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00:00:00:01 सर्वशक्तिमान को लोग अधिक समझ रहे हैं कि वो इतना सर्व कुछ

00:00:02:19 शक्तिमान है कि सब कुछ कर सकता है ईश भी सब कुछ नहीं कर सकता यहां लोग भूल रहे हैं सब कुछ नहीं कर सकता सर्वशक्तिमान तो है सर्वशक्तिमान इसलिए है वो अपने कार्य में किसी की सहायता नहीं लेता अच्छा तो फिर आत्मनिर्भर किसे कहेंगे ईश्वर स्वयं कार्य नहीं करता पृथ्वी के माध्यम से का वो प्रकृति के माध्यम से कार्य करता है जी तो यहां पे तो सहायता हो गई नहीं सहायता कहां होई प्रकृति की तो क्या छोटे-छोटे जो दुष्ट प्रवृत्ति के लोग है जैसे रावण हुए कंस हुए क्या इनको मारने के लिए इनको खत्म करने के लिए क्या उस अवताल लेने की आवश्यकता पड़ेगी तो अगर ज्ञान कराना है विद्या विद्या का भेद बताना है केवल ईश्वर अपने मन में सोच ले अपने कहा इच्छा से होता तो हमें ज्ञान हो जाएगा विद्या विद्या का ये क्यों इतनी व्यवस्था है कि गायत्री मंत्र जैसे सबने सभी जितने भी अवतार वादी जो लोग हैं या ग्रंथ है सबने ये कहा कि जब धर्म की हानि होती तभी ईश्वर अवतरित होता है ठीक है धर्म बढ़ना चाहिए था नहीं बढना चाहिए अगर स्थापना करने धर्म बढ़ना चाहिए था लेकिन अगले युग में क्या हुआ त्रेता आया तो धर्म की हानि और हुई बढ़ा नहीं महापुरुष जन्म लेकर युग युग में आते हैं आकर भूमंडल का वो भार हटाते हैं ईश्वर आता है तो धर्म की स्थापना होती है मगर धर्म की स्थापना हुई नहीं और पतन हुआ मगर वहीं पर आपने ये मान लिया कि महापुरुष आते हैं भर

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00:00:58:16 हटाने के लिए बर हटा दिया तो सभी को जय श्री राम जैसा कि आप लोग हमें जानते हैं विभिन्न जो मत हैं धर्म को लेकर के ब्रह्म को लेकर के इनको लेकर के हम कई प्रकार की व्याख्या आपको प्रस्तुत करते हैं चर्चाएं करते हैं विद्वानों के साथ तो इसी संबंध में हमें एक विद्वान मिले हैं आचार्य हैं यह गुरुकुल है इनका यहां पर और ये शाहजहांपुर में अभी आपको पूरा बताएंगे हमें ट के माध्यम से इनका संपर्क सूत्र इत्यादि सब प्राप्त हो पाया तो ईश्वर पर चर्चा के निमित्त हमने यह आयोजित किया तो सर्वप्रथम आचार्य जी आप दर्शकों को एक अपना परिचय दे दीजिए जी सभी दर्शकों को मेरा नमस्ते है और मैं इस समय शजहांपुर जनपद में आचार्य देव पाल जी के गुरुकुल जनपुर में बैठा हूं जो मिर्जापुर के निकट में है और तहसील कलान लगती यहां की वहां पर हम लोग बैठे हैं और मेरा

00:02:13:20 नाम आचार्य रक्षपाल देवारी है मैं आर समाज का उपदेशक हूं जो संगीत के माध्यम से भी कथाओं के माध्यम से भी उपदेश करता हूं समाज में जाता हूं और प्रवचन के रूप में भी जाता हूं साथ में में साहित्य लिखन का भी कार्य करता हूं अभी तक 65 से 70 पुस्तकों को मैंने लिखा है व सारी समाज के हित में य है कहीं कहीं उनमें समाज सुधार छुपा हुआ है और यही मेरी भावना है कि यह देश ऋषि मुनियों का देश रहा है यह देश विश्व का गुरु रहा है यह देश विश्व का सम्राट भीरा है और एक दो वर्ष नहीं बड़ी लंबी काल तक रहा है लगभग पौने दो अरब वर्ष तक इस देश ने सारे विश्व को दिशा दी सारे विश्व को ज्ञान दिया और एक परिवार की भाती व्यवस्था दी इसलिए हमारी वेद की अवधारणा है वसुदेव कुटुंब कम कतो विश्व मरयम और सर्वे

00:03:28:25 भवत सुखना सर्वे संत निरामया सर्वे भद्राणि पंतु माक श दुख भाग वेद हम ही सुखी नहीं रहे य देश ही सुखी ना रहे सारा विश्व सुखी रहे सारा विश्व हमारा एक परिवार है सारे विश्व को श्रेष्ठ बनाने के लिए यहां पर जो भी गतिविधियां हमारे पूर्वज ऋषियों की रही है और उन्हीं के पक्षों पर हम लोग भी चलते हैं यही उद्देश्य हमारा गुरुकुल खोलने का गुरुकुल चलाने का उपदेश प्रचार प्रसार करने का जिससे समाज में बदलाव आए और बदलाव के रूप में क्या हम देखना चाहते इस मनुष्य में मनुष्यता को देखना चाहते हैं जिसे इस मनुष्य यह मानव मानव बने सच्चे अर्थों में और यही वेदों का उद्देश्य है जब तक यह मनुष्य मनुष्य नहीं बनेगा तब तब तक समाज में शांति नहीं आएगी तब तक समाज में जो समरसता आनी चाहिए वह नहीं आएगी इसलिए यह ऋषियों की परंपरा है उसी परंपरा को हम वेदों

00:04:43:26 के अनुसार वेदों को उद्देश को लेकर के चल रहे हैं समाज में पहुंच रहे हैं और आज आपके साथ में भी जी मेरा यही विषय है आपने भी जिज्ञासा की थी कि हम ब्रह्म के विषय में आपसे चर्चा करना चा हैं जी क्योंकि आज ईश्वर को भी लोग विविध प्रकार से मान रहे हैं जी और वह विशेष मैं हिंदू धर्म की बात नहीं करर सारे विश्व की बात है जी चाहे वह इस्लाम के मानने वाले सही चाहे वह ईसाइयत को मानने वाले सही हम सभी इस विषय पर गुम रहा है और अभी से नहीं है हजारों वर्ष बल् देखा जाए महाभारत काल से लगभग यह दशा है पूरे विश्व की जी क्योंकि हमारा समाज पतित हुआ महाभारत काल से ही महाभारत काल में हमारा एक महा विशाल युद्ध हुआ जो परस्पर युद्ध रहा उसमें बड़े-बड़े विद्वान समाप्त हुए विद्या समाप्त हुई और वहीं से हमारे पतन का कारण हुआ बल्क विश्व के पतन का कारण हुआ वहीं से मत मता तरों का जन्म हुआ वहीं से

00:05:58:26 अविद्या की की वृद्धि हुई और जो आज भी उस अविद्या को हम नहीं हटा पा रहे हैं यह विद्या ही मूल कारण है कु संस्कारों को जन्म देने वाली मानवता के स्थान पर दानव को जन्म देने वाली और शांति के स्थान पर अशांति का जन्म देने वाली धर्म के स्थान पर अधर्म को जन्म देने वाली विद्या ही मूल कारण है इसलिए हम पुनः वेद की विद्या क्योंकि वेद की विद्या इसलिए है कि वेद सब स विद्याओं का पुस्तक है ऐसा ऋषियों ने कहा है मषि दयानंद ने कहा है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है वेद का पढ़ना पढ़ाना सुनना सुनाना सभी मनुष्यों का परम धर्म है और सारे विश्व ने भी माना है कि वेद प्राचीनतम ग्रंथ है विश्व में अगर कोई विश्व के पुस्तकालय में कोई सबसे प्राचीन पुस्तक पाई जाती है तो वेद पाया जाता है ये सारे विश्व के लोगों ने माना इसलिए वेद के अनुसार वेद में ही जो सारे विश्व की भावनाएं हैं दिशा देने की शांति लाने की धर्म का पाठ पढ़ाने की सच्चे ईश्वर को का ज्ञान कराने की वेद में ही सारी चीजें निहित है वेद का ज्ञान

00:07:13:27 ईश्वरीय ज्ञान है इसलिए वह सार्वभौमिक ज्ञान है सारे विश्व के लिए ज्ञान है किसी एक देश के लिए किसी एक धर्म मत पंथ के लिए नहीं है सारे संसार के मानवों के लिए वेद में व्यवस्था है क् ईश्वर जो भी व्यवस्था देता है वह सभी के लिए देता है कोई पक्षपात नहीं करता इसलिए हमने वेदों को चुना वेदों के मार्ग को चुना कि वेद का मार्ग ही सारे विश्व को मार्ग एक अच्छा दे सकता है सारी अविद्या को नाश कर सकता है बाकी तो अगर हम जाएंगे तो अगर इस्लाम को देंगे इस्लाम केवल कुरान की बात करता है कुरान को जो नहीं मानते उनको काफिर मानता है जो कुरान को मानते हैं उनको अपना बंदा मानता है ऐसे सबने अपनी बात कही लेकिन वेद ने सबकी बात कही सब अपने हैं सारा विश्व हमारा परिवार है इसलिए वेद के अनुसार हम चाहेंगे हम लोग चर्चा करें जी जी और एक सत्य निर्णय पहुंचे इसका संदेश जाए समाज को जी जी जी बहुत ही सुंदर परिचय हमें प्राप्त हुआ आचार्य जी का और जैसा आप लोग जानते भी हैं आवान कॉल ऑफ धर्मा के नाम से हम लोग जो है आपके सामने इसी तरह की रोचक जो व्याख्या हैं वह लाते रहते हैं और उसमें हम लोग यहां के रहने

00:08:28:27 वाले नहीं है क्योंकि शाहजहांपुर काफी दूर है हमारा जो होम टाउन है वहां से यहां विशेष रूप से आचार्य श्री को उनसे समय लिया और फिर हम यहां पर पहुंचे हैं और जो हमारे यहां पर जो विभिन्न धाराएं हैं जैसे हम शंकराचार्य के मत को मानने वाले हैं और जैसे रामानुजाचार्य हैं जैसे दयानंद जी भी हैं तो इनमें जो मुख्य अंतर है इन्हीं पर लेकर के हम लोग आपके सामने प्रस्तुत करते हैं चीजें कि कहां पर बिखराव है कहां पर जो इनमें मतों में दूरी है तो एक बात मुझे बहुत अच्छी लगी आपने जो शुरू से बताई है आचार्य जी और यह हमारे समाज में लोगों को मालूम भी होनी चाहिए जी कि एक जीव जो मनुष्य दे धारण कर कर करते हुए जो जन्म ले रहा है समाज में जीव है जो मनुष्य देह में है बस मगर वह अभी मनुष्य है नहीं जैसे व कहा गया धर्मे हीना पशु भी समाना तो जो धर्म की मूल व्याख्या है वह क्या हुई कि सामने खड़ी हुई तीन स्त्रियों में कौन माता है कौन बहन है कौन पत्नी है यह अंतर करना हमें धर्म सिखाता है जी अगर धर्म हमारे पास नहीं है जी तो हम पशु वत है जी हमने हमारी योनि तो

00:09:44:06 मनुष्य की है शरीर हमारा मनुष्य का है मगर धर्म ना होने के कारण हमें ये अंतर करना नहीं आ रहा है कि किसको किस दृष्टिकोण से देखना है जी यह दृष्टिकोण देता है हमें धर्म अब इसमें ही जो हम ईश्वर की आवश्यकता जो लेते हैं जैसा कि आचार्य जी ने बताया कि धर्म में ईश्वर कहां से आता है चलिए आपको जैसे साम जो आपको सामाजिक प्राणी बनना है तो आपको धर्म को धारण करना है मगर क्यों बने सामाजिक प्राणी क्यों बने क्यों धर्म को धारण करें तो धर्म की आवश्यकता जो है वह मनुष्य को इसलिए है क्योंकि मनुष्य सच्चिदानंद स्वरूप होकर के शेष रहना चाहता है मोक्ष चाहता है मनुष्य की जो मूल इच्छा है वो मोक्ष की है एसी टीवी फ्रिज बल्ब सब में वो यही ढूंढ रहा है कि मैं कैसे सच्चिदानंद स्वरूप होक के शेष रह और इसी को वो कहा गया हमारे उपनिषदों में कि असतो मा सद गम तम सोमा जो तगम मृत मतम तो अब क्या है मनुष्य को चाहिए मुक्ति और मुक्ति के लिए उसको चाहिए कोई रास्ता रास्ता कि यहां से जाना है यहां से नहीं जाना है तो मनुष्य पहुंचेगा मुक्ति तक

00:10:59:21 और उसको चाहिए एक रास्ता उस रास्ते का नाम धर्म है तेरे लिए कर्तव्य और अकर्वेंट दन स्वरूप होना है तुझे मुझ तक पहुंचना है ईश्वर अगर ईश्वर तक अगर आपको पहुंचना है तो आपको यह करना है यह नहीं करना है आपको सच बोलना है झूठ नहीं बोलना है आपको व्यभिचार नहीं करना है आप संयम संयम में रहना है आपको जो है ऐसी बहुत सी बहुत सी चीजें आपको चोरी नहीं करनी है दान करना है तो यह सब क्या है यह आपको धर्म बताता है कि आप जब इस मार्ग पर चलेंगे तो आपकी जो मूल इच्छा है आप सब कुछ ढूंढ रहे हो मगर उसकी जड़ में आपको क्या मिला आपको उसकी जड़ में आपको चाहिए सच्चिदानंद और वह आपको मिलेगा सच्चिदानंद स्वरूप ईश्वर जी तो ईश्वर तक पहुंचाने की जो यात्रा है उस यात्रा में आपको क्या करना है क्या नहीं करना है इसी का नाम धर्म है तो हमारे जो इस धर्म को लेकर के जो विभिन्न मत मता बनते हैं उसमें यह बहुत इंपॉर्टेंट एक चीज होती है कि हमारी जो ईश्वर की व्याख्या है वह एक

00:12:14:24 बिल्कुल सार्वभौम हो जी जो वही ईश्वर हो जो ईश्वर मनुष्य की इच्छा का विषय है मनुष्य की वास्तविक इच्छा का मूल विषय जी तो इसीलिए मैं यह जानना चाह रहा था जी से कि क्या आर्य समाज के द्वारा जो प्रतिपादित परिभाषित होने वाला जो ईश्वर है जो आर्य समाज की व्याख्या उसके अनुसार जो ईश्वर है क्या वह मतलब सर्वशक्तिमान है यदि है तो सर्वशक्तिमान होने के जितने घटक हो सकते हैं क्या वह उन पर भली भाति ये क्वेश्चन एक आता है जब हम बात करते हैं ईश्वर पर कि वो सर्व सामर्थ वान होना चाहिए तो समाज के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर जो है सर्व सामर्थ्य वान है या नहीं और यदि है तो फिर एक बात आती है कि वह सभी नियमों को बनाने वाला है उस पर कोई नियम लागू नहीं होने तो इसमें थोड़ा सा आप प्रकाश डाल दीजिए जी देखिए कई प्रश्न यहां पर आपके उठे हैं आपकी भाषा में जी और मैं सबसे पहले मूल विषय भी बात करता हूं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है लोग सर्वशक्तिमान को समझ नहीं

00:13:30:08 पाए आर समाज का भी उद्देश्य है श्वर देव दयानंद ने 21 विशेषण बताए उस ईश्वर के जिसमें यह घटित होते हैं वही ईश्वर है आर समाज के दूसरे नियम में उन्होंने कहा है ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप निराकार सर्वशक्तिमान न्याय कारी दयालु अजन्मा अनंत निर्विकार अनादि अनुपम सर्वाधा सर्वेश सर्व शक्तिमान अजर अमर अभय पवित्र सृष्टि करता है उसी की उपासना करने योग्य है ये 21 विशेषण जिसमें घटित होते हैं वही ईश्वर है वही ब्रह्म है जिसमें यह विशेषण नहीं घटित होते वह एक जीव हो सकता है वो एक महापुरुष हो सकता है वो एक अपर ब्रह्म हो सकता है वाइस वाइस कैप्टन एक तरीके से जी वो ब्रह्म नहीं हो सकता पूर्ण नहीं हो सकता इसलिए वो सर्वशक्तिमान है पर स शक्तिमान का लोग अर्थ क्या समझ रहे हैं इसका क्या है उनके विषय से परिभाषा इसकी क्या है तो

00:14:38:20 सर्वशक्तिमान को लोग अधिक समझ रहे हैं कि वह इतना सर्व कुछ शक्तिमान है कि सब कुछ कर सकता है ईश्वर भी सब कुछ नहीं कर सकता यहां लोग भूल रहे हैं सब कुछ नहीं कर सकता सर्वशक्तिमान तो है सर्वशक्तिमान इसलिए है कि वह अपने कार्यों में किसी

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00:14:55:18 की सहायता नहीं लेता अच्छा अपने कार्यों में किसी की सहायता नहीं लेता उसने उसने सूर्य जैसे आग के पिंड को भी स्थापित कर दिया इस सौरमंडल में उसमें किसी की सहायता नहीं ली ईश्वर स्वयं स्वता ही अपने सारे कार्य करता है वो किसी अन्य की सहायता नहीं लेता इसलिए वह सर्वशक्तिमान है इसका मतलब यह नहीं कि वो सारे कार्य कर सकता सारे कार्य नहीं कर सकता वो भी नियमों में बंधा हुआ है नियम के अनुकूल ही कार्य करेगा करता भी है करता भी रहेगा नियम के विपरीत परमपिता परमात्मा भी नहीं जाएगा जिसको ईश्वर मानते हैं सर्व शक्तिमान का अर्थ इतना ही है कि वो अपने कार्यों में किसी की सहायता नहीं लेता अच्छा आचार्य जी इसमें एकय क्वेश्चन आता है कि जैसे वो अपने कार्यों में किसी की सहायता नहीं लेता इसलिए वो सर्वशक्तिमान है जी तो फिर आत्मनिर्भर किसे कहेंगे नहीं आत्मनिर्भर जीव होता है हम जीव होता है स्वयं पर निर्भर रहने वाला हां आत्म स्वयं पर रहने वाला अच्छा परमात्मा तो ईश्वर तो शाश्वत है जी ठीक है उसको निर्भर कहना भी हम कहेंगे उसको एक सीमित दायरे में ले आना है अच्छा वो शाश्वत उसकी सारी अवस्थाएं

00:16:11:08 सारी व्यवस्थाएं सब शाश्वत है नहीं नहीं जैसे हमने कहा ना कि वो किसी की मदद नहीं लेता जी तो आत्मनिर्भर की व्याख्या भी यही होती है कि वो किसी की मदद ना ले

00:16:21:20 तो फिर सर्वशक्तिमान और आत्मनिर्भर क्या एक दूसरे के पर्यायवाची माने जाए हां मान भी सकते हैं हम मान भी सकते हैं

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00:16:29:15 अच्छा अच्छा एक चीज इसमें और आती है कि जैसे हम कहते हैं कि अनंत सामर्थ्य वान जी अनंत मगर यदि हम यह कह रहे हैं कि वो भी कुछ कार्य हैं भले ही उसकी वजह हो ईश्वर ही है मगर कुछ कार्य है जो वह नहीं कर सकता तो फिर वोह जो अनंत कहना है फिर वो सत्यापित नहीं हो पाता है साथन

00:16:52:16 इसलिए है कि उसके अनंत ऐसे कार्य जिसको हम समझ नहीं पा रहे देख नहीं पा रहे अभी जान नहीं पा रहे

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00:16:57:10 हैं इसलिए गोस्वामी तुलसी जान हरि अनंत हरि कथा यानी कथा मतलब उसकी व्यवस्था है उसका जो कर्म क्षेत्र है वो अनंत है यानी कुछ ऐसी चीज जो अभी आर्य समाज ने नहीं बताई नहीं आर समाज ने कोई नहीं बता सकता जी क्योंकि ऋषि जन स्वयं कहा है कि जीव जितना भी है मानव प्राणी के कोई राम को ले लो श्याम को ले लो इन सारे जीव आत्माओं का जन एक सीमित होता है बिल्कुल कहीं कहीं सीमा में जाएगा बंधेगा जी और परमपिता पर त्मा का ज्ञान असीमित है उसका क्षेत्र असीमित है इसलिए उसको ऋषि मुनियों ने भी बहुत कहने की कोशिश की दर्शन दर्शनाचा ने बहुत कहने की वा का विषय नहीं विषय नहीं है अंत में जाकर के लोग वहां पर मुख हो जाते हैं फिर कहना ही बंद हो जाता है इसलिए वो असीमित है और उसके विषय में यह खोजें निरंतर अनादिकाल से चल रही है अनादि काल से चलती रहेंगी और फिर भी वह शेष ही रह जाएगा इसलिए उसको शेष भी कहा गया मतलब एक फैक्ट यहां प निकल के आ रहा है कि वो और क्या क्या कर सकता है यह कहा नहीं जा सकता है मगर वो क्याक नहीं कर सकता यह हमें

