1
00:00:02,640 --> 00:00:06,720
तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप

2
00:00:06,720 --> 00:00:07,760
सभी कुशल पूर्वक

3
00:00:07,760 --> 00:00:11,840
होंगे और

4
00:00:11,840 --> 00:00:16,640
धरातल पर कार्यों की अधिकता होने के कारण

5
00:00:16,640 --> 00:00:20,800
आपके समक्ष यथावत जिस तरह से

6
00:00:20,800 --> 00:00:25,920
पूर्व में YouTube चैनल के माध्यम से इनेटिव

7
00:00:25,920 --> 00:00:30,320
वीडियोस हम प्रदान कर रहे थे। उसमें

8
00:00:30,320 --> 00:00:34,400
थोड़ी सी रुकावट आई धरातल पर ज्यादा एक्टिव होने के

9
00:00:34,400 --> 00:00:38,480
कारण। परंतु जो भी हम कर रहे हैं यहां समय ना

10
00:00:38,480 --> 00:00:42,480
देकर के जो धरातल पर समय अधिक दे रहे हैं। धरातल पर पहले

11
00:00:42,480 --> 00:00:46,640
भी समय देते थे पर इस समय बहुत ज्यादा दे रहे हैं। तो उसका जो

12
00:00:46,640 --> 00:00:50,880
अभी जो ऐसा परिवर्तन किया तो उसके द्वारा मिलने वाले जो परिणाम

13
00:00:50,880 --> 00:00:54,880
है जो फल हैं वो आपको आपके

14
00:00:54,880 --> 00:00:59,200
लिए अत्यंत लाभदायक होंगे। आपको जब प्राप्त होंगे वो फल जब आपको सूचनाएं

15
00:00:59,200 --> 00:01:03,200
प्राप्त होंगी तो आपको अत्यंत हर्ष

16
00:01:03,200 --> 00:01:06,800
होगा।

17
00:01:06,800 --> 00:01:11,600
तो सबसे पहले आ जाते हैं आज के बुलेट पॉइंट्स पर

18
00:01:11,600 --> 00:01:17,600
बिना विलंब के।

19
00:01:27,600 --> 00:01:31,760
हम तो हमने पिछले अध्याय में पिछले एपिसोड

20
00:01:31,760 --> 00:01:37,200
में जो चौथा अध्याय है उसके कुछ 15

21
00:01:37,200 --> 00:01:41,600
श्लोकों की विवेचना कर ली थी। उसमें

22
00:01:41,600 --> 00:01:45,840
रामपाल ने अपनी गरिमा गीता की पृष्ठ संख्या

23
00:01:45,840 --> 00:01:49,120
94

24
00:01:49,120 --> 00:01:53,120
उसमें रामपाल ने माना है रामपाल की

25
00:01:53,120 --> 00:01:56,560
गरिमा गीता की खोल लीजिए

26
00:01:56,560 --> 00:02:00,560
रामपाल के द्वारा लिखी गई या जो भी है पता नहीं किसने लिखा

27
00:02:00,560 --> 00:02:03,520
है

28
00:02:03,520 --> 00:02:09,520
पृष्ठ संख्या 94

29
00:02:12,240 --> 00:02:16,080
तो इसमें रामपाल ने सर्वप्रथम

30
00:02:16,080 --> 00:02:20,080
गीता जी के अध्याय चार से चार के श्लोक एक से

31
00:02:20,080 --> 00:02:24,080
तीन में इसने माना है कि गीता कहने वाला अर्जुन को

32
00:02:24,080 --> 00:02:28,240
बोल रहा है कि तू मेरा प्रिय मित्र है। अब यदि

33
00:02:28,240 --> 00:02:32,320
गीता बोलने वाला गीता बोलने वाले भगवान श्री कृष्ण नहीं है।

34
00:02:32,320 --> 00:02:36,560
कोई और एंटिटी इनके द्वारा बनाई गई जो तथाकथित इनका जो काल

35
00:02:36,560 --> 00:02:40,560
है वह है जो कि ब्रह्मा विष्णु महेश नहीं है जो

36
00:02:40,560 --> 00:02:44,800
कृष्ण नहीं है जो राम नहीं है जो ईश्वर भी नहीं है जो एक राक्षस

37
00:02:44,800 --> 00:02:48,800
है तो यदि इस राक्षस यह

38
00:02:48,800 --> 00:02:53,120
राक्षस अर्जुन को अपना प्रिय मित्र बता रहा

39
00:02:53,120 --> 00:02:57,440
है क्यों बता रहा है

40
00:02:57,440 --> 00:03:01,840
भगवान श्री कृष्ण की और

41
00:03:01,840 --> 00:03:04,720
अर्जुन की मित्रता प्रासंगिक

42
00:03:04,720 --> 00:03:08,960
है हम सब लोग जानते हैं जग जाहिर रहे। परंतु

43
00:03:08,960 --> 00:03:13,120
यह अर्जुन को अपना प्रिय मित्र क्यों बोल रहा है? कब हुई

44
00:03:13,120 --> 00:03:17,120
इनकी मित्रता? कैसे हुई? इस बारे में कोई विवेचना नहीं है। कोई शास्त्र

45
00:03:17,120 --> 00:03:21,120
नहीं है, कुछ नहीं है। क्योंकि वास्तविकता क्या है कि भगवान श्री कृष्ण ने

46
00:03:21,120 --> 00:03:26,160
ही गीता का ज्ञान दिया है। उसके बाद इसने

47
00:03:26,160 --> 00:03:30,480
इसमें शब्दों की

48
00:03:30,480 --> 00:03:35,440
चोरी भी बहुत सारी की है। हम

49
00:03:35,440 --> 00:03:39,440
बहुत सारी इस में चोरी की है। तो आप उसको देख सकते हैं

50
00:03:39,440 --> 00:03:43,440
जाकर के। कहा जो इसका जिस एपिसोड के हम

51
00:03:43,440 --> 00:03:47,440
बुलेट पॉइंट्स आज बता रहे हैं उस एपिसोड को आप देख लेंगे तो कई ऐसे शब्द

52
00:03:47,440 --> 00:03:51,920
बोले हैं जो है ही नहीं। जैसे फॉर एग्जांपल मैं दे देता हूं जैसे आगे

53
00:03:51,920 --> 00:03:57,600
अगले पैरा अगले दूसरे पैराग्राफ में ये कह रहा है कि

54
00:03:57,600 --> 00:04:01,600
चार के श्लोक पांच से नौ तक गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि अर्जुन तेरे और मेरे

55
00:04:01,600 --> 00:04:06,240
बहुत से जन्म हो चुके हैं। इन सबको तू नहीं जानता मैं जानता हूं। इसके बाद

56
00:04:06,240 --> 00:04:10,560
इसने कहा कि मैं मनुष्यों की तरफ तरह जन्म ना लेने वाला अविनाशी

57
00:04:10,560 --> 00:04:14,560
आत्मा होते हुए भी यह मनुष्यों की तरह ये क्या है?

58
00:04:14,560 --> 00:04:18,560
अच्छा सर्व के बाद इसने कोष्टक में लिखा है

59
00:04:18,560 --> 00:04:21,760
21 ब्रह्मांड।

60
00:04:21,760 --> 00:04:25,760
ये दिखाइए जरा ये वाला। सर्व का अर्थ 21 ब्रह्मांड कैसे

61
00:04:25,760 --> 00:04:29,920
हुआ? सर्व प्राणियों का स्वामी होते हुए भी ये

62
00:04:29,920 --> 00:04:34,240
कौन से हिसाब से स्वामी है? सर्व प्राणियों का हम

63
00:04:34,240 --> 00:04:38,320
किस हिसाब से स्वामी है ये? ये तो एक चोर टाइप का व्यक्ति है

64
00:04:38,320 --> 00:04:42,720
ना। स्वामी तो कोई और है। 21 ब्रह्मांडों के

65
00:04:42,720 --> 00:04:47,040
लोगों का भी ये स्वामी नहीं है। स्वामी तो कोई और है। कबीर है

66
00:04:47,040 --> 00:04:51,200
रामपाल के हिसाब से। ये किस हिसाब से स्वामी हुआ? ये तो चोरी और

67
00:04:51,200 --> 00:04:55,280
डकैती करने आया हुआ व्यक्ति है। इसको आप स्वामी बोल रहे हैं।

68
00:04:55,280 --> 00:04:59,840
मूर्खता की पराकाष्ठा हर पन्ने पर मिलती रहेगी।

69
00:04:59,840 --> 00:05:04,000
तो इस तरह से इसने जो है बहुत सारे शब्दों का हेरफेर किया है। जो है

70
00:05:04,000 --> 00:05:08,000
ही नहीं वह शब्द बोले हैं। है ना? जैसे मैं इसी पैराग्राफ

71
00:05:08,000 --> 00:05:12,160
में देखिए अंतिम लाइन में उनहीं में से अंश अवतार रूप में श्री कृष्ण राम

72
00:05:12,160 --> 00:05:16,240
श्री परशुराम आदि सजामि रचता हूं।

73
00:05:16,240 --> 00:05:20,960
अंश अवतार कहां लिखा है? इसमें उसमें तो लिखा है मैं अपना

74
00:05:20,960 --> 00:05:25,120
सजाम में हम अपना सजन करता हूं।

75
00:05:25,120 --> 00:05:29,840
उसमें यही कहना पड़ेगा अपने रूप का सजन करता हूं। परंतु

76
00:05:29,840 --> 00:05:34,160
इसमें कहां लिखा है कि अंश अवतार का सजन करता हूं

77
00:05:34,160 --> 00:05:36,880
और उनमें गुप्त रूप से प्रकट होता हूं।

78
00:05:36,880 --> 00:05:41,280
यह कहां लिखा है? इसकी संस्कृत कहां है?

79
00:05:41,280 --> 00:05:44,640
जेल वाले बाबा जी

80
00:05:44,640 --> 00:05:49,280
वाले बाबा मेरा गाना बजा दो, गाना बजा दो।

81
00:05:49,280 --> 00:05:53,360
यह रामपाल के जो फॉलोअर्स हैं वहां जाकर कहते

82
00:05:53,360 --> 00:05:58,000
होंगे जेल वाले बाबा मेरा गाना बजा दो, गाना बजा दो।

83
00:05:58,000 --> 00:06:04,000
वो गाना बजाता होगा।

84
00:06:05,280 --> 00:06:09,280
जेलर कहता होगा जेल वाले बाबा इसका गाना बजा दे। कौन सा

85
00:06:09,280 --> 00:06:13,600
जनता कह रही है बाकी फिर प्रशासन कहेगा

86
00:06:13,600 --> 00:06:17,760
बाकी पूरी कर दूंगा मैं वही कसर जो रह रही है।

87
00:06:17,760 --> 00:06:22,000
हां नहीं वो शिवश कहेगा जेल

88
00:06:22,000 --> 00:06:26,320
वाले बाबा गाना बजा दो। कौन सा जनता कह रही है बाकी

89
00:06:26,320 --> 00:06:32,320
पूरी कर दूंगा मैं कोई कसर जो रह रही है हम

90
00:06:32,800 --> 00:06:37,840
खैर आगे चलते हैं तो क्या है

91
00:06:37,840 --> 00:06:42,320
कि

92
00:06:42,320 --> 00:06:46,480
काल ब्रह्म जो मुझे अब इसमें क्या

93
00:06:46,480 --> 00:06:52,080
है सा अच्छा हां दो चीजें हमें माननी पड़ेगी

94
00:06:52,080 --> 00:06:55,920
95वें पृष्ठ पर

95
00:06:55,920 --> 00:06:59,920
इसने मतलब गीता इस इस पृष्ठ के अंत से जो

96
00:06:59,920 --> 00:07:04,000
है इसने कहा है कि यह जो अवतार होता है साधुओं

97
00:07:04,000 --> 00:07:08,800
की रक्षा के लिए और असाधुओं के संहार के लिए होता है। ठीक है?

98
00:07:08,800 --> 00:07:12,960
जबकि यही अपने लेक्चर्स में यही लोग ढिंढोरा पीटते हैं कि जो

99
00:07:12,960 --> 00:07:17,120
लोग मर रहे हैं वह काल की वजह से मर रहे हैं और शास्त्र विरुद्ध

100
00:07:17,120 --> 00:07:21,440
भक्ति की वजह से इनके अनुसार जो शास्त्र विरुद्ध भक्ति है उसकी वजह से मर रहे हैं।

101
00:07:21,440 --> 00:07:25,760
तो पहले तय कर ले कि वह शास्त्र

102
00:07:25,760 --> 00:07:29,920
विरुद्ध जो लोग हैं जिनको धर्म और अधर्म का बोध नहीं है वह

103
00:07:29,920 --> 00:07:34,000
साधु है कि असाधु है धर्मी है कि अधर्मी है

104
00:07:34,000 --> 00:07:38,160
तो इनके अनुसार काल जो है खुद ही एक तरफ कहते

105
00:07:38,160 --> 00:07:42,160
हैं कि काल जो है वो आता है किस लिए लोगों को खाने

106
00:07:42,160 --> 00:07:46,160
के लिए लोगों को परेशान करने के लिए झूठ बोलने के लिए भ्रम में डालने

107
00:07:46,160 --> 00:07:47,920
के लिए इन इन सारे बुरे

108
00:07:47,920 --> 00:07:52,320
कारणों की वजह से काल है और यहां पर क्या आ रहा है

109
00:07:52,320 --> 00:07:56,480
चार सार्थ के अर्थ में खुद ही कह रहा है कि वह अवतार जो होते हैं वह साधुओं

110
00:07:56,480 --> 00:08:01,840
की रक्षा और असाधुओं का संहार करने के लिए होते हैं। ठीक है?

111
00:08:01,840 --> 00:08:06,160
तो इसके अलावा धर्म स्थापना तो

112
00:08:06,160 --> 00:08:11,200
चार सात चार आठ चार छ इन सब श्लोकों को अमान्य मानना पड़ेगा।

113
00:08:11,200 --> 00:08:15,200
अगर तुम यह मानते हो कि काल अपना उल्लू सीधा करता है या उसकी भक्ति

114
00:08:15,200 --> 00:08:19,680
घटिया है या ये है वो है जो पंचौरा अपना छाप रखा है।

115
00:08:19,680 --> 00:08:23,840
ठीक है? जो बकवास कर रखी है तो इन श्लोकों को भी अमान्य

116
00:08:23,840 --> 00:08:27,840
मानना पड़ेगा। कौन-कौन से हैं? चार, छ,

117
00:08:27,840 --> 00:08:31,920
सात, आठ ये सब अमान्य मानने पड़े। चार, तीन भी अमान्य मानना पड़ेगा। जिसमें कि

118
00:08:31,920 --> 00:08:36,080
ये कहा है कि अर्जुन तू मेरा मित्र है। इसलिए तुझे बता रहा हूं। इसने कहा

119
00:08:36,080 --> 00:08:41,600
नहीं है कि ये गलत श्लोक है। क्यों भाई? अर्जुन काल का मित्र था क्या?

120
00:08:41,600 --> 00:08:44,880
हां।

121
00:08:44,880 --> 00:08:49,360
कब हुई मित्रता? चलिए आगे चलते हैं। अब पृष्ठ संख्या 95

122
00:08:49,360 --> 00:08:53,440
पर आ जाते हैं। क्या हुआ है? इसमें

123
00:08:53,440 --> 00:08:57,520
इसने माना है कि काल अच्छा जो मुझे

124
00:08:57,520 --> 00:09:01,360
तत्व से जान लेता है

125
00:09:01,360 --> 00:09:05,600
जो मुझे तत्व से जान लेता है वह पुनः जीवन

126
00:09:05,600 --> 00:09:09,840
मरण को प्राप्त नहीं होता। यह भगवत गीता में कहा गया

127
00:09:09,840 --> 00:09:13,920
है। जो भगवत गीता के श्लोक का अर्थ है। परंतु इसने

128
00:09:13,920 --> 00:09:18,080
क्या लिखा है? जो मुझे तत्व से जान लेता है उस

129
00:09:18,080 --> 00:09:22,480
पूर्ण ज्ञानी का पुनर्जन्म नहीं होता। तो

130
00:09:22,480 --> 00:09:26,560
जब काल को तत्व से जान लेना ही पूर्ण ज्ञान है तो

131
00:09:26,560 --> 00:09:30,720
फिर काल से अलग किसी और का ज्ञान क्यों लेने जाए? क्योंकि

132
00:09:30,720 --> 00:09:34,880
इसने यही कहा ना कि जो मुझ काल को तत्व से जान लेता है उस

133
00:09:34,880 --> 00:09:39,040
पूर्ण ज्ञानी का यानी काल को तत्व से जान लेने वाला पूर्ण ज्ञानी

134
00:09:39,040 --> 00:09:43,680
हो गया। पुनर्जन्म नहीं होता। ठीक है?

135
00:09:43,680 --> 00:09:47,680
और जो तत्व से नहीं जानता है वह

136
00:09:47,680 --> 00:09:52,480
मेरे जाल में फंसा रह जाता है।

137
00:09:52,480 --> 00:09:56,720
जो इस प्रकार तत्व से मुझे नहीं जानता है वो मेरे जाल में फंसा रहता

138
00:09:56,720 --> 00:10:00,960
फंसा रह जाता है। तो यानी

139
00:10:00,960 --> 00:10:05,120
कि गीता बोलने वाला ही ये कह रहा है यहां पर इसके हिसाब से भी

140
00:10:05,120 --> 00:10:09,120
कि जो उसको जान लेगा वो पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता। और

141
00:10:09,120 --> 00:10:13,120
यह बात भगवान ने और भी कई जगह पर कही है कि वो

142
00:10:13,120 --> 00:10:17,200
ऐसा ज्ञान है जिसके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रह जाएगा। मेरे बारे में अपने

143
00:10:17,200 --> 00:10:21,520
बारे में ये बात कही है। आगे के चैप्टर्स में आएगा। तो

144
00:10:21,520 --> 00:10:25,520
जब भगवान ने कह दिया कि मुझे ही जानना तत्व ज्ञान है और मुझे जान लेने

145
00:10:25,520 --> 00:10:30,240
के बाद पुनर्जन्म नहीं होता है। इसके हिसाब से काल ने कहा हमारे हिसाब से भगवान ने कहा।

146
00:10:30,240 --> 00:10:34,240
तो फिर क्यों जाए कबीर को जानने? भाई जब यहां पर पूर्ण

147
00:10:34,240 --> 00:10:38,240
ज्ञान हो गया व्यक्ति पूर्ण ज्ञानी हो गया जान के वो किसी

148
00:10:38,240 --> 00:10:42,320
भी रूप में जाने तुम्हारे हिसाब से बुरे रूप में जाने हमारे हिसाब से

149
00:10:42,320 --> 00:10:46,480
अच्छे रूप में जाने मगर यहां पर जान करके तुमने भी मान लिया कि वो पूर्ण

150
00:10:46,480 --> 00:10:50,560
ज्ञानी हो गया पूर्ण ज्ञानी हो गया जिसने काल को तत्व से जान लिया

151
00:10:50,560 --> 00:10:54,560
तो कबीर को क्यों जाने सूक्ष्म वेद क्यों पड़े हो गया

152
00:10:54,560 --> 00:10:59,200
खत्म यही पर हो गया इनका चैप्टर क्लोज ठीक है आगे चलते है

153
00:10:59,200 --> 00:11:03,200
इसके आगे इसने क्या बेवकूफी की जेल वाले

154
00:11:03,200 --> 00:11:07,280
बाबा ने गाना बजाया है तो क्या बजाया है? काल ब्रह्म

155
00:11:07,280 --> 00:11:07,780
अच्छी

156
00:11:07,760 --> 00:11:11,840
आत्माओं को रचता है अर्थात पैदा करता है। अब ये

157
00:11:11,840 --> 00:11:16,560
बताओ आत्माओं को अ

158
00:11:16,560 --> 00:11:20,720
क्या कहते हैं? परमेश्वर रचता है क्योंकि इसने दो दूसरे

159
00:11:20,720 --> 00:11:24,800
अध्याय के दव श्लोक में जो बातें की है उसमें यह माना

160
00:11:24,800 --> 00:11:29,280
है कि जो कबीर परमेश्वर है इनके हिसाब से वो आत्माओं को उत्पन्न

161
00:11:29,280 --> 00:11:33,440
करता है रचता है और यहां क्या कह रहा है कि

162
00:11:33,440 --> 00:11:37,680
काल ब्रह्म रचता है तो क्या काल ब्रह्म और कबीर एक ही है परमेश्वर काल ब्रह्म

163
00:11:37,680 --> 00:11:41,680
ही है और दूसरी बात यह है कि अच्छी आत्माओं को रचता है

164
00:11:41,680 --> 00:11:45,680
इसका अर्थ क्या हुआ कि वो अच्छा अच्छा है यानी कि काल ने

165
00:11:45,680 --> 00:11:49,920
अगर यह मानेंगे अगर ये मानेंगे कि काल यहां पे जो है आत्मा

166
00:11:49,920 --> 00:11:54,000
जो मनुष्य रूप में जन्म लेती है। हालांकि वो अर्थ निकलेगा नहीं पर मान लेते हैं कि

167
00:11:54,000 --> 00:11:58,560
आत्मा जो है मनुष्य रूप में जो जन्म लेती है

168
00:11:58,560 --> 00:12:02,800
उसको काल रचता है। मतलब उसके शरीर को काल रचता है। तो फिर ये फिर

169
00:12:02,800 --> 00:12:06,960
क्या बुरे शरीर वाले जो मनुष्य हैं उनको काल नहीं रचता

170
00:12:06,960 --> 00:12:11,440
है क्या? तो अच्छी आत्माओं को रचता है। यह क्या है?

