⬜ Not used yet · 00:00:00:00 – 00:56:03:00 (56:03)
00:00:00:00 अवतार का विरोध किस किस प्रकार से किया जाता है अगर हम उसको जन्म लेने वाला मान लेंगे तो उसके विषय में जो अजन्मा शब्द आया है वो कट जाएगा वो सर्वव्यापक है तो वो एक देशीय नहीं हो सकता भवान अर्जुन को कह रहे कि तू इस दृष्टि से मुक्त हो और व खुद मुक्त नहीं है पहले तो मैं व्यवहार परमार्थ का दे दूं आपको हम क्या करते हैं ना कि हम व्यक्ति को उसी शस्त्र से मारते है जि शस्त्र को स्व कहता है शस्त्र से म में ना आ सकने वाली स्थिति की बात हैय बात तो आपकी सत्या प्रकाश में भी हुई है पूजा परा पूजा किया करते हो तो देखो अलंकारी परा पूजा परा पूजा किया करता है स के दवारा आजल रही है
00:00:42:19 क्यों के सा भी उस में जाने आ समाज के नाम पर दयानंद जी के नाम पर य ंग फैलाना बंद करें अगर आवान से हम तुम्ह क्या बताए किस कदर चोट खाए हुए हैं मौत ने हमको मौत ने हमको मौत ने हमको मारा है लेकिन आवान के सताए हुए हैं तो कुछ अलंकार हों का ऐसा ही हाल हुआ
00:01:22:09 है उन्होंने कुछ मर्यादा का उल्लंघन करते हुए कुछ समय पूर्व ऐसे कुछ टिप्पणियां व व्याधि की थी भगवत स्वरूपों पर परंपरा प्राप्त आचार्यों पर केवल शंकर संप्रदाय के नहीं सभी परंपरा प्राप्त आचार्य जितने भी आचार्य जो पुराणों को स्वीकार करते हैं प्रमाण के रूप में फिर भले व वैष्णव चार्य हो निंबार्काचार्य हो कोई भी हो किसी भी परंपरा से हो तो उन्होंने ऐसा कुछ किया था जिस पर की हमारी ओर से प्रतिक्रियाएं दी गई दर्शन विज्ञान और व्यवहार की सीमा के अंदर रहते हुए परिणाम स्वरूप यह हुआ कि सामने वाले के पास कोई भी उत्तर ही नहीं था देने के लिए और होते होते होते उसको अपना सर इतना पटकना पड़ा इतना पटकना पड़ा कि उसे जो द्वारका पीठ है वहां जाकर के माथा टेकना पड़ा उसके बाद वीडियो में आकर के भी कहीं ना कहीं अप्रत्यक्ष रूप से क्षमा मांगनी पड़ी हालांकि वह संतुष्टि जनक नहीं था केवल दिखावा था पाखंड था तो यह सब उसने किया केवल और केवल जो आसक्ति हो चुकी थी हमें पराजित करने के विषय में उसकी उस आसक्ति को परिपूर्ण
00:02:37:14 करने के लिए प्राप्त करने के लिए और फिर भी वह सफल ना हो सका यहां तक कि उसका इतना उसका मिट्टी हो गया मिट्टी पलीद हो गया उसका कि उसकी अपनी संस्था वालों ने उसको घोषित कर दिया कि हम उसे नहीं जानते जिस जिस संस्था में व पदाधिकारी उसको भी उसे घोषित करना पड़ा सार्वजनिक रूप से कि भैया हम उसे नहीं जानते हम तो दूर है उससे उसे अपने चैनल का नाम तक बदलना पड़ गया इतनी मिट्टी हो गई तो यह सब होने के बाद वह अभी भी यह जो अभी जो मैंने आपको कुछ पंक्तियां गाकर सुनाई यह उस पर चरितार्थ होती है क्योंकि अभी भी जो वह व्यक्ति है वह इसी हालत में है कि वो समझ नहीं पा रहा है कि किस प्रकार से मैं अपनी वर्चस्व होता को समाज में सि कर सकू अपनी वर्चस्व होता मैं इसम बात करूंगा आगे किसी सिद्धांत की वर्चस्व होता की बात नहीं है यहां पर अब अपनी वर्चस्व होता की बात है वो कैसे तो सबसे पहली बात है कि उसके द्वारा और कई अलंकार हों द्वारा अलंकार आर्य समाज
00:03:52:27 तो अलंकार समाज के कई लोगों के द्वारा यह प्रश्न उठाया जाता है और अवतार के विषय में बात की जाती है कि अवतार क्यों क्यों नहीं हो सकते तो आज हम उस पर बात करेंगे विशेष रूप से उस व्यक्ति की बात करें तो उसने एक वृद्ध सज्जन को भी साथ में ले लिया अपने मत की पुष्टि के लिए अपने ही मत को मानने वाले किसी सज्जन को साथ में ले लिया और थोड़ी बहुत देर बातचीत की और निर्णय निकाल लिया साहब जो है ऐसा ऐसा है व मैं भी बताऊंगा क्या क्या निर्णय निकाले तो मैं यह सोच रहा था भाई कि चलिए ठीक है वह तो अभी यु वस्था में है या फिर युवा से थोड़ा आगे का है मगर भाई जो सज्जन वृद्ध उसके साथ बैठे हैं गपो मारने के लिए गप्पे मारने के लिए अरे भाई आप तो अपना अपनी इमेज का अपनी छवि का अपनी आयु का अपने स्तर का ध्यान रखना चाहिए था आपको क्यों अपनी मिट्टी पलीत करा ली ऐसे ऐसे वक्तव्य दे दिए बताता हूं कैसे कैसे वक्तव्य दिए तो सबसे पहले तो इनका जो मैं वैसे अवतारवाद पर बात करने ही वाला था काफी दिन से मैं कुछ और आचार्यों के ग्रंथों को पढ़ने का समय निकालना चाह रहा था कि मैं
00:05:07:28 और ज्यादा पढ़ करके और अच्छा ठोस सामने ला सकूं मगर फिलहाल अभी मुझे समय नहीं मिल पाया मगर फिर भी जितना है उतना पर्याप्त है तो सबसे पहले हम देखते हैं कि अवतार का विरोध किसकिस प्रकार से किया जाता है सबसे पहला नंबर आता है कि ईश्वर अजन्मा है तो अगर हम उसको जन्म लेने वाला मान लेंगे तो उसके विषय में जो अजन्मा शब्द आया है वह कट जाएगा अरे भैया जीवात्मा भी अजन्मी है ना फिर भी वह जो जी जीव तत्व है वह ऐसा रूप ऐसा शरीर धारण करता है जिससे कि वह किसी के व्यवहार का विषय बन जाए जिससे कि उसकी एक पहचान बन जाए जिससे कि उसकी पहचान के प्रति व्यवहार किया जाए उसकी फोटो खींच जाए उसकी मूर्ति बन जाए अब आप यहां कह देंगे कि जीव तो बद्ध हो जाता है इसलिए वह जन्म लेता है मुक्ति के लिए यह दूसरा कारण है मगर यदि आप यह कह रहे हैं कि वह अजन्मा है इसलिए उसका अवतार लेना जन्म लेना सिद्ध नहीं होता क्योंकि उसके लिए अजन्मा शब्द आया है तो कारण कोई भी दीजिए अगर अजन्मा शब्द आत्मा के लिए भी आ गया है तो फिर उसके द्वारा भी शरीर धारण करना जन्म लेना सिद्ध नहीं होता तो
00:06:23:00 अजन्मा के आधार पर आप यह नहीं कह सकते कि नहीं भाई ईश्वर जो है अवतार नहीं ले सकता मनुष के बीच में नहीं आ सकता जन्म नहीं ले सकता ठीक है इसके साथ ही साथ अजन्मा होते हुए भी ईश्वर अपनी माया द्वारा अनेकानेक रूप बना कर के विरता है गर्भ के मध्य में विचर है हे लो शयों के प्रमाण ले लो भगवत गीता का शायद मान जाओ वैसे प्रमाण मानते नहीं हो कह दिया है मगर भगवत गीता का प्रमाण है मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी अपनी माया को अधीन करके सजाम में हम यदा यदाई धर्मस्य भारता अभन धर्मस्य तत् मानम सजाम में
