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00:00:00:01 काशी शास्त्रार्थ हो रहा है चार घंटे तक निरंतर शास्त्रार्थ हुआ 26 पंडित अंग्रेजी के यू के आकार में बैठे थे और उस तरफ अकेले स्वामी जी थे फिर नीचे के दालान में 40 पंडित थे फिर उसके बाद नीचे 300 पंडित थे और स्वामी दान जी ने विचार किया जब तक इस पाखंड नगरी जो काशी है इसकी जड़म को नहीं हिलाया गया तीन बार स्वामी जी बनारस के अंदर शाप के लिए गए मूर्ति पूजा पर शाप
00:00:34:01 वेक अप टू रियलिटी के करीब दो दर्जन विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ किया था तो यहां के पंडितों ने उनके संबंध में अफवाह उड़ाया कि वे ईसाइयों के गुप्तचर हैं और अंग्रेजी सरकार के जो है वह जासूस है बुद्धि हों को सद मार्ग सद मार्ग पर प्रेरित करें ईश्वर से हम जो है प्रार्थना करें कि हमारी बुद्धि कोने कुमार गामी ना हो मांगना जो है एक याचना करना है जो चीज हमारे पास नहीं है उसकी हम याचना करते हैं वाला ईश्वर वो सर्वशक्तिमान है या नहीं है राम तो दशरथ के पुत्र थे ऐतिहासिक संदर्भ है
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00:01:13:07 चार ऋषियों ने ही तो देखा मंत्रों को उस समय कुत्ते हैं बिल्ली है चूहे इन्होने तो नहीं देखा व सृष्टि के आदि की मैं बात कर रहा हूं और कोई था उस समय व चार यो के अलावा कोई नहीं था उस सम केवल चार ऋषि प्राणी न केवल चार ही ऋषियों में आया और जो बाकी के प्राणी उसम नहीं है वैसे आपने कहा कि और कोई प्राणी था ही नहीं नहीं नहीं ये मैंने कहा कहा चार विषयो के अलावा कोई नहीं था उस सम बिना मतलब सुनामी आने में ईश्वर की शक्ति का उपयोग नहीं होता है बिल्कुल नहीं होता है
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00:01:40:06 किसी देशकाल परिस्थिति में ईश्वर ने अपने आप को प्रकट किया अपने ज्ञान सृष्टि के आदि में अब हमने उसको नहीं देखा है उस पर हम नहीं बोल पाएंगे आपको बता पाएंगे संपूर्ण सृष्टि रूपी शरीर का मुख ब्राह्मण है काम नहीं करेगा अगर ब्राह्मण है तो हम जानता है कि हम कोई गलत काम करेंगे तो हम पतित हो जाएंगे दूसरे वर्ण में चले जाएंगे मगर जहा पर उसका वर्ण ही चेंज कर दिया व पतित शब्द कहां से आएगा वहा तो क्षत्रिय आएगा क्त्र आएगा तो ब्राह्मण से तो गिर करके हुआ ना तो पतित होही गया ब्राह्मण से पढ़ा लिखा नहीं है ना समझ है जिको ज्ञान नहीं है व शूद्र है समझ हैको ज्ञान नहीं है व शूद्र
00:02:25:12 है तो सभी को जय श्री राम जैसा कि आप जानते कि आहवान की तरफ से जो आध्यात्मिक पक्ष है विभिन्न मत है उनको समाज के सामने प्रस्तुत करने का कार्य हम करते हैं और आपको जानकर बहुत आश्चर्य भी होगा और बहुत अच्छा भी लगेगा कि आज हम लोग बैठे हुए हैं जो जगह मानी जाती है आज के टाइम में कि काशी शास्त्रार्थ स्मृति स्थल वहां पर इस समय हम बात कर रहे हैं दुर्गाकुंड वाराणसी की हम वहां पर है है जहां के बारे में ऐसा बताया जाता है कि दयानंद जी ने शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त की थी और यह जो स्मृति स्थल है यहीं पर हमें यहां के एक आर्य समाज के जो प्रतिनिधि हैं मं मंत्री जी हैं वो हम हमसे संपर्क में आए हैं तो आज हम इनके साथ एक चर्चा आपके समक्ष लेकर प्रस्तुत हुए हैं तो सबसे पहले आपको मेरा यथोचित अभिवादन आपको भी नमस्ते और आप सर्वप्रथम हमारे दर्शकों को थोड़ा सा अपना परिचय दे दें कि किस तरह से आप यहां पर हैं आपका क्या परिचय है जी
00:03:40:19 मेरा नाम डॉक्टर शंभूनाथ शास्त्री है जी मैं गुरुकुल महाविद्यालय वेदनाथ दम बिहार का स्नातक रहा हूं और मैं यहां जगतपुर स्नातकोत्तर महाविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर था जून 19 में रिटायर्ड हुआ और लगातार मैं समाज आनंदबाग दुर्गाकुंड वाराणसी में यहां आता रहा हूं यह महर्षि दयानंद काशी शास्त्रार्थ स्मृति स्थल है यहीं पर 18698 के करीब दो दर्जन विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ किया था और उस शास्त्रार्थ में यहां के विद्वानों को पराजित किया था स्वामी दयानंद का सवाल यह था कि क्या मूर्ति पूजा वेद विहित है और इसी को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने यहां के विद्वानों को चुनौती दी थी कि यदि वेदों में मूर्ति पूजा का कहीं विधान है तो आप इसे दिखावे और यहां के पंडित जो विशुद्धानंद स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती के नेतृत्व में आए थे बाल शास्त्री आदि उन सभी लोगों में से कोई भी उनके इस चुनौती का जवाब
00:04:55:24 नहीं दे सका महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह उस में पूरे शास्त्रार्थ का की अध्यक्षता कर रहे थे और उन्हीं की अध्यक्षता में या संयोजक में यह शास्त्रार्थ यहां पर संपन्न हुआ था और 18693 सरे दिन ही उजागर हो गई थी और संपूर्ण भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में यह बात प्रचारित हो गई कि स्वामी दयानंद के चुनौतियों का स्वामी दयानंद के प्रश्नों का काशी के तमाम विद्वानों में से कोई भी उनका सटीक उत्तर नहीं दे पाया और वे लोग हो हला मचाने लगे दरअसल स्वामी दयानंद सरस्वती जब काशी में आए थे 189 ईसवी में तो यहां के पंडितों ने उनके संबंध में अफवाह उड़ाया कि वे ईसाइयों के गुप्तचर है और अंग्रेजी सरकार के जो है वह जासूस हैं और साथ-साथ यह भी कहा कि एक बहुत बड़ा नास्तिक है जो हिंदू धर्म की आलोचना करता है इस तरह से स्वामी दयानंद के संबंध में तमाम तरह की ये अफवाह
00:06:10:27 फैला कर के लोगों ने उनके विरुद्ध वातावरण पैदा करने का प्रयास किया लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती अडीग रहे और अपनी बातों पर दृढ़ रहे स्वामी दयानंद सरस्वती का सबसे बड़ा मंत्र यह था कि वो कहते थे कि वेदों की ओर लौटो क्योंकि भारतवर्ष का जो नति हुई भारतवर्ष जो सदियों तक गुलाम रहा उसका एक मात्र कारण यह था कि हम वेद के मार्ग से हट गए अब वेद के मार्ग से हटने का कारण जो है हम तमाम तरह की विसंगतियों के शिकार हुए तमाम तरह की समस्याएं सुरसा की तरह मुबाए हमारे सामने खड़ी हो गई जिसका स्वामी दयानंद सरस्वती ने जवाब दिया था अपने कालखंड में बहुत ही सुंदर आपने एक व्याख्या की यहां के स्मृति स्थल के बारे में बहुत ही सुंदर परिचय आपने दिया
00:07:02:15 तो सबसे पहले मैं यह पूछना चाहूंगा कि जैसे कि कहा जाता है कि ईश्वर के कार्य कितने बताए हैं अकॉर्डिंग टू दयानंद सरस्वती जी ने ईश्वर के तीन काम है अच्छा सृष्टि करना सृष्टि का पालन करना और सृष्टि का संघार करना प्रलय करना जी और परमात्मा एक ही है कर्मों का फल लेना य चौथा काम भी है ना हा चौथा काम भी उन हा जो जैसा कर्म करता है उसके अनुसार उसको फल देता है अच्छा तो इसमें जो एक उपासना बताई जाती है ईश्वर की तो क्या दयानंद जी के अनुसार जो भगवान की उपासना करने में जो भक्त गण भगवान के भक्त ईश्वर के भक्त उनसे कुछ मांगते हैं तो क्या ईश्वर व जो वो मांग रहे हैं वो प्रदान करता है मतलब उपासना में जो मांगा जा रहा है वह क्या ईश्वर प्रदान करते हैं या केवल कर्मों का फल ही देते हैं ईश्वर केवल कर्मों का फल देते हैं और जो चढ़ावा चढ़ाया जाता है वो एक तरह का घुस है ईश्वर कोई चढ़ावा नहीं प्राप्त करते नहीं नहीं चढ़ावे की नहीं जैसे कुछ मांगा जाता है ना कि हे ईश्वर हमें बल दे दीजिए हे ईश्वर हमें
00:08:17:26 यह साहस दे दीजिए हे ईश्वर हमें फलानी चीज दे दीजिए तो यह जो मांगा जाता है य ईश्वर देता है मांगने से या नहीं देता है आदमी उसे मनुष्य का आत्म होता है और उसके अंदर शक्ति आती है लेकिन ईश्वर जो कर्म है जो आपने किया उसी के अनुसार परिणाम देता है मांगने से नहीं देता मांगने से नहीं देता तो इसका अर्थ यह माना जा सकता है कि हमें अपना कर्म ही करना चाहिए मांगना नहीं चाहिए बिल्कुल है ना बिल्कुल आप कर्म करिए उपासना करिए संध्या करिए वंदन करिए जब हमें कुछ मांगना नहीं चाहिए इसका मतलब जो अगर कोई मांग भी रहा तो व्यर्थ है वो क्योंकि कर्म सेही देगा ईश्वर कर्म सेही देगा ईवर बकुल तो उस संबंध में अगर कुछ स्तुति बना बना दी गई है कुछ श्लोक बना दिए गए मांगने वाले वो भी गलत है बिल्कुल गलत है अच्छा तो ये जो गायत्री मंत्र है हमारा इसका अर्थ है कि हे ईश्वर हमें सद्बुद्धि दे जी तो इसमें तो मांगा जा रहा है ये ये जो है प्रार्थना प्रार्थना तो हम कर सकते हैं नहीं मांगा ही तो जा रहा है नहीं मांगा कह सकते हैं आपके मांगा जा रहा है ओम भूर भु स्व तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन प्रचोदयात हमारी बुद्धि हों को सद मार्ग सद मार्ग पर प्रेरित करें ईश्वर से हम जो है प्रार्थना करें कि हमारी बुद्धि
