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00:00:03:13 तो सभी को जय श्री राम। आज हम आए हैं लखनऊ का जो प्रधान कार्यालय है आर्य प्रतिनिधि सभा जो उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश की जो प्रतिनिधि सभा है वहां पर आए हैं और जो लखनऊ मंडल की जो प्रधान हैं श्रीमती निष्ठा जी तो इनसे हम थोड़ी सी आज आर्य समाज का जो दर्शन विज्ञान व्यवहार को लेकर के जो दृष्टिकोण है उसको जानने का प्रयास करेंगे। तो सबसे पहले मिश्रा जी आपको मेरा प्रणाम और आप थोड़ा सा दर्शकों को परिचय दे दीजिए आपका जिससे कि हम जान सके। [गला साफ़ करने की आवाज़] मेरा नाम है डॉक्टर निष्ठा विद्यालंकार अंतरराष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता संस्कृत प्रवक्ता श्री बाबा नीमकररी संस्कृत शिक्षण संस्थान और प्रधान जिला आर्य उप प्रतिनिधि सभा लखनऊ पूर्व उप प्रधान आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश पूर्व उपमंत्री सार्वदेशिक सभा नई दिल्ली जी अरे वाह जी और पूरे ही देश विदेश में प्रचारार्थ
00:01:18:28 मैं भ्रमण करती हूं लेखन कार्य करती हूं और प्रवचन का पहले मेरे बहुत लेख दैनिक जागरण में भी नियमित आते थे पर मंत्र ऊर्जा कॉलम में अच्छा तो इस तरह से पूरी तरह से आर्य समाज की सेवा में और ऋषि दयानंद का ऋण उतारने में संलग्न अच्छा क्योंकि क्योंकि ऋषि दयानंद सरस्वती ही एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने तमाम सारे सामाजिक कार्यों को करते हुए नारी उत्थान का भी एक महत्वपूर्ण कार्य किया। यह उन्हीं की देन है कि आज मैंने गुरुकुल में अध्ययन करके वेद वेदांगों का आर्ष साहित्य का और संपूर्ण विश्व में संपूर्ण [गला साफ़ करने की आवाज़] भारतवर्ष में जहां भी कोई इस तरह के पाखंड होते हैं। कोई भी शंकराचार्य महिलाओं के लिए कोई बात का निषेध करते हैं कि वह वेद मंत्र नहीं पढ़ सकती। गायत्री मंत्र से आहुतियां नहीं दे सकती या यज्ञ नहीं कर सकती। तो अगर ऋषि दयानंद ना आते तो गुरुकुल संस्कृति गुरुकुल पद्धति का शुभारंभ ना होता
00:02:34:07 और गुरुकुल पद्धति अगर प्रारंभ ना होती तो हम जैसी मातृशक्ति गुरुकुल में अध्ययन करके और इस तरह से आज इन सारे शंकराचार्य को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती ना देते हैं। क्या बात है? 27 जुलाई को यहां प्रेस क्लब में प्रेस वार्ता हुई थी और रामभद्राचार्य जी ने महर्षि दयानंद सरस्वती के विषय में जो बात उन्होंने कभी कही नहीं इस संदर्भ में और उन्होंने रामायण महाभारत को पठनीय ग्रंथ माना उसको उन्होंने इस तरह से प्रस्तुत किया व्यास पीठ पर बैठकर के एक व्यास की ही बात को काट रहे हैं क्योंकि महाभारत महर्षि व्यास के द्वारा ही लिखी हुई है और महर्षि वाल्मीकि के द्वारा रामायण लिखी हुई है। तो उनके संदर्भ में उन्होंने व्यास पीठ से बैठकर के तुलसी पीठाधीश्वर हैं और दिव्यांग यूनिवर्सिटी के अधिष्ठाता हैं। पद्मश्री है और वह अपने मुखारविंद से एक सन्यासी हैं और वह भी एक अप्रतिम सन्यासी युग प्रवर्तक महर्षि दयानंद सरस्वती के लिए इस तरह का आक्षेप लगा रहे हैं कि उन्होंने तो इन दोनों
00:03:49:15 ग्रंथों को काल्पनिक माना है। ये महर्षि दयानंद ने बहुत बड़ी भूल कर दी। हमारे [गला साफ़ करने की आवाज़] साथ में आचार्य जी आचार्य विमल किशोर जी हैं। आप यहां पर कार्य संभाल रहे हैं। आज प्रतिनिधि सभा में आप वैश्य जी हैं। शिव शंकर वैश्य जी हैं। आप आर्य मित्र यहां पत्रिका निकलती है। उसके संपादक हैं। अच्छा। आप पाठक जी हैं यहां कार्यालय अधीक्षक हैं और तो ये आप सभी लोग की भी उपस्थिति उस दिन वहां थी प्रेस क्लब में तो वहां पर हमने उनको शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी थी और भी पूरे आर्य जगत में सभी लोगों ने इस बात के लिए रोष प्रकट किया। अच्छा अच्छा जी अच्छा जैसे कि अभी हमने जैसे बात की कि रामभद्राचार्य जी की और शंकराचार्य जी की तो आर्य समाज के द्वारा जो प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है उसको लेकर के भेद पाए जाते हैं कि आर्य समाज के द्वारा माना जाने वाला जो ईश्वर का स्वरूप है वो और जो शंकराचार्य आदि हैं उनके द्वारा स्वीकार किया जो ईश्वर का स्वरूप है उसमें कुछ मूलभूत आधारभूत कुछ अंतर माने जाते हैं। तो उसमें जो एक पहला फैक्ट आता है वो एक प्रश्न यह आता है
00:05:04:24 कि क्या आर्य समाज के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है वह सर्वशक्तिमान है? इस पर क्या कहते हैं मतलब आर्य समाज को? [गला साफ़ करने की आवाज़] आर्य समाज की कोई अपनी व्यक्तिगत मान्यता नहीं है। आर्य समाज मूलतः वेदों पर ही आधारित संस्था है। जी और अपने नाम से कोई आर्य समाज का मत नहीं चलाया ऋषि दयानंद ने। जी जी आर्य समाज तो की स्थापना तो ऋषि दयानंद ने संसार में व्याप्त जितनी कुरीतियां थी कुप्रथाएं थी रूढ़ियां थी परंपराएं थी अंधविश्वास और पाखंड थे उनके उन्मूलन के लिए उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की और यह आर्य समाज जो है यह पूर्ण रूप से वैदिक है पूर्ण रूप से वेदों पर ही आधारित है और वेदों में जैसा ईश्वर का स्वरूप प्रतिपादित किया गया है वही वास्तविक उसका स्वरूप है ईश्वर का और उसी स्वरूप को ही वह सारे संसार को जानना और मनवाना चाहता है आर्य
00:06:19:25 समाज ऋषि दयानंद ने ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को जानने के कारण ही वो बहुत संपन्न घर के थे। बहुत बड़ी रियासत थी उनके यहां। उनके पिताजी बहुत बड़े जमींदार थे और उन्होंने अपने घर की बहुत विराट संपदा को त्याग करके सच्चे शिव को पाने के लिए ही अपने मूल स्थान टंकारा को तिलांजलि दे दी थी कि जब तक मैं सच्चे शिव को नहीं जान लूंगा क्योंकि वो चूहे की उनकी घटना विश्व विख्यात है कि उनके पिताजी शिव के भक्त थे और उनको भी शिवरात्रि को शिव का व्रत रखाया था और वो व्रत किया रात्रि भर जागरण किया तब उन्होंने देखा कि शिव की पिंडी पर तो चूहे उछल कूद कर रहे हैं। भक्तों ने जो चढ़ावा चढ़ाया है उसे खा रहे हैं और यहां पर लैट्रिन बाथरूम भी सब कर रहे हैं। तो ये कैसे शिव जी हैं कि चूहों से अपनी रक्षा नहीं कर पा रहे हैं। जब ये अपनी रक्षा नहीं कर पा रहे चूहों से तो ये हमारी रक्षा क्या करेंगे? यह वास्तविक शिव नहीं हो सकते और भक्तगण भी जो रात्रि जागरण किए थे वहां पर वो भी घोर निद्रा में लीन थे उस समय
00:07:35:13 तो यही सारी स्थितियों ने उनके मन में एक क्रांति उत्पन्न की और वो क्रांति ऐसी प्रस्फुटित हुई कि फिर जब तक उन्होंने ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को नहीं जान लिया तब तक वो चैन से नहीं बैठे। हम यह जो आजकल शंकराचार्य जी हैं और अनेक उनके और उपाचार्य हैं और अनेक प्रकार के जो आज अपने आप को भगवान घोषित कर देते हैं। तमाम सारे आज भगवान पैदा हो जाते हैं। यह सब तो वेद में स्पष्ट लिखा है। ना तस्य प्रतिमा अस्ति। परमात्मा की कोई मूर्ति ही नहीं है। कोई प्रतिमा ही नहीं है। जब उसकी कोई प्रतिमा नहीं है तब तो ईश्वर हर प्रकार की आवश्यकताओं से परे हैं। हम लोग क्या है कि मूर्ति के रूप में है। दर्शन में मूर्ति को चेतन रूप में कहा गया है। हमारे घर में माता मूर्ति है, पिता मूर्ति है। जितने भी बड़े बुजुर्ग हैं, वह मूर्ति है। जिनमें कुछ चेतन शक्ति है, वह मूर्ति कहलाती है। प्रतिमा क्या होती है? प्रतिकृति। किसी चीज की नकल तो जैसे यह प्रतिमा रखी है। यह प्रतिमा है महर्षि दयानंद सरस्वती की तो
00:08:51:08 वो प्रतिमा को ही प्रतिमा पूजा को ही मूर्ति पूजा कह देते हैं। वो इतना अंतर भी नहीं जानते। जैसे श्लोक को ही मंत्र कह देते हैं। मंत्र को श्लोक कह देते हैं। श्लोक क्या है? मनुष्य कृत होते हैं और मंत्र ऋषि कृत होते हैं। ऋषियों ने जो जो ऋषियों ने बनाया ऋषियों मंत्र दृष्टारा ऋषि लोग जिन मंत्रों का साक्षात्कार करके उसको व्यवहार में लाकर प्रत्यक्ष देख लेते हैं तो उनको ऋषि कहा जाता है। तो यह ऋषि थे दोनों वाल्मीकि जी और व्यास जी। तो ऋषियों के ग्रंथ क्या होते हैं? प्रामाणिक होते हैं। इसलिए ऋषि दयानंद ने इनके द्वारा ऋषियों के द्वारा लिखित ग्रंथों को पठनीय ग्रंथ माना। और एक उन्होंने जो अपना कालजई ग्रंथ लिखा सत्यार्थ प्रकाश उसके तीसरे समुल्लास में उन्होंने एक पूरा चैप्टर ही दिया पठनपाठन की व्यवस्था तो उसमें पठनीय ग्रंथों में उन्होंने इन ग्रंथों को भी रखा है रामायण और महाभारत को और जो पहला समुल्लास उन्होंने लिखा है वहां पर ईश्वर के 100 नामों की व्याख्या की है कि ईश्वर क्या है और यही सब जो है वेदों से स्वाध्याय करके वेदों का स्वरूप
00:10:06:09 जान के कि वह ईश्वर कैसा है सपरगा शुक्र अकायम अप्रणम अस्नावीरम शुद्धम अपापवि कवि मनीष पर स्वयं भूथा तथ्यतो अर्थान वेदधा शतिभ्या समाभ्या तो कहा अपा पादो जवनो गहिता पश्यत चक्षु सतत कर सवे विश्व नचस्यास्त वेता तमाहुर ग्रह पुरुषम पुराणम तो वेद स्वयं कह रहा है जिसका पदुवाद स्वयं तुलसी तुलसीदास जी ने किया है। तुलसीदास जी का प्रमाणिक नहीं हो सकता। लेकिन इसी का पद्यानुवाद सारी बातें उन्होंने काल्पनिक लिखी। तुलसीदास जी ने ऐसा नहीं है। बिनु पग चले सुने बिनु काना कर बिनु कर्म करे विधि नाना। आनन रहित सकल रस भोगी बिन वाणी वक्ता बढ़ योगी। स्वयं वेदों की बातों का ही ये अनुवाद कर रहे हैं कि परमात्मा कैसा है। बिन पग चले। बिना पैरों के चलता है। है ना? और कर बिनु कर्म बिना हाथों के अनेक प्रकार से कार्यों को संपादित करता है। कान नहीं है फिर भी सुनता है। वाणी नहीं है फिर भी बहुत बड़ा बोलता है। जिव्वा नहीं है फिर भी बहुत बड़ा रस चखने वाला है। तो बिना आकार प्रकार
00:11:21:13 के जब वो सारा कार्य करे तो वो निराकार हुआ ना। वेद जो है वह यूनिवर्सल बात करता है। और और जो लोग हैं वह थोड़ी अपनी धर्म और पाखंड की दुकान चलाने के लिए थोड़ी मिश्रित बातें करते हैं। जी ये आर्य समाज में और अन्य समाज में भेद है। अच्छा नहीं इसमें एक प्रश्न ये आता है जैसे कि बृहधर्म उपनिषद में ये कहा गया कि ईश्वर के दो आयाम हैं। वो निराकार भी है वो साकार भी है। या फिर ईश्वर ने अपनी प्रतिमा की बात भी की वेद में एक जगह कि प्रतिमा भी है वो श्लोक है उसमें एक जगह पर श्वेता शत्रुपनिषद में यह आया है कि अह हे कल्याणमई शिव शिव नाम से ईश्वर को बोला जा रहा है। अपनी उस मूर्ति से मेरी ओर देखो। तो वहां पर मूर्ति आई। मतलब और दूसरी बात यह आती है कि जैसे हम यह कह लेते हैं जैसे हम यह कह लेते हैं कि ईश्वर जो है सर्वशक्तिमान है। इसमें आपने अपना वो नहीं दिया कि ईश्वर ईश्वर देखो सर्वशक्तिमान है। हम लोग ओनली शक्तिमान है। परमात्मा सर्वशक्तिमान है। और जो सर्व शक्तियों का भंडार होगा जिसके पास वो एक
