1
00:00:02,360 --> 00:00:03,040
तो क्या

2
00:00:03,040 --> 00:00:07,080
ईश्वर ऐसा पत्थर बन सकता है जिसको वह स्वयं ना उठा सके क्या

3
00:00:07,080 --> 00:00:07,680
ईश्वर मर

4
00:00:07,680 --> 00:00:11,760
सकता है क्या ईश्वर अपने एक्जिस्टेंस से बाहर जा सकता है

5
00:00:11,760 --> 00:00:16,640
क्या ईश्वर अपने जैसा दूसरा ईश्वर बना सकता है हां बिल्कुल बना सकता है

6
00:00:16,640 --> 00:00:21,200
ईश्वर ऐसा पत्थर बन सकता है आपने देखा होगा

7
00:00:21,200 --> 00:00:25,760
कि प्रभु सीता माता का जब स्वयंवर हुआ था

8
00:00:25,760 --> 00:00:30,840
तो उसमें धनुष को कई महानुभाव उठा नहीं पाए थे रावण भी उठा नहीं पाया

9
00:00:30,840 --> 00:00:35,600
इसका अर्थ क्या है क्या उनके अंदर ईश्वर नहीं है तो रावण के रूप में

10
00:00:35,600 --> 00:00:40,200
या अन्य रूपों में उस दिन धनुष को ना उठाने वाला ईश्वर बाधित हो गया ना

11
00:00:40,200 --> 00:00:44,240
बाधित होकर दिखाया इसका मतलब ईश्वर पर यह

12
00:00:44,240 --> 00:00:48,320
नियम भी लागू नहीं होता कि ईश्वर बाधित नहीं हो सकता विष्णु भगवान के कान

13
00:00:48,320 --> 00:00:52,680
से मधु कटप का जन्म होता है जिसको वह स्वयं नहीं मार पाते मां भगवती को

14
00:00:52,680 --> 00:00:57,120
उन्हें मारने के लिए आना पड़ता है अब बात ये आती है

15
00:00:57,120 --> 00:01:01,280
अगर ईश्वर असमर्थ हो गया कोई कार्य करने में तो इसका मतलब बाधित हो गया

16
00:01:01,280 --> 00:01:05,400
ये तो ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं रहा नहीं जब वो मधु केटब

17
00:01:05,400 --> 00:01:09,560
को मार नहीं पाए उसके बाद भी वो ऐसे अस्तित्व

18
00:01:09,560 --> 00:01:13,600
में शेष थे जिस अस्तित्व के कारण दोबारा आए

19
00:01:13,600 --> 00:01:17,600
दूसरे रूप में और उन्होंने मधु कटप को मार दिया जब रावण के रूप में

20
00:01:17,600 --> 00:01:21,800
वो धनुष को नहीं उठा पाए तो दोबारा आए राम के रूप में और उन्होंने

21
00:01:21,800 --> 00:01:23,040
धनुष को उठा दिया

22
00:01:23,040 --> 00:01:27,200
पहली बात तो यह है कि ईश्वर ऐसा पत्थर बना पाया जिसको वो

23
00:01:27,200 --> 00:01:31,600
स्वयं नहीं उठा पाया मगर वास्तविकता में ईश्वर का एक अस्तित्व

24
00:01:31,600 --> 00:01:35,800
ऐसा शेष रहता है जिसमें जिसके कारण वह पुनः किसी अन्य रूप में आकर

25
00:01:35,800 --> 00:01:40,200
के या उसी रूप में आकर के उस पत्थर को दोबारा उठा भी सकता है

26
00:01:40,200 --> 00:01:44,520
तो आपका प्रश्न फिर यह होगा क्या ईश्वर अंत में ऐसा पत्थर

27
00:01:44,520 --> 00:01:48,680
बना सकता है जिसको वह स्वयं ना उठा सके उसके बाद उसका रूप शेष ना रह

