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00:00:00:06 आत्मा और परमात्मा का मिलन यहां से आत्मा दौड़ने में आई है और वहां स्मृतियां पुराण इतिहास ग्रंथ ये सब दूसरे दज की पुस्तकें हैं पहले दज की नहीं जय श्री राम तो जैसा की आप जानते हैं समय कंट्रोल से चल रही है अमोघ लीला जी को बहन किया गया है एक मा के लिए इस्कॉन के द्वारा पर यह वीडियो शुरू करने से पहले मैं हाथ जोड़ करके उन सभी महानुभावों से निवेदन करना चाहूंगा जिनको भी अवन के वीडियो सही लगता हैं जिनका हमें वैचारिक समर्थन प्राप्त है उन सभी से मेरा ये विनम्र निवेदन है की यदि वह हमारी आर्थिक सहायता करने में समर्थ हैं तो वो हमारी आर्थिक सहायता जरूर करें भले ही हमें ₹1 दान करें प्रधान अवश्य करें क्योंकि हम नियमित रूप से गुरुदेव के नाम से भंडारे चला रहे हैं जिसके मध्य से हम लोगों को इकट्ठा कर पाते हैं जिसके मध्य से हम लोगों को अपनी बातें अपने मैसेज सुना पाते हैं इसके साथ ही साथ आत्मरक्षा प्रशिक्षण शिविर भी चल रहे हैं जिसमें की निशुल्क बच्चों को अपनी
00:01:15:18 रक्षा करने की योग्य बनाया जा रहा है महिलाओं को मत शक्तियों को सभी को इसके साथ ही साथ स्कूल कॉलेजेस में जान जाकर के बच्चों को अपने धर्म के प्रति जागरूक करने प्रकल्प भी चला रहे हैं और ऑनलाइन क्लासेस के मध्य से भी यह साड़ी जो प्रमाणिक जानकारियां हैं जो विभिन्न हमारे आचार्य हैं महान उनके ग से संकट की गई है इन जानकारी को हम आम जनता पहचाने के लिए प्रयासरत है और इन साड़ी एक्टिविटीज को करते समय हमारे पास अपने लिए बिल्कुल भी समय नहीं होता है तो इन सारे कर्म से हमारी अपनी व्यक्तिगत और संस्था की जो आर्थिक स्थिति है वो बहुत ही समय निम्न है निम्न है अतः आप सभी से मेरा निवेदन है की आप सभी एक रुपए के रूप में भी हमें दान अवश्य करें इससे हमारी बहुत सहायता होगी
00:02:07:20 है तो अब आज का टॉपिक शुरू करते हैं हम जैसा की कंट्रोवर्सी आप सभी को मालूम है की विवेकानंद जी मांस का भाषण करते थे और अभी हाल ही में अमोघ लीला जी ने उनको एक टिप्पणी कर दी थी जी पर की एक प्रतिकार किया गया शायद जो विवेकानंद जी के फॉलोअर्स हैं उनके द्वारा और इस मामले को संज्ञान में लेते हुए इस्कॉन द्वारा अमूल लिया जी को एकमात्र बन कर दिया गया तो इसमें हमने तीन सेगमेंट बनाए हैं तीन चैप्टर में हम इस बड़े में बात करेंगे तो सबसे पहले चैप्टर तो ये है की मांसाहार और शाकाहार में अंतर क्या है जब तक हम इसको नहीं जानेंगे तब तक हम साड़ी चीजों को ठीक से समझ नहीं पाएंगे तो जाहिर सी बात है
00:02:58:21 [संगीत] वैसे तो कई प्रकार के अंतर होंगे जो कई तरह से बताए जा सकते हैं मगर जो अंतर हमारे कम आने वाला है इस पुरी चर्चा में वो अंतर है की किसी
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00:03:11:10 भी कार्य को किया जाते समय उत्पन्न होने वाला जो भाव होता है ना अगर उसमें छिपने के भाव उत्पन्न हो रहा है तो वह सात्विक नहीं र जाता है और यह बात कहीं गई है
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00:03:22:07 मनुष्य की 12वीं अध्ययन 37 में शुरू इसके अनुसार किसी भी कार्य को करते समय उत्पन्न होने वाले छिपने के भाव के आधार पर ये ते होता है की क्या वो सात्विक है राज्यविक है या तामसिक है सतोगुणी कार्य के लिए कहा गया है जी कार्य को करते समय आपके मां में यह भाव ना आए की मैं इसको किसी से छुपाऊं बल्कि भाग यह आए की मैं तो इसको सबको बताऊं तो ऐसे कार्य को आप सतोगुणी कार्य मां सकते हैं अर्थ मैंने निष्ठा के निमित्त जी कार्य को छुपाने का भाव है वह राजगुरु कहलायेगा और कम में लास्ट में निष्ठा के निमित्त जी कार्य को छुपाने का भाव आएगा इसीलिए आप देखिए क्योंकि एक ब्राह्मण का कार्य देने का होता है तो ब्राह्मण कोई माना किया गया है की उसे प्राण रक्षा से अधिक धन संचय करना है क्योंकि यदि धन संचय होगा तो उसे कहानी ना कहानी रखेगा जब रखिएगा तो उसे सबसे छुपा कर रखना का उसको सजा कर रखना का सहज के रखना का भाव स्वत ही उसके मां में उत्पन्न हो जाएगा इसके साथ ही साथ निंदा करना निर्वस्त्र होकर नहाना एवं इस प्रकार के अन्य कई ऐसे कार्य जींस की छिपने का भाव मां में उत्पन्न होता है उनको ब्राह्मण के लिए माना किया गया है तो वर्ण व्यवस्था में जो कर वर्ण