00:07:12:22 तो प्रकट होते हैं अपनी माया के द्वारा अजन्मा अविनाशी होते हुए भी अब दूसरा इनका पॉइंट आता है कि जो पहले से ही है उसका आना जाना सिद्ध नहीं होता जो पहले से ही है यहां पर ऑलरेडी है उसका आना जाना सिद्ध नहीं होता तो मैंने इनसे प्रश्न भी किया इनके कुछ सज्जनों से प्रश्न किया निरुत्तर थे वो लोग सर्वत्र व्याप्त है तो वह हमारे आपके मन मस्तिष्क में भी व्याप्त है फिर भी ऋषि किसी एक देश काल परिस्थिति में मंत्रों की दृष्टा क्यों बन रहे हैं जब कोई शिशु जन्म ले रहा है उसके मस्तिष्क में भी ईश्वर है सर्वत्र समान रूप से होता है फिर भी उसे वेद के मंत्रों को जानने के लिए किसी ग्रंथ की आवश्यकता क्यों है क्यों वो एक देशीय हो रहा है जबकि उसके उसके मन के अंदर वही ईश्वर है जो सर्वत्र है जो ज्ञानी है मनुष्य को जो आवश्यक है जीवन के लिए जो उसके इस लोक और परलोक के लिए आवश्यक है वो ज्ञान उसको उसने दिया लेकिन सीखना पड़ता है मनुष्य को इसीलिए जन्म से सारी चीज यानी कि पहले से जो हमें प्राप्त है ज्ञान उसको भी बाहर निकालने के लिए हमें उद्योग करना पड़ता है प्रयास करना पड़ेगा तो इसी प्रकार से तो हम अग्नि को भी मानते हैं कि पहले से वो काट की लकड़ी में मौजूद
00:08:27:22 है उसकी शक्ति फिर भी उद्योग करने प प्रकट होती है जैसे दूध के अंदर वो जो दूध के अंदर मक्खन है फिर भी उद्योग करने प प्रकट होती है इसी प्रकार से जो सर्वत्र व्याप्त ईश्वर है है वो हर जगह फिर भी वहां उद्योग करने से वो प्रकट हो जाते हैं क्या चीज ईश्वर प्रकट हो जाता है इस इस से ले रहे हैं वो हमारे मन में नहीं है नहीं उतना नहीं है व सब मतलब ईश्वर सर्वत्र समान रूप से व्याप्त नहीं मेरी बात सुनो साइंस के मैं साइंस का विद्यार्थी नहीं हूं लेकिन साइंस का ज्ञान है कि नहीं पहले से लेकिन मैं तो आर्ट्स का भा मैं इसीलिए आपको वो बताना चाह रहा हूं ना कि जैसे पार मार्थी दृष्टि से ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है पार मार्थी दृष्टि से ईश्वर का जो ज्ञान है वैदिक ज्ञान वह सर्वत्र व्याप्त है फिर भी उद्योग आदि से उसको व्यावहारिक बनाया जाता है इसी प्रकार से परमार्थिक दृष्टि से जो ईश्वर है वो सर्वत्र व्याप्त है मगर उद्योग आदि से उसको व्यवहारिक बनाया जाता है जिसमें वह साकार हो जाता है जैसे जैसे वेद वेद के रूप में साकार हु इस बात से नहीं मानता नहीं मैं आपको मनवा नहीं रहा आपका तर्क हो सकता है मैं तो एक बात मैंने पूछा कि अगर ईश्वर सब जगह पहले से ही है आपके मस्तिष्क में भी है तो फिर म मंत्र का प्रकट होना सिद्ध नहीं होता मंत्र कैसे
00:09:42:27 प्रकट हो रहा है मन में इसका अर्थ है कि किसी रूप में वह पहले है पहले से है वास्तविक रूप में व पहले से है उसको हम परमार्थिक कहते हैं वो अभी मैं आऊंगा परमार्थिक व्यवहारिक आप कितना मानते हो कितना नहीं मानते तो आध्यात्मिक रूप से ईश्वर सब जगह पहले से है परंतु व्यावहारिक रूप से उसका आना जाना सिद्ध होता है जैसे व्यवहारिक रूप से जब परमात्मा जब आपके अनुसार व्यवहार और परमार्थ का तो अंतर है नहीं तो ईश्वर जो है प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में है जब वह प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में ऑलरेडी है तो उसके अंदर का जो ज्ञान है वो भी तो सबके अंदर है तो फिर मंत्रों का प्रकट होना कैसे सिद्ध हो रहा है कि मंत्र प्रकट होते हैं मंत्रों के दृष्टा बनते हैं ऋषि यह कैसे हो रहा है व तो पहले से ही जन्म के साथ ही मंत्रों को लेकर के जन्म लेना चाहिए मनुष्य को क्योंकि ईश्वर तो सर्वत्र व्याप्त है हम तो अब मतलब वो पहले से है तब उसका आना जाना सिद्ध नहीं होता यह बात भी आपकी गलत हो गई इसके साथ ही साथ जो आर्य समाज के द्वारा स्वीकारी गई भगवत गीता है उसमें जो यथा यदा
00:10:58:01 यदाई धर्मस्य वाले प्रकरण की जब व्याख्या की जा रही है तो वहां पर उसका अर्थ लिखने वाले लेखक को मानना पड़ गया कि जब जब धर्म पर हानि होती है कोई ना कोई शक्ति ईश्वरीय शक्ति प्रकट होती है तो लो फिर कैसे आना जाना करोगे भाई ईश्वर की शक्ति तो पहले से ही है ना हर जगह प्रकट कैसे हो रही है फिर वो इसका अर्थ है वह किसी और रूप में पहले से है और किसी और रूप में प्रकट हो रही है इसका अर्थ है कि वह निष्क्रिय रूप में पहले से है निर्गुण रूप से पहले से है पार मार्थी रूप से पहले से है फिर सक्रिय और व्यवहारिक रूप से प्रकट होती दिखाई दे रही है ठीक है तो यह भी आपका कट गया अब तीसरा आता है कि भाई वह सर्वव्यापक है तो व एक देशीय नहीं हो सकता तो यहां से हम लोग दो चीजें सिद्ध कर लेंगे सर्वव्यापक है वह एक एक देशीय नहीं होता ऐसे पहली बात तो यह है जब वह सर्वत्र सब जगह है जब वह सर्वत्र समान रूप
00:12:13:01 से सब जगह है तो फिर वह किसी एक देश में ही कैसे एक्टिव होकर के पृथ्वी आदि की रचना कर सकता है भाई संसार की रचना उत्पत्ति उसी ने की ना तो जब व समान रूप से सर्वत्र व्याप्त है तो वह एक जगह पर एक्टिव कैसे हो सकता है हमें यह मानना पड़ेगा कि उसने अपने आप को रेगुलेट किया और जहां वह चाहता था वहां उसने अपने आप को एक्टिव कर लिया इसी प्रकार से हमें मानना होगा कि सर्वत्र सर्वव्यापी होते हुए भी उसने अपने आप को रेगुलेट किया और जहां वह चाहता था उसने अपने आप को दृश्य बना दिया तो यह भी कट गया अच्छा इसके साथ ही साथ यहां पर अवतार लेना भी सिद्ध होता है अवतरित होना क्यों क्योंकि ईश्वर समान रूप से सर्वत्र व्याप्त है समान रूप से कहीं ऊपर नीचे कम ज्यादा नहीं है तो अगर उसके द्वारा हम सृष्टि का निर्माण स्वीकार कर रहे हैं तो हमें यह मानना होगा कि कहीं ना कहीं उसने अपने आप को रेगुलेट करके मतलब जो समान रूप से सब जगह व्याप्त था उसने अपने को कंट्रोल किया और किसी एक जगह पर एक्टिव
00:13:28:08 हुआ जहां पर उसे पृथ्वी की रचना करनी है सूर्य की रचना करनी है जो भी रचना करनी हो अन्यथा अगर ऐसा नहीं कर सकता है वो अपने आप को रेगुलेट करके किसी एक जगह पर वो दृश वो एक्टिव नहीं हो सकता तो क्या होगा जब भी वो एक्टिव होगा तो समान रूप से सर्वत्र एक्टिव होगा तो कभी कोई रचना हो पाएगी क्या कोई शेप आ पाएगा क्या कहीं पे नहीं आ पाएगा जब तक वह अपने आप को रेगुलेट करने वाला नहीं बनेगा तब तक वो कुछ भी बनाने लायक है ही नहीं फिर व निर्गुण है केवल तो क्या हुआ कि यहां पर निर्गुण जो आपके ही अनुसार अगर आपके अनुसार सृष्टि बना रहा है ईश्वर उत्पत्ति करता है तो क्या हुआ कि जो सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है यह उसका निर्गुण निराकार स्वरूप है और जब उसने अपने आप को रेगुलेट करके सक्रिय किया किसी एक जगह पर जहां वो चाहता है तो यह क्या हुआ अवतार हो गया यहां पर मतलब इतना अवतार तो आपको भी मानना पड़ेगा भले ही अभी व आंखों का विषय नहीं बना है निराकार है इतने अंश में तो अवतार आपको आपने मान लिया ना कि उसने आपको उसने अपने आप को अवतरित हुआ किसी ऐसे रूप में जो किसी कार्य के लिए आवश्यक है