00:09:33:01 को माने हम कुमार्ग गामी ना हो अच्छे मार्ग पर च हा ये ईश्वर से प्रार्थना हम कर रहे हैं मांग रहे हैं क्या य प्रार्थना हुआ प्रार्थना में मांग ही तो रहे हैं नहीं मांगना इसको आप नहीं कह सकते हैं मांगना मा क्या कह रहे हम ईश्वर से ईश्वर से हम प्रार्थना कर रहे हैं कि हमारी बुद्धि कभी भ्रष्ट ना हो प्राथना में मांगा नहीं जाता है कोई प्रार्थना में मांगा नहीं जाता य मांग नहीं है यह तो मांग ही तो है कि आप ऐसा करें आप मांगने में और प्रार्थना में सूक्ष्म मंत यही है क्या मांगना जो है ये याचना करना है जो चीज हमारे पास नहीं है उसकी हम याचना करते हैं और इस आशा से करते हैं कि वो हमको प्राप्त हो जाएगा समझ गया ना लेकिन ईश्वर जो है कर्मों का फल देता है जैसा हम कर्म करते हैं उसके अनुसार फल देता है इसलिए जो कुछ हम मांगेंगे वो हमको उससे प्राप्त नहीं हो पाएगा तो तो याचना ही कर रहे हैं वहां मांग ही तो रहे हैं कि हमें बुद्धि दे दो बुद्धि आएगी सही कर्मों से बु बुद्धि बुद्धि को प्रेरित करें हमारी हमारी बुद्धि हों को सत्कर्म में प्रेरित करें अच्छे मार्ग पर ले चले य हम उनसे प्रार्थना कर रहे तो हम उससे कुछ अपने लिए करने को ही तो कह रहे हैं हा करने के लिए क रहे हैं कहने से तो ईश्वर करने वाला है नहीं वो तो कर्मों के कारण कर तो ये तो व्यर्थ हो रहा है ना नहीं व्यर्थ नहीं हो रहा है जी उससे हमको आत्म शक्ति मिल रही है आत्म बल मिल रहा है ईश्वर करेगा कि नहीं कहने से ईश्वर
00:10:48:07 करेगा नहीं करने वो कहना व्यर्थ है ना करना वर्थ ईश्वर हमारी सहायता तब करेगा जब हम अपने अच्छे कर्म करेंगे बकुल करेंगे है ना तभी करेगा कहने से नहीं करेगा तो फिर यहां प कहना व्यर्थ रहा है ना फिर कहना व्यर्थ नहीं हो रहा है इसलिए प्रार्थना तो हमको करना है हमको अपनी जो है अपनी बात करनी है लेकिन वो प्रार्थना है हम ये याचना नहीं कर रहे हैं नहीं जैसे अभी आपने कहा ना कि यदि हमें पता है कि सामने वाला देखिए एक शास्त्र में उक्ति आती है अवश्य में वक्तव्य कृतम कर्म शुभ शुभम हमने जो शुभ कर्म किया है अशुभ कर्म किया है उसका भोग हमको प्राप्त करना है किसी भी रूप में उसका जो है वो क्षमा नहीं हो सकता व माफ नहीं हो सकता है अगर ईश्वर उसको माफ कर दे तो अन्याय हो जाएगा जी अब जैसे हमने कोई ऐसा कर्म किया जी जिससे कि हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई जी अब हम भगवान से कह रहे हैं कि हमें सद्बुद्धि दे दो प्रे कर भगवान अगर मांगने से हमें सद्बुद्धि दे देगा तो हमारी जो बुद्धि जो फल मिलना था बुद्धि भ्रष्ट हो गई तो वो हमारा वो अन्याय कारी हो जाएगा इसलिए वो सद्बुद्धि नहीं देगा मांगने से आपके आपके कर्म ही ऐसे होंगे धीरे धीरे आपके सद्बुद्धि आए बकुल बिल्कुल तो इसका मतलब जितनी भी ऐसी स्तुति है जिसमें ईश्वर से कुछ मांगा जा रहा है डायरेक्ट जी जी जैसे ईश्वर का महिमा मंडन है जिसमें हे ईश्वर तुम बलशाली हो तुम सर्वशक्तिमान
00:12:03:13 हो ऐसी स्तुति है वो तो सही है मगर जिन स्तुति में मांगा जा रहा है ईश्वर से हमको ये दे दो तो वो अनावश्यक है ना जी व नहीं है वैदिक नहीं अ वैदिक है तो फिर गायत्री मंत्र ही अ वैदिक हो गया गायत्री मंत्र अ वैदिक नहीं है वो प्रार्थना किया जा रहा है मा जा रहा है उसम ईवर प्रेरित कर दीजिए ईश्वर के सद्गुणों के ईश्वर के जितने कृत्य कर्म है उसका हम ध्यान करते हैं और हम प्रार्थना करते हैं कि हमको भी वो सारी शक्तियां प्राप्त वो नहीं देगा ना कहने से हा तो वो तो नहीं देगा तो व्यर्थ है य नहीं लेकिन हम उसे प्रेरणा प्राप्त करते हैं ना उसको उसकी शक्तियों को स्मरण करके उसम हमें ये कहना चाहिए कि हम हे ईश्वर आपसे हमें क्या कहते हैं हम आपकी पूजा कर रहे हैं आप प्रेरित करने वाले तो तो ठीक है कि हमें प्रेरणा प्राप्त होती है मगर जब हम यह कहते हैं कि हे ईश्वर हमें प्रेरित करो करो तोय करो कहना जो है यह व्यर्थ हो रहा है क्योंकि ईश्वर कहने से नहीं करेगा नहीं नहीं नहीं करेगा यह तो सत्य है लेकिन हम य ना कर रहे प्रार्थना में आसना में मांगने में बहुत का अंतर है नहीं प्रार्थना में भी हम उससे कुछ करने को ही कह रहे हैं ना अपने लिए हा प्राथना में कहने से वो करता नहीं है बिल्कुल नहीं करता तो फिर य गलत है कहना नहीं गलत तो नहीं है अच्छा चलिए ठीक है अच्छा एक चीज आती जैसे अभी आपने मूर्ति पूजा की बात की है तो एकय चीज
00:13:18:15 आती है कि जैसे ईश्वर ने जो आर्य समाज के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है परिभाषित होने वाला ईश्वर वो सर्वशक्ति मान है या नहीं है पहले तो आर्य समाज के द्वारा प्रतिपादित नहीं है वह वैदिक धर्म के द्वारा प्रतिपादित है वेद के द्वारा प्रतिपादित है वेद के दो वेदों के दूसरे अर्थ भी निकलते हैं तो इसलिए मैंने ऐसा कहा कि वेदों के जो अर्थ आर्य समाज ने स्वीकार किए हैं उसके अनुसार जो ईश्वर है क्या व सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है यही तंडा वाद है देश इसी के कारण जो है गर्त में गया वेदों को जानने के लिए वैदिक व्याकरण का अध्ययन चाहिए निघंटू निरुक्त जिसने निघंटू और निरुक्त को पढ़ा है वह वही वेद के मंत्रों का सही अर्थ कर सकता है स प्रसंग अर्थ कर सकता है जिसने निघंटु निरुक्त को नहीं पढ़ा है पानी व्याकरण के आधार पर या लौकिक व्याकरण के आधार पर उसका अर्थ करेगा वो अनर्थ करेगा स्वामी नहीं प्रश्न मेरा यह है कि क्या ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानता है बिल्कुल बिल्कुल मानता है तो जैसे वह सर्वशक्तिमान मानता है बिल्कुल मानता है सर्वशक्तिमान का अर्थ ये हुआ कि वो सर्व यानी सर्व शक्ति सभी कार्य को ने की शक्ति से संपन्न है संपन्न है वो सब कुछ कर सकता है जी
00:14:33:15 तो क्या वो अवतार ले सकता है नहीं ले सकता तो यहां पर सर्व में बाधा आ गई नहीं बाधा नहीं आई क्यों सर्वशक्तिमान होने का नहीं मतलब कि जो है वो अगर जो है अवतार ले लेगा तो फिर उसी का जो सर्व व्यापकता नष्ट हो जाएगी सर्वशक्तिमान के साथ वो सर्वव्यापक भी है जब अवतार ले लेगा तो एक देशी हो जाएगा आप मूर्त रूप में है तो यहां है अपने घर पर नहीं है तो आप यहां की बात जान रहे अपने घर पर क्या हो रहा नहीं जान रहे हैं देख तो ईश्वर भी जब अवतार ने लगा तो एक देशी हो जाएगा संपूर्ण संसार के बारे में नहीं जान पाएगा तो उसका जो स सर्वज्ञ नष्ट हो जाएगी इसमें एक चीज आती है हा कि कारण कोई भी हो कि वह यह काम इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि उसकी सर्वज्ञ नष्ट हो जाएगी मगर कारण कोई भी हो मगर ऐसा है ना कि कुछ कार्य वो नहीं कर पा रहा है तो सर्व शब्द जो सर्व विशेषण है उसमें फिर बाधा आएगी ना नहीं बाधा नहीं आएगी बिल्कुल बाधा नहीं आगी मतलब जैसे चलिए वो जो आपने कारण बता व जनन कारण है सही कारण ब मगर कोई भी अच्छा कारण ही है सटीक कारण है इसकी अवतार य इसलिए ईश्वर ऐसा नहीं कर सकता मगर नहीं कर सकता ना तो कोई कार्य ऐसा है ना नहीं कर सकता अब जैसे कहा गया कि राम ईश्वर के अवतार थे राम तो दशरथ के पुत्र थे ऐतिहासिक संदर्भ है दशरथ दशरथ
00:15:48:21 पुत्र थे कृष्ण को अवतार कहा गया कि ईश्वर के अवतार है ईश्वर का अवतार क कर लोग उनकी पूजा करते हैं लेन कृष्ण तो वासुदेव और उसके देवकी के पुत्र थे वो दूसरी बात हो जा मैं ये पूछ रहा हूं कि कारण कोई भी हो यदि किसी कारण वश अगर वहां पर ईश्वर एक भी कार्य को करने में मना कर रहा है कि हम नहीं कर सकते तो फिर उसकी वो सर्व जो सभी कार्यों को करने की शक्ति उसमें बाधा आ गई फिर हम नहीं आई वो सर्व शक्तिमान है सर्व का अर्थ क्या है सब कुछ सब कुछ सब कुछ कर सकता है सब कुछ करने का मतलब नहीं कि जो है वो जन्म ले ले स का मतलब जब सब कुछ है तो फिर जब सब कुछ है तो उसमें सब कुछ में ये कैसे आ गया ये नहीं कर सकता फ वो सब कुछ नहीं रहा ना अच्छा जैसे सर्वज्ञ का क्या मतलब है सब कुछ जानने वाला अब उसमें क्या ऐसा होता है कि सब कुछ जानने वाला इस मतलब सर्वज्ञ वही होगा जो सर्वव्यापक होगा एक मिनट एक मिनट जैसे हमने कहा सर्वज्ञ सब कुछ जानने वाला अब उसम ये कह सकते हैं सब कुछ जानने वाले का मतलब ये नहीं है कि लेटन के अंदर क्या है वो भी नहीं जानता नहीं सब कुछ जानता ब कु जानता सब कुछ जानने का मतलब ये नहीं है कि वो नाली के अंदर क्या है वो जानता है वो नाली के अंदर क्या है वो भी जानता है जी बिल्कुल जानता है इसका मतलब जो सर्व है वहां पर ऐसी कोई चीज नहीं आ रही है जिसमें वो इसी तरीके से जो सर्वव्यापक है अब हम क सर्वव्यापक का मतलब य नहीं व नाली
00:17:03:27 में भी है नहीं नाली में भी है बक अब हम कह सर्वव्यापक का मतलब ये नहीं कि बाथरूम में भी है नहीं बाथरूम में भी है यानी कि उसका जब व्यापक के साथ सर्व विशेषण ले रहे हैं तो तब हम उसम कहीं भी एक पॉइंट भी ऐसा नहीं कह रहे कि वहां वो नहीं है फिर जब हम सर्वशक्तिमान की बात कर रहे हैं तो हम कहीं कहीं पर ये क्यों कह रहे हैं कि नहीं ईश्वर ऐसा नहीं कर सकता इसलिए कि जो है उसकी अन्य गुण जो है नष्ट हो जाएंगे तो हम यह कहे ना ईश्वर सर्व शक्ति शक्तिमान नहीं शक्तिमान है नहीं सर्व शक्तिमान है तो स सर्व विशेषण बाधा आएगी नासे अनंत जैसे हमने कहा ऋगवेद समझ का अंतर है बाधा नहीं आगी उसम बाधा आ रही है अच्छ इसको एक