00:04:37:13 हैं उनके जो कार्य हैं अलग-अलग जो शुद्ध है वैश्य है क्षत्रिय इन तीनों के कार्यों में छिपने का भाव उत्पन्न होता है करते समय जैसे की एक वेश्या है उसको बार-बार अपना व्यापार करते समय ग्राहकों को ही बताना पड़ेगा की भाई चीज ₹5 की आई थी मैं आपको ₹6 की दे रहा हूं भले ही वो चीज ₹2 की आई हो तो यहां पर बेस्ट के जीवन में छुपाने का भाव ए गया इसके बाद छतरियां अगर सामने वाले को हरण है तो उससे अपनी रणनीति को छुपाना ही पड़ेगा इसीलिए सतोगुणी कार्य द्वारा आजीवक को परिजन करने के करण ब्राह्मण को चारों वर्णों में श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि ज्ञान देते समय आप अपने मां में कुछ ना छुपाते हुए बल्कि कुछ बाहर निकाल कर के आजीविकों पर्जन करते हैं इसके अलावा इसको और समझना चाहें तो अथर्ववेद 117 16 में कहा गया है की ब्रह्मचारी आचार्य बंता है मनुष्यमती में कहा गया है 12वीं अध्याय के 112 में से 114 श्लोक तक धर्म में संशय होने पर ब्रह्मचारी के पास जैन इसके अलावा हम जब विभिन्न ग्रंथ पढ़ेंगे तो उसमें भी यही कहा गया है जो ब्रह्मचारी का और जो आखरी अंतिम चरण होता है सन्यास उसमें यही कहा गया है की जो धर्म की शिक्षा हो वो सन्यासी से लेने इस बात को हम स्त्री और पुरुष में तुलनात्मक तरीके से देखें तो एक स्त्री के
00:05:52:18 जीवन में पुरुष की अपेक्षाकृत अधिक कार्य ऐसे होते हैं जिनको छुपाने का भाव उत्पन्न होता है इस करण से कई ऐसी चीज हैं जिसमें की स्त्रियों के लिए कहा गया है की आप ये ना करके दूसरी चीज करिए जिससे की आपको भागवत प्रताप हो जैसे की प्रणव का उच्चारण गायत्री मंत्र वैदिक मंत्र इत्यादि का उच्चारण अपना करें क्योंकि जीवन छिपने वाले कार्यों की अधिकता अथवा न्यूनता के आधार पर व्यक्ति के मस्तिष्क में ईश्वरीय ज्ञान को समझ अपने की अथवा समझ कर उसे बता अपने की जो क्षमता है वो प्रभावित होती है इसीलिए जिसके मस्तिष्क की जैसी क्षमता उसके मस्तिष्क के अनुसार उसकी भागवत प्रताप की विधि अलग-अलग कहीं गई है क्योंकि अगर गलत विधि का उपयोग करके कोई व्यक्ति प्रयास करेगा भागवत प्रताप का तो वो समाज के लिए हानिकारक तो होगा ही बल्कि साथ ही साथ वो स्वयं के लिए भी हानिकारक सिद्ध होता है इसका जो बिल्कुल प्रैक्टिकल अर्थ है वो ये देख लेने की जब भी हम किसी कम को छिपाते हैं तो मां में भाव आता है हमें कोई नहीं देख रहा है तो एक पाल के लिए हम उसे समय भगवान को भी नेकर कर ही वो कार्य करते हैं जरा सोचिए ऐसे कई कार्य दिन भर में करते होंगे गृहस्ट आश्रम वाले सबसे ज्यादा सोचें की जब वो अपने ऐसे कार्य जिनको उन्हें छुपकर करना पड़ता है तो उन्हें ये भी समझना पड़ता है की भगवान
00:07:07:20 यहां पर नहीं है अर्थात क्या हुआ की जितना व्यक्ति के जीवन में छुपाने वाले कार्यक्रम यानी की सातवीं अरे ज्यादा तो उतना ही वह ईश्वर के निकट और जितना जिसके जीवन में छिपने वाले कार्य अधिक उतना ही वो तामसिक और उतना ही हुए ईश्वर से दूर इस पर ये आधारित होता है की आपकी भागवत प्रताप की जो विधि है वो क्या हनी चाहिए आपको वैदिक मंत्र पढ़ने चाहिए की नहीं पढ़ने चाहिए या फिर आपको नाम जाप के द्वारा सरल चीजों के द्वारा आपको भागवत प्रताप करनी चाहिए यह तथ्य भागवत पुराण के वचन द्वारा और भी स्पष्ट हो जाता है जहां कहा गया है की जो पतित त्नी है स्त्री और शुद्ध है क्योंकि इनके द्वारा वैदिक कर्मों को करते समय भूल चक होने की संभावना अधिक रहती है इसलिए इनके लिए पुराने की रचना की गई है और पौराणिक पूजा पद्धति के मध्य से इनकी भागवत प्रताप की व्यवस्था की गई है तो अब इस व्याख्या को मास पर आधारित करते हुए देख लेते हैं तो मांस भी एक ऐसा भजन है जिसको प्राप्त करने हेतु जो क्रिया होती है उसको करते समय आपके मां में छिपने वाले भाव उत्पन्न होते ही जैसे की शेर वो भी हिरण का शिकार करेगा तो उसे पर छुपकर वार करेगा यानी छिपा कर के वहां पर छिपने वाले भाग उसके मां में उत्पन्न होते हैं इसीलिए मांस को तमोगुण कहा जाता
