⬜ Not used yet · 00:00:01:27 – 00:09:07:24 (9:06)
00:00:01:27 एक बहुत बड़ी मिथ्या आ जाती है इनके द्वारा प्रचारित प्रसारित की जाने वाली कि शास्त्रों का जो भी सार आपको मैंने अभी तक बताया उसको इस बात पर टकराएंगे कि भाई तुम जो भी शास्त्र प्रमाणिक बता रहे हो प्रमाणों का अर्थ बता रहे हो वह सब तुम्हारी जो व्याख्या वो गलत है क्योंकि व्याख्या तो तत्वदर्शी संत की मानी जाएगी और व तत्वदर्शी संत तत्वदर्शी कैसे सिद्ध होगा भगवत गीता से बात पहली बात तो वही आ जाए रे पास भगवत गीता आई कैसे जिसके आधार पर तुम्हे यह पता चला कि तत्वदर्शी कहते हैं खैर इसम बाद में आएंगे पर पहले इनकी बात का इन्हीं की बात से वो करेंगे तो भगवत गीता 4 चौ द्वारा धर्म का ज्ञान लेने हेतु तत्वदर्शी के पास जाने का निर्देश दिया गया है दूसरी ओर भगवत गीता 15 एक के अनुसार जो संसार रूपी उल्टे वृक्ष को तत्व से जानता है वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है यह बताया गया है तत्वदर्शी नहीं कहा गया है आपकी बात से यह सब वैसे जैसी बात मगर जिस तरह से आप बात करते हो वैसे ही उन्हीं शब्दों में बात कर रहा हूं वहां पर वेद को जानने वाला कहा गया है तत्वदर्शी नहीं कहा गया है उल्टे वृक्ष को बताने वाला तो पहली बात जिस के ऊपर आपने तत्वदर्शी की इमारत खड़ी कर
00:01:16:27 रखी है कि चार चौ में तत्वदर्शी वहां पर देखो वेद को जानने व वेद को जानने वाला कहा है तत्वदर्शी नहीं काहा है अब दूसरी बात यह है कि यदि य मान भी लिया जाए कि उल्टे वृक्ष की जो व्याख्या करेगा संसार रूपी उल्टे वृक्ष की जो व्याख्या करेगा वह तत्वदर्शी संत है तो जितने गीता प्रेस के जो जिन्होंने अनुवाद किया है भाष्य किया है वह सब तत्वदर्शी संत है और है भी स्वामी राम सुखदास जी हैं जय दयाल गोयंका जी हैं इन सबने किया है उस उल्टे वृक्ष की व्याख्या की है संसार रूपी ये भी तत्वदर्शी हो गए है ना अब इन लोगों को आप तत्वदर्शी नहीं मानोगे क्यों नहीं मानोगे य आपके पास जवाब नहीं है हमें यह मानना होगा कि केवल उल्टे वृक्ष के रूप में संसार की व्याख्या कर देने पर तत्वदर्शी नहीं माना जाएगा और भी उस पर नियम लागू होंगे व कौन से नियम है नहीं सोचा नहीं समझा नहीं जाना जितनी चाबी भरी दास ने उतना चले खिलौना तो अब सुनो शास्त्र में क्या कहा जा रहा है तत्व संत के लिए प्रामाणिक आचार्य के
00:02:31:28 लिए गुरु सन्यासी विरक्त ब्रह्मचारी होना चाहिए मनुस्मृति 12वां अध्याय 112 से 114 मनुस्मृति की प्रमाणिकता पहले दे आया हूं मनुस्मृति की प्रमाणिकता में और क्या है वाल्मीकि रामायण में भी भगवान श्री राम ने जो है अ जब बाली को तीर मारा तो वहां पर भगवान श्री राम ने मनु महाराज के वचन बताते हुए म मनुस्मृति के श्लोकों को ज्यों कि त्यों वहां पर रखा है ज्यों कि त्यों यह मनुस्मृति की प्रमाणिकता है मनुस्मृति संविधान है हमारा संविधान तो मनुस्मृति कह रही है ब्रह्म धर्म में संशय होने पर अधिष्ठाता ब्रह्मचारी को बनाए और ब्रह्मचारी सन्यासी ही आचार्य बनता है 11 पा 16 वह मेले में मुझसे गड़बड़ हो गई थी 117 16 कर दिया था अच्छा हुआ उसके उसकी वजह से आप लोगों ने बहुत सारे वीडियोस बना दिए और हमारा वो वीडियो और ज्यादा देखा गया इसका ज्ञान परंपरा से प्राप्त होता है कैसे प्राप्त होता है परंपरा से कहां कहा बोला जा रहा है मांड उपनिषद में बोला जा रहा है छंद उपनिषद में बोला जा रहा है निरुक्त में 13 11 में बोला जा रहा है निरुक्त एक 665 में बोला जा रहा है मुंडकोपनिषद में बोला जा रहा है एक एक
