1
00:00:02,000 --> 00:00:06,080
सभी को जय श्री राम और आशा करते हैं

2
00:00:06,080 --> 00:00:10,080
आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। हमारे साथ आज बहुत

3
00:00:10,080 --> 00:00:14,160
ही आदरणीय अतिथि हैं यहां पर जो हमारे साथ

4
00:00:14,160 --> 00:00:18,320
चर्चा करने वाले हैं जो इटावा का प्रकरण हुआ है और उसके नाम पर

5
00:00:18,320 --> 00:00:22,480
जो राजनीतिक रोटियां सेकी जा रही हैं। तो हम सबसे पहले आचार्य

6
00:00:22,480 --> 00:00:28,480
श्री को ले लेते हैं। आचार्य ज्ञानेंद्र शर्मा जी

7
00:00:33,120 --> 00:00:39,120
चश आचार्य श्री जय हो भैया जय हो जयस्तु

8
00:00:40,000 --> 00:00:45,280
आचार्य श्री आपके चरणों में एक बार पुनः दंडवत

9
00:00:45,280 --> 00:00:49,280
प्रणाम निवेदित करते हुए और इस समय

10
00:00:49,280 --> 00:00:53,520
जो प्रासंगिक एक विवाद बहुत ही गर्म है जैसा

11
00:00:53,520 --> 00:00:57,520
आपको बताया भी था मैंने कि एक चर्चा हम रखना चाहते इस

12
00:00:57,520 --> 00:01:01,520
चैनल पर और जो इटावा वाला विवाद चल

13
00:01:01,520 --> 00:01:05,680
रहा है उस पर हम चर्चा करने वाले हैं। और मैं एक बात दर्शकों को बता दूं

14
00:01:05,680 --> 00:01:11,120
कि आचार्य श्री ने अपने चैनल पर बहुत ही टू द पॉइंट कुछ

15
00:01:11,120 --> 00:01:15,280
आवश्यक जानकारियां वहां पर प्रोवाइड कराई हैं जो ये वर्ण व्यवस्था

16
00:01:15,280 --> 00:01:19,280
से रिलेटेड है। वर्ण व्यवस्था पर कई प्रकार के तर्क

17
00:01:19,280 --> 00:01:23,680
और प्रमाण इस चैनल पर ही हम कई बार देख चुके हैं और पूर्व में

18
00:01:23,680 --> 00:01:27,680
आचार्य श्री जैसे मर्मज्ञ जो धर्म के ज्ञाता हैं उन लोगों

19
00:01:27,680 --> 00:01:31,760
ने भी अपने अपने चैनल पर बहुत से वीडियोस के माध्यम से तर्क

20
00:01:31,760 --> 00:01:36,320
और प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। इस संबंध में एक

21
00:01:36,320 --> 00:01:40,800
पार्ट आता है एक कि भाई कुछ लोग यह कहने लगते हैं कि फलाने वो

22
00:01:40,800 --> 00:01:45,040
जो इस पर हम बात करेंगे कि जो ग्रंथकार थे वह

23
00:01:45,040 --> 00:01:49,120
ब्राह्मण नहीं थे। या वह भागवत वक्ता थे, वह ब्राह्मण नहीं थे।

24
00:01:49,120 --> 00:01:54,400
इस तरह के वो कुतर्क करने का प्रयास करते हैं। तो उस समय भी हम लोग

25
00:01:54,400 --> 00:01:55,280
एक

26
00:01:55,280 --> 00:01:59,440
व्यवस्थित आज चर्चा देखने वाले हैं। तो सबसे पहले तो हम एक

27
00:01:59,440 --> 00:02:05,040
बार थोड़ा सा एक रिककैप कर ले कि विवाद क्या था।

28
00:02:05,040 --> 00:02:09,120
विवाद यह दिखाया गया है क्योंकि हमने अपने एक वीडियो में आचार्य श्री ये

29
00:02:09,120 --> 00:02:13,360
बताया है दर्शकों को कि यह पूरा जो

30
00:02:13,360 --> 00:02:17,600
विवाद है यह प्रायोजित है। प्रायोजित

31
00:02:17,600 --> 00:02:21,680
अर्थात एक विवाद बनाया गया

32
00:02:21,680 --> 00:02:26,000
जैसे ऐसे लग रहा है क्योंकि जो एक कथा

33
00:02:26,000 --> 00:02:30,000
वक्ता है जो कहीं पर कथा बोल रहा

34
00:02:30,000 --> 00:02:34,080
है और वो पिछले 16 सालों से कथा बोल

35
00:02:34,080 --> 00:02:38,080
रहा था अनेक मंचों पे और जहां पर उसका अपमान होने की

36
00:02:38,080 --> 00:02:42,080
घटना दिखाई जा रही है वहां पर भी उसने एक महीने पूर्व ही कथा बोली

37
00:02:42,080 --> 00:02:46,080
है तो जो आयोजक है जो ये जो ऐसा दिखाया

38
00:02:46,080 --> 00:02:50,400
जा रहा है कि आयोजकों के द्वारा उसको पीटा गया या उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया

39
00:02:50,400 --> 00:02:54,400
अपमान किया गया उन आयोजकों को क्या वो एक महीने पहले

40
00:02:54,400 --> 00:02:58,400
जो कथा हुई थी तब नहीं पता था कि ये ब्राह्मण नहीं है यादव नहीं है जो

41
00:02:58,400 --> 00:03:02,560
व्यक्ति 16 साल से कथा कर रहा है उसके बारे में आपको 16

42
00:03:02,560 --> 00:03:07,440
वर्ष लग गए जानने में कि ये ब्राह्मण नहीं है ये यादव है

43
00:03:07,440 --> 00:03:10,320
तो इससे और फिर घटना के

44
00:03:10,320 --> 00:03:14,400
तुरंत बाद राजनीतिक पार्टियों का उसमें कूद पड़ना उसको जाति

45
00:03:14,400 --> 00:03:18,480
जातिवाद के रूप में घृणा मूलक जातिवाद के रूप में प्रचारित करते हुए जो व्यवस्था

46
00:03:18,480 --> 00:03:22,560
मूलक हमारा वर्णाश्रम धर्म है उस पर आघात करना

47
00:03:22,560 --> 00:03:27,840
उसको जो है उसका प्रतिकार करना तो

48
00:03:27,840 --> 00:03:31,920
ये पूरी घटना इस तरह से प्रायोजित दिखती है और भी कई सारे इसके पहलू है जिस

49
00:03:31,920 --> 00:03:35,920
पर हमने पूर्व में भी बात की आज भी बात करेंगे तो इसको आचार्य

50
00:03:35,920 --> 00:03:39,920
श्री कैसे देखते हैं मुझे लगता है सत्येंद्र आचार्य सत्येंद्र

51
00:03:39,920 --> 00:03:43,360
जी भी आ गए हैं

52
00:03:43,360 --> 00:03:47,360
चरण स्पर्श आचार्य श्री सत्येंद्र

53
00:03:47,360 --> 00:03:52,160
पाठक जी भी हमारे साथ में है और

54
00:03:52,160 --> 00:03:56,480
संभवत उन्होंने अभी तक जो पृष्ठभूमि हमने तैयार की है वो

55
00:03:56,480 --> 00:04:00,320
सुनी होगी आचार्य श्री ने

56
00:04:00,320 --> 00:04:04,560
हां जी और दोनों ही

57
00:04:04,560 --> 00:04:08,880
हमारे धर्म के ज्ञाता हैं मर्मज्ञ हैं। तो आज इनकी

58
00:04:08,880 --> 00:04:12,880
मुख से इनकी वाणी से जो दिव्य वाणी इनके गुरु मुख से

59
00:04:12,880 --> 00:04:16,880
हम आज इस ये जो विवाद चल रहा है इसकी समीक्षा पर

60
00:04:16,880 --> 00:04:21,040
दृष्टि डालेंगे तो सबसे पहले मैं पुनः

61
00:04:21,040 --> 00:04:25,200
जो आचार्य ज्ञान जी है उनके उनके पास वापस लौटता हूं। थोड़ा सा मैं

62
00:04:25,200 --> 00:04:25,700
कहता

63
00:04:25,440 --> 00:04:29,520
हूं कि इस विवाद पर जो आपका जो दृष्टिकोण उसको

64
00:04:29,520 --> 00:04:35,520
थोड़ा सा इस विवाद पर अपने दृष्टिकोण से प्रकाश डाल दीजिए आप।

65
00:04:36,960 --> 00:04:41,120
देखो [संगीत]

66
00:04:41,120 --> 00:04:45,520
वागदेव विद्महे कामराजाय धीमहि

67
00:04:45,520 --> 00:04:51,520
तन्न सरस्वती प्रचोदयात

68
00:04:52,240 --> 00:04:56,240
बाद संवाद होता है तो वादे वादे

69
00:04:56,240 --> 00:05:00,320
जा तत्व बोधा बाद संवाद से कोई तत्व

70
00:05:00,320 --> 00:05:04,320
का बोध होता है यह जो यह जो प्रसंग

71
00:05:04,320 --> 00:05:08,320
चल रहा है तो वाद संवाद ना हो के

72
00:05:08,320 --> 00:05:13,040
एक दूसरा इसका वो होता है जलवाद

73
00:05:13,040 --> 00:05:17,120
जलवाद का बात जलवाद उसको कहते हैं जो

74
00:05:17,120 --> 00:05:21,360
हम कह रहे हैं वही सही है आजकल जो अपना

75
00:05:21,360 --> 00:05:25,360
जो उनका पक्ष लेकर के विषयांतर

76
00:05:25,360 --> 00:05:30,320
करके किसी ना किसी ढंग से जो है

77
00:05:30,320 --> 00:05:34,480
एक जाति को आधार मान करके उसका

78
00:05:34,480 --> 00:05:38,960
अपमान कर रहे हैं। तो जलपवाद है वह

79
00:05:38,960 --> 00:05:40,480
किसी की सुन रही सुन नहीं रहे हैं।

80
00:05:40,480 --> 00:05:45,040
वो अपनी कह रहे हैं। यदि दोनों पक्ष

81
00:05:45,040 --> 00:05:49,280
बैठकर के बात हो तो कहीं कुछ है ही नहीं।

82
00:05:49,280 --> 00:05:53,440
जैसे खरगोश से सिंह नहीं होती है ना वैसी स्थिति है। ये इस

83
00:05:53,440 --> 00:05:57,440
बंध्या सुता सत्संग धनुर्धरा कोई कहता है कि

84
00:05:57,440 --> 00:06:01,600
भाई पुत्र किसका जाता है कि ये जो बंध्या का पुत्र है अरे

85
00:06:01,600 --> 00:06:05,600
जो धनुर्धर है। धनुष किसका है? खरगोश

86
00:06:05,600 --> 00:06:09,760
सिंह का है। अरे वो दूध किसका पी रहे हो? कछुआ का दूध पी

87
00:06:09,760 --> 00:06:14,160
रहे हैं। अरे माला किसकी पहन रहे हो कि आकाश के कुसुम है। इसी

88
00:06:14,160 --> 00:06:18,400
ढंग से विवाद है। इसके मूल में आप जाओगे

89
00:06:18,400 --> 00:06:22,480
तो कहीं कोई बात है ही नहीं। तो जलपवाद वो अपनी बात कह रहे हैं। किसी

90
00:06:22,480 --> 00:06:26,640
सुन नहीं रहे। तो हमने कहा कि भाई इसके बाद आता

91
00:06:26,640 --> 00:06:29,840
है वितंडावाद।

92
00:06:29,840 --> 00:06:34,000
यह तीसरा पक्ष है। उसका कहना यह है

93
00:06:34,000 --> 00:06:38,640
कि आप सही क्या है?

94
00:06:38,640 --> 00:06:42,720
सही क्या है ये बताओ। तो तीसरा पक्ष ये तो हम भी नहीं जानते

95
00:06:42,720 --> 00:06:47,120
क्या है। तो हमको जलपवाद से विथंडावाद

96
00:06:47,120 --> 00:06:51,200
से आगे निकल के यदि हमारी सोच बढ़ेगी तो इस विषय

97
00:06:51,200 --> 00:06:55,360
को जानेंगे। बाकी यह

98
00:06:55,360 --> 00:07:00,560
जो जैसे वहां थे तो नहीं कोई केवल जैसे

99
00:07:00,560 --> 00:07:04,560
वीडियो के माध्यमों से जिस ढंग से जो है देखने में विषय आ रहा है उसके

100
00:07:04,560 --> 00:07:07,200
अनुसार ही

101
00:07:07,200 --> 00:07:11,600
सबसे पहले यह है कि जो व्यास पीठ है उसकी गरिमा होती है

102
00:07:11,600 --> 00:07:16,000
एक मर्यादा होती है और व्यास

103
00:07:16,000 --> 00:07:20,080
पीठ पर बैठा हुआ जो आचार्य है अथवा जो

104
00:07:20,080 --> 00:07:24,160
विद्वान है उसका सबसे पहले लक्षण ये

105
00:07:24,160 --> 00:07:28,400
है कि आचोति शास्त्रान आचार्य स्थापना दपि

106
00:07:28,400 --> 00:07:34,160
स्वयं आचस्तु तस्माद आचार प्रचक्षते

107
00:07:34,160 --> 00:07:38,800
स्वयं आच शास्त्राण जो शास्त्र है

108
00:07:38,800 --> 00:07:43,040
क्या विधि है क्या निषेध है और

109
00:07:43,040 --> 00:07:47,040
क्या कहना है क्या नहीं कहना है इस सब का चयन करता है कौन

110
00:07:47,040 --> 00:07:51,440
आचार्य चाहे व्यास वेद व्यास जी हो आचार्य हो गुरुकुल

111
00:07:51,440 --> 00:07:55,600
को पढ़ाने वाले हो चुस्तव में शास्त्री

112
00:07:55,600 --> 00:08:00,000
बात है क्या और आचार स्थापना

113
00:08:00,000 --> 00:08:04,240
जो शास्त्रों में बात कही है उस आचार को हमें समाज में स्थापित करना

114
00:08:04,240 --> 00:08:08,560
है। तो श्रीमद् भागवत का जो विषय है जिसके

115
00:08:08,560 --> 00:08:13,200
हम वक्ता हैं उस महात्म में जो विषय लिखा है वो

116
00:08:13,200 --> 00:08:17,200
सही ढंग से हम पर घटता है अथवा नहीं घटता है। तो

117
00:08:17,200 --> 00:08:21,280
भागवत में जो बात कही गई है पुराणों में जो बात कही गई है शास्त्र में जो बात कही गई

118
00:08:21,280 --> 00:08:25,440
है उस बात को हमें समाज में स्थापित करना है। और क्या

119
00:08:25,440 --> 00:08:29,600
स्वयं आचरतेस्तु और वह बात अपने आचरण में भी लानी

120
00:08:29,600 --> 00:08:34,480
है जब जाकर के वह जो है पात्रता बनती है

121
00:08:34,480 --> 00:08:38,960
उसमें कहीं कोई जिसमें श्लोक घटेगा

122
00:08:38,960 --> 00:08:43,280
वो पात्र है नहीं घटेगा तो नहीं पात्र है

123
00:08:43,280 --> 00:08:48,240
वहां पर जो चला कि जो कथा व्यास थे

124
00:08:48,240 --> 00:08:50,080
उन्होंने जो है

125
00:08:50,080 --> 00:08:54,320
उन पर दो आईडी थी एक ब्राह्मण पर थी और

126
00:08:54,320 --> 00:08:58,560
एक जाति परक थी तो ब्राह्मण के यहां उन्होंने

127
00:08:58,560 --> 00:09:02,880
जो है जैसे सुनने में आया है तो परिचय दिया ब्राह्मण

128
00:09:02,880 --> 00:09:08,240
होने का दिया ये नहीं देना चाहिए

129
00:09:08,240 --> 00:09:12,320
ये गलत है यदि ब्राह्मण की इच्छा ब्राह्मण से कराने

130
00:09:12,320 --> 00:09:16,480
की है कराओ तो क्षत्रिय को क्षत्रिय से कराने की है जो जाट

131
00:09:16,480 --> 00:09:20,720
है वो जाट से कराएं कराएं वो इसका निर्णय

132
00:09:20,720 --> 00:09:25,280
तो धर्मराज करेंगे ये निर्णय यहां नहीं होगा। यह तो धर्मराज

