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00:00:02:10 तो सभी को जय श्री राम आप सभी जानते हैं कुछ समय पूर्व लखनऊ महोत्सव मेले में एक स्टॉल लगा हुआ था रामपाल का सतलोक आश्रम नाम से संभवतः उस स्टॉल पर कुछ इस तरह की पंक्तियां लिखी हुई थी दुर्गा माता का पति कौन है दुर्गा का पति कौन है ब्रह्मा विष्णु महेश का पिता कौन है इस तरह की पंक्तियां और अगर यह तथाकथित जो त तत्वदर्शी संत है रामपाल इन लोगों के अगर आप वीडियोस देखेंगे तो उसमें तो यह बहुत ही अभद्रता पूर्वक ऐसा कहते हुए मिल जाएंगे कि य देखो इनका बाप हो गया ना यह हो गया ऐसे तो वहां पर जाकर के हमने जब इन लोगों से चर्चा की वहां पर आपने वह वीडियो देखा होगा उस वीडियो में हमने हमने इनको ऐसा कुछ भी बताने का प्रयास नहीं किया कर कि यहां यह लिखा है वहां वो लिखा है जी के बारे में विष्णु जी के बारे में भगवान श्री कृष्ण के बारे में और आप कैसे कह सकते हैं कि कबीर इन सबसे श्रेष्ठ है और कैसे कह सकते कि इन सबसे श्रेष्ठ कोई अन्य जो दुर्गा का पति के नाम से आप खित करते हो जिसको आप सदाशिव कहते हो मगर वह सदाशिव

00:01:17:10 कौन है एक गलत एंटिटी जो काल है और एक उसका जो प्रासंगिक नाम आपके द्वारा बताया जाता है कि वोह है ब्रह्म और व है जो है ज्योत निरंजन और यह नहीं चाहता है कि जीवों को मुक्ति मिले और पता नहीं अनेक अनेक जो फैंटसीज हो सकती हैं इनकी वह सब उसमें बोली जाती है और जो सार और जो परमेश्वर है वह है कबीर जो सातवें आसमान पर बैठते हैं कुछ इस दुनिया को बनाते हैं यह वो कितने दिन में छह दिन में वह कुछ इस्लामिक वर्जन उतने में तो हमने यह सब बातें नहीं इनसे पूछी थी हमने सीधे बोला था कि जो ग्रंथ आप दे रहे हो इसमें जो ज्ञान है यह किस परंपरा से आपको प्राप्त हुआ क्योंकि संत कबीर दास जी थे वह स्वयं रामानंदाचार्य परंपरा के रा रामानंद जी के शिष्य थे और वह स्वयं राम के भक्त थे तो अगर आप यह कहते हैं कि कबीर जी ने वह ज्ञान नहीं दिया जो रामानंद जी ने दिया तो वहां गुरु विरोध सिद्ध होता है तो इस तरह का वहां पर हमारा वार्तालाप हुआ उनसे वो सारी चर्चा वीडियो में पड़ी हुई है कि हमें कई बार अप्रोच किया गया कि आप जो है एक शास्त्रों मीमांसा समीक्षा कुछ उपलब्ध

00:02:32:10 करा दो जितने क्लेम यह कबीर पंथी वाले रामपाल दास के फॉलोअर्स उठाते हैं शास्त्रों के आधार पर कुछ भड़काने का या शास्त्रों के विपरीत दिशा भ्रमित करने का जो कार्य करते हैं तो उनके लिए आप जो है प्लीज एक वीडियो बना दीजिए जिसमें कि सारी चीजें हो तो हमने कभी भी इसको यह जो यह रामपाल दा स जी का जो तंत्र है इसको कभी भी हमने अ प्राथमिकता नहीं दी थी इंपॉर्टेंस नहीं दी थी महत्ता नहीं दी थी और हमें नहीं लगता था कि हम हमको इनके शास्त्रोक्त जो है बातें निकालने की आवश्यकता है तो तब से लेकर अब तक हमने कभी भी ऐसा कोई शास्त्रोक्त वीडियो नहीं बनाया जैसे हमने हरिहर भेद का बनाया जैसे हमने जो आर्य समाज का जो क्लेम हो थे गुरु परंपरा के ऊपर और फिर जो क्लेम है उनके सत्यार्थ आदी में ईश्वर को लेकर के है ना ब्रह्म और धर्म को लेकर के तो ऐसा जैसे हमने वोह वीडियोस बनाए मगर हमने कबीर पंथ के द्वारा जो फैलाई जा रही जो मिथ्या हैं जो प्रचार प्रसार किया जा रहा है जिसके कारण समाज बट रहा है सनातनी आपस में विभाजित