00:18:00:16 पता चल चुका जी जी ऐसा तो नहीं कि वह और क्या-क्या जो कर सकता है उसमें यह वाली चीज भी आ जाए कि हमने जिसको लगाम लगा दी है कि वो यह नहीं कर सकता ये शायद और क्या-क्या कर सकता है में इंक्लूडेड हो जाए जो हमें नहीं पता चल रहा है अभी हां बिल्कुल सही ऐसा भी हो सकता है क्योंकि उसकी व्यवस्था को वही जान सकता है हम लोग पूर्ण नहीं जान सकते

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00:18:20:06 क्योंकि हम अल्ज है हमारा जन भी उसके सामने अल्फ है हमारा जितना बोध है हमने जिसको उतना जितना उसको समझ पाया है हम उतना ही कह सकते उसके विषय में कोई अगर पूर्ण घोषणा करता है कि परमात्मा इस क्षेत्र में इतना पूर्ण है तो वो मैं समझता हूं एक अल्पजीवी आपकी सामर्थ है अच्छा हो सकता है कि आगे चलकर के ऐसी चीजें हो कि वो ले भी सकता बिल्कुल है क्यों कितना परिवर्तन हो रहा हम देखें अभी हमारी आयु 55 वर्ष है 55 वर्ष मैंने बचपन में जो देखा था आज समाज कितना परिवर्तन हो गया है कितना बदल गया हमारा ही परिवेश बदल जाता हम मानवों का ही समाज बदल जाता है और ईश्वर व्यवस्था भी क्या रही होगी पूर्व युग में क्या रही होगी क्या आगे व्यवस्था उसकी रहेगी क्या उसे करने की आवश्यकता कराने की आवश्यकता पड़ सकती है यह उसकी व्यवस्था वही जान सकता हम लोग उसके विषय में पूरा निर्णय लेने के अधिकारी नहीं है ना सामर्थ रखते हैं तो अभी मतलब एक बहुत अच्छी

00:19:35:14 सी एक सुंदरता से चीज एक तथ्य हमारे को समझ में आया कि ईश्वर के विषय में जो यह बात कही जा रही है कि वो नहीं ले सकता अवतार या फलाना कार्य नहीं कर सकता है यह एक मतलब निर्णय नहीं है अपनी जांच का एक समीक्षा की है कि भाई इस इस तरीके से ऐसा लग रहा है मगर फिर भी ईश्वर क्योंकि अनंत साम

00:19:56:00 नहीं कुछ विषय में तो है उसमें अवतार की बात ले जी अवतार में हम निर्णय हम ले सकते हैं हम कह सकते हैं कि अवतार नहीं ले सकता ना लेगा ना लिया है क्योंकि

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00:20:06:06 वो व्यवस्था ऐसी है अवतार अगर लेंगे जैसे लोग लोगों ने लिखा है चाहे मानस में देख लीजिए मानस में गोस्वामी लिख रहे हैं जब जब होई धर्म की हानि बाढ असुर अभिमानी तब तब ले विविध प्रभु विविध शरीरा हरे भक्त संकट दुख पीरा ये लिखा है गोस्वामी जी ने ऐसा ही गीता में भी लिख रखा है ददा यदा धर्म से गन भवत भारत जब धर्म के होती है कृष्ण महाराज जी के द्वारा कहवा तब मैं धरती पर अवतरित होता हूं और धर्म की स्थापना करता हूं व धर्म का नाश करता हूं ऐसा कहा गया ऐसे सारे पुराणों में सब जगह लिखा है वेद को छोड़ कर के दर्शनों को छोड़ कर के जी जो आपके सांस्कृतिक ग्रंथ है जो प्राचीन ग्रंथ ऋषी कृत है उनमें किसी में भी ऐसा नहीं है जो महाभारत के बाद में जिन ग्रंथों की रचना की गई मानवत ग्रंथों की पुराण से लेकर आदि उनमें सारी व्यवस्था इन में है अब अवतार के विषय में हम कह सकते हैं कि अवतार परमात्मा कभी नहीं ले सकता तो जब हम ये कह रहे हैं आचार्य जी कि वो नहीं ले सकता तो फिर हमारी जो वो वाली बात थी कि हो सकता है आगे कुछ ऐसी ची पता चले जिन कार्यों को हमने जान लिया है मतलब ये फिक्स है कि वो ये नहीं कर सकते जिन कार्यों को हमने जान लिया उनमें हम कह सकते हैं जो कार्य अभी जानकारी से हमारे बाहर है ठीक है जी उनको हम कैसे कह सकते हैं अच्छा तो एक ये वाली बात उसके कार भी तो अनंत हो सकते हैं जी जी जी उस

00:21:21:14 बस यहीं पर थोड़ा सा एक वो आता है कि जब हमने ये जान लिया चलिए कि वो कितने भी काम कर सकता हो मगर कोई एक कार्य तो हमें पता चल गया जो वो नहीं कर सकता है ये तो क्लियर है तो जब हमें कोई एक भी कार्य हमें ऐसा पता चल गया जो वो नहीं कर सकता है तो फिर हम उसे अनंत कैसे कह सकते हैं नहीं अनंत है अनंत इसलिए हम नहीं हम अनंत इसलिए कहते हैं हम उसका अंत नहीं पा अनंत अनंत सामर्थ्य वान नहीं अनंत सामर्थ्य वान है वो इसलिए भी है इसलिए भी कह सकते हैं कि हम उसका पार ही नहीं पा पा रहे हैं हम उसको पूर्ण तरीके नहीं कह सकते हैं नहीं एक चीज पता चल गई ना कि उसका अंत है सामर्थ्य का कि वो अवतार नहीं ले सकती ये सामर्थ का अंत नहीं है ये व्यवस्था है क् उसको लेने की आवश्यकता ही नहीं है ये सामर्थ्य का अंत नहीं ऐसा नहीं वो अवतार ले सकता है मगर लेता नहीं है क्योंकि उसको आवश्यकता लेने की आवश्यकता ही नहीं है जैसे मान लिया जाए इस समय आप अवतार छोड़ दीजिए मान लीजिए इस समय ईश्वर सर्वव्यापक मान रहे हैं नहीं मान रहे हैं बिल्कुल सर्वव्यापक है जी कण कण व्यापक है सर्वत्र है और समान रूप से है जी गोस्वामी जी की हम चौपाई उठाते हैं गो हर व्यापक सर्वत्र समाना वो परमपिता परमात्मा समान रूप से व्यापक सब जगह है आगे लिख रहे हैं कि अगली चौपाई में देश काल दिश विद से

00:22:36:20 माई कहो कहां जहां प्रभु नाही ऐसा

00:22:39:22 देश कौन सा ऐसा काल कौन सा ऐसा स्थान कौन सा है जो परमपिता परमात्मा उस जगह पर उस समय

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00:22:45:25 पर है नहीं सब जगह और समान रूप से व्यापक है जब समान रूप से व्यापक है एक वस्तु कोई भी जब समान रूप से है कहीं पर उपस्थित मान लिया जाए किसी थाली में हम जल को भर ले मान लिया जाए और पूरी थाली लबालब जल से भरी हुई है कहीं पर कम अधिक नहीं है तो फिर जल का जाना वाना संभव हुआ क्यों हुआ क्योंकि जब वो पहले से ही वहां पहुंचा हुआ है जी तो वहां पहुंचने की जरूरत ही नहीं है और समान रूप से है पूरी थाली में जल समान रूप से है तो कहीं कम अधिक हो ही नहीं सकता कहीं जाने की कहीं से जाने की आवश्यकता ही नहीं हो सकती जब पहले से व्यापक है वो इसी तरीके से परमपिता परमात्मा जब बीहड़ और मंदिर में जब देश या विदेश में जो भी ब्र उसमें समस्त स्थानों पर समान रूप से वह है तो

00:23:32:28 कहां से जाएगा कहां जाएगा क्योंकि जब न्यून और अधिक होगा तभी तो जाना आना संभव हो सकेगा जी तो इसलिए व संसद दूसरी बात अवतार लेने के लिए कुछ विशेष कार्य करने के लिए क्यों आएगा जब वह प्रलय जैसी व्यवस्था को करता है प्रलय इस संसार को प्रलय में बदलता है तब किसी अवतार के माध्यम से नहीं बदलता

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00:23:53:02 इस संसार की रचना जब करता तब भी किसी अवतार की व्यवस्था से नहीं रचना करता है जब वो रचना कर सकता इतने विशाल ब्रह्मांड की इस विशाल व्यवस्था को हमें अपने सौरमंडल का ही पूरा ज्ञान नहीं कितने सौरमंडल ऐसे वैज्ञानिकों ने निश्चित किया कितने सौरमंडल और भी है ऐसी व्यवस्था को व जब रचना कर देता बिना शरीर के कर देता है बिना अवतार कर देता है हा ये सृष्टि इतना सृष्टि का काल रहता है इतने समय तक वो परमपिता परमात्मा इसके बाद जब उसको प्रलय में लीन कर दे लीन करता है तब भी उसे किसी अवतार की आवश्यकता नहीं पड़ती तो

00:24:25:24 क्या छोटे-छोटे जो दुष्ट प्रवृत्ति की लोग हैं जैसे रावण हुए कंस हुए क्या इनको मारने के लिए इनको खत्म करने के लिए क्या उस अवताल लेने की आवश्यकता पड़ेगी नहीं नहीं आचार्य जी मेरा जो वो है ना जो पूछने का कि उसके वो ले सकता है कि नहीं क्यों ले सकता है जब वो उसे जरूरत ही नहीं है भाई जरूरत ही नहीं है और लेगा तो वो सीमित हो जाएगा क्योंकि फिर वो सर्वद नहीं रहेगा जी जी अवतार वाला एक देश ही हो जाएगा तो उसकी शक्ति सामर्थ्य घटी क्षेत्र घटा कि बढ़ा है तो हमें

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00:24:57:24 इसमें तीन एक तो सर्वव्यापक है इसलिए नहीं ले सकता एक उसे आवश्यकता नहीं है इसलिए नहीं ले सकता एक वो हर जगह पहले से ही है तो उसका आना जाना अच्छा इस पर थोड़ा और मैं स्पष्ट कर दूं कि अभी तक उसका जैसे लोग अवतार बता रहे 24 अवतार हुए हैं अभी तक कोई भी अवतार नहीं हुआ मैं सिद्ध करूंगा जी जी जी यह लोगों की भ्रांति है जी जी जी या लोगों ने अजान वस या लोगों ने स्वार्थ वसी अवतार की व्यवस्था को खड़ा किया है अपने आम में अवतार उसका एक भी नहीं हुआ ना हो सकता जैसे अब जैसे कहते हैं लोग कि एक विषय बदल जाएगा अभी वो तीन चीज चल रही है आप ये आगे ले लेंगे नहीं मैं उसी पे आ रहा हूं क्योंकि इसको समझ लेंगे तो आपको आपका हो सकता है उसमें उत्तर हो जाए अच्छा अच्छ जैसे सबने सभी जितने भी अवतारवाद जो लोग हैं या ग्रंथ है सबने यह कहा कि जब धर्म की हानि होती तभी ईश्वर अवतरित होता है ठीक है जी और उधर सतयुग में चारों चरण धर्म बताया है जी जी भागवत ने 20 चरणों में पूर्ण धर्म को कहा है रामायण जैसे ग्रंथों ने चार चरणों में पूर्ण धर्म कहा है तो सतयुग में चाहे रामायण के माध्यम से चाहे अन्य ग्रंथों के माध्यम से पूर्ण धर्म बताया सतयुग इसलिए सत्य का युग कहा गया है त्रेता में तीन चरण धर्म के और एक अधर्म हो गया द्वापर

00:26:12:25 में दो चरण अधर्म के दो चरण धर्म के हो गए कलयुग में य चारों चरण अधर्म है हम एक एक बचा शायद एक शेष बचा वो बीज रूप में तीन चरण धर्म हो गया एक धर्म है ये है अब देखिए 24 अवता की बात अगर करें लंबी हो जाएगी मूल 10 अवतार माने गए हैं भगवान के ठीक है सबने वो द्वापर तक ले लिया मूल अवतार बताए और मूल अवतारों में जो 10 अवतार हुए उनमें चार अवतार भगवान के हुए सतयुग में सतयुग में चार अवतार हुए जब उनके चार जब धर्म के चार पैर है तब चार अवतार चार अवतार हुए चार अवतार हुए और कौन-कौन से हुए 12 अवतार हुआ जी मतस्य अवतार हुआ जी कुर्म अवतार हुआ और नरसिंह अवतार हुआ ये चार अवतार सतयुग में हुए हैं ठीक है जी अब यहां पर एक बात समझ ले हम यदि चारों चरण धर्म सतयुग में है और धर्म की हानि होने पर ईश्वर अवतरित होता है और सतयुग में चालो चरण धर्म पूर्ण है धर्म की हानि हुई नहीं तो अवतारों की आवश्यकता क्या थी क्यों आ गया कैसे आ गया और यदि चार अवतार हुए तो इसका मतलब क सतयुग में धर्म था

00:27:27:25 ही नहीं कलयुग से भी वो निम्न का युग रहा है क् कलयुग में तीन चरण से अधर्म है एक चरण धर्म यहां भी है लेकिन वहा चारो च धर्म रहा होगा जब धर्म की हानि होने पर अवतरित होता है और चार भगवान आए चार बर में आए और फिर उसम उसमें यह भी है कि वो साधु भक्तों के उद्धार के ना ना क्यों नहीं नहीं साधु भक्तो मतलब उद्धार क्यों सतयुग में साधु भक्त है नहीं मेरी बात जो घोषणा लोगों ने की है कि चाहे गीता को देख ली चाहे रावण दे लो जी जब जब होए धर्म की हानी हम साधु भक्तों की बात नहीं है जी बाढ़ असुर अधव अभिमानी इसमें तो ये भी कहा जा सकता है कि भाई उसका जो काल है वह कितना बीता कितने देर बाद उसने वहां जन्म लिया कितना भी सही चार आए हैं जी ठीक और उसके बाद भी एक सबसे बड़ी विडंबना यह है जी इससे मैं कह सकता हूं कि हमारे धर्मावलंबियों नहीं ये हमारे ग्रंथों में बातें मिलावट की गई इस हिंदू को इस आर्यों को भटकाने के लिए लिए पस से कि अपने मूल ग्रंथ जैसे धर्म वैदिक ग्रंथ से वेद से ये भटक जाए वेद के मार्ग से भटक जाए इस पाखंड फस जाए तो ये बाद में मिलावट की गई अब जैसे धर्म का ज्ञान या धर्म की स्थापना वही तो व्यक्ति कर सकता है बोध

00:28:43:03 करा सकता है जो धर्म को स्वयं जानता हो हम है जी जी ऐसा क्या हो सकता है जिसको धर्म का स्वयं ज्ञान नहीं जो धर्म को स्वयं नहीं धारण कर सकता वो व्यक्ति धर्म की स्थापना करेगा क्या जी ऐसा क्या कर सकता है नहीं कर सकता जैसे कोई व्यक्ति अशिक्षित है बिल्कुल अक्षर बोध उसे नहीं है और उसे आप किसी पाठ किसी पाठ्य पुस्तक का आप ज्ञान उसे लेना चाहे कि हमें यह पढ़ा दीजिए क्या वो पढ़ा सकता है या जो कोई व्यक्ति बिल्कुल निर्धन है उसके पास बिल्कुल धन नहीं धना अभाव है जीवन जी रहा धना अभाव में उसे आप कहे डाए कि साहब हमारी गरीबी को दूर कर दीजिए क्या वह कर सकता है नहीं कर सकता ना जो वस्तु जिसके पास स्वयं नहीं है वह आपको नहीं दे सकता ऐसे चार अवतार हुए धर्म के उन चारों अवतारों को सतयुग में धर्म कि जो बताए उनको चारों को धर्म का ज्ञान कराने से भी नहीं हो सकता और ना वो धर्म के अधिकारी हैं जैसे मतस्य मछली का अवतार हुआ क्या मछली धर्म को जान सकती है या जानने वाली है क्या कछुआ कच्छप अवतार हुआ क्या वो कच्छप कछुआ क्या धर्म को जान सकता है देखिए वो तो मैंने सुन लीजिए पहले पूरी बात क्या कछुआ धर्म को जान सकता है नहीं जान सकता ना क्या शेर धर्म को जान सकता है नहीं जान सकता ना

00:29:59:20 जब ये स्वयं स्वयं धर्म को नहीं जान सकते जी जी जी और इनका जीवन हिंसा पर निर्भर है ये सारे हिंसक है कछुआ भी जीवों को अपने जीवों छोटे जीवों को खाता है मछली भक्षण करती है शेर भी खाता है और हमारे धर्म की परिभाषा दूसरी क्या अहिंसा परमो धर्मा अहिंसा ही परम धर्म है हम है अब ये चार अवतार हुए इनको धर्म का बोध स्वयं नहीं आता दूसरा नीति का कहता है मनुष्य को मनुष्य हम क्यों कहते हैं मनुष्य वही कहलाने अधिकारी इसलिए वो श्रेष्ठ है यदि वह गुण उसमें नहीं है धर्म को धारण करने के अगर धर्म को जो धारण नहीं कर सका वो मनुष्य मनुष्य है नहीं ना उसको श्रेष्ठ कहने का अधिकार है जैसा गोस्वामी लिख रहे हैं बड़े भाग मानुस तन पावा तन तो मिल गया बड़े भाग लेकिन आप बड़े भाग्यशाली है नहीं अगर आप मनुष्य धर्म को ण करते हैं क्योंकि लिखा है आहार निद्रा भय मैथुन समान मेत पशु भी नराम जी आहार निद्रा भय मैथुन समान में तत ये चार कार्य आपके पशुओं के समान है आहार निद्रा समान में त पशु नाम विशेष क्या है आपके पास धर्मो तोध को विशेषा धर्म नहीं ना पशु भी समाना धर्म को धारण करना विशेष गुण है आपका वही आपको पशुओं से भिन्न करता है वही आप पशुओं की श्रेणी से उच्च स्थान देता है यदि

00:31:14:24 आप में धर्म नहीं है तो आप में पशु में कोई अंतर नहीं केवल आकृति का अंतर हो सकता है काया का अंतर काया अंतर हो सकता है लेकिन बाकी कोई अंतर नहीं है इसलिए अब देखिए चार तार

00:31:26:21 वहां हुए धर्म बढ़ना चाहिए था नहीं बढ़ना चाहिए अगर स्थापना करने धर्म बढ़ना चाहिए था लेकिन अगले युग में क्या हुआ त्रेता आया तो धर्म की हानि और हुई बढ़ा नहीं भाई सतयुग में चार डॉक्टर आए चार वैद आए चार धर्म की स्थापना करने वाले महापुरुष आए या भगवान आए कहे उनको तो धर्म बढ़ना चाहिए नहीं बढ़ना अगला युग हमारा उससे बेहतर होना चाहिए नहीं होना लेकिन नहीं हुआ थोड़ा

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00:31:50:14 सुन लीजिए मैं जो कहना चाह रहा हूं मैं सुन रहा हूं ध्यान लगा के सुन ये मत पथों के अंदर नहीं बात है जी जी ये मैं सत्य कह रहा हूं कट सत्य जरूर है मैं आपकी बात तो बहुत मनन कर रहा सुन रहा हूं जी तो अब त्रेता आया त्रेता में क्या धर्म की हानि होनी चाहिए थी अभी हमारे शरीर में रोग लगा है और हमें वैद या डॉक्टर हमारी औषधि देकर मुझे स्वस्थ करने का प्रयत्न कर रहा है तो डॉक्टर वो सफल जबी है जब मैं स्वस्थ हो जाऊं अगले आने वाले भविष्य के लिए मैं सही अपने कार्यों में उतर जाऊं मेरी वह क्षति ना हो जिसको मैंने बचाना चाहा रोग के माध्यम से वो क्षति ना हो पाए जो होनी चाहिए थी उन्होने हमें स्वस्थ कर दिया अरे वो शोर बंद करो स्थ कर दिया और मैं स्वस्थ होने अपने कार्यों में सही कार्य करने लगा यानी पिछले जो था भी अभाव वह सारा दूर हो गया मैं अस्वस्थ था वो मैं स्वस्थ में बदल गया मैं कार्य करने सतयुग में य चार भगवान आए चारों ने धर्म की स्थापना की अलग अलग तरीके से तो धर्म बढ़ना चाहिए था त्रेता में धर्म की हानि नहीं ले त्रेता में क्या हुआ तीन चरण धर्म के हुए और एक अधर्म का बढ़ गया त्रेता और वहां भी एक अवतार आना चाहिए था अगर होने भी थे लेकिन वहां भी तीन आए भाई एक चरण धर्म कहानी एक भगवान आता लेकिन वहां भी तीन आए कौन राम परशुराम और बामन अवतार ये तीन

