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00:00:02:09 तो सभी को जय श्री राम एक व्यक्ति जिसको पिछले कई दिनों पहले हमने एक लाइव चर्चा में देखा था जो कि जो चर्चा इस बात के निमित्त रखी गई थी कि किस प्रकार से किस तरीके से शिवांश नारायण द्विवेदी जो अलंकार समाज का जो निराधार एक तानाबाना है सिद्धांतों का उसके सिद्धांतों पर जाकर के जो प्रश्न रहा है उसके ऊपर व्यक्तिगत आक्षेप व्यक्तिगत प्रहार करके किस तरीके से उसका मुंह बंद कराया जा सके और भले ही उस व्यक्तिगत प्रहार में उसके घर की मातृ शक्तियों तक को क्यों ना घसीटना पड़े तो ऐसी एक चर्चा से जुड़ा हुआ एक व्यक्ति कलयुग का एक जो अपने आप को योगी कहता है इस व्यक्ति को पिछले कुछ दिनों में आपने जो अलंकार समाज का अनऑफिशियल गुंडा है ऋषि उवाच उसके साथ भी आपने कोलबेट करते हुए देखा ही होगा जिससे कि पता लगता है कि यह अभी तक इस चर्चा से पहले तक किस मान्यता से ग्रसित था और जिस चर्चा में यह हमसे चर्चा करने आया था उस चर्चा में भी हमने इसके बारे में लोगों को बताया था कि एक होंडा हिंदू है जो समय आने पर यह भी कह देगा कि मैं आर समाज का नहीं हूं और

00:01:17:12 इस चर्चा के दौरान जब इसका पक्ष कमजोर पड़ने लगा तो इसने आर समाज के सिद्धांतों को किस प्रकार से छोड़ा भी है इसको शायद पता नहीं है यह देखने वाली बात है तो इस चर्चा में आपको देखने को मिलेगा आर्य समाज के सिद्धांतों को छोड़कर किस तरीके से व्यक्ति को नितर होते हुए सनातन परंपरा का पक्षधर होना पड़ता है सर्वशक्तिमान ईश्वर का पक्षधर होना पड़ता है ईश्वर सर्वशक्तिमान है इसलिए वह अवतार नहीं ले सकता क्यों कैसे नहीं समझा थोड़ अवतार मतलब अवतार मतलब होता अवत होना तो प्रश्न उठता है कि अगर ईश्वर ने अवतार लिया है तो पहले वहां पर क्या था अगर सब जगह ईश्व ही है वो सर्वव्यापी है तो फिर अवतार ले कैसे रहा है आपके अनुसार जो ईश्वर सृष्टि की रचना करता है वह केवल मन में सोच लेता है कि बाकायदा फिजिकली फोर्स फुली वो रचना करता है संकल्प मात्र से संकल्प मात्र से कोई फोर्स काम नहीं करती है फोर्स भी काम करती है कि नहीं फोर्स काम करती है उसी फोर्स है ईश्वर ही कार्य कर रहा है

00:02:32:12 ना शक्ति के रूप में बिल्कुल बिल्कुल ईश्वर स्वयं को रेगुलेट करेगा ना कि भाई कहां पर पृथ्वी बनने लायक एनर्जी का यूज होना है और कहां पर सूर्य बनने लायक एनर्जी का यूज हो रहा है हां तो बिल्कुल सही बोला लेकिन ये नहीं कह सकते कि एक जगह तो कार्य कर रहा है लेकिन दूसरी जगह कार्य नहीं कर रहा मैं ये नहीं कह रहा हूं कि एक जगह कार्य कर रहा है मैं य नहीं मेरा कहना ही नहीं वो अपने आप को कम ज्यादा कर रहा है जबकि वो समग्र रूप से एक हो कर के सर्वत्र व्याप्त है पहली बात अगर वह सूर्य में कोई कार्य कर रहा है पृथ्वी में कोई कार्य कर रहा है मैंने फिर बोला उसका परिणाम अलग अलग है लेकिन आप ये कह दो कि यहां पर ज्यादा कार्य कर रहा है यहां पर कम कार्य कर रहा है यह कोई तर्क संगत नहीं रहता कि आप देख लो नहीं र् संगत है मान लीजिए मान लीजिए कि एक जगह मुझे 100 किलो की बोरी उठानी है और एक जगह मुझे जो है 5 किलो की बोरी उठानी है तो जहां पर मैं 100 किलो की बोरी उठाऊंगा वहां पर फोर्स ज्यादा लगाऊंगा ना फ ज्यादा लगे ना कंपेरटिवली टू जहां पर मुझे पा किलो की बोरी उठानी है बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल सही तो यहां पर मैंने अपने आपको को रेगुलेट किया ना कम ज्यादा कर लिया ना जबक मैं समान रूप से सब जगह व्याप्त था बिल्कुल तो रेगुलेट हो गया ना इससे य