00:03:47:19 हो रहा है उसको लेकर के कभी हमने वीडियो बनाना महत्त्वपूर्ण नहीं समझा मगर आज जाकर के इतनी ज्यादा अप्रोच हमें किया गया कि भाई बनाना पड़ेगा और यह करना पड़ेगा वह करना पड़ेगा तो इसलिए फिर अब आज जाकर के हम यह करने जा रहे हैं तो हमें एक दो चीजें जो है वहां पर बहुत ज्यादा प्राप्त हुई हमारे कमेंट्स में वह जो वीडियो था मेले वाली जो डिस्कशन था मेले में जो बातें हुई है उस वीडियो के कमेंट्स में उसके बाद जो एक दो और वीडियोस कबीर पंथिया से संबंधित हमने वीडियोस बनाए उसके कमेंट्स में दो चार पंक्तियां हैं जो वहां हमें भरमार मिली रहती है एक तो कुछ भी आप तर्क देते रहो कुछ भी प्रमाण देते रहो सामने वाला बोलेगा कबीर इज गॉड कबीर इज गॉड वही वो काजल वाला हाल काजल काजल काजल कबीर इज गॉड कबीर इज गॉड कबीर इज गॉड कुछ नहीं अच्छा दूसरा हमें सुनाई देता है उसमें भाव ऐसे आते हैं कि व्यक्ति ऐसे बोल रहा हूं हरियाणा की तरफ के लोग हैं ज्यादातर ओ विद में प्रमाण है ओए ओए कबीर साहब भगवान है ऐसा वो उसमें लिखा रहता य नहीं लिखा होता है वेदों में प्रमाण है

00:05:02:22 कबीर साहब भगवान वेदों में प्रमाण है कबीर साहब भगवान है एक आता है [संगीत] कि कि भैया व देवी भागवत के अनुसार ब्रह्मा विष्णु महेश के जो पिता है वह यह जो काल है ब्रह्म है सदाशिव यही और वह पूरा एक कोई अच्छा एक चीज और है वो संदर्भ देते हैं कहां लिखा है तो एक चीज और मैंने देखी कि इतना बड़ा तंत्र है मगर जो ग्रंथ गीता प्रेस वाले नहीं छापते हैं श्लोक के साथ श्लोका सहित नहीं छापते व कुछ ग्रंथ ऐसा होता है जो संक्षिप्त में छाप देते हैं जैसे कि देवी भागवत अब शायद आ गया हो तो बात अलग है मगर उन्होंने जब तक छापा था तो उन्होंने संक्षिप्त में छाप दिया था मतलब उन्होंने श्लोक ये उसकी श्लोक उसकी हिंदी ऐसे नहीं छापा था तो यह लोग जो प्रमाण देते हैं वह गीता प्रेस के छापे हुए ग्रंथ के ही आधार पर देते मतलब उस पर आश्रित है गीता प्रस ने अगर संक्षिप्त करके छापा है तो यह श्लोक क्रमांक को जानने के लिए चौखंबा आदि

00:06:19:00 से ग्रंथ लेने का भी प्रयास नहीं करेंगे व भी इतना बड़ा तंत्र है जहां संसाधनों की कोई क कमी नहीं है मगर फिर भी इनके द्वारा जो प्रमाण दिए जाएंगे देवी भागवत के तो उसमें पृष्ठ संख्या मिली होगी श्लोक संख्या नहीं लिखी होगी पृष्ठ संख्या यहां तक कि रामपाल दास का भी कोई वीडियो होगा और उसमें देवी भागवत इत्यादि की बात हो रही होगी तो उसमें वह पृष्ठ संख्या बोलेगा तो यह एक बड़ी सोचने वाली बात है यदि यह प्रामाणिक तथ्यों की बात कर रहे हैं तो यह पृष्ठ संख्या पर बात क्यों कर रहे भाई अरे श्लोक संख्या क्यों नहीं बता पा रहे आप अरे भाई पृष्ठ संख्या तो केवल एक गीता प्रेस के हिसाब से है ना वो वो जो ग्रंथ है उसका उसकी पहचान केवल यह नहीं है कि वह गीता प्र से छापा जाता है वह चौखंबा से भी छापा जाता है बनारस से भी छापा जाता है हरिद्वार से भी छापा जाता है बंबई पब्लिकेशन से भी छापा जाता है आप लोग अपने ज्ञान के लिए गीता प्रस पर आश्रित है निर्भर हैं यह उससे पता लगता है जब आप पृष्ठ संख्या का उपयोग करते हो श्लोक क्रमांक की बजाय खैर मैं पष्ट संख्या का उपयोग नहीं करूंगा भगवत कृपा से गुरु गोविंद ग्रंथ की कृपा से मैं श्लोक मांग का उपयोग करूंगा ठीक अब जो इनके द्वारा फैलाई