28
00:01:48,680 --> 00:01:52,880
जाए ऐसा कभी नहीं हो सकता कि ईश्वर का रूप कोई शेष ना रह जाए

29
00:01:52,880 --> 00:01:56,880
इसी को दूसरे प्रकार से देख ले आपने जो कहा क्या ईश्वर मर सकता

30
00:01:56,880 --> 00:02:01,400
है तो अगर देह के नाश को आप मरना मानते हैं

31
00:02:01,400 --> 00:02:05,440
तो हां ईश्वर ने कई ऐसी लीलाएं की है जिसमें उन्होंने अपनी देह को

32
00:02:05,440 --> 00:02:09,520
नाश करके भी दिखाया है क्या ईश्वर अपने एक्जिस्टेंस से बाहर जा सकता है तो

33
00:02:09,520 --> 00:02:13,600
यह भी यही हो गया कि देह के देह को उसने नष्ट कर दिया एक्जिस्टेंस से बाहर चला

34
00:02:13,600 --> 00:02:18,480
गया इसके अलावा क्या ईश्वर अपने जैसा दूसरा ईश्वर बना सकता है तो हां

35
00:02:18,480 --> 00:02:22,680
राम भी आए परशुराम भी आए दूसरा ईश्वर बना दिया नरसिंह

36
00:02:22,680 --> 00:02:27,040
रूप बना दिया राम भी है हनुमान भी है यह भी हो गया

37
00:02:27,040 --> 00:02:31,080
और विष्णु भी है शिव भी है और राम भी है भी हो गया तो एक

38
00:02:31,080 --> 00:02:35,120
ही समय में ईश्वर अपने अपने जैसे अन्य ईश्वर भी उसने बनाए तो कुल

39
00:02:35,120 --> 00:02:38,440
मिलाकर के इन सारी गुथ यों में आपके द्वारा उलझाया

40
00:02:38,440 --> 00:02:42,440
हुआ जो कुतर्क है वो है क्या ईश्वर मर सकता है क्योंकि

41
00:02:42,440 --> 00:02:46,440
आपने कहा क्योंकि जब ईश्वर ऐसा पत्थर बना देगा जिसको

42
00:02:46,440 --> 00:02:50,480
वो स्वयं नहीं उठा पा रहा है पर हम यह कहेंगे कि अभी भी ईश्वर का अस्तित्व

43
00:02:50,480 --> 00:02:54,760
बाकी है जो उसको उठा सकता है तो उस पर आपका प्रश्न ये होगा क्या ईश्वर

44
00:02:54,760 --> 00:02:59,040
ऐसा पत्थर बना सकता है जिसको नाना उठा सकने वाले रूप के अलावा

45
00:02:59,040 --> 00:03:03,280
उसका कोई भी रूप रूप शेष ना रहे तो इन सारे प्रश्नों में एक ही प्रश्न

46
00:03:03,280 --> 00:03:08,240
उलझा हुआ है एक ही कुतर्क है क्या ईश्वर मर सकता है तो नहीं

47
00:03:08,240 --> 00:03:12,320
ईश्वर मर नहीं सकता पर कहां परमार्थ में और

48
00:03:12,320 --> 00:03:16,600
ईश्वर मर भी और ईश्वर मर के भी दिखा सकता है कहां व्यवहार

49
00:03:16,600 --> 00:03:20,760
में तो दो दुनिया है एक परमार्थिक

50
00:03:20,760 --> 00:03:24,960
दुनिया और एक व्यवहारिक दुनिया तो परमार्थिक दुनिया में ईश्वर

51
00:03:24,960 --> 00:03:29,200
से भिन्न किसी भी वस्तु विशेष का अस्तित्व ही नहीं है किसी भी तत्व का अस्तित्व

52
00:03:29,200 --> 00:03:33,520
नहीं है ही परमेश्वर तो इस तरह से अगर देखा जाए तो व्यावहारिक

53
00:03:33,520 --> 00:03:37,840
शब्दों में अगर व्याख्या करें तो परमार्थ की दुनिया में परमार्थ के संसार में ईश्वर