133
00:09:25,280 --> 00:09:29,440
के जाकर के होगा कि आपने जो है जो धर्म

134
00:09:29,440 --> 00:09:35,200
का अनुसार जो आपने

135
00:09:35,200 --> 00:09:39,600
धर्म को मान के जो व्यासपीठ

136
00:09:39,600 --> 00:09:44,080
का उपयोग किया है वो धर्म अथवा अधर्म है। तो भगवान धर्मराज है चित्रगुप्त

137
00:09:44,080 --> 00:09:48,080
है ना वो उसका निर्धारण करेंगे जाकर के। उससे बात ऐसा देखने

138
00:09:48,080 --> 00:09:52,080
में मिली के शिख मतलब शिख को काटा

139
00:09:52,080 --> 00:09:56,480
तो यह गलत है। तो पक्ष जो है जैसे सुनने में आता है पक्ष

140
00:09:56,480 --> 00:10:00,480
दोनों ही दोषी हैं। जी और मैं ये समझता

141
00:10:00,480 --> 00:10:05,280
हूं यदि अति उत्साह में वो ना आते। मुझे लगता है कोई

142
00:10:05,280 --> 00:10:09,280
थोड़ा विषय चला है तो अन्य ने लपक लिया है। कुछ असामाजिक तत्व आ

143
00:10:09,280 --> 00:10:13,600
जाते हैं तो आगे का जितना भी प्रसंग है आगे उस असामाजिक

144
00:10:13,600 --> 00:10:17,760
तत्वों के द्वारा ही मुझे मालूम पड़ता है कि उनके द्वारा उठाया गया है। जैसे

145
00:10:17,760 --> 00:10:22,480
आपके द्वारा भी ये बात ध्वनि हो रही है। जी

146
00:10:22,480 --> 00:10:27,040
उसमें उसमें आचार्य श्री ये वाली बात भी है ना कि

147
00:10:27,040 --> 00:10:33,040
पहली बात तो दोनों ही पक्ष दोषी है और दूसरी बात यह है कि

148
00:10:34,560 --> 00:10:38,560
भागवत में ही और अन्य हमारे जो वेद शास्त्र वांगमय

149
00:10:38,560 --> 00:10:42,000
है वैदिक वांगमय है उसमें

150
00:10:42,000 --> 00:10:46,080
किसे ब्राह्मण के रूप में अपने घर पर लेकर आए इस

151
00:10:46,080 --> 00:10:50,240
बारे में भी बहुत व्याख्या दी गई है किसको ब्राह्मण के रूप में आप

152
00:10:50,240 --> 00:10:54,400
स्वीकार करें और उसकी जांच कैसे करें ये भी है ये

153
00:10:54,400 --> 00:10:58,560
भी बताया गया है हम तो जब हम एक तरफ धर्म के

154
00:10:58,560 --> 00:11:02,560
और शास्त्र के इतने बड़े रक्षक बनते हैं कि यदि कोई व्यक्ति

155
00:11:02,560 --> 00:11:06,640
ने अपना नाम बदल करके और व्यास गद्दी को

156
00:11:06,640 --> 00:11:10,720
अपमानित किया या फिर व्यास गद्दी को विकृत किया या फिर भागवत

157
00:11:10,720 --> 00:11:15,040
को विकृत किया और उसके परिणाम स्वरूप आप उसके

158
00:11:15,040 --> 00:11:19,600
साथ इतना दुर्व्यवहार कर देते हैं। खुद ही राजा खुद ही दंडाधिकारी

159
00:11:19,600 --> 00:11:23,600
बनते हुए आप इतना उसके साथ इस

160
00:11:23,600 --> 00:11:27,600
आगे तक बियों्ड द लिमिट जाकर के और ऐसा आचरण कर

161
00:11:27,600 --> 00:11:31,680
देते हैं। तो फिर जब आप धर्म और शास्त्र

162
00:11:31,680 --> 00:11:35,680
के इतने रक्षक हैं तो आपने धर्म शास्त्र के इस

163
00:11:35,680 --> 00:11:40,160
पक्ष पर ध्यान क्यों नहीं दिया कि व्यास के रूप में किसको लेकर आया जाए

164
00:11:40,160 --> 00:11:44,320
इस बारे में विवेचना है हमारे शास्त्रों में जहां तक

165
00:11:44,320 --> 00:11:48,320
मुझे ज्ञात है तो उन्होंने तो वो जब किसी को लेने

166
00:11:48,320 --> 00:11:49,840
जा रहे हैं जो 16 वर्ष

167
00:11:49,840 --> 00:11:53,920
से 16 वर्षों से जो कथा कर रहा है और

168
00:11:53,920 --> 00:11:57,920
वो यादव है वास्तविकता में उसके उसके बारे में आसपास के तमाम सारे

169
00:11:57,920 --> 00:12:02,080
गांव में पता मगर यह क्या और इनके यहां पर वही व्यक्ति एक

170
00:12:02,080 --> 00:12:06,160
महीने पहले आकर के जा चुका है कथा करके और फिर भी इनसे यह

171
00:12:06,160 --> 00:12:10,240
गलती हो रही है कि उसी को कथाव्या तो ये इसलिए मुझे मतलब ये जो

172
00:12:10,240 --> 00:12:14,640
सारी चीजें हैं वो प्रायोजित फिर दिखाई देने लगती है कि ये ब्राह्मण

173
00:12:14,640 --> 00:12:18,720
और यादवों में फूट डाल के इनके बीच में एक युद्ध की स्थिति बना करके

174
00:12:18,720 --> 00:12:22,880
और वोट बैंक की राजनीति की जाए और ऐसे

175
00:12:22,880 --> 00:12:27,040
में फिर दूसरा एक पक्ष खड़ा हो जाता है जो

176
00:12:27,040 --> 00:12:31,440
इस विवाद को समझने की बजाय कि यह प्रायोजित मामला

177
00:12:31,440 --> 00:12:36,000
है। वह विवाद को समझने की बजाय अपना दामन

178
00:12:36,000 --> 00:12:40,480
छुड़ाने के लिए वो सीधेसीधे ये जो ये

179
00:12:40,480 --> 00:12:44,560
घृणा मूलक ये दृश्य प्रस्तुत किया गया कि जाति

180
00:12:44,560 --> 00:12:48,960
के नाम पर घृणा तो ये जो दृश्य प्रायोजित रूप से प्रस्तुत

181
00:12:48,960 --> 00:12:53,040
किया गया इससे वो लोग जो अपनी मार्केटिंग

182
00:12:53,040 --> 00:12:57,040
करना चाहते हैं वो तुरंत कहने लगते हैं अरे भाई हम तो जातिवाद को मानते ही नहीं वर्णाश्रम

183
00:12:57,040 --> 00:13:01,200
धर्म तो हमें मतलब अपमान करने लगते हैं। उसके लिए बहुत

184
00:13:01,200 --> 00:13:04,960
सारी उलजुलूल बातें करने लगते हैं। मतलब पहली बात तो

185
00:13:04,960 --> 00:13:09,040
वो अस्तित्व में है ही नहीं। दूसरी बात वो घृणा मूलक है

186
00:13:09,040 --> 00:13:13,120
और आप उसके आधार पर कोस किसको रहे हो? व्यवस्था मूलक को,

187
00:13:13,120 --> 00:13:17,200
शास्त्र मूलक को। तो यह सब दोनों पार्टियां फिर उसमें ज्वाइन

188
00:13:17,200 --> 00:13:21,200
कर लेती हैं। एक पार्टी जो उसका फायदा उठाने की कोशिश

189
00:13:21,200 --> 00:13:25,360
करती है और एक पार्टी वो अपना दामन छुड़ाने के लिए फिर कहने लगती है अरे

190
00:13:25,360 --> 00:13:29,520
वर्णाश्रम धर्म तो श्राप है। वर्णाश्रम धर्म ये है उसकी वजह से धर्म

191
00:13:29,520 --> 00:13:34,080
परिवर्तन हो रहा है। बहुत सारी चीजें हैं। तो इस

192
00:13:34,080 --> 00:13:38,160
पर मैं एक वक्तव्य शतेंद्र पाठक

193
00:13:38,160 --> 00:13:44,080
जी है आचार्य जी उनका भी ले लेता हूं। जी आचार्य जी स्वागत है आपका।

194
00:13:44,080 --> 00:13:48,240
ये इटावा में जो प्रकरण हुआ जिसमें आपने

195
00:13:48,240 --> 00:13:52,240
सही तरह से समझाया कि इसमें यादव और

196
00:13:52,240 --> 00:13:56,640
ब्राह्मण का विद्वेष फैलाने के लिए यह सोची समझी हुई साजिश

197
00:13:56,640 --> 00:14:00,640
है। जी जबकि भागवत कथा के

198
00:14:00,640 --> 00:14:04,640
विषय में जो श्रीमद् भागवत का महात्म है उसी

199
00:14:04,640 --> 00:14:09,040
में बताया गया है किस प्रकार का वक्ता होना चाहिए। उसमें विरक्तो

200
00:14:09,040 --> 00:14:13,040
वैष्णव विप्रो वेद शास्त्र विशुद्ध कृत इस

201
00:14:13,040 --> 00:14:17,040
प्रकार से विप्र शब्द आया है। विप्र शब्द का मतलब ही होता है

202
00:14:17,040 --> 00:14:20,640
जन्मना ब्राह्मणोगे संस्कार द्विजते

203
00:14:20,640 --> 00:14:24,880
द्वाभ्याम जन्म संस्कार्या जाज

204
00:14:24,880 --> 00:14:29,840
जब संस्कार उसका उपनयन संस्कार आदि हो जाता है तब द्व कहलाता है और वेदाभ्यासा

205
00:14:29,840 --> 00:14:34,000
विप्रतम जो वेदभ्यास करेगा उसके बाद

206
00:14:34,000 --> 00:14:38,480
विप्रज्ञा होगी वही भागवत कथा करने का अधिकारी है

207
00:14:38,480 --> 00:14:42,800
तो इसमें जो यादव है वो कथा

208
00:14:42,800 --> 00:14:46,880
करने के श्रीमद भागवत कथा के विषय में वो अधिकारी नहीं

209
00:14:46,880 --> 00:14:51,120
माने जा सकते और जहां तक कि ब्राह्मण भी अधिकारी नहीं माना जाएगा अगर

210
00:14:51,120 --> 00:14:55,120
यदि वो वेद वेद और वेदांग का जिसने अध्ययन नहीं किया

211
00:14:55,120 --> 00:14:59,280
है वह ब्राह्मण भी अधिकारी नहीं है यादव की तो बात छोड़िए और किसी

212
00:14:59,280 --> 00:15:04,000
की बात की बात नहीं है यहां तो ऐसी स्थिति में

213
00:15:04,000 --> 00:15:08,080
यह कि नहीं उसको अधिकार है ब्राह्मण को ही अधिकार है ब्राह्मण सभी ब्राह्मण को

214
00:15:08,080 --> 00:15:12,720
अधिकार नहीं है यह श्रीमद् भागवत के महात्म ही स्पष्ट हो गया

215
00:15:12,720 --> 00:15:16,880
और जो ये कथा करने वाले आजकल हैं ये

216
00:15:16,880 --> 00:15:20,880
क्या करते हैं? ये कुछ जो श्रीमद् भागवत की कुछ कथाएं

217
00:15:20,880 --> 00:15:25,200
हैं उनको याद कर लिया और फिर गाना बजाना

218
00:15:25,200 --> 00:15:29,440
करके और जनता को जो है वो रिझा देते हैं। उससे

219
00:15:29,440 --> 00:15:33,440
जो उसी को कथा मानते हैं। जबकि उसका

220
00:15:33,440 --> 00:15:35,840
जो श्रीमद् भागवत के जो मूल श्लोक

221
00:15:35,840 --> 00:15:39,840
हैं उनका वो उच्चारण भी नहीं कर सकते। चतुश्लोकी

222
00:15:39,840 --> 00:15:44,400
भागवत जो कि मूल है जो कि भगवान नारायण से

223
00:15:44,400 --> 00:15:48,640
परंपरा से प्राप्त होकर के ब्रह्मा जी को नारद जी को

224
00:15:48,640 --> 00:15:52,800
और सनका आदि ऋषियों को और व्यास जी को सुखदेव जी को उसके पश्चात प्राप्त

225
00:15:52,800 --> 00:15:57,280
हुआ है और उस परंपरा में

226
00:15:57,280 --> 00:16:01,280
जो जिस प्रकार से चतुश्लोकी भागवत का ज्ञान प्राप्त

227
00:16:01,280 --> 00:16:05,360
हुआ उस चतुश्लोकी भागवत के जो चार श्लोक हैं उनका जो इतना

228
00:16:05,360 --> 00:16:09,360
गढ़ रहस्य है उसको बिना वेद वेद वेदांग और वेदांत के

229
00:16:09,360 --> 00:16:13,840
उसका कोई भी मर्म नहीं जान सकता है। तो ये आजकल

230
00:16:13,840 --> 00:16:18,080
के जो कथावाचक हैं इसमें ब्राह्मण भी बहुत से कथावाचक हैं कि

231
00:16:18,080 --> 00:16:22,400
जो भागवत का जो मूल है उसको लेकर के नहीं चलते हैं। गाना

232
00:16:22,400 --> 00:16:26,720
बजाने में ही और उसको जो है मनोरंजन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जबकि

233
00:16:26,720 --> 00:16:30,960
राजा परीक्षित जो है वो राज्षि थे और

234
00:16:30,960 --> 00:16:35,440
भगवान सुखदेव जी महाराज वो परमहंस थे और परमहंसों

235
00:16:35,440 --> 00:16:39,920
की संभता है। तो परमहंस की संभिता का जो बखान

236
00:16:39,920 --> 00:16:44,160
करते हैं इस तरह से तो वो तो उसके परमहंसों के विपरीत है तो

237
00:16:44,160 --> 00:16:48,400
उसको श्रीमद् भागवत कथा नहीं कहा जा सकता है। रही बात भगवत

238
00:16:48,400 --> 00:16:50,880
चर्चा की या सत्संग की वो हर

239
00:16:50,880 --> 00:16:54,960
वर्ण की हर जाति का पूर्ण अधिकार है। उसमें किसी की रोक

240
00:16:54,960 --> 00:16:59,040
नहीं है। और हमारे भारतवर्ष में भी अन्य भी जो कथा करने वाले हैं।

241
00:16:59,040 --> 00:17:03,040
कोई भागवत कथा के नाम से कर रहे हैं। कोई राम कथा के नाम से कर रहे हैं।

242
00:17:03,040 --> 00:17:07,360
उनकी जाति भी सबको मालूम है। किंतु उनका प्रस्तुतीकरण सही है।

243
00:17:07,360 --> 00:17:11,520
वह मनोरंजन अच्छा कर लेते हैं तो जनता उनको उनकी जाति नहीं पूछती

244
00:17:11,520 --> 00:17:16,000
है। और वो जैसे मुरारी बापू है, अन्य जाति हैं वो तो

245
00:17:16,000 --> 00:17:20,400
सब लोग उनको जानते हैं कौन किस जाति का है और ये तो एक समीप

246
00:17:20,400 --> 00:17:24,480
गांव के ही थे। कोई ज्यादा दूर के नहीं थे कि जो इनकी जाति के बारे

247
00:17:24,480 --> 00:17:28,640
में ना पता हो। किंतु बाद में किसी कारण से साजिश करके विद्वेष

248
00:17:28,640 --> 00:17:32,720
फैलाने की दृष्टि से ऐसा किया कि ब्राह्मण यादवों का विद्वेष हो

249
00:17:32,720 --> 00:17:37,040
जाए। इस प्रकार का किया गया षड्यंत्र है और बाकी इसमें ब्राह्मण

250
00:17:37,040 --> 00:17:41,200
और यादव के विद्वेष राजनैतिक मात्र है।

251
00:17:41,200 --> 00:17:46,720
इसमें कोई वास्तविकता नहीं है। जी

252
00:17:46,720 --> 00:17:50,720
आचार्य श्री इसमें एक जो हम एक जो पक्ष प्रस्तुत किया जाता

253
00:17:50,720 --> 00:17:54,800
है यह तो ठीक है प्रायोजित है मगर अब जब वो मामला

254
00:17:54,800 --> 00:17:58,960
बन ही गया विवाद का आधार तो फिर उसकी विवेचना

255
00:17:58,960 --> 00:18:03,440
समीक्षा करना होना फिर दायित्व हो जाता है आचार्यों का

256
00:18:03,440 --> 00:18:05,920
तो इसमें एक बात आती है आचार्य श्री कि जब हम ये

257
00:18:05,920 --> 00:18:10,240
कह रहे हैं कि अ

258
00:18:10,240 --> 00:18:14,480
उनको झूठ नहीं बोलना चाहिए था है ना चलिए उसकी

259
00:18:14,480 --> 00:18:19,280
गलती मान ली जाती है। अभी मैं थोड़ी देर वो कुतर्कियों की ओर से एक प्रश्न रख रहा हूं आपके समक्ष।

260
00:18:19,280 --> 00:18:23,600
है ना? तो एक बात रखी जाती है कि

261
00:18:23,600 --> 00:18:28,000
कि वो मान लीजिए उसने अपनी आइडेंटिटी छुपाई। मगर

262
00:18:28,000 --> 00:18:32,560
उसको आइडेंटिटी अपनी छुपानी क्यों पड़ रही है? ये व्यवस्था

263
00:18:32,560 --> 00:18:36,560
क्यों है? कि वक्ता जो है कथा

264
00:18:36,560 --> 00:18:41,040
का वो ब्राह्मण कुल से ही होना चाहिए। है ना?

