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00:00:00:02 हिंदू जो शब्द है यह कोई शब्द नहीं है किसी वेद में नहीं है किसी दर्शन में नहीं है किसी उपनिषद में नहीं है संहिता में नहीं है किसी स्मृति में नहीं है हिंदू धर्म नाम की कोई कोई धर्म है ही नहीं हिंदू धर्म केवल [प्रशंसा] धोखा तो सभी को जय श्री राम आज हम एक बहुत ही प्रासंगिक विषय उस पर बात करेंगे कुछ लोग हैं जो ऐसा कहते हैं कि हिंदू नाम जो है वह वैदिक नहीं है वो अभी कुछ मुगलों के द्वारा दिया गया नाम है और ऐसा कहते हुए ये कहते कि हमें आर अपने आप को कहना चाहिए हमें हिंदू नहीं कहना चाहिए और हमारा धर्म हिंदू धर्म नहीं है हम सनातनी हैं तो हम लोग सनातनी है इसमें कोई दो राय नहीं है मगर हम हिंदू भी हैं और इसी बात पर प्रकाश डालने के लिए आज ये वीडियो मैं बना रहा हूं सबसे पहले मैं आपको बता दूं कि वेदों में मनुष्यों के समाज को सिंधु कहा गया है जैसे कि नेता सिंधु नाम जिसमें कि सिंधु का नेता बताया जा रहा है अब सिंधु नदी का अगर नाम है तो यह ध्यान रखने वाली बात है कि नदियों का कोई नेता नहीं होता है अच्छा इसके अलावा आगे और कहा गया है क्षत्रियों
00:01:15:06 का क्षत्रिय क्षत्रियों का पति क्षत्रियों का नेता या इस तरीके से और भी आपको यह प्रमाण मिल जाएंगे जहां पर मनुष्य वाचक शब्द के रूप में सिंधु का उपयोग किया गया है अब मैं इस चीज को अब इस चीज को भी जान लेना बहुत आवश्यक है यह सिंधु नाम हमें मिला क्यों है सिंधु नाम इसलिए मिला है क्योंकि सिन का मतलब है चंद्रमा जैसे कि वेदों में प्रमाण है सिन यानी कि चंद्रमा की कोमलता के बिना यज्ञ संपन्न नहीं हो सकता तो इसलिए सिन को धारण करने वाले यानी चंद्रमा को धारण करने वाले यज्ञ का अनुष्ठान करने वालों को सिंधु कहा जाता है यहां जो दू है वह धारण करने के लिए उपयोग में लिया गया है और भी ऐसे उदाहरण है जैसे भगवान शिव चंद्रमा को धारण करते हैं तो सिन को धारण करने वाले जो भगवान शिव है उनका उपासक जो देश है वह सिंधु माना जाता है अच्छा इसके अलावा और क्या है जो गंगा माता की सात धाराएं निकली है उनमें से एक धारा सिंधु भी है अतः गंगा को सिंधु भी कहा जा सकता है तो इस नियम के आधार पर गंगा को क्योंकि भगवान शिव धारण करते हैं तो अतः दोबारा भगवान शिव गंगा को धारण
00:02:30:07 करते हैं यानी कि सिंधु को धारण करते हैं उन्हें पूजने वाले सिंधु कहलाते हैं अब बात आती है कि सिंधु से हिंदू क्यों हो रहा है तो सिंधु से हिंदू होना भी कोई आजकल की बात नहीं है वैदिक काल से ही चला आ रहा है सा का उपयोग हा की जगह पर करना तो इस पर मैं बात करूंगा पर अभी समझ लीजिए कि सा का उपयोग ह की जगह पर कई जगह पर वेदों में भी हुआ है जैसे सरिता का हरिता हो गया या हरिता का सरिता हो गया अ सरस्वती का सरस्वती हो गया इस तरह से आपको कई सारे प्रमाण मिल जाएंगे जहां पे वैदिक काल में भी सा का उपयोग ह में किया जा रहा है हमारे कई बड़े महाकवि हों ने इसी नियम का प्रयोग करते हुए सा की