54
00:03:37,840 --> 00:03:41,840
सीमित है निश्चित है बाधित है सुनिश्चित है हालांकि इन

55
00:03:41,840 --> 00:03:45,880
सारे मापदंडों पर ईश्वर को आंकना ही गलत है क्योंकि जो

56
00:03:45,880 --> 00:03:49,920
परमार्थ का ईश्वर का रूप है वह प्राप्त व्य है वह व्यवहार

57
00:03:49,920 --> 00:03:53,800
का विषय नहीं है प्राप्त व्य क्या होता है कि जो चीज हमें अचीव करनी

58
00:03:53,800 --> 00:03:57,960
है अचीव करने के लिए प्राप्त करने के लिए हमें करना क्या है

59
00:03:57,960 --> 00:04:02,120
कुछ और जैसे कि हम कैलोरी प्राप्त करनी है भूख लग रही है अपनी

60
00:04:02,120 --> 00:04:06,200
इंटेस्टाइन को तृप्त करने के लिए हमें कैलोरी प्राप्त करनी है

61
00:04:06,200 --> 00:04:10,400
परंतु कैलोरी के लिए हम व्यवहार नहीं कर सकते हैं कैसे व्यवहार

62
00:04:10,400 --> 00:04:14,760
करोगे हाथ पैर मारोगे क्या हवा में व्यवहार किसके लिए करेंगे जो कैलोरी

63
00:04:14,760 --> 00:04:18,880
का सोर्स होता है फूड हम उसके लिए व्यवहार कर सकते हैं तो हम

64
00:04:18,880 --> 00:04:23,240
फूड के लिए व्यवहार करते हैं दिखाई देने वाला सगुण साकार स्वरूप कैलोरी

65
00:04:23,240 --> 00:04:27,360
का स्त्रोत उसके लिए हम व्यवहार करते हैं और फल स्वरूप प्राप्त होती है हमें

66
00:04:27,360 --> 00:04:31,480
कैलोरी क्योंकि कैलोरी हम हमारे व्यवहार का विषय नहीं है इसी

67
00:04:31,480 --> 00:04:35,600
प्रकार से पार मार्थी जो रूप भगवान का वो हमारे व्यवहार का विषय

68
00:04:35,600 --> 00:04:39,920
नहीं है परंतु फिर भी व्यवहारिक व्याख्या में आपके

69
00:04:39,920 --> 00:04:43,920
ही शब्दों के अनुसार हम यह कह सकते हैं कि परमार्थ में ईश्वर निश्चित है

70
00:04:43,920 --> 00:04:47,960
सीमित है बाधित है नियम नियमों के नीचे भी है वो

71
00:04:47,960 --> 00:04:52,000
नियमों के नीचे कैसे है कि परमार्थ में वो ऐसा नहीं कर सकता कि वेदों

72
00:04:52,000 --> 00:04:56,000
पर चलने वाला मनुष्य उनके पास गया और वहां उसको मोक्ष ना मिला नहीं

73
00:04:56,000 --> 00:05:00,080
धर्म के मार्ग पर चलने वाले को तो मोक्ष मिलेगा ही हां व्यवहार

74
00:05:00,080 --> 00:05:04,520
में रावण के रूप में आके कंस के रूप में आके या आजकल जितने भी सनातन विरोधी तत्व

75
00:05:04,520 --> 00:05:09,000
उनके रूप में आकर के ईश्वर धर्म के ईश्वर

76
00:05:09,000 --> 00:05:13,160
धर्म के मार्ग पर चलने वालों के साथ अन्याय भी कर देता है व्यवहार

77
00:05:13,160 --> 00:05:17,240
में तो कुल मिलाकर के ये जो चैप्टर है व्यवहार और परमार्थ के बीच

78
00:05:17,240 --> 00:05:21,240
अंतर को समझाने के लिए है अब बात ये

79
00:05:21,240 --> 00:05:25,560
आती है अब बात ये आती है कि व्यवहार में उसके निश्चित सीमित