00:33:05:16 अवतार मूल अवतार हुए और कितनी बड़ी विडंबना एक को ब्रह्म दती नास्ति एक बात कही यहां एक ही ब्रह्म है ना चार है ना 10 है ना पांच है ऐसा उपनिषद ने भी गाया है अन्य भी स्थानों पर आया परमा ईश्वर एक है सारी दुनिया के लोग मानते हैं हम भले उसे अपने नामों से अलग-अलग तरीके से कोई कहे ईश्वर एक है संसार व्यवस्था देख के भी लग रहा है ईश्वर एक है अगर अलग-अलग होते तो ना उनकी अलग अलग होती पता लगता है ईश्वरी केसा स वो ना हो सर्व नियंत्र अगर अलग-अलग होते तो पता लगता रचनाएं अलग-अलग होती सौरमंडल अलग होते सूर्य अलग होता किसी कभी उदय होता किसी कभी उनके मनुष्य बनाई हुई आकृतियां अलग-अलग होती पता लगता है लाने भगवान की रचना फलाने भगवान लेकिन ईश्वर एक है हम इसलिए कहते सारे संसार में एक जैसी वस्था ईश्वरी व्यवस्था है व सब एक जैसी हो रही है इसलिए ईश्वर एक है अब अगर राम को मान ले परशुराम को भगवान मान ले तो दोनों जनकपुर में इकट्ठे होते नहीं होते हम और दोनों एक दंद की स्थिति में आए एक क्रोध कर रहा है एक उसको थोड़ा चिढ़ाने का काम कर रहा है अंत में दोनों ने भगवानों ने एक दूसरे को पहचान नहीं पाया मैं भी ईश्वर हूं यह भी ईश्वर है लड़ाई किस बात की और फिर हमारा ईश्वर निर्विकार है इंद्रिया तीत है वो इंद्रियों के विषय से मुक्त है

00:34:20:18 विषय मुक्त है इसलिए उसको निर्वेश कहा गया लेकिन वहां किस विषय में लड़ाई हो रही है कहीं तो मान सम्मान की बात है ना वहां पर हम एक स्त्री विषय लड़ाई हो रही है एक मान सम्मान की वि से छोटे बड़े की लड़ाई हो रही है आखिरकार क्यों एक दूसरे को नहीं पहचान पाए अंत में जब पूरा बल लग गया तब पता लगा कि एक वहां से चला गया हार मानकर एक दूसरे की विजय पर प्राप्त हुई और वहां से अपनी सगाई करके ले जाते हैं जब दो हमारे भगवान वहां इकट्ठे हो गए जबकि इन ईश्वर को ना तो ईसाइयों ने माना है ना मुस्लिमों ने माना है ना सिखों ने माना है केवल कुछ हिंदुओं ने माना हुआ है तो जब हमारे हिंदुओं के दो भगवान एक जगह खट्टे हो गए तो उनके भी वर्तमान में होंगे वसे एक दो भगवान अलग-अलग तो कितने भगवान खट्टे हो गए दोनों ईश्वर खट्टे हो गए और किसलिए इसके बाद आया बामण अवतार हुआ बामण

00:35:11:03 अवतार में भी राजा बली के साथ छल किया गया छल करने वाला तीन कदम उसकी जमीन मांगी जमीन साथ उसका पूरा राज्य ही नाप लिया अंत में जब उसका तीसरा कदम उस भगवान का नहीं पूरा हुआ तो उसने कहा आप कहां रखे इसको बताओ स्थान तुम्हारा तो ढाई कदम में पूरा न गया तो राजा बली धर्मात्मा अपने आप लेट गया साहब मैं नापता हूं मुझे नाप लीजिए इसको छल कहेंगे ईश्वर छल द्वेष रहित है वह किसी के साथ छल नहीं करता किसी साथ कपट नहीं करता जी

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00:35:39:22 वो सत्य ही ईश्वर है सत्य व है जो तीनों कालों में एक जैसा रहे कभी परिवर्तन नहीं होता भूत भविष्य वर्तमान हमेशा एक रहने वाला उसी को सत्य कहा गया इसलिए वहां भी सत्य राम परशुराम वा मनता तीन हुए अब देखिए तीन भगवान यहां भी आए ठीक है लेकिन धर्म निरंतर घटता जा रहा है बढ़ा नहीं धर्म की स्थापना नहीं हुई धर्म का नाश हुआ अवतार आ रहे धर्म घट रहा है द्वापर आया युग द्वापर में दो चरण धर्म के हो गए दो अधर्म के हो गए जी कायदे में जब भगवान तीन तो यहा भी धर्म बढ़ना चाहिए था द्वापर धर्म धर्म से पूर्ण होना चाहिए था लेकिन द्वापर में भी धर्म की हानि हुई वहां दो चरण धर्म रहा दो अधर्म रहा और दोनों में दो ईश्वर आए भी वहां पुराण के अनुसार माने तो दो ईश्वर आए भी कृष्ण और बलदाऊ दोनों ईश्वर के अवतार माने गए और दोनों एक साथ में आए एक साथ में आए लगभग एक ही साथ में वापस चले गए संसार से विदा भी हो गए सवा स साल की लगभग आयु रही है और एक कंस जैसे दुराचारी का नाश करने के लिए जी या तो इन दोनों ईश्वर ने सलाह नहीं कर पाई होगी कि हम जाएंगे कि आप जाएंगे या उस कंस जैसे उस जरासंध

00:36:55:01 जैसे दुष्ट दुराचारी से यह दोनों भयभीत होंगे कि एक अकेला विजय नहीं प्राप्त कर स लिए दो लोग चलो अगर दो को हम ईश्वर मानेंगे तो सिद्ध होगा कि ईश्वर दो है ईश्वर दो है दोनों आए सवा स साल के एक ही चरण में सवा स साल धरती पर रह कर के फर पुनः वापस चले गए और धर्म फिर भी बढ़ा नहीं धर्म बढ़ा नहीं अधर्म बढ़ा आगे कलयुग आया मैं समझ गया मिट भी अंत है थोड़ा सा किसी बात के रहस्य को आप नहीं समझ पाएंगे तो आप बीच में में बोलिए कलयुग आया धर्म फिर भी नहीं बढ़ा दो भगवान ये भी फैल गए जी और आकर के कलयुग में तीन चरण अधर्म हो गया केवल एक चरण धर्म रह गया बीज रूप में और उसको लिए भी घोषणा कर रखी लोगों ने मैं तो कहूंगा यह धर्म के ठेकेदार हैं इन्होंने घोषणा कर रखी है और इस देश को फिर आगे चलने की ठगने की योजना बना रखी है हम कैसे धर्म के नाम पर ठेंगे अभी भी ठगा जा रहा है आगे भी लूटेंगे क्या घोषणा कर रखी है कि कलिंग भगवान का अवतार होगा केवल यहां एक कल की कल की भगवान का केवल एक भगवान आएगा य जहां तीन चरण धर्म है जहां तीन आने चाहिए वहां एक आएगा और कब आएगा कलयुग के अंतिम चरण में

00:38:10:20 अंतिम चरण में अच्छा अंतिम चरण में आएगा तब तो सतयुग आ ही जाएगा जरूरत तो अभी है तीन चरण ये कैसे हमारे भुगतान अभी प्रथम चरण चल रहा है कलयुग का और ये प्रथम चरण फिर द्वितीय फ तृतीय हम कैसे भुगतान करेंगे जब इस समय इतना अधर्म पापा चार हो रहा है सारे रिश्ते हमारे दूषित हो रहे हैं सारी व्यवस्थाएं दूषित हो रही है राष्ट्रीय व्यवस्था दूषित हो रही समाज की व्यवस्था दूषित हो रही राजनीतिक व्यवस्था दूषित हो रही धार्मिक व्यवस्था दूषित हो रही सारा दूषित वातावरण हो रहा है जरूरत हमें अभी है और अभी प्रथम चरण में ये दशा है कि आज बेटी और पिता का संबंध भी दूषित हो रहा है आज भाई बहन का संबंध दूषित हो रहा है आज विश्वास पात्र हम नहीं बन पा रहे हैं तो आज प्रथम चरण में दशा हमारी है आगे जब दूसरा चरण आएगा तृतीय चरण आएगा तब हमारी दशा क्या होगी चौथे चरण में अगर ईश्वर आएगा भी तो उस वो हमारी रक्षा क्या कर पाएगा अंत में तो सतयुग आने वाला उसम हमें शांति मिल जाएगी फिर पुन अगर सतयुग सत्य का युग है तो उसमें शांति मिल जाएगी इसलिए ईश्वर कभी अवतार नहीं लेता और ना ईश्वर के अवतार हुए हैं अवतार किसके हुए हैं महापुरुष जन्म लेकर युग युग में आते हैं आकर भूमंडल का वह भार हटाते हैं सतयुग में जन्म लेकर आए प्रहलाद ध्रुव यह व्यवस्था

00:39:25:24 ईश्वर की है ईश्वर के पास महान आत्माओं की कमी नहीं है बहुत सारी महान आत्माएं मोक्ष में है उसके पास मोक्ष से ही वापस करता है संसार में जो व्यवस्था परिवर्तन करने की आवश्यकता होती है अपनी पवित्र आत्माओं को अपने अमृत पुत्रों को भेजता है वो उनको संदेश देता जाओ पृथ्वी पर संदेश दो जाकर किसीकी आवश्यकता है वो भेजता है सतयुग में जन्म लेकर आए प्रहलाद ध्रुव छोटी सी अवस्था में कर दिया प्रचार शुरू गुरु नारद जी आकर के उन्हें बोध कराते हैं महापुरुष जन्म लेकर युग युग में आते हैं श्री राम का जन्म हुआ था जब था संसार दुखी रावण का वध करके कर दिए नर नार सुखी फूकी लंका असुरों की भू भार हटाते हैं महापुरुष जन्म लेकर युग युग में आते हैं आकर भूमंडल का वह भार हटाते हैं श्री कृष्ण महापुरुष भूमि पर नहीं आया यदि हम ईश्वर मानेंगे तो कृष्ण कुछ नहीं थे तो उने ईश्वर जैसा कोई कार्य नहीं किया कृष्ण राम को भी अगर हम ईश्वर मानेंगे तो जैसा कोई कार्य नहीं किया उन्होंने यदि महापुरुष मानेंगे तो द्वितीय महापुरुष दोनों रहे आप्त पुरुष रहे उनके जैसा महापुरुष आज हमें प्राप्त होना मुश्किल हो रहा है श्री कृष्ण महापुरुष आया इस भूमि पर

00:40:41:20 जिसने मा भावत में सबको भय दिखलाया उठाया था सुदर्शन को कौरव भय खाते हैं महापुरुष जन्म लेकर युग में आते हैं सुदर्शन को उठा के हां हथियार उनका रहा होगा जो भी तो वो उठाया तो सुदर्शन को कौरव भय खाते महापुरुष ज दर्शन मतलब माना जाता है उनके पास हा युग युग में आते हैं गुरुदेव दयानंद ने यह देश जगाया था यह देश जब गुलामी के जंजीरों से जकड़ा हुआ था य भारत माता हज 1200 वर्षों से गुलाम थी यहां क्या दोसा दोसा नहीं हो रही थी उस परिस्थितियों में ऋषिवर देव दयानंद का जन्म हुआ गुरुदेव दयानंद उस समय आए इस देश को गुलामी के जंजीरों से जकड़ा हुआ पाया और उनको वैराग सही बचपन में वैराग्य उत्पन्न हुआ एक शिव के मंदिर में जाकर के उन्होंने घटना शायद आपको पता होगी वो उस उनको वैराग्य उत्पन्न हुआ और उनको वहीं से लग गया कि मैं सच्चे ईश्वर सच्चे शिव की में खोज करूंगा सच्चा ईश्वर है क्या क्योंकि शिवलिंग को सच्चा ईश्वर लोग बता रहे हैं य शिवलिंग पर तो चढ़ावा चढ़ा चूहे खा रहे हैं और यह शिवलिंग शिव तो ऐसा बताया जा रहा है कि दुष्टों का संघार करने वाला भक्तों का उद्धार करने वाला यह तो अपने ऊपर चढ़े हुए छुओ को नहीं भगा पा रहा है तो दुष्टों का संघार क्या करेगा भक्तों

00:41:56:25 का उधार इसलिए ये नहीं ईश्वर है तो यहां पर एक कवि ने बहुत अच्छा लिखा है कि महादेव महा महादेव महाशक्ति वाला सब जग का स्वामी कहलाया नियंत्रण करे सारे जग का दरबार कहीं ना लगवाया भारत नेपाल अमेरिका क्या उसकी त्रिलोक में है माया जिसने रब चांद से जिसने रचकर रब चांद सितारे भूमंडल को चमकाया आज उसे भुला जानि ने पत्थर महादेव है बतलाया जिस पर सरकार ने बस गाड़ी और ठेला आदि चलवा हमने भी जिसको तोड़ ताड़ महलों के अंदर चुनवा या कर सका स्वयं की रक्षा ना उसको महादेव है बतलाया महादेव महाशक्ति वाला सब्ज का स्वामी कहलाया यह उनके अंदर प्रश्न उत्पन्न हुआ महादेव तो कोई दूसरा है उसको हम नहीं जान पाए हमने पत्थर को महादेव बता दिया जो स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर पा रहा है यहां चूहों से अपने भोजन को नहीं बचा पा रहा है इसके सर पर च उसको नहीं भगा पा रहा है और वह तोड़ ताड़ के अपने महलों में लोग चुना रहे हैं रोड बनवा रहे हैं उसपे ठेला टका चला अपनी रक्षा नहीं कर पा रहे वो महादेव नहीं महादेव कोई दूसरा है मैं सच्चे महादेव की खोज कर नि सदानंद निकल पड़े और जाकर के तीन वर्ष का स्वाध्याय किया और जाकर के जब उनको सच्चा बोध प्राप्त हुआ देश को जगाने का काम किया उस समय जिस समय धर्म की बात कहना असंभव थी मुश्किल थी

00:43:12:02 ऐसा अंग्रेजों का आतंक छाया हुआ था उस समय सत्या प्रकाश में लिखते स्वामी दयानंद महाराज कि स्वदेशी विदेशी राजा कितना भी क्यों ना बढ़िया हो लेकिन स्वदेशी राजा के समान कभी वो सुखदाई नहीं हो सकता इसलिए हमें स्वदेशी राजा चाहिए स्वराज्य चाहिए सबसे पहले स्वराज की अगर किसी ने बात की है तो ऋषि दे दन की बात की ऐसे नहीं म लेखित भी की लेखित में भी की सत्या प्र का समय दिया और उन्हीं के कारण 1857 में क्रांति मची वहीं से क्रांति शुरू हुई उनके दयानंद के शिष्य निकले यह कांग्रेस के ब पट्टा रमैया ने इतिहास लिखा उसको आप पढ़ेंगे तो उसने लिखा है कि देश की आजादी में ऋषि दयानंद के शिष्यों का 95 पर योगदान रहा है चाहे भगत सिंह को पकड़ के देखें ऋषि के शेष रहे चाहे पंडित राम बशाल को ब को देखे ऋषि के शिष्य रहे जिस महापुरुष को उठाएंगे अधिकांश उसम ऋषि दन के लोक सेवक रहे इसने आकर व्यवस्था परिवर्तन की ठीक इसी तरह समय समय

00:44:08:07 पर महापुरुषों को परमपिता परमात्मा भेजता है और इस राष्ट्र की व्यवस्था को समाज की व्यवस्था को परिवर्तन करते हैं आए भी उससे पहले भी आए हैं लेकिन ईश्वर स्वयं में नहीं आता

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00:44:18:27 चलिए बहुत अच्छा सा वृतांत हमको सुनने को मिला वैसे दो प्रश्न हो गए एक था कि वो आ सकता है कि नहीं जी यह प्रश्न नहीं था कि वो आता है कि नहीं और एक तीसरा और हो गया कि वो आया है कि नहीं जी तो एक बहुत बड़ा आपने जो वृतांत हमें सुना है वो इस बात का है कि वो आया है कि नहीं जी तो मैं मुख्य नहीं उसमें सारे का आया है कि नहीं सब था और आए आएगा भी नहीं क्योंकि उसका आने की आवश्यकता ही नहीं है आपने जो बातें की है इतना एक्सप्लोर कर दिया है कि एक प्रश्न का उत्तर यह आपकी तरफ से जो भी दिया गया कि वह आ सकता है कि नहीं उस पर भी आपने बात की है और वह आता है कि नहीं उस पर पर भी आपने बात की है और आया है कि नहीं इस पर भी आपने बात की है तो मैं वो जो मुख्य विषय था ना सबसे पहला वाला उस पर जाऊंगा मगर एक छोटी सी जिज्ञासा यहां पर ये आती है जैसे आपने कहा कि अ ईश्वर

00:45:12:07 आता है तो धर्म की स्थापना होती है जी मगर धर्म की स्थापना हुई नहीं और पतन हुआ मगर वहीं पर आपने यह मान लिया कि महापुरुष आते हैं

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00:45:20:07 बाहर हटाने के लिए बाहर बाहर हटा दिया नहीं भा समाज की व्यवस्था परिवर्तन मेरा य जिज्ञासा हो गई कि भगवान के आने पर तो आपने पतन माना मगर महापुरुष के आने पर आपने भर हटाना मान लिन थे ही नहीं भाई भवान मेरा कहने का उद्देश्य था जिन अवतारों को माना है जी वो ईश्वर नहीं थे तो क्या भार हटा क्या मगर जब आप महारु भार हटा नहीं जब महा भार हटाने जिस भार हटाने की हमने बात कही अधर्म की स्थापना धर्म अधर्म के लिए मिट जिनको हमने जिस जिस बात को लेक जिस विषय को लेकर अवतार मान रहे हैं वह विषय का ही उनको बोध नहीं था नहीं नहीं वो ठीक है वो करेंगे मगर एक यह जिज्ञासा आ रही है कि जब कोई यह कह रहा है कि ईश्वर आया उसने धर्म की स्थापना की तो वहां पर हम ही ये चैलेंज कर रहे हैं कि कहां धर्म की स्थापना हुई सतयुग से तो और पतन हो गया जी वो आ गया त्रेता आ गया मगर हम जब ये वही व्यक्ति जो वहां पर चैलेंज कर रहा है व पतन क्यों हुआ वही व्यक्ति ये क्लेम कर रहा है कि नहीं महापुरुष आया उसने भार हटा दिया जो अधर्म का भार था तो हम एक तरफ कह रहे

00:46:27:13 कि पतन हुआ एक तरफ महापुरुष के रूप में य मान रहे हैं कि नहीं पतन नहीं हुआ धर्म की रक्षा हो गई तो

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00:46:32:26 यह दो बातें हो गई नहीं दो बात नहीं होगी बात एक कि आप समझने थोड़ा कोशिश करिए जैसे यदि हम ईश्वर की स्थापना करेंगे ईश्वर से यदि मनाएंगे ईश्वर वो पतन हुआ माते मिनट जैसे ईश्वर का हम अगर इसको श्रेय देंगे कि धर्म की स्थापना करने वाला केवल ईश्वर है ठीक है धर्म की व्यवस्था देने वाला ईश्वर है और वही आता है संसार में जब अधर्म बढ़ता है तो वही आता है तो इससे हम मानेंगे तो पतन हुआ है क्योंकि ईश्वर के लिए कोई बहुत बड़ा कार्य नहीं है और महापुरुष से मानेंगे तो उठा है हा क्यों वो जरूरत है आज भी मैंने अभी आपसे पहले कहे थी मैंने अभी भी प्रचारकों की आवश्यकता है मेरी बात थ विद्वानों की आवश्यकता है क्योंकि अविद्या बहुत फैल चुकी है इसलिए विद्वानों की संख्या विशेष होनी चाहिए गली गली घर घर विद्वान होने चाहिए पहुंचने चाहिए जैसे अन्य धर्मयोद्दा व भले ही हम उनको अ विद्वान कहते हैं लेकिन उनकी उनके विद्वान है जो अधर्म हों के विद्वान है और आज घर घर उन्होने बो दिए हैं उनके गांव गांव घर-घर जा रहे हैं उनके उनके बच्चे उनके धर्म के केंद्र जो है वहां जा रहे हैं पढ़ने के लिए भले ही वो अधर्म पढ़ा रहे हैं मानवता के विपरीत उनको संस्कार को संस्कार दे रहे हैं लेकिन उनके लिए वह संस्कार है उनके लिए वह अल्लाह के आदेश का अनुपालन हो रहा है चलिए ठीक है ये वाला जो चैप्टर है कि

00:47:48:02 उसने अवतार लिया है कि नहीं जो तीसरा वाला आपने इसमें वैसे काफी सारे आपने वृतांत इतना बताया तो उसमें तो काफी सारी चीजें हैं एक छोटी चीज और है फिर हम लोग मुख्य विषय पर ही जाएंगे बस कि जैसे आपने कहा कि हम यह मानते हैं कि ईश्वर का एक चौथा जो वो कार्य करता है वो है किसी को उसके कर्मों का फल देना जी है ना तो जैसे कोई व्यक्ति है और उसने कोई बुरा कार्य किया है जी तो उसको रास्ते में चलते जैसे उसने किसी थप्पड़ मारा है जी आगे चलकर के उसको ठोकर लग गई क्योंकि ईश्वर ने उसको उसके कर्मों का फल दे दिया है ना तो यहां ठोकर लगने में वो देख नहीं पाया या अंधेरा हो गया तो इसमें मतलब इस ठोकर को लगने को ईश्वर के द्वारा प्रदत उसके कर्म का फल मान माने या ना माने नहीं ठोकर लगना देखो सामान्य जितने भी कार्य हैं जी मानव प्राणी को ईश्वर ने कर्म करने में स्वतंत्र छोड़ रखा है ठीक है अन्य प्राणी जितने भी हैं वो कर्म करने में स्वतंत्र नहीं है ठीक है वो अपने पूर्व जन्मों के किए हुए फल का भोग कर रहे हैं अच्छा इसलिए उनको भोग योनि कहा गया है जैसे पशु पक्षी कीट पतंगी जितने मनुष्यों को छोड़ कर के जी वो सब भोग योनि में है यानी जैसे कोई व्यक्ति बहुत बड़ा जो

