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00:00:00:00 एक यह बात फिक्स मान लेता हूं कि खुदा में ऐब नहीं हो सकते। ऊपर वाले में यह मानू कि ना मानू मैं? आपसे पूछ रहा हूं ये मुफ्ती सर। हां बिल्कुल खुदा में ऐब नहीं है। खुदा में ऐब है। तो फिर अब बात ये आती है कि ये जो ऐब वाले लोग हैं इनको खुदा ने बनाया कि नहीं बनाया? तो मैं अगर आपसे कहूं कि इनसेस्ट बहन और भाई आपस में अगर सेक्सुअल रिलेशनशिप रखें तो आपको कोई एतराज है बाय डिफॉल्ट नो सर
00:00:38:19 जय श्री राम। तो आज हम बात करेंगे सनातन धर्म की सौंदर्यता के बारे में तुलनात्मक व्याख्या के माध्यम से। तो सबसे पहला जो पॉइंट है व्हाई सनातन इज सुप्रीम? वो यह है कि संसार में एकमात्र सनातन धर्म ऐसा है जो ईश्वर को मनुष्य के ऊपर थोपता नहीं है बल्कि ईश्वर के अस्तित्व को सर्वप्रथम सिद्ध भी करता है। कैसे इस बारे में हम कई बार बात कर चुके हैं। असतो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर्गमया मृत्युमा मृतम गमया। सबसे पहले तो मैं आपको बता दूं दुनिया की कई बहुचरर्चित फिल्मों में से एक फिल्म है जो वो पूरी इसी आईडियोलॉजी पर ही बनी है मैट्रिक्स उस मूवी में आखिर का जो सीन है मैट्रिक्स 3 का उसमें यह गाना अंग्रेजों के द्वारा गाया भी गया है जिसमें कि इसी श्लोक का उच्च चोक के माध्यम से कहा क्या जा रहा है संसार के प्रत्येक जीव में तीन तरह की प्यास विद्यमान है। पहली प्यास है कभी ना मरने की प्यास, मृत्यु विहीन जीवन। दूसरी प्यास है सर्वज्ञ ज्ञाता बन जाने की चाह, जड़ता विहीन जीवन। और तीसरी प्यास है सदा आनंदित रहने की चाह, कष्ट विहीन जीवन, अमरता की प्यास को कहते हैं सत, सर्व ज्ञाता बन जाने की प्यास को कहते हैं चित्त। और सदा आनंदित रहने की प्यास को कहते हैं आनंद। इसके साथ ही साथ अगर इन तीनों डिजायर्स का निचोड़ हम देखा जाए तो एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी
00:01:54:02 ऐसे भाव आते हैं कि धूप ज्यादा पड़ रही है तो कम हो जाए। बारिश ज्यादा हो रही है तो कम हो जाए। ठंड ज्यादा पड़ रही है तो कम हो जाए। यानी कि वो मौसम को भी कंट्रोल करने वाला बनना चाहता है। एक नास्तिक व्यक्ति के मन में भी कई बार इस तरह की प्यास आती है, भाव आते हैं कि काश मुझे यह बात पहले पता लग जाती तो मैं इस नुकसान से बच जाता। यानी यहां पर वह भविष्य को भी देखने वाला बनना चाहता है। एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी कई बार ऐसे भाव आते हैं कि काश मैं भूतकाल में जाकर के अपनी वो गलती सुधार आता। या फिर मैं अगर मेरी कार आ जाए तो वह कभी खराब ना हो। मेरा मोबाइल आ जाए तो वो कभी खराब ना हो। मेरी त्वचा जो है वो कभी झुर्रियां ना पड़े। मेरे बाल कभी सफेद ना हो। मेरे पास अगर मोबाइल हो तो इस दुनिया का सबसे अच्छा मोबाइल हो। मेरे पास अगर कार हो तो इस दुनिया की सबसे अच्छी कार हो। ये सुपरलेटिव बन जाने वाले भाव भी एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी आते हैं। तो अब बात ये आती है कि एक नास्तिक व्यक्ति के अकॉर्डिंग अगर इस दुनिया में कोई भी ऐसा नहीं है जो अमर हो। तो फिर वह खुद अमर क्यों बनना चाह रहा है? एक नास्तिक व्यक्ति के अकॉर्डिंग दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो सर्वज्ञाता हो। तो फिर वो खुद सर्वज्ञाता क्यों बनना चाह रहा है? एक नास्तिक व्यक्ति के अकॉर्डिंग दुनिया में कोई ऐसा नहीं है जो सदा आनंदित रहने वाला हो। तो फिर वो खुद ऐसा क्यों बनना चाह रहा है? और उसके अकॉर्डिंग अगर देखा जाए तो