171
00:12:11,440 --> 00:12:15,600
हम तो खैर कुल मिला के

172
00:12:15,600 --> 00:12:19,520
बात यह है कि

173
00:12:19,520 --> 00:12:23,760
आत्माओं को रचने वाला परमेश्वर इसने ही माना है।

174
00:12:23,760 --> 00:12:27,760
यद्यपि आत्माओं को रचने वाला कोई है ही नहीं। परंतु इस मूर्ख

175
00:12:27,760 --> 00:12:31,840
ने माना है कि आत्माओं को परमेश्वर ने रचा। और यहां पे खुद कह रहा है कि आत्माओं

176
00:12:31,840 --> 00:12:37,520
को कौन रचता है? काल। ठीक है?

177
00:12:37,520 --> 00:12:41,680
और क्या है? आकार में प्रकट नहीं होता है। अब यहां आगे कह

178
00:12:41,680 --> 00:12:45,760
रहा है कि यह जो

179
00:12:45,760 --> 00:12:49,840
है आकार में प्रकट नहीं होता है। इसका अटल अविनाशी नियम है।

180
00:12:49,840 --> 00:12:53,920
क्या नियम है कि अपने आकार में प्रकट नहीं होता है।

181
00:12:53,920 --> 00:12:58,240
मतलब दिखाई देने वाला स्वरूप नहीं प्राप्त लेता है।

182
00:12:58,240 --> 00:13:02,560
तो फिर खुद ही कह रहा है कि मैं अवतार लेता हूं। मैं आता हूं। मैं ये करता हूं। मैं

183
00:13:02,560 --> 00:13:06,880
विष्णु रूप में प्रकट हो जाता हूं। ये वो ये क्या है? हम

184
00:13:06,880 --> 00:13:11,280
यानी वह आकार लेता है ना साकार रूप में

185
00:13:11,280 --> 00:13:15,360
आकार रूप में प्रकट होता है ना तो ये खुद

186
00:13:15,360 --> 00:13:19,360
ही माथा पीटते रहो इसके

187
00:13:19,360 --> 00:13:25,360
बाद आगे क्या है कि

188
00:13:26,130 --> 00:13:30,720
[संगीत] 96 वे पृष्ठ पर इसने

189
00:13:30,720 --> 00:13:34,960
एक शब्द लिखा है अगला पृष्ठ है 96 इसमें दूसरी

190
00:13:34,960 --> 00:13:39,840
लाइन के अंत में इसने कहा है

191
00:13:39,840 --> 00:13:43,840
चार द का अर्थ करते समय कहा है कि काल ब्रह्म ने कहा कि जिनके राग द्वेष मर गए हैं

192
00:13:43,840 --> 00:13:47,840
जिसने मुझे यहां 21 ब्रह्मांड के कर्मों का कर्ता अर्थात मालिक हूं

193
00:13:47,840 --> 00:13:52,000
ऐसा तत्व से जान लिया है देखिए तत्व से जानने को बार-बार ये

194
00:13:52,000 --> 00:13:56,160
सीमित कर रहा है भगवान की असीमितता अलौकिकता

195
00:13:56,160 --> 00:14:00,400
जो उन्होंने बताई है कि मेरे मैं तू जानता है मैं नहीं जानता मेरे जन्म कर्म

196
00:14:00,400 --> 00:14:04,560
तीव्र होते हैं तो उसको बार-बार ये सीमित कर रहा है कि 21 ब्रह्मांड

197
00:14:04,560 --> 00:14:08,560
चलो चलो ठीक है। 21 ब्रह्मांड ठीक है मान लिया। फिर आगे वह

198
00:14:08,560 --> 00:14:13,200
मतावलंबी हो चुके हैं। यह शब्द कहां से आ गया? वह मतावलंबी

199
00:14:13,200 --> 00:14:18,720
हो चुके हैं। जबकि वहां भगवत गीता में कहा गया है कि वो

200
00:14:18,720 --> 00:14:22,800
सिद्ध माना गया उनको जो भगवान को तत्व से जान लेंगे। मगर

201
00:14:22,800 --> 00:14:26,880
इसने क्या किया? इसने उसको मतावलंबी कहा है।

202
00:14:26,880 --> 00:14:31,920
मतावलंबी का क्या अर्थ है यहां पर लेने का? हम

203
00:14:31,920 --> 00:14:36,000
तो यह भी एक हर बात में बोल वचन है भैया हर बात में कहां

204
00:14:36,000 --> 00:14:40,000
तक क्या-क्या करोगे ठीक है इसको निकाल लेता हूं क्या

205
00:14:40,000 --> 00:14:41,360
कहा है जिनके

206
00:14:41,360 --> 00:14:45,440
राग द्वेष खत्म हो चुके हैं पहले भी जिनके राग द्वेष भय और क्रोध

207
00:14:45,440 --> 00:14:49,520
सर्वदा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेम पूर्वक स्थित रहते

208
00:14:49,520 --> 00:14:53,600
थे ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपयुक्त ज्ञान

209
00:14:53,600 --> 00:14:57,680
रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं।

210
00:14:57,680 --> 00:15:01,920
ठीक है? मतलब सच्चिदानंद वाला जो मोक्ष होता है उसको प्राप्त कर चुके

211
00:15:01,920 --> 00:15:05,920
हैं। मगर यहां पे वह मतावलंबी हो चुके हैं। ये क्या है? क्या

212
00:15:05,920 --> 00:15:10,160
बकवास है भाई? खैर आगे चलते हैं। इसी में इसने

213
00:15:10,160 --> 00:15:14,240
कहा है कि ज्ञानी मुझे अच्छे लगते हैं

214
00:15:14,240 --> 00:15:18,320
तथा मैं ज्ञानी को ज्ञानियों को प्रिय हूं। ठीक है?

215
00:15:18,320 --> 00:15:22,560
इसको क्या अच्छे लगते हैं? ज्ञानी और यह ज्ञानियों को प्रिय

216
00:15:22,560 --> 00:15:26,560
है और क्योंकि वे तीनों गुणों की भक्ति

217
00:15:26,560 --> 00:15:32,000
ना करके मेरी अर्थात ब्रह्म की भक्ति करते हैं।

218
00:15:32,000 --> 00:15:36,080
तो जो व्यक्ति ज्ञानी है और जिसको यहां

219
00:15:36,080 --> 00:15:40,480
पर क्या कहा जा रहा है? उपयुक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र

220
00:15:40,480 --> 00:15:44,720
होकर तपस्वी कहा गया है। ज्ञान तपसा चार 10

221
00:15:44,720 --> 00:15:49,600
भगवत गीता चार 10 ज्ञान तपसः

222
00:15:49,600 --> 00:15:55,360
ज्ञान तपसा ज्ञान रूप तप से

223
00:15:55,360 --> 00:15:59,360
और जो पवित्र है तो वो काल की भक्ति कैसे कर रहे हैं

224
00:15:59,360 --> 00:16:03,440
भाई पहली बात तो जो काल की भक्ति करने वाला वो काल

225
00:16:03,440 --> 00:16:07,520
की भक्ति करने वाला अज्ञानी वो अज्ञानी है ज्ञानी कहां से

226
00:16:07,520 --> 00:16:11,840
हुआ और फिर जब वो अज्ञानी है तो वो

227
00:16:11,840 --> 00:16:16,080
ज्ञान रूप तप से पवित्र कैसे हुआ? तपस्या से पवित्र कैसे

228
00:16:16,080 --> 00:16:20,240
हुआ? तब का तो यह खंडन करता है। इसी में आगे देखेंगे

229
00:16:20,240 --> 00:16:24,400
तो यह भी एक झोल का ढोल में पोल और

230
00:16:24,400 --> 00:16:28,480
बहुत सारे यहां पर शब्द छिपाए गए हैं बार-बार वो आप उसमें देख

231
00:16:28,480 --> 00:16:32,560
लीजिएगा जो पूरा एपिसोड है। इसके

232
00:16:32,560 --> 00:16:36,640
बाद इसने यहां पर देखिए देवताओं के लिए जहां शब्द आया देवताओं की

233
00:16:36,640 --> 00:16:40,720
जो अपना लौकिक फल प्राप्त करने के लिए हम देवताओं

234
00:16:40,720 --> 00:16:44,880
का पूजन करते हैं। उनको जो देवताओं से मिलने वाली सिद्धि है जल्दी प्राप्त हो जाती है।

235
00:16:44,880 --> 00:16:48,880
तो यह ब्रह्मा विष्णु महेश जबरदस्ती यहां बात बात में ब्रह्मा विष्णु महेश को डाल

236
00:16:48,880 --> 00:16:53,120
रहा है। ठीक है? इसके बाद क्या हुआ

237
00:16:53,120 --> 00:16:57,600
कि चार 13 में भगवान ने कहा कि समस्त

238
00:16:57,600 --> 00:17:01,920
कर्मों को करते हुए भी संपूर्ण सृष्टि की रचना करते हुए भी

239
00:17:01,920 --> 00:17:06,400
तू मुझे अकर्ता जान। क्यों? क्योंकि

240
00:17:06,400 --> 00:17:10,400
उनकी कर्म फल में आसक्ति नहीं है। केवल लग रहा है कि

241
00:17:10,400 --> 00:17:14,480
वो कर्म कर रहे हैं। वास्तविकता में वो कर्म कुछ वो कुछ नहीं कर रहे। सब कुछ

242
00:17:14,480 --> 00:17:19,040
करते हुए भी वह कुछ ना करने वाले हैं। इसलिए उनको कर्म बांधते

243
00:17:19,040 --> 00:17:23,840
नहीं है। ठीक है? यह

244
00:17:23,840 --> 00:17:27,920
चार 13 और चार 14 से हमें पता चलता है। पर इसने

245
00:17:27,920 --> 00:17:30,640
क्या किया?

246
00:17:30,640 --> 00:17:34,720
इसने क्या किया? कि इसने इस बारे में बात ही नहीं

247
00:17:34,720 --> 00:17:38,960
की है कि काल को जो है अकर्ता मानना है क्योंकि काल तो भाई अपने उल्लू

248
00:17:38,960 --> 00:17:43,040
सीधा करता है। काल तो अपने खाने पीने का इंतजाम करता है। तो

249
00:17:43,040 --> 00:17:47,200
काल ना ही कर्म फल से अनासक्त है और

250
00:17:47,200 --> 00:17:51,440
ना ही वो अकर्ता है। मगर इसने अपनी भगवत गीता गीता

251
00:17:51,440 --> 00:17:55,440
का अर्थ करते समय इसने ये बात ही नहीं की। ठीक है?

252
00:17:55,440 --> 00:17:59,600
तो इस हिसाब से जो चार 13 है जिसमें गीता कहने वाले

253
00:17:59,600 --> 00:18:04,560
को अकर्ता कहा गया है। चार 14 है जिसमें गीता कहने वाले को

254
00:18:04,560 --> 00:18:08,720
क्या कहते हैं? कर्म फल से अनासक्त कहा गया है। ये

255
00:18:08,720 --> 00:18:13,200
दोनों ही अमान्य मानने पड़ेंगे। नोट करते जाना मैं कर रहा हूं।

256
00:18:13,200 --> 00:18:17,920
कितने श्लोक अभी तक अमान्य हो चुके हैं। इसकी थ्योरी के अनुसार

257
00:18:17,920 --> 00:18:22,080
है ना जो यह कहता है ना 5% ज्ञान गलत है। इसकी बैंड बजेगी

258
00:18:22,080 --> 00:18:25,600
कम से कम कुछ नहीं तो 80% श्लोक जो होंगे

259
00:18:25,600 --> 00:18:29,600
70 से 80% वो इसने नहीं माने हैं गीता के और

260
00:18:29,600 --> 00:18:34,400
कहने को कह दिया कि 5% ज्ञान गलत है। ठीक है?

261
00:18:34,400 --> 00:18:38,320
आगे चलते हैं।

262
00:18:38,320 --> 00:18:42,560
इसके लास्ट में इसी पैराग्राफ के लास्ट में इसने क्या बात मान

263
00:18:42,560 --> 00:18:46,880
ली है? इसलिए तू अपने पूर्वजों

264
00:18:46,880 --> 00:18:51,760
की तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर।

265
00:18:51,760 --> 00:18:55,840
अब यह बताओ कि इसके पूर्वजों को तत्वदर्शी कौन

266
00:18:55,840 --> 00:19:00,480
मिला था? और यह बात कह कौन रहे हैं?

267
00:19:00,480 --> 00:19:04,640
यह बात कह कौन रहे हैं? यह बात कह रहे हैं भगवान श्री

268
00:19:04,640 --> 00:19:09,120
कृष्ण यानी भगवान श्री कृष्ण तब कह रहे हैं जब तक कबीर नहीं आए हैं।

269
00:19:09,120 --> 00:19:13,120
तो कौन तत्वदर्शी मिला था जिसने गीता

270
00:19:13,120 --> 00:19:17,760
की व्याख्या या जो भी व्याख्या की थी तात्विक ज्ञान की वेदों की व्याख्या

271
00:19:17,760 --> 00:19:21,920
तो वो कौन सा तत्वदर्शी था जिसने ज्ञान दिया था जिसके

272
00:19:21,920 --> 00:19:25,920
कारण जो है वो पूर्वज यह लोग दिन भर गाली देते हैं

273
00:19:25,920 --> 00:19:30,240
कि पूर्वजों ने गलत भक्ति की और ये वो ये भक्ति हम बता रहे हैं आज

274
00:19:30,240 --> 00:19:34,240
कलयुग में आज हम भक्ति बता रहे हैं तब से कोई मुक्ति नहीं हुआ है और कुछ

275
00:19:34,240 --> 00:19:38,320
दो चार लोग जो इनकी चपेट में आ गए हैं जेल धाम जाकर के वो मुक्त

276
00:19:38,320 --> 00:19:40,640
होते जेल वाले बाबा

277
00:19:40,640 --> 00:19:45,280
का गाना सुन के। मगर यहां क्या कह रहा है

278
00:19:45,280 --> 00:19:49,280
कि तू अपने पूर्वजों की तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर। ये भी

279
00:19:49,280 --> 00:19:53,360
मान लिया इसने 4:15 में। तो अब इनका कोई बेवकूफ फॉलोअ

280
00:19:53,360 --> 00:19:57,440
आए तो उनके मुंह पे ये मारना। ये देख तेरे बाबा ने क्या लिखा है। जेल वाले बाबा ने

281
00:19:57,440 --> 00:20:01,600
गाना बजाया तेरा। तो ये है

282
00:20:01,600 --> 00:20:05,680
लास्ट एपिसोड के बुलेट पॉइंट्स। ठीक है? आप

283
00:20:05,680 --> 00:20:10,320
लोग नोट कर लीजिएगा। पूर्वजों की तरह भक्ति करना इसने

284
00:20:10,320 --> 00:20:14,560
मान लिया। तो अर्जुन के वह कौन से पूर्वज है जो शास्त्रानुकूल

285
00:20:14,560 --> 00:20:19,200
भक्ति करते थे वो बताए रामपाल

286
00:20:19,200 --> 00:20:23,200
का कोई नुमाइंदा अंधेरा कायम रहे

287
00:20:23,200 --> 00:20:27,440
का नुमाइंदा अंधेरा कायम रहे। बाबा जेल में रहे बाबा का गाना बजता

288
00:20:27,440 --> 00:20:29,920
रहे। खैर आगे चलते

289
00:20:29,920 --> 00:20:35,920
हैं।

290
00:20:45,680 --> 00:20:49,840
हम तो अब बात आती है कि

291
00:20:49,840 --> 00:20:54,560
इसने सबसे पहले अध्याय चार के श्लोक 16 से 22 तक को

292
00:20:54,560 --> 00:21:00,560
22 तक की बात की है। तो उसे हम पढ़ लेते हैं। क्या है 16 से 22 में?

293
00:21:06,560 --> 00:21:11,280
अब यह आगे कर्म बता रहे हैं। वही जो पहले लगभग

294
00:21:11,280 --> 00:21:15,280
सभी चैप्टर्स में बताते आए हैं कि कर्म में कर्म को करते हुए भी तुम्हारी

295
00:21:15,280 --> 00:21:19,440
बुद्धि कैसी होनी चाहिए। तो भगवान जो बार-बार यही बात करते

296
00:21:19,440 --> 00:21:23,520
आए हैं तो कुछ अलग तरह से यहां पर भी इन्होंने वही बात कही है कि

297
00:21:23,520 --> 00:21:27,600
कर्म करते हुए आपकी बुद्धि कैसी होनी चाहिए? कर्म क्या

298
00:21:27,600 --> 00:21:32,080
है? अकर्म क्या है? इस प्रकार का इस प्रकार इसका निर्णय करने में

299
00:21:32,080 --> 00:21:36,640
बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म तत्व में तुझे

300
00:21:36,640 --> 00:21:42,480
भलीभांति समझाकर कहूंगा जिसे जानकर तू अशुभ हो।

301
00:21:42,480 --> 00:21:45,040
अर्थात बंधन में डालने वाले

302
00:21:45,040 --> 00:21:48,560
कर्म बंधन से मुक्त हो जाएगा।

303
00:21:48,560 --> 00:21:53,200
तो

304
00:21:53,200 --> 00:21:57,360
और यहां पे इस बात के लिए मोक्ष शब्द का उपयोग

305
00:21:57,360 --> 00:22:01,680
हुआ है मोक्ष। मोक्ष से। ठीक है?

306
00:22:01,680 --> 00:22:05,920
आगे देखते हैं। कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए

307
00:22:05,920 --> 00:22:10,560
तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए। क्योंकि कर्म की गति गहन।

308
00:22:10,560 --> 00:22:14,560
अब यहां पे तीन बातें जान लेने की। कर्म क्या है? जो शास्त्र

309
00:22:14,560 --> 00:22:20,560
कर्म करना चाहिए। अकर्म क्या है? जो

310
00:22:20,720 --> 00:22:24,800
शास्त्र वेत कर्मों के प्रति

311
00:22:24,800 --> 00:22:28,800
कर्मों से मिलने वाले फल के प्रति आसक्त ना होना

312
00:22:28,800 --> 00:22:32,800
यह है अकर्म और विकर्म क्या है जो करना नहीं है

313
00:22:32,800 --> 00:22:36,800
जो निषेध ठीक है अब आगे चलते

314
00:22:36,800 --> 00:22:40,720
हैं क्या कहा है

315
00:22:40,720 --> 00:22:44,880
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता हुआ और जो अकर्म में कर्म देखता

316
00:22:44,880 --> 00:22:49,120
हुआ देखता है वह मनुष्यों में बुद्धि मान है और वह

317
00:22:49,120 --> 00:22:54,000
योगी समस्त कर्मों को करने वाला है। तो

318
00:22:54,000 --> 00:22:58,160
कर्म में अकर्म देखने का मतलब क्या है?