80
00:05:25,560 --> 00:05:29,760
वादित नियमों के नीचे आपके अनुसार हालांकि वहां पर

81
00:05:29,760 --> 00:05:33,880
ये जो नियम है इनके पर्सपेक्टिव से ईश्वर को जांचना गलत है पर फिर

82
00:05:33,880 --> 00:05:37,960
भी आपके अनुसार वो नीचे है नियमों के पर कहां पर है

83
00:05:37,960 --> 00:05:42,080
परमार्थ में अब ये परमार्थ और व्यवहार का अंतर क्या है व्यवहार

84
00:05:42,080 --> 00:05:46,160
वो दुनिया है जिसको मनुष्य ने अपनी आंखों से जाना अपनी आंखों से

85
00:05:46,160 --> 00:05:50,200
देखा और परमार्थ वो दुनिया है जिसको वो ईश्वर की आंखों से देखता

86
00:05:50,200 --> 00:05:54,600
है ईश्वर की आंखों से जानता है ईश्वर के कानों से सुनता है

87
00:05:54,600 --> 00:05:58,600
इसका अर्थ क्या है कि यदि आपके हिसाब से मान भी लिया जाए कि

88
00:05:58,600 --> 00:06:02,680
परमार्थ में ईश्वर निश्चित है सीमित है बाधित है सब कुछ है पर

89
00:06:02,680 --> 00:06:06,720
उसके आधार पर उस ईश्वर को नकारा नहीं जा सकता

90
00:06:06,720 --> 00:06:10,920
क्यों क्योंकि उस दुनिया को मनुष्य जान ही तब पाया

91
00:06:10,920 --> 00:06:14,960
जब उसने किसी को ईश्वर मान लिया ईश्वर को ईश्वर मानने

92
00:06:14,960 --> 00:06:19,080
के बाद वो एक जान पाया कि इसके अलावा एक दुनिया है जहां

93
00:06:19,080 --> 00:06:23,240
पर ईश्वर ही ईश्वर है दूसरा कोई तत्व ही नहीं है जहां वो अपने जैसा

94
00:06:23,240 --> 00:06:24,200
कोई दूसरा ईश्वर

95
00:06:24,200 --> 00:06:28,280
नहीं बना सकता जहां व मर नहीं सकता जहां वह किसी के साथ

96
00:06:28,280 --> 00:06:32,640
अन्याय नहीं कर सकता वो दुनिया आप कब देख पाए जब आपने ईश्वर को ईश्वर

97
00:06:32,640 --> 00:06:37,080
मान लिया तो कुल मिलाकर के ईश्वर की पार मर्थक निश्चित

98
00:06:37,080 --> 00:06:41,160
के आधार पर उसको मनुष्य नकार नहीं सकता हम

99
00:06:41,160 --> 00:06:45,560
जब भी कहते हैं कि ईश्वर कुछ भी कर सकता है तो हम कहते हैं कि मनुष्य

100
00:06:45,560 --> 00:06:49,600
दृष्टि से सोचा जा सकने वाला ऐसा कोई कार्य नहीं है जो ईश्वर नहीं

101
00:06:49,600 --> 00:06:53,680
कर सकता मनुष्य दृष्टि अगर मनुष्य सोच रहा है अपनी व्यवहारिक

102
00:06:53,680 --> 00:06:57,720
दुनिया के अनुसार उस दृष्टि से ईश्वर ऐसा कोई कार्य नहीं है

103
00:06:57,720 --> 00:07:01,760
जो नहीं कर सकता हां वो न्याय भी करेगा व पत्थर ऐसा बनाएगा जिसको वो

104
00:07:01,760 --> 00:07:05,760
खुद ना उठा सके वो रोएगा भी वो हसेगा भी वो सब कुछ करके दिखा सकता