00:03:47:22 पहली बात चलो ठीक है आपने इससे यह साबित कैसे होता है कि अवतार ले रहे है इससे इससे अवतरित होना अवतरित अवतरित होना सिद्ध हुआ ना कि जो ईश्वर स सर्वव्यापक था एक रस था उस कहीं पर भी कम ज्यादा नहीं था अब वो कम ज्यादा के रूप में काम कर रहा है ये वो वाला अकार नहीं है ये वो वाला अवतार नहीं है अभी भी मैं बताऊंगा यह वो वाला अवतार नहीं है अभी भी जो आंखों से दिखाई दे मगर अवतरित हुआ ना हुआ ना किसी देश काल परिस्थिति में उसने जब सृष्टि की रचना की तो वह अपने आप से अवतरित हुआ भगवान एक रस है तो एक रस से जब वो सृष्टि का निर्माण करेगा तो उसे अवतरित होना उतरना पड़ेगा अवतरित होना पड़ेगा तो जो निर्गुण निराकार ईश्वर है वो सगुण निराकार बना तो जिस प्रकार ईश्वर समान रूप से सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी स्वयं को रेगुलेट करते हुए किसी एक देश काल परिस्थिति में सृष्टि का निर्माण करता है उसी प्रकार किसी एक देश काल परिस्थिति में ईश्वर स्वयं को रेगुलेट करते हुए आंखों का विषय बना देता है तो ये इस बात पर हम अपनी एक सीरीज बना चुके हैं जिसके खंडत इस व्यक्ति ने वीडियो भी बनाया था मगर आज यहां

00:05:02:26 आकर के इसके पास इसके प्रति उत्तर में कोई उत्तर नहीं था तो इसने फिर आगे बात बढ़ाई दूसरा विषय उठाया किसी देश काल परिस्थिति में जो इनका जो यह है ऋषियों का मस्तिष्क उसमें जो वेद मंत्र है वो कैसे प्रकट हो रहे हैं ईश्वर तो पहले से ही था कैसे प्रकट हो रहे ठीक है कैसे कैसे प्रकट हो रहे हैं ठीक है सिंपल प्रश्न है कैसे प्रकट हो रहे हैं पहली बात वह पुरुष है या पुरुष के द्वारा लिखे गए है या ईश्वर के द्वारा आए है इसमें क्या है कि वह अभ्यास के द्वारा हो रहे हैं ऐसे नहीं कि एकदम से उतर गया पह अरे भाई वही तो हम भी कहते हैं कि भगवान अभ्यास के द्वारा अपना दर्शन दे देते हैं इसी देश काल परिस्थिति में बिल्कुल तो इस को काट रहा हूं मैं इस तर्क को काट रहा हूं जो पहले से ही है अगर ईश्वर सबके पास है तो ईश्वर के रूप में उसका ज्ञान भी है वेद मंत्र भी है फिर किसी देश काल परिस्थिति में कोई उनका दृष्टा क्यों बन रहा है इसका मतलब ईश्वर होते हुए भी पार मर्थक रूप से ईश्वर होते हुए भी व्यवहारिक रूप से उसका आना जाना सिद्ध होता

00:06:17:28 है यही बात एक अजीब सी लग रही है मुझे एक बात बहुत नता समझाना कि वह सर्वव्यापी है अब वो सर्वव्यापी है वो यहां भी है यहां भी है अब उसने यहां अवतार लिया अरे जब वो यहां पर है ही तो अवतरित क्यों हो रहा है मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं वो जहां हर जगह है वो पार मार्थिया यहां से तो क्या आकाश का कोई गेट खुलता है नहीं खुलता ना नहीं तो यानी कि उसका केवल एक डायमेंशन चेंज होता है गेट नहीं खुलता है कोई कि आकाश में कोई गेट खुला और थोर की तरह इस दुनिया से उस दुनिया में चले गए सब नहीं होता है डायमेंशन चेंज होता है हा तो इसी तरीके से यह जो भगवान हर जगह है ये आध्यात्मिक उससे फिर वह व्यवहारिक रूप में प्रकट हो जाता है मतलब कि बिल्कुल ऐसे जैसे कि मक्खन दूध में है मगर अभ्यास करने पर मक्खन प्रकट हो जाता है काट की लकड़ी में तो यह अभ्यास करने से प्रकट हो जाता है यूं ही प्रकट नहीं होता कि विष्णु का ये अरभी अभी आपने बोला अभ्यास करने ठीक है तो अभी हम तर्क यह वाला काट रहे हैं कि जो