00:49:03:08 रहा हो एक तरीके से डाकू रहा हो जी ठीक है और वह किसी तरीके से बंधक बन गया है और जेल में पहुंच गया है अब जेल वो व्यवस्था है जहां वो अपराध नहीं कर सकता नए यदि जेल अपने माध्यम से कार्य सही कर रही है वहां अनुशासन है प्रशासन ठीक है तो उसको इतना मौका इतना अवसर इतना सामर्थ्य नहीं मिलता कि वो नया अपराध कोई वहां कर ले जी जी जी यदि कहीं शिथिलता तो तो अलग बात है ऐसे ही जो मानव प्राणी को छोड़कर जितने भी अन्य प्राणी है अन्य योनि है वो सब भोग योनि है उनमें जीवात्मा जो पीछे कर्म करता है उसका भोग पाने के लिए जाता है निश्चित उस भोग को करता है नया कुछ भी कर्म नहीं कर सकता मानव यहां उभय योनि है यह नया भी कर्म करता है और पीछे किए हु का भी भोग भोगता है अब रही कर्म करने में आप स्वतंत्र हो ठीक चाहे धर्म करिए चाहे अधर्म करिए ये आप करने में परमात्मा आपको रोकेगा नहीं नहीं एक मिनट भ कर उसने आपको बोध तो करा दिया सही क्या सत्य क्या असत्य क्या धर्म क्या अधर्म क्या ये बोध उसने इस सृष्टि की रचना के साथ-साथ जब मानव की रचना की है मानव की रचना के साथ-साथ उसने बोध कराया मानव की रचना के साथ-साथ वेदों की उत्पत्ति की है जी वेद की उत्पत्ति और वेदों के अंदर उसने सारा का सारा ज्ञान कर्म उपासना

00:50:18:08 और विज्ञान ये चार विषय मूल वेद के हैं इन सारे चारों विषयों का बोध उसने दे रखा है कि आप ज्ञान सत्य सत्य क्या ज्ञान माने जो वस्तु जैसी उसको वै साही जानना जी जी जी ज्ञान कर्म कर्म आपका क्या है जो करना क्या चाहिए नहीं करना क्या चाहिए सारा बोध है उपासना उस परमपिता परमात्मा को वो कैसा है उसको जानेंगे कैसे विज्ञान जो ि विधिवत है जो प्रैक्टिकल आत्मक है जो प्रयोगात्मक व विज्ञान है जो व्यवहारिक कसौटी पर और वैज्ञानिक कसौटी पर दोनों पर कस कर देखा जाए तो खरा उतरे व्यवहार में भी आवे और वज्ञान की कसोटी पर देखा तत्व बोध भी उसके माध्यम से हो तो इस तरीके बोध य परमात्मा ने दिए हैं इसलिए ईश्वर कभी भी क्या विषय था आपका थोड़ा सा विशांत हुआ अभी जैसे किसी को ठोकर लगी किसी ने कोई द इसलिए ईश्वर ने आपको कर्म करने में स्वतंत्रता दे रखी है आप कर्म करोगे तो कुछ कार्य तो ऐसे हैं जिसका आप कर्म करेंगे आपने गलतियां की हैं उसका तत्काल आपको प्रणाम मिल रहा है जैसे आपने पैर सही नहीं रखे इसमें ईश्वर का दोष नहीं आप चलना स्वयं चल रहे हैं स्वयं कार्य कर रहे हैं अगर आपने पैर सही नहीं रखा है आपने देखा नहीं कि यहां पर रखने की योग्य जगह है कि नहीं है उसमें आपको ठोकर लगी उसका प्रणाम

00:51:33:13 आपने शीघ्र पाया उसमें में ठोक कर लगी आपका पैर फूट गया इसमें ईश्वर का कोई हप नहीं है ये हमारी गलती है सावधानी हटी दुर्घटना घटी हमारी है ठीक है और ना ईश्वर इसके प्रणाम बनाता है जी जो कार्य आप स्वयं अपने कर्मों से ही आप दंड भी पा रहे हैं उसका प्रणाम परमात्मा नहीं जिन कार्यों को आप कर रहे हैं लेकिन स्वयं दंड नहीं पा सकते हैं जिन कार्यों को आप कर रहे हैं ऐसे विलक्षण कार्य कर रहे हैं ऐसे अद्भुत कार्य करें ऐसे विशेष क्लिष्ट या पापा चार कार्म जिसको आप स्वयं दंड नहीं पा सकते हम ठीक है जी जिसको स्वयं दंड नहीं पाओगे उसका दंड देने वाला वही है परमात्मा उसकी दंड व्यवस्था उसके दंड व्यवस्था से आप जरूर दंड पाएंगे उसकी आवश्यकता तो नहीं थी इसलिए हर कार्यों में जैसे कभी-कभी ऐसा होता है कि सब कुछ बिल्कुल परफेक्टली व्यक्ति ने देख लिया जी आगे जमीन है मैं पैर रखने वाला मगर वहां पर दलदल था ये भी व्यक्ति की गलती हो गई बिल्कुल गलती इसमें भी ईश्वर का नहीं

00:52:33:03 मगर व्यक्ति एक ऐसी जगह खड़ा है जहां पर उल्का पिंड आ कर के गिर गया जी तो यह ईश्वरीय माना जाएगा या व्यक्ति को माना जाएगा ये भी ये उसके पूर्व जन्मों का जैसे मान लिया जाए मतलब कर्म का फल है ये ये कर्म का फल है मतलब ईश्वर के द्वारा जो

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00:52:46:28 हमारी समझ से बाहर चीजें हैं और समझ के बाहर से हमें उसका दंड भी मिलर कहीं ना कहीं से जी ठीक है या हमने वर्तमान में ऐसा कोई दोष नहीं किया और फिर भी हम त्मक कोई व्यवहार हमारे साथ नहीं हमने जैसे कुछ किया था जो हमने किसी की हत्या कर दी और अभी हमारे ऊपर उल्का पिंडा करके गिर गया हत्या उसके भी उसके भी कारण है यदि आपने हत्या कर दी अगर आपने अनैतिक हत्या कर दी है आपको नहीं करने चाहिए थी या उसने ऐसा दंड दंडात्मक ना दंडात्मक कार्य नहीं किया था जिसकी आपने हत्या कर दी तो उसका जरूर आपको परिणाम मिलेगा तो मैं वही कह रहा हूं जैसे यदि वो हत्या करने की योग्य था जी और फिर आपने हत्या कर दी जो समाज के लिए एक जहर था समाज के लिए एक बहुत बड़ा दुखदाई था मैं पाप पाप पाप वाली हत्या की बात कर रहा हूं जी पाप वाली जो निर्दोष को हत्या कर गई जी जी तो हत्या

00:53:35:20 की है उसको एक दंड मिला कि भाई वो कहीं खड़ा हुआ और उसके ऊपर उल्का पिंडा करके गिर गया जी तो ये ईश्वर द्वारा प्रदत कार्य इसमें तो उसका कोई हस्तक्षेप है ही नहीं कि उसका पिंड गिरता है कि नहीं गिरता तो क्या ये ईश्वर के द्वारा उसके साथ छल हुआ कि नहीं जैसा छल आपने बताया कि बाली के साथ हुआ था बली के साथ हुआ था जी इसको भी तो छल माना जाएगा नहीं कैसे छल माना जाएगा उसको नहीं पता था कि उल्का पिंड मेरे ऊपर गिर सकता है उसको नहीं पता था लेकिन ईश्वर

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00:54:00:19 न्याय कारी है ईश्वर न्याय कारी है न्याय करने के लिए छल कर सकता है नहीं छल है ही नहीं वो जी छल है ही नहीं उसको बता के गिराया नहीं क्यों बता गिराए का भाई जैसे अभी फांसी दी जाए ठीक है आप आप कैद में बंद हुए हो आपकी सजा हुई क्या क्या जो है न्यायाधीश सजा उसकी उसको बता के करता है कि हम तुझको फांसी देने फांसी की बोल रहे हैं नहीं करता है वो तो जब भुल जाती तब उसको पता लगता है उससे पहले नहीं पता नहीं वो आखिरी में मुकदमे के आखिर में उससे पूछा जाता है पू जजमेंट जब हो जाता है जजमेंट सुनने के पश्चात उसको ज्ञात होता है कि मुझे फांसी हुई है जजमेंट सुनाया ही तभी जाता है जब मुजरिम सामने खड़ा हो हां सुनाया जाता है लेकिन इससे पहले नहीं उसको पता लगता है इससे पहले उसको पता नहीं लगता मेरी फांसी होने वाली है जजमेंट लिख गया है निश्चित हो गई उसकी फांसी और जजमेंट निश्चित लिखने के फांसी लगने से पहले तो उसको बताता तब उसको बताया जाता है कि तुम्हारी ये सजा है हां ये संसार व्यवस्था है लेकिन उसको भी अगर देखा जाए उसको बता रहा है जब उसने दुष्कर्म किए थे उसको उसी समय बता दिया गया क्योंकि आत्मा ने उसको धक्का है आत्मा ने उसको कहा है

00:55:05:26 यानी कि जिसके जो छल कर रहा है उसके साथ छल हो सकता है ईश्वर के दल हो सकता है क्यों नहीं हो सकता तो बली ने कुछ हो सकता है ऐसा किया हो जो उसके साथ छल पूर्वक किया हो सकता है हम ये भी नहीं

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00:55:16:07 कह सकते हो सकता है अच्छा असल बहुत बहुत सारा हम लोग घूम चुके हैं तो हम लोग वो मूल प आए वो जो था कि हम एक्चुअली इसमें बात लिए करनी पड़ती इसका सही से जवाब नहीं मिल पाता है तो दूसरी चीजें मिल जाती है जी जी कि जैसे हमने कहा कि ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता कि एक तो वो सर्वव्यापक है जी दूसरा वह पहले से

00:55:39:19 ही है तो उसका आना जाना सिद्ध नहीं होता है और तीसरा उसको आवश्यकता नहीं है जी अच्छा एक क्वेश्चन यहां पर अभी भी ये शेष है कि यदि किसी भी कारण से किसी भी कारण से उसकी कार्यों की कार्य क्षमता की कोई सीमा है तो फिर उसके वो ईश्वर ही मान जाएगा कोई दिक्कत नहीं है मगर उसके सामने से अनंत सामर्थ्य वान तो हटाना पड़ेगा क्योंकि अंत हो रहा है कि कोई कुछ कार्य ऐसे हैं जो नहीं कर पा रहा है नहीं ठीक है मैं इनको पहले ले लू वो अनंत को छोड़ देते हैं जी अब जब हमने देखा कि सर्वव्यापक आपने एक बात कही कि उसको अधिक अथवा न्यून होना पड़ेगा तभी वो एक देशीय हो सकता है जी तो जैसे हम देखते हैं कि ईश्वर पृथ्वी सृष्टि की जब रचना करते हैं तो कहीं पर वो सूर्य बना रहे हैं जी कहीं पर वो क्या कहते हैं चंद्रमा बना रहे हैं पृथ्वी बना रहे हैं तो अब इसमें बात य आती है कि सूर्य को बनाने में फोर्स ज्यादा चाहिए और पृथ्वी को बनाने में फोर्स कम चाहिए जी जो ईश्वर है अपनी शक्ति के रूप में कार्य कर रहा है चंद्रमा को बना रहा है सूर्य को बना रहा है तो वह खुद को जो एक रस था अब वह कहीं पर कम ज्यादा होकर के कार्य कर रहा है या नहीं नहीं ईश्वर हम जैसे

00:56:54:27 हम लोग कार्य करते हैं उस तरीके से हाथ पैरों से कार्य नहीं करता नहीं नहीं वो नहीं कह रहा हूं ईश्वर को दर्शनों में बताया ईश्वर की ईण इच्छा के माध्यम से केवल इच्छा मात्र से सारे संसार रचना हो जाती है उसे करने की आवश्यकता नहीं पड़ती इच्छा मात्र से ही तो वो सिर्फ इच्छा करता है इच्छा इच्छा मात्र से ही सारी रचना हो जाती है और इच्छा मात्र से इसका प्रलय भी हो जाता है और ये सृष्टि का एक क्रम है अनादि काल से अनादि इसका सिस्टम है कि कितने दिन तक इसको रहना है कितने दिन तक इसको प्रलय में जाना व उसकी बनी हुचा रूप से मतलब ईश्वर केवल सोचता है करता कुछ नहीं है हा नहीं य उसका करना ही हो गया क्योंकि करने लगेगा तो परम सवान नहीं होगा वो अगर हमारे जैसे हाथ पैरों से क्रियाकलाप करने लगेगा हाथ तो पैर तो वो परम श्वान नहीं हो सकता मतलब उसकी कोई फोर्स कामै एकदम आज प्रधानमंत्री है जी प्रधानमंत्री इतनी व्यवस्था राष्ट्र का देख रहा है तो क्या वह सारे कार्य अपने आप करने आ रहा है नहीं अपने आप नहीं करने आ रहा है लेकिन उसकी इच्छा मात्र से ही वो इच्छा अपनी व्यक्त करता है परमात्मा को व्यक्त भी नहीं करना पड़ता है प्रधानमंत्री अपनी इच्छा व्यक्त करता है और संबंधित अधिकारी उस क्रिया को करने लग जाते इसको जैसे थोड़ा सा सम ऐसे ही ऐसे ही प्रकृति है परमात्मा

00:58:10:12 की जो प्रकृति है ये स्वयं में कार्य करता मान लीजिए प्रकृति कार्य करती है प्रकृति कार्य करती है उसकी इच्छा मात्र से ही और प्रकृति में वैसे रचना शुरू हो जाती प्रति जड़ है ना जड़ है जड़ तो है वो

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00:58:25:13 संदेश लेती नहीं नहीं संदेश नहीं लेती लेकिन प्रकृति एक पदार्थ है एक जो उसको मटेरियल कहना चाहिए जो मटेरियल कहना चाहिए परमात्मा व्यवस्था का तो ये मटेरियल अपने आप क्रियान्वित होते हैं अच्छा जैसे जैसे आप इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन बते हैं विज्ञान की भाषा में उसको आप देखें तीनों जब इकट्ठे हो जाते हैं तो अपने आप क्रियाशील हो जाते हैं जबकि वो भी जड़ है वो भी जड़ है आप परमाणुओं को इकट्ठा करते हैं इकट्ठा करने से परमाणु बम बन जाती है वो भी जड़ है नहीं नहीं मेरा कहने का मतलब जैसे मान लीजिए यह कुर्सी अगर यहां पर है जी और भाई साहब हैं कुर्सी में भाई साहब से कम वजन है जी ठीक है अब मैं मान लीजिए ईश्वर है वो कुर्सी को सरकाना चाहते हैं दोनों को ही सरकाना चाहते हैं वो इच्छा करेंगे फिर भी फ भौतिक रूप से अगर देखेंगे तो शक्तियां काम करेंगी ना जी खसने के लिए तो एक जगह पर ज्यादा शक्ति काम कर रही होगी इनको किसका के लिए भाई जैसे हम लोग जैसे हम लोग साइकिल चलाते हैं या कोई मोटर चलाते हैं ठीक है जी हमने मोटर चलाने के लिए हमारे कई सारे अंग प्रयोग होते हैं हम साइकिल कई अंग प्रयोग होते हैं ठीक है क्या ऐसा है कि हम हाथों में कम ताकत लगा रहे हैं और पैरों में ज्यादा ताकत लगा रहे जीवात्मा को उस पर

00:59:40:14 अलग से कुछ करना पड़ रहा है केवल जीवात्मा की इच्छा से तो क्रिया सारा शरीर करने लग जाता है नहीं बिल्कुल पैरों से ज्यादा ताकत नहीं नहीं इच्छा मा कोई हमें बटन नहीं बदलना पड़ता ज्यादा कम के लिए बटन कोई यंत्र नहीं लगाना एक मिनट कहीं कोई हमें यंत्र नहीं लगाना पड़ता लेकिन शरीर की गति है वो जैसी जहां जरूरत है वैसी अपने आप करने लग जाती है केवल जीव आत्मा की इच्छा मात्र से कि मुझे साइकिल चलाना है हाथ हैंडल पकड़ ले हैंडल का काम श ठीक पैरों ने अपना हैंडल पैडल मना शुरू कर दिया पैडल मारना शुरू कर दिया अगर कोई आ गया सामने ब्रेक लगाने के लिए फिर हाथ ब्रेक लगाने लग गए उसके लिए कोई बटन बदलना नहीं केवल शरीर का केवल जीवात्मा का इच्छा मात्र से ही ये क्रिया सारा शरीर क्रिया हो जाता ऐसे सारी प्रकृति ये भी जड़ है अगर कहेंगे ये भी जड़ शरीर तो जड़ है ये भी चेतन नहीं है लेकिन फिर ये क्यों काम कर रहा है क्योंकि नर्वस सिस्टम के द्वारा सूचना नर्वस सिस्टम उसके में जीवात्मा निकल जाए तब भी रहेगा तब भी कोई जीवात्मा अपने साथ निकाल कुछ भी नहीं ले जाता चेतना का उपयोग तो ही हां बस ऐसे ही जैसे ये शरीर को डेवलपमेंट करने वाला जीवात्मा है ऐसे ही ये स्थूल प्रकृति है ये परमात्मा का शरीर है ये परमात्मा का शरीर है यही उसका विराट रूप है मतलब आपका कहने का मतलब है कि जो कार्य है वो प्रकृति करती है प्रकृत हां प्रकृति के माध्यम से ईश्वर के सूचना को लेकर प्रकृति के माध्यम से ईश्वर करता है यू मान

01:00:55:16 लीजिए जैसे शरीर जीवात्मा शरीर के माध्यम से जैसे जीवात्मा शरीर के

01:01:02:06 माध्यम से क्रिया करता है कार्य करता है ठीक विविध प्रकार कार्य करता है ऐसे ही परमपिता परमात्मा इस प्रकृति के माध्यम से सारे कार्य करता है

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01:01:10:07 तो य शरीर को इस शरीर को डेवलपमेंट करने वाला जीवात्मा है और इस विराट रूपी शरीर को डेवलपमेंट करने वाला वही परमात्मा है उसी के माध्यम से सूर्य तप है उसी के माध्यम चंद्रमा में रोशनी है कु एक चीज य पर आ रही है कि

01:01:25:27 ईश्वर स्वयं कार्य नहीं करता पृथ्वी के माध्यम से का वो प्रकृति के माध्यम से कार्य करता है जी तो यहां पर तो सहायता हो गई नहीं सहायता कहां हो गई प्रकृति की सहायता

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01:01:37:18 नहीं हो गई जैसे शरीर ठीक है जी शरीर और इसका प्रकृति का भी अगर देखे तो मूल वही है मूल प्रकृति जड़ है तो मूल उसका वही है सब कहा गया है ऋषियों ने कहा है कि सब सत्य विद्या जो जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं सब का आदि मूल परमेश्वर है अगर प्रकृति भी जब जैसे यह प्रल अवस्था होती है तो प्रकृति शून्य बदलती कहां जाती है मतलब प्रकृति भी नहीं शेष रहती वो का स्वरूप है वो भी उसी में स भी उस नहीं है अलग तत्व अनादि है लेकिन वो भी आधार उसका परमात्मा ही है है तो है तो अलग है लेकिन आधार उसका वही है अच्छा ठीक है इसको इसमें ये वाला ले लेते हैं कि जो पहले से है जी उसका आना जाना कैसे सिद्ध हो रहा है जी तो जो इसमें जो निराकरण है इस बात का वो ऐसे है कि ईश्वर है मगर अभी वो हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है जी है ना जी इसीलिए नास्तिक इंद्रियों का विषय ना होने के उसमें आराम से अच्छा य एक मुझे चीटा चल रहा है कोई बात नहीं मुझे याद मुझे एक याद आ गई तुलसीदास गोस्वामी जा जी आपको सहायता मिलेगी गोस्वामी

01:02:52:26 ने लिखा है यहीं पर जी कि गो गोचर जहां लग मन जाई वहां तक माया जानो भाई ये भी अवतार बात को खंडन करती है गो गोचर जहां लग मन जाई वहां तक माया जानो भाई जहां तक आपकी आंख देख सकती है जहां तक कान सुन सकते हैं पैर जा सकते हैं हाथ स्पर्श कर सकते हैं वाणी जहां तक बोल सकती है वहां तक माया है प्रकृति है वहां ब्रह्म का बोध इन इंद्रियों से नहीं हो सकता मैं उसी बात जितना अगर हम साकार मान लेंगे परमात्मा को ठीक है साकार मान लेंगे तो हम आंखों से देखेंगे जैसे हमने राम को देखा नहीं मगर हमने कृष्ण को देखा है निराकार भी मान रहे हैं मगर आर समाज को जो ईश्वर है उसको सुनते तो है ना हा नहीं आर समाज का अलग से नहीं है आर समाज का निराकार द समाज का आर समाज का जो ईश्वर है वो वेद का ईश्वर है जिसमें वेद ने जो इस ईश्वर को माना आर समाज का अपना कोई निजी दर्शन आर समाज का कोई निजी दर्शन अपना नहीं है ऋषिवर देव दया

