⬜ Not used yet · 00:00:00:03 – 00:22:01:22 (22:02)
00:00:00:03 मगर क्या ऐसा है कि हमने किसी को भी दीक्षा दे दी और वो कहीं पर भी जाकर के अपने हिसाब से और फिर अपने आप को ऐसे प्रस्तुत करने लगे कि मधवा चार्य जी की तरफ से या शंकराचार्य जी की तरफ से या रामाचार्य की तरफ से प्रामाणिक वक्तव्य प्रस्तुत कर रहा ह अगर इसन का संबंध गुरु परंपरा से है तो गुरु परंपरा का मतलब होता है कि हम जिस परंपरा से जुड़े हैं उस परंपरा के आचार्य ने जो सिद्धांत दिया जो मान्यताएं स्थापित की उन्ही मान्यताओं को हम आगे फॉलो करें तो वर्तमान में देखते हुए इकान की जो परिस्थिति है जो इकान में वर्णाश्रम की िया उड़ाई जा रही है लेकिन वे भ हु लोग है और उनके द्वारा सनातन धर्म का बहुत बड़ा नुकसान धर्म सम्राट स्वामी कपा जी महाराज पंडित कालूराम शास्त्री जी और पुरी के शंकराचार्य जी उस समय श्री निरन देव महाराज कलयुग में अधर्म सीधे नहीं आएगा सीधे अधर्म आएगा तो हम उसका तिरस्कार कर देंगे तो अधर्म जो है धर्म का चोला ओ करके आए अपशब्द और गालियों का प्रयोग वही व्यक्ति करता है जिसकी बुद्धि में भक्ति नहीं है ज्ञान नहीं है द है अथवा पाखंड करते का एक टव उन्होने बनाया है वैष्णव इसीलिए हम वणवा चार्य परम वणवा शरण में आए वो इससे हमें बताए कि इसका कैसे क्या उपाय तो सभी को जय श्री राम जैसा कि आप सबको पता है हम आवान के जरिए युद्ध स्तर पर जो धर्म का विकृत स्वरूप
00:01:15:22 प्रस्तुत करने वाली सनातना भाषी संस्थाएं हैं शोधन की दृष्टि से उनकी जो वास्तविकता है वह समाज के ला समाज के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं तो ऐसे में कई ऐसी भी संस्थाएं हैं जो स्वयं को किसी परंपरा संप्रदाय इत्यादि से जोड़कर प्रस्तुत करती हैं जिससे कि उनका जो भ्रम का जाल है वह और ज्यादा मजबूती के साथ जो है समाज में फैलता है तो इसी संबंध में जो सांप्रदायिक वाली बात है तो इसी संबंध में आज हम आए हैं शरण में जगतगुरु राघवाचार्य जी महाराज जी इनके परिचय की कोई नहीं हो सकते इनके परिचय के लिए फिर भी जो हमारे परम पूज्य आचार्य रामानुजाचार्य जी थे उनके द्वारा जो परंपरा है उनकी जो परंपरा है श्री परंपरा उनमें आज जो पीठाधीश्वर है आज राघवाचार्य जी महाराज है उनकी शरण में आजम आए हैं और आज इनके कुछ शास्त्रोक्त और प्रामाणिक वक्तव्य हम प्राप्त करेंगे ऐसे जो सनातना भाषी तंत्र है जो धीरे धीरे दीमक की तरह से अंदर से हमारे सनातन धर्म को खोखला कर रहे हैं महाराज जी के चरणों
00:02:31:13 में हृदय से प्रणाम निवेदित करते हुए मैं अपना जो है वक्तव्य प्रस्तुत करूंगा महाराज जी से और मेरा बहुत सौभाग्य है जो हम लोग कुंभ में आए और महाराज जी से इस प्रकार से हमें समय मिल पाया महाराज जी सर्वप्रथम जैसे हम बात करें स्कन संस्था है जो स्वयं को मधवा चार्य जी से जोड़ कर के बताती है कि हम मधवा चार्य की परंपरा से हैं और फिर वह वर्णाश्रम धर्म की धज्जिया उड़ाते हुए कर्म से भी मानते हैं और किसी को भी ब्राह्मण दीक्षा देते हैं जैसे अभी हमारे साथ में कल भी एक वृतांत हुआ है मैं अभी बताऊंगा आगे तो वो बड़ा उससे बताते मुझे ब्राह्मण दीक्षा हुई है भले ही उनका जन्म किसी भी उसम हुआ हो तो यह स्वयं को मधवा चार जी से जोड़ केर बताते मधवा परंपरा अच्छा मुझे जहां तक ज्ञात है महाराज जी की कोई जो पीठाधीश्वर होता है जैसे रामानुजाचार्य जी की गद्दी पर जो बैठेंगे जगतगुरु वो अपना उत्तराधिकारी चुनेंगे और उसके बाद वो वो डिसीजन लेगा कि अगला उत्तराधिकारी कौन होगा यूं ही कोई अपने आप को प्रामाणिक रूप से किसी
00:03:47:07 संप्रदाय से नहीं बता सकता कि मैं उनका उत्तराधिकारी हू तो यह इस पर थोड़ा सा प्रकाश डाल दीजिए जो माधव परंपरा है श्री माध मुनि की जो परंपरा है वह तो परम पवित्र परंपरा है सनातनी परंपरा है जी लेकिन उन उस परंपरा से इनका संबंध अगर इसकन का संबंध गुरु परंपरा से है तो गुरु परंपरा का मतलब होता है कि हम जिस परंपरा से जुड़े हैं उस परंपरा के आचार्य ने जो सिद्धांत दिया जो मान्यताएं स्थापित की और जिन मान्यताओं पर वे आचार्य चलते हैं उन्हीं मान्यताओं को हम आगे फॉलो करें उसे आगे बढ़ाए तो वर्तमान में देखते हुए इकान की जो परिस्थिति है जो इकान में वर्णाश्रम की धज्जियां उड़ाई जा रही है विदेशियों को मलेच्छ को त्रिदंडी पहनाया जा रहा है गो मांस भक्षण करने वाले जो ईसाई कम्युनिटी के लोग हैं वे लोग भी आकर के यगोपवित पहनकर तिलक लगाकर लोगों को मंत्र की दीक्षा देकर के गुरु और आचार्य बनने की जो चेष्टा कर रहे हैं और पाखंड फैला