00:07:33:01 पहले से ही व्याप्त है वो उसका आना जाना सिद्ध नहीं होता है होता है अभ्यास करने से होता है पर होता है आना जाना सिद्ध नहीं होता अब वो जान गया कि वो ईश्वर ही है पहले वो जानता नहीं था अरे आप रहे नहीं नहीं अगर जीव आत्मा है हो जाए तो क्या वो भगवान नहीं है आप जो है अध्यात्म को और इसको आध्यात्मिक दुनिया को भौतिक जगत को एक करके चल रहे हैं दिक्कत ये है मैंने अभी आपको बताया कि ईश्वर जब सब जगह व्याप्त है तो किसी देश काल परिस्थिति में जो ऋषि है वह मंत्रों के दृष्टा कैसे बन रहे हैं बताइए इसको ठीक से बताइए मैंने कहा अभ्यास करके ध्यान करके अभ्यास करके जो चीज उनके पास पहले से थी उसी का दर्शन कर रहे हैं उनके पास तो पहले से थी ना वो चीज वो चीज है ही वो चीज है ही कोई नई चीज आई नहीं ना मैं ये कह नहीं सकता कि परमात्मा परमात्मा है ही अब देखिए अगर मैं मैं हूं मैं जीव आत्मा जानता नहीं हूं मानता हूं अभ्यास करके मुझे अनुभव हुआ कि मैं जीव आत्मा हूं और जीवात्मा मुक्त हो गई आपकी बात समझ गया मैं आपकी बात समझ गया इसको ऐसे समझ लीजिए कि हमारे दो तरीके के ट्रुथ होते हैं एक

00:08:48:03 होता है बहेल ट्रुथ एक होता है स्पिरिचुअल ट्रुथ जो इटरनल होता है जैसे की पृथ्वी गोल है यह हमको किस दृष्टि से पता है सेटेलाइट इत्यादि की दृष्टि से हम देख रहे तो पृथ्वी गोल है मगर पृथ्वी हमें दिख कैसी रही है ट चप फ्लैट अब हम व्यवहार कैसा करेंगे फट के अनुसार जब हम फ्लैट के अनुसार व्यवहार करेंगे सैटेलाइट बनाएंगे एरोप्लेन बनाएंगे तब हम पृथ्वी की पर्दी से बाहर निकलेंगे फिर कहेंगे हां यह पृथ्वी जो है गोल है इसी तरीके से अभ्यास के माध्यम से अरे मेरी बात सुन लो सुन लो ईश्वर का अव का होना सिद्ध होता है व्यवहारिक रूप से आना जाना जब हम यह कहते हैं कि ईश्वर आता है जाता है तो य व्यवहारिक रूप से है और पार मार्तिक रूप से तो ईश्वर सब जगह है ही वो तो है ही मगर मगर मगर उसके अ मैं अपनी बात पूरी कर लू मगर उसके अनुसार हम लोग बिहेव नहीं कर सकते क्यों नहीं कर सकते जैसे की ईश्वर हर जगह है तो ईश्वर तो माता भी और पत्नी भी है क्या करोगे एक जैसा बिहेव करोगे क्या देखिए बिल्कुल सही बोला एक जैसा हां

00:10:03:08 अलग-अलग बिहेव करेंगे क्योंकि अभी हम भौतिक उसम है देखिए बिल्कुल सही बोला एक जैसा हां अलग-अलग बिहेव करेंगे क्योंकि अभी हम भौतिक उसम है देखिए बिल्कुल सही बोला एक जैसा भा अलग-अलग बिहेव करेंगे क्योंकि अभी हम भौतिक उसम है देखिए बिल्कुल सही बोला एक जैसा भा अलग-अलग बिहेव करेगे क्योंकि अभी हम भौतिक उसम है ठीक है बात कर लेकिन सूक्ष्म दृष्टिकोण से देखा जाएगा तो यह कह देना कि व अवतरित हुआ यह एक देखो ऊपरी रूप से तो मैं मानता हूं कि सी रूप मान तो ये बात हम भी कह रहे हैं ये बात हम भी कह रहे हैं सूक्ष्म दृष्टिकोण से तो भगवान जो है सब जगह पहले से ही सर्वत्र व्याप्त है मगर जो व्यवहारिक दृष्टिकोण है उसमें भगवान का आना जाना सिद्ध होता है तो यह सूक्ष्म दृष्टि की बात है कि ईश्वर सब जगह है मगर व्यवहार में ईश्वर का आना जाना सिद्ध होता है जैसे सूक्ष्म दृष्टि की बात है कि ईश्वर का ज्ञान सब जगह है मगर व्यवहार में ऋषियों द्वारा उसके वेद मंत्रों का दृष्ट होना सिद्ध होता है किसी देशकाल परिस्थिति में तो जिस प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से पहले से ही व्याप्त ईश्वरीय ज्ञान का किसी एक देश काल परिस्थिति में प्रकट होना सिद्ध होता है उसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से पहले