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00:17:40:20 तरीके से जैसे आपने कहा कि ईश्वर एक देशीय हो जाएगा तो जैसे किसी देश काल परिस्थिति में ऋषि मंत्र के दृष्टा बनते हैं अब जो मंत्र के दृष्टा बन रहे हैं ऋषि गण तो व जो मंत्रों का ज्ञान है है ना अच्छा ईश्वर सब जगह है इसका मतलब सब जगह सर्वव्यापक था ईश्वर पहले से ही ऋषियों के मन में भी व्यापक था ठीक है मगर फिर भी वो एक देशीय होकर ऋषियों के मन में मंत्रों को प्रकाशित कर रहा है एक देश काल नहीं एक जगह होकर के नहीं किया उसने उसने सृष्टि के आरंभ में चार ऋषियों के हृदय में ऋग्वेद जो है अग्नि ऋषि साथ मंत्र प्रकाशित हुए हा पूरी दुनिया में जी मतलब सबने मंत्रों के दृष्टा है उस समय जितने प्राणी थे चार चार ऋषि चार ऋषि मंत्र के स् बन र है हो रहा आदित्य अंग चार ऋषि यहां पे एक देशीय कार्य हो रहा है ना एक देशीय कार्य कहां हो रहा चार ऋषियों ने ही तो देखा मंत्र को समय कुत्ते हैं बिल्ली है चूहे इन्होने तो नहीं देखा सृष्टि के आदि की मैं बात कर रहा हूं उस समय सब कुछ नहीं था इतना केवल चार ऋषि थे प्रारंभ में जो है मनुष्य की सृष्टि होती है तब जो है वो बच्चे के रूप में नहीं होता है युवा
00:18:56:01 युवती के रूप में जो सृष्टि होती है ठीक है मैं ये कहं में जी कि जब ईश्वर सब जगह है तो उसका ज्ञान भी सब जगह है ना सर्वव्यापक है फिर भी वो किसी एक देश में ऋषियों के मन में प्रकट हो रहा है वो ज्ञान जी तो वो ज्ञान जबक पहले से ही है उसके उनके मन में ईश्वर के रूप में जी ठीक है फिर भी वो एक देश में प्रकट हो रहा है एक देश में नहीं चार ऋषियों को चार वेदों का ज्ञान प्राप्त हुआ उसके बाद उन्होंने ब्रह्मा ब्रह्माने लिया चार ऋषियों के अलावा और कोई था उस समय चार चार ऋषियों के अलावा कोई नहीं था उस समय केवल चार ऋषि प्राणी थे उस समय हा उन्हीं के मन में उन्हीं को ज्ञान प्राप्त हुआ उनसे उनसे ब्रह्मा को जो है ज्ञान प्राप्त हुआ उनके द्वारा ब्रह्मा को हुआ और फिर ब्रह्मा के द्वारा श्रुत परंपरा से एक दूसरे को सुना करके इसलिए इसके वेदों का नाम एक नाम श्रुति भी है सुन कर के फिर इसका जो है विस्तार होता चला गया जी तो चलिए इसका दूसरा उदाहरण ले लेते हैं जैसे कि ईश्वर जब सृष्टि बनाते हैं तो वो कहीं पर पृथ्वी बना रहे हैं कहीं पर सूर्य बना रहे हैं कहीं कुछ बना रहे हैं
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00:19:57:10 तो कहीं पर ज्यादा शक्ति का उपयोग होता है और कोई छोटी चीज बन रही तो कम शक्ति का उपयोग होता है अरे भाई इनको रोको ना यार आप इधर बैठो बीच से निकल जा रहा है कोई कट लगा दो य तो ईश्वर जैसे इसम दूसरा उदाहरण ले लेते हैं कि ईश्वर जैसे जब सृष्टि की रचना करते हैं तो कहीं पर पृथ्वी बनाते हैं कहीं पर सूर्य सूर्य बनाते
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→ Used in: A · Video सर्व व्यापक ईश्वर एकदेशीय कैसे हो सकता है? अवतारसिद्धि at 5:21 ↗
00:20:23:16 हैं तो ऐसा होता है कि कहीं पर ज्यादा शक्ति की आवश्यकता है और कहीं पर कम अब शक्ति के रूप में भी ईश्वर ही तो है ये हम आप सोच रहे हैं जी कहीं ज्यादा शक्ति की आवश्यकता है कहीं कम शक्ति की आवश्यकता है वेदों में एक मंत्र आता है ओ सूर्या चंद्र स धाता यथा पूर्व कल्प सूर्य चंद्र पृथ्वी समुद्र जैसे यथा पूर्व जैसे इसके पूर्व के कल्प में था प्रलय के पूर्व उसी तरह से फिर से जो उसकी जो है उसकी सृष्टि होती है हम और जब प्रलय होता है तो बीज रूप में सब आ जाते हैं नहीं नहीं सृष्टि वो होती है वो सही बात है मगर मैं ये कह रहा हूं जहां पर बड़ी चीजें करनी है तो वहां पर ईश्वर ज्यादा शक्ति ईश्वर शक्ति जो लग रही है आप हम समझ रहे हैं बड़ी शक्ति है उसके लिए सब कुछ बराबर है सूर्य बनाया चंद्रमा बनाया पृथ्वी बनाया समुद्र बनाया पर्वत बनाया पशु पक्षी बनाए यानी हमारी समझ में ईश्वर जो है कम ज्यादा हो सकता है हमारी समझ में हम समझ रहे हैं लेकिन वो है नहीं नहीं तो ऐसे यही तो अवतार है नहीं अवतार हो जैसे जैसे जैसे जैसे कि हम समझ रहे हैं ये जो लौकिक संसार है अविद्या रूपी है वास्तविकता तो ऐसी नहीं है कोई ऐसा गेट तो खुलता
00:21:38:25 नहीं है जिसमें हम लोग मुक्ति के बाद उसमें प्रवेश कर जाते हो केवल समझ का फर्क आता है ना अविद्या से मुक्त हो जाते हैं तो जब तक अविद्या में है इस अविद्या रूपी संसार में हमारी समझ के अनुसार हमारे पर्सपेक्टिव के अनुसार ईश्वर का आना जाना सिद्ध हो सकता है जब हम यह कह रहे हैं कि हमारी समझ के अनुसार ईश्वर कम ज्यादा होकर के कार्य कर रहा है कर नहीं रहा हमारी समझ के अनुसार हम समझते हैं कि वो ऐसा कर रहा है लेकिन वो ऐसा कर नहीं रहा है हमारी समझ हम अल्पज्ञ है इसके बारे में पूरी तरह नहीं जानते हैं इसलिए हमारे दृष्टि में इस तरह इस तरह की चीजें हो रही है मतलब ईश्वर सब जगह एक साथ एक बराबर कार्य कर रहा है बिल्कुल फिर भी कहीं पे कम कहीं पे पृथ्वी बन जा रही है कहीं पर सूर्य बन जा रहा है नहीं सूर्य अलग बना है पृथ्वी अलग बनी है आप समझे नहीं मेरी बात जैसे अगर ईश्वर बिल्कुल एक रस है उसकी शक्ति बिल्कुल एक रस है अब वो जैसे ही हरकत करेगा तो पूरे संसार में एक साथ सब जगह एक ही हरकत होगी जी तो फिर कुछ बन सकता है ऐसे में ईश्वर जो है सृष्टि जब करता है तो एक साथ सारी चीजों को बनाया उसने क्रमश बना समुद्र बने समुद्र बने पर्वत बने सूर्य बने चंद्रमा बने फिर वनस्पतियां हो गई जीव जंतु बने वो सब क्रमबद्ध रूप से जो है ब च वो सही है जैसे मान लीजिए कि सपोज करिए कि मिट्टी के कण तैर रहे हैं आकाश मंडल में ठीक
00:22:53:27 है अब ईश्वर सर्वत्र एक समान रूप से सब जगह व्याप बराबर मात्रा में अब अब वो यदि अपने आप को रेगुलेट नहीं कर सकता कि मैं इस जगह पर ज्यादा हिल इस जगह पर कम हिल ठीक है इस जगह पर मेरी हरकत ज्यादा हो इस जगह पर कम हो अगर वह रेगुलेट तो सब जगह व एक ही साथ हरकत करेगा तो कोई शेप कुछ भी स्ट्रक्चर कैसे बनेगा फिर भाई वो साकार होगा तब ना कहीं पर जो कम करेगा कहीं पर ज्यादा करेगा वो सर्वव्यापक हर जगह विद्यमान है इसलिए उसको अतिरिक्त शक्ति लगाने की जरूरत ही नहीं है नहीं अतिरिक्त नहीं कह रहा हूं जैसे कहीं पर वो जैसे मान लीजिए कि उसको कहीं पर प्रलय लानी है उसी समय दूसरी जगह प्रलय नहीं लानी है नहीं प्रलय का तो तात्पर्य है कि संपूर्ण संपूर्ण सृष्टि का विल छोटी प्रलय मैं कह रहा हूं समुद्र में वो लाना है क्या कहते हैं सुनामी उसको कहीं पर सुनामी लाना है ठीक है समुद्र में तूफान लाना है तो उसी समय दूसरी जगह पर तूफान नहीं आ रहा है तो वहां पर भी तो ईश्वर है मगर वहां पर वो अपने आप को रोक रहा है तो सुनामी श्वर थोड़ लाता है चाहे जो है इस तरह ये तो है तमाम जो प्रदूषण है और जो ओजोन परत में छरण हो रहा है तमाम जो है वो गैस उत्सर्जित हो रहे हैं उनके कारण जो है ये संसार में जो तर तरह की समस्याए
00:24:09:02 पैदा हो रही है ईश्वर की शक्ति के बिना आ जाती है क्या ईश्वर थ कर रहा है हम अगर जो है प्रदूषण प्रदूषित वातावरण को कर र कमों का फल भी तो हो सकता है ना सुनामी आना किसका हम कर रहे तो ही फल फल है ना मगर दे कौन रहा है फल ईश्वर ही तो दे रहा है हम तो ईश्वर फल का दे रहा है वो फल का हम तो अपना परिणाम उसका भुगत रहे हैं हमने कियाम देता कौन है कर्मों का फल ईश्वर ही तो देता है बिल्कुल देता है ईश्वर तो जो जो सुनामी इत्यादि आ रही है हमारे दोष के कारण वो दे तो ईश्वर ही रहा है ना प्रकृति अपने आप कर लेती है कार्य प्रकृति क्या कर रही है हमने जो उस तरह का वातावरण बनाया तो उस तरह का रिजल्ट हम भोग रहे हैं तो रिजल्ट देने वाला तो भगवान ही है ना रिजल्ट जो है संपूर्ण रूप में तो देने वाला भगवान है लेकिन ये तो थोड़ा जैसे हम हम जो है यहां पर बैठे हुए हैं और हमने खाना खाने उसम 20 मिला लिया 20 मिला दिया तो थोड़ा जो है ईश्वर ईश्वर ने वो परिणाम हमको थोड़ा ईश्वर दे रहा है वो तो बतिक रूप से हमें दिख रहा है कि क्या हो रहा है मगर एट द एंड ज ये भी तो भौतिक है एट द एंड जहां पर सुनामी आना भूकंप आना ये सब तो जो है प्राकृतिक आपना है तो सुनामी बिना मतलब सुनामी आने में ईश्वर की शक्ति का उपयोग नहीं होता है बिल्कुल नहीं होता है बिना ईश्वर की शक्ति के सुनामी