जगह पे ह का उपयोग किया है जैसे केसरी की जगह उन्होंने केहरी कहा तुलसीदास जी ने अब ऐसे में कुछ लोग हैं जैसे गौतम खट्टर जी हैं उन्होंने सीधे-सीधे कहा कि भाई जब सा का उपयोग हा हो सकता है तो सियाराम को हिया राम क्यों नहीं कह सकते या फिर इस्लाम को इस्लाम क्यों नहीं कह सकते सबसे पहली बात यह है गौतम खट्टर जी कि जब हम सा का उपयोग हा में करते हैं तो उस हा के द्वारा बनने वाले शब्द का भी कोई अर्थ निकलना होता है अब यहां पर
00:03:45:09 क्या अर्थ निकल रहा है इसके प्रमाण ले लीजिए हिकार करती हुई गाय को धोने वाले लोग हिंदू कहलाते हैं इसलिए यहां पर सा का उपयोग हा में किया गया इसके अलावा हीनता को दूषित करने वाले लोग लोग हिंदू कहलाते हैं यहां पर हीनता का हिन आया और दूषित का दू आया हिन नाती हुई गाय का हिन आया और दूने वाले का दू आया इसी प्रकार से हिंसा से दूर रहने वाले लोग भी हिंदू कहलाते हैं तो यहां पर भी हिन आया और दूर रहने वाले का दु आया इस प्रकार से इन दो शब्दों के प्रथम अक्षर को जोड़ कर के यह हिंदू शब्द बनता है तो इसलिए सिंधु से हिंदू लिया गया इसके अलावा अब यहां पर यह बात भी जानने लायक है क्या यह नियम वेदों द्वारा प्रतिपादित है याने हम अपने मन से कर रहे हैं नहीं ग्रंथों में सत्य शब्द का जो निर्माण हुआ है वो इसी नियम के आधार पर हुआ है तो ये भी आप देख लीजिएगा अब बात आती है क्या ये विदेशियों द्वारा दिया गया शब्द है हमें नहीं क्योंकि विदेशियों के यहां पर सा का उपयोग हा के रूप में करने का कोई नियम नहीं है यह सनातन नियम है जिसका प्रमाण हम पहले दे चुके हैं हमारे कई हिंदू योद्धा ऐसे हैं जो हिंदू
00:05:00:12 राज्य के लिए लड़े हिंदू देश के लिए लड़े हिंदू राष्ट्र के लिए लड़े छत्रपति शिवाजी महाराणा प्रताप यह लोग हिंदू राष्ट्र के लिए इसलिए लड़े क्योंकि यह जो हिंदू नाम है यह हमें मुगलों से नहीं मिला यह हमें परंपरा प्राप्त आचार्यों के द्वारा वैदिक काल से जो नाम उद् भाषित हुआ था वह हमें परंपरा के द्वारा प्राप्त हुआ अब एक बात और जानने लायक है कि दयानंद सरस्वती जी ने सत्यार्थ प्रकाश में जब यह कहा कि हिंदू शब्द हमें विदेशी आक्रांता द्वारा दिया गया है और हिंदू शब्द का अर्थ विदेशी जो साहित्य है उसमें यह है मगर इस संबंध में उन्होंने प्रमाण नहीं दिया कोई भी बाद में आर्य समाज के कोई अनुयाई थे उन्होंने अपनी एक बुक लिखी जिसमें उन्होंने मेंशन किया कि वहां के कोई आधुनिक काल के या समकालीन कोई साहित्यकार है उन्होंने अपनी बुक में हिंदू शब्द उल्लेखित किया है उनके ग्रंथों में जाकर के अगर हम चेक करेंगे तो हिंदू शब्द का फला फला फला फला मीनिंग है तो इस तरीके से तो अगर हम राम शब्द का अर्थ भी पर्शियन भाषा में ढूंढेंगे तो उसमें आपको बहुत ही घृणित उत्तर मिलेगा आर्य शब्द का अर्थ भी अगर हम पर्शियन भाषा में ढूंढेंगे तो बहुत ही गलत उत्तर मिलेगा इसके अलावा और भी कई ऐसे शब्द हैं