00:11:18:12 से ही व्याप्त ईश्वर का किसी एक देश काल परिस्थिति में प्रकट हो जाना व्यावहारिक हो जाना आंखों का विषय बन जाना सिद्ध होता है अभ्यास के माध्यम से जब जीव आत्मा जान जाती है कि वो परमात्मा है तो जीव आत्मा और परमात्मा में भेद नहीं रहता तो उसी जीवात्मा को अगर भगवान कह दिया जाए तो इसमें क्या गलती है पहली बात जब वो जान गई जब अभ्यास से जान गई ठीक है अब वैसे मैं यह कहूंगा कि भाई यह व्यक्ति खुद कह रहा है कि माया के कांसेप्ट को मानता नहीं है क्योंकि यह आर्य समाजी है और फिर यहां पर जागने की बातें भी कर रहा है और सोने वाले की बात भी कर रहा है यह सारा कांसेप्ट तो है नहीं अब इसीलिए यह जो व्यक्ति है वह होंडा हिंदुओं की श्रेणी में आता है क्योंकि यह है तो पक्षधर आर्य समाज यों का जिनका ईश्वर अवतरित नहीं होता है जिनके अनुसार ईश्वर जगत बनता नहीं है केवल बनाता है केवल निमित्त कारण है अभिन्न निमित्त उपादान कारण नहीं है मगर यहां पर यह क्या कर रहा है कि अब जो है क्योंकि इसके पास उत्तर नहीं बचे आर्य समाधि हों के पक्ष से तो अब ये अद्वैत होते हुए प्रश्न कर रहा है कि हर जागने वाला जो है ईश्वर क्यों नहीं है इसीलिए इसको

00:12:33:14 होंडा हिंदू कहते क्योंकि होंडा हिंदू वो है जो कहेगा कि मैं आर्य समाजी अलंकार समाजी हूं मगर जैसे ही वो निरुत्तर होने लगेगा तो तुरंत कह देगा मैं आर समाजी नहीं हूं अब यह व्यक्ति खुद ही कह रहा है कि मैं माया को नहीं मानता मगर यहां पर जागने की बात भी कर रहा है यह व्यक्ति जो है अद्वैतवाद को नहीं मानता है व्यवहार और परमार्थ में अंतर नहीं मानता है मगर तार्किक दृष्टिकोण से मैं ये कह रहा हूं कि जब मैं कहूंगा कि वह अवतरित हुआ तो फिर अगर मैं कहूंगा अवतरित हुआ मतलब उतरा पर वो पहले भी वही था लेकिन हम मैं ये कह सकता हूं कि वो जागा जान गया कि व परमात्मा बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल वो देखिए मुक्त की दृष्टि ब्रह्म की दृष्टि जो है ब्रह्म कौन है मुक्त जो ब्रह्म की दृष्टि है उसके अनुसार वो जागा ही है केवल वो ब्रह्म स्वरूप हो गया वो जागा भी नहीं कुछ नहीं हुआ उसके उसको अपने स्वरूप का बोध हो गया मगर यहां जो खड़ा है ये दो पर्सपेक्टिव है मान लीजिए बीच का हिस्सा है इसके इधर है और इधर जो है हम तो ब्रह्म देख रहा है कि एक व्यक्ति जो है मुक्त हो गया ब्रह्म स्वरूप हो गया हम देख रहे हैं व्यक्ति जो है उसके रूप में ईश्वर जो है अवतरित हो गया इसको मैं एक बात ऐसे कहूंगा कि जैसे जो सुखदेव जी का प्रकरण आता है महाभारत में महाभारत में सुखदेव जी का प्रकरण आता है सुखदेव जी मुक्त

