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00:00:01:07 तो सभी को जय श्री राम आज बात करेंगे मायावादी रास्ता नहीं मिलता है तो कुछ विरोधी तंत्रों के द्वारा शंकराचार्य के लिए कुछ नैरेटिव बनाए जाते हैं कि मायावादी स्वयं को भगवान मानने वाले या फिर इसी तरीके के कई अन्य नैरेटिव बनाए जाते हैं और उनको प्रचारित प्रसारित किया जाता है जिससे कि व्यक्ति एक पहले से ही व्यक्ति के दिमाग में एक भावना रहे कि इस व्यवस्था से इस शिक्षा प्रणाली से इस सिद्धांत से मुझे दूर रहना है तो आज हम उसी बात करेंगे
00:00:47:26 मायावादी जान ले कि शंकराचार्य जी का सिद्धांत क्या है अद्वैत क्या है अद्वैत का अर्थ है कि संसार में सिर्फ एक ही तत्व है से हम ब्रह्म कहते हैं भगवान कहते हैं जब वो व्यावहारिक हो जाता है तो उसे हम भगवान कहते हैं ईश्वर कहते हैं और जब वह मनुष्य के लिए अव्यावहारिक होता है मतलब व्यवहार में ना आ सकने वाला तो उसी को हम ब्रह्म कह देते हैं और यही ब्रह्म यही ईश्वर तत्व जीव जगत और जगदीश्वर तीनों के रूप में कल्पित होता है संसार बनता है मनुष्य बनते हैं प्राणी बनते हैं स्थावर जंगम दोनों प्रकार के प्रकृति बनती है सब कुछ ईश्वर ही बनता है तो यह सिद्धांत है भगवान आदि शंकराचार्य जी का अब यह सिद्धांत प्रमाणिक धरातल पर कैसे सिद्ध है तार्किक धरातल पर कैसे सिद्ध है इस बारे में हम आगे बात करेंगे अब बात ये आती है भगवान आदि शंकराचार्य जी ने जब पीछे से परंपरा से जो सिद्धांत चला आ रहा था अद्वैत का उसी को आगे और सरल शब्दों में बताया तो जब उन्होंने यह कहा कि भाई एक ही ईश्वर जीव जगत जगदीश्वर के रूप में प्रकट होता है तो इसका अर्थ यह है कि जितना भी द्वैत भाव है जैसे कि मैं पुरुष हूं और वह स्त्री
00:02:03:02 है मैं जीवित हूं और वह मृत है मैं सजीव हूं वह निर्जीव है इस तरह का जितना भी द्वैत भाव है यह सब हमारी कल्पना मात्र है जबकि वस्तुतः कहीं पर कोई दूसरी चीज है ही नहीं आप ही आप हो यह उन्होंने कहा तो इसका यह निकाला जाता है कि भाई उन्होंने दुनिया को मिथ्या कह दिया उन्होंने दुनिया को माया कह दिया और इसी माया शब्द के उपयोग के आधार पर यह क दिया जाता है कि भाई शंकराचार्य तो मायावादी है और मायावादी के लिए कुछ श्लोकों का संदर्भ भी दे दिया जाता है जिनके बारे में आगे बात करेंगे कुछ श्लोक ऐसे हैं कुछ प्रमाण ऐसे हैं जिनका संदर्भ जो इकोन की श्रीमत भागवत है उसमें भी दिया गया है श्रील प्रभुपाद जी के नाम से अब वो उन्होंने ही दिया है कि नहीं दिया है यह एक चर्चा का अलग विषय हो जाएगा क्योंकि इसकन पूरी तरीके से श्री प्रभुपाद जी को फॉलो करता है नहीं करता इस पर हमने कई वीडियोस बनाए भी है वो भी एक संशय पूर्ण स्थिति है खैर तो श्रीमद् भागवत में स्कोन की श्रीमद भागवत में या अन्य कई जगह पर भगवान आदि शंकराचार्य जी के लिए मायावादी शब्द का उपयोग होता है और उन्हें मायावा उनका वह सिद्धांत पहले तो उपयोग करते हैं मायावादी
00:03:18:13 और उस मायावादी को गलत सिद्ध करने के लिए वह जो संदर्भ लेते हैं वो लेते हैं पदम पुराण से आज के टाइम में अगर बात करें इस कौन से जुड़े हुए लोगों से तो वह अन्य कई अन्य शास्त्रों से भी संदर्भ निकाल देंगे जो प्रभुपाद जी ने भी नहीं जिनका संदर्भ दिया होगा वहां से भी संदर्भ आपको मिल जाएगा सबसे पहली बात यह आती है कि यह जो लोक है पद पुराण का जिसमें यह कहा जा रहा है जिसमें भगवान शिव पार्वती माता से कह रहे हैं कि मैं ऐसा अवतार लूंगा जिसमें कि मैं अवद सिद्धांत की का प्रचार प्रसार करूंगा तो क्या इस श्लोक के आधार पर भगवान आदि शंकराचार्य जी के सिद्धांतों को शिक्षा को गलत माना जाना चाहिए या नहीं तो उसके लिए सबसे पहले यह तय होना आवश्यक है कि अगर इस श्लोक में मायावादी बात हो रही है कि मायावादी गलत है तो सबसे पहले तो हम यह जान ले कि क्या आदि शंकराचार्य जी का सिद्धांत
00:04:14:27 मायावादी शास्त्रों में कहीं पर रामायण में महाभारत में यह कहा गया है कि शंकराचार्य जी के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो सिद्धांत होगा मायावादी का जो सिद्धांत है व ब्रह्मवादिनी वाद है मायावादी शंकराचार्य जी की गुरु परंपरा में आने वाले किसी आचार्य ने किसी से वार्ता करते समय अपने पक्ष को रखते समय यदि सामने वाला कह रहा है इस सिद्धांत के लिए मायावादी उसको अपने पक्ष को रखते हुए कि भाई हमारा सिद्धांत गलत नहीं है उस समय अपने पक्ष के लिए मायावादी कर लिया तो इससे ये सिद्ध नहीं होता है कि शास्त्रों में अगर कहीं पर मायावादी तो वह यही मावाद है मावाद अगर किसी सिद्धांत को माना जाएगा तो वह तब माना जाएगा जब वेदों में स्मति शास्त्रों में जो हमारे महाभारत रामायण गीता पुराण यह सब जो ग्रंथ है इनमें कहीं पर जब यह कहा जाएगा कि इस इस तरह की फीचर्स वाला या फिर शंकराचार्य के द्वारा प्रतिपादित होने वाला या फिर शंकराचार्य की परंपरा में आने वाले शिष्यों के द्वारा स्वीकारा जाने वाला जो मावाद होगा वह मावाद कहलाएगा यह तो यह तो वो