00:05:02:09 रहे हैं उनके इस आचरण से यह प्रतीत होता है कि उन्होंने अपने संप्रदाय की परंपरा को स्वीकार नहीं किया माध परंपरा की जो मान्यताएं थी जो सिद्धांत जो सनातनी परंपरा थी उसको स्वीकार नहीं किया अगर उसे स्वीकार करते तो उनकी भी परंपरा विशुद्ध और पवित्र होती और वो वर्णाश्रम धर्म की मान्यताओं को मानते तो इससे य लगता है कि इनकी इकान की कोई परंपरा मा गौड़ से जुड़ी हुई नहीं है अभी तो वो बच्छ लोग है भटके हुए लोग हैं जी जी महाराज जी अच्छा इसमें एक ये चीज है जैसे कि जो जगतगुरु की गद्दी पर बैठे हैं उन्होंने अगर किसी को अपना प्रतिनिधि चुना उत्तराधिकारी चुना वो तो कह सकता है कि मैं रामानुजाचार्य परंपरा की ओर से एक प्रमाणिक वक्तव्य दे रहा हूं मगर क्या ऐसा है कि हमने किसी को भी दीक्षा दे दी और वो कहीं पर भी जाकर के अपने हिसाब से और फिर अपने आप को ऐसे प्रस्तुत करने लगे कि मधवा चार्य जी की तरफ से या शंकराचार्य जी की तरफ से या रामानुजाचार्य जी की तरफ से प्रामाणिक वक्तव्य प्रस्तुत कर रहा हूं क्या ये संभव है दीक्षा तो एक उपासना के लिए होती है जी और उपासना की दृष्टि से कोई भक्त आत्म कल्याण के लिए दीक्षा लेकर के भजन पूजन करे वह सामान्य दीक्षा सभी को दी जाती है जी और कोई भी जीव मात्र प्राणी मात्र भगवान की भक्ति का अधिकारी है इस दृष्टिकोण से
00:06:18:06 और रही बात परंपराओं के संरक्षण की तो परंपराओं के संरक्षण के लिए जो उत्तराधिकारी नियुक्त किया जाता है वह योग्य हो और उस मत और सिद्धांत को विधिवत जानता हो और आचार्य ने उसको परंपरागत रूप से स्वीकार किया हो और विशेष रूप से आचार्य पीठ पर बैठने का अधिकार केवल ब्राह्मण मात्र को है ब्राह्मण ही आचार्य हो सकता है क्योंकि आचार्य का जो लक्षण लिखा आचार्य वेद संपन्न विष्ण भक्तो विमसर मंत्र मंत्र भक्त सदा सदा सत्या सुच सत संप्रदाय सं जुक्तो ब्रह्म विद्या विशारद ब्रह्म विद्या विशारद सत संप्रदाय से संयुक्त ब्राह्मण योग्य वेदज व्यक्ति को ही आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया जाता है इसीलिए आचार्य लोग जीवन काल में ही अपने योग्यतम उत्तराधिकारी का प्रस्ताव करके और उसकी घोषणा करके उसको प्रतिस्थापित कर देते हैं इसी कारण से आज तक समस्त आचार्यों की परंपराएं अविच्छिन्न रूप से संरक्षित और सुरक्षित बनी हुई है व परंपराएं जीवंत है लेकिन उन परंपराओं से जुड़कर उन परंपराओं का केवल सिंबल लगाकर कुछ लोग अपना मत प्रचार करने के लिए अपने पाखंड का विस्तार करने के लिए यत्र तत्र करते रहते हैं लेकिन वे हुए लोग हैं और उनके द्वारा सनातन धर्म का बहुत बड़ा नुकसान
00:07:33:07 है ऐसे लोगों के द्वारा सनातन धर्म को बहुत बड़ी हानि है व सनातन धर्म को घुन के समान भीतर भीतर चाट रहे हैं और सामान्य जनता उनके बाह्य आडंबर को देखकर भक्ति का आडंबर देख कर के उससे प्रभावित होती है और सोचती बहुत अच्छा कर रहे हैं हमको इनसे जुड़ना चाहिए लेकिन स सामान्य जनता को भी यह विचार करना चाहिए कि जो वेद और वेद के दोनों भाग वेद को तो आर्य समाज भी मानता है लेकिन संहिता भाग को मानता है को नहीं मानता जबकि मंत्र ब्राह्मण यो वेद नाम धेयम मंत्र और ब्राह्मण अर्थात संगीता और ब्राह्मण ग्रंथ दोनों मिलाकर के वेद का पूर्णत्व है वेद वेद राशि मानी जाती है तो जो संगीता ग्रंथ को ब्राह्मण ग्रंथ को वेद माने और स्मृतियों को प्रमाण माने और इतिहास भागवत महाभारत और रामायण और वेदव्यास की रचना 18 पुराण इन श्रुति स्मृति इतिहास पुराण को जो प्रमाण के रूप में स्वीकार करता हो और आगम ग्रंथों में जो आगम ग्रंथ वेद के अनुकूल है शति स्मृति के अनुकूल है उन आगम को प्रमाण मानकर जीवन यापन करता हो या धर्म के पथ पर चल रहा हो उसी को हम सनातनी कह सकते हैं वही सनातनी हो सकता है और बहुत अच्छा तो आचार्य जी जहां तक मेरी जानकारी
00:08:48:20 है जो मधवा परंपरा है उसमें किसी ने भी इसकन से जुड़े हुए किसी व्यक्ति को अपना उत्तराधिकारी तो घोषित नहीं किया है मध परंपरा के किसी भी व्यक्ति ने इस को अपना उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया और आज तक हमें जहां तक ज्ञात है हो सकता है कि हमारा ज्ञान पूर्ण ना हो परंतु जहां तक हमें जत है कि माधव परंपरा के लोग स्थान को अपना अंग नहीं मानते मा जो पवित्र परंपरा है माध मुनि की उस परंपरा में जो मान्यताएं है उनके अनुसार आज भी इस कान को व अपना अंग नहीं मानते या अपने से निकला हुआ भी नहीं मानते आचार श्री इस तथ के साथ फिर हम कह सकते हैं कि स्कोन द्वारा यह कहना कि हम मधवा संप्रदाय से हैं यह तार्किक उचित प्रमाणिक सिद्ध नहीं होता सीधी सधी बात है अगर आप माधु संप्रदाय के तो माधु की मान्यताएं आपके जीवन में कहां दिखाई पड़ रही है ये कहने की जरूरत थोड़ी है हम कहते हैं हम किसी परंपरा से जुड़े हैं तो हमको प्रमाण देने की हमारा आचरण ही स्वयं में प्रमाण होता है जी आचरण ही प्रमाण होता है कोई पूछे कि हम रामानु संप्रदाय के हैं तो प्रमाण क्या है बोले रामानु संप्रदाय का तिलक लगाते हैं रामानु संप्रदाय वर्णाश्रम को मानता हम वर्णाश्रम को मानते हैं हमारी परंपरा में संख चक्र के चिन्ह अंकित किए जाते हैं वो चिन्ह अंकित किए जाते हैं
