1
00:00:00,360 --> 00:00:06,360
आप अपना अग दर्शको को दे

2
00:00:06,520 --> 00:00:10,600
बता का है कुमार बनाता है जिसे

3
00:00:10,600 --> 00:00:14,840
घड़ा बोलते जी शंकराचार्य मठों के शिविर लगे हुए हैं

4
00:00:14,840 --> 00:00:18,840
जी और म हमारा गोवर्धन मठ पुरी

5
00:00:18,840 --> 00:00:23,080
आदि गुरु शंकराचार्य ने वेदों पर भाष्य किया है उ पर भाष्य किया

6
00:00:23,080 --> 00:00:27,360
है भी किया हो महाराज धर्म की

7
00:00:27,360 --> 00:00:31,240
उपयोगिता हमारा समय खम

8
00:00:31,240 --> 00:00:35,800
क्या हुआ जब हम गए एक फर्जी शंकराचार्य के शिविर

9
00:00:35,800 --> 00:00:40,160
में आप लोगों को बता द इस समय हम कुंभ में है

10
00:00:40,160 --> 00:00:44,240
और कुंभ में बहुत तरह के संत गण भी यहां पर आए

11
00:00:44,240 --> 00:00:48,240
हुए हैं हमारे धर्म को आगे बढ़ाने वाले लोग भी आए

12
00:00:48,240 --> 00:00:52,280
हुए हैं और साथ ही साथ छगन जो बेस

13
00:00:52,280 --> 00:00:56,680
धारण कर करके हमारे ही धर्म को हानि पहुंचाते हैं

14
00:00:56,680 --> 00:01:01,000
ऐसे बहरू भी कुंभ में आए हुए हैं अब वो

15
00:01:01,000 --> 00:01:05,400
एक लोकतंत्र है जिसके कारण से जो फिल्टर

16
00:01:05,400 --> 00:01:09,800
होना चाहिए कि कौन पाखंडी है कौन सनातन का दुश्मन है

17
00:01:09,800 --> 00:01:14,120
और कौन सनातन का पक्षधर है और किसको कुंभ में आना चाहिए

18
00:01:14,120 --> 00:01:15,640
यह सारा फिल्ट्रेशन पॉसिबल

19
00:01:15,640 --> 00:01:19,760
नहीं है इसलिए यहां पर आपको कुंभ में जो

20
00:01:19,760 --> 00:01:23,800
भेष धारी पाखंडी जो संत का चोला ड़

21
00:01:23,800 --> 00:01:27,880
करके चल रहे हैं वो भी मिल जाएंगे और जो वास्तविक परंपरा प्राप्त

22
00:01:27,880 --> 00:01:31,960
प्रामाणिक आचार्य गण है वो भी मिल जाएंगे तो जब

23
00:01:31,960 --> 00:01:36,080
हम कुंभ में पहुंचे और हम कवर कर रहे थे कुंभ को तो उसमें हमें मिला एक

24
00:01:36,080 --> 00:01:40,760
नकली शंकराचार्य का शिविर ये जो नकली शंकराचार्य

25
00:01:40,760 --> 00:01:44,800
है इसकी कहानी थोड़ी सी बता दें एक प्रस्ताव आया

26
00:01:44,800 --> 00:01:49,760
था कांग्रेस की ओर से नरसिंहा राव के समय में कि

27
00:01:49,760 --> 00:01:53,960
राम मंदिर जहां पर है वहां पर मस्जिद भी बन जाए ऐसे एक प्रस्ताव

28
00:01:53,960 --> 00:01:58,040
पर पूरी पीठ के जो वर्तमान शंकराचार्य हैं इनका हस्ताक्षर

29
00:01:58,040 --> 00:02:02,400
कांग्रेस को चाहिए था और वर्तमान जो पुरी

30
00:02:02,400 --> 00:02:06,960
शंकराचार्य जी है स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज उन्होंने वह हस्ताक्षर

31
00:02:06,960 --> 00:02:11,120
करने से मना कर दिया था कि नहीं अगर बनेगा तो सिर्फ मंदिर बनेगा

32
00:02:11,120 --> 00:02:15,120
वहां पर मस्जिद नहीं बनेगी मतलब वो उनका कहना था कि वहां पर मस्जिद

33
00:02:15,120 --> 00:02:19,240
बन जाए तो यह मंदिर और मस्जिद का जो विवाद है वह खत्म हो जाए मस्जिद भी बन जाए

34
00:02:19,240 --> 00:02:23,360
और मंदिर भी बन जाए पर गुरुदेव ने जगतगुरु है उन्होंने मना कर दिया

35
00:02:23,360 --> 00:02:28,080
था अब इस कारण से द्वेष वश नरसिमा राव के द्वारा

36
00:02:28,080 --> 00:02:31,040
एक तथाकथित व्यक्ति को शंकराचार्य

37
00:02:31,040 --> 00:02:35,040
के रूप में ख्या पित कर दिया गया व भी गोवर्धन मठ पुरी पीठ

38
00:02:35,040 --> 00:02:39,280
के नाम से और वह शंकराचार्य आज तक

39
00:02:39,280 --> 00:02:43,960
चल रहा है घूम रहा है विदेश यात्रा कर रहा है कई बार

40
00:02:43,960 --> 00:02:48,000
हमारे आज की जो सरकार है उसके द्वारा भी उससे जुड़े हुए कई

41
00:02:48,000 --> 00:02:52,280
लोग भी उनके उसके साथ दिखाई देते हैं तो यह शंकराचार्य की कहानी

42
00:02:52,280 --> 00:02:56,520
है यह कैसे बना था और मगर एक

43
00:02:56,520 --> 00:03:00,520
खास बात है जब हम जब यहां पर आए कुंभ मेले में और हमने यहां

44
00:03:00,520 --> 00:03:06,520
का जो कुंभ सहायता का जो एक

45
00:03:30,200 --> 00:03:34,680
तो सही चीज के भी कहना बनता है तो प्रशासन ने साफसाफ कहा

46
00:03:34,680 --> 00:03:38,720
कि सभी शंकराचार्य का शिविर जो है सेक्टर 19 में है तो

47
00:03:38,720 --> 00:03:42,720
हमें बड़ा अच्छा लगा क्योंकि जो फर्जी शंकराचार्य का शिविर लगा हुआ है यह

48
00:03:42,720 --> 00:03:46,760
सेक्टर 18 में लगा हुआ है तो सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही

49
00:03:46,760 --> 00:03:50,760
मगर कहीं ना कहीं एक समर्थन किया कि नहीं भाई जो शंकराचार्य

50
00:03:50,760 --> 00:03:54,880
व आपको सेक्टर 19 में ही मिलेंगे मगर वो एक अलग बात

51
00:03:54,880 --> 00:03:58,960
है कि जब वो शंकराचार्य है ही नहीं तो उसको शंकराचार्य के

52
00:03:58,960 --> 00:04:03,000
रूप में अपने आप को प्रस्तुत करते हुए और कुंभ के

53
00:04:03,000 --> 00:04:07,520
मेले में शिर लगाने की अनुमति क्यों दी जा रही है क्यों

54
00:04:07,520 --> 00:04:11,840
कु को शंकराचार्य कह पा रहा है क्यों विदेश यात्रा कर रहा है शंकराचार्य

55
00:04:11,840 --> 00:04:15,880
के नाम से यह सब प्रश्नवाचक प्रश्न है जो

56
00:04:15,880 --> 00:04:20,320
बनते हैं मगर खैर हम उसके शिविर में गए एक सबसे

57
00:04:20,320 --> 00:04:24,920
हसी की बात यह है तो सभी को जय श्री राम

58
00:04:24,920 --> 00:04:28,960
हम लोग इस समय कुंभ में है और

59
00:04:28,960 --> 00:04:33,880
सनातन की सांस्कृतिक रोवर कहा जाता है इसको और हमारे साथ में

60
00:04:33,880 --> 00:04:38,280
पूज्य शंकराचार्य जी महाराज जी हैं और इनके आज हमको

61
00:04:38,280 --> 00:04:42,840
कृपा वचन कुछ प्राप्त होने वाले हैं तो

62
00:04:42,840 --> 00:04:47,920
पहले मैं आपको प्रणाम करता हूं महाराज जी

63
00:04:47,920 --> 00:04:52,680
अ तो थोड़ा सा आप अपना अगर परिचय

64
00:04:52,680 --> 00:04:55,160
दर्शकों को दे दे कुछ बता दे लिख

65
00:04:55,160 --> 00:04:59,360
देगा परिचय लिख देगा परिचय लिख

66
00:04:59,360 --> 00:05:03,480
देगा कि जब इस फर्जी शंकराचार्य से

67
00:05:03,480 --> 00:05:07,800
हमने इसका यूंही थोड़ा सा महिमा बखान करते हुए और

68
00:05:07,800 --> 00:05:12,760
कहा कि आप थोड़ा सा अपना परिचय दे दीजिए

69
00:05:12,760 --> 00:05:17,560
हमारे दर्शकों को अगर वास्तविक संचार होते इस प्रश्न पर हमारे