00:13:48:25 मुक्त हो गए थे ठीक है अब जब वो मुक्त हो गए तो उसके बाद उन्होंने ये जो हमारी जो गुरु परंपरा है शंकराचार्य की इसमें उनको दर्शन कैसे दे दि जब वो मुक्त हो गए महाभारत में तो व्यवहारिक दृष्टि से हमने क्या देखा कि हमारे पास सुखदेव जी आए मगर वास्तव में कौन आया था ब्रह्म में लीन क्योंकि सुखदेव जी तो ब्रह्म स्वरूप हो गए थे मोक्ष तो ब्रह्म ही आए थे तो ब्रह्म ही तो है जो आपके हमारे सबके रूप में है मगर यह ब्रह्म दृष्टि की सच्चाई है व्यवहारिक सच्चाई क्या है कि आप जो है जो आपका नाम होगा वो है मैं जो हूं मैं वो हूं जो मेरा नाम है ये हमारी व्यवहारिक सच्चाई है तो व्यवहारिक दृष्टि से माता बहन पत्नी ये सब अलग अलग है सूक्ष्म दृष्टि से माता और बहन और पत्नी में कोई अंतर नहीं मगर वो मुक्त की दृष्टि से वो ब्रह्म की दृष्टि से मनुष्य की दृष्टि से माता अलग है बहन अलग है बेटी अलग है पत्नी अलग है अब इसका व्यवहार का आलंबन लेकर के हम लोग वो जो परमार्थ है उसको सिद्ध करते हैं व्यवहार अब ये धर्म की उपयोगिता क्या है अगर अगर हम लोग सब कुछ सूक्ष्म दृष्टि से ही देखने लगे तो धर्म की कोई उपयोगिता ही नहीं है तो यहां पर स्पष्ट हुआ कि व्यावहारिक रूप से ईश्वर का आना जाना सिद्ध हुआ और ब्रह्म

00:15:04:04 दृष्टि से मुक्त की दृष्टि से कुछ भी नहीं हुआ धर्म का उपयोग ही नहीं है मुक्त की दृष्टि से तो कि क्या करना है और क्या नहीं करना है क्रिया की आवश्यकता तो वहां है ना जहां पर भेद हो जहां भेद ही नहीं है वहां पर क्रिया की आवश्यकता ही क्या है तो अगर आप कह रहे हैं कि हम धर्म का अनुकरण कर रहे हैं धर्म का अनुसरण कर रहे हैं तो यानी कि आप भेद बुद्धि को अभी प्राप्त है तभी धर्म की उपयोगिता है इस व्यक्ति को यहां पर भी निरुत्तर होते हुए हामी भरनी पड़ी कि हां भाई हम भौतिक संसार में है और जब तक हम भौतिक दुनिया से जुड़े हुए हैं तब तक हमें ये भेद मानना ही पड़ेगा और व्यावहारिक रूप से हमें ये मानना पड़ेगा कि जिस प्रकार माता बहन और पत्नी में अंतर है उसी प्रकार जो सिर्फ जागा है जिसको सिर्फ बोध हुआ है कि वो ईश्वर स्वरूप ही है बद्ध की दृष्टि से जो मुक्त नहीं है उसकी दृष्टि से मनुष्य की दृष्टि से उसका भी ईश्वर के रूप में आना जाना सिद्ध होता है बात हमारी अवतारवाद की ऊपर थ और हमारी मुझे लगता है बहुत अच्छी बात वहां पर हो चुकी

00:16:14:00 है लेकिन यह कह देना कि ए तो ईश्वर है बी ईश्वर नहीं है य ईश्वर को संकुचित करने वाली बात है देख रहे हैं आप जो व्यक्ति ईश्वर का अवतार नहीं हो सकता इस बात का पक्ष लेने के लिए आया था कि ईश्वर जगत बनाता तो है मगर जगत बनता तो नहीं है इस बात का पक्ष लेने आया था उसे भी धीमी आवाज में अद्वैत दर्शन को स्वीकारते हुए अब अद्वैत दर्शन की जिज्ञासा संबंधी प्रश्न पूछने पड़ रहे हैं कि जब ईश्वर सब कुछ है तो फिर वह ए ईश्वर क्यों है और बी ईश्वर क्यों नहीं है वैसे इसका जवाब इसके पास स्वयं भी है इसने उसको जागा हुआ कहा है और शास्त्रोक्त भाषा में उसे कहते हैं कि जो अविद्या से ग्रसित है वो ईश्वर नहीं है उसे ईश्वर के रूप में व्यवहारिक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता और जो अविद्या से मुक्त है उसे ही हम ईश्वर के रूप में व्यवहारिक रूप से स्वीकार करते हैं यहां जो हमारा भेद था वो यह था कि यह बात कह नहीं जा रही कि जो जागा हुआ व्यक्ति है वही भगवान है क्योंकि अगर जैसे कि आप बाल्मीकि रामायण में पढ़ते हो तो वहां पर विश्वामित्र को भी राम भगवान के से संबोधित कर रहे हैं वहां वशिष्ठ जी को भी भगवान के संबोधित करें लेकिन राम जी को वहां पर भगवान ही बोला था रामचरित मानस में जाकर उनको भगवान