265
00:18:41,040 --> 00:18:45,120
तो इसमें तर्क और युक्ति और प्रमाण क्या-क्या हो सकते हैं

266
00:18:45,120 --> 00:18:51,120
उस पर थोड़ा सा प्रकाश डालें। उसमें

267
00:18:53,910 --> 00:18:56,160
[संगीत]

268
00:18:56,160 --> 00:19:00,480
उसमें ऐसा है कि जो है

269
00:19:00,480 --> 00:19:04,640
वहां महात्म जो लक्षण दिए हैं उसमें

270
00:19:04,640 --> 00:19:09,040
निश्चित निश्चित किया कहा है कि विद्या

271
00:19:09,040 --> 00:19:13,280
और जन्म विद्या से ही पवित्र हो जन्म

272
00:19:13,280 --> 00:19:17,360
से ही पवित्र हो और आचार संपन्न भी हो कर्म

273
00:19:17,360 --> 00:19:21,840
से भी हो तो पहले बोला ही था इन्होंने

274
00:19:21,840 --> 00:19:26,080
पहली शर्त यह है कि वृक्तो वैष्णवो वेद शास्त्र विशुद्ध

275
00:19:26,080 --> 00:19:31,120
कृत आप जब श्रीमद् भागवत

276
00:19:31,120 --> 00:19:35,280
की कथा कर रहे हैं जी जो अपने

277
00:19:35,280 --> 00:19:39,280
पक्ष में है उसको तो आप कहते हैं और वही

278
00:19:39,280 --> 00:19:43,440
भागवत में अपने विपक्ष में बात जा रही है उस बात को आप छिपा

279
00:19:43,440 --> 00:19:47,520
लेते हैं छिपाना नहीं चाहिए जैसे वही

280
00:19:47,520 --> 00:19:52,080
के श्लोक है ये वक्त वैष्णो वेद शास्त्र विशुद्ध

281
00:19:52,080 --> 00:19:56,960
दृष्टांत कुशल धीरा वक्ता कार

282
00:19:56,960 --> 00:20:01,920
वक्त होना जो कथा व्यास है वो वक्त हो

283
00:20:01,920 --> 00:20:06,000
मतलब राग द्वेष वाला नहीं होना चाहिए और वैष्णव

284
00:20:06,000 --> 00:20:09,200
होना चाहिए वैष्णव का तात्पर्य वहां उससे

285
00:20:09,200 --> 00:20:13,360
नहीं है संप्रदाय से नहीं है ये तो विष्णु मुख भूता

286
00:20:13,360 --> 00:20:17,600
वैष्णव से तात्पर्य है कि ब्राह्मणो वै

287
00:20:17,600 --> 00:20:21,920
मुख्या यतो मुखवा अंगे देवता सर्वा

288
00:20:21,920 --> 00:20:26,080
मुखे वेदा व्यवस्थिता ये ऐसा ये

289
00:20:26,080 --> 00:20:30,560
श्लोक इसमें घटेगा वो वैष्णव है और वेद शास्त्र

290
00:20:30,560 --> 00:20:34,880
विशुद्ध कृत जो वेद का अध्ययन है गुरु परंपरा

291
00:20:34,880 --> 00:20:39,120
के के माध्यम से जो गुरु

292
00:20:39,120 --> 00:20:43,920
जी है गुरु जी भी कैसे होंगे तद विज्ञानार्थम स गुरु

293
00:20:43,920 --> 00:20:48,080
गुरुवा गच्छत समिति पानी भ्रम निष्ठम मुंडकोपनिषद

294
00:20:48,080 --> 00:20:52,400
है ये के गुरु के समीप में जाए हाथ में जो है

295
00:20:52,400 --> 00:20:56,400
समित पानी लेकर के और गुरुकुल में रहे और गुरुकुल में

296
00:20:56,400 --> 00:21:00,400
रह के जिसने उपरवा धर्म का पालन

297
00:21:00,400 --> 00:21:04,640
करके ब्रह्मचर्य का पालन करके जिसने वेद का स्वाध्याय किया है

298
00:21:04,640 --> 00:21:09,920
ऐसा जो ज्ञाता है

299
00:21:09,920 --> 00:21:14,080
आचार्य जी के कुछ टेक्निकल इशू आ गया

300
00:21:14,080 --> 00:21:19,120
है आचार्य ज्ञान जी के यहां पर

301
00:21:19,120 --> 00:21:24,560
ठीक है तब तक सत्येंद्र आचार्य सत्येंद्र जी आप

302
00:21:24,560 --> 00:21:28,800
गुरुदेव की बात को आगे थोड़ा सा मैं

303
00:21:28,800 --> 00:21:33,040
प्रस्तुत कर दे तो ये

304
00:21:33,040 --> 00:21:37,040
विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेद शास्त्र विशुद्ध कृत

305
00:21:37,040 --> 00:21:41,200
इस पर आचार्य जी बता रहे थे कि विरक्त होना चाहिए वैष्णव होना

306
00:21:41,200 --> 00:21:45,680
चाहिए वैष्णव का मतलब वैष्णव दीक्षा से यहां तात्पर्य नहीं है।

307
00:21:45,680 --> 00:21:50,640
जो भगवान में जिसकी निष्ठा है वो उसका

308
00:21:50,640 --> 00:21:55,040
हां भगवान का जो भक्त है वही वही वैष्णव है।

309
00:21:55,040 --> 00:21:59,360
और जो यादवों की जहां तक बात है तो उद्धव

310
00:21:59,360 --> 00:22:03,520
जी जो है बृहस्पति के साक्षात शिष्य थे। उन्होंने गोपियों

311
00:22:03,520 --> 00:22:08,000
के लिए उपदेश किया। भगवान कृष्ण ने उनको भेजा। तो

312
00:22:08,000 --> 00:22:12,240
उन्होंने वो भी भागवत का ही अंश है। तो उन्होंने

313
00:22:12,240 --> 00:22:16,480
गोपियों को उपदेश देने के लिए वो गए थे ना कि उन्होंने जैसे

314
00:22:16,480 --> 00:22:20,480
सुखदेव जी ने भागवत कथा करते थे उस तरह से व्यास पीठ

315
00:22:20,480 --> 00:22:24,480
पर बैठकर के उन्होंने कोई भागवत कथा नहीं की थी। तो इस

316
00:22:24,480 --> 00:22:24,980
प्रकार से

317
00:22:24,960 --> 00:22:29,360
जो भी किसी भी जाति का हो सत्संग है भगवान

318
00:22:29,360 --> 00:22:33,440
के गुणों का गुणों का गान करना है तो उसको करने

319
00:22:33,440 --> 00:22:37,760
के लिए सभी का अधिकार है। पर वो उसको अब

320
00:22:37,760 --> 00:22:42,240
जाति रूप जातिवाद के रूप में और राजनैतिक विद्वेष

321
00:22:42,240 --> 00:22:46,480
के रूप में अपने लाभ के लिए इधर से उधर लोग प्रचारित कर रहे हैं

322
00:22:46,480 --> 00:22:50,560
जो कि बहुत गलत है। और जहां तक ब्राह्मण यादवों की

323
00:22:50,560 --> 00:22:54,800
बात है उनका जो कभी भी विद्वेष नहीं रहा है। कोई जातिगत विद्वेष

324
00:22:54,800 --> 00:22:59,520
नहीं रहा है। यादव ब्राह्मणों में श्रद्धा रखते हैं और

325
00:22:59,520 --> 00:23:03,680
सब साथ में रहते हैं। ऐसा कोई हमारे भारत की परंपरा नहीं रही है

326
00:23:03,680 --> 00:23:07,760
और पूर्व काल से ही नहीं रही है। किंतु यह राजनीतिक लोग जो

327
00:23:07,760 --> 00:23:11,920
है वह अपना हित साधने के लिए इस प्रकार का करते हैं

328
00:23:11,920 --> 00:23:17,040
और कुछ लोग ऐसे भी हैं कि जो वर्ण शंकर

329
00:23:17,040 --> 00:23:21,200
कार्य करने के लिए है वो

330
00:23:21,200 --> 00:23:25,280
खुद अपनी बेटी है या खुद

331
00:23:25,280 --> 00:23:29,360
ने अपना जो विवाह किया है किसी दूसरी जाति में किया है तो वो

332
00:23:29,360 --> 00:23:33,440
लोग भी इसको राजनीतिक रूप में लेते हैं और अपना

333
00:23:33,440 --> 00:23:37,520
जो कमी है उसको ढकने के लिए और वो कहते हैं

334
00:23:37,520 --> 00:23:40,000
कि व्यास जी जो है वह भी धीवर के

335
00:23:40,000 --> 00:23:44,320
पुत्र थे जबकि जो लिखा

336
00:23:44,320 --> 00:23:48,800
है व्यासम वशिष् नतारम पौत्र कलमसम

337
00:23:48,800 --> 00:23:52,880
पराज सुतात तपो निधि जो ब्रह्मा

338
00:23:52,880 --> 00:23:56,960
वशिष्ठ है उनके वो नाती हैं। शक्ति के पुत्र हैं

339
00:23:56,960 --> 00:24:01,040
और सुखदेव जी जो महाराज है उनके पिता हैं। तो जो ब्रह्मा

340
00:24:01,040 --> 00:24:05,280
वशिष्ठ के जो नाती हैं तो वह धीवर कैसे हो सकते हैं

341
00:24:05,280 --> 00:24:09,360
और यह सब दिव्य जन्मा है और इनका

342
00:24:09,360 --> 00:24:13,440
जो है कोई वो किसी भी प्रकार से इनका जो है

343
00:24:13,440 --> 00:24:17,760
हो नहीं की जा सकती है। अब कोई लोग कहे कि यह भी हैं

344
00:24:17,760 --> 00:24:22,000
व्यास जी भी हैं या सूत जी को भी बताते हैं। जबकि सूत जी लोम

345
00:24:22,000 --> 00:24:26,080
हर्षण जी उनके व्यास जी के जो पुत्र लोम हर्षण जी

346
00:24:26,080 --> 00:24:30,160
हैं। उसके वो भी अयोनिज है। और

347
00:24:30,160 --> 00:24:34,240
उनको भी जो वर्ण शंकर शद्र सूद्र के रूप में लोग प्रचारित

348
00:24:34,240 --> 00:24:38,560
करने का प्रयास करते हैं। तो यह केवल अपनी जो कमियां

349
00:24:38,560 --> 00:24:42,720
है वो जो अंतरजाती विवाह को बढ़ावा देने के लिए

350
00:24:42,720 --> 00:24:46,800
या विजाती को बढ़ावा देने के लिए ये इस प्रकार की चीजों के

351
00:24:46,800 --> 00:24:51,520
लिए वो जो वर्णाश्रम धर्म के विरुद्ध है।

352
00:24:51,520 --> 00:24:55,280
तो वर्णाश्रम में जो जैसा बताया गया है उसके हिसाब

353
00:24:55,280 --> 00:24:59,280
से जो आचरण करना है वही मुख्य उद्देश्य होना चाहिए ना

354
00:24:59,280 --> 00:25:03,760
कि अपना धर्म जातिगत विदेश को बढ़ावा देना

355
00:25:03,760 --> 00:25:07,920
जिससे कि समाज में जो भ्रांतियां फैलती जा रही है किंतु

356
00:25:07,920 --> 00:25:12,000
अभी भी जो समझदार जो यादव भी है ब्राह्मण भी है वो इसको सही नहीं मान

357
00:25:12,000 --> 00:25:16,160
रहे

358
00:25:16,160 --> 00:25:20,480
आचार्य श्री वापस आ गए आचार्य श्री मैं ये कह रहा था एक बार आप ये

359
00:25:20,480 --> 00:25:24,560
अगर समस्या स्या ना हो तो जो हेडफोन है ना इसको आप हटा के अगर

360
00:25:24,560 --> 00:25:28,720
बोलेंगे तो ज्यादा अच्छी आवाज आ रही है। अच्छा अच्छा वो

361
00:25:28,720 --> 00:25:34,720
मोबाइल से हटा दीजिए तो ज्यादा अच्छे से आवाज आएगी। संभवत

362
00:25:46,270 --> 00:25:52,270
[संगीत]

363
00:25:55,280 --> 00:25:59,360
आवाज आ रही है अच्छा हां कुछ इंटरनेट की भी

364
00:25:59,360 --> 00:26:03,520
जो है वो समस्या है जी जी अब अब आवाज आपकी बहुत प्रकरता

365
00:26:03,520 --> 00:26:08,160
से आ रही है अब अच्छा अच्छा आवाज आपकी ज्यादा अच्छी आ रही है

366
00:26:08,160 --> 00:26:12,160
हां तो उसमें तो आचार्य श्री आपकी बात को पूरा किया है मगर

367
00:26:12,160 --> 00:26:16,240
यदि आपको कुछ लग रहा हो तो आप उस पर उसको पूर्ण कर

368
00:26:16,240 --> 00:26:21,440
दे अन्यथा फिर आगे हम थोड़ी है ये जो पात्रता

369
00:26:21,440 --> 00:26:25,520
ये नहीं है त्रिच

370
00:26:25,520 --> 00:26:30,320
उसमें सबसे कहा कि तीन व्यक्ति जो है वेद के अधिकारी नहीं है

371
00:26:30,320 --> 00:26:34,640
तो सबसे पहले उसमें जो ब्राह्मण ही गित कहा जो पतित

372
00:26:34,640 --> 00:26:38,640
ब्राह्मण है पतित सावित्री है जिसने

373
00:26:38,640 --> 00:26:42,880
जो है विध्वत वेद का स्वाध्याय नहीं किया वही वेद पढ़ने का अधिकारी

374
00:26:42,880 --> 00:26:47,040
नहीं है। जी और स्त्री है और इनका सेवा धर्म

375
00:26:47,040 --> 00:26:51,040
है। तो शास्त्र जो कभी भेद नहीं करता है।

376
00:26:51,040 --> 00:26:55,280
जो पात्रता इसमें हमने बताई वो पात्रता ब्राह्मण

377
00:26:55,280 --> 00:26:59,280
में है तो वो अधिकारी होगा और वो पात्रता ब्राह्मण में

378
00:26:59,280 --> 00:27:01,280
नहीं है तो वो भी जो व्यास पीठ पर

379
00:27:01,280 --> 00:27:06,160
बैठने का अधिकारी नहीं है। समझिए जो है

380
00:27:06,160 --> 00:27:08,720
तो उसत्र

381
00:27:08,720 --> 00:27:11,360
ब्राह्मणो

382
00:27:11,360 --> 00:27:13,520
वैजा

383
00:27:13,520 --> 00:27:18,880
वेदा पुरुषोत्तम शब्द

384
00:27:18,880 --> 00:27:23,040
शब्द है क्योंकि पहले परंपरा थी गुरुकुल में जैसे देख

385
00:27:23,040 --> 00:27:27,200
भी रहे हैं जैसे उज्जैन में पढ़ने गए सुदामा जी भी साथ

