1
00:00:02,960 --> 00:00:06,960
सभी को जय श्री राम और आशा करते

2
00:00:06,960 --> 00:00:11,200
हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। आज एक

3
00:00:11,200 --> 00:00:15,600
बहु प्रतीक्षित वार्ता होने जा रही है निर्भय

4
00:00:15,600 --> 00:00:19,600
जी के साथ इनके साथ जब ये गुप्त

5
00:00:19,600 --> 00:00:23,600
रूप से आए थे हमारे चैनल पर तब आपने हमारी और इनकी वार्ता थोड़ी सी देखी है।

6
00:00:23,600 --> 00:00:27,920
हालांकि उस वो कुछ निष्कर्ष पूर्वक पूर्ण

7
00:00:27,920 --> 00:00:33,120
वार्तालाप नहीं थी पर देखी होगी। उसके बाद फिर आपने

8
00:00:33,120 --> 00:00:37,680
जो हमारा इंटरेक्शन है वैसे दूर रह के तो काफी बातचीत होती रही।

9
00:00:37,680 --> 00:00:41,840
पर इंटरेक्शन आपने देखा होगा

10
00:00:41,840 --> 00:00:46,000
जो हमारा एक जो कॉल रिकॉर्डिंग आपने सुनी

11
00:00:46,000 --> 00:00:50,320
होगी उनके भी चैनल पर और हमारे भी चैनल पर यद्यपि

12
00:00:50,320 --> 00:00:54,400
हमारे बीच में कई सारे वो है वैचारिक मतभेद

13
00:00:54,400 --> 00:00:58,400
जैसे कि वर्णाश्रम को लेकर के है फिर इन्होंने अपनी पहचान को

14
00:00:58,400 --> 00:01:02,720
भी बताया कि भाई मैं मुझे आप आर्य समाजी नहीं हां दयानंद जी का फॉलोअर

15
00:01:02,720 --> 00:01:07,040
कहिए तो यह इंगित करता है परंपरा को लेकर के बात करना परंप परंपरा

16
00:01:07,040 --> 00:01:11,280
का विषय भी हमारे बीच में है और मगर आज मुख्य

17
00:01:11,280 --> 00:01:15,440
रूप से जो हमारा सबसे बड़ा एक सिद्धांत है ईश्वर अवतार ले सकता है

18
00:01:15,440 --> 00:01:18,000
और उसको लेकर के कई सारी हमारी चर्चाएं हो चुकी

19
00:01:18,000 --> 00:01:23,840
है आर्य समाजियों के साथ इवन मुसलमानों के साथ

20
00:01:23,840 --> 00:01:27,840
तो उसी बात को लेकर के उसी विषय पर आज

21
00:01:27,840 --> 00:01:32,320
हमारी मुख्य रूप से चर्चा होनी है।

22
00:01:32,320 --> 00:01:36,480
अच्छा एक बात और है कि हमेशा की तरह मैं आज भी थोड़ा सा लेट ही आया

23
00:01:36,480 --> 00:01:40,640
हूं। मुझे लगता है 5 सात मिनट 8 मिनट लेट है। तो मैं थोड़ा सा अपडेट भी दे दूं

24
00:01:40,640 --> 00:01:45,280
आप लोगों को कि आने से पहले जस्ट पहले

25
00:01:45,280 --> 00:01:49,440
पुलिस की ओर से रामपाल वाला जो प्रकरण चल रहा है उस प्रकरण

26
00:01:49,440 --> 00:01:53,440
में हाई कोर्ट को एक जवाब दिया गया है जिसमें पुलिस का यह कहना है कि हमने

27
00:01:53,440 --> 00:01:57,520
हमारे द्वारा बताए गए जो चिन्हित जो जगह हैं वहां वहां पर

28
00:01:57,520 --> 00:02:02,240
जो है जांच पड़ताल कर ली है। परंतु वहां पर वो जो विवादास्पद

29
00:02:02,240 --> 00:02:06,400
सामग्री है वो प्राप्त नहीं हुई जिसको लेकर के हमें आपत्ति है। मतलब

30
00:02:06,400 --> 00:02:10,480
हमने इनको मुख्य रूप से एफआईआर में दो चीजें बताई थी। एक जो पता

31
00:02:10,480 --> 00:02:14,640
दिल्ली वाला इसमें लिखा हुआ है इनकी किताब में वह और एक जो रामपाल

32
00:02:14,640 --> 00:02:18,640
का एड्रेस यहां लखनऊ वाला है वो हमने उसमें एफआईआर में बताई थी और

33
00:02:18,640 --> 00:02:22,640
बयान में बाकी सारा पूरा इनका दिया

34
00:02:22,640 --> 00:02:26,720
था डिटेल्स। तो पुलिस का कहना है कि इन्होंने जो एफआईआर में हमें जो

35
00:02:26,720 --> 00:02:30,800
चीजें दी हैं वहां पर हम गए और हमें कुछ प्राप्त नहीं हुआ।

36
00:02:30,800 --> 00:02:33,200
तो एक जवाब

37
00:02:33,200 --> 00:02:37,520
तैयार करना था कि आपको कहां-कहां से प्राप्त हो सकता है। बड़े आसानी से

38
00:02:37,520 --> 00:02:42,080
इनकी पुस्तकें जैसे कि उत्तर प्रदेश में सीतापुर, शामली इत्यादि में

39
00:02:42,080 --> 00:02:46,240
डंके की चोट पर सब चल रहा है तो वहां आप जाएं और फिर

40
00:02:46,240 --> 00:02:50,400
पूरे देश भर में चल रहा है वहां आप जाएं। तो ये

41
00:02:50,400 --> 00:02:54,400
सारे इस तरह के कई सारे पॉइंट्स थे जो हमने

42
00:02:54,400 --> 00:02:58,480
जवाब तैयार करना आवश्यक था और आज देना भी है वो। हालांकि तैयार

43
00:02:58,480 --> 00:03:02,640
हो गया। तैयार होते मुझे देर हो गई आने में। यहां से जब ये चर्चा पूरी होगी या

44
00:03:02,640 --> 00:03:06,880
बंद होगी जब भी होगी तो उसके बाद हम वहां पहुंचेंगे वो जवाब देंगे

45
00:03:06,880 --> 00:03:11,280
कि अब जैसे हमने जिन लोगों का नाम लिया है एफआईआर इत्यादि में तो वो

46
00:03:11,280 --> 00:03:15,280
उन लोगों से भी अभी पुलिस ने सख्ती से पूछताछ नहीं की है और वो लोग क्या

47
00:03:15,280 --> 00:03:19,600
कर रहे हैं कि हमारे ऊपर केस लगाने की कोशिश कर रहे हैं तरह-तरह

48
00:03:19,600 --> 00:03:23,600
के कोर्ट में जाकर के हमको डेली एक दो दिन में एक नया संबंध आ जाता है कोर्ट

49
00:03:23,600 --> 00:03:27,680
की ओर से। तो ठीक है अब आ जाते हैं मुख्य विषय पर। हम निर्भय जी को

50
00:03:27,680 --> 00:03:33,680
ले लेते हैं। और अभी

51
00:03:35,520 --> 00:03:40,640
निर्भय जी अपना कैमरा ऑन कर लें।

52
00:03:40,640 --> 00:03:45,520
आपका स्वागत है। जय श्री राम।

53
00:03:45,520 --> 00:03:50,480
आपकी आवाज नहीं आ रही निर्भय जी।

54
00:03:50,480 --> 00:03:54,640
जी नमस्ते मेरी आवाज आ रही है? जी जी नमस्ते जय

55
00:03:54,640 --> 00:03:58,880
श्री राम। नमस्ते जय श्री राम। आवाज आपकी आ रही है और

56
00:03:58,880 --> 00:04:03,360
मैं एक बात की आपकी प्रशंसा करना चाहूंगा सभी के समक्ष

57
00:04:03,360 --> 00:04:07,360
कि एक तो आपने धैर्य रखा काफी लंबी हमारी बातचीत

58
00:04:07,360 --> 00:04:11,520
शुरू हुई थी लगता है हो गए होंगे आज से दो-ती साल हो गए होंगे जब पहले पहली बार हम

59
00:04:11,520 --> 00:04:16,000
मेरी आपकी बात हुई थी फोन पर लगभग मेरे ख्याल दो साल हो गए हैं हां

60
00:04:16,000 --> 00:04:20,000
तो तब पहली बार बातचीत हुई थी और उसके बाद से आज तक आपने जो

61
00:04:20,000 --> 00:04:24,320
धैर्य रखा और मामले को किसी तरह से चर्चा के पटल पर लेकर के आए

62
00:04:24,320 --> 00:04:28,480
तो इसमें आपने बहुत अच्छी भूमिका निभाई भाई और इसके लिए आपका अभिवादन है

63
00:04:28,480 --> 00:04:30,960
और

64
00:04:30,960 --> 00:04:35,120
कई बार ऐसी वाइब्स आती है आपकी ओर से कि एक छोटे भाई जैसा फील होता है कि

65
00:04:35,120 --> 00:04:39,440
कुछ थोड़ा सा मतलब साथ में एक टीम वाली बात होती तो

66
00:04:39,440 --> 00:04:43,920
एक अलग रहता और हो सकता है भगवान ने चाहा तो होगी भी। पूर्वांचल

67
00:04:43,920 --> 00:04:48,400
के लोगों का आपस में थोड़ा सा ऐसा टैली होता है। अच्छा

68
00:04:48,400 --> 00:04:50,960
तो एक्चुअली मेरा जो बैकग्राउंड

69
00:04:50,960 --> 00:04:55,280
है ना वो पूर्वांचल प्रॉपर नहीं कहेंगे क्योंकि वो

70
00:04:55,280 --> 00:04:59,760
थोड़ा सा इधर ये जो यूपी का ये वाला हिस्सा है ना कानपुर इटावा

71
00:04:59,760 --> 00:05:03,760
अच्छा अच्छा ये सेंटर टाइप का है। मैं बनारसी रूप से

72
00:05:03,760 --> 00:05:08,640
अगर आप जो है उधर दिल्ली की ओर चले जाएंगे तो उधर से तो पूर्वांचल ही लगेगा वो

73
00:05:08,640 --> 00:05:13,120
मैं आगरा मैं मुख्य रूप से वाराणसी से हूं। वाराणसी

74
00:05:13,120 --> 00:05:17,840
हां तो हम लोग मतलब काफी पास ही हो गए फिर वो गंगा किनारे वाले

75
00:05:17,840 --> 00:05:21,840
तो अच्छा लगा आपने जो है प्रयास किया और जो है वो जो पिछला कॉल

76
00:05:21,840 --> 00:05:26,000
भी किया था सम्मान पूर्वक उसमें अपनी बात को रखा तो चीजें ठीक है

77
00:05:26,000 --> 00:05:30,000
क्योंकि सौहार्दपूर्ण वार्तालाप से ही

78
00:05:30,000 --> 00:05:34,480
परिवर्तन आ सकता है जिसके लिए हम भी प्रयासरत है हालांकि

79
00:05:34,480 --> 00:05:38,560
कभी-कभी अपने मंतव्य की रक्षा के लिए उसके दृष्टिकोण अलग होने की वजह से लोग

80
00:05:38,560 --> 00:05:43,360
उसका गलत अर्थ भी निकाल लेते हैं। और

81
00:05:43,360 --> 00:05:47,520
ठीक है। हमारे एक मॉडरेटर को मैंने कहा था कि वो आएंगे पर अभी तक आए नहीं है।

82
00:05:47,520 --> 00:05:51,840
चलिए कोई इशू नहीं है। हम दोनों मैनेज कर लेंगे। हां। ठीक। ठीक है।

83
00:05:51,840 --> 00:05:56,480
तो सबसे पहले मैं शुरुआत करना चाहूंगा।

84
00:05:56,480 --> 00:06:00,720
हां जी। तो वैदिक मंगलाचरण से ओम विश्वा

85
00:06:00,720 --> 00:06:06,160
देव सवितानी परासुआ य भद्रम तनासुआ।

86
00:06:06,160 --> 00:06:09,840
ओम

87
00:06:09,840 --> 00:06:14,000
सभी दर्शकों को सादर नमस्ते। तो जैसा कि सारे

88
00:06:14,000 --> 00:06:18,240
लोग लाइव देख रहे हैं। लाइव देख रहे हैं तो कुछ बातें मैं पहले स्पष्ट कर देना चाहूंगा। कमेंट

89
00:06:18,240 --> 00:06:22,240
में बहुत सारे लोग होंगे जो एकदम विरोधाभासी होंगे। कुछ मेरे पक्ष के

90
00:06:22,240 --> 00:06:26,240
होंगे, कुछ शिवाश जी के पक्ष के होंगे। दोनों ही पक्ष के लोगों को मैं आग्रह

91
00:06:26,240 --> 00:06:30,480
करना चाहूंगा। ठीक है? जो मेरा सम्मान करते हैं उनको खास करके आग्रह पूर्वक

92
00:06:30,480 --> 00:06:34,640
और अधिकार पूर्वक कहना चाहूंगा कि किसी भी तरह के गलत शब्द का प्रयोग ना करें। ठीक?

93
00:06:34,640 --> 00:06:38,720
इस बात का सभी लोग ध्यान रखें। दूसरी बात कुछ ऐसे भी

94
00:06:38,720 --> 00:06:43,440
लोग हैं जिन्हें मैंने नोटिस किया है जो यह चाहते हैं कि दोनों पक्षों में समन्वय बैठे।

95
00:06:43,440 --> 00:06:47,440
कुछ तो चाहते हैं कि अच्छे से एकदम सामने वाला मुझे पटके मैं सामने वाले को पटकू।

96
00:06:47,440 --> 00:06:51,760
कुछ लोग तो यही चाहते हैं। कुछ लोग ये भी चाहते हैं कि समन्वय बैठे। ऐसे

97
00:06:51,760 --> 00:06:56,080
लोगों को ऐसे लोगों की जो बातें मुझे भी ठीक लगी बुद्धि पूर्वक लगी। ठीक है? क्योंकि

98
00:06:56,080 --> 00:07:00,080
जहां तक एक दूसरे को पटका पटकी वाली बात है उसका कोई अंत नहीं है क्योंकि व्यक्ति मानेगा नहीं

99
00:07:00,080 --> 00:07:04,160
कोई फायदा नहीं है। समन्वय बैठे तो हमारे पूर्वाचार्य ठीक है।

100
00:07:04,160 --> 00:07:08,160
चाहे अगर शंकराचार्य जी ने बौद्धों के साथ में भी शास्त्रार्थ किया तो उनका उद्देश्य बौद्धों

101
00:07:08,160 --> 00:07:12,240
को मार देना खत्म कर देना नहीं था। उनका उद्देश्य था ये भी हमारे ही भाई हैं। ये भी वही

102
00:07:12,240 --> 00:07:16,240
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ही है। इनको अपने मत में ले आओ। मत में एक के हो जाएगा। मत एक्य हो

103
00:07:16,240 --> 00:07:21,040
जाएगा। यही काम महर्षि दयानंद जी ने भी किया। ठीक है? शास्त्रार्थ का एक ही

104
00:07:21,040 --> 00:07:25,040
शास्त्र चर्चा जो हम करते हैं किसी पक्ष पर जब हम वाद करते हैं। अच्छा

105
00:07:25,040 --> 00:07:29,040
एक बात मैं क्लेरिटी दे देता हूं जो हम चर्चा कर रहे हैं ये जलप्प

106
00:07:29,040 --> 00:07:33,360
नहीं है। ठीक है दर्शकों को पता होगा जो क्योंकि

107
00:07:33,360 --> 00:07:37,440
जब हम कोई भी चर्चा करते हैं तो शास्त्रों के अनुकूल ही चर्चा होती है और

108
00:07:37,440 --> 00:07:41,680
जो चर्चा से संबंधित जो हमारे पास एक शास्त्र अवेलेबल है वो है न्याय दर्शन। न्याय

109
00:07:41,680 --> 00:07:46,160
दर्शन को आर्य समाज भी स्वीकार करता है। महर्षि दंत तो मानते ही मानते थे और वेदांत

110
00:07:46,160 --> 00:07:50,240
जो अद्वैत वेदांत है उसकी परंपरा में भी चलता है। करपात्री जी तो अच्छे खासे

111
00:07:50,240 --> 00:07:54,720
विद्वान थे। मीमांसा के मीमांसक तो थे ही वो और न्याय के भी अच्छे खासे विद्वान थे।

112
00:07:54,720 --> 00:07:58,720
तो न्याय में जो इस प्रकार की सौहार्दपूर्ण जो चर्चा होती है उसे कहते हैं

113
00:07:58,720 --> 00:08:03,280
वाद। ठीक है? एक होता है वादी दूसरा होता है प्रतिवादी।

114
00:08:03,280 --> 00:08:07,280
अच्छा एक और तरह का होता है जिसे बोलते हैं जल्प जिसमें हार और जीत निश्चित

115
00:08:07,280 --> 00:08:11,600
होती है कि भैया यह सामने वाले को हराओ ऐसे करके और दूसरा पक्ष जीतेगा

116
00:08:11,600 --> 00:08:15,680
तो हम यहां पे जल्प नहीं कर रहे यहां पे हारजीत वाला विषय नहीं है यहां पे वाद चल

117
00:08:15,680 --> 00:08:19,680
रहा है समझने वाला हां बाकी जो चीजेंगी वाद के नियम के अनुसार ही होंगी ऐसा

118
00:08:19,680 --> 00:08:23,760
नहीं कि हम बिना नियम के कुछ भी कोई कुछ बोलेगा नियम हो गया न्याय दर्शन के अनुसार ही

119
00:08:23,760 --> 00:08:27,760
होगा वाद के अनुसार ही होगा क्योंकि और कोई चर्चा कोई विधान है नहीं शास्त्रों में

120
00:08:27,760 --> 00:08:31,760
वाद है जल है वितंडा है तीन है तो तीन में से ना हम वितंडा

121
00:08:31,760 --> 00:08:35,840
कर रहे हैं ठीक है हम अपना-अपना पक्ष क्लियर कर रहे हैं। जल्प कर नहीं रहे। हमें हारजीत कोई

122
00:08:35,840 --> 00:08:39,840
मुझे कोई आवश्यकता है नहीं अपना कुछ जीता हुआ सिद्ध करने का ना मुझे कोई आवश्यकता है सामने वाले को हरा

123
00:08:39,840 --> 00:08:40,340
के

124
00:08:40,080 --> 00:08:44,160
मेडल लेने का। तो हम बात करने जा रहे हैं। और जो विषय है वो

125
00:08:44,160 --> 00:08:48,160
बहुत ही क्लियर है। और क्लेरिटी थोड़ी सी मैं इस

126
00:08:48,160 --> 00:08:52,240
विषय में दे देता हूं। अब आते हैं डायरेक्ट मुख्य विषय पर। हम जो विषय है

127
00:08:52,240 --> 00:08:56,320
वो है अवतारवाद। ठीक है? अवतारवाद का क्या इसमें पर्सेक्टिव

128
00:08:56,320 --> 00:09:00,400
है? पर्सेक्टिव ये है कि मैं मानता हूं महर्षि दयानंद को। ठीक है?

129
00:09:00,400 --> 00:09:04,480
हम आप महर्षि दयानंद मानते हैं वेदों को वो वेदों को जो

130
00:09:04,480 --> 00:09:10,400
मुख्य विषय स्टार्ट होने से पहले एक छोटी सी चीज मैं ऐड कर दूं आपने जो बताया है

131
00:09:10,400 --> 00:09:16,160
ऐसा है कि कई बार लोग ये समझते हैं कि मुझे कोई

132
00:09:16,160 --> 00:09:20,720
क्या कहते हैं ये आर्य समाज से या स्पॉन से

133
00:09:20,720 --> 00:09:24,880
या रामपाल से रामपाल को तो खैर स्कॉन आर्य समाज के समक्ष नहीं खड़ा

134
00:09:24,880 --> 00:09:29,120
करना चाहिए पर क्योंकि वो मेरे विरोधी के रूप में तो दिखते

135
00:09:29,120 --> 00:09:33,280
ही हैं तो कई बार ऐसा होता है कि अ

136
00:09:33,280 --> 00:09:37,440
क्या कहते हैं जो आर्य समाज से अगर मेरी कोई चर्चा हुई हालांकि

137
00:09:37,440 --> 00:09:41,600
जो भी चर्चा आप लोगों ने देखी होगी जो ग्राउंड पे हुई है उसमें कभी भी कोई

138
00:09:41,600 --> 00:09:45,760
आपने झगड़े जैसी चीज या चिल्ला या चिल्लाहट या ऐसा होना

139
00:09:45,760 --> 00:09:49,840
नहीं देखा होगा एक बैलेंस चर्चाएं देखी होंगी आपने और

140
00:09:49,840 --> 00:09:54,160
इस के साथ भी ऐसा ही है तो कई बार लोग ये लगा लेते हैं कि भाई मेरा उद्देश्य

141
00:09:54,160 --> 00:09:55,120
इनको नष्ट करना

142
00:09:55,120 --> 00:09:59,120
है जैसे अभी आपने कहा ना कि पुत्र नष्ट हो जाए बिल्कुल सही बात कही उसी के पक्ष में मैं कह

143
00:09:59,120 --> 00:10:03,120
रहा हूं कि मेरा उद्देश्य ऐसा नहीं होता है कि आर्य समाज को मुझे नष्ट करना

144
00:10:03,120 --> 00:10:07,200
है या उसके ताला लग जाए या इस में ताला लग जाए। मेरा उद्देश्य

145
00:10:07,200 --> 00:10:11,200
जैसे अभी आपने दो दिन पहले एक चर्चा देखी है ना जो दो चार दिन पहले

146
00:10:11,200 --> 00:10:15,280
आपने एक चर्चा देखी होगी ललन टॉप वाली मेरा उद्देश्य ये रहता है कि हम

147
00:10:15,280 --> 00:10:19,520
क्या हम विधर्मी के लिए तैयार हैं कि नहीं जिन सिद्धांतों

148
00:10:19,520 --> 00:10:24,240
का हम प्रचार कर रहे हैं वो विधर्मी में कितना लागू मतलब विधर्मी को किस तरह से काट पाएंगे

149
00:10:24,240 --> 00:10:28,800
तो इस कारण से मुझे उन सिद्धांतों का रक्षा करने

150
00:10:28,800 --> 00:10:32,880
का मंतव्य रहता है कि हम विधर्मियों से जब लड़ने जाएंगे तो वहां

151
00:10:32,880 --> 00:10:37,040
जो है क्लीन बोल्ड कर सके वहां इफ एंड बट की बात रहे तो जो जो

152
00:10:37,040 --> 00:10:41,280
ऐसे सिद्धांत मिलते हैं उनके साथ बहुत अच्छा सौहार्दपूर्ण वो रहता

153
00:10:41,280 --> 00:10:45,280
है मगर यदि कोई उनको उनको ही काट रहा है तो फिर वहां हम लोग हल्के

154
00:10:45,280 --> 00:10:49,360
होते हैं और हुआ भी है मेरे साथ मैं मुक्ति के पास सामने था एक

155
00:10:49,360 --> 00:10:53,360
समय पे तब मैं अध्ययन में बहुत प्रारंभिक स्तर पर

156
00:10:53,360 --> 00:10:57,600
ही था और मुक्ति ने कह दिया जब मैंने कहा कि आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान

157
00:10:57,600 --> 00:11:01,840
है तो मुक्ति ने कह दिया आर्य समाज भी तो नहीं मानता है अच्छा मुक्ति ने उस समय

158
00:11:01,840 --> 00:11:06,080
इस की गीता का भी एक संदर्भ लिया हालांकि फिर मैंने वहां पर डिपेंड नहीं किया

159
00:11:06,080 --> 00:11:10,560
मगर उनको मतलब हम ही ऐसे सिद्धांत परोस के दें जो विधर्मी

160
00:11:10,560 --> 00:11:14,560
के काम आए हमारे विरोध में तो इस कारण बस ये सिंगल पॉइंट एजेंडा है इसमें

161
00:11:14,560 --> 00:11:18,960
ऐसा कभी नहीं है कि भाई मुझे जो है आर्य समाज में ताला लगाना है

162
00:11:18,960 --> 00:11:23,120
मेरा उद्देश्य है कि हम विधर्मियों से कैसे विधर्मियों को अकाट वो

163
00:11:23,120 --> 00:11:27,600
सिद्धांत कौन से कि विधर्मियों अब जैसे कई बार हम लोग देखते हैं

164
00:11:27,600 --> 00:11:32,080
कि जैसे हम बहुत सारे चैनल्स हैं बहुत सारे जो विधर्मियों

165
00:11:32,080 --> 00:11:36,080
में ये अच्छाई हो रही है ये बुराई हो रही इन सब विषयों में

166
00:11:36,080 --> 00:11:40,160
बात करते हैं। जैसे हलाला हलाला बुरा है, ट्रिपल तलाक बुरा

167
00:11:40,160 --> 00:11:44,240
है। इन सब विषयों पर बात करते रहते हैं। जबकि इसमें दिक्कत क्या है कि जब हम

168
00:11:44,240 --> 00:11:48,400
इन विषयों को लेकर के विधर्मी को हराएंगे तो दयानंद जी ने भी अपनी सत्यार्थ

169
00:11:48,400 --> 00:11:52,480
प्रकाश में एक बात कही नियोग के समय उन्होंने पूर्व पक्ष में नियोग

170
00:11:52,480 --> 00:11:56,480
में लिखा कि भाई जब व्यक्ति ने पूर्व पक्ष में कहा

171
00:11:56,480 --> 00:12:01,120
कि भाई ये नियोग तो व्यभचार जैसा दिखता है। तो दयानंद जी ने वहां पर कहा

172
00:12:01,120 --> 00:12:05,440
उत्तर पक्ष में कि भाई वो जो यह बताओ कि विवाह

173
00:12:05,440 --> 00:12:09,840
व्यभचार नहीं है यह कहां से तय हुआ या फिर

174
00:12:09,840 --> 00:12:13,920
कई मतलब बिना किसी विधि विधान के और किसी किसी के साथ भोग करना

175
00:12:13,920 --> 00:12:18,160
ये करना यह व्यभचार है ये कैसे तय हुआ जब शास्त्र से वो चीज तय

176
00:12:18,160 --> 00:12:22,320
हुई है ईश्वर की वाणी से वो चीज तय हुई है अच्छी या बुरी तो

177
00:12:22,320 --> 00:12:25,760
फिर जब ईश्वर की वाणी कह रही है कि नियोग बुरा नहीं है तो फिर

178
00:12:25,760 --> 00:12:30,000
उसमें आपको हस्तक्षेप क्यों है तो जब उन्होंने यह बात कही

179
00:12:30,000 --> 00:12:34,400
तो मैंने बात तो तर्क तो बिल्कुल सही है। तो कहने का मतलब यह है कि

180
00:12:34,400 --> 00:12:38,480
हम अगर यह कहते रहेंगे कि तुम्हारे यहां पर ये चीज गलत है तो वो तो यह कहते हैं ना

181
00:12:38,480 --> 00:12:42,480
कि हमारे ईश्वर ने कही है। उसमें वहां पर आप तर्क बहुत ज्यादा

182
00:12:42,480 --> 00:12:46,960
अंत तक नहीं जा सकते। मगर जब हम उनकी जड़ पे ही वार करेंगे कि आप

183
00:12:46,960 --> 00:12:51,520
जो संविधान कह रहे हैं कि ईश्वर ने दिया वो ईश्वर है ही नहीं। उसकी ईश्वर की एलिजिबिलिटी

184
00:12:51,520 --> 00:12:55,600
ही नहीं है। तब हम उसका जो है रूट्स जो है उखाड़ सकते हैं। तो

185
00:12:55,600 --> 00:12:59,600
यह कुछ चीजें थी। उद्देश्य को समझे मन में ऐसा कोई द्वेष ना

186
00:12:59,600 --> 00:13:05,040
पाले ना मेरे लिए ना निर्भय के लिए। ठीक है? तो

187
00:13:05,040 --> 00:13:09,200
आपने एक बात यहां पे वो जो आप नियोग वाला बता रहे थे शिवशी जी उसमें ये है ना कि

188
00:13:09,200 --> 00:13:13,680
उसमें दोनों पक्ष है। पक्ष ये है कि पूरा जो नियोग प्रकरण है

189
00:13:13,680 --> 00:13:17,760
उसमें महर्षि ने केवल एक बार ये कहा है कि भाई ये इसका प्रमाण वेद में

190
00:13:17,760 --> 00:13:22,560
भी है और वो कब आया है इसलिए इस संदर्भ में दिया है कि नहीं मेरा

191
00:13:22,560 --> 00:13:26,560
वहां पर तार्किक रूप से ही सिद्ध किया है। मैं नियोग को

192
00:13:26,560 --> 00:13:30,640
गलत ठहराने के लिए नहीं बोल मगर उन्होंने समझिए समझिए मैं आपकी स्टेटमेंट का विरोध

193
00:13:30,640 --> 00:13:34,640
नहीं कर रहा हूं। तक मैंने आज तक सुनिए सुनिए मैंने आज तक कभी

194
00:13:34,640 --> 00:13:38,880
भी नियोग के विषय में कोई एक वीडियो बनाया हो तो बताइए आप कभी भी बनाया

195
00:13:38,880 --> 00:13:40,960
इसीलिए इसीलिए मैं आपके इसलिए नहीं बनाया

196
00:13:40,960 --> 00:13:45,120
इसलिए नहीं बनाया क्योंकि हम देखिए अगर उसमें ऐड ऑन करूंगा तो आपको भी अच्छा लगेगा

197
00:13:45,120 --> 00:13:49,280
ना कि देखिए एक बात मेरी तरफ से ऐड ऑन हो गई है ना मैं बस ऐड ऑन कर रहा हूं ठीक है वो देखिए

198
00:13:49,280 --> 00:13:53,440
एक्चुअली क्या है कि उसमें फिर ये बात आ जाएगी कि अगर आप ये कहेंगे कि वो सही

199
00:13:53,440 --> 00:13:57,440
थे तो मुझे देखना पड़ेगा कि उस बारे में फिर अध्ययन करना पड़ेगा कि वो सही थे इस

200
00:13:57,440 --> 00:14:01,440
विषय में कि नहीं सही थे वो तो वो तो बिना अध्ययन के कोई कुछ बोल नहीं सकता।

201
00:14:01,440 --> 00:14:05,920
अगर मैं कोई यहां अभी वो नहीं चाहेंगे ना मैं अध्ययन करके ही बोलूं।

202
00:14:05,920 --> 00:14:09,920
यहां अभी वो विषय ना लाया जाए ना जिस बारे में मेरा पक्ष उसमें क्या है क्या

203
00:14:09,920 --> 00:14:14,320
नहीं है। फिर आपका ही वो की बात तो मैं तो लाया नहीं नहीं

204
00:14:14,320 --> 00:14:18,320
नियोग की मैंने नियोग को गलत नहीं कहा है। मैंने कहा है कि वहां पर नियोग के पक्ष

205
00:14:18,320 --> 00:14:22,640
में उन्होंने जो तर्क दिया बहुत सही तर्क था। जब आप दुनिया में अच्छाई

206
00:14:22,640 --> 00:14:26,640
और बुराई के लिए शास्त्र का चश्मा लगा रहे हो तो फिर वो

207
00:14:26,640 --> 00:14:30,640
शास्त्र क्योंकि ईश्वर की वाणी है इसलिए लगा रहे हो तो सामने वाले को

208
00:14:30,640 --> 00:14:34,720
ये क्यों कह रहे हो कि तुम्हारे यहां जो ईश्वर की वाणी है वो गलत है आप उसके

209
00:14:34,720 --> 00:14:38,880
ईश्वर को ही जो है असिद्ध कर दो ना उसके ईश्वर को ही असिद्ध

210
00:14:38,880 --> 00:14:42,880
कर दो कि वो शास्त्र लिखने वाला एलिजिबल नहीं मेरा कहने मैं यहां पे उनके पक्ष

211
00:14:42,880 --> 00:14:46,960
में हूं कि उन्होंने जो तर्क दिया है बिल्कुल सही दिया है यदि शास्त्र कह

212
00:14:46,960 --> 00:14:51,120
रहा है अच्छा शास्त्र प्रमाण हां

213
00:14:51,120 --> 00:14:55,120
और वो अच्छा है या बुरा है उसमें मेरा कोई क्लेम नहीं है। अभी मैं उसमें कोई न्यूट्रल

214
00:14:55,120 --> 00:14:56,240
हूं। वो गलत कहा उन्होंने

215
00:14:56,240 --> 00:15:00,240
सही कहा मैं न्यूट्रल हूं। उसमें कुछ मेरा अभी वो नहीं है। गति नहीं है अभी उसमें नियोग

216
00:15:00,240 --> 00:15:04,240
वाले मामले में और ना ही मैं कभी मुझे नहीं लगता कि मैं उस

217
00:15:04,240 --> 00:15:08,240
पक्ष में जाऊंगा क्योंकि मैं हमेशा कहता हूं सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष

218
00:15:08,240 --> 00:15:12,400
शाश्वत धर्म ये तीन चीजें आप दोगे तो मैं आपके द्वारा

219
00:15:12,400 --> 00:15:16,400
कहा हुआ ये भी मान लूंगा कि भैया सनातन को हिंदू मत कहो या हिंदू को सनातन मत

220
00:15:16,400 --> 00:15:20,640
कहो। जैसे अभी आपने देखा होगा आर्य समाज की ओर से लेटर आ रहा है हमसे हिंदू हिंदू

221
00:15:20,640 --> 00:15:25,040
शब्द पर शास्त्रार्थ उससे क्या क्या परिवर्तन आएगा हिंदू शब्द पर शास्त्रार्थ

222
00:15:25,040 --> 00:15:29,360
से क्या परिवर्तन आएगा ज्यादा से ज्यादा आपकी जीत मेरी हार हो जाएगी या मेरी जीत आपकी हार हो जाएगी

223
00:15:29,360 --> 00:15:33,680
मगर मूलभूत विषय जो है सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत

224
00:15:33,680 --> 00:15:37,760
धर्म जब तक इनको एक मत मतेक्य के अनुसार नहीं माना जाएगा

225
00:15:37,760 --> 00:15:41,760
तब तक परिवर्तन नहीं आएगा तो इन पर बात पूरा विश्वास है कि आज

226
00:15:41,760 --> 00:15:45,840
इन विषयों पर मतक्य हो जाएगा जहां तक मुझे पूर्ण विश्वास है हां

227
00:15:45,840 --> 00:15:49,920
चलिए चलिए तो ठीक है तो ईश्वर विषय पे थोड़ा सा जो

228
00:15:49,920 --> 00:15:53,920
हम शुरू कर रहे थे तो उसप मैं बता देता हूं कि मेरा अवतारवाद है मतभेद क्या है इसको मैं

229
00:15:53,920 --> 00:15:58,000
स्पष्ट कर देता हूं नहीं पहले पहले पहले हमें कहां से शुरू करना है ये

230
00:15:58,000 --> 00:16:02,160
आप स्पष्ट कर देते कि इस बात से शुरू करना है क्या मैं

231
00:16:02,160 --> 00:16:06,240
स्टेप बता देता हूं आर्य समाज का ईश्वर सर्वशक्तिमान है या नहीं यहां से शुरू करना है

232
00:16:06,240 --> 00:16:10,240
या फिर यहां से शुरू करना है कि आप ईश्वर को नहीं मानते अवतार को

233
00:16:10,240 --> 00:16:11,440
नहीं मानते अवतार से ही शुरू

234
00:16:11,440 --> 00:16:15,440
करते हैं आप अवतार को नहीं मानते ठीक हम शुरुआत

235
00:16:15,440 --> 00:16:19,680
भी यही आप बताइए आपकी जिज्ञासाएं क्या-क्या है अवतार को लेकर? अब देखिए

236
00:16:19,680 --> 00:16:23,760
सबसे पहला तो यह आता है कि हम जैसे ईश्वर का जो वैदिक स्वरूप

237
00:16:23,760 --> 00:16:27,760
मानते हैं। ठीक है? उसमें बहुत हद तक मिलते जुलते स्वरूप आप

238
00:16:27,760 --> 00:16:31,760
भी मानते ही हैं और और भी कुछ कुछ मत वाले लोग हैं वह भी मानते हैं। तो ऐसा

239
00:16:31,760 --> 00:16:35,920
नहीं कि एकदम ही नित पूरा अलग-अलग है। जैसे अगर कोई

240
00:16:35,920 --> 00:16:39,920
भी मत मतांतर का व्यक्ति कोई भी अपने को आस्तिक क्लेम करता है वो ईश्वर को सृष्टि करता मानता ही

241
00:16:39,920 --> 00:16:44,160
मानता है। तो क्या है निर्भय जी अगर थोड़ा वॉइस का वॉल्यूम बढ़ा

242
00:16:44,160 --> 00:16:48,480
सके तो क्योंकि अच्छा मेरी निर्भय जी का वॉइस निर्भय जी का

243
00:16:48,480 --> 00:16:53,520
सही आ रहा है। नहीं आपका पहले भी सही आ रहा था। अच्छा

244
00:16:53,520 --> 00:16:57,520
पॉइंट इसके अंदर यही है कि अब जैसे बहुत मायनों पर तो

245
00:16:57,520 --> 00:17:01,680
हमारा मतलब एक है। ठीक है? अब जैसे ईश्वर को जो हम वैदिक स्वरूप

246
00:17:01,680 --> 00:17:05,760
मानते हैं क्या मानते हैं भाई? ईश्वर सर्वव्यापक है। सृष्टि करता है। अनादि अनंत नित्य

247
00:17:05,760 --> 00:17:09,920
है। ठीक है? सर्वशक्तिमान है इत्यादि इत्यादि। ये जो

248
00:17:09,920 --> 00:17:13,920
ईश्वर का वैदिक स्वरूप हम माने बैठे हैं। इस वैदिक स्वरूप में अवतारवाद कहीं फिट

249
00:17:13,920 --> 00:17:18,080
नहीं होता। हमारा यह कहना है, मेरा यह कहना है कि अवतारवाद

250
00:17:18,080 --> 00:17:22,400
कहीं फिट नहीं होता। जो कोई व्यक्ति अवतारवाद इन स्वरूप के साथ ही फिट कर दे

251
00:17:22,400 --> 00:17:26,400
तब तो हम मान लें। इसमें देखिए दो तरह से पॉइंट होगा। या तो

252
00:17:26,400 --> 00:17:26,900
आप

253
00:17:26,560 --> 00:17:30,560
इसी स्वरूप के अंदर ही अवतारवाद को फिट कर दो तो मान लेंगे। या

254
00:17:30,560 --> 00:17:34,880
तो आप ये क्लेम करो कि मैं ईश्वर के इस स्वरूप को मानता ही नहीं हूं। तब

255
00:17:34,880 --> 00:17:38,880
वाद विवाद चलेगा कि भाई फिर ईश्वर को स्वरूप है क्या? सर्व्यापक नहीं है तो

256
00:17:38,880 --> 00:17:43,040
एक देश ही है। सृष्टि करता नहीं है तो क्या है? तो एक वो आ जाएगा। तो जहां तक मुझे

257
00:17:43,040 --> 00:17:47,040
लग रहा है जो मैंने चर्चाएं देखी हैं तो मुख्य मुख्य्य विषय तो आप भी

258
00:17:47,040 --> 00:17:51,920
ईश्वर का वैदिक स्वरूप वही मान रहे हो जो हम मान रहे हैं।

259
00:17:51,920 --> 00:17:55,920
सर्वशक्तिमान आप भी मान रहे हो सर्वशक्तिमान ठीक है हम भी मान रहे हैं। मेरी आवाज

260
00:17:55,920 --> 00:17:59,920
आ रही थी कि कट गई थी? जी जी मेरी ठीक है। तो

261
00:17:59,920 --> 00:18:03,920
बात यही है। तो अगर हम वो भी मान रहे तो उसके अंदर अवतारवाद फिट नहीं हो रहा। जो कोई फिट कर दे तो

262
00:18:03,920 --> 00:18:07,920
हम मान ले। ठीक है? इसमें आपका पक्ष क्या है? वो एक बार स्पष्ट कर दो। उसके

263
00:18:07,920 --> 00:18:11,600
बाद फिर हम स्टेप बाय स्टेप शुरू करते हैं।

264
00:18:11,600 --> 00:18:15,920
ऐसा है कि दो पर्सेक्टिव से ईश्वर की व्याख्या

265
00:18:15,920 --> 00:18:20,000
है। एक कि वह सर्वव्यापक है, सर्वशक्तिमान

266
00:18:20,000 --> 00:18:24,320
है, अजन्मा है, अविनाशी है। ठीक है? और फिर दूसरी

267
00:18:24,320 --> 00:18:28,400
जो व्याख्या है कि वह प्रकट होता है भांति भांति के रूप धारण

268
00:18:28,400 --> 00:18:32,400
करता है या ऐसा करता है या वैसा करता है मतलब वो व्यवहारिक

269
00:18:32,400 --> 00:18:37,200
एक व्याख्या और है तो होता क्या है कि जो

270
00:18:37,200 --> 00:18:41,360
ईश्वर को लेकर के जितने भी दर्शन है या विचार है जैसे आर्य

271
00:18:41,360 --> 00:18:41,860
समाज

272
00:18:41,600 --> 00:18:45,760
और अभी हम अपनी बात करते हैं तो मैंने ये देखा है कि आर्य समाज कई

273
00:18:45,760 --> 00:18:50,160
जगह पर व्यवहारिक और पारमार्थिक दोनों चीजें मान लेता है मगर कहीं-कहीं

274
00:18:50,160 --> 00:18:54,160
पर बाउंड कर देता है पारमार्थिक के आधार पर व्यवहार की खंडन करने लगता

275
00:18:54,160 --> 00:18:58,240
है। इतनी सी बात इतनी सी बात जैसे कि

276
00:18:58,240 --> 00:19:02,960
फॉर एग्जांपल जैसे कि फॉर एग्जांपल आर्य समाज ये कहता है

277
00:19:02,960 --> 00:19:07,200
कि उसको आवश्यकता क्या है करने की?

278
00:19:07,200 --> 00:19:11,360
ठीक है? उस पर हम आएंगे बाद में आएंगे। ईश्वर नहीं मैं एक एग्जांपल

279
00:19:11,360 --> 00:19:15,440
के साथ में समझा दे रहा हूं। जैसे कि आवश्यकता क्या है? तो भाई ईश्वर को तो

280
00:19:15,440 --> 00:19:19,600
पेड़ों का रंग हरा करने की आवश्यकता नहीं है। पीला ही कर दे।

281
00:19:19,600 --> 00:19:23,760
पीला करने की आवश्यकता है। वैसे प्रमाण सहित उत्तर दूंगा। आवश्यकता आप भी मानेंगे। वैसे

282
00:19:23,760 --> 00:19:29,760
तो जी जी तो कहने का अर्थ ये है कि

283
00:19:30,080 --> 00:19:34,160
ईश्वर को आवश्यकता क्या है? ये कह करके वो जो है पारमार्थिक धरातल को

284
00:19:34,160 --> 00:19:38,160
आधार बना के और व्यवहारिक धरातल का खंडन कर देते हैं। जबकि

285
00:19:38,160 --> 00:19:42,160
ईश्वर के दोनों पर्सपेक्टिव है व्यवहार और परमार्थ। व्यवहार

286
00:19:42,160 --> 00:19:46,960
में सब कुछ कर सकता है। जब उस ईश्वर को हम जानते हैं तब परमार्थ की बात आती है।

287
00:19:46,960 --> 00:19:51,040
जी अब आप बताएं। ठीक है। एक बात मैं क्लेरिटी दे देता हूं

288
00:19:51,040 --> 00:19:55,280
यहां पे कि जब भी मैं ईश्वर की बात करूंगा तो व्यवहार में जिसे

289
00:19:55,280 --> 00:19:59,360
आप निराकार ईश्वर कहते हो, निराकार सर्व्यापक सृष्टि करता ईश्वर जिसे आप मानते हो

290
00:19:59,360 --> 00:20:03,600
व्यवहार में मैं जब भी ईश्वर शब्द बोलूंगा मैं हमेशा उसी ईश्वर की बात करूंगा।

291
00:20:03,600 --> 00:20:07,760
ठीक है? क्योंकि हम लोग उसी ईश्वर को ही मानते हैं। शायद आप उसे सगुण

292
00:20:07,760 --> 00:20:11,760
निराकार कहते हो। अब अब वो जो है प्रकट हो सकता है कि नहीं इस पर बात

293
00:20:11,760 --> 00:20:15,760
है। वो एक अलग विषय है। वो एक अलग विषय है। ठीक है? लेकिन जब मैं जब मैं

294
00:20:15,760 --> 00:20:19,760
परमार्थिक अगर मुझे परमार्थिक को मेरे को ले जाना होगा जिसे आप परमार्थिक

295
00:20:19,760 --> 00:20:23,920
कहते हो तब मैं अलग से शब्द प्रयोग कर दूं कि हां मैं परमार्थिक की बात कर रहा हूं आपके दृष्टिकोण

296
00:20:23,920 --> 00:20:28,080
से नहीं मेरे दृष्टिकोण से क्या है जो जिसे आप निराकार सगुण कहते

297
00:20:28,080 --> 00:20:32,240
हो वही मेरे लिए व्यवहारिक परमार्थिक वो सारा ईश्वर वही है ठीक है वो

298
00:20:32,240 --> 00:20:36,240
मतलब आपके अनुसार सगुण निराकार और निर्गुण निराकार में कोई अंतर

299
00:20:36,240 --> 00:20:40,320
नहीं है नहीं है नहीं है बिल्कुल एक ही है हम

300
00:20:40,320 --> 00:20:44,560
बिल्कुल बिल्कुल ठीक है इसके बारे में भी वैसे सत्यार्थ प्रकाश प्रश्न है

301
00:20:44,560 --> 00:20:45,360
और बाकी

302
00:20:45,360 --> 00:20:49,360
जो बात महर्षि अंध इसके विषय में इस पर मैं समझना चाहूंगा थोड़ा सा कि

303
00:20:49,360 --> 00:20:53,520
निर्गुण निराकार तो हो गया जो व्यवहार में नहीं आ सकता और सगुण निराकार

304
00:20:53,520 --> 00:20:57,760
हो गया जो व्यवहार में आ सकता है। इसमें क्या होता है ना इसमें केवल डिफरेंस आता है शब्दों

305
00:20:57,760 --> 00:21:01,920
में। ठीक है? अगर आप शास्त्रों को उठा के देखोगे तो शास्त्रों में अलग

306
00:21:01,920 --> 00:21:05,920
से कहीं ऐसा डिस्क्रिप्शन नहीं मिलता कि व्यवहारिक अलग है, परमार्थिक अलग है। इस टाइप से

307
00:21:05,920 --> 00:21:10,000
नहीं मिलता। शास्त्रों में वो लोह के लो के भाष्यों का अलग वो एक अलग

308
00:21:10,000 --> 00:21:14,080
बात है। कि किसी आचार्य ने अपने भाष्य में उसकी क्या व्याख्या कर रखी एक अलग विषय है। मूल

309
00:21:14,080 --> 00:21:18,880
रूप से शास्त्रों में ये नहीं मिलता। मूल रूप से शास्त्रों में मतलब आपका कहने का मतलब है जो

310
00:21:18,880 --> 00:21:23,120
मतलब जो आपका कहने का मतलब सगुण से पीछे कोई अल्टीमेट ट्रुथ है ही नहीं। सगुण ही अल्टीमेट

311
00:21:23,120 --> 00:21:27,360
ट्रुथ है। सगुण निराकार हूं क्या मैं बता देता हूं क्या? अब

312
00:21:27,360 --> 00:21:31,520
शास्त्रों में दो शब्द मिलते हैं सगुण और निर्गुण। ठीक है? अब होता क्या है?

313
00:21:31,520 --> 00:21:35,600
जब हम इसको समझेंगे तो हमें ये पता चलता है। इस पे जो मैं बोल रहा हूं इसपे मैंने आचार्य शंकर

314
00:21:35,600 --> 00:21:39,600
का भी पढ़ा हुआ है। सेम स्टेटमेंट्स। ठीक है? क्योंकि मैंने आचार्य शंकर के लगभग सारे उपनिषद

315
00:21:39,600 --> 00:21:43,680
भाष्य पढ़े हुए हैं। मैं एक मैं एक चीज कोट कर दूं निर्भय जी मैं एक

316
00:21:43,680 --> 00:21:47,760
चीज कोट कर दूं कि अगर हम लोग प्रमाण को ज्यादा बीच में

317
00:21:47,760 --> 00:21:52,720
लाएंगे चर्चा में तो फिर हमारी चर्चा का विषय परंपरा पे आ जाएगा।

318
00:21:52,720 --> 00:21:56,800
बिल्कुल परंपरा की बात करूंगा आज। उसकी अगर हम अगर हम स्टेटमेंट इस

319
00:21:56,800 --> 00:22:00,480
पे लाएंगे तो परंपरा पे जैसे आप मान लीजिए जैसे मान लीजिए मैं कोई बात

320
00:22:00,480 --> 00:22:04,480
बोल रहा हूं। आप कह रहे हो कि शंकराचार्य ने तो ये लिखा है। ठीक है? हम तो मैं

321
00:22:04,480 --> 00:22:08,560
कहूंगा शंकराचार्य का ग्रंथ आपको कहां से प्राप्त हुआ है? हम हम बोल

322
00:22:08,560 --> 00:22:12,560
दूंगा आपके वहां से प्राप्त हुआ है। तो क्या उन्होंने जो व्याख्या बताई

323
00:22:12,560 --> 00:22:17,040
है आपको अपने मुंह से जो व्याख्या आप कह रहे हो क्या वो व्याख्या

324
00:22:17,040 --> 00:22:21,200
जो पूरी मटके यहां से जो प्रकाशित होती है वो व्याख्या अगर आप स्वीकार

325
00:22:21,200 --> 00:22:25,360
करते हो कि वो वही व्याख्या है तो मैं भी उसी की बात कर रहा हूं। नहीं तो उसमें भी जब जब

326
00:22:25,360 --> 00:22:29,600
जो व्यक्ति जो लिखता है वो उसमें क्या समझाना चाह रहा है तो डायरेक्टली वर्बली

327
00:22:29,600 --> 00:22:33,760
जो उसका अगर भाष्य अगर मैं कहूंगा मैं उनका मैं उनका शिष्य हूं और मैं उनसे जाकर

328
00:22:33,760 --> 00:22:37,840
के समझाऊं इस बात का उन्होंने ये मतलब लिखा है तो फिर आपको मेरी बात माननी होगी क्योंकि

329
00:22:37,840 --> 00:22:42,080
मैं उनका शिष्य हूं। ठीक है चलिए मैं चलिए मैं उस विषय में आपकी बात मान लूंगा।

330
00:22:42,080 --> 00:22:46,320
अगर मैंने कोई प्रमाण आपको आचार्य शंकर का दिखाया। ठीक है? नहीं आचार्य शंकर

331
00:22:46,320 --> 00:22:50,400
का नहीं फिर आचार्य शंकर आचार्य शंकर का ही नहीं जैसे हम शास्त्रों को बार-बार

332
00:22:50,400 --> 00:22:54,400
जैसे बीच में लाए मुझे ऐसा लगता था कि रैशन वाली बात होती है

333
00:22:54,400 --> 00:22:58,560
वरना विषय परंपरा में चला जाएगा पूरा बदल ही जाएगा पूरा आपको मैं आपको बता देता हूं

334
00:22:58,560 --> 00:23:02,640
देखिए मैं आपको बता देता हूं होगा क्या हम तर्क वितर्क पे ही बात करेंगे ठीक है उसमें

335
00:23:02,640 --> 00:23:07,040
समस्या जब जब शब्द प्रमाण की बात आएगी ठीक है उसमें दो चीज होगा

336
00:23:07,040 --> 00:23:11,120
या तो मैं चाहूं तो अपने अपनी परंपरा भी सिद्ध कर सकता हूं चाहूं तो अभी सिद्ध कर दूं बड़ी

337
00:23:11,120 --> 00:23:15,360
आराम से कोई बड़ी बात नहीं है ठीक है लेकिन मैंने इसको बाद के लिए छोड़ा हुआ है कि इसको मैं लास्ट में करूंगा।

338
00:23:15,360 --> 00:23:15,860
मुझे

339
00:23:15,520 --> 00:23:19,520
कोई जल्दी नहीं है क्योंकि मुझे पता है कि मुझे सिद्ध करना है। आज आज

340
00:23:19,520 --> 00:23:23,760
जो है मैंने जैसे अभी आपने सुना होगा मुझे जाना भी है। देखिए मुझे मुश्किल से पांच मिनट लगे हैं परंपरा

341
00:23:23,760 --> 00:23:27,760
सिद्ध करने में। अगर आप चाहे आपकी परमिशन से ही करूंगा मैं। मुझे कोई अगर

342
00:23:27,760 --> 00:23:30,560
आप नहीं मानेंगे मुझे कोई दिक्कत नहीं है। ठीक है?

343
00:23:30,560 --> 00:23:34,560
जो मैं आपको प्रमाण दिखाऊंगा शब्द प्रमाण वो मैं आप ही के आचार्य को दिखाऊंगा। तो

344
00:23:34,560 --> 00:23:38,800
कोई मतलब भेद भी नहीं होगा। जैसे परंपरा की बात कब आएगी? जब मैं बोलूंगा कि भाई आग नहीं

345
00:23:38,800 --> 00:23:42,960
यहां पे आग का मतलब पानी है। इंद्र का मतलब ईश्वर नहीं। मतलब बिजली है तो आप बोलेंगे नहीं

346
00:23:42,960 --> 00:23:47,200
मेरे आचार्य तो कुछ और कह रहे हैं तो मैं आप ही के आचार्य का दिखाऊंगा कोई समस्या नहीं है इसमें ठीक है आचार्य

347
00:23:47,200 --> 00:23:51,280
का दिखाएंगे पर देखो ऐसा है जैसे कि बैरन

348
00:23:51,280 --> 00:23:55,680
बांस की बांसुरिया गिरजा मुख चूमत बनवारी ये किसी ने बात कही

349
00:23:55,680 --> 00:24:00,000
अब इसमें आचार्य अगर वो किसी का अगर आप मान लो कि ये मेरे आचार्य

350
00:24:00,000 --> 00:24:04,000
है जिन्होंने लिखा बैरन बांस की बांसुरिया गिरजा मुख चूमत बनवारी ठीक है

351
00:24:04,000 --> 00:24:08,080
आपने कहा ये आपके आचार्य ने लिखा है अब इसमें गिरजा मुख चूमत

352
00:24:08,080 --> 00:24:12,480
बनवारी मतलब गिरजा यानी पार्वती सी मुख चूम रही है बनवारी

353
00:24:12,480 --> 00:24:16,640
का। पार्वती इसका अर्थ निकल रहा है कि मुख चूम रही है पार्वती।

354
00:24:16,640 --> 00:24:20,640
अब आप कहोगे देखिए आपके आचार्य ने लिखा है कि पार्वती माता ने

355
00:24:20,640 --> 00:24:24,800
भगवान श्री कृष्ण का मुख चूमा। ठीक है? तो मैं बताऊंगा

356
00:24:24,800 --> 00:24:28,800
कि भाई मेरे आचार्य ने तो यहां पर ये कहा था कि जो गोपियां है वो कह रही

357
00:24:28,800 --> 00:24:32,880
है बैरन बांस की बांसुरिया यानी जो बांसुरी है पांच

358
00:24:32,880 --> 00:24:36,960
की ये बैरी है मेरी और ये गिर जा। ये पार्वती

359
00:24:36,960 --> 00:24:40,960
नहीं है गिरजा। यह गिर जाए जो बनवारी का मुख चूम रही है।

360
00:24:40,960 --> 00:24:44,960
बनवारी का जो मुख चूम रही है तो इसलिए इसलिए वहां पे मेरी

361
00:24:44,960 --> 00:24:45,600
बात को मानना

362
00:24:45,600 --> 00:24:49,840
पड़ेगा क्योंकि क्योंकि मैं उनका शिष्य हूं। मैंने उनकी बात को उनसे

363
00:24:49,840 --> 00:24:53,360
समझा है। कोई इशू नहीं है। जी मुझे कोई इशू नहीं

364
00:24:53,360 --> 00:24:57,520
है। आप ही मानिएगा शब्द पर मैं इतना स्पष्ट दूंगा कि उसमें

365
00:24:57,520 --> 00:25:02,320
से एक इंच का भी अंतर नहीं होगा। ना आप ही कर पाए। मतलब अभी कर ही नहीं पाएंगे। जो चीज लिखी

366
00:25:02,320 --> 00:25:06,800
आप अपनी बात शुरू करिए फिर देखते हैं क्योंकि मैं तो अभी मैं तो अभी

367
00:25:06,800 --> 00:25:11,280
मतलब मैं अपने शब्द प्रमाण इत्यादि को ले नहीं पहुंचा हूं। हालांकि ज्यादा

368
00:25:11,280 --> 00:25:15,360
नहीं अगर कोई अगर कोई बात आएगी तो फिर मैं निकालूंगा

369
00:25:15,360 --> 00:25:19,360
टाइम लगेगा। ठीक है। मैं तो अभी जो है आप जो तर्क वगैरह करते हैं ना

370
00:25:19,360 --> 00:25:23,520
अवतार के विरोध में उनको ही सोच करके आया था। मैंने मतलब शब्द

371
00:25:23,520 --> 00:25:27,520
वगैरह शब्द प्रमाण वगैरह मुझे लेने पड़ेंगे निकालने पड़ेंगे तो थोड़ा अवस्थित हो सकता है

372
00:25:27,520 --> 00:25:31,760
और कोई बात नहीं। कोई कोई इशू नहीं कोई इशू नहीं मैं तार्किक चर्चा ही रखूंगा शब्द प्रमाण

373
00:25:31,760 --> 00:25:35,920
जाऊंगा भी नहीं उसकी आप निश्चिंत रहिए ठीक है अब आते हैं बात कि जैसा मैंने

374
00:25:35,920 --> 00:25:39,920
बताया कि जब भी मैं ईश्वर की बात करूंगा तो मैं आपके वो जो निराकार सगुण ईश्वर है उसकी बात

375
00:25:39,920 --> 00:25:40,560
करूंगा ठीक है

376
00:25:40,560 --> 00:25:44,560
अब आते हैं अवतार वाले विषय पर तो अवतार वाले विषय में जैसा कि मैंने

377
00:25:44,560 --> 00:25:48,560
आपको बता ही दिया है कि हम जैसे मैंने बताया कि अवतार फिट नहीं होता इसीलिए ठीक

378
00:25:48,560 --> 00:25:52,640
है अब अवतारवाद की चर्चा हम शुरू करते हैं सबसे पहले तो एक

379
00:25:52,640 --> 00:25:56,640
तो अब ये करना है कि मैं अवतार मान नहीं रहा हूं क्योंकि मैं जो ईश्वर की व्याख्या मान रहा हूं उसके

380
00:25:56,640 --> 00:26:00,720
अकॉर्डिंग फिट नहीं हो रहा अब अवतार मानते हो आपके अकॉर्डिंग वहां पे फिट हो रहा है। अगर मैं सही समझ पा रहा हूं

381
00:26:00,720 --> 00:26:04,720
तो मुझे लग रहा है कि स्वरूप में कोई विशेष मतभेद नहीं है। आप क्योंकि व्यवहारिक

382
00:26:04,720 --> 00:26:08,800
वाले को आप स्वीकार कर रहे हो। व्यवहारिक वाले को मैं मैं मान ही रहा हूं। उसमें कोई इशू नहीं है। आप उसी

383
00:26:08,800 --> 00:26:12,800
व्यवहारिक के द्वारा अवतार लेना सिद्ध कर रहे हो। मैं उसी व्यवहारिक के द्वारा पूछ रहा हूं

384
00:26:12,800 --> 00:26:16,800
कि कैसे सिद्ध हो रहा है। मुझे करवा दो मैं मान लूंगा। मेरा इतना ही आग्रह है। ठीक है। अब उसमें

385
00:26:16,800 --> 00:26:20,880
पॉइंट ये है कि अब सिद्ध करना है आपको। अच्छा सिद्ध करने से

386
00:26:20,880 --> 00:26:25,200
पहले जो अवतार सिद्धि का पॉइंट आता है वो करने से पहले मुझे थोड़ा अवतारवाद

387
00:26:25,200 --> 00:26:29,280
की धारणा स्पष्ट कर दीजिए कि अवतार से मैं समझूं क्या जिसे आप सिद्ध करना चाहते

388
00:26:29,280 --> 00:26:33,280
हैं मुझे पता हो कि वो धारणा है क्या वैष्णव भी है उसी में बहुत सारे मत

389
00:26:33,280 --> 00:26:37,520
मतांतर है जिस प्रकार एक परम शक्ति जिस प्रकार एक परम

390
00:26:37,520 --> 00:26:41,840
शक्ति जो है जीव जगत और जगदीश्वर बनके प्रकट

391
00:26:41,840 --> 00:26:45,840
होती है सृष्टि का निर्माण करती है व्यवहारिक जगत का निर्माण

392
00:26:45,840 --> 00:26:50,000
होता है जिस प्रकार तो वही शक्ति अपने

393
00:26:50,000 --> 00:26:54,000
जो अचिंत शक्ति है उसकी उसके द्वारा अपने आप को मनुष्य

394
00:26:54,000 --> 00:26:56,960
की आंखों का विषय बनाती है।

395
00:26:56,960 --> 00:27:01,760
यही उसका अवतार होता है उस शक्ति का। कैसे कर मतलब कैसे?

396
00:27:01,760 --> 00:27:05,920
फॉर एग्जांपल जैसे कि अ

397
00:27:05,920 --> 00:27:10,560
जैसे कि आपने आजकल एप्लीकेशनेशंस वगैरह देखी होंगी।

398
00:27:10,560 --> 00:27:14,640
क्या कहते हैं ये कंप्यूटर इत्यादि में आती है जो एक्सिस बैंक की

399
00:27:14,640 --> 00:27:18,960
होती है जी या या फिर ये रेलवे इंक्वायरी

400
00:27:18,960 --> 00:27:23,600
की भी होती है। हेलो आई एम ईला करके आती है। है ना?

401
00:27:23,600 --> 00:27:28,000
तो ये एप्लीकेशन क्या है? ये पूरे जगत में फैली हुई है इंटरनेट के द्वारा।

402
00:27:28,000 --> 00:27:32,240
उसमें जो इंफॉर्मेशन दे रही है ना आपको वो जो जो एक कार्टून

403
00:27:32,240 --> 00:27:36,320
कररेक्टर आता है और आपसे बात करता है वो कररेक्टर। तो

404
00:27:36,320 --> 00:27:40,320
वो कहने का तो ये है कि वो केवल कंप्यूटर की किसी एक जगह पे दिखाई

405
00:27:40,320 --> 00:27:44,480
दे रहा है। है ना? मगर वो मगर उसमें वो

406
00:27:44,480 --> 00:27:48,480
सारी क्वालिटीज हैं। वो सारी क्वालिटीज है जो पूरे जगत में

407
00:27:48,480 --> 00:27:52,480
है। मतलब आप उसको कहोगे कि जो इस समय जो इंफॉर्मेशन अमेरिका में हो तो वो वहां पर दे

408
00:27:52,480 --> 00:27:56,480
देगी। मतलब जो भी वो रिलेटेड जो वो सिस्टम जो काम कर सकता है वो सारा

409
00:27:56,480 --> 00:28:00,720
काम वो लीला से कहोगे तो वो कर देगी। यही उस सिस्टम का अवतार

410
00:28:00,720 --> 00:28:04,800
है। ये कैसे होता है? थोड़ा सा इसको यही धारणा

411
00:28:04,800 --> 00:28:09,040
जो है ना ये कैसे होता है? इसको थोड़ा स्पष्ट कर दीजिए। दो

412
00:28:09,040 --> 00:28:12,320
तीन मैंने शब्द सुने हुए हैं आपसे कि

413
00:28:12,320 --> 00:28:16,560
एक तो आप बोलते हो कि चीरा लगा देता है जैसे पर्दे में कुछ दिखता है एक वो बोलते हो

414
00:28:16,560 --> 00:28:20,640
अच्छा एक बार आपने बोला था कि स्वयं का सृजन कर लेता है एक बार आपने

415
00:28:20,640 --> 00:28:24,720
बोला था शरीर धारण कर लेता है तो मुझे थोड़ा स्पष्ट कर दीजिए कि ये जो आप उसको रूप

416
00:28:24,720 --> 00:28:28,720
का विषय कह रहे हो तो वो रूप का विषय कैसे बन रहा है क्या

417
00:28:28,720 --> 00:28:33,040
उसमें जैसे प्रकृति ही

418
00:28:33,040 --> 00:28:37,120
जैसे जैसे जैसे वो पृथ्वी सूर्य इत्यादि बनाते

419
00:28:37,120 --> 00:28:41,360
समय लोगों के व्यवहार का विषय बनता है ना वहां धक्का

420
00:28:41,360 --> 00:28:45,440
का लगता है ना मिट्टी उठाई गई दिखाई नहीं देता लेकिन लेकिन

421
00:28:45,440 --> 00:28:49,520
दिखाई नहीं देता मगर मगर जो स्पर्श इंद्रिय है इत्यादि का तो विषय बनता है ना

422
00:28:49,520 --> 00:28:50,800
वहां

423
00:28:50,800 --> 00:28:54,800
तभी तो मिट्टी एक कौन बनता है स्पर्श का विषय ईश्वर स्पर्श

424
00:28:54,800 --> 00:28:58,800
का विषय बनता है ईश्वर स्पर्श का विषय बनता है तो

425
00:28:58,800 --> 00:29:02,800
कौन मेरा फोन है ये मेरा फोन है इसको मैंने टच किया तो अभी

426
00:29:02,800 --> 00:29:07,040
मैं ईश्वर को टच कर रहा हूं कि मैं प्रकृति को टच कर रहा हूं चलो

427
00:29:07,040 --> 00:29:11,760
प्रकृति प्रकृति का विषय बनता है प्रकृति बनती है प्रकृति

428
00:29:11,760 --> 00:29:15,760
स्पर्श का विषय बनती है। प्रकृति स्पर्श का विषय बनती है। यानी कि प्रकृति

429
00:29:15,760 --> 00:29:19,920
अलग है। और यानी कि प्रकृति अलग है। जो ये जो मिट्टी इत्यादि कण

430
00:29:19,920 --> 00:29:24,000
है ये अलग है। मैंने कब कहा? तो

431
00:29:24,000 --> 00:29:28,000
तो मिट्टी इत्यादि कण प्रकृति है या प्रकृति वो है जो जो

432
00:29:28,000 --> 00:29:32,080
क्या कहते हैं उसको धक्का दे रही है। आपने बोला आपने बोला कि जब जैसे जब जैसे

433
00:29:32,080 --> 00:29:36,160
मान लो पृथ्वी बन रही है। ठीक है? मैं पृथ्वी पे चल रहा हूं। आपने बोला ईश्वर का स्पर्श

434
00:29:36,160 --> 00:29:40,320
हुआ। मिट्टी के साथ हमारा स्पर्श मिट्टी के साथ तो मैं कह तो रहा हूं कि

435
00:29:40,320 --> 00:29:44,320
आप प्रमाण मैं वहां पर कह तो रहा हूं कि ईश्वर का स्पर्श

436
00:29:44,320 --> 00:29:48,320
नहीं मान रहे तो किसका मान रहे आपने कहा प्रकृति का तो जब प्रकृति का स्पर्श मान

437
00:29:48,320 --> 00:29:52,480
रहे हो यानी कि मिट्टी अलग है मिट्टी किससे

438
00:29:52,480 --> 00:29:57,520
बनी है देखो प्रकृति वो मूलभूत तत्व है जिससे सारा ब्रह्मांड बना हुआ है मटेरियल कॉज ऑफ द यूनिवर्स

439
00:29:57,520 --> 00:30:01,840
ठीक है उसी से बना हुआ है ये प्रकृति है प्रकृति के अंदर है स्पर्श गुण

440
00:30:01,840 --> 00:30:06,640
तो आप जो कह रहे हो कि मैंने किसे टच किया मैंने ईश्वर को टच किया या मैंने प्रकृति को टच

441
00:30:06,640 --> 00:30:08,720
तो मैं वही तो कह रहा हूं कि जैसे

442
00:30:08,720 --> 00:30:12,800
मिट्टी है। मिट्टी के कण चारों ओर फैले हुए हैं। अब ये प्रकृति तो फैली हुई

443
00:30:12,800 --> 00:30:16,960
है। हम अब प्रकृति खुद से खुद

444
00:30:16,960 --> 00:30:21,440
से होती है इकट्ठा। यानी मिट्टी कण खुद से इकट्ठा होते हैं। ईश्वर का धक्का

445
00:30:21,440 --> 00:30:25,680
ईश्वर है। उसका निमित्त ईश्वर है। तो ईश्वर का धक्का लगा ना।

446
00:30:25,680 --> 00:30:29,760
हम ठीक है। तो ईश्वर का धक्का लगा तो जैसे ईश्वर धक्के का

447
00:30:29,760 --> 00:30:33,760
विषय बन रहा है ऐसे ही ऐसे ही ईश्वर नेत्रों का विषय

448
00:30:33,760 --> 00:30:37,760
बनता है। कैसे बनता है? तो कैसे धक्के का

449
00:30:37,760 --> 00:30:41,760
विषय कैसे बनता है? अपने बल से बनता है। अपने

450
00:30:41,760 --> 00:30:46,960
बल से बनता है। हम तो आंखों का विषय कैसे बनता है?

