1
00:00:01,760 --> 00:00:05,800
तो अभी कुछ दिनों पहले हमने एक वीडियो डाला

2
00:00:05,800 --> 00:00:10,520
था जिसमें कि

3
00:00:10,520 --> 00:00:14,920
यह तो अभी कुछ दिनों पहले हमने एक वीडियो डाला था जिसमें हमने एक

4
00:00:14,920 --> 00:00:18,920
मुस्लिम विचारधारा को मानने वाले व्यक्ति का एक

5
00:00:18,920 --> 00:00:23,200
कुतर्क था उसका निराकरण किया था उसका समाधान किया था

6
00:00:23,200 --> 00:00:27,240
तो उसके जवाब में हमें बहुत सारे

7
00:00:27,240 --> 00:00:31,520
रेपकेस प्राप्त होने लगे मुस्लिम विचारधारा से प्रभावित

8
00:00:31,520 --> 00:00:35,840
लोगों की ओर से तो इसलिए मैं आज एक

9
00:00:35,840 --> 00:00:39,840
अंतर को स्पष्ट करने वाला ये वीडियो बना रहा हूं कि

10
00:00:39,840 --> 00:00:44,040
मुस्लिम विचारधारा में और सनातन सिद्धांतों

11
00:00:44,040 --> 00:00:48,080
में क्या अंतर है सबसे पहली बात यह

12
00:00:48,080 --> 00:00:50,240
है

13
00:00:50,240 --> 00:00:55,280
कि एक मनुष्य के जीवन में

14
00:00:55,280 --> 00:00:59,440
ईश्वर और धर्म की जो उत्पत्ति होती है वो होती

15
00:00:59,440 --> 00:01:03,600
है उसके अंदर व्याप्त सत चित आनंद की

16
00:01:03,600 --> 00:01:07,720
चाह के कारण यदि इस आधार पर उसके जीवन

17
00:01:07,720 --> 00:01:12,560
में धर्म और ईश्वर का ढांचा तैयार नहीं किया जाएगा

18
00:01:12,560 --> 00:01:16,800
तो कोई जरूरी नहीं है कि वह धर्म के प्रति आस्थान

19
00:01:16,800 --> 00:01:21,240
वित हो ईश्वर के प्रति आस्थान वित हो ईश्वर को सिद्ध

20
00:01:21,240 --> 00:01:25,400
भी ऐसे ही किया जा सकता है तो

21
00:01:25,400 --> 00:01:29,520
सबसे बड़ा अंतर जो है सनातन में

22
00:01:29,520 --> 00:01:33,680
और और जो इस्लाम है उसमें वो यह है कि

23
00:01:33,680 --> 00:01:38,040
सनातन ईश्वर को किसी के ऊपर थोप नहीं है

24
00:01:38,040 --> 00:01:42,080
कि भाई मेरी पूजा करो सनातन ईश्वर यह नहीं कहता

25
00:01:42,080 --> 00:01:46,400
है नहीं मेरी पूजा करो वरना तुम्हारे साथ ये होगा वो होगा अरे भाई पहले समझाओ

26
00:01:46,400 --> 00:01:50,680
तो सही तो सनातन सिद्धांत स्वयं कहता है प्रश्न

27
00:01:50,680 --> 00:01:55,280
करने के लिए ग्रंथ लिखता है क्या ग्रंथ है अथातो

28
00:01:55,280 --> 00:01:59,280
धर्म जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा प्रश्न करने

29
00:01:59,280 --> 00:02:03,520
को कहता प्रश्न करने को मना नहीं करता है 5 101

30
00:02:03,520 --> 00:02:06,240
कुरान जहां यह कहा जा रहा है कि

31
00:02:06,240 --> 00:02:10,360
ज्यादा प्रश्न मत करो वरना वह आयत तुम्हारे लिए खोल

32
00:02:10,360 --> 00:02:13,920
दी जाएंगी जिन आयतों के कारण पिछले कुछ लोग बागी हो

33
00:02:13,920 --> 00:02:18,120
गए थे इसका अर्थ क्या है उसका अर्थ यह निकल रहा है कि

34
00:02:18,120 --> 00:02:22,120
वास्तविक जो धर्म था वह कुछ और था मगर उसका पालन करने में कठिनाई

35
00:02:22,120 --> 00:02:26,240
आई लोगों को तो उन्होंने मना किया उसका पालन करने के लिए इसलिए

36
00:02:26,240 --> 00:02:30,280
कुछ सरलीकरण करके धर्म को दिया गया है तो

37
00:02:30,280 --> 00:02:34,960
भाई जो मनुष्य इस दुनिया में जन्म लेता है

38
00:02:34,960 --> 00:02:39,120
वह लट के साथ जन्म लेता है उसको जब भी आप

39
00:02:39,120 --> 00:02:43,800
धर्म की लगाम द्वारा सीमित करने चलोगे तो उसको तो कठिनाई आएगी उसको

40
00:02:43,800 --> 00:02:48,760
कठिनाई ना आए इसलिए धर्म को ही थोड़ी ना बदल दिया जाएगा

41
00:02:48,760 --> 00:02:53,320
और यदि यह बदला हुआ धर्म है तो इसका अर्थ है

42
00:02:53,320 --> 00:02:57,360
कि यह शाश्वत सिद्धांत नहीं है पहले कुछ और सिद्धांत

43
00:02:57,360 --> 00:03:03,360
थे अब कुछ और सिद्धांत हैं [संगीत]

44
00:03:03,600 --> 00:03:08,480
और तो बात आ जाती पूरी दोबारा विषय पर आ जाते हैं

45
00:03:08,480 --> 00:03:12,680
कि सनातन कहता है प्रश्न करो वहां से शुरू

46
00:03:12,680 --> 00:03:16,800
होता है हमारे जितने भी ग्रंथ हैं सनातन धर्म के ग्रंथ वह

47
00:03:16,800 --> 00:03:20,840
सभी प्रश्न से शुरू होते हैं भगवत गीता प्रश्न पर है सारे पुराण प्रश्न पर

48
00:03:20,840 --> 00:03:25,240
है और प्रश्न करने के लिए तो कहा ही जा रहा है बड़े वचन है श्रुति

49
00:03:25,240 --> 00:03:29,360
शास्त्रों के अब जब मनुष्य के अंदर ये जो

50
00:03:29,360 --> 00:03:33,960
सत आनंद की प्यास है इस पर बात करना शुरू की जाती है

51
00:03:33,960 --> 00:03:38,720
तो इसी के आधार पर यह सिद्ध किया जाता है सनातन के द्वारा कि

52
00:03:38,720 --> 00:03:42,920
आपके अंदर जो सत चित आनंद जो आप ढूंढ रहे हो

53
00:03:42,920 --> 00:03:47,120
हर तरह से सुखी होना चाहते हो कुल मिलाकर के आपकी चाह

54
00:03:47,120 --> 00:03:51,720
यही है कि मुझे ऐसा सुख प्राप्त हो जाए जो कि अवाद

55
00:03:51,720 --> 00:03:55,720
रूप से जिसका मैं भोग कर सकू यही है आपकी चाह उ

56
00:03:55,720 --> 00:03:59,840
उसी सुख को अगर डिवाइड कर दे तो व सच्चितानंद है

57
00:03:59,840 --> 00:04:04,000
आप अगर कुछ जानना चाहो तो जान सको आपको कुछ जानना बाकी ना रह जाए

58
00:04:04,000 --> 00:04:08,000
ऐसा दुनिया में कुछ ना हो जो आप ना जानते हो ये चित है आपको

59
00:04:08,000 --> 00:04:12,640
कभी मृत्यु का ग्रास ना बनना पड़े यह सत है

60
00:04:12,640 --> 00:04:16,880
और आप सदैव सुखी रहो ये आनंद है सत चित

61
00:04:16,880 --> 00:04:18,880
आनंद तो व्यक्ति के अंदर

62
00:04:18,880 --> 00:04:22,960
व्याप्त सत चित आनंद की जो चाह है उसी से सिद्ध होता

63
00:04:22,960 --> 00:04:27,080
है कि इस दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर है अब इस पर नास्तिक कुतर करने लगते

64
00:04:27,080 --> 00:04:31,120
हैं कि किसी व्यक्ति के मन के अंदर को हर चाह का विषय हो यह

65
00:04:31,120 --> 00:04:35,320
जरूरी नहीं हां जरूरी नहीं मगर वह चाह वो व्यक्ति

66
00:04:35,320 --> 00:04:39,440
छोड़ सकता हो यदि कोई व्यक्ति उड़ने वाले डायनासोर

67
00:04:39,440 --> 00:04:43,840
की कल्पना कर रहा है उड़ने वाले हाथी की कल्पना कर रहा है 2024 में

68
00:04:43,840 --> 00:04:48,240
तो जब उसको साइंस से बता देगी कि भाई आज की तारीख में ऐसा कोई हाती नहीं है

69
00:04:48,240 --> 00:04:52,360
तो उस चा को करना वह व्यक्ति बंद कर देता है छोड़ देता

70
00:04:52,360 --> 00:04:56,800
है मगर यह जो चाह है सच्चितानंद की चाह

71
00:04:56,800 --> 00:05:00,840
कि मैं कभी ना मरू मेरे प्रियजन कभी ना मर कल इंडिया पाकिस्तान में

72
00:05:00,840 --> 00:05:05,040
ये जीत जाए ये हो जाए मौसम ऐसा हो जाए मौसम वैसा बन

73
00:05:05,040 --> 00:05:09,080
जाए और मैं सदा सुखी रहूं मैं कभी बूढ़ा ना पढ मेरे दांत

74
00:05:09,080 --> 00:05:13,160
कभी ना टूटे मेरा फैट परसेंटेज कभी बढ़े नाना मेरे सिक्स पैक एप्स

75
00:05:13,160 --> 00:05:18,080
रहे ये जो वो कर रहा है वो बार-बार प्रकृति

76
00:05:18,080 --> 00:05:22,120
के नियमों को तोड़ने की चाह कर रहा है तो जब साइंस ने

77
00:05:22,120 --> 00:05:26,720
प्रकृति के उन उन नियमों को तोड़ने की बात को अभी तक नहीं स्वीकारा है

78
00:05:26,720 --> 00:05:32,400
तो आप उसकी डिमांड क्यों रखे हो मन में कि ऐसा

79
00:05:32,400 --> 00:05:34,040
हो अगर हमारा

80
00:05:34,040 --> 00:05:38,280
कोई प्रियजन अस्पताल में दो घं 200 वर्ष की उम्र

81
00:05:38,280 --> 00:05:42,280
आयु में भी भर्ती हो जाएगा तो हम चाहेंगे कि वह बच

82
00:05:42,280 --> 00:05:46,440
जाए अगर हम ऐसी कामना कर रहे हैं कि वह सुखी रहे

83
00:05:46,440 --> 00:05:50,640
हम हमेशा सुखी रहे तो यही कामना है सच्चिदानंद की और इसी से सिद्ध

84
00:05:50,640 --> 00:05:54,800
होता है कि दुनिया में कोई सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर

85
00:05:54,800 --> 00:05:58,800
है तो जो इस्लाम है उसके

86
00:05:58,800 --> 00:06:02,800
द्वारा स ईश्वर को सिद्ध नहीं किया गया है सीधे कहा

87
00:06:02,800 --> 00:06:07,040
गया है कि मैं ईश्वर हूं मेरी पूजा करो और मैंने जो कहा कहा है वो

88
00:06:07,040 --> 00:06:11,040
वो तुम करो अगर तुम करोगे तो तुम मेरी सजाओ से बच जाओगे और

89
00:06:11,040 --> 00:06:15,160
आखिर में मेरा दर्शन कर सकोगे तो सबसे पहला क्या अंतर आया सनातन

90
00:06:15,160 --> 00:06:19,160
में और सनातन विरुद्ध जो विचारधारा है इस्लाम उसमें क्या अंतर

91
00:06:19,160 --> 00:06:23,280
आया सबसे पहले कि सनातन ईश्वर को थोप

92
00:06:23,280 --> 00:06:27,440
नहीं है मनुष्य के जीवन पर धर्म को ठोकता नहीं है मनुष्य के जीवन पर उसको सिद्ध करता

93
00:06:27,440 --> 00:06:31,520
है उसका और ईश्वर के बीच में एक रिलेशन बताता है

94
00:06:31,520 --> 00:06:35,600
और उस वो बताता है कि तुम्हारी जो चाह का वास्तविक विषय है

95
00:06:35,600 --> 00:06:39,880
वह ईश्वर ही है और यदि तुम्हें उसे प्राप्त करना है तो तुम्हें इन इन नियमों का पालन

96
00:06:39,880 --> 00:06:44,080
करना पड़ेगा जिन्हे सनातन सिद्धांत कहते हैं जिन्हें सनातन

97
00:06:44,080 --> 00:06:48,560
धर्म कहते हैं अब इसमें कई बार एक बात आती है

98
00:06:48,560 --> 00:06:49,160
कि

99
00:06:49,160 --> 00:06:53,680
इस्लाम की तरफ से उनके जो विचारक होते हैं

100
00:06:53,680 --> 00:06:57,920
उनके द्वारा य कहा जाता है बार-बार कि भाई

101
00:06:57,920 --> 00:07:02,640
हमारा भी षष्टि के प्रारंभ से था हमारा धर्म भी

102
00:07:02,640 --> 00:07:06,920
तो और धर्म क्या है वो नियम जो

103
00:07:06,920 --> 00:07:11,200
वो नियम जो हमें पशुओं से भिन्न बनाते हैं यह तो इस्लाम के विद्वान

104
00:07:11,200 --> 00:07:15,200
भी मानते हैं वो बताते हैं यदि कोई नास्तिक उनके पास आता

105
00:07:15,200 --> 00:07:19,400
है तो वो उनसे कहते हैं कि भाई यदि तुम धर्म को नहीं मानते हो ईश्वर

106
00:07:19,400 --> 00:07:23,440
को नहीं मानते हो तो बताओ तुम्हें तुम्हारी मोरालिटी कैसे मिली मोरालिटी

107
00:07:23,440 --> 00:07:27,600
का मिलना वही मतलब है कि आप पशु से भिन्न मनुष्य कैसे

108
00:07:27,600 --> 00:07:31,960
हैं मोरालिटी का आधार क्या है है तो

109
00:07:31,960 --> 00:07:36,240
इसका अर्थ है कि धर्म का अर्थ वही है नियम

110
00:07:36,240 --> 00:07:40,320
नैतिकता के नियम तो तो इस्लाम की ओर

111
00:07:40,320 --> 00:07:44,640
से कई बार दावा किया जाता है कि जो

112
00:07:44,640 --> 00:07:48,720
हमारा जो धर्म है हमारे जो सिद्धांत है वो भी सनातन है जबकि अभी मैंने एक

113
00:07:48,720 --> 00:07:52,800
बात बताई कि वह खुद ही य क्लेम करता है कि पहले

114
00:07:52,800 --> 00:07:56,960
कुछ और सिद्धांत थे अब कुछ और सिद्धांत है इसके साथ ही

115
00:07:56,960 --> 00:08:01,240
साथ दो 186 में कहा गया

116
00:08:01,240 --> 00:08:04,600
कि कुछ नियम ऐसे थे

117
00:08:04,600 --> 00:08:09,080
रोजों की रात में स्त्री संकरना पहले

118
00:08:09,080 --> 00:08:13,160
अवैध था अनुमति नहीं थी पर आज से अनुमति दी जा

119
00:08:13,160 --> 00:08:17,760
रही है आज से अभी से यह नियम अभी अभी प्रतिपादित हो रहा है

120
00:08:17,760 --> 00:08:21,800
इसका अर्थ क्या है कुरान के ही अनुसार कुरान के

121
00:08:21,800 --> 00:08:26,040
ही अनुसार कुरान द्वारा प्रतिपादित होने वाले जो सिद्धांत है वह सनातन

122
00:08:26,040 --> 00:08:30,360
नहीं है टर्नल नहीं है पहले नहीं थे और

123
00:08:30,360 --> 00:08:34,400
अब है और बड़ा दार्शनिक

124
00:08:34,400 --> 00:08:38,560
धरातल पर क्या अंतर है कि यदि कुरान को प्रमाण मान

125
00:08:38,560 --> 00:08:43,120
लिया जाए तो कुरान खुद यह कहती है

126
00:08:43,120 --> 00:08:47,320
कि मुझ पर विश्वास मत करो क्यों क्योंकि दो 106

127
00:08:47,320 --> 00:08:52,840
में कुरान के रचयिता यह बोल रहे हैं कि

128
00:08:52,840 --> 00:08:57,040
क्या कहते हैं यह मैं अगर हम कोई आयत बदल

129
00:08:57,040 --> 00:09:01,080
देते हैं तो उससे बेहतर आयत देते हैं तो क्या हुआ यहां पर

130
00:09:01,080 --> 00:09:05,640
शिक्षा को बदलना सिद्धांतों को बदलना स्वीकार किया

131
00:09:05,640 --> 00:09:09,960
गया इसका अर्थ क्या है कि आज मूर्ति पूजा निषेध

132
00:09:09,960 --> 00:09:14,800
है तो कल को वैद भी हो सकती

133
00:09:14,800 --> 00:09:19,000
है तो जो आज मूर्ति पूजा को लेकर के वो हो रही

134
00:09:19,000 --> 00:09:20,000
है दुनिया भर

135
00:09:20,000 --> 00:09:24,000
में कि हमें लड़ना होगा अपने उसको बचाना होगा कल

136
00:09:24,000 --> 00:09:28,280
को अचानक से कोई नई आयत आ जाएगी आपको कह दिया जाएगा बदल

137
00:09:28,280 --> 00:09:32,280
गया भाई तो हम ऐसी चीज की रक्षा कर रहे हैं जो कल को

138
00:09:32,280 --> 00:09:36,280
कभी भी बदली जा सकती और यह मैं नहीं कह रहा यह जिस

139
00:09:36,280 --> 00:09:40,560
चीज की आप रक्षा कर रहे हो वही कह रही है इसके

140
00:09:40,560 --> 00:09:44,600
बाद एक जगह पर बदला भी गया जो मैंने बता दिया आपको

141
00:09:44,600 --> 00:09:48,600
5 101 से पता चल रहा है दो 187 से पता चल रहा है कि बदला

142
00:09:48,600 --> 00:09:52,800
गया इसके साथ ही साथ जो मैसेंजर है उसके लिए

143
00:09:52,800 --> 00:09:57,200
भी यह कहा गया है कि मैसेंजर भी कभी-कभी शैतान

144
00:09:57,200 --> 00:10:01,440
से प्रभावित हो सकता है और वह शैतान से प्रभावित

145
00:10:01,440 --> 00:10:05,840
होकर के शैतान जो बात बुलवाना चाहता है वह भी बोल सकता है

146
00:10:05,840 --> 00:10:10,160
तो यहां पर अपनी जो क्रेडिबिलिटी है कुरान

147
00:10:10,160 --> 00:10:14,200
ने उस पर भी एक प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया कि भाई

148
00:10:14,200 --> 00:10:19,080
जो नबी शैतान से प्रभावित हो सकता है उस नबी के द्वारा

149
00:10:19,080 --> 00:10:23,120
ऊपर वाले के नाम से आने वाले जो मैसेजेस हैं वह हम समझ रहे हैं

150
00:10:23,120 --> 00:10:27,200
मगर हो सकता है कि वो प्रभावित हो गया हो और वो ऊपर वाले के मैसेजेस ही

151
00:10:27,200 --> 00:10:31,640
ना हो किसी और के मैसेजेस हो तो यहां पर भी कुरान अपनी क्रेडिबिलिटी पर

152
00:10:31,640 --> 00:10:35,120
स्वयं ही सवाल उठा देती है सैटेनिक

153
00:10:35,120 --> 00:10:40,000
वर्सेस नाम की जो बुक है वह इसी प्रकरण के इर्दगिर्द लिखी गई

154
00:10:40,000 --> 00:10:44,160
थी उस पर मैं नहीं जाऊंगा मगर हां

155
00:10:44,160 --> 00:10:48,240
यहां पर क्रेडिबिलिटी पर फिर से एक बार प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है कि जिन सिद्धांतों

156
00:10:48,240 --> 00:10:52,480
की हम रक्षा कर रहे हैं वह सिद्धांत वही सिद्धांत है जो मानव जाति की

157
00:10:52,480 --> 00:10:57,160
अच्छाई के लिए रचे गए हैं या नहीं अब इसके अलावा एक

158
00:10:57,160 --> 00:11:01,480
और बात है जहां पर जिस जिस बात के आधार पर सनातन

159
00:11:01,480 --> 00:11:05,680
में और सनातन विरुद्ध सनातन को ना मानने वाले वेदों को ना मानने वाले जितने

160
00:11:05,680 --> 00:11:09,880
भी तंत्र है उनमें जो है एक बहुत स्पष्ट अंतर

161
00:11:09,880 --> 00:11:14,040
आ जाता है वह क्या कि जिन ग्रंथों पर हम विश्वास करते हैं

162
00:11:14,040 --> 00:11:18,360
वह ग्रंथ यह कहते हैं कि उनको ईश्वर ने रचा नहीं

163
00:11:18,360 --> 00:11:22,840
है और जिन ग्रंथों पर सनातन विरुद्ध

164
00:11:22,840 --> 00:11:26,960
विचारधारा वाले व्यक्ति विश्वास करते हैं वो सभी ग्रंथ यह

165
00:11:26,960 --> 00:11:31,320
कहते भी हैं और ये सिद्ध भी है कि किसी किसी देश काल परिस्थिति

166
00:11:31,320 --> 00:11:35,560
में उनको रचा गया है अभी इस पर बात करेंगे जैसे

167
00:11:35,560 --> 00:11:39,680
कि हमारे यहां दो चार 10 में कहा गया बारण उपनिषद में और भी कई जगह

168
00:11:39,680 --> 00:11:43,760
कहा गया कि वेद जो है अपर है उनको रचने वाले ईश्वर भी नहीं

169
00:11:43,760 --> 00:11:47,920
है क्यों क्योंकि ईश्वर

170
00:11:47,920 --> 00:11:50,720
के ऊपर कोई भी नियम लागू नहीं हो सकता

171
00:11:50,720 --> 00:11:54,800
हालांकि कुरान के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर पर यह नियम लागू होता है

172
00:11:54,800 --> 00:11:58,920
कि व अवतार नहीं ले सकता उसकी मूर्ति नहीं बनाई जा सकती है ना

173
00:11:58,920 --> 00:12:02,920
मगर मर फिर भी वो इस नियम इस जब वोह इस नियम को नहीं

174
00:12:02,920 --> 00:12:06,920
मानता है जब वो इस नियम को मान लेता है कुरान के द्वारा प्रतिपादित

175
00:12:06,920 --> 00:12:11,120
होने वाला ईश्वर कि वो अवतार नहीं ले सकता मगर उसके ऊपर यह नियम तब

176
00:12:11,120 --> 00:12:15,880
भी नहीं लागू होता कि वह झूठ नहीं बोल सकता वो खुद कह रहा है

177
00:12:15,880 --> 00:12:19,880
तुम जानते नहीं हम कुछ भी कर सकते हैं इस तरह से वही जहां पर वो यह

178
00:12:19,880 --> 00:12:24,040
कह रहा है कि हम अपनी आयतों को बदल देते हैं तो वहां पर वो कह स्वीकार

179
00:12:24,040 --> 00:12:28,040
कर रहा है कि हम कुछ भी कर सकते हैं तो जब वो ये स्वीकार कर रहा है कि हम कुछ भी कर

180
00:12:28,040 --> 00:12:32,160
सकते हैं तो उस कुछ में भी एक सीमा है वह कुछ कुछ नहीं है

181
00:12:32,160 --> 00:12:36,560
असीमित कुछ नहीं है कुछ भी का मतलब कुछ भी नहीं है कुछ भी का मतलब

182
00:12:36,560 --> 00:12:41,480
कुछ कुछ कुछ भी नहीं तो

183
00:12:41,480 --> 00:12:45,600
जब उसने यहां पर कह दिया कि हम कुछ भी कर सकते तो दूसरी जगह वह अपने अवतारवाद

184
00:12:45,600 --> 00:12:49,720
का अपनी मूर्ति का जैसे कहा है उसने

185
00:12:49,720 --> 00:12:54,040
4 150 में कि ईश्वर की कोई संतान कैसे हो सकती है

186
00:12:54,040 --> 00:12:58,320
611 में कहा सॉरी तो ईश्वर की कोई संतान कैसे हो सकती है जबक

187
00:12:58,320 --> 00:13:02,720
उसकी कोई पत्नी नहीं तो यहां पर क्या हुआ पत्नी के अभाव में ईश्वर की संतान नहीं हो

188
00:13:02,720 --> 00:13:06,080
सकती इसका अर्थ क्या हुआ

189
00:13:06,080 --> 00:13:10,240
इसका अर्थ यह हुआ कि जो ईश्वर एक जगह झूठ बोलने के लिए यह

190
00:13:10,240 --> 00:13:14,240
बोल रहा है या अपनी बात को बदलने के लिए यह बोल रहा है कि हम

191
00:13:14,240 --> 00:13:18,440
कुछ भी कर सकते हैं हमारे ऊपर कोई भी मर्यादा लागू नहीं होती वही

192
00:13:18,440 --> 00:13:22,680
ईश्वर अवतार लेने के संबंध में यह कह रहा है कि हमारे ऊपर

193
00:13:22,680 --> 00:13:27,120
अवतार ना ले पाने की मर्यादा लागू होती है या संतान

194
00:13:27,120 --> 00:13:31,640
का संतान को उत्पन्न ना कर पाने की मर्यादा लागू होती है

195
00:13:31,640 --> 00:13:35,720
ठीक है तो क्या हुआ यहां पर अब यह जो बात

196
00:13:35,720 --> 00:13:40,160
है कि एक तरफ हम यह मान रहे हैं कि ईश्वर अपनी आयतों को बदल सकता है

197
00:13:40,160 --> 00:13:44,240
एक तरफ हम यह मान रहे हैं जैसे सातव सातव जो सुरा है

198
00:13:44,240 --> 00:13:48,360
उसमें कहा गया कि ईश्वर जो है भटका है तो जब ईश्वर को भटकाने वाला हम

199
00:13:48,360 --> 00:13:52,560
मान लेंगे तो यह कैसे पता चलेगा कि जब यह जो किताब उसने

200
00:13:52,560 --> 00:13:57,640
रची है जिसको हम प्रमाण मान रहे हैं यह उसने भटकाने के लिए नहीं रची

201
00:13:57,640 --> 00:14:02,160
है और इस बात का प्रमाण क्या है कि ईश्वर भटका आता है वह किताब

202
00:14:02,160 --> 00:14:06,360
खुद इस बात का प्रमाण क्या है कि इस किताब को किसने रचा वह किताब

203
00:14:06,360 --> 00:14:10,480
खुद तो यदि इस किताब को ही हम प्रमाण मान ले

204
00:14:10,480 --> 00:14:14,520
तो उस किताब के ही आधार पर सिद्ध हो रहा है कि इसको रचने वाला ऐसा

205
00:14:14,520 --> 00:14:18,520
कोई सोर्स है ऐसा ईश्वर है ऐसा ऊपर वाला है

206
00:14:18,520 --> 00:14:21,280
जो कि भटका है और जब वह भटका

207
00:14:21,280 --> 00:14:25,320
है तो इस किताब के माध्यम से नहीं भटका रा है यह कैसे पता चलेगा तो यहां

208
00:14:25,320 --> 00:14:29,800
पर फिर से एक बार क्रेडिबिलिटी समाप्त हो जाती है अच्छा

209
00:14:29,800 --> 00:14:34,320
एक जाकिर नायक साहब ने बहुत ज्यादा सवाल उठाया

210
00:14:34,320 --> 00:14:38,680
था कि भाई हम उस किताब का अनुसरण

211
00:14:38,680 --> 00:14:43,040
अनुकरण क्यों करें जो कंटक्ट करती अपनी बातों में और उन्होंने चैलेंज

212
00:14:43,040 --> 00:14:47,200
भी दिया था हालांकि इस चैलेंज को कई लोगों ने स्वीकार किया है और जवाब भी दिया गया

213
00:14:47,200 --> 00:14:51,680
है पर मैं मर्यादा की सीमा का अतिक्रमण

214
00:14:51,680 --> 00:14:56,160
करके बात का जवाब ना देते हुए दार्शनिक धरातल पर य एक बहुत अकाट्य

215
00:14:56,160 --> 00:15:01,080
सा जवाब दे देता हूं 4150 में

216
00:15:01,080 --> 00:15:05,560
संभवतः कहा जा रहा है कि कुरान के द्वारा प्रतिपादित

217
00:15:05,560 --> 00:15:09,800
होने वाले ईश्वर और उसके रसूल के बीच में अंतर करना

218
00:15:09,800 --> 00:15:14,360
गलत है ठीक है अब

219
00:15:14,360 --> 00:15:18,840
जब अंतर नहीं किया जा सकता तो या तो हम रसूल को माने कि उसको देखा नहीं जा सकता

220
00:15:18,840 --> 00:15:22,960
उसकी कोई संतान नहीं हो सकती और या फिर हम ऊपर वाले

221
00:15:22,960 --> 00:15:27,360
को माने कि उसको देखा जा सकता है तो यहां पर अवतारवाद

222
00:15:27,360 --> 00:15:31,440
सिद्ध हो गया कुरान के अनुसार तो अगर ऐसे हम

223
00:15:31,440 --> 00:15:36,080
निकालने बैठे तो अनगिनत कंट्रक्शन कुरान में ही आ जाएंगे जैसे

224
00:15:36,080 --> 00:15:37,080
कि

225
00:15:37,080 --> 00:15:41,160
एक जगह शराब के लिए आया कि भाई जब आपने शराब

226
00:15:41,160 --> 00:15:45,280
पी हो तो आप मस्जिद में ना जाए यानी कि शराब पी सकते हो मगर

227
00:15:45,280 --> 00:15:49,960
मस्जिद में ना जाओ मगर आगे क्या आया कि शराब पीना हराम है

228
00:15:49,960 --> 00:15:54,080
अब यहां पर दोनों बातें आपस में टकरा रही है अब इन बातों के लिए वो कह सकते

229
00:15:54,080 --> 00:15:58,480
कि भाई आपको जो है खुद ना समझे और उसके उसके किसी विद्वान

230
00:15:58,480 --> 00:16:02,560
के पास उनसे समझिए तो भाई क्या जाकिर नायक गया था क्या

231
00:16:02,560 --> 00:16:05,680
शंकराचार्य के

232
00:16:05,680 --> 00:16:10,440
पास सनातन धर्म के बारे में कुप्र चार करने से पहले गया था क्या

233
00:16:10,440 --> 00:16:14,720
शंकराचार्य के पास गया था क्या वोह नहीं गया था

234
00:16:14,720 --> 00:16:19,080
जबकि हमारे शास्त्रों में वर्णन है कि धर्म का ज्ञान किससे ले

235
00:16:19,080 --> 00:16:23,520
सनातन को किससे समझे परंपरा से

236
00:16:23,520 --> 00:16:27,600
लक्षण संपन्न सन्यासी से मगर नहीं उसका मोटिव ये

237
00:16:27,600 --> 00:16:31,320
था ही नहीं कि उसको जो है

238
00:16:31,320 --> 00:16:35,400
एकता लानी थी उसका उसका मोटिव था हिंदू धर्म के बारे में कु प्रचार करना

239
00:16:35,400 --> 00:16:40,640
वो उसने किया तो इस प्रकार से देखा जाए

240
00:16:40,640 --> 00:16:44,840
तो इस्लामिक जो किताब है उसमें कंट्रक्शन भी सिद्ध

241
00:16:44,840 --> 00:16:49,000
हो जाता है और अगर उसका अध्ययन करेंगे तो बहुत सारे कंट्रक्शन निकल आएंगे

242
00:16:49,000 --> 00:16:52,280
तो इसलिए यह प्रचार करना भी बंद करें य कंट्रक्शन

243
00:16:52,280 --> 00:16:56,280
है दूसरी बात आपने जैसे कहा ना आपका एक उत्तर आ जाता

244
00:16:56,280 --> 00:16:59,120
है

245
00:16:59,120 --> 00:17:03,200
यह जो मदरा वाली बात है उसके लिए वह क्या आता है कि भाई वह

246
00:17:03,200 --> 00:17:07,240
धीरे-धीरे उसकी आयत उतरी हैं इसलिए उस समय की स्थिति यह थी तो

247
00:17:07,240 --> 00:17:11,440
वह था और उस समय की स्थिति यह थी तो वह था तो फिर आज की स्थिति

248
00:17:11,440 --> 00:17:15,520
के लिए क्या है यह कैसे पता चलेगा अच्छा दूसरी बात एक

249
00:17:15,520 --> 00:17:19,640
बात और आ जाती है कि अगर वह स्थिति के वशीभूत हो रहा है चीजें प्रतिपादित

250
00:17:19,640 --> 00:17:23,960
हो रही है तो फिर उनको सनातन सिद्धांत इटरनल लॉ क्यों आप बोल रहे हैं

251
00:17:23,960 --> 00:17:27,960
सनातन सिद्धांत का मतलब ये नहीं कि आप सनातन धर्म का बोल रहे हैं ध्यान रखिएगा

252
00:17:27,960 --> 00:17:32,120
यहां पर मैं गुण की बात कर रहा हूं शाश्वत सिद्धांतों की बात आप क्यों कर रहे हैं

253
00:17:32,120 --> 00:17:36,360
अपने लॉज को आप कहिए कि वोह किसी विशेष देश का देश

254
00:17:36,360 --> 00:17:40,400
काल परिस्थिति में किसी विशेष देश काल परिस्थिति के लोगों के लिए उतरे

255
00:17:40,400 --> 00:17:44,520
थे उनको समान रूप से सभी देश काल

256
00:17:44,520 --> 00:17:48,960
परिस्थितियों में लागू करने वाले सिद्धांत मत बताइए एक

257
00:17:48,960 --> 00:17:53,760
न पाच के बारे में भी काफी बातें की जाती है जहां पर लिखा हुआ है कि

258
00:17:53,760 --> 00:17:57,800
रमजान का पवित्र महीना खत्म होते ही काफिरों को ढूंढो

259
00:17:57,800 --> 00:18:01,880
और मारो तो इसके एप्लीकेशन में कई बार

260
00:18:01,880 --> 00:18:06,080
इसका अर्थ यह निकलता है कि जो भी कुरान पर विश्वास नहीं करता

261
00:18:06,080 --> 00:18:07,400
है उसको

262
00:18:07,400 --> 00:18:11,480
रमजान का महीना खत्म होते ही मारो बात ठीक है कि वहां

263
00:18:11,480 --> 00:18:15,480
पर कुछ मुशरिक थे मुशरिक मुझे नहीं पता शाब्दिक अर् मैं अपनी भाषा

264
00:18:15,480 --> 00:18:19,760
में बात करता हूं कुछ ऐसे डबल स्टैंडर्ड लोग थे जिन्होंने प्रॉमिस

265
00:18:19,760 --> 00:18:23,840
किया था कि हम इस युद्ध में आपका साथ देंगे मगर बाद में

266
00:18:23,840 --> 00:18:28,360
वह मुकर गए थे तो यहां पर उनकी बात की जा रही है ऐसा कहा जाता है

267
00:18:28,360 --> 00:18:32,360
बात ठीक है समझ में आती है मगर यहां पर प्रश्न यह खड़ा होता है कि

268
00:18:32,360 --> 00:18:36,520
यदि सिर्फ पर्टिकुलर उनके बारे में बात की जा रही थी तो यहां

269
00:18:36,520 --> 00:18:40,720
पर डायलॉग यह आना चाहिए था कि जिन लोगों ने जिन काफिरों ने

270
00:18:40,720 --> 00:18:44,800
धोखा दिया है पवित्र महीना खत्म होते ही उनको मारो

271
00:18:44,800 --> 00:18:49,080
तो यदि यहां से यह शिक्षा नहीं मिलती है कि काफिरों को मारो यदि कुरान के द्वारा

272
00:18:49,080 --> 00:18:53,360
यहां से ये शिक्षा नहीं मिलती है कि काफिरों को मारो तो यह शिक्षा तो मिलती

273
00:18:53,360 --> 00:18:57,560
है कि अगर किसी कम्युनिटी के दो-चार लोग 10 लोग

274
00:18:57,560 --> 00:19:01,720
कुछ कर देंगे तो उस गुनाह को उस ऑफेंस को पूरी

275
00:19:01,720 --> 00:19:05,800
कम्युनिटी का माना जाएगा यानी अगर कुछ 1020 लोगों ने

276
00:19:05,800 --> 00:19:10,120
कहीं पर बम लगा दिया उड़ा दिया गया तो वह जिस कम्युनिटी

277
00:19:10,120 --> 00:19:14,920
से बिलोंग करते हैं उन सबका नाम लिया जाना ही कुरान ने सिखाया है

278
00:19:14,920 --> 00:19:19,200
यह यहां से निकलता है यदि आप यह कहते हैं कि वहां पर जिन

279
00:19:19,200 --> 00:19:22,440
वहां पर काफिरों के लिए बात की गई है जिन काफिरों ने वहां पर

280
00:19:22,440 --> 00:19:26,640
ऐसा ऐसा किया था उन काफिरों की बात हो रही है और जब आदेश

281
00:19:26,640 --> 00:19:30,960
आया कि काफिरों को मारो तो यह नहीं आया कि उन काफिरों

282
00:19:30,960 --> 00:19:35,000
को मारो यह आया कि काफिरों को मारो तो इसका मतलब

283
00:19:35,000 --> 00:19:39,400
यहां से शिक्षा प्रतिपादित हुई कि जिस कम्युनिटी के लोगों ने ऑफेंस किया है

284
00:19:39,400 --> 00:19:43,400
उस ऑफेंस को पूरी कम्युनिटी का ऑफेंस कम से कम माना जाना चाहिए इसके

285
00:19:43,400 --> 00:19:47,400
साथ ही साथ एक बहुत ही क्रिटिकल कंडीशन उत्पन्न करने वाली शिक्षा आ जाती

286
00:19:47,400 --> 00:19:51,560
है सामने क्या कि भाई 334 में कह दिया

287
00:19:51,560 --> 00:19:55,680
गया कि अगर तुमने किसी को माता

288
00:19:55,680 --> 00:19:59,920
बहन वगैरह बोल दिया है तो वह तुम्हारी वो हो गई

289
00:19:59,920 --> 00:20:04,200
यह तो तुम्हारे सब मुख्य वचन है तुम इनके ठीक विपरीत कार्य

290
00:20:04,200 --> 00:20:09,120
भी कर सकते हो इसका अर्थ क्या हुआ

291
00:20:09,120 --> 00:20:13,200
क्या हम यह माना जाए इस प्रश्न का उत्तर यदि कोई दे पाए तो दीजिएगा क्या

292
00:20:13,200 --> 00:20:17,400
हम यह माने कि उस किताब को मानने वाला उस विचारधारा

293
00:20:17,400 --> 00:20:21,400
को मानने वाला जब कभी भी कह रहा है कि बहन भाई तो हम

294
00:20:21,400 --> 00:20:25,880
उस पर विश्वास ना करें तो इसका अर्थ है कि आपके बारे में

295
00:20:25,880 --> 00:20:29,880
जो लोग ऐसा कहते हैं क्या वह सही है कि

296
00:20:29,880 --> 00:20:33,880
इस विचारधारा को मानने वाले लोगों पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह

297
00:20:33,880 --> 00:20:37,600
विचारधारा का जो प्रमाणिक किताब है वह खुद कह रही है

298
00:20:37,600 --> 00:20:41,800
कि नहीं मुख की बातों का कोई वैल्यू नहीं है मुंह की बातें

299
00:20:41,800 --> 00:20:45,880
हैं सब तो इसके अलावा एक और भयावह दृश्य वाली शिक्षा है जो प्रश्न

300
00:20:45,880 --> 00:20:50,840
चिन्ह खड़ा कर देती है 424 और कई जगह कहा गया है

301
00:20:50,840 --> 00:20:54,960
जैसे मूर्ति पूज कों से तब तक लड़ते रहो जब तक मूर्ति पूजा खत्म ना

302
00:20:54,960 --> 00:20:59,040
हो जाए या फिर एक बहुत गलत दिखाई देने वाली शिक्षा क्या है

303
00:20:59,040 --> 00:21:03,960
जिसमें कि जब तुम युद्ध करते हो इनसे काफिरों से

304
00:21:03,960 --> 00:21:08,040
तो वहां की जो स्त्रिया उनको लाओ एक मासिक धर्म के बाद उनसे आप संभोग कर

305
00:21:08,040 --> 00:21:12,760
सकते हो यह कैसे आप सिखा सकते हैं

306
00:21:12,760 --> 00:21:16,800
भाई हमारे यहां पर यह नहीं सिखाया गया है कि आप युद्ध में जीत जाओ तो वहां की स्त्रियों को

307
00:21:16,800 --> 00:21:21,040
ले आओ कैदी बनाओ बंदी बनाओ और

308
00:21:21,040 --> 00:21:25,720
ज्यादा दूर मत जाइए केवल रामायण पढ़ लीजिए रामो विग्रह वान धर्मा

309
00:21:25,720 --> 00:21:29,880
राम जी ने रावण के यहां से किसी स्त्री को बंदी नहीं बनाया अपने साथ

310
00:21:29,880 --> 00:21:34,200
नहीं ले आए ला सकते थे यह नहीं

311
00:21:34,200 --> 00:21:38,720
सिखाया तो यह सब अंतर है

312
00:21:38,720 --> 00:21:42,760
सनातन में और इस्लाम में अब बात करते हैं कि कई लोग आते

313
00:21:42,760 --> 00:21:46,920
कमेंट्स में कहते भाई आपके ग्रंथों में यह लिखा है भाई आपने क्या पढ़ा है

314
00:21:46,920 --> 00:21:51,160
पहली बात तो यह है कि जब आपके ग्रंथों से आपको निकाल करके दे रहे हैं अवतारवाद तो

315
00:21:51,160 --> 00:21:52,640
आप हमारी बात मान नहीं रहे

316
00:21:52,640 --> 00:21:57,240
खैर जो बात आप स्वीकार नहीं करेंगे हम उस पर अड़ते ही नहीं है हमारे पास

317
00:21:57,240 --> 00:22:01,440
कुछ ऐसे सिद्धांत जिन पर बात करने से दूध का दूध और पानी

318
00:22:01,440 --> 00:22:05,520
पानी हो जाएगा उस पर मैं लास्ट में बात करूंगा मगर

319
00:22:05,520 --> 00:22:09,560
जब हम आपके ग्रंथों पर बात करते हैं और कुछ ऐसी बात होती है जो आपको

320
00:22:09,560 --> 00:22:13,760
समझ में नहीं आ रही होती तो आप कहते हैं आप भैया उसको जाकर उससे पढ़िए आपने

321
00:22:13,760 --> 00:22:17,880
हमारे ग्रंथों को किससे पढ़ा जो आप आकर के हमें बता रहे हो आपके ग्रंथों

322
00:22:17,880 --> 00:22:22,040
में य लिखा है भाई किसी एक विशेष

323
00:22:22,040 --> 00:22:26,200
वर्ग के कह देने से आर समाज के कह देने से कि नात

324
00:22:26,200 --> 00:22:30,200
प्रतिमा अस्थ नात प्रतिमा अस्थ से नहीं हो जाता है कि भगवान अवतार नहीं

325
00:22:30,200 --> 00:22:34,200
ले सकते ऋग्वेद में लिखा है भगवान अपनी माया धारा तरह तरह के

326
00:22:34,200 --> 00:22:38,200
अवतार लेता है रूप बनाता है प्रकट करता है वेदों में

327
00:22:38,200 --> 00:22:42,600
ही लिखा है कि जो ईश्वर होता है वह गर्भ में विचर है

328
00:22:42,600 --> 00:22:46,920
गर्भ के मध्य में विरता है मूर्ति पूजा का सिद्धांत

329
00:22:46,920 --> 00:22:51,920
दिया हुआ है शता शत्र उपनिषद में मूर्ति पूजा के बारे में बात हो रही है रुद्र की

330
00:22:51,920 --> 00:22:56,000
मूर्ति और सीधे-सीधे पत्थर में कहा जा रहा है हे देवता

331
00:22:56,000 --> 00:23:00,400
तुम इस पत्थर में आकर के बस जाओ तो आप

332
00:23:00,400 --> 00:23:04,680
जब अपने लिए स्वीकार नहीं करते कि हम

333
00:23:04,680 --> 00:23:07,640
आपकी शिक्षा अनाधिकृत रूप से ले ले जबकि आपके

334
00:23:07,640 --> 00:23:11,720
शास्त्रों ने इस तरह की कोई विधि नहीं दी है कि किससे लेनी है किससे नहीं यह

335
00:23:11,720 --> 00:23:16,280
भी बात है हां यह बहुत बड़ा अंतर है सबसे बड़ा अंतर इस्लाम

336
00:23:16,280 --> 00:23:20,360
और सनातन में यही है कि इस्लाम में गुरु व्यवस्था का

337
00:23:20,360 --> 00:23:24,480
अभाव है 459 में यह कहा गया है कि आप

338
00:23:24,480 --> 00:23:29,000
जो है या तो अल्लाह को फॉलो करें और या फिर नबी को फॉलो कर

339
00:23:29,000 --> 00:23:33,280
और या फिर अधिकृत लोगों को फॉलो करें अब अल्लाह और नबी

340
00:23:33,280 --> 00:23:37,600
व्यावहारिक रूप से यहां पर उपलब्ध नहीं है है ना

341
00:23:37,600 --> 00:23:41,640
तो फिर कौन बचा अधिकृत व्यक्ति और अधिक अधिकृत व्यक्ति कौन

342
00:23:41,640 --> 00:23:45,760
होगा इसके इसका जो है आप अपने आप आंकलन करिए और जैसे

343
00:23:45,760 --> 00:23:50,120
ही आप व्यक्ति अपने आप आंकलन करेगा तो सबकी अपनी अपनी थ्योरी हो

344
00:23:50,120 --> 00:23:54,240
जाएगी अधिकृत व्यक्ति के लिए हमारे यहां क्या है बिल्कुल

345
00:23:54,240 --> 00:23:58,520
स्पष्ट सिद्धांत धर्म में संचय होने पर ब्रह्मचारी सन्यासी के पास जाएं

346
00:23:58,520 --> 00:24:02,720
ब्रह्मचारी आचार्य बनता है अथर्ववेद 11 पा 16 मनुस्मृति

347
00:24:02,720 --> 00:24:06,760
12वां अध्याय 112 से 114 और ज्ञान प्राप्त

348
00:24:06,760 --> 00:24:11,600
होता है परंपरा से एवं परंपरा प्राप्ति मम और

349
00:24:11,600 --> 00:24:15,760
गुरु की शरण में जाने के लिए बार-बार कहा जा रहा है कि जो इस रास्ते

350
00:24:15,760 --> 00:24:20,280
पर पहले गए उन्हीं के पीछे पीछे तुम जाओ और क्या कहा जा रहा है

351
00:24:20,280 --> 00:24:22,880
कि गुरु की शरण में जाकर के उनके शरणागत होकर

352
00:24:22,880 --> 00:24:27,040
के उनसे प्रश्न करो शरणागत होकर के और क्या कहा

353
00:24:27,040 --> 00:24:31,240
जा रहा है सभी शति स्मति शास्त्रों में सामंजस्य की शि शिक्षा देने वाला गुरु

354
00:24:31,240 --> 00:24:35,480
है और गुरु वही जो आपका संशय दूर कर दे तो आपने इनमें

355
00:24:35,480 --> 00:24:39,680
से कौन से नियम के आधार पर हमारे शास्त्रों को शास्त्रों का अध्ययन किया है

356
00:24:39,680 --> 00:24:44,560
जो आ गए आप ना तस प्रतिमा स्ती नात प्रतिमा स्थ

357
00:24:44,560 --> 00:24:48,760
अब नाथस प्रतिमा अस्थ के बारे में आर्य समाज ने जो तानाबाना खड़ा

358
00:24:48,760 --> 00:24:52,840
किया है जिसकी हेल्प जाकिर नायक ने बहुत ली है है ना

359
00:24:52,840 --> 00:24:57,000
तो इसका भी जवाब देते ही चले भाई नात प्रतिमा अस्थ का पहली

360
00:24:57,000 --> 00:25:01,080
बात तो अर्थ यह है कि भगवान यह कह रहे हैं कि मेरे समान कोई और नहीं

361
00:25:01,080 --> 00:25:05,280
है ईश्वर इसमें भी आर समाज अठखेलिया करने लगेगा

362
00:25:05,280 --> 00:25:09,320
कि अरे तो भगवान की बात कर रहे हैं भगवान तो कृष्ण भी थे राम भी थे ईश्वर की बात

363
00:25:09,320 --> 00:25:13,640
नहीं कर रहे हैं यहां पर भी अठखेलिया करने लगेगा तो

364
00:25:13,640 --> 00:25:17,920
ईश्वर यहां पर यह कह रहे हैं नात प्रतिमा स्ती में कि मेरे

365
00:25:17,920 --> 00:25:21,960
समान मेरे प्रतिमान किसी का नहीं है और यह

366
00:25:21,960 --> 00:25:26,480
बात जो इनका भाष्य है यजुर्वेद का उसमें लिखी हु है कि प्रासंगिक

367
00:25:26,480 --> 00:25:30,680
अर्थ ये भी है इसका यह अर्थ भी हो सकता है मगर सही अर्थ जो मान

368
00:25:30,680 --> 00:25:34,840
ग्रहण करने योग्य अर्थ है व यह है तो पहली बात तो ये है कि उन्होंने

369
00:25:34,840 --> 00:25:38,240
जो ग्रहण ना करने योग्य अर्थ था वह इन्होंने लिया

370
00:25:38,240 --> 00:25:42,280
और ग्रहण करने योग्य जो अर्थ था वह छोड़ दिया कि ईश्वर

371
00:25:42,280 --> 00:25:46,400
यहां पर यह कह रहे हैं कि मेरे समान कोई नहीं है दूसरी बात यह

372
00:25:46,400 --> 00:25:50,400
आती है क्या शरीर में रहने वाली जो आत्मा है आर समाज

373
00:25:50,400 --> 00:25:54,520
के अनुसार बात कर रहा हूं क्या उसका कोई आकार

374
00:25:54,520 --> 00:25:59,080
है क्या उसको देखा जा सकता है क्या उसकी मूर्ति है

375
00:25:59,080 --> 00:26:03,320
तो अगर प्रतिमा का अर्थ मूर्ति लेना है ना तस्य प्रतिमा अस्ति लेना

376
00:26:03,320 --> 00:26:07,320
है तो यह बात तो जीवात्मा के लिए भी है मगर जी

377
00:26:07,320 --> 00:26:11,440
जीवात्मा स्थूल शरीर धारण करती है भौतिक शरीर धारण करती है ऐसा

378
00:26:11,440 --> 00:26:15,480
शरीर धारण करती है जो मनुष्य की कर्म इंद्रियों का विषय हो सके आंखों

379
00:26:15,480 --> 00:26:20,160
का विषय हो सके और फिर उसकी मूर्ति बनती है

380
00:26:20,160 --> 00:26:24,360
तो यदि ना तस्य प्रतिमा अस्थ से अर्थ

381
00:26:24,360 --> 00:26:29,320
यह निकाला जाएगा कि मेरी कोई मूर्ति नहीं हो सकती तो वो तो जीवात्मा की भी नहीं हो सकती

382
00:26:29,320 --> 00:26:33,480
मगर जीवात्मा जिस शरीर को धारण कर रही है उसकी मूर्तियां बन रही है उसके चित्र

383
00:26:33,480 --> 00:26:37,520
छप रहे हैं तो इसका अर्थ क्या हुआ कि जब जीवात्मा

384
00:26:37,520 --> 00:26:42,320
शरीर धारण कर सकती है तो ईश्वर नहीं कर सकता है

385
00:26:42,320 --> 00:26:46,480
इसीलिए सनातन शास्त्रों में भगवान के साकार और

386
00:26:46,480 --> 00:26:50,640
निराकार दोनों रूपों की बात की है बन उपनिषद दो तीन एक में लिखा

387
00:26:50,640 --> 00:26:53,600
है कि भगवान साकार भी है निराकार

388
00:26:53,600 --> 00:26:57,680
भी है दोनों उनके व्यक्तित्व के आयाम है जब आप

389
00:26:57,680 --> 00:27:01,680
पढ़ रहे तो केवल वही मत पढ़ो जो आ समाने आर समाज ने अलंकार

390
00:27:01,680 --> 00:27:05,800
समाजी ने प्रचारित प्रसारित कर दिया है यह भी पढ़ो ठीक

391
00:27:05,800 --> 00:27:10,080
है तो हमारे ग्रंथों को कृपया करके हमें समझाने की कोशिश

392
00:27:10,080 --> 00:27:14,360
ना करें अपने ग्रंथों में झांके तो अब बात य आती है अंततः

393
00:27:14,360 --> 00:27:18,760
अं गत्वा कि सनातन में और इस्लाम में अंतर

394
00:27:18,760 --> 00:27:23,600
क्या है पहला अंतर मैंने आपको बताया कि

395
00:27:23,600 --> 00:27:28,400
सनातन ईश्वर को ठोकता नहीं है धर्म को ठोकता नहीं है उसे सिद्ध करता है

396
00:27:28,400 --> 00:27:32,840
सिद्ध करता है पूरी दुनिया के नास्तिकों को ले आना जब उनको समझाना पाओ

397
00:27:32,840 --> 00:27:37,720
निरुत्तर निराधार करके भेजेंगे वचन है

398
00:27:37,720 --> 00:27:42,880
हमारा इसके बाद दूसरा क्या है

399
00:27:42,880 --> 00:27:47,000
कि जो इस्लामिक विचारधारा वाली किताब है

400
00:27:47,000 --> 00:27:51,280
वह खुद यह सिद्ध करती है कि उसके जो लॉज

401
00:27:51,280 --> 00:27:55,520
है उसके द्वारा दिया जाने वाला जो मजहब है दीन है वह

402
00:27:55,520 --> 00:27:59,720
शाश्वत नहीं है क्यों क्योंकि वो खुद कह रहे पहले ऐसा था आज ऐसा

403
00:27:59,720 --> 00:28:03,760
है वह खुद कह रही है कि आज हम इस चीज को बदल रहे हैं

404
00:28:03,760 --> 00:28:08,120
बदल सकता है तीसरी बात कि

405
00:28:08,120 --> 00:28:08,640
वह खुद

406
00:28:08,640 --> 00:28:12,800
अपनी क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठाती है एक इस बात से कि

407
00:28:12,800 --> 00:28:16,800
उसको उस उस मैसेज को पहुंचाने वाले को शैतान काबू

408
00:28:16,800 --> 00:28:20,880
में कर सकता है और दूसरी इस बात से कि उसका उसको

409
00:28:20,880 --> 00:28:25,400
रचने वाला जो है वह झूठ बोल सकता है या फिर वह अपनी बात को बदल सकता है

410
00:28:25,400 --> 00:28:30,120
है ना तो य क्रेडिबिलिटी प प्रश्न हो और

411
00:28:30,120 --> 00:28:34,400
तीसरी बात क्या है कि कुछ ऐसी शिक्षाएं हैं जिनका

412
00:28:34,400 --> 00:28:39,280
संतुष्टि जनक निर्णय प्राप्त नहीं होता है जैसे कि वह न पाच वाली बात

413
00:28:39,280 --> 00:28:43,720
कि यह कैसे सिखा रहा है कि अगर कि कुछ 10 लोगों ने कोई बात कह दी तो उसकी पूरी कम्युनिटी

414
00:28:43,720 --> 00:28:47,840
को ही उसमें नाम दे दिया गया यह तो फिर ठीक ही है कि अगर कहीं पर बम लगाने वाले

415
00:28:47,840 --> 00:28:51,880
कुछ लोग हैं तो व जिस कम्युनिटी के हो उसका पूरा नाम लेना ठीक है य तो कुरान ही सिखा रही

416
00:28:51,880 --> 00:28:56,480
है फिर अच्छा इसके बाद क्या है कि

417
00:28:56,480 --> 00:29:01,040
ऐसा कि कुरान की जो शिक्षा है उसमें कंट्रक्शन

418
00:29:01,040 --> 00:29:05,160
भर भर के मिलता है जैसे कि आप कह कि मूर्ति पूजा का निषेध

419
00:29:05,160 --> 00:29:09,360
है मगर मूर्ति पूजा कुरान से ही सिद्ध हो सकती है अब इसके

420
00:29:09,360 --> 00:29:13,360
बाद अगला पॉइंट क्या है कि कुरान जो है जब

421
00:29:13,360 --> 00:29:17,480
यह क यह कहते हैं कि कुरान को किसी उसके विद्वान से समझिए तो

422
00:29:17,480 --> 00:29:21,600
व विद्वान की पहचान क्या होनी चाहिए यानी कि गुरु तत्व के प्रति आस्था

423
00:29:21,600 --> 00:29:23,680
और गुरु तत्व कैसा होना चाहिए इसका

424
00:29:23,680 --> 00:29:28,080
निराकरण वहां उपलब्ध नहीं है यह व्यवहारिक

425
00:29:28,080 --> 00:29:32,520
अंतर है और अब बात आ जाती है तीन मूल

426
00:29:32,520 --> 00:29:36,600
सिद्धांत मनुष्य की वास्तविक चाह है कि

427
00:29:36,600 --> 00:29:40,760
वोह सत्य चित आनंद को प्राप्त करे जिससे कि ईश्वर सिद्ध हो सकता है अगर इस

428
00:29:40,760 --> 00:29:44,920
इस चाह को आप स्वीकार नहीं करते हैं तो ईश्वर की सिद्धि नहीं कर

429
00:29:44,920 --> 00:29:49,440
पाएंगे तो मनुष्य की चाह क्या है सच्चिदानंद को प्राप्त करने की चाह

430
00:29:49,440 --> 00:29:54,000
तो क्या उसको सच्चिदानंद ईश्वर दिया जा रहा है क्या उसको सच्चिदानंद

431
00:29:54,000 --> 00:29:58,160
रूपी मोक्ष दिया जा रहा है नहीं दिया जा रहा है ईश्वर वो है जो बाधित

432
00:29:58,160 --> 00:30:02,160
है किसी नियम के नीचे है मनुष्य क्या करना चाह रहा है दुनिया के हर

433
00:30:02,160 --> 00:30:06,440
नियम को तोड़ देना चाह रहा है तोड़ देने वाला बनना चाह रहा है किसी प्राकृतिक

434
00:30:06,440 --> 00:30:10,480
नियम के नीचे नहीं रहना चाहता है और उसको मोक्ष

435
00:30:10,480 --> 00:30:14,680
में क्या मिल रहा है मोक्ष के रूप में उसे मिल रहा है कि वह आखिर में

436
00:30:14,680 --> 00:30:18,880
ऊपर वाले को देख लेगा यह मोक्ष है तो उसकी जो

437
00:30:18,880 --> 00:30:22,960
ईश्वर को मानने की धर्म को स्वीकार करने की जो कंडीशन थी वो

438
00:30:22,960 --> 00:30:27,000
ये नहीं थी वो थी सभी नियमों को तोड़ देने

439
00:30:27,000 --> 00:30:31,000
वाला बनना बनना है ना मगर

440
00:30:31,000 --> 00:30:35,080
वह अंत में बन नहीं रहा है यानी कि हम मांग रहे हैं

441
00:30:35,080 --> 00:30:39,520
पानी और हमें मिल रहा है दूसरे लिक्विड तत्व

442
00:30:39,520 --> 00:30:43,680
जैसे कि कहीं पर एसिड मिल रहा है कहीं पर ऑयल मिल रहा है जिनको

443
00:30:43,680 --> 00:30:48,240
व्यक्ति पी तो सकता है मगर उससे प्यास नहीं बुझ सकती

444
00:30:48,240 --> 00:30:52,560
है ना और इससे आगे कि

445
00:30:52,560 --> 00:30:56,640
उस गंतव्य स्थान तक पहुंचाने वाला जो साधन है

446
00:30:56,640 --> 00:31:01,400
यानी कि ईश्वर वह कौन है

447
00:31:01,400 --> 00:31:05,400
तो यहां पर सर्वशक्तिमान है किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है सत्यम ज्ञान

448
00:31:05,400 --> 00:31:09,560
अनंतम ब्रम किसी भी प्रकार का मतलब किसी भी प्रकार का नियम

449
00:31:09,560 --> 00:31:13,760
नहीं है कोई अगर कहे कि व अवतार नहीं ले सकता तो राम कृष्ण

450
00:31:13,760 --> 00:31:18,120
के रूप में अवतार लेता है कोई अगर कहे कि वह

451
00:31:18,120 --> 00:31:22,120
कछुआ नहीं बन सकता तो कर् बनता है वरा नहीं बन सकता वरा अवतार लेता है मत्सा नहीं

452
00:31:22,120 --> 00:31:26,240
बन सकता मत से अवतार लेता है कोई अगर कहे कि वह झूठ नहीं बोल

453
00:31:26,240 --> 00:31:30,440
सकता वो कृष्ण बन जाता है मोहिनी बन जाता है छल नहीं कर सकता तो

454
00:31:30,440 --> 00:31:34,680
कोई अगर कहे कि वो सच नहीं बोल सकता व राम बन जाता है

455
00:31:34,680 --> 00:31:38,920
और कोई अगर कहे कि वो मूर्ख नहीं हो सकता वह पापी

456
00:31:38,920 --> 00:31:43,000
नहीं बन सकता और रावण के रूप में पापी हमारे जैसे मूर्खों के रूप में

457
00:31:43,000 --> 00:31:48,760
मूर्ख बन जाता है यह है अब आद्य सर्वशक्तिमान

458
00:31:48,760 --> 00:31:50,920
ईश्वर

459
00:31:50,920 --> 00:31:54,560
तो जो अब अब कई बार ऐसा प्रश्न आता है

460
00:31:54,560 --> 00:31:58,640
कि भाई ईश्वर बुराई कैसे कर सकता है भाई अगर ईश्वर

461
00:31:58,640 --> 00:32:02,840
बुराई नहीं कर सकता तो दुनिया में बम बनाने वालों को बना कौन रहा है यह बुराई

462
00:32:02,840 --> 00:32:07,160
नहीं है इस पर जो है मुफ्ती साहब शांत

463
00:32:07,160 --> 00:32:11,840
हो जाते हैं और कह देते बुराई को बनाना बुराई नहीं है

464
00:32:11,840 --> 00:32:16,760
वाह कितनी अच्छी बात है ना और लास्ट

465
00:32:16,760 --> 00:32:21,120
में कि पहली बात तो

466
00:32:21,120 --> 00:32:25,560
जो मनुष्य को चाहिए वह अंत में मिल नहीं रहा है यानी कि मोक्ष सच्चिदानंद

467
00:32:25,560 --> 00:32:30,160
रूपी मोक्ष नहीं मिल रहा है तो हम कहेंगे परम स्वतंत्र मोक्ष

468
00:32:30,160 --> 00:32:34,280
जो मनुष्य को मोक्ष दिलवाने वाला ईश्वर चाहिए सर्वशक्तिमान ईश्वर

469
00:32:34,280 --> 00:32:38,600
वो नहीं मिल रहा है बाधित ईश्वर मिल रहा है जो जन्म नहीं ले सकता इसकी मूर्ति नहीं बन सकती

470
00:32:38,600 --> 00:32:42,800
बहुत से कार्य नहीं कर सकता है वह बात और है कि झूठ ना बोलने

471
00:32:42,800 --> 00:32:46,920
वाली मर्यादा को वो तोड़ देता है या बात को बदलने वाली मर्यादा को वह तोड़

472
00:32:46,920 --> 00:32:51,520
देता है और इसके

473
00:32:51,520 --> 00:32:55,600
बाद लास्ट में मान भी लिया जाए कि चलो ठीक है

474
00:32:55,600 --> 00:32:59,640
वही मोक्ष जो है प्यास बुझाने वा वाला मोक्ष है और वही

475
00:32:59,640 --> 00:33:04,200
ईश्वर जो बाधित है मगर व वहां तक पहुंचाने वाला ईश्वर है मगर

476
00:33:04,200 --> 00:33:10,200
इन दोनों को साधने के लिए जो नियम है वह शाश्वत नहीं

477
00:33:10,240 --> 00:33:11,240
है

478
00:33:11,240 --> 00:33:15,400
वह शाश्वत नियम नहीं है तो ना तो परम स्वतंत्र मोक्ष है ना

479
00:33:15,400 --> 00:33:20,320
ही सर्वशक्तिमान ईश्वर है और ना ही शाश्वत धर्म है

480
00:33:20,320 --> 00:33:24,360
और गुरु तो है ही नहीं कई शिक्षाएं

481
00:33:24,360 --> 00:33:29,000
हैं जो भ्रमित कर रही है नौ पाच

482
00:33:29,000 --> 00:33:33,560
कंट्रक्शन है ही है ना

483
00:33:33,560 --> 00:33:38,160
और ईश्वर की सिद्धि है ही नहीं

484
00:33:38,160 --> 00:33:42,400
इसके बाद आखरी में एक बात फिर से मैं दोबारा ले आऊंगा

485
00:33:42,400 --> 00:33:47,360
कि मेरे सामने आ सकता है कि भाई हमसे समझो आ करके भाई आपसे कोई क्यों समझे

486
00:33:47,360 --> 00:33:51,360
आप जिस ग्रंथ को अच्छे और बुरे के लिए प्रमाण मान

487
00:33:51,360 --> 00:33:55,440
रहे हो उससे सिद्ध करो कि किस विधि के द्वारा किसी को सेलेक्ट

488
00:33:55,440 --> 00:33:59,440
और रिजेक्ट किया जाए उससे जा हम समझें

489
00:33:59,440 --> 00:34:03,520
नहीं कर पाओगे क्योंकि वहां पर

490
00:34:03,520 --> 00:34:08,360
चेन ऑफ ट्रेडीशन को आप मानते तो हैं पर कहां से मानते हैं यह मुझे नहीं पता

491
00:34:08,360 --> 00:34:12,520
मैं तो कहूंगा कि चेन ऑफ ट्रेडिशनल

492
00:34:12,520 --> 00:34:16,520
ही मानते हैं क्यों क्योंकि चेन ऑफ ट्रेडीशन को

493
00:34:16,520 --> 00:34:20,920
यानी परंपरावादी

494
00:34:20,920 --> 00:34:25,160
है अगर परंपरा से ज्ञान को सुरक्षित रखा जा सकता था

495
00:34:25,160 --> 00:34:29,160
कुरान को आने की आवश्यकता ही नहीं थी ज्यादा से ज्यादा वो प्रासंगिक भाषा

496
00:34:29,160 --> 00:34:33,280
में जैसे पहले जो नियम प्रतिपादित हो चुके हैं और आज जो है भाषा बदलने

497
00:34:33,280 --> 00:34:37,520
के कारण उन नियमों को समझने में परेशानी हो रही है तो ज्यादा से ज्यादा वो जो

498
00:34:37,520 --> 00:34:41,600
क्लेरिफिकेशन है उसके रूप में कुरान आ सकती है मगर कुरान तो यह

499
00:34:41,600 --> 00:34:45,760
कहती है ना कि मुझसे पहले आई जितनी भी किताबें हैं उनको निरस्त

500
00:34:45,760 --> 00:34:50,400
करते हुए मैं आई हूं अब मेरे अंदर जो लिखा है वही उनमें मान्य है

501
00:34:50,400 --> 00:34:54,560
बाकी उनमें सारी बातें मान्य नहीं है उनमें मिलावट हो चुकी है कुरान तो य

502
00:34:54,560 --> 00:34:58,560
प्रतिपादित करती है तो इसका अर्थ क्या हुआ कि

503
00:34:58,560 --> 00:35:02,640
कुरान खुद परंपरा वाद को तोड़ती है तो फिर कुरान को

504
00:35:02,640 --> 00:35:06,840
समझने के लिए परंपरा का सहारा कैसे लिया जाए नहीं

505
00:35:06,840 --> 00:35:11,080
लिया जा सकता आप कुरान के आधार पर सिद्ध नहीं कर सकते हां

506
00:35:11,080 --> 00:35:15,080
थोड़ी बहुत देर के लिए भगवत गीता को मान लीजिएगा तो चार दो और तीन 16 के आधार पर आप

507
00:35:15,080 --> 00:35:19,200
यह कह पाएंगे कि परंपरा से प्राप्त ज्ञान ही प्रमाणिक होता है ठीक

508
00:35:19,200 --> 00:35:23,360
है ना तो यह सारी चीजें हैं तो व्यर्थ के

509
00:35:23,360 --> 00:35:27,720
तंड बाद से बचे और हमारे शास्त्र क्या

510
00:35:27,720 --> 00:35:32,280
कहते हैं हमारे ग्रंथ क्या कहते हैं कुछ हमारे यहां के जो अपूर्ण

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00:35:32,280 --> 00:35:36,560
या अजर गगरी छलकत जाए वाले अलंकारी लोग हैं

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00:35:36,560 --> 00:35:40,680
उनके आधार पर आकर के हमारे सामने अपने

513
00:35:40,680 --> 00:35:44,720
मंतव्य की पूर्ति करने का प्रयास ना करें तो इसलिए अगर

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00:35:44,720 --> 00:35:48,720
समझना चाहते हैं कोई बात है जो आपको लगता है कि आप सिद्ध कर सकते हैं

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00:35:48,720 --> 00:35:52,840
सनातन सिद्धांतों से श्रेष्ठ सिद्ध कर सकते हैं तो

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00:35:52,840 --> 00:35:57,040
चर्चा के लिए आमंत्रित है और नहीं आते

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00:35:57,040 --> 00:36:01,320
हैं तो जो आपकी दुनिया है उसमें आप खुश रहिए

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00:36:01,320 --> 00:36:05,760
प्रसन्न रहिए अनजान बने रहिए सत्य से मगर

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00:36:05,760 --> 00:36:10,320
जिस दिन सामना होगा उस दिन दृश्य बदल जाएगा

520
00:36:10,320 --> 00:36:14,320
जय श्री राम [संगीत]