319
00:22:58,160 --> 00:23:02,880
तो कर्म में अकर्म देखने का मतलब अर्थ है कि

320
00:23:02,880 --> 00:23:06,960
कर्म को तो करो। शास्त्र कर्मों को तो करो परंतु

321
00:23:06,960 --> 00:23:11,200
उससे मिलने वाले फल की ओर अनासक्त रहो। तो अकर्म जैसा

322
00:23:11,200 --> 00:23:15,360
मतलब कि यह मैं कुछ कर ही नहीं रहा हूं। इस तरह का भाव अपने मन में

323
00:23:15,360 --> 00:23:19,760
लाएं। ठीक है? और अकर्म में कर्म को देखने

324
00:23:19,760 --> 00:23:24,080
का मतलब कि जो आपकी विरक्तता है वह आपको पकड़

325
00:23:24,080 --> 00:23:28,160
के रखना है। तो यानी विरक्तता को अपना एक कर्म समझो और उसको पकड़

326
00:23:28,160 --> 00:23:33,920
के रखो। तो अकर्म में कर्म को देखो और कर्म में अकर्म को।

327
00:23:33,920 --> 00:23:36,800
इसके बाद क्या कहा है? कि

328
00:23:36,800 --> 00:23:40,880
जिसके संपूर्ण शास्त्र सम्मत कर्म बिना कामना

329
00:23:40,880 --> 00:23:44,880
और संकल्प के होते हैं। है ना? मतलब आप केवल क्यों

330
00:23:44,880 --> 00:23:49,360
कर रहे हो? क्योंकि ईश्वर ने कहा है। यह बात हमने 247 के उसमें

331
00:23:49,360 --> 00:23:53,360
भगवत गीता 247 की विवेचना में अच्छे से समझ ली थी। देख

332
00:23:53,360 --> 00:23:57,440
लीजिएगा अलग से वीडियो बना के डाला हुआ है। जिसके समस्त कर्म ज्ञान

333
00:23:57,440 --> 00:24:02,160
रूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं। उस महापुरुष को ज्ञानी जन भी पंडित कहते हैं।

334
00:24:02,160 --> 00:24:06,240
ठीक है? एक ये हो गया। इसके बाद 20वा

335
00:24:06,240 --> 00:24:10,640
क्या कह रहा है श्लोक? जो पुरुष समस्त कर्मों में

336
00:24:10,640 --> 00:24:14,640
और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के

337
00:24:14,640 --> 00:24:18,880
आश्रय से रहित होता हो गया है। परमात्मा में नित्य तृप्त

338
00:24:18,880 --> 00:24:23,200
है। हम वह कर्मों में भलीभांति

339
00:24:23,200 --> 00:24:27,360
बरतता हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता। और यह बात हम लोग बहुत बार समझ

340
00:24:27,360 --> 00:24:31,360
चुके हैं कि गृहस्थ होते हुए भी कर्मों में बरतने वाला

341
00:24:31,360 --> 00:24:35,360
होते हुए भी व्यक्ति यदि अपने उन उन कर्मों

342
00:24:35,360 --> 00:24:39,440
से मिलने वाले फल के प्रति आसक्त ना हो तो वह

343
00:24:39,440 --> 00:24:44,400
कर्म करता हुआ भी मुक्त मुक्त होने के पथ पर चलने वाला ही कहलाएगा।

344
00:24:44,400 --> 00:24:48,560
और इसी बात का खंडन किया

345
00:24:48,560 --> 00:24:53,120
उसने कि देखो श्रृंगी ऋषि थे और वह देखो

346
00:24:53,120 --> 00:24:57,200
क्या कहते हैं गृहस्थ उन्हें जो कर्म योग

347
00:24:57,200 --> 00:25:01,280
है उसका खंडन करने के लिए शंगी ऋषि की वो दे दी उदाहरण कि शंगी

348
00:25:01,280 --> 00:25:04,480
ऋषि देखो वो अपने

349
00:25:04,480 --> 00:25:08,800
आप को संभाल नहीं पाए और देखो उसमें भोग विलास में पड़ गए और फिर

350
00:25:08,800 --> 00:25:12,960
यह भी बात है कि इंद्रिय संयम का खंडन करने के लिए उसने दूसरी

351
00:25:12,960 --> 00:25:17,120
बात कह दी कि नहीं नहीं हठ योग तो गलत होता है। हठ योग लोग जो कर रहे थे वो देखो

352
00:25:17,120 --> 00:25:21,200
कभी मुक्त नहीं हो पाए। तो कुल मिला के गीता जो भी बात कहेगी वो नहीं

353
00:25:21,200 --> 00:25:25,360
माननी है। वो गलत है। दोनों बातों गलत कहेगा। फिर जो खुद कहेगा वो

354
00:25:25,360 --> 00:25:29,360
सही है। हम उनमें से एक बात

355
00:25:29,360 --> 00:25:33,680
खुद बोलता है और वो सही है। वो हठ योग के रूप में इंद्रिय संयम

356
00:25:33,680 --> 00:25:37,840
का खंडन करेगा। ठीक है? कि इंद्रिय संयम नहीं करना है।

357
00:25:37,840 --> 00:25:42,080
हठ योग कह करके इंद्रिय संयम का खंडन करेगा रामपाल।

358
00:25:42,080 --> 00:25:46,240
और फिर दूसरी जगह जब इंद्रिय संयम नहीं करना यानी जो कर्मों

359
00:25:46,240 --> 00:25:50,320
में होकर गुजरना है तो गस्थ गस्थ जीवन की बात कर रहा है तो वहां

360
00:25:50,320 --> 00:25:54,400
पर गस्थ जीवन का भी खंडन करेगा तो वही व्यक्ति करे क्या

361
00:25:54,400 --> 00:25:58,480
तो गीता के नाम पर मत करो कुछ भी जो मैं कहूं वो करो मेरे

362
00:25:58,480 --> 00:26:02,560
द्वारा जो जो गधों को शिक्षा दी जाती है

363
00:26:02,560 --> 00:26:07,120
जो मैं वो दे रहा हूं उसको मानो भगवत गीता के अनुसार नहीं चलो

364
00:26:07,120 --> 00:26:08,400
पहली बात तो मेरे अनुसार

365
00:26:08,400 --> 00:26:12,720
चलो मेरा ठप्पा होना चाहिए मैं सही बताऊं या गलत बताऊ उस पर जो मार्क

366
00:26:12,720 --> 00:26:18,720
होना चाहिए मेरा मार्क इधर है मार्क इधर है मेरा मार्क होना चाहिए

367
00:26:18,960 --> 00:26:22,640
ठीक है आगे चलते हैं

368
00:26:22,640 --> 00:26:26,640
जिसका अंतःकरण और इंद्रियों के सहित शरीर जीता हुआ है और

369
00:26:26,640 --> 00:26:30,800
जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है ऐसा आशा

370
00:26:30,800 --> 00:26:34,800
रहित पुरुष केवल शरीर संबंधी कर्म करता हुआ भी पाप को नहीं प्राप्त

371
00:26:34,800 --> 00:26:39,040
होता है। वही वाली बात कि आपका शरीर है उससे वह

372
00:26:39,040 --> 00:26:43,120
काम आप करवा रहे हो कार्य करवा रहे हो जो जो कार्य शास्त्रों के अनुसार है और

373
00:26:43,120 --> 00:26:47,200
ऐसा बरतते हुए आप कर्मों में लिप्त नहीं होंगे मुक्त होंगे

374
00:26:47,200 --> 00:26:51,200
ठीक है पाप तो होना दूर की बात है और

375
00:26:51,200 --> 00:26:55,200
22वा क्या कह रहा है जो बिना इच्छा के अपने आप प्राप्त हुए पदार्थ

376
00:26:55,200 --> 00:26:59,920
में सदा संतुष्ट रहता है है ना बिना इच्छा के मतलब जो

377
00:26:59,920 --> 00:27:03,920
कर्तव्य कर्म करते हुए प्राप्त हो गया इच्छा मतलब उसमें आसक्ति

378
00:27:03,920 --> 00:27:08,320
नहीं थी कि मुझे ये मिलेगा मिलेगा, चोला भटूरा मिलेगा या कुलचा

379
00:27:08,320 --> 00:27:13,760
मिलेगा, नान मिलेगी यह सब नहीं उनके प्रति आसक्ति नहीं थी।

380
00:27:13,760 --> 00:27:17,760
जो मिला कर्तव्य कर्म करके उसी से ही तृप्त उसी से

381
00:27:17,760 --> 00:27:21,840
संतुष्ट ये भी अच्छा है। जो हर्ष शोक आदि

382
00:27:21,840 --> 00:27:23,440
द्वंदों से सर्वथा अतीत हो

383
00:27:23,440 --> 00:27:27,440
गया। ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्म योगी ज्ञान

384
00:27:27,440 --> 00:27:31,520
कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बनता। अब देखिए सबसे पहले तो यहां पर

385
00:27:31,520 --> 00:27:35,600
वही वाली बात जो सम बुद्धि वाली बात समत पुरुष होने की बात जो शुरू से अब तक कही गई

386
00:27:35,600 --> 00:27:39,680
है वही यहां भी कही गई है अलग शब्दों में मगर इसने क्या किया

387
00:27:39,680 --> 00:27:43,840
था कि दूसरे अध्याय में किसी पृष्ठ पर हमने बार-बार बताया है कि

388
00:27:43,840 --> 00:27:48,000
ये जहां पर गीता राग द्वेष से हटने की बात करती है भगवान राग द्वेष

389
00:27:48,000 --> 00:27:52,240
से हटने की बात करते तो वहां कहता है अरे राग द्वेष के बिना युद्ध हो सकता है क्या

390
00:27:52,240 --> 00:27:56,400
राग राग द्वेष से मुक्त कोई हो पाया है क्या यह कहता है और

391
00:27:56,400 --> 00:28:00,800
उसके बाद खुद अपने नाम पर राग द्वेष से अलग होने अलग होने की बात करता है।

392
00:28:00,800 --> 00:28:04,880
राग द्वेष से राग द्वेष के बिना कुछ नहीं हो सकता। राग द्वेष के

393
00:28:04,880 --> 00:28:09,120
बिना कुछ नहीं हो सकता। युद्ध भी नहीं हो सकता। धर्म युद्ध भी नहीं हो सकता। ये सब इसने बातें

394
00:28:09,120 --> 00:28:13,280
कही है। फिर जब राग द्वेष से अलग होने का पहले खंडन

395
00:28:13,280 --> 00:28:17,360
करेगा कि अलग नहीं होना चाहिए। ठीक है? जैसे हठ

396
00:28:17,360 --> 00:28:21,600
योग का इंद्रिय संयम को खंडन करेगा। पहले

397
00:28:21,600 --> 00:28:25,600
उसके बाद फिर अपने नाम पर राग द्वेष से अलग होने की बात कहेगा। अपने नाम

398
00:28:25,600 --> 00:28:30,240
पर इंद्रिय संयम की बात कहेगा। ठीक है? खैर

399
00:28:30,240 --> 00:28:34,320
यहां पर भी सिद्धि और सिद्धि में समान बुद्धि रखने वाला

400
00:28:34,320 --> 00:28:38,320
रखने वाले को मुक्ति का कहा गया है। मुक्ति के पथ पर

401
00:28:38,320 --> 00:28:38,820
चलने

402
00:28:38,640 --> 00:28:42,880
वाला। अब इसने देखते हैं क्या क्या अकर्म किया है विकर्म

403
00:28:42,880 --> 00:28:47,360
किया विकर्म इसने क्या कहा है कि चार अध्याय

404
00:28:47,360 --> 00:28:51,440
चार के श्लोक 16 से 22 में कर्मों का विवरण कहा है जो

405
00:28:51,440 --> 00:28:55,680
व्यक्ति जिस कर्म का वो करे उसमें कर्ता पन का अभिमान

406
00:28:55,680 --> 00:29:01,120
नहीं लाए तथा कहे कि कर्म मालिक आपके आश्रित होकर

407
00:29:01,120 --> 00:29:05,120
कर रहा हूं। कर्म अकर अकर्म का ज्ञान इस तुच्छ जीव

408
00:29:05,120 --> 00:29:09,680
को नहीं है जो निष्काम भावना से कर्म करता है

409
00:29:09,680 --> 00:29:14,240
वह पंडित विद्वान है तथा कर्मों के बंधन में नहीं बंधता

410
00:29:14,240 --> 00:29:18,480
इसलिए इसी अध्याय के श्लोक 34 में कहा है कि अब यहां अपना तत्व

411
00:29:18,480 --> 00:29:22,960
ज्ञान डाल दिया हम तो

412
00:29:22,960 --> 00:29:27,040
इसने अब देखिए यहां पर राग द्वेष की बात को माना है

413
00:29:27,040 --> 00:29:31,120
कि जो ये सब कर्म कर्म का ज्ञान अच्छे से

414
00:29:31,120 --> 00:29:35,600
हो आए और कर्तापन का अभिमान ना आए। निष्काम

415
00:29:35,600 --> 00:29:39,920
भाव से कर्म करता है। जबकि यही व्यक्ति आपको एक उदाहरण

416
00:29:39,920 --> 00:29:45,920
दे दूं। यही व्यक्ति

417
00:29:48,560 --> 00:29:53,040
राग द्वेष की बात मुझे याद है। इसने दूसरे अध्याय में मना किया था।

418
00:29:53,040 --> 00:29:57,040
राग द्वेष के बिना जो है युद्ध नहीं हो सकता। कर्म नहीं

419
00:29:57,040 --> 00:30:00,480
हो सकता है। यह देखिए।

420
00:30:00,480 --> 00:30:04,880
देखिए लाभ हानि को यहां पर भगवान ने कहा था

421
00:30:04,880 --> 00:30:10,080
पष्ठ संख्या 23 दिखाइए। 23

422
00:30:10,080 --> 00:30:14,320
थोड़ा नीचे का 23 में नीचे का पार्ट दिखाइए।

423
00:30:14,320 --> 00:30:20,320
23

424
00:30:23,920 --> 00:30:28,320
हां इसमें नीचे का पार्ट दिखाइए। इसमें देखिए सबसे

425
00:30:28,320 --> 00:30:34,000
लास्ट जो लाइन है वह क्या है? बिना क्या बिना लाभ हानि के युद्ध हो सकता है?

426
00:30:34,000 --> 00:30:38,000
क्या आवश्यकता पड़ी है छाती में तीर खाने की? मतलब कोई भी कर्म

427
00:30:38,000 --> 00:30:42,080
अगर करेगा व्यक्ति तो लाभ हानि देख के ही करेगा। ठीक है? इससे

428
00:30:42,080 --> 00:30:46,160
जस्ट पहले भगवान क्या कह रहे थे? कि इसलिए

429
00:30:46,160 --> 00:30:50,160
अर्जुन मान जा मेरी बात युद्ध कर ले। इसके अनुसार भगवान कह रहे हैं। अध्याय

430
00:30:50,160 --> 00:30:54,240
दो के श्लोक 38 में कहा हारजीत दुख सुख लाभानि को समाज समान

431
00:30:54,240 --> 00:30:58,960
समझ कर युद्ध कर। अब देखो यहां भगवान के इस भाव का खंडन कर रहा है

432
00:30:58,960 --> 00:31:03,040
और फिर बाद में यह जो लाभ हानि में समत्व बुद्धि वाली बात

433
00:31:03,040 --> 00:31:03,680
है इसका कई

434
00:31:03,680 --> 00:31:08,320
जगह पर इसने समर्थन भी किया है। ये चाहता क्या है भाई? बेवकूफ

435
00:31:08,320 --> 00:31:11,920
है क्या दुनिया का सबसे बड़ा?

436
00:31:11,920 --> 00:31:16,000
मतलब भगवान कह रहे हैं तब तो वो बात गलत है। और फिर कहीं दूसरी जगह सही

437
00:31:16,000 --> 00:31:20,000
भी मानता है। भगवान की ये दोहरा कही गई बात। पागल

438
00:31:20,000 --> 00:31:22,400
है ये।

439
00:31:22,400 --> 00:31:26,800
विक्षिप्त है दिमाग से जो इस किताब को लिख रहा है बेवकूफ

440
00:31:26,800 --> 00:31:30,960
कहीं का। खैर चलते हैं आगे। तो इसने

441
00:31:30,960 --> 00:31:34,960
यहां पे जो निष्काम भावना है वो

442
00:31:34,960 --> 00:31:40,320
रखने की बात मान ली। और जबकि वहां क्या लिख रहा है? यही व्यक्ति क्या लाभानि के बिना

443
00:31:40,320 --> 00:31:44,400
युद्ध हो सकता है? क्या यहां निष्काम बना रहा है। वहां पर

444
00:31:44,400 --> 00:31:48,400
निष्कामता का खंडन कर रहा है। यहां पर निष्कामता का पक्ष ले रहा है। अजीब भैया

445
00:31:48,400 --> 00:31:52,640
जेल वाले बाबा का गाना है यह। कोई लिखे कोई

446
00:31:52,640 --> 00:31:56,640
अगर थोड़ा पंक्ति लिख सकता हो तो जेल वाले बाबा मेरा गाना बजा दो यह

447
00:31:56,640 --> 00:32:00,800
वाला टाइटल ले गाना लिखिए उस पर फिर थोड़ा सा हम लोग बनवा के उसको

448
00:32:00,800 --> 00:32:05,040
डालेंगे आप लोगों के एंटरटेनमेंट के लिए है ना लिखिए गाना

449
00:32:05,040 --> 00:32:09,120
जेल वाले बाबा मेरा गाना बजा दो फिर शिवश

450
00:32:09,120 --> 00:32:13,520
उसमें कैसे आकर के कहेगा कि ओ जेल वाले बाबा इसका गाना बजा दे

451
00:32:13,520 --> 00:32:17,760
कौन सा जनता है कौन सा तेरे मूर्ख कह रहे हैं और बाकी पूरी

452
00:32:17,760 --> 00:32:19,040
कर दूंगा मैं कोई कसर

453
00:32:19,040 --> 00:32:25,040
जो रह रही है हम

454
00:32:27,440 --> 00:32:30,960
ठीक है आगे चलते हैं।

455
00:32:30,960 --> 00:32:34,000
तो इसने जो है

456
00:32:34,000 --> 00:32:38,320
अच्छा इसने एक बात और लिखी है यहां इसी पैराग्राफ में बात करते समय यह 96

457
00:32:38,320 --> 00:32:42,480
नंबर पृष्ठ पर कि अब ये कर्म

458
00:32:42,480 --> 00:32:46,640
और अकर्म में जब हम पहचान कर रहे हैं कि भाई अगर तुम्हें भोजन करना है तो कैसे

459
00:32:46,640 --> 00:32:50,720
करना है युद्ध करना है तो किसके लिए करना है किसके लिए नहीं करना है इन सब बातों

460
00:32:50,720 --> 00:32:55,040
का यहां भगवान ज्ञान दे रहे हैं। मगर ये हर बात में जाकर के कर्म अकर्म

461
00:32:55,040 --> 00:32:59,280
को एक ही दृष्टि से देखता है कि किसकी पूजा करनी है और किसकी पूजा नहीं करनी है।

462
00:32:59,280 --> 00:33:03,440
तो प्रॉब्लम यह आएगी कि जब हम हर जगह पर पूजा किसकी करनी है, किसकी नहीं

463
00:33:03,440 --> 00:33:07,600
करनी है, कैसे करनी है, कैसे नहीं करनी है। जब हम यह देखने लगेंगे

464
00:33:07,600 --> 00:33:11,680
तो फिर जो बाकी के कर्म है

465
00:33:11,680 --> 00:33:15,920
जो पूजा से अतिरिक्त जैसे स्नान करना है तो कैसे करना है?

466
00:33:15,920 --> 00:33:19,920
विवाह करना है तो किससे करना है, कैसे करना है। उसमें कर्म और अकर्म इससे

467
00:33:19,920 --> 00:33:23,920
नहीं करना। यह हो गया विकर्म। और इससे करना है ये हो

468
00:33:23,920 --> 00:33:27,920
गया कर्म। तो जब अगर हर जगह हम लोग पूजा के बारे में ही जान रहे हैं

469
00:33:27,920 --> 00:33:32,080
कि पूजा किसकी करनी है, किसकी नहीं करनी है तो फिर यह

470
00:33:32,080 --> 00:33:34,080
इन बातों की जानकारी कहां से प्राप्त

471
00:33:34,080 --> 00:33:38,080
हो रही है कि धर्म क्या है? अधर्म क्या है? विवाह किससे करना है, किससे

472
00:33:38,080 --> 00:33:42,400
नहीं करना है? क्योंकि इसने तो हर जगह घुसेड़ दिया कि ये देखिए क्या घुसेड़ा

473
00:33:42,400 --> 00:33:46,480
है? कर्म और कर्म और अकर्म का मतलब क्या बताया

474
00:33:46,480 --> 00:33:50,480
इसने? कि तत्व ज्ञान से ही सर्व कर्मों का

475
00:33:50,480 --> 00:33:54,560
ज्ञान होगा कि कौन पूजा के योग्य कौन नहीं है। फिर साधक ब्रह्म

476
00:33:54,560 --> 00:33:59,360
द्वारा लगाए गए कर्मों के बंधन में ना बंधकर सत्यलोक सदा चला जाएगा।

477
00:33:59,360 --> 00:34:05,360
वह सदा के लिए कर्म बंधन से मुक्त हो जाएगा।

478
00:34:06,160 --> 00:34:10,320
अब इसने यहां अगले पैराग्राफ में भगवान विष्णु से बढ़कर कौन

479
00:34:10,320 --> 00:34:14,480
विद्वान हो सकता है? उनका भी कर्म बंधन में बंधकर

480
00:34:14,480 --> 00:34:18,800
श्री रामचंद्र के रूप में जन्म हुआ। तो अब मैं पूछ रहा हूं

481
00:34:18,800 --> 00:34:22,880
इनके अनुसार कबीर के कबीर से ज्यादा विद्वान कौन हो सकता है?