00:03:47:16 दो से चार में और एक दो 12 में सपद ब्राह्मण 11 पाछ श्रीमद् भगवत गीता 3 16 श्रीमद् भगवत गीता चार दो छंद उपनिषद 6 14 दो 4 नती सब बोला जा रहा है परंपरा परंपरा से प्राप्त होता है ज्ञान इसी क्रम में क्योंकि शिक्षा देने का कार्य जो है द्विज का होता है तो द्विज भी परंपरा से होना चाहिए जो द्वि जत्व यानी जने संस्कार उसके पीछे से पुरखों के यहां होता चला आया हो वही आचार्य बनेगा उसी का जने होगा उसी का यज्ञ पवित होगा और वही आचार्य बनेगा कहां लिखा है भागवत पुराण 7 11 13 मनुष मति 1888 मनुस्मृति 1074 76 ऋग्वेद 1
00:04:38:01 149.5 वह शिक्षा देते समय सनातन धर्म के किसी भी परंपरा प्राप्त प्रामाणिक शास्त्र का खंडन ना करता हो जो परंपरा प्राप्त प्रामाणिक शास्त्र है वो खंडन ना करता हो कि भगवत गीता की इतनी बात मानो उतनी बात काल की बता दो वो भी आ रहा हूं उस पर भी आऊंगा छोडूंगा नहीं एक भी मिथ्या नहीं छोडूंगा आता हूं उस पर एक बात कहां लिखी है सामंजस होना चाहिए सभी शास्त्र में मत्स पुराण 145 वा अध्याय 5वा समस्त सुति स्मति सत स्मार्थ जो धर्म होते हैं उनको मिलाकर जो धर्म बनता है वह साधु सम्मत धर्म है अंततोगत्वा गुरु वही है जो अपने शिष्य का संशय दूर कर दे अद्व तार का उपनिषद 16 स्कंद पुराण गुरु गीता 33 स्कंद पुराण गुरु गीता 191 संचय क्या है क्या ईश्वर सर्वशक्तिमान है
00:05:32:14 क्या वह ऐसा है जिसके ऊपर कोई नियम लागू नहीं होता बल्कि सभी नियमों के बल्कि सभी नियमों को बनाने वाला व सर्व नियामक है अगर वह सर्व नियामक है उसके ऊपर कोई लागू नहीं होता नियम तो क्या वह जन्म ले सकता है माता के गर्भ से क्या वह अपनी देह का नाश कर सकता है यदि नहीं कर सकता तो यह ईश्वर कैसा यह मेरा संशय है अब इस संशय को आप दूर करोगे नहीं तो तो क्या हुआ संशय दूर नहीं हो रहा है तो क्या हो रहा है कि गुरु वही जो संशय दूर करते यानी कि जो संशय को दूर नहीं कर रहा है वो गुरु नहीं है संशय रूपी अंधकार को नहीं मिटा पा रहा वो गुरु नहीं है ठीक है तो इनसे भी यहां पर भी हमें पता चल गया प्रामाणिक आचार्य के क्या-क्या लक्षण है इसमें से एक चीज है कि प्रामाणिक आचार को दूर से अगर देखे तो कौन सा लक्षण दिखाई दे रहा है ब्रह्मचारी सन्यासी यानी कि विरक्त होता अब बात करते हैं भ गीता में क्या कहा गया है उस लक्षण के बारे में तो भगवत गीता 434 में भगवान ने तत्वदर्शी संत के पास जाने को कहा ठीक है बिल्कुल अब वह तत्व ज्ञान क्या है जिसको जानकर फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होता व तत्व ज्ञान क्या