00:14:44:03 अवतरित हो गया निर्गुण निराकार से सगुण निराकार ईश्वर अवतरित हो गया अवतार मान लिया आपने और नहीं मानो तो सृष्टि की रचना सिद्ध करके बता दो भाई ठीक है अब दूसरी बात ये आती है कि इसी प्रकार से जैसे वह सर्वत्र सर्वव्यापी है मगर किसी एक जगह अपने आप को अपनी इच्छा अनुसार एक्टिव करता है वहां पर वह कार्य करता है आपके अनुसार हमारे अनुसार तो है ही यह चीज आप भी मानते हो अब क्या है इसके आगे कि जब वह अपने आप को कहीं रेगुलेट करके किसी एक जगह एक्टिव कर सकता उसी प्रकार से अपने आप को रेगुलेट करके किसी जगह व आंखों का विषय भी बन सकता है इसको हमने बताया भी है कि अविद्या आपकी भाषा में कहे तो अन अजान रूपी पदे से पदे से वो जो ईश्वर है वो हमें नहीं दिख रहा है उसने अपने आप को छुपा रखा है फिर वो साधु भक्तों के उद्धार के लिए वो जो अ अजान रूपी जो चादर है अजान अजान रूपी जो चादर है उसमें वह शेप बनाता है और वहां पर वह जो अज्ञान रूपी चादर को आप कहे तो फाड़ दिया उसमें चीरा लगा दिया उस चीरे से उस फटे हुए फटी हुई चादर से जो हमको उधर का वास्तविक ब्रह्म
00:15:59:10 का स्वरूप दिख रहा है किसी एक शेप में व्यावहारिक शेप में किसी मनुष्य आकृति में दिख रहा है वह अवतार है वह भगवान का सगुण साकार अवतार है ठीक है तो यह उसने क्या किया अपने आप को किसी एक जगह पर दृश्य बना दिया आंखों का विषय बना दिया अपने आप को कंट्रोल कर लिया अब कहे यह नहीं हो सकता वह कैसे कर सकता है तो फिर वही बात भाई आफ्टर ऑल वह सर्व सामर्थ्य वान है ना उसके द्वारा अथुनी सृष्टि की रचना मान रहे हो ना अनेकानेक ऐसी चीजें मान रहे हो जो इंपॉसिबल है साइंटिफिक लैंग्वेज में तो फिर एक अवतार लेने के लिए तुमको क्यों दिक्कत आ जाती है कि नहीं साहब यह कैसे हो सकता है अरे भाई यह कैसे हो सकता है तो अथुनी सृष्टि कैसे हो सकती है यह लिखा है लिखा तो यह भी है इंटरप्रिटेशन तुमने अपनी बदल दी तो हम क्या करें अभी आएंगे परंपरा प बहुत सारा झोल कर रखा है और बाबू जी वृद्ध वाले भाई साहब आपने तो मट्टी कुटा ली अपनी ऐसी ऐसी बातें कह दी इसमें मट्टी कुट गई
00:17:10:15 मट्टी तो हंसी आ रही है मुझे मैंने जब मेरे स ज्ञान में आया उनकी बातें मैंने सुनी इतना चको चको के इतना रस ले ले के गप्पे मार रहे हैं कोई हद नहीं है मैं भी मारूंगा अभी दो चार गप्पे चलो तो एट दी एंड क्या हुआ कि ईश्वर सर्व सामर्थ्य वान है कि नहीं सब कुछ कर सकने वाला है कि नहीं अगर है तो फिर वह यह भी कर सकता है किसी एक जगह अपने आपको को आंखों का विषय बना सकता है अपने अपनी इच्छा अनुसार के मैं इतनी इतनी जगह पर इस इस आकृति में इसको देखूं बना लिया उसने आंखों का विषय बाकी जगह ढका रा वह हमें दिख ही इसलिए रहा है क्योंकि हमारे सामने अज्ञान रूपी जो चादर पड़ी है उस अज्ञान रूपी चादर को चीर के वो हमें दिख रहा है व है सगुण साकार स्वरूप जगतगुरु शंकराचार्य जी ने बताया था इस बारे में उन्होंने कहा था इसको कहते सावरण ब्रह्म और निरा ब्रह्म जहां पूरा हमको यह सब जो वातावरण दिख रहा है यह भी ईश्वर ही है कण कण में ईश्वर य भी है मगर इसके ऊपर अज्ञानता रूपी अविद्या रूपी माया रूपी चादर है इसका ईश्वर सिद्ध नहीं हो पा रहा हमारे व्यावहारिक रूप से तो
00:18:26:02 भगवान जो है वो यह जो अज्ञान रूपी चादर है इसको चीरते हैं और फिर वह दिखाई देते हैं उसको कहा है अपनी माया को अपने अधीन करके योग माया से प्रकट होता हूं साधु भक्तों के उद्धार के लिए गप्पे मारने वालों के लिए नहीं हां ठीक है तो सर्वव्यापी का मामला हो गया अब बात आ जाती है जब हम कहते हैं सर्व सामर्थ वान हालांकि टेक्निकली भी हमने उसको कर दिया मगर फिर भी अंत में यह बात माननी होगी कि आपने सारी चकल विद्या बता दी सारी गप्पे बता दी ठीक है मगर उसके बाद भी आप यह कहो ना कि ठीक है वेदों के द्वारा निर्धारित सीमा में हमारा ईश्वर सीमित है आप अगर वेदों का ऐसा इंटरप्रिटेशन निकालते हो जिसमें कि ईश्वर सीमित है तो यह कहो ना कि ईश्वर सीमित है भाई अनंत क्यों कह रहे हो और अगर वेदों में अनंत भी लिखा है तो या तो उसकी अनंतता सिद्ध करो और या फिर यह कहो कि वेद जो है वो सही बात नहीं बताने वाले हैं नास्तिक कर दो दुनिया को अपने मत को प्रचारित करने के चक्कर में अपनी वर्चस्व सिद्ध करने
00:19:41:06 के चक्कर में कुछ भी कर डालो धर्म छीन लो मानवता छीन लो संसार से क्योंकि हमसे जो गलती हो गई है हमने जो एक बार कह दिया उसको जो है निभाएंगे त्रिया चरित्र मातृ शक्ति से अगर विवाह हो गया है पता चल गया है कि वो त्र्या चरित्र है मगर नहीं सबूत सारे मिल जाए प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाए मगर अब तो हम उसके अब तो हम लोगों से लड़ेंगे कि तुमने कैसे कह दिया इसको तया चरित्र वो वाली कहानी है निभाना है मन में डाउट आ रहा है यार बात तो ये ठीक कह रहा है लॉजिकल कह रहा है मगर हमको इसको नहीं टटोलना है हमको तो बस सवाल करने हैं अगर तुम्हारा ये कैसे तुम्हारा अरे भाई हमारा गलत हो भी जाएगा तो तुम तुम्हारा कहां से सिद्ध हो जाएगा जब भी प्रश्न करो तो तुम्हारा ही है तुम्हारा य भाई अपने आप को सिद्ध करो ना प्रश्न आपसे जब किया गया है तो तुम उसके रेप्ट केशन में सामने वाले से ही प्रश्न कर रहे हो इसका अर्थ है कि तुम्हारे पास अपने ब अपना वो है ही नहीं सिद्धि अब बात आ जाती है कि सब कुछ कर सकने का मतलब क्या ईश्वर बुराई कर सकता है क्या ईश्वर मर सकता है तो इस बारे में