00:17:29:24 दया जाता है तो इसमें मैं ये कहूंगा जागा हुआ व्यक्ति भी भगवान आप वो चीज सही कह रहे परमार्थिक दृष्टि से मगर इसमें बात आ जाएगी कि जो हमारे परंपरा प्राप्त वेदा आदि शास्त्र हैं उसने किस किस कौन-कौन किस किस व्यक्ति को स्वीकार किया है उसको ही हम मानेंगे कि हां यह जागा हुआ है अब मैं कह दू मैं जागा हूं तो मुझे थोड़ी ना भगवान माना जाएगा क्यों क्योंकि शास्त्र नहीं बोल रहे तेरे लिए कर्तव्य और कर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण है ये कोई नई बात तो है नहीं साईं बाबा वाले कहते हैं आर्य समाजी कहते देखो देखो साईं बाबा को भी भगवान मान लिया हा इकन वाले मजाक उड़ाते हैं अहम ब्रह्मास्मि अहम ब्रह्मास्मि ये तो सबको भगवान मानते हैं तो ईश्वर जगत बनता भी है बनाता भी है वो ठीक है तो जब ईश्वर जगत बन रहा है तो सब कुछ ईश्वर ही है परंतु उपास्य के रूप में अथवा अविद्या से मुक्त जो ईश्वर है उसके रूप में उन्हीं व्यक्तित्व को उन्हीं तत्वों को स्वीकार किया जाएगा जिनके लिए शास्त्र सूचना देगा जिनकी जानकारी शास्त्र देंगे तो जितने भी शास्त्र हैं उसमें जो नाम लिए गए हैं वाल्मीकि जी वशिष्ठ जी इत्यादि या अन्य भी कई महापुरुष जिनके लिए भगवान अथवा ईश्वर शब्द का उपयोग हुआ है

00:18:45:13 परंतु कहीं भी उन्हें परम ब्रह्म नहीं कहा गया परम ब्रह्म स्वयं अवतरित हुआ प्रकट हुआ यह नहीं कहा गया अविद्या से मुक्त नहीं अविद्या से मुक्त कैसे हुआ जाता है या अविद्या से मुक्त हो में सहायक के रूप में कहा गया है और इस व्यक्ति के अनुसार बात करें तो इन महापुरुषों को जागा हुआ नहीं जागा कैसे जाता है या जागने में सहायता करने वाला कहा गया है जबकि श्री राम कृष्ण इत्यादि को कहा गया है जैसे कृष्णस्वामी

00:19:29:07 श्री राम स्वयं परम ब्रह्म विष्णु है विष्णु कौन जिसकी वेदों में बात हुई है तो जिनका जो स्वयं भगवान नहीं है परंतु उनका महत्व भगवान के ही तुल्य है क्योंकि वह विद्या और अविद्या को तत्व से जान गए हैं क्योंकि वह उस परमात्मा को प्राप्त कराने वाली विद्या को जानते हैं इसलिए उनका महत्व भी उतना ही है जितना कि परमात्मा का है इसीलिए श्वेता सत्र उपनिषद में भी लिखा हुआ है कि जिसकी भगवान में जितनी भक्ति होती है उतनी ही गुरु में भी होती है वही इस भवसागर को तार पार कर पाते हैं तो इसी दृष्टि से पूज्य पदार्थों को सूचित करने के लिए भगवान शब्द का उपयोग प्रयोग परमात्मा के लिए मुख्य रूप से है और यह जो बाकी के जो महापुरुष होते हैं जो तत्व वेता हो जाते हैं तत्वदर्शी हो जाते हैं विद्या और अविद्या के अंतर को जान जाते हैं उनके लिए भी भगवान शब्द का उपयोग किया जाता है परंतु उन्हें भगवान के रूप में पूजा नहीं जाता है हमारे भी गुरु हैं हम भी उन्हें गुरुदेव भगवान कहते हैं परंतु उन्होंने हमें कभी यह नहीं सिखाया कि भगवान की जगह हमारी पूजा करने लगो उनके लिए भगवान शब्द का उपयोग गौण रूप से इसलिए किया जा रहा है क्योंकि वह