00:05:30:06 उस समय की बात है जब सामने वाला कोई आक्षेप लगा रहा है तो हमने उस उस थोड़ी सी देर के लिए यह मानते हुए चलो मान लिया य मायावादी किया अब इसको प्रमाण के रूप में नहीं लिया जा सकता है कि शंकराचार्य का सिद्धांत मायावादी बात तो यह है कि अगर आप ग्रंथों में अगर ऐसा कहा जा रहा है कि माया विवाद का सिद्धांत गलत है तो सबसे पहले पहले आपको यह तो सिद्ध करना पड़ेगा कि शंकराचार्य जी का जो सिद्धांत है वो
00:06:09:04 मायावादी अपने ग्रंथों को लिखते समय माया शब्द का उपयोग करने से यह सिद्ध होता है कि जहां पर उसका उपयोग किया गया है माया शब्द का वह ग्रंथावली या वह दृष्टांत या वह सिद्धांत मायावादी तो इकोन के ग्रंथों में भी कई जगह हो रहा है वैष्णव के ग्रंथों में कई जगह हो रहा है बल्कि वैष्णव का कोई भी ऐसा ग्रंथ ही नहीं है जिसमें कि इस दुनिया को पूर्णतः वास्तविक माना गया हो तो इसको प्रपंच या फिर इसको इसी तरीके से प्रतिपादित किया जाता है कि ये जो दुनिया दिखाई दे रही है यह दुनिया आपकी वास्तविक जगह नहीं है आप जो खुद को खुद दिखाई दे रहे हो वह भी आपकी वास्तविक आइडेंटिटी नहीं है इसका अर्थ क्या हुआ कि माया शब्द का उपयोग हो जाने से यह सिद्ध नहीं होता है कि जिस ग्रंथ में जिस सिद्धांत में माया शब्द का उपयोग हुआ है वह ग्रंथ वह सिद्धांत
00:07:14:16 मायावादी मानते हैं प्रक्षिप्त यानी कि मिलावट व यह मानते हैं कि य मिलावट वाला श्लोक है उसके कई कारण है एक तो परंपरा प्राप्त आचार्य द्वारा कहीं पर भी कहा नहीं गया है और दूसरा मायावादी इसमें कहा जा रहा है कि मायावादी गलत है जबकि वेदों में मायावादी का पक्ष लिया गया है प्रमाण है वेदों में तो तो देखने वाली बात यह है कि श्री मधवा चार्य ने अपने ग्रंथों में कहीं पर भी श्लोक का संदर्भ लेते हुए शंकराचार्य को मायावादी नहीं कहा श्री रामानुजाचार्य ने अपने ग्रंथों में इस श्लोक का संदर्भ लेते हुए शंकराचार्य को मायावादी नहीं कहा निंबार्क परंपरा वालों ने अपने ग्रंथों में कहीं पर भी भगवान आदि शंकराचार्य को इस श्लोक का संदर्भ लेते हुए मायावादी नहीं कहा तो जितने भी परंपरा प्राप्त प्रमाणिक आचार्य गण है लक्षण संपन्न वो इस श्लोक को प्रक्षिप्त ही मानते हैं और इसका कारण एक यह भी है कि वेदों में
00:08:19:10 मायावादी करना चाहते हो कि ये जो है भगवान आदि शंकराचार्य के बारे में ही कहा जा रहा है तो अब उन प्रमाणों का क्या करें जिन प्रमाणों में भगवान आदि शंकराचार्य जी को वैदिक धर्म की स्थापना करने वाला बताया गया है कि शंकर भगवान अवतार लेंगे शंकर भगवान जो है ब्रह्म सूत्र पर भाष्य करेंगे ब्राह्मण के रूप में आएंगे उनके चार शिष्य होंगे इतने सारे बहुत सारे ग्रंथों में यह दिया गया है शंकराचार्य की भविष्यवाणी की गई है जो कि वैदिक धर्म की स्थापना करेंगे जो भी उनको जो भी उनकी सेवा कार्य करेगा वो उसको मोक्ष को प्राप्त होगा सद्गति पाएगा यह सब उसको मिला है तो इन सारे प्रमाणों का क्या करें अगर आप उस एक प्रमाण के आधार पर भगवान आदि शंकराचार्य को अवैध सिद्ध करना चाहते उनकी शिक्षा को अवैध सिद्ध करना चाहते हैं तो फिर उन प्रमाणों का क्या किया जाए जो ढेर सारे प्रमाण भगवान आदि शंकराचार्य को वैदिक सिद्ध करते हैं अच्छा अब बात य आती है कि इकोन के द्वारा एक दावा किया जाता है कि भाई भगवान आदि शंकराचार्य जी ने वह जो माया वो जो अद्वैत का सिद्धांत था वो बौद्धों का खंडन करने के लिए दिया था तो अब स्कोन के अनुसार जो उनकी उनका ज्ञान है वह परंपरा से आ रहा है वैसे वोह परंपरा भी बहुत ज्यादा संशय
00:09:34:10 पूर्ण है मगर फिलहाल के लिए अगर बात करें देखिए यही बात होती है जैसे अभी मैंने फिलहाल के लिए बात करते हुए उनकी उनके लिए परंपरा शब्द का उपयोग कर लिया अब मेरे इस शब्द को लेकर के लोग आगे ये कह दे कि नहीं नहीं शिवांश नारायण द्विवेदी ने भी माना है कि इकन जो है परंपरा प्राप्त ज्ञान देती है खैर अभी वर्तमान की बात करते हैं तो इकोन का कहना है कि वो परंपरा प्राप्त ज्ञान देते हैं और परंपरा कहां से चालू हो रही सृष्टि के प्रारंभ से ईश्वर से भगवान श्री कृष्ण से विष्णु से अब बात ये आती है कि परंपरा प्राप्त ज्ञान जब आ रहा है तो इसका अर्थ ये है कि आज से ढाई हजार साल पहले जब वो बौद्धों का राज्य स्थापित हो चला था उस समय भी इनके द्वारा दी जाने वाली जो शिक्षा थी ज्ञान था वो एजिस्ट करता था तो क्या उसमें सामर्थ्य नहीं था बौद्धों का खंडन करने का जो एक झूठी फिलोसोफी को भगवान को लाना पड़ रहा है पृथ्वी पर बौद्धों का खंडन करने के लिए झूठी फिलोसोफी को लाकर के बौद्धों का खंडन करना पड़ रहा है वास्तव में जो फिलॉसफी है वास्तविक वो बौद्धों का खंडन करने में सामर्थ्य वान नहीं है अर्थात यह है कि भगवान की सही भक्ति भगवान के बारे में सही शिक्षा भगवान को नकारने वालों को चुप कराने के लिए पर्याप्त नहीं है आप यह कहना चाहते हैं