386
00:27:27,200 --> 00:27:31,200
में पड़े हैं भगवान श्री कृष्ण भी साथ में बलराम भी साथ में ब्राह्मण

387
00:27:31,200 --> 00:27:35,840
क्षत्रिय सब साथ में ही पढ़ते थे तो जैसे

388
00:27:35,840 --> 00:27:41,040
जन्म ना होकर के जो है वेदा अध्ययन जो है सब में बराबर ही होता

389
00:27:41,040 --> 00:27:45,200
जिन गुरु से जो है सुदामा जी पढ़े हैं। जिन गुरु से जो है भगवान श्री

390
00:27:45,200 --> 00:27:49,360
कृष्ण बलराम पड़े हैं। वही जो है साक्षात

391
00:27:49,360 --> 00:27:54,400
रूप से जो है भगवान श्री कृष्ण भी पढ़े हुए हैं।

392
00:27:54,400 --> 00:27:59,120
जी तो वेदा अध्ययन साम्य वेदा अध्ययन

393
00:27:59,120 --> 00:28:03,280
अर्थात भगवान श्री कृष्ण का बलराम का सुदामा जी का वेदा अध्ययन

394
00:28:03,280 --> 00:28:08,400
साम्य है। उसमें किंतु उसमें लिखा शोत्र ब्राह्मण

395
00:28:08,400 --> 00:28:13,360
किंतु शोत्री सबसे केवल ब्राह्मण ही गहित होगा ना वैश्य नाजा

396
00:28:13,360 --> 00:28:16,480
वैश्व भी गहित नहीं है ना बाहु अर्थात

397
00:28:16,480 --> 00:28:20,480
ये वेद को जो पढ़ सकते हैं पढ़ा नहीं सकते दान दे सकते

398
00:28:20,480 --> 00:28:24,720
ले नहीं सकते ये श्रुति का ये वाक्य है

399
00:28:24,720 --> 00:28:29,200
तो वेदाध्यन वेदा अध्ययन बराबर होने पर भी तो दृष्टांत

400
00:28:29,200 --> 00:28:33,280
दिया पुरुषोत्तम शब्दवत जैसे भगवान मर्यादा

401
00:28:33,280 --> 00:28:37,440
पुरुषोत्तम भगवान श्री राम है उनका नाम है और किसी की संज्ञा रख लो

402
00:28:37,440 --> 00:28:41,440
पुरुषोत्तम तो पुरुषोत्तम संज्ञा वाला जो मनुष्य

403
00:28:41,440 --> 00:28:45,440
पुरुषोत्तम शब्द से गित नहीं होगा कि भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम

404
00:28:45,440 --> 00:28:49,520
श्री राम वही गित होंगे तो इसीलिए शोत्री शब्द से जो

405
00:28:49,520 --> 00:28:53,760
है ब्राह्मण गित होगा वैश्य और क्षत्रिय गित नहीं होंगे ये

406
00:28:53,760 --> 00:28:58,160
वहां का सब विषय है यदि श्रोत्री ब्राह्मण नहीं है

407
00:28:58,160 --> 00:29:02,560
वेद का स्वाध्याय नहीं किया है और वैष्णव

408
00:29:02,560 --> 00:29:06,560
नहीं है वत नहीं है और मासरी उसको

409
00:29:06,560 --> 00:29:10,640
कहेंगे मत्समा सस कोपी नास्त मेरे बराबर संसार में कोई नहीं है यह

410
00:29:10,640 --> 00:29:14,880
बुद्धि भी इसमें नहीं होनी चाहिए यदि कोई भी कमी इसमें रही तो

411
00:29:14,880 --> 00:29:18,960
ब्राह्मण भी वेद व्यास पीठ पे बैठने का

412
00:29:18,960 --> 00:29:23,040
अधिकारी नहीं है शास्त्र ने कहीं भेद किया ही नहीं है यदि

413
00:29:23,040 --> 00:29:27,120
कोई निर्धारण है तो सबसे पहले ब्राह्मण सब ब्राह्मण

414
00:29:27,120 --> 00:29:31,120
को पहले बनाया उन्होंने के भाई नहीं तुम भी पात्र हो

415
00:29:31,120 --> 00:29:31,620
यदि ऐसा

416
00:29:31,520 --> 00:29:35,600
तुम्हारे अंदर नहीं होगा जी आचार्य

417
00:29:35,600 --> 00:29:39,120
श्री इसमें एक

418
00:29:39,120 --> 00:29:43,280
समस्या सामने रखी जाती है कि

419
00:29:43,280 --> 00:29:47,280
क्या आजकल जितने भी कथावाचक हैं और भी

420
00:29:47,280 --> 00:29:51,920
कथावाचक हैं जो ब्राह्मण कुल से आते तो हैं

421
00:29:51,920 --> 00:29:55,920
परंतु कई अंशों में उनके भी आचरण ऐसे नहीं दिखते हैं या

422
00:29:55,920 --> 00:30:00,080
फिर जैसे कि बताया गया कि वो विरक्त होना चाहिए या

423
00:30:00,080 --> 00:30:05,280
फिर वो बताया गया कि वो मतम होना चाहिए। तत्ववेता होना चाहिए।

424
00:30:05,280 --> 00:30:09,280
वेद वेदांगों को जानने वाला होना चाहिए। तो ऐसे कई कथावाचक

425
00:30:09,280 --> 00:30:13,600
है जो ब्राह्मण कुल से तो आते हैं परंतु वो

426
00:30:13,600 --> 00:30:17,760
भी मतलब वो जो ये जो आपने

427
00:30:17,760 --> 00:30:22,240
जो चीजें बताई है ये उन पर घटित नहीं होती है कुल मिलाकर के और ऐसे हैं

428
00:30:22,240 --> 00:30:26,240
मैं भी जानता हूं आप भी जानते हैं समाज में ऐसे कई कथावाचक है और

429
00:30:26,240 --> 00:30:30,240
मुझे लगता है आपको भी कभी-कभी उनको उनके लिए बोलना पड़ता है कि

430
00:30:30,240 --> 00:30:34,240
आप ऐसा वक्तव्य ना दें जो शास्त्र के विपरीत जा रहा हो

431
00:30:34,240 --> 00:30:38,720
तो एक तो यह बात आ गई और इसमें में एक तर्कपूर्ण स्थिति

432
00:30:38,720 --> 00:30:44,720
दूसरी और खड़ी की जाती है कि जो भाई

433
00:30:45,680 --> 00:30:50,320
ब्रह्म को जानता है वो ब्राह्मण है। जो जो

434
00:30:50,320 --> 00:30:54,480
ज्ञानी है वही ब्राह्मण है। जो वक्ता है वही जो ज्ञान रखता

435
00:30:54,480 --> 00:30:58,720
है वही वो है। तो इसमें जो हम लोग जो पक्ष

436
00:30:58,720 --> 00:31:02,800
अपने सामर्थ्य से प्रस्तुत कर पाते हैं वह यही होता है कि थोड़ी देर के

437
00:31:02,800 --> 00:31:06,960
लिए अगर मान भी लिया जाए कि जो भी व्यक्ति ज्ञान

438
00:31:06,960 --> 00:31:11,200
रखता है भगवान की कथा करने का जिसमें भी सामर्थ्य

439
00:31:11,200 --> 00:31:15,440
है वो जो है वो क्या कहते

440
00:31:15,440 --> 00:31:19,680
हैं भगवान की कथा कर सकता है। वो व्यास गद्दी पर बैठ सकता है। तो

441
00:31:19,680 --> 00:31:23,840
सबसे पहली बात तो है कि यह जो सामर्थ्य है कि भगवान की

442
00:31:23,840 --> 00:31:28,080
कथा कौन कर सकता है? यह सामर्थ्य जांचने

443
00:31:28,080 --> 00:31:32,240
के लिए हमको उसको व्यास गद्दी पर बैठाने से पहले उसके द्वारा कथा जाननी

444
00:31:32,240 --> 00:31:36,480
होगी। उसके द्वारा कथा को सुनना होगा कि ये जानता

445
00:31:36,480 --> 00:31:40,480
है कि नहीं और उसके इस गुण को नापने के

446
00:31:40,480 --> 00:31:44,560
लिए हमारा ज्ञानी होना आवश्यक होगा। भाई ये कथा सही कह

447
00:31:44,560 --> 00:31:48,960
रहा है कि नहीं। ये तत्व का विवेचन सही कर रहा है कि नहीं? इसका परीक्षण

448
00:31:48,960 --> 00:31:53,040
करने के लिए जो परीक्षा लेने वाला गया है जहां उसको बुलाने के

449
00:31:53,040 --> 00:31:57,120
लिए उसका तत्व को जानने वाला होना चाहिए। तो ऐसी स्थिति

450
00:31:57,120 --> 00:32:00,720
में यदि हम इस योग्यता के आधार पर कि जो ब्रह्म को जानता

451
00:32:00,720 --> 00:32:04,800
है जो भागवत को जानता है जो भागवत का ज्ञान रखता है वही ब्राह्मण

452
00:32:04,800 --> 00:32:09,120
हो जाएगा। वही व्यास हो जाएगा। तो इस स्थिति के लिए तो फिर व्यास

453
00:32:09,120 --> 00:32:13,280
गद्दी की आवश्यकता ही नहीं रह गई। क्योंकि व्यास कौन है? यह

454
00:32:13,280 --> 00:32:17,440
जांचने के लिए कोई पहले से ब्रह्म ज्ञानी भागवत को जानने वाला

455
00:32:17,440 --> 00:32:20,160
होना चाहिए।

456
00:32:20,160 --> 00:32:24,160
भाई कथा हम लोग हम लोगों को वेद वेदांग

457
00:32:24,160 --> 00:32:28,480
का ज्ञान तब होगा जब कोई संत की गद्दी पर व्यास की गद्दी पर बैठ के हमें

458
00:32:28,480 --> 00:32:32,560
सुनाएगा। तब हम लोगों को ज्ञान होगा। मगर उसकी व्यास की गद्दी पर

459
00:32:32,560 --> 00:32:36,560
बैठने से पहले हम उसकी जांच कर रहे हैं कि तुमको ज्ञान है कि

460
00:32:36,560 --> 00:32:40,560
नहीं। इसका मतलब हम हम ज्यादा बड़े ज्ञाता हो गए। जो हम यह जांच

461
00:32:40,560 --> 00:32:44,640
रहे हैं। पहली बात एक दूसरी बात यह

462
00:32:44,640 --> 00:32:49,760
भी आती है कि कुछ लोगों ने अभी मुझसे यह पक्ष रखे थे

463
00:32:49,760 --> 00:32:54,000
कि जो भागवत कथा बोल देगा या भागवत वचन बोल देगा,

464
00:32:54,000 --> 00:32:58,320
भगवत वचन बोल देगा या जो भी जिसको भी वेद वेदांगों का ज्ञान होगा वही ब्राह्मण

465
00:32:58,320 --> 00:33:02,320
है। उसी को कथा कहने का आ गया। तो एक समस्या तो यही आ गई कि सबसे पहले

466
00:33:02,320 --> 00:33:06,640
तो हमें उसको व्यास गद्दी पर बैठाने से पहले हमें पता होना चाहिए कि ये

467
00:33:06,640 --> 00:33:10,880
व्यास गद्दी पर बैठने योग्य है कि नहीं और ये ज्ञात करने के लिए हमारा ब्रह्म

468
00:33:10,880 --> 00:33:14,960
ज्ञानी होना आवश्यक है। तो फिर कथा सुन क्यों रहे हैं? जब हम ब्रह्म

469
00:33:14,960 --> 00:33:15,760
ज्ञानी है पहले

470
00:33:15,760 --> 00:33:20,000
ही पहली और दूसरी एक बात हम ये पक्ष रखते

471
00:33:20,000 --> 00:33:24,480
जैसे एक बहुत बड़ा आतंक चला एक समय

472
00:33:24,480 --> 00:33:29,680
धर्म परिवर्तन का आज भी वह आधार है डॉक्टर जाकिर नायक

473
00:33:29,680 --> 00:33:33,760
वेद वेदांगों की बात वो भी कर रहा था। वो

474
00:33:33,760 --> 00:33:37,840
भी अपने मुख से जो है उपनिषदों के

475
00:33:37,840 --> 00:33:42,080
वाक्य बोलता था। वेदों के वाक्य बोलता था। तो क्या

476
00:33:42,080 --> 00:33:46,160
ये जो समाज आज कह रहा है कि जो भागवत को जानने वाला है जो वेद को जानने

477
00:33:46,160 --> 00:33:50,160
वाला है वही ब्राह्मण है। वही ज्ञानी है। क्या यह समाज डॉक्टर जाकिर

478
00:33:50,160 --> 00:33:54,400
नायक जैसे सरीखे लोगों को भी बिठा देगा व्यास गद्दी

479
00:33:54,400 --> 00:33:58,320
पर अपना धर्माचार्य बनाकर

480
00:33:58,320 --> 00:34:02,320
तो यह भी एक पक्ष है। जैसे एक पूर्व में

481
00:34:02,320 --> 00:34:06,640
एक बात आई थी एनआरसी को लेकर के एक वो आया था कि

482
00:34:06,640 --> 00:34:10,720
बिल पास किया जाए एनआरसी वाला। रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में

483
00:34:10,720 --> 00:34:14,800
ना आने के लिए भाजपा सरकार ने कहा था कि हम रोहिंग्या मुसलमानों को

484
00:34:14,800 --> 00:34:18,880
भारत में नहीं आने देंगे। जिसका विरोध किया गया मुस्लिम्स के द्वारा। तो

485
00:34:18,880 --> 00:34:23,200
यही लोग जो आज कह रहे हैं ना कि जो भागवत को जानने वाला है वो व्यास

486
00:34:23,200 --> 00:34:27,200
है। यही लोग उस समय एनआरसी का

487
00:34:27,200 --> 00:34:30,800
समर्थन कर रहे थे। क्यों भाई वहां आप सीमा पर जाकर खड़े हो

488
00:34:30,800 --> 00:34:34,880
जाइए और जो भागवत बोल दे वो हिंदू है। वो रोहिंग्या मुसलमान थोड़ी ना है।

489
00:34:34,880 --> 00:34:39,600
जो भागवत को बोल दे वो हिंदू हो गया। वो हिंदू हो गया। उसको आने दो।

490
00:34:39,600 --> 00:34:43,760
तो मुसलमान होने के नाते आप किसी को मत रोको। तो कहीं पर

491
00:34:43,760 --> 00:34:47,920
यही लोग जन्म से मान लेते हैं आधार है ना

492
00:34:47,920 --> 00:34:51,920
व्यवहार का आधार जन्म से मानते हैं ये लोग कई जगह और कई जगह कुतर्क

493
00:34:51,920 --> 00:34:56,400
करते हैं अपने मंतव्यों की सिद्धि करने के लिए तो इस पर थोड़ा सा आप

494
00:34:56,400 --> 00:35:00,640
प्रकाश डाल दें यह सबसे पहले तो

495
00:35:00,640 --> 00:35:04,640
ये जो है ना वो जन्म से कर्म से ये प्रमाण देते हैं

496
00:35:04,640 --> 00:35:09,600
आर्य समाज लोग भी और लोग भी कि जन्मना जात

497
00:35:09,600 --> 00:35:12,160
संस्कारते

498
00:35:12,160 --> 00:35:16,560
वेदा्यासमधते

499
00:35:16,560 --> 00:35:20,640
ये मनुस्मृति का बताते हैं कहीं है नहीं नहीं नहीं

500
00:35:20,640 --> 00:35:26,640
ये कहीं नहीं है वो पहले जन्मना ब्राह्मण संस्कार वेदाभ्यास

501
00:35:26,880 --> 00:35:31,120
ये है चलो एक आता है तस दुर्जन न्याय आता है तस

502
00:35:31,120 --> 00:35:35,280
तभी हम दुर्जन को भी संतुष्ट करें तो सिर्फ बात सुननी चाहिए

503
00:35:35,280 --> 00:35:39,360
तो हम चलो आपका ही श्लोक है आपने अपने मनमाने ढंग

504
00:35:39,360 --> 00:35:43,760
से बना लिया है तो हम आपसे प्रश्न करते आप सबसे पहले

505
00:35:43,760 --> 00:35:47,760
इस पक्ष पर जन्म से जाती मानते तो कर्म से मानते हैं। एक पे तो आना