00:06:48:03 है वह स्वयं के साथ प्राणी मात्र की एकमात्र प्राणी मात्र में भी और तद उपरांत परमात्मा को देखना अपने अंदर समस्त प्राणियों में स्वयं को और फिर समस्त प्राणियों को स्वयं में देखना और तद उपरांत परमात्मा के साथ एकत्व को देखना यह तत्व ज्ञान है इसको तत्व ज्ञान बोला गया है वेद को जानने वाले को तत्व दर्शी नहीं बोला गया तत्वदर्शी कौन है जिसको तत्व ज्ञान हो तत्व ज्ञान किसे कहा गया है जो समदर्शी हो समय ईश्वर को देखे समय ईश्वर को देखे और ईश्वर में सबको देखे जो सम हो यह बात कहा लिखी है भगवत गीता 435 ईवास उपनिषद सात और भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि उन्हें यथार्थ रूप से जानना एक तो यह हो गया तत्व ज्ञान और क्या है तत्व ज्ञान तो क्या
00:07:48:06 है जिसको जानने के बाद कुछ भी जानना बाकी ना रह जाए तो एक तो तत्व तत्व ज्ञान वो हो गया और एक यहां पर भगवान कह रहे हैं कि ऐसा क्या है जिसको जानने के बाद कुछ भी जानना बाकी नहीं रह जाता है तो उन्हें जान लेना श्री कृष्ण को जान लेना भगवान श्री कृष्ण को जान लेना ऐसा ज्ञान है जिसको जान लेने के बाद कुछ भी और जानना बाकी नहीं रह जाता यह कहां लिखा है भगवत गीता सात दो भगवत गीता सात तीन और
00:08:24:00 फिर यहां तक हमने यह जान लिया कि तत्व ज्ञान वह ज्ञान है जिसको प्राप्त करने के बाद पुनः जन्म तथा मरण के चक्र में नहीं आना पड़ता अब आगे भगवान श्री कृष्ण ने बताया है कि उनके बाल उनके बारे में क्या जान लेना है जिसके बाद जन्म और मरण के बंधन से मुक्त हो जाते दोबारा संसार में नहीं आना पड़ता जीवन और मरण से मुक्त हो जाते हैं वो क्या है तो जो मुझको अजन्मा अर्थात वास्तव में जन्म रहित समझते हैं वो समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं पाप समस्त मुक्त हो गए तो जन्म और मरण का नहीं रहा कहां लिखा है 10 10.3 मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी यहां इन्होंने अपनी चीज बताई मैं अजन्मा अविनाशी होते
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00:09:07:24 हुए भी समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योग माया से
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00:09:14:28 प्रकट होता हूं यह कहां लिखा है श्रीमद भग गीता चाछ और यदा यदाई धर्मस्य गनि भवती भारता अनम धर्मस्य त् मानम सजाम हम भगवत गीता चार सात जब जब अधर्म की वृद्धि होती है धर्म की हानि होती है तब तब मैं धर्म की संस्थापन के लिए अपना सृजन करता हूं प्रकट होता हूं है ना तो अब यह सब जो बातें हैं इस प्रकार से भगवान श्री कृष्ण ने कहा इस प्रकार से जो मुझे तत्व से जान लेता है उसको दोबारा वह जो है जीवन मरण के बंधनों से मुक्त हो जाता उसको दोबारा संसार में आना नहीं पड़ता तो वो क्या था कि तत्वदर्शी कौन है इसको त ज्ञान तत्व ज्ञान क्या है एक तो तत्व ज्ञान वो है जो हमने जाना एक तो तत्व ज्ञान यह है कि जिसकी जो सर्वत्र सम दृष्टि हो जाए जो परमात्मा में सबको और सब में परमात्मा को देखे अपने आप के साथ भी एकत्व कर लेय हो गया और एक तत्व ज्ञान यह भी है कि भगवान को जान लेना भगवान के बारे में क्या जान लेना कि वह अजन्म में अविनाशी होते हुए भी वह अपनी योग माया से समस्त प्राणियों के ईश्वर होते हुए व प्रकट कर प्रकट होते हैं तो इस प्रकार से उनको जान लेना य तत्व ज्ञान है