00:03:09:03 इस दुनिया में कोई ऐसा नहीं है जो इस प्रकृति को कंट्रोल कर सके। इस दुनिया को कंट्रोल कर सके। तो फिर वह खुद प्रकृति को कंट्रोल क्यों करना चाह रहा है? नियम यह कहता है कि मनुष्य के अंदर व्याप्त हर तरह की डिजायर्स का जो सब्जेक्ट है, वह दुनिया में मौजूद है। जैसे प्यास का विषय पानी सिद्ध होता है। नेत्रों का विषय दृश्य सिद्ध है। कानों का विषय आवास सिद्ध है। काम का विषय भोग सिद्ध है। भूख का विषय भोजन सिद्ध है। तो जिस प्रकार नेत्रों का विषय दृश्य सिद्ध होता है। कानों का विषय आवास सिद्ध होता है। उसी प्रकार एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी व्याप्त सचित आनंद की प्यास का विषय सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। इसके साथ ही साथ सनातन धर्म ये भी बताता है कि ये जो प्यास मनुष्य के अंदर आ रही है वो क्यों आ रही है? उसके अंदर ये चाह क्यों आ रही है सर्वज्ञाता बन जाने की, अमर हो जाने की, प्रकृति को कंट्रोल करने वाला बन जाने की। वो इसलिए आ रही है क्योंकि वो ऐसे किसी का अंश है पार्ट है जिसमें ये सारे गुण मौजूद हैं। क्योंकि सनातन धर्म के अनुसार जीव जो है वो परमात्मा का ही अंश है। तो नियम क्या कहता है? अंश हमेशा अपने अंशी की ओर आकृष्ट होता है। जैसे अग्नि जब भी प्रज्वलित होती
00:04:24:07 है तो वह पृथ्वी से पृथक हो के अंतरिक्ष में स्थित अपने अंशी की ओर भागने लगती है। झरने नदियां आदि सभी जैसे ही निकलते हैं वैसे ही अपने अंशी समुद्र की ओर भागते हैं। यहां तक कि पृथ्वी से निकलने वाले फल फूल आदि भी प्रतिदिन इसीलिए यात्रा कर रहे हैं। उनकी उम्र इसीलिए बढ़ रही है। धीरे-धीरे वो सड़ते हैं, गलते हैं कि वापस वो मिट्टी में मिल जाए। तो यहां से सिद्ध होता है कि अंश हमेशा अपने अंशी की ओर आकृष्ट होता है और सनातन धर्म के अनुसार क्योंकि जो जीव है वो परमात्मा का ही अंश है। इसलिए यहां पर जो अंश है वो अपने अंशी सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर की ओर आकृष्ट हो रहा है। तो ये जो संबंध है यह संबंध भी संसार में एकमात्र सनातन धर्म के द्वारा ही स्थापित होता है। वरना यहां पर एक आदमी कह सकता है कि ठीक है भाई इस दुनिया में भगवान होगा तो मुझे क्या करना उससे सर तो बीच में ये गॉड आप क्यों मतलब दिलाते हो अगर देखें हम मजहब को तो वहां पर ईश्वर के अस्तित्व को इस तर्क से सिद्ध किया जाता है कि इस सृष्टि में हर चीज को बनाने वाला कोई ना कोई मौजूद है तो उसी प्रकार से इस पूरी कायनात को इस पूरी दुनिया को बनाने वाला कोई ईश्वर भी है। मगर मजहब की आईडियोलॉजी के अकॉर्डिंगली अगर इस बात को
00:05:39:08 मान भी लिया जाए तो ये प्रश्न बाकी रह जाएगा कि अगर संसार को बनाने वाला कोई है तो फिर क्योंकि ये नियम है कि हर चीज को बनाने वाला कोई ना कोई होता है तो अगर संसार को बनाने वाला कोई ना कोई है तो फिर उसको बनाने वाला कौन है? यह प्रश्न शेष रह जाता है। इसके साथ ही साथ एक बात और कही जाती है मजहब के जो स्कॉलर्स होते हैं, विद्वान गण होते हैं उनके द्वारा कि अगर इस दुनिया में कोई ईश्वर नहीं है तो फिर आपको ये जो मोरल वैल्यूस है, नैतिकता की शिक्षा है, ये कहां से प्रदान हुई है? हम ये कहते हैं कि आपके पास कोई वजह नहीं है मोरल जिंदगी गुजारने की। लेकिन इसके बावजूद अगर आपके पास सेंस ऑफ़ मोरालिटी है, आप मोरल हैं, तो यह एक स्टार्टिंग पॉइंट ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन है कि आप मोरल क्यों हैं? तो, वहां से आपकी जर्नी शुरू होती है ट्रू द एक्सटर्नल एजेंसी यानी अल्लाह ताला की जात के इवेंचुअली बहुत से क्वेश्चंस को आंसर करने के बाद कि हां एक जात ऐसी है जिसने हमें मोरालिटी दी है। एंड देयर इज द ओनली एक्सप्लेनेशन। तो अगर गॉड नहीं है तो फिर आप जो मर्जी करें। इस बात को तो सनातन धर्म में भी कहा जाता है कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये चार चीज़ें मनुष्यों में और जानवरों में समान है। केवल धर्म ही है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। सामने खड़ी हुई तीन स्त्रियों में से माता, बहन और