01:03:49:28 ने कोई अपनी बात नहीं लिखी स प्रकाश का मूल ग्रंथ आपने पढ़ा हो नहीं पढ़ा पढ़ के देख लेना कहीं पर भी उन्होंने कोई बात कही वो प्राचीन ग्रंथों से लेकर के कही है उसका उन्होंने प्रमाण दिया एक ऐसे ऋषि हुए जिन्होंने अपनी बात का प्रमाण दिया कि मैं कहां से कह रहा हूं ये फला ग्रंथ में देखिए जाकर के ये तो सभी आचार्यों ने दिया है सबने नहीं दिया है सबने अपनी भी बात बचार रामानुजाचार्य सबने दिया है कोई प्रमाण नहीं दिया उन्होंने अपनी बात की बल्कि उनके ग्रंथों के प्रमाण नहीं हो होंगे तो बहुत कुछ ग्रंथों

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01:04:16:06 के होंगे कुछ ना ब्रह्म सूत्र देखिए सं वो गीता भाष देखिए सब में दिया नहीं नहीं आप किसी भी देखिए जैसा ऋषि दन ने प्रमाण दिया कि अपनी बात उन्होने अपने पास से कुछ कहा ही नहीं उन्होंने सब प्राचीन ग्रंथों से लेकर कहा है नहीं इस इसमें मैं बताऊंगा आपको मैंने रामानुजाचार्य जी का भी देखा है जो उनका श्री भाष्य और ब्रह्मसूत्र का भाष्य शंकरा शंकर भाष्य हर बात कहीं ना कहीं से कोट करके ही

01:04:41:00 नहीं अब जैसे शंकर शंकर जी लिख रहे हैं ठीक है ये विषय नारी नरक दवार बताओ कहां से प्रमाणित किया उन्होंने उनकी प्रश्न उत्तरी में है ऐसे बहुत सारे प्रश्न उत्तर है कहीं कोई प्रमाण नहीं दिया मैंने कहां से उठा के लिया इस तरह की चीज अत्यार प्रकाश में भी मिल जाएंगे नहीं नहीं मिलेगी एक भी बात नहीं हम चैलेंज करते हैं मैं मेरे पास अत्यार प्रकाश बिल्कुल अभी दिखाइए अब मैं देखूंगा एक भी अगर कहीं ऋषि ने ऐसी बात लिखी हो जिसका प्रमाण नहीं दिया जैसे जैसे जैसे उन्होंने ये बात कही रहने दीजिए अ जैसे उन्होंने ये बात कही जी कि अगर जो जीवात्मा है मुक्त हो जाती है जब जी तो मुक्त होने के बाद वो इतने इतने लाख जो वर्ष होते हैं कुछ एक अवधि वहां बताई प्रांत काल उसके बाद वो वापस आती है जी तो वहां पर उन्होंने एक तर्क दिया है जी वो तर्क यह है कि बहुत लंबे समय तक अच्छा भोजन भी करते रहेंगे तो उससे भी मन आपका उब जाएगा अपनी भाषा में दिया उन्होंने तर्क दिया इस तर्क का कोई प्रमाण नहीं है जी

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01:05:36:27 काहे का कौन सा प्रमाण दिया जी अच्छी भाषा में भोजन करेंगे कमी ऐसा नहीं ले सकता नहीं नहीं विय में भोजन की बात नहीं आ अगर आप बहुत दिनों तक एक ही सुख का आस्वादन करते रहेंगे तो उससे भी आप बोर हो जाएंगे उन्होने लि मुक्ति का मुक्ति कहा ऐसा सत्या प्रकाश

01:05:57:21 में नहीं लिखा है आनंद को लेकर के आनंद को लेकर के क्योंकि सुख तो संसार का है और सुख एक मिनट नहीं सुख है लेकिन सुख संसार उसको सुख नहीं कहा सकता जो ब्रह्मानंद है जो मुक्ति कानंद होने के बाद दयानंद जी ये कह रहे हैं कि उस मुक्ति से आप उब जाओगे इसलिए वापस आना उचित है नहीं वापस इसलिए भी आना है क्योंकि मैं ये नहीं कह रहा उन्होंने इस बात का प्रमाण नहीं दिया ऐसी हजारों बातें मिल जाएंगी जिसका उन्होंने प्रमाण नहीं दिया नहीं नहीं ऐसा नहीं है चलिए इसको छोड़ दे अगर अगर वो परमानंद की उने वाली बात ही नहीं है वो वहां तो उने वाली बात तो जीवात्मा निरंतर चाहता हमें यही मिला रहे कि उसको सर्व स्वतंत्रता प्राप्त होती है दयानंद सरस्वती जीने कहा है उने का चलो मैं मान लिया क भी लेकिन वहां कोई स्वतंत्रता इतनी स्वतंत्रता उसे हमें जीवन काल मिल ही नहीं सकती जीवन काल में नहीं मुक्ति के बाद मुक्ति का वो आनंद है वो स्वतंत्रता है कि अन्य किसी क्षेत्र में अन्य किसी अवस्था मगर दयानंद जी लिख रहे हैं कि आप उब जाओगे नहीं उसके लिए मैंने विचार नहीं उसके लिए नहीं कहा होगा उसके विषय जरूर को कोई विषय होगा चलिए देख लूंगा बाद में चलिए च आगे बात करिए अच्छा ठीक है

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01:07:06:28 मैं उस परे आ जाता हूं कि जैसे ईश्वर है उसका आना जाना क्योंकि वो पहले से ही सर है तो उसका आना जाना नहीं प्राप्त होता है जी तो इसमें एक प्रश्न ये बनता है जैसे हमने कहा था कि बेटा शांत रहो आवाज ना करो चलिए मूल चर्चा कर लीजिए जो थोड़ी स काफी समय हो गया जी तो तो वही इसी के साथ ही हो जाएगा लगभग लगभग दो प्रश्न जो भी हो बेटा उदम मत करो थोड़ा सा तो जैसे मैं जो ये निराकरण है ना कि ईश्वर है फिर उसका आना जाना कैसे सिद्ध होता

01:07:40:03 है तो अभी ईश्वर जो है वो हमें शब्द प्रमाण से मालूम पड़ रहा है प्रात भाषिक सत्ता है उसकी जी पर वो अभी भी हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है भौतिक इंद्रियों का इस कारण से जी एक नास्तिक उसे नकार सकता है ईश्वर को है ना कि भाई नहीं मानता जो मेरे को प्रूफ नहीं हो रहा क्यों प्रूफ नहीं हो रहा वो इंद्रियों का विषय नहीं है वो ठीक है वो एक अलग बात है तो निराकरण इस बात का य है कि वो अभी इंद्रियों का विषय नहीं था मगर फिर वह इंद्रियों का विषय बना तो इसी को कहा गया कि आना जाना सिद्ध होता है अब इसको एक उदाहरण है कि ईश्वर सब जगह पहले से ही है उस तो जब ईश्वर है सब जगह पहले से ही तो ईश्वर ऋषियों के मस्तिष्क में भी है तो ईश्वर के रूप में उसका ज्ञान भी है जी बक फिर किसी देश का परिस्थिति में उसके मंत्रों का आना जाना कैसे सिद्ध होगा जी उसके मंत्र भी तो हैं पहले से ही जी मगर वो मंत्र आ जा रहे हैं तो इसमें हमें ये मानना पड़ेगा पहले वह मन का विषय नहीं थे बाद में वह मन रूपी इंद्रिय का विषय बन गए तो मंत्रों का प्रकट होना य इस तरह से सिद्ध हुआ तो

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01:08:44:21 इसमें क्या कहेंगे फिर मंत्रों का आपके माध्यम से क्या मंत्रों का बीच-बीच में आना कैसे आना जैसे ऋषि ने किसी देश काल परिस्थिति में ऋषि जो है मंत्रों के दृष्टा बने हम तो कैसे बन रहे ईश्वर तो पहले से ही है उनके अंदर मंत्र भी है तो फिर वो दृष्टा कैसे बन रहे हैं देखिए मंत्र को हम समझ ले वेदों की रचना ईश्वर परमपिता परमात्मा जो करता है वह ऋषियों के अंतःकरण में करता है आदि सृष्टि में जब आद सृष्टि अ मैथु सृष्टि हुई मानव को सर्वप्रथम उतारा गया और उसमें चार ऋषि उत्पन्न होते हैं आदित्य अंग्र अग्नि और वायु इनके अंतः कण में एक एक वेद का परमात्मा प्रकाशित करता है तो पहले नहीं था वो क्या ज्ञान ईश्वर था ना जब सृष्टि नहीं था व तो ज्ञान ईश्वर में था ईश्वर में ज्ञान था उसम को ऋषियों के अंतःकरण में ईश्वर नहीं था क्या उस समय जिस समय ज्ञान उन्होने प्रकाशित अगर वो होता नहीं तो कैसे जन कैसे ईश्वर पहले से नहीं था अंतःकरण में क्यों नहीं था तो था तो उसका ज्ञान भी था नहीं ज्ञान जब प्रकट नहीं करेगा ज्ञान कैसे होगा यानी कि वो उनके मन रूपी या जो भी किसी का उनका विषय नहीं था वो तो ज्ञान उसम ही सीमित था जब ज्ञान को प्रकाशित करेगा तभी तो हमें मिलेगा हमारे अंदर भले हमारे अंदर मतलब था मगर

01:09:59:24 उसने रोशनी डाल दी जी जो भी कुछ तो इसी तरीके से मान सकते हैं ना कि वह था मगर उन्होंने ऐसी रोशनी डाली कि वह आंखों का विषय बन गया आंखों का विषय नहीं है वह रोशनी नहीं है वह ज्ञान रूपी है वह आत्मा का ज्ञान है वो कोई आंखों से देखने वाला जिव्या से पढ़ने के पढ़ के नहीं आया क्यों उसमें गुरु परंपरा नहीं थी जैसे जैसे किसी को कोई व्यक्ति शुरू में कोई आविष्कार करता है ठीक है नहीं वो नहीं कह रहा मैं जो आप दूसरी जगह जा मैं कह रहा हूं जब ईश्वर का ज्ञान अंतःकरण में पहले से ही है तो हम क्यों कह रहे हैं कि वो दृष्टा बने प्रका नहीं है सृष्टि काल में परमात्मा देता है और ये हर सृष्टि में देता हैल जब वो बना बनाता है ये सब सृष्टि रचना होती जीवात्मा रचना में आता है मानव रचना में आता है जैसे वो ऋषि बनाता है ऋषियों को उत्पन्न करता है चार ऋषि उत्पन्न हुए तो वो जब उत्पन्न हुए उस समय ईश्वर उनके अंतःकरण में नहीं था क्यों नहीं था उसी समय था तभी तो जन ईश्वर जब अंतःकरण में था तो उसका ज्ञान भी तो था तो तभी तो ज्ञान हुआ उनको प्रक तभी उन्होने प्रकट किया ज्ञान का होना सिद्ध नहीं होता ज्ञान लेकर ही वो जन्मे ना बिल्कुल ज्ञान लेकर जन्मे तो फिर वो दृष्टा बने उनको प्रकाशित किया ये सब हम क्यों कह प्रकाशित वो नहीं बने उन्होंने तो ज्ञान दिया है जैसे इसके बाद दृष्टा तो

01:11:14:26 और ऋषि बने हैं सबने जो रिसर्च किया उसके बाद ऐसा नहीं हुआ कि ऋषि ऋषि किसी देशकाल परिस्थिति में दृष्टा बने ऐसा नहीं हुआ है लेकिन उसके बाद अन्य ऋषि बने नहीं नहीं वो तो बाद में करेंगे जब वेद वेद का ज्ञान प्रकाशित हुआ और चार ऋषियों के माध्यम से उसके बाद समय आगे बढ़ा और ऋषि परंपरा बढ़ी आपकी आवाज नहीं आएगी ऋषि ऋषि परंपरा बढ़ी उस ऋषि परंपरा में और जैसे एक मिनट जैसे उ चार ऋषियों से एक मिनट चार ऋषियों से चार ऋषियों से ज्ञान प्राप्त हुआ एक एक वेद का उपदेश किया ब्रह्मा को ठीक है उसी अम सृष्टि ब्रह्मा में उत्पन्न हुए ब्रह्मा को चारों वेदों का ज्ञान हुआ उनको सुन करके ब्रह्मा के द्वारा फिर वो मैं वही कह रहा हूं कि ज्ञान होना कैसे सिद्ध हो रहा है जब जब ईश्वर पहले से है तो उसका ज्ञान भी तो है तो होना कि अभी हो रहा है नहीं ईश्वर तो अभी नहीं ईश्वर तो अभी भी आपके पास भी मेरे मेरे अंदर भी है तो इसका मतलब कह दे हम हम वही मैं कह रहा हूं कि अभी वो हमारी उस मन रूपी इंद्रियों के विषय इंद्री का विषय नहीं है फिर किसी देशकाल परिस्थिति में ईश्वर ऐसी व्यवस्था करते हैं कि मन रूपी इंद्री का विषय हो जाए इसी तरह से भगवान ईश्वर नहीं श्वर विषय इंद्रिय नहीं होता है ईश्वर नहीं

01:12:27:14 ईश्वर जो मंत्र आप जो हम देख रहे हैं कि अब पहले हम मंत्र को नहीं जानते थे मगर हम किसी देशकाल परिस्थिति में मंत्र को जान गए जबकि हम जब ये कहते हैं कि जब ईश्वर पहले से ही है तो उसके रूप में उसके मंत्र भी पहले से हैं पहले से पहले से मगर फिर भी हम ये कहते हैं कि हमने मंत्र को पढ़ा देखा हमें मंत्र हमने जाना तो ये आना जाना क्यों हो रहा है जब ईश्वर पहले से ही है तो हम मंत्रों का आना जाना क्यों स्वीकार कर रहे हैं और अगर मंत्रों का आना जाना स्वीकार कर रहे हैं तो जिस तरह से मंत्रों का आना जाना स्वीकार कर रहे हैं उस तरह से ईश्वर का क्यों नहीं स्वीकार कर सक नहीं ईश्वर आता उसमें आने की जरूरत नहीं है भाई ई वो अगला चरण है आवश्यकता है कि नहीं अगला चरण हमें ज्ञान देने के लिए उसको कोई साकार रूप लेने की आवश्यकता नहीं है नहीं नहीं आव आत्मा का विषय ईश्वर आत्मा का विषय है इसमें भी एक पॉइंट है जैसे आपने कहा कि ईश्वर को ज्ञान देने के लिए अवतार साकार रूप लेने की आवश्यकता नहीं है तो अगर ज्ञान ही कराना है विद्या विद्या का भेद बताना है केवल ईश्वर अपने मन में सोच ले आपने कहा इच्छा से हो जाता तो हमें ज्ञान हो जाएगा विद्या विद्या का ये क्यों इतनी व्यवस्था है कि गायत्री मंत्र पढ़ो

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01:13:31:26 इतना आपको तप होना भाई वो ऋषि चार जो ऋषि आदि सृष्टि में उत्पन्न आते हैं वो जीवात्मा वो सारे के सारे मुक्ति आत्मा होते हैं निर्विकार होते हैं विकार आत्माओं को वो देता ज्ञान उनके द्वारा वो ज्ञान प्रारंभ कराता है वहीं से गुरु शीष परंपरा प्रारंभ होती है तो हमारा उतना तप नहीं है आज भी अगर आप तप करें तो प्रस्तुत हुआ भी है अभी अभी उदाहरण दे रहा ऋषिवर देव दयानंद के गुरु निजानंद कोई कालेजी व्यवस्था नहीं थी उनकी पड़े हुए थे छ वर्ष की अवस्था में उनके नेत्र हीन हो गए थे वो और भिखारी बनकर भटकने लगे थे घर घर छोड़ कर के उन माता-पिता बचपन में समाप्त हो गए थे भाभी भाई थे भाभी बड़ी ककासा नार थी उसके दुरा चरण से वो पीड़ित होकर के घर से निकल गए नहीं और एक मिनट भिक्षा हटन करने लगे ऐसे अपना जीवन गुजारा करने लगे अंत में जाकर के कहीं उपदेश ऐसे हो रहा था वेद का किसी किसी विद्वान के माध्यम से उस बच्चे ने वो सुना और साधना के विषय में वेद चल रहा था उपदेश उसने वो सुना उसने वो लगा

01:14:29:26 बृजनंदन प्रकाशित हुआ व्याकरण के सहित तमाम उस समय के ग्रंथ प पंथ के दे भी थे बजान को उसका भी ज्ञान था और वह सारा का सारा ज्ञान श्व देव दन को उन्होने तीन वर्ष में दिया और इससे पहले नंद से पहले भी और शिष्य पढ़ाए उन्होंने सार्थ भी उनके शिष्य से हुआ बजान का इतिहास पढ़ के देखिए तो अनपढ होने के पश्चात भी परमात्मा की जब वो उतने पवित्र आत्मा बने और जिसके पात्र होना चाहिए मतलब कि हम ये माने कि अगर पवित्र आत्मा अथवा यदि आप उतने पात्र हो सकते हो पवित्र आत्मा तो आपके हृदय में भी जो ईश्वर का ज्ञान पहले से ही भले ही है पर ईश्वर का ज्ञान आना जाना सिद्ध होता है उसका पैरामीटर है कि आप पवित्र आत्मा होनी चाहिए हो जी जो चीज आपके पास पहले से है उस चीज का भी आना जाना सिद्ध हो जाएगा जी नहीं पहले से है लेकिन वो आपके अंदर गौण रूप से है तो सारी चीज आपको जो ब्रह्मांड यही यही मैं कह रहा हूं है ईश्वर है रूप किसी देशकाल परिस्थिति में पवित्र आत्मा साधु भक्तों के उद्धार के लिए उसका आना जाना सिद्ध हो मतलब मान सकते हैं ऐसा नहीं है वो कराने के लिए उसके पास बहुत साधन उसको आने की जरूरत ही नहीं है नहीं साधन की बात में अब आवश्यकता के आते जैसे एक हमने बात कही कि ईश्वर अपने मंत्र को मंत्रों को प्रकाशित करते हैं

01:15:45:18 तो मंत्रों को प्रकाशित करने की क्या आवश्यकता है वो डायरेक्टली जो ईश्वरीय ज्ञान है उन मंत्रों का जो अर्थ है कि करना क्या है व्हाट टू डू एक्जेक्टली उसको प्रकाशित कर तो हमने वो किसी भाषा का एक वाक्य है ठीक है मंत्र है हम चाहे अंग्रेजी का मान लेहे तरीका भाषा तो रूप देना पड़ेगा आपको ना कोई नहीं तो उसकी क्या आवश्यकता थी रूप की क्या आवश्यकता थी उस जन दे भाषा अगर व्यवस्थित परमात्मा नहीं आगे भाषा का संचालन नहीं हो पाता अगर भाषा व्यवस्थित नहीं होती आ आगे जो मंत्र है वो ज्ञान के रूप में ही आए थे ऋषियों ने मंत्र बनाया उन्हे ऋषियों के ऋषियों के द्वारा य प्रकट हुए प्रभ नहीं नहीं ऋषियों ने मंत्र का रूप दिया या ज्ञान ही मंत्र के रूप में आया था जब ज्ञान आया तभी तो उन्होने दिया उन्होने पढ़ा थोड़ी था ऋषियों को तो बोध ही नहीं था अगर ऋषि पढ़ा नहीं था गु ज्ञान है कि उनको आभास हो गया ऋषि परंपरा में नहीं थे ठीक है जैसे एक आती है वाल्मीकि रामायण का उदाहरण देता हूं वाल्मीकि जी तमसा नदी में स्नान करने जा रहे हैं जी ठीक है और उन्होंने वहां कौंच पक्षी को देखा दोनों को आपस में नर्मदा को कड़ा कर रहे थे क्रीड़ा के देखा उधर एक धिक उनका निशाना लगाकर उसने एक बाण चला दिया तो उनमें से एक जो नर

01:17:01:13 पक्षी था वो खत्म हो जाता है उसका तड़पना और उस मादा का शेष उसका तड़पना उसके उस पार्थिव शरीर के माध्यम से देख कर के व्याकुल होना वो पीड़ा वाल्मीकि जी के हृदय में बहुत ज्यादा आघात कर गई और पीड़ा उठी जब पीड़ा उठी तो उनके अंदर अचानक एक श्लोक निकला वहीं से महाकाव्य की रचना हुई एक श्लोक ऐसा श्लोक निकला वाल्मीकि स्वयं लिख रहे हैं उसमें जो वाल्मीकि रामायण अव तरणिका नाम की पहली कथा उसमें लिख रहे हैं अपने भरद्वाज को बताते हैं उनको बताते हैं कि देखो यह वाक्य मेरे मुह से निकला है इसका ना तो मुझे बोध है ना मुझे बोध था और यह ऐसा निकला संगीत पर पूरा चारों काव्य से भरा हुआ है पूरा और मुझे य इसका बोध नहीं कैसे हुआ अनायास आखिर वो फिर वहां से स्नान करके चले जाते अपने आश्रम में उसके बाद में नारद जी पहुंचते हैं के आश्रम उन्होंने वो जिज्ञासा रखी कि ये श्लोक मेरे माध्यम से स् प्रारंभ निकला जिसका मुझे बोध नहीं है कैसे श्लोक निकला कैसे बना लेकिन उसको भरद्वाज ने इन्होंने तुरंत उसको लिखा भी नोट भी किया वीणा पर गाने योग्य है यही बाद में ब्रह्मा जी भी उनके जाते हैं तो ब्रह्मा जी से वही जिज्ञासा उन्होंने रखी तब ब्रह्मा जी ने कहा कि ये ईश्वरीय संकेत