00:10:30:27 तो तत्व ज्ञान हो गए और तत्व ज्ञान जिसको है वो तत्वदर्शी है उल्टे वृक्ष की व्याख्या करने वाले को तत्वदर्शी नहीं कहा तत्व ज्ञानी नहीं कहा और इसमें और देख लीजिए और क्या है अब इस तत्व ज्ञानी के लक्षण बताए हैं कैसे कि वहां पर तत्व ज्ञानी कौन है जो जीवन मरण से मुक्त हो जाता है तो यहां पर जीवन मरण से मुक्त होने वाले के बारे में बताया जा रहा है क्या बताया जा रहा है कि जीवन मरण के चक्र से मुक्त हो हो जाने वाले परम ज्ञान को जान लेने वाले रूप में यहां किसकी बात हो रही है उसी तत्वदर्शी की क्योंकि वो भी जीवन मरण से मुक्त हो जाने वाला है दोबारा उसको जीवन मरण के उसम नहीं आना पड़ता यहां भी जीवन मरण से मुक्त हो जाने वाले के बारे में बात हो रही तो यहां पर किसकी बात हुई तत्वदर्शी की बात हुई और यहां पर तत्वदर्शी की बात करते हुए उसके लक्षण बताए जा रहे हैं जिसका मान मोह नष्ट हो चुका हो जो सुख और दुख के द्वंद से मुक्त हो चुका हो जिसने इंद्रियों पर जीत पा ली हो जिसकी काम इच्छाएं नष्ट हो चुकी हो जो सुख और दुख के द्वंद से मुक्त हो चुका हो और जो नित्य शाश्वत परमेश्वर की साधना करता हो यह उसके लक्षण है तो यह भी
00:11:45:27 वैराग्य है काम इच्छाएं नष्ट हो जाना सुख और दुख से मुक्त हो जाना है ना जितेंद्रिय यह भी वैराग्य सन्यास यह कहां लिखा है श्रीमद् भगवत गीता पांच और छह में तो अब क्या हुआ श्रीमद् भगवत गीता की जब हमने क्रमानुसार अलग-अलग श्लोकों के एक जगह करके जब बात की तो यहां पर भी निस्तारण क्या निकला कि प्रम प्रमुख लक्षण जो है वैराग्य है तत्वदर्शी का प्रामाणिक आचार्य का प्रमुख लक्षण जो है वो वैराग्य है और पीछे भी हमने देखा अथर्ववेद 115 16 और मनुस्मृति इत्यादि में कि तत्वदर्शी संत का जो तत्व ज्ञानी संत है उसका प्रमुख लक्षण प्रामाणिक आचार्य का प्रमुख लक्षण क्या है सन्यास विरक्त अब इन्हीं की भाषा में इन्हीं के शब्द को पकड़ के इनको जवाब दे देते हैं इनका कहना है कि भाई भगवान ने तत्वदर्शी के पास जाने को कहा और इनके अनुसार जो संसार रूपी उल्टे वृक्ष की व्याख्या कर देता है वही तत्वदर्शी संत है हालांकि ये स्वामी राम सुख दास जी को तत्वदर्शी नहीं मानेंगे जिसकी जिनके द्वारा दी गई गीता प्रस की किताबें पढ़ रहे हैं वो सब नहीं उनको नहीं मानेंगे मगर ठीक है कि इनके अनुसार संसार रूपी वृक्ष की व्याख्या केवल किसने
00:13:01:03 की है इन्होंने की है हालांकि वहां पर क्या कहा गया है संसार रूपी उल्टे वृक्ष की व्याख्या करने वाले को वेदों को जानने वाला तत्वदर्शी नहीं कहा गया तत्व ज्ञानी नहीं कहा गया है ना तत्व ज्ञानी होता है वेदों को जानने वाला मगर मैं आपके शब्दों को पकडू ना जैसे आपने वेदों में प्रमाण है कबीर साहब भगवान ने बनाया ना ऐसे मैं आपके शब्दों को पकडू तो वहां पर तत्वदर्शी नहीं कहा गया वहां वेदों को जानने वाला कहा गया है तत्व ज्ञानी कहीं और कहा गया तत्व ज्ञानी यानी कहां कहां क आ गया तत्व ज्ञान क्या है उसके हिसाब से जीवन मरण के बंधनों से मुक्त हो जाने वाले की व्याख्या हो गई उसका प्रमुख लक्षण है सन्यास मगर अब हम थोड़ी देर के लिए दुर्जन तोष न्याय से ये मान लेते हैं कि नहीं भैया वहां पर जो है जो वेदों को जानने वाला कहा जा रहा है वो तत्व ज्ञानी के लिए ही कहा जा रहा है मगर आगे एक श्लोक छोड़ कर के 15वें अध्याय के पहले श्लोक से आपने यह जोड़ा कि यहां पर संसार रूपी उल्टे वृक्ष की जो व्याख्या कर रहा है वही तत्व ज्ञान है वेदों को जानने वाला ठीक है आपने जोड़ लिया हमने मान लि थोड़ी देर के लिए वही तत्व ज्ञान है उसी की बात आगे बताई जा रही है उसका प्रमुख लक्षण पता है क्या है वैराग्य 15.3 पढ़िए अध्ययन करिए तत्व ज्ञानी के लिए बोला