00:07:34:02 जाने वाली मोटी मोटी मिथ्या हैं जो भी बातें हमें विभाजित कर रही है हमारे सनातनी भाइयों को सनातनी सनातनी ग्रंथों के आधार पर गलत बातें बता कर के हमसे ही दूर ले जाने वाली बातें कर रही हैं हम उन मिथ्या हों पर प्रश्न करेंगे तो सबसे पहले इनके द्वारा एक फैलाई गई मिथ्या है कि ईश्वर साकार ही है वह निर्गुण निराकार नहीं है केवल साकार है कहीं एक जगह बैठ कर के दुनिया को संसार का निर्माण करता है और उसकी शक्ति सर्वत्र व्याप्त है परंतु वह सर्वत्र व्याप्त नहीं है तो अब सबसे पहले हम इसमें प्रमाण देंगे बृहदारण्यक उपनिषद दोती एक ईश्वर दोनों ही रूपों में विद्यमान है निराकार ब्रह्म के रूप में वह व्यक्तिगत ईश्वर के रूप में भी है और साकार ब्रह्म निराकार ब्रह्म के रूप में भी है और व्यक्तिगत ईश्वर के रूप में में भी है यह भी गीता प्रस से ही छापे गए हैं देख लेना है ना विदों में प्रमाण है कबीर साहब का कोई और भगवान है है ना निराकार ईश्वर की व्याख्या और कहां है तो अब हमने यह जान लिया कि ईश्वर के दोनों रूप है भगवान साकार भी है निराकार भी है

00:08:50:00 सिंपल तो निराकार ईश्वर की व्याख्या यजुर्वेद 32 दो यजुर्वेद 40

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→ Used in: A · Live रामपाल का ईश्वर Discussion with Rampal follower #rampaljimaharaj #kabir at 2:05:08 ↗

00:08:56:07 ईश्वर को ना ऊपर से ना मध्य से नाना विस्तार से कोई जान सकता है

⬜ Not used yet · 00:09:01:02 – 00:18:30:00 (9:29)

00:09:01:02 परमात्मा काया रहित है वर्ण और नस नाड़ी के बंधनों से रहित है अतः पाप से विद्ध नहीं है वह जो जानने में ना आने वाला है गोत्र रंग आदि से दोष रहे पकड़ने में ना आने वाला है वह जो नित्य है सभी प्रकार की कर्म ज्ञान इंद्रियों से भी रहित है सर्वव्यापक है सब में फैला हुआ है अत्यंत सूक्ष्म और अविनाशी ब्रह्म परब्रह्म है मांड उपनिषद एक एक छह निश्चय ही दिव्य पूर्ण पुरुष समस्त जगत के बाहर और भीतर भी व्याप्त है जन्म आदि विकारों से अतीत प्राण रहित मन रहित होने के कारण सर्वता विशुद्ध है मांडो के उपनिषद और एक बड़ा सा दे देते हैं 6 47 18 ऋग्वेद परमात्मा अपनी माया द अनेक रूप बनाकर विचर है तो इतने सारे जो प्रमाण है इससे इसके इसके अलावा भी निराकार रूप के लिए अनेकानेक प्रमाण है भरे पड़े हैं साकार के भी भरे पड़े हैं निराकार के भी भरे पड़े हैं तो साकार तो आप मान ही रहे हो

00:10:16:10 तो साकार के प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है फिर भी वह प्रसंग वश आ ही जाएंगे प्रमाण वो भी तो अब आगे अगर चले तो मांड उपनिषद में सात में कहा गया है ईश्वर वहार में नहीं आ सकता क्या कहा गया है ईश्वर व्यवहार में नहीं आ सकता व्यवहार मतलब आप उसके लिए अगर कुछ कर पा रहे हो उसको समझ पा रहे हो कुछ उसको उससे प्रार्थना कर पा रहे हो तो यह ईश्वर का वह रूप नहीं है तो ईश्वर के दो रूप है एक व्यवहार में आ सकने वाला एक व्यवहार में ना आ सकने वाला य कहा लिखा है मांड उपनिषद मांड उपनिषद के अनुसार ईश्वर व्यवहार में नहीं आ सकता अन्य ग्रंथों में अन्य जगह पर व्यवहार में आ सक ने वाले प्रमाण भी है तो क्या हुआ कि जिस प्रकार जीव अजन्मा होते हुए भी संसार प्रपंच शरीर धारण कर संसार में व्यवहारिक हो जाता है उसी प्रकार भगवान भी शरीर धारण करके अनेक लीला करते हैं और व्यवहारिक होते हैं ठीक है अब य ऋग्वेद में भी है कि कैसे भगवान सगुण साकार कैसे होते हैं परमात्मा अपनी माया द्वारा अनेक रूप बनाकर विचर है ऋग्वेद 6