00:20:56:06 हमने कई बार वीडियोस बना दिए हैं कि बुराई वो भी है जहां पर बुराई हो रही है तुम शांत बैठे हो तो व्यावहारिक रूप से अगर जैसे इनके द्वारा आरोप लगाया जाते हैं कि भगवान श्री कृष्ण जो है वोह क्या कहते हैं वस्त्र चुराते थे यह व हालांकि इन सारी यह जो लीलाएं हैं भगवान की यह जो कृत है भगवान के इनके आदि दैविक आदि भौतिक पार मर्थक आध्यात्मिक रहस्य होते हैं जो हमें गुरुओं की शरण में जाकर सुनने होते हैं मगर एक बात बताओ कि वो जब महिला निर्वस्त्र हो रही होती है तो आपका ईश्वर उन्हें देख नहीं रहा होता है क्या वहां नहीं होता है क्या वो उसके वहां पर देखने की क्षमता खत्म हो जाती है असाम वान हो जाता है वो तो यह दोस्त तो उस पर भी लगता है बस वो व्यावहारिक रूप से दिखता करता हुआ दिख नहीं रहा है है ना भाई यह दोस्त जहां पर चोरी हो रही है डकैती हो रही है कोई भी बुराई हो रही है ये मैं सबसे पूछना चाह रहा हूं जितने लोग ये आरोप लगाते जितने लोग आरोप लगाते हैं कि भाई तुम्हारा ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो व बुराई भी कर सकता है तो जिस ईश्वर को आप मानते हो क्या उसकी सत्ता नहीं होती है जहां पर यह सब चीजें
00:22:11:06 हो रही होती है और सत्ता होती है तो ना रोकने की स्थिति में दोष तो उसके ऊपर भी लगता है ना मगर नहीं वास्तविकता यह है कि भगवान जहां पर खड़े हैं वहां से कोई अच्छाई बुराई है ही नहीं सब समान है उनके लिए लिए यही बात भगवान श्री कृष्ण उनको बता रहे हैं अर्जुन को 2.17 से लेकर 2.31 तक कि ना कोई मरता है ना कोई मारता है सम दृष्टि रख जय पराजय में सम दृष्टि रख सिद्धि सिद्धि में सम दृष्टि रख यह समत्व की दृष्टि को प्राप्त करना ही तो मोक्ष है तो भगवान तो पहले से ही समत्व की दृष्टि प्राप्त किए हुए हैं इसीलिए कहते हैं कि मैं सबका कर्ता होते हुए भी अकता ही हूं क्योंकि मुझे कर्म लिप्त नहीं करते क्योंकि उनके कर्मों के फल में मेरी आसक्ति नहीं है सम दृष्टि है उनके पास मुक्त है
00:23:12:02 वो मुक्त आत्मा यहां से मुक्त हो कर के चली जाएंगी उनके जो परिवार वाले बचेंगे यहां सुनामी आएगा प्रलय आएगी कुछ होगा उनके साथ तो व मुक्त आत्मा घबराएगी यह मुक्ति है आपके हिसाब से यह जो अच्छाई बुराई है यह मनुष्यों के लिए है ईश्वर के लिए नहीं है अच्छाई बुराई मनुष्यों के लिए प्राणियों के लिए और इस अच्छाई बुराई का निर्वाह करके उनको वह दृष्टि प्राप्त करनी है मनुष्यों को जो दृष्टि ईश्वर के पास है जिससे वह चैन से रह
00:23:45:25 सके सच्चिदानंद होकर के रह सके सच्चिदानंद असतो मा सदम तम माया यह जो अविद्या सॉरी आपकी भाषा में अज्ञान ये जो अज्ञान के कारण जो आप यह आपको लग रहा है कि वो हो रहा है वो हो रहा है वो हो रहा है इस इस दृष्टि से आप मुक्त हो सके तो भगवान अर्जुन को कह रहे कि तू इस दृष्टि से मुक्त हो और वह खुद मुक्त नहीं है तो यह कहना बेकार है कि ईश्वर बुराई भी कर सकता है क्योंकि आपके ईश्वर के द्वारा भी बुराई होना सिद्ध है कैसे सिद्ध है ना वो बताया था लोहा वाला एक कुतर्क टाइप का दिया हुआ है मुझे नहीं लगता वो दयानंद जी ने दिया होगा वो बहुत बड़े तर्कशील व्यक्ति लगते हैं मगर उनके नाम से आजकल जो सत्यार्थ प्रकाश छापी जा रही है बड़ा उसमें सुना है कि 50 से ज्यादा बार बदली जा चुकी है पता नहीं क्या क्या डाल दिया गया उनके नाम से वो खनिज निकलता है लोहा निकलता है तो अगर उससे उससे लोहा क्या कहते लोहार तलवार बना देगा और तलवार लेकर के कोई आदमी हत्या कर देगा तो लोहार पर और खनिज निकालने
00:25:01:01 वाले पर क्या दोष लगेगा क्या नहीं लगेगा मगर उस स्थिति में लगेगा जब खनिज निकालने वाले को और लोहे से तलवार बनाने वाले को यह पता हो कि सामने वाला व्यक्ति जो मुझसे तलवार लेकर के जा रहा है यह क्या करने वाला है और तो और करते हुए भी वहां पर वह विद्यमान हो तब तो दोष लगेगा ना तो यह भी मत कहना अब बात आती है तो पूजा कैसे करें कई बार बता चुका हूं जिस प्रकार से जल सर्वत्र व्याप्त है नमी आदि के रूप में तरह तरह के पानी के रूप में मगर हमारी हमारी प्यास पानी का वह रूप बुझा सकता है जो हमारे व्यवहार की सीमा में आ जाए जो हमारे लिए व्यवहारिक हो जाए उसी प्रकार से हमारी भक्ति की प्यास भगवान का वह रूप बुझा सकता है जो मोक्ष दायक वेदा दि शास्त्रों द्वारा बताए जो सीमा है उसके अंदर आ जाए हमारे लिए उसके अंदर होते हुए व्यवहारिक हो जाए वो हमारी भक्ति की प्यास बजाता है वो हमारी भक्ति का विषय है वो जो सर्वत्र व्याप्त वाला जो भगवान का रूप है वो तो प्राप्त व्य है भगवान का वो रूप जो मोक्ष दायक
00:26:16:04 हो जो मोक्ष का मार्ग दिखाए जो हमें मोक्ष की ओर ले जाए वेदों की ओर ले जाए धर्म की ओर ले जाए धर्म परायणता सिखाए वो रूप हमारे लिए वो हो जाता है क्यों बुद्ध को भी तो भगवान की इच्छा से जन्म मिल रहा है मोहम्मद को भी तो भगवान की इच्छा से ही जन्म मिल रहा है क्या इच्छा के बाहर जन्म मिल गया क्या इन लोगों को तो जब अगर बात ये है कि वो जो है वो बुराई करने वाले ईश्वर तो भाई ऐसी एंटिटी जो आपके ही धर्म के विरुद्ध है ऐसी एंटिटी को बनाने वाले ईश्वर को क्यों बजोग तुम क्यों बनाया उसने क्यों जन्म लेने दिया ना बनाते मोहम्मद को ना बनाते नास्तिकों को ना बनाते बुद्ध को
00:26:59:24 ठीक है जैसे पेंटर होता है ना वो पेंटिंग बनाते समय भले ही मातृ शक्ति की पेंटिंग हो आंखों में रंग भरते समय और दूसरे अंगों में रंग भरते समय भेद नहीं करता है इसी प्रकार से भगवान भेद नहीं करते हैं भगवान के लिए भेद नहीं है भेद हमारे लिए जिस अंश में भगवान हमारी सहायता करते हैं यहां से बाहर निकलने के लिए वह अंश जो उनका है वह रूप जो उनका है वह हमारे लिए भक्ति का विषय हो जाता है और एक बात और आती है अच्छा हुआ वो पीछे जो मैं बोल के आया हूं कि वह जो चीरा लगा हुआ भगवान का रूप है इसमें एक कुतर का सकता है कि वो पूरा भगवान थोड़ी ना है आपने पूरे ईश्वर को थोड़ी ना देख लिया यह कुतर का सकता है ना अगर वह जो माया रूपी चादर के बीच में जो कट लगने से दिखाई देने वाला जो निरा वण ब्रह्म है भगवान का अवतार है जो वो इसलिए आप भगवान नहीं मानोगे उसे भगवान का ता ईश्वर नहीं मानोगे उसे क्योंकि वह पूरा नहीं दिख रहा है है ना तो इस आधार पर इस कुतर्क के आधार पर ईश्वर के द्वारा सृष्टि निर्माण होना भी सिद्ध नहीं होगा ईश्वर के द्वारा कोई कार्य होना सिद्ध नहीं होगा क्यों क्योंकि