00:25:24:02 आती है माने हमने जो जिस तरह का वातावरण बनाया उसके चलते जो विकृति उत्पन्न हो मल ईश्वर का उसम कोई हस्तक्षेप नहीं है बकल हस्तक्षेप नहीं है तो जब हमने वातावरण बनाया तो हमारे ही कर्मों का फल तो देता है ईश्वर अभी आप कह रहे हो बकुल कर्म कर्म का फल मिल रहा है वो ईश्वर ही तो दे रहा है अब आप इस तरह से उसकी उसको कह सकते हैं लेकिन ऐसा है नहीं वो तो जो हमारे द्वारा हमने उत्पन्न किया तत्काल हम उसका परिणाम भुगत रहे हैं हम तो शभ मतलब जैसे दुनिया में प्राकृतिक जो भी चीजें होती है व अपने आप होती है ईश्वर का उसम कोई रोल नहीं है प्राकृतिक चीजों का मैं नहीं क रहा हूं प्राकृतिक नहीं है वो तो जो कृ प्राकृतिक चीज मान लीजिए चलिए वो तो कृत्रिम हो गया चलिए मान लीजिए प्राकृतिक मान लीजिए कहीं पे हवा चली कहीं पे नहीं चली ये तो प्राकृतिक है हां ठीक है तो ये जो हवा चलाई ये तो ईश्वर ने चलाई नहीं हम ईश्वर ने नहीं चलाई किसने चलाई अब यहां पर ज्यादा वाष्पीकरण हो गया तो नीचे की हवा ऊपर उठ गई तो बाहर की हवा जो है तेजी के साथ आएगी उसे आंधी उत्पन्न हो जाता है तो वो तो जो है भौगोलिक कारण और उसके आप बार-बार वैज्ञानिक आधार पर जो है ईश्वर का खंडन कर दे रहे हैं कर क्या रहा है फिर तो हम खंडन कहां कर रहे हैं वैज्ञानिक आधार पर ईश्वर क्या कर रहा है फिर वैज्ञानिक आधार पर तो ईश्वर के पुष्टि हो जाती है भाई स्थिति कहां है ईश्वर जो आप कह रहे हो ना स्थिति संचालन हां संचालन वाला कार्य
00:26:39:07 नहीं है ईश्वर का बिल्कुल संचालन वाला चल र तो संचालन ईश्वर का ये है सूर्य है चंद्र है पृथ्वी है सभी अपने अपने धूरी पर घूम रहे हैं ये उसकी व्यवस्था है उस व्यवस्था में कहीं व्यतिक्रम नहीं हो रहा है व्यतिक्रम होता तो सब कुछ नष्ट हो जाता है ये उसकी व्यवस्था है तो ये भी तो उसकी व्यवस्था है कहीं पे हवा चल रही है कहीं पे नहीं चल रही नहीं ये उसकी व्यवस्था नहीं है अच्छा ये उसकी व्यवस्था नहीं ये प्राकृतिक है अच्छा तो ये प्रकृति अपने आप निर्णय ले रही है नहीं प्रकृति अपने आप निर्णय नहीं ले रही किसने लिया निर्णय कि ऐसा होने पे ऐसा होगा ये तो वैज्ञानिक विज्ञान के आधार पर जो है विज्ञान ईश्वर का निर्णय नहीं हैय ईश्वर के उसम निर्णय नहीं है अच्छा ठीक है एक चीज ये बताइए जैसे चलिए कहीं पे पृथ्वी घूम रही है और कहीं पे दूसरा कोई ग्रह जुपिटर घूम रहा है जी उसमें तो कम ज्यादा एनर्जी है पृथ्वी के घूमने में एनर्जी कम लग रही है और जुपिटर के घूमने प ज्यादा लग रही है जी ये तो मानेंगे हां तो यहां तो ईश्वर की शक्ति कम ज्यादा हुई कहां पर ईश्वर की शक्ति कम ज्यादा हु ईश्वर ने हम जहां जो उचित था पृथ्वी को के अंदर कितना गुरुत्वाकर्षण शक्ति देना था हम सूर्य को पृथ्वी से कितनी दूरी पर रखना था ताकि जीव जंतु मरे नहीं उसके ताप से हां तो ये एक व्यवस्था उसने दिया है नहीं व्यवस्था दिया है मगर अपने आप को उसने कम ज्यादा किया ना अपने आप यहां कार्य ज्यादा होना है वहां ज्यादा
00:27:54:19 कम होना है तो उसने अपने आप को कम ज्यादा कि ये हम समझ रहे हैं कि कम ज्यादा काम हो रहा है ना हम उसने जो व्यवस्था दिया है उसके अनुसार ये हो रहा है कम ज्यादा नहीं हो रहा हम तो मुझे आप समझाइए ना जैसे मान लीजिए कि पृथ्वी को घुमाने में 10 नंबर की ऊर्जा लगेगी जुपिटर को घुमाने में 60 नंबर की ऊर्जा लगेगी अब ये ऊर्जा के रूप में ईश्वरी तो है बिल्कुल है तो कम ज्यादा हुआ ना यहां 10 नंबर और वहां 60 नंबर हां तो कम ज्यादा हुआ ना तो जहां जहां जितनी शक्ति की आवश्यकता है उतनी और कहीं कहीं प ऐसा भी होगा कि ईश्वर को एनर्जी लगा ही नहीं रहा है यहां लग रही है यहां लग ही नहीं रही ऐसा भी होगा देखिए ये सब जड़ है जितने ग करेंगे जब भगवान शक्ति देंगे जब तक चेतन उसम नहीं लगेगा तब तक उसके अंदर शक्ति नहीं आएगी तब तक उसके अंदर संचलन नहीं होगा सुनामी आने में कौन सा चेतन लगा सुनामी आने में किसका चेतन लगा सुनामी आ सुनामी तो प्राकृतिक रूप से जो हमने बताया आपको उसके कारण आ गया चेतन की जरूरत नहीं है उस जड़ को किसको सुनामी आने में उस जड़ को चेतन की क्या जरूरत है चेतन जो प्रकृति का दोहन किया उसके कारण जो य सब हो रहा है अरे चेतन को जड़ को चेतन की आवश्यकता है कि नहीं कार्य करने के लिए बकल है तो आप वहां पर तो पानी जो सुनामी आ रहा है उसम नहीं मान रहे हो क तो रहे हैं
00:29:09:19 कि चेतन किसका चेतना लगी चेतन ने जो कुकृत्य किया उसी का परिणाम है मतलब मनुष्य ने चाहा कि ऐसा हो चाहा नहीं मनुष्य ने जो वातावरण को प्रदूषित कर दिया उसके कारण य चीज उत्पन्न हो गई अच्छा ठीक है तो जुपिटर पर आ जाते हैं जो क्या कहते हैं ये पृथ्वी जहां पे हमने माना कि यहां पे 10 नंबर ऊर्जा लग रही है और जुपिटर में लग रही है 60 नंबर तो ऊर्जा के रूप में स्वयं ईश्वर ही है क्योंकि तीन ही तत्व है है ना जीव ब्रह्म और प्रकृति ईश्वर जीव प्रकृति हा तो जब ऊर्जा के रूप में ईश्वरी है तो ईश्वर अपने आप को कर रहा है ना कि यहां पर मैं ज्यादा हूं यहां पर मैं कम हूं अपने आप को रेगुलेट कर रहा है ईश्वर ज्यादा कम कहां है भाई साहब ईश्वर तो सब जगह र् ऊर्जा के रूप में कौन है भाई साहब ऊर्जा के रूप रूप में कौन है ऊर्जा उससे आती है ऊर्जा उससे आती है मतलब ऊर्जा एक अलग तत्व है हा ऊर्जा अलग तत्व है बिल्कुल मतलब जीव ब्रह्म प्रकृति के अलावा एक तत्व और है ऊर्जा वो अलग तत्व नहीं ईश्वर जी प्रकृति से अलग तत्व नहीं तत्व के आप कह सकते हैं लेकिन जो है वो अलग से सत्ता नहीं है तो क्या है वो ये ऊर्जा जहां से ऊर्जा का ऊर्जा का आदि स्रोत जो है ईश्वर है सूर्य में जो
00:30:24:19 सूर्य में जो ताप आ ऊर्जा आ ईश्वर से जैसे मान लीजिए पृथ्वी ठीक है अब इसको घुमाना है ठीक है अब फोर्स चाहिए इसको बय फोर्स तभी ये घूमेगी तो ईश्वर शक्ति के रूप में ईश्वर ही तो कार्य कर रहा है उसको घुमाने का ईश्वर ने व्यवस्था दे दी जो कि निरंतर चल रहा है अरे तो वो शक्ति के रूप में ईश्व तो है निरंतर जो चल रहा है अब जैसे सूर्य है सूर्य की परिक्रमा जो है पृथ्वी कर रही है तो सूर्य के अंदर जैसे कि किसी चीज में ताप दिया जाए ताप दिया जाए तो देखेंगे उसमें संचरण होने लग जाता है तो सूर्य के कारण जो है पृथ्वी जो घूमने लग जाती है अपनी दूरी पर घूम रही है पृथ्वी के चारों तरफ जो चंद्रमा चक्कर काट रहा है तो ये व्यवस्था व्यवस्था दी गई जिसके कारण हो रहा है तो व्यवस्था हो रही है उसको जो हो रहा है उसमें ईश्वर अलग अलग आक नहीं कर रहा है अलग-अलग थोड़ कर रहा है वहां ज्यादा शक्ति दे दिया यहां कम शक्ति दे दिया उसने एक व्यवस्था बना दिया उस व्यवस्था के अंतर्गत य सब हो रहा है ईश्वर तो सब जगह 100% है ना बिल्कुल वो तो मंत्र क रहा है ईवाम सर्व 100% तो जहां प कम शक्ति यूज हो रही है जहां ज्यादा शक्ति यूज हो रही तो यहां प वो अपने आप को कम ज्यादा करने वाला हो गया ना तो उसने इस तरह की व्यवस्था ही बनाई कम हो और ये कहीं प लिखा हुआ है
00:31:39:20 क्या कि जो है उस जिस समय चार ऋषियों ने मंत्र की दृष्टा बने उस समय कोई और प्राणी नहीं था हा वो वेदों में आया है ना वेद का ही मंत्र है वेद का ही मंत्र है हमको वो मंत्र याद नहीं है कि ऋ जो है अग्नि ऋषि को य नहीं उनके अलावा कोई और प्राणी था ही नहीं हां ये जो है वेदों में ही है कहां प अब इस समय तो हमको ध्यान नहीं च ठीक ऐसे मान लेते हैं कि अभी भी ठीक है ईश्वर सब जगह है तो हमारे दिमाग में भी है फिर भी किसी किसी के दिमाग में वह वेदों के मंत्र प्रकट होते हैं है ना वो पढ़ के ही होते हैं मगर किसी किसी के मन तो एक देशी हो रहा है ना मनुष्य जो ईश्वर का ज्ञान है एकद कहां हो क्यों ईश्वर तो सब जगह है बराबर रूप से सर्वव्यापक है मन में भी है प्रारंभ में चार ऋषियों को ये ज्ञान प्रा अभी अभी की बात कर रहा हूं क्योंकि वो एक मामला वो हो गया कि चार ऋषियों के अलावा और दूसरा प्राणी था कि नहीं था जिस दूसरे प्राणी मंत्र के दृष्टा बने मंत्र के दृष्टा बने ये चार ऋ थे है ना तो चार चार ऋषि ही थे उनके अलावा और कोई प्राणी दुनिया में था ही नहीं सृष्टि में था ही नहीं नहीं ये थोड़ा हम क रहे कि नहीं था तो फिर उनके मन में क्यों नहीं आया वो क् क्या जी ईश्वर सब जगह है ना यही चार ऋषि जो है