00:06:54:09 पत्नी कौन है, यह आपको विज्ञान बता सकता है। मगर मां को किस तरह से देखना है, बहन को किस तरह से देखना है, पत्नी को किस तरह से देखना है, यह आपको धर्म बताता है। तो, यह बात सही है। मगर यह जो नैतिकता की शिक्षा है यह ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारने के बाद का एक बाय प्रोडक्ट है। इससे ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि एक मनुष्य जो है जो कि नैतिकता का पालन कर रहा है वो मनुष्य अनजाने में भगवान को मानता है। धर्म को मानता है। मगर जब हम न्यूट्रल एक व्यक्ति जो कि धर्म को फॉलो नहीं कर रहा है। सिर्फ खड़ा हुआ है। उसको हम कैसे सिद्ध करेंगे कि भगवान है तो उसके लिए केवल और केवल सनातन धर्म ही है। सरल भाषा में कहें, तो इस तर्क के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व ऐसे व्यक्ति के समक्ष सिद्ध नहीं किया जा सकता जो नैतिकता को ना मानता हो। क्योंकि नैतिकता उसे बाहर से प्राप्त होती है। वह नैतिकता के साथ जन्म नहीं लेता। तो मैं अगर आपसे कहूं कि इनसे बहन और भाई आपस में अगर सेक्सुअल रिलेशनशिप रखें तो आपको कोई ऐतराज है बाय डिफॉल्ट।
00:08:04:26 नो सर कोई ऐतराज नहीं है आपको उस पे वेरी गुड नो बहुत-बहुत शुक्रिया आपका बाप और बेटी अगर आपस में सेक्सुअल रिलेशनशिप रखें तो आपको उस पे कोई ऐतराज है अगर वो दोनों चाहे तो दे कैन हैव इट दे कैन हैव इट एब्सोलुटली कोई प्रॉब्लम नहीं है इसमें से आपको मां और बेटा अगर आपस में सेक्सुअल रिलेशनशिप रखना चाहें और दोनों की मर्जी अगर हो तो फिर भी आपको कोई प्रॉब्लम नहीं है यस सर सिमिलरली ली अगर उन दोनों की आपस में कंसेंट हो तो व्हाई नॉट बीच में ये गॉड आप क्यों मतलब लाते हो इसलिए कि क्या हम मोरल वैल्यूस को रीजनिंग की बुनियाद पर इंटेलिजेंस की बुनियाद पर रख सकते हैं कि नहीं एंड यू सेड नॉट अर्थात ईश्वर का अस्तित्व मनुष्य को जन्म से प्राप्त इनबिल्ट गुणों के आधार पर ही सिद्ध किया जा सकता है जो है सच्चित आनंद के रूप में सर्व नियामक बन जाने की चाह। अब जो दूसरा पॉइंट आता है सनातन धर्म की सुप्रीमेसी का वो है कि संसार में एकमात्र सनातन धर्म के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर ही सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है। वो कैसे? सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म। अभी हमने पिछले पॉइंट में यह ध्यान दिया था कि ईश्व जो मनुष्य है वो सारे नियमों को तोड़ने
00:09:20:02 वाला बनना चाहता है। तो यहां पर जो उसकी डिजायर है उसका जो विषय सब्जेक्ट उस चाह पे खरा उतरने वाला ईश्वर ही सनातन धर्म का ईश्वर है। ईश्वर किसी भी तरह के नियम के अधीन नहीं है बल्कि वो तो सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है। वो कुछ भी कर सकता है। अगर कोई कहे कि वो कछुआ नहीं बन सकता तो वह कछुआ बन जाता है। अगर कोई कहे कि वो मछली नहीं बन सकता तो मछली बन जाता है। अगर कोई कहे
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00:09:44:00 कि वो जन्म नहीं ले सकता तो वो जन्म लेकर दिखाता है राम के रूप में। अगर कोई कहे कि वह मृत्यु को प्राप्त नहीं हो सकता तो वो कृष्ण के रूप में मृत्यु को प्राप्त हो के भी दिखा देता है। अगर कोई