01:18:16:27 है आपके लिए कि वो आपसे कोई समाज में ऐसा कोई शब्दों के माध्यम से चरित्र चित्रण कराना चाहते हैं जिस चरित्र चित्रण के माध्यम से इस समाज को एक दिशा मिले और आप कर सकते हो तो फिर उन्होंने कहा ऐसा कौन सा महापुरुष है मैं किसके विषय में कर सकता हूं तब वहां राम का नाम निकल के आया कि राम में क है अयोध्या में जो इाक वंश में जन्म हुआ है उनके गुणों का वर्णन उन्होने किया है कि वह समाधि सिद्ध है हिमाल जैसे गंभीर हैं पृथ्वी जैसे भारी हैं ऐसे सारे गुणों में अतरण का कहीं वहां ईश्वर नहीं आया है वाल्मीक को पढ़ के देख लेंगे महापुरुष आया समाधि सिद्ध आया एक मिनट जी समाधि से दाया सब कुछ उसके बहुत-बहुत सारे लक्षण गुणों को दिया है लेकिन उन्होंने कहीं ईश्वर शब्द नहीं प्रयोग किया बाल्मीकि ने नारद जी ने ना विष्णु जी ने उन्होंने कहा ऐसे महापुरुष का आप जो इस समय अयोध्या में राज कर रहे हैं आप उनका चित्रण लिखिए जो सामान्य जनों को भी वेद का ज्ञान उनके आचरण के माध्यम से मिलेगा और लोग उस परे चलेंगे तो उनका कल्याण होगा लोग धर्मात्मा बनेंगे ये तो ये तो खैर है ये है मैं ये पूछ रहा था कि ऐसे ही ऋषियों का वही ऋषियों पर भी है नहीं नहीं जब उस समय एक मिनट जब उस समय गुरु शिष्य परंपरा थी नहीं कोई और उस समय ऐसा विलक्षण ज्ञान वेदों का उनको प्रकाशित हुआ

01:19:32:07 और जिस तरीके का प्रकाश वही उन्होंने फिर देना शुरू किया तो वेद के मंत्र के रूप में ज्ञान आया था या अव्यवस्थित आया था मतलब जैसे अवस्थित नहीं अवस्थित होता व्यवस्थित कर क उनको प्रशिक्षण देने वाला था उन्होने दि मंत्र के रूप में ही आया मंत्र के रूप में आया अच्छा तो मतलब मंत्र के रूप में आया तो

01:19:51:24 फिर प्रश्न यही है ना कि जब उनको आपको ज्ञान कराना है जो अविद्या से मुक्ति का ज्ञान विद्या तो जब ज्ञान कराना है तो डायरेक्ट वो ज्ञान दे सकते हैं मंत्रों का फॉर्म की आवश्यकता क्या है फिर वो इसलिए थी अगर उन चार शयों को तो ऐसे ही बोध करा सकते थे लेकिन जो आगे परंपरा चलती वो तो किसी व्यवस्था से चलती ना किसी भाषा के माध्यम से किसी व्याकरण के माध्यम से जिससे गुरु शिष्य परंपरा

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01:20:15:22 में ढले गी तो गुरु कैसे पढ़ाए उसको आगे मंत्र आगे मंत्र मतलब वो ऋषियों ने बनाए बनाए नहीं हां वो भगवान नेही इसलिए दिए कि आप उसको आगे देख पढ़ाए आगे ऐसी फॉर्म ऐसी फॉर्म में बनना प वो बहुत लाखों नहीं करोड़ों वर्षों मिनट करोड़ों वर्षों तक वो सुन कर के ज्ञान होता रहा केवल हमारा श्रुति परंपरा इसलिए उसको वेद को श्रुति मैं यहां पर एक बात कहूंगा ईश्वर

01:20:39:28 ने उनको फॉर्म इसलिए दिया जिससे कि क्योंकि फॉर्म है तभी तो हम आगे प्रदान कर पाएंगे जी तो ईश्वर ने वैदिक ज्ञान का जो ज्ञान का स्वरूप साकार स्वरूप यानी कि मंत्रों के रूप में वो ऋषियों को इसलिए दिया जिसे कि वो आगे किसी को दे पाए है ना तो क्या ये मान सकते हैं कि ईश्वर का जो साकार स्वरूप होता है वो इसलिए होता है कि उसके बारे में कोई किसी के कोई किसी को बता पाए वो वाणी का विषय बन पाए भाई

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01:21:08:20 साकार आगे किसी को प्रदान कर पाए ज्ञान के लिए साकार रूप क्यों जैसे अभी एक मा जैसे अभी मैंने बताया ना आपको कि अभी अभी हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है वाणी का विषय नहीं है और प्रा भाषिक सत्ता है कि मुझे उसने पाणी को थोड़ी दिया है इंद्रियों को दिया उसने तो आत्मा को दिया है वो ज्ञान प्रकाशित कहां हुआ आत्मा को बोध हुआ उसका और आत्मा को बोध हुआ व आत्मा ने निकाल के दिया समाज को उसने णी वाणी का विषय बन गया फिर एक वो चैप्टर तो छूट गया है भाई ऋषियों के माध्यम से जो ज्ञान बटा वो वाणी का विषय बन गया फिर वाणी के माध्यम से दिया उन्होंने एक वो चैप्टर छूटा है उस जब भगवान मतलब ईश्वर पहले से ही है अंतःकरण में तो उसका ज्ञान भी है फिर फिर भी उसका ज्ञान किसी देशकाल परिस्थिति में प्रकाशित हो रहा है प ये तो छूट गया खैर हम जब आगे बढ़े हैं तो

01:21:52:22 अब बात इस पर हो रही कि जो जिस चीज आवश्यकता नहीं मगर आपने कहा कि जो वैदिक ज्ञान है जिससे कि उसको हम किसी को बता सके किसी को प्रदान कर सके आसानी से इसलिए उसको ऐसा रूप देक के भेजा मंत्रों के रूप में तो हम यह भी कह सकते हैं कि ईश्वर के जो ईश्वर के बारे में हम किसी को बता सके हम उसके व्यवहार कर सके व्यवहारिक हो सके इसलिए ईश्वर ने ऐसा रूप बनाया कि जो जो मनुष्य के व्यवहार का विषय बन सके जिससे कि आगे परंपरा चल सके अच्छा इसमें

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01:22:20:26 एक यह वाली बात आ जाती है जी कि हम ज हम कहते को अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है तो इसमें यह बात आती है कि हमने देखा है कि जो वेद के मंत्र है उसमें कई जगह पर रूपक अलंकार उपमा अलंकार ये लग रहा है ये अलंकार की क्या आवश्यकता है वहां भाई अलंकार से हम छोटे से विषय में छोटे से रूप में बड़ी बात समझा सकते हैं संकेत मात्र समझा सकते यानी समझाने के लिए सरल करने के लिए हम संकेत मात्र में से किसी विषय को समझा सकते हैं उसका हम एक उदाहरण दे पेश कर सकते हैं अलंकार इसलिए आते मतलब समझाने के लिए सरल करने के लिए अलंकार दिया गया तो क्या समझाने के लिए सरल करने के लिए भक्ति ईश्वर के प्रति ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है जी मैं पूछ रहा हूं तो क्या समझाने के लिए सरल करने के लिए ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है नहीं ले सकता है क्यों अवतार की आवश्यकता ही नहीं अवतार लेने के लिए ईश्वर उपदेश देने नहीं आएगा जब वो उपदेश एक साथ में दे रहा है एक हो एक देश हो जाएगा लोग दे सकता एक देसीय की बात वो वहां पर कट रही है कि जब वो कुसी और आपको खिसका एगा तो दोनों जगह अलग अलग ताकत लगाएगा तो वह अधिक और न्यून हो रहा है जबकि वह सब जगह एक रस है उसे कुर्सी खसने की आवश्यकता

01:23:36:07 नहीं है उ जो वो ताकत लगा रहा है वो ताकत जो है वो भी वही है ना उसे वो कम और ज्यादा हुआ ना जबक वो तो एक रस है वर नकत जदा कम लगा ज्यादा कम के रूप में वही तो है व ज्यादा कम के रूप में ताकत कम जदा नहीं लगाता है लगाने की आवश्यकता ही नहीं उसे चलिए खैर इसमें एक चीज और है हमारी अच्छी बातें हो गई एक ये भी बात जैसे प्रलय काल आपने बताया सब शून्य होता है जी एक स्थिति है तर्क में ना आ सकने वाली स्थिति जी तर्क हो ही नहीं सकता जहां ये तो इन्होंने माना है सता प्रकाश में जी कि एक स्थिति है जो तर्क में नहीं आ सकती जी मगर उसके बाद दूसरी ईश्वर की स्थिति ऐसी होती है जिसमें ईश्वर थोड़ा बहुत तो सही मगर तर्क में आ रहा है कि जैसे वो यह कर सकता है वो कर सकता है ये तर्क में आ गया तो यह भी तो अवतरित हो गया ईश्वर ईश्वर तर्क में नहीं आ सकता है फिर ईश्वर तर्क में आ सकता है जी तो ईश्वर अवतरित हो गया नहीं कैसे तर्क में आ सकता तर्क हमारी हमारी बुद्ध हमारी बुद्धि का विषय है जी हम अपनी बुद्धि के माध्यम से उसे विषय युक्त भले ही समझ ले हम हम ईश्वर के बारे में कुछ भी बात अगर कह रहे हैं कि वो ये करता है एक दूसरे को समझाने के लिए कहते हमारा वाणी कशा एक दूसरे

01:24:51:12 के लिए हो सकता है लेकिन ईश्वर इससे अलग है नहीं है मैं जो कह रहा हूं कि हम कुछ बातें तो मान ही रहे हैं ना जैसे वो अवतार नहीं ले सकता वो ये नहीं कर सकता वो यह करता है तो कुछ तर्क है जो हमारे पास आ गए ईश्वर के ईश्वर के लिए मगर जो ईश्वर की प्रारंभिक स्थिति है वह है कि वह तर्क में नहीं आ सकता तर्क में आही नहीं स अा और अवतार की बात अगर आपसे निकाले देखो एक मिनट मिट अब अवतार की बात हैय अधूरा र जाए इना अधूरा नहीं आप अवतार की तरफ ज्यादा पीड़ित है उस विषय से मैं और थोड़ा इसी में देना हूं आपको उरण देखिए आप यह मानते हैं कि हिंदू धर्म इसको हिंदू मान जबकि हिंदू भी हमारा हमारा भी हमारा शब्द नहीं है यह वि धर्मिंदर शब्द हमारे किसी ग्रंथ में नहीं है लेकिन फिर भी हम मान लेते हैं ठीक है हिंदू धर्म सारी दुनिया में छाने वाला सबसे प्राचीन यही तो धर्म था बताएंगे हम सारे जो हमारे यहां से वो चर्चा फिर नहीं जो दूसरे देशों में भी गए हैं दूसरे देश भी बसे हैं इसी यहीं से निकल के लोग गए हैं गए सारे विश्व प यही छाया हुआ था यह आर्यव्रत इतना विशाल देश था यहीं पर सूर्य उदय होता था यहीं अस्त होता था इतना विशाल था सब आर्यों की संतान सब हिंदुओं की संतान सारे विश्व में फस र हम कहेंगे क्योंकि 2022 से पहले

01:26:06:15 कोई यहां दूसरा नहीं था 2024 से पहले ईसाइयों को कितना हुआ 2024 मुस्लिमों को तो 15 1600 वर्ष हुए इससे पहले कोई य था नहीं केवल आपके अलावा हमारे अवतार भी आते रहे एक मिनट मूल बात करने जा हमारे अवतार भी आते रहे और हम समाप्त भी होते रहे हमारी धर्म की स्थापना भी भगवान आने वाले करते रहे और हिंदू सिकुड़ता गया सिकुड़ सिकुड़ करके आज सारे विश्व सिकुड़ करके भारत में आ गए और भारत में भी हम बहुत चंद स्थानों पर सुरक्षित अपने को महसूस करें वहां भी भया भाय की स्थिति बनी हुई है यहां से भी हम बेदखल होने की स्थिति में है आखिरकार क्या हुआ कैसे धर्म की हम स्थापना मान ले कैसे श् का अवतार मान ले तो हम महापुरुषों के द्वारा धरती का भार हटाना क्यों मान रहे हैं धरती इसलिए क्योंकि समाज बिगड़ता है अब जैसे अगर आजाद अगर हम होते हम यदि भगवान अगर है या अवतार लेता है हम ह 1200 वर्ष लग गुलाम रहे ठीक है नहीं नहीं देखिए मिनट मिनट एक मिनट सुन लीजिए अगर भगवान है हम वो भी तर्क दे रहे हैं लोग कहते हैं धर्म के हानी होने परमात्मा आया हम कहते हैं कलयुग में जैसे अधर्म जितना हुआ किसी युग में इतना हुआ नहीं गा मैं उदाहरण दे रहा हूं जैसे धर्म के नाम पर हमारे छोटे-छोटे बच्चे कभी दीवारों में जिंदा नहीं चुनाई गए अगर किसी युग में चुना गए हो

01:27:21:16 बताओ और यहां भगवान जब छोटे बच्चे जोरावर फतेह सिंह जैसे एक मिनट सुन लो मेरी बात दीवार जिंदा चुना दिए गए क्या उन्होंने भगवान नहीं पुकारा होगा भगवान आना चाहिए था लेकिन नहीं उनको बचाने आया जलिन बग जैसा कांड जलिन बग जैसा कांड नर संघार का जहां सारे लोग एक देश से आजादी की बात करने बैठ बैठे थे और वहां एक मुख्य द्वार था उस परे गन मशीन डायड ने लगवा दी वहां लाशों विलास बिचवा दी वहां मैंने जाकर देखा स्थान मेंे देखा हुआ है ये कुआ था कुआ में लोग कूदे अपनी जान बचाने के लिए उस कुआ को लाशों से पट गया र कूदते कूदते कूदते मरते गए नीचे वाले चले गए ऊपर वाले कूदते रहे किस तर बच्चाए हम और वहां गन मसीन नहीं फट पाई वहां नरसिंह अवतरित हो गया वहां उसमें खंब में प्रहलाद को बचाने के लिए णा कश्यप को मानने के लिए और वहां गन मशीन उसकी नहीं फट पाई भाई साहब फिर एक मिनट जी दूसरा किसी युग में महिलाओं के सतीत्व को नष्ट करने के लिए मीना बाजार जैसी नहीं लगवाई गई किसी युग में लेकिन यहां अकवन ने आगरा में मीना बजा लगवाई और जाने कितनी सति को मा नष्ट किया आ गया और वहां से पक प दूसरे देशों में बिक्री की भी की जाती थी भेड़ बकरियों जैसी और वहां आकर भगवान नहीं आया ईश्वर अपता नहीं हुआ महापुरुष भी तो नहीं आया महापुरुष तो आए क्यों नहीं आए मीना बाजार लगवाई महारानी किरण महारानी

01:28:36:22 किरण रोका अरे कहां रुका आप ही तो कह रहे हो कि नहीं रुका बाजार रकाई उन्होने कौन कौन कहता है छाती प चढ़े अकबर को एक मिनट छाती उसी क्षण बाजार बंद हुई उसी क्षण बाजार बंद हुई देश में आप भया भय की स्थिति बनी हुई 65 लाख क्रांतिकारी आए एक लाख नहीं साढे 6 लाख क्रांतिक बलदान दिया सब जानते थे हम देश का काम कर रहे हैं हम मारे जाएंगे फांसी फंदे चढ़े जाएंगे और परिवार वालो रोकने की कोशिश रुके नहीं 65 लाख लोगों 90 साल युद्ध किया महापुरुषों ने हमारे आप और उन्होंने बलदान दिया और देश को आजाद कराया देखिए आपने यह माना है कि महापुरुषों के आने से धर्म की स्थापना हो जाती है समाज की रक्षा होती आप ही ये कह रहे हैं कि नहीं धर्म जो है घटता चला जा रहा है कौन कहता है आप जिस धर्म को पुराण मानता है मैं उस धर्म की बात कर रहा हूं मैं वो धर्म इस समय बढ़ रहा है कौन बढ़ा धर्म कौन महापुरुषों के आने के बाद हां जिस समय धर्म जिस समय महापुरुष आ उस समय बढ़ा तो इस जिस समय जिस समय अवतार आ उस समय बढ़ा कहां बढ़ा बताओ ना मैं एक भी अवतार बताओ भाई हिरण्य कश्यप मरा ना उस समय जैसे आपने अभी कहा नहीं नहीं जैसे अभी आपने कहा कि मीना बाजार लग रहा था फलाने महापुरुष ने जाकर के उसको रोक दिया तो ऐसे ही हिरण्य कश्यप अन्याय कर रहा था उसको जाकर के रोक दिया कहां कहां रोक दिया अरे आप आप उसको जब

01:29:51:26 स्वीकार करते हुए बात कर रहे हो ताने नहीं रोका उसको उसने उसको बो दिया प्रहलाद ने जो महापुरुष था प्रहलाद ने बो दिया परमात्मा उसको बेटा बेटा बनाकर भेज दिया जाओ दुष्ट को बोध करा दो श् तू नहीं ई दूसरा कोई है उन्होने सिद्ध कर दिया हे पिता जिसको तू अपने को बता रहा है तू नहीं कोई दूसरा है प्रहलाद ने आकर के वो बोध कराया और प्रहलाद ने बोध करा के रखा उसको उसको मानना पड़ा ठीक है तो वो एक चर्चा अलग हो गई उस पर आते हैं हम लोग ये क्या कहते हैं ये जो इस पर बात चल रही थी कि व

01:30:28:13 व्यवहारिक हो सकता है व्यवहार करने के लिए जिससे कि ऋषि उस ज्ञान को आगे दे पाए इसलिए मंत्र के रूप में जो ईश्वर है वो अपना ज्ञान देते हैं तो इसी तरीके से हम कह सकते हैं कि ईश्वर को लेकर के लोग व्यवहारिक हो पाए इसलिए ईश्वर अपना दर्शन या ईश्वर अपना स्वरूप बनाते हैं बिल्कुल

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01:30:45:09 है ना अच्छा इसमें एक चीज और है जो यह कहा जाता है कि सर्वशक्तिमान का अर्थ यह है कि मैं वो सारे कार्य कर सके जो उसके कार्य हैं हम तो फिर उसको क्या कहा जाएगा जो वह कार्य भी कर सकता है जो उसके नहीं है जी जैसे मेरे मेरे कार्य हैं कि मुझे मान लीजिए आपके साथ बातचीत करनी है कार चलानी है और मान लीजिए कि खाना बनाना है और खाना खाना है ये चार कार्य हो गए मेरे ये सपोज कर रहा हूं मैं जी तो ऐसे ही ईश्वर के चार कार्य हैं कि उसको यह करना है अब मेरे जो चार कार्य वो मैं कर पा रहा हूं मगर मैं यह भी कर सकता हूं कि मैंने जो है इनके लिए बैडमिंटन खेलना था वो मैं खेल पाया मेरा कार्य नहीं है मगर मैं वो खेल पाया जी तो जब स्वयं के कार्य को करने वाला सर्वशक्तिमान है जी तो फिर वो क्या कहलाएगा जो वो कार्य भी कर सकता है जो उसके नहीं है मगर वह कर सकता है जी उसको क्या कहा जाएगा भाई उस उसको ईश्वर कैसी आवश्यकता है जो कार्य उसके नहीं वो नहीं करेगा जो कार्य जिसके उसको करेगा करेगा नहीं मैं कह रहा हूं एक मिट जैसे हम हम छोटी सी बात कर घर का मुखिया मान ले हम मुखिया वह नहीं है सारे घर के अपने आप कार्य करे मुखिया

01:32:00:16 वह है जो अपने अधिकार के अपने आप काम करें और दूसरों को काम जो अधिकार उनको काम करने का बोध कराए मुखिया मुखिया कई बार बच्चों को खिलाने के लिए घोड़ा बन जाता है पिता वो तो पिता हैलू बन जाता है वो वहा मुखिया बच्चे के साथ मुखिया नहीं है वो वो भी पिता है बच्चे को उसको प्यार चाहिए तो मुखिया ऐसा कर सकता है ना कि अपने घर के किसी बालक के लिए वो लेकिन जब वो मुखिया एक अपने घर का एक संचालक का रूप दिखाएगा तो संचालक वही कुशल है अपने परिवार का वो भालू नहीं बन सकता अपने पोते के लिए क्यों बन सकता है क्यों बन सकता है वो तो बन रहा है ना मुखिया होते हुए उस समय मुखिया नहीं है उस समय पिता का रूप है हां ये कह सकते पिता का रूप है आप ये कह सकते हो कि जिस समय वो अवतार लेते हैं उस समय वो वाला रूप नहीं होता है भाई आप अवतार के पीछे क्यों पड़े हो थोड़ा चिंतन करना ठीक है हा आप अच्छी चर्चा हुई हम लोगों की अगर आप आपके पास समय है तो और थोड़ी सी कुछ चीजें कर लेते हैं हम तो कहते हैं अगर अवतार है तो अवतार अगर हमने माना तो हमारी वृद्धि होनी चाहिए थी भाई नास्तिक ऐसे बोलता है कि अगर भगवान है तो जो है ये सब गलत क्यों हो रहा है लो वो तो मू ना कैसे खंडन कर तो हम खंडन करेंगे जो आपका तर्क है उसी का यूज कर र है वो कि अगर अगर भगवान है तो ये क्यों हो रहा है गलत क्यों हो रहा है क्यों दुनिया