00:28:14:27 ईश्वर तो सर्वत्र व्याप्त है तो जब पृथ्वी बन रही है तो पूरे पूरा ईश्वर थोड़ी ना बना रहा है पृथ्वी व तो उसका एक छोटा सा अंश बना रहा है पूरा ईश्वर नहीं बना रहा तो यह कहना बंद करो ईश्वर ने सृष्टि बनाई कर दोगे अरे भाई थोड़ा लॉजिकली सोचो तो कि बिल्कुल पागल हो गए हो अपने मत को स्थापित करने के चक्कर में यह मत को स्थापित नहीं कर रहे हो धर्म को स्थापित नहीं कर रहे हो यह अपनी वर्चस्व को स्थापित कर रहे हो यह संस्था निश्ता भी नहीं है यह व्यक्ति निश्ता भी नहीं है यह केवल अपनी अपनी वर्चस्व होता है यह इसमें
00:29:01:12 खैर आगे चलते हैं अब बात आती है कि हमने ईश्वर के अवतार को जो चार पांच चीजें बताई जाती हैं उसके अनुसार सिद्ध कर लिया एक चीज और ले लेते हैं एक बात इनके द्वारा कही जाती है ईश्वर को आवश्यकता क्या है आने की भाई ईश्वर को आवश्यकता क्या है अलंकार लगाने की जगह जगह जहां पर भी चमत्कारिक वर्णन हो रहे हैं वेदों में पुराणों को तो आप इसलिए नकार देते हो कि भैया पुराण जो है ये है वो है ऐसे सब बोल कर के आप पुराणों को नकार देते हो और पुराणों को मानने वाले जो आचार्य गण है पर परंपरा प्राप्त उनका तो अपमान करते हो पास उड़ाते हो है ना मगर वेदों में जब इस तरह की चीजें आती है तो उनको अलंकार बता के यह करके वो करके और जो है आप जो है उनका वेदों के सम्मान की रक्षा करते अच्छी बात है इतना इतना तो किया कम से कम मगर मगर जब आप अलंकार को वहां स्वीकार कर रहे हो तो मुझे बताइए अलंकार उत्पत्ति स्थिति समार कौन से उसमें आता है यदि अलंकार मंत्रों में आवश्यक है वैसे आवश्यकता नहीं है मगर आप अगर कहेंगे उसकी आवश्यकता है तो फिर हर मंत्र में क्यों नहीं है है जवाब बस अब दूसरा वीडियो बना देना
00:30:16:18 कि तुम्हारे में यह तुम्हारे अबे भाई अपना तो बता दो किसी दिन जब भी कुछ पूछो तुम्हारे में तो ये तुम्हारा में तोय परंपरा क्या है तुम्हारी परंपरा क्या है गट प पहले कौन थे सुखदेव जी कैसे बने अरे भैया अपनी तो बताओ अरे हमको ज्यादा से ज्यादा गलत सिद्ध करके तुम यही तो सिद्ध करोगे कि वेदों का कोई प्रमाण नहीं है कि वह ईज वर्ष पूर्व के हैं यही तो सिद्ध करोगे कि वह प्रामाणिक है कि नहीं शति परंपरा है कि नहीं यही तो सिद्ध करोगे क्योंकि जिसकी है उस पर तुम उंगली उठा रहे हो और तुम्हारे पास है नहीं यही तो कर दोगे ना इससे तुम्हारे पास वेदों का माणिक रूप से आना सिद्ध नहीं होता है और अंततोगत्वा जब तुम अपने से पूर्व किसी का अस्तित्व स्वीकार कर रहे हो भले ही उससे पहले का उसके पास ना हो मगर अपने से पहले उसका तो व वेदों की प्रामाणिकता के लिए अभी भी तुम उसी पर डिपेंड कर रहे हो ठीक है वेदों की प्रमाणिकता के लिए अभी भी तुम जिसका अस्तित्व तुमसे पहले उस पर डिपेंड कर रहे हो अगर वेदों को प्रमाण मानना है तो आदि शंकराचार्य को प्रमाण मानना होगा भले ही आदि शंकराचार्य के पास य जवाब ना हो कि मेरे से पहले के गुरु कौन है वैसे है ये मत सोचना है
00:31:32:04 वो हम किसी और वीडियो में कवर कर चुके हैं और फिर से कर देंगे आवश्यकता पड़ी मगर फिलहाल यह है कि जब आपसे कोई क्वेश्चन पूछा गया है तो अपना तो बताइए आप आपने बता दिया कि वो क्या कहते हैं वो अजन्मा है इसलिए उसका जन्म लेना सिद्ध नहीं होता फिर आत्मा क्या कर रही है अरे कारण आप बता रहे हो आत्मा इसलिए आत्मा का आत्मा अजन्मी है अगर अजन्मा शब्द आ जाने से जन्म लेना सिद्ध नहीं हो सकता तो आत्मा के लिए भी जन्म आया है तो जन्म कैसे हो रहा है उसका किसी शरीर के रूप में कैसे धारण कर रही है अगर धारण कर रही है कोई रूप ऐसा ले रही जो व्यवहार का विषय हो सकता है आंखों का विषय हो सकता है तो इसी प्रकार से भगवान का होता है आत्मा का दूसरा कारण है भगवान का दूसरा कारण
00:32:18:18 है अब आ जाते हैं भाई इनकी ओर से एक और गप्प मारी गई वो जो वृद्ध को पकड़ा है कितने में पकड़ा है मुझे नहीं पता है कैसे पकड़ में आए नहीं पता है क्यों अपनी मट्टी कुटवा के लिए राजी हो गए नहीं पता है और कभी-कभी मुझे ये भी लगता है ये जो व्यक्ति है जो प्रलाप कर रहा है इस तरह का पीछे मतलब वो अपना चैनल का नाम चेंज कर लिया और य ये जो प्रलाप कर रहा मुझे मुझे लगता है कि जानबूझ के यह ऐसा चाहता है कि मेरी खिल्ली उड़े या मेरा अपमान हो ऐसी चीजें कर रहा है कई बार मैं देख चुका हूं जैसे इस वीडियो में इसने कहा कि जो शंकराचार्य है वो ईश्वर को साकार नहीं मानते थे ठीक है व्यवहार परमार्थ की शंकराचार्य ने बात नहीं की ठीक है और इससे पहले एक वीडियो बनाया था तो उसमें मुझे हंसी आई थी जहां पर कंपैरेटिव केवल मोक्ष और सायुज मोक्ष की बात हो रही है तो उसमें आदि शंकराचार्य सायुज मोक्ष के लिए कह रहे हैं कि सायुज्य मोक्ष प्राप्त कर लेने पर भी जो मुक्त मुक्त आत्मा होती है सायुज मोक्ष को प्राप्त करने वाली उसको ईश्वर विषयक कार्य करने को नहीं मिलते वो यह कार्य नहीं करती वो तो केवल केवल मोक्ष वाला ही करेगा उत्पत्ति स्थिति समार आदि जो कार्य है
00:33:33:18 वो ईश्वर के ही होते वो वहां कंपेरटिवली कैवल की बात हो रही है मगर वो केवल की बात एक पेज पीछे जो हो रही है उसको ना देख कर के केवल सायुज मोक्ष वाली बात से सिद्ध कर रहा है कि देखो तुम्हारे अनुसार भी मुक्ति मिल जाने पर भी ईश्वर के कार्य तुम नहीं करते भाई ईश्वर में जब विलीन हो गए ईश्वर और भक्त और भगवान एक हो गए तो भगवान जो कर रहा है व भक्त भी कर रहा है जो भक्त कर रहा भगवान भी कर रहा है ठीक है तो यह केवल मोक्ष है और सायुज मोक्ष के लिए व वो कह रहे हैं कि उसमें ऐसा ऐसा नहीं होता है तो वो मुझे बता रहे हैं कि आपके अपने गुरु ऐसा कर रहे तो मुझे ऐसा लगता है ये व्यक्ति चाहता है कि इसकी खुल्ली उड़े कोई या तो यह जिस पक्ष को प्रस्तुत कर रहा है उसका दुश्मन है यह चाहता है कि वो श्तो नाबूत हो जाए बर्बाद हो जाए पूरी तरीके से इसको लगा होगा कि आवान ऐसा है जो बारबार जो इस तरह की वीडियो बनाएगा और मैं इस तरह की बातें कगा तो कुछ कुछ ऐसी प्लानिंग लगती है पता नहीं क्या है खैर आगे चलते हैं अब बात आती है इन्होंने कहा कि भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी ने साकार ईश्वर को नहीं माना है कुल मिलाकर के और यहां यह बात करते समय उन्होंने यह तक कह दिया कि आदि शंकराचार्य जी ने ईश्वर को वैसा ही माना है