00:10:04:01 और तीन मंत्रों की दीक्षा होती है मूल मंत्र द मंत्र चरम मंत्र उन मंत्रों की परंपरा हमारे यहां हम विशिष्टा वेद को मानते हैं और रहस्य वेदांत और बाद वेदांत दोनों वेदांत का हम लोग अनुशीलन करते हैं तो यह जो चीजें है संप्रदाय की अपनी अंतर्भरती करे वही उसका अनुयाई कहा जा सकता है तो माद गौड़ की जो परंपरा है माग का जो सिद्धांत है उनके यहां आज भी वर्णाश्रम की व्यवस्था मान्य है जो आचार्य होते हैं योगत ब्राह्मण होते हैं सन्यासा आदि की दीक्षा जो होती है वह श शास्त्र अनुकूल होती है वेदा आदि का अध्ययन उनके यहां परंपरागत होता है और आचार विचार और शुद्धता आहार इत्यादि की शुद्धि इन सब विषयों पर माधव परंपरा में जो पवित्र विचार है उस विचारों का अगर वो अनुसरण करते हैं त भले उनको कहा जाए कि भाई आप उनके अनुयाई है अथवा उनके मत को आप स्वीकार करते हैं लेकिन आप तो सर्वथा उनके विपरीत आचरण करने वाले हैं इसलिए किसी भी तरह से उ उनका अंग कैसे माना जा सकता है जी अच्छा आचार्य श्री जैसे कि हमें यह ज्ञात है कि स धर्म यानी सनातन को नष्ट करने के लिए जो ताकत हैं वह कभी नास्तिकता के जरिए कभी विधर्मी हों के जरिए और कभी सनातना भास के जरिए जो है हमें नष्ट करना चाहती तो उनका मेन
00:11:19:02 टारगेट होता है वर्णाश्रम धर्म को नष्ट करो जिसे कि इनके व ब्राह्मण हो जाए हो जाए सनातन धर्म जी सनातन धर्म के जितने भी द्रोही अथवा सनातन को स्वीकार करने का सामर्थ्य नहीं रखते हैं सनातन को नष्ट करना चाहते हैं उन लोगों का मूल रूप से विविध प्रकार से जो प्रहार है वो वर्णाश्रम धर्म पर ही क्योंकि सनातन धर्म का मतलब ही वर्णाश्रम धर्म है वर्ण और आश्रम के अनुकूल धर्म जहां है वही वर्णाश्रम धर्म सनातन धर्म है और वर्णाश्रम पर प्रहार का मतलब है संपूर्ण सनातन पर प्रहार सनातन की समस्त परंपराओं का उे करना इसी संदर्भ में यह लोग दो तीन कुछ बातें कहते हैं तो उसमें मैं आप आपसे पूछना चाहूंगा एक यह कहते हैं सबसे पहले यह कहते हैं कि जो वर्ण है वह जन्म से नहीं कर्म से होता है और इसके लिए सहारा लेते हैं यह भगवत गीता का 41 का चातु वर्ण्य मया सटम गुण कर्म वाला जो श्लोक है तो उस पर थोड़ा सा प्रकाश डाल देखिए जन्म और कर्म कुछ लोग कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था को मानते हैं जाति और वर्ण मूलतः अर्थ
00:12:34:04 देखा जाए तो जाति का मतलब ही होता है जायते जाति जो जन्म से हो उसी को जाति कहते हैं तो जन्म से जिसका निर्धारण हो उसी को जाति कहा जाएगा तो ब्राह्मण एक जाति भी तो है ब्राह्मण वर्ण है और ब्राह्मण जाति है ब्राह्मण जाति होने के कारण उसम ब्राह्मण है क्षत्रिय जाति है इसलिए उसम क्षत्रिय है तो जाति का मतलब य होता है जन्म से जाति शब्द ही जन्म शब्द से जिस जाति में जिसका जन्म हुआ वही उसकी जाति निर्धारित होगी और जाति का वर्णाश्रम का जो वर्णन हमारे वेदों में है उन वेदों के आधार पर हम जब निर्धारण करेंगे तो वेद कहता है कि ब्राह्मण का यज्ञो पवित संस्कार बसंत ऋतु में हो बसंते ब्राह्मण उपन वेद कहता है कि ब्राह्मण का यज्ञोपवित बसंत ऋतु में हो क्षत्रिय का यज्ञोपवित संस्कार ग्रीष्म ऋतु में में हो शरद वैश्य वैश्य का यज्ञोपवित संस्कार शरद ऋतु में हो और कर्म के सिद्धांत मतलब कर्म से जाति और वर्ण को मानने वाले लोग कहते हैं कि जो वेद पढ़े वो ब्राह्मण जो ब्रह्म ज्ञानी हो वो ब्राह्मण तो ब्रह्म ज्ञानी और वेद पढ़ने के बाद वेद पढ़ कर के ब्रह्मज्ञानी बनेगा तब वह ब्राह्मण
00:13:49:12 बनेगा और वेद तब पढ़ेगा जब जजो पवित होगा और जजो पवित्र कब होगा तो उसके पहले ब्राह्मण जाति का वर्णन वेद कर रहा वेद कह रहा है कि ब्राह्मण बसंते ब्राह्मण उप बसंत ब्राह्मण की ब्राह्मण का यज्ञ उ पवित हो तो यह निर्धारण कैसे होगा कि ये ब्राह्मण है इसका यज्ञ पवित किया जाए बसंत ऋतु में तो वेद का जो तात्पर्य है वेदों का शास्त्रों का यही तात्पर्य है जाति जन्मना है जन्म से ही जाति है रही बात भगवान कृष्ण ने जो गीता में कहा कि चातु वर्णम मया सृष्ट गुण कर्म विभाग तो वो चारों वर्णों को भगवान ने बनाया और उनके गुण और कर्म का निर्धारण किया किसका गुण क्या है किसका कर्म क्या है और जोय कहते हैं कि कर्म के आधार पर वर्ण का निर्धारण हुआ तो कर्म के आधार पर भी वर्ण का निर्धारण होता है लेकिन पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर वर्तमान वर्ण का निर्धारण होता है अगर इस जन्म में हम ब्राह्मण होकर के ब्राह्मण धर्म का पालन ना करें पतित हो जाए तो अगला जन्म हमारा जो है अन्य वर्ण में होगा हीन जाति में होगा हीन वर्ण में हमारा जन्म होगा और इसी प्रकार कोई सामान्य है व्यक्ति लेकिन उसने सदाचरण पूर्वक धर्म का पालन करके जीवन व्यतीत किया तो उसका उत्कर्ष होगा अगले जन्म में वो जो है उच्च कुल में ब्राह्मण कुल में क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होकर के धर्म का पालन करेगा