451
00:30:46,960 --> 00:30:50,960
अपने बल से आपने कहा ना बल से तो बल से तो ये

452
00:30:50,960 --> 00:30:53,120
वस्तु यहां से यहां जाएगी ना। आंखों का विषय

453
00:30:53,120 --> 00:30:57,200
कैसे बन रहा है? बल से बल से वो धक्के का विषय बना ना

454
00:30:57,200 --> 00:31:01,440
स्पर्श का विषय बना ना पृथ्वी वो मिट्टी है पॉइंट समझो

455
00:31:01,440 --> 00:31:05,600
आप पॉइंट समझो जैसे ईश्वर द्वारा वेदों का ज्ञान देना आप

456
00:31:05,600 --> 00:31:09,840
भी मानते हैं मैं भी मानता हूं सिद्ध है ठीक है ईश्वर द्वारा सृष्टि निर्माण करना

457
00:31:09,840 --> 00:31:13,840
सुनिए पहले पूरी बात सुनिए जी जी बताइए एक बार सुनिए तो सही पूरी बात तो सुनिए

458
00:31:13,840 --> 00:31:17,840
बताइए ईश्वर द्वारा सृष्टि निर्माण करना ठीक है आप भी मानते हैं मैं ही मानता हूं

459
00:31:17,840 --> 00:31:21,840
ये भी सिद्ध है साध्य क्या है साध्य ये है

460
00:31:21,840 --> 00:31:26,000
कि ईश्वर जो है वो आंखों का विषय बन जाता है। यह साध्य है। अब पॉइंट

461
00:31:26,000 --> 00:31:30,240
यह है। आप मुझे क्या कह रहे हो? आप कह रहे हो क्योंकि यह यह कर

462
00:31:30,240 --> 00:31:34,320
ले रहा है इसलिए यह भी कर लेगा। वो तो ऑलरेडी वो उसे

463
00:31:34,320 --> 00:31:38,400
मैं बता रहा हूं ना। मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं। पहले सुनिए मैं आपकी

464
00:31:38,400 --> 00:31:42,480
बात सुनूंगा। एक बार मैं पूरा सुनिए सुनाइए। सुनाइए सुनिए। अब देखिए पॉइंट ये है

465
00:31:42,480 --> 00:31:46,640
कि अब जो कि वो पहले से सिद्ध है। उसमें तो कोई मतभेद है ही नहीं। इस साध्य

466
00:31:46,640 --> 00:31:50,800
को सिद्ध करना है तो इस साध्य को सिद्ध करने के लिए हेतु देना होगा। ठीक है? खैर

467
00:31:50,800 --> 00:31:54,800
वैसे भी अभी हम हेतु पे बात नहीं कर रहे। अभी हम खाली इस बात करेंगे धारणा

468
00:31:54,800 --> 00:31:59,120
की मैं बोल दूं अब जी जी जी धारणा मुझे स्पष्ट जैसे

469
00:31:59,120 --> 00:32:03,200
जैसे वहां पर एक अचिंत शक्ति काम कर रही है कि वो

470
00:32:03,200 --> 00:32:07,440
जो है धक्के का विषय नहीं था धक्के का विषय बन रहा है एक अचिंत शक्ति को आपने

471
00:32:07,440 --> 00:32:11,600
माना ठीक है तो वैसे ही मैं बता रहा हूं कि यहां पे भी अचिंत शक्ति को मान

472
00:32:11,600 --> 00:32:12,100
लीजिए

473
00:32:12,080 --> 00:32:16,160
तो अचिंत शक्ति से आंखों का विषय बन रहा है फिर वहां आप कैसे क्यों पूछ रहे हो जब वहां अच

474
00:32:16,160 --> 00:32:20,320
यही मैंने कहा था ना कि कई जगह आर्य समाज व्यवहार और परमार्थ दोनों

475
00:32:20,320 --> 00:32:24,320
में चीजों को मान लेता है कई एक एक मिनट

476
00:32:24,320 --> 00:32:28,400
एक मिनट कई बार आर्य समाज क्या करता है? पारमार्थिक धरातल के आधार

477
00:32:28,400 --> 00:32:32,400
पे व्यवहारिक चीजों का खंडन करता है। तो मैंने अभी आपने जैसे

478
00:32:32,400 --> 00:32:36,480
शुरुआत में आपने तो ये मना ही कर दिया कि वो ईश्वर नहीं प्रकृति कर रहा है। जब मैंने उसको थोड़ा

479
00:32:36,480 --> 00:32:40,480
खोला तो आपने इसमें ना उसमें फॉल्ट है। उसमें फॉल्ट

480
00:32:40,480 --> 00:32:44,560
ये है जब पहले आपने बोला एक मिनट मैं पूरा कर एक मिनट मैं

481
00:32:44,560 --> 00:32:48,720
बताऊंगा आपको बोलने के लिए। हम तो पहले तो आपने मना ही कर दिया ईश्वर नहीं ईश्वर

482
00:32:48,720 --> 00:32:52,960
नहीं होता है फिर आपने माना है तो मान लिया अच्छी बात है मगर उसके बाद जब आप जब

483
00:32:52,960 --> 00:32:57,120
आप उसका धक्के का विषय बनना और वहां पे ये स्वीकार

484
00:32:57,120 --> 00:33:01,120
कर रहे हो कि उसकी एक अचिंत शक्ति होती है उसको समझाया जा ही नहीं सकता है अचिंत शक्ति के

485
00:33:01,120 --> 00:33:05,120
द्वारा ही वो ये कर रहा है जब आपने एक जगह अचिंत शक्ति मानी

486
00:33:05,120 --> 00:33:09,200
है तो दूसरी जगह अचिंत शक्ति मानने में क्या दिक्कत है यही मेरा कहना है अब

487
00:33:09,200 --> 00:33:13,280
बात आएगी अगर प्रमाण की तो फिर प्रमाण से चले जाएंगे परंपरा

488
00:33:13,280 --> 00:33:17,440
पे ये दिक्कत आता हूं उसप आता हूं देखिए अब मैं आपको बताता हूं क्या एफर्ट

489
00:33:17,440 --> 00:33:21,440
है। पहले जब आपने बोला था ना स्पर्श वाला विषय तब आपने पहले यह शब्द प्रयोग किए थे

490
00:33:21,440 --> 00:33:25,600
कि मैं ईश्वर का स्पर्श कर रहा हूं। मैंने उस पे विरोध किया था। मैंने कहा था भैया हम ईश्वर

491
00:33:25,600 --> 00:33:27,120
पे विरोध ईश्वर का स्पर्श नहीं कर

492
00:33:27,120 --> 00:33:31,120
रहे हैं। हां ईश्वर अपने बल से ये तो एक अलग व्याख्या हो जाएगी कि आप आप

493
00:33:31,120 --> 00:33:36,000
ये मानते हैं कि नहीं आपका फोन जो है वो ईश्वर है कि नहीं। वो एक अलग व्याख्या हो जाएगी।

494
00:33:36,000 --> 00:33:40,080
मैं वही कह रहा हूं। वो एक अलग व्याख्या वो एक अलग कि थोड़ा शब्दों का शब्दों

495
00:33:40,080 --> 00:33:44,320
का उसमें ऊपर नीचे था। बाकी यह नहीं कि मैं यह कह रहा हूं क्योंकि अगर अगर मेरी यह धारणा

496
00:33:44,320 --> 00:33:48,320
यह होती कि ईश्वर निमित्त नहीं है तो मैं इस बात को बोलता ही नहीं। ठीक है? तो

497
00:33:48,320 --> 00:33:52,480
उसमें शब्दों का थोड़ा ऊपर नीचे हेरफेर हो सकता है। बाकी अब नहीं शब्दों का जरा

498
00:33:52,480 --> 00:33:56,480
मुझे समझाइए जब मैंने कहा जब मैंने कहा कि

499
00:33:56,480 --> 00:34:00,480
ईश्वर जो है धक्के का विषय बनता है प्रकृति के लिए। तो आपने कहा

500
00:34:00,480 --> 00:34:04,560
कि नहीं प्रकृति धक्के का विषय बनती है। फिर मैंने पूछा प्रकृति तो मिट्टी है। दोनों में अंतर

501
00:34:04,560 --> 00:34:08,640
है। दोनों में अंतर है। दोनों में अंतर है। दोनों में अंतर ये है

502
00:34:08,640 --> 00:34:12,960
कि एक होता है कि वस्तु को मैं स्पर्श कर रहा हूं। ठीक है? जैसे

503
00:34:12,960 --> 00:34:17,040
मैंने चुंबक को स्पर्श किया। क्योंकि उसमें स्पर्श गुण है। इसलिए मैंने

504
00:34:17,040 --> 00:34:21,040
उसको स्पर्श किया। लेकिन जब चुंबक किसी लोहे की वस्तु को आकर्षित

505
00:34:21,040 --> 00:34:25,120
करता है। ठीक है? वो उसे अपने बल से आकर्षित करता है। वो उसे स्पर्श

506
00:34:25,120 --> 00:34:29,120
नहीं करता। वो जब वस्तु आके लोहे की क्लिप उसकी चिपक जाती है तब वो स्पर्श होता

507
00:34:29,120 --> 00:34:33,120
है उससे। ठीक है? तो दोनों में बात नहीं है। सुनिए जो टॉपिक है

508
00:34:33,120 --> 00:34:37,120
वो चेंज हो रहा है। मैं बता रहा हूं क्या है। बात ये है कि वहां पे प्रकृति

509
00:34:37,120 --> 00:34:41,280
ने मिट्टी को धक्का लगाया वो वो छू के लगाया या बिना छुए लगाया?

510
00:34:41,280 --> 00:34:42,160
प्रकृति ने लगाया

511
00:34:42,160 --> 00:34:46,240
कि ईश्वर ने लगाया? तो आपने मना किया ईश्वर ने नहीं प्रकृति ने लगाया। तो मैंने कहा

512
00:34:46,240 --> 00:34:50,320
प्रकृति तो स्वयं मिट्टी है। तब आपने माना कि हां ईश्वर ने लगाया। आपने ये

513
00:34:50,320 --> 00:34:54,480
बोला था कि आपने ये बोला था कि हमने ईश्वर को छुआ तब मैंने उस विरोध किया था।

514
00:34:54,480 --> 00:34:58,720
मैंने हमने नहीं कहा मैंने कहा सूर्य चंद्रमा इत्यादि बनाते समय वो

515
00:34:58,720 --> 00:35:02,720
स्पर्श का विषय बनता है उनके लिए मिट्टी के कणों के लिए वही तो कह रहा हूं मैं वही कह रहा हूं

516
00:35:02,720 --> 00:35:06,800
कि ये जो बात है तो आपको आपको वहां पे ये कहना चाहिए था आपको वहां पे

517
00:35:06,800 --> 00:35:10,800
ये कहना चाहिए था कि वो स्पर्श का विषय नहीं वो धक्के का विषय बनता है या आकर्षण

518
00:35:10,800 --> 00:35:16,080
का विषय बनता है या व्यवहार का विषय बनता है उसमें बल है बल का एक

519
00:35:16,080 --> 00:35:20,480
आपका खिंचाव का मगर आपने तो मना ही कर दिया ना कि ईश्वर नहीं वहां पर प्रकृति

520
00:35:20,480 --> 00:35:24,480
प्रकृति जो है वो काम कर रही है लेकिन बोला कि नहीं बोला मैंने ये बात बोला ईश्वर निमित्त

521
00:35:24,480 --> 00:35:28,640
कारण है सृष्टि का बोला ना ये बात जब मैंने आपको ये रखा ना कि

522
00:35:28,640 --> 00:35:32,640
भाई मिट्टी जो है मिट्टी तो स्वयं प्रकृति तो क्या अलग से प्रकृति आ

523
00:35:32,640 --> 00:35:36,800
के उसमें काम कर रही मिट्टी में तब आपने कहा इस टॉपिक को मैं बड़ा आराम

524
00:35:36,800 --> 00:35:40,880
से स्ट्रीट लाइन कर देता हूं आपने जब पहले बोला तो मुझे ये समझ में आया कि आप ये बोल रहे हो

525
00:35:40,880 --> 00:35:45,440
कि मैंने ईश्वर को छुआ तब मैंने इसका विरोध किया लेकिन जब आपने मैंने मैंने

526
00:35:45,440 --> 00:35:49,440
मैंने मेरा शब्द तो यूज़ ही नहीं किया। खैर चलिए आगे चलते हैं। बताइए आगे।

527
00:35:49,440 --> 00:35:53,600
अब आते हैं अब आगे अब जैसे बात ये है कि जैसे मैंने वो चुंबक वाले का उदाहरण

528
00:35:53,600 --> 00:35:54,160
दिया। अब पॉइंट

529
00:35:54,160 --> 00:35:58,240
इसके अंदर ये आता है कि अभी खाली हम हेतु पे बात ही नहीं कर रहे हैं। अभी हम जा रहे हैं

530
00:35:58,240 --> 00:36:02,320
इसके ऊपर किसके धारणा के ऊपर ठीक है। अवतारवाद की धारणा क्या है? अब धारणा

531
00:36:02,320 --> 00:36:06,640
में हमें यह समझना है कि कोई वस्तु मेरी आंखों का विषय बन रही है।

532
00:36:06,640 --> 00:36:11,280
अगर कोई वस्तु मेरी आंखों का विषय बन रही है अर्थात उसके अंदर रूप गुण है।

533
00:36:11,280 --> 00:36:15,360
रूप गुण है तभी तो वो आंखों का विषय बन रही है। अच्छा रूप गुण जो

534
00:36:15,360 --> 00:36:19,520
हमें पता है वो तो रूप गुण जिसमें है वो तो प्रकृति में है।

535
00:36:19,520 --> 00:36:23,520
जैसे सारा ब्रह्मांड। ठीक है? प्रकृति से बना हुआ है। इसके अंदर रूप गुण है। हम इसे

536
00:36:23,520 --> 00:36:27,520
आंखों से देख भी पाते हैं। ठीक है? तो पॉइंट यह है कि अब मुझे

537
00:36:27,520 --> 00:36:31,520
थोड़ा सा यह समझा दीजिए क्योंकि अभी मैं धारणा पे ही हूं। अभी मैं समझ रहा हूं कि अवतारवाद है क्या?

538
00:36:31,520 --> 00:36:35,600
ठीक है? यह जो रूप गुण है यह ईश्वर के अंदर आप मान रहे हो। निराकार

539
00:36:35,600 --> 00:36:39,600
सगुण ईश्वर के अंदर रूप गुण मान रहे हो। या फिर आप यह कह रहे हो

540
00:36:39,600 --> 00:36:43,600
कि ईश्वर क्या करता है? स्वयं की रचना कर लेता है। स्वयं का सृजन कर लेता है। या फिर आप

541
00:36:43,600 --> 00:36:47,760
ये कह रहे हो कि ईश्वर ये जिस प्रकृति में रूप गुण है उसी प्रकृति से अपने लिए शरीर

542
00:36:47,760 --> 00:36:53,760
निर्मित करता है। आप ये कह रहे हो। क्या कह रहे हो? थोड़ा सा इसको स्पष्ट कर दो।

543
00:36:54,240 --> 00:36:58,880
जो परम तत्व है वो ऐसा प्रभाव उत्पन्न करता है

544
00:36:58,880 --> 00:37:03,040
प्रकृति के अंदर एक जगह पर जहां पर आप जो

545
00:37:03,040 --> 00:37:07,360
है प्रकृति की जो बाकी चीजें दिख रही है वो ना दिख के जहां

546
00:37:07,360 --> 00:37:11,360
प्रकृति ना दिखे जहां जो एक तरीके से

547
00:37:11,360 --> 00:37:15,440
जो सत्य का वो परम तत्व है मतलब एक तरीके से वो ऐसा प्रभाव

548
00:37:15,440 --> 00:37:19,760
उत्पन्न करे जिससे कि आपकी आंखें जो उसके आरपार देख सकती है प्रकृति

549
00:37:19,760 --> 00:37:23,920
को वो आरपार ना देख के एक तत्व आपको बीच में टकरा जाए

550
00:37:23,920 --> 00:37:26,560
वहीं से आपको जो है उसके दर्शन प्राप्त हो जाए तो

551
00:37:26,560 --> 00:37:31,120
वो ऐसा तभी संभव है ना जब संयोग होगा किसके साथ

552
00:37:31,120 --> 00:37:35,360
जैसे समझाता हूं जैसे घर में धूल मिट्टी

553
00:37:35,360 --> 00:37:39,360
होती है नॉर्मली आंखों से नहीं दिखती झाड़ू मारते हैं तो धूल

554
00:37:39,360 --> 00:37:43,360
इकट्ठा हो जाता है ना थोड़ा सा तब दिखता है क्यों दिखा कारण ये है कि अभी वो

555
00:37:43,360 --> 00:37:47,680
फैला हुआ है बिखरा हुआ है हमने उसको आपस में इकट्ठा कर दिया झाड़ू मार के तो क्या हुआ वो संयोग

556
00:37:47,680 --> 00:37:51,920
हो गया संयोग होने से जो सूक्ष्मकार था वो स्थूल कूलाकार हो गया संयोग विषय

557
00:37:51,920 --> 00:37:55,920
से। इसीलिए वो नेत्रों का विषय स्पष्ट रूप से बन गया। ऐसा नहीं कि उसमें पहले रूप

558
00:37:55,920 --> 00:38:00,160
गुण नहीं था। पहले भी था जब वो कण-कण-कण में बिखरा रहा होता। लेकिन वो वियोग

559
00:38:00,160 --> 00:38:04,240
रूप में था। जब हमने उसे इकट्ठा कर दिया संयोग विशेष अवस्था में आया तो हमें दिख रहा है। तो

560
00:38:04,240 --> 00:38:04,880
अगर आप ये कह

561
00:38:04,880 --> 00:38:09,040
रहे हो कि प्रकृति जो सामने है। ठीक है? जैसे मेरे सामने वायु है। नहीं दिख रहा।

562
00:38:09,040 --> 00:38:13,040
मान लो मेरे सामने ऑक्सीजन है नहीं दिख रहा। मैंने उसको कंडेंस कर दिया लिक्विड में आ गया। वो कंडेंस

563
00:38:13,040 --> 00:38:17,200
लिक्विड ऑक्सीजन होता है। वो मेरे को दिख रहा है। क्या आप ये कह रहे हो कि ईश्वर भी इसी प्रकार से

564
00:38:17,200 --> 00:38:21,280
ऐसे सामने होता है। बिखरा होता है और वो अपने आप को संयोग कर

565
00:38:21,280 --> 00:38:25,280
लेता है। कंडेंस कर लेता है। फिर वहां का विषय क्या आप ये कह रहे हो? मैं ये कह

566
00:38:25,280 --> 00:38:29,600
रहा हूं कि जो परम सत्य है वो अविद्या

567
00:38:29,600 --> 00:38:33,920
के कारण माया के कारण छिपा हुआ है। अविद्या माया

568
00:38:33,920 --> 00:38:37,920
प्रकृति। हां। तो ईश्वर एक ईश्वर

569
00:38:37,920 --> 00:38:42,080
एक जगह ऐसा प्रभाव उत्पन्न करता है जहां पर आपकी

570
00:38:42,080 --> 00:38:46,160
आंखें प्रकृति को प्रकृति आपकी आंखों के सामने से हट जाती है एक स्ट्रक्चर

571
00:38:46,160 --> 00:38:50,240
में वो ईश्वर का अवतार होता है। यानी आप यही कह

572
00:38:50,240 --> 00:38:54,400
रहे हो देखो इस चीज को समझो क्योंकि मैं इस चीज को समझना चाहता हूं रियल में। है ना? यानी

573
00:38:54,400 --> 00:38:58,400
अब मेरे सामने ये कह रहे हो कि मान लो धूल मिट्टी उड़ रही है और धूल मिट्टी में से एक बीच में

574
00:38:58,400 --> 00:39:02,400
एक कोई गैप ऐसा कुछ बन गया। मान लो बुध के आकार का कुछ बन गया। तो ये जो बुध के आकार

575
00:39:02,400 --> 00:39:06,400
का बन रहा है उसमें भले ही मेरे को आउटलाइन दिख रही है। आंखें नाक वहां कुछ नहीं दिख फिर आउटलाइन दिख रही है। तो ये जो

576
00:39:06,400 --> 00:39:10,480
बीच में हल्का सा हवा की वजह से किसी गैप है यही अवतार है। भले उसमें कुछ दिखे

577
00:39:10,480 --> 00:39:14,480
ना वो यही यही अवतार है। परंतु वो इस पर ऐसी कवरिंग

578
00:39:14,480 --> 00:39:18,640
करते हैं कि आपको जो है उसके प्रति वो पूरा वैसा ही मनुष्य रूप

579
00:39:18,640 --> 00:39:20,080
वाला चीजें दिखाई दे। कवरिंग

580
00:39:20,080 --> 00:39:24,880
किस चीज की होती है? वो अपनी माया शक्ति अचिंत शक्ति।

581
00:39:24,880 --> 00:39:29,200
नहीं माया का मतलब तो प्रकृति होता है ना। पूरी शंकराचार्य का तो वीडियो है इसके ऊपर। पूरी शंकराचार्य

582
00:39:29,200 --> 00:39:33,440
ने बोला हुआ है ना इसके ऊपर कि माया का मतलब प्रकृति होता है। प्रगति वही जिससे संसार

583
00:39:33,440 --> 00:39:37,840
बना हुआ है। ये ब्रह्मांड बना हुआ है। अचंत माया का मतलब अचंत शक्ति भी है।

584
00:39:37,840 --> 00:39:41,840
ये भी पूरी शंकराचार्य ने बोला है। वो है लेकिन जब हम उससे किसी

585
00:39:41,840 --> 00:39:46,000
वस्तु का बनना बताते हैं। कार्य रूप क्या है? मैं बताऊं आपको बात क्या है? मैं

586
00:39:46,000 --> 00:39:50,080
सरल शब्दों में आपको बताऊं कि कोई व्यक्ति अभी देख रहा है कि मेरे

587
00:39:50,080 --> 00:39:54,160
सामने आसमान है। ठीक है? अब भगवान ने क्या किया? ईश्वर ने क्या

588
00:39:54,160 --> 00:39:59,040
किया? यहां पे एक क्या कहते हैं? कैरेक्टर बनाया

589
00:39:59,040 --> 00:40:03,200
जो हमारी आंखों का विषय है। उसके पार हम नहीं देख सकते। उस आसमान को नहीं देख सकते।

590
00:40:03,200 --> 00:40:07,280
वो हमारी आंखों के रास्ते में आ रहा है ऑन द वे। ठीक है? वो

591
00:40:07,280 --> 00:40:11,360
उसने अपनी अचिंत शक्ति से बनाया। जैसे उसने पूरा संसार अचिंत शक्ति से बनाया

592
00:40:11,360 --> 00:40:15,440
ऐसे उसने वो कररेक्टर बनाया। उस कैरेक्टर के माध्यम

593
00:40:15,440 --> 00:40:19,440
से वो कररेक्टर वो कररेक्टर जो है जैसे

594
00:40:19,440 --> 00:40:23,680
क्या कहते हैं ये जो श्रवण इंद्री होती है

595
00:40:23,680 --> 00:40:27,840
उसका अभिवंजक होता है ना कान का ये चमड़ा तो ऐसे ही

596
00:40:27,840 --> 00:40:32,320
वो जो कररेक्टर होता है वो इस सर्वशक्तिमान जो व्यापक ईश्वर है उसका अभिवंजक

597
00:40:32,320 --> 00:40:35,520
संस्थान होता है। देखिए इसमें

598
00:40:35,520 --> 00:40:40,480
जो मैं नहीं समझ पा रहा हूं वो क्या है पॉइंट यही है कि

599
00:40:40,480 --> 00:40:44,560
जैसे ईश्वर है ठीक है आपने बोला अचिंत शक्ति से बनाया ये

600
00:40:44,560 --> 00:40:48,720
जो अचिंत शक्ति है ये क्या है ये संसार का निमित्त

601
00:40:48,720 --> 00:40:50,880
है

602
00:40:50,880 --> 00:40:55,280
जो उपादान है वो क्या है वो माया शक्ति है ठीक

603
00:40:55,280 --> 00:40:59,280
है उपादान माया शक्ति है और जो जिसे आप अचिंत शक्ति

604
00:40:59,280 --> 00:41:03,280
कह रहे हैं वो उसका निमित्त रूप होता है। ठीक है? अब इसके अंदर पॉइंट क्या आता है? पॉइंट

605
00:41:03,280 --> 00:41:07,280
ये आ रहा है कि जिसे मैं देख रहा हूं जो मेरी आंखों का विषय बन

606
00:41:07,280 --> 00:41:11,280
रहा है। ठीक है? लौकिक दृष्टांत अब जैसे समझिए इस चीज को कि लौकिक दृष्टांत

607
00:41:11,280 --> 00:41:15,520
में मैं तो देखने की वस्तु किसे जानूंगा? देखने की वस्तु मैं उसे जानूंगा जैसे

608
00:41:15,520 --> 00:41:20,080
अगर मैं किसी इंसान को देखने की बात कर रहा हूं या मैं किसी जानवर को देखने की बात कर रहा हूं। अल्टीमेटली

609
00:41:20,080 --> 00:41:24,080
मैं उस जीव को देखने की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उसके शरीर को देखने की बात कर रहा हूं। है ना?

610
00:41:24,080 --> 00:41:28,080
मैं ये बोलता हूं कि भाई मैं मैंने शिवश जी को देखा। ठीक है? मैं अपनी फोटो देख रहा हूं।

611
00:41:28,080 --> 00:41:32,160
तो मैं अपनी फोटो में अपने जीव को थोड़ी देख रहा हूं। मैं तो आंख नाक मुंह देख रहा हूं। अगले जन्म में मैं कोई और

612
00:41:32,160 --> 00:41:36,320
बनूंगा। मेरे आंख ना मुंह चेंज हो जाएंगे। है ना? मैं शरीर को देख रहा हूं। तो जो मैं ईश्वर

613
00:41:36,320 --> 00:41:40,400
को देख रहा हूं या अवतार मान लो अवतार मेरे सामने है। मैं उस अवतार को देख रहा

614
00:41:40,400 --> 00:41:44,400
हूं। तो जिस अवतार को मैं देख रहा हूं क्या ये ऐसा शरीर धारण करता है या

615
00:41:44,400 --> 00:41:48,400
क्या है? वो मैं बता रहा हूं। देखिए ये जो शरीर है ये भौतिक

616
00:41:48,400 --> 00:41:50,960
शरीर है सारे सारे के सारे। ठीक है?

617
00:41:50,960 --> 00:41:55,040
वो जो शरीर है वो परम क्योंकि जहां जहां पूरे में आपको जो भौतिकता

618
00:41:55,040 --> 00:41:59,360
दिख रही है ना जहां पे भौतिकता नहीं दिख रही वहां आपको क्या दिखेगा

619
00:41:59,360 --> 00:42:03,520
जहां पे भौतिकता नहीं दिख रही वहां आपको क्या कुछ जहां भौतिकता

620
00:42:03,520 --> 00:42:07,600
नहीं दिख रही है वहां आपको क्या दिखेगा वहां परम तत्व दिखेगा नहीं

621
00:42:07,600 --> 00:42:11,680
क्यों दिखेगा परम तत्व में कुछ कुछ तब नहीं दिखेगा जब पूरे में ही भौतिकता ना

622
00:42:11,680 --> 00:42:15,920
दिखे मगर जब आसपास बगल में भौतिकता दिख रही होगी तब आपको क्या दिखेगा

623
00:42:15,920 --> 00:42:19,920
जैसे कि हम आकाश को अगर खुले में देखें तो आकाश का कोई

624
00:42:19,920 --> 00:42:24,080
स्ट्रक्चर नहीं दिखेगा। परंतु जब हम बंद कमरे से देखेंगे खिड़की खोल

625
00:42:24,080 --> 00:42:29,120
के तो बंद जो आकाश का एक स्ट्रक्चर दिखेगा चौकोर वो आकाश का अवकार

626
00:42:29,120 --> 00:42:33,680
नहीं दिखेगा दिखेगा ना मैं बताता हूं कैसे नहीं दिखेगा मैं बताता हूं

627
00:42:33,680 --> 00:42:37,680
आपने जो देखा आपने आकाश का आकार नहीं देखा क्यों क्योंकि आकाश में रूप गुण है ही

628
00:42:37,680 --> 00:42:41,840
नहीं इसको समझिएगा दार्शनिक चर्चा है थोड़ी बहुत दर्शन के टर्मिनोलॉजीस मैं यूज़ करूंगा

629
00:42:41,840 --> 00:42:45,920
आप कोशिश करना अगर आप शंकराचार्य के शिष्य हो आपको समस्या नहीं होगी इसमें अब बात

630
00:42:45,920 --> 00:42:50,080
आती है कि आकाश में रूप गुण है ही नहीं

631
00:42:50,080 --> 00:42:54,080
ठीक है? चाहे मैं उसको टेलीिस्कोप से देखूं, माइक्रोस्कोप से देखूं, खिड़की से देखूं, बंगले से देखूं,

632
00:42:54,080 --> 00:42:58,240
कहीं से देखूं, उसमें रूप नहीं वो नहीं दिखाई देगा। एक बात। ठीक है? अब जो मुझे

633
00:42:58,240 --> 00:43:02,400
चौकोर दिख रहा है वो क्या दिख रहा है? वो खिड़की दिख रही है। खिड़की की आउटलाइन दिख

634
00:43:02,400 --> 00:43:06,320
रही है। उस खिड़की की आउटलाइन से जो मैं देख रहा हूं ना वो रियल में क्या है?

635
00:43:06,320 --> 00:43:10,560
वो मेरे को बादल दिख रहा है। वो मेरे को बाहर का स्ट्रक्चर दिख रहा है। है ना? वो जो मुझे

636
00:43:10,560 --> 00:43:14,560
है ना? वो स्पेस वो स्पेस दिख ही नहीं रहा। ये मत बोलिए कि स्पेस दिख रहा है। स्पेस दिखता

637
00:43:14,560 --> 00:43:18,640
ही नहीं है। स्पेस आंखों का विषय नहीं है। जो मुझे दिख रहा है वो क्या दिख रहा है? वो मुझे क्या

638
00:43:18,640 --> 00:43:22,720
दिख रहा है? वो जो लाइट टकरा रही है, रिफ्रेक्शन हो रहा है, वो रिफ्रेक्शन की वजह से मुझे कलर दिख रहा है।

639
00:43:22,720 --> 00:43:26,720
है ना? स्पेस नहीं दिख रहा, आकाश नहीं दिख रहा। क्योंकि उसमें रूप गुण

640
00:43:26,720 --> 00:43:30,720
नहीं है। उसी प्रकार अगर ईश्वर में रूपगुण नहीं है, रूपगुण

641
00:43:30,720 --> 00:43:34,720
प्रकृति में है। ठीक है? इतना स्ट्रक्चर बना लो ईश्वर तो फिर भी नहीं दिखेगा ना।

642
00:43:34,720 --> 00:43:38,800
दिखेगा क्या आपको? आपको वो दिखेगा जो आउटलाइन आपने प्रकृति से बनाई है। तो वो जो

643
00:43:38,800 --> 00:43:42,880
वो जो है ना वो जो वो आप तत्व से उसे जो भी माने मगर

644
00:43:42,880 --> 00:43:46,960
जहां पर प्रकृति है चारों ओर और उसमें बीच में एक स्ट्रक्चर से जो हमें दिखाई दे

645
00:43:46,960 --> 00:43:51,120
रहा है मनुष्य जैसा वही ईश्वर का अवतार है। उसको आप उसको

646
00:43:51,120 --> 00:43:55,200
क्या है व्यवहार अब जैसे पृथ्वी भी वास्तव में तो गोल है। मगर हमें

647
00:43:55,200 --> 00:43:59,280
चपटी भी दिख रही है और हमारा व्यवहार भी उसके साथ चपटे जैसा है। तो

648
00:43:59,280 --> 00:44:03,280
ऐसे ही व्यवहारिक रूप से जो ये जो हमें आकाश दिख रहा है कि नहीं दिख रहा है वो

649
00:44:03,280 --> 00:44:07,600
तात्विक व्याख्या है कि वो रूप रंग मैं पृथ्वी वाले देता हूं आपको।

650
00:44:07,600 --> 00:44:11,760
एक एक मिनट एक मिनट एक मिनट। तो जो आप जो खाली स्पेस

651
00:44:11,760 --> 00:44:16,240
है ना वो जो जहां से नहीं दिख रहा है मगर बंद कमरे की खिड़की से जो हमें एक स्ट्रक्चर

652
00:44:16,240 --> 00:44:20,240
में वो व्यवहारिक जो क्या कहते है बाहर का आसमान दिख रहा है प्रतीत

653
00:44:20,240 --> 00:44:21,360
हो रहा है वही

654
00:44:21,360 --> 00:44:25,440
ईश्वर का अवतार है। प्रतीत होना ईश्वर प्रकट हो गया।

655
00:44:25,440 --> 00:44:29,600
जैसे हमारे ठीक है लेकिन रूप का विषय जो आप बोल रहे हो ना मैं उसको मगर

656
00:44:29,600 --> 00:44:33,680
तात्विक तात्विक यही है कि हां ईश्वर ईश्वर पूरा का पूरा वहां प्रकट नहीं हो

657
00:44:33,680 --> 00:44:37,840
गया क्योंकि पूरा का पूरा प्रकट तो ईश्वर हो ही नहीं सकता तात्विक विषय तो यही

658
00:44:37,840 --> 00:44:41,840
है मैं मैं इतना समझ रहा हूं कि आप उसको सर्व्यापक मानते हुए भी उसका अवतार मान रहे

659
00:44:41,840 --> 00:44:46,000
हो इतना मुझे समझ में आ रहा है इसमें मुझे दिक्कत नहीं है जहां मैं समझना चाह रहा हूं मैं ये समझना

660
00:44:46,000 --> 00:44:50,000
चाह रहा हूं कि जब आप ये वर्ड यूज़ कर रहे हो ना कि वो आंखों का विषय बन रहा है। ठीक है?

661
00:44:50,000 --> 00:44:54,080
इसका क्लियर मतलब क्या हुआ? आंखों का विषय कैसे बन सकता है कोई वस्तु जिसमें रूप आंखों

662
00:44:54,080 --> 00:44:58,160
का देखिए मैं मैं और इसको क्लियर कर दूं वो एक

663
00:44:58,160 --> 00:45:02,320
मान लीजिए एक ऐसा कररेक्टर डेवलप कर रहा है इस पूरे भौतिक संसार के बीच

664
00:45:02,320 --> 00:45:06,320
में जिसके द्वारा वो आपको आसानी आसानी कर देता हूं मैं इसमें थोड़ी

665
00:45:06,320 --> 00:45:10,560
सी जैसे इसको ये ले लीजिए अगर मैं ये बोलता हूं कि निराकार

666
00:45:10,560 --> 00:45:14,560
सर्व्यापक ईश्वर में ऑलरेडी रूप गुण है बस वो हमें दिख नहीं

667
00:45:14,560 --> 00:45:18,560
रहा एनी कॉज ड्यू टू एनी कॉज किसी भी कारण की वजह से नहीं दिख रहा ठीक

668
00:45:18,560 --> 00:45:23,200
है लेकिन उसके अंदर रूप गुण पहले से ही अगर मैं ये अजम्शन लेकर के चलता हूं। ठीक है? अव्यू

669
00:45:23,200 --> 00:45:27,200
नहीं नहीं रूप गुण क्यों मानेंगे उसमें? अजंप्शन क्यों मानेंगे? अच्छा

670
00:45:27,200 --> 00:45:30,640
ठीक है। चलिए रूप गुण हटा देते हैं। तो जब उसमें कुल मिला के देखिए ये

671
00:45:30,640 --> 00:45:34,640
जो अवतार दिख रहा है ना आप ये कह सकते हैं कि हां भाई वो क्या कहते हैं वो

672
00:45:34,640 --> 00:45:38,800
आकाश नहीं दिख रहा है क्योंकि आकाश तो है ही ऐसा। मगर जो आकाश को ना

673
00:45:38,800 --> 00:45:43,040
आकाश को देखने में उस बंद कमरे की वजह से जो बाधा आ रही है उसके

674
00:45:43,040 --> 00:45:47,600
कारण व्यवहारिक रूप से जो खिड़की के द्वारा हमें आकाश दिखाई दे रहा है वही

675
00:45:47,600 --> 00:45:51,840
आकाश खिड़की आकाश वो हमें जो है वार्ता व्यवहार

676
00:45:51,840 --> 00:45:55,920
में कहना पड़ेगा ना मैं अभी आपसे भी कहलवा सकता हूं कई चीजों में कई

677
00:45:55,920 --> 00:46:00,480
चीजों में व्यवहार में आप भी कहते हैं वही मैं कह रहा हूं ना व्यवहारिक सत्य को जो है आप पारमार्थिक

678
00:46:00,480 --> 00:46:04,800
सत्य के आधार पर काटते हैं आर्य समाज के देखिए अभी जैसे अगर आपको

679
00:46:04,800 --> 00:46:08,960
जैसे मैं बताऊं जैसे मैं बताऊं जैसे जैसे मैं बताऊं जैसे मैं बताऊं मैं आपको उदाहरण

680
00:46:08,960 --> 00:46:12,960
दे रहा हूं ना उदाहरण दे रहा हूं ये बताइए ईश्वर सर्वव्यापक

681
00:46:12,960 --> 00:46:17,040
है हम ठीक है अब ईश्वर सर्व्यापक है तो

682
00:46:17,040 --> 00:46:21,200
इसका मतलब उसका ज्ञान भी सर्वव्यापक है हां जी हां जी बिल्कुल

683
00:46:21,200 --> 00:46:26,240
ठीक है तो फिर वो किसी देश काल परिस्थिति में क्या उसके अंदर आया

684
00:46:26,240 --> 00:46:30,560
ऋषि के अंदर ऋषियों के अंदर अंतकरण नहीं

685
00:46:30,560 --> 00:46:34,720
दयानंद जी ने तो लिखा कि आया आता है ज्ञान देता है ईश्वर

686
00:46:34,720 --> 00:46:38,800
अच्छा इसमें एक बात आती ज्ञान देता है किस सेंस में आपने पढ़ा आधा

687
00:46:38,800 --> 00:46:42,960
अधूरा पढ़ लिया उसको पूरा समझा देता हूं क्या चलिए बात ये है अब देखिए

688
00:46:42,960 --> 00:46:46,960
पॉइंट ये है कि ईश्वर है ईश्वर ने अपना ज्ञान सबके लिए प्रकाशित कर रखा है

689
00:46:46,960 --> 00:46:51,120
ठीक है वेद में भी एक मंत्र आता है जिसका अर्थ यही आता है कि जो

690
00:46:51,120 --> 00:46:55,120
ईश्वर का जो ज्ञान वेद रूप है वो सबके मन में पहले से ही है ठीक है उदाहरण मैं समझा

691
00:46:55,120 --> 00:46:59,200
देता हूं मान लो कोई खुला मैदान है ठीक है वहां धूप पड़ रही है वहां पे

692
00:46:59,200 --> 00:47:03,200
दो आदमी एक अंधा है एक स्वस्थ नेत्रों वाला है ठीक है अब जो सूर्य का

693
00:47:03,200 --> 00:47:07,200
प्रकाश जा रहा है वो अंधे की आंख में भी जा रहा और वो स्वस्थ नेत्र वाले के आंख में

694
00:47:07,200 --> 00:47:11,440
भी जा रहा है। ठीक है? लेकिन जो अंधा है वो नहीं देख पा रहा। जो स्वस्थ नेत्र वाला है वो देख ले रहा है।

695
00:47:11,440 --> 00:47:15,600
अब इसमें ये कहना कि नहीं जो ज्ञान है वो प्रकाश जो है वो है ही नहीं। ऐसे

696
00:47:15,600 --> 00:47:20,000
नहीं है। गड़बड़ी कहां है? गड़बड़ी रिसीवर में है। अब पॉइंट इसका

697
00:47:20,000 --> 00:47:24,320
है कि उसमें वो पूरा सुनिए। गलत जा रहा है। गलत जवाब दूसरे

698
00:47:24,320 --> 00:47:28,320
मुझे जवाब दे रहे हैं। दूसरे प्रश्न का आप मुझे करेक्ट कर

699
00:47:28,320 --> 00:47:32,720
दीजिएगा। एक बार मैं पूरा देता हूं उत्तर। अब इसमें पॉइंट क्या है? पॉइंट ये है

700
00:47:32,720 --> 00:47:36,800
क्योंकि वो ज्ञान मेरे मन में ऑलरेडी है। ज्ञान मेरे मन में भी ऑलरेडी है। आपके

701
00:47:36,800 --> 00:47:41,200
मन में भी ऑलरेडी है। ठीक है? लेकिन अब मेरे जो अंधकार है, ठीक है? अंधकार

702
00:47:41,200 --> 00:47:45,200
रूपी जो मेरे मन में अंधकार है, उसको मैंने तपस्या से दूर किया तो वो ज्ञान मैंने ग्रहण

703
00:47:45,200 --> 00:47:49,200
नहीं किया। अब पॉइंट ये है कि ईश्वर में ज्ञान था तो उसने दिया। अगर आप इस

704
00:47:49,200 --> 00:47:49,760
चीज को रिलेट

705
00:47:49,760 --> 00:47:53,840
करते हो कि उसी प्रकार जैसे तपस्या करने से ज्ञान ग्रहण हो गया। वैसे तपस्या करने से रूप दिख जाता है। अगर आप

706
00:47:53,840 --> 00:47:57,920
ये बोलते हो। तो आपको मानना पड़ेगा कि उसके अंदर रूप गुण है। भाई जैसे ज्ञान

707
00:47:57,920 --> 00:48:01,920
उसके अंदर था उसने प्रकट किया। हमने एक्सेस कर लिया। वैसे आपको ये मानना

708
00:48:01,920 --> 00:48:06,000
पड़ेगा कि रूप गुण उसमें था। उसे प्रकट ऑलरेडी प्रकट किया मैंने आप दूसरे प्रश्न

709
00:48:06,000 --> 00:48:10,080
का उत्तर दे दूसरे प्रश्न का उत्तर दे रहे हो आप देखिए जो

710
00:48:10,080 --> 00:48:14,160
आपने तात्विक व्याख्या कही है ना ज्ञान के प्राप्त होने की अथवा ना प्राप्त होने

711
00:48:14,160 --> 00:48:17,200
की वो तो मैं भी मान रहा हूं कि हां बिल्कुल सही बात है मगर

712
00:48:17,200 --> 00:48:21,280
वहां पर क्यों कहा कि भैया आता है ज्ञान होता है ये

713
00:48:21,280 --> 00:48:25,280
क्यों कहा जब ज्ञान था तो जब ज्ञान से

714
00:48:25,280 --> 00:48:29,520
कोई जगह रिक्त है ही नहीं तो फिर ज्ञान का आना जाना होना

715
00:48:29,520 --> 00:48:33,600
ये किसी विशेषत्ल परिस्थिति में

716
00:48:33,600 --> 00:48:37,680
तो मैं मैं यही तो कह रहा हूं कि मैं यही कह रहा हूं जब

717
00:48:37,680 --> 00:48:41,760
आया अरे आप आप फिर आप ही बोल रहे हो जब मैं

718
00:48:41,760 --> 00:48:46,080
बोल रहा हूं तो बोलने दो ना मेरा प्रश्न ये है कि जब ज्ञान आया

719
00:48:46,080 --> 00:48:50,240
गया नहीं तो उसके लिए आने जाने वाले शब्दों का व्यवहारिक प्रयोग

720
00:48:50,240 --> 00:48:54,640
क्यों हो रहा है होता है पहली बात तो ग्रंथों में भी होता है

721
00:48:54,640 --> 00:48:58,720
ठीक है मैं बोल देता हूं पहली बात तो ज्ञान होने की बात है ज्ञान के आने जाने की बात नहीं

722
00:48:58,720 --> 00:49:02,800
होती आने आने जाने का भी हो रहा है आने जाने

723
00:49:02,800 --> 00:49:07,040
का भी हो रहा है। शब्दों का ज्ञान इसी को

724
00:49:07,040 --> 00:49:11,760
अब वो प्रमाण मैं आपको दे दूंगा। आपको प्रमाण

725
00:49:11,760 --> 00:49:15,760
स्वीकार करो ना। देखो उस चीज को मैंने पढ़ा है। मैं उसका ठीक है तो रुको तो रुको अभी मैं

726
00:49:15,760 --> 00:49:19,920
दिखा देता हूं। ज्ञान होता है। ठीक है मैं दिखा देता हूं। वेट करो आप।

727
00:49:19,920 --> 00:49:23,920
आना जाना सिद्ध करो। ज्ञान का आना जाना सिद्ध करो आप। चलो ज्ञान होना

728
00:49:23,920 --> 00:49:28,480
क्यों हो रहा है? यही बता दो व्यवहार। बताओ। ज्ञान होने में आना जाना कहां आ गया?

729
00:49:28,480 --> 00:49:32,640
तो आना जाना कैंसिल कर दो। अभी मैं पूछ रहा हूं होना क्यों हो रहा है जब वो

730
00:49:32,640 --> 00:49:36,800
जब वो जब वो पहले से ही है जब वो पहले से ही है तो हो क्यों

731
00:49:36,800 --> 00:49:41,120
रहा है

732
00:49:41,120 --> 00:49:47,120
एक सेकंड रुको हम

733
00:49:48,240 --> 00:49:52,240
हां बताओ अब पॉइंट यही है जब जब वो जब वो

734
00:49:52,240 --> 00:49:53,200
जब वो पहले से

735
00:49:53,200 --> 00:49:57,200
ही है तो किसी विशेष देश काल परिस्थिति में वो हो क्यों रहा

736
00:49:57,200 --> 00:50:01,120
है वो तो है व्यक्ति ज्ञान ही होना चाहिए क्यों हो अब

737
00:50:01,120 --> 00:50:05,200
पॉइंट इसके अंदर देखो इसका पॉइंट ये है समझा देता हूं ना मूल जो विषय

738
00:50:05,200 --> 00:50:09,440
था आपका आना जाना वो तो कट चुका है ऑलरेडी कट चुका है नहीं आना जाना आने जाने

739
00:50:09,440 --> 00:50:13,520
कोई आप आप देखिए जैसे आपने जो मेरी बात आप समझ नहीं पाए थे ना

740
00:50:13,520 --> 00:50:17,600
जैसे अभी शुरू में मेरी बात नहीं समझ पाए थे ना कि वो स्पर्श का विषय है और फिर आपने कहा कि

741
00:50:17,600 --> 00:50:21,760
मैं प्रकृति हूं मिट्टी मिट्टी को पहले आपने कर दिया था सुनिए

742
00:50:21,760 --> 00:50:25,920
मैं वैसे नहीं कर रहा हूं आप आप मेरी बात को समझ नहीं पाए कि आने जाने का मतलब

743
00:50:25,920 --> 00:50:29,920
मैं वही कह रहा हूं ना मैं वही कह रहा हूं आप बोलोगे जो जो आप शब्द

744
00:50:29,920 --> 00:50:34,000
उस शब्द को लेकर के ही आप तो मैं उसको क्लियर कर रहा हूं तो मैं उसको क्लियर कर रहा हूं

745
00:50:34,000 --> 00:50:38,320
और बाकी मैं आपके लोगों के द्वारा गलत बोला नहीं आपके

746
00:50:38,320 --> 00:50:42,560
लोगों के द्वारा वो स्वीकार रहे आपकी किताब के द्वारा स्वीकार है किताब आप टाइम दोगे मैं दिखा दूंगा

747
00:50:42,560 --> 00:50:46,560
दिखाओ ना मेरे को दिखाओ कहां स्वीकार्य है तो ठीक है रुको अभी मैं

748
00:50:46,560 --> 00:50:50,560
दिखाता हूं दिखाओ

749
00:50:50,560 --> 00:50:54,880
दिखाओ कहां लिखा है ज्ञान आ रहा है और जा रहा है अरे ज्ञान

750
00:50:54,880 --> 00:50:59,040
नहीं तो मैं कुछ ना कुछ ऐसा जरूर दिखा दूंगा जो पहले से था और ज्ञान का दिखाओ

751
00:50:59,040 --> 00:51:03,120
जिसका क्लेम किया उसका दिखाओ। देखो ऐसा नहीं हो रहा है। बात यह है कि जो चीज आज

752
00:51:03,120 --> 00:51:07,600
आ नहीं रही है उसका आना जाना मैं दिखा दूंगा आपको। दिखा दूंगा।

753
00:51:07,600 --> 00:51:11,680
आपने हमारा सिद्धांत क्या है? किस चीज पे बहस हो रही है? कौन है?

754
00:51:11,680 --> 00:51:15,680
बहस बहस यहां पे मामला अटका हुआ है कि जो चीज पहले से

755
00:51:15,680 --> 00:51:20,880
है उसका आना जाना। दिखाओ। मैं दिखा दूंगा आपको। आना जाना। दिखाऊं?

756
00:51:20,880 --> 00:51:24,960
क्या कह रहे हो? दोबारा बोलो। एक बार मैं सुन नहीं पाया था। जो चीज पहले से है

757
00:51:24,960 --> 00:51:28,960
उसका आना जाना मैं आपके आपकी किताब में दिखा दूंगा। आपने ज्ञान की

758
00:51:28,960 --> 00:51:32,960
बात की जिसका क्लेम किया उस अरे भाई ज्ञान की बात क्यों कही है? ज्ञान की बात

759
00:51:32,960 --> 00:51:37,040
क्यों कही है? ज्ञान तो एक उदाहरण है। मैं तो आपको ये सिद्धांत समझा रहा हूं

760
00:51:37,040 --> 00:51:41,200
जो पहले से था उसका किसी विशेष देश काल परिस्थिति में क्यों हो रहा है वो ज्ञान

761
00:51:41,200 --> 00:51:45,200
किसी को? अच्छा यानी जो सिद्धांत में ज्ञान

762
00:51:45,200 --> 00:51:49,440
ज्ञान और सिद्धांत का एक उदाहरण है। अब आपको खामखा उसमें बड़ा

763
00:51:49,440 --> 00:51:54,160
बड़ी छोटी बात करनी हो बात एक अलग है। ज्ञान तो उस सिद्धांत का एक उदाहरण है।

764
00:51:54,160 --> 00:51:58,160
आवाज आ रही है मेरी? हेलो हम्म हम्म हम्म कह रहे हो ये बात शुरू कहां से हुई

765
00:51:58,160 --> 00:52:02,320
थी? बात शुरू ये हुई थी कि जब ज्ञान पहले से है और आपने

766
00:52:02,320 --> 00:52:05,680
अंधे वाला उदाहरण ये वाली बात कहां से शुरू हुई थी? कौन

767
00:52:05,680 --> 00:52:09,760
सी? ये ज्ञान वाली बात कहां से शुरू हुई थी? किस पॉइंट को सिद्ध करने के लिए वाली बात शुरू

768
00:52:09,760 --> 00:52:15,760
हुई थी? जब हम लोग ये बाते कर रहे थे कि क्या कहते है वो?

769
00:52:16,240 --> 00:52:20,320
ये अवतार एक जगह कैसे दिखाई दे सकता है?

770
00:52:20,320 --> 00:52:24,320
हां तो पॉइंट ये है ना कि अवतार ये जगह कैसे दिखाई दे रहा है? तो इसमें मेन पॉइंट

771
00:52:24,320 --> 00:52:28,400
यही है। मेन पॉइंट इसके अंदर यही है कि इसमें यहां जो ये जो दो कन्फ्यूजन

772
00:52:28,400 --> 00:52:32,480
इसके अंदर आ रहा है कि या तो प्रकृति दिखाई दे रही है। हां मैं बताऊं कैसे हो रहा है। जब मैंने

773
00:52:32,480 --> 00:52:36,560
उसमें आसमान का उदाहरण दिया था ना मैं मैं मुझे याद आ गया। मैंने

774
00:52:36,560 --> 00:52:40,720
जब उसमें आसमान का उदाहरण दिया था तो उसको आसमान को देखने

775
00:52:40,720 --> 00:52:44,880
वाली बात को आपने कहा था भाई हम उसे आसमान को नहीं देखते हैं। वहां पर तो हम खिड़की देख

776
00:52:44,880 --> 00:52:49,040
रहे होते हैं। खिड़की के कारण जो बाधा उत्पन्न हो रही है वहां दीवारों से

777
00:52:49,040 --> 00:52:53,280
उसके कारण ऐसा लगता है कि हमने आसमान को देखा। आसमान को तो देखा नहीं। ठीक है?

778
00:52:53,280 --> 00:52:57,360
तो मैंने आपको बताया कि आपके यहां भी व्यवहारिक रूप से ऐसी बातें होती है

779
00:52:57,360 --> 00:53:01,360
कि जो चीज पहले से थी हैं। सब जगह उसके विषय में भी

780
00:53:01,360 --> 00:53:05,440
व्यवहारिक रूप से ऐसे शब्द उपयोग में लिए जाते हैं कि आया और गया। अब उसमें

781
00:53:05,440 --> 00:53:09,920
मैंने उदाहरण आपको ज्ञान का दे दिया। मगर ऐसी और भी बहुत सी चीजें हैं जो थी

782
00:53:09,920 --> 00:53:13,920
पहले से ही और उसके बारे में लिखा होगा। हो सकता है हो सकता है ज्ञान के

783
00:53:13,920 --> 00:53:17,920
बारे में भी लिखा हो। मैंने अभी देखा नहीं है। मैं उसके लिए प्रिपेयर नहीं था। हो

784
00:53:17,920 --> 00:53:20,720
सकता है ज्ञान के बारे में लिखा हो। मगर ऐसे तत्व

785
00:53:20,720 --> 00:53:24,960
जो पहले से हैं उनके बारे में आपके यहां पर व्यवहार

786
00:53:24,960 --> 00:53:29,120
में उनका प्राप्त होना, उनका होना इत्यादि इसी को मैं आना जाना

787
00:53:29,120 --> 00:53:33,120
कह रहा हूं। और उनका आना जाना हुआ है। ठीक है। ठीक है।

788
00:53:33,120 --> 00:53:37,120
अब इसका पॉइंट डिस्कस करते हैं। पॉइंट ये है कि पॉइंट पॉइंट ये है।

789
00:53:37,120 --> 00:53:41,120
मेन पॉइंट सुनो ना। एक मिनट एक मिनट मैं पॉइंट आपको याद दिला दूं। पॉइंट ये

790
00:53:41,120 --> 00:53:45,520
है कि जब वो पहले से था तो उसका होना क्यों लिखा हुआ है? ये बताइए।

791
00:53:45,520 --> 00:53:46,020
पॉइंट ये

792
00:53:46,000 --> 00:53:50,640
नहीं है। पॉइंट ये नहीं है। पॉइंट मैं समझा देता हूं। क्या है? पॉइंट ये है

793
00:53:50,640 --> 00:53:54,800
पॉइंट ये है इसके अंदर कि वो रूप का विषय कैसे

794
00:53:54,800 --> 00:53:58,960
बन रहा है? बात चली ना अवतार की धारणा के ऊपर। अब

795
00:53:58,960 --> 00:54:03,040
सुनना पूरा सुनना बीच में ठोकना नहीं पॉइंट ये है पॉइंट सुनिए सुनिए

796
00:54:03,040 --> 00:54:07,120
पॉइंट ये है सुनिए सुनिए सुनिए नहीं आप आप कैसे मना कर सकते हो काम करो

797
00:54:07,120 --> 00:54:11,120
आप ही बोल लो आप कैसे मना कर सकते हो भाई पॉइंट आपने

798
00:54:11,120 --> 00:54:15,120
एक पॉइंट बताया पॉइंट ये है कि वो क्या कहा आपने आंखों का विषय कैसे बन

799
00:54:15,120 --> 00:54:19,440
सकता है ना ये कहा ना आपने जबकि

800
00:54:19,440 --> 00:54:24,080
पॉइंट ये है कि क्या हम व्यवहार में वो तात्विक उसके द्वारा

801
00:54:24,080 --> 00:54:28,400
तात्विक परिभाषा के कारण क्या हमारे व्यवहारिक शब्द दूसरे आते हैं कि नहीं

802
00:54:28,400 --> 00:54:32,480
व्यवहार में उसी को हम दूसरी चीजें बोलते हैं कि नहीं। जैसे कि मैंने फिर वहां

803
00:54:32,480 --> 00:54:35,680
पर उदाहरण दिया जैसे कि ज्ञान पहले मैं इसको आगे

804
00:54:35,680 --> 00:54:39,760
बढ़ाओ। इसको आगे बढ़ाओ आप रुको। नहीं आप क्योंकि वहां पर उस पॉइंट को बदल रहे हैं ना।

805
00:54:39,760 --> 00:54:43,760
आप अभी ये आपको अभी ये बताना है कि वो जो आप मेरी बात सुनोगे तब तो

806
00:54:43,760 --> 00:54:47,840
पता चलेगा कि मैं क्या कह रहा हूं। बिना सुने आपने पॉइंट आप पॉइंट

807
00:54:47,840 --> 00:54:52,000
दूसरा ला रहे हो। आपने कहा आंखों का विषय कैसे बनता है। अभी हम अगर मैं दूसरा पॉइंट

808
00:54:52,000 --> 00:54:56,000
लाऊंगा फिर आप बात करना। तो मैं पॉइंट क्लियर कर दूं दोबारा से। फिर आप बताइएगा। ऑलरेडी

809
00:54:56,000 --> 00:55:00,080
बहुत आप बोल चुके। नहीं पॉइंट क्लियर आपने जब पॉइंट गलत बताया तो मैं उसमें क्लियर

810
00:55:00,080 --> 00:55:04,240
करके पॉइंट आपने कुछ बोला है मेरे को उसका रिसोंस देने दो आप रिसोंस

811
00:55:04,240 --> 00:55:08,400
दीजिए ना आपने जो आपने अभी जो रिसोंस दिया था उसकी शुरुआत में आपने हेडलाइन

812
00:55:08,400 --> 00:55:12,640
आपने हेडलाइन बदल दी मेरी मेरी हेडलाइन है बस

813
00:55:12,640 --> 00:55:16,720
एक एक पंक्ति की हेडलाइन है रुके थे आप बोल के रुके थे जब मैं उत्तर दे रहा था

814
00:55:16,720 --> 00:55:20,720
मेरे बीच में कूद गए आप तो मेरे को तो आप भाई आप हेडलाइन बदल के उत्तर दे

815
00:55:20,720 --> 00:55:24,880
रहे हो ना हेडलाइन बदल के कर देना ना आप आप करेक्ट कर देना

816
00:55:24,880 --> 00:55:28,880
अगर मैं गलत बोल रहा हूं उत्तर देना आ रहा है तो जो उतनी देर में आप जो चीज़ बोल

817
00:55:28,880 --> 00:55:32,880
दोगे उनका क्या करूंगा फिर मैं उनका खंडन करूंगा फिर विषय ऐसे ही बहुत कुछ आप भी

818
00:55:32,880 --> 00:55:37,120
तो बहुत कुछ बहुत से ऐसी बातें बोल जिससे कोई रेलेवेंट नहीं है आप अभी भी तो बहुत कुछ बोल रहे हो मैं टोलेट

819
00:55:37,120 --> 00:55:41,280
कर रहा हूं आप मुझे बताओ कौन सी चीज बोली जो आपने

820
00:55:41,280 --> 00:55:45,600
पूरा जो आपने चार बार रिपीट किया वो यूज़लेस है कोई मतलब नहीं क्योंकि वो सेंसिंग क्योंकि वो

821
00:55:45,600 --> 00:55:49,600
हमारे कंटेंट से रिलेटेड बात नहीं थी वो बताइए वो चार बार उसका रिपीटेशन अलग

822
00:55:49,600 --> 00:55:50,720
बात है और जो हमारे

823
00:55:50,720 --> 00:55:54,880
संदर्भित ना हो वो अलग बात है अभी जो आपने जितना पूरा बोला ना उसका

824
00:55:54,880 --> 00:55:58,880
रेलेवेंस नहीं कैसे नहीं था? बताइए कैसे नहीं था? बताइए। हां।

825
00:55:58,880 --> 00:56:03,040
तो भैया उसका उसका रिपीट उसका उसका रिपीटेशन रेलेवेंट

826
00:56:03,040 --> 00:56:07,040
मत बताइए। वो रेलेवेंट नहीं था ये बताइए। हम अब मैं समझा

827
00:56:07,040 --> 00:56:11,040
दे रहा हूं। समझो अब जितना बार-बार कह रहा हूं ना आना जाना आना जाना। ठीक है?

828
00:56:11,040 --> 00:56:13,120
मैं कह रहा हूं आने जाने का विषय ही नहीं है।

829
00:56:13,120 --> 00:56:17,120
पॉइंट यहां पे कहां अटक रहा है? पॉइंट इस पे अटक रहा है। अभी हमारी बात इस पे चल रही है कि

830
00:56:17,120 --> 00:56:21,280
अवतारवाद की धारणा क्या है? ठीक है। नहीं मैं बता फिर आप फिर

831
00:56:21,280 --> 00:56:25,360
आप चेंज कर रहे हो। फिर आप इसको बोलने नहीं। उस धारणा उस विषय के

832
00:56:25,360 --> 00:56:29,520
अंतर्गत बात करते करते हम एक जगह आकर के अटके हैं। मैं आगे

833
00:56:29,520 --> 00:56:32,400
खिड़की हूं। मेरे को सुन लो। मैं आगे

834
00:56:32,400 --> 00:56:36,720
चलिए चलिए बताइए आगे बढ़िए आगे बढ़िए आप क्या बोल रहे हो? मेरे को मेरे

835
00:56:36,720 --> 00:56:40,720
दो ना मेरे बढ़िया ठीक है। पढ़िए। पॉइंट इसके अंदर ये है कि

836
00:56:40,720 --> 00:56:44,800
जब हम बात कर रहे है की अवतारवाद की धारणा क्या है? अवतारवाद की धारणा के अंदर इंपॉर्टेंट पॉइंट इसके अंदर

837
00:56:44,800 --> 00:56:48,880
ये आ जाता है कि हम तो आपने बोला कि वो अपने आप को आंखों का विषय बना लेता है। अब मैंने

838
00:56:48,880 --> 00:56:52,960
आपसे पूछा कि आंखों का विषय कैसे बनाता है? ठीक है? तो इसमें दो पॉइंट आते हैं कि

839
00:56:52,960 --> 00:56:56,960
मैंने ये एजम्पशन लेने का कोशिश किया कि एक बार को हम मान लेते हैं कि चलो उसके अंदर रूपगुण

840
00:56:56,960 --> 00:57:00,960
है तो वो रुगण क्या करता है वो किसी कारण से रुग गुण दिखता नहीं बाद में हमें दिखा देता है

841
00:57:00,960 --> 00:57:05,120
तो वो कैसे दिखा देता है उसको एक्सप्लेन कर दो ठीक है वो प्रोसीजर क्या है वो आप समझा दो तो आपने

842
00:57:05,120 --> 00:57:09,120
मना कर दिया कि नहीं नहीं हम ये एजम्पशन नहीं लेंगे हम हमारे सिद्धांत नहीं है आपने ये मान लिया

843
00:57:09,120 --> 00:57:13,120
ठीक है फुल्ली एक्सेप्टेड कोई इशू नहीं है तो सेकंड क्या पॉइंट आ जाता है सेकंड जो मैं समझ पा

844
00:57:13,120 --> 00:57:14,480
रहा हूं सेकंड क्या ये आ जाता है

845
00:57:14,480 --> 00:57:18,480
कि ईश्वर क्या करता है शरीर धारण करता है ठीक है जैसे जीव शरीर धारण

846
00:57:18,480 --> 00:57:22,480
करता है एक वीडियो में आपने एक लाइव में बोला भी था एक लाइव लाइव में आपने मेरे से बोला भी था कि

847
00:57:22,480 --> 00:57:26,480
भाई अगर जीव शरीर धारण कर सकता है तो ईश्वर सर्वशक्तिमान होके शरीर धारण क्यों नहीं कर सकता? एक लाइव में आपने ये

848
00:57:26,480 --> 00:57:30,800
बात बोला भी था जो आपके सर्वशक्तिमान वाले चैनल पे डाला हुआ है। है ना? अच्छा

849
00:57:30,800 --> 00:57:34,800
और जो गीता से आप प्रमाण देते हो कि सजाम्यामि जो मैं अपने आप का सृजन करता

850
00:57:34,800 --> 00:57:39,440
हूं। ठीक है? तो उसमें पॉइंट कि अगर अपने आप का सृजन करेगा तो उसमें फंस जाओगे।

851
00:57:39,440 --> 00:57:43,520
भाई जो जिसका सृजन जो सृजित अभी-अभी बना है यानी बनने से पूर्व नहीं था। तो जो

852
00:57:43,520 --> 00:57:47,520
सृजित शरीर हुआ निराकार रूप में था साकार रूप में सृजित हुआ नया नया खुद

853
00:57:47,520 --> 00:57:51,600
को बनाया तो फिर वो अनादि स्वरूप नहीं रहेगा। तो अनादि नहीं रहा तो अनंत भी नहीं रहा अनंत नहीं रहा

854
00:57:51,600 --> 00:57:56,080
तो फिर नित्य नहीं रहा तो नित्य स्वरूप नहीं ईश्वर का ही स्वरूप नहीं है ईश्वर क्यों बोल रहे हो कुर्सी

855
00:57:56,080 --> 00:58:00,160
बोल दो उसे कुर्सी बोलते हो ना अभी बनी है नष्ट हो जाएगी कल परसों उसमें उसमें नित्य

856
00:58:00,160 --> 00:58:03,920
वाला दे दूर नित्य वाला उत्तर दे दूं मैं मैं पूरा कर देता

857
00:58:03,920 --> 00:58:08,160
हूं अब इसमें बात क्या है तो हमें ये मानना तो ये थोड़ा सा ज्यादा लॉजिकल

858
00:58:08,160 --> 00:58:12,240
हो जाता है आपने अभी जो बात मैं एक बात आपको बता दूं आपने अभी जो बात कही

859
00:58:12,240 --> 00:58:16,320
ना ईश्वर के लिए कि वो पहले नहीं था हां ये बात सत्य है कि वो पहले नहीं

860
00:58:16,320 --> 00:58:20,640
था अब मैं इस पर उत्तर दे दूंगा कि ऐसे ईश्वर कहते हैं।

861
00:58:20,640 --> 00:58:24,640
आप मुझे यहां लाना चाह रहे थे क्या कि मैं उसको ये कह दूं कि वो नित्य नहीं है। यही लाना चाह

862
00:58:24,640 --> 00:58:28,720
रहे थे। नहीं नहीं जो कह रहा हूं देखो आप कह

863
00:58:28,720 --> 00:58:32,800
लीजिए मैं मैं आपको बता दूं कि हम भी ये मानते हैं कि वो रूप धारण करता

864
00:58:32,800 --> 00:58:36,800
उससे पहले वो रूप नहीं था। हम भी यही मानते हैं। मैं आपको बता रहा हूं।

865
00:58:36,800 --> 00:58:40,880
चलिए। ठीक है। अब इसमें अब जो इसमें ज्यादा लॉजिकल एप्रोच समझ में आता

866
00:58:40,880 --> 00:58:45,040
है वो ये समझ में आता है कि ईश्वर शरीर धारण करता है। ठीक है? अब

867
00:58:45,040 --> 00:58:49,040
जो उसने क्या किया? अब शरीर धारण कर रहा है। ठीक? अब वो उसको कुछ भी

868
00:58:49,040 --> 00:58:53,120
काम करना तो उसने अपने लिए एक शरीर बना लिया और शरीर को धारण करके वो अपना चलाता वलाता है जो भी करता

869
00:58:53,120 --> 00:58:57,120
है। ठीक है? एक हम ये अप्रोच लेके चलते हैं। तो जो हमें जो आंखों का विषय बनेगा वो

870
00:58:57,120 --> 00:59:01,360
शरीर हमें आंखों का विषय बनेगा। ठीक है? अब जैसे आपने वो बोला ना कि

871
00:59:01,360 --> 00:59:05,360
खिड़की वाला है ना कि खिड़की वो हमें ऐसा भास हो रहा है

872
00:59:05,360 --> 00:59:09,440
कि हम आकाश को देख रहे हैं। रियल में नहीं देख रहे हैं। उसी प्रकार से जैसे

873
00:59:09,440 --> 00:59:13,440
मैं आपको देख रहा हूं। ठीक है? आप क्या हो? आप तो जीव हो। भाई मैं

874
00:59:13,440 --> 00:59:17,440
आपको थोड़ी देख रहा हूं। मैं तो आपके शरीर को देख रहा हूं ना। तो उसी प्रकार से हम

875
00:59:17,440 --> 00:59:19,280
यह भी बोल सकते हैं कि हम

876
00:59:19,280 --> 00:59:23,440
कि मैं एक शरीर को देख रहा हूं। कृष्ण जी का, राम जी का जिन्हें आप अवतार कहते हो उनको मैं शरीर

877
00:59:23,440 --> 00:59:27,520
देख रहा हूं। इनडायरेक्टली मैं उन्हें या ईश्वर को देख रहा हूं। अगर ये मेरी

878
00:59:27,520 --> 00:59:31,600
जो मैंने भी समझा है अगर एज इट इज अवतार यही है तो आप हां बोल

879
00:59:31,600 --> 00:59:37,600
दो। फिर हम आगे बढ़ते हैं। नहीं है तो आप इस आप अपनी व्याख्या कर दो।

880
00:59:38,880 --> 00:59:42,960
शरीर देख रहा हूं। और ईश्वर को नहीं देख रहा हूं। इनडायरेक्टली

881
00:59:42,960 --> 00:59:46,960
ईश्वर को देख रहा हूं। हम जैसे इनडायरेक्टली मैं जीव आप जीव हो ना

882
00:59:46,960 --> 00:59:50,960
तो इनडायरेक्टली मैं आप ही से व्यवहार कर रहा हूं। लेकिन कहने का मतलब ये कह सकते हैं कि

883
00:59:50,960 --> 00:59:55,040
ईश्वर का आभास हो रहा है। ईश्वर का आभास हो रहा है। सीधे ईश्वर को ही

884
00:59:55,040 --> 00:59:59,200
नहीं देख रहे हैं। ये कह सकते हैं। जैसे जैसे जीव वाले में हो रहा है। हां।

885
00:59:59,200 --> 01:00:03,200
जैसे जीव में हो रहा है। जैसे आसमान में हो रहा है। जैसे सब में हो रहा है। जैसे जीव निराकार है

886
01:00:03,200 --> 01:00:07,200
ना। जैसे जीव आप निराकार हो। जीव आप जीव हो। जीव निराकार है। ठीक है?

887
01:00:07,200 --> 01:00:11,360
तो मैं भाई आपका रूप नहीं है। मैं कैसे देखूंगा? मैं आपको देख रहा हूं यानी आपके

888
01:00:11,360 --> 01:00:15,360
शरीर को देख रहा हूं। उस क्या जो अवतार की इस धारणा को जो मैंने समझा है

889
01:00:15,360 --> 01:00:19,360
जैसे एग्जांपल कहते हैं राम कृष्ण अवतार है तो मैंने राम कृष्ण में क्या देखा

890
01:00:19,360 --> 01:00:23,360
भाई रामकृष्ण का शरीर देखा जैसे मान ये रामायण में

891
01:00:23,360 --> 01:00:27,520
रामायण में वर्ण है ना शरीर सब लिखा हुआ है ना

892
01:00:27,520 --> 01:00:32,160
जीव और ईश्वर के रूप में केवल इतना अंतर है कि जीव

893
01:00:32,160 --> 01:00:36,320
जो है अविद्या से ढका हुआ शरीर है

894
01:00:36,320 --> 01:00:40,400
और जो ईश्वर है वो अविद्या से हटा मगर माया के संयोग के बिना कोई

895
01:00:40,400 --> 01:00:44,480
नहीं बनता है माया के माया के संयोग के

896
01:00:44,480 --> 01:00:48,480
बिना वो नहीं बना है। माया के संयोग से ही वो भी

897
01:00:48,480 --> 01:00:52,560
बना है। क्योंकि अगर अगल-बगल माया नहीं होगी तो हमें उसका स्ट्रक्चर नहीं

898
01:00:52,560 --> 01:00:56,800
दिखेगा। समझ रहे हैं ना? यानी माया इक्व टू प्रकृति। प्रकृति

899
01:00:56,800 --> 01:01:01,200
नहीं होगी तो स्ट्रक्चर नहीं दिखेगा। जो दिख रही है वो माया है।

900
01:01:01,200 --> 01:01:05,200
है ना? यानी यानी अगर हम इसे सामान्य भाषा में बोले इसे ज्यादा कॉम्प्लेक्स

901
01:01:05,200 --> 01:01:06,640
ना बनाए। ठीक है?

902
01:01:06,640 --> 01:01:10,720
अल्टीमेटली कहने का अर्थ यह है कि जैसे जीव शरीर धारण करता है वैसे ईश्वर भी

903
01:01:10,720 --> 01:01:14,880
शरीर धारण करता है। उसी को अवतार बोलते हैं। बस इतना है कि

904
01:01:14,880 --> 01:01:18,960
वो माया से बद्ध है। जीव और वो माया से मुक्त है।

905
01:01:18,960 --> 01:01:22,960
जो ईश्वर का अवतार है। जो ईश्वर का अवतार है वो माया से

906
01:01:22,960 --> 01:01:26,960
मुक्त है। जी। ठीक है। ये एक नोटिसबल। यानी अभी हमारे पास

907
01:01:26,960 --> 01:01:30,960
में ये बहुत ही चलिए। इतनी बातचीत होते इतनी क्लेरिटी

908
01:01:30,960 --> 01:01:34,960
स्पष्ट हो चुकी है। अवतारवाद में कि अवतारवाद की धारणा क्या? धारणा ये है कि भैया जैसे

909
01:01:34,960 --> 01:01:39,200
जीव धारण कर रहा है तो वो कर्मों के बंधन से कर रहा है। ठीक है? और वो अविद्या

910
01:01:39,200 --> 01:01:43,360
ग्रस्त है। जीव अविद्या ग्रस्त है। जो ईश्वर है वो अविद्या गग्रस्त है। जीव जो है जीव

911
01:01:43,360 --> 01:01:47,520
अपने मन से नहीं कर रहा है। जीव जो है बद्ध है इसलिए हो रहा है उसका और

912
01:01:47,520 --> 01:01:51,760
उसका कंट्रोलर कोई और है और जो ईश्वर है वो स्वयं से कर रहा है।

913
01:01:51,760 --> 01:01:55,920
स्वयं से कर रहा है। ठीक। बहुत बढ़िया बात। तो यानी इतना स्पष्ट है कि वो भी शरीर

914
01:01:55,920 --> 01:02:00,080
धारण करता है। चलिए ठीक है। अब अवतारवाद की धारणा पे हम आ चुके हैं। इतना क्लेरिटी आ चुका है।

915
01:02:00,080 --> 01:02:04,080
अच्छा अब हम सेकंड स्टेप पे अगले स्टेप पे बढ़ते हैं कि अवतार

916
01:02:04,080 --> 01:02:08,320
का लक्षण क्या है? जैसे जैसे समझिएगा

917
01:02:08,320 --> 01:02:12,800
कि मेरे सामने राम जी खड़े हैं। मेरे सामने रामपाल खड़ा है। ठीक है?