482
00:34:22,880 --> 00:34:26,880
इनके अनुसार कबीर परमात्मा है भाई। तो रामपाल के रूप में कर्म कौन

483
00:34:26,880 --> 00:34:32,400
भोग रहा है? जेल में पड़ा पड़ा गाना बजा रहा है।

484
00:34:32,400 --> 00:34:36,480
कौन कर्म बंधन में कर्म बंधन को भोग रहा है? जेल वाले

485
00:34:36,480 --> 00:34:41,040
बाबा मेरा गाना बजा दो।

486
00:34:41,040 --> 00:34:44,240
ठीक है

487
00:34:44,240 --> 00:34:48,400
क्योंकि यह सब हो गया क्योंकि इन्होंने

488
00:34:48,400 --> 00:34:52,640
कुछ उदाहरण दिए हैं अंट सीधे आ जाते हैं अध्याय

489
00:34:52,640 --> 00:34:56,800
चार के श्लोक 23 24 का भाव अब ये भाव क्यों बता रहे हैं अनुवाद

490
00:34:56,800 --> 00:35:01,360
क्यों नहीं बता रहे हैं ये यही बताएं मगर इसमें है क्या

491
00:35:01,360 --> 00:35:05,840
भाव क्या बताया है जो साधक सर्व कर्म परमात्मा

492
00:35:05,840 --> 00:35:10,000
को साक्षी रखकर कर रहा है उसके सर्व कर्म

493
00:35:10,000 --> 00:35:14,000
ब्रह्म परमात्मा जैसे होते हैं। अब देखिए पहली बात तो यहां

494
00:35:14,000 --> 00:35:18,320
पर जो यह कारक शब्द आए हैं जैसे

495
00:35:18,320 --> 00:35:22,560
होते हैं। है ना? जो एक दूसरे से पंक्ति को जोड़ते

496
00:35:22,560 --> 00:35:26,640
हैं जो शब्द ये सब जो शब्द आ रहे हैं यहां पर इन

497
00:35:26,640 --> 00:35:30,720
शब्दों को प्रकट करने वाले संस्कृत शब्द भी होने चाहिए। संस्कृत में वो

498
00:35:30,720 --> 00:35:35,040
भाव होना चाहिए। पहली बात। दूसरी बात यह है कि

499
00:35:35,040 --> 00:35:39,920
यहां पर इसने ब्रह्म शब्द का अर्थ क्या माना है? परमात्मा

500
00:35:39,920 --> 00:35:44,320
जबकि ब्रह्म तो अलग है क्योंकि ब्रह्म शब्द यहां आया है।

501
00:35:44,320 --> 00:35:48,480
23 वे श्लोक में 24 वे श्लोक में ब्रह्म शब्द

502
00:35:48,480 --> 00:35:52,800
आया है। तो 23वा श्लोक क्या कह रहा है? जिसकी आसक्ति सर्वथा

503
00:35:52,800 --> 00:35:56,240
नष्ट हो गई है। पहले हम पढ़ लेते हैं। 23 वा श्लोक

504
00:35:56,240 --> 00:36:00,640
क्या कह रहा है। जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है। जो देह अभिमान

505
00:36:00,640 --> 00:36:03,200
से

506
00:36:03,200 --> 00:36:07,280
और ममता से रहित हो गया। जिसका चित्त निरंतर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता

507
00:36:07,280 --> 00:36:11,280
है। ऐसे केवल यज्ञ संपादन के लिए कर्म करने वाले

508
00:36:11,280 --> 00:36:15,440
यज्ञ संपादन मतलब धर्म शास्त्र के द्वारा कहे गए कर्म

509
00:36:15,440 --> 00:36:19,760
को करने वाले मनुष्य के संपूर्ण कर्म भलीभांति विलीन हो जाते हैं।

510
00:36:19,760 --> 00:36:23,920
करने वाला होते हुए भी वो कर्म विलीन हो जाते हैं। उनका कर्म फल नहीं

511
00:36:23,920 --> 00:36:29,920
बनता है। आगेकि

512
00:36:30,720 --> 00:36:35,200
और आगे इसमें क्या है? वही अपना फेवरेट वाला जो श्लोक है

513
00:36:35,200 --> 00:36:39,360
ब्रह्म्पणम ब्रह्म अभी ब्रह्माो ब्रह्मणा

514
00:36:39,360 --> 00:36:43,840
हुतम ब्रह्मते गंतव्यम ब्रह्म कर्म समाधि

515
00:36:43,840 --> 00:36:47,920
चार 24 जिसमें इस वालों ने भी बहुत हेराफेरी

516
00:36:47,920 --> 00:36:52,240
कर रखी है इस श्लोक में खैर जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात

517
00:36:52,240 --> 00:36:56,240
स्त्रवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म

518
00:36:56,240 --> 00:37:00,240
है तथा दता ब्रह्म रूप कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि

519
00:37:00,240 --> 00:37:04,480
में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है। उस ब्रह्म कर्म में स्थित रहने वाले

520
00:37:04,480 --> 00:37:08,800
योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल फल भी ब्रह्म ही है।

521
00:37:08,800 --> 00:37:12,960
अब यहां एक यज्ञ के पर्सपेक्टिव से आपको धर्म का

522
00:37:12,960 --> 00:37:17,040
धर्म रूपी जो यज्ञ है धर्म का पालन करने वाले का फल बताया जा रहा है

523
00:37:17,040 --> 00:37:21,120
कि आप जो धर्म धर्म कार्यों में जो आप क्रिया करते हो वो भी ब्रह्म

524
00:37:21,120 --> 00:37:25,200
होती है। धर्म कार्यों में जो आपका जो सामग्री यूज़ होती है

525
00:37:25,200 --> 00:37:29,760
वो अलग-अलग तरीके की सामग्री कही जा सकती है। तो

526
00:37:29,760 --> 00:37:33,840
वह भी ब्रह्म है और फल स्वरूप आपको प्राप्त भी ब्रह्म होता है

527
00:37:33,840 --> 00:37:38,080
मगर इसने क्या किया है इसने कहा

528
00:37:38,080 --> 00:37:42,480
है कि जो साधक सर्व कर्म परमात्मा को साक्षी रखकर

529
00:37:42,480 --> 00:37:46,240
कर रहा है अब ये साक्षी क्या है

530
00:37:46,240 --> 00:37:50,240
हम इसका वो कहां है संस्कृत शब्द उसके सर्व कर्म

531
00:37:50,240 --> 00:37:54,240
ब्रह्म परमात्मा जैसे हो जाते तो यहां पे सबसे पहली बात तो यह है ब्रह्म की बात हो

532
00:37:54,240 --> 00:37:58,240
रही है एक बार नहीं कम से कम ब्रह्म शब्द कितनी बार आया है इस

533
00:37:58,240 --> 00:38:02,480
श्लोक है 44 किसी को भी रामपाल

534
00:38:02,480 --> 00:38:06,800
को मुंह तोड़ जवाब अगर देना हो तो चार 24 खोलना गीता का क्योंकि

535
00:38:06,800 --> 00:38:10,800
इसमें ब्रह्म की बात हुई है और इस बेवकूफ व्यक्ति ने यहां पर ब्रह्म को

536
00:38:10,800 --> 00:38:14,880
परमात्मा कहा है। ठीक है? अगर यह

537
00:38:14,880 --> 00:38:19,040
कहे कि नहीं एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं तो इसी व्यक्ति ने

538
00:38:19,040 --> 00:38:23,360
अगले पृष्ठ में गीता प्रस के अनुवादको द्वारा और अन्य

539
00:38:23,360 --> 00:38:27,360
आचार्यों के भाष्यों में जो एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ लिए

540
00:38:27,360 --> 00:38:31,360
गए हैं उस पर कटाक्ष किया है कि देखो ये लोग कितना गलत करते हैं। एक

541
00:38:31,360 --> 00:38:35,440
जगह यहां पर ब्राह्मण का अर्थ जो है ब्रह्म लिया है। सच्चिदानंद ब्रह्म

542
00:38:35,440 --> 00:38:39,520
लिया है। दूसरी जगह ब्राह्मण ब्रह्मण शब्द का अर्थ लिया है वेद।

543
00:38:39,520 --> 00:38:43,520
एक ही शब्द के अलग एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ दूसरे लोग नहीं कर

544
00:38:43,520 --> 00:38:48,480
सकते मगर रामपाल कर सकता है। ठीक है? तो यहां देखो

545
00:38:48,480 --> 00:38:52,560
इसने ब्रह्म को परमात्मा खुद कहा है और इसमें ब्रह्म शब्द आया

546
00:38:52,560 --> 00:38:56,560
है। एक भी बार जो है परम ब्रह्म शब्द नहीं आया है। ये भी बात है। एक बार

547
00:38:56,560 --> 00:39:00,640
तो आता इसमें कई बार ब्रह्म शब्द है। देखिए जिस

548
00:39:00,640 --> 00:39:01,440
यज्ञ में

549
00:39:01,440 --> 00:39:05,520
अर्पण अर्थात स्त्रवा आदि भी ब्रह्म है। हवन किए जाने

550
00:39:05,520 --> 00:39:09,600
योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है। तथा ब्रह्म रूप कर्ता द्वारा करने

551
00:39:09,600 --> 00:39:13,840
वाला भी ब्रह्म है। ब्रह्म रूप कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया

552
00:39:13,840 --> 00:39:17,920
भी ब्रह्म है। उस ब्रह्म कर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा

553
00:39:17,920 --> 00:39:22,000
प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही है। अब इतनी

554
00:39:22,000 --> 00:39:26,560
बार ब्रह्म आया है। इस व्यक्ति ने इसका अनुवाद क्यों नहीं किया?

555
00:39:26,560 --> 00:39:31,520
इसलिए नहीं किया क्योंकि अगर कर देगा तो इसके

556
00:39:31,520 --> 00:39:36,320
ढोल की पोल खुल जाएगी। चार 24 में अच्छे-अच्छों की ढोल की पोल खुल जाएगी।

557
00:39:36,320 --> 00:39:41,440
जो सनातन सिद्धांतों के विरुद्ध

558
00:39:41,440 --> 00:39:45,520
सनातन धर्म ग्रंथों का सहारा लेकर के शिक्षा

559
00:39:45,520 --> 00:39:49,520
देने का प्रयास कर रहा होगा। उसकी चार

560
00:39:49,520 --> 00:39:53,920
24 में आकर के पोल खुलनी निश्चित है। कोई भी हो। निश्चित

561
00:39:53,920 --> 00:39:59,360
है। क्योंकि यहां सनातन सिद्धांत है कि सब कुछ ब्रह्म है।

562
00:39:59,360 --> 00:40:02,240
ठीक है।

563
00:40:02,240 --> 00:40:06,800
खैर आगे चलते हैं।

564
00:40:06,800 --> 00:40:10,800
अब चार के श्लोक 25 से 30 तक में क्या कहा है? पहले

565
00:40:10,800 --> 00:40:14,800
हम 25 से 30 अपना पढ़ ले। अन्य योगी

566
00:40:14,800 --> 00:40:16,960
जन

567
00:40:16,960 --> 00:40:21,360
श्रोत्र आदि समस्त इंद्रियों को संयम रूप अग्नियों

568
00:40:21,360 --> 00:40:25,520
में हवन किया करते हैं। देखिए मैंने कहा ना कि

569
00:40:25,520 --> 00:40:29,600
इंद्रियों इंद्रिय संयम की जो बात कही गई है उसका ये

570
00:40:29,600 --> 00:40:33,680
खंडन करता है। जबकि एक जगह भगवत गीता में यह कहा गया है कि जो

571
00:40:33,680 --> 00:40:38,160
व्यक्ति इंद्रिय संयम तो कर रहा है परंतु मन से

572
00:40:38,160 --> 00:40:42,400
जिन इंद्रियों को उसने सिकोड़ के रखा है उनहीं इंद्रियों का जो विषय है उसका

573
00:40:42,400 --> 00:40:46,480
चिंतन कर रहा है तो वो भी मूर्ख है तो उस चिंतन वाली बात को

574
00:40:46,480 --> 00:40:50,640
कट कर दिया और ये कहा कि इंद्रिय संयम करने वाले मूर्ख है बीच

575
00:40:50,640 --> 00:40:55,040
में जो चिंतन है विषयों का चिंतन करने वाला मूर्ख है उसको इसने कट कर दिया

576
00:40:55,040 --> 00:40:59,200
ठीक है तो अभी देखना ये इंद्रिय संयम का विरोध

577
00:40:59,200 --> 00:41:04,880
भी करेगा और इंद्रिय संयम का समर्थन भी करेगा। ये है जेल वाले बाबा।

578
00:41:04,880 --> 00:41:08,960
ठीक है? तो देखो कैसे विरोध करेगा। अभी ये पहले हम पढ़ लेते हैं। 25 से

579
00:41:08,960 --> 00:41:12,960
30 तक में भगवान ने कहा क्या है? जो सार है 25 से 30 तक का

580
00:41:12,960 --> 00:41:16,960
वह यह है कि भगवान ने अलग-अलग तरह से भगवान के लिए प्रयत्न

581
00:41:16,960 --> 00:41:17,460
करने वाले

582
00:41:17,360 --> 00:41:21,360
मुमुक्षुओं की बात की है कि कोई योग के द्वारा करता

583
00:41:21,360 --> 00:41:25,520
है। कोई अपने शरीर पर नियंत्रण करता है। कोई भगवान का तप करता

584
00:41:25,520 --> 00:41:29,600
है। नाम जप करता है। इस तरह की भाव यहां से प्रकट किए

585
00:41:29,600 --> 00:41:34,000
हैं। आगे इसको देख लेते हैं। योगी लोग और

586
00:41:34,000 --> 00:41:38,160
देखिए कुछ योगी योगी जो होते हैं वो इंद्रियों इंद्रियों को संयम

587
00:41:38,160 --> 00:41:42,240
रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं। मतलब अपनी इंद्रियों

588
00:41:42,240 --> 00:41:46,320
को संयम कर उसको हवन का रूप दिया है।

589
00:41:46,320 --> 00:41:50,480
फिर दूसरे शब्दा आदि समस्त विषयों को इंद्रिय रूप अग्नियों में हवन

590
00:41:50,480 --> 00:41:54,720
किया करते हैं। ठीक है? इंद्रियों की संपूर्ण

591
00:41:54,720 --> 00:41:59,040
क्रियाओं और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म

592
00:41:59,040 --> 00:42:03,120
संयम योग रूप द्वारा अग्नि में हवन किया करते हैं। कई

593
00:42:03,120 --> 00:42:07,360
पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं। कितने ही तपस्या रूप

594
00:42:07,360 --> 00:42:11,680
यज्ञ करने वाले तो कुछ है जो सामग्री से यज्ञ करते हैं।

595
00:42:11,680 --> 00:42:16,320
ठीक है भगवान का कुछ है तपस्या तपस्या रूप

596
00:42:16,320 --> 00:42:20,400
सामग्री से यज्ञ करते हैं। तथा दूसरे कितने ही योग

597
00:42:20,400 --> 00:42:24,240
रूप यज्ञ करने वाले हैं।

598
00:42:24,240 --> 00:42:28,720
कितने ही अहिंसा आदि तीक्षण व्रतों से युक्त यत्नशील

599
00:42:28,720 --> 00:42:32,720
पुरुष स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ करने वाले हैं।

600
00:42:32,720 --> 00:42:37,680
है ना? ज्ञान यज्ञ से करते हैं।

601
00:42:37,680 --> 00:42:42,000
मतलब भगवान के प्रति जो चरण हम लोग

602
00:42:42,000 --> 00:42:46,080
क्या कहते हैं उसको? स्टेप्स जो ले रहे हैं वह

603
00:42:46,080 --> 00:42:50,320
अलग-अलग प्रकार से ले रहे हैं। अब देखिए आगे जो

604
00:42:50,320 --> 00:42:55,120
जो हम लोग शरीर का वो करते हैं उपयोग

605
00:42:55,120 --> 00:42:59,280
क्या करते हैं? दूसरे कितने ही योगी जन अपान वायु में प्राण वायु

606
00:42:59,280 --> 00:43:03,360
को हवन करते हैं। वैसे ही अन्य योगी जन प्राण वायु में अपान

607
00:43:03,360 --> 00:43:07,360
वायु को हवन करते हैं। अन्य कितने ही नियमित आहार

608
00:43:07,360 --> 00:43:11,680
करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान

609
00:43:11,680 --> 00:43:15,920
की गति को रोक कर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं।

610
00:43:15,920 --> 00:43:20,000
ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले

611
00:43:20,000 --> 00:43:24,960
और यज्ञों को जानने वाले हैं। यज्ञ विद

612
00:43:24,960 --> 00:43:29,200
है ना यज्ञों को जानने वाले हैं। और यहां पर यज्ञ का अर्थ क्या है?

613
00:43:29,200 --> 00:43:33,360
धर्म धर्म कार्यों को जानने वाले हैं। धार्मिक अनुष्ठानों को जानने

614
00:43:33,360 --> 00:43:37,600
वाले हैं। यानी कि ब्रह्म ब्रह्म की परम ब्रह्म परमेश्वर मुक्ति

615
00:43:37,600 --> 00:43:39,280
को प्राप्त करने की विधि को

616
00:43:39,280 --> 00:43:43,520
जानने वाले हैं। ये सभी ठीक है? अब

617
00:43:43,520 --> 00:43:47,600
इसने क्या अनर्थ किया है यहां पे? 25 से 30 में भगवान ने जो

618
00:43:47,600 --> 00:43:51,760
भी कहा है उसका खंडन किया है कि इन सबको त्यागना है। कैसे त्यागना

619
00:43:51,760 --> 00:43:55,840
है बताते हैं। इसने क्या कहा है? अध्याय चार के

620
00:43:55,840 --> 00:44:01,520
श्लोक 25 से 30 तक में कहा है कि पष्ठ संख्या 97

621
00:44:01,520 --> 00:44:06,320
कहा है कि इनमें भिन्नभिन्न प्रकार की कर्म उपासना का विवरण किया है।

622
00:44:06,320 --> 00:44:10,320
कहा है कि कुछ साधक तो हवन यज्ञ करके कर्म योग को कर रहे हैं। कुछ

623
00:44:10,320 --> 00:44:14,320
एक स्थान पर विशेष आसन पर बैठकर कान नाक आंक आदि इंद्रियों को हट के

624
00:44:14,320 --> 00:44:17,600
रोक कर संयम

625
00:44:17,600 --> 00:44:21,600
करने की साधना में लगे हैं। अन्य भक्त जन देवी देवताओं की भक्ति करते हैं। कुछ

626
00:44:21,600 --> 00:44:25,600
दान कुछ घोर तप करते हैं, कुछ व्रत कर पहली बात तो

627
00:44:25,600 --> 00:44:29,760
शब्द जो है शब्दों का ध्यान रखिएगा। अपने आप शब्द आ जाते हैं कुछ भी कहीं

628
00:44:29,760 --> 00:44:34,240
से भी। ठीक है? कुछ व्रत कर रहे हैं। कुछ अन्य अभ्यास तथा स्वाध्याय,

629
00:44:34,240 --> 00:44:39,440
धार्मिक शास्त्र पढ़ना यह सब कर रहे हैं। ठीक है?

630
00:44:39,440 --> 00:44:44,560
तो धार्मिक शास्त्र पढ़ना।

631
00:44:44,560 --> 00:44:50,560
स्वाध्याय की बात कहां पर आई है?

632
00:44:57,440 --> 00:45:02,080
स्वाध्याय को ज्ञान यज्ञ भगवत गीता में कहा गया है अध्याय

633
00:45:02,080 --> 00:45:06,240
भगवान को जानना तत्व ज्ञान प्राप्त करना तो ज्ञान यज्ञ कहा गया है भगवत

634
00:45:06,240 --> 00:45:10,240
गीता में भी ठीक है और ये

635
00:45:10,240 --> 00:45:14,480
सभी करने वालों को इस प्रकार से सभी हवन करने यज्ञ करने वालों को धार्मिक

636
00:45:14,480 --> 00:45:18,480
कार्य करने वालों को मुमुक्षु भी कहा है और तत्व से जानने

637
00:45:18,480 --> 00:45:22,960
करने वाला भी कहा है और मुक्त हो जाने वाला भी कहा है।

638
00:45:22,960 --> 00:45:28,240
तो क्या कहा है आगे? इसने भी माना यहां पर

639
00:45:28,240 --> 00:45:32,880
कुछ स्वाध्याय, धार्मिक शास्त्र पढ़ना, कर्म श्रेष्ठ मानकर आध्यात्मिक

640
00:45:32,880 --> 00:45:36,880
कर्मों में संलग्न है तथा अन्य प्राणायाम कर रहे हैं और मान रहे हैं कि यह सर्व

641
00:45:36,880 --> 00:45:41,040
भक्ति कर्म पाप नष्ट करने वाले हैं। विचार करें।

642
00:45:41,040 --> 00:45:45,440
भगवान कृष्ण अर्जुन के रूप में थे। फिर इसने बकवास की अपनी। ठीक है?

643
00:45:45,440 --> 00:45:48,880
बकवास करने के बाद इसने इस पैराग्राफ के अंत में कहा है कि

644
00:45:48,880 --> 00:45:53,280
इससे सिद्ध है कि वेद व गीता में वर्णित साधना से

645
00:45:53,280 --> 00:45:57,440
पाप विनाश नहीं होते। भोगने ही पड़ते हैं।

646
00:45:57,440 --> 00:46:01,440
अन्य उपलब्धियां जैसे सिद्धियां व स्वर्ग

647
00:46:01,440 --> 00:46:05,440
महास्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। तो पहली बात तो यह भैया कि

648
00:46:05,440 --> 00:46:10,240
सांसारिक सुख सुविधाएं तुमको किससे मिलती है? जो

649
00:46:10,240 --> 00:46:14,640
सनातन पद्धति जिसको तुम कहते हो कि गलत है उसी से मिलती है।

650
00:46:14,640 --> 00:46:18,640
परंतु पाप कर्म नहीं करते क्योंकि वेदों तथा गीता का ज्ञान अधूरा

651
00:46:18,640 --> 00:46:22,720
है। ये ऑफेंसिव वर्ड है यहां पर। वेदों तथा गीता का ज्ञान अधूरा है।

652
00:46:22,720 --> 00:46:28,720
झूठा तो है ही है अधूरा भी है। ठीक है?