00:08:22:20 है आप बकरा को लाकर के मुर्गी को ला करके सबके बीच में अपनी किचन में सब महिलाओं के बीच में बच्चों के बीच में नहीं काटते हैं मांस कहानी अन्यत्र पर्दे के पीछे काटा जाता है और वो सरलता से घर में लाकर के उपयोग किया हैं तो यहां से एक तथ्य ये भी प्राप्त होता है की मांस अगर सरलता से उपलब्ध होना बैंड हो जाए और सबको जानवरों को अपने घर में लाकर काटना मारना पड़े हो फिर खाना पड़ेगा तो मांस खाने की जो डर है वो बहुत कम हो जाएगी इसी करण से
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00:08:52:10 मास के निषेध के हमारे शास्त्रों में हर भर के श्लोक दिए गए हैं वेदों में है मनुष्य में तो है ही इसके अलावा महाभारत गरुण पुराण सभी जगह पर मास के लिए निषेध का के श्लोक आपको मिल जाते हैं कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं जिसमें मास के लिए मांस खाने के लिए अनुमति दी गई है अब सवाल ये आता है की अनुमति क्यों दी गई है तो ये अनुमति इसलिए दी गई है की यदि कोई व्यक्ति विवश है प्राण रक्षा के निमित्त या फिर उसकी प्रवृत्ति है उसको मांस खाने की अनुमति दी गई है मगर वीडियो का उपयोग करते
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00:09:30:16 हुए रामजी वनवास को जा चुके थे तो राजा भारत वहां पर कैसेट हैं उसे व्यक्ति को जिसके करण रामजी बनवास गया है तो इस मेरे बड़े भ्राता श्री राम को वनवास के लिए भेजना वाले व्यक्ति को वही दंड प्राप्त हो जो दंड मांस बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण करने वाले व्यक्ति को प्राप्त होता है इसके अलावा दूसरी जगह पे एक श्लोक आता है जहां पर कहा जाता है की कसाई के द्वारा काटा गया मांस खाने खाने पर पाप लगता है तो यहां से समझ में ए गया की कसाई के द्वारा काटा गया मांस हमारे यहां वर्जित है यानी की अगर आपको मांस आप प्रवृत्ति या प्राण रक्षा के निमित्त आप अगर का भी रहे हैं तो भी आपको यह ध्यान रखना होगा की मैं उसे विधि का इस्तेमाल करते हुए दिखाऊं ये विधि क्यों डाली गई है इस विधि को डालने के भी वैसे तो कई करण है मगर एक करण ये भी है की जो आप तामसिक भजन कर रहे हो उसको भी एक सात्विक भीम द्वारा प्राप्त कर सुकून
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00:10:27:18 यहां ध्यान देने वाली बात ये है की जहां एक और कसाई को पापी कहा गया है और कसाई के यहां से खरीद कर लाकर मांस खाने वाले को भी पापी कहा गया है तो वहीं दूसरी और जो देवताओं को निमित्त करके या फिर आ हवन यज्ञ आदि के द्वारा मांस खाने के अनुमति दी गई है इसमें एक बड़ा डिफरेंस यह है की जब आप कसाई के यहां से ला करके मांस खाता हैं पहले से काटा कटाया तो वहां पर आप कहानी ना कहानी उसे मास को छुपा कर के की गई भीम के द्वारा प्राप्त करते हैं और जब आप एक देवताओं को चढ़ते हैं हवन आदि यज्ञ के द्वारा इस मांस को प्राप्त करते हैं तो वहां पर आप लोगों से छुपा कर नहीं बल्कि लोगों के सामने प्रस्तुत करते हुए उसे मास को प्राप्त करते हैं है तो इस विधि यह जो विधियां दी गई है मास को प्राप्त करने की व्यवस्था वर्ष यह जो विधियां दी गई है प्राण रक्षा के निमित्त या फिर आपकी प्रवृत्ति से निवृत्ति तक ले जान के लिए तो इसमें दिखाई देता है की
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00:11:24:03 ये और कुछ नहीं ये एक प्रयास है तामसिक भजन को सात्विक भीम के द्वारा प्राप्त करने का देखा जाए तो जो इस्लाम है उसमें भी जितनी चीजों को माना किया गया है उसमें कहानी ना कहानी जो आधार है वो छुपाना ही है क्योंकि कुफ्र का अर्थ होता है छिपाना और काफिर किसी को इसलिए कहा जाता है की वो उन आयतन को माना कर रहा है ना आए तो उसे मुंह फ़िर रहा है जो की ईश्वर की तरफ से आई हैं तो अर्थात वो ईश्वर से प्राप्त ज्ञान को छुपा रहा है इसी के साथ-साथ कुरान के द्वारा बहुत साड़ी ऐसी चीज माना की गई है जींस की छुपाने का भाव प्रकट होता है अब बात आई है की डॉक्टर जाकिर नायक साहब अपने एक वीडियो में कहते हैं की क्योंकि पेड़ पौधों के भी जान होती है और पेड़-पौधे भी प्राण वाले होते हैं पर की होते हैं किताब में यह लिखने के बाद की गोष्ट का सकते फिर भी कुछ हिंदू शाकाहारी क्यों है वेजीटेरियन क्यों क्योंकि जब आप कोई जिंदगी लेते हैं किसी का कत्ल करते हराम है आज सैंड्स तरक्की करने के बाद पता चला है की वेजिटेबल्स ने भी जान हैं भाजीपाला में भी जान के वेजिटेबल्स को भी दर्द होता है लेकिन ये
