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00:00:02:06 कुछ लोग कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र इन चार वर्णों की व्यवस्था कर्म पर आधारित है जन्म पर नहीं इस पर में भगवत गीता के चौथे अध्याय के 13वें श्लोक को कोट करते हुए कहते हैं कि भगवान ने चार वर्णों की सृष्टि गुण और कर्म के आधार पर की है इसलिए भगवत गीता के अनुसार वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित है जन्म पर नहीं दूसरे शब्दों में कहे तो अगर हमारे कर्म ब्राह्मण वाले हैं तो हम ब्राह्मण हैं क्षत्रिय वाले हैं तो हम क्षत्रिय हैं वैश्य शूद्र वाले हैं तो वैश्य शूद्र हैं लेकिन यहां पर सोचने वाली बात यह है कि हमारा वर्ण अगर हमारे कर्मों के आधार पर है तो फिर किन कर्मों के आधार पर है इस जन्म के कर्मों के आधार पर है या पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर है छांदोग्य उपनिषद 10 57 में कहता है कि पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर जीव को अगले जन्म का शरीर और शरीर का वर्ण प्राप्त होता है अर्थात वर्ण व्यवस्था पूर्व जन्म के कर्मों पर आधारित है पूर्व जन्म के कर्म के आधार पर हमें जन्म से ही ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र का शरीर प्राप्त होता है तभी तो यह वर्ण व्यवस्था कहलाती है नहीं तो अगर वर्ण व्यवस्था का यह अर्थ लिया जाए कि जो जैसा कर्म कर रहा है उसका वर्ण वही है अगर कोई ब्राह्मण का कर्म कर रहा है तो वह ब्राह्मण है अगर ब्राह्मण का कर्म छोड़कर क्षत्रिय
00:01:17:26 का कर्म कर रहा है तो वो क्षत्रिय है क्षत्रिय का कर्म छोड़कर वैश्य शूद्र का कर्म करने लगता है तो वो वैश्य शूद्र है अगर ऐसा है तो यह वर्ण व्यवस्था कहां है यह तो व्यवस्था है जिसका जैसा कर्म करने को मन कर रहा है वो वैसा ही कर्म कर रहा है जिसका जो कर्म छोड़ने को मन कर रहा है वो उस कर्म को छोड़ रहा है इसी अव्यवस्था के अनुरूप अर्जुन का मन भी क्षत्रिय के कर्म को छोड़ने का कर रहा था लेकिन भगवान ने साफ मना कर दिया भगवान ने कहा अर्जुन तू क्षत्रिय है इसलिए तुझे क्षत्रिय का कर्म करना ही चाहिए अर्थात क्षत्रिय को क्षत्रिय का कर्म छोड़ना नहीं चाहिए उसी तरह ब्राह्मणों को ब्राह्मणों का कर्म छोड़ना नहीं चाहिए वैश्य को वैश्य का कर्म छोड़ना नहीं चाहिए और शूद्र को शूद्र का कर्म छोड़ना नहीं चाहिए इसलिए ब्राह्मण को ब्राह्मण बने रहने देना चाहिए क्षत्रिय को क्षत्रिय बने रहने देना चाहिए जैसे भगवान ने क्षत्रिय अर्जुन को क्षत्रिय ही बने रहने दिया अपना वर्ण नहीं बदलने दिया अर्जुन के चाहने पर भी क्योंकि हमारा वर्ण बदलने का अधिकार भगवान को है किसी और को नहीं भगवान जब हमें मनुष्य का शरीर देते हैं तो पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर मनुष्य शरीर का वर्ण भी देते हैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र बनाने का काम भगवान का है हमारा नहीं इसलिए अगर हम यह सोचे कि अगर किसी
00:02:33:00 ने 16 माला घुमा दी 16 किताबें पढ़ ली 16 किताबें बांट दी और 16 प्रवचन कर दिए तो उसका यज्ञोपवित कर दो ब्राह्मण बना दो तो हमसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं क्योंकि ब्राह्मण बनाने का काम भगवान का है तुम क्यों भगवान बन रहे हो बिना सरकारी लाइसेंस के हथियार देने का अधिकार तुम्हें किसने दिया हां तुम भगवान के नाम का कीर्तन कराओ हर एक से कराओ यज्ञोपवित क्यों करते हो अनाधिकार हों का यज्ञोपवित के बिना भक्ति नहीं होती क्या यज्ञोपवित के के बिना कृष्ण भावना मृत में उन्नति नहीं होती क्या प्रभुपाद जी ने जो कृष्ण भावना मृत शब्द दिया है उसका सीधा संबंध भावना से है और भावना का संबंध मन से है और तुम लोग तन का यज्ञ पवित्र करने में लगे पड़े हो भागवत में 11142 में श्री कृष्ण ने ब्राह्मण शरीर को दुर्लभ बताया है लेकिन तुम लोगों ने उसे भी सुलभ बना दिया है यज्ञो पवित ही तो करना है वो अधिकारी हो या ना हो अगर तुम कहो कि भागवत में 79 10 में भगवत विमुख ब्राह्मण से चांडाल भक्त को श्रेष्ठ बताया गया है तो यहां पर भक्त की महिमा बताई गई है यह बताया गया है कि भक्त होने के लिए ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है ब्राह्मण जैसा दिखना जरूरी नहीं है तो तुम क्यों यज्ञ पवित करके ब्राह्मण जैसा दिखना चाहते हो भागवत में ही 3337 में कहा गया है कि जो भगवान के नाम का उच्चारण करते हैं उन्होंने तप
00:03:48:06 भी कर लिया हवन भी कर लिया तीर्थ स्नान सदाचार पालन और वेदा अध्यन सब कुछ कर लिया ऐसा मान लिया जाएगा लेकिन यज्ञोपवित हो गया ये नहीं माना जाएगा वो हम करवा क्योंकि यज्ञ पवित सबसे जरूरी है तप जरूरी नहीं है उसे तप नहीं करने देंगे हवन भी नहीं करने देंगे यह बस यज्ञ पवित कर देंगे यह तप हवन सदाचार पालन भिक्षा न यह सब ब्राह्मणों के लिए आवश्यक है लेकिन इकोन के द्वारा घोषित तथाकथित ब्राह्मणों के लिए नहीं क्योंकि इतना कष्ट उठाने की उनमें योग्यता नहीं
00:04:22:24 [संगीत]
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