1
00:00:01,760 --> 00:00:05,920
तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक

2
00:00:05,920 --> 00:00:10,000
होंगे और आज एक बहुत ही महत्वपूर्ण चर्चा होने जा

3
00:00:10,000 --> 00:00:16,000
रही है। आचार्य हैं

4
00:00:16,960 --> 00:00:22,960
आर्य समाज से हैं और काफी योग्य हैं।

5
00:00:23,040 --> 00:00:27,120
तो सबसे [गला साफ़ करने की आवाज़] पहले हम उन्हें ले लें ऊपर फिर आपसे उनका परिचय

6
00:00:27,120 --> 00:00:31,280
करवाते हैं। जी जय श्री राम

7
00:00:31,280 --> 00:00:36,640
आचार्य जी। जय श्री राम श्री राम जी

8
00:00:36,640 --> 00:00:40,960
आप आचार्य संजीव वेदालंकार हैं

9
00:00:40,960 --> 00:00:46,720
संस्थापक और अध्यक्ष सनातन प्रहरी संस्थान वेद मंदिर पानीपत

10
00:00:46,720 --> 00:00:50,880
अगर योग्यता की बात करें तो प्रारंभिक शिक्षा गुरु गुरु

11
00:00:50,880 --> 00:00:55,440
विजानंद स्मारक गुरुकुल करतारपुर पंजाब

12
00:00:55,440 --> 00:00:59,440
अह एक वेदालंकार समकक्ष

13
00:00:59,440 --> 00:01:03,520
स्नातक दो आचार्य परा स्नातक एमए संस्कृत से

14
00:01:03,520 --> 00:01:08,000
किया है इन्होंने और तीसरा क्रमांक पे डिप्लोमा है मानव

15
00:01:08,000 --> 00:01:12,400
चेतना एवं योग विज्ञान पर यह इन्होंने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय

16
00:01:12,400 --> 00:01:16,640
हरिद्वार से किया है। YouTube एवं Instagram चैनल वैदिक

17
00:01:16,640 --> 00:01:17,140
ध्वनि

18
00:01:17,040 --> 00:01:21,440
के नाम से है इनका। विगत 20 वर्षों से गुरुकुलय

19
00:01:21,440 --> 00:01:25,760
शिक्षा पद्धति के संवर्धन, ध्यान, योग, वैदिक विचारधारा

20
00:01:25,760 --> 00:01:29,760
के पोषण, गौ रक्षण एवं वैचारिक क्रांति के द्वारा

21
00:01:29,760 --> 00:01:34,000
समाज में कार्यरत हैं। तो आपका बहुत-बहुत स्वागत है हमारे

22
00:01:34,000 --> 00:01:38,480
चैनल पर। धन्यवाद। जी।

23
00:01:38,480 --> 00:01:42,880
तो [गला साफ़ करने की आवाज़] थोड़ा सा अगर कुछ आप अपने बारे में हमारे दर्शकों को

24
00:01:42,880 --> 00:01:47,120
संक्षिप्त में कुछ थोड़ा सा जो बताना चाहे अपने

25
00:01:47,120 --> 00:01:51,680
शब्दों में आप बता दे जी मेरा नाम आचार्य संजीव वेदालंकार

26
00:01:51,680 --> 00:01:56,480
है। सबसे पहले मैं आपको सबको प्रणाम करता हूं

27
00:01:56,480 --> 00:02:00,640
और सबको जय श्री राम। जय श्री राम। मेरी शिक्षा जैसा

28
00:02:00,640 --> 00:02:04,880
कि श्रीमान जी ने बताया कि गुरुकुल कांगड़ी से हुई है और उससे

29
00:02:04,880 --> 00:02:09,120
पहले की जो पूर्व शिक्षा है वो गुरुकुल करतारपुर

30
00:02:09,120 --> 00:02:13,120
जालंधर के पास एक स्थान है। वहां से हुई

31
00:02:13,120 --> 00:02:17,360
उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार और

32
00:02:17,360 --> 00:02:21,680
उसके बाद से फिर मैं सेवा के कार्य में धर्म क्षेत्र में विगत

33
00:02:21,680 --> 00:02:25,920
20 वर्षों से कार्य कर रहा हूं। जी

34
00:02:25,920 --> 00:02:30,320
अच्छा तो आपका वो जो कार्य क्षेत्र है वो ये पानीपत

35
00:02:30,320 --> 00:02:32,160
और उसके आसपास का ही

36
00:02:32,160 --> 00:02:36,240
स्थान माना जा सकता है। इस तरह से मतलब वहां केंद्रित वो है सेंट्रिक

37
00:02:36,240 --> 00:02:40,480
हां कार्य क्षेत्र में तो पूरे भारतवर्ष में है केवल पानीपत नहीं पानीपत

38
00:02:40,480 --> 00:02:44,480
तो मेरा निवास स्थान है। वैसे पूरे भारतवर्ष में मैं कार्यक्रम

39
00:02:44,480 --> 00:02:48,560
के लिए आता जाता रहता हूं और भारत से बाहर भी मेरा जाना होता है।

40
00:02:48,560 --> 00:02:52,720
अच्छा मेरी आवाज क्लियर नहीं आ रही है क्या? नहीं बिल्कुल आपकी आवाज बहुत साफ

41
00:02:52,720 --> 00:02:56,720
आ रही है। आपको आ रही पर कुछ लोग कह रहे हैं

42
00:02:56,720 --> 00:03:02,720
कि क्लियर नहीं आ रही है। किसकी आवाज क्लियर नहीं आ रही? आप लोग बताएंगे कमेंट करके।

43
00:03:04,710 --> 00:03:07,330
[हंसी]

44
00:03:07,330 --> 00:03:11,440
[गला साफ़ करने की आवाज़] आचार्य जी की वॉइस ब्रेक हो रही

45
00:03:11,440 --> 00:03:15,520
है। अच्छा थोड़ा हां वो आपकी में वो

46
00:03:15,520 --> 00:03:19,520
जो ब्लूटूथ लगा हुआ है ना उसमें नहीं लगा है। नहीं

47
00:03:19,520 --> 00:03:24,720
लगा है। हां बिना ब्लूटूथ के अच्छा

48
00:03:24,720 --> 00:03:28,880
तो तो ठीक है एक बार ब्लूटूथ लगाकर

49
00:03:28,880 --> 00:03:32,880
ट्राई करें क्या दोनों की आवाज ठीक है ठीक

50
00:03:32,880 --> 00:03:38,400
है चलने दीजिए वो ठीक है समझ में आ रही है ठीक है ओके जी

51
00:03:38,400 --> 00:03:42,480
तो पानीपत के आसपास ही आपका कार्य क्षेत्र है तो पानीपत के

52
00:03:42,480 --> 00:03:46,800
अलावा पूरा भारतवर्ष पूरा पूरा भारतवर्ष पूरा भारतवर्ष

53
00:03:46,800 --> 00:03:47,440
उसको केंद्र

54
00:03:47,440 --> 00:03:51,680
मान लें पानीपत हां पानीपत मेरा निवास है मैं पानीपत से हूं

55
00:03:51,680 --> 00:03:55,680
हां जी हां जी तो संजीव जी थोड़ा सा

56
00:03:55,680 --> 00:04:00,000
हमें आर्य समाज के अनुसार ईश्वर की जो

57
00:04:00,000 --> 00:04:04,240
धारणा है अवधारणा कि किस तरह से ईश्वर को देखता है आर्य समाज वो

58
00:04:04,240 --> 00:04:08,400
हमें थोड़ा सा बताएं आप [गला साफ़ करने की आवाज़]

59
00:04:08,400 --> 00:04:12,560
मैं आप सभी का स्वागत करता हूं और ईश्वर

60
00:04:12,560 --> 00:04:16,720
के विषय में आर्य समाज की क्या विचारधारा है ये मैं रखने का प्रयास

61
00:04:16,720 --> 00:04:18,880
करूंगा जी सर्वप्रथम

62
00:04:18,880 --> 00:04:22,960
अधिकतम आप में से जितने लोग हैं वो यह सब जानते होंगे कि

63
00:04:22,960 --> 00:04:27,040
आर्य समाज जो है वह मूर्ति पूजा का पक्षधर नहीं है। सैद्धांतिक

64
00:04:27,040 --> 00:04:31,280
रूप से हम लोग इससे इसमें अपनी आस्था नहीं रखते हैं।

65
00:04:31,280 --> 00:04:35,520
और जो निराकार ईश्वर है जो सर्वव्यापक है उसकी उपासना

66
00:04:35,520 --> 00:04:39,680
पद्धति आर्य समाज में होती है। लेकिन

67
00:04:39,680 --> 00:04:44,080
यदि आकार रूप में भी ईश्वर को हम देखना चाहे

68
00:04:44,080 --> 00:04:48,240
तो शास्त्रों के माध्यम से यह कहा गया है कि

69
00:04:48,240 --> 00:04:52,880
ये सारा संसार उस परमात्मा की बनाई हुई प्रतिमा ही है।

70
00:04:52,880 --> 00:04:57,440
आकाश है, जल है, वायु है, अग्नि है। ये पांचो तत्व जो है

71
00:04:57,440 --> 00:05:01,680
ईश्वर के बनाए हुए हैं। उसके अतिरिक्त इतना सुंदर संसार

72
00:05:01,680 --> 00:05:05,760
जो उस परमात्मा ने बनाया है ये उसकी रचना है। और यदि हम भगवान को

73
00:05:05,760 --> 00:05:09,920
देखना चाहे तो हम इस संसार के माध्यम से ही

74
00:05:09,920 --> 00:05:14,480
भगवान को देख सकते हैं। जैसे कि भगवान कृष्ण ने अर्जुन

75
00:05:14,480 --> 00:05:18,800
को अपने स्वरूप का ज्ञान करवाया था जिसे हम विराट

76
00:05:18,800 --> 00:05:22,880
रूप कहते हैं। विराट रूप का अभिप्राय है हर स्थान पर

77
00:05:22,880 --> 00:05:27,040
उसका दर्शन होने लगना। वैसे तो हमें हर

78
00:05:27,040 --> 00:05:31,040
स्थान पर उसके दर्शन नहीं होते। हम यह कहते तो जरूर हैं। हम भी

79
00:05:31,040 --> 00:05:35,120
कहते हैं आर्य समाज में लोग के ईश्वर का संसार के कण-कण

80
00:05:35,120 --> 00:05:39,120
में वास है। परंतु जब हम व्यवहारिक रूप से इस बात पर विचार करते हैं

81
00:05:39,120 --> 00:05:43,200
तो यह विचार हमारे व्यवहार में दिखाई नहीं देता है।

82
00:05:43,200 --> 00:05:46,560
क्योंकि जो आस्तिक है चोरी करने से वो भी चूकता

83
00:05:46,560 --> 00:05:50,720
नहीं। और जो नास्तिक है वो भी नहीं चूकता। जो मूर्ति पूजक है वो भी चोरी

84
00:05:50,720 --> 00:05:54,720
करने से चूकता नहीं। जो उसे सर्व्यापक मानता है तो वह भी समय आने

85
00:05:54,720 --> 00:05:57,520
पर कुछ ना कुछ गड़बड़ कर ही देता है। तो

86
00:05:57,520 --> 00:06:01,840
हम यदि सैद्धांतिक रूप से देखें तो जो हम कहते हैं ईश्वर व्यापक

87
00:06:01,840 --> 00:06:06,000
है उसकी व्यापकता का जब तक हमें सम्यक आभास नहीं होगा

88
00:06:06,000 --> 00:06:10,240
जब तक इस बात को हम समझ नहीं लेंगे तब तक व्यापक ईश्वर

89
00:06:10,240 --> 00:06:14,480
से हम पूरा लाभ नहीं उठा पाएंगे। तो आर्य समाज की मुख्य विचारधारा

90
00:06:14,480 --> 00:06:18,560
है कि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं क्योंकि व्यक्ति होगा तो जन्मेगा जन्मेगा

91
00:06:18,560 --> 00:06:22,640
तो मरेगा और जन्म मरण के बंधन में कोई शास्त्र भारत का जो

92
00:06:22,640 --> 00:06:26,640
ऐसा है चाहे वो पौराणिक मान्यता हो चाहे वो आर्य समाज मान्यता हो ईश्वर

93
00:06:26,640 --> 00:06:31,120
को जन्मने और मरने वाला कोई भी नहीं मानता है और उसे सर्वव्यापक

94
00:06:31,120 --> 00:06:36,080
मानते हैं क्योंकि वो हर स्थान पे है। हर स्थान पे है तो न्यायकारी है।

95
00:06:36,080 --> 00:06:40,000
यदि वो सब स्थान पर होगा ही नहीं तो न्याय कैसे करेगा?

96
00:06:40,000 --> 00:06:44,240
यदि हम यह मानेंगे कि परमात्मा इस स्थान पर रहता है। इससे

97
00:06:44,240 --> 00:06:48,320
बाहर नहीं रहता। तो इससे बाहर जो घटनाएं हो रही है उनका ईश्वर

98
00:06:48,320 --> 00:06:52,560
न्याय कैसे करेगा? तो यहां बेसिक बिल्कुल विचारधारा इसमें कोई भेद ना समझे

99
00:06:52,560 --> 00:06:56,560
आप। यदि कोई परमात्मा को एक व्यक्ति के रूप में देखता है तो यह

100
00:06:56,560 --> 00:07:00,960
उसकी अपनी अप्रोच है। उसकी अपनी समझ है। और यदि कोई

101
00:07:00,960 --> 00:07:05,600
ईश्वर को बड़े विरा रूप में और हर जगह देखता है ये उसकी जागरूकता है।

102
00:07:05,600 --> 00:07:09,600
तो जो जागरूक नहीं हुआ है उसके लिए प्रारंभिक अवस्था

103
00:07:09,600 --> 00:07:13,760
किसी मूर्ति आदि से किसी विग्रह से किया जा सकता है। लेकिन

104
00:07:13,760 --> 00:07:17,760
जिसकी चेतना विकसित हो गई और जो इतनी समझ और जिसने

105
00:07:17,760 --> 00:07:22,000
चेतना को विकसित कर लिया वो उसके दर्शन हर कहीं कर पाता है। इसमें एक छोटा सा उदाहरण

106
00:07:22,000 --> 00:07:26,080
हम संत नामदेव का लेंगे। जब उनकी रोटी एक

107
00:07:26,080 --> 00:07:30,240
कुत्ता उठा के भाग चला तो महात्मा नामदेव जो है

108
00:07:30,240 --> 00:07:34,240
वो घी की लुटिया ले उसके पीछे पीछे भाग पड़े और ये

109
00:07:34,240 --> 00:07:38,400
कहने लगे कि प्रभु अब सूखी रोटी ले जा रहे हो कम से कम इसे घी

110
00:07:38,400 --> 00:07:42,560
तो लगवा लो चुपवा तो लो इसलिए हम हां वो कहते

111
00:07:42,560 --> 00:07:46,640
हैं कि चुपवा के खाओ प्रभु और वो उसको कुत्ता नहीं कह रहे वो कह रहे प्रभु

112
00:07:46,640 --> 00:07:50,880
कहां जा रहे हो पीछे पीछे भाग रहे हैं आगे आगे कुत्ता भाग रहा है रोटी लेकर और पीछे पीछे

113
00:07:50,880 --> 00:07:55,280
संत नामदेव जा रहे हैं लुटिया लेकर जिसमें घी था कि महाराज ऐसे ऐसे मत खाओ। इसे चुपड़वा

114
00:07:55,280 --> 00:07:59,440
के खाओ। तो अब आप इसे क्या कहेंगे? जिसकी दृष्टि अच्छी

115
00:07:59,440 --> 00:08:03,600
है वो पशुओं में भी ईश्वर के दर्शन कर सकता है। और जिसका दृष्टिकोण

116
00:08:03,600 --> 00:08:07,840
विकसित नहीं है उसे अपनी मां में मां दिखाई नहीं देती। पिता में पिता दिखाई

117
00:08:07,840 --> 00:08:11,920
नहीं देते। भाई में भाई दिखाई नहीं देता। मित्र में मित्र नहीं दिखता। ईश्वर

118
00:08:11,920 --> 00:08:16,320
के दर्शन तो बड़ी दूर की बात है। तो आर्य समाज की जो विचारधारा

119
00:08:16,320 --> 00:08:20,960
है ईश्वर की सर्वव्यापक विचारधारा एक बात है। दूसरी

120
00:08:20,960 --> 00:08:25,040
उसकी कोई आकृति नहीं है। क्योंकि जिन जिन वस्तुओं की

121
00:08:25,040 --> 00:08:29,040
आकृति होती है उन वस्तुओं के रूप में परिवर्तन

122
00:08:29,040 --> 00:08:33,200
होता है और जिन वस्तुओं के रूप में परिवर्तन होता है वो

123
00:08:33,200 --> 00:08:37,520
एक दिन नष्ट भी हो जाती हैं। तो आर्य समाज की बड़ी

124
00:08:37,520 --> 00:08:41,840
एक क्लियर और साफ मान्यता है कि परमात्मा कोई

125
00:08:41,840 --> 00:08:46,080
वस्तु नहीं है। वो कोई पदार्थ नहीं है।

126
00:08:46,080 --> 00:08:50,080
वो इतनी बड़ी एक शक्ति है। शुद्ध ऊर्जा है जो हर कहीं मेरे अंदर बाहर सब

127
00:08:50,080 --> 00:08:54,080
जगह व्याप्त है। यदि उसकी व्याप्ति को मैं समझ लेता हूं

128
00:08:54,080 --> 00:08:58,080
तो मुझे जीवन जीने में सरलता होती है और मैं पाप कर्मों से बहुत

129
00:08:58,080 --> 00:09:02,640
बच जाता हूं। तो बहुत मुख्य विचारधारा ये है। अच्छा

130
00:09:02,640 --> 00:09:03,140
तो

131
00:09:02,960 --> 00:09:07,040
इसमें आचार्य एक चीज हमने देखी कि अगर ईश्वर को न्यायकारी

132
00:09:07,040 --> 00:09:11,280
होना है तो उसका सर्वव्यापक होना आवश्यक है। आवश्यक है। है ना?

133
00:09:11,280 --> 00:09:15,360
तो इसमें जैसे हम ये देखते हैं कि जैसे मान लीजिए न्यायकारी

134
00:09:15,360 --> 00:09:18,960
होना है यानी कोई ना कोई क्रिया करनी है। न्याय

135
00:09:18,960 --> 00:09:22,960
करने के न्याय करने के लिए उसको कोई ना कोई क्रिया करनी होगी। जैसे

136
00:09:22,960 --> 00:09:27,440
कि मान लीजिए कि कोई हाथ उठा रहा है तो उसका हाथ हाथ रुके। मतलब एग्जांपल

137
00:09:27,440 --> 00:09:31,600
के लिए मैं ले रहा हूं। ऐसा डायरेक्टली वो करता नहीं है। मगर अगर सृष्टि

138
00:09:31,600 --> 00:09:35,680
रचना सृष्टि रचना को अगर हम देखें सीधे तौर पर [गला साफ़ करने की आवाज़]

139
00:09:35,680 --> 00:09:39,760
जैसे कि ईश्वर ईश्वर सर्वव्यापक तो है पर क्रिया

140
00:09:39,760 --> 00:09:44,080
भी उसने की। कहीं पर उसने सूर्य बनाया कहीं पर उसने पृथ्वी

141
00:09:44,080 --> 00:09:45,840
बनाई और कहीं

142
00:09:45,840 --> 00:09:49,920
पर उसने अन्य ग्रह बनाए या जो भी उसे बनाना था वो उसने बनाए।

143
00:09:49,920 --> 00:09:54,160
तो ये जो ये जो क्रिया उसने की जगह-जगह पर और कहीं-कहीं

144
00:09:54,160 --> 00:09:58,240
पर नहीं भी की। तो एक शक्ति के रूप में वह कार्य कर रहा है। निराकार

145
00:09:58,240 --> 00:10:02,240
शक्ति के रूप में हमें यह मानना पड़ेगा कि वो जो दो दो

146
00:10:02,240 --> 00:10:06,640
प्रकार की क्रियाएं होती हैं। एक होता है पुश और एक होता है पुल।

147
00:10:06,640 --> 00:10:10,640
दो प्रकार की क्रियाएं होती हैं। तो ये पुश और पुल

148
00:10:10,640 --> 00:10:15,280
वो कर रहा है शक्ति के रूप में। तभी वो सृष्टि की रचना कर रहा है। है ना?

149
00:10:15,280 --> 00:10:19,600
जी। हां। हां। तो तो [गला साफ़ करने की आवाज़] इसका मतलब यह है कि ईश्वर

150
00:10:19,600 --> 00:10:23,760
सर्वव्यापक होते हुए भी जहां पर चाहता है

151
00:10:23,760 --> 00:10:28,000
वहां पर वो किसी चीज को पुश कर सकता है शक्ति के रूप में

152
00:10:28,000 --> 00:10:32,000
और जहां पर चाहता है किसी चीज को अपनी ओर खींच भी सकता है, पुल भी कर सकता

153
00:10:32,000 --> 00:10:36,080
है। मैं ठीक समझ रहा हूं ना? हां, इसमें थोड़ा सा परिवर्तन

154
00:10:36,080 --> 00:10:40,400
करें आप। जी आपने ये कहा कि कहीं

155
00:10:40,400 --> 00:10:44,800
वो नहीं भी है। नहीं नहीं हर है।

156
00:10:44,800 --> 00:10:48,960
मगर हर जगह होते हुए भी हर जगह होते हुए भी वो

157
00:10:48,960 --> 00:10:53,040
जो शक्ति के रूप में क्रियान्वित हो रहा है कि किसी

158
00:10:53,040 --> 00:10:57,120
चीज को संरचना कर रहा है तो वो शक्ति रूप शक्ति के रूप

159
00:10:57,120 --> 00:11:01,360
में सब जगह व्याप्त है वो पूर्ण रूप से एक

160
00:11:01,360 --> 00:11:05,520
फिर जहां पर उसको क्रिया करनी है वहां पर एक्टिव मोड पर आकर के वो क्रिया

161
00:11:05,520 --> 00:11:09,600
कर रहा है। जी है ना? सब जगह होते हुए भी वह

162
00:11:09,600 --> 00:11:13,920
कहीं पर क्रिया कर रहा है और कहीं पर क्रिया नहीं कर रहा है।

163
00:11:13,920 --> 00:11:17,920
कहां पर क्रिया नहीं कर रहा है? जैसे मान लीजिए कि पृथ्वी बनाई

164
00:11:17,920 --> 00:11:22,000
जा रही है तो पृथ्वी के जस्ट बगल में जो खाली स्पेस है उसमें

165
00:11:22,000 --> 00:11:26,400
वो क्रिया नहीं [गला साफ़ करने की आवाज़] हो रही है। मान लीजिए पृथ्वी बनाने के लिए

166
00:11:26,400 --> 00:11:30,400
एक मान लीजिए पुश हो रहा है। पुश जिसको हम आम भाषा में कह

167
00:11:30,400 --> 00:11:34,480
दे कि धक्का तो मैं एक लाइन में एक थोड़ी सी लाइन उसमें

168
00:11:34,480 --> 00:11:38,480
और शामिल करना चाहूंगा। जी एक तो

169
00:11:38,480 --> 00:11:44,080
हम ईश्वर को ना किसी पुरुष के नजरिए से ना देखें।

170
00:11:44,080 --> 00:11:47,280
उसको उसका नजरिया एक बहुत बड़ा है।

171
00:11:47,280 --> 00:11:51,280
परमात्मा की जो स्थिति है वो संसार में सर्वोपरि है। और

172
00:11:51,280 --> 00:11:55,360
हम जो उसे देख रहे हैं हम एक मानवीय दृष्टिकोण से उसे देख रहे हैं। सबसे

173
00:11:55,360 --> 00:11:57,840
पहले ये दृष्टिकोण छोड़ना होगा।

174
00:11:57,840 --> 00:12:02,000
मानवीय दृष्टिकोण से परमात्मा थोड़ा ही समझ आ पाएगा।

175
00:12:02,000 --> 00:12:06,000
पूरी तरह से समझ नहीं आएगा। और फिर ऊपर से जो मानवीय समझ है

176
00:12:06,000 --> 00:12:10,000
उसकी अपनी सीमाएं हैं। पूरी तरह से कोई मनुष्य भगवान को जान

177
00:12:10,000 --> 00:12:14,080
भी नहीं सकता है। क्योंकि अगर पूरी तरह से ईश्वर को हमने जान लिया

178
00:12:14,080 --> 00:12:18,240
तो हम भी ईश्वर के जैसे ही हो जाएंगे। फिर उसमें हम में कोई अंतर

179
00:12:18,240 --> 00:12:22,560
नहीं रहेगा। तो जैसे पिता और पुत्र में अंतर होता ही है। पिता

180
00:12:22,560 --> 00:12:26,720
की अलग क्षमताएं हैं। पुत्र की अपनी अलग क्षमताएं हैं। पिता मेरा पिता है और

181
00:12:26,720 --> 00:12:30,960
मैं अपने बच्चों का पिता हूं। पिता पद तो दोनों के पास है। तो जब हम ईश्वर

182
00:12:30,960 --> 00:12:34,960
की चर्चा करेंगे तो हम उसको किसी एक तो तत्व पदार्थ के

183
00:12:34,960 --> 00:12:39,840
रूप में नहीं मानेंगे और उसमें मानवीय दृष्टिकोण आरोपित नहीं करेंगे।

184
00:12:39,840 --> 00:12:44,080
और एक जो आपने कहा क्रिया तो एक सूत्र है

185
00:12:44,080 --> 00:12:48,160
कि परमात्मा कैसे काम करता है तो एक सूत्र है अनंत ज्ञान

186
00:12:48,160 --> 00:12:52,880
बल क्रिया च उस परमात्मा में अनंत ज्ञान है

187
00:12:52,880 --> 00:12:57,120
अनंत बल है अनंत क्रिया है और

188
00:12:57,120 --> 00:13:01,200
और ये इसमें एक छोटा उदाहरण आप अपने से भी देख सकते हैं। जैसे अब हम अभी बात

189
00:13:01,200 --> 00:13:05,280
कर रहे हैं और हम अपनी आंखों को झपक रहे हैं। इन

190
00:13:05,280 --> 00:13:09,360
आंखों को झपकने के लिए क्या हम परिश्रम कर रहे हैं? अपने

191
00:13:09,360 --> 00:13:12,960
आप हो रहा है। बात करते करते हम स्वास भी

192
00:13:12,960 --> 00:13:17,200
ले रहे हैं। ये भी स्वाभाविक है। हमें इसके लिए प्रयास नहीं करना पड़ रहा।

193
00:13:17,200 --> 00:13:21,360
यदि हम स्वास लेने का प्रयास करेंगे तो जीवन की बहुत सारी प्रक्रियाएं हमारी जो है ना

194
00:13:21,360 --> 00:13:25,440
अव्यवस्थित होंगी। स्वाभाविक है। जी हां। तो

195
00:13:25,440 --> 00:13:29,840
उस परमात्मा में भी ज्ञान बल क्रिया स्वाभाविक है। जैसे

196
00:13:29,840 --> 00:13:33,840
हम उसको इंप्लांट कर रहे हैं कि उसने ये बनाया फिर उसने वो बनाया। ये हम

197
00:13:33,840 --> 00:13:38,240
अपनी अपनी भावना अपने विचार आरोपित कर रहे हैं। जबकि उसका स्वभाव

198
00:13:38,240 --> 00:13:42,320
ही है। उसका ये स्वभाव है। जैसे स्वास लेना छोड़ना हमारा

199
00:13:42,320 --> 00:13:46,480
और आपका स्वभाव है। हम इसके लिए प्रयास नहीं करते। मैं समझ गया। तो

200
00:13:46,480 --> 00:13:50,480
हम क्या यह माने कि हम क्या यह माने कि ईश्वर इस

201
00:13:50,480 --> 00:13:54,960
तरह से कार्य करता है जो हमारी मनुष्य दृष्टि से समझ में ना आने वाले कार्य हैं।

202
00:13:54,960 --> 00:13:58,960
हां वो बड़े कार्य है वो समझ में आ भी सकते हैं यदि हमारा स्तर ऊंचा हो

203
00:13:58,960 --> 00:14:03,040
ध्यान उपासना के द्वारा और यदि देखो एक बात है

204
00:14:03,040 --> 00:14:07,200
यदि समझ में ना आए तो मनुष्य को गणित है विज्ञान है बड़ी छोटी छोटी बातें

205
00:14:07,200 --> 00:14:11,600
जीवन में नहीं समझ में आती और [हंसी] यदि समझ में आने लगे तो उसे

206
00:14:11,600 --> 00:14:15,760
परमात्मा के नजदीक जाने में भी समय लगता नहीं है वैसे अभ्यास करे तो हो

207
00:14:15,760 --> 00:14:19,840
जाता है जी तो इसमें

208
00:14:19,840 --> 00:14:24,160
एक्चुअली मैंने ये प्रश्न क्यों किया है क्योंकि बात ये है कि जैसे हम

209
00:14:24,160 --> 00:14:28,160
लोग मानते हैं कि ईश्वर जो सर्वव्यापक है, एक रस है उसने सृष्टि

210
00:14:28,160 --> 00:14:32,160
रचना की है। ठीक है? जब सृष्टि रचना करेगा तो जाहिर

211
00:14:32,160 --> 00:14:36,320
सी बात है जो जड़ पदार्थ है जो भौतिक पदार्थ हैं उनके वो व्यवहार

212
00:14:36,320 --> 00:14:40,480
का विषय बनेगा कहीं ना कहीं और जो स्वाभाविक है जो स्वाभाविक आपने

213
00:14:40,480 --> 00:14:44,720
कहा कि नहीं उनके व्यवहार का विषय नहीं बनेगा। वो पदार्थों के व्यवहार

214
00:14:44,720 --> 00:14:48,880
निश्चित करेगा। ईश्वर कोई इस तरह का विषय नहीं। मतलब ईश्वर जो

215
00:14:48,880 --> 00:14:52,880
है पदार्थों का व्यवहार निश्चित करता है। अग्नि

216
00:14:52,880 --> 00:14:56,960
ताप देगी जल अपना काम करेगा। जी जी संजीव

217
00:14:56,960 --> 00:15:01,040
जी मैं थोड़ा सा पूरा कर लूं। मैं आपको शायद अपनी चीज समझा पाऊं कि मैं कहना क्या चाह

218
00:15:01,040 --> 00:15:05,040
रहा हूं। तो मुझे एक बार पूरा करने दीजिएगा। तो

219
00:15:05,040 --> 00:15:09,520
क्या है कि जैसे आपने कहा कि स्वाभाविक कर्म तो कर्म तो स्वाभाविक

220
00:15:09,520 --> 00:15:13,600
है। उसमें कोई इशू नहीं है कि वह स्वतः हो रहे हैं। पर होने के लिए भी वो

221
00:15:13,600 --> 00:15:17,680
एक शक्ति काम कर रही है। ईश्वर ईश्वर के द्वारा एक शक्ति काम

222
00:15:17,680 --> 00:15:21,680
कर रही है कि भाई यह जो पृथ्वी है यहां से यहां चली गई। वहां से वहां चली

223
00:15:21,680 --> 00:15:25,680
गई। जो भी है जो भी कुछ हो रहा है संसार में वहां पर एक इनविज़िबल

224
00:15:25,680 --> 00:15:29,760
निराकार दिखाई ना देने वाली शक्ति वहां पर कार्य करना मालूम

225
00:15:29,760 --> 00:15:33,760
हो रही है हमें। अब हमने यह भी मान लिया कि वो जो

226
00:15:33,760 --> 00:15:37,760
है कई कार्य उसके ऐसे होते हैं जो हमें मनुष्य दृष्टि से समझ में नहीं आते।

227
00:15:37,760 --> 00:15:41,760
तो बात यह है कि जब हम देखते हैं सृष्टि रचना को तो हमें यह मानना

228
00:15:41,760 --> 00:15:43,280
पड़ता है कि

229
00:15:43,280 --> 00:15:47,840
ईश्वर भले ही सर्वव्यापक है पर उसके बावजूद भी

230
00:15:47,840 --> 00:15:51,840
वो एक ऐसा रूप धारण कर रहा है

231
00:15:51,840 --> 00:15:55,840
जहां वो सर्वव्यापक होते हुए भी कहीं पर किसी

232
00:15:55,840 --> 00:16:00,000
के लिए पुश और पुल क्रिया का विषय बने अथवा किसी

233
00:16:00,000 --> 00:16:04,400
के लिए ना बने तभी क्रिया तभी रचना संभव है। एक मिनट पूरा कर लूं।

234
00:16:04,400 --> 00:16:08,640
तो अब यहां पर क्या आता है कि अगर हमने यह माना कि ईश्वर जैसे

235
00:16:08,640 --> 00:16:12,640
मान लीजिए पृथ्वी को ले लेते हैं। ठीक है? अब पृथ्वी को मूव

236
00:16:12,640 --> 00:16:16,800
कराना है। मूव केवल हिलाना है। तो दो तीन तरीके

237
00:16:16,800 --> 00:16:20,880
हैं जिससे वो मूव होगी पृथ्वी। या तो ईश्वर जो अंदर है जो पृथ्वी

238
00:16:20,880 --> 00:16:24,960
में भी समाया हुआ है। बाहर का ईश्वर निष्क्रिय रहते हुए केवल

239
00:16:24,960 --> 00:16:29,360
अंदर का ईश्वर सक्रिय हो जाए और क्योंकि बाहर का ईश्वर निष्क्रिय

240
00:16:29,360 --> 00:16:33,520
है। मतलब अभी वो किसी से टकराव के उसमें नहीं है। अंदर का ईश्वर

241
00:16:33,520 --> 00:16:37,600
सक्रिय हुआ और जब वो सक्रिय हुआ तो उसने अपने आप को मूव कराया तो वो

242
00:16:37,600 --> 00:16:41,600
अपने ही स्वरूप में रहते हुए मूव कर गई पृथ्वी। ठीक है? एक तो

243
00:16:41,600 --> 00:16:45,680
यह हो गया। एक हो गया कि पृथ्वी के बाहर से ईश्वर एक्टिव हुआ।

244
00:16:45,680 --> 00:16:50,000
बाकी सब जगह वही क्षेपक के रूप में नहीं है। बाहर पृथ्वी के बाहर करेक्ट उतने

245
00:16:50,000 --> 00:16:54,160
स्पेस में वो क्षेपक बना और पृथ्वी को धक्का लेकर के दूर ले गया। एक ये स्थिति

246
00:16:54,160 --> 00:16:58,160
हो गई। एक ये स्थिति हो गई कि वो पृथ्वी के दूर जाकर के अपने आप को

247
00:16:58,160 --> 00:16:58,660
उसने

248
00:16:58,400 --> 00:17:02,400
एक्टिव किया और पृथ्वी को उसने खींच लिया अपनी ओर। ये दो तीन तरीके से

249
00:17:02,400 --> 00:17:06,400
मतलब कहने का यह है कि सर्वव्यापक एक रस होते हुए भी

250
00:17:06,400 --> 00:17:10,400
उसने एक ऐसा रूप धारण किया जहां पर वह सब सब जगह जो

251
00:17:10,400 --> 00:17:14,560
है टकराव का विषय ना बनते हुए केवल एक ही जगह शक्ति का विषय बना।

252
00:17:14,560 --> 00:17:18,560
टकराव का विषय बना तो पृथ्वी अपनी मूव की। अब हम अगर यह कहते

253
00:17:18,560 --> 00:17:22,640
हैं कि इस तरीके से मानवोचित दृष्टि से ईश्वर को तराजू में

254
00:17:22,640 --> 00:17:26,720
तोलना नहीं चाहिए तो फिर एक बात आती है सामने से

255
00:17:26,720 --> 00:17:30,880
कि जब हम कहते हैं कि ईश्वर अवतार ले रहा है या ईश्वर की जो मूर्ति

256
00:17:30,880 --> 00:17:34,880
पूजा हो रही तो हम वहां पर एक काउंटर करते हैं कि जो सब जगह है

257
00:17:34,880 --> 00:17:38,880
वह एक जगह कैसे हो सकता है या जो अजन्मा है वह जन्म

258
00:17:38,880 --> 00:17:43,120
कैसे ले सकता है? तो जो सब जगह है वह कहीं

259
00:17:43,120 --> 00:17:47,440
एक जगह पृथ्वी या सूर्य इत्यादि के धक्के या आकर्षण

260
00:17:47,440 --> 00:17:51,440
का विषय बन रहा है जो सब जगह है। यदि वह आकर्षण का विषय बनेगा

261
00:17:51,440 --> 00:17:53,440
तो सब जगह बनेगा। तो कहने का

262
00:17:53,440 --> 00:17:57,520
मतलब यह है जब हम यहां पर यह मान लेते हैं कि ईश्वर के कार्य मनुष्य दृष्टि से समझ

263
00:17:57,520 --> 00:18:01,680
में ना आने वाले हैं तो वहां पर भी मान लेना चाहिए। नहीं तो यदि हम वहां

264
00:18:01,680 --> 00:18:05,680
पर तर्क कर रहे हैं कि जो सर्वव्यापक है वो मूर्त

265
00:18:05,680 --> 00:18:09,840
रूप में क्यों नहीं आ सकता है तो फिर हमें यहां पर भी जवाब देना चाहिए कि फिर वो

266
00:18:09,840 --> 00:18:10,720
यहां पर कैसे कर रहा

267
00:18:10,720 --> 00:18:14,520
है? कहने का मतलब ये है जी

268
00:18:14,520 --> 00:18:18,720
[गला साफ़ करने की आवाज़] आपने कहा कि ईश्वर सृष्टि के बाहर है और एक अंदर

269
00:18:18,720 --> 00:18:22,720
है। एक बात तो हमेशा आप ध्यान रखें। ऐसा

270
00:18:22,720 --> 00:18:26,800
कोई स्थान ही नहीं है जहां वो ना हो। नहीं सृष्टि के बाहर नहीं।

271
00:18:26,800 --> 00:18:30,880
सृष्टि आपने कहा पृथ्वी के अंदर है ईश्वर एक ईश्वर

272
00:18:30,880 --> 00:18:34,880
पृथ्वी के बाहर है और वो बाहर वाला सक्रिय अंदर वाला अक्रिय

273
00:18:34,880 --> 00:18:39,760
है या अंदर वाला अक्रिय है बाहर वाला सक्रिय है ठीक है ना

274
00:18:39,760 --> 00:18:43,840
आप मेरी बात समझ नहीं पाए मैंने ये कहा कि जैसे कि ईश्वर

275
00:18:43,840 --> 00:18:47,840
सर्वत्र व्याप्त है ठीक है और वो पृथ्वी के पृथ्वी के

276
00:18:47,840 --> 00:18:52,400
अंदर भी व्याप्त है अब उसने क्या किया क्योंकि अगर वो खुद को बदलेगा

277
00:18:52,400 --> 00:18:56,400
अगर वो खुद को बदलेगा कि वो कहीं पर एक्टिव हो जाए सक्रिय

278
00:18:56,400 --> 00:19:00,960
हो जाए और कहीं पर निष्क्रिय रह जाए। यदि वह खुद को बदल रहा है तो वह सनातन

279
00:19:00,960 --> 00:19:04,960
नहीं रहा। शाश्वत सत्य नहीं रहा। अगर उसने खुद को बदला

280
00:19:04,960 --> 00:19:09,040
तो कहने का मतलब यह है कि उसने स्वयं का वो जो रूप है

281
00:19:09,040 --> 00:19:13,040
ना जो एक रस है एक रस किसी के भी व्यवहार में ना

282
00:19:13,040 --> 00:19:17,120
आ सकने वाला उसने वो उसको अपने आप को बदला नहीं

283
00:19:17,120 --> 00:19:21,120
बल्कि उसने क्या किया? एक शक्ति के रूप में रूप और धारण किया।

284
00:19:21,120 --> 00:19:25,360
और अब उस रूप से वह कहीं पर एक्टिव कहीं पर निष्क्रिय,

285
00:19:25,360 --> 00:19:26,400
कहीं पर सक्रिय

286
00:19:26,400 --> 00:19:31,360
कहीं पर धक्के का विषय और कहीं पर धक्के का विषय नहीं के रूप में काम कर रहा है।

287
00:19:31,360 --> 00:19:33,920
जी

288
00:19:33,920 --> 00:19:38,000
इस बात को और नजदीक ले जाओ। इसको समझो जैसे आत्मा

289
00:19:38,000 --> 00:19:42,000
ने हमारा शरीर धारण किया हुआ है। अब हम शरीर

290
00:19:42,000 --> 00:19:46,160
में कहीं सुई चुभोते हैं तो दर्द तो कहीं भी चूने का अनुभव होता है।

291
00:19:46,160 --> 00:19:50,240
और हम कहे कि आत्मा का इस शरीर में निवास स्थान क्या है?