70
00:05:17,560 --> 00:05:22,080
चपेट मार देते कि हमारे पास आए हो हमसे हमारा परिचय पूछ रहे हो

71
00:05:22,080 --> 00:05:26,440
मगर क्योंकि इसके मन में चोर था क्योंकि यह इसकी जो

72
00:05:26,440 --> 00:05:30,560
बुनियाद है वो झूठ पर टिकी हुई है तो इस व्यक्ति को

73
00:05:30,560 --> 00:05:34,760
अपना परिचय देने में भी लज्जा आई इस व्यक्ति

74
00:05:34,760 --> 00:05:39,040
के मुख से बोल नहीं फूटे ऑन कैमरा कि मैं शंकराचार्य

75
00:05:39,040 --> 00:05:43,160
हूं गोवर्धन मठ पूरी पीठ का क्योंकि व नहीं

76
00:05:43,160 --> 00:05:47,320
है क्योंकि व नकली है तो जब हमने इससे कहा कि भाई आप

77
00:05:47,320 --> 00:05:52,680
अपना परिचय दे दीजिए तो व्यक्ति क्या कहता है लिखित में दे देंगे

78
00:05:52,680 --> 00:05:56,800
देखिए सर्वप्रथम हमने उससे कुछ ऐसे प्रश्न किए जिससे

79
00:05:56,800 --> 00:06:00,920
कि वो अगर यह सोच रहा हो कि पता नहीं से प्रश्न मेरे सामने आने

80
00:06:00,920 --> 00:06:04,960
वाले हैं तो वो थोड़ा सा थोड़ा काम डाउन हो

81
00:06:04,960 --> 00:06:08,960
जाए थोड़ा सा नर्वसनेस उसकी खत्म हो जाए तो हमने

82
00:06:08,960 --> 00:06:10,360
सबसे पहले उससे यही पूछा

83
00:06:10,360 --> 00:06:14,360
कि कुंभ मेले की कथा क्या है तो भाई कथा वा चने में तो सब आगे

84
00:06:14,360 --> 00:06:18,720
रहते हैं तो उसने किस प्रकार से उत्तर दिया कथा बचते हुए व आप

85
00:06:18,720 --> 00:06:22,960
देखिए तो महाराज जी कुंभ की विशेषता

86
00:06:22,960 --> 00:06:27,040
क्या है क्या अर्थ है कुंभ का यह थोड़ा सा कुंभ

87
00:06:27,040 --> 00:06:31,440
के बारे में बता कुंभ है मतलब कुभ का अर्थ है

88
00:06:31,440 --> 00:06:35,720
कुमार बनाता है जिसे घड़ा बोलते हैं वही

89
00:06:35,720 --> 00:06:40,160
कुंभ अच्छा सतयुग में

90
00:06:40,160 --> 00:06:44,600
जी देवता और दैत्य ने मिलकर समुद्र मंथन किया था

91
00:06:44,600 --> 00:06:49,520
जी भगवान श्री हरि के निर्देशन में

92
00:06:49,520 --> 00:06:55,120
जी उससे 14 रत्न निकले

93
00:06:55,120 --> 00:06:59,760
थे इसमें विष भी था

94
00:06:59,760 --> 00:07:04,000
ऐरावत हाथी जो इंद्र को दे दिया गया जी

95
00:07:04,000 --> 00:07:08,560
देवलोक की शोभा बढ़ाने के लिए उचे शवा घोड़ा

96
00:07:08,560 --> 00:07:12,560
जो दैत्य लोक में महाराजा बली को दिया दे दिया गया जी

97
00:07:12,560 --> 00:07:17,320
कस्त मणि और रमा नाम की लक्ष्मी निकली जो श्री हरि नारायण ने ले लिया

98
00:07:17,320 --> 00:07:21,400
जी अब सराए निकली जो इंद्र लोक को दे दी गई

99
00:07:21,400 --> 00:07:26,080
जी और फिर अमृत निकला जी

100
00:07:26,080 --> 00:07:30,240
भगवान विष्णु के अवतार भगवान धनवंतरी

101
00:07:30,240 --> 00:07:34,320
उस समुद्र मंथन की प्रक्रिया से समुद्र से

102
00:07:34,320 --> 00:07:38,560
स्वर्ण के घड़े में कुंभ में अमृत लेकर

103
00:07:38,560 --> 00:07:43,920
प्रकट हुए जी और वह

104
00:07:43,920 --> 00:07:48,360
अमृत भगवान ने मोहिनी रूप धारण

105
00:07:48,360 --> 00:07:52,880
कर अपनी लीला चलाते हुए देवताओं को पिला

106
00:07:52,880 --> 00:07:56,880
दिया जिससे कमजोर हुई जो देवी शक्ति थी जिनका

107
00:07:56,880 --> 00:08:00,960
राज पार छिन गया था जी देवलोक में का कब्जा हो

108
00:08:00,960 --> 00:08:05,080
गया था फिर से देवता शक्तिशाली हुए अमरत्व

109
00:08:05,080 --> 00:08:09,240
प्राप्त हुआ उन्हें और अपने लोक को फिर से प्राप्त

110
00:08:09,240 --> 00:08:10,200
हुए

111
00:08:10,200 --> 00:08:14,520
फिर फिर उनकी संप्रभुता कायम हुई तभी

112
00:08:14,520 --> 00:08:19,000
से यह महाकुंभ का प्रचलन है जब ग्रह नक्षत्र

113
00:08:19,000 --> 00:08:23,000
वार तिथियां उसी तरह उसी संजोग में

114
00:08:23,000 --> 00:08:27,160
आ जाती हैं तो अमुक

115
00:08:27,160 --> 00:08:31,320
अमुक जगह में चार जगहों पर योग आता है और

116
00:08:31,320 --> 00:08:36,120
वहां अमृत प्रकट होता है और यह समय

117
00:08:36,120 --> 00:08:40,480
दैविक शक्ति को मजबूत करने के लिए सबको सिद्धि

118
00:08:40,480 --> 00:08:45,280
प्राप्त करने के लिए जी और विश्व कल्याण के लिए सर्वोत्तम समय होता

119
00:08:45,280 --> 00:08:50,240
है चार स्थानों में हरिद्वार

120
00:08:50,240 --> 00:08:54,960
उत्तराखंड नासिक महाराष्ट्र

121
00:08:54,960 --> 00:08:59,480
उज्जैन मध्य प्रदेश सिपरा तट में और

122
00:08:59,480 --> 00:09:03,480
यह तीर्थराज प्रयाग जहां गंगा जमुना सरस्वती

123
00:09:03,480 --> 00:09:07,680
संगम होता है यहां पर लगता है और अभी

124
00:09:07,680 --> 00:09:11,800
यह महा संजोग तीर्थराज प्रयाग में आया

125
00:09:11,800 --> 00:09:16,080
है और आप देख रहे हैं कि यह विराट

126
00:09:16,080 --> 00:09:20,280
कुंभ मेला यहां कोई सामान्य मेला नहीं है य जी

127
00:09:20,280 --> 00:09:24,520
यहां सब साधक आए हुए हैं सिद्ध पुरुष आए हुए हैं साधनाएं

128
00:09:24,520 --> 00:09:25,880
चल रही है

129
00:09:25,880 --> 00:09:30,040
आत्म कल्याण के लिए जगत कल्याण के लिए रा की उन्नति

130
00:09:30,040 --> 00:09:34,040
के लिए तरह तरह के यज्ञ अनुष्ठान विधान किए जा रहे

131
00:09:34,040 --> 00:09:38,440
हैं जो हमारे वेदों में वर्णन है जी यह शंकराचार्य

132
00:09:38,440 --> 00:09:42,640
शिविर जो हमारा है सभी कुंभ में लगता

133
00:09:42,640 --> 00:09:46,640
है यहां भी विशाल वैदिक

134
00:09:46,640 --> 00:09:50,800
यज्ञ चल रही है जी जो राष्ट्र के समृद्धि के लिए जी

135
00:09:50,800 --> 00:09:55,000
और सबके कल्याण के लिए किया जा रहा

136
00:09:55,000 --> 00:09:59,520
है बहुत ही अच्छा हमको कुंभ के बारे में एक

137
00:09:59,520 --> 00:10:03,600
डेफिनेशन प्राप्त हुई है क्योंकि आजकल लोग यह भी कर रहे हैं