00:32:55:16 योग्य थे जिनके अंदर चाहे तो स्वयं को एक दसी कर सकता है नहीं कैसे कर सकता है आपने कहाना यही चार योग्य इनके मन में इसलिए ये योग्य थे हर तरह से जो है पवित्र थे इसलिए उनके अंदर यह पवित्र ज्ञान आया उनके हृदय में ज्ञान दिया गया तो ईश्वर अपने आपको को अपनी शक्तियों को एक देशीय कर सकता है ना नहीं एक दे नहीं कर सकता एक देशी हो तो रही है उसने ज्ञान दिया इसका मतलब थोड़ा एक देशी हो गया तो मैं आपको पूछ रहा हूं जब ऋषियों के मन में वो ज्ञान आ रहा है तो दूसरों के मन में क्यों नहीं आ रहा है दूसरो फिर उसके द्वारा तो प्रसारित हुआ सबके ज्ञान में दूसर के में क्यों नहीं आ रहा ईश्वर तो सब जगह है ना प्रारंभ में उन्हीं चार ऋषियों को हुआ मैं वो पूछ रहा हूं कि दूसरों के मन में क्यों नहीं आ रहा है दूसरों के मन में कैसे आता दस यही चार ऋषि सम यानी ईश्वर ने ये चाहा कि मैं इन्हीं चार ऋषियों में ही प्रकट करूं ज्ञान बिल्कुल क्या तो ज्ञान के रूप में वो भी तो था क्या ईश्वर भी तो था ज्ञान के रूप में ईश्वर ईश्वर तो थे ही सर्वत्र फिर भी ज्ञान केवल चार ही ऋषियों में आया और जो बाकी के प्राणी उसमें नहीं आ वैसे आपने कहा कि और कोई प्राणी था ही नहीं नहीं नहीं ये मैंने क कहा अच्छा ठीक है ये मैंने नहीं कहा कि प्राणी नहीं था तो दूसरे प्राणियों के मन में क्यों नहीं आया दूसरे मनुष्य ही मननशील प्राणी है विवेकशील प्राणी है तो चार ऋषियों के अलावा और कोई मनुष्य नहीं था उस समय दुनिया में चार ऋषि प्रारंभ में जो थे और और लोग भी थे लेकिन सबसे योग्य यही
00:34:10:16 थे जिनके यानी ईश्वर ईश्वर चाहे तो ऐसा कर सकता है कि मैं यहां पर प्रकट हूं यहां पर ना हूं अप प्रकट र हूं नहीं ये कहां काहा तो वो हो तो रहा है ज्ञान वो पहले से सब जगह है ज्ञान ज्ञान जो है चार यों को दिया तो वो ज्ञान केन लेकिन वो इसका मतलब थोड़ा कि प्रकट हुआ प्रकट हुआ ना उसने अपना ज्ञान दिया उसने अपना जो ज्ञान चारों वेदों का ज्ञान जो है ज्ञान जो ज्ञान वो देख रहे हैं मंत्रों के दृष्टा बन रहे हैं वो ज्ञान उनके अंदर पहले से भी था ना ई ईश्वर के रूप में ईश्वर के अंदर ज्ञान है ना ईश्वर के अंदर ज्ञान है ईश्वर सब जगह है हा ईश्वर उनके मन में भी है हा मगर अभी वो नहीं जानते नहीं जानते उसके बाद एक दिन ईश्वर ऐसा करता है कि जो मंत्र है वो उसके दृष्टा बन जाते हैं यानी कि किसी देशकाल परिस्थिति में ईश्वर ने अपने आप को प्रकट किया अपने ज्ञान सृष्टि के आदि सृष्टि के आदि में चार ऋषियों को ये ज्ञान प्रकट हुआ तो उसने अपने आप को एक देशीय किया ना नहीं एक देशीय नहीं किया तो यानी कि और जगह भी प्रकट हुआ होगा वो सब जगह जितने भी और प्राणी होंगे प्रकट कहां हुआ वो तो प्रकट तो हुआ ही नहीं प्रकट क्यों होगा वो अपने ज्ञान को प्रकट किया कि नहीं अपने ज्ञान को दिया ज्ञान का जो उनको ज्ञान चारों वेदों का ज्ञान उन लोगों को हुआ एक देशीय एक देशीय किया ना अपना ज्ञान एक देशीय नहीं होगा अरे तो फिर औरों को भी प्रकट होना चाहिए वो
00:35:25:24 और को कैसे प्रकट हो ग चार ऋषि जिन यानी कि योग्यता के आधार पर ईश्वर सेलेक्ट कर सकता है कहां प्रकट होना है कहां नहीं होना है ईश्वर उसको कहां प्रकट होना था ये ज्ञान देना था जिके माध्यम से जिसके माध्यम से वेदों का ज्ञान आगे ज्ञान के रूप में भी तो ईश्वर ही है ईश्वर ज्ञान के रूप में है लेकिन वो चारों चारों वेद वही नहीं ना है उसके उसके वो ज्ञान है मैं वही कह रहा हूं जैसे जैसे मेरे और आपके मन में दोनों में ईश्वर है ठीक है तो ईश्वर के रूप में मेरे और आपके मन में ज्ञान भी है ईश्वर का क्योंकि ईश्वर है तो ज्ञान भी है सच्चिदानंद चित है तो उसका ज्ञान भी है फिर भी वह ज्ञान अभी हमारे इंद्रियो इंद्रियों का विषय नहीं है नहीं है ना तो किसी एक देश काल परिस्थिति में भगवान ने कुछ ऐसा किया जिससे कि वह अब हमारी मन इंद्री का विषय हो गया तो व मंत्रों के रूप में भगवान ने चाहा तो उसने दे दिया मगर उसने चाहा कि मैं इन्ही चार लोगों के मन में आऊ बगल में कोई और दूसरा प्राणी हो तो उसके मन में ना हो नहीं नहीं पहले से तो उनके य था लेकिन ज्ञान वेदों का उन्होने चार वही वही कह रहा हूं कि जो इंद्रियों का विषय बनू तो इसी इन्हीं चार का इंद्रियों का विषय बनू और भी प्राणी है वो इतने योग्य नहीं उनकी इंद्रियों का विषय नहीं बनूंगा इंद्रियों का विषय तो बन ही नहीं सकता क्योंकि अतिंद्रीय है अरे
00:36:41:10 इंद्रियो दन का विषय बना कि नहीं ज्ञान बुद्धि का विषय है चलो बुद्धि का विषय बना ना बुद्धि का विषय है हा तो कहने का अर्थ यह है कि वो उसने अपने आप को रेगुलेट किया और वो एक जगह पर आया ज्ञान के रूप में ज्ञान के रूप में वो तो सर्वत्र विद्यमान है ही उसने ज्ञान दिया तो उसने अपने आप को रेगुलेट कर तो लिया वेद जो है सृष्टि का ज्ञान है सृष्टि का संपूर्ण सृष्टि का संविधान है कह सकते हैं जिस तरह से देश को चलाने के लिए संविधान की आवश्यकता होती है उसी तरह से संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए वेद है नहीं वो सही है व आप सही कह रहे हैं मगर इसमें यह चीज आ रही है मैं इसमें थोड़ा जानना चाहूंगा यह चीज समझ में नहीं आ रही है कि ईश्वर जब पहले से है तो उसका ज्ञान भी है सब जगह य बैठे हुए सब लोगों में ईश्वर का ज्ञान है फिर भी किसी किसी के मन में ईश्वर का ज्ञान वैसे प्रकट होता है जो भौतिक इंद्रियों के वो उसमें आ जाए सभी लोगों के अंदर ईश्वर है लेकिन ईश्वरीय ज्ञान जो है सब में नहीं है क् ईश्वर ईश्वर का ज्ञान नहीं है ईश्वर है तो ईश्वर में ज्ञान है ईश्वरीय ज्ञान नहीं है वो ज्ञान जो जो वेद कहते हैं वो नहीं है अच्छा ईश्वर से अलग है ज्ञान क ज्ञान ईश्वर से अलग है नहीं ईश्वर में तो ज्ञान है फिर ईश्वर है तो ज्ञान भी तो है वहां
00:37:57:02 नहीं ना वो जो वेदों का जो ज्ञान है वो जो जिसको दिया उसने चार ऋषियों को उनके पास आया उनके माध्यम से चारों तरफ फैला हा अरे भाई जब ईश्वर है तो ईश्वर के अंदर तो सब कुछ है तो उसका ज्ञान भी है तो हम यह कैसे कह रहे उसका ज्ञान नहीं है लोगों के अंदर नहीं तो उसके ज्ञान केवल इतना है कि वो भी अविद्या होने के कारण अविद्या से ग्रसित होने के कारण वो जानता नहीं है उस ज्ञान किसी देश काल परिस्थिति में ईश्वर जो है वो अविद्या से बचा करके उसका ज्ञान जो है प्रकाशित कर देते हैं ऋषियों के मन में मगर ऐसा वो सब जगह नहीं करते एक साथ जहां वो चाहते हैं वही करते सृष्टि के आदमी उन्होंने चार ऋषियों को
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00:38:34:21 अच्छा एक चीज मैं कह रहा था जो हमारी पिछली चर्चाएं हुई जैसे ईश्वर जो है कहते हैं कि अजन्मा है इसलिए वो जन्म लेना उसका सिद्ध नहीं होता तो जैसे ईश्वर के बारे में एक बात है दयानंद सरस्वती जी ने जो मुक्ति वाला समय है उसमें लिखा है कि प्रलय काल में एक समय ऐसा होता है जो तर्क में नहीं आ सकता है ना यानी कि ईश्वर की एक स्टेट जब तर्क में नहीं आ सकता तो ईश्वर की एक स्टेट हो गई वो तर्क में नहीं आ सकता अब तर्क में नहीं आ सकता वाला ईश्वर है मगर उसके बाद एक स्टेट ऐसी हुई जिसमें वह तर्क में आ गया कौन ईश्वर हां एक स्टेट है कि तर्क में नहीं आ सकता उन्होंने माना अब उसके बाद तर्क में आ भी रहा है कि वो हमें सुन सकता है वो हमें देख सकता है तर्क आ गया है ना तो यानी तर्क में नहीं आ सकता है से तर्क में आने वाली स्टेट में ईश्वर आ गया अब इसमें यह है कि हम कहते अजन्मा है तो जन्म नहीं ले सकता ठीक है अच्छा तो तर्क में नहीं आ सकता फिर तर्क में कैसे आ रहा
00:39:36:15 है हमें मान अच्छा वो तर्क में जब आया मान लीजिए तो क्या उसने अपने आप को बदला तो एक रस नहीं रहा बदल गया परिवर्तनशील बान लिया तो हमें ये मानना पड़ेगा कि ईश्वर तर्क में नहीं आ सकने वाला रूप होते हुए भी एक और रूप तर्क में आ सकने वाला लेता है ये मानना पड़ेगा अब हमने उसको नहीं देखा है उस पर हम नहीं बोल पाएंगे आपको बता पाएंगे अच्छा अब इसमें थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं एक ये जो वर्ण व्यवस्था वाला मामला आता है जी आर्य समाज को लेकर के तो उसमें आर्य समाज कहता है कि जो वर्ण होता है वह कर्म से होता है है ना तो इसमें एक दिक्कत आती है कि फिर इसकी उपयोगिता क्या है कर्म की मतलब कर्म से जब वर्ण मानेंगे तो उसकी उपयोगिता क्या है मैं अपना सवाल थोड़ा क्लियर कर दू जैसे कि हमने किसी को कहा कि तुम एक अध्यापक हो तुम्हारा कर्तव्य है लोगों को शिक्षा देना अब जैसे मान लीजिए वहां पर कोई विपदा
00:40:41:13 आई लोगों को पढ़ाने में दिक्कत आ रही है मेहनत ज्यादा हो रही है तो उसने क्या किया मैं एक काम करता हूं गार्ड बन जाता हूं स्कूल का और बाहर सुरक्षा इंचार्ज बन गया तो वो वहां वापस आया अरे तुम्हारा कर्तव्य था है ना तुम दायित्व था लोगों को पढ़ाना तुम यह क्या कर रहे हो तुम कैसे बन गए तो कहता है भाई मैं कर्म से मानता हूं और मैंने मेरा जो है जो मैं करूंगा वह मेरा दायित्व कहलाएगा जो मेरा दायित्व होगा वह मैं नहीं करूंगा जो मैं करूंगा वो मेरा दायित्व कहलाएगा तो अब मैं गाड़ बन गया हूं तो इसलिए मतलब दायित्व के आधार पर व्यक्ति कर्म करने के लिए बाध्य नहीं हो रहा है यहां पर कर्म के अनुसार दायित्व का नामकरण करने के लिए बाध्य हो रहा है तो फिर इसकी उपयोगिता क्या रह जाएगी देखिए व्यवस्था जो हमारे यहां वैदिक युग से है आज से नहीं प्राचीन काल से है और यह वैदिक व्यवस्था है और वेद में एक मंत्र भी आया है ब्राह्मण से मुख मास बाहु राजन कत उरुत पद सुद्र जाता माने संपूर्ण सृष्टि रूपी शरीर का मुख ब्राह्मण है भुजाएं क्षत्रिय है जंा जो है बैश्य है और पैर जो है शूद्र है लेकिन जो है वैदिक कालखंड