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00:09:53:15 कहे कि वो झूठ नहीं बोल सकता तो वो कृष्ण बन के झूठ बोल के दिखाता है। अगर कोई कहे कि वो सत्य नहीं बोल सकता तो राम बन केवल सत्य बोल के दिखाता है। वो हर वो काम कर सकता है जो एक मनुष्य बुद्धि से सोचा जा सकता है। इसका अर्थ क्या हुआ कि केवल एक संसार में सनातन धर्म का ईश्वर वह ईश्वर है जिसके सामने एक लाइन नहीं लिखी जा सकती। ही कांट डू इट कि दुनिया में कोई ऐसा कार्य है जो सनातन ईश्वर नहीं कर सकता। ऐसा नहीं कहा जा सकता। अगर हम कहें कि वो मूर्ख नहीं हो सकता तो वो हम मनुष्यों के रूप में मूर्ख बन जाता है। अगर हम कहें कि वो पापी नहीं हो सकता तो वो रावण आदि के रूप में पापी बन के भी दिखा देता है। तो इस प्रकार से जो सनातन धर्म का ईश्वर है वो अब ईश्वर सिद्ध होता है। जो मनुष्य की चाह का विषय है। मनुष्य की चाह क्या थी? दुनिया के हर प्रकार के अच्छे हो या बुरे हो सभी नियमों को तोड़ने वाला सर्वनियामक बन जाने वाला बनने की चाहती। वहीं पे अगर हम मजहब के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर को देखें तो वो यह कहता है कि मैं अवतार नहीं ले सकता। अब ये अवतार ना लेने के लिए बाधित होना भले ही किसी मर्यादा का पालन करना हो या फिर क्षमता विहीन होना हो। ये एक अलग बात है। मगर यहां पर वो रुक रहा है। वो कह रहा है कि मैं अवतार नहीं ले सकता। मेरी
00:11:08:16 कोई संतान कैसे हो सकती है? जबकि मेरी कोई पत्नी ही नहीं है। तो अगर ईश्वर भी किसी मर्यादा का पालन कर रहा है कि मैं मुझे भगवान बने रहना है। मैं छोटे स्तर के कार्य नहीं कर सकता। तो मजहब के अकॉर्डिंग हमारी जो मोरल वैल्यूज़ है वो हमें वहां से प्राप्त होती है जब हम किसी को ईश्वर मान लेते हैं और उसे प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ते हैं। तो अगर मजहब के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर भी किसी मर्यादा को मान रहा है कि मैं छोटे काम नहीं करूंगा। मैं घ्रणित काम नहीं करूंगा। तो ऐसे में तो यह सिद्ध होता है कि वह ईश्वर तो स्वयं किसी और को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत है। इसके साथ ही साथ अगर हम मजहब की स्टडी को और ध्यानपूक करते हैं तो कई जगह ऐसा मेंशन मिलता है जहां पर ईश्वर भी मर्यादाओं को तोड़ रहा है। जैसे कि ईश्वर कह रहा है कि मैं अपनी बातों को बदल देता हूं। अपनी दी हुई शिक्षाओं को बदल देता हूं कि मैं ईश्वर हूं। मैं सब कुछ कर सकता हूं। वहीं दूसरी ओर बताया गया है कि ईश्वर भटकाता है लोगों को। तो ये सारी चीजें जो मोरल्टी को तोड़ रही है, ब्रेक कर रही है। एक ये बात फिक्स मान लेता हूं कि खुदा में ऐब नहीं हो सकते ऊपर वाले में। ये मानू कि ना मानू मैं? आपसे पूछ रहा हूं ये मुफ्ती सर। हां बिल्कुल खुदा में ऐब नहीं है। ऐब है। तो फिर अब बात ये आती है कि ये
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00:12:21:10 जो ऐब वाले लोग हैं इनको खुदा ने बनाया कि नहीं बनाया? हां। ऐब का क्रिएट करना ऐब ऐबदार नहीं बनाते इंसान को। ऐब का क्रिएट करना
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00:12:30:16 ऐब ऐब ऐबदार नहीं बनाते इंसान को। मगर ईश्वर यहां पर इन इन नियमों को तो ब्रेक कर रहा है। बात ना बदलना बात बदल रहा है। भट ना भटकाना भटका रहा है। मगर वहीं पर दूसरी जगह पर अगर जन्म लेने की बात आए अवतार लेने की बात आए तो वो मना कर देता है। अल्लाह ताला कहते है एक आयत है मैसेंजर भाई जो सुपरसी है फकरा गनी अल्फाज फकरा उसका मतलब ये है कि तुम उस पे डिपेंडेंट हो तुम उसके स्लेव हो तुम उसके मोहताज होल गनी वो सबसे इंडिपेंडेंट है उसकी सुपरमेसी सबसे ऊपर है वो किसी भी नियम के नीचे
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00:13:08:02 नहीं है वो नियमों के ऊपर है नियम उसने बनाए हैं कैसा कैसे हो सकता है कि नियम उस पे बनाए नियम तो उसके जो जोक है और हमारा जो खुदा जिस खुदा को हम तसवुर हमारे यहां है वो कभी भी लोअर नहीं हो सकता और खुदा अनलिमिटेड है तो फिर आप उसको मुकम्मल तरीके से नहीं जान सकते ये तो फिक्स ही हो गया कि वो जन्म नहीं ले सकता ये भी क्लियर है ना बिल्कुल