00:15:04:15 तो पूर्व कृत कर्मों के आधार पर आगे का अगले जन्म के वर्ण का निर्धारण मानने में कोई आपत्ति नहीं है वह तो सिद्धांत है शास्त्र का और जो गीता में भगवान कहते भगवान कहते चारों वर्णों को मैंने उत्पन्न किया एक व्यवस्था परमात्मा ने दी और उस व्यवस्था के अनुकूल उनके कार्यों और कर्तव्यों का निर्धारण किया भगवान यह उसका तात्पर्य है न कि ये तात्पर्य है कि कर्म के आधार पर जाती कर्म के आधार पर वर्ण की व्यवस्था अगर मानी जाए तो सरे व्यक्ति पूजा पाठ करेगा तो ब्राह्मण होगा दोपहर में जाकर के मध्यान में वो रोजगार करेगा व्यापार करेगा रोजी रोटी करेगा तो भविष्य हो जाएगा तो सवेरे से शाम तक तो उसके कर्म का निर्धारण ही नहीं होगा जी जी उसके वर्ण का निर्धारण नहीं हो सकता और वर्ण निर्धारण के और जब तीनों काल में वो संध्या करेगा तो प्रातः काल संध्या में समात बोलना है ब्राह्मण को क्षत्रिय को बर्मा बोलना है वष बोलना है तो जब दिन भर में 10 बार उसका वर्ण बदलेगा तो किसी भी संस्कार और कर्मों में वो किस प्रकार से प्रयोग करेगा तो ये सब बहुत ओछे तर्क है इन लोगों के और इनको यही कहा जाएगा कि सनातन धर्म की मान्यताओं को यह समझ नहीं पाए अथवा समझने के बाद भी यह दुराग्रह पूर्वक वर्णाश्रम धर्म को नष्ट करने का षड्यंत्र करते हुए सनातन धर्म में घुस कर के अंदर से सनातन धर्म को कोकड़ करने का प्रयास कर रहे तो यह कहा
00:16:19:20 जा सकता है कि इन्होने इस श्लोक का जो हैथ किया जो जो भगवत पाद शंकराचार्य जी ने अर्थ किया जो भगवत पाद रामानुजाचार्य जीने अर्थ किया उससे भिन्न अर्थ करने की आवश्यकता क्या आचार्य चरणों ने जो अर्थ किया है वही अर्थ हम ग्रहण करें परंपरा जो अर्थ प्राप्त है उसी अर्थ को हम ग्रहण करेंगे जी जी जी अच्छा जब हम इनसे इस पर बात करते हैं तो फिर ये कहने लगते हैं कि जन्म और कर्म दोनों से है क्या यह संभव है जन्म कर्म से दोनों पूर्व जन्म का कर्म और वर्तमान का जन्म जन्म अब रही बात वर्तमान में ब्राह्मण कुल में क्षत्रिय कुल में वैश्य कुल में जिस कुल में जन्म हुआ अगर उस उस वर्ण का वह कर्म जो निर्धारित है उस कर्म में वह निरत नहीं है फिर भी वह जन्मना शरीरत ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कहलाएगा कर्महीन होने के कारण व सम्मान का पात्र नहीं होगा कर्महीन होने के कारण उसमें कर्म हीनता बनी रहेगी परंतु उसकी जाति समाप्त नहीं होगी जाति मरण पर्यंत रहेगी उदाहरण के तौर पर आप देख ले महाभारत में कथा है कि विदुर जी दासी पुत्र है और जब धृतराष्ट्र को मोह हुआ तो धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा कि आप भगवान के भक्त है ब्रह्म ज्ञानी है आप हमें तत्व का उपदेश करें जिससे
00:17:34:22 मेरा मोह नष्ट हो तो यद्यपि उनका कर्म सर्वोत्कृष्ट और श्रेष्ठ है विदुर जी का भगवान के परम भक्त है भागवत है लेकिन शरीर से दासी पुत्र होने के कारण उन्होंने इस मर्यादा को स्वीकारा और माना और विदुर जी ने कहा शूद्र योनह जात ब्रह्म नमते मैं दासी पुत्र हूं इसलिए मैं आपको ब्रह्म का उपदेश नहीं कर सकता ब्रह्म उपदेश आप किसी योग्य ब्राह्मण ऋषि से आचार्य से श्रवण करे तब भगवान स कुमार को बुला कर के उनके द्वारा धृतराष्ट्र ने ब्रह्मोपदेशम किया तो उनका मोह नष्ट हुआ यह सारी कथाए हैं तो और रही बात कर्म की जब बात करेंगे तो महाभारत में द्रोणाचार्य ने युद्ध कर्म किया तो युद्ध कर्म तो क्षत्रिय का कर्म है युद्ध कर्म करते हुए भी द्रोणाचार्य के ब्राह्मण का ब्राह्मण का हानि ब्राह्मण की हानि नहीं हुई यहा तक कि उनके पुत्र अश्वथामा के ब्राह्मण की हानि नहीं हुई शरीर वो ब्राह्मण है इसीलिए जब अर्जुन अश्वथामा को बांध करके ले आए तो भागवत में जो है द्रोपदी क्या कहती है द्रोपदी की इस धर्म निष्ठा को आप देखे द्रोपदी ने कहा स भगवान द्रोण प्रजा रूपते ये द्रोणाचार्य के पुत्र जो अश्वथामा है ये आचार्य ही है गुरु ही है और वहां पर द्रोपदी
00:18:49:28 ने यही कहा मुता मुता ब्राह्मण नित राम गुरु क्यों कहा द्रोपदी ने इसलिए कहा शरीरत वो ब्राह्मण कर्म क्त्र का कर रहे य जी और क्रूर भी है द्रौपदी के पांच पांच पुत्रों को मारा है कर्म की दृष्टि से विचार करें तो श्रेष्ठ कर्म नहीं किया अश्वथामा ने परंतु शरीर से ब्राह्मण होने के कारण उस धर्म को द्रोपदी ने स्वीकार किया और द्रोपदी ने कहा कि मुता मुता ब्राह्मण राम गुरु तो इस धर्म निष्ठा को देखकर वर्णाश्रम की इस निष्ठा को देखकर भगवान कृष्ण प्रसन्न हुए द्रौपदी के इस चरित्र से कि द्रोपदी में इतनी धर्म की निष्ठा य हमारा सना सनातन धर्म के रहस्य को भाव को जब तक व्यक्ति गंभीरता से नहीं समझेगा तब तक सनातन धर्म को जानना बड़ा कठिन अचा इसम पुत जाते की वैष्णव जो हो जाता है व ब्राह्मण से भी ऊचा होता सब एक हो जाते हैं ऐसा नहीं है वैष्णव भगवान भगवान का भक्त कोई भी हो श्रेष्ठ है भगवान के भक्त की महिमा है भगवान की भक्ति में अपने वर्णाश्रम धर्म के अनुकूल कोई भगवान की भक्ति में और भगवान का शरणागत है तो वह भक्त सामान्य प्राणियों से तो श्रेष्ठ है