00:11:31:19 47 18 सर्व पालक सर्वेश्वर गर्भ में गर्भ के मध्य में वि विचरण करता है यद्यपि वह अजन्मा है फिर भी विविध रूपों में उत्पन्न होता है यजुर्वेद 31 19 परमात्मा बारबार मत से कर्मा आदि नाना रूप बनाता है ऋग्वेद 3538 अब बनक उपनिषद दो पा दूसरे अध्याय के पांचवें पार्ट में यह है इसमें क्या बताया गया है कि ऋग्वेद में भी वही है और ब्रदर उपनिषद दूसरे अध्याय के पांचवे भाग में भी यही है कि परमात्मा अपनी माया के कारण इंद्रो माया भी माया को के आधार पर अनेकानेक रूप बनाते हैं मत्स कुर्मा आदि नाना प्रकार के रूप बनाता है तो हमने यहां तक य सिद्ध कर लिया कि भैया शास्त्रों के अनुसार और तर्क के अनुसार भी भगवान साकार और निराकार दोनों रूपों में विद्यमान है पहली बात तो यह है कि ईश्वर वही है जिसके ऊपर कोई नियम लागू नहीं हो सकता ईश्वर कौन है सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म अगर उसके ऊपर कोई भी नियम

00:12:46:22 लागू हो सकता हो रहा है तो जिसके बारे में बात हो रही वो ईश्वर नहीं है तो अगर नियम लागू हो रहा है कि वो निराकार नहीं है तो वो ईश्वर नहीं है और अगर नियम लागू हो रहा है कि वो साकार नहीं है तो भी वो ईश्वर नहीं अब इनके द्वारा दूसरी मिथ्या फैलाई जाती है कि परंपरा प्राप्त आचार्यों के अनुसार संसार के एक से अधिक परमेश्वर हैं ऐसा नहीं है परंपरा प्राप्त आचार्यों के अनुसार चाहे वह रामानुजाचार्य जी हो चाहे वह निंबार्काचार्य जी हो चाहे वह शंकराचार्य जी हो परमात्मा एक से अधिक नहीं है बस इतना है कि अगर रामानुजाचार्य जी का फॉलो करेंगे तो परमात्मा विष्णु रूप में है मार्का चार्य जी का फॉलो करेंगे तो विष्णु रूप में है और अगर शंकराचार्य जी का फॉलो करेंगे तो एक ही परमात्मा पांच अलग-अलग रूपों में है यह भी शास्त्र सम्मत है पांच अलग-अलग रूपों में है ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश यही पांच रूप संसार में बार-बार अवतरित होते हैं राम कृष्ण आदि के रूप में कल्प भेद से अथवा जो है अनन्य होता की रक्षा करने के लिए कल्प भेद मतलब सृष्टि की रचना एक बार नहीं हुई है कई बार हो चुकी तो किसी रू किसी सृष्टि की रचना

00:14:01:27 को जब किसी पुराण में सार गर्भित किया गया लिखा गया नोट डाउन किया गया तो उसमें क्या किया गया उसमें जो है विष्णु नाम से उस परम तत्व की व्याख्या कर दी जिसने जो है सृष्टि की रचना की और किसी किसी शास्त्र में शिव तत्व शिव नाम से परम तत्व की बात कह दी किसी शास्त्र में भगवती नाम से परम तत्व की बात कही तो अनन्य की रक्ष रक्षा के लिए कल्प भेद से और एक ही परम तत्व के अलग-अलग नामों से व्याख्या की गई है अलग-अलग यह जो पुराण है पुराण आदि ग्रंथ है और जगह जगह पर वेदों में भी विष्णु के बारे में बात आती भगवान शिव के बारे में बात आती है माता के बारे में बात आती है तो यह एक ही परम तत्व की अलग-अलग व्याख्या हो रही हैं जब वह ऐसे दिख रहे हैं तो उनको उस नाम से कहा गया जब वह ऐसे दिख रहे हैं तो उनको उस नाम से कहा गया जैसे एक जगह मां भगवती की रात्रि के नाम से भी रात्रि सूक्त है उसमें भी व्याख्या हो रही है महा भगवती की तो इसको प्रमाणों से देख लेते हैं विद में प्रमाण प्रमाण देख लेते हैं तो ईश्वर एक है यह कहां से पता लगता है आचार्यों के द्वारा प्राप्त जो ज्ञान है वो क्या है अथर्ववेद 10 26 438

00:15:17:20 ऋग्वेद एक 164 46 कठोपनिषद दो दो 9 10 इसमें इनको आप पढ़ेंगे ईश्वर एक है पता लग जाएगा और भी जगह है महाभारत में यह बात कही गई है कि सतयुग में जो एक ही परमेश्वर है परम तत्व इसी की डायरेक्ट इसी रूप में ही पूजा होती थी मतलब एक मानते हुए पूजा होती थी फिर आगे चलकर के कल्प भद से और अन्यता की रक्षा करने के लिए और जो अनेका अनेक व्याख्या वेदों में ही दी गई उनके आधार पर यह भी है कि बाद में ईश्वर के अनेक जो रूप है उनकी रूप में पूजा होने लगी तो आगे चलते हैं मिथ्या नंबर तीन ईश्वर कण कण में नहीं है बल्कि किसी एक जगह बैठा हुआ है तो सबसे पहले तो ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है और ईश्वर वही है अगर हम यह कह देंगे वो एक जगह बैठा है तो हमें य मानना पड़ेगा यहां नहीं है यहां नहीं है तो बाधित हो गया ईश्वर यहां नहीं हो सकता नहीं हो सकता बाधित हो गया तो बाधित हो गया तो वो ईश्वर नहीं रहा तो अगर आपका ईश्वर कहीं सातवें आत्व आसमान पर बैठा है जो छ दिन में सृष्टि की रचना करता है तो उसको पूछो भाई कि तुम हर जगह क्यों नहीं हो सकते

00:16:31:10 बाय द वे मैं एक बात बता दूं यह वह अगर इनकी जो परिभाषा उसके आधार पर जो कबीर है कबीर का नाम है उसकी मैं बात कर रहा हूं जो संत कबीर दास जी है वो हमारे लिए आदरणीय है हम उनका आदर करते सम्मान करते हैं अच्छा अब बात आती है कि ईश्वर की सर्व व्यापकता के संबंध में प्रमाण ले लीजिए ऋ ऋग्वेद एक 16446 श्रीमद् भागवत 12229 श्रीमद् भगवत गीता 6 29 से 31 छांदोग्य 3 14 एक इन सब में लिखा हुआ है कि ईश्वर जो है सर्वव्यापक है हर जगह है ईश्वर अब एक चीज जानने लायक है कि यदि हम यह माने कि ईश्वर एक जगह बैठा हुआ है और वह सर्वत्र समान रूप से नहीं है तो हमें यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर का कंट्रोल वहां पर नहीं है क्योंकि ईश्वर तो वहां पर है नहीं तो ऐसे में कहना होगा ईश्वर नहीं उसकी शक्ति वहां पर ठीक है मान लिया अगर हमने य मान लिया कि ईश्वर नहीं उसकी शक्ति वहां पर है तो हमें यह मानना होगा कि ईश्वर में और उसकी शक्ति में थोड़ा सा तो डिफरेंस है तभी तो उसको अलग कहा जा रहा है क्वालिटीज में कहीं ना कहीं तो डाउन मारेगी ना शक्ति ईश्वर जितना जैसा है

00:17:46:22 एक रस या शाश्वत वैसा शक्ति नहीं है तभी तो वह सेकेंडरी हो गई तो ईश्वर की जब शक्ति ईश्वर नहीं है तो उसमें कोई ना कोई कमी आई तो फिर हमें यह मानना पड़ेगा कि जितना कंट्रोल ईश्वर जहा बैठा है वहां पर है ईश्वर का संसार में उतना कंट्रोल ईश्वर का वहां नहीं है जहां वह स्वयं नहीं है उसकी शक्ति है तो फिर वही बात हो गई बाधित हो गया ईश्वर ईश्वर समान रूप से सर्वव्यापक नहीं है अगर वह एक जगह बैठा और उसकी शक्ति आपको मानना होगा ईश्वर ही सर्वत्र व्याप्त है अपनी शक्ति के रूप में ठीक है तो तर्क भी हो गया प्रमाण भी हो गया आगे चलते [संगीत] हैं m

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 18:30 · 07 Sep 2024

सतलोक आश्रम वालो का मिथ्या प्रचार E-1 #rampaljimaharaj @EKAM EVADVITIYAM @Fact by Abhishek

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