1
00:00:01,920 --> 00:00:07,680
तो जय श्री राम सभी को आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे

2
00:00:07,680 --> 00:00:13,200
और हमारे साथ में पंडित लोकी जी भी हैं

3
00:00:13,200 --> 00:00:17,280
वो भी हमें ज्वाइन कर रहे हैं और आज का

4
00:00:17,280 --> 00:00:21,280
जो विषय है वो आप लोगों ने देख ही लिया होगा कि

5
00:00:21,280 --> 00:00:27,040
हम जो लाइव चर्चा करते हैं कल एक बहुत अव्वल दर्जे के

6
00:00:27,040 --> 00:00:31,120
कहेंगे कि तर्कहीन व्यक्ति जिसके पास तर्क है ही नहीं

7
00:00:31,120 --> 00:00:35,200
तो जरा भी तर्क शक्ति बहुत कमजोर है। मतलब बौद्धिक स्तर

8
00:00:35,200 --> 00:00:39,600
उसका बहुत निम्न है। ऐसे एक व्यक्ति से कल मगजमारी

9
00:00:39,600 --> 00:00:43,760
करनी पड़ी। लगभग दो घंटे तक बात हुई।

10
00:00:43,760 --> 00:00:48,560
ब्रह्मा कुमारी से ब्रह्मा ये मत चालू करो।

11
00:00:48,560 --> 00:00:52,640
ब्रह्मा कुमारी से उत्पन्न एक और सेक्ट जो है अब

12
00:00:52,640 --> 00:00:57,040
एक संस्था के रूप में काम किया जिसने उसका नाम पड़ा आध्यात्मिक

13
00:00:57,040 --> 00:00:59,200
विश्वविद्यालय।

14
00:00:59,200 --> 00:01:03,440
और अब उस सेक्ट में भी वही जैसे ब्रह्मा कुमारी में हुआ कि हम अपना

15
00:01:03,440 --> 00:01:07,600
नया बनाएंगे। ऐसे ही अब वह जो आध्यात्मिक विश्वविद्यालय उसमें भी वही

16
00:01:07,600 --> 00:01:11,680
सब चल रहा है। थोड़े बाद थोड़े दिनों बाद देखेंगे। आध्यात्मिक विश्वविद्यालय किसने

17
00:01:11,680 --> 00:01:15,760
शुरू किया है? वीरेंद्र देव दीक्षित नाम का कोई व्यक्ति है। और अगर हम सोशल

18
00:01:15,760 --> 00:01:17,200
मीडिया इत्यादि पर न्यूज़

19
00:01:17,200 --> 00:01:21,200
वगैरह देखते हैं तो बहुत सारे आरोप लगे हैं। कि युवतियों का शोषण

20
00:01:21,200 --> 00:01:25,200
करता करता था। ऐसा है वैसा है। कुछ ये सब बहुत

21
00:01:25,200 --> 00:01:29,200
सारी चीजें आरोप लगे हुए हैं और भाई

22
00:01:29,200 --> 00:01:33,440
देखिए उसका शरीर नष्ट हो चुका है। मगर ऐसा

23
00:01:33,440 --> 00:01:37,440
भी है कि कुछ लोग यह भी कहने वाले लोग हैं कि शरीर नष्ट नहीं हुआ है। कुछ लोग ये

24
00:01:37,440 --> 00:01:41,680
कहने वाले लोग हैं कि शरीर जो है वो दूसरे में प्रवेश करके आ रहा है। वो

25
00:01:41,680 --> 00:01:46,880
ब्ल ब्ल बहुत सारी चीजें हैं जो कल हमने लाइव स्ट्रीम में देखी। तो

26
00:01:46,880 --> 00:01:51,120
अ हमारी ये जो मगजमारी हम जो कर रहे हैं कई

27
00:01:51,120 --> 00:01:55,120
बार ये क्वेश्चन आता है कि भाई इससे क्या फायदा होना है? समाज ये

28
00:01:55,120 --> 00:02:00,160
भड़भड़ देख रहा है। समाज और यह और वो तो

29
00:02:00,160 --> 00:02:04,480
श्वता जी इस बारे में आप थोड़ी सी अपनी बात रखेंगे

30
00:02:04,480 --> 00:02:08,720
कि हमारी इन लाइव स्ट्रीम से क्या लाभ प्राप्त हो रहा है समाज को।

31
00:02:08,720 --> 00:02:12,960
भाई वहां पर जैसे कुछ न्यूज़ चैनल होते हैं ना कुछ

32
00:02:12,960 --> 00:02:17,120
वैसा सिनेरियो भी दिखाई देता है कई बार न्यूज़ चैनल्स जैसा वो नहीं

33
00:02:17,120 --> 00:02:21,520
जानबूझ के वो एक गरमा गर्मी वाली डिबेट होती है। जय श्री राम अवनीश जी जय श्री राम।

34
00:02:21,520 --> 00:02:25,680
तो कुछ वैसा सीन यहां भी बन जाए। कल तो मैं बिल्कुल मतलब मेरा ये

35
00:02:25,680 --> 00:02:30,080
समझ लीजिए जो व्यक्ति आया था उसने सिरिंज लगा के मेरे ब्रेन

36
00:02:30,080 --> 00:02:32,800
से सारे न्यूट्रिएंट्स सारा ऑक्सीजन

37
00:02:32,800 --> 00:02:36,800
सारा ब्लड सप्लाई सब निकाल लिया था है ना फिर

38
00:02:36,800 --> 00:02:40,960
भी हमने उसे क्यों लिया तो इसके पीछे मेरी रीजनिंग

39
00:02:40,960 --> 00:02:46,960
है पर मैं थोड़ा सा श्वेता जी आप अपने पर्सपेक्टिव से थोड़ा सा बताएं

40
00:02:49,600 --> 00:02:55,600
मुझे आवाज नहीं आ रही है आपकी कोई कारण है विशेष इसका

41
00:02:56,320 --> 00:03:00,320
मेरी आवाज सबको आ रही है?

42
00:03:00,320 --> 00:03:06,000
श्वेता जी की आवाज आ रही है सबको?

43
00:03:06,000 --> 00:03:12,000
म्यूट थे आप। म्यूट थे। अब बोलिए।

44
00:03:14,080 --> 00:03:18,160
अभी भी नहीं आ रही है। अब आ रहा है।

45
00:03:18,160 --> 00:03:22,960
अब आ रही है। सेटिंग तो

46
00:03:22,960 --> 00:03:26,960
देखिए ऐसा है कि ये कार्य जो हम कर रहे हैं

47
00:03:26,960 --> 00:03:32,000
ना या फिर जो आवाहन जो है ये कार्य कर रहा है वो बहुत ही

48
00:03:32,000 --> 00:03:36,800
स्तर पर आपको दिखेगा दूर से। ठीक है? लेकिन जो इसका प्रभाव

49
00:03:36,800 --> 00:03:40,800
होगा या फिर जो पड़ रहा है ना वो बहुत ही मूल में जाके हो रहा है

50
00:03:40,800 --> 00:03:44,800
क्योंकि वो क्या कर रहा है कि आवान जो ये ये जो चीजें कर रहा है

51
00:03:44,800 --> 00:03:49,040
चाहे वो धरातल पर कर रहा हो चाहे नवम मार्ग द्वारा यानी सोशल मीडिया

52
00:03:49,040 --> 00:03:53,680
इत्यादि के माध्यम से जो कर रहा हो वो सीधा मूल पे आप कहेंगे

53
00:03:53,680 --> 00:03:57,760
अधर्मियों के मूल पे वार कर रहा है ठीक है और

54
00:03:57,760 --> 00:04:01,840
जो कर रहा है सिद्धांतों के बल पर ठीक है जो जो कर रहा है जो

55
00:04:01,840 --> 00:04:05,920
हमारे जो परंपरा प्राप्त ज्ञान हैं उसके बल पर। ठीक है? यह नहीं कर

56
00:04:05,920 --> 00:04:09,920
रहा है कि जाके किसी को फिजिकली मार

57
00:04:09,920 --> 00:04:14,320
रहा हो या फिर उस उस पे कोई झगड़ा आदि कर रहा हो। उस तरह से नहीं सिद्धांतों

58
00:04:14,320 --> 00:04:18,400
के बल पर कर रहा है। हां, जहां कहीं जरूरत पड़ रही है वहां पर ऑफ कोर्स

59
00:04:18,400 --> 00:04:21,120
जाकर क्या बोलते हैं? बोलना पड़ रहा है या फिर उनकी सच्चाइयों

60
00:04:21,120 --> 00:04:25,520
को अवगत कराना पड़ रहा है जो कि आपको मिलेगा ही क्योंकि हम कोई भी कार्य आवाहन

61
00:04:25,520 --> 00:04:29,840
कोई भी कार्य जो है वह पीठ पीछे या छुप छुपा कर नहीं करता।

62
00:04:29,840 --> 00:04:33,920
ठीक है? क्योंकि यह कार्य जो है वह धर्म रक्षा के लिए है।

63
00:04:33,920 --> 00:04:38,160
और जब जहां तक धर्म रक्षा की बात आती है वहां पर मनुष्य को

64
00:04:38,160 --> 00:04:42,240
क्या बोलते हैं सिद्धांतों पर चलकर ठीक है? राम

65
00:04:42,240 --> 00:04:46,480
के पथ राम कृष्ण आदि के पथ पर चलकर ही उसको करना चाहिए

66
00:04:46,480 --> 00:04:50,480
और वो कर रहा है। हम हमारा भी प्रवास प्रयास यही रहता है। कभी हो सकता है कि

67
00:04:50,480 --> 00:04:54,640
कभी जाने अनजाने में हमने या आवाहन ने कभी

68
00:04:54,640 --> 00:04:58,800
ऊपर नीचे कुछ बातें कह दी हो या जो कि 99.9%

69
00:04:58,800 --> 00:05:02,960
नहीं हो नहीं होगी। बट कभी-कभी हो सकता है। तो उसके लिए वो आप

70
00:05:02,960 --> 00:05:07,280
स्वयं समझ सकते हैं क्योंकि हमारा जो मूल उद्देश्य है वो है पूरी

71
00:05:07,280 --> 00:05:11,520
समाज को इस दुनिया को सही धर्म से अवगत कराना। ठीक है?

72
00:05:11,520 --> 00:05:15,600
क्योंकि काल नेमी जैसी जो संस्थाएं हैं और जो अलग-अलग जो पंथ आदि

73
00:05:15,600 --> 00:05:20,240
जो हो गए हैं ना वो सनातन का चोला ओढ़े हुए

74
00:05:20,240 --> 00:05:24,400
बहुत ही गलत शिक्षाएं दे रहे हैं। ठीक है? और आपने बहुत सारी ऐसी वीडियोस में देखा

75
00:05:24,400 --> 00:05:28,480
होगा अंत में जब शिवान जी का आता है ना वो वो गुस्से

76
00:05:28,480 --> 00:05:32,640
वाला जो एक इंट्रो इंट्रो कहूंगा जो जो

77
00:05:32,640 --> 00:05:36,400
एंड वाला पार्ट है हिंदू तो है ना हिंदू तो है ना घर में बैठे रहो

78
00:05:36,400 --> 00:05:40,400
बस ये सोच कर कि हिंदू तो है ना करेंगे तो एग्जैक्टली वही

79
00:05:40,400 --> 00:05:44,480
चीज ही हमें या मोस्टली बहुत सारे लोगों को सनातन धर्मियों को

80
00:05:44,480 --> 00:05:48,800
रोकती है वो ये और उनके मन में भाव रहता है कि हिंदू वाला कार्य तो हो रहा है

81
00:05:48,800 --> 00:05:52,960
लेकिन हिंदू वाला कार्य नहीं हो रहा ये कालमी वाला कार्य हो रहा है और

82
00:05:52,960 --> 00:05:56,960
अगर कालमी का रेफरेंस देंगे तो उसके लिए एक बार आपको रामचरितमानस रामायण

83
00:05:56,960 --> 00:06:01,360
आदि का अध्ययन करना चाहिए आपको पता लग जाएगा कि हनुमान जी जब संजीवनी

84
00:06:01,360 --> 00:06:05,520
लेने जा रहे थे तो कान लेमी नाम का व्यक्ति राम राम कर रहा था। राम राम

85
00:06:05,520 --> 00:06:10,960
इसलिए और उसका मुख्य उद्देश्य यह था कि वो संजीवनी जो है वो समय पर ना ले ना

86
00:06:10,960 --> 00:06:15,120
ले जा पाए। है ना? तो इसी तरह से बहुत सारी ऐसी

87
00:06:15,120 --> 00:06:19,200
संस्थाएं हैं जो मुंह में राम बगल में छुरी वाली जो कहावत है ना

88
00:06:19,200 --> 00:06:23,200
वह बिल्कुल यहीं पे फिट बैठती है। ठीक है? और जिसमें बगल में छुरी है केवल

89
00:06:23,200 --> 00:06:27,280
और केवल सनातन के पीठ पर घोंप रहे हैं। सनातन यानी हम सब

90
00:06:27,280 --> 00:06:31,440
हम सब के पीठ पर घोंप रहे हैं। क्योंकि अगर ये मूल हिला देंगे हमारा। ठीक है?

91
00:06:31,440 --> 00:06:35,760
अगर तो हम क्या बोलते हैं? फिर हम वही है धर्मे हीना पश्चमी समाना

92
00:06:35,760 --> 00:06:39,760
वही वाली हालत हो जाएगी। ठीक है? तो तो आह्वान जो ये कार्य कर रहा

93
00:06:39,760 --> 00:06:43,920
है वीडियो वीडियो आदि के माध्यम से लाइव के माध्यम से कक्षाओं के माध्यम से नाम

94
00:06:43,920 --> 00:06:47,920
जप के माध्यम से जो हमारा नामास्त्र चल रहा है जो ये

95
00:06:47,920 --> 00:06:52,080
लाइव सेशंस होते हैं जो हमारे

96
00:06:52,080 --> 00:06:56,160
लाइव चर्चाएं होती हैं या फिर जो क्लासेस होते हैं उसमें हमारा मूल उद्देश्य

97
00:06:56,160 --> 00:07:00,320
ये नहीं है कि अपना कोई ज्ञान देना। ठीक है? जैसे जगुरु आदि

98
00:07:00,320 --> 00:07:04,400
शंकराचार्य महा महाभाग ने अपनी तरफ से कोई ज्ञान नहीं दिया है। उन्होंने

99
00:07:04,400 --> 00:07:08,560
केवल वही ज्ञान हमें हिंदी में यानी कि आसान शब्दों

100
00:07:08,560 --> 00:07:13,040
में समझा दिया। कोशिश की उस समय की जो आसान भाषा थी जो कि संस्कृति

101
00:07:13,040 --> 00:07:17,040
थी उसमें बताने का प्रयास किया है। वही जो शास्त्र सम्मत बातें हैं। उन्होंने अपनी तरफ

102
00:07:17,040 --> 00:07:21,360
से कोई ज्ञान नहीं दिया। जैसे कई लोग यह कहते हैं ना कि आदि

103
00:07:21,360 --> 00:07:25,680
गुरु शंकराचार्य का यह अद्वैत सिद्धांत है। यह उनका अद्वैत सिद्धांत नहीं है। ठीक है?

104
00:07:25,680 --> 00:07:30,160
यह सिद्धांत वही सिद्धांत है जो वशिष्ठ ऋषि ने भगवान श्री राम को दिया।

105
00:07:30,160 --> 00:07:34,240
वही सिद्धांत है जो भगवान कृष्ण ने सूर्यारायण

106
00:07:34,240 --> 00:07:38,640
भगवान को दिया। ये वही सिद्धांत है। वही सिद्धांत है जो अह कई उपनिषदों

107
00:07:38,640 --> 00:07:43,360
में ब्रह्मा जी ने सनत कुमार आदि को दिया या

108
00:07:43,360 --> 00:07:47,760
नारद जी को दिया एसेट्रा। ठीक है? तो तो वही चीज है। तो इसीलिए

109
00:07:47,760 --> 00:07:52,080
जब कोई यह बोलता है कि आदि गुरु शंकराचार्य के सिद्धांत है तो मैं इससे बिल्कुल

110
00:07:52,080 --> 00:07:56,160
असहमत हो जाता हूं क्योंकि सिद्धांत शास्त्र का है। शास्त्र वेदों

111
00:07:56,160 --> 00:08:00,160
का सिद्धांत है। ठीक है? तो बस अभी तो यही कहूंगा और

112
00:08:00,160 --> 00:08:04,400
यही हमारा मतलब नहीं आपने तो बहुत वाइड स्केल से पूरी

113
00:08:04,400 --> 00:08:07,280
सारी पूरा कांसेप्ट क्लियर कर दिया। जी।

114
00:08:07,280 --> 00:08:11,520
बहुत बढ़िया। और अभी एक फोन आया मेरे पास

115
00:08:11,520 --> 00:08:15,520
यहां आने से जस्ट पहले तक और मेरे ख्याल से जो हम लोग 101 मिनट लेट हुए

116
00:08:15,520 --> 00:08:19,680
उसमें उस फोन की भी भूमिका रही है थोड़ी सी। हालांकि मैं

117
00:08:19,680 --> 00:08:23,760
इस मामले में मेरा रिकॉर्ड हिस्ट्री सीटर हो गया हूं मैं कि अब

118
00:08:23,760 --> 00:08:27,920
भाई मैं जो है यही आता हूं। तो मुझे अपनी इस

119
00:08:27,920 --> 00:08:32,400
छवि के निमित्त जो जनता जनार्दन

120
00:08:32,400 --> 00:08:36,400
है उसके प्रति क्षम्य भाव जो है

121
00:08:36,400 --> 00:08:40,400
वो रखने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मगर अभी जिस व्यक्ति का फोन

122
00:08:40,400 --> 00:08:45,360
आया वो बोला कि मैं ब्रह्मा कुमारी से हूं। हम और

123
00:08:45,360 --> 00:08:49,360
पहले उसमें ब्रह्मा कुमारी से हां

124
00:08:49,360 --> 00:08:53,360
मेन ब्रह्मा एज अ दर्शक कहूं ना तो अब इतनी सारी जो ऐसे वीडियोस आ

125
00:08:53,360 --> 00:08:57,760
गई हैं आपके पिछले एक दो हफ्ते ब्रह्माकुमारी की तो कंफ्यूजन हो गई है एस अ दर्शक

126
00:08:57,760 --> 00:09:01,920
कि कौन से वाले ब्रह्माकुमारी की बात कर रहे हैं आप देखिए इस समय अभी

127
00:09:01,920 --> 00:09:06,240
तक हमारे पास दो सेक्शन बन पाए हैं हां हां एक तो ब्रह्माकुमारी

128
00:09:06,240 --> 00:09:10,320
और एक है आध्यात्मिक विश्वविद्यालय लेकिन कल वाली चर्चा में उसमें से

129
00:09:10,320 --> 00:09:14,480
भी एक निकल रहा था जो सुनने में पता लगा अमूल फोकने

130
00:09:14,480 --> 00:09:18,720
जी हां मगर उसने अपना नाम नहीं बदला है उसने अपने आप को वही

131
00:09:18,720 --> 00:09:22,640
रखा है आध्या आध्यात्मिक आध्यात्मिक विश्वविद्यालय हम

132
00:09:22,640 --> 00:09:27,840
जी तो वो व्यक्ति जो है बोलता है कि मुझे

133
00:09:27,840 --> 00:09:32,000
तुम कहां से बोल रहे हो तुम्हारा नाम क्या है ये चैनल तुम्हारा ही है क्या मैंने

134
00:09:32,000 --> 00:09:36,080
कहा ठीक है हां हां जो भी है फिर जब वो कुछ बोलने लगा कि तुम

135
00:09:36,080 --> 00:09:40,160
धर्म पे ज्यादा बोल रहे हो धर्म के बारे में ज्यादा बोल रहे थे अब भाई धर्म के

136
00:09:40,160 --> 00:09:44,320
बारे में ज्यादा भी नहीं बोलना चाहिए ये भी एक अपराध है। दिक्कत

137
00:09:44,320 --> 00:09:48,480
यही है। [हंसी] तो जब उसने यह कहा ना धर्म के बारे में ज्यादा क्यों मतलब

138
00:09:48,480 --> 00:09:52,480
आपत्तिजनक उसने क्यों शब्द नहीं लगाया मगर उसमें यह

139
00:09:52,480 --> 00:09:56,480
हो गया कि धर्म के बारे में ये क्या हो

140
00:09:56,480 --> 00:10:01,440
गया

141
00:10:01,440 --> 00:10:05,440
आपकी आवाज सुन उसने उसने जो है

142
00:10:05,440 --> 00:10:09,520
क्यों शब्द नहीं लगाया हालांकि मगर उसने ये जरूर कहा कि भाई धर्म के बारे

143
00:10:09,520 --> 00:10:14,000
में ज्यादा बोल रहा है आपत्ति आपत्ति पूर्वक तरीके से उसने ये पंक्ति कही

144
00:10:14,000 --> 00:10:18,000
तो जैसे ही वो नहीं होता है कुछ एक इंस्टिंक्ट होता है हर व्यक्ति के अंदर कि कहां

145
00:10:18,000 --> 00:10:22,400
पे वो एक्टिव होता है होता है ना तो मैं अभी तक नॉर्मल हूं

146
00:10:22,400 --> 00:10:26,560
जब उसने ये लाइन कही एकदम से दूसरा रोल चालू हो गया फिर मैंने उससे [हंसी] तुरंत

147
00:10:26,560 --> 00:10:30,720
पूछा कि भाई तुम्हारा नाम क्या है तो बोला कि मेरा नाम

148
00:10:30,720 --> 00:10:35,440
जो भी हो मैंने कहा जो भी हो क्यों जब तुम चाहते हो कि सामने वाला अपनी पहचान तुम्हें

149
00:10:35,440 --> 00:10:39,440
ठीक से बताए तो तुम अपनी पहचान क्यों छुपाओगे तो पहले मैंने उसको

150
00:10:39,440 --> 00:10:43,600
थोड़ा सा जो आता है ना व्यक्ति बहुत तेजी में कॉल

151
00:10:43,600 --> 00:10:47,600
कराऊंगा शोएब अख्तर और ग्लेन मैग्रा और ब्रेटली और सबको मिक्स करके

152
00:10:47,600 --> 00:10:51,680
जो बॉलर बनेगा ना वो बॉल कराऊंगा मैं। है ना?

153
00:10:51,680 --> 00:10:55,760
सबसे पहले तो राहुल द्रविड़ की तरह तो तुम्हारा नाम क्या

154
00:10:55,760 --> 00:10:59,840
है? तो उससे व्यक्ति थोड़ा डिप्लीट होता है। फिर वो

155
00:10:59,840 --> 00:11:03,920
जो आया था ना वो भर के भूबा उससे व्यक्ति थोड़ा

156
00:11:03,920 --> 00:11:09,040
फिर मैंने कहा कि भाई फिर आगे बोलता रहा कि तुम ये वो

157
00:11:09,040 --> 00:11:13,280
तो अभी हम लोग डालेंगे वो चीज बताएंगे सार्वजनिक करेंगे।

158
00:11:13,280 --> 00:11:16,560
मुख्य बात यह रही कि उसने आखिर में दूसरी

159
00:11:16,560 --> 00:11:20,560
भाषा में मुझे कुछ उल्टा सीधा शायद बोलना शुरू कर दिया। मैं समझ नहीं पाया। अब मैं

160
00:11:20,560 --> 00:11:26,560
क्या करूं? ये क्या बोल रहा है? तो जब वो दूसरी भाषा बोलने लगा तो मैं भी बोलने लगा।

161
00:11:27,100 --> 00:11:31,200
[हंसी] फिर वो क्या

162
00:11:31,200 --> 00:11:35,200
कहते हैं? बोला कि

163
00:11:35,200 --> 00:11:39,360
अब हिंदी में बोलने लगा। दोबारा हो गया। मैंने कहा हिंदी सीख ली।

164
00:11:39,360 --> 00:11:44,080
पांच मिनट लगे हिंदी सीखने में। तो फिर लास्ट में धमकी देता है

165
00:11:44,080 --> 00:11:48,400
कि भाई मैं तुम्हारे सारे वीडियोस वगैरह बंद करा दूंगा,

166
00:11:48,400 --> 00:11:52,560
रद्द करा दूंगा। ठीक है? मैं उसको बोला कि अगर तुम पाखंडी

167
00:11:52,560 --> 00:11:56,640
नहीं हो तो आओ बात करो। तो वो इधर उधर

168
00:11:56,640 --> 00:12:00,800
की बातें करने लगा तो मैंने कहा ठीक है तो फिर बंद करा दो तुम। तो यह

169
00:12:00,800 --> 00:12:04,880
होता है हमारी लाइव स्ट्रीमिंग से। हमारी लाइव स्ट्रीमिंग

170
00:12:04,880 --> 00:12:09,360
से यह होता है। यह लोग अपने बिल से बाहर आते हैं।

171
00:12:09,360 --> 00:12:13,680
क्या हुआ था? मैं अपने अपने परिवार के साथ हिंदुस्तान

172
00:12:13,680 --> 00:12:17,760
हस्तशिल्प महोत्सव गया था। रामपाल के लिए थोड़ी ना गया

173
00:12:17,760 --> 00:12:22,080
था। गया था। लखनऊ वाला लखनऊ वाला। हां लखनऊ वाला। हां टकरा

174
00:12:22,080 --> 00:12:26,400
गया। वहां देखा धर्म वहां पर

175
00:12:26,400 --> 00:12:30,800
विरोध किया। अगले दिन वीडियो बना और

176
00:12:30,800 --> 00:12:32,000
आज स्थितियां

177
00:12:32,000 --> 00:12:36,080
आपके सामने इतना बड़ा आंदोलन शुरू हो गया। तो क्या हुआ

178
00:12:36,080 --> 00:12:41,040
कि जब हमने इनकी चीजों को इनकी जड़ों को टटोला

179
00:12:41,040 --> 00:12:46,160
चीजें चेक करने की बात की उसके कारण ये बिलबिला करके जैसे

180
00:12:46,160 --> 00:12:50,480
एक दवाई होती है ना जो डाल दो तो अंदर जो चींटियां भरी होती है सब बाहर भागती है

181
00:12:50,480 --> 00:12:54,640
है ना वो दवाई जैसे डाली तो वो सारी चीटियां

182
00:12:54,640 --> 00:12:58,640
फिर बाहर निकल के आ गई कितने सारे आपने हमारे लाइव स्ट्रीम देखे

183
00:12:58,640 --> 00:13:02,720
हम है ना कितने सारे लाइव स्ट्रीम आपने हमारे देखे

184
00:13:02,720 --> 00:13:07,280
जो रामपाल पे लगातार चल रहे बहुत बुद्धि का लेवल बिल्कुल

185
00:13:07,280 --> 00:13:11,280
डाउन और हम लोग उनसे जूझ रहे हैं। क्यों जूझ रहे हैं? जिससे

186
00:13:11,280 --> 00:13:15,440
वो जो मूर्खता पूर्ण बातें हैं वो समाज में ज्यादा

187
00:13:15,440 --> 00:13:19,520
से ज्यादा लोग देखें। ये है देखो मूर्खता की पराकाष्ठा और वो

188
00:13:19,520 --> 00:13:23,520
देखा लोगों ने और आज हालात ये हो गए हैं कि वो जब कोर्ट का

189
00:13:23,520 --> 00:13:28,320
फैसला जब आएगा तब आएगा। जगह-जगह इनकी किताबें जलाई जा रही है। पैरों तले

190
00:13:28,320 --> 00:13:32,640
पैरों से कुचली जा रही है। बिहार में अभी देखिए सब जगह आवाजें

191
00:13:32,640 --> 00:13:37,920
उठ उठ खड़ी हुई है। ये हुआ जागरूकता।

192
00:13:37,920 --> 00:13:41,920
तो अब एक बात सिद्धांत की आती है। मैंने

193
00:13:41,920 --> 00:13:46,240
कई बार कहा है कि भाई मुझे जरूरत क्या है? मुझे जरूरत

194
00:13:46,240 --> 00:13:47,040
किसी से

195
00:13:47,040 --> 00:13:52,640
तब यह बात कहने की है कि तुम्हारा सिद्धांत गलत है जब

196
00:13:52,640 --> 00:13:56,640
मैं कहीं पर अपने धर्म के लिए खड़ा हूं। लड़ रहा हूं। रक्षा कर रहा हूं अपनी

197
00:13:56,640 --> 00:14:00,640
चीजों की। वहां पर मेरे तुम्हारे द्वारा फैलाई गई गंदगी मेरे

198
00:14:00,640 --> 00:14:04,960
आड़े नहीं आनी चाहिए। सिंपल। तुम अपनी कोई भी मान्यता रखो

199
00:14:04,960 --> 00:14:09,440
कोई दिक्कत नहीं है। मगर जब मैं जब हम धर्म की लड़ाई लड़ने जाएंगे

200
00:14:09,440 --> 00:14:13,440
तो वहां पर तुम्हारी मान्यता से उत्पन्न होने के कारण मेरे कोई

201
00:14:13,440 --> 00:14:17,520
सामने समस्या नहीं आनी चाहिए। तुम मेरे ही पाले में हो। मैं तुम्हारा हूं।

202
00:14:17,520 --> 00:14:21,600
मैं भाई हूं तुम्हारा। तुम्हारी अपनी मान्यताएं बहुत सारी अलग-अलग हो सकती।

203
00:14:21,600 --> 00:14:25,600
मगर मगर आती है। क्यों आती है? जब मैं

204
00:14:25,600 --> 00:14:30,000
जाता हूं रामचरितमानस को जलने से बचाने के लिए तो आर्य

205
00:14:30,000 --> 00:14:33,680
समाधि नहीं आता है।

206
00:14:33,680 --> 00:14:37,920
आर्य समाजी तो एक बार आर्य समाजी तो एक बार को जो ये वाली

207
00:14:37,920 --> 00:14:42,320
एक लाइन है ना ये एक बेल्ट बनी हुई है। उनकी मान्यताएं

208
00:14:42,320 --> 00:14:46,320
जो भी है मगर वो एक मतलब अपने आप को वो सैनिक के रूप में जो

209
00:14:46,320 --> 00:14:50,320
प्रदर्शित करते हैं। है ना स्वतंत्रता का आंदोलन या जो भी है वो

210
00:14:50,320 --> 00:14:54,320
अपने आप को उससे जोड़ते हैं तो वो राम राम मंदिर आंदोलन से भी जुड़े रहते हैं।

211
00:14:54,320 --> 00:14:58,400
करते हैं उनकी मौलिक मान्यताएं भले ही उसी के खिलाफ हो जो वो करने की कोशिश कर

212
00:14:58,400 --> 00:15:02,640
रहे हैं। भाई राम मंदिर के लिए तुम लड़ रहे हो मगर तुम्हारा जो इंजेक्ट है

213
00:15:02,640 --> 00:15:06,720
लास्ट में वो तो यही है ना कि मूर्ति पूजा गलत है तो एट द एंड

214
00:15:06,720 --> 00:15:10,720
तुम अपने सिद्धांत के विरुद्ध लड़ रहे हो तो तुम अपने लिए ही तो मुसीबत

215
00:15:10,720 --> 00:15:14,800
खड़ी कर रहे हो या तो उस सिद्धांत के लिए या उस सिद्धांत का पोषण करने

216
00:15:14,800 --> 00:15:19,920
के चक्कर में अपने उस युद्ध के लिए तो वो एक अलग चीज है। मगर

217
00:15:19,920 --> 00:15:24,000
जैसे कुमार विश्वास ने अनेकानेक लोगों ने कह दिया कि

218
00:15:24,000 --> 00:15:28,240
भाई राम रामचरितमानस का वो उत्तरकांड प्रक्षिप्त है। अब स्वामी प्रसाद मौर्य

219
00:15:28,240 --> 00:15:32,320
उसको जला रहा है या यह बीके वाले लोग भर देते हैं लोगों के अंदर कि राम कृष्ण सब

220
00:15:32,320 --> 00:15:36,480
कल्पना है यह वो तो ऐसे में जब राम ये स्वामी प्रसाद मौर्य

221
00:15:36,480 --> 00:15:40,960
जैसे लोग जब उसको जलाते हैं हम जब

222
00:15:40,960 --> 00:15:45,040
उसको जलाते हैं तो क्या होता है कि कुछ हिंदू जो

223
00:15:45,040 --> 00:15:48,960
बहुसंख्यक है बहुसंख्यक होते हुए भी वो थोड़ी सी मात्रा

224
00:15:48,960 --> 00:15:53,520
में वहां पर विरोध करने पहुंच पाता है। यह है हमारी सबसे बड़ी दिक्कत।

225
00:15:53,520 --> 00:15:57,520
हम संगठित नहीं है। आपकी इन मान्यताओं के कारण

226
00:15:57,520 --> 00:16:01,760
जो आपने हमारी मूल मान्यताओं के विरोध में अपने अपने नए-नए नाम देकर के खड़ी

227
00:16:01,760 --> 00:16:05,760
की है। तो मैं आपकी पर्सनल चीजें मैंने अपने

228
00:16:05,760 --> 00:16:09,840
चैनल पर कभी किसी के बारे में जैसे इस का

229
00:16:09,840 --> 00:16:14,080
कोई व्यक्ति हो इस कान के फाउंडर हो या आर्य समाज

230
00:16:14,080 --> 00:16:18,480
के फाउंडर हो दयानंद जी हो प्रभुपाद जी हो इनके लिए कभी भी कोई व्यक्तिगत

231
00:16:18,480 --> 00:16:22,720
रूप से इनकी व्यक्तिगत जीवन शैली इत्यादि को लेकर के कटाक्ष नहीं किया

232
00:16:22,720 --> 00:16:26,720
ना ही इनका मुंह बिगाड़ा ना ही इनका मुंह बिगाड़ा ना ही

233
00:16:26,720 --> 00:16:30,880
चेहरा बिगाड़ करके जो है मैंने कहीं पर लगाया ऐसा कुछ नहीं किया

234
00:16:30,880 --> 00:16:34,880
केवल इनके द्वारा जो ऐसी मान्यता है वो मान्यता है जो हमारी

235
00:16:34,880 --> 00:16:38,960
चीजों में दिक्कत डाल रही है उनको मैंने क्वेश्चनिंग की।

236
00:16:38,960 --> 00:16:43,120
ठीक है? और ये भी कहता रहा कि आप मुझे अगर समझा दोगे ये

237
00:16:43,120 --> 00:16:47,120
चीजें ऐसे ऐसे करके आड़े नहीं आएंगी तो मैं समझ जाऊंगा। फिर मैं आपकी चीजों को साथ

238
00:16:47,120 --> 00:16:51,680
में ले चलूंगा। वो साथ में हो नहीं पा रहा है। मैंने ये सब कहा है।

239
00:16:51,680 --> 00:16:55,680
तो ये तो उद्देश्य है कि ये चीजें हमें

240
00:16:55,680 --> 00:16:59,760
करनी क्यों पड़ रही है? क्योंकि सनातन समाज बटा हुआ है और जब तक वो बटा

241
00:16:59,760 --> 00:17:03,760
रहेगा जितना ज्यादा वो बटा रहेगा उतना ज्यादा वो अपने जो मौलिक

242
00:17:03,760 --> 00:17:04,320
आदर्श

243
00:17:04,320 --> 00:17:09,120
है अपने अस्तित्व और आदर्श की रक्षा नहीं कर पाएगा। इसलिए हमें

244
00:17:09,120 --> 00:17:13,200
उन सार्वभौम सिद्धांतों की का

245
00:17:13,200 --> 00:17:17,440
सानिध्य लेते हुए जो ऐसे पाखंडवादी तंत्र फैल

246
00:17:17,440 --> 00:17:21,520
रहे हैं उनसे क्वेश्चनिंग करनी पड़ेगी। और जैसे ही क्वेश्चनिंग

247
00:17:21,520 --> 00:17:25,840
करी तो वो दवाई डाली तो वहां से चींटियां बाहर आने लगी। अब

248
00:17:25,840 --> 00:17:29,920
आप देखिएगा कुछ ही दिनों में बीके या आध्यात्मिक विश्वविद्यालय से एक बड़ा

249
00:17:29,920 --> 00:17:33,920
संघर्ष आप लोगों को देखने देखने को मिलने वाला है। जैसे अभी रामपाल के

250
00:17:33,920 --> 00:17:38,160
साथ मिला और जैसे रामपाल का वैचारिक अंत हुआ है।

251
00:17:38,160 --> 00:17:42,160
वैचारिक अंत हो चुका है। व्यवहारिक अंत चल रहा है। ऐसे ही फिर

252
00:17:42,160 --> 00:17:46,240
अगर ये लोग इसी तरह से करते हैं धमकी पूर्वक देते हैं तो क्या होगा? इन्हीं की हानि

253
00:17:46,240 --> 00:17:49,680
होगी। इन्हीं की हानि होगी। क्योंकि हम तो घर से

254
00:17:49,680 --> 00:17:53,760
निकले ही थे बांध कर दर पे कफ़न। जा हथेली पर लिए लो बढ़ चले

255
00:17:53,760 --> 00:17:57,760
हैं ये कदम जिंदगी तो अपनी महिमा मौत की महफिल में है

256
00:17:57,760 --> 00:17:59,440
सरफरोशी की तमन्ना अब

257
00:17:59,440 --> 00:18:03,440
हमारे दिल में हमारे दिल में है ना

258
00:18:03,440 --> 00:18:07,760
तो एक तो ये बात हो गई अब इसमें

259
00:18:07,760 --> 00:18:12,480
एक दूसरी बात आती है इससे मिलती जुलती चीजें ही है

260
00:18:12,480 --> 00:18:17,360
जैसे अभी आपने हमारी एक चर्चा देखी

261
00:18:17,360 --> 00:18:21,520
तो निर्भय निर्भय के साथ निर्भय आर्य

262
00:18:21,520 --> 00:18:25,680
कहते हैं वो स्वयं को तो उनके साथ आपने

263
00:18:25,680 --> 00:18:29,760
हमारी एक चर्चा देखी और वो चर्चा मेरे लिए भी बहुत प्रतीक्षित चर्चा

264
00:18:29,760 --> 00:18:33,760
थी क्योंकि थोड़े इंटेलेक्चुअल लेवल के जो पर्संस होते हैं

265
00:18:33,760 --> 00:18:37,760
व्यक्ति होते हैं उनके साथ बात करने में आनंद आता है। तर्क

266
00:18:37,760 --> 00:18:42,080
वितर्क करना और सत्य के ऊपर बात करना तो ऐसा

267
00:18:42,080 --> 00:18:46,720
नहीं है। नो डाउट कि निर्भय आर्य जो है एक बुद्धिमान व्यक्ति है। है ना?

268
00:18:46,720 --> 00:18:50,720
और निर्भय आर्य को लेकर के मैं अपनी कुछ फीलिंग्स बताऊं। पर्सनल फीलिंग्स

269
00:18:50,720 --> 00:18:55,520
मैं शेयर कर रहा हूं। तो निर्भय यार में छोटा भाई मुझे

270
00:18:55,520 --> 00:18:59,520
दिखाई देता है और कहां से दिख रहा है। मुझे

271
00:18:59,520 --> 00:19:03,600
एग्जैक्ट वो दिन नहीं याद है कि कहां से ये छवि बनी है। हालांकि उसने जब ये कहा

272
00:19:03,600 --> 00:19:07,680
तो वो जो अंदर गौ रूप से वो जो भावना थी जब उसने भ्राता

273
00:19:07,680 --> 00:19:11,760
श्री कहा तो वो गौ रूप से जो भावना थी वो थोड़ा सा उस वो भावनाएं

274
00:19:11,760 --> 00:19:14,560
थोड़ा व्यवहार में आ गई। वो आना जाना सिद्ध

275
00:19:14,560 --> 00:19:18,800
हो गया। [हंसी]

276
00:19:18,800 --> 00:19:23,040
हां पहले से ही थी मगर उसके भ्राता

277
00:19:23,040 --> 00:19:27,360
ये कह देने थे व्यवहार में आ गई हूं तो वो एक फीलिंग

278
00:19:27,360 --> 00:19:31,440
तैयार हो गई फिर क्या है तो

279
00:19:31,440 --> 00:19:36,400
उस दिन जो मैं बैठा था बहुत

280
00:19:36,400 --> 00:19:40,400
सच्चे मन हालांकि मैं चर्चाएं जो करता हूं वो ऐसे नहीं करता हूं कि सामने वाले

281
00:19:40,400 --> 00:19:44,720
को परास्त कैसे करना है। मैं ऐसे करता हूं जो चर्चाएं होती हैं

282
00:19:44,720 --> 00:19:49,200
मेरे पास ये है। अब मैं क्या कर सकता हूं बस

283
00:19:49,200 --> 00:19:53,280
और अगर मैं उसमें प्लानिंग कर रहा हूं, खुराफात कर रहा हूं, रणनीति अपना रहा हूं।

284
00:19:53,280 --> 00:19:57,440
इस तरीके से स्ट्रक्चरल मेरा मानना है कि अगर मैं स्ट्रक्चरल वे

285
00:19:57,440 --> 00:20:01,600
में तैयारी कर रहा हूं तो इसका मतलब कहीं ना कहीं मैं सत्य की रक्षा नहीं

286
00:20:01,600 --> 00:20:05,760
अपने मत की रक्षा कर रहा हूं। मैं तो ऐसे चल रहा हूं।

287
00:20:05,760 --> 00:20:10,000
ये है मेरे पास सर्वशक्तिमान ईश्वर, परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म।

288
00:20:10,000 --> 00:20:14,160
बस कहीं कोई मिल जाएगा मैं इनहीं तीन बातों पर उसको लपेट दूंगा। मैं

289
00:20:14,160 --> 00:20:18,720
बहुत ज्यादा चीजों की बात नहीं करूंगा। सांख्य दर्शन न्याय दर्शन

290
00:20:18,720 --> 00:20:23,040
बहुत ज्यादा बातें नहीं करूंगा वो मैं आऊंगा उस आगे मेरे

291
00:20:23,040 --> 00:20:27,120
पास क्या है मैं उसको लेके चलता हूं अगर मेरे पास सत्य चीज

292
00:20:27,120 --> 00:20:29,840
है तो वो हर जगह जीतेगी अगर मेरे

293
00:20:29,840 --> 00:20:34,000
पास झूठ है तो वो हारेगी और फिर मुझे उसे एक्सेप्ट करना पड़ेगा मुझे उसमें

294
00:20:34,000 --> 00:20:38,080
रणनीति की क्या जरूरत है स्ट्रक्चरल कि मैं उससे यह सवाल करूं फिर उसको

295
00:20:38,080 --> 00:20:42,480
ऐसे कहलवा दूं फिर उसकी कही हुई बात को आधार बना करके अगला चैप्टर खोलूं

296
00:20:42,480 --> 00:20:47,760
और फिर उसको वहां परास्त कर दूं देखो ये नहीं

297
00:20:47,760 --> 00:20:51,920
सिद्धांत है। अब मेला गए उसने चार बातें

298
00:20:51,920 --> 00:20:56,320
झूठी लिखी। सीधे परंपरा क्या है? ये है सिद्धांत। तैयारी

299
00:20:56,320 --> 00:21:00,320
करके नहीं जाना है कि अगर वो झूठी बात बोलेगा ये करेगा तो उसको वहां पे ये

300
00:21:00,320 --> 00:21:04,320
देंगे वो कोई तैयारी नहीं। बिना तैयारी के है ना

301
00:21:04,320 --> 00:21:08,400
वो इस तरह से चलते हैं तो मैं वहां पर सच्चे मन

302
00:21:08,400 --> 00:21:13,280
से आया था एकदम और उससे एक दो दिन पहले से पिताजी से भी मेरी बातें हुई थी अपनी

303
00:21:13,280 --> 00:21:17,440
तो उनको भी मैंने कहा था ये जो व्यक्ति आ रहा है बुद्धिमान है और आपको चर्चा देखने में

304
00:21:17,440 --> 00:21:21,520
आनंद आएगा अच्छा लगेगा अब वो बात अलग है कि हमारे

305
00:21:21,520 --> 00:21:25,600
सिद्धांत ही ऐसे हैं नहीं तो मुझे मुझे लगता

306
00:21:25,600 --> 00:21:30,560
है कि कहीं ना कहीं इंटेलेक्चुअल लेवल उसका निर्भय आर्य का ज्यादा होगा मुझसे

307
00:21:30,560 --> 00:21:34,560
अब हम हम हम लोग निम्न स्तर के हैं। पर हमारे पास सिद्धांत ऐसा है

308
00:21:34,560 --> 00:21:39,520
तो करें क्या? उसको कैसे तोड़ोगे है ना

309
00:21:39,520 --> 00:21:43,680
वो एक बात है। तो उसको लेकर के मुझे फीलिंग्स

310
00:21:43,680 --> 00:21:45,280
आती थी कि छोटा भाई है

311
00:21:45,280 --> 00:21:49,760
लगभग वैसा ही है वो भी और

312
00:21:49,760 --> 00:21:54,080
उसका जो एटीट्यूड वगैरह भी है थोड़ा सा वो एक प्रभावशाली

313
00:21:54,080 --> 00:21:58,080
अच्छे व्यक्तित्व का है तो वो अच्छा लगता है और

314
00:21:58,080 --> 00:22:02,240
जैसे वो अवेंजर्स में नहीं स्पाइडरमैन और कैप्टन

315
00:22:02,240 --> 00:22:06,400
अमेरिका लड़ रहे होते हैं। कहां से हो?

316
00:22:06,400 --> 00:22:10,640
कहां से हो? तो वो कहता है मैं न्यूयॉर्क से। तो फिर

317
00:22:10,640 --> 00:22:14,640
लास्ट में कैप्टन अमेरिका जब उसको छका देता है ना फिर कहता है मैं भी

318
00:22:14,640 --> 00:22:19,120
मैं भी न्यूयॉर्क से था। तुम में दम है। [हंसी]

319
00:22:19,120 --> 00:22:23,760
है कि नहीं? हां। तो वो है

320
00:22:23,760 --> 00:22:28,000
कुछ वैसा उसको लेकर के रहता है। अब क्या हुआ कि

321
00:22:28,000 --> 00:22:32,480
वो उस चर्चा में क्या हुआ है? पूरा शुरू से लास्ट तक

322
00:22:32,480 --> 00:22:36,640
वो तो एक अलग विषय है। है ना? वो अभी हम

323
00:22:36,640 --> 00:22:40,640
एक दूसरे पार्ट में कर लेंगे। मगर अच्छा इसमें इसमें आप इसको

324
00:22:40,640 --> 00:22:44,800
यह जो अभी निर्भय आर्य ने माफी भी मांगी है आपको

325
00:22:44,800 --> 00:22:49,200
पता हो शायद क्षमा उस पर डाली है कि उसने

326
00:22:49,200 --> 00:22:53,440
वीडियो को देखा है ना और उसने जो है आत्मग्लानी

327
00:22:53,440 --> 00:22:57,440
फील की तो उसने वहां पर जो है कहा है निर्भय ने कि

328
00:22:57,440 --> 00:23:00,400
मुझे क्षमा मैं मतलब अपनी गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।

329
00:23:00,400 --> 00:23:04,400
ऐसे ऐसे कुछ वर्ड्स कहे उसमें एक्सजेक्टली वर्ड ना भी हो तो भाई समझ जाना

330
00:23:04,400 --> 00:23:08,480
अपनी ओर से देख लेना। तो अब [हंसी] ये

331
00:23:08,480 --> 00:23:12,560
ये कुछ चीजें हुई है। ठीक है? तो मैं क्या है

332
00:23:12,560 --> 00:23:16,560
जब वो चर्चा पूरी हो गई उसके बाद जब मैं उसे एडिट करने बैठा जो

333
00:23:16,560 --> 00:23:20,560
दो पार्ट मैंने डाले हैं। है ना? और एक श भी डाला है

334
00:23:20,560 --> 00:23:24,640
अभी थोड़ी बहुत देर पहले। जब उस चर्चा को मैं देख रहा हूं तो एक नंबर

335
00:23:24,640 --> 00:23:28,640
तो निकल के आया कि निर्भय बहुत

336
00:23:28,640 --> 00:23:33,120
डेडिकेटेड तरीके से आया था। बहुत डेडिकेटेड था उसके लिए।

337
00:23:33,120 --> 00:23:37,120
है ना जैसे सब कुछ सिस्टम बना के बिल्कुल नहीं मुझे आज ये

338
00:23:37,120 --> 00:23:41,440
करना तो ये जो मेहनत है ना इसके लिए उसे अप्रिशिएट करना चाहिए

339
00:23:41,440 --> 00:23:45,520
है ना बहुत डेडिकेटेड था उसकी अपनी चीजें बिल्कुल क्लियर थी मुझे कहां

340
00:23:45,520 --> 00:23:50,640
पहुंचना है कहां से चालू करते हुए कहां पहुंचना है हां

341
00:23:50,640 --> 00:23:54,800
वो जो मेरी बात है वो यहां पे क्रॉस होती है कि हम अपने मत की रक्षा करने आए

342
00:23:54,800 --> 00:23:58,880
हैं। हम धर्म की रक्षा या सनातन की रक्षा करने नहीं आए। वो

343
00:23:58,880 --> 00:24:02,960
चीज अलग है। मगर ये बहुत ही बेसिक चीज है। मतलब अगर यह बात अगर किसी

344
00:24:02,960 --> 00:24:07,440
के ध्यान में आ जाए ना तो जो मंथन होने के बाद जो अर्थ

345
00:24:07,440 --> 00:24:11,600
जो निकलेगा ना वो धर्म ही होगा। इसमें कोई दो राय नहीं है। अच्छा

346
00:24:11,600 --> 00:24:15,520
मैंने कभी नहीं कहा है कि मैं किसी और का मत नहीं मानूंगा।

347
00:24:15,520 --> 00:24:19,680
भाई तुम मुझे ऐसी चीजें दो जो सामने वाले के समक्ष कटे ना।

348
00:24:19,680 --> 00:24:23,680
मैं जहां जाऊंगा ये सर्वशक्तिमान ईश्वर लेकर के जाऊंगा। मुसलमान

349
00:24:23,680 --> 00:24:28,080
को पांच मिनट में हराऊंगा। पांच मिनट में ईसाई को मैं चुप कराऊंगा

350
00:24:28,080 --> 00:24:32,160
पांच पांच मिनट में तो वहां पर ये चीजें ना कटे

351
00:24:32,160 --> 00:24:36,240
मुझे वो दे दो अगर कुछ तोड़ भी है भाई मैं मैं उनसे ये नहीं

352
00:24:36,240 --> 00:24:40,400
कहूंगा तुम्हारे यहां हलाला गलत है तुम्हारे यहां जो ट्रिपल तलाक है वो गलत

353
00:24:40,400 --> 00:24:44,400
है या अमुक चीज गलत है या मोहम्मद जी मोहम्मद ने ऐसा किया या उसने वैसा

354
00:24:44,400 --> 00:24:48,480
किया मैं ये नहीं कहूंगा मैं सीधे कहूंगा तुम जिसकी चीजों को मान रहे हो क्या

355
00:24:48,480 --> 00:24:53,760
वो वो है जो तुम उसको सोच रहे हो बस खत्म

356
00:24:53,760 --> 00:24:57,840
बिल्कुल हम ऐसी लड़ाई क्यों लड़े जिसका अंत

357
00:24:57,840 --> 00:25:02,080
ही नहीं है। फिर वो कहे तुम्हारे यहां राम ने ये किया था। फिर हम उसको कहे नहीं साहब

358
00:25:02,080 --> 00:25:06,080
जो है वो तो उत्तरकांडी प्रक्षिप्त है। फिर हम उसको बताएं ये वो परंपरा नहीं है।

359
00:25:06,080 --> 00:25:10,320
ये वो ये अनंत लड़ाई है। फिर वो अपने हमारे शास्त्रों में से कुछ ले आए।

360
00:25:10,320 --> 00:25:14,640
वो अनंत युद्ध है। युद्ध को समाप्त कहां किया जा सकता है? मूल

361
00:25:14,640 --> 00:25:20,640
चीजों पर बात करो। मूल मूल में क्या है?

362
00:25:21,200 --> 00:25:25,600
धर्म की गुणवत्ता की वो परिवर्तनशील नहीं है। ये भी

363
00:25:25,600 --> 00:25:29,600
एक बहुत इंपॉर्टेंट चीज है जिसको कहते हैं शाश्वत धर्म वो बदल रहा

364
00:25:29,600 --> 00:25:34,880
है। 187 में कह रहा है तो

365
00:25:34,880 --> 00:25:38,880
वो अपने पहली बात है कि वो अपने उसमें आया था। तो जब मैं उसको पूरे को देख

366
00:25:38,880 --> 00:25:42,880
रहा हूं ना श्वेता जी तो मुझे उसमें दिख रहा है मेरा छोटा भाई कैसे परेशान

367
00:25:42,880 --> 00:25:47,040
है वो जो नहीं एक मुझे उसके प्रति करुणा का भाव आया

368
00:25:47,040 --> 00:25:51,040
उसको देख रहा हूं ना उसका चेहरा पहले तो मैं उसमें जॉइ था तो मुझे अपनी

369
00:25:51,040 --> 00:25:55,200
चीजें भी जब मैं एक न्यूट्रल दर्शक की तरह से उसको देख रहा था उसके प्रति मेरे

370
00:25:55,200 --> 00:25:59,360
को बहुत वैसा भाव आया कि इसको चर्चा से हटा

371
00:25:59,360 --> 00:26:02,640
के मैंने गलत किया है

372
00:26:02,640 --> 00:26:07,360
और वो भाव क्यों आया

373
00:26:07,360 --> 00:26:11,360
मुझे जो यह लग रहा था ना कि वह अपने को बड़ा साबित करना

374
00:26:11,360 --> 00:26:15,440
चाह रहा है। एंड में मैं यह देख रहा हूं कि मैं उसकी बातों के बीच में

375
00:26:15,440 --> 00:26:19,680
टोक रहा हूं। हालांकि वो उद्देश्य पूर्वक नहीं है कि मुझे विघ्न डालना है। वो

376
00:26:19,680 --> 00:26:23,840
एक स्वाभाविक कहीं पे मेरी चीजों का विरोध हो रहा है तो मेरे मुंह से निकल जा रहा है।

377
00:26:23,840 --> 00:26:28,080
जैसे उसने माना कि मेरे मुंह से स्वाभाविक रूप से ये निकल जा रहा है कि ठीक है ना?

378
00:26:28,080 --> 00:26:32,160
ठीक है ना? है ना? है ना? या स्वाभाविक रूप से निकल रहा है तो वो

379
00:26:32,160 --> 00:26:36,320
मेरा स्वाभाविक रूप जिसके प्रति मैं कंट्रोल करने की बात भी कह रहा हूं

380
00:26:36,320 --> 00:26:40,480
मगर इसके कारण से वो मेरे प्रति थोड़ी सी अभद्रता कर रहा था ये

381
00:26:40,480 --> 00:26:44,960
चीज आप देखोगे उस वीडियो को कि कूदो मत बीच में

382
00:26:44,960 --> 00:26:50,000
है ना या हेलो हेलो हेलो हेलो इस तरह की चीजें तो

383
00:26:50,000 --> 00:26:54,000
मैं ये सब तो देख रहा हूं ये सब देख रहा हूं मगर इन

384
00:26:54,000 --> 00:26:58,560
कारणों से ये जो उसने अभद्रता की इन कारणों से मेरे मन में ये गलतफहमी

385
00:26:58,560 --> 00:27:02,800
आ गई कि वो मुझे जो है नीचा दिखाना

386
00:27:02,800 --> 00:27:07,040
चाह रहा है ये ये दिखाते हुए कि तुमको पंचा का मतलब नहीं पता है।

387
00:27:07,040 --> 00:27:12,160
समझ रहे हो? उसको इससे मतलब नहीं है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि नहीं।

388
00:27:12,160 --> 00:27:16,640
वो वहां पर ये सिद्ध करने में लग गया कि शिवश को पंचाव

389
00:27:16,640 --> 00:27:20,720
का अर्थ नहीं पता है। ठीक है? तो यह मुझे

390
00:27:20,720 --> 00:27:22,480
उस समय लगा कि यह मेरी गलतफहमी

391
00:27:22,480 --> 00:27:26,560
है। मैंने जब उसको पूरा देखा पहले मुझे और मैं उस वीडियो को देखतेदेखते आपको रात

392
00:27:26,560 --> 00:27:31,120
को एक दो दिन पहले मैंने फोन लगाया था। क्यों लगाया था पता है?

393
00:27:31,120 --> 00:27:35,600
मुझे इतनी करुणा आ रही थी कि हम लोग वीडियो बनाए और कहे

394
00:27:35,600 --> 00:27:39,840
जो इसने किया है। इसने अपने पर्सेक्टिव से किया है।

395
00:27:39,840 --> 00:27:43,840
है ना? कि वीडियो को जब इसने तीसरी आंख से देखा होगा तो इसको लगा होगा

396
00:27:43,840 --> 00:27:47,920
कहीं-कहीं गलत मिस बिहेव हो गया। तो तो ऐसा ही बिहेव

397
00:27:47,920 --> 00:27:51,920
मेरे मन में आ रहा था कि हमने यार उसके साथ जो है उसको समझ नहीं पाए। उसने

398
00:27:51,920 --> 00:27:56,320
गलती की अभद्र आचरण किया वो एक अलग बात है। मगर उसका उद्देश्य

399
00:27:56,320 --> 00:28:00,320
जो है ये नहीं था कि वो मुझे क्या कहते हैं

400
00:28:00,320 --> 00:28:04,400
नीचा दिखाना चाह रहा है क्योंकि लास्ट में जब उसने कहा था मेरी

401
00:28:04,400 --> 00:28:08,640
स्क्रीन शेयर कर दो आप। हमने कहा था स्क्रीन शेयर करने की जरूरत नहीं है। अच्छा

402
00:28:08,640 --> 00:28:12,880
उसको यह लगा कि हमने स्क्रीन शेयर ना करने के लिए इसलिए कहा है

403
00:28:12,880 --> 00:28:16,880
कि जिससे कि उसका पलड़ा भारी ना हो जाए।

404
00:28:16,880 --> 00:28:20,880
है ना? और उसका कहना था कि हम मैं बताना चाहता था कि पंचाव क्या

405
00:28:20,880 --> 00:28:24,960
है क्या नहीं है जो भी है। बिल्कुल बिल्कुल। उसने अपनी अगली

406
00:28:24,960 --> 00:28:29,120
जो लाइव थे मैंने जो कुछ समय के लिए देखा था जब थोड़ी करात्री जी की निंदा तो मैं

407
00:28:29,120 --> 00:28:33,280
मैं इसको पूरा मैं इसको पूरा कर दूं। तो हमने वहां

408
00:28:33,280 --> 00:28:37,280
पर यह सोचा था कि एक तो कोई फोटो अगर दिखा रहे हो तो आप अपनी बात

409
00:28:37,280 --> 00:28:37,780
बोल

410
00:28:37,520 --> 00:28:41,600
दो। अगर आवश्यकता लगेगी तो प्रमाण के रूप में फोटो को लेंगे। हमारे मन में ये नहीं था।

411
00:28:41,600 --> 00:28:46,080
हालांकि उसको ऐसा लग रहा है कि हमारे मन में ये था कि हम उसकी चीजों को

412
00:28:46,080 --> 00:28:50,240
यहां दिखाना नहीं चाहते। कहीं हमारी हार हो जाए। ऐसा कुछ नहीं भाई। हम अपने सिद्धांत पे लड़

413
00:28:50,240 --> 00:28:54,320
अभी थोड़ा आपको समझने की आवश्यकता है। हम राम

414
00:28:54,320 --> 00:28:58,400
को खून में रखते हैं अपने। हम राम को अपने खून में

415
00:28:58,400 --> 00:29:02,720
रखते हैं। यह जो झूठी इत्यादि वाली चीजें हैं, यह

416
00:29:02,720 --> 00:29:07,280
जानकारी में बुद्धि पूर्वक तो नहीं करने का प्रयास करते हैं। अब भगवान

417
00:29:07,280 --> 00:29:11,360
के द्वारा कहीं पर हो जाए मतलब मतलब हमारा जहां कंट्रोल ना हो वहां पर हो

418
00:29:11,360 --> 00:29:15,840
जाए वो बात अलग है। अनजाने अनजाने में तो उसके लिए क्षमा याचना भी कर लेते अगर

419
00:29:15,840 --> 00:29:19,920
पता चल गया तो। तो ऐसा उद्देश्य नहीं था कि हम तुम्हारे

420
00:29:19,920 --> 00:29:23,920
पलड़े को भारी होने से रोकना चाहते थे। उद्देश्य ये था कि

421
00:29:23,920 --> 00:29:28,000
भाई आप जो फोटो दिखा रहे हो उसके बारे में पहले आप बता दो अगर हमको आवश्यकता लगेगी हम

422
00:29:28,000 --> 00:29:33,440
आपत्ति करेंगे कि ये है कि नहीं है तो आप दिखाना प्रमाण पहली बात

423
00:29:33,440 --> 00:29:37,440
फिर जो है लास्ट में जब उसने ये कहा कि मैं क्यों

424
00:29:37,440 --> 00:29:41,440
दिखाऊं ये बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट है ये जो है ना उसने कहा कि मैं

425
00:29:41,440 --> 00:29:45,600
क्यों दिखाऊं श्वेता जी ध्यान दीजिएगा इस बात पे अब हम

426
00:29:45,600 --> 00:29:49,840
ये देख रहे हैं कि हमें अब उसके अभद्र आचरण से ये लगने लगा है कि ये जो है हमको

427
00:29:49,840 --> 00:29:52,720
ये दिखाना चाहता है कि जो है पंचा पंचाव इसको

428
00:29:52,720 --> 00:29:56,880
नहीं आता है। भाई तुम पंचाव्य का अर्थ बताओ। पंचाव्य में क्या-क्या चीजें हैं और वो

429
00:29:56,880 --> 00:30:01,200
चीजें आप मांगो तो हम ना दे तो बताओ। है ना? हम शास्त्रार्थ

430
00:30:01,200 --> 00:30:05,680
नहीं कर रहे थे। शास्त्र चर्चा कर रहे थे। शास्त्रार्थ

431
00:30:05,680 --> 00:30:09,760
में इसमें मैं इसमें एक बात कहूंगा। आपने तो एक बार वीडियो देखिएगा

432
00:30:09,760 --> 00:30:13,760
ना तो जब मैं ने ज्वाइन किया था तो मतलब उसके ही डिफेंस में एक बात कहता हूं आपको

433
00:30:13,760 --> 00:30:18,240
कि स्टार्टिंग में उसने उस उसने कहा था कि मैं

434
00:30:18,240 --> 00:30:22,320
दिखा दूंगा या बता दूंगा आपको क्या होता है। फिर जब मैंने उसको मना कर दिया था कि आपको

435
00:30:22,320 --> 00:30:26,320
आवश्यकता नहीं है। फिर जब आपने बोला दिखाने के लिए तो उसने मना कर दिया

436
00:30:26,320 --> 00:30:30,320
और आपको लगा कि अब वो मैं मैं उसी पे आ रहा हूं। उसी

437
00:30:30,320 --> 00:30:34,320
पे आ रहा हूं। कि जब मैंने वो वीडियो पूरा लास्ट

438
00:30:34,320 --> 00:30:38,560
तक देखा है ना तो मैंने क्या किया? मैंने देखा कि हमने

439
00:30:38,560 --> 00:30:42,640
कहा कि उसकी आवश्यकता नहीं है और फिर हम कह रहे हैं कि बताओ तो

440
00:30:42,640 --> 00:30:46,800
शायद तो मैं मुझे लगा कि इसने ये जो लाइन कही है मैं क्यों

441
00:30:46,800 --> 00:30:51,360
बताऊं ये इसलिए कही है जब मैं एडिटिंग कर रहा हूं तब

442
00:30:51,360 --> 00:30:55,360
ये लाइन इसलिए इसने कही कि भाई जब तुम पहले जब मैं बता रहा था तब

443
00:30:55,360 --> 00:31:00,400
तो तुमने रोक दिया मना कर दिया एक्सक्टली मैं यही कह रहा था यही कह रहा था

444
00:31:00,400 --> 00:31:04,400
मैंने आपको यही कहा था उसके बाद में तुम कह रहे हो उसके बाद

445
00:31:04,400 --> 00:31:07,760
में तुम कह रहे हो कि जो है दिखाओ पहले मैं दिखा दिखा रहा

446
00:31:07,760 --> 00:31:11,760
था तो तुमने मना कर मतलब अपने वो अपने हिसाब से उसको समझाना चाह

447
00:31:11,760 --> 00:31:15,840
रहा होगा हमने कहा मत हमने कहा मत दिखाओ हालांकि वो समझा वो दिखा के

448
00:31:15,840 --> 00:31:20,160
समझा रहा था तो हमने उससे कहा कि भाई तुम जो है वो दिखाना

449
00:31:20,160 --> 00:31:24,160
दिखाना तुम बता दो मगर जब हमने जब उसने

450
00:31:24,160 --> 00:31:28,240
क्या कहते जब आपने मना कर दिया आवश्यकता नहीं है और फिर मैं कह रहा हूं दिखाओ तो

451
00:31:28,240 --> 00:31:32,800
उसने कहा फिर मैं वो बहुत कनेक्टिंग हो गया कि भाई क्यों दिखाऊं

452
00:31:32,800 --> 00:31:36,800
जी मैं क्यों दिखाऊं अब मेरे को लगा अच्छा ये जो है यही सिद्ध करना चाह

453
00:31:36,800 --> 00:31:40,880
रहा कि जो है इसको पंजाब में नहीं पता है। ठीक है। राइट राइट। हां

454
00:31:40,880 --> 00:31:44,880
बिल्कुल सही पकड़ा आपने। यही बात है। हां यही बात है। मगर इसमें एक ट्विस्ट

455
00:31:44,880 --> 00:31:48,880
है। अब मेरा मैं इसको देख के रोआसा हो गया। भाव

456
00:31:48,880 --> 00:31:53,120
विभोर हो गया। रात में जब मैंने देखा कि मेरे से अन्याय हो गया। मतलब

457
00:31:53,120 --> 00:31:57,200
अन्याय क्यों हुआ? वो अभद्र आचरण की वजह से जो मेरी एक दृष्टि उसके लिए

458
00:31:57,200 --> 00:32:01,280
बन गई थी। उसमें मैं उसके पक्ष को समझ

459
00:32:01,280 --> 00:32:05,280
नहीं पाया। समझ रहे हैं? तो मेरे अंदर इतनी वेदना हुई। मैं रात को ही

460
00:32:05,280 --> 00:32:09,600
उनको फोन कर रहा हूं। ऑपरेटर को और चीजें कर रहा हूं।

461
00:32:09,600 --> 00:32:13,760
आपको फोन मिला रहा हूं कि भाई तुरंत लाइव करो और जल्दी अपनी ये बात बताओ।

462
00:32:13,760 --> 00:32:17,840
है ना? और दोबारा से आयोजन करो। अब इसमें ट्विस्ट है।

463
00:32:17,840 --> 00:32:22,240
एक ट्विस्ट क्या है कि जब मैं उसकी वीडियो जो उसने

464
00:32:22,240 --> 00:32:22,800
लाइव किया

465
00:32:22,800 --> 00:32:26,880
है जब मैं मैंने मैंने कहा शायद इसने वहां

466
00:32:26,880 --> 00:32:31,280
अपना ये पॉइंट जो है क्लियर किया हो। पंचावे

467
00:32:31,280 --> 00:32:36,240
वाला कि उसने क्यों कहा था कि वो जो है

468
00:32:36,240 --> 00:32:40,400
मैंने कहा कि इसका देख ले कंफर्म कर ले चलो अब रात में तो लाइव हो नहीं सकती

469
00:32:40,400 --> 00:32:44,480
11 12 बज चुका था तो मैंने उसकी लाइव देखी जितना

470
00:32:44,480 --> 00:32:48,560
उसने बोला है तो सबसे पहले तो उस पूरे उसमें व्यक्तिगत कटाक्ष

471
00:32:48,560 --> 00:32:52,640
थे कि गुरुकुल तो तुम गए नहीं हो तुम्हें अपने पता नहीं

472
00:32:52,640 --> 00:32:56,960
तो यहां से फिर से जो एक वो करुणा वाला भाव आया था वो पहले डिप्लीट

473
00:32:56,960 --> 00:33:01,440
होना शुरू हुआ उसमें पूरे व्यक्तिगत गत कटाक्ष ही थे

474
00:33:01,440 --> 00:33:05,680
और वो सैद्धांतिक बातें जो थी उस पर अभी हम बात करेंगे व्यक्तिगत कटाक्ष

475
00:33:05,680 --> 00:33:09,760
ज्यादा थे कि तुम ये है तुम वो हो और

476
00:33:09,760 --> 00:33:13,760
तुम्हारा अपना ही गुरु विरोध है तुम्हारे गुरु कुछ कह रहे हैं आचार्य कुछ कह

477
00:33:13,760 --> 00:33:17,840
रहे हैं और तुम गुरुकुल नहीं गए हो और भाई हेतु नहीं पता इसको हेतु

478
00:33:17,840 --> 00:33:21,920
नहीं पता भाई तुम्हारा मेरे हेतु ना पता होने से धर्म की

479
00:33:21,920 --> 00:33:26,400
रक्षा होगी क्या शिवश नारायण द्विवेदी को हेतु नहीं पता है ये

480
00:33:26,400 --> 00:33:30,400
आपके आपके आपके मत की रक्षा कर रहे हो आप मेरे

481
00:33:30,400 --> 00:33:34,720
भाई सनातन की रक्षा करो सनातन की

482
00:33:34,720 --> 00:33:38,480
शिवश नारायण द्विवेदी को हेतु पता है या नहीं पता है

483
00:33:38,480 --> 00:33:42,560
या शिवश नारायण द्विवेदी पंचाव्य आपको दे पाए पंचाव समझ

484
00:33:42,560 --> 00:33:46,720
पाएगा कि नहीं दे पाना तो अलग बात है पंचाव्य समझ पाएगा या नहीं समझ पाएगा

485
00:33:46,720 --> 00:33:50,800
मेरे भाई ये आपका लक्ष्य नहीं है अगर आप एक योद्धा हो

486
00:33:50,800 --> 00:33:55,120
धर्म के योद्धा आर्य समाज के योद्धा मत बनो सनातन

487
00:33:55,120 --> 00:33:59,200
धर्म के योद्धा बनो क्या मतलब है शिवा नारायण द्विवेदी को हेतु का

488
00:33:59,200 --> 00:34:03,280
मतलब पता है कि नहीं पता है भाई? इससे क्या मतलब?

489
00:34:03,280 --> 00:34:07,280
हम अच्छा खैर आगे

490
00:34:07,280 --> 00:34:11,280
दूसरी बात करें कि जब मैंने उसकी वो लाइन देखी तो

491
00:34:11,280 --> 00:34:15,440
उसमें उसने जो बातें प्रस्तुत की

492
00:34:15,440 --> 00:34:19,920
ये जो लास्ट में उसका बोलना है तो उससे यही सिद्ध हुआ कि वो यही दिखाना चाह रहा था

493
00:34:19,920 --> 00:34:23,920
कि शिवा नारायण द्विवेदी को पंचायत में नहीं आता है। अब लो

494
00:34:23,920 --> 00:34:28,000
तो वो जो करुणा भाव वाली चीजें तैयार हुई थी जो मैं कहना

495
00:34:28,000 --> 00:34:32,000
चाह रहा था तो मैंने कहा खत्म हो गया भाई हमने सही निकाला हम सही समझ रहे

496
00:34:32,000 --> 00:34:36,080
थे ये यही दिखा रहा है क्योंकि वहां पे बार-बार वो बोल ही रहा है इसको हेतु नहीं पता

497
00:34:36,080 --> 00:34:40,080
है इसको हेतु नहीं पता है ये गुरु ये गुरुकुल में रह के नहीं पढ़ा है ये नहीं है

498
00:34:40,080 --> 00:34:44,320
वो नहीं है भाई मैं नहीं है मेरे पास सिर्फ राम का नाम है मेरे राम

499
00:34:44,320 --> 00:34:48,320
का नाम है मेरे पास और मेरे गुरुदेव का आशीर्वाद मेरे पास

500
00:34:48,320 --> 00:34:52,400
इतनी चीजें ये जो है ना इनको भी कुछ मत समझो आप नहीं ऐसा नहीं है कि आपको नहीं पता है

501
00:34:52,400 --> 00:34:53,680
बता उस समय था

502
00:34:53,680 --> 00:34:57,760
मैं मैंने आप समझे नहीं एक बात कहूंगा मैं

503
00:34:57,760 --> 00:35:02,080
मैंने मैं एक बात कहूंगा मैं हमेशा उस स्थिति

504
00:35:02,080 --> 00:35:06,160
में अपने आप को खड़ा रखना चाहता हूं जो सबसे विपरीत स्थिति

505
00:35:06,160 --> 00:35:10,240
हो आप समझ नहीं रहे हो एक आम इंसान को कहीं

506
00:35:10,240 --> 00:35:14,320
पे अगर कोई कहेगा कि तुम्हारा धर्म खराब है तो वो कहेगा मुझे पंचा

507
00:35:14,320 --> 00:35:19,040
दो कहोगे आप आम इंसान

508
00:35:19,040 --> 00:35:24,800
बनके लड़ना सिखाओ जनता को अपने धर्म की रक्षा करना सिखाओ भाई

509
00:35:24,800 --> 00:35:28,800
हम किसी मुस्लिम के पास जाएंगे भाई तुम्हारा जो है ईश्वर वो काम का

510
00:35:28,800 --> 00:35:32,880
नहीं है या वो जो है मनुष्य की चाह का विषय नहीं है उसमें बात करेंगे फिर कहेंगे

511
00:35:32,880 --> 00:35:36,880
भाई हमारा सर्वशक्तिमान नहीं तुम्हारा भी तो नहीं है तो कहेंगे हमारा है क्योंकि हमारे न्याय शास्त्र

512
00:35:36,880 --> 00:35:41,040
के अंदर आ जाता है वो वो हमारी अंदर की

513
00:35:41,040 --> 00:35:45,120
चीजें हो सकती है मगर जिन चीजों के आधार पर आप

514
00:35:45,120 --> 00:35:49,280
जो है मुझे गलत सिद्ध करने निकले हो उन चीजों से सनातन की रक्षा नहीं

515
00:35:49,280 --> 00:35:53,440
होनी है ठीक है इसमें मैं

516
00:35:53,440 --> 00:35:57,680
इसमें बस एक बात कहूंगा कि मैं मैं

517
00:35:57,680 --> 00:36:01,840
उस टाइम क्या बोलते हैं मैं इसीलिए बोल रहा था कि आप इनको देने दीजिए या बोलने

518
00:36:01,840 --> 00:36:05,840
दीजिए क्योंकि जो आप उत्तर देंगे ना क्योंकि मैं जानता हूं ये बात मैं आपको पहले

519
00:36:05,840 --> 00:36:08,960
भी आपको ये बात कही थी कि जब आप उत्तर देंगे तो उसमें वो पांचों पॉइंट कवर

520
00:36:08,960 --> 00:36:12,960
हो जाएंगे अगर हाइपोथेटिकली स्पीकिंग या दुरदंतोष ने

521
00:36:12,960 --> 00:36:17,200
ऐसे मान लेते हैं कि आपको नहीं पता आपको कुछ नहीं पता उस हेतु के बारे में पंचाव

522
00:36:17,200 --> 00:36:21,360
के बारे में और या फिर न्याय दर्शन के बारे में लेकिन जो उत्तर आप देते हैं ना उसमें वो

523
00:36:21,360 --> 00:36:25,360
पांचों पॉइंट कवर हो जाते। ठीक है? लेकिन वहां तक चली बात ही नहीं गई

524
00:36:25,360 --> 00:36:29,440
थी तो उसके चर्चा ही नहीं हो पाई थी तो वो बात अलग है। बट ये मतलब ये मेरी

525
00:36:29,440 --> 00:36:33,440
मतलब थिंकिंग थी। ये मेरा प्रोसेस था और इसलिए मैं चाह रहा था कि

526
00:36:33,440 --> 00:36:37,680
आगे चली जाए। जो न्याय न्याय शास्त्र है मैंने उसका

527
00:36:37,680 --> 00:36:41,760
बहुत ज्यादा मैं आपको बता दूं बहुत ज्यादा अध्ययन नहीं किया क्योंकि मेरे अंदर ये भावना

528
00:36:41,760 --> 00:36:45,920
है उसके प्रति कि भाई न्याय क्या नाम है? न्याय।

529
00:36:45,920 --> 00:36:50,000
और अगर हम तर्क के साथ लड़ रहे हैं तो कहीं भी ऐसा नहीं होगा कि वो तर्क के विरुद्ध

530
00:36:50,000 --> 00:36:54,160
जाएगा। हां न्याय शास्त्र जो है न्याय करेगा तो कहीं

531
00:36:54,160 --> 00:36:58,320
अन्याय नहीं कर देगा। जब हम न्याय के लिए लड़ रहे हैं। है ना? न्याय

532
00:36:58,320 --> 00:37:02,480
के लिए लड़ रहे हैं तो वो कहीं अन्याय नहीं कर रही। तो इस दृष्टिकोण से मैंने बहुत ज्यादा उसको

533
00:37:02,480 --> 00:37:06,640
देखा नहीं है। हालांकि अगर आप उसको खोल खोल के पूछोगे जो पॉइंट्स तो

534
00:37:06,640 --> 00:37:10,640
हम उसका जवाब देंगे और अंत में जीत हमारी होगी। क्योंकि ये बात सत्य

535
00:37:10,640 --> 00:37:14,800
है कि मत पड़ो टक्कर में कोई नहीं है टक्कर में। यह वो वाली

536
00:37:14,800 --> 00:37:18,800
बात नहीं है कि भाई हम अपने उसके लिए कह रहे हैं। हम धर्म

537
00:37:18,800 --> 00:37:22,960
के लिए कह रहे हैं। सनातन धर्म सनातन धर्म का जो सिद्धांत है

538
00:37:22,960 --> 00:37:24,240
वो ऐसा सिद्धांत

539
00:37:24,240 --> 00:37:28,320
है कि उसके सामने पूरी दुनिया का कोई माई का लाल आ के उस सिद्धांत को

540
00:37:28,320 --> 00:37:32,480
छोटा नहीं कर सकता है। मगर वहां हम ये नहीं कहेंगे पंचाव में आप हराओगे

541
00:37:32,480 --> 00:37:36,480
तो हम मानेंगे नहीं तो नहीं क्योंकि वहां विरोधी है वो तो न्याय शास्त्र को

542
00:37:36,480 --> 00:37:40,720
भी नहीं मानेंगे। खैर समय आने पर न्याय शास्त्र

543
00:37:40,720 --> 00:37:44,720
की बात भी होगी। तो अभी अब थोड़ा सा मैं उस चर्चा में हुआ क्या

544
00:37:44,720 --> 00:37:49,040
था उस पर भी थोड़ी रोशनी डाल दूं।

545
00:37:49,040 --> 00:37:53,120
सबसे पहली बात आती है कि इन्होंने अपनी लाइफ में

546
00:37:53,120 --> 00:37:57,120
बहुत सी चीजें ऐसी कही है जो बहुत मतलब एक वो व्यक्तिगत कटाक्ष वो

547
00:37:57,120 --> 00:38:01,200
शायद अच्छा पहले निर्भय ने जाकर के एक लाइव और किया था। ये भी

548
00:38:01,200 --> 00:38:05,200
बात है और उसमें बहुत सारी अभद्र बातें कही थी तो उसको इन्होंने प्राइवेट किया है

549
00:38:05,200 --> 00:38:09,280
जहां तक मेरी जानकारी में उसके बाद उसी लाइव

550
00:38:09,280 --> 00:38:13,280
की बात कर रहा हूं। उसी लाइव में अच्छा तो

551
00:38:13,280 --> 00:38:17,520
उसके बाद इन्होंने जो एक और लाइव किया जिसमें सभ्रांत भाषा में की ये बात वो अलग

552
00:38:17,520 --> 00:38:21,520
है हम मैं देखा ही नहीं मतलब मैं उसके बाद

553
00:38:21,520 --> 00:38:25,680
तो हट ही गया फिर मैं फिर मैं गया ही नहीं फिर आज तक नहीं गया हूं तो जो जो लाइव

554
00:38:25,680 --> 00:38:29,840
तुरंत तुरंत की थी ना इसने जाकर के वो लाइव में बताया जा आप ही ने बताया था

555
00:38:29,840 --> 00:38:33,840
कि बहुत गंदा गंदा बोला था तू तड़ाक

556
00:38:33,840 --> 00:38:37,840
वाली भाषा में खैर अब उसने क्षमा मांग ली है तो उसको लेकर के

557
00:38:37,840 --> 00:38:39,920
बहुत सारी विवेचना नहीं होगी

558
00:38:39,920 --> 00:38:43,920
जी तो अब जो है वो वाली बात जो खत्म हो

559
00:38:43,920 --> 00:38:48,000
गई जो मेरे अंदर एकदम से भाव उमड़े ना कि मेरे से अन्याय हो गया क्योंकि मैंने इनकी जो लाइव

560
00:38:48,000 --> 00:38:52,080
देखी बाद वाली जिसमें इन्होंने क्लियर कर दिया कि भाई ये वहां पर यही दिखाना चाह

561
00:38:52,080 --> 00:38:56,080
रहे थे कि जो है शिवश को ये नहीं पता हां मुझे

562
00:38:56,080 --> 00:39:00,560
नहीं पता है इसमें मुझे कोई दिक्कत मैं क्या कहता हूं मेरी पहचान क्या है मैं नहीं हूं आचार्य

563
00:39:00,560 --> 00:39:04,800
मैंने कभी कहा मैंने क्या कहा प्रभु श्री राम का साधारण

564
00:39:04,800 --> 00:39:08,800
भक्त और श्रीमद जगुरु शंकराचार्य का

565
00:39:08,800 --> 00:39:13,200
अल्प अल्पज्ञ शिष्य क्या अल्पज्ञ शिष्य मैंने

566
00:39:13,200 --> 00:39:17,360
कभी नहीं कहा ठीक है हां मगर वो दृश्यम में जैसे

567
00:39:17,360 --> 00:39:21,120
चौथी क्लास फेल था ना

568
00:39:21,120 --> 00:39:25,120
वो वाट लगा के रख देता है ना पूरे सिस्टम की

569
00:39:25,120 --> 00:39:29,200
तो बस वैसा कुछ अगर देख अगर कुछ दिख रहा हो किसी को तो वो

570
00:39:29,200 --> 00:39:32,960
देख सकता है खैर अभी

571
00:39:32,960 --> 00:39:37,760
तो मैं कह रहा हूं कि हमारे समाज को ऐसा बनाओ कि समाज

572
00:39:37,760 --> 00:39:41,760
अगर मेले में जाए और वहां पे ऐसी पुस्तकें बिक रही है जिसमें माता यह

573
00:39:41,760 --> 00:39:46,080
माता को गाली दी जा रही है या मैं कह रहा हूं दयानंद जी को ही गाली दी जा रही है

574
00:39:46,080 --> 00:39:50,160
तो वहां ऑन द स्पॉट वो चीजें कर सके ऐसा हमें समाज को

575
00:39:50,160 --> 00:39:54,320
बनाना है और उस सब वैसे समाज के लिए हमें सिद्धांत देने होंगे

576
00:39:54,320 --> 00:39:55,680
कंक्लूजन

577
00:39:55,680 --> 00:40:00,080
ठीक है अब वहां पर वो न्याय शास्त्र लेकर के नहीं जाएगा कि भैया ये तुम्हारे

578
00:40:00,080 --> 00:40:04,240
हमारे न्याय शास्त्र में पंचाव के रूप में ये चीज जो मैं बोल रहा हूं वो सिद्ध है कि नहीं

579
00:40:04,240 --> 00:40:08,400
सामने वाले को मतलब ही नहीं न्याय शास्त्र से ये तो इंटरनल लड़ाई हो गई न्याय

580
00:40:08,400 --> 00:40:12,400
शास्त्र के हिसाब से दो हिंदू जो आपस में बात कर रहे हैं उनके बीच में क्या सिद्ध होता

581
00:40:12,400 --> 00:40:16,560
है मगर सामने मुस्लिम होगा नास्तिक होगा विधर्मी होगा बाइबल वाला होगा वो

582
00:40:16,560 --> 00:40:20,720
थोड़ी ना न्याया शास्त्र के आधार पर तुमसे लड़ेगा तो वहां तुम क्या करोगे चुप रहोगे हम तो तभी

583
00:40:20,720 --> 00:40:24,720
लड़ेंगे जब नया शास्त्र को मान लोगे भाई नया शास्त्र को मानना क्यों है ये

584
00:40:24,720 --> 00:40:28,960
तो बताओ उसे वो तो सिद्ध करो तर्क वितर्क करके

585
00:40:28,960 --> 00:40:32,960
अच्छा तो शुरुआत होती है कहां से

586
00:40:32,960 --> 00:40:36,960
इसने अपनी लाइफ में कहा है कि करपात्री जी ने ये बोला ये अपना मत सिद्धि नहीं कर

587
00:40:36,960 --> 00:40:41,040
पा रहे थे मेरी पहली लाइन क्या थी? जिस प्रकार जो परम सत्य है

588
00:40:41,040 --> 00:40:45,520
जो परम तत्व है वो जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में उद्भाषित

589
00:40:45,520 --> 00:40:50,320
होता है। एक ही परम सत्य जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में उभाषित होता है और वही

590
00:40:50,320 --> 00:40:54,880
अपने आप को एक ऐसा रूप धारण करता है जो मनुष्य के व्यवहार का विषय बन जाए।

591
00:40:54,880 --> 00:40:59,200
यही कुछ कहा था वहां पर है ना?

592
00:40:59,200 --> 00:41:03,200
अब ये क्या हुआ कि मैंने अपना मत स्थापित किया ना वहां। इसमें कोई किसी

593
00:41:03,200 --> 00:41:07,360
को कन्फ्यूजन रही क्या? फिर इसने वहां जो अपनी लाइव की है उसमें बार-बार कहा है कि इनका

594
00:41:07,360 --> 00:41:10,800
मत स्थापित करने में भी मैं इनकी हेल्प कर रहा था। वह क्या हेल्प थी मैं बताता

595
00:41:10,800 --> 00:41:15,200
हूं। इनको पंचाव में लिखने के लिए मेरी एक पंक्ति चाहिए

596
00:41:15,200 --> 00:41:19,440
थी। वो पंक्ति क्या थी कि जिस प्रकार जीव शरीर धारण

597
00:41:19,440 --> 00:41:23,440
करता है उसी प्रकार ईश्वर भी शरीर धारण करता है। ठीक? इनको

598
00:41:23,440 --> 00:41:27,840
मेरी एक पंक्ति चाहिए थी। तो जब तक मैं वो पंक्ति नहीं बोल रहा हूं। जो इनको चाहिए

599
00:41:27,840 --> 00:41:32,720
आखिर जो इन्होंने जो स्ट्रक्चरल तैयारी की है ना रणनीति

600
00:41:32,720 --> 00:41:36,880
कि कैसे मैं यहां तक लाऊंगा कैसे फसाऊंगा और मैंने बता दिया कि रणनीति

601
00:41:36,880 --> 00:41:41,600
को मैं क्यों नहीं वो करता हूं तो वो जो इसने जो तैयारी की थी

602
00:41:41,600 --> 00:41:45,600
वो तैयारी में वो पंक्ति इसको चाहिए थी तो इसने जो

603
00:41:45,600 --> 00:41:49,680
अपनी लाइफ में कहा है कि अपने मत को ही नहीं सिद्धि कर पाए अपने धारणा ही नहीं रख पा रहे थे

604
00:41:49,680 --> 00:41:53,760
मैंने मदद की वो मदद इन्होंने इसलिए की कि करपात्री जी ने कहीं पर अगर

605
00:41:53,760 --> 00:41:57,920
ये लिख दिया है कि जिस प्रकार वो जीव धारण करता है शरीर

606
00:41:57,920 --> 00:42:02,160
वैसे ही ईश्वर भी करता है तो बस वही एक बात है जो

607
00:42:02,160 --> 00:42:06,240
मुझे उनकी कृपात्री जी की माननी चाहिए ना भक्ति सुधा सुनू ना कर कृपात्री

608
00:42:06,240 --> 00:42:10,320
जी के प्रमाणिक शिष्य क्या कह रहे हैं उनकी सुनू बस तुमने जो वही एक पन्ना वो जो

609
00:42:10,320 --> 00:42:15,120
दो चार चीजें उनकी बता दी मैं वही सुनू उनका

610
00:42:15,120 --> 00:42:19,200
तो मैंने अपनी ओर से अपना अपनी धारणा स्पष्ट की मगर ये

611
00:42:19,200 --> 00:42:23,440
वहां कह रहे हैं कि नहीं कर पा रहे थे क्यों क्योंकि इसको वो लाइन नहीं मिल रही थी जिस प्रकार

612
00:42:23,440 --> 00:42:27,600
जीव शरीर धारण करता है तो खैर वो तो एक अलग अलग बात है। अब दूसरी पॉइंट आता

613
00:42:27,600 --> 00:42:31,760
है कि अगला जो

614
00:42:31,760 --> 00:42:35,760
मामला हुआ पता है सच बात तो ये है कि जो हमारे बीच में जो नॉलेज वाली

615
00:42:35,760 --> 00:42:40,800
बातें हुई है वो शायद हमारे बीच में आधे घंटे की है।

616
00:42:40,800 --> 00:42:44,800
आधे घंटे की नॉलेज वाली बातें हैं। बाकी सब व्यर्थ का

617
00:42:44,800 --> 00:42:48,640
चला है और

618
00:42:48,640 --> 00:42:52,640
आपकी कि मेरी? अब अब आ रही है।

619
00:42:52,640 --> 00:42:57,280
हां। तो वह जो चर्चा हमारी वह आधे घंटे की थी मात्र

620
00:42:57,280 --> 00:43:01,360
या शायद एक घंटे में हो जाती। वो दो चार पॉइंट है जो अच्छे

621
00:43:01,360 --> 00:43:05,520
थे जिन पर बात अच्छे से हुई है। तो पहली यही थी मैंने

622
00:43:05,520 --> 00:43:09,840
कहा कि अ ईश्वर शक्ति

623
00:43:09,840 --> 00:43:13,840
के रूप में है ना मिट्टी इत्यादि जैसे जो कण होते

624
00:43:13,840 --> 00:43:17,920
हैं वो बातें बाद की वो सगुण साकार कैसे हो? सगुण निराकार कैसे हुआ वो बात

625
00:43:17,920 --> 00:43:22,080
अलग है। मगर मिट्टी के कण से स्पर्श

626
00:43:22,080 --> 00:43:26,480
करती है। शक्ति जैसे यह मिट्टी का कण है मान लीजिए ठीक है

627
00:43:26,480 --> 00:43:30,720
इसको धक्का लगा तो उस धक्के ने इसको छुआ ना अब

628
00:43:30,720 --> 00:43:34,800
यहां पे वो क्या कह रहा है निर्भयार्य निर्भय का

629
00:43:34,800 --> 00:43:39,360
कहना है कि छुआ नहीं है अट्रैक्शन किया है भाई अट्रैक्शन

630
00:43:39,360 --> 00:43:43,760
भी एक क्रिया का नाम है आकर्षण बल मान लिया

631
00:43:43,760 --> 00:43:48,960
आकर्षण में बल जो है वो जाके छुएगा नहीं तो फिर वो कैसे आएगा

632
00:43:48,960 --> 00:43:53,120
छुएगा ना उसको स्पर्श हुआ बल का हुआ तो

633
00:43:53,120 --> 00:43:57,680
छुआ। अब मेरा कहना यह था कि जैसे एक बल

634
00:43:57,680 --> 00:44:01,760
इसके बगल में एक बाधा बन के है जिसके विपरीत ये मिट्टी का जो

635
00:44:01,760 --> 00:44:03,680
कण है इसके विपरीत

636
00:44:03,680 --> 00:44:07,840
नहीं जा सकता। मतलब इसको चीर के इधर नहीं निकल सकता। ऐसा बल है

637
00:44:07,840 --> 00:44:12,160
ठोस है ना? और इसके द्वारा धक्का दिए जाने पे इधर ट्रेवल

638
00:44:12,160 --> 00:44:16,160
भी करेगा। अगर वो इधर खींचना चाहेगा तो इधर ट्रेवल भी करेगा। यही है ना

639
00:44:16,160 --> 00:44:20,320
बल बल है तो यानी कि मिट्टी के कण के लिए

640
00:44:20,320 --> 00:44:25,040
एक ठोस जैसा फील होने वाला बल जो है

641
00:44:25,040 --> 00:44:29,120
निर्मित किया निर्मित हुआ ईश्वर उस रूप में ठीक है हम

642
00:44:29,120 --> 00:44:33,200
तो मैंने कहा कि जब किसी चीज पर पड़ के जो सन रेज है

643
00:44:33,200 --> 00:44:37,440
वापस आती है तब हम उसको देखते हैं यही होता है ना तो हमारी

644
00:44:37,440 --> 00:44:41,520
जो ये जो रोशनी है उसके मार्ग में

645
00:44:41,520 --> 00:44:45,600
क्या ईश्वर ऐसी बाधा उत्पन्न कर सकता है कि उससे टकरा के चीज वापस आ

646
00:44:45,600 --> 00:44:49,840
जाए तो बाधा यहां पे भी तो उत्पन्न हो रही है। है ना?

647
00:44:49,840 --> 00:44:53,920
यहां भी बाधा ही उत्पन्न हुई। वहां भी बाधा उत्पन्न हुई है। रोशनी टकरा गई वापस आ गई

648
00:44:53,920 --> 00:44:58,000
या उसके पास रोशनी जाए ही नहीं। मैंने कहा भी अच्छा मगर वो ना तो इसको

649
00:44:58,000 --> 00:45:02,000
काउंटर कर रहा है इन तर्कों को। देखिएगा वो काउंटर क्योंकि वो

650
00:45:02,000 --> 00:45:06,000
उसके इंतजार में है। जिस प्रकार जीव बस वो एक पंक्ति पंचाव्य।

651
00:45:06,000 --> 00:45:10,160
उसको वहां ले जाना है तो वो काउंटर नहीं कर रहा है। हालांकि

652
00:45:10,160 --> 00:45:14,240
मैंने यह भी कहा कि भाई उसको पता नहीं होगा इसलिए नहीं कर रहा। मगर उसका उद्देश्य

653
00:45:14,240 --> 00:45:18,240
था कि मुझको उस पंक्ति के साथ वहां ले जाना।

654
00:45:18,240 --> 00:45:18,740
निर्भय

655
00:45:18,720 --> 00:45:23,760
का यही उद्देश्य था। हम तो अब क्या होता है कि

656
00:45:23,760 --> 00:45:28,000
मैंने ये वाली बात कर दी। सबसे पहले स्पर्श वाली बात क्लियर हो गई कि स्पर्श का विषय

657
00:45:28,000 --> 00:45:32,000
बनता है। ठीक है? हम अब वो वाली बात अलग है

658
00:45:32,000 --> 00:45:36,000
कि ये अलग अगर उससे दोबारा बात होती है निर्भय से

659
00:45:36,000 --> 00:45:40,000
तो फिर उसमें हम अपनी चीजें बताएंगे कि फिर वो जो

660
00:45:40,000 --> 00:45:44,080
तत्व से रोशनी टकरा के वापस आ रही है तो उस पर रूप रंग

661
00:45:44,080 --> 00:45:48,160
कैसे आया है ना रूप रंग कैसे आया वो

662
00:45:48,160 --> 00:45:52,320
वो चीजें बात की है। देखिए नहीं नहीं वैसे

663
00:45:52,320 --> 00:45:56,320
क्या है कि आप इसको मतलब साइंट ये कन्वर्सेशन ना बहुत ही साइंटिफिकली

664
00:45:56,320 --> 00:46:00,320
चली जाती। ठीक है लेकिन जिस साइंस और जिस फिजिक्स

665
00:46:00,320 --> 00:46:04,400
के लॉस की आप बात कर रहे हैं उसका मूल क्या है? वो भी तो ईश्वर है ना। वही तो

666
00:46:04,400 --> 00:46:08,400
भाई जब हमने अचिंत शक्ति मान ही रहे हो। सीधी सिंपल सी बात है। जब

667
00:46:08,400 --> 00:46:12,400
आप धक्के के लिए मान रहे हो तो आंखों का विषय बनने के लिए मान लो। इसमें एक और

668
00:46:12,400 --> 00:46:17,040
बात कहूंगा। इसमें भी लिमिटेशन है। जैसे क्या हुआ कि मान लीजिए विज्ञान की भाषा में हमारा

669
00:46:17,040 --> 00:46:21,440
जो ये यूनिवर्स है वो फोर फोर डायमेंशनल है। ठीक है? एक मिनट

670
00:46:21,440 --> 00:46:25,520
हां बोलिए मानने पे भी एक है। क्यों मानना पड़ेगा? क्योंकि

671
00:46:25,520 --> 00:46:29,520
मनुष्य की चाह है कि कोई हो ऐसा जो सब कुछ कर सके। सब कुछ

672
00:46:29,520 --> 00:46:33,520
कर सके। में जो जो चीजें बाधांगी उसको आप अचिंत शक्ति से आप मानते

673
00:46:33,520 --> 00:46:34,020
चले जाओ।

674
00:46:34,000 --> 00:46:38,000
वरना यहां चाह का विषय नहीं रह जाएगा। फिर ईश्वर की सिद्धि नहीं हो पाएगी। यह सब

675
00:46:38,000 --> 00:46:42,880
सोचना है ना। इसलिए मानना पड़ेगा। मानना पड़ेगा। चलिए अब आप बोलिए।

676
00:46:42,880 --> 00:46:47,200
मैं तो मैं यही कह रहा हूं कि जैसे मतलब कम पॉलिसी साइंटिफिकली

677
00:46:47,200 --> 00:46:51,280
चली जाती है लेकिन उसका ना फिर फिर वो डिबेट जो है फिर वो

678
00:46:51,280 --> 00:46:55,360
मूल वाली ठीक है वो अलग वो अलग हालांकि मेरा वो क्षेत्र है भी नहीं वो

679
00:46:55,360 --> 00:46:59,440
फिर जिसमें नहीं अगर मान लीजिए कन्वर्सेशन चल भी रही है या बातें चल रही है

680
00:46:59,440 --> 00:47:04,960
अब आप क्या है कि आपकी भी लिमिटेशन है ना मतलब आप क्या है इस यूनिवर्स के

681
00:47:04,960 --> 00:47:09,200
को क्या किसी भी एक्शन को जो फिजिकल एक्शन हो रहे हैं जो व्यवहारिक

682
00:47:09,200 --> 00:47:13,360
एक्शन हो रहे हैं जो काम हो रहा है उसको आप इसी के बनाए हुए रूल्स के अंडर ही

683
00:47:13,360 --> 00:47:17,360
मतलब के हिसाब से ही आप उसको प्रूव कर सकते हो। ठीक है? मैंने ये भी कहा। मैंने

684
00:47:17,360 --> 00:47:21,520
ये भी कहा जो आप कह रहे हो। मैंने ये भी कहा जैसे ये नोटबुक है।

685
00:47:21,520 --> 00:47:25,680
ठीक है? इसका कलर क्या है? इसका कलर क्या है? इस

686
00:47:25,680 --> 00:47:29,920
चीज में हमारी आंखें प्रमाण है। जी। इस चीज में हमारी आंखें प्रमाण

687
00:47:29,920 --> 00:47:34,240
है। अब मैं कहूं कि यहां जो आवाज है उसके लिए भी मेरी आंख प्रमाण होगी।

688
00:47:34,240 --> 00:47:38,240
तो मेरी आंख आवाज के विषय में प्रमाण नहीं हो सकती। तो यह

689
00:47:38,240 --> 00:47:42,560
अती्द्रिय विषय है। हां बिल्कुल अती्द्रिय विषय

690
00:47:42,560 --> 00:47:46,640
एक समय पर जाकर तो वहां अचिंत शक्ति को आपको मानना पड़ेगा। अब क्यों मानना पड़ेगा? मान लो

691
00:47:46,640 --> 00:47:49,200
देखो जाके वो कहता है जावेद अख्तर

692
00:47:49,200 --> 00:47:53,360
कहते हैं मान लो। क्यों मान लो? क्योंकि मनुष्य में चाह आ रही है। आप

693
00:47:53,360 --> 00:47:57,760
मनुष्य की चाह का विषय सिद्ध करो। फिर क्या है? क्यों आ रही है? नहीं तो अपने आप को पागल मान लो।

694
00:47:57,760 --> 00:48:01,760
नहीं तो अपने आप को पागल मान लो। जो चीज है नहीं उसको खोज रहे हो।

695
00:48:01,760 --> 00:48:05,920
ठीक है? तो मैं इसमें हां एक बात कहूंगा जैसे कि

696
00:48:05,920 --> 00:48:10,400
मैं इन जनरल सबकी सभी ऑडियंस के लिए बात बोलता हूं कि क्या है ना कि

697
00:48:10,400 --> 00:48:14,400
जैसा कि ये यूनिवर्स की अपनी लिमिटेशन है। इस ब्रह्मांड की अपनी लिमिटेशन

698
00:48:14,400 --> 00:48:18,400
है। ऐसे बहुत सारे ब्रह्मांड है जिसको मतलब आप मतलब सोच

699
00:48:18,400 --> 00:48:22,400
या समझ सकते हैं या फिर जो चीजें कर सकते हैं। अब क्या है कि जो मॉडर्न साइंस

700
00:48:22,400 --> 00:48:26,480
है ना वो इनफेरेंस के बेसिस पे चलती है।

701
00:48:26,480 --> 00:48:31,120
जैसे कोई टूल, कोई मशीन, टेलिस्कोप, माइक्रोस्कोप

702
00:48:31,120 --> 00:48:35,120
या फिर कोई इंस्ट्रूमेंट जिससे आप क्या करते हो? ऑब्जर्व करते हो और उसको

703
00:48:35,120 --> 00:48:39,120
इनफर करते हो। जैसे कि प्रत्यक्ष या परोक्ष बोल देंगे उसको।

704
00:48:39,120 --> 00:48:43,360
प्रत्यक्ष या परोक्ष। ठीक है? लेकिन यह मेथड जो है वो

705
00:48:43,360 --> 00:48:47,440
के वो आपको ईश्वर की चाह या फिर

706
00:48:47,440 --> 00:48:51,600
ईश्वर की डिस्कवरी से अह को प्राप्त नहीं करवा सकती।

707
00:48:51,600 --> 00:48:55,680
ठीक है? इसीलिए जगुरु आदि शंकराचार्य ने एक अपना एक ग्रंथ लिखा अपरोक्ष

708
00:48:55,680 --> 00:48:59,840
अनुभूति। ठीक है? जिसमें आप क्या बोलते

709
00:48:59,840 --> 00:49:04,000
हैं और ये उन्होंने तीसरा मेथड बताया इस इस हमारे इस संसार के हिसाब

710
00:49:04,000 --> 00:49:04,500
से इस

711
00:49:04,240 --> 00:49:08,960
जगत के हिसाब से कि अपरोक्ष मतलब ना तो डायरेक्ट परसेप्शन

712
00:49:08,960 --> 00:49:13,600
ना इनफेरेंस ना डायरेक्ट मतलब प्रत्यक्ष ना परोक्ष।

713
00:49:13,600 --> 00:49:17,600
ठीक है? यह तीसरा मेथड बताया जिससे आप मतलब ब्रह्म को

714
00:49:17,600 --> 00:49:21,760
समझ सकते हो। ठीक है? और वह होता है मतलब इस एक्सटर्नल वर्ल्ड के बियों्ड

715
00:49:21,760 --> 00:49:26,080
सोचना या जानना और वो क्या है वही मूल चाह अस्तो

716
00:49:26,080 --> 00:49:30,080
मादम तमस मृत्य मृतम गमय वो जो मूल चाह है ना वो मूल चाह

717
00:49:30,080 --> 00:49:34,320
वो अपरोक्ष अनुभूति कराएगा तब आपको ब्रह्म की अनुभूति

718
00:49:34,320 --> 00:49:38,640
आदि होगी फलाना फलाना ठीक है तो आपका जो कन्वर्सेशन है वही चीज उसको समझनी

719
00:49:38,640 --> 00:49:42,800
थी ठीक है अगर वो ये समझ जाता कि जो ये परोक्ष और प्रत्यक्ष

720
00:49:42,800 --> 00:49:47,040
और अपरोक्ष के बीच का जो है ना गैप ये गैप वो जो गैप

721
00:49:47,040 --> 00:49:51,040
और वो जो अपरोक्ष अनुभूति है वो ईश्वर है वो ब्रह्म है ठीक

722
00:49:51,040 --> 00:49:55,040
है जो हम क्या बोलते हैं ऑफ कोर्स इससे नहीं जा सकते तो वो

723
00:49:55,040 --> 00:49:59,360
जो का लगना या नहीं दिखना जी जिसको

724
00:49:59,360 --> 00:50:03,600
आपने एक वर्ड दिया था अचिंत शक्ति ठीक है बस लास्ट पॉइंट बोलूंगा

725
00:50:03,600 --> 00:50:07,760
तो वही अचिंत शक्ति जो है वही ईश्वर है या वही अचिंत

726
00:50:07,760 --> 00:50:11,920
शक्ति का जो मूल है वो ईश्वर या ब्रह्म है बस ये कह रहा था बोलिए तो

727
00:50:11,920 --> 00:50:15,920
फिर भी जो क्योंकि ये वाली हमारी चीजें क्लियर है कि वो आंखों

728
00:50:15,920 --> 00:50:19,280
का विषय कैसे बन जाता है उसमें तत्व क्या है क्या नहीं है वो

729
00:50:19,280 --> 00:50:23,360
विषय क्लियर है हमारी तो जो यह जो जहां पे वो बात हो रही

730
00:50:23,360 --> 00:50:27,440
थी उसका मैं जवाब दे सकता था तो मैं दे रहा था मैंने दिया बट जो इतना

731
00:50:27,440 --> 00:50:31,520
खोल करके जवाब देना था ना जैसे अभी मैंने दिया है

732
00:50:31,520 --> 00:50:35,520
अच्छा स्पर्श वाली बात पे उसको लगा कि मैं मिट्टी

733
00:50:35,520 --> 00:50:39,600
के कण को स्पर्श करने की बात नहीं कर रहा हूं मैं मनुष्य द्वारा ईश्वर

734
00:50:39,600 --> 00:50:43,760
को स्पर्श करने की बात कर रहा हूं तो उसमें भी थोड़ी बहुत देर मतलब

735
00:50:43,760 --> 00:50:48,000
दूसरी बातें करने लगा तो मैंने उन बातों को इसलिए नहीं छुआ

736
00:50:48,000 --> 00:50:52,080
है ना कि हमारा ट्रैक ना बदल जाए। ट्रैक चल रहा है जो

737
00:50:52,080 --> 00:50:56,320
चलता रहे। तो मैंने अगर वह ऐसे कहने लगा जैसे उसने कहा कि

738
00:50:56,320 --> 00:51:00,640
भाई ईश्वर स्पर्श करता है। मैंने कहा ईश्वर नहीं करता तो तुम बताओ तुम क्या

739
00:51:00,640 --> 00:51:04,720
कौन स्पर्श करता है? मतलब मैंने उस पर छोड़ा। हां हां क्योंकि बात

740
00:51:04,720 --> 00:51:08,800
तो वही है। ईश्वर ही स्पर्श कर रहा है ना मिट्टी के कण को जब वो मिट्टी के कण इकट्ठा हो

741
00:51:08,800 --> 00:51:12,800
रहे है। है ना? अदृश्य शक्ति के रूप में वही स्पर्श कर रहा है।

742
00:51:12,800 --> 00:51:16,960
हां बिल्कुल। तो स्पर्श का व्यवहार वहां हो रहा है। यानी वो व्यवहार

743
00:51:16,960 --> 00:51:21,120
बन रहा है। या मैं मैं मैं इसको थोड़ा सा और एक लाइन में और बोल देता हूं।

744
00:51:21,120 --> 00:51:25,440
मान लीजिए इस पे भी कोई किसी उस उस व्यक्ति ने ये कर दिया है कटाक्ष कर दिया या फिर कुतर्क

745
00:51:25,440 --> 00:51:29,520
या तर्क कर दिया अपना कि नहीं नहीं भाई ईश्वर कैसे कर रहा है? वो तो ऑटो एटॉमिक एनर्जी

746
00:51:29,520 --> 00:51:33,680
से आपस में हो रहा है। न्यूक्लियर एनर्जी से आपस में हो रहा है। तो वो जो न्यूक्लियर एनर्जी है

747
00:51:33,680 --> 00:51:34,480
उसका मूल क्या

748
00:51:34,480 --> 00:51:38,480
वो ईश्वर है जो न्यूक्लियर एनर्जी दे रहा है या जो फिर वो एटम्स में

749
00:51:38,480 --> 00:51:42,560
आ रही है और फिर वो आपस में इधर उधर धक्का लग रहा है मुश्किल या फिर ग्रेविटेशनल एनर्जी या फिर दूसरी

750
00:51:42,560 --> 00:51:46,560
फलाना फला या सगुण का कुल

751
00:51:46,560 --> 00:51:51,200
मिलाकर के सगुण निराकार का अर्थ यही है कि वो व्यवहारिक है

752
00:51:51,200 --> 00:51:55,760
जी सगुण निराकार का अर्थ यही है कि वो व्यवहारिक है व्यवहारिक है

753
00:51:55,760 --> 00:51:59,760
व्यवहारिक है तो हमारी किसी ना किसी इंद्री का विषय तो है ही है ना व्यवहार

754
00:51:59,760 --> 00:52:04,720
का मतलब क्या है करेक्ट है ना विषय है

755
00:52:04,720 --> 00:52:08,800
अब अब जो है वह व्यवहारिक है तो मैंने उसकी जब व्याख्या की तो थोड़ी बहुत

756
00:52:08,800 --> 00:52:12,800
देर उसमें चली और फिर मैंने बताया कि भाई आंखों की रोशनी में बाधा उत्पन्न हुई उससे टकरा

757
00:52:12,800 --> 00:52:17,120
के वापस आई तो वो हो गया वही बाधा मिट्टी के कण के लिए उत्पन्न हुई थी

758
00:52:17,120 --> 00:52:21,120
अब वो रोशनी के लिए उत्पन्न हो रही है ठीक इसमें आगे चले

759
00:52:21,120 --> 00:52:25,760
उसने क्या किया ऐसे ऐसे वो अनगिनत बाधाएं ला सकती है अनगिनत

760
00:52:25,760 --> 00:52:30,000
वो हम सोच भी नहीं सकते इसमें उसने क्या किया इतना मैं कहूंगा कि अपने उस

761
00:52:30,000 --> 00:52:34,000
लाइन के चक्कर में के वो जीव जिस तरह से शरीर धारण करता है जो

762
00:52:34,000 --> 00:52:38,000
कृपा जी महाराज के ग्रंथ से उसने पढ़ लिया है और उस को अपने

763
00:52:38,000 --> 00:52:42,000
न्याय पंचा में जो डालना था वहां जाके एंड करना था उसको बूम

764
00:52:42,000 --> 00:52:46,000
करना था उसके हिसाब से जो उसको एंडिंग क्लाइमेक्स उसने रच

765
00:52:46,000 --> 00:52:49,600
रखा था इस फिल्म का तो वो उसकी रक्षा कर

766
00:52:49,600 --> 00:52:53,600
रहा था वो उस पर ला रहा था शरीर धारण करता है ये क्यों नहीं बोल रहा है ये

767
00:52:53,600 --> 00:52:57,840
व्यक्ति शरीर धारण करता है जैसे जीव और आपने बोला भी है

768
00:52:57,840 --> 00:53:02,560
अच्छा वहां कह रहा है कि भाई वो खुद उनके क्लियर नहीं थे सोचिए

769
00:53:02,560 --> 00:53:06,800
यहां पे खुद बता रहा है। आपने एक वीडियो में बोला भी है कि जिस प्रकार से जीव शरीर

770
00:53:06,800 --> 00:53:10,880
धारण करता है वैसे ईश्वर भी करता है। तो इसका मतलब मेरा क्लियर है। मगर वहां अपनी

771
00:53:10,880 --> 00:53:15,040
लाइफ में बता रहा है कि मेरा क्लियर नहीं था कांसेप्ट। है ना?

772
00:53:15,040 --> 00:53:19,360
वो उसने क्लियर करवाया। ये बता रहा है बार-बार। वो उसने क्लियर करवाया।

773
00:53:19,360 --> 00:53:23,440
खैर इससे आगे बढ़ी। हम लोग इस पे आ गए। धारणा स्पष्ट

774
00:53:23,440 --> 00:53:27,520
हो गई कि जिस प्रकार जीव शरीर धारण करता है वैसे भी वैसे ही

775
00:53:27,520 --> 00:53:31,520
ईश्वर भी शरीर धारण करता है जिसे अवतार कहा जाता है। है ना?

776
00:53:31,520 --> 00:53:35,680
हम आगे चले अब आगे वो आ गया सब कुछ

777
00:53:35,680 --> 00:53:39,840
कर सकता है तो ये कर सकता है क्या तो उस पर तो आप लोगों को मालूम ही हम हमारा

778
00:53:39,840 --> 00:53:43,840
कितना पावरफुल कांसेप्ट है फिर भी मैं थोड़ा सा समझा देता हूं इसको

779
00:53:43,840 --> 00:53:48,080
अब वो काउंटर करे तब ना जो प्रश्न रह जाते हैं

780
00:53:48,080 --> 00:53:52,080
जब सामने वाला काउंटर ही नहीं कर रहा है तो वो बाकी के प्रश्नों का उत्तर कैसे दूंगा

781
00:53:52,080 --> 00:53:56,160
मैं अब मैं देता हूं देखिए दो और

782
00:53:56,160 --> 00:54:00,160
दो पांच कर सकता है क्या दो और दो पांच होता है यह क्या कोई

783
00:54:00,160 --> 00:54:04,320
क्रिया है क्या ये कोई एक एक्शन

784
00:54:04,320 --> 00:54:05,360
है क्या?

785
00:54:05,360 --> 00:54:09,600
हां ये एक इंफॉर्मेशन है कि दो और दो पांच होते हैं

786
00:54:09,600 --> 00:54:14,080
और दो और दो चार दो और दो दो और दो चार होते हैं। ये एक इंफॉर्मेशन

787
00:54:14,080 --> 00:54:18,080
है। अब उसका कहना है कि दो और दो पांच कर सकता है। इसका मतलब

788
00:54:18,080 --> 00:54:22,240
इंफॉर्मेशन चेंज करने की बात हो रही है ना। पहली बात क्रिया

789
00:54:22,240 --> 00:54:26,480
की बात नहीं हो रही है कि इस पत्थर को उठा के वहां फेंक सकता है। ये कोई क्रिया

790
00:54:26,480 --> 00:54:30,480
की बात नहीं हो रही है। क्या हो रहा है? इंफॉर्मेशन इंफॉर्मेशन चेंज

791
00:54:30,480 --> 00:54:34,560
हो सकती है क्या? बहुत साधारण सी बात है। अच्छा वास्तविकता में तत्व

792
00:54:34,560 --> 00:54:38,640
कितने हैं? आर्य समाज की बात ले लो। आर्य समाज की बात ले लो।

793
00:54:38,640 --> 00:54:42,640
कोई कहे ये तीन तत्व है केवल वास्तविकता में। हमको दिख

794
00:54:42,640 --> 00:54:46,720
कितने रहे हैं? जीव को आभास क्या हो रहा है? तीन से ज्यादा

795
00:54:46,720 --> 00:54:50,720
तत्वों का आभास हो रहा है ना। तभी तो बंधी है। बंधन में है। तभी तो

796
00:54:50,720 --> 00:54:54,720
बंधन में है। अगर आर्य समाज की धारा से भी चले। शंकराचार्य को

797
00:54:54,720 --> 00:54:59,040
अभी छोड़ दो। मगर जीव को आभास हो रहा है ना झूठ का तीन से ज्यादा तत्वों

798
00:54:59,040 --> 00:55:03,120
का हां हो रहा है हो रहा है तो यानी कि ईश्वर गलत

799
00:55:03,120 --> 00:55:07,280
इंफॉर्मेशन दे रहा है हां हां बिल्कुल

800
00:55:07,280 --> 00:55:11,280
हां गलत इन दे रहा है तो वही गलत इन नहीं दे सकता है कि दो और दो पांच

801
00:55:11,280 --> 00:55:15,280
होते हैं हां है ना अब बात ये आ

802
00:55:15,280 --> 00:55:19,360
जाती है कि रियलिटी में नहीं हुआ है इंफॉर्मेशन चेंज की है तो भाई रियलिटी में तो

803
00:55:19,360 --> 00:55:20,560
तीन से ज्यादा तत्व नहीं

804
00:55:20,560 --> 00:55:24,560
है रियलिटी में तो कोई किसी की मां नहीं है कोई किसी का भाई

805
00:55:24,560 --> 00:55:28,640
नहीं जितना कोई किसी का भाई है, जितना

806
00:55:28,640 --> 00:55:32,720
कोई किसी की मां है, उतना ही कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर अवतार लेता

807
00:55:32,720 --> 00:55:37,280
है। बस सिंपल

808
00:55:37,280 --> 00:55:41,840
मैंने कब कहा कि भाई उस दुनिया में अवतार लेता है मुक्त की दुनिया में।

809
00:55:41,840 --> 00:55:46,160
समझ रहे हैं? तो कहने का तात्पर्य क्या है? कि रियलिटी

810
00:55:46,160 --> 00:55:50,160
में नहीं हुआ तो भाई कोई रियल में कोई किसी की मां भी नहीं है। कोई किसी

811
00:55:50,160 --> 00:55:54,240
का भाई रियल में ये सब जो आप इतने तत्व देख रहे हो ये है ही नहीं।

812
00:55:54,240 --> 00:55:58,320
रियल क्या है? तीन तत्व है। अभी आर्य समाज के अनुसार बात कर रहा हूं। वो

813
00:55:58,320 --> 00:56:02,400
अद्वैत की बात तो बाद की। तीन तत्व निर्गुण निराकार, सगुण साकार ये सब

814
00:56:02,400 --> 00:56:06,400
सगुण निराकार वो तो बाद की बात है। ठीक है? अच्छा एक चीज और

815
00:56:06,400 --> 00:56:10,400
है। अब ये हमारे ग्रंथों के आधार पे हमको बता रहे। जबकि मैंने शुरू

816
00:56:10,400 --> 00:56:14,800
में तीन वो तीन बेर खाती है। वो तीन बेर खाती थी। बिजना डुलाती है। वो बिजना

817
00:56:14,800 --> 00:56:18,800
डुलाती थी। हम इसमें वो तीन बेर बेर

818
00:56:18,800 --> 00:56:23,040
शब्द का उपयोग दो बार विजुना डुलाती है बिजना बिजना शब्द का उपयोग

819
00:56:23,040 --> 00:56:27,120
दो बार कौन से शब्द का उपयोग किस लिए तुम कैसे तय करोगे भाई हमारे

820
00:56:27,120 --> 00:56:31,280
आचार्यों ने क्या कहा है जब हमारे आचार्य ठो ताल ठोक ठोक करके ये

821
00:56:31,280 --> 00:56:35,440
कह रहे हैं कि हमारा जीव हमारा जो ईश्वर है वो जगत बनाता ही नहीं बनता

822
00:56:35,440 --> 00:56:35,940
भी

823
00:56:35,680 --> 00:56:39,680
है तो फिर तुम कहां से कह रहे हो कि वो शरीर धारण नहीं कर सकता ईश्वर ही हमारे यहां

824
00:56:39,680 --> 00:56:44,160
तो ईश्वर ही शरीर धारण कर रहा है भाई तुम्हारा

825
00:56:44,160 --> 00:56:48,160
जो वो है अगर अद्वैत के हिसाब से देखेंगे तो ईश्वर

826
00:56:48,160 --> 00:56:52,960
ही शरीर धारण कर रहा है। हालांकि अभी मैं ऑफिशियल स्टेटमेंट नहीं दे रहा हूं।

827
00:56:52,960 --> 00:56:57,040
मगर इस बारे में पंचाव के बारे में वो अगर बात हुई निर्भय से

828
00:56:57,040 --> 00:57:01,280
तो फिर बात होगी वहां अभी ऑफिशियल स्टेटमेंट नहीं है उस संबंध में।

829
00:57:01,280 --> 00:57:05,280
मगर क्या कहते हैं ये?

830
00:57:05,280 --> 00:57:09,360
जब हमारा ईश्वर जगत बनाता ही नहीं, बनता भी है तो तुम अब हमारे

831
00:57:09,360 --> 00:57:13,360
ही आचार्यों का नाम लेके हमें बता रहे हो कि अवतार नहीं ले सकता। वो ये मान

832
00:57:13,360 --> 00:57:17,520
रहे हैं। यह कैसे कह रहे हो? और अगर तुम्हें

833
00:57:17,520 --> 00:57:21,520
आचार्यों का वो करके करना था तो तुम आचार्यों के पास जाओ। वहां

834
00:57:21,520 --> 00:57:25,680
जाके कहो उनसे कहो कि भैया तुम्हारा न्याय से मैच नहीं खा

835
00:57:25,680 --> 00:57:28,880
रहा है।

836
00:57:28,880 --> 00:57:32,960
सीधे अच्छा दूसरी बात

837
00:57:32,960 --> 00:57:37,520
एक ये आ जाती है तो इंफॉर्मेशन वाली बात आप समझ गए कि

838
00:57:37,520 --> 00:57:41,520
ईश्वर को इंफॉर्मेशन बदलनी है इन सब चीजों में। वंद्या पुत्र

839
00:57:41,520 --> 00:57:45,520
में ईश्वर ऐसा पत्थर में यह सब इनफेटिव वाली बातें हैं। यहां इंफॉर्मेशन चेंज

840
00:57:45,520 --> 00:57:49,920
करनी है। आपको महसूस होगा कि हां ईश्वर ने वह कर दिया जो मैं चाहता था।

841
00:57:49,920 --> 00:57:53,920
हां। खैर तो बात ये है

842
00:57:53,920 --> 00:57:57,920
क्या कि अब मान लो चलो इस पर भी आ जाए व्यक्ति कि भैया उसने

843
00:57:57,920 --> 00:58:01,920
रियल में नहीं किया। अब तू सिद्ध कैसे करेगा? कैसे करेगा सिद्ध?

844
00:58:01,920 --> 00:58:07,040
उसने तो तुम्हारे मन की इंफॉर्मेशन बदल दी। तुम खुद बोलोगे दो और दो पांच होते हैं। फिर

845
00:58:07,040 --> 00:58:11,120
सबूत क्या है? सबूत क्या है? कि भैया और जितने लोग हैं उनका भी मन बदल

846
00:58:11,120 --> 00:58:15,200
दिया और लोग है ना जैसे करपात्री जी ने उसमें

847
00:58:15,200 --> 00:58:20,960
एक बात लिखी है नास्तिकवाद आस्तिकवाद में कि

848
00:58:20,960 --> 00:58:25,200
वैश्या को ऊपर से आप देखेंगे ना वो बात ही पारमार्थिक

849
00:58:25,200 --> 00:58:29,440
धरातल से दिव्य दृष्टि से हो रही है उन्होंने बात मान उन्होंने उसमें ये लाइन लिखी है कि वैश्या

850
00:58:29,440 --> 00:58:33,520
को कुमारी नहीं बना सकता क्या ईश्वर वैश्या को कुंवारी बना

851
00:58:33,520 --> 00:58:38,160
सकता है तो उन्होंने क्या कहा जन्मांतर में तो बना ही सकता है ये

852
00:58:38,160 --> 00:58:42,320
जन्मांतर कौन देख सकता है? जन्म

853
00:58:42,320 --> 00:58:44,080
जन्मांतर कौन? जन्मांतर

854
00:58:44,080 --> 00:58:48,400
देख सकता है। जिसको दिव्य दृष्टि प्राप्त है। जो इस दुनिया

855
00:58:48,400 --> 00:58:52,400
के बाहर जाकर के देखेगा कि व्यवहारिक भौतिक जगत क्या है? यही व्यक्ति जन्म ले रहा

856
00:58:52,400 --> 00:58:56,560
है। दूसरा क्या भौतिकता को मानने वाला व्यक्ति देख सकता है कि जन्मांतर

857
00:58:56,560 --> 00:59:00,560
हुआ है? नहीं हुआ है। तो क्या हुआ है? कि

858
00:59:00,560 --> 00:59:04,560
उसने दूसरा शरीर धारण किया है। मगर इस दूसरे शरीर

859
00:59:04,560 --> 00:59:08,560
को आप दूसरा सिद्ध कैसे करोगे? जितनी भी भौतिक साइंस है वो तो शरीर

860
00:59:08,560 --> 00:59:13,200
के जो अवयव होते हैं फिंगरप्रिंट ये सब इनसे पहचान करती है।

861
00:59:13,200 --> 00:59:17,200
तो क्या ईश्वर दूसरे शरीर को भी वही फिंगरप्रिंट दे सकता है? हां दे सकता

862
00:59:17,200 --> 00:59:21,200
है। हो गया दे सकता है। क्या वही के वही

863
00:59:21,200 --> 00:59:25,360
तिल लगा सकता है? जहां पहले तिल था वहां लगा सकता है। तो सिद्ध कैसे

864
00:59:25,360 --> 00:59:29,440
करोगे कि वो शरीर नहीं है। और फिर जो अगर

865
00:59:29,440 --> 00:59:33,920
क्वालिटी की जांच हो सकती होगी कि वैश्या का जो शरीर है उसमें क्या चीज क्षतिग्रस्त

866
00:59:33,920 --> 00:59:38,160
होती है और बाद में क्या चीज जो है कौमार्य के लिए अनिवार्य होती है उसकी

867
00:59:38,160 --> 00:59:42,160
टेस्टिंग कर लो। तो भौतिक क्या ईश्वर ऐसा शरीर दे सकता

868
00:59:42,160 --> 00:59:46,240
है? शरीर बदला हुआ है। यह ईश्वर जानता है। यह दिव्य

869
00:59:46,240 --> 00:59:50,240
दृष्टि ईश्वर पर विश्वास रखने वाला जानता है। मगर जब तक कोई ईश्वर

870
00:59:50,240 --> 00:59:54,640
पर विश्वास नहीं रख रखता है तब तक वो ये नहीं कह सकता ये दूसरा शरीर है।

871
00:59:54,640 --> 00:59:59,120
सिद्धि नहीं कर पाओगे। तो दूसरा शरीर सिद्ध ना कर पाने की स्थिति में भौतिकता

872
00:59:59,120 --> 01:00:03,120
के अनुसार क्या हुआ? वैश्या को कुमारा बना दिया। कुमार्य

873
01:00:03,120 --> 01:00:07,360
दे दिया ईश्वर ने। अब तुम मानो चाहे ना मानो।

874
01:00:07,360 --> 01:00:11,440
अब जो नहीं मानेगा उनके मन की इंफॉर्मेशन बदल सकता है। सब कहने लगेंगे हो गया हो

875
01:00:11,440 --> 01:00:15,760
गया हो गया। इसी को कहते हैं ईश्वर की माया शक्ति। मेरे भाई

876
01:00:15,760 --> 01:00:20,000
ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध करना है ना। जीव की चाह का वास्तविक विषय बनाना

877
01:00:20,000 --> 01:00:24,400
है ना। अधर्मियों को विरोधियों को खदेड़ना है ना। नास्तिकों

878
01:00:24,400 --> 01:00:28,400
का मुंह बंद करना है ना। ये है वो शक्ति सर्वशक्तिमान ईश्वर की

879
01:00:28,400 --> 01:00:32,640
शक्ति। नहीं हरा पाएगा कोई इस शक्ति को। हम

880
01:00:32,640 --> 01:00:36,640
अपने आचार्य के लिए अपनी परंपरा के लिए नहीं लड़ते हैं। हम धर्म और ईश्वर के लिए लड़ते हैं।

881
01:00:36,640 --> 01:00:40,720
धर्म और ईश्वर। हां। हां आचार्य का सिद्धांत

882
01:00:40,720 --> 01:00:45,440
हमारे पास है। वो हथियार है। ब्रह्मास्त्र है वो।

883
01:00:45,440 --> 01:00:49,600
यह शायद इस जीवन में आप लोग समझ पाओ। अपने

884
01:00:49,600 --> 01:00:53,680
दिल पे अपने हृदय पे हाथ रख के शीशे में देख के अपने आप को देखो

885
01:00:53,680 --> 01:00:58,000
एक बार कि शिवश नारायण द्विवेदी कहना

886
01:00:58,000 --> 01:01:02,080
क्या चाह रहा है। भाई उसको देखो ध्यान से। पहले ही अपना पर्सेक्टिव

887
01:01:02,080 --> 01:01:06,160
मत बनाओ विरोधाभास का कि वो कहना क्या चाह रहा है।

888
01:01:06,160 --> 01:01:10,640
एक बार झांको अपनी आत्मा में। खैर

889
01:01:10,640 --> 01:01:14,160
तो अविद्या वाली बात क्लियर हो गई। फिर इसके बाद हम

890
01:01:14,160 --> 01:01:18,160
लोग अब अविद्या वाली बात पर भी इन्होंने काउंटर नहीं किया उसमें चर्चा में। है

891
01:01:18,160 --> 01:01:22,560
ना? अच्छा एक वो आना जाना वाली बात हुई थी बीच में आना जाना

892
01:01:22,560 --> 01:01:26,640
पीछे पड़ गए कि वो जो है आपने देखना शब्द क्यों कहा है?

893
01:01:26,640 --> 01:01:30,800
आसमान को तो देख ही नहीं सकते। भाई मंत्र को देखा था क्या ऋषियों ने?

894
01:01:30,800 --> 01:01:35,680
काहे के लिए मंत्र दृष्टा मंत्र दृष्टा लिखे पड़े हो। व्यवहार

895
01:01:35,680 --> 01:01:40,000
में कहना पड़ रहा है ना व्यवहार कैसे करोगे करेक्ट और ये जो ज्ञान

896
01:01:40,000 --> 01:01:44,160
है तो ये जो ज्ञान है ईश्वर का ये ज्ञान

897
01:01:44,160 --> 01:01:48,160
भी ज्ञान के रूप में है कि मंत्रों के रूप में ही है

898
01:01:48,160 --> 01:01:53,600
मंत्रों के रूप में होगा तो कहीं ना कहीं किसी देश काल परिस्थिति से बाधित होगा

899
01:01:53,600 --> 01:01:57,680
होगा ना कहीं ना कहीं ऐसी जगह होगी जहां नहीं होगा क्योंकि मंत्रों के

900
01:01:57,680 --> 01:02:01,680
रूप में कोई समय धारा में नहीं है और क्योंकि वो उसका रूप है

901
01:02:01,680 --> 01:02:05,840
मंत्र एक रूप है तो मंत्र के के रूप में ईश्वर का ज्ञान भी तो अवतरित

902
01:02:05,840 --> 01:02:08,480
हो रहा है।

903
01:02:08,480 --> 01:02:12,480
प्रणव के रूप में ईश्वर का ज्ञान भी तो अवतरित हो रहा है। अरे इसको

904
01:02:12,480 --> 01:02:16,880
दूसरे तरीके से ले लीजिए ना आप नमी का ले लीजिए एग्जांपल पानी और

905
01:02:16,880 --> 01:02:21,280
जो पानी का जो मूल है वो क्या है? एटॉमिक स्ट्रक्चर H2O हाइड्रोजन

906
01:02:21,280 --> 01:02:25,520
और ऑक्सीजन से मिलकर बनता है। ठीक है? अब वो तो हमारे इस

907
01:02:25,520 --> 01:02:29,200
क्या बोलते हैं? एटमॉस्फियर में तो है ही सराउंडिंग्स

908
01:02:29,200 --> 01:02:33,200
में। लेकिन क्या हम उस सराउंडिंग में होने के बाद भी क्या हम उससे अपनी प्यास

909
01:02:33,200 --> 01:02:37,280
बुझा पाते हैं? नहीं हमें व्यवहार करना पड़ता है। उसको गिलास में पानी के

910
01:02:37,280 --> 01:02:41,440
रूप में लेना पड़ता है और फिर पीना पड़ता है। तो इसने मुझे इसने इसने

911
01:02:41,440 --> 01:02:45,440
मुझे वो भी नहीं दिखाने दिया क्योंकि ये हर चीज इसमें अब धैर्य रख

912
01:02:45,440 --> 01:02:49,680
रहा था कि मैं सब चीजें यहां मान लूं। इसको पंचांग पे ले जाऊं और वहां इसको

913
01:02:49,680 --> 01:02:53,840
बिल्कुल क्लियर कट चुनौती दे दूं। है ना? ये इस

914
01:02:53,840 --> 01:02:57,840
चक्कर में इसने कहीं काउंटर नहीं किया। हालांकि भाई क्योंकि उस समय

915
01:02:57,840 --> 01:03:02,000
मैं उस पर्सेक्टिव से देख नहीं रहा था तो मुझे ये भी लग रहा था भाई काउंटर होगा नहीं इसके पास

916
01:03:02,000 --> 01:03:06,000
नहीं तो थोड़ा बहुत तो करता जैसे अविद्या वाली बात का नहीं किया

917
01:03:06,000 --> 01:03:10,160
पीछे धारण करने वाला नहीं किया कि कौन सा तत्व है वो फिर रूप कैसे आ गया

918
01:03:10,160 --> 01:03:14,160
नहीं किया तो वहां उतनी ज्यादा खुल के बात नहीं हो पाई फिर तीसरा

919
01:03:14,160 --> 01:03:18,560
पक्ष आया ये कौन सा ये वाला कि भाई पहचानेंगे

920
01:03:18,560 --> 01:03:22,560
कैसे ईश्वर को फिर यह लक्षण वाला पक्ष आया किसी इन्होंने कहा

921
01:03:22,560 --> 01:03:26,640
है कि कोई लिख के गया इनके यहां भाई ठीक है। उनको मैं क्या

922
01:03:26,640 --> 01:03:30,720
ही कहूं जो लिख के गए हैं। मगर बात यह है कि

923
01:03:30,720 --> 01:03:35,120
जब मैंने इनसे पूछा प्रणव को आपने क्यों स्वीकार किया है?

924
01:03:35,120 --> 01:03:39,600
तो उसमें इन्होंने शास्त्र का ही प्रमाण दिया। तो मैं भी तो वही कह रहा हूं।

925
01:03:39,600 --> 01:03:43,680
ईश्वर कौन है? कौन नहीं है? इस विषय में शास्त्र प्रमाण है। शब्द प्रमाण है।

926
01:03:43,680 --> 01:03:44,240
शब्द क्या

927
01:03:44,240 --> 01:03:48,400
है? शास्त्र ही तो शब्द है। शास्त्र मगर कौन से शास्त्र? कौन

928
01:03:48,400 --> 01:03:52,480
से शास्त्र? जो गुरु गोविंद और ग्रंथ के सामंजस्य से जो शास्त्र होंगे

929
01:03:52,480 --> 01:03:57,920
वो शास्त्र शास्त्र है नहीं तो वो भी कहेगा रामपाल मेरा भी शास्त्र ले लो

930
01:03:57,920 --> 01:04:01,920
तो गुरु उसमें आना पड़ेगा ना गवाही देने के लिए परंपरा से हां ये वही शास्त्र

931
01:04:01,920 --> 01:04:06,480
है जो पहले था वही है ये गुरु को लाना पड़ेगा ना परंपरा

932
01:04:06,480 --> 01:04:10,720
आप तरीके से आप यही टेस्ट कर सकते है आपके पास कुल मिला के शब्द

933
01:04:10,720 --> 01:04:14,800
वो भी है जो शास्त्र में है शब्द वो भी है जो गुरु के पास है इन दोनों में सामंजस्य

934
01:04:14,800 --> 01:04:18,880
होना चाहिए ऐसा नहीं है कि शास्त्र कुछ कह रहा हो इसी के द्वारा स्वीकार शास्त्र

935
01:04:18,880 --> 01:04:22,880
कुछ कह रहा है और यह कुछ कह रहा है। नहीं अगर इन्होंने जिस शास्त्र को स्वीकार मान्यता

936
01:04:22,880 --> 01:04:27,200
दी है वो शास्त्र भी वही बात करे ये भी वही बात करे दोनों

937
01:04:27,200 --> 01:04:32,080
तब वो जो है माना जाएगा। तो इन्होंने प्रणव के विषय में और

938
01:04:32,080 --> 01:04:36,240
बहुत सी चीजें हैं जो अगर हमारे बीच में चर्चा होगी तब के लिए मैंने रख रखी है।

939
01:04:36,240 --> 01:04:40,400
इन्होंने काउंटर नहीं किया। जब मैंने पूछा भाई प्रणव को

940
01:04:40,400 --> 01:04:44,400
तुम मोक्षदायक क्यों मान रहे हो? ईश्वर का एकमात्र प्रतीकात्मक क्यों

941
01:04:44,400 --> 01:04:48,480
मान रहे हो? उन्हीं को जो शास्त्र में दिए हैं। किसी को भी मान लो जो गूंगा बोल

942
01:04:48,480 --> 01:04:52,720
रहा है कुछ भी मान लो गूंगा बोल सकता है। उसको

943
01:04:52,720 --> 01:04:56,960
भी पूजा में हवन में ये करने लगो हवन में यज्ञ

944
01:04:56,960 --> 01:04:59,520
में नहीं करेंगे। वही करेंगे जो शास्त्र

945
01:04:59,520 --> 01:05:03,600
में लिखा है तो बस राइट। एक जगह तक ला सकते

946
01:05:03,600 --> 01:05:07,760
हैं। हम चीजों को तर्क खूब कर सकते हैं। तर्क की पराकाष्ठा पे हम खड़े हैं।

947
01:05:07,760 --> 01:05:12,640
मगर एक जगह तो हमें श्रद्धा लानी पड़ेगी ना। विश्वास लाना पड़ेगा ना।

948
01:05:12,640 --> 01:05:17,360
वेद वेद अपुरुष है। इसमें क्या प्रमाण है?

949
01:05:17,360 --> 01:05:21,360
वेद अपुरुष है। इसमें यही प्रमाण है कि उनका कोई कर्ता नहीं है।

950
01:05:21,360 --> 01:05:25,520
उनका कोई करता नहीं है। इसलिए भाई वह कर्ता है। और

951
01:05:25,520 --> 01:05:29,600
वो कहां से मिला वो भी शास्त्र हमारे लिए तो हमारे लिए तो वेद वाक्य क्योंकि प्रमाण है

952
01:05:29,600 --> 01:05:34,000
तो उसने कह दिया वेद अपुरुष है तो मानना है। वेद अपुरुष है। मगर ये तर्क की पराकाष्ठा

953
01:05:34,000 --> 01:05:38,400
है। तर्क की पराकाष्ठा क्या है कि कुरान और बाइबल कहती है मुझे इसने लिखा।

954
01:05:38,400 --> 01:05:42,720
मुझे इसने बनाया। वेद कहता है मुझे किसी ने नहीं बनाया ये तर्क की पराकाष्ठा

955
01:05:42,720 --> 01:05:47,520
था करेक्ट हम है ना

956
01:05:47,520 --> 01:05:49,840
तो

957
01:05:49,840 --> 01:05:54,240
यहां तक आ गई बात फिर इन्होंने काउंटर नहीं किया और

958
01:05:54,240 --> 01:05:58,240
इन कई और बातों का काउंटर नहीं किया इन्होंने जैसे मैंने पूछा कि भाई

959
01:05:58,240 --> 01:06:02,640
फिर जो है जो नहीं जो निर्गुण निरा जो निर्गुण

960
01:06:02,640 --> 01:06:06,800
है एक रस है वो सगुण कैसे हो रहा है उस पर भी काउंटर नहीं किया अब आ गई बात कुल

961
01:06:06,800 --> 01:06:10,960
मिलाकर के पंचाव्य पे है ना तो पंचाव्य तो

962
01:06:10,960 --> 01:06:14,640
आपने देखा ही है। पंचाव का मामला क्या है? उसको अगर एक खोलते वहां

963
01:06:14,640 --> 01:06:19,120
पर तो हमारी चीजें हैं। अगर चर्चा होगी तो देखा जाएगा। और

964
01:06:19,120 --> 01:06:23,360
अंत तो कथवा एक बात और बता दूं उस पूरी कन्वर्सेशन

965
01:06:23,360 --> 01:06:27,440
में चार घंटे की कन्वर्सेशन एक पॉइंट है जिसका ये अर्थ निकाल सकते हैं

966
01:06:27,440 --> 01:06:31,600
कि देखो यहां हमारा पल्लाव भारी है। वो पॉइंट क्या है कि उसने पंचा कहा। मैंने कहा भाई पंचा

967
01:06:31,600 --> 01:06:35,600
बताओ। तो उसने कहा क्यों बताऊं? ये पॉइंट है। तो पंचा वो ये

968
01:06:35,600 --> 01:06:39,600
कह सकते हैं कि पंचाव का नाम सुनकर हटाया गया। हमारा कहना यह है

969
01:06:39,600 --> 01:06:43,920
इसने अभद्राचरण किया और यह यह नहीं बता रहा है सिद्धांत क्या है इस पर लड़ रहा है इसको पंचाव

970
01:06:43,920 --> 01:06:47,920
नहीं आता और वह यह दिखा सकते हैं कि भाई इनको पंचाव से सिद्ध नहीं कर

971
01:06:47,920 --> 01:06:51,920
सकते थे इसलिए हटाया गया बस बाकी पूरी कन्वर्सेशन में

972
01:06:51,920 --> 01:06:56,640
हमारी एक बात उसने नहीं काटी अब इसके पीछे सामर्थता

973
01:06:56,640 --> 01:07:00,640
का दोष है कि सामर्थ्य नहीं था असामर्थता का दोष है या वो

974
01:07:00,640 --> 01:07:04,960
जो उसकी रणनीति थी स्ट्रक्चरल उसको करना था ना

975
01:07:04,960 --> 01:07:09,200
उस पंक्ति को बचा के लाना था जीव धारण जैसे जीव शरीर

976
01:07:09,200 --> 01:07:13,520
धारण कर सकता है। मेरी प्रतिज्ञा पंचा में जो प्रतिज्ञा है वो बना

977
01:07:13,520 --> 01:07:17,680
समझ रहे उसमें हो गया उसमें उसके साथ चूक हो गई। लास्ट

978
01:07:17,680 --> 01:07:21,760
तक बेचारा सारे सीने में पत्थर रख रख के चीजें वो लेके आ रहा

979
01:07:21,760 --> 01:07:25,920
है शुरू से चार घंटे तक अपने आप को धैर्य रख रहा है। हाथ भी जोड़

980
01:07:25,920 --> 01:07:29,840
रहा है कई जगह पर। हालांकि वो अभद्र आचरण था मगर उसके मन में उस समय नहीं

981
01:07:29,840 --> 01:07:33,920
रहा होगा हाथ जोड़ने का। मगर क्यों जोड़ रहा है? चलो मैं फंस गया।

982
01:07:33,920 --> 01:07:38,240
मगर आप टॉपिक पे आओ। हाथ जोड़ रहा हूं। क्यों कर रहा है? अपने उस

983
01:07:38,240 --> 01:07:43,920
वो वो जो पंचा की प्रतिज्ञा है ना उसकी रक्षा के लिए

984
01:07:43,920 --> 01:07:48,560
समझ रहे हैं लेकिन उस प्रतिज्ञा पे भी डिस्कशन नहीं हुई ना

985
01:07:48,560 --> 01:07:52,960
नहीं तो वो तो उसका अपना

986
01:07:52,960 --> 01:07:57,120
वो अगर पंजाब मां खुलता अगर ये ये ना कह करके

987
01:07:57,120 --> 01:08:01,440
कि भाई मैं क्यों बताऊं मैं पंजाब में ये ये चीजें मुझे चाहिए दे देंगे

988
01:08:01,440 --> 01:08:05,600
भाई दे देंगे तुम काटो तो सही और

989
01:08:05,600 --> 01:08:09,680
एक सनातन शंकर जी ने भी बातें की है कि यह तो एक पक्ष है कि

990
01:08:09,680 --> 01:08:15,120
पंचाम का भी हम दे सकते हैं। उसमें कोई दिक्कत नहीं। मगर एक पक्ष ये भी है मान लो

991
01:08:15,120 --> 01:08:20,400
कि पंचा से मैच नहीं खा रहा है। ठीक? नहीं दे पा रहे।

992
01:08:20,400 --> 01:08:24,480
तो क्या भगवत गीता का वो श्लोक हटा दे। यदा

993
01:08:24,480 --> 01:08:28,640
धर्मस वाला या जो वेद में जो लिखा हुआ है कि ईश्वर नाना

994
01:08:28,640 --> 01:08:32,640
प्रकार के अवतार लेता है वो प्रकट होता है वो हटा दे। अब तुम कहोगे

995
01:08:32,640 --> 01:08:36,640
उनका वो अर्थ नहीं है। यही कहोगे तो फिर बात वही घूम फिर के

996
01:08:36,640 --> 01:08:40,880
आ जाएगी। तुमको प्राप्त कैसे हुआ? करेक्ट। कैसे प्राप्त

997
01:08:40,880 --> 01:08:44,880
कैसे हुआ? फिर परंपरा पे आ जाएगी। कहने का मतलब ये है जैसे इन्होंने उसमें भी

998
01:08:44,880 --> 01:08:48,880
कहा कि भाई उसमें ही लिखा है कि वो जो है बाधित हो रहे हैं।

999
01:08:48,880 --> 01:08:52,960
उसमें ही जो है वो सर्वशक्तिमान भी है। बाधित हो रहे वाला पकड़ रहे हो वो वाला नहीं

1000
01:08:52,960 --> 01:08:56,960
पकड़ रहे हो। तो अगर तुमको यह लग रहा है निर्भय आर्य से मैं

1001
01:08:56,960 --> 01:09:01,120
कह रहा हूं। अगर तुम्हें यह लग रहा है कि शास्त्र में एक जगह भगवान

1002
01:09:01,120 --> 01:09:05,360
बाधित दिखाई दे रहे हैं और तुमको अब ये विश्वास नहीं हो रहा है कि ये जो

1003
01:09:05,360 --> 01:09:09,520
बोल रहा है जो व्यक्ति इस पर क्वेश्चन करने वाला है कोई भी व्यक्ति हो

1004
01:09:09,520 --> 01:09:13,600
कि भाई मुझे उस शास्त्र पे विश्वास नहीं हो रहा है मुझे उस

1005
01:09:13,600 --> 01:09:17,680
बात पर विश्वास नहीं वो बाधित नहीं क्योंकि वो बाधित की एक्टिंग तो कर रहे हैं। इसने कई कई जगह पे वो

1006
01:09:17,680 --> 01:09:21,760
दिया है। खुद ऐसे तर्क दिए हैं कि पुलिस वाला कहीं पे खड़ा है।

1007
01:09:21,760 --> 01:09:25,840
तो हम कैसे पहचानेंगे उसे भाई उसकी वर्दी से पहचानोगे। अब वो अगर भष बदल के खड़ा

1008
01:09:25,840 --> 01:09:29,840
होगा जासूसी करने के लिए तो कैसे पहचानोगे? पुलिस वाला अगर भष

1009
01:09:29,840 --> 01:09:33,840
बदल के खड़ा होगा जासूसी करने के लिए तो कैसे पहचानोगे? तो भैया वहां पे आपको कोई

1010
01:09:33,840 --> 01:09:37,920
शब्द प्रमाण दिए जाएंगे। मैं हां मैं इसका अच्छा एक बात

1011
01:09:37,920 --> 01:09:42,080
और है। एक बात एक बात और है। पुलिस वाला अगर कोई खड़ा है उसमें

1012
01:09:42,080 --> 01:09:46,160
तो शब्द ही प्रमाण है। शब्द ही प्रमाण है।

1013
01:09:46,160 --> 01:09:50,400
बोल दिया। हां हां हां क्योंकि क्योंकि रियलिटी में क्या है? मतलब

1014
01:09:50,400 --> 01:09:54,640
अगर व्यवहार की रियलिटी में देखें तो रियलिटी में क्या है? वो तो पुलिस वाला ही है ना वही खड़ा है। चाहे

1015
01:09:54,640 --> 01:09:58,800
भेद खड़ा हो चाहे वो वर्दी में खड़ा हो पुलिस वाला ही है तो वो तो वैसे

1016
01:09:58,800 --> 01:10:00,000
वो अपने आप में ही प्रमाण है कि

1017
01:10:00,000 --> 01:10:04,320
वो पुलिस वाला है अगर उस तरीके से उसकी वास्तविकता जांचने

1018
01:10:04,320 --> 01:10:08,320
के लिए एक ही काम हो सकता है कि उसकी अंतरात्मा के साथ तुम एक ही भूत हो जाओ

1019
01:10:08,320 --> 01:10:12,320
और उसके विचारों को जान आओ कि उस वो बैरूिया है कोई या क्या

1020
01:10:12,320 --> 01:10:16,480
है ना खैर अच्छा एक पॉइंट और

1021
01:10:16,480 --> 01:10:20,720
इन्होंने कहा है अपनी लाइफ में मुझे ध्यान आ गया इसलिए कह रहा हूं अच्छा एक

1022
01:10:20,720 --> 01:10:24,960
चीज अब ध्यान आ गया तो और कह देता हूं कि

1023
01:10:24,960 --> 01:10:29,200
संदीपन आर्य ने अपने वीडियो में कहा कि हम तो आकाश को मस्तक

1024
01:10:29,200 --> 01:10:33,280
कहते हैं ईश्वर का। मस्तक क्यों कह रहे हो भाई?

1025
01:10:33,280 --> 01:10:37,360
जब हम उसको यहां पे खिड़की देख खिड़की के रूप में उसका अवतार को

1026
01:10:37,360 --> 01:10:41,360
देख रहे हैं आसमान के तो तुम्हें दिक्कत हो रही है। वहां आसमान का मस्तक क्यों कह

1027
01:10:41,360 --> 01:10:45,920
रहे हो? और एक

1028
01:10:45,920 --> 01:10:49,920
चीज और करते हैं ये लोग मालूम है? यह कुछ अभी यंग एज के

1029
01:10:49,920 --> 01:10:54,000
ही होंगे मुझे लगता है। मैं नहीं मैं मैं उनके डिफेंस में बोल देता हूं। उन्होंने अलंकार

1030
01:10:54,000 --> 01:10:58,240
में कहा होगा इसे। अलंकार तो फिर अलंकार शब्द से प्रॉब्लम

1031
01:10:58,240 --> 01:11:02,480
क्या है? अच्छा एक बात और है ये लोग हमें सम्मान पूर्वक भी पौराणिक भी कहते हैं।

1032
01:11:02,480 --> 01:11:06,480
इन मुझे हो सकता है इसलिए कहते हो क्योंकि ये खुद को वैदिक समझते हैं। तो

1033
01:11:06,480 --> 01:11:10,720
ऐसे वैदिक जो कि उनकी नजरों में पूर्णत वैदिक

1034
01:11:10,720 --> 01:11:14,880
नहीं तो इसलिए पौराणिक कहते हो। ऐसा इनका पक्ष है। ठीक है? तो हम भी तो वही

1035
01:11:14,880 --> 01:11:15,380
कर

1036
01:11:15,040 --> 01:11:19,200
रहे हैं कि ऐसे आर्य जो हमारी नजरों में पूरे के पूरे आर्य नहीं है उनके लिए हम आर्य

1037
01:11:19,200 --> 01:11:23,360
समाधि नहीं कह सकते। हम उनको अलंकार समाधि कहते हैं। उसमें भाईचारा कहां मिट गया? अलंकार

1038
01:11:23,360 --> 01:11:27,440
कोई गाली थोड़ी ना है। जैसे आप पौराणिक को गाली नहीं मानते हो

1039
01:11:27,440 --> 01:11:31,520
ऐसे आप अलंकार को भी गाली ना समझो। ये कहना है। पहली बात। अब इन्होंने एक चीज

1040
01:11:31,520 --> 01:11:36,240
वहां पे और कही है कि पृथ्वी

1041
01:11:36,240 --> 01:11:40,240
पृथ्वी गोल वाला उदाहरण। तो पृथ्वी गोल वाला उदाहरण

1042
01:11:40,240 --> 01:11:44,320
जो है उससे ये लोग कहते हैं कि मैं अद्वैत की स्थापना करता हूं

1043
01:11:44,320 --> 01:11:48,320
ना अद्वैत की स्थापना नहीं करता हूं मैं दो प्रकार

1044
01:11:48,320 --> 01:11:52,560
के बताते हैं हां दो प्रकार के पर्सेक्टिव

1045
01:11:52,560 --> 01:11:56,800
आपको बताता हूं कि देखो एक रियलिटी का पर्सपेक्टिव तो यह है

1046
01:11:56,800 --> 01:12:01,760
मगर वो जानते हुए भी आप एक और रियलिटी आपकी बिहेवियल

1047
01:12:01,760 --> 01:12:06,400
रियलिटी व्यवहारिक सत्य उसके अनुसार आप बिहेव करते हो

1048
01:12:06,400 --> 01:12:10,560
है ना तो यह जो एक रियलिटी मैं यह समझाने

1049
01:12:10,560 --> 01:12:14,560
के लिए दो प्रकार के पर्सेक्टिव को समझाने के लिए बात बोलता हूं। अद्वैत के लिए नहीं बोलता

1050
01:12:14,560 --> 01:12:18,800
हूं कि दो प्रकार के पर्सेक्टिव है। रियल में कुछ और हो सकता है।

1051
01:12:18,800 --> 01:12:22,880
फिर भी आप जो है दूसरी चीजें कर रहे हो। ये दिखाने के लिए वो बात

1052
01:12:22,880 --> 01:12:26,880
बोलता हूं। तो वो कुछ अपनी अलग ही चीजें बता रहे हैं। तो

1053
01:12:26,880 --> 01:12:30,480
ये सारी चीजें ऐसे क्यों होना चाहिए? ये तो मतलब बिल्कुल सेल्फ एक्सप्लनेटरी

1054
01:12:30,480 --> 01:12:34,560
है कि जब भी भी आपने ये वाला बताया है या फिर कहीं से भी पढ़ाया जाना है तो उसमें

1055
01:12:34,560 --> 01:12:38,720
केवल व्यवहार परमार्थ का डिफरेंस के लिए एक रियल वर्ल्ड क्लोजेस्ट

1056
01:12:38,720 --> 01:12:42,800
टू अस हमारे जो जितने जो बिल्कुल नजीक समीप है उसका एग्जांपल देके समझाया गया

1057
01:12:42,800 --> 01:12:46,880
है बस और यही है एक और मतलब रियलिटी कुछ और है फिर भी

1058
01:12:46,880 --> 01:12:50,880
हमने जो है हम जो है क्योंकि हमारी रियलिटी कुछ

1059
01:12:50,880 --> 01:12:54,880
और है तो उसके अनुसार हम काम कर रहे हैं है ना ये बात है

1060
01:12:54,880 --> 01:12:59,360
आसान से एग्जांपल या उदाहरण देके समझाने की प्रयास किया गया जो हमें दिख आसपास

1061
01:12:59,360 --> 01:13:03,600
वहां अद्वैत अद्वैत की सिद्धि में वो एग्जांपल सहायक होता है।

1062
01:13:03,600 --> 01:13:08,080
वो अद्वैत के लिए ही नहीं है। द्वैत के लिए भी है वो। अगर द्वैत भी कहे

1063
01:13:08,080 --> 01:13:12,560
तो द्वैत के लिए भी है। जैसे कि द्वैत के अनुसार जो जीवात्मा

1064
01:13:12,560 --> 01:13:17,040
है और ब्रह्म है वो अलग है। ठीक है? अब जीवात्माएं किसी की

1065
01:13:17,040 --> 01:13:21,600
ना कोई मां है, ना कोई बहन है, ना कोई पत्नी है, कोई किसी का नहीं है। ठीक है?

1066
01:13:21,600 --> 01:13:25,840
सब एक है। एक जैसी आत्माएं हैं सारी। अब यहां

1067
01:13:25,840 --> 01:13:30,320
नीचे कोई किसी की मां है, कोई किसी की वो है, पत्नी है। है ना?

1068
01:13:30,320 --> 01:13:34,400
माता बहन और पत्नी हो गई। तो अब भाई हम अगर वहां का

1069
01:13:34,400 --> 01:13:38,400
रियलिटी ले आए, द्वैत वाली रियलिटी यहां ले आए द्वैत

1070
01:13:38,400 --> 01:13:42,400
के अनुसार। अभी मैं अद्वैत की रक्षा नहीं कर रहा हूं मेरे भाइयों। ध्यान रखना। मैं अभी

1071
01:13:42,400 --> 01:13:46,080
द्वैती हो गया हूं। जय हो मधवाचार्य जी की।

1072
01:13:46,080 --> 01:13:50,480
ठीक है? तो अभी द्वैत हां तो मैं अभी जो है द्वैत

1073
01:13:50,480 --> 01:13:54,720
के लिए बात कर रहा हूं। कोई अगर एक कुतर्क करे कि भाई जब कोई किसी की माता

1074
01:13:54,720 --> 01:13:58,880
बहन पत्नी नहीं है तो सब बराबर हो गए। नहीं

1075
01:13:58,880 --> 01:14:03,200
वो पारमार्थिक सत्य है। और दूसरी रियलिटी

1076
01:14:03,200 --> 01:14:07,200
है। आपकी रियलिटी ये है कि ये आपकी मां है। ये आपकी पत्नी है और ये

1077
01:14:07,200 --> 01:14:11,280
आपकी बहन है। ये आपकी व्यवहारिक रियलिटी है। तो

1078
01:14:11,280 --> 01:14:15,280
ये दो प्रकार के पर्सपेक्टिव मैं समझाने का प्रयास करता हूं।

1079
01:14:15,280 --> 01:14:19,360
इस पृथ्वी इन्होंने हालांकि मुझे ये चीजें अब पता चली। ये लोग

1080
01:14:19,360 --> 01:14:23,520
बड़ी तैयारी करते तेरी बारी है कमर कस ले तेरे बस

1081
01:14:23,520 --> 01:14:28,000
में जैसे वो मॉनटी था ना ब्रदर ब्रदर मूवी में मॉनटी

1082
01:14:28,000 --> 01:14:32,320
ब्रदर मूवी थी ना बस वही किस्सा है डेविड डेविड

1083
01:14:32,320 --> 01:14:36,400
से वही चिड़ है डेविड [हंसी] डेविड से वही वाली

1084
01:14:36,400 --> 01:14:40,560
चिड़ है मोंटी वाली है ना ब्रदर मूवी में पूरी तैयारी

1085
01:14:40,560 --> 01:14:44,800
करता है वो डेविड से लड़ने की तो खैर

1086
01:14:44,800 --> 01:14:49,040
अच्छा एक चीज और मैं बता दूं कि क्या कहते

1087
01:14:49,040 --> 01:14:53,120
हैं इस पूरी चीज में एक चीज और है। अभी हमने तो

1088
01:14:53,120 --> 01:14:58,160
क्वेश्चनिंग की ही नहीं है। बिंगो

1089
01:14:58,160 --> 01:15:01,120
ये बात तो रह गई ना। भाई हम क्या कहते हैं? हमको

1090
01:15:01,120 --> 01:15:05,200
तुम हम अपने पूजा भक्ति जो भी करेंगे हम कुछ नहीं कहेंगे किसी से।

1091
01:15:05,200 --> 01:15:09,440
आप हमें तीन चीजें दो। सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म। हमें

1092
01:15:09,440 --> 01:15:13,440
ये सिद्ध नहीं करना है कि दयानंद जी गलत थे। हमें तीन चीजें

1093
01:15:13,440 --> 01:15:17,840
समाज को देनी है। सूत्रात्मक शैली में बच्चे बच्चे को पकड़ाना है।

1094
01:15:17,840 --> 01:15:22,800
जिससे जब कोई कहे कि मूर्ति को तोड़ दो क्योंकि

1095
01:15:22,800 --> 01:15:26,800
उसकी मूर्ति पूजा नहीं हो सकती तो बच्चा कहे ना तबा ईश्वर वही

1096
01:15:26,800 --> 01:15:31,760
है जो कुछ भी कर सकता है अवतार भी ले सकता है उसकी मूर्ति भी हो सकती है मूर्ति की रक्षा होगी

1097
01:15:31,760 --> 01:15:35,920
हां तभी होगी रक्षा हां सही मायने में तभी होगी

1098
01:15:35,920 --> 01:15:39,920
रक्षा नहीं तो फिर ऐसे समाज जो है वो अपने अपने मंतव्यों से अपने

1099
01:15:39,920 --> 01:15:44,800
अपने जो फिलॉसफी से बटा रहेगा एक

1100
01:15:44,800 --> 01:15:48,800
तो मैंने अभी क्वेश्चन किए नहीं हालांकि क्वेश्चन तो मेरे भी है ना कि

1101
01:15:48,800 --> 01:15:52,800
भाई मैं अपना कुछ भी करूं मुझे गलत सिद्ध नहीं करना। मुझे आप ये

1102
01:15:52,800 --> 01:15:56,800
तीन चीजें दो। तो तीन चीजें दोगे कैसे? जब मैं आपसे मांगूंगा तो मैंने

1103
01:15:56,800 --> 01:16:00,800
मांगा कहां? हमने तो कभी ये कहा ही नहीं। हम किसी का वो साथ नहीं

1104
01:16:00,800 --> 01:16:04,800
देंगे। हमने कहा तीन चीजें लाओ साथ लो। वो तीन चीजें कोई दे ही नहीं रहा है। फिर

1105
01:16:04,800 --> 01:16:08,800
आ के हमारी चीजों पर कुछ मेरे गलत होने से तुम्हारा सही होना सिद्ध नहीं

1106
01:16:08,800 --> 01:16:12,960
होता। सिद्ध नहीं होता। हां बिल्कुल। अपने आप को तो सिद्ध किया ही नहीं। पहली

1107
01:16:12,960 --> 01:16:16,240
बात। दूसरी बात एक ये है कि वो शास्त्रों

1108
01:16:16,240 --> 01:16:20,320
की बात में बता रहा था कि एक बात ये आई थी कि भाई मुझे जो है शास्त्रों की एक

1109
01:16:20,320 --> 01:16:24,400
बात सही लग रही है। एक बात गलत लग रही ना ऐसा नहीं कर सकते। इसको कहते हैं अर्ध कुकुट

1110
01:16:24,400 --> 01:16:29,520
न्याय है ना गांव की लाइब्रेरी में

1111
01:16:29,520 --> 01:16:34,640
गुरुदेव की लाइब्रेरी में धर्म की किताबें भी पढ़ी थी हमने।

1112
01:16:34,640 --> 01:16:38,720
ठीक है? तो क्या है? अकुट न्याय नहीं कर सकते। आप जब ये

1113
01:16:38,720 --> 01:16:43,360
कहेंगे ना मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि वो लीला थी।

1114
01:16:43,360 --> 01:16:47,440
जिस रूप में आपको भगवान बाधित दिख रहे हैं। हालांकि भगवान ऐसी चीजें कर

1115
01:16:47,440 --> 01:16:51,440
रहे हैं। भगवान हो तो विराट स्वरूप दिखाओ तो वो दिखा रहे हैं। ठीक है? और वो

1116
01:16:51,440 --> 01:16:55,600
अपने व्यवहारिक और पारमार्थिक दोनों तरीके के वो बता रहे हैं। सत्य जैसे इसमें से व्यवहारिक

1117
01:16:55,600 --> 01:16:59,840
और परमार्थिक में संदीपन रॉय जी ने एक बात कही वहां लाइव में। अरे

1118
01:16:59,840 --> 01:17:04,000
भाई जब प्रभु श्री राम सत्य है तो वो जो है झूठ कैसे बोल सकते हैं? मैं भगवान नहीं हूं। क्यों

1119
01:17:04,000 --> 01:17:08,320
बोल रहे हैं झूठ? भैया वो मनुष्य की जो

1120
01:17:08,320 --> 01:17:12,320
सीमा है उसमें रहकर के सत्य ही बोला उन्होंने और वो

1121
01:17:12,320 --> 01:17:16,400
उनका पारमार्थिक सत्य है। ऐसे तो दुनिया में कोई

1122
01:17:16,400 --> 01:17:20,400
भी जो व्यक्ति है ना वो सत्य बोलने वाला सिद्धि नहीं होगा।

1123
01:17:20,400 --> 01:17:24,800
कोई भी क्योंकि वास्तविक सत्य तो त्रयतवाद है तुम्हारे अनुसार

1124
01:17:24,800 --> 01:17:29,040
आर्य समाज के अनुसार तो इस हिसाब से तो कोई सत्यवादी

1125
01:17:29,040 --> 01:17:31,360
सिद्धि नहीं होगा। जो व्यवहार

1126
01:17:31,360 --> 01:17:35,920
में रहकर व्यवहारिक सीमाएं हैं उसमें रहकर उन्होंने कहीं भी वो नहीं किया है।

1127
01:17:35,920 --> 01:17:39,920
ऐसे मनुष्य उन्होंने वही बोला है जो सत्य हो। क्या

1128
01:17:39,920 --> 01:17:44,080
मतलब थोड़ा आप लोग मैच्योर लोग हो और संदीप संदीपन

1129
01:17:44,080 --> 01:17:48,240
रॉय मुझे मतलब उस मामले में अगर वो इंटेलेक्चुअल लगता है शार्प

1130
01:17:48,240 --> 01:17:52,640
बुद्धि वाला लगता है जो निर्भय आ रहे हैं वो अगर मुझे

1131
01:17:52,640 --> 01:17:58,080
शार्प माइंड वाले दिखते हैं वो स्पाइडरमैन तुम में दम है

1132
01:17:58,080 --> 01:18:02,320
तो ये संदीपन रॉय मुझे समझदार दिखते हैं ये समझदार है

1133
01:18:02,320 --> 01:18:06,560
मगर मतलब किस श्रेणी की चीजें

1134
01:18:06,560 --> 01:18:10,640
कर देते हैं कहीं-कहीं पे तो वो ध्यान देने वाली बात तो मैं वहां पर बुक पे आ जाऊं।

1135
01:18:10,640 --> 01:18:14,720
बुक वाली बात जो है वो ऐसी है कि अगर आप

1136
01:18:14,720 --> 01:18:18,880
कह रहे हैं कि भगवान यहां बाधित दिख रहे हैं और यहां पर भगवान के

1137
01:18:18,880 --> 01:18:24,880
लिए कहा जा रहा है कि वो वही है। ठीक है? क्या कहते हैं वो

1138
01:18:25,200 --> 01:18:29,520
कि वो सर्वशक्तिमान ही है। अच्छा एक बात बताइए

1139
01:18:29,520 --> 01:18:33,600
जब ऋषियों के अंतःकरण में ज्ञान आया था वेद

1140
01:18:33,600 --> 01:18:38,080
का तो ऋषियों ने कैसे पहचाना था उसे? ऋषियों

1141
01:18:38,080 --> 01:18:42,480
के शब्द प्रमाण को मानते हो ना कि भगवान ने वेद प्रकाशित

1142
01:18:42,480 --> 01:18:46,800
किए ज्ञान के ज्ञान के रूप में या उपदेश किया वेद का तो उन्होंने

1143
01:18:46,800 --> 01:18:51,200
कैसे पहचाना अपनी दिव्य दृष्टि से ना

1144
01:18:51,200 --> 01:18:55,280
अनुभूति से अब उसको आप मान रहे हो शब्द प्रमाण को कि हां वो तो उसी

1145
01:18:55,280 --> 01:19:00,160
ने किया था कि उन्होंने दिखा दिया था कि मैं सर्व्यापक हूं मैं वही हूं मैं वो हूं

1146
01:19:00,160 --> 01:19:05,040
दिखा दिया था उन्होंने ऋषियों को ऋषियों को अनुभूति हुई कि ये वही

1147
01:19:05,040 --> 01:19:09,280
ज्ञान का प्रकाश है जो इस माया रूपी संसार के बिल्कुल विपरीत

1148
01:19:09,280 --> 01:19:13,600
है। तो वो अनुभूति जिस सिद्ध पुरुष को होती है जिसको

1149
01:19:13,600 --> 01:19:18,240
देखकर वो बताता है कि हां ये अवतार है वो अवतार है। सिंपल

1150
01:19:18,240 --> 01:19:22,400
शास्त्रों में भी है और फिर जो आज के जो आगे आने वाले गुरुजन होंगे

1151
01:19:22,400 --> 01:19:26,800
सुशास्त्रों की सीमा में रहकर जिसको अवतार कहेंगे तो अवतार माना जाएगा।

1152
01:19:26,800 --> 01:19:30,800
है ना? तो ये तो रही बात। अब बार-बार वो बात छूट जाती

1153
01:19:30,800 --> 01:19:35,840
है। तो मगर फिर भी यदि आपको ऐसा लग रहा है कि

1154
01:19:35,840 --> 01:19:40,000
अ क्या कहते हैं कि एक जगह भगवान बाधित दिख रहे हैं। मगर

1155
01:19:40,000 --> 01:19:40,500
वो

1156
01:19:40,240 --> 01:19:44,240
कह रहे हैं उसी शास्त्र में लिखा है कि वो लीला है और फिर गुरुजन कह रहे

1157
01:19:44,240 --> 01:19:48,400
हैं कि नहीं ये अवतार है तो आपको विश्वास नहीं हो रहा उनकी इस बात पे तो फिर आप

1158
01:19:48,400 --> 01:19:52,400
उस शास्त्र को मानने वाले सिद्ध नहीं होते। उस शास्त्र

1159
01:19:52,400 --> 01:19:56,400
में आपकी प्रमाण्य बुद्धि नहीं रह गई क्योंकि जहां पर एक पॉइंट भी

1160
01:19:56,400 --> 01:20:00,560
झूठ हो सकता है वहां कहीं भी झूठ हो सकता है। तो आपको

1161
01:20:00,560 --> 01:20:04,720
यह कहना पड़ेगा वहां पर आपको यह कहना पड़ेगा

1162
01:20:04,720 --> 01:20:06,880
कि

1163
01:20:06,880 --> 01:20:10,960
हां वहां पर आपको यह कहना पड़ेगा कि मैं रामायण को नहीं

1164
01:20:10,960 --> 01:20:15,600
मानता। अगर जिस मैं यही तो कह रहा हूं

1165
01:20:15,600 --> 01:20:19,680
आप वेद को ना मानने वाले बन जाओ ना। अगर आपको वेद जिनसे प्राप्त

1166
01:20:19,680 --> 01:20:23,680
हुए उन्हीं के अर्थ पर विश्वास नहीं है तो आप सीधे कह दो कि हम

1167
01:20:23,680 --> 01:20:27,920
वेद को नहीं मानते। वरना आप जितना भी नियमावली लाकर रख दो। शास्त्रार्थ

1168
01:20:27,920 --> 01:20:32,240
में हरा दो। फिर भी आपका उनप अविश्वास सिद्ध होने के कारण आप वैदिक

1169
01:20:32,240 --> 01:20:36,320
सिद्ध नहीं हो पाओगे। हम करेक्ट हां

1170
01:20:36,320 --> 01:20:40,320
है ना ये सिद्ध कैसे करोगे कि ये वही मंत्र है जो वहां से आए हैं

1171
01:20:40,320 --> 01:20:44,640
बदल दिए किस व्यक्ति ने जिसको तुम झूठा कह रहे हो उसने जिसको

1172
01:20:44,640 --> 01:20:48,720
तुम अज्ञानी कह रहे हो तुमने तो हो सकता है भूभ स्वाहा की

1173
01:20:48,720 --> 01:20:52,720
जगह तुम्हारा वो आमीन इत्यादि कोई आया हो वास्तविकता में

1174
01:20:52,720 --> 01:20:55,360
अंतकरण में फिर तो यह वाली बात

1175
01:20:55,360 --> 01:21:00,560
है इस इस संबंध में

1176
01:21:00,560 --> 01:21:04,720
इस संबंध में जो है

1177
01:21:04,720 --> 01:21:08,800
पुंडरिक पुंडरिक का उदाहरण उसने खुद भी दिया था। खुद ही उसने

1178
01:21:08,800 --> 01:21:13,200
कई ऐसी चीजें की है निर्भय ने जो वहां की वहां हो सकती थी। मगर हुआ क्या? पुंडरीिक

1179
01:21:13,200 --> 01:21:17,280
पंडिक का उदाहरण दिया। पुंडरीिक कह रहा हूं मैं। पुंडरीिक महाराज जी के पास पहुंच

1180
01:21:17,280 --> 01:21:21,360
गए। पोंडरीिक आया था तो पंडिक पोंडरीिक जो था उसको भी

1181
01:21:21,360 --> 01:21:25,440
देखो वहां पर पहचाना गया। है ना? अनुभूति से पहचाना। सब

1182
01:21:25,440 --> 01:21:29,680
कुछ करके नहीं दिखाया। ईश्वर ने कुछ एक चीजें कर दी जो

1183
01:21:29,680 --> 01:21:33,760
नॉर्मल नहीं है कुछ एक चीजें मगर अनुभूति मेन है अनुभूति हमें फसा

1184
01:21:33,760 --> 01:21:38,000
कौन रहा है अनुभूति फंसा कौन रहा है अनुभूति एक माया है भगवान

1185
01:21:38,000 --> 01:21:42,080
की जो हमें फसा रही है तो भगवान का जो ज्ञान है वो भी तो एक माया

1186
01:21:42,080 --> 01:21:46,080
जैसी शक्ति है जैसे अविद्या एक शक्ति तो विद्या भी तो एक शक्ति है भगवान ज्ञान

1187
01:21:46,080 --> 01:21:50,400
स्वरूप है ना तो जब हमें अविद्या की शक्ति का जो वो

1188
01:21:50,400 --> 01:21:54,480
होता है अनुभूति जिसके कारण हम फंसते हैं उसी प्रकार हमें विद्या

1189
01:21:54,480 --> 01:21:58,960
की शक्ति की अनुभूति जिस रूप से होती है। एक सिद्ध पुरुष को तपस्या

1190
01:21:58,960 --> 01:22:03,040
करने वाले को वो पहचान लेता है कि ईश्वर का अवतार ये

1191
01:22:03,040 --> 01:22:07,360
है। ठीक है? अच्छा तो यह

1192
01:22:07,360 --> 01:22:10,720
सारी चीजें हैं और निर्भय आर्य ने जो है

1193
01:22:10,720 --> 01:22:14,960
क्षमा भी मांगी है पब्लिकली और संदीपन

1194
01:22:14,960 --> 01:22:19,280
रॉय जी के माध्यम से भी मुझे फोन पर मैसेज भी आया और मैं अप्रिशिएट

1195
01:22:19,280 --> 01:22:23,520
करता हूं उन लोगों की जो साहसिक बातें हैं साहसिक

1196
01:22:23,520 --> 01:22:27,520
चीजें हैं और डेडीकेशन है जो अपनी चीजों के लिए और थोड़ा सा

1197
01:22:27,520 --> 01:22:31,520
आत्म मंथन करने की आवश्यकता है मेरे अनुसार है ना मेरी जानकारी

1198
01:22:31,520 --> 01:22:35,600
में थोड़ा आत्म मंथन करें और टोटे भाई जैसे हो

1199
01:22:35,600 --> 01:22:40,000
निर्भय आर्य तुम मेरे और तुम्हारे प्रति बहुत स्नेह और

1200
01:22:40,000 --> 01:22:44,000
मैं हो सकता है शायद समाज में एक दूसरी छवि बन गई हो कि मैं

1201
01:22:44,000 --> 01:22:48,240
बहुत पत्थर जैसा व्यक्ति हूं मगर वास्तविकता में ये है कि मैं कोमल हृदय

1202
01:22:48,240 --> 01:22:52,800
का व्यक्ति हूं जरा सी बात पर पिघल जाता हूं और मतलब कोमल

1203
01:22:52,800 --> 01:22:56,800
अपनी तारीफ नहीं कर रहा मतलब मैं वो स्थिति बता रहा हूं कि मेरे आंसू तक आने वाले थे जब

1204
01:22:56,800 --> 01:23:00,800
मैंने तुम्हारा तुम्हारी बेबसी देखी थी उस चीज को एडिट करते

1205
01:23:00,800 --> 01:23:04,960
समय शायद तुमको भी मेरे प्रति वैसा भाव आया हो तभी तुमने ने वो पोस्ट डाली है, क्षमा

1206
01:23:04,960 --> 01:23:09,040
मांगी है। मगर मुझे बहुत करुणा आई थी। जब मैं तुमको देख रहा था ना ऐसा लग रहा था

1207
01:23:09,040 --> 01:23:13,200
मेरा छोटा भाई वहां पर बोल रहा है। वो वहां आना चाहता है। अच्छा मैं आपको एक पर्सनल

1208
01:23:13,200 --> 01:23:17,520
एक्सपीरियंस बताऊं कि बहुत समय पहले क्या हुआ था? मैं अपने छोटे

1209
01:23:17,520 --> 01:23:21,520
भाई को साथ में ले गया था जिम वर्कआउट कराने के

1210
01:23:21,520 --> 01:23:25,600
लिए। तो जिस समय वो वर्कआउट कर रहा था

1211
01:23:25,600 --> 01:23:26,100
बेंच

1212
01:23:26,080 --> 01:23:30,160
प्रेस। तो भाई वो शुरुआत थी उसकी और मैं एक्सपीरियंस था। तो वो

1213
01:23:30,160 --> 01:23:34,480
बेंच प्रेस पर जो है लिफ्ट कर रहा है वेट तो उसकी

1214
01:23:34,480 --> 01:23:38,480
जो चेहरा था ना वो ऐसा दिखाई दिया मैं वही रो दिया

1215
01:23:38,480 --> 01:23:42,480
मैं वहीं पे रो दिया कि मैं अपने भाई को

1216
01:23:42,480 --> 01:23:46,480
असहाय स्थिति में नहीं देख पाया मैं वही रो दिया आंसू आ गए फिर मैंने

1217
01:23:46,480 --> 01:23:50,720
कहा तुम दूसरी जिम में जाओ मैं तुम्हें कसरत करते मैं तुम्हें

1218
01:23:50,720 --> 01:23:54,880
कसरत करते हुए नहीं देख पाऊंगा क्योंकि तुम लगाओगे पूरी ताकत तुम्हारा

1219
01:23:54,880 --> 01:23:59,120
चेहरा सहाय सा दिखेगा तो मुझे बड़ी दया आएगी समझ रहे हो

1220
01:23:59,120 --> 01:24:03,520
तो मुझे बिल्कुल सेम एक्सपीरियंस बिल्कुल सेम वैसा ही स्नेह

1221
01:24:03,520 --> 01:24:07,600
और करुणा अंदर से दर्द वो जो उसके चेहरे पर मैं देख रहा था ना बहुत

1222
01:24:07,600 --> 01:24:11,760
ध्यान से जब एडिट कर रहा था तो मुझे बड़ा उसने भावुक किया और

1223
01:24:11,760 --> 01:24:16,000
मैं अंत में मैंने रात को ही आपको फोन मिलाया था आप देखिएगा रिसेंट उसमें

1224
01:24:16,000 --> 01:24:20,080
जाके स्ट्रीम में तो मैंने फोन मिलाया था कि लाइव कर रही है हमसे अन्याय हो

1225
01:24:20,080 --> 01:24:24,080
गया इस बच्चे के प्रति है ना तो बहुत अपनेपन से बस वो

1226
01:24:24,080 --> 01:24:29,200
है कि मैंने जब उसकी लाइव देखी तो उसमें पता चला कि नहीं नहीं [हंसी]

1227
01:24:29,200 --> 01:24:33,200
तो वो

1228
01:24:33,200 --> 01:24:37,360
तो सारी चीजें हमने अभी क्लियर कर दी है। निर्भय आर्य और संदीपन

1229
01:24:37,360 --> 01:24:41,360
जी के लिए ये है कि भाई आपने क्षमा मांग ली। हमने मतलब

1230
01:24:41,360 --> 01:24:45,360
हमारे मन में उस बात को लेकर के वो जो हुआ उसको लेकर के कोई वो नहीं है। अगर

1231
01:24:45,360 --> 01:24:49,440
आपको चर्चा करनी है तो हम कुछ ही एक दो दिन में मतलब कुछ अपना

1232
01:24:49,440 --> 01:24:53,680
शेड्यूल देख के दोबारा से आयोजित कर लेंगे। इसके लिए निर्भय हमसे

1233
01:24:53,680 --> 01:24:58,000
व्यक्तिगत रूप से संपर्क में है। संदीप जी भी संपर्क में है तो वहां पर डिसाइड हो जाएंगी

1234
01:24:58,000 --> 01:25:02,320
चीजें। हां श्वेता जी आप कुछ कह रहे थे नहीं बस

1235
01:25:02,320 --> 01:25:06,320
मैं तो अपनी बात कह चुका हूं सारी और मैं बिल्कुल मैं

1236
01:25:06,320 --> 01:25:10,400
सहमत सहमत हूं इस चीज से कि हां ठीक है एक बार तो जरूर हो जानी चाहिए क्योंकि मुझे भी ऐसा लग रहा था

1237
01:25:10,400 --> 01:25:14,800
कि उस समय वो चर्चा आगे बढ़ सकती थी लेकिन फिर वही है मिसकम्युनिकेशन

1238
01:25:14,800 --> 01:25:18,880
या मिसअंडरस्टैंडिंग की वजह से शायद मुझे ऐसा लगता है कि वो हो गई लेकिन बाद में तो फिर आपने

1239
01:25:18,880 --> 01:25:22,240
बात अपनी सारी कह ही दी है।

1240
01:25:22,240 --> 01:25:26,400
तो देखते हैं अभी आप बताइए। बस मैं यही कहूंगा कि वो जो लाइव की है ना निर्भय

1241
01:25:26,400 --> 01:25:30,560
ने कि जैसे उसने अभी क्षमा की है मगर वो लाइव में भी उसने सारी बातें

1242
01:25:30,560 --> 01:25:35,360
जो है वो जो है वही व्यक्तिगत कटाक्ष

1243
01:25:35,360 --> 01:25:39,360
मैं वो देखूंगा वो वाली वीडियो अगर डाली होगी उन्होंने तो हां तो उसमें

1244
01:25:39,360 --> 01:25:43,520
भी व्यक्तिगत कटाक्ष ही है तो आगे से भविष्य में व्यक्तिगत कटाक्षों

1245
01:25:43,520 --> 01:25:47,600
से बचे सैद्धांतिक कटाक्ष करिए है ना कि एक ऐसा

1246
01:25:47,600 --> 01:25:48,560
ईश्वर है जो

1247
01:25:48,560 --> 01:25:52,880
अवतार नहीं ले सकता है ईश्वर में बात करिए व्यक्तिगत कटाक्ष से बचिए

1248
01:25:52,880 --> 01:25:56,960
है ना बातों पर बात करी है तो कुछ रह गया

1249
01:25:56,960 --> 01:26:01,040
हो तो मुझे याद दिला दें अन्यथा फिर लाइफ को

1250
01:26:01,040 --> 01:26:05,200
पूरा बस यही है यही है और हां एक और बात इसमें मैं जोड़ना चाहूंगा

1251
01:26:05,200 --> 01:26:10,320
कि जैसा भाव आर्य समाजियों के जो हमारे

1252
01:26:10,320 --> 01:26:14,400
बंधुओं के साथ में है वैसा ही मतलब ऐसा नहीं है कि उनसे कोई द्वेष भाव

1253
01:26:14,400 --> 01:26:18,480
नहीं है। कहने का मतलब यह है वैसा ही हमें हमें हमारे लिए कोई द्वेष भाव

1254
01:26:18,480 --> 01:26:22,560
इस वाले के सदस्यों के साथ भी नहीं है। उनसे भी केवल सैद्धांतिक मतभेद

1255
01:26:22,560 --> 01:26:26,560
ही है या किसी भी हिंदू के साथ जैसे कि आपने आपको याद होगा जब मैं लाइव

1256
01:26:26,560 --> 01:26:30,720
पे था और जब एक क्रिश्चियन महानुभाव आए थे और उन्होंने बोला था कि इनके

1257
01:26:30,720 --> 01:26:34,880
हिसाब से कहते हैं कि बाइबल में भी में भी प्रमाण है कबीर साहब भगवान है

1258
01:26:34,880 --> 01:26:39,040
तो आपने वहां पे उस उसे उस व्यक्ति को रोक दिया था। है ना? आपने

1259
01:26:39,040 --> 01:26:43,120
कहा था कि कि आप यह प्रूफ करिए

1260
01:26:43,120 --> 01:26:47,280
कि क्रिश्चियन ये बाइबल के से प्रतिपादित होने वाला

1261
01:26:47,280 --> 01:26:51,600
ईश्वर सर्व शक्तिमान है। क्योंकि अंततवा संत रामपाल

1262
01:26:51,600 --> 01:26:55,680
या फिर जो रामपाल रामपाल को फॉलो करने वाले वो भी अंत में हमारे भाई ही हैं

1263
01:26:55,680 --> 01:27:00,000
और जो हमारी वो चल रही है तो ये चीज है ठीक है

1264
01:27:00,000 --> 01:27:04,080
तो इसमें कोई दो राय नहीं है वो ये पहले भी थी और आज भी है

1265
01:27:04,080 --> 01:27:08,320
कहीं ना कहीं मैं आपको बता दूं रामपाल से बहुत आगे

1266
01:27:08,320 --> 01:27:12,480
दयानंद जी थे विद्वान डाउट ही नहीं है कोई दो

1267
01:27:12,480 --> 01:27:16,480
राय नहीं है और ये सब बातें भी संदीपन रॉय जी ने गलत कही है

1268
01:27:16,480 --> 01:27:20,480
कि जगदगुरु शंकराचार्य जी महाराज है कि वो कह रहे हैं

1269
01:27:20,480 --> 01:27:24,560
कि उनका खंडन नहीं किया जा सकता। खंडन इसलिए नहीं किया जा सकता जो त्रेतवाद से मिलता

1270
01:27:24,560 --> 01:27:28,720
जुलता रामानुजाचार्य जी का वो दर्शन था और वो जब कर रहे

1271
01:27:28,720 --> 01:27:32,800
थे तो उनको लगा कि रामानुजाचार्य जी की बातों को मुझे काटना पड़ रहा है। तो

1272
01:27:32,800 --> 01:27:37,040
जब पूर्वाचार्यों ने कर रखा है इस बारे में काम दयानंद

1273
01:27:37,040 --> 01:27:41,200
जी पर काम कार्य अच्छा खासा कर रखा है। तो उनके मन में क्योंकि आस्था थी तो

1274
01:27:41,200 --> 01:27:45,200
उन्होंने अपनी पर्सनल उसके हिसाब से नहीं किया। मगर यह कहना कि हो

1275
01:27:45,200 --> 01:27:49,440
ही नहीं सकता है। ऐसा उन्होंने नहीं कहा तो गलत प्रचारित करने से बचें।

1276
01:27:49,440 --> 01:27:53,600
ऐसी बातें प्रचार ना करें जो है नहीं वही करिए ना कांटे की नोक वाला काम

1277
01:27:53,600 --> 01:27:58,000
क्यों नहीं पकड़ते आप लोग कांटे की नोक सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र

1278
01:27:58,000 --> 01:28:02,000
मोक्ष शाश्वत धर्म मुझे वक्तव्य याद

1279
01:28:02,000 --> 01:28:06,320
है जब मतलब मैंने देखा था ये वीडियो जब गुरुदेव बोल रहे थे तो उन्होंने

1280
01:28:06,320 --> 01:28:10,480
कहा था मतलब रामनाचार्य महाभाग के लिए सम्मान जो कहते हैं कि मतलब ये मुझसे

1281
01:28:10,480 --> 01:28:14,560
नहीं हो पाएगा ये मैं कर नहीं सकता है ना अच्छा सम्मान सम्मान सम्मान

1282
01:28:14,560 --> 01:28:18,640
जो है स्वामी दयानंद जी के लिए भी था हां वो तो है बिल्कुल है हां नहीं

1283
01:28:18,640 --> 01:28:19,440
कभी

1284
01:28:19,440 --> 01:28:23,440
उनको हमेशा जी और देखो निर्भय निर्भय निर्भय और संदीपन

1285
01:28:23,440 --> 01:28:28,080
के लिए एक बात है कि जैसे संदीपन ने उस संदेश में यह भी लिखा है कि

1286
01:28:28,080 --> 01:28:32,400
अ क्या कहते हैं कि जो उस समय कमेंट

1287
01:28:32,400 --> 01:28:36,400
बहुत गलत गलत आ रहे थे। ऐसा नहीं है। कमेंट मेरी स्क्रीन पर मुझे भी गलत गलत दिख रहे

1288
01:28:36,400 --> 01:28:40,880
थे। पर जो है अभी भी आ रहे हैं। आज अभी आज भी आ रहे हैं।

1289
01:28:40,880 --> 01:28:44,880
गीता में देखिए भगवत गीता में जो बात भगवान ने कही

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01:28:44,880 --> 01:28:49,760
है ना ऐसे ही नहीं कही है। आसक्ति रहित होना सीखिए।

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01:28:49,760 --> 01:28:54,640
अब भाई हम है तो हमारे पास तो राम का नाम है। हम उससे कोशिश करते हैं आसक्ति रहित होना।

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01:28:54,640 --> 01:28:59,040
आप जो आज यज्ञ कर रहे हैं उससे करिए अपने आप को आसक्ति रहित। समत्वता

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01:28:59,040 --> 01:29:03,200
तो लाइए कि जिस जीत का लालच हार का भय दोनों ना

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01:29:03,200 --> 01:29:08,160
हो। उसमें अपने अंदर इतना कंट्रोल लाइए कम से गलत बिहेव ना निकले।

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01:29:08,160 --> 01:29:12,320
पद से बड़े-बड़े जिनको कार्य करने होते हैं ना जीवन में

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01:29:12,320 --> 01:29:16,320
वो छोटी चीजों पर अपने आप को प्रभावित नहीं होने देते।

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01:29:16,320 --> 01:29:20,480
और और मैं इसमें आपको एग्जांपल एक छोटी मोटी चीजें बैठे

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01:29:20,480 --> 01:29:25,120
हैं तो मैं बता दूं कि मेरे मेरे जो छोटे भाई हैं

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01:29:25,120 --> 01:29:29,280
वो मेरे साथ मतलब एक डबल बेड है तो वो कहते

1300
01:29:29,280 --> 01:29:33,600
थे कि मैं एक दूसरे बेड पे जाके सोऊंगा कि क्यों सोओगे? कि मुझे जो है मतलब स्पेस

1301
01:29:33,600 --> 01:29:34,720
ज्यादा चाहिए। कुछ बुक

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01:29:34,720 --> 01:29:38,880
चाहिए। मैंने कहा लोग मर रहे हैं दुनिया में। उनके पास सोने की जगह

1303
01:29:38,880 --> 01:29:44,080
नहीं है। तुम्हारे पास बेड है, कंबल है मगर तुम्हें अपना सेपरेट चाहिए।

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01:29:44,080 --> 01:29:48,080
और तो मैंने उनको ये कहा कि सुनो अगर तुमको अच्छा

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01:29:48,080 --> 01:29:52,400
नहीं लग रहा हो बातें गलत। मगर अपने आप को तैयार करो। हर विपरीत परिस्थिति से लड़ने

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01:29:52,400 --> 01:29:56,480
के लिए। ऐसे नहीं होगा। इतना आसान नहीं है धर्म का धर्म

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01:29:56,480 --> 01:30:00,480
की रक्षा का मार्ग। विपरीत परिस्थितियों के लिए तैयार करो। अपने आप

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01:30:00,480 --> 01:30:04,560
को विपरीत से विपरीत तब जो है आप सामान्य स्थितियों

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01:30:04,560 --> 01:30:10,560
में तो बहुत सामान्य रहोगे। तो कहने का मतलब यह है अपने आपको थोड़ा सा

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01:30:12,240 --> 01:30:16,320
तो उस वीडियो में भी जो अभी लाइव हो रही थी और यह कहना है कि गलत कमेंट

1311
01:30:16,320 --> 01:30:20,320
आ रहे थे तो हमारे ऑपरेटर ऑटोमेटिकली जो उल्टी सीधी बातें लगातार करता

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01:30:20,320 --> 01:30:24,480
है एक दो बार चेतावनी देने के बाद हटा देते हैं। हमारी ओर से इन

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01:30:24,480 --> 01:30:28,880
बारे में उल्टी सीधी बातें कभी भी ना दयानंद जी के लिए की गई है। हां

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01:30:28,880 --> 01:30:33,040
सैद्धांतिक कटाक्ष जरूर किए गए हैं। ठीक है? सैद्धांतिक कटाक्ष

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01:30:33,040 --> 01:30:37,040
सी है। मगर दयानंद जी ये करते थे। वो चिलम फूंकते थे। सब बातें

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01:30:37,040 --> 01:30:41,120
उल्टी सीधी जो हमने तो यहां तक कि आप पता नहीं

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01:30:41,120 --> 01:30:45,360
कैसी नजर रख रहे हैं। दो साल तीन साल आप करियर की बातें कर रहे हैं।

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01:30:45,360 --> 01:30:49,680
हमने जब रामपालियों ने दयानंद जी के लिए उल्टी सीधी बात की थी तो शायद

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01:30:49,680 --> 01:30:53,840
पोस्ट भी की थी और वीडियो भी बनाया था। हम तो उनका

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01:30:53,840 --> 01:30:58,000
कहीं ज्यादा सम्मान है। मगर बात यह है कि हम

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01:30:58,000 --> 01:31:02,000
उनके उन सिद्धांत जिन सिद्धांतों का हम ये विरोध कर रहे उन

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01:31:02,000 --> 01:31:07,280
सिद्धांतों को ले जाके उससे नहीं लड़ सकते शत्रु से

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01:31:07,280 --> 01:31:11,280
दूसरे से नहीं कर सकते। बाहरी व्यक्ति से नहीं लड़ सकते। तो इसलिए उन सिद्धांतों

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01:31:11,280 --> 01:31:15,280
पर ऑब्जेक्शन है। वो हमें दे दो। उनका निराकरण दे दो। जो ऑब्जेक्शन निकल रहा

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है जो शत्रु करता है जो शत्रु करेगा जब हम उसको पटकने देने जाएंगे।

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01:31:19,360 --> 01:31:23,680
वो निराकरण हमको दे दो। हमें कोई दिक्कत नहीं है। खूब आराम से उसी को आगे बढ़ाओ आप

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तो वो निराकरण नहीं दोगे बल्कि हम जो लेके जा

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रहे हैं जो राह स है उस पर वार करोगे। इसका भी नष्ट कर दो

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01:31:31,520 --> 01:31:35,840
तो क्या रहेगा? शत्रु के लिए एक भी हथियार नहीं रह जाएगा। यही तो कर रहे हो। भाई शत्रु

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01:31:35,840 --> 01:31:40,560
से हम भिड़ने जा रहे हैं। हमारे पास एक हथियार है। तुम्हारा ठीक नहीं है। इसको लेके नहीं जा सकते। इसको

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01:31:40,560 --> 01:31:44,560
हटा दो। पीछे रखो। अपने तक रखो। प्रचारित मत करो। ठीक

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है। इस इस ये हो गया। मगर आप क्या कह रहे हो? अच्छा हमारा खराब है ले तेरा भी फोड़

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दूंगा बम शत्रु के लिए हमारे पास क्या रह गया कुछ नहीं इसलिए कहते

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हैं मेरे गलत होने से आपका सही होना सिद्ध नहीं होता आप अपने आप को सिद्ध करिए हम

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तो वहां पर सिद्ध है ही पूरे पूरे देश में इस

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समय बातें हो रही है पूरे देश में बच्चे पूछते हैं कमेंट में जाके

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क्या तुम्हारा ईश्वर सर्वशक्तिमान है ये लाना है बच्चों की उस पे

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तब जब किसी बिटिया से कहा जाएगा ना कि ये कैसा भगवान है जो

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नाच रहा है एक ऐसा भगवान है जो ये रो रहा है तब वो त से बोलेगी

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ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है सकता है

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ना चलिए ठीक है सभी

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को जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री कृष्णा हर हर

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महादेव कृष्णा