653
00:46:29,200 --> 00:46:33,600
अब इसके बाद ये क्या कह रहा है?

654
00:46:33,600 --> 00:46:37,600
इसके बाद इसने फिर अगले पृष्ठ पर 98 पर ऑफेंसिव वो

655
00:46:37,600 --> 00:46:43,120
लैंग्वेज की है। क्या कहा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश

656
00:46:43,120 --> 00:46:47,120
आदि आदि देवताओं की पूजा करने वाले राक्षस स्वभाव को

657
00:46:47,120 --> 00:46:51,120
धारण किए हुए मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने

658
00:46:51,120 --> 00:46:57,120
वाले मूर्ख कहे। ठीक है?

659
00:46:57,920 --> 00:47:02,080
ये सब करा है इसने। अब इस पूरे पैराग्राफ को हम लोग छोड़

660
00:47:02,080 --> 00:47:07,440
करके आगे चलते हैं। इसमें बहुत सारी बकवास की है।

661
00:47:07,440 --> 00:47:11,840
वो बकवास क्या है? देखते हैं

662
00:47:11,840 --> 00:47:12,340
चार

663
00:47:12,000 --> 00:47:16,720
के श्लोक 31 32 में कहा है कि गीता अध्याय

664
00:47:16,720 --> 00:47:20,720
चार श्लोक 25 से 30 तक वर्णित शास्त्र विरुद्ध साधना से

665
00:47:20,720 --> 00:47:25,360
बचे हुए साधक शास्त्र शास्त्र विधि अनुसार

666
00:47:25,360 --> 00:47:27,680
अर्थात नाम साधना करते हैं।

667
00:47:27,680 --> 00:47:31,760
अब सबसे पहली बात है कि चार 31 में कह क्या रहे हैं वो

668
00:47:31,760 --> 00:47:36,240
देखना पड़ेगा। फिर आपको समझ में आएगी कहानी। तो यह

669
00:47:36,240 --> 00:47:40,400
भगवान ने 25 से 30 तक में यज्ञ यानी धर्म कार्य बताए।

670
00:47:40,400 --> 00:47:44,480
ठीक है? भगवान को प्राप्त करने के निमित्त जो

671
00:47:44,480 --> 00:47:48,960
कार्य होते हैं उन सब की विवेचना की। उसके बाद उसको

672
00:47:48,960 --> 00:47:53,120
यज्ञ का नाम दिया वहां पर। उसके बाद कहा कि इस प्रकार यज्ञ से बचे

673
00:47:53,120 --> 00:47:57,120
हुए जब हमने यज्ञ किया तो यज्ञ के परिणाम स्वरूप हमें

674
00:47:57,120 --> 00:48:01,280
क्या प्राप्त होता है? उसको कहा है भगवान ने। यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले

675
00:48:01,280 --> 00:48:05,920
योगी जन सनातन परम ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं।

676
00:48:05,920 --> 00:48:08,240
ठीक है?

677
00:48:08,240 --> 00:48:12,240
सनातन ब्रह्म सनातन परम ब्रह्म को प्राप्त

678
00:48:12,240 --> 00:48:16,320
हो जाते हैं। बात लिखित में आई है। सनातनम

679
00:48:16,320 --> 00:48:21,840
ब्रह्म याती प्राप्त होते हैं।

680
00:48:21,840 --> 00:48:26,240
यानी 25 से 30 में जो यज्ञ कर्म बताए हैं

681
00:48:26,240 --> 00:48:30,240
धर्म बताया है। उसको करने वाला सनातन परमात्मा

682
00:48:30,240 --> 00:48:34,720
को प्राप्त होता है। भगवत गीता में स्पष्ट लिखा है। सनातनम ब्रह्म

683
00:48:34,720 --> 00:48:38,720
याती सनातन सनातन जिसके आगे लग गया उसके

684
00:48:38,720 --> 00:48:42,720
आगे परम अरम लगाने की जरूरत नहीं है। सनातन

685
00:48:42,720 --> 00:48:48,240
जिसके आगे लग गया वो सच्चिदानंद स्वरूप हो गया।

686
00:48:48,240 --> 00:48:52,480
ठीक है? खैर आगे चलते हैं। तो

687
00:48:52,480 --> 00:48:56,560
और क्या लिखा है कि और यज्ञ ना करने वाले पुरुष के लिए तो

688
00:48:56,560 --> 00:49:00,720
यह मनुष्य लोक भी सुखदायक नहीं है। फिर परलोक कैसे सुखदायक हो

689
00:49:00,720 --> 00:49:05,760
सकता है? तो यानी यज्ञ यानी धर्म। ठीक है?

690
00:49:05,760 --> 00:49:11,760
अब इसने क्या कहा है यहां पर जेल वाले बाबा ने

691
00:49:12,160 --> 00:49:12,720
कि

692
00:49:12,720 --> 00:49:16,880
चार के श्लोक 31 32 में कहा है कि गीता अध्याय चार श्लोक 25 से 30

693
00:49:16,880 --> 00:49:19,120
तक वर्णित शास्त्र

694
00:49:19,120 --> 00:49:23,280
विरुद्ध साधना। अच्छा चार अध्याय चार के 25

695
00:49:23,280 --> 00:49:27,680
से 30 में साधना शब्द आया है क्या?

696
00:49:27,680 --> 00:49:31,760
नहीं आया है। बार-बार क्या आया है? यज्ञ। यज्ञ शब्द

697
00:49:31,760 --> 00:49:35,760
आया है 25 से 30 में तो यह और यज्ञ से

698
00:49:35,760 --> 00:49:40,240
बचे हुए अमृत का अनुभव अब यह यज्ञ से बचने का कह रहा है कि जो

699
00:49:40,240 --> 00:49:44,320
शास्त्र विरुद्ध भक्ति से बच जाते हैं मतलब उसमें फंसने से बच जाते

700
00:49:44,320 --> 00:49:48,720
हैं। यानी कि यहां पर इसने यज्ञ का अर्थ क्या लिया है? शास्त्र विरुद्ध

701
00:49:48,720 --> 00:49:52,720
भक्ति। देखो इसका पंचर दिमाग इसने यज्ञ का

702
00:49:52,720 --> 00:49:56,880
अर्थ क्या लिया है? शास्त्र विरुद्ध भक्ति। ठीक है? कि

703
00:49:56,880 --> 00:50:02,880
शास्त्र विरुद्ध भक्ति से जो लोग बच जाते हैं वह शास्त्र विरुद्ध

704
00:50:03,840 --> 00:50:08,160
कार्य करके या जो भी इसके अनुसार वो करके अपना माथा फोड़ते हैं।

705
00:50:08,160 --> 00:50:12,480
मतलब इसके अनुसार शास्त्र विरुद्ध भक्ति से बच जाते हैं। वो शास्त्र विधि

706
00:50:12,480 --> 00:50:16,560
अनुसार साधना करते हैं। सबसे पहले तो ये शास्त्र विरुद्ध भक्ति छोड़

707
00:50:16,560 --> 00:50:20,640
के और शास्त्र विधि के अनुसार साधना करने की बात कहां है यहां?

708
00:50:20,640 --> 00:50:24,640
कहां लिखी है? कौन से शब्द से वो निकल रहा है? यहां तो 25 से 30

709
00:50:24,640 --> 00:50:29,040
तक भगवान ने बताया कि इस इस तरह से भगवान को प्राप्त करने के कार्य करते हैं

710
00:50:29,040 --> 00:50:33,040
और इस प्रकार किए गए यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले

711
00:50:33,040 --> 00:50:37,040
योगी जन सनातन परमात्मा को प्राप्त होते हैं। प्राप्त

712
00:50:37,040 --> 00:50:41,040
कर लिया। मगर यहां पर इसने पूरा भाव ही बदल दिया 25 से 30

713
00:50:41,040 --> 00:50:45,360
श्लोकों का। यानी 25 से 30 में जो बातें कही है वह

714
00:50:45,360 --> 00:50:49,440
सारे उन कर्मों से बचना है। उनमें फसना नहीं है। इंद्रिय संयम में नहीं फसना

715
00:50:49,440 --> 00:50:53,600
है और वो जो अनुशासित रूप से आहार वगैरह में ध्यान रखना

716
00:50:53,600 --> 00:50:57,680
है। भक्ष का ध्यान रखना है वो सब नहीं करना। जबकि खुद ही अभी आगे कहेगा भी

717
00:50:57,680 --> 00:51:01,760
देखना। बेवकूफी की पराकाष्ठा भाई पराकाष्ठा।

718
00:51:01,760 --> 00:51:05,840
अगर तुमसे कोई कभी जीवन में कहे ना कि दुनिया के सबसे बड़े मूर्ख

719
00:51:05,840 --> 00:51:10,160
को ले आओ तो तुम्हें ढूंढने जाने की जरूरत नहीं है। इस किताब

720
00:51:10,160 --> 00:51:14,560
को लिखने वाला यदि वो रामपाल है और दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख है सीधे हिसार

721
00:51:14,560 --> 00:51:19,440
जेल दो में चले जाना।

722
00:51:19,440 --> 00:51:23,920
ठीक है? ब्रह्मा विष्णु महेश को अज्ञानी कहने वाला

723
00:51:23,920 --> 00:51:28,080
और ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति करने वालों को राक्षस और नीच और दूषित

724
00:51:28,080 --> 00:51:32,160
कर्म दूषित कर्म करने वाला कहने वाला मूर्ख कहने वाला खुद

725
00:51:32,160 --> 00:51:36,240
कितना बड़ा मूर्ख है देखो तो अब

726
00:51:36,240 --> 00:51:40,480
पहली बात तो ये आती है क्या यज्ञ का अर्थ शास्त्र विरुद्ध साधना

727
00:51:40,480 --> 00:51:44,720
होता है अब हम इसी के अनुसार अगर

728
00:51:44,720 --> 00:51:48,880
यज्ञ का अर्थ शास्त्र विरुद्ध साधना है जिससे बचे

729
00:51:48,880 --> 00:51:52,880
हुए जो तत्व जो जिसके हमारे अनुसार जिसके परिणाम स्वरूप जो

730
00:51:52,880 --> 00:51:56,880
हमें जैसे भगवान पे हमने प्रसाद चढ़ाया प्रसाद चढ़ाया तो उसके बाद

731
00:51:56,880 --> 00:52:01,120
जो प्रसाद हम ग्रहण करते हैं वो क्या हुआ भगवान को चढ़ाए जाने के बाद बचा

732
00:52:01,120 --> 00:52:05,120
हुआ प्रसाद उसी तरीके से जो हमने यज्ञ कर्म किया धर्म

733
00:52:05,120 --> 00:52:09,280
कर्म किया उस उसके द्वारा मिलने वाला जो हमें फल

734
00:52:09,280 --> 00:52:13,600
है वो होता है मोक्ष ठीक है तो

735
00:52:13,600 --> 00:52:18,000
अब हम इसको इसी की बात से काटते हैं कि क्या यज्ञ का मतलब

736
00:52:18,000 --> 00:52:22,000
यज्ञ का अर्थ ये शास्त्र विरुद्ध साधना मानता है कि नहीं तो भैया पृष्ठ

737
00:52:22,000 --> 00:52:26,880
संख्या इनको दिखाओ 40

738
00:52:26,880 --> 00:52:32,720
यज्ञ का अर्थ इसने शास्त्र विरुद्ध साधना कैसे ले लिया पूछो इससे

739
00:52:32,720 --> 00:52:36,880
डीजे नहीं जेल वाले बाबा से 40 नंबर

740
00:52:36,880 --> 00:52:41,120
प्रश्न पे दिखाइए इनको

741
00:52:41,120 --> 00:52:45,120
तीन 11 का वहां अर्थ किया गया है हां इसमें

742
00:52:45,120 --> 00:52:51,120
देखिए 31 का अर्थ करते हुए 3 10 का अर्थ करते हुए क्या बता रहा है यह बाबा

743
00:52:53,120 --> 00:52:56,960
क्या बता रहा है?

744
00:52:56,960 --> 00:53:01,920
पूर्ण तीन 10 से पढ़ते हैं। ठीक है? अनुवाद

745
00:53:01,920 --> 00:53:06,000
प्रजापति यानी कुल के मालिक ने कल्प के अंत आदि में

746
00:53:06,000 --> 00:53:10,160
यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा

747
00:53:10,160 --> 00:53:14,400
कि अन्न द्वारा होने वाला धार्मिक कर्म जिसे धर्म

748
00:53:14,400 --> 00:53:18,400
यज्ञ कहा कहते हैं। ठीक है? इसने यज्ञ का अर्थ क्या माना है?

749
00:53:18,400 --> 00:53:22,560
धार्मिक धार्मिक कर्म धार्मिक अनुष्ठान

750
00:53:22,560 --> 00:53:26,640
ठीक है नीचे भी आप देख लीजिए यज्ञ के द्वारा देवताओं अर्थात

751
00:53:26,640 --> 00:53:30,880
संसार रूपी पौधे की शाखाओं को उन्नत करो और देवताओं ये वो यज्ञ

752
00:53:30,880 --> 00:53:36,000
का अर्थ इसने धार्मिक अनुष्ठान माना है

753
00:53:36,000 --> 00:53:38,880
तो यहां पर इसने

754
00:53:38,880 --> 00:53:42,000
यज्ञ का अर्थ क्या माना धार्मिक

755
00:53:42,000 --> 00:53:46,000
अनुष्ठान और यहां पर यज्ञ का अर्थ क्या बता रहा है

756
00:53:46,000 --> 00:53:50,000
कि शास्त्र विरुद्ध साधना

757
00:53:50,000 --> 00:53:54,400
यह है जेल वाले बाबा। ठीक है?

758
00:53:54,400 --> 00:53:58,800
अब बात यह है कि शास्त्र विरुद्ध साधना जो

759
00:53:58,800 --> 00:54:04,800
है वो तो बुरी है ही।

760
00:54:04,960 --> 00:54:09,040
फिर आगे क्या है? आगे भगवान ने कहा है कि जो लोग यज्ञ

761
00:54:09,040 --> 00:54:13,360
नहीं करते यानी धर्म कार्य नहीं करते हैं ऐसे 31

762
00:54:13,360 --> 00:54:17,360
वे श्लोक में और यज्ञ ना करने वाले अब यज्ञ का अर्थ तो

763
00:54:17,360 --> 00:54:21,600
इसने शास्त्र विरुद्ध कर्म कहा है तो और यज्ञ ना करने वाले पुरुष

764
00:54:21,600 --> 00:54:25,600
के लिए तो यह मनुष्य लोक भी सुखदायक नहीं है। फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता

765
00:54:25,600 --> 00:54:29,680
है? तो भगवान ने यज्ञ ना करने वालों

766
00:54:29,680 --> 00:54:33,680
को क्रिटिसाइज किया यहां पर। वो गलत है। तो

767
00:54:33,680 --> 00:54:37,840
यह यह कह रहा है कि यज्ञ का अर्थ है शास्त्र

768
00:54:37,840 --> 00:54:42,080
विरुद्ध साधना। यह यह कह रहा है। यानी कि शास्त्र विरुद्ध

769
00:54:42,080 --> 00:54:46,960
साधना ना करने वाले लोग जो होते हैं वो गलत होते हैं। अब देखो इसने क्या किया?

770
00:54:46,960 --> 00:54:50,960
इसने शास्त्र विरुद्ध साधना जब यज्ञ को

771
00:54:50,960 --> 00:54:55,120
मान लिया है तो आगे यज्ञ ना करने वालों को फिर से कह रहा है कि वह दयाहीन

772
00:54:55,120 --> 00:54:57,120
श्रद्धाहीन हो जाते हैं। वास्तविक जाप

773
00:54:57,120 --> 00:55:02,080
मंत्र बिना केवल यज्ञ करना भी निष्फल है। अब इस पर आ गया।

774
00:55:02,080 --> 00:55:06,400
इधर यज्ञ करने को मना किया। यज्ञ का अर्थ शास्त्र

775
00:55:06,400 --> 00:55:10,800
विरुद्ध साधना। और फिर अगले पृष्ठ पर 99 वे प्रश्न पर

776
00:55:10,800 --> 00:55:14,160
इसमें क्या कह रहा है

777
00:55:14,160 --> 00:55:18,320
कि इस प्रकार यज्ञ ना करने से साधक अहंकारी दयाहीन

778
00:55:18,320 --> 00:55:22,560
श्रद्धाहीन हो जाता है। वास्तविक जाप मंत्र बिना केवल

779
00:55:22,560 --> 00:55:26,640
यज्ञ करना भी निष्फल है। अभी कह रहा था कि यज्ञ करना गलत है।

780
00:55:26,640 --> 00:55:30,960
यह धार्मिक जो 25 से 30 में बताए। अब कह रहा है कि यज्ञ करो।

781
00:55:30,960 --> 00:55:35,120
परंतु वास्तविक जाप मंत्र के साथ करो। तो यह बात कहां गई कही? इन श्लोकों में कहीं

782
00:55:35,120 --> 00:55:39,440
नहीं कही। परंतु भगवान ने इस प्रकार यज्ञ करने वालों को मुक्त बता दिया।

783
00:55:39,440 --> 00:55:43,680
सनातन परम ब्रह्म को प्राप्त करने वाला बता दिया। तो यह

784
00:55:43,680 --> 00:55:47,840
है जेल वाले बाबा का गाना। आगे यदि गुरु जी से नाम

785
00:55:47,840 --> 00:55:52,080
नहीं ले रखा है तो उसने फिर अपनी वही बकवास की है। आगे चलते हैं। अब

786
00:55:52,080 --> 00:55:56,320
चार श्लोक 32 में क्या कहा है? कि

787
00:55:56,320 --> 00:56:02,320
चार श्लोक 32 में 99 वे पष्ठ पर 99

788
00:56:02,480 --> 00:56:06,640
चार श्लोक 32 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा द्वारा अपने मुख कमल के सूक्ष्म वेद

789
00:56:06,640 --> 00:56:10,640
में सभी यज्ञों यानी धार्मिक अनुष्ठानों

790
00:56:10,640 --> 00:56:14,640
का विस्तार पूर्वक विवरण है जो सांसारिक कर्तव्य कर्मों

791
00:56:14,640 --> 00:56:18,880
तथा शारीरिक यानी शरीर द्वारा दान सेवा स्मरण आदि भक्ति

792
00:56:18,880 --> 00:56:23,600
कर्मों से संपन्न होते हैं। इस प्रकार जानकर साधक मुक्त हो जाता है।

793
00:56:23,600 --> 00:56:28,480
उस तत्व ज्ञान को मैं गीता बोलने वाला प्रभु भी नहीं जानता

794
00:56:28,480 --> 00:56:33,120
जो पूर्ण परमात्मा के पूर्ण मोक्ष मार्ग का विवरण है।

795
00:56:33,120 --> 00:56:37,120
ठीक है? उसके लिए अध्याय चार श्लोक 34 में

796
00:56:37,120 --> 00:56:41,120
कहा है कि उस तत्व ज्ञान को जानने वाले संतों की खोज कर।

797
00:56:41,120 --> 00:56:43,600
ठीक।

798
00:56:43,600 --> 00:56:47,840
अब इसमें नोट करके इसने एक बात और कही है। वह भी पढ़ लेते हैं। गीता

799
00:56:47,840 --> 00:56:51,920
जी के अन्य अनुवाद्ताओं ने गीता अध्याय चार श्लोक 32

800
00:56:51,920 --> 00:56:56,000
का अनुवाद ठीक नहीं किया है क्योंकि उन्होंने ब्राह्मण का अर्थ वेद किया है। अब

801
00:56:56,000 --> 00:57:00,720
यहां देखिए कॉमेडी देखिए कॉमेडी किंग है रामपाल देखिएगा कि

802
00:57:00,720 --> 00:57:05,200
ब्राह्मण ब्राह्मण शब्द का अर्थ वेद किया है तो उसको प्रॉब्लम है।

803
00:57:05,200 --> 00:57:09,200
ठीक है? तो ब्रह्मण का शब्द का अर्थ जो है फिर यह बोल रहा

804
00:57:09,200 --> 00:57:13,280
है जबकि गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में ब्रह्मण का का अर्थ

805
00:57:13,280 --> 00:57:17,520
उन्होंने ही सच्चिदानंद घन ब्रह्म किया है जो सही है। तो इसने

806
00:57:17,520 --> 00:57:22,000
मान लिया कि ब्रह्म का अर्थ जो है सच्चिदानंद घन ब्रह्म होना चाहिए।

807
00:57:22,000 --> 00:57:26,000
वेद नहीं होना चाहिए। ठीक है? इसलिए मानव समाज गीता जी के

808
00:57:26,000 --> 00:57:30,800
अनमोल ज्ञान को यथार्थ भाव से नहीं जान पाया। अब बात यह आती है

809
00:57:30,800 --> 00:57:34,960
कि इस व्यक्ति ने

810
00:57:34,960 --> 00:57:39,120
यहां पे वेद मानने से मना कर दिया। उसका मतलब क्या माना कि वहां पर तो सच्चिदानंद