506
00:35:47,760 --> 00:35:52,320
ही पड़ेगा। जन्म से मानो तो कर्म से मानो।

507
00:35:52,320 --> 00:35:56,560
जी हां तो आप ये आप इसमें जन्म से भी जाती

508
00:35:56,560 --> 00:36:01,120
मानने और कर्म से भी मान रहे हैं। तो बद तो व्याघात हो गया।

509
00:36:01,120 --> 00:36:05,520
अर्थात अपनी बात अपने से ही कट रही है। तो जन्म ना जाते

510
00:36:05,520 --> 00:36:09,760
शद्रा कह रहे जन्म से शद्र होता है तो जन्म ना मान लिया आपने

511
00:36:09,760 --> 00:36:13,840
और और संस्कार से हो जाता है।

512
00:36:13,840 --> 00:36:16,960
कर्म से मान ली

513
00:36:16,960 --> 00:36:21,200
आप जो है जन्म से भीति मान रहे हैं। कर्म से भी जाति मान रहे हैं। तो

514
00:36:21,200 --> 00:36:25,280
ऐसी स्थिति में जो है ये नहीं अब रही जो है आपकी तत्व

515
00:36:25,280 --> 00:36:29,360
ज्ञानी बात तत्व ज्ञान तो सबसे पहले क्या

516
00:36:29,360 --> 00:36:31,760
कहते हैं कि कर्म को

517
00:36:31,760 --> 00:36:36,320
छोड़ दो। जब हमारा जो है परमात्मा

518
00:36:36,320 --> 00:36:40,480
स्थिति हो गई तो फिर किसी कर्म की आवश्यकता नहीं है।

519
00:36:40,480 --> 00:36:45,440
तो कहा तुलसी जो है ब्रह्म ज्ञान उपज नहीं कर्म दिए झटकाए

520
00:36:45,440 --> 00:36:49,680
ब्रह्म ज्ञान के और पास तक भी नहीं है और हमारे जो है संध्या वंदना

521
00:36:49,680 --> 00:36:53,680
आदि अग्निहोत्र तर्पण वो छोड़ देते हैं ये लोग जो है

522
00:36:53,680 --> 00:36:57,920
ऐसा जो है तुलसी कहते हैं ऐसी आत्मा सहज नरक

523
00:36:57,920 --> 00:37:02,240
में जाए आपको तत्व ज्ञान हुआ नहीं तत्व

524
00:37:02,240 --> 00:37:06,480
ज्ञान क्या परवासा से क्या अनुभव है के शब्द से कहने

525
00:37:06,480 --> 00:37:10,480
लगे और कर्म को छोड़ दिया ऐसी जो आत्माएं अपने आप ही नरक में चली

526
00:37:10,480 --> 00:37:15,200
जाती है। कोई है नहीं। तत्व का मतलब ये होता है

527
00:37:15,200 --> 00:37:19,920
कि जो है ब्रह्म शब्द स्वरूप ब्रह्म शब्द वाच्य वेद

528
00:37:19,920 --> 00:37:24,160
अने ब्रह ब्रह्म शब्द वाच्यम सब

529
00:37:24,160 --> 00:37:29,200
में जो भी है उसमें शब्द स्वरूप ही ब्रह है।

530
00:37:29,200 --> 00:37:33,360
चींटी से लेकर के ब्रह्मा पर्यंत उसी परमात्मा का दर्शन

531
00:37:33,360 --> 00:37:37,760
होना चाहिए। मुक्ति रूपम स्वरूप

532
00:37:37,760 --> 00:37:41,760
मुक्ति रूपम ये ब्रह्म साक्षात्कार है जो अन्यथा

533
00:37:41,760 --> 00:37:45,760
रूप है उसको मार के भाई हमारा जो है

534
00:37:45,760 --> 00:37:46,960
हम कथा वाचक है

535
00:37:46,960 --> 00:37:51,200
हम व्यास जी है कि हम गुरु जी है हम पाठक जी

536
00:37:51,200 --> 00:37:55,760
है ये अन्यथा हम पुत्र है बेटा है बेटी अन्यथा रूप है

537
00:37:55,760 --> 00:37:59,840
इसको छोड़ के अपने स्वरूप में स्थित हो जाएंगे तो आप

538
00:37:59,840 --> 00:38:04,000
ब्रह्म ज्ञानी माने जाएंगे अर्थात अपनी अपना जो आत्मा है वो

539
00:38:04,000 --> 00:38:08,320
तो सबकी आत्मा है। अपने आत्म दर्शन सब की आत्मा

540
00:38:08,320 --> 00:38:12,320
में करना। सबकी आत्मा का आ अपनी आत्मा में करना है।

541
00:38:12,320 --> 00:38:17,360
तो उसका तात्पर्य होता है वो अपने से व्यक्ति विरोध करता नहीं है।

542
00:38:17,360 --> 00:38:21,920
यदि तत्व ज्ञानी होते तो विवाद चलता कहां? जी

543
00:38:21,920 --> 00:38:26,800
ये उसमें आता है अथवा तो ब्रह्म जिज्ञासा जैसे

544
00:38:26,800 --> 00:38:30,880
आजकल जो है वो जो ब्रह्म साक्षात्कारी बन रहे हैं। उनको ब्रह्म

545
00:38:30,880 --> 00:38:35,440
ज्ञानी समझ रहे हैं। ब्रह्म हो गए। ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण होता है।

546
00:38:35,440 --> 00:38:39,440
ये बहुत से लोग मूर्ख है। ये ब्रह्म जानी थी ब्रह्मज्ञ

547
00:38:39,440 --> 00:38:43,760
बनेगा। ब्रह्म जानी ब्रह्मज्ञ

548
00:38:43,760 --> 00:38:48,480
ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म होता है। ब्राह्मण नहीं बनता।

549
00:38:48,480 --> 00:38:52,480
सुन लिया ब्रह्म जानी ब्राह कुछ नहीं है ये जो है

550
00:38:52,480 --> 00:38:57,360
निरक्षर भट्टाचारी लोग है इनके विषय में जो है के

551
00:38:57,360 --> 00:39:01,360
यदि इनकी बातों को कहने सुनने लगोगे तो समय का ही बर्बादी है तो

552
00:39:01,360 --> 00:39:02,160
अर्थात ब्रह्म

553
00:39:02,160 --> 00:39:06,400
जिज्ञासा कहेंगे ब्रह्म की जिज्ञासा होगी तो ब्रह्म साक्षात्कार

554
00:39:06,400 --> 00:39:10,960
हो गया ऐसा अर्थ निकाल लेते हैं अथातो ब्रह्म जिज्ञासा

555
00:39:10,960 --> 00:39:15,120
किंतु वहां भगवान वेदव्यास भाष्य किया है भामतीकार ने

556
00:39:15,120 --> 00:39:19,440
कि ब्रह्म साक्षात्कार पर्यंत ब्रह्म

557
00:39:19,440 --> 00:39:23,440
साक्षात्कार पर्यंत ब्रह्म की जिज्ञासा होनी चाहिए। जब

558
00:39:23,440 --> 00:39:27,680
तक ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं हो जब तक ब्रह्म नहीं बनोगे। तो

559
00:39:27,680 --> 00:39:31,680
जिज्ञासा को भ्रम मानने लगे। ये लोग जो है जिज्ञासा को ही

560
00:39:31,680 --> 00:39:36,080
भ्रम मानने लगे। यही आकर के जो है वो बुद्धि

561
00:39:36,080 --> 00:39:40,480
का पर विषय हो जाता है। जी जी और

562
00:39:40,480 --> 00:39:44,640
आचार्य सत्येंद्र जी मैं आपसे इस बात पर प्रकाश डालने

563
00:39:44,640 --> 00:39:48,720
को का निवेदन करूंगा कि जिससे हम ज्ञान लेने

564
00:39:48,720 --> 00:39:52,880
जा रहे हैं उसके ज्ञान की समीक्षा हम कैसे

565
00:39:52,880 --> 00:39:57,200
करेंगे? यदि जो ज्ञानी होगा वही ब्राह्मण है वही व्यास

566
00:39:57,200 --> 00:40:01,440
है तो जिससे हम भागवत की चर्चा सुनने जा रहे हैं जिससे हम ज्ञान

567
00:40:01,440 --> 00:40:05,520
प्राप्त करने जा रहे हैं उसकी परीक्षा हमें लेनी होगी तभी तो हम उसको

568
00:40:05,520 --> 00:40:09,520
व्यास के रूप में स्वीकार करेंगे तो क्या यह व्यवहारिक रूप

569
00:40:09,520 --> 00:40:13,840
से मतलब तार्किक है यह बात कहना कि जो ज्ञानी होगा वही ब्राह्मण

570
00:40:13,840 --> 00:40:17,440
है व्यास के रूप में वही स्वीकार कर लिया जाएगा जो ज्ञानी

571
00:40:17,440 --> 00:40:23,360
है इस पर आप कैसे प्रतिक्रिया देंगे

572
00:40:23,360 --> 00:40:27,360
ज्ञान की परीक्षा तो वो इनका

573
00:40:27,360 --> 00:40:31,760
कहां अध्ययन हुआ है और आजकल तो खैर

574
00:40:31,760 --> 00:40:35,760
आज संचार का माध्यम हो गया है तो उससे हम लोग सुनते

575
00:40:35,760 --> 00:40:39,760
हैं कि कौन कैसी कथा कर रहा है उससे हम लोग सोचते हैं कि

576
00:40:39,760 --> 00:40:44,080
हां इनका कथा का वाचन सही है। ये श्लोकों की व्याख्या

577
00:40:44,080 --> 00:40:48,240
भी कर रहे हैं। जो स्तुति अंश है उसको नहीं छोड़ रहे हैं। तो उससे

578
00:40:48,240 --> 00:40:52,400
हम लोग पता कर लेते हैं। वैसे पहले तो बहुत कम

579
00:40:52,400 --> 00:40:56,400
होती थी जो कथावाचक थे उनको कथा प्रवक्ता कहा जाता था।

580
00:40:56,400 --> 00:41:00,480
पहले व्यास शब्द से प्रयोग नहीं किया जाता था कि भागवत

581
00:41:00,480 --> 00:41:04,640
प्रवक्ता ऐसा करके कहा जाता था। अब वो भागवत व्यास

582
00:41:04,640 --> 00:41:08,880
करके श्लोक जब क्योंकि व्यास तो भगवान के अवतार हैं। व्यास कोई

583
00:41:08,880 --> 00:41:13,680
नहीं हो सकता। जिन्होंने वेदम विद्यासति वेद व्यास

584
00:41:13,680 --> 00:41:17,840
तो वो व्यास की संज्ञा तो किसी की हो ही नहीं सकती।

585
00:41:17,840 --> 00:41:22,880
तो वह तो भागवत प्रवक्ता माना जाएगा और भागवत का वो निर्वचन

586
00:41:22,880 --> 00:41:27,360
करने की सामर्थ्य है। उपाधि स्वरूप व्यास स्वरूप

587
00:41:27,360 --> 00:41:31,360
स्वीकार कर लिया जाता है। उपाधि प्रतिनिधि

588
00:41:31,360 --> 00:41:32,480
हां व्यास

589
00:41:32,480 --> 00:41:36,720
जी का प्रतिनिधि मान के अभी जो

590
00:41:36,720 --> 00:41:41,040
विद्या भास्कर जी हैं तो उन्होंने उनकी एक शिष्य गौरांगी

591
00:41:41,040 --> 00:41:45,040
देवी है तो उन्होंने वो अच्छी तरह से संतों

592
00:41:45,040 --> 00:41:49,040
के सानिध्य में रही। उनको ज्ञान हो गया। तो वो विद्या भास्कर जी

593
00:41:49,040 --> 00:41:53,120
बता रहे थे कि मैंने कहा कि तुमको जो है भागवत कथा करने का

594
00:41:53,120 --> 00:41:57,200
अधिकार नहीं है। तुम्हें क्या करना है? एक भागवत पीठ

595
00:41:57,200 --> 00:42:01,520
जो है आप बनाएं। उस पर श्रीमद् भागवत को विराजमान करें। उनकी

596
00:42:01,520 --> 00:42:05,600
पूजा करें और जो मंच है उस पर अलग बैठ के अपना

597
00:42:05,600 --> 00:42:10,080
जो ज्ञान है जो सत्संग है उसको प्रकाशित कर सकते हैं।

598
00:42:10,080 --> 00:42:14,320
तो उन्होंने जो महिला जो महिलाएं हैं उनके लिए भी

599
00:42:14,320 --> 00:42:18,400
इस तरह से अधिकार नहीं है और जो ब्राह्मण

600
00:42:18,400 --> 00:42:22,880
जो वेदज्ञ ब्राह्मण जो वेदांग का जिन्होंने अध्ययन नहीं किया है वो भी अधिकारी

601
00:42:22,880 --> 00:42:27,360
नहीं है। ऐसा जो देव ये वासुदेवाचार्य

602
00:42:27,360 --> 00:42:31,840
विद्या भास्कर जी जो कि अयोध्या के बहुत प्रतिष्ठित और बहुत विद्वान

603
00:42:31,840 --> 00:42:36,000
है उनके द्वारा ये सफाई दी जा रही है। उनसे किसी ने कहा आपकी भी शिष्या जो

604
00:42:36,000 --> 00:42:40,000
भागवत कर रही है। वो बोले मैंने तब से उससे जो मना कर दिया कि

605
00:42:40,000 --> 00:42:44,240
मेरे मेरा नाम मत लो। क्योंकि जो मैंने जो बताया

606
00:42:44,240 --> 00:42:47,520
था उसका तुमने पालन नहीं किया। तुमको व्यास पीठ

607
00:42:47,520 --> 00:42:51,680
जो है बना करके उसकी पूजा करनी चाहिए और पास में बैठकर के अपना जो

608
00:42:51,680 --> 00:42:55,760
ज्ञान है उसको सत्संग के रूप में प्रकाशित करें। उसी

609
00:42:55,760 --> 00:42:59,840
प्रकार से अन्य किसी को ज्ञान है अगर यदि वह अधिकारी नहीं

610
00:42:59,840 --> 00:43:04,240
है तो वो व्यासपीठ इस तरह से निर्माण करके उसका विधिवत पूजन

611
00:43:04,240 --> 00:43:08,240
करके उसको प्रणाम सभी लोग करें और बाकी जो किसी भी जाति

612
00:43:08,240 --> 00:43:12,240
का हो महिला हो पुरुष हो वो सत्संग और प्रवचन कर

613
00:43:12,240 --> 00:43:17,200
सकते हैं। उसमें किसी कोई धर्म की बाधा नहीं। जी।

614
00:43:17,200 --> 00:43:21,600
और ज्ञान तो ये हम लोग इस तरह के ज्ञान के चक्कर में अगर पड़ेंगे

615
00:43:21,600 --> 00:43:26,160
कि हां कौन योग्य है अयोग्य है तो उसका जो श्रोता है

616
00:43:26,160 --> 00:43:30,240
तो उनके लिए जो पहले पूर्व में जो श्रोता रहे जैसे

617
00:43:30,240 --> 00:43:34,480
नारद जी है उन्होंने भी सनकादी से कथा सुनी जो 88 हजार ऋषि

618
00:43:34,480 --> 00:43:38,560
थे वो सब जो है विद्वान थे सभी वेद वेदांकों

619
00:43:38,560 --> 00:43:42,560
के जो है जानकार थे वो भी कथा

620
00:43:42,560 --> 00:43:46,640
सुनते थे तो पहले तो 88000 ऋषि एक तो ऋषि नहीं 880001

621
00:43:46,640 --> 00:43:50,640
एक जगह बैठकर के और सू जी से कथा सुन रहे हैं तो वो

622
00:43:50,640 --> 00:43:54,720
उनको परीक्षण का परीक्षण की जरूरत ही नहीं वो वैसे

623
00:43:54,720 --> 00:43:59,200
ही समझ जाते थे कि हां कौन योग्य है कौन अयोग्य कौन अधिकारी है तो अधिकारी

624
00:43:59,200 --> 00:44:02,560
का जो जो व्याख्या की गई है कौन

625
00:44:02,560 --> 00:44:06,560
है वो हम श्रीमद् भागवत के महात्म और शास्त्रों से ही वो ज्ञान

626
00:44:06,560 --> 00:44:10,640
कर सकते हैं और उसकी उपयुक्तता जो है आप अपने हिसाब से

627
00:44:10,640 --> 00:44:14,720
या अन्य विद्वानों के संसर्ग से उसको पता कर सकते

628
00:44:14,720 --> 00:44:18,960
हैं। हां कि इनकी योग्यता है कथा करने की है नहीं

629
00:44:18,960 --> 00:44:23,200
है ये पता लग सकता है। इसमें आचार्य

630
00:44:23,200 --> 00:44:27,680
जी इसमें इसमें ना एक जो समस्या है जो एक ही पक्ष

631
00:44:27,680 --> 00:44:31,680
जो कुतर्क करने वाला जो पक्ष है वही खुद समस्या को बताता भी

632
00:44:31,680 --> 00:44:35,840
जैसे आचार्य श्री ने अभी आपने वो उदाहरण दिया कि

633
00:44:35,840 --> 00:44:39,840
जन्म जन्म जन्मना जाते शद्र वाला तो उसी में

634
00:44:39,840 --> 00:44:44,080
उन्होंने जन्म से मान लिया उसके बाद कर्म से भी मान लिया इसी तरीके से एक

635
00:44:44,080 --> 00:44:48,080
तरफ यह कहते हैं कि जो मतलब क्या

636
00:44:48,080 --> 00:44:52,320
कहते हैं आवश्यक नहीं है कि हर कोई जो

637
00:44:52,320 --> 00:44:56,560
कथा करने वाला है आजकल जो जिसको ब्राह्मण के स्वरूप में जो है बिठा

638
00:44:56,560 --> 00:45:00,640
के व्यास के रूप में और व्यास के प्रतिनिधि के रूप में और

639
00:45:00,640 --> 00:45:04,640
कथा वक्ता जितने लोग हैं जो ब्राह्मण कुल से ही आते हैं और कथा कर रहे हैं कि वो

640
00:45:04,640 --> 00:45:08,720
उन सब पर वो आचरण लागू नहीं होते। और दूसरी ओर खुद ही कहते

641
00:45:08,720 --> 00:45:13,040
हैं कि आजकल ऐसे आचरण वाले क्या ब्राह्मण मिलते हैं?

642
00:45:13,040 --> 00:45:17,440
तो इसमें हमारा पक्ष यह होता है लोगों को समझाने का

643
00:45:17,440 --> 00:45:17,940
कि

644
00:45:17,840 --> 00:45:22,160
भाई इसीलिए तो ब्राह्मण एक वर्गीकरण किया गया।

645
00:45:22,160 --> 00:45:26,160
जैसे कि अभी रामदेव जी भी हैं।

646
00:45:26,160 --> 00:45:31,360
वो भी अनेक न्यूज़ चैनल्स के मंचों से और इस तरह के

647
00:45:31,360 --> 00:45:35,360
कुछ अंटस शंट बयान दे रहे हैं जिसमें कि कह

648
00:45:35,360 --> 00:45:39,440
रहे हैं कि अरे ऊंचनीच करना गलत है। शंकराचार्यों के द्वारा

649
00:45:39,440 --> 00:45:43,600
संतों के द्वारा आचार्यों के द्वारा ऊंचनीच शब्द। जबकि

650
00:45:43,600 --> 00:45:47,600
अब जब ऊंचनीच की बात ही आएगी तो उनसे यह

651
00:45:47,600 --> 00:45:51,920
पूछा जाए कि भाई कोई व्यक्ति आप अपना जब योग दिखाते

652
00:45:51,920 --> 00:45:56,000
हैं तो आप ऊंचे पर क्यों बैठे हैं? आप जिस जगह पर बैठे हैं

653
00:45:56,000 --> 00:46:00,000
वहां पर हर सामान्य व्यक्ति क्यों नहीं बैठ सकता? हर रास्ता चलने

654
00:46:00,000 --> 00:46:04,000
वाला क्यों नहीं बैठ सकता? तो उत्तर यही आएगा कि हर रास्ता

655
00:46:04,000 --> 00:46:08,320
चलने वाला वहां पर वक्ता बनने योग्य है कि नहीं? योग शिक्षक

656
00:46:08,320 --> 00:46:12,320
बनने योग्य है कि नहीं? यह जांचना पड़ेगा और रामदेव

657
00:46:12,320 --> 00:46:16,400
जी जांचे परखे हुए हैं इसलिए वह बैठते हैं। है ना? तो

658
00:46:16,400 --> 00:46:20,560
इसका अर्थ क्या हुआ कि जांचने में समय ना गवाना पड़े इसलिए

659
00:46:20,560 --> 00:46:24,640
एक कैटेगराइज कर दिया गया कि भैया अगर वो इस

660
00:46:24,640 --> 00:46:28,800
कुल से आता हो इस इस वर्ण से सद्ध हो तो उसको

661
00:46:28,800 --> 00:46:32,880
यथा योग्य अपनी जांच पड़ताल करके भी आप व्यास के रूप में स्वीकार कर

662
00:46:32,880 --> 00:46:36,880
ले। है ना? जिससे कि इस समय को इस

663
00:46:36,880 --> 00:46:40,880
श्रम को बचाया जा सके कि हर बार किसी भी कार्य के लिए व्यक्ति को

664
00:46:40,880 --> 00:46:45,040
चयन करने के से पहले उसकी पूरी संपूर्ण जांच की जाए।

665
00:46:45,040 --> 00:46:49,920
जैसे कि रामदेव जी कई ऐसे उनके

666
00:46:49,920 --> 00:46:54,160
चलने वाले जो उनके प्रकल्प है जो भी व्यापार इत्यादि के प्रकल्प है उसमें

667
00:46:54,160 --> 00:46:58,160
कई जगह ऐसी होंगी जहां पर रामदेव जी का ही आधिपत्य

668
00:46:58,160 --> 00:47:02,320
होगा। उनसे इत्र उनसे इतर और किसी का आधिपत्य

669
00:47:02,320 --> 00:47:06,400
नहीं होगा। तो वहां पर रामदेव जी के अनुसार भी

670
00:47:06,400 --> 00:47:10,400
ऊंचनीच स्वीकार की गई। तो इस पर आप कैसे प्रकाश

671
00:47:10,400 --> 00:47:15,440
डालते हैं आचार्य श्री वो थोड़ा सा बता दें।

672
00:47:15,440 --> 00:47:21,440
आचार्य ज्ञान जी अच्छा अच्छा अच्छा

673
00:47:21,760 --> 00:47:25,840
तो ये है कि

674
00:47:25,840 --> 00:47:30,720
जो पहले परंपरा थी अब भी परंपरा है राजस्थान में तो

675
00:47:30,720 --> 00:47:35,520
जब हम श्रीमद् भागवत की कथा कहलवानी है

676
00:47:35,520 --> 00:47:40,560
तो पहले आचार्य जी का गोत्र क्या है कहां के हैं कैसे हैं वहां जाते हैं

677
00:47:40,560 --> 00:47:44,880
पूरा उपपचार पूजन करते हैं आचार्य जी और जाकर

678
00:47:44,880 --> 00:47:49,120
के जो है वो नारियल देके आते हैं। जैसे आचार्य

679
00:47:49,120 --> 00:47:53,120
जी वहां नारियल पकड़ लेंगे तो वचनबद्ध हो जाते हैं कि हमें

680
00:47:53,120 --> 00:47:58,320
जो है यहां कथा करने जाना है। जी और

681
00:47:58,320 --> 00:48:02,400
यजमान है वो उतना धना नहीं है।

682
00:48:02,400 --> 00:48:06,400
जो वचन दे दिया उसी के यहां जाएंगे। चाहे अंबानी क्यों ना आ जाए पर उसके वहां भी

683
00:48:06,400 --> 00:48:10,640
वो नहीं जाएंगे। तो सबसे पहले गांव

684
00:48:10,640 --> 00:48:14,880
में जाते थे जहां आचार्य जी रहते थे वहां जाते थे उनका पूजन करते थे नारियल

685
00:48:14,880 --> 00:48:18,880
देते थे ये परंपरा थी आजकल नहीं है कि बस जो है

686
00:48:18,880 --> 00:48:23,040
फोन से संपर्क कर लिया कि हमारे यहां भागवत आप आ जाओ इतने इतने तारीख तक आपकी

687
00:48:23,040 --> 00:48:27,440
बुकिंग है जब ये सोशल मीडिया बीच में आ गई ना तो परंपरा

688
00:48:27,440 --> 00:48:30,800
समाप्त हो गई जी

689
00:48:30,800 --> 00:48:34,800
नहीं भूला जन श्रति हमारे मूल में जो

690
00:48:34,800 --> 00:48:38,880
परंपरा है वो वेद के द्वारा ही प्रमाणित कहा भी

691
00:48:38,880 --> 00:48:43,440
है कि जो है जो हमारी परंपरा है और जिस परंपरा

692
00:48:43,440 --> 00:48:47,920
से हमारे पूर्वज चले हैं उसी के अनुसार भी चलना चाहिए

693
00:48:47,920 --> 00:48:53,920
तो यते पित याता याता पितामता मार्गते

694
00:48:54,160 --> 00:48:58,880
जिस पर हमारे माता पिता पिताम चले हो

695
00:48:58,880 --> 00:49:02,880
गुरुजन चले हो पूजन चले हो संत लोग चले हो उसी मार्ग

696
00:49:02,880 --> 00:49:08,240
पर चलना चाहिए हम सुन रहे थे कि जो है

697
00:49:08,240 --> 00:49:12,240
विद्वान यदि विपरीत अर्थ करने

698
00:49:12,240 --> 00:49:14,400
लगे

699
00:49:14,400 --> 00:49:18,480
विद्वान है और लोभ से मोह से जो है कहीं

700
00:49:18,480 --> 00:49:22,880
धर्म का आचरण छोड़ने लगे जबकि न जात भया ना लो

701
00:49:22,880 --> 00:49:26,880
धर्म हेतु ना काम से ना क्रोध से ना

702
00:49:26,880 --> 00:49:31,280
लोभ से अपने धर्म का प्रत्याग नहीं करना चाहिए किंतु किसी ने राजनीति

703
00:49:31,280 --> 00:49:35,520
महत्वाकांक्षा के कारण अथवा अन्य प्रयोजन के कारण अपने

704
00:49:35,520 --> 00:49:39,600
मनमाने ढंग से व्याख्या की तो साक्षरा

705
00:49:39,600 --> 00:49:43,760
राक्षसी केवलम यदि साक्षर विपरीत आचरण

706
00:49:43,760 --> 00:49:46,000
करने लगेगा तो साक्षर

707
00:49:46,000 --> 00:49:50,000
का विपरीत क्या हुआ राक्षस उसकी राक्षस में

708
00:49:50,000 --> 00:49:54,000
गणना हो जाएगी तो आजकल जो ऐसा है कि

709
00:49:54,000 --> 00:49:58,000
अपना थोड़ा YouTube के सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ जान लिया कुछ

710
00:49:58,000 --> 00:50:02,160
सुन लिया और मैं बार-बार कहता हूं हमारा

711
00:50:02,160 --> 00:50:06,240
जो वेद है वो कभी भी जो है पैसा देकर के नहीं पढ़ा कहा

712
00:50:06,240 --> 00:50:10,320
जाता है। हमारी जो भागवत है ज्योतिष वेदांग

713
00:50:10,320 --> 00:50:14,480
है। ये इनका कभी क्र भी नहीं होता है और ना ये जो है पैसा

714
00:50:14,480 --> 00:50:18,560
देकर के पढ़े जाते हैं। किंतु वृंदावन में भी जो है

715
00:50:18,560 --> 00:50:22,800
चल गए छ महीना का एक वर्ष का लोग कोर्स कर जाते हैं। साप्ताहिक

716
00:50:22,800 --> 00:50:27,040
विधि से द 50 लोग पढ़ लिए और व्यास गद्दी पर आके

717
00:50:27,040 --> 00:50:31,280
बैठ गए। फिर वही जो नाचना गाना हर्ष स्वामी कृपाती

718
00:50:31,280 --> 00:50:35,360
जी महाराज कहते थे कि कीर्तन

719
00:50:35,360 --> 00:50:39,440
की एक विधि है जिसमें प्रणव नम शब्द का

720
00:50:39,440 --> 00:50:43,600
प्रयोग आ गया उसका कीर्तन नहीं हो सकता ओम नमः

721
00:50:43,600 --> 00:50:47,760
शिवाय का कीर्तन नहीं होगा ओम नमो भगवते वासुदेव का कीर्तन नहीं ओम नमो

722
00:50:47,760 --> 00:50:53,040
नारायण का भी गाजे वाजे के साथ कीर्तन नहीं हो सकता केवल नाम

723
00:50:53,040 --> 00:50:57,600
शिव हरि राम सीता

724
00:50:57,600 --> 00:51:01,280
केवल नाम उसका आप कीर्तन कर सकते हैं

725
00:51:01,280 --> 00:51:05,280
और कहीं इसमें प्रणव और नम शब्द का प्रयोग हो गया तो माय

726
00:51:05,280 --> 00:51:09,680
के द्वारा कीर्तन नहीं कर सकते किंतु इन्हें ज्ञान है नहीं

727
00:51:09,680 --> 00:51:13,920
चाहे ब्राह्मण हो या ब्राह्मणतर हो उसको मर्यादा

728
00:51:13,920 --> 00:51:18,480
तो रखनी होगी मर्यादा ज होगी जब गुरुकुल में 12 वर्ष पर्यंत

729
00:51:18,480 --> 00:51:22,480
रह के उसने निवास किया होगा जब धर्म शास्त्र का ज्ञान उसके लिए

730
00:51:22,480 --> 00:51:26,560
होगा आजकल क्या है कि जो है गुरु ग्रह

731
00:51:26,560 --> 00:51:32,560
पंच वेदांत

732
00:51:33,440 --> 00:51:35,920
समाधा

733
00:51:35,920 --> 00:51:41,520
कुट जैसे होता है ना कि जो है मुर्गा

734
00:51:41,520 --> 00:51:45,840
यदि ना बोले तो भोर नहीं होगा ऐसा कहते है चार बजे मुर्गा जो है बोलता

735
00:51:45,840 --> 00:51:51,440
है कुकुद है ये गुरु पंच

736
00:51:51,440 --> 00:51:55,440
बैठ गए दो चार छ दिन संगत किया और समझ गए हम विद्वान

737
00:51:55,440 --> 00:51:59,440
है पंच केवल पांच दिन ही

738
00:51:59,440 --> 00:52:03,680
पढ़े हैं। वेदांत शास्त्र और

739
00:52:03,680 --> 00:52:08,480
तीन दिन में वेदांत पढ़ लिया। अभी समाज

740
00:52:08,480 --> 00:52:12,560
में जाग तर्क वितर्क कुत संभावना संभावना जाग

741
00:52:12,560 --> 00:52:16,640
फैला देते हैं। ये जो है अपनी कुतों के द्वारा जो समाज को

742
00:52:16,640 --> 00:52:21,120
भ्रमित करते हैं। समागथा कुपुट पाद कुट

743
00:52:21,120 --> 00:52:25,120
कुकुर मु तो ये ऐसे

744
00:52:25,120 --> 00:52:29,920
लोग हैं इनके द्वारा धर्म की रक्षा नहीं होनी ना कथा कितनी भी कहेंगे

745
00:52:29,920 --> 00:52:33,920
वो कथा से कोई लाभ नहीं मिलने वाला है जब तक हमारा समाज

746
00:52:33,920 --> 00:52:38,160
जागरूक नहीं होगा जो लिखा प्रेरणा अर्थ

747
00:52:38,160 --> 00:52:42,240
उसमें लिखा कि धर्मात महाराज हम पढ़ रहे थे कि

748
00:52:42,240 --> 00:52:46,640
वेद प्रतिपादित जो विधि निषेध है और वेद

749
00:52:46,640 --> 00:52:50,800
प्रतिपादित जो प्रवृत्ति निवत्त है। जब जिसको

750
00:52:50,800 --> 00:52:54,800
वेद के द्वारा ज्ञान होगा अर्थात वेद विधि के

751
00:52:54,800 --> 00:52:59,600
द्वारा जो बात कही जाएगी उसी के द्वारा धर्म अधर्म का पता चलेगा।

752
00:52:59,600 --> 00:53:03,840
जब मूल में हमारे वेद का ज्ञान तो क्या धर्म है क्या अधर्म है तो कैसे

753
00:53:03,840 --> 00:53:07,840
बात पूरी हो सकती है जी आचार्य जी

754
00:53:07,840 --> 00:53:11,920
फिर इसमें जो वो एक कुछ भ्रम

755
00:53:11,920 --> 00:53:16,160
फैले हुए हैं जो कि मूल एक

756
00:53:16,160 --> 00:53:20,160
समस्या भी है। कई उनके बारे में ठीक से पता नहीं

757
00:53:20,160 --> 00:53:24,160
होने के कारण जैसे व्यास जी जो

758
00:53:24,160 --> 00:53:28,160
है खुद एक दासी पुत्र कहे मतलब एक उनके बारे में प्रचार किया जाता

759
00:53:28,160 --> 00:53:31,760
है कि वो ब्राह्मण नहीं थे व्यास जी ब्राह्मण नहीं थे वाल्मीकि जी

760
00:53:31,760 --> 00:53:35,840
ब्राह्मण नहीं थे और जो रोमहर्षण

761
00:53:35,840 --> 00:53:39,840
जी थे वो ब्राह्मण नहीं थे और कोई

762
00:53:39,840 --> 00:53:44,000
एक नाम और लिया था तो इन इन चारों के विषय

763
00:53:44,000 --> 00:53:48,080
में थोड़ा थोड़ा प्रकाश डाल दें शास्त्र सम्मत कि किस तरीके से इनके बारे

764
00:53:48,080 --> 00:53:52,160
में मिथ्या प्रचार किया गया है। हां सबसे अधिक जो भयंकर प्रचार

765
00:53:52,160 --> 00:53:56,240
करते हैं सूत को प्रमाण मानकर करते हैं लोग। जी देखिए

766
00:53:56,240 --> 00:54:00,720
ये सूत शब्द है। एक सूत शब्द उसको कहते हैं

767
00:54:00,720 --> 00:54:06,400
जो अपना रथ चलाता है उसका नाम भी सूत है।

768
00:54:06,400 --> 00:54:10,880
जो सूत है वो भी उसको सूत कहेंगे। रथ चलाने वाले के लिए

769
00:54:10,880 --> 00:54:16,560
और एक जो उसको सूत कहते हैं [संगीत]

770
00:54:16,560 --> 00:54:20,720
क्षत्रिय के द्वारा ब्राहणी में उत्पन्न होता है उसका नाम सूत है

771
00:54:20,720 --> 00:54:24,960
जी किंतु सूत जी से इसका कोई लेना देना नहीं है

772
00:54:24,960 --> 00:54:29,280
सूत जी से इसका कोई लेना देना नहीं है तो मैं बहुत संक्षिप्त में जो विष्णु

773
00:54:29,280 --> 00:54:33,280
पुराण का जो है बतला देता हूं आचार्य श्री सूत जी

774
00:54:33,280 --> 00:54:37,440
और रोम जी एक ही एक ही है ना जो है सूत

775
00:54:37,440 --> 00:54:41,680
जी संज्ञा है नाम है उनका अच्छा वोति

776
00:54:41,680 --> 00:54:45,120
परक शब्द नहीं है ये

777
00:54:45,120 --> 00:54:49,280
रोम भी उनकी संज्ञा है लोम जो है सूत जी की संज्ञा

778
00:54:49,280 --> 00:54:53,440
है सूत शब्द जो है ना जो पुराणों

779
00:54:53,440 --> 00:54:57,760
का प्रवक्ता हो वक्ता हो ब्राह्मण तो जाति से हो सकता है

780
00:54:57,760 --> 00:55:01,840
सबसे विशिष्ट होता है उसका नाम सूत होता है तो वो जो सूत है

781
00:55:01,840 --> 00:55:06,400
उनका नाम है वो संज्ञा नहीं है जैसे

782
00:55:06,400 --> 00:55:11,120
ब्राहणी से उत्पन्न हो गए उसमें कहा है कि जो है महाभारत में ही

783
00:55:11,120 --> 00:55:15,200
जब महाराज पृथ्वी यज्ञ कर रहे थे तो अग्निकुंड से सू

784
00:55:15,200 --> 00:55:19,520
जी महाराज उत्पन्न हुए हैं। तो शिव कहते हैं महाभारत

785
00:55:19,520 --> 00:55:21,760
में कहां पर है आचार्य श्री

786
00:55:21,760 --> 00:55:26,000
हां हां ये जो है उसमें भी आया है भागवत में भी आ गया है

787
00:55:26,000 --> 00:55:32,000
और वायु पुराण में भी है कि यज्ञ वर्तमानु

788
00:55:32,000 --> 00:55:36,720
महाराज के द्वारा यज्ञ हो रहा था

789
00:55:36,720 --> 00:55:40,880
प्रथम वर्णम तो वहां क्या होता है

790
00:55:40,880 --> 00:55:45,120
कि हसा तम बहस्पते

791
00:55:45,120 --> 00:55:49,280
तो वहां इंद्र को उदेश करके जो है हानस

792
00:55:49,280 --> 00:55:53,600
मतलब सामग्री छोड़ी जाती है उसी क्षण जो है बृहस्पति

793
00:55:53,600 --> 00:55:57,840
को उदेश करके भी सामग्री छोड़ दी जाती है इंद्र

794
00:55:57,840 --> 00:56:02,160
क्षत्रिय है और बृहस्पति ब्राह्मण है तो दोनों शांत

795
00:56:02,160 --> 00:56:06,320
एक साथ जो उसमें जाकर के जो है मिली तो उससे क्या होता

796
00:56:06,320 --> 00:56:10,640
है जो इंद्र तथा सूत उसमें जो

797
00:56:10,640 --> 00:56:15,040
अग्नि से उत्पन्न कौन हो गए सूत महाराज हो गए

798
00:56:15,040 --> 00:56:19,600
इस ढंग से वो जो है उनकी उत्पत्ति है अग्निकुंड समता

799
00:56:19,600 --> 00:56:23,760
सूतो निर्मल मानसम अग्निकुंड से उत्पन्न

800
00:56:23,760 --> 00:56:27,760
होने के कारण ये जो है जो सूत जी है वो

801
00:56:27,760 --> 00:56:32,560
निर्मल मानस थे और शास्त्रज्ञ थे पुराण देखता थे

802
00:56:32,560 --> 00:56:37,360
जो लोम हर्षणा इनहीं को लोम हर्षण कहते हैं और भगवान

803
00:56:37,360 --> 00:56:41,440
भगवान वेदव्यास जी के जो है ये प्रधान शिष्य है सूत संिता

804
00:56:41,440 --> 00:56:45,920
इनके द्वारा बनी हुई है पुत्र सौती उग्रवा

805
00:56:45,920 --> 00:56:51,920
जब बलराम जी द्वारा वध हो गया तो इनके पुत्र कौन है सौती

806
00:56:52,800 --> 00:56:56,960
यहां पे मैं यहां पे मैं एक बात कहूंगा कि ये ये बात

807
00:56:56,960 --> 00:57:01,120
भविष्य में आनी थी इसीलिए बलराम जी के द्वारा वहां पर लीला पूर्वक पहले

808
00:57:01,120 --> 00:57:06,480
ही दिखा दिया गया कि शिवसूत जी को लेकर के भ्रम हो गया

809
00:57:06,480 --> 00:57:10,480
है ना तो उनको जैसे जैसे आज के कलयुग में होने वाले

810
00:57:10,480 --> 00:57:14,560
कुतर्कों को जानते थे भागवतकार तो वो लीला पूर्वक वहां

811
00:57:14,560 --> 00:57:18,560
पर पहले ही प्रस्तुत कर दिया गया कि सूत जी को ले भ्रम होगा

812
00:57:18,560 --> 00:57:22,640
तो वो बलराम जी ने वो वो स्थिति दिखाते हुए उस भ्रम का निराकरण

813
00:57:22,640 --> 00:57:26,800
वहां पर प्रस्तुत किया गया भागवत में और आप एक

814
00:57:26,800 --> 00:57:31,200
चीज मैं और क्लियर कर दूं जिससे कि जो श्रोता है दर्शक है वो भी समझ जाए

815
00:57:31,200 --> 00:57:35,200
कि जैसे यहां पर जो आचार्य श्री ने उत्पत्ति

816
00:57:35,200 --> 00:57:39,200
बताई है कि जो इंद्र देव और

817
00:57:39,200 --> 00:57:43,600
बृहस्पति देव के निमित्त जो सामग्री डाली गई तो क्योंकि इंद्रदेव

818
00:57:43,600 --> 00:57:47,680
को ब्राह्मण वर्ण में जो जब देवताओं का वर्ण होता है तो

819
00:57:47,680 --> 00:57:51,920
उसके अनुसार इंद्रदेव ब्राह्मण वर्ण में आते हैं और क्षत्रिय

820
00:57:51,920 --> 00:57:52,720
वर्ण में बृहस्पति

821
00:57:52,720 --> 00:57:56,800
ब्राह्मण वर्ण क्षत्रिय इंद्र इंद्रदेव क्षत्रिय में आते हैं और बृहस्पति ब्राह्मण

822
00:57:56,800 --> 00:58:00,960
में तो उनके निमित्त डाली गई सामग्री से उत्पन्न होने के कारण उनको

823
00:58:00,960 --> 00:58:06,560
सूत संज्ञा दे दी गई तो इसमें उनको

824
00:58:06,560 --> 00:58:11,680
जो वर्ण है चतुर्थ वर्ण में इसलिए नहीं लिया गया क्योंकि

825
00:58:11,680 --> 00:58:15,680
यह जो उत्पत्ति है यह मानसिक संसर्ग के द्वारा नहीं

826
00:58:15,680 --> 00:58:20,880
हुई है। ये दय ये दय संसर्ग के द्वारा

827
00:58:20,880 --> 00:58:25,280
उत्पत्ति उनकी हुई है। इसलिए उनके उनकी उत्पत्ति

828
00:58:25,280 --> 00:58:29,520
को अभिव्यक्त करने के लिए संज्ञा तो सूत्र दे दी गई उनको।

829
00:58:29,520 --> 00:58:33,680
परंतु उनके ऊपर वह विधि निषेध लागू नहीं होते हैं जो

830
00:58:33,680 --> 00:58:37,760
मानसिक संसर्ग जब होगा और उसमें ब्राह्मण

831
00:58:37,760 --> 00:58:42,080
ब्राहणी में और क्षत्रिय द्वारा उत्पन्न पुत्र होगा तो उस पर जो विधि निषेध

832
00:58:42,080 --> 00:58:46,160
लागू होंगे वो विधि निषेध उन पर लागू नहीं हुए वो एक औपचारिक

833
00:58:46,160 --> 00:58:50,400
रूप से उनको एक उनकी स्थिति उनकी उत्पत्ति कैसे हुई थी उस कथा को अभिव्यक्त

834
00:58:50,400 --> 00:58:54,560
करने के लिए उनको संज्ञा दे दी गई इतना मात्र अहिल्या दोप

835
00:58:54,560 --> 00:58:58,720
की तारा कुंदी मंदोदरी तथा आपकी द्रोपदी के पांच

836
00:58:58,720 --> 00:59:04,320
पति होते हुए भी कन्या ही रही क्यों से

837
00:59:04,320 --> 00:59:08,080
विधि लागू नहीं होता है अच्छा रही

838
00:59:08,080 --> 00:59:12,640
व्यास जी की बात तो व्यासम वशिष्

839
00:59:12,640 --> 00:59:16,640
शक्ति पौत्र कल्पसम परा वंदे सुख

840
00:59:16,640 --> 00:59:20,720
तात तपो निधि जी व्यास जी वशिष् के

841
00:59:20,720 --> 00:59:24,880
प्रपत्र है जो वशिष्ठ है उनके प्रपत्र

842
00:59:24,880 --> 00:59:28,960
है शक्ति के पौत्र है और पराशर जी के

843
00:59:28,960 --> 00:59:32,960
पुत्र है और सुखदेव जी के पिता है। जी ये

844
00:59:32,960 --> 00:59:37,040
हो गया। इनकी वंश परंपरा क्या रही कि ब्रह्मा जी से

845
00:59:37,040 --> 00:59:41,040
वशिष्ठ जी हुए। वशिष्ठ से शक्ति और

846
00:59:41,040 --> 00:59:45,600
शक्ति से परासर और परासर से व्यास जिसको कृष्ण

847
00:59:45,600 --> 00:59:49,680
भी कहते हैं और उनके पुत्र हुए सुखदेव जी। यहां कहीं अब

848
00:59:49,680 --> 00:59:53,440
ब्राह्मण वाली बात आ रही है क्या?

849
00:59:53,440 --> 00:59:57,440
ब्राह्मण वाली बात संभता वहां आ जाती है जो एक व्यवस्था थी कि

850
00:59:57,440 --> 01:00:00,320
द्वापर तक

851
01:00:00,320 --> 01:00:04,400
जो कन्या है वो अब ब्राह्मण भी है यदि तो भी ब्राह्मण

852
01:00:04,400 --> 01:00:08,640
के द्वारा उसमें जो पुत्र उत्पन्न होगा तो ब्राह्मण में गिना गिना जाएगा ऐसा

853
01:00:08,640 --> 01:00:13,040
कुछ जो पूज्य जगुरु शंकराचार्य जी वो भी बताते तो क्या व्यास

854
01:00:13,040 --> 01:00:17,280
देव जी की माता को लेकर के वो एक भ्रम फैला हुआ है कि उनसे उत्पन्न

855
01:00:17,280 --> 01:00:21,520
होने के कारण व्यास देव जी को जो है अब्राह्मण में गिनते तो

856
01:00:21,520 --> 01:00:23,120
वो बात है वो

857
01:00:23,120 --> 01:00:27,120
भी जो है अप्सरा थी वो कोई जो है निषाद

858
01:00:27,120 --> 01:00:31,200
की पुत्री नहीं थी वो अप्सरा थी पिक्चर रिसीव हुए है उनकी है वो पूरा हमने वीडियो

859
01:00:31,200 --> 01:00:35,280
में डाल दिया है वो कहीं भी कुछ भी नहीं है जब उनका

860
01:00:35,280 --> 01:00:40,000
सत्यवती का और जो पाराशर जी का सहयोग भी नहीं है केवल

861
01:00:40,000 --> 01:00:44,000
मात्र से जो पांच तरह के पुत्र भी होते दृष्टि से भी होता है स्पर्श

862
01:00:44,000 --> 01:00:48,320
से भी होता है हमारे शारीरिक संबंध की सृष्टि नहीं है ये

863
01:00:48,320 --> 01:00:52,320
और एक क्षण में ही जो है तुरंत पुरुष रूप में

864
01:00:52,320 --> 01:00:56,960
हो गए वो और वेदों का जो भास करने लगे

865
01:00:56,960 --> 01:01:01,120
तो इनका जो जन्म कर्म दिव्य होता है इनको जाति

866
01:01:01,120 --> 01:01:05,120
से नहीं जोड़ा जाता भगवान श्री राम को जाति से नहीं जोड़ सकते कृष्ण को जाति

867
01:01:05,120 --> 01:01:09,520
से नहीं जोड़ सकते परशुराम जी को जाति से नहीं जोड़ सकते उसी

868
01:01:09,520 --> 01:01:13,520
भगवान विष्णु का अवतार कौन है भगवान वेदव्यास है

869
01:01:13,520 --> 01:01:17,680
जी जन्म कर्म दोनों दिव्य है येति

870
01:01:17,680 --> 01:01:22,080
से जोड़ते हैं अज्ञानी लोग अज्ञानी है।

871
01:01:22,080 --> 01:01:27,520
जी

872
01:01:27,520 --> 01:01:31,600
जी अ

873
01:01:31,600 --> 01:01:36,080
वाल्मीकि जी के बारे में बता दिया है आचार्य श्री आपने। हां

874
01:01:36,080 --> 01:01:40,480
विस्तार से बताया है। वाल्मीकि जी जो है

875
01:01:40,480 --> 01:01:44,880
ब्रह्मा जी के पुत्र प्रचता थे। उनके पुत्र प्रास

876
01:01:44,880 --> 01:01:50,320
करके है उसमें कुछ संदेह नहीं है तो ब्राह्मण

877
01:01:50,320 --> 01:01:53,040
ब्राह्मण

878
01:01:53,040 --> 01:01:57,120
ब्राह्मण होते हैं और मन मान मनु

879
01:01:57,120 --> 01:02:01,200
की संतान मानव होते हैं तो ब्राह्मण कोई संदेह

880
01:02:01,200 --> 01:02:06,800
नहीं है ये तो अपनी कप कल्पना ही है

881
01:02:06,800 --> 01:02:12,720
जी जी अच्छा आचार्य श्री इसमें

882
01:02:12,720 --> 01:02:16,720
एक कुतर्क और आता है। जो समस्या फैलाई जा रही है यह जो

883
01:02:16,720 --> 01:02:21,120
उन्माद बनाया जा रहा है इसको इसमें कुतर्क कर रहे हैं। रामदेव

884
01:02:21,120 --> 01:02:25,520
जी की बात करूंगा मैं नाम लेके बात करूंगा। उन्होंने कुतर्क किया है

885
01:02:25,520 --> 01:02:29,520
कि यदि जो अमुक अमुक

886
01:02:29,520 --> 01:02:33,120
वर्ण के लोग

887
01:02:33,120 --> 01:02:37,520
व्यास गद्दी पर नहीं बैठ सकते या ब्राह्मणोचित कार्य नहीं कर सकते

888
01:02:37,520 --> 01:02:41,600
तो फिर ब्राह्मणों को भी अमुक अमुक वर्ण के कार्यों से हट जाना

889
01:02:41,600 --> 01:02:45,840
चाहिए। ऐसा क्यों है कि वह तो सभी क्षेत्रों

890
01:02:45,840 --> 01:02:50,000
में कार्य कर सकते हैं। और जब चतुर्थ वर्ण के

891
01:02:50,000 --> 01:02:54,080
लोग या अमुक अमुक वर्ण के लोग जब वो कार्य कर रहे हैं जो

892
01:02:54,080 --> 01:02:58,160
के ब्राह्मण के लिए स्पेसिफाई है तो उसमें आपको आपत्ति है।

893
01:02:58,160 --> 01:03:03,040
तो इसमें हम तो यह पक्ष रखते हैं कि भाई देखिए जब

894
01:03:03,040 --> 01:03:07,280
ऐसा होना तो नहीं चाहिए कि ब्राह्मण जो है अपने से जाकर के व्यापार

895
01:03:07,280 --> 01:03:11,600
करने लगे। ब्राह्मण जो है परचून की दुकान खोले, मेडिकल स्टोर खोले या

896
01:03:11,600 --> 01:03:16,000
जो है फौज में चला जाए या इंस्पेक्टर बन जाए ऐसा होना नहीं चाहिए। प्राथमिकता

897
01:03:16,000 --> 01:03:20,000
तो प्रथमता तो ब्राह्मण का यही है कि वो

898
01:03:20,000 --> 01:03:22,320
ब्राह्मणोचित

899
01:03:22,320 --> 01:03:26,800
माध्यम से ही अपना आजीव कोपार्जन करे। बिल्कुल बिल्कुल परंतु

900
01:03:26,800 --> 01:03:27,760
यदि वो

901
01:03:27,760 --> 01:03:31,840
करता भी है तो उसको हीन ब्राह्मण पतित ब्राह्मण ही माना जाएगा। कर्म

902
01:03:31,840 --> 01:03:35,920
संकरता का दोष तो लगेगा ही उसप भी। बिल्कुल बिल्कुल लगेगा।

903
01:03:35,920 --> 01:03:40,240
मगर जब जब आज हम संक्रमण काल देख रहे हैं कलयुग

904
01:03:40,240 --> 01:03:44,400
में जब हमारी जो व्यवस्थाएं लागू नहीं है धर्म शास्त्रों के अनुसार

905
01:03:44,400 --> 01:03:48,400
नहीं है तो ऐसी स्थिति में यदि किया भी जा रहा है तो

906
01:03:48,400 --> 01:03:52,640
धर्म जहां से धार्मिक ज्ञान उत्पन्न हो रहा है केवल

907
01:03:52,640 --> 01:03:57,040
उस क्षेत्र को संरक्षित रखने के लिए आजोपार्जन

908
01:03:57,040 --> 01:04:01,440
के निमित जीवन को संरक्षित रखने के लिए नहीं वो जो धर्म की

909
01:04:01,440 --> 01:04:05,840
जो व्याख्या है वो बदल ना जाए धर्म ब्रह्म की व्याख्या में दोष ना आ जाए।

910
01:04:05,840 --> 01:04:09,840
रामपाल जैसे लोग खड़े ना हो जाए जो धर्म का

911
01:04:09,840 --> 01:04:13,920
सत्यानाश करें। इस कारण से धार्मिक ज्ञान बताने

912
01:04:13,920 --> 01:04:17,600
वाली जगह पर उस चीज को बिल्कुल

913
01:04:17,600 --> 01:04:21,600
क्या कहते हैं? कठोरता के साथ वहां पालन करने के लिए कहा जा रहा है कि सारे सेक्टर्स

914
01:04:21,600 --> 01:04:25,680
में तो आज एक दूसरे के उसमें कूद ही रहे हैं। सभी वर्ण के लोग

915
01:04:25,680 --> 01:04:29,760
क्षत्रिय वैश्य के कार्य कर रहा है। वैश्य क्षत्रिय के कार्य कर रहा है। शद्र भी

916
01:04:29,760 --> 01:04:33,840
सब जगह अपॉइंट हो रहे हैं। यहां तक कि आधुनिक शिक्षा में भी वो

917
01:04:33,840 --> 01:04:37,920
शद्र पढ़ाते हैं। अगर चतुर्थ वर्ण का पढ़ाता है या

918
01:04:37,920 --> 01:04:42,240
जो वैश्य पढ़ाते हैं तो उससे भी कोई आपत्ति नहीं है।

919
01:04:42,240 --> 01:04:42,800
केवल एक

920
01:04:42,800 --> 01:04:46,960
धर्म की और ब्रह्म की व्याख्या जो है उसको

921
01:04:46,960 --> 01:04:51,040
संरक्षित रखने के लिए अपने सही स्वरूप में इस कारण से वहां

922
01:04:51,040 --> 01:04:55,520
पर केवल इस बात का ध्यान कठोरता के साथ रखने का कहा जाता है हमारे आचार्यों

923
01:04:55,520 --> 01:04:59,600
के द्वारा कि वहां पर भाई ब्राह्मण ही वो कार्य करे तब लोग

924
01:04:59,600 --> 01:05:03,680
भाजी तो मार रहे हैं अन्य क्षेत्रों में मारो मगर कम से कम धर्म की व्याख्या

925
01:05:03,680 --> 01:05:08,000
को छोड़ दो तो इसमें जो है आप थोड़ा सा प्रकाश

926
01:05:08,000 --> 01:05:12,240
डाल देखिए ऐसा है

927
01:05:12,240 --> 01:05:17,200
कर्म क्षेत्र संग्राम

928
01:05:17,200 --> 01:05:21,840
ब्रह्मचर तपो मंत्र त

929
01:05:21,840 --> 01:05:24,000
ब्राह

930
01:05:24,000 --> 01:05:28,880
सबसे पहले है जो वैश्य है उनका कृषि धर्म था

931
01:05:28,880 --> 01:05:33,520
गोपालन था गोचारण था और

932
01:05:33,520 --> 01:05:37,600
चतुर्थ वर्ण का सेवा धर्म था और क्षत्रियों

933
01:05:37,600 --> 01:05:42,320
का जो है युद्ध करना था। ब्रह्मचर्य

934
01:05:42,320 --> 01:05:46,640
तप है, मंत्र है और ज्ञान है। यह सब ब्राह्मणों

935
01:05:46,640 --> 01:05:50,640
के धर्म थे। तो सबसे ब्राह्मण का

936
01:05:50,640 --> 01:05:54,800
पठन पाठन धर्म था। यज्ञ करना

937
01:05:54,800 --> 01:05:58,000
कराना धर्म था और दान लेना

938
01:05:58,000 --> 01:06:02,320
दान देना धर्म था। यदि इसके अलावा दूसरा

939
01:06:02,320 --> 01:06:06,400
अपनाता है तो उसमें किया कि

940
01:06:06,400 --> 01:06:10,480
विशेष परिस्थिति है प्राण संकट में है तो क्षत्रियों की वृत्त को

941
01:06:10,480 --> 01:06:14,720
ग्रहण कर ले और उससे ना जो है की वृत्त गित

942
01:06:14,720 --> 01:06:18,320
कर सकता है चौथे वर्ण की नहीं

943
01:06:18,320 --> 01:06:22,640
ये बात उन्होंने कही और अन्य वृत्त

944
01:06:22,640 --> 01:06:26,720
ग्रहण करने के बाद में श्रेष्ठ ब्राह्मण नहीं कहलाता वहां

945
01:06:26,720 --> 01:06:31,040
क्या होगा सकल भय शंकर आता है ना उसमें

946
01:06:31,040 --> 01:06:35,040
किस में आता है उसमें भगवान तुलसीदास जी कह रहे हैं कि

947
01:06:35,040 --> 01:06:39,120
कलयुग में जितने भी लोग हैं सब वर्ण शंकर हो गए हमने

948
01:06:39,120 --> 01:06:43,280
सोचा कि ब्रह्मा से पर्यंत आज तक कहीं हमारे परिवार में बेकार नहीं तो हम भी

949
01:06:43,280 --> 01:06:47,840
शंकर कैसे हो गए तो बड़ा अंदर से गिरानी हुई जब अध्ययन किया

950
01:06:47,840 --> 01:06:52,240
तो कहीं हो जाता है कि जाति सांक्य जाति

951
01:06:52,240 --> 01:06:56,480
से भी सांकर हो जाता है कि ब्राह्मण है उसे अन्य वर्ण की जाति से कर लिया जाति

952
01:06:56,480 --> 01:07:01,760
सांकर हो गया एक होता है वित्त सांकर्य

953
01:07:01,760 --> 01:07:05,840
वित्त सांकर यही है जो रामदेव जी जो कह रहे हैं कि ब्राह्मण

954
01:07:05,840 --> 01:07:09,920
शरीर है और आपने जो है सूअर पालन केंद्र खोल दिया मत्स्य पालन

955
01:07:09,920 --> 01:07:13,120
केंद्र खोल दिया और मांस का विक्रय करने लगे

956
01:07:13,120 --> 01:07:17,520
अथवा शराब की दुकान खोल ली ये आपका जो है क्या है ये वित्त सा

957
01:07:17,520 --> 01:07:21,520
है ये सा श्रेणी में आता है ये और एक होता है विद्या

958
01:07:21,520 --> 01:07:25,600
शरी ब्राह्मण अन्य किसी के द्वारा ब्राह्मण ने जो

959
01:07:25,600 --> 01:07:29,840
है किसी अन्य के द्वारा विद का स्वाध्याय कर लिया विद्या हो जाएगा

960
01:07:29,840 --> 01:07:33,840
तो ब्राह्मण की जो जीविका है वही जीविका है

961
01:07:33,840 --> 01:07:37,920
पढ़ना पढ़ाना है जब उससे काम नहीं चलता जब शास्त्र

962
01:07:37,920 --> 01:07:42,240
आदिक क्षति की करो फिर वैसे कर सकते हो ये विशेष परिस्थिति

963
01:07:42,240 --> 01:07:46,320
में सामान्य परिस्थिति में नहीं जी

964
01:07:46,320 --> 01:07:50,320
तो इसमें इसमें ही जो कुतर्की है वो

965
01:07:50,320 --> 01:07:54,560
ये सवाल कर देते हैं ना कि जब काम नहीं चल रहा है तो जैसे

966
01:07:54,560 --> 01:07:58,960
ब्राह्मण क्षत्रिय की वृत्ति का उपयोग कर सकता है आलंबन ले सकता है तो

967
01:07:58,960 --> 01:08:02,960
काम ना चलने पर शूद्र या अमुक अमुक क्षत्रिय वैश्य क्यों

968
01:08:02,960 --> 01:08:07,200
नहीं ब्राह्मण की वृत्ति का आलंबन ले सकते हैं तो वही मैंने उसमें

969
01:08:07,200 --> 01:08:11,200
बोला कि भाई जहां धर्म की व्याख्या की बात आ रही है प्रामाणिक

970
01:08:11,200 --> 01:08:15,600
उसको केवल संरक्षित रखने के लिए ये नियम लागू बाकी तो कलयुग

971
01:08:15,600 --> 01:08:20,080
है ही तो उसमें थोड़ा सा बता दीजिए कि यदि ब्राह्मण आप अपने

972
01:08:20,080 --> 01:08:24,400
मतलब जो जो आचार्य की वाणी के रूप में भी हमें मिल जाए कुछ

973
01:08:24,400 --> 01:08:28,400
कि ब्राह्मण जो है वो तो अमुक अमुक स्थिति में अमुक अमुक

974
01:08:28,400 --> 01:08:33,440
सभी व्यक्तियों का आलंबन ले सकता है। परंतु फिर अन्य वर्ण वाले

975
01:08:33,440 --> 01:08:37,520
वो सभी यही कहेंगे ना कि भाई हम क्या कहते हैं हमारा काम नहीं चल रहा

976
01:08:37,520 --> 01:08:42,000
है। तो इसलिए हम कथा माच रहे हैं। तो इस पर क्या किया जाए?

977
01:08:42,000 --> 01:08:46,400
नहीं जो है वो कथा का जो विषय है वो धर्म शास्त्र फर्क है।

978
01:08:46,400 --> 01:08:51,280
तस् प्रमाण

979
01:08:51,280 --> 01:08:55,280
कर्मसी उसमें शास्त्र वाक्य वो मानना

980
01:08:55,280 --> 01:08:59,440
पड़ेगा। इसमें अपनी मनमानी या व्यवहारिक सत्ता

981
01:08:59,440 --> 01:09:03,600
नहीं है। जी वही वो परमार्थ

982
01:09:03,600 --> 01:09:07,760
वही वाली बात कि जब शास्त्र की बात आएगी तो वो कम से कम वो

983
01:09:07,760 --> 01:09:13,200
शास्त्रों के हिसाब से चले कि शास्त्र कौन पढ़ेगा पढ़ाएगा वो वाली बात

984
01:09:13,200 --> 01:09:17,200
ये तो परमार्थ का विषय है जी व्यवहार का नहीं है ये तो

985
01:09:17,200 --> 01:09:21,840
ये व्यवहारिक विषय है जी

986
01:09:21,840 --> 01:09:25,840
ठीक है आचार्य श्री बहुत अच्छा लगा आप आए आपने

987
01:09:25,840 --> 01:09:30,560
समय निकाला हमारे लिए हम अल्पज्ञों के अज्ञानियों

988
01:09:30,560 --> 01:09:34,720
के लिए आपने समय दिया अपना और मुझे लगता है कि बहुत सारी चीजें जानने

989
01:09:34,720 --> 01:09:38,720
को मिली होंगी दर्शकों को और आचार्य श्री का चैनल है डॉक्टर ज्ञानेंद्र

990
01:09:38,720 --> 01:09:42,960
शर्मा नाम से वहां पर आचार्य श्री भी यथावत

991
01:09:42,960 --> 01:09:43,460
रूप से धर्म

992
01:09:43,440 --> 01:09:47,440
के स्तंभ को खड़ा कर रहे हैं। आप जो है वहां पर जाकर

993
01:09:47,440 --> 01:09:51,680
के उनकी दिव्य वाणी को दिव्य वाणी से

994
01:09:51,680 --> 01:09:55,920
स्वयं के जीवन का कल्याण कर सकते हैं। अ बस

995
01:09:55,920 --> 01:10:00,080
इसी के साथ हम सब आपसे जो है अनुमति चाहेंगे। आचार्य श्री

996
01:10:00,080 --> 01:10:04,240
आपसे भी अनुमति लूंगा और आपके आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आचार्य

997
01:10:04,240 --> 01:10:08,960
श्री और

998
01:10:08,960 --> 01:10:12,560
जी

999
01:10:12,560 --> 01:10:18,560
ठीक है आचार्य जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपका पधारने के लिए।

1000
01:10:18,640 --> 01:10:23,280
सभी को जय श्री राम। चरण आचार्य जय

1001
01:10:23,280 --> 01:10:29,280
जय जय

1002
01:10:30,930 --> 01:10:34,930
[संगीत]