00:20:44:07 भी हमारे लिए उतना ही महत्व रखते हैं जितना कि भगवान रखते हैं क्योंकि भगवान प्राप्त है और गुरु उस प्राप्त को प्राप्त कराने वाला इसीलिए कहा जाता है कि गुरु गोविंद दो खड़े काके लागू पाए बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए और यह जो भगवान शब्द का प्रयोग किसके लिए गौण रूप से है और किसके लिए मुख्य रूप से है यह बात भी लिखी हुई है विष्णु पुराण में हमारे यहां तो यह था बुद्ध के रूप में अगर आकर के उन्होंने यह कहा कि वेदों का मत मानो यज्ञों की रक्षा के लिए तो हमने बुद्ध को ईश्वर का रूप तो माना मगर हमने उनकी शिक्षाओं का अनुगमन नहीं किया क्योंकि हम सनातनी वो है जो अपौरुषेय

00:21:32:02 जिनका जिनकी रचना ईश्वर ने भी नहीं की हम उन शास्त्रों को मानते हैं मैंने य प्रश्न किया था मुसलमानों से मैंने प्रश्न किया था ये सब कटिंग नहीं निकालते फस गए थे मैंने कहा कि अगर तुम्हारे अल्लाह ने बुराई को भी बनाया है शैतान को भी बनाया है तो यह कैसे कहा जाए कि कुरान में बुराई नहीं है जब तक आप अपरस ग्रंथ की बात य यह तर्क की है सनातन में तर्क की पराकाष्ठा क्यों पराकाष्ठा है कि भाई क्योंकि ईश्वर नहीं सब कुछ बनाया है तो अगर ईश्वर से प्रकट होने वाले ईश्वर के दिए हुए ग्रंथों को मान लेंगे ना तो उसकी क्रेडिबिलिटी पर भी प्रश्न हो जाएगा तो हम उन ग्रंथों को मानते हैं जिन्ह ईश्वर ने भी नहीं रचा वो तो सदैव विद्यमान थे किस रूप में ईश्वर की सांस के रूप में तोय ब उपनिषद दो चर 10 में दिया हुआ है ईश्वर की सांस के रूप में जो हमारे वेदा दि शास्त्र है वो सदैव विद्यमान थे तो ये इतने घटको के द्वारा जो हमें यह होगा कि हा भाई यह ईश्वर का रूप है तो हम उसको मानेंगे क्योंकि हम सना अब कोई स्वयं को घोषित कर दे व बात अलग मगर समष्टि के रूप से उसी को धर्म माना जाएगा जो हमारे वेद शास्त्रों से उत्पन्न हो रहा होगा उसी को ब्रह्म माना जाए जैसे की

00:22:47:14 एक प्रश्न य भी किया गया था यह किया गया था अलंकार समाज के किसी व्यक्ति के द्वारा वो कहा था उसने कि अगर वो मूर्ति में आ जाता है तो फिर वहां क्या कहते हैं वो फलाना उसने उतर था उसका कि फिर तो जीसस की मूर्ति में भगवान मान लो उसकी पूजा कर लो जीसस की मूर्ति को भगवान मान लो उसकी पूजा कर लो क्यों नहीं करते हम लोग क्योंकि वो वैदिक नहीं है अब इसमें प्रश्न क्या बनता है कि जब सब कुछ भगवान है निराकार भगवान सर्वत्र व्याप्त है तो केवल प्रणव क्यों प्रणव को मानता है ना आर्य समाज केवल प्रणव क्यों दूसरा कोई शब्द उठा लो दो तीन चार कोई भी उठा लो और उसको मान लो भगवान नहीं क्यों क्योंकि प्रणव जो है वेद द्वारा प्रदत्त है इसलिए हम उसका आलंबन हमने क्या कहा यह वह अविद्या है जो हमें अविद्या से मुक्त कराएगी तो वेदों का सहारा इसलिए चाहिए किसी को भी ईश्वर के रूप में स्वीकार करने के लिए क्योंकि वेदों द्वारा बताई गई व विद्या अविद्या है जो हमें अविद्या से ही मुक्त कराएगी जैसे नाव चलते समय चप्पू चलाते हैं ना तो नदी के पानी का ही उपयोग कर रहे हैं आगे नाव को धकेलने के लिए वो चीज जी