00:14:16:09 जा रहा है वहां पर कि जो यह जो संसार रूपी उल्टा वृक्ष है उसको मूल उसके मूल को काटने के लिए वैराग्य रूपी शस्त्र का आलंबन होगा वैराग्य रूपी शस्त्र तो तत्वदर्शी के पास क्या होना चाहिए वैराग्य तो नहीं कहां है अब आ जाते हैं एक और मिथ्या श्रीमद् भागवत में तीन प्रकार के पुरुष बताए गए हैं श्रीमद् भगवत गीता में तीन प्रकार के पुरुष बताए गए हैं क्षर पुरुष अक्षर पुरुष और एक और है परम अक्षर पुरुष वही ब्रह्म परम ब्रम अब परम परम परम परम परम परम लगता जाएगा अभी कल और आएंगे न्यू कबीर पंथी वो कहेंगे हम बताएंगे परम परम ब्रह्म परम परम परम परम परम ब्रह्म आएगा ही नहीं कभी वो परम की श्रंखला चालू हो जाएगी ब्रह्म गया तो क्या है तो इन्होंने कहा कि तीन प्रकार के श्रीमद् भगवत गीता 15 15.17 से 18 के आधार पर ये लोग बात करते हैं 15वें अध्याय के तो सर्वप्रथम जो तत्वदर्शी संत की व्याख्या है वह हमने देख ली
00:15:31:12 वह क्या है तो दंडी सन्यासी भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी जो हैं सन्यासी विरक्त वैराग्य है उनके पास वह जो यह श्लोक है जिसके आधार पर बोल रहे हैं तीन पुरुष हैं वह इस श्लोक की व्याख्या क्या कर रहे हैं परम ब्रह्म के ही दो भाव संसार में पुरुष नाम से कहे गए हैं परम ब्रह्म के ही दो भाव एक ही ब्रह्म है उसके दो भाव इसमें एक भाव नाशवान छर पुरुष है लीला रूप से दूसरा उससे विपरीत अक्षर पुरुष जो भगवान की माया शक्ति है तो लीला रूप से अलग-अलग दो हैं मगर तत्त एक ही है यही माया शक्ति क्षर पुरुष की उत्पत्ति का बीज है ठीक है श्रीमद् भगवत गीता शंकर भाष्य 15वां अध्याय सवा श्लोक सरल भाषा में कहे तो एक ही ब्रह्म जब सृष्टि की रचना करते हैं तो नाशवान प्रकृति के रूप में क्षर पुरुष उसके भोक्ता अविनाशी आत्मा के रूप में अक्षर पुरुष इन दोनों पर शासन और इन दोनों पर शासन करने वाले के रूप में पुरुषोत्तम कहलाते हैं एक ही परमात्मा क्षर पुरुष यानी प्रकृति इसका भोग इसका भोग करने वाला अक्षर पुरुष यानी जीव
00:16:46:24 और इन पर शासन करने वाला परम अक्षर पुरुष यानी कि भगवान पुरुषोत्तम कहलाते हैं व्यवहारिक भेद से भगवान श्री कृष्ण ने भी इस बात को कहा है क्या कहा है कि वह जो परम जो परमेश्वर है वह इनसे अलग व्यावहारिक भेद है तत्ता भेद नहीं है व हमने स्वेता सत्र उपनिषद से भी ले लिया तो व्यवहारिक वेद से वह कह रहे हैं अगर व्यवहारिक वेद कोई मानो कि ब्रह्म अलग है और क्या कहते हैं वो क्षर पुरुष अक्षर पुरुष अलग है तो उन्होंने जिस परमेश्वर की वहां बात की है कि परमेश्वर इ दोनों से अलग है वो कौन है भगवान श्री कृष्ण स्वयं वो कह रहे हैं कि वो मेरा उपासक है मेरा स्वामी मैं उपास्य हूं वो जो है अल्प शक्ति है मैं सर्वशक्तिमान हूं यह सब उन्होंने कहा तो उसकी अपेक्षा में सब प्रकार से उत्तम होते हुए उसके द्वारा प्राप्त करने के निमित्त मैं भजनी हूं ये किसने कहा भगवान श्री कृष्ण श्रीमद् भगवत गीता 15.1 यानी कि जब हम इन्ह अलग-अलग भी मान लेंगे तत्व ता तो अलग-अलग है नहीं अगर अलग-अलग हम इन्ह मान भी ले तो भी यह जो क्षर पुरुष के द्वारा अक्षर पुरुष के द्वारा जो उपास्य है वह कौन है भगवान