00:10:49:15 साथ ही साथ यदि इस श्लोक को सत्य माना जाए कि ये मिलावट नहीं है तो यह श्लोक तो फिट बैठता है कापालिक वाले शास्त्रों पर अघोर शास्त्रों पर जिसके लिए श्रीमद् देवी भागवत में वर्णन है कि राजा दक्ष के यज्ञ में जब माता सती ने आत्मदाह कर लिया था तब क्रोध में आकर के जो शिव गण थे शिवजी की तरफ के जो लोग थे उन्होंने सामने दक्ष की तरफ के लोगों को श्राप दिया था और जिसके प्रतिकार में उधर से भी इनको श्राप दिया गया शिव गणों को इस प्रकार से दोनों तरफ के लोग श्रापित हो गए थे वो श्राप क्या था आप ऐसे कुल में जन्म लोगे ऐसे जन्म होगा जहां पर आप मास मद्रा का सेवन करते हुए आप जो है पूजा पाठ किया करोगे आप मास मांसाहारी हो जाओगे और मास मदरा मद मैथुन इन सब का उपयोग करते हुए आप पूजा पाठ करोगे यह सब उनको श्राप मिला था अब इस श्राप से मुक्ति के लिए भगवान विष्णु और भगवान शिव में मंत्रणा होती है तब शिव भगवान कहते हैं मैं ऐसे शास्त्रों की रचना करूंगा जिसमें कि ऐसी पूजा पद्धति बताई गई हो जिसमें कि इन निषिद्ध वस्तुओं का उपयोग होता हो तो इन वस्तुओं का उपयोग करने के बहाने वह लोग धीरे धीरे धीरे धीरे व जो अवद मार्ग पर गए हैं वह पुनः वैदिक
00:12:04:15 हो जाएंगे तो भगवान का वह जो कापालिक वाले शास्त्र थे उनके बारे में यह जो श्लोक है वह ज्यादा प्रमाणित सिद्ध होता है क्योंकि प्रमाण तो यह भी है कि भगवान शंकर के अनेका अनेक अवतार हो चुके हैं तो हम एक उसी अवतार पर क्यों ले जिस अवतार के बारे में उनका वैदिक होना सिद्ध हो रहा है उन अवतारों के बारे में बात क्यों ना करें जिन तारों का अवैध होना शास्त्रों के द्वारा सिद्ध है तो यह भी प्रश्न बाकी रह जाएगा अब अंततः अगर बात करें तो भाई आप तार्किक रूप से भी तो मायावादी उनके सिद्धांत का खंडन करिए या फिर किसी गांव में किसी व्यक्ति विशेष से शत्रुता निकालने के लिए द्वेष पूर्वक उसके बारे में ऐसी बातें उड़ाना कि भविष्यवाणी हुई है कि वह जो व्यक्ति है वो वो प्रेत है या वो जो महिला है वो डायन है उसको मार देना चाहिए भगवान की भविष वाणी हुई है इसलिए उसको मार दिया जाए तो आपको नहीं लगता कि इस प्रकार से तो हम अब्राम हो जाएंगे जबकि हमारा धर्म हम सिखाता है अथातो धर्म जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा अब बात करते हैं तर्क की क्या तार्किक रूप से भगवान आदि शंकराचार्य जी का सिद्धांत जो है अद्वैत वह गलत है तो मनुष्य की चाह क्या है असतो
00:13:20:06 मा सद गम तमसो जोगम मतया मनुष्य की चा है सत चित आनंद बन जाने की सचित आनंद को प्रात कर लेने की इस श्लोक का आप अर्थ करके बताइएगा देखिएगा और मुझे बताइए श्लोक का अर्थ क्या है तो प्राणी मात्र की चाह है सत चित आनंद को प्राप्त करने की चाह कभी ना मरने की चाह ऑल नोइंग बन जाने की चा चित सारा ज्ञान हासिल कर लेने की चाह आनंद सदा सुखी रहने की चाह सत चित आनंद को प्राप्त करने की चाह है मनुष्य के अंदर तो इस चाह का विषय कौन होगा इस चा का विषय होगा वह ईश्वर जो सत चित आनंद हो जो अबाध हो सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म तो ईश्वर वही है जो किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है वह सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है तो अब बात ये आती है क्या अद्वैत के विरोध में खड़े किए जाने वाले जो मत है उनके अनुसार जो प्राप्त होने वाला ईश्वर है क्या वह सर्वशक्तिमान है क्या वह अध्य है मान लीजिए आप कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण जैसे वहां रहते हैं वैसे ही वो नीचे आए हैं जैसे अपने बैकुंठ लोक में गोलोक में वो रहते हैं वैसे