00:12:39:12 दर्द इंसान को सुने नहीं देता वेजिटेबल के पास तकरीबन तीन सेंसर है जानवर के पास 5 सेंसेज है इसीलिए जानवरों की जान लेना बड़ा गुना है वो सुन नहीं सकता है बोल नहीं सकता जब वो बड़ा होता है तो एक इंसान आपके छोटे भाई का कत्ल करता है क्या आप जाके झट से कहेंगे मी लॉर्ड इस कातिल को कम सजा दो क्योंकि मेरे भाई के पास दो सेंसेज कम थे सर
00:13:26:04 इस्लाम इस्लाम तो ऐसा नहीं कहता है जहां एक और शाकाहारी भजन के लिए कोई विशेष विधि नहीं है वहीं पर मास हर को प्राप्त करने के लिए जीत की हत्या करते समय एक विशेष पंक्ति आयत का पढ़ा जाना वहां पर आदेशित किया गया है अनिवार्य किया गया है इसके साथ ही साथ अगर गहनता से अध्ययन किया जाए तो इस्लाम भी कहानी ना कहानी प्रवृत्ति से निवृत्ति की बात करता है कैसे क्योंकि इस्लाम के यहां सबसे पवित्र महीना सबसे अच्छा महीना माना गया रमजान का अब रमजान में इनको इनकी साड़ी प्रवृत्तियां से मुक्त रहने की प्रैक्टिसिंग ही तो कराई जाति है दिन में आप पानी तक नहीं पी सकते दिन में आप भजन तक नहीं कर सकते तो अगर इनके आए प्रवृत्ति से निवृत्ति की व्यवस्था नहीं होती और हर चीज को जैसे इनके यहां कहा जाता है की जो सन्यास लेना हराम है सन्यास नहीं लेना चाहिए मगर जो सबसे इनका पवित्र महीना है उसमें तो व्यक्ति सन्यासी वाला ही जीवन में उनको स्त्री सॉन्ग करने से माना किया गया भजन करने से माना किया गया है मांसाहार प्राप्त करने की तो बात दूर की है फर्क सिर्फ इतना है की उनके यहां पर किसी भी चीज को बताते समय उसको अंत तक नहीं बताया गया है उसको जो एक्सप्लोर किया जाता है जो एक-एक चीज की मीमांसा की जाति है मीमांसा नहीं की गई है और ज्यादा प्रश्न करने को माना कर दिया गया है इसका अर्थ क्या हुआ किस
00:14:41:08 संसार में ईश्वर के संबंध में जितनी भी विचारधारा है उनका उतना अंश जो वेदों से मिलता जलता है वेदों की शिक्षाओं का अनुसरण करता है उतना अंश तो मानवता के लिए मनुष्यता के लिए पूर्णतः ग्रहण करने योग्य होता है मगर जितना अंश वेदों के विरुद्ध हो जाता है जितना अंश ऐसी बातें करता है ऐसी शिक्षा देता है जो वेदों के विरुद्ध हैं उतने अंश के ऊपर विचारणीय प्रश्न खड़े हो जाते हैं तो इसी करण से उनके यहां तो ऐसा होता ही है की मांसाहार को व्यवस्था अवश्य प्राण रक्षा के निमित्त ना समझ कर एक साधारण भजन के रूप में माना जाता है मगर सनातन धर्म में जहां हर बात को एक्सट्रीम लेवल तक समझाया गया है हर शब्द की विमानस की जाति है मीमांसा ग्रंथ हैं वहां के लोग इन चीजों को इसलिए नहीं समझ पाते हैं क्योंकि उनके पास गुरु तत्व का भाव होता है क्योंकि वो परंपरा प्राप्त आचार्य के पास नहीं जाते हैं इन चीजों को समझना के लिए जो की वही शास्त्र का रहे हैं जिन शास्त्रों को फॉलो कर रहे हैं मगर वहां पर वो कस्टमाइजेशन लगा देते हैं की हम इतना पार्ट मानेंगे शास्त्र का और उतना नहीं मानेंगे गुरु तत्व के अभाव में ज्ञान के अभाव में अज्ञानतारांश जो हमें सहूलियत प्राप्त हुई है उसको हम अपना अधिकार समझ बैठे हैं जो हमें आ रियायत प्राप्त हुई है उसको हम अपना हक समझ बैठे हैं जी
00:15:56:22 करण से प्रतिदिन अनगिनत निर्दोष पशु तो मारे ही जाते हैं मगर साथ ही साथ आपका जो मानव जीवन का उद्देश्य है जो जिसमें सार्थकता है की प्रवृत्ति से निवृत्ति और निवृत्ति से निर्वात की और जाना यानी मोक्ष की और जाना यानी ईश्वर की तरफ जाना उससे भी आप कहानी ना कहानी मटका कर पीछे होते चले जाते हैं तो मनुष्य में रामायण में यह साड़ी बातें बार-बार कहानी जा रही हैं की शाकाहार श्रेष्ठ है और मांसाहार निम्न है भगवान भी इस बात को कहते हैं भागवत पुराण में की यह जो मांस मदर मिथुन यह साड़ी जो भाव है यह आपके अंदर इनबिल्ट है मैंने आपको इनके साथ ही जन्म दिया है बनाए ही ऐसा है बस आपको करना ये है की इनको आप अपने हर कार्य को मेरे से होकर गुर्जर दो मांस भी अगर का रहे हो आपकी प्रवृत्ति आप नहीं र का रहे हो तो उसको बाली देकर दिखाओ ये ठीक इस प्रकार से है की आपको बहुत सिगरेट पीने की आदत है और सभी को मालूम है की सिगरेट पीना बहुत हानिकारक है ऐसे में आपको एक सिगरेट छुड़ाने वाले के पास भेजो जा रहा है तो आपको यह नहीं कहा जाएगा पहले सिगरेट छोड़ो फिर छुड़ाने वाले पास जो फिर छुड़ाने वाला का कोई मतलब ही नहीं है तो वहां पर यह कहा जा रहा है की आप अगर सिगरेट पी भी रहे हो तो इस तरीके