00:18:02:02 श्री कृष्ण कहां कहा उन्होंने 15.1 में अब बात आ जाती है कि इन सारी बातों को छोड़ भी दे तो क्या बात आ जाती है कि जिसमें क्षर अर्थात प्रकृति अक्षर अर्थात अविनाशी जीव तथा उत्तम पुरुष अर्थात सर्वज्ञ परमेश्वर भगवान श्री कृष्ण को बताया गया है परंतु यदि उपरोक्त व्याख्या को सही ना मा मिथ्या प्रचारकों द्वारा उनके ही अर्थ को उचित कहकर वित करने का प्रयास किया जाए तो ऐसे में निम्नलिखित जो कुछ मैं अभी बिंदु आपको बताने वाला हूं वह आपको विचारणीय हो जाएंगे क्या होंगे क्या उपरोक्त व्याख्या के विरुद्ध दी जाने वाली जो हमने जो व्याख्या दी है क्षर पुरुष की और अक्षर पुरुष की व्यवहारिक पार मर्थक तत्व तः दोनों जो इसके विरोध में दी जाने वाली जो व्याख्या है क्या वह सन्यासी होते हुए किसी परंपरा प्राप्त आचार्य तत्वदर्शी संत ने दी है सन्यासी है परंपरा से है तभी वो तत्वदर्शी है है नहीं है अगर ध्यातव्य यह भी है कि ब्रह्म और परम ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है हमने पीछे से देख लिया कई जगह आ गया परमात्मा तत्व को ही परम
00:19:17:07 तत्व को ही कहीं कहीं पर ब्रह्म कहीं कहीं पर परम ब्रह्म कहा गया है ब्रह्म परम ब्रह्म परमात्मा इनका एकत्व स्थापित करने वाले हमने अनेकानेक पीछे प्रमाण दे दिए यदि परम ब्रह्म और ब्रह्म अलग है तो तो प्रस्थानत्रई में से एक वेदांत दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित श्रुति शास्त्र का नाम ब्रह्म सूत्र क्यों है परम ब्रह्म सूत्र क्यों नहीं है जब ब्रह्म निचली एंटिटी है तो परम ब्रह्म के नाम से होना चाहिए ना सूत्र परमात्मा का जिक्र है उसम पूरे ब्रह्म सूत्र में अब बात करते हैं कि अगर अक्षर का अर्थ ब्रह्म माने और परम ब्रह्म को उससे अलग माने तो यह भी संभव नहीं है क्योंकि शति शास्त्रों में अक्षर का अर्थ परमात्मा लिया गया है अब बताइए क्या करेंगे श्रुति शास्त्र में ऋग्वेद 10 164 39 परमात्मा किसका अर्थ दिया जा रहा है अक्षर का और वैदिक वांगम की जो डिक्शनरी है निरुक्त उसमें दिया गया है 13 में जो उसका आध्या वो है आदि
00:20:32:16 जो परमात्मा के संबंध में जो अर्थ बताया गया है वह है अक्षर का अर्थ है परमात्मा परम ब्रह्म तो अक्षर का अर्थ यदि ब्रह्म है तो भी आप ही के अनुसार ब्रह्म और परमात्मा का एकत्व सिद्ध हो गया कैसे आप कह रहे हो अक्षर का अर्थ ब्रह्म है और शास्त्र कह रहे हैं अक्षर का अर्थ परम ब्रह्म है परमात्मा है तो वस्तु स्थिति यही है कि परम ब्रह्म और परमात्मा में और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है यह खेल है केवल एक केवल एक इमारत खड़ी की गई है मिथ्या की [संगीत]
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रामपाल का मिथ्या प्रचार Ep-5 #rampaljimaharaj @FactfulDebates @SatlokAshramNewsChannel
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