00:34:49:24 जैसा क्या कहते हैं इन्होंने माना है ये दयानंद जी ने अब सबसे पहले तो मैं ये कहूंगा एक बात अच्छी लगी कि किसी कारण वस धीरे-धीरे धीरे-धीरे ही सही आप जो है आदि शंकराचार्य जी की शरणागत होना शुरू हुए अच्छी बात है यही शुद्ध धर्म है आपको आना चाहिए मगर आप सामने से आ सकते हैं इस तरह से धीमी धीमी चाल और छुप छुपा के आने की आवश्यकता नहीं है आपके भाई हैं आपको सहर्ष स्वीकार करेंगे सामने से आइए इस तरह से अप्रत्यक्ष रूप से कि भाई आलंबन तो लेना पड़ेगा अगर धर्म की स्थापना करनी है ईश्वर को सर्वशक्तिमान से करना है तो शंकराचार्य का आलंबन तो लेना पड़ जाएगा तो कैसे करें कि ऐसे करते हैं कि जो शंकराचार्य के बारे में बताया जा रहा है वह गलत है हम जो बता रहे वो सही है वेद के ही मंत्रों का अर्थ बताया जैसे सस प्रतिमा जैसे नाथस प्रतिमा आता है तो दूसरी जगह सहस प्रतिमा भी आया नहीं तो वेद नहीं तो लिखा न तस प्रतिमा तो वो तस प्रतिमा अस् जी जी सहस्त्र प्रतिमा शंकराचार्य जी को ले लो जी शंकराचार्य जी ने शंकराचार्य जी ने पुस्तक लिखी है उसका नाम है एक छोटी पुस्तक उन्होंने
00:36:05:07 परा पूजा अब उसमें क्या लिखा है उसमें स्पष्ट एक जगह नहीं दो जगह नहीं तीन जगह नहीं चार जगह लिखा है हम थोड़ा सा विषय से अलग हो रहे हैं जसे शंकराचार्य शंकराचार्य ने परा पूजा भी लिखा है और मणि रत्न माला भी लिखा है भज गोविंदम भी लिखा है तो शक देखो ऐसा है शंकराचार्य जी ने जो लिखा है वो तीन बार यदि अलग अलग चीज लिखी तो आप उसको किससे प्रमाण किससे मानोगे वेद से ही तो मानना पड़ेगा इसमें य मानना पड़ेगा नहीं वेद में भी ऐसे मंत्र है वेद में इस बात करते खैर अब बात करते शंकराचार्य जी ने साकार ईश्वर की बात की है कि नहीं की है प्रथमा पूजन की बात की है कि नहीं की है तो अब बात ये आती है जैसे इन्होंने माना कि जितने भी उनकी तरफ से जो स्तुति लिखी गई है वो सब जो है मिलावट है ना और इनकी तरफ से केवल प्रस्थानत्रई ब्रह्म सूत्र का भाष्य और जो भगवत गीता का भाष्य इन्होंने स्वीकार किया है उपनिषदों का भाष्य उन्होने स्वीकार किया है तो इन्होंने कहा है उपनिषदों में भगवत गीता में उन्होने कहीं भी ईश्वर के साकार स्वरूप को नहीं माना कितना झूठ बोलोगे
00:37:20:13 बाबा और आप अपनी मट्टी कराने क्यों आ गए पहले तो मैं व्यवहार और परमार्थ का दे दूं आपको व्यवहार परमार्थ की बात कहां कहा की आदि शंकराचार्य जी ने सबसे पहले विवेक चूना मुनी परमार्थ की बात कर रहे हैं 228 नंबर के श्लोक में 235 नंबर के श्लोक में 309 नंबर के श्लोक में 406 नंबर के श्लोक में 431 नंबर के श्लोक में व्यवहार की बात हो रही है व्यवहार से निवृत्ति की बात हो रही है और इसके बाद आप अब जाते हैं भगवत गीता भाष्य यह तो आपने माना ना उन्होंने भगवत गीता भाष्य किया है इसी पर हम चित्त कर देंगे इसी प चि कर देंगे कैसे भगवत गीता में 268 में भगवान व्यवहार की बात कर रहे हैं और फिर 29 में परमार्थ की बात कर रहे हैं व्यवहारिक चीज अलग बता रहे हैं और 29 में परमार्थिक चीज अलग बता रहे हैं ठीक है व्यवहार का विषय अलग और परमार्थ का विषय अलग इसी प्रकार से आगे दो 69 में व्यवहार के बारे में और बात की है दो तीन बार तो ये सब देख लीजिए आप अब देखो हम क्या करते हैं ना कि हम व्यक्ति को उसी शस्त्र से मारते हैं जिस शस्त्र को
00:38:35:15 वो स्वयं कहता है कि मुझे शस्त्र से ही मारना बस मैं इस शस्त्र से ही मरना चाहता हूं और कोई नहीं मैं तो केवल डंडे डंडे से ही पिटना चाहता हूं और किसी से नहीं के पास ब्र दर्क उपनिषद है क्या नहीं होगा शायद दो तीन एक में लिखा है कि ईश्वर साकार भी है निराकार भी है ना और तीसरे अध्याय में शत श उपनिषद में लिखा है हे ईश्वर मैंने क्या बोला भाष गलत भाष गलत प्रक्षेप बहुत हो चुके तो अब इन्होंने कह दिया कि भाई उपनिषदों में और जो है भगवत गीता भाष्य तो भगवत गीता भाष्य में बवे अध्याय को पढ़ा आपने वहां सगुण उपासना को उन्होंने स्वीकार किया कि नहीं किया हम तीसरा चैप्टर पढ़ा आपने स्वेता शत्र उपनिषद का भाष्य में आदि शंकराचार्य जी ने भगवान का रूप उन्होंने स्वीकार किया कि नहीं किया इतने नेत्रों वाला विराट रूप उन्होंने तो नहीं कहा ये अलंकार है उन्होंने एज इट इज स्वीकार किया भैया और रूप की बात की है मूर्ति की बात की है छानो उपनिषद में बात की है और ले लो प्रतिमा की स्वीकार कर लिया उन्होने तो व्यवहार परमार्थ भी हो गया साकार निराकार भी हो गया और यह जो व्यवहार और परमार्थ की बात है और साकार और निराकार की बात है
00:39:50:24 अंधे हो गए हो क्या अंधे हो आंखों पर पट्टी बांध ली है क्या भगवत गीता का भाष्य हो ब्रह्म सूत्र का भाष्य हो या उपनिषदों का भाष्य हो कहां पर जो भगवान भगवत पा आदि शंकराचार्य जी उन्होंने पुराणों को नहीं लिया है हैं चले आए और साकार को नहीं मानते तरस आता है और बाबा आप तो अपना सोचना चाहिए था रास आता है या इतनी मट्टी करवाओ ग अब भाई जब वो पुराणों का आलंबन ले रहे हैं जगह जगह पर प्रमाण के रूप में भगवत गीता भाष्य में उन्होने पुराण का आलंबन लिया है मणि रत्न माला में उन्होंने कहा जब लास्ट में शिष्य पूछता है कि अंत तो गत्वा में जीव भाव को प्राप्त हो गया मैं करूं क्या तो क्या बोलते मणि रथ माला में काम के शत्रु शिव की पूजा करो
00:40:50:08 और कंस के शत्रु श्री कृष्ण की पूजा करो और यह विष्णु पुराण का आलंबन भगवत गीता में अनेका अनेक पुराणों का आलंबन अपने इन्ही भाष्य में ज जगह अरे ये परा पूजा परा पूजा किया करते हो जो देखो अलंकारी परा पूजा परा पूजा किया करता है अरे भाई परा पूजा कहां से आई है जो हाथ में पकड़े हैं गीता प्रश् से ना क्या गीता प्रश्न है विवेक चुनाम को वो नहीं माना प्रामाणिक भगवत गीता भाष्य को प्रामाणिक नहीं माना आपने भी माना है और उसमें पुराणों की व्याख्या साकार स्वरूप की व्याख्या है व्यवहार परमार्थ की व्याख्या है पर उनके भगवत गीता के भाष्य को वहां वहा पर मानोगे जहा उन्होंने निराकार की बात की होगी भग जो गीता प्रेस से प्रकाशित उन ग्रंथों को मानोगे आदि शंकराचार्य के संदर्भ से जहां उन्होंने परा पूजा में निराकार की बात की होगी उन्हीं से प्रकाशित जो मणि रत्न माला है उसको नहीं मानोगे क्योंकि उसमें साकार की बात हो रही है भगवान की पूजा की बात हो रही है भगवान की भक्ति की बात हो हो रही है वाह मेरे दोगले भाइयों वाह आपसे बड़ा दोगला नहीं देखा मैंने