00:24:01:12 मैं एक चीज आपसे पूछना चाहूंगा जैसे मूर्ति पूजा की बात क्या वेदों में मूर्ति पूजा आती है बिल्कुल बिल्कुल आती है अवेद में दो 1 चर दोते चर में क्या कहा जा रहा है तुम आकर इस पाषाण में विराजमान हो जाओ यह आपका शरीर बन जावे सैकड़ों वर्ष पर्यंत उसमें आपकी विभूति को स्थिर करें स्ता स उपनिषद में मैं आपको दिखा देता हूं हे रुद्र आपकी जो मंगलमय शांत पुण्य प्रकाशनी मूर्ति है हे गिरि संतु पूर्ण आनंदमय रूप के द्वारा आप हमारी ओर देखो और जैसे नाथस प्रतिमा स्थ आ रहा है ना आर समाज ही कुछ कुछ अंशों में कई जगहों पर प्रतिमा का अर्थ मूर्ति नहीं माना है प्रतिमा का मतलब किसी के तुल्य प्रतिमान कि मेरे समान कोई नहीं है नात प्रतिमा मगर एक जगह सस्त प्रतिमा स भी आया है फिर क्या करें और स्वेता चतु निषद में तो रुद्र की मूर्ति की बात हो ही रही है और ऐसे तमाम जगह पर हुई है अरे भाई सीधे-सीधे ये समझ लीजिए अगर रूप की बात हो रही है कहीं पर मैं ऐसे लेकर चलता हूं कि रूप की बात अगर हो रही है कि आपके इतने हजार आंखें इतनी हजार हाथ है ये पैर है रूप की बात हो रही तो मूर्ति बन सकती है ना फिर क्या दिक्कत

00:25:16:24 एक चीज ज ठीक है तो मैं आपके दो विषयो के बारे में समझना चाह रहा था मूर्ति पूजा के ऊपर अवतारवाद के ऊपर हमने बात कर ली थी तो एट द एंड क्या हुआ कि आर्य समाज हों के साथ में रहने वाला व्यक्ति आर्य समाज को सपोर्ट करने वाला व्यक्ति हमारे पास आता है अपने मन में द्वेष या जो भी भाव लेकर के आता है और पहले सर्वत्र व्याप्त होने वाले ईश्वर को एक देश काल परिस्थिति में प्रकट होने वाले रूप में स्वीकार करते हुए निरुत्तर होते हुए अगला प्रश्न करता है उसके बाद पहले से ही व्याप्त ईश्वर को किसी एक देशकाल परिस्थिति में प्रकट होने वाले रूप में स्वीकार करते हुए निरुत्तर होते हुए अगला प्रश्न करता है फिर फिर अद्वैत प्रश्न कर है कि भाई जब केवल जागने वाला ही ईश्वर है तो ए ईश्वर क्यों और बी ईश्वर क्यों नहीं फिर उसका निराकरण भी होता है कि ठीक है सब कुछ ईश्वर ही है मगर हमें ईश्वर का वह स्वरूप मुक्ति दिला सकता है जो वैदिक हो जो सनातन शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित हो ऐसे तो कोई भी कहने लगेगा कि मेरी दृष्टि हो गई मैं जो है मुक्त हो गया हूं तो ऐसे मान ले क्या जैसे कि पानी नमी के रूप में सर्वत्र व्याप्त है मगर आपकी प्यास पानी का वह रूप बुझा पाता है जो आपके

00:26:31:25 व्यवहार की सीमा में आ जाए उसी प्रकार ईश्वर तो सबको ही है सर्वत्र व्याप्त है मगर आपकी मुक्ति की प्यास वही ईश्वर का रूप बुझा सकता है जो वेदों के द्वारा प्रतिपादित मोक्ष की सीमा के अंदर आ जाए यह भी इसको मानना पड़ा और इसके बाद अंततोगत्वा जब इसने कुछ छद्म से प्रश्न किए मूर्ति पूजा के बारे में तो हम उस समय तो बहुत ज्यादा दे भी नहीं पाए हमने इनसे कहा भी है कि हम आपको और दे देंगे तो इसी प्रकार गुरुदेव भी कहते हैं कि लाठी भाले की नोक पर नहीं गोष्ठी करने से वार्ता करने से बड़ी-बड़ी लड़ाइयां सुलझ सकती हैं और इसीलिए हम भी कहते हैं कि भाई विरोध के चक्कर में मत पड़ो क्यों पड़े हो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर में जय श्री राम [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 27:27 · 05 Dec 2024

आर्य समाजी ने माना ईश्वर का अवतार #aryasamaj

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