00:17:11:28 से आप मेरे पास ए सकते हो तो भक्तों जो उसका आध्यात्मिक रूप है की
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00:17:16:16 भगवान आपका स्वयं साथ देंगे उसे प्रवृत्ति से निवृत्ति में और जो व्यवहारिक रूप है यह है जो मांस आपको सरलता से मिल जा रहा था वह मांस आपको बहुत ही प्रयोजन करके प्रकल्पों का सहारा लेते हुए प्राप्त होगा तो धीरे-धीरे अपने आप मानना खाने की प्रवृत्ति
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00:17:33:01 आपने जन्म लगी और ये जो भाव मैंने आपसे कहे हैं यही भाव विवेकानंद जी ने भी आगे आईटी इसे अपने शिष्य को भी गए थे की मांस छोड़ने पर ध्यान देना जरूरी नहीं है जरूरी ये है की आप अध्यात्म की और आगे बंधन जब आप अध्यात्म की और आगे बढ़ेंगे तो ये मास वगैरा अपने आप ही स्वत जीवन से छठ जाए तो ये साड़ी व्यवस्थाएं प्रवृत्ति से निवृत्ति और निवृत्ति से निरवृत्ति यानी की पहले आपकी जो वासनाएं हैं भोग है उससे आपकी आजादी और फिर यहां इस आजादी के बाद भी इससे भी आजादी मोक्ष की तरफ इसलिए बाली देवताओं को चढ़ाने के रूप में मांस भाषण की व्यवहारिक अनुमति दी गई और अंततः मांस छोड़ना ही श्रेष्ठ है इसके अलावा कई बार लोग ये भी उदाहरण दे देते हैं की प्रभु श्री राम ने भी मांस खाया है इस पर तो मैंने एक पूर्व में एक वीडियो पूरा बनाया था मगर मोटा-मोटा अगर ले लेने तो माधव शास्त्री जी की बुक है क्यों उसमें आ उन्होंने उन तथ्यों पर प्रकाश डाला की मांस जो शब्द है वो आज के टाइम में हम मांस का अर्थ केवल मास लेते हैं मगर मास का अर्थ सिर्फ मास नहीं है तो रामायण में प्रभु श्री राम के लिए जो मांस दो तक शब्द आए हैं उन शब्दों का अर्थ कुछ और है इसको आप उदाहरण से भी समझ लीजिए की तीन बर खाती थी वो तीन बर खाती है इसमें
00:18:48:28 कवि हैं जो एक ही शब्द का प्रयोग अलग-अलग अर्थो में कर रहे हैं एक-एक रानी की व्यथा बताई जा रही है जिसके जिसका राजपत आप छन गया है उसमें उसके लिए कहा जा रहा है की पहले वो तीन बर खाती थी यानी थ्री टाइम सनी दे और अब वो तीन बर खाती है यानी जो बर आता है ना फ्रूट अब वो दिन भर में सिर्फ वो तीन बर खाती है तो एक ही शब्द का प्रयोग दो बार किया जा रहा है अलग-अलग अर्थो में तो इसी प्रकार से जो मां शादी जो प्रभु श्री राम के लिए आए हैं वो मांस दो तक ना हो करके उनका अर्थ अलग-अलग है मगर जो अनर्थ निकालना वाले लोग हैं या फिर स्वर्ग उसे सेल्फ प्रोक्लेमद गुरु है या फिर अपने मां से हिंदू धर्म के विरोध में अपनी ममत्व उड़ती है तो वो इस तरह की जो बुक्स हैं इंटरनेट आदि पर उपलब्ध कर देते हैं पब्लिश कर देते हैं अब बात ये आई है की हम यही अर्थ क्यों मैन तो यही अर्थ इसलिए मैन यदि हम मानते हैं की प्रभु श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम है तो प्रभु श्री राम का एक जगह मांस का अर्थ लिया है जब वो कौशल्या माता से वनवास के लिए अपनी बात बताने जाते हैं विदा लेने जाते हैं उनसे तो उनके पास जाकर के वो बताते हैं तो क्वेश्चन ले आता है उनको जब भजन ऑफर करती हैं की आई हमारे साथ बैठ करके भजन करिए तो वहां पर उन्होंने एक शब्द आया है ई शब्द तो उसका भी अर्थ मास के रूप में लिया जाता है जबकि और वहां पर उसका अर्थ है राजभोग के वास्तु में
00:20:03:14 लिया तो प्रभु श्री राम ने यहां पर यह कहा की अब तो मैं वनवास में रहूंगा मां शादी का त्याग करके मांस के बिना रहूंगा मैं अकॉर्डिंग तू जिन लोगों ने इसका ऐसा ट्रांसलेशन किया है जिसमें की भगवान श्री राम मांस खाता थे तो उनके अकॉर्डिंग अगर देखा जाए तो प्रभु श्री राम ने यहां पर ये का दिया की मैं जो है मास के बिना जंगल में रहूंगा और आगे जाकर के यही जो लेकर के यही जो ट्रांसलेटर हैं इन्होंने दिखा दिया की प्रभु श्री राम आगे जाकर के मांस खाने जबकि वहां पे भी उसे मास दो तक शब्द का अर्थ कुछ और है और यहां पे भी स्मार्ट 2 तक शब्द का अर्थ कुछ और है प्रभु श्री राम यह का रहे हैं की मुझे इन राज भोग्य वस्तुओं के बिना रहना होगा राजभोग वस्तुएं जैसे की वहां पर एक स्टॉल था तो उसे स्टॉल को माता कौशल्या ने ऑफर किया था की आई इस पे विराजिये तब भगवान ने कहा था की मैं अब इन्हें राजभोग वस्तुओं की अब मुझे जरूर नहीं है तुम मुझे खुशी की चटाई पर बैठना है तो अगर हम इस मास दो तक शब्दों वाली रामायण को मानेंगे तो हमें ये भी मानना पड़ेगा की प्रभु श्री राम सत्यवादी थे हमें ये भी मानना पड़ेगा की अगले वचन के पक्के नहीं थे तो जो हिंदू ऐसा सोचते हैं की नहीं ब्रह्म प्रभु श्री राम ने भी मांस खाया है तो वो हिंदू इस बात को भी स्वीकार कर लेने की प्रभु श्री राम असत्यवादी थे अपने वचन के पक्के नहीं थे और फिर वो मर्यादा पुरुषोत्तम
00:21:18:25 नहीं थे और अगर मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं थे तो उन्हें जितने भी धर्म ग्रंथ हैं हमारे उन सब ने मर्यादा पुरुषोत्तम का है तो इस तरह से अगर आप राम को मसहरी मानेंगे इस ट्रांसलेशन को मसहरी वाले को एक्सेप्ट करेंगे तो धीरे-धीरे धीरे-धीरे आप सनातन धर्म कोई नष्ट कर देंगे यह सब बातें और कहां-कहां से प्रूफ होती हैं की शाकाहार श्रेष्ठ है और मांसाहार निम्न है इसके लिए कई उदाहरण मिलते हैं हमें बाली जिनको जब तीर लगा तो उन्होंने भी प्रभु श्री राम को कहा की जो प्रवृत्ति के करण जो निम्न लोग मांस खाता हैं तो उनको भी फलाने फलाने का मांस खाने की आजा दी गई है तो बाली ने भी वहां पर को किया की प्रवृत्ति के करण भी अगर आप मांस का रहे हैं तो आपको सबसे पहले स्वीकार करना पड़ेगा की आपने इसके अलावा और कैसे पता लगता है कई बार लोग मां काली के नाम पर या फिर शिवा शिवा जी की भक्ति के नाम पर मांस खाता हैं मगर ऐसा भी नहीं है राजा दक्षिणी का यज्ञ हो रहा था जब सती माता ने आत्मदाह कर लिया था तो वहां पर शिवा जी के जो गांठ थे उन्होंने सामने वाली पार्टी को श्राप दे दिया था और जब सामने वाली पार्टी को श्राप दिया गया तो वहां से भी किसी ने ये शिवगणों को श्राप दे दिया की तुम ऐसे रूप में प्रकट हो गए जिसमें तुम मां शादी का भाषण करोगे मांस मदिरा मिथुन इन सब का भाषण करोगे
00:22:33:25 तो इसके बाद शिवा जी और विष्णु भगवान में मंत्र ना हुई शिवा जी ने कहा की मैं धरती पर अवतार लेट हूं और ऐसे वैदिक शास्त्रों की रचना करता हूं जिसमें मैं यह लिखूंगा की आप मांस खाकर मिथुन करते हुए मदरा पीते हुए भी आप पूजा कर सकते हैं और उसे पूजा के प्रभाव से वो जो उसे समय भी पूजा इनके जीवन से जुड़ी रहेगी तो उसे पूजा के प्रभाव से यह पुनः वैदिक हो जाएगी और अंततः भगवती पुराण में यह बात कहीं गई की फिर भी वो जो शास्त बच्चे गए हैं या रचे जाएंगे शिवा जी के द्वारा शिवगणों की मुक्ति के लिए उन शास्त्रों को फॉलो फॉलो करना सज्जनों के लिए अच्छा नहीं है सज्जनों के लिए तो यही अच्छा है की वो पूर्णतया वैदिक वैदिक धर्म को ही फॉलो करें आवधिक धर्म को फॉलो ना करें भले ही वह शिवाजी के द्वारा लिखे गए हैं किसी विशेष देश कल स्थिति में क्योंकि अगर आप उनको फॉलो करेंगे तो सबसे पहले तो आप वैदिक हो गए अब देखो अर्थ है की आप ऐसे शास्त्रों को फॉलो कर रहे हैं अब जो किसी विशेष देश कल स्थिति में रखें गए भले ही भगवान के द्वारा रचे गए मगर वो सनातन ग्रंथ नहीं है तो जब वो सनातन नहीं है तो उन शास्त्रों को फॉलो करने वाले को सर्वप्रथम ये मानना पड़ेगा की मैं सनातनी नहीं इसके साथ ही साथ उसे मानना पड़ेगा की मैं निम्न व्यक्ति हूं अब यह साड़ी थ्योरी जो हमने पकड़ी है वह
00:23:48:25 उसका निचोड़ क्या निकाला उसका निचोड़ी निकाला [संगीत] हुए प्राण रक्षा अथवा प्रवृत्ति के निमित्त व्यवस्था अवश्य मांस भाषण खाने की अनुमति मंत्र दी गई है और अंत में यह भी बताया गया है उदाहरण के द्वारा भी प्रमाण के द्वारा भी की मांस छोड़ना ही श्रेष्ठ है आपकी मुक्ति आपका उधर तभी होगा जब आप मांस छोड़ देंगे प्रगति से निवृत्ति और निवृत्ति से निरवृत्ति अब मैंने आपको जो इतनी साड़ी व्याख्याएं बता दी प्रमाण दे दी है मगर बात ये आई है की बर का अर्थ कौन सा वाला लेना है मेरा वाला ही क्यों माना जाए एक ही शब्द के जब दो अर्थ निकाल रहे हैं तो उसमें से वही अर्थ क्यों माना जाए जो मैं बता रहा हूं तो इसलिए क्योंकि ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो और मैं जो बोल रहा हूं वो सारे परंपरागत आचार्य बोलते हैं अगर इसके विरुद्ध कोई व्यक्ति बोल रहा होगा तो उससे जब आप उसकी गुरु परंपरा पूछेंगे तो जब आप उसके गुरु के गुरु के गुरु के गुरु पर जाएंगे तो पांचवें छठवें गुरु के बाद एक समय ऐसा आएगा जब वो स्टॉप हो जाएगा मगर यहां पर जिन गुरुओं के नाम हम बता रहे हैं तब इसे जब इनकी वंश पूछ जाएगी गुरु के गुरु के गुरु तो