00:41:56:26 में जो य वर्ण परिवर्तनीय थे ब्राह्मण का कार्य कर था पढ़ना पढ़ाना और जो है ज्ञान का प्रचार करना लोगों को स्वाध्याय करने के लिए स्वाध्याय में परिवृत्त करना यह ब्राह्मण का कार्य था अपरिवर्तनीय थे तब वैदिक काल में परिवर्तनीय थे वर्ण परिवर्तनीय थे अगर वो मैं जानता हूं कि क्या है आपका कहना क्या है व जानता हूं मैं कह रहा हूं कि जो व्यक्ति जो करने लग जाएगा अगर मैं अभी थोड़ी देर पहले डॉक्टर था अचानक से मैं सब्जी बेचने लगा अरे तू डॉक्टर है तेरे पेशेंट व मर रहे हैं तू यहां क्या कर रहा है भाई मैं अब डॉक्टर नहीं हूं मैं अब सब्जी बेचने वाला बनया अब यही मेरा कर्म तो कहने का मतलब दायित्व के अनुसार कर्म बाध्य नहीं हो रहे हैं बल्कि कर्म के अनुसार दायित्व का नामकरण बाध्य हो रहा है तो फिर इसकी उपयोगिता क्या है नहीं नहीं ऐसा ऐसा कि उस तरह से तो सोच हर आदमी ब्राह्मण क्षत्रिय चारों वर्ण है जब पढ़ने पढ़ाने का काम करता है तो ब्राह्मण है जब किसी की रक्षा करता है या सुरक्षा काम करता है तो वो क्षत्रिय हो गया भ भ पोषण का कार्य कर रहा तो बै हो गया सेवा का काम कर रहा तो शूद्र हो गया ये वैदिक व्यवस्था थी मनुष्य जीवन को संचालित करने के लिए समाज को संचालित करने के बताइए इसकी उपयोगिता क्या है बेनिफिट क्या है हमने कहा
00:43:12:00 यह ब्राह्मण है यह वैश शूद्र क्षत्रिय हमने कह दिया इसको नाम दे दिए चार अब इसका फायदा क्या है हमें कैसे य चीज बेनिफिट करेगी जैसे हमने कहा यह प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री जब मुख्यमंत्री की आवश्यकता होगी तो मुख्यमंत्री हमको काम आएगा वो अपना काम करेगा यह पुलिस वाला है यह डॉक्टर है इंजीनियर है तो जब हमें पुलिस वाले की आवश्यकता होगी तो पुलिस वाला हमारी सुरक्षा करेगा या डॉक्टर हमारा इलाज करेगा वर्ण का पहला अर्थ होता है चयन करना वर्ण का साबिक अर्थ है चयन करना चुनना जब वण हां वर्ण करना चयन करना वर्ण से वर्ण बना है हां वर्ण करना वर्ण से वर्ण तो शायद वो उससे उसका उपयोग उसमें भी लिया जाता है रंग में हां
00:43:58:18 वर्ण रंग को भी कहते हैं वर्ण चयन करने को भी कहते हैं तो प्रारंभ में बच्चा छोटा होता था उसको विद्यालय में पढ़ने के लिए भेजा जाता था गुरुकुल में तो उसके गुण कर्म को देख कर के जो है गुरु जो है उसका वर्ण निर्धारित करता था अगर उसम पढ़ने पढ़ाने के प्रति रुचि पढ़ने लिखने के प्रति रुचि होती थी तो ब्राह्मण वर्ण उसको दिया किया जाता था और जब वो आप सही कह रहे जसे मेरा प्रश्न दूसरा है ये जब हमने कर्म के अनुसार कर दिया हा ठीक तो कर्म के अनुसार क्योंकि कर्म व्यक्ति के स्वेच्छा अनुसार है केवल कर्म नहीं चातु वर्ण जैसे कृष्ण ने भी कहा है गीता में ना चातु वर्ण मया सिस्टम गुण कर्म विभाग गुण और कर्म के द्वारा उसके अंदर गुण भी हो वो कर्म भी करे ये कौन चेक करेगा कौन चेक करेगा य समाज चेक करेगा और जो है मध्य काल में फायदा क्या हुआ मतलब समाज चेक करेगा वो घोषित होगा पहले से या हर बार जब भी काम पड़ेगा तो हमें समाज से पूछना पड़ेगा 100 से 1 स लोगों से इसके गुण और कर्म क्या क्या है बताओ क्या है समझने में दिक्कत ऐसा है ना कि ये वैदिक काल से हीय परंपरा चली आ रही थी कि गुण कर्म के आधार पर यह वर्ण व्यवस्था होगी और चली आ रही थी हमारी
00:45:13:18 परिवर्तनीय भी थी लेकिन जब यह मध्य काल आया नहीं नहीं मैं पूछ रहा हूं परिवर्तनीय जो व्यवस्था है उसका फायदा क्या है उसका विनियोग किसम है मतलब कि जैसे श्री कृष्ण कह रहे हैं कि हे अर्जुन तू क्षत्रिय है तेरा कार्य रक्षा करना ठीक है अर्जुन का क्योंकि कर्म के हिसाब से तो अर्जुन कह सकता है भाई मैं अभी अभी जो है पंडित ब्राह्मण हो रहा हूं मुझे युद्ध नहीं लड़ना कुछ नहीं उतर के चले जाएंगे कहने का मतलब ये है ये घोषित ही इसलिए की जा रहे हैं कि समय आने पर हम इनको इनके कर्म के लिए बाध्य कर सके कि तेरा ये कर्म है तेरा ये दायित्व है जैसे हम किसी के पुत्र है इसको हम बदल नहीं सकते कि हम किसी के पुत्र हैं तभी एक उसको बाद कीया जाती पिता तेरा दायित्व इनके लिए ऐसा करना है ना तो उसको हम बाद कर सकते हैं उसका धर्म याद दिला के तो जो वर्ण धर्म है वर्णाश्रम धर्म उसका भी यही बेनिफिट है अगर वह बदला ना जा सके तो अगर उसको परिवर्तनीय नहीं माना जाएगा तो कि समय आने पर उसको उसका वर्ण धर्म याद दिलाया जा सके वरना वह धर्म की दृष्टि में दोषी माना जाए मगर यदि हम उसको परिवर्तनीय मान लेंगे तो अपने दायित्व से मुख फेरना भी धर्म की दृष्टि में दोष नहीं होगा अब जैसे मा कोई ब्राह्मण है जैसे मैं गया
00:46:28:28 मेरी रक्षा करो तुम क्षत्रिय हो मेरी रक्षा करो बस पाच मिनट पहले मैं जो है कथावाचक हो गया हूं ब्राह्मण बन गया हूं हो गया इसकी उपयोगिता क्या रही ब्राह्मण वो थोड़ा है समाज को संचालित करने के लिए वर्ण व्यवस्था की स्थापना ई तो कैसे क्या आधार है उसका घोषित कैसे करेगा कौन करेगा कौन घोषित करेगा हां बड़ गुण कर्म स्वभाव के अनुसार जो है वो काम पड़ेगा क्षत्रिय के अनुसार क्षत्रिय से काम है तो हम हर बार कहेंगे भाई समाज के लोगों को इकट्ठा करो कि इसके गुणों नहीं नहीं नहीं उसके अनुसार थोड़ा होता है एक बार जब निर्धारित हो गया सु सुनिए तो पहले और उसके अनुसार हम जो है संपादन कर रहे हैं क्रिया कर्म का तब हम ब्राह्मण है अगर हमने जो काम अपना गुण कर्म स्वभाव छोड़ दिया और हम जो क्षत्री का काम करने लग गए उस काम को छोड़कर पूर्णतः क्षत्री का काम करने लगे गए तब हम क्षत्रिय हो गए तो इस इसका फायदा क्या रहा नामकरण तो हम करते जा रहे हैं जो मेरी इच्छा हुई मैंने किया नामकरण हो गया उस हिसाब से तो इसका फिर फायदा क्या है समाज को फायदा है उसका समाज को फायदा य है जैसे समाज ढूंढने निकला क्षत्रिय को मगर वो तो बदल चुका है ब्राह्मण था ब्राह्मण ढूंढने सोच के आया था मगर अभी क्षत्रिय मिल रहा है तो फायदा कहां हुआ उसके अंदर जो है अगर क्षत्रिय क्षत्रिय का गुण होगा तब क्षत्रिय होगा अगर वो गुण नहीं है तो
00:47:43:28 फिर क्यों है अरे मैं पूछ रहा हूं इसका फायदा जब व्यक्ति की इच्छा के अनुसार कर्म इच्छा अनुसार कर सकता है वो इच्छा के अनुसार तो जब व्यक्ति की इच्छा के अनुसार वर्ण बदल सकता है तो फिर उसका फायदा क्या रहा उसको ये याद कैसे दिलाया तय फायदा उसका ये रहा कि वो गलत काम नहीं करेगा अगर ब्राह्मण है तो हम जानता है कि हम कोई गलत काम करेंगे तो हम पतित हो जाएंगे दूसरे वर्ण में हम चले जाएंगे इसलिए अपना ब्राह्मण को नहीं छोड़ना चाहेगा जो क्षत्रिय है वह अपने छात्र धर्म पर अटल रहेगा वो गलत काम नहीं कर नहीं ब्राह्मण है हमें दूसरे उसमें चले जाएंगे मगर जब वो चला जाएगा तो वो ये कहेगा ना मैं ब्राह्मण हूं ही नहीं मैं तो क्षत्रिय ही हूं और छत्री के हिसाब से मैं सही कर रहा हूं मैं तो धर्म की सीमा में हूं नहीं नहीं तो कहे कहने का उसका अवसर नहीं है क्योंकि वो तो चाहेगा कि जो है हम अपने उच्चता को जो है हम निम्न वर्ग में ना आवे हम ब्राह्मण को प्राप्त कर चुके हैं ब्राह्मण वर्ण में है तो हम ब्राह्मण बने रहे क्षत्रिय चाहेगा कि हम क्षत्रिय बने रहे जानता है कि हम वो काम नहीं करेंगे तो हम शव को प्राप्त हो जाएंगे अरे भाई जब व्यक्ति का अपने दायित्व से मुंह फेर लेना भी धर्म में है क्योंकि जब तुमने मुंह फेर के जो किया वही तुम्हारा धर्म हो गया तो फिर उसके धर्म का याद कैसे दिलाया जाए उसको धर्म को उसके कर्म के आधार पर याद को ये भी नहीं कहा जा सकता कि तुम पतित ब्राह्मण हो
00:48:59:04 यहां पे ये चीज है जहां पे जन्म से है उसमें हम कह सकते हैं तू पतित हो गया तूने ब्राह्मण में जन्म तो लिया मगर तूने कर्म नहीं किए तू पतित है तू निकृष्ट है है ना निम्न है यहां पे तो कह सकते हैं मगर जहां पे उसका वर्ण ही चेंज कर दिया व पतित शब्द कहां से आएगा वहां तो क्षत्रिय आएगा वहां तो क्षत्रिय आएगा भाई तो ब्राह्मण से तो गिर करके हुआ ना तो पतित हो ही गया ब्राह्मण से तो वो तो उसका धर्म है ना वो कहेगा ये तो मेरा धर्म है मैं क्षत्रिय हूं ये मेरा धर्म है यही करना हां तो करो वो भाई जैसे अ अर्जुन से भगवान ने ये कहा कि तेरा धर्म रक्षा करना तो वो ये कहेगा मुझे तो उच्च कोटि में जाना है ब्राह्मण बनना है मैं क्यों करूं ये थोड़ी ना कहेगा वो मेरा धर्म है मैं क्षत्रिय कुल में उत्पन्न मेरा धर्म है यह करना बिल्कुल तो यह बात है कि इसकी उपयोगिता क्या दिखती है वो समझ में नहीं आता है वर्ण जब कर्म से मानते हैं इसको एक चीज से और समझ सकते हैं जैसे कि जो सत्यार्थ प्रकाश है उसमें जब वर्ण की बात आती है तो दयानंद जी लिखते हैं कि यजुर्वेद का 26 में अध्याय का दूसरा मंत्र उसमें कहा गया है कि जो क्या कहते हैं