00:14:35:09 ही वो नीचे आए हैं अब हमने भगवान श्री कृष्ण को पकड़ लिया तो क्या इस देह को भगवान श्री कृष्ण नष्ट करके दिखा सकते हैं नहीं दिखा सकते अगर नहीं दिखा सकते हैं तो बाद और अगर दिखा सकते हैं तो इसका अर्थ क्या हुआ कि जितनी देर उनकी वह देह जो हमें दिखाई दे रही है वो नष्ट हुई उतनी देर ईश्वर का अस्तित्व कैसे था किस फॉर्म में था इसका अर्थ क्या हुआ या तो आपको यह कहना पड़ेगा कि जिस फॉर्म में वह वहां बैठते हैं उस फॉर्म में वह यहां नहीं आए और या फिर आप आपको यह मानना पड़ेगा कि नहीं भौतिक संसार में भी कई कार्य ऐसे हैं जो भगवान नहीं कर सकते जैसे कि आप कहते भी है कि भगवान श्री कृष्ण शिव बनने के बाद पुनः कृष्ण नहीं बन सकते तो यहां क्या हुआ भगवान बाधित हो रहा है तो यह बाधित होने वाला जो ईश्वर है बाद ईश्वर क्या वह मनुष्य की चाह का विषय है जो हमारे पूर्वा चार्य है श्री रामानुजाचार्य श्री मधवा चार्य श्री निबार काचार्य अन्य जितने भी आचार्य उन्होंने भी भगवान की जो अंतिम स्वरूप
00:15:50:19 माना है वह साकार तो कहा है मगर उनके लिए वर्ड यूज किया गया ज्यादातर जगह पर कि वो उनकी वो लोग उनका जो रूप है वो आध्यात्मिक रूप है दिव्य रूप है भौतिक रूप नहीं है इसका अर्थ क्या हुआ कि मनुष्य जो है मनुष्य के लिए वोह समझ में ना आ सकने वाला रूपी ही है तो भगवान आदि शंकराचार्य मनुष्य की दृष्टि से अगर यह कह रहे हैं कि वो निर्गुण निराकार है तो उसमें क्या दिक्कत है अन्य आचार्य भी तो दूसरे शब्दों में वही कह रहे हैं जो मनुष्य के समझ में ना आ सके ऐसा रूप आपने कहा वो साकार है मगर मैं उसे इन आंखों से देख नहीं सकता आपने कहा वो आपने कहा व बोलने वाला है मगर मैं इन कानों से उसे सुन नहीं सकता आपने कहा कि वह कार्य करने वाला है मगर मैं इन आंखों से उनके हाथ कार करते हुए नहीं देख सकता तो इसका अर्थ क्या हुआ इसका अर्थ हुआ यह जो मुझे जो प्राप्त इंद्रिया है जो भौतिक जगत की इंद्रिया इनका वह विषय नहीं है उनका जो स्वरूप है तो उसको भले ही आप निर्गुण निराकार कह लीजिए या फिर ऐसा साकार कह लीजिए जो आध्यात्मिक स्वरूप वाला साकार भौतिक स्वरूप वा वाला साकार नहीं तो घुमा फिरा के बात तो वही की जा रही है तो फिर आप भगवान आदि शंकराचार्य जी का विरोध कहां कर रहे हैं अच्छा
00:17:06:12 अब बात आती है क्या भगवान आदि शंकराचार्य जी का विरोध करते हुए ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध किया जा सकता है नहीं किया जा सकता अगर हम भगवान आदि शंकराचार्य जी का जो सिद्धांत है कि एक ही तत्व जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में प्रकट होता है वो भी अपने स्वप्न में ब्रह्म का स्वप्न है यह सब तो अब बात ये आती है अगर यह सब ब्रह्म का स्वप्न नहीं है और ईश्वर कहीं पर बैठ कर के दुनिया को बना रहा है तो सबसे पहली बात तो आ जाएगी कि ईश्वर के ईश्वर से भिन्न भी कुछ स्पेस है जहां पर सृष्टि का निर्माण किया गया है जहां पर ईश्वर बैठा हुआ है तो अब बात ये आएगी उस स्पेस को किसने बनाया इसका अर्थ क्या हुआ यहां पर जो ईश्वर होगा व अब्राह्मिक हो जाएगा जो कि एक कुम्हार की तरीके से जैसे कुम्हार सृष्टि की रचना करता है मिट्टी लेकर घड़ा बनाता है मगर घड़े का सर्वोच्च रचयिता वह सिद्ध नहीं होता क्योंकि उसने घड़े को घड़े का रूप दिया मिट्टी को मात्र मिट्टी को बनाने वाला वह नहीं है उसी प्रकार से हमारा जो ईश्वर है वह सर्वोच्च रचयिता सिद्ध नहीं होगा क्योंकि प्रकृति को उसने नहीं बनाया प्रकृति पहले से व्याप्त है पहली बात दूसरी बात यह है कि जब हम उसे
00:18:21:28 जब हम यह वाला ईश्वर जब हम यह वाला ईश्वर पकड़ लेंगे अद्वैत का विरोध करते हुए अगर हम अद्वैत का विरोध करते हुए एक ऐसे ईश्वर को पकड़ेंगे जो एक जगह बैठा है वह ईश्वर है वो मनुष्य है तो वह ईश्वर कण कण में व्याप्त नहीं है और अगर होगा भी तो अपनी शक्ति के माध्यम से व्याप्त होगा यह कहा जाएगा तो उसमें भी बात ये आती है कि अगर आप अपनी शक्ति के माध्यम से हर जगह व्याप्त हैं तो क्या आपकी शक्ति और आप में कोई अंतर है अगर शक्ति और भगवान में कोई अंतर है तो इसका अर्थ यह है कि जहां पर शक्ति है और भगवान नहीं है वहां पर कहीं ना कहीं भगवान का कंट्रोल कम है और जहां पर भगवान है वहां पर भगवान का कंट्रोल ज्यादा है तो ऐसी स्थिति में यह भी कहा जाएगा कि भगवान सर्वव्यापक तरीके से सर्वशक्तिमान नहीं है वह उस विशेष जगह पर सर्वशक्तिमान है जहां पर वह स्वयं है अच्छा एक बात और आती है कुछ आर समाज के द्वारा ऐसे तर्क दिए जाते हैं क्या ईश्वर अपने जैसा एक और ईश्वर बना सकता है हां भाई बना सकता है अगर आपका एक सपना है जो आप एक कल्पना कर रहे हो आप एक देख रहे हो तो उस स्वप्न के अंदर जो कुछ आप करना चाहते हो व आप कर सकते हो आपको अगर एक पेड़ के अंदर से प्रकट होना है तो