01:33:15:16 में ये क्यों हो रहा इसलिए हो रहा है परमात्मा ने मनुष्य को कर्म करने में स्वतंत्र छोड़ दिया इसलिए स्वतंत्र हो जैसे और आपको यहां आप यहां कुछ भी करने ला आपको दंड देने नहीं आएगा वो यहां जैसे हमारे जिला का न्यायाधीश है या हाई कोर्ट का न्यायाधीश है उसको अधिकार है आपको दंड देने का लेकिन आप यहां मर्डर पे मर्डर करते जाओ आपको कोई भी न्यायाधीश यहां पकड़ने नहीं आएगा ना दंड देने आएगा कब दंड देने आएगा जब आप उसके न्यायालय में पहुंचो ग और जब वो आपका मुकदमा जब आपका मुकदमा सुनेगा जी जब वो मुकदमा सुनेगा आपके विषय में न्याय करेगा फिर आपको कितनी सजा मिलनी चाहिए वो जरूर देगा मतलब वो जीते जी दंड नहीं देता है जीने के क्यों नहीं देता है जीते जी देता है जीते जी जीते जी देने योग जैसे ऐसा कोई आपका कार्य भयंकर है जो इस इस इस जीवन में आपका वैसा माहौल बन ही नहीं पा रहा है या व्यवस्था नहीं बन पा रही है तो अगले जन्म के लिए आप जाएंगे वैसे मा जीते जी दंड देता है जैसे आपने कहा कि उल्का पिं गिर गया क्यों नहीं देता देता है बिल्कुल देते नहीं तो लोग देते नहीं तो ये दंड कैसे है कि एक बच्चा राजा के यहां पैदा हो रहा है एक बच्चा जो है भिखारी के उत्पाद में पैदा हो रहा है ये भोगी तो है और क्या है ठीक है ठीक है अच्छा अब एक ठीक है के वो अवतारवाद प हमने काफी सारी बातें कर ली मैं इस ये पूछूंगा कि आर्य समाज के द्वारा जो

01:34:30:22 वर्ण व्यवस्था है जी वो कर्म आधारित है या जन्म आधारित है अगर कर्म आधारित है तो शूद्र किसे कहते हैं कर्म आधारित है जी और शूद्र उसे कहते हैं जिसे पढ़ाने से भी विद्या ना आ सके जिसे विद्या सिखाने पर भी ना आ सके पढ़ाने से भी नहीं पढ सकता अच्छा केवल शारीरिक क्म के द्वारा अपना जीवन यापन कर सकता है या उच्च वर्ण के जो लोग हैं जो ब्राह्मण है क्षत्रिय वै उनके संपर्क में उनके सहयोग में रह कर के उनका सहयोग करके सेवा कार्य करके उनके द्वारा उसका उद्धार होता है उसके द्वारा उनको सेवा मिल रही बस उसका उपनयन तो होगा नहीं उसका उपनयन नहीं होगा क्योंकि द्विज कहलाएंगे वो जिनका उपनयन हुआ तो जब उपनयन नहीं होगा तो शास्त्रों के हिसाब से उसको जो है वेद अध्ययन का अधिकार नहीं है जी है ना जी मगर

01:35:17:09 सत्यार्थ नहीं नहीं हां बताइए आपका ये तो तो सत्यार्थ प्रकाश में जो थेमा वाचम वाला जो मंत्र दिया है 26 दो यजुर्वेद का उसमें उन्होंने कहा है कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सबको अधिकार है पढ़ने का तो यह कौन सा शूद्र है क्योंकि शूद्र तो वो है जिसका जने नहीं हुआ यज्ञ पवित नहीं हुआ नहीं ऐसा नहीं है वो नहीं जने ले रहा है इसलिए वो सूद हम कह सकते हैं उसको लेकिन वो मस्तिष्क सूद नहीं है आज जैसे बैकवर्ड में बैकवर्ड में आप देख लीजिए बड़े बड़े अच्छे विद्वान है नहीं शूद्र संस्कार के ना होने से हुआ ना वो संस्कार हो संस्कार नहीं शूद्र इसलिए वो है कि उसे विद्या पढ़ाने की क्षमता ही उसके पढ़ने की क्षमता नहीं है वो बौधिक क्षमता खो चुका है उसके अंदर बौधिक क्षमता है ही नहीं ठीक बाकी तो पढ़ने के लिए चारों वर्णों के लोगों को है एक मिनट चारों वर्णों के मनुष्य मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है ठीक है मैं यह कह रहा हूं वेद पढ़ने जैसे जैसे अब ये अधिकार कब होगा जैसे किसी किसी का शूद्र कोई पिता है ठीक है पिता शूद्र है लेकिन संतान उसकी नहीं मैं एक बार क्लियर कर दूं आप शायद समझ नहीं पा रहे जी शूद्र हमने उसे कहा जिसकी बौद्धिक

01:36:32:13 क्षमता नहीं है वेदों को पढ़ने की इसलिए हमने उसका संस्कार नहीं किया उसे हमने पढ़ नहीं सकता तो हमने उसका संस्कार प नहीं सकता अब उसका संस्कार नहीं हुआ है वो शूद्र है जी ठीक है जी अब हमने कहा कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सबके लिए सबको वेद पढ़ने का अधिकार है तो फिर ये कौन सा शूद्र है जब शूद्र तो वो है जि जो मतलब उतनी बौद्धिक क्षमता नहीं है जिस कारण से उसका संस्कार नहीं होता है तो क्या यहां पर बिना संस्कार के शूद्रों को वेद अध्ययन दिया गया है हम वही तो कहने जा रहे हैं तो यहां दूसरा शूद्र कोई नहीं शूद्र जैसे हम वही क जैसे किसी का पिता शूद्र है ठीक है पिता के पास यहां पर वो वाला शूद्र जिसका पिता भी शूद्र है पिता जिसका शूद्र है एक मिनट सुन लो जिसका पिता शूद्र पिता को पढ़ने का अधिकार पढ़ना की क्षमता नहीं है वो अनपढ़ शिक्षित है गमर है लेकिन संतान उसकी संयोग से ऐसी हुई है कि जो बुद्धिमान हैद एक मिनट एक मिनट अभी परंपरा जो हम अगर कर्म के ना माने वर्ण वस्था माने तो ऐसे ही मान रहे जिसका पिता शूद्र वो शूद्र कहलाता है चाहे वो लड़का चाहे पीएचडी कर ले तभी शूद्र कहेंगे उसको और अगर ब्राह्मण एकदम जो जिसका पिता ब्राह्मण है अगर हम वर्ण व्यवस्था की बात करें जो जन्मना वर्ण व्यवस्था की बात करें तो यही है कि जिसका पिता ब्राह्मण है उसका बच्चा चाहे महामूर्ख सही शराबी कबाबी चाहे बिल्कुल भट्टाचार

01:37:47:26 सको कुछ भी नहीं आता लेकिन वो भी पंडित कहलाता है लेकिन यहां नहीं ऐसा है यहां क्या अगर किसी का पिता है किथ पिता शूद्र है मैं मानता हूं उसको बोध नहीं व पढ़ा लिखा नहीं बिल्कुल अचित है गवार है लेकिन बालक उसके यहां ऐसा कोई आ गया है जो उसकी बचपन से ही बौद्धिक मेमोरी हमें अच्छी लग रही है और ऐसा लग रहा है कि यह बालक पढ़ सकता है इसको पढ़ाया जाए पढ़ सकता है उस शूद्र की बात हो रही है शूद्र को पढ़ने का अधिकार है वो 26 दो में उस शूद्र की बात हो रही है वो द बन सकता तो यानी कि मतलब यजुर्वेद में उसको अधिकार है किसी को पिता की वजह से शूद्र माना गया है हा नहीं वेद में नहीं माना गया वेद में नहीं वेद में तो पिता शूद्र होने पर भी ब्राह्मण बनने का अधिकार है नहीं नहीं जो वेद में यह कहा जा रहा है कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सत्या प्रकाश में लिखा जी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सबको वेद पढ़ने का अधिकार है जी अब यदि हम ये नहीं मानते कि ये शूद्र जो है पिता वाला शूद्र है ज जन्मना जन्मना नहीं मानते अगर इसको तो ये जो शूद्र है इसको तो वेद पढ़ने का अधिकार है ही नहीं क्योंकि वो है ही वही जिसका जने नहीं हुआ है और बिना ज इसलिए है कि उसको उसके अंदर बौद्धिक क्षमता है नहीं उसके अंदर विवेक है नहीं हम उसको पढ़ाना चाहे तब भी नहीं पढ़ सकता वो शूद्र है वो शूद्र है इसको पढ़ना चा

01:39:03:10 अधिकार उसको भी हैका एक मिनट अधिकार उसको भी है वो जनेऊ जब करा लेगा तब है ना और फिर वो द्विज बन जाएगा फिर वो सूत्र अधिकार उसको भी है कि जो नहीं पढ़ सकता है अधिकार उसको है लेकिन वो अधिकार का उपयोग नहीं हो पा रहा उसके जीव क् वो उसके पास क्षमता ही नहीं है नहीं नहीं वो सही है मलिए उ वेद पढ़ने काब वो वेद पढ़ेगा तो अकॉर्डिंग टू आर्य समाज जब वह वेद पढ़ने वाला बन जाएगा तो वह शूद्र नहीं कहलाएगा व द्विज कहलाएगा बिलकुल द्विज कहलाएगा तो फिर यह यहां पे शूद्र को पढ़ने की बात क्यों हो रही है कहां पर सत्या प्रकाश में भाई इसीलिए तो हो रही है आप समझ नहीं पा रहे हैं यहां पे मतलब मेरा कहने का मतलब है कि यहां पर जन्म से माना है सत्या प्रकाश नहीं माना जन्म से आज समाज की व्यवस्था है वो जन्म से मान रही है ऋषि ने कहीं सत्या प्रकाश मान रहा है ना क्योंकि ऋषि ने क ऋषि ने तो प्रमाण दिया जन्म जायते शूद्र संस्कारा दते वेद पाठ प्रा ब्रह्म चने ब्रह्मणा ऐसा ऋषि ने इसको प्रमाण माना है ब्राह्मणों मुखमा बाहु न करता उरु त शूद्र अजत नहीं नहीं मैं जब शूद्र अपना संस्कार करा लेगा तो वो तो द्ज बन जाएगा बकुल बन जाएगा ब्राह्मण क्षत्रिय वैश में से कोई एक है ना तो फिर यहां पर इसको इस शूद्र की तो बात नहीं हो रही क्योंकि अगर यह द्विज बन जाएगा तो द्विज की बात होनी चाहिए

01:40:19:02 मगर यहां पर शूद्र कहा जा रहा है कि शूद्र को भी वेद पढ़ने का अधिकार है तो इस शूद्र को उन्होंने जन्म से माना ना कि तुम शूद्र जन्म से हो अगर तुम्हारे पिता भी भाई पिता के माध्यम से पिता के माध्यम से मैं वही कह रहा हूं तो यहां पे उन्होंने पिता तो पहले से स्थापित है ना तो यहां पे जन्म से माना गया ना शूद्र कौन पिता भी जन्म से नहीं बना है पिता भी पिता नहीं जो वो शूद्र है और पहले तो हमें मानना पड़ेगा पिता के अनुसार ही मानना पड़ेगा भाई जो पिता उसका शूद कुल में चला गया म मतलब सबसे पहले हमें स्वीकार करना पड़ेगा जन्म से जन्म से नहीं करना पड़ेगा पिता भी जन्म से नहीं वो तो बौ वो भी बौधिक इसीलिए तो जैसे हम अशिक्षित है ठीक हम को जन्म से अशिक्षित नहीं हुए ऐसा नहीं कि हम किसी अशिक्षित घर में पैदा हो गए तो वो घर उसम घर में जो पैदा होगा व सचित ही होगा या बौद्धिक हीन हो जाएगा विद्या हीन हो जाएगा सभी अगर ऐसा हो तो सभी उसके य जितने पैदा हो तो डॉक्टर अंबेडकर जैसे लोग नहीं निकलने चाहिए थे बश जैसे लोग ब्राह्मण नहीं बनने चाहिए थे गणिका गर्भ समताम तपसा ब्राह्मण जाता संस्कारा वशिष्ठ जैसा ब्राह्मण बना जो शूद्र था शूद्र कु में जन्म लिया व्यास कैव त्या व्यास व्यास जैसे हमारे यहां पंडित बने जो कैव त्या शूद्र कुल से वो भी निकले वो थोड़ा सा बदल रहा है थोड़ा विषय भूल जाऊंगा आपकी स्मरण शक्ति बहुत

01:41:34:03 है पर मैं विषय भूल जाऊंगा अब उसमें क्या है कि यदि शूद्र वही है जो वेदा अध्ययन नहीं करता इसलिए उसकी संज्ञा शूद्र है नहीं नहीं ऐसा नहीं है जो मूर्ख है जिसका उपनयन संस्कार वेद पढ़ने की क्षमता ही नहीं है क्षमता नहीं है और जब वो वेद पढ़ेगा पढ़ेगा तो द्विज कहलाएगा वो शूद्र नहीं कहलाएगा वंद पुत्र इसलिए कहा भी है जैसे जैसे वंदे पुत्र जैसे वंदे पुत्र है अगर वंदे के पुत्र हो जाएगा तो वो वंदे नहीं रहेगी जी हा तो शूद दोनों ही केस में वंदे के पुत्र का जन्म होना सिद्धि नहीं होता क्योंकि जब वो पुत्र को जन्म देगी तो वो वंध्या नहीं रह गई इसी तरीके से जब शूद्र है तो वो अगर वेद पढ़ने वाला बन गया तो वो शूद्र नहीं रहा नहीं रहा तो फिर यहां पर शूद्र के वेद पढ़ने की बात कैसे कह रहे हैं पिता के माध्यम से हां जन्म से सूत्र है ना वो ना जन्म से वहां भी नहीं है नहीं नहीं जन्म से नहीं नहीं जन्म से नहीं भाई पिता को भी जन्म थोड़ी माना गया पिता को पिता को नहीं उसका जो पुत्र जिसको पिता के माध्यम से ही शूद्र कुल में पहले गिना जाएगा पिता के माध्यम लेकिन पिता कैसे शूद्र हुआ वो जन्म व्यवस्था से वो भी नहीं हुआ वो ममरी क्षमता के कारण हुआ अविद्या के कारण हुआ वो तो बाद की बात है अभी हम इस ल जन्म ये बेईमानी हुई जो आज हमने जन्म व्यवस्था

01:42:49:08 से मान लिया ये बेईमानी हुई पिता भी इसलिए शूद्र कुल में शूद्र श्रेणी में आया था कि उसको विद्या पढ़ने का उसे क्षमता नहीं थी उसके अंदर वो वेद नहीं आचार सुनने की कोशिश करो तो पिता भी इसीलिए उसको सूद कुल में रखा गया था कि उसने वेद की पढ़ने की क्षमता नहीं थी बौद्धिक क्षमता नहीं थी वो विद्याओं को नहीं ग्रहण कर सका इसलिए उसको सूद कुल में रखा गया और बचपन में उसकी संतान होगी वो पिता के माध्यम से ग जा उसको सूद में इसलिए रखा गया क्योंकि उसमें क्षमता नहीं थी वो वेद वेद पढ़ने का उसके पास सामर्थ्य ही नहीं था इसलिए उसका उपनयन नहीं हुआ उसके लिए उप नहीं हुआ तो अब उसके पास अधिकार नहीं है किसके पास उसके पास के लिए अधिकार नहीं है लेकिन उसकी संतान जो आएगी वो अधिकार को प्राप्त करेगी संतान के पिता से शूद्र पिता से उत्पन्न होने के कारण यहां पर शूद्र माना गया है स्वरूप माना जाएगा इसलिए इसलिए सभी शूद्र है यही मैं पूछ रहा था ठीक है अच्छा सभी शूद्र वाली बात है जैसे आप वो कहते हैं ना जन्मन जाति शूद्र तो इस जैसे क अध के वस्ता सबके पास होती जैसे मैं एक बात बता द जैसे हम लोग कहते हैं धर्मे हीना पशु भी समाना तो इसमें कई जगह पर ऐसा भी लिखा हुआ है कि धर्म के बिना मनुष्य जो है पशु है सीधे-सीधे लिखा है पशु है तो क्या हम यह माने कि उसकी योनि भी पशु है किसकी जिसको ये कहा जा रहा धर्म के बिना वह व्यक्ति जो है पशु है जी तो हम लोग खुद कहते हैं नहीं भाई वो पशु योनि में नहीं है वो पशु वत

01:44:04:09 है जी तो ये जो ये वाली बात होती है ना कि वो जो अभी जो उत्पन्न हुआ है वो शूद्र वत है जी तो इसका ये निराकरण दिया जाता है हां बिल्कुल दिया जा सकता है बिल्कुल दिया इस अब अंत में आ जाते हैं बहुत अच्छी-अच्छी चर्चाएं हमारी हुई है अलग-अलग विषयों पे अब एक मैंने आपसे भी सुना कई बार वो ऋषि परंपरा की बात मैंने सु तो ये जो वेदों का ज्ञान है जिसे आपने बताया कि परंपरा से चलता है तो यह जो दयानंद जी के पास जो वेद मंत्र हैं वो उनके गुरु परंपरा क्या रही है जो के मतलब कुछ पीछे के कुछ आठ 10 पीढ़ियों के गुरु के नाम कुछ हमें मिल पाए हम दयानंद जी के जीनंद बृजनंदन पढ़ी थी ना कि वेदार्थ वगैरह भी लिया था कुछ विद्या सारी विद्या व सारी विद्या ली थी अच्छा अच्छा मतलब वो पीछे से उनके गुरु थे तो बजान के गुरु संपूर्णानंद रहे हैं संपूर्णानंद और उनके गुरु उनका मुझे यात नहीं है संपूर्णानंद का कौन रहा मतलब जो मध्यकालीन हमें जैसे इतिहास हमारा प्राप्त है अकबर यहां तक और उससे थोड़ा पहले का भी हमारा इतिहास काहा होगा कोई ना कोई जरूर लेकिन उसका हमें हम लोगों ज्यादा जरूरत नहीं हमें तो दयानंद से तक सीमित हमारी क् हमारा जो परंपरा हमें मिली है जो व्यवस्था मिली वो दन से मिली है

01:45:19:14 ठीक है नहीं नहीं काक जो हमारे हुए हैं क वो तो बहुत सारी ऋषि परंपरा लगातार ब्रह्मा ब्रह्मा से लेकर जमिनी तक और मदान तक रही लगातार ऋषियों की परंपरा रही है जमिनी से लेके जो ब्रह्मा से लेकर के कपिल कणादी जमुनी व्यास आदि रहे हैं अंत में ऋषि दनन भी अंतिम उसी श्रेणी में आए हैं इधर से अगर हम पीछे जाए तो संपूर्णानंद जी से पहले के गुरु का नाम नहीं हमें पता चल सकता क्यों नहीं चल सकता क्योंकि जैसे हम रामानुजाचार्य या शंकराचार्य की बात करेंगे जरूर मिलेगा मैंने कई बार ये बात बात पूछ ली है मगर आप संपर्क में रहिए मैं आपको पता करके दूंगा हां ब ब करूगा क्योंकि जब हम ये कहते हैं ना कि जो ज्ञान वहां पर दिया गया शुरुआत में ईश्वर द्वारा ऋषियों को तो वो श्रुति परंपरा से होते होते होते होते हम तक आया है जी जी तो अब क्या है जब हम यह कह रहे हैं कि अच्छा जिनकी परंपरा हमें प्राप्त है जैसे शंकराचार्य हैं इनकी परंपरा हमें प्राप्त है तो जैसे शंकराचार्य आते हैं प्राप्त होगी यहां भी प्राप्त ऋषि परंपरा भी प्राप्त होगी े है वो अलग हमें जानकारी नहीं है वो अलग बात है लेकिन ऐसा नहीं परंपरा ना हो क्योंकि ऋषि परंपरा हमारी प्राचीन परंपरा रही है मैं एक बात कह रहा वो कोई ऐसा नहीं बीच में पड़ गई होद सृष्टि से रही है परंपरा तो मैं ये बात कह रहा ह जैसे और यही नहीं मुंडकोपनिषद एक से चार में

01:46:34:15 बताया जा रहा है कि हमारे को से ऐसे ऋषि परंपरा क्या रही शति तो जैसे हम कह रहे हैं कि जिसकी परंपरा हमें प्राप्त है मालूम है हम कह रहे हैं कि ये जो है ये परंपरा से प्राप्त जो ज्ञान बता रहे हैं गलत बता रहे हैं है ना अच्छा वेद मंत्र तो परंपरा से ही आएंगे हमारे पास वेद जो है अब जब जिसकी परंपरा प्राप्त है उसके अर्थ पर हमें विश्वास नहीं है तो उसके उसको हम प्रमाण नहीं मान सकते कि यह जो हमें वेद मंत्र दे रहा है ये वही वेद मंत्र होंगे जो ईश्वर ने दिए थे क्योंकि उस वो अर्थ में झूठ बोल रहा है अर्थ में झूठ बोल रहा है जी जी अच्छा और हमारी परंपरा हमें मालूम नहीं है हमारी जो परंपरा है वह हमें मालूम नहीं है तो फिर हम जो धर्म बता रहे हैं वह वेदों का ही अर्थ है यह फिर प्रूफ कर पाना मुश्किल हो जाता है क्योंकि भाई ईश्वर ने ज्ञान का परंपरा से कोई मतलब नहीं है अगर हमें परंपरा नहीं हमें नहीं अगर हमें परंपरा नहीं मालूम है तो क्या हम जनी नहीं हो सकते जो हम बात कह रहे हैं जो हम बात कह रहे हैं क्या सत्य जैसे बहुत स जैसे एक मिनट कहीं जैसे बहुत सारे हम आप पौराणिक मत में ले ले कबीर जैसे रहे ठीक कबीर कबीर की व्यवस्था कबीर तक सीमित रही है कबीर की वीर रामानंद रामानंद तो केवल औपचारिकता

01:47:49:22 थी रामानंद से विप का दर्शन अ रहा रामानंद मूर्ति पूजक मूर्ति न कभी ने मूर्ति की धज्जियां उड़ा दी तो उसको प्रमाण कहां माना लोगों ने किनको अगर उन्होंने धज्जिया ही उड़ाई तो फिर प्रमाण थोड़ी ना माना किस किसको नहीं मा गुरु विरोध हो जाएगा ना शता शत्र उपनिषद में लिखा है 2 में अगर उनका उनके कबीर बीजक को पढ़िए नहीं नहीं गुरु विरोधी मानते हैं कि नहीं कबीर जी को नहीं मानते हैं गुरु के लिए गुरु के लिए उन्होने बहुत सारी गुरु विरोधी का मतलब कि उन्होने विपरीत शिक्षा दी ना गुरु विपरीत नहीं अगर गुरु अज्ञानी तो क्या हम अज्ञान में चले जाए क्या गुरु क तो वो गुरु कहां से हुए वो तो प्रारंभ में जैसे हमें कोई कक्षा पांच का पढ़ाने वाला व्यक्ति सही हमें उसम बोध ही नहीं है हम किसी के पास पढ़ने चले गए या आपकी पास चले आए रामानंदाचार्य जी के गुरु रामानंदाचार्य जी उनके गुरु नहीं थे कौन गुरु थे ठीक लेकिन वो उस समय के गुरु थे जिस समय अबोध थे और बोध के समय जब उनको बोध हुआ तो क्या जरूरी थोड़ी कि गुरु अज्ञानी है तो हम अज्ञान को ही अज्ञान को ही आगे बढ़ाते रहे उनको यही तो यही सत्य है उन्होंने जब बोध हो गया उन्होंने समझ लिया कि गुरु का ज्ञान अलग है गुरु का ज्ञान सत्य से नहीं प्राप्त करा हो सकता उन्होंने अपना जन दिया आज रामानंदाचार्य कौन जान रहा है आज कबीर को जान रहे हैंसी दस जी का तो आपने 10 बार दो प लि अगर अगर उनकी पहचान है रामानंदाचार्य की पहचान है तो कबीर से पहचान है नहीं

01:49:04:25 नहीं आपने तुलसीदास जी के दोहे इतनी बार बोले वो किसके परंपरा में है नहीं वो गुरु परंपरा में है वो भी किसकी परंपरा में है किसी की परंपरा से रामानंदाचार्य आप कह रहे हो रामानंदाचार्य को कोई नहीं जानता नहीं कबी आप जानते हो तुलसी कबीर के माध्यम से जानते हैं हम कबीर के माध्यम से उनका नाम हुआ ना नाम उनके ये तो अपना अपनी जानकारी है किसी महापुरुष को जितने भी जैसे बुद्ध जी आए अब देखिए आपने कबीर जी पनि एक बात कह ल आपने जब दोहे पढ़े तो कबीर जी के नहीं पढ़े आपने तुलसीदास जी के प तुलसीदास जी रामानंदाचार्य परंपरा के आवश्यकता अगर होती हम जरूर पढ़ते उनको भी अब जैसे बुद्ध जी आए बुद्ध जी गुरु परंपरा में नहीं गए लोग कहते हैं बिना गुरु ज्ञान नहीं बिना गुरु के ही ज्ञान होता है बु बिना गुरु परंपरा में गए उनको बोध हुआ अच्छा बु का दर्शन मानते हैं आप बिल्कुल मानते हैं जो उनकी मानने वाली चीज मानेंगे बिल्कुल सही भाई सही चीज है उन्होंने कहा धम्मम शरणम गच्छामि आप धर्म की शरण में जाओ नहीं सत्यार्थ प्रकाश तो खंडन करती है बौद्ध धर्म कौन बु बुद्ध की जो गलत गलतियां है जो जो जो नीति मतलब वो प्रॉपर नहीं थे जो जो नीतियां गलत है वो गलत है प्रॉपर नहीं जो सही है वो सही है पूर्ण ज्ञानी नहीं भाई मेन तो ब्रह्म के बारे में पूर्ण ज्ञानी अगर होते तो ये देश गुलाम नहीं हो जाता पूर्ण ज्ञानी अगर होते अशोक सम्राट जैसे व्यक्ति को सस्त

01:50:19:27 त्याग नहीं करा देते और वहीं से देश भाग इस देश का अहिसा नहीं अहिंसा नहीं उनके ब्रह्म जो उन्होंने आध्यात्मिक लेवल का जो ज्ञान दिया है बुद्ध जी ने बुद्ध भगवान ने नहीं माना बु जी ने दो चार वचनों के अलावा कोई विशेष कहीं भी कोई बातचीत नहीं की विशेष रूप से ठीक है और बुद्धि अरे पूरा खंडन भरा पड़ा है इसमें सत्या प्रकाश में बुद्ध और जैन ना ना खंडन नहीं है जो गलत चीजें है परंपरा में ने उसम प्रकाश डाला है नास्तिक मत खंडन के नाम पर उसमें वही है बुद्ध बुद्ध मत का हा तो बिल्कुल जो गलत है है गलत तो फिर आप कैसे मान रहे नहीं बुद्ध अच्छा भाई किसी महापुरुष में किसी व्यक्ति में अच्छा भी होंगी जिसकी अच्छाई य पक्षपात नहीं हो जाता जिसकी अच्छाई अच्छा मानी है जैसे आपसे मेरी शत्रुता हो जाए मेरी इंसानियत है कि आपके अच्छे गुण आज मुझे दिखाई दे रहे अच्छे गुण हमेशा दिखाई आपके देने चाहिए लेकिन जो बुराई आ जाए बुराई का भी हम दोष दिखाए

01:51:15:20 अने कहा उन्होने कहा कि धम श गच्छा हे मनुष्य धर्म की शरण में जा ठीक उन्होंने कहा बद्ध बुद्धम शरण गच्छा बुद्धि शरण विवेक की शरण में जा अहिंसा परमो धर्मा उन्होंने कहा हम हम स्वीकार करते हैं ये चीज अच्छी बात थी मान थ और ये भी बात उनकी अपनी बात ये वेद की बात थी वेद ने बहुत पहले कह दिया वो विषय बदल रहा है मैं ये बात कह दू बस वेद ने बहुत पहले कह दिया जैसे आपने एक बात कही क्या मैं बिना परंपरा के ज्ञानी नहीं हो सकता आपने कहा ठीक है हो सकते हैं मगर हम यह नहीं कह सकते कि जो ज्ञान हम दे रहे हैं वो वेद के मंत्रों का ही अर्थ है कैसे मैं बताता हूं कैसे जी जैसे मैं आपको कोई बुक दे रहा हूं यह मैं आपके लिए उस बुक का कोई और सोर्स नहीं है मेरे अलावा जी मैंने आपको वो बुक दी ठीक है अब आप कह रहे हैं कि इस बुक का जो अर्थ है वो मैं बता रहा हूं वो सही है मगर मैं भी कुछ अर्थ बता रहा हूं उस अर्थ को आप मना कर रहे हैं जी तो जब आपका मेरे दी हुई बुक पर विश्वास है तो मेरे ऊपर विश्वास ना होना सिद्ध नहीं होता जी और यदि मेरे ऊपर विश्वास नहीं है तो मेरे द्वारा दी गई बुक पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता यदि परंपरा से आपको मंत्र देने वाले

01:52:30:26 आचार्य जो हैं वो झूठ बोल रहे हैं उनका मंत्र का अर्थ ग गलत बता रहे हैं तो व आपको वेद मंत्र भी तो झूठे दे सकते हैं बिल्कुल दे सकते हैं क्यों नहीं दे सकते तो इसलिए यदि हम उन पर भरो वेद मंत्र झूठे इसलिए नहीं दे सकते बात पूरी करलू यदि हम उनके वेद मंत्रों पर विश्वास कर रहे हैं तो हमारा उनके वेदार्थ पर विश्वास ना करना सिद्ध नहीं होता और यदि हम उनके वेदार्थ पर विश्वास नहीं कर रहे हैं तो उनके वेद मंत्रों पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता जैसे कि कोई व्यक्ति कहे कि डी ओ डू नहीं डीओ डो होता है तो हम उससे कहेंगे एट दी एंड वो कहेगा मैं ज्ञानी हूं मैं यही बता रहा हूं यही होता है डीओ डो होता है तो एट द एंड हम उससे पूछेंगे तूने भाई कहां से इंग्लिश पढ़ी है जी पूछेंगे ना तो वो क्यों वो क्या पढ़ क्या पूछ रहे हैं कि भाई उसकी पीछे सोर्स ऑफ इंफॉर्मेशन क्या है परंपरा क्या है उसकी जो वो अपने आप कोई इंग्लिश का जानकार कह रहा है उसके पास वो इंग्लिश वहीं से आई है जहां से इंग्लिश आई है या कहीं से भी ले ली है इसी तरीके से वही क्वेश्चन वही आ गया भाई ज्ञान के क्षेत्र में ये परंपरा से कोई मतलब नहीं है नहीं नहीं तो ऋषि क्यों बता रहे हैं परंपरा अपनी मुंडकोपनिषद एक से चार ऋषि बता रहे हैं चार दो में श्री कृष्ण बता रहे हैं परंपरा नहीं परंपरा तो है लेकिन ज्ञान

01:53:46:01 में कम ज्यादा करने की कोई ऐसी व्यवस्था नहीं कि परंपरा नहीं होगी तो आप ज्ञानी नहीं बन सकते अच्छे ज्ञानी नहीं बन सकते गुरुओं से भी शिष्य भी आगे निकल गए मैं आपको तर्क की बा अग अगर यही होती कि हम परंपरा के अंदर गुरुओ के आधीन रहेंगे गुरुओ जैसा या गुरुओं से कम न्यून हमारा रहेगा तो शिष्य विद्या बढ़ ही नहीं पाती नहीं गुरु का विरोध नहीं करेंगे अगर गुरु गलत है अरे गुरु गलत कैसे है गुरु का देखिए भाई वंदे पुत्र वाली बात हो गई देखिए वंदे पुत्र वाली बात हो गई जैसे अगर वो गलत है तो वो गुरु नहीं है आज जैसे है आज जैसे बहुत सारे गुरु माने जा रहे हैं गुरु को भगवान ल भगवान मानने बिल्कुल मिथ्या चार प्रचार कर रहे उपदेश कर रहे लोग उसको स्वीकार करें भगवान मान गुरु नहीं भगवान मान रहे हैं उनको नहीं नहीं वो उनकी बात नहीं करता जब हमने कह दिया यह हमारा गुरु है गुरु है यानी कि वो कौन है हमारे जीवन से अंधकार रूपी अज्ञानता को दूर करने वाला है ना गु का मतलब अंधकार रू का मतलब जी निकालने वाला अंधकार से निकालने वाला और श्वेता शत्र उपनिषद में लिखा है जिसकी भगवान में जितनी भक्ति है उतनी ही भक्ति यदि गुरु में है मतलब महत्व उतना ही होना चाहिए उसकी ईश्वर को ईश्वर के रूप में पूजा मत करो महत्व दोनों का है गुरु गोविंद दो खड़े काके ला

01:55:01:01 उपाय है ना तो जितनी भक्ति हमारी तो गुरु का विरोध नहीं कर सकते एक्सप्लोर कर सकते हैं और अच्छे से व्याख्या कर दी लोग गुरु की बात नहीं समझ पाए मगर इनकी बात समझ ली यह कर सकते हैं मगर गुरु का विरोध कर देंगे और यह कहेंगे हमारा गुरु अज्ञानी था तो वह तो गुरु रहा ही नहीं फिर वो गुरु था ही नहीं भाई जैसे कक्षा पांच में पढ़ने जाता है कक्षा एक से लेकर पांच में जाता है पढ़ना ठीक उसको घर वाले सौंप के आते हैं उसका चयन नहीं गुरु का था उसने चयन नहीं किया था जब हम चयन करते हैं स्वयं जब बोध वान हो जाते हैं ठीक अगर बोध हमें हो जाए फिर हम चयन करें फिर अगर गुरु परंपरा को हम ना माने बोध वाले गुरु की बात कर रहा उस गुरु से सीख कर के उस गुरु से विद्या लेकर के और उस विद्याओं प चले गुरु को ना माने तो हम नास्तिक हुए उस गुरु के लिए ठीक है यदि हमें किसी हमारा चयन नहीं किसी हमारे परिवार वालों ने हमें किसी गुरु को चयन करा दिया कोई बोध नहीं है आगे जब हमारा बोध जगेगा यदि हमारे बोध के अनुल गुरु नहीं रहा हम उसको त्याग गुरु वो हमारा गुरु है नहीं तो मैं वही क रहा ऐसे ही रामानंद के साथ एक मिनट रामानंद कबीर के साथ यही घटना घटी थी वो अचानक उनको उन्होंने एक व्रत लिया था पौराणिक विधि हालाकि मुझे सत्य उसम क्या मुझे नहीं जानकारी विशेष है लेकिन जो जैसा लिखा है पढ़ाया गया वैसा

01:56:16:04 जानता हूं उन्होंने विचार किया कि मैं गुरु बनाऊंगा ठीक है वो सीढ़ियों में लेट गए और उनका स्पर्श हो गया उने बस तुम हमें पहले व्यक्ति मिले तुम हमारे गुरु हो जबकि गुरु चयन करने की क्रिया है नहीं गुरु चयन करने की क्रिया क्या है गुरु लोग कर लेते हैं गुरु की जो क्रिया मुझे पता है मैं आपको शायद जल्दी हो जाए चलो आप र्वेद 11 16 ब्रह्मचारी ही सन्यासी ब्रह्मचारी ही आचार्य बनता है मनुस्मृति 12 अध्याय 112 से 114 जी धर्म में संशय होने पर अधिष्ठाता ब्रह्मचारी को बना पहला लक्षण प्राप्त हो गया कि वो ब्रह्मचर्य सन्यास युक्त होना चाहिए जी वैराग्य होना चाहिए उसके जीवन में बिल्कुल तो पहला लक्षण हो गया अंतिम निर्णायक आपके धर्म और अधर्म का होगा वैराग्य वैराग्य होना चाहिए दूसरा हो गया कि वो जो आपको बात बता रहा है कि मैं तुझे वेदों का अर्थ बता रहा हूं तो वो परंपरा से ही बता रहा हू निरुक्त में जो आचार्य यासक है वो बोल रहे हैं यह मैंने परंपरा प्राप्त अर्थ बताया जी निरुक्त में बोल र हां मैंने गुरु सुना है वो मैंने बताया हां मुंडकोपनिषद में तो ये विद्या इस ऋषि से इस ऋषि के पास आई इस ऋषि से इस ऋषि के पास आई इस ऋषि से इस ऋषि के पास आई जी तो जितने भी मतलब जो ये वाले जो ऋषि जो

01:57:31:06 आचार्य गण है ये परंपरा अपनी पूरी बताते हैं तो इसमें क्या है दूसरा आ गया कि वो परंपरा से होना चाहिए हो सकता है कि आपके द्वारा दिया जाने वाला जो अच्छाई और बुराई की नियमावली है वो ज्यादा सही हो उस नियमावली से जो कि ये जो वेदों वेद वैदिक जो मंत्र आपके पास तक लेकर आने वाली परंपराएं हैं वो नहीं दे रही है मगर जब हम ये कहते कि हम उनके अर्थ को नहीं मानते जहां से मंत्र आ रहे हैं तो हम यह नहीं कह सकते कि हमारा ये जो धर्म है जो जो हो सकता है सही है मगर हम यह नहीं कह सकते कि उसी वेद मंत्र का अर्थ है जो हमें परंपरा से प्राप्त हुआ जी वो क्योंकि अविश्वास हो गया ना वहां पर जब अविश्वास हो गया तो कुछ भी बदल सकता है हो सकता है भगवान ने कोई और मंत्र प्रकट किया हो द्वेष वश लालच वच अज्ञानता वश उसने मंत्र ही बदल दिया हो तो जब क्रेडिबल जब विश्वास प उंगली उठ गई तो उठ गई मैं पूरा कर मैं पूरा कर लू तो पहला तो तो हो गया कि वैराग्य होना चाहिए दूसरा हो गया कि परंपरा से होना चाहिए तीसरा हो गया कि वह हमारा सामंजस अर्ध कुकुट न्याय ना करता हो अर्ध कुकुट न्याय यह वाली बात मान ली यह वाली नहीं मानी और अंत तोक अथवा गुरु की जो परिभाषा है वह सार्थक हो उसपे कि वो अपने शिष्य का अंधेरा दूर कर दे वो पूछ रहा है कि अगर ईश्वर अनंत सामर्थ्य वान है तो वो एक

01:58:46:06 कार्य क्यों नहीं कर पा रहा है जी और भी ऐसी कई संशय होते हैं हम तो ये मतलब गुरु के जो पैरामीटर शास्त्रों से प्राप्त है जो मुझे मालूम है तो वही कुल मिलाकर बात है कि जो परंपरा है इसके वेदों जो जिसकी परंपरा हमें मालूम है तो हमको यही मानना पड़ेगा कि वेद के मंत्र हमारे पास इनसे ही आए क्योंकि हमें हमारी परंपरा नहीं मालूम तो हमें मानना पड़ेगा अगर हम अपने आप को वैदिक कहना चाहते हैं कि इनसे आए जब हम ये मान लेंगे तो हम उसका फिर विरोध नहीं कर सकते अगर विरोध करेंगे तो फिर उन वेद मंत्रों पर विश्वास होना सिद्ध नहीं रहेगा तो ठीक है आप अब कभी भी भविष्य में निकट भविष्य में जब आपको संपूर्णानंद जी से पहले के जो गुरुओं के नाम हो कुछ 1015 हम तो अपने मध्यकालीन इतना इतिहास पता है मगर हमें यह कई दिनों से मैं पूछ रहा हूं कि ऋषि दयानंद जी जो हैं दयानंद स्वामी जी उनके पास ये वेद मंत्र आए कैसे कोई ये कह देता है कि उ उनको तो वो समाधि हुए खुद उनके अद पढ़े वेद उन्होंने पढ़ाई बजान के माध्यम से कोई ये कह देता है कि खुद जो है ईश्वर ने डायरेक्ट जो है उनको वेदार्थ दिया तो बजान संपूर्णानंद के शिष्य थे बजान संपूर्णानंद शिष्य थे और संपूर्णानंद भी किसी के शिष्य रहे होंगे परंपरा है जरूर रही होगी क्योंकि भले ही

02:00:01:10 हमें नहीं मालूम वो अलग बात है लेकिन ऐसा नहीं कि परंपरा नहीं रही हो परंपरा तो हमारी प्राचीन ऋषियों की परंपरा चली चलती रही तो आप निकट भविष्य में हमें जरूर बताए और बहुत अच्छा लगा आपसे इतनी देर तक चर्चाएं हुई और हमारी आपकी बिटियां है उन्होंने बहुत धैर्य पूर्वक अच्छे से सुना पूरी चर्चा को मुझे लगता है कि आप लोगों को आनंद भी आया होगा और और काफी कुछ चीजें समझने में भी आई होंगी और यही मैं अपने दर्शकों से भी कहना चाहूंगा इन्होंने आपने हमें इतना समय दिया उसके लिए आपको बहुत-बहुत साधुवाद आपको भी बहुत-बहुत धन्यवाद है आपने इस तरीके से जो छिपे हुए रहस्यों पर चर्चा की जी जी जी हम लोग जरूर कहीं कहीं एक सिद्धांत पर पहुंचे एक निर्णय पहुंचे जिसको हमारे दर्शक भी सुनेंगे और चिंतन करेंगे मनन करेंगे तो वो भी किसी एक निर्णय पर पहुंचेंगे और सत्य का त्याग करेंगे स जी जी आचार्य जी का चैनल भी है आप लोग उसको जाकर के देख सकते हैं आचार्य जी का अपना चैनल है हा हमारा चैनल है सत्य की आवाज सत्य की आवाज आचार्य जी का सुनेंगे और अभी मैंने जल्दी से शुरू किया है और आगे इसमें और व्यवस्थित रूप से कार्य करने की तैयारियां है मेरी तो सभी को समय देने के लिए आभार और हमें लगता है संतुष्टि जनक आप लोगों ने देखा चर्चा काफी अच्छी रही सभी को

02:01:16:12 जय श्री राम नमस्ते जी नमस्ते [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 2:01:25 · 10 Dec 2024

Discussion With Acharya Of #aryasamaj Gurukul #vedpuran #hindu

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A · Video Conversation with an International Arya Samaj Scholar | आर्य समाज वैदि...
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