811
00:57:39,120 --> 00:57:43,600
ब्रह्म होना चाहिए। मगर अगले पैराग्राफ में देखिए

812
00:57:43,600 --> 00:57:47,680
गीता अध्याय चार श्लोक 25 से 30 तक में कहा है कि कुछ साधक देवताओं की

813
00:57:47,680 --> 00:57:51,920
पूजा रूपी यज्ञ अर्थात धार्मिक कर्म करते हैं। दूसरे हट योग द्वारा कर्म इंद्रियों को साधते

814
00:57:51,920 --> 00:57:55,920
हैं। दूसरे स्वास क्रिया करते हैं। अन्य घोर तप तथा अहिंसा

815
00:57:55,920 --> 00:58:00,080
आदि घोर व्रत करते हैं। अन्नदान ही करते हैं। दूसरे योगी जन

816
00:58:00,080 --> 00:58:04,080
केवल अल्पाहार करते हैं। या सर्व साधक अपनी अपनीपनी साधनाओं को पाप

817
00:58:04,080 --> 00:58:08,160
नाशक जानते हैं। पाप नाशक जानते नहीं। वहां कहा गया है

818
00:58:08,160 --> 00:58:12,400
कि वो यज्ञ यज्ञ को जानने वाले धर्म को जानने वाले होते हैं। मोक्ष मार्ग को जानने

819
00:58:12,400 --> 00:58:16,880
वाले होते हैं। श्लोक 32 में कहा है कि उपरोक्त

820
00:58:16,880 --> 00:58:21,120
साधनाओं सहित पूर्ण मोक्ष का मार्ग ज्ञान सच्चिदानंद घन ब्रह्म

821
00:58:21,120 --> 00:58:25,360
अर्थात पूर्ण परमात्मा के द्वारा अपने मुख कमल से कहे जाने कहे गए ज्ञान

822
00:58:25,360 --> 00:58:29,600
अर्थात सच्चिदानंद की घन सच्चिदानंद घन की वाणी

823
00:58:29,600 --> 00:58:32,640
में है। सूक्ष्म वेद यानी कबीर वाणी

824
00:58:32,640 --> 00:58:36,720
में है। अब देखिए इसने ब्राह्मण शब्द

825
00:58:36,720 --> 00:58:40,720
का अर्थ वेद मानने से मना कर दिया। वहां

826
00:58:40,720 --> 00:58:44,800
कहा कि नहीं नहीं वहां तो सच्चिदानंद घन ब्रह्म होना चाहिए। जबकि ये कुतर्क भी इसका

827
00:58:44,800 --> 00:58:49,040
गलत है। क्योंकि खुद ही ये एक ही शब्द के अनेक अर्थ लेता है। पर

828
00:58:49,040 --> 00:58:53,120
यदि कोई दूसरा करे तो वहां टोकता है। एक ही शब्द के कई अलग-अलग

829
00:58:53,120 --> 00:58:57,200
हो सकते हैं। इस हमने कई बार विवेचना कर रखी है। और ब्रह्म शब्द का अर्थ

830
00:58:57,200 --> 00:59:01,200
वेद भी हो सकता है। इसके बारे में भी हमने कहा है। ब्रह्म शब्द का अर्थ वेद भी माना

831
00:59:01,200 --> 00:59:05,360
है निरुक्त में। यह भी हमने बताया है। पर यह टोकता है। जब एक ही शब्द के अलग-अलग

832
00:59:05,360 --> 00:59:09,600
अर्थों का प्रसंग के अनुसार उपयोग करे कोई तो यह टोकता है। इसको वहां

833
00:59:09,600 --> 00:59:13,600
प्रॉब्लम है। खुद करता है। जैसे परम का अर्थ इसने कई जगह कहा

834
00:59:13,600 --> 00:59:17,760
है कि परम और कई जगह परम का अर्थ परदादा वाला कोई और

835
00:59:17,760 --> 00:59:22,080
है। पर जबकि वहां पर दादा में भी जो पर लगा होता है

836
00:59:22,080 --> 00:59:26,320
वो परम के रूप में होता है। परमदा जो परदादा दूसरे दादा नहीं

837
00:59:26,320 --> 00:59:32,080
जो इनसे श्रेष्ठ है। है ना पर दादा। खैर

838
00:59:32,080 --> 00:59:36,320
इस पर बात कर लेते हैं। तो एक तो यह दूसरे के द्वारा

839
00:59:36,320 --> 00:59:40,320
एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ किए जाने पर टोकता है। इसको प्रॉब्लम है।

840
00:59:40,320 --> 00:59:44,320
और दूसरा उसने वेद ने वेद उसने

841
00:59:44,320 --> 00:59:47,760
सच्चिदानंद घन ब्रह्म क्यों क्यों नहीं किया? वेद क्यों

842
00:59:47,760 --> 00:59:51,840
किया? सच्चिदानंद घन ब्रह्म सही अर्थ है किस शब्द

843
00:59:51,840 --> 00:59:55,840
का? ब्रह्मण का। तो इसको वहां प्रॉब्लम थी। तो वहां पर वेद को नहीं माना

844
00:59:55,840 --> 01:00:01,360
इसने। मगर वही पर थोड़ी देर बाद अपनी कबीर वाणी को ठूस दिया।

845
01:00:01,360 --> 01:00:03,760
जैकपॉट

846
01:00:03,760 --> 01:00:07,920
मतलब ब्रह्मणा शब्द का अर्थ तो परमेश्वर हो सकता है।

847
01:00:07,920 --> 01:00:11,920
वेद नहीं मगर थोड़ी देर बाद खुद ही कह रहा है कि ब्रह्मणा शब्द का

848
01:00:11,920 --> 01:00:16,080
अर्थ कबीर वाणी है। वेद

849
01:00:16,080 --> 01:00:20,240
नहीं कह सकते तुम। तुमने ही कहा है कि ब्रह्म होता है उसका अर्थ परम

850
01:00:20,240 --> 01:00:24,320
ब्रह्म। इसलिए वेद मत कहो। उसके बाद थोड़ी देर बाद खुद कहेगा कि

851
01:00:24,320 --> 01:00:28,320
नहीं यहां पे तो उसने कबीर वाणी के लिए कहा है। ठीक है? अब समझ

852
01:00:28,320 --> 01:00:34,080
में आया थोड़ा बात मेरी समझ में आ रही होगी अब फिर

853
01:00:34,080 --> 01:00:39,520
गीता अध्याय चार के श्लोक 34 में

854
01:00:39,520 --> 01:00:44,560
कहा है कि उस ज्ञान को तू तत्वदर्शी संतों से समझ

855
01:00:44,560 --> 01:00:49,200
तत्वदर्शी संत की पहचान आगे बताई है अब

856
01:00:49,200 --> 01:00:53,360
33 34 आने वाला उससे पहले हम अपना अर्थ पढ़ ले 32

857
01:00:53,360 --> 01:00:57,440
33 का तो 32 में क्या कहा है भगवान ने

858
01:00:57,440 --> 01:01:01,760
इस प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं।

859
01:01:01,760 --> 01:01:02,800
ठीक है? अब

860
01:01:02,800 --> 01:01:07,120
यहां पे देखिए वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको

861
01:01:07,120 --> 01:01:11,280
तू मन इंद्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा संपन्न होने

862
01:01:11,280 --> 01:01:15,520
वाला जान। इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठान द्वारा तू

863
01:01:15,520 --> 01:01:19,760
कर्म बंधन से सर्वथा मुक्त हो जाएगा। और इसने क्या कहा

864
01:01:19,760 --> 01:01:25,760
है?

865
01:01:25,840 --> 01:01:30,320
अब 33वा पढ़ते हैं। 33 का पहले अपना पढ़ लेते हैं।

866
01:01:30,320 --> 01:01:34,480
द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ

867
01:01:34,480 --> 01:01:38,640
है। ज्ञान यज्ञ ध्यान दीजिए। द्रव्यमय

868
01:01:38,640 --> 01:01:42,720
यज्ञ की जगह अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यंत

869
01:01:42,720 --> 01:01:46,800
श्रेष्ठ है। तथा यावन मात्र संपूर्ण कर्म ज्ञान में

870
01:01:46,800 --> 01:01:51,520
समाप्त हो जाते हैं। ठीक है? तो यहां पर

871
01:01:51,520 --> 01:01:55,760
ज्ञान यज्ञ की बात हो रही है और ज्ञान यज्ञ

872
01:01:55,760 --> 01:01:59,920
के लिए 34 में कहा है कि उस ज्ञान को तू ज्ञान

873
01:01:59,920 --> 01:02:04,720
यज्ञ के ज्ञान को तू तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ

874
01:02:04,720 --> 01:02:08,800
उनको भलीभांति दंडवत प्रणाम करने से उनकी सेवा करने से और कपट

875
01:02:08,800 --> 01:02:13,280
छोड़कर सरलता पूर्वक प्रश्न करने से परमात्म तत्व को

876
01:02:13,280 --> 01:02:18,400
भलीभांति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे तत्व ज्ञान का उपदेश करेंगे।

877
01:02:18,400 --> 01:02:22,400
यहां केवल नाम देते हैं। तत्व ज्ञान नहीं है कुछ। तत्व ज्ञान यह है कि

878
01:02:22,400 --> 01:02:27,280
यह लोग गलत है। मैं सही हूं और मैं तुम्हें क्या दूंगा? नाम।

879
01:02:27,280 --> 01:02:31,520
कोई तत्विक विवेचना नहीं है मेरे पास। मेरे पास केवल नाम है।

880
01:02:31,520 --> 01:02:36,160
ये सब है कि वो फेंटसी जो इसने बना रखी है ना परिक कथाएं

881
01:02:36,160 --> 01:02:39,280
वो सब है।

882
01:02:39,280 --> 01:02:43,360
अच्छा इसको जानने से क्या होगा? ये ध्यान देने योग्य बात है। जिसको जानकर

883
01:02:43,360 --> 01:02:47,360
तू इस प्रकार मोह को प्राप्त दोबारा नहीं होगा। जिस ज्ञान के

884
01:02:47,360 --> 01:02:51,360
द्वारा तू संपूर्ण भूतों को संपूर्ण प्राणियों को

885
01:02:51,360 --> 01:02:55,520
निशेष भाव से पहले स्वयं में और उसके बाद

886
01:02:55,520 --> 01:02:59,520
मुझ सच्चिदानंद घन ब्रह्म परमात्मा में देखेगा मतलब वही

887
01:02:59,520 --> 01:03:03,600
ब्रह्म ब्रह्म ब्रह्म सब कुछ ब्रह्म है और ये हमने 35

888
01:03:03,600 --> 01:03:07,680
वे तक पढ़ लिया अब ये बहुत इंपॉर्टेंट है पूरा एक

889
01:03:07,680 --> 01:03:11,760
तरीके से इसके द्वारा इसके अनुसार इसके शब्दों में कहे तो रामपाल की

890
01:03:11,760 --> 01:03:15,920
जो पूरी एक वो है ना षड्यंत्र

891
01:03:15,920 --> 01:03:21,120
उसका का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है चार चौथे तत्वदर्शी

892
01:03:21,120 --> 01:03:25,200
तो क्या है अब हमने पढ़ लिया कि ज्ञान यज्ञ

893
01:03:25,200 --> 01:03:29,200
श्रेष्ठ है और उसी ज्ञान यज्ञ के बारे में 34व में बताया जा रहा है कि

894
01:03:29,200 --> 01:03:33,440
वो ज्ञान यज्ञ कहां से मिलेगा तत्वदर्शी के पास जाने से मिलेगा और ज्ञान

895
01:03:33,440 --> 01:03:37,520
स्वरूप तुमको क्या प्राप्त होगा कि तुम सब में ईश्वर को देखोगे सब में परमात्मा

896
01:03:37,520 --> 01:03:41,520
को देखोगे या इसके अनुसार गीता बोलने वाले को देखोगे

897
01:03:41,520 --> 01:03:45,520
क्योंकि उसने कहा ना मुझ मई है

898
01:03:45,520 --> 01:03:49,600
ना मई शब्द आया है 4:35 में ध्यान देने योग की बात है। मई शब्द आया

899
01:03:49,600 --> 01:03:53,600
है। मई का अर्थ मुझ ठीक है? अगर इसके अनुसार वो

900
01:03:53,600 --> 01:03:57,600
परमात्मा नहीं है तो संपूर्ण प्राणियों को पहले खुद में स्वयं में और

901
01:03:57,600 --> 01:04:01,600
फिर मुझ में देखेगा। किस किस ज्ञान से? जो ज्ञान

902
01:04:01,600 --> 01:04:05,600
तुझे तत्वदर्शी से मिलेगा। उसको ज्ञान एक का ज्ञान है। अब

903
01:04:05,600 --> 01:04:09,680
पहली बात आती है कि ये क्या कहता

904
01:04:09,680 --> 01:04:13,920
है? पहले इसका पढ़ लेते हैं। क्या कहा है इसने? तो अध्याय चार के श्लोक

905
01:04:13,920 --> 01:04:18,000
33 34 तथा 35 का भाव है कि गीता ज्ञान दाता ने अर्जुन से कहा

906
01:04:18,000 --> 01:04:22,080
कि हे अर्जुन इस प्रकार पूर्ण परमात्मा के ज्ञान को अब

907
01:04:22,080 --> 01:04:26,080
भाई यहां पूर्ण परमात्मा शब्द कहां आया है? ज्ञान यज्ञ आया है ना पूर्ण परमात्मा

908
01:04:26,080 --> 01:04:30,080
कहां आया है? ज्ञान परमात्मा के ज्ञान

909
01:04:30,080 --> 01:04:34,080
को व समाधान को जानने वाले तत्वदर्शी संतों के पास जा।

910
01:04:34,080 --> 01:04:38,400
यहां पूर्ण परमात्मा का ज्ञान नहीं आया। भाई यहां शब्द आया है ज्ञान यज्ञ।

911
01:04:38,400 --> 01:04:42,400
ठीक है? उनको अधिनी पूर्वक आदर के साथ

912
01:04:42,400 --> 01:04:46,480
धन प्रणाम कर प्रेम प्रेम विनय पूर्वक उस परमात्मा का मार्ग पूछ फिर

913
01:04:46,480 --> 01:04:48,560
वह संत पूर्ण परमात्मा के को

914
01:04:48,560 --> 01:04:52,800
पाने की विधि वो विधि क्या है सतनाम व सारनाम

915
01:04:52,800 --> 01:04:57,120
अर्थात ये तत्सत मंत्र बताएंगे इनकी संस्कृत क्या है

916
01:04:57,120 --> 01:05:01,200
बताएंगे जिसको जानकर तू फिर इस प्रकार अज्ञान रूप

917
01:05:01,200 --> 01:05:05,360
मोह को प्राप्त नहीं होगा फिर तू इसी ज्ञान के आधार पर पहले अपने आप

918
01:05:05,360 --> 01:05:09,440
को जानेगा कि मैं काल के जाल में फंसा हूं। ठीक है? अब देखिए इसमें

919
01:05:09,440 --> 01:05:13,600
ढोल की पोल हम पकड़ेंगे कैसे? कैसे पकड़ेंगे? देखिए कि पहले तू अपने

920
01:05:13,600 --> 01:05:18,320
आप को जानेगा कि मैं काल के जाल में फंसा हूं तथा फिर मुझे काल रूप से देखेगा

921
01:05:18,320 --> 01:05:22,320
तथा तब तू यहां से निकलने की पूरी चेष्टा करेगा। अब सबसे पहली

922
01:05:22,320 --> 01:05:26,480
बात है कि उस ज्ञान से

923
01:05:26,480 --> 01:05:30,480
तुझे क्या मिलेगा? तो इसमें आया है तू संपूर्ण

924
01:05:30,480 --> 01:05:34,880
भूतों को निशेष भाव से पहले अपने में। तो

925
01:05:34,880 --> 01:05:39,200
यहां भूतानी शब्द आया है। जिस ज्ञान के द्वारा

926
01:05:39,200 --> 01:05:43,440
तुम भूतानी संपूर्ण भूतों को अगर संपूर्ण

927
01:05:43,440 --> 01:05:47,520
नहीं लगाओगे तो भूतों को तो लगाओगे तो उसको उनको पहले मुझ में

928
01:05:47,520 --> 01:05:51,600
देखेगा पहले स्वयं में देखेगा तो संपूर्ण भूत कहां गए भैया यहां

929
01:05:51,600 --> 01:05:55,600
से अर्थ करते समय कहां गए

930
01:05:55,600 --> 01:05:59,760
वो उनके बारे में बात क्यों नहीं की है कि पहले खुद में देखेगा पहले तू अपने

931
01:05:59,760 --> 01:06:03,840
आप को जान लेगा नहीं अपने आप को जानने की बात नहीं कही है संपूर्ण भूतों

932
01:06:03,840 --> 01:06:08,720
को स्वयं में देखेगा और उसके बाद गीता को कहने वाले में देखेगा।

933
01:06:08,720 --> 01:06:12,800
तो यहां क्या लिख रहा है तू बेवकूफ बाबा कि पहले तू

934
01:06:12,800 --> 01:06:16,800
स्वयं को जानेगा कि मैं काल के जाल में फसा हूं और फिर तू ये जाने और फिर

935
01:06:16,800 --> 01:06:20,960
तू मुझे देख लेगा कि मैं कौन हूं और फिर तू भैया संपूर्ण भूतों को पहले

936
01:06:20,960 --> 01:06:24,960
स्वयं में और फिर मुझ और अगर हमारी दृष्टि से कहे तो

937
01:06:24,960 --> 01:06:28,400
मुझ परमात्मा में सबको देखेगा।

938
01:06:28,400 --> 01:06:32,560
ये आपको तात्विक ज्ञान मिलना चाहिए। तत्वदर्शी

939
01:06:32,560 --> 01:06:37,920
से यही बताया है। 15 एक में नहीं बताया है। तीन

940
01:06:37,920 --> 01:06:42,240
चार 35 में ही बता दिया कि तत्वदर्शी क्या ज्ञान देगा आपको। एक

941
01:06:42,240 --> 01:06:46,320
पहली बात दूसरी बात यह है कि तत्वदर्शी कौन है?

942
01:06:46,320 --> 01:06:50,480
ज्ञान यज्ञ का ज्ञान देने वाला। चार 33 में क्या कहा जा रहा है?

943
01:06:50,480 --> 01:06:54,560
कि ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ होता है। उस उसके ज्ञान को

944
01:06:54,560 --> 01:06:59,120
तू तत्वदर्शी के पास जाके समझ। तो तत्वदर्शी कौन

945
01:06:59,120 --> 01:07:05,120
हुआ? ज्ञान यज्ञ का ज्ञान देने वाला। अब जरा इनको वो

946
01:07:05,520 --> 01:07:09,680
इसी का नौव अध्याय में

947
01:07:09,680 --> 01:07:14,720
एक जगह इस व्यक्ति ने ज्ञान यज्ञ का अर्थ माना है। शास्त्रों का पठनपाठन।

948
01:07:14,720 --> 01:07:18,720
हालांकि ज्ञान यज्ञ का अर्थ है शास्त्रों का पठन पाठन भी है, प्रवचन सुनना भी

949
01:07:18,720 --> 01:07:22,800
है, सब कुछ है। मगर ये ज्ञान यज्ञ का जो अर्थ है वो निश्चित

950
01:07:22,800 --> 01:07:26,880
मानता है शास्त्र पढ़ना। ठीक है?

951
01:07:26,880 --> 01:07:30,880
नौव अध्याय में वह मैंने आपको जो फोटो बताई थी लिंक

952
01:07:30,880 --> 01:07:35,040
भेजा था एक वह दिखाइए उसमें नौवा अध्याय है नौव अध्याय

953
01:07:35,040 --> 01:07:41,040
का कोई पष्ठ है वहां से आप निकाल के इनको दिखाएं

954
01:08:03,440 --> 01:08:09,440
मिला आपको

955
01:08:10,960 --> 01:08:15,120
खैर अभी हम बात कर लेते हैं वो जब तक निकाल के दिखा रहे हैं तो ज्ञान

956
01:08:15,120 --> 01:08:19,200
यज्ञ का अर्थ इसने माना है ज्ञान यज्ञ का अर्थ इसने

957
01:08:19,200 --> 01:08:22,880
माना है।

958
01:08:22,880 --> 01:08:27,040
मैंने आपको लिंक भेजा है ना एक जब मैंने आपको ये

959
01:08:27,040 --> 01:08:31,200
ढूंढने को कहा था तो उसके बाद मैंने आपको लिंक भेज दिया था कि अब नहीं ढूंढना है। उस

960
01:08:31,200 --> 01:08:36,240
लिंक में आप स्क्रॉल करोगे तो

961
01:08:36,240 --> 01:08:40,560
लास्ट से सेकंड लास्ट वगैरह कुछ है। नौवें

962
01:08:40,560 --> 01:08:44,640
अध्याय का ही है वो। जहां पे इसने ज्ञान यज्ञ का अर्थ

963
01:08:44,640 --> 01:08:48,880
माना है। बुलेट पॉइंट में ऐड कर देंगे ज्ञान यज्ञ का।

964
01:08:48,880 --> 01:08:53,360
ये टाइमिंग नोट कर लीजिएगा। बुलेट पॉइंट में ऐड कर देंगे। आप

965
01:08:53,360 --> 01:08:56,800
टाइमिंग नोट कर लीजिए।

966
01:08:56,800 --> 01:09:02,000
बुलेट पॉइंट में ऐड कर देंगे। तो

967
01:09:02,000 --> 01:09:06,080
अब पहली बात है ज्ञान यज्ञ क्या है? इसके अनुसार ज्ञान

968
01:09:06,080 --> 01:09:10,240
यज्ञ है। शास्त्रों का पठन पाठन और शास्त्रों के पठन पाठन से मुक्ति नहीं है। इसने

969
01:09:10,240 --> 01:09:14,320
अपने कई पष्ठों में कह दिया है कि पांचों यज्ञों से मुक्ति नहीं

970
01:09:14,320 --> 01:09:18,320
है। मुक्ति किसी और चीज से है। और तो और अभी इसने

971
01:09:18,320 --> 01:09:22,400
थोड़ी देर पहले ही जो भगवत गीता का ज्ञान यज्ञ कहा गया है जो 25

972
01:09:22,400 --> 01:09:26,480
से 30 के बीच में उनका भी खंडन किया है। उनसे भी मुक्ति नहीं

973
01:09:26,480 --> 01:09:30,880
है। तो ज्ञान यज्ञ के ज्ञान को देने वाले को तत्वदर्शी कहा है। तो यदि

974
01:09:30,880 --> 01:09:34,880
रामपाल यह वाला तत्वदर्शी 434 का ठीक है?

