1
00:00:02,160 --> 00:00:06,400
तो जय श्री राम सभी को आशा करता हूं आप सभी कुशल

2
00:00:06,400 --> 00:00:10,480
पूर्वक होंगे और आज गरिमा गीता की

3
00:00:10,480 --> 00:00:14,480
का अवलोकन कर रहे हैं हम इसकी जो भ्रष्ट किताब है इसने

4
00:00:14,480 --> 00:00:18,560
अपने भ्रष्ट मंसूबों के साथ लिखी है रामपाल

5
00:00:18,560 --> 00:00:22,720
ने और

6
00:00:22,720 --> 00:00:27,840
उसका अवलोकन करते हुए पांचव पांचवा अध्याय उसका आज अंतिम

7
00:00:27,840 --> 00:00:32,320
भाग है ये जो इस पार्ट में जो पिछले वाले एपिसोड

8
00:00:32,320 --> 00:00:36,400
के जो बुलेट पॉइंट्स हैं उसके लिए पर्टिकुलरली एक मतलब बीच में

9
00:00:36,400 --> 00:00:40,400
लाइव हुआ था उसमें बुलेट पॉइंट्स बता दिए गए थे। वो बुलेट पॉइंट्स आपको मिल

10
00:00:40,400 --> 00:00:42,880
जाएंगे कहां?

11
00:00:42,880 --> 00:00:46,960
जो सर्वशक्तिमान धर्म दूसरा चैनल है हमारा वहां

12
00:00:46,960 --> 00:00:50,960
पर। तो मेरी तैयारी तो आज अभी बात

13
00:00:50,960 --> 00:00:55,280
करने की थी इस बारे में जो गरमा गीता के पांचवा अध्याय है

14
00:00:55,280 --> 00:01:00,320
शायद श्लोक सात से लेकर के 29 तक

15
00:01:00,320 --> 00:01:02,000
तो उस बारे में मेरी प्रिपरेशन थी।

16
00:01:02,000 --> 00:01:06,000
फिर आने से पहले मैंने एक कॉमेडी शो देखा तो थोड़ा सा

17
00:01:06,000 --> 00:01:10,160
मैं उस कॉमेडी शो के बारे में बात कर लूं। कॉमेडी

18
00:01:10,160 --> 00:01:16,160
शो क्या है कि एक पगला चला है

19
00:01:16,720 --> 00:01:20,800
बुद्धिमान की चाल। एक मूर्ख चला है बुद्धिमान की चाल।

20
00:01:20,800 --> 00:01:26,800
और उसने

21
00:01:29,120 --> 00:01:33,120
उसने एक वीडियो बनाया है। वीडियो जारी किया है कि भाई मैं 50

22
00:01:33,120 --> 00:01:37,200
लाख रुपए दूंगा जो मेरी बातों को

23
00:01:37,200 --> 00:01:41,520
गलत साबित कर दे और वह खुद को सनातन का आदि सनातन का एडवोकेट

24
00:01:41,520 --> 00:01:45,520
कह रहा है। तो उसकी जरा बोली हुई जो टच्चेगिरी की

25
00:01:45,520 --> 00:01:49,600
बातें हैं उनका अवलोकन करते हुए उनका रिप्लाई कर देते हैं और फिर

26
00:01:49,600 --> 00:01:53,760
आज का जो चैप्टर है वो चालू करते हैं। वो क्या है ना आज बुलेट पॉइंट्स

27
00:01:53,760 --> 00:01:57,840
बुलेट पॉइंट्स तो है नहीं तो उनका स्पेस खाली रहेगा तो चलो इसने अच्छा कॉमेडी शो

28
00:01:57,840 --> 00:02:02,490
दे दिया तो उसी पे बात हो जाएगी। अच्छा

29
00:02:02,490 --> 00:02:06,800
[गला साफ़ करने की आवाज़] बात करते हैं इसने क्या-क्या बकवास की है अपने

30
00:02:06,800 --> 00:02:10,240
उस कॉमेडी सर्कस में।

31
00:02:10,240 --> 00:02:15,040
हम

32
00:02:15,040 --> 00:02:19,040
वर्किंग प्रोजेक्ट हम इसने

33
00:02:19,040 --> 00:02:23,040
बोला है विश्व के जितने भी धर्म गुरु हैं पहले तो क्या इसको धर्म की

34
00:02:23,040 --> 00:02:27,040
परिभाषा मालूम है परमात्मा की परिभाषा मालूम है यह कहता है आगे

35
00:02:27,040 --> 00:02:31,200
कि पवित्र जो शास्त्र हैं जिसमें ये कबीर सागर को भी जोड़ देता है सूक्ष्म वेद

36
00:02:31,200 --> 00:02:35,760
के नाम पे सूक्ष्म वेद छमम छक्षम वेद करके अपना जो उसमें पष्टण

37
00:02:35,760 --> 00:02:40,480
किया कबीर सागर एक पवित्र ग्रंथ है पर जो यह प्रस्तुत करता है अपना घोटाखोरी

38
00:02:40,480 --> 00:02:44,560
मिलावट के साथ वह पवित्र नहीं है। तो कबीर सागर

39
00:02:44,560 --> 00:02:48,560
एक सम्मानित ग्रंथ है तब तक जब तक उसकी बात का अर्थ

40
00:02:48,560 --> 00:02:53,200
उसमें कही हुई किसी बात का अर्थ वेद के सम्मत है। सनातनियों

41
00:02:53,200 --> 00:02:57,680
के लिए बाकी वो अपने नजर से कुछ भी हो उससे हमें कोई

42
00:02:57,680 --> 00:03:01,760
आपत्ति नहीं है। सनातनियों के लिए तब तक वो ग्राह है तब जब तक

43
00:03:01,760 --> 00:03:05,760
उसकी कही हुई किसी बात का अर्थ वेद के विरुद्ध ना निकल रहा हो। क्योंकि वेद

44
00:03:05,760 --> 00:03:10,000
यह घोषणा करते हैं कि वेद के अलावा कोई मार्ग नहीं है। और उपनिषदों

45
00:03:10,000 --> 00:03:14,000
के अनुसार जो पंचम वेद कहा गया है, सूक्ष्म वेद कहा गया, सूक्ष्म

46
00:03:14,000 --> 00:03:18,480
वेद तो प्रणव है। जो प्रणवाक्षर है वही सूक्ष्म वेद है। बीज

47
00:03:18,480 --> 00:03:22,640
रूपी वेद वो हमारा प्रणवाक्षर है। और पंचम वेद

48
00:03:22,640 --> 00:03:26,880
कहा गया इतिहास, पुराण, महाभारत इत्यादि को, पुराण, शास्त्र इत्यादि

49
00:03:26,880 --> 00:03:30,880
को और इसके भरभर के उपनिषदों में प्रमाण भी हैं।

50
00:03:30,880 --> 00:03:34,880
अच्छा तो ये कहता है कि जो हमारे शास्त्र हैं उन पर आधारित

51
00:03:34,880 --> 00:03:39,040
चर्चा होगी। इसने कम से कम उस वीडियो में तीन से चार बार ये

52
00:03:39,040 --> 00:03:43,120
बताया है कि कौन-कौन से शास्त्र ने इस पर जोर दिया है। उसमें

53
00:03:43,120 --> 00:03:47,440
रामचरितमानस का नाम लिया है। उसमें जो है वाल्मीकि रामायण का नाम लिया है। महाभारत

54
00:03:47,440 --> 00:03:51,760
का नाम लिया है। गीता का नाम लिया है। और गीता को इसने सार बताया

55
00:03:51,760 --> 00:03:56,000
है। गीता को इसने किसका सार बताया

56
00:03:56,000 --> 00:04:00,880
है? चारों वेदों का प्लस सूक्ष्म वेद का। इसके चमचम वेद का।

57
00:04:00,880 --> 00:04:05,680
तो उसको इन सब का सार इसने गीता गीता को बताया है।

58
00:04:05,680 --> 00:04:09,760
जबकि यह खुद ही कहता है कि गीता में पूर्ण

59
00:04:09,760 --> 00:04:14,160
ज्ञान नहीं है। यह खुद ही कहता है और गीता कबीर

60
00:04:14,160 --> 00:04:18,400
सागर का भी सार है। यह इसकी मूर्खता है।

61
00:04:18,400 --> 00:04:22,480
इसने अपनी वीडियो में कहा। तो एक-एक करके चलते हैं। सबसे पहली

62
00:04:22,480 --> 00:04:26,960
बात इसने बोली है कि परमा पवित्र शास्त्र में कबीर सागर यह कैसे जुड़ा?

63
00:04:26,960 --> 00:04:31,120
रामपाल तुम बता दो। जब पंचम वेद, इतिहास, पुराण शास्त्र इत्यादि

64
00:04:31,120 --> 00:04:35,840
हैं उपनिषदों के अनुसार, महाभारत के अनुसार, पुराणों के अनुसार,

65
00:04:35,840 --> 00:04:40,640
ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार तो फिर तुम कैसे उसमें कबीर सागर को घुसेड़ोगे?

66
00:04:40,640 --> 00:04:44,800
अपनी वो थुल्लाग्लागिरी के आधार पर। अच्छा।

67
00:04:44,800 --> 00:04:46,000
फिर तुम कहते हो कि

68
00:04:46,000 --> 00:04:50,000
गीता चार वेद प्लस सूक्ष्म वेद। तुम्हारे छमम छमम

69
00:04:50,000 --> 00:04:55,920
वेद का सार है। तो भैया तुम ही तो यह कहते हो कि गीता में पूर्ण

70
00:04:55,920 --> 00:05:00,480
परमात्मा की भक्ति कैसे करनी है? ये देखो

71
00:05:00,480 --> 00:05:04,800
वेदों और गीता में ज्ञान तो श्रेष्ठ है। मगर जो साधक

72
00:05:04,800 --> 00:05:09,040
परंतु भक्ति की साधना केवल तुम्हारे अनुसार जो काल ब्रह्म है जिसको पाकर के मुक्ति

73
00:05:09,040 --> 00:05:13,200
नहीं होती वहां तक की है। तो फिर तुम कैसे कह रहे हो कि गीता उसका

74
00:05:13,200 --> 00:05:17,360
सार है। या तो तुम यह कहो कि कबीर सागर में भी पूर्ण ज्ञान

75
00:05:17,360 --> 00:05:22,560
नहीं है। इसके अलावा और भी कई जगह तुमने कहा है

76
00:05:22,560 --> 00:05:26,560
चारों वेदों 18 पुराणों गीता जी व छह शास्त्रों में केवल

77
00:05:26,560 --> 00:05:30,720
ब्रह्म काल की उपासना है यानी मुक्ति की बात नहीं है तुम्हारे हिसाब से तो

78
00:05:30,720 --> 00:05:34,800
तुम गीता को कबीर सागर का सार कैसे कह रहे हो क्योंकि भैया दुकान चलानी

79
00:05:34,800 --> 00:05:39,280
है अपनी आप को फेमस करना है इसलिए है ना

80
00:05:39,280 --> 00:05:43,360
और एक जगह लिखा हुआ बिल्कुल साफ सुथरा कि भैया गीता में

81
00:05:43,360 --> 00:05:49,120
जो है अच्छा क्या कहता है

82
00:05:49,120 --> 00:05:53,200
गीता इसके और यह कहता है कि यह जो शास्त्र है ना वेद,

83
00:05:53,200 --> 00:05:57,440
पुराण और गीता यह सब जो है सद ग्रंथ

84
00:05:57,440 --> 00:06:01,280
है। इसके लिए पवित्र ग्रंथ हैं। और यह सद

85
00:06:01,280 --> 00:06:05,360
ग्रंथ कहने वाला कौन है? जो लोगों को बहकाता है, झूठ

86
00:06:05,360 --> 00:06:10,240
बोलता है, अज्ञानता करता है, अपना उल्लू सीधा करता है,

87
00:06:10,240 --> 00:06:15,120
झूठ बोल के उल्लू सीधा करता है। उसके द्वारा की गई जो उल्टी है,

88
00:06:15,120 --> 00:06:19,280
जो इसने कहीं अपनी कल्पनाओं में सोच रखी है, उसको ये हमारे शास्त्रों से जोड़ देता है।

89
00:06:19,280 --> 00:06:23,280
और फिर भी इस मूर्खता को करने के बाद भी कहता है

90
00:06:23,280 --> 00:06:27,360
कि ये सद ग्रंथ है। अरे भाई तेरे अनुसार ये सद ग्रंथ है। पहले ये

91
00:06:27,360 --> 00:06:31,360
तो साबित कर सद ग्रंथ है कैसे? इनको तो काल दे रहा है

92
00:06:31,360 --> 00:06:35,520
और काल झूठ बोलता है। यह देखो इसका 95 नंबर पेज खोलकर दिखाओ।

93
00:06:35,520 --> 00:06:39,600
95 चलो बाद में लगा देना। अभी मत खोलो। 95 नंबर

94
00:06:39,600 --> 00:06:44,640
प्रश्न पर तीसरे चौथे पैराग्राफ में लिख रहा है यह

95
00:06:44,640 --> 00:06:48,800
कि जो काल ब्रह्म है वह अच्छी आत्माओं को रचता है अर्थात पैदा

96
00:06:48,800 --> 00:06:52,800
करता है फिर उनमें स्वयं प्रवेश करके गुप्त रूप

97
00:06:52,800 --> 00:06:56,960
से अपना उल्लू सीधा कर लेता है और अभी आज पांचवे चैप्टर

98
00:06:56,960 --> 00:07:00,960
में भी यह बात आ रही है कि काल जो है भ्रमित करता है व्यक्ति को अज्ञानता

99
00:07:00,960 --> 00:07:05,200
फैलाता है व्यक्ति को तो फिर काल के द्वारा दिए गए जो वेद

100
00:07:05,200 --> 00:07:09,280
है वह भ्रमित करने वाले नहीं है कैसे तय हो रहा

101
00:07:09,280 --> 00:07:13,360
ठुल्ले गिरी के ज्ञान से घटियाई घटियाई रामपाल की

102
00:07:13,360 --> 00:07:16,320
घटिया गिरी के ज्ञान से जैसे तुम कहते हो ना ब्रह्मा विष्णु महेश

103
00:07:16,320 --> 00:07:20,320
की भक्ति करने वाले या वो गीता ज्ञान दाता की जो

104
00:07:20,320 --> 00:07:24,480
भक्ति है वो गति है वो घटिया है तो वास्तविकता में तुम्हारा जो

105
00:07:24,480 --> 00:07:28,640
घटिया स्तर है उसके आधार पर तुम ये कहते हो

106
00:07:28,640 --> 00:07:32,800
तुम्हारी घटियागिरी है ये कि तुम पहले तो कहते हो कि काल

107
00:07:32,800 --> 00:07:37,120
जो है वो उल्लू सीधा करता है झूठ बोलता है अज्ञानता फैलाता है भ्रमित करता है

108
00:07:37,120 --> 00:07:41,120
और और फिर उसी के द्वारा दिए जाने वाले शास्त्रों को तुम कहते हो कि ये हमारे सद ग्रंथ

109
00:07:41,120 --> 00:07:45,120
है और सद ग्रंथ होने के बाद भी तुम फिर उसमें एक ठुल्लू लगाते हो

110
00:07:45,120 --> 00:07:49,600
कि इसमें ये तो काल ने अपनी मर्जी से कह दिया ये झूठ है वो झूठ है फलाना है ढिमका

111
00:07:49,600 --> 00:07:53,680
है तो पहली बात तो तुम यही सिद्ध कर दो कि भैया धर्म किसे

112
00:07:53,680 --> 00:07:57,840
कहते हैं ईश्वर किसे कहते हैं तुम्हारे अनुसार

113
00:07:57,840 --> 00:08:02,000
जो धर्म है जो धर्म है वही सिद्ध नहीं होगा

114
00:08:02,000 --> 00:08:06,000
धर्म की परिभाषा ही सिद्ध नहीं होगी फिर उसके बाद तुम ईश्वर की परिभाषा

115
00:08:06,000 --> 00:08:10,240
तुम्हारी सिद्ध नहीं हो पाएगी और तो और अंतत गतवा तुम्हारे द्वारा

116
00:08:10,240 --> 00:08:14,400
शास्त्र की परिभाषा सिद्ध नहीं हो पाएगी और अंत में अगर बात करो कि तुम इनको

117
00:08:14,400 --> 00:08:18,560
शास्त्र कहते हो सद ग्रंथ शास्त्र कहते हो तो किस आधार पर कहते हो सद

118
00:08:18,560 --> 00:08:22,720
ग्रंथ कहते हो तो किस आधार पर कहते हो अगर गीता

119
00:08:22,720 --> 00:08:26,800
कबीर सागर का और बाकी चारों वेदों का सार है तो फिर गीता में पूर्ण

120
00:08:26,800 --> 00:08:31,120
भक्ति की बात क्यों नहीं है तुम्हारे हिसाब से उसमें ज्ञान अधूरा है यह है तुम्हारा

121
00:08:31,120 --> 00:08:31,920
घटियागरी

122
00:08:31,920 --> 00:08:35,920
का ज्ञान है ना ठोको ताली अच्छा इसके बाद इसने

123
00:08:35,920 --> 00:08:40,080
अपने उसमें क्या कहा है। आगे चलते हैं। इसने बड़ी कॉमेडी की है उसमें।

124
00:08:40,080 --> 00:08:44,160
मैं तो अभी तक समझता था कि रामपाल ही जो है ज्यादा बड़े कॉमेडियन हैं।

125
00:08:44,160 --> 00:08:48,320
मगर आज मुझे इस वीडियो को देख के पता लगा कि सबसे बड़ा कॉमेडी तो

126
00:08:48,320 --> 00:08:52,400
कॉमेडी किंग तो रामपाल है। कैसे? आगे क्या कह रहा है?

127
00:08:52,400 --> 00:08:56,800
फैसला कौन करेगा? जनता करेगी। है ना? फैसला

128
00:08:56,800 --> 00:09:00,800
कौन करेगा? जनता करेगी। और

129
00:09:00,800 --> 00:09:04,880
उसमें उदाहरण देता है। उदाहरण क्या देता है कि जैसे दो वकील हैं। ध्यान देना

130
00:09:04,880 --> 00:09:08,960
इस बात पे। जैसे दो वकील हैं, वह आपस में एक दूसरे को कुछ नहीं कहते

131
00:09:08,960 --> 00:09:13,040
हैं। बल्कि वह अपनेप पक्ष को रखते हैं। फैसला जो है वह

132
00:09:13,040 --> 00:09:17,200
करता है। जज करता है। ठीक है? तो फैसला जब

133
00:09:17,200 --> 00:09:21,200
जनता को करना है और फिर इसने ये कहा कि मैं साधना टीवी

134
00:09:21,200 --> 00:09:25,200
पर बैठकर के अपने आश्रम में क्या कहते हैं? कायरता

135
00:09:25,200 --> 00:09:29,280
पूर्वक क्योंकि मैं अपने बिल से तो बाहर निकल नहीं सकता। तो कायरता पूर्वक

136
00:09:29,280 --> 00:09:33,280
रामपाल अपने वक्तव्य निर्गत करेगा साधना टीवी पर आकर के और

137
00:09:33,280 --> 00:09:37,360
उसके बाद जिसका भी मन हो उसकी बात को काटने का जिससे कि रामपाल फेमस

138
00:09:37,360 --> 00:09:41,440
हो जितने ज्यादा से ज्यादा धर्म गुरु रामपाल की बात करेंगे उससे शास्त्रार्थ

139
00:09:41,440 --> 00:09:45,600
जैसा सीन बनेगा रामपाल कभी ये मानेगा नहीं कि मैं गलत हूं जनता

140
00:09:45,600 --> 00:09:47,040
का जनता ने किसको गलत

141
00:09:47,040 --> 00:09:51,600
माना किसको सही माना ये फैसला कैसे होगा इस बारे में रामपाल जी का घटियागरी

142
00:09:51,600 --> 00:09:55,840
का ज्ञान कोई आधार नहीं है जनता ने किसको चुना इस इस

143
00:09:55,840 --> 00:09:59,840
बारे में रामपाल के पास कोई उपाय उपाय नहीं है। उसके बाद

144
00:09:59,840 --> 00:10:04,080
रामपाल यह कहता है कि रामपाल यह नहीं कहता कि आप साधना टीवी पर आकर

145
00:10:04,080 --> 00:10:08,080
के लाइव चर्चा करो मेरे सामने बैठकर ना रामपाल ये कहता है कि

146
00:10:08,080 --> 00:10:12,160
आप भी अपना चैनल बुक करके उस पर बोलो जैसे मैं बोल रहा हूं और चैनल ना हो

147
00:10:12,160 --> 00:10:16,320
तो YouTube पर बोलो और YouTube पर या Instagram

148
00:10:16,320 --> 00:10:20,320
पर जिस पर सोशल मीडिया पर मेरे बारे में बोलना है मेरी बात को काटो। कितना

149
00:10:20,320 --> 00:10:25,600
घटियागिरी करोगे भाई। कितनी घटियाई बातें करोगे।

150
00:10:25,600 --> 00:10:30,000
जो चीज तुम करने को कह रहे हो वह तो वह अभी भी कर रहे हैं।

151
00:10:30,000 --> 00:10:34,080
क्या अनुचार्य ज्ञान नहीं दे रहे? क्या देवकीन नंदन ज्ञान नहीं दे

152
00:10:34,080 --> 00:10:38,080
रहे? क्या रामानुजाचार्य परंपरा के जो

153
00:10:38,080 --> 00:10:42,160
आचार्य गण है वो ज्ञान नहीं दे रहे? क्या मधवाचार्य परंपरा के लोग हैं वो

154
00:10:42,160 --> 00:10:46,320
ज्ञान नहीं दे रहे सोशल मीडिया पर? क्या शंकराचार्य परंपरा के लोग ज्ञान

155
00:10:46,320 --> 00:10:50,880
नहीं दे रहे सोशल मीडिया पर? तो ये क्या मूर्खता

156
00:10:50,880 --> 00:10:54,960
की पराकाष्ठा प्रस्तुत कर रहे हो? तुम्हारे लोग वैसे ही अर्ध पागल है। उन्हें

157
00:10:54,960 --> 00:10:58,960
पूरा पागल बना के ही छोड़ोगे क्या? भाई वो लोग जो काम तुम करने

158
00:10:58,960 --> 00:11:02,240
को कह रहे हो वह तो दे ही रहे हैं। अच्छा तुम कहो कि मेरा नाम लेकर

159
00:11:02,240 --> 00:11:07,040
के मेरी बात काटते हुए तो कोई बात नहीं कही। वैसे तो कही भी है। सुक्राईनाथ

160
00:11:07,040 --> 00:11:11,280
इत्यादि तरीके के जो कई ऐसे संत हैं जिन्होंने तुम्हारी बात को काटते

161
00:11:11,280 --> 00:11:15,760
हुए बातें की है। पर यदि चलो मान लिया कि जो

162
00:11:15,760 --> 00:11:19,760
बड़े संत है उन्होंने तुम्हारी बात को काटते हुए बात नहीं कही। उन्होंने अपना पक्ष

163
00:11:19,760 --> 00:11:24,080
रखा है। तो होत चुल्लू व्यक्ति शुरू में तू ही तो कह रहा है

164
00:11:24,080 --> 00:11:28,080
कि भैया केवल अपना पक्ष रखो। आपस में नहीं लड़ना है। फिर बाद में

165
00:11:28,080 --> 00:11:32,080
तुम ये क्यों अपेक्षा कर रहे हो कि भैया मेरा नाम लेकर के ज्ञान दो। वो तो वो

166
00:11:32,080 --> 00:11:36,960
कर ही रहे हैं। तो एक नया एक वो क्या होता है वो?

167
00:11:36,960 --> 00:11:41,040
एक तनतुना लेकर के आए बस और कुछ नहीं। फिर तनतुने में

168
00:11:41,040 --> 00:11:44,080
आगे क्या बोलते हैं?

169
00:11:44,080 --> 00:11:50,080
आगे क्या बोलते हैं? कि

170
00:11:50,960 --> 00:11:55,120
आगे बोलते हैं कि जो सृष्टि रचना जो सृष्टि रचना

171
00:11:55,120 --> 00:11:59,360
बता सकता है वही सृष्टि करता है।

172
00:11:59,360 --> 00:12:03,600
तो भाई अगर सृष्टि रचना बतानी है तो जितने शास्त्र वेदव्यास

173
00:12:03,600 --> 00:12:07,760
के माध्यम से हमको प्राप्त हुए यानी वेदव्यास मानते थे जानते थे सृष्टि रचना

174
00:12:07,760 --> 00:12:12,160
तो वो तो सृष्टि तो वो तो तुम्हारे हिसाब से ईश्वर हो गए वेदव्यास जी

175
00:12:12,160 --> 00:12:16,960
अच्छा इसने कुछ उदाहरण भी दिए अपने बकवास में एक उदाहरण दिया

176
00:12:16,960 --> 00:12:21,040
भागवत का जो इनका फेवरेट पुराण है जिसमें इनको अपना वो ब्रह्मा विष्णु महेश

177
00:12:21,040 --> 00:12:25,120
का आविर्भाव तिरोभाव मिल जाता है तो ये वहां पर जो है

178
00:12:25,120 --> 00:12:29,280
ये व्यक्ति कहता है देवी भागवत में ब्रह्मा जी पूछ रहे हैं और देखो जो शिव शिव पुराण

179
00:12:29,280 --> 00:12:33,280
है उसमें ब्रह्मा विष्णु पूछ रहे हैं। इससे सिद्ध हो गया कि

180
00:12:33,280 --> 00:12:37,680
तीनों लोगों को नहीं मालूम है। जबकि सृष्टि रचना

181
00:12:37,680 --> 00:12:42,320
के बारे में ही जहां पर ब्रह्मा जी पूछ रहे हैं वहां पर देवी जी बता रही है।

182
00:12:42,320 --> 00:12:46,400
जहां पर ब्रह्मा और विष्णु दोनों पूछ रहे हैं वहां पर शिव जी बता रहे हैं। मगर यह

183
00:12:46,400 --> 00:12:50,480
बात नहीं बोलेगा क्योंकि ये दोगला व्यक्ति है। झूठा व्यक्ति है।

184
00:12:50,480 --> 00:12:54,480
कहीं पर भी एक बात को आप नोट करो। ये लोग कहते हैं कि शास्त्रों में

185
00:12:54,480 --> 00:12:58,480
इनकी भक्ति करने को मना किया गया है। पहली बात इस यह कभी

186
00:12:58,480 --> 00:13:02,640
प्रमाण सहित बता पाएगा यह घटियागिरी करने वाला व्यक्ति

187
00:13:02,640 --> 00:13:06,160
कि ब्रह्मा विष्णु महेश जो हमारे पंच देवोपासना

188
00:13:06,160 --> 00:13:10,320
है वो करने के लिए यदि मना किया गया है शास्त्रों में तो इनकी

189
00:13:10,320 --> 00:13:14,400
भक्ति करने की जो विधा है वो आई कहां से अगर इनको जो

190
00:13:14,400 --> 00:13:18,560
है पूर्ण परमेश्वर नहीं कहा गया है शास्त्रों में तो इनको पूर्ण परमेश्वर

191
00:13:18,560 --> 00:13:22,560
माना कैसे किस आधार पर माना क्यों माना तो यहां

192
00:13:22,560 --> 00:13:26,800
पर तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं होगा क्योंकि जो हमारे सारे शास्त्र हैं। इसके

193
00:13:26,800 --> 00:13:30,800
हिसाब से इसकी घटियागरी की बातों के हिसाब से वो सारे शास्त्र तो इस

194
00:13:30,800 --> 00:13:34,960
बात के लिए हैं कि ब्रह्मा विष्णु महेश भगवान नहीं है। पूर्ण भगवान नहीं

195
00:13:34,960 --> 00:13:38,960
है। इस बात के लिए है तो फिर उनको पूर्ण भगवान माना किस आधार पे?

196
00:13:38,960 --> 00:13:43,360
दूसरी बात एक बहुत पॉइंट की बात है। यह लोग जितने लोग ब्रह्मा

197
00:13:43,360 --> 00:13:47,520
विष्णु महेश भगवती और गणेश की भक्त को पूर्ण ब्रह्म मानने वाली

198
00:13:47,520 --> 00:13:51,680
बातों को कट करने के लिए जितने भी शास्त्र के प्रमाण

199
00:13:51,680 --> 00:13:55,920
लेके आएंगे आपके सनातन शास्त्रों के तो जहां से प्रमाण दे रहे होंगे

200
00:13:55,920 --> 00:14:00,000
वहीं पर यदि ब्रह्मा विष्णु महेश को कहा जा रहा होगा कि उनका जीवन मरण होता

201
00:14:00,000 --> 00:14:04,080
है या आविर्भाव तिरोभाव होता है। हमारे अनुसार आविर्भाव तिरोभाव इनके अनुसार

202
00:14:04,080 --> 00:14:08,240
जीवन मरण। तो जहां पर यह कहा जा रहा होगा वहीं पर इन पांचों

203
00:14:08,240 --> 00:14:12,400
देवों में से किसी ना किसी एक को पूर्ण ब्रह्म के रूप में स्थापित किया

204
00:14:12,400 --> 00:14:16,480
है। मगर वह बातें यह नहीं बताएंगे क्योंकि यह

205
00:14:16,480 --> 00:14:20,480
है दोगले कौन है यह दोगले अपने बिल में बैठकर के बकवास

206
00:14:20,480 --> 00:14:21,920
करने वाले

207
00:14:21,920 --> 00:14:25,920
इसके बाद ये दो बातें हमेशा ध्यान रखो एक

208
00:14:25,920 --> 00:14:30,320
बात कि भैया ब्रह्मा विष्णु महेश को पूर्ण परमेश्वर मानने

209
00:14:30,320 --> 00:14:34,320
वाली बात शुरू कहां से हुई इसका प्रमाण क्या है क्योंकि ये सारे शास्त्र तो

210
00:14:34,320 --> 00:14:38,720
उनको पूर्ण परमेश्वर ना मानने के निमित्त बनाए गए हैं और दूसरी बात

211
00:14:38,720 --> 00:14:42,800
क्या कहीं पर ऐसा है कि एक सिरे से पांचों देवों की उपासना

212
00:14:42,800 --> 00:14:46,880
को खंडन कर दिया गया हो कहीं नहीं है। यदि ब्रह्मा विष्णु महेश का आविर्भाव

213
00:14:46,880 --> 00:14:51,040
तिरोभाव बताएंगे तो वहां पर देवी ब्रह्म के रूप में स्थापित है। उत्पत्ति

214
00:14:51,040 --> 00:14:55,280
के रूप में स्थापित है। यदि देवी को उत्पन्न होना दिखाएंगे तो वहां पर शिव जी स्थापित

215
00:14:55,280 --> 00:14:59,760
है। यदि शिव जी का उत्पन्न होना दिखाएंगे तो विष्णु जी स्थापित है।

216
00:14:59,760 --> 00:15:03,760
इसका अर्थ क्या है? एक ही परम तत्व ब्रह्मा विष्णु

217
00:15:03,760 --> 00:15:08,000
महेश भगवती और गणेश के रूप में बार-बार सृष्टि करता है। कभी

218
00:15:08,000 --> 00:15:12,160
सृष्टि उसने मां मां भगवती के रूप को

219
00:15:12,160 --> 00:15:16,160
प्राथमिकता देते हुए रखी तो ये उनके परिकर कहलाए। बाकी के चार

220
00:15:16,160 --> 00:15:20,400
देव और जिस-जिस देव को प्राथमिकता देते हुए सृष्टि रचना की व्याख्या

221
00:15:20,400 --> 00:15:24,400
हुई। तो उस सृष्टि रचना के आधार पर जो बाकी के चार अन्य देव

222
00:15:24,400 --> 00:15:28,400
हैं वो उनके परिककर कहलाए। इतनी सी बात समझने वाली है। इसको

223
00:15:28,400 --> 00:15:32,720
कल्प भेद कहते हैं। वह बात और है कि इनके यहां पर काल मरता

224
00:15:32,720 --> 00:15:36,720
भी है। काल मरता है इसका मतलब वो दोबारा पैदा होता है। दोबारा पैदा होता

225
00:15:36,720 --> 00:15:37,220
है।

226
00:15:37,120 --> 00:15:41,280
उसका जीवन मरण होता है। मानता है ना रामपाल अपनी घटियागरी के ज्ञान के अनुसार।

227
00:15:41,280 --> 00:15:45,440
तो काल जब मरा उसके बाद वो जन्म लिया। कबीर को मालूम है ये ऐसा-सा

228
00:15:45,440 --> 00:15:49,760
करेगा। फिर भी उसको जन्म दिया। यानी कि उसको फंसाना है दोबारा से आत्माओं

229
00:15:49,760 --> 00:15:53,840
को और जब वो दोबारा जन्म लेगा तो वही कहानी सब रिपीट होगी। वह

230
00:15:53,840 --> 00:15:57,920
दोबारा से ऐसा कुछ करेगा कि आत्मा उसके जाल में फसग दोबारा से कुछ ऐसी

231
00:15:57,920 --> 00:16:02,080
गलतियां जिससे कि ब्रह्मा विष्णु महेश रामपाल के हिसाब से प्रकट होंगे। ये

232
00:16:02,080 --> 00:16:07,280
सारी चीजें इसके यहां पर मान्य है और हमारे यहां के कल्पवेद को ये

233
00:16:07,280 --> 00:16:11,440
घटियागिरी का ज्ञान देने वाला कभी समझ नहीं सकता। इसके बाद इसने क्या

234
00:16:11,440 --> 00:16:14,480
बकवास की है?

235
00:16:14,480 --> 00:16:18,560
ये इसने पुराणों की बात की थी। वो हो गया। इसके बाद इसका

236
00:16:18,560 --> 00:16:22,560
एक चमचा बैठा हुआ है। किसी संत का भष धरे हैं। मैं उनको जानता

237
00:16:22,560 --> 00:16:26,720
नहीं हूं। हो सकता है संत हो या फिर हो सकता है इनके द्वारा प्रायोजित हो। ज्यादा

238
00:16:26,720 --> 00:16:31,040
चांसेस ऐसे हैं क्योंकि उन्होंने संस्कृत बोली और रामपाल के खेमे का व्यक्ति कभी संस्कृत

239
00:16:31,040 --> 00:16:35,120
बोलता हुआ नहीं मिलेगा। है ना? तो उन्होंने

240
00:16:35,120 --> 00:16:39,280
संस्कृत बोली तो वो एक इनका एक घटियागिरी का चेला वहां पर बैठा हुआ है और वो

241
00:16:39,280 --> 00:16:43,280
बातें कर रहा है कि वो रामपाल ने जो गौशाला में दान भेजा।

242
00:16:43,280 --> 00:16:47,600
अरे भैया रामपाल यदि गौशाला में दान भेज रहा है तो यह प्रश्न

243
00:16:47,600 --> 00:16:53,600
करने वाले क्या अपनी स्त्रियों को रामपाल के पास सोने के लिए भेज देंगे

244
00:16:53,920 --> 00:16:57,920
जो तुम ऐसी बातें करते हो कि दुर्गा माता के बलात्कार की बात करने वाले

245
00:16:57,920 --> 00:17:02,000
का पक्ष लेते हो कि उसने पाइप दिए हैं। उसने जो है गेहूं, शक्कर,

246
00:17:02,000 --> 00:17:08,000
आटा, तेल, चावल दिया है। हां।

247
00:17:08,000 --> 00:17:12,480
बात हो रही है कि उसने जो है वेदों के नाम पर कूड़ा क्यों किया?

248
00:17:12,480 --> 00:17:16,560
उसने उसको कूड़ा करना है अपना भैया जो तुम लिख रहे हो किताब अपने

249
00:17:16,560 --> 00:17:20,560
आप को परमेश्वर कहो भजवाओ मगर वेदों के नाम पर कूड़ा करना इसलिए जरूरी है

250
00:17:20,560 --> 00:17:24,720
क्योंकि वेदों पे सबकी आस्था है पुराणों पे सबकी आस्था है गीता पे सबकी आस्था

251
00:17:24,720 --> 00:17:29,040
है इसलिए जिस पे पहले से सबकी आस्था है उसी के अंदर चोरी से घुसना

252
00:17:29,040 --> 00:17:33,120
है और अंदर घुस करके ऐसा दिखाना है कि भैया इसके द्वारा तो मुझे ही पूजा जा रहा

253
00:17:33,120 --> 00:17:37,280
है वो बात और है कि मेरी हर दूसरी बात पहली बात से कट जाती है और हर पहली

254
00:17:37,280 --> 00:17:41,600
बात दूसरी बात से कट जाती है क्योंकि मेरा जो ज्ञान है रामपाल का जो ज्ञान

255
00:17:41,600 --> 00:17:45,920
है वो घटियागरी का ज्ञान है। है ना? अच्छा

256
00:17:45,920 --> 00:17:50,480
और आगे क्या है? फिर इसने आखिर में कहा

257
00:17:50,480 --> 00:17:54,480
कि जो है ये इनाम देगा जो इसकी एक बात को गलत साबित कर देगा। गलत

258
00:17:54,480 --> 00:17:59,040
साबित का निर्णय कैसे होगा? तेरी बात गलत साबित हो गई। अरे फोड़ है क्या तू?

259
00:17:59,040 --> 00:18:03,040
एक नंबर का मूर्ख व्यक्ति है क्या? एक तरफ तो कह रहा है भैया

260
00:18:03,040 --> 00:18:07,040
जनता फैसला ले लेगी। जनता फैसला ले लेगी। ये पता कैसे चलेगा? इस बारे

261
00:18:07,040 --> 00:18:09,280
में कोई तूने समीकरण बैठाए। समीकरण

262
00:18:09,280 --> 00:18:13,360
बैठा भी नहीं पाएगा। उसके लिए दिमाग चाहिए होता है। उसके लिए पूर्ण बुद्धि

263
00:18:13,360 --> 00:18:17,360
काम नहीं करती है। एक लेवल तक जो रटा रटाई चीजें हैं वो बोल लोगे। उसके

264
00:18:17,360 --> 00:18:21,440
बाद ये सब चीजें कैसे स्थापित करोगे? जनता ने किसको चुना, किसको

265
00:18:21,440 --> 00:18:25,440
नहीं चुना। अच्छा दूसरी बात जब ये

266
00:18:25,440 --> 00:18:29,440
निर्णय ही नहीं होगा तो फिर ये कैसे तय होगा कि तेरी बात गलत साबित

267
00:18:29,440 --> 00:18:34,240
हुई कि नहीं हुई? हम अच्छा अब 100 की सीधी एक बात है।

268
00:18:34,240 --> 00:18:38,480
तो अभी रामपाल ने एक घोषणा की है। एक घोषणा अब मैं कर देता हूं। कॉमेडी सर्कस

269
00:18:38,480 --> 00:18:42,720
उसने किया है। मैं उसको उसका जवाब दे देता हूं। आप लोग यहां से चाहो तो रील कट करके

270
00:18:42,720 --> 00:18:46,800
अपना जो जवाब किसी को देना हो तो दे देना। तो एक कॉमेडी सर्कस में

271
00:18:46,800 --> 00:18:51,040
रामपाल ने हरियाणा का जो तथाकथित बाबा है जो हमारे सनातन देवी

272
00:18:51,040 --> 00:18:55,040
देवताओं का मजाक उड़ाता है। हमारे सनातन

273
00:18:55,040 --> 00:18:59,440
धर्म को मानने वाले हिंदुओं की आस्था के जो केंद्र हैं

274
00:18:59,440 --> 00:19:03,520
हमारे तीज त्यौहार इत्यादि हमारे ईश्वर

275
00:19:03,520 --> 00:19:07,920
के स्वरूप और हमारी पूजा पद्धति यानी कि श्राद्ध कर्म इत्यादि

276
00:19:07,920 --> 00:19:12,080
करवा चौथ के व्रत इत्यादि इन सबका मजाक उड़ाता है। कहता है करवा

277
00:19:12,080 --> 00:19:16,320
चौथ रखने वाली जो महिलाएं हैं वो गधी बनेंग

278
00:19:16,320 --> 00:19:20,560
है ना और ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति करने वाले नीच हैं। दुर्गा

279
00:19:20,560 --> 00:19:24,480
के साथ जो है बलात्कार किया एक राक्षस ने और भी ना जाने कितनी

280
00:19:24,480 --> 00:19:28,480
बातें कि गायत्री ने गवाही देने के लिए झूठी झूठी गवाही

281
00:19:28,480 --> 00:19:32,560
देने के लिए शर्त रखी कि मेरे साथ पहले संभोग करो तब जो है मैं झूठी गवाही

282
00:19:32,560 --> 00:19:36,960
दूंगी। तेरे इकाई कई सांड पति होंगे। यह सब अश्लील बातें हैं।

283
00:19:36,960 --> 00:19:41,120
स्त्रियों के अंतरंग वस्त्रों की बात ये करता है माता पार्वती और शिवजी

284
00:19:41,120 --> 00:19:45,440
के विवाह वाले प्रकरण में अंतरंग वस्त्रों वो भी अंग्रेजी नाम उनका

285
00:19:45,440 --> 00:19:49,520
हिंदी नाम नहीं अंग्रेजी नाम। तो ये सब चीजें करने

286
00:19:49,520 --> 00:19:53,520
वाला जो बाबा है तथाकथित जो अपने जो कायरता पूर्वक अपने बिल में बैठा

287
00:19:53,520 --> 00:19:57,600
रहता है। उसने अपने बिल में बैठकर के एक घोषणा की है कि मैं

288
00:19:57,600 --> 00:20:01,680
हूं आदि सनातन धर्म का एडवोकेट। अरे घोंंचू तेरी सबसे पहले तो यही बात

289
00:20:01,680 --> 00:20:05,840
गलत हो गई। तू कह रहा है ना मेरी गलत बात साबित कर दो। सनातन के आगे यदि

290
00:20:05,840 --> 00:20:09,840
आदि लगा दिया तो सनातन का अस्तित्व कहां रह गया? जिसकी शुरुआत

291
00:20:09,840 --> 00:20:14,080
हो रही है वो सनातन नहीं है। सनातन वो जो अनादि है।

292
00:20:14,080 --> 00:20:18,320
अनादि सनातन कहता मूर्ख तो तेरी बात चल भी जाती। कहां तू प्रबुद्ध जनों

293
00:20:18,320 --> 00:20:24,080
में बैठकर के सोच रहा है कि लाइव तेरे साथ कोई शास्त्रार्थ करेगा।

294
00:20:24,080 --> 00:20:28,320
इतना बड़ा तू मूर्खता का पिटारा है ना। इतना बड़ा

295
00:20:28,320 --> 00:20:33,280
पिटारा है कि तुझको कौन अपने सामने बिठाएगा?

296
00:20:33,280 --> 00:20:37,680
आदि सनातन मैं हूं आदि सनातन का एडवोकेट तो सुन ले भाई रामपाल

297
00:20:37,680 --> 00:20:39,600
कहता है कि वह आदि सनातन का एडवोकेट

298
00:20:39,600 --> 00:20:43,840
है और वो आदि सनातन उसका जो तथाकथित धर्म

299
00:20:43,840 --> 00:20:48,080
है जिसका उसे खुद ज्ञान नहीं है धर्म होता क्या है उसके

300
00:20:48,080 --> 00:20:52,240
बारे में वो अपना पक्ष रखेगा और उसकी बातों को जो भी गलत साबित कर देगा वो उसको

301
00:20:52,240 --> 00:20:56,240
50 लाख देगा तो सुन मैं हूं सनातन धर्म का

302
00:20:56,240 --> 00:21:00,560
एडवोकेट और जितनी बातें तुमने सनातन

303
00:21:00,560 --> 00:21:04,880
परंपरा परंपरा प्राप्त सनातन धर्म के विरुद्ध कही है।

304
00:21:04,880 --> 00:21:08,880
उसके संबंध में जो मैंने निराकरण प्रस्तुत किए और तेरी मूर्खता प्रस्तुत की

305
00:21:08,880 --> 00:21:12,880
है। उसके एक भी शब्द को एक भी पंक्ति

306
00:21:12,880 --> 00:21:16,880
को एक भी बात को जो गलत साबित कर देगा उसको मैं ₹1 करोड़

307
00:21:16,880 --> 00:21:21,680
इनाम दूंगा। बोल कर गलत साबित

308
00:21:21,680 --> 00:21:26,080
तू डाल डाल तो मैं पाथ पाथ। और फैसला कौन करेगी जनता?

309
00:21:26,080 --> 00:21:30,080
तो जनता फैसला करके बता देगी गलत साबित किया कि नहीं किया? तेरी डपोर शंख वाली

310
00:21:30,080 --> 00:21:34,080
बातें हैं ना। कर गलत साबित रामपाल के

311
00:21:34,080 --> 00:21:38,240
विरुद्ध मेरे द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले सिद्धांतों में से एक भी

312
00:21:38,240 --> 00:21:42,640
सिद्धांत को कोई गलत साबित कर देगा मैं उसको ₹1 करोड़ इनाम दूंगा।

313
00:21:42,640 --> 00:21:46,720
अपना चैनल खोलो सोशल मीडिया पे आओ YouTube पे आओ और

314
00:21:46,720 --> 00:21:50,800
करो गलत साबित और अगर कर दिया तो

315
00:21:50,800 --> 00:21:56,160
₹1 करोड़ तुम तुम्हें मैं इनाम दूंगा। रामपाल

316
00:21:56,160 --> 00:22:01,360
तू भी कर दे गलत साबित तेरे को मैं इनाम दूंगा। जा

317
00:22:01,360 --> 00:22:05,600
ठीक है भाई। तो यह आज के कॉमेडी

318
00:22:05,600 --> 00:22:09,680
शो का शो की थोड़ी सी विवेचना थी और उस पर

319
00:22:09,680 --> 00:22:13,840
हमारे रिप्लाई था। सबने सुन लिया इस रील को काट लेना और डालना आप

320
00:22:13,840 --> 00:22:18,800
लोग अपने अपने चैनल पर। अब आ जाते हैं

321
00:22:18,800 --> 00:22:22,880
इसके पांचव अध्याय पे और देख आज ही तेरी कितनी बातें

322
00:22:22,880 --> 00:22:27,200
गलत साबित होंगी। देख

323
00:22:27,200 --> 00:22:31,040
110 नंबर का प्रश्न है।

324
00:22:31,040 --> 00:22:35,120
इसमें बोलता है गीता जी अध्याय पांच

325
00:22:35,120 --> 00:22:40,560
श्लोक सात में स्पष्ट किया हुआ है कि उपरोक्त दोनों प्रकार के सन्यासियों

326
00:22:40,560 --> 00:22:45,200
यानी कि कर्म सन्यास वाले कर्म सन्यास पर इसने कितनी

327
00:22:45,200 --> 00:22:51,200
बकवास की है वो आप लोग पहले देख चुके होंगे

328
00:22:51,200 --> 00:22:55,360
दोनों प्रकार के सन्यासियों फिर से बोल दे रहा हूं एक बार मैं

329
00:22:55,360 --> 00:23:00,000
हूं सनातन धर्म का एडवोकेट अधिवक्ता

330
00:23:00,000 --> 00:23:04,080
और मैं चैलेंज दे रहा हूं कि रामपाल के

331
00:23:04,080 --> 00:23:08,160
विरुद्ध दिए गए सिद्धांतों को मेरे द्वारा प्रस्तुत किए गए सिद्धांतों

332
00:23:08,160 --> 00:23:12,240
में से किसी भी एक सिद्धांत को जो भी व्यक्ति दुनिया का जो भी कोई

333
00:23:12,240 --> 00:23:16,960
रामपाली गलत सिद्ध कर देगा मैं उसे ₹1 करोड़ इनाम दूंगा।

334
00:23:16,960 --> 00:23:21,200
ठीक है? अब कर दूं मेरी चीजों को गलत साबित।

335
00:23:21,200 --> 00:23:25,280
जिसने अपनी मां का दूध पिया हो, जिसको भी उसकी मां ने

336
00:23:25,280 --> 00:23:29,680
निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो, तो एक भी मेरे द्वारा रामपाल

337
00:23:29,680 --> 00:23:33,920
के विरुद्ध प्रस्तुत किए गए सिद्धांत को गलत साबित कर दे, मैं उसे

338
00:23:33,920 --> 00:23:39,600
₹1 करोड़ दूंगा। ठीक है?

339
00:23:39,600 --> 00:23:44,080
हां। तो अब यह कह रहा है कि भाई

340
00:23:44,080 --> 00:23:48,400
गीता जी पांच श्लोक सात में स्पष्ट किया गया है

341
00:23:48,400 --> 00:23:52,400
कि उपरोक्त दोनों प्रकार के सन्यासियों खोल लो पेज खोल

342
00:23:52,400 --> 00:23:56,640
लो 110 सन्यासियों को अपने त्याग व साधना

343
00:23:56,640 --> 00:24:00,640
का अभिमान हुए बिना नहीं रहता। अभिमान भगवान

344
00:24:00,640 --> 00:24:04,720
के मार्ग में पूरा बाधक है। अर्थात अभिमानी

345
00:24:04,720 --> 00:24:08,800
व्यक्ति ही सर्व साधना अभिमानी व्यक्ति

346
00:24:08,800 --> 00:24:12,960
की सर्व साधना पूजा निष्फल हो जाती है। यहां ध्यान दीजिएगा

347
00:24:12,960 --> 00:24:17,040
अभिमानी। ठीक है? अहंकार नहीं होना चाहिए व्यक्ति के

348
00:24:17,040 --> 00:24:21,360
अंदर। ठीक है? अभिमानी व्यक्ति की सर्व साधना

349
00:24:21,360 --> 00:24:25,680
पूर्ण रूप से निष्फल हो जाती है। परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती। इसके

350
00:24:25,680 --> 00:24:31,360
आगे इसने प्रमाण भी दिए हैं। कि

351
00:24:31,360 --> 00:24:35,360
ध्रुव प्रहलाद राजा अंबरीश राजा जनक शास्त्र विधि

352
00:24:35,360 --> 00:24:39,360
रहित गृहस्ती कर्म योगी थे। श्री नानक जी संत रविदास

353
00:24:39,360 --> 00:24:43,840
एवं संत गरीबदा दास जी शास्त्र अनुकूल साधना करने वाले गृहस्थ

354
00:24:43,840 --> 00:24:48,080
कर्म योगी थे। कर्म योगी में अभिमान नहीं हो पाता है।

355
00:24:48,080 --> 00:24:53,600
तो बात यह है कि शास्त्र विधि रहित कर्म योगी व्यक्ति बना कैसे?

356
00:24:53,600 --> 00:24:54,800
भाई कर्म योगी में

357
00:24:54,800 --> 00:24:58,960
तो जब तक व्यक्ति शास्त्र सम्मत कार्य नहीं करेगा तो उसको

358
00:24:58,960 --> 00:25:02,960
आप कर्म योगी नहीं कह सकते हो यानी उत्तम नहीं कह सकते हो तो फिर वो कर्म

359
00:25:02,960 --> 00:25:07,120
योगी बना कैसे जब वो शास्त्र के विपरीत है तो वो कर्म योगी बन ही नहीं सकता क्योंकि

360
00:25:07,120 --> 00:25:11,360
कर्म तो वो है जो शास्त्र बताए जो शास्त्र नहीं बताएगा वो तो

361
00:25:11,360 --> 00:25:15,520
विकर्म है वो तो अधर्म है जो शास्त्र की सीमा

362
00:25:15,520 --> 00:25:20,640
से बाहर होगा फिर उसको कर्म योगी कैसे कहोगे दूसरी बात

363
00:25:20,640 --> 00:25:24,640
कि फिर फिर भी इनकी स्थिति को अच्छा कह रहा है ध्रुव प्रह्लाद

364
00:25:24,640 --> 00:25:28,880
इत्यादि की स्थिति को। वो बात अलग है कि भाई साहब ऑपरेटर

365
00:25:28,880 --> 00:25:33,360
जी आप मेरी बात सुन लीजिए। 110 नंबर पष्ठ को खोल लीजिए।

366
00:25:33,360 --> 00:25:37,760
दूसरी बात यह है कि इसने जो है एक जगह पर प्रह्लाद

367
00:25:37,760 --> 00:25:42,160
को प्रह्लाद को क्या कहा है? संसार

368
00:25:42,160 --> 00:25:46,240
के सब नर नारी सनक सनंदन

369
00:25:46,240 --> 00:25:50,240
59 नंबर पेज है। संसार के सब नर नारी सनक

370
00:25:50,240 --> 00:25:54,400
सनंदन सनातन तथा संत कुमार तथा नारद

371
00:25:54,400 --> 00:25:59,440
जी व्यास जी उनके पिता ऋषि पाराशर जी प्रह्लाद

372
00:25:59,440 --> 00:26:03,760
तथा मुनि ऋषि ये सब स्वयं परमात्मा कबीर

373
00:26:03,760 --> 00:26:08,000
जी ही थे। यानी कि जो कबीर हैं

374
00:26:08,000 --> 00:26:10,240
वह भी गृहस्थ कर्म

375
00:26:10,240 --> 00:26:14,400
योगी थे क्योंकि प्रह्लाद कर्म योगी थे। है ना?

376
00:26:14,400 --> 00:26:18,800
तो कबीर जी कौन है? गृहस्थ कर्म योगी मगर शास्त्र रहित

377
00:26:18,800 --> 00:26:22,960
साधना करने वाले। ठीक है ना? 59 नंबर पेज दिखा दीजिए

378
00:26:22,960 --> 00:26:27,360
इनको पहले। पृष्ठ संख्या 59

379
00:26:27,360 --> 00:26:32,320
और उसके बाद दिखा दीजिए अह

380
00:26:32,320 --> 00:26:36,400
110 नंबर। इसके आगे चलते हैं।

381
00:26:36,400 --> 00:26:40,400
इन्होंने कुछ बहुत सारी कथाओं का वर्णन

382
00:26:40,400 --> 00:26:44,400
दे दिया है कि अच्छा

383
00:26:44,400 --> 00:26:48,800
एक चीज इसकी इसकी जो ये लिखता है ना ये

384
00:26:48,800 --> 00:26:52,880
इसकी चीजों में एक चीज साफ पता चलती है कि यह व्यक्ति ये

385
00:26:52,880 --> 00:26:57,040
तय नहीं कर पा रहा है कि मुझे जो है काम वासना से अलग होना है

386
00:26:57,040 --> 00:27:01,360
या नहीं होना है। क्योंकि कहीं पे काम वासना का पक्ष लेता है। कहीं पे काम वासना

387
00:27:01,360 --> 00:27:05,520
का विरोध करता है। जैसे अभी सुखदेव जी का नाम लेकर के

388
00:27:05,520 --> 00:27:09,840
काम वासना का पक्ष ले रहा है कि सुखदेव जी ने उसको छुआ तक नहीं वह अप्सरा

389
00:27:09,840 --> 00:27:14,000
आई। यानी कि इसके पास अगर कोई आएगा तो ये छू लेता है।

390
00:27:14,000 --> 00:27:18,080
तो इस पर जो आरोप लगते हैं छू लेने के या बबिता इत्यादि वाले वो

391
00:27:18,080 --> 00:27:22,160
सही आरोप है क्या? यहां पर ये कह रहा है। ये देखिए

392
00:27:22,160 --> 00:27:25,440
पहले 59 नंबर देख लीजिए। दूसरी लाइन

393
00:27:25,440 --> 00:27:29,520
से संसार के नर नारी सनक सनंदन सनातन तथा सन

394
00:27:29,520 --> 00:27:33,520
सन सनत कुमार तथा नारद जी व्यास जी ये सब

395
00:27:33,520 --> 00:27:37,520
जो है कबीर परमात्मा कबीर पूर्ण

396
00:27:37,520 --> 00:27:41,600
स्वयं परमात्मा कबीर जी ही थे। ठीक है? अब आ जाइए 110 नंबर पेज

397
00:27:41,600 --> 00:27:45,600
पर। 110 नंबर पेज पर सुखदेव जी की कथा

398
00:27:45,600 --> 00:27:48,160
बताते समय

399
00:27:48,160 --> 00:27:52,160
यह व्यक्ति कह रहा है कि जो सुखदेव जी थे उनको

400
00:27:52,160 --> 00:27:56,880
अभिमान था। ध्यान रखिएगा यहां पर ये अभिमान का भी विरोध कर रहा है कि

401
00:27:56,880 --> 00:28:00,880
कि जो है अभिमान नहीं होना चाहिए। ये बात तो सही है नहीं होना चाहिए।

402
00:28:00,880 --> 00:28:04,960
वो बात आगे है कि आगे इसने एक कूड़ा और कर रखा है। वो कूड़ा क्या है कि आगे

403
00:28:04,960 --> 00:28:09,200
जाकर के ये कहेगा कि अभिमान होना चाहिए। अहंकार होना चाहिए। समझ

404
00:28:09,200 --> 00:28:13,520
रहे हो? यही इसका घटियाईगिरी का ज्ञान है। तो

405
00:28:13,520 --> 00:28:17,600
यहां पर ये सुखदेव जी के अंदर अहंकार बता रहा है और वहां पर

406
00:28:17,600 --> 00:28:21,680
बता रहा है कि सुखदेव जी के पास एक अप्सरा आई। सुखदेव जी ने उसे छुआ तक नहीं।

407
00:28:21,680 --> 00:28:25,760
इसका मतलब ये है कि ये जो है छूना चाहता है। इसके पास अगर कोई

408
00:28:25,760 --> 00:28:30,080
जाएगी भवता सखा सरीखी इत्यादि तो छुएगा। इसका

409
00:28:30,080 --> 00:28:34,320
मतलब ये है। इसका मतलब ये है कि इसके ऊपर जो ये तथाकथित जो

410
00:28:34,320 --> 00:28:38,400
ये इन लोगों के अनुसार जो आरोप लगते हैं जो तथाकथित है वो सब सत्य होने

411
00:28:38,400 --> 00:28:40,480
की प्रतीति हो रही है। क्योंकि ये खुद इस

412
00:28:40,480 --> 00:28:44,560
बात की इस बात का पक्ष ले रहा है कि कोई अगर तुम्हारे पास

413
00:28:44,560 --> 00:28:48,640
भले ही तुम्हारे अह तुम्हारे अधिकार में वो महिला आती हो तुम्हारा उससे

414
00:28:48,640 --> 00:28:52,640
विवाह हुआ हो या ना हुआ हो। हालांकि इनके विवाह की टेक्निक भी आप लोग जानते हैं

415
00:28:52,640 --> 00:28:56,880
पर अभी उस पे नहीं जाएंगे लंबा हो जाएगा। तो भले ही वो विवाहित हो आपसे

416
00:28:56,880 --> 00:29:01,120
ना हो मगर आपके पास यदि आए तो ये उसको छूता है। ये अपनी

417
00:29:01,120 --> 00:29:05,120
किताब में यही समझ में नहीं आ रहा है इसको कि मैं उसको छू कि

418
00:29:05,120 --> 00:29:09,120
नहीं छू। इसलिए कोई छू रहा है तो आपत्ति है इसको और कोई नहीं छू

419
00:29:09,120 --> 00:29:13,120
रहा है तो भी आपत्ति है इसको। कहां ना छूने पर आपत्ति है

420
00:29:13,120 --> 00:29:17,280
बता देता हूं। रुचि ऋषि की कथा ये व्यक्ति बताता है। तब उसके पितर उसको

421
00:29:17,280 --> 00:29:21,520
कहते हैं कि तू गृहस्थ होते हुए भी मुक्ति प्राप्त कर सकता है तो ये वहां पर खंडन करता है। देखो

422
00:29:21,520 --> 00:29:25,520
देखो वो जो है पूर्ण सन्यासी बन करके अपना जीवन बिता रहा है। वैदिक धर्म पर

423
00:29:25,520 --> 00:29:30,320
चल रहा है और उसके पिता आ करके उसको भटका रहे हैं। कहता है [चीखने की आवाज़] और

424
00:29:30,320 --> 00:29:34,400
यहां पर क्या कर रहा है? यहां पर जो है दूर रह के और अप्सराओं

425
00:29:34,400 --> 00:29:38,400
से दूर रहना उन्हें ना छू करके और जो है कोई साधना कर रहा है तो

426
00:29:38,400 --> 00:29:42,720
उसका भी खंडन कर रहा है। तो ये कशमकश में है कि छूना है कि नहीं छूना

427
00:29:42,720 --> 00:29:46,800
है। है ना? तो इसका इस एपिसोड का नाम डाला जाए आगे चलकर के

428
00:29:46,800 --> 00:29:51,840
कि छूना है कि नहीं छूना है। भाई रामपाल

429
00:29:51,840 --> 00:29:55,520
अच्छा इसके बाद यह अगले भावार्थ में लिखता है। यह आप आ जाइए

430
00:29:55,520 --> 00:29:59,520
110 नंबर पृष्ठ पे।

431
00:29:59,520 --> 00:30:05,520
110 नंबर पृष्ठ पर आ जाइए। इसके बाद भावार्थ में लिखता है

432
00:30:06,480 --> 00:30:11,280
परमेश्वर कबीर जी सर्व प्राणियों के उत्पत्ति करता है। ठीक है भाई।

433
00:30:11,280 --> 00:30:15,280
इसलिए सर्व के पिता तथा माता भाई सखा रूप में

434
00:30:15,280 --> 00:30:19,520
सच्चे हितैषी हैं। अब देखो रामपाल जिस तरीके

435
00:30:19,520 --> 00:30:23,760
से हमारी चीजों का अनर्थ वो अर्थ निकालता है। अब मैं उसका अर्थ निकालता

436
00:30:23,760 --> 00:30:27,920
हूं। इसने लिखा है सबके पिता चल पिता मान लिया तथा

437
00:30:27,920 --> 00:30:32,320
माता अब क्या हुआ यानी कि कबीर

438
00:30:32,320 --> 00:30:36,320
जो है माता भी है और पिता भी है तो कबीर की पत्नी

439
00:30:36,320 --> 00:30:40,320
कौन हुई कबीर और क्योंकि रामपाल को भी कहा जाता

440
00:30:40,320 --> 00:30:44,400
है क्या कहते हैं वो कबीर ही है तो यानी कि कबीर

441
00:30:44,400 --> 00:30:48,400
जो सतलोक में बैठा है वो कबीर जी जो सतलोक में बैठे हैं इसके

442
00:30:48,400 --> 00:30:52,800
वाले वो जो संत कबीर दास हैं उनका बहुत सम्मान है अभी ये रामपाल

443
00:30:52,800 --> 00:30:56,800
के तथाकथित कबीर की बात हो रही है तो रामपाल का जो कबीर

444
00:30:56,800 --> 00:31:00,800
है वह सतलोक में बैठा हुआ है और उसकी पत्नी कौन है?

445
00:31:00,800 --> 00:31:05,040
उसकी पत्नी यानी कि सर्व प्राणियों की माता यानी कि रामपाल है।

446
00:31:05,040 --> 00:31:09,120
और रामपाल की रामपाल का विवाह कैसे हुआ होगा? जैसे रामपाल ने षष्ठी

447
00:31:09,120 --> 00:31:10,800
रचना में बताया है। कैसे

448
00:31:10,800 --> 00:31:14,880
होता है विवाह? विवाह कैसे हुआ कि स्त्री इंद्री पहले थी नहीं।

449
00:31:14,880 --> 00:31:19,040
तो रामपाल की जाहिर सी बात है नहीं है। उसके बाद वो स्त्री इंद्री चिपकाई जाएगी

450
00:31:19,040 --> 00:31:23,040
नाखूनों के द्वारा। वो नाखूनों के द्वारा जो रामपाल से विवाह कर रहा है यानी

451
00:31:23,040 --> 00:31:27,200
कि जो सतलोक वाला कबीर वो स्त्री इंद्री रामपाल के चिपकाएगा। फिर

452
00:31:27,200 --> 00:31:31,280
रामपाल से उसका विवाह होगा। इसके आगे फिर कबीर भाई

453
00:31:31,280 --> 00:31:35,280
भी है। तो भाई भी है इसका मतलब क्या हुआ? ये तो बहुत ही गंदी बात हो

454
00:31:35,280 --> 00:31:39,280
गई यहां पर। क्योंकि कबीर भाई कबीर पिता है और कबीर ही भाई भी

455
00:31:39,280 --> 00:31:43,440
है। तो भाई जो है यानी कि माता का पुत्र वो कबीर के रूप में

456
00:31:43,440 --> 00:31:47,520
माता का पति हो गया। अरे कितनी अश्लील बातें

457
00:31:47,520 --> 00:31:51,760
हैं भाई तेरे सद ग्रंथ में ये सद ग्रंथ है तेरे कूड़े कहीं के

458
00:31:51,760 --> 00:31:55,920
ऐसे सद ग्रंथ हां ऐसे ही करते हो ना हमारे धर्म ग्रंथों

459
00:31:55,920 --> 00:32:00,000
का अपमान ऐसे ही करते हो ना उनकी बातों का अनर्थ अब ले तेरे

460
00:32:00,000 --> 00:32:04,080
ग्रंथों से तेरी बात निकल रही है क्या है कि कबीर

461
00:32:04,080 --> 00:32:08,400
सर्व आत्माओं का पिता भी है माता भी है भाई भी है

462
00:32:08,400 --> 00:32:12,960
आगे सखा मित्र भी है सखा भी है ठीक है

463
00:32:12,960 --> 00:32:16,960
तो भाई भाई अगर है तो वह किसका पुत्र है? माता

464
00:32:16,960 --> 00:32:21,040
का पुत्र है, भाई भी है। और क्योंकि पिता भी है तो यह जो पुत्र है वो

465
00:32:21,040 --> 00:32:25,120
कबीर के रूप में रामपाल का पति भी है। यानी कि अगर

466
00:32:25,120 --> 00:32:26,080
रामपाल पत्नी

467
00:32:26,080 --> 00:32:30,320
के रूप में है कबीर की है ना? वो स्त्री अंग चिपका चिपकू

468
00:32:30,320 --> 00:32:34,800
करके बनाई गई। तो अगर रामपाल पत्नी के रूप में तो उसका जो पुत्र है भाई

469
00:32:34,800 --> 00:32:38,800
वही उसका पति भी है। ये कैसे रिश्ते हैं भाई? तुम्हारे यहां कैसे

470
00:32:38,800 --> 00:32:43,600
संबंध है? इस अश्लीलता को तुम लोग कहते हो सद ग्रंथ।

471
00:32:43,600 --> 00:32:47,680
धिक्कार है तुम जैसे लोगों पर। ऐसे ही करते हो ना हमारे

472
00:32:47,680 --> 00:32:53,600
सनातन धर्म ग्रंथों का अपमान। हां। खैर

473
00:32:53,600 --> 00:32:58,720
तो ये अगर इनकी तरीके से माना जाए तो यहां पर यही अर्थ निकलेगा

474
00:32:58,720 --> 00:33:02,800
जो मैंने अभी बताया। बाकी क्या है कि ईश्वर जो है वो हर रूप में

475
00:33:02,800 --> 00:33:06,880
सर्व रूपों में ईश्वर ही है। एक ही परम तत्व

476
00:33:06,880 --> 00:33:10,880
जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में प्रकट होता है। तो परमार्थ

477
00:33:10,880 --> 00:33:15,040
क्या है कि सब कुछ ईश्वर ही है। व्यवहार क्या है? सब जो हम देख रहे हैं भौतिक

478
00:33:15,040 --> 00:33:19,440
जगत। तो उस रूप में अगर देखेंगे तब तो इस बात, ये बात की सार्थकता

479
00:33:19,440 --> 00:33:23,440
निकल आएगी। मगर क्योंकि इन रूप चुल्लुओं का ज्ञान कैसा है? जिस तरीके

480
00:33:23,440 --> 00:33:27,600
से हमारे धर्म ग्रंथों का नर्थ करते हैं उसी तरीके से अगर किया जाए तो यही निकलेगा कि

481
00:33:27,600 --> 00:33:31,600
रामपाल पत्नी है जो कि जिसके स्त्री अंग चिपकाया गया है

482
00:33:31,600 --> 00:33:35,840
और उसके बाद वो कबीर कबीर के साथ ब्याही हुई है कबीर ने भी उसका वो

483
00:33:35,840 --> 00:33:40,160
जो जबरदस्ती की है उसकी नियत खराब हो गई थी रामपाल पर वैसे रामपाल

484
00:33:40,160 --> 00:33:41,120
पर नियत खराब हो गई

485
00:33:41,120 --> 00:33:45,840
वो भैया उससे पहले तो कोई व्यक्ति आत्महत्या कर लेगा [हंसी]

486
00:33:45,840 --> 00:33:49,840
खैर तो कभी इसके अनुसार रामपाल पर नियत खराब

487
00:33:49,840 --> 00:33:54,000
हो गई थी और फिर रामपाल के साथ जबरदस्ती ब्याह करवा

488
00:33:54,000 --> 00:33:58,480
दिया गया है। उसके बाद जो इनका इनका जो पुत्र है वह भी

489
00:33:58,480 --> 00:34:03,040
अपनी माता के पति के रूप में भी स्थापित हो जाता है। कबीर के रूप में ये सारी खिचड़ी

490
00:34:03,040 --> 00:34:07,040
ये निकल आएगी अनर्थ करने के लिए। अगर अनर्थ किया जाए बातों का तो

491
00:34:07,040 --> 00:34:11,120
है ना? खैर आगे चलते हैं। अच्छा एक बात

492
00:34:11,120 --> 00:34:15,360
और है कि ब्रह्मचारी का जो शाब्दिक अर्थ निकलता है ब्रह्म के लिए आचरण

493
00:34:15,360 --> 00:34:19,680
करने वाला। सीधी बात। तो यहां पर ये कह रहा है

494
00:34:19,680 --> 00:34:23,760
अह इसमें थोड़ा नीचे आइए। के भावार्थ में हूं मैं इस समय। यहां

495
00:34:23,760 --> 00:34:27,920
पर यह कह रहा है कि ब्रह्मचारी

496
00:34:27,920 --> 00:34:32,880
का अर्थ इसने माना है ब्रह्मचारी जो किसी स्त्री की ओर आकर्षित ना होता हो।

497
00:34:32,880 --> 00:34:37,040
ठीक है? तो वो इसने माना है कि जो

498
00:34:37,040 --> 00:34:41,040
किसी स्त्री की ओर आकर्षित नहीं होता वो ब्रह्मचारी है और ब्रह्मचारी ना

499
00:34:41,040 --> 00:34:45,200
होने की बात ये कह रहा है। यानी कि रामपाल आज भी किसी

500
00:34:45,200 --> 00:34:49,280
ना किसी स्त्री की ओर आकर्षित होता है। अब भाई इतनी सारी स्त्रियां आती है तो होता

501
00:34:49,280 --> 00:34:53,360
होगा किसी की ओर आकर्षित। क्या पता क्योंकि यहां पर सुखदेव जी

502
00:34:53,360 --> 00:34:56,240
द्वारा स्त्री की ओर आकर्षित ना होने की बात कह रहा है तो

503
00:34:56,240 --> 00:35:00,320
रामपाल स्त्रियों की ओर आकर्षित हो रहा होगा अभी भी होता है ना भाई बता देना

504
00:35:00,320 --> 00:35:04,320
वो साधना साधना टीवी पे आएगा तो बता देना कौन सी वाली के ऊपर होता हूं

505
00:35:04,320 --> 00:35:09,520
क्योंकि विकल्प तो बहुत है तुम्हारे पास खैर

506
00:35:09,520 --> 00:35:13,520
ये इसका फुअर ज्ञान है यह इसकी फुअर बातों का जवाब है इसी की भाषा

507
00:35:13,520 --> 00:35:17,840
में

508
00:35:17,840 --> 00:35:22,640
आगे अगले प्रश्न पर आ जाते हैं 111

509
00:35:22,640 --> 00:35:26,720
111 पर इसने कहा है गीता अध्याय

510
00:35:26,720 --> 00:35:30,800
सात श्लोक 19 में गीता ज्ञान कहने वाले ने

511
00:35:30,800 --> 00:35:34,800
कहा है कि सर्व मानव अन्य देवी देवताओं की भक्ति करते हैं

512
00:35:34,800 --> 00:35:39,200
पर मेरी भक्ति तो बहुत बहुत जन्म जन्मांतर के पश्चात कोई ज्ञानी

513
00:35:39,200 --> 00:35:43,760
पुरुष करता है ज्ञानी कौन करता है ज्ञानी

514
00:35:43,760 --> 00:35:47,840
पुरुष करता है ये कह रहे हैं ये कह रहे हैं गीता ज्ञान दाता यानी हमारे

515
00:35:47,840 --> 00:35:52,000
भगवान श्री कृष्ण तो गीता गीता ज्ञान दाता ने कह दिया कि मेरी भक्ति श्रेष्ठ

516
00:35:52,000 --> 00:35:56,240
है। जन्म जन्मांतर के बाद होती है। अब इसके बाद इसने एक लाइन आगे चिपका दी।

517
00:35:56,240 --> 00:36:01,040
परंतु यह बताने वाला सत्य कठिनता से प्राप्त होता है कि वासुदेव

518
00:36:01,040 --> 00:36:05,200
यानी जिस परमेश्वर की सत्ता सब ब्रह्मांडों पर है वही कुल का मालिक है। यह इसने

519
00:36:05,200 --> 00:36:09,200
अपना घुसेड़ दिया। वो कह रहे हैं कि मुझ वासुदेव की भक्ति कोई जन्म

520
00:36:09,200 --> 00:36:12,640
जन्मांतर में करता है और इसने अपना घुसेड़ दिया।

521
00:36:12,640 --> 00:36:16,640
तो यहां से गीता करने वाले गीता कहने वाले के द्वारा उसकी भक्ति

522
00:36:16,640 --> 00:36:22,640
करना सिद्ध होता है। सात 19 से भी और

523
00:36:28,560 --> 00:36:32,640
परंतु यह बताने वाला संत कठिनता से प्राप्त होता है। यह जो

524
00:36:32,640 --> 00:36:36,800
इसने लाइन लिखी है इसमें पहले पैराग्राफ में परंतु यह बताने वाला संत कठिनता

525
00:36:36,800 --> 00:36:41,120
से प्राप्त होता है। इस बात का संस्कृत अनुवाद

526
00:36:41,120 --> 00:36:45,200
उस श्लोक में है ही नहीं जो ये बात करता है सात 19 की। अब

527
00:36:45,200 --> 00:36:49,440
आ जाते हैं इसने बहुत सारी चीज कथाएं कही है हम लोग इसकी पर्टिकुलर इसने जो बातें

528
00:36:49,440 --> 00:36:53,600
कही हैं

529
00:36:53,600 --> 00:36:57,600
गरिमा गीता की में भगवत गीता का अर्थ करते हुए उन बातों पर हम लोग ध्यान

530
00:36:57,600 --> 00:37:01,760
दे रहे हैं सीधे-सीधे एक ये पष्ठ संख्या निकालिए

531
00:37:01,760 --> 00:37:05,760
115 115 में

532
00:37:05,760 --> 00:37:11,760
यह

533
00:37:12,080 --> 00:37:15,040
सतगुरु बोले

534
00:37:15,040 --> 00:37:19,200
करी स्नान तखत पर आए सुखदेव परम ज्ञान गहराए

535
00:37:19,200 --> 00:37:22,880
115 नीचे आइए नीचे

536
00:37:22,880 --> 00:37:27,360
करी स्नान तखत पर आए सुखदेव परम ज्ञान गहराए अकल अचिंत

537
00:37:27,360 --> 00:37:31,920
शब्द निर्मोही सुखदेव दर्श दर्श

538
00:37:31,920 --> 00:37:35,920
भर्म सब खोई कबीर राजा जनक गुरु किया कीन

539
00:37:35,920 --> 00:37:40,080
हरि की सेव अब देखो ये कहते हैं हरि राजा

540
00:37:40,080 --> 00:37:44,080
जनक को तत्व ज्ञानी तो मिला नहीं था राजा जनक को तो तत्व ज्ञानी

541
00:37:44,080 --> 00:37:48,160
कोई मिला नहीं था। फिर उसने हरि की सेवा कैसे कर ली? क्योंकि ये कहता है कि हरि

542
00:37:48,160 --> 00:37:52,320
यही है। हरियाणा में हरि आए हैं। बोलता है ना ये इसकी बात को

543
00:37:52,320 --> 00:37:56,640
ना इसी की किताबों से निकल आएगा। जूता जैसा इसके सर पर मारो। इसकी

544
00:37:56,640 --> 00:38:00,800
हर एक बकवास का जो उत्तर है वो इसकी किताबों में

545
00:38:00,800 --> 00:38:05,040
आपको मिल जाएगा। निकाल के जूता इसके सर पे मार। तो राजा

546
00:38:05,040 --> 00:38:08,640
जनक ने हरि की सेवा कैसे कर ली?

547
00:38:08,640 --> 00:38:12,720
राजा जनक को तत्वदर्शी मिल गया था क्या? हम हरि

548
00:38:12,720 --> 00:38:16,480
की सेवा कैसे कर ली? अच्छा

549
00:38:16,480 --> 00:38:21,200
कहे कबीर बैकुंठ में चले गए सुखदेव। यह भी लिखा है।

550
00:38:21,200 --> 00:38:25,520
कहे कबीर बैकुंठ में चले गए सुखदेव। सुखदेव जी को बैकुंठ

551
00:38:25,520 --> 00:38:29,680
प्राप्त हो गया। बैकुंठ का मतलब जहां कुंठा नहीं होती

552
00:38:29,680 --> 00:38:33,840
किसी प्रकार की। यानी कि अभाव नहीं होता। यानी कि पूर्ण होता है। और

553
00:38:33,840 --> 00:38:38,000
भागवत के अनुसार भी सुखदेव जी को मोक्ष मिला था। सतगुरु

554
00:38:38,000 --> 00:38:42,160
बोले अमृत वाणी गुरु बिन मुक्ति नहीं रे प्राणी अब बता भाई तूने

555
00:38:42,160 --> 00:38:46,480
वेद भाष्य किससे पढ़ा कौन है तेरा वेद को पढ़ाने वाला गुरु क्या कबीर

556
00:38:46,480 --> 00:38:50,480
ने कभी वेदों पर भाष्य किया ठीक है और

557
00:38:50,480 --> 00:38:56,480
इसमें आगे यही सब बातें लिखी हुई है गुरु के बारे में

558
00:38:57,280 --> 00:39:01,440
अच्छा हां यह और देख लो भाई

559
00:39:01,440 --> 00:39:05,760
यह कह रहा है कि 116 अगले प्रश्न पे दिखाते हैं एक बहुत बढ़िया चमत्कार

560
00:39:05,760 --> 00:39:09,360
दिखा रहा हूं आपको

561
00:39:09,360 --> 00:39:11,920
बढ़िया चमत्कार।

562
00:39:11,920 --> 00:39:15,920
अगले प्रश्न पे आइए 116 पे। 116 पे पहला ही

563
00:39:15,920 --> 00:39:20,080
जो दो चार लाइन है। हां ये देखो इसमें तीसरी लाइन देखिए आप क्या लिखा

564
00:39:20,080 --> 00:39:24,800
है? ब्रह्मा गुरु कविग्नि को कीना

565
00:39:24,800 --> 00:39:29,360
हां? होम यज्ञ जिन आज्ञा दीनना।

566
00:39:29,360 --> 00:39:33,360
पहली बात तो यह है कि आज्ञा दी गई है तो प्रमाणित हो गया यज्ञ

567
00:39:33,360 --> 00:39:37,440
की। होम यज्ञ तो भैया इनके यहां पर यज्ञ कौन-कौन करता

568
00:39:37,440 --> 00:39:41,600
है रामपाल के यहां पर यह बताएं और यहां

569
00:39:41,600 --> 00:39:47,600
पर जो है इसने माना है

570
00:39:48,880 --> 00:39:53,040
अगर इसके हिसाब से इसकी तरीके से अगर मैं अर्थ करूं तो यहां पर कबीर जी ने गुरु

571
00:39:53,040 --> 00:39:57,040
किसको माना ब्रह्मा जी को क्योंकि यह तो अपने हिसाब से कुछ

572
00:39:57,040 --> 00:40:01,120
भी अर्थ कर लेता है तो यहां पर मैं अर्थ कर ले रहा हूं कबीर जी ने गुरु

573
00:40:01,120 --> 00:40:05,440
किसको किया ब्रह्मा जी को ठीक है। कवि

574
00:40:05,440 --> 00:40:09,680
अग्नि को ब्रह्मा गुरु कीना। ठीक है। होम

575
00:40:09,680 --> 00:40:14,000
यज्ञ जिन आज्ञा दीना। तो भैया इनके यहां पर कौन है जो

576
00:40:14,000 --> 00:40:18,000
यज्ञ करता है? यह बताएं ओम यज्ञ करता है। और

577
00:40:18,000 --> 00:40:22,320
तुम्हारे तो कबीर कबीर जो हैं कबीर अग्नि हम

578
00:40:22,320 --> 00:40:26,720
तो कबीर जी जो है वह तो जो है क्या कर रहे हैं? ब्रह्मा जी को गुरु बना रहे हैं।

579
00:40:26,720 --> 00:40:32,080
ठीक है भाई। ब्रह्मा जी गुरु हो गए। कबीर जी के। चलो अब आगे चलते हैं।

580
00:40:32,080 --> 00:40:37,680
अब 118 पर आ जाइए। श्लोक क्रमांक पर आते हैं।

581
00:40:37,680 --> 00:40:41,680
गीता अध्याय पांच अच्छा हां पांच सात का जो इसने कूड़ा किया था

582
00:40:41,680 --> 00:40:46,400
वो पढ़ दूं। हमारे यहां क्या लिखा है? पांच सात में

583
00:40:46,400 --> 00:40:50,640
पांच सात में हमारे यहां लिखा है। जिसका मन अपने

584
00:40:50,640 --> 00:40:54,640
वश में है। जो जितेंद्रिय है एवं विशुद्ध अंतःकरण

585
00:40:54,640 --> 00:40:58,720
वाला है। है ना? यह प्रैक्टिसिंग के बाद जो स्थिति प्राप्त होती है उसकी

586
00:40:58,720 --> 00:41:02,800
बात हो रही है और संपूर्ण प्राणियों का आत्म स्वरूप

587
00:41:02,800 --> 00:41:04,160
परमात्मा ही जिसका

588
00:41:04,160 --> 00:41:08,320
आत्मा है यानी परमात्मा के साथ एकत्व को स्थापित करने

589
00:41:08,320 --> 00:41:12,560
वाला उसके सानिध्य को सानिध्य में रहने वाला ऐसा कर्म योगी कर्म करता

590
00:41:12,560 --> 00:41:16,800
हुआ भी लिप्त नहीं होता यानी कि आसक्ति रहित है जो राग

591
00:41:16,800 --> 00:41:20,960
द्वेष जिसमें नहीं है वो कर्मों को करते हुए भी उनसे प्रभावित

592
00:41:20,960 --> 00:41:24,960
नहीं होता यह यहां कहा गया है इसमें कहीं भी अभिमान

593
00:41:24,960 --> 00:41:29,040
होने अथवा ना होने की कोई बात यहां पर नहीं आई है। मगर इस फुअर ने

594
00:41:29,040 --> 00:41:33,040
क्या लिखा है? पुअर ने क्या लिखा है पांच सात के उसमें अर्थ करते हुए

595
00:41:33,040 --> 00:41:38,800
कि उसमें कहा गया है कि अ

596
00:41:38,800 --> 00:41:42,800
कि भाई जो सन्यासी होता है कर्म सन्यास

597
00:41:42,800 --> 00:41:46,800
उसको जो है अभिमान होते हुए भिन्न नहीं रहता। भाई इसकी संस्कृत

598
00:41:46,800 --> 00:41:50,960
कहां है? फड़ कहीं के तू कहता है मेरी बात को गलत साबित कर दो।

599
00:41:50,960 --> 00:41:55,120
दिखाना अनुवाद कहां है? कौन से शब्दों से तूने अभिमान को यहां पे ठोका है?

600
00:41:55,120 --> 00:41:58,160
ठोको ताली।

601
00:41:58,160 --> 00:42:03,040
इस समय मैं अपनी भगवत गीता पढ़ रहा हूं। अच्छा

602
00:42:03,040 --> 00:42:07,120
अब आगे आठ और नौ का अर्थ बता रहा है। अच्छा

603
00:42:07,120 --> 00:42:11,200
एक बात ध्यान दीजिएगा। ज्यादातर ऐसा होगा इसकी गीता

604
00:42:11,200 --> 00:42:15,680
में कि जहां जहां पर गीता प्रेस से

605
00:42:15,680 --> 00:42:19,840
अर्थ करते समय कभी-कभी ऐसा होता है दोद श्लोकों को एक साथ लेकर

606
00:42:19,840 --> 00:42:24,000
के उसका अनुवाद किया जाता है तो जहां जहां पर ऐसा क्योंकि खुद तो उड़क चुल्लू

607
00:42:24,000 --> 00:42:28,000
है तो ये पूरा कॉपी करता है ना तो इसलिए जहां पर उन्होंने दो श्लोक एक

608
00:42:28,000 --> 00:42:32,640
साथ होंगे तो यह भी वही पर दो श्लोक एक साथ लेगा इसका उदाहरण बता रहा हूं

609
00:42:32,640 --> 00:42:36,720
पांचवे अध्याय में जय दयाल गोविंद का जी के जो अर्थ है वहां पर आठ और नौ

610
00:42:36,720 --> 00:42:40,800
श्लोक का एक साथ अनुवाद किया गया तो इसने भी फड़ ने आठ और

611
00:42:40,800 --> 00:42:44,880
नौ श्लोक का एक साथ ही अनुवाद किया। आगे भी मिलेगा ये चीज है

612
00:42:44,880 --> 00:42:48,960
ना। तो क्या है? आठ और नौ श्लोक में यह

613
00:42:48,960 --> 00:42:53,360
कहता है कि आठ और नौ श्लोक का भाव है कि जो

614
00:42:53,360 --> 00:42:53,920
जो भी

615
00:42:53,920 --> 00:42:58,720
कर्म व्यक्ति करता है, वह सोच ले कि मैं कुछ नहीं करता। यह अनुवाद

616
00:42:58,720 --> 00:43:02,960
अन्य गीता जी के अनुवादकर्ताओं ने किया है जो गलत

617
00:43:02,960 --> 00:43:06,960
है। यानी कि यह गलत है। ठीक है? अब भैया नीचे

618
00:43:06,960 --> 00:43:12,880
करो जरा इनको दिखाओ 118 पे नीचे जाओ

619
00:43:12,880 --> 00:43:16,880
गीता अध्याय पांच श्लोक आठ और नौ का

620
00:43:16,880 --> 00:43:20,960
भावार्थ ठीक है इसमें भाव आठ और नौ का भाव

621
00:43:20,960 --> 00:43:24,960
अब देखो क्या कह रहा है श्लोक आठ और नौ का भाव

622
00:43:24,960 --> 00:43:29,040
है ये श्लोक का भाव बता रहा है भाव फिर आगे क्या

623
00:43:29,040 --> 00:43:33,040
कह रहा है यह अनुवाद इन्होंने किया है जो गलत है तो फिर तू क्यों कह

624
00:43:33,040 --> 00:43:37,280
रहा है कि ये भाव है तू भी कहना अनुवाद है शुरू से अनुवाद

625
00:43:37,280 --> 00:43:42,000
कहना अरे फ अनपढ़ है क्या तू

626
00:43:42,000 --> 00:43:46,240
ये गुस्सा मुझे पता है क्यों आता है ये इसलिए आता है कि

627
00:43:46,240 --> 00:43:50,560
जब मैं इसका अर्थ करने बैठता हूं तो भाई

628
00:43:50,560 --> 00:43:55,760
मैं सर में दर्द होता है कुछ भी लिखता है ये आदमी

629
00:43:55,760 --> 00:43:59,840
अरे कुछ तो सर पैर हो कह रहा है कि ये भाव है भाव है मतलब तू

630
00:43:59,840 --> 00:44:04,000
जानता है कि इसका अर्थ सही क्या है और तू बता रहा है कि सही क्या है फिर आगे

631
00:44:04,000 --> 00:44:08,000
जाके आगे आगे जाके कह देता है यह अनुवाद गलत किया है। अरे भाई जब

632
00:44:08,000 --> 00:44:09,120
ये अनुवाद है और गलत

633
00:44:09,120 --> 00:44:15,120
भी है तो तू भाव क्यों कह रहा है?

634
00:44:15,840 --> 00:44:20,000
फिर आगे अब ये खुद बताता है सही भाव क्या है? ठीक है अब विचार इसने

635
00:44:20,000 --> 00:44:25,040
कहा इसने तर्क दिया विचार करें। यदि कोई किसी की हत्या कर दे

636
00:44:25,040 --> 00:44:29,200
और कहे कि मैंने कुछ नहीं किया। क्या वह दोष मुक्त है? यह ज्ञान

637
00:44:29,200 --> 00:44:33,360
भगवान श्री कृष्ण का नहीं ब्रह्म काल का है। पहले कर्म करवाएगा

638
00:44:33,360 --> 00:44:37,520
फिर भोग देगा। ठीक है? तो ये काल जो है फंसाने

639
00:44:37,520 --> 00:44:41,680
वाली चीजें करता है। फिर इसी के ये काल फसाएगा तो फंसाने

640
00:44:41,680 --> 00:44:45,680
वाली चीजें करता है। फिर इसी के शास्त्रों को तू सद ग्रंथ भी मानता है। चल ठीक है।

641
00:44:45,680 --> 00:44:49,760
वो तो बातें जब किसी दिन तू अपने बिल से बाहर मिलेगा हाई कोर्ट में आएगा वो

642
00:44:49,760 --> 00:44:53,840
सब बातें तो तब होंगी। अभी तो ऐसे ही तेरे पर कच्चे उड़ाने हैं। तूने कहा था

643
00:44:53,840 --> 00:44:57,840
ना कि भैया सोशल मीडिया पे करो। कर रहा हूं। दे जवाब और एक

644
00:44:57,840 --> 00:45:01,040
करोड़ ले जा।

645
00:45:01,040 --> 00:45:05,120
हम तो अब इसने क्या कहा है कि भाई विचार करें

646
00:45:05,120 --> 00:45:09,120
अगर कोई किसी की हत्या कर दे। देखिए जो बात ये कही गई है आठ और नौ

647
00:45:09,120 --> 00:45:13,200
में पहले कहा क्या गया है उसको समझ लीजिए। तत्व को जानने वाला सांख्य योगी

648
00:45:13,200 --> 00:45:17,520
तो देखता हुआ सुनता हुआ स्पर्श करता हुआ सूंघता हुआ भोजन करता हुआ गमन

649
00:45:17,520 --> 00:45:21,600
करता हुआ सोता हुआ श्वास लेता हुआ बोलता हुआ त्यागता हुआ ग्रहण

650
00:45:21,600 --> 00:45:24,560
करता हुआ तथा आंखों को खोलता हुआ और मूंदता

651
00:45:24,560 --> 00:45:29,040
हुआ भी सब इंद्रियां अपने अपने अर्थों में बरत रही है। इस प्रकार

652
00:45:29,040 --> 00:45:33,040
समझकर निसंदेह ऐसा माने माने कि मैं कुछ भी नहीं

653
00:45:33,040 --> 00:45:37,120
करता हूं। अब इसने यहां पे इस चीज का उदाहरण यहां किसकी बात हो रही है? जो तत्व

654
00:45:37,120 --> 00:45:41,120
को जानने वाला है उसको ऐसा मानना चाहिए। और यहां इसने क्या कहा

655
00:45:41,120 --> 00:45:45,200
है कि भाई अह जो कोई हत्या कर देगा तो वो

656
00:45:45,200 --> 00:45:49,200
यह मानेगा कि मैंने मैंने कुछ नहीं किया। पहली बात तो यह है कि हत्या जब

657
00:45:49,200 --> 00:45:53,360
जैसे तूने हत्या की तो तू भले ही यह मान के मैंने नहीं की। मगर वो कोर्ट तुझको

658
00:45:53,360 --> 00:45:57,520
दे ठोक देगी जेल में और वहां पे होगी ठुकाई वहां पे अच्छे

659
00:45:57,520 --> 00:46:01,600
से ठुकाई होगी और वो तुझे कुछ नहीं वहां निर्णय करना है मैंने किया

660
00:46:01,600 --> 00:46:05,680
कि नहीं किया वो कोर्ट करेगी निर्णय न्यायालय करेगा पहले तो ये वाली बात है हत्या

661
00:46:05,680 --> 00:46:10,240
करने वाली बात दूसरी बात ये है कि भाई

662
00:46:10,240 --> 00:46:14,240
जो तत्व को जानने वाला है वो हत्या क्यों करेगा तत्व

663
00:46:14,240 --> 00:46:18,240
को जानने वाला तो यानी कि धर्म को जानने वाला ह

664
00:46:18,240 --> 00:46:22,320
तत्व को जानने वाला हत्या करता है क्या इसका मतलब कि तू हत्यारा है

665
00:46:22,320 --> 00:46:26,640
क्योंकि तू अपने आप को तत्वदर्शी कहता है और तेरे अनुसार तत्व को जानने वाला हत्या

666
00:46:26,640 --> 00:46:30,800
करता है। भाई तत्व को जानने वाला यानी धर्म को जानने वाला वो

667
00:46:30,800 --> 00:46:35,040
हत्या क्यों करेगा? वो तो जिन कर्मों को कर्तव्य कर्मों

668
00:46:35,040 --> 00:46:39,120
को कर रहा है। यानी कि यहां पर कर्तव्य कर्मों की बात हो रही है। यहां पाप कर्म को

669
00:46:39,120 --> 00:46:39,620
तो भूल ही

670
00:46:39,600 --> 00:46:43,680
जाओ। यहां बात हो रही है कि आप जो कर्तव्य कर्म भी कर रहे हैं उसके लिए भी

671
00:46:43,680 --> 00:46:47,760
आप यह सोचो कि आप नहीं कर रहे हैं। यानी जो अच्छे कार्य भी आप कर रहे हैं

672
00:46:47,760 --> 00:46:51,760
उसके लिए भी स्वयं के ऊपर ना लाओ। अहंकार मत लाओ कि मैंने

673
00:46:51,760 --> 00:46:56,320
किया। यानी धर्म कार्य के लिए भी ऐसा मत सोचो कि मैंने किया।

674
00:46:56,320 --> 00:47:00,560
इसके लिए ऐसा कहा जा रहा है। मैं तो कुछ कर ही नहीं रहा हूं। और यही बात नैनम चिंदती शस्त्राणी

675
00:47:00,560 --> 00:47:04,560
भी साउंड करता है कि कोई कुछ कर ही नहीं सकता।

676
00:47:04,560 --> 00:47:08,560
तुमको कुछ हो ही नहीं सकता क्योंकि तुम कहीं से लिप्त हो ही नहीं। दूसरी बात ये

677
00:47:08,560 --> 00:47:12,560
आती है कि कर्तव्य कर्मों

678
00:47:12,560 --> 00:47:16,640
को करने पर भी तुम यह मत सोचो कि ये मैंने किया है। मगर सबसे जरूरी

679
00:47:16,640 --> 00:47:20,640
बात यह आती है कि इसे कहते हैं अहंकार। अब यहां पर ये फुअर

680
00:47:20,640 --> 00:47:25,120
अहंकार का पक्ष ले रहा है। यानी हमें अहम करना चाहिए। देखो देखो

681
00:47:25,120 --> 00:47:29,280
हमने उसको पाइप बांट दिए अनाकोंडा के बराबर। देखो देखो

682
00:47:29,280 --> 00:47:33,280
मैंने उसको चीनी दे दी 4 किलो। देखो देखो मैंने वहां पर राहत

683
00:47:33,280 --> 00:47:37,440
कार्य कर दिया। इसलिए रामपाल के अनुसार रामपाल के

684
00:47:37,440 --> 00:47:41,440
चेलों के अनुसार सब लोगों को अपने-अ अपने घर की गरिमा को भंग करते

685
00:47:41,440 --> 00:47:45,600
हुए अपनी गरिमा को गरिमा के ध्वज को लहराने वाली जो

686
00:47:45,600 --> 00:47:49,760
भी विषय वस्तु व्यक्ति स्थिति स्त्री होती है उसको रामपाल के पास भेज

687
00:47:49,760 --> 00:47:53,760
देना चाहिए। क्योंकि भाई रामपाल ने पाइप बांटे हैं। रामपाल को

688
00:47:53,760 --> 00:47:54,640
अहंकार है

689
00:47:54,640 --> 00:47:58,720
और रामपाल पीछे कह रहा था अहंकार नहीं होना चाहिए और यहां पर कह रहा है कि

690
00:47:58,720 --> 00:48:02,960
अहंकार होना चाहिए। ठोको ताली क्योंकि यह है रामपाल का

691
00:48:02,960 --> 00:48:07,520
कॉमेडी शो कॉमेडी नाइट वि रामपाल

692
00:48:07,520 --> 00:48:11,920
ठोको ताली कितनी घटियाई बातें हैं भाई तेरी हर पन्ने

693
00:48:11,920 --> 00:48:15,920
पे अपनी पहली बात को तू काटता है हर दूसरी बात से तू अपनी पहली बात

694
00:48:15,920 --> 00:48:20,080
को काटता है ये जो मुझे जो गुस्सा आता है इसीलिए

695
00:48:20,080 --> 00:48:24,160
आता है वो सब बातें तो एक तरफ है कि उसने ये कहा है वो कहा है मगर ये

696
00:48:24,160 --> 00:48:28,240
गुस्सा इसलिए आता है ये सब कचरा मुझे अब मुझे

697
00:48:28,240 --> 00:48:32,400
पढ़ना पड़ता और इसके बारे में बात करनी पड़ती है

698
00:48:32,400 --> 00:48:37,040
आप लोगों से। [हंसी]

699
00:48:37,040 --> 00:48:41,040
अच्छा तो आप लोग यहां समझ गए पांच और आठ

700
00:48:41,040 --> 00:48:45,360
और नौ में क्या कहा जा रहा है और ये क्या कह रहा है। ठीक है। इसने

701
00:48:45,360 --> 00:48:49,680
क्या कहा है आठ और नौ का अर्थ? अब इसने विचार तो करने को कह दिया था। फिर आगे कह रहा है

702
00:48:49,680 --> 00:48:53,840
कि तत्व ज्ञान युक्त साधक सर्व कर्म करता हुआ ध्यान

703
00:48:53,840 --> 00:48:58,560
रखता है कि मैं कोई पाप कर्म तो नहीं कर रहा हूं। इसलिए कहा है कि वह ज्ञान

704
00:48:58,560 --> 00:49:02,960
आधार से सोच समझकर सर्व्म करता है। अब यह फवर ने

705
00:49:02,960 --> 00:49:07,280
यहां पर जो भी बातें लिखी है इस जगह पे है ना उसका

706
00:49:07,280 --> 00:49:10,960
संस्कृत अनुवाद तो करके दिखा

707
00:49:10,960 --> 00:49:14,720
शास्त्र चोर कहीं के

708
00:49:14,720 --> 00:49:18,880
खैर आगे चलते हैं। तालियां ठोकते रहिए बीच-बीच में।

709
00:49:18,880 --> 00:49:24,880
अच्छा आगे इसने क्या बोला है? गीता के इस अध्याय

710
00:49:25,840 --> 00:49:30,080
पांच श्लोक के 14 15 16

711
00:49:30,080 --> 00:49:35,520
19 20 24 25 26

712
00:49:35,520 --> 00:49:39,600
अब देखिए इसने 10 11 और 10 11 12 13 की बात ही नहीं की

713
00:49:39,600 --> 00:49:43,680
है। सीधा 14 पे आ गया। चोर है ना कहीं ना कहीं तो

714
00:49:43,680 --> 00:49:47,680
फसेगा। ये जो बात कहता है कि काल ने कुछ श्लोक अपने मन से कह

715
00:49:47,680 --> 00:49:51,840
दिए। ये लोग कभी बता ही नहीं सकते कि काल ने कितने श्लोक कौन-कौन से कहां-कहां

716
00:49:51,840 --> 00:49:55,920
पर अपने मन से कहे। क्योंकि इनके अनुसार तो सारे श्लोक कट जाएंगे।

717
00:49:55,920 --> 00:49:59,920
बहुत कम श्लोक बचेंगे गीता के। खैर अब

718
00:49:59,920 --> 00:50:03,920
इसने जो है 10 11 12 13 की बात नहीं की। आठ नौ के नहीं

719
00:50:03,920 --> 00:50:08,320
10 से 13 की बात की है। 10 से 13 की बात की है। क्या कह रहा है? अध्याय

720
00:50:08,320 --> 00:50:12,720
पांच के श्लोक 10 से 13 में कहा है कि आत्म तत्व में आए

721
00:50:12,720 --> 00:50:16,880
साधक अर्थात जिन्होंने पूर्ण परमात्मा का ज्ञान हुआ।

722
00:50:16,880 --> 00:50:21,200
जिनको पूर्ण परमात्मा का ज्ञान हुआ तथा पूर्ण गुरु के नाम से लिया।

723
00:50:21,200 --> 00:50:25,680
वह पूर्ण गुरु से नाम लिया। वह व्यक्ति शुभ कर्म करता है।

724
00:50:25,680 --> 00:50:29,680
इसलिए कर्मों के बंधन में नहीं बंधता है। तथा

725
00:50:29,680 --> 00:50:30,180
अब

726
00:50:30,000 --> 00:50:34,080
देखो इसने क्या मान लिया? जिसको तत्व ज्ञान है वो शुभ कर्म करता है। तो फिर तू

727
00:50:34,080 --> 00:50:38,240
क्यों कह रहा है भैया हत्या करेगा तो हत्या का दोष उस पर लगेगा कि नहीं? अगर तेरी बात भी मान

728
00:50:38,240 --> 00:50:43,200
ली जाए कि तत्व ज्ञान तेरा नाम है। तो जिसके पास तत्व ज्ञान है वो

729
00:50:43,200 --> 00:50:47,200
हत्या क्यों करेगा जो उससे तू उसकी तुलना कर रहा है। वह तो सिर्फ धर्म कार्य करेगा।

730
00:50:47,200 --> 00:50:51,360
तो शास्त्र तो यह कह रहे हैं कि धर्म कार्य का धर्म कार्य करने

731
00:50:51,360 --> 00:50:55,680
के लिए भी अहम भाव अपने ऊपर मत लाओ। इसमें क्या गलत कह रहे हैं शास्त्र

732
00:50:55,680 --> 00:50:59,520
खैर

733
00:50:59,520 --> 00:51:03,520
अब जो है आगे अब हम लोग अपना 10 से 13 का अर्थ

734
00:51:03,520 --> 00:51:07,760
पढ़ते हैं क्या है? तो 10 में लिखा है जो पुरुष सब कर्मों

735
00:51:07,760 --> 00:51:11,840
को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर्म करता

736
00:51:11,840 --> 00:51:15,920
है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भांति पाप से लिप्त नहीं

737
00:51:15,920 --> 00:51:20,320
होता। ठीक है। यहां पर संस्कृत

738
00:51:20,320 --> 00:51:24,560
की इसमें संस्कृत के साथ इन्होंने गरिमा

739
00:51:24,560 --> 00:51:30,480
भंग कर दी संस्कृत की। आगे क्या कह रहा है?

740
00:51:30,480 --> 00:51:34,960
भगवत गीता क्या कहती है आगे? अह 11वें

741
00:51:34,960 --> 00:51:39,120
श्लोक का अर्थ कर्म योगी ममत्व बुद्धि रहित केवल इंद्रिय मन

742
00:51:39,120 --> 00:51:43,200
बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म

743
00:51:43,200 --> 00:51:45,280
करते हैं। ममत्व की बुद्धि

744
00:51:45,280 --> 00:51:49,280
रहित वही वाली बात कि अगर ऐसा सोचो कि इंद्रियां ही इंद्रियों में गुण

745
00:51:49,280 --> 00:51:53,520
गुण ही गुण में बरत रहे हैं और अपना अहम भाव ना लाओ तो ममत्व की बुद्धि

746
00:51:53,520 --> 00:51:57,680
रहे राग द्वेष इत्यादि से रहित हो के और इंद्रिय मन बुद्धि

747
00:51:57,680 --> 00:52:01,680
और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं

748
00:52:01,680 --> 00:52:05,760
तो उनके मन में किसी के प्रति राग द्वेष नहीं होता है। तत्व कुछ भी मान

749
00:52:05,760 --> 00:52:10,000
लो जो सना परंपरा प्राप्त तत्व का अर्थ है यहां पर वह मान लो या रामपाल

750
00:52:10,000 --> 00:52:14,160
का तत्व मान लो मगर तत्व ज्ञान जिसको है वो हत्या

751
00:52:14,160 --> 00:52:18,400
जैसी चीजें क्या अत्याचार पाप कर्म नहीं करेगा

752
00:52:18,400 --> 00:52:22,480
कर्तव्य कर्म करेगा अगर हत्या होगी तो वध के रूप में होगी किसी दुराचारी की हत्या

753
00:52:22,480 --> 00:52:26,800
होगी जैसे अर्जुन को करने के लिए कह रहे हैं भगवान यहां पर

754
00:52:26,800 --> 00:52:30,880
आगे चलते हैं पांच 12 में कहा गया है कर्म योगी

755
00:52:30,880 --> 00:52:34,960
कर्मों के फल का त्याग करके भगवत प्राप्ति रूप शांति को प्राप्त होता है

756
00:52:34,960 --> 00:52:39,040
और सकाम पुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बंधता

757
00:52:39,040 --> 00:52:43,120
है। ठीक है? अब आप एक चीज नोटिस करिए

758
00:52:43,120 --> 00:52:47,200
कि 10 से लेकर 13 में हर श्लोक अलग-अलग बातें कर रहा है।

759
00:52:47,200 --> 00:52:51,360
क्रम को आगे बढ़ा रहा है। मगर इसने केवल एक बात कर दी। 10 से

760
00:52:51,360 --> 00:52:55,440
13 में क्या कहा गया है? इस 10 से 13 में कहा गया कि आत्म तत्व

761
00:52:55,440 --> 00:52:59,440
में आए साधक जिन्होंने पूर्ण परमात्मा का ज्ञान जिनको पूर्ण परमात्मा

762
00:52:59,440 --> 00:53:00,400
का ज्ञान हुआ

763
00:53:00,400 --> 00:53:04,480
तथा पूर्ण गुरु से नाम लिया ले लिया वह व्यक्ति शुभ कर्म करता है

764
00:53:04,480 --> 00:53:08,560
इसलिए कर्मों के बंधन में नहीं बंधता तथा अन्य काल ब्रह्म ज्ञान के

765
00:53:08,560 --> 00:53:12,640
आधार पर अन्य लोग जो है वह काल ब्रह्म के आधार पर कर्म करते

766
00:53:12,640 --> 00:53:17,280
हैं और फिर कर्म फल भोगते हैं। ठीक है? तो

767
00:53:17,280 --> 00:53:21,360
यहां पर काल ब्रह्म के आधार पर कर्म करते हैं। ऐसा

768
00:53:21,360 --> 00:53:25,440
कहीं नहीं लिखा है। और इन श्लोकों में अलग-अलग बातें हो रही। जैसे

769
00:53:25,440 --> 00:53:29,600
इन शब्दों का अनुवाद कहीं है ही नहीं। इसकी बात में ममत्व, बुद्धि रहित केवल

770
00:53:29,600 --> 00:53:33,680
इंद्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर यह सब अनुवाद का घोल

771
00:53:33,680 --> 00:53:37,680
घपला कुछ है ही नहीं। यहां पर है ना? फाड़ के फेंक दिया जाए।

772
00:53:37,680 --> 00:53:41,680
इनके हिसाब से इनके लोग तो बोलते हैं इनके चूहे भगत। फिर कर्म योगी कर्मों

773
00:53:41,680 --> 00:53:45,840
के फल का त्याग करके भगवत प्राप्त रूपी शांति को प्राप्त होता है। तो

774
00:53:45,840 --> 00:53:50,000
यह भैया शांति को प्राप्त हो रहा है। फिर फिर इसकी बात क्यों नहीं की

775
00:53:50,000 --> 00:53:54,080
इसने? हां यह भी नहीं

776
00:53:54,080 --> 00:53:58,080
बात की। 5 13 क्या कह रहा है? अंतःकरण जिसके वश में है। ऐसा सांख्य

777
00:53:58,080 --> 00:54:02,080
योग आचरण करने वाला पुरुष ना करता हुआ और ना करवाता हुआ

778
00:54:02,080 --> 00:54:06,240
ही नव द्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्याग कर

779
00:54:06,240 --> 00:54:10,400
आनंद पूर्वक सच्चिदानंद घन ब्रह्म सच्चिदानंद

780
00:54:10,400 --> 00:54:14,480
घन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है। लो यहां भी सच्चिदानंद की बात हो

781
00:54:14,480 --> 00:54:15,520
गई। परमात्मा

782
00:54:15,520 --> 00:54:19,600
की बात हो गई, सुख की बात हो गई। तो यहां

783
00:54:19,600 --> 00:54:23,920
सर्व कर्म करते हुए भी परमात्मा

784
00:54:23,920 --> 00:54:27,920
में समर्पित समझकर कि मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। कर्तव्य कर्मों का पालन मात्र कर

785
00:54:27,920 --> 00:54:32,000
रहा हूं। इस रूप में कर्म करते हुए अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए वो कर्म करते

786
00:54:32,000 --> 00:54:36,720
हैं। और ऐसे लोग जो होते हैं वो सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा में स्थित रहते हैं।

787
00:54:36,720 --> 00:54:41,280
सुख में स्थित रहते हैं। सुख का मतलब क्या है? ज्ञान स्वरूप। सुख क्या है?

788
00:54:41,280 --> 00:54:45,360
सुख आएगा आपके पास ज्ञान के रूप में। तो सुख का अर्थ क्या हुआ? फाइनली

789
00:54:45,360 --> 00:54:49,440
जो सुख है उसका अर्थ क्या हुआ? सुख का अर्थ है ईश्वर। तो इसलिए यहां पर

790
00:54:49,440 --> 00:54:53,600
ईश्वर लिखा गया। ठीक है? अब ये आ जाता है 5 14

791
00:54:53,600 --> 00:54:57,680
पे। 5 13 में तो इसने घोल घपला कर दिया। श्लोकों का अलग-अलग अर्थ

792
00:54:57,680 --> 00:55:01,680
किया ही नहीं। वो उस समय इसको शायद कोई छूने वाली आ गई हो आश्रम में। तो

793
00:55:01,680 --> 00:55:06,000
ये इसको लगाओ इन 10 से लेके और 13 तक के श्लोकों का अर्थ जल्दी

794
00:55:06,000 --> 00:55:10,240
से र सपड़ा मार सपाटा मार दो। तो इसने अपना जल्दी से मार दिया। अलग-अलग

795
00:55:10,240 --> 00:55:14,560
अर्थ नहीं किया उन सारे श्लोकों का। और अब जो है फिर से पांच

796
00:55:14,560 --> 00:55:18,720
14 पांच के पांचव अध्याय के 14 15 16 19

797
00:55:18,720 --> 00:55:22,800
20 24 25 26 इसमें ये जो है कुछ लोगों को छोड़ रहा है। उसका

798
00:55:22,800 --> 00:55:28,720
क्या करेगा वो नहीं पता। खैर तो

799
00:55:28,720 --> 00:55:30,800
यह इसका जहां मन होता है ऐसे ही जंप

800
00:55:30,800 --> 00:55:34,880
मार जाता है। लोग जो जेल में बंद होते हैं वो कई

801
00:55:34,880 --> 00:55:38,960
बार जेल से भागने की प्रैक्टिस करते हैं। उसमें एक प्रैक्टिस होती है कि उनको

802
00:55:38,960 --> 00:55:43,520
कोई लंबा सा बंबू मिल जाए और बंबू लेकर के वो उसका

803
00:55:43,520 --> 00:55:47,520
सहारा लेकर के और दीवार को फान जाए जेल की। हालांकि मेरी जानकारी में अभी तक ऐसा

804
00:55:47,520 --> 00:55:51,520
हुआ नहीं है। पर जिस प्रकार से ऐसी भावना जेल में बंद लोगों के मन

805
00:55:51,520 --> 00:55:55,600
के अंदर आती है, उसी प्रकार की भावना गीता पर बात करते समय

806
00:55:55,600 --> 00:55:59,840
इस जेल कट्टू रामपाल के मन में आती है। जगह-जगह पर यह श्लोकों पर जंप

807
00:55:59,840 --> 00:56:03,920
मार देता है। जैसे 10 से लेकर 13 के बीच में इसने दो-तीन पंक्तियों

808
00:56:03,920 --> 00:56:08,560
में ही चार श्लोकों का अर्थ कर दिया और एक का भी हिंदी अनुवाद इसने नहीं लिखा।

809
00:56:08,560 --> 00:56:12,640
ठोको ताली। आगे चलते हैं। अब यह कह

810
00:56:12,640 --> 00:56:17,120
रहा है कि गीता ज्ञान बोलने वाले से अन्य पूर्ण परमात्मा

811
00:56:17,120 --> 00:56:21,760
है। यह बात गीता के इस अध्याय पांच के श्लोक 14, 15, 16,

812
00:56:21,760 --> 00:56:26,000
19, 20, 24, 25, 26 में कही गई है। गीता

813
00:56:26,000 --> 00:56:30,160
ज्ञान बताने वाला अपने से अन्य पूर्ण परमात्मा की भक्ति बता रहा है। कहीं नहीं बता रहा है। देखते

814
00:56:30,160 --> 00:56:33,120
हैं कैसे। देखो

815
00:56:33,120 --> 00:56:37,120
सबसे पहले पांच श्लोक 14, 15, 16 में क्या कहा गया है?

816
00:56:37,120 --> 00:56:41,280
देख लेते हैं। कहा है कि पूर्ण परमात्मा ने जब

817
00:56:41,280 --> 00:56:45,280
सतलोक में सृष्टि रची थी। उस समय किसी को कोई कर्म आधार बनाकर

818
00:56:45,280 --> 00:56:45,920
उत्पत्ति नहीं

819
00:56:45,920 --> 00:56:50,160
की थी। सत्यलोक में सुंदर शरीर दिया था जो कभी विनाश नहीं होता।

820
00:56:50,160 --> 00:56:55,200
परंतु प्रभु ने कर्म फल का विधान अवश्य बनाया था।

821
00:56:55,200 --> 00:56:59,280
इसलिए सर्व प्राणी इसलिए सर्व

822
00:56:59,280 --> 00:57:02,720
प्राणी

823
00:57:02,720 --> 00:57:06,960
अपने स्वभाव वश कर्म करके सुख व दुख की भोगी होते

824
00:57:06,960 --> 00:57:11,120
हैं। जैसे हम सर्व आत्माएं सत्यलोक में पूर्ण ब्रह्म परमात्मा द्वारा

825
00:57:11,120 --> 00:57:15,520
अपने मध्य से शब्द शक्ति से उत्पन्न किए

826
00:57:15,520 --> 00:57:19,840
गए। वहां हमें कोई कर्म नहीं करना था तथा सर्व सुख उपलब्ध

827
00:57:19,840 --> 00:57:23,840
थे। हम स्वयं अपने स्वभाववश ध्यान रखिएगा आत्मा

828
00:57:23,840 --> 00:57:28,240
का स्वभाव है। क्या है? हम अपने स्वभाववश होकर ज्योति

829
00:57:28,240 --> 00:57:32,480
निरंजन ब्रह्म काल पर आसक्त होकर अपने सुखदाई प्रभु से विमुख हो गए।

830
00:57:32,480 --> 00:57:36,960
ठीक? अब यहां पर एक बात है कि इसने प्रभु का अर्थ मान लिया

831
00:57:36,960 --> 00:57:40,960
परमेश्वर। यह ध्यान रखना प्रभु का अर्थ भी परमेश्वर

832
00:57:40,960 --> 00:57:45,280
माना है। तो कई जगह पर रामचंद्र जी के लिए कृष्ण भगवान

833
00:57:45,280 --> 00:57:50,240
के लिए प्रभु शब्द आया है। जैसे रामायण में आया है भगवान

834
00:57:50,240 --> 00:57:54,480
राम जी के लिए या अन्य शास्त्रों में आया है कि वो स्वयं प्रभु है। जैसे कृष्णस्तु

835
00:57:54,480 --> 00:57:58,480
भगवान स्वयं आया वैसे स्वयं प्रभु राम जी के लिए आया है। तो राम जी भी

836
00:57:58,480 --> 00:58:01,040
परमेश्वर सिद्ध हो रहे हैं ना प्रभु के अर्थ

837
00:58:01,040 --> 00:58:05,760
में। अच्छा दूसरी बात एक है कि

838
00:58:05,760 --> 00:58:09,760
स्वभाववश यानी कि आत्मा का स्वभाव क्या है? इसके

839
00:58:09,760 --> 00:58:13,920
अनुसार काल की ओर आकृष्ट होना और काल क्या करवाता

840
00:58:13,920 --> 00:58:17,920
है? काल अज्ञान देता है। अधर्म करवाता है। तो इसका अर्थ क्या

841
00:58:17,920 --> 00:58:22,240
हुआ? कि काल की ओर आकृष्ट हो के अधर्म करना

842
00:58:22,240 --> 00:58:26,320
पाप करना इसके अनुसार रामपाल के अनुसार वह आत्मा का

843
00:58:26,320 --> 00:58:30,320
स्वभाव है। आत्मा का अगर स्वभाव है तो इसका मतलब आत्मा

844
00:58:30,320 --> 00:58:34,320
वही कर रही है जो उसे करना होता है। स्वभाव क्या होता है? वही कर्म

845
00:58:34,320 --> 00:58:38,400
करना जो उसे करना है। ठीक है? तो यहां पर इसने ये मान लिया। तो इसका

846
00:58:38,400 --> 00:58:42,400
अर्थ क्या है? इसके अनुसार यह व्यक्ति को सिद्धि नहीं कर पाएगा कि

847
00:58:42,400 --> 00:58:46,400
तेरा स्वभाव तो भैया भगवान की ओर आकृष्ट होना है। काल की ओर

848
00:58:46,400 --> 00:58:50,480
नहीं। तेरा स्वभाव तो मुक्ति है। तेरा स्वभाव तो सदाचरण है। धर्माचरण

849
00:58:50,480 --> 00:58:54,640
है। स्वभाव तो इसने पाप मान लिया। यह तो सबको पापी बनाएगा। अपना आटा खिला

850
00:58:54,640 --> 00:58:59,280
के, चीनी खिला के, तेल पिला के और ना जाने क्या-क्या पिला के।

851
00:58:59,280 --> 00:59:04,480
खैर आगे चलते हैं।

852
00:59:04,480 --> 00:59:08,640
फिर इसने 5:15 के उसमें अर्थ में कहा है। अच्छा हम लोग भी पढ़

853
00:59:08,640 --> 00:59:14,480
लेते हैं जरा।

854
00:59:14,480 --> 00:59:19,970
पांच से 17 तक हम भी पहले इसकी पूरी बात पढ़ ले फिर क्या है तो इसमें

855
00:59:19,970 --> 00:59:24,080
[गला साफ़ करने की आवाज़] फिर आगे लिखा है अब जैसे कर्म करते हैं उसी के अनुसार

856
00:59:24,080 --> 00:59:28,240
प्राप्त हो रहे हैं शास्त्र विधि के अनुसार साधना करने से क्षमा कर देता है अन्यथा

857
00:59:28,240 --> 00:59:33,680
संस्कार ही बरतता है अध्याय पांच 14 26 तक शास्त्र अनुकूल भक्ति

858
00:59:33,680 --> 00:59:37,920
कर्म तथा मर्यादा में रहकर पूर्ण परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं तथा पूर्ण प्रभु

859
00:59:37,920 --> 00:59:42,640
पाप पाप क्षमा कर देता है इसलिए लिए कर्म करता हुआ ही पूर्ण

860
00:59:42,640 --> 00:59:47,440
मुक्त होता है। जबकि इसने अपनी पिछली इसी

861
00:59:47,440 --> 00:59:51,440
पांचव अध्याय में इसने माना था कि वो जो है पाप कर्म वगैरह क्षमा नहीं

862
00:59:51,440 --> 00:59:55,440
करता कुछ नहीं करता। वो कुछ नहीं करता है। और यहां पर मान रहा है

863
00:59:55,440 --> 01:00:01,440
कि पाप कर्म क्षमा कर देता है। ठीक है? अब जो है

864
01:00:02,640 --> 01:00:08,640
एक बात तो यह है कि इसने पांच 14 में

865
01:00:08,720 --> 01:00:13,280
जो संस्कृत में प्रभु शब्द आया है उसका अर्थ इसने परमेश्वर माना

866
01:00:13,280 --> 01:00:17,600
पांच 15 में विभु शब्द आया है। विभु का मतलब व्यापक सर्वव्यापक

867
01:00:17,600 --> 01:00:21,680
तो विभु का मतलब इसने जो है वहां भी परमेश्वर मान लिया। इसका मतलब इसने मान लिया

868
01:00:21,680 --> 01:00:25,680
कि जो परमेश्वर है वो सब जगह है। सर्वव्यापक मान लिया। इसलिए क्या करता है

869
01:00:25,680 --> 01:00:29,680
ना जहां देखता है कि यहां पे हमारी बातें कट रही है तो वहां पे खोल खोल के एक-एक शब्द पे

870
01:00:29,680 --> 01:00:33,760
बात नहीं करता। जहां पे इसके मतलब का कुछ निकल रहा होगा वहीं पे बात करेगा जैसे अभी

871
01:00:33,760 --> 01:00:38,000
थोड़ी देर आगे करेगा। तो

872
01:00:38,000 --> 01:00:42,960
आगे सब अगले पैराग्राफ में कह रहा है पांच

873
01:00:42,960 --> 01:00:47,280
14 15 16 19 20 24 25 26 का अर्थ करते हुए अगले अगले पैराग्राफ

874
01:00:47,280 --> 01:00:51,280
में कह रहा है सब स्वभाववश चलते हैं। कर्म तो काल ज्योति

875
01:00:51,280 --> 01:00:55,280
निरंजन ने लगा रखे हैं। वही अज्ञान पैदा करके जीवों को भ्रमित करता है।

876
01:00:55,280 --> 01:00:59,840
देख ले भाई तू ताल ठोक रहा है ना अपने 50 लाख वाले इनामी

877
01:00:59,840 --> 01:01:03,920
कूपन वाले वीडियो में कि भैया ये सद ग्रंथ है। सद

878
01:01:03,920 --> 01:01:08,880
ग्रंथ को कहने वाला तो अज्ञान पैदा करके जीवो को भ्रमित करता है। भाई

879
01:01:08,880 --> 01:01:12,880
दिख रहा है? अंधे हो तुम लोग जो इसकी बातों में आते हो।

880
01:01:12,880 --> 01:01:17,200
अंधे और पुअर पत्रकार जो इसका प्रचार

881
01:01:17,200 --> 01:01:22,800
करते घूम रहे हैं। पेड़ प्रचारक

882
01:01:22,800 --> 01:01:26,960
वास्तविक ज्ञान पूर्ण परमात्मा का अज्ञान काल ज्ञान के द्वारा दबा

883
01:01:26,960 --> 01:01:30,960
रखा है। काल ने वास्तविक ज्ञान को दबा रखा है। ध्यान रखो। काल ने वास्तविक

884
01:01:30,960 --> 01:01:35,120
ज्ञान को दबा रखा है। यानी कि गीता में गीता कहने वाला

885
01:01:35,120 --> 01:01:39,200
काल है और वेद भी कहने वाला काल ही है।

886
01:01:39,200 --> 01:01:43,200
तो उसने तो ज्ञान को दबा रखा है। काहे है कि सद ग्रंथ बिल

887
01:01:43,200 --> 01:01:47,360
से बाहर तो निकल फड़ कहीं के बात करता है।

888
01:01:47,360 --> 01:01:52,400
हां तो वास्तविक ज्ञान

889
01:01:52,400 --> 01:01:56,960
दबा रखा है। जिससे अज्ञानी जिनको पूर्ण ब्रह्म परमात्मा का ज्ञान नहीं है मोहित हो रहे हैं।

890
01:01:56,960 --> 01:02:00,960
इस अज्ञान काल ज्ञान को तत्व ज्ञान पूर्ण परमात्मा के

891
01:02:00,960 --> 01:02:05,040
ज्ञान द्वारा नष्ट करके उत्तम ज्ञान को सूर्य की तरह प्रकाशित कर दिया जाता है।

892
01:02:05,040 --> 01:02:09,040
जिनको पूर्ण ज्ञान हो गया है। वह वह व्यक्ति पूर्ण संत के नाम से पूर्ण

893
01:02:09,040 --> 01:02:13,440
संत से नाम ले लेता है। बस एक ही बात है। नाम ले लेता है।

894
01:02:13,440 --> 01:02:17,520
वहां संशय दूर होने की बात हो रही है। नाम ले लो। नाम ले लो भाई।

895
01:02:17,520 --> 01:02:21,840
पूर्ण संत से नाम ले लो। वो बताया

896
01:02:21,840 --> 01:02:26,640
उस जो सोनिया माथुर है उसने अपने वीडियो उन्होंने अपने वीडियो में दिखाया था।

897
01:02:26,640 --> 01:02:31,040
पता नहीं क्या वो बंदर की एक तस्वीर लगी हुई थी और आवाज आ रही थी। कॉमेडी

898
01:02:31,040 --> 01:02:34,560
था अच्छी। खैर

899
01:02:34,560 --> 01:02:38,000
तो जिनको पूर्ण ज्ञान हो गया वह पूर्ण संत के नाम पूर्ण

900
01:02:38,000 --> 01:02:42,240
संत से नाम ले लेता है तथा काल साधना त्याग देता है क्योंकि सत्य नाम से पाप कटते हैं। अपने पापों

901
01:02:42,240 --> 01:02:46,400
को पूर्ण ज्ञान से समझकर सतनाम व सारनाम से काटकर एक रस

902
01:02:46,400 --> 01:02:50,480
होकर अविनाशी परमात्मा पूर्ण ब्रह्म सत्पुरुष में स्थित होकर जन्म मरण से मुक्त हो जाता

903
01:02:50,480 --> 01:02:53,520
है।

904
01:02:53,520 --> 01:02:57,600
अब यह सबसे पहली बात तो अनुवाद है ही

905
01:02:57,600 --> 01:03:01,600
नहीं इसमें और कोरी बकवास भाई शब्दार्थ के अनुसार अनुवाद करता

906
01:03:01,600 --> 01:03:05,840
चलना जिससे व्यक्ति समझ पाए कि भाई गीता ये कह रही है और तू भी उसी

907
01:03:05,840 --> 01:03:10,080
के अनुसार बता रहा है और दूसरी बात इसने 5 17

908
01:03:10,080 --> 01:03:14,320
को तो छुआ ही नहीं क्योंकि 5 17 में क्या कहा जा रहा है 5

909
01:03:14,320 --> 01:03:18,480
17 में कहा जा रहा है जो पीछे जो बताया जा रहा है उसके अनुसार जो बरतता

910
01:03:18,480 --> 01:03:24,320
है उसके अनुसार जो चलता है वह मुक्त होता है अभी बात करते हैं

911
01:03:24,320 --> 01:03:29,040
सबसे पहले तो हम 5 14 से लेकर के और इसने

912
01:03:29,040 --> 01:03:33,040
14 15 16 की बात कही है। 17 को इसने छोड़ दिया है। तो

913
01:03:33,040 --> 01:03:37,600
हम 14 से लेकर 17 तक पढ़ते हैं वास्तविकता में क्या लिखा है? परमेश्वर

914
01:03:37,600 --> 01:03:41,760
मनुष्य के ना तो कर्तापन की ना कर्मों की ना कर्म फल के संयोग की रचना करता है। किंतु

915
01:03:41,760 --> 01:03:46,160
स्वभाव ही बरत रहा है। तो क्या है

916
01:03:46,160 --> 01:03:50,240
कि सबसे पहली बात यह अनुवाद के अनुसार इसने

917
01:03:50,240 --> 01:03:53,040
यहां पर कोई बात नहीं की। ये कोरी बकवास की है। फिर आगे क्या

918
01:03:53,040 --> 01:03:57,280
कह रहा है कि [गला साफ़ करने की आवाज़] एक तरीके

919
01:03:57,280 --> 01:04:01,680
से यहां पे ये कहा जा रहा है कि परमेश्वर जो है वो मनुष्यों

920
01:04:01,680 --> 01:04:06,080
के कर्तापन का मतलब अहंकार का जो कर्मों

921
01:04:06,080 --> 01:04:10,320
को करते समय कर्तापन का निर्माण वो नहीं करता है और

922
01:04:10,320 --> 01:04:14,560
वो केवल जो कर्म फल होता है कर्म फल उसकी

923
01:04:14,560 --> 01:04:20,560
व्यवस्था देखता है। ठीक है? और आगे क्या है?

924
01:04:21,280 --> 01:04:25,520
सर्वव्यापी परमेश्वर अगले में सर्वव्यापी कहा गया है। सर्वव्यापी परमेश्वर भी ना

925
01:04:25,520 --> 01:04:29,760
किसी को पाप किसी के पाप कर्म को ना किसी के शुभ कर्म को ही ग्रहण करता है।

926
01:04:29,760 --> 01:04:33,760
किंतु अज्ञान के द्वारा अज्ञान के द्वारा काल के द्वारा नहीं काल

927
01:04:33,760 --> 01:04:37,920
तो ये ठूस देता है। जहां भी इसका मन होता है दो चार शब्द अपने मन से ठूस देता

928
01:04:37,920 --> 01:04:42,080
है। अज्ञान के द्वारा अज्ञान किसको है? अज्ञान है

929
01:04:42,080 --> 01:04:46,400
जीव को। तो अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है। कौन सा ज्ञान?

930
01:04:46,400 --> 01:04:50,720
कि परमेश्वर किसी के पाप कर्म को ना किसी के शुभ कर्म को ग्रहण करता है।

931
01:04:50,720 --> 01:04:54,960
तो तो अज्ञान के कारण यानी माया के द्वारा एक तरीके से

932
01:04:54,960 --> 01:04:59,200
यह ज्ञान ढका हुआ है। उसी से सब अज्ञानी मोहित हो रहे हैं। किससे मोहित हो रहे हैं? माया

933
01:04:59,200 --> 01:05:03,360
से। ठीक है? और यहां पर परमेश्वर को सर्वव्यापक कहा

934
01:05:03,360 --> 01:05:07,600
गया है विभू। आगे क्या कहा गया है? ज्ञान।

935
01:05:07,600 --> 01:05:08,160
परंतु

936
01:05:08,160 --> 01:05:12,320
जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया। अब ध्यान देने

937
01:05:12,320 --> 01:05:16,320
वाली बात है। यहां पर अनुवादकर्ता ने गीता प्रेस में जय

938
01:05:16,320 --> 01:05:21,520
दयाल गोविंद का जी ने ज्ञान का अर्थ तत्व ज्ञान माना है।

939
01:05:21,520 --> 01:05:25,680
और इसने भी यह चीज जो कही है कि भैया वो तत्व ज्ञान

940
01:05:25,680 --> 01:05:29,920
प्राप्त कर लेता है। इसी आधार पर यानी कि ज्ञान का अर्थ तत्व ज्ञान है। इसने

941
01:05:29,920 --> 01:05:33,920
मान लिया। यानी कि ज्ञान यज्ञ की भक्ति

942
01:05:33,920 --> 01:05:38,080
करने से ज्ञान यज्ञ से मोक्ष होता है। जबकि अपनी गीता में लिखता

943
01:05:38,080 --> 01:05:42,080
है ज्ञान यज्ञ से भी मोक्ष नहीं होगा। ज्ञान से

944
01:05:42,080 --> 01:05:46,640
भी मोक्ष नहीं होगा। यह खुद कहता है फड़ है ना इसलिए

945
01:05:46,640 --> 01:05:50,640
तो यहां पर [गला साफ़ करने की आवाज़] इसने ज्ञान मान लिया और फिर उनका

946
01:05:50,640 --> 01:05:55,120
वह ज्ञान सूर्य के सदस उस सच्चिदानंद घन ब्रह्म परमात्मा को प्रकाशित

947
01:05:55,120 --> 01:05:59,360
कर देता है। तो कहने का तात्पर्य यह है यहां पे इसने जबरदस्ती दूसरा

948
01:05:59,360 --> 01:06:03,440
एक खड़ा किया जो कि है नहीं कि भैया वह अपने

949
01:06:03,440 --> 01:06:07,440
से अलग किसी की बात कर रहा है। ऐसा कुछ नहीं है। यहां पर इसने केवल अपनी

950
01:06:07,440 --> 01:06:11,760
पूता के अनुसार केवल बकवास की है। अनुवाद रखते

951
01:06:11,760 --> 01:06:15,840
हुए इसने कोई बात नहीं समझाई। आगे चलते हैं। अब यहां पर

952
01:06:15,840 --> 01:06:19,840
57 को यह खा गया। जैसे इसने बहुत सारी चीजें खा गए कि भाई

953
01:06:19,840 --> 01:06:23,280
इसके जब छापा पड़ा था तो मीडिया खबरों के अनुसार रामपाल

954
01:06:23,280 --> 01:06:27,520
के बाथरूम से कैमरे वगैरह मिले थे और बहुत सी वैसी चीजें मिली

955
01:06:27,520 --> 01:06:31,920
थी जो काम वासना से काम वासना को

956
01:06:31,920 --> 01:06:36,160
काम वासना में गति करने के लिए। आजकल के आधुनिक समाज के लोग का उपयोग

957
01:06:36,160 --> 01:06:40,320
करते हैं जिन चीजों का ऐसी सामग्री एक-ए किलो दो-द किलो मीडिया खबरों के अनुसार वो

958
01:06:40,320 --> 01:06:44,560
मिली थी। तो जैसे ये उन चीजों के बारे में उनको अपने पेट

959
01:06:44,560 --> 01:06:48,560
में डाल लेता है। इन इस बारे में कोई बात ही नहीं होती। दूसरी बात जैसे बहुत से

960
01:06:48,560 --> 01:06:52,640
भगवत गीता के जो अर्थ होते हैं जो इसके विरुद्ध जा रहे होते हैं उनको पी

961
01:06:52,640 --> 01:06:56,960
लेता है। उसी तरीके से इसने यहां पर भी 5 17 को पी लिया।

962
01:06:56,960 --> 01:07:01,440
5 17 पे बात ही नहीं की। तो क्या बात की है? 57 में बात क्या लिखी

963
01:07:01,440 --> 01:07:05,680
लिखी जा रही है वह देख लेते हैं। जिनका मन तदूप हो रहा है जिनकी बुद्धि तदूप

964
01:07:05,680 --> 01:07:11,680
हो रही है यानी पीछे जो बताया गया उसके अनुसार और सच्चिदानंद

965
01:07:11,760 --> 01:07:16,160
घन ब्रह परमात्मा में जिनकी निरंतर एक ही भाव से स्थिति है।

966
01:07:16,160 --> 01:07:20,560
ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान के द्वारा पाप रहित होकर अपुनरावृति

967
01:07:20,560 --> 01:07:24,640
को अर्थात परम गति को प्राप्त होते हैं। यह इसने

968
01:07:24,640 --> 01:07:28,720
छोड़ दिया यह सब कुछ। ठीक है? इसने यह वाली बात

969
01:07:28,720 --> 01:07:31,200
ही नहीं की।

970
01:07:31,200 --> 01:07:35,200
और अब इसने अगला क्या कहा है? पांच श्लोक

971
01:07:35,200 --> 01:07:39,280
18 का अर्थ किया है इसने। इसने बताया कि पंडित कौन होते हैं? इसके

972
01:07:39,280 --> 01:07:43,360
यहां के लोगों को पंडित से बड़ी नफरत है। मुझे कुछ ऑडियो प्राप्त हुई है। लखनऊ का जो वकील

973
01:07:43,360 --> 01:07:47,440
है ना दिनेश चंद्र छोकरा उसकी कुछ ऑडियो सुनी है। उसमें वो

974
01:07:47,440 --> 01:07:50,960
जब बात करता है अपने

975
01:07:50,960 --> 01:07:55,120
गुरु भाई से। ऐसा गुरु भाई जो उनके पहले उनके खेमे में था अब अलग हो गया।

976
01:07:55,120 --> 01:07:59,360
तो जब वो बात कर रहा है तो कह रहा है यादव

977
01:07:59,360 --> 01:08:03,440
पंडित की गोदी में बैठ गया जाके पंडित की बड़ी पंडितों से बड़ी चिढ़ है

978
01:08:03,440 --> 01:08:07,600
इन लोगों को फड़ लोगों को तो पंडित के बारे में यहां क्या लिखा है इसके

979
01:08:07,600 --> 01:08:11,840
बाबा जेल कट्टू ने वो भी सुन लो पांच श्लोक 18 में पंडित की परिभाषा

980
01:08:11,840 --> 01:08:15,920
बताते हुए बताया गया है कि जो समदर्शी

981
01:08:15,920 --> 01:08:21,360
ज्ञान योगी देखिए ज्ञान योगी तत्वदर्शी साधक पंडित तत्वज्ञानी

982
01:08:21,360 --> 01:08:25,440
यानी पंडित की परिभाषा पंडित को इसने माना है तत्वज्ञानी पंडित कौन होते हैं?

983
01:08:25,440 --> 01:08:27,280
तत्वज्ञानी। और तत्वज्ञानी

984
01:08:27,280 --> 01:08:31,600
कौन है? जो क्या कहते हैं?

985
01:08:31,600 --> 01:08:35,680
पंडित होते हैं। तत्वज्ञानी जो तत्वज्ञानी वो तो पूर्ण वो हो गए। पूर्ण संत

986
01:08:35,680 --> 01:08:39,680
हो गए। तो तू जिनकी गोदी में जाकर के बैठने को कह रहा है क्या उनकी

987
01:08:39,680 --> 01:08:44,000
गोदी में नहीं बैठना चाहिए? पूर्ण संत की गोदी में इस फोड़ आदमी जो

988
01:08:44,000 --> 01:08:48,000
जो यहां का जो वकील है जो ऐसी बातें करता है

989
01:08:48,000 --> 01:08:52,560
द्वेष भावना रखता है जाति के आधार पर है ना कि पंडित

990
01:08:52,560 --> 01:08:57,120
और यहां कमेंट में भी कई पंडित पंडित कर रहे होंगे ये रहा

991
01:08:57,120 --> 01:09:01,440
ये रहा मिल गया अरे ऊपर निकल गया जरा ऊपर

992
01:09:01,440 --> 01:09:05,600
निकल गया जरा लाइए जरा उसको पंडित वाला अभी अभी हां पंडित को तो राक्षस बताया

993
01:09:05,600 --> 01:09:09,600
गया है जिसका मेरे पास बड़ा सबूत है लो भाई अरे देख ले तेरा

994
01:09:09,600 --> 01:09:13,600
जेल कट्टू बाबा बाबा यहां क्या कह रहा है पंडितों के बारे में? तत्वज्ञानी है पंडित।

995
01:09:13,600 --> 01:09:17,760
जा अपने जेल कट्टू दादा को बाबा को जाकर के आन मिलो सजना वाला जो पट्टा

996
01:09:17,760 --> 01:09:22,080
होता है ना थाने में रखा हुआ उससे उसका परिचय करा अपने बाबा का।

997
01:09:22,080 --> 01:09:26,240
थाने में एक पट्टा होता है पुलिस के पास। उसमें लिखा होता है आन मिलो

998
01:09:26,240 --> 01:09:30,320
सजना या लिखा होता है फिर कब मिलोगे? वो पट्टा लेके अपने बाबा

999
01:09:30,320 --> 01:09:34,640
के पास जा और उसको परिचित करवाओ पट्टे पट्टे से। ठीक है?

1000
01:09:34,640 --> 01:09:38,640
और या फिर उसको बिल से बाहर निकाल दो। हम लोग हम में से कोई ऐसा योद्धा

1001
01:09:38,640 --> 01:09:42,880
जाएगा और वह उसका परिचय करवाएगा उस पट्टे से।

1002
01:09:42,880 --> 01:09:46,880
वह तेरा बाबा ही लिख रहा है यहां पर पंडित कौन होता है? ठोको ताली। पंडित कौन होता

1003
01:09:46,880 --> 01:09:50,960
है? तत्वज्ञानी। अच्छा गौ, कुत्ते,

1004
01:09:50,960 --> 01:09:55,120
हाथी व चांडाल को एक समझता है। वह जीवित मुक्त कहलाता है। वह तथा भगवान

1005
01:09:55,120 --> 01:09:59,120
प्राप्ति के लिए भक्ति में लग चुका है। जो ऐसा नहीं करता है। वह बेशक बात

1006
01:09:59,120 --> 01:10:03,680
बनाए। 84 लाख योनियों का कष्ट भोगेगा तथा इसने फिर अपनी आगे की

1007
01:10:03,680 --> 01:10:09,680
जो है बकवास लिख दी है।

1008
01:10:10,390 --> 01:10:16,390
[गला साफ़ करने की आवाज़] आगे चलते हैं।

1009
01:10:19,200 --> 01:10:25,200
इसने फिर आगे जो है 122 नंबर पेज निकाली है।

1010
01:10:25,280 --> 01:10:31,280
122 नंबर पेज है। उसमें

1011
01:10:34,080 --> 01:10:38,400
इसने फिर आगे जो है 122 नंबर पेज पे पहला पैराग्राफ

1012
01:10:38,400 --> 01:10:42,480
और उसकी लास्ट की दो लाइन कर्म योगी ब्रह्मचारी या गृहस्ती

1013
01:10:42,480 --> 01:10:46,480
कार्य करते-करते साधना करने वाला भक्त कर्म सन्यासी भक्तों से श्रेष्ठ है

1014
01:10:46,480 --> 01:10:50,480
तथा जो पूर्ण परमात्मा की भक्ति करते हैं वो सर्वोत्तम है। यहां पे फिर से यह

1015
01:10:50,480 --> 01:10:54,800
गृहस्ती का पक्ष ले रहा है। वहां पर

1016
01:10:54,800 --> 01:10:59,120
गृहस्ती का विरोध करता है। कहां पर? रुचि ऋषि की उसमें फिर सुखदेव

1017
01:10:59,120 --> 01:11:03,280
जी की में गृहस्ती का पक्ष लेता है। फिर यहां पर पक्ष लेता है।

1018
01:11:03,280 --> 01:11:07,360
तो यह कशमकश में है कि मुझे ड्रामा तो करना है विरक्त

1019
01:11:07,360 --> 01:11:11,440
होने का और फिर मुझे जो है गृहस्ती वाले सुख भी चाहिए कि अप्सरा आए तो मैं छू

1020
01:11:11,440 --> 01:11:15,520
लूं। ऐसी बातें करता है ये कि सुखदेव जी के पास अप्सरा आई। उसने उन्होंने

1021
01:11:15,520 --> 01:11:19,760
छुआ नहीं। यानी कि छू लेना चाहिए। यानी इसका स्वभाव है। यानी कि काल

1022
01:11:19,760 --> 01:11:22,800
के वश में यह भी है।

1023
01:11:22,800 --> 01:11:24,960
अच्छा

1024
01:11:24,960 --> 01:11:30,960
आगे चलते हैं। अब आ जाइए भाई अभी

1025
01:11:34,720 --> 01:11:40,000
ये सीधे पांच श्लोक 23 पे क्यों आ गया है?

1026
01:11:40,000 --> 01:11:44,240
51 19 की बात इसने की नहीं। 519

1027
01:11:44,240 --> 01:11:48,480
की बात हां देखिए अब इसने 51 18 की बात की पृष्ठ

1028
01:11:48,480 --> 01:11:52,800
क्रमांक 51 18 की बात की पृष्ठ क्रमांक 119

1029
01:11:52,800 --> 01:11:57,040
पे उसके बाद इसने कुछ खिचड़ी पकाई और

1030
01:11:57,040 --> 01:12:01,040
फिर उसके बाद इसने 5 19

1031
01:12:01,040 --> 01:12:05,760
20 21 22 इनकी बात ही नहीं की गायब

1032
01:12:05,760 --> 01:12:09,760
पी गया वो सारी मीडिया खबरों की तरह पी गया अब

1033
01:12:09,760 --> 01:12:15,760
सीधे आ गया यहां पर पांच श्लोक 23 में

1034
01:12:18,640 --> 01:12:22,960
और क्या करता है जिन जिन श्लोकों में से चोरी करनी होती है तो वैसे

1035
01:12:22,960 --> 01:12:27,040
ये श्लोक श्लोक लिखेगा तो उसमें हेडिंग डालेगा कि पांच श्लोक 19 में

1036
01:12:27,040 --> 01:12:31,200
ये कहा पांच श्लोक 20 में 21 में ये कहा मगर जब इसे चोरी करनी होगी

1037
01:12:31,200 --> 01:12:35,200
तो क्या करेगा कहीं और से किसी और शब्दों से बात शुरू करेगा और पांच

1038
01:12:35,200 --> 01:12:39,600
19 20 21 की समराइज करते हुए बात बीच में घुसा देगा जैसे इसने

1039
01:12:39,600 --> 01:12:45,360
यहां पर इसमें बीच में घुसाई क्या घुसाई

1040
01:12:45,360 --> 01:12:49,360
बीच में हर श्लोक में लिखता है अध्याय पांच के श्लोक 23 में बताया

1041
01:12:49,360 --> 01:12:53,520
गया है कि और यहां पे क्या लिख रहा है यहां पे 5 19 20

1042
01:12:53,520 --> 01:12:59,520
21 की हेडिंग से शुरू ही नहीं है पैराग्राफ ऊपर देखो बड़ा करो

1043
01:13:00,560 --> 01:13:04,560
हां इसमें इसने इस पैराग्राफ के मध्य से ये बात शुरू की है कि पांच

1044
01:13:04,560 --> 01:13:08,640
के श्लोक 19 से 21 में फिर प्रमाण है कि वही व्यक्ति को

1045
01:13:08,640 --> 01:13:12,880
मुक्त समझो जिसमें निम्न लक्षणों जो गीता जी के श्लोकों में निम्न निम्नलिखित है। पांच श्लोक

1046
01:13:12,880 --> 01:13:16,960
22 में कहा है कि हे अर्जुन कर्मों के संयोग से उत्पन्न भोग राज के लिए

1047
01:13:16,960 --> 01:13:21,040
लड़ाई करना। फिर भगवान कह रहा है कि अर्जुन तू युद्ध कर यदि युद्ध

1048
01:13:21,040 --> 01:13:25,680
में मारा गया तो स्वर्ग में मौज मारेगा।

1049
01:13:25,680 --> 01:13:29,760
पांच के श्लोक 22 में कहा है कि हे अर्जुन कर्मों के

1050
01:13:29,760 --> 01:13:33,840
संयोग से उत्पन्न भोग राज के लिए लड़ाई करना तथा फिर

1051
01:13:33,840 --> 01:13:37,840
मौज मारना नाशवान है। ज्ञानवान व्यक्ति इससे दूर

1052
01:13:37,840 --> 01:13:42,000
रहता है तथा अध्याय दो के श्लोक 37 में भगवान कह रहा है कि अर्जुन तू युद्ध

1053
01:13:42,000 --> 01:13:46,160
कर यदि युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग में मौज मारेगा और यदि जीत गया तो राज का आनंद

1054
01:13:46,160 --> 01:13:50,160
लेगा। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] यहां पर मतलब

1055
01:13:50,160 --> 01:13:54,160
श्लोक 237 की बात को यहां 22 52 से काट

1056
01:13:54,160 --> 01:13:58,240
रहा है यह और हालांकि इसने यहां पर भी 5:1 से

1057
01:13:58,240 --> 01:14:02,640
लेकर के 5:22 तक का अनुवाद शब्दार्थ नहीं किया।

1058
01:14:02,640 --> 01:14:06,720
अपने मन से गड़ब जिम्म कर दिया। खैर आगे चलते

1059
01:14:06,720 --> 01:14:10,480
हैं।

1060
01:14:10,480 --> 01:14:15,040
अब यहां पर बात यह है कि अगर यह 52 से

1061
01:14:15,040 --> 01:14:19,200
237 काट रहा है तो 237 से 52 क्यों नहीं काट रहा है? ये बाबा

1062
01:14:19,200 --> 01:14:23,600
जी कट्टटू कभी इस बात का उत्तर नहीं दे पाएंगे। ठोको ताली।

1063
01:14:23,600 --> 01:14:27,680
अब पांच श्लोक 23 पे आ जाते हैं। अच्छा 51 19 से लेकर 58 भी

1064
01:14:27,680 --> 01:14:32,160
हमें पढ़ना है। 5:18 क्या है? हमारा 5:18 क्या कह रहा है?

1065
01:14:32,160 --> 01:14:36,320
ये भी आप पढ़ते चलो। वह ज्ञानी जन विद्या और विनय युक्त

1066
01:14:36,320 --> 01:14:40,480
ब्राह्मण में कौन ज्ञानी जन जो तद रूप काम करते हैं जो

1067
01:14:40,480 --> 01:14:44,480
इसको ले चल रहे हैं एक एक श्लोक का जो श्लोकों के अनुसार जो कर्म कर

1068
01:14:44,480 --> 01:14:48,560
रहे हैं तो उनको ज्ञानी जन कहा गया जो परमात्मा में स्थित हो जाते हैं पूर्ण क्रांति को प्राप्त

1069
01:14:48,560 --> 01:14:53,680
कर जाते हैं जो कि पांच 17 में कहा गया है ना

1070
01:14:53,680 --> 01:14:57,680
अपुनरावृत्ति यानी कि दोबारा पुनरावृति नहीं होती तो वो कौन है

1071
01:14:57,680 --> 01:15:01,680
वो ज्ञानी जन जो विद्या और विनय युक्त ब्राह्मण में तथा

1072
01:15:01,680 --> 01:15:06,160
गौ हाथी कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी होते हैं। व्यवहार अलग हो सकता है।

1073
01:15:06,160 --> 01:15:10,720
परंतु सब में ही परम तत्व को देखने का प्रयास करते हैं। तो वह जो है

1074
01:15:10,720 --> 01:15:15,360
परम शांति को प्राप्त कर लेते हैं। यहां ये कहा गया है। जबकि इसने क्या कर लिया?

1075
01:15:15,360 --> 01:15:19,600
इसने पंडित किसको कहा है? इसने पंडित उसको माना है

1076
01:15:19,600 --> 01:15:24,480
जो पूर्ण भक्ति में लग चुका है। यानी कि इसने तब भी यह नहीं माना

1077
01:15:24,480 --> 01:15:25,840
कि वो जो है मुक्त

1078
01:15:25,840 --> 01:15:30,000
हो जाएगा। उसको मुक्त होने वाला नहीं कह रहा है। वो नहीं माना

1079
01:15:30,000 --> 01:15:34,240
इसने। अब इसने 51 में क्या कहा है वह भी देख

1080
01:15:34,240 --> 01:15:36,720
लेते हैं।

1081
01:15:36,720 --> 01:15:40,240
51 [गला साफ़ करने की आवाज़]

1082
01:15:40,240 --> 01:15:44,480
51 का हमारा अर्थ है जिनका मन समभाव में स्थित है यानी कि हार और जीत

1083
01:15:44,480 --> 01:15:48,480
में जीत का लालच हार का भय ये दोनों चीजें नहीं होनी

1084
01:15:48,480 --> 01:15:52,880
चाहिए। तो जिनका मन समभाव में स्थित है उनके द्वारा इस जीवित

1085
01:15:52,880 --> 01:15:57,120
अवस्था में ही संपूर्ण संसार जीत लिया गया है। क्योंकि उनको अब राग

1086
01:15:57,120 --> 01:16:01,120
द्वेष नहीं है। इसलिए उनको कोई कष्ट नहीं है। जब कष्ट नहीं तो

1087
01:16:01,120 --> 01:16:05,120
जीत लिया संसार को। तो संपूर्ण संसार जीत लिया है।

1088
01:16:05,120 --> 01:16:09,280
क्योंकि सच्चिदानंद घन परमात्मा निर्दोष

1089
01:16:09,280 --> 01:16:13,440
और सम है। इसका मतलब जब आप सम स्थिति में पहुंच गए तो आप जो है

1090
01:16:13,440 --> 01:16:18,240
एकत्व में है। किसके साथ एकत्व में है? ईश्वर के साथ। इससे वह

1091
01:16:18,240 --> 01:16:22,400
सच्चिदानंद घन परमात्मा में स्थित है। आप देखिए यह कितना अंतर

1092
01:16:22,400 --> 01:16:26,640
करता है। 5:19 से लेकर 22 तक इस फर ने बकवास कर दी।

1093
01:16:26,640 --> 01:16:30,640
शब्दार्थ तथा इसने कोई अनुवाद नहीं किया। अपने मन से जो मन आता है लिखता

1094
01:16:30,640 --> 01:16:34,640
है। ठीक है? जो पुरुष 20वें का पढ़

1095
01:16:34,640 --> 01:16:38,960
रहा हूं। जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं होता है। यानी समदर्शिता क्या है?

1096
01:16:38,960 --> 01:16:40,880
जो पुरुष यह समदर्शिता वहीं से

1097
01:16:40,880 --> 01:16:45,200
चल रही है जिसके मन में अहंकार ना हो

1098
01:16:45,200 --> 01:16:49,360
जो गुण ही गुण में बरत रहे हैं ऐसा समझे जो

1099
01:16:49,360 --> 01:16:53,600
गौ पांच 18 जो इनमें अंतर ना करता हो गौ कुत्ते हाथी

1100
01:16:53,600 --> 01:16:57,760
चंडाल में ब्राह्मण में समदर्शिता रखता हो तो

1101
01:16:57,760 --> 01:17:02,080
वही आगे चल रही है जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित ना हो

1102
01:17:02,080 --> 01:17:06,080
और प्रिय को प्राप्त होकर जो पुरुष प्रिय को

1103
01:17:06,080 --> 01:17:10,240
प्राप्त होकर हर्षित ना हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्वग्न ना हो

1104
01:17:10,240 --> 01:17:16,240
वह स्थिर बुद्धि संशय रहित ब्रह्मवेत्ता कौन ब्रह्मवत्ता

1105
01:17:17,360 --> 01:17:21,760
51 19 520 है इसने क्या कहा है 520 में 19

1106
01:17:21,760 --> 01:17:27,760
21 में प्रमाण है कि लिखित में

1107
01:17:29,680 --> 01:17:34,400
देखिए अपने मन से यहां पर ब्रह्मत्ता कहा जा रहा है

1108
01:17:34,400 --> 01:17:38,480
संशय रहित कहा जा रहा है कहां ले जाओगे इन शब्दार्थों क्या

1109
01:17:38,480 --> 01:17:42,480
ये रामपाल के फुहड़ चेले चिलए भगत

1110
01:17:42,480 --> 01:17:46,640
क्या ये संशय रहित हैं? एक सवाल में एक

1111
01:17:46,640 --> 01:17:50,640
प्रश्न में गीले गीला होने लगती गीली होने लगती है इनकी

1112
01:17:50,640 --> 01:17:54,960
पतलू ऐसे ऐसे तो लोग हैं। और क्या कह रहे हैं

1113
01:17:54,960 --> 01:17:58,960
यहां संशय रहित वाली बात को काट ही दिया। ब्रह्मवित्ता संशय रहित कौन है?

1114
01:17:58,960 --> 01:18:03,040
जो ब्रह्मवित्ता है। ब्रह्म की बात करता है। लो इनके

1115
01:18:03,040 --> 01:18:07,280
इनके अनुसार तो ब्रह्म से मुक्ति नहीं होगी। मगर ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म की बात करने

1116
01:18:07,280 --> 01:18:11,760
वाला वही संशय रहित है और वही सच्चिदानंद

1117
01:18:11,760 --> 01:18:16,400
घन ब्रह्म परमात्मा में एक ही भाव से नित्य स्थित है।

1118
01:18:16,400 --> 01:18:21,200
और वहां क्या कह रहा है? फड़ अपनी कुछ अलग ही बकवास चला रहा है।

1119
01:18:21,200 --> 01:18:25,920
21 में क्या कहा जा रहा है? बाहर के विषयों में आसक्ति रहित अंतःकरण

1120
01:18:25,920 --> 01:18:29,920
वाला देखिए 21 में बहुत जरूरी बात है।

1121
01:18:29,920 --> 01:18:32,560
बाहर के विषयों में अंतःकरण बाहर के विषयों

1122
01:18:32,560 --> 01:18:36,560
में आसक्ति रहित अंतःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो

1123
01:18:36,560 --> 01:18:40,560
ध्यान जनित सात्विक आनंद है उसको प्राप्त होता है। तदंतर वह

1124
01:18:40,560 --> 01:18:44,640
सच्चिदानंद घन ब्रह परम ब्रह्म परमात्मा के ध्यान रूप योग में अभिन्न

1125
01:18:44,640 --> 01:18:48,880
भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनंद का अनुभव

1126
01:18:48,880 --> 01:18:52,880
करता है। अब यहां पे 5:21 को

1127
01:18:52,880 --> 01:18:57,280
इसने क्यों नहीं खोला? पता है आपको? क्यों नहीं खोला? इसलिए नहीं खोला कि यहां पर ब्रह्म

1128
01:18:57,280 --> 01:19:01,440
के साथ योग युगात्मा शब्द आया है। ब्रह्म के साथ

1129
01:19:01,440 --> 01:19:05,680
और उसके लिए कहा जा रहा है कि उसको अक्षय अक्षय

1130
01:19:05,680 --> 01:19:09,920
सुख की प्राप्ति होती है। 5:21 में यहां भी मुक्ति मिल गई। अक्षय

1131
01:19:09,920 --> 01:19:15,360
सुख प्राप्त होता है। कौन? किसको प्राप्त होता है? जो ब्रह्म

1132
01:19:15,360 --> 01:19:19,600
ब्रह्म योग युगात्मा युक्त आत्मा। ब्रह्म योग से युक्त युक्त

1133
01:19:19,600 --> 01:19:23,680
है जो आत्मा वो उसको अक्षय सुख की प्राप्ति

1134
01:19:23,680 --> 01:19:27,760
होती है। इसलिए इसने छोड़ा क्योंकि यहां ब्रह्म की बात आ रही है। ब्रह्मवित्ता की बात

1135
01:19:27,760 --> 01:19:31,760
आ गई। संशय रहित तो यह कभी कर ही नहीं सकता। इसके चपड़ गंजू चेलों को आपने देखा

1136
01:19:31,760 --> 01:19:35,840
होगा कैसा सूखा सा मुंह लेकर आते हैं मेरे सामने। संशय रहित तो ये कभी

1137
01:19:35,840 --> 01:19:40,160
कर ही नहीं सकता। और यहां पर ब्रह्म योग

1138
01:19:40,160 --> 01:19:44,320
युक्त आत्मा को अक्षय सुख प्राप्त करने वाला कहा

1139
01:19:44,320 --> 01:19:47,600
गया। इसलिए यह जो है जेलकट्टू इन

1140
01:19:47,600 --> 01:19:52,000
चीजों के बारे में खोल खोल कर बात नहीं करता। फिर 22 में क्या कहा गया है? जो यह इंद्रिय

1141
01:19:52,000 --> 01:19:56,880
तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाला सब भोग है। वे यद्यपि विषय

1142
01:19:56,880 --> 01:20:01,200
पुरुषों को सुख रूप भासते हैं तो भी वे दुख के ही हेतु है

1143
01:20:01,200 --> 01:20:05,840
और आदि अंत वाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन बुद्धिमान

1144
01:20:05,840 --> 01:20:10,640
विवेक पुरुष में पुरुष उनमें नहीं रमता।

1145
01:20:10,640 --> 01:20:14,800
अब एक बात है यहां पर जो इसने अर्जुन को इस अर्जुन को कहे

1146
01:20:14,800 --> 01:20:18,800
गए इस वाक्य का खंडन करने का प्रयास किया है कि भाई अर्जुन अगर तू युद्ध

1147
01:20:18,800 --> 01:20:23,040
में जीत गया तब तो तू राजमल का सुख भोगेगा ही और अगर हार भी

1148
01:20:23,040 --> 01:20:27,280
अगर तू इसमें जो वीरगति को प्राप्त हो गया तब भी तू जो है स्वर्ग जाएगा

1149
01:20:27,280 --> 01:20:31,440
तो भैया एक कायर और पीठ दिखाकर भागने

1150
01:20:31,440 --> 01:20:35,440
वाले से तो उत्तम गति वहां पर बताई जा रही है ना कि

1151
01:20:35,440 --> 01:20:39,440
कम से कम तेरी अपकीर्ति तो नहीं होगी इस बारे में वहां

1152
01:20:39,440 --> 01:20:43,440
बात कर रहे हैं कि तुझे इस युद्ध को लड़ने में कितने वो

1153
01:20:43,440 --> 01:20:47,440
हैं। अगर इस बात को लेकर के चल रहे हैं कि इस युद्ध को

1154
01:20:47,440 --> 01:20:51,520
लड़ने से मुझे क्या फायदा होगा और व्यवहारिकता को लेकर के चल रहे हैं। उस व्यवहारिक

1155
01:20:51,520 --> 01:20:55,840
ज्ञान के अनुसार वो बता रहे हैं कि अगर तू जीत गया तब तो तुझे यहां का सुख मिलेगा

1156
01:20:55,840 --> 01:20:59,840
और तू अगर हार भी गया यानी कि वीरगति को प्राप्त हो गया। हारने का मतलब

1157
01:20:59,840 --> 01:21:02,800
वीरगति को प्राप्त होना तो भी तुझे स्वर्ग मिलेगा क्योंकि तू

1158
01:21:02,800 --> 01:21:07,040
क्षत्रिय है और कर्तव्य कर्म करते हुए वो हुआ है। तो अगर तू तत्व

1159
01:21:07,040 --> 01:21:11,040
ज्ञान जो तत्वज्ञ ज्ञान है ब्रह्म के साथ एकत्व वाली बात को नहीं अभी समझ पा

1160
01:21:11,040 --> 01:21:15,200
रहा है और केवल व्यवहारिकता के अनुसार देख रहा है तब भी तेरी गति श्रेष्ठ होगी

1161
01:21:15,200 --> 01:21:19,200
उस कायर नपुंसक कहलाने वाले पुरुष की अपेक्षाकृत

1162
01:21:19,200 --> 01:21:23,200
जिसकी स्त्रियों की गरिमा भंग कर दी जाती है जिसकी अपकीर्ति होती

1163
01:21:23,200 --> 01:21:27,520
है जिसके कुल का नाश हो जाता है ये वहां पर समझा रहे हैं व्यवहारिक

1164
01:21:27,520 --> 01:21:31,680
ज्ञान के अनुसार होने वाला फायदा बता रहे हैं जैसे ये जैसे ये जेल कट्टू

1165
01:21:31,680 --> 01:21:35,920
बताता है कि मैं बिजली के तारों से छुड़ा लूंगा ये खुद भी तो बताता

1166
01:21:35,920 --> 01:21:40,000
है भाई यह भी तो भौतिक संसार का लालच देता है। गेहूं, शक्कर, आटा, चावल।

1167
01:21:40,000 --> 01:21:44,080
तू क्यों देता है भौतिक संसार का? हम तू क्यों छोड़ता है अपने

1168
01:21:44,080 --> 01:21:48,080
चेले? पीछे गन मशीन लिए दो आदमी खड़े हुए हैं। क्यों छोड़ता है

1169
01:21:48,080 --> 01:21:52,320
भाई अपने? पहले तेरे पीछे भी रहते थे गन मशीन लिए हुए व्यक्ति। अब तेरे

1170
01:21:52,320 --> 01:21:57,280
चेलों के पीछे भी रहते हैं। यानी कि तू भी उनसे कह रहा है कि युद्ध कर

1171
01:21:57,280 --> 01:22:01,440
और भोग। किनको भोग? वो बात अलग है। वो स्त्रियां चिपका

1172
01:22:01,440 --> 01:22:06,160
चिपका के भोगते हैं बेचारे। [हंसी] ठोको

1173
01:22:06,160 --> 01:22:10,320
ताली। खैर आगे चलते हैं। अब

1174
01:22:10,320 --> 01:22:16,140
5 23 में क्या कह रहा है ये? अब इसका पढ़ लेते हैं। 5 23

1175
01:22:16,140 --> 01:22:18,160
[गला साफ़ करने की आवाज़] 52

1176
01:22:18,160 --> 01:22:22,160
में पूर्ण मुक्ति बताई गई है। और 5:21

1177
01:22:22,160 --> 01:22:26,320
में पूर्ण मुक्ति बताई गई है। इसने यहां पर कहीं भी पूर्ण मुक्ति की बात नहीं

1178
01:22:26,320 --> 01:22:32,320
की है। ठीक है? 5:21 में

1179
01:22:33,440 --> 01:22:38,000
पांच श्लोक 23 में बताया गया है कि

1180
01:22:38,000 --> 01:22:42,160
योग योगी की व्याख्या इस प्रकार है कि जो अपने काम क्रोध को जीत लेता

1181
01:22:42,160 --> 01:22:46,160
है वही योगी परमात्मा और वही सुखी है। ठीक? फिर

1182
01:22:46,160 --> 01:22:50,400
इसके बाद ये कह रहा है विचार करें। यह मन तथा इंद्रियां तो शंकर

1183
01:22:50,400 --> 01:22:54,480
जी जैसे योगी से भी नहीं जीते गए। अन्य प्राणी अर्जुन जिसने दो-दो

1184
01:22:54,480 --> 01:22:58,800
शादियां करवा रखी हैं। रखी थी। जैसे साधक कैसे योग युक्त परमात्मा

1185
01:22:58,800 --> 01:23:02,960
को प्राप्ति हो सकता है। अब देखो भाई इसकी इस बात को काटते हैं कि अर्जुन जो है परमात्मा

1186
01:23:02,960 --> 01:23:08,240
को प्राप्त हो सकता है कि नहीं। है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] ठोको ताली।

1187
01:23:08,240 --> 01:23:12,480
इस फवर्ड की बात का तो सारा इंतजाम इसकी ही किताबों में दिया गया

1188
01:23:12,480 --> 01:23:18,320
है। मेरे ख्याल से

1189
01:23:18,320 --> 01:23:22,240
प्रश्न क्रमांक

1190
01:23:22,240 --> 01:23:26,560
अर्जुन को मोक्ष 99 प्रश्न क्रमांक 99

1191
01:23:26,560 --> 01:23:32,560
निकालिए भाई।

1192
01:23:38,240 --> 01:23:40,880
हम

1193
01:23:40,880 --> 01:23:44,960
ये देखिए पृष्ठ क्रमांक 99 अब

1194
01:23:44,960 --> 01:23:49,840
ये कह रहा है अर्जुन को मोक्ष नहीं मिल सकता जबकि

1195
01:23:49,840 --> 01:23:55,600
ये खुद ये फर् खुद ही कह रहा है कि अर्जुन को मोक्ष मिला।

1196
01:23:55,600 --> 01:24:00,560
देखिए 99 99

1197
01:24:00,560 --> 01:24:04,640
इसी में नीचे जाइए बस पहले पैराग्राफ की लास्ट की तीन लाइन पहले पैराग्राफ

1198
01:24:04,640 --> 01:24:09,040
की लास्ट की तीन लाइन ऊपर ऊपर ऊपर चला गया हां देखिए

1199
01:24:09,040 --> 01:24:13,200
लास्ट की तीन लाइन ये अर्जुन यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा

1200
01:24:13,200 --> 01:24:17,200
को पहली बात तो अर्जुन को कोई तत्वदर्शी मिला नहीं भाई है ना वो तो काल से ज्ञान

1201
01:24:17,200 --> 01:24:21,440
ले रहा था रामपाल के अनुसार तो अर्जुन यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमा पूर्ण पूर्ण परमात्मा

1202
01:24:21,440 --> 01:24:25,600
को इष्ट रूप में मानकर यज्ञ करता है तथा यज्ञों के साथसाथ वास्तविक नाम का

1203
01:24:25,600 --> 01:24:30,000
सुमिरण करके यानी कि उसको तत्वदर्शी मिल गया था। पूर्ण मोक्ष

1204
01:24:30,000 --> 01:24:34,160
रूपी अमंत शायद अनंत होगा को प्राप्त हो जाता

1205
01:24:34,160 --> 01:24:38,480
है। अर्थात पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं। यानी अर्जुन

1206
01:24:38,480 --> 01:24:42,800
को मुक्ति मिल गई। ठोको ताली दोद पत्नियां करने वाले। अब बता फुअर

1207
01:24:42,800 --> 01:24:47,040
तेरी कौन सी बात मानी जाए? एक तरफ तू कह रहा है अर्जुन जिसने दो-दो शादी करवा

1208
01:24:47,040 --> 01:24:51,040
रखी है। उस जैसे साधक कैसे योग युक्त परमात्मा

1209
01:24:51,040 --> 01:24:56,240
प्राप्ति हो सकती है। हैं इसको कहते हैं पागल फूहड़।

1210
01:24:56,240 --> 01:25:01,200
ठीक है ना? अच्छा अब आगे इसने पांच

1211
01:25:01,200 --> 01:25:05,360
अध्याय पांच के 24 25 26 का अर्थ किया है। अच्छा हम भी अपने

1212
01:25:05,360 --> 01:25:09,840
पांच 23 का अर्थ पढ़ लेते हैं। तो 5 23 का अर्थ हमारा क्या है?

1213
01:25:09,840 --> 01:25:13,920
जो साधक इस मनुष्य शरीर में शरीर का नाश होने से पहले पहले ही अपने

1214
01:25:13,920 --> 01:25:15,840
काम क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग

1215
01:25:15,840 --> 01:25:20,240
को सहन करने में समर्थ हो जाता है। वही पुरुष योगी है वही सुखी है।

1216
01:25:20,240 --> 01:25:24,320
मतलब शरीर समाप्त होने से पहले मेरा राग द्वेष इत्यादि सब

1217
01:25:24,320 --> 01:25:28,320
नष्ट हो जाए और मैं स्थिर बुद्धि का हो जाऊं, संशय रहित हो जाऊं, समदर्शी हो

1218
01:25:28,320 --> 01:25:32,720
जाऊं। तो ऐसा होगा तो शरीर नष्ट होने पर मुझे ऐसा होने

1219
01:25:32,720 --> 01:25:37,600
होगा तो मैं सुखी यहां भी कहलाऊंगा और परमार्थ में भी। ठीक है?

1220
01:25:37,600 --> 01:25:41,600
तो 5 23 में इसने कुछ अलग ही अपनी

1221
01:25:41,600 --> 01:25:45,840
बहा दी और ऐसी उल्टी की जिस उल्टी को हमने आपके समक्ष

1222
01:25:45,840 --> 01:25:51,840
प्रस्तुत कर दिया। वापस आ जाइए भाई उसी पृष्ठ पर 123

1223
01:25:52,000 --> 01:25:56,080
पांच के श्लोक 24 25 26 में गीता ज्ञान दाता अब रामपाल की पढ़ रहे हैं हम

1224
01:25:56,080 --> 01:26:00,720
लोग से अन्य परमात्मा की जानकारी फिर ले आया अन्य परमात्मा को

1225
01:26:00,720 --> 01:26:04,720
अच्छा एक बात है यहां भी देखो इसने गृहस्ती का खंडन किया है हां ये तो मैं

1226
01:26:04,720 --> 01:26:08,880
भूल ही गया ये कशमकश में है रामपाल कि मैं छू कि मैं

1227
01:26:08,880 --> 01:26:12,880
नहीं छू पकडूं कि नहीं पकड़ूं स्त्री अंग फिट करूं कि ना करूं

1228
01:26:12,880 --> 01:26:16,960
तो रामपाल इस कशमकश में रहता है इसलिए कहीं पर

1229
01:26:16,960 --> 01:26:21,440
सन्यास को गृहस्ती से दूर वाली चीजों का खंडन करता है।

1230
01:26:21,440 --> 01:26:25,520
फिर उसके मन में लालच आ जाता है तो फिर गृहस्ती का पक्ष लेने लगता है।

1231
01:26:25,520 --> 01:26:29,600
अब फिर जो है ध्यान आता है कि मुझे तो अपना ड्रामा फैलाना है। पाखंड करना है तो

1232
01:26:29,600 --> 01:26:30,880
फिर से गृहस्ती का खंडन

1233
01:26:30,880 --> 01:26:35,120
करता है। तो यहां पे ये एक तरफ क्या कह रहा है? सुखदेव जी के पास अप्सरा

1234
01:26:35,120 --> 01:26:39,360
आई। पर सुखदेव जी ने नहीं छुआ। सुखदेव जी को इसके हिसाब से छूना

1235
01:26:39,360 --> 01:26:43,440
चाहिए था। और यहां पर जो छू रहा है यहां पर जो छू रहा है उसका

1236
01:26:43,440 --> 01:26:47,520
भी खंडन कर रहा है। सुखदेव जी ने नहीं छुआ तो आफत क्योंकि वहां पर इसको

1237
01:26:47,520 --> 01:26:51,600
गृहस्ती का लालच है। और यहां पर छू लिया तो आफत क्योंकि यहां पर ये

1238
01:26:51,600 --> 01:26:55,680
बाबा बनना चाह रहा है। ठोको ताली है

1239
01:26:55,680 --> 01:26:58,480
ना?

1240
01:26:58,480 --> 01:27:02,880
अच्छा आगे चलते हैं। पांच के श्लोक 24 25 26 में गीता ज्ञान इसीलिए

1241
01:27:02,880 --> 01:27:06,960
इस सीरीज का नाम होगा पांचवा अध्याय जो है इसका नाम अलग से रखा

1242
01:27:06,960 --> 01:27:11,520
जाएगा कि छूना है कि नहीं छूना है। रामपाल

1243
01:27:11,520 --> 01:27:15,840
इसी कसमकश में पूरा ये पांचवा चैप्टर है ना इसमें फंसा रहा है। गृहस्थ

1244
01:27:15,840 --> 01:27:19,920
होना है कि विरक्त होना है ये समझ नहीं पा रहा है। तो पांच श्लोक

1245
01:27:19,920 --> 01:27:24,720
24 25 26 में गीता ज्ञान दाता से अन्य परमात्मा की जानकारी बताई गई है।

1246
01:27:24,720 --> 01:27:29,200
श्लोक 23 में कहा गया है कि जो सच्चिदानंद घन ब्रह्म यानी परम अक्षर ब्रह्म

1247
01:27:29,200 --> 01:27:33,200
की शास्त्रोक्त साधना निश्चल मन से करता है तो उस परमात्मा को प्राप्त

1248
01:27:33,200 --> 01:27:37,200
हो जाता है। है ना जबकि यहां पर फिर से

1249
01:27:37,200 --> 01:27:41,600
इसने अनुवाद की मटिया मेट कर दी फिर से

1250
01:27:41,600 --> 01:27:45,600
इसने ये सब बताया ही नहीं कि काम क्रोध मोह को सहने में समर्थ हो

1251
01:27:45,600 --> 01:27:46,100
जाता है।

1252
01:27:45,920 --> 01:27:50,400
इनकी यहां पे संस्कृत दी गई है। राम क्रोधोभव

1253
01:27:50,400 --> 01:27:54,480
राम क्रोधोदभवम संस्कृत दी गई है भाई कोई

1254
01:27:54,480 --> 01:27:58,640
बात ही नहीं करता अनुवाद की ठोको ताली बनते रहो

1255
01:27:58,640 --> 01:28:02,880
घिस घिस के मूर्ख बनते रहो रामपाल का जो मल्लम है रामपाल

1256
01:28:02,880 --> 01:28:07,040
का जो बाम है वो माथे पर लपेटते रहो ठोको ताली ताली ठोकते

1257
01:28:07,040 --> 01:28:13,040
रहो हां [गहरी सांस लेने की आवाज़]

1258
01:28:13,770 --> 01:28:17,920
[अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] आगे क्या कह रहा है तो श्लोक 23 की बात तो हमने कर ली अब पांच पांच

1259
01:28:17,920 --> 01:28:21,600
श्लोक 24 में कहा है कि वह योगी

1260
01:28:21,600 --> 01:28:25,760
साधक ही निर्वाण ब्रह्म। अब देखिए यहां पर निर्वाण ब्रह्म

1261
01:28:25,760 --> 01:28:29,920
आगे के दो तीन श्लोक में बार-बार शब्द आएगा। इसने क्या किया है? निर्वाण

1262
01:28:29,920 --> 01:28:34,000
ब्रह्म को ब्रह्म से अलग कर दिया है। निर्वाण ब्रह्म

1263
01:28:34,000 --> 01:28:38,240
को जबकि वहां कहा जा रहा है कि ब्रह्म का जो निर्वाण है ब्रह्म की जो शांति

1264
01:28:38,240 --> 01:28:42,480
है वो प्राप्त होती है। मगर इसने कहा है कि निर्वाण ब्रह्म जो है अलग है।

1265
01:28:42,480 --> 01:28:46,480
इस कारण से जो निर्वाण ब्रह्म है वो गीता कहने वाले से अलग

1266
01:28:46,480 --> 01:28:50,480
हो गया। ठोको ताली बाकी हमने बता दिया है कौन सा पृष्ठ

1267
01:28:50,480 --> 01:28:54,480
है वह पहले इसका पढ़ लेते हैं तो भैया निर्वाण ब्रह्म है

1268
01:28:54,480 --> 01:28:58,480
अर्थात पूर्ण परमात्मा सत्पुरुष को प्राप्त होता है श्लोक 25 में भी

1269
01:28:58,480 --> 01:29:01,120
निर्वाण ब्रह्म को पाने का वर्णन है तथा श्लोक

1270
01:29:01,120 --> 01:29:05,360
26 में भी निर्वाण ब्रह्म पाने का प्रमाण देता है जिसमें काम क्रोध समाप्त

1271
01:29:05,360 --> 01:29:09,360
कर लिए वह व्यक्ति पूर्ण ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त समझो यह समता ना ब्रह्मा

1272
01:29:09,360 --> 01:29:13,600
जी में ना शिव जी में ये अपनी इसने बकवास डाल दी ठीक है अर्थात वार

1273
01:29:13,600 --> 01:29:17,760
ही ब्रह्मा ये सब इसने अपनी बकवास अब यहां पर निर्वाण

1274
01:29:17,760 --> 01:29:21,840
ब्रह्म की मेन बात है कि भाई निर्वाण ब्रह्म निर्वाण आया है। यहां पर ब्रह्म से प्राप्त

1275
01:29:21,840 --> 01:29:26,000
होने वाली शांति की बात हो रही है। पहले तो हम लोग अपना पढ़ लेते हैं क्या है

1276
01:29:26,000 --> 01:29:30,320
24 से 26 जो पुरुष अंतरात्मा

1277
01:29:30,320 --> 01:29:34,400
में यह गीता प्रेस का पढ़ रहा हूं। जो पुरुष अंतरात्मा में सुख वाला है, आत्मा में

1278
01:29:34,400 --> 01:29:38,720
ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानंद

1279
01:29:38,720 --> 01:29:43,280
घन ब्रह्म परम ब्रह्म परमात्मा हमारे यहां तो ब्रह्म का अर्थ फाइनल है।

1280
01:29:43,280 --> 01:29:47,280
तो वो परमात्मा के साथ एक ही भाव को प्राप्त हो गया। अब ये एक

1281
01:29:47,280 --> 01:29:51,360
ही भाव का वहां पे एक वो है। क्या है? ब्रह्म भूत।

1282
01:29:51,360 --> 01:29:55,600
यह ब्रह्म भूत शब्द का अर्थ करना फड़। गीता

1283
01:29:55,600 --> 01:29:59,760
में एक शब्द आया है। ब्रह्म भूत। तो ब्रह्म भूत का मतलब ब्रह्म स्वरूप।

1284
01:29:59,760 --> 01:30:03,760
ब्रह्म के साथ एकत्व तो ब्रह्म के साथ एकत्व वाली बात तो

1285
01:30:03,760 --> 01:30:08,000
स्वीकार कर नहीं पाएगा कभी भी तो ब्रह्म ब्रह्म भूत होने की बात का क्या करें

1286
01:30:08,000 --> 01:30:12,400
यहां पर जो श्लोक में आई है ठोको ताली उसको पी जाओ जैसे बबता

1287
01:30:12,400 --> 01:30:16,160
वाला मामला हो गया जैसे रामपाल अपने लोगों को कुछ खिलाता पिलाता है

1288
01:30:16,160 --> 01:30:20,320
वो वो जब पिया जाता है उसी तरीके से ब्रह्म भूत भी गायब कर दो

1289
01:30:20,320 --> 01:30:24,560
तो यहां क्या कहा जा रहा है कि ब्रह्म के साथ एक ही भूत हो के

1290
01:30:24,560 --> 01:30:28,560
जो ब्रह्म की शांति को प्राप्त हो जाता है ब्रह्म ब्रह्म के पास जाने

1291
01:30:28,560 --> 01:30:33,040
से जो आपको वो अक्षय सुख मिलेगा वही परम शांति है वही सद्गति

1292
01:30:33,040 --> 01:30:37,120
है उसको प्राप्त हो जाता है। ठीक है? तो यह

1293
01:30:37,120 --> 01:30:41,120
हो गया 24 का आगे क्या है? जिनके सब पाप नष्ट

1294
01:30:41,120 --> 01:30:45,440
हो गए हैं। 25 का सही अर्थ जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं। जिनके सब संशय

1295
01:30:45,440 --> 01:30:49,600
ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं। है ना? अब देखो 5:25

1296
01:30:49,600 --> 01:30:54,640
में सीधी सी बात आई है। छिन्न द्वैधा

1297
01:30:54,640 --> 01:30:58,800
है ना? यह बात सीधे-सीधे आई है और इसका अर्थ संशय समझ लीजिए

1298
01:30:58,800 --> 01:31:03,280
या द्वैत रूपी संशय समझ लीजिए कुछ भी समझ लीजिए यहां पर द्वैत

1299
01:31:03,280 --> 01:31:07,440
भाव के कारण होने वाले संशय की बात की जा रही है कुछ अनुवादकों

1300
01:31:07,440 --> 01:31:11,520
के द्वारा संशय की बात तो की जा रही जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा

1301
01:31:11,520 --> 01:31:15,520
निवृत्त हो गए हैं। कौन सा चपड़ गंजू चेला है इनका? जिसको

1302
01:31:15,520 --> 01:31:19,520
ज्ञान है, जिसके संशय दूर हो गए हैं। परमात्मा सर्व्यापक है कि एक

1303
01:31:19,520 --> 01:31:23,520
देश है। सर्वशक्तिमान है तो कैसे है?

1304
01:31:23,520 --> 01:31:27,520
व्यवहार में आ सकने वाला है या ना आ सकने वाला है। एक एक

1305
01:31:27,520 --> 01:31:31,200
पॉइंट पर इनके पुअर चेलों की फवरता के प्रमाण है हमारे

1306
01:31:31,200 --> 01:31:36,080
पास एक-एक पॉइंट पर। फिर कहने लगते हैं अल्ला

1307
01:31:36,080 --> 01:31:40,240
ल ये करने लगते हैं। जो संपूर्ण प्राणियों के हित

1308
01:31:40,240 --> 01:31:44,240
में रत है और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव

1309
01:31:44,240 --> 01:31:48,320
से परमात्मा में स्थित है। वह ब्रह्मवित्ता देखिए

1310
01:31:48,320 --> 01:31:52,480
यहां पर भी ब्रह्मवित्ता कहा जा रहा है उसको।

1311
01:31:52,480 --> 01:31:56,640
पुरुष शांत ब्रह्म को ब्रह ब्रह्म का जो मोक्ष है ब्रह्म का जो सुख है ब्रह्म

1312
01:31:56,640 --> 01:32:00,800
की जो शांति है उसको प्राप्त हो जाते हैं। ब्रह्म निर्वाण तो यहां पर भी ब्रह्म निर्वाण

1313
01:32:00,800 --> 01:32:05,040
शब्द आ गया। और 26 में क्या है? काम क्रोध से रहित जीते

1314
01:32:05,040 --> 01:32:09,280
हुए चित्त वाले परम ब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किए

1315
01:32:09,280 --> 01:32:13,440
हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत

1316
01:32:13,440 --> 01:32:17,520
परम ब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है। तो यहां पर भी परम

1317
01:32:17,520 --> 01:32:21,600
ब्रह्म वाली शांति की बात हो रही है। परम ब्रह्म वाला जो सुख

1318
01:32:21,600 --> 01:32:25,840
है अक्षय होता है जो उस सुख की बात हो रही है। जिसको यह गीता कहने

1319
01:32:25,840 --> 01:32:29,920
वाले से अलग टाइप का सुख बनाना चाहते हैं। ठीक है? अब ये तो

1320
01:32:29,920 --> 01:32:34,240
इन्होंने बना दिया। पर इसका हम साथ-साथ एक खंडन करते चल

1321
01:32:34,240 --> 01:32:38,240
जो आवश्यक है। शायद 59 नंबर पेज है वह

1322
01:32:38,240 --> 01:32:42,320
निकालिए जरा। 59 है जहां पर यह वाली बात की है ना

1323
01:32:42,320 --> 01:32:48,320
कि वो उस की बात हो रही थी। उस

1324
01:32:50,640 --> 01:32:56,640
उस दिन जो बात हुई थी ना वह तारेंद्र करके आया था कोई व्यक्ति।

1325
01:33:02,480 --> 01:33:08,480
आ गया क्या? 59 नहीं है और कोई है।

1326
01:33:31,840 --> 01:33:36,000
पहले एक बार हमने अभी पिछले एपिसोड जो तारेंद्र [गला साफ़ करने की आवाज़] के साथ बात हुई थी उसमें उसमें

1327
01:33:36,000 --> 01:33:42,000
उस वाले शब्द में फंसाया था ना

1328
01:33:43,280 --> 01:33:47,600
आगे होगा कहीं पे ठीक वो अलग से आप लगा दीजिएगा बुलेट पॉइंट्स

1329
01:33:47,600 --> 01:33:53,600
में संसार के नर नारी हां ये आ गया मिल गया 63 है 63

1330
01:33:53,720 --> 01:33:58,560
[गला साफ़ करने की आवाज़] अब यहां से गरमा गीता की में इनके जो कबीर हैं

1331
01:33:58,560 --> 01:34:02,560
वो भी एक अलग परमात्मा की बात कर रहे हैं अपने से भिन्न परमात्मा की वो क्या कह रहे हैं वो भी

1332
01:34:02,560 --> 01:34:06,960
देखते चलो वह परमात्मा यानी कि कबीर से अलग परमात्मा

1333
01:34:06,960 --> 01:34:10,960
है इसलिए कबीर कह रहा है के भाई रामपाल का कबीर कह रहा है रामपाल

1334
01:34:10,960 --> 01:34:15,600
का परमात्मा कह रहा है कबीर का नाम मत लो रामपाल का जो तथाकथित

1335
01:34:15,600 --> 01:34:19,840
ईश्वर है वो कह रहा है वह परमात्मा जिसका काल ना हो यानी अविनाशी सत्पुरुष

1336
01:34:19,840 --> 01:34:23,920
वह सच्चा परमात्मा जिसका नाश ना हो यानी अविनाशी शब्द स्वरूपी राम

1337
01:34:23,920 --> 01:34:29,520
वह यहां देख लो शब्द स्वरूपी शब्द स्वरूप है वो

1338
01:34:29,520 --> 01:34:33,680
शब्द स्वरूपी राम वह परमात्मा जिसका वास्तविक रूप शब्द है वास्तविक

1339
01:34:33,680 --> 01:34:38,240
रूप शरीर नहीं है शब्द है और शब्द खंड नहीं होता

1340
01:34:38,240 --> 01:34:42,240
वह नाश में नहीं आता यानी अविनाशी उस परमात्मा को जो अविनाशी ये

1341
01:34:42,240 --> 01:34:46,240
भैया तुम्हारा कबीर फिर भी यहां पर अपने से भिन्न किसी परमात्मा

1342
01:34:46,240 --> 01:34:50,720
की बात कर रहा है। वो भी तुम्हारी ही लेखनी के अनुसार।

1343
01:34:50,720 --> 01:34:56,720
ठोको ताली। चलिए अब वापस आ जाते हैं उसी प्रश्न पर।

1344
01:34:57,260 --> 01:35:02,080
[खांसने की आवाज़]

1345
01:35:02,080 --> 01:35:08,080
कौन सा प्रश्न चल रहा था?

1346
01:35:09,840 --> 01:35:13,840
हां। ये चल रहा था 24 से 26 वाला। तो निर्वाण ब्रह्म

1347
01:35:13,840 --> 01:35:18,320
की बात हमने कर ली और अपने से भिन्न परमात्मा की बात कर ली। कबीर से भी भिन्न कोई परमात्मा

1348
01:35:18,320 --> 01:35:22,320
जिसके बारे में कबीर इसकी ही किताब में फूल की किताब में बात कर रहे हैं।

1349
01:35:22,320 --> 01:35:26,400
अब आगे बात करते हैं। अब आ जाते हैं हम 27 और 28 पर। अब

1350
01:35:26,400 --> 01:35:30,640
देखो यहां पर 27 और 28 का भग ये जो गीता प्रेस गोरखपुर है

1351
01:35:30,640 --> 01:35:34,640
उसमें भी दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ किया गया है। तो इस पुअर ने तुरंत

1352
01:35:34,640 --> 01:35:38,640
नकल करते हुए 27 और 28 श्लोक का अनुवाद तो ये करता नहीं है।

1353
01:35:38,640 --> 01:35:42,640
अपनी जो मक्कारी जो कर सकते हैं लोग गलत लोग वही यह भी करता

1354
01:35:42,640 --> 01:35:46,880
है। तो क्या किया इसने? इसने क्या किया वो पढ़ लेते हैं।

1355
01:35:46,880 --> 01:35:50,880
बाहर के विषयों से मन हटाकर शरीर के अंदर चल रहे स्वास से

1356
01:35:50,880 --> 01:35:55,600
नाम स्मरण करते हुए स्वास व नाम जप पर ध्यान लगाएं।

1357
01:35:55,600 --> 01:35:59,840
ठीक है? स्वास उस स्वास जो भकुटी यानी

1358
01:35:59,840 --> 01:36:03,840
दोनों नाक छिदों के मध्य सुषमना द्वार के

1359
01:36:03,840 --> 01:36:08,160
अंदर बाहर होता है उसको सम करके यानी अभ्यास से साधक साधना

1360
01:36:08,160 --> 01:36:12,320
करता है। ठीक है? अब यह बताओ यह एक जगह बैठकर

1361
01:36:12,320 --> 01:36:17,520
के साधना करने को मना करता है ये फवर्ड। ठीक है? और

1362
01:36:17,520 --> 01:36:21,680
यहां पर यह जो बातें कह रहा है कि भकुटी यानी दोनों नाक छिदों के मध्य

1363
01:36:21,680 --> 01:36:25,760
सुषमना द्वार के अंदर बाहर होता है। उसको सम करके यानी अभ्यास के अभ्यास से

1364
01:36:25,760 --> 01:36:29,840
साधक साधना करता है। यहां पे इस तरह की चीजें बता रहा है।

1365
01:36:29,840 --> 01:36:33,920
और क्या बता रहा है? बाहर के विषय भोगों से मन हटाकर अंदर चल

1366
01:36:33,920 --> 01:36:38,160
रहे स्वास से नाम स्मरण करते हुए तो मूर्ख व्यक्ति तू

1367
01:36:38,160 --> 01:36:42,720
यह सब कार्य चलते फिरते करता है बता ये

1368
01:36:42,720 --> 01:36:46,880
कहता है ना कि भाई एक जगह बैठकर मत करो हठ

1369
01:36:46,880 --> 01:36:50,960
योग मना करता है ना एक जगह बैठकर करने के लिए छठव अध्याय में यही किया

1370
01:36:50,960 --> 01:36:55,200
इसने तीसरे में भी यही बताया है कि एक जगह बैठकर

1371
01:36:55,200 --> 01:36:59,360
के साधना मत करो चलते फिरते करो एक जगह बैठकर ध्यान लगाना गलत है नाम

1372
01:36:59,360 --> 01:37:03,680
जप करना बदल गलत है। एक एकाग्रचित हो के करना गलत है। और

1373
01:37:03,680 --> 01:37:07,920
यहां पर जो बातें करता है तो इसके फूहड़ जो अनपढ़ चेले इसके ही अनुसार

1374
01:37:07,920 --> 01:37:12,080
गीता की इसकी गीता के अनुसार वो चलते चलते सब करते होंगे। भगटी

1375
01:37:12,080 --> 01:37:16,320
के बीच में ध्यान लगाते होंगे। इसीलिए उनके बार-बार

1376
01:37:16,320 --> 01:37:20,720
वो किसी बुलडोजर जैसे व्यक्ति से भिड़ जाते हैं।

1377
01:37:20,720 --> 01:37:25,120
क्योंकि उसको तूने ये ज्ञान दिया है ना फोड़ता वाला। इसलिए वो देखते नहीं है। भगवती

1378
01:37:25,120 --> 01:37:27,520
के बीच में ऐसेसे चलते हुए करते रहते हो। चलते

1379
01:37:27,520 --> 01:37:31,520
फिरते चलते फिरते किसी मनुवादी से टकरा जाते हैं। जैसे राघव

1380
01:37:31,520 --> 01:37:35,600
दास की आजकल मिट्टी पलीद हो रही है। शिवाश नारायण द्विवेदी से टकरा गए क्योंकि चलते

1381
01:37:35,600 --> 01:37:41,600
चलते वो ऐसे करते हैं। वो भ्रकुटी के बीच में ध्यान लगाते हैं। [हंसी]

1382
01:37:41,920 --> 01:37:46,000
भकुटी के बीच में ध्यान लगाते हैं। ये जो रामपाल द्वारा

1383
01:37:46,000 --> 01:37:50,160
बनाए गए जॉम्बीज हैं। राघव दास और ये फैक्ट बाय अभिषेक

1384
01:37:50,160 --> 01:37:54,240
जैसे ये ज़ॉम्बीज चलते चलते भकुटी के बीच में ध्यान लगाते हैं। क्योंकि

1385
01:37:54,240 --> 01:37:58,400
एकाग्र चित्त होकर एक जगह बैठकर आसन लगाकर बैठने के लिए तो मना

1386
01:37:58,400 --> 01:38:02,400
किया गया है। रामपाल के अनुसार ठोको ताली। अब की बार जब भी

1387
01:38:02,400 --> 01:38:06,480
कोई इनका वीडियो बनाता हुआ दिखे इन लोगों का तो उससे पूछना कि तू

1388
01:38:06,480 --> 01:38:11,790
इस समय भगवती के बीच में ध्यान लगा रहा है कि नहीं लगा रहा? इससे पूछना।

1389
01:38:11,790 --> 01:38:14,240
[हंसी]

1390
01:38:14,240 --> 01:38:16,960
ठीक है।

1391
01:38:16,960 --> 01:38:21,040
एक मातृशक्ति है जो कह रहे हैं आज के आजकल किसी के पास

1392
01:38:21,040 --> 01:38:25,200
टाइम नहीं है एक जगह बैठने का तो टाइम नहीं है बैठने का। आजकल

1393
01:38:25,200 --> 01:38:29,520
लोगों के पास धर्माचरण करने का टाइम भी नहीं है। यह टाइम भी नहीं बचेगा

1394
01:38:29,520 --> 01:38:34,560
थोड़े दिन बाद कि विवाह करो तो किसी से भी मुंह मार लेंगे क्या?

1395
01:38:34,560 --> 01:38:38,640
और दूसरी बात तुम अगर टाइम नहीं है तो कोई बात नहीं। वह बात एक अलग है।

1396
01:38:38,640 --> 01:38:44,640
तुम तो उसका निषेध कर रहे हो ना। ऐसा करना ही नहीं है।

1397
01:38:46,000 --> 01:38:52,000
चलिए आगे चलते हैं। 5 27 से 28

1398
01:38:52,000 --> 01:38:56,080
अब हमारे 5 27 से 28 क्या कह रहे हैं? बाहर के विषय भोगों का ना चिंता

1399
01:38:56,080 --> 01:39:00,080
चिंतन करता हुआ बाहर ही निकालकर नेत्रों की दृष्टि को भकुटी के

1400
01:39:00,080 --> 01:39:05,360
बीच में। अब देखिए नेत्रों की दृष्टि को

1401
01:39:05,360 --> 01:39:10,080
देखिए चक्षु यहां पर चक्षु शब्द आया है।

1402
01:39:10,080 --> 01:39:14,080
तो नेत्रों की दृष्टि को भकुटी के

1403
01:39:14,080 --> 01:39:18,080
बीच में स्थित करके यह सब का अनुवाद कौन करेगा रे फड़

1404
01:39:18,080 --> 01:39:22,080
जेल कट्टू और तेरी बात को गलत साबित कोई कर नहीं सकता

1405
01:39:22,080 --> 01:39:27,520
कोई बच्चा भी कर देगा तेरी बातों को गलत साबित

1406
01:39:27,520 --> 01:39:31,520
50 लाख गिनते गिनते थक जाएगा इतने लोग करेंगे तेरे को गलत

1407
01:39:31,520 --> 01:39:36,560
साबित

1408
01:39:36,560 --> 01:39:40,720
यहां चक्षु की बात हो रही तेरे अनुवाद में चक्षु क्यों नहीं बे फर्

1409
01:39:40,720 --> 01:39:46,720
कहीं का अनपढ़

1410
01:39:48,640 --> 01:39:52,720
तो बाहर के विषयों में विषय भोगों को ना चिंतन

1411
01:39:52,720 --> 01:39:57,120
करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भकुटी के बीच में

1412
01:39:57,120 --> 01:40:01,280
स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके

1413
01:40:01,280 --> 01:40:06,320
जिसकी इंद्रियां मन और बुद्धि जीती हुई है। ऐसा जो मोक्ष परायण मुनि

1414
01:40:06,320 --> 01:40:10,640
मोक्ष परायण कहा गया है। मोक्ष परायण परायण शब्द आया है। इसके

1415
01:40:10,640 --> 01:40:14,640
पास तो है ही नहीं ऐसा शब्द मोक्ष परायण यह सब ब्रह्म भूत

1416
01:40:14,640 --> 01:40:18,960
सब खा जाता है और कहता है मैंने सबसे अच्छा अनुवाद किया है मूर्ख कहीं

1417
01:40:18,960 --> 01:40:23,280
का तो मोक्ष परायण शब्द आया है ऐसा जो मोक्ष परायण

1418
01:40:23,280 --> 01:40:28,480
मुनि इच्छा भय और क्रोध से रहित हो गया वह सदा मुक्त है

1419
01:40:28,480 --> 01:40:32,560
ये है तत्वदर्शी

1420
01:40:32,560 --> 01:40:37,760
अब देखो लास्ट में क्या कहा इस सब के बाद अंत में माम

1421
01:40:37,760 --> 01:40:42,320
सब इसने जो किया ना उस उसकी भक्ति बताई। अब देखो लास्ट में अब यह अपनी

1422
01:40:42,320 --> 01:40:46,400
अज्ञान अज्ञानता का प्रदर्शन करेगा। अब यहां भगवान

1423
01:40:46,400 --> 01:40:50,960
लास्ट में कह रहे हैं कि

1424
01:40:50,960 --> 01:40:55,680
[खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] माम शब्द आ गया। भगवान कह रहे हैं मेरा भक्त मुझको

1425
01:40:55,680 --> 01:40:59,680
सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला संपूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी

1426
01:40:59,680 --> 01:41:04,080
ईश्वर तथा संपूर्ण भूत प्राणियों का सुहृद

1427
01:41:04,080 --> 01:41:06,240
अर्थात

1428
01:41:06,240 --> 01:41:10,240
स्वार्थ रहित दयालु और प्रेमी ऐसा तत्व से जानकर शांति को प्राप्त

1429
01:41:10,240 --> 01:41:15,280
होता है। मेरा भक्त शांति को कौन प्राप्त होता है?

1430
01:41:15,280 --> 01:41:19,360
मेरा भक्त यह कह रहे हैं भगवान अंत में और वहां

1431
01:41:19,360 --> 01:41:23,360
पर कह रहे ऐसा तत्व से यानी तत्व तत्व को जानने वाला भी

1432
01:41:23,360 --> 01:41:27,360
हो गया भगवान श्री कृष्ण का भक्त भी हो गया गीता कहने वाले का भक्त भी हो गया

1433
01:41:27,360 --> 01:41:31,840
और शांति को प्राप्त होने वाला भी हो गया अब देखो ये एक फर्ता इसमें फैलाएगा

1434
01:41:31,840 --> 01:41:36,000
क्योंकि माम शब्द आ गया ना अगले प्रश्न पर आ जाओ 126

1435
01:41:36,000 --> 01:41:40,080
अब ये पांच 29 का श्लोक का अर्थ बताता है गीता ज्ञान देने वाला काल ब्रह्म ने

1436
01:41:40,080 --> 01:41:43,760
कहा है कि इस तत्व ज्ञान के अभाव से मुझ काल

1437
01:41:43,760 --> 01:41:47,920
को यज्ञ तथा तपों को भोगने वाला संपूर्ण लोकों का महान ईश्वर

1438
01:41:47,920 --> 01:41:52,240
यानी महेश और सर्व प्राणियों का सुह

1439
01:41:52,240 --> 01:41:56,480
यानी स्वार्थ रहित दयालु हितषी जानकर शांति को गवा

1440
01:41:56,480 --> 01:42:01,760
देता है। दीक्षति का अर्थ होता है गवाना। ये कहां लिखा है?

1441
01:42:01,760 --> 01:42:05,840
कहां लिखा है? अभी चैट जीपीटी करो। अभी

1442
01:42:05,840 --> 01:42:11,280
Google करके देख लो। कहां लिखा है? इच्छति का अर्थ गवा देना।

1443
01:42:11,280 --> 01:42:17,280
ठीक है? दूसरी बात एक और है कि

1444
01:42:17,520 --> 01:42:21,840
अभाव तत्व ज्ञान के अभाव से वहां पर बात हो रही है तत्व

1445
01:42:21,840 --> 01:42:25,920
से जानकर यानी तत्व ज्ञान का अभाव नहीं अभाव है मगर यहां यह बात कर

1446
01:42:25,920 --> 01:42:30,480
रहा है कि तत्व ज्ञान के अभाव से इस अभाव की संस्कृत कहां मिलेगी रमलू

1447
01:42:30,480 --> 01:42:34,800
अभाव की भी तो संस्कृत करनी पड़ेगी केवल तेरी ही किताबें पर्याप्त

1448
01:42:34,800 --> 01:42:39,040
है तेरी बातों का खंडन करने के लिए भाई तत्व ज्ञान के अभाव

1449
01:42:39,040 --> 01:42:43,120
की संस्कृत तो मिल ही नहीं रही ना इसमें कहां है? तत्व

1450
01:42:43,120 --> 01:42:48,400
ज्ञान के अभाव की संस्कृत ज्ञात्वा तत्व से जानकर

1451
01:42:48,400 --> 01:42:53,040
ज्ञात्वा इसमें कहां है? अभाव

1452
01:42:53,040 --> 01:42:57,120
अभाव कहां है इसमें? अभाव है ही नहीं। ज्ञान का

1453
01:42:57,120 --> 01:42:58,800
अभाव है ही नहीं। तो ज्ञान का

1454
01:42:58,800 --> 01:43:02,880
अभाव नहीं है। ज्ञान का भाव है यहां। तो ज्ञान का अभाव है। तो जिसको ज्ञान का भाव है वो

1455
01:43:02,880 --> 01:43:06,880
शांति को कैसे गवा देगा? तो ये आप लोग देख लेना। 5 29 हो

1456
01:43:06,880 --> 01:43:11,120
गया। इस तरीके से इसका पांचवा अध्याय रमलू का बैंड बजाते हुए हमने पूरा

1457
01:43:11,120 --> 01:43:15,200
किया और फिर से लास्ट में मैं घोषणा कर दूं कि मैं हूं

1458
01:43:15,200 --> 01:43:15,840
सनातन

1459
01:43:15,840 --> 01:43:20,000
धर्म का एडवोकेट और मैं घोषणा करता हूं

1460
01:43:20,000 --> 01:43:24,000
रामपाल और इसके विश्व भर में फैले हुए समस्त चूहे

1461
01:43:24,000 --> 01:43:28,080
भगत को कि रामपाल ने जो परंपरा प्राप्त सनातन सिद्धांतों

1462
01:43:28,080 --> 01:43:32,240
के विषय में जिन विषय को लेकर मैंने आपत्ति प्रकट की है उन विषयों में मेरी

1463
01:43:32,240 --> 01:43:36,320
एक भी बात को गलत साबित कर दे मैं उसे एक करोड़ दूंगा 50

1464
01:43:36,320 --> 01:43:41,360
लाख नहीं ₹1 करोड़ दूंगा। ठीक है?

1465
01:43:41,360 --> 01:43:45,520
यह मेरा खुला चैलेंज है। जिसने भी अपनी मां का दूध पिया हो,

1466
01:43:45,520 --> 01:43:49,520
जिसको भी उसकी मां ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो, वो गलत साबित करके

1467
01:43:49,520 --> 01:43:54,360
बताए और ₹1 करोड़ ले जाए।

1468
01:43:54,360 --> 01:43:58,720
[गहरी सांस लेने की आवाज़] थोड़ा सा लिंक दे दीजिए। तो

1469
01:43:58,720 --> 01:44:02,800
किसी को कुछ विचार प्रकट करने हो कुछ लोग हैं

1470
01:44:02,800 --> 01:44:06,800
इस समय जो देख रहे होंगे लाइव वो आ सकते

1471
01:44:06,800 --> 01:44:10,960
हैं। वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा के लिए ना

1472
01:44:10,960 --> 01:44:15,200
आए उसके लिए संपर्क करें WhatsApp पर फॉर्म

1473
01:44:15,200 --> 01:44:19,600
भरें। WhatsApp पे और कोई बात ना करके फॉर्म भरा करिए।

1474
01:44:19,600 --> 01:44:23,600
आपको फॉर्म यहां से मिल जाता है। जैसे ही आप WhatsApp करेंगे तो आपको फॉर्म

1475
01:44:23,600 --> 01:44:29,600
मिलेगा। अपने रुचि के अनुसार

1476
01:44:30,000 --> 01:44:34,560
अपनी रुचि के अनुसार

1477
01:44:34,560 --> 01:44:38,560
यह देखिए रिक्षति का अर्थ इसका मुख्य अर्थ होता है

1478
01:44:38,560 --> 01:44:42,640
प्राप्त करता है पहुंचता है जैसे फल फलम वृक्षति फल को

1479
01:44:42,640 --> 01:44:46,880
प्राप्त करता है और यह बातें लिखी हुई है शिवराम आपटे में

1480
01:44:46,880 --> 01:44:52,240
डिक्शनरी में ठीक है

1481
01:44:52,240 --> 01:44:58,240
हां जी प्रेम सिंह भाटी जी जय श्री राम

1482
01:45:03,520 --> 01:45:06,880
जय श्री राम भाटी जी

1483
01:45:06,880 --> 01:45:12,880
जी जय श्री राम जी

1484
01:45:14,320 --> 01:45:18,400
बहुत अच्छा मैं देख रहा था शुरू से बढ़िया एक

1485
01:45:18,400 --> 01:45:22,480
वो कह रहा है वो कहता है ना हमारे गुरु जी अंगुली रख कर दिखाते

1486
01:45:22,480 --> 01:45:26,480
हैं हां आपने अंगुली रख रख के अच्छा इसका भंडाफोड़ कर दिया

1487
01:45:26,480 --> 01:45:30,880
सारे अज्ञान का सारे कुतर्कों का मतलब इसमें

1488
01:45:30,880 --> 01:45:34,960
अपनी घफोड़बाजी साबित करने के लिए ना तो कोई व्याकरण

1489
01:45:34,960 --> 01:45:39,040
का ध्यान रखा है ना कोई संदर्भ का ध्यान रखा कुछ नहीं बस उलूल

1490
01:45:39,040 --> 01:45:43,040
जुलूल करके अपना वो गपोड़बाजी सिद्ध करने

1491
01:45:43,040 --> 01:45:47,200
की कोशिश की है। अब इनसे बात करते कहते

1492
01:45:47,200 --> 01:45:51,360
व्याकरण पर मत जाओ हमारे तिरछादर्शी है। उन्होंने कह दिया वही फाइनल

1493
01:45:51,360 --> 01:45:55,600
है। ठीक है ना? हमें व्याकरण से, संधि से, संदर्भ

1494
01:45:55,600 --> 01:45:59,600
से कोई लेना देना नहीं है। हमारे लिए जो तिचा दर्शी

1495
01:45:59,600 --> 01:46:03,760
ने कह दिया वो फाइनल है। तो भाई तुम्हारे लिए लेना

1496
01:46:03,760 --> 01:46:09,760
देना नहीं है। फिर गीता से भी क्यों लेना देना रखते हो? वो कहे वही मान लो।

1497
01:46:11,280 --> 01:46:15,360
अच्छा लगा। बहुत अच्छा। एक-ए चीज को इसको अलग-अलग काट

1498
01:46:15,360 --> 01:46:19,680
के डाला जा सकता है। आजकल ऐसा कंटेंट आपने दे दिया है। निश्चित रूप से प्रचारित

1499
01:46:19,680 --> 01:46:23,760
करने जैसा है। सबको जो भी सोशल मीडिया पर है उनको ये

1500
01:46:23,760 --> 01:46:27,920
प्रचारित चीजें करनी चाहिए। एक एक श्लोक की व्याख्या आप

1501
01:46:27,920 --> 01:46:32,000
लोग ले ले के एक एक श्लोक जो आपको हिस्सा अच्छा लगे उस श्लोक को

1502
01:46:32,000 --> 01:46:36,000
कट करिए और खूब सोशल मीडिया पर आप प्रचारित करिए। कोई यहां

1503
01:46:36,000 --> 01:46:40,240
पर रोक नहीं है कि आप यहां से उठा नहीं सकते। एक एक श्लोक पर जो मैंने धज्जियां

1504
01:46:40,240 --> 01:46:44,240
इसकी उड़ाई है रामपाल की उसको यहां से कट करिए और दिखाइए कि ये

1505
01:46:44,240 --> 01:46:48,400
क्या कर रहा है। उस उस उस पर बात करता है ना उसमें

1506
01:46:48,400 --> 01:46:52,880
ही घुसा दिया इसको उसकी बात करता है ना

1507
01:46:52,880 --> 01:46:58,160
उस उस परमात्मा हां जी

1508
01:46:58,160 --> 01:47:02,320
गोस्वामी जी बोले जय शिव जी जय

1509
01:47:02,320 --> 01:47:08,320
श्री राम जय श्री राम जय राम कल एक नया

1510
01:47:08,560 --> 01:47:12,800
आएगा कि ये 50 लाख तो हम लोग ये

1511
01:47:12,800 --> 01:47:17,120
फलाने गुरु और ढक गुरु पूछे गुरु वो आएंगे उसके साथ ही शास्त्रार्थ

1512
01:47:17,120 --> 01:47:21,200
करेंगे तो मैं मैं थोड़ी ना कह रहा हूं कि मैंने इससे शास्त्रार्थ

1513
01:47:21,200 --> 01:47:25,680
कर लिया मैं तो एक नई घोषणा कर रहा हूं मैं ये नहीं कह रहा कि मैंने शास्त्रार्थ

1514
01:47:25,680 --> 01:47:29,680
मैं तो नई घोषणा कर रहा हूं कि मैं एक करोड़ की घोषणा करूंगा तू कल एक करोड़ की कर

1515
01:47:29,680 --> 01:47:34,000
मैं दो करोड़ की कर दूंगा घोषणा तो घोषणा ही तो करनी है केवल करता रहे

1516
01:47:34,000 --> 01:47:38,080
उसका कोई सर पैर तो है नहीं तेरी बातों का कि कहां पर लाइव डिबेट

1517
01:47:38,080 --> 01:47:43,040
होगी, क्या होगा? वो कह रहा है अपना चैनल पर जाओ, अपने पक्ष को प्रस्तुत करो।

1518
01:47:43,040 --> 01:47:48,320
फिर कह रहा है मेरी बात को काटो। अपना पक्ष तो प्रस्तुत कर ही रहे हैं वे मूर्ख।

1519
01:47:48,320 --> 01:47:54,320
कौन नहीं कर रहा अपना पक्ष प्रस्तुत?

1520
01:47:56,400 --> 01:48:00,480
तुम अपना ज्ञान बताओ। मैं अपना ज्ञान बताता हूं। ये तो सदियों से

1521
01:48:00,480 --> 01:48:04,560
युगों से ज्ञान पड़ा है। कोई आज नया थोड़ी है। युगों से ये कह

1522
01:48:04,560 --> 01:48:09,040
रहा है ये कह रहा है खुद भीख मांगने वाला एक करोड़ देगा। अबे तेरा

1523
01:48:09,040 --> 01:48:13,040
तेरा जो तथाकथित बाबा है ना जेलकट्टू वो कह रहा है कि मैं तो

1524
01:48:13,040 --> 01:48:17,200
भक्तों से चंदा लेकर के पाइप लगवाता हूं। अनाकोंडा वाले मुझे क्या

1525
01:48:17,200 --> 01:48:20,160
बता रहा है तू?

1526
01:48:20,160 --> 01:48:25,040
हां वो कौन सा मजदूरी करके कमाता है जो भीख की बात कर रहे हो।

1527
01:48:25,040 --> 01:48:29,040
नहीं नहीं उस उसके शायद उसके जो वो सुबह सुबह जो खीर निकलती है ना

1528
01:48:29,040 --> 01:48:33,120
उसके गुदा द्वार से होकर के दूध बह के आता है। मीडिया खबरों के अनुसार

1529
01:48:33,120 --> 01:48:37,280
रामपाल जो स्नान करता है जो दूध

1530
01:48:37,280 --> 01:48:41,360
इत्यादि से तो वो जाने कहां-कहां से बह करके आता होगा। उसमें जो है

1531
01:48:41,360 --> 01:48:45,600
वो पैसा नोट इत्यादि आ जाता होगा जिसके आधार पर ये पाइप लगवाते हैं जगह-जगह

1532
01:48:45,600 --> 01:48:49,600
पर। अगर इनकी बात मानी जाए तो जो यह बात कर रहे हैं जिस

1533
01:48:49,600 --> 01:48:52,400
तरह से

1534
01:48:52,400 --> 01:48:56,560
ठीक है मैं इनको ले लेता हूं

1535
01:48:56,560 --> 01:49:02,560
जी कुलकर्णी जी बताइए

1536
01:49:03,360 --> 01:49:09,360
जय श्री राम गुरु जी जय श्री राम जय श्री राम

1537
01:49:10,480 --> 01:49:15,280
नमस्कार गुरु जी मैं ओमकार कुलकर्णी हूं भीड़ महाराष्ट्र से

1538
01:49:15,280 --> 01:49:20,000
जी जी

1539
01:49:20,000 --> 01:49:24,000
थोड़ा सा विषय से हटके बोलना था। विषय से हटके

1540
01:49:24,000 --> 01:49:28,160
आप कॉल कर लीजिएगा। कल दिन में कॉल कर लीजिएगा। यहां पर चर्चा

1541
01:49:28,160 --> 01:49:32,160
केवल रामपाल के बारे में। जी जी

1542
01:49:32,160 --> 01:49:36,480
जी जी ठीक है गुरु जी धन्यवाद। बस बोलना

1543
01:49:36,480 --> 01:49:41,840
था। धन्यवाद। थैंक यू। जी जी जी जय श्री

1544
01:49:41,840 --> 01:49:46,480
ठीक है तो मुझे लगता है आज अ

1545
01:49:46,480 --> 01:49:50,560
काफी अच्छा रहा और कल हम लोग इनके एक इनके

1546
01:49:50,560 --> 01:49:54,640
यहां का एक प्रह्लाद है इस गैंग के अंदर रामचंद्र

1547
01:49:54,640 --> 01:49:58,640
यादव उनके पास बहुत सी तथ्यात्मक बातें हैं इस गैंग के बारे में

1548
01:49:58,640 --> 01:50:02,640
हमें बताने के लिए वह कल यहां प्रस्तुत होंगे

1549
01:50:02,640 --> 01:50:07,040
और उनके साथ चर्चा होगी ठीक

1550
01:50:07,040 --> 01:50:11,120
ठीक है? बहुत से खुलासे होने वाले हैं। तो कल सब लोग अप टू डेट रहे रात के

1551
01:50:11,120 --> 01:50:15,120
लिए। बहुत बड़े-बड़े खुलासे होंगे कल। एक सत साहिब जी करके आए

1552
01:50:15,120 --> 01:50:19,280
हैं यहां पर। आप पहली बात तो चेहरा नहीं दिखा रहे। दूसरी

1553
01:50:19,280 --> 01:50:23,520
बात यह है वैचारिक मतभेद के निमित्त अभी हमारे पास समय नहीं है। 1 घंटे 50 मिनट

1554
01:50:23,520 --> 01:50:29,520
हो चुका है। है ना? रुके हुए हैं।

1555
01:50:35,880 --> 01:50:40,560
[गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़]

1556
01:50:40,560 --> 01:50:46,560
अच्छा एक बात है

1557
01:50:47,120 --> 01:50:53,120
थोड़ी देर

1558
01:50:58,080 --> 01:51:02,160
भाई अगर उसको अस्पताल जल्दी नहीं भेजा गया ना तो भैया उसको

1559
01:51:02,160 --> 01:51:06,400
श्रवण करने वाले लोग बहुत पहुंच जाएंगे अस्पताल। आज

1560
01:51:06,400 --> 01:51:11,120
आपको दो खुशखबरियां बता रहा हूं। जो ऑडियो क्लिप है मैं डाल दूंगा।

1561
01:51:11,120 --> 01:51:15,200
एक रामपाल का एक वकील हुआ करता था लखनऊ

1562
01:51:15,200 --> 01:51:19,200
में जो बहुत षड्यंत्र करता था। अभी उसने

1563
01:51:19,200 --> 01:51:23,280
पता है क्या क्या हुआ? उसको जब ये पता चला कि हम लोग ये बहिष्कार आंदोलन चला रहे हैं। ये सब

1564
01:51:23,280 --> 01:51:27,440
कर रहे हैं। तो उसको जब पता चला कि हम लोग उसके घर का भी उसके घर के आसपास

1565
01:51:27,440 --> 01:51:31,680
भी वो तो करेंगे ही। उसके घर के आसपास हम लोग यह उसका बॉयकॉट

1566
01:51:31,680 --> 01:51:36,880
करने के लिए हम लोग जाएंगे। परमिशन लेकर के वहां पर जो है

1567
01:51:36,880 --> 01:51:40,960
प्रदर्शन करेंगे कि भाई आम आदमी उसका बहिष्कार करें। तो

1568
01:51:40,960 --> 01:51:45,040
वो तो करेंगे ही मगर उससे पहले उसको जब ये पता चला ऐसा होने

1569
01:51:45,040 --> 01:51:49,280
वाला है तो वो व्यक्ति क्या बोल रहा है मालूम है? वो व्यक्ति बोल रहा है मैंने अब सब छोड़ दिया है। दंद

1570
01:51:49,280 --> 01:51:51,040
फन मतलब जो षड्यंत्र वगैरह करना

1571
01:51:51,040 --> 01:51:55,360
छोड़ दिया है। अब मैं केवल भक्ति में सीमित हूं। अच्छा

1572
01:51:55,360 --> 01:51:59,440
उसके बाद मेरे से उसकी बात हुई। मैंने फोन लगाया क्योंकि वो मेरे लोगों को कॉल

1573
01:51:59,440 --> 01:52:03,600
कर रहा था। मैंने उसको कॉल लगाया तो वो बोल रहा है

1574
01:52:03,600 --> 01:52:08,320
मैंने उसको बोला मतलब उससे कुछ बात पूछने लगा तो वो पागल हो गया।

1575
01:52:08,320 --> 01:52:13,760
वो बोल रहा है कि भाई मैं तो शंकराचार्य जी का शिष्य हूं पूरी वाली।

1576
01:52:13,760 --> 01:52:17,920
ऐसे बोलने लगा। मैंने कहा हो शिष्य तो बोलो जय। जगदगुरु शंकराचार्य

1577
01:52:17,920 --> 01:52:22,650
महाराज की जय। तो बोला जय। पागल हो गया वो।

1578
01:52:22,650 --> 01:52:26,960
[हंसी] आप लोगों को भी आएगा एक दो दिन में और सुनो

1579
01:52:26,960 --> 01:52:31,520
इनको धन इनको धन से मतलब है धन

1580
01:52:31,520 --> 01:52:35,520
से धन धन से नहीं अपना जीवन कैसे सरलतम से कटे

1581
01:52:35,520 --> 01:52:39,920
धर्म तो धन तो जो ये लोग बात करते हैं ना धर्म

1582
01:52:39,920 --> 01:52:43,920
वो इनको कुछ पता ही नहीं है तो ये करेंगे क्या अच्छा एक चीज और है

1583
01:52:43,920 --> 01:52:48,160
कि जो रामचंद्र यादव जी हैं उन्होंने उसको फोन

1584
01:52:48,160 --> 01:52:52,160
किया था एकद दिन पहले तो ये जब ये

1585
01:52:52,160 --> 01:52:56,160
बोला बोला था ना कि मैं तो अब भक्ति में सीमित हूं। मैंने

1586
01:52:56,160 --> 01:53:00,240
ये सब दंद फंद छोड़ दिए। मुझसे जो ये बोला राम शंकराचार्य भगवान की जय।

1587
01:53:00,240 --> 01:53:04,320
उससे पहले ये रामचंद्र यादव जी बोले इससे कि भाई जय

1588
01:53:04,320 --> 01:53:06,080
श्री राम। तो ये बोला अरे तुम

1589
01:53:06,080 --> 01:53:10,240
जय श्री राम क्यों बोल रहे हो? तुम तो बंदी छोड़ जय बंदी छोड़ बोलने वाले जय श्री राम बोलने

1590
01:53:10,240 --> 01:53:14,240
लगे। मतलब ये देखो जय श्री राम बोलने पर कितनी आपत्ति है।

1591
01:53:14,240 --> 01:53:18,320
रामचंद्र यादव जी ने उसको बोला कि अगर लखनऊ

1592
01:53:18,320 --> 01:53:22,480
में रहना है तो जय श्री राम बोलना पड़ेगा। यह उन्होंने बोला और

1593
01:53:22,480 --> 01:53:26,720
उसके बाद एक दिन बाद देखो उसको जय शंकराचार्य बोलना पड़ा।

1594
01:53:26,720 --> 01:53:30,960
हमारे पक्षी बाद उसको जय करनी पड़ गई। बोला ना जय हो शंकराचार्य

1595
01:53:30,960 --> 01:53:35,520
की तो बहुत बढ़िया है। और सुनो जो व्यक्ति हमारे लिए

1596
01:53:35,520 --> 01:53:39,600
वहां जा रहा था कलेक्टेट में ज्ञापन देने। वो

1597
01:53:39,600 --> 01:53:43,760
व्यक्ति आज कह रहा है। है ना? वह

1598
01:53:43,760 --> 01:53:47,840
व्यक्ति आज कह रहा है कि भैया मैं शिवश नारायण द्विवेदी का फोन आएगा तो उसको कह दूंगा कि

1599
01:53:47,840 --> 01:53:51,920
भाई मुझे अब इस सब से कोई मतलब नहीं है क्योंकि जो लोग मुझे पुश कर रहे

1600
01:53:51,920 --> 01:53:55,920
हैं जो लोग षड्यंत्रकारी हैं वो लोग खुद आगे नहीं

1601
01:53:55,920 --> 01:54:00,000
आते दूसरों को पुश करते हैं भोलेभाले लोगों को तो वो यह कह

1602
01:54:00,000 --> 01:54:04,000
रहा है कि मुझको जो लोग पुश कर रहे थे जब बार-बार शिवश नारायण द्विवेदी ने किताबों

1603
01:54:04,000 --> 01:54:08,080
में लिखी हुई बातों पर बात की और मैं उनके पास लेकर गया भैया इन

1604
01:54:08,080 --> 01:54:12,080
किताबों का तुम जवाब क्यों नहीं देते हो आपने सुना होगा कल की एक रिकॉर्डिंग डाली

1605
01:54:12,080 --> 01:54:16,160
उसमें भी मैं पूछ रहा हूं कि तुम्हारे घर पे किताबें रखी है क्या? वो भी यही बात इस

1606
01:54:16,160 --> 01:54:20,160
बात पर आकर के चुप हो जा रहा है। तो वो जो हमारे खिलाफ कलेक्टेट में गया था

1607
01:54:20,160 --> 01:54:21,200
वो गया उन लोगों

1608
01:54:21,200 --> 01:54:25,520
के पास अपने आकाओं के पास कि भाई इन किताबों का जवाब दो ना मैं क्या जवाब दूं?

1609
01:54:25,520 --> 01:54:29,600
तो आका पीछे हट गए ये वकील की तरह कि भैया किताबों

1610
01:54:29,600 --> 01:54:33,680
का जवाब हमारे पास नहीं है। हमारे पास तो दूर से षड्यंत्र हैं। महिला को खड़ा

1611
01:54:33,680 --> 01:54:37,680
कर दो। ये कर दो, कपड़े फाड़ दो, छेड़खानी का आरोप लगवा दो। ये सब

1612
01:54:37,680 --> 01:54:41,760
षड्यंत्र हैं। हमारे पास किताबों में लिखी हुई गलत बातों का जवाब

1613
01:54:41,760 --> 01:54:45,760
नहीं है। क्योंकि हम तो अनपढ़ हैं, गवार हैं, फूलण हैं। किसके अनुसार? हमारे

1614
01:54:45,760 --> 01:54:49,760
रामपाल के अनुसार। रामपाल ने ही अपनी गीता में लिख दिया है। तो वो व्यक्ति

1615
01:54:49,760 --> 01:54:54,000
ये बोला कि जब वो लोग पीछे हट रहे हैं ना किताबों का जवाब देने से वो व्यक्ति

1616
01:54:54,000 --> 01:54:58,080
भी कह रहा है कि अब मैं इन सब में नहीं हूं। अब मैं भी कोई किसी षड्यंत्र का

1617
01:54:58,080 --> 01:55:02,480
हिस्सा नहीं बनूंगा। ठोको ताली। देखिए कितना परिवर्तन आ रहा है लखनऊ

1618
01:55:02,480 --> 01:55:07,120
में। जो समोसे वाला समोसे की ठेल लगाता था।

1619
01:55:07,120 --> 01:55:11,120
उस समोसे वाले वो समोसे वाला अपनी ठेल पर रामपाल

1620
01:55:11,120 --> 01:55:15,280
का पोस्टर लगा के रखता था। हमने प्रदर्शन किया

1621
01:55:15,280 --> 01:55:19,360
उसने पोस्टर हटा दिया। एक प्लास्टिक की दुकान वाली

1622
01:55:19,360 --> 01:55:23,360
जिसका नाम है रंजना। वो अपनी दुकान पर ये

1623
01:55:23,360 --> 01:55:27,440
फूहड़ तत्वदर्शी राम पाल का फोटो लगा के रखे थी। आज

1624
01:55:27,440 --> 01:55:31,600
वहां पर प्रभु श्री रामचंद्र जी की फोटो लगी हुई है। यह है

1625
01:55:31,600 --> 01:55:35,840
जीत। इसको कहते हैं धर्म की जीत। और

1626
01:55:35,840 --> 01:55:36,340
जो लोग

1627
01:55:36,320 --> 01:55:40,400
षड्यंत्रकारी थे, जो हमारे विरुद्ध षड्यंत्र रच रहे थे, वह आज कह रहे हैं कि अब

1628
01:55:40,400 --> 01:55:44,400
मैं इन सब में नहीं हूं, मैं तो दूर हूं। वह आज कह रहे हैं जय हो शंकराचार्य जी

1629
01:55:44,400 --> 01:55:48,560
की। इसको कहते हैं जीत। इसको कहते हैं धर्म

1630
01:55:48,560 --> 01:55:51,840
की जीत।

1631
01:55:51,840 --> 01:55:57,840
ठीक है। जी

1632
01:55:59,600 --> 01:56:05,600
जय श्री राम भाई। जय श्री राम जी बताइए।

1633
01:56:05,760 --> 01:56:09,920
ये सही आ रही है मेरी

1634
01:56:09,920 --> 01:56:15,280
थोड़ा सा वो कट कट कट ऐसे हो रहा है

1635
01:56:15,280 --> 01:56:19,440
दिक्कत क्या दिक्कत है क्या आपने कोई

1636
01:56:19,440 --> 01:56:24,160
लीड वीट तो नहीं लगा रखी है

1637
01:56:24,160 --> 01:56:28,720
नहीं नहीं नहीं अब अब अभी सही आई थी अभी

1638
01:56:28,720 --> 01:56:32,960
अभी सही आई थी अभीभी जिसको भी कुछ जवाब

1639
01:56:32,960 --> 01:56:37,360
चाहिए वो वो हमारे नंबर पर संपर्क करें, फॉर्म भरे

1640
01:56:37,360 --> 01:56:41,440
और फॉर्म भर के सामने आकर बात करें। यह कमेंट

1641
01:56:41,440 --> 01:56:45,680
सेक्शन में मक्कारी पूर्वक कायरता पूर्वक अपनी

1642
01:56:45,680 --> 01:56:49,680
अपनी नपुंसकता का प्रदर्शन ना करें। ठीक है?

1643
01:56:49,680 --> 01:56:53,680
चलिए फिर काफी हो चुका है समय और यह जो सरिता

1644
01:56:53,680 --> 01:56:57,680
जी हैं उन्होंने वहां पर प्रदर्शन किया है। प्रधानमंत्री जी

1645
01:56:57,680 --> 01:57:02,960
से गुहार लगा रही हैं कि मेरी बेटी को बचाओ।

1646
01:57:02,960 --> 01:57:07,200
सरिता जी हैं। इनकी बिटिया जो तथाकथित स्वयं को भगवान कहने

1647
01:57:07,200 --> 01:57:11,840
वाले अमोल कोकने द्वारा संचालित जो केंद्र है आध्यात्मिक

1648
01:57:11,840 --> 01:57:17,840
विश्वविद्यालय जो ब्रह्मा कुमारी की उपज है

1649
01:57:18,080 --> 01:57:21,360
उसमें इनकी बेटी

1650
01:57:21,360 --> 01:57:25,520
ब्रेन वाश करके उसको लोगों ने एक तरीके

1651
01:57:25,520 --> 01:57:29,760
से मानसिक गिरफ्त में लिया हुआ है और ये अपनी बेटी को छुड़ाने

1652
01:57:29,760 --> 01:57:34,160
की गुहार लगा रही हैं और इसमें हिंदी में इनके यह प्लेट

1653
01:57:34,160 --> 01:57:38,240
है जो इन्होंने वहां बांटे हैं। पहले संसद पर प्रदर्शन करने गई थी पर

1654
01:57:38,240 --> 01:57:43,200
वहां नहीं कर पाई। उसके बाद फिर इन्होंने राजीव चौक पर प्रदर्शन किया है।

1655
01:57:43,200 --> 01:57:48,080
जितना हो सके इनका संदेश ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाए

1656
01:57:48,080 --> 01:57:52,880
जिससे कि इनकी बिटिया जल्दी से घर वापस आए

1657
01:57:52,880 --> 01:57:55,840
और

1658
01:57:55,840 --> 01:57:59,920
इनकी बिटिया का घर वापस आने आना केवल

1659
01:57:59,920 --> 01:58:04,000
इनकी जीत नहीं होगी। धर्म की जीत होगी। जिस प्रकार से रामायण

1660
01:58:04,000 --> 01:58:08,160
में प्रभु श्री राम की जीत हुई थी। जिस प्रकार

1661
01:58:08,160 --> 01:58:12,160
से महाभारत में पांडवों की जीत हुई थी। तो आप इसको ऐसा ना समझे कि

1662
01:58:12,160 --> 01:58:17,520
इनकी लड़ाई है। ये हम सब की लड़ाई है। इस रूप में देख के इसको

1663
01:58:17,520 --> 01:58:22,080
अ समझे। ठीक है?

1664
01:58:22,080 --> 01:58:26,080
ठीक है। और आप में से किसी को कोई बात रखनी हो तो

1665
01:58:26,080 --> 01:58:28,800
बताएं।

1666
01:58:28,800 --> 01:58:32,720
भाटी जी

1667
01:58:32,720 --> 01:58:38,720
जी विश्राम कीजिए लंबा बोले आप भी आज सारा परिवार

1668
01:58:46,880 --> 01:58:50,960
गोस्वामी जी कोई बात जी नहीं

1669
01:58:50,960 --> 01:58:55,280
विश्राम कीजिए जय श्री राम सभी को हर हर महादेव जय

1670
01:58:55,280 --> 01:59:00,080
श्री राम जय श्री राम सभी को जय श्री राम जय श्री राम और जय श्री राम

1671
01:59:00,080 --> 01:59:04,160
कल हमारी लाइव होगी रामचंद्र यादव जी के साथ वो जरूर

1672
01:59:04,160 --> 01:59:08,160
रहिएगा और परसों लाइव होगी जो नीलमा जी हैं जो

1673
01:59:08,160 --> 01:59:13,360
हमें कोर्स करा रही है ब्रह्मा कुमारी का से डेज वाला तो उन सब में रहिएगा

1674
01:59:13,360 --> 01:59:15,680
और

1675
01:59:15,680 --> 01:59:20,480
भगवान के नाम का जप करते रहे सवा घंटे का नाम जप अवश्य करें

1676
01:59:20,480 --> 01:59:23,760
सभी को जय श्री राम

1677
01:59:23,760 --> 01:59:27,760
जय श्री राम जय श्री राम