00:19:36:28 आप हो सकते हो आपको अगर पहाड़ उठाना है तो उठा सकते हो आपको अगर लोगों को एक ऐसा त्रिभुज दिखाना है ना जो गोलाकार हो तो वो भी दिखा सकते हो किस आधार पर दिखा सकते हो अगर कोई कहे कि भाई मुझे ऐसा त्रिभुज बना केर दिखाओ जो गोलाकार हो तो आप उसको दिखा सकते हैं कि नहीं तो भगवान दिखा सकता है कि नहीं तो जिस प्रकार से आप अपने सपने के अंदर पूर्णतया कंट्रोलर होते हैं निर्णायक होते हैं ऐसे ही ब्रह्म भी अपने सपने के अंदर पूर्णतया कंट्रोलर है अब सपोज इसको बहुत सरल भाषा में ऐसे समझ लीजिए मान लीजिए कि आप एक कल्पना कर रहे हैं उस कल्पना में एक कोई कन्या है जो खाई में गिर रही है और एक डकैत है जो उस कन्या को मारने जा रहा है तो अब यह बताइए कि वह जो दुनिया है वो दुनिया कौन है आप ही की चेतना है ना उस पूरी दुनिया के कण कण में आप ही तो हो उस खाई में उस पेड़ में जहां से वो लटकी है उस पत्थर में जितनी भी निर्जीव प्राकृतिक वस्तुएं हैं उनमें कौन है कण कण के रूप में आप हो और वह जो लड़की जो बचना चाहती है वह कौन है वह भी आप हो और जो उस लड़की को मारना चाहता है वह कौन है वह भी आप हो अब मैं और अब आप यह सोचते हो कि अब मैं
00:20:52:00 जाऊं अंदर और मैं वहां जाकर के स्वयं उस लड़की को बचाओ जो लटकी हुई है उसको उसका विनाश करूं जो वहां उसको मार रहा है तो फिर क्या करोगे आप आप चाहो जहां से आप प्रकट हो जाओगे आप जाओगे उस कन्या को बचाओगे उसको म ये जो आपका स्वरूप होगा आपके सपने के लोगों का यही ईश्वर होगा ये जो आपका स्वरूप होगा आपके सपने के अंदर की दुनिया का यही भगवान होगा अब बात ये आ जाती है अंततः कि जब हम ही ईश्वर हैं हम ही ब्रह्म है और ये सब एक कल्पना मात्र है तो हम पूजा किसकी करें भक्ति किसकी करें तो सबसे बड़ी बात यह है कि अहम ब्रह्मास्मि यह हमारे व्यवहार की वास्तविकता नहीं है यह हमारे परमार्थ की वास्तविकता है यह हमारे व्यवहार का विषय नहीं है यह हमारी प्राप्ति का विषय है आप वह लड़की हैं आप वह डाकू हैं जो उस लड़की को मारना चाहते हैं आप वह लड़की हैं जो बचना चाहते हैं उसके अनुसार वही दुनिया सत्य है और यह जो सच्चाई आपको बताई गई है यह ब्रह्म की दृष्टि से बताई गई है आपके पर्सपेक्टिव से नहीं बताई गई है आपके लिए क्या है आपको कोई बचाने आए आपको य डकैत मार डालेगा डकैत के लिए क्या है कि अगर कोई मुझसे
00:22:07:00 अट्टा गट्टा ताकतवर शक्तिशाली कोई यहां पर आ गया तो वह मुझे इस लड़की को मारने से रोक सकता है आपके लिए वही दुनिया सच्चाई है तो इसी प्रकार से हम जो लोग हैं हमें अपने आप को य समझना नहीं है कि हम भगवान है हमें उस स्थिति को प्राप्त करना है वो प्राप्ति का विषय है हम ब्रह्मास्मि भगवान के साथ एकत्व जो वहां पर लड़की को बचाने आए भगवान आपके सपने में आप भगवान बन के गए उस उस उस रूप के साथ वो जो लड़की है जो लटकी हुई है उस रूप के साथ एक अंतरंग संबंध बना कर के एकत्व प्राप्त करेगी तब वो सच्चिदानंद स्वरूप स्थिति को प्राप्त कर पाएगी अब मैं जो उदाहरण दे रहा हूं यह व्यवहार और परमार्थ का अंतर का मैं दो तीन उदाहरण दूंगा जिससे आपको स्पष्ट हो जाएगा पहला उदाहरण है कि सभी मतों के द्वारा हमारी वास्तविक स्थिति क्या बताई गई है मूल पहचान क्या बताई गई है स्कोन के द्वारा भी हमारी मूल पहचान क्या है हम आत्मा है और आत्मा के लिए भगवान श्री कृष्ण ने क्या कहा भगवत गीता में नैनम छिंदंति सण नन दहति पावक ना चैन क्ले दन तपो ना ना शोती मारुत आत्मा
✅ This part is already used · 00:23:18:21 – 00:23:25:07 (0:07)
→ Used in: A · Live रामपाल के जाल में पीड़िता #तत्त्वदर्शीसंत #rampaljimaharaj at 2:40:34 ↗
00:23:18:21 को ना शस्त्र काट सकते हैं ना अग्नि जला सकती है ना जल डुबो सकता है
⬜ Not used yet · 00:23:25:07 – 00:30:55:13 (7:30)
00:23:25:07 ना जो वायु है उसको सुखा सक अब आपको मालूम पड़ गया आत्मा को कोई कुछ नहीं कर सकता है आत्मा को कोई काट नहीं सकता अब यह बात बताइए कि अगर आपकी ओर कोई तलवार घुमाएगा आपकी ओर कोई थप्पड़ मारेगा तो आपकी पलक झपके गी कि नहीं अगर झपकी तो क्यों झपकी आपकी तो मूल पहचान आत्मा है और आत्मा को तो कोई कुछ नहीं कर सकता है इसका अर्थ क्या है कि आत्मा की वह जो सच्चाई है वह प्राप्ति का विषय है अभी आपके शरीर ने आपके कॉन्शियस माइंड ने जो इस भौतिक दुनिया से जुड़ा हुआ है उस स्थिति को प्राप्त नहीं कर लिया है प्राप्त कैसे करोगे ब्रह्म का वह रूप जो पूर्ण है जोय जानता है कि यह सब दुनिया मेरी बनाई हुई है उस रूप की भक्ति कर कर के उसके साथ एकत्व प्राप्त करके आप सच्चिदानंद स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं उस स्थिति को जिसमें आपका व्यवहार भी वैसा ही हो कि आत्मा को कोई काट नहीं सकता अन्यथा जितने लोग इकोन की गीता पढ़ते हैं जितने लोग भगवान आदि शंकराचार्य जी का इस आधार पर विरोध करते हैं कि हम ही अगर ब्रह्म है तो हम पूजा क्यों करें और इस व्यवहार और परमार्थ के अंतर को नहीं समझना चाहते हैं तो उन लोगों से मैं कहूंगा कि अगर वह शलोक अगर वह यह मानते हैं कि व आत्मा है और आत्मा