00:25:04:00 आप डायरेक्ट शास्त्र संवत परमाणु के साथ पहुंच जाएंगे विष्णु भगवान तक नारायण तक शिवा तक ब्रह्मा तक तो अब ए जाते हैं दूसरे चैप्टर पर कंट्रोल सी अब बात आई है की एक सिद्ध पुरुष ने ऐसा क्यों किया तो मैं ये नहीं कहूंगा की विवेकानंद जी सिद्ध पुरुष नहीं थे मगर आप ये मां लीजिए की वो सिद्धि सिद्ध पुरुष ही नहीं वो भगवान का स्वयं अवतार थे वो भगवान थे तो क्या हमारे शास्त्रों ने कहा है की आप भगवान का अनुसरण करिए नहीं सनातन वो नहीं जो किसी व्यक्तित्व को फॉलो करता हो सनातन वह है जो वेदों को फॉलो करता है और अगर किसी भी महान व्यक्ति का किसी भी पूजनीय व्यक्ति का कोई ऐसा आचरण है जो वेदों के विरुद्ध है तो वह हमारे लिए ग्रहण करने योग्य नहीं है जैसे की विष्णु के 10 में अवतार स्वयं भगवान बुद्ध वह आए उन्होंने वेदों का विरोध किया तो क्या हम बुद्ध का अनुसरण करते हैं बुद्ध का अनुकरण करते हैं भगवान श्री कृष्णा ने भी भागवत गीता के मध्य से जो आदेश दिए हैं जो शिक्षा दिए हैं हम उनका अनुसरण करते हैं मगर भगवान श्री कृष्णा के जीवन कम अनुकरण नहीं करते हैं वो बात और है की विभिन्न लियाओ के मध्य से भगवान ने कई प्रकार की अर्थ बताने की कोशिश की है इसको हम किसी और दिन लेंगे मगर फिलहाल के लिए आप इतना जान लीजिए की सनातन धर्म वो नहीं जो भगवान ने अगर किसी विशेष दर्श देश कल स्थिति में कुछ कार्य
00:26:19:06 किया तो उनका अनुकरण किया जाए सनातन धर्म वो है जहां भगवान की श्वास रूप में शाश्वत हमेशा से विद्वान सनातन वेदों का अनुकरण किया जाए अनुसरण किया जाए सनातन धर्म वह है तो अमोघ लीला जी ने विवेकानंद जी के लिए सही कहा या गलत कहा इस पर ना जाते हुए यह देखना चाहिए की किस ढंग से कहा किस तरह से कहा उन्होंने बहुत ही हसरात्मक खास उड़ते हुए इस बात को रखा और जो पूज्य गुरुदेव है वो हमेशा एक बात कहते हैं की अपनी बात को सदा ही दर्शन विज्ञानों व्यवहार को साथ करके रखिए जिससे की सामने वाला भी आपकी बात को सुन सके समझना का प्रयास कर सके मगर ज्यादातर उनके व्यक्तियों में सामने वाले के प्रति एक हसरत आ भाग होता है मगर बात ये आई है की क्या इस्कॉन द्वारा उनको बन किया जाना सही है या नहीं तो अब बात ये आई है क्या अमोघ लीला जी ने पहले बार किसी सिद्ध पुरुष के लिए ऐसी बातें गई हैं क्या अमूल लीला जी ने पहले बार किसी महान व्यक्तित्व के लिए इस प्रकार के भाव प्रकट किया नहीं आदि शंकराचार्य जी के बड़े में अमूल लीला जी कई बार उनकी हंसी उड़ते हैं उनकी मृत्यु हुई मां की मिमिक्री करके बताते हैं की किस प्रकार से आदि शंकराचार्य
00:27:34:09 जी अपने शिष्यों से झूठ बोलते थे और अपनी मां से उन्होंने उनकी मां के मरते समय सही बोला था देखिए [संगीत] इमाम ठीक है भाई
00:28:26:14 राधा श्याम सुंदर के बड़े में सुना वैसे तो यह पूर्णतया निराधार है मगर फिर भी मैं अमोघ लीला जी से पूछना चाहूंगा की हम लीला जी मुझे यह बता दीजिए की जब आदि शंकराचार्य जी ने अपनी मां से ये बात बोलते समय गेट को बैंड कर लिया था तो फिर आपको ये बात उन्होंने स्वयं आकर के बताई है या किस प्रकार से आपको प्राप्त हुई है गुरु परंपरा से प्राप्त हुई है तो क्या इस बड़े में आपके पास कोई प्रमाण है की मरते हुए जब मां ने उनसे पूछा तो उन्होंने इस तरह की एक्टिविटी की थी तो यह ज्ञान आपको कहां से प्राप्त हुआ है इसका अर्थ यह निकलता है की आप लोगों को परंपरा से प्राप्त ज्ञान नहीं दे रहे हैं [संगीत]
00:29:12:07 सर यहां से लेकिन तीन चीज हो गई थोड़ा घड़ा ऐसी बातें नहीं करते अब इस साड़ी व्याख्या के बाद अब हम आते हैं आखिरी बिंदु पर की अमोघ लीला जी को बन क्यों किया तो हमने देख लिया की शाकाहार श्रेष्ठ है मांसाहार निम्न है प्रति प्राण रक्षा अथवा अन्य किसी व्यवस्था के निमित्त विधि पूर्वक मांस खाने की अाग्यवर दी गई है मगर मांस छोड़ने कोई श्रेष्ठ कहा गया है उसके बाद हमने देख लिया की अमूल लीला जी ने पहले बार किसी महापुरुष के ऊपर इस तरह की टिप्पणी नहीं दिखाई है इसके पहले भी हम उंगली दाल द्वारा या स्पन के ही अन्य जो ख्याति प्राप्त उनके प्रतिनिधि हैं उनके द्वारा इस प्रकार की कई टिप्पणियां दी जा चुकी हैं मगर इस टिप्पणी में ऐसा क्या विशेषता जो की अमूल लीला जी को बहन किया तो इस्कॉन द्वारा उनको बन किया जान से भाग प्रकट होता है की इस्कॉन में एक व्यापार तंत्र कायत है जो की व्यापार को सर्वप्रथम प्रायोरिटी रखना है ना की सत्यता जब उसने यह देखा की हमारे किसी वेल फेस के द्वारा ऐसी कोई टिप्पणी दे दी गई है जिससे की हमारा व्यापार प्रभावित हो सकता है तो फिर उन्होंने उसे टिप्पणी के लिए उनको
00:30:27:09 बन दिया वरना बहन तो उन्हें उनको भी करना चाहिए जो आचार्य शंकर को बोगस फिलासफी वाला खाने वाला बताना बता रहे हैं और स्क्रीन पर ऑन पालश की गेम बाइक देता है आमग लीला को पहले कर देना चाहिए था जब उन्होंने उनकी मर्जी मां के वक्त का सुनहरी हो क्रिएट करके हंसी उदय थी इस कौन के द्वारा मुंह लीला जी को बहन किया जान से प्रभाव क्या पड़ेगा प्रभाव यह पड़ेगा की व्यक्ति यह सोचेगा की अगर अमूल लीला जी गलत बोल सकते हैं तो उन्होंने पता नहीं और कितनी जगह पर हमसे गलत बोला हो जो की इस्कॉन के द्वारा सही नहीं है और अगर अमूल्य जी गलत नहीं बोल रहे हैं सही बोल रहे हैं तो इसका मतलब इस्कॉन की जो ऑथेंटिसिटी है वो वीक हो गई है तो इसका मतलब पीछे से जो चीज ए रही है जो सोर्स ऑफ इनफॉरमेशन है वो करेक्ट नहीं है और कौन वालों ने अगर समाज को दिखाने के लिए ये कहा है की हम आ अमूल लीला जी द्वारा विवेकानंद जी पर जो टिप्पणी की गई है उसके लिए शर्मिंदा है यह केवल एक दिखावा है तो इसका अर्थ है की इस्कॉन ऐसे कार्य करता है जो लोगों के सामने कुछ और और अंदर कुछ और खाने का मतलब ये है की इन्होंने कोई गलती की है की नहीं की है
00:31:46:24 तो आपने ये वजह नहीं लिखी ना उसमें प्रश्नोत में लिखा है की उन्होंने गलत किया अभी क्या लिखेंगे अभी तो अभी एक साथ जो अभी इसका मतलब ये हम ये मानेंगे कौन झूठ भी बोलना है अरे प्रभु जी आवाज अगर आपको इधर जाना है डी लाइक एन अगर बंगाल में कर का एक साथ कम करना है तो फिर तो अभी उनको इसलिए किया गया अभी इतने सारे उड़ता है की इस्कॉन के द्वारा और कहां कहां जो मां में नहीं है मगर लिखने वाले के द्वारा कहा गया है जो मां में नहीं है राम जी नहीं शिखा रहे शिवा और विष्णु में भेद राम जी का रहे हैं भैया शिवा की भी पूजा कर सकते हो विष्णु रूप में भी भगवान की पूजा कर सकते हो मगर यह मां में नहीं है मगर किसी कारणवश अपने किसी मंतव्य की पूर्ति हेतु गलत बात बता दी गई तो यह जो क्वेश्चन उठ जाता है की अगर वो अमूल लीला जी को गलत नहीं मानते हैं जैसा की अभी हमने रिकॉर्डिंग में सुना इस्कॉन द्वारा अमूल्य जी को गलत नहीं माना जा रहा है मगर लेटर में यही लिखा जा रहा है प्रेस नोट नहीं लिखा जा रहा है उन्होंने जो असंवेदनशील टिप्पणी कर ली है विवेकानंद जी के लिए उसके लिए हमें खेत है और हम इस चीज के लिए शर्मिंदा हैं इस तरह का भाव उन्होंने प्रकट किया आपने प्रश्नों के द्वारा तो जो भाव मां में नहीं है जो विचार मां
00:33:01:25 में नहीं है उनको अगर वो सामाजिक रूप से प्रस्तुत कर रहे हैं तो इससे प्रकट होता है की इस्कॉन द्वारा ऐसे कितने विचार हैं जो वास्तविकता में नहीं है मगर उन विचारों को वो अपनी किताबें के मध्य से प्रकट कर रहे हैं अपने कुछ व्यक्तिगत अथवा संस्थागत मानते हो की पूर्ति के लिए तो ये सारे क्वेश्चन है ये थी आज की व्याख्या आशा करता हूं आपको अच्छी लगी हो मैंने वीडियो के शुरू में कहा था जो भी हमें समर्थन दे रहे हैं प्लीज हमारी हेल्प करिए यही वो वक्त है जब हमें आपकी हेल्प की बहुत आवश्यकता है और प्रभु श्री राम आप सब पर कृपा बनाए और मैं तो अपने मां में यही सोचता हूं की हमारे साथ इस बात की चिंता जय श्री राम
00:33:48:02 [संगीत]
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