138
00:10:03,600 --> 00:10:07,760
कि भाई कुंभ में जाने से घबरा रहे हैं और बहुत

139
00:10:07,760 --> 00:10:11,800
ज्यादा भीड़ है बहुत ज्यादा मतलब आने में हच

140
00:10:11,800 --> 00:10:15,840
पच हो रही है तो इस इस बारे में थोड़ा सा आप बताना चाहेंगे क्या कर भीड़

141
00:10:15,840 --> 00:10:19,920
तो बहुत है और होती आई है हमेशा कुंभ में जी और

142
00:10:19,920 --> 00:10:24,400
भीड़ होना भी चाहिए क्योंकि ये सनातन धर्म का

143
00:10:24,400 --> 00:10:28,760
सबसे बड़ा पवित्रतम और महानतम समागम

144
00:10:28,760 --> 00:10:32,840
है मेला का मतलब मेल मिलाप है

145
00:10:32,840 --> 00:10:37,040
और यह भारतवर्ष सनातनी है और हमाने सनातन

146
00:10:37,040 --> 00:10:41,440
परंपरा को मानने वाले श्रद्धालु भारत से बाहर भी

147
00:10:41,440 --> 00:10:46,400
पूरी दुनिया में रहते हैं सबको इस बात का इंतजार होता है

148
00:10:46,400 --> 00:10:50,680
कि वह महाकुंभ का पर्व आएगा तो हम भी जाएंगे जी तो भीड़

149
00:10:50,680 --> 00:10:55,480
तो होना स्वाभाविक है और बहुत लोग ऐसे हैं जो शरीर से नहीं आ पा रहे

150
00:10:55,480 --> 00:10:59,720
लेकिन मन से सम्मिलित है तो एक तरह से पूरी पूरी दुनिया ही पूरा

151
00:10:59,720 --> 00:11:03,880
उत्तर प्रदेश और भारतवर्ष ही नहीं पूरा दुनिया इस समय कुंभ

152
00:11:03,880 --> 00:11:08,120
में माहौल में रंगा हुआ है कुछ लोग काफी सारे

153
00:11:08,120 --> 00:11:12,320
लोग यहां प्रयाग आ पहुंचे हैं और बहुत लोग नहीं आए जो अपने अपने जगह

154
00:11:12,320 --> 00:11:16,480
से आनंद मना रहे हैं तो जो आए हुए हैं उनको और

155
00:11:16,480 --> 00:11:20,560
जो आना चाहते हैं उनको भी चिंता करने की ड़ने की कोई जरूरत नहीं

156
00:11:20,560 --> 00:11:25,280
है य सब कुछ बहुत सामान्य व्यवस्थाएं चल रही है

157
00:11:25,280 --> 00:11:30,400
और यहां के सरकार ने

158
00:11:30,400 --> 00:11:34,720
और यहां के मुख्यमंत्री जी ने जो खुद एक साधक और सिद्ध

159
00:11:34,720 --> 00:11:38,960
है एक विशा महान संत परंपरा के संवाहक

160
00:11:38,960 --> 00:11:43,400
हैं वह उन्होंने पूरे लगन के साथ इस

161
00:11:43,400 --> 00:11:47,920
दिन के लिए इस उत्सव के लिए पिछले दो सालों से तैयारियां

162
00:11:47,920 --> 00:11:52,040
की हैं बहुत व्यापक स्तर पर और बहुत बड़े क्षेत्र में यह मेला

163
00:11:52,040 --> 00:11:56,320
फैला हुआ है चाहे जितने भी लोग आ जाए सबको सुविधा

164
00:11:56,320 --> 00:11:56,820
है

165
00:11:56,480 --> 00:12:00,520
सब स्नान करें गंगा में ध्यान कर कर और अपने जीवन को

166
00:12:00,520 --> 00:12:04,880
धन्य बनाए हमारी हजारों हजारों धार्मिक संस्थाएं आई हुई है यहां

167
00:12:04,880 --> 00:12:08,920
जी शंकराचार्य मठों के शिविर लगे हुए हैं जी और अन्य

168
00:12:08,920 --> 00:12:13,520
हमारे जो सनातन परंपरा साधु संता आचार्य हैं

169
00:12:13,520 --> 00:12:17,560
वैष्णव हैं उदासी हैं नाथ संप्रदाय

170
00:12:17,560 --> 00:12:21,960
के लोग हैं और स्वयं सेवक संस्थाएं भी हैं यहां शिविर लगाकर

171
00:12:21,960 --> 00:12:26,200
खाना खिला रही हैं रहने का प्रबंध कर रही हैं

172
00:12:26,200 --> 00:12:30,520
और हर तरह से यहां कार्यकर्ता लगे सग कर रहे हैं

173
00:12:30,520 --> 00:12:34,800
सरकार की ओर से भी यहां बहुत अच्छे अच्छे रन बसेरा बनाए गए हैं

174
00:12:34,800 --> 00:12:38,880
जी तो सर्दी का मौसम है उसके बावजूद भी यहां

175
00:12:38,880 --> 00:12:42,920
कोई चिंता का नहीं है सब कुछ अच्छा है और सबका

176
00:12:42,920 --> 00:12:47,080
कल्याण होने वाला है बहुत बढ़िया अब जब ये उत्तर उसने

177
00:12:47,080 --> 00:12:51,120
दे दिया कि कुंभ मेले की कथा क्या है इसके बाद

178
00:12:51,120 --> 00:12:55,400
हमने अगला एक प्रश्न उससे किया कि नास्तिकता का खंडन

179
00:12:55,400 --> 00:13:00,040
क्या है अब यहां से हमने थोड़ा सैद्धांतिक प्रश्न उससे

180
00:13:00,040 --> 00:13:04,240
नास्तिकता का खंडन क्या है नास्तिकता को क्या जवाब

181
00:13:04,240 --> 00:13:08,760
दे नास्तिकों को कैसे त्तर करें अब यह शंकराचार्य का कार्य है

182
00:13:08,760 --> 00:13:11,680
दुनिया में जब भी कभी भगवान के अस्तित्व पर

183
00:13:11,680 --> 00:13:15,920
उंगली उठाई जाती है तो उसका जो अंतिम उत्तर आपको प्राप्त

184
00:13:15,920 --> 00:13:20,120
होगा अका उत्तर जिसका जिसके सामने फिर कोई बात टिक ना सके

185
00:13:20,120 --> 00:13:24,520
वो उत्तर शंकराचार्य से आपको मिलेगा तो क्योंकि वो अपने आप को शंकराचार्य

186
00:13:24,520 --> 00:13:29,400
कह रहा है तो हमने उससे पूछा कि भाई

187
00:13:29,400 --> 00:13:33,480
आप आजकल जो युवा है वो नास्तिक हो रहे हैं तो

188
00:13:33,480 --> 00:13:37,480
उनको किस तरह से त्तर किया जाए किस तरह से संतुष्ट किया जाए अगर

189
00:13:37,480 --> 00:13:41,560
कोई जिज्ञासु है तो उसको संतुष्ट कैसे किया जाए और अगर

190
00:13:41,560 --> 00:13:45,840
कोई विरोधी है तो उसको निरुत्तर कैसे किया जाए

191
00:13:45,840 --> 00:13:49,320
इस पर उसने क्या बातचीत की व आप देख सकते हैं अच्छा महाराज

192
00:13:49,320 --> 00:13:53,400
जी एक आज की युवाओं में देखते हैं एक परेशानी

193
00:13:53,400 --> 00:13:58,080
चल रही है कि युवा धीरे धीरे नास्तिक होता जा रहा है तो

194
00:13:58,080 --> 00:14:02,880
यह जो की सिद्धि है युवाओं के समक्ष

195
00:14:02,880 --> 00:14:06,920
ज्यादातर लोग जो कॉलेज जाने वाले बच्चे हैं वह आजकल क्या है भगवान को

196
00:14:06,920 --> 00:14:11,120
नहीं मानते तो ऐसा कौन सा सिद्धांत उन्हें दिया जाए जो

197
00:14:11,120 --> 00:14:15,440
वह भगवान पर विश्वास करना शुरू कर दे कि हां भगवान है जो भगवान

198
00:14:15,440 --> 00:14:19,480
को नहीं मानते ऐसा कहते हैं तो मुझे लगता है कि वह

199
00:14:19,480 --> 00:14:23,600
लोग भगवान को बहुत मानते हैं कि

200
00:14:23,600 --> 00:14:28,040
जिसकी कोई सत्ता नहीं है उसकी चर्चा हो ही नहीं सकती

201
00:14:28,040 --> 00:14:32,600
जिसकी संपूर्ण सत्ता है उसकी ही चर्चा होगी

202
00:14:32,600 --> 00:14:36,800
कोई यह नहीं कह सकता कि मैं आकाश से अंगूर नहीं तोडूंगा