105
00:07:05,760 --> 00:07:09,840
है किसी भी नियम के नीचे नहीं है मगर व्यवहार में इसको ऐसे समझ लीजिए कि

106
00:07:09,840 --> 00:07:12,360
कोई मनुष्य यह नहीं कह सकता कि किसी के

107
00:07:12,360 --> 00:07:16,640
आवाज देने के कारण मैं जाग गया क्यों क्योंकि अगर वह सो रहा था

108
00:07:16,640 --> 00:07:20,720
तो उसका सुनना सिद्ध नहीं होता और अगर वह सुन रहा है तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता

109
00:07:20,720 --> 00:07:24,760
है ठीक इसी प्रकार पार मर्थक दुनिया में ईश्वर की निश्चित के

110
00:07:24,760 --> 00:07:29,080
आधार पर उसको नकारा नहीं जा सकता है क्यों क्योंकि

111
00:07:29,080 --> 00:07:33,440
अगर वो परमार्थ को मान रहा है तो उसका ईश्वर को ना मानना सिद्ध

112
00:07:33,440 --> 00:07:37,640
नहीं होता और अगर वह ईश्वर को नहीं मान रहा है तो उसका

113
00:07:37,640 --> 00:07:39,400
परमार्थ को जानना सिद्ध नहीं होता

114
00:07:39,400 --> 00:07:43,960
है अगर प्रैक्टिकली देखें तो आपने ईश्वर की पार मार्थी निश्चित

115
00:07:43,960 --> 00:07:48,000
के कारण उसको नकार दिया उसके बाद आपसे पूछा जाएगा

116
00:07:48,000 --> 00:07:52,000
कि आपने ईश्वर को क्यों नकारा आप कहोगे भाई वो परमार्थ में निश्चित है

117
00:07:52,000 --> 00:07:56,680
अपने जैसा ईश्वर नहीं बना सकता है वो ऐसा पत्थर नहीं बना सकता है

118
00:07:56,680 --> 00:08:01,040
जिसके बाद जिसको ना उठा सकने वाले रूप के अलावा उसका अस्तित्व शेष ना रहे

119
00:08:01,040 --> 00:08:05,120
परमार्थ में वो मर जाए वो मर नहीं सकता है वो अपने एक्जिस्टेंस से बाहर

120
00:08:05,120 --> 00:08:09,280
नहीं जा सकता है वो धर्म के मार्ग पर चलने वाले के साथ अन्याय

121
00:08:09,280 --> 00:08:13,560
नहीं कर सकता है तो क्योंकि ईश्वर सीमित है ईश्वर भी तो इसलिए

122
00:08:13,560 --> 00:08:17,720
मैं नहीं मान रहा हूं परमार्थ की दुनिया में ईश्वर सीमित है इसलिए मैं नहीं मान रहा हूं

123
00:08:17,720 --> 00:08:21,720
तो प्रश्न आपसे फिर यह बनेगा कि परमार्थ तो आपके लिए एजिस्ट ही

124
00:08:21,720 --> 00:08:25,880
नहीं करता ना क्योंकि आप ईश्वर को नहीं मानते तो

125
00:08:25,880 --> 00:08:30,160
कुल मिलाकर के ईश्वर को मानने वाला परमार्थ िक दुनिया

126
00:08:30,160 --> 00:08:34,640
के आधार पर ईश्वर को नकार नहीं सकता और ईश्वर को ना मानने वाला

127
00:08:34,640 --> 00:08:39,520
परमार्थिक दुनिया में ईश्वर का बाधित होना सिद्ध नहीं कर सकता

128
00:08:39,520 --> 00:08:43,560
ठीक है अर्थात ईश्वर का सर्वशक्तिमान सब कुछ

129
00:08:43,560 --> 00:08:47,840
कर सकने वाला सिद्ध होना व्यवहार में अनिवार्य है परमार्थ में नहीं

130
00:08:47,840 --> 00:08:51,840
क्योंकि परमार्थ तो प्राप्त व्य का विषय है मगर यह जितने भी