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00:13:30:28 अल्लाह ताला के लिए आला तरीन जो हायर कैरेक्टरिस्टिक्स है वो अल्लाह ताला के लिए साबित उसके लिए लोअर कैरेक्टरिस्टिक्स साबित ही नहीं अगर यह कहा जाए कि मनुष्य को दिखाई देना एक छोटे स्तर का कार्य है तो अंत में तो वो मनुष्य को दिख भी रहा है जब आखिर रात के समय में बताया गया है कि वह मनुष्य को दिखाई देगा। तो यह कुछ प्रश्न है जो बाकी रह जाते हैं। अगर इन प्रश्नों पे हम बात करें बैठकर के तो शायद एक कंक्लूजन पे पहुंच पाए। इसके साथ ही साथ संशय पूर्ण शिक्षा देने वाले ऐसे तंत्र हैं गुरुओं के जो पूर्णतया प्रमाणिक सिद्ध नहीं होते। वह किस प्रकार से सनातन धर्म के पक्ष को कमजोर करते हैं? देखिए
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00:14:09:06 कि ईश्वर क्या मनुष्य के रूप में आ सकता है, प्रकट हो सकता है। यह सवाल के जवाब में आमतौर पर श्री राम और श्री कृष्णा को पेश कर दिया जाता है और इस तरह के और विष्णु के अवतारों को पेश कर दिया जाता है। स्वामी दयानंद सरस्वती साहब ने श्री राम और श्री कृष्णा को कहा ये साधारण मनुष्य थे। हां बार-बार जन्म लेकर आते थे। ये उन्होंने खुद कहा है। स्वामी दयानंद सरस्वती साहब ने ऋग्वेद आदि ऋग्वेद का भूमिका लिखते हैं। और उस भूमिका के अंदर वो कहते हैं कि ईश्वर कभी भी जिस्म ले नहीं सकता। मनुष्य की शक्ल में आ नहीं सकता। यह मुमकिन नहीं है। सनातन के अनुसार ईश्वर हिरण्य गर्भा है। उसने जो सृष्टि का निर्माण किया है वो अपने से भिन्न नहीं बल्कि अपने अंदर ही किया है। इसीलिए वो कण-कण में व्याप्त है। सियाराम सब जगह जाना। चैप्टर नंबर नाइन वर्स नंबर फोर। इसमें क्लियर कट बताया जा रहा है। पूछना बता रहे हैं कि दिस एंटायर कॉस्मिक मेनिफेस्टेशन इज प्रिवेटेड बाय मी इन माय अनमैनिस फॉर्म। ऑल द लिविंग बींग्स ड्वेल इन मी बट आई डू नॉट ड्वेल इन देम। मैं किसी के अंदर
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00:15:09:06 ड्वेल नहीं करता हूं। अब मैं या ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसको गुरु की प्रमाणिकता के शास्त्र सम्मत सिद्धांत पता है। वह तो इन बातों का खंडन कर पाएगा। मैंने भी वहां प्रयास किया था मगर मौका नहीं मिल पाया। वहां पे कई लोग थे तो बोलने का अवसर नहीं मिल पाया। ठीक है। आपका माइक म्यूट है। जरा सुन ले मेरा माइक। आपका माइक म्यूट है। जरा सुन ले। मगर यदि कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसको शास्त्र सम्मत सिद्धांत पता ही नहीं होंगे कि गुरु के प्रमाणिक सिद्धांत क्या है प्रमाणिक गुरु के तो वह व्यक्ति उस व्यक्ति के मन में ऐसी स्थिति में अपने धर्म के प्रति अरुचि आने आ जाने की पूरी संभावनाएं हैं कि वो खुद चीजें भी डिस्प्यूटेड है क्फ्लिक्टेड है उनके बारे में हिंदुओं के अंदर क्फ्लिक्ट है कोई यूनानिमसली हिंदू से ये हिंदूइज़्म के जितने सेक्सफुल ऑफ़ थॉट्स हैं यूनानिमसली इस पर मुत्तफिक ही नहीं है इसका मतलब ये है कि आप एक ऐसे आर्गुमेंट को पेश कर रहे हैं ईश्वर को मनुष्य के रूप में दिखाने के लिए जो खुद कॉन्फ्लिक्टेड है। इसके साथ ही साथ इस चर्चा में एक तार्किक प्रश्न और किया गया था जिसका उत्तर भी वही बात बोलने का अवसर प्राप्त ना हो पाने के कारण पूर्णतया प्रस्तुत नहीं कर सका मैं।
00:16:14:19 मुझे अपनी बात रखने दीजिए। जो दयानंद भाई बहुत टाइम हो गया लेकिन लेकिन आप अगली बात हमारे पास बोलने का दिया जा रहा है आपकी साहब मुझे बस दो मिनट दीजिए आप इनसे जेन्युइन सवाल पूछना है भाई लास्ट कमेंट कर रहे हैं आपके साथ तो विष्णु पुराण बुक नंबर थ्री चैप्टर नंबर फोर में लिखा है द ओरिजिनल वेदास इन फोर पार्ट कंसिस्टेड ऑफ 100 थाउज स्टजास एक लाख वर्सेस थे इसमें ओरिजिनल वेदास में अगर आपकी गुरु परंपरा जो थी तो एक लाख व आपके चार वेदास में आज मौजूद रहना चाहिए था। ट्रांसफर करने वाले हैं। शुरुआत में ही वेदों का ज्ञान प्राप्त करके जब भगवान जब वेदों स्वास रूप में वेद प्रकट होते हैं तो एक लाख में होते हैं। मगर उनको जब श्लोकबद्ध किया जाता है तो उसमें श्लोक कम हो जाते हैं। उनका सार कम में आ जाता है।