203
00:14:36,800 --> 00:14:40,920
या मैं आकाश में फले हुए सेव फल नहीं खाऊंगा क्योंकि आकाश

204
00:14:40,920 --> 00:14:45,960
में सेव नहीं फलते अंगूर भी नहीं

205
00:14:45,960 --> 00:14:50,880
फलता जो चीज होती है वही कही जाती है

206
00:14:50,880 --> 00:14:53,240
इसलिए ईश्वर को जो मानते हैं वही

207
00:14:53,240 --> 00:14:57,520
य कहते हैं कि मैं नहीं मानता तो इनका

208
00:14:57,520 --> 00:15:01,680
कहना है कि जिस चीज का कोई अस्तित्व नहीं है तो उसके बारे में अगर बात भी हो रही

209
00:15:01,680 --> 00:15:05,840
है इसका मतलब उसका अस्तित्व है तो ये इनके बहुत ही निचले स्तर

210
00:15:05,840 --> 00:15:10,160
के जो है बस कुछ कुतर्क जिसका कोई बच्चा भी आकर के खंडन

211
00:15:10,160 --> 00:15:14,440
कर दे जैसे कोई कुछ उग्रता करे

212
00:15:14,440 --> 00:15:18,440
तो लोग कहते हैं राक्षस है और फिर यह अवधारणा बन जाती

213
00:15:18,440 --> 00:15:22,440
राक्षस भगवान को नहीं मानते और राक्षस कहते

214
00:15:22,440 --> 00:15:26,800
भी है कि हम भगवान को नहीं मानते लेकिन भगवान को मानने

215
00:15:26,800 --> 00:15:31,280
वाले सबसे बड़े जो भक्त हैं उन उनमें से जो गिनती की जाएगी

216
00:15:31,280 --> 00:15:36,160
राक्षसों का नाम उसम जरूर होगा भगवान विष्णु के भक्तों

217
00:15:36,160 --> 00:15:40,360
में शिव जी के भक्त तो राक्षस होते ही हैं जगजाहिर है

218
00:15:40,360 --> 00:15:44,640
और शिव जी सबको वरदान देते हैं लेकिन भगवान विष्णु के भक्तों

219
00:15:44,640 --> 00:15:48,920
में भी जब महानतम नाम लिए जाएंगे उसमें

220
00:15:48,920 --> 00:15:53,560
महाराजा बलि बाणासुर प्रहलाद

221
00:15:53,560 --> 00:15:57,760
ये सब राक्षस जाति के ही हैं लेकिन भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों

222
00:15:57,760 --> 00:16:02,480
में है जी लिए सनातन भूमि में युवाओं का एक अवस्था

223
00:16:02,480 --> 00:16:06,720
है जब अवस्था का असर होता है बाकी

224
00:16:06,720 --> 00:16:08,800
हमारे सब बच्चे अच्छे हैं

225
00:16:08,800 --> 00:16:13,080
युवा हमारे अच्छी दिशा में जा रहे हैं हां

226
00:16:13,080 --> 00:16:17,160
कुछ पश्चिमी संस्कृति हैं जो

227
00:16:17,160 --> 00:16:21,240
उनको गाने की कोशिश करती रहती जी और कभी कभी

228
00:16:21,240 --> 00:16:25,800
डिग नजर भी आते हैं लेकिन हमारी ऋषि संस्कृति बहुत मजबूत है

229
00:16:25,800 --> 00:16:29,920
और व फिर से वापस अपने संस्कारों में आ जाते हैं और अच्छे दिशा

230
00:16:29,920 --> 00:16:34,760
में आगे बढ़ते हैं आगे बढ़े इसके लिए माता-पिता को भी अपना जिम्मेदारी

231
00:16:34,760 --> 00:16:39,680
करते हैं माता-पिता करते ही हैं और करना चाहिए और गुरुजनों को भी अपनी जिम्मेदारी

232
00:16:39,680 --> 00:16:42,040
करते हैं और आगे करेंगे

233
00:16:42,040 --> 00:16:46,120
बहुत बढ़िया तो महाराज जी इसमें कई बार यह होता है कि जैसे हम

234
00:16:46,120 --> 00:16:50,160
लोग कॉलेजेस वगैरह में जाते हैं ना कैंप लगाते हैं ये तो

235
00:16:50,160 --> 00:16:54,280
उसमें क्या होता है कि वो लोग इस तरह के अनर्गल काउंटर करते हैं तो क्या हमारे

236
00:16:54,280 --> 00:16:59,320
पास कोई परफेक्ट ऐसा सिद्धांत नहीं है कि उसका एक

237
00:16:59,320 --> 00:17:04,400
है कि जब हमारा देश गुलाम हुआ

238
00:17:04,400 --> 00:17:08,840
था तो आक्रांता ने य आक्रमण किया और

239
00:17:08,840 --> 00:17:13,160
यहां अपना कब्जा जमा लिया जी और वह जो आक्रांता

240
00:17:13,160 --> 00:17:18,040
थे व सांस्कृतिक रूप से हमसे भिन्न

241
00:17:18,040 --> 00:17:22,080
थे और यहां शासन आते ही उन्होंने

242
00:17:22,080 --> 00:17:26,400
हमारे जो प्रयोगशाला है प्रशिक्षण संस्थान जिह गुरुकुल

243
00:17:26,400 --> 00:17:30,960
कहते हैं जी नम संस्कारों का नि होता था

244
00:17:30,960 --> 00:17:35,080
मनुष्य बनने के लिए मनुष्य को टेलर नहीं बनाता मनुष्य को नाई नहीं

245
00:17:35,080 --> 00:17:39,600
बनाता मनुष्य संस्कार से बनते जी उस

246
00:17:39,600 --> 00:17:43,920
संस्कार से मनुष्य बनाने वाली जो प्रयोगशाला थी गुरुकुल

247
00:17:43,920 --> 00:17:47,960
थे उनको विधर्मी शासन में बंद कर दिया गया उसके

248
00:17:47,960 --> 00:17:52,200
बाद कई खानदान यहां शासन में आए लेकिन वह सनातन

249
00:17:52,200 --> 00:17:56,240
से नहीं थे उसके बाद ब्रिटिश शासन आ गया और

250
00:17:56,240 --> 00:18:01,360
उन्होंने भी हमारी संस्कृति के बारे में उन्ह को नहीं

251
00:18:01,360 --> 00:18:05,360
लेकिन जब देश आजाद हो गया स्वराज कायम हो गया

252
00:18:05,360 --> 00:18:09,400
तब हमारे वो शिक्षा पद्धति आ जानी चाहिए थी जो विधर्मी

253
00:18:09,400 --> 00:18:13,520
शासन में आके बंद कर दिए गए वो नहीं आई

254
00:18:13,520 --> 00:18:14,480
इसकी कमी हमें

255
00:18:14,480 --> 00:18:18,560
खल रही है हमारे समाज को अखर रही है और उसी

256
00:18:18,560 --> 00:18:23,520
के कारण यह जो अलग-अलग विचार आते हैं युवाओं

257
00:18:23,520 --> 00:18:27,800
में तो उनमें मार्गदर्शन का अभाव है शिक्षण

258
00:18:27,800 --> 00:18:32,200
प्रशिक्षण का अभाव इसलिए हमारा शंकराचार्य मठ

259
00:18:32,200 --> 00:18:36,800
हमारा गोवर्धन मठ पुरी हमारे जो आचार्य थे

260
00:18:36,800 --> 00:18:40,960
उन्होंने उस समय भी जब यहां विधर्मी हों का शासन था

261
00:18:40,960 --> 00:18:45,080
हमारे मठ ने हमेशा य कोशिश रखा कि गुरुकुल

262
00:18:45,080 --> 00:18:49,480
चलते रहे गौशाला चलती रही हमने चलाया भी

263
00:18:49,480 --> 00:18:53,480
अब चकि विधर्मी शासन नहीं है और राष्ट्र में हिंदूवादी

264
00:18:53,480 --> 00:18:57,480
शासन है स्वदेश यों का शासन है इसलिए

265
00:18:57,480 --> 00:19:01,880
हम कहते हैं

266
00:19:01,880 --> 00:19:06,120
कि फिर से व गुरुकुल खोल दिए जाए गांव गांव

267
00:19:06,120 --> 00:19:10,600
में गुरुकुल खोल दिए जाए ऋषि परंपरा वापस आए जिससे

268
00:19:10,600 --> 00:19:14,840
उमर रहते बच्चों में युवा होते होते

269
00:19:14,840 --> 00:19:19,000
वैदिक संस्कार आ जाए और व बिना किसी समय को बर्बाद

270
00:19:19,000 --> 00:19:23,000
किए मनुष्य जीवन के असली लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ते चले जाए

271
00:19:23,000 --> 00:19:27,040
इससे राष्ट्र की भी उन्नति है और समाज की भी उन्नति है

272
00:19:27,040 --> 00:19:31,360
जी बहुत बढ़िया आपने मार्गदर्शन दिया किस तरह से युवाओं में हम लोग ईश्वर

273
00:19:31,360 --> 00:19:34,080
की स्थापना कर सकते हैं अ मगर

274
00:19:34,080 --> 00:19:38,120
मैं महाराज जी ये चीज जानना चाह रहा था जैसे कोई एक ऐसा प्रॉपर

275
00:19:38,120 --> 00:19:42,160
एक कोई सिद्धांत कोई फंडामेंटल हमारे सनातन धर्म ने दिया हो

276
00:19:42,160 --> 00:19:46,280
कि हम उसको काउंटर कर सके जब जैसे आपने कहा ना कि जो चीज

277
00:19:46,280 --> 00:19:50,520
नहीं है उसके बारे में बात ही नहीं होगी तो इसमें वो लोग ये कह देंगे कि तुमने कोई कल्पना

278
00:19:50,520 --> 00:19:54,880
की हम उस कल्पना को मना कर रहे हैं आपने कल्पना की भगवान की

279
00:19:54,880 --> 00:19:58,920
तो हम नास्तिक हैं हम उसको मना कर रहे हैं तो कोई ऐसा सिद्धांत

280
00:19:58,920 --> 00:20:03,200
आस्तिक का जो यह वाद विवाद है जी

281
00:20:03,200 --> 00:20:07,840
यह बहुत पुराना हैय ऋषि ऋषि कुल में भी था जी

282
00:20:07,840 --> 00:20:08,960
जो नहीं मानते हैं व

283
00:20:08,960 --> 00:20:13,880
नहीं मानते हैं व तो हिरण कश कहते थे कि मैं भगवान को नहीं मानता

284
00:20:13,880 --> 00:20:17,880
और भगवान नाम की कोई चीज नहीं और यदि कोई भगवान है तो मैं हूं क्योंकि मैं

285
00:20:17,880 --> 00:20:22,360
राजा हूं सर्व देव मस यद

286
00:20:22,360 --> 00:20:26,400
सर्वत्र कस्मा स्तंभ न दते लेकिन उनका बेटा

287
00:20:26,400 --> 00:20:30,440
था वो कहता था भगवान है और लो कण कण में व्याप्त है

288
00:20:30,440 --> 00:20:34,480
उसने उसको बहुत प्रताड़ित किया लेकिन वोह नहीं माना वो कहता था

289
00:20:34,480 --> 00:20:38,520
भगवान है अंत में जब बात अंतिम चरण में आ

290
00:20:38,520 --> 00:20:43,480
गई और रण कसप ने

291
00:20:43,480 --> 00:20:47,560
अपने उस विष्णु भक्त पुत्र को मारने के लिए

292
00:20:47,560 --> 00:20:51,760
अंतिम चरण में आ गया और पूछा कि इस पत्थर में बांधकर

293
00:20:51,760 --> 00:20:55,800
यदि वो सब जगह है तो पत्थर में क्यों नहीं दिखाई देता तुम्हारे प्राण

294
00:20:55,800 --> 00:20:59,960
क्यों नहीं बचा रहा अब मैं तुम्हें मार रहा हूं जी तो भगवान प्रकट हुए

295
00:20:59,960 --> 00:21:03,960
पत्थर फड़ नरस आ गए जी और वो तो सुरक्षित था

296
00:21:03,960 --> 00:21:08,400
वरदान से जी लेकिन कोई उसकी रक्षा नहीं कर पाया और व मारा

297
00:21:08,400 --> 00:21:12,480
गया जी तो कहने मतलब यह है कि

298
00:21:12,480 --> 00:21:12,980
जो य

299
00:21:12,800 --> 00:21:17,000
सदियों से चली आ रही है हमारे पास प्रॉपर नास्तिकता का कोई खंडन नहीं है

300
00:21:17,000 --> 00:21:21,520
हमारे आचार्यों ने दिया हो ऐसे नास्तिक आचार्य भी हुए हमारे

301
00:21:21,520 --> 00:21:25,600
हमारे जो दर्शन हमारे मान्य है लेकिन ऐसे भी दार्शनिक

302
00:21:25,600 --> 00:21:30,040
हुए हैं जो बड़े विद्वान थे लेकिन भगवान को नहीं मानते धर्म को नहीं

303
00:21:30,040 --> 00:21:34,080
चारवा आदि जैसे हमारे जो शंकराचार्य आदि शंकराचार्य जी इनके द्वारा कोई

304
00:21:34,080 --> 00:21:38,360
ऋषि महा ऋषियों द्वारा दिया ग कोई ऐसा अकाट्य सिद्धांत जिससे कि हम नास्तिकों

305
00:21:38,360 --> 00:21:42,520
की बोलती बंद कर दे माने या ना माने उनको निरुत्तर कर दे निराधार कर दे बहुत

306
00:21:42,520 --> 00:21:43,680
है आदि गुरु शंकराचार्य

307
00:21:43,680 --> 00:21:47,680
ने वेदों पर भाष्य किया है उपनिषद पर भाष्य किया है वे

308
00:21:47,680 --> 00:21:51,760
पर भी किया है और क्या और अनेक ग्रंथ लिखे हैं बहुत है आदि गुरु शंकराचार्य

309
00:21:51,760 --> 00:21:55,760
ने वेदों पर भाष्य किया है उपनिषद पर भाष्य किया है वे

310
00:21:55,760 --> 00:21:59,920
पर भी किया है और क्या और अनेक ग्रंथ लिखे हैं आदि गुरु शंकराचार्य

311
00:21:59,920 --> 00:22:03,920
ने वेदों पर भाष्य किया है उपनिषद पर भाष्य किया है

312
00:22:03,920 --> 00:22:07,960
पर भी किया है और क्या और अनेक ग्रंथ लिखे हैं तो इसने एक

313
00:22:07,960 --> 00:22:12,280
जगह पर देखिए क्या कहा जब इसने ये कहा

314
00:22:12,280 --> 00:22:16,560
कि शंकराचार्य ने वेदों पर भाष्य किया था आदि शंकराचार्य ने

315
00:22:16,560 --> 00:22:20,920
अब ये खुद को शंकराचार्य कह रहा है तो कम से कम इसको आदि शंकराचार्य

316
00:22:20,920 --> 00:22:25,160
के बारे में तो पता होना चाहिए था मगर ये कह रहा है कि आदि शंकराचार्य

317
00:22:25,160 --> 00:22:29,360
जी ने वेदों पर भाष किया था जबकि आदि शंकराचार्य जी ने वेदों पर भाष्य

318
00:22:29,360 --> 00:22:33,560
नहीं किया था उन्होंने उपनिषद पर भाष्य किया था उन्होंने ब्रह्म सूत्र

319
00:22:33,560 --> 00:22:38,040
पर भाष्य किया था गीता पर भाष्य किया था वेदों पर भाष्य नहीं किया उनकी परंपरा

320
00:22:38,040 --> 00:22:42,080
के आचार्य आचार्य शायन ने वेदों

321
00:22:42,080 --> 00:22:46,320
पर भाष्य किया था तो ये जो अपने आप को शंकराचार्य कह रहा है इसको

322
00:22:46,320 --> 00:22:50,480
इतनी एक आधार बेसिक नॉलेज भी नहीं है कि आदि शंकराचार्य जी

323
00:22:50,480 --> 00:22:54,600
ने क्या किया था और क्या नहीं किया था और य अपने आप को शंकराचार्य कह रहा

324
00:22:54,600 --> 00:22:57,080
है तो वही तो कह रहा

325
00:22:57,080 --> 00:23:01,080
हूं कि गुरुकुल प्रणाली तो सारा अधूरा ज्ञान

326
00:23:01,080 --> 00:23:05,440
भी अज करता है तो उन्होंने कोई सिद्धांत नास्तिकों के खंडन के लिए दिया हो

327
00:23:05,440 --> 00:23:09,600
ऐसा कुछ बहुत कुछ है उनके जितने अद्वैत

328
00:23:09,600 --> 00:23:13,760
सिद्धांत के ग्रंथ है तो हमें कोई एक सिद्धांत आप दे देते

329
00:23:13,760 --> 00:23:14,600
जिसे

330
00:23:14,600 --> 00:23:18,640
नास्तिकता का खंडन क्या है शास्त्रो असतो

331
00:23:18,640 --> 00:23:23,560
मा सया तिया मृत मा मतम

332
00:23:23,560 --> 00:23:28,520
गमाया एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी

333
00:23:28,520 --> 00:23:32,760
कभी ना मरने की प्यास विद्यमान है अखंड ज्ञानी

334
00:23:32,760 --> 00:23:36,840
बन जाने की प्यास विद्यमान है और सदा सुखी रहने

335
00:23:36,840 --> 00:23:41,040
की प्यास विद्यमान है इन तीनों प्यास को मिलाकर कहते हैं सत चिता

336
00:23:41,040 --> 00:23:45,400
आनंद तो सत चिता आनंद की प्यास एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी

337
00:23:45,400 --> 00:23:49,480
है तो जिस प्रकार एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर एक नियम

338
00:23:49,480 --> 00:23:53,480
है कि हमारे अंदर उसी चीज की चाह होती है जिस चीज

339
00:23:53,480 --> 00:23:57,600
की चा का विषय का अस्तित्व हो इनबिल्ट चा

340
00:23:57,600 --> 00:24:02,080
की बात कर रहा हूं जि चाह से हम स्वयं को अलग नहीं कर सकते हम चाह के भी मृत्यु

341
00:24:02,080 --> 00:24:06,360
के भय से अपने आप को अलग नहीं कर सकते हम चाह के भी सब

342
00:24:06,360 --> 00:24:10,520
कुछ जान लेने की इच्छा से स्वयं को अलग नहीं कर सकते हम चाह के

343
00:24:10,520 --> 00:24:15,120
भी सदा सुखी रहने की इच्छा से स्वयं को अलग नहीं कर सकते

344
00:24:15,120 --> 00:24:19,120
हां मगर कुछ वस्तुनिष्ट चीज आ जाएंगी जैसे मैंने कहा कि उड़ने वाला डायनासोर

345
00:24:19,120 --> 00:24:23,120
मुझे उड़ने वाला डायनासोर चाहिए इस चाह से हम अपने आपको अलग कर

346
00:24:23,120 --> 00:24:27,680
सकते हैं मगर हमसे कह दिया जाए आप जो है जो

347
00:24:27,680 --> 00:24:30,200
अमर होने इच्छा है उसको छोड़ दो तो

348
00:24:30,200 --> 00:24:34,440
नहीं नहीं छोड़ पाएंगे जितनी बार मृत्यु का ख्याल हमारे

349
00:24:34,440 --> 00:24:38,520
मन में आएगा उतनी बार हम उस ख्याल से दूर भागना चाहेंगे है

350
00:24:38,520 --> 00:24:42,640
ना तो एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी सत चित

351
00:24:42,640 --> 00:24:46,760
आनंद की चा विद्यमान है नियम क्या है कि हमारे अंदर जो भी चाह

352
00:24:46,760 --> 00:24:50,760
ऐसी जिससे हम स्वयं को अलग नहीं कर सकते हैं उस चाह के विषय

353
00:24:50,760 --> 00:24:55,000
का दुनिया में अस्तित्व जैसे हमारे अंदर भूख है तो दुनिया में खाना है

354
00:24:55,000 --> 00:24:59,120
हमारे अंदर प्यास है तो दुनिया में पानी है हमारे अंदर देखने की चा

355
00:24:59,120 --> 00:25:03,120
है तो दुनिया में क्या है दृश्य है हमारे अंदर सुनने की

356
00:25:03,120 --> 00:25:07,160
चा है तो दुनिया में क्या है आवाज है तो जिस प्रकार एक

357
00:25:07,160 --> 00:25:11,760
नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी व्यापत भूक का विषय भोजन सिद्ध होता है

358
00:25:11,760 --> 00:25:15,800
प्यास का विषय पानी सिद्ध होता है उसी प्रकार से एक नास्तिक

359
00:25:15,800 --> 00:25:19,840
व्यक्ति के अंदर भी व्यापत सत चित आनंद की चा का

360
00:25:19,840 --> 00:25:24,040
विषय सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अस्तित्व डंके की चोट

361
00:25:24,040 --> 00:25:28,480
पर सिद्ध होता है यह है नास्तिकता का खंडन य

362
00:25:28,480 --> 00:25:32,640
नास्तिकता का उत्तर मगर इस फर्जी शंकराचार्य के पास ऐसा कुछ

363
00:25:32,640 --> 00:25:36,640
नहीं था यहां तक कि हमने इस

364
00:25:36,640 --> 00:25:40,960
इससे ये भी पूछा बारबार कहा कि भाई त्तर करने वाला वो

365
00:25:40,960 --> 00:25:45,000
कौन सा सिद्धांत बताइए तो फिर य बातें बनाने लगा

366
00:25:45,000 --> 00:25:45,500
बातों

367
00:25:45,240 --> 00:25:49,440
की जलेबिया वो देखिए आप कैसे बनाने लगा यह कहने लगा कि

368
00:25:49,440 --> 00:25:53,560
आचार्यों ने बहुत कुछ लिखा है हमने कहा क्या लिखा है क्या

369
00:25:53,560 --> 00:25:57,680
लिखा है आचार्य ने वो में नहीं मिल सकता वो में नहीं मिल सकता

370
00:25:57,680 --> 00:26:02,130
अच्छा अच्छा वो

371
00:26:02,130 --> 00:26:08,130
[संगीत]

372
00:26:28,920 --> 00:26:32,960
और वेद विरुद्ध जो कार्य है जी वो अधर्म है और वो नहीं करना

373
00:26:32,960 --> 00:26:37,240
चाहिए मनुष्य जाति को बस वेदों में यही स्पष्टीकरण उसका

374
00:26:37,240 --> 00:26:41,280
है बाकी व्याख्या बड़ी है नहीं वो तो है मतलब

375
00:26:41,280 --> 00:26:45,320
वेद को तो तब हम प्रमाण के रूप में जब कोई वेद को मानता हो

376
00:26:45,320 --> 00:26:49,520
अभी तो एक सामान्य सा लड़का है कोई और उसको हमें बताना है कि धर्म

377
00:26:49,520 --> 00:26:53,720
वेद को ना मानने वाले के लिए हमारे पास कोई उपाय नहीं है वो नास्तिक मत

378
00:26:53,720 --> 00:26:57,720
है नास्तिक मत हमेशा से रहते नहीं फिर भी हम कुछ

379
00:26:57,720 --> 00:27:01,880
समझा तो सते क्यों मानना चाहिए तुमहे वेद को क्यों मानना चाहिए तुम्हारे धर्म

380
00:27:01,880 --> 00:27:06,240
को आज तक तो नहीं समझे हैं समझाने वाले समझा रहे हैं आदि गुरु शंकराचार्य समझाने

381
00:27:06,240 --> 00:27:10,600
ही आए थे जी भगवान राम समझाने ही आए थे श्री कृष्ण समझाने

382
00:27:10,600 --> 00:27:14,600
ही आए थे तो जो समझने वाले हैं वो समझ जाते हैं और

383
00:27:14,600 --> 00:27:18,800
जो नहीं समझने वाले नहीं समझते हा तो कुछ उन्होंने ऐसा बोला होगा

384
00:27:18,800 --> 00:27:22,960
ना कि ये समझ लो त जिससे की वो समझे वो समझे

385
00:27:22,960 --> 00:27:27,080
नहीं बात अलग है मगर हम कुछ ऐसा बताए तो कि वो धर्म को समझ पाए धर्म उनके

386
00:27:27,080 --> 00:27:31,240
लिए क्यों आवश्यक है का पालन अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य

387
00:27:31,240 --> 00:27:35,480
वचन दयम धर्म का व्याख्याता

388
00:27:35,480 --> 00:27:39,720
सबसे बड़ा हमारा महर्षि व्यास है और वह कहते

389
00:27:39,720 --> 00:27:43,800
हैं कि अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य

390
00:27:43,800 --> 00:27:44,640
बचन

391
00:27:44,640 --> 00:27:49,640
दयम परोपकाराय पुण्या

392
00:27:49,640 --> 00:27:53,760
पापायी परोपकार के समान कोई पुण्य नहीं है

393
00:27:53,760 --> 00:27:58,480
और दूसरे को सताने के समान कोई पाप नहीं

394
00:27:58,480 --> 00:28:02,600
स धर्म नहीं भाई पर पीड़ सम नहीं अध माई

395
00:28:02,600 --> 00:28:06,920
तुलसीदास जी की भाषा में दूसरे को पीड़ा पहुंचाने

396
00:28:06,920 --> 00:28:11,160
जैसे कोई अधम कार्य नहीं है और परहित करने जैसा कोई अच्छा

397
00:28:11,160 --> 00:28:15,160
कार्य नहीं सबसे अच्छा कार्य परहित

398
00:28:15,160 --> 00:28:18,040
मगर यह तो लक्षण हो गए ना महाराज जी धर्म की उपयोगिता

399
00:28:18,040 --> 00:28:22,320
अब बस हमारा समय खत्म अब बस हमारा समय खत्म अब बस

400
00:28:22,320 --> 00:28:26,360
हमारा समय खत्म अब हमारा समय खम हमारा समय

401
00:28:26,360 --> 00:28:30,400
हो गया अब बस अच्छा बस थोड़ा सा और

402
00:28:30,400 --> 00:28:34,440
बस लास्ट उने कहा जो वेद बताते हैं वही धर्म है ठीक

403
00:28:34,440 --> 00:28:39,080
है वेद बताते वो धर्म है मगर ये आपने धर्म को

404
00:28:39,080 --> 00:28:43,520
इंगित कर दिया कि भाई धर्म को कहां ढूंढे कि वेद में ढूंढे मगर

405
00:28:43,520 --> 00:28:47,680
उसकी मगर उसकी उपयोगिता उसके अस्तित्व

406
00:28:47,680 --> 00:28:51,800
की उपयोगिता जिससे सिद्ध हो वो परिभाषा नहीं बता पाए है धर्म की

407
00:28:51,800 --> 00:28:56,000
परिभाषा नहीं बता पाए धर्म की परिभाषा क्या है कि जीव की

408
00:28:56,000 --> 00:29:00,320
चाह का वास्तविक विषय सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर

409
00:29:00,320 --> 00:29:05,120
को परिभाषित कर सकने वाले शास्त्रों द्वारा

410
00:29:05,120 --> 00:29:09,400
सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त करने के निमित्त बताई

411
00:29:09,400 --> 00:29:13,640
गई विधि विधान का नाम धर्म है जो आपको सच्चिदानंद

412
00:29:13,640 --> 00:29:17,920
स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त कराएगी उस मर्यादा का नाम धर्म

413
00:29:17,920 --> 00:29:22,360
है तो इनके पास इतना भी उत्तर नहीं था मैं यह कह रहा

414
00:29:22,360 --> 00:29:26,800
था इस्लाम और क्रिश्चियनिटी का सिद्धांत

415
00:29:26,800 --> 00:29:30,800
थोड़ा सा उस पर अगर कुछ प्रकाश डाल दे क्या कहते हैं यह सब

416
00:29:30,800 --> 00:29:33,080
पंथ है और चल

417
00:29:33,080 --> 00:29:37,560
रहे हैं बहुत सारी अच्छी बातें हैं उनके पैगंबरों

418
00:29:37,560 --> 00:29:41,880
ने उनके जो प्रशिक्षु है व सब पढ़ाते

419
00:29:41,880 --> 00:29:46,160
पढ़ पढ़ाते े मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है उसकी अच्छा अच्छा इनके

420
00:29:46,160 --> 00:29:50,840
जो लेकिन ये मैं यह बताना चाहता हूं कि सनातन मूल है

421
00:29:50,840 --> 00:29:55,800
और सनातन के ही तनया डालियां शाखाएं पत्ते

422
00:29:55,800 --> 00:30:00,320
फूल नहीं जैसे उसमें कहा गया ना कि ईश्वर जो है वो

423
00:30:00,320 --> 00:30:04,680
यह नहीं कर सकता वो नहीं कर सकता तो उनके यहां

424
00:30:04,680 --> 00:30:08,880
जो सुप्रीम अथॉरिटी मानी गई है और हमारे यहां जो सुप्रीम अथॉरिटी मानी वो दोनों

425
00:30:08,880 --> 00:30:13,080
सिमिलर है ईश्वर क्या कर सकता है क्या नहीं कर सकता है इसके बारे में कोई अधिकृत नहीं

426
00:30:13,080 --> 00:30:17,080
है कहने के लिए ईश्वर क्या कर सकता है क्या नहीं कर सकता है इसके बारे में

427
00:30:17,080 --> 00:30:21,200
कोई अधिकृत नहीं है कहने के लिए ईश्वर क्या कर सकता है क्या नहीं कर सकता

428
00:30:21,200 --> 00:30:25,360
है इसके बारे में कोई अधिकृत नहीं है कहने के लिए हमारे यहां वेदों

429
00:30:25,360 --> 00:30:29,480
की बहुत बड़ी पहुंच है और सर्वोच्च मार्गदर्शन वेदों

430
00:30:29,480 --> 00:30:33,760
का होता है लेकिन वेदों की अंतिम लाइन जो है नेति

431
00:30:33,760 --> 00:30:37,920
नेति कहक खत्म हो जाती है ना इता नता अंत नहीं है अनंत

432
00:30:37,920 --> 00:30:42,280
है जी तो जो अनंत है और अनादि है उसके बारे में गारंटीड

433
00:30:42,280 --> 00:30:46,920
बात नहीं की जा सकती वही जान सकता तो फिर इसका मतलब यह माने कि इस्लाम अनुपम

434
00:30:46,920 --> 00:30:48,400
उपमा आन राम

435
00:30:48,400 --> 00:30:52,520
समान राम निगम का है उसकी कोई उपमा

436
00:30:52,520 --> 00:30:56,800
किसी से नहीं हो सकती कि उसके जैसा वो है क्यों जन कोटि

437
00:30:56,800 --> 00:31:00,880
सत र क अलता है एक

438
00:31:00,880 --> 00:31:05,040
लाख एक करोड़ जुगन को इकट्ठा करके और यह कहा जाए

439
00:31:05,040 --> 00:31:10,080
कि देखो यह सूर्य के समान है यह सूर्य की तौहीन

440
00:31:10,080 --> 00:31:14,720
है क्योंकि जुगनू का सूर्य का कुछ नहीं है जी जी

441
00:31:14,720 --> 00:31:18,800
अब बस हमारा समय खत्म हो बस थोड़ा सा बस

442
00:31:18,800 --> 00:31:23,680
लास्ट एक महाराज जी एक बात कही जाती है बारबार

443
00:31:23,680 --> 00:31:28,040
की अद्वैत जो सिद्धांत है शंकराचार्य जी के द्वारा

444
00:31:28,040 --> 00:31:32,320
जो मतलब प्रचारित हुआ है बहुत ज्यादा तो अद्वैत सिद्धांत

445
00:31:32,320 --> 00:31:36,480
में भक्ति नहीं है तो इसको कैसे कई लोग ऐसा

446
00:31:36,480 --> 00:31:40,680
क्लेम करते अद्वैत सिद्धांत में अद्वैत में भक्ति नहीं है केवल ज्ञान मार्ग है

447
00:31:40,680 --> 00:31:44,920
पहले लोग ऐसा भी कहते थे कि शिव भक्त विष्णु

448
00:31:44,920 --> 00:31:49,920
भक्ति नहीं करते जी या विष्णु भक्त शिव भक्त नहीं होते

449
00:31:49,920 --> 00:31:54,560
जी तो इसकी पुरानी लंबी कथानक

450
00:31:54,560 --> 00:31:58,720
है और कहीं बड़ी जगह से यह बातें शुरू ई हो

451
00:31:58,720 --> 00:32:02,920
दक्ष प्रजापति और उनकी घटनाओं से

452
00:32:02,920 --> 00:32:04,200
अच्छा

453
00:32:04,200 --> 00:32:08,640
लेकिन आगे जब युग आया तो हमारे विद्वानों ने

454
00:32:08,640 --> 00:32:13,520
बताया कि विष्णु भक्ति के बगैर शिव भक्ति नहीं हो सकती

455
00:32:13,520 --> 00:32:17,800
और शिव के भक्त विष्णु भक्ति करेंगे तो विष्णु जी प्रसन्न

456
00:32:17,800 --> 00:32:22,280
होंगे जी शंकर प्रिय मम द्रोही शिव द्रोही मम

457
00:32:22,280 --> 00:32:26,400
दास सोनर को नरक में कलब तक करे नरक

458
00:32:26,400 --> 00:32:30,440
में वास जी जी जी शंकर भगति बिना नर

459
00:32:30,440 --> 00:32:34,640
भगत न पावई मोरी और एक गुपत मति तुम

460
00:32:34,640 --> 00:32:38,640
कहो कर जोर जी जी तो उसी

461
00:32:38,640 --> 00:32:43,400
प्रकार से क्या प्रश्न था आपका

462
00:32:43,400 --> 00:32:47,480
कि अद्वैत में भक्ति नहीं है अद्वैत केवल ज्ञान मार्ग है मतलब

463
00:32:47,480 --> 00:32:51,640
कि मैं ही ब्रह्म हूं हम ब्रह्मास्मि तत्व मसी तो इसमें

464
00:32:51,640 --> 00:32:55,920
भक्ति नहीं रह जाती कि वो रामचंद्र जी है भक्ति के बगैर

465
00:32:55,920 --> 00:32:58,600
ज्ञान

466
00:32:58,600 --> 00:33:01,400
अधूरा

467
00:33:01,400 --> 00:33:07,400
है और ज्ञान के बगैर भक्ति लंगड़ी

468
00:33:08,240 --> 00:33:12,800
है भक्ति ज्ञान दोनों होंगे तभी

469
00:33:12,800 --> 00:33:17,160
मनुष्य को यह फायदा करेगा राम प्रेम

470
00:33:17,160 --> 00:33:21,200
बिन सोहन ज्ञान करण धार बिन

471
00:33:21,200 --> 00:33:25,440
जिम जल जानू नौका बहुत अच्छी हो

472
00:33:25,440 --> 00:33:29,600
वोट बहुत अच्छा बना हो से जड़ित हो लेकिन

473
00:33:29,600 --> 00:33:33,600
नाविक यदि उसमें नहीं है या नाविक अच्छा नहीं है तो नौका बेकार

474
00:33:33,600 --> 00:33:37,680
है तो ज्ञान और भक्ति दोनों

475
00:33:37,680 --> 00:33:41,760
एक दूसरे के परिपोक हैं वैराग्य भी उसमें शामिल है भागवत

476
00:33:41,760 --> 00:33:45,840
में इस बात का वर्णन है कि भक्ति ज्ञान वैराग वृद्ध हो

477
00:33:45,840 --> 00:33:50,000
गए वृंदावन में आके भक्ति युवा हो गई

478
00:33:50,000 --> 00:33:54,760
भक्ति तो युवा हो गई लेकिन ज्ञान बैराग बुड्ढे रहे तो वो दुखी रही

479
00:33:54,760 --> 00:33:58,880
बेचारी नारद जैसा ज्ञानी विज्ञानी आया उन्होंने जब

480
00:33:58,880 --> 00:34:03,040
उन्हें श्रीमद् भागवत सुनाया तो ज्ञान और वैराग्य भी जब

481
00:34:03,040 --> 00:34:07,280
चेतन हो गए तब भक्ति प्रसन्न हुई एक दूसरे के परिपूर्ण

482
00:34:07,280 --> 00:34:11,400
है जो असली ज्ञानी होगा वह महा भक्त अवश्य होगा और

483
00:34:11,400 --> 00:34:15,600
जो असली भक्त होगा वह ज्ञान से परिपूर्ण जरूर होगा ज्ञानी

484
00:34:15,600 --> 00:34:16,480
प्रज प्रभु

485
00:34:16,480 --> 00:34:20,920
में देख जगत कसन करही विरोध

486
00:34:20,920 --> 00:34:24,920
भक्त जो होते हैं व सारे संसार को भगवान के रूप में

487
00:34:24,920 --> 00:34:28,000
देखते हैं

488
00:34:28,000 --> 00:34:32,000
सबको प्रणाम करते हैं आदर करते हैं विरोध नहीं करते

489
00:34:32,000 --> 00:34:36,520
और ज्ञानी ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या

490
00:34:36,520 --> 00:34:40,520
सर्वम लविद ब्रह्म जो उनका सर्वोच्च

491
00:34:40,520 --> 00:34:44,600
साधना ब्रह्म है व क्या है बोलिए सर्वम कल विम य सारा

492
00:34:44,600 --> 00:34:49,080
संसार ब्रहम है और भगत बोले प्रभु मैं देख

493
00:34:49,080 --> 00:34:53,760
जगत य सारा संसार उनका प्रभु है तो फर्क कहां है

494
00:34:53,760 --> 00:34:58,160
मतलब य एक दूसरे के परिपोक है मतलब यह जो सर्व

495
00:34:58,160 --> 00:35:02,160
ब्रम कहते हैं इसमें य लोग जो भक्ति गरस होता है वह बताते कि नहीं होता

496
00:35:02,160 --> 00:35:06,400
है केवल ज्ञान मार्ग अवत के संबंध में हमने इनसे

497
00:35:06,400 --> 00:35:10,440
एक प्रश्न और किया क्योंकि भगवत पाल आदि शंकराचार्य की जब बात होती है तो

498
00:35:10,440 --> 00:35:14,640
अद्वैत सिद्धांत की बात होती है तो हमने इनको और ड़

499
00:35:14,640 --> 00:35:19,040
टोला कि भाई अद्वैत में भक्ति बहुत कम है अद्वैत

500
00:35:19,040 --> 00:35:23,920
में भक्ति नहीं है ऐसा लोग आरोप लगाते हैं तो

501
00:35:23,920 --> 00:35:28,200
यह महाशय इस बात के पीछे पड़ गए कि भाई ज्ञान के भक्ति

502
00:35:28,200 --> 00:35:31,600
नहीं हो सकती भक्ति के बिना ज्ञान नहीं हो सकता ये बात सही है

503
00:35:31,600 --> 00:35:36,000
मगर हम पूछ रहे हैं कि आप अद्वैत में भक्ति की स्थापना करिए तो महाशय

504
00:35:36,000 --> 00:35:40,520
को सिद्धांत जब पता हो जब वो शंकराचार्य परंपरा से परंपरा

505
00:35:40,520 --> 00:35:44,680
प्राप्त आचार्यों से पढ़ते आए हो तब तो उन्हें कुछ पता होगा तो वो उन्ही

506
00:35:44,680 --> 00:35:49,080
बातों को गोल मल गोल मोल बारबार घुमाते रहे इसका सिद्धांत जगतगुरु शंकराचार्य

507
00:35:49,080 --> 00:35:49,880
जी ने दिया था

508
00:35:49,880 --> 00:35:53,920
कि अन्यों में प्रीति आत्मा के लिए होती है आत्मा

509
00:35:53,920 --> 00:35:56,920
में प्रीति अन्यों के लिए नहीं होती है इसका

510
00:35:56,920 --> 00:36:01,160
अर्थ है कि जब हम यह कहते रहेंगे कि भगवान हमसे

511
00:36:01,160 --> 00:36:05,200
अलग है तब तक हमारा जो भगवान के प्रति प्रेम

512
00:36:05,200 --> 00:36:09,560
है वह अंतिम रूप से भगवान के लिए नहीं माना जाएगा क्यों क्योंकि भगवान

513
00:36:09,560 --> 00:36:13,600
को प्रेम करने से आपको क्या मिल रहा है अंतक अथवा सुख किसको मिल रहा है

514
00:36:13,600 --> 00:36:17,800
आपको और आप तो भगवान से अलग हो मगर जब आप और भगवान

515
00:36:17,800 --> 00:36:21,880
एक ही रूप मानोगे आप स्वयं को और भगवान को आत्म स्वरूप

516
00:36:21,880 --> 00:36:26,040
मान लोगे एक दूसरे का तो आप सीना ठोक के कह सकते हो कि भगवान

517
00:36:26,040 --> 00:36:30,240
की भक्ति करने से जो सुख मिल रहा है वो भी किसको मिल रहा है भगवान

518
00:36:30,240 --> 00:36:34,320
को यानी कि आप जो भी भक्ति कर रहे हैं वह अपने लिए नहीं कर रहे

519
00:36:34,320 --> 00:36:38,400
वह भी भगवान के लिए ही कर रहे हैं तो तो भक्ति की

520
00:36:38,400 --> 00:36:42,880
पराकाष्ठा भी कहां पर हो सकती है अद्वैत सिद्धांत में तो इन महाशय

521
00:36:42,880 --> 00:36:47,200
को ना तो शंकराचार्य के बारे में कुछ पता है ना ना ही नास्तिकों

522
00:36:47,200 --> 00:36:51,320
के के समक्ष ईश्वर का अस्तित्व कैसे सिद्ध किया जाए

523
00:36:51,320 --> 00:36:56,080
यह कुछ पता है ना ही धर्म की परिभाषा पता है ना ही

524
00:36:56,080 --> 00:37:00,160
इनको यह पता है कि मत में भक्ति किस प्रकार से सिद्ध होती है और

525
00:37:00,160 --> 00:37:04,400
अंततोगत्वा इनको तो यह भी नहीं पता है कि यह है कौन क्योंकि इनको अपना परिचय

526
00:37:04,400 --> 00:37:09,160
देने में शर्म आ रही है जय श्री राम बहुत बहुत तुम्हारे

527
00:37:09,160 --> 00:37:10,920
दर्शकों को रे

528
00:37:10,920 --> 00:37:15,360
चैनल के बहुत-बहुत आशीर्वाद और कुंभ मेले से उन सबके कल्याण की कामना

529
00:37:15,360 --> 00:37:19,520
तीर्थराज प्रयाग सबका सबको कल्याण करें और सब

530
00:37:19,520 --> 00:37:21,230
सुखी रहे

531
00:37:21,230 --> 00:37:25,230
[संगीत]