00:50:10:10 यह ईश्वर ने जो वेद वाणी है वह चारों वर्णों के लिए दी है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश शूद्र ठीक है अब दिक्कत यह है कि शूद्र वो है जो उपनीत नहीं है उपनीत नहीं है ना और वेदों का अधिकार किसको है उपनीत है तो फिर यहां पर किस शूद्र की बात कर रहे हैं भगवान कि हमने उसके लिए भी दिए शूद्र तो वही है जो वेद नहीं पढ़ता और यहां कह रहे हैं कि शूद्र के लिए भी वेद है नहीं वेदों में तो मंत्र आया है जैसे वो हमको याद नहीं आ रहा जी य ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र और स्त्री पुरुष सबके लिए मैंने जो है वेदों का ज्ञान दिया वेदों का ज्ञान दिया है जी समझ गया ना जी तो अब ये कौन सा शूद्र है क्योंकि शूद्र तो वही है जो वेद नहीं पढ़ता है शूद्र वही है भगवान य क शूद्र के लिए भी वेद हैद लिए यानी यहां पर यह लग रहा है कि भगवान ने ब्राह्मण क्षत्रिय वै शूद्र चारों को जन्म से माना है तब यह बात फिट बैठेगी दयानंद जी के अकॉर्डिंग कि हमने चारों के लिए वेदवा कही है क्योंकि अगर कर्म से मानेंगे तो कर्म के अनुसार जो शूद्र है व तो वेद का अधिकारी नहीं है फिर भगवान कैसे कह रहे त अधिकारी हैद का शूद्र को ये नहीं कहा
00:51:25:16 कि जो मध्यकाल में यह बात आ गई कि शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है तो मध्य काल मध्यकाल में यह था मध्यकाल की बात है नहीं नहीं मध्यकाल में बात आई कि जो है वेद शूद कौन से शूद्रों को नहीं है कर्म वाले या जन्म वाले किसी भी शूद्रों को कह दिया कि जोद पढ़ने का अधिकार नहीं नहीं नहीं अगर जन्म से मानेंगे तो तो यह बात फिट बैठेगी ब्राह्मण क्षत्रिय वै शूद्र जब आ रहा है इसको जन्म से कहा भगवान ने कहा मैंने तो चारों चारों कुलों में जन्मे चारों वर्णों में जन्मे लोगों के लिए वेदवा कही है वो बात अलग है कि उसको दूसरा अर्थ माने ना माने वो एक बात अलग है मगर यदि हम यहां कर्म से मानेंगे शूद्र मतलब कर्म से हम वर्ण को मानेंगे तो ये बात फिटी नहीं बैठेगी क्योंकि कर्म के अनुसार जो शूद्र है यानी कि उसका उपनयन नहीं हुआ है वो वेदों का अधिकारी नहीं है तो भगवान उसको वेद दे रहे हैं जो वेदों का अधिकारी नहीं है नहीं वेदों का माने जो पढ़ा लिखा नहीं है ना समझ है जिसको ज्ञान नहीं है वो शूद्र है हम वो शूद्र है शूद्र वो है एट द एंड जो शूद्र है जिसने अपना यज्ञ पवित नहीं कराया जिसको गायत्री मंत्र नहीं गायत्री मंत्र का अधिकार नहीं है गायत्री मंत्र का अधिकार तभी होगा जब वो जविध होगा जब होगा तो दज हो जाएगा ब्रह्मण क्त्र में से एक हो जाएगा तो यह दिक्कत
00:52:40:16 है कि फिर भगवान यहां पर या तो जन्म से मान रहे हैं भगवान तो कह रहे मैंने चारों को दिया है नहीं भगवान तो जन्म से नहीं मान रहे हैं फ वेदों के अनुसार जो आ गया शूद्र तो वही है जो वेदों का अधिकारी नहीं है फिर भगवान अपनी आज्ञा के उलट काम कर रहे हैं वेदों का अधिकारी नहीं वेदों का अधिकार दे रहे वेद मंत्र खुद कह रहा है इस बात को वेद मंत्र खुद इस बात को कह रहा है शूद्र तो वही है ना जो वेद नहीं पढ़ सकता नहीं जो पढ़ नहीं सकता ये नहीं है उसको भी पढ़ने का अधिकार है बिना यज्ञ पवित के बिना यज्ञ पवित के उसको भी दिया जाए यज्ञ पवित्र हो जाएगा तो वो शूद्र कहां रहेगा कर्म से वो बदल जाएगा ना फिर वो हो जाएगा बण में से एक हो जाएगा जाएगा बकुल हो तो फिर वो शूद्र कहां रहा यानी कि अंततोगत्वा शूद्र ने वेद नहीं पढ़ा वेद पढ़ा ब्राह्मण ने क्षत्रिय ने या वैश्य ने शूद्र ने तो नहीं पढ़ा वेद लेकिन अधिकार है अरे अगर श जब तक वो शूद्र है तब तक वेद का अधिकार कहां से हो गया क्योंकि कर्म के अनुसार वो शुद्र है अगर तो उसका वो वही है जो जिसका उपनीत नहीं हुआ है तो उपनयन करा कर के हम पढ़ाएंगे तो उपनयन करा कर उपनयन करा के वो द्विज हो गया ना शूद का रहा हां तो द्विज हो गया तो ठीक है कोई बात नहीं तो यानी वेद किसको मिला द्विज को मिला ना परिवर्तनीय हो गया वही कह रहा हूं ना परिवर्तन हो गया इसलिए कहा कि परिवर्तन है तो शूद्र तो अकॉर्डिंग टू दयानंद जी शूद्र तो वही है जो कर्म से शूद्र है जिसका संस्कार
00:53:55:24 नहीं हुआ है उसका संस्कार नहीं हुआ वो शूद्र है वो वेदों का अधिकारी नहीं है जिसका संस्कार नहीं हुआ वेदों का अधिकारी है कैसे है वेदों का अधिकारी वो है वेद पढ़ने का अधिकार उसको भी है और सु सुनने सुनाने का अधिकार उसको भी है अरे जब वो वेदों का अधिकार उसको है जिसका यज्ञ पवित हुआ और यज्ञ पवित उसका होगा जो नहीं जो नहीं पढ़ना पढ़ाना चाहेगा जो ज्ञान प्राप्त नहीं करना चाहेगा वो शुद्र हो गया अब ज्ञान प्राप्त करना चाहेगा तो उपनयन करा करके उसको वेद पढ़ाएंगे तो भगवान ये कहेंगे ना मैंने ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य के लिए वेद दिए हैं शूद्र के लिए क्यों कहेंगे शूद्र तो वही है ना जो पढ़ना नहीं चाहता जो वेदों का अधिकारी नहीं है नहीं नहीं बता प बताइए जिसके पास जनिव नहीं है वो शूद्र है ना वो उसको क्या वेद पढ़ना चाहिए बिना जनेऊ के नहीं तो वो शूद्र है ना तो शूद्र का वेदों में अधिकार नहीं रहा ना नहीं वेदों में अधिकार वेद का अधिकार है आप ही तो कह र नहीं पढ़ना चाहिए फिर उपनयन करा के हम पंगे उपनयन करा के वो शूद्र कहां रहा है ये तो बंद पुत्र जैसी बात है कि अगर पुत्र का जन्म हो गया तो ब्या रही जब पुत्र का पुत्र हो गया व्या को तो वंद नहीं रही व्या तो तभी तक है ना जब तक व पुत्र नहीं है ऐसे ही जब उसका यज पवित्र हो गया तो शूद्र क रहा अंत वेद जो मिला व शूद्र को
00:55:10:24 नहीं मिला वो मिला बज को तो फिर य भगवान कैसे कह रहे शूद्र को भी हमने दिया हैद का य मंत्र है उसके अनुसार तो जो है ब्राह्मण क्षत्रिय चार ों को पढ़ने का अधिकार है अच्छा इसमें एक चीज और आती हैसे हमारी मनुस्मृति में संस्कार विधि इत्यादि में यह कहा जाता है कि जो ब्राह्मण बालक का जो यज्ञ पवित है वो इतने से इतने के बीच में होना चाहिए ठीक है अच्छा ब्राह्मण कौन है जो वेद पढ़ता है जी है ना तो जो वेद पड़ेगा वह ब्राह्मण है ठीक है और ब्राह्मण का यग पवित इतने से इतने के बीच में होना चाहिए तो यानी कि उसके कर्म कर देने से पहले ही तय हो रहा है कि वह ब्राह्मण है नहीं यह किस आधार पर तय होगा बताए ना चयन होता है गुरुकुल में जब पढ़ने के लिए विद्यार्थी जाता है तो उनका गुरु उसका गुण कर्म स्वभाव दे कर के तय करता हैय ब्राह्मण है कि क्षत्रिय है बैस है या शुद्र है कितने दिन कितने दिन विद्यालय में जब प्रवेश करने जा कुछ दिन रखने के बाद नहीं कहीं लिखा होगा ना कितने दिन रहेगा फिर वो सेलेट करेगा स्मृति में है वो सब हमें नहीं मिला य चीज मनुस्मृति मेंगा कि इतने दिन वो रहेगा फिर वो बताएगा कि अब ये ब्राह्मण
00:56:25:27 बनेगा वो बनेगा अच्छा दूसरी बात यह है कि मतलब बिना यज्ञ पवित किए ही पहले वो रहेगा गुरु के पास जाकर के ऐसा है कि पहले यज्ञ पवित होगा नहीं जब गुरु के पास पढ़ने जाएगा तो सम पवित संस्कार होता है तो यज्ञ पवित किस आधार पर हुआ उसका य प पवित हुआ आधार ब्राह्मण क्षत्रिय व शूद्र के आधार पर तीन में से ब्राह्मण में से तीन में से किसी एक के आधार पर होगा वहां पर किसने कैसे सिलेक्ट किया कि ब्राह्मण के अनुसार होना चाहिए या शूद्र के अनुसार होना चाहिए शूद्र नहीं सॉरी यह मतलब वैश्य के अनुसार होना चाहिए क्त्र वहां कैसे हुआ व वेद में वो जो वेद आरंभ हुआ पढ़ने तो बाद में गया तो पढ़ने से पहले ही कैसे य तय किया जाए कि य इसका ब्राह्मण के अनुसार होना है या वैश्य के अनुसार यहां कैसे हो रहा है वो तो बाद में रहेगा ना गुरुदेव के पास देखिए अपने य शास्त्र में एक वचन आता है जन जायते शुद्र संस्कारा उते जन्म से सभी शूद्र होते हैं इसलिए कि वो अज्ञानी होते हैं कुछ उनको प्राप्त नहीं हु कुछ जानकारी प्राप्त पहली बात तो पुराण में आता है दूसरी बात ये है कहां पुराण कौन पुराण में आता है स्कंद पुराण का वचन हैय
00:57:41:02 ज जा ठीक दूसरी बात ये है एक जगह पर यह भी लिखा हुआ है कि धर्मे ना पशु भी समाना हा बिल्कुल यह भी लिखा हुआ गुरु के बिना पशु हो हा तो क्या वास्तविकता में पशु है नहीं वो तो उक्ति है पशु पशु तो इसका ये अर्थ भी निकाला जा सकता है कि जन्म से सब शूद्र वत होते हैं हां बिल्कुल हा ये अर्थ भी निकाला शूद्र ही नहीं होते शद शूद्र कुल के ही जरूरी नहीं है शूद्र होते हैं ये भी कहा जा सकता जमना शद संस्कारा संस्कार होने के बाद जो है वो द्वत होते हैं द पूर्ण रूप से होते हैं वो ठीक है मगर अभी मैं ये पूछ रहा हूं कि जब हमने वेद आरंभ करने से पहले गुरु के पास रहने से पहले ही हमें यह तय करना है कि इस का यज्ञ पवित ब्राह्मण के अनुसार होगा क्षत्रिय के अनुसार होगा या वैश्य के अनुसार होगा तो यहां कैसे तय करेंगे कि ब्राह्मण का यज्ञ पवित होना है पहले तय ही नहीं होगा हो रहा है ये कहा गया ना कि ब्राह्मण का यज्ञ पवित इतने से इतने उम्र के बीच में होगा उस समय पढ़ने के लिए जाता है ना पाच वर्ष के बाद तो पाच वर्ष के बाद जाने का अरे मनुस्मृति में दो चीजें लिखी हुई है ब्राह्मण का यज्ञोपवित इस ऋतु में होगा और ब्राह्मण का यज्ञोपवीत इतने से इतने के बीच में होगा उसके बाद ही वो गुरु के पास जाएगा ना पढ़ने