292
00:19:50,240 --> 00:19:54,480
तो जब हम सुई चुभते तो हर जगह ही दर्द होता तो लगता है वो हर जगह ही है और

293
00:19:54,480 --> 00:19:58,560
उसी के कारण शरीर गति करता है तो जैसे आत्मा शरीर में व्याप्त

294
00:19:58,560 --> 00:20:02,720
है और उसकी गति का कारण है आंतरिक बाहरी दोनों चाहे

295
00:20:02,720 --> 00:20:06,880
मन मन अपना काम करे बुद्धि अपना काम करे शरीर में कोई क्रिया हो

296
00:20:06,880 --> 00:20:11,120
आत्मा के कारण से होती है आत्मा ना हो तो शरीर निष्क्रिय

297
00:20:11,120 --> 00:20:15,680
हो जाता है अब [गला साफ़ करने की आवाज़] आत्मा की जो सक्रियता है वैचारिक

298
00:20:15,680 --> 00:20:19,840
शारीरिक आंतरिक और बाह्य बिल्कुल इसी तरह

299
00:20:19,840 --> 00:20:23,840
की भगवान की सक्रियता है सृष्टि के अंदर। जैसे

300
00:20:23,840 --> 00:20:28,000
जैसे उसकी शक्ति से आंखें देखती हैं। उसी की शक्ति से कान सुनते

301
00:20:28,000 --> 00:20:32,240
हैं। जबकि कान अलग है। आंखें बिल्कुल अलग है। नाक बिल्कुल अलग है। तो ईश्वर एक

302
00:20:32,240 --> 00:20:36,240
ऊर्जा है। उसी जैसे जैसे बिजली

303
00:20:36,240 --> 00:20:40,320
विद्युत ये एक ऊर्जा है। इसी से पंखा चलता है तो हवा देता है।

304
00:20:40,320 --> 00:20:41,440
इसी से एसी चलता है तो

305
00:20:41,440 --> 00:20:45,520
ठंडक दे देता है। यही हीटर चलाती है तो गर्म हो जाती है। इसी ऊर्जा से आटा चक्की आटा

306
00:20:45,520 --> 00:20:49,680
पीस देती है। इसी ऊर्जा से तेल निकालने वाली मशीन तेल निकाल देती है। अब उसमें

307
00:20:49,680 --> 00:20:54,000
इस प्रकार का कोई बंटवारा नहीं हो सकता। मैं मैं अब आपने बिल्कुल

308
00:20:54,000 --> 00:20:58,000
बिल्कुल सही उदाहरण दिया है। मैं इसी बात को कह रहा हूं आपको कि जो

309
00:20:58,000 --> 00:21:02,200
ईश्वर एक रस है समान रूप से सर्वत्र व्याप्त है। जैसे बिजली

310
00:21:02,200 --> 00:21:06,480
[गला साफ़ करने की आवाज़] तो जहां पर जहां पर बिजली को पंखा चलाना है

311
00:21:06,480 --> 00:21:10,560
या जहां पर बल्ब चलाना है वहां पर अलग-अलग पावर में बिजली जो

312
00:21:10,560 --> 00:21:14,560
है रेगुलेट हो रही है। मतलब जहां पर पंखे के लिए बिजली चाहिए

313
00:21:14,560 --> 00:21:18,640
वहां पंखे वाली पावर मिल रही है और जहां पर बल्ब वाली पावर

314
00:21:18,640 --> 00:21:22,800
चाहिए वहां पर बल्ब वाली पावर मिल रही है। जहां पर वाशिंग मशीन और

315
00:21:22,800 --> 00:21:26,880
बड़े-बड़े जो अह इलेक्ट्रॉनिक अह यंत्र होते हैं वहां पर और भी

316
00:21:26,880 --> 00:21:31,280
ज़्यादा हैवी पावर की बिजली मिल रही है। तो ये शक्ति के रूप

317
00:21:31,280 --> 00:21:35,280
जब ईश्वर कार्य करने वाला हो रहा है बिजली के समान अगर माने

318
00:21:35,280 --> 00:21:39,440
तो वो रेगुलेट वो रेगुलेट हो रहा है। कहीं पर ज्यादा है कहीं

319
00:21:39,440 --> 00:21:43,680
पर कम है। हम तो नहीं कम ज्यादा नहीं है।

320
00:21:43,680 --> 00:21:47,840
जी जैसे आप समुद्र का जल ले। समुद्र का जल

321
00:21:47,840 --> 00:21:51,840
आप समुद्र [गला साफ़ करने की आवाज़] के जल को एनालाइज कैसे करेंगे? सारे समुद्र का तो नापतोल नहीं

322
00:21:51,840 --> 00:21:55,920
करेंगे। एक बूंद आप उसको लेबोरेटरी में चेक कर लेंगे। एक बूंद के अंदर जो

323
00:21:55,920 --> 00:21:56,480
अनुपात है वही

324
00:21:56,480 --> 00:22:00,560
अनुपात सारे समुद्र में है। तो आप समुद्र को नापने

325
00:22:00,560 --> 00:22:04,560
के लिए बड़े स्तर पर नहीं जाएंगे। विद्युत बिजली बिजली है। चाहे वो छोटे रूप

326
00:22:04,560 --> 00:22:08,800
में काम करती हो चाहे वो बड़े रूप में काम करती हो। उसकी लेवल्स अलग-अलग

327
00:22:08,800 --> 00:22:12,960
हो सकते हैं। लेकिन अल्टीमेटली वो रहेगी विद्युत। आप ऐसा नहीं कह सकते कि जो एसी

328
00:22:12,960 --> 00:22:17,040
में है वो दूसरी तरह की विद्युत है। तीसरी तरह की विद्युत विद्युत है। फ्रीक्वेंसी अलग-अलग

329
00:22:17,040 --> 00:22:21,120
हो सकती है। आप कहीं 220 वोल्ट दे सकते हो। 440 हो सकती है कहीं ज्यादा

330
00:22:21,120 --> 00:22:25,280
कम हो सकती है लेकिन है तो वो बेसिकली विद्युत उसके मूल रूप में कभी

331
00:22:25,280 --> 00:22:29,440
परिवर्तन नहीं होता हां मूल रूप में परिवर्तन नहीं हो रहा है पर

332
00:22:29,440 --> 00:22:33,680
कार्य करने वाली कार्य करने वाली जो स्थिति है वो अलग-अलग है

333
00:22:33,680 --> 00:22:37,840
वो मशीनों के कारण वो भेद मशीनों का है बिजली का नहीं अगर

334
00:22:37,840 --> 00:22:41,920
चक्की और पंखे की तुलना करोगे तो ये यंत्रगत भेद है बिजलीगत

335
00:22:41,920 --> 00:22:46,000
भेद नहीं मैं बता रहा हूं यंत्र यंत्रगत भेद हो गया ना ये

336
00:22:46,000 --> 00:22:50,320
तो मैं बता रहा हूं कैसे जैसे कि मान लीजिए कि

337
00:22:50,320 --> 00:22:54,640
पृथ्वी को धक्का लगाना है। मान लीजिए पृथ्वी को फेंकना है। दूर फेंकना है। ठीक है?

338
00:22:54,640 --> 00:22:58,960
तो यहां पर जो बल शक्ति चाहिए वहीं पे

339
00:22:58,960 --> 00:23:03,040
किसी और छोटे से मिट्टी के ढेले को दूर फेंकना होगा। तो वहां

340
00:23:03,040 --> 00:23:07,040
पर हमें शक्ति कम लगानी होगी। और यदि वहां पर भी पृथ्वी वाली ही शक्ति

341
00:23:07,040 --> 00:23:11,200
लगा दी जो हमने पृथ्वी को धक्का देने में लगाई थी वही शक्ति

342
00:23:11,200 --> 00:23:11,700
मिट्टी

343
00:23:11,520 --> 00:23:15,760
के ढेले में लगा दी तो मिट्टी का ढेला जहां पहुंचना चाहिए वहां से कहीं

344
00:23:15,760 --> 00:23:19,840
और पहुंचेगा। तो इससे कोई अंतर तो पड़ा ही ना। मैं यह

345
00:23:19,840 --> 00:23:23,840
कह रहा हूं आपको कि जो शक्ति है ना शक्ति तो शक्ति

346
00:23:23,840 --> 00:23:28,000
है और वो वो इसी बात को ज्ञान कहते हैं कि जब ये पता करना

347
00:23:28,000 --> 00:23:32,000
हो कि पृथ्वी घुमानी है तो अलग तरह से है। चंद्रमा का मास अलग है तो अलग तरह से

348
00:23:32,000 --> 00:23:36,240
घूमेगा। बृहस्पति का मास अलग है तो अलग तरह से घूमेगा। तो उन सब

349
00:23:36,240 --> 00:23:40,240
सबको के अंतर्गत जो उनकी अपनी भार है उस

350
00:23:40,240 --> 00:23:44,400
अनुसार शक्ति लगी। इस ये ज्ञान के कारण बंटवारा हुआ। क्योंकि

351
00:23:44,400 --> 00:23:48,400
मैंने कहा ना स्वाभाविक की ज्ञान बल क्रिया तो यह ज्ञान के कारण भेद है

352
00:23:48,400 --> 00:23:52,400
कि उसे अणु परमाणुओं में भी गति हो रही है और ब्रह्मांड में भी गति हो रही

353
00:23:52,400 --> 00:23:56,560
है। मतलब मतलब सब जगह एक समान

354
00:23:56,560 --> 00:24:00,720
पावर लग रही है ईश्वर की। पावर का अंतर है। शक्ति तो उतनी

355
00:24:00,720 --> 00:24:04,880
शक्ति तो शक्ति है। फ्रीक्वेंसी का देखो परमाणु भी उछल रहे हैं।

356
00:24:04,880 --> 00:24:08,880
छोटेोटे परमाणु है। जी [गला साफ़ करने की आवाज़] पावर का अंतर आ रहा है

357
00:24:08,880 --> 00:24:12,880
ना दोनों में। हर शक्ति का फ्रीक्वेंसी का मतलब

358
00:24:12,880 --> 00:24:17,120
उसकी मात्रात्मक भेद है। ये इसे आप इसको आप सुनो

359
00:24:17,120 --> 00:24:21,600
इसके स्वरूप का भेद नहीं कह सकते। मात्रात्मक भेद स्वरूप का भेद

360
00:24:21,600 --> 00:24:25,920
एक बूंद एक बूंद में जो है वही बिल्कुल समुद्र में है।

361
00:24:25,920 --> 00:24:26,800
बूंद भी समुद्र

362
00:24:26,800 --> 00:24:30,880
है। समुद्र भी बूंद है। बस अब आप ये कहेंगे कि जो

363
00:24:30,880 --> 00:24:34,960
बूंद है उसमें कुछ अलग तरह का समुद्र है या जो ये बड़ा समुद्र

364
00:24:34,960 --> 00:24:39,520
है इसमें अलग तरह की शक्ति ज्यादा है। नहीं वो बराबर है।

365
00:24:39,520 --> 00:24:43,520
सिर्फ हम अपने क्योंकि हमारी क्षमता कम है बेटे हम उसमें से एक

366
00:24:43,520 --> 00:24:47,760
बूंद निकालना है क्योंकि हम सारे समुद्र को नहीं एनालाइज कर सकते जैसे

367
00:24:47,760 --> 00:24:51,760
उसमें ना एक एक बच्चा ना रो रहा था वो समुद्र के किनारे पात्र लिए

368
00:24:51,760 --> 00:24:55,760
रो रहा है और एक कोई सयाना आदमी आया तो उसने कहा अरे

369
00:24:55,760 --> 00:24:59,840
तुम क्यों रो रहे हो उसने कहा भाई मैं ना ये समुद्र को इसमें भरना

370
00:24:59,840 --> 00:25:04,240
चाहता हूं कटोरे में और ये तो आ नहीं रहा इसमें तो उसने कहा

371
00:25:04,240 --> 00:25:08,480
कोई बात नहीं अगर ये इसमें नहीं आ रहा तो तुम ना कटोरा इसमें फेंक दो समुद्र में

372
00:25:08,480 --> 00:25:12,640
जी जी तो जब कटोरा आप समुद्र में फेंक देते हो तो वो कटोरे के चारों ओर समुद्र ही

373
00:25:12,640 --> 00:25:16,800
होता है और वैसे आप समुद्र में उसको भर नहीं सकते कटोरे में समुद्र को

374
00:25:16,800 --> 00:25:20,800
तो ये सिर्फ हमारी सोच का अंतर है ऐसा कोई ऐसे इतना कोई बड़ा भेद नहीं

375
00:25:20,800 --> 00:25:24,800
है और इसमें भी जो आप आर्य समाज

376
00:25:24,800 --> 00:25:28,880
और सनातन की जो आप विचारधारा कह रहे हो उसमें भी कोई भेद नहीं है ध्यान रखना आप

377
00:25:28,880 --> 00:25:32,880
ये भारतीय परंपराएं हैं सबसे पहले जब हम बात शुरू करें तो

378
00:25:32,880 --> 00:25:37,120
इस बात का ध्यान रखें भारतीय जो दर्शन शास्त्र है या भारतीय जो चिंतन

379
00:25:37,120 --> 00:25:41,200
और जो भारतीय मनीष है उसके अंतर्गत नास्तिक

380
00:25:41,200 --> 00:25:41,840
दर्शनों को

381
00:25:41,840 --> 00:25:46,320
भी स्थान है और आस्तिक दर्शनों को भी स्थान है। आस्तिक

382
00:25:46,320 --> 00:25:50,560
दर्शनों पे भी चर्चा होती है। नास्तिक दर्शनों को भी मान्यता है। चारबा

383
00:25:50,560 --> 00:25:54,720
बौद्ध जैन आदि के जो नास्तिक दर्शन है उनको बिल्कुल मान्यता है। इन पे भी डिस्कशन होती है। इनको

384
00:25:54,720 --> 00:25:58,800
इनको डिनाई नहीं करता है कोई। तो ऐसा कुछ नहीं। हम बांट नहीं सकते। हम

385
00:25:58,800 --> 00:26:02,960
ना इसको अलग-अलग ले ना चले। जब हम आकार और निराकार पे आते हैं तो

386
00:26:02,960 --> 00:26:07,040
वहां हम अपने कई बार ना हम जानबूझ के शायद भेद पैदा करना

387
00:26:07,040 --> 00:26:11,600
चाहते हैं। वहां है नहीं है। हो सकता है हमसे कोई गलती हो

388
00:26:11,600 --> 00:26:15,760
साकार साकार पूजा भी वैदिक पूजा ही है। देखो वैदिक

389
00:26:15,760 --> 00:26:19,920
नहीं कह सकते आप उसको इसको आप ये कह सकते हो कि वैचारिक भेद

390
00:26:19,920 --> 00:26:24,000
कह सकते हो। देखो मैं बताता हूं आपको थोड़ा सा और समझ लो। उसमें कोई ऐसी बात भी नहीं है।

391
00:26:24,000 --> 00:26:28,160
जैसे बच्चा स्कूल जाता है तो सबसे पहले स्कूल जाके जब स्लेट उसको

392
00:26:28,160 --> 00:26:32,240
लिखवाते हैं मान लो अ लिखवाया अ अनार तो पूरी स्लेट

393
00:26:32,240 --> 00:26:36,320
पे सिर्फ अ लिखा जाता है और वो भी डॉट डॉट डॉट डॉट डॉट डॉट करके

394
00:26:36,320 --> 00:26:40,400
पूरी स्लेट पे अ क्योंकि वो अभ्यास करवाना है। बच्चा भी जड़

395
00:26:40,400 --> 00:26:44,480
है। उसमें बहुत बुद्धि नहीं है। उसके हाथ पैर नहीं चलते ढंग से। तो उसको डॉट डॉट

396
00:26:44,480 --> 00:26:48,480
डॉट डॉट करके फिर वो धीरे-धीरे बड़े परिश्रम से अ लिख पाता है।

397
00:26:48,480 --> 00:26:52,640
बड़ी मेहनत लगती है और उसको लगता है भगवान एक ऐसा काम है और खींच खींच

398
00:26:52,640 --> 00:26:56,720
घर चले जाना पड़ता है और रोतेरोते जाता है और जब वो

399
00:26:56,720 --> 00:26:57,360
अभ्यासी

400
00:26:57,360 --> 00:27:02,160
हो जाता है तो उसी एक स्लेट पे वो सारी बारा कड़ी लिख देता है।

401
00:27:02,160 --> 00:27:06,240
सब कुछ लिख देता है। तो यहां भेद जो है ना यहां प्रारंभ देखिए आप एक बात को

402
00:27:06,240 --> 00:27:10,720
समझो। जब हम बात कौन कैसे

403
00:27:10,720 --> 00:27:14,960
ये बात समझो आप जब एक बच्चा अ लिख रहा है एक समय उसके लिए बहुत बड़ा कार्य

404
00:27:14,960 --> 00:27:18,960
है जब वो विद्या का ज्ञानी हो गया चीजों को समझने लगा तो हो सकता है वो कविता लिख

405
00:27:18,960 --> 00:27:23,280
दे हो सकता है कहानी लिख दे हो सकता है शब्दों से खेलने लगे

406
00:27:23,280 --> 00:27:27,280
इसमें एक कैच आता है जी इसमें एक कैच आता है कि जब

407
00:27:27,280 --> 00:27:31,280
बच्चा बड़ा हो जाता है बहुत ज्ञानी हो जाता है पीएचडी कर लेता है मगर वो

408
00:27:31,280 --> 00:27:35,360
जो सिलेट स्लेट में लिखा हुआ अ है ना वो कभी भी ये नहीं

409
00:27:35,360 --> 00:27:40,080
कहता कि वो अ गलत गलत था उसमें ये तो कोई बात नहीं

410
00:27:40,080 --> 00:27:44,080
समझे नहीं उसमें तो हम भी नहीं कह रहे गलत है मैं मैं ये कह वही मैं कह रहा हूं जैसे

411
00:27:44,080 --> 00:27:48,160
हमने कहा कि मूर्ति पूजा वैदिक नहीं है वो ठीक नहीं है तो ये वैदिक नहीं

412
00:27:48,160 --> 00:27:52,160
है वैदिक तो नहीं ये तो हम मना कर रहे हैं ना कि स्लेट

413
00:27:52,160 --> 00:27:56,160
में लिखी हुई जो पहली बात थी वो गलत है वो गलत नहीं नहीं गलत क्यों है नहीं

414
00:27:56,160 --> 00:28:00,560
नहीं नहीं समझे नहीं आप सुनो इसमें आप इसमें ना चीजें डालो मत

415
00:28:00,560 --> 00:28:04,560
सिर्फ एक बात देखो आप वहां भी अ लिखा जा रहा है वहां भी अ लिखा जा

416
00:28:04,560 --> 00:28:08,720
रहा है बाद में भी सिर्फ सिर्फ योग्य उसके सामर्थ्य का अंतर है। ये बच्चे

417
00:28:08,720 --> 00:28:12,480
का सामर्थ्य अलग है और बड़े का सामर्थ्य अलग है। ये भाषा का अंतर

418
00:28:12,480 --> 00:28:16,480
नहीं है। आप इसे भाषा के अंतर में ना लेके जाओ। ये बच्चे के सामर्थ्य

419
00:28:16,480 --> 00:28:20,720
का अंतर है कि उसे शुरू में लिखना नहीं आता। बाद में वो उसी स्लेट पर सारा कुछ लिख देता है।

420
00:28:20,720 --> 00:28:24,880
तो ये बच्चे के सामर्थ्य के घटने बढ़ने की बात है। इसमें इसमें

421
00:28:24,880 --> 00:28:28,960
भाषा की घटोतरी बढ़ोतरी नहीं है। मैं वही इसमें बच्चे के सामर्थ्य की

422
00:28:28,960 --> 00:28:33,440
बढ़ोतरी ऐसे भगवान को जानने समझने में मनुष्य के सामर्थ्य

423
00:28:33,440 --> 00:28:37,440
की बढ़ोतरी घटोतरी है। ईश्वर की नहीं जी। जैसे

424
00:28:37,440 --> 00:28:41,520
ना आप देखो चार अंधे थे। उन्होंने कहा यार हाथी हाथी की बड़ी है। तो कहने लगे

425
00:28:41,520 --> 00:28:45,600
हमें हाथी दिखाओ। अब वो चारों अंधे उन्होंने कहा चलो दिखाते हैं। तो एक की पकड़

426
00:28:45,600 --> 00:28:49,600
में पूछ आई। उसने पूछ को ऐसे ऐसे देखा। ओ हो अच्छा समझ गया

427
00:28:49,600 --> 00:28:53,760
समझ गया। एक के हाथ में उसका पैर आया तो उसने कहा अच्छा अच्छा ऐसा एक के हाथ में सूंड

428
00:28:53,760 --> 00:28:57,840
आ गई। उसने कहा अरे अच्छा अच्छा ईश्वर ऐसा एक के हाथ में कान आ गया। उसने कहा अच्छा

429
00:28:57,840 --> 00:29:02,000
अच्छा ईश्वर ऐसा। तो फिर उसने उसने पूछा अंधों को हां भाई जान गए तुम ईश्वर

430
00:29:02,000 --> 00:29:06,000
कैसा है? कि हां जी जान गए कि बताओ कैसा है? तो जिसके हाथ में पूछ आई थी उसने कहा

431
00:29:06,000 --> 00:29:10,000
वो तो झाड़ू जैसा है। जिसके हाथ में पैर आया था उसने कहा अरे ये तो बहुत बड़े

432
00:29:10,000 --> 00:29:14,000
खंबे जैसा होता है। फिर किसी के हाथ में सूंड आई तो उसने कहा अरे नहीं नहीं ये तो

433
00:29:14,000 --> 00:29:18,000
बड़ा नरम नरम सा होता है। सांप जैसा जिसके हाथ में कान आया था उसने कहा नहीं वो

434
00:29:18,000 --> 00:29:22,640
तो बड़े पंखे जैसा होता है। तो एक्चुअली वो सब सत्य कह रहे हैं।

435
00:29:22,640 --> 00:29:25,840
सामर्थ्य का अंतर है। जिसने जैसा जाना वैसा समझ लिया।

436
00:29:25,840 --> 00:29:30,000
और वैसे मैं एक बात आपको बताऊं ईश्वर विषय पर मैं चर्चा

437
00:29:30,000 --> 00:29:34,000
नहीं करना चाहता हूं। वैसे बेसिकली मैं अपना निजी विचार बता रहा हूं। उसका कारण

438
00:29:34,000 --> 00:29:38,080
यह है कि यह चर्चा का विषय नहीं है। ये तो अनुभूति का विषय है। चर्चा तो

439
00:29:38,080 --> 00:29:42,480
आप अगर गुड पे भी करोगे ना गुड़ इतनी बड़ी चीज होती है। गुड़

440
00:29:42,480 --> 00:29:46,560
एक डेली गुड़ तो है। कितनी बड़ी बात है। आप चर्चा चर्चा में

441
00:29:46,560 --> 00:29:50,640
उस गुड़ की ही व्याख्या नहीं कर सकते। मैं गुड़ की कितनी मर्जी व्याख्या करूं। मैं

442
00:29:50,640 --> 00:29:54,720
आपका मुंह मीठा नहीं करा सकता। आप गुड़ की कितनी मर्जी लच्छेदार बात करो। आप मेरा मुंह नहीं

443
00:29:54,720 --> 00:29:58,880
मीठा करा सकते। वास्तव में गुड़ एक अनुभव का विषय है। तो जब हम

444
00:29:58,880 --> 00:30:02,880
पदार्थों को ले विषय करते हैं और एक होती है चर्चा। चर्चा और

445
00:30:02,880 --> 00:30:07,120
अनुभूति हमेशा ही अंतर वाली होती है। जो चर्चा के विषय है वह हमेशा

446
00:30:07,120 --> 00:30:11,360
उलझे ही रहते हैं। चर्चा वाले लोग मैंने हमेशा उलझे देख। मुझे कभी अंतर नजर

447
00:30:11,360 --> 00:30:15,440
नहीं आया। जैसे कोई व्यक्ति मूर्ति पूजा करने गया। मुझे वो कभी शत्रु नहीं लगा।

448
00:30:15,440 --> 00:30:19,440
मैं सच बताऊं आपको। मैं यह मानता हूं कि वो उस रूप में

449
00:30:19,440 --> 00:30:23,520
उसको जान समझ रहा है। कभी साना होगा, बड़ा होगा, दूसरे रूप में

450
00:30:23,520 --> 00:30:27,520
समझेगा। कोई फर्क नहीं है इस बात में। और हम इस तरह से

451
00:30:27,520 --> 00:30:31,920
इसको ना ले चले कि मैं आरस से हूं तो इस विषय को खींच खींच के लाया जाएगा।

452
00:30:31,920 --> 00:30:35,920
वैदिक विषय मूर्ति पूजा नहीं है। ये कभी भी होता नहीं। ये होगा भी

453
00:30:35,920 --> 00:30:40,240
नहीं। आप चाहे वेदों से कुछ चीज लाके दे। मेरे सामने भी रखे हुए और मैं आपको

454
00:30:40,240 --> 00:30:44,240
देख के भी बता सकता हूं। ऐसी कोई बात नहीं। लेकिन हम उसको ना खींचातान ना

455
00:30:44,240 --> 00:30:48,960
करें। मतलब आप समझे भगवान हम और आप जैसे तुच्छ मनुष्यों की खींचातान

456
00:30:48,960 --> 00:30:49,460
का

457
00:30:49,120 --> 00:30:53,120
विषय नहीं है। अनुभूति का विषय

458
00:30:53,120 --> 00:30:57,120
हो सकता है कि जो मूर्ति पूजा करता हो वो ज्यादा साना

459
00:30:57,120 --> 00:31:01,280
समझदार शुद्ध पवित्र आदमी हो सकता है। और हो सकता

460
00:31:01,280 --> 00:31:05,360
है जो निराकार की उपासना करता हो वो शरारती हो शैतान हो चालाक हो

461
00:31:05,360 --> 00:31:09,520
झूठ बोलता हो शरारत करता हो ये हो सकता है तो इसमें ना तो उसके

462
00:31:09,520 --> 00:31:14,320
आकार के कारण कमी है ना उसके निराकार के कारण कमी है। मनुष्य की अपनी समझ है।

463
00:31:14,320 --> 00:31:18,480
एक्चुअली तो क्या है ईश्वर का सहारा हम अपनी अपनी चेतना

464
00:31:18,480 --> 00:31:22,480
और अपनी बुद्धि के विकास के लिए करते हैं। ईश्वर एक माध्यम है जिसके

465
00:31:22,480 --> 00:31:26,560
द्वारा मनुष्य अपनी आत्मा की पूर्णता को प्राप्त करता है। यहां विषय ईश्वर

466
00:31:26,560 --> 00:31:30,560
नहीं है। यहां विषय है आत्मा कैसे पूर्ण होगी? आत्मा को

467
00:31:30,560 --> 00:31:35,680
पूर्णता कैसे मिलेगी? और पूर्णता ईश्वर के पास है। तो ईश्वर

468
00:31:35,680 --> 00:31:39,680
दो मिनट मैं यहां पे थोड़ा सा लेना चाहूंगा आपसे। जी एक पहली बात यह

469
00:31:39,680 --> 00:31:43,680
है कि जैसे हमने कहा कि यह जो है आप नहीं करते कहीं पर

470
00:31:43,680 --> 00:31:47,680
भी और जैसे हम गुण की व्याख्या कितनी भी करते जाए तो वो जो

471
00:31:47,680 --> 00:31:51,680
है कभी भी हम प्रॉपर सामने वाले को वो नहीं कर सकते सेटिस्फाइड नहीं

472
00:31:51,680 --> 00:31:55,920
कर सकते उसमें भी ये बिल्कुल आप अच्छी बात कर रहे हैं बट इसमें फिर ये

473
00:31:55,920 --> 00:32:00,320
एक लकीर खींच देना कि आप गलत हो मतलब वेदों में नहीं दिया

474
00:32:00,320 --> 00:32:04,160
या वो तर्क के द्वारा सिद्ध नहीं होता तो ये लाइन भी नहीं खींचनी चाहिए

475
00:32:04,160 --> 00:32:08,160
यदि हम नहीं लाइन नहीं देखो सुनो ये हमने आपने नहीं खींची देखो आचार्य आचार्य

476
00:32:08,160 --> 00:32:12,240
जी आचार्य आचार्य जी दो मिनट दो मिनट दो मिनट मुझे बस पूरा करने ले दीजिए

477
00:32:12,240 --> 00:32:16,400
दूसरी बात ये है कि हमने ये तो माना कि

478
00:32:16,400 --> 00:32:20,480
शक्ति के रूप में कम और ज्यादा के रूप में भेद है

479
00:32:20,480 --> 00:32:24,640
स्वरूप से भेद नहीं है ईश्वर में है ना कार्य करने

480
00:32:24,640 --> 00:32:28,720
वाली शक्ति के रूप में भेद है कहीं पे ज्यादा है कहीं पे कम है नहीं यंत्रगत भेद है

481
00:32:28,720 --> 00:32:32,800
शक्ति यंत्रगत भेद कहीं वो शक्ति बड़े प्रकट रूप में आती

482
00:32:32,800 --> 00:32:36,800
है कहीं कहीं वो शक्ति बड़े कम रूप में आती है तो तो शक्ति

483
00:32:36,800 --> 00:32:40,960
के जैसे जैसे भगवान राम में भगवान

484
00:32:40,960 --> 00:32:44,960
राम में वो ज्यादा दिखाई देते हैं। ईश्वर मैं मैं वही कह

485
00:32:44,960 --> 00:32:50,960
रहा हूं। व्यवहार में ज्यादा दिखाई देते हैं। और

486
00:32:52,880 --> 00:32:57,120
बिल्कुल सर दूसरा रूप है। मैं वही कह रहा हूं। जी जी

487
00:32:57,120 --> 00:32:58,880
इसका मतलब जी आ रही इसका

488
00:32:58,880 --> 00:33:02,960
मतलब ईश्वर ईश्वर यह रेगुलेट कर सकते हैं कि वो कहां पर

489
00:33:02,960 --> 00:33:06,960
शक्ति के रूप में ज्यादा प्रकट हो और कहां पर शक्ति के रूप में कम प्रकट

490
00:33:06,960 --> 00:33:10,880
हो। ठीक है?

491
00:33:10,880 --> 00:33:11,440
हां।

492
00:33:11,440 --> 00:33:15,440
तो अब इसी में एक आगे की चीज आती है कि जैसे ईश्वर डिसाइड

493
00:33:15,440 --> 00:33:19,440
कर सकते हैं कि वह कहां पर जैसे पृथ्वी का ही मान लिया

494
00:33:19,440 --> 00:33:24,000
कि पृथ्वी के लिए वो धक्के का या पुश का या पुल का विषय बने ज्यादा

495
00:33:24,000 --> 00:33:28,080
और किसी और ग्रह के लिए या और किसी जड़ पदार्थ के लिए नहीं बने

496
00:33:28,080 --> 00:33:32,400
या किसी के लिए कम बने या किसी कैसे निर्धारित करोगे

497
00:33:32,400 --> 00:33:36,640
किसी के लिए नहीं बने आप कैसे निर्धारित करोगे कि वो किसी कहीं जगह

498
00:33:36,640 --> 00:33:40,800
पूर्ण और कुछ का विषय नहीं बने क्यों नहीं बने इस संसार

499
00:33:40,800 --> 00:33:44,800
में कोई भी वस्तु स्थिर है ही नहीं। कोई भी वस्तु स्थिर

500
00:33:44,800 --> 00:33:48,960
नहीं है। इवन आप कोई आपके सामने कोई मेज पड़ा है,

501
00:33:48,960 --> 00:33:53,360
कुर्सी पड़ी है, उस कुर्सी के परमाणुओं में भी गति हो रही है।

502
00:33:53,360 --> 00:33:57,600
उस मेज के परमाणुओं में भी गति हो रही है। कोई वस्तु चम्मच है, किताब

503
00:33:57,600 --> 00:34:01,600
है, जो भी है सबके परमाणुओं में गति है। तो हम

504
00:34:01,600 --> 00:34:05,840
इस बात पे हम फैसला ना करें। नहीं नहीं मैं ये नहीं कह रहा क्योंकि

505
00:34:05,840 --> 00:34:09,920
हम अपनी चीजें कहीं कहीं ऐसा लगता है कि हम उस ना आरोपित कर रहे हैं और उससे

506
00:34:09,920 --> 00:34:14,000
उसका स्वरूप खराब हो जाएगा। मैं इसको मैं इसको थोड़ा सा एक

507
00:34:14,000 --> 00:34:18,000
बार एक बार आचार्य जी मैं अपनी बात पूरी कर लूं क्योंकि मुझे लगता है मैं जब बात

508
00:34:18,000 --> 00:34:22,080
पूरी करूंगा तो आप जब मुझे बताएंगे नहीं ये बात ना पहले कह चुके हो

509
00:34:22,080 --> 00:34:25,200
जैसे पुश और पुल की बात है वो आप पहले कह दी ये बार-बार कहने से

510
00:34:25,200 --> 00:34:28,400
वास्तव में तो मैं इसे समझ भी नहीं पाया मैं सच बताऊं तो आपको अब तक

511
00:34:28,400 --> 00:34:32,400
जैसे आपने कहा ना पुश और अंदर बाहर पूरी वास्तव में तो

512
00:34:32,400 --> 00:34:36,400
मेरी समझ में अब तक नहीं आया मैं पूरी बात करता हूं या कहीं से कोई उठा लाई

513
00:34:36,400 --> 00:34:40,880
हुई चीज कोई के भ आज मैंने ये चीज रखनी है नहीं नहीं [हंसी] सर मैं

514
00:34:40,880 --> 00:34:45,360
इसको जब मैं जब मैं पूरा करूंगा ना तो आपको समझ में आ जाएगा। मैं बता रहा हूं। आपने

515
00:34:45,360 --> 00:34:49,680
जैसे जैसे कि जड़ पदार्थ के लिए भगवान

516
00:34:49,680 --> 00:34:53,680
यह डिसाइड कर रहे हैं कि उन्हें कहां अपनी शक्ति के रूप में ज्यादा प्रकट होना

517
00:34:53,680 --> 00:34:57,920
है। कहां कम प्रकट होना है। इतना तो आप मानते हैं। और दूसरी बात यह है कि सारे ही

518
00:34:57,920 --> 00:35:02,160
परमाणु गति कर रहे हैं। मगर उनकी कई कई वस्तुओं की कई जड़

519
00:35:02,160 --> 00:35:06,320
पदार्थों की गति इतनी कम है कि वो हमारे व्यवहार के विषय में ना आने वाली।

520
00:35:06,320 --> 00:35:10,400
मतलब हम देख नहीं पा रहे हैं। कर तो वो रही हैं मगर हम देख नहीं पा रहे हैं। इतनी

521
00:35:10,400 --> 00:35:14,560
कम है उसकी गति। तो उसको हम लोग व्यवहारिक दृष्टि से ही मानते

522
00:35:14,560 --> 00:35:18,640
हैं कि वो चीज स्थिर है और जो वास्तविकता में हमारे व्यवहार में जिनकी गति

523
00:35:18,640 --> 00:35:22,640
आ रही है वो हमारे व्यवहारिक दृष्टिकोण से गति कर रही है। अब दूसरी

524
00:35:22,640 --> 00:35:26,640
बात यह आती है कि जैसे ईश्वर पृथ्वी सूर्य

525
00:35:26,640 --> 00:35:31,200
इत्यादि के मार्ग में बाधक बनता है या उन्हें उनके आकर्षण

526
00:35:31,200 --> 00:35:35,280
अथवा उनके पुश अथवा पुल का विषय बनता है।

527
00:35:35,280 --> 00:35:39,280
तो क्या इसी प्रकार से ईश्वर प्रकाश के मार्ग में भी बाधा बन

528
00:35:39,280 --> 00:35:45,280
सकता है ना? किसी विषय से नहीं

529
00:35:45,360 --> 00:35:49,360
नहीं बन सकता असल में क्या है देखो ईश्वर

530
00:35:49,360 --> 00:35:53,360
इतना सूक्ष्म तत्व है कि उससे सूक्ष्म तत्व इस

531
00:35:53,360 --> 00:35:56,480
संसार में है ही नहीं और जो

532
00:35:56,480 --> 00:36:00,480
जो अत्यंत सूक्ष्म होता है वो बाधक हो ही नहीं सकता तो

533
00:36:00,480 --> 00:36:03,040
वो प्रति

534
00:36:03,040 --> 00:36:07,200
बाधक होने के लिए उसका स्थूल होना जरूरी है किसी भी अर्थों में

535
00:36:07,200 --> 00:36:11,200
ठीक है और जबकि ईश्वर सिद्धांत जो उसका मूल स्वरूप

536
00:36:11,200 --> 00:36:15,280
है वो इतना सूक्ष्म है कि उससे सूक्ष्म कोई

537
00:36:15,280 --> 00:36:19,920
पदार्थ नहीं और सूक्ष्मता के कारण ही व्यापकता है। ठीक है?