00:24:40:09 के लिए कहा गया कि आत्मा को कोई कुछ नहीं कर सकता है तो क्या वह इस बात के लिए तैयार हैं कि उन पर कोई हाथ उठाएगा और वह रिएक्ट नहीं करेंगे पलक तक नहीं झमके गी नहीं झपके गी आपकी पलक आप रिएक्ट करोगे क्योंकि अभी आपने वह स्थिति प्राप्त नहीं की है आप भक्ति कर करके कर करके वह स्थिति प्राप्त करेंगे तो यह पूरा सिद्धांत है इसको समझिए हम मनुष्य हैं हम मनुष्य भाव को प्राप्त हैं जीव भाव को प्राप्त हैं हमारा एक ही मोक्ष का मार्ग है भगवत स्वरूप की भक्ति करना ब्रह्म का वह स्वरूप जो हमें मोक्ष देने के लिए आया है जो हमें इन मुसीबतों से छुड़ाने के लिए आया है उस स्वरूप की भक्ति करना तो कुल मिलाकर के निचोड़ यह है इस सारे वीडियो का कि पहली बात भगवान आदि शंकराचार्य का सिद्धांत मायावादी है यह सिद्ध नहीं होता दूसरी बात वह जो
00:25:45:14 मायावादी बात यदि उस श्लोक को प्रक्षिप्त ना भी माने तो वह जो श्लोक है वो भगवान आदि शंकराचार्य जी के ऊपर फिट नहीं बैठता है क्योंकि भगवान आदि शंकराचार्य जी के बारे में कई ऐसी भविष्यवाणियां है जिसमें वो जो उन्हें पूर्णतया वैदिक सिद्ध करती हैं और यह जो श्लोक है ज्यादा फिट बैठता है कापालिक वाले अवतार पर जो कि दक्ष के यज्ञ के जो श्रापित गण थे उनको मुक्त करने के लिए लिखे गए ऐसे ग्रंथों के लिए यह श्लोक फिट बैठता है चौथी बात है कि तार्किक धरातल पर भगवान आदि शंकराचार्य जी के सिद्धांत को गलत कहना वो सिद्ध नहीं होता है क्योंकि भगवान आदि शंकराचार्य का विरोध करके आप भगवान को सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं कर सकते कुछ आर्य समाजी हैं जो कहते हैं कि क्या भगवान दो और दो को पांच बना सकते हैं कुछ समाजी हैं जो कहते हैं ईश्वर को बाधित सिद्ध करने के लिए कहते हैं कि क्या भगवान ऐसा व्रत बना सकते हैं जो त्रिभुजाकार हो ऐसे कुतर्क भी करते हैं तो दुनिया में जो नास्तिक हैं जाकर चेक करिए वो यही कुतर्क करते हैं और मैं इसीलिए इस प्रकार के वीडियो बनाता हूं जिससे कि इस प्रकार के जो तथाकथित पंथ
00:27:00:22 है उनकी वास्तविकता बाहर आए और वह शोधित हो सके नष्ट नहीं उनका शोधन हो सके उन शिक्षाओं का शोधन हो सके जो भगवान का खंडन करती हैं तो जैसे ही हम इनकी मूल अवधारणा को छेड़ते हैं तंत्रों की यह स्वयं ही भगवान का खंडन करने लगेंगे यह स्वयं ऐसे ऐसे पॉइंट निकाल के बताने लगेंगे क्या भगवान ही कर सकता है क्या भगवान ये कर सकता है तो मैं आपको खुला चैलेंज दे रहा हूं भगवान आदि शंकराचार्य जी के सिद्धांत पर हां आप कोई भी ऐसी बात नहीं बोल पाएंगे जो भगवान ना कर सकते हो मनुष्य दृष्टि से ये ध्यान रखिएगा मनुष्य दृष्टि से मनुष्य को दिखाई देने वाली जो दुनिया है मनुष्य को समझ में आने वाली जो दुनिया है उस उस दृष्टि से भगवान कुछ भी कर सकते हैं इस बारे में और भी बात कर लेंगे जब आप आएंगे क्या ईश्वर अपने जैसा एक और ईश्वर बना सकता है हां भाई बना सकता है तो क्या भगवान ऐसा व्रत बना सकते हैं जो त्रिभुजाकार हो तो आप यह बताइए कि आप वृत को व्रत क्यों मानते हैं त्रिभुजाकार को त्रिभुजाकार क्यों मानते हैं तो आप यह कहेंगे कि भाई हमें बताया गया है तो इसका अर्थ यह है कि आपसे अगर भगवान कई लोगों से बुलवा दे कि ऐसा व्रत है
00:28:15:26 जो त्रिभुजाकार है तो आप मान लेंगे तो आप कहेंगे नहीं उनके बुलवाने से क्या होगा मुझे मान मुझे तो मालूम है आप आपके लिए कोई भी बात तभी सिद्ध होती है ना जब आपके मानने योग्य जो प्रमाण है वो उस बात को कह तो क्या आप ये मानते हैं कि भगवान जो है लोगों के मस्तिष्क को कंट्रोल नहीं कर सकते वो अपने मन की बात बुलवा नहीं सकते क्या आप ये भी मानते हैं और अगर बुलवा सकते हैं तो वो उन लोगों से वो बात बुलवा देंगे जिन लोगों की बात आपके लिए प्रमाण है लो बन गया त्रिभुजाकार और तो और वो आपके माइंड को कंट्रोल कर लेंगे आप खुद कहने लगोगे कि ये त्रिभुजाकार है भाई ये सृष्टि है ही क्या ये सृष्टि माया है जो कुछ नहीं है वह आपको दिख रहा है तो व आपको दिखा देंगे एक ऐसा वृत जो त्रिभुजाकार हो वास्तविकता यह है ये जो व्रत और त्रिभुजाकार की बात है यह कोई क्रिया नहीं है कि भगवान इसको कर सकते हैं कि नहीं कर सकते हैं यह एक स्थिति है जो आपने मान चुके हैं जो आप यह मान चुके हैं कि भाई इस तरह से जिसका चित्र होगा वो व्रत है और इस तरह से जिसका चित्र होगा इस तरह से जिसका चित्र होगा वृत है इस तरह से जिसका चित्र होगा वो त्रिभुजाकार है ये आपकी मन स्थिति है जो आपके मन ने स्वीकार कर लिए तथ्य