00:58:56:03 गुरु डिसाइड करेंगे कौन है नहीं वही गुरु के पास होता है यो पवित राम संस्कार पढ़ने जाता पवित से पहले रहता है गुरु के पास कि नहीं रहता है रहता है वही पर गुरु वही पर होता मतलब यज्ञ पवित्र कराने से पहले अपने बालक को भेजा जाता है गुरुकुल तुम वहां रहो तब गुरुदेव ये सिलेक्ट करेंगे कि तुम ब्राह्मण हो वै क्षत्रिय हो ये कहां लिखा है बिल्कुल मनुस्मृति में है नहीं हमने नहीं देख अब देखिएगा अच्छा दूसरी बात यह है कि गुरु अगर डिसाइड करते हैं तो कितने दिन तक रहना होगा जो डिसाइड करते हैं मतलब यज्ञ पवित इसका किस आधार पर होना है ये गुरु डिसाइड करते हैं तो कितने दिन देख लेने के बाद करते हैं कुछ लिखा है अब कहीं होगा यह भी हमको ध्यान नहीं है ये भी ध्यान अच्छा एक चीज इसमें और आ जाती है आपने कहा कि गुरु डिसाइड करता है कि ये कौन बनेगा जी यानी कि अगर व्यक्ति को दोबारा अपना कभी यज्ञ पवित वो बदलना है वर्ण कर्म के अनुसार तो क्या उसको दोबारा गुरुकुल जाकर के रहना होगा या वो फिर अपने मन से बदल लेगा क्यों बदलेगा वो गुरु ही घोषित करेगा ना बदलता फिर क्यों बदलते हैं ना लोग लोग बदलते हैं पुलिस की नौकरी छोड़ देते हैं आर्मी की नौकरी छोड़ देते हैं दूसरी करते हैं बदल र है ना हां
01:00:11:03 यहां प इस समय तो हो रहा है ये सब तो बदलते हैं तो आपने कहा कि वही उसका वर्ण हो जाएगा तो तो उस मान कहां रहे हैं उसको आज के लोग उसको मान कहां रहे हैं नहीं मगर आपका वो क्या है प्रोटोकॉल क्या उसको दोबारा गुरुकुल जाना पड़ेगा फिर गुरु से चेक कराना पड़ेगा मेरा कर्म और स्वभाव जाएगा नहीं जाएगा मतलब जो एक बार गुरु ने दे दिया वही जीवन पर्यंत रहेगा रहना चाहिए बिल्कुल उसको बदल नहीं सकते उस धर्म का पालन करना चाहिए और उसको बदल नहीं सकते एक ही बार जो गुरु ने कह दिया सो रहेगा गुरु ने घोषित कर दिया वो बात है कि आपके गुण कर्म के अनुसार जो घोषित कर दिया बता दिया उस गुरु गुरु ही कर सकता है घोषित और कोई नहीं कर सकता और दूसरी बात एक बार अगर गुरु ने कर दिया तो दोबारा वो नहीं बदल सकता ऐसा है वर्ण परिवर्तनीय है इसके अनुसार दोबारा सते गुरु के पास अब गुरु के पास गुरु पास ो जा पाएंगे जब बदल रहे लोग वो क्या पाएगा वो नहीं पूछ रहा हूं शास्त्र क्या कहते तेरे लिए कर्तव्य और अ कर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण है शास्त्र क्या कहते हैं जाना जाना है उसको गुरु के पास दोबारा जब अपना कर्म बदल लिया उसने तो उसको जाना चाहिए उसको जाना चाहिए कि जो है भाई हमने हम अपना य मतलब जितनी बार भी वो वो करता रहे अपना कर्म चेंज करता रहे तोव गुरु के पास जा जाकर अपना कर्म
01:01:26:07 कितनी बार कोई चेंज करेगा कर्म चेंज करने से जो है व नहीं करेगा कि नहीं वह नहीं है नियम क्या है वह तो करेगा कि नहीं व बात की बात है कई लोग हैं जो जीवन पर्यंत एक ही कर्म में रहते हैं कई लोग हैं 10 नौकरियां छोड़ बदल चुके तो वो करेगा कि नहीं करेगा वो तो एक अलग बात है मगर वो जाएगा कि नहीं गुरु के पास ही एक वो है कोई आवश्यकता नहीं है जैसे कि एक ही आदमी है मैं जब पढ़ने पढ़ाने का काम करता हूं तो मैं ब्राह्मण धर्म में हूं तो आप हर बार यज्ञ पवित उसके अनुसार करते हैं क्या क्यों करेंगे क्या बदलेंगे कतल घोषित होना चाहिए ना कि अब आप ब्राह्मण हो समाज को पता होना चाहिए ना नहीं नहीं उसको कि अब आप ब्राह्मण नहीं हो अब आप ब्राह्मण हो ये समाज समाज को इसलिए जिससे आपकी उपयोगिता हो सके समाज को कि वो वक्त आने पर आपका आपसे एक मदद ले सके उसको मालूम होगा य ब्राह्मण रहता है तो आएगा ना वो कि मुझे वेद पढ़ा दो उसको मालूम होगा कि यहां क्षत्रिय रहता है तो आएगा ना वो यहां वो कर दो तो आपका ये पता होना चाहिए ना आपके आसपास समाज को आप कौन हो जी ये चीज अच्छा इसमें अब एक चीज और आ जाती है लास्ट में हम
01:02:29:08 कि जैसे आर्य समाज जब कर्म के अनुसार मानता है और यज पवित कराता है लोगों का तो वह भी अपने पास पहले लोगों को रखता है कई दिनों तक गुरुकुल में आचार्य गुरुकुल में रखता है अच्छ और जब भी किसी को अपना कर्म चेंज करके और कराना हो कि मैं ठाकुर हो गया ठाकुर के हिसाब से कर समाज नहीं करता है गुरुकुल में व्यवस्था है आर समाज के गुरुकुल समाज के गुरुक आर समाज के गुरुकुल तो तो क्या आर्य समाज किसी को वैश्य भी बनाता है कि सबको ब्राह्मण बनाता है सबके जो जग पवित्र ब्राह्मण के अनुसार होते हैं या किसी के वैश किसी के ठाकुर के अनुसार भी ठाकुर का भी मिलता है किसी कोय क्षत्रिय है वो तो गुरुकुल में जब जाते हैं विद्यार्थी तब उसके अनुसार उ तय करते हैं बताते हैं आर्य समाज में यहां पर हम लोग थोड़ा उसको बनाते हैं गुरुकुल गुरुकुल में आर्य समाज के गुरुकुल में ब्राह्मण के अलावा दूसरे वर्ण आचार्य जो होते ब्राह्मण के अलावा दूसरे वर्ण बनाए जाते हैं वैश्य घोषित किया जाता है कि तुम वैश्य हो तुम क्षत्रिय तुम ब्राह्मण नहीं हो ऐसा होता है नहीं अभी इस तरह की बात तो नहीं मतलब सिर्फ ब्राह्मण ही घोषित होते हैं सबके सब संस्कार उसके गुण कर्म स्वभाव अनुस कराया जाता है मतलब घोषित मैं कह रहा हूं जो आप कह र घोषित करते हैं तो घोषित ब्राह्मण के अलावा कोई कुछ और भी होता है या केवल
01:03:44:20 ब्राह्मण ही घोषित होते हैं आर समाज से शुरू में तो य संस्कार होता है तो केवल संस्कार होता है में बताया जाएगा ना तुम आपने ही कहा ना गुरु बताएगा तो बताते हैं ना कि तुम ब्राह्मण उस समय नहीं बताते हैं फिर ध्यान रखें उसका गुण कर्म का जो है विवेचना करते रहते हैं देखते रहते हैं किस तरह का स्वभाव उसके अनुसार बताते हैं तो मैं बाद में बताते तो बताते तो हैं तो फिर वही कह रहा हूं कि ब्राह्मण घोषित करने के अलावा और कुछ घोषित करते हैं कि नहीं करते हैं जब यह विधान है तो करते ही है अच्छा मतलब ब्राह्मण के अलावा यह भी बताते हैं कि तुम ब्राह्मण नहीं तुम क्षत्रिय हो और तुम क्षत्रिय भी नहीं हो तुम वैश्य हो तो यह भी बताते हैं कि तुम वैश्य नहीं हो तुम शूद्र हो ये किसी को बताया आज तक आर्य समाज ने अब इस तरह के इस तरह की चीजें होंगी तो क्यों नहीं बताया जाएगा बताते ही होंगे अच्छा मेरी जानकारी में ऐसा नहीं है कि आर्य समाज ने शूद्र भी किसी को घोषित किया हो ऐसा है क्या नहीं शूद्र नहीं घोषित किया शूद्र किसी को आर्य समाज घोषित नहीं तो शूद्र का अस्तित्व ही नहीं है फिर तो नहीं ऐसा क नहीं है जो कहा तो जन्मना जाए थे शूद्र नहीं आर्य समाज ने किसी को शूद्र कहा नहीं कहा क्यों नहीं कहा मतलब उसके हिसाब से ऐसा व्यक्ति है ही नहीं दुनिया में जो वेदों के लिए बुद्धि नहीं रखता है
01:05:00:02 या जो उनी प्रज्ञा शक्ति नहीं है नहीं दूसरे कामों में उसकी उपयोगिता हो सकती है हा हा बिल्कुल है तो फिर वो उसने घोषित क्यों नहीं किया अगर है तो घोषित करने की आवश्यकता जन्म जैसे ब जैसे वो किसी को आचार्य कह रहा है किसी को ब्राह्मण कह रहा है ठोक बजा के तो ऐसे किसी को शूद्र क्यों नहीं कह रहा है उसके अंदर योग्यता नहीं है तो शूद्र तो है ही कोई किसी तरह की योग्यता नहीं है तो जैसे वो घोषित कर रहा है वर्ण घोषित किए जाने चाहिए ना तो शूद्र आर्य समाज से जुड़े हुए जितने भी व्यक्ति आर्य समाज को मानते हैं उम उनमें कोई भी शूद्र घोषित हुआ है आज तक नहीं शोषित नहीं हुआ तो अकॉर्डिंग टू आर समाज की जो थ्योरी है उसके अनुसार सारा सारी दुनिया अगर आ समाजी हो गई तो शूद्र का तो अस्तित्व ही नहीं रहेगा और जो अज्ञानी सभी ब्राह्मण बन के घूमेंगे अज्ञानी अज्ञानी जो है वो शूद उनका भी तो यज्ञ पवित होता है किसका हां तो आना चाहेंगे तो क्यों नहीं हो तो फिर यज्ञ पवित हो गया तो शूद्र कहां रहा शूद्र नहीं रहा बु ठीक है तो ये एक चीज है तो ये थी हमारी एक साधारण सी चर्चा जो काशी का शास्त्रार्थ स्मृति स्थल है वहां पर बैठ कर के बहुत सज्जन है जो आर समाज से यहां पर है हमारे साथ इन्होंने हमें समय दिया आपका बहुत-बहुत आभार और मैं आशा
01:06:15:06 करता हूं कि हमारे दर्शकों को काफी कुछ जानने को सीखने को मिला होगा जिससे कि उनकी जो जागरूकता है धर्म अध्यात्म के विषय में वो आगे बढ़ेगी सभी को जय श्री राम j [संगीत]
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काशी शास्त्रार्थ स्थल के आर्य समाजी #satyarthprakash #आर्यसमाज #शूद्र
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