00:06:15:21 जिसको हम अन्य भाषाओं में खोज जिसका अर्थ गलत अर्थ मिलेगा इसका कारण क्या है इसका कारण यह है कि जो हमसे द्वेष की भावना रखते हैं वह हमारे नाम के आधार पर अपनी किताबें जब लिखते हैं तो उसमें हमारे नाम का अर्थ कुछ ना कुछ ऐसा लिखते हैं जिससे कि हमारी वहां पर हीनता प्रकट हो और हमारे प्रति हीन विचार आए वहां के साहित्य को पढ़ने वालों के मन में तो इसलिए मैं आपसे निवेदन करता हूं कि जो जिस भाषा का शब्द है उसका अर्थ उसी भाषा में खोजना चाहिए इसलिए मैं आपसे भी आग्रह करूंगा कि गर्व से कहा करिए हम हिंदू हैं इस सबके बाद में एक बात आपको याद दिलाना चाहूंगा गौतम खट्टर जी कि ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो जिन वेदों का आप आज अर्थ कर पा आ रहे हैं वो वेद आपको प्राप्त कहां से हुए वेदों के वह श्लोक आपको सपने में आए थे नहीं परंपरा प्राप्त आचार्य उसको पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर करते रहे स्थानांतरित करते रहे वह वेद श्लोकों के रूप में प्राप्त हुए तब आप जाकर के अपना मनमाना भाष्य उस पर कर पाए और भाष्य जो किया सो किया अंततः सीधी सधी सी एक बात आप देख लीजिए कि आपके अनुसार प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है क्या वह मनुष्य की चाह का विषय है क्या वह सच्चिदानंद स्वरूप
00:07:30:26 है नहीं है क्योंकि वह बाधित है क्योंकि वह प्रकट नहीं हो सकता है क्योंकि उसकी मूर्ति पूजा नहीं हो सकती है यह मैं नहीं कह रहा हूं आप कह रहे हैं क्योंकि वह रूप नहीं ले सकता है तो इस प्रकार प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है वह सर्वशक्तिमान नहीं है अगर भगवत गीता को मानते हैं तो भगवत गीता के श्लोक को मानिए जिसमें भगवान ने कहा कि मुझे यह ज्ञान परंपरा से प्राप्त हुआ है जो इस परंपरा से प्राप्त ज्ञान का पालन करते हैं फॉलो करते हैं वही सुख समृद्धि पाते हैं देखा जाए तो स्वामी दयानंद सरस्वती जी के गुरु का नाम हमें पता है स्वामी विरजानंद उनके भी गुरु का नाम हमें पता है स्वामी पूर्णागिरी पर क्या उनके गुरु का नाम आपको प्राप्त है और अगर प्राप्त है तो क्या उनके गुरु का नाम आपको प्राप्त है नहीं जबकि यह बात केवल 300 400 साल में ही घटित होने वाली बात होगी यानी कि आपकी श्रंखला में आपकी गुरु परंपरा में कोई ना कोई एक व्यक्ति ऐसा है जिसने परंपरा प्राप्त को आगे नहीं बढ़ाया बल्कि स्व प्रतिपादित ज्ञान को आगे बढ़ाया जबकि प्रभु श्री राम जब धरती पर अवतरित होते हैं तो गुरु के पास जाते हैं भगवान श्री कृष्ण जब अवतरित होते हैं तो गुरु के पास जाते हैं पर आप यहां पर इतने अंश में गीता को वेदों
00:08:46:06 को उपनिषदों को नहीं मानेंगे तो इसलिए इस प्रकार की मिथ्या बातें फैलाना बंद करिए क्षमा चाहूंगा अगर मेरे शब्द आपको कठोर लगे हो तो जय श्री राम i
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Hindu ka sahi arth kya hai | क्या हिंदू नाम विदेशियों के दिन है | Reply to Gautam khattar Arya samaj
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