131
00:08:51,840 --> 00:08:54,560
तथाकथित तंत्र है जो ईश्वर के विषय

132
00:08:54,560 --> 00:08:58,720
में बात करते हैं फिर वो भले ही सनातन विरोधी तंत्र हो इस्लाम

133
00:08:58,720 --> 00:09:03,040
ईसाई आदि या फिर वह तथाकथित सनातनी तंत्र आर्य

134
00:09:03,040 --> 00:09:07,800
समाज स्कोन आदि या जिनसे भी हम प्रश्न करते हैं इनके द्वारा प्रतिपादित

135
00:09:07,800 --> 00:09:11,920
होने वाला जो ईश्वर है वह व्यवहार में ही बाधित हो जाता है

136
00:09:11,920 --> 00:09:16,280
जिसे नास्तिकों द्वारा आसानी से नकारा जा सकता है

137
00:09:16,280 --> 00:09:20,480
क्योंकि जो मनुष्य के व्यवहार में ही बाधित हो जाए वह

138
00:09:20,480 --> 00:09:24,840
ईश्वर ईश्वर ही सिद्ध नहीं होता जिसके कारण अधर्म

139
00:09:24,840 --> 00:09:28,880
को समर्थन मिलता है धर्म का हास होता है अब इस प्रश्न को

140
00:09:28,880 --> 00:09:32,960
दूसरे पर्सपेक्टिव से भी समझ लेते हैं तो लीला रूप

141
00:09:32,960 --> 00:09:37,080
में अपनी शक्तियों को रेगुलेट करके एक निश्चित लीला में

142
00:09:37,080 --> 00:09:41,360
बाधित होना या फिर असमर्थ होना यह तो

143
00:09:41,360 --> 00:09:45,400
शक्तियों का ही एक और रूप भी हो सकता है कि उसने अपनी चीजों को रेगुलेट भी

144
00:09:45,400 --> 00:09:49,440
कर लिया मगर जब आप यह कहते हैं कि जब वह असमर्थता

145
00:09:49,440 --> 00:09:53,600
अपनी सिद्ध कर दे उसके बाद वह सामर्थ्य वान ना बन सके अर्थात

146
00:09:53,600 --> 00:09:57,760
उसके बाद असमर्थ से भिन्न उसका कोई एक्जिस्टेंस ना रह जाए

147
00:09:57,760 --> 00:10:01,840
या फिर वो मर जाए या फिर वो अपने एक्जिस्टेंस से बाहर चले जाए

148
00:10:01,840 --> 00:10:05,920
जब इस रूप में आप बात करते हैं तो आप अप्रत्यक्ष रूप से

149
00:10:05,920 --> 00:10:09,760
यह कह रहे हैं कि हम भी यह कहने लगे कि ईश्वर

150
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सर्वशक्तिमान नहीं है भाई हमारे और आपके बीच में

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वैचारिक मतभेद इस चीज को लेकर है कि आप कह रहे हैं

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कि ईश्वर में सब कुछ हर स्थिति में सब कुछ कर सकने वाली शक्ति

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00:10:22,400 --> 00:10:26,400
नहीं है और हम यह कह रहे हैं कि ईश्वर में हर समय

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में सब कुछ कर सकने वाली शक्ति है मगर जब जब आप यह कह देते हैं

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कि क्या व मर सकता है तो फिर आप यह कह रहे हैं क्या

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00:10:35,200 --> 00:10:39,240
ईश्वर में शक्ति नहीं है क्या कोई ऐसी स्थिति हो सकती है जब ईश्वर

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में शक्ति ना रहे मतलब आप वाद विवाद के समय

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00:10:43,520 --> 00:10:47,600
पर हमारे मुख के द्वारा अपने पक्ष को कलवाने का प्रयास

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मात्र कर रहे हैं इस कुतर्क के द्वारा आप कह रहे हैं कि ईश्वर

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00:10:51,880 --> 00:10:55,920
शक्तिहीन है कुछ कुछ परिस्थितियों में तो आप यह

