⬜ Not used yet · 00:00:01:26 – 00:06:53:13 (6:52)
00:00:01:26 आप मेरे हाथ में जो कॉम्प्रोमाइजिंग गुरु परंपरा वाली तीन किताबें देख रहे हैं गीता तेरा ज्ञान अमृत सत्यार्थ प्रकाश और एक ये भगवत गीता एज इट इज इन तीनों किताबों में दो सिमिलरिटीज है पहली कि इन तीनों किताबों के आधार पर प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है वो बाधित है जैसे गीता तेरा ज्ञान अमृत का जो ईश्वर है कबीर व सात में पर बैठता है वो मां के गर्भ से जन्म नहीं ले सकता उसकी जो देह है मृत्यु को प्राप्त होकर नहीं दिखा सकती और इसका जो ईश्वर है वह निराकार है केवल व जन्म नहीं ले सकता अवतार नहीं ले सकता बाधित है मूर्ति पूजा नहीं हो सकती और इसका जो ईश्वर है वह कृष्ण नाम तो है मगर शिव बनने के बाद वापस कृष्ण नहीं बन सकता और यहां पर भी उसी ये जो यो गीता तेरा ज्ञान अमृत की तरह ये इनकी भी जो देह है वो मृत्यु को प्राप्त नहीं हो सकती और बहुत सी ऐसी चीज तो पहली सिमिलरिटी तो हमने पता कर ली कि इन तीनों किताबों में सेम क्या है मगर दूसरी खास सिमिलरिटी पता है क्या है
00:01:17:00 यह तीनों किताबें भगवान आदि शंकराचार्य का विरोध करती हैं जैसे ही आप गीता ज्ञान अमृत गीता 13 ज्ञान अमृत खोलेंगे सबसे पहले दूसरे पृष्ठ पर शंकराचार्य का विरोध प्रारंभ हो जाएगा जैसे ही आप सत्यार्थ प्रकाश को पढ़ेंगे तो जब भी कहीं पर गुरु परंपरा का विरोध होगा या किसी आचार्य का विरोध होगा तो शंकराचार्य का विरोध होगा इसी प्रकार से जब इनकी ग्रंथावली पढ़ेंगे तो उसमें भी शंकराचार्य का विरोध आएगा अच्छा सोचने वाली बात है कि ईश्वर को बाधित करने वाले इन सभी तंत्रों का एकमात्र शत्रु कौन है शंकराचार्य यह शंकराचार्य का विरोध क्यों करते हैं ऐसे सभी तंत्र जिनके द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर बाधित है और जिनकी जो गुरु परम जिनके द्वारा जो प्राप्त होने वाला ज्ञान है उसकी प्रमाणिकता पर प्रश्न चिन्ह ऐसा इसलिए होता है अगर इसको समझे इस्लाम क्रिश्चियनिटी या बौद्ध इनको हम जानते ही है सामने से वेदों का विरोध करते हैं और वेदों का विरोध करते हुए य पूर्ण ईश्वर का विरोध कर देते हैं पर यह जो तंत्र ऐसे हैं यह हमारे उन ग्रंथों का विरोध नहीं करते जिनके द्वारा पूर्ण ईश्वर प्रतिपादित हो सकता है बल्कि उनका उन्हीं ग्रंथों का उपयोग हुए ऐसा अर्थ प्रतिपादित करते हैं जिनके द्वारा
00:02:32:04 पूर्ण ईश्वर प्रतिपादित नहीं होता अब यह जो पूर्ण ईश्वर सर्वशक्तिमान ईश्वर की आवश्यकता क्या है तो सर्वशक्तिमान ईश्वर की आवश्यकता यह है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो धर्म है वह सर्वशक्तिमान होता है अर्थात पूर्ण ईश्वर के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो धर्म है वह भी पूर्ण होता है यानी कि पूर्ण ईश्वर का अर्थ है पूर्ण मानवता पूर्ण ईश्वर को प्राप्त करने के लिए आएगी पूर्ण मान मानवता तो इस पूर्ण मानवता को जो विरोध करना चाहते हैं वह अगर प्रत्यक्ष रूप से विरोध करते हैं तो बौद्ध इस्लाम बाइबल यह बनते हैं जो नास्तिक व्यक्ति होता है उसको धर्म से परेशानी होती तो ईश्वर को ही नकार देता है और जब अप्रत्यक्ष रूप से विरोध करते हैं तो इस प्रकार के तंत्रों के रूप में उद् भाषित हो जाते हैं तो अब आप यह समझ लीजिए कि दुनिया में जब भी कहीं पर ईश्वर का विरोध हो रहा होगा जैसे कि ब इस्लाम या बाइबल के द्वारा जब ईश्वर का विरोध हो रहा है वेदों का विरोध हो रहा है इसका अर्थ है ईश्वर का विरोध हो रहा है तो इसका अर्थ है वहां पर शंकराचार्य का विरोध भी हो रहा है और इसी प्रकार से दुनिया में कभी भी कहीं भी जब शंकराचार्य का विरोध हो रहा होगा तो उसका अर्थ है वहां पर वेदों
00:03:47:12 का विरोध भी हो रहा होगा और ईश्वर का विरोध भी हो रहा होगा अभ ये ईश्वर को बाधित सिद्ध करने की आवश्यकता क्यों पड़ती है किसी को क्योंकि पूर्ण ईश्वर के द्वारा मिलता है पूर्ण धर्म पूर्ण मानवता और जब किसी को पूर्ण मानवता रास नहीं आती है ठीक नहीं लगती है जैसे कि मान लीजिए अथर्ववेद में एक विवाह को समर्थन दिया गया है एक विवाह को उत्तम ठहराया गया है और प्रभु श्री राम आते हैं एक नारी सदा ब्रह्मचारी का उपदेश करते हैं और यह उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है और यह आदर्श स्थापित किया जाता है कि एक ही विवाह करें अपने जीवन में अब यदि किसी को संसार में एक विवाह अच्छा नहीं लगेगा तो उसे ऐसा ईश्वर रचना होगा जो वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर से अलग हो तो वो ईश्वर रचे या फिर वो ईश्वर प्रकट होगा तो वो ईश्वर रचे वो ईश्वर वो ईश्वर अपने संदेश वाहक को भेजेगा किसी को भेजेगा और कहेगा भाई जिसको तुम मान रहे हो पहले से वो ईश्वर ईश्वर नहीं है उसमें तो कई सारी खामियां हैं उन शास्त्रों में उस ईश्वर को प्रतिपादित करने वाले शास्त्रों में बहुत सारी त्रुटियां हैं उनको छोड़ दो और मुझे डायरेक्टली ईश्वर
00:05:02:15 ने भेजा है प्रत्यक्ष रूप से और उन्होंने कहा है कि एक नहीं आप चार पाच छ सात या जो भी उस व्यक्ति का मन होगा जिसके पास वह आया है उसके अनुसार वह जो विवाह की अनुमति है प्राप्त हो जाएगी अगर किसी को यह मर्यादा पसंद नहीं आएगी कि चचेरी बहनों से विवाह मत करो ममेरी बहनों से विवाह मत करो फुफेरी बहनों से विवाह मत करो तो वो भी उसके पास भी इसी तरीके का ईश्वर संदेश भेजेगा अपना और इस तरीके से नई मर्यादा स्थापित होगी नए ईश्वर के द्वारा अब वह ईश्वर अपूर्ण होना इसलिए आवश्यक है कि अगर उसने पूर्ण बनाने की कोशिश की ईश्वर को तो जो पहले से पूर्ण ईश्वर है उसके जैसा हो जाएगा और जब उसके जैसा हो जाएगा तो फिर उस तो फिर आदमी आपकी बात क्यों सुनेगा व्यक्ति आपकी बात तभी सुनेगा जब आपके पास कुछ नया हो वरना पूर्ण ईश्वर तो पहले से ही है तो पूर्ण ईश्वर की बात ही मानेगा तो इसलिए उससे भिन्न करने के लिए ये आवश्यक होता है कि ईश्वर की कटिंग की जाए और ईश्वर की कटिंग कैसे होती है कोई कहेगा कि मैं ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है कोई कहेगा कि ईश्वर जन्म नहीं ले सकता है कोई कहेगा कि ईश्वर कण कण में नहीं है सर्वव्यापक नहीं है तो कहने का अभिप्राय ये है कि जब भी कहीं पर शंकराचार्य
00:06:17:16 का विरोध हो रहा है तो इसका अर्थ है वहां पर वेदों का विरोध हो रहा है और उसका अर्थ है कि पूर्ण ईश्वर का विरोध हो रहा है और उसके भी मूल में अगर जाएंगे तो वहां पर मानवता का विरोध हो रहा है तो इसको अगर सैद्धांतिक रूप से आप सिद्धांत को पकड़ना चाहे तो सरल भाषा में ऐसे कह सकते हैं पहला सिद्धांत यदि कोई व्यक्ति संसार में ऐसा है जो यह मानता है कि वह पशुओं से भिन्न है जानवरों से अलग है मनुष्य है इंसान है तो इसका अर्थ है कि वह यह मानता है कि इस संसार में कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर है जिसको प्राप्त करने के लिए उसने
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→ Used in: A · Video Message to So called Hindus like @Ajeetbharti and @tufailchaturvedi #narendramod... at 18:30 ↗
→ Used in: A · Video हिंदुओं की जिज्ञासा का समाधान | Live Questions from Curious Hindus.Part-1 #adit... at 21:54 ↗
00:06:53:13 उन मर्यादाओं का आलंबन लिया हुआ है जिसे धर्म कहते हैं पहला सिद्धांत दूसरा सिद्धांत है कि यदि इस संसार में कोई व्यक्ति ऐसा है जो यह मानता है कि इस संसार में कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर है तो इसका अर्थ है कि वह वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर को मानता है और
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00:07:13:15 तीसरा सिद्धांत है कि यदि इस संसार में कोई व्यक्ति ऐसा है जो यह मानता है कि वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो इसका अर्थ है कि वह वेदों के उस अर्थ को मानता है जो शंकराचार्य ने स्वीकार किए हैं तो अर्थ कुल मिलाकर के यही है पूर्ण ईश्वर से प्राप्त होने वाला धर्म बनाता है एक पशु रूप में जन्म लेने वाले मनुष्य को मनुष्य मर्यादित और इस प्रकार से ईश्वर को बाधित करते हुए वापस उसे कहां ले जाने का प्रयास हो रहा है यह बुद्धिजीवी स्वयं समझ सकते हैं जय श्री
00:07:58:09 राम
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Similarity between ISKCON Arya Samaj and Rampal Panth | ईश्वर को बाधित क्यों बताया जाता है ।
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