00:20:05:26 और यह बात भागवत में भी कही गई है कि विप अरविंद ना पादा रविंद विम सुच ष तो वेदव्यास जी महाराज कहते कि अगर कोई ब्राह्मण ही हो और सकल शास्त्र निष्णात हो परंतु भगवान के चरणों में भगवान की भक्ति ना हो तो उसकी अपेक्षा अगर किसी स्वच में भगवान की भक्ति है तो वो स्वप अच्छा है तो यह एक प्रकार से ब्राह्मण की निंदा नहीं है वहां वेदज और शास्त्र के ब्राह्मण की निंदा नहीं है अथवा उस स्पति को उस ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ मानकर उसकी पूजा आराधना अथवा उस ब्राह्मण के द्वारा भी प्रणम में वो हो जाए यह सब सारी बातें नहीं है वहां केवल भक्ति की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करने के लिए इस प्रकार से कहा गया मतलब उसकी उपयोग उसको ब्राह्मण के रूप में उपयोग नहीं ले सकते करवाने ल ऐसा नहीं हो सकता वो यज्ञ कराने लग जाए उसम ब्राह्मण आ जाए वो दाना कर्म करने लग जाए और फिर वेदा अध्ययन का अधिकार हो जाए ये नहीं अतु केवल भगवत भक्ति की महिमा का प्रतिपादन करने के लिए भक्ति होने के कारण वह श्रेष्ठ है फिर वैष्णव तो एक ब्राह्मण भी हो सकता है वैष्णव तो कोई भी हो सकता है वैष्णव संपूर्ण सृष्टि ही तो वैष्णव
00:21:21:07 है जी जी विष्ण विष्ण विष्ण ध वैष्णव मसी विष्ण सृष्ट ही विष्णु की है जो विष्णु का हो वही तो वैष्णव है इसीलिए आज भी संकल्प में हम लोग बोलते हैं विष्णु श्रीम भग महारु तो भगवान विष्णु से संपूर्ण सृष्टि उत्पन्न हुई इसलिए संपूर्ण सृष्टि स्वत वैष्णव है उस वैष्णव का हमें केवल बोध करना है उस विस्मृति को छोड़कर हमें उस अपने स्वरूप का स्मरण करना है वो ज्ञान के द्वारा भक्ति के द्वारा उपदेश के द्वारा हम प्राप्त हो आचार श एक बहुत हमारे पूज्य आचार्य हुए पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी महान मतलब शास्त्रार्थ उनका बहुत नाम है और
✅ This part is already used · 00:22:01:22 – 00:22:59:04 (0:57)
→ Used in: B · Video शंकराचार्य को मायावादी कहने वाला #iskcon अर्धपागल निकला @swamiRaghvacharya जी ने... at 11:44 ↗
00:22:01:22 उन्होंने बहुत कालजई ग्रंथ लिखे क्यों क्यों दर्शन एक समय प्रभाव बहुत ज्यादा हो गया था आर्य समाज जो है पुराणों पर कटाक्ष कर रहा था यथोचित उत्तर उन्होंने समग्र रूप से उन्होंने दिया उसमें उन्होंने कई य वर्णाश्रम धर्म का भी पक्ष लिया उन्होंने उसमें जन्म से और यही जो आपने जो तथ दिए उन्होंने उसमें रखे और उसमें उन्होंने एक जोय माया अच्छ शास्त्रम वाला जो श्लोक है पदम पुराण का उसका भी खंडन किया उन्होंने उसमें उन्होंने कहा कि शंकराचार्य जी का जो सिद्धांत है वो भी शति सम्मत है और यह जो श्लोक है प्रक्षिप्त है उन्होंने शति के आधार पर उसको खंडित किया हम जब इस तत को ये जो संस्था है वि रूप से प्रस्तुत कर रही है परंपराओं के विरुद्ध कार्य कर रही है हम जब इस तत को रखते तो इनके लोग कहते हैं कि पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी प्रामाणिक आचार्य ही नहीं थे परंपरा
⬜ Not used yet · 00:22:59:04 – 00:24:18:20 (1:20)
00:22:59:04 के तो उनकी प्रमाणिकता माधवाचार्य जी रामानुज परंपरा के थे जी उनके पुत्र प्रेमाचा जी अभी कुछ दिन पूर्व उनका शरीर पूरा हुआ है प्रेमा आचार्य जी का और उसन प्रेमाचा जी का भी हमने दर्शन किया माधवाचार्य जी का तो हमने दर्शन नहीं किया उनके ग्रंथों का दर्शन हमने किया उस ग्रंथ में ही माधवाचार्य जी का हमने दर्शन किया उकी पाणी और लेखन के द्वारा माधवाचार्य जी रा शास्त्रार्थ महारथी स्वामी श्री माधवाचार्य जी महाराज रामानु संपदा की परंपरा के थे और विद्वान पुरुष थे शास्त्र निष्ठावान थे और उस काल में धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज पंडित कालूराम शास्त्री जी और पुरी के शंकराचार्य जी जो उस समय पूज बन श्री निरंजन देव तीर्थ जी महाराज श्री कृष्ण बध आश्रम जी और शास्त्रार्थ मारती स्वामी माधवाचार्य जी इन लोगों ने बहुत ही श्रम करके और बड़ी तपस्या और साधना से सनातन धर्म को जिस प्रकार पल्लवित और पुष्पित किया है उस कालक्रम में जब अंग्रेजों का काल था अंग्रेजों के बाद स्वतंत्र राष्ट्र में यहां की सरकार धर्म का पोषण करने लगी उस समय आर्य समाज हों को और ऐसे नास्तिकों
00:24:14:15 को उत्तर देकर के महापुरुषों ने बहुत बड़ा कार्य किया है
✅ This part is already used · 00:24:18:20 – 00:24:24:07 (0:06)
→ Used in: B · Video शंकराचार्य को मायावादी कहने वाला #iskcon अर्धपागल निकला @swamiRaghvacharya जी ने... at 12:54 ↗
00:24:18:20 और माधवाचार्य जी के विषय में ऐसा कहना कि वो पारंपरिक नहीं थे यह तो एक उनका
⬜ Not used yet · 00:24:24:07 – 00:27:16:18 (2:52)