00:29:30:28 तो भगवान आपकी मन स्थिति को बदल सकते हैं चिंता ना करें यह कोई क्रिया नहीं है आप उसको क्रिया का नाम दे रहे हैं अब क्या भगवान दो और दो पांच कर सकते हैं यह भी एक स्थिति है ये क्रिया नहीं है आप मान चुके हैं जब दो और दो चार दो और दो को जोड़ा जाएगा तो चार ही आएगा आप ये मान चुके हैं तो भगवान को वहां कोई क्रिया नहीं करनी है सिर्फ आपकी मन स्थिति को बदलना है और या फिर आप कहे तो उन लोगों की मन स्थिति को बदलना है जिसकी बातें आपके लिए प्रमाण होती है पूरी दुनिया कहने लगेगी हां भाई दो और दो पांच होते हैं फिर क्या करोगे आप आपको पागल आपको पागल माना जाएगा क्या भगवान पूरी दुनिया के मस्तिष्क को कंट्रोल कर सकते हैं या नहीं हां भाई बिल्कुल कर सकते हैं इसीलिए तो आपको अद्वैत के ईश्वर को मानना पड़ेगा वह ईश्वर जो किसी भी नियम के नीचे नहीं है और नहीं मानेंगे तो आपके ईश्वर में और दूसरे के ईश्वर में अंतर क्या र दुनिया में जो अच्छाई और बुराई वह निर्भर करती है ईश्वर पर ईश्वर ने जो कहा है उसे प्राप्त करने के लिए यह सही है वह सही है और ईश्वर ने कहा है कि यह मेरे प्राप्त करने में कठिनाई देगा वह गलत है इस पर निर्भर करती है बाद में उसमें तर्क आते हैं इस पर निर्भर करती है दुनिया
00:30:46:03 में धर्म ना पशु भी समाना और धर्म क्या है सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को परिभाषित कर सकने वाले शास्त्रों द्वारा सच्चिदानंद स्वरूप
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00:30:55:13 परमेश्वर को प्राप्त कर करने के निमित्त बताई जाने वाली मर्यादा का नाम विधि का नाम धर्म है तो जब सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर सच्चिदानंद स्वरूप सिद्धि
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00:31:08:09 ही नहीं होगा तो क्या मतलब है कि आपका धर्म धर्म है और दूसरे का धर्म धर्म नहीं है क्या मतलब है कि आपकी मर्यादा मान्य है और दूसरे की मर्यादा मान्य नहीं है दुनिया में जो लड़ाई है वह इसी बात की है ईश्वर सर्वशक्तिमान है या नहीं है तो अब आप निर्णय करिए कि ईश्वर ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध करना है और उनके सानिध्य में रहते हुए भगवान की भक्ति करनी है द्वैत जो द्वैत है वह व्यवहार का विषय है और जो अद्वैत है वह परमार्थ का विषय है प्राप्ति का विषय है आपके व्यवहार में राम जी अलग हैं मैं राम जी नहीं हूं मैं इस प्रकार के व्यवहार का निर्वाह करते हुए राम जी के साथ आलिंगन करूंगा किसी दिन ऐसी कामना करता हूं तो ये सुनने में आपको बुरा लग रहा है
00:31:59:07 और एक उदाहरण ले लीजिए कि जब अरे भाई जब हम और भगवान एक ही है तो पूजा क्यों करे उसकी दूस दूसरा मान कर के भाई गुरुदेव कहते हैं पृथ्वी पर जब व्यक्ति कोई गिर पड़ जाता है तो वह पृथ्वी से उठने के लिए उसी का सहारा लेता है पृथ्वी का हवाई जहाज की जो अंतिम गत स्थिति होती है उसके हिसाब से जो यथा सामर्थ्य स्थिति होती वो होती है पृथ्वी से अलग होना उड़ना और उस स्थिति तक पहुंचने लिए हवाई जहाज पहले उसी पर दौड़ता है तो इसी प्रकार से हमारी जो अंतिम स्थिति है व भगवान के साथ एकत्व अद्वैत है मगर उस अद्वैत को प्राप्त करने के लिए यहां पर हम जो द्वैत भाव में आ चुके हैं इसका निर्वाह करना ही हमारा कर्तव्य है और वो कर रहे हैं भक्ति कर रहे हैं हमें तो बहुत रस आता है भगवान श्री राम की भक्ति करने में भगवान श्री कृष्ण की भक्ति करने में विष्णु भगवान की भक्ति करने में और उदाहरण ले लीजिए आपके अनु अनुसार जो पृथ्वी है वो घूमती है वो चलती है मगर यह जो स्थिति है यह आपके व्यवहार का विषय नहीं है क्या ऐसा होता है कि आप सुबह जाएं घर से और शाम को आप जब वापस आए तो कहीं और आपका घर हो इसका
00:33:14:14 अर्थ क्या है चलती हुई पृथ्वी नहीं है पृथ्वी पर रहने वालों के लिए सूर्य की दृष्टि से चंद्रमा की दृष्टि से जो पृथ्वी से जो मुक्त है उस दृष्टि से पृथ्वी घूम रही है चल रही है राउंड लगा रही है मनुष्य की दृष्टि से जो पृथ्वी जो यहां पर जो मनुष्य रह रहे हैं पृथ्वी पर उनके व्यवहार का विषय पृथ्वी चलती हुई नहीं है उसी प्रकार से पृथ्वी गोल है मगर आप व्यवहार कैसा करते हैं पृथ्वी के साथ पृथ्वी के साथ आप व्यवहार करते हैं कि पृथ्वी चपटी है आप किसी को रास्ता ऐसे नहीं बताते ऐसे चले जाओ राउंड आप रास्ता बताते हो सीधे चले जाओ अगर आप जो उंगली दिखा रहे हैं अगर आप बाहर से देखें वो उंगली आपकी सदैव अंतरिक्ष की ओर जाती है क्योंकि आप जब भी सीधी उंगली दिखा रहे हैं वो तो पृथ्वी की प्रदी से छूट के बाहर जा रही है ना परंतु आपके व्यवहार में पृथ्वी चपटी है और आपकी जो प्राप्ति का विषय है वो है पृथ्वी गोल है अब गोल की स्थिति को आप जान गए थ्योर कली मगर प्रैक्टिकली उसको फील करना वो कैसे कर पाएंगे आत्मसात उसके लिए आपको ऐसे उपकरण बनाने होंगे वायु यान आदि जिनके द्वारा पृथ्वी की प्रदी से मुक्त हो सके और वहां दूर जाकर के पृथ्वी को देखकर कहे कि हां