00:12:36:21 देश नहीं हो सकता। उसकी प्रतिमा नहीं हो सकती। उसकी मूर्ति नहीं हो सकती है। नहीं नहीं मैं इसमें ये कहना चाह रहा था कि अगर ऋषि दयानंद ने स्वयं सर्वशक्तिमान माना है। आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद सरस्वती ही थे और उन्होंने आर्य समाज के 10 नियम लिखे हैं। और उसमें जो दूसरा नियम उन्होंने लिखा है। उसमें स्वयं उन्होंने ईश्वर को सर्वशक्तिमान बताया।
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00:13:03:27 ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप निराकार सर्वशक्तिमान न्यायकारी दयालु अजन्मा अनंत निर्विकार अनादि अनुपम सर्वाधार सर्व्यापक सर्वांतर्यामी अजर अमर अभय नित्य पवित्र और जो सृष्टि करता है उसी की उपासना
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00:13:25:08 करनी योग्य है। वो आपसे कह रहे हैं मतलब बात यह आती है जो क्वेश्चन जो पुट अप किया जाता है वह यह आता है कि अगर वह सर्वशक्तिमान है तो क्या वो अवतार जन्म या यह जो प्रकट होना यह नहीं हो सकता है? नहीं हो सकता। तो फिर जो उसके जो सर्वशक्तिमत्ता है कि सर्वशक्तिमान सभी कार्यों को करने में शक्ति है। तो सर्व शब्द पे फिर बाधा आ जाती है।
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00:13:47:25 जैसे उसको कहा गया अनंत अबाध्य अनंत सामर्थ्यवान तो अनंत सामर्थ्यवान जब है तो वो फिर प्रकट क्यों नहीं हो सकता? फिर ये बाधा उस पर लग जाएगी।
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00:13:57:03 जो प्रकट हो गया हम लोग प्रकट हुए। अच्छा इसमें हमारे पास अनंत सामर्थ्य नहीं है। हमारे पास अनंत सामर्थ्य नहीं है। जो अनंत सामर्थ्य वाला होगा, वह प्रकट हो ही नहीं सकता। नहीं आप ठीक कह रहे हैं। वो हो नहीं सकता तो यहां पे बाधा आ गई ना। फिर अनंत नहीं रहा। अंत है वो ये नहीं कर सकता। फिर उसके अगर वो कोई काम करने में रुक रहा है तो कहीं ना कहीं अंत आ गया ना उसकी सामर्थ का। परमात्मा का अंत नहीं होता। वो अनंत है। अभी इस नियम में यही तो मैंने बताया अनादि अनंत उसकी ना आदि है और ना उसका अंत है। वो है अनंत सामर्थ्यवान है तो फिर उसके अंदर जन्म लेने की सामर्थ्य क्यों नहीं आ रही है? ये बात आती है। ये क्वेश्चन पुट अप किया जाता है जन समाज के द्वारा तो वो मैं आपके सामने रख रहा हूं। नहीं नहीं नहीं। परमात्मा का जन्म नहीं होता। नहीं होता नहीं वो मैं एक्सेप्ट कर रहा हूं। वो सही है। फिर परमात्मा को हम सर्वशक्तिमान कैसे कह रहे हैं? तो सरजन अनंत सामर्थ्यवान कैसे कह रहे हैं? इसीलिए तो कह रहे हैं कि जन्म नहीं लेता। जन्म ले ले तो उसका अनंत सामर्थ्य समाप्त हो जाएगा। हम लोगों में हम लोग जन्म लेते हैं और मृत्यु को भी प्राप्त होते हैं। तो हम लोग केवल सामर्थ्यवान है। सर्व सामर्थ्यवान नहीं है। अनंत सामर्थ्य नहीं है हम लोगों में। हम
00:15:12:12 लोगों की सामर्थ्य की एक सीमा है। लेकिन वो परमात्मा क्या है? वो अनादि है, अनंत है। इसीलिए वो सर्व सामर्थ्यवान है। तो जब हम यह कह देते हैं कि वो सर्व सामर्थवान है। तो फिर वो जन्म लेने में उसको दिक्कत आ रही है ना? सर्व का अर्थ होता है सब कुछ। सर्व शक्तिमान तो ठीक है। किसी की सहायता नहीं हां जी।
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00:15:36:04 हम लोगों को किसी ना किसी की सहायता लेने की जरूरत पड़ती है और उसको किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है। वो अपना काम स्वयं करता है। नहीं वो ठीक है कि उसको आवश्यकता नहीं है जन्म लेने की। वो थ्योरी तो एक्सेप्टेबल है कि उसको सहायता नहीं है। उसको आवश्यक नहीं है जन्म। जब आपने ये मान लिया कि उसको जन्म लेने की आवश्यकता नहीं है। फिर आप क्यों कह रहे हो कि जन्म लेने में उसे बाधा क्यों है? मतलब बाधा उसकी जो शक्ति सामर्थ्य पर उंगली उठ गई ना कि वो ले ही नहीं सकता। यह क्वेश्चन है। उंगली उठा रहे हैं। यह तो ऐसा है ना? यह तो इसका उत्तर नहीं है। नहीं नहीं उत्तर नहीं है। यह एक बाल की खाल है और बाल की खाल होती नहीं है। ये ये आपका कोई तर्क ही नहीं है।
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00:16:15:18 बाधा उसमें क्या है? नहीं जैसे ये कहा जा रहा है जैसे ये कहा जा रहा है कि वो अनंत सामर्थ्यवान है। अनंत मतलब ऐसा कुछ भी नहीं है जिसको करने का उसके पास सामर्थ्य ना हो। तो जब वो अनंत सामर्थ्यवान है तो वो प्रकट क्यों नहीं हो पा रहा है? वो जन्म क्यों नहीं ले पा रहा है? अपने को एक जगह पर दृष्टि का विषय क्यों नहीं बना पा रहा है? मनुष्य की दृष्टि का विषय क्यों नहीं बना पा रहा है? जैसे आपने कहा जो एक देसी वाली बात है कि वो एक देसी जो होता है वो जो है नहीं सर्व्यापक नहीं होता। अब इसमें एक देसी वाली बात में ये आता है कि जैसे इसमें जो वहां के विद्वान हैं हम जो ये कहते हैं कि नहीं ईश्वर जो है जन्म ले सकता है। उनका यह रहता है कि जैसे स्वामी श्री कृपात्री जी महाराज का नाम आपने सुना हो जिन्होंने मार्क्सवाद रामराज लिखी है। उन्होंने एक उसमें अह तर्क दिया कि अह साकार और निराकार इसमें या अवतार और निराकार में अंतर सिर्फ इतना है कि एक जो है वो दृष्टिगोचर है और बाकी का उसका जो भाग है वो उससे जुड़ा हुआ है। अलग नहीं हो गया। मगर उसने अपने एक निश्चित अनुपात को दृष्टि का विषय बना दिया। जिससे कि वो व्यवहारिक हो गया मनुष्य के लिए। तो यह उन्होंने मतलब वो एक देसी नहीं है। अगर वह आपको दिख भी रहा है तो वो एक देसी तब भी नहीं है। वो सब उससे जुड़ा हुआ है। जैसे कि मान लीजिए आकाश है। आकाश को अगर हम एक खिड़की से देखें
00:17:31:06 तो उसका एक हिस्सा हमको नजर आएगा। एक चौकोर टाइप का आकार दिखाई देगा। मगर वो आका जो आकाश हमें दिख रहा है वो अलग नहीं हो गया उससे। तो लक्षण साम्य से वस्तु साम्य हो गई इसलिए उसको ये नहीं कहा जा सकता कि बाधित हो गया। तो ये तो एक देसी वाली बात हो गई। अब एक जगह आया है कि जो आर्य समाज के द्वारा जो प्रकाशित वो है अ सत्यार्थ प्रकाश नहीं भगवत गीता तो भगवत गीता में क्या हुआ है कि जो भाष्यकार हैं उन्होंने ये कहा है कि जब ये वाला क्वेश्चन आता है यदा धर्मस ग्लानि भवती भारत अभानमं धर्मसात्मान सजाम्य तो उन्होंने ये कहा कि जैसे ये कहा जा रहा है कि जो सर्वव्यापक है जैसे ईश्वर सर्वव्यापक है तो फिर उसका कहीं पर आना जाना सिद्ध ही नहीं होता। अगर वह पहले से ही सब जगह है तो उसका आना जाना सिद्ध ही नहीं होता। तो मगर वहां पर उन्होंने जो भाष्यकार हैं उन्होंने उसमें गीता में लिखा कि भाई वो जन्म तो नहीं लेते हां मगर जब जब धर्म पे हानि होती है तो कोई ना कोई सकारात्मक शक्ति जो है वो प्रकट होती है। तो शक्ति यहां पर प्रकट हो गई। क्योंकि शक्ति भी पहले से है। नहीं तो वो तो कोई ना कोई महापुरुष आते हैं। तो महापुरुष के रूप में आए योगीराज
00:18:46:07 कृष्ण महर्षि दयानंद मर्यादा पुरुषोत्तम राम तो अब जब बड़े-बड़े यज्ञ होते थे राम के समय में और उसमें राक्षस लोग विघ्न वादा डालते थे। तो उसके लिए निश्चर हीन करो में बुझ उठाए प्रणकीन तो [गला साफ़ करने की आवाज़] उन्होंने विध्वंस किया राक्षसों का। ऐसे ही जब अधर्म का बोलबाला था तो उसके लिए उन्होंने लिखा क्योंकि उनका जो है उद्देश्य था योगीराज कृष्ण के जीवन का धर्म संस्थापनार्थयाम मतलब मैं अधर्म के नाश के लिए और धर्म की रक्षा के लिए यहां पर आता हूं तो वो तो एक देश है। आकाश जो है वो दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। आकाश का आप कोई वो को आकाश को आप कभी मूर्त रूप नहीं दे सकते। आकाश क्या है? वह व्यापक है। यह भी आकाश है। जहां बैठे हैं आप यह भी खाली स्थान है। और वेद ने तो ईश्वर के लिए कह ही दिया। ओम खम ब्रह्मा जैसे आकाश सब जगह समाया हुआ है। उसको हम पकड़ नहीं सकते। ऐसे ही परमात्मा भी जर्रे जर्रे में अणु परमाणु में कण-कण में वो व्याप्त है। उसको हम एक देसी नहीं बना सकते। वो सर्वदेशी ही है। वो सर्वशक्तिमान ही है। वो सर्वव्यापक
00:20:01:22 ही है। गॉड इज ओमनी प्रेजेंट। वो दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। बस अंतर यह है कि आर्य समाज शुद्ध वेदों की बात करता है और लोग उसमें कुछ अपना मिश्रण करते हैं। वेदों में ये वाली बात आई है कि मैं नाना प्रकार के रूप बनाता हूं। अपनी माया को कंट्रोल नहीं आपने
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00:20:20:19 वेद ठीक से पढ़े नहीं है। अच्छा। हां। उतना आपने वेद नहीं पढ़ा है इसलिए आप इस तरह प्रश्न नहीं कर
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00:20:26:28 सकते। वेद में ऐसी कहीं चर्चा नहीं है। अच्छा अच्छा ठीक है। अब एक चीज ये आती है कि जैसे हम कह रहे हैं कि जो ये काम नहीं कर सकता है उसको भी क्योंकि वो अपने अपने अनुसार जो जो उसके कार्य हैं वो वो कर सकता है। वो सामर्थ्यवान इसलिए वो अनंत सामर्थ्यवान है। हम तो फिर उसको क्या कहेंगे जो कि प्रकट हो भी सकता होगा। सर्वव्यापी होते हुए भी वो एक देसी रूप में प्रकट हो सकता है। दृष्टियों का दृष्टि का व्य नहीं यही में मतभेद है। जो सर्वव्यापी है वो एक देसी नहीं हो सकता। मैं ये नहीं कह रहा हूं। मैं ये कह रहा हूं अगर किसी के पास ऐसी क्षमता है हम अगर हम जो नहीं हो सकता उसको भी सर्वशक्तिमान कह रहे हैं। अनंत कह रहे हैं, अबाध्य कह रहे हैं। तो फिर जो हो सकता है उसको क्या कहेंगे हम? जैसे जैसे मान लीजिए सर्वव्यापी ईश्वर है। वो एक जन्म नहीं ले सकता है। अवतार नहीं ले सकता। मां माता के गर्भ से प्रकट नहीं हो सकता। ये ठीक है। मगर फिर भी हम उसे अनंत कह रहे हैं। अनंत सामर्थ्यवान कह रहे हैं। फिर भी हम उसे सर्वशक्तिमान कह रहे हैं। तो जब हम उसे सर्वशक्तिमान कह रहे हैं तो मां तो अगर ईश्वर अगर ईश्वर ले लेता है या कोई ऐसी एंटिटी है जो ले ले सर्व्यापी होते हुए भी प्रकट हो जाए तो उसको हम क्या उपमा
00:21:42:04 देंगे? क्या वो प्रकट ही नहीं हो सकता। वह अप्रकट है। जैसे अलंकार के रूप में हम जब बात करते हैं काव्य करते हैं कि तुम जो हो ही नहीं सकता उसकी भी बातें हो जाती है। वो तो अतिशयोक्ति अलंकार है और वेद में अतिशयोक्ति अलंकार नहीं है। नहीं ठीक है। वो नहीं [गला साफ़ करने की आवाज़] है मगर अलंकार के रूप में जब बात होती है तो अगर कोई कार्य करने में ईश्वर रुक रहा है और फिर भी हम उसे कह रहे हैं कि तुम अनंत हो। तुम सर्वशक्तिमान हो। वो ईश्वर हो ही नहीं सकता जो रुक जाएगा। वह अनादि काल से है। अनंत काल तक रहेगा। उसका कभी कोई वो दृष्टि का विषय नहीं बन पा रहा ना। दृष्टि का विषय है ही नहीं। वो नेत्रों का विषय है ही नहीं। वो तो अनुभव का विषय है। है नहीं वो एक अलग बात है। वो है नहीं अलग बात है। मगर वो वो जो है कोई ऐसा कार्य है। वो जो आप इस तरह कह रहे हैं कि वो इस रूप में भी हो सकता है आ जाए। वो नहीं हो सकता। ईश्वर का जो स्वभाव है वो नित्य बुद्ध नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव है। बुद्ध हां वो सब कुछ जानता है। वो क्या है? सहस्र शीर्ष पुरुष सहस्राक्षा सहस्त्रपात सभूमि सर्वत तष् दशांगुलम वो
00:22:57:15 परमात्मा अब इसका लोग अर्थ कर देते हैं कि हजार आंखों वाला बहुत लिमिट लेकिन जब वेद पढ़ेंगे तो वेद में आया है सहस्त्र शीर्ष वो सर्वज्य है सब कुछ जानने वाला है सहस्त्राक्षा सर्व दृष्टा वो सब कुछ देखने वाला है सहस्त्रपा सर्वव्यापक यह अर्थ है वेद में आप एक-एक जगह एक-ए मंत्र परमात्मा की सच्ची व्याख्या कर रहा है। वेद से बढ़कर के कोई और प्रामाणिक मंत्र जो मैंने आपको बताए हैं जैसे नहीं नहीं वो आपने
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00:23:32:28 विशुद्ध नहीं बताए वो वहां पर व्याख्या कोई मिलावटी किसी और ने की होगी जो
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00:23:38:26 शुद्ध रूप से लिखे गए आपके अनुसार वेद ये कह रहा है कि वो जो है साकार नहीं है ईश्वर साकार है ही नहीं वेदों में कहीं वर्णन ही नहीं है साकार ना उपनिषदों में ना वेदों में ना दर्शन में कहीं नहीं है तो इसमें अब एक बात जितने आश ग्रंथ है अब आप गीता को मानते हैं तो गीता में ही देख लो गीता में योगीराज कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं ओम इति एकाक्षर ब्रह्मा व्याण माम अनुस्मरण ये गीता का श्लोक है वो अर्जुन से कह रहे हैं कि ईश्वर का मुख्य नाम क्या है ओम है ओम इति एक वो एक है अनेक नहीं है और इसकी पुष्टि वेद ने भी की। वेद ने कहा ना द्वितीय ना तृतीय ना चतुर्थो नाचते ना पंचमो ना षष्टो ना सप्तमो ना प्युचते ना अष्टमो ना नवमो ना दशमो नाचते ये वेद का मंत्र कह रहा है कि वो परमात्मा दूसरा नहीं तीसरा नहीं चौथा नहीं पांचवा नहीं छठा नहीं सातवां नहीं आठवां नहीं नौवा नहीं दसवां नहीं है ना वो परमात्मा क्या है एक है ये भगवान कृष्ण कह रहे हैं ओम इति एक और उसका मुख्य नाम क्या है ओम है जैसे क्या क्या है? है ना? क्या है कि जैसे मांडकोपनिषद में एक वचन आता है जिसमें कहा जा रहा है कि जो ईश्वर
00:24:54:00 है वो व्यवहार में नहीं आ सकता। उसके प्रति व्यवहार नहीं किया जा सकता। अब जैसे हम ये जो निराकार के मैं तो स्वीकार कर लिया मगर उसकी वो हमें देख रहा है। वो हमें सुन रहा है। वो हमें जो है उसको हम सुन सकते हैं। तो फिर ये तो व्यवहार में आ गया। तो फिर वो ईश्वर का रूप किसके लिए कहा जा रहा है? ऐसा है जो ये कहा जाता है कि वो एक देश नहीं हो सकता। उसमें यह है ईश्वर के दो स्वरूप हैं। एक व्यवहार में आ सकने वाला और दूसरा परमा जो परमार्थिक स्वरूप है वो तो वैसा ही है जो निर्गुण निराकार सर्व व्यापक मगर फिर व्यवहार में आ सकने वाला जो ईश्वर है फिर अगर वो उसको सुना जा सकता है अगर उसको उसको अपनी बात सुनाई जा सकती है तो व्यवहार में आ गया व्यवहार की बात नहीं है वो अनुभव की बात है। दरअसल जैसे बहुत सी चीजें दुनिया में ऐसी हैं जो हमको प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होती हैं। है ना? जैसे कि भूख लगती है हमको तो अनुभव होती है ना भूख का कोई हमें जैसे आप कह रहे हो ना आकाश दृष्टिगोचर वो तो भूख का कोई पुतला तो नहीं है प्यास लगती है तो अनुभव से लगती है ना प्यास हम कहे दिखाओ कैसे लग रही है प्यास प्यास की कोई सूरत दिखाओ बना सकते हैं आप है ना ऐसे ही आप कहे हमें दर्द महसूस हो रहा है तो महसूस हो रहा है ना वो दिखाई तो नहीं दे रहा तो
00:26:09:06 सारी चीजें बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जो जिनको हम अनुभव से देखते हैं लेकिन फिर ईश्वर के प्रति अन्याय क्योंकि वो दिखाई नहीं देता तो हम उसको कैसे सही है जैसे वो अनुभव रूपी आंख से उसका प्रत्यक्ष होता है। अगर हम अनुभव भी वो अनुभव रूपी आंख से जिसको आप व्यवहार कह रहे हैं वो अनुभव रूपी आंख से तो फिर उसका एक स्वरूप ये बताया गया ना कि वो व्यवहार में नहीं आ सकता। अगर हमने व्यवहार मान लिया ईश्वर का कि हम ईश्वर को सुन सुन रहे हैं। अनुभव कर पा रहे हैं। अनुभव माने उसका अनुभव से प्रत्यक्ष करना। व्यवहार हो गया ना वो। और ईश्वर के लिए कहा जा रहा है कि व्यवहार में नहीं आ सकता। व्यवहारिक नहीं हुआ। वह अनुभव से उसका प्रत्यक्ष हुआ। जैसे मान लीजिए आपने कहा प्यास लग रही है तो हम अनुभव से उसके प्रति व्यवहार ही तो कर रहे हैं। व्यवहार हो गया ना। अनुभव हो रहा है। अगर हमें किसी चीज का दिखाई नहीं दे रही मगर हमें हवा लग रही है। दिखाई नहीं दे रही मगर हमें बहुत सी चीजें जो अनुभव हो रही है। दर्द हो रहा है। तो यह व्यवहारिक हो गया। व्यवहार में आ रहा है ना हमारे। तो इसी प्रकार से अगर हम ईश्वर अगर यहां व्यवहारिक है तो मांडूक उपपनिषद के अनुसार तो ईश्वर को कहा गया कि व्यवहार में नहीं आ सकता। तो इसलिए दो स्वरूप माने गए ईश्वर के स्वीकार किए गए कि एक व्यवहारिक है ईश्वर का स्वरूप जो इस माया रूपी संसार में दिखाई या आज व्यवहार का विषय बन सकता है। दूसरा जो किसका भाष्य पढ़ लिया है आपने वो अनुभव रूपी आंख से ही
00:27:24:09 उसका प्रत्यक्ष होता है। सातवां मंत्र है मांडुकनिषद में वो नेत्रों का विषय नहीं है। मतलब मतलब ईश्वर अव्यवहारिक नहीं है। व्यवहार में आ सकता है। नहीं नहीं व्यवहार ईश्वर के साथ व्यवहार और अव्यवहार की बात ही नहीं है। ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव से ही किया जा सकता है। जैसे हम इन चीजों का अनुभव करते हैं कि मुझे मतलब भूख लग रही है, प्यास लग रही है, दर्द हो रहा है। इनका अनुभव करते हैं ना। ऐसे ही अनुभव रूपी आंख से हम उस ईश्वर का भी प्रत्यक्ष करते हैं। ये जो अनुभव है इसको ही तो व्यवहार कहते हैं। हम बहुत सी चीजें फील करते हैं केवल। हम उस पे छूते नहीं देखते नहीं है बिल्कुल प्रत्यक्ष रूप से। व्यवहार से क्या कहना चाहते हैं आप? बिहेवियल जैसे कि मान लीजिए कहा गया कि ईश्वर हमें सुन सकता है तो यह व्यवहारिक हो गया। ईश्वर हमें देख सकता है तो यह व्यवहारिक हो गया। तो अब ईश्वर के लिए कहा जा रहा है ईश्वर सबको देख रहा है। ईश्वर सर्वभूत नाम हृद अर्जुन तष् ईश्वर जो है वो सब प्राणियों के हृदय में बैठा हुआ है। ईश्वर हमें सुन सकता है ना? सब कुछ कर सकता है। वो हमारे एक एक कार्य प्रणाली को देखता है। तो अगर वो आप ही ने ये लगाया हुआ है। कैमरा लगाया है। इसकी कैपेसिटी जहां तक है, यह वहां तक ही
00:28:39:13 देखेगा। वहां तक का ही कैच करेगा। लेकिन परमात्मा का सीसी कैमरा देखिए। ये आपके अंतर्मन में क्या चल रहा है? ये कैमरा नहीं आपको कैद कर सकता। आपके अंतर मन में इस समय क्या विचार उठ रहे हैं। आप किसके लिए क्या सोच रहे हैं? आप किससे क्या पूछना चाहते हैं? यह आपके अंदर के विचारों का जो वो है चित्र वो उसको नहीं कैद कर सकता। लेकिन परमात्मा सर्वांतर्यामी है। सर्वशक्तिमान है, अजर है, अमर है। इसीलिए वो हमारे अंदर के हृद अर्जुन तष्त हृदय में बैठा हुआ वो हमारे हृदय की भावनाओं को समझ जाता है। जहां तक हम पहुंच नहीं पाते। जहां तक हम अभी पहुंचना चाह रहे हैं विचारों से वहां वो पूर्वम अर्शत वहां वो पहले से ही पहुंचा हुआ है। अगर हमारे आपकी तरह एक देसी हो तो इस सामर्थ्य से वो हीन हो जाएगा। ये तो आप सही कह रहे हैं। मगर जैसे अगर हम कोई बात बोल रहे हैं और वो सुन रहा है तो व्यवहार हो गया ना। अच्छा ठीक है। इसको ऐसे ऐसे जानने का प्रयास करते हैं। जैसे आपने हां मैं उसको अनुभव रूपी व्यवहार में ले सकती हूं।
00:29:54:16 अब आगे प्रश्न करिए आप। अच्छा यह है कि जो जैसे हमने कहा कि वो एक देश नहीं हो सकता। तो मान लीजिए जब संसार बनता है या कोई भी ईश्वर जो है कोई भी कार्य कर रहे होते हैं तो अगर वो एक देश अपने आप को रेगुलेट नहीं कर सकते हैं ईश्वर तो फिर जो कार्य वो एक जगह कर रहे हैं वो उसी समान भाव से पूरे संसार में एक साथ होगा। जैसे कि मान लीजिए वेद वेद मंत्र ऋषियों ने ऋषि वेद मंत्र की दृष्टा बनी तो वह जो ऋषियों के मन में आया वह संसार के हर प्राणी के मन में आएगा वेद वेद का ज्ञान वो एक देश नहीं हो सकता ना अपने आप को कंट्रोल नहीं कर सकता कि नहीं इसी के पास जाए या फिर पृथ्वी बनानी है मान लीजिए और पृथ्वी के कण पूरे पूरे पूरे वायुमंडल में तैर रहे हैं तो फिर वो ऐसा नहीं नहीं परमात्मा का अपना नियंत्रण है वो उसका अपने को कंट्रोल कर सकते पर है जहां पर जो करना है वो उसका सारा काम सिस्टम सिस्टमेटिक है। तो उसी तरीके से अगर वो सर्व्यापक है अब आप देख लीजिए हम ही सब जीव जंतुओं का निर्माण करता है। कितने सिस्टम से जहां आंख बनानी चाहिए वहां आंख बनाई है ना जहां कान बनाने चाहिए वहां कान बनाए हैं। जहां पर जैसे एक शरीर का सिस्टम से सारा निर्माण होना चाहिए। तो उसकी
00:31:09:18 तो सारा ही व्यवस्था जो है इतना बड़ा व्यवस्थापक है। हम लोग कितनी बढ़िया-बढ़िया मूर्तियां बना दें। क्या यह बना दे प्रतिमा इनमें क्या जान डाल सकते हैं? आजकल कितने लोग हैं जो यह झूठा ही दावा करते हैं। प्राण प्रतिष्ठा है ना एक चींटी की टांग बना नहीं सकते। प्राण प्रतिष्ठा करते हैं और जब चाहे तब प्राण प्रतिष्ठा कर दें और जब चाहे तब विसर्जित कर दें और विसर्जित करने जाते हैं। बाढ़ आई हो तो खुद भी विसर्जित हो जाते हैं। तो अगर उनका अपने में इतने वो सर्वदेशी है एक देसी होते हुए भी हैं। तो यह सब बने हुए जो साकार हरि बाबा और दुनिया भर के सब अपने को घोषित कर रहे हैं। यह अपने बारे में ही नहीं जानते। इसमें एक ही बात आती है जैसे आपने कहा कि शिवलिंग के ऊपर जो चूहे कूद रहे थे वो अपनी रक्षा नहीं कर पा रहे मगर वहां पे ये फिक्स कैसे होगा कि जो चीज हमें बुरी लग रही है वही चीज ईश्वर को भी बुरी लगे जैसे हमें खुजली हो रही है चूहों के उससे हमें गुदगुदी हो रही है परेशानी हो रही है मगर वो चीज ईश्वर को भी परेशान करे जैसे कि मान लीजिए जैसे मोक्ष की धारणा है हमारे यहां तो कोई व्यक्ति कोई जीव है जो मुक्त हो जाता
00:32:24:19 है यहां से इस जगत से तो जब वो मुक्त हो गया तो यहां पर उसके जो रिलेटिव्स हैं, संबंधी हैं वह बच गए। अभी यहां पर उनको बाढ़ आ रही है, क्लेश हो रहा है। अगर उसको दुख हो रहा है तो फिर वो मुक्त नहीं है। उसकी जो फैमिली है उसके साथ जो भी कुछ हो रहा है उसके मुक्त होने के बाद अगर उस फैमिली के साथ कष्ट हो रहा है तो वो मुक्त नहीं है। और अगर वह मुक्त है तो उसकी फैमिली के साथ यहां कुछ भी होता रहे उसको फर्क नहीं पड़ना चाहिए। तो जब मुक्त आत्मा को फर्क नहीं पड़ना चाहिए। तो ईश्वर को फर्क कैसे पड़ रहा है चूहों से? ईश्वर को कहां फर्क पड़ा? वो तो महर्षि दयानंद के अंदर एक तर्क आया सही दिशा में सकारात्मक तो ये तर्क सही है कि ईश्वर को फर्क पड़ना चाहिए चूहों से। नहीं तो ईश्वर वो ईश्वर है कहां? नहीं नहीं जैसे उन्होंने कहा अगर अगर ये ईश्वर होता तो ये अपनी रक्षा नहीं कर पा रहा। हो सकता है ईश्वर को आनंद आ रहा हो कि भाई मैं मेरे बनाए हुए चूहे मेरे साथ खेल रहे हैं। ये तो हमारा पर्सपेक्टिव है ना कि वो बुरा है चूहों का कूदना। जैसे छोटे बच्चे नहीं होते अपने मां-बाप के साथ कभी-कभी खेलतेखेलते घूंसा मारने लगते हैं तो मां-बाप हंसने लगते हैं क्योंकि उनको भूसे का आनंद आ रहा होता है। वात्सल्य सुखा रहा होता है। नहीं नहीं तो ईश्वर को बुरा ईश्वर अपनी रक्षा है कि जिसमें कोई अगर जान है उसमें
00:33:40:00 कोई कुछ करेगा उछल कूद तो उसको कुछ तो वो होगा ना। नहीं ये तो हमारा रिएक्शन होगा ना। ये हमारा पर्सेक्टिव है कि ईश्वर को बुरा लगना चाहिए या कुछ भी रिएक्ट होना चाहिए। यह हमारा पर्सपेक्टिव है। मैं वही कह रहा हूं ना जैसे मेरी पत्नी है या मेरा मेरी फैमिली है। अगर मान लो मान लीजिए मैं मुक्त हो जाता हूं और उसके बाद मुक्त होने के बाद मैं देख रहा हूं कि मेरी पत्नी बाढ़ आ रही है। सुनामी आ रही है। हो रहा है वो हो रहा है। तो मैं दुखी हो रहा हूं। तो फिर अगर मैं दुखी हो रहा हूं तो मैं मुक्त नहीं हूं क्योंकि क्लेश है मेरे पास। और अगर मैं दुखी नहीं हो रहा हूं। तो यानी कि यहां की जितने भी प्रपंच है ये सब ये सब हमारे लिए हैं। मुक्तों के लिए नहीं है। तो जब मुक्त आत्मा के लिए प्रपंच है अह नहीं आप अपने जो चेतन वाली बात है उनके लिए तो ये सारे आते हैं। संकल्प विकल्प तमाम भाव आ सकते हैं। लेकिन आप उस जड़ वस्तु से वहां तुलना नहीं कर सकते। वो जड़ वस्तु के लिए उन्होंने वही एक देखो एक गीत लिखा गया था। इसीलिए कितनी भारी भूल हुई थी। क्या दिलों ने ठान लिया है ना जब इस देश के लोगों ने पत्थर को ईश्वर मान लिया तो यही आज जो है ना जड़ पूजा ने ही इस दुनिया का मतलब नामोनिश मिटाया है। जैसे यह आपकी प्रतिमा लगी हुई है दयानंद जी की तो
00:34:55:08 इसके साथ अगर कोई दुराचार करे थूके या कोई अन्य दुष्कर्म करे इस प्रतिमा के साथ तो आपके अंदर ऐसा भाव आना चाहिए कि नहीं आना चाहिए कि भाई ये गलत कर रहा है और वैसे तो वस्तु है ऋषि दयानंद की प्रतिमा बना के लोग और उसको गधे में रख के और घुमा रहे थे और लोग और हंस रहे थे लोग ऋषि दयानंद के लिए ये देखो दयानंद तो गधे पे जा रहा है। तो ऋषि दयानंद ने कहा नकली दयानंदों की तो यही स्थिति होनी चाहिए क्योंकि वह तो हमारी भाई नकल हो गई ना उनकी फोटो की नकल हो गई। मतलब फोटो के लिए भावना नहीं आनी चाहिए। नहीं आती फोटो फोटो में क्या भावना आ जाएगी? जड़ वस्तु है वो। तो मतलब इसके साथ अगर कोई दुराचार होगा तो इनको मानने वालों को बुरा नहीं लगेगा। नहीं वो तो भाई नकली चीज के साथ आप कर रहे हैं। असली में कोई करे तो मतलब फोटो के साथ कुछ भी करा जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। फोटो के साथ क्या कर दिया? जैसे आपने इसको सम्मान दिया है ना इससे अभी आप हम लोग आए तो आपने कहा कि सम्मान यह है कि चित्र को देखकर चरित्र का सम्मान है। यह कौन है? इनके बारे में जब पता चले कि ऋषि दयानंद ने तो ये जड़ वस्तु नहीं है ना ऋषि दयानंद? ये तो प्रेरणा के लिए कि भाई जाने ना कि ये ये एक ऐसे
00:36:10:19 महापुरुष हुए थे। तो चित्र को देख करके चरित्र का अनुसरण करना। चरित्र की पूजा ही मतलब वास्तविक पूजा होती है। यानी अब जैसे राम की फोटो बना ली हमने लेकिन राम का कोई काम तो घर में नहीं होता है। है ना? जब आज के रावणों से वो रावण कई गुना अच्छा था। लेकिन रावण शब्द का अर्थ भी अच्छा है। लेकिन कोई रावण नाम नहीं रखता। क्यों? कि बस एक उसका चरित्र का वो लगा। तो इसी तरह से चित्र रावण का लगा होगा तो लोग कहेंगे अरे यह ऐसा था और ये इनका लगाओ राम का लगाओ कृष्ण का लगाओ शिवाजी का लगाओ अब आप देखो औरंग औरंगजेब अपने शौचालय में शिवाजी का चित्र लगाता था तो लोग कहे व्हाट इज दिस यहां क्यों लगाते हो बोले इतना वीर बहादुर था कि इसका स्मरण करते ही इसके वीरता का स्मरण करते ही मेरा पेट धड़ा आराम से साफ हो जाता है। चरित्र की पूजा को हमें देना चाहिए। आत्मसात चित्र को देख के चरित्र हमें याद आता है कि ये महापुरुष के ये ये कार्य हैं। उनका हम अनुसरण करें। प्रेरणा के लिए चित्र लगाते हैं। चित्र में कोई सेंसिटिविटी नहीं है। कोई ऐसे
00:37:25:22 हमारे आपकी तरह फीलिंग्स वो नहीं है। नहीं वो ठीक है। तो ऐसे क्या जिस तरह से आप प्रेरणा लेने के लिए इनका चित्र जैसे लगा रहे हैं तो प्रेरणा लेने के लिए फिर मूर्ति या कोई जड़ वस्तु उसके प्रति व्यक्ति भाव रखे तो उससे फिर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अगर इसमें अगर इसको आप जड़ मान रहे हैं तो इसका अपमान हो या सम्मान हो। आपको प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। और अगर आपको प्रभाव पड़ रहा है, फीलिंग्स आ रही है इसके इसके प्रति आपके अंदर तो फिर आपका फिर भगवान की प्रतिमा बना करके अगर कोई इसके प्रति अपने भाव प्रकट करता है। हर हर उसमें उसमें भी तो वो प्रेरणा ले सकता है चरित्र से। हर जगह हर जगह मौजूद है पर वो नजर आता नहीं। योग साधन के बिना उसको कोई पाता नहीं। इस प्रतिमा में भी भगवान है। सब जगह भगवान है। कण-कण में भगवान है। लेकिन प्रतिमा भगवान नहीं है। समझ रहे हैं? नहीं प्रतिमा भगवान नहीं है। दयानंद जी अब आप जो भी प्रतिमा घर में भी लगा के आप पूजा करते हैं। आंखें आपकी बंद हो जाती है कि नहीं? होती है कि नहीं? पूजा करने बैठते हैं तो जब आप श्रद्धा भाव से ईश्वर का ध्यान करते हैं। नेत्र बंद होते हैं कि नहीं बंद होते हैं? बताइए। पहले बताइए। जी जी मैं वही होते हैं ना तो नेत्र क्यों बंद हो रहे हैं? वह कह रहे यह अंदर
00:38:41:03 का विषय है। अंदर ईश्वर से मिलन करो। अब हमारे मिलने का जगह स्थान है गोमती नगर और आप हमें ढूंढे हजरतगंज में तो किसी कोई यही कहेगा अरे भाई आप बेवकूफ है क्या? उनका मिलने का स्थान तो वहां है। आप यहां ढूंढ रहे हैं तो मिलेगा। इसी तरह भगवान जो है ईश्वर जो है उसके मिलने का स्थान आत्मा है। है ना? आत्मा की आप प्रतिदिन सफाई करिए। जैसे दर्पण में मुख देखते हैं तो दर्पण स्वच्छ होता है तो मुख साफ दिखाई देता है। गंदगी लगी होती है उसको साफ कर देते हैं तो साफ दिखाई देता है। गंदगी होगी तो गंदा दिखाई देगा। ऐसे ही आत्मा रूपी दर्पण है। ये तो सही है। इस दर्पण के अंदर जितनी भी विषय वासनाएं मलिनताएं आती हैं। काम क्रोध है ना ये लोभ मोह मदद मात्सर्य रूपी जो कूड़ा कचरा है सत्संग रूपी साबुन से इनको परिमार्जित करते रहना चाहिए। वेदा आदि सत्य शास्त्रों का श्रवण पाठन पठन आदि से और उसके बाद में जो व्यवस्था योग दर्शन में महर्षि पतंजलि ने हमको ईश्वर को प्राप्त करने की दी है आठ अंगों के माध्यम से यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि तो क्रमशः
00:39:56:14 इन आठों अंगों का पालन करते हुए ईश्वर में चाहे प्रतिदिन हम 10 मिनट ही समाधस्त हो लेकिन वो विषय अंदर का है। अच्छा नहीं इसमें एक आता है जैसे आपने पूछा कि आपकी आंखें बंद होती है तो इसमें क्या है जो व्याख्या ऐसी आई है कि ईश्वर के जो दो स्वरूप है एक व्यवहार और एक परमार्थ तो परमार्थ क्या है प्राप्तव्य मैं एक मिनट मैं बोल दूं तो जैसे हम लोग हमें चाहिए बात ही खत्म हो गई जब परमार्थ में प्राप्तव्य है प्राप्त हो गया जब वहां वहां ही प्राप्ति है तो फिर दूसरे रूप को व्यर्थ में लपेट रहे हैं ये दूसरे रूप की ही बात आपने यहां शुरू की थी कि ये सब जो हमारे पात और शंकराचार्य और ये तो वहां पर ये दूसरा रूप वही मिलेगा। यहां पर एक ही रूप है और वही वास्तविक रूप है जो मैंने आपको बताया वेद मंत्र के माध्यम से कि वो परमात्मा क्या है स पर आघात वो सब जगह पहुंचा हुआ है। वो आकायम है वो शरीर से रहित है। अब्राणम है वो घाव से रहित है। अस्ना विरहम है नस नाड़ियों से रहित है। शुद्धम है शुद्ध है। है ना? अपापवि पापों से रहित है। कवि है क्रांतिशी उसमें ये कहा गया है कि अगर जैसे व्यवहार होता है जैसे हमें खाना खाना है। कैलोरी
00:41:11:18 चाहिए हमें। अब कैलोरी के लिए हम व्यवहार नहीं कर सकते। हम व्यवहार कर सकते हैं। कैलोरी का जो एक सोर्स है दिखाई देने वाला फूड सगुण साकार स्वरूप उसका उसके लिए हम व्यवहार करेंगे तब हमें प्राप्त में कैलोरी प्राप्त होगी। जैसे पृथ्वी जो है वास्तविकता में गोल है। मगर हम उसके साथ व्यवहार करते हैं चपटा। हम किसी को रास्ता दिखाते सीधे जाओ यूं नहीं दिखाते यूं जाओ क्योंकि धरती तो यूं ही है तो अब क्या है धरती को अगर गोल उसमें हमें आत्मसात करना है कि गोल ही है तो धरती से मुक्त होकर के जब हम उसको देखेंगे धरती को तब वो गोल जो है हम आत्मसात कर पाएंगे। तो अब धरती से हमें जब मुक्त होना है तो उसके लिए भी हमें धरती पर रहते हुए धरती का जो चपटापन है उसको स्वीकार करना पड़ेगा। जैसे कि हम जब एरोप्लेन बनाएंगे, स्पेसशिप बनाएंगे धरती से मुक्त होने के लिए, सेटेलाइट बनाएंगे तो उस समय मोटरसाइकिल चलाएंगे या कार से कहीं जाएंगे तो हमें उसके साथ चपटा व्यवहार करना पड़ेगा। अगर हम उसको साथ गोल व्यवहार करेंगे व्यवहारिक है ही नहीं गोल। धरती हमारे लिए व्यवहारिक नहीं है। ना ही धरती हमारे लिए जो है गतिमान व्यवहारिक है। गतिमान भी व्यवहारिक नहीं। हम सुबह जहां से जाते हैं वहीं लौट के आते हैं घर को वापस। तो ये जो है धरती का गोल होना ये पारमार्थिक जैसा हो गया कि धरती से मुक्त होने पर ही वो हमारे लिए गोल है। तो इसी प्रकार से जो जो ईश्वर का जो
00:42:26:21 वो निर्गुण निराकार सर्व्या मुक्त हो के जाएंगे कहां आप मुक्त हो के जाएंगे कहां जब धरती पर रह के ही सारे कार्य संपन्न होने हैं। नहीं जैसे जो
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00:42:37:13 नहीं ये आपका वो सही दिशा में आपका ये प्रश्न नहीं है। प्रश्न कुछ आप ऐसे करिए कि वास्तव में जिनका कुछ तर्क हो। अच्छा
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00:42:47:08 अच्छा। अच्छा मैं अह इसको एक एक चीज़ और आती है बस कि जो भगवान श्री कृष्ण जैसे हमने कहा कि ईश्वर भी जन्म नहीं ले सकता। अब मतलब ईश्वर की भी ईश्वर भी क्यों? ईश्वर ही हां हां अपनी इच्छा से जन्म नहीं। ही माने ही निश्चयात्मक जी भी तो एक वो हो गया। साथ वो हो गया। ईश्वर अपनी इच्छा अनुसार जन्म नहीं ले सकता। इतना तो है। यह है ना? तो अब जब भगवान श्री कृष्ण ये कह रहे हैं यदा यदा ही धर्मस ग्लाने भवती भारत तो हम इसका अर्थ क्या लेना चाहिए? जैसे सत्यार्थ प्रकाश पढ़ते हैं तो उसमें कहा तो एक महापुरुष है। उसमें उसमें ये कहा जा रहा है सत्यार्थ प्रकाश में कि जब सत्यार्थ प्रकाश में एक कहा गया यहां यह कहने की कोशिश की गई है कि जब जब धरती पर पाप बड़े मैं जन्म ले लूं। ठीक है? मगर हम कह रहे हैं कि अपनी इच्छा अनुसार कोई जन्म नहीं ले सकता। तो जो आप पुरुष हैं श्री कृष्ण योगीराज हैं वो ऐसी कामना क्यों कर रहे हैं जो पूरी नहीं हो सकती? पूरी नहीं हो सकती क्योंकि अपनी इच्छा से वो जन्म नहीं ले सकते ना।
00:43:54:00 यहां तो अपने कर्मों के अनुसार परमात्मा जो है वह सभी जीवात्माओं को कर्मों के अनुसार ही वातावरण देता है। वैसे माता-पिता देते हैं। वैसा ही स्थान देते हैं। तो इसमें तो देखो कहा गया है पाणिनी पाणिनी अष्टाध्याय में कहा गया है स्वतंत्र कर्ता एक सूत्र आया है पाणिनि का कि व्यक्ति जो है वो कर्म करने में स्वतंत्र है और फल भोगने में परतंत्र है। तो जैसा हम करेंगे वैसा उसके अनुरूप जो परिणाम है वह परमात्मा हमको देता है। हां तो उसके वो परिणाम स्वरूप ही आप पुरुष आप तो वह श्रेष्ठ पुरुष उनके श्रेष्ठ गुण कर्म स्वभाव है योगीराज कृष्ण के इसलिए उनको आप पुरुष कहा मतलब वो गलती कर सकते हैं गलत ये जो सेंटेंस उन्होंने कहा ये गलत है अपनी इच्छा से जन्म नहीं ले सकते अपनी इच्छा से जन्म लेने की बात कहां कही वो कामना कर रहे हैं ना वो ये कह रहे हैं ना कि जब जब धरती पे अधर्म हो तो मुझे भेजें ये अकॉर्डिंग टू सत्यार्थ प्रकाश बाकी जो अन्य गीता की बात धरती पर भेजें नहीं वह
00:45:09:06 उनका एक अच्छे कर्मों के आधार पर वो एक बात कह रहे हैं कि यहां पर अधर्म का नाश करने के लिए और धर्म की रक्षा के लिए मैं इसी तरह से परमात्मा हमको भेजता रहे अपनी इच्छा से जन्म लेने की बात हो गई ना तो वो
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00:45:27:15 कामना कर रहे हैं ना कि अपनी इच्छा से उन्होंने जन्म ले लिया तो ये कामना पूर्ति हो सकती है क्यों नहीं ईश्वर भक्तों की हो सकते हैं। अगर हम ईश्वर की भक्ति करते हैं और ईश्वर के बताए मार्ग का अनुसरण करते हैं तो ईश्वर अपने भक्तों पर कृपा तो करता ही है। हम जन्म ले सकते हैं।
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00:45:45:15 ले सकते नहीं। अच्छी कामना करने में अच्छी प्रार्थना करने में क्या बुराई है? जब वेदों में तो इतनी अच्छी-अच्छी प्रार्थनाएं हैं। कि असतो मा सद्गमे हम असत्य से सत्य की ओर चल। तमसो मा ज्योतिर्गमे अंधकार से प्रकाश की ओर चल। मृत्युमा अमृतम गम मृत्यु से अमृत की ओर चल तो क्यों नहीं वो अच्छी प्रार्थना कर सकते हैं जैसे कि इसमें कहा जा रहा है असतो सद्गमया तमसुमा ज्योतिग मृत्यु तो एक तरीके से धर्म का जो अनुष्ठान है सभी धार्मिक अनुष्ठानों का जो पर्यावसान है वो माना गया है मुक्ति में मगर वो कह रहे हैं कि मुझे भेज देना तो ये भी तो धर्म के अकॉर्डिंग बुरा हो गया गलत हो गया भेज देना नहीं जब जबजब भी ऐसा हो तो उसका नाश करने के लिए हम जैसे जैसे लोगों को यहां पर नहीं वहां हम जैसे नहीं आते रहे हम जैसे नहीं आए अपने लिए आया है मतलब अपने लिए कहा उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में ही माना कि अपने आप को भेजने की बात कर रहे हैं सत्यार्थ प्रकाश में कहां पढ़ लिया आपने वो जहां पर ये सर्वशक्तिमान वाली बात हो रही है वहीं पर चलिए ठीक है अच्छा सत्यार्थ प्रकाश में ऐसा कुछ नहीं जी जी जी अब हम थोड़ा सा दीदी कट लगा दीजिए स्टॉप करके दोबारा ले लीजिए मतलब कि स्टॉप करके दोबारा चलो अच्छा तो अगर जैसे
00:47:00:16 आपको कोई विराम लेना हो तो नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है बोल सकते हैं। मैंने कहा ना जैसे नहीं नहीं मैंने कहा अगर एक से दो लोगों का भी करना हो तो विद्वान हमारे पास हैं। ये मैंने कहा अच्छा ठीक है। तो अब आगे ये आता है कि जैसे आर्य समाज के द्वारा स्वीकार्य जो वेदादि शास्त्र सम्मत वर्ण व्यवस्था है उसका उपयोग क्या है कि वर्ण व्यवस्था से हमें क्या फायदा है? वर्ण व्यवस्था जो मानी गई है उससे हमें उसका जो पर्यवसान है किस तरीके से हमें वह लाभ देती है देखिए वर्ण का अर्थ ही होता है चुनाव करना वर्ण करना ना किसी चीज का चयन करना जी तो वर्ण व्यवस्था ही हमारे यहां थी वैदिक काल में ये जाति और ये जो सब आज चल रही हैं पद्धतियां वो सब नहीं था। वैदिक काल में केवल वर्ण व्यवस्था ही थी। आश्रम व्यवस्था ही थी। तो गुरुकुलों में जब पढ़ने जाते थे ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारणियां तो उस समय वो जो गुरुकुल की आचार्याएं होती थी
00:48:16:02 वो अपने गुरुकुल की ब्रह्मचारणियों के चित्र के पीछे उनका चरित्र अंकित करती रहती थी। ऐसे ही जो गुरुकुल के आचार्य होते थे वह अपने गुरुकुल के ब्रह्मचारियों के चित्र के पीछे उनका चरित्र अंकित करते रहते थे तो आपस में उन चित्र और चरित्र का आदान प्रदान होता था और तब जिसका जिससे मिलन हो जाता था चरित्र का उसी का उसके साथ विवाह हो जाता था तो जिसके अंदर वेद वेद पढ़ने, पढ़ाने, वेद सुनने, सुनाने, यज्ञ करने, कराने, दान देने, दान लेने आदि की प्रवृत्ति होती थी। उसको ब्राह्मण की का वर्णन दिया जाता था। नहीं ये तो ये आप वो तो सही कह रहे हैं कि ब्राह्मण कौन है? आर्य समाज के अनुसार इसका उपयोग क्या है कि यह ब्राह्मण है, यह वैश्य है, ये क्षत्रिय है, यह शूद्र है। इसका उपयोग क्या है? लाभ क्या है इसका? ऐसा क्यों? लाभ यही है कि जो ब्राह्मण है, वो मिशनरी का काम करे। है ना? विचार करे। अपने ज्ञान से सारे वातावरण का अज्ञान दूर दूर करें। अज्ञान का जो नाश करता है अपने शुद्ध ज्ञान
00:49:31:10 से और शुद्ध विचारों से सबको जागरूक करता है। है ना? सबको जगाता है और कहीं भी कोई अंधविश्वास है पाखंड है उसको नष्ट करता है अपने ज्ञान से तो वो ब्राह्मण है नहीं वो है वो है वो ब्राह्मण है जब हमें पता तो यही तो उपयोग है ब्राह्मण का अगर हमें ब्राह्मण की आवश्यकता वो देख हमें अगर ब्राह्मण की आवश्यकता हो तो हम उसके पास जा सके यही है ना जैसे कि आपके जो आपने पद बताया हमारा कि हम प्रधान हैं उत्तर प्रदेश के जी तो अब इस पद से फायदा यह है कि हमें जब कोई ऑथर निर्णय लेना होगा तो हम आपके पास आ सकते हैं। इसलिए आपको ये आपके सामने ये टैग लगाया गया। तो अब जैसे किसी के सामने ब्राह्मण लिखा है और क्षत्रिय लिखा है तो हमें रक्षा की आवश्यकता पड़ेगी तो हम क्षत्रिय के पास जाएंगे। क्षत्रिय के पास जाएंगे और किसी अब ये क्षत्रिय ही है जो मिलिट्री में अपना सब कुछ आहुत कर रहे हैं। अपने प्राणों की बाजी लगा के आज उन्हीं की वजह से तो हम सुरक्षित बैठे हैं। है ना? तो जो अन्याय से रक्षा कर रहा है और शत्रुओं से लड़ रहा है, हमको बचा रहा है, प्रोटेक्ट कर रहा है, वो क्षत्रिय है। तो और जो अभाव समाज का दूर कर रहा है, वो वैश्य है। और जो तीनों ही वर्णों
00:50:46:21 से चित है। तीनों ही कार्य करने से जिसका तीनों ही कार्य में कोई सामर्थ्य नहीं है कि वो ज्ञान भी प्राप्त करके अज्ञान नहीं मिटा सकता। और जो जिसके अंदर क्षत्रियत्व नहीं है, बाहुबल नहीं है। और जो अभाव को भी दूर नहीं कर सकता अर्जित करके धनार्जन करके तो उसको कहा गया शूद्र सर्विस अच्छा मतलब ब्राह्मण हो गया मिशनरी और क्षत्रिय हो गया मिलिट्री वैश्य हो गया बिजनेस और शूद्र हो गया सर्विस अच्छा तो इसका मतलब पर्यावसान इसी में है कि अगर हमने कैटेगराइज कर लिया कि ये ब्राह्मण वैश्य ये शूद्र है ये क्षत्रिय तो जब हमें जरूरत पड़े तो हम ब्राह्मण को ढूंढ सकें गुण कर्म स्वभाव के अनुसार वर्ण व्यवस्था जी अब मैं वही प्रश्न वही है। प्रश्न यह है कि जब हम अह अगर इसकी उपयोगिता यह है कि समय पड़ने पर हम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य का चुनाव कर सके कौन है? तो प्रश्न यह है कि अगर कर्म के अनुसार वर्ण को माना है जैसे आज समाज ने तो हम मान लीजिए उनके पास गए कि भाई हमें रक्षा करिए। हमें आपसे आप क्षत्रिय हमारी रक्षा करिए तो वो ऐसा कह सकते हैं क्या कि मैं अभी 5 मिनट पहले जो है ब्राह्मण बन गया हूं। कर्म के अनुसार बनता है ना? नहीं। एक ही व्यक्ति में चारों वर्ण भी हो सकते हैं। जैसे कि अब हम
00:52:02:19 आपसे ज्ञान विज्ञान की चर्चा कर रहे हैं तो मेरे अंदर ब्राह्मणत्व है। चारों वर्ण है। हां। तो अब कहीं हम किसी के साथ अच्छे और सच्चे व्यक्ति के साथ अन्याय होता देख रहे हैं तो उसमें भी हम आ गए रक्षा के लिए खड़े हो गए। तो फिर इसकी उपयोगिता क्या रही? जब सब कुछ सभी है। सब सेम ही है। तो फिर उपयोगिता क्या? क्यों दिया जा रहा है टैग ऐसा है कि एक विशेष योग्यता जिसमें अधिक हो विशेष योग्यता का आधिक्य हो तो वो ब्राह्मण है तो वो अपने कर्म कर्म के अनुसार उसको बदल देता है ना वही मैंने कहा ना जैसे हम किसी को बाउंड करते हैं कि भाई तुम ये हो तुम्हें ये करना है जैसे भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन तू क्षत्रिय तेरा धर्म है रक्षा करना अब उस समय अर्जुन कह दे कि मैं अभी तो मैं अब ज्ञान विज्ञान लेने जा रहा हूं कथा करने जा रहा हूं मैं अब क्षत्रिय नहीं तो क्या यह पॉसिबल है कि इसका फिर हम यूज़ कर सके इस व्यवस्था का? नहीं मैं वो उस समय के लिए नहीं रहेगा जब वो काम करेगा। वेदों में तो कहा यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्य चरता सा है ना? यानी ये कभी भी बदल सकते हैं इसको। नहीं दोनों का मिश्रण होना भी होता है लोगों के भाई इनमें क्षत्रियत्व भी है बाहुबल भी है और ज्ञान बल भी है तो मूल रूप से कोई ब्राह्मण नहीं है कोई क्षत्रिय नहीं कोई वैश्य
00:53:17:20 नहीं है कोई नहीं है नहीं चुनाव होता था एक विशेष ज्ञान का आधिक्य होने पर जैसे कि किसी कोई एक ही चीज में कोई पीएचडी होता है एक सब्जेक्ट में कि भाई इन्होंने वेद में पीएचडी की इन्होंने साइंस में की इसमें इन्होंने फिजिक्स में की तो वो कहते हैं भाई थोड़ा थोड़ा थोड़ा हमने ये भी अध्ययन किया है। कहते हैं ना थोड़ा थोड़ा ये भी अध्ययन किया है। लेकिन स्पेशलाइज जिस उसमें होता है तो वही तो उसको टाइटल मिलता है। दूसरे में भी पीएचडी कर ले तो बदल जाएगा। तो कर ले लेकिन मुख्य रूप से जिसमें किया है वो मुख्य वाला तो नहीं हटेगा ना। नहीं अगर अरे एक मुख्य होता है एक गौण होता है। तो वही चीज है। नहीं तो मान लीजिए उसने दूसरे को भी मुख्यता से किया। दूसरे में भी पीएचडी अच्छे से की। मुख्य बना के की तो उसके फिर दो वर्ण हो जाएंगे। तो इसका उपयोग हमें मतलब थोड़ा तो उसका भी उपयोग समाज में मिल सकता है। भाई अल्टरनेट जैसे कि लोग कहें कि भाई हमारे यहां इस समय ये सब्जेक्ट का कोई नहीं है। तो बोले भाई तब तक हम ये आता है तो उसका उपयोग हो गया ना। यही वर्ण तो उपयोग हो गया। एक तरीके से यही है कि वर्ण को कभी बदल सकते हैं अपनी योग्यता के अनुसार। अपनी इच्छा अनुसार तो फिर