918
01:02:12,800 --> 01:02:16,800
दोनों में से ईश्वर का अवतार क्योंकि जीव और ईश्वर को तो मैं देख नहीं

919
01:02:16,800 --> 01:02:20,960
सकता। वो तो निराकार है। ठीक है? जो मुझे दिख रहा है वो शरीर है। तो इसमें

920
01:02:20,960 --> 01:02:21,680
लक्षण क्या

921
01:02:21,680 --> 01:02:25,760
है कि राम जी या रामपाल दोनों में से ईश्वर का अवतार है कौन? यह

922
01:02:25,760 --> 01:02:30,960
मैं कैसे पता करूं? इसमें इसमें इसमें शब्द ही प्रमाण है।

923
01:02:30,960 --> 01:02:35,200
इसमें शब्द क्या लिखा है? इसमें असतो मा सद्गमया

924
01:02:35,200 --> 01:02:39,280
का जवाब दिया। जिसने हमारे जो अंदर की जो क्या कहते

925
01:02:39,280 --> 01:02:43,600
हैं जो वास्तविक उत्कंठाएं जिज्ञासाएं अपने को जानने की

926
01:02:43,600 --> 01:02:48,000
उसने जो ज्ञान दिया उसके बारे में सही सही डेफिनेशन बनाई

927
01:02:48,000 --> 01:02:52,320
उसके द्वारा निर्धारित किया जाएगा कि इसमें से कौन ईश्वर का स्वरूप

928
01:02:52,320 --> 01:02:56,640
है ईश्वर का अवतार है और कौन नहीं इसमें शब्द प्रमाण है जैसे कि जैसे

929
01:02:56,640 --> 01:03:00,800
कि अगर ईश्वर सर्वव्यापक है तो सब जगह ईश्वर

930
01:03:00,800 --> 01:03:05,360
है और दुनिया में सारी दुनिया सारे स्वर ईश्वर के ही है।

931
01:03:05,360 --> 01:03:09,680
ईश्वर कहीं से भी कहीं किसी से अलग नहीं है। तो ऐसे में हमने

932
01:03:09,680 --> 01:03:14,320
केवल एक प्रणव को ही उसका दतक क्यों माना? प्रणव

933
01:03:14,320 --> 01:03:19,280
को ही उसका वो क्यों माना? प्रतीकात्मक तो इसका निर्णय आएगा

934
01:03:19,280 --> 01:03:23,360
गूंगा भी बोल सकता है। वो तो एक अलग चीज हो गई।

935
01:03:23,360 --> 01:03:28,640
मगर ये कोई सिद्धांत थोड़ी ना गूंगा।

936
01:03:28,640 --> 01:03:33,360
अगर कोई अगर कोई और ऐसा शब्द हुआ जो बोल सकता हो तो

937
01:03:33,360 --> 01:03:37,360
बोल सकते है अथो इति शब्द भी तो ईश्वर का है अथ भी तो इसी का है ईश्वर

938
01:03:37,360 --> 01:03:41,600
का ही है ना वेदों में आया क्यों नहीं उपनिषदों में अगर और अगर और कोई शब्द

939
01:03:41,600 --> 01:03:45,760
होगा जो गूंगा भी बोल सकता होगा तो उसको भी ईश्वर ईश्वर का वो मान लोगे क्या

940
01:03:45,760 --> 01:03:49,760
उसको प्रणव की जगह अरे शंकर भाष में मानो क्या बात कर रहे हो आप

941
01:03:49,760 --> 01:03:53,920
मैं वो नहीं कह रहा हूं मैं कह रहा हूं अगर केवल एक तर्क से हम मानेंगे कि

942
01:03:53,920 --> 01:03:58,160
भैया वो गूंगा भी बोल सकता है इसलिए वो ईश्वर का देवता है उससे ईश्वर को वो

943
01:03:58,160 --> 01:04:02,240
वो लीजिए तो फिर हमें वहां पर ये जो भी शब्द गूंगा बोल सकता होगा

944
01:04:02,240 --> 01:04:06,400
जो भी ध्वनिया वो कर सकता होगा उसको भी अपनी पूजा में लेना पड़ेगा मगर वहां

945
01:04:06,400 --> 01:04:10,400
पर शब्द प्रमाण वहां पर हमारा शब्द प्रमाण मैं

946
01:04:10,400 --> 01:04:14,480
बात पूरी कर लो जो भी शब्द की बात नहीं है आपने ये बोला कि ओम को इतनाेंस

947
01:04:14,480 --> 01:04:18,480
क्यों दिया तो वो बात जो भी शब्द की बात नहीं है नहीं बात मैं

948
01:04:18,480 --> 01:04:22,480
बता रहा हूं आपने उसको तर्क दिया ना उसके पक्ष में उदाहरण के रूप

949
01:04:22,480 --> 01:04:26,880
में आपने प्रणव के पक्ष में

950
01:04:26,880 --> 01:04:30,880
अरे भाई मेरी बात पूरी हुई नहीं। आपने प्रणव के पक्ष में एक

951
01:04:30,880 --> 01:04:35,200
तर्क दिया है क्योंकि उसको गूंगा भी बोल सकता है। तो मैंने उसको बताया

952
01:04:35,200 --> 01:04:39,280
कि गूंगा और भी धनिया निकाल सकता है। फिर प्रणव ही क्यों

953
01:04:39,280 --> 01:04:43,280
तो उसके बारे में यही है कि उसमें शब्द प्रमाण है। तो फिर रामपाल

954
01:04:43,280 --> 01:04:43,780
के बगल

955
01:04:43,760 --> 01:04:47,760
में श्री राम जी खड़े हैं। इसमें से कौन सा ईश्वर का अवतार है? कौन सा नहीं

956
01:04:47,760 --> 01:04:52,000
है? तो इसके लिए शब्द प्रमाण। अच्छा इसमें जैसे मुझे

957
01:04:52,000 --> 01:04:56,720
समझना है कि जैसे किसी जैसे

958
01:04:56,720 --> 01:05:01,360
किसी ने कॉपी में लिख के दिया मुझे। ठीक है? आपने मेरे को WhatsApp पे मान लो मैसेज भेजा

959
01:05:01,360 --> 01:05:05,520
कि दिल्ली में आप यहां हो। यहां पे एक व्यक्ति है। वो खड़ा

960
01:05:05,520 --> 01:05:09,760
है। आप उससे ये डॉक्यूमेंट ले लो। ठीक है? आपने मुझे बता दिया। उसका डिस्क्रिप्शन दे दिया कि फलाना

961
01:05:09,760 --> 01:05:13,760
फलाना ऐसा व्यक्ति है। पुलिस की वर्दी में खड़ा है। ऐसा-सा है। ठीक? अब मैं

962
01:05:13,760 --> 01:05:17,760
जब जाऊंगा उसके पास में तो मैं वेरीफाई तो करूंगा ना कि जिसका आपने लिखा है यह वही है या

963
01:05:17,760 --> 01:05:22,080
कोई और है। करूंगा तो जिन पैरामीटर से मैं वेरीफाई

964
01:05:22,080 --> 01:05:26,160
करूंगा वही पैरामीटर उसके लक्षण है। किताब में ठीक है। किताब में किसी व्यक्ति की

965
01:05:26,160 --> 01:05:30,400
बात की गई है। किताब में उसी व्यक्ति की बात की जा रही है। वो जिन मा जिन पैरामीटर

966
01:05:30,400 --> 01:05:34,400
से चेक होगा। ठीक है? उदाहरण के लिए मैं आपको समझाता हूं। किताब में

967
01:05:34,400 --> 01:05:38,560
तो यह भी लिखा है कि ईश्वर है। है ना? किताब में यह भी लिखा है कि ईश्वर

968
01:05:38,560 --> 01:05:42,560
सृष्टि करता है। नास्तिक को सिद्ध करने के लिए लक्षण बताते हैं ना? नास्तिक को सिद्ध करने के लिए

969
01:05:42,560 --> 01:05:46,640
तर्क देते हैं ना प्रमाण देते हैं। क्यों देते हैं? क्योंकि पॉइंट है उसी

970
01:05:46,640 --> 01:05:50,640
प्रकार से क्योंकि सामने वाला व्यक्ति ईश्वर को मान नहीं रहा है। तो जैसे ही सामने वाला व्यक्ति

971
01:05:50,640 --> 01:05:54,800
जब अवतार को नहीं मान रहा तो उसको बता समझने के लिए। ठीक है? इन ऑर्डर टू अंडरस्टैंड

972
01:05:54,800 --> 01:05:58,880
दोज़ थिंग्स। तो हमें क्या करना है? हमें बताना है कि लक्षण क्या है कि भैया मेरे सामने अगर अवतार

973
01:05:58,880 --> 01:06:03,200
खड़े हो कि ये वही है। जैसे कृष्ण जी के समय में भी उनका एक डुप्लीकेट आया था।

974
01:06:03,200 --> 01:06:07,280
कुछ पंड्रिक कुंड्रिक कुछ नाम था उसका बोल रहा हूं मैं। तो वो भी

975
01:06:07,280 --> 01:06:11,280
आया था। वो भी वासुदेव पुत्र और बनके और वो मोर पंख लगा के चार हाथ ला के

976
01:06:11,280 --> 01:06:15,280
घूमता था। उसने भी अपने नकली भाई बलराम सब तो उसमें

977
01:06:15,280 --> 01:06:19,360
भी पहचान को लेकर के उसमें उसके भी बहुत चेले क्योंकि बहुत लोग भ्रमित हुए थे। उसके

978
01:06:19,360 --> 01:06:24,240
बहुत भक्त बने थे। युद्ध हुआ था उसमें वो मारा गया था। शायद भागवत में आता था।

979
01:06:24,240 --> 01:06:28,240
तो बात वही है कि जो यहां शब्द में लिखा हुआ है, शास्त्र

980
01:06:28,240 --> 01:06:32,480
में लिखा हुआ है तो वहां मैं वेरीफाई तो करूंगा ना तो मैं किन पैरामीटर से वेरीफाई करूंगा?

981
01:06:32,480 --> 01:06:36,560
वो जो लक्षण है वो है क्या? वो स्पष्ट कर। देखिए इसमें मैं बता

982
01:06:36,560 --> 01:06:40,560
दूं। एक कुछ पैराटर्स ऐसे हो सकते हैं कि

983
01:06:40,560 --> 01:06:44,720
भाई वो जैसे हमने मान लिया कि भाई तुम ये कर सकते हो पहाड़ उठा सकते हो या

984
01:06:44,720 --> 01:06:49,600
तुम यहां पर खड़े हो तुम दिल्ली में प्रकट हो सकते हो क्योंकि सर्वशक्तिमान है तो ऐसे

985
01:06:49,600 --> 01:06:53,680
हम लोग कह सकते हैं मगर अगर हम ये कहे कि भाई तुम सर्वव्यापक हो ये सिद्ध

986
01:06:53,680 --> 01:06:57,680
करो हम तुम सर्व्यापक हो ये सिद्ध करो

987
01:06:57,680 --> 01:07:01,680
हमें दिखाओ सर्व्यापक तो उसमें वो जो पैरामीटर है ना वो हमारे व्यवहार का

988
01:07:01,680 --> 01:07:05,680
विषय नहीं है पूरा का पूरा हम उसे जांच नहीं सकते इसलिए वहां पे हमें

989
01:07:05,680 --> 01:07:10,240
शब्द प्रमाण पे ही रुकना पड़ेगा तो आप आप

990
01:07:10,240 --> 01:07:14,320
जैसे पैरामीटर बता दो कि दो चार क्या है ऐसा ऐसा है वो बता दो किन पैरामीटर

991
01:07:14,320 --> 01:07:18,800
से वो अवतार सिद्ध होगा तो मैं फिर उसमें जवाब दूं नहीं मैं तो मानता ही नहीं ना

992
01:07:18,800 --> 01:07:22,960
नहीं नहीं आप बताओ क्या वो ये क्या आप ये आप अपनी

993
01:07:22,960 --> 01:07:27,120
वो बताओ ना क्या ऐसा हो सकता है क्या ऐसा हो सकता है तो मैं जवाब दूं उसका

994
01:07:27,120 --> 01:07:31,120
देखो मैं अपनी किसी को ईश्वर मानने का एक

995
01:07:31,120 --> 01:07:35,440
किसी को ईश्वर मान लेने का एक ही पैरामीटर है अगर लक्षण

996
01:07:35,440 --> 01:07:39,600
की बात करें वो सर्वशक्तिमान हूं। मैं आपकी बात समझ गया। मैं

997
01:07:39,600 --> 01:07:43,680
देता हूं उत्तर इसका। अब देखो पॉइंट इसके अंदर क्या है कि जहां तक आपने बोला

998
01:07:43,680 --> 01:07:47,760
कि कुछ चीजें जैसे पहाड़ उठा सकता है इत्यादि इत्यादि कुछ ऐसे पॉइंट

999
01:07:47,760 --> 01:07:50,160
है जिसको हम उसके लक्षणों में घटा सकते हैं।

1000
01:07:50,160 --> 01:07:54,320
ठीक है? क्योंकि सीधी बात है कि अगर जीव ने शरीर धारण किया है।

1001
01:07:54,320 --> 01:07:58,320
ठीक है? एक है बद्ध जीव, एक है मुक्त जीव जिसकी मुक्ति के कगार पे

1002
01:07:58,320 --> 01:08:02,480
है। दोनों के लक्षण जीव नहीं है। मुक्त ईश्वर है। जो मैंने

1003
01:08:02,480 --> 01:08:06,800
बोला कि मुक्ति के कगार पे होगा। मैंने ये शब्द बोला। ठीक है? मुक्ति के जो कगार पे होगा

1004
01:08:06,800 --> 01:08:10,960
ठीक है नहीं नहीं मुक्ति के कगार पे नहीं ईश्वर जो मुक्त

1005
01:08:10,960 --> 01:08:15,120
है वो अवतार ले रहा है नहीं मैं क्या कह रहा हूं उसको समझिए मैं

1006
01:08:15,120 --> 01:08:19,200
उदाहरण दे रहा हूं आप तत्व कह लीजिए एक है बद्ध तत्व और एक

1007
01:08:19,200 --> 01:08:23,200
है मुक्त तत्व ऐसे कह लीजिए नहीं नहीं आपको क्योंकि आपके सिद्धांतों

1008
01:08:23,200 --> 01:08:27,280
के विपरीत ना जाना पड़े तो आप उस तरह से कह लीजिए एक है मुक्त तत्व और

1009
01:08:27,280 --> 01:08:31,520
एक है बद्ध तत्व अभी तो आप मेरी मेरी परिभाषा को कह

1010
01:08:31,520 --> 01:08:35,600
ही नहीं रहा हूं आपने मुक्त जीव कहा ना मैं समझा देता

1011
01:08:35,600 --> 01:08:39,760
हूं मैं क्या मेरे को बोलने तो दीजिए जी मैं ये कह रहा हूं कि

1012
01:08:39,760 --> 01:08:42,320
जैसे उदाहरण के रूप में उदाहरण के

1013
01:08:42,320 --> 01:08:46,400
रूप में कोई बद्ध जीव है जीव तो बद्ध ही होता है है ना लेकिन

1014
01:08:46,400 --> 01:08:50,400
कोई ऐसा जीव है जो बहुत कई जन्मों से तपस्या कर रहा है तपश्चर्या

1015
01:08:50,400 --> 01:08:54,400
कर रहा है और वो मुक्ति के कगार पे है ठीक है

1016
01:08:54,400 --> 01:08:58,400
उसमें और जो एक डाकू चोर लुटेरा उनकी मनस्थिति

1017
01:08:58,400 --> 01:09:02,400
में ठीक है कुछ तो अंतर होगा कुछ तो गुणों में अंतर उनके व्यवहार में

1018
01:09:02,400 --> 01:09:06,560
उनके ज्ञान में कुछ तो अंतर होगा। है ना? तो हमें तो जब हम किसी

1019
01:09:06,560 --> 01:09:10,560
व्यक्ति से सिद्ध कोटि के व्यक्ति से बात करते हैं तो हमें एक अच्छा अनुभव होता

1020
01:09:10,560 --> 01:09:14,560
है। हमें समझ में आता है कि यार ये व्यक्ति वो उसके लफंगे जैसा नहीं है। हमें समझ में आता है।

1021
01:09:14,560 --> 01:09:18,640
ठीक है? तो उसी प्रकार से जैसे आपने बोला कि अवतार के

1022
01:09:18,640 --> 01:09:22,880
विषय में सारी चीजें तो नहीं जैसे सर्वव्यापकता को नहीं किया जा सकता। लेकिन कुछ-कुछ चीजें लक्षण

1023
01:09:22,880 --> 01:09:27,200
बताए जा सकते हैं। वो दो चार लक्षण जो भी आपको समझ में आए आप वो मुझे बता दो।

1024
01:09:27,200 --> 01:09:31,280
ठीक है? एक पॉइंट। दूसरा पॉइंट आपने एक और लाइन बोला था कि आपको क्या समझ में आ रहा है?

1025
01:09:31,280 --> 01:09:35,840
आप बता दो। मुझे क्या समझ में आ रहा है? मैं बता देता हूं। मेरे दृष्टिकोण से मेरे दृष्टिकोण

1026
01:09:35,840 --> 01:09:41,200
से मेरे सामने कोई मनुष्यधारी है। ठीक है?

1027
01:09:41,200 --> 01:09:45,440
मेरे को मैं सोच ही नहीं पा रहा कोई ऐसा पॉइंट कि जिससे मैं डिफरेंशिएट कर दूं

1028
01:09:45,440 --> 01:09:51,200
कि फलाना व्यक्ति इंसान नहीं है। ईश्वर है। मेरे दिमाग में कोई आ ही नहीं रहा पॉइंट।

1029
01:09:51,200 --> 01:09:55,200
मेरे इसीलिए मैंने आपसे पूछा। हां तो मैंने वो लक्षण बता दिया

1030
01:09:55,200 --> 01:09:57,440
सर्वशक्तिमान। अभी हम अंडरस्टैंडिंग की तरफ ही है। वी

1031
01:09:57,440 --> 01:10:01,520
आर अभी हम अंडरस्टैंडिंग हम अवतार को समझ रहे हैं। अवतार की धारा शरीर

1032
01:10:01,520 --> 01:10:05,520
धारण मैंने लक्षण बता दिया सर्वशक्तिमान यानी वो

1033
01:10:05,520 --> 01:10:09,600
कुछ भी कर सकता है तो ही माना जाएगा कि वो है ना यानी अगर

1034
01:10:09,600 --> 01:10:13,680
मेरे सामने कोई ऐसा व्यक्ति है जो कुछ भी कर दे तो हम मैं मान लूंगा

1035
01:10:13,680 --> 01:10:18,160
कि वो ईश्वर है। अगर कुछ भी नहीं कर पा रहा कहीं अटक जा रहा है तो

1036
01:10:18,160 --> 01:10:22,240
ठीक है। जो कुछ भी कर सकने की बात जिसकी शब्द प्रमाण से मानी

1037
01:10:22,240 --> 01:10:26,480
जा रही हो। बात दिक्कत ये है कि कई चीजें करने के लिए वो मनुष्य उसका

1038
01:10:26,480 --> 01:10:30,480
गवा साक्षी नहीं हो सकता। कई चीजें ऐसी है वो करने को

1039
01:10:30,480 --> 01:10:34,800
कह दिया जाए तो मनुष्य उसका साक्षी नहीं हो सकता। तो जब उसका साक्षी नहीं हो सकता तो

1040
01:10:34,800 --> 01:10:38,800
इसीलिए तो फंस रहे हैं ना यही तो फंस रहे हैं। हां पॉइंट क्या है? जब

1041
01:10:38,800 --> 01:10:42,880
हम लक्षण की बात कर रहे हैं तो अब अभी जैसे आपने बोल दिया सर्वशक्तिमान ठीक है। कुछ भी

1042
01:10:42,880 --> 01:10:46,960
कर सकता है। उदाहरण के रूप में मैं बोल दूं। अच्छा आप ये मानते हैं

1043
01:10:46,960 --> 01:10:51,120
मैं आपसे एक नॉर्मल सा प्रश्न बोल रहा हूं। ये कोई बहुत इंपॉर्टेंट प्रश्न नहीं है। नॉर्मल है कि क्या राम

1044
01:10:51,120 --> 01:10:55,120
जी जो है ईश्वर जो है जिसे आप जिन्हें आप ईश्वर आप अवतार मानते हो

1045
01:10:55,120 --> 01:10:59,200
तो मैं आपको उसी हिसाब में बात कर रहा हूं कि क्या ईश्वर राम के रूप में अधर्म कर

1046
01:10:59,200 --> 01:11:03,200
सकता है? आप मानते हैं इस चीज को? हां कर सकता है। क्यों

1047
01:11:03,200 --> 01:11:07,280
नहीं कर सकता? ठीक है। क्या ईश्वर बिना श्री राम का शरीर

1048
01:11:07,280 --> 01:11:11,440
धारण किए हुए सीता माता से शादी कर सकता है।

1049
01:11:11,440 --> 01:11:12,720
बिना सीता माता

1050
01:11:12,720 --> 01:11:16,720
से शादी शादी कहते किसे हैं? इस पे जाइए पहले। वही पॉइंट

1051
01:11:16,720 --> 01:11:20,720
है ना? नहीं कर सकता। अटक रहा है वहां पे। यह शादी तो शरीर नहीं नहीं आप आप

1052
01:11:20,720 --> 01:11:24,720
उसको सिद्ध करिए ना कि बिना शरीर के वो शादी होती है कि नहीं तब तो मैं उस पे

1053
01:11:24,720 --> 01:11:29,120
जाऊं मैं वही तो यहां कर सकता है हो ही नहीं सकती आ रहा है अटक रहा है ना काम

1054
01:11:29,120 --> 01:11:33,200
कि बिना शरीर के जैसे समझो इस चीज को जैसे मैंने एक ऐसा काम दे दिया जिसको बिना

1055
01:11:33,200 --> 01:11:37,280
शरीर के द्वारा नहीं किया जा सकता तो मैं ये अगर वो सर्वशक्तिमान है तो क्या बिना शरीर

1056
01:11:37,280 --> 01:11:41,440
के कर सकता है मैंने यही काम ही मैंने जानबूझ के काम दिया है तो मैं पूछ रहा हूं नार्मल

1057
01:11:41,440 --> 01:11:45,680
इसमें इसमें एक लॉजिक आ जाता है मैं बता देता हूं आपको जी ठीक है जिसमें शरीर

1058
01:11:45,680 --> 01:11:49,840
की आवश्यकता है क्या इसको लॉजिकल पैलेस कहते हैं शायद अंग्रेजी वाले लोग

1059
01:11:49,840 --> 01:11:53,840
इस तरह की चीजों को क्या वो दो और दो पांच कर सकता है थोड़ा मुझे समझाइए

1060
01:11:53,840 --> 01:11:58,160
इसमें इसमें एक वो आ जाता है कि अंतत गत्वा

1061
01:11:58,160 --> 01:12:02,480
अगर हम अविद्या के उसको स्वीकार करते हैं अस्तित्व को माया के अस्तित्व

1062
01:12:02,480 --> 01:12:06,480
को स्वीकार करते हैं तो हमें ये मानना पड़ेगा कि ईश्वर हमें

1063
01:12:06,480 --> 01:12:10,640
वही इंफॉर्मेशन प्राप्त करवा रहा है जो इंफॉर्मेशन सत्य

1064
01:12:10,640 --> 01:12:14,880
नहीं है। है ना? बोलिए

1065
01:12:14,880 --> 01:12:20,560
पूरा वही इन दे रहा है ना जो सत्य नहीं है।

1066
01:12:20,560 --> 01:12:24,640
हां पूरा बोलिए। मैं मतभेद रखता हूं इसलिए मैं हामी नहीं भर रहा हूं। पूरा बोलिए। हां

1067
01:12:24,640 --> 01:12:27,760
अंतत गत्वा अविद्या को तो कहीं ना कहीं आपने भी

1068
01:12:27,760 --> 01:12:32,160
माना है। तो अंतत गत्वा जो है हमें ऐसी इंफॉर्मेशन

1069
01:12:32,160 --> 01:12:36,160
प्राप्त हो रही है जो रियल नहीं है। तो अगर ऐसी कोई चीज अटक जाएगी

1070
01:12:36,160 --> 01:12:40,240
ना जो इसमें आ जाएगी जो हो ही नहीं सकता है। तो उसके पास अविद्या

1071
01:12:40,240 --> 01:12:44,640
शक्ति है। वो आपको इंफॉर्मेशन देगा केवल कि हो गया। हो गया सर

1072
01:12:44,640 --> 01:12:48,880
हमारी रियल में नहीं हुआ हमारी जो हां रियल में नहीं हुआ परमार्थ में नहीं हुआ मैं रियल

1073
01:12:48,880 --> 01:12:53,120
की कह रहा हूं हां रियल में नहीं हुआ बिल्कुल मगर वो रियल

1074
01:12:53,120 --> 01:12:57,440
में आप पहुंचे कैसे एक मिनट रियल में आप पहुंचे कैसे उसका साक्षी

1075
01:12:57,440 --> 01:13:01,680
कौन है रियल में वो व्यक्ति पहुंचा कैसे पहुंचा

1076
01:13:01,680 --> 01:13:05,920
रियलिटी में तब उसको पहले यहां किसी को तब उसको पहले

1077
01:13:05,920 --> 01:13:09,920
यहां पे किसी ईश्वर की सत्ता को मानना पड़ेगा और ईश्वर की सत्ता को

1078
01:13:09,920 --> 01:13:15,920
सिद्ध करने के लिए फिर वहां पर उसका जो है अवतार इत्यादि

1079
01:13:16,080 --> 01:13:20,080
सिद्धांतिक रूप से कहने का मतलब ये है ईश्वर

1080
01:13:20,080 --> 01:13:24,080
जो अवतार लेता है तो क्या ईश्वर सैद्धांतिक रूप से ये कार्य कर सकता है

1081
01:13:24,080 --> 01:13:28,080
बिना शरीर के तो नहीं कर सकता मैंने कहा ना

1082
01:13:28,080 --> 01:13:32,560
कि ईश्वर हमको ऐसी इंफॉर्मेशन दे सकता है जो इंफॉर्मेशन

1083
01:13:32,560 --> 01:13:36,560
रियल नहीं है और जो पूरा स्ट्रक्चर है एक एक

1084
01:13:36,560 --> 01:13:40,640
मिनट जो जो अद्वैत का स्ट्रक्चर है उसमें तो एक ही तत्व

1085
01:13:40,640 --> 01:13:43,440
है दूसरा तो तत्व ही नहीं मगर हमको

1086
01:13:43,440 --> 01:13:47,440
बहुत सारे तत्व दिख रहे हैं अविद्या के कारण तो एक एक अविद्या वो

1087
01:13:47,440 --> 01:13:51,440
और दे देगा। एक अव एक अविद्या वो और दे देगा कि भैया

1088
01:13:51,440 --> 01:13:55,600
बिना शरीर के उसने वो कर लिया विवाह कर लिया।

1089
01:13:55,600 --> 01:13:59,680
मगर बात ये है कि अगर हम ये कहने लगेंगे कि रियल में ऐसा नहीं हुआ है

1090
01:13:59,680 --> 01:14:03,840
और यहां पर हुआ है। मगर रियल में नहीं हुआ है। तो हमें ये मानना पड़ेगा कि भाई वो रियल

1091
01:14:03,840 --> 01:14:07,920
की दुनिया आपको प्राप्त कैसे उसका साक्षी कौन है? हमने जो कहा है कि ईश्वर

1092
01:14:07,920 --> 01:14:12,160
अवतार लेता है। हमने जो कहा है कि ईश्वर अवतार लेता है वो

1093
01:14:12,160 --> 01:14:16,160
मनुष्यों का ईश्वर है। प्राणियों का ईश्वर है। देहधारी प्राणियों का हमने कभी नहीं

1094
01:14:16,160 --> 01:14:20,160
कहा कि जो व्यक्ति मुक्त है जो रियल की दुनिया में है उसका ईश्वर अवतार

1095
01:14:20,160 --> 01:14:24,560
लेता है। हमने कहा कि जो यहां पे जो फंसा हुआ बद्ध जीव है अविद्या

1096
01:14:24,560 --> 01:14:28,640
ग्रस्त है उसका उसके लिए ईश्वर उसका जो ईश्वर है वो अवतार लेता

1097
01:14:28,640 --> 01:14:32,880
है। ठीक है? मैं आपको बताता हूं इसमें पॉइंट क्या है। देखिए

1098
01:14:32,880 --> 01:14:36,880
आपने कहा कि कौन से स्तर पे जैसे मैं बोलूं कि क्या ईश्वर दो और दो को पांच कर सकता है?

1099
01:14:36,880 --> 01:14:40,880
तो आप बोलोगे हां कर सकता है। मैं पूछूं कैसे कर सकता है? तो हमें बेवकूफ बना देगा। दिमाग भ्रम डाल

1100
01:14:40,880 --> 01:14:44,880
देगा कि नहीं दो और दो पांच हो गया। मैं ये नहीं कह रहा। मैं मैं ईश्वर को ये नहीं कह रहा कि

1101
01:14:44,880 --> 01:14:48,960
आ ईश्वर मेरे को बेवकूफ बना कि दो और दो पांच हो गए। मैं ये नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं

1102
01:14:48,960 --> 01:14:52,960
उसको ऐसे कर दो। मैथमेटिकली कर दो। पूछे तो ईश्वर पूछेगा भाई तू ही बता

1103
01:14:52,960 --> 01:14:57,120
दे कैसे करूं? तो मैं ईश्वर को बोलूंगा कि आप मैथमेटिकली कर दो। ठीक है? उसी

1104
01:14:57,120 --> 01:14:58,560
प्रकार से उसी प्रकार से अब

1105
01:14:58,560 --> 01:15:02,640
मैं ईश्वर को मैंने ईश्वर को यह बोला कि जब मैंने बोला ना कि बिना शरीर के

1106
01:15:02,640 --> 01:15:06,320
तुम सीता जी से शादी करो तो ईश्वर बोलेगा भाई बिना शरीर के तो हो नहीं सकता तो बोलो कैसे

1107
01:15:06,320 --> 01:15:10,560
करूंगा सिद्धांत देखिए देखिए मैं आपको एक बात बताऊं यहां मैं आपको क्रॉस करूंगा आपके

1108
01:15:10,560 --> 01:15:14,720
उदाहरण विवाह संभोग इत्यादि से अलग हटके भी हो सकते हैं

1109
01:15:14,720 --> 01:15:19,280
तो ऐसी कोशिश करिए ऐसी कोशिश ऐसी कोशिश करिए

1110
01:15:19,280 --> 01:15:23,600
ऐसे उदाहरण दीजिए जो कि क्या कहते हैं जो जो नैतिक

1111
01:15:23,600 --> 01:15:28,800
मर्यादा है उसको तोड़ने के करीब ना पहली बात दूसरी दूसरी बात

1112
01:15:28,800 --> 01:15:32,800
दूसरी बात भाई साहब मुझे मुझे बोलने दीजिए मुझे बोलने दीजिए एक बार

1113
01:15:32,800 --> 01:15:33,360
दूसरी बात

1114
01:15:33,360 --> 01:15:37,520
मैंने आपको पहले ही बता दिया कि आपको उसने बेवकूफ बनाया है इसका साक्षी

1115
01:15:37,520 --> 01:15:41,600
कौन होगा ये बताइए वो सिद्ध कैसे करोगे कि उसने बेवकूफ

1116
01:15:41,600 --> 01:15:45,840
बनाया वही तो मैं कह रहा हूं अगर वो हां मैं उसका उत्तर दे दे रहा हूं अगर वो मैथमेटिकली

1117
01:15:45,840 --> 01:15:49,840
होगा तो मैथमेटिकल कैलकुलेशन रूल्स के अकॉर्डिंग होगा ना अगर वो उसके अकॉर्डिंग नहीं

1118
01:15:49,840 --> 01:15:53,920
है वैसा कुछ रूल नहीं दिख रहा डायरेक्ट हमें भास हो गया उसके माइंड में उसके माइंड में

1119
01:15:53,920 --> 01:15:58,000
वो मैथमेटिकल रूल्स डाले किसने ने बिना

1120
01:15:58,000 --> 01:16:02,240
मैथमेटिक्स के डाले ना अगर मैथमेटिकल के अकॉर्डिंग हो सकता जो रूल्स है जिनके

1121
01:16:02,240 --> 01:16:07,040
अकॉर्डिंग सिद्ध होगा जो रूल्स है वो रूल्स कहां से आए

1122
01:16:07,040 --> 01:16:11,120
रूल्स है ही तो नहीं यही तो पॉइंट है अरे मैथ के जो रूल्स है कि दो

1123
01:16:11,120 --> 01:16:15,200
और दो पांच नहीं हो सकता है वो कहां से आए न्यूमरोलॉजी से

1124
01:16:15,200 --> 01:16:19,680
आए और न्यूमरोलॉजी ईश्वर से आई है कि नहीं आई पढ़े हैं आपने

1125
01:16:19,680 --> 01:16:24,080
थ्री होते हैं देखिए अब आप खास जो है खामखा खामखा

1126
01:16:24,080 --> 01:16:28,240
भटका रहे हैं मामले को मैं पॉइंट पे आ गया हूं तो भटका रहे हो आप। मैं बता रहा हूं वो

1127
01:16:28,240 --> 01:16:32,480
जो रूल्स मैं भी आपसे बोल सकता हूं ना वो आपके पास वो जो

1128
01:16:32,480 --> 01:16:36,480
वो जो रूल भाई साहब वो जो रूल्स है वो जो रूल्स है वो

1129
01:16:36,480 --> 01:16:40,480
जो रूल्स है वो ईश्वर से ही आए हैं ना। अरे ईश्वर से

1130
01:16:40,480 --> 01:16:44,560
कैसे आ जाएंगे? ईश्वर ने अरे भाई आपको ये कहां से पता लगा है कि दो और दो

1131
01:16:44,560 --> 01:16:48,400
पांच और चार होते हैं। अच्छा मैं आपको बता देता हूं ना। इसी का

1132
01:16:48,400 --> 01:16:53,440
उत्तर सुन लीजिए। हां। प्रिंसेस एपिया और मैथमेटिका नाम सुना है कभी?

1133
01:16:53,440 --> 01:16:58,000
मुझे पता है आप क्या कर रहे हो। आप जहां पर फस रहे हो आप खामखा एक वो अपनी

1134
01:16:58,000 --> 01:17:02,080
जिसको कहते हैं मैं बता रहा हूं अपना प्रभाव उत्पन्न करने के लिए जिन

1135
01:17:02,080 --> 01:17:06,480
क्षेत्रों में विशेषज्ञ हो उसको यहां प्रकट कर रहे हो और क्या है

1136
01:17:06,480 --> 01:17:10,880
इंग्लिश बोल लो और आपने मैथमेटिक्स पढ़ी है तो उसको यहां बहुत ज्यादा

1137
01:17:10,880 --> 01:17:15,120
विवेचना कर दो उससे पॉइंट नहीं बदलेगा आपके पास आपके

1138
01:17:15,120 --> 01:17:19,920
पास देखिए आप देखिए जो जो

1139
01:17:19,920 --> 01:17:23,920
मेरे पास उत्तर है मैं बता तो रहा हूं जो अंतवा अंतत

1140
01:17:23,920 --> 01:17:28,000
गतवा जो आपके पास जो ज्ञान है वो ईश्वर से आया है कि नहीं आया

1141
01:17:28,000 --> 01:17:32,000
है कि ईश्वर के बाहर किसी की बात हो रही है कि अभी की बात हो रही है तो अभी

1142
01:17:32,000 --> 01:17:36,480
मैं अंतत गतवा की बात बता रहा हूं ना अंतत की बात मैं अंतत

1143
01:17:36,480 --> 01:17:39,040
की मैं आपको

1144
01:17:39,040 --> 01:17:44,000
मैं आपको मैं आपको अंततवा की बात बता रहा हूं भाई साहब मैं आपको अंत

1145
01:17:44,000 --> 01:17:48,400
अंततवा की बात बता रहा हूं सुनिए तो आप सुन लीजिए नहीं

1146
01:17:48,400 --> 01:17:52,400
देखिए जो मूर्ख की बात है वो मैं आपको

1147
01:17:52,400 --> 01:17:58,160
बता रहा हूं अंतत गतवा की बात कि जो दो और दो

1148
01:17:58,160 --> 01:18:02,480
और दो चार कैसे हुआ आपको मालूम है आप हसोगे

1149
01:18:02,480 --> 01:18:06,160
तो आपको बात होने ही नहीं दोगे आपको मालूम है आपसोगे

1150
01:18:06,160 --> 01:18:10,160
मैं बोल रहा था तो आप फसोगे ही नहीं मैं आपको बोल रहे मेरे बीच

1151
01:18:10,160 --> 01:18:14,160
में आप आए हो अच्छा आप बोल लीजिए बोल लीजिए आपको जो बोलना

1152
01:18:14,160 --> 01:18:18,160
है बोल लीजिए अब अपना प्रभाव आप छोड़ लीजिए बीच में आप कूदोगे तो

1153
01:18:18,160 --> 01:18:22,480
रोकना ही पड़ेगा ना बीच में मत कदो ठीक है आप बोल लीजिए मैं कूद कूद नहीं रहा हूं। मेरा कूदना

1154
01:18:22,480 --> 01:18:26,480
सिद्ध करिए आप। चलिए बीच में आप कूदना नहीं कर

1155
01:18:26,480 --> 01:18:30,560
रहे हो। आपने कहा कूद रहा हूं। कूदना सिद्ध करो। अच्छा इसे टॉपिक डायवर्ट करना

1156
01:18:30,560 --> 01:18:34,560
है ना। ऐसे ही टॉपिक डायवर्ट नहीं आप ये जो कटाक्ष पूर्ण वाली

1157
01:18:34,560 --> 01:18:38,720
भाषा ले रहे हो ना इस पे मैं प्रहार कर रहा हूं। आपको वहां पे आपको

1158
01:18:38,720 --> 01:18:42,720
मेरा वहां पे आसमान दिखाई देने से दिक्कत है। यहां मेरा कूदना कह रहे हो। ये

1159
01:18:42,720 --> 01:18:47,200
भी आपने व्यवहार में कहा ना आप कूदना सिद्ध करो। आप तात्विक व्याख्या में

1160
01:18:47,200 --> 01:18:51,280
अरे भैया कूदना सिद्ध करो। मैं कह रहा हूं मैं कह रहा हूं मेरा

1161
01:18:51,280 --> 01:18:55,840
जंप लेना सिद्ध करो आप नहीं तो आपने उसके लिए वापस क्षमा मांगो

1162
01:18:55,840 --> 01:18:59,920
भाई मैंने बोला कि आपने प्रैक्टिकली जंप किया आपने कहा कि कूद कूद रहे हो आप मेरे

1163
01:18:59,920 --> 01:19:03,920
बीच में कूदना मेरा सिद्ध करो मैंने बोला ना कि आप मेरे मैं बोल रहा

1164
01:19:03,920 --> 01:19:07,920
हूं मेरे बोलने के बीच में कूद रहे हो मैंने ये बोला ना वो तो कर ही रहे हो आप मेरे

1165
01:19:07,920 --> 01:19:12,000
बीच में कूद रहे हो इसलिए इसलिए मैं कह रहा हूं ऐसी भाषा का उपयोग

1166
01:19:12,000 --> 01:19:16,000
मत करो जो आप हल्की सी जो रहे हो मैं अच्छा मन

1167
01:19:16,000 --> 01:19:20,240
लेकर के बैठा हुआ हूं आपके साथ बात करने के लिए ठीक आप उस तरह से रहिए

1168
01:19:20,240 --> 01:19:21,200
आप कटाक्षों में

1169
01:19:21,200 --> 01:19:25,200
मत जाइए या फिर इनडायरेक्ट में हम सामने वाले को नीचा दिखाएंगे या

1170
01:19:25,200 --> 01:19:29,760
हंसी उड़ा लेंगे फिर बाद में क्लिप काट करके उसका वो बनाएंगे शॉट बनाएंगे

1171
01:19:29,760 --> 01:19:34,000
ये सब आप मत करिए करना है तो अच्छी बात नहीं है ठीक है टॉपिक आप डाइवर्ट

1172
01:19:34,000 --> 01:19:38,320
आपको कूदने जैसी भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए अपने से बड़े के लिए आप मत करो

1173
01:19:38,320 --> 01:19:42,320
बोल रहा हूं मेरे पीछे मत बोलिए आपने अभी इससे आपने आपने कूदना कहा ना कूदना

1174
01:19:42,320 --> 01:19:46,560
शब्द उपयोग में नहीं आएगा जिसका आप सम्मान करते हैं उसके लिए कर दूं मैं एक्सप्लेन

1175
01:19:46,560 --> 01:19:50,720
कर दूं मैं एक्सप्लेन कर दूं कर दूं। अब आप इसको एक्सप्लेन कर

1176
01:19:50,720 --> 01:19:54,720
लेना। अब आप इसको एक्सप्लेन करो। आपने क्यों

1177
01:19:54,720 --> 01:19:58,800
बोला? आपने कहा भले ही था। आपने कहा भले ही था कि मत एक के लिए आया हूं।

1178
01:19:58,800 --> 01:20:02,960
मगर आप सामने वाले को केवल उसकी कोई भी एक बात को गलत साबित करने आए।

1179
01:20:02,960 --> 01:20:07,120
देखो मैंने द्विवेदी की ये बात गलत साबित कर दी। जब मैं

1180
01:20:07,120 --> 01:20:11,280
सुनिए सुनिए जब मैं फ्रस्टेट मत होइए। शांत रहिए। फ्रस्टेट मत होइए। जरूरत नहीं फ्रस्टेट होने की शांत रहिए। अरे

1181
01:20:11,280 --> 01:20:16,320
भैया मैंने थोड़ी ना आपके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया है जो मैं जो आप फ्रस्टेट होंगे

1182
01:20:16,320 --> 01:20:20,400
आप आप जो अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हो आप कूद रहे हो मेरे बीच में मैं कोई चिलटू

1183
01:20:20,400 --> 01:20:25,440
बच्चा हूं क्या कोई दो दो साल का आपसे मैं छोटा हूं क्या जो आप ऐसे बोलोगे

1184
01:20:25,440 --> 01:20:29,440
अरे अगर मैंने आपको कुछ अभद्र बोला उसके लिए हाथ जोड़ लिया ठीक है अगर नहीं

1185
01:20:29,440 --> 01:20:33,520
अगर नहीं बोला ही है अगर नहीं है चलो ठीक है चलो ठीक है मैंने बोला

1186
01:20:33,520 --> 01:20:36,560
है मैंने आपको बहुत कुछ अपशब्द बोल दिया ठीक

1187
01:20:36,560 --> 01:20:41,120
ये भी गलत है जो है वो रियल बोलो कि मैंने कूदना बोल के

1188
01:20:41,120 --> 01:20:45,680
नहीं भाई बस मिल गई शांति आगे बढ़े ऐसे नहीं

1189
01:20:45,680 --> 01:20:49,680
ऐसे नहीं ऐसे नहीं आप कुछ मत करिए बस दोबारा

1190
01:20:49,680 --> 01:20:53,760
आप आप कुछ मत करिए आप आपकी ये जो चीजें हैं कुछ मत करिए बस

1191
01:20:53,760 --> 01:20:57,920
आप आगे इसको दोहराइएगा नहीं विषय पर मैं क्या कह रहा हूं

1192
01:20:57,920 --> 01:21:01,920
इसको आप इसको एक्सेप्ट करिए मैं दोहराऊंगा नहीं प्रयास कर रहा हूं छोडूंगा

1193
01:21:01,920 --> 01:21:06,080
नहीं देखा आप जो आप जो क्षमा भी मांगे तो ऐसे मैंने क्षमादान

1194
01:21:06,080 --> 01:21:10,480
दे दिया एहसान कर दिया मैं यह कह रहा हूं कि आप जो है हरकत को दोहराइए

1195
01:21:10,480 --> 01:21:14,560
गा नहीं आप मैंने यहां पे बोला क्लियरली मैंने

1196
01:21:14,560 --> 01:21:18,640
बोला कि मैं यह थोड़ी कह रहा हूं कि आप बिल्डिंग से कूद गए इत्यादि तो आप कह रहे हो नहीं मेरे को ऐसा कूदना

1197
01:21:18,640 --> 01:21:22,960
सिद्ध करो मैंने क्या कहा आप कूदने शब्द का इस्तेमाल मत करिएगा दोबारा

1198
01:21:22,960 --> 01:21:27,040
मेरे लिए की बातें कर रहे हो बताओ मैंने बोला क्या वैसे इसका मतलब आप दोबारा

1199
01:21:27,040 --> 01:21:31,040
करोगे ये बात मैंने बोला कि मैं दोबारा कर रहा हूं तो फिर कह दो

1200
01:21:31,040 --> 01:21:35,040
कि नहीं करूंगा दोबारा आप आप हाथ जोड़ लोगे सब कर लोगे ये नहीं कहोगे आप उतना

1201
01:21:35,040 --> 01:21:39,120
शब्द दोबारा नहीं करूंगा मैं उपयोग आपको अपने मन से असम्पशन लगाना है आप लगाओ ना मेरा क्या

1202
01:21:39,120 --> 01:21:43,120
जा अरे तो आप क्लियर कर दो ना बहुत देर लगेगी क्या आप परंपरा क्लियर

1203
01:21:43,120 --> 01:21:47,200
5 मिनट में कर सकते हो मगर आप यह नहीं क्लियर कर पा रहे कि मैं आगे इस चर्चा

1204
01:21:47,200 --> 01:21:51,200
में आपके लिए पूछना शब्द का उपयोग करूंगा कि नहीं करूंगा आधे घंटे आपको

1205
01:21:51,200 --> 01:21:51,760
आधे घंटे

1206
01:21:51,760 --> 01:21:56,000
इस पर बहस करनी है मूल विषय पे नहीं आना आपको देखा आप हाथ जोड़ आप हाथ

1207
01:21:56,000 --> 01:22:00,000
जोड़ लोगे सब कर लोगे मगर ये जो अभद्र आचरण है उसको क्लियर कट स्वीकार नहीं करोगे

1208
01:22:00,000 --> 01:22:04,080
कि मुझे कूदना शब्द नहीं बोलना चाहिए था एक तरफ आप कहते हो कि आप बड़े

1209
01:22:04,080 --> 01:22:08,080
हो आप ये हो वो सम्मान की बात करते हो मैं मैं अपने मन को मैं

1210
01:22:08,080 --> 01:22:12,320
अपने मन को मनाता क्यों हां भाई ठीक है वो ठीक है जो भी है व्यक्ति सामने

1211
01:22:12,320 --> 01:22:16,800
से आया तो उसके साथ जो है बूंद चर्चा करो हेलो हेलो हेलो हेलो

1212
01:22:16,800 --> 01:22:21,200
आवाज आ रही है ये सब देखिए इस तरह की चीजों में जाएंगे

1213
01:22:21,200 --> 01:22:25,280
मैं चर्चा आपसे आगे नहीं बढ़ा पाऊंगा ये जो हेलो हेलो हेलो ये सब कर रहे हो ना ये

1214
01:22:25,280 --> 01:22:29,520
अपने लौंडे लपाड़ियों के साथ आप जाके करो जिनके साथ बैठ के आप जो करते

1215
01:22:29,520 --> 01:22:33,680
हो वो आप उनके साथ करो यहां मेरे साथ ये सब नहीं चलेगा ठीक है

1216
01:22:33,680 --> 01:22:37,760
कह रहा हूं ना मैं नहीं बोलूंगा अगर सौहार्दपूर्ण बात करनी है तो सौहार्दपूर्ण करो

1217
01:22:37,760 --> 01:22:41,920
और ये जो ये जो हंसी ठट्टा करना है अपने लौंडे लपाड़ियों वाला मवालियों वाला वहां

1218
01:22:41,920 --> 01:22:46,160
जाओ आप उनके साथ बैठ के करो ठीक आवाज

1219
01:22:46,160 --> 01:22:50,240
आ रही है हेलो बताइए कूदने शब्द का

1220
01:22:50,240 --> 01:22:54,320
उपयोग दोबारा करेंगे या नहीं ठीक है कूदने शब्द का उपयोग दोबारा नहीं करूंगा हो गया

1221
01:22:54,320 --> 01:22:58,960
हां अब बताइए ठीक है अब आगे बढ़ाते

1222
01:22:58,960 --> 01:23:04,960
तो अब जो बात हो रही है ना लक्षण पे तो चलो अब मेरे को लक्षण बता दो अवतार के लक्षण क्या है जल्दी से

1223
01:23:05,280 --> 01:23:07,600
अब पीछे रिवाइंड कर लो

1224
01:23:07,600 --> 01:23:12,080
थोड़ी देर लगेगी बता दो ना देखो ऐसा है कि आपने मेरे को इतना कुछ बात

1225
01:23:12,080 --> 01:23:16,160
कर रहे हो आप अपना पक्ष रखो आप मेरा आप मेरा इंटरव्यू मत लो आप अपना पक्ष

1226
01:23:16,160 --> 01:23:20,480
रखो मैंने जो बोला है मैंने कहा है पीछे कहा भी है आप उसके संबंध में

1227
01:23:20,480 --> 01:23:24,560
मेरे को देखिए मैं उसी पे ही बात कर रहा हूं मेरे को जानना सुनना तो पड़ेगा ना कि अवतार बिना

1228
01:23:24,560 --> 01:23:29,040
लक्षण के जिस चीज के लक्षण उसकी सिद्धि कैसे होगी तो मेरे को समझना तो पड़ेगा लक्षण क्या है

1229
01:23:29,040 --> 01:23:33,120
सर्वशक्तिमान लक्षण सर्वशक्तिमत्ता का लक्षण उसके अंदर

1230
01:23:33,120 --> 01:23:37,120
मिलना चाहिए है ना यानी किसी भी पॉइंट पे वो बाधित नहीं होना चाहिए

1231
01:23:37,120 --> 01:23:39,120
तो मैं बता बता तो रहा हूं वो बाधित

1232
01:23:39,120 --> 01:23:43,120
नहीं है और और जो कुछ ऐसी लॉजिकल फैलेसी अगर आप लाएंगे कि

1233
01:23:43,120 --> 01:23:47,520
भैया क्या वो बिना शरीर के विवाह कर सकते हैं दो और दो पांच कर सकते हैं तो उसमें मेरी

1234
01:23:47,520 --> 01:23:51,840
जो ईश्वर की अविद्या शक्ति होगी वो काम करेगी आपको जो है इंफॉर्मेशन डालेगी

1235
01:23:51,840 --> 01:23:56,080
जैसे अच्छा वो आप कह रहे हो कि मैथमेटिकल ही होना चाहिए मैं इसको बता दूं

1236
01:23:56,080 --> 01:24:00,160
मैथमेटिकल के जो रूल्स है ना वो भी ईश्वर नियंत्रित कर सकता है कि आपके मन से

1237
01:24:00,160 --> 01:24:04,160
कब हटाए जाए कब ना हटाए जाए तो हटा देगा वो ऐसे रूल्स डालेगा जिससे कि वो आपको

1238
01:24:04,160 --> 01:24:08,320
लॉजिकल लगने लगेगा बस देखो अभी मैं उस पे जाऊंगा मैथमेटिक्स पे

1239
01:24:08,320 --> 01:24:12,400
तो फिर बोलोगे कि ऐसे वैसे तो मैं अगर मैं इसको और पूरा कर दूं और

1240
01:24:12,400 --> 01:24:16,560
अगर आप यह कहते हो कि भैया प्रूव कैसे होगा तो मैं प्रूफ की बात बता दूं हमारे लिए जो प्रूव

1241
01:24:16,560 --> 01:24:20,560
होता है इसी पे रहो मैं आपसे रिक्वेस्ट कर रहा हूं आप इसी पे रहो मैं आपसे रिक्वेस्ट कर

1242
01:24:20,560 --> 01:24:24,720
रहा हूं आप इसी पे रहो किस पे जो अभी जो लक्षण पे

1243
01:24:24,720 --> 01:24:29,920
बात चल रही है ना फिलहाल इस जो आप मैथमेटिक्स वगैरह उधर जा रहे हो उस टाइम आ चुके

1244
01:24:29,920 --> 01:24:34,240
मैं उस बात को पूरी कर रहा हूं मैं उस बात को मैं उस बात को पूरी मैं उस बात को

1245
01:24:34,240 --> 01:24:38,560
मैं उस बात को पूरी कर रहा हूं वो मैथमेटिक्स ही छोड़ दो कोई भी ऐसी लॉजिकल

1246
01:24:38,560 --> 01:24:42,640
फैलेसी कि बंदा के पुत्र हो सकता है। ये जो इस तरह

1247
01:24:42,640 --> 01:24:47,760
की जो चीजें हैं जो घटित नहीं हो सकती है

1248
01:24:47,760 --> 01:24:52,000
कौन सी लॉजिकलसी है ये कह रहा हूं कौन सी अरे भाई जो जो

1249
01:24:52,000 --> 01:24:54,160
कार्य जो कार्य हो ही नहीं

1250
01:24:54,160 --> 01:24:58,480
सकता कुल मिलाकर के कहने का मतलब ये है अब बात ये है कि

1251
01:24:58,480 --> 01:25:02,640
पूरी लिस्ट है तो उनमें से अब वो कार्य अब वो कार्य क्यों

1252
01:25:02,640 --> 01:25:06,960
नहीं हो सकता मैं वो बता रहा हूं वो कार्य कैसे हो सकता है

1253
01:25:06,960 --> 01:25:11,200
क्यों नहीं हो सकता है कि संबंध में बात यह है कि हमको किसी ने बताया है

1254
01:25:11,200 --> 01:25:15,360
कि वध्या कौन होगी छोड़ दीजिए मैं चाहता हूं टॉपिक पर रहे ताकि हमारी बात थोड़ी जल्दी हो

1255
01:25:15,360 --> 01:25:20,160
वो टॉपिक को ही तो पूरा कर रहा हूं क्योंकि आप उसमें फंस रहे हो तो आप दूसरी बात करोगे

1256
01:25:20,160 --> 01:25:24,240
देखो मैं फंस रहा हूं ना चलो कोई बात नहीं मैं मैं स्वीकार कर लूंगा मैं फंस रहा हूं लेकिन मैं ये चाहता हूं आप विषय

1257
01:25:24,240 --> 01:25:28,800
पे रहो ठीक है तो विषय ही तो है आपने पूछा आपने पूछा कि मुझे तो मैथमेटिकली

1258
01:25:28,800 --> 01:25:33,600
प्रूफ करके दिखाओ तो मैं उस बात का जवाब दे रहा हूं अभी मैंने आपसे ये पूछा

1259
01:25:33,600 --> 01:25:37,760
अभी नहीं पूछा पहले तो पूछा था ना तो पहले बढ़ चुके है ना

1260
01:25:37,760 --> 01:25:42,000
वहां पे आगे कैसे बढ़ गए वहां बीच में कूदने कूदने की बात आ गई आगे क्यों बढ़ गए आपने

1261
01:25:42,000 --> 01:25:46,480
पूछा था मुझे तो मैथमेटिकली बताओ मैं उसका जवाब दे रहा हूं सुनिए सुनिए

1262
01:25:46,480 --> 01:25:50,480
मेरी बात सुनिए विषय से कोई बहुत संबंधित नहीं है ठीक है हमारी बात काफी बढ़ चुकी

1263
01:25:50,480 --> 01:25:54,480
है अब आप मुख्य विषय आना नहीं चाहते हो तो आप इधर उधर आपको जो है

1264
01:25:54,480 --> 01:25:58,480
यहां पे क्योंकि आपको ऐसा लग रहा है कि यहां जो है इनका सिद्धांत सिद्ध हो जाएगा इसलिए उस बात

1265
01:25:58,480 --> 01:26:00,400
को मुझे बोलने नहीं देना चाहते हो मैं

1266
01:26:00,400 --> 01:26:04,400
दिक्कत लास्ट तक देख लूंगा सुनिए मैं आपको लास्ट तक का चांस दूंगा चर्चा हो रही है

1267
01:26:04,400 --> 01:26:08,560
ना अगर सर आप मेरे को अपना सिद्धांत स्वीकार करवा दो। देखिए मैं

1268
01:26:08,560 --> 01:26:12,720
किसी को मैं किसी को अपना सुनिए मैं किसी को अपना

1269
01:26:12,720 --> 01:26:16,720
सिद्धांतो मैं किसी को अपना सिद्धांत उसके मुख से बुलवा

1270
01:26:16,720 --> 01:26:20,800
नहीं सकता। मैं सामने वाले को निरुत्तर और निराधार कर सकता हूं। वही

1271
01:26:20,800 --> 01:26:24,880
वो जनता तय करेगी। वो वो जो देखने वाले हैं वो तय करेंगे कि भैया किसका

1272
01:26:24,880 --> 01:26:29,040
सिद्धांत सिद्ध हुआ। क्योंकि ना तो आप मानने वाले हो मेरी बात अगर मान अगर

1273
01:26:29,040 --> 01:26:33,920
सिद्ध भी हो जाए तो ना आप मानने वाले हो और ना मैं मानने वाला हूं। विषय

1274
01:26:33,920 --> 01:26:38,320
विषय पर लक्षण पे बात कर रहे थे। लक्षण पे आ जाओ। इधर-उधर

1275
01:26:38,320 --> 01:26:42,720
का क्या बात ये हो रही थी कि मैथमेटिकली बात ये हो रही थी कि मुझे तो मैथमेटिकली

1276
01:26:42,720 --> 01:26:46,960
प्रूव करके दिखाओ। मैं आपको बता रहा हूं वो बात। उसको सुनो। आप टाइम ले लो। सुनो

1277
01:26:46,960 --> 01:26:50,960
आप टाइम ले लो। जितना आपको टाइम लेना है एक बार आप बोल दो। उसके बाद जहां से मैंने बात शुरू किया था

1278
01:26:50,960 --> 01:26:55,200
ना मैं वापस लक्षण पे आ जाऊंगा। ठीक है? भाई आपको जो मैं दूंगा इसको काटना

1279
01:26:55,200 --> 01:26:59,280
पड़ेगा ना आपको जो मैं दूंगा। आप वहां क्यों जाओगे पीछे?

1280
01:26:59,280 --> 01:27:03,440
क्योंकि बात क्लियर होने वाली है। निर्भय मेरी बात समझिए। तो यहां पे बात क्लियर होने वाली है

1281
01:27:03,440 --> 01:27:07,840
इसलिए मैं कह रहा हूं इसको मत छोड़ो आप सही जगह आ गए हो क्यों जा रहे हो दोबारा पीछे

1282
01:27:07,840 --> 01:27:12,080
मैं बता देता हूं क्यों जाऊंगा मैं बता देता हूं क्योंकि अभी हमारा पहला क्लियर हुआ

1283
01:27:12,080 --> 01:27:16,320
धारणा का दूसरा हमारा अर्थ था इसपे अवतार के लक्षण पे अब मैं आपसे

1284
01:27:16,320 --> 01:27:20,480
आपने मैथमेटिकल वाला जो बोला गलत बोला मैं बोल दूं पूरा

1285
01:27:20,480 --> 01:27:24,640
बोल दूं या बीच में फिर आप बीच में इंटरप्ट करोगे ठीक है बात ये

1286
01:27:24,640 --> 01:27:28,640
है कि अब अब मैंने ये पूछा कि भैया इसका लक्षण क्या है

1287
01:27:28,640 --> 01:27:32,880
तो जब आपने बोल दिया कि सर्वशक्तिमान अब मैं सर्वशक्तिमान पे आपसे जा रहा हूं कि ठीक है इसको समझना

1288
01:27:32,880 --> 01:27:36,960
कि अच्छा सर्वशक्तिमान है। यानी अगर राम जी अवतार हैं तो उनमें

1289
01:27:36,960 --> 01:27:42,080
सर्वशक्तिमत्ता दिखनी चाहिए। कोई भी कार्य करते हुए बाधित नहीं होने चाहिए वो।

1290
01:27:42,080 --> 01:27:46,160
ठीक है? अब हम उस विषय पर हैं। अब इसके बाद हम डायरेक्ट जाएंगे हेतु की

1291
01:27:46,160 --> 01:27:49,040
ओर कि आप जो ईश्वर का अवतार ले रहे हो शरीर धारण करना उसका

1292
01:27:49,040 --> 01:27:53,040
हेतु क्या? हम उसकी तरफ जाएंगे डायरेक्ट सिद्धि की ओर। ठीक है? अब इसके अंदर हम

1293
01:27:53,040 --> 01:27:57,280
ये तो सीक्वेंस बहुत सही चल रहा है। इसमें कोई इशू नहीं है। अब आप बीच में मैथमेटिक्स

1294
01:27:57,280 --> 01:28:01,280
में ऐसे परिवर्तन कर सकता है। दिमाग में भ्रम डाल सकता है इत्यादि। ठीक है? उसमें कोई

1295
01:28:01,280 --> 01:28:05,360
इशू नहीं है। तो बात ये है कि उधर उधर वो कब आएगा? वो इशू कब

1296
01:28:05,360 --> 01:28:09,600
आएगा? वो पॉइंट कब आएगा? समझो चीज़। जब हम बात करेंगे एक्सैक्ट सिद्धि पर। ठीक है?

1297
01:28:09,600 --> 01:28:13,680
जब हम बात करेंगे जब मैं आपको बोलूंगा ना आप सिद्धि करो। उस सिद्धि में अगर आप वो पॉइंट रखो तो ज्यादा

1298
01:28:13,680 --> 01:28:17,840
बेटर है। वो उसका टेली करेगा। अभी आप बात कर रहे हैं। आपने बोल लिया।

1299
01:28:17,840 --> 01:28:21,840
मैं बोल रहा हूं। मैं बोल रहा हूं। ठीक है। अब इसमें स्पष्ट इतना ही है कि

1300
01:28:21,840 --> 01:28:25,920
अगर आपने ये मान लिया कि एक मात्र आपने ये मान लिया कि सर्वसक्तिमान है। ठीक है?

1301
01:28:25,920 --> 01:28:30,000
इसमें मेरे को एक और बता दो कि अगर वो सरसक्तिमान है तो यानी राम जी या

1302
01:28:30,000 --> 01:28:34,160
कृष्ण जी कोई भी कार्य करते हुए उनको बाधा नहीं आनी चाहिए। ठीक है? एक पॉइंट सही हो गया।

1303
01:28:34,160 --> 01:28:38,160
दूसरा पॉइंट है कि अच्छा मैं आपसे सामने से ये पूछ रहा हूं कि क्या जो अवतार

1304
01:28:38,160 --> 01:28:43,360
होता है ईश्वर का वो सर्वज्य भी होता है या नहीं होता? बिल्कुल होता है।

1305
01:28:43,360 --> 01:28:47,440
ठीक है। यानी उसकी सर्वज अल्पज्जता कहीं भी प्रकट नहीं होनी चाहिए। यानी ऐसा कुछ भाई वो

1306
01:28:47,440 --> 01:28:51,440
सर्वशक्तिमान तभी हो पाएगा जब वो सर्वज्ञ भी हो। ठीक है? ये

1307
01:28:51,440 --> 01:28:55,600
सब चीजें आपस में अलग-अलग नहीं हो सकती ना। और जैसे एक बात हुई थी जैसे

1308
01:28:55,600 --> 01:28:59,680
एक बात हुई थी कि जो श्री राम है श्री राम के रूप में ईश्वर

1309
01:28:59,680 --> 01:29:03,760
ऐसा कर सकता है पूरा धर्म कर सकता है तो उसका जवाब यही है कि श्री राम के रूप

1310
01:29:03,760 --> 01:29:04,260
में जब

1311
01:29:04,240 --> 01:29:08,400
ईश्वर ऐसा कुछ करता है तो वो श्री राम के रूप में ही कर रहा है मगर उसको

1312
01:29:08,400 --> 01:29:12,400
हम श्री राम स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि शब्द प्रमाण उसमें साथ में नहीं है

1313
01:29:12,400 --> 01:29:16,480
शब्द प्रमाण ने कहा है अगर ऐसा ऐसा हो तो वो राम है ऐसा वैसा हो तो वो

1314
01:29:16,480 --> 01:29:20,720
कृष्ण है शब्द प्रमाण उसमें साथ में सपोर्ट नहीं करेगा जैसे कि फॉर एग्जांपल

1315
01:29:20,720 --> 01:29:25,040
बता दूं दर्शकों के लिए आवश्यक है ये बात दर्शकों के लिए आवश्यक है

1316
01:29:25,040 --> 01:29:29,200
जैसे काम कर सकते हो कि जैसे ना

1317
01:29:29,200 --> 01:29:33,280
उसमें आप बोल सकते हो वाला पॉइंट वो बात रह जाएगी ना एक मिनट लगेगा

1318
01:29:33,280 --> 01:29:37,600
हनुमान जी ब्रह्मचारी है शब्द प्रमाण के अनुसार

1319
01:29:37,600 --> 01:29:41,680
अब भैया क्या ईश्वर क्या हनुमान जी के रूप में ईश्वर विवाह कर

1320
01:29:41,680 --> 01:29:45,920
सकता है तो हमारा जो हमारा जो कांसेप्ट है उसमें भगवान ने जब विराट

1321
01:29:45,920 --> 01:29:50,000
स्वरूप लिया तो उन्होंने उसका जो विराट स्वरूप था तो उन्होंने अपने कई रूप दिखाए

1322
01:29:50,000 --> 01:29:54,000
तो उसमें से एक रूप हनुमान जी का भी था यानी कि हनुमान जी ने कृष्ण के रूप में विवाह भी

1323
01:29:54,000 --> 01:29:58,080
किए। ठीक है? मगर हमने उस रूप को हनुमान जी नहीं माना क्योंकि शब्द

1324
01:29:58,080 --> 01:30:02,240
प्रमाण वहां सपोर्ट में नहीं है। तो ये बात मैं क्लियर करना था। अब आप बताइए

1325
01:30:02,240 --> 01:30:06,320
अपनी बात। ठीक है। ठीक है। अब इसमें बात ये आती है कि

1326
01:30:06,320 --> 01:30:10,640
अब हमें लक्षण जो है वो स्पष्ट हो चुके हैं कि यानी कहीं पर भी ईश्वर की अल्पता

1327
01:30:10,640 --> 01:30:14,800
नहीं दिखनी चाहिए। कहीं पर भी उसके सर्वशक्तिता में बाधा नहीं आनी चाहिए। ठीक है? उसकी अपनी

1328
01:30:14,800 --> 01:30:18,880
मर्यादा दिखनी चाहिए। नहीं दिखनी चाहिए। नहीं दिखनी चाहिए वो

1329
01:30:18,880 --> 01:30:19,380
अलग बात

1330
01:30:19,280 --> 01:30:23,600
है। होना नहीं चाहिए। होता है कि नहीं?

1331
01:30:23,600 --> 01:30:27,600
हुआ दिखने को तो कुछ भी दिख सकता है। अच्छा कुछ भी दिख सकता है तो

1332
01:30:27,600 --> 01:30:32,080
वो चीज हुई या नहीं हुई कैसे पता चलेगा? शब्द प्रमाण

1333
01:30:32,080 --> 01:30:36,080
शब्द प्रमाण से नहीं जैसे मैं ये अच्छा शब्द प्रमाण से जैसे राम जी ने जीवन में क्या-क्या किया

1334
01:30:36,080 --> 01:30:40,080
वो तो हमें शब्द प्रमाण से पता चलेगा। ठीक है। मैं ये कह रहा हूं जैसे राम

1335
01:30:40,080 --> 01:30:44,080
जी जैसे राम जी नित बात थोड़ी सी हां बताइए

1336
01:30:44,080 --> 01:30:48,160
थोड़ी सी बात बताइए बताइए। जैसे राम राम जी ने राम जी के जीवन में क्या-क्या घटा वो

1337
01:30:48,160 --> 01:30:52,160
हमें उनके शब्द प्रमाण रामायण से पता है। ठीक है? तो पॉइंट इसके अंदर ये कि अगर

1338
01:30:52,160 --> 01:30:56,240
उसी में वहीं पे लिखा हुआ है कि राम जी को नहीं पता था कि सीता जी कहां हैं? राम जी

1339
01:30:56,240 --> 01:31:00,400
असहाय हो गए इत्यादि इत्यादि बातें राम जी पहचान नहीं पाए कि सुग्रीव और बाली कौन इत्यादि इत्यादि बातें

1340
01:31:00,400 --> 01:31:04,640
जो हमें सर्वजता में बाधा नजर आती है। तो क्या हम एट दैट केस

1341
01:31:04,640 --> 01:31:08,720
पॉइंट ये है कि आप तो कह रहे हो कि ये वही राम जी और ईश्वर के अवतार हैं। लेकिन

1342
01:31:08,720 --> 01:31:12,720
जो लक्षण बताएं वो मैच नहीं कर रहे हैं। उस केस में क्या होगा? हम उन्हें

1343
01:31:12,720 --> 01:31:17,040
अवतार मानेंगे या नहीं मानेंगे? इसका थोड़ा सा स्पष्टीकरण दे दीजिए। मैं स्पष्टीकरण

1344
01:31:17,040 --> 01:31:21,680
देता हूं। मगर मैं बात अपनी पीछे से शुरू करूंगा। जहां पर मैथमेटिकल

1345
01:31:21,680 --> 01:31:26,000
वाली बात आ रही थी। तो मैथमेटिक वाली बात ऐसी है

1346
01:31:26,000 --> 01:31:30,240
कि दो और दो पांच नहीं होते हैं। यह हमने जाना है।

1347
01:31:30,240 --> 01:31:34,240
किसी ने हमको इंफॉर्मेशन दी है। और अगर एट दी एंड चले जाए तो वो

1348
01:31:34,240 --> 01:31:34,740
इंफॉर्मेशन

1349
01:31:34,720 --> 01:31:38,960
हमको ईश्वर से ही आ रही है। अगर कोई हमारा व्यवहार में कोई टीचर

1350
01:31:38,960 --> 01:31:43,120
है, कोई हमारे परिजन है, हमारे जो है अभिभावक है वो हमको

1351
01:31:43,120 --> 01:31:47,120
इंफॉर्मेशन देते हैं। दो और दो चार होते हैं। उसको चार कहा जाता है या इतना

1352
01:31:47,120 --> 01:31:51,200
इतना ऐसे ऐसे गिना जाता है। कुछ भी कांसेप्ट हो वो कांसेप्ट हमको हमारा कोई ना

1353
01:31:51,200 --> 01:31:55,360
कोई गुरु देता है। शिक्षा गुरु जिसे हम कह सकते हैं। अगर गुरु ना भी दे

1354
01:31:55,360 --> 01:31:59,360
तो भाई वो जो कांसेप्ट है हो सकता है अंदर से ही उद्भाषित हो जाए। कई

1355
01:31:59,360 --> 01:32:03,440
लोग भाई सिद्ध जन्म ले सकते हैं तो अंदर से हो जाए। तो उसमें कुल मिलाकर

1356
01:32:03,440 --> 01:32:08,160
के बात है कि वो इंफॉर्मेशन आ रही होती है ईश्वर से। तो ईश्वर

1357
01:32:08,160 --> 01:32:12,400
अगर चाहे तो हमारी उस इंफॉर्मेशन को बदल सकता है कि भैया

1358
01:32:12,400 --> 01:32:16,560
ऐसे से ऐसे चार होते नहीं अब उसने इंफॉर्मेशन बदल दी और अब वो ऐसे

1359
01:32:16,560 --> 01:32:20,560
से ऐसे पांच होते अब दिक्कत ये आती है कि रियल में तो

1360
01:32:20,560 --> 01:32:24,560
ऐसा हुआ नहीं है रियल में तो ईश्वर ने का्सप्ट जो कासेप्ट

1361
01:32:24,560 --> 01:32:28,720
के अनुसार तो ये सब किया नहीं है उसने तो अपना जो अविद्या के अविद्या शक्ति के कारण

1362
01:32:28,720 --> 01:32:32,960
हमको मगर बात ये है कि उसको सिद्ध कैसे करोगे क्योंकि हमें कोई ना गवाह मिलेगा

1363
01:32:32,960 --> 01:32:37,200
ना शब्द प्रमाण मिलेगा अच्छा अब बात आती है रियल वो वो रियल दुनिया हमने

1364
01:32:37,200 --> 01:32:41,200
जानी कैसे? वो रियल दुनिया है या एक्सिस्ट करती है ये

1365
01:32:41,200 --> 01:32:45,360
कैसे पता चलेगा? हमने तो तुम्हारे मुंह से कहलवा दिया कि दो और दो पांच होते हैं। हमने

1366
01:32:45,360 --> 01:32:49,440
तो सबके मुंह से दुनिया के एक एक व्यक्ति के मुंह से कहलवा दिया कि दो और दो

1367
01:32:49,440 --> 01:32:49,940
पांच होते

1368
01:32:49,840 --> 01:32:55,200
हैं। अब भैया ये बेवकूफ बनाया गया है। ये सिद्ध कैसे होगा?

1369
01:32:55,200 --> 01:32:59,280
तो सिद्ध करने के लिए पहले हमको किसी को ईश्वर मानना पड़ेगा। परमार्थ तब

1370
01:32:59,280 --> 01:33:03,440
पहुंचेंगे। वो वाला बात है। और दूसरी बात यह है कि उसका साक्षी कौन

1371
01:33:03,440 --> 01:33:07,680
हुआ? अगर किसी ने बेवकूफ बनाया तो बात यही है कि ईश्वर हमको

1372
01:33:07,680 --> 01:33:11,680
ऐसी ही चीजें दिखा रहा है ऑलरेडी जो रियल नहीं है तो

1373
01:33:11,680 --> 01:33:15,840
वो एक चीज और दिखा देगा। अगर सर्व व्यक्ति मत्ता की बात में ऐसी चीजों

1374
01:33:15,840 --> 01:33:20,720
से बाधा आ रही है। अब दूसरी बात आपने कहा कि जो शब्द प्रमाण है

1375
01:33:20,720 --> 01:33:24,880
वो अब कुल मिलाकर के अब बात आ गई शब्द प्रमाण में कि भाई वो जो

1376
01:33:24,880 --> 01:33:29,360
उसमें सर्वजता भी लिखा हुआ है और ये भी लिखा हुआ है। लक्षण पे बात है।

1377
01:33:29,360 --> 01:33:33,520
हां वो लक्षण जो है शब्द प्रमाण से कट रहे हैं ना। उस पर आ गई बात

1378
01:33:33,520 --> 01:33:37,920
मतलब उसमें उसमें विरोध हो रहा है। हां शब्द

1379
01:33:37,920 --> 01:33:41,920
आप ही ने तो कहा आप ही ने तो कहा कि भाई वही वहीं पे लिखा है

1380
01:33:41,920 --> 01:33:46,000
कि वो रो रहे थे या वो सर्वजता में बाधा आ रही है। ये

1381
01:33:46,000 --> 01:33:50,160
सब आपने कहा ना तो शब्द प्रमाण से दिक्कत आ रही है ना कि जिन शब्द प्रमाणों

1382
01:33:50,160 --> 01:33:54,400
से हमको जिन शब्द प्रमाणों से जिन शब्द

1383
01:33:54,400 --> 01:33:58,880
प्रमाणों से हमें यह पता चल रहा है कि भैया राम जी सर्वशक्तिमान

1384
01:33:58,880 --> 01:34:03,040
है। उनहीं शब्द प्रमाणों से हमें राम जी के सर्वशक्तिमान होने में बाधा दिखाई दे रही है।

1385
01:34:03,040 --> 01:34:05,600
यही बात है ना? हम

1386
01:34:05,600 --> 01:34:09,600
हां। तो उसमें शब्द प्रमाण से ही हमें पता चलता है कि वो

1387
01:34:09,600 --> 01:34:13,600
है तो नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त मगर वो ये जो है रोल कर रहे हैं।

1388
01:34:13,600 --> 01:34:17,920
लीला कर रहे हैं। वो उनहीं शब्द प्रमाण बात को क्लियर करते हैं। उसको

1389
01:34:17,920 --> 01:34:22,000
क्लियर करते हैं। यानी कि वो मुक्त होते हुए भी ऐसा दिखाते हैं कि मैं

1390
01:34:22,000 --> 01:34:26,240
मुक्त नहीं हूं। जिससे कि आप उनके साथ ज्यादा कनेक्ट हो पाओ।

1391
01:34:26,240 --> 01:34:30,240
हम इसमें एक पॉइंट है। इसमें छोटा सा पॉइंट ये है कि इसमें अगर लक्षण वाली

1392
01:34:30,240 --> 01:34:34,240
बात कट गई ना कैसे कट गई मैं समझा देता हूं थोड़ा सा। जैसे समझिए

1393
01:34:34,240 --> 01:34:38,640
जैसे आपने बोला कि अवतार का लक्षण है कि वो सर्वज्य है।

1394
01:34:38,640 --> 01:34:42,640
सर्वशक्तिमान है। लेकिन जब हम अवतार की जीवनी देख रहे

1395
01:34:42,640 --> 01:34:46,640
हैं। उसकी जीवनी में हमें सर्वजता नजर नहीं आती। सर्वशक्तिमत्ता नजर

1396
01:34:46,640 --> 01:34:51,120
नहीं आती। ठीक है? यानी उसका लक्षण घट नहीं रहा है। नजर आती है।

1397
01:34:51,120 --> 01:34:55,280
नजर आती है। मैं पूरा बोल देता हूं। पूरा बोल। पूरा बोल देता हूं। पूरा बोलता अब

1398
01:34:55,280 --> 01:34:59,280
उसमें पॉइंट ये आ जाता है कि जब हम जिस पॉइंट पे पकड़ लेते हैं कि नहीं यहां

1399
01:34:59,280 --> 01:35:03,440
पे तो देखिए यहां पे तो सर्वजिता नजर नहीं आई। यहां पे तो अल्पज्जता आई तो उस

1400
01:35:03,440 --> 01:35:07,600
केस में आप कहते हो कि नहीं यहां पर ये जानबूझ के अपनी अल्पजता

1401
01:35:07,600 --> 01:35:11,600
प्रकट कर रहे हैं। यानी ठीक है उस उस केस में तो यानी उसी

1402
01:35:11,600 --> 01:35:15,600
केस में कह रहा हूं कि उस एक पॉइंट पे उनका जो लक्षण है जिससे वो

1403
01:35:15,600 --> 01:35:19,600
वो उनका अवतार होना सिद्ध हो रहा है। ठीक है? क्योंकि फिलहाल हम जो मैंने

1404
01:35:19,600 --> 01:35:20,640
ये किया है ना वो हम इस

1405
01:35:20,640 --> 01:35:24,640
पे नहीं कह रहे। हम शब्द प्रमाण पे बात नहीं कर रहे हैं कि रामायण में या रामचरितमानस में लिखा

1406
01:35:24,640 --> 01:35:28,800
है राम जी अवतार है। अभी हम उसको मान नहीं रहे हैं। शब्द प्रमाण पे नहीं है हम। ठीक है? अभी वो साध्य कोटि

1407
01:35:28,800 --> 01:35:32,960
का बात है। सिद्ध कोटि की बात नहीं है। पॉइंट इसके अंदर ये है कि अगर वहां

1408
01:35:32,960 --> 01:35:36,960
पे एक पॉइंट में उनकी जीवनी में कहीं ना कहीं पे ये आ गया कि फलाना चीज के बारे में ना

1409
01:35:36,960 --> 01:35:40,960
नॉलेज उन्हें नहीं पता था कि सुग्रीव और बाली में से कौन है? इन दोनों में से दो आपस में लड़

1410
01:35:40,960 --> 01:35:45,040
रहे हैं। इनमें से बाली कौन है? उनको नहीं पता। तो वहां पे जो उनको उनकी जो

1411
01:35:45,040 --> 01:35:49,440
अल्पजिता वहां पे प्रकट हो रही है। ठीक है? उस केस में आप कह रहे हो कि नहीं ये जानबूझ

1412
01:35:49,440 --> 01:35:53,680
के वहां पर अल्पजिता प्रकट कर रहे हैं। यानी अगर आप जानबूझ के भी बोलो ठीक है

1413
01:35:53,680 --> 01:35:57,760
उस केस में ये होगा कि वहां पे उस केस में ये हो रहा है कि उनका लक्षण

1414
01:35:57,760 --> 01:36:01,840
तो प्रकट हो नहीं रहा अवतार का तो वहां पे तो वो अवतार नहीं है

1415
01:36:01,840 --> 01:36:06,000
ये सिद्ध हो रहा है ना लक्षणों से शब्द प्रमाण से नहीं शब्द प्रमाण

1416
01:36:06,000 --> 01:36:10,000
में तो चलो लिखा है वो हम मान नहीं रहे नहीं मान रहे अलग विषय है उसप मैं नहीं जा रहा हूं

1417
01:36:10,000 --> 01:36:14,320
लेकिन जब हम लक्षणों की बात लक्षणों से ये सिद्ध हो रहा है कि वो नहीं है ये है मेरा पॉइंट इसको

1418
01:36:14,320 --> 01:36:18,400
थोड़ा सा इबोरेट कर दीजिए जरा इसको ऐसे इबेट करेंगे

1419
01:36:18,400 --> 01:36:22,560
यही कारण है ना जिस जिसके कारण रावण नहीं समझ

1420
01:36:22,560 --> 01:36:26,640
पाया कि वह अवतार है। जिसके कारण कंस नहीं समझ पाया कि भगवान ही

1421
01:36:26,640 --> 01:36:30,800
है। जिसके कारण उस समय के जो लोग थे उनकी ही समय धारा में वो

1422
01:36:30,800 --> 01:36:34,880
तुरंत उनको देखते ही मुक्त नहीं हो पाए। क्योंकि उन्होंने उनको भगवान माना

1423
01:36:34,880 --> 01:36:35,760
ही नहीं। भगवत गीता

1424
01:36:35,760 --> 01:36:39,760
में भी भगवान ने कहा कि जो लोग मनुष्य देह में देख के मनुष्य

1425
01:36:39,760 --> 01:36:43,920
देह में देख के मेरे ब्रह्म भाव को नहीं ध्यान नहीं जान पा रहे हैं वो

1426
01:36:43,920 --> 01:36:48,000
मूर्ख लोग हैं। मगर जब उनके बारे में हमको

1427
01:36:48,000 --> 01:36:52,320
दिव्य दृष्टि से बातें पता चली दिव्य दृष्टि के द्वारा फिर गुरु परंपरा

1428
01:36:52,320 --> 01:36:56,320
के द्वारा हमको पता चली तो हमें पता चला कि हां ये अवतार हैं। ये

1429
01:36:56,320 --> 01:37:00,320
अवतार ही थे जो भगवान के आए थे। और उस समय भी जो दिव्य

1430
01:37:00,320 --> 01:37:04,400
दृष्टि रखते थे उनकी समय धारा में उन्होंने उनको अवतार माना। वो

1431
01:37:04,400 --> 01:37:08,480
जानते हैं वहां पर ये जानते हैं कि यह सर्वज्ञ है। उनको सब शब्द प्रमाण

1432
01:37:08,480 --> 01:37:10,800
से नहीं अपनी दिव्य दृष्टि से जानते हैं।

1433
01:37:10,800 --> 01:37:14,800
वो उनके आचरण से नहीं वो अपने शब्द प्रमाण से जानते हैं। जैसे कि जैसे

1434
01:37:14,800 --> 01:37:18,800
कि वाल्मीकि रामायण में ब्रह्मा जी ने कहा तुम नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त हो वो परम ब्रह्म

1435
01:37:18,800 --> 01:37:23,840
हो। और भी कई लोगों ने कहा कि तुम सर्वशक्तिमान हो।

1436
01:37:23,840 --> 01:37:27,920
तो पॉइंट तो कहने का अर्थ ये है कि इसीलिए जो बात आप कह

1437
01:37:27,920 --> 01:37:31,920
रहे हो बिल्कुल सही बात है क्योंकि भगवान ऐसा रोल सीधी सिंपल सी बात है जो

1438
01:37:31,920 --> 01:37:35,920
सर्वव्यापक है। वो एक जगह आ रहा है। उसका वो लक्षण तो कट ही रहा है

1439
01:37:35,920 --> 01:37:40,000
ना। सबसे पहले तो सबसे पहले वो लक्षण मैं वो

1440
01:37:40,000 --> 01:37:44,080
नहीं कह रहा। मैं वो नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं कि चलो वो तो एक बहुत थोड़ी सी दूर की

1441
01:37:44,080 --> 01:37:48,080
बात है। मगर जब ईश्वर सर्वस व्यापक है तो वो एक जगह दिख रहा

1442
01:37:48,080 --> 01:37:52,080
है तो उसको हम कैसे स्वीकार कर ले अवतार के रूप में। इसी कारण से तो यह रावण

1443
01:37:52,080 --> 01:37:56,080
और कंस इत्यादि नहीं जान पा रहे हैं ना कि वो ईश्वर है। यानी कि या और भी

1444
01:37:56,080 --> 01:38:00,240
सामान्य लोग नहीं जान पा रहे हैं। यानी कि यानी कि राम

1445
01:38:00,240 --> 01:38:04,240
जी कृष्ण जी को जो हम अवतार मान रहे हैं वो हम शब्द प्रमाण मान रहे हैं। हमारे पास में

1446
01:38:04,240 --> 01:38:08,320
लाक्षणिक सिद्धांत नहीं है। वी कैन नॉट प्रूफ कि राम जी ईश्वर के अवतार हैं। हमें

1447
01:38:08,320 --> 01:38:12,320
शब्द प्रमाण डिपेंड होना पड़ेगा। बात हमारी बात हम हां हमें

1448
01:38:12,320 --> 01:38:16,320
शब्द प्रमाण पे ही डिपेंड होना पड़ेगा कि कौन ईश्वर है कौन नहीं है इस

1449
01:38:16,320 --> 01:38:20,320
बात के लिए ईश्वर अवतार ले सकता है कि नहीं ये एक अलग चैप्टर

1450
01:38:20,320 --> 01:38:24,480
है कौन ईश्वर है कौन नहीं है ये एक अलग चैप्टर है इसके लिए तो शब्द

1451
01:38:24,480 --> 01:38:25,840
प्रमाण जाना पड़ेगा कैसे है मैं

1452
01:38:25,840 --> 01:38:29,920
समझा देता हूं हां हां बताइए लिंक ऐसे है कि जब हम बात करेंगे

1453
01:38:29,920 --> 01:38:34,000
कि ईश्वर अवतार ले सकता है या नहीं ले सकता केवल बात इतनी ही नहीं है कि

1454
01:38:34,000 --> 01:38:38,000
ले सकता है या नहीं ले सकता बात पूरे अवतारवाद पर है हमने आपने

1455
01:38:38,000 --> 01:38:42,080
टाइटल लिखा अवतारवाद केवल इतना नहीं लिखा कि क्या वो ले सकता है? बस इसको प्रूफ कर दो। बाकी बात खत्म। बाकी

1456
01:38:42,080 --> 01:38:46,080
छोड़ दो। इतना नहीं है। नहीं मैंने ऐसा नहीं कहा कि बाकी छोड़ दो। मगर ये चैप्टर अलग

1457
01:38:46,080 --> 01:38:50,080
है। वो ले सकता है कि नहीं ले सकता है? एक अलग बात है। और किसको

1458
01:38:50,080 --> 01:38:54,080
ईश्वर मानना है, किसको नहीं मानना एक अलग बात है। अभी हम उसप बात नहीं कर रहे।

1459
01:38:54,080 --> 01:38:58,240
क्यों ले सकता है कि नहीं ले सकता? अवतार अवतार से अवतार से

1460
01:38:58,240 --> 01:39:02,240
ईश्वर के समस्त लक्षणों मैं एक बात एक टैगलाइन देखूं।

1461
01:39:02,240 --> 01:39:06,320
अवतार से ईश्वर के समस्त अवतार से ईश्वर के

1462
01:39:06,320 --> 01:39:10,720
समस्त लक्षणों की आप जो है वाचन दृष्टि से वाचिक

1463
01:39:10,720 --> 01:39:14,800
रूप से आप सिद्धि कर ही नहीं पाओगे क्योंकि बात मैं इसका आप पहले

1464
01:39:14,800 --> 01:39:19,040
अपनी बात पूरी कर लो तब मैं एक उदाहरण दूंगा अच्छा सा बात पूरी करो देखो

1465
01:39:19,040 --> 01:39:23,120
पॉइंट इसके अंदर यही है ना कि यानी आपने अभी हम इस पे चर्चा नहीं कर रहे कि वो

1466
01:39:23,120 --> 01:39:27,120
कर सकता है या नहीं कर सकता ईश्वर है ना अभी हम जैसा कि आपने मेरे से शुरू में पूछा था

1467
01:39:27,120 --> 01:39:31,200
ना कि हम क्या पहले इस पे चर्चा करें कि ईश्वर कुछ भी कर सकता है या हम पहले अवतार पे चर्चा

1468
01:39:31,200 --> 01:39:35,200
करें मैंने ये बोला था कि पहले हम इस पे चर्चा करेंगे कि अवतार पे सब कुछ कर रास्ता नहीं कर

1469
01:39:35,200 --> 01:39:39,200
सकता उस हम उसके बाद चर्चा करेंगे है ना तो अभी पॉइंट ये नहीं है कि अवतार ले सकता है या

1470
01:39:39,200 --> 01:39:40,960
नहीं ले सकता वो फलाना काम

1471
01:39:40,960 --> 01:39:44,960
अभी इस पे चर्चा नहीं है अभी चर्चा किस पे अवतार पे चर्चा हुई तो है

1472
01:39:44,960 --> 01:39:49,040
आप बोल लो बोल लो बोल लो तो पॉइंट इसके अंदर क्या रहता

1473
01:39:49,040 --> 01:39:53,520
है कि अभी हम अवतार पे चर्चा कर रहे हैं अब जब अब बात ये है कि अगर मेरे सामने अवतार

1474
01:39:53,520 --> 01:39:57,600
मैंने अब हमने समझ लिया कि भैया अवतार क्या होता है उसकी धारणा क्या है अवतार मेरे सामने

1475
01:39:57,600 --> 01:40:01,920
है मैंने पूछा था राम और रामपाल में भेद कैसे करेंगे तो पॉइंट

1476
01:40:01,920 --> 01:40:05,920
यही है कि मान लो कोई मेरे को शब्द प्रमाण लाके जैसे वो कबीर

1477
01:40:05,920 --> 01:40:10,000
शब्द से कबीर शब्द सिद्ध करते हैं कबीर को सिद्ध करते हैं है तो वो भी अपना खैर उसके अंदर

1478
01:40:10,000 --> 01:40:14,000
गुरु परंपरा वाली बात आती है लेकिन फिर भी सामने वाला भी कुछ ना कुछ एक कर रहा है तो

1479
01:40:14,000 --> 01:40:18,080
उसके अंदर जो इंपॉर्टेंट क्योंकि नास्तिक के सामने ये चीजें सिद्ध नहीं हो सकती जैसे आप कहते हो ना मैं नास्तिक के सामने

1480
01:40:18,080 --> 01:40:22,320
सिद्ध कर दूंगा उसमें पॉइंट ये आता है कि नास्तिक के सामने एक पॉइंट ये आता है

1481
01:40:22,320 --> 01:40:26,480
कि मैं ईश्वर को भी क्यों मानूं तो फिर हम बोलते हैं ना भाई ईश्वर के लक्षण है बोलेंगे सृष्टि करता है कौन

1482
01:40:26,480 --> 01:40:30,880
अपने आप कैसे बन गई सृष्टि वो विषय आ जाता है ठीक ज्ञान अपने आप कैसे हो गया हो गया तो आदिवासियों

1483
01:40:30,880 --> 01:40:34,880
को क्यों नहीं हुआ आज तक तो ऐसे जो विषय आते हैं तो उसमें पॉइंट ये आता है कि लक्षणों

1484
01:40:34,880 --> 01:40:38,960
वाली ठीक है कि ज्ञान प्रकट करता है बल तो स्वाभाविक ज्ञान या स्वाभाविक बल। ठीक है?

1485
01:40:38,960 --> 01:40:42,960
लक्षणों की हमारे यहां बात आ जाती है। उसी प्रकार से अवतार की जब हम

1486
01:40:42,960 --> 01:40:46,960
बात करते हैं तो यानी आपने स्वीकार कर लिया कि अवतार का कोई लक्षण

1487
01:40:46,960 --> 01:40:51,120
नहीं है। वस्तुता नहीं है। लक्षणों के माध्यम से अवतार को पहचान नहीं सकते। मेरे सामने राम

1488
01:40:51,120 --> 01:40:55,120
जी भी खड़े होंगे तो भी जैसा आपने खुद स्वीकार कर लिया कि बहुत लोग नहीं पहचान पाए

1489
01:40:55,120 --> 01:40:56,400
कि राम जी

1490
01:40:56,400 --> 01:41:00,640
अवतार हैं या नहीं है। है ना? तो ये पॉइंट है। यानी आपने मान लिया कि लक्षण अवतार

1491
01:41:00,640 --> 01:41:04,960
के नहीं होते। उसको हम नहीं स्वीकार कर सकते। क्योंकि आपने जो पॉइंट बोला था कि वो सर्वजिता

1492
01:41:04,960 --> 01:41:09,360
आदि लक्षण स्वीकार नहीं कर सकते। नहीं बोला है स्वीकार नहीं कर सकते

1493
01:41:09,360 --> 01:41:13,440
बोला है डिफाइन नहीं कर सकते ये बोला है डिफाइन नहीं कर सकते ये बोला है

1494
01:41:13,440 --> 01:41:16,960
लक्षण वहां पे हम

1495
01:41:16,960 --> 01:41:21,360
व्यवहारिक रूप से हम उसको डिफाइन नहीं कर सकते पॉइंट

1496
01:41:21,360 --> 01:41:25,440
हां पॉइंट देखिए पॉइंट पॉइंट इसके अंदर वही है ना कि जैसे मेरे सामने कोई पुलिस वाला खड़ा है तो मैं

1497
01:41:25,440 --> 01:41:29,440
बोलूंगा ना कि पुलिस की वर्दी है पुलिस का आई कार्ड इत्यादि इत्यादि तो हमारे पास

1498
01:41:29,440 --> 01:41:33,600
पहचान है पहचान तो लक्षण क्या होता है पहचान होता है आत्मानुलिंगात लिंगात

1499
01:41:33,600 --> 01:41:37,600
अर्थात लिंग अर्थात लक्षण लक्षण अर्थात पहचान ठीक है तो किसी चीज की पहचान किससे हो

1500
01:41:37,600 --> 01:41:41,680
रही है? तो अवतार की पहचान लक्षण मतलब पहचान ही होता है। तो उसकी पहचान क्या है? है

1501
01:41:41,680 --> 01:41:45,680
ना? तो बात वही है कि मेरे सामने अगर अवतार खड़ा है तो मैं पहचानूंगा कैसे? तो आपने

1502
01:41:45,680 --> 01:41:49,760
बोला भैया चेक करो कि सर्वज्य है कि नहीं है। तो चेक किया तो नहीं है। बहुत बातें नहीं पता।

1503
01:41:49,760 --> 01:41:53,760
चेक करो सर्वस के मानने कि नहीं है। तो नहीं वो तो दूसरों के ऊपर डिपेंड हो रहा है। ठीक है? तो ऐसे पॉइंट

1504
01:41:53,760 --> 01:41:57,760
आ रहे हैं। तो यानी जो आपने लक्षण बताए वो नहीं घटित हो रहे। तो आप मुझे कुछ ऐसे लक्षण

1505
01:41:57,760 --> 01:42:01,840
बताओ जो घटित हो जिससे मैं पैरामीटर से चेक कर सकूं। तो आप मुझे वो लक्षण बताओ। क्योंकि जो आपने

1506
01:42:01,840 --> 01:42:05,840
बताए वो मैच नहीं हो रहे। देखिए अब मैं थोड़ा सा टाइम

1507
01:42:05,840 --> 01:42:10,160
लूंगा। मुझे बोलने दीजिएगा। इंटरप्ट मत करिएगा। पहले

1508
01:42:10,160 --> 01:42:12,720
तो मैं एक उदाहरण दे दूं

1509
01:42:12,720 --> 01:42:16,800
कि मान लीजिए कि कहीं पर भाई बहन विवाह

1510
01:42:16,800 --> 01:42:20,880
कर रहे हैं और कोई नवक्पित जो तंत्र है रामपाल इत्यादि

1511
01:42:20,880 --> 01:42:25,200
तरीके का वो भाई और बहन का विवाह करा रहे हैं कि भैया जो है हमारे

1512
01:42:25,200 --> 01:42:29,280
पास एक ईश्वर का नया कांसेप्ट है और उसके अनुसार हमें अमुक अमुक तरीके से

1513
01:42:29,280 --> 01:42:33,520
पता चला है कि भाई बहन भी विवाह कर सकते हैं। एक ही माता-पिता से जने लोग विवाह

1514
01:42:33,520 --> 01:42:37,840
कर सकते हैं। अब उसमें क्या होगा कि नहीं भैया तुम गलत कह रहे हो।

1515
01:42:37,840 --> 01:42:42,240
जो है आप जो है ये कैसे कह रहे हो गलत

1516
01:42:42,240 --> 01:42:46,240
भैया वेद में लिखा है नहीं भेद तो मिलावट हो गई ये हो गई वो हो गई मनुस्मृति में लिखा

1517
01:42:46,240 --> 01:42:50,720
है कि नहीं भैया मिलावट हो गई अच्छा भैया अब ईश्वर जो है यहां पे

1518
01:42:50,720 --> 01:42:54,800
मान लीजिए परेशान हुए मान के चलिए वाली बात है अब वो ईश्वर

1519
01:42:54,800 --> 01:42:59,120
ने कहा कि कैसे बताऊं ईश्वर स्वयं एक रूप धारण करके चले आए

1520
01:42:59,120 --> 01:43:03,600
मैं ईश्वर हूं मैं बता रहा हूं भैया ये जो तुम कर रहे हो गलत है

1521
01:43:03,600 --> 01:43:07,840
तुम ईश्वर कैसे हो सकते हो तुम ईश्वर कैसे हो सकते हो तुम तो सर्व्यापक

1522
01:43:07,840 --> 01:43:11,840
हो तुम कैसे सकते हो? अब सोचो कि वो सर्व्यापक

1523
01:43:11,840 --> 01:43:15,920
जब तक दिखेगा नहीं तब तक वो किसी की बात मानेंगे नहीं और दिख गया तो उसकी ईश्वरता भंग हो

1524
01:43:15,920 --> 01:43:20,400
गई। समझ रहे हैं आप मेरी बात? जो मैं जिस ओर संकेत कर रहा हूं पहली बात।

1525
01:43:20,400 --> 01:43:24,400
दूसरी बात ये है कि जिस प्रकार से अब आप ये

1526
01:43:24,400 --> 01:43:28,720
बताइए ईश्वर को एक रस मानते हैं कि नहीं?

1527
01:43:28,720 --> 01:43:32,880
एक रस मानते हैं। कहीं भी ना ज्यादा है ना कम

1528
01:43:32,880 --> 01:43:38,400
है। ठीक है?

1529
01:43:38,400 --> 01:43:42,800
पूरा बोलिए। तो अब बात ये है कि जो एक रस

1530
01:43:42,800 --> 01:43:46,880
ईश्वर है जैसे मान लीजिए मेरे सामने यहां टेबल है इस पर

1531
01:43:46,880 --> 01:43:51,280
रख के इस ट्राईपॉड को मैं आपसे बात कर रहा हूं। ठीक है? इस पे

1532
01:43:51,280 --> 01:43:55,360
कई सारे डब्बे रखे हुए हैं। कई सारे डब्बे इस

1533
01:43:55,360 --> 01:43:59,600
पर रखे हुए हैं। कोई बड़े हैं, कोई छोटे हैं और कहीं-कहीं पर है ही नहीं।

1534
01:43:59,600 --> 01:44:00,100
अब

1535
01:43:59,840 --> 01:44:04,080
मुझे जो एक रस ईश्वर है, एक रस

1536
01:44:04,080 --> 01:44:10,080
वो ईश्वर जो है क्या कहते हैं यह?

1537
01:44:10,880 --> 01:44:14,960
जब मैं चाहूं कि यहां से मुझे डब्बे नीचे गिराने हैं।

1538
01:44:14,960 --> 01:44:18,960
अगर मैं एक रस हूं सब जगह तो जब मैं हरकत करूंगा

1539
01:44:18,960 --> 01:44:22,960
तो सारे डब्बे एक साथ नीचे गिरेंगे। इवन जो खाली

1540
01:44:22,960 --> 01:44:27,040
जगह है जहां पे डब्बा नहीं भी होगा वहां पे मेरी वो फोर्स लगेगी।

1541
01:44:27,040 --> 01:44:31,280
मगर यदि मेरे पास रेगुलेट कर सकने की स्वयं

1542
01:44:31,280 --> 01:44:35,440
को शक्ति है कि मैं जहां चाहूं वहां के डब्बे में मेरा धक्का लगे और जहां

1543
01:44:35,440 --> 01:44:40,080
चाहूं वहां ना लगे। यदि मेरे पास यह शक्ति है तो

1544
01:44:40,080 --> 01:44:44,160
क्या कहते हैं? मैं ऐसा कर सकता हूं कि जिस डब्बे को

1545
01:44:44,160 --> 01:44:48,240
मैं गिराना चाहूं वो गिरेगा और जिस डब्बे को गिराना ना चाहूं वो नहीं गिरेगा और

1546
01:44:48,240 --> 01:44:52,240
जो खाली जगह है वहां मेरी शक्ति काम ही नहीं करेगी। ये मेरे पास शक्ति

1547
01:44:52,240 --> 01:44:56,720
है। मगर प्रॉब्लम क्या है कि शक्ति के रूप में भी मैं ही हूं।

1548
01:44:56,720 --> 01:45:00,800
शक्ति के रूप में शक्ति कोई अलग से तो है नहीं। भाई तीन आपने तीन

1549
01:45:00,800 --> 01:45:05,440
तत्व माने हैं एक तरीके से जीव प्रकृति और ब्रह्म

1550
01:45:05,440 --> 01:45:09,600
तीन तत्व माने ना आपने तो शक्ति कोई ब्रह्म की शक्ति तो अलग से

1551
01:45:09,600 --> 01:45:13,600
कोई ब्रह्म ही शक्ति के रूप में है तो जब वो शक्ति के रूप में अपने

1552
01:45:13,600 --> 01:45:17,600
आप को कम ज्यादा कर रहा है तो वहां पर उसकी एक रास्ता भंग हो रही है तो

1553
01:45:17,600 --> 01:45:21,920
फिर उसको ईश्वर क्यों कह रहे हैं कहने का मतलब है अगर आपका ये सिद्धांत

1554
01:45:21,920 --> 01:45:26,080
मान लेंगे कि वहां शब्द प्रमाण से हम नहीं पा रहे तो आप हमको यह

1555
01:45:26,080 --> 01:45:30,240
कहना पड़ेगा कि इस ईश्वर की स जो सृष्टि

1556
01:45:30,240 --> 01:45:34,480
रचना है वो ईश्वर ने नहीं की है क्योंकि ईश्वर तो एक रस है

1557
01:45:34,480 --> 01:45:36,320
और ईश्वर तो यहां पे कम ज्यादा हो

1558
01:45:36,320 --> 01:45:38,640
रहा है।

1559
01:45:38,640 --> 01:45:42,640
अच्छा हो गया। हां एक बात और थी मैं भूल गया

1560
01:45:42,640 --> 01:45:46,800
रिवाइंड करना पड़ेगा। हां जी बताइए। हो सकता है मैं बोलूं तो आपको याद आ जाए। मैं

1561
01:45:46,800 --> 01:45:50,960
बोलता हूं शुरू करता हूं। तो बात थी लक्षणों पे। हां नास्तिक

1562
01:45:50,960 --> 01:45:55,440
नास्तिकों के लिए नास्तिकों के लिए आपने कहा था। नास्तिकों के लिए

1563
01:45:55,440 --> 01:45:59,600
तो नास्तिकों को जो बता रहा है ना जो चीजें

1564
01:45:59,600 --> 01:46:03,920
बता रहा है कसतो सद्गम तमसोर्गम है ना सबसे

1565
01:46:03,920 --> 01:46:07,920
पहली बात ये है कि ईश्वर एकिस्ट करता है कि नहीं करता ये वाली बात

1566
01:46:07,920 --> 01:46:11,920
उसको बतानी है एकिस्टेंस है कि नहीं नास्तिक के लिए सबसे

1567
01:46:11,920 --> 01:46:16,000
पहले तो ये जरूरी है वो तो फिर बाद की बात है कि अगर उसने एक्सिस्टेंस उसका मान लिया तो

1568
01:46:16,000 --> 01:46:20,160
फिर भी उसकी श्रद्धा है कि वो जिसने उसको सिद्ध किया उसी की बात माने या फिर अपना

1569
01:46:20,160 --> 01:46:24,320
नया ईश्वर खोजने चला जाए वो तो उसकी बात मगर हम उसके

1570
01:46:24,320 --> 01:46:28,400
समक्ष यह सिद्ध करते हैं कि हां एक सत्ता है। अब उसके बाद हमारे पास और

1571
01:46:28,400 --> 01:46:32,800
भी तार्किक चीजें हैं जिसके कारण तुम वैदिक स्क्रिप्चर

1572
01:46:32,800 --> 01:46:36,800
का अनुगमन करो। मगर वो ये कह दे कि अगर ईश्वर सब कुछ

1573
01:46:36,800 --> 01:46:40,880
कर सकता है तो यही दिखाओ। तो बात तो वहीं से शुरू हो गई। जहां से वो कह रहे थे। जहां से

1574
01:46:40,880 --> 01:46:44,960
शुरू हुई थी बात। बहुत इसका स्पष्ट सीधा सा सिंपल सा उत्तर है। आप

1575
01:46:44,960 --> 01:46:48,960
नास्तिक के सामने बात करोगे तो मैंने ये नहीं कहा कि नास्तिक

1576
01:46:48,960 --> 01:46:51,520
को सिद्ध कर दो। फिर उसके बाद बात करो। कहने का मतलब

1577
01:46:51,520 --> 01:46:55,680
ये कहने का मतलब ये है कि हमें वहां अपने कहने का मतलब ये है कि हमें वहां

1578
01:46:55,680 --> 01:46:59,760
अपने सिद्धांत बताने हैं। वहां हमें उनको करके नहीं दिखाना है कि ये कर

1579
01:46:59,760 --> 01:47:03,840
दिया लो। एक एक चीज हमें वहां सिद्धांत बताने है। ये सिद्धांत है

1580
01:47:03,840 --> 01:47:07,920
जो तार्किक रूप से बिल्कुल सिद्ध होते हैं। जैसे ईश्वर अवतार ले सकता

1581
01:47:07,920 --> 01:47:11,920
है। सिद्ध होता है। अब वो ईश्वर के लक्षण उसमें हमको शब्द प्रमाण

1582
01:47:11,920 --> 01:47:15,920
से मिल रहे हैं कि नहीं मिल रहे वो तो बाद की बात है। ईश्वर ले सकता है कि नहीं बात

1583
01:47:15,920 --> 01:47:19,920
इसकी तो ले सकता है। वो हमने सिद्ध कर दिया। फिर आगे दूसरा चैप्टर है वो क्या कहते

1584
01:47:19,920 --> 01:47:23,920
हो शब्द प्रमाण वाली बात जी अब आप बताइए ठीक है अभी बीच में

1585
01:47:23,920 --> 01:47:27,920
मत बोलना ना जैसे अभी आप बीच में बोल गए ना बताइए बताइए

1586
01:47:27,920 --> 01:47:32,320
बताइए अब बात ये है अब जैसे आपने नास्तिक वाला पॉइंट छेड़ा ठीक है

1587
01:47:32,320 --> 01:47:37,040
नास्तिक वाले पॉइंट में पॉइंट ये आता है जैसे क्योंकि मूल विषय चल रहा था लक्षणों वाला

1588
01:47:37,040 --> 01:47:41,360
अब जैसे आप जब आप नास्तिक के सामने ईश्वर को सिद्ध करते हो तो आप क्या बोलते हो कि सचित

1589
01:47:41,360 --> 01:47:45,440
आनंद की जो चाह है ठीक है वहां पे जो आप ईश्वर का लक्षण ब्रह्म का लक्षण करते

1590
01:47:45,440 --> 01:47:49,680
हो क्या करते हो सतित और आनंद उसका लक्षण ये करते हो।

1591
01:47:49,680 --> 01:47:53,920
ठीक है? इसके अलावा आप एक बात बोलते हो सत्यम जान अनंतम

1592
01:47:53,920 --> 01:47:58,240
ब्रह्म। सत्यम जान अनंतम ब्रह्म में जब आप शंकर भाष्य पढ़ोगे तो शंकर

1593
01:47:58,240 --> 01:48:02,400
भाष्य में आचार्य शंकर ने लिखा है सत्यम, जानम और अनंतम ये तीन ब्रह्म के लक्षण

1594
01:48:02,400 --> 01:48:06,480
है। ये लिखा हुआ है। ठीक है? अच्छा। यानी हम

1595
01:48:06,480 --> 01:48:06,980
ब्रह्म

1596
01:48:06,800 --> 01:48:10,800
का भी लक्षण कर रहे हैं। ईश्वर जो आप सच्चिदानंद उसका हम लक्षण कर ही रहे हैं। नास्तिक

1597
01:48:10,800 --> 01:48:14,880
के सामने हम उसका लक्षण नहीं तो नास्तिक को बोलोगे क्या कि मैं किसकी बात कर रहा हूं? किसकी बात कर

1598
01:48:14,880 --> 01:48:18,880
रहा हूं? नहीं पता चलेगा। तो बताने के लिए उसका लक्षण करना पड़ेगा। है ना? आ जाता

1599
01:48:18,880 --> 01:48:22,960
है पॉइंट। तो जब आप यह बोलोगे कि मैं अवतार की बात कर रहा हूं।

1600
01:48:22,960 --> 01:48:26,960
ठीक है? बिल्कुल वैसे ही जैसे आपने वो रामपाल वाला उदाहरण दिया कि रामपाल

1601
01:48:26,960 --> 01:48:31,040
ने कुछ हरकतें कर दी और बीच में कोई आया। ठीक है? मान लो ईश्वर

1602
01:48:31,040 --> 01:48:35,280
वैसे तो ईश्वर मुक्त है तो वो परेशान तो होगा नहीं। ईश्वर मुक्त है तो परेशान

1603
01:48:35,280 --> 01:48:40,000
तो होने से रहा वो। है ना? कि परेशान हो जाए कि ईश्वर अरे ये ऐसे ऐसे शादी क्यों कर रहे हैं? ये तो

1604
01:48:40,000 --> 01:48:44,400
कुछ नहीं होगा। अपनी बात का जवाब देने की आवश्यकता नहीं है। मगर आप बोल दीजिए।

1605
01:48:44,400 --> 01:48:48,640
ठीक है? अब इसमें पॉइंट क्या आता है कि अब अब जब

1606
01:48:48,640 --> 01:48:52,640
इसमें यह आ जाएगा। ठीक है? अब ईश्वर मान के चलते हैं। अब ईश्वर को ये रूप

1607
01:48:52,640 --> 01:48:56,640
ले के इत्यादि उनके सामने प्रकट हुआ। और ईश्वर बोले कि भैया ये जो कर रहे हो गलत

1608
01:48:56,640 --> 01:49:00,720
कर रहे हो मत करो। सीधी सी बात है। अगर मेरे सामने ईश्वर आ के

1609
01:49:00,720 --> 01:49:04,720
कुछ बोले। ठीक है? ईश्वर तो रियल में तो पहली बात तो मैं

1610
01:49:04,720 --> 01:49:09,200
वेरीफाई जैसे उदाहरण इसको समझ लो कि जैसे कुरान है।

1611
01:49:09,200 --> 01:49:13,280
ठीक है? सो कॉल्ड बोला जाता है कि भाई यह गॉड की बुक

1612
01:49:13,280 --> 01:49:17,360
है। आप उसको वेरीफाई तो करोगे ना कि गॉड की बुक है कि नहीं है। करोगे

1613
01:49:17,360 --> 01:49:21,440
ऐसा तो नहीं कि क्योंकि वो बोल रहा है कि मैं हूं। इसीलिए आप चुपचाप मान

1614
01:49:21,440 --> 01:49:22,000
लोगे। है

1615
01:49:22,000 --> 01:49:26,320
ना? तब जैसा आपने बोला ना कि आपने तो ईश्वर को कटघरे में आपने तो अवतार को कटघरे

1616
01:49:26,320 --> 01:49:30,320
में खड़ा कर दिया कि प्रूफ करो कि तुम अवतार हो। उसी प्रकार से ये बात जैसे जैसे हम खोलते

1617
01:49:30,320 --> 01:49:34,400
हैं ना कुराण को कि भ कुरान में जो लिखा हम चुपचाप क्यों मान लें? तो पहले प्रूफ करो कि

1618
01:49:34,400 --> 01:49:38,640
ये रियल में ठीक है? तो ईश्वर की किताब है। इसको प्रूफ करो।

1619
01:49:38,640 --> 01:49:42,640
करना पड़ता है यह पॉइंट है ना वैसे ही अगर कोई मॉनिटर बनके आ जाता है तो हमें प्रूफ

1620
01:49:42,640 --> 01:49:46,640
करना पड़ेगा कि भैया आप रियल में मॉनिटर हो कि नहीं हो जज बनके आया तो हो जज कि

1621
01:49:46,640 --> 01:49:50,640
नहीं हो है ना वेरीफाई करेंगे बिना वेरीफाई किए तो हमें कम से कम

1622
01:49:50,640 --> 01:49:54,720
पता तो चले कि ये है कि नहीं है पुलिस वाला आया है तो भैया वर्दी दिख रही है आई कार्ड

1623
01:49:54,720 --> 01:49:58,800
दिख रहा है पता तो चल रहा है बैचवच है कुछ है ना तो जो चीज ये जो जो

1624
01:49:58,800 --> 01:50:02,880
उसकी पहचान है उसी को लक्षण बोलते हैं। तो बात है इसी लक्षण के ऊपर

1625
01:50:02,880 --> 01:50:06,960
मूल विषय जो है वो इस लक्षण के ऊपर ही है कि आपने जो दो लक्षण मुझे

1626
01:50:06,960 --> 01:50:11,040
बताएं ठीक है आपने कहा कि मान लेते हैं सर्व्यापकता सिद्ध नहीं होगी जो

1627
01:50:11,040 --> 01:50:15,200
पॉइंट उसके आप नहीं सिद्ध कर सकते मुझे कोई दिक्कत नहीं है मुझे कोई दिक्कत ही नहीं

1628
01:50:15,200 --> 01:50:19,280
है आपने सर्व्यापकता मना कर दिया तो मैं कहा नहीं जा सकता ये बात

1629
01:50:19,280 --> 01:50:23,280
है मैं समझ रहा हूं मैं समझ रहा हूं मेरी मेरी बारे में मैं आपने मेरे को बोला था ना चुप

1630
01:50:23,280 --> 01:50:27,760
रहने को मैं चुप था है ना मेरे बारे में आप दो बार बोल चुके ये तीसरी बार आपने इंटरप्ट कर दिया मत करिए प्लीज

1631
01:50:27,760 --> 01:50:31,760
है ना तो अब बात क्या आती है कि अब वही पॉइंट है ना

1632
01:50:31,760 --> 01:50:35,840
कि जब हम अवतार के लक्षण की बात कर रहे हैं। है ना? तो आपने बोला

1633
01:50:35,840 --> 01:50:37,120
आप ये जो बार-बार बीचबीच

1634
01:50:37,120 --> 01:50:41,520
में है ना हैना बोल रहे हैं ना ये हैना मत बोलिए नहीं तो मुझे वहां पर जवाब देना पड़ेगा।

1635
01:50:41,520 --> 01:50:45,680
मैं मैं क्यों बोल रहा हूं इंटरप्ट जैसे अभी एक एक आध बार अपने मन से भी किया होगा

1636
01:50:45,680 --> 01:50:49,680
मगर जैसे आपने अभी भी कहा ना एक एक मिनट आपने कहा ना बार-बार मत बोलिए

1637
01:50:49,680 --> 01:50:53,760
तो वो इसलिए बोलना पड़ता है आप ऐसी बात बोल रहे हैं जिसमें ऐसा लग रहा है कि आप

1638
01:50:53,760 --> 01:50:57,760
मुझसे पूछ रहे हैं। है ना? है ना? अच्छा मतलब आप सोच के पूछ रहे हैं कि आप

1639
01:50:57,760 --> 01:51:01,760
यही समझते हैं या कुछ और समझते हैं तो मैं जो कुछ और समझता हूं वो आपको बता दिया

1640
01:51:01,760 --> 01:51:05,840
नहीं नहीं बहुत सही किया आपने मेरे को बता दिया सही किया जी बिल्कुल बिल्कुल अब इसमें पॉइंट

1641
01:51:05,840 --> 01:51:09,840
ये आ जाता है कि जब हम अवतार के लक्षण की बात

1642
01:51:09,840 --> 01:51:14,080
कर रहे हैं तो सर्व्यापकता वाला पॉइंट क्लियर नहीं हो सकता इसको मैंने स्वीकार कर लिया

1643
01:51:14,080 --> 01:51:18,080
आपने दो और पॉइंट दिए इसके अलावा जो आपने बोला कि हां ये हो सकता है

1644
01:51:18,080 --> 01:51:22,160
क्या सर्वशक्तिमत्ता और सर्वजता लेकिन जब मैं

1645
01:51:22,160 --> 01:51:26,240
उसे अवतार में घटाता हूं तो वो प्रूफ नहीं हो पा रहा है उस केस में

1646
01:51:26,240 --> 01:51:30,240
अब वो मेरी थोड़ी है ना मेरी बोलने की आदत है आप थोड़ा एडजस्ट कर सकते हैं। मैं भी उसको कंट्रोल कर रहा हूं

1647
01:51:30,240 --> 01:51:34,320
अपनी साइड से। मैं भी मैं भी कोशिश करूंगा। कोशिश कर अब

1648
01:51:34,320 --> 01:51:38,720
इसमें पॉइंट यही आ जाता है कि जब मैंने उसको वेरीफाई किया तो वो

1649
01:51:38,720 --> 01:51:42,720
लक्षण उसमें घट नहीं रहे। तो लक्षणों के बिहाफ पे मैं उसे अवतार नहीं मान

1650
01:51:42,720 --> 01:51:46,720
सकता। लक्षणों के बिहाफ पे। जैसे लक्षण जैसे सच्चित आनंद वो लक्षण के

1651
01:51:46,720 --> 01:51:51,200
बिहाफ पे मैं उसको ब्रह्म मान रहा हूं। उसी प्रकार सर्वजता सर्वशक्तिमत्ता

1652
01:51:51,200 --> 01:51:52,320
के जो लक्षण उसमें घटित

1653
01:51:52,320 --> 01:51:56,320
हो ही नहीं रहे हैं तो उस बिहाफ पर मैं उसका अवतार नहीं मान सकता। एक पॉइंट यहां आ जाता है।

1654
01:51:56,320 --> 01:52:00,400
हां उस पॉइंट पे आप ये क्लेम करोगे कि नहीं मेरे पास शब्द प्रमाण है इसलिए

1655
01:52:00,400 --> 01:52:04,400
आप मान लो। शब्द और शुरू में आपने मेरे से बोला था कि नहीं शब्द प्रमाण हम

1656
01:52:04,400 --> 01:52:08,640
फ़िलहाल बात नहीं करेंगे। मैंने भी बोला था कि आप चिंता मत करिए। शब्द प्रमाण हम बात नहीं करेंगे। हम शब्द

1657
01:52:08,640 --> 01:52:12,720
प्रमाण जब तक ज़रूरत ना हो एकदम लास्ट हम नहीं जाएंगे। बात यही आ जाती है

1658
01:52:12,720 --> 01:52:16,880
कि किस पे बात आ जाती है? यही तार्किक चर्चा पे। तो तार्किक चर्चा में तो बिना लक्षणों

1659
01:52:16,880 --> 01:52:20,960
के तो तार्किक चर्चा हो ही नहीं सकती। भाई किस वस्तु के विषय में बात कर रहे हो पता ही नहीं होगा बिना लक्षणों

1660
01:52:20,960 --> 01:52:25,520
से। तो वो पॉइंट है। है ना? तो मैंने आपसे ये पूछा कि आप मुझे

1661
01:52:25,520 --> 01:52:29,520
सर्वशक्तिमत्ता और सर्वजता ये दो पॉइंट तो फेल हो गए।

1662
01:52:29,520 --> 01:52:33,520
तो मुझे कोई ऐसा लक्षण बता दीजिए जिससे मैं पहचान कर सकूं अवतार

1663
01:52:33,520 --> 01:52:38,080
की। फिर हम सिद्धि की ओर जाएंगे। जी कुल

1664
01:52:38,080 --> 01:52:42,960
मिलाकर के आपने जो बातें बोली है उसमें यह है कि आप शब्द से नहीं

1665
01:52:42,960 --> 01:52:47,120
शब्द प्रमाण से नहीं ईश्वर के अवतार को स्वीकार

1666
01:52:47,120 --> 01:52:51,360
करोगे उसके किसी आचरण से उसी किसी क्रिया से गतिविधि इत्यादि से

1667
01:52:51,360 --> 01:52:55,680
यही बात है ना अन्यथा ईश्वर ईश्वर अवतार क्यों

1668
01:52:55,680 --> 01:52:59,680
है ये वाला अवतार क्यों है ये आप जो है इस पे आपका क्वेश्चन है

1669
01:52:59,680 --> 01:53:03,760
मैं किसी को अवतार क्यों मानू ये क्वेश्चन है अवतार ले सकता है कि नहीं ले सकता

1670
01:53:03,760 --> 01:53:07,440
ये चैप्टर अभी क्लोज हो गया है मैथमेटिक वाली बात

1671
01:53:07,440 --> 01:53:11,680
नहीं अभी फिलहाल के लिए थमा हुआ है मैं वहां तक आई थी बात अविद्या तक अविद्या

1672
01:53:11,680 --> 01:53:15,680
तक जब चीजें चल रही थी तब तक वो बात आई नहीं हुआ है उसप हम वो कंक्लूड नहीं

1673
01:53:15,680 --> 01:53:19,840
है मगर अभी फिलहाल थमा हुआ है ना ये तो मानना पड़ेगा ना

1674
01:53:19,840 --> 01:53:23,920
कि वो अविद्या वाली बात जहां पे आई है वहां पे वो रुका हुआ है मतलब वो है

1675
01:53:23,920 --> 01:53:28,080
बिल्कुल कोई अच्छा अब बात आ रही है अब आपने कहा है कि

1676
01:53:28,080 --> 01:53:32,240
आपने कहा कि शब्द प्रमाण से आप मान लो मतलब शब्द प्रमाण आपको स्वीकार नहीं

1677
01:53:32,240 --> 01:53:36,320
कुछ तो उसमें लक्षण क्या कहते हैं जो आपने कहा कि ये कट गया

1678
01:53:36,320 --> 01:53:40,400
वो कट गया ये फेल हो गए दो फेल हो गए तो आपने कहा कि शब्द प्रमाण तो हम किसी को

1679
01:53:40,400 --> 01:53:44,480
अगर प्रूफ करेंगे तो शब्द से हमें प्रूफ करना होगा कि भैया ऐसा ऐसा है

1680
01:53:44,480 --> 01:53:48,560
तो अब बात ऐसी है कि जैसे कि बहन के साथ विवाह नहीं करना

1681
01:53:48,560 --> 01:53:52,560
है। यह हम किसी नास्तिक को बता रहे हैं। बहन के साथ विवाह नहीं

1682
01:53:52,560 --> 01:53:56,560
करना है। अब वो कहेगा प्रूफ करो। तो हम कैसे कर सकते हैं?

1683
01:53:56,560 --> 01:54:01,040
क्योंकि शब्द के शब्द प्रमाण तो हटा देना है। कैसे करेंगे प्रूफ?

1684
01:54:01,040 --> 01:54:05,280
बताइए। जानवरों में भी जब तक उन्हें

1685
01:54:05,280 --> 01:54:09,280
अपने पार्टनर की अवेलेबिलिटी नहीं होती। ठीक है? तो जानवर भी

1686
01:54:09,280 --> 01:54:13,280
आपस में कंसेंट नहीं करते हैं। तो हम पशु आपस मतलब

1687
01:54:13,280 --> 01:54:17,600
एक ही मां से एक ही मां से पैदा हुए वाले एक ही मां से पैदा हुए कंसेंट

1688
01:54:17,600 --> 01:54:21,600
नहीं करते हैं। हां जब तक ऐसा ना हो कि जब तक उन्हें कोई मीटिंग करने के

1689
01:54:21,600 --> 01:54:22,480
लिए कोई पार्टनर मिल नहीं

1690
01:54:22,480 --> 01:54:26,560
रहा हो। कुत्तों में बड़ा कॉमन है। इसके ऊपर बहुत रिसर्च हो रखी है। आप इजीली अवेलेबल चेक कर सकते

1691
01:54:26,560 --> 01:54:30,560
हो। एक बात। दूसरी बात ये कि हम चीजें देख सकते हैं। जैसे

1692
01:54:30,560 --> 01:54:34,640
ऐसे लोग जो आपस में कंसेंट करते हैं। ठीक है? उनके बच्चे वीक पैदा होते

1693
01:54:34,640 --> 01:54:38,800
हैं। ठीक? नहीं तो सामने वाला घुमा करके प्रश्न कर देगा कि अगर

1694
01:54:38,800 --> 01:54:42,880
आपकी किताब में लिखा हो लेट सपोज ठीक है अगर आपकी किताब

1695
01:54:42,880 --> 01:54:46,880
में लिखा हो क्योंकि जैसे आपने लेट सपोज ही लिया है ना कि अगर मान लो नहीं

1696
01:54:46,880 --> 01:54:50,880
पता हो कि भाई बहन के साथ करना चाहिए नहीं करना चाहिए अगर नहीं रियल में तो हमें पता है

1697
01:54:50,880 --> 01:54:54,880
भाई इससे नुकसान होता है हमें पता है अगर नहीं पता हो तो आपने जैसे अगर वाला प्रश्न किया

1698
01:54:54,880 --> 01:54:58,960
ना तो नास्तिक भी अगर वाला प्रश्न कर दे कि अगर आपकी किताब में लिखा हो कि माता और बहन के साथ में करना चाहिए

1699
01:54:58,960 --> 01:55:03,040
तो क्या आप कर लोगे क्योंकि आप तो शब्द प्रमाण को आंख बंद करके फॉलो कर रहे हो तो अगर लिखा

1700
01:55:03,040 --> 01:55:08,240
हो तो कर लोगे तो सामने वाला ये भी ये प्रश्न कर अच्छा बाकी

1701
01:55:08,240 --> 01:55:12,400
ऐसी बात नहीं है कि शब्द प्रमाण अब देखो आपने इस चीज को कैसे लिया

1702
01:55:12,400 --> 01:55:16,400
समझो इस चीज को आपने कैसे आपने जब मुझसे भाई बहन वाला पॉइंट पूछा ना तो आपने

1703
01:55:16,400 --> 01:55:20,480
क्यों पूछा आप मुझसे अभी ये मनवाना चाहते हो कि शब्द प्रमाण भी

1704
01:55:20,480 --> 01:55:24,560
जरूरी है आपको शब्द प्रमाण को स्वीकार करना पड़ेगा ठीक है यही मनवाने के लिए आपने मेरे से

1705
01:55:24,560 --> 01:55:28,560
पॉइंट बोला है मैंने अपनी तरफ से इसको रिजेक्ट नहीं किया मैंने अपनी तरफ से ये बोला

1706
01:55:28,560 --> 01:55:32,800
ही नहीं कि मैं शब्द प्रमाण को नहीं मानता है ना जैसे एग्जांपल के रूप में मैंने बोला सत्यम जान अनंतम

1707
01:55:32,800 --> 01:55:37,040
ब्रह्म मैंने कहां से पढ़ा मैंने शब्द प्रमाण ही पढ़ा है। सीधी बात है। उपनिषद से पढ़ा मैंने। पॉइंट

1708
01:55:37,040 --> 01:55:37,540
इसके अंदर

1709
01:55:37,520 --> 01:55:41,840
इतना है। डिस्कशन की स्टार्ट बस इसको स्वीकार करना है। विरोध

1710
01:55:41,840 --> 01:55:45,920
नहीं है। शब्द प्रमाण का विरोध नहीं है। इसको बस आपको स्वीकार करना है अपने मुंह

1711
01:55:45,920 --> 01:55:50,000
से कि हां अवतार की सिद्धि शब्द प्रमाण से हो सकती है और नहीं हो सकती। आपको बस अपने

1712
01:55:50,000 --> 01:55:54,160
मुंह से स्वीकार करना है। मुझे उसमें कोई दिक्कत नहीं है। ये पॉइंट है। लेकिन आप

1713
01:55:54,160 --> 01:55:58,240
जब आप बोलते हो कि नहीं मैं पूरा बोल दूं? पूरा बोल दूं मैं। आप जब ये बोलते

1714
01:55:58,240 --> 01:56:02,240
हो कि नहीं शब्द प्रमाण तो है ही है। इसके अलावा हम तो इसे तर्क से स्वीकार सिद्ध कर

1715
01:56:02,240 --> 01:56:06,240
देंगे। वहां पे कमी आ जाती है ना। कमी ये आ जाती है कि आप जब उस चीज

1716
01:56:06,240 --> 01:56:10,320
का लक्षण नहीं कर पा रहे तो सिद्ध करना तो बहुत कोसों दूर की बात है। है ना? तो वही पॉइंट

1717
01:56:10,320 --> 01:56:14,320
है कि जब तक लक्षण जैसे सच्चिद जैसे आप पॉइंट वही है ना कि किताब में तो ये भी

1718
01:56:14,320 --> 01:56:18,400
लिखा है कि ईश्वर है। लिखा है ईश्वर ने सृष्टि बनाई लिखा है। क्यों नास्तिक को सिद्ध करते हो? बोल दो

1719
01:56:18,400 --> 01:56:22,400
किताब में लिखा है मानो चुपचाप। नहीं बोलते ना सिद्ध करते हो। सिद्ध करते हैं हम। तो

1720
01:56:22,400 --> 01:56:26,400
पॉइंट इसके अंदर यही आ जाता है कि जब हम सिद्ध करते हैं तो उसे लक्षण बताते हैं। लक्षण

1721
01:56:26,400 --> 01:56:30,560
बताए बिना पता नहीं चलेगा हम किसकी बात कर रहे हैं। उसी प्रकार हम किसी को अवतार सिद्ध करें तो अवतार

1722
01:56:30,560 --> 01:56:34,800
का लक्षण बताना पड़ेगा। उसके बिना पता ही नहीं चलेगा कि हम किसकी बात कर रहे हैं। उसी प्रकार से

1723
01:56:34,800 --> 01:56:38,800
तो वो लक्षण नहीं सिद्ध हो पा रहे। यानी केवल शब्द प्रमाण सिद्ध होगा। आपको बस इसे स्वीकार करना है।

1724
01:56:38,800 --> 01:56:42,800
फिर हम आगे बढ़ते हैं। हां मैं आगे बढ़ता हूं। मैं बता देता हूं। पहली

1725
01:56:42,800 --> 01:56:47,120
बात तो एक ये थी ना कि

1726
01:56:47,120 --> 01:56:51,200
अ तो इतनी सारी बातें हो जाती कि कौन सी बात उठानी भूल जाते

1727
01:56:51,200 --> 01:56:55,600
हैं। एक आपने बात कही थी ना कि मुक्त है तो परेशान क्यों होंगे?

1728
01:56:55,600 --> 01:56:59,760
ये बात कही थी। तो वो मैंने ये नहीं कहा कि वो परेशान हो

1729
01:56:59,760 --> 01:57:03,920
के आए। यूं ही जैसे यू ही वो सृष्टि की रचना करते हैं। जैसे

1730
01:57:03,920 --> 01:57:08,080
ही किसी जैसे यूं ही वो किसी पेड़ को हरा और किसी पेड़ को पीला बनाते

1731
01:57:08,080 --> 01:57:12,080
हैं। यूं ही इसके पीछे रीजनिंग नहीं होती है। वो अपने मन से यूं ही यूं

1732
01:57:12,080 --> 01:57:16,080
ही करते हैं। ऐसे ही उनका यूं ही मन हुआ कि भैया हम यहां जा रहे हैं तो जाते

1733
01:57:16,080 --> 01:57:20,160
हैं। ये करने पहली बात मैं इसमें बस थोड़ा सा पहले मुझे बोलने

1734
01:57:20,160 --> 01:57:24,480
दीजिए। यही होता है ना। आपने बहुत सारे पॉइंट बोले तो उसमें से कई पॉइंट मेरे रह गए।

1735
01:57:24,480 --> 01:57:28,480
वही होता है। मैं आपसे पूछ रहा हूं। इसमें मैं आपसे पूछ रहा हूं। अगर आप ऑर्डर आगे आते हैं तो फिर मैं

1736
01:57:28,480 --> 01:57:32,480
थोड़ा सा एक लाइन नहीं मैं मैं आ गया नहीं। अभी मैं थोड़ी अपनी सारी बातें कर लूं। अब

1737
01:57:32,480 --> 01:57:36,720
दूसरी बात आपने ये कही कि कुत्तों में एक चीज होती है कि क्या

1738
01:57:36,720 --> 01:57:40,800
कहते हैं वो जब तक वो ना मिले तब तक ऐसा नहीं करते हैं। यानी

1739
01:57:40,800 --> 01:57:44,880
कि हमें ये बात माननी चाहिए कि जब तक ना मिले तब तक ना करें। बाद में

1740
01:57:44,880 --> 01:57:48,960
जो है कर ले अगर ना मिले तो ऐसा है। दूसरी बात ये है कि शब्द प्रमाण

1741
01:57:48,960 --> 01:57:52,960
को आपने ठुकराया नहीं है। बस मुझे ये बात माननी है। आपने कहा मैंने ये बात जो कही थी

1742
01:57:52,960 --> 01:57:57,040
वो इसलिए कही थी कि हम ये चर्चा कर रहे हैं। वो अवतार ले सकता

1743
01:57:57,040 --> 01:58:01,040
है कि नहीं। मुझे नहीं मालूम था कि अगर चर्चा मुझे ये बात मालूम

1744
01:58:01,040 --> 01:58:02,640
होती कि वो अवतार

1745
01:58:02,640 --> 01:58:06,640
यह वाला है यह वाला नहीं है। यह डिसाइड कैसे होगा? तो उसके लिए तो मैं कहता

1746
01:58:06,640 --> 01:58:10,720
हां इस बारे में शब्द प्रमाण है। मैंने जो ये लाइन कही थी उसकी हमको

1747
01:58:10,720 --> 01:58:15,440
अभी शब्द प्रमाण पे नहीं तार्किकता पे है कि ले सकता है कि नहीं ले सकता।

1748
01:58:15,440 --> 01:58:19,680
ठीक है? और दूसरी बात कि कौन होगा कौन नहीं होगा ये तो बाद की बात है।

1749
01:58:19,680 --> 01:58:23,680
वो तो ले सकता ही मना कर रहा है ना। पहले इसको तो स्वीकार करो आप। तब

1750
01:58:23,680 --> 01:58:27,760
मैं इसको स्वीकार करने पे आऊंगा कि भैया शब्द प्रमाण ही है इसके बारे में। पहले आप

1751
01:58:27,760 --> 01:58:32,000
यह स्वीकार करो जब ले सकता है कि नहीं ले सकता मैं तो ले सकता है

1752
01:58:32,000 --> 01:58:36,000
तो वो जो आर्य समाज का कांसेप्ट है कि नहीं ले सकता है वो बात कट रही है।

1753
01:58:36,000 --> 01:58:40,560
दूसरी बात अब यह है कि आपने कहा कि

1754
01:58:40,560 --> 01:58:44,640
हम किसी नास्तिक को ही नहीं कहेंगे। तो मैंने आपको उसके बारे में बताया है कि

1755
01:58:44,640 --> 01:58:48,640
हम कई चीजों में जो क्या कहते हैं कई चीजें हैं

1756
01:58:48,640 --> 01:58:52,640
जो शब्द प्रमाण से ही मानते हैं और मान लीजिए कि चलिए आपने कहा

1757
01:58:52,640 --> 01:58:56,640
कि जब तक उनको मिलता नहीं है तब तक वो अपने अपने ही परिवार में इंटिमेट

1758
01:58:56,640 --> 01:59:01,120
नहीं होते हैं। मैं कह रहा हूं गोद ली हुई बहन के साथ तो हमारे यहां मर्यादा है ना

1759
01:59:01,120 --> 01:59:05,200
जो हमारी जेनेटिकली हमारे परिवार की वंशज नहीं है। फिर

1760
01:59:05,200 --> 01:59:09,280
उसके साथ भोग करने में क्यों मन वो हो रहा है? फिर उसको आप सिद्ध कैसे

1761
01:59:09,280 --> 01:59:13,600
करोगे? गोद ली हुई और यह एक बात नहीं है। ऐसी हजारों बातें

1762
01:59:13,600 --> 01:59:17,600
हैं जो हमने शब्द प्रमाण से मैंने और आपने मानी हुई है। ठीक है?

1763
01:59:17,600 --> 01:59:18,100
ये

1764
01:59:17,840 --> 01:59:22,080
तो एक उदाहरण मात्र है। अगर हम बात करेंगे तो ऐसी हजारों बातें होंगी जो हमने

1765
01:59:22,080 --> 01:59:26,080
शब्द प्रमाण उसका एक मात्र है। अब उसमें अगर नास्तिक नहीं मान रहा है तो वहां पर हम कुछ

1766
01:59:26,080 --> 01:59:30,240
नहीं। मगर नास्तिक के सामने ये प्रूफ कर सकते हैं कि हां सत्ता है।

1767
01:59:30,240 --> 01:59:34,400
अब वो जाना चाहता है उसके बावजूद भी ये जो नियमावली है उसको फॉलो

1768
01:59:34,400 --> 01:59:38,640
नहीं कर सकता है। तो वहां पर हम उसको वो नहीं कर। मगर वो जो ये कह रहा है कि ईश्वर का अस्तित्व

1769
01:59:38,640 --> 01:59:42,640
ही नहीं है उसमें हम उसको निरुत्तर कर देंगे। अब उसके बाद वो

1770
01:59:42,640 --> 01:59:46,800
आगे की डिबेट है कि उसको किस कौन सी वो माननी उसमें भी हम उसको निरुत्तर

1771
01:59:46,800 --> 01:59:50,880
कर देंगे कि वो कौन सी नियमावली को मानेगा। ठीक है? वो एक अलग विषय हो

1772
01:59:50,880 --> 01:59:55,200
जाएगा। अच्छा दूसरी एक बात ये है कि लक्षण की बात आखरी

1773
01:59:55,200 --> 01:59:57,440
है। लक्षण लक्षण की बात ये है कि

1774
01:59:57,440 --> 02:00:01,600
जैसे आपने कहा आपको लक्षण नहीं दिख रहे। तो ऐसा

1775
02:00:01,600 --> 02:00:05,840
भी हो सकता है कि आप अंधे हो। अगर हम कहें कि ईश्वर

1776
02:00:05,840 --> 02:00:10,000
चिल्ला के दिखाया ऐसा भी हो सकता है कि हम बह रहे हो तो हमें वहां पर शब्द

1777
02:00:10,000 --> 02:00:14,480
प्रमाण से यह पता चल रहा है ना कि वो रोल कर रहे थे।

1778
02:00:14,480 --> 02:00:18,560
अगर हमको विश्वास नहीं शब्द प्रमाण में तो बात अलग है। मगर जब हमको शब्द प्रमाण

1779
02:00:18,560 --> 02:00:22,800
से पता चल रहा है कि वो वहां पर रोल कर रहे थे। वास्तविकता में सर्वज्ञ

1780
02:00:22,800 --> 02:00:27,040
ही थे। वो वहां पर दुखी होने का रोल कर रहे थे। वास्तविकता में वो आनंदित

1781
02:00:27,040 --> 02:00:31,120
ही थे। वास्तविकता में वो सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म का व्यवहारिक रूप

1782
02:00:31,120 --> 02:00:35,120
ही थे। तो हम हम उस पर विश्वास कर लेते हैं। आप मत करो।

1783
02:00:35,120 --> 02:00:39,280
आप यह मत मानो कि यह वाला अवतार है। यह वाला नहीं है। आप यह कहना तो शुरू करो कि अवतार

1784
02:00:39,280 --> 02:00:40,880
ले सकता है ईश्वर। आप

1785
02:00:40,880 --> 02:00:45,280
ये तो कहो हो गया। हां बताइए।

1786
02:00:45,280 --> 02:00:49,360
ठीक है। तो यानी आपने स्वीकार कर लिया इस बात को मोटा-म

1787
02:00:49,360 --> 02:00:53,520
मोटी क्योंकि जैसा मैंने पहले ही बताया कि कि आपने जो देखिए

1788
02:00:53,520 --> 02:00:57,760
आप अगर देखिए अगर आप शब्दों का खेल है तो मैं भी ये कह सकता हूं आपने यानी

1789
02:00:57,760 --> 02:01:02,560
आपने स्वीकार कर लिया मोटा-मोटा कि ईश्वर अवतार ले सकता है।

1790
02:01:02,560 --> 02:01:06,560
देखिए वो तो जनता डिसाइड कर ले कोई इशू नहीं है। लेकिन फिलहाल मैं बोलूंगा तो वो भी जनता ही

1791
02:01:06,560 --> 02:01:10,880
डिसाइड करेगी। फिर वो क्यों बोल रहे हैं? वो भी जनता ही डिसाइड करेगी। मेरी आप बात सुने

1792
02:01:10,880 --> 02:01:15,440
देखो आपने सुना भी नहीं कि मैंने किस चीज को स्वीकार करने के बारे में बोला। आप निर्णायक आप निर्णायक

1793
02:01:15,440 --> 02:01:19,520
आप निर्णायक वक्तव्य जब दे रहे हैं तो मैं उसको क्रॉस कर रहा हूं। निर्णायक वक्तव्य मत दीजिए

1794
02:01:19,520 --> 02:01:23,920
कि आपने यह कर लिया। मैं उसको क्रॉस कर रहा हूं। निर्णायक मत अपनी आप विवेचना

1795
02:01:23,920 --> 02:01:28,080
दीजिए। आप अपना पक्ष बताइए। आप निर्णायक मत बनिए। वो जनता निर्णायक है उसका।

1796
02:01:28,080 --> 02:01:32,400
निर्णय सुना रहे हैं ना आपने स्वीकार कर लिया। कितना बोलते हैं मुझे भी बोलने

1797
02:01:32,400 --> 02:01:36,400
दीजिए। कितना अभी खत्म ही नहीं हुआ क्या आपका? चलिए चलिए बोलिए बोलिए बोलिए। खत्म

1798
02:01:36,400 --> 02:01:40,480
ही नहीं होता। अच्छा ऐसा नहीं सुनिए। पॉइंट ये है कि मैंने जब बोला ना इस बात को कि आपने

1799
02:01:40,480 --> 02:01:44,560
इस चीज को स्वीकार कर लिया। आपने सुना भी नहीं कि मैं किस चीज को स्वीकार करने की बात कर रहा हूं। आप

1800
02:01:44,560 --> 02:01:49,120
बीच में आप इंटरप्ट करना चालू हो कि नहीं कैसे कैसे कैसे चलिए कर

1801
02:01:49,120 --> 02:01:53,280
देता हूं। आपने आपने इस चीज को माना कि ये

1802
02:01:53,280 --> 02:01:56,160
जो शब्द प्रमाण से पता चलेगा कि ये अवतार

1803
02:01:56,160 --> 02:02:00,160
है ये अवतार है। बाकी उसका लक्षण नहीं घटेगा। आपने मान लिया इस चीज को। मानते हैं ना इस चीज को एक्सेप्ट

1804
02:02:00,160 --> 02:02:04,240
करते हैं। मैंने यही चीज बोली। लक्षण नहीं घटेगा। ये मैं कहां कह रहा हूं?

1805
02:02:04,240 --> 02:02:08,800
लक्षण घटेगा मगर उसके हम गवाह नहीं बन सकते। ओवरऑल एट द एंड।

1806
02:02:08,800 --> 02:02:12,880
लक्षण नहीं घटेगा। मैं कहां कह रहा हूं? मैं ये थोड़ी ना कह रहा हूं कि हम ईश्वर से कहे अगर

1807
02:02:12,880 --> 02:02:16,960
तुम बात सुनिए जी चलिए ठीक है बताइए लक्षण नहीं

1808
02:02:16,960 --> 02:02:21,200
घटेगा नोट कर लेता हूं मुझे समझ में नहीं आता कि मैं आपकी बात आप जो मैंने

1809
02:02:21,200 --> 02:02:25,520
कहा है वो बोलिए ना आप आप जब वो बता रहे हैं पैराग्राफ

1810
02:02:25,520 --> 02:02:29,760
मैंने कोई ऐसी बात कही जो आपने नहीं बोली है बताइए मेरे को बोल

1811
02:02:29,760 --> 02:02:33,760
मैंने कोई ऐसी बात कही है कूद के मुझे बोलेंगे क्या तो

1812
02:02:33,760 --> 02:02:37,920
कैसे बोलूं भाई आप आप अगर दो चार चीजें वो बोल आप दो

1813
02:02:37,920 --> 02:02:41,920
चार चीजें गलत बता देंगे आप दो चार चीज़ मुझे गलत बता देंगे। अभी मेरे पहले के

1814
02:02:41,920 --> 02:02:46,000
भी कई पॉइंट रह गए हैं जो मैं बोल नहीं पाया। अभी

1815
02:02:46,000 --> 02:02:50,160
मैं बोल लूं। आप वो आप वो बोलिए। आप वो बोलिए जो

1816
02:02:50,160 --> 02:02:54,160
कि मैंने बोला है। अगर मेरे अगर मेरे संदर्भ से बोल रहे हैं तो आप

1817
02:02:54,160 --> 02:02:58,400
वो एज इट इज बोलिए जो मैंने बोला है। मैंने इनहीं का लक्षण नहीं घटेंगे। हम उसके साक्षी

1818
02:02:58,400 --> 02:03:02,400
नहीं बन सकते हैं। वो व्यवहार में आएगा तो कहीं ना कहीं हमको ये होगा कि

1819
02:03:02,400 --> 02:03:06,480
यहां पे दिख रहा है यहां नहीं दिख रहा। बोल लेने दीजिए। मैं सुन चुका

1820
02:03:06,480 --> 02:03:10,640
हूं। मैंने क्या कहा? मैंने क्या कहा? जो मैंने बोला है वही आप बोलिए। मेरे संदर्भ

1821
02:03:10,640 --> 02:03:11,360
से अपने संदर्भ

1822
02:03:11,360 --> 02:03:15,600
से कुछ भी बोलिए। मेरे संदर्भ से जब आप बोल रहे यानी आपने मान लिया कि उसके लक्षण

1823
02:03:15,600 --> 02:03:19,600
नहीं घटेंगे तो ये बात मैंने कहीं नहीं बोली है। आप रिवाइज करके दिखा

1824
02:03:19,600 --> 02:03:23,680
दीजिए। मैंने कहा बोली कि उसके लक्षण नहीं घट सकते। मैं सुन चुका हूं। 10

1825
02:03:23,680 --> 02:03:27,840
बार और तो आप उसको आप उसको स्वीकार करिए ना। मुझे क्या पता आप दोबारा ऐसा

1826
02:03:27,840 --> 02:03:31,840
करने वाले हैं कि नहीं। फिर मैं इंटरप्ट करूंगा। फिर आप कहोगे कि कूदेंगे। आप उसको

1827
02:03:31,840 --> 02:03:35,840
स्वीकार करिए ना। फिर आगे बढ़। मेरे भाई जब आप मुझे बोलने दोगे तब

1828
02:03:35,840 --> 02:03:39,840
तो मैं कुछ बोलूंगा। बोलो रेगुलर रेगुलर रेगुलर लगे पड़े पता नहीं क्या अचीव करना

1829
02:03:39,840 --> 02:03:43,840
चाहिए। अरे भाई जब आप देखो दूसरी बातें बोलोगे पर ये नहीं बोलोगे कि हां मैं नहीं

1830
02:03:43,840 --> 02:03:48,000
करूंगा ऐसा आपके संदर्भ से जो चीजें आपने बोली वही बोलूंगा शांत

1831
02:03:48,000 --> 02:03:52,000
हो जाओ मेरे को मेरी बारे में बोलने दो शांत हो जाओ हां बोलिए माइक आप

1832
02:03:52,000 --> 02:03:56,160
म्यूट कर लो ठीक है पॉइंट ये ये आप तय मत करिए मैं क्या करूं

1833
02:03:56,160 --> 02:04:00,240
क्या ना करूं आप ऐसे तय मत करिए मत बोलिए ना आप ये आप

1834
02:04:00,240 --> 02:04:04,720
देखिए आप क्या कर रहे हैं मैंने जो चीजें बोली नहीं वो आप एक निर्णायक

1835
02:04:04,720 --> 02:04:08,720
रूप में बोल रहे हैं कि मैंने ये बोला अब उसके बाद क्या होगा कि जो

1836
02:04:08,720 --> 02:04:12,800
10 चीजें और बता 10 चीजें और बता देंगे। उसके बाद मेरी एक चीज वो छूट

1837
02:04:12,800 --> 02:04:16,800
जाएगी। मैंने बोला कि नहीं बोला। तो आप मेरे रेफरेंस से वही बात बोलिए

1838
02:04:16,800 --> 02:04:20,800
जो बात आपने जो बात मैंने बोली है। दूसरी बात आपने दोबारा से आपने

1839
02:04:20,800 --> 02:04:25,040
अभी कहा था कि आप कूदो शब्द का इस्तेमाल नहीं करेंगे। आपने फिर कर दिया।

1840
02:04:25,040 --> 02:04:26,480
हां मैं माफी मांगता हूं। इसके लिए मेरे

1841
02:04:26,480 --> 02:04:30,560
से गलती हो गई। ठीक। अबकी बार ऐसा ना हो। नहीं तो हमको ये जो है

1842
02:04:30,560 --> 02:04:34,640
जो चर्चा है यहीं पर रोकनी पड़ जाएगी। अबकी बार ऐसा ना करिए।

1843
02:04:34,640 --> 02:04:38,720
हां। ठीक है। अब पॉइंट इसके अंदर ये आ जाता है हम आ जाते

1844
02:04:38,720 --> 02:04:42,720
हैं मूल विषय पर कि जब हम लक्षण की बात कर रहे हैं तो

1845
02:04:42,720 --> 02:04:46,960
आपने जो लक्षण दो लक्षण आपने बताए थे अब वो दोनों लक्षण

1846
02:04:46,960 --> 02:04:51,040
जब हम जीवनी से चेक करते हैं तो कटते हैं। दोनों लक्षण वहां पे कटते हैं। पॉइंट

1847
02:04:51,040 --> 02:04:55,120
इसके अंदर ये आ जाता है कि तब आपने इस चीज को स्वीकार किया। आपने बोला कि हां

1848
02:04:55,120 --> 02:04:59,200
जब हम अवतार पे कि यह अवतार है या नहीं है इस विषय में हम

1849
02:04:59,200 --> 02:05:03,200
शब्द प्रमाण पर ही निर्भर हैं। जो मैंने आपसे पूछा था

1850
02:05:03,200 --> 02:05:07,280
वो मैंने पूछा था कि अगर हमें लक्षण पता हो तो हम लक्षण के द्वारा चेक कर सकते हैं कि फलाना

1851
02:05:07,280 --> 02:05:11,840
व्यक्ति शब्द पर ये अवतार है। जैसे मैंने उदाहरण दिया था कि राम जी और रामपाल

1852
02:05:11,840 --> 02:05:15,840
है ना। तो हम लक्षण पता हो तो हम चेक कर सकते हैं कि अगर वो रामपाल में लक्षण घट रहे होंगे

1853
02:05:15,840 --> 02:05:19,920
तो रामपाल अवतार हो जाएगा। राम जी में घट रहे हो तो राम जी अवतार हो जाएंगे। वो लक्षण तो

1854
02:05:19,920 --> 02:05:23,920
जो आपने लक्षण बताए वो जब हमने उसे राम जी के कॉन्टेक्स्ट में चेक

1855
02:05:23,920 --> 02:05:28,080
किया तो वो कट रहे थे वहां पे। अच्छा तो जब राम जी के कॉन्टेक्स्ट

1856
02:05:28,080 --> 02:05:32,240
में जरा मैं अपनी बारे में बोल लीजिएगा कोई। हां बोलिए बोलिए बोलिए

1857
02:05:32,240 --> 02:05:36,880
है ना तो जब राम जी के कान्टेक्स्ट में जब हमें सिद्ध हो रहा है कि वो सर्वज्य नहीं है।

1858
02:05:36,880 --> 02:05:40,880
ऐसे जगह आ रहे हैं जहां पे वो दिख रहा है कि नहीं वो उन्हें चीजों के बारे में नहीं

1859
02:05:40,880 --> 02:05:41,680
पता। कृष्ण

1860
02:05:41,680 --> 02:05:45,760
जी के विषय में जब वो कृष्ण जब वो दत क्रीड़ा होती है कृष्ण जी युद्ध लड़ के वापस आते

1861
02:05:45,760 --> 02:05:49,760
हैं। पांडवों से कहते हैं कि नहीं मैं तो था ही नहीं। मैं तो युद्ध लड़ रहा था। मुझे पता ही नहीं था कि यहां ये

1862
02:05:49,760 --> 02:05:53,840
सब हो गया। मैं होता तो मैं ये होने नहीं देता। मैं तो दूध क्रीड़ा होने उन्होंने यह

1863
02:05:53,840 --> 02:05:57,920
शब्द ये तक शब्द बोला कि अगर मैं होता और ये लोग नहीं मानते तो मैं सबका वध करके भी इसको

1864
02:05:57,920 --> 02:06:02,080
रोकता। उन्होंने बोला था। वो कहते हैं कि मुझे नहीं पता था कि ऐसा कुछ यहां पे हो रहा है। मैं तो युद्ध में बिजी

1865
02:06:02,080 --> 02:06:06,400
था। उन्होंने ये बात बोला। यानी वहां पे भी वो अपने अल्पजीता प्रकट करते। सर्वजिता वहां खत्म हो जाती है।

1866
02:06:06,400 --> 02:06:10,560
तो अर्थात वहां पे लक्षण जो है वो नहीं मेरा मेरी एक रिक्वेस्ट है आपसे।

1867
02:06:10,560 --> 02:06:14,560
मेरी एक रिक्वेस्ट मेरी एक रिक्वेस्ट है मैं थोड़ा सा इंटरप्ट करना मजबूरी है

1868
02:06:14,560 --> 02:06:18,560
मेरी कि आप जो यह उदाहरण दे रहे हैं ना जिसमें कि

1869
02:06:18,560 --> 02:06:22,800
उन्होंने ऐसा किया अगर ये उदाहरण देंगे तो हमें हमारी जो एक चर्चा

1870
02:06:22,800 --> 02:06:26,880
व्यर्थ में एक ओर जाएगी मुझे फिर उसका भी खंडन करना पड़ेगा अगर वो आपने

1871
02:06:26,880 --> 02:06:30,880
एक उदाहरण दिया आप अपनी एक बात रखिए कि हां उनकी सर्वजता प्रकट नहीं होती

1872
02:06:30,880 --> 02:06:35,280
ऐसी कई चीजें मगर आप उसमें वस्तुनिष्ठता के साथ कोई संदर्भ दे देंगे

1873
02:06:35,280 --> 02:06:39,280
और फिर मुझे लगेगा ये बहुत इंपॉर्टेंट है ऐसा ना हो कि यहां पर इससे लोग

1874
02:06:39,280 --> 02:06:43,360
यही संदेश संदेश प्राप्त करके रह जाए कि उन्होंने अपने आप को यही कहा था। फिर मुझे वहां पर उसका

1875
02:06:43,360 --> 02:06:47,360
खंडन करने के लिए दूसरा पूरा चैप्टर एक नया खोलना पड़ेगा। फिर हो

1876
02:06:47,360 --> 02:06:51,360
सकता है उसमें आपको इंटरप्शन हो जाए तो फिर आप उसका खंडन करो। फिर मुझे उसमें

1877
02:06:51,360 --> 02:06:55,440
इंटरप्शन हो जाता। तो उन चीजों से बचिए जिनसे कि हमारी जो चर्चा

1878
02:06:55,440 --> 02:06:56,720
है भटक सकती है।

1879
02:06:56,720 --> 02:07:00,800
तो इसलिए आप अगर केवल सिद्धांत कह देंगे उससे भी काम चल जाएगा। उसमें

1880
02:07:00,800 --> 02:07:05,040
आपको यह संदर्भ देने की आवश्यकता नहीं है कि उस समय ऐसा हुआ था। दे रहा था फिर

1881
02:07:05,040 --> 02:07:09,280
मुझे उसमें फिर मुझे उसमें निराकरण भी प्रस्तुत करना पड़ेगा क्योंकि उसमें हमारे सिद्धांत

1882
02:07:09,280 --> 02:07:13,360
की वो हो रही है ना अकीर्ति तो उसमें मुझे निराकरण प्रस्तुत करना पड़ेगा

1883
02:07:13,360 --> 02:07:17,360
खामखा हमारी चर्चा बदलती चली जाएगी ट्रैक बदलता चला जाएगा ठीक

1884
02:07:17,360 --> 02:07:21,360
है ठीक है ठीक है अब देखिए पॉइंट यानी इतना जो है दर्शकों को भी क्लियर हो चुका है आपको

1885
02:07:21,360 --> 02:07:25,440
भी क्लियर हो चुका है कि हमें वहां पे कट रहा है अच्छा इस चीज में आपने ये कहा था जहां तक

1886
02:07:25,440 --> 02:07:29,520
मैं समझ पा रहा हूं क्योंकि बहुत सारे पॉइंट मिसिंग भी होते हैं दिमाग से ठीक है जहां तक मुझे ध्यान आ

1887
02:07:29,520 --> 02:07:33,600
रहा है आपने ये बात कहा था कि जो ईश्वर है मतलब वो

1888
02:07:33,600 --> 02:07:37,760
कौन कौन सा जो अवतार है वो ईश्वर ने कौन-कौन से अवतार लिए ये हमें इसके लिए हम शब्द

1889
02:07:37,760 --> 02:07:41,840
प्रमाण पे ही डिपेंड है। हम लक्षणों के माध्यम से हम वो चीज को क्या

1890
02:07:41,840 --> 02:07:46,000
पता हम वेरीफाई ना कर पाए क्योंकि हो सकता है वो उसको दिखा ही ना रहा हो। एक पॉइंट आपने बोला था क्या

1891
02:07:46,000 --> 02:07:50,160
पता वो लीला कर रहा हो तो दिखा ना रहा हो। है ना? इस पॉइंट में हम ये आ जाते हैं कि अगर हम ये

1892
02:07:50,160 --> 02:07:54,160
लेके भी चलते हैं। वैसे तो लक्षण एक ऐसी चीज है जो कि अप्रकट नहीं होती प्रकट ही

1893
02:07:54,160 --> 02:07:58,240
होती है। जब भी क्रिया होती है तो लक्षण प्रकट होते हैं। उसी को ही लक्षण बोले जाते

1894
02:07:58,240 --> 02:08:02,320
हैं पहचान। ठीक है? कि अगर मैं वर्दी पहनूंगा तो वर्दी तो रहेगी ही रहेगी ना। वर्दी पहन के

1895
02:08:02,320 --> 02:08:06,400
भी वर्दी ना रहे तो वो फिर वही बात है ना कि जैसे शादी होगा तो वो शरीर के साथ ही

1896
02:08:06,400 --> 02:08:10,560
होगा। वो आ जाती है पॉइंट। अब उसी प्रकार से यह भी है कि अगर

1897
02:08:10,560 --> 02:08:11,920
कार्य हो रहा है तो लक्षण तो सीधी

1898
02:08:11,920 --> 02:08:15,920
बात प्रकट हो गई होगी। है ना? अब इसके अंदर वही बात है। अब आप कह रहे हो कि नहीं

1899
02:08:15,920 --> 02:08:20,080
लक्षण के माध्यम से तो हम वो पॉइंट वहां पे कट रहे हैं तो हम उसे ठीक-ठीक

1900
02:08:20,080 --> 02:08:24,160
जांच नहीं कर पाएंगे कि रामपाल और उसमें क्या है। तो हमें शब्द प्रमाण निर्भर होना पड़ेगा। क्योंकि शब्द

1901
02:08:24,160 --> 02:08:28,160
प्रमाण के आधार पे रामपाल अवतार नहीं है। राम जी अवतार हैं। तो इसलिए आप मान रहे हो। एक वाला पॉइंट यहां पे ये

1902
02:08:28,160 --> 02:08:32,320
आ गया। यानी हमारे पास में मोटा-मोटी तौर पर यही है कि लक्षण जो है वहां पर मिसमैच

1903
02:08:32,320 --> 02:08:36,400
नहीं हो पा रहे। फिर मैंने आपसे पूछा था कि मुझे कोई लक्षण दे दीजिए। दो लक्षण तो

1904
02:08:36,400 --> 02:08:40,560
मिसमैच हो गए। मुझे कोई और तीसरा लक्षण दे दीजिए। तो वो आपने तीसरा लक्षण नहीं दिया

1905
02:08:40,560 --> 02:08:44,560
मुझे कोई और आपने यही बोला कि नहीं शब्द प्रमाण ही है। उसी से ही हम

1906
02:08:44,560 --> 02:08:48,560
इस चीज को स्वीकार करेंगे। चलिए ठीक है। कोई इशू नहीं है। इसको भी हम मान

1907
02:08:48,560 --> 02:08:52,560
लेते हैं। अब हम आगे बढ़ते हैं सिद्धि की तरफ। अवतार सिद्धि की तरफ। अब

1908
02:08:52,560 --> 02:08:56,560
जो मुख्य विषय जो आपने अवतार सिद्धि पे कर ले। अब इस जो आपने बोला इसप दे दूं

1909
02:08:56,560 --> 02:09:00,720
आपको। शुद्धि की तरफ आगे बढ़ते हैं। ये जो आपने बोला अभी

1910
02:09:00,720 --> 02:09:04,800
तक लक्षण वाला मैं बोल दूं इसलिए अगर हम इसको

1911
02:09:04,800 --> 02:09:08,960
रिवाइज कर दे थोड़ा सा कि मैं आपसे पूछूं कि

1912
02:09:08,960 --> 02:09:12,960
वो जो है ये लक्षण उनके कट रहे हैं। ये

1913
02:09:12,960 --> 02:09:17,200
आपको कहां से प्राप्त हुआ? तो इस संबंध में आपके पास क्या प्रमाण है? सिवाय

1914
02:09:17,200 --> 02:09:21,520
शब्द के। जीवनी है। ऐतिहास प्रमाण है। यही तो शब्द है। इसी

1915
02:09:21,520 --> 02:09:25,520
शब्द की तो बात कह रहा हूं मैं। आप उनके लक्षण कटने के संबंध में

1916
02:09:25,520 --> 02:09:27,840
भी तो शब्द प्रमाण ही दे रहे हैं।

1917
02:09:27,840 --> 02:09:31,840
इसको मैंने रिवाइज कर दिया केवल। आपने कहा कि उनके लक्षणों के संबंध में

1918
02:09:31,840 --> 02:09:35,840
क्या प्रमाण है? तो मैंने कहा शब्द अब मैंने कहा उनके लक्षण कटने के संबंध में क्या प्रमाण है?

1919
02:09:35,840 --> 02:09:39,840
तो आपने कहा शब्द तो हम तो दोनों एक ही मंच पे हैं। बस ये है कि आप

1920
02:09:39,840 --> 02:09:44,000
शब्द एक मिनट एक मिनट भाई पूरा पूरा ले लो पूरा बता दूं।

1921
02:09:44,000 --> 02:09:48,240
तो उसमें क्या है कि आप जो है शब्द प्रमाण थोड़ा मान रहे हो वो आपकी

1922
02:09:48,240 --> 02:09:52,240
मान्यता के अनुसार और बाद वाला या उसी उसी चैप्टर में अगले पेज पे

1923
02:09:52,240 --> 02:09:56,240
क्या दिया वो नहीं मान जैसे कि वाल्मीकि रामायण में लिखा हुआ है

1924
02:09:56,240 --> 02:10:00,640
कि तुम सर्वज्ञ हो तुम ये लीला रूप कर रहे हो

1925
02:10:00,640 --> 02:10:04,720
तुम परम ब्रह्म हो ये सब लिखा हुआ है उसी में तो हम शब्द प्रमाण को मान तो

1926
02:10:04,720 --> 02:10:09,040
रहे हैं लक्षण कटने के लिए तो मान रहे हैं मगर लक्षण घटित

1927
02:10:09,040 --> 02:10:13,200
होने के लिए नहीं मान रहे शब्द प्रमाण ठीक है मैं इसको समझा देता हूं मैं

1928
02:10:13,200 --> 02:10:17,200
समझ मैं आपको समझा देता हूं कि मैंने ऐसा क्यों बोला मैं अपनी पूरी बात पूरी

1929
02:10:17,200 --> 02:10:22,160
बात बोल दूं तो जी कहने का अर्थ ये है कि इस संबंध में

1930
02:10:22,160 --> 02:10:26,560
इसलिए भी वो शब्द प्रमाण है क्योंकि यदि उनके होने के संबंध में

1931
02:10:26,560 --> 02:10:30,560
यदि उनके ना होने के संबंध में आप शब्द प्रमाण को ले रहे हैं तो

1932
02:10:30,560 --> 02:10:34,720
उनके होने के संबंध में भी शब्द प्रमाण को ही लेना पड़ेगा। पूरे शब्द को लेना पड़ेगा। पूरी

1933
02:10:34,720 --> 02:10:38,880
जीवनी को लेना पड़ेगा। पूरा शब्द लेना पड़ेगा। यहां तक कि राम जी और कृष्ण

1934
02:10:38,880 --> 02:10:43,040
जी थे। इस संबंध में भी शब्द प्रमाण है अंतोगत और

1935
02:10:43,040 --> 02:10:47,440
मैं आपको बताऊं और आपने एक बात और कही है लक्षण

1936
02:10:47,440 --> 02:10:51,440
प्रकट होते हैं। बिल्कुल होते हैं। मगर कई लक्षण व्यवहारिक रूप से प्रकट

1937
02:10:51,440 --> 02:10:55,440
नहीं कर सकते। ईश्वर एक रस है। ये प्रकट करेंगे

1938
02:10:55,440 --> 02:10:59,760
तो ईश्वर की सृष्टि ही नहीं कर पाएंगे हम। प्रकट नहीं केवल प्राप्तव्य

1939
02:10:59,760 --> 02:11:03,920
का विषय ये वाला लक्षण। ठीक है? अब जैसे लक्षण

1940
02:11:03,920 --> 02:11:08,160
प्रकट होते हैं। ईश्वर ने सृष्टि बनाई। वैदिक ईश्वर ने ही बनाई।

1941
02:11:08,160 --> 02:11:11,360
कैसे सिद्ध होता है?

1942
02:11:11,360 --> 02:11:15,600
वैदिक ईश्वर नहीं देने बताइए

1943
02:11:15,600 --> 02:11:19,680
लक्षण बताइए। वो थोड़ा सा विषय भटक जाएगा। अब तक जो बोला मैं पहले

1944
02:11:19,680 --> 02:11:23,680
उस बोलना चाहूंगा। कहने का मतलब ये है लक्षण प्रकट होते बिल्कुल है। मगर

1945
02:11:23,680 --> 02:11:27,920
कई लक्षण ऐसे हैं जो प्राप्तव्य का विषय है। वो व्यवहार में आ सकने

1946
02:11:27,920 --> 02:11:32,800
वाले या फिर वाणी का निर्वाचन का विषय नहीं है।

1947
02:11:32,800 --> 02:11:36,800
जैसे सच्चिदानंद लक्षण है ना आता है पॉइंट। मैम अब जो आपने

1948
02:11:36,800 --> 02:11:40,800
मोटा मोटी मूल पॉइंट बोला उसको मैं एड्रेस कर देता हूं कि क्यों क्यों

1949
02:11:40,800 --> 02:11:44,800
हम जहां राम जी को किसी बात के बारे में जानकारी नहीं है उस वाले पॉइंट को

1950
02:11:44,800 --> 02:11:48,880
तो हम पकड़ रहे हैं लेकिन उस वाले पॉइंट को हम छोड़ दें जहां वहां लिखा है कि वो सर्वजन सरस्वती है। उस

1951
02:11:48,880 --> 02:11:52,960
वाले पॉइंट को छोड़ कि ऐसा क्यों कर रहे हैं? रीज़न मैं बता देता हूं। रीज़न इसको उदाहरण देके समझाता

1952
02:11:52,960 --> 02:11:57,440
हूं। बड़ा इजी है। समझिएगा इस चीज को। जैसे

1953
02:11:57,440 --> 02:11:58,080
कुरान में

1954
02:11:58,080 --> 02:12:02,240
लिखा है कि जो अल्लाह है वो सर्वशक्तिमान है। कुरान में लिखा

1955
02:12:02,240 --> 02:12:06,960
है कि अल्लाह ऑल नोइंग है। ठीक है? फिर भी हम उस पर तर्क करते हैं।

1956
02:12:06,960 --> 02:12:11,360
है ना? वो तर्क में फंस जाते हैं। सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं होते। अच्छा उसी प्रकार

1957
02:12:11,360 --> 02:12:15,440
जैसे कुरान में लिखा है कि जो अल्लाह

1958
02:12:15,440 --> 02:12:19,920
है वो ऑल नोइंग है। और एक जगह पे दूसरे जगह पे क्या कर रहा है? उसकी अल्पज्जता प्रकट हो रही है।

1959
02:12:19,920 --> 02:12:23,920
दूसरे जगह पे वो उसे किसी बात की जानकारी नहीं है। तो हम वहां फंसाते

1960
02:12:23,920 --> 02:12:28,160
हैं ना सामने वाले को फसाते हैं। कैसे फंसाते हैं? कि भैया अगर यह सर्वज्य है तो

1961
02:12:28,160 --> 02:12:32,320
यहां पे ये कैसे अल्पज्ज्य हो रहा है। कैसे फंस रहा है पॉइंट पे? यानी कि कहने का अर्थ यह

1962
02:12:32,320 --> 02:12:36,720
है कि शब्द रूप में तो आप इस चीज को मुंह से तो बोल रहे हो। नहीं जैसे

1963
02:12:36,720 --> 02:12:40,800
उदाहरण समझिए जैसे मेरे सामने कोई व्यक्ति है। मैं मुंह से तो बोल रहा हूं कि नहीं बहुत महान

1964
02:12:40,800 --> 02:12:45,120
बहुत बढ़िया आप तो गजब हो एकदम है ना हरकतें उसकी लुच्चों वाली है। तो क्या समझ में आया

1965
02:12:45,120 --> 02:12:49,280
कि रियल में तो ऐसा नहीं है। लेकिन मैंने झूठ बोला या जो भी मैंने जो भी मेरा कारण

1966
02:12:49,280 --> 02:12:53,280
था मैंने उसको या किसी उसके किसी चेले ने या लीवापोती

1967
02:12:53,280 --> 02:12:57,280
करने वाले जिसने भी उसने उसको महान बताया। ठीक है? एक पॉइंट आ जाएगा। ये मैंने उदाहरण दिया खाली

1968
02:12:57,280 --> 02:13:01,280
समझने के लिए बात है ना? इसके अंदर तो यही उसी प्रकार से

1969
02:13:01,280 --> 02:13:05,280
अब जैसे मैंने वो कुरान वाला भी उदाहरण दे दिया उसी प्रकार से अगर कोई

1970
02:13:05,280 --> 02:13:09,280
व्यक्ति ठीक है किसी ने अब जैसे किसी ने लिखा है रामायण में

1971
02:13:09,280 --> 02:13:13,280
किसी ने लिखा कि राम जी जो है वो सर्वसक्तिमान है सर्वज्य हैं ठीक है आपने किसी

1972
02:13:13,280 --> 02:13:17,920
ने ब्रह्मा के मुंह से बुलवाना लिखा है या इंद्र के मुंह से किसके मुंह से बुलवाना लिख दिया ठीक

1973
02:13:17,920 --> 02:13:22,080
लेकिन क्या जो वहां पे मुंह से यहां जो लिखा है वो चीज रियल में घटित हो रही है

1974
02:13:22,080 --> 02:13:26,160
इतिहास के रूप में इतिहास के रूप में एक तो होता है सैद्धांतिक पक्ष

1975
02:13:26,160 --> 02:13:30,320
एक होता है ऐतिहासिक पक्ष इसीलिए न्यायदर्शन में जो आठ प्रमाण है ना उसमें से दो प्रमाण

1976
02:13:30,320 --> 02:13:34,720
आते हैं। एक होता है शब्द प्रमाण, एक होता है इतिहास प्रमाण। ऐतिह ठीक है? ऐतिहास प्रमाण।

1977
02:13:34,720 --> 02:13:38,960
इतिहास प्रमाण में सैद्धांतिक बातें नहीं आती। घटनाक्रम आता है। है ना?

1978
02:13:38,960 --> 02:13:43,040
सिद्धांतिक बातें जो होती है उसके लिए आप वचन प्रमाण होता है। वो शब्द प्रमाण के अंदर काउंट

1979
02:13:43,040 --> 02:13:47,120
होता है। शब्द प्रमाण दो प्रकार के होते हैं। ठीक? तो ये आ जाती है चीजें। उसी प्रकार

1980
02:13:47,120 --> 02:13:51,360
से उसी प्रकार से अब हमने यहां पे बात कर ली। तो यानी कि

1981
02:13:51,360 --> 02:13:55,360
जब वो कह रहे हैं ब्रह्मा जी अगर कह रहे हैं कि सरस्वती है, सर्वज है। लेकिन जब हम उसको

1982
02:13:55,360 --> 02:13:59,520
वेरीफाई करने के लिए उनकी जीव नहीं देख रहे तो वहां पर वो चीज हमें पता नहीं चल रही वो लक्षण घटित

1983
02:13:59,520 --> 02:14:03,680
नहीं हो रही। तो पॉइंट वही है ना कि या तो इधर गलत है या तो इधर गलत है।

1984
02:14:03,680 --> 02:14:07,760
भाई या तो ब्रह्मा जी का ब्रह्मा जी के मुंह से जिसने बुलवाना लिखा है वो गलत लिखा

1985
02:14:07,760 --> 02:14:12,000
है। जिस किसी ने भी लिखा है। ठीक है? वो गलत लिखा है या तो एक या तो ये पॉइंट हो जाएगा।

1986
02:14:12,000 --> 02:14:16,000
ठीक है? या फिर अगर वो सही लिखा है। अगर वो चीज पॉइंट सही

1987
02:14:16,000 --> 02:14:20,000
है तो उनके द्वारा किसी विषय की जानकारी ना होना। वो जो घटनाक्रम लिखा है

1988
02:14:20,000 --> 02:14:24,000
वो गड़बड़ घटनाक्रम है। उसमें हेरफेर की गई है। यानी दोनों में से

1989
02:14:24,000 --> 02:14:28,000
कुछ तो कटेगा क्योंकि दोनों में विरोध हो रहा है। लिखा है सर्वज लेकिन सर्वजिता प्रकट

1990
02:14:28,000 --> 02:14:28,500
नहीं हो

1991
02:14:28,320 --> 02:14:33,360
रही। तो उधर विरोध हो रहा है। ये पॉइंट है। हो गया।

1992
02:14:33,360 --> 02:14:37,520
सबसे पहली बात एक आपकी चीज मैं जानकारी दुरुस्त कर दूं। जैसे

1993
02:14:37,520 --> 02:14:41,520
राम जी का दुखी होना। है ना? उसमें लिखा है

1994
02:14:41,520 --> 02:14:45,600
या राम जी या कृष्ण जी का अल्पज्ञता होना उसमें लिखा है कि उनको मालूम

1995
02:14:45,600 --> 02:14:50,400
नहीं था। उनको मालूम नहीं था। है ना आप भी है ना है ना बोल रहे हैं उसको थोड़ा कंट्रोल करिए

1996
02:14:50,400 --> 02:14:54,640
नहीं तो मैंने तो आपसे नहीं कहा ना कि बीच-बीच में जरा जरा सी बात में इंटरप्ट मत करिएगा

1997
02:14:54,640 --> 02:14:58,640
आपने उस समय कहा था मुझको तो मैंने आपको बताया था कि आपने मैं जब आपसे मैं जब

1998
02:14:58,640 --> 02:15:02,640
आपसे ये कहूं कि आप मुझे इंटरप्ट मत करना अगली बार जब ये कहूं तब आप कहो

1999
02:15:02,640 --> 02:15:06,640
कि है ना मत कहो समझ रहे हो आप आप तो कर ही रहे हो मैंने आपको मैंने आपको

2000
02:15:06,640 --> 02:15:11,040
ऐसा नहीं कहा कि अब अगली बार मेरे बीच में मत बोलना क्योंकि मैं समझता हूं यह स्वाभाविक

2001
02:15:11,040 --> 02:15:15,440
एक बात है कहीं पे कोई बात हमें ठीक नहीं लग रही होगी और मैं है ना

2002
02:15:15,440 --> 02:15:19,520
मैं है ना कहूंगा तो आप उसमें बीच में कर सकते हो। मैं उस आपको आपत्ति नहीं

2003
02:15:19,520 --> 02:15:23,840
जता रहा हूं कि आप क्यों बोल रहे हो मेरे बीच में अबकी बार मत कूदना ये मत करना। मैं

2004
02:15:23,840 --> 02:15:27,920
अगर बोलूंगा तो मुझे रोकते हो ना तो मैं वही बोल रहा हूं कि आप तो मैं ऐसे रोकता हूं कि मुझे बोलने दो।

2005
02:15:27,920 --> 02:15:32,240
मैं आपका ये नहीं कहता अबकी बार मत करना ऐसा आप मतलब उस व्यवहार

2006
02:15:32,240 --> 02:15:36,320
पर उस व्यवहार से आपत्ति प्रकट नहीं करता हूं। मैं आपको ध्यान दिलाता

2007
02:15:36,320 --> 02:15:40,560
हूं। मुझे बोल लेने दो। आपत्ति प्रकट नहीं करता हूं। आपने गलती कर दी।

2008
02:15:40,560 --> 02:15:43,360
ये नहीं जब करना पड़ता है जब बहुत ज्यादा अति हो जाती है तब

2009
02:15:43,360 --> 02:15:47,680
अति भी प्रकट करनी पड़ती है वो अति फिर वो फिर पैरामीटर आएगा कि भैया कौन डिसाइड

2010
02:15:47,680 --> 02:15:52,160
करेगा आप वो भरा हुआ है उस आपत्तियों से वैसे तो चलिए वो

2011
02:15:52,160 --> 02:15:56,320
देखिए कमेंट सेक्शन की अगर बात करेंगे तो फिर वही बात आ जाएगी कि भैया

2012
02:15:56,320 --> 02:16:00,400
किसका कमेंट सेक्शन है किसने प्रचार किसने प्रचार किया है

2013
02:16:00,400 --> 02:16:04,560
किसने नहीं किया है कौन अपने Instagram पे भी डाल रहा है यहां भी डाल रहा है वहां भी

2014
02:16:04,560 --> 02:16:08,640
डाल रहा है किसको आवश्यकता थी एक दिन पहले से प्रचार करने की

2015
02:16:08,640 --> 02:16:12,720
ये सब बातें भी आ जाएगी किसके लोगों को मालूम है? किसके लोगों को

2016
02:16:12,720 --> 02:16:16,720
दूसरी बात दूसरी बात दूसरी बात दूसरी बात और मैं बता

2017
02:16:16,720 --> 02:16:20,240
दूं और दूसरी बात और मैं बता दूं जुगनू और

2018
02:16:20,240 --> 02:16:24,240
उल्लू सूर्य के प्रकाश की ओर आकर्षित नहीं होते हैं।

2019
02:16:24,240 --> 02:16:28,320
वो टिमटिमाते हुए दिए की ओर आकर्षित होते हैं। तो जुगनू और

2020
02:16:28,320 --> 02:16:32,720
उल्लू का सूर्य की ओर आकर्षित ना होने में जुगनू और उल्लू

2021
02:16:32,720 --> 02:16:36,640
की असामर्थता का दोष है। सूर्य की सामर्थता का नहीं।

2022
02:16:36,640 --> 02:16:41,040
और कंक्लूजन क्या निकला कि प्रकाश के विषय में जुगनू

2023
02:16:41,040 --> 02:16:45,120
और उल्लू प्रमाण नहीं होते। ये कंफ ठीक है? अब

2024
02:16:45,120 --> 02:16:49,120
मैं जो बातें आपने जो बातें आपने कही है

2025
02:16:49,120 --> 02:16:53,120
जो बातें आपने कही है उनको मैं जरा बता दूं। ठीक है? जो बातें मूल

2026
02:16:53,120 --> 02:16:58,160
विषय था बता दूं। हम हां वो ये है

2027
02:16:58,160 --> 02:17:02,320
पहली बात आपने कही कि उनकी सर्वज्ञता प्रकट

2028
02:17:02,320 --> 02:17:06,480
नहीं हो रही थी। ठीक है? तो जैसे हमने माना कि

2029
02:17:06,480 --> 02:17:11,200
उनको नहीं पता था। यह किसी घटनाक्रम से माना

2030
02:17:11,200 --> 02:17:15,360
या फिर एक वाक्य से माना कि मैं भूल गया हूं। भगवान श्री

2031
02:17:15,360 --> 02:17:20,480
कृष्ण से के वाक्य से माना ना किससे माना?

2032
02:17:20,480 --> 02:17:24,640
राम जी की बात चली। राम जी की घटनाक्रम से पता चला। भगवान श्री कृष्ण की बात आपने

2033
02:17:24,640 --> 02:17:28,720
की ना कि मैं वो जो ज्ञान दिया था मैं भूल गया। की ना अभी मैंने नहीं अभी

2034
02:17:28,720 --> 02:17:33,120
मैं अभी मैं कृष्ण जी का उदाहरण आपसे पूछ रहा हूं कि आपने भगवान

2035
02:17:33,120 --> 02:17:37,200
श्री कृष्ण की बात बोलने से माना या फिर कोई दृश्य से माना

2036
02:17:37,200 --> 02:17:41,520
कि वो नहीं जानते थे उनका उनकी अल्पज्ञता उनकी अल्पज्ञता

2037
02:17:41,520 --> 02:17:45,760
को आपने किससे माना है उदाहरण तो आप अच्छा आचरण आचरण

2038
02:17:45,760 --> 02:17:50,000
से भी गतिविधि से भी उनके बोलने से भी तो बोलने वाली बात तो कट गई क्योंकि

2039
02:17:50,000 --> 02:17:51,680
वो तो शब्द ही है अगर

2040
02:17:51,680 --> 02:17:55,680
वो ये कह रहे हैं अगर वो ये मैं बता रहा हूं अगर वो ये कह रहे हैं कि मैं

2041
02:17:55,680 --> 02:17:59,680
भूल गया तो वो ये भी कह रहे हैं मैं मैं सर्व नियंता हूं। सर्वज्ञ हूं। वो

2042
02:17:59,680 --> 02:18:03,760
ये सब भी कह रहे हैं। कट गए। वो झूठ बोल रहे थे उस टाइम पे। मैं बता दूंगा क्या बोल

2043
02:18:03,760 --> 02:18:08,000
रहे थे। एक है उनका व्यवहारिक पक्ष जहां वो रोल निभा रहे हैं। एक है उनका पारमार्थिक

2044
02:18:08,000 --> 02:18:11,920
पक्ष सत्य का पक्ष जो वास्तविक

2045
02:18:11,920 --> 02:18:16,880
नहीं तो वो अपनी चीज अपनी चीजों को बता रहे हैं ना। व्यवहार में रह के वो अपनी

2046
02:18:16,880 --> 02:18:20,960
वो एक एक तरफ वो एक वो एक तरफ साधारण मनुष्य का रोल निभाने

2047
02:18:20,960 --> 02:18:25,040
का प्रयास कर रहे हैं और एक तरफ अपने झूठ नहीं बोल रहे। एक

2048
02:18:25,040 --> 02:18:29,520
तरफ अपने पारमार्थिक सत्य को बता रहे हैं। व्यवहारिक सत्य होता है ना।

2049
02:18:29,520 --> 02:18:33,680
जैसे आपने जैसे आपने जैसे आपने जब जैसे आपने जब

2050
02:18:33,680 --> 02:18:38,000
किसी से ये कहा ना कि उधर चले जाओ तो ये झूठ नहीं है। व्यवहारिक

2051
02:18:38,000 --> 02:18:42,320
सत्य हमारा यही है कि हमने उसको सही रास्ता बताया है। नहीं तो कहना तो यूं चाहिए

2052
02:18:42,320 --> 02:18:46,400
यूं गोल चले जाओ। पहली बात। अच्छा ये भी गलत पॉइंट है। वैसे तो मैं

2053
02:18:46,400 --> 02:18:50,560
उसको बाद में कर दूंगा अपनी बारी में। चलिए ठीक ठीक मैं बताता हूं। मैं बताता हूं अब।

2054
02:18:50,560 --> 02:18:54,640
मैं मेरी बात पूरी कर लूं। हम अब आपने एक उदाहरण

2055
02:18:54,640 --> 02:18:58,800
दिया कि भाई उनकी गतिविधियों से भी यह सिद्ध होता है कि वो नहीं

2056
02:18:58,800 --> 02:19:02,800
जानते थे। कुल मिलाकर के आप आपका कहना यह है

2057
02:19:02,800 --> 02:19:05,920
कि

2058
02:19:05,920 --> 02:19:10,080
शास्त्रों में क्योंकि उनके अल्पज्ञता वाली बातें लिखी हुई है

2059
02:19:10,080 --> 02:19:14,240
जिन ऐसी गतिविधियां ऐसे स्मृति ऐसे इतिहास प्राप्त है जिससे

2060
02:19:14,240 --> 02:19:18,400
वो अल्पज्ञ सिद्ध हो रहे हैं तो हम अगर दूसरी ओर ये कोई कह

2061
02:19:18,400 --> 02:19:22,480
देगा शास्त्रों में कह देगा घटना नहीं कह कहने मात्र से

2062
02:19:22,480 --> 02:19:26,640
हम कैसे मान लेंगे तो इसका निवारण ये है कि हमारे शास्त्रों में उनके

2063
02:19:26,640 --> 02:19:30,640
द्वारा ऐसी कई चीजें ऐसी कई घटनाएं सिर्फ

2064
02:19:30,640 --> 02:19:34,720
कहना नहीं घटनाएं प्राप्त है जिससे उनकी सर्वशक्तिमत्ता सिद्ध हो रही है

2065
02:19:34,720 --> 02:19:39,840
जो असाधारण चीजें हैं जो उन्होंने की जैसे विराट स्वरूप दिखाना

2066
02:19:39,840 --> 02:19:44,000
जैसे विराट स्वरूप दिखाना ये असाधारण चीज थी जो उन्होंने की और ऐसे कई

2067
02:19:44,000 --> 02:19:48,080
असाधारण जो शास्त्र हैं शास्त्रों में वर्णित घटनाएं हैं जो हमें शब्द प्रमाण

2068
02:19:48,080 --> 02:19:52,480
के द्वारा हमें प्राप्त है जो घटनाएं हैं इतिहास है जो अब उस इतिहास

2069
02:19:52,480 --> 02:19:56,480
को आप ना मानो वो बात एक अलग है मगर वहां शब्द

2070
02:19:56,480 --> 02:20:00,480
नहीं होगी नहीं ठीक है मैं मैं अभी मैं कर लूंगा। मैं कर लूंगा मैं

2071
02:20:00,480 --> 02:20:04,480
सिद्ध कर लूंगा। दूसरी बात यह है आपने अल्लाह का उदाहरण दिया कि अल्लाह एक जगह

2072
02:20:04,480 --> 02:20:08,800
कहता है सर्वशक्तिमान हूं। दूसरी जगह कहता है कि

2073
02:20:08,800 --> 02:20:12,880
क्या कहते हैं वो उसकी वो उसके ऊपर घटित नहीं हो रही है। तो बात ऐसी

2074
02:20:12,880 --> 02:20:16,880
है कि अल्लाह ने कहीं भी ये नहीं कहा है। एक जगह ये कहा है कि अगर मेरी संतान नहीं हो सकती

2075
02:20:16,880 --> 02:20:21,280
तो कहीं ये नहीं कह दिया है कि संतान हो सकती है। उसके बाद उसके जो प्रामाणिक

2076
02:20:21,280 --> 02:20:25,520
लोग हैं उन्होंने कंक्लूजन ये नहीं दिया है कि नहीं वो अवतार ले सकता है। इसलिए

2077
02:20:25,520 --> 02:20:29,520
हम उससे काउंटर करते हैं उसकी बात का। और हमारा क्या है कि व्यवहार और

2078
02:20:29,520 --> 02:20:33,600
परमार्थिक दृष्टि से शास्त्रों में दोनों तरीके की बातें चली है। इसलिए हम

2079
02:20:33,600 --> 02:20:37,680
कंक्लूजन लेने गुरुओं के पास जाते हैं। शब्द प्रमाण के पास जाते हैं जो हमें

2080
02:20:37,680 --> 02:20:41,920
बताते हैं। नहीं भैया राम जी अंतत गतवा जो है परम सत्य का ही स्वरूप

2081
02:20:41,920 --> 02:20:46,000
थे। अवतार हो गया। हां

2082
02:20:46,000 --> 02:20:50,000
अब बोलिए। ठीक है। अब इसमें जो एक बात आ जाती है

2083
02:20:50,000 --> 02:20:54,800
बात इसके अंदर ये आ जाती है जो आपने इसमें पॉइंट रखा था कि

2084
02:20:54,800 --> 02:20:58,880
इसमें क्या बोलते हैं? हां कि अभी जो हमने उनके

2085
02:20:58,880 --> 02:21:03,120
सर्वशक्तिमत्ता कुछ कुछ उदाहरण मिलते हैं सर्वजता का कुछ-कुछ उनके दृष्टांत

2086
02:21:03,120 --> 02:21:07,120
मिलते हैं। अब इसमें पॉइंट यहां पे ये कटेगा इसमें पॉइंट ये कटेगा कि

2087
02:21:07,120 --> 02:21:11,280
आपने आपकी एक व्यक्ति के साथ में चर्चा हुई थी। ठीक है? और वो चर्चा

2088
02:21:11,280 --> 02:21:15,280
थी हनुमान जी के बंदर पूछ इत्यादि कुछ ऐसा कुछ विषय था।

2089
02:21:15,280 --> 02:21:19,520
वो चर्चा उसमें आपने उस व्यक्ति को एक बात बोला था कि अगर कोई व्यक्ति सत्यनिष्ट

2090
02:21:19,520 --> 02:21:23,680
है तो उसका झूठ बोलना सिद्ध नहीं होता। झूठ बोल रहा है तो सत्यनिष्ट होना सिद्ध नहीं होता।

2091
02:21:23,680 --> 02:21:27,760
इस उदाहरण के बाद आपने बोला था कि उसी प्रकार अगर सर्वशक्तिमान है तो बाधित होना सिद्ध

2092
02:21:27,760 --> 02:21:31,840
नहीं होता। बाधित है तो सर्वशक्तिमान होना सिद्ध नहीं होता। उसी प्रकार से अगर आप

2093
02:21:31,840 --> 02:21:36,000
मुझे राम जी के दृष्टांत की बात कर रहे हो। एक भी पॉइंट पे उनकी अगर बाध्यता

2094
02:21:36,000 --> 02:21:36,500
सिद्ध हो

2095
02:21:36,320 --> 02:21:40,480
गई तो सर्वशक्तिमान होना सिद्ध नहीं होता। और अगर वो सर्वशक्तिमान है तो बाधित होना सिद्ध

2096
02:21:40,480 --> 02:21:44,640
नहीं होता। ठीक? तो यहां से आप वाला आप ही के पॉइंट से आप ही का जो

2097
02:21:44,640 --> 02:21:48,640
पॉइंट है वो यहां पे उसमें विरोध आ रहा है। कट रहा है। विरोध इसलिए नहीं आ

2098
02:21:48,640 --> 02:21:52,880
रहा है कि वो बात मैंने कही थी व्यवहार में। केवल व्यवहार में और

2099
02:21:52,880 --> 02:21:57,040
यहां पर मैं यह बता रहा हूं कि उनके पारमार्थिक सत्य है कि वो सर्वज्ञ है और व्यवहार

2100
02:21:57,040 --> 02:22:01,120
में उन्होंने ऐसा रोल प्ले उन्होंने ऐसा रोल प्ले लक्षण की बात है

2101
02:22:01,120 --> 02:22:05,200
ना समझिए इस चीज को तो लक्षण की बात तो मैंने बता तो दिया

2102
02:22:05,200 --> 02:22:09,200
आपको कि भैया उसमें शब्द प्रमाण है और आप और आपने भी माना कि कई चीजों में हम

2103
02:22:09,200 --> 02:22:13,360
शब्द प्रमाण को ही मानते हैं और उनके उनके उनके सुनिए

2104
02:22:13,360 --> 02:22:17,520
उनके उनके जो क्या कहते हैं उनके लक्षण कटने

2105
02:22:17,520 --> 02:22:21,760
के विषय में भी आपने शब्द प्रमाण ही रखे हैं। नहीं तो आप दीजिए दूसरा लक्षण कटने

2106
02:22:21,760 --> 02:22:25,840
के विषय में क्या प्रमाण है? ना ना देखिए हमारी हमारी बातचीत कैसे चली?

2107
02:22:25,840 --> 02:22:29,840
इस चीज को फिर से रिवाइंड करूंगा। मैं समझ जाएंगे आप। बात हमारी ऐसे चली कि जब

2108
02:22:29,840 --> 02:22:33,840
मैंने ये बोला कि वो जैसे जब हमने बात की लक्षणों की तो

2109
02:22:33,840 --> 02:22:37,840
आपने बोला सर्वजिता और सर्वशक्तिमत्ता ये उनके लक्षण है। तो मैंने ये बोला कि

2110
02:22:37,840 --> 02:22:42,400
वो ऐसे और जो फिर आपने बोला कि मैंने ये पॉइंट रखा था कि ये लक्षणता

2111
02:22:42,400 --> 02:22:46,560
जो उन्हें है सिद्ध नहीं हो रही राम जी में। ठीक है? तो आपने बोला कि नहीं ब्रह्मा जी ने तो आपने

2112
02:22:46,560 --> 02:22:50,560
मुझसे पूछा कि ये पॉइंट आप कैसे बोल दो कि सिद्ध नहीं हो रहा? शब्द प्रमाण से बोल रहे हो। मैंने कहा ठीक है।

2113
02:22:50,560 --> 02:22:51,360
तो आपने बोला

2114
02:22:51,360 --> 02:22:55,360
कि उसी शब्द प्रमाण से भी तो ब्रह्मा जी बोल तो रहे हैं कि सर्वज सरस्वती मानो

2115
02:22:55,360 --> 02:22:59,360
तो तो मैंने उसमें विरोध बताया कि ये कैसे विरोध आ रहा है। विरोध ऐसे आ रहा है कि ब्रह्मा जी

2116
02:22:59,360 --> 02:23:04,240
क्लेम तो कर रहे हैं लेकिन मैं बीच में नहीं बीच में नहीं बीच में नहीं। पॉइंट ये

2117
02:23:04,240 --> 02:23:08,240
हां अच्छी बात है। अच्छी बात है। तो पॉइंट ये कि ब्रह्मा जी जो है अगर वो क्लेम

2118
02:23:08,240 --> 02:23:12,400
कर रहे हैं। ब्रह्मा जी कह रहे हैं कि हां इसमें जो है सरस्वती

2119
02:23:12,400 --> 02:23:16,480
मान है और बाद में क्या हो रहा है कि उनकी सर्वजिता और सरस्वती माता दृष्टांतों में

2120
02:23:16,480 --> 02:23:21,280
वो अभिव्यक्ति उसकी नहीं होगी। की कम हो गई है। हेलो

2121
02:23:21,280 --> 02:23:24,480
मेरी आवाज सही है?

2122
02:23:24,480 --> 02:23:28,560
मेरी आवाज सही है? कम आ रही है। कम

2123
02:23:28,560 --> 02:23:32,560
कैसे आ रही सब कुछ तो सही है। रुकिए एक सेकंड

2124
02:23:32,560 --> 02:23:38,400
अभी जो आ रही थी वो आपको आवाज कम आ रही है पंडित जी? जय श्री राम।

2125
02:23:38,400 --> 02:23:42,400
जय श्री राम। हां कम आ रही है। मेरी आवाज कैसी आ रही है? अब ठीक

2126
02:23:42,400 --> 02:23:46,400
आ रही है। सही आ रही है? मेरी आवाज सही आ रही है अभी। अब फिर कम हो

2127
02:23:46,400 --> 02:23:50,880
गई? नहीं आ रही है अभी आ रही है वही सही

2128
02:23:50,880 --> 02:23:55,040
फ्लोकी जी को आ रही है नहीं आ रही है मगर पहले जितनी बुलंद

2129
02:23:55,040 --> 02:23:59,520
आ रही थी उतनी नहीं आ रही अभी आ रही है क्या अभी आ रही है बुलंद आवाज

2130
02:23:59,520 --> 02:24:03,600
काम चल जाएगा मगर वैसे नहीं आ रही है खुल के जैसे पहले आ रही थी

2131
02:24:03,600 --> 02:24:06,800
चलिए कोई बात नहीं पता नहीं शायद मेरे आई कोई दिक्कत हो

2132
02:24:06,800 --> 02:24:10,800
अगर अगर नहीं हो सकता है एक बार मेरे को कोई कमेंट सेक्शन में नीचे बता दो कि

2133
02:24:10,800 --> 02:24:14,800
मेरी आवाज कमेंट सेक्शन में बता दो भैया इनकी आवाज कम हुई है क्या अगर

2134
02:24:14,800 --> 02:24:19,040
मेरी आवाज सही आ रही है आपकी आवाज मेरे लिए कंफर्टेबल है सुनने लायक मगर जो बुलंद

2135
02:24:19,040 --> 02:24:23,120
आ रही थी थोड़ा सा उसमें कम हुआ है। ठीक है। शिवश जी

2136
02:24:23,120 --> 02:24:27,440
के लिए कंफर्टेबल है। थोड़ा ऑडियंस के लिए एक बार मुझे कंफर्मेशन चाहिए। आवाज पहले

2137
02:24:27,440 --> 02:24:31,440
आवाज पहले जैसी सही है। हां ठीक है। मतलब मेरी आवाज वैसी

2138
02:24:31,440 --> 02:24:35,840
ही है। आपकी साइड से शायद मेरे फोन में कोई दिक्कत होगी। बताइए। हम

2139
02:24:35,840 --> 02:24:40,240
ठीक है। तो वही जो मैं पॉइंट रख रहा था। अच्छा फ्लोकी जी वैसे नमस्ते।

2140
02:24:40,240 --> 02:24:44,480
तो पॉइंट जो मैं वही रख रहा था कि अब हमने

2141
02:24:44,480 --> 02:24:48,640
बात यही किया था ना कि शब्द प्रमाण से जो शब्द प्रमाण टकरा रहा है तो आपने वही दृष्टांत और

2142
02:24:48,640 --> 02:24:52,720
सिद्धांत वाली बात आई थी कि हां दृष्टांतों में जब वो कार्य कर रहे हैं तो उसमें

2143
02:24:52,720 --> 02:24:56,720
वो उनकी सर्वजता और सर्वशक्तिमत्ता प्रकट नहीं हो रही है। तो

2144
02:24:56,720 --> 02:25:00,720
जब तो अब अब जब मैंने आपसे पूछा तो आपने बोला नहीं नहीं मैं तो परमार्थ की

2145
02:25:00,720 --> 02:25:04,800
बात करें तो परमार्थिक रियल में देखिए जब हम अवतार की बात करें तो अवतारिक एक व्यवहारिक

2146
02:25:04,800 --> 02:25:08,800
विषय है। भाई साहब आपने मेरे को एक मेरा संदर्भ बताया। सुनिए

2147
02:25:08,800 --> 02:25:12,880
आपने क्या बताया आपकी उस दिन भू पूछ की बात हो रही थी ध्यान रखिए मैंने उसके बारे में बोला

2148
02:25:12,880 --> 02:25:17,200
है कि मैं वहां पे किस बारे में बात कर रहा था मैं यहां पे बात नहीं कर रहा हूं आपने मेरा एक संदर्भ

2149
02:25:17,200 --> 02:25:21,280
लाए उस व्यक्ति से जिससे मेरी चर्चा हो गई मैंने उसके बारे में

2150
02:25:21,280 --> 02:25:21,840
बोला व्यवहार

2151
02:25:21,840 --> 02:25:26,000
परमार्थ वाली बात आप उसको यहां पे कनेक्ट करके ये मत करिए कि आपकी बात

2152
02:25:26,000 --> 02:25:30,000
यहां व्यवहार में हो रही है तो व्यवहार की बात करिए नहीं नहीं मैं आपसे ये पूछ रहा हूं मैं आपसे पूछ रहा

2153
02:25:30,000 --> 02:25:34,000
हूं कि जो आप उस दिन सर्वशक्तिमत्ता की बात कर रहे थे कि अगर बाधित सिद्ध हो रहा है तो

2154
02:25:34,000 --> 02:25:38,080
सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं होगा सर्वशक्तिमान है तो बाधित नहीं होता यह बात आपने परमार्थ के कही

2155
02:25:38,080 --> 02:25:42,160
थी कि व्यवहार के लिए कही थी पहले मैं उसको सुनूंगा देखना पड़ेगा मुझे उसको

2156
02:25:42,160 --> 02:25:46,240
सुनना समझना पड़ेगा मैं क्या कह रहा हूं शब्दश याद है आपने क्या बोला था शब्दश याद

2157
02:25:46,240 --> 02:25:50,320
अरे वही तो मैं पीछे से लूंगा ना प्रीफिक्स क्या चल रहा है आगे क्या मैं क्या सोच रहा

2158
02:25:50,320 --> 02:25:54,480
था आपने शब्दश बताया मैं मुझे सुनना पड़ेगा

2159
02:25:54,480 --> 02:25:58,560
देखिए वो आप सिद्धांतिक बात करिए ना आपने वहां पे क्या बोला था

2160
02:25:58,560 --> 02:26:02,560
क्यों बोला था इसको करेंगे तो मैं वहां जाना पड़ेगा किस लिए बोला है मैंने मैंने

2161
02:26:02,560 --> 02:26:06,880
किस लिए बोला है मैं वो समझा देता हूं किस लिए बोला है वो मैंने इसीलिए मैंने यही बोला आप

2162
02:26:06,880 --> 02:26:10,880
राइट नाउ मैं जो बोल रहा हूं उसको काटिए। राइट नाउ मैं जो बोल रहा हूं उसको

2163
02:26:10,880 --> 02:26:14,960
काटिए। मैं यही बात बोल रहा हूं। मैं यही बात बोल रहा हूं कि अगर राम

2164
02:26:14,960 --> 02:26:19,040
जी कहीं पे बाधित सिद्ध हो रहे हैं। कहीं पे अल्पज सिद्ध हो रहे हैं। अगर बाधित सिद्ध हो रहे हैं तो उनका

2165
02:26:19,040 --> 02:26:23,040
सर्वज सर्वशक्तिमान सिद्ध होना सिद्ध नहीं होता। है ना? पॉइंट ये आ जाती

2166
02:26:23,040 --> 02:26:27,040
है। अगर वो अल्पज्ज्य हैं तो उनका सर्वज्य होना सिद्ध नहीं होता। जैसे ये मैंने किस पॉइंट पे

2167
02:26:27,040 --> 02:26:31,040
बोला? उस पॉइंट पे बोला जहां पे आप ये कह रहे हो कि कुछ दृष्टांत तो मिलते हैं जहां वो

2168
02:26:31,040 --> 02:26:35,280
सर्वशक्तिमान है। कुछ-कुछ फलाना-फाना काम कर दे। कुछ दृष्टांत ऐसे हैं जहां पे वो वाद

2169
02:26:35,280 --> 02:26:36,960
सिद्ध हो रहे हैं। उन्हीं दृष्टांतों को

2170
02:26:36,960 --> 02:26:41,120
ही मैंने बात बोला कि हम उस केस में हम यही मान सकते हैं कि जो जो केस

2171
02:26:41,120 --> 02:26:45,120
उनके बारे में लिखा है। ठीक है? संभावित रूप से अभी मैं उसको स्वीकार

2172
02:26:45,120 --> 02:26:49,120
नहीं कर रहा हूं। आपके मैं मतलब दुर्जन ने ऐसे ले रहा हूं। संभावित रूप से हनुमान

2173
02:26:49,120 --> 02:26:53,200
जी पहाड़ उठा सकते थे। उसके अलावा नहीं कर सकते थे कोई और कार्य। संभावित रूप से।

2174
02:26:53,200 --> 02:26:57,200
लेकिन इससे ये कहना कि क्योंकि पहाड़ उठा सकते थे इसलिए सब कुछ कर सकते थे। तो हम उस केस में इसलिए

2175
02:26:57,200 --> 02:27:01,280
नहीं मानते क्योंकि कई केस में उनकी या राम जी की कई केसेस में बाध्यता सिद्ध हो रही

2176
02:27:01,280 --> 02:27:05,360
है। सर्वशक्तिमत्ता सिद्ध नहीं हो रही। तो जिस-जिस केस में उनके द्वारा जो जो कार्य करना

2177
02:27:05,360 --> 02:27:09,760
सिद्ध हो रहा है उसको तो स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन जो जो बातें सिद्ध नहीं हो रही उसको स्वीकार

2178
02:27:09,760 --> 02:27:13,840
नहीं किया जा सकता। ये एक पॉइंट आता है। बाकी इसका अर्थ ये नहीं कि मैंने

2179
02:27:13,840 --> 02:27:17,920
सारी चीजें उसके एज़ इट इज़ स्वीकार कर ली। वो एक आर्य समाज या हमारा एक अलग मत है। उसको भी

2180
02:27:17,920 --> 02:27:21,920
फिलहाल में दुर्जन ने ऐसे चीजों को लेके यहां पे मैंने रखा है। है ना? ये पॉइंट

2181
02:27:21,920 --> 02:27:26,480
आ जाता है। बाकी आपने एक अच्छा पॉइंट इसके अंदर ये बोल दिया कि

2182
02:27:26,480 --> 02:27:30,480
जहां तक बात है अवतार के लक्षणों वाली पॉइंट है तो आपने बोला

2183
02:27:30,480 --> 02:27:34,480
कि नहीं वो हम शब्द प्रमाण से ही मान रहे हैं उसको शब्द प्रमाण है ना पॉइंट शब्द

2184
02:27:34,480 --> 02:27:38,480
प्रमाण तो ये शब्द प्रमाण शब्द प्रमाण के अगेंस्ट जा रहा था तो आपने ये बात बोला कि नहीं जो हम लेंगे

2185
02:27:38,480 --> 02:27:42,480
वो पूरा शब्द प्रमाण लेंगे शब्द प्रमाण के आधार पे ही उसको लेंगे चलिए ठीक है मैं

2186
02:27:42,480 --> 02:27:46,560
आपको इस बात को मानता हूं है ना अब अगर आपको कोई पॉइंट है ठीक है मैं

2187
02:27:46,560 --> 02:27:50,720
एक्सपेक्ट ये कर रहा हूं कि फ्लोकी जी हमारे बीच है शायद मॉडरेटर अकेले ही उसी चर्चा के हिसाब

2188
02:27:50,720 --> 02:27:52,000
से जी जी है

2189
02:27:52,000 --> 02:27:56,080
ना तो अगर अभी तक इस पॉइंट में हो चुका है और कोई अब तो

2190
02:27:56,080 --> 02:28:00,160
वैसे हम लोग इतना थोड़ा सा एक दूसरे को झेल चुके हैं पंडित जी आप इतनी

2191
02:28:00,160 --> 02:28:04,480
लेट आए हैं कि हम मुझे ऐसा लग रहा है हम ही लोग संभाल लेंगे अब तो आप दर्शक

2192
02:28:04,480 --> 02:28:08,480
बने वो ज्यादा उचित है क्योंकि अब दोबारा से दोबारा से एक नई धारा शुरू

2193
02:28:08,480 --> 02:28:12,480
हो जाएगी कि भैया मॉडरेटर का यूज करना है कि नहीं करना है कि मॉडरेटर के

2194
02:28:12,480 --> 02:28:16,640
चेहरे के हावभाव किसी एक व्यक्ति के पक्ष में जाएंगे तो उसका मनोबल बढ़ जाए तो

2195
02:28:16,640 --> 02:28:21,520
इससे अच्छा है कि मैं मैं मेरा तो यही है कि आप आप लोग

2196
02:28:21,520 --> 02:28:25,680
से मेरे हिसाब से अगर फ्लोकीज अगर मतलब मतलब एज अ मॉडरेटर करेंगे

2197
02:28:25,680 --> 02:28:29,760
तो मैं अच्छी बात समझूंगा। ठीक है? फ्लोकी जी भी मुझसे अगर जैसे आपको

2198
02:28:29,760 --> 02:28:34,000
असहज ना हो इनका इनका जो क्योंकि अगर शुरुआत से होते

2199
02:28:34,000 --> 02:28:38,400
तो हम लोग फिर शायद अभी तक की चर्चा में कुछ थोड़ा बहुत अंतर रहा होता।

2200
02:28:38,400 --> 02:28:42,480
अब वो अब आए हैं। अब हम लोग थोड़ा सा समझ गए हमको किस तरीके से बात करनी है

2201
02:28:42,480 --> 02:28:46,720
और उसके लिए हैबिट भी डाल रहे हैं। अब उसमें दोबारा से एक नए सिरे से शुरू करना

2202
02:28:46,720 --> 02:28:50,960
और फिर उसमें भी फिर ये आए हैं और मान लीजिए इनका हम

2203
02:28:50,960 --> 02:28:54,960
उपयोग नहीं करते हैं एज ए मॉडरेटर। अब वो यहां पर दिखाई

2204
02:28:54,960 --> 02:28:59,120
दे रहे हैं तो अब उनका हंसना या देखना या कुछ करना कोई हरकत जो

2205
02:28:59,120 --> 02:29:03,200
आपके खामखा कहीं से आपको हां

2206
02:29:03,200 --> 02:29:07,120
नहीं बाकी आपको दिक्कत नहीं है और और फ्लोकी

2207
02:29:07,120 --> 02:29:11,200
जी रहना चाहते तो रहे पर मेरा सुझाव ये था कि मैं

2208
02:29:11,200 --> 02:29:15,280
तो देखिए मैं चाहता हूं मैं लेट हो गया आने में लेकिन मैं बैक स्टेज हो जाता हूं आप

2209
02:29:15,280 --> 02:29:19,280
लोग क्योंकि अभी जो दो जो चर्चा चल रही है वो बिल्कुल बीच मध्य में है तो बीच में है तो आप लोगों को

2210
02:29:19,280 --> 02:29:23,280
कंटिन्यू रखना हां कुछ थोड़ा सा उससे जो है विघ्न विघ्न टाइप का हो

2211
02:29:23,280 --> 02:29:27,760
सकता है कामका निर्भय का जो है कि मतलब नहीं नहीं मैं

2212
02:29:27,760 --> 02:29:31,840
आपके सामने स्टेटमेंट चाहिए मैं क्लियर स्टेटमेंट दे दे रहा हूं मैं खुद चाहता हूं मॉडरेटर बनके

2213
02:29:31,840 --> 02:29:36,320
मैं चाह रहा था कोई मॉडरेटर हो अच्छी बात है फ्लोकीजा जाके फ्लोकी जा मॉडरेट करिए आई एम हैप्पी विद यू

2214
02:29:36,320 --> 02:29:41,360
ठीक बढ़िया बढ़िया बढ़िया ठीक है आप फिर अब बहुमत हो गया आप रहिए फिर भैया

2215
02:29:41,360 --> 02:29:45,440
आप आए भी हो गया बहुमत क्या हुआ है 50-50 हुआ है ना आप मुझे काउंट मत

2216
02:29:45,440 --> 02:29:49,760
करिए नहीं नहीं आप आए हो तो ये आपकी वो आए ही थे मॉडरेटर

2217
02:29:49,760 --> 02:29:53,920
बनने तो आप आए हो तो आपकी इच्छा वो वो वोट हो गया और निर्भय ने कह

2218
02:29:53,920 --> 02:29:57,920
दिया। ठीक है? अब बात ये आती

2219
02:29:57,920 --> 02:30:03,600
है जी। मैं आपने जो बात कही उस मैं अपनी बात कह दूंगी। देखिए

2220
02:30:03,600 --> 02:30:07,600
सबसे पहली बात तो ये है कि बार-बार बात यही हो

2221
02:30:07,600 --> 02:30:11,680
रही है कि उनके आचरण थे कि नहीं थे। ठीक है? तो हमने

2222
02:30:11,680 --> 02:30:15,760
ऐसे आचरण बता दी बता दिए जो असाधारण थे वो

2223
02:30:15,760 --> 02:30:19,920
भी हमें प्राप्त है। और ऐसे भी आचरण बता दिए जो साधारण थे वो भी हमें प्राप्त

2224
02:30:19,920 --> 02:30:22,240
है। ठीक है? पहली बात।

2225
02:30:22,240 --> 02:30:26,320
अब दूसरी बात यह है कि असाधारण वाले जो आचरण थे उन पर आपको

2226
02:30:26,320 --> 02:30:30,400
डाउट है। यानी कि आप शब्द प्रमाण बात बार-बार बात यही हो रही

2227
02:30:30,400 --> 02:30:34,480
है कि शब्द प्रमाण के आधार पे आप क्वेश्चनिंग कर रहे हो कि

2228
02:30:34,480 --> 02:30:38,640
अवतार कौन अवतार है, कौन नहीं है? इसको कैसे स्वीकार किया जाए? वो अवतार सिद्ध

2229
02:30:38,640 --> 02:30:42,640
होता है कि नहीं होता? वो एक अलग विषय है। कौन अवतार है, कौन नहीं है? इस

2230
02:30:42,640 --> 02:30:46,880
विषय में आप शब्द प्रमाण को काउंटर कर रहे हो। ये बात कह करके कि उनकी गतिविधि ऐसी

2231
02:30:46,880 --> 02:30:51,040
थी। ठीक है? मतलब तो चाहिए होते हैं किसी भी चीज गतिविधि गतिविधि

2232
02:30:51,040 --> 02:30:55,200
ऐसे होने के कारण आप जो है शब्द प्रमाण काउंटर कर रहे हो कि ऐसेसे हम कैसे

2233
02:30:55,200 --> 02:30:59,600
मान ले दूसरी बात से भी लक्षण ले तो पता तो होना चाहिए क्योंकि हम व्यवहारिक

2234
02:30:59,600 --> 02:31:03,840
वस्तु की बात नहीं शब्द से देखिए दो तरह की बातें हो गई एक

2235
02:31:03,840 --> 02:31:08,160
कि शास्त्र में उन्होंने ये कहा कि मैं भूल गया एक तो ये शब्द प्रमाण

2236
02:31:08,160 --> 02:31:12,720
है एक हमारे शब्द प्रमाण ने हमको बताया कि उन्होंने ये कहा

2237
02:31:12,720 --> 02:31:16,880
एक तो श्री कृष्ण का स्वयं का शब्द जो ऐतिहासिक है समझ रहे हैं जो

2238
02:31:16,880 --> 02:31:20,880
उन्होंने कहा कि मैं भूल गया। अब यह भी तो एक शब्द ही है

2239
02:31:20,880 --> 02:31:25,040
जो वहां उन्होंने कहा दृष्टांत वाली भी तो बात दी है ना और एक एक जो हमारे

2240
02:31:25,040 --> 02:31:29,120
गुरुजनों ने हमारे शास्त्रों ने बताया कि श्री कृष्ण ने ये

2241
02:31:29,120 --> 02:31:33,120
कहा तो मैं ये वाला जो शब्द प्रमाण है ना जिससे हमें शास्त्र

2242
02:31:33,120 --> 02:31:37,280
मिल रहा है जिससे हमको श्री कृष्ण का यह कहना प्राप्त हो रहा है

2243
02:31:37,280 --> 02:31:41,520
कि क्या कहते हैं कि मैं भूल गया या राम जी का दुखी होना

2244
02:31:41,520 --> 02:31:45,760
प्राप्त हो रहा है। इस वाले शब्द प्रमाण से ही यह बता रहा हूं कि राम

2245
02:31:45,760 --> 02:31:50,000
जी जो है दुखी नहीं थे। उन्होंने केवल लीला की थी, एक्टिंग की थी दुखी

2246
02:31:50,000 --> 02:31:54,240
होने की। उन्होंने केवल भूल जाने की एक्टिंग की थी और

2247
02:31:54,240 --> 02:31:58,320
क्या कहते हैं? ये भी उन्होंने एक्टिंग की थी कि वो रावण को रोक नहीं पा रहे या जो भी अमुक

2248
02:31:58,320 --> 02:32:02,480
अमुक जो चीजें वो एक्टिंग थी। ये भी हमको प्राप्त हो रहा है। कहां से? उसी शब्द प्रमाण

2249
02:32:02,480 --> 02:32:06,480
से। पहली बात। दूसरी बात यह है कि अगर हम बार-बार इसको काउंटर कर ही

2250
02:32:06,480 --> 02:32:10,720
रहे हैं तो क्यों ना यह बात जांच ली जाए कि भैया यह कैसे सिद्ध होता

2251
02:32:10,720 --> 02:32:14,800
है कि वैदिक ईश्वर ने ही सगुण निराकार

2252
02:32:14,800 --> 02:32:16,560
का रूप लिया है। पहली बात तो सगुण

2253
02:32:16,560 --> 02:32:20,640
निराकार जो है वो भी एक अवतार ही है। अगर आप जो है सगुण

2254
02:32:20,640 --> 02:32:24,480
साकार का अवतार नहीं मानोगे तो मैं सिद्ध कर दूंगा कि सगुण निराकार का भी अवतार नहीं होता।

2255
02:32:24,480 --> 02:32:28,640
तो फिर ये दुनिया बनने के बाद ईश्वर से सिद्ध नहीं हो पाएगी। मगर फिर भी

2256
02:32:28,640 --> 02:32:32,720
अभी अगर हम ये मान के चल रहे हैं कि ईश्वर ये जो सृष्टि बनाई

2257
02:32:32,720 --> 02:32:36,880
है वो सगुण निराकार ईश्वर ने बनाई है तो सगुण निराकार ईश्वर ने

2258
02:32:36,880 --> 02:32:41,280
अगर सृष्टि बनाई है तो ये सिद्ध कैसे होता है तो वैदिक ईश्वर ने ही बनाई है

2259
02:32:41,280 --> 02:32:44,160
बताइए

2260
02:32:44,160 --> 02:32:45,360
कि अगर जरूरी नहीं है तो

2261
02:32:45,360 --> 02:32:49,680
इसको स्किप करते हैं मूल विषय रहते हैं नहीं

2262
02:32:49,680 --> 02:32:53,840
आपने ये लास्ट में जो बातें बोली है मेरे अब आपको

2263
02:32:53,840 --> 02:32:57,920
नहीं करना है उसको तो काउंटर मत करिए कुल मिलाकर के

2264
02:32:57,920 --> 02:33:02,560
एक एंडिंग स्टेटमेंट इस बारे में दे दूं कि भाई कौन

2265
02:33:02,560 --> 02:33:06,880
कौन अवतार है कौन नहीं इस विषय में शब्द ही प्रमाण हो सकता है क्योंकि हम उसको काउंटर

2266
02:33:06,880 --> 02:33:11,040
नहीं कर सकते क्योंकि कई विषयों में हम शब्द को ही प्रमाण मान रहे हैं उनके होने के विषय

2267
02:33:11,040 --> 02:33:15,120
में भी हम इतिहास को ले रहे हैं वो इतिहास भी एक शब्द प्रमाण है उनका

2268
02:33:15,120 --> 02:33:19,280
होना एक्सिस्टेंस उनका अस्तित्व वो भी शब्द प्रमाण से ले रहे हैं तो फिर हम वहां जाके काउंटर

2269
02:33:19,280 --> 02:33:23,280
नहीं कर सकते जिन शब्द प्रमाणों से हमको ये मिल रहा है कि वो थे उनहीं शब्द प्रमाणों से जब

2270
02:33:23,280 --> 02:33:27,360
हमें ये मिल रहा है कि वो एक्टिंग कर रहे थे तो हम कह नहीं वो एक्टिंग नहीं कर रहे थे वो तो उनका उनका वहां

2271
02:33:27,360 --> 02:33:30,480
पे ये हो रहा था। हम आपकी बात नहीं मान सकते।

2272
02:33:30,480 --> 02:33:34,480
तो वो विरोधाभास चलिए यानी आप ये कह रहे हो मोटा-म मोटी आप ये कह रहे हो

2273
02:33:34,480 --> 02:33:38,640
जो मैं समझ पाया हूं। आपने ये बोला है ठीक है कि जब

2274
02:33:38,640 --> 02:33:42,800
राम जी और कृष्ण जी हुए तो दिव्य दृष्टि

2275
02:33:42,800 --> 02:33:47,120
या किसी भी अन्य प्रकार से जो साधु जन थे जो आपके गुरु परंपरा

2276
02:33:47,120 --> 02:33:51,120
के जो आचार्य लोग थे उन्होंने जाना कि ये अवतार हैं। लौकिक दृष्टिकोण से पता

2277
02:33:51,120 --> 02:33:55,280
नहीं चल पा रहा था कि वो अवतार हैं। लेकिन जो भी उनका जो भी माध्यम

2278
02:33:55,280 --> 02:33:59,360
रहा होगा उस माध्यम से उन्होंने पहचाना कि ये अवतार है। ठीक? फिर उसको

2279
02:33:59,360 --> 02:34:03,680
पहचान करके उन्होंने शब्द रूप में उसको आगे बढ़ाया। शब्द परंपरा से या

2280
02:34:03,680 --> 02:34:07,840
आप यही कह रहे हैं मैं ये समझ पा रहा हूं। बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल इसी कारण से तो उस समय

2281
02:34:07,840 --> 02:34:12,000
जो कंस अगर ये सब जान जाते इनसे मुझे मोक्ष मिलेगा या अन्य

2282
02:34:12,000 --> 02:34:16,080
जो बात नहीं है हां अगर वो जानते होता है ना कि अगर मेन

2283
02:34:16,080 --> 02:34:20,160
पॉइंट क्लियर हो जाए तो ज्यादा इधर उधर जाके टाइम बिल्कुल बिल्कुल कोई

2284
02:34:20,160 --> 02:34:24,160
इशू नहीं बनता है ना बिल्कुल बहुत बढ़िया एक चीज एक चीज बहुत अच्छी

2285
02:34:24,160 --> 02:34:28,240
है मैं एक चीज कहूंगा कि भैया आज की जो चर्चा है थोड़े बहुत

2286
02:34:28,240 --> 02:34:32,240
अप एंड डाउन हुए मगर फिर भी मुझे लगता है लोगों को पसंद आ रही होगी और बहुत अच्छे से जा

2287
02:34:32,240 --> 02:34:36,240
रही है एक गंतव्य की ओर जी जी अब इसके अंदर मैं

2288
02:34:36,240 --> 02:34:40,240
बस एक एक बात बोलना चाहूंगा बीच में मैं एक बार आया था देखने और लाइव देख रहा था

2289
02:34:40,240 --> 02:34:44,240
मैं तो थोड़ा सा लाइट कर रहा हूं मोमेंट मैं बस ये पूछ रहा हूं शिव जी

2290
02:34:44,240 --> 02:34:46,700
इसके बाद कूदे कि नहीं आप

2291
02:34:46,700 --> 02:34:50,560
[हंसी]

2292
02:34:50,560 --> 02:34:54,800
कंटिन्यू करिए अच्छा एक चीज और है कि थोड़ा सा समय

2293
02:34:54,800 --> 02:34:58,800
की मर्यादा को थोड़ा सा देख ले एक बना ले

2294
02:34:58,800 --> 02:35:02,800
क्योंकि मुझे जो है वो मैंने बताया था ना चर्चा की शुरुआत में एसीपी को

2295
02:35:02,800 --> 02:35:06,880
वो प्रमाण जो उपलब्ध कराने है ना उसके लिए जाना है तो अच्छा

2296
02:35:06,880 --> 02:35:11,040
मुझे लगता है शाम के टाइम थोड़ी अभी आपके पास में है

2297
02:35:11,040 --> 02:35:15,280
अभी एक डेढ़ घंटा हम कर सकते हैं हां 5:00 बजे

2298
02:35:15,280 --> 02:35:19,440
मतलब ऐसा है ना अंधेरे जब शाम होती है तो वो उनकी ड्यूटी हो जाती है इधर उधर

2299
02:35:19,440 --> 02:35:23,520
रनिंग में मूविंग बिल्कुल सही बात है तो फिर उनसे मिल पाना थोड़ा सा मुश्किल हो जाता

2300
02:35:23,520 --> 02:35:27,520
है और देना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि एकद दिन में

2301
02:35:27,520 --> 02:35:31,520
ही वो हियरिंग शायद हो सकती है तो वहां पे हमको हाई कोर्ट को वहां

2302
02:35:31,520 --> 02:35:35,840
पे हमें हाई कोर्ट को ही दिखाना हुआ कि भैया हमने पुलिस को ये चीजें उपलब्ध

2303
02:35:35,840 --> 02:35:39,840
करा दी है। उसके बावजूद भी पुलिस ढिलाई कर रही है। हमको ये वहां

2304
02:35:39,840 --> 02:35:43,920
पर थोड़ा सा बताना है। है ना? क्योंकि पुलिस ने ये लिख के दे दिया है ना कि भैया

2305
02:35:43,920 --> 02:35:47,920
हमें वो मिल ही नहीं रही। डंके की चोट पे सब जगह काम हो रहे हैं मगर उनको कुछ मिल ही

2306
02:35:47,920 --> 02:35:51,760
नहीं रहा है। समझ रहे? ठीक है। अब मूल विषय पे आते हैं। जी ठीक है। अब

2307
02:35:51,760 --> 02:35:56,320
इसमें पॉइंट यहां पे ये आ जाता है कि हमें दो बातों की क्लेरिटी मिल चुकी है। पहला

2308
02:35:56,320 --> 02:36:00,480
ठीक है। फ्लोकी जी आप भी है तो थोड़ा ध्यान दीजिएगा इन विषयों पर। है ना?

2309
02:36:00,480 --> 02:36:04,720
तो पहली बात तो हमारी इस विषय पर आया था कि अवतार की धारणा क्या है?

2310
02:36:04,720 --> 02:36:08,960
तो हमें जो क्लेरिटी वहां से मिली थी वह यह मिली थी कि जैसे जीव शरीर धारण करता है वैसे

2311
02:36:08,960 --> 02:36:13,120
ईश्वर भी शहीद धारण करता है। लेकिन अंतर ये होता है कि जीव जो होता है वो बद्ध

2312
02:36:13,120 --> 02:36:17,280
होता है और जो ईश्वर जो जिस शरीर को धारण करता है जिसे हम अवतार कहते हैं वो मुक्त होता है।

2313
02:36:17,280 --> 02:36:21,360
ठीक है? स्वभाव से वो मुक्त होता है। ये एक पॉइंट आया था। तो हमें पता चला कि अवतारवाद की

2314
02:36:21,360 --> 02:36:25,360
धारणा क्या है? अच्छा इसका स्पष्टीकरण हो गया। उसके बाद पॉइंट ये था कि अवतार का लक्षण क्या है कि

2315
02:36:25,360 --> 02:36:29,440
अगर मेरे सामने राम जी या रामपाल खड़े हो जाए तो दोनों में से ईश्वर का अवतार कौन है? कैसे पता चलेगा?

2316
02:36:29,440 --> 02:36:33,440
तो उसमें पॉइंट यह था कि उसमें सामान्य लोग नहीं जान सकते कि ये ईश्वर के

2317
02:36:33,440 --> 02:36:37,440
अवतार हैं। उसमें जो विशेष दिव्य दृष्टि रखने वाले गुरुजन हैं, सिद्ध

2318
02:36:37,440 --> 02:36:41,520
लोग हैं, वही पहचान सकते हैं कि ये ईश्वर है। क्योंकि व्यवहारिक जो लक्षण

2319
02:36:41,520 --> 02:36:45,840
है वो उसमें उस टाइप से नहीं होते। है ना? पता नहीं चलते हैं। तो

2320
02:36:45,840 --> 02:36:49,920
जो जो उस टाइप का ज्ञानी जो उस टाइप का व्यक्ति है सिद्ध

2321
02:36:49,920 --> 02:36:54,000
व्यक्ति वो पहचान करके फिर वो अपने शिष्यों को बताएगा। तब शिष्य जान पाएंगे कि हां

2322
02:36:54,000 --> 02:36:58,000
ये जो है ये राजा जो है ये अवतार हैं वास्तव में। है ना? इत्यादि

2323
02:36:58,000 --> 02:37:02,000
बातें निकल कर के आती है। तो हमें दो चीजों की क्लेरिटी हो चुकी है कि अवतारवाद

2324
02:37:02,000 --> 02:37:06,000
की धारणा क्या है? अवतारवाद का लक्षण तो खैर चलिए हमें नहीं पता चला। वो तो शब्द प्रमाण के ही है।

2325
02:37:06,000 --> 02:37:06,800
लेकिन उसको हम स्वीकार करते

2326
02:37:06,800 --> 02:37:10,800
हैं। आगे बढ़ते हैं। क्योंकि तीसरी बात आपने छोड़ दी है वो मैं ध्यान दे रहा

2327
02:37:10,800 --> 02:37:14,880
हूं। जी जी बता दीजिए। कि ऐसा कैसे कर सकता है? तो अविद्या शक्ति से वो सब

2328
02:37:14,880 --> 02:37:18,880
कुछ कर सकता है। एक ये पॉइंट आया था ना कि ऐसा कैसे कर सकता है। तो अविद्या

2329
02:37:18,880 --> 02:37:23,120
शक्ति का आलंबन लेकर के वो सब कुछ कर सकता है। क्योंकि वो हमको वही

2330
02:37:23,120 --> 02:37:26,640
चीजें एट द एंड दिखा रहा है जो है नहीं जो अनरियल है। ठीक है?

2331
02:37:26,640 --> 02:37:31,120
हां। तो कोई इशू नहीं है। मतलब अभी जो हमें बात पता चली है कुछ बातें कि जैसे

2332
02:37:31,120 --> 02:37:34,560
राम जी औरते

2333
02:37:34,560 --> 02:37:38,640
लेकिन वाली बातें आई है यहां पे कुछ कुछ तो ठीक है। एक चीज एक चीज और है वो

2334
02:37:38,640 --> 02:37:42,720
वही व्यवहार परमार्थ से आ रही है ना व्यवहार परमार्थ से आ रही

2335
02:37:42,720 --> 02:37:46,800
है कि भाई ये जो हम जिसको देख रहे हैं ये हो तो दुखी

2336
02:37:46,800 --> 02:37:50,960
रहा है मगर ये जो है अंतत गतवा तो अंतत गतवा क्या है अंतत गतवा

2337
02:37:50,960 --> 02:37:55,040
जो परम सत्य है उसी ने रूप को धारण किया है और ये लीला तो ये क्या

2338
02:37:55,040 --> 02:37:59,200
है ये दिव्य दृष्टि हो गई जो योगी जन होते हैं और इस

2339
02:37:59,200 --> 02:38:03,200
चीज को मैंने एक चीज से और एक चीज से और एक चीज और तर्क दे

2340
02:38:03,200 --> 02:38:07,520
के प्रस्तुत किया कि जो सगुण निराकार ईश्वर है वो सृष्टि

2341
02:38:07,520 --> 02:38:11,520
बना रहा है वो ठीक है मगर वो वैदिक ही है ये कैसे सिद्ध करेंगे

2342
02:38:11,520 --> 02:38:15,600
हम सगुण निराकार वैदिक ईश्वर ने सृष्टि की ये कैसे

2343
02:38:15,600 --> 02:38:19,680
सिद्ध करेंगे हो सकता है वेद विरोधी ईश्वर ने की हो

2344
02:38:19,680 --> 02:38:23,760
देखिए पॉइंट इसके अंदर ये आ जाते है ना कि जब हम ईश्वर सिद्धि की बात करते हैं तो

2345
02:38:23,760 --> 02:38:27,840
ऐसा नहीं कि वैदिक ईश्वर कोई अलग है और पुराण वाला ईश्वर कोई अलग ईश्वर तो वही एक ही है। है

2346
02:38:27,840 --> 02:38:31,840
ना? हम ये हम ईश्वर को समझना शुरू करते हैं। जब हम जैसा

2347
02:38:31,840 --> 02:38:35,840
हम थोड़ा बहुत ईश्वर को समझते हैं उसके अकॉर्डिंग ये मैच करते हैं कि ये इस मैचिंग

2348
02:38:35,840 --> 02:38:40,080
के अकॉर्डिंग कौन सी किताब में बातें मिल रही है नहीं मिल रही। वो इसको इसको

2349
02:38:40,080 --> 02:38:41,920
ऐसे मगर मगर

2350
02:38:41,920 --> 02:38:45,920
अंत अंत में तो वहां शब्द प्रमाण को ही स्वीकार करते हैं ना कि वैदिक

2351
02:38:45,920 --> 02:38:50,080
ईश्वर है। वैदिक सुनिए वैदिक ईश्वर है। मगर वो मगर

2352
02:38:50,080 --> 02:38:54,160
वो प्रणव से ही मिलेगा। वो हवन से ही मिलेगा। इसमें हम

2353
02:38:54,160 --> 02:38:58,320
शब्द प्रमाण ही लेते हैं अंत में। उसमें उसमें ठीक है। लेकिन जैसे आपने वैदिक

2354
02:38:58,320 --> 02:39:02,480
ईश्वर वाली बात बोली ना मैं कह रहा था कि इसका उत्तर मेरे पास है। मैं बस इधर जाना नहीं चाहता क्योंकि इधर

2355
02:39:02,480 --> 02:39:06,480
टॉपिक डाइवर्ट होगा। मैं वही बोल रहा हूं। अब आप चाहते हैं उत्तर तो फिर मैं भी छोटे से में खत्म

2356
02:39:06,480 --> 02:39:10,480
कर दे रहा हूं। पॉइंट इसके अंदर यही है कि पहले भी हमें वेरिफिकेशन करने

2357
02:39:10,480 --> 02:39:14,480
के लिए कि कुरान में जिस अल्लाह की बात की गई वास्तव में वही ईश्वर है जिसने दुनिया बनाई। तो

2358
02:39:14,480 --> 02:39:18,480
पहले हमें पता तो होना चाहिए ना कि किसी ने दुनिया बनाई है। अच्छा जिसने दुनिया बनाई वो

2359
02:39:18,480 --> 02:39:22,640
सर्वज है, अल्पज्ज है। सर्वशक्तिमान है, अल्पशक्तिमान है। सर्वव्यापक है, एक देश है। इत्यादि बातों

2360
02:39:22,640 --> 02:39:26,720
का जब हम निर्णय कर लेंगे फिर हम वेरिफिकेशन करेंगे। नहीं पता चला कि यार यहां पे तो ये देश ही लिखा है।

2361
02:39:26,720 --> 02:39:30,720
यहां पे तो चौथे आसमान पे इधर उधर बैठा है। इत्यादि बातों से मतलब जब पता चलता है कि अच्छा

2362
02:39:30,720 --> 02:39:34,960
ये वो ईश्वर नहीं जो रियल वाला है। उसमें भी काउंटर आ जाएगा निर्भय जी उसमें

2363
02:39:34,960 --> 02:39:39,040
भी आ जाएगा काउंटर दे दूं। उस काउंटर का हां करिए आप

2364
02:39:39,040 --> 02:39:43,280
करिए दीजिए दीजिए। उसमें उसमें काउंटर ये आ जाएगा

2365
02:39:43,280 --> 02:39:47,280
कि भाई सृष्टि जब वैदिक ईश्वर नहीं बनाई है सब कुछ

2366
02:39:47,280 --> 02:39:51,280
बनाया है तो फिर ये जो कुरान है वो अपने

2367
02:39:51,280 --> 02:39:56,080
आप बन गई क्या? नहीं जीव ने बनाई जीव स्वतंत्र कर्म करने में

2368
02:39:56,080 --> 02:39:56,960
द्वैत है ना अरे

2369
02:39:56,960 --> 02:40:01,120
भैया वहां सत्ता नहीं है क्या ईश्वर की

2370
02:40:01,120 --> 02:40:05,120
ईश्वर की सत्ता नहीं है क्या वहां है ईश्वर की सत्ता के बाहर बन

2371
02:40:05,120 --> 02:40:09,440
गई वो नहीं नहीं बनी है उसकी तो दिक्कत क्या आ रहा है इसमें

2372
02:40:09,440 --> 02:40:13,520
तो दिक्कत ये आ रहा है जब वो ईश्वर की सत्ता के अंदर ही बनी है तो काउंटर ये

2373
02:40:13,520 --> 02:40:17,520
आ जाएगा फिर ईश्वर इसका मतलब यहां पर जो है गलत चीजों को भी दे रहा

2374
02:40:17,520 --> 02:40:22,080
है हमें तो फिर हम तो उसको प्राप्त

2375
02:40:22,080 --> 02:40:26,320
उसको सुनिए उसको प्राप्त करने वाली जो वैदिक नियमावली है उसको ही क्यों माने

2376
02:40:26,320 --> 02:40:30,400
हो सकता है कोई और नियमावली रही हो जो है ही नहीं वास्तविक थी जो इसका भी उत्तर ले

2377
02:40:30,400 --> 02:40:34,480
लीजिए आपने यही बोला ना अगर ईश्वर है तो फिर गलत काम क्यों हो रहे हैं मूल

2378
02:40:34,480 --> 02:40:38,560
प्रश्न इसका यही है मूल प्रश्न नहीं यही होता है हमको गलत

2379
02:40:38,560 --> 02:40:42,720
इंफॉर्मेशन क्यों दी जा रही है ईश्वर है तो गलत ज्ञान

2380
02:40:42,720 --> 02:40:46,800
क्यों दिया जा रहा है एक ही बात है गलत ज्ञान गलत काम में ही आ गया ना वो जी

2381
02:40:46,800 --> 02:40:51,040
गलत मैं भी वही कह रहा हूं बताइए बताइए बताइए बताइए

2382
02:40:51,040 --> 02:40:55,120
तो पॉइंट पॉइंट इसके अंदर यही है कि गलत ज्ञान देना यानी गलत काम करना क्यों हो रहा है?

2383
02:40:55,120 --> 02:40:59,360
ईश्वर है तो भी। इसमें पॉइंट ये आ जाता है कि पहली बात तो द्वैत है।

2384
02:40:59,360 --> 02:41:03,520
ठीक है? जीव अलग, ईश्वर अलग, जीव अविद्या ग्रस्त है। ईश्वर सर्वज्य है। ठीक है?

2385
02:41:03,520 --> 02:41:07,520
इसमें पॉइंट ये आ जाता है। अब इसमें विशेष बात आती है कि जीव जो है वो चेतन है। कर्म

2386
02:41:07,520 --> 02:41:11,680
करने में स्वतंत्र है। अपना कर्म करता है। है ना? अब पॉइंट ये है कि ईश्वर

2387
02:41:11,680 --> 02:41:12,180
उसको रोक

2388
02:41:12,080 --> 02:41:16,080
क्यों नहीं रहा? जब वो कर्म कर रहा है। क्योंकि ईश्वर न्यायकारी है। उदाहरण के रूप में मैं

2389
02:41:16,080 --> 02:41:20,080
समझाता हूं। मैं बहुत अच्छे से समझाता हूं। ईश्वर को पता है कि मैं शेर

2390
02:41:20,080 --> 02:41:24,080
बनाऊंगा तो शेर हिरण को मार के खाएगा। उसको पहले से पता है। इंसान

2391
02:41:24,080 --> 02:41:28,080
को भी पता है कि वह शेर बनाएगा। भी शेर क्यों बना रहा है? शेर

2392
02:41:28,080 --> 02:41:32,160
क्योंकि ईश्वर अपनी मर्जी से शेर नहीं बना रहा है। ईश्वर क्योंकि न्यायकारी

2393
02:41:32,160 --> 02:41:36,320
है। अपने स्वरूप उसका स्वरूप ही है कि न्यायकारी है। इसीलिए वो अपने क्योंकि

2394
02:41:36,320 --> 02:41:40,400
भाई सामने वाले ने कर्म वैसे करे तो उसको फल देना ही पड़ेगा। उसे नाट नहीं सकता। मना नहीं कर सकता

2395
02:41:40,400 --> 02:41:44,480
कि भाई निंदू का फल नहीं बनाऊंगा। बेचारे तुम हिरण को मार दोगे। क्योंकि वो न्यायकारी है। इसीलिए

2396
02:41:44,480 --> 02:41:48,560
वो कर्म का फल देगा ही देगा। इस शेर को बनाएगा ही बनाएगा। और शेर अपनी प्रवृत्ति के अनुकूल मार के

2397
02:41:48,560 --> 02:41:52,640
खाएगा ही खाएगा। यह वाला पॉइंट है क्योंकि ईश्वर न्यायकारी है। न्यायकारी होने से वाली

2398
02:41:52,640 --> 02:41:56,640
बात जो है आप जो कह रहे थे वो कट जाता है। बोलिए इसमें एक

2399
02:41:56,640 --> 02:42:01,920
दिक्कत है कि आपने अपनी मान्यता को तर्क के रूप में प्रस्तुत किया है।

2400
02:42:01,920 --> 02:42:06,320
आपने अपनी मान्यता को तर्क नहीं मानते ईश्वर को। मैं मैं बता रहा हूं। न्यायकारी

2401
02:42:06,320 --> 02:42:10,320
की बात नहीं है। वो जो कर्म फल में वो जो उसमें हस्तक्षेप करता है कि

2402
02:42:10,320 --> 02:42:14,400
कर सकता है कि फल वाला को न्यायकारी से रिलेट किया मैंने। सुनिए मैं मैं जो बात

2403
02:42:14,400 --> 02:42:18,720
कह रहा हूं वो सुनिए। इसका मतलब यह है कि अंतत गत्वा

2404
02:42:18,720 --> 02:42:22,880
जो ईश्वर है वह सही कर रहा होता है। कुल मिलाकर के आप यह कह रहे हैं। मैं भी वही

2405
02:42:22,880 --> 02:42:26,880
मानता हूं। अंतत गतवा ईश्वर सही कर रहा होता है। मगर हमको ये दिख

2406
02:42:26,880 --> 02:42:27,380
सकता

2407
02:42:27,200 --> 02:42:31,200
है व्यवहारिक रूप से जब तक हम लोग उसको जो आपकी जो

2408
02:42:31,200 --> 02:42:35,200
वो है ना मान्यता आपके जो सैद्धांतिक मान्यता है जो

2409
02:42:35,200 --> 02:42:39,280
ये सब है जब तक हम उसको स्वीकार नहीं करते तब तक हम यही

2410
02:42:39,280 --> 02:42:43,440
मान मतलब हमको ऐसा दिख सकता है कि ईश्वर ने यहां यहां गलत किया। ये तो

2411
02:42:43,440 --> 02:42:47,440
तात्विक यानी आपने मान ये तो तात्विक विवेचना हो

2412
02:42:47,440 --> 02:42:51,600
गई ना मान लिया तात्विक विवेचना ये जो तात्विक विवेचना

2413
02:42:51,600 --> 02:42:55,680
है ये तब हम लेंगे ना आपकी व्यवहार में तो हमको ऐसा दिख सकता

2414
02:42:55,680 --> 02:42:59,760
है छोटा बच्चा हुआ और जो सुनामी आ गई मर गया ये क्यों मार

2415
02:42:59,760 --> 02:43:04,160
दिया ईश्वर ने तो उसके पीछे का एक उसके पीछे का एक कारण है

2416
02:43:04,160 --> 02:43:08,240
उसके पीछे का एक तात्विक कारण है जो आप बता रहे हैं ठीक है कि वो क्यों

2417
02:43:08,240 --> 02:43:12,960
मरा मगर हमको ऐसा लग सकता है ईश्वर

2418
02:43:12,960 --> 02:43:17,600
ईश्वर अंतत कथवा तो सही कर रहा है। मगर हमको ऐसे कार्य ईश्वर के दिख सकते हैं

2419
02:43:17,600 --> 02:43:21,760
जो कि गलत है। हमको ऐसे कार्य ईश्वर के दिख सकते हैं।

2420
02:43:21,760 --> 02:43:26,400
ये तो मानेंगे ना। उसमें बात ही नहीं है ना कि दिख सकते हैं।

2421
02:43:26,400 --> 02:43:30,640
जब तक ईश्वर को तत्व से नहीं जानेंगे तब तक हमें उसको

2422
02:43:30,640 --> 02:43:34,720
हां पॉइंट पॉइंट मैं बता रहा हूं। पॉइंट मैं बता रहा हूं। अब देखिए पॉइंट

2423
02:43:34,720 --> 02:43:39,040
मैं बता रहा हूं आपको। मैं मैं पॉइंट बता रहा हूं। मैं आप बता चुके हैं। मैं एक बार उत्तर दे देता हूं।

2424
02:43:39,040 --> 02:43:42,400
हम ठीक है। अब पॉइंट इसके अंदर यही है। यानी आप

2425
02:43:42,400 --> 02:43:46,560
जब कह रहे हैं कि आपने अभी स्टेटमेंट दिया स्टेटमेंट आपने ये दिया कि यानी हम यह

2426
02:43:46,560 --> 02:43:50,640
मान सकते हैं दोनों लोग ये मान सकते हैं कि ईश्वर जो भी करता है गलत नहीं करता है। किसी को

2427
02:43:50,640 --> 02:43:54,720
गलती से गलत लग सकता है। अपनी अज्ञानता के कारण गलत लग सकता है। ब्रह्मवास उसको

2428
02:43:54,720 --> 02:43:58,960
ऐसा लगा कि मैं पूरा बोल देता हूं। मैं पूरा बोल देता हूं। यानी आपने इस चीज को स्वीकार

2429
02:43:58,960 --> 02:44:02,960
कर लिया कि जब ईश्वर जब कोई व्यक्ति कुरान बनाता है और ईश्वर उसको हस्तक्षेप करके नहीं रोकता

2430
02:44:02,960 --> 02:44:07,120
है तो ईश्वर सही करता है। गलत नहीं करता। आपने इस चीज को स्वीकार कर लिया। अच्छा। यानी जो मूल विषय

2431
02:44:07,120 --> 02:44:11,120
जो मैंने मैंने बोला था ना अल्टीमेटली वही था। यही हो गया। आपने खुद स्वीकार कर

2432
02:44:11,120 --> 02:44:15,840
लिया। आप समझे नहीं मेरी बात। यह आपने तात्विक विवेचना की है।

2433
02:44:15,840 --> 02:44:19,840
यह तात्विक विवेचना है। व्यवहारिक तत्व तो यह है कि ईश्वर ऐसे कार्य करना

2434
02:44:19,840 --> 02:44:23,840
चाहूंगा। सुनिए मैं बताऊं। जैसे जैसे मैं उदाहरण दे दूं आपको जैसे राम जी

2435
02:44:23,840 --> 02:44:28,160
जो है व्यवहार में दिख रहे हैं बाधित होते हुए। कृष्ण जी जो है व्यवहार

2436
02:44:28,160 --> 02:44:32,240
में दिख रहे हैं बाधित होते हुए। मगर हमारी तात्विक विवेचना से हमने कहा कि

2437
02:44:32,240 --> 02:44:36,320
नहीं वो सर्वशक्तिमान ईश्वर का ही स्वरूप है। मगर वहां आपने कहा कि वो शब्द प्रमाण से

2438
02:44:36,320 --> 02:44:40,320
हम नहीं मानेंगे। यहां पर भी मैं वही कह रहा हूं कि ईश्वर व्यवहार में दिख

2439
02:44:40,320 --> 02:44:44,320
रहा है गलत करता हुआ। मगर हमने शब्द प्रमाण से माना है कि ऐसे

2440
02:44:44,320 --> 02:44:48,320
से ऐसे इसलिए वो ऐसा करता है। उसमें भी बहुत सारी लंबी बहस हो सकती है। मगर शब्द

2441
02:44:48,320 --> 02:44:52,480
प्रमाण से हमने माना है कि वो गलत करता हुआ दिख रहा है। मगर इसके पीछे

2442
02:44:52,480 --> 02:44:56,480
भी उसकी रीजनिंग है। और वो जो रीजनिंग है ना वो हमने

2443
02:44:56,480 --> 02:44:57,440
शब्द प्रमाण से मानी

2444
02:44:57,440 --> 02:45:01,520
है। उसमें पॉइंट पता है कहां आएगा? ये शब्द प्रमाण से माना।

2445
02:45:01,520 --> 02:45:05,760
ये चीज आप तब क्लेम करेंगे जब आप बोलेंगे कि न्यायकारी ईश्वर है। ये मैंने शब्द प्रमाण

2446
02:45:05,760 --> 02:45:09,760
से माना। अगर आपने ये क्लेम कर दिया कि ईश्वर न्यायकारी पूरी

2447
02:45:09,760 --> 02:45:13,760
बात सुनिएगा। अगर आपने यह क्लेम कर दिया कि ईश्वर न्यायकारी मैंने शब्द प्रमाण से

2448
02:45:13,760 --> 02:45:17,760
माना है तब तो आपकी बात ठीक है लेकिन अगर आप किसी प्रकार से ये प्रकार अगर

2449
02:45:17,760 --> 02:45:21,760
आप इसको तर्क वितर्क से सिद्ध अन्य प्रमाणों से जैसे अष्ट प्रमाण है अष्ट में केवल शब्द तो

2450
02:45:21,760 --> 02:45:26,480
एक ही है सप्तर चलिए मैं आपसे पूछ लेता हूं तो उन

2451
02:45:26,480 --> 02:45:30,640
ईश्वर का न्यायकारी होना सिद्ध कैसे हो मुझे बोलने देंगे नहीं बोलने देंगे मेरी पूरी बात सुन

2452
02:45:30,640 --> 02:45:34,640
बोलिए बोलिए बोलिए बोलिए है ना अब बात ये है कि मैं समझा क्या आ रहा हूं आप मुझे उसकी दिशा

2453
02:45:34,640 --> 02:45:38,800
मोड़ देंगे अगर मैंने बोला है कि नहीं फलानी चीज ऐसे तो आप बोलेंगे नहीं अब ये करो मैं बोलूं मुझे कराटे

2454
02:45:38,800 --> 02:45:43,360
आते हैं बोलो मार के दिखाओ फिर वो दिशा भटक जाएगी समझ रहे हो तो कटाक्ष

2455
02:45:43,360 --> 02:45:47,520
करने के लिए ओवर एक्टिंग अगर करेंगे मैं इंटरप्ट कर दूंगा तुरंत आप

2456
02:45:47,520 --> 02:45:51,520
अगर कटाक्ष करने के लिए कटाक्ष करने के लिए मैंने ओवर एक्टिंग नहीं की

2457
02:45:51,520 --> 02:45:55,680
आप ये कराटे वगैरह वाली बातें जो लेके आते हो ये आपकी

2458
02:45:55,680 --> 02:45:59,680
फितरत मैं शुरू से देख रहा हूं अभी से नहीं अभी से नहीं जब जब जब आप चर्चा में

2459
02:45:59,680 --> 02:46:03,760
आए हो जैसे आप जब जैसे आप जब चबा चबा के जैसे

2460
02:46:03,760 --> 02:46:07,920
आप जब चबा चबा करके खाना खा रहे थे मंच पर आ के खाना खाते हुए

2461
02:46:07,920 --> 02:46:11,920
बात कर रहे वह अभद्र लग रहा था देखने में सुनिए सुनिए मगर फिर भी

2462
02:46:11,920 --> 02:46:12,560
आपने

2463
02:46:12,560 --> 02:46:16,720
नहीं बोल सकते आप मैं निवेदन है मेरा आप इससे स्वयं को बचाएं मॉड्रेटर

2464
02:46:16,720 --> 02:46:20,720
जी थोड़ा सा करिए आप देख लीजिए कंट्रोल करिए सिचुएशन मैं अच्छी

2465
02:46:20,720 --> 02:46:24,720
बात है अभी देखिए वापस आते हैं टॉपिक पे बस मैं इसलिए चाहता

2466
02:46:24,720 --> 02:46:29,040
था ना कि मॉडरेटर रहे मेरे को पता था ये चीजें होंगी नहीं तो इनकी ये बात ये कटाक्ष

2467
02:46:29,040 --> 02:46:33,040
पूर्वक जो विनोद कर रहे हैं ये अलग से कि जो एक हल्का सा कटाक्ष देते

2468
02:46:33,040 --> 02:46:38,400
आप मुझसे कराटे खेलने कहोगे हमने इनको एक बार भी इस तरह

2469
02:46:38,400 --> 02:46:42,560
बनाने की कोशिश नहीं की है। भाई आपने आपने दर्शकों को

2470
02:46:42,560 --> 02:46:47,040
क्या वो टोंट मारा था ना दर्शकों को कि सूर्य का दीपक नहीं

2471
02:46:47,040 --> 02:46:51,280
कौन सा आपने वो व्यंग मारा था दर्शकों को लेकर मैंने आप मैंने आपने आपने

2472
02:46:51,280 --> 02:46:55,440
दर्शकों को बीच में लाए थे। आपने आप दर्शकों को बीच में लाए

2473
02:46:55,440 --> 02:46:59,440
थे। आप दर्शकों को बीच में लाए थे और और वो जो दर्शक थे

2474
02:46:59,440 --> 02:47:03,520
ना वो जो दर्शक थे कमेंट उसमें गालियां फट गई।

2475
02:47:03,520 --> 02:47:07,520
ये सब शब्द भी लिखे हुए थे। अगर आप चाहते हैं कि ऐसे दर्शकों का मैं

2476
02:47:07,520 --> 02:47:11,520
कटाक्ष ना करूं तो यहां पर भी आप गलत है। हेलो मॉडरेटर जी

2477
02:47:11,520 --> 02:47:15,520
मेरी आवाज आ रही है? आ रही है। आपकी आवाज आ रही है। हां थोड़ा सामने वाले को रोकिए मैं बोलना चाहता

2478
02:47:15,520 --> 02:47:19,760
हूं। ठीक है। आप अपनी बात मॉडरेटर जी इनकी बात मानेंगे

2479
02:47:19,760 --> 02:47:23,840
ना इसीलिए तो आए हैं। नहीं

2480
02:47:23,840 --> 02:47:27,600
है ना कि जब मैं जब मैं आपको बोलता हूं तो आप रुकते नहीं हो। तो मैं तो मॉडरेटर के पास

2481
02:47:27,600 --> 02:47:31,600
ही जाऊंगा ना। नहीं अभी मैं एक विषय समझा दूं। मैं एक विषय समझा

2482
02:47:31,600 --> 02:47:35,760
दूं। इन्होंने मुझ पर मैं उत्तर दूंगा। विषय बाद में समझेंगे। नहीं वो

2483
02:47:35,760 --> 02:47:39,840
दे दीजिएगा। दे दीजिएगा। मैं एक बात मुझे बोल दूं कि आपने जो कराटे

2484
02:47:39,840 --> 02:47:43,920
वाला टाइप का उदाहरण दिया कूदने वाला उदाहरण दिया ये सब एक छोटा

2485
02:47:43,920 --> 02:47:48,000
सा एक लाइट सा एक कटाक्ष होता है सामने वाले पर। ऐसा करने से बचिए।

2486
02:47:48,000 --> 02:47:52,160
अब आपने अपने पक्ष के लिए वो सूर्य और दीपक वाला उदाहरण लेकर के

2487
02:47:52,160 --> 02:47:56,240
आए जो मैंने ऐसे लोगों के लिए कहा था जो गालियां तक दे रहे थे कमेंट

2488
02:47:56,240 --> 02:48:00,240
में और उनका आप कह रहे हैं कि आप जो है ऐसे लोगों पर कटाक्ष मत करिए। अच्छा ये

2489
02:48:00,240 --> 02:48:04,240
आपने आप क्यों गलत झूठ क्यों बोल रहे हो मैं समझा देता हूं। क्यों झूठ बोल रहे मैं समझा देता हूं। मैं

2490
02:48:04,240 --> 02:48:08,240
मैं इसमें झूठ क्या है? नहीं मैं जी मैं फ्लोकी जी आपको समझाता हूं मैं क्या कैसे

2491
02:48:08,240 --> 02:48:12,480
झूठ है ये पॉइंट मैंने इनको ये बोला था इन्होंने मुझे बोला था कि मैंने

2492
02:48:12,480 --> 02:48:16,480
जब वो कौन बीच में इंटरप्ट कर रहा है वो वाला पॉइंट था है ना बोलने नहीं दे रहे बोलने नहीं दे रहे

2493
02:48:16,480 --> 02:48:20,560
तो मैंने बोला था कि आप मेरे को बोलने नहीं दे रहे बात तो ठीक है तो उन्होंने बोला निर्णय

2494
02:48:20,560 --> 02:48:24,880
कौन करेगा तो मैंने बोला दर्शक देख लो मैंने बोला दर्शकों के ऐसे कमेंट बहुत सारे भरे पड़े हैं

2495
02:48:24,880 --> 02:48:28,960
जिनमें वो लोग दर्शक खुद कह रहे हैं कि भाई आवाहन जी जो हैं वो मेरे को बोलने नहीं दे रहे ये

2496
02:48:28,960 --> 02:48:32,960
बात दर्शकों तो मैंने इनसे ये बात बोली यानी मैं किन लोगों की बात कर रहा हूं मैं उन लोगों की बात कर रहा हूं

2497
02:48:32,960 --> 02:48:37,120
जो कमेंट वो कर रहे हैं कि बोलने नहीं दे रहे अब इन्होंने ने कैसे उस चीज को पलटा कि नहीं मैं नहीं

2498
02:48:37,120 --> 02:48:41,440
मैं तो मैंने तो उसके लिए बोला था कि गाली भाई गाली की बात नहीं चली तो आप उसकी कैसे बोल दोगे

2499
02:48:41,440 --> 02:48:42,960
ठीक है यहां पे यहां पे दो बात

2500
02:48:42,960 --> 02:48:47,120
हां तो दो अब मेरा पक्ष सुन लीजिए इस बारे में एक सत्य से पर्दा उठा

2501
02:48:47,120 --> 02:48:51,520
दूं मैं पहले यहां क्या होता है सच के आसपास वाला झूठ होता है ना वो

2502
02:48:51,520 --> 02:48:55,600
उसको पकड़ना बड़ा मुश्किल होता है सुनिए सुनिए सुनिए सुनिए तो सुनिए

2503
02:48:55,600 --> 02:48:59,760
सच के आसपास वाला झूठ क्या है सच के आसपास वाला झूठ क्या है कि

2504
02:48:59,760 --> 02:49:03,760
इन्होंने कहा कि भाई इन्होंने कहा था कि इन्होंने मुझसे कहा कि मॉडरेटर वो जो दर्शक

2505
02:49:03,760 --> 02:49:07,760
है वो निर्णय कर लेंगे बात क्या थी? इन्होंने कही कि भाई मैं बोलने नहीं दे रहा हूं

2506
02:49:07,760 --> 02:49:11,760
और आप जो है बोलना चाहते हो। मैं इनको बोलने नहीं दे रहा हूं। इस बात का निर्णय दर्शक

2507
02:49:11,760 --> 02:49:16,160
नहीं। आप रिवाइंड करके देख लीजिए। वहां बात यह हो रही थी कि चर्चा

2508
02:49:16,160 --> 02:49:20,160
किसके पक्ष में जा रही है। इसका निर्णय दर्शक कर रहे हैं। तब इन्होंने

2509
02:49:20,160 --> 02:49:24,720
बोला था। वो तो दर्शक देख रहे हैं। दर्शकों के आप कमेंट देख लीजिए। यानी कि ये कंक्लूजन

2510
02:49:24,720 --> 02:49:28,880
पे दर्शकों को गवाही मान रहे थे। कंक्लूजन की अवतार

2511
02:49:28,880 --> 02:49:32,880
के संबंध में जो इनका पक्ष है यह चर्चा उस ओर जा रही है और इसके

2512
02:49:32,880 --> 02:49:36,880
लिए इन्होंने प्रमाण के रूप में दर्शकों का नाम लिया था। अभी क्या कह रहे हैं कि

2513
02:49:36,880 --> 02:49:41,040
मैं इनको बोलने नहीं दे रहा हूं। इस संबंध में दर्शक प्रमाण है। ये है सच

2514
02:49:41,040 --> 02:49:45,280
के आसपास। अभी भी इस बात पे तटस्थ हूं। मैं अभी भी इसी बात पेट हूं। आपको रिवाइंड करके दिखाते

2515
02:49:45,280 --> 02:49:49,360
हैं। रुक जाइए। वो ऑपरेटर जी रिमाइंड करके कर रहा हूं ना बाद में कर लेना। जब आपको

2516
02:49:49,360 --> 02:49:53,520
करना हो तो आप कर लेना। नहीं आप आप यह बात मान रहे हैं कि नहीं मान रहे? आपने कारण दूसरा बताया

2517
02:49:53,520 --> 02:49:57,680
है। नहीं मैंने भाई मैं नहीं मान रहा। मैं बोल रहा हूं जब इसकी जांच कर बाद में कर लेना फिलहाल विषय

2518
02:49:57,680 --> 02:49:58,180
दर्शकों

2519
02:49:58,160 --> 02:50:02,160
का प्रमाण जो आपने कहा था ना वो इस विषय में कहा था कि

2520
02:50:02,160 --> 02:50:06,160
चर्चा किसके निर्णय में जा रही है निर्णय कि अवतार के पत्र

2521
02:50:06,160 --> 02:50:10,400
और डाल दूंगा आप अपनी तरफ से कट करके डाल देना फैसला हो जाएगा फिलहाल अभी

2522
02:50:10,400 --> 02:50:14,560
चलिए अब आप बात करेंगे अभी हां अभी के लिए क्या करते हैं अभी बहुत सारी

2523
02:50:14,560 --> 02:50:19,440
चीजें ऐसे ओवरलैप हो जाएंगी और कभी-कभी क्या होता है कि जब हम कम्युनिकेट कम्युनिकेट

2524
02:50:19,440 --> 02:50:23,760
आदत पे लगाम लगानी चाहिए ना जो इनके अंदर एक ये कटाक्ष करने की आदत

2525
02:50:23,760 --> 02:50:27,760
को भी नहीं बोलने दे रहे इस जो इनको लगाम लगानी चाहिए मत बोलिए

2526
02:50:27,760 --> 02:50:33,520
मत बोलिए कराटे वाली बात मॉडरेटर भी नहीं बोलेंगे अब तो वाह बहुत सही

2527
02:50:33,520 --> 02:50:37,680
यही किसी चीज को टोक रहे थे को टोक रहे थे

2528
02:50:37,680 --> 02:50:41,680
ये भी एक्स्ट्रा था यही यही आपकी जो फितरत है ना ये

2529
02:50:41,680 --> 02:50:45,760
ये गलत है ये जो आप ओवर एक्टिंग कर रहे हैं ना वाह ये कूदो मत

2530
02:50:45,760 --> 02:50:49,840
हल्का सा हल्का सा मिस बिहेव हल्का सा अपमान जो कर रहे हैं

2531
02:50:49,840 --> 02:50:54,080
सॉफ्ट तरीके से यही इसी पे मैं उंगली उठा रहा हूं ये मत करिए आप

2532
02:50:54,080 --> 02:51:00,080
अगली तो हमारी चर्चा समाप्त होगी करते हैं

2533
02:51:00,640 --> 02:51:04,800
वो कूदने वाला प्रसंग देखा था मैंने के रूप में दो बार इन्होंने किया

2534
02:51:04,800 --> 02:51:08,800
फिर अभी कराटे वाली बात बोली मुझे लेकिन एक बार ये केवल इतना भी

2535
02:51:08,800 --> 02:51:12,880
कह सकते थे कि आप जो जो कहते जाओ कहते जाओगे मैं करता नहीं फिर आप मुझे

2536
02:51:12,880 --> 02:51:16,960
कराटे करने को कहोगे मैं कराटे करके दिखाऊं ऐसा तो नहीं हूं मतलब यह उदाहरण

2537
02:51:16,960 --> 02:51:20,960
का व्यंग नहीं था यह उदाहरण था वो वो देखिए वो

2538
02:51:20,960 --> 02:51:24,960
वो समझ में आ रहा है कि वो व्यंग था कि नहीं था इसमें शब्द फिर

2539
02:51:24,960 --> 02:51:29,760
वही शब्द प्रमाण की बात आ जाएगी। व्यंग था कि नहीं था। अभी के लिए क्या करते हैं? अभी

2540
02:51:29,760 --> 02:51:33,840
सेम पेज पे ऑन करते हैं। ठीक है। हां ठीक है। शांत आप तो कह

2541
02:51:33,840 --> 02:51:38,000
दोगे जोकर भी व्यंग नहीं है। वो भी बहुत सम्मानित शब्द है। जैसे

2542
02:51:38,000 --> 02:51:42,000
अपने पिता को भी आप जोकर कहते हैं। नहीं आप अपने पिता को आपको अच्छा लगा? बोलो।

2543
02:51:42,000 --> 02:51:46,000
अपने पिता को बोलो। आपको मजा आ रहा है अपने। मैंने मैंने तो नहीं कहा जोकर सम्मानित शब्द है। आप कह रहे हैं

2544
02:51:46,000 --> 02:51:50,160
जोकर तो सही चीज है। क्या मैंने बोला? आप आप उस दिन लड़ रहे थे ना कि जोकर शब्द

2545
02:51:50,160 --> 02:51:54,320
गलत कहां से हो गया? मैंने आपको सम्मान देने के लिए जोकर नहीं बोला था। जिस बोला था उसी

2546
02:51:54,320 --> 02:51:58,560
जोकर के कटाक था ना यानी आप आप मुझे कुछ ऐसा बोलना चाह रहे थे जो चुबे

2547
02:51:58,560 --> 02:52:02,720
फिर उसके पक्ष में आप बता रहे थे मैंने तो आप तो जो कहते हो वही तो कह रहा हूं

2548
02:52:02,720 --> 02:52:06,720
यानी पॉइंट ये है ना कि सामने वाला मैंने कौन सा शब्द किस भाव से बोला मैं बताऊं

2549
02:52:06,720 --> 02:52:10,880
कि आप अपने मन से सुनोगे तो आप उसमें यही तो बता रहे थे कि ये गलत कहां से हो गया

2550
02:52:10,880 --> 02:52:14,880
वो गलत था कि नहीं था जोकर हां तो अब देखो चालाकी क्या कर रहे हो अभी बात कुछ

2551
02:52:14,880 --> 02:52:15,680
और हो रही है ठीक

2552
02:52:15,680 --> 02:52:19,680
है अब अभी अरे ठीक है मैं अभी आपसे फिर से एक

2553
02:52:19,680 --> 02:52:23,760
अंतिम बार निवेदन कर रहा हूं आप जो है अपने कटाक्ष वाले से

2554
02:52:23,760 --> 02:52:27,840
बचिए और मूल विषय पे आ जाइए। मैं भी यही कब से रिक्वेस्ट कर रहा हूं मूल

2555
02:52:27,840 --> 02:52:31,840
विषय पे क्योंकि मैंने यह सब सीखा नहीं है। इस तरह से करना मतलब सामने कोई व्यक्ति

2556
02:52:31,840 --> 02:52:36,400
आए और उसका अपमान करूं ऐसे बिठा के जबकि वो व्यक्ति सौहार्दपूर्ण

2557
02:52:36,400 --> 02:52:40,640
चर्चा के लिए आया है। ठीक है। ठीक है। तो अभी कंटिन्यू करते हैं वापस। ठीक है।

2558
02:52:40,640 --> 02:52:45,360
वापस कंटिन्यू करते हैं। दोनों लोग हां दोनों बस बस हो गया। ठीक है।

2559
02:52:45,360 --> 02:52:49,520
अ हम तो आप बोल रहे थे ना

2560
02:52:49,520 --> 02:52:53,600
निर्भय जी बस बोलिए। हां। तो मैं ये कह रहा था कि अब दो बातों पे जो है

2561
02:52:53,600 --> 02:52:58,320
क्लेरिटी आ चुकी है। ठीक है? धारणा के ऊपर और

2562
02:52:58,320 --> 02:53:02,320
लक्षण वाला तो खैर क्या ही है। अब जो आता है बात वो

2563
02:53:02,320 --> 02:53:06,640
सिद्धि पे आ जाता है कि हां जो धारणा लक्षण तो चलिए वो जो दिव्य

2564
02:53:06,640 --> 02:53:10,880
सिद्ध व्यक्ति है वही जान पाएगा। नॉर्मल व्यक्ति तो नहीं जान पाएगा। तो मैं तो नहीं जान सकता। है ना? जबकि

2565
02:53:10,880 --> 02:53:14,960
वो अलग बात है कि ईश्वर के लक्षण पता चल जा रहे हैं। अवतार के लक्षण नहीं पता चल रहे हैं। वो एक अलग पॉइंट

2566
02:53:14,960 --> 02:53:19,120
है। अ तो अब हम बात करते हैं सिद्धि पे। तो जैसा

2567
02:53:19,120 --> 02:53:23,120
कि मैंने बताया था कि दो धारणाएं बोलिए मैं इसको फिर क्लियर कर दूं फिर सिद्धि पे

2568
02:53:23,120 --> 02:53:27,600
जाइए फिर क्लियर कर दूं ठीक है बोलिए सगुण निराकार द्वारा

2569
02:53:27,600 --> 02:53:30,960
सगुण निराकार द्वारा भी सगुण निराकार

2570
02:53:30,960 --> 02:53:34,960
द्वारा वैदिक ईश्वर वो न्यायकारी ईश्वर के द्वारा भी जो

2571
02:53:34,960 --> 02:53:39,520
ईश्वर की वो सृष्टि का निर्माण है या फिर बहुत सी चीजें हैं

2572
02:53:39,520 --> 02:53:43,520
जो सिद्ध नहीं हो रही है उसमें शब्द ही प्रमाण है।

2573
02:53:43,520 --> 02:53:47,520
ठीक है? बहुत सी ऐसी चीजें सगुण निराकार की भी और लक्षण की

2574
02:53:47,520 --> 02:53:51,760
बात है तो अगर हम लक्षणों के लिए अगर हम राम और कृष्ण के अस्तित्व

2575
02:53:51,760 --> 02:53:55,920
के लिए अगर हम अपने ग्रंथों के लिए शब्द आश्रित है तो

2576
02:53:55,920 --> 02:54:00,000
फिर उनकी पूरी बात को मानना होगा। पूरे शब्द को मानना होगा और उनकी

2577
02:54:00,000 --> 02:54:04,320
कंक्लूजन के रूप में कही गई बात को मानना होगा जिससे सिद्ध है कि वो जो है

2578
02:54:04,320 --> 02:54:08,320
ईश्वर का अवतार ही थे। अन्य शब्द प्रमाण है हमारे पास में तर्क नहीं है। ठीक है। आगे

2579
02:54:08,320 --> 02:54:12,320
बढ़ते हैं। हां तो तर्क तर्क इस बारे में भी नहीं है ना कि वैदिक ईश्वर ने सृष्टि

2580
02:54:12,320 --> 02:54:16,320
बनाई है। इसमें भी नहीं है। उसप मैंने उसप पॉइंट रखे थे। आपको याद नहीं

2581
02:54:16,320 --> 02:54:20,480
होंगे आप रिवाइंड करके देख लेना। लेकिन हम मूल जाते हैं फिलहाल। नहीं नहीं थे उसमें।

2582
02:54:20,480 --> 02:54:23,600
वो वो सारे

2583
02:54:23,600 --> 02:54:27,600
एक बार इन्होंने एक पॉइंट बोला था। इन्होंने एक पॉइंट बोला था कि हम ऐसे से

2584
02:54:27,600 --> 02:54:31,600
ऐसे देखेंगे उसमें। शिवश जी इनको आप एक बार फिर से पॉइंट ये

2585
02:54:31,600 --> 02:54:35,920
रख दीजिए। जल्दी रख दीजिए पॉइंट। देखिए फ्लोकी जी बात यह है बात यह है ना कि अभी जितनी

2586
02:54:35,920 --> 02:54:40,000
बार मैं बोल रहा हूं कि मूल विषय पे आते हैं उतनी बार वो फिर पीछे से उठा करके फिर कोई बात नहीं आप आगे आप इस

2587
02:54:40,000 --> 02:54:44,000
बार बोल दीजिए है ना मैं रिक्वेस्ट मैं मेरे को आगे बढ़ना है मेरा बहुत मेरा बहुत 4:00 बज चुके हैं

2588
02:54:44,000 --> 02:54:46,000
बहुत समय बीत चुका है इनका क्या हुआ कुछ इशू हुआ है

2589
02:54:46,000 --> 02:54:50,080
क्या इनका नहीं नहीं नहीं मेरी आवाज आ रही है वो कुछ अच्छा नहीं आपका स्क्रीन गायब हो गया

2590
02:54:50,080 --> 02:54:54,160
हां हां अब बोलिए बोलिए ठीक है मैं ये कह रहा हूं कि अब

2591
02:54:54,160 --> 02:54:58,160
आते हैं मूल विषय पर तो जैसा मैंने बोला इन इन्होंने कहा कि मुझे कुछ बात बोलनी है

2592
02:54:58,160 --> 02:55:02,560
उन्होंने वो बोल भी दी कि शब्द परमाण पे निर्भर होते हैं चलिए ठीक है उस पे मैं हान

2593
02:55:02,560 --> 02:55:06,640
बोलूंगा ना ही ना बोलूंगा क्योंकि मैं उस चीज को स्वीकार नहीं करता। आगे बढ़ते हैं। लेकिन मूल

2594
02:55:06,640 --> 02:55:10,800
विषय उस पे नहीं है तो मैं उधर जाऊंगा भी नहीं। ठीक। ठीक है आप आप मूल विषय पे आ जाइए। बोलिए।

2595
02:55:10,800 --> 02:55:15,680
अब मूल विषय पे आ जाती है अवतार सिद्धि की। अब जब बात आती है अवतार सिद्धि की तो

2596
02:55:15,680 --> 02:55:19,840
थोड़ा सा इस पे वन वे वन थोड़ा सा

2597
02:55:19,840 --> 02:55:24,000
चलना चाहूंगा। श्लोकी जी मैं चाहूंगा आप थोड़ा उसको मॉडरेट भी करिएगा ताकि

2598
02:55:24,000 --> 02:55:28,000
वन वे वन की जगह वो बहुत एक्सटेंडेड और विवाद के रूप में ना बड़े। ठीक है? जैसा

2599
02:55:28,000 --> 02:55:32,000
हमारे बीच में बीच-बीच में हो रहा है। मैं कोशिश करूंगा कि ओवरलैप ना हो। बाकी हां जी।

2600
02:55:32,000 --> 02:55:36,000
बिलकुल जो कि मैं अंदर से नहीं चाहता कि विवाद हो क्योंकि एटलीस्ट हम लॉजिक

2601
02:55:36,000 --> 02:55:40,320
पे आ ही रहे हैं तो फिर झगड़ के ही क्यों लॉजिक किसी से भी लॉजिक पे आ सकता है है ना

2602
02:55:40,320 --> 02:55:44,320
तो शिवश जी मुझे एक बात बताइए कि ये जैसे आप कह रहे हो ईश्वर अवतार

2603
02:55:44,320 --> 02:55:48,320
ले सकता है अर्थात ईश्वर एक शरीर धारण कर सकता है जैसे जीव

2604
02:55:48,320 --> 02:55:53,280
शरीर धारण कर सकता है वैसे ईश्वर शरीर धारण कर सकता है ठीक है तो

2605
02:55:53,280 --> 02:55:57,360
इसके पीछे हेतु क्या है अर्थात ईश्वर जो अवतार ले सकता है जिसकी व्याख्या हमने की

2606
02:55:57,360 --> 02:56:02,880
इसका हेतु क्या है इसकी सिद्धि के

2607
02:56:02,880 --> 02:56:06,960
अवतार लेने की सिद्धि इसका हेतु क्या है? प्रश्न

2608
02:56:06,960 --> 02:56:11,040
याद रखिएगा हेतु क्या है? हेतु मतलब क्यों लेगा? हां।

2609
02:56:11,040 --> 02:56:16,000
क्यों ले रहा है अवतार? नहीं क्यों ले रहे? नहीं है

2610
02:56:16,000 --> 02:56:21,280
क्यों? क्यों दूसरा हो गया? अच्छा फ्लोकी जी आपने न्याय दर्शन पढ़ा है?

2611
02:56:21,280 --> 02:56:25,520
जी पढ़ा है। अरे आप अपने अपनी बात बताइए। आप इस तरह से मत किसी क्वालिफिकेशन

2612
02:56:25,520 --> 02:56:29,520
मत जाइए। नहीं नहीं अपनी बात बताइए। वो कंफर्टेबल नहीं नहीं ये सवाल

2613
02:56:29,520 --> 02:56:33,520
ही गलत है। नया दर्शन पड़ा है। आप अपनी बात रखिए भाई शिवश जी मैं मॉडरेटर से

2614
02:56:33,520 --> 02:56:37,840
बात अच्छा आप सुनिए सुनिए आप क्यों बीच में देखिए मैं देखिए आप

2615
02:56:37,840 --> 02:56:41,840
लोग सुनिए एक बात बता जी एक

2616
02:56:41,840 --> 02:56:46,000
मिनट मैं एक बात क्लियर कर दूं निर्भय हम यहां पर बिल्कुल

2617
02:56:46,000 --> 02:56:50,160
अपने सत्य के साथ आए हैं। कोई मन में राग द्वेष इस तरह का नहीं है

2618
02:56:50,160 --> 02:56:54,160
कि हमें आपकी अपमानना करनी है या फिर छोटा दिखाना है। आपके

2619
02:56:54,160 --> 02:56:58,240
आचरण से हमको ऐसा लग रहा है कि आपके अंदर है तो आप

2620
02:56:58,240 --> 02:57:02,240
उन चीजों से बचिए। जैसे कि किसी से किसी से

2621
02:57:02,240 --> 02:57:04,560
ये पूछना

2622
02:57:04,560 --> 02:57:08,560
उससे क्या मतलब है? अगर हम उसको डिनाई करें आपकी कही हुई बात को तब आप कहिए

2623
02:57:08,560 --> 02:57:12,800
कि आपने पढ़ा है कि नहीं पढ़ा है? बल्कि आप तो प्रमाण दिखा दीजिए यहां पे लिखा हुआ है।

2624
02:57:12,800 --> 02:57:16,960
आप किसी की आप किसी की क्वालिफिकेशन पे बात मत करिए।

2625
02:57:16,960 --> 02:57:17,920
आपने क्या किया?

2626
02:57:17,920 --> 02:57:21,920
आप क्या इसलिए बोलना पड़ रहा है मुझे तेज? क्योंकि आप बीच में बोल

2627
02:57:21,920 --> 02:57:25,920
रहे हैं मेरी बात को। क्यों कूद रहे हैं? नारायण नारायण ठीक है। मैंने आप

2628
02:57:25,920 --> 02:57:30,080
बता दीजिए किेंगे अवतार लेने का हेतु क्या है? इस एक बार इसको थोड़ा एक्सप्लेन

2629
02:57:30,080 --> 02:57:34,640
कर दीजिए ताकि शिवान जी को भी समझ में आ जाए। बाकी जनता को समझ मुझे भी समझ में आ जाए।

2630
02:57:34,640 --> 02:57:38,640
ठीक है? मान लीजिए मैं नहीं समझ पा रहा हूं तो अब समझा दीजिए हेतु से क्या

2631
02:57:38,640 --> 02:57:42,640
अर्थ है? नहीं मेरी आवाज आ रही है? मैंने मैंने हां आ रही

2632
02:57:42,640 --> 02:57:46,720
है आ रही है। मैंने आपसे यह पूछा था न्याय दर्शन के विषय में ताकि मैं इस बात की श्योरिटी

2633
02:57:46,720 --> 02:57:50,720
हो सकूं कि पंचाय के बारे में आपको अगर आपने न्याय दर्शन पढ़ा होगा तो 100% आपको पंचायत

2634
02:57:50,720 --> 02:57:54,720
का छोड़ दीजिए न्याय दर्शन को आप हेतु का अर्थ बताइए। छोड़ो मैं

2635
02:57:54,720 --> 02:57:58,880
वही मैं उसी पे ही आ रहा हूं। मैं उसी पे ही आ रहा हूं। कि चर्चा जो होती है वाद में

2636
02:57:58,880 --> 02:58:03,440
वाद में क्या होता है? जब हम दो चीज एक तो होता है प्रत्यक्ष अनुमान। ठीक है? हेतु

2637
02:58:03,440 --> 02:58:07,520
ईशु मैं वही कह रहा हूं। मेरे को एक बार पूरा देखिए एक होता है ना एक ही डायरेक्ट

2638
02:58:07,520 --> 02:58:11,680
शब्द में नहीं थोड़ा समझाना पड़ता है। ये ये क्या हो रहा है मैं बता दूं आपको बता

2639
02:58:11,680 --> 02:58:15,840
दूं मैं बता दूं इनको बोलिए मुकदमा जब शुरू होता है सुनो मुकदमा जब शुरू

2640
02:58:15,840 --> 02:58:19,840
होता है सामने वाला व्यक्ति जो है कटघरे में खड़ा हुआ है एक

2641
02:58:19,840 --> 02:58:24,240
मिनट भैया मैं बोल दूं आप आप जो कर रहे हो उसको मैं बता दूं आपको क्या है

2642
02:58:24,240 --> 02:58:28,240
सामने वाला व्यक्ति कटघरे में खड़ा हुआ है अब जो है

2643
02:58:28,240 --> 02:58:32,240
उसप आरोप लगा है नहीं दिया जा रहा गलत बात मैं

2644
02:58:32,240 --> 02:58:33,120
आपको बता दूं आप

2645
02:58:33,120 --> 02:58:37,280
क्या कर रहे हैं यहां पे बार-बार ये वाली बात कि न्याय दर्शन ये उसका पहला यह लिखा

2646
02:58:37,280 --> 02:58:41,360
है दूसरा यह लिखा है भाई हम हम जो है जो एक्स्ट्रा चीजें आप शास्त्र

2647
02:58:41,360 --> 02:58:45,360
में लिखी हुई क्यों बता रहे हैं? आप सीधे वो पॉइंट बताइए। नया दर्शन के आधार पे ये बात

2648
02:58:45,360 --> 02:58:49,520
है। मैं क्या मगर आप जी से आप श्वेता जी से पूछ रहे हो कि

2649
02:58:49,520 --> 02:58:53,600
आपने पढ़ा है कि नहीं पढ़ा है? आपने न्यूमोलॉजी न्यूमरोलॉजी पढ़ी है कि नहीं

2650
02:58:53,600 --> 02:58:57,600
पढ़ी है? ये सब बातें आपने की। ठीक है। अब मैं बता रहा हूं इसको क्या कहते हैं?

2651
02:58:57,600 --> 02:59:01,680
इसको समझ लीजिए क्या चीज है। श्वेता जी आप भी सुन लीजिए। व्यक्ति

2652
02:59:01,680 --> 02:59:05,840
पर आरोप लगा है कि उसने मर्डर किया है। सुन लीजिए

2653
02:59:05,840 --> 02:59:10,080
सुन लीजिए। पूरा आपने पूछा हेतु समझाओ मैं हेतु समझा रहा हूं मेरे को बोलने नहीं दिया

2654
02:59:10,080 --> 02:59:14,400
आप आप हेतु नहीं उनको इंटरप्ट करना पड़ा ना आपको उनको इंटरप्ट करना पड़ा आपको सुनिए

2655
02:59:14,400 --> 02:59:18,400
वो बोलेंगे आप कौन होते हैं बोलने वाले बीच में भाई मॉडरेट मेरे सामने अन्याय हो रहा है

2656
02:59:18,400 --> 02:59:22,560
और मनुस्मृति में लिखा है मौन रहने से अच्छा है सत्य बोलना जो ना

2657
02:59:22,560 --> 02:59:26,640
जो व्यक्ति को अधिकृत है जो अधिकृत है वो बोलेगा क्या बोलोगे तो मैं

2658
02:59:26,640 --> 02:59:30,720
तो अपनी भावना व्यक्त कर रहा हूं ना मैं उनकी थोड़ी ना व्यक्त कर रहा हूं समय में करो ना अब अपने समय में करो

2659
02:59:30,720 --> 02:59:34,880
ना मेरी भावना ये है कि यहां अन्याय हो रहा है मैं इसमें अपने समय पे क्या करूं

2660
02:59:34,880 --> 02:59:39,120
अरे भाई अपने समय अरे शिवाजी एक बार मैं श्वेता जी मुझे वो उदाहरण

2661
02:59:39,120 --> 02:59:43,280
प्लीज मुझे वो उदाहरण बोलने दीजिए वो उदाहरण क्या है जिससे जनता को समझ में आ जाए अपने

2662
02:59:43,280 --> 02:59:47,440
समय में यह बार-बार ऐसा क्यों कर रहे हैं मुझे उदाहरण बोलने

2663
02:59:47,440 --> 02:59:48,160
दीजिए मेरे को भाई

2664
02:59:48,160 --> 02:59:52,320
मेरे को बोल लेने दो क्या हो रहा है कुछ भी हो रहा है मतलब मैं बोल मेरे बीच में कूद

2665
02:59:52,320 --> 02:59:56,960
करके हम चालू बताइए क्या मतलब मैं फिर कूदने शब्द का उपयोग किया इन्होंने देख लो

2666
02:59:56,960 --> 03:00:01,120
देख रहे हो ये इसीलिए आए हैं या तो बाद में डंडा

2667
03:00:01,120 --> 03:00:05,200
करके या तो बात खत्म हो जाए किसी तरीके से इनको निकाल दिया जाए तो ये हो जाएगा मुझे

2668
03:00:05,200 --> 03:00:09,360
बोलने और या फिर यहां पर यह बदतमीजी करेंगे या फिर

2669
03:00:09,360 --> 03:00:13,760
यहां पर यह बदतमीजी करेंगे आप अपनी बातमीजी आप

2670
03:00:13,760 --> 03:00:17,760
बार-बार कूदने कूदने शब्द का इस्तेमाल कर रहे हो कटाक्ष कर रहे हो दूसरे दूसरे

2671
03:00:17,760 --> 03:00:22,160
कराटे सीखने को मैं क्यों बोलूंगा कराटे करके दिखाओ क्यों दिया वो उदाहरणारी

2672
03:00:22,160 --> 03:00:26,480
आप आप जो है मेरे ऊपर वो सिद्ध करके दिखाओ कि मैं आपको कराटे कूदने का उदाहरण दूंगा

2673
03:00:26,480 --> 03:00:30,480
ये सिद्ध कैसे होता है बोलने क्यों नहीं दे रहे बोलने क्यों नहीं दे रहे मेरे को इसलिए

2674
03:00:30,480 --> 03:00:34,560
नहीं बोलने दे रहा कि आप गलत बातें कर रहे हो तो अपने बारे में बताओगे ना अपने समय

2675
03:00:34,560 --> 03:00:38,800
में बताओगे ना कि मैंने क्या गलती की मेरा भाई मैं कोई गलत बात होने के बाद

2676
03:00:38,800 --> 03:00:43,040
इंतजार करूंगा क्या कि आप यहां पे जो जो वितंडा करनी है जो उल्टी

2677
03:00:43,040 --> 03:00:47,520
करनी है वो कर दो उसके बाद मैं बोलूं आपने ये किया और फिर आप कह दो अब नहीं करूंगा

2678
03:00:47,520 --> 03:00:51,840
आप कुछ भी कर दो उसके बाद मैं कहूं कि नहीं किया अपनी उल्टी अपने समय में करो अभी

2679
03:00:51,840 --> 03:00:55,920
मुझे मुझे मुझे इससे मतलब है कि आप जो है अगर मेरे सामने कोई गलत

2680
03:00:55,920 --> 03:01:00,160
कार्य हो रहा है मैं बोलूंगा मैं रोकूंगा मेरी सामर्थ के अनुसार

2681
03:01:00,160 --> 03:01:03,280
जो मैं कर सकता हूं करूंगा आपको नहीं करनी है चर्चा आप

2682
03:01:03,280 --> 03:01:07,280
बता दीजिए आप जा सकते अरे मेरे भाई मैं चर्चा कर दो ना

2683
03:01:07,280 --> 03:01:11,280
चर्चा तो अब मुझे वो बात बताने दो कि ये क्या कर रहे हैं अब मुझे

2684
03:01:11,280 --> 03:01:15,840
वो बात बताने दो कि ये क्या कर रहे हैं बात बोल लेना मेरा जो विषय अब मुझे वो बात बताने दो

2685
03:01:15,840 --> 03:01:19,920
क्योंकि ये बार-बार कर रहे हैं ना बिना बात ये है कि जब हम जब

2686
03:01:19,920 --> 03:01:24,000
हम हेतु रखते हैं जब हम हेतु की बात करते हैं तो ये आपको

2687
03:01:24,000 --> 03:01:28,800
ऐसे बात करनी चाहिए थी हेतु के बारे में जो आप ये कर रहे हैं आपने

2688
03:01:28,800 --> 03:01:33,040
न्याय में ऊपर ये लिखा है वो लिखा है ये क्या होता है वो मैं बताऊंगा

2689
03:01:33,040 --> 03:01:37,520
मेरी बारे में चलिए बताइए मुझे मत सिखाओ। मुझे से बात करनी खुद सीखो। खुद सीखो। मुझे

2690
03:01:37,520 --> 03:01:41,840
बात करनी है। निर्भय जी आप ऐसा है भाई साहब अगर आप यह सब बातें करेंगे दोबारा आपने

2691
03:01:41,840 --> 03:01:46,000
यहां माफी मांगी है तो सीखना आपको है। आपने माफ़ मांगी

2692
03:01:46,000 --> 03:01:50,000
मैंने माफ़ी नहीं मांगी है। अब आइए आपकी आवाज है। आपने माफी मांगी है।

2693
03:01:50,000 --> 03:01:54,240
आप हेतु का अर्थ बताएं। आपने माफी मांगी है। मैंने नहीं मांगी है माफ़ी।

2694
03:01:54,240 --> 03:01:58,320
क्षमा आपने मांगी है। आपको सीखना होगा। WhatsApp मैसेज दिखा

2695
03:01:58,320 --> 03:02:02,480
दूं। माफ़ी मांगी। हां तो उसमें उसमें मैं सीखूंगा जहां मैंने माफी मांगी है

2696
03:02:02,480 --> 03:02:07,760
जहां नहीं मांगी है वहां मुझे मत कहो सीखने को ठीक ठीक ठीक मेरे को मत

2697
03:02:07,760 --> 03:02:12,320
अभी आप जो है माफी मांग रहे हो ना कि मैं कूदो नहीं बोलूंगा फिर बोल रहे हो कूदो

2698
03:02:12,320 --> 03:02:16,320
शिव जी थोड़ा सा जाइए कोई बात नहीं तो भैया आप जो है

2699
03:02:16,320 --> 03:02:18,400
जो शब्द का मना कर रहे हो कि मैं नहीं मैं

2700
03:02:18,400 --> 03:02:22,400
नहीं बोलूंगा तो आप बार-बार उसप बदल रहे हो मैंने जिस बात के लिए आपको

2701
03:02:22,400 --> 03:02:26,560
WhatsApp में कहा था वो मेरा उदार भाव था कि भैया मैंने आपको एक दिन पहले

2702
03:02:26,560 --> 03:02:30,560
क्यों नहीं बताया उसमें कोई सनातन सिद्धांत नहीं था कि मुझे आपको एक दिन पहले ही बताना

2703
03:02:30,560 --> 03:02:35,280
है। उसको आप कह रहे मैं WhatsApp दिखाऊंगा आपको। क्यों गलत व्यवहार किया आपने?

2704
03:02:35,280 --> 03:02:39,440
क्यों बोला? आदमी सामने वाला सामने वाला कहां गलत शब्द बोला? चलो

2705
03:02:39,440 --> 03:02:43,440
गलत शब्द सिद्ध करो उसे। शब्द गलत शब्द सिद्ध करो। उल्टी क्यों बोला?

2706
03:02:43,440 --> 03:02:47,520
उल्टी क्यों बोला? उल्टी कब बोला? अभी बोला है। WhatsApp में

2707
03:02:47,520 --> 03:02:52,400
बोला है। अरे अभी अभी लाइव में बोला है। अभी लाइव में बोला है। कब बोला?

2708
03:02:52,400 --> 03:02:56,640
कब बोला? पांच मिनट पहले बोला। इसलिए बोला इसलिए बोला क्योंकि आप बार-बार

2709
03:02:56,640 --> 03:03:00,800
ये गलत बातें करते चले जा रहे हो। फिर कह रहे हैं अपनी बारी अपनी बारी आए तब बोलना

2710
03:03:00,800 --> 03:03:04,800
झूठ की हद है भाई ऐसे क्या बोलते हैं इस कन्वर्सेशन जो है इसका

2711
03:03:04,800 --> 03:03:09,120
एंड नहीं उसका ये कभी खत्म नहीं होगा गए डर गए

2712
03:03:09,120 --> 03:03:13,120
देखिए अरे डर क्यों रहे हो यार ये आवश्यकता नहीं है बोलने की मैं आखरी

2713
03:03:13,120 --> 03:03:17,200
बार आपसे कह रहा हूं आप अगर आप अगर इस तरह से बदतमीजियां करोगे मुझे आपसे चर्चा नहीं

2714
03:03:17,200 --> 03:03:21,360
करनी है ठीक है आप मेरे को पंचामे दे दो और सिद्धि आपने कूद कूद करके

2715
03:03:21,360 --> 03:03:25,600
मना कर कर के बार-बार कूदना बोला आप जब मुझसे यह कहने लगे

2716
03:03:25,600 --> 03:03:29,600
आप जब मुझसे यह कहने लगे आप जब ये आप जब आप

2717
03:03:29,600 --> 03:03:33,600
जब आप जब मुझसे यह कहने लगे कि भैया मैं जब अपनी

2718
03:03:33,600 --> 03:03:37,600
बारी आए तब बोलना तब मैंने कहा तुम जब उल्टी कर दोगे उसके बाद मैं बोलूंगा क्या सीधा

2719
03:03:37,600 --> 03:03:43,360
नहीं हो सकता मैं पंचा दे रहा हूं तारवा नहीं होता अभी चलो जाइए भाई

2720
03:03:43,360 --> 03:03:47,600
मुझे मालूम था हैंड बताने बताने बताने देते

2721
03:03:47,600 --> 03:03:51,760
ना हेतु का अर्थ बताने देते व्यवहार और

2722
03:03:51,760 --> 03:03:55,760
जा रहा है लगातार वो पता है क्या चाहता है श्वेता जी सुन लीजिए

2723
03:03:55,760 --> 03:03:59,920
वो व्यक्ति क्या चाहता वो यह चाहता है कि वो जो कुछ

2724
03:03:59,920 --> 03:04:03,920
बोलना चाहता है ना बुरी बातें हमारे विषय में या कटाक्ष वाली बातें

2725
03:04:03,920 --> 03:04:08,240
वो बोल दे वो रह जाए और उसके बाद उनका मिसयज हो बस

2726
03:04:08,240 --> 03:04:12,320
इनका यही काम है अच्छे से चर्चा हो रही है मगर उसमें

2727
03:04:12,320 --> 03:04:16,480
ऐसे ऐसे जो सॉफ्ट से मजाक करना कि भैया वो कराटे करने ही कह दोगे

2728
03:04:16,480 --> 03:04:20,480
मैंने इनके साथ किया क्या ऐसा कोई अब बद्दी बात बोली

2729
03:04:20,480 --> 03:04:24,480
फिर ये कह रहे हैं कि अपनी बारी आए तब काउंटर करना मतलब तुम जो उल्टी मैंने ये कहा तुम

2730
03:04:24,480 --> 03:04:28,720
जो उल्टी करना चाह रहे हो वो कर दोगे उसके बाद उसको मैंने सुना मैंने सुना मैंने सुना

2731
03:04:28,720 --> 03:04:32,800
अब मैं यहीं पे था सुनिए मैं कह रहा हूं कि उनको डायरेक्ट हेतु का अर्थ बता दीजिए और टू

2732
03:04:32,800 --> 03:04:36,880
द पॉइंट बात कर मैं मैं टोक दूंगा ना अगर मैं भी तो यही कह रहा था भाई मैं अपने

2733
03:04:36,880 --> 03:04:41,040
घर में अपने माता-पिता से उनको भी इस चर्चा के बारे में मालूम है मैं उनसे

2734
03:04:41,040 --> 03:04:45,200
ये कह के आ रहा हूं मेरा ईश्वर साक्षी है ये व्यक्ति जो आ रहा है ना ये बात तो

2735
03:04:45,200 --> 03:04:48,880
सुनो मैंने क्या कहा है अपने माता पिता से ये व्यक्ति जो आज आ रहा है चर्चा

2736
03:04:48,880 --> 03:04:52,960
करने अच्छा व्यक्ति है ये व्यक्ति टू द पॉइंट बात करने वाला व्यक्ति ये बातों

2737
03:04:52,960 --> 03:04:57,760
घुमाएगा नहीं इधर उधर की बातें नहीं करेगा ये मैंने उनसे से कहा है

2738
03:04:57,760 --> 03:05:01,760
मगर ये मुझे ही वहां पर वो सिद्ध कर रहे हैं ना इस तरह की बातें करके मैं

2739
03:05:01,760 --> 03:05:05,920
तो अच्छे भाव से ही आया था सत्य के साथ कोई कटाक्ष नहीं कुछ नहीं कोई द्वेष

2740
03:05:05,920 --> 03:05:10,320
भावना नहीं किसी को नीचा नहीं दिखाना अब वापस

2741
03:05:10,320 --> 03:05:14,400
और ये अपने युवा युवा उसमें जो अब मैं क्या कहूं फिर वो कहेगा

2742
03:05:14,400 --> 03:05:18,560
एक और कटाक्ष कर दिया ये अपने उस खमार में अपने भटके

2743
03:05:18,560 --> 03:05:22,720
हुए दिशाहीनता के कारण वो सब आचरण जो अपने दोस्तों यारों में करते

2744
03:05:22,720 --> 03:05:26,960
होंगे वो मेरे साथ कर रहे हैं हम वो लेने के लिए वो एक्सेप्टेबल

2745
03:05:26,960 --> 03:05:31,680
नहीं है मेरे लिए आपके दोस्तों के लिए आपके घर के लिए होगा

2746
03:05:31,680 --> 03:05:36,160
लाइव है दूसरी बात अब मैं वो वो जो फोटो वाली बात है वो बता के रहूंगा

2747
03:05:36,160 --> 03:05:40,240
उसके बिना आगे नहीं क्योंकि इन्होंने इन्होंने इतनी चीजें कर दी है कि मुझे वो बताना

2748
03:05:40,240 --> 03:05:44,240
बहुत आवश्यक है आप वो बता दीजिए इसके बाद हम इनका हेतु का जो प्रसंग

2749
03:05:44,240 --> 03:05:48,480
है वो आगे ले लेते या इसको ऐसे कर सकते हैं कि पहले हेतु वाला ले ले बाद

2750
03:05:48,480 --> 03:05:52,640
नहीं पहले वही होगा आपने कर दिया ना कूदो कूदो और वो आपको झूठो

2751
03:05:52,640 --> 03:05:55,760
कराटे आपको

2752
03:05:55,760 --> 03:05:59,760
ऊपर ये लिखा है इसमें मेरा पॉइंट ये है इसमें मेरा पॉइंट ये है कि कम से कम जो

2753
03:05:59,760 --> 03:06:04,000
मूल विषय है ये हो जाए बाकी जो मूल विषय पे मैं आऊंगा लेके ना मूल विषय भटकने

2754
03:06:04,000 --> 03:06:08,320
नहीं देंगे चाहे जो हो जाए वो खोल लेंगे दोबारा वो मूल विषय भटकने

2755
03:06:08,320 --> 03:06:12,400
नहीं देंगे नहीं ना वो ठीक है मेरी बात सुन लीजिए मैं कह रहा हूं मूल विषय पे एक बार कंप्लीट

2756
03:06:12,400 --> 03:06:16,480
कर लेते हैं तो यह आपको सोचना चाहिए कराटे वाला उदाहरण देने से पहले

2757
03:06:16,480 --> 03:06:20,640
श्वेतांगी से पूछने से पहले कि आपने नया दर्शन पढ़ा है मुझसे पूछने से पहले क्या

2758
03:06:20,640 --> 03:06:24,720
आपने न्यूमरोलॉजी पढ़ी है क्या ऐसा ना हो ऐसा ना हो ऐसा ना हो कि

2759
03:06:24,720 --> 03:06:29,120
इन सब बातों के चक्कर में जो मूल विषय है वो रह जाए है ना मूल विषय

2760
03:06:29,120 --> 03:06:33,120
मूल तो ये बात ये बात आपको भी सोचनी चाहिए ना निर्भय जी ये बात

2761
03:06:33,120 --> 03:06:37,120
आपको भी सोचनी चाहिए कुछ बोल रहे हैं ना आप भी तो मैंने अलग से आपके आपके

2762
03:06:37,120 --> 03:06:41,120
लिए अलग से प्रथम कि मैंने आपको जवाब में नहीं बल्कि अपनी ओर से क्या

2763
03:06:41,120 --> 03:06:45,200
कहा है बताइए गलत अगर आप सही होते अगर अगर आप जैसे जैसे

2764
03:06:45,200 --> 03:06:49,680
अगर आप सही होते तो अपनी तरफ से कुछ नहीं बोलते ना बोला ना आपने उल्टी इत्यादि शब्द बोला ना नहीं

2765
03:06:49,680 --> 03:06:53,840
मैंने उसको प्रतिकार स्वरूप बोला है आपने बोला प्रतिकार स्वरूप बोला है प्रतिकार

2766
03:06:53,840 --> 03:06:58,160
स्वरूप वो गलत नहीं है मैंने आपको जो जो चीजें सुनिए जो चीजें निषेध

2767
03:06:58,160 --> 03:07:02,320
है जो चीजें निषेध है वो नहीं की है मैंने प्रतिकार स्वरूप जिनकी आज्ञा है वो

2768
03:07:02,320 --> 03:07:06,400
किया है जैसे किसी पे जैसे किसी पे किसी

2769
03:07:06,400 --> 03:07:10,400
के साथ अहिंसा करना गलत है मगर धर्म की रक्षा के

2770
03:07:10,400 --> 03:07:10,900
लिए करना

2771
03:07:10,800 --> 03:07:14,880
उचित है सिद्धि पे आना चाहता हूं मेरे से अवतार सिद्ध भी बात कर आप अवतार सिद्ध पे आइएगा पहले मैं

2772
03:07:14,880 --> 03:07:18,880
वो बात बोलूंगा कि आप यहां कर क्या रहे थे अपने आप अपने नहीं मैं मैं नहीं

2773
03:07:18,880 --> 03:07:22,960
रोकूंगा भाई आपने इतना सब कर दिया है ना कि मुझे बताना है लोगों को ठीक है मैं

2774
03:07:22,960 --> 03:07:27,280
आपको म्यूट करके बता देता हूं मैं आपको रोक अचुदाय

2775
03:07:27,280 --> 03:07:31,840
नमता नम सुनिए ये क्या कर रहे थे

2776
03:07:31,840 --> 03:07:36,240
ये ये कर रहे हैं कि एक व्यक्ति खड़ा हुआ है कटघरे में

2777
03:07:36,240 --> 03:07:40,720
उस पर आरोप लगा है कि उसने हत्या की है

2778
03:07:40,720 --> 03:07:44,960
ठीक है अब हत्या करने का जब वो केस केस चालू हुआ मुकदमा चालू

2779
03:07:44,960 --> 03:07:49,200
होता है तो व्यक्ति क्या करता है यह देखिए

2780
03:07:49,200 --> 03:07:53,360
उसमें फोटो में कितनी बेरहमी से हत्या हुई है ये दिखा रहा है

2781
03:07:53,360 --> 03:07:57,680
उसका कोई मतलब नहीं है कि उससे सिद्ध हो रहा है कि नहीं हो रहा है कि वो हत्यारा

2782
03:07:57,680 --> 03:08:01,680
ही है ये हत्या उसी ने की है। मगर वो खामखा अपना प्रभाव उत्पन्न

2783
03:08:01,680 --> 03:08:06,000
करने के लिए ये सब ऐसी फोटोज दिखा रहा है। देखिए कितना ब्रूटल

2784
03:08:06,000 --> 03:08:10,080
मर्डर केस है, कितना ये है, कितना वो है जिससे लोगों के मन में

2785
03:08:10,080 --> 03:08:14,160
एक प्रभाव उत्पन्न हो जाए कि देखो ऐसे इस वाले करते हैं। इस वाले जो है

2786
03:08:14,160 --> 03:08:18,720
श्लोक गान करने लगते हैं तो मुझे उन्हें टोकना पड़ता है। भैया श्लोक गान यहां मत करो।

2787
03:08:18,720 --> 03:08:22,960
गाना गाने लगते हैं वो। भैया टू द पॉइंट रहो। अपनी बात

2788
03:08:22,960 --> 03:08:26,000
टू द पॉइंट रखो। जिन बातों के बिना काम चल सकता है वो बातें

2789
03:08:26,000 --> 03:08:30,320
मत करो। ठीक है निर्भय जी।

2790
03:08:30,320 --> 03:08:34,480
हो गई। अब आप निर्भय जी

2791
03:08:34,480 --> 03:08:38,560
अपना हेतु वाला जो है बात उसको कंटिन्यू करिए

2792
03:08:38,560 --> 03:08:42,800
और हम अब हम ट्रैक पे रहेंगे। अगर कोई भी इधर-उधर जाएगा

2793
03:08:42,800 --> 03:08:46,960
तो मैं क्षमा करिएगा मैं टोक दूंगा। नारायण शुरू करिए। अब आप हेतु

2794
03:08:46,960 --> 03:08:52,160
काट एक बात और कि हां एक बात और कि बीच में इंटरप्शन ना हो। थोड़ा सा ध्यान दीजिएगा।

2795
03:08:52,160 --> 03:08:56,240
बस फिर ये सब आप ठीक है। अब आप नहीं हुआ है तो मैं आपको बोलूंगा

2796
03:08:56,240 --> 03:09:00,240
ना। ठीक है। देखो इसमें मैं भी मैं कुछ बोल बोल दूं बीच

2797
03:09:00,240 --> 03:09:04,320
में इंटरप्शन ना होने पे। इसीलिए मैं इसीलिए कह रहा था कि ये

2798
03:09:04,320 --> 03:09:08,320
रिक्वेस्ट है आपकी मेरी तो मॉडरेटर से रिक्वेस्ट है कि आप ध्यान रखें कोई बीच में ना बोले। हां हां ध्यान

2799
03:09:08,320 --> 03:09:12,320
रखा जाएगा। आप आप कृपया हेतु का आप ये चाहते हैं।

2800
03:09:12,320 --> 03:09:16,320
ठीक है। सुनिए डिस्कशन रीस्टार्ट होने से पहले जैसे वो अपनी कुछ मांग कर रहे हैं। मैं

2801
03:09:16,320 --> 03:09:20,320
भी एक मांग मांग या जो कुछ है कुछ अपना पक्ष आपको बताना चाहता हूं। बता

2802
03:09:20,320 --> 03:09:25,360
दूं? हां। वो ये है कि इंटरप्शन

2803
03:09:25,360 --> 03:09:29,520
क्या कहते हैं इन्होंने कहा कि देखिएगा कोई इंटरप्ट ना करे। ठीक है? अब क्या होता जैसे

2804
03:09:29,520 --> 03:09:33,680
मैंने अभी ठीक है बोला ना ठीक है बोला जैसे अभी तो सामने वाले को ये लगने लगता

2805
03:09:33,680 --> 03:09:37,840
है कई बार कि भैया यहां पे मुझसे अब मेरा पक्ष जो है पूछ रहा है

2806
03:09:37,840 --> 03:09:41,040
कुछ ना कुछ तो ऐसी स्थिति में जैसे इनसे

2807
03:09:41,040 --> 03:09:45,040
स्वाभाविक ये निकल सकता है कि ठीक है ना या मुझसे स्वाभाविक

2808
03:09:45,040 --> 03:09:49,200
रूप से निकल सकता है कि ठीक है ना वैसे ही किसी व्यक्ति की

2809
03:09:49,200 --> 03:09:53,440
किसी व्यक्ति के सिद्धांत पर कोई बात हो रही है कुछ हो रहा है तो वो कोशिश

2810
03:09:53,440 --> 03:09:57,680
कर रहा है कि ऐसा ना करूं मैं फिर भी उससे स्वाभाविक रूप से वहां पर इंटरप्शन

2811
03:09:57,680 --> 03:10:01,760
हो सकता है मगर यदि सामने वाले को ध्यान दिलाया जाए भाई बोल अभी मेरी

2812
03:10:01,760 --> 03:10:05,760
बारी चल रही है वो रुके ना तो उसको अन्याय माना जाए ठीक है

2813
03:10:05,760 --> 03:10:09,760
वो रुके ना जब है ना और ऐसे में ना माना जाए

2814
03:10:09,760 --> 03:10:13,760
कि मेरे मुंह नहीं ऐसा नहीं ये गलत कह रहे हो फिर अरे भाई मेरी बारी चल रही है बस

2815
03:10:13,760 --> 03:10:17,760
ये देखा मैंने कहा था ना इंटरप्ट नहीं करेगा तो ऐसे में इन्होंने भी स्वीकार

2816
03:10:17,760 --> 03:10:21,760
किया भाई मेरी आदत है आप स्वीकार कर लो है ना है ना मैं कहता हूं पूछता हूं ठीक है ठीक है

2817
03:10:21,760 --> 03:10:25,760
पूछता हूं तो ठीक है ठीक है पूछते हो तो इन्होंने फिर मेरे स्वीकार किया

2818
03:10:25,760 --> 03:10:30,000
था कि भाई मेरा इंटरप्शन उस स्थिति में इनको स्वीकार फिर बाद में जब मैंने

2819
03:10:30,000 --> 03:10:34,000
ठीक है ठीक है कहा तो उन्होंने कहा जैसे आप ठीक है ठीक बोल रहे हो ऐसे मैं भी ठीक है ठीक बोल रहा था

2820
03:10:34,000 --> 03:10:38,160
तो फिर मैंने याद दिलाया कि ठीक है ठीक है बोलने पर जब आपने रिप्लाई किया तो मैंने आपत्ति

2821
03:10:38,160 --> 03:10:42,160
प्रकट नहीं की मैं वो समझ गया जी समझ गए ना मैं

2822
03:10:42,160 --> 03:10:46,640
वो समझाऊं कि आप किसके बारे में चलिए बोलिए निर्भय जी बोलिए नारायण

2823
03:10:46,640 --> 03:10:51,040
हम अच्छा ठीक तो

2824
03:10:51,040 --> 03:10:55,360
अब आते [हंसी] हैं सिद्धि पर ठीक है अब आते हैं सिद्धि पर

2825
03:10:55,360 --> 03:10:56,480
बोलिए बोलिए

2826
03:10:56,480 --> 03:11:00,480
तो जब हम अवतार की सिद्धि पर बात करते हैं तो पॉइंट आ जाता है हेतु। अब हेतु

2827
03:11:00,480 --> 03:11:04,480
क्या है कि जब हम किसी बात को अनुमान प्रमाण से सिद्ध करते हैं क्योंकि ईश्वर जो हमारे सामने

2828
03:11:04,480 --> 03:11:08,480
प्रत्यक्ष रूप से अवतार नहीं ले रहा तो ये जो विषय है ये परोक्ष विषय है। तो इसकी

2829
03:11:08,480 --> 03:11:12,560
सिद्धि अनुमान प्रमाण से होती है। ठीक है? अब जब अनुमान प्रमाण से जब किसी चीज

2830
03:11:12,560 --> 03:11:16,880
की सिद्धि होती है तो अकॉर्डिंग टू न्याय दर्शन अकॉर्डिंग टू जो

2831
03:11:16,880 --> 03:11:20,960
परंपरा से जो ज्ञान चलाता है वो न्याय दर्शन में स्वामी करपात्री जी अनुष्ठान जी सारे लोग ही मानते हैं इस

2832
03:11:20,960 --> 03:11:25,360
चीज को। बताएं तो उसमें जब अनुमान प्रमाण से किसी बात की सिद्धि की जाती है तो वो पंचाव्या

2833
03:11:25,360 --> 03:11:29,760
द्वारा की जाती है। ठीक है? पंचाव में पांच अवयव होते हैं।

2834
03:11:29,760 --> 03:11:33,760
प्रतिज नहीं नहीं हेतु आप हेतु हां बस वो हेतु

2835
03:11:33,760 --> 03:11:38,000
बता दीजिए कि हेतु का क्या कहना चाह रहे हैं आप उसको बाकी जी मैं वो

2836
03:11:38,000 --> 03:11:42,080
वो थोड़ा सा अच्छा टीम बाकी छोड़ देता हूं आपको नहीं बैकग्राउंड की आवश्यकता नहीं है वो

2837
03:11:42,080 --> 03:11:46,320
बहुत लोग सारी बहुत सारे दर्शक समझ नहीं पाएंगे उसको है ना आप केवल हां

2838
03:11:46,320 --> 03:11:50,400
हां अब इसमें जैसे मान लीजिए कि मैंने कोई प्रतिज दी कि ईश्वर

2839
03:11:50,400 --> 03:11:54,560
जो है वो शरीर धारण कर सकता है। ठीक है? शरीर धारण करके

2840
03:11:54,560 --> 03:11:58,560
मुख्य निमित्त रूप में क्रियाकलाप जैसे मेरा शरीर तो ईश्वर ने ऑलरेडी धारण किया ही हुआ है

2841
03:11:58,560 --> 03:12:02,560
तो हम इसको नहीं कह रहे अवतार ये कह रहे हैं कि ईश्वर मुख्य निमित्त रूप में शरीर धारण करके क्रियाकलाप कर सकता

2842
03:12:02,560 --> 03:12:06,720
है तो जब हम पूछते हैं कि इसका हेतु क्या है अर्थात हम ये पूछ रहे हैं

2843
03:12:06,720 --> 03:12:10,880
कि ये वो किस कारणवश यानी ऐसा कौन सी

2844
03:12:10,880 --> 03:12:11,520
चीज है कौन

2845
03:12:11,520 --> 03:12:15,840
सा सामर्थ्य या कौन सा गुण क्या है जिसके कारण वो ये काम है उसका

2846
03:12:15,840 --> 03:12:19,920
है ना एक तो होता है क्यों कर पा रहा है तो क्यों कर पा रहा है तो मुझे रक्षा करनी है ये करना है

2847
03:12:19,920 --> 03:12:24,080
वो वो नहीं पूछा जा रहा पूछा जा रहा है कि वो किस कारण से यह कार्य कर पा रहा है। करने में

2848
03:12:24,080 --> 03:12:28,080
समर्थ है। वो जो चीज होती है उसको बोलते हैं हेतु। ठीक है? अब

2849
03:12:28,080 --> 03:12:32,080
इसमें मैं जो कह रहा हूं यही लाइन आप अगर स्टार्टिंग में ही फर्स्ट में ही बोल देते तो भी समझ

2850
03:12:32,080 --> 03:12:36,160
जाता। क्यों? मैंने क्यों नहीं बोला? क्यों नहीं बोला? क्यों मैं बता देता हूं ना क्यों

2851
03:12:36,160 --> 03:12:40,160
नहीं बोला? क्योंकि मुझे केवल हेतु नहीं बोला था ना। आपने जैसे मैं जैसे मैं सीक्वेंस में

2852
03:12:40,160 --> 03:12:44,320
बोल मुझे कई बातें बोलनी थी। उस कई बातों में एक शब्द हेतु था। आपने हेतु को पकड़

2853
03:12:44,320 --> 03:12:48,400
लिया। अब आप कह रहे हो कि बाकी बातें मत बोलो। मेरी इच्छा है ना मैं बोलूं। आप मुझे मना देखिए ऐसा है कि

2854
03:12:48,400 --> 03:12:52,480
मतलब मैं मैं थोड़ा सा थोड़ा सा आगे बढ़

2855
03:12:52,480 --> 03:12:56,560
जाता हूं वो हेतु का ही अर्थ पूछना था अगर आप मैं आपको जैसे बता रहा हूं

2856
03:12:56,560 --> 03:13:00,800
कि आपने बहुत अच्छी सारी बहुत सारी बातें बताई जो अच्छी थी ठीक है उसमें कोई खराब नहीं है लेकिन

2857
03:13:00,800 --> 03:13:05,120
अगर आप केवल ये होती वाली जो बात है ना ये भी काफी सफिशिएंट थी अगर आप बताते ना

2858
03:13:05,120 --> 03:13:09,600
तो समझ जाता व्यक्ति नहीं कोई कोई दिक्कत नहीं कोई दिक्कत नहीं अब जो आप

2859
03:13:09,600 --> 03:13:13,600
समझ गए शिव जी हेतु का जो इनका अर्थ है वो मूल है बाकी मूल में क्या

2860
03:13:13,600 --> 03:13:18,400
है थोड़ी बातें मैं पूरी कर देता हूं एक तरीके से निमित्त कारण क्या है? यही तो है

2861
03:13:18,400 --> 03:13:22,480
तो पूरा पूरा नहीं अब नहीं बोल दीजिए अगर हम कह रहे हैं वो गलत

2862
03:13:22,480 --> 03:13:26,480
हो जाएगा थोड़ा वो ठीक है ठीक है आप जब मैं जवाब दूं और वो आपका

2863
03:13:26,480 --> 03:13:26,980
जवाब

2864
03:13:26,800 --> 03:13:31,120
ना हो तो आप बताइएगा अभी निमित्त कारण ध्यान मत दीजिए जी जी बिल्कुल बिल्कुल

2865
03:13:31,120 --> 03:13:35,360
बिल्कुल तो पॉइंट यही है कि अब मुझे ये बता दीजिए कि जैसे अवतार

2866
03:13:35,360 --> 03:13:39,520
सिद्धि में आपकी प्रतिज है कि ईश्वर जो है मुख्य निमित्त रूप में शरीर धारण करके क्रियाकलाप कर सकता है।

2867
03:13:39,520 --> 03:13:43,600
थोड़ा सा वॉल्यूम कट कर दीजिए क्योंकि दर्शकों को भी नहीं समझ आ रहा। मुझे भी थोड़ा सा कम आ रहा है। सॉरी

2868
03:13:43,600 --> 03:13:47,680
क्या क्या है? कम आ रही कि वॉल्यूम आपका वॉल्यूम आवाज जी थोड़ी सी कम आ रही है मतलब पहले

2869
03:13:47,680 --> 03:13:51,680
से कम आ रही है ठीक है मैं कह रहा अभी सही आ रही है अभी सही आ रही है हां अभी अभी सही तो मैं मैं कह

2870
03:13:51,680 --> 03:13:56,160
रहा हूं कि प्रतिज ये है श्रीमानस जी की कि ईश्वर मुख्य निमित्त

2871
03:13:56,160 --> 03:14:00,240
रूप में शरीर धारण करके मुख्य निमित्त रूप में क्रियाकलाप कर सकता है उस शरीर के द्वारा

2872
03:14:00,240 --> 03:14:04,320
जिसे हम अवतार कह रहे हैं मैं कह रहा हूं इसका मुझे पंचाव दे दीजिए क्योंकि

2873
03:14:04,320 --> 03:14:08,320
अनुमान प्रमाण से सिद्धि हो रही है शब्द हम ले नहीं रहे तो इसका मुझे आप वो दे

2874
03:14:08,320 --> 03:14:12,400
दीजिए क्या बोलते हैं पंचाव पंचाय हेतु तो एक अधूरा

2875
03:14:12,400 --> 03:14:16,640
पॉइंट हो गया ना समझिए इस चीज इसको पंचाव अगर मैं हेतु बोलूं हेतु

2876
03:14:16,640 --> 03:14:20,960
से कोई बात प्रूव नहीं होती हेतु से कोई बात प्रूव हेतु इज़ अ पार्ट हेतु

2877
03:14:20,960 --> 03:14:25,120
पंचाव में से पांच अवयव में से केवल एक पार्ट है पांच में से ठीक है नहींकि आपने

2878
03:14:25,120 --> 03:14:29,200
पहले हेतु ही मांगा ना नहीं मैंने क्या बोला मैंने मैंने देखिए

2879
03:14:29,200 --> 03:14:33,280
मैंने वो मैंने बोला कि जब आप हेतु बोला कि ये हेतु है तो मैं बोलूंगा कि अच्छा ये हेतु इसका

2880
03:14:33,280 --> 03:14:37,440
मुझे पंचाम दे दीजिए वो मेरी आगे की लाइन थी लेकिन आपने बोला कि नहीं हेतु का अर्थ वो

2881
03:14:37,440 --> 03:14:41,600
उसमें समस्या आई थी तो वही बात आपने हेतु का अर्थ समझा दिया

2882
03:14:41,600 --> 03:14:42,100
है

2883
03:14:41,840 --> 03:14:45,840
डायरेक्टली आपने हेतु का अर्थ समझा हां अब मैं वो आगे की बात भी मैं बोल दे रहा

2884
03:14:45,840 --> 03:14:49,920
हूं साथ के साथ कि जो भी आपका पॉइंट है हेतु उसके साथ में मुझे पूरा

2885
03:14:49,920 --> 03:14:53,920
जो पंचावे होते हैं क्योंकि न्याय जो अनुमान से बात सिद्ध करते तो पंचावे सिद्ध करते

2886
03:14:53,920 --> 03:14:57,920
हैं तो मुझे वो पंचा बोल रहे हैं आपने बात पहले खत्म कर दी थी इनके जवाब लेने

2887
03:14:57,920 --> 03:15:02,240
से पहले चलिए हां मैं वही रिपीट मैं वही बोल दे रहा हूं ठीक है मैं बोल रहा हूं कि पंचावे

2888
03:15:02,240 --> 03:15:06,240
जो है आप मुझे वो दे दीजिए और एक और रिक्वेस्ट थी मेरी छोटी सी कि मेरी स्क्रीन मैंने लगाई

2889
03:15:06,240 --> 03:15:10,240
हुई है उसको शेयर कर दीजिए उसप चीजें लिखी हुई है थोड़ी सी कोई फोटोोटो नहीं है

2890
03:15:10,240 --> 03:15:14,320
जी देखिए फिर वही बात आ रही है फोटो उनको

2891
03:15:14,320 --> 03:15:18,320
दिखाने का जो जिसका कोई मतलब नहीं जबरदस्ती उसको प्रभाव उत्पन्न किया जा रहा

2892
03:15:18,320 --> 03:15:22,640
है। मैं फिर वही इंटरप्ट करूंगा ऑब्जेक्शन बिलो वाला इन फोटो

2893
03:15:22,640 --> 03:15:26,960
से सिद्ध नहीं होता कि ये इसने हत्या की है। आपकी बात को जब मैं काउंटर

2894
03:15:26,960 --> 03:15:31,040
करूं कि ऐसा नहीं लिखा है तो आप प्रमाण दिखाइए ना स्क्रीन पे। मैंने काउंटर

2895
03:15:31,040 --> 03:15:35,040
किया है। वो प्रमाण नहीं है। आप उसे स्क्रीन शेयर करेंगे तब तो पता

2896
03:15:35,040 --> 03:15:39,840
चलेगा क्या है। आप एक बार लगाइए। नहीं तो आप पहले बताइए ना स्क्रीन शेयर करवाने से पहले।

2897
03:15:39,840 --> 03:15:43,920
किस संदर्भ में वो पंचाव ही लिखा हुआ है मैंने तो

2898
03:15:43,920 --> 03:15:48,000
क्यों लिखा है क्यों दिखा रहे हैं हमने मना किया आप गलत कह रहे हो हमने कहा

2899
03:15:48,000 --> 03:15:52,160
कि आप गलत कह रहे हो ये नहीं लिखा हुआ है अपने पक्ष के लिए दिखाना है मुझे अपने पक्ष के लिए दिखाना है तो

2900
03:15:52,160 --> 03:15:55,760
आपने बोल तो दिया

2901
03:15:55,760 --> 03:15:58,960
ये वही वाली बात है

2902
03:15:58,960 --> 03:16:02,960
अभी उसकी आवश्यकता नहीं करनी क्योंकि प्रभाव उत्पन्न करना है

2903
03:16:02,960 --> 03:16:07,120
क्योंकि कैसे एक्सप्लेन करना है बताना है तो हम आपको अवश्य

2904
03:16:07,120 --> 03:16:11,280
करने व्यंग मारा की प्रभाव हल्का हो रहा है आपने ने किया ना गलत किया ना यह काम मॉडरेटर के

2905
03:16:11,280 --> 03:16:15,280
इसलिए किया क्योंकि आप चार पांच बार अपनी मर्यादा को लांग चुके हैं तो अब आपको

2906
03:16:15,280 --> 03:16:19,520
लाइसेंस मिल गया मर्यादा लांगने का लाइसेंस नहीं मिला है फिर क्यों

2907
03:16:19,520 --> 03:16:23,520
आपने मगर एक आध बार तो पनिशमेंट के रूप में बोल सकते हैं ना क्यों बोल

2908
03:16:23,520 --> 03:16:27,520
सकते हैं चलिए क्योंकि आपने गलत किया नहीं लाइसेंस क्या क्यों

2909
03:16:27,520 --> 03:16:31,760
क्योंकि आपने गलत किया फिर वही डायवर्शन हो रहा है तो आप वही ना जब मैंने आपसे रिक्वेस्ट

2910
03:16:31,760 --> 03:16:35,840
किया था कि मैंने बोला था किसी न्यूट्रल भाई साहब देखिए मैंने भी आपसे

2911
03:16:35,840 --> 03:16:40,000
रिक्वेस्ट की थी कि आप व्यर्थ के विनोद पूर्ण उपास पूर्वक जो उदाहरण

2912
03:16:40,000 --> 03:16:44,000
दे रहे हैं उनको देने से तो मैं मैं आहत हूं

2913
03:16:44,000 --> 03:16:48,000
भाई मुझे उसका कोई न्याय नहीं मिल गया है। ये मेरी उदारता है कि मैंने आपको

2914
03:16:48,000 --> 03:16:52,240
वापस ले लिया है। ये मेरी उदारता है कि आपको वापस ले लिया है। आहत होने

2915
03:16:52,240 --> 03:16:56,480
ये मेरी उदारता है कि आपको मैंने वापस लिया है। ठीक है। अच्छा ठीक है। आप उदारता है

2916
03:16:56,480 --> 03:17:00,560
आप आप मुझसे बोलो कि देखिए मैं अब नहीं करूंगा तो आप भी मत करिए। आप ये मत बोलो आपने

2917
03:17:00,560 --> 03:17:04,960
कैसे कर दिया? ये मत बोलो। आप आप पहले एक निवेदन करो इस समय मुझसे।

2918
03:17:04,960 --> 03:17:09,280
कोई मर्यादा की बात करके मर्यादा तोड़ेगा तो मैं पूछूंगा ना कि आप तो मर्यादा मैंने मर्यादा नहीं तोड़ी

2919
03:17:09,280 --> 03:17:10,960
है। मैंने मर्यादा नहीं तोड़ी

2920
03:17:10,960 --> 03:17:14,960
है। अगर अहिंसा लिखा हुआ है तो धर्म की रक्षा के लिए हिंसा भी लिखा हुआ

2921
03:17:14,960 --> 03:17:19,120
है। ऐसा नहीं है। मर्यादा नहीं तोड़ी। ठीक है। आपने मर्यादा तोड़ी अभी व्यूंग नहीं। मूल

2922
03:17:19,120 --> 03:17:23,280
विषय पे बात करनी है। मैं तो चाहता हूं लेकिन बिना व्यंग के व्यंग

2923
03:17:23,280 --> 03:17:27,360
मत करना। हां तो मैंने मैंने मैंने व्यंग इसलिए किया आपने पांच छह बार व्यंग

2924
03:17:27,360 --> 03:17:31,440
किया। पांच-छह बार क्योंकि वही बात और निर्णय भी सुना दिया था एक बार तो। अब

2925
03:17:31,440 --> 03:17:35,440
आपका चैनल है। अब मैं व्यंग करूंगा मुझे निकाल दो। देखिए मैं कह

2926
03:17:35,440 --> 03:17:41,360
रहा हूं इनकी ये सब बातें है ना इनको केवल कंटेंट चाहिए वहां निकाल के यहां से

2927
03:17:41,360 --> 03:17:43,840
मैं बहुत पहले

2928
03:17:43,840 --> 03:17:48,320
मुझे कंटेंट नहीं चाहिए मुझे देखिए स्क्रीन शेयरिंग की अभी आवश्यकता नहीं है अगर किसी को

2929
03:17:48,320 --> 03:17:52,320
बैठा होता हटानी होती मुझे चर्चा करनी है अब या तो

2930
03:17:52,320 --> 03:17:57,040
इनकी बातें सुनके काउंटर बिना किए आगे बढ़े तो ये कंटेंट निकालेंगे

2931
03:17:57,040 --> 03:18:02,800
और अगर काउंटर करेंगे तो फिर एक कंटेंट के लिए दूसरी बात बोलेंगे

2932
03:18:02,800 --> 03:18:07,360
पंचाय में पूछा है मैंने फ्लोकी जी पंचाव पूछा है मैंने उसमें

2933
03:18:07,360 --> 03:18:11,840
से पहले आप हेतु से शुरू कर दीजिए दूसरा बता दीजिए आप पहले हेतु से बताइए कि क्या है

2934
03:18:11,840 --> 03:18:16,000
पांचों होते हैं वो पंचाव एक अधूरा नहीं होता मुझे पता है भाई

2935
03:18:16,000 --> 03:18:20,080
दर्शकों को नहीं पता ना अब उनको पंचाव एक्सप्लेन करना पड़ेगा आप समझ नहीं

2936
03:18:20,080 --> 03:18:24,320
रहे हो तो उसमें से आप कॉज वाला बात बताइए देखिए एक मिनट

2937
03:18:24,320 --> 03:18:28,320
योगी जी एक मिनट इन्होंने अभी ये बोल दिया है कि आप मुझे पंचाय बताइए यही

2938
03:18:28,320 --> 03:18:32,480
बोला है ना इसका मतलब मेरी बारी है ना बोलने की बोलिए आप बोलिए

2939
03:18:32,480 --> 03:18:36,640
आपकी हां अब इन्होंने क्या किया है एक बार मैंने भी देखा था

2940
03:18:36,640 --> 03:18:40,800
हमारी साइड का कोई लर्नर होगा बिगिनर टाइप का वो

2941
03:18:40,800 --> 03:18:45,200
जो भव्य राधा कृष्ण दास है ना उसके वहां पर पहुंचा

2942
03:18:45,200 --> 03:18:49,760
भव्य राधा कृष्ण दास ने उसने बोल दिया कि भाई

2943
03:18:49,760 --> 03:18:53,920
वो जो माया है या प्रकृति है वो

2944
03:18:53,920 --> 03:18:57,920
बदलती है ये भी तो सनातन है तो इससे वो भी उसका भी

2945
03:18:57,920 --> 03:19:02,080
लक्षण सनातन सिद्ध हो गया अब यहां वो अटक गया है ना

2946
03:19:02,080 --> 03:19:06,080
यहां पूछना ये था फिर जो है अगर बदलने वाली चीज को

2947
03:19:06,080 --> 03:19:11,280
भी शाश्वत कह रहे हो तुम बदलने के कारण तो फिर

2948
03:19:11,280 --> 03:19:15,280
उसको क्या वो चीज किसको कहोगे कि जो परिवर्तनशील है जो

2949
03:19:15,280 --> 03:19:18,000
शाश्वत नहीं है वो किसको मानोगे वहां कहना ये था मगर

2950
03:19:18,000 --> 03:19:22,080
वो व्यक्ति कंफ्यूज हो गया वो क्या कहने लगा क्या कहते

2951
03:19:22,080 --> 03:19:26,400
हैं शास्त्रों के ऐसे शब्द जो सरलता से किसी की समझ में ना आए

2952
03:19:26,400 --> 03:19:30,400
ऐसे शब्द निकाल करके और वहां बोलने लगा और भव्य राधा कृष्ण दास वहां

2953
03:19:30,400 --> 03:19:34,560
अटक गए वो व्यक्ति थोड़ी देर फिर ये सब बोलबाल के कहा मैं अभी थोड़ी देर में आता हूं। ऐसे

2954
03:19:34,560 --> 03:19:38,880
बोल के चला गया। ठीक है? अभी इन्होंने क्या किया है

2955
03:19:38,880 --> 03:19:43,280
कि अब ये उसको एक्सप्लोर नहीं करेंगे। अब ये कहेंगे

2956
03:19:43,280 --> 03:19:47,360
कि भैया ये जो मैं बोल रहा हूं ये जो मैं बोल रहा हूं आप इस रूप में मुझे

2957
03:19:47,360 --> 03:19:51,760
बताइए। अब ये ऐसा सोच करके कि इन्होंने इस तरह के शास्त्रों तैयारी

2958
03:19:51,760 --> 03:19:56,000
नहीं की होगी। ये कोई बड़ी बात नहीं है। शास्त्रों तैयारी करके आपसे बात करना। अगर

2959
03:19:56,000 --> 03:20:00,000
हम सिद्धि के विषय में बात कर रहे हैं। ठीक है? सिद्धि के विषय में। दूसरी

2960
03:20:00,000 --> 03:20:04,240
बात यह है इन्होंने कहा करपात्री जी करपात्री जी

2961
03:20:04,240 --> 03:20:08,240
तो हमें केवल आपको यही बताना है ना कि कृपात्री जी अवतार को मानते हैं कि नहीं

2962
03:20:08,240 --> 03:20:12,560
जब आप हमें कृपात्री जी का शब्द प्रमाण दे रहे हैं कि इसको मान लो इस

2963
03:20:12,560 --> 03:20:16,960
चीज को तो हम कितनी जगह बताएं कि कृपात्री जी ने अवतार माना है।

2964
03:20:16,960 --> 03:20:20,960
ठीक है? अब आप अब आप उसको एक्सप्लोर करिए जो आप बोल रहे हैं कि

2965
03:20:20,960 --> 03:20:24,960
भैया आपको क्या चाहिए। जैसे आपने हेतु को एक्सप्लोर किया ना कि

2966
03:20:24,960 --> 03:20:29,040
कौन सा कारण था जिससे वो बना? वो कौन सा कारण था

2967
03:20:29,040 --> 03:20:33,040
जिससे वो बना क्यों बना ये नहीं किससे वो बना वो कौन सा कारण

2968
03:20:33,040 --> 03:20:37,360
वो हेतु ऐसे ही बाकी की चीजों को एक्सप्लोर करिए एक्सप्लेन कर दीजिए

2969
03:20:37,360 --> 03:20:41,440
अब इसमें पॉइंट ये आ जाता है ना कि जो मैंने कर्पात्री जी वाला जो पॉइंट बोला था है ना वो

2970
03:20:41,440 --> 03:20:45,520
इस दृष्टिकोण से बोला कि वो बात मैं भी स्वीकार कर रहा हूं वो बात आप भी स्वीकार

2971
03:20:45,520 --> 03:20:49,520
कर रहे हो आप किस भी कर सकते हो हां मैंने क्यों

2972
03:20:49,520 --> 03:20:53,680
करपात्री जी भी करते जी अब आप मुझे इंटरप्ट कर रहे हो मैं थोड़ा सा पूरा कर दूं बताएं बताएं

2973
03:20:53,680 --> 03:20:57,680
जी मैं अपनी बात पूरी बोलूंगा ना स्पष्ट हो जाएगी दिक्कत नहीं आपको बीच में रोने जी बात यह

2974
03:20:57,680 --> 03:21:01,680
है कि जब मैंने कर्पात्री जी वाली बात बोली तो वह मैंने इसी दृष्टिकोण से बोला

2975
03:21:01,680 --> 03:21:06,000
यही बात समझाने के लिए बोला कि न्याय को करपात्री जी भी स्वीकार करते हैं। इसलिए आप भी इसको आपकी

2976
03:21:06,000 --> 03:21:10,080
वो उसमें परंपरा से आ रही है तो उसमें ऐसा कुछ नहीं कि मैंने कोई ऐसी बात बोल दी जो केवल मैं मानता

2977
03:21:10,080 --> 03:21:14,320
हूं आप नहीं मानते। आपकी परंपरा में स्वीकार किया जाता है। वो मैंने इस इस बात को समझाने के लिए बोला।

2978
03:21:14,320 --> 03:21:18,400
अच्छा अब आते हैं बात करते हैं पछावे पे। ठीक है? जब हम न्याय दर्शन पढ़ते हैं।

2979
03:21:18,400 --> 03:21:22,400
न्याय दर्शन के अंदर जैसा मैंने बताया जब मैं पहले समझा रहा था आपने मुझे रोक दिया था प्रोजिंग मत समझाओ। केवल

2980
03:21:22,400 --> 03:21:26,400
हेतु समझाओ। अब आप मेरे से पूछ क्योंकि क्योंकि इसमें मुझे बोलने

2981
03:21:26,400 --> 03:21:31,280
दीजिए भैया ये जो है ना यह कुछ नहीं है। ये अपना कंटेंट ही बना रहे हैं।

2982
03:21:31,280 --> 03:21:35,520
मैं इस मैं इस ऑब्जेक्शन करूंगा। इन्होंने शुरू में सुनिए

2983
03:21:35,520 --> 03:21:40,000
इन्होंने शुरू में क्या किया था? इन्होंने कहा इनको रोक।

2984
03:21:40,000 --> 03:21:44,160
ये जो है अपना कंटेंट तैयार कर रहे हैं। मैं बता रहा हूं आपको। मैं पहले यही कर रहा था।

2985
03:21:44,160 --> 03:21:48,240
इन्होंने सबसे पहले हेतु पूछ के चुप हो गए थे। ये कुछ नहीं बता रहे थे उसके

2986
03:21:48,240 --> 03:21:52,240
आगे पीछे। जब हमने हेतु बात करना शुरू की तो मैं ये भी पूछ रहा था। वो भी पूछ

2987
03:21:52,240 --> 03:21:56,240
रहा था इन्हें मैंने टोक दिया मैंने उसके लिए मैंने उसके लिए ऑलरेडी वो टोक दिया था मैंने

2988
03:21:56,240 --> 03:22:00,240
इसीलिए आपको स्पेसिफिकली शिव जी बोला कि आप केवल कारण वाला पार्ट अभी

2989
03:22:00,240 --> 03:22:04,240
बता दीजिए बाकी के चार हम उसके बाद लेंगे एक साथ क्योंकि अगर आप

2990
03:22:04,240 --> 03:22:08,240
पांचों बताएंगे तो फिर टाइम लगेगा बहुत ज्यादा ठीक है बाकी तो

2991
03:22:08,240 --> 03:22:12,240
एक-एक करके इनसे सुन लेंगे ना आप केवल अभी हेतु वाला बता

2992
03:22:12,240 --> 03:22:16,320
दीजिए कि कारण क्या है उसको अवतार ले सिंपल सी बात है ईश्वर

2993
03:22:16,320 --> 03:22:20,400
को अवतार लेने का कारण क्या है इसका इसका अर्थ बताइए

2994
03:22:20,400 --> 03:22:24,800
मुझे लोकी जी ये मुझसे नहीं पूछ रहे अभी उनको दिक्कत है वो पूछेंगे कुछ

2995
03:22:24,800 --> 03:22:28,800
हां बताइए बताइए निर्वा जी क्या बोल रहे जी इसमें बात ये आ जाती है कि

2996
03:22:28,800 --> 03:22:32,880
मैं पंचावे का अर्थ क्यों बताऊं ये भाई साहब आप जा

2997
03:22:32,880 --> 03:22:36,880
सकते हैं ठीक है जाइए सुनिए हो गया वो मैं जान रहा हूं ना वो

2998
03:22:36,880 --> 03:22:41,040
आदमी क्यों आया यार वो वो दिख रहा है वो कोई शास्त्र की ऐसी

2999
03:22:41,040 --> 03:22:45,280
चीज जो उसने तैयारी की उसने पढ़ी है मैंने नहीं पढ़ी है इस बात का ले मैं

3000
03:22:45,280 --> 03:22:49,440
पंचायत का अर्थ क्यों बताऊं अब मुझसे फोन करके बोलता है तर्क पे बात होगी

3001
03:22:49,440 --> 03:22:53,440
प्रमाण पे नहीं सुनिए मुझसे फोन पे बात फोन पे जब ये बोलता है बोलता है

3002
03:22:53,440 --> 03:22:57,680
तर्क पे बात होगी प्रमाण पे बात नहीं होगी ये सबसे पहला कॉल बता रहा हूं आपको इसका

3003
03:22:57,680 --> 03:23:01,840
रैशन आर के नाम से दूसरी बात अब ये है कि

3004
03:23:01,840 --> 03:23:03,280
ये पंचा का अर्थ क्यों नहीं

3005
03:23:03,280 --> 03:23:07,360
बताएंगे जब इन्होंने मुझसे शुरू में पूछा कि शब्द प्रमाण होता है जिससे वो होता

3006
03:23:07,360 --> 03:23:11,360
है तो इन्होंने कहा आप नास्तिक को समझाएंगे ना ऐसे होता है वैसे होता है नहीं नहीं वो बता

3007
03:23:11,360 --> 03:23:15,360
रहे थे पांचों का अर्थ क्योंकि वो समय ले रहे थे वो कह रहे हैं कि नहीं इसी

3008
03:23:15,360 --> 03:23:20,400
में खींचेंगे कि इसको ये नहीं पता था आप समझ नहीं रहे इनके पास केवल

3009
03:23:20,400 --> 03:23:24,480
इनको संस्कृत आती है या इनको फलाना पड़ा हुआ है। इनके पास नहीं है

3010
03:23:24,480 --> 03:23:29,200
कि अवतार को असिद्ध कर पाए। अब भैया मैं अपनी बुक लेकर के आ जाऊंगा। दोबारा आ जाना।

3011
03:23:29,200 --> 03:23:33,280
ठीक है दोबारा आ जाना। मैं आ जाऊंगा बुक लेकर के।

3012
03:23:33,280 --> 03:23:37,520
मैंने अभी वो तैयारी की नहीं है कि नया दर्शन में क्या कह रहे पंचव

3013
03:23:37,520 --> 03:23:41,600
जो लिखे नहीं वही कंटेंट

3014
03:23:41,600 --> 03:23:45,680
ले रहा है कि मैं क्यों समझाऊं पंचाव? अब देखिए ईश्वर को असिद्ध

3015
03:23:45,680 --> 03:23:50,160
सिद्ध नहीं कर पा रहे। वो जो अविद्या वाली वो थी ना वो छोड़ दी। मैथमेटिकल

3016
03:23:50,160 --> 03:23:54,240
क्वेश्चन पूछा था ना कि मुझे तो मैथमेटिकल से प्रूव करके दिखाओ। जैसे ही मैं प्रूफ करने

3017
03:23:54,240 --> 03:23:58,560
लगा इनको समझ में आ गया अरे अविद्या आ गई भैया भगवान की सुपर पावर आ गई यार तो भागो

3018
03:23:58,560 --> 03:24:02,640
यहां से। ये सब होने लगा। अब ये यहां ये जाकर के वहां पर

3019
03:24:02,640 --> 03:24:06,640
ये दिखाना चाहते हैं कि देखो शिवश नारायण द्विवेदी को जब पंचाव्य

3020
03:24:06,640 --> 03:24:10,640
बोला गया तो उसको समझ में नहीं आया पंचाव्य क्या है। ये इनका मतलब इससे नहीं

3021
03:24:10,640 --> 03:24:14,800
है कि ईश्वर सिद्ध हो सकता है कि नहीं। भाई आपको उसका अर्थ

3022
03:24:14,800 --> 03:24:18,320
सुनिए अगर आपको पंचाव्य पता हो या ना पता हो उससे फर्क ही नहीं पड़ता क्योंकि

3023
03:24:18,320 --> 03:24:22,320
आपको उसके पांचों के उत्तर आपको पता है। बस तो हमको आप खोल

3024
03:24:22,320 --> 03:24:26,480
खोल के बता दीजिए किस में क्या है मगर अब अब मत लो उसको वो हो गया अब मत लो

3025
03:24:26,480 --> 03:24:30,880
उसकी मंशा समझ में आ रही है वो वो अब हार चुका है निर्भय आर्य

3026
03:24:30,880 --> 03:24:34,960
जो है अब निर्भय आर्य जो है हार चुका है इसलिए अब वो इसमें आ रहा है

3027
03:24:34,960 --> 03:24:39,200
मैं पंचाव का अर्थ क्यों बताऊं भैया अब जो है अब ये शास्त्र उसमें

3028
03:24:39,200 --> 03:24:43,360
आ गया शास्त्रीय प्रमाण मैंने मैंने उनको टोक दिया था शुरू में मैंने उनको मना

3029
03:24:43,360 --> 03:24:47,440
कर दिया था कि आप केवल हेतु बताइए इसलिए नहीं वो व्यक्ति

3030
03:24:47,440 --> 03:24:51,520
शुरू में हेतु ही पूछ रहा था मगर जैसे जैसे उसको वो वो मिलती जा रही है ना उसकी जो

3031
03:24:51,520 --> 03:24:55,520
क्वेश्चनिंग का आंसर मिलता जा रहा है वैसे वैसे वो लपक के दूसरे उस पे आ रहा है जैसे

3032
03:24:55,520 --> 03:24:59,680
कि जब ये मैथमेटिकल वाली बात पे अटका था तो मैंने इसको

3033
03:24:59,680 --> 03:25:03,680
उत्तर दे दिया था कि उसमें साक्षी कौन होगा आप रिवाइंड करके देख लीजिएगा

3034
03:25:03,680 --> 03:25:07,920
तुरंत अच्छा अब ये बताइए किसको ईश्वर समझेंगे किसको नहीं और जब जब

3035
03:25:07,920 --> 03:25:12,160
इसने निर्णय सुनाया तो दो बातें बताई एक शुरू में कि ईश्वर

3036
03:25:12,160 --> 03:25:16,640
के एक तो शुरू वाली बात थी कि ईश्वर वो

3037
03:25:16,640 --> 03:25:20,640
मैंने वहां पर उसको ठीक भी किया कि नहीं तीसरी बात और ईश्वर की सिद्धि कैसे हुई

3038
03:25:20,640 --> 03:25:24,640
वो हमने कर ली बात फिर इसने दोबारा वो बात पकड़ी नहीं तब से वो बात

3039
03:25:24,640 --> 03:25:29,280
पकड़ी नहीं अविद्या शक्ति वाली बात पकड़ी नहीं क्योंकि वहां फंस रहा है व्यक्ति

3040
03:25:29,280 --> 03:25:33,360
इसने दोबारा वो बात नहीं पकड़ी है वहां से अब अब क्या लाए ईश्वर सिद्धि के लिए

3041
03:25:33,360 --> 03:25:37,680
कि भैया पंचाय अब शास्त्रीय प्रमाणों पे चलते हैं तो शास्त्रीय प्रमाणों पे भी

3042
03:25:37,680 --> 03:25:41,680
है देखिए ऐसा है कि अगर पहली बात तो इसका

3043
03:25:41,680 --> 03:25:45,680
कुछ हार्ड एंड फास्ट कोई रूल नहीं होना चाहिए वो यूजुअली न्याय दर्शन के

3044
03:25:45,680 --> 03:25:49,680
हिसाब से ही होता है कि पांच जो आप जब आप उत्तर देंगे ना आपने जो

3045
03:25:49,680 --> 03:25:53,840
जब आप पूरा उत्तर अगर ईश्वर के अरे वो यह कह रहा है मैं आप

3046
03:25:53,840 --> 03:25:57,840
समझिए वो यह कह रहा है कि मैं पंचा अगला स्टेटमेंट उसका ये

3047
03:25:57,840 --> 03:26:01,840
होगा आपने पंचाय पढ़ा नहीं है आपको न्याय दर्शन पता नहीं है ये सब उसके

3048
03:26:01,840 --> 03:26:05,840
स्टेटमेंट जाएंगे और ये कंटेंट लेकर के वो अपने लोगों को दिखाएगा देखो

3049
03:26:05,840 --> 03:26:09,920
देखो यहां उसके पास उत्तर नहीं था वो ईश्वर को असिद्ध नहीं कर सकता

3050
03:26:09,920 --> 03:26:15,520
उस बारे में उसका कोई विवेचन नहीं है

3051
03:26:15,520 --> 03:26:20,320
अरे सीधा सीधा कारण ही डाल जान लो ना हेतु डाल लो उसके बात

3052
03:26:20,320 --> 03:26:24,480
उसमें ऐसे बहुत से वचन है जो

3053
03:26:24,480 --> 03:26:28,480
इसने भी पढ़े नहीं होंगे मगर मैं इस मंशा से नहीं आया मुझे इसको नीचा सिद्ध करना

3054
03:26:28,480 --> 03:26:32,720
है मुझे अवतार को सिद्ध करना है कि अवतार ईश्वर ले सकता है

3055
03:26:32,720 --> 03:26:36,880
मुझे ये करना है अब आपको अगर कोई शब्द है क्या कहते शास्त्र

3056
03:26:36,880 --> 03:26:40,880
का वो आप शब्द आप लेकर के आपने उसको पढ़ा है हमें परंपरा

3057
03:26:40,880 --> 03:26:44,960
से प्राप्त उन्ही आचार्यों ने जिन्होंने उसको पढ़ा भी है समझा भी है विवेचना

3058
03:26:44,960 --> 03:26:49,040
भी की है उन्होंने सिद्धांत बताए खोल खोल करके हमने वो सिद्धांत

3059
03:26:49,040 --> 03:26:53,280
ग्रहण भी किए उनको बताया भी है समाज को। आप जो है उन सिद्धांतों को काटिए।

3060
03:26:53,280 --> 03:26:57,280
आप मेरी परीक्षा क्यों ले रहे हैं कि मुझे पंचा क्यों बताना पड़ रहा है? आप मेरी

3061
03:26:57,280 --> 03:27:02,880
परीक्षा क्यों ले रहे? आवश्यकता नहीं है। मैं यही कहना चाहूंगा इसकी आवश्यकता नहीं है।

3062
03:27:02,880 --> 03:27:07,200
आप इस समय किससे? आप किससे बात कर रहे? मुझसे कि उससे

3063
03:27:07,200 --> 03:27:11,280
आपसे बात कर रहा हूं मैं। मैं ये कह रहा हूं कि आपको पंचाबे

3064
03:27:11,280 --> 03:27:15,280
से ही सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। आप समझ नहीं रहे। वो

3065
03:27:15,280 --> 03:27:19,680
जब यह बोल रहा है कि मैं पंचाव्य का अर्थ क्यों बताऊं? तो इसमें

3066
03:27:19,680 --> 03:27:23,520
मेरा आंसर क्या होगा?

3067
03:27:23,520 --> 03:27:26,320
क्या होगा?

3068
03:27:26,320 --> 03:27:30,560
यही होगा ना कि पंचाव की आवश्यकता नहीं है। फिर वो कहेगा नहीं पंचा पंचा

3069
03:27:30,560 --> 03:27:35,760
है। पंचा की आवश्यकता है। नर्शन में लिखा है। फिर मैं फिर आप क्यों नहीं बता रहे हो?

3070
03:27:35,760 --> 03:27:39,920
बात इस पे ही अटकी रहेगी और वो ये कहेगा देखो देखो पंचा

3071
03:27:39,920 --> 03:27:43,920
नहीं आता भाई। अभी मैंने पंचा नहीं पढ़ा है। तुम्हारे पास अगर ईश्वर को सिद्ध करने

3072
03:27:43,920 --> 03:27:48,000
का और कोई तर्क हो कुछ हो तो ले आओ। हमारे परंपरा प्राप्त आचार्यों ने

3073
03:27:48,000 --> 03:27:52,080
बताया है ईश्वर अवतार ले सकता है और तर्क से मैंने इसी उसमें

3074
03:27:52,080 --> 03:27:56,080
चर्चा में सिद्ध भी किया है। जब सिद्ध होने लगा तो आप जो है पुदक के लक्षण पे

3075
03:27:56,080 --> 03:28:00,240
चले गए। वहां भी मैंने सिद्ध किया है कि इन विषयों में केवल शब्द ही प्रमाण है। जैसे आपका

3076
03:28:00,240 --> 03:28:04,400
जो प्रणव है हमारा भी है जो हमारा प्रणव है उसके लिए आपका शब्द

3077
03:28:04,400 --> 03:28:08,400
प्रमाण है। और भी ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिसमें हम किसी को प्रैक्टिकली प्रूफ

3078
03:28:08,400 --> 03:28:12,720
नहीं कर पा कर सकते कि ऐसा ही होगा। ऐसा ही होता है। उसमें हमारे लिए शब्द

3079
03:28:12,720 --> 03:28:16,880
प्रमाण है। ठीक है? जो अती्द्रिय विषय होते हैं इंद्रियों का विषय नहीं हो सकते उसमें

3080
03:28:16,880 --> 03:28:20,960
शब्द ही प्रमाण होता है। जब हम इंद्रियों से जिन विषयों को जान

3081
03:28:20,960 --> 03:28:25,120
सकते हैं उसमें शब्द प्रमाण नहीं होता है। इसको किसने लिया है

3082
03:28:25,120 --> 03:28:29,200
वापस? हटा दो इसको। मैंने तो नहीं हो गया है। चर्चा हो

3083
03:28:29,200 --> 03:28:33,200
गई। डर गए क्या?

3084
03:28:33,200 --> 03:28:37,200
देखिए चर्चा किसने लिया इसको? मेरी आज्ञा के बिना किसने

3085
03:28:37,200 --> 03:28:41,360
लिया? मैं एडमिन नहीं हूं भाई। ठीक है। तो

3086
03:28:41,360 --> 03:28:45,440
देखिए ऐसा है कि जो वो

3087
03:28:45,440 --> 03:28:50,160
जो भी वह पांचों पॉइंट्स जो मांगना चाह रहे थे उसकी आवश्यकता नहीं है

3088
03:28:50,160 --> 03:28:54,160
ईश्वर की उसको वो क्योंकि उसकी अपनी मैं ऑपरेटर को भी बता

3089
03:28:54,160 --> 03:28:58,400
रहा हूं आपको भी बता रहा हूं उसको नहीं लेना है वो वो यही सब करने आया अभी क्या बोल रहा था

3090
03:28:58,400 --> 03:29:02,480
डर गए ना डर गए ना ये सब करने आया था वो हार चुका है वहां हार चुका है जब उसने

3091
03:29:02,480 --> 03:29:06,640
कहा था मैथमेटिकल वो मुझे दो मैथमेटिकल वही अविद्या से हरा दिया

3092
03:29:06,640 --> 03:29:11,520
भगवान की जो अविद्या शक्ति है उससे तुम कभी नहीं जीत सकते

3093
03:29:11,520 --> 03:29:16,960
यह बात है सत्य उससे तुम भागोगे माया शक्ति से

3094
03:29:16,960 --> 03:29:21,040
और उसका जो अस्तित्व तुमने भी स्वीकार कर रखा है।

3095
03:29:21,040 --> 03:29:25,360
अब एक बात बताओ लॉजिकल बात समझो जब भगवान

3096
03:29:25,360 --> 03:29:29,360
एक रस है। ठीक है वो हो गया वो आज की चर्चा हो गई। वो

3097
03:29:29,360 --> 03:29:33,440
गए निर्भय जी गए। ठीक है? जब भगवान एक रस

3098
03:29:33,440 --> 03:29:37,600
है हम तो एक रस है तो

3099
03:29:37,600 --> 03:29:41,680
मैंने इस मैंने बताया कि भाई वो सब एक रस है तो वो कुछ कर नहीं रहा है कुछ नहीं

3100
03:29:41,680 --> 03:29:45,680
कर रहा है भगवान को कुछ भी करने के लिए क्रियावान

3101
03:29:45,680 --> 03:29:48,320
होने के लिए अपने

3102
03:29:48,320 --> 03:29:52,400
में कम ज्यादा रूप धारण करना ही पड़ेगा उसी

3103
03:29:52,400 --> 03:29:56,640
को हम लोग सगुण निराकार कहते हैं जो कुछ करता है पहली बार तो ये अवतार

3104
03:29:56,640 --> 03:30:00,880
नहीं है क्या अच्छा जब उसने सगुण निराकार रूप धारण किया पृथ्वी को बनाने

3105
03:30:00,880 --> 03:30:06,160
के तो क्या उसका वो एक रस वाला रूप था खत्म हो गया क्या बताइए

3106
03:30:06,160 --> 03:30:10,320
वो होते हुए भी उसने एक और डायमेंशन में एक

3107
03:30:10,320 --> 03:30:14,320
और अवतार ले लिया अब वो सगुण निराकार है अब वो जहां चाहे वहां धक्के का विषय

3108
03:30:14,320 --> 03:30:18,320
बनेगा जहां चाहे वहां नहीं बनेगा जहां चाहेगा वहां ग्रेविटी के

3109
03:30:18,320 --> 03:30:23,120
अगेंस्ट काम कर सकने वाला है जहां चाहेगा वहां नहीं भी है निष्क्रिय है

3110
03:30:23,120 --> 03:30:27,200
सगुण निराकार रूप भी तो अवतार ही है एक रस भगवान का

3111
03:30:27,200 --> 03:30:31,280
तो एक रस होते हुए भी जब वो जो रस में उसके भेद

3112
03:30:31,280 --> 03:30:35,440
आ सकता है। सगुण निराकार हो सकता है। निर्गुण होते हुए भी तो निर्गुण वो सगुण

3113
03:30:35,440 --> 03:30:39,440
निराकार से वो सगुण साकार भी हो सकता है। जैसे उसने कहीं पे अपने आप को

3114
03:30:39,440 --> 03:30:43,600
धक्के का विषय बनाया। कहीं पे नहीं बनाया। वैसे ही उसने आपको कहीं पर दृष्टि का विषय बनाया,

3115
03:30:43,600 --> 03:30:47,920
कहीं पे नहीं बनाया। व्यवहार का विषय बनाने वाली बात है ना।

3116
03:30:47,920 --> 03:30:51,920
ये बात हो गई। दूसरी बात कि अब जो सर्वशक्तिमान है क्या वो सब कुछ

3117
03:30:51,920 --> 03:30:56,160
कर सकता है? तो हां भैया कर सकता है। तो भैया क्या वो बंध्या पुत्र

3118
03:30:56,160 --> 03:31:00,400
कर सकता है? तो यहां पर मैंने जो ऐसी लॉजिकल फैलेसी फसाने

3119
03:31:00,400 --> 03:31:03,440
के प्रयास करते हैं उसमें भगवान की अविद्या शक्ति पर्याप्त

3120
03:31:03,440 --> 03:31:07,600
है। आपके मन की इंफॉर्मेशन बदलनी है ना उसको और इंफॉर्मेशन ही बदली

3121
03:31:07,600 --> 03:31:11,680
गई है। आप भी मानते हो जो जीव है वो अज्ञानी है। जो फंसा हुआ है। जो मुक्त है वो

3122
03:31:11,680 --> 03:31:16,080
अज्ञानी नहीं है। ये तो ये भी मानते हैं ना। अविद्या

3123
03:31:16,080 --> 03:31:20,080
तो इन्होंने भी मानी है ना। अब वो क्या कर रहा है? ये

3124
03:31:20,080 --> 03:31:24,160
सारी चीजें हो गई क्लियर। उसके बाद एक एक चीज केवल रह गई थी कि

3125
03:31:24,160 --> 03:31:28,320
राम जी है रामपाल नहीं है इस विषय में क्या शब्द प्रमाण है कौन भगवान

3126
03:31:28,320 --> 03:31:32,320
का अवतार है कौन नहीं है इसमें शब्द और शब्द प्रमाण केवल यही नहीं है

3127
03:31:32,320 --> 03:31:36,400
गुरु गोविंद और ग्रंथ केवल गुरु नहीं केवल गोविंद नहीं

3128
03:31:36,400 --> 03:31:40,560
गुरु गोविंद और ग्रंथ उस संबंध में हमको शास्त्र भी प्राप्त है पर्याप्त उस

3129
03:31:40,560 --> 03:31:44,960
संबंध में परंपरा प्राप्त आचार्य भी प्राप्त है और वो गोविंद प्रकटित

3130
03:31:44,960 --> 03:31:50,960
हो रहे हैं वो चीजें

3131
03:31:51,360 --> 03:31:55,760
ठीक है? तो अब वह वाली बात भी हो गई कि भैया जिस विषय में इंद्रियां

3132
03:31:55,760 --> 03:31:59,760
वो हो ही नहीं सकती वो जो चीज है कि वही सर्वशक्तिमान जो

3133
03:31:59,760 --> 03:32:04,400
सत्ता है वही हमारे सामने खड़ी हुई है। इसमें इंद्रियां प्रमाण हो ही नहीं सकती।

3134
03:32:04,400 --> 03:32:08,560
अती्द्रिय विषय है कि वो सर्वशक्तिमान सत्ता आई है कि नहीं आई है। इस रूप में

3135
03:32:08,560 --> 03:32:12,640
जो हम कह रहे हैं। तो जो अती्द्रिय विषय होते हैं उसमें तो शब्द ही प्रमाण है। तुम

3136
03:32:12,640 --> 03:32:16,800
भी लेते हो शब्द प्रमाण। गोद ली हुई बहन के साथ जो है

3137
03:32:16,800 --> 03:32:22,560
भोग करना है कि नहीं करना है? इस विषय में क्या प्रमाण है? शब्द प्रमाण है नहीं करना है।

3138
03:32:22,560 --> 03:32:26,720
हां भाई जी। अब जैसे वन

3139
03:32:26,720 --> 03:32:30,800
टू प्लस टू बोला साफसाफ सबको पता है टू और

3140
03:32:30,800 --> 03:32:34,800
टू ये ज्ञान है। ये ईश्वर का है। वहां बात

3141
03:32:34,800 --> 03:32:38,800
पलट दी। हां। अब प्रकृति है। प्रकृति में कई

3142
03:32:38,800 --> 03:32:42,960
वो वहां पर फस गया था। उसने तुरंत आप समझिए उसने विषय

3143
03:32:42,960 --> 03:32:47,200
बदला था वहां से लक्षण पे आ गया था और मैं कह रहा था मैथमेटिक वाली बात और

3144
03:32:47,200 --> 03:32:51,280
लास्ट में जब वो सिद्धि पे आया तो उसने वो बात नहीं उठाई मैथमेटिक वाली जहां

3145
03:32:51,280 --> 03:32:55,440
वो फंस रहा था वो तैयार नहीं था ना इन चीजों उसने कौन सी बात उठाई कि भैया मुझे

3146
03:32:55,440 --> 03:32:59,440
पंचाव दो अभी मैसेज में लिख रहा था पंचाव दो उसकी

3147
03:32:59,440 --> 03:33:03,600
आवश्यकता नहीं है तो यहां पे निर्भय अरे तुम एक बात समझने की कोशिश

3148
03:33:03,600 --> 03:33:06,480
करो तुम हो सकता है कि भैया ये सिद्ध कर दो

3149
03:33:06,480 --> 03:33:10,560
के शिवश नारायण द्विवेदी पंचाव्य का अर्थ नहीं जानता सिद्ध कर दो

3150
03:33:10,560 --> 03:33:14,560
मगर ईश्वर के अवतार का खंडन नहीं कर पाओगे। यही करो

3151
03:33:14,560 --> 03:33:18,560
बस व्याकरण ले आओ कि भैया किसी ने वो वहां पर वो शब्द पूछा

3152
03:33:18,560 --> 03:33:22,560
उसका अर्थ नहीं लो शुरू में मैंने कहा था ना हिंदू का

3153
03:33:22,560 --> 03:33:26,720
हिंदू शब्द सनातनियों का है कि नहीं इससे करके हम क्या कर लेंगे

3154
03:33:26,720 --> 03:33:32,720
बताइए परिवर्तन ला देंगे इससे इसमें एक व्यक्ति शास्त्रार्थ आ जाएगा

3155
03:33:34,320 --> 03:33:38,640
मैं आपसे कोई व्याकरण का शास्त्रार्थ करने आया हूं क्या ईश्वर को असिद्ध

3156
03:33:38,640 --> 03:33:42,800
करोगे वो अवतार नहीं ले सकता और वो यहां पर ये ये जब वो

3157
03:33:42,800 --> 03:33:46,800
उनके पास और कुछ बचा नहीं तो पंचा दो पंचा का अर्थ क्यों बता रहा हूं मैं बताऊ

3158
03:33:46,800 --> 03:33:49,760
मैं लो

3159
03:33:49,760 --> 03:33:55,760
अब हम कहे कि क्यों का अर्थ क्यों बताऊं मैं लो

3160
03:33:56,480 --> 03:34:00,480
मैं हर शब्द की व्याख्या पूछने लगू उससे ये करने आया

3161
03:34:00,480 --> 03:34:05,200
है ये ये धर्म स्थापना के लिए प्रयासरत

3162
03:34:05,200 --> 03:34:09,600
लोग नहीं है इनको सत्य से मतलब नहीं है किस सिद्धांत से सनातन

3163
03:34:09,600 --> 03:34:14,000
की रक्षा होगी उससे मतलब नहीं है इनको ये है कि इसने मेरे दयानंद जी के इन सिद्धांतों

3164
03:34:14,000 --> 03:34:18,160
का खंडन क्यों किया? तो मैं जो है इसको किसी तरीके से यह दिखाऊंगा कि ये

3165
03:34:18,160 --> 03:34:22,480
चीज इसको मैं सर्वज्ञ थोड़ी ना हूं भाई। नहीं आती बहुत सी चीजें मुझे। हां

3166
03:34:22,480 --> 03:34:26,480
मगर ईश्वर सर्वशक्तिमान के विषय में मैं तुम जैसे लोगों

3167
03:34:26,480 --> 03:34:30,640
के लिए पर्याप्त हूं। ठीक है।

3168
03:34:30,640 --> 03:34:36,000
बताइए बताइए। शर्मा जी बोलिए।

3169
03:34:36,000 --> 03:34:40,000
अबकी जी अब देखिए रामायण का तर्क दे

3170
03:34:40,000 --> 03:34:44,400
रहे जहां तक अपनी बात पकड़नी है वो तो बोल दिया

3171
03:34:44,400 --> 03:34:48,720
और जो हमारी है वो छोड़ देते नहीं मैं

3172
03:34:48,720 --> 03:34:52,800
अगर होता तो उस टाइम इसी बात पे टोक देता कि रीकिंग अलाउड नहीं है या तो आप पूरा

3173
03:34:52,800 --> 03:34:57,040
मानो नहीं तो फिर उसको मत मानो राइट तो मैं उसको

3174
03:34:57,040 --> 03:35:01,200
मैं उसको आखिर तक ले गया ना मैं उसको ले गया उसने बात को खत्म

3175
03:35:01,200 --> 03:35:05,440
नहीं होने दिया शिव जी चालाकी देख के भाई

3176
03:35:05,440 --> 03:35:09,600
शब्द बोल दिया उसने कि राम जी कमजोर है वो

3177
03:35:09,600 --> 03:35:11,600
है पर वो चार पांच तर्क

3178
03:35:11,600 --> 03:35:15,920
ऐसे दे रहे है मतलब तर्क नहीं बातें बता रहा है वो बातें बताने

3179
03:35:15,920 --> 03:35:20,000
की जरूरत क्यों है हां वही तो मैंने उस भी काउंटर

3180
03:35:20,000 --> 03:35:24,080
किया कि भाई तुम क्यों बता रहे हो जिससे कि तुम कहीं ना कहीं खामखा अपना प्रभाव

3181
03:35:24,080 --> 03:35:28,080
उत्पन्न करने का प्रयास कर रहे हो कि कृष्ण जी

3182
03:35:28,080 --> 03:35:32,080
ने कहा था कि वह सर्वज्ञ नहीं है ये अब मैं उसका खंडन करने

3183
03:35:32,080 --> 03:35:36,240
बैठू उसको चैप्टर को खोलू और मैं आया था टू द पॉइंट

3184
03:35:36,240 --> 03:35:40,240
बात करने। भाई टू द पॉइंट आ रहे हैं। नहीं तो श्री कृष्ण

3185
03:35:40,240 --> 03:35:44,560
जी कहां था ये उसको कहां से प्राप्त हुआ? कहां से प्राप्त महाभारत से प्राप्त हुआ होगा सर्वज्ञ

3186
03:35:44,560 --> 03:35:49,840
नहीं है। उसी महाभारत में लिखा है कि श्री कृष्ण ब्रह्म है। फिर

3187
03:35:49,840 --> 03:35:53,920
नहीं बात नहीं होगी फिर इसमें। फिर वो कहेगा उसको क्यों?

3188
03:35:53,920 --> 03:35:58,000
मैं कह रहा हूं कि अगर चल तू उसको नहीं मान पा रहा तो उसको भी मत मान कि वो सर्वज्ञ

3189
03:35:58,000 --> 03:36:02,640
नहीं है। उसको क्यों मान ले रहा है? जैसे

3190
03:36:02,640 --> 03:36:05,920
जी

3191
03:36:05,920 --> 03:36:10,000
एक निष्कर्ष तो आया ना तार्किक धरातल पे यक्तिक धरातल पे

3192
03:36:10,000 --> 03:36:15,040
सिद्ध नहीं कर पाएगा ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है बने रशन फिरते हैं

3193
03:36:15,040 --> 03:36:19,200
जैसे जी कुरान पे नाम रख रखा है रैशन

3194
03:36:19,200 --> 03:36:23,680
आर्य और आ गए पंचाव दो देख रहे हो

3195
03:36:23,680 --> 03:36:29,680
समझ रहे हो नाम क्या है रैशन आर्य और मांग रहे है पंचाव्य

3196
03:36:30,800 --> 03:36:34,960
मैं मैं यहां पर चर्चा करने कैसे आया हूं पता है? चर्चा करने कैसे आया

3197
03:36:34,960 --> 03:36:39,440
हूं मैं? ऐसे नहीं आया कि मैं बैठा था सुबह से हाय हाय आज चर्चा करनी है।

3198
03:36:39,440 --> 03:36:43,680
जैसे इन्होंने वक्त मांगा था कि मैं तीन दिन और अध्ययन कर दूं तो एक महीने बाद मुझे फोन किया

3199
03:36:43,680 --> 03:36:47,920
कि भैया मैं तैयार हूं। तब तक मैं कहीं बिजी हो गया था तो और एक महीना लग गया।

3200
03:36:47,920 --> 03:36:52,640
मैं ऐसे नहीं आया था। मैं भाई सुबह से लिख रहा हूं रामपाल के बारे में। फोटोकॉपी

3201
03:36:52,640 --> 03:36:56,800
करा रहा हूं। ये सब कर रहा हूं। फिर अरे अरे देर हो गई 1:00 बज गया। चलो पहुंचो पहुंचो जल्दी। ऐसे

3202
03:36:56,800 --> 03:37:00,800
आके बैठ गया। फोन किया था आपको जब मैंने तब भाग हां तो मैंने क्या कहा था अभी पहुंच

3203
03:37:00,800 --> 03:37:05,040
रहा हूं पहुंच रहा हूं पांच मिनट पांच मिनट यही कहा था ना मैंने हां हां इनको लगा

3204
03:37:05,040 --> 03:37:09,120
इनको ये भाई साहब पूरा वो तैयार करके आए थे कि मैं आखिर में कोई

3205
03:37:09,120 --> 03:37:13,120
ना कोई ऐसा शब्द होगा अरे भाई बहुत से शब्द है मुझे नहीं पता है बहुत सी चीजें नहीं पता

3206
03:37:13,120 --> 03:37:17,120
है सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र हो ना पता हो

3207
03:37:17,120 --> 03:37:21,280
लेकिन आपके तर्क मेरे हिसाब से सफिशिएंट है जिसमें पंचाव्य

3208
03:37:21,280 --> 03:37:25,280
आदि की जो ये जो पांचों की आवश्यकता नहीं है और वह सुनिए आवश्यकता

3209
03:37:25,280 --> 03:37:29,360
यह नहीं है जानना लेकिन जब आप जो तर्क देंगे ना उसमें ऑटोमेटिक ये पांचों

3210
03:37:29,360 --> 03:37:33,440
आंगी। मैं एक बात जानता हूं। आपको एक बात बताऊं आपको एक बात बताऊं।

3211
03:37:33,440 --> 03:37:37,520
बस एक एक बात और सुन लीजिए। हाइपोथेटिकली मान लीजिए मान लीजिए कि आप

3212
03:37:37,520 --> 03:37:41,520
केवल हेतु का ही अर्थ बताते हैं ना। हेतु का ही उसका अभी रीज़ बता रहे होते। मैं ये बात

3213
03:37:41,520 --> 03:37:45,520
जानता हूं क्योंकि 50 बार सुन चुका हूं मैं ये चीज। तो आप वो पांचों

3214
03:37:45,520 --> 03:37:49,680
पॉइंट अपने ऑटोमेटिकली वो पांचों के पांचों पॉइंट कर चुके हो। डाल चुके होते अपने अंदर।

3215
03:37:49,680 --> 03:37:54,080
आपको नहीं पता होता लेकिन आप ऑलरेडी डाल चुके थे क्योंकि ज्ञान ही ऐसा मिला है परंपरा

3216
03:37:54,080 --> 03:38:00,080
से हमें। ठीक है? मैं यह बात जानता हूं। आप बोलिए बात।

3217
03:38:00,160 --> 03:38:04,320
ऐसा था कि क्या

3218
03:38:04,320 --> 03:38:07,440
कहते हैं ये

3219
03:38:07,440 --> 03:38:11,600
इन्होंने मैं इस चर्चा का एंड कैसे समझ रहा था? बिल्कुल

3220
03:38:11,600 --> 03:38:15,760
वो जो भगवान भगवत प्रेरणा से जो मेरे दिमाग में था कि ऐसे होगी

3221
03:38:15,760 --> 03:38:19,840
ये चर्चा का अंत वैसे ही हुआ है। कैसे हुआ है

3222
03:38:19,840 --> 03:38:23,920
कि भाई बात यह है कि वो आया है अपने पक्ष को सिद्ध करने। मैं

3223
03:38:23,920 --> 03:38:28,000
आया हूं अपने पक्ष को सिद्ध करने। मैं इस भाव से आया हूं। मेरे पास केवल

3224
03:38:28,000 --> 03:38:32,560
सत्य है। मेरे पास बातें घुमाने के लिए

3225
03:38:32,560 --> 03:38:36,560
चीजें करने के लिए कुछ नहीं है। और अगर मैं कुछ स्पेशली कुछ बोला हूं

3226
03:38:36,560 --> 03:38:40,880
उदाहरण तो जब मैं छक गया तब मुझे एक उदाहरण देना पड़ा अपने सिद्धांत

3227
03:38:40,880 --> 03:38:45,200
के पक्ष में। उसमें भी किसी के ऊपर कटाक्ष नहीं था।

3228
03:38:45,200 --> 03:38:50,400
ठीक है? हां। कटाक्ष के उत्तर में कटाक्ष जरूर दिया मैंने।

3229
03:38:50,400 --> 03:38:54,480
तो यह भाई साहब मैंने क्या सोचा था यह अंत कैसे होगा इस चर्चा

3230
03:38:54,480 --> 03:38:58,480
का मैंने यह सोचा था कि हम लोग बैटिंग बिंग बैटिंग बिंग होगी बहुत

3231
03:38:58,480 --> 03:39:02,640
लंबी चलेगी और अंत में जब ये व्यक्ति फेल होने

3232
03:39:02,640 --> 03:39:06,640
लगेगा तो व्यक्ति जो है विघ्नकारी चीजें करनी शुरू

3233
03:39:06,640 --> 03:39:10,720
करेगा जिससे कि हमें यह वो हो जाए

3234
03:39:10,720 --> 03:39:15,360
हम विवश हो जाए या तो इसकी विघ्नकारी बातों को सुनते हुए भी आगे बढ़े

3235
03:39:15,360 --> 03:39:19,600
इसकी गलत बातों को सुनते हुए भी आगे बढ़े अन्यथा हमको विवश हो

3236
03:39:19,600 --> 03:39:24,160
हम इसको हटा दें और फिर ये बाद में मुझे हटा दिया गया था। इसकी हार

3237
03:39:24,160 --> 03:39:28,320
वहां पर हो चुकी थी मैथमेटिकल वाले क्वेश्चन पे मैं उत्तर दे रहा था। इसने उत्तर नहीं

3238
03:39:28,320 --> 03:39:32,480
सुना लक्षण पे आ गया बस और दोबारा इसने एक घंटा हो गया

3239
03:39:32,480 --> 03:39:36,560
वो टॉपिक दोबारा नहीं उठाया। अरे भैया जब वो टॉपिक नहीं था तो तूने

3240
03:39:36,560 --> 03:39:40,560
खोला क्यों था? ये जो ये वाले जो क्वेश्चन है तू

3241
03:39:40,560 --> 03:39:44,640
क्यों लाया था कि बिना शरीर के विवाह कर सकते हैं। इसका मतलब वो तुम्हारी लिस्ट में

3242
03:39:44,640 --> 03:39:48,800
था। मगर उसका इतनी जल्दी ताबड़तोड़ वीरेंद्र सहवाग और सचिन तेंदुलकर

3243
03:39:48,800 --> 03:39:52,960
तेंदुलकर की बैटिंग की तरह उसका इतनी जल्दी वो हुआ शॉर्ट ही शॉट

3244
03:39:52,960 --> 03:39:57,120
पड़े उस पे क्या तुमने कहा इस पर ज्यादा देर नहीं टिकना है अविद्या कहां

3245
03:39:57,120 --> 03:40:01,440
से आ गई समझ रहे हो भगवान

3246
03:40:01,440 --> 03:40:05,520
की जो माया शक्ति है ना अच्छे बहुत आए बहुत गए ठीक है जो

3247
03:40:05,520 --> 03:40:09,680
शक्ति है भगवान की उसका खंडन नहीं कर सकते और माया शक्ति

3248
03:40:09,680 --> 03:40:13,760
के अस्तित्व को स्वीकारे बिना बहुत से ऐसे पक्ष जैसे वो अभी कह

3249
03:40:13,760 --> 03:40:18,160
रहा था ना मुल्ला जो वहां पर मौलवी इत्यादि थे। कौन-कौन

3250
03:40:18,160 --> 03:40:22,400
थे? वो कह रहे थे कि अरे दुख क्यों हो दुख क्यों है संसार में?

3251
03:40:22,400 --> 03:40:26,560
अख्तर जावेद अख्तर जी कह रहे थे ना मुल्ला नहीं

3252
03:40:26,560 --> 03:40:31,360
थे सॉरी वो मुस्लिम है ना तो क्या कह रहे थे वो

3253
03:40:31,360 --> 03:40:35,520
वो कह रहे थे कि भाई वो जो भगवान है तो यह सब कैसे

3254
03:40:35,520 --> 03:40:39,840
कर सकता है? जब तक तुम अविद्या को नहीं साधोगे ना भगवान की अविद्या

3255
03:40:39,840 --> 03:40:44,160
शक्ति को तब तक तुम इन चीजों को क्लेरिफाई कर ही नहीं पाओगे।

3256
03:40:44,160 --> 03:40:48,160
और अविद्या शक्ति को सृष्टि निर्माण इत्यादि सब करने के लिए तुम्हें साधना

3257
03:40:48,160 --> 03:40:52,160
पड़ेगा। नहीं तो एक रस वाला ईश्वर जो है कम ज्यादा क्यों हो रहा है

3258
03:40:52,160 --> 03:40:56,320
सगुण साकार में? सगुण निराकार में ये सब बातें हैं।

3259
03:40:56,320 --> 03:40:59,840
जी

3260
03:40:59,840 --> 03:41:03,840
खैर फिर भी मुझे मुझे ऐसा लगता है आज लोगों को काफी कुछ जानने को मिल गया

3261
03:41:03,840 --> 03:41:07,440
होगा।

3262
03:41:07,440 --> 03:41:11,920
हां बताइए शर्मा जी बोलिए पंडित जी

3263
03:41:11,920 --> 03:41:15,920
मैं तो ये बोल रहा हूं वो जब तर्कों से सिद्ध कर दिया शिवा

3264
03:41:15,920 --> 03:41:19,920
जी ने अवतार ले सकते हैं बाद में आए शब्द

3265
03:41:19,920 --> 03:41:24,560
प्रमाण तो वो शब्द प्रमाण भी हमारे ही ले रहे हैं

3266
03:41:24,560 --> 03:41:29,920
रामायण हमारी है उसी की और फिर पूरा नहीं मान रहे

3267
03:41:29,920 --> 03:41:34,000
अच्छा टू और टू फाइव और उसमें अभी बायो

3268
03:41:34,000 --> 03:41:38,000
और क्या साइंस फिर प्रकृति बनाते हैं और वो

3269
03:41:38,000 --> 03:41:42,000
जो ज्ञान मिलता है उसमें भी अनु परमाणु सब कुछ हो

3270
03:41:42,000 --> 03:41:46,640
जाएगा अच्छा एक बात इसमें मैं ये कहूंगा

3271
03:41:46,640 --> 03:41:50,960
जब मैंने ये वाली बात कही थी ना ये ज्ञान ईश्वर देता है तो एक बार का

3272
03:41:50,960 --> 03:41:55,650
बोला ईश्वर नहीं देता न्यूमरोलॉजी देती है न्यूरोलॉजी

3273
03:41:55,650 --> 03:42:00,080
[हंसी] अच्छा वही तो तो वो न्यूोलॉजी

3274
03:42:00,080 --> 03:42:06,080
कहां से आई? हां वही तो मैं कह रहा हूं

3275
03:42:07,600 --> 03:42:11,600
हम बंदर थे ना और बंदर से फिर वो पत्थर वो जला

3276
03:42:11,600 --> 03:42:16,240
के आग फिर वो थ्योरी आ जाती कहां से आया

3277
03:42:16,240 --> 03:42:20,000
हां यही तो दिक्कत है

3278
03:42:20,000 --> 03:42:24,240
प्रॉब्लम ये है देखिए दो चीजें है एक एक

3279
03:42:24,240 --> 03:42:28,400
तो इनका मंतव्य ये नहीं है कि धर्म की रक्षा हो सिद्धांत सिद्ध

3280
03:42:28,400 --> 03:42:32,480
हो अकाट्य सिद्धांत हमारे लोग जाने इनकी एक तो ये नहीं इनका

3281
03:42:32,480 --> 03:42:36,480
ये है कि दयानंद जी अगर कह गए हैं किसी प्रकार से उनके पल्ले को भारी

3282
03:42:36,480 --> 03:42:40,480
प्रतीत करवाना है लोगों बस एनी हाउ अब जैसे

3283
03:42:40,480 --> 03:42:44,640
मैंने शुरू में ही कहा था ना हिंदू शब्द पे मुझे हरा भी दोगे तो क्या निर्णय आ जाएगा उससे

3284
03:42:44,640 --> 03:42:48,640
क्या उससे सर्वशक्तिमान ईश्वर प्राप्त हो जाएगा क्या उससे

3285
03:42:48,640 --> 03:42:52,880
परम स्वतंत्र मोक्ष प्राप्त हो जाएगा शाश्वत धर्म प्राप्त हो जाएगा

3286
03:42:52,880 --> 03:42:56,880
नहीं होगा तीन चीजें तो वही चीजें लास्ट में करने लगा ना हिंदू शब्द की

3287
03:42:56,880 --> 03:43:01,120
वजह दूसरी जगह पंचाव आ गया हम पहली बात तो ये दूसरी

3288
03:43:01,120 --> 03:43:05,360
बात क्या है कि इनका एक तो उद्देश्य यह नहीं था और

3289
03:43:05,360 --> 03:43:10,240
दूसरी बात यह थी कि इनका जो है ये ईश्वर

3290
03:43:10,240 --> 03:43:14,400
ईश्वर अवतार ले सकता है कि नहीं ले सकता इसकी सिद्धि वही हो गई

3291
03:43:14,400 --> 03:43:18,400
थी अविद्या वाली जगह पे जहां पे ये बात चल रही थी बस इसने

3292
03:43:18,400 --> 03:43:23,280
वहां पे ये वहां पे ज्यादा देर ठहरा नहीं लक्षण पे आ गया क्यों

3293
03:43:23,280 --> 03:43:26,640
क्यों नहीं ठहरे

3294
03:43:26,640 --> 03:43:30,640
हैं अभी से अविद्या सही इनका लिंक दे दो

3295
03:43:30,640 --> 03:43:34,800
कोई चेहरे के साथ अगर बात करना चाहे तो कर सकता है। अब जो है डिबेट

3296
03:43:34,800 --> 03:43:39,040
नहीं है। कोई विचार अपने प्रकट करना चाहे

3297
03:43:39,040 --> 03:43:43,040
विरोधा विरोध वाला व्यक्ति नहीं चाहिए। कोई ऐसा समर्थक हो जो

3298
03:43:43,040 --> 03:43:47,040
जानता है हमको अगर वो आकर के कुछ कहना चाहे इस चर्चा को देख

3299
03:43:47,040 --> 03:43:51,360
के कह सकता है। ठीक है? और अगर

3300
03:43:51,360 --> 03:43:55,440
किसी को कोई दिक्कत है चर्चा करनी है निर्भय इसकी तरह नहीं निर्भय की तरह

3301
03:43:55,440 --> 03:43:59,600
नहीं। इसकी तरह नहीं अगर किसी को निष्पक्षता के साथ चर्चा

3302
03:43:59,600 --> 03:44:03,600
करनी है तो वह आ सकता है। यहां पर नंबर आपको दिया गया है। शुरू में भी

3303
03:44:03,600 --> 03:44:07,680
दिया गया होगा ना। क्यों शर्मा जी? शुरू में नंबर दिया है

3304
03:44:07,680 --> 03:44:10,720
ना लाइव के

3305
03:44:10,720 --> 03:44:14,880
शुरू में दिया गया है। डिस्क्रिप्शन में है। अंत में भी आपको मिल जाएगा। ठीक है? दे

3306
03:44:14,880 --> 03:44:19,280
दीजिए भैया लिंक। पंडित जी आप दे दीजिए।

3307
03:44:19,280 --> 03:44:25,280
अब तक वहां लाइव चालू हो गई होगी।

3308
03:44:26,000 --> 03:44:32,000
लाईचारी हो गई होगी दूसरे वाले में।

3309
03:44:32,320 --> 03:44:38,320
अच्छा क्या क्या बोल रहे हैं शिवास द्विवेदी जी? क्या बोल रहे हैं?

3310
03:44:38,640 --> 03:44:44,640
अच्छी बात है भाई। अच्छी बात है। [हंसी]

3311
03:44:45,760 --> 03:44:50,320
ऐसे ही ऐसे ही जीत के खुशियां मनाओ। बढ़िया। अपने पर्चे छपवा देना।

3312
03:44:50,320 --> 03:44:54,480
अपने पर्चे भी छपवा देना। वो जैसे दयानंद जी ने चपए

3313
03:44:54,480 --> 03:44:58,640
थे ना काशी शास्त्रार्थ के बाद मैं जीता था मैं जीता था मैं जीता था वहां स्मृति

3314
03:44:58,640 --> 03:45:02,800
स्थली बना दो जहां पर हारे थे इतना मामा आ गए मामा आ गए

3315
03:45:02,800 --> 03:45:06,880
चिल्लाओ इतना चिल्लाओ मामा आ गए मामा आ गए कि लोग ये ध्यान देना

3316
03:45:06,880 --> 03:45:10,880
भूल ही जाए कि यहां कुछ शरारत भी हो रही है मामा आ गए मामा आ

3317
03:45:10,880 --> 03:45:13,680
गए

3318
03:45:13,680 --> 03:45:17,680
जी बोलिए ब्रह्मचारी जी आए कोई जगदीश स्वरूप ब्रह्मचारी

3319
03:45:17,680 --> 03:45:23,280
जी जय जगन्नाथ

3320
03:45:23,280 --> 03:45:29,040
नमो नारायण नमो नारायण

3321
03:45:29,040 --> 03:45:33,120
जी मैंने आपको बताया था कि ये पौराणिक हर तीर्थ के बारे में भी

3322
03:45:33,120 --> 03:45:39,120
ये लोग काफी आपके पीछे बोल रहे थे ये लोग

3323
03:45:39,680 --> 03:45:43,360
आप अपना थोड़ा सा परिचय

3324
03:45:43,360 --> 03:45:49,360
मैं ऋषिकेश कैलाश आश्रम का विद्यार्थी हूं

3325
03:45:49,760 --> 03:45:54,160
तो क्या शंकर परंपरा से ही जी जी

3326
03:45:54,160 --> 03:45:58,640
जी बताएं आपसे मिला हुकुम मेला में मिला था मैं आपसे अरे

3327
03:45:58,640 --> 03:46:02,720
वाह मिले मिले मिले नारायण आवाज सुनी सुनाई लग रही

3328
03:46:02,720 --> 03:46:07,040
थी पौराणिक हंस तीर्थ के बारे में ऋषि मंतव्य इनका चैनल

3329
03:46:07,040 --> 03:46:11,120
है उन्होंने कुछ लिखा था उसके बारे में उन्होंने आपत्ति जताई थी मैं आपको

3330
03:46:11,120 --> 03:46:15,200
कमेंट भी लिखा था लेकिन ये मुद्दा आया नहीं उस पे हम लोग हंस तीर्थ के

3331
03:46:15,200 --> 03:46:19,440
बारे में भी काफी जूसी में कुछ कार्य कर रहे हैं इन्होंने

3332
03:46:19,440 --> 03:46:23,600
कुछ पौराणिक के ले लेके भी काफी पोस्ट और काफी कंटेंट

3333
03:46:23,600 --> 03:46:27,760
बनाया था। ऋषि मंतव्य चैनल है आर्य समाज का संदीपन रॉय जी का।

3334
03:46:27,760 --> 03:46:31,920
आपको Facebook पे मैंने आपको संज्ञान के बारे में इसको अब वो संदीपन रॉय

3335
03:46:31,920 --> 03:46:36,320
का नहीं रहा। ऐसा सुनने में आया कि दूसरे लोगों से चला रहे हैं।

3336
03:46:36,320 --> 03:46:40,400
हो भी सकता है। कह नहीं सकते। मगर ऐसी हरकतें होती है जो

3337
03:46:40,400 --> 03:46:44,880
संदीपन रॉय नहीं करते थे। ऐसी हरकतें भी वहां से होती हैं।

3338
03:46:44,880 --> 03:46:49,360
संदीपन रॉय जो है बड़े मरदित व्यक्ति हैं।

3339
03:46:49,360 --> 03:46:53,840
वो थोड़ा लड़कपन वाला इस तरह का थोड़ा सा

3340
03:46:53,840 --> 03:46:58,480
अब क्या कहे वो शब्द आएंगे तो फिर और बुरा निकलेगा। है ना?

3341
03:46:58,480 --> 03:47:02,480
जी जी इस तरह का आपने कोई इंटरव्यू

3342
03:47:02,480 --> 03:47:04,960
आपने किया था व्यास मुनि जी का जूसी में शिव

3343
03:47:04,960 --> 03:47:09,200
गंगा आश्रम में मैं बताऊं मैं मैं बताऊं? जी जी

3344
03:47:09,200 --> 03:47:13,200
कृपया बताइए। जी जी इन्होंने मुझको इन्होंने हम

3345
03:47:13,200 --> 03:47:17,440
पर प्रश्न उठाया देखिए इनके बारे में पहले है क्या इनके बारे

3346
03:47:17,440 --> 03:47:21,520
में जैसे ये उपस पूर्वक हमें बोलते हैं ना पौराणिक पौराणिक पौराणिक जब

3347
03:47:21,520 --> 03:47:25,600
ये बोलते हैं उसका अर्थ ये होता है कि हम वैदिक नहीं है

3348
03:47:25,600 --> 03:47:29,600
ठीक है हम अपने को वैदिक है वैदिक

3349
03:47:29,600 --> 03:47:33,680
हम अपने आप को वैदिक पौराणिक बोलते हैं अगर गौण रूप से उसको नहीं भी बोल

3350
03:47:33,680 --> 03:47:37,760
रहे हैं अगर उसको ये भी नहीं बोल रहे हैं कि वैदिक पौराणिक मगर फिर भी जब हम

3351
03:47:37,760 --> 03:47:41,840
अपने आप को पुराणों को मानने वाला बोलते हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि हम वेदों को नहीं

3352
03:47:41,840 --> 03:47:45,920
मानते तो उसमें वेदों को मानना भी गण रूप से छुपा हुआ है। तो

3353
03:47:45,920 --> 03:47:50,480
कई जगह पर सीधे सीधे पौराणिक अगर किसी ने बोल भी दिया तो उससे अवैदिक

3354
03:47:50,480 --> 03:47:54,640
होना सिद्ध नहीं होता है। मगर इसी बात को चतुराई से

3355
03:47:54,640 --> 03:47:58,640
जो ये समाजी लोग हैं ये जो है इसी बात

3356
03:47:58,640 --> 03:48:02,960
का फायदा उठाकर के पुराणों को मानने वाले तो इनको पौराणिक कहो। पौराणिक कहो

3357
03:48:02,960 --> 03:48:07,200
पौराणिक पौराणिक कहते हैं। अब मैं जब इस मैं आया था ना इन

3358
03:48:07,200 --> 03:48:11,360
चीजों में कि भैया यह करना है ऐसे ऐसे सेट करना है तो मैंने कहा कि

3359
03:48:11,360 --> 03:48:15,520
इनके लिए लोग एक शब्द बोलते थे नमाजी नमाजी ठीक है

3360
03:48:15,520 --> 03:48:19,680
आर्य नमाजी नमाजी नमाजी आया है ये बोलते थे मुझे ये खराब

3361
03:48:19,680 --> 03:48:20,180
लगा

3362
03:48:20,080 --> 03:48:24,240
नहीं हमारे भाई है हम उनको नमाजी क्यों बोले तो मैंने कहा कि फिर

3363
03:48:24,240 --> 03:48:28,240
भी जो ये पौराणिक पौराणिक हमको बोल रहे हैं उसका उत्तर तो चाहिए होगा कुछ ना कुछ

3364
03:48:28,240 --> 03:48:32,560
अगर ये पौराणिक हमको कह रहे हैं अवैदिक के रूप में तो हम क्या करें नमाजी

3365
03:48:32,560 --> 03:48:37,280
तो गलत है तो मैंने ने उस चीज को सेट करने के लिए नमाजी हटाया

3366
03:48:37,280 --> 03:48:41,520
और इनके लिए अलंकारी शब्द ढूंढा के लो तुम पौराणिक

3367
03:48:41,520 --> 03:48:45,600
कहोगे तो हम अलंकारी कहेंगे। अब जैसे हम हम क्योंकि पुराण को मानते हैं तो तुमने

3368
03:48:45,600 --> 03:48:49,840
हमें पौराणिक कहा है तो तुम अलंकार को मानते हो। जहां ईश्वर का अवतार दिखाई

3369
03:48:49,840 --> 03:48:53,840
दे रहा है उसके इतने हाथ है वेद में। विराट स्वरूप है वो है

3370
03:48:53,840 --> 03:48:58,000
तो वहां अलंकार कह देते हैं अलंकार अलंकार अलंकार जहां वो

3371
03:48:58,000 --> 03:49:02,080
शर्मा नाम की जो शर्मा नाम की स्वान है मादा

3372
03:49:02,080 --> 03:49:06,240
स्ान वो आकर के जहां मंत्र बोल रही है अलंकार अलंकार कबूतर

3373
03:49:06,240 --> 03:49:10,400
मंत्र बोल रहा है अलंकार अलंकार तो जहां आप जो है अपनी चीजों को सेट

3374
03:49:10,400 --> 03:49:14,640
करने के लिए अलंकार का यूज़ करते हो मैंने उसको ले लिया अलंकारी ठीक

3375
03:49:14,640 --> 03:49:18,720
तो इसमें इन्होंने बहुत सारी विवेचना की तो इसमें इन्होंने क्या किया

3376
03:49:18,720 --> 03:49:22,960
इन्होंने मुझको प्रूफ देने के लिए आप अपने आप को पौराणिक कहते हो तो

3377
03:49:22,960 --> 03:49:27,200
मेरी एक जो इनके साथ चर्चा हुई थी जिसमें पौराणिक हंस तीर्थ मंदिर क्षेत्र

3378
03:49:27,200 --> 03:49:31,360
लिखा हुआ है वो चर्चा मुझे दिखा रहे हैं और हम

3379
03:49:31,360 --> 03:49:35,760
लोग कितना संघर्ष कर रहे हैं हंस तीर्थ के लिए ये तो आपको मालूम ही है

3380
03:49:35,760 --> 03:49:39,840
तो उस चर्चा को ये दिखा रहे हैं कि भैया देखो तुमने अपने आप को

3381
03:49:39,840 --> 03:49:43,920
पौराणिक कहा है तो हम पौराणिक कह रहे हैं तो क्या दिक्कत हो गई तो मैंने कहा

3382
03:49:43,920 --> 03:49:47,920
सीधी सिंपल सी बात है कि तुमने हमारी इच्छा के विपरीत हमको

3383
03:49:47,920 --> 03:49:52,080
पौराणिक कहा है तुम भी जानते हो तुम्हारे पौराणिक कहने में हमारा हमारा वैदिक

3384
03:49:52,080 --> 03:49:56,080
होना छिपा हुआ है और हमारे स्वयं को पौराणिक कह देने में हमारा वैदिक होना

3385
03:49:56,080 --> 03:50:00,800
छुपा हुआ है क्योंकि हमारा तो मतलब ही है कि पुराण जो है वेद के अर्थ

3386
03:50:00,800 --> 03:50:04,960
अब आपने कुछ ऐसा किया जो हमें पसंद नहीं है। हम कुछ ऐसा कर रहे हैं जो आपको पसंद नहीं है।

3387
03:50:04,960 --> 03:50:09,120
उसमें आपको दिक्कत नहीं होनी चाहिए क्योंकि उसमें हमने मर्यादा

3388
03:50:09,120 --> 03:50:13,360
को भंग नहीं कर दिया आपको अलंकारी कह के निष्ठा

3389
03:50:13,360 --> 03:50:17,840
विद्या अलंकार क्यों लगा रहे समाजी अलंकार शब्द अपने में अलंकारी

3390
03:50:17,840 --> 03:50:21,440
हो इसलिए तो लगा रहे हो

3391
03:50:21,440 --> 03:50:26,000
चलिए जी बताइए

3392
03:50:26,000 --> 03:50:30,720
आपकी आवाज नहीं हां तो यही यही मुद्दा था कि

3393
03:50:30,720 --> 03:50:34,720
जो हंस तीर्थ के बारे में कि आपका तो पुराण में ईश्वर है

3394
03:50:34,720 --> 03:50:38,960
वगैरह तो जो जो पुराण में जो पुराण

3395
03:50:38,960 --> 03:50:43,200
में श्रुति जो पौराणिक वाक्य श्रुति को समर्थन

3396
03:50:43,200 --> 03:50:47,600
करते हैं वो हम स्वीकार करते हैं तो उसमें क्या आपत्ति है

3397
03:50:47,600 --> 03:50:51,680
क्योंकि ये वेद में आप देखो ना वेद में जो ब्राह ब्राह्मण वाक्य है। काफी उपनिषद

3398
03:50:51,680 --> 03:50:55,760
में दिक उपनिषद ब्राह्मण वाक्य भी है। एक मंत्र वाक्य है एक ब्राह्मण

3399
03:50:55,760 --> 03:51:00,320
वाक्य है। ब्राह्मण वाक्य को आर्य समाज स्वीकारेगा नहीं।

3400
03:51:00,320 --> 03:51:05,200
पहले भले आप तो आप चलो पुनः वेदों की ओर फिर

3401
03:51:05,200 --> 03:51:10,720
उसमें ब्रैकेट में लिखा ब्रैकेट में

3402
03:51:10,720 --> 03:51:15,040
आवाज चली गई आपकी। पुनः वेद की ओर क्यों लिखते हो?

3403
03:51:15,040 --> 03:51:19,360
हां। तो पुनः वेद की ओर क्यों लिखते हो वो लोग? अगर आप वेद

3404
03:51:19,360 --> 03:51:23,520
में ब्राह्मण के सेक्शन को आप मानते ही नहीं हो तो आप

3405
03:51:23,520 --> 03:51:27,760
वैदिक तो हुए नहीं ना। भाई ब्राह्मण जो है ब्राह्मण मंत्र की व्याख्या

3406
03:51:27,760 --> 03:51:32,560
रूप ब्राह्मण लिखे गए।

3407
03:51:32,560 --> 03:51:36,880
भाई किसी को भी पहचान क्लियर किए बिना स्टेज मत दीजिएगा।

3408
03:51:36,880 --> 03:51:39,200
ठीक है?

3409
03:51:39,200 --> 03:51:43,920
पहचान क्लियर हुए बिना किसी को स्टेज मत दीजिएगा। हां।

3410
03:51:43,920 --> 03:51:48,160
तो ये ठीक बात ऐसी है ये ठीक बात ऐसी

3411
03:51:48,160 --> 03:51:52,240
है पुराण को मानने वालों के कारण पुराण को

3412
03:51:52,240 --> 03:51:56,480
मानने के कारण अगर आप हमें पौराणिक कह रहे हैं और जिसमें गौ

3413
03:51:56,480 --> 03:52:00,720
रूप से आपका ये छुपा हुआ है कि आप कटाक्ष पूर्वक कह रहे हैं कि हम वेद को नहीं मानते

3414
03:52:00,720 --> 03:52:04,720
तो हम भी ऐसे ही कह रहे हैं अलंकारी उसमें गौ रूप में छिपा हुआ है कि आप

3415
03:52:04,720 --> 03:52:08,800
जो वेदों का खंडन करते हैं अलंकार के द्वारा हम जहां चाह वहां

3416
03:52:08,800 --> 03:52:12,800
अलंकार अब ये पूछ रहे हैं ना हेतु हेतु अंत में यही आ जाएंगे क्यों लेता है

3417
03:52:12,800 --> 03:52:16,800
फिर मैं पूछूंगा मंत्र क्यों बनाता है? ईश्वर ज्ञान मंत्र के रूप में क्यों

3418
03:52:16,800 --> 03:52:21,120
देता है? सीधे स्मृति बोध करा दे बस वो मुक्त हो जाएगा।

3419
03:52:21,120 --> 03:52:26,080
तुरंत मंत्र के रूप में क्यों देता है? हां बिल्कुल

3420
03:52:26,080 --> 03:52:30,240
तो वो तो मुक्त हो जाएंगे प्राणी। मंत्र के रूप में क्यों देता है? जिससे कहानी चल

3421
03:52:30,240 --> 03:52:34,320
सके, किस्सा चल सके। है ना? ये जो

3422
03:52:34,320 --> 03:52:38,400
जिस कारण से इनका तो कारण है कि इनका जो ईश्वर है वो तो बौद्धों

3423
03:52:38,400 --> 03:52:42,480
के जैसा है। अगर उसको ईश्वर ना कह के प्रकृति कह दोगे तो क्या हो गया? ना तो

3424
03:52:42,480 --> 03:52:46,560
वो उसका उसको तो करना ही है सृष्टि का निर्माण

3425
03:52:46,560 --> 03:52:50,560
उसको करना है और करने के बाद क्या करना है कि वो किसी

3426
03:52:50,560 --> 03:52:54,640
में हस्तक्षेप नहीं कर सकता कुछ नहीं कर सकता मशीन की तरह काम करने वाला है इनका

3427
03:52:54,640 --> 03:52:58,880
ईश्वर तो जब वो उसका कुछ वो हस्तक्षेप नहीं कुछ नहीं है ना वो मांगने से देगा

3428
03:52:58,880 --> 03:53:02,880
ना वो प्रार्थना से देगा तो उसको क्यों नहीं क्यों ईश्वर कहा जाए

3429
03:53:02,880 --> 03:53:06,960
उसको केवल एक सिस्टम क्यों ना कहा कह दिया जाए सिस्टम है जो काम कर

3430
03:53:06,960 --> 03:53:11,280
रहा है अपना बस उससे हमारी भावनाएं कैसे जुड़ सकती है

3431
03:53:11,280 --> 03:53:15,280
वेदों में तत्वचार महावाक्य है। वह महावाक्य को भी स्वीकार नहीं करते। हम

3432
03:53:15,280 --> 03:53:19,520
ब्रह्मास्मि को भी स्वीकार नहीं करते। हम लोग ईश्वर कैसे हो सकते हैं? अगर समाधि

3433
03:53:19,520 --> 03:53:25,520
में लगाते तो हम लोग ईश्वर हो सकते हैं। क्यों नहीं? वो अलग विषय है।

3434
03:53:26,480 --> 03:53:30,480
जी जी अलग विषय हो जाएगा। तो ये क्या

3435
03:53:30,480 --> 03:53:34,720
कहते हैं? जी शास्त्रवाद जी बोले

3436
03:53:34,720 --> 03:53:40,720
जय श्री राम।

3437
03:53:40,720 --> 03:53:45,840
जय श्री राम भैया। कैसी लगी चर्चा?

3438
03:53:45,840 --> 03:53:50,320
चर्चा तो बहुत बढ़िया थी आज की। एकदम धीरे-धीरे एकदम

3439
03:53:50,320 --> 03:53:54,800
सॉफ्टली सब चर्चा हो रहा था। लेकिन अंत आते आते तक

3440
03:53:54,800 --> 03:53:58,880
सब वो तो वो होना ही वो होना ही था।

3441
03:53:58,880 --> 03:54:02,880
क्योंकि वो व्यक्ति ऐसे जाने वाला तो था नहीं कि चुप होके जाए। समझ रहे

3442
03:54:02,880 --> 03:54:06,960
हैं? जिसके अंदर सत्य को ग्रहण करने का भाव होगा वो ऐसा करेगा। मगर आप

3443
03:54:06,960 --> 03:54:10,320
ऐसी उम्मीद ऐसी अपेक्षा

3444
03:54:10,320 --> 03:54:14,800
समाधियों से अलंकारियों से कैसे कर सकते हैं?

3445
03:54:14,800 --> 03:54:18,800
जी अरे वो अपनी जो ज्ञान है ना उसको दिखाने

3446
03:54:18,800 --> 03:54:22,880
के चलते हमें अपने आप को ज्यादा विद्वान समझने के

3447
03:54:22,880 --> 03:54:26,880
नहीं वो थोड़ा सा हां आभास हो रहा था होता

3448
03:54:26,880 --> 03:54:31,040
है मतलब वो कभी-कभी बीच-बीच में एक बार तो मेरी भी हंसी छूट गई थी जब

3449
03:54:31,040 --> 03:54:35,280
वो जब वापस हमने जब ट्रैक पे आ गए थे फिर भी उसने

3450
03:54:35,280 --> 03:54:39,360
थोड़ा वेस्ट करा था शिव जी भी मुस्कुरा दिए थे मेरे को तो हंसी आ गई थी मैं समझ

3451
03:54:39,360 --> 03:54:41,680
गया था कि वो फिर से वही फोक करने वाली

3452
03:54:41,680 --> 03:54:45,680
चीज है लेकिन ठीक है फिर कंट्रोल हो गया था उस टाइम पे इस टाइम शिवा जी ने कुछ रिएक्ट नहीं

3453
03:54:45,680 --> 03:54:50,480
करा था और मैं हंस के टाल दिया था फिर वो मूव ऑन कर लेकिन फिर वापस वो उस पे आ गया

3454
03:54:50,480 --> 03:54:54,480
वो रहता है थोड़ा सा कभी-कभी ऐसा हो वो वो कहीं-कहीं

3455
03:54:54,480 --> 03:54:58,640
पे जहांजहां पे पक्ष कमजोर हो रहा था वो पो कर रहा था जैसे कि यही लेना

3456
03:54:58,640 --> 03:55:02,800
कि बिना शरीर के सीता माता से विवाह कर सकते हैं ये भी ऐसा विषय

3457
03:55:02,800 --> 03:55:08,320
है इसकी बजाय कोई और उदाहरण नहीं मिला था कई उदाहरण है जो

3458
03:55:08,320 --> 03:55:12,560
वही ईश्वर पत्थर एक उदाहरण है बहुत सी चीजें हैं ना

3459
03:55:12,560 --> 03:55:17,760
सब मालूम है इन्हें मगर ऐसा ही उदाहरण करेंगे जिसमें हमारी भावनाएं आहत हो

3460
03:55:17,760 --> 03:55:21,920
क्योंकि इनको साथ में छेड़ते भी चलना है और हम बैठे हैं अपने

3461
03:55:21,920 --> 03:55:26,000
सत्य के साथ कि भाई हमें कोई अन्याय नहीं है मन में कोई राग

3462
03:55:26,000 --> 03:55:30,080
द्वेष नहीं है व्यक्ति सामने से क्वेश्चन करता जाएगा लॉजिकल मैं उसका जवाब

3463
03:55:30,080 --> 03:55:34,080
देता जाऊंगा लॉजिकल अच्छा मैं आपको बताना चाहता हूं तो

3464
03:55:34,080 --> 03:55:38,080
मैं बताऊंगा यहां लॉजिकल नहीं है अच्छा शिवश भाई ये अपना ऋषि

3465
03:55:38,080 --> 03:55:42,160
मंतव्य चैनल पे आपका मतलब शिवश की धुलाई अभी लाइव चल

3466
03:55:42,160 --> 03:55:46,960
रहा उनका ये बहुत गलत कर रहे हैं ये लोग मतलब उनका पूर्व

3467
03:55:46,960 --> 03:55:51,040
विचार के लेकर के वो तो मैंने अभी अभी बताया ना आपको वहां लाइव शुरू

3468
03:55:51,040 --> 03:55:55,360
हो गया वो पहले से तैयार होगा ये लोग पूरा

3469
03:55:55,360 --> 03:55:56,720
पूर्वाग्रह ले आते हैं कि

3470
03:55:56,720 --> 03:56:00,960
इनको मतलब बेेजज्जती करनी है जो प्लानिंग प्लॉटिंग के साथ सनातन

3471
03:56:00,960 --> 03:56:05,040
सिद्धांत सनातन सिद्धांत धर्म रक्षा इत्यादि

3472
03:56:05,040 --> 03:56:09,280
इनके विषय नहीं है। कितनी बार गए हैं निर्भया आर्य लड़ने के लिए बाहर

3473
03:56:09,280 --> 03:56:13,440
ग्राउंड पर क्या किया इन्होंने और जितने जितने चर्चा कर रहे हैं बैठकर

3474
03:56:13,440 --> 03:56:18,640
के इन्होंने क्या धरातल पर काम किया है नथिंग

3475
03:56:18,640 --> 03:56:22,720
केवल ऑनलाइन शेयर है धर्म अनुष्ठान इनके शून्य

3476
03:56:22,720 --> 03:56:26,880
है बस धर्मांतरण करना है सबको आर्य नमाजी बनाना है तभी तो आर्य

3477
03:56:26,880 --> 03:56:30,880
नमाजी इनको बोला गया है जैसे कि मुसलमान को धर्म अनुष्ठान ना

3478
03:56:30,880 --> 03:56:34,880
बोले नमाजी ना बोले जी जी जी इनका लक्ष्य धर्म अनुष्ठान है ही नहीं

3479
03:56:34,880 --> 03:56:39,200
ना धरातल में धरातल में काम करना इनको इतनी अच्छाई

3480
03:56:39,200 --> 03:56:43,200
तो समाजियों में है ना कि वो कट्टर विरोध करते

3481
03:56:43,200 --> 03:56:47,680
हैं। इस्लाम का विरोध करते हैं। इतनी बात अप्रिशिएट

3482
03:56:47,680 --> 03:56:51,840
करने वाली है भाई। इसमें कोई दो राय नहीं है। कट्टर विरोधी है। हालांकि

3483
03:56:51,840 --> 03:56:55,840
सिद्धांत उन्हीं के दे देते हैं। मूर्ति पूजा नहीं हो सकती।

3484
03:56:55,840 --> 03:56:59,840
जो वो चाहते हैं मूर्ति पूजा बंद करना उसमें सहायता कर देते। वो एक

3485
03:56:59,840 --> 03:57:04,080
पक्ष अलग है। मगर वाचिक प्रतिकार तो करते ही हैं।

3486
03:57:04,080 --> 03:57:08,080
और ऑनलाइन के शेर भी तो यह काम कर ही रहे हैं ना। इधर-उधर चेहरा

3487
03:57:08,080 --> 03:57:11,840
छुपा के गाली गलौज करना ये सब कर रहे हैं। तो कट्टर

3488
03:57:11,840 --> 03:57:15,920
विरोध तो दिखता है। हालांकि ये मर्यादा को उल्लंघन करके नहीं करना चाहिए। तो नमाजी

3489
03:57:15,920 --> 03:57:20,960
कहना उचित नहीं है। भटके हुए अपने ही भाई है। ठीक है।

3490
03:57:20,960 --> 03:57:25,120
जी जी पर काफी यज्ञ पवित्र संस्कार के बारे में भी काफी ये लोग उटांग

3491
03:57:25,120 --> 03:57:29,200
चारों वर्ण एक ही है। कोई भी नया अंतत आता

3492
03:57:29,200 --> 03:57:33,360
है चौथा वर्ण वाला बोले बेटा क्या बनना चाहेगा? क्षत्रिय बनना चाहेगा या ब्राह्मण

3493
03:57:33,360 --> 03:57:37,760
बनना चाहेगा? वो डर के मारे क्षत्रिय बोल देता है नहीं नहीं हम लोग क्षत्रिय बनेंगे।

3494
03:57:37,760 --> 03:57:41,840
उसको डांटते हैं। एक बात याद आई इनके विवाह पद्धति से रिलेटेड

3495
03:57:41,840 --> 03:57:45,920
एक बात आई बस ज्यादा समय नहीं लेंगे। चार घंटे होने वाले हैं। इनकी विवाह पद्धति

3496
03:57:45,920 --> 03:57:50,000
से एक बात याद आई कि जो आर्य समाजी है उसका

3497
03:57:50,000 --> 03:57:54,160
विवाह वहां पर हो रहा है। तो वो तो ठीक है। यह बात अटकी थी ना एक बार चर्चा में। अब

3498
03:57:54,160 --> 03:57:58,160
इनके लोग कहते हैं विवाह करने के लिए संपर्क करें। वो चलता है विवाह

3499
03:57:58,160 --> 03:58:02,720
कराते हैं ये और एक तरफ को ये कट्टर विरोधी बनते हैं जिहाद के।

3500
03:58:02,720 --> 03:58:06,960
अब बात वहां पर यह आती है दिक्कत कि जो व्यक्ति अभी अभी इनके

3501
03:58:06,960 --> 03:58:10,960
यहां पहुंचा क्या वो इसका उसका जनेऊ करा

3502
03:58:10,960 --> 03:58:15,040
करके विवाह कराते हैं जनेऊ धारी का विवाह

3503
03:58:15,040 --> 03:58:19,200
होता है जनेऊ करा के कराते हैं कराते हैं तो उसके पैराटर्स क्या होते हैं

3504
03:58:19,200 --> 03:58:23,280
क्या क्या समझते हैं वहां आचरण से ज्ञान से कैसे समझते हैं कि

3505
03:58:23,280 --> 03:58:27,120
ये ब्राह्मण है कि नहीं और अगर जनेऊ करा के नहीं कराते

3506
03:58:27,120 --> 03:58:31,360
तो क्या वो वहां पर ये मेंशन करते हैं ये शूद्र का विवाह

3507
03:58:31,360 --> 03:58:36,000
हमारे यहां हुआ है क्योंकि जनेऊ नहीं तो शद्र है ना

3508
03:58:36,000 --> 03:58:40,160
तो यानी कि माना जाएगा जितने भी भागे भागे भागने वाले लोग और इनके

3509
03:58:40,160 --> 03:58:44,240
यहां करते हैं तो अगर सैद्धांतिक धरातल पे देखा जाए तो सब के सब शूद्र

3510
03:58:44,240 --> 03:58:48,240
होते हैं क्योंकि मुझे नहीं लगता है किसी का जनेऊ कराते होंगे अगर जनेऊ कराते

3511
03:58:48,240 --> 03:58:52,240
हैं तो फिर वहां पे भी दिक्कत है कि कैसे करा रहे हैं भैया आपने उसी

3512
03:58:52,240 --> 03:58:56,240
समय देख लिया कि इसके आचरण कैसे सब कुछ देख लिया एक दिन

3513
03:58:56,240 --> 03:59:00,320
के अंदर अंदर ब्याह हो जाता है आज जाके फॉर्म भरो कल ब्याह कर लो आज भी

3514
03:59:00,320 --> 03:59:03,680
भर सकते हो

3515
03:59:03,680 --> 03:59:07,760
और मैंने इनके रायपुर वाले मंदिर में देखा वहां आदि शंकराचार्य जी विवेकानंद जी इनकी

3516
03:59:07,760 --> 03:59:12,640
भी फोटो लगी है। क्या है भाई?

3517
03:59:12,640 --> 03:59:16,800
चलिए कहीं का रोड़ा कहीं का ईटा भानुमती ने कुबा

3518
03:59:16,800 --> 03:59:20,960
जोड़ा यही चल रहा है। चलिए वो हर्ष

3519
03:59:20,960 --> 03:59:26,960
जी आपको और कुछ कहना है?

3520
03:59:28,000 --> 03:59:32,240
ये कह रहे थे हम कि यह जो बिना

3521
03:59:32,240 --> 03:59:36,480
शरीर का विवाह वाला जो बात वो हो रहा था ना राम जी का

3522
03:59:36,480 --> 03:59:40,480
तो इस तो ये व्यवहार का विषय है ना विवाह जो है व्यवहार का विषय है

3523
03:59:40,480 --> 03:59:44,560
और जब व्यवहार का विषय है तो संसार में आएगा

3524
03:59:44,560 --> 03:59:48,880
मैंने मैंने बोली थी मैंने बोली

3525
03:59:48,880 --> 03:59:52,960
थी ये बात मैंने बोली थी विवाह होता क्या है ये बता दो तो तो उसने कह दिया कि हां वो

3526
03:59:52,960 --> 03:59:57,440
आप मानते हो ना नहीं हो सकता हां हां सही बात है नहीं हो सकता भाई विवाह को अगर एक्सप्लोर करोगे

3527
03:59:57,440 --> 04:00:02,000
तो यही तो आएगा कि दो स्त्री और पुरुष आपस में विवाह करते हैं

3528
04:00:02,000 --> 04:00:06,080
तो पहले आप विवाह को तो आपने विवाह में उसको

3529
04:00:06,080 --> 04:00:10,080
पूछा नहीं बोला नहीं कि पहले तुम ये बताओ विवाह कहते किसे हैं हां पूछा था

3530
04:00:10,080 --> 04:00:14,240
वो जब वो आगे बढ़ना चाहता था कि मतलब ऐसा कुछ है ना जो वो जो

3531
04:00:14,240 --> 04:00:18,560
वो दिखा नहीं सकता मतलब पॉइंट्स उसको क्लियर करना पड़ेगा ना उसी में ही उसको मिल जाता है व्यवहार

3532
04:00:18,560 --> 04:00:19,060
उसमें

3533
04:00:19,040 --> 04:00:23,040
मैंने पूछा था विवाह कहते किसे हैं आप यही बताओ पहले तो वो ये बोला

3534
04:00:23,040 --> 04:00:27,040
वो ये बोल के आगे आगे बढ़ गया कि भाई यानी कि आप यह मान रहे हो ना कि कुछ

3535
04:00:27,040 --> 04:00:31,040
ऐसी चीजें हैं जो वो दिखा नहीं कर सिद्ध नहीं मतलब वो आपको व्यवहारिक रूप

3536
04:00:31,040 --> 04:00:35,280
से नहीं दिखा सकता है प्रकट नहीं कर सकता ये उत्तर नहीं है इसका ये उत्तर नहीं है मैंने मैंने

3537
04:00:35,280 --> 04:00:39,520
कुछ ऐसी चीजें जब बोला वो तो मैंने कहा दूसरी कुछ ऐसी तो है विवाह

3538
04:00:39,520 --> 04:00:43,520
तो बनता ही नहीं पहले तुम विवाह को सिद्ध करो विवाह होता किस में है क्या बिना

3539
04:00:43,520 --> 04:00:47,680
शरीरधारी में और शरीरधारी में विवाह होता है क्या हां बस

3540
04:00:47,680 --> 04:00:52,640
वही पहले तुम उसको सिद्ध करो वही आर्गुमेंट खत्म हो जाता है ना ये वाला वही

3541
04:00:52,640 --> 04:00:56,720
फिर भी कुछ चीजें तो ऐसी है ना जो लॉजिकल उसमें आ जाती है कि आपको घुमा

3542
04:00:56,720 --> 04:01:00,880
के रख देगी वही पे हमारी कि अगर उसको अगर ये व्यवहार

3543
04:01:00,880 --> 04:01:05,040
और परमार्थ का जो डिस्टिंशन है समझ में आ नहीं उठते ना उसको

3544
04:01:05,040 --> 04:01:09,120
समझना नहीं है उसको उसको जो है ये नहीं है कि

3545
04:01:09,120 --> 04:01:13,200
सत्य की रक्षा करनी है उसको ये है कि भाई कोई आर्य समाज के बारे में दयानंद जी

3546
04:01:13,200 --> 04:01:17,280
के बारे में बोला था मैंने जो है ध्यान देखो इतनी चीज में उसको ये जो है उसको

3547
04:01:17,280 --> 04:01:21,440
पंचा पूछा ये नहीं आता उसको वही भव्य राधा कृष्ण दास वाली बात बताई

3548
04:01:21,440 --> 04:01:25,440
थी वो भी यही था वो हमारी साइड का व्यक्ति था। मगर

3549
04:01:25,440 --> 04:01:29,440
भव्य राधा कृष्ण दास ने वहां पर तर्क दिया। अच्छा लगा। मगर वहां से

3550
04:01:29,440 --> 04:01:33,440
वो व्यक्ति जो है वो बात ना करनी उसको शब्द जाल में

3551
04:01:33,440 --> 04:01:34,160
फसा रहा है। भ

3552
04:01:34,160 --> 04:01:38,800
राधा कृष्ण दास ने ये वाला शास्त्र नहीं पढ़ा होगा। तो यहां के शब्द उठा के दे।

3553
04:01:38,800 --> 04:01:42,960
अरे भैया ऐसे बहुत कुछ चीजें हो सकती है जो तुमने नहीं पढ़ी। हमने पढ़ी होंगी।

3554
04:01:42,960 --> 04:01:47,040
हम यहां ये करने नहीं आए ना कि तुमने क्या पढ़ा है, क्या नहीं पढ़ा है।

3555
04:01:47,040 --> 04:01:52,480
आपको उसका जो अर्थ प्राप्त हुआ है वो हमें बताओ। हम आपको बताएंगे।

3556
04:01:52,480 --> 04:01:56,560
चलिए ठीक है सभी को जय श्री राम। बहुत अच्छा लगा आप लोग जुड़े और

3557
04:01:56,560 --> 04:02:00,560
आशा करते हैं आप लोगों ने काफी कुछ सीखा होगा और वो

3558
04:02:00,560 --> 04:02:06,000
जो धुलाई कर रहे हैं ऑनलाइन धुलाई उसको भी वो सिद्ध कर दे धुलाई है क्या

3559
04:02:06,000 --> 04:02:10,320
उसको वो धुलाई सिद्ध कर पाई ही नहीं क्या जो लिख रहे हैं धुलाई व्यवहार

3560
04:02:10,320 --> 04:02:14,400
एक और बात है भैया नहीं नहीं वो बहुत ही अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहा है

3561
04:02:14,400 --> 04:02:18,560
यार मैं मैं तो छोड़ो मुझे

3562
04:02:18,560 --> 04:02:22,720
लोगों ने बताइए आप यहां मंच मंच पे मत बोलिए वो सब बातें वो क्या कर रहे हैं

3563
04:02:22,720 --> 04:02:26,880
बताइए हां नहीं नहीं मुझे बताया किसी ने मतलब मैं

3564
04:02:26,880 --> 04:02:32,240
देखा नहीं है मैंने अभी देखूंगा तो पूछूंगा अच्छी बात अरे करने दो ना

3565
04:02:32,240 --> 04:02:36,320
करने दो करने दो अभी हमारे पास काफी चीजें हैं

3566
04:02:36,320 --> 04:02:40,480
उनकी पहचान है वो कौन है शास्त्रवाद चैनल वो

3567
04:02:40,480 --> 04:02:45,040
चलाते हैं इन सब बातों में प्रमाण है हमारे पास उनके है ना

3568
04:02:45,040 --> 04:02:49,040
तो एक बार सावधान कोई

3569
04:02:49,040 --> 04:02:49,540
कोई

3570
04:02:49,280 --> 04:02:53,360
सुन रहा है कोई अगर जिसने बताया व्यक्ति एक बार उनको सावधान कर दे क्योंकि वो

3571
04:02:53,360 --> 04:02:57,360
अच्छी शब्द के प्रयोग नहीं हो रहे हैं वहां पर। ठीक है। मुझे

3572
04:02:57,360 --> 04:03:01,840
सुनने में शास्त्रवाद जी आप अपनी बात बोले। जी

3573
04:03:01,840 --> 04:03:05,920
भैया कह रहे थे कि ये जो ये लोग मानते हैं ना कि अगर ईश्वर

3574
04:03:05,920 --> 04:03:09,920
साकार हो गया तो फिर उसका सर्व व्यापकता पे प्रश्न चिन्ह आ

3575
04:03:09,920 --> 04:03:13,920
जाता है। तो इसका उत्तर तो आप बहुत अच्छा से दिए थे वो खिड़की और

3576
04:03:13,920 --> 04:03:18,640
आकाश वाला। लेकिन उसको भी वो प्रकृति वाला मान करके

3577
04:03:18,640 --> 04:03:22,640
खिड़की का ही आकार बता करके वह उसको डिनाई कर रहा था कि उसका आकार नहीं आया। वो

3578
04:03:22,640 --> 04:03:26,960
व्यक्ति को दिख रहा है। है ना? तो बात

3579
04:03:26,960 --> 04:03:30,960
यही है कि अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है वो वीडियो आई

3580
04:03:30,960 --> 04:03:35,760
थिंक नेटवर्क इशू है कुछ चले गए हैं वो जब वो अवसर ले सकता है

3581
04:03:35,760 --> 04:03:39,760
हां जब वो जब वो जो है

3582
04:03:39,760 --> 04:03:43,840
सर्वव्यापक है तो फिर वो कहीं पर भी प्रकट हो सकता है ना

3583
04:03:43,840 --> 04:03:47,840
सभी रूपों में तो वही है ना तो वो कहीं भी प्रकट हो सकता है और

3584
04:03:47,840 --> 04:03:51,840
अपनी सर्वशक्ति मत्ता से वो किसी का हाथों का विषय भी बन

3585
04:03:51,840 --> 04:03:56,000
सकता है तो फिर ये इसमें प्राकृतिक नियम जो व्यक्ति सामान्य व्यक्ति

3586
04:03:56,000 --> 04:04:00,480
पर लागू होते हैं कि हम नहीं देख सकते या वह नहीं देख सकते तो

3587
04:04:00,480 --> 04:04:04,560
वह आंखों का विषय ना होते हुए भी आंखों का विषय बन सकने का सामर्थ प्रदान करके

3588
04:04:04,560 --> 04:04:08,640
अपने आप को दिखवा भी सकते हैं। तो यह सामर्थ्यता पर जब बात आती

3589
04:04:08,640 --> 04:04:12,720
है तो फिर वह कहने लगता है कि यह प्रकृति का जो है

3590
04:04:12,720 --> 04:04:17,200
हम लोग देखेंगे कैसे जब वो निराकार देखेगी कैसे प्रकार की बातें

3591
04:04:17,200 --> 04:04:21,360
है ना बात ये है कि हमने जब उसको मैं बताऊं

3592
04:04:21,360 --> 04:04:25,440
उसका वीक पॉइंट क्या था मुझे लगता है कि उसने अविद्या शक्ति वाली बात

3593
04:04:25,440 --> 04:04:29,520
की तैयारी नहीं की थी और तैयारी हो भी नहीं सकती करेंगे

3594
04:04:29,520 --> 04:04:34,000
क्या मगर की ही नहीं थी इसलिए जल्दी थोड़ी बहुत की होती तो थोड़ा बहुत वहां रुकता

3595
04:04:34,000 --> 04:04:38,560
मगर उसने बिल्कुल की ही नहीं थी तो तुरंत जंप मार के उसमें आ गया लक्षण बताइए

3596
04:04:38,560 --> 04:04:42,880
कौन वो है कौन नहीं है ठीक है तो

3597
04:04:42,880 --> 04:04:46,880
अविद्या शक्ति की तैयारी उसने नहीं की और अविद्या शक्ति इन

3598
04:04:46,880 --> 04:04:51,200
सब चीजों में काम आती है कि एक रस ईश्वर सगुण कैसे हो रहा है निर्गुण

3599
04:04:51,200 --> 04:04:55,440
ईश्वर सगुण कैसे हो रहा है और जैसे ही आप निर्गुण का अवतार सगुण

3600
04:04:55,440 --> 04:04:59,520
मानोगे तो फिर सगुण का अवतार मानने में आगे क्या दिक्कत है और रही बात शब्द प्रमाण की

3601
04:04:59,520 --> 04:05:05,520
भर भर के हमारे पास फिर परंपरा की बात आ जाएगी

3602
04:05:06,640 --> 04:05:10,720
तो फिर भैया जो राम कृष्ण आदि जो रूप है ईश्वर के इन्हें जो कहा जाता

3603
04:05:10,720 --> 04:05:14,720
है नित्य भी है कई शास्त्रों में इन्हें नित्य कहा गया है वो है ही ईश्वर तो नित्य

3604
04:05:14,720 --> 04:05:18,880
है कि वो ब्रह्म स्वरूप में सदा विद्यमान है राम और कृष्ण के रूप में लेकिन

3605
04:05:18,880 --> 04:05:24,880
उनका जो उनका स्वरूप है

3606
04:05:25,440 --> 04:05:29,760
हो गए ड्रॉप हो गए नारायण चलिए

3607
04:05:29,760 --> 04:05:34,800
काफी देर हो चुकी है कहां चले गए

3608
04:05:34,800 --> 04:05:39,360
ड्रॉप हो गए। ठीक है। फिर चलिए ठीक है। फिर जुड़ेंगे

3609
04:05:39,360 --> 04:05:43,440
हर जी की कोई बात थी वो रह गई है। चलिए सब चर्चा से

3610
04:05:43,440 --> 04:05:47,680
जुड़ने के लिए सभी का आभार और सभी को आज इस चर्चा से काफी कुछ सीखने

3611
04:05:47,680 --> 04:05:52,240
को मिला होगा। मुझे लगा था कि ये बात तो मुझे

3612
04:05:52,240 --> 04:05:56,320
थी। बहुत अनुमानित था यह चर्चा एंड कैसे

3613
04:05:56,320 --> 04:06:00,640
होगी। चाहे जितना सौहार्दपूर्ण चले। एंड जो है उसी तरह से होगी

3614
04:06:00,640 --> 04:06:03,760
कि जो है

3615
04:06:03,760 --> 04:06:07,760
ये क्या कहते हैं? एंड उसी तरह से होगी कि भाई वो आखिर में

3616
04:06:07,760 --> 04:06:12,480
कुछ ऐसी चीजें होगी कि हमें उसे निकालना पड़ेगा। ये हमें मालूम था। ठीक है। चलिए

3617
04:06:12,480 --> 04:06:16,480
ठीक है। जय श्री राम पीतांग जी जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय

3618
04:06:16,480 --> 04:06:22,480
श्री राम। जय श्री राम। ब्रह्मचारी जी।

3619
04:06:29,420 --> 04:06:33,420
[संगीत]