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00:10:55,920 --> 00:11:00,080
चाह रहे हैं कि हम भी खुद ये स्वीकार कर ले कि ईश्वर शक्ति ने कुछ

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00:11:00,080 --> 00:11:04,080
कुछ परिस्थितियों में तो ध्यान रखिए कि चर्चा इस बात

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पर है कि आपको सिद्ध करना है ईश्वर सब कुछ नहीं कर सकता

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00:11:08,080 --> 00:11:12,160
और हमें सिद्ध करना है ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो आप हमसे

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यह कलवा समय क्या ईश्वर मर सकता है आप हमसे यह कलवाना

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00:11:16,720 --> 00:11:20,920
चाह रहे हैं कि ईश्वर सब कुछ नहीं कर सकता है तो आपको

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00:11:20,920 --> 00:11:24,800
हमें ऐसा प्रश्न देना होगा जिसमें कि ईश्वर

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की शक्ति मत्ता सिद्ध हो ना कि शक्ति हीनता अच्छा

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00:11:28,960 --> 00:11:32,960
एक एक बात मैं और बताता चलूं आपको कि ये जो कुतर्क है यह करने

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00:11:32,960 --> 00:11:37,040
वाले वो नास्तिक लोग होते हैं जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की आड़

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00:11:37,040 --> 00:11:41,080
में अपनी जो पशुता है उसको पोषित करना चाहते हैं वो मर्यादाओं

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00:11:41,080 --> 00:11:45,200
को नहीं मानना चाहते हैं वो बहन को बहन की दृष्टि से नहीं देखना चाहते

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00:11:45,200 --> 00:11:49,480
हैं वो माता को माता की दृष्टि से नहीं देखना चाहते हैं धर्मेन

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00:11:49,480 --> 00:11:53,800
हीना पशु भी समाना तो भगवान को प्राप्त कराने वाले विधि विधान

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00:11:53,800 --> 00:11:58,120
मर्यादा का नाम धर्म है तो यदि धर्म को नकारना है तो हमें भगवान

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00:11:58,120 --> 00:12:02,240
को ही नकारना पड़ेगा तो जो कुतर्क है ये ऐसे नास्तिक पैराडॉक्स

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00:12:02,240 --> 00:12:06,320
वगैरह करते हैं और वो सारे तंत्र जो ईश्वर

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00:12:06,320 --> 00:12:10,680
को स्वीकार तो करते हैं मगर अपूर्ण रूप में निश्चित रूप में सीमित रूप में

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00:12:10,680 --> 00:12:14,840
जिनके मूल में भी नास्तिकता ही है वह सारे तंत्र भी जब

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00:12:14,840 --> 00:12:18,920
उनके सामने कभी ऐसा प्रश्न आता है कि क्या आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान

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00:12:18,920 --> 00:12:22,920
है क्या वो किसी भी नियम के नीचे नहीं है बल्कि सभी नियमों

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00:12:22,920 --> 00:12:26,960
को बनाने वाला सर्व नियामक है तो इस प्रकार के प्रश्न आने पर जो ये

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00:12:26,960 --> 00:12:31,240
तथाकथित तंत्र होते हैं वह इन नास्तिकों के कुतर्कों

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का ही सहारा लेते हैं क्या ईश्वर मर सकता है क्या ईश्वर ऐसा

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पत्थर बना सकता है जिसको वह स्वयं ना उठा सके तो आज के बाद आप

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00:12:39,520 --> 00:12:40,020
इन

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कुतर्कों से परेशान नहीं होंगे आपको बस यह जानना है कि दो दुनिया है एक व्यवहारिक

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और एक पार मार्थी पार मार्थी दुनिया में ईश्वर की निश्चिता

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के आधार पर उसे नकारा नहीं जा सकता और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार

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बिना पार मार्थी संसार को स्वीकारा नहीं जा सकता जय श्री

191
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[संगीत]