975
01:09:34,880 --> 01:09:39,120
यदि रामपाल 434 का तत्वद है तो मुक्ति देने वाला नहीं है क्योंकि वह ज्ञान

976
01:09:39,120 --> 01:09:43,280
यज्ञ का ज्ञान देने वाला है। हां यदि वह नाम देने वाला है तो उसका

977
01:09:43,280 --> 01:09:47,280
श्लोक यहां होना चाहिए। उसके बारे में

978
01:09:47,280 --> 01:09:51,280
श्लोक यहां होना चाहिए कि वो ये ज्ञान यज्ञ का ज्ञान नहीं ये वाला ज्ञान भी

979
01:09:51,280 --> 01:09:56,320
देगा। ये भी देगा ये भी देगा। वो श्लोक होना चाहिए ना प्रमाण।

980
01:09:56,320 --> 01:10:00,480
तुम इस श्लोक के आधार पर उसको तत्वदर्शी सिद्ध मत करो। मोक्ष देने

981
01:10:00,480 --> 01:10:04,800
वाला सिद्ध मत करो। दूसरी बात यह है कि भगवान ने

982
01:10:04,800 --> 01:10:09,120
इसकी बेवकूफी की देखिए सीमाएं क्या है? इसने अपनी भगवत गीता

983
01:10:09,120 --> 01:10:13,280
में यह गरमा गीता की का कचरा करते समय और उसमें ये लिखा

984
01:10:13,280 --> 01:10:17,200
है कि अर्जुन को मोक्ष भी मिला। मोक्ष कैसे मिल गया? उसको तत्वदर्शी तो मिला

985
01:10:17,200 --> 01:10:21,200
नहीं था। अच्छा हम अगर देखें तो अर्जुन को मोक्ष

986
01:10:21,200 --> 01:10:25,200
मिला? बिल्कुल मिला। और जो गीता कहने वाला जो है यहां पर

987
01:10:25,200 --> 01:10:29,280
भगवान श्री कृष्ण गीता कहने वाले हैं और दो 16 में

988
01:10:29,280 --> 01:10:33,360
विद्या और अविद्या को जानने वाला होने के रूप में वो वहां

989
01:10:33,360 --> 01:10:37,520
पर तत्वदर्शी सिद्ध हो रहे हैं। विद्या और अविद्या को जानने वाला तत्वदर्शी है। वहां पर कहा गया

990
01:10:37,520 --> 01:10:41,520
है। ठीक है? तो भगवान श्री कृष्ण तत्वदर्शी वहां सिद्ध हो रहे

991
01:10:41,520 --> 01:10:46,000
हैं। तो यहां पे भगवान कहना क्या चाह रहे हैं कि तू भैया उसको तत्वदर्शी के पास जाके जान।

992
01:10:46,000 --> 01:10:50,240
अच्छा उस समय तत्वदर्शी था कौन? जो

993
01:10:50,240 --> 01:10:55,280
कह रहे हैं कि तू तत्व के पास जाकर जान क्या वो

994
01:10:55,280 --> 01:10:59,360
लगभग महाभारत के कितने वर्षों के बाद ये आए हैं कबीर

995
01:10:59,360 --> 01:11:03,440
कुछ नहीं तो मेरे ख्याल से दो ढाई हजार वर्ष के बाद तो आए हैं तो क्या दो

996
01:11:03,440 --> 01:11:08,000
ढाई हजार वर्ष के लिए कह रहे थे कि अर्जुन तू जब मैं 600

997
01:11:08,000 --> 01:11:12,000
क्या कहते हैं कलयुग में जब ये कबीर आएंगे तो उससे लेना तुम ज्ञान कौन था

998
01:11:12,000 --> 01:11:16,560
उस समय तत्वदर्शी जिसके पास जाने को कह रहे हैं। दूसरी बात अर्जुन गया क्या?

999
01:11:16,560 --> 01:11:20,560
तीसरी बात भूलक से लिख दिया है रामपाल ने कि अर्जुन को

1000
01:11:20,560 --> 01:11:24,720
मोक्ष मिला मगर क्या यह मानता है कि अर्जुन को मोक्ष मिला मिला तो उसको ज्ञान किसने

1001
01:11:24,720 --> 01:11:29,040
दिया ये बहुत सारी बातें यहां पर खड़ी हो जाती है एक कि तत्वदर्शी

1002
01:11:29,040 --> 01:11:32,960
गीता कहने वाले सिद्ध है दो 16 से दूसरा

1003
01:11:32,960 --> 01:11:37,040
कि चार 34 के अनुसार रामपाल के शब्दों में अगर कहा

1004
01:11:37,040 --> 01:11:41,280
जाए तो तत्वदर्शी जो है चार 34 वाला तत्वदर्शी मोक्ष देने

1005
01:11:41,280 --> 01:11:45,440
वाला नहीं है मोक्ष ज्ञान देने वाला नहीं है बल्कि यज्ञों का ज्ञान देने वाला

1006
01:11:45,440 --> 01:11:49,520
है अगर वो साथ में नाम भी देता है रामपाल के अनुसार तो

1007
01:11:49,520 --> 01:11:53,520
वो नाम का नाम लेने जाने वाला श्लोक यहां होना चाहिए कि भैया

1008
01:11:53,520 --> 01:11:57,600
तू उसको उस नाम को तू तत्व दृष्टि से जाके जान किस

1009
01:11:57,600 --> 01:12:02,080
नाम को तुझे जपना है मगर यहां ऐसी कोई बात नहीं कही गई तो

1010
01:12:02,080 --> 01:12:06,240
मोक्ष देने वाला सिद्ध नहीं है तीसरा क्या है कि भगवत गीता

1011
01:12:06,240 --> 01:12:10,240
चार 35 के अनुसार तत्वदर्शी जो ज्ञान देगा उसके अनुसार आपको

1012
01:12:10,240 --> 01:12:14,320
क्या प्राप्त होगा कि पहले पूरी दुनिया में पूरी दुनिया स्वयं

1013
01:12:14,320 --> 01:12:18,400
में दिखने लगेगी और फिर सारे समस्त संसार तुम्हें

1014
01:12:18,400 --> 01:12:23,680
ईश्वर में दिखने लगेगा। यह ज्ञान प्राप्त होता है तत्व ज्ञान से।

1015
01:12:23,680 --> 01:12:27,920
तो ये सारी चीजें अप्लाई नहीं होती है और तुम तत्वदर्शी नहीं

1016
01:12:27,920 --> 01:12:30,800
बन पाते हो। तुम बन पाओगे जेल वाले बाबा। ठीक

1017
01:12:30,800 --> 01:12:36,800
है? लिंक दे दीजिए अपना पूरा होने वाला है

1018
01:12:38,960 --> 01:12:42,960
और इन सब इन सब शब्दों का तो यहां अर्थ है संस्कृत शब्द है

1019
01:12:42,960 --> 01:12:46,960
ही नहीं कि मैं काल के जाल में कैसे फसा तब तू यहां

1020
01:12:46,960 --> 01:12:51,280
से निकलने की पूरी चेष्टा करेगा यह है वो है ठीक है

1021
01:12:51,280 --> 01:12:55,440
अच्छा इसने देखो क्या खुराफात की है 15 से तत्वदर्शी

1022
01:12:55,440 --> 01:12:59,600
के तत्वदर्शी के द्वारा दिए जाने वाला ज्ञान कैसा होगा तो इसने 435

1023
01:12:59,600 --> 01:13:03,680
को नहीं उठाया है 435 की बात नहीं की है। तत्वदर्शी से तुझे

1024
01:13:03,680 --> 01:13:07,920
कैसा ज्ञान मिलेगा? सीधे चला गया 15 एक में 15 एक से चार में। अरे क्यों

1025
01:13:07,920 --> 01:13:12,000
भाई? तत्वदर्शी से तुझे कैसा ज्ञान मिलेगा? यही पे बता ना तो वो उसको

1026
01:13:12,000 --> 01:13:16,560
दिक्कत है। हर जगह बात करेगा। 15 एक में देखो। 15 एक में चार 35 मत देखो।

1027
01:13:16,560 --> 01:13:20,640
कि तुमको क्या ज्ञान मिलेगा तत्वदर्शी से? तो ये तत्वदर्शी वाला चैप्टर अलग

1028
01:13:20,640 --> 01:13:24,960
से बना के डाल देना भाई।

1029
01:13:24,960 --> 01:13:30,960
अब इसके बाद क्या बोल रहा है यह?

1030
01:13:34,080 --> 01:13:38,160
पवित्र गीता जी को बोलने वाला काल प्रभु ने कहा है कि द्रव्यम में यज्ञ

1031
01:13:38,160 --> 01:13:42,480
यानी धन से होने वाले धार्मिक अनुष्ठान जो बिना तत्व ज्ञान समझे करते हैं

1032
01:13:42,480 --> 01:13:46,560
जैसे दान देना धर्म भंडारा लंगड़ भोजन करना

1033
01:13:46,560 --> 01:13:50,560
वस्त्रदान करना कुएं धर्मशाला प्याऊ आदि आदि धर्म बनवाना

1034
01:13:50,560 --> 01:13:54,960
से ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है अर्थात पहले पूर्ण संत से आध्यात्मिक

1035
01:13:54,960 --> 01:13:59,360
संपूर्ण ज्ञान समझ फिर उनके द्वारा बताए गए धर्म यज्ञ कर

1036
01:13:59,360 --> 01:14:03,440
अपने मन से कुछ भी बोल लो। अब यहां पर जो है यज्ञ

1037
01:14:03,440 --> 01:14:07,520
का अर्थ इसने धर्म यज्ञ ले लिया। अब देखिए इसकी बाल की

1038
01:14:07,520 --> 01:14:11,520
खाल पकड़ते हैं। क्या है? गीता अध्याय चार श्लोक 36

1039
01:14:11,520 --> 01:14:16,720
से 42 का सारांश नीचे है ना?

1040
01:14:16,720 --> 01:14:20,880
गीता अध्याय चार श्लोक 36 से 42

1041
01:14:20,880 --> 01:14:24,960
का सारांश। सबसे लास्ट पैराग्राफ की हेडलाइन पे वो कर लीजिए

1042
01:14:24,960 --> 01:14:29,040
अंडरलाइन। अब यहां देखिए इसने क्या कहा है अध्याय चार

1043
01:14:29,040 --> 01:14:33,120
श्लोक 36 पहले हमारा 36 पढ़ ले क्या लिखा है

1044
01:14:33,120 --> 01:14:37,120
यदि तू अन्य सभी तब पापियों से भी अधिक पाप

1045
01:14:37,120 --> 01:14:40,720
करने वाला है तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निसंदेह

1046
01:14:40,720 --> 01:14:44,720
संपूर्ण पाप समुद्र से भलीभांति तर जाएगा अब इसने क्या

1047
01:14:44,720 --> 01:14:48,800
लिखा है उपरोक्त ज्ञान तथा साधना के करने

1048
01:14:48,800 --> 01:14:53,200
से अब देखिए यहां फस गया उपरोक्त क्या है मतलब

1049
01:14:53,200 --> 01:14:57,280
कि उपरोक्त जो ज्ञान दिया गया है और और तथा साधना

1050
01:14:57,280 --> 01:15:01,280
यानी कि उक्त साधना यानी यहां पे इसने मान लिया कि गीता

1051
01:15:01,280 --> 01:15:05,440
में साधना बताई गई है। इसने मान लिया देखिए क्या लिखा

1052
01:15:05,440 --> 01:15:09,840
है। उपरोक्त ज्ञान तथा साधना के करने से साधक

1053
01:15:09,840 --> 01:15:14,000
पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है तो भी तत्व ज्ञान

1054
01:15:14,000 --> 01:15:18,080
रूपी नौका द्वारा पाप के समुद्र से भलीभांति तर जाएगा।

1055
01:15:18,080 --> 01:15:22,240
ठीक है? इसने यहां यह मान लिया उपरोक्त ज्ञान

1056
01:15:22,240 --> 01:15:26,560
उक्त ज्ञान यानी उपरोक्त साधना उक्त साधना यानी गीता

1057
01:15:26,560 --> 01:15:32,000
में साधना लिखी हुई है कौन सी साधना जिसको

1058
01:15:32,000 --> 01:15:36,320
जिसका जो करने से है ना जो करने से समुद्र

1059
01:15:36,320 --> 01:15:40,560
से भलीभांति तर जाएगा ये उक्त अगर

1060
01:15:40,560 --> 01:15:46,560
गीता में वो साधना नहीं लिखी हुई है तो उक्त शब्द नहीं आएगा फिर

1061
01:15:46,640 --> 01:15:50,720
वो आएगा कि इन दिशा दिशा निर्देशों के अनुसार जो

1062
01:15:50,720 --> 01:15:54,880
है जो दिशा निर्देश दिए जा रहे हैं ज्ञान प्राप्त करने हेतु

1063
01:15:54,880 --> 01:15:55,760
उनका पालन

1064
01:15:55,760 --> 01:16:00,320
करने से तुम्हें वो ज्ञान प्राप्त हो जाएगा मगर उक्त ज्ञान उक्त साधना नहीं

1065
01:16:00,320 --> 01:16:04,320
दिए गए दिशा निर्देशों के अनुसार तुम्हें

1066
01:16:04,320 --> 01:16:08,960
जो मोक्ष दिलाने वाली साधना है वो प्राप्त हो जाएगी ये कहा जाएगा

1067
01:16:08,960 --> 01:16:12,960
मगर उक्त साधना उक्त साधना का मतलब यहां साधना दी गई

1068
01:16:12,960 --> 01:16:17,040
है तो इस बेवकूफ ने जो ये भाषा का भी ज्ञान है वो

1069
01:16:17,040 --> 01:16:21,120
कम होने के कारण यहां पे एक और अपने लिए पंचर कर लिया। किसी को

1070
01:16:21,120 --> 01:16:25,280
अपना दिमाग पंचर कराना हो तो वो इसका ज्ञान लेने जाए इसके

1071
01:16:25,280 --> 01:16:28,080
उसमें।

1072
01:16:28,080 --> 01:16:32,240
ठीक है?

1073
01:16:32,240 --> 01:16:37,200
अगला पढ़ते हैं क्या है? अध्याय 37

1074
01:16:37,200 --> 01:16:41,360
इस श्लोक में क्या कह रहे हैं? क्योंकि हे अर्जुन जैसे प्रज्वलित अग्नि अब

1075
01:16:41,360 --> 01:16:45,520
यहां पे भगवान ने एक उदाहरण दिया है इस श्लोक में। ईंधनों को

1076
01:16:45,520 --> 01:16:49,680
भस्म भस्मय कर देता है। वैसे ही ज्ञान रूप अग्नि संपूर्ण कर्मों को

1077
01:16:49,680 --> 01:16:53,760
भस्मय कर दे। ज्ञान क्या है? संपूर्ण प्राणियों को अपने आप में। ज्ञान क्या

1078
01:16:53,760 --> 01:16:57,920
है? वो क्या कहते हैं? जो अभी

1079
01:16:57,920 --> 01:17:02,000
चार 24 हमने पढ़ा था वो ज्ञान चार 24 क्या पढ़ा था

1080
01:17:02,000 --> 01:17:07,200
हमने? ब्रह्मपणम ब्रह्म

1081
01:17:07,200 --> 01:17:10,160
अभी ब्रह्मा

1082
01:17:10,160 --> 01:17:14,560
है ना ब्रह्मणाम ब्रह्मते गंतव्यम

1083
01:17:14,560 --> 01:17:18,720
ब्रह्म कर्म समाधना ये ज्ञान है तो इस जब

1084
01:17:18,720 --> 01:17:22,800
ये ज्ञान हो जाता है और वो ज्ञान समस्त प्राणियों को स्वयं

1085
01:17:22,800 --> 01:17:27,120
में फिर भगवान में देखना वो ज्ञान जब हो जाता है कि एक ही परम तत्व

1086
01:17:27,120 --> 01:17:31,520
है तो वो ज्ञान हो जाता है तो उसके कारण उस ज्ञान के कारण समस्त

1087
01:17:31,520 --> 01:17:35,520
जो कर्म है कर्म फल है उनके प्रति आसक्ति वो सब नष्ट

1088
01:17:35,520 --> 01:17:40,720
हो जाती है भस्म हो जाता है इसने क्या कहा है चार 37 में

1089
01:17:40,720 --> 01:17:43,200
इस श्लोक में कहा है कि तत्व ज्ञान को जानकर

1090
01:17:43,200 --> 01:17:47,200
तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा लेकर बस नाम मिलेगा तत्वदर्शी के पास

1091
01:17:47,200 --> 01:17:51,200
और कुछ नहीं वो पर कथाएं मिलेंग बाकी दीक्षा लेकर साधना

1092
01:17:51,200 --> 01:17:55,280
करने से साधक के पाप कर्म ऐसे भस्म हो जाते हैं जैसे वो भावार्थ है कि तत्व ज्ञान

1093
01:17:55,280 --> 01:17:59,520
बताने वाला संत साधना की साधना भी बताएगा जिससे पाप नष्ट हो जाएंगे साधक

1094
01:17:59,520 --> 01:18:04,160
भविष्य में कोई पाप कर्म नहीं करता ठीक है आगे चलते करके

1095
01:18:04,160 --> 01:18:10,160
चार 38 में क्या कहा है भगवान ने

1096
01:18:10,240 --> 01:18:14,400
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निसंदेह कुछ भी नहीं है।

1097
01:18:14,400 --> 01:18:18,400
उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्म योग द्वारा शुद्ध

1098
01:18:18,400 --> 01:18:22,400
शुद्ध अंतःकरण वह मनुष्य अपने आप ही आत्मा में पा लेता

1099
01:18:22,400 --> 01:18:26,640
है। तो ये जो ज्ञान क्या कहते हैं? कर्म

1100
01:18:26,640 --> 01:18:30,720
का फल क्या है? जो कर्म योग के रास्ते पर चल रहा है जो अपना मैं ऐसा

1101
01:18:30,720 --> 01:18:34,800
कर्म करूंगा ऐसा नहीं करूंगा ऐसा करूंगा ऐसा नहीं करूंगा तो कर्म योग का भी फल क्या

1102
01:18:34,800 --> 01:18:38,880
है एक अंतत गथवा ज्ञान ही है बस

1103
01:18:38,880 --> 01:18:41,840
होने वाला है

1104
01:18:41,840 --> 01:18:45,520
ठीक है

1105
01:18:45,520 --> 01:18:49,840
कर्म योग का फल भी ज्ञान ही है तो वो जो कर्म योग पर चलने वाला जो

1106
01:18:49,840 --> 01:18:54,480
योगी होता है वो भी प्राप्त कर लेता है इस ज्ञान को अपने आप ही

1107
01:18:54,480 --> 01:18:58,480
आत्मा में पा लेता है इसने क्या लिखा है। इसने

1108
01:18:58,480 --> 01:19:02,480
लिखा है कि इसलिए इस संसार में तत्व ज्ञान के समान कोई पवित्र करने वाला नहीं

1109
01:19:02,480 --> 01:19:06,480
है। जो संपर्क में आने वाले को शुद्ध कर देता है। उस ज्ञान के आधार पर

1110
01:19:06,480 --> 01:19:10,480
तत्वदर्शी संपर्क में के संपर्क में आकर शुद्ध अंतःकरण हुआ

1111
01:19:10,480 --> 01:19:14,640
भक्त स्वयं ही अपना अनुभव बताता है। क्या है भाई?