00:24:24:07 अलाप है माधवाचार्य जी रामानु संप्रदाय की परंपरा के विद्वान थे और राणु संप्रदाय की जो परंपरा है सिद्धांत है उसको स्वीकार करते थे और हम लोग भी स्वीकार करते हैं और रही बात मायावादी और अद्वैतवाद की विशिष्टा द्वैतवाद कीय जो बाद है उन वादों का प्रयोग अपनी अपनी उपासना के लिए है तो अपनी अपनी उपासना की निष्ठा को दृढ़ करने के लिए ततत आचार्यों ने अपने अपने ढंग से अपने अपने बाद का प्रतिपादन किया है और कहीं न कहीं श्रुति में उसका मूल पाया है और श्रुति में उसका मूल पा कर के उसको पल्लवित और पुष्पित किया है वह उपासक का विषय है व विषय व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय है अपनी अपनी पद्धति से व्यक्ति उपासना करे लेकिन मूल रूप से जो सनातन धर्म का स्वरूप है श्रुति स्मित पुराण इतिहास की मान्यताओं को मानना वर्णाश्रम धर्म को मानना मूर्ति पूजा को मानना लोक परलोक को मानना पाप पुण्य की व्यवस्था यज्ञ आगा कर्मों की व्यवस्था उसमें हम सभी संप्रदाय के लोगों का मतक है उसमें कोई मतभेद नहीं है और उस मत पर हम सब लोगों को एक साथ चलते हुए सनातन धर्म का पोषण करना चाहिए आचार्य श्री एक अभी कल ही यहां पर एक घटना हो गई स्कन के पास एक व्यक्ति मिला जो प्रचार कर रहा था कि राम जी की भक्ति जो है वो व्यर्थ है राम जी निम्न
00:25:39:09 है राम जी जो है 12 कला के हैं राम जी कम पावरफुल है हमने जब उनको प्रतिकार किया कुछ अपना अल्प ज्ञान के जरिए तो वह हमें गाली गलोज बता रहा था कि मैं 28 साल से भक्त हूं और वो बाहर रहा है मतलब विदेशी भारतीय क्या कहा जाए इन लोगों को कला की बात है तो राम जी 12 कला और कृष्ण भगवान 16 कला भगवान तो सदा परिपूर्ण है पूर्ण मद पूर्ण विम पूर्णा पूर्ण मुद उनके सारे प्रश्नों का उत्तर यही एक श्रुति पर्याप्त है भगवान सदा पूर्ण है और भगवान किसी भी रूप में कभी अपूर्ण होते ही नहीं भगवान सदा परिपूर्ण है परिपूर्ण तत्व ही तो परमात्मा होता जो अपूर्ण है वो भगवान कहां से होगा तो अगर एक भी कला उसम कम रह गई तो अपूर्णता हो गई और अपूर्ण हुआ तो परमात्मा कैसे होगा तो परमात्मा तो हर स्थिति में परिपूर्ण है अब रही बात किस अवतार में और किस रूप में भगवान के कितने गुण प्रकाशित हो रहे हैं और कितने गुण जो है अंतर हित है बात केवल इनकी है और जहां तक पूर्णता की बात है तो भगवान सभी रूप में सदा परिपूर्ण है पूर्ण पूर्णम पूर्णा पूते पूर्णस पूर्ण मादा पूर्ण मेवा विशेष इसलिए हमारे यहां रामानु संप्रदाय में भगवान के सभी स्वरूपों को पूर्ण ही माना जाता है पूर्ण रूप से उनका अनुभव किया जाता है
00:26:55:08 और और जहां तक यह बात है कि राम जी की उपासना का वो निषेध करते हैं या वो लोग उसका अलाप करते हैं कि वो पूर्ण परमात्मा नहीं है तो उनका कारण यही है कि लोग राम से जुड़ेंगे राम की महिमा जानेंगे तो फिर हमसे कैसे जुड़ेंगे अन्य भगवान के स्वरूपों की उपासना में लगेंगे तो हम हम उनको कैसे अपने से जोड़ पाएंगे
✅ This part is already used · 00:27:16:18 – 00:27:31:25 (0:15)
→ Used in: A · Video #amoghlilaprabhu द्वारा #iskcon की चोरी छिपाने के कुतर्कपूर्ण प्रयास at 2:18 ↗
00:27:16:18 और उनकी एक छोटी मानसिकता यह भी मैंने देखी कि कुछ ऐसे भारतीय मूल के जो इस्कान से जुड़े हुए युवा वर्ग के लोग हैं उसमें कुछ लोग मेरे वक्तव्य को कथा को श्रवण करते हैं और
⬜ Not used yet · 00:27:31:25 – 00:27:47:01 (0:15)
00:27:31:25 उन्हें अच्छी लगती है बातें समझ में आती है जो भी है था ज्ञान हम जो कुछ सुना पाते हैं तो वो लोग एक दो बार मेरे पास मिलने के लिए आए और कहीं कथा में भी आए शायद दिल्ली की कथा में और एक बार आगरा की कथा में
✅ This part is already used · 00:27:47:01 – 00:28:54:24 (1:08)
→ Used in: A · Video #amoghlilaprabhu द्वारा #iskcon की चोरी छिपाने के कुतर्कपूर्ण प्रयास at 2:29 ↗
00:27:47:01 तो कथा में वो लोग बहुत दूर पीछे बैठते थे तो एक दिन हमने कथा के बाद उनको बुलाया और बुला कर के पूछा कि आप लोग भक्त है भगवान के आप लोगों को आगे बैठ कर के कथा श्रमण करना चाहिए तो रुचि भी होगी और सुनाने वाले को भी आनंद की अनुभूति होगी उन्होंने एक बड़ी गंभीर बात बताई कि स्वामी जी आपके यहां येय पर प्रसारण हो रहा है और यह रिकॉर्डिंग हो रही है य चैनल पर दिखेगा और कहीं कैमरा हमारी तरफ घूम गया और हम उसमें दिख गए तो हमारे इकान संस्था के जो लोग हैं वोह मुझे दंडित करेंगे और मुझे फटकार लगाएंगे कि दूसरे संप्रदाय के आचार्यों का प्रवचन सुनने क्यों गए दूसरे संप्रदाय के आचार्यों की कथा सुनने क्यों गए तो वे लोग यहां तक छोटी मानसिकता रखते हैं कि अन्य किसी महापुरुष की वाणी भी ना सुनी जाए कहीं हम उससे ख जाएगा भेद खुल जाएगा तो मूल रूप से व अपने भेद को खुलने से बचाने के लिए और अपने झूठ को और अपने आडंबर को सुरक्षित रखने के लिए वह अपने आदमियों को अपने से जुड़े लोगों को किसी अन्य आचार्यों के पास जाने का पर भी रोक लगाते
⬜ Not used yet · 00:28:54:24 – 00:37:19:00 (8:24)
00:28:54:24 कहीं आप ना जाइए ना किसी से मिलिए ना किसी के ग्रंथ पढ़िए उनकी कथा सुनिए ये बातें मेरे सामने भी आए लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं हमारे य सभी महापुरुषों का लोग प्रवचन श्रवण करते हैं और करना ही चाहिए हम कहते हैं जो सनातनी परंपरा के लोग है ऐसे लोगों का ही प्रवचन सुने अब तो मैं कथाओं में यह कहता हूं कि सबकी कथा मत सुनो कथा उन्हीं की सुनो प्रवचन उन्ही का सुनो जो सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुकूल प्रवचन करते हो अन्यथा सामान्य व्यक्ति दिग भ्रमित हो जाएगा धर्म के नाम पर उसे अधर्म का धर्मास धर्मास मिलेगा और कलयुग कभी कभी मैं कथाओं में कहता हूं कि कलयुग में अधर्म सीधे नहीं आएगा सीधे अधर्म आएगा तो हम उसका तिरस्कार कर देंगे तो अधर्म जो है धर्म का चोला ओढ़ करके आए जी धर्म का चोला ओढ़ करके अधर्म आएगा तो सामान्य व्यक्ति उसे धर्म समझ कर के एक्सेप्ट कर लेगा और करते करते एक दिन जब उसे पता चलेगा तो यह तो अधर्म है और वह धर्म समझ कर के अधर्म में प्रवृत हो जाएगा ये कलयुग में एक बड़ी विडंबना है तो इन चीजों से बचने की आवश्यकता है और बचने का एक ही उपाय है कि जो हमारे सनातनी मूल के आचार्य लोग हैं भगवान शंकराचार्य भगवान रामानुजाचार्य भगवान मधवा चार्य भगवान नि पार काचार्य श्री वल्लभाचार्य और स्मार्थ परंपराओं
00:30:09:26 में जो बड़े-बड़े महापुरुष विद्वान हुए उनके ग्रंथों का अनुशीलन करें उन्हीं की परंपराओं के अनुकूल जीवन यापन करें जिसकी जहां तक निष्ठा है जिस प्रकार की निष्ठा है और जिस देवता में जिसकी निष्ठा है पंच देव उपासक है तो पंचदेव की उपासना ततत संप्रदायों की निष्ठा है ततत संप्रदाय के मूल सिद्धांतों का अनुभव करते हुए सनातन धर्म के अनुकूल उपासना करें और कल्याण करें यही सुंदर मार्ग और सुव्यवस्थित मार्ग बस तो मैं थोड़ा सा बता दूं महाराज जी कि उसने जब हमने उसका ये प्रतिकार किया हमने तो महाराज माधवाचार्य शास्त्री जी ने अपने उसम दिया था वही तर्क हमने उससे दिया कि एक अग्नि है जो यहां पर जल रही तो उसने कम जलाया चीजों को एक अग्नि जो यहां जल रही है उसने ज्यादा जलाया तो क्या यहां की अग्नि ने क्योंकि कम चपेट में आई चीज तो क्या इसकी दाह क्षमता कम है इसकी गरमाहट कम है तो वो ममती हमको गालिया देने लगा यह सब तथ्य सुनकर और वह बता रहा था कि हम 28 साल से उसम है भक्ति में और स्कोन की प्रीचिंग करते मतलब पढ़ाने जाते हैं कॉलेजेस में और वो हमको मां बहन की गालियां देते हुए वहां से गया जाने दीजिए अगर 28 साल भक्ति करने के बाद यही उनकी बुद्धि में आया किसी व्यक्ति से तर्क करके उसको गालिया दी जाए तो फिर भक्ति कहां है अगर वास्तव
00:31:25:01 में 28 साल भक्ति किए होते तो ऐसी उनकी बुद्धि हो हो किसी के लिए अपशब्द का प्रयोग करते अपशब्द और गालियों का प्रयोग वही व्यक्ति करता है जिसकी बुद्धि में भक्ति नहीं है ज्ञान नहीं है दम है अथवा पाखंड है और जिसके हृदय में भगवान की भक्ति होगी और 28 साल तक जिसने भगवान की उपासना की उसके अंदर भगवान का कुछ तो गुण आएगा भगवान का कुछ भी गुण भगवान की कुछ भी विशेषता तो उसके जीवन में आनी चाहिए भक्त का मतलब यही होता है कि हम भगवान की उपासना कर रहे हैं तो भगवान के अंदर जो गुण है सहन शक्ति त्याग वैराग्य क्षमा करुणा तो भगवान के उन गुणों का कुछ अंश तो हमारे जीवन में आवे उपासना का तो यही तात्पर्य है और 28 साल उपासना करने के बाद भी उनके अंदर अगर य गुण नहीं आया तो उनकी उपासना भी कहीं कहीं संदिग्ध है बस अंतिम एक प्रश्न है यह लोग जब यह सारी चीज जब हम करते तो स्कोन वालो का एक नैरेटिव उन्होंने बनाया है वैष्णव अपराध अगर हमने कोई भी विरोधाभासी प्रश्न किया तर्क कर दिया ये वैष्णव अपराध किया आपने तो इसीलिए हम वैष्णव चार्य परम वैष्ण की शरण में आए वो इससे हमें बताए कि इसका कैसे क्या उपाय है वैष्णव अपराध बोलने लगते हैं वो वैष्णव वैष्णव अपराध का महत्व है जो अपराध भगत कर करई राम रोस पावक
00:32:40:03 जर लेकिन फिर वैष्णव का लक्षण क्या है यह तो पहले तय हो कि वैष्णव है कौन जी केवल तिलक लगाने मात्र से कोई वैष्णव हो जाएगा जी केवल तुलसी की माला धारण करने मात्र से वैष्णव नहीं हो जाएगा वैष्णव का मतलब होता है कि जो भगवान के अनुकूल अनुकूल संकल्प प्रतिक न रक्ष विश्वासो गणम तथा आत्म निक्षेप कार्पण स विधा शरणागति इन छह अंगों से युक्त जो भगवान की शरणागति करके भगवत आधीन जीवन व्यतीत करता हो वो वैष्णव है उसका पहला लक्षण अनुकूल संकल्प जो भगवान के अनुकूल हो उसका संकल्प करे जो भगवान के प्रतिकूल हो उसका परित्याग करे तो भगवान के अनुकूल जो वेदा शास्त्र है वर्णाश्रम धर्म है उसका तो तुम पहले त्याग कर चुके हो इस अनुकूलता से तुम वंचित हो और प्रतिकूल आचरण जो नहीं करना चाहिए शास्त्र विरुद्ध आचरण तुम कर रहे हो तो तुम पहले बात तो तुम वैष्णव ही नहीं हो जी वैष्णव कौन है वैष्णव का मतलब ख शति स्मृति मम वाग भगवान स्वयं कहते श्रुति स्मति हमारी आज्ञा है य स्तान उल वर्त मनी जो उसका उल्लंघन करके आचरण करता है आज्ञा छेदी मम द्रोही मद भक्तो पन वैष्णव वो मेरा भक्त होते हुए भी वैष्णव नहीं है तो पहले तो आप वैष्णव बन जाइए और वैष्णव बनने के बाद श्रुति स्मृति के अनुसार आचरण करते हुए भगवान की भक्ति आप कर रहे हैं और आप