538
00:36:19,920 --> 00:36:23,920
स्थूलता में तो व्यापकता नहीं हो सकती। मैं यहां बैठा हूं आप कहीं और बैठे। तो इसको

539
00:36:23,920 --> 00:36:28,000
हमने माना ना कि वह एक शक्ति के रूप में कार्य करता है। जैसे सत्यार्थ प्रकाश मैंने पढ़ा तो

540
00:36:28,000 --> 00:36:32,000
उसमें वो कह रहा है कि ईश्वर ईश्वर अपने शक्ति रूपी हाथों से कार्य

541
00:36:32,000 --> 00:36:36,240
कर रहा है। शक्ति रूपी हाथ मतलब दिखाई तो नहीं दे रहा है पर ईश्वर

542
00:36:36,240 --> 00:36:40,560
सब जगह होते हुए भी किसी विशेष स्थिति में हाथ जैसे मतलब हाथ

543
00:36:40,560 --> 00:36:44,880
की तरीके से इधर से उधर मूवमेंट करने वाले कार्य कर रहा है।

544
00:36:44,880 --> 00:36:49,600
हां वो तो वो तो तुलसीदास भी कहते हैं बिनु पद चले सुने बिनु कान्हा

545
00:36:49,600 --> 00:36:53,600
वो तो उसमें क्या वो तो जैसे आप जैसे आप जैसे आपने

546
00:36:53,600 --> 00:36:57,680
कहा कि वो इतना सूक्ष्म है कि वो कहीं पे बाधक नहीं बन सकता किसी

547
00:36:57,680 --> 00:36:59,440
का भी तो फिर वो तो

548
00:36:59,440 --> 00:37:03,440
फिर वो ये जो जड़ पदार्थ है पृथ्वी इत्यादि मिट्टी के कण इनके

549
00:37:03,440 --> 00:37:06,240
लिए बाधक कैसे बना फिर रचना कैसे की उसने

550
00:37:06,240 --> 00:37:10,560
कहां बाधक बना

551
00:37:10,560 --> 00:37:14,720
मिट्टी का कण मान लीजिए पड़ा है उससे पृथ्वी बन रही है तो

552
00:37:14,720 --> 00:37:18,880
कैसे बनेगी? अच्छा कैसे बनेगी मतलब प्रोसेस है जैसे

553
00:37:18,880 --> 00:37:22,880
शुक्र और रज मिलने से बच्चा बन जाता है। क्या कहेंगे उसको कैसे

554
00:37:22,880 --> 00:37:26,880
बनना है? तो तो पृथ्वी उसकी प्रक्रिया है और ईश्वर के ज्ञान में वो

555
00:37:26,880 --> 00:37:31,040
देखो मिट्टी पड़ी है। आपकी मेरी दृष्टि में मिट्टी है। कुमार की दृष्टि

556
00:37:31,040 --> 00:37:35,280
में वो उसके [हंसी] लिए साधु तो उसको लेके आएगा। फिर उसको चाक

557
00:37:35,280 --> 00:37:39,440
पे रखेगा। फिर चीजें करेगा और उसमें ज्ञान भी लगाएगा। ऐसेसे करे तो घड़ा बनेगा।

558
00:37:39,440 --> 00:37:43,600
बिल्कुल यदि यदि मिट्टी हो कुम्हार ना हो चाक ना हो फिर सब चीजें

559
00:37:43,600 --> 00:37:47,840
तो तो कुम्हार मिट्टी के लिए बाधक कुम्हार मिट्टी के लिए बाधक बना ना

560
00:37:47,840 --> 00:37:50,320
कुमारक

561
00:37:50,320 --> 00:37:54,400
शब्द गलत इस्तेमाल कर रहे हैं बाधक नहीं है वो वो साधक है

562
00:37:54,400 --> 00:37:58,640
साधक है वो तो मिट्टी से उसने घड़ा बनाया उसने साधन किया बाधक कैसे मैं

563
00:37:58,640 --> 00:38:02,880
मैं बता रहा हूं बाधक कैसे हुआ कि जैसे उसने मिट्टी को उठाया तो

564
00:38:02,880 --> 00:38:07,040
मिट्टी उसके हाथ के उसके हाथ के नीचे नहीं जा सकती ये बाधा

565
00:38:07,040 --> 00:38:11,360
है जैसे उसने मिट्टी को उठाया तो अब मिट्टी

566
00:38:11,360 --> 00:38:13,600
ठीक है उसकी बात लेकिन सुनो अब इसमें

567
00:38:13,600 --> 00:38:17,840
क्या है अब यही मैंने यही शुरू किया था कि आप मनुष्य की वस्तुएं भगवान

568
00:38:17,840 --> 00:38:19,120
पे आरोपित ना करें

569
00:38:19,120 --> 00:38:23,520
वो कुम्हार के जैसे हाथ का ऊपर नीचे नहीं होगा उसका वो सिस्टम नहीं है

570
00:38:23,520 --> 00:38:27,760
लेकिन अगर हम दिया है नहीं नहीं वो ठीक है नहीं आप

571
00:38:27,760 --> 00:38:32,240
ओ मेरी बात सुनो उदाहरण उदाहरण लक्ष्य नहीं है बेटे

572
00:38:32,240 --> 00:38:36,480
हम यहां कुम्हार और की चाक और मिट्टी की चर्चा नहीं कर रहे हम उसके माध्यम

573
00:38:36,480 --> 00:38:40,960
से किसी चीज को समझने की कोशिश कर रहे उसका सहारा ले सहारा

574
00:38:40,960 --> 00:38:44,960
गौण होता है और जहां मैं पहुंचना वो मुख्य होता है। मैंने दिल्ली जाना है

575
00:38:44,960 --> 00:38:49,040
तो मैं गाड़ी का सहारा ले सकता हूं। रिक्शा में जा सकता हूं हूं। पैदल जा सकता हूं। साइकिल पे जाऊं कैसे जाऊं?

576
00:38:49,040 --> 00:38:53,040
अब इस बात की व्याख्या नहीं हो सकती कि रिक्शा है ये साइकिल अपना नहीं लक्ष्य है

577
00:38:53,040 --> 00:38:57,120
गति लक्ष्य है दिल्ली। तो सिर्फ उदाहरणों को ना

578
00:38:57,120 --> 00:39:01,280
पकड़ के कहे कि जी कुमार ने मिट्टी उठाई। अब उसके आरपार नहीं हो सकता।

579
00:39:01,280 --> 00:39:05,280
भगवान के ऐसे नहीं हुई होगी। अब आपने क्या करा? उसका रूप एक व्यक्ति के जैसा

580
00:39:05,280 --> 00:39:09,680
मान लिया और यहां बाधा हो गई। अब वो इस तरह से चीजें नहीं करता है।

581
00:39:09,680 --> 00:39:15,360
आंतरिक शक्ति है। अब आप मैं आपको कह रहा हूं कि आपकी आंखें झपक रही है। बताओ

582
00:39:15,360 --> 00:39:19,360
आप तो झपका नहीं रहे तो अपने आप झपकती रहती है। तो ऐसे संसार के कुछ

583
00:39:19,360 --> 00:39:23,840
कार्य नैमितिक होते हैं। कुछ स्वाभाविक है। भगवान ने सृष्टि घुमा के चला दी।

584
00:39:23,840 --> 00:39:27,840
स्वाभाविक तो है मगर कहने का मतलब जब तक वो जड़ पदार्थों

585
00:39:27,840 --> 00:39:31,840
के लिए बाधक नहीं बनेगा तो वो सृष्टि रचना पॉसिबल

586
00:39:31,840 --> 00:39:34,160
नहीं दिख रही। और यदि

587
00:39:34,160 --> 00:39:38,240
एक मिनट भाई साहब एक मिनट और यदि हमने उसका बाधक बनना मान लिया जड़

588
00:39:38,240 --> 00:39:42,240
पदार्थों के लिए तो हम यह भी मान सकते हैं कि प्रकाश के मार्ग में भी वो बाधा बन जाए

589
00:39:42,240 --> 00:39:46,320
तो फिर उसका वो जो तर्क की दृष्टि से अवतार या जो स्वरूप है मूर्त

590
00:39:46,320 --> 00:39:50,480
रूप वो आ जाएगा। मगर मगर मगर एक मिनट अगर हम यह कहें कि ठीक है

591
00:39:50,480 --> 00:39:54,720
वह बाधक तो नहीं बनता है मगर वो कुछ ऐसा करता है जो हमारी समझ

592
00:39:54,720 --> 00:39:58,800
से परे है मगर वो सृष्टि रचना कर देता है तो फिर इस चीज को हम

593
00:39:58,800 --> 00:40:03,200
उसके मूर्त रूप के लिए भी ले सकते हैं कि वो जो है एक देशीय

594
00:40:03,200 --> 00:40:07,200
तो नहीं होता है बाधक तो नहीं बनता है प्रकाश के मार्ग में मगर वो कुछ ऐसा

595
00:40:07,200 --> 00:40:11,280
करता है जिसकी वजह से वो हमारे आंखों का विषय किसी निश्चित देश काल

596
00:40:11,280 --> 00:40:15,360
परिस्थिति में हो जाता है। अगर हम अचिंत एक मिनट अगर हम

597
00:40:15,360 --> 00:40:19,360
अचिंत शक्ति को मान रहे हैं तो वहां पे क्यों नहीं मान सकते और अगर

598
00:40:19,360 --> 00:40:23,440
हम वहां पर तर्क कर रहे हैं तो यहां पर हमारे तर्क का उत्तर क्यों नहीं है ये मेरा मतलब

599
00:40:23,440 --> 00:40:27,440
वहां और यहां का बताओ एक बार जरा वहां और यहां हम एक बार बताओ कि वहां मान रहे और

600
00:40:27,440 --> 00:40:31,760
यहां नहीं मान रहे एक बारी बताओ कैसे जैसे हमने कहा कि

601
00:40:31,760 --> 00:40:35,840
ईश्वर उसका जो बाधा का विषय नहीं बनता है

602
00:40:35,840 --> 00:40:39,920
जड़ पदार्थों के लिए मगर सृष्टि रचना वो करता है अब वो कैसे करता है वो

603
00:40:39,920 --> 00:40:42,000
मनुष्य दृष्टि से समझाने तो आपकी बेटी बात

604
00:40:42,000 --> 00:40:45,200
नहीं समझ पा आप ये बाधा शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हो? बार-बार

605
00:40:45,200 --> 00:40:49,200
बाधा कैसे होती? कैसे बाधा बन जाता है? मतलब मेरे को आप आप मुझे

606
00:40:49,200 --> 00:40:53,200
बता दो कि कैसे उसने सृष्टि रचना की जो आपने

607
00:40:53,200 --> 00:40:57,440
आप कैसे जकी? आपका हृदय कैसे धड़का? आपका हृदय

608
00:40:57,440 --> 00:41:01,680
कैसे धड़क रहा है? ठीक है। आपका हृदय जब से आप पैदा होते हैं तब

609
00:41:01,680 --> 00:41:05,840
से मरने तक धड़कता है। अपने आप तो आप इसकी व्याख्या कैसे करोगे?

610
00:41:05,840 --> 00:41:10,080
बता रहा हूं ना। किसी बता रहा हूं। किसी निश्चित देश काल परिस्थिति

611
00:41:10,080 --> 00:41:14,160
में मेरी जो स्वाभाविक रूप से काम करने वाली जो चेतना शक्ति

612
00:41:14,160 --> 00:41:18,160
है वो मुझे मिलने वाली जो सूर्य की सूर्य से मिलने वाली जो एनर्जी है

613
00:41:18,160 --> 00:41:22,240
उसके साथ संयोग करके बार-बार दिल को धड़का रही है। जिस दिन मेरे अंदर वो

614
00:41:22,240 --> 00:41:26,480
एनर्जी नहीं होगी निश्चित रूप से। जैसे निश्चित रूप से मतलब किसी

615
00:41:26,480 --> 00:41:30,560
देश का तो इसका मतलब ये हो गया कि जो आप सूर्य और फला चीज का

616
00:41:30,560 --> 00:41:34,560
संयोग बता रहे हो यदि उनके संयोग को स्थापित रखा जाए तो फिर व्यक्ति

617
00:41:34,560 --> 00:41:38,960
अमर भी हो सकता है। जीवन का कारण क्या सूर्य और पदार्थों

618
00:41:38,960 --> 00:41:43,040
की की अलाइनमेंट है या कोई और कारण है? अगर

619
00:41:43,040 --> 00:41:47,120
अगर ईश्वर ने हमें ऐसी क्षमता दी हो मान लीजिए कि हम उसको स्थापित

620
00:41:47,120 --> 00:41:51,120
रख सके तो अमर भी हो सकता है। मगर उसने ऐसी क्षमता नहीं दी है ना। नहीं

621
00:41:51,120 --> 00:41:55,200
नहीं नहीं आप मुझे समझाएं। एक तो पहली बात यह है कि हम अपनी मर्जी

622
00:41:55,200 --> 00:42:00,640
से कोई बात करें या शास्त्रगत परंपरा के बंधन में बंध के काम करें।

623
00:42:00,640 --> 00:42:04,640
ये जो नियम बनाए हैं जो वेद आदि शास्त्र ठीक है? उसका

624
00:42:04,640 --> 00:42:08,720
कारण क्या है? थोड़ा सा बस एक दो मिनट में कहूंगा फिर आप जैसा भी कहेंगे चलता

625
00:42:08,720 --> 00:42:09,680
रहेगा।

626
00:42:09,680 --> 00:42:13,920
जैसे बंधन का मतलब हो गया यदि हम विचार उन्मुक्तता

627
00:42:13,920 --> 00:42:18,320
की बात करें। कि जिसके मन में जो आए वो कहे

628
00:42:18,320 --> 00:42:22,320
जिसके मन में जो आए वो सिद्धांत खड़ा कर दे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि

629
00:42:22,320 --> 00:42:26,400
यह सिद्धांत गणित में नहीं है। मनमानी गणित में नहीं

630
00:42:26,400 --> 00:42:30,640
चलती। मनमानी विज्ञान में नहीं चलती। ये धर्म में मनमानी

631
00:42:30,640 --> 00:42:34,720
चलती है। क्योंकि इसको विषय एक विषय के रूप में हम कभी मानते नहीं ना

632
00:42:34,720 --> 00:42:38,880
जानते ना पढ़ते। तो ये ध्यान रहे हर विषय की अपनी परिधि

633
00:42:38,880 --> 00:42:43,120
है। सीमाएं हैं। उन सीमाओं में जो बंधा हुआ है वही लक्ष्य

634
00:42:43,120 --> 00:42:45,920
तक जाएगा। जो बिखरा हुआ है वो लक्ष्य तक

635
00:42:45,920 --> 00:42:49,920
नहीं जाएगा। जैसे नदी को कहीं ले जाना है तो मजबूत किनारों में बांध

636
00:42:49,920 --> 00:42:54,400
के हम कहीं भी उसको ले जाए। यदि हम कहे जी नहीं हम तो फैलेंगे तो वह विनाशकारी

637
00:42:54,400 --> 00:42:58,640
होगा। तो पहले तो चिंतन शक्ति को एक

638
00:42:58,640 --> 00:43:02,160
दिशा की धारा में देना होगा। वो दिशा कौन निर्धारित करे?

639
00:43:02,160 --> 00:43:06,560
पैरामीटर कौन है? मैं नहीं हूं। मैं पैरामीटर नहीं हूं।

640
00:43:06,560 --> 00:43:10,640
पैरामीटर है ऋषि। पैरामीटर है मुनि ऋषि

641
00:43:10,640 --> 00:43:14,160
मुनि योगी वेद वो पैरामीटर है

642
00:43:14,160 --> 00:43:18,240
वो बताता है कि हमें सोचना भी है तो कैसे सोचना है

643
00:43:18,240 --> 00:43:22,240
ऐसे तो कोई कुछ भी सोचेगा आप देखो कि यही

644
00:43:22,240 --> 00:43:26,320
वो कह रहा है पीली चटनी खा लो तो तुम्हारा कल्याण हो जाए कोई कहता है लाल चटनी खा लो तो

645
00:43:26,320 --> 00:43:30,320
कल्याण इसका मतलब है आचार्य मैं समझ गया

646
00:43:30,320 --> 00:43:34,640
आपकी बात मैं समझ गया हमने उसका हमने चिंतन को बांधा नहीं हमने चिंतन

647
00:43:34,640 --> 00:43:38,720
को छोड़ दिया तो कोई कुछ भी कहे मतलब तो ये होगा नहीं ऐसे

648
00:43:38,720 --> 00:43:43,040
तो इसका निष्कर्ष नहीं निकलेगा। इसका मतलब यह है कि जो तर्क

649
00:43:43,040 --> 00:43:47,040
है तर्क से तो यह [गला साफ़ करने की आवाज़] है कि भाई तर्क से तो अवतार संभव

650
00:43:47,040 --> 00:43:51,280
है क्योंकि जैसे मैं बताता हूं आपको सुनिए आचार्य शंकर ने

651
00:43:51,280 --> 00:43:55,440
शंकराचार्य जी ने एक बात कही है एक तर्क है एक

652
00:43:55,440 --> 00:44:00,160
आचार्य जी एक मिनट एक मिनट तो मैं ये कह रहा हूं कि तर्क से

653
00:44:00,160 --> 00:44:04,160
तो हमें ये मानना पड़ेगा कि यदि वो पृथ्वी इत्यादि के लिए बाधक क्षेपक या

654
00:44:04,160 --> 00:44:08,320
जो भी बन सकता है अगर तो वो जो है प्रकाश के मार्ग

655
00:44:08,320 --> 00:44:09,680
में भी बाधक मुझे तो आपके

656
00:44:09,680 --> 00:44:13,680
बाधक क्षेपक वाली बात नहीं समझ में आई। ये क्या कहना चाह रहे हो आप? मुझे बाधक ही समझ

657
00:44:13,680 --> 00:44:17,760
में नहीं आया मुझे तो अब तक आप कह रहे हो वो बाधक है। कैसे बाधक

658
00:44:17,760 --> 00:44:21,920
है? आप मुझे समझाओ। मैं मैं बता रहा हूं। यदि दुनिया में कोई भी जड़

659
00:44:21,920 --> 00:44:25,920
पदार्थ इधर से उधर मूव करेगा ईश्वर के कारण।

660
00:44:25,920 --> 00:44:30,000
तो उसमें ईश्वर का धक्का, बल इत्यादि लगेगा। जो बल

661
00:44:30,000 --> 00:44:32,960
होने की बात स्वीकार की है सभी ग्रंथों में। वो

662
00:44:32,960 --> 00:44:37,040
बल बल जो है वहां पर उसको इधर-उधर मूव कराएगा। तो

663
00:44:37,040 --> 00:44:41,200
बल जो होगा वो ऐसा नहीं है कि पूरी दुनिया में एक साथ काम करे। क्यों? कि मान

664
00:44:41,200 --> 00:44:45,200
लीजिए मुझे मेरे सामने इस समय आप लैपटॉप में मुझे दिख रहे हो। ठीक है? और

665
00:44:45,200 --> 00:44:49,520
मुझे केवल लैपटॉप को हिलाना है। तो ऐसा नहीं है कि पूरे

666
00:44:49,520 --> 00:44:53,840
पूरी टेबल पे मेरी पूरी टेबल पर मैं बल लगा दूं तो सारे सामान नीचे गिर जाए।

667
00:44:53,840 --> 00:44:58,080
मैं केवल बल लगाऊंगा लैपटॉप में और लैपटॉप खिसक जाएगा। तो इस

668
00:44:58,080 --> 00:45:02,240
रूप में जो ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है वो एक देश कार्य करने

669
00:45:02,240 --> 00:45:06,240
वाला बन रहा है। ठीक है? तो वो बाधा ज्ञान से पूरी हो

670
00:45:06,240 --> 00:45:10,240
जाती है। जो आप कह रहे हो ना ऐसा हो रहा है ऐसा हो रहा है वो एक ही सूत्र

671
00:45:10,240 --> 00:45:14,400
में समाप्त हो जाती है बात कि अनंत ज्ञान बल क्रिया उसकी क्रिया केवल क्रिया

672
00:45:14,400 --> 00:45:18,720
नहीं है। ज्ञान युक्त क्रिया मैं पूरा कर लूं एक मिनट कि

673
00:45:18,720 --> 00:45:22,880
अगर हम ये मानते हैं कि उसने किसी निश्चित देश काल

674
00:45:22,880 --> 00:45:26,880
परिस्थिति में सृष्टि रचना के लिए जड़ पदार्थों के व्यवहार

675
00:45:26,880 --> 00:45:30,880
का विषय बना। बाधक बना या छेपक बना कुछ भी बना। व्यवहार का विषय नहीं

676
00:45:30,880 --> 00:45:34,960
बना। आप फिर आप इसको अपनी मनमानी से इस विषय को कहीं और ले जाना चाहते हो। मैं

677
00:45:34,960 --> 00:45:39,040
आपकी बात भी ला रहा हूं। आचार्य जी मैं आचार्य आचार्य जी मैं

678
00:45:39,040 --> 00:45:43,040
आपकी बात ला रहा हूं। मैं बोल रहा हूं मैं ऑप्शन वो भी बोलूंगा। या तो

679
00:45:43,040 --> 00:45:47,200
वो व्यवहार का विषय बना और या फिर हम लोग ये कहेंगे कि व्यवहार का विषय नहीं बना।

680
00:45:47,200 --> 00:45:48,320
उसने कुछ ऐसा

681
00:45:48,320 --> 00:45:52,400
किसके व्यवहार का विषय किसके व्यवहार का विषय व्यवहार चेतन का होता है। जड़ का कोई व्यवहार नहीं

682
00:45:52,400 --> 00:45:56,480
होता। अरे आचार्य जी मैं कह रहा हूं धक्के का विषय बना, बल का विषय बना,

683
00:45:56,480 --> 00:46:01,040
पुश का विषय बना, क्रिया का विषय बना। यह चीज यहां से

684
00:46:01,040 --> 00:46:04,240
ये जो

685
00:46:04,240 --> 00:46:08,240
है बल बल की समीक्षा करना चाहते हो धक्के

686
00:46:08,240 --> 00:46:12,320
की ताकत की समीक्षा करना चाहते हो या जो पदार्थ इधर से उधर घूम रहा है

687
00:46:12,320 --> 00:46:16,400
उसकी समीक्षा करना चाहते हो या जो जिस पीछे से ताकत लग रही है जो जो कोई

688
00:46:16,400 --> 00:46:21,360
शक्ति है उसकी समीक्षा करना चाहते हो किसकी समीक्षा करना चाहते हैं आप

689
00:46:21,360 --> 00:46:25,440
हां ठीक है तो मैं इसको एक बार पूरा कर लूं आप बीच

690
00:46:25,440 --> 00:46:29,520
में अगर इंटरप्ट नहीं करेंगे तो हम आगे बढ़ जाएंगे मतलब हो गया है ऑलमोस्ट कंप्लीट

691
00:46:29,520 --> 00:46:33,520
तो तो क्या है कि सृष्टि रचना के लिए यदि

692
00:46:33,520 --> 00:46:37,520
हम यह मानेंगे कि वो शक्ति के रूप में कहीं पर

693
00:46:37,520 --> 00:46:41,520
छेपक बना मूव कराने के लिए पदार्थों को और

694
00:46:41,520 --> 00:46:45,600
कहीं पर नहीं बना या तो ये मानेंगे तो हमें ये मानना पड़ेगा कि वो प्रकाश के

695
00:46:45,600 --> 00:46:49,920
रास्ते में भी क्षेपक बन सकता है बाधा बन सकता है और तब वो जो है मूर्त

696
00:46:49,920 --> 00:46:54,000
रूप ले सकता है। मगर यदि हम ये कहें भाई साहब एक मिनट एक

697
00:46:54,000 --> 00:46:58,160
मिनट भाई साहब और यदि हम यह कहें कि वो अचिंत तरीके से काम करता

698
00:46:58,160 --> 00:47:02,160
है। उसने कैसे सरकाया, कैसे जड़ पदार्थों को सरकाया,

699
00:47:02,160 --> 00:47:03,360
वह मनुष्य दृष्टि से

700
00:47:03,360 --> 00:47:07,360
समझ में नहीं आ सकता है। मगर वह क्षेपक बाधक नहीं बना। तो फिर हम

701
00:47:07,360 --> 00:47:11,440
यह कह सकते हैं कि वह जो है सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी कैसे

702
00:47:11,440 --> 00:47:15,520
अपने आप को मूर्त रूप दे रहा है, उसमें हम नहीं बता सकते, पर वो दे सकता है। अगर

703
00:47:15,520 --> 00:47:20,240
ये अब बात आ जाती है एक ही कि क्या ये बात हमारे शास्त्र

704
00:47:20,240 --> 00:47:24,400
आवाज बीच-बीच में से गायब हो रही है। अब आ रही है। बीच

705
00:47:24,400 --> 00:47:28,720
में से कुछ चीजें चली जाती है ऐसे अचानक। अब अब आ रही है आवाज आपको?

706
00:47:28,720 --> 00:47:32,960
हां जी। हां जी। ठीक है। तो ये दो चीजें तो हो गई। अब हमने कहा

707
00:47:32,960 --> 00:47:37,040
कि ठीक है हम स्वतंत्र रूप से मनमानी व्याख्या नहीं कर सकते। जो हमारे

708
00:47:37,040 --> 00:47:39,520
शास्त्रों में दिया गया है हम वही मानेंगे। तो

709
00:47:39,520 --> 00:47:43,600
तर्क की दृष्टि से भले ही मूर्त रूप धारण करना सिद्ध हो

710
00:47:43,600 --> 00:47:47,760
सकता हो मगर नहीं सिद्ध करिए।

711
00:47:47,760 --> 00:47:52,160
करो हो सकता नहीं। आप सिद्ध करिए तर्क से। ऐसा हो सकता है। बताइए।

712
00:47:52,160 --> 00:47:56,240
तो भाई साहब मैं कह तो रहा हूं कि आप जब यह तय करने चलेंगे कि उसने

713
00:47:56,240 --> 00:48:00,480
सृष्टि कैसे बनाई उसी से तय हो जाएगा कि वह अवतार कैसे लेगा। अच्छा आप

714
00:48:00,480 --> 00:48:04,560
क्या सोचते हैं ईश्वर ने सृष्टि कैसे बनाई? मैंने आपकी दोनों

715
00:48:04,560 --> 00:48:08,800
बातें ले ली है। अगर वो धक्के का विषय बनेगा तो प्रकाश के मार्ग में माधक

716
00:48:08,800 --> 00:48:12,880
बन जाएगा। और अगर आप अगर अगर आप अचिंत शक्ति

717
00:48:12,880 --> 00:48:16,880
मान रहे हैं। आप ये नहीं बता पा रहे हैं वो कैसे जड़ पदार्थ जड़ पदार्थ मूव

718
00:48:16,880 --> 00:48:20,960
कैसे किया। आप अगर यह नहीं बता रहे हैं तो फिर हम यह कहेंगे कि वो अचंत शक्ति से

719
00:48:20,960 --> 00:48:26,960
ही अवतार धारण करेगा। यह तर्क की मेरी दो बातें हैं। जी

720
00:48:28,000 --> 00:48:31,360
अब आप प्रश्न क्या करना चाहते हैं वो बताइए आप।

721
00:48:31,360 --> 00:48:35,360
आपने मुझसे कहा है ना कि आप सिद्ध करिए तर्क से कैसे सिद्ध होगा? हां

722
00:48:35,360 --> 00:48:39,360
मैंने आपको कहा कि आप ये बताइए वो कैसे मूर्त रूप हो जाएगा बताइए आप। जब

723
00:48:39,360 --> 00:48:43,520
मूर्त रूप होगा मूर्त रूप होगा तो परिवर्तनशील होगा। कोई

724
00:48:43,520 --> 00:48:47,680
ऐसी वस्तु जो परिवर्तनशील ना हो। मैं वही तो बता रहा हूं।

725
00:48:47,680 --> 00:48:51,840
मैं वही तो बता रहा हूं। मैं वही बता रहा हूं आपको कि जब अगर हम

726
00:48:51,840 --> 00:48:55,840
यह मानते हैं कि वो परिवर्तनशील है जो मूर्त रूप है तो हमें ये भी मानना पड़ेगा

727
00:48:55,840 --> 00:49:00,000
जो पृथ्वी को धक्का दे रहा है जो सृष्टि रचना कर रहा है वो भी परिवर्तनशील है क्योंकि

728
00:49:00,000 --> 00:49:04,160
वो कहीं पर ज्यादा है कहीं पर कम है। ये तो आपने

729
00:49:04,160 --> 00:49:08,480
फिर आप इस विषय को ना उलझा ही रहे हो। वैसे व्यर्थ में इसका कोई लाभ नहीं है।

730
00:49:08,480 --> 00:49:13,040
और इसीलिए मैं इस विषय पे चर्चा नहीं करता हूं कि ये वाद विवाद का विषय तो वैसे है नहीं।

731
00:49:13,040 --> 00:49:17,200
आप मान लो उसको किसी मूर्ति के रूप में मान लो तो आपकी इच्छा है भाई इसमें कोई आपको

732
00:49:17,200 --> 00:49:21,200
आकर रोकेगा थोड़ी यहां भगवान कहां किसी को कहता है ये तो हम में और

733
00:49:21,200 --> 00:49:25,200
आप में असमानता हो रही है ना बेचारी अब भगवान बैठा होगा ऊपर आनंद

734
00:49:25,200 --> 00:49:29,200
में देख रहा होगा कि ये देखो लगे हुए हैं दोनों ना वास्तव में ना वो जानता है ना

735
00:49:29,200 --> 00:49:30,000
वो जानता है

736
00:49:30,000 --> 00:49:33,440
तो ये बेटे साक्षात्कार का विषय है ये इस तरह की चर्चा का विषय नहीं है

737
00:49:33,440 --> 00:49:37,520
आप उसे किसी रूप का मानो कि जो उसका आकार होता है आकृति

738
00:49:37,520 --> 00:49:41,520
संभव नहीं है बस इतनी सी ही बात है और वो संभव क्यों नहीं

739
00:49:41,520 --> 00:49:45,840
है क्योंकि आकृति कोई भी हो वो प्रकृति

740
00:49:45,840 --> 00:49:49,920
है आकृति किसी भी चीज की है ना प्रकृति के परमाणु हो कुछ भी हो

741
00:49:49,920 --> 00:49:54,000
वो आकृति है और आकृति है तो वो प्राकृतिक है ईश्वर

742
00:49:54,000 --> 00:49:58,000
प्राकृतिक नहीं है क्योंकि प्रकृति नष्ट हो जाती है तो ईश्वर भी नष्ट हो जाएगा

743
00:49:58,000 --> 00:50:02,080
वो नष्ट नहीं होता है क्योंकि वो कोई किसी प्राकृतिक परमाणु से नहीं बना

744
00:50:02,080 --> 00:50:06,080
है और जिस शक्ति के आक्षेप की आप बात करते हो आप आक्षेप का मतलब

745
00:50:06,080 --> 00:50:10,400
किसी पुरुष शक्ति की बात कर रहे हो कि जैसे इस हाथ ने इस हाथ को धक्का

746
00:50:10,400 --> 00:50:14,560
मारा तो ये भी एक हाथ है यह भी एक हाथ है। आप यह कह रहे हो

747
00:50:14,560 --> 00:50:17,520
इस धक्के में अंतर

748
00:50:17,520 --> 00:50:21,760
से ईश्वर धक्का नहीं करता जैसे आप कह रहे हो जैसे जैसे विद्युत ऊर्जा निराकार

749
00:50:21,760 --> 00:50:25,840
होते हुए भी कहीं पर धक्के का विषय बनती है निराकार होते हुए

750
00:50:25,840 --> 00:50:29,840
वहां वो हाथ नहीं होता है पर विद्युत ऊर्जा ऐसा प्रभाव उत्पन्न करती है वो केवल

751
00:50:29,840 --> 00:50:33,920
ऊर्जा है और उसमें भी आप ध्यान रखना जो परमात्मा है

752
00:50:33,920 --> 00:50:38,000
चेतन ऊर्जा है [गला साफ़ करने की आवाज़] ये अंतर समझो आप मैं ये कह रहा हूं एक बात

753
00:50:38,000 --> 00:50:42,000
मैं दो मिनट की कह दूं फिर आप उसके बाद बात कह देना एक तो ऊर्जा

754
00:50:42,000 --> 00:50:46,000
होती है जड़ और एक ऊर्जा होती है चेतन। [गला साफ़ करने की आवाज़]

755
00:50:46,000 --> 00:50:48,560
जो जड़ ऊर्जा है वो विद्युत है

756
00:50:48,560 --> 00:50:52,640
और प्रकार की जो संसार की शक्तियां है बारूद की शक्ति कह लो आप गम विस्फोट होता

757
00:50:52,640 --> 00:50:56,640
है जो ये सारी शक्तियां जड़ शक्तियां वायु की शक्ति कह लो अग्नि की

758
00:50:56,640 --> 00:51:01,520
शक्ति कह लो ये जड़ शक्ति है और एक होती है चेतन शक्ति

759
00:51:01,520 --> 00:51:05,520
जो चेतन शक्ति है वो निर्णय करती है

760
00:51:05,520 --> 00:51:09,760
जो जड़ शक्ति है वो निर्णय नहीं करती जैसे आपने बिजली

761
00:51:09,760 --> 00:51:13,840
को छुआ जो स्वामी छुए सन्यासी छुए योगी छुए धनी छुए

762
00:51:13,840 --> 00:51:17,840
करण खाएगा और जब बिजली यह नहीं देखेगी कि इसको

763
00:51:17,840 --> 00:51:22,000
करंट देना है कि नहीं देना उसको देना ही है। बम गिरेगा तो

764
00:51:22,000 --> 00:51:26,000
लोगों को मरना ही है। योगी हो, सन्यासी हो, ध्यानी हो सब मरेंगे। लेकिन

765
00:51:26,000 --> 00:51:30,080
जब आप और हम ये फैसला करते हैं कि मुझे इसको मारना है और वो हाथ जोड़ के खड़ा हो

766
00:51:30,080 --> 00:51:34,080
जाए तो हम कहते हैं नहीं छोड़ो। अभी जब इसने हाथ जोड़ दिए तो तो यहां जो ईश्वर की शक्ति

767
00:51:34,080 --> 00:51:38,240
है आप उसे उस तरह की शक्ति भी ना समझे जो आप कुदरत में शक्तियां देखते हैं प्रकृति

768
00:51:38,240 --> 00:51:42,400
में। चेतन शक्ति है जो निर्णय करती है जिसमें साथ

769
00:51:42,400 --> 00:51:46,480
में ज्ञान जुड़ा हुआ है जब उसमें ज्ञान जुड़ गया तो फिर उसको

770
00:51:46,480 --> 00:51:50,560
यह पता है कि किस चीज का क्या करना है कैसे करना है आप और मैं उसको

771
00:51:50,560 --> 00:51:54,560
नहीं बनाएंगे यहां पे आपने बिल्कुल सही बात बोली कि किसको

772
00:51:54,560 --> 00:51:58,640
झटका मारना है किसको नहीं मारना है ये वो तय कर सकती है कि फिर आप कह रहे हो किसको नहीं

773
00:51:58,640 --> 00:52:03,040
मारना है मुझे समझाओ आप फिर आप इसमें दो भेद पैदा कर देते हो झटका

774
00:52:03,040 --> 00:52:03,600
मारना है

775
00:52:03,600 --> 00:52:07,600
कि नहीं मारना है ऐसा क्या ये विषय कैसे हो गया उसने

776
00:52:07,600 --> 00:52:11,680
इस संसार का नाम है जगत। जगत का मतलब है जो

777
00:52:11,680 --> 00:52:15,840
लगातार गतिशील है और परिवर्तनशील है। अब कम है ज्यादा

778
00:52:15,840 --> 00:52:19,920
है वो उसका अपना पृथ्वी की गति और तरह की है। मनुष्य की गति और तरह की

779
00:52:19,920 --> 00:52:24,160
है। ठीक है। ठीक है वो ये तय करता है। ठीक है वो ये तय करता है कम अथवा ज्यादा

780
00:52:24,160 --> 00:52:28,400
किसको मारना है। ये तो तय करता है। ये तो तय करता है।

781
00:52:28,400 --> 00:52:32,400
कैसे? किसको तेज किसको तेज आपने कहा कि जो विद्युत होती

782
00:52:32,400 --> 00:52:36,800
है वो यह तय नहीं कर सकती कि मुझे किसको झटका मारना है। ना

783
00:52:36,800 --> 00:52:41,120
विद्युत इसलिए नहीं तय कर सकती क्योंकि वो जड़ है। भाई साहब मेरे को बोलने

784
00:52:41,120 --> 00:52:45,280
दीजिए। मुझे बोलने दीजिए भाई साहब। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो क्योंकि वो जड़ है।

785
00:52:45,280 --> 00:52:49,360
अब जो ईश्वर की शक्ति है वो जड़ शक्ति नहीं है। वो चेतन

786
00:52:49,360 --> 00:52:53,440
शक्ति है। वो तय करती है कि मुझे कहां कम अथवा कहां ज्यादा रूप में

787
00:52:53,440 --> 00:52:57,680
कार्य करना है। ठीक है? उसका स्वाभाविक ज्ञान है। बिल्कुल ठीक है। हां। तो

788
00:52:57,680 --> 00:53:01,680
इस रूप में ईश्वर एक रस होते हुए भी अपनी शक्ति के रूप में

789
00:53:01,680 --> 00:53:06,560
कहीं कम कहीं ज्यादा हो रहा है। किस रूप में? सोते हुए

790
00:53:06,560 --> 00:53:10,960
नहीं होते हुए

791
00:53:10,960 --> 00:53:14,960
होते हुए अपने एक रस रूप में होते हुए भी फिर कहीं कम

792
00:53:14,960 --> 00:53:19,120
कहीं ज्यादा रूप में शक्ति के रूप में वो आ रहा है। तो

793
00:53:19,120 --> 00:53:23,280
मेरी बात सुनो वो तो एक शक्ति है। वो जब आप उसे कह रहे हैं एक रस। एक रस

794
00:53:23,280 --> 00:53:27,760
का मतलब है जिसके स्वरूप में कभी परिवर्तन नहीं होता। बिल्कुल बढ़िया।

795
00:53:27,760 --> 00:53:32,000
ठीक है। एक रस इसको कहते हैं जिसके स्वरूप में कभी परिवर्तन ना हो। तो परमात्मा

796
00:53:32,000 --> 00:53:36,000
को एक रस कहते हैं और उसके रूप का परिवर्तन हम लेते हैं

797
00:53:36,000 --> 00:53:40,080
मनुष्य के हिसाब से ऐसा बदलेगा ऐसा बदलेगा क्योंकि हमारी नेचर हम उसी तरह

798
00:53:40,080 --> 00:53:44,320
से हमारी ग्रोथ हुई है ना तो हम उसी तरह के परिवर्तनों को परिवर्तन मानते हैं।

799
00:53:44,320 --> 00:53:48,640
कुछ परिवर्तन ऐसे भी है जो हमारी पकड़ से ही बाहर है। तो उनको ऐसा थोड़ी हम परिवर्तन नहीं मानेंगे।

800
00:53:48,640 --> 00:53:52,640
तो परिवर्तन तो मानने ही पड़ेंगे किसी ना किसी को। मेरा कहने का मतलब यह है कि

801
00:53:52,640 --> 00:53:56,640
ईश्वर जब सब जगह एक समान है तो सृष्टि करने के

802
00:53:56,640 --> 00:54:00,960
समय वो कहीं पर जो है शक्ति बन के निराकार

803
00:54:00,960 --> 00:54:05,200
शक्ति के रूप में कार्य करने वाला होता है और कहीं नहीं होता है तो ये ईश्वर

804
00:54:05,200 --> 00:54:09,200
ने अपने आप को परिवर्तित करते हुए कहीं ना होना कैसे परिवर्तित कर

805
00:54:09,200 --> 00:54:13,200
दिया बताओ कैसे परिवर्तित कर दिया सबने पांच

806
00:54:13,200 --> 00:54:17,440
किलो का पांच किलो का वजन उठाना आपने 5 किलो की ताकत लगाई

807
00:54:17,440 --> 00:54:21,440
आपने 10 ही किलो का वजन उठाना आपने 10 किलो की शक्ति लगाई आपकी शक्ति

808
00:54:21,440 --> 00:54:25,440
है। आप जितनी चाहे इस्तेमाल करें, कम करें। उसमें भेद कहां से हो गया? शक्ति के

809
00:54:25,440 --> 00:54:26,000
रूप में भेद

810
00:54:26,000 --> 00:54:30,160
हुआ ना? नहीं। तो शक्ति का भेद हो तो हमने देखना है। किस में ज्यादा

811
00:54:30,160 --> 00:54:34,160
लगानी है, किस में कम लगानी है। इसमें क्या हुआ? तो भेद हुआ ना शक्ति

812
00:54:34,160 --> 00:54:38,240
के रूप में। पदार्थों के कारण हुआ। उसकी मूलभूत शक्ति का उसके स्वरूप

813
00:54:38,240 --> 00:54:42,240
में अंतर थोड़ी आ गया। मैं मैं नहीं कह रहा उसके स्वरूप में अंतर हुआ।

814
00:54:42,240 --> 00:54:46,320
शक्ति के रूप में भेद हुआ ना। वो तो चलो उसमें भेद में क्या

815
00:54:46,320 --> 00:54:50,400
अंतर है? अगर मान लो भेद हुआ। शक्ति रूप में भेद यानी

816
00:54:50,400 --> 00:54:54,640
कि ईश्वर सर्वत्र एक रस होते हुए भी कहीं

817
00:54:54,640 --> 00:54:58,640
पर कम कहीं पर ज्यादा रूप में क्रियान्वित हो सकता है। वो

818
00:54:58,640 --> 00:54:59,140
ठीक

819
00:54:58,880 --> 00:55:02,880
बात है। वो देखो जड़ जगत में वो अलग तरह से प्रकट करता है अपने आप को और

820
00:55:02,880 --> 00:55:06,880
चेतन जगत में वो अलग तरह से प्रकट करता है। बहुत बढ़िया। तो इसका मतलब

821
00:55:06,880 --> 00:55:11,120
इसका मतलब इसका मतलब जिस प्रकार से वो जड़ पदार्थों

822
00:55:11,120 --> 00:55:15,120
के लिए धक्के इत्यादि का विषय बन रहा है उसी प्रकार से वो प्रकाश के

823
00:55:15,120 --> 00:55:17,920
मार्ग में भी धक्के का या टकराने का विषय बन

824
00:55:17,920 --> 00:55:22,240
सकता है। निराकार रहते हुए निराकार

825
00:55:22,240 --> 00:55:26,240
जैसे निराकार जैसे निराकार रहते हुए वो पृथ्वी को सरका रहा

826
00:55:26,240 --> 00:55:31,520
है वैसे ही निराकार रहते हुए प्रकाश के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर देगा।

827
00:55:31,520 --> 00:55:35,680
तो आप अपने मन से ही कह रहे हो कि इसके लिए ना कोई सूत्र बताओ। आप अपनी

828
00:55:35,680 --> 00:55:39,840
मर्जी से बात मत करो। आप ना कोई सूत्र बताओ। कोई वेद का मंत्र बताओ। अब

829
00:55:39,840 --> 00:55:44,000
आ जाते हैं। इस तरह से बताओ। फिर चर्चा मैं समझ गया

830
00:55:44,000 --> 00:55:48,080
कि अब जो है तर्क वाली जो बात है जो आर्य समाज की ओर से

831
00:55:48,080 --> 00:55:52,800
जो एक तर्क आपने रखा कि सर्वत्र व्याप्त होते हुए वो आंखों का विषय नहीं बन सकता।

832
00:55:52,800 --> 00:55:56,800
ये वाली बात तो अब उतनी ज्यादा हम मतलब हमने काफी देर चर्चा कर

833
00:55:56,800 --> 00:56:01,200
ली। अब हम आते हैं इस पे कि क्या शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि वो मूर्त

834
00:56:01,200 --> 00:56:05,360
रूप धारण कर सकता है। अब हम इस पे आते हैं। है ना? कैसे कैसे

835
00:56:05,360 --> 00:56:09,520
लिखा है क्या शास्त्रों में यह बात लिखी है कि वो मूर्त

836
00:56:09,520 --> 00:56:13,920
रूप धारण कर सकता है इस रूप में आते हैं हम मेरी आवाज सबको आ रही है क्लियर

837
00:56:13,920 --> 00:56:17,920
इंटरेस्ट हो रही है बीच-बीच में कट जाती है मेरी आवाज सबको आ रही है

838
00:56:17,920 --> 00:56:22,460
क्या जरा कमेंट कर दीजिए

839
00:56:22,460 --> 00:56:26,240
[हंसी]

840
00:56:26,240 --> 00:56:31,440
हां मेरी आवाज सबको आ रही है ये एक कमेंट आया है

841
00:56:31,440 --> 00:56:35,600
ओके सभी आपको आ रही है संजीव जी हां हां जी हां बिलकुल बिलकुल

842
00:56:35,600 --> 00:56:39,680
बिलकुल आ रही है जी जी ठीक है अब हम लोग शास्त्रों की बात करते हैं कि शास्त्र

843
00:56:39,680 --> 00:56:43,680
में कहां लिखा है तो जैसे शास्त्र में कई

844
00:56:43,680 --> 00:56:46,240
जगह लिखा है या कई जगह नहीं

845
00:56:46,240 --> 00:56:50,560
लिखा है इस पर जाने से पहले मैं एक बात पूछना चाहूंगा कि आर्य समाज

846
00:56:50,560 --> 00:56:54,720
के पास ये वेद कैसे आए वेद

847
00:56:54,720 --> 00:56:59,120
के जो आर्य समाज के पास वेद कैसे आए जी

848
00:56:59,120 --> 00:57:03,280
हां असल में क्या था जब ऋषि दयानंद सरस्वती यहां घूमे

849
00:57:03,280 --> 00:57:07,920
गए दाएं बाएं जहां भी काशी आदि तो वहां पूर्ण रूप में उनको वो चीजें प्राप्त नहीं हुई

850
00:57:07,920 --> 00:57:11,360
तो उन्होंने फिर ये जर्मनी से मंगवाए

851
00:57:11,360 --> 00:57:15,360
जर्मनी से तो वहां से मंगवाने के बाद फिर उनको देखा सारा

852
00:57:15,360 --> 00:57:19,440
करा तो वहां से मंगवाने पड़े अच्छा अच्छा

853
00:57:19,440 --> 00:57:23,600
हां जर्मनी से मंगवा तो जैसे ये कैसे तय किया मतलब

854
00:57:23,600 --> 00:57:27,840
जर्मनी में जिससे उन्होंने वेद लिए हैं उन्होंने जो वेदों की व्याख्या

855
00:57:27,840 --> 00:57:31,920
की थी क्या वो व्याख्या स्वीकार है उन्हें दयानंद

856
00:57:31,920 --> 00:57:34,480
किनोंने की थी व्याख्या

857
00:57:34,480 --> 00:57:38,560
उन्होंने किससे वेद लिए थे जर्मनी में? जर्मनी में कोई व्यक्ति थोड़ी

858
00:57:38,560 --> 00:57:42,640
जर्मन से उन्होंने मंगवाए थे। भाई जर्मन में उनको पता चला कि महा वेद रखे हुए

859
00:57:42,640 --> 00:57:46,640
हैं। उन्होंने जर्मन से मंगवा लिया लाइब्रेरी से मूल संगीता पाठ होता है। व्याख्या तो नहीं होती।

860
00:57:46,640 --> 00:57:50,720
आप समझ रहे मेरी बात? जो वेद है वो संगीता पाठ है। संगीता

861
00:57:50,720 --> 00:57:55,120
पाठ है। जी जी उन्होंने किया

862
00:57:55,120 --> 00:57:59,120
ये वेद है। अच्छा अच्छा हां उन्होंने तय कैसे किया? अच्छा देखो

863
00:57:59,120 --> 00:58:03,280
ये है कि वो हम इसको तय नहीं करते कि वेद है।

864
00:58:03,280 --> 00:58:07,520
वेद की रचना छंदोबद्ध रचना है। उसके अंदर स्वर

865
00:58:07,520 --> 00:58:11,600
है, ऋषि है, देवता है और हर चीज का एक हिसाब

866
00:58:11,600 --> 00:58:15,680
किताब है। एक प्रकार एक रचना है। तो जब हम ये देखते हैं कि सारी

867
00:58:15,680 --> 00:58:19,920
ठीक है तो भी हमें पता चल जाता है कि वेद का मंत्र है। ऐसा श्लोकों

868
00:58:19,920 --> 00:58:23,920
में आदि दूसरी चीजों में नहीं होता है। उसमें घटोरीत बढ़ोतरी हो सकती है। इसमें नहीं हो सकती [गला साफ़ करने की आवाज़]

869
00:58:23,920 --> 00:58:28,400
क्योंकि बड़ी एक जटिल रचना है। तो यह जो वेदों को पहचानने

870
00:58:28,400 --> 00:58:32,640
की व्याख्या है यह दयानंद जी के पास कैसे आई? छह ग्रंथ

871
00:58:32,640 --> 00:58:36,960
पढ़ने पड़ते हैं बेटे। वेदों के पढ़ने से पहले छह ग्रंथ होते हैं। षडंग

872
00:58:36,960 --> 00:58:41,600
कहते हैं उनको निरुक्त कल्प छंद ज्योतिष आदि ये छे होते हैं।

873
00:58:41,600 --> 00:58:45,920
छह ग्रंथों को पढ़ने से पता चलता है कि कौन किसको हम मंत्र

874
00:58:45,920 --> 00:58:48,240
मंत्र संज्ञा किसकी है? किसको

875
00:58:48,240 --> 00:58:52,320
मंत्र कहा जाएगा? क्या तुलसीदास की चौपाई में मंत्र हो सकते हैं।

876
00:58:52,320 --> 00:58:57,520
क्या रामायण में मंत्र है? क्या महाभारत में मंत्र है? क्या पुराणों में मंत्र है

877
00:58:57,520 --> 00:59:01,680
ये सब या वेदों में ही मंत्र है तो वहां वेद में ही मंत्र

878
00:59:01,680 --> 00:59:05,760
है। पुराण, गीता, रामायण, महाभारत इन सब में श्लोक है।

879
00:59:05,760 --> 00:59:09,760
मंत्र नहीं है क्योंकि मंत्र रचना का जो मापदंड है वो अलग है

880
00:59:09,760 --> 00:59:14,320
और जो श्लोक रचना का मापदंड है वो अलग है। तो ये जो

881
00:59:14,320 --> 00:59:18,400
जो षडंग आपने बताए ये उनके पास कहां से आए?

882
00:59:18,400 --> 00:59:22,400
दयानंद जी के पास। ये तो बेटे हां बेटे ये तो भारतीय शास्त्र परंपरा में शुरू से

883
00:59:22,400 --> 00:59:26,480
है मतलब उनके पीछे उनके पीछे उनको

884
00:59:26,480 --> 00:59:30,560
किसी ने दिए होंगे ना उनके नहीं नहीं ये तो जैसे पढ़ना अब आप कहोगे जी क

885
00:59:30,560 --> 00:59:34,640
ख ग कहां से लाए हो ये किसने दिया है स्वर कहां से आए हैं

886
00:59:34,640 --> 00:59:39,280
ये तो जब से भाषा का विकास हुआ अब ये भाषा का विषय हो गया अब अलग से

887
00:59:39,280 --> 00:59:43,280
भाषा का जैसे विकास होता है ये उस तरह का विषय है ठीक है ना

888
00:59:43,280 --> 00:59:47,440
कहां से नहीं आती होती है चीजें होती है ऐसा है जैसे कि

889
00:59:47,440 --> 00:59:51,440
जो मुंडकोपनिषद उसमें एक एक से ले चार के

890
00:59:51,440 --> 00:59:55,760
बीच में ऋषि गण ये बता रहे हैं कि उन्होंने जो ब्रह्म विद्या है वो कहां से ली

891
00:59:55,760 --> 00:59:59,840
और आचार्य या आचार्य यास्क भी बता रहे हैं कि मैंने

892
00:59:59,840 --> 01:00:03,600
जो है जो जो अर्थ किया है इस ग्रंथ का वो

893
01:00:03,600 --> 01:00:08,080
श्रुति से और परंपरा से तर्क और युक्ति के प्रमाण

894
01:00:08,080 --> 01:00:12,320
परंपरा और तर्क से किया है। तो कहने का अर्थ यह है कि कहने

895
01:00:12,320 --> 01:00:16,640
का अर्थ यह है कि हम जिस भी किताब को वेद मानेंगे उसके

896
01:00:16,640 --> 01:00:20,800
लिए हमें किसी गुरु पर विश्वास होना चाहिए कि इस

897
01:00:20,800 --> 01:00:24,800
ये कह रहा है एक एक मिनट अच्छा जी एक मिनट तो अगर हमने

898
01:00:24,800 --> 01:00:28,880
जैसे किसी पुराने जैसे वेद आज तो उत्पन्न हुए नहीं है। वेद

899
01:00:28,880 --> 01:00:33,040
तो आज से हजारों वर्ष लाखों साल पहले आप जैसे आर्य समाज

900
01:00:33,040 --> 01:00:37,040
का मानना होगा कि शायद 20 हजार वर्ष पहले कितने हजार वर्ष पहले मानता है

901
01:00:37,040 --> 01:00:41,040
आर्य समाज जब से जब से मनुष्य है तब से वेद है ठीक

902
01:00:41,040 --> 01:00:45,280
है तो जब से मनुष्य है तो काफी प्राचीन हो गया फिर वहां से हमारे

903
01:00:45,280 --> 01:00:49,360
पास तक वेद आ रहे हैं तो वेद हमने वेद या वेदों को समझने के

904
01:00:49,360 --> 01:00:53,520
लिए षडंग ले लिए तो वो षडंग हमने किसी से लिए तो क्या हमें

905
01:00:53,520 --> 01:00:57,600
उस पर भरोसा है जिसने हमें षडंग दिए हैं अथवा नहीं है यह

906
01:00:57,600 --> 01:01:01,600
बात हां हां हां बिल्कुल है ये तो [गला साफ़ करने की आवाज़] ये ना भाषा

907
01:01:01,600 --> 01:01:05,840
के टूल्स है जो चलते आते हैं हमेशा से जैसे किससे लिए किससे

908
01:01:05,840 --> 01:01:09,840
लिए थे लेना नहीं है तो भाषागत होते ही है जैसे आपने

909
01:01:09,840 --> 01:01:13,920
कहा सूर्य जमा उदय तो सूर्योदय हो गया ये संधि हो गई यहां पे

910
01:01:13,920 --> 01:01:18,000
अब आप कहोगे जी ये कहां से आई तो ये भाषा का विषय ही आना कहां से है उसमें

911
01:01:18,000 --> 01:01:18,800
वो तो वो

912
01:01:18,800 --> 01:01:22,880
तो पठन पाठन की परंपरा से है जो पठन पाठन की परंपरा

913
01:01:22,880 --> 01:01:27,040
है उसमें अब आप कहो क ख ग कहां से आए क ख

914
01:01:27,040 --> 01:01:31,280
ग कहां से आए जो परंपरा आप कह रहे हो वही परंपरा

915
01:01:31,280 --> 01:01:35,680
है। वही परंपरा मैं पूछ रहा हूं कि वो परंपरा क्या है? क्योंकि ऐसा है

916
01:01:35,680 --> 01:01:39,680
कि कई ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने वेदों के ही अर्थ में मूर्ति

917
01:01:39,680 --> 01:01:43,760
पूजा को स्वीकार किया है और उनकी परंपरा है प्राचीनता से

918
01:01:43,760 --> 01:01:48,000
प्राचीनतम से लेकर के आज तक की परंतु

919
01:01:48,000 --> 01:01:52,000
नहीं किसने किया है? आप ना ऐसे बातें ना करें कि उसने किया है।

920
01:01:52,000 --> 01:01:56,080
आप मुझे व्यक्ति का नाम मंत्र संख्या मंत्र का अर्थ ये बताएं

921
01:01:56,080 --> 01:02:00,080
बेटे। मैं बात तो आप कुछ भी कह देंगे तो कुछ ही परंपरा शुरू आप

922
01:02:00,080 --> 01:02:04,160
मुझे युक्ति बताओ फिर मैं अपना वेद उठाऊंगा और उसी में

923
01:02:04,160 --> 01:02:08,160
से आपको तुरंत ही अर्थ बता दूंगा आपको बहुत देर नहीं लगेगी उसमें मैं

924
01:02:08,160 --> 01:02:12,320
मेरे पास चारों वेद है भाष्य के सहित है आप अपने तरफ से ऐसे कुछ कुछ

925
01:02:12,320 --> 01:02:16,800
बना के ना बीच में रखें इसमें ठीक ठीक है मैं युक्ति बता रहा हूं कि

926
01:02:16,800 --> 01:02:17,520
दयानंद

927
01:02:17,520 --> 01:02:21,600
जी ने किसी व्यक्ति से वेद लिए तो क्या किसी से भी

928
01:02:21,600 --> 01:02:25,600
वेद लेने को हम ये मान ले कि वेद है आजकल बच्चे इंटरनेट से वेद पढ़

929
01:02:25,600 --> 01:02:29,760
रहे हैं इंटरनेट से डाउनलोड करके तो ऐसे में इंटरनेट पर कोई भी कोई भी मिलावट

930
01:02:29,760 --> 01:02:33,840
कर देगा कुछ भी वेद के नाम से दे देगा तो हम लोग ये प्रमाणित कैसे कर हम

931
01:02:33,840 --> 01:02:37,920
लोग ये प्रमाणित कैसे कर रहे हैं कि वो वेद ही है जो हम ले रहे हैं वेदों

932
01:02:37,920 --> 01:02:41,920
के नाम पे अगर हम कहें कि षडांग के आधार पे हमने प्रमाणित किया तो

933
01:02:41,920 --> 01:02:44,400
हमें ये देखना होगा वो षडांग हमें किसने दिए

934
01:02:44,400 --> 01:02:48,960
अगर हमने कहा कि षडांग के आधार पर प्रमाणित

935
01:02:48,960 --> 01:02:53,280
है ना एक मिनट एक मिनट आचार्य जी एक मिनट तो अगर हम कहें कि षडांग

936
01:02:53,280 --> 01:02:57,280
के आधार पे हमने प्रमाणित किया यहां समस्या जो है हां आप एक

937
01:02:57,280 --> 01:03:01,680
ना उसको नाप रहे हो किसी सोफा सेट को फीते से।

938
01:03:01,680 --> 01:03:06,080
अब आप कह रहे हो कि सोफा सेट और फीता और ये फीता किसने दिया?

939
01:03:06,080 --> 01:03:10,240
ऐसे ही कह रहे हो ना आप फीता किसने दिया? कैसे हम माने कि फीता है।

940
01:03:10,240 --> 01:03:12,880
कैसे माने इसका ये पैरामीटर ठीक है।

941
01:03:12,880 --> 01:03:17,680
आपसे मैं पूछूं कि आपको वेद किसने दिए? तो आप कहोगे ना दयानंद जी ने दिए।

942
01:03:17,680 --> 01:03:21,920
नहीं दयानंद जी हां ठीक है। उन्होंने मंगाए और हम उनसे पढ़ रहे हैं। बिल्कुल ठीक है। हां।

943
01:03:21,920 --> 01:03:26,000
अब दयानंद जी से लिए हुए वेद आप इसलिए मानते हो क्योंकि आपको दयानंद जी

944
01:03:26,000 --> 01:03:30,080
पर विश्वास है। चलो कह भी सकते हो लेकिन उसके

945
01:03:30,080 --> 01:03:32,880
अलावा उन्होंने ऐसी बहुत सारी चीजें दी है कि हम परीक्षण भी कर सकते

946
01:03:32,880 --> 01:03:36,960
हैं। ऐसी बात नहीं है कि उन विश्वास है। उन्होंने हमें परीक्षण करने

947
01:03:36,960 --> 01:03:41,200
के तरीके बता परीक्षण कर लो। तो जब परीक्षण कर लोगे तो जान लेना।

948
01:03:41,200 --> 01:03:45,440
और जो उन्होंने मंगाए वो मूल संगीिता थी। मूल संगीिता ठीक है।

949
01:03:45,440 --> 01:03:49,440
मूल जैसे मैंने बताया कि हर मंत्र का ऋषि होता है। हर मंत्र का देवता

950
01:03:49,440 --> 01:03:53,200
होता है। हर मंत्र का छंद होता है। हर मंत्र के स्वर होते

951
01:03:53,200 --> 01:03:57,280
हैं। ये जो ये जो परीक्षण की विधि है ना यह भी जिससे ली होगी उस

952
01:03:57,280 --> 01:04:01,440
पर आपको विश्वास होना चाहिए। ये जो आप

953
01:04:01,440 --> 01:04:05,440
मेरी बात समझो अब आपने कहा जी बच्चे ने अ लिखना सीखा तो

954
01:04:05,440 --> 01:04:09,680
कहते हैं किसी पे ये अ कहां से आया और किसी पे इस पर विश्वास होना चाहिए।

955
01:04:09,680 --> 01:04:14,240
अब एक बात बताओ। हमने अ लिखा मैं बता रहा हूं। हमने अ लिखा

956
01:04:14,240 --> 01:04:18,320
और अंग्रेजों ने ए लिखा। ठीक है? अब आप कहेंगे ये तो भेद हो

957
01:04:18,320 --> 01:04:22,400
गया दोनों में। वो कह रहे हैं ए माने ए और हम कह रहे आ माने आ दूसरी

958
01:04:22,400 --> 01:04:26,480
भाषा में उसकी लिपि दूसरी हो जाएगी। तो आप इतना मानो मोटे रूप

959
01:04:26,480 --> 01:04:30,640
में कि दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत है। उसमें भी

960
01:04:30,640 --> 01:04:34,800
सबसे प्राचीन वैदिक संस्कृत है। एक लौकिक संस्कृत एक वैदिक

961
01:04:34,800 --> 01:04:39,200
संस्कृत मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं कि आ का अर्थ क्या है और उपयोग

962
01:04:39,200 --> 01:04:43,280
क्या है। इस विषय में जो हमारा निर्णायक स्त्रोत

963
01:04:43,280 --> 01:04:46,000
है वो हमारे सामने व्यवहारिक है। जैसे कि

964
01:04:46,000 --> 01:04:50,000
हम कहें कि मुझे मालूम है कि अ से अनार होता है। तो इस विषय

965
01:04:50,000 --> 01:04:54,000
में जो मेरा आपको मालूम है अ से अनार होता है। आपको कैसे मालूम है अ से अनार होता

966
01:04:54,000 --> 01:04:58,160
है। मैं मुझे मुझे बोलने तो दीजिए भाई साहब। आलू

967
01:04:58,160 --> 01:05:02,320
भी हो सकता है। मैं बता रहा हूं। मैंने ये नहीं कहा कि आलू नहीं होता

968
01:05:02,320 --> 01:05:06,400
है। मैंने ये नहीं कहा। मैंने कहा कि आ का अर्थ और आ का

969
01:05:06,400 --> 01:05:10,480
उपयोग यह मुझे मालूम है कि भैया इसका निर्णायक कौन है और

970
01:05:10,480 --> 01:05:15,040
क्या निर्णय होगा और अगर मैं आ का यह अर्थ लिखूंगा तो मैं पास हो जाऊंगा।

971
01:05:15,040 --> 01:05:16,080
ठीक है? मगर

972
01:05:16,080 --> 01:05:20,160
जो वेद इत्यादि है वो अती्द्रिय विषय है। अती्द्रिय विषय

973
01:05:20,160 --> 01:05:24,400
जैसे गायत्री मंत्र से मुक्ति मिलेगी या नहीं मिलेगी? आवाज आ रही है मेरी?

974
01:05:24,400 --> 01:05:28,560
बीच में चली जाती है? हां आवाज आ रही है ना? तो जो

975
01:05:28,560 --> 01:05:32,800
वेद इत्यादि कुल मिलाकर के जो धर्म है वो अती्द्रिय विषय है। जैसे गायत्री

976
01:05:32,800 --> 01:05:36,960
मंत्र से मुक्ति मिलेगी कि नहीं मिलेगी इसका निर्णय मैं यहां पर व्यवहारिक

977
01:05:36,960 --> 01:05:40,960
जगत में नहीं कर सकता हूं। तो इसमें मुझे विश्वास करना होगा कि जिससे

978
01:05:40,960 --> 01:05:45,040
मैं गायत्री मंत्र ले रहा हूं उस पर मुझे विश्वास है कि हां ये

979
01:05:45,040 --> 01:05:49,120
गायत्री मंत्र के नाम पर मुझे वही गायत्री मंत्र दे रहा है जो आज से कई वर्षों

980
01:05:49,120 --> 01:05:52,480
पूर्व हमारे ऋषियों ने जिसका दर्शन किया था।

981
01:05:52,480 --> 01:05:56,560
ठीक है? आप कैसे निर्णय करोगे? जब आपने किसी से लिया आप कैसे

982
01:05:56,560 --> 01:06:00,560
निर्णय करोगे कि वर्ष पुराना वही है? वही तो मैं कह रहा हूं कि वहां

983
01:06:00,560 --> 01:06:04,720
पर आपके पास भी जो कुछ भी है जिन जिन चीजों को आप आधार बना रहे हो उनका

984
01:06:04,720 --> 01:06:09,360
भी आधार क्या है? चीजों को आप आधार मान के चल रहे हो। उनका भी आधार

985
01:06:09,360 --> 01:06:13,440
मैं बता रहा हूं ना मैं आपको बता रहा हूं। इसीलिए मैंने जिससे वो गायत्री मंत्र

986
01:06:13,440 --> 01:06:17,440
लिया है वो वेद मंत्र लिए हैं या उसको पहचानने की जो विधि

987
01:06:17,440 --> 01:06:21,520
है जो आपने बताई षडांग वगैरह उस वो जिससे मैंने लिए है उस पर

988
01:06:21,520 --> 01:06:25,520
मैं विश्वास प्रकट करूंगा। अगर मैंने कहा कि मुझे विश्वास थोड़ा सा धीरे

989
01:06:25,520 --> 01:06:29,520
बोलोगे तो शायद बीच में आवाज कटेगी नहीं। जैसे जोर जोर से बोलने

990
01:06:29,520 --> 01:06:33,840
से ना कई बार उसमें कुछ ऐसा होता है कि बीच में से आवाज गायब हो जाती है थोड़ी देर के लिए।

991
01:06:33,840 --> 01:06:37,920
जैसे आराम आराम से बोलेंगे तो पूरी आवाज सुनी। मुझे क्या लगता है जैसे आप बोलते हो तो

992
01:06:37,920 --> 01:06:42,000
बीच में से कुछ चीजें एकदम गायब हो जाते हैं। फिर एकदम आवाज आ जाती है। ऐसा हो रहा है कुछ।

993
01:06:42,000 --> 01:06:46,240
अच्छा मैं एक मिनट पूछ लेते हैं। शायद कुछ गड़बड़ हो रही हो। कोई

994
01:06:46,240 --> 01:06:50,880
मुझे दिक्कत है। किसी के पूछ लेने से क्या होगा? जब मुझे इसमें दिक्कत आ रही है ना? जी

995
01:06:50,880 --> 01:06:54,960
हो सकता है मेरे यहां समस्या है कि आपके यहां है। ये बात है। जैसे आप कुछ

996
01:06:54,960 --> 01:06:59,280
बोलते हो तो बीच में कुछ शब्द कट जाते हैं। कुछ कुछ शब्द

997
01:06:59,280 --> 01:07:03,760
ठीक है। ठीक है। आवाज सही आ रही है। जी ठीक है। अभी आपको मेरी आवाज आ रही है?

998
01:07:03,760 --> 01:07:07,760
साफ अब देखो फिर गायब हो गई बीच में। फिर गायब हो गई।

999
01:07:07,760 --> 01:07:11,920
तो आप थोड़ा सा एक बार ना मूव हो के दोबारा आ जाइए

1000
01:07:11,920 --> 01:07:16,000
आप। मूव हो के मतलब इसको बंद करके। हां लीव

1001
01:07:16,000 --> 01:07:20,080
लीव मैं आपको लीव करवा देता हूं और फिर आप एक बार दोबारा कर दीजिए। कोई

1002
01:07:20,080 --> 01:07:24,080
ग्लिच आ रहा होगा आपके क्योंकि मेरी आवाज सही आ रही है।

1003
01:07:24,080 --> 01:07:28,080
मेरे यहां अभी एक बार तो बहुत सीख आती है लाइन में फिर एकदम बीच में

1004
01:07:28,080 --> 01:07:32,160
से कुछ शब्द गायब हो जाते हैं। आप एक बार लीव करके आ जाइए। ठीक है।

1005
01:07:32,160 --> 01:07:36,160
अब देखो फिर गायब हो गई। आप लीव करके आ जाइए।

1006
01:07:36,160 --> 01:07:40,960
एक मिनट एक मिनट करना बेटे एक बार आकाश

1007
01:07:40,960 --> 01:07:46,000
करना इसको। [गला साफ़ करने की आवाज़]

1008
01:07:46,000 --> 01:07:51,200
जय श्री राम और आशा करता हूं आप सभी को काफी

1009
01:07:51,200 --> 01:07:55,360
ठीक-ठाक चर्चा अपना स्वरूप

1010
01:07:55,360 --> 01:07:58,720
लेते हुए दिख रही होगी

1011
01:07:58,720 --> 01:08:02,010
और

1012
01:08:02,010 --> 01:08:07,360
[खांसने की आवाज़]

1013
01:08:07,360 --> 01:08:12,720
वॉइस इज क्लियर हां जी वॉइस वही मैं कह रहा था वॉइस क्लियर है

1014
01:08:12,720 --> 01:08:17,040
उनको कोई ग्लिच आ रहा होगा संजीव जी को और काफी

1015
01:08:17,040 --> 01:08:23,040
सुंदर तरीके से वार्ता अपना एक निष्कर्ष को पहुंच रही है।

1016
01:08:24,280 --> 01:08:30,280
[गला साफ़ करने की आवाज़]

1017
01:08:48,240 --> 01:08:52,240
ये भाई साहब पूछ रहे हैं कि आपका उद्देश्य क्या है?

1018
01:08:52,240 --> 01:08:56,320
उद्देश्य वैसे हमारे YouTube चैनल के उसमें डिस्क्रिप्शन में लिखा हुआ है। पीछे

1019
01:08:56,320 --> 01:09:00,800
जाकर पढ़ सकते हैं। अन्यों के हित का ध्यान रखते हुए समाज

1020
01:09:00,800 --> 01:09:05,200
को सुसंस्कृत सुसंगठित

1021
01:09:05,200 --> 01:09:09,360
एक सूत्र में बांधते हुए जो है हिंदुओं के अस्तित्व

1022
01:09:09,360 --> 01:09:13,840
और आदर्श की रक्षा करना ही एकमात्र उद्देश्य है। जी

1023
01:09:13,840 --> 01:09:18,480
संजीव जी वेलकम बैक। हां जी हां जी जी जी अब क्या?

1024
01:09:18,480 --> 01:09:23,040
पुनः स्वागत है आपका। अब मेरी आवाज ठीक से आ रही है आपको? हां अभी तो आ रही है फिलहाल।

1025
01:09:23,040 --> 01:09:28,080
जी जी जी तो मेरा कहने का मतलब यह है कि

1026
01:09:28,080 --> 01:09:32,160
जो अती्द्रिय विषय है धर्म और ब्रह्म जैसे कि आपने बताया

1027
01:09:32,160 --> 01:09:36,240
कि मनुष्य दृष्टि से वो समझ में आने वाली चीजें नहीं है। तो उस विषय में क्योंकि

1028
01:09:36,240 --> 01:09:39,440
हम यहां पर उसका उपयोग और प्रयोग नहीं कर सकते कि भाई गायत्री

1029
01:09:39,440 --> 01:09:44,400
मंत्र से मोक्ष मिलना है कि नहीं मिलना। तो व्यवहारिक जगत में इसका कोई प्रयोग

1030
01:09:44,400 --> 01:09:48,560
प्रयोग नहीं कर सकते। तो इसलिए हमें किसी जिससे हम ले रहे

1031
01:09:48,560 --> 01:09:52,400
हैं हमें यह प्रकट करना होगा कि हमें उस पर विश्वास है। तो

1032
01:09:52,400 --> 01:09:56,480
जिससे हमने गायत्री मंत्र लिए उसके यदि अर्थ पर विश्वास नहीं है तो हम यह

1033
01:09:56,480 --> 01:10:00,640
कह रहे हैं कि वो हमको झूठ बोल सकता है। अज्ञानता वश या किसी

1034
01:10:00,640 --> 01:10:04,800
लोभ लालच वश वो हमें झूठ बता सकता है। तो वो जो गायत्री मंत्र को हम मंत्र

1035
01:10:04,800 --> 01:10:09,040
मान रहे हैं वो भी झूठा हो सकता है। हो सकता है कि ईश्वर ने कुछ और दिया हो और वो हमें झूठ

1036
01:10:09,040 --> 01:10:13,040
कह रहा है। और यदि हमें उसके अर्थ

1037
01:10:13,040 --> 01:10:17,120
पर विश्वास नहीं है तो उसके मंत्र पर भी विश्वास नहीं होना चाहिए

1038
01:10:17,120 --> 01:10:21,200
और यदि मंत्र पर विश्वास नहीं है, यदि मंत्र पर विश्वास है तो उसके अर्थ

1039
01:10:21,200 --> 01:10:25,200
पर भी विश्वास होना चाहिए। तो इसके लिए सबसे पहले तो यह जरूरी होगा

1040
01:10:25,200 --> 01:10:29,280
कि दयानंद जी ने मंत्र लिए कहां से? एग्जजेक्टली ये पता होना

1041
01:10:29,280 --> 01:10:29,780
चाहिए।

1042
01:10:29,760 --> 01:10:33,840
जैसे कई ऐसी गुरु परंपरा है जिसमें काफी पीछे तक के गुरुओं के नाम

1043
01:10:33,840 --> 01:10:37,840
है। जैसे शंकराचार्य परंपरा। शंकराचार्य परंपरा में अभी वर्तमान के

1044
01:10:37,840 --> 01:10:42,240
जो शंकराचार्य हैं उनसे पीछे के आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व जो आदि शंकराचार्य

1045
01:10:42,240 --> 01:10:46,320
हुए थे। वहां तक के जो आदि दैविक गुरु मान लीजिए या

1046
01:10:46,320 --> 01:10:50,480
लौकिक गुरु मान लीजिए उनके नाम है। उनके बाद जो दिव्य

1047
01:10:50,480 --> 01:10:54,560
जो आपके यहां शायद नहीं माना जाता हो उनके पीछे के दिव्य गुरुओं के नाम वहां

1048
01:10:54,560 --> 01:10:58,720
तक के प्राप्त है जहां से सृष्टि रचना हुई है। तो कहने का मतलब है

1049
01:10:58,720 --> 01:11:02,960
वर्तमान में अगर कोई भी व्यक्ति वेद मंत्र ले रहा है तो उसको

1050
01:11:02,960 --> 01:11:07,040
किसी ना किसी परंपरा प्राप्त आचार्य से वेद मंत्र लेना होगा। अगर नहीं लेना

1051
01:11:07,040 --> 01:11:11,120
होगा तो उनकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होगी। सत्यापन नहीं होगा उनका कि यह वेद

1052
01:11:11,120 --> 01:11:13,920
मंत्र ही है। तो ऐसे में सबसे पहले देखना

1053
01:11:13,920 --> 01:11:18,000
होगा कि दयानंद जी ने वेद मंत्र लिए किससे हैं? स्वतंत्र रूप से लेकर

1054
01:11:18,000 --> 01:11:23,280
स्वतंत्र भाष्य किया या किसी प्रामाणिक परंपरा प्राप्त आचार्य से लिए? जी

1055
01:11:23,280 --> 01:11:28,640
इसमें ऐसा है बेटे हर मंत्र की अपनी एक रचना है।

1056
01:11:28,640 --> 01:11:32,640
हर मंत्र की अपनी रचना है और वो आप तब समझ पाएंगे जब आप

1057
01:11:32,640 --> 01:11:36,640
यह विद्या पड़े होंगे। अब हमारी समस्या क्या है? हम

1058
01:11:36,640 --> 01:11:41,280
तो हिंदी भाषी लोग हैं। संस्कृत लौकिक भी नहीं जानते।

1059
01:11:41,280 --> 01:11:45,360
वैदिक तो बहुत ही दूर की बात है। तो हम इस बात

1060
01:11:45,360 --> 01:11:49,360
को इसका निर्णय तो हम कभी भी नहीं कर पाएंगे क्योंकि हमें

1061
01:11:49,360 --> 01:11:53,360
संस्कृत लौकिक भी नहीं आती। वैदिक तो कहां से आएगी? उसका पठन

1062
01:11:53,360 --> 01:11:57,440
पाठन ही नहीं है। तो हर मंत्र का एक स्ट्रक्चर है। मैंने जो आपको बताया

1063
01:11:57,440 --> 01:12:01,440
स्ट्रक्चर वो स्ट्रक्चर ही ये सिद्ध करता है कि ये

1064
01:12:01,440 --> 01:12:05,440
मंत्र है या नहीं। स्ट्रक्चर है। आप

1065
01:12:05,440 --> 01:12:09,440
किसने बताया आपको? वो तो उसमें वेद में है आलरेडी उसके ऊपर अंक

1066
01:12:09,440 --> 01:12:14,000
लिखे हुए हैं। हर हर हर जो मंत्र है ना यानी

1067
01:12:14,000 --> 01:12:18,000
यानी यानी कि वेद अच्छा मेरी बात सुनो आप पहले ना भाषा होती

1068
01:12:18,000 --> 01:12:22,480
है। देखो आप आपको अब शायद समझ में आ जाएगा। जैसे बच्चा पैदा होता है

1069
01:12:22,480 --> 01:12:27,840
तो ना वो लेखन नहीं करता है। पहले क्या करता है?

1070
01:12:27,840 --> 01:12:31,840
पहले बोलता है, लिखना बाद में करता है,

1071
01:12:31,840 --> 01:12:35,840
कानों से सुनता है और फिर वो लेखन बाद में आता है, वाचन

1072
01:12:35,840 --> 01:12:38,400
बोलना पहले आता है। तो ऐसे जो वेद है

1073
01:12:38,400 --> 01:12:42,400
ये प्रथम में लिखित रूप में नहीं थे। ये ध्यान रखना इनको

1074
01:12:42,400 --> 01:12:46,560
श्रुति इसलिए कहते हैं कि सुनने की परंपरा से चले।

1075
01:12:46,560 --> 01:12:50,640
जैसे बच्चे की विद्या सुनने की परंपरा से चलती है और फिर पुस्तकों पर

1076
01:12:50,640 --> 01:12:55,040
आ जाती है बाद में। तो कालांतर में पहले तो यह छंदोबद्ध

1077
01:12:55,040 --> 01:12:59,200
रचना श्रुति के रूप में रही और इनको श्रुति और वेद कहते इसलिए

1078
01:12:59,200 --> 01:13:03,280
हैं कि सुनने से चले। श्रुति माने सुनना कान का विषय तो श्रुति

1079
01:13:03,280 --> 01:13:07,440
परंपरा से चले। बहुत समय तक श्रुति परंपरा से चलते रहे। किसी ने सामवेद

1080
01:13:07,440 --> 01:13:11,440
याद कर लिया, किसी ने यजुर्वेद याद कर लिया। परंपरा से फिर वो अपने गुरुओं से याद

1081
01:13:11,440 --> 01:13:15,600
करते रहे। ऐसे चलता रहा। ठीक है? फिर धीरे-धीरे जब बुद्धि का रास होने

1082
01:13:15,600 --> 01:13:19,840
लगा क्योंकि स्मृति भी धीरेधी क्षय [गला साफ़ करने की आवाज़] हुआ ना समय के अनुसार। तो जैसे

1083
01:13:19,840 --> 01:13:24,240
स्मृति का क्षय हुआ तो फिर भाषा का विकास हो के फिर उनको बांधा गया।

1084
01:13:24,240 --> 01:13:28,320
फिर वो लेखन में आए। तो ऋषि परंपरा से जब वो लेखन में आए तो उन्होंने

1085
01:13:28,320 --> 01:13:32,400
फिर उनके अब जैसे बच्चे ने कहा पापा तो अब तो उसे नहीं पता था

1086
01:13:32,400 --> 01:13:36,480
पापा। फिर उसने कहा पी ए पी ए फिर वो आया लिखने

1087
01:13:36,480 --> 01:13:40,480
में पी पी यू पी ए नहीं अब वो कहेगा पी यू

1088
01:13:40,480 --> 01:13:44,480
पी को मैं पाप नहीं करते पुपा हो जाएगा पी ए पी ए

1089
01:13:44,480 --> 01:13:48,480
तो भाषा और जो उसके लिखने का ढंग इकार अ

1090
01:13:48,480 --> 01:13:52,640
उ अ आदि मात्राओं के हिसाब से तो सबसे पहले तो ये समझना

1091
01:13:52,640 --> 01:13:53,760
है कि मंत्र

1092
01:13:53,760 --> 01:13:57,840
प्रथम श्रुति है बाद में रिटन है तो श्रुति परंपरा

1093
01:13:57,840 --> 01:14:01,840
से चलते आए चलते आए फिर धीरेधीरे जब स्मृति लुप्त होने लगी तो

1094
01:14:01,840 --> 01:14:06,240
फिर वो भाषा में बांधे गए। भाषा में बांधे गए तो उच्चारण

1095
01:14:06,240 --> 01:14:11,200
के हिसाब से बांधे गए। जब मैं कहता हूं

1096
01:14:11,200 --> 01:14:15,280
आपका नाम क्या है? शिवश नारायण द्विवेदी। हां जब मैं कहता

1097
01:14:15,280 --> 01:14:19,840
हूं शिवंश तो मैं शिवंश नहीं लिख सकता उसे।

1098
01:14:19,840 --> 01:14:24,240
भाषा में आपका नाम वैसा ही लिखा जाएगा जैसा उच्चारित होता है।

1099
01:14:24,240 --> 01:14:28,240
उच्चारण को वैसा ही लिखा जाएगा जैसा उच्चारण है। ऐसा नहीं

1100
01:14:28,240 --> 01:14:32,480
होगा कि हम उच्चारण कुछ और करें और लिख कुछ और दे। तो प्रथम

1101
01:14:32,480 --> 01:14:36,480
जो आई श्रुति श्रुति से आई वाणी और जैसे सुनते थे

1102
01:14:36,480 --> 01:14:40,480
उस मात्रा से फिर उसको लिखा गया बांधा गया उसको इस प्रकार कीति

1103
01:14:40,480 --> 01:14:44,640
परंपरा समझ गया मैं समझ मैं समझ गया हमने [गला साफ़ करने की आवाज़] ये माना

1104
01:14:44,640 --> 01:14:49,200
कि श्रुति परंपरा चली नहीं माना नहीं बेटे बेटे माना नहीं

1105
01:14:49,200 --> 01:14:53,200
यही परंपरा है उसका नाम श्रुति ही इसलिए आप ऐसे ना करो कि

1106
01:14:53,200 --> 01:14:57,680
हमने माना आप कुछ मानने वाले नहीं मैं मानू

1107
01:14:57,680 --> 01:15:01,680
ना मानू मैं वेद का पोषक नहीं हूं मेरी कोई ऐसी नहीं

1108
01:15:01,680 --> 01:15:05,680
है कि मेरे होने से वेद होंगे या आपके कहने से होंगे तो मानना नहीं

1109
01:15:05,680 --> 01:15:09,040
ऐसा है उसका नाम श्रुति है। ये वो सिद्ध कर रही है

1110
01:15:09,040 --> 01:15:13,120
कि वो स्रोत परंपरा से ही चले हैं। ठीक है। ठीक है। अभी मैं

1111
01:15:13,120 --> 01:15:17,200
अपनी पंक्ति को सही करता हूं कि श्रुति परंपरा से

1112
01:15:17,200 --> 01:15:21,840
वेद वेद हमें प्राप्त होते हैं। श्रुति परंपरा से आगे चलकर के कालांतर में जब

1113
01:15:21,840 --> 01:15:26,000
लोगों की सामर्थ्य कम हो जाती है तो वो उसको लिपिबद्ध कर

1114
01:15:26,000 --> 01:15:30,080
दिया जाता है। ठीक है? अब इसमें ये बात आती है कि सबसे पहले तो हमने ये मान

1115
01:15:30,080 --> 01:15:34,160
लिया कि श्रुति परंपरा से यानी कि शिष्य ने अपने गुरु से सुने

1116
01:15:34,160 --> 01:15:38,160
और जब बाद में वो लिपिबद्ध किए गए तब भी एक गुरु की

1117
01:15:38,160 --> 01:15:42,560
आवश्यकता इसलिए है कि जो लिखा हुआ हम वेद मान रहे हैं

1118
01:15:42,560 --> 01:15:46,640
वो वेद ही है कि नहीं जिस जो हम सोच रहे हैं ईश्वर की वाणी वो वही है

1119
01:15:46,640 --> 01:15:50,640
कि नहीं तो जिस गुरु हमारे जिस गुरु ने जो हमको मंत्र दे रहा है या जो

1120
01:15:50,640 --> 01:15:54,880
हमें बताने वाला है वो ये सत्या करेगा हां ऋषियों ने

1121
01:15:54,880 --> 01:15:59,280
हां गुरु ने यही एक मिनट ना गुरु ना मनुष्य मनुष्य

1122
01:15:59,280 --> 01:16:03,920
ना महापुरुष आपने नहीं दे रहे मैं कुछ

1123
01:16:03,920 --> 01:16:08,480
ऋषि मैं कुछ ऋषि तो वो थे जिन्होंने दर्शन किया था

1124
01:16:08,480 --> 01:16:12,720
दर्शन तो किया लेकिन परंपरा से उन्होंने चलाया उन्होंने परंपरा

1125
01:16:12,720 --> 01:16:16,720
से चलाया उसके उसके बाद अभी जो दो ढाई हजार साल पहले

1126
01:16:16,720 --> 01:16:21,200
से हमने जब किसी से वेद मंत्र लिए वेद मंत्र लिए ना जब लिपिबद्ध

1127
01:16:21,200 --> 01:16:24,160
लिपिबद्ध कब हुए लिपिबद्ध

1128
01:16:24,160 --> 01:16:28,400
भी बहुत समय पहले हो गए थे लिपिबद्ध भी बहुत समय पहले हो गए थे।

1129
01:16:28,400 --> 01:16:32,720
आप कितना मान के आप कितना मान के चलते हो बताइए? कितने समय से लिपिबद्ध हुए?

1130
01:16:32,720 --> 01:16:36,560
भाई साहब मूल विषय ये नहीं है। लिपिबद्ध

1131
01:16:36,560 --> 01:16:40,800
मूल विषय ये है कि शुरुआत हुई श्रुति परंपरा

1132
01:16:40,800 --> 01:16:45,040
से और एक आप मैं समझ गया। आप ये कहना चाह रहे हो कि इसका आधार क्या है कि

1133
01:16:45,040 --> 01:16:49,200
शुद्ध है कि अशुद्ध है। नहीं नहीं पहले मुझे बोलने दीजिए आप। एक मुझे

1134
01:16:49,200 --> 01:16:53,200
पूरा करने दे। श्रुति परंपरा से वो चले और फिर एक समय

1135
01:16:53,200 --> 01:16:57,280
पर आकर के उसको लिपिबद्ध किया। जब लिपिबद्ध किया तब किसी

1136
01:16:57,280 --> 01:17:01,280
ने उसको वेद समझा कि यह किताब, यह पोथी, यह पत्र

1137
01:17:01,280 --> 01:17:05,680
यह वेद ही है। उसके लिए जिसने अपने गुरु से उनको सुना था

1138
01:17:05,680 --> 01:17:09,760
उससे पूछा क्या यह वेद मंत्र ही है? तो उसने बताया हां तब हमने

1139
01:17:09,760 --> 01:17:13,760
उसे वेद माना। उसके बाद फिर आगे और इस तरह से चलते गए, चलते गए, चलते

1140
01:17:13,760 --> 01:17:18,080
गए। अन्यथा अगर हम स्वतंत्र रूप से किसी चीज को वेद मानेंगे तो परेशानी

1141
01:17:18,080 --> 01:17:22,080
यह आएगी कि हमने जिससे हमने वेद लिए हैं तो वो हमारा प्रमाण

1142
01:17:22,080 --> 01:17:26,400
हो जाएगा। मान लीजिए आज कोई इंटरनेट से डायरेक्ट बिना किसी से कोई मार्गदर्शन लिए

1143
01:17:26,400 --> 01:17:30,480
और इंटरनेट से वेद नाम की कोई पुस्तक जो है डाउनलोड कर लेता है। अब उसको

1144
01:17:30,480 --> 01:17:34,480
तो नहीं मालूम उसको पहचानना कैसे है उसमें क्या सिस्टम है क्या नहीं है वो वेद

1145
01:17:34,480 --> 01:17:38,640
नाम से कोई मैक्स मूलर टाइप का या कोई क्या नाम है

1146
01:17:38,640 --> 01:17:39,440
और भी कई

1147
01:17:39,440 --> 01:17:43,680
लोग रहे मिलावट करने वाले कोई इस तरह का जो असामाजिक तत्व है वो वेद

1148
01:17:43,680 --> 01:17:48,240
के नाम से कोई किताब रख देगा तो अगर हम स्वतंत्र रूप से वेद को लेने लगेंगे

1149
01:17:48,240 --> 01:17:52,560
अपने हिसाब से तो कोई भी चीज हमें वेद के रूप में प्राप्त हो सकती है। इसलिए

1150
01:17:52,560 --> 01:17:56,560
श्रुति परंपरा के बाद जब वो लिपिबद्ध हुए तब भी हमने किसी

1151
01:17:56,560 --> 01:18:00,720
ना किसी गुरु से उसे वेरीफाई कराना है कि वो वेद ही है या नहीं

1152
01:18:00,720 --> 01:18:04,960
है। अगर हम यह कहते हैं कि हमको पद्धति मिली है वेद को पहचानने की

1153
01:18:04,960 --> 01:18:09,040
तो वो पद्धति प्रामाणिक पद्धति है वेद को पहचानने की नहीं पहचानने

1154
01:18:09,040 --> 01:18:13,040
की। इस पद्धति को भी वेरीफाई कराना है किसी ना किसी गुरु से। तो

1155
01:18:13,040 --> 01:18:17,920
मैं पूछ रहा हूं दयानंद जी ने किससे वेरीफाई कराया? [हंसी]

1156
01:18:17,920 --> 01:18:22,000
मैं आपको कितनी देर पहले से मैं यही कह रहा हूं और आप इतनी देर में वही आए हो घूम

1157
01:18:22,000 --> 01:18:26,160
के क्या आप वेरिफिकेशन की बात कर रहे हो घुमा फिरा के मैं सिर्फ आपको

1158
01:18:26,160 --> 01:18:30,160
ये कहना चाहता हूं आप कहो कि जी आकाश आकाश है

1159
01:18:30,160 --> 01:18:34,160
किसने वेरीफाई किया पानी पानी है किसने वेरीफाई किया आप कह रहे हो

1160
01:18:34,160 --> 01:18:38,160
कि शब्द ऐसे बना किसने वेरीफाई किया ये चीजें परंपरा से चली आई और

1161
01:18:38,160 --> 01:18:42,160
मैंने बताया कि उसकी रचना का एक प्रकार है आपको मैंने

1162
01:18:42,160 --> 01:18:46,240
कितनी बार ये बात कही है कि रचना का है जो प्रकार

1163
01:18:46,240 --> 01:18:50,240
है वो आपको कैसे जो रचना का प्रकार है वो वो बंधा हुआ है

1164
01:18:50,240 --> 01:18:54,480
पहले से ही आपने मैंने नहीं निर्धारित किया इस बार वो आप वो किसने और आप उसमें

1165
01:18:54,480 --> 01:18:58,560
गलत सही का निर्णय भी नहीं कर पाओगे मुझे आश्चर्य इस बात का है मुझे नहीं पता

1166
01:18:58,560 --> 01:19:02,640
आपकी संस्कृत की बैकग्राउंड क्या है लेकिन आप कैसे निर्णय करोगे

1167
01:19:02,640 --> 01:19:06,720
आप वो आप पूछ रहे हो ऐसी बात हो रही है कि जैसे गरीब

1168
01:19:06,720 --> 01:19:11,760
आदमी अंबानी के धन की चर्चा करता हो है दोनों गरीब

1169
01:19:11,760 --> 01:19:15,840
यानी कि मेरा यानी कि मेरा कहने का मतलब है यानी कि मेरा मेरा कहने का मतलब

1170
01:19:15,840 --> 01:19:19,840
है कि हम लोग किसी भी किताब को वेद के रूप में अपना लें। कोई टेंशन

1171
01:19:19,840 --> 01:19:23,840
नहीं है। कोई वहां पर प्रामाणिक कैसे? बताओ कैसे बताओ। आप मुझे बता के दिखाओ।

1172
01:19:23,840 --> 01:19:27,920
बना के मुझे तो आप ही मुझे बताइए ना। मैंने बताया

1173
01:19:27,920 --> 01:19:32,000
कि आप मेरे सामने लाओगे तो पता चल जाएगा। आप आप अपना सकते हो। आप ही

1174
01:19:32,000 --> 01:19:36,080
अपनाओगे क्योंकि आपके पास वो पैरामीटर है नहीं। आप जब उन

1175
01:19:36,080 --> 01:19:40,160
पैरामीटर को ना पढ़ोगे, ना देखोगे, ना सुनोगे, ना समझोगे

1176
01:19:40,160 --> 01:19:44,800
और उस बात को खींचते ही चले जाओगे तो फिर निर्णय कभी भी होगा नहीं।

1177
01:19:44,800 --> 01:19:49,440
मैंने कहा वेद का मंत्र एक छंदोबद्ध रचना है।

1178
01:19:49,440 --> 01:19:53,680
स्वरों में बंधी हुई रचना है। उसके अपने उसके

1179
01:19:53,680 --> 01:19:57,760
छंद है अलग-अलग। उसके स्वर है उसके प्रकार है। आप किसी दूसरे

1180
01:19:57,760 --> 01:20:01,760
शब्द की कविता में वो प्रकार डाल ही नहीं सकते।

1181
01:20:01,760 --> 01:20:05,760
आप डाल ही नहीं पाओगे। आप कहोगे कि वेद सिद्ध कर दो। हम कुछ भी लिख

1182
01:20:05,760 --> 01:20:09,840
देंगे वेद होगा। आप करके दिखाओ। ठीक है। कोई भी करके दिखाए। इस संसार

1183
01:20:09,840 --> 01:20:13,840
का कोई विद्वान एक मंत्र बना के दिखाए। और मैं छह श्लोक बना के

1184
01:20:13,840 --> 01:20:17,840
दिखाता हूं अभी आपको। कोई विद्वान दुनिया भर का संस्कृत का

1185
01:20:17,840 --> 01:20:22,320
वेद का एक मंत्र बना के दिखाए। वेद के मंत्र नहीं बनाए जा सकते।

1186
01:20:22,320 --> 01:20:26,320
ये समझो आप इस बात को और वो तब पता चलेगा बेटे जब आप परंपरा से पढ़ोगे

1187
01:20:26,320 --> 01:20:30,320
तब। ये ऐसे सिद्ध नहीं होगा किसने कहा, फलाने ने कहा,

1188
01:20:30,320 --> 01:20:34,560
उसको किसने कहा, उसने कहा, उसको किसने कहा, उसने कहा। फिर तो आप लगे रहो। पिता

1189
01:20:34,560 --> 01:20:38,640
आया, उससे पहले पुत्र था, फिर कुत्ता था। बीज खा के पेड़ था, अंडा था,

1190
01:20:38,640 --> 01:20:42,960
मुर्गी थी। आपकी बात फिर चलते रहोगे ऐसे। मैं समझ गया। मैं समझ गया संजीव

1191
01:20:42,960 --> 01:20:47,200
जी मैं समझ गया। आपने कहा जब परंपरा से पढ़ेंगे तब तो आपने

1192
01:20:47,200 --> 01:20:51,200
किस परंपरा से पढ़ा है? जो जो हमारी भारतीय परंपरा है जो

1193
01:20:51,200 --> 01:20:55,680
सनातन वैदिक परंपरा है वो परंपरा बताई है ना वैदिक परंपरा क्या है? आश

1194
01:20:55,680 --> 01:21:00,000
पाठ विधि होती है। एक आर्ष पाठ विधि कहते हैं उसको विधि विधि नहीं परंपरा बताइए।

1195
01:21:00,000 --> 01:21:04,560
परंपरा हां आश पाठ विधि कहते हैं। आर्ष पाठ परंपरा कहो विधि कहो उसको

1196
01:21:04,560 --> 01:21:08,880
परंपरा का मतलब है कि एक चैन ऑफ नरेशन चैन गुरुओं की चैन

1197
01:21:08,880 --> 01:21:12,000
वो क्या है आपकी?

1198
01:21:12,000 --> 01:21:16,160
वैदिक विचारधारा वैदिक वैदिक मैं तो आपको आपके गुरुओं

1199
01:21:16,160 --> 01:21:16,960
के कुछ नाम होंगे

1200
01:21:16,960 --> 01:21:21,200
ना पीछे जाते हुए कि मेरे नहीं कोई गुरुओं के नाम नहीं है। मेरी बात सुनो जी आप आप

1201
01:21:21,200 --> 01:21:25,200
ये ये क्यों कहना चाहते हो कि गुरु का नाम होना चाहिए। हां ठीक

1202
01:21:25,200 --> 01:21:29,200
है। जंगल में कोई बहुत से लोग हैं जो बिना दूसरी भाषाओं में भी ज्ञान प्राप्त

1203
01:21:29,200 --> 01:21:33,520
किए जा रहे हैं। पहली तो बात आप ये भी समझो ज्ञान

1204
01:21:33,520 --> 01:21:37,520
एक मिनट एक मिनट विषयंतर हो जाएगा। तो आपने यह कहा कि

1205
01:21:37,520 --> 01:21:41,600
गुरु की आवश्यकता जरूरी नहीं है। हमको नियम मालूम है कि कैसे वेद को पहचानना

1206
01:21:41,600 --> 01:21:45,680
है। पक्का ठीक है ना? हमको मालूम है कैसे वेद को पहचान। उस तरह से

1207
01:21:45,680 --> 01:21:49,920
नहीं जैसे आप कहोगे उससे लिया फलाने से लिया। एक सिस्टम

1208
01:21:49,920 --> 01:21:54,320
है बस बात खत्म हो गई। अब आप जयशंकर प्रसाद ने जो कविता लिखी

1209
01:21:54,320 --> 01:21:58,480
जयशंकर प्रसाद ने जो कविता लिखी उन्होंने कहां से लिखी?

1210
01:21:58,480 --> 01:22:02,480
मुझे बताओ। सुनो बस अब एक बात सिर्फ एक मेरी बात सुनिए।

1211
01:22:02,480 --> 01:22:06,560
आप लास्ट इसी से करते हैं। जयशंकर प्रसाद ने कविता लिखी। वो

1212
01:22:06,560 --> 01:22:10,640
कविता कहां से लाए? ठीक है। अब मैं अपनी

1213
01:22:10,640 --> 01:22:14,640
बात कर लूं जो मैं कहना चाहता हूं। कहां से लाए वो कविता? ये बताइए। जय

1214
01:22:14,640 --> 01:22:18,880
शंकर जयशंकर बात की जयशंकर ने जो कि कविता लिखी उस की भी बात करेंगे।

1215
01:22:18,880 --> 01:22:23,040
अभी मैं ये पूछ रहा हूं कि गुरुओं की आवश्यकता है नहीं। हमारे पास

1216
01:22:23,040 --> 01:22:27,200
नियम है जिसमें भेद कर रहे हैं। आप मेरी बात सुनिए। गुरु

1217
01:22:27,200 --> 01:22:31,680
की आवश्यकता किस अर्थों में है? इस अर्थों में है कि भाषा का ध्यान कराए।

1218
01:22:31,680 --> 01:22:32,240
व्यवहार

1219
01:22:32,240 --> 01:22:36,400
का ध्यान कराए, विद्याओं का ध्यान कराए। इस तरह से ध्यान कराए और गुरुओं

1220
01:22:36,400 --> 01:22:40,400
की आवश्यकता मतलब आप ऐसे कांटा मार दोगे कि गुरु की आवश्यकता ही नहीं। ऐसे थोड़ी होता है।

1221
01:22:40,400 --> 01:22:44,640
माने गुरु माने गुरु माने वो विद्या

1222
01:22:44,640 --> 01:22:48,880
शास्त्र वेद किसी पुरुष के अधीन नहीं है। और आप इन चीजों को पुरुष के अधीन

1223
01:22:48,880 --> 01:22:52,960
करना चाहते हो। फला गुरु फला गुरु उसका गुरु उसका गुरु। फिर सबसे पहला

1224
01:22:52,960 --> 01:22:57,200
गुरु कौन? मुझे आप ही बताओ। आप मुझे बताइए। आप बताते हो कि फला

1225
01:22:57,200 --> 01:23:01,360
ऋषि का फला हुआ। फला का फला हुआ। वो दिव्य रूप हुए। आप मुझे दिव्य

1226
01:23:01,360 --> 01:23:05,680
रूप की व्याख्या करके बताओ जी पहले तो आपने कहा पहले सन्यासी हुए

1227
01:23:05,680 --> 01:23:09,760
फिर उनका दिव्य रूप था जो शायद आप नहीं मानते मुझे वो दिव्य रूप बताओ आप क्या

1228
01:23:09,760 --> 01:23:14,000
था आप बताओ मैं कैसे मानू उस दिव्य रूप को वो ठीक है

1229
01:23:14,000 --> 01:23:18,080
आप ही स्वयं कह रहे हो आप स्वयं कह रहे हो उस विषय को तो हो

1230
01:23:18,080 --> 01:23:22,160
जाने दीजिए आप मेरी बात सुनो आपने स्वयं ये विषय उठाया कि गुरु

1231
01:23:22,160 --> 01:23:26,480
पहले दिव्य रूप में होता है और दिव्य रूप के बाद वो मनुष्य रूप में होता है

1232
01:23:26,480 --> 01:23:30,560
आपको आपने बताया कि पहले गुरु दिव्य रूप में होता है फिर वो मनुष्य

1233
01:23:30,560 --> 01:23:34,560
रूप में होता है। अब आप ही बता रहे हो दोस्त किसी हाथ ही कर दिया। अब बता ठीक

1234
01:23:34,560 --> 01:23:38,960
है। अब मैं बोलूं? जी अब आप मेरी आपसे

1235
01:23:38,960 --> 01:23:43,280
प्रार्थना है। आप जब मैं बोल रहा हूं तो मुझे बीच में मत इंटरप्ट करिएगा। आप अपनी बात

1236
01:23:43,280 --> 01:23:47,360
मेरी बात सुनो। आप तो फिर कुछ भी बोलोगे तो फिर तो विषय फिर कुछ और हो जाएगा उसमें।

1237
01:23:47,360 --> 01:23:51,440
भाई साहब आप कैसे बोलोगे? आपको एक विधि का अनुपालन तो

1238
01:23:51,440 --> 01:23:55,600
करना होगा। आप मुझे बात बताइए। एक गणित का व्यक्ति है। कोई कहे जी मुझे बोलने

1239
01:23:55,600 --> 01:23:59,600
दो। तीन और तीन सात होते हैं। पहले मेरी बात सुनो आप। तीन और तीन सात

1240
01:23:59,600 --> 01:24:03,680
होते हैं। आपकी बात तीन और तीन सात होते हैं। ऐसा तो कभी हो नहीं पाया। मैंने

1241
01:24:03,680 --> 01:24:07,680
आपकी बात सुन ली है काफी। मैंने आपकी बात सुन ली है। मैंने बेटे सुन ली

1242
01:24:07,680 --> 01:24:11,040
होती तो अब

1243
01:24:11,040 --> 01:24:15,040
एक कुछ देर के लिए आपको मैंने म्यूट किया है भाई साहब। मेरी एक बात

1244
01:24:15,040 --> 01:24:19,360
प्रार्थना है। मुझे थोड़ा सा आप सुन लीजिए। मैं जो कहना चाह रहा हूं वो सुन लीजिए।

1245
01:24:19,360 --> 01:24:23,760
हां। तो मैं ये कह रहा था कि हम आवाज

1246
01:24:23,760 --> 01:24:28,000
नहीं आ रही आपकी। एक मिनट रुको। कह रहे हैं आप? हां। आप

1247
01:24:28,000 --> 01:24:32,080
कुछ मत करिए। हां बस हो गया हो गया। ठीक है। आ गया। जी जी जी

1248
01:24:32,080 --> 01:24:36,160
मैं ये कह रहा हूं कि ये जो है हमने

1249
01:24:36,160 --> 01:24:36,660
ये

1250
01:24:36,400 --> 01:24:40,480
कहा कि वेद मंत्रों को हम जो है एक निश्चित नियमावली है।

1251
01:24:40,480 --> 01:24:44,640
उसके द्वारा पहचानते हैं कि ये वेद मंत्र है। ठीक है? अब ये

1252
01:24:44,640 --> 01:24:49,360
जो निश्चित नियमावली है ये हमने जिससे [गला साफ़ करने की आवाज़] ली

1253
01:24:49,360 --> 01:24:53,600
जिससे भी ली क्या हमें उस पर विश्वास नहीं होना चाहिए? जो हमें निश्चित

1254
01:24:53,600 --> 01:24:57,920
नियमावली दे रहा है वेद मंत्रों को पहचानने की। बेटे वो तो जब आप पढ़ोगे ना

1255
01:24:57,920 --> 01:24:59,360
तो आपको तभी पता चल जाएगा

1256
01:24:59,360 --> 01:25:03,520
कि ये गलत पढ़ा रहा है कि ठीक पढ़ा रहा है। कई बार बच्चे ही टीचर को कह देते हैं सर आप गलत पढ़ा रहे हो।

1257
01:25:03,520 --> 01:25:07,760
मैं आपकी बात करते ये तो सामान्य सी बात है।

1258
01:25:07,760 --> 01:25:11,840
अगर कोई अध्यापक ये कहने लगे कि अभी तीन और तीन छह होते हैं आठ होते हैं। तो

1259
01:25:11,840 --> 01:25:16,240
बच्चा खुद ही कहता है नहीं सर ऐसे नहीं होते। इतना ज्ञान तो भाई साहब

1260
01:25:16,240 --> 01:25:20,400
मैंने आपको म्यूट किया क्योंकि आप थोड़ा सा म्यूट म्यूट मैंने किया है। एक मिनट

1261
01:25:20,400 --> 01:25:23,840
थोड़ा सा इंट्रप्ट हो रहा है। ओवरलैपिंग हो जाती है। तो मैं ये कह रहा

1262
01:25:23,840 --> 01:25:27,840
हूं कि जैसे मैंने आपकी बात मान ली कि जब मैं पढूंगा डायरेक्ट जाकर के तब मुझे

1263
01:25:27,840 --> 01:25:32,000
पता चलेगा। तो मैं किसी से पढ़ने कहां पर जाऊं वेद? ये बताइए

1264
01:25:32,000 --> 01:25:36,320
आप मुझे। कौन प्रामाणिक रूप से वेद पढ़ा रहा है? जी अनम्यूट

1265
01:25:36,320 --> 01:25:40,640
करो। आप प्रमाणिक रूप से अगर वेद पढ़ना चाहते हैं तो आप गुरुकुलों

1266
01:25:40,640 --> 01:25:45,440
से संपर्क कर सकते हो। हमारे यहां रेवली गुरुकुल है पास में ही

1267
01:25:45,440 --> 01:25:49,520
प्रभात आश्रम है रेवली है पास में ही तो रेवली गुरुकुल है सोनीपत

1268
01:25:49,520 --> 01:25:53,840
में आप वहां जाइए पढ़िए बड़ा मजा आएगा आपको पढ़ के आप आनंदित हो जाओगे

1269
01:25:53,840 --> 01:25:58,240
शंकराचार्य और रामानुजाचार्य द्वारा जो गुरुकुल चलाए जा रहे हैं वहां पर प्रामाणिक

1270
01:25:58,240 --> 01:26:02,320
रूप नहीं है देखो अब हमें कोई बताए तो पता चलेगा ऐसे

1271
01:26:02,320 --> 01:26:06,400
आप कुछ भी किसी को कुछ मानोगे तो कैसे होगा

1272
01:26:06,400 --> 01:26:10,640
आप आप जो मूर्ति पूजक हैं जो वेदों का अर्थ मूर्ति पूजा बताते हैं

1273
01:26:10,640 --> 01:26:14,720
उसको प्रामाणिक मानते हैं क्या? नहीं नहीं मानते। तो फिर

1274
01:26:14,720 --> 01:26:18,800
मैं ये तय कैसे करूं कि वो प्रामाणिक नहीं है। आप प्रामाणिक हो। हां ये तो भाषा

1275
01:26:18,800 --> 01:26:22,880
के नियम तय कर देंगे। अब अब किसी ने कहा मैं सुनो

1276
01:26:22,880 --> 01:26:26,960
मेरी बात। अभी एक एक एक मिनट इसका मतलब आपसे मुझे जो

1277
01:26:26,960 --> 01:26:31,840
है प्रामाणिक रूप से अध्ययन करने से पहले मुझे ज्ञात होना चाहिए कि

1278
01:26:31,840 --> 01:26:35,040
जो है नियम क्या है। जी

1279
01:26:35,040 --> 01:26:37,520
भाई साहब

1280
01:26:37,520 --> 01:26:42,320
इसको अन म्यूट करो ना पहले आप। एक मेरी बात सुनो आप। एक शब्द है संध

1281
01:26:42,320 --> 01:26:46,800
एक मिनट एक मिनट कुछ हो गया है आप जो रिमूव हो गया हेलो ये

1282
01:26:46,800 --> 01:26:50,800
क्या हो गया हेलो ये इनको स्टेज पर

1283
01:26:50,800 --> 01:26:55,360
लाइए ऑपरेटर जी एक मिनट आप स्टेज पे नहीं है इस समय

1284
01:26:55,360 --> 01:26:59,360
हां आ गया जी हां बताइए बताइए एक शब्द

1285
01:26:59,360 --> 01:27:03,440
है सेंधव सेंधव सेंधव

1286
01:27:03,440 --> 01:27:07,680
माने नमक हम सेंधव माने घोड़ा

1287
01:27:07,680 --> 01:27:11,760
हम एक ही एक ही शब्द के एक ही अर्थ इसके अलग है। शब्द

1288
01:27:11,760 --> 01:27:15,760
एक ही है। सेंधव माने नमक। सेंधव माने घोड़ा। तो जब युद्ध की बात हो

1289
01:27:15,760 --> 01:27:19,920
रही हो तो उसने कहा सेंधव लाओ। तो फिर आप नमक लाओगे कि घोड़ा

1290
01:27:19,920 --> 01:27:22,640
लाओगे?

1291
01:27:22,640 --> 01:27:26,720
मैं तो घोड़ा ही लाऊंगा जब युद्ध की बात हो रही है। हां हां जी हां। और मैं भोजन

1292
01:27:26,720 --> 01:27:32,080
करने बैठा हूं। तो मैंने कहा सेंधव लाओ तो घोड़ा लाओगे कि नमक?

1293
01:27:32,080 --> 01:27:36,400
नमक लाऊंगा। क्या? हां। बस इसी बात से देखना होता है मंत्र

1294
01:27:36,400 --> 01:27:40,560
किस पृष्ठभूमि में कहा जा रहा है वहां मेरी मर्जी नहीं है बेटे या किसी

1295
01:27:40,560 --> 01:27:44,960
व्यक्ति की मर्जी नहीं है कि उसका मनवाना मरोड़ के कोई भी अर्थ निकाल दे वो

1296
01:27:44,960 --> 01:27:49,040
यही तो मजेदार बात है इसी कारण वेद बचे हुए हैं नहीं तो इसका कुछ का कुछ

1297
01:27:49,040 --> 01:27:53,120
हो जाता अब तक ठीक है इनमें मनुष्य का दखल है ही नहीं आप जो

1298
01:27:53,120 --> 01:27:57,120
अर्थ करोगे वो ऐसा नहीं होगा कि मैं इस मंत्र का कुछ पूर्वाकर पूर्वापर

1299
01:27:57,120 --> 01:28:01,200
संबंध भी होता है [हंसी] कोई चला रहा माने कोई सूक्त है उस सूक्त का नाम

1300
01:28:01,200 --> 01:28:05,440
है अग्नि सूक्त तो उसमें मुख्य विषय वही रहेगा देवता रहेगा

1301
01:28:05,440 --> 01:28:09,440
उन सब का मुख्य विषय वही रहेगा तो उससे हम यह पता कर लेंगे कि इस

1302
01:28:09,440 --> 01:28:13,680
मंत्र का देवता तो अग्नि है और ये अर्थ कर रहा है जल पर

1303
01:28:13,680 --> 01:28:17,760
या दूसरी चीजों से परख तो ये बना ही नहीं अर्थ परंपरा

1304
01:28:17,760 --> 01:28:22,000
से अपने आप इसका मतलब मुझे प्रामाणिक रूप से वेद पढ़ने

1305
01:28:22,000 --> 01:28:26,800
से जाने से पहले मालूम होना चाहिए प्रामाणिक रूप से वेद क्या है

1306
01:28:26,800 --> 01:28:30,800
हां आपको बड़ी संस्कृत पढ़नी पड़ेगी बेटे ये तो है ही है ऐसे कैसे पता

1307
01:28:30,800 --> 01:28:34,880
चलेगा प्रामाणिक रूप से वेद वेद पढ़ने जाने से पहले मुझे मालूम होना

1308
01:28:34,880 --> 01:28:38,080
चाहिए प्रामाणिक रूप से वेद क्या है? मतलब पहले ही

1309
01:28:38,080 --> 01:28:39,280
मालूम होना चाहिए। आप फिर

1310
01:28:39,280 --> 01:28:43,280
वही बात कर रहे हो। आप तो कह रहे हो स्कूल जाने से पहले पता चलना चाहिए कि स्कूल

1311
01:28:43,280 --> 01:28:47,920
प्रमाणिक है कि नहीं। ऐसा नहीं होता। वो प्रमाणिक ही है। आप ही तो कह रहे हो। आप जाओ पढ़ो तो पता चलेगा।

1312
01:28:47,920 --> 01:28:52,000
आप जाके तब जाके पता पढ़ो ना बेटा। तब पता चलेगा। मुझे बताइए ना

1313
01:28:52,000 --> 01:28:56,000
कि मैं शंकराचार्य के यहां क्यों ना जाऊं और आर्य हां अब मैंने बता तो दिया आपको

1314
01:28:56,000 --> 01:29:00,080
कि इसमें जो जो रिफरेंट और कॉन्टेक्स्ट चल रहा है किस विषय में कौन

1315
01:29:00,080 --> 01:29:04,480
मंत्र जा रहा है उसी विषय व्याख्या होगी जो उसके विरुद्ध व्याख्या करेंगे

1316
01:29:04,480 --> 01:29:08,480
तो वो व्याख्या नहीं मानी जाएगी ये तो स्पष्ट सी बात है संजीव जी ये

1317
01:29:08,480 --> 01:29:12,480
तो तब है ना जब मुझे मालूम हो कि वेद में क्या चल रहा है क्या नहीं चल रहा है

1318
01:29:12,480 --> 01:29:16,480
ये तो तब होगा ना अभी तो मैं न्यूट्रल है मुझे तो कुछ पता ही नहीं ना कहां वेद में

1319
01:29:16,480 --> 01:29:20,640
क्या है क्या नहीं है तो मैं कैसे निर्धारित करूंगा कि ये प्रामाणिक है जाने

1320
01:29:20,640 --> 01:29:24,720
आने से पहले यह तो आप जो बोल रहे हो तब है जब मैं अंदर जा चुका हूं और मुझे

1321
01:29:24,720 --> 01:29:26,800
मालूम पड़ गया क्या है क्या नहीं है उसमें

1322
01:29:26,800 --> 01:29:30,800
क्या लिखा है किस रेफरेंस में बात चल रही है किस कॉन्टेक्स्ट में बात चल

1323
01:29:30,800 --> 01:29:34,800
रही है ये तो तब की बात है जब मुझे मालूम ही नहीं है कि वो खाना खाने के विषय में बात चल

1324
01:29:34,800 --> 01:29:39,040
रही है या युद्ध के विषय में बात चल रही है तो मैं कैसे तय करूंगा कि नहीं यहां पर इन्होंने नमक

1325
01:29:39,040 --> 01:29:43,360
की जगह घोड़ा घोड़े की जगह नमक किया है अभी तो मैं बाहर हूं ना वेद से

1326
01:29:43,360 --> 01:29:49,360
तो मैं कैसे डिसाइड करूं कि ये प्रामाणिक है जी

1327
01:29:51,280 --> 01:29:52,480
आपने कहा अभी कैसे

1328
01:29:52,480 --> 01:29:56,640
डिसाइड करूं तो उसके लिए पढ़ो उनको बस पढ़ने से ही पता चलेगा आपको पढ़ना

1329
01:29:56,640 --> 01:30:00,800
पड़ेगा ऐसा कोई प्रकार नहीं है कोई उपाय नहीं है कि मैं कुछ दे दूं

1330
01:30:00,800 --> 01:30:04,880
आपको आपके हाथ में कुपुड़िया आ जाए ऐसा कोई उपाय नहीं है मैं आपको

1331
01:30:04,880 --> 01:30:08,880
आप कहो जी मुझे अंग्रेजी की पोयम बनानी है तो बेटे पहले भाषा का ध्यान करो दो

1332
01:30:08,880 --> 01:30:13,040
चार कवियों को पढ़ो और उसके बाद राइमिंग वर्ड सीखो तो आपको आ जाएगा अब

1333
01:30:13,040 --> 01:30:17,200
आप चाहते हो कि मैं वेद बिल्कुल नहीं जानता आप मुझे बताओ वेद कैसे जानू जाके

1334
01:30:17,200 --> 01:30:21,360
पढ़ो बस ऐसी जानो और कैसे जानोगे जैसे आपने इतनी बात करना जान लिया कैसे

1335
01:30:21,360 --> 01:30:25,360
जाना तो यानी कि ब्रह्मा कुमारी के पास जाकर के वेद अगर वो पढ़ाने

1336
01:30:25,360 --> 01:30:29,440
का दावा कर रही तो वहां पढ़ लूं पढ़ लो जाओ देखो कोई बुद्धि ईश्वर ने

1337
01:30:29,440 --> 01:30:33,520
इंसान की भी तो दी है इंसान तो दी है

1338
01:30:33,520 --> 01:30:37,600
तर्क भी तो है दर्शन भी तो है अरे सिर्फ वेद थोड़ी है साथ

1339
01:30:37,600 --> 01:30:41,680
में दर्शन भी है साथ में उपनिषद भी मेरी मेरी जानकारी में जो

1340
01:30:41,680 --> 01:30:45,760
बुद्धि है वो ये है कि जिससे हमें वेद मेरी बात सुनो मेरी बात

1341
01:30:45,760 --> 01:30:50,160
सुनिए आप पहले आप ये मेरी मेरी जानकारी शब्द छोड़ दीजिए।

1342
01:30:50,160 --> 01:30:54,240
मेरी जानकारी में है। फला की जानकारी में नहीं। आप एक निश्चय बात

1343
01:30:54,240 --> 01:30:58,320
करो। तो इधर आपकी जानकारी आपकी या मेरी जान मैं कहूं जी

1344
01:30:58,320 --> 01:31:02,640
मेरी जानकारी कोई मेरी जानकारी नहीं। मैं कहता हूं जो ऋषि कहता है जो

1345
01:31:02,640 --> 01:31:06,800
जो वेद की संरचना उस हिसाब से है। मेरी मर्जी नहीं है। जहां

1346
01:31:06,800 --> 01:31:10,880
मेरी मर्जी आएगी वहां स्वार्थ आ जाएगा। वहां चीजों में बदलाव आ जाएगा।

1347
01:31:10,880 --> 01:31:12,160
वहां चीजें गड़बड़ांगी।

1348
01:31:12,160 --> 01:31:16,320
मनुष्य तो शरारती होता है ऋषी होते हैं वो निर्द होते हैं। तो आप मुझे

1349
01:31:16,320 --> 01:31:20,400
निश्चित जानकारी दीजिए कि मैं किस किस जगह जाऊं वेद पढ़ने प्रामाणिक रूप

1350
01:31:20,400 --> 01:31:24,480
से आप रेवली चले जाए गुरुकुल रेवली चले जाए आप

1351
01:31:24,480 --> 01:31:28,480
कह रहे हो ना प्रामाणिक किसी को प्रामाणिक मानने की जाके देखोगे तो बेटे

1352
01:31:28,480 --> 01:31:32,560
ऐसे थोड़ी होता है अब आप बताओ जी प्रामाणिक मैं आप कहो कि मैं पानी पीना चाहता

1353
01:31:32,560 --> 01:31:36,640
हूं मुझे बताओ प्रमाणिक पानी कहां है ये क्या बात हुई हर हर पानी प्रमाणिक

1354
01:31:36,640 --> 01:31:40,960
जाओ नदी में जाके साफ सुथरा पानी पी लो उसका फैसला भी तो करोगे मैं कहूंगा सुनो

1355
01:31:40,960 --> 01:31:45,040
मैं कहूं गंदे नाले का पानी पी लो पी लोगे आपकी आंखें हैं दिख रहा

1356
01:31:45,040 --> 01:31:49,120
अरे तो मामला खराब है और एक स्वच्छ बैरा तो आप ही लोगे तो इसमें क्या प्रमाण है? अब

1357
01:31:49,120 --> 01:31:53,280
मैंने आपको जगह बताई कि रेवली जाओ पढ़ो रेवली जाकर पढ़ो।

1358
01:31:53,280 --> 01:31:57,280
अब आप रेवली जाकर नहीं पढ़ोगे। आप सोचोगे कि मैं यही बैठे-बैठे बता

1359
01:31:57,280 --> 01:31:59,920
दूं आपको सारा कुछ वो संभव नहीं है। आपको

1360
01:31:59,920 --> 01:32:04,000
एक बड़ा लंबा समय देना होगा। बट ढंग से उसको पढ़ना होगा और अपने आप चीजें

1361
01:32:04,000 --> 01:32:08,080
स्पष्ट हो जाएंगी। कुछ भी नहीं। इतनी बहस इसलिए करनी पड़ रही है क्योंकि

1362
01:32:08,080 --> 01:32:12,320
परंपरा से जो पठनपाठन की जो विधि है उस तरह से नहीं पढ़ा गया है। इसलिए बहस

1363
01:32:12,320 --> 01:32:16,480
हो रही है। तो परंपरा क्या है आर्य समाज की? वही तो पूछ रहा हूं। रेवली

1364
01:32:16,480 --> 01:32:20,560
गुरुकुल में जा रेवली गुरुकुल किसी भी गुरुकुल में चले जाओ आर्य समाज

1365
01:32:20,560 --> 01:32:24,960
से जुड़े हुए। देखिए आप अब यहां पर देखिए क्या हो रहा है। आपने

1366
01:32:24,960 --> 01:32:29,280
कहा कि आपको किसी को गुरु को प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है।

1367
01:32:29,280 --> 01:32:33,280
परंतु जब मैं पूछ रहा हूं आपसे कि कौन सा गुरुकुल प्रमाणिक है तो आप अपने

1368
01:32:33,280 --> 01:32:37,520
आप को प्रमाण रूप में वहां ज्ञापित कर रहे। हां देखो क्या है हमें ये भी देखना

1369
01:32:37,520 --> 01:32:41,920
है कि कहां पठनपाठन विधि पूर्वक हो रहा है। वेदोक्त विधि जो पठन पाठन किया

1370
01:32:41,920 --> 01:32:46,000
आप ये चाहते हो आप ये चाहते हो कि मैं आपको प्रमाण मान लूं। आप ये चाहते हो कि

1371
01:32:46,000 --> 01:32:50,160
मैं आपको प्रमाण नहीं मुझे नहीं बेटे मुझे नहीं फिर गलती कर रहे हो आप। मुझे क्यों प्रमाण मान रहे हो? मैं थोड़ी

1372
01:32:50,160 --> 01:32:54,560
प्रमाण हूं। मैं नहीं मैं नहीं जो लोग इस विषय में परिश्रम

1373
01:32:54,560 --> 01:32:58,400
कर रहे हैं जिन्होंने जीवन खपाया है उनके पास जाओ उनके

1374
01:32:58,400 --> 01:33:02,400
पास जाओ थोड़ी कोई सड़क चल आदमी कुछ भी कहने लगे आप जो बीटेक करना

1375
01:33:02,400 --> 01:33:06,720
चाहते हो तो किसी जाके आर्ट के स्कूल से थोड़ी बीटे होगी बीटेक के कॉलेज अलग है

1376
01:33:06,720 --> 01:33:10,960
इंजीनियरिंग और दूसरी मेडिकल के अलग है तो ऐसे जाके जाके देखना पड़ेगा आपको विद्याएं

1377
01:33:10,960 --> 01:33:15,040
तो सीखने से आती है बेटे कैसे तय करूं जाने से पहले

1378
01:33:15,040 --> 01:33:19,200
कि आप जाओ ना यार तय कैसे करोगे आप जाओ ना वहां जाके पढ़ो आप कह रहे हो मैं तय करूं

1379
01:33:19,200 --> 01:33:21,360
कैसे आप स्कूल स्कूल जाते हो जैसे

1380
01:33:21,360 --> 01:33:25,360
तय करते हो स्कूल जाके आपके द्वारा बताया मैं क्यों जाऊं आपके द्वारा बताए

1381
01:33:25,360 --> 01:33:29,440
हुए मैं क्यों जाऊं किसी और में मत जाओ मत जाओ फिर आप ये तो आपकी यानी

1382
01:33:29,440 --> 01:33:33,760
कोई यानी कि कोई निश्चित नियम नहीं है आपके पास पहचान फिर वही मैंने आपको निश्चित

1383
01:33:33,760 --> 01:33:37,760
नियम बताया कि ऐसे पढ़ लो आप कह रहे मैं आपको ये बात मानूंगा नहीं तो फिर मैं कैसे आप

1384
01:33:37,760 --> 01:33:41,840
कह रहे हो कि मैं मुंह से नहीं खाऊंगा मैं कान से खाऊंगा मुझे प्रमाणित करो

1385
01:33:41,840 --> 01:33:45,840
कि मुंह से ही खाना होता है आप मुझे प्रमाणित करो कि मुंह से ही खाया जाता है ये क्या

1386
01:33:45,840 --> 01:33:50,000
बात है आप आप नियम नहीं बता रहे हो आप सीधे बोल रहे हो वहां चले जाओ नियम

1387
01:33:50,000 --> 01:33:50,880
नहीं है

1388
01:33:50,880 --> 01:33:54,880
बेटे पद्धति तो है ना आप स्कूल तो गए हो ना बच्चे आप स्कूल गए हो

1389
01:33:54,880 --> 01:33:59,200
पढ़ने के लिए इतने वर्ष भाषा सीखी तब तो बातचीत करनी आई ना

1390
01:33:59,200 --> 01:34:03,520
ऐसे संस्कृत पढ़नी भी आ जाएगी जैसे आप जाओगे तो आ जाएगी वो कोई ऐसी बड़ी बात नहीं

1391
01:34:03,520 --> 01:34:07,680
मैं पूछ रहा हूं कि आपने मुझे शास्त्रोक्त कोई विधि

1392
01:34:07,680 --> 01:34:11,760
तो बताई नहीं है कि वहां अरे विधि तो वो बेटे वो बताएंगे ना मैं कैसे विधि बताऊंगा

1393
01:34:11,760 --> 01:34:15,760
आपको तो फिर वहां मैंने बता दिया आपको सुनो नहीं जाने

1394
01:34:15,760 --> 01:34:19,920
से पहले मेरी बात सुनो आप कह रहे हो जाने से पहले मैं उसको मैं उसको प्रमाणिक क्यों मानू

1395
01:34:19,920 --> 01:34:24,160
ये पूछ रहा हूं ना मानू आपके प्रमाण मानने से क्या है आप नहीं मानोगे तो कोई चीज प्रमाणिक

1396
01:34:24,160 --> 01:34:28,160
नहीं होगी आप कल को कहोगे मैं तो गणित को नहीं मानता मैं सूर्य को कुछ नहीं मानते इस

1397
01:34:28,160 --> 01:34:32,400
संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं वो कहते हैं सूर्य कोई चीज देवता ही नहीं है

1398
01:34:32,400 --> 01:34:37,120
तो फिर आप ठीक है वो नहीं है तो नहीं है बात खत्म आप उनको कैसे मनाओगे

1399
01:34:37,120 --> 01:34:37,620
आपके

1400
01:34:37,360 --> 01:34:42,000
पास निश्चित निश्चित नियमावली नहीं है प्रमाणिक अथवा अप्रामाणिक में अंतर करने की

1401
01:34:42,000 --> 01:34:46,000
मेरी बात सुनो मैं तो आपको बता रहा हूं जो ऋषियों के द्वारा दी गई चीजें वो प्रमाणिक है जो मनुष्य

1402
01:34:46,000 --> 01:34:50,080
के द्वारा प्रचलित है वो अप्रामाणिक है तो कैसे पता पता करें। ये ऋषियों के द्वारा दिया

1403
01:34:50,080 --> 01:34:54,880
गया है जो आर्य समाज बता रहा है। पढ़ो पढ़ो

1404
01:34:54,880 --> 01:34:58,880
अध्ययन ही इसका एकमात्र उपाय है अध्ययन। ये

1405
01:34:58,880 --> 01:35:02,880
जो आप कर रहे हो ये वाघ विलास है। वाग विलास इसके अलावा कुछ नहीं है।

1406
01:35:02,880 --> 01:35:07,040
आप एक स्टैंड लेके बैठे हो और आप तय करके बैठे हो कुछ मुझे ऐसा ही

1407
01:35:07,040 --> 01:35:11,920
करना है। तो फिर ये तो इसका तो किसी के पास भी इलाज नहीं होता। यानी यानी कि मैं

1408
01:35:11,920 --> 01:35:16,240
इंटरनेट खोलूं वहां से वेद डाउनलोड करूं और पढ़ लढू। पढ़ो पढ़ो पढ़ो कहीं

1409
01:35:16,240 --> 01:35:20,240
भटकोगे कुछ उलटम पलटम करोगे तो कुछ शायद समझ में भी आए ये आपकी इच्छा है ना

1410
01:35:20,240 --> 01:35:24,240
बेटा आपको स्कूल जाना है मैं सेंट मैरी में जाऊं मैं डीएवी में जाऊं

1411
01:35:24,240 --> 01:35:28,240
मैं सनातन धर्म वाले में जाऊं जिसे मर्जी जाओ पढ़ो पढ़ना ही उपाय है

1412
01:35:28,240 --> 01:35:30,000
और कोई उपाय नहीं आप सोचो

1413
01:35:30,000 --> 01:35:34,080
मैं ही सिद्ध कर दूं ना मैं प्रमाण हूं मैं एक मनुष्य हूं और

1414
01:35:34,080 --> 01:35:38,400
मनुष्य होने के नाते जितनी जानकारियां मैंने जुटाई है इधर उधर से पढ़ने पाठन

1415
01:35:38,400 --> 01:35:42,480
करने से वही जानकारियां आपको उतना ही समय लगेगा आप ये ना समझे

1416
01:35:42,480 --> 01:35:46,560
कि आप गलत जगह भी जाइए अगर आपको ऐसा लगता है ना कि मेरे जगह से नहीं

1417
01:35:46,560 --> 01:35:50,560
जाना है तो आप जहां जाना चाहते हो वहां जाके पढ़ लो। पढ़ो तो सही। आप मुझे आप

1418
01:35:50,560 --> 01:35:54,560
मुझे सिद्धांत नहीं बता रहे हैं ना। सिद्धांत तो बताइए कि [हंसी] आपके द्वारा बताई गई

1419
01:35:54,560 --> 01:35:58,640
जगह को क्यों चुने? मैं आपको सारी बात बता चुका हूं। जब इस पडकास्ट को आप या जो

1420
01:35:58,640 --> 01:36:02,880
भी कर रहे हो इसको रिकॉर्ड किए इसको आप सुनोगे तो आपको सब पता चल जाएगा।

1421
01:36:02,880 --> 01:36:06,960
अब एक दो तीन चार की गिनती है। आप कहो जी पहले मुझे प्रमाण दो कि एक दो तीन

1422
01:36:06,960 --> 01:36:10,960
चार है और किसी से तब मैं शुरू करूंगा पढ़ना। ऐसे नहीं होता। हां तो इसका मतलब

1423
01:36:10,960 --> 01:36:15,040
किसी पे मुझे विश्वास करना है ना किसी पे हां तो जिस पे भी विश्वास करके

1424
01:36:15,040 --> 01:36:19,200
पढ़ो पढ़ो बिल्कुल पढ़ो ना अरे स्वामी कहते हैं कि

1425
01:36:19,200 --> 01:36:23,600
अगर वो पुराण ना पढ़ते तो उनको ये भी ना पता चलता कि इसमें क्या है वो तो कहते

1426
01:36:23,600 --> 01:36:27,600
तभी समझ में आएगा क्या ठीक है क्या बुरा मैं कह रहा हूं वही मैं कह रहा हूं दयानंद जी ने

1427
01:36:27,600 --> 01:36:31,600
किस पर विश्वास किया था ईश्वर पे नहीं

1428
01:36:31,600 --> 01:36:35,760
ईश्वर मुझे मुझे आप ईश्वर के पास भेज रहे हो क्या [हंसी]

1429
01:36:35,760 --> 01:36:40,000
आप चले जाओ उन्होंने ईश्वर को आगे 17 साल लगाए पहले तो उन्होंने

1430
01:36:40,000 --> 01:36:45,120
अपने आप को शुद्ध किया फिर उनको पता चला पढ़ना है तो

1431
01:36:45,120 --> 01:36:45,620
चले

1432
01:36:45,280 --> 01:36:49,440
गए दंडीजानंद जी के पास उस समय जो व्याकरण पढ़ाया करते थे उस समय

1433
01:36:49,440 --> 01:36:53,520
स्वर्णानंद जी ने कहा कि व्याकरण पढ़ाने वाले भारतवर्ष में सबसे बढ़िया व्यक्ति है तो

1434
01:36:53,520 --> 01:36:57,520
वहां चले गए पढ़ने अब वो कहे नहीं जी पहले तो मुझे ये बताओ ये प्रमाणिक है क्या

1435
01:36:57,520 --> 01:37:01,680
भाई जब जाओगे पढ़ोगे बेटे खाओगे तो पता चलेगा ये रोड़ा आ गया

1436
01:37:01,680 --> 01:37:06,560
ये चबाने योग्य नहीं है इसको थूक दो ये खाने योग्य है इसको खा लो

1437
01:37:06,560 --> 01:37:10,640
सबकी बुद्धि इतनी काम करती है यहां कोई कुछ नहीं यहां जितना आप फैला रहे हो उतना है नहीं

1438
01:37:10,640 --> 01:37:15,040
कुछ भी दो परंपरा है एक साकार परंपरा एक निराकार परंपरा

1439
01:37:15,040 --> 01:37:19,120
आपकी इच्छा है आपको शरीर के रूप में लेना तो आप साकार हो आत्मा के रूप में

1440
01:37:19,120 --> 01:37:23,360
ले तो आप निराकार हो और भारत की परंपरा है इसमें इतनी लंबी बहस

1441
01:37:23,360 --> 01:37:27,360
करने का कुछ मतलब है नहीं ठीक है नहीं आपने जैसे

1442
01:37:27,360 --> 01:37:31,440
कहा ना कि खाने पे पता चलेगा तो बात ये है कि जो खाने पे पता चल

1443
01:37:31,440 --> 01:37:35,520
रहा है कि ये खाना नहीं है रोड़ा है ये हमको व्यवहार जगत में ही हम इसका

1444
01:37:35,520 --> 01:37:40,400
निर्णय कर सकते हैं मगर ऐसे ही हो जाएगा उसका भी हो जाएगा जिसको हम

1445
01:37:40,400 --> 01:37:44,640
जिसको हम वेद विद्या मान [गला साफ़ करने की आवाज़] करके मोक्ष की कामना कर रहे हैं

1446
01:37:44,640 --> 01:37:48,960
वो व्यवहार जगत में हम लोग सिद्ध नहीं कर सकते उसमें तो हमें किसी ना किसी क्यों नहीं कर सकते

1447
01:37:48,960 --> 01:37:52,960
क्यों नहीं सिद्ध कर सकते क्यों नहीं सिद्ध कर सकते

1448
01:37:52,960 --> 01:37:57,520
बताइए क्या सिद्ध करना चाहना बताओ मुझे आप क्या पूछना कैसे सिद्ध करना उसको

1449
01:37:57,520 --> 01:38:00,400
एक मंत्र गायत्री मंत्र गायत्री मंत्र से मोक्ष

1450
01:38:00,400 --> 01:38:04,480
मिल रहा है ये सिद्ध कैसे होगा सिद्ध थोड़ी होना चाहिए कैसे

1451
01:38:04,480 --> 01:38:08,880
सिद्ध होगा [हंसी] तो इसका मतलब इसका मतलब यहां लोग

1452
01:38:08,880 --> 01:38:13,200
रो है कि नहीं है वो तय नहीं सुनो सुनो गायत्री मंत्र से मोक्ष नहीं होता मोक्ष

1453
01:38:13,200 --> 01:38:17,280
तो जब आपके सारे जब आप जीना सीखते हो अपने कर्मों के बंधनों को काट देते

1454
01:38:17,280 --> 01:38:21,440
हो सारे कर्म समाप्त होते तो मुक्ति मिल जाती है उसमें गायत्री मंत्र का कुछ बीच

1455
01:38:21,440 --> 01:38:26,080
में रोला नहीं है कि गायत्री मंत्र से ही मोक्ष मिलेगा फला मंत्र से मोक्ष मिलेगा

1456
01:38:26,080 --> 01:38:30,080
मंत्र तो हां मंत्र तो है ना आपकी शक्तियां

1457
01:38:30,080 --> 01:38:34,320
जो है जो बिखरी हुई है उनको आप बांध लेते हो किसी मंत्र के माध्यम

1458
01:38:34,320 --> 01:38:38,320
से और जब वो शक्तियां बंध जाती है तो उसके अच्छे परिणाम आते

1459
01:38:38,320 --> 01:38:42,400
हैं। अगर हम मंत्र का आश्रय ना ले तो पता नहीं आदमी क्या सोच के बैठ जाए।

1460
01:38:42,400 --> 01:38:46,720
यह भगवान है। वो कहता है यह भगवान है। तो कुछ भी मान के बैठे मंत्र से शक्तियां

1461
01:38:46,720 --> 01:38:50,880
बंधती है। हां जो आपकी शक्ति है आपकी जो शक्ति है वो मंत्र

1462
01:38:50,880 --> 01:38:54,960
से एकाग्र हो जाती है। कौन सी? जो मान

1463
01:38:54,960 --> 01:38:59,040
आपकी मन की शक्तियां है। आपकी बुद्धि की शक्तियां है। जो आपका मन

1464
01:38:59,040 --> 01:39:03,440
एक विषय में 20 चीजें सोचता है। एक थोड़ी देर में कुछ सोचेगा,

1465
01:39:03,440 --> 01:39:07,440
थोड़ी देर में कुछ सोचेगा, थोड़ी देर में कुछ सोचेगा। तो इसको जो बिखराव है ना जो

1466
01:39:07,440 --> 01:39:11,520
मल्टीपल ये ट्रांसफर हो रहा है कभी इस सब्जेक्ट पर कभी इस सब्जेक्ट के कभी इस सब्जेक्ट पर

1467
01:39:11,520 --> 01:39:15,600
उसको इन सब से हटा के एक मंत्र पर ले आओ तो अब आपके पास

1468
01:39:15,600 --> 01:39:19,600
एक मंत्र है अब आपका 20 विषय नहीं है जो आपके दिमाग को खा रहे थे और

1469
01:39:19,600 --> 01:39:23,600
जिन जिन विषयों के चिंतन का कोई लाभ भी नहीं था अब अब आपके

1470
01:39:23,600 --> 01:39:27,600
पास एक एक चिंतन है बस तो जब आप एक मंत्र के माध्यम

1471
01:39:27,600 --> 01:39:31,680
से बहुत सारी विचारधारा जो मन में उठ रही थी तरह-तरह की उसको

1472
01:39:31,680 --> 01:39:36,320
आपने समाप्त करके एक मंत्र का सहारा लेकर अपने आप को एक विचारधारा पे ले आए

1473
01:39:36,320 --> 01:39:40,400
अब आपने इतना काम तो कर लिया कि आपने मन के भटकाव को इतनी जगह से कम

1474
01:39:40,400 --> 01:39:44,480
से कम एक जगह ले आए और वहां से फिर उसको प्रवेश कराएंगे हम ईश्वर

1475
01:39:44,480 --> 01:39:48,640
में। जब वो हमारी शक्ति एकदम इकट्ठी हो जाएगी फिर उसे ईश्वर में प्रवेश कराएंगे।

1476
01:39:48,640 --> 01:39:52,640
तो मंत्र जो है मनुष्य की शक्तियों को मैं समझ गया। मैं समझ गया। मैं

1477
01:39:52,640 --> 01:39:56,720
समझ गया। तो गायत्री मंत्र से बुद्धि हमारी एक जगह आ जाती है। एक तो ये

1478
01:39:56,720 --> 01:40:00,800
माना कि मंत्र से बुद्धि एक जगह। मन के विचार दूसरी

1479
01:40:00,800 --> 01:40:05,120
बात यह है। दूसरी बात यह है कि एक जगह आ जाने पर बुद्धि का

1480
01:40:05,120 --> 01:40:09,120
बुद्धि का एक जगह आ जाने पर मोक्ष हो ही जाएगा। इस विषय में नहीं नहीं मोक्ष

1481
01:40:09,120 --> 01:40:13,200
नहीं होगा। वो विषय के समझने योग्य हो जाएगी। आप समझे मेरी बात जब

1482
01:40:13,200 --> 01:40:17,200
बुद्धि एकाग्र होगी तो गढ़ विषय को समझ पाएगी क्योंकि ईश्वर दुनिया

1483
01:40:17,200 --> 01:40:21,360
का सबसे गढ़ विषय है। आप जो कहते हैं ना कोई कोई कहे जी मेडिकल

1484
01:40:21,360 --> 01:40:25,520
बड़ा मुश्किल है। परमाणु मुश्किल है। संसार का सबसे मुश्किल विषय ईश्वर

1485
01:40:25,520 --> 01:40:30,000
है और इसके लिए बड़ी सूक्ष्म बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। इसी को तप कहते हैं।

1486
01:40:30,000 --> 01:40:30,800
ये बात है।

1487
01:40:30,800 --> 01:40:34,800
यही यही मैं कह रहा था कि वो इतना सूक्ष्म विषय है कि उसका इस तरह से हम यहां

1488
01:40:34,800 --> 01:40:39,040
पर निर्णय नहीं कर सकते कि ये रोड़ा है या भोजन है। वो इतना सूक्ष्म

1489
01:40:39,040 --> 01:40:43,040
विषय है। तो इसलिए ही इस विषय में हमको किसी ना किसी आप

1490
01:40:43,040 --> 01:40:47,040
मेरी बात यह जो व्यवहारिक विषय हैं उनमें रोड़ा और भोजन

1491
01:40:47,040 --> 01:40:51,280
का प्रमाण है। जी ईश्वर विषय में नहीं समझे आप

1492
01:40:51,280 --> 01:40:56,400
यही बात है। जी जी ठीक है। तो मेरे ख्याल से

1493
01:40:56,400 --> 01:41:00,480
कुल मिलाकर के हमारे पास ये नहीं है कि किसी चीज को प्रमाणिक वेद के

1494
01:41:00,480 --> 01:41:04,480
विषय में कैसे किसी चीज को अप्रामाणिक और किसी को प्रमाणिक कैसे माना जाए।

1495
01:41:04,480 --> 01:41:08,640
जैसे हम लोग स्कूल जाते हैं मान लीजिए तो स्कूल जाते समय या अपने बच्चे

1496
01:41:08,640 --> 01:41:12,720
को एडमिशन दिलाते समय हम विश्वास करते हैं कि यह वही शिक्षा

1497
01:41:12,720 --> 01:41:16,880
दे रहा है जिस शिक्षा के द्वारा हमको अभीष्ट फल की प्राप्ति होती

1498
01:41:16,880 --> 01:41:20,960
है। तब हम स्कूल भेजते हैं। या तो हम या तो हम

1499
01:41:20,960 --> 01:41:25,120
या तो हम हमारे पूर्वज भी उसी स्कूल से पढ़े हैं। उन्होंने वहीं से सफलता

1500
01:41:25,120 --> 01:41:26,800
पाई है। ऐसा है। हां जी।

1501
01:41:26,800 --> 01:41:30,960
हां जी। तो दयानंद जी के पूर्वज कौन थे जो कहां से पढ़े थे जहां से उनको

1502
01:41:30,960 --> 01:41:35,120
सफलता मिली थी? के पूर्व कहने कहने

1503
01:41:35,120 --> 01:41:39,360
का मतलब हम लोग यहां पे क्यों आए मैं बता दूं क्यों आए सुनो जी क्या है

1504
01:41:39,360 --> 01:41:43,360
उनके जो पिताजी थे कृष्ण जी तिवारी औदित्य ब्राह्मण थे उनके गर्भ

1505
01:41:43,360 --> 01:41:47,520
के अंदर वेद पाठ की बड़ी अच्छी परंपरा थी और उनको

1506
01:41:47,520 --> 01:41:51,680
उसी समय में हां उनके यहां परंपरा थी वेद पाठ

1507
01:41:51,680 --> 01:41:53,040
की यानी कि उनको

1508
01:41:53,040 --> 01:41:57,040
वेद वेद वगैरह वेद मंत्र जो है वो अपने पिताजी से मिले हैं हां

1509
01:41:57,040 --> 01:42:01,040
भाई पिताजी से नहीं उनके यहां ब्राह्मण आचार्य जो आदि आया करते थे उनको याद करते थे तो उनको

1510
01:42:01,040 --> 01:42:05,120
शुक्ल यजुर्वेद उसी समय याद हो गया था। तो शुक्ल यजुर्वेद हां

1511
01:42:05,120 --> 01:42:09,200
ठीक है। शुक्ल यजुर्वेद उनको उनके यहां आने वाले आचार्य उनको याद

1512
01:42:09,200 --> 01:42:10,400
हो गया था। जी हां जी हां

1513
01:42:10,400 --> 01:42:14,480
यानी कि शुक्ल यजुर्वेद के विषय में जो उनके आने वाले आचार्य हैं

1514
01:42:14,480 --> 01:42:18,720
वो दयानंद जी के प्रमाण है। संगीिता उन्होंने

1515
01:42:18,720 --> 01:42:21,680
संगीिता बताई सिर्फ संगीिता पाठ केवल पाठ। ठीक

1516
01:42:21,680 --> 01:42:25,760
है। ठीक है। पाठ जो है ना वो अलग है, अर्थ अलग है। तो

1517
01:42:25,760 --> 01:42:30,000
पहले शुद्ध पाठ होना जरूरी है। तो उनको शुद्ध पाठ सिखाया जो जैसे

1518
01:42:30,000 --> 01:42:34,000
मंत्रों के उच्चारण करने का एक विशेष तरीका है। ऐसे नहीं कि जैसे हम बोल रहे हैं हम

1519
01:42:34,000 --> 01:42:38,080
तो अलग बोल रहे हैं। किस किस शब्द पे आघात देना है, किस पे करना गण पाठ ये बहुत

1520
01:42:38,080 --> 01:42:42,080
सारे प्रकार के पाठ होते हैं। तो इस प्रकार से उनको जो संगीिता

1521
01:42:42,080 --> 01:42:46,080
पाठ है वो उन्होंने याद करा दिया। उस समय जो परंपरा रही होगी जो उनके पास

1522
01:42:46,080 --> 01:42:50,960
थी उसे प्रमाणित कहे अपमाण कहे जो भी उनके

1523
01:42:50,960 --> 01:42:54,960
यानी कि उनके यहां जो आचार्य आते थे उस उन पर

1524
01:42:54,960 --> 01:43:00,320
उन्होंने बिलीव किया कि यह अगर मुझे शुक्ल यजुर्वेद के पाठ बता रहे हैं

1525
01:43:00,320 --> 01:43:04,320
तो ये ये सही बता रहे हैं। ठीक है। हां। हम अब

1526
01:43:04,320 --> 01:43:08,320
अब ये बताइए जो शिवलिंग की पूजा है वो उनके घर में होती थी ना?

1527
01:43:08,320 --> 01:43:12,400
हां बिल्कुल होती थी। तो वो जो शिवलिंग की पूजा बताई वो भी आचार्य ने

1528
01:43:12,400 --> 01:43:16,640
ही बताई। हां परंपरा जो घर में चल रहा था वही बिल्कुल ठीक है।

1529
01:43:16,640 --> 01:43:20,960
तो यानी कि शिवलिंग की पूजा बताने के विषय में आचार्य जी झूठ बोल रहे हैं

1530
01:43:20,960 --> 01:43:24,960
और सुनो मेरी बात। अब एक छोटी सी बात कहूंगा। उससे आपको सब समझ में

1531
01:43:24,960 --> 01:43:29,040
आ जाएगा। एक छोटी सी बात बस। एक अंधे अंधी की

1532
01:43:29,040 --> 01:43:33,120
शादी हुई। अंधे अंधे की शादी हो गई तो अब

1533
01:43:33,120 --> 01:43:36,960
समस्या यह रही कि दोनों अंधे खाना बनाए तो कुत्ता

1534
01:43:36,960 --> 01:43:41,440
आकर मुंह मार जाए खाने में तो क्या करें तो उन्होंने फिर वो एक

1535
01:43:41,440 --> 01:43:45,440
योजना बनाई कि तुम ना यहां कुर्सी पर बैठो और मैं जब खाना बनाऊंगी तो

1536
01:43:45,440 --> 01:43:49,440
बांस फड़फड़ाते रहा करो जमीन पे ऐसे बजाते रहो ताकि पशु आदि ना आए तो

1537
01:43:49,440 --> 01:43:53,520
ऐसे करके उनके यहां चलने लगा काम कालांतर में उनके संतान

1538
01:43:53,520 --> 01:43:57,520
हो गई संतान थी आंखों वाली हम लेकिन आंखों वाली थी

1539
01:43:57,520 --> 01:44:01,680
तो वो भी यही देखती थी कि जब खाना बनता है तो पिताजी बांस फटाने लगते

1540
01:44:01,680 --> 01:44:05,840
हैं। तो फिर वो बड़ा हुआ। उसका विवाह

1541
01:44:05,840 --> 01:44:10,080
हो गया। उसकी पत्नी भी आंखों वाली थी। वो भी आंख वाला था। अब उसकी

1542
01:44:10,080 --> 01:44:14,160
पत्नी लगी खाना बनाने। तो उसने क्या करा कि वो बांस उठा के ऐसे

1543
01:44:14,160 --> 01:44:18,240
फटपटा के बजाने लगा। तो उसने कहा अच्छा जी ये क्यों बजाते हो? तो कहा जी देखो

1544
01:44:18,240 --> 01:44:22,320
मुझे तो पता नहीं ये हमारी ना परंपरा है। मेरे पिताजी बजाया करते थे और भोजन

1545
01:44:22,320 --> 01:44:26,480
के समय बजाते थे तो मुझे भी इसको बजाना ही है। तो जिस रूप में वो

1546
01:44:26,480 --> 01:44:30,480
क्यों बजाते थे कि वो अंधे थे बेचारे इसलिए बजाते आंख वाला भी बजा रहा है। इसीलिए बजा रहा है कि

1547
01:44:30,480 --> 01:44:34,560
उसने विचार तो किया नहीं। क्यों बजा रहे हैं? वो बजा रहा है। तो ऋषि दयानंद ने उस

1548
01:44:34,560 --> 01:44:38,720
समय चीजें पढ़ी तो सही। बाल बुद्धि से जो उपलब्ध था वो पढ़ा। लेकिन एक

1549
01:44:38,720 --> 01:44:43,040
बात आप ध्यान रखना वही ऋषि दयानंद सरस्वती जिसे आप आज मूर्ति

1550
01:44:43,040 --> 01:44:47,120
पूजक कहना चाहते हो जिसे आज आप शिवलिंग का पुजारी कहना चाहते हो। उसी

1551
01:44:47,120 --> 01:44:51,200
व्यक्ति ने सारा जीवन लगा दिया उधेड़ने में इन सब चीजों को। वो समझ गए।

1552
01:44:51,200 --> 01:44:52,000
उनको ये समझ आ

1553
01:44:52,000 --> 01:44:56,160
गई कि ये सब चीजें मैं

1554
01:44:56,160 --> 01:45:00,160
ना आपने आप वही आ रहे हो। मुझे पता है आप ध्यान रखो इस बात का आप

1555
01:45:00,160 --> 01:45:04,240
आप दुनिया को बहलाओ मुझे नहीं बहला सकेंगे आप मैं आपके हर शब्द को पकड़

1556
01:45:04,240 --> 01:45:08,320
रहा हूं मुझे हर चीज का आपकी बिल्कुल पूरा अंदाजा है आप क्या योजना बनाए मुझे

1557
01:45:08,320 --> 01:45:12,640
इतना भी पता है जब आप कहते हो कि कोई ब्राह्मण आया उसने सिखाया वो प्रमाणिक

1558
01:45:12,640 --> 01:45:16,640
था कि नहीं था फिर आप वहां घुस जाते हो जाके भाई साहब आपके परिवार में शिवलिंग

1559
01:45:16,640 --> 01:45:20,640
के आपको भाई साहब आप प्लीज मुझे बोलने दीजिए आपसे निवेदन

1560
01:45:20,640 --> 01:45:25,280
है मुझे प्लीज बोलने दीजिए बोलने दीजिए आपसे निवेदन है विनम्र सुनिए

1561
01:45:25,280 --> 01:45:29,360
आपने एक उदाहरण दिया है फिर से आपने वही सही उदाहरण दिया है लौकिक

1562
01:45:29,360 --> 01:45:33,360
वाला उदाहरण कि हम लौकिक चीजों से पता कर सकते हैं क्या सही है और क्या

1563
01:45:33,360 --> 01:45:37,440
गलत है क्योंकि वो हमारा इंद्रियों का विषय है मगर धर्म और ब्रह्म का जो विषय

1564
01:45:37,440 --> 01:45:42,480
है वो हमारी इंद्रियों का विषय नहीं बहुत सूक्ष्म है तो उसमें हम

1565
01:45:42,480 --> 01:45:46,560
बुद्धि लगाएंगे बुद्धि लगाएंगे मगर एक जगह जाकर के हमें शब्द

1566
01:45:46,560 --> 01:45:50,560
प्रमाण मानना पड़ेगा ना किसी को और शब्द प्रमाण तो अपने आप में

1567
01:45:50,560 --> 01:45:54,800
आप कैसे किसी को शब्द प्रमाण मानोगे शब्द तो मनुष्यों के आने से शब्द के बाद शब्द आए

1568
01:45:54,800 --> 01:45:59,760
उससे पहले किस रूप में था मैं कह रहा हूं अरे भाई मेरी बात सुनो बेटे

1569
01:45:59,760 --> 01:46:04,480
जिससे हम वेद मंत्र ले रहे हैं जिससे हम वेद मंत्र ले रहे हैं भाई साहब

1570
01:46:04,480 --> 01:46:07,440
यदि हमें

1571
01:46:07,440 --> 01:46:11,440
नहीं अरे आप बीच में जब आप

1572
01:46:11,440 --> 01:46:15,520
बोलते हो सुनिए ऐसा है जब आप बोलते हो तो आप मैं आपको सुनता हूं

1573
01:46:15,520 --> 01:46:19,920
पर मैं जब आपसे कुछ बोलना चाहता हूं आप बीच में इंटरप्ट कर देते हो ये बात है

1574
01:46:19,920 --> 01:46:24,000
मुझे बोलने तो दीजिए अपनी बात बोलूं मैं आप

1575
01:46:24,000 --> 01:46:28,080
इंटरप्ट ना करो मैं एक बार बोलूं अपनी बात जी तो ऐसा है

1576
01:46:28,080 --> 01:46:32,160
कि जो छन्नी वाली बात है वो हम देख पता कर सकते

1577
01:46:32,160 --> 01:46:36,160
हैं कि वहां पर क्या सही है और क्या गलत क्योंकि वो हमारी इंद्रियों का विषय

1578
01:46:36,160 --> 01:46:40,400
है मगर जो धर्म है आपने भी कहा धर्म ब्रह्म वो अति सूक्ष्म विषय है

1579
01:46:40,400 --> 01:46:44,400
तो उसमें हम अपनी इंद्रियों से स्वतंत्र

1580
01:46:44,400 --> 01:46:48,480
रूप से व्याख्या नहीं कर सकते कि अगर हमने किसी से वेद का मंत्र लिया तो

1581
01:46:48,480 --> 01:46:52,800
हम सुनो मेरी बात एक धर्म ये कहता है कि मनुष्यों की हत्या कर दो।

1582
01:46:52,800 --> 01:46:56,880
आप भाई साहब मुझे आप मुझे बोलने दीजिए। प्लीज पूरा बोलने दीजिए। आप

1583
01:46:56,880 --> 01:47:01,440
बीच में रोक देते हैं। मुझे बोलने दीजिए। तो ऐसा है कि

1584
01:47:01,440 --> 01:47:05,440
सीधी सी बात है जब सूक्ष्म विषय है तो उसमें शब्द ही प्रमाण

1585
01:47:05,440 --> 01:47:09,440
है। जैसे कि बुद्धि का मैं बताऊं आपको सत्यार्थ प्रकाश में एक

1586
01:47:09,440 --> 01:47:14,000
जगह आया नियोग विषय। वहां पर जब पूर्व पक्ष रखते हुए

1587
01:47:14,000 --> 01:47:18,000
दयानंद जी ने यह बताया कि यह व्यभचार जैसा लग रहा है।

1588
01:47:18,000 --> 01:47:22,240
मतलब वहां पर पूर्व पक्ष को रखने वाला एक व्यक्ति मान लीजिए तो वो क्वेश्चन कर रहा है कि

1589
01:47:22,240 --> 01:47:22,740
जो नियोग

1590
01:47:22,720 --> 01:47:26,960
है मुझे व्यभचार जैसा लग रहा है। तो वहां दयानंद जी ने कहा कि भैया

1591
01:47:26,960 --> 01:47:31,200
जिन विषयों में शास्त्र ही प्रमाण है उसको शास्त्र को ही हमको प्रमाण मानना पड़ेगा।

1592
01:47:31,200 --> 01:47:35,200
वहां पर अपनी बुद्धि काम नहीं कर सकती है। सीधी बात ठीक

1593
01:47:35,200 --> 01:47:39,600
है? तो इसी तरीके से यह जो धर्म और ब्रह्म का विषय है यह अति सूक्ष्म

1594
01:47:39,600 --> 01:47:43,680
विषय है। तो इन विषयों में हम लोग लौकिक दृष्टि से स्वतंत्र रूप से

1595
01:47:43,680 --> 01:47:47,760
तय नहीं कर सकते कि क्या सही है और क्या गलत है। तो ऐसे में ये

1596
01:47:47,760 --> 01:47:51,920
जो ये है किस लिए वैसे भाई साहब एक मिनट मुझे पूरा करने लेने दीजिए। मुझे

1597
01:47:51,920 --> 01:47:56,080
पूरा मुझे पूरा तो करने दीजिए। मेरी बात पूरी होती ही नहीं है। मुझे

1598
01:47:56,080 --> 01:48:00,160
पूरा करने दीजिए प्लीज। मेरा निवेदन है आपसे। पूरा तो

1599
01:48:00,160 --> 01:48:06,160
करने दीजिए। बहुत अच्छा चल रहा है चर्चा। फिर

1600
01:48:06,880 --> 01:48:11,120
आप मुझे मेरी लाइन तो पूरी करने दीजिए भाई साहब। नहीं नहीं नहीं [गला साफ़ करने की आवाज़] सुनिए आप सर

1601
01:48:11,120 --> 01:48:15,200
मैं आप देखो अगर आप ऐसे बोलेंगे और एक बिल्कुल ही और आप

1602
01:48:15,200 --> 01:48:19,360
ना बहुत भाई साहब मेरी बात पूरी हो जाने दीजिए भाई साहब मेरी

1603
01:48:19,360 --> 01:48:25,360
बात पूरी हो जाने दीजिए मैं यह कह रहा हूं

1604
01:48:26,480 --> 01:48:30,640
बात तो पूरी होने दीजिए भाई साहब आप बीच में बार-बार बोलते हैं मैं कितनी विनम्रता

1605
01:48:30,640 --> 01:48:34,800
से आपसे निवेदन कर रहा हूं मेरी कोई लाइन आप पूरी नहीं होने दे रहे हो चलिए

1606
01:48:34,800 --> 01:48:38,880
मैं पूरी कर लेता हूं तो ऐसा है कि जो अति सूक्ष्म विषय है

1607
01:48:38,880 --> 01:48:43,040
उसमें उसमें हम स्वतंत्र रूप से व्याख्या कैसे करेंगे? उसमें तो हमें शब्द ही प्रमाण

1608
01:48:43,040 --> 01:48:45,840
मानना पड़ेगा। और जब शब्द को प्रमाण मान रहे हैं। जैसे

1609
01:48:45,840 --> 01:48:50,080
मान लीजिए हमने किसी आचार्य को ये माना कि इससे हमारे पास यजुर्वेद आया है।

1610
01:48:50,080 --> 01:48:54,240
वही आचार्य बता रहा है कि भैया यहां शिवलिंग की पूजा हो रही है। वेदों के अनुसार

1611
01:48:54,240 --> 01:48:58,240
हो रही है। और हम कह रहे और हम ये कह रहे हैं कि नहीं इस विषय में तुम

1612
01:48:58,240 --> 01:49:02,400
झूठ बोल रहे हो। तुम अंधे हो। हमें पता है कि यहां पर जो है जो है गलत है।

1613
01:49:02,400 --> 01:49:06,400
तो अगर वह हमसे झूठ बोल सकता है तो वह हमको गलत मंत्र

1614
01:49:06,400 --> 01:49:10,480
भी दे सकता है। और यदि वो हमें सही मंत्र दे रहा है हमें विश्वास

1615
01:49:10,480 --> 01:49:13,280
है तो फिर हमें उसके अर्थ पर भी विश्वास करना होगा। मेरा

1616
01:49:13,280 --> 01:49:17,360
ये कहना है बस। जी जब आप ऋषि दयानंद को एक मूर्ति

1617
01:49:17,360 --> 01:49:21,360
पूजक के रूप में मान रहे हो। [गला साफ़ करने की आवाज़] बचपन में वही व्यक्ति प्रबुद्ध हो

1618
01:49:21,360 --> 01:49:25,440
के मूर्ति पूजा का खंडन कर रहा है तो आप अपनी चॉइस से उसको उसी समय का प्रमाणिक

1619
01:49:25,440 --> 01:49:30,080
मान रहे हो। निराकार नहीं मान रहे

1620
01:49:30,080 --> 01:49:34,080
आप अपनी चॉइस से चल रहे हो ये मेरी और ये ध्यान रखना अब आप कहते हो धर्म और

1621
01:49:34,080 --> 01:49:38,160
विज्ञान जो धर्म और ईश्वर सूक्ष्म विषय है पर एक बात ध्यान रखना

1622
01:49:38,160 --> 01:49:42,320
ये अपने व्यावहारिक को ही शुद्ध करने के लिए है ईश्वर केवल ईश्वर

1623
01:49:42,320 --> 01:49:46,400
के लिए नहीं है धर्म केवल धर्म के लिए नहीं है ये हमारे दैनिक

1624
01:49:46,400 --> 01:49:50,480
जो नित्य व्यवहार है उनको शुद्ध करने का कारण है आप इसको व्यवहार को

1625
01:49:50,480 --> 01:49:54,560
लौकिक को और इसको अलग मत करो जो धर्म और ईश्वर है

1626
01:49:54,560 --> 01:49:58,560
वो मनुष्य के व्यवहारों को ही शोधित करने के लिए यह अलग से

1627
01:49:58,560 --> 01:50:02,800
कोई विषय नहीं है। आप ना कहे कि लौकिक ऐसा है वहां ऐसा है।

1628
01:50:02,800 --> 01:50:06,880
आप एक तरफ में उसे प्रमाण मान रहे हैं। वही व्यक्ति थोड़े समय के बाद एक दूसरी

1629
01:50:06,880 --> 01:50:10,880
बात कहता है। आप कहते नहीं अब ये प्रमाण नहीं माना जाएगा। आप कह रहे हैं कि गुरु ने उससे

1630
01:50:10,880 --> 01:50:14,960
सीखा तो उन्होंने कहा ऐसा ही है। उसके बाद वो कुछ और कहने लगे तो आप

1631
01:50:14,960 --> 01:50:20,080
ना डिपार्टली इसको ना बांट कर ना देखिए। आप बांटिए मत एक

1632
01:50:20,080 --> 01:50:24,160
मैं समझ गया। कुछ और तरह का था और बाद में उसकी बुद्धि का विकास हुआ तो उन्होंने

1633
01:50:24,160 --> 01:50:28,320
दूसरी बात कही। तो ये बात और कुछ बात ठीक ठीक अब मैं यह

1634
01:50:28,320 --> 01:50:30,800
कहना चाहता हूं इस बात पर आपकी कि अच्छा

1635
01:50:30,800 --> 01:50:34,960
मेरी समय क्या हो गया समय समय एक मिनट समय एक घंटे

1636
01:50:34,960 --> 01:50:39,200
50 मिनट हो गई हमारी चर्चा तो अब ना फिर इसको अगले उसमें

1637
01:50:39,200 --> 01:50:40,800
रखें सत्र में ठीक

1638
01:50:40,800 --> 01:50:45,600
है बस मैं अपनी एक बात कह दूं फिर अगले सत्र में रखते हैं मैं

1639
01:50:45,600 --> 01:50:49,680
कोई बात नहीं मैं मैं दयानंद जी को नहीं कह रहा था कि दयानंद जी जो है

1640
01:50:49,680 --> 01:50:53,840
पहले मूर्ति पूजक थे ना मैंने कहा कि उनके यहां जो आचार्य आते हैं जिससे

1641
01:50:53,840 --> 01:50:58,080
उन्होंने मंत्र लिए वो वहां पर बाद में उन्होंने मंत्र की दूसरी व्याख्या

1642
01:50:58,080 --> 01:51:02,240
की। अब आप कैसी बात कर रहे हो? मतलब मैं आप इतनी छोटी सी बात को बहुत बड़ी-बड़ी करके

1643
01:51:02,240 --> 01:51:06,560
करके समय नष्ट कर रहे हो। ये बात इतनी है ही नहीं। आप कह रहे हो एक आचार्य

1644
01:51:06,560 --> 01:51:10,800
आए। उन्होंने कैसे प्रमाण उन्होंने स्वयं ही बता दिया कि ये बात गलत थी।

1645
01:51:10,800 --> 01:51:13,280
अपने

1646
01:51:13,280 --> 01:51:17,280
कौन से आचार्य आए थे? जो उनके परिवार में सुनो बेटे नाम नहीं

1647
01:51:17,280 --> 01:51:21,440
होता। उनके वहां लिखा है जीवनी में। कोई आते होंगे उनके परिवार में जो भी व्यक्ति आते हो किसी का नाम

1648
01:51:21,440 --> 01:51:25,520
थोड़ी है वहां लिखा होगा। नहीं होता तो ये हिस्ट्री है कि वो ये हिस्ट्री है कि बाद में

1649
01:51:25,520 --> 01:51:27,200
उन्होंने ये कह दिया कि नहीं नहीं गलत था

1650
01:51:27,200 --> 01:51:31,200
वो सुनो जैसे जब उन्होंने व्याख्या करी तो आप इसी से बेटे अंदाजा

1651
01:51:31,200 --> 01:51:35,440
लगाओ कि उनके पिताजी रहे शिवजी के पुजारी बिल्कुल घोर और बड़े

1652
01:51:35,440 --> 01:51:39,600
बड़े अच्छे वाले मतलब जिनको आप कह सकते हो बिल्कुल शव मत के बड़े अच्छे वो मानने

1653
01:51:39,600 --> 01:51:43,600
वाले थे और उनकी शिव जी के प्रति बड़ी आस्था थी। इसमें कोई खराब बात भी

1654
01:51:43,600 --> 01:51:47,600
नहीं है। लेकिन ऋषि दयानंद सरस्वती जी ने अपने पिता

1655
01:51:47,600 --> 01:51:51,920
के द्वारा जो उनकी परंपरा से था, अच्छा था, बुरा था,

1656
01:51:51,920 --> 01:51:55,920
उन्होंने ठीक गुरु से समझा कि गलत गुरु से समझा हमें नहीं

1657
01:51:55,920 --> 01:52:00,320
पता। लेकिन ऋषि दयानंद सरस्वती ने 17 18 वर्ष लगाए

1658
01:52:00,320 --> 01:52:04,400
इस बात को जानने के लिए कि जो ये जो चल रहा है ये युक्ति

1659
01:52:04,400 --> 01:52:06,400
संगत तर्क संगत है कि नहीं?

1660
01:52:06,400 --> 01:52:10,400
व्यावहारिक है कि नहीं? यह चीजें वैसी है कि नहीं जैसी कही जा रही

1661
01:52:10,400 --> 01:52:14,560
है और 181 19 वर्ष उन्होंने तपस्या करी जिसमें उन्होंने

1662
01:52:14,560 --> 01:52:18,560
लगभग 17 बार विष पिया जहर का भी उनको 17 बार जहर दिया

1663
01:52:18,560 --> 01:52:22,560
गया कि व्यक्ति चुप कर जाए ना बोले तो लेकिन वो फिर भी लोक कल्याण

1664
01:52:22,560 --> 01:52:26,560
के लिए गए। अच्छा उन्होंने एक और मैं बात बताऊं आपको ऋषि दयानंद सरस्वती स्वयं लिखते

1665
01:52:26,560 --> 01:52:30,880
हैं कि मैं कोई नई मत परंपरा नहीं शुरू करना चाहता। मेरा

1666
01:52:30,880 --> 01:52:34,880
वही मान्यता है जो ब्रह्मा से ले जैमिनी पर्यंत ऋषियों ने कहा है।

1667
01:52:34,880 --> 01:52:39,120
वो स्वयं लिखते हैं। ब्रह्मा कुमारी वाले भी कहते हैं। ये चलो कहते होंगे देखो

1668
01:52:39,120 --> 01:52:43,120
मेरी बात सुनो जी या तो आप ब्रह्मा कुमारी वाले को लेके आओ। आप सबके ठेकेदार मत बनो।

1669
01:52:43,120 --> 01:52:47,360
ये फलाना भी कहता है ढिमका आप किस वर्ग से हो मुझे उस वर्ग की बात करो। ऐसे

1670
01:52:47,360 --> 01:52:51,360
बातें बिखर जाती है। वो कहते होंगे मुझे क्या पता। कोई कहेगा जी मैं तो हाथों के बल

1671
01:52:51,360 --> 01:52:55,600
चलता हूं तो पैरों के बल चला ही नहीं जाता। अब तो मैं हाथों के बल चला तो चले भाई। इसमें

1672
01:52:55,600 --> 01:52:59,600
क्या अब किस बात को ले तर्क करो। अच्छा चलिए छोड़िए मैं वो मैं

1673
01:52:59,600 --> 01:53:00,100
वो कह

1674
01:53:00,000 --> 01:53:04,320
रहा हूं कि दयानंद जी ने जिससे वेद मंत्र लिए उस पर दयानंद जी को विश्वास

1675
01:53:04,320 --> 01:53:08,880
नहीं था बाद में उन्होंने वेदों की स्वतंत्र व्याख्या की अपनी बुद्धि से

1676
01:53:08,880 --> 01:53:12,880
ठीक है अब उन विश्वास नहीं था उस समय तो उन्होंने याद कर ही लिया था ना एक

1677
01:53:12,880 --> 01:53:16,880
मिनट आपने कहा एक जगह कि हमें परंपरा से पठनपाठन करना चाहिए पर

1678
01:53:16,880 --> 01:53:21,120
आप वहीं पर दूसरी जगह कह रहे हैं कि दयानंद जी ने परंपरा से पठनपाठन

1679
01:53:21,120 --> 01:53:25,120
नहीं किया क्योंकि उनके यहां की जो परंपरा थी उसके विरुद्ध उन्होंने 17 साल जाकर के

1680
01:53:25,120 --> 01:53:29,200
पढ़ाई की और जो है उन्होंने अपना स्वतंत्र हां बिलकुल बिलकुल

1681
01:53:29,200 --> 01:53:33,440
बिलकुल तो अब इसी के लिए उन्होंने जीवन लगाया

1682
01:53:33,440 --> 01:53:37,600
और लोगों को ये समझाने की कोशिश की कि मैंने जैसे मैंने अपना जीवन नष्ट कर दिया बिना

1683
01:53:37,600 --> 01:53:41,760
बात के तो मैं ऐसी परंपरा चीजें बना के जाऊंगा कि लोगों का जीवन नष्ट ना हो।

1684
01:53:41,760 --> 01:53:45,840
उनको चीजें जल्दी और रिफाइन रिफाइन रूप में समझ में आ जाए। यानी

1685
01:53:45,840 --> 01:53:50,240
कि वो स्वयं तो परंपरा को तोड़ रहे हैं। मगर आगे चाहते हैं कि लोग परंपरा

1686
01:53:50,240 --> 01:53:54,400
को थोड़ी तोड़ रहे हैं। बेटे प्राइमरी क्लास में पढ़ने वाला बीए में पढ़ने लगे

1687
01:53:54,400 --> 01:53:58,400
तो वो मैथ की परंपरा तोड़ रहा है। अरे पांचवी का मैथ अलग है, बीए

1688
01:53:58,400 --> 01:53:59,360
का मैथ अलग है।

1689
01:53:59,360 --> 01:54:03,680
आप क्या बात करते हो? कैसे परंपरा टूट गई भाई? उसने गणित के परिष्कृत

1690
01:54:03,680 --> 01:54:07,680
रूप को समझा है। जो पांचवी क्लास में वो नहीं समझ सकता था। वो एमए में

1691
01:54:07,680 --> 01:54:12,000
समझ पाया। उसकी बुद्धि अब आप कैसे कहोगे कि एमए वाला ठीक है कि प्राइमरी

1692
01:54:12,000 --> 01:54:15,040
वाला ठीक है। कैसे कहोगे? अलग-अलग है। ये बीए बीए

1693
01:54:15,040 --> 01:54:19,120
में जाने के बाद यह नहीं होता है कि पांचवी की पढ़ाई गलत है। यहां गलत

1694
01:54:19,120 --> 01:54:23,440
बात है। मैंने आपको आप समझे नहीं। मैंने आपको शुरू में यह बात कही

1695
01:54:23,440 --> 01:54:27,440
थी कि कोई व्यक्ति विग्रह पर आस्था करता है। आप आप मेरी बात समझ

1696
01:54:27,440 --> 01:54:30,880
ही नहीं रहे। आपने दो घंटे खराब कर दिए।

1697
01:54:30,880 --> 01:54:35,120
दो घंटे इसलिए खराब कर दिए। मैं कह रहा हूं कोई व्यक्ति विग्रह पूजा करे

1698
01:54:35,120 --> 01:54:39,600
और अपने व्यक्तित्व का विकास करे तो वो ठीक है। मैंने आपको कहा कि कोई निरा

1699
01:54:39,600 --> 01:54:43,600
निराकार की पूजा करे और उसका व्यक्तित्व अच्छा ना हो तो व्यर्थ है। बताओ

1700
01:54:43,600 --> 01:54:47,360
इसमें आपके सारे उसका निष्कर्ष है। आप लास्ट में ये

1701
01:54:47,360 --> 01:54:51,360
कह देते हो ना वेदों में मूर्ति पूजा नहीं है। वेद नहीं है नहीं फिर मैं तो अभी

1702
01:54:51,360 --> 01:54:55,440
भी कह रहा हूं। वो बात को मैं आपको आप मुझसे कभी नहीं कहवा। यही है कि

1703
01:54:55,440 --> 01:54:58,000
आप पांचवी के पांचवी की पढ़ाई को गलत बता रहे

1704
01:54:58,000 --> 01:55:02,160
हो। बेटे वो अभी प्राइमरी वाले हो तो आप आपको ऐसे

1705
01:55:02,160 --> 01:55:06,400
ही लगेगा यही तो गड़बड़ है। यहां क्या हो रहा है कि आप उच्च शिक्षा पढ़ना

1706
01:55:06,400 --> 01:55:10,480
चाह रहे हो लेकिन अपना मानसिक स्तर उठाना नहीं चाह रहे हो तो वो ऐसे नहीं होगा।

1707
01:55:10,480 --> 01:55:14,480
पांचवी के बच्चे को बीए की चीजें समझने में बाधा ही लगेगी। वो ये पूछेगा

1708
01:55:14,480 --> 01:55:18,480
ही कि जो ये कह रहे हैं ठीक है कि नहीं प्रमाण क्या है? ये सच है कि झूठ है मुझे नहीं पता।

1709
01:55:18,480 --> 01:55:22,480
क्योंकि उसकी बुद्धि उस विषय को ग्रहण करने के योग्य नहीं हुई है अभी। ये बात और

1710
01:55:22,480 --> 01:55:26,800
कुछ नहीं। बेटे इसमें कोई विरोध नहीं है। आप आप ना समझ नहीं रहे बात को। आपने

1711
01:55:26,800 --> 01:55:30,960
बात ही गलत शुरू कर दी। आप इस बात को घुमा फिरा के मूर्ति पूजा ईश्वर निराकार

1712
01:55:30,960 --> 01:55:35,120
उसमें ले चले गए। मैंने आपको सीधे शब्दों में कहा बेटे यदि आपको आकृति

1713
01:55:35,120 --> 01:55:39,120
प्यारी है तो आप अपने शरीर को बढ़िया बनाइए। इसको बलवान बनाइए। ये

1714
01:55:39,120 --> 01:55:43,120
आकार है। ये बोलता है। ये सुनता है।

1715
01:55:43,120 --> 01:55:47,280
ये देखता है। ये काम करता है। अच्छे बुरे की पहचान रखता है। लेकिन नहीं

1716
01:55:47,280 --> 01:55:51,280
आप कहते हो मैं इस ईश्वर की बनाई रचना पे विश्वास नहीं करूंगा। मैं तो उस

1717
01:55:51,280 --> 01:55:55,920
मूर्ति को मानूंगा जो किसी मनुष्य ने जो बनाया फिर आप

1718
01:55:55,920 --> 01:55:59,920
फिर वही कर रहा हूं। आप ये कहने के बाद आप ये कह के आप

1719
01:55:59,920 --> 01:56:03,920
मान रहे मानो सुनिए आप ये कह के आप आप सामंजस्य वाली बात

1720
01:56:03,920 --> 01:56:08,080
कह के अपनी बात को बड़ी रख रहे हो। ये बात नहीं नहीं देखो

1721
01:56:08,080 --> 01:56:12,160
अब आप कोई रास्ता नहीं देते। आपने नहीं सामंजस्य नहीं कहता

1722
01:56:12,160 --> 01:56:13,120
मैं देखो भाई

1723
01:56:13,120 --> 01:56:17,120
मेरी बात सुनो। वर्तमान समय में दोनों चीज़ हैं। आपने एक लाइन

1724
01:56:17,120 --> 01:56:21,200
एक लाइन एक लाइन नहीं आप मुझे एक मिनट बोल देते। एक लाइन में बोलने आप मुझे आप

1725
01:56:21,200 --> 01:56:25,360
मुझे बोलने नहीं देते। सबसे बड़ी बात है। आप बोलने नहीं देते। आपने

1726
01:56:25,360 --> 01:56:29,760
जब यह कह दिया आपने जब यह आपने जब यह कह दिया भाई साहब

1727
01:56:29,760 --> 01:56:33,840
सुनिए तो आपने जब यह कह दिया कि भाई आप जो दोनों

1728
01:56:33,840 --> 01:56:38,080
तरह की चीजें आपको जिसमें जो हो आपको जिसमें जो हो आपने

1729
01:56:38,080 --> 01:56:42,080
जब यह कह दिया कि आपको जिसमें वो हो उसको आप मान सकते हो तो फिर

1730
01:56:42,080 --> 01:56:46,080
आप यह बात क्यों कहते हो कि नहीं आपको यह समझ में नहीं आया वहां पर अब मानना नहीं

1731
01:56:46,080 --> 01:56:50,320
है सामने वाले की वहां पर आप क्रॉस नहीं कर रहे लाइन यह कहने का मतलब

1732
01:56:50,320 --> 01:56:54,480
मेरा जी बोले

1733
01:56:54,480 --> 01:56:58,560
या तो फिर आप सिद्ध करिए अपनी चीजों को तो सिद्ध करने के नाम पर आप परंपरा बता नहीं

1734
01:56:58,560 --> 01:57:03,840
रहे हो तर्क बता नहीं रहे हो शास्त्र कहां से आए वो बता नहीं रहे हो आप जी

1735
01:57:03,840 --> 01:57:07,920
देखो बेटे ये जो वर्तमान में समय है ये इस

1736
01:57:07,920 --> 01:57:12,080
बात के झगड़ने का नहीं है कि मूर्ति पूजा सही है कि निराकार पूजा सही

1737
01:57:12,080 --> 01:57:16,160
है तुम ऐसे ही मारे जाओगे ये जो तुम कर रहे हो ना यहां बैठ के ये हम

1738
01:57:16,160 --> 01:57:20,160
जो झगड़ रहे हैं ना तुम मुझे शत्रु फिर आप गलत तरीके से बोल

1739
01:57:20,160 --> 01:57:24,160
रहे हैं मारे जाओगे ये सब नहीं बोलना चाहिए आप विषय विषय पर रहिए। दूसरी बात यह

1740
01:57:24,160 --> 01:57:28,240
है लाइन को क्रॉस करके लाइन को क्रॉस करके आप हमें

1741
01:57:28,240 --> 01:57:32,240
गलत ठहरा करके झगड़ तो आप रहे हो ना। मैं तो आपसे नहीं कह रहा हूं कि

1742
01:57:32,240 --> 01:57:36,400
नहीं वेदों में निराकार की पूजा नहीं है। आप मुझसे कह रहे हो कि वेदों में साकार की पूजा

1743
01:57:36,400 --> 01:57:40,800
नहीं है। तो झगड़ तो आप रहे हो। मुझे गलत तो आप ठहरा रहे हो।

1744
01:57:40,800 --> 01:57:45,120
आखिर में कह रहे हो तुम मारे जाओगे। तो ये सब गलत बात है। भाई साहब ऐसी बातें ना करें कृपा

1745
01:57:45,120 --> 01:57:49,280
करके। जी देखो ऐसा यही तो मजा है।

1746
01:57:49,280 --> 01:57:53,360
कोई व्यक्ति दूसरा भी उसको देखेगा तो बड़ा ही खुश होएगा कि देखो भैया

1747
01:57:53,360 --> 01:57:57,440
दोनों हिंदू आर्य हैं। एक अपने आप को आर्य कहता है एक अपने आप को हिंदू कहता है और आज तक

1748
01:57:57,440 --> 01:58:01,600
ये फैसला ही नहीं कर पाए कि सही और गलत क्या है? तो ऐसे लोग अच्छा चारा बनते

1749
01:58:01,600 --> 01:58:05,600
हैं दूसरे लोगों के लिए जो बिल्कुल जिनके सिद्धांत हो सकता है गलत हो लेकिन उस पर वो

1750
01:58:05,600 --> 01:58:09,520
बड़ी बड़ी तत्परता से चलते हैं वो बड़े अच्छे से उसका पालन करते हैं। हम सिर्फ

1751
01:58:09,520 --> 01:58:13,520
बहस करते हैं। मैं इसलिए मैं ये कह रहा हूं कि मूर्ति आप कह रहे हो कि

1752
01:58:13,520 --> 01:58:17,520
आप मूर्ति पूजा को भी सही ठहरा रहे हो। ठहरा नहीं रहा बेटे बेटे। मैं ये ठहरा रहा

1753
01:58:17,520 --> 01:58:21,760
हूं कि भारत में बहुत से लोग मूर्ति पूजा करते हैं। क्या मैं उनसे शत्रुता कर लूं?

1754
01:58:21,760 --> 01:58:25,920
शत्रुता कर लूं उनसे। मैं उनको स्वीकार कर रहा हूं। ये मैं उनका

1755
01:58:25,920 --> 01:58:30,000
विरोधी नहीं हूं। देखो आर्य समाधि होने का अभिप्राय मूर्ति पूजा का विरोधी

1756
01:58:30,000 --> 01:58:34,000
नहीं है। ये क्या बात हो गई आज? आप तो कुछ और ही सिद्ध करने में लगे हो। ये इससे तो हम

1757
01:58:34,000 --> 01:58:38,240
बट जाएंगे और ये समय आज का समय बटने का नहीं है। आज का समय

1758
01:58:38,240 --> 01:58:42,240
इकट्ठे होकर चलने का है। मैं मैं इस दृष्टि से सामंजस्य से बैठा रहा हूं। अपने

1759
01:58:42,240 --> 01:58:46,640
को बड़ा दिखाने के लिए नहीं बेटे। अपने देश की रक्षा के लिए हिंदुत्व की समृद्धि

1760
01:58:46,640 --> 01:58:50,640
के लिए। हम लोगों का एकजुट रहना जरूरी है। ये यहां ये

1761
01:58:50,640 --> 01:58:54,640
लड़ाई मेरी और तुम्हारी नहीं है बेटे। के मैं क्या कह रहा हूं। हम और तुम क्या है यार 6

1762
01:58:54,640 --> 01:58:59,760
साल के बाद 10 साल मर जाएंगे। को पूछेगा भी नहीं ठीक है जो परंपरा है उसको

1763
01:58:59,760 --> 01:59:04,080
आशा करता हूं आशा करता हूं आप लोगों को आज की चर्चा

1764
01:59:04,080 --> 01:59:08,160
काफी मतलब कुछ ऐसी लगी हो जिससे आपको कुछ

1765
01:59:08,160 --> 01:59:12,160
सीखने को मिले और हो सका तो हम और आचार्य जी एक बार दोबारा कभी

1766
01:59:12,160 --> 01:59:16,240
ना कभी कनेक्ट होंगे और इस चर्चा को आगे बढ़ाएंगे आपका आने के

1767
01:59:16,240 --> 01:59:20,000
लिए बहुत-बहुत आभार आचार्य जी बहुत धन्यवाद बहुत धन्यवाद

1768
01:59:20,000 --> 01:59:24,880
अन्यथा ना लीजिएगा ये क्योंकि नहीं कोई बात नहीं कोई हमारे

1769
01:59:24,880 --> 01:59:28,960
जिज्ञासा कोई बात नहीं। मैंने तो समाप्त बात ऐसी की है कि हम दोनों एक ही

1770
01:59:28,960 --> 01:59:33,040
परंपरा से हैं। भारतवासी हैं और भगवान को मानने वाले हैं। ऐसी कोई बात नहीं

1771
01:59:33,040 --> 01:59:37,040
है ना जी। बहुत-ब आपका आपका बहुत धन्यवाद। समय दिया।

1772
01:59:37,040 --> 01:59:43,040
बहुत धन्यवाद। थैंक यू। धन्यवाद।

1773
01:59:45,120 --> 01:59:49,120
तो ठीक है। हमने कई स्तरों पर बात की।

1774
01:59:49,120 --> 01:59:53,120
लगभग दो घंटे की चर्चा हो चुकी है और

1775
01:59:53,120 --> 01:59:57,600
सबसे पहले हमने जो निर्गुण सगुण वाला विषय था कि

1776
01:59:57,600 --> 02:00:01,760
ईश्वर सृष्टि रचना करता कैसे है? तो वहां पे यदि जो

1777
02:00:01,760 --> 02:00:06,080
तार्किक व्याख्या अगर मानी जाए तो भी हमारा पक्ष वहां पर

1778
02:00:06,080 --> 02:00:10,400
मजबूत है कि अ ईश्वर

1779
02:00:10,400 --> 02:00:14,400
को सगुण साकार सगुण निराकार अवतार लेना पड़ेगा। तब वो जो है

1780
02:00:14,400 --> 02:00:18,480
सृष्टि रचना करेगा। कहीं पर शक्ति के रूप में क्रियान्वित

1781
02:00:18,480 --> 02:00:22,560
होगा, कहीं पर नहीं होगा। कहीं पर कम होगा, कहीं पर ज्यादा होगा। इतना तो

1782
02:00:22,560 --> 02:00:26,640
मानना ही पड़ेगा। और इसके बाद थोड़ा लिंक दे दीजिए अगर

1783
02:00:26,640 --> 02:00:30,720
जो कुछ वैचारिक मतभेद के निमित्त तो

1784
02:00:30,720 --> 02:00:36,720
नहीं मगर थोड़े से विचार प्रकट करने हो तो

1785
02:00:37,830 --> 02:00:43,760
[खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] जुड़ सकते हैं

1786
02:00:43,760 --> 02:00:49,120
वैसे काफी देर हो गई है

1787
02:00:49,120 --> 02:00:53,200
और मैंने सोचा था कि इस कन्वर्सेशन को बहुत हेल्दी बना करके

1788
02:00:53,200 --> 02:00:57,280
चल चलना है तो मैंने पूरा प्रयास किया तो इसमें भी आप लोगों का मुझे वह

1789
02:00:57,280 --> 02:01:02,080
चाहिए होगा भाई कॉम्प्लीमेंट वगैरह कि

1790
02:01:02,080 --> 02:01:06,800
कैसी लगी आपको यह चर्चा जो है इस तरह की चर्चा जो हुई है अभी

1791
02:01:06,800 --> 02:01:11,440
अच्छा तो मुख्य बातें मैं आपको बता दूं

1792
02:01:11,440 --> 02:01:15,680
कि पहली बात तो वो सगुण निराकार वाली है कि ईश्वर अगर

1793
02:01:15,680 --> 02:01:19,920
हम तर्क के रूप से देखें तो ईश्वर की व्याख्या माननी पड़ेगी

1794
02:01:19,920 --> 02:01:24,080
राम अखिलेश कुमार अगर वैचारिक मतभेद

1795
02:01:24,080 --> 02:01:28,960
के निमित्त आए हैं तो आप ना आए और वीडियो के अंत में दिए गए

1796
02:01:28,960 --> 02:01:32,800
नंबर पर WhatsApp करें।

1797
02:01:32,800 --> 02:01:36,880
जी अनिकेत जी मैं एक बात पूरी कर दूं फिर आप

1798
02:01:36,880 --> 02:01:41,280
बोलिए। है ना? तो

1799
02:01:41,280 --> 02:01:45,760
सगुण निराकार वाली बात हमने युक्ति से बात की वहां पर

1800
02:01:45,760 --> 02:01:49,840
केवल चेहरा लेकर आए। चेहरा आप लाएंगे साथ

1801
02:01:49,840 --> 02:01:53,840
में तभी हम आपको स्टेज पर लेंगे और अगर वैचारिक मतभेद के निमित्त

1802
02:01:53,840 --> 02:01:57,840
आ रहे हैं तो ना आए है ना अभी से बता दूं वैचारिक

1803
02:01:57,840 --> 02:02:02,480
मतभेद के निमित्त ना आए इस चीज को क्लियर रखें

1804
02:02:02,480 --> 02:02:06,640
पंडित बहुत सारे लोग आ रहे हैं चलिए मैं अपनी बात पहले पूरी कर दूं तब

1805
02:02:06,640 --> 02:02:10,800
किसी को लूंगा स्टेज पर तो हमने जब तर्क से देखा कि

1806
02:02:10,800 --> 02:02:15,280
यदि हम यह कहते हैं कि जो सर्वत्र व्याप्त है वह एक जगह कैसे दिख सकता है

1807
02:02:15,280 --> 02:02:19,600
तो हमने उसमें बताया कि जो ईश्वर जड़ पदार्थों के लिए

1808
02:02:19,600 --> 02:02:23,680
फोर्स का विषय बन सकता है। शक्ति का विषय बन सकता है। क्रिया का विषय

1809
02:02:23,680 --> 02:02:27,760
बन सकता है। तो वह जो ईश्वर है वही प्रकाश के

1810
02:02:27,760 --> 02:02:31,760
मार्ग में भी फोर्स इत्यादि के रूप में वो बाधक क्षेपक

1811
02:02:31,760 --> 02:02:35,920
का विषय बन सकता है। पहली बात तो यदि युक्ति से देखेंगे

1812
02:02:35,920 --> 02:02:39,920
तो इस प्रकार से यदि हम यह यहां कह देते हैं कि यहां हमें नहीं पता ईश्वर ने कार्य कैसे

1813
02:02:39,920 --> 02:02:44,000
किया परंतु वो क्षेपक नहीं बना। तो फिर हम यह कह सकते हैं कि

1814
02:02:44,000 --> 02:02:47,840
भैया हमें नहीं पता वह अचिंत वाली बात कि हमें नहीं पता कि ईश्वर ने अवतार

1815
02:02:47,840 --> 02:02:51,920
कैसे किया परंतु उसने स्वरूप को बिना परिवर्तित होते हुए भी वह

1816
02:02:51,920 --> 02:02:56,000
प्रकट हो गया। हमारे पास युक्ति भी है और जिस भाषा में आप जैसे जो भी

1817
02:02:56,000 --> 02:03:00,560
सामने वाला कहना चाहता है वो भी है। अब इसके बाद क्रमबद्धता

1818
02:03:00,560 --> 02:03:04,640
से बात आ गई कि भैया ऐसे हम अपने आप नहीं मानेंगे। शास्त्र से मानेंगे। क्रम

1819
02:03:04,640 --> 02:03:09,200
को समझिए। किस क्रम में बातचीत हुई है कि पहले युक्ति उसके बाद अचिंत

1820
02:03:09,200 --> 02:03:13,200
शक्ति उसके बाद अब बात आ जाती है कि अब मानेंगे तो शास्त्र की कही

1821
02:03:13,200 --> 02:03:17,280
हुई बात मानेंगे। हालांकि यह बात तब फेल हो जाती है जब हम विधर्मियों

1822
02:03:17,280 --> 02:03:21,360
से बात करते हैं। जो वैदिक होगा वही बात मानेगा हमारी। तो

1823
02:03:21,360 --> 02:03:25,360
ठीक है। अब दो वैदिक बात कर रहे हैं तो फिर वहां पर यह बात आ जाती है कि शास्त्र की बात

1824
02:03:25,360 --> 02:03:29,440
मानेंगे। तो यहां पर आ जाती है कि शास्त्र का मनमाना अर्थ किसने कर

1825
02:03:29,440 --> 02:03:33,760
रखा है और किसने नहीं कर रखा है? तो इसमें पूछा जाता है कि भाई प्रामाणिकता

1826
02:03:33,760 --> 02:03:37,760
कैसे जांच होगी कि किसने अर्थ प्रामाणिक किया है वही अर्थ किया है जो आपको

1827
02:03:37,760 --> 02:03:41,840
शास्त्र दे रहे हैं वो जो मानते थे वही अर्थ किया है या अपना स्वतंत्र अर्थ किया है

1828
02:03:41,840 --> 02:03:45,920
तो अब जैसे कि उन्होंने दोनों बातें कही कि जो मैंने वही चीज मानी है

1829
02:03:45,920 --> 02:03:50,160
जो जैमिनी मानते थे वो चीज आप तक आई कैसे है तो मैंने स्वतंत्र व्याख्या

1830
02:03:50,160 --> 02:03:54,240
की है तो इस विषय में भी आपने देखा कि क्या बातचीत हुई है

1831
02:03:54,240 --> 02:03:58,400
और प्रमाणिकता को पहचानने के लिए अगर यह नियम है कि हमें पहले

1832
02:03:58,400 --> 02:04:02,480
जानना होगा कि कौन ज्ञानी है और कौन ज्ञानी नहीं है उसके

1833
02:04:02,480 --> 02:04:03,120
लिए मुझे ज्ञानी

1834
02:04:03,120 --> 02:04:07,200
बनना होगा। इसका मतलब है कि मुझे पढ़ाई प्रामाणिक पढ़ाई करने से

1835
02:04:07,200 --> 02:04:11,200
पूर्व ही पढ़ाई होनी चाहिए। तब मैं तय कर पाऊंगा कि कौन प्रामाणिक है

1836
02:04:11,200 --> 02:04:15,200
कौन प्रमाणिक नहीं। यह सारी चर्चा का सारांश हमारा रहा। काफी देर तक

1837
02:04:15,200 --> 02:04:19,360
और वो भी सज्जन ही थे। उन्होंने कहीं पर भी हां बस थोड़ा सा यह दिक्कत आ रही

1838
02:04:19,360 --> 02:04:23,440
थी कि वो जब अपनी बात बोल रहे थे बहुत लंबी-लंबी बोल रहे थे और मैं जब बोल रहा था तो

1839
02:04:23,440 --> 02:04:27,520
बीच में इंटरप्ट कर देते थे जिससे कि मेरी एक जो क्रमबद्धता से कोई भाव मैं व्यक्त करना चाहता

1840
02:04:27,520 --> 02:04:31,760
था वो हो नहीं पाते थे हालांकि फिर बाद में विनम्रता पूर्वक और सद्भाव

1841
02:04:31,760 --> 02:04:36,240
पूर्वक यह चर्चा पूरी हुई जी अनिकेत जी बताएं

1842
02:04:36,240 --> 02:04:40,720
और जो अब जो जुड़े हुए हैं वह अपना चेहरा दिखाएं अन्यथा

1843
02:04:40,720 --> 02:04:44,800
और यह बात समझ लें कि वैचारिक मतभेद के निमित्त यदि वह आए हैं तो अगली

1844
02:04:44,800 --> 02:04:48,960
बार ही उनके साथ चर्चा होगी ऑलरेडी दो घंटे हो चुके हैं। जी एन के

1845
02:04:48,960 --> 02:04:53,040
जी बोल जय श्री राम भैया प्रणाम जय

1846
02:04:53,040 --> 02:04:56,560
जय श्री राम जय हो बताइए

1847
02:04:56,560 --> 02:05:00,960
[हंसी] मैंने सुना तो मुझे तो यहां तक लगा कि एक्चुअली

1848
02:05:00,960 --> 02:05:05,520
वो परंपरा सिद्ध नहीं कर पाए। हालांकि कर भी नहीं पाएंगे।

1849
02:05:05,520 --> 02:05:09,520
वो खाली बात को यहां वहां यहां वहां नहीं गए। और यह बात तो

1850
02:05:09,520 --> 02:05:14,000
मुझे जरा भी लॉजिकल नहीं लगी कि अगर मुझे मान लीजिए

1851
02:05:14,000 --> 02:05:18,000
किसी को स्कूल में अगर एडमिशन कराना है तो पहले उसको पूरा पीएचडी

1852
02:05:18,000 --> 02:05:18,500
करा

1853
02:05:18,160 --> 02:05:22,320
दूं समझा दूं फिर उसको स्कूल में भेजूं तो ये लॉजिक मुझे समझ में नहीं आया पहली

1854
02:05:22,320 --> 02:05:26,640
बात तो ये चीज और यहां पे

1855
02:05:26,640 --> 02:05:30,720
यहां पे यहां पे क्या है यहां पे एक अंतर और है मां-बाप स्कूल में एडमिशन

1856
02:05:30,720 --> 02:05:34,720
कराते हैं तो मां-बाप पढ़े हुए होते हैं बच्चे की नजरिए से स्वतंत्र रूप से

1857
02:05:34,720 --> 02:05:38,960
अच्छा बच्चा मां-बाप को भी प्रमाण नहीं मानेगा क्योंकि क्योंकि इनके केस में बच्चे

1858
02:05:38,960 --> 02:05:42,960
को मां-बाप को भी प्रमाण नहीं मानना है। स्कूल को भी प्रमाण नहीं मानना है। तो

1859
02:05:42,960 --> 02:05:47,120
वो किस रूप से कहेगा जाकर के कि भैया डीओ डू होता है और जिओ

1860
02:05:47,120 --> 02:05:51,600
गो होता है। समझ रहे हैं आप? इसमें क्या बुद्धि लगाएगा?

1861
02:05:51,600 --> 02:05:55,920
इसमें कौन सा तर्क लगाएगा कि डीओ डू होता है, जिओ गो होता है। उसको जिओ गो बोलेगा

1862
02:05:55,920 --> 02:06:00,000
तभी उसको मार्क मिलेंगे। वो जिओ को कुछ और बोल देगा ना डीओ डू वाले तरीके

1863
02:06:00,000 --> 02:06:06,000
से तो उसके मार्क कट जाएंगे। कटेंगे कि नहीं? जी

1864
02:06:06,320 --> 02:06:10,640
तो कौन प्रमाणिक है मतलब कि शब्द प्रमाण मान करके

1865
02:06:10,640 --> 02:06:14,720
हमको फिर वहां से शिक्षा लेनी होती है और यहां पर जो शब्द

1866
02:06:14,720 --> 02:06:18,880
प्रमाण किसे मान रहे हैं कि किसको जिस शिक्षा से हमें अभीष्ट

1867
02:06:18,880 --> 02:06:23,200
फल की प्राप्ति होनी है और जो अभीष्ट फल देने वाला है उसने

1868
02:06:23,200 --> 02:06:27,360
जो अभीष्ट फल देने वाला है उसने किस शिक्षा के स्त्रोतों को प्रमाणिक

1869
02:06:27,360 --> 02:06:31,360
मान रखा है वही हमारे लिए प्रमाणिक है तो हमें यहां पे स्त्रोत प्राप्त

1870
02:06:31,360 --> 02:06:36,480
है निर्णय करने वाला दोनों दोनों प्राप्त है। ठीक है? जी।

1871
02:06:36,480 --> 02:06:40,560
उन्होंने एक चीज और बोला था कि हम

1872
02:06:40,560 --> 02:06:44,560
जरूरी नहीं है कि उनके अनुसार मुझे समझ में आया कि जरूरी नहीं

1873
02:06:44,560 --> 02:06:48,720
है कि हम दयानंद जी के ही भाष्य को पढ़कर वेद समझे।

1874
02:06:48,720 --> 02:06:52,800
हम किसी के भी भाष्य को अब उन्होंने कहा ना कि आप इंटरनेट से पढ़िए। आपके बुद्धि

1875
02:06:52,800 --> 02:06:57,200
है। तो ये चीज भी मुझे समझ में नहीं आई। हालांकि वो यह क्वेश्चन

1876
02:06:57,200 --> 02:07:02,080
ही इतना अपने आप में इतना प्रबल है कि आपकी परंपरा बताइए।

1877
02:07:02,080 --> 02:07:06,320
कि इसका उत्तर ना हो के अगर व्यक्ति को अपने आप को बचाना

1878
02:07:06,320 --> 02:07:10,480
या तो व्यक्ति अपने आप को यह कह दे कि हां परंपरा तो नहीं है या तो व्यक्ति

1879
02:07:10,480 --> 02:07:14,480
अपने साथ में अपने आप को सिद्ध करने के लिए यहां वहां की बात करके

1880
02:07:14,480 --> 02:07:18,640
जबरदस्ती ले जाए। यह प्रश्न इतना प्रबल है कि आज तक कोई

1881
02:07:18,640 --> 02:07:21,440
भी इसका उत्तर ही नहीं दे पाया कि हां मेरी परंपरा ये

1882
02:07:21,440 --> 02:07:25,440
है। जैसे आपने कहा ना कि ब्रह्मकुमारी भी वेद दे रहा है तो हम उसको

1883
02:07:25,440 --> 02:07:30,080
मान ले तो उन्होंने कहा कि हां मान लीजिए। हम

1884
02:07:30,080 --> 02:07:34,160
बिल्कुल तो हमें विश्वास प्रकट करना ही होगा। जिससे हम

1885
02:07:34,160 --> 02:07:38,800
वेद लेना मान रहे हैं उसके प्रति विश्वास प्रकट करना होगा। अविश्वास

1886
02:07:38,800 --> 02:07:44,160
यदि हम कहेंगे तो वहां पर जो है

1887
02:07:44,160 --> 02:07:48,240
प्रकट करना होगा। अविश्वास यदि हम कहेंगे आपके

1888
02:07:48,240 --> 02:07:52,880
यहां टीवी चल रहा है क्या? वहां पर

1889
02:07:52,880 --> 02:07:57,200
अविश्वास यदि प्रकट करते हैं तो फिर हमारा उनके द्वारा प्राप्त होने वाले शास्त्रों

1890
02:07:57,200 --> 02:08:02,320
पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होगा। यदि हम उस पर अविश्वास करते हैं तो

1891
02:08:02,320 --> 02:08:06,560
जो आ रहे हैं वह अपना चेहरा दिखाएं। यह भाई साहब आ तो गए हैं मगर चेहरा बहुत अंधेरे

1892
02:08:06,560 --> 02:08:12,160
में है। भाई साहब चेहरा अपना प्रकाश में ले आए।

1893
02:08:12,160 --> 02:08:16,240
पंडित आदित्य नारायण जी हां जी आदित्य जी बताएं। जय

1894
02:08:16,240 --> 02:08:20,880
श्री राम। नारायण भैया नारायण नारायण

1895
02:08:20,880 --> 02:08:25,760
आरंभ से ही हम सुन रहे थे तो एक हम कुछ बोले

1896
02:08:25,760 --> 02:08:29,920
जी जी बोलिए बोलिए तो एक चीज ये है

1897
02:08:29,920 --> 02:08:34,000
कि पहली बात तो जो प्रश्न आप उठाते हैं परंपरा वाले

1898
02:08:34,000 --> 02:08:38,160
ये तो हमें पता ही है कि हम ही ने रट रट के

1899
02:08:38,160 --> 02:08:42,400
वेदों को लाया है तो इस प्रश्न का उत्तर तो किसी से मिलने

1900
02:08:42,400 --> 02:08:47,040
वाला है। यह असंभव है। कुल मिला के चाहे कोई सामंजस्य

1901
02:08:47,040 --> 02:08:51,120
बिठाए या कोई जो है भाग जाए अथवा

1902
02:08:51,120 --> 02:08:55,360
कोई जो है भड़क जाए या कोई कुछ बहाना बना

1903
02:08:55,360 --> 02:08:59,920
ले परंतु उत्तर तो कोई देने वाला है नहीं ये निश्चित है। आदिकाल

1904
02:08:59,920 --> 02:09:04,240
तक कोई उत्तर नहीं दे सकता। अब आचार्य जी ने क्या किया?

1905
02:09:04,240 --> 02:09:08,400
उन्होंने बड़ी मधुरता से इस बात को स्वीकार कर लिया कि भाई

1906
02:09:08,400 --> 02:09:12,480
अगर आप अपनी पर्सनालिटी डेवलपमेंट कर पाते हैं

1907
02:09:12,480 --> 02:09:16,480
मूर्तियों से सो यू कैन डेवलप लेकिन मैं मूर्ति पूजा

1908
02:09:16,480 --> 02:09:21,040
को प्रामाणिक नहीं मानता मैं मूर्ति पूजा को वैदिक नहीं मानता

1909
02:09:21,040 --> 02:09:25,120
माने कि कैसे हमें आप गलत

1910
02:09:25,120 --> 02:09:27,600
भी सिद्ध कर रहे हैं बड़े प्रेम से

1911
02:09:27,600 --> 02:09:32,000
ना परंतु हां उसके बाद जो है

1912
02:09:32,000 --> 02:09:36,000
जब कह रहे हैं कि भाई हम आपसे शत्रुता नहीं रखते। ठीक है? आप नहीं

1913
02:09:36,000 --> 02:09:40,320
रखते। आप सज्जन पुरुष हैं। आप साधु हैं। परंतु जो छोटे

1914
02:09:40,320 --> 02:09:44,800
छोटे बच्चे आप ही के परंपरा में वेदों को इस तरीके से पढ़ेंगे

1915
02:09:44,800 --> 02:09:49,600
कि भाई मूर्ति पूजा करना गलत है। वो तो हमसे शत्रुता रखेंगे ना।

1916
02:09:49,600 --> 02:09:53,600
उनकी जिम्मेदारी कैसे लेंगे आप? मैंने कुछ विवादित चीजें

1917
02:09:53,600 --> 02:09:57,680
उठाई नहीं। जैसे कि सत्यार्थ प्रकाश इत्यादि में सीधे-सीधे लिखा है कि

1918
02:09:57,680 --> 02:10:01,680
मूर्ति पूजा अधर्म है। तो इसको कैसे कोई एक्सेप्ट कर सकता

1919
02:10:01,680 --> 02:10:05,680
है? पर ठीक है। सज्जन व्यक्ति थे। वह विवाद में पड़ना भी नहीं चाहते

1920
02:10:05,680 --> 02:10:09,760
थे। तो इसलिए सब मतलब ऐसी बात बोल दे रहे थे कि काम खत्म

1921
02:10:09,760 --> 02:10:13,760
करो और आगे बढ़ो। ऐसा कुछ मुझे लगता है। और ठीक है। हमें जो

1922
02:10:13,760 --> 02:10:18,080
देखिए हमें हमारा मकसद ये नहीं किसी को नीचा दिखाना या किसी को गलत साबित

1923
02:10:18,080 --> 02:10:22,320
करना। हमारा मकसद यह है कि जो जनता है वह तय करे जो

1924
02:10:22,320 --> 02:10:26,480
सामान्य व्यक्ति है जो दर्शक है वह यह जान

1925
02:10:26,480 --> 02:10:30,640
पाए कि कौन तर्क की तर्क पे खड़ा हुआ है प्रमाण पे खड़ा हुआ

1926
02:10:30,640 --> 02:10:34,960
है तो जब चर्चा देखते जिसको उनकी बात बिल्कुल सटीक लगेगी तो वो निर्णय

1927
02:10:34,960 --> 02:10:38,960
कर पाएगी तो ये जो प्रश्न है ना जैसे आप कह रहे हैं आदित्य जी कि हमने कई बार

1928
02:10:38,960 --> 02:10:42,640
पूछा उसका मिलना है नहीं वो सही बात है मगर जितनी ज्यादा बार ये

1929
02:10:42,640 --> 02:10:46,640
प्रश्न होगा और किया जाएगा और उस पे जो दृश्य होगा

1930
02:10:46,640 --> 02:10:50,800
वो जितने ज्यादा लोग देखेंगे उतनी जागरूकता आएगी। परंपरा से जुड़ने

1931
02:10:50,800 --> 02:10:55,040
के प्रति जागरूक यह हमारा उद्देश्य है। जी हां जरूरी

1932
02:10:55,040 --> 02:10:59,440
भी है भैया। जरूरी भी है। जी जी शास्त्रवाद

1933
02:10:59,440 --> 02:11:02,560
जी जय श्री राम।

1934
02:11:02,560 --> 02:11:06,640
जय श्री राम भैया। जय श्री राम। पूरा चर्चा जबरदस्त रहा

1935
02:11:06,640 --> 02:11:11,120
है आज का। और जो मुख्य बात था

1936
02:11:11,120 --> 02:11:15,200
वो जो परंपरा पे वो अपना बता रहे। परंपरा नहीं बता

1937
02:11:15,200 --> 02:11:19,520
पाए लेकिन परंपरा में घुमाते रह गए घुमाते रह गए लेकिन परंपरा

1938
02:11:19,520 --> 02:11:23,840
नहीं बताए और अच्छा अच्छा कहा भी उन्होंने उन्होंने

1939
02:11:23,840 --> 02:11:28,000
उन्होंने कहा भी कि जो है परंपरा से पढ़ना चाहिए मगर

1940
02:11:28,000 --> 02:11:32,240
परंपरा क्या है वो नहीं मगर दयानंद जी परंपरा से नहीं पढ़ेंगे दयानंद

1941
02:11:32,240 --> 02:11:36,320
जी तो परंपरा को ब्रेक करके पढ़ेंगे और फिर ये भी दावा करेंगे कि हम जैमिनी

1942
02:11:36,320 --> 02:11:40,400
वाली परंपरा को फॉलो करते हैं। तो ये मतलब अगर तार्किक दृष्टि से जब

1943
02:11:40,400 --> 02:11:45,520
भी देखेंगे तो इन बातों का कोई बेस है ही नहीं। स्टैंड नहीं करती। हालांकि

1944
02:11:45,520 --> 02:11:49,870
ठीक व्यक्ति थे तो बिल्कुल जी। अरे

1945
02:11:49,870 --> 02:11:53,920
[गला साफ़ करने की आवाज़] आपने जो वो उदाहरण दिया कि उनके दयानंद जी के जो माता-पिता थे वो

1946
02:11:53,920 --> 02:11:57,920
तो शिवलिंग पूजा करते थे। शिव जी के परम जो थे भक्त

1947
02:11:57,920 --> 02:12:02,240
थे। ठीक है। तो वहां पे वो अंधा और आंख

1948
02:12:02,240 --> 02:12:06,240
वाला का जो उदाहरण दिया उन्होंने। ये बहुत ही गलत काम। मतलब वो क्या कहना चाहते

1949
02:12:06,240 --> 02:12:10,320
हैं कि उनके जो दयानंद जी थे जो जो आचार्य थे और जो

1950
02:12:10,320 --> 02:12:14,480
परिवार वाले थे वो अंधे थे। अच्छा अंधे थे तो फिर वो आपको वेद मंत्र सही

1951
02:12:14,480 --> 02:12:18,480
कैसे दे रहे बात ये है फिर उनकी किसी चीज पर विश्वास मत करिए

1952
02:12:18,480 --> 02:12:22,640
फिर आपने वेद मंत्र पर विश्वास क्यों कर लिया अंधे हैं वो तो हो सकता है आपको गलत

1953
02:12:22,640 --> 02:12:26,880
वेद मंत्र दे रहे हो आपको कैसे पता ये वही वेद मंत्र है जो ईश्वर ने दिए थे

1954
02:12:26,880 --> 02:12:31,040
ऋषियों को उनके अंतकरण में बात ये है बहुत सरल सा प्रश्न है पर

1955
02:12:31,040 --> 02:12:36,480
अब कोई इसको विवाद के रूप में देखे तो बात अलग है जी

1956
02:12:36,480 --> 02:12:40,480
वेद में मूर्ति पूजा के प्रमाण पूछ रहे हैं तो

1957
02:12:40,480 --> 02:12:45,440
भाई साहब बहुत सारे प्रमाण है मूर्ति पूजा के वेद में ईश्वर

1958
02:12:45,440 --> 02:12:49,440
अपनी माया द्वारा विभिन्न रूपों में स्वयं को प्रकट करता है। गर्भ में

1959
02:12:49,440 --> 02:12:53,760
विचरण करता है और जो है ऋग्वेद

1960
02:12:53,760 --> 02:12:57,920
में है। यजुर्वेद में शायद 31 18 या 19 में है। यजुर्वेद

1961
02:12:57,920 --> 02:13:02,000
में तो ऐसे बहुत सारे प्रमाण हैं। प्रमाण हमने दे रखे हैं। वेद में

1962
02:13:02,000 --> 02:13:08,000
मूर्ति पूजा वाला हमारा वीडियो देखे। बहुत सारे प्रमाण हमने दे रखे हैं। ठीक है?

1963
02:13:08,560 --> 02:13:12,720
अब बात यह है कि उस मंत्र का वह अर्थ आप मानते नहीं हैं। आप जो

1964
02:13:12,720 --> 02:13:16,720
है अलंकार कह देते हैं। विराट पुरुष की व्याख्या जहां पर होगी वहां आप

1965
02:13:16,720 --> 02:13:20,960
अलंकार कह देते हैं। जहां पर शर्मा जो

1966
02:13:20,960 --> 02:13:24,960
शर्मा जो स्वान है मादा स्वान

1967
02:13:24,960 --> 02:13:29,120
वो आकर के वेद मंत्र बताएगी। वहां आप अलंकार कह देंगे। उसको यह

1968
02:13:29,120 --> 02:13:33,120
अलंकार कह देंगे। तो फिर अवतार में आकर के आप कहते हैं कि अवतार

1969
02:13:33,120 --> 02:13:37,360
की आवश्यकता क्या है? फिर अलंकार की आवश्यकता क्या है? यह प्रश्न भी हो सकता है। अच्छा

1970
02:13:37,360 --> 02:13:41,440
कबूतर जो कपोत सूक्त है उसमें आप अलंकार अपने हिसाब से आप

1971
02:13:41,440 --> 02:13:45,520
जहां पर भी आपकी मान्यता के विरुद्ध जाता हुआ अर्थ आपको दिखाई देगा वहां

1972
02:13:45,520 --> 02:13:49,680
आप अलंकार कह देते हैं तो इसीलिए हम ये जो व्यर्थ की चर्चा है ना

1973
02:13:49,680 --> 02:13:53,760
कि यहां दिया हुआ है अब वहां पर वो अपनी संस्कृतज्ञता दिखाएंगे फिर वो

1974
02:13:53,760 --> 02:13:57,840
अपना स्वतंत्र व्याख्या दिखाएंगे तो इसीलिए हम सीधे मूल विषय पर आते हैं

1975
02:13:57,840 --> 02:14:01,920
जिस पर बाद में भी आना है बाद में क्या आना है कि भाई आपको वेद मंत्र जहां

1976
02:14:01,920 --> 02:14:06,240
से मिले हैं वहीं से मिले हुए अर्थ पर विश्वास है कि नहीं और

1977
02:14:06,240 --> 02:14:10,640
यदि नहीं है तो आपका वेद मंत्र पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता या फिर आप स्वतंत्र

1978
02:14:10,640 --> 02:14:14,720
रूप से अपनी परंपरा बता दीजिए कि आपके पास वेद मंत्र कहां से आए।

1979
02:14:14,720 --> 02:14:18,880
ठीक है जी शास्त्रवाद जी इस तरीके से

1980
02:14:18,880 --> 02:14:22,960
अगर अलंकार ही सिद्ध करने पे आ जाए

1981
02:14:22,960 --> 02:14:23,680
तो फिर तो

1982
02:14:23,680 --> 02:14:27,760
यज्ञ इत्यादि जो ये सब करते हैं सब भी सब खत्म हो जाएगा। उसमें भी अलंकार

1983
02:14:27,760 --> 02:14:32,000
सिद्ध हो सकता है। भाई अग्नि ये है, कुंड ये है,

1984
02:14:32,000 --> 02:14:36,160
अरण ये है। अब देखो जैसे एक बात उठी कि वो वो

1985
02:14:36,160 --> 02:14:40,240
दिव्य थे। दिव्य का मतलब कि जैसे कि हमारे कई ऐसे हमने

1986
02:14:40,240 --> 02:14:44,320
गुरु माने हैं जो कई लाख वर्ष तक जीवित रहे हैं। ठीक है? तो अब

1987
02:14:44,320 --> 02:14:48,320
ये कहते हैं कि भाई वो कई लाख वर्ष तक जीवित कैसे रह सकते हैं।

1988
02:14:48,320 --> 02:14:52,320
जब वो यह स्वयं मान रहे हैं कि ईश्वर जड़ पदार्थों में प्राण

1989
02:14:52,320 --> 02:14:56,320
शक्ति डालता है। चेतना डालता है। ठीक है? तो अगर

1990
02:14:56,320 --> 02:15:00,320
इन्होंने ये माना कि वशिष्ठ जी हैं मान लो वशिष्ठ जी की ये मान रहे हैं

1991
02:15:00,320 --> 02:15:04,480
मैक्सिमम आयु जो है 150 वर्ष इतनी तो मानेंगे ही किसी मनुष्य की आर्य

1992
02:15:04,480 --> 02:15:08,880
समाज या मान लो 100 वर्ष मानते हैं तो जब ईश्वर

1993
02:15:08,880 --> 02:15:13,360
मिट्टी के कणों को जोड़ करके उसको एक पुतला बना करके उसमें जो है

1994
02:15:13,360 --> 02:15:17,600
प्राण शक्ति चेतना शक्ति डाल सकता है तो वो पहले से जो मिट्टी

1995
02:15:17,600 --> 02:15:22,000
का पुतला बना हुआ है उसको केवल रीस्टॉल नहीं कर सकता

1996
02:15:22,000 --> 02:15:26,320
क्या उसको ठीक नहीं कर सकता पुनः 100 वर्षों के लिए और ऐसा क्या वो 10,000

1997
02:15:26,320 --> 02:15:30,400
बार नहीं कर सकता? तो इस प्रकार से तो वशिष्ठ जी 1 लाख वर्ष तक जी सकते

1998
02:15:30,400 --> 02:15:34,400
हैं। अगर यह मानते हैं कि ईश्वर ने जड़ पदार्थों में को इकट्ठा

1999
02:15:34,400 --> 02:15:38,400
करके मनुष्य का शरीर बनाया। उसमें चेतना शक्ति डाली। उसमें

2000
02:15:38,400 --> 02:15:38,900
जो है

2001
02:15:38,800 --> 02:15:44,480
प्राण शक्ति डाली। या तो यह मान ले कि उसने ऐसा नहीं किया।

2002
02:15:44,480 --> 02:15:48,640
इनके वेद भाष्यों में तो महापुरुषों के लिए यह भी माना है कि

2003
02:15:48,640 --> 02:15:52,800
महापुरुष जो है कालातीत यात्रा करते हैं। त्रिकाल आबाधित यात्रा करते

2004
02:15:52,800 --> 02:15:56,960
हैं। सूर्य चंद्र आदि महत लोकों में भी यात्रा करते हैं। इस न्याय

2005
02:15:56,960 --> 02:16:00,960
से भी इस वाक्य से भी यह सिद्ध होता है कि जो ऋषि कोटि के

2006
02:16:00,960 --> 02:16:05,360
विद्वान होंगे। मतलब जो ऋषि कोटि के महात्मा रहे होंगे वह तो

2007
02:16:05,360 --> 02:16:09,520
त्रिकाल आज भी आना चाहे तो आज भी प्रकट हो जाए। आनंद जी के ही वेद भाष्य

2008
02:16:09,520 --> 02:16:13,600
से यह बात सिद्ध है। अगर मान ले तो एक

2009
02:16:13,600 --> 02:16:17,680
भाई साहब पूछ रहे हैं कि आपका कैमरा ऑन करने को क्यों नहीं कह रहे हैं? यह जो इनकी फोटो है,

2010
02:16:17,680 --> 02:16:21,680
यह यही है। यह इनके वास्तविक फोटो ही है। दूसरी बात

2011
02:16:21,680 --> 02:16:26,000
यह है कि वैचारिक मतभेद के निमित्त हमें आवश्यकता होती है कि हम

2012
02:16:26,000 --> 02:16:30,080
जो है कैमरा ऑन करके ही बात करें क्योंकि उसमें सारी और भी चीजें

2013
02:16:30,080 --> 02:16:34,240
हैं जो हम बता चुके हैं। ऐसा [नाक से की जाने वाली आवाज़] है कि जब हम फोटो लगा सकते हैं तो हम चेहरा

2014
02:16:34,240 --> 02:16:38,240
भी दिखा सकते हैं। ठीक है? परंतु अब ये क्या शयन का शयन का समय

2015
02:16:38,240 --> 02:16:42,400
है और हम त्रिपुंड वगैरह सब मिट जाता है तो ब्राह्मण का चेहरा जो है वो

2016
02:16:42,400 --> 02:16:46,480
देखने योग्य नहीं होता। ठीक है। चलिए ऐसा

2017
02:16:46,480 --> 02:16:50,560
कहा गया है शास्त्रों में। ठीक ठीक है। आने का

2018
02:16:50,560 --> 02:16:53,920
बहुत-बहुत धन्यवाद। जी शास्त्रवाद जी आप अपनी बात कर

2019
02:16:53,920 --> 02:16:57,920
दीजिए। जी ये जो आए थे और

2020
02:16:57,920 --> 02:17:02,320
जो कह रहे थे कि बार-बार बीए और प्राइमरी

2021
02:17:02,320 --> 02:17:06,480
इस तरह की जो बातें कर रहे थे तो ये हम अपने ऊपर ही क्यों माने इस

2022
02:17:06,480 --> 02:17:10,560
इस उदाहरण को आपके ऊपर क्यों नहीं माने आप प्राइमरी पे क्यों नहीं हो

2023
02:17:10,560 --> 02:17:14,560
सकते नहीं वो हालांकि वो असल में क्या होता

2024
02:17:14,560 --> 02:17:19,120
है कि जब ये दो कारें अटकी हुई होती है ना तो अगर आपको

2025
02:17:19,120 --> 02:17:23,200
बात को आगे बढ़ाना है किसी निष्कर्ष की ओर ले जाना है तो फिर उनमें

2026
02:17:23,200 --> 02:17:27,520
से दो को कारों में से किसी एक को पीछे हटना पड़ता है। तो मैं उस उसमें

2027
02:17:27,520 --> 02:17:31,680
नहीं था कि मैं भी उनको उन पलटवार वैसा ही करने लगूं जैसा वो कर रहे हैं। क्योंकि

2028
02:17:31,680 --> 02:17:35,840
मुझे जो ये इधर की ओर ले जाना था कि जो सैद्धांतिक निष्कर्ष है वो प्राप्त

2029
02:17:35,840 --> 02:17:40,000
करने थे। वो मुझे लगता है कि उसमें मैं सफल हुआ आप लोग निर्णय करिएगा।

2030
02:17:40,000 --> 02:17:44,480
तो इसलिए मैंने उनको उन्हीं की भाषा में उस तरह के जवाब देना उचित नहीं समझा।

2031
02:17:44,480 --> 02:17:48,640
तो बस ठीक है। जी मैं मैं

2032
02:17:48,640 --> 02:17:52,640
ये मैं ये कह रहा था कि जिस प्रकार प्राइमरी

2033
02:17:52,640 --> 02:17:57,440
क्लास के जो स्टूडेंट होते हैं यदि उनको हम इंजीनियरिंग का कुछ बताएंगे

2034
02:17:57,440 --> 02:18:01,520
तो वो तो हसेंगे ना इस बारे में कि उन्हें तो पता नहीं होगा कि भाई

2035
02:18:01,520 --> 02:18:05,760
पानी से भी बिजली बन सकती है। ठीक है? यदि देखेंगे

2036
02:18:05,760 --> 02:18:09,200
तो पानी से भी बिजली बन सकती है। तो इस बात पे लोगों

2037
02:18:09,200 --> 02:18:13,520
पता ही नहीं चलेगा। वो तो हसेंगे। वो बोलेंगे पानी तो तो प्यास बोझता है।

2038
02:18:13,520 --> 02:18:17,680
बिजली कैसे बनेगी? तो अब वो नहीं समझ पा रहे। इसका मतलब यह

2039
02:18:17,680 --> 02:18:21,920
नहीं है कि हमारा इंजीनियरिंग का पढ़ाई गलत है। ठीक है? तो अच्छा

2040
02:18:21,920 --> 02:18:25,920
एक बात और है। ना समझने वाली बात उन्होंने कई बार कही है कि मैं

2041
02:18:25,920 --> 02:18:29,920
तो आपकी बात समझ ही नहीं पा रहा हूं। उन्होंने शुरुआत में

2042
02:18:29,920 --> 02:18:34,000
जब वो वाली बात चल रही थी ईश्वर का शक्ति के रूप में अवतरण तो उस

2043
02:18:34,000 --> 02:18:38,080
समय जब मैं बता रहा था कि क्षेपक बनेगा या बाधक बनेगा या फिर आप बताओ क्या बनेगा?

2044
02:18:38,080 --> 02:18:42,320
कैसे होगी क्रिया? क्रिया कैसे होगी? तो वो

2045
02:18:42,320 --> 02:18:46,480
उसमें ना बता रहे थे और ना ही मेरी बात को समझ पा रहे थे। करीबन उन्होंने 810

2046
02:18:46,480 --> 02:18:50,800
बार तो कहा होगा और फिर यह कहना कि आप जो है प्राइमरी

2047
02:18:50,800 --> 02:18:54,880
वाले हो आप कैसे समझो तो वो सब चीजें ठीक है मैंने बड़े बड़े भी थे बेटा बेटा

2048
02:18:54,880 --> 02:18:58,960
करके बात कर रहे थे तो मैं उसमें फिर मैंने उचित नहीं समझा कि मैं ऐसे ही बात

2049
02:18:58,960 --> 02:19:03,200
करूं जो है जो क्या कहते हैं उसको

2050
02:19:03,200 --> 02:19:07,200
क्या कहते डोमिनेटिंग तरीके से बात करूं ठीक है काफी निष्कर्षपूर्ण

2051
02:19:07,200 --> 02:19:11,200
रहा तो आप लोगों को अच्छा लगा होगा सीखने को भी मिला

2052
02:19:11,200 --> 02:19:15,360
होगा शास्त्रवाद जी आपकी मुझे लगता है कोई बात रह नहीं गई तो अब हम चर्चा

2053
02:19:15,360 --> 02:19:20,160
को विराम दे दे। जी भैया जी

2054
02:19:20,160 --> 02:19:24,320
चर्चा बहुत नारायण नारायण नारायण जय

2055
02:19:24,320 --> 02:19:30,320
श्री राम सभी को जय श्री राम

2056
02:19:53,270 --> 02:19:57,270
[संगीत]