00:34:29:25 पृथ्वी गोल है अब यह बताइए कि जिस समय आप वो उपकरण बना रहे होंगे वायु यान आदि वह उपकरण बनाते समय आपका व्यवहार कैसा होगा पृथ्वी के साथ गोल या चपटा अचला या चला कैसा व्यवहार होगा आपका व्यवहार होगा अचला आपका व्यवहार होगा चपटा उसी ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से जो हमारी आत्मा है उसको काटा नहीं जा सकता उसको मारा नहीं जा सकता जलाया नहीं जा सकता सुखाया नहीं जा सकता डुबोया नहीं जा सकता परंतु फिर भी यह थ्योर कली जानते हुए भी हम हमारे ऊपर जब कोई आक्रमण करेगा तो हम रिएक्ट करेंगे हमारी पलक झपक जाएगी भय से हम बचने का प्रयास करेंगे जबकि हमें थ्योरी पता है कि हमें कुछ हो सकता हम आत्मा है तो यह सारी चीजें थी द्वैत अद्वैत और मायावादी इसी बात से है कि जिस चीज को मनुष्य दृष्टि से भगवान आदि शंकराचार्य जी ने निर्गुण निराकार कहा है उसी प्रकार से दूसरे शब्दों में अन्य
00:35:45:01 पूर्वा चार्य ने भी वही कहा है कि भाई भगवान साकार स्वरूप तो है मगर उसका व जो स्वरूप है वो भौतिक नहीं है यह जो आपकी समझ में आने वाला आपकी इन इंद्रियों का विषय नहीं है भगवान आदि शंकराचार्य जी ने सीधे निर्गुण निराकार कह दिया उसे जो वैमनस्यता फैली रहती है द्वैत अद्वैत के बीच में उसका सामंजस्य है कि द्वैत को नकारा नहीं है भगवान आदि शंकराचार्य ने और अद्वैत को पूर्णतया स्वीकारा नहीं है अद्वैत प्राप्ति का विषय है द्वैत व्यवहार का विषय है अगर ऐसा होता कि द्वैत को पूर्णतया नकारते तो मंदिर क्यों बनवाते विग्रह सेवा क्यों करते भगवान श्री कृष्ण की पूजा भक्ति करने को क्यों कहते शंकर भगवान के लिए सौंदर्य शंकर लहरी जो स्त्रोत है वो क्यों लिखते भज गोविंदम क्यों लिखते और अगर वो अद्वैत को नकारते तो फिर वो अहम ब्रह्मास्मि के महावाक्य को अपने मठ से क्यों जोड़ते तो यह सारी बातें हैं जो समझने की है एक सामंजस है सभी आचार्यों में पूर्वा चार्य में यह सभी आचार्य जो हैं एक समय पर अगर आ गए होते तो इनके बीच में जो कम्युनिकेशन गैप की वजह से शाब्दिक भेद आ रहा है सबकी शिक्षाओं में सिर्फ वो है जिस बात को भगवान आदि शंकराचार्य जी ने अलग तरह से कहा उसी बात को अन्य आचार्यों ने अलग तरह से कहा है तो इसलिए
00:37:00:16 कुल मिलाकर के बात यही है कि भगवान आदि शंकराचार्य जी का विरोध करते हुए आप सर्वप्रथम भक्त सिद्ध नहीं होंगे आस्तिक सिद्ध नहीं होंगे वैदिक सिद्ध नहीं होंगे धार्मिक सिद्ध नहीं होंगे और अंततः आप मनुष्य भी सिद्ध नहीं होंगे इसका अर्थ क्या है कि भ यदि कोई व्यक्ति भगवान आदि शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित की गई सीमा के अंदर रहते हुए भक्ति कर रहा है द्वैत भाव के अनुसार जैसे सभी हम भी कर रहे हैं तो वह ठीक है मगर यदि वह यह कहता है कि मैं द्वैतवाद हूं मैं अद्वैत वादी का विरोधी हूं मैं भगवान आदि शंकराचार्य जी का विरोधी हूं मैं खंडन करता हूं तो इसका अर्थ है कि वह सर्वप्रथम तो भगवान का खंडन कर रहा है फिर वह वेदों का खंडन कर रहा है सनातन धर्म का खंडन कर रहा है और अंततः वह मानवता का खंडन भी कर रहा है तो आशा करता हूं मैंने आपकी सहायता की हो यह समाधान देने में और कुछ कुतर्क होते हैं भगवान के खंडन में उनका निराकरण करने में प्रयास किया है मैंने केवल जो गुरु गोविंद ग्रंथ के माध्यम से जो मुझे प्राप्त होती है थोड़ी बहुत जानकारी कहेंगे इसे ज्ञान भी नहीं कहेंगे प्रयास करता हूं आपकी सहायता करने का और तथ्यों तक पहुंचने
00:38:15:21 का और एक बात और कि यदि जाने अनजाने में मैंने कहीं कोई ऐसी बात कह भी दी है यद्यपि मुझे मेरे संज्ञान में ऐसा नहीं है कि ऐसी कोई बात कही है मेरी कोई भी बात तभी तक मान्य है जब तक वो गुरुदेव का विरोध नहीं करती अगर मेरी किसी बात ने जाने अनजाने में गुरुदेव के किसी कथन का विरोध किया है तो वो वहीं पर अस्वीकार है एज इट इज तो अंतिम निर्णायक क्योंकि कौन है श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य जय श्री राम भक्ति हूं मैं द्वत की अ द्वत का मैं ज्ञान हूं तत्व हूं मैं वेद का रहस्य का पुराण हूं लक्ष्य हूं मैं जीव का मनुष्य व्यवहार हूं प्रेम का सगुन विषय निर्गुण मैं निराकार हूं
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द्वैत अद्वैत और मायावाद part-1 Ishwar sakar hai ya nirakar #iskon #aryasamaj #nastik
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