1112
01:19:14,640 --> 01:19:20,640
बताता है।

1113
01:19:20,720 --> 01:19:24,880
बहुत इसने बकवास की है। कुछ भी कहीं पर भी लिख देता है। अब इसकी इससे

1114
01:19:24,880 --> 01:19:29,040
कहो इसकी संस्कृत करो। वो मैच करो भगवत गीता की संस्कृत से मैच

1115
01:19:29,040 --> 01:19:33,200
हो रही है कि नहीं तत्व ज्ञानी इंद्रिय इंद्रियों पर संयम करके

1116
01:19:33,200 --> 01:19:37,200
देखो मैंने अभी थोड़ी देर पहले कहा था ना 25 से 30 के बीच में इंद्रिय

1117
01:19:37,200 --> 01:19:41,520
संयम आया था तो इसने खंडन किया था वहां पे अभी देखो इंद्रिय संयम

1118
01:19:41,520 --> 01:19:45,280
तत्व ज्ञानी इंद्रिय संयम

1119
01:19:45,280 --> 01:19:49,440
उससे आगे का सूक्ष्म वेद वाला संपूर्ण ज्ञान इंद्रिय

1120
01:19:49,440 --> 01:19:52,080
संयम करके

1121
01:19:52,080 --> 01:19:56,480
ठीक है यहां इंद्रिय संयम का समर्थन हो गया अभी 25 से 30 में जब गीता

1122
01:19:56,480 --> 01:20:00,960
यही बात बोल रही थी तो उसका खंडन था। अब अपने मन से इंद्रिय

1123
01:20:00,960 --> 01:20:04,960
संयम ला दिया। यहां 39 में भगवान ने क्या

1124
01:20:04,960 --> 01:20:09,360
कहा है? जितेंद्रिय यहां पर भगवान ने भी इंद्रिय संयम की बात की है। साधना

1125
01:20:09,360 --> 01:20:13,680
परायण मगर इसने एक जगह खंडन किया। एक जगह यहां मान लिया। साधना परायण

1126
01:20:13,680 --> 01:20:16,560
और श्रद्धावान

1127
01:20:16,560 --> 01:20:20,640
मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलंब के तत्काल ही

1128
01:20:20,640 --> 01:20:24,720
भगवत प्राप्ति रूप परम शांति को प्राप्त हो जाता है। इसने क्या कहा

1129
01:20:24,720 --> 01:20:28,960
है? कि वो सूक्ष्म वेद का ज्ञान प्राप्त

1130
01:20:28,960 --> 01:20:29,460
करता है। उस

1131
01:20:29,360 --> 01:20:34,000
तत्व ज्ञान को तत्व ज्ञानी से प्राप्त करके साधक शीघ्र ही परम ब्रह्म

1132
01:20:34,000 --> 01:20:36,000
साधना से होने वाली गति से दूसरी

1133
01:20:36,000 --> 01:20:40,240
गति से दूसरी गति से होने वाली परम शांति को प्राप्त

1134
01:20:40,240 --> 01:20:44,240
हो जाता है।

1135
01:20:44,240 --> 01:20:49,360
परम शांति की बात हो रही है। ब्रह्म साधना से होने वाली

1136
01:20:49,360 --> 01:20:54,000
गति से दूसरी गति से होने वाली परम शांति को प्राप्त हो जाता है।

1137
01:20:54,000 --> 01:20:58,000
440 440 क्या कह रही है कि

1138
01:20:58,000 --> 01:21:02,160
विवेकहीन यानी 440 तो हमारा भी फेवरेट श्लोक

1139
01:21:02,160 --> 01:21:06,400
है। कई बार उपयोग में आता है। क्या है? विवेकहीन

1140
01:21:06,400 --> 01:21:10,480
और श्रद्धा रहित संशय युक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य

1141
01:21:10,480 --> 01:21:14,720
ही भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशय युक्त मनुष्य

1142
01:21:14,720 --> 01:21:18,960
के लिए ना यह लोक है ना परलोक है और ना ही सुख ही है।

1143
01:21:18,960 --> 01:21:23,280
अब इसने क्या कहा है कि इसको पढ़

1144
01:21:23,280 --> 01:21:27,440
लेते हैं अपनी अपनी वाली गीता का। आगे दो ही तीन है। जिसने कर्म योग की विधि

1145
01:21:27,440 --> 01:21:31,440
से समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक द्वारा

1146
01:21:31,440 --> 01:21:36,000
समस्त संशयों का नाश कर दिया है। ऐसे व में किए हुए अंतःकरण

1147
01:21:36,000 --> 01:21:41,440
वाले पुरुष को कर्म नहीं मानते। इसके बाद क्या है?

1148
01:21:41,440 --> 01:21:45,520
इसलिए हे भारतवंशी अर्जुन तू हृदय में स्थित इस अज्ञान जनित

1149
01:21:45,520 --> 01:21:49,680
अपने संशय का विवेक ज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके

1150
01:21:49,680 --> 01:21:51,040
समत्व रूप कर्म योग

1151
01:21:51,040 --> 01:21:55,040
में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा। ठीक? अब देखिए इसमें मजा आने वाला है। बहुत

1152
01:21:55,040 --> 01:21:59,200
बहुत आनंद आएगा आपको। जेल वाले बाबा के गाने में। अब इसका

1153
01:21:59,200 --> 01:22:03,200
पढ़ते हैं। अब इसने क्या कहा है? 40 वे में विवेक हीन

1154
01:22:03,200 --> 01:22:07,520
आदि से जिसको तत्व ज्ञान नहीं मिला उसका संशय समाप्त नहीं होता।

1155
01:22:07,520 --> 01:22:11,520
ठीक है? वह सत्य मार्ग से अवश्य भटक कर नष्ट हो जाता है।

1156
01:22:11,520 --> 01:22:15,760
संशय युक्त व्यक्ति के लिए ना यह लोक सुखदायक है ना परलोक सुखदायक है।

1157
01:22:15,760 --> 01:22:20,080
अब यहां पे कहा है कि भाई और आगे संशय की बात और कर लेते हैं। जिसने तत्व

1158
01:22:20,080 --> 01:22:24,320
ज्ञान सुनकर विवेक द्वारा संशय का नाश कर लिया है। जिसने सर्व भक्ति

1159
01:22:24,320 --> 01:22:28,560
कर्म परमात्मा पर छोड़ दिए है। वह पुनः पाप कर्म नहीं करता जिस कारण से वह

1160
01:22:28,560 --> 01:22:32,640
कर्म के बंधनों में नहीं बंधन। मगर बात यह

1161
01:22:32,640 --> 01:22:36,880
है कि क्या यह तत्वदर्शी अपने फॉलोअ के संशय दूर

1162
01:22:36,880 --> 01:22:41,040
करने वाला है? इतने संशय है ना इसकी बुक में

1163
01:22:41,040 --> 01:22:45,040
ही इसकी बुक में वो तत्व ज्ञान तो छोड़ो कबीर परमेश्वर के

1164
01:22:45,040 --> 01:22:49,120
संबंध में सतलोक सतलोक आश्रम के संबंध में सतलोक के संबंध

1165
01:22:49,120 --> 01:22:54,320
में इतने इतने संशय है कि पूछो नहीं

1166
01:22:54,320 --> 01:23:00,240
और ये तो इसकी किताब में इतने संशय है उनको ही नहीं समाप्त कर सकता

1167
01:23:00,240 --> 01:23:04,480
हम क्यों आज मैंने

1168
01:23:04,480 --> 01:23:08,560
एक व्यक्ति से पूछा जो सतलोक वाला जो अता पता

1169
01:23:08,560 --> 01:23:12,560
बताने वाला जो इनका कस्टमर केयर वो कह रहा है मैं अपना नाम नहीं बताऊंगा।

1170
01:23:12,560 --> 01:23:18,560
उसका नाम ना उसका नाम जानना भी एक संशय पूर्ण कार्य है।

1171
01:23:18,880 --> 01:23:22,960
नाम तक नहीं बता पा रहे हैं शर्म के मारे। इतनी लज्जा

1172
01:23:22,960 --> 01:23:28,720
है इनको अपने तत्व ज्ञान पर।

1173
01:23:28,720 --> 01:23:33,520
है ना? और ये है तत्वदर्शी संशय नष्ट करने वाले।

1174
01:23:33,520 --> 01:23:37,600
खैर तो अंत में बात करते

1175
01:23:37,600 --> 01:23:41,600
हैं। इसमें इसने बहुत से ऐसे शब्द है ना कि द्वारा संशय का नाश

1176
01:23:41,600 --> 01:23:45,600
कर जिसने सर्व भक्ति कर्म परमात्मा पर छोड़ दिए हैं। परमात्मा पर छोड़ दिए

1177
01:23:45,600 --> 01:23:49,760
कि संस्कृत कहां है? कहीं नहीं है। फिर इसने आगे कहा

1178
01:23:49,760 --> 01:23:54,160
है कि चार के 42

1179
01:23:54,160 --> 01:23:58,400
में भगवान ने क्या कहा? इस प्रकार विचार करके हे भारत अपने हृदय में उत्पन्न अपने संशय

1180
01:23:58,400 --> 01:24:02,400
को ज्ञान रूपी तलवार से काटकर भक्ति कर्म में स्थित होकर साधना के

1181
01:24:02,400 --> 01:24:07,840
लिए खड़ा हो जा यानी भक्ति के लिए कमर कस ले। अब देखो

1182
01:24:07,840 --> 01:24:11,920
जब ये भगवान श्री कृष्ण यह कहते हैं ज्ञानार्थक

1183
01:24:11,920 --> 01:24:16,320
दृष्टि से मेरी शरण में आ जा चल के नहीं गत्यातार्थक

1184
01:24:16,320 --> 01:24:20,560
नहीं ज्ञानार्थक दृष्टि से मेरी शरण प्राप्त कर

1185
01:24:20,560 --> 01:24:24,640
यानी कि जो तू सोच रहा है कि भाई परमात्मा कोई और है

1186
01:24:24,640 --> 01:24:29,280
वो जो परमात्मा की शरण में तुझे जाना है तो वो मेरी शरण में आ जा ठीक है ज्ञानार्थक

1187
01:24:29,280 --> 01:24:33,440
दृष्टि से तो ये वहां पर कहते अर्जुन तो पहले से ही वहां पर है फिर उसको जो

1188
01:24:33,440 --> 01:24:37,520
है जाने जाने की क्यों कह रहे हैं? अर्जुन तो पहले से ही कृष्ण

1189
01:24:37,520 --> 01:24:41,600
की शरण में है। तो फिर वो क्यों कहेंगे कि मैं मेरी शरण में आजा। है

1190
01:24:41,600 --> 01:24:43,760
ना? अब ये बताइए इसने

1191
01:24:43,760 --> 01:24:48,080
यहां पर ये इस बेवकूफ ने यहां पर ये लिखा है कि

1192
01:24:48,080 --> 01:24:52,080
भक्ति करने के लिए खड़ा हो जा। भक्ति करने

1193
01:24:52,080 --> 01:24:56,240
के लिए खड़ा हो जा। भक्ति बैठ के नहीं होगी। इससे

1194
01:24:56,240 --> 01:25:00,400
पूछो इस बेवकूफ से। वहां पर भगवान कह रहे हैं कि समस्त कर्मों को मुझ

1195
01:25:00,400 --> 01:25:04,480
में अर्पित करके तू युद्ध करने के लिए खड़ा हो जा। कर्मों को इस भाव के कुल

1196
01:25:04,480 --> 01:25:08,560
मिलाकर के पूरा सारांश क्या है कि कर्मों को तू इस

1197
01:25:08,560 --> 01:25:12,800
भाव के साथ कर कि तू केवल शास्त्र भेद कर्म कर रहा है। ईश्वर के द्वारा कहे गए वचनों

1198
01:25:12,800 --> 01:25:16,800
का पालन कर रहा है। बस तू अपने फल की आसक्ति को ध्यान में रख के कर्म मत कर तू नहीं

1199
01:25:16,800 --> 01:25:20,800
बंधेगा। और ये युद्ध भी मत कर। ऐसा सोच करके तू अपने केवल शास्त्र

1200
01:25:20,800 --> 01:25:24,800
वेद कर्मों के कहे गए वचनों के अनुसार तू

1201
01:25:24,800 --> 01:25:29,120
अपना कर्म कर। ये पूरा चैप्टर समझाया है। तो ये

1202
01:25:29,120 --> 01:25:33,360
वहां पर युद्ध युद्ध के लिए खड़ा हो जा। इसको यह कह रहे हैं आगे

1203
01:25:33,360 --> 01:25:37,920
कि विचार करिए कि चार के श्लोक 42 में

1204
01:25:37,920 --> 01:25:42,000
मेरे अलावा सभी अनुवादों ने गलत अर्थ किया है और यह कहा है कि

1205
01:25:42,000 --> 01:25:46,000
युद्ध के लिए खड़ा हो जाओ जबकि युद्ध के लिए वहां कह रहा है युद्ध के लिए

1206
01:25:46,000 --> 01:25:50,000
खड़ा होने को नहीं कह रहे हैं और इसमें इसने तर्क दिया है कि पूरे अध्याय में

1207
01:25:50,000 --> 01:25:54,560
परमात्मा के तत्व ज्ञान तथा अज्ञान का विश्लेषण है तो फिर वो

1208
01:25:54,560 --> 01:25:58,960
युद्ध के लिए खड़ा होने की बात क्यों कहेंगे? परमात्मा की भक्ति के लिए खड़ा होने की बात कहेंगे।

1209
01:25:58,960 --> 01:26:03,280
अरे भैया पहले परमात्मा की भक्ति के लिए खड़ा होना आवश्यक है क्या?

1210
01:26:03,280 --> 01:26:07,280
ऐसे ही पकड़ते हो ना तुम बातों को। खड़ा हो

1211
01:26:07,280 --> 01:26:11,440
खड़ा होना आवश्यक है क्या? परमात्मा की भक्ति के लिए खड़ा हो जा। युद्ध

1212
01:26:11,440 --> 01:26:17,440
के लिए तो खड़ा होना समझ में आता है। बैठ के तो लड़ेंगे नहीं। हां।

1213
01:26:18,480 --> 01:26:22,560
तो जब खड़ा होने की बात आ रही है तो वो

1214
01:26:22,560 --> 01:26:26,560
युद्ध से ही रिलेट करेगी ना। यह है गप

1215
01:26:26,560 --> 01:26:30,800
वाले गपोड़ जेल वाले बाबा का गाना तो

1216
01:26:30,800 --> 01:26:34,960
यह इनकी अल्पज्ञता का प्रमाण है कि खड़े होने को भी इन्होंने भक्ति

1217
01:26:34,960 --> 01:26:39,040
से जोड़ा युद्ध हटा के कि भक्ति के

1218
01:26:39,040 --> 01:26:43,440
लिए खड़ा हो जा और फिर कह रहे हैं मतलब भक्ति के लिए कमर कस ले यानी

1219
01:26:43,440 --> 01:26:47,520
अगर इनकी बात मानी जाए तो वास्तविकता में कमर नहीं कसनी है या

1220
01:26:47,520 --> 01:26:51,600
फिर इनसे पूछो कि इनके जितने ये जो टहल

1221
01:26:51,600 --> 01:26:55,680
रहे हैं ना मार्केट में वो सब क्या कमर को कस के टहलते हैं

1222
01:26:55,680 --> 01:26:59,680
क्या? पूछो तुम्हारी कमर कसी है क्या तुमने? तो तुम्हें मानना

1223
01:26:59,680 --> 01:27:03,760
पड़ेगा कि ज्ञानार्थक दृष्टि से कमर कसने की बात कह रहे हैं। अगर रामपाल की बात को

1224
01:27:03,760 --> 01:27:07,840
यहां माना भी जाए तो ज्ञानार्थक दृष्टि से तुम कमर कस सकते हो। मगर

1225
01:27:07,840 --> 01:27:13,840
ज्ञानार्थक दृष्टि से अर्जुन भगवान की शरण में नहीं जा सकता।

1226
01:27:15,200 --> 01:27:21,200
धर्त

1227
01:27:22,160 --> 01:27:26,400
तो यहां पर ये 42वा श्लोक 42वा श्लोक के साथ ये चैप्टर चौथा पूर्ण

1228
01:27:26,400 --> 01:27:30,400
हुआ और आपने देखा कि और ये तर्क क्या दे

1229
01:27:30,400 --> 01:27:34,720
रहा है? इस तर्क को बताना भूल गया। तर्क दे रहा है कि पूरे अध्याय में परमात्मा की बात हो रही। भाई पूरे

1230
01:27:34,720 --> 01:27:38,880
पूरी भगवत गीता में भगवत गीता शुरू ही इसलिए हो रही है कि अर्जुन जो है

1231
01:27:38,880 --> 01:27:43,040
युद्ध नहीं करना चाहता था। उसको धर्म और अधर्म में निर्णय

1232
01:27:43,040 --> 01:27:47,280
लेना कठिन हो गया था। इसलिए भगवान बार-बार बहुत सारा विश्लेषण दे

1233
01:27:47,280 --> 01:27:51,520
के उसको बता रहे हैं कि यह धर्म युक्त युद्ध है। शास्त्र अनुसार

1234
01:27:51,520 --> 01:27:55,600
युद्ध है। अनासक्त होते हुए कर्म फल से अपने दृष्टि को हटाते हुए

1235
01:27:55,600 --> 01:27:59,600
मुझ परमात्मा में लगाते हुए तू युद्ध के लिए खड़ा हो जा। तो तुम्हारा

1236
01:27:59,600 --> 01:28:03,600
यह तर्क भी एक गधा बुद्धि तर्क है। जब तुम कह

1237
01:28:03,600 --> 01:28:07,840
रहे हो कि पूरा चैप्टर जो है परमात्मा के लिए है। यह पूरा

1238
01:28:07,840 --> 01:28:12,320
चैप्टर ये बताने के लिए कि तुमको क्या करना है और क्या नहीं करना है

1239
01:28:12,320 --> 01:28:17,920
और किस आधार पर निर्णय लेना है। अपने मन में कौन से भाव को रखना है

1240
01:28:17,920 --> 01:28:22,480
और ये पूरा जो चैप्टर है वो युद्ध की युद्ध की पृष्ठभूमि

1241
01:28:22,480 --> 01:28:26,960
पर है। कि तुमको यह युद्ध क्यों करना चाहिए?

1242
01:28:26,960 --> 01:28:30,320
यह धर्म युक्ति युद्ध है। धर्म को धर्म की रक्षा के लिए

1243
01:28:30,320 --> 01:28:34,400
युद्ध है। ऐसा युद्ध क्षत्रियों को सौभाग्य से प्राप्त होता

1244
01:28:34,400 --> 01:28:37,200
है।

1245
01:28:37,200 --> 01:28:43,200
गधे

1246
01:28:50,160 --> 01:28:55,120
कौन है यहां पर?

1247
01:28:55,120 --> 01:29:00,480
अमित जी। लिंक एक बार और दे दीजिए। थोड़ी बहुत बात करेंगे।

1248
01:29:00,480 --> 01:29:06,480
लंबी चर्चा हम लोग किसी और समय कर लेंगे।

1249
01:29:06,880 --> 01:29:12,880
ले लीजिए इनको अमित जी को।

1250
01:29:20,160 --> 01:29:24,880
आज का चैप्टर बहुत अच्छा था। रोचक था। जय श्री राम भैया जी।

1251
01:29:24,880 --> 01:29:28,880
जय श्री राम। जय श्री राम आप आप आ चुके हैं क्या

1252
01:29:28,880 --> 01:29:33,280
स्क्रीन पर

1253
01:29:33,280 --> 01:29:36,320
हां बिल्कुल

1254
01:29:36,320 --> 01:29:40,480
जी बताइए जय श्री राम जय श्री राम जी नहीं

1255
01:29:40,480 --> 01:29:44,560
एक धर्म गुरु नाम से एक सज्जन थे वो चैट में काफी भगवत गीता

1256
01:29:44,560 --> 01:29:49,040
के बारे में बकवास करे जा रहे थे तो मैंने कहा कि अभी ऐड हो जाना तुम

1257
01:29:49,040 --> 01:29:53,120
वीडियो के बाद तुम्हें सारे आपके उत्तर मिल जाएंगे अभी बोल रहे हैं कि

1258
01:29:53,120 --> 01:29:57,200
मैं बैकस्टेज में हूं मुझे लेते नहीं है क्योंकि क्योंकि सब डरते हैं मुझसे तो धर्म गुरु नाम

1259
01:29:57,200 --> 01:30:01,280
का अगर कोई है तो उसको भी तुम हो कौन भाई जो तुमसे डरेंगे पहले तुम्हें जानने

1260
01:30:01,280 --> 01:30:05,280
वाले तो होने चाहिए कि तुम

1261
01:30:05,280 --> 01:30:09,360
भी वही ऐसा आदमी है कि ना अपना धर्म बता रहा है धर्म बताने में

1262
01:30:09,360 --> 01:30:14,000
इसको अपनी शर्म आ रही है मैंने कहा तुम्हें अपने पिता का नाम नहीं पता

1263
01:30:14,000 --> 01:30:18,000
तो तुम क्या भगवत गीता के बारे में बात करोगे पहले अपना तो

1264
01:30:18,000 --> 01:30:21,920
परिचय दो हम्म नहीं वो गलत भाषा बोलने

1265
01:30:21,920 --> 01:30:25,920
वाले को नहