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00:00:01:21 अभी मैंने एक वीडियो देखा यह नास्तिक विमोह करके है उनका उसमें उन्होंने एक तर्क दिया है कि भाई मनुष्य जो है पशुओं से श्रेष्ठ है यह भावना भी हमें धर्म से मिलती है तो हमें यह नहीं मानना चाहिए कि मनुष्य जो है पशुओं से श्रेष्ठ है और जो आस्तिक हैं उनके हिसाब से ईश्वर ने निश्चित किया है कई सारी चीजें हैं क्योंकि मनुष्य के पास धर्म है मनुष्य के साथ भगवान को प्राप्त करने की जो इच्छा है उसे क्रियान्वित कर पा ने की सामर्थ्य भी है इसलिए मनुष्य को श्रेष्ठ माना जाता है प्रज्ञा शक्ति के कारण परंतु उन्होंने कहा कि भाई उन्होंने कुछ तीन तर्क दिए मुझे वो कुछ इस प्रकार है तो वो तर्क में जो सबसे पहला तर्क है वो यह है कि भाई अगर आप किसी को श्रेष्ठ और किसी को निम्न देख रहे हो तो वो आपका अपना पर्सपेक्टिव है अगर दो सेव रखे हुए हैं उसमें से अगर एक सेव सड़ा हुआ है और एक सेव बिल्कुल फ्रेश है तो आपके लिए वो फ्रेश वाला सेव हो सकता है कि श्रेष्ठ हो मगर जो सड़ा हुआ एप्पल है उसमें एक कीड़ा रहता है जिसके लिए वो जो सड़ा हुआ सेव है वो भी उसके लिए श्रेष्ठ है और तीसरा इनका था क्या किसी थर्ड पार्टी ने आकर के आपको यह मोहर दी है क्या कि आप श्रेष्ठ हो जो दूसरे लिविंग बीइंग्स हैं धरती पर रहने वाले उनसे आप श्रेष्ठ

00:01:16:27 हो क्या किसी थर्ड पार्टी ने आकर के जजमेंट दिया है क्या तो इन तीन तर्कों के आधार पर थोड़ा सा आज देखते हैं कि इनके तर्क हैं या कुतर्क हैं तो सबसे पहली बात तो यह है कि आपने कहा कि हमें किसी के पर्सपेक्टिव से अगर कोई चीज प्राप्त हो रही है अगर हमें हमारे पर्सपेक्टिव से कोई ट्रुथ कोई सत्य दिखाई दे रहा है तो हमें उसको मानना नहीं चाहिए क्योंकि किसी दूसरे पर्सपेक्टिव से वह सत्य सत्य नहीं है है ना तो पहली बात तो यह है कि इसमें भी आपके अंदर और हमारे बीच में एक समानता है कि आप भी शाश्वत सत्य को ही सत्य कहते हैं और हम भी शाश्वत सत्य की ही खोज में हैं ठीक है एक तौर पर भी भौतिकी की तरीके से हम सत्य को सत्य नहीं मानते व्यवहार में तो फिर अगर हम किसी भी चीज को पर्सपेक्टिव के आधार पर यानी कि पर्सपेक्टिव का अर्थ है कि कोई एक स्टार्टिंग पॉइंट हमने माना और उसके आधार पर हमने देखना शुरू किया कि वो चीज क्या कही जाए अगर हमने दो को दो कहना है दो को एक से अधिक कहना है या कम कहना है तो हमने जीरो या एक के पर्सपेक्टिव से देखा कि दो क्या है तीन के पर्सपेक्टिव से नहीं तो इस इस तरह से अगर हम किसी एक पर्सपेक्टिव को स्टार्टिंग पॉइंट के आधार में रूप में स्वीकार नहीं करेंगे तो फिर तो हम दुनिया का कोई भी वाक्य नहीं बोल सकते कोई भी वाक्य यह नहीं बोल सकते

00:02:32:06 कि मेरा नाम विमोह है क्यों क्योंकि भाई जो आपको अगर हम साइकिल की दृष्टि से या सामान्य व्यक्ति की स्पीड से हम कहेंगे तो हम कह सकते हैं कि ट्रेन जो है स्पीड में दौड़ रही है तेज दौड़ रही है मगर वहीं पे हम अगर ए एरोप्लेन की दृष्टि से देखेंगे तो वो ट्रेन तेज नहीं दौड़ रही तो क्या करें यह भी नहीं कहा जा सकता कि ट्रेन तेज दौड़ती है अगर आप किसी चीज को ठंडा कहेंगे तो किसी ऐसे पर्सपेक्टिव से कहेंगे जिसको आपने सामान्य कहा होगा या गर्म कहा होगा वरना आप यह भी नहीं कह सकते कि दुनिया में कोई चीज ठंडी है या गर्म है अगर आप किसी चीज को गीला कहेंगे तो तब कहेंगे जब आपने किसी चीज को सूखा माना होगा अगर आपने वो सूखे का स्टार्टिंग पॉइंट और पर्सपेक्टिव नहीं लिया तो आप यह भी नहीं कह सकते कि दुनिया में कोई चीज गीली है और किसी चीज को गीले के रूप में पर्सपेक्टिव मानने के अभाव में आप यह भी नहीं कह सकते कि दुनिया में कोई चीज सूखी है इसका अर्थ क्या हुआ कि आपको एक जनरल

00:03:47:14 पर्सपेक्टिव के आधार पर ही आप कोई बात बोल सकते हैं वरना आप एक शब्द नहीं बोल सकते आप मुंह से आवाज नहीं निकाल सकते चू भी नहीं बोल सकते क भी नहीं बोल सकते अगर आपका ये नियम लागू कर दिया जाए तो आपकी चीजें मान ली जाए तो कि पर्सपेक्टिव जब तक सभी का नहीं मानने होगा जब तक सभी के अनुसार वह सत्य सत्य नहीं होगा तब तक हमें वह बात माननी नहीं चाहिए तो इस हिसाब से आप इंसान भी नहीं है इस हिसाब से आप किसी के बेटे भी नहीं है इस हिसाब से आप किसी के पुत्र भी नहीं है भाई भी नहीं है बहन कुछ नहीं है आप कुछ भी अपने बारे में बोल ही नहीं सकते आपके इस नियम के अनुसार यहां तक कि दिन समय डेट ये सब भी बिना किसी स्टार्टिंग पॉइंट को स्वीकार किए मतलब पर्सपेक्टिव को रख कर के आप दिन समय और डेट भी नहीं बोल सकते कि आज की डेट यह है तो आप तो कुछ भी बोल ही नहीं सकते क्योंकि आप ही ये नियम प्रतिपादित कर रहे हैं कि सभी पर्सपेक्टिव से जो चीज मानी जा सके वही चीज मानने लायक है व्यवहार की बात कर रहा हूं वैसे हम भी नहीं मानते हम भी शाश्वत सत्य को ही खोज रहे हैं तो इसका अर्थ क्या हुआ कि आप भी शाश्वत सत्य को खोज रहे हैं और शाश्वत शबद के सत्य के रूप में आप किसे खोज रहे हैं सच्चितानंद को एक स्टेट को खोज रहे हैं सत्य चित आनंद की स्टेट को जिसमें कि किसी भी पर्सपेक्टिव से

00:05:02:21 वो जो सत्य है जो बात बोल रहे हैं आप वो वही रहे जैसे कि मैंने कहा मैं जीवित हूं तो अगर कोई व्यक्ति आज से 100 साल बाद जब मैं नहीं रहूंगा उस पर्सपेक्टिव से इसको देखा जाए कि मैं जीवित हूं तो यह सत्य सत्य नहीं रह जाएगा उस समय मैं जीवित नहीं कहला हंगा यदि सारे पर्सपेक्टिव से कोई बात सिद्ध है तो वही मानी जा सकती है अन्यथा नहीं अगर कोई थर्ड पार्टी आकर के ठप्पा दे रही है तो वही चीज मानी जा सकती है अथवा नहीं तो थर्ड पार्टी द्वारा अगर आपको ठप्पा मिल भी जाता है तो यह न्याय होगा यह क्यों माने आपको कैसे पता कि उस कीड़े को वो जो एप्पल है जिसे वो जिससे वो पोषित हो रहा है वो श्रेष्ठ लगता है ये आपको कैसे पता इसके साथ ही साथ कीड़े के अनुसार न्याय अन्याय क्या है यह आपको कैसे पता आपको कैसे पता कि कीड़ा भी यही सोचता है कि किसी भी चीज को तब माना जाए जब उसको दो लोग या उससे अधिक लोग या किसी थर्ड पार्टी द्वारा ठप्पा मिल जाए कीड़ा कीड़ा इसी को न्याय मानता है ये आपको कैसे पता आप यहां प हो सकता है ये कहोगे कि इन जनरल ऐसा माना जाता है कि सभी की सम्मति से वो बात जो आए निकल के वो जो है न्याय है तो फिर यहां तो आप स्वयं का ही खंडन करोगे एक्चुअली क्या है कि कीड़े का जो पर्सपेक्टिव है या पशुओं का जो पर्सपेक्टिव है वो व्यावहारिक है ही नहीं वो हमें प्राप्त है ही नहीं इसलिए हम जो भी चीज की गणना करते हैं

00:06:17:25 थ्योरी पढ़ते हैं जो भी चीज करते हैं वो उपलब्ध पर्सपेक्टिव्स के आधार पर करते हैं से आवश्यक तो नहीं है पर मैं आपको कुछ कारण दे देता हूं मनुष्यों को श्रेष्ठ मानने के आप मुझे बताइए कितने कीड़ों ने कितने अ पशुओं ने मनुष्यों को गुलाम बनाया है कंट्रोल किया है उन्हें और उनकी जानकारी में कितने कीड़े ऐसे हैं जो अपनी अगर चोट लग जाती है उनके घाव हो जाता है तो अपने प्रयासों के द्वारा उन्होंने अपनी दवा प्राप्त की है इतने कीड़े ऐसे हैं जो मनुष्यों की जानकारी में मनुष्यों पर एक्सपेरिमेंट्स करते हैं अब आप यहां पर फिर वही कह सकते हैं कि ये तो मैंने अपने पैरामीटर्स लगा दिए तो भाई आपने भी तो अपनी पैरामीटर्स लगाए कि जो कीड़े के पर्सपेक्टिव से होगा वो श्रेष्ठ होगा या जो आपके वैज्ञानिकों के पर्सपेक्टिव से होगा वो श्रेष्ठ होगा या अंततः कुल मिलाकर के आप यह कहना चाहते हैं कि जो आपके पर्सपेक्टिव से होगा वही श्रेष्ठ होगा यहां पे फिर वही बात आ गई जो आपने अन्य वीडियोस में कहा कि पहले आपने अपनी एक डेफिनेशन बनाई और बहुत ही चालाकी से उस डेफिनेशन को सब पर ये वही डेफिनेशन वाला पॉइंट है आपने ईश्वर का डेफिनेशन बताया वो जो फिंगरप्रिंट्स में डिफरेंस पैदा करता है और फिर आपने कहा फिंगरप्रिंट्स में डिफरेंस है इसीलिए ईश्वर का अस्तित्व है आपने एक डेफिनेशन बनाया और उस डेफिनेशन को आप एविडेंस के रूप में प्रेजेंट कर रहे हैं ये वही

00:07:32:27 पॉइंट है जिसके बारे में मैं पिछले तीन-चार लीज में बात कर चुका हूं डेफिनेशंस आर नॉट एविडेंस वी कैन मेक डेफिनेशंस इवन फॉर थिंग्स दैट डू नॉट एजिस्ट व्हिच इज व्हाट आई थिंक यू आर डूइंग राइट नाउ आपने डेफिनेशन बनाई कि जो कीड़े को भी सही लगेगा कीड़ों से भी पूछा जाएगा सर्वसम्मति से जो श्रेष्ठ और निम्न होगा उसी को श्रेष्ठ और निम्न माना जाएगा या फिर उसके और मूल में चले जाए तो जो वैज्ञानिकों को भी एक्सेप्ट होगा उसको श्रेष्ठ माना जाएगा या फिर अंततः उसके मूल में चले जाएं तो जो आपको एक्सेप्ट होगा श्रेष्ठ और निम्न के रूप में वही माना जाएगा आपने जो पैरामीटर्स तय किए हैं स्वीकार किए हैं किसी को श्रेष्ठ अथवा निम्न मानने के लिए क्या वो आपने कीड़ों से जानवरों से पूछे हैं कि वो भी इसमें सहमत है कि नहीं कि थर्ड पार्टी के द्वारा अगर बोला जाएगा तो मान लेंगे कि अ यह वाला जो न्याय प्रक्रिया है कि उसमें वो भी उनसे भी पूछा जाए और आपसे भी पूछा जाए ये न्याय प्रक्रिया उनके लिए न्याय है ये आपने उनसे कंफर्म कर लिया ने भी यह जो डेफिनेशन है ना यह खुद ही तय की है और इसके आधार पर आप यह कहना चाहते हैं कि सभी मनुष्य मान ले कि वो म पशुओं से भिन्न या श्रेष्ठ नहीं है डेफिनेशन आपने बनाई है आपकी डेफिनेशन है ये ठीक है कि आपके अनुसार यह तरीका गलत है कि अपनी

00:08:48:08 खुद ही डेफिनेशन बनाई और उस डेफिनेशन के आधार पर एक तथ्य को स्थापित कर लिया कि या तो ईश्वर है या फिर आप ही ने कहा कि अपनी डेफिनेशन के अनुसार आपने मान लिया कि ईश्वर श्रेष्ठ मनुष्य श्रेष्ठ है अब मैं कुछ प्रश्न पूछ लेता हूं आपसे क्या आप यह नहीं मानते कि माता बहन और पत्नी में अंतर करने के कारण सिविलाइज्ड होने के कारण मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ है क्या दूसरे को भी अवसर देने की भावना न्याय की भावना होना यह मनुष्य को पशुओं से कीड़ों से या दूसरी लिविंग बीइंग से श्रेष्ठ नहीं बनाती अगर नहीं बनाती तो इसका अर्थ है कि आप पशु में और अपने में कोई अंतर नहीं मानते नहीं मानते तो फिर वही वाली बात आ जाती है कि आप माता बहन और पत्नी में अंतर करते हैं कि नहीं करते अगर करते हैं तो आपकी वह निश्चित नियमावली क्या है है ना अब बताएं कि वह कौन सा आविष्कार होगा फाइनली कौन सा आविष्कार होगा जिसके बाद जो साइंटिस्ट हैं या आप जैसे लोग हैं भगवान को नहीं मानते मगर प्राकृतिक खोज जरूर करते रहते हैं वो कौन सा आविष्कार होगा जिसके बाद वह संतुष्ट हो जाएंगे चयन मिल जाएगा उन्हें कि अब मुझे कुछ नहीं खोजना जाहिर सी बात है वो एक ही स्टेज है सत चित आनंद की स्टेट जिस समय व सब कुछ कर सकने वाला किसी भी प्रकार से मृत्यु को

00:10:03:13 ना प्राप्त होने वाला या फिर ऑल नोइंग या फिर एंडलेस जॉय वाला बन जाएगा उस दिन वह अपनी खोज रोक देगा तो एट द एंड आप कहां जा रहे हो वहीं जहां हम

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00:10:16:04 जा रहे हैं बस आप में और हम में फर्क क्या है इतना सा अंतर है कि आप जहां जा रहे

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00:10:22:08 हो वहां के लिए आप मना करते हो कि नहीं नहीं मैं जहां जा रहा हूं वो जगह इस दुनिया में है ही नहीं और हम जहां जा रहे हैं हम वहां उस जगह को मानते हैं स्वीकार करते हैं कि हम जहां जा रहे हैं वो जगह इस दुनिया में है आप भी जा रहे हो सच्चितानंद की तरफ जाना वही चाहते हो मगर मना करोगे सच्चिदानंद नहीं है और हम भी जा रहे हैं सच्चिदानंद की तरफ जाना चाहते हैं पर हम कहते हैं सच्चिदानंद है तो मूर्ख कौन हुआ आप कहते हो जब भी आपसे पूछा जाता है कोई भी ऐसा प्रश्न आ जाता है कि ये स्टेज है कि नहीं जहां आप जाना चाहते हो या फिर कोई सुप्रीम अथॉरिटी है कि नहीं तो आप कहते हो मुझे नहीं पता मेरी यह स्टेट है अरे भाई आपकी अगर यह स्टेट है तो आप अपने को जिज्ञासु कहो ना जिज्ञासा रखने वाला कहो ना फिर आप निर्णायक कैसे बन रहे हो कि ईश्वर है ही नहीं इस दुनिया में या तो ईश्वर तक जाने की भावना बंद कर दो ईश्वर तक कहने का अर्थ है कि सत चित आनंद की खोज बंद कर दो और या फिर यह कहना बंद कर दो कि सचित आनंद है ही नहीं क्योंकि जिस चीज का कोई अस्तित्व नहीं है उसके लिए प्रयास करने वाला उसे खोजने वाला जो खुद कह रहा है कि नहीं है हम नहीं कह रहे हम तो कह रहे हैं मगर उसे खोजने वाला कौन सिद्ध हुआ मूर्ख मूर्ख सिद्ध होगा ततः मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि

00:11:37:10 आपके तर्क जो है ना वह पागलपन से भिन्न और कुछ भी नहीं है जिसको सुन कर के केवल वह बातों का एक आनंद लिया जा सकता है रोचकता भरी बातों का मगर उसके गुण में जाएंगे तो प्राप्त होगा कुछ नहीं कुछ नहीं प्राप्त होगा अगर आपके तर्कों से आपसे बात की जाए तो आप चू भी नहीं बोल सकते चू चू का मतलब समझते हैं ना चू नहीं बोल पाएंगे जय श्री राम [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 12:08 · 29 May 2024

क्या मनुष्य और पशु समान है @Vimoh @Vimoh Live #nastik #communist

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