00:42:05:13 अजीब बात है सोच तो लो पुराणों में भगवान साकार स्वरूप नहीं है भगवान का भाग गए हो गया करारी किरकिरी और अंततोगत्वा एक सबसे बड़ी हंसी की बात मुझे ये आती है सबसे ज्यादा हंसी मुझे इस बात पर आती है कि तुम अवतार ना लेना किसके लिए कह रहे हो कि हम ज्यादा जानते हैं जहां से हमें उसके ग्रंथ प्राप्त हुए हैं हम वो नहीं जानते मगर हम ज्यादा जानते हैं जबकि जीवन भर हम उसकी बुराई करते रहे व्यक्ति की और हम यह जानते हैं कि उस उसने कभी भी जो भगवान है उसका अवतार लेना स्वीकार ही नहीं किया उसका साकार होना स्वीकार ही नहीं किया किसके लिए कह रहे हो जिनका ईश्वर जगत बनाता ही नहीं बनता भी है किसके लिए कह रहे हो जिनका ईश्वर जगत बनाता ही नहीं बनता भी है यानी कि व्यवहार में ना आ सकने वाले रूप से व्यवहार में आ सकने वाले रूप में जिसका ईश्वर अवतरित होता है अरे भाई अवतार लेना नहीं मानते हो मगर इतना तो मानते हो कि वह जो अद्वैत को मानते थे ब्रह्म ही सृष्टि में आता है प्रपंच में दिखाई देता है
00:43:21:04 इतना तो मानते हो तो जब ब्रह्म मनुष्य के रूप में जीव भाव को प्राप्त हो रहा है तो अवतार भाव को क्यों नहीं प्राप्त होगा अरे भाई इस इतने अंश में तो आपने ब्रह्म को साकार स्वरूप लेता हुआ मान लिया ना पृथ्वी के रूप में मनुष्यों के रूप में व्यवहार का विषय बनने वाला स्वीकार करना पड़ेगा ना अगर शंकराचार्य के सिद्धांत को देखोगे तो जिसका ईश्वर जगत बनाता ही नहीं बनता भी है उससे तुम कह रहे हो कि ईश्वर अवतार नहीं लेता इनका वाह
00:43:54:00 वाह इतने बड़े भैया कहां से ला हो गप्पे मारन वास्ते अब मैं आपसे पूछता हूं कि भाई आपके पास वेदों का ज्ञान कहां से आया वो तो आप लोग पता नहीं पाए आज तक कि वेद आपके वेद मंत्र कैसे मिले अब प्रत्यक्ष रूप से आपको भी यही मानना पड़ेगा जो पुराण आदि शास्त्रों को मानने वाले वैष्णवास्त्र सुखदेव जी के रूप में या आपके य भी य सब मानना शुरू हो गया है अनकहे शब्दों में अवतारवाद भगवान आके जो कर जाते हैं सीधी व्यवस्था तो यह शंकराचार्य जी का ज्ञान आप तक कैसे आया अगर भाई आप कोई ग्रंथ उठा रहे हो उनके नाम से वह ग्रंथ आपके हाथ में कैसे पहुंचा जहां से पहुंचा है उन्हीं को तुम क्लेम कर रहे हो किय शंकराचार्य के नाम से जो है गलत बातें फैला रहे हैं अरे भैया व्यवहार और परमार्थ को तो तुमने भी माना है जो मैंने अभी थोड़ी देर पहले बात बताई कि ईश्वर सर्वत्र एक स्वरूप
00:45:09:01 में व्याप्त है और यदि ईश्वर के द्वारा कोई कार्य होना उसका कहीं किसी एक जगह पर सक्रिय होना है तो ये पहली बात तो अवतार हो गया सगुण वो निर्गुण निराकार से सगुण निराकार अवतरित हो गया ईश्वर और दूसरी बात कि ये जो एक रस वाली बात है व्यवहार में ना आ सकने वाली स्थिति की बात है बात तो आपकी सत्यार्थ प्रकाश में भी हुई है हा सत्यार्थ प्रकाश में भी तर्क में ना आ सकने वाली स्थिति को स्वीकार किया गया है होती है कोई कोई स्थिति जो तर्क में नहीं आ सकती तो जो तर्क में नहीं आ सकती व्यवहार में नहीं आ सकती उस उस स्थिति के समय ईश्वर होता है कि नहीं होता है वही है परमार्थिक रूप ईश्वर का और अगर वह परमार्थिक रूप है जिसको आपने स्वीकार कर लिया तो फिर व्यवहारिक रूप उससे अलग हो गया कि नहीं जो सृष्टि बनाने वाला रूप है व अवतरित हो गया कहां से परमार्थिक रूप से जो व्यवहार में ना आ सकने वाला रूप है वहां से क्या और थोड़ी भाषा शैली अच्छी करो हम लोग उटपटांग शब्दों का उपयोग नहीं करते हैं अब बात य आती है कि मैं दोबारा से टॉपिक पर आ जाता हूं एक बात कही गई हमारे लिए कि आदि
00:46:24:09 शंकराचार्य जी के नाम से जो ज्ञान बांटा जा रहा है है वो सब लोगों को ढोंग है मूर्ख बना रहे हैं हालांकि सबका हमने तिया पाचा कर दिया सारे क्लेम का मैं अभी ये बात पूछ रहा हूं कि सत्यार्थ आदि शंकराचार्य जी ने तो जगह-जगह अपने ग्रंथों में अपनी चीजों में परंपरा प्राप्त गुरुओं की बात की है परंपरा का आलंबन उन्होंने लिया है ठीक है मगर बात ये आती है कि आप तो परंपरा को मानते नहीं है तो इसका अर्थ पता है क्या है कि आपके ग्रंथ के नाम पर कोई व्यक्ति कुछ भी कह सकता है मैंने कई बार कहा है अब मैं कह रहा हूं कि सत्यार्थ प्रकाश के द्वारा जो आज जो चीजें फैल रही है वह उसमें बहुत सारे प्रश्न चिन्ह है क्योंकि दयानंद जी तो अद्वैत वादी थे कैसे उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में यह लिखा कि भगवान की भक्ति करने से भगवान के गुण हमारे अंदर आ जाते हैं ये लिखा अब भगवान के जब गुण आएंगे तो उत्पत्ति समार भी तो आएगा हो गया एकत्व हो गया अद्वैत और यह बात हमने पूछी भी थी तो जो आज के जो अपने आप को अलंकार समाज आर्य समाज का जो फॉलोअर
00:47:39:15 बताते हैं वह तो कह रहे हैं कि भाई इसका हमारे पास कोई उत्तर नहीं है मगर उत्पत्ति स्थिति समार वाला गुण नहीं आता है दूसरे गुण आते हैं दया आती है क्षमा आती है इस तरह के गुण आते हैं वो उस पर भी प्रश्न है बुद्धि तो मांगना ही पड़ेगी आपके पास बुद्धि को इसकी सीमा मत रखो अनंत है तो उसको बढ़ाना है हमें निरंतर वेद कहता है कि तो ईश्वर अगर बुद्धि भी देता है अलग से उत्पत्ति स्थिति संभ बु और क्या कहते हैं कर्मों का फल तो इसमें ये कहां आ रहा है कि वो अलग से आपकी प्राथना सुनिए बुद्धि तो उसने जो आपको देना था दे दिया सुनि बुद्धि सब में है बुद्धि सब में है नक्सलवादियों में भी बुद्धि है आतंकवादियों में भी बुद्धि है और दुनिया के जितने भ्रष्ट काम करने वाले सब में बुद्धि है परमात्मा देखिए उपासना का क्या अर्थ हुआ परमात्मा को इसके साथ में उपासना से जोड़ो कि दया दयावान है कि नहीं ईश्वर क्योंकि दयावान है वह एक ही काम कर रहा है कि आपको सृष्टि बना के दे रहा है यह दया है उसकी और सृष्टि में फसना तो जीव के लिए बंधन है यह दया है उसकी अगर एक मात्र सृष्टि को बनाने से ही उसकी दया सिद्ध होती तो यह दया थोड़ी ना है यह तो निर्दयता है
00:48:54:26 क्योंकि सृष्टि में सृष्टि बना के दे रहा उसम जीव को डाल रहा है जीव जो है बंधन में आ रहा है इस सृष्टि में सृष्टि से पहले वो मुक्त था तो सृष्टि बना के उसमें उसको फसा के तो वो निर्दयता दिखा रहा है ईश्वर दयालुता कहां से शुद्ध हो रही है खैर बैक टू द पॉइंट पॉइंट यह है कि अगर ईश्वर के गुण आ जाते हैं तो यहां से तो अद्वैत ही हो गए दयानंद जी तो इसका मतलब उनके नाम से जो उनके जो स्वयं को फॉलोअर कहते हैं कि हम बहुत बड़े दयानंद है वो सब से प्रश्न हो जाता है वो सब आज मतलब एक तरीके से ढोंग कर रहे हैं लोगों को गलत बता रहे हैं तो ये प्रश्न है फिर तो दयानंद तो अद्वैत सिद्ध हो जाते हैं जबकि आप लोगों के पास तो प्रामाणिक परंपरा भी नहीं है आप लोग तो यही नहीं सिद्ध कर सकते हो कि हम दयानंद वादी हैं कि नहीं है अलंकार वादी है कि नहीं है सत्यार्थ प्रकाशवादी है कि नहीं है त्रवादी है कि नहीं है यही नहीं सिद्ध कर पाओगे क्यों क्योंकि परंपरा परंपरा व्यवस्था है ही नहीं कौन बोले प्रामाणिक रूप से लौकिक सिद्धांत लाओगे सनातन सिद्धांत होगा नहीं लौकिक सिद्धांत काम करेगा नहीं कैसे सिद्ध करोगे कोई भी व्यक्ति स्वयं को प्रामाणिक आर्य समाजी सिद्ध कर सकता है
00:50:11:07 क्या लौकिक सिद्धांत को ले आओगे देखो हमने रजिस्टर्ड करवाई संस्था आर्य समाज के नाम से मैं भी करवा लू हो जाऊंगा प्रमाणिक मान लोगे आर्य समाजी हम तो दो चीजें एक कि दयानंद जो थे वह अद्वैत वादी थे भाई दीक्षा तो ली ही थी और उनके नाम से जो कथाएं कल्पित है कि उन्होने दंड फेंक दिया व सब गप्पे हैं अद्वैत थे अद्वैत फैलाने गए थे किसी ने उसमें उनके झोल कर दिया उनके ज्ञान मन में और अब दूसरी चीजें फैल रही है उनके नाम से नहीं तो बताओ इसका अर्थ क्या है कि उनकी भक्ति करने से उनके गुण आ जाएंगे और दूसरी बात ले लो भूर भुवा स्वाहा गायत्री मंत्र तो इसका अर्थ क्या है इसका अर्थ है कि जो भगवान है सच्चिदानंद स्वरूप है ना वो हमारे को सत के लिए प्रेरित करें प्रचोदयात यही अर्थ है ना सत के लिए भगवान ऐसी हम कामना कर रहे हैं भगवान हमें सत के लिए प्रेरित करें तो यहां पर क्या हुआ कि भक्ति से फल की कामना हो रही है जबकि भक्ति से भगवान कोई फल नहीं देते
00:51:26:18 तो कामना का कामना का अर्थ क्यों लिया जा रहा है तो गायत्री मंत्र को यदि स्वीकार करता है आर समाज तो फिर अगर दयानंद जी ने गायत्री को स्वीकार किया तो भक्ति का फल देने वाला मान लिया ईश्वर को मान लिया ना या तो वो गायत्री को स्वीकार ना करें या फिर कोई दूसरा अर्थ बताए गायत्री का उसमें से वो हटा दे प्रचोदयात कि भगवान ऐसा करे यहां कामना हो रही है चलो भाई वहां से तो आपने मुंह मोड़ लिया वहां भगवान श्री कृष्ण की जब बात आती है तो वहां देते कि वो संभवत ऐसा कह रहे हो यदा यदा धर्मला भवती भारता वाला श्लोक आता है उसके संदर्भ में आर समाज के द्वारा एक क्लेम कर दिया जाता है कि यहां पर भगवान अपना जन्म लेने की बात नहीं कर रहे हैं वह भगवान से कामना कर रहे हैं और वह है आप्त पुरुष तो जब हमने पूछा कि जब वो आप्त पुरुष है तो व ऐसा कार्य क्यों कर रहे हैं जिसके लिए शास्त्रों का विधान ही नहीं है कामना करने का विधान नहीं है
00:52:27:01 तो आप्त पुरुष का कामना क्यों कर रहा है ऐसा ऐसा कार्य क्यों कर रहा है जिसका कोई वही नहीं है परवन भाई भक्ति का फल नहीं देता ना ईश्वर आज जो आर समाज के नाम से फैलाया जा रहा है भाई वह बहुत विरुद्ध हो रहा है दयानंद जी के य देखिए आप गायत्री मंत्र को दयानंद जी ने स्वीकार किया गायत्री मंत्र में भगवान से प्रार्थना की जा रही है कि हमें यह भक्ति का फल दो आप कामना कर रहे कि हमारे हमारा ऐसा करो कहने से भगवान यानी प्रार्थना भक्ति कर से भगवान नहीं करता है आज के आर समाज के अनुसार जबक गायत्री मंत्र के अनुसार भगवान से फल की कामना की जा रही है भक्ति करने के आधार पर तो यह सब बातें हैं तो किरकिरी मत कराया करो और यह आर्य समाज के नाम पर दयानंद जी के नाम पर यह ढोंग फैलाना बंद करें अगर इन सब बातों का उत्तर नहीं है तो और कि वो त्रवादी थे या वो जो है निराकार को मानते थे वो तो यहां पर अद्वैतवाद हो रहे हैं भगवान के गुण आए जा रहे हैं ठीक है यह सब बातें हैं और मैं बूढ़े बाबा से कहूंगा वृद्ध है आप थोड़ा अपना मर्यादा का ध्यान रखिए जिस व्यक्ति के साथ आप दिख रहे हैं लोगों
00:53:42:07 को उस व्यक्ति की छवि अच्छी नहीं है अपनी संस्था वालों ने लात मार के निकाल दिया उसको हां उसको निकालना पड़ गया उसको जाकर के जिन शंकराचार्य की आज आज वो बुराई कर रहा है अभी कुछ दिन पहले फोटो खिंचाई कि देखो मैंने माथा टेक लिया क्यों खिचाई थी क्योंकि आवान ने परेशान कर रखा है रात में सपने नहीं आ रहे हैं नींद नहीं आ रही है उठ उठ के खटिया से खड़े हो जा रहे हैं रात के दो दो बजे तीन तीन बजे खड़े हो जा रहे हैं सर्वशक्तिमान कैसे सिद्ध कर परंपरा कहां से लाऊ अपनी खड़े हो जा रहे हैं तो उस चक्कर में जिनको हम नहीं भी मानते जिनके प्रति मन में अपार विरोध है उसके य भी माथा टेक लेंगे उसके लिए हम नाक भी रगड़ लेंगे मगर फिर भी नहीं हुआ तो अपनी असलियत भी वापस ले आएंगे क्यों थोड़े दिन पहले तो सम्मान दिखा रहे थे अब फिर वो ढोंगी होंगी इत्यादि जैसी संज्ञा दे रहे हो तो इसलिए बूढ़े बाबा आपसे कहूंगा वृद्ध है बड़े हैं आयु में ऐसे लोगों की संगत में ना पड़े अपनी मट्टी ना करवाए और बाकियों से कहूंगा अवतारवाद के विषय में पर्याप्त मैंने आज सामग्री आपको प्रोवाइड करा दीए आदि शंकराचार्य जी के व्यवहार परमार्थ के विषय में भी करा दिए और जिसका ईश्वर जगत बनाता ही नहीं बनता
00:54:57:09 भी ये तो मानो यार अद्वैत है जब अद्वैत है तो ईश्वर ही तो मनुष्य के रूप में आ रहा है यह तो अवतार हो गया यह कहां ले जाओगे यही से अवतार सिद्ध हो गया बद्ध जीव के रूप में तो कम से कम मनुष्य बन के आ ही रहा है ना अवतरित हो गया ना कैसी बात करते हैं भाई और यहां पर मैं कहूंगा जो वृद्ध स सज्जन है आपकी भाषा शैली जी आपका जो व्यक्तित्व है जो आपका प्रस्तुतीकरण है वो बिल्कुल भी य जो आपने वक्तव्य दिए हैं ट पटांग मन गणन इससे बिल्कुल मैच नहीं करता है सभ्य हो जाइए सभ्य लोगों के साथ उठना बैठना शुरू करिए गाली बाजों के साथ
00:55:44:04 नहीं गाली बाजों के साथ से दूरी बनाओ नहीं तो आप आपको भी उसी श्रेणी में गिना जाने लगेगा जिसके साथ बैठे हैं ना गाली बाज है गाली बाज और क्याक बाज है वो पता नहीं चलिए जय श्री राम [संगीत]
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