00:17:14:21 तो अभी 80000 और एक लाख का फर्क कहां से हुआ? एक लाख तो पहले 80000 कर देते 20,000 पहले ही कर देते। इस तरह से अगर देखा जाए तो नियमावली के संक्षिप्त होने की जानकारी तो हमें मजहब में भी मिलती है। जहां पांच 106 में बताया जा रहा है कि पहले कुछ ऐसे कठिन नियम थे जिन्हें अब हटा दिया गया है क्योंकि उन्हें मनुष्य फॉलो नहीं कर पा रहे थे। वह बात और है कि सनातन धर्म के संदर्भ से जो यह प्रकरण प्रस्तुत किया गया है। यहां पर नियमावली के संक्षिप्त दिखाई मात्र देने का कारण दूसरा है। वेद सर्वप्रथम वेद बीज ओंकार के रूप में प्राप्त हुए थे। उसके बाद गुरु शिष्य परंपरा के द्वारा स्थानांतरित होते हुए श्लोक बद्ध होते हुए यह हमें वेद रूप में प्राप्त हुए हैं। सरल शब्दों में मैं मात्र इतना कहूंगा कि जिस प्रकार सर्वज्ञ फैला हुआ सर्वव्यापी ईश्वर हमें रामकृष्ण आदि के रूप में सुलभ हो जाता है। सुगमता से प्राप्त हो जाता है। उसी प्रकार इतनी सारी संख्या वाले वेद हमें उस रूप में प्राप्त हुए जिस रूप में मानव के लिए वो सुलभ है। तो जो काम बंदो को करना तो भगवान खुद ही कर लेते हैं। बंदो ने नहीं भगवान ने ही किया। भी इसके साथ ही साथ जो सनातन ईश्वर की सर्वशक्ति मत्ता है वो इस बात से सिद्ध होती है कि सनातन के अनुसार ईश्वर ने सृष्टि की रचना
00:18:30:02 अपने से बाहर नहीं की है। क्योंकि अगर ईश्वर अपने से बाहर सृष्टि की रचना कर रहा है तो इसके इसका अर्थ ये होगा कि ईश्वर से भिन्न भी किसी तरह की स्पेस, किसी तरह की प्रकृति, अंतरिक्ष आदि का अस्तित्व था। तो फिर प्रश्न ये रह जाएगा कि उसे किसने बनाया? मगर सनातन
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00:18:47:27 के अनुसार ईश्वर हिरण्य गर्भा है। उसने जो सृष्टि का निर्माण किया है वो अपने से भिन्न नहीं बल्कि अपने अंदर ही किया है। इसीलिए वो कण-कण में व्याप्त है। सिया राममय
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00:18:58:28 सब जगह जाना। मगर हम वहीं पर मजहब के अनुसार अगर सृष्टि की रचना को देखें तो ईश्वर ने किसी एक विशेष जगह पर बैठकर के सृष्टि का निर्माण किया और अपने से भिन्न किया। अगर इस बात को माना जाए तो इसे मानना पड़ेगा कि उनसे भिन्न किसी खाली जगह का अस्तित्व था। जिस खाली जगह में उन्होंने सूर्य चंद्रमा आदि को फिक्स कर दिया। तो ऐसे में इस तरह से प्राप्त होने वाली सृष्टि की रचना जो है वो एक उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि जैसे कि मान लीजिए एक कुम्हार है वो एक मट्टी लेकर घड़ा बनाता है तो घड़े की घड़े का जो सर्वोच्च रचयिता है वो कुम्हार सिद्ध नहीं होता क्योंकि मट्टी पहले से मौजूद थी। उसने उसको केवल शेप मात्र दिया है। तो, इस प्रकार से सृष्टि की रचना को मजहब के अनुसार समझते समय यह प्रश्न शेष रह जाता है। हमने पहला देख लिया, ईश्वर का अस्तित्व, दूसरा देख लिया ईश्वर सर्वशक्तिमान और तीसरा पॉइंट है मोक्ष। जिस एकम एकमात्र नियम के आधार पर ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। मनुष्य की चाह का विषय ईश्वर है। तो मनुष्य की जो चाह है वह ईश्वर को देख लेने की या ईश्वर को निहार लेने की नहीं है बल्कि अंत में स्वयं सच्चिदानंद स्वरूप में स्थित हो जाने की है। तो जो सनातन धर्म है वो मनुष्य को पूर्ण मोक्ष देता
00:20:14:07 है। वो बताता है कि मनुष्य जो है वो समुद्र की एक बूंद है और वह बूंद जब सागर में जा करके मिल जाएगी तो स्वयं भी सागर बन जाएगी। तो उसी प्रकार से यहां पर भगवत प्राप्ति है। भगवत दर्शन नहीं है। यहां सनातन धर्म के अनुसार आपको भगवत प्राप्ति हो जाएगी। भगवत प्राप्ति का मतलब आप उस स्थिति में पहुंच जाओगे जिस स्थिति के लिए आप खोज कर रहे हो। हर समय वहीं पर अगर हम देखें मजहब के द्वारा मिलने वाला मोक्ष तो उस मोक्ष में आपको भगवत प्राप्ति नहीं होती है। बल्कि आप भगवान के लास्ट में दर्शन मात्र कर पाएंगे। तो यहां पर यह भी प्रश्न बाकी रह जाता है कि मनुष्य की जिस चाह से हम लोग शुरू हुए थे, मनुष्य जिस स्टेज में पहुंचना चाहता है। क्या वो अंत में उस स्टेज में पहुंचा? क्या उसको वो मोक्ष प्राप्त हुआ? जिस मोक्ष के लिए उसके जीवन में धर्म आया था। जिस धर्म का उसने पालन किया तो वो मोक्ष यहां पर देने की बात नहीं की जा रही है। तो ये प्रश्न फिर एक बाकी रह जाता है। इसके बाद आता है चौथा पॉइंट विश्वसनीय शास्त्र। इसमें भी कुछ अलग-अलग पॉइंट है। तो, पहला पॉइंट है कि सनातन धर्म के जो शास्त्र हैं, जिस पर सनातन को मानने वाले बिलीव करते हैं, वह शास्त्र कभी यह नहीं कहते कि उन्हें किसी विशेष देश काल परिस्थिति में ईश्वर ने रचा। क्योंकि अभी हम पिछले नियमों से जान चुके हैं। ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। वो सच बोलने के लिए बाधित
00:21:29:15 नहीं है। तो ऐसे में अगर ईश्वर सोच समझ करके किसी शास्त्र को रच रहा है। वो स्वयं कह रहा है कि मैंने यह शास्त्र रचा है तो उस पर बिलीव करना कठिन है क्योंकि ईश्वर झूठ भी बोल सकता है। और इस झूठ बोलने वाली बात को तो सनातन भी मान रहा है और यहां तक कि मजहब भी मान रहा है। जैसे कि सनातन में भगवान श्री कृष्ण ने झूठ बोला। जैसे कि मजहब में एक जगह कहा जा रहा है कि हम अपनी आयतों को बदल देते हैं। एक जगह कहा जा रहा है कि हम भटकाते हैं। तो फिर ये कैसे पता चलेगा कि ये जो आय ये जो हमें अब जो बात कही जा रही है जिस पर हम बिलीव कर रहे हैं। ये जो है हमें भटकाया नहीं जा रहा है। तो इस संबंध में जो सनातन जो शास्त्र हैं वो ये नहीं कहते कि उनको भगवान ने रचा। बृहधारणिक उपनिषद दो चार 10 के अनुसार ये जो सभी शास्त्र है जो जो ग्रंथावली है सनातन की उसे ईश्वर ने कभी भी रचा नहीं है सोच समझ करके वो हमेशा से विद्यमान थी जैसे ईश्वर विद्यमान है। कैसे ईश्वर की सांस के रूप में और सांस के बारे में मैं आपको बता चुका हूं कि हम लोग दो प्रकार के कार्य करते हैं। एक जिसमें कि हमारी चाह इनवॉल्व होती है। हमारा एफर्ट इनवॉल्व होता है। जब किसी काम को करते समय हमारा एफर्ट उसमें इनवॉल्व होता है। हमारी चाह उसमें इन्वॉल्व होती है। तो बुद्धि का यूज़ होने की वजह से वहां पर
00:22:44:24 हम डिसाइड कर सकते हैं कि उस कार्य को किस प्रकार से करना है। मगर कई कार्य हम ऐसे भी करते हैं जिसमें हमारी चाह नहीं होती है वो हम स्वतः करते हैं। शुद्ध रूप से करते हैं। जैसे कि सांस लेना। एक बच्चा मां के गर्भ से जन्म ले रहा है और सांस ले रहा है। तो इसी प्रकार से जो सनातन शास्त्र है इनको ईश्वर ने रचा नहीं है बल्कि ये सांस के रूप में ईश्वर की हमेशा से विद्यमान थे। वहीं पर अगर हम वहीं पर अगर हम मजहब को देखें तो वहां कई बार ये कहा गया है कि इन शास्त्रों को भगवान ने भेजा है। सोच समझ के भेजा है। उनको रचा गया है किसी विशेष देश काल परिस्थिति में। तो यहां पर जब हम यह देख रहे हैं कि ईश्वर स्वयं ये कह रहा है कि मैं भटकाता हूं तो हमें यह कैसे पता लग रहा है कि इस समय हमको इस किताब के द्वारा भटकाया नहीं जा रहा है। जब एक तरफ बुराई चाह बुराई चाहने वाले को बना रहे हैं तो फिर डिसाइड कैसे होगा कि ये जो वो किताब दे रहे हैं वो रियल है? मैं आपको बताइए। चलिए हमारा मेरार थोड़ी देर के लिए मानना गलत है। आप अपने मेयार पर आ जाइए आप ये मुझे आपका मैकेनिज्म बताइए क्या है? हां मैं मैं यही आपसे सुनना चाह रहा था कि आप मुझसे ये चीज पूछे। अब दूसरी जो बात आती है वह इसी से कनेक्टेड ही है कि सनातन शास्त्र जो है वह हमेशा यह दावा करते हैं कि हम हम जो नियम बताते हैं हम जो धर्म बताते हैं मनुष्य के द्वारा पालन किए जाने योग्य वो
00:23:59:25 कभी बदलता नहीं है। कहीं पर भी यह नहीं कहा गया कि इस धर्म को बदला भी जाता है। अगर वहीं पर अगर हम मजहब को देखें तो उसमें एक दो जगह ऐसी बात आती है जहां पर कहा जा रहा है कि हम अपनी जो हम जो शिक्षा देते हैं धर्म के विषय में उसको हम बदल देते हैं। तो, अब डाउट यह आ जाता है कि अगर हम आज यह मान रहे हैं कि मूर्ति पूजा नहीं करनी है, मूर्ति पूजा करना गलत है तो यह कैसे विश्वास हो कि कल को यह नियम बदलेगा नहीं। क्योंकि वहां तो ईश्वर स्वयं कह रहे हैं कि हम अपनी चीजों को बदल देते हैं। इसी प्रकार से और भी कई सारी चीजें हैं जो हम ये मान रहे हैं कि आज जिसके लिए हम बिल्कुल अिग होकर के खड़े हैं चट्टान बन करके यह समझते हुए कि यह हमारा धर्म है। तो कल को तो वो कभी भी बदल सकता है। क्योंकि ईश्वर स्वयं कह रहे हैं कि मैं अपनी दी हुई आयतों को बदल देता हूं। इसके साथ ही साथ जो तीसरा पॉइंट है शास्त्रों की श्रेष्ठता में वो यह है कि सनातन धर्म के शास्त्र आपसे प्रश्न करने को कहते हैं। वो कहते हैं अथातो धर्म जिज्ञासा वो कहते हैं अथातो ब्रह्म जिज्ञासा वहीं पर जो मजहब है वहां पर कई बार ऐसा दिखता है देखने को मिलता है कि आपसे प्रश्न करने को मना किया जा रहा है। मजहब में 5 106 में कुछ इस तरह से कहा जा रहा है कि ऐसे प्रश्न मत मत करो कि तुम्हारे लिए कष्टदायक हो जाए। तुमसे पहले भी कुछ लोगों ने इस तरह के प्रश्न किए
00:25:14:26 थे और उनके लिए वो आयतें खोल दी गई जो कि जिनका फॉलो करने में कठिन था। इस कारण से वो लोग बागी हो गए थे। इसके साथ ही साथ यहां पर एक बात और मिलती है शिक्षा से ऐसा लग रहा है कि मनुष्य के लिए जो शुद्ध धर्म बनाया गया था वो कुछ और था। मगर बाद में क्योंकि मनुष्य बागी होने लगे तो उसे थोड़ा सा कस्टमाइज किया गया। ये सब कुछ प्रश्न है जो कि बैठकर बात करने से सुलझ सकते हैं। मेरे ख्याल से कंक्लूजन तक हम किसी पहुंच सकते हैं। मैं चाहूंगा कि अगर कोई इन प्रश्नों का जवाब देने के लिए आए आगे तो उसका स्वागत है। तो ये थी वो कंपैरेटिव व्याख्या इसको अगर हम एक नजर में देखें तो सनातन धर्म वो है जो ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करता है। सनातन धर्म वो है जो ईश्वर और मनुष्य के बीच में संबंध स्थापित कर सकता है। इसके अलावा सनातन धर्म का ईश्वर ही वह ईश्वर है जो सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है। इसके अलावा सनातन धर्म ही मनुष्य को वह मोक्ष प्रदान करता है जिस मोक्ष के लिए यत्र तत्र सर्वत्र मनुष्य प्रयासरत है। इसके अलावा सनातन धर्म ग्रंथ सबसे अधिक विश्वसनीय है। क्योंकि उन्हें किसी विशेष देश काल परिस्थिति में रचा नहीं गया। वह सदैव विद्यमान ईश्वर की सांस के रूप में है। इसके अलावा सनातन धर्म कभी बदलता नहीं है। इसका अर्थ है कि आज जिस चीज के लिए हम प्रतिराद हो के डट कर खड़े हैं, हम कल
00:26:29:27 भी उसके लिए डट कर खड़े रह सकते हैं। ऐसा नहीं है कि जो आज अच्छा है, वो कल को बुरा बन जाए और हम कहें कि अरे हम अब तक बेकार ही लड़ेंगे। इसके अलावा कि सनातन धर्म आपसे प्रश्न करने को कहता है। प्रश्न करने को मना नहीं करता है। तो यह थी वो कंपैरेटिव व्याख्या। आई होप कि आपको अच्छी लगी हो। जय श्री राम। [संगीत]
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सनातन धर्म और इस्लाम | Why we love Sanatan Dharma | comparative study with Islam | Hinduism vs Islam
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