00:33:55:06 वैष्णव है तब तो आपके प्रति कोई अपराध करे तो अपराध होगा खाली आप श्रुति स्मृति की अवहेलना करते रहे शास्त्र की अवहेलना करते रहे सिद्धांतों की अवहेलना करते रहे धर्म की मर्यादाओं की धजिया उड़ाते रहे वर्णाश्रम धर्म का नाश करते रहे और ऊपर से अपने को वैष्णव कहे और आपको कोई प्रतिकार करे आपको बोले तो आप कहे वैष्णव अपराध हो गया तो भैया ऐसे वैष्णव अपराध को हम अगर देखेंगे तो हमारा सनातन धर्म जो है विन्न हो जाए आप वैष्णव बने वैष्णव बने तो वैष्णव का जो स्वरूप है उसका परिज्ञान करें वैष्णव किसे कहते हैं स्वयं भगवान राम रामायण में कहते हैं सोई सेवक प्रियतम मम सोई मम अनुशासन माने जो वैष्णव वही है जो भगवान के अनुशासन को माने और भगवान का अनुशासन शास्त्र है भगवान किसी को आक के प्रत्यक्ष शासन थोड़ी करते हैं भगवान ने शास्त्र प्रकट किया यही भगवान का अनुशासन है तो भगवान के द्वारा प्रवर्तित वेदा दि शास्त्रों का जो पालन करे उस शासन को स्वीकार करे वही भगवान का प्रियतम भक्त है मम अनुशासन माने जोई सोई सेवक प्रियतम मम सोई वही प्रियतम सेवक है वही वैष्णव है वही भगवान का और वो वैष्णव नहीं तो फिर उसको वैष्णव क्या कहा जा और आचार्य श्री मर्यादित रूप से अगर प्रश्न कर भी रहे तो इसको अपराध में अरे हमारे य परंपरा रही है बड़े
00:35:10:08 बड़े आचार्यों ने शास्त्रार्थ किया है मर्यादा के अंदर रह कर के शास्त्र का चिंतन करना शास्त्र का मंथन करना विचार करना यही तो सनातन धर्म का सौंदर्य है इसे हम सनातन धर्म का सौंदर्य मानते हैं भगवान भगवान शंकराचार्य जी ने जिन सिद्धांतों में उनको अनुकूलता नहीं थी उन सिं उन्होंने शास्त्रीय मर्यादा के अनुकूल विचार किया चिंतन किया शास्त्रार्थ किया कुमार भट्ट से शास्त्रार्थ करने के लिए गए और कुमार भट्ट से न मिलने पर मंडन हुआ य सब इतिहास है भगवान रामानुजाचार्य को जो बातें भगवत पाद आचार्य शंकराचार्य की बातें अपनी उपासना में अनुकूल नहीं लगी उन पर उन्होने अपना विचार रखा यह तो परंपरा है अनादि काल की और आज भी है अपराध नहीं क सकते य तो एक शास्त्र चिंतन की सरणी है शास्त्र चिंतन की प्रक्रिया है और इसी प्रक्रिया के कारण ही सनातन धर्म बड़ी बड़ी विसंगतियां और विरोधाभास में और विपरीत परिस्थितियों में भी जीवंत बना रहा कारण कि हम सदा हम कभी हम तर्क हीन नहीं रहे और हम कभी अंध भक्ति में नहीं गए हमने सदा बुद्धि और विवेक का प्रयोग करके शास्त्र की सीमा में रह कर के यत केनस धर्म वेने तरह के सिद्धांत को मान बहुत बहुत धन्यवाद आचार्य श्री आपका इतना
00:36:25:13 समय हमें मिल पाया के लिए स्वास्थ्य बहुत अनुकूल नहीं है माघ का कुंभ के अवसर पर बारबार मौसम भी बदल रहा है उसम भी आपने हमें समय दिया लेकिन बहुत अच्छा है और आप सभी लोगों को धन्यवाद है कि आप लोग इस अवस्था में जिस अवस्था में आज दुनिया के लोग आज नई पीढ़ी के बच्चे ऐसो आराम और मन मौज में लगे हुए हैं उस उम्र में आप लोगों ने जो सनातन की सेवा के कार्य को आगे बढ़ाने का काम किया है इसके लिए बहुत-बहुत आशीर्वाद और युवा पीढ़ी में यही संदेश जाए कि हमारे जितने सनातनी युवा हैं विश्व में वे धर्म के इस कार्य में जुड़े और वर्तमान के सोशल मीडिया और इंटरनेट के ुग में इसका सदुपयोग करते हुए सनातन धर्म के मूल सिद्धांत को जन जन तक पहुंचाए यही सनातन धर्म की सबसे बड़ी सेवा होगी बहुत बहुत आचार [संगीत]
Plans for this video (0)
No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.
-
⬜Hindi SRT Required
YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)
-
⬜English SRT
YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.
-
⬜Title (per Rules)
Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.
-
⬜Description
YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.
-
⬜End Screen
YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.
-
⬜Cards
YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.
-
⬜Playlist Automatic
YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.
-
⬜Thumbnail
YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.
"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.
Playlists
Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).
हिंदू धर्म को खतरा किससे है । Hidden truth of #iskcon by @Swami Raghvacharya Ji Maharaj
Description
(empty)
History
No changes yet.
✂️ Clip Cutter
⌨️ Keyboard shortcuts
Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop
Start
End
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)
Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".
Clips () · Total
Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.
-
⋮⋮