00:54:32:24 इसका यूज़ कहां रह गया? जैसे हमने कहा कि भाई क्षत्रिय से रक्षा लेनी है। यूज़ तो हुआ ही। मैं बता रहा हूं ना। जैसे मैं मान लीजिए कि ये भाई साहब क्षत्रिय हैं। अब मुझे कोई डर आया मैं सेवादार हूं। मैं शूद्र हूं। अब मेरे को लगा कि रक्षा इनसे मिलेगी। अब मैं इनके पास गया। इन्होंने तब तक पीएचडी कर ली है। मुझे पहले से मालूम था ये क्षत्रिय हैं। अभी-अभी बदल गए। अभी-अभी ब्राह्मण हो गए। फिर मेरे को क्या फायदा हुआ ये जानने का कि क्षत्रिय हैं। अरे भाई बदल बदल क्यों जाएंगे? अगर उन्होंने अच्छी तरह से अपने अंदर चारों वर्णों को धारण किया तो समय पड़ने पर उस वर्ण का वहां उपयोग करेंगे ना। ये जो है अच्छा आप केवल वहीं तक एक एक लिमिट करना चाहते हैं ना हर चीज को। है ना? भाई आप देखिए ना कई बार होता है ना कि आप वहीं पर माउंट करना चाह रहे हैं कि भाई अगर किसी ने ब्राह्मण ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया है तो वो ब्राह्मणत्व तक सीमित रहे। फिर अगर उसने अंदर क्षत्रियत्व आ गया तो उसका वर्ण बदल गया। बदलता नहीं है। एक चीज में स्पेशलाइजेशन होती है। उसके आगे भी उसने अगर और भी चीजें कर ली है। तो उसका भी वो उपयोग समाज को दे सकता है। अच्छा जैसे ये नहीं है कि इस समय हमने क्षत्रियत्व को
00:55:47:25 धारण कर लिया तो हमारा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया। हम तो जो इसमें ये बात ये भी होता है ना कि भाई इन्होंने इसके साथ-साथ ये सब भी डिग्रियां धारण की है। ब्राह्मणत्व तो इनके अंदर है ही लेकिन अभी इनका हमने अह क्षत्रियत्व भी देख लिया है ना। तो फिर उसको कहा क्या जाएगा? ब्राह्मण या क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। अगर उसने चारों डिग्रियां लेनी उसको क्या कहा जाएगा? अरे तो उसको चातुर चातुर वर्ण कह दो भैया। अच्छा उसके अंदर चारों वर्ण है। अच्छा वो मतलब ब्राह्मण भी है, क्षत्रिय भी, वैश्य भी है, शूद्र भी है। किसी की चीज में आप उसको ऐसे बाउंड नहीं कर सकते। तो यह अपने ऊपर है कि हम अपनी कितना अपनी आत्मा का विकास कर सकते हैं कि इसकी उपयोगिता क्या रह गई कि जब सब लोग सब कुछ कर सकते हैं। कोई बाउंडनेस है ही नहीं। सब कुछ सब कोई नहीं कर सकते। ये विशेष प्रतिभा के धनी कोई कोई ही होते हैं। सब सब लोग कर ले तब तो राष्ट्र का नक्शा ही बदल जाए ना। अच्छा एक चीज और है कि ये जो शूद्र वाली बात है कि उसमें कहा गया कि जैसे जिसको अपने बेटे को मूर्ख बनाना होता है वो जो है उसको जो नहीं मूर्ख नहीं बनाना होता है जो सिखाने से सीख ना पाए पढ़ाने से पढ़ ना पाए बताने से समझ
00:57:03:03 ना पाए है ना तो फिर उसको जो है सेवा कार्य दे दिया जाता है कि चलो भाई तुम अपना कोई आया है आतिथ्य करो पानी पिलाओ है ना कुल मिलाकर वर्णोचित वर्णोचित धर्म के आधार पर किसी को हम बाउंड नहीं कर सकते कि तेरा यह धर्म है तुझे करना है क्योंकि वह कभी भी अपने धर्म को त्याग करके शूद्र बन सकता है। नहीं नहीं त्यागने की बात नहीं है यहां पर यहां धारण करने की बात है। वर्ण करने की बात है कि मैंने ब्राह्मणत्व का का वर्णन किया है। मैंने वेदादि सत्य शास्त्रों का अध्ययन किया है और उसके साथ-साथ कुछ जो है हमारे अंदर क्षत्रियत्व भी है कि समय पर ऐसा अवसर अगर आ जाए तो हम उसके लिए भी जो है तैयार हैं। अर्थात रक्षा करेगा तो क्षत्रिय हो गया। उसी समय जैसी रक्षा की वैसे ही क्षत्रिय हो गया। हां तो भाई लोग कह देते हैं अरे भाई इनके अंदर का क्षत्रियत तो जाग उठा। ये तो मैंने अभी देखा। यह उपमा रूप में तो कह देते हैं। जैसे होता है ना कि धर्म वही बात है। वही बात कह रहे हैं। उसी रूप में मगर उसका जो मूल है वह वही रहेगा। ब्राह्मण वो ब्राह्मण नहीं चेंज होगा। भले ही वो क्षत्रिय में पीएचडी कर ले। हम्म। मूल जो चीज है मूल चीज में जिस चीज में मूल का मतलब होता है कि जो रुचि होती है
00:58:18:07 वही ज्ञान का परिष्कार करती है। तो मूल चीज से जैसे आपको इन चीज में रुचि है कि आप मीडिया में सब कर लें। आप इंटरव्यू और दें तो आपके अंदर यह है। लेकिन इसके साथ-साथ आप अगर जाते हैं तो घर में कोई साथ में और भी काम करते हैं कि हम यह भी काम कर लें तो कुछ धनार्जन भी हो जाएगा। तो वो जैसे एक माता तो वैश्य वृत्ति भी तो हुई ना। जैसे एक माता है वो अपने बच्चे को शौच करा रही है। सेवा कर रही है। तो शूद्र उस उस समय के लिए कहलाई। हां बिल्कुल। और सेवा कार्य है और वो खाना खिला रही है वैश्य हो गई बाहर से कोई मारने आया बचा लिया क्षत्रिय हो गई पढ़ाया तो ब्राह्मण हो गई अब आपने बात पकड़ ली तो इसका अर्थ ये है अब समझ में आया तो फिर ये टैग देने की आवश्यकता क्या है जब सब लोग सभी हैं टैग इसलिए दिया जाता है जो स्पेशलाइजेशन होता है तो स्पेशलाइजेशन तो वो दूसरे में भी कर सकता है ना कर सकता है तो वो बाद में कर रहा है ना मुख्य रूप से जिसमें पहले एक बार जो पहले क्रिया वही उसका जीवन पर्यंत रहेगा यह है आपका कहना वो नहीं वो नहीं बदल सकता। मुख्य एक मुख्य गुण सब में होता है। एक मुख्य वर्ण जो है वह सब में होता है। जिसको देख के
00:59:33:10 उसकी रुचि, उसका ज्ञान, उसका विचार, उसका व्यवहार, उसका संस्कार वो देख के वो उसको वर्ण दिया जाता है। मुख्य रूप से जो चीज मुख्य रूप से जिसमें दिखाई देगी, उसके साथ गौणिक रूप कैसे तय होगा कि इसका मुख्य यही है। तय हो जाता है ना जब प्रवृत्तियां देखते रहिए। प्रवृत्तियां देखते रहे जैसे कि आप ज्ञान विज्ञान की हमेशा चर्चा करते रहे। अब जैसे मेरे अंदर एक मुख्य प्रवृत्ति ज्ञान की है। मैंने ज्ञान अर्जन किया और ज्ञान का मैं प्रचार प्रसार कर रही हूं। तो ये मेरा मुख्य गुण है। तो मैं मैं क्या हुई? ब्राह्मण। मैं हूं मिशनरी। लेकिन इसके साथ-साथ कभी-कभी जैसे कहीं आवश्यकता पड़ी। अब कई बार मैं खड़ी नहीं भी हो सकती हमारे अंदर वो प्रवृत्ति हो भी सकती है। अब हम खड़े हैं यहां पर देख रहे हैं किसी के साथ कुछ हो रहा है। नहीं कर रहे हैं। तब तो हम खाली वहीं रह गए ना। जी ब्राह्मणी वर्ण रह गए ना। जी तो अच्छा तो इसमें ये वाली बात आई ना कि जैसे कि अगर ये जो वर्ण है ये चेंजबल है तो मूल जो ये उपनाम दिया जा रहा है कि ये ब्राह्मण वैश्य क्षत्रिय है तो ये क्यों दिया जा रहा है फिर तो उसका वही नाम रहेगा
01:00:48:14 ना वो सब कुछ कर सकता है ये बात आ गई ना नहीं नहीं अब जैसे कोई स्पेशलाइजेशन है कि प्रतिदिन कोई अग्निहोत्र करता है तो उसी को हमारे यहां अग्निहोत्री एक वेद अच्छी तरह कंठस्थ करता है तो वेदी जी दो वेद याद करता है तो द्विवेदी और तीन वेद याद करता है तो त्रिवेदी चार वेद याद करता है तो चतुर्वेदी तो आपको नहीं लगता ये जैसे अवस्था मूलक है जैसे ये जब भी ये ज्ञान से जुड़ी हुई व्यवस्थाएं हैं तो इसके आधार पर लोगों को ये टाइटल मिलते थे वर्ण के आधार नहीं इसमें ये है कि आपको नहीं लगता अवस्था मूलक है जब मुझे क्षत्रिय की आवश्यकता पड़ी तो पहले मैं उसको साल भर या छ महीने देखूं कि वह क्या कर्म कर रहा है जिससे मैं पहचान सकूं कि वह क्षत्रिय है कि नहीं। यह तो प्रोसेस लॉन्ग हो गई ना। जैसे मुझे अभी कोई मारने आ रहा है और मुझे क्षत्रिय की आवश्यकता है और मैं पहले उसको चेक करूं भाई खड़क चला पाता है कि नहीं या बाहुबल है कि नहीं। उसका चेक करना और वो चेक कितने समय तक करना है यह भी नहीं पता है। कब घोषित होगा ये? तो यह बात तो मैंने पहले प्रारंभ में ही आपको बता दी कि जहां
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01:01:54:14 पर जो फैक्ट्री है जहां पर निर्माण होता है बच्चों के संस्कारों का उनको विद्यावान संस्कारवान बनाया जाता है वहां से तय उसकी वो फैक्ट्री तो गुरुकुल ही होती थी यानी कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से आचार्य लोग जो है वहां पर प्रवृत्ति देखते थे छात्रों की उनके मतलब आचार्य तय करते हैं ब्राह्मण
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01:02:14:04 है वैश्य शद्र और क्या आचार्य के स्वयं से हम तय नहीं कर सकते कि मैं ब्राह्मण हूं आचार्य तय भी तो कॉन्फिडेंस तभी आता है जब हम जिस ज्ञान में हमारी प्रवृत्ति हो। है ना? अब हम हम कहेंगे कि हमारी रुचि है डॉक्टर बनने की। आप चिकित्सक बनेंगे। नहीं रुचि है मगर आचार्य नहीं कह रहे तब तक हम नहीं कह सकते ना अपने आपको। नहीं आचार्य आचार्य का ठप्पा चाहिए होगा उसके लिए कि नहीं चाहिए होगा। हां आचार्य तो एक-एक प्रवृत्ति को देख करके ही वो जज करते। एक तो गर्भ से माता के पैदा होता है और दूसरा जब विद्या पढ़ने जाता था तब आचार्य के गर्भ में रहता था। जी है ना? तो आचार्य उसी तरह से ही उसके एक-एक कार्यप्रणाली को देख करके ही ये चयन करता था कि इसके अंदर ये प्रवृत्ति है तो इसका ये वर्ण है। इसका अर्थ
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01:03:03:22 ये हुआ ना कि आचार के बिना मैं अपना वर्ण नहीं चेंज कर सकता। आचार से पहले सर्टिफिकेट एक तरीके से लेना पड़ेगा। हां पहले तो वही मिलता है।
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01:03:10:21 अच्छा अच्छा तो यह कोई विधि दी गई है हमारे शास्त्रों में किचन संस्कार विधि में दी गई है। आचार्य घोषित संस्कार में ही संस्कार विधि हां संस्कार विधि लिखी महर्षि दयानंद सरस्वती ने वेदों में दिया गया है विधि के आचार्य घोषित करेगा किसका ही वर्ण है किसका क्या वर्ण है ये कौन तय करेगा आचार्य तय करेगा जैसा आपने बताया पहले जो है गुरुकुलों में ही ब्रह्मचारणियों की आचार्याएं और ब्रह्मचारियों के वो तो सही है ये नियम दिया गया है हमारी मनुस्मृति के किसी भी आर्ट्स ग्रंथ में हां संस्कार विधि में दिया गया है संस्कार विधि तो उनके ऊपर भाई तीन रात्रि गर्भ में रहता था। है ना? आचार्य जो है उसके अंदर से अपने शिष्य के अंदर से तीनों चीजों का निवारण करता था। अज्ञान, अन्याय, अभाव इन तीनों को ही वो दूर करता था। संतान को बनाने वाले तीन निर्माता होते हैं। माता, पिता और आचार्य। जी पहले नंबर पर माता होती है। दूसरे नंबर पर पिता होते हैं और तीसरे नंबर पर आचार्य होते हैं। है ना? तो आचार्य के कुल में जाकर के ही वहां पर वो सारी चीजों में वो निष्णात बनाते थे। वो एक विद्या की ज्ञान की
01:04:25:22 ऐसी फैक्ट्री होती है गुरुकुल जहां तप करके कोई भी विद्यार्थी कुंदन बन जाता था। और मुख्य रूप से सभी वहां पर ब्राह्मण ही बनाए जाते हैं। अब जैसे अब हमारे गुरुकुल है, चोटीपुरा है वहां पर क्या है कि बच्चियां सब वेदों को भी उन्होंने कंठस्थ कर रखा है। तो एक तरफ से वो वेद की भी ज्ञाता हैं और दूसरे तरफ वो कहीं विदेशों में जो क्रीड़ा के क्षेत्र में भी जाती हैं दूर-दूर है ना कहीं भाला हां मनु भाकर जो गुरुकुल की ही पड़ी हुई है। [गला साफ़ करने की आवाज़] इसमें एक ये प्रश्न आता है। हां। कि आपने कहा कि आचार्य तय करते हैं। मगर
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01:05:04:00 संस्कार विधि में लिखा हुआ है कि जो अपने बच्चे को बालक बालिका को ब्राह्मण बनाना चाहता है।
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01:05:09:10 यानी मां-बाप तय कर रहे हैं। आचार्य तय नहीं कर रहा। दूसरा प्रश्न यह आता है कि जो यज्ञोपवीत होता है ब्राह्मणों का वह तो तब होता है जब उनका विद्या अध्ययन शुरू ही नहीं हुआ होता। तो वहां पे ये तय कैसे हो पा रहा है कि यह ब्राह्मण नहीं नहीं यजुपवीत का अर्थ ही होता है विद्या की गोद में प्रवेश करना। और यानी कि विद्या प्राप्त करने से पहले ये तय होता है कि ये ब्राह्मण बनेगा। हां विद्या की गोद में प्रवेश करना फिर आचार्य तय नहीं कर रहे कि यह ब्राह्मण है क्षत्रिय वैश्य अरे विद्या एक होता है ना कि इसको कहते हैं एडमिशन विद्या के क्षेत्र में प्रवेश करना उसका नाम है एडमिशन अब प्रवेश करते ही थोड़ी ठप्पा लग जाएगा ये ब्राह्मण ये क्षत्रिय है। जब वहां पढ़ता रहेगा जिस चीज में जिस ज्ञान की निषणात देखी जाएगी जिस विद्यार्थी की उसको ही वो टाइटल दिया जाएगा जो जैसे वहां आप बात समझने का प्रयास करिए आप बात समझ नहीं रहे हैं नहीं नहीं उसमें एक वो आ रहा है जैसे क्या वो आ रहा है प्रश्न आ रहा है उसमें ये आ रहा है कि ब्राह्मण को कहा गया है कि उसका जो यज्ञोपवीत है वो इससे इसके बीच में होगा तो इस नियम को फॉलो हम कैसे कर रहे हैं वहीं पर जबकि अभी उसको आचार्य ने घोषित नहीं किया कि ब्राह्मण है आचार्य घोषित करेगा विद्या प्राप्त करने के बाद तो हम ब्राह्मण हो ब्राह्मण वाला नियम उसका यहां घोषित कैसे फॉलो कर रहे हैं
01:06:24:14 वो तो तभी फॉलो होगा जब वो पहले से मां-बाप के द्वारा ब्राह्मण हो नहीं ऐसा है यजो पवित का अर्थ होता है विद्या की गोद में प्रवेश करना जब अभी ये आ रहा है श्रावण मास आ रहा है श्रावणी पर्व जो रक्षाबंधन का समय है इसी समय ही यजो पवित संस्कार सब गुरुकुलों में किए जाते हैं और इसी इसी समय में अब बच्चे क्या है जो पवित्र के बाद में वेदा अध्ययन के लिए वो बैठते हैं। फिर उनकी प्रवृत्ति देखी जाती है। शन ज्ञानी की प्रवृत्ति देखने से अरे भाई आप किसी विद्यालय में जब अपने बच्चे का एडमिशन कराने जाते हैं तो उसकी कोई शर्तें होती हैं एडमिशन की। तो उसी तरह से यह गुरुकुलों में एडमिशन का एक वो होता था सिग्नल कि यजोपवित हो गया तो अब यह विद्या ग्रहण करने के योग्य हो गया। नहीं वो सही है यज्ञपवित हो गया। मगर यज्ञोपवित ब्राह्मण के अनुसार हो रहा है। यह क्यों तय हो रहा है वहां पर? क्योंकि अभी उसने विद्या ग्रहण नहीं की। आचार्य ने घोषित नहीं किया कि वो ब्राह्मण है। तो ब्राह्मण के अनुसार या क्षत्रिय के अनुसार या वैश्य के अनुसार यज्ञोपवीत क्यों हो रहा है वहां पर? अनुसार होता है ना एक एज
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01:07:35:10 लिमिट होती है इससे इसके बीच में ब्राह्मण का होगा इससे इसके बीच में वैश्य का होगा इससे इसके तो वह जो नियम है कि ब्राह्मण का जनेऊ इस तरह से होगा तो ये नियम यहां क्यों लग रहा है जब आचार्य ने अभी उसने विद्या ग्रहण नहीं की आचार्य ने भी घोषित नहीं किया ये वहां पर क्वेश्चन बन रहा है वो तो वर्ण परंपरा से कि भाई जैसे कि वर्ण परंपरा मतलब जो वंश परंपरा होती है वर्ण परंपरा नहीं वंश परंपरा नहीं वर्ण से वर्ण के आधार पर जिनके यहां यह चला आ रहा है कि भाई इनके यहां जो बुजुर्ग थे उनके अंदर क्षत्रियत्व था तो यह क्षत्रिय वर्ण है जैसे कि शिवाजी मतलब वो जो जनेऊ होता है वो जो उनकी वंश परंपरा है उसके आधार पर वंश परंपरा में मतलब वो वंश पर बुजुर्ग वर्ण परंपरा जो चली आ रही उनके बुजुर्ग किस तरह के थे वो क्षत्रिय थे तो इसका क्षत्रिय के अनुसार करना अच्छा अच्छा और ब्राह्मण ब्राह्मण ब्राह्मण का गण करते थे क्योंकि इनके यहां पर का पठन पाठ पठन उसके बच्चे का उसके अनुसार लेना यज्ञ करना कराना उसके अकॉर्डिंग अच्छा अब लास्ट है कि जैसे मैंने कुछ आपको कोट किए कि वेदों में ये दिया है या उपनिषदों में ये दिया है तो आपने कहा कि आपने गलत वो किसी और का भाष्य पढ़ लिया गलत भाष्य पढ़ लिया है तो इसमें
01:08:50:16 बात ये आती है कि आर्य समाज की गुरु परंपरा क्या है गुरु तो सबसे आदि गुरु तो हमारा वही परमात्मा ही है जिसे योग दर्शन में इधर से जैसे जो दयानंद जी हैं इनके गुरु बिरजानंद जी फिर बिजानंद के गुरु ये फिर इनके गुरु ये तो ऐसे ऋषियों तक जाने वाली वो परंपरा क्या है गुरु परंपरा को मानता है आर्य समाज की नहीं जैसे शंकराचार्य गुरु परंपरा रामानुजाचार्य गुरु परंपरा या निंबारकाचार्य गुरु परंपरा है तो क्या आर्य समाज गुरु परंपरा को मानता है हां गुरु जिनसे ज्ञान लेते हैं गुरु मतलब वही जो हमें गुरु हां अज्ञान से हमें अंधकार से हमें जो प्रकाश की ओर ले जाता है उसको ही गुरु कहते हैं। माने अंधकार से रूह जो प्रकाश की ओर हमें ले जाए हमारा पथ प्रदर्शन करें। हमारा मार्गदर्शन करें सही दिशा दिखाए वही गुरु होता है और आर्य समाज जो है सबसे प्राचीन गुरु जो है वो परमपिता परमात्मा को ही मानता है सा पूर्वेशा गुरु कालेना वदात वो सबसे [गला साफ़ करने की आवाज़] पुरातन गुरु है उसको
01:10:05:25 काल से भी अवच्छेदित नहीं किया जा सकता और उसके बाद जो हमें सैद्धांतिक रूप से जो ज्ञान ज्ञान दिया वो हमारे गुरु महर्षि दयानंद सरस्वती नहीं इधर से गुरु परंपरा थोड़ी सी बताइए कि परंपरा वहां तक कैसे जाती ऋषियों तक जैसे दयानंद सरस्वती जी फिर उनके गुरु विजानंद फिर उनके गुरु कौन फिर उनके थोड़ा थोड़ा पीछे ऐसे हम तो ऋषि दयानंद के गुरु थे विजयनंद जी और फिर ऋषि दयानंद जी तो हैं वो हम सबके गुरु हैं जी के पीछे भाई परंपरा परमेश्वर तक है ना तो परमेश्वर से यहां तक जो आई है मध्यकाल के गुरु वो एक बहुत एक लंबा सिस्टम और उतना थोड़े से दो चार कुछ पीछे के कुछ पीढ़ियों पहले के गुरु के नाम जैसे विजानंद के ये थे इनके ये थे ऐसे कुछ थोड़ा दो चार ऐसे तो हमारे सब जो ये वेद शास्त्र है ये जो ऋषियों के ग्रंथ हैं ये सब हमारे गुरु ही है नहीं ऐसे नाम बद्ध जी कि भाई विजानंद को इन्होंने पढ़ाया इन्होंने वेद मंत्र सिखाए फिर उनको इन्होंने वेद मंत्र सिखाए ऐसे पांच छह पीढ़ी तो हमें तो ऋष ऋषि दयानंद अह ऋषि दयानंद से तो बहुत दो धाराएं फूटी। दो तरह के इनके शिष्य तैयार हुए। एक
01:11:20:26 नहीं ऋषि दयानंद जी नहीं ऋषि दयानंद जी के पीछे इधर का नहीं ऋषि दयानंद जी के पास वेद मंत्र कहां से आए? कैसे आए? ऋषि दयानंद जी ने तो गुरु विजानंद जी से जानंद जी के पास जी के वो गुरु थे पूर्णानंद जी। नहीं वो तो वेदों के विद्वान तो पूर्णानंद जी के गुरु पूर्णानंद जी के गुरु का नहीं इतनी लंबी परंपरा का स्मरण नहीं है नहीं लंबी नहीं कुछ पांच छी जैसे हमें मध्यकालीन पूर्णानंद जी तक का मुझे टीपू सुल्तान का इतिहास स्वामी विजानंद जी के गुरु गुरु पूर्णानंद जी उससे पहले उसके पहले के गुरुओं का नाम स्मरण नहीं है पढ़ा तो है स्मरण नहीं है मतलब किसी शास्त्र में दिया गया है ऐसा हां तो गुरु परंपरा जब चली आ रही है तो सबके होंगे ही नहीं नहीं कुछ पांच छह पीढ़ी पहले के गुरुओं जितना था वो मैंने बता दिया कुछ और पूछिए। अच्छा तो इसमें यह बात आती है कि पूर्णानंद जी को वेद मंत्र किससे मिले ये हमें यह नहीं पता है। तो हम यह कैसे माने कि जो वेद मंत्र हैं जो पूर्णानंद जी ने इनको दिए वो वही वेद मंत्र हैं जो परमात्मा दे रहा है ऋषियों को
01:12:27:06 वही है। नहीं नहीं वही है वो सही है। मगर पूर्णानंद जी ने वही वेद मंत्र दिए हैं जो परमात्मा ने निष्कासित किए वही पूर्णानंद जी ने विजानंद जी को दिए। तो यह किस आधार पर है? ऐसा है क्योंकि या तो हमें गुरुओं का नाम मालूम हो गया। हम आपको बता रहे हैं। ऐसा है कि परमपिता परमात्मा ने सृष्टि के आदिकाल में चार ऋषियों के पवित्र अंतःकरण में वेद रूपी सूर्य का प्रकाश किया। नहीं तो वो अग्नि, वायु, आदित्य, अंगीरा। ठीक है? तो उसके बाद ब्रह्मा ऋषि ने उन चारों वेदों को लिखा। जी क्योंकि वेद का नाम था श्रुति और श्रुति का अर्थ होता है श्रुयते इति श्रुति जिसको सुना जाता है उसको श्रुति कहते हैं तो पहले जब ये श्रुति का पाठ होता था तो लोग सुन लेते थे और उनको स्मरण हो जाता था याद हो जाता था तो श्रवण श्रवण परंपरा से वेद सुरक्षित थे फिर कुछ समय बाद वो स्थिति आई कि लोग विस्मृत करने लगे तो यह हुआ कि ना श्रवण श्रावण परंपरा से तो पठनपाठन परंपरा से हमारे वेद जो हैं वो सुरक्षित
01:13:42:16 रहे तो इसलिए ब्रह्मा नामक ऋषि ने उन चारों वेदों को लिपिबद्ध किया है। ठीक है? और उसके बाद ब्रह्मा ऋषि से लेकर के अब तक ऋषि दयानंद पर्यंत नहीं तो इसमें ब्रह्मा ऋषि से लेकर ऋषि दयानंद पर्यंत गैप नहीं है। बहुत सारे गुरु नहीं मैं पीछे नहीं जाऊंगा। जैसे हमें मध्यकाल का इतिहास अपना पता है कि टीपू सुल्तान ऐसा था या फलाना व्यक्ति ऐसा था। मध्यकाल का इतिहास हमें पता है। तो हमें अपने गुरुओं का मध्यकालीन गुरुओं का इतिहास तो पता होना चाहिए। क्योंकि ऋषि दयानंद जी 100 150 साल पहले और उनके विजानंद जी और 100 मान लीजिए उसके पहले का इतिहास मान लीजिए 50 और मान लीजिए पूर्णानंद जी अब थोड़ा ये मध्यकालीन हम लोग एलेक्जेंडर का इतिहास जानते हैं हम लोग टीपू सुल्तान का अकबर का इतिहास जानते हैं 500 साल पहले का इतिहास बहुत लंबी चली वो गुरु परंपरा महर्षि दयानंद तक चली है उसमें कहा था तो तमाम हमारे जो शाह थे वो सब जला दिए गए अब उसे जिनके पास रखा हुआ है मनुस्मृति में बताया जाता है वो तो सब हमारे दिए अंदाजे से चल रहे हैं कि हां ये वही परमात्मा के दिए हुए ग्रंथ होंगे वेद के ज्ञान से वेदों के भाष्य से भाष्य जो है आजकल महाभारत युद्ध के बाद जो है सब गलत किया नहीं नहीं वो ठीक
01:14:57:18 है निघंटू के हम लोग निघंटू को मानते हैं तो वो निगंटू जैसे वो क्या करता है वो आज के आधुनिक जो है सब वो जो निघंटू है वो हमारे पास कैसे आया वो 5000 लोग व्याकरण महर्षि व्यास ने लिखा ना वो भी ऋषि थे तो बस व्यास से यहां तक व्यास मतलब एक अंदाजा है कि हम जो पढ़ रहे हैं व्यास का हमारे ऋषि बहुत हुए अंगीरा ऋषि अरबों नहीं पिछले 500 साल का तो इतिहास हमें मालूम होना चाहिए ये कहां है ये तो सब जला दिए गए ये तो वेद ही भी नहीं था नहीं नहीं कहने का अर्थ ये है कहने का अर्थ यह है कि जो अन्य परंपराएं हैं गुरुओं की जैसे नबार्क परंपरा या आगे कर लीजिए या रामानुजाचार्य परंपरा या शंकराचार्य परंपरा इनकी परंपरा में लिपिबद्ध बिल्कुल गुरुओं का नाम एक एक पता है। इनका शंकराचार्य जी तो आदि शंकराचार्य जी से आए तो अब बात ये आती है कि अगर हमारे पास तो वेदों की प्रशंसा की वेदों ने भी तो माना हां वेदों को माना। अब बात ये आती है कि अगर हमें इन गुरु परंपराओं से वेद प्राप्त होना हम स्वीकार करते हैं तो इन गुरु परंपराओं के अर्थ को हम स्वीकार क्यों नहीं करते? और अगर इनके अर्थ को स्वीकार नहीं करते तो इनके वेद मंत्र पर हमें हम क्यों स्वीकार करते हैं? मतलब
01:16:12:21 जिनसे हम वेद मंत्र ले रहे हैं अगर हमें उस पर भरोसा नहीं है तो फिर हम उसके उसका जो उसका कारण है उसका कारण यह है कि दो संस्कृत दो तरह की है। एक लौकिक संस्कृत एक वैदिक संस्कृत तो वैदिक संस्कृत को पढ़ने की जो कुंजी है वो है निगंटु और निघंटू वैदिक शब्दकोश है और उसके जो निर्वचन है वो महर्षि यास्क ने निरुक्त में किए हैं। तो जब तक निघंटू और निरुक्त का हम स्वाध्याय नहीं करेंगे तब तक वेद मंत्रों के वास्तविक अर्थ हम नहीं कर सकते। वह ठीक है। निघंटू हमारे पास किसने दिया? कैसे आया? गुरु परंपरा से। अब गुरु परंपरा कह रही है नहीं इसका अर्थ है और हम लोग मना कर रहे हैं। एक 1 मिनट। हम लोग मना कर रहे हैं कि नहीं इसका यह अर्थ नहीं है। तो जब हम ऐसा कह देते हैं कि हमें इस पर विश्वास नहीं है। तो उससे प्राप्त होने वाले मंत्रों पर विश्वास कैसे? और अगर उससे प्राप्त होने वाले मंत्रों पर विश्वास है तो फिर उसके अर्थों पर विश्वास क्यों नहीं? बात अटल है कि इसके इसको पढ़ के ही वेदों का अर्थ किया जा सकता है। साक्षात कृत धर्माणो ऋषभ तो हम यह भी तो कह सकते हैं जिन्होंने ईश्वर और धर्म का साक्षात्कार किया है उनको ही तो ऋषि कहा जाता है। ठीक है। हम ये कह हम ये कह सकते हैं कि हमने जो अर्थ किया है वो सही है। जरूरी
01:17:28:00 नहीं कि ये जो मंत्र है वेद का इसका ही ये अर्थ है। यही होगा ना फिर। नहीं नहीं। मतलब उसको वेद से जोड़ना जोड़ किस तरह से रहे। क्योंकि जो जैसे जो हमको गलत अर्थ दे सकता है वो हमको गलत मंत्र भी तो दे सकता है। मंत्र जो है वो ऋषियों के बनाए हैं। मंत्र में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इसीलिए वो आठ विकृतियां बनाई गई जिनके माध्यम से आज तक कोई वेद में मिलावट नहीं कर पाया और ना कर पाया है ना भविष्य में कर पाएगा। मालाजो दंडो गना अष्टो विकृतया पूष इसको मिलावट करनी है वो अष्टाविकृति वाले श्लोक को ही मिटा देगा कैसे मिटा देगा वो सुरक्षित है प्रतिलिपि है पूरी उनकी नहीं जब आपको आप मुझसे अगर वेद मंत्र ले रहे हो मुझे पता है कि इसमें जटा वाला है से समझ जाएगा तो मैं उसको मिटा के आपको मुझसे कैसे वेद मंत्र ले लेंगे वेद तो एक मैं वहां पर रख रहा हूं गुरु परंपरा से अगर हम तक आया तो हमें जो इतिहास प्राप्त है जिसका वो ये सारी गुरु परंपराएं आदि शंकराचार्य की प्राचीनतम मान लेते हैं बस वो भाष में ही त्रुटि होती है के मंत्रों तो वेद के मंत्रों पर हमें विश्वास क्यों है कि ईश्वरी वाणी वही है जो उसने दिया था को लोगों ने जलाया ने जलवाया
01:18:43:08 वो कौन थी वो नवी थी थी सब नहीं नहीं वो वो सही कह रहे हैं आप मैं ये पूछ रहा हूं कि हमें अगर उसके अर्थ पर विश्वास नहीं है तो उन मंत्रों पर विश्वास क्यों है कि ये वही मंत्र है जो परमात्मा ने दिए हैं हां परमात्मा की जो चीज अनादि काल से चली आ रही है मगर उसमें बीच में वो है ना पाखंडी आपके अनुसार शंकराचार्य पाखंडी है ना नहीं आज जो नकली शंकराचार्य बन रहे हैं वो पाखंडी है जिनके अंदर पाखंड भरा है वो पाखंडी है वो वो पूजा वो शंकराचार्य जी उन्होंने विग्रह पूजन भी माना है जगन्नाथ पुरी का वो किया स्थापना की शंकराचार्य आदि आदि शंकराचार्य उन्होंने मूर्ति पूजा मानी है पुस्तक पढ़ी है परा पूजा मैंने प्रबोध सुधाकर पढ़ी है। उनका पूरा जीवन दर्शन शंकर दिग्विजय पढ़ा है। मैंने उनकी प्रश्न पढ़ी है। नहीं तो उन्होंने केवल परा पूजा नहीं लिखी ना। उन्होंने काफी कुछ लिखा है। एक केवल उसी को क्यों पढ़े जिसमें उन्होंने निराकार की व्याख्या कर दी हो। उन्होंने मूर्ति पूजा का भी बात की। प्रश्न जो मणि प्रश्न माला है उनका ग्रंथ उसमें उससे पूछ पूछते हैं उनके शिष्य के अब मैं जीव इस तरह के जब असद्धांतिक बात करते हैं शंकराचार्य जी लोग तभी तो जो प्योर ज्ञान है वेद उसके आधार पर ही तो हम लोग चैलेंज करते हैं
01:19:58:14 कि भाई उनको ज्ञान चारों वेदों का है उपनिषदों का है सब चीज का है अच्छे विद्वान है ऐसे नहीं उनको शंकराचार्य जी की उपाधि मिलती है लेकिन जब उसमें वो मिश्रित करके और कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा बताएंगे तो तो फिर चैलेंज किया ही जाएगा और कितने बार उनको चैलेंज किया? जैसे हम यह मानते हैं। वेद शास्त्रों की ऋषियों की बात को हम झुठला नहीं सकते। नहीं नहीं वो ठीक है। और देखो हम ही नहीं हम ही नहीं विदेशी विद्वान तक भी वेदों की महिमा को स्वीकार कर रहे हैं। वो भी कह रहे हैं ऋग्वेद इज द ओल्डेस्ट बुक इन द लाइब्रेरी। आपने जी जी। हां वो तो ठीक है मगर अगर हमें मालूम है ये अज्ञानी है या फिर ये अपने लालच वश कोई गलत बात फैला सकता है तो वो लालच वश आपके मंत्रों को भी तो गलत दे सकता है आपको तो गलत दे सकता है तो वो उनकी प्रवृत्ति है वो ऐसा जैसे भद्राचार्य जी की प्रवृत्ति है कि ऐसा लिखा नहीं ऋषि दयानंद ने तब भी उनको कह रहे हैं तो एक चर्चा में बने रहने के लिए वो कुछ भी कपोल कल्पना से कह के और यह माने ने कि आदि शंकराचार्य हमारे मंत्रों को नहीं बदल सकते। मंत्रों को नहीं बदल सकते। भाष्य बदल सकते। है ना? वो
01:21:13:18 मतलब इतने इतने तो इतने अच्छे हैं। इतने ज्ञानी हैं वो मंत्रों को नहीं बदलेंगे। इतने तो अच्छे हैं। मगर वो अर्थ गलत बता रहे हैं। वाणी को कौन बदल सकता? कोई नहीं बदल सकता। [हंसी] चलिए ईश्वरी वाणी को कोई अब मैं लास्ट में इसको चर्चा को समाप्त करते हुए एक छोटा सा प्रश्न करूंगा। जैसे तिलक आदि को पाखंड बताया गया है। है ना? सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार आर्य समाज के अनुसार पाखंड नहीं है जी चंदन लगा सकते हैं ये तो लगाना भस्म लगाना ये पाखंड नहीं है तो चंदन वगैरह का लगा सकते हैं शीतलता देता है मस्तिष्क को ठंडक प्रदान करता है तो जैसे आपने बिंदी लगाई है तो ये तो चंदन नहीं है अरे तो महिलाओं के लिए नहीं नहीं इसका इसका वर्णन वैदिक वैदिक है कैसे है इसको कैसे माना आर्य समाज का प्रारूप क्या है इस बिंदी के लिए वो पूछो आप हां ये तो यह तो चंदन नहीं है। केवल चंदन का ही टीका आपने स्वीकार किया। श्रृंगार जो होता है महिलाओं को वो अपने पति के लिए करती हैं। इसका कोई अर्थ और यह है कि एक प्रामाणिकता होती है जैसे सिंदूर लगाते हैं, बिंदी लगाते हैं कि भाई इनके इनके कोई रक्षक पोषक हैं। यह विवाहित हैं। एक वो चिन्ह होता है तो यह भी एक धार्मिक चिन्ह है। तो चंदन आप लगा सकते हैं। भस्म वगैरह
01:22:28:26 नहीं भस्म लगा सकते हैं। शिख आप रखे हैं तो ये हमारे यजो पवित है। तो ये हमारे वैदिक संस्कृति के एक चिन्ह नहीं जैसे आपने कहा कि चंदन का ही टीका लगाना चाहिए तो ये तो बिंदी है तो ये फिर इसको किस उसमें अर्थ में ले रहे है कि एक प्रतीकात्मक मगर इसका शास्त्रों वर्णन नहीं है। शास्त्रों ने ऐसे ही स्वीकार किया है क्या बिंदी को? नहीं स्वीकार तो किया है श्रृंगार पति के लिए। मतलब बता सकते हैं थोड़ा सा किस यह है कि विवाह संस्कार आदि में है विवाह संस्कार तो उनका लौकिक प्रक्रियाएं होती हैं अच्छा लोकाचार में थोड़ा सा अच्छा लोकाचार में भस्म नहीं लगा सकते बिंदी लगा सकते कहीं नहीं नहीं ऐसे नहीं कि इधरउधर का सब जैसे होली को विकृत कर दिया कि कीचड़ पोतो तो वो रूप नहीं जिस चीज का जो शुद्ध रूप है उसको कहता है आर्य समाज भस्म लगाना जो हवन की बची हुई भस्म होती है यज्ञ की उसको नहीं लगाना चाहिए पर बिंदी लगा सकते हैं लोकाचार उसकी औषधियां होती है विदेशों में जो है नहीं नहीं माथे पे लगाने की बात कर रहा हूं माथे पे मतलब लगा के क्या वो साबित करना चाहते हैं जैसे आपने प्रतिकार किया अब आपने एकाग्रता देता है यहां पे कुछ हम लगाए तिलक
01:23:44:02 यहां अपना जैसे ध्यान भी करते हैं तो एकाग्रता प्रदान करता है और एक यह भी है कि भाई हम कोई यज्ञ आदि का सूचक चिन्ह है या कोई श्रे श्रेष्ठ कार्य वो ये कह सकता है नहीं अब ये थोड़ी अब भस्म में आप ये कीचड़ लपेट लो कहो कि भाई बिंदी लगा सकते कीचड़ नहीं लगा सकते अब वही बात है अब ईश्वर के लिए भी बहुत लोग एक डायलॉग बोलते हैं कि मानो तो ईश्वर नहीं तो पत्थर तो हम भी कहते हैं भाई मानो तो हलवा नहीं तो गोबर है ना वो सही है जैसे हम अपनी इच्छा अनुसार ये तय कर रहे हैं कि लोकाचार के अनुसार हमने भले ही लौकिक रीतियां होती है उनको किया लोकाचार के अनुसार हमने बिंदी यूज़ कर ली जिसमें कि चंदन नहीं है। मगर लोकाचार के अनुसार अगर कोई व्यक्ति भस्म यूज़ कर रहा है। नहीं तो वो अपने ईश्वर के प्रति श्रृंगार हां नहीं तो ये कौन तय कर रहा है? शास्त्रोक्त है। जी शास्त्र मतलब कि जो ये कपड़े की बिंदी है जिसमें गोंद होता है ये शास्त्रोक्त है। ये लगाई जा सकती है। ठीक
⬜ Not used yet · 01:24:43:10 – 01:25:14:00 (0:31)
01:24:43:10 है। चलिए अच्छा तो बहुत अच्छी चर्चा रही आपसे और बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने इतना सारा समय दिया। आप सभी लोगों के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और आप सबको कैसा क्या-क्या जानने को मिला तो वो सारी अपनी प्रतिक्रियाएं दें और बहुत ही यहां आकर के हमें भी बहुत अनुग्रह प्राप्त हुआ यहां का सभी का तो सभी को जय श्री राम नमस्ते करते हुए [संगीत]
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Conversation with an International Arya Samaj Scholar | आर्य समाज वैदिक या अवैदिक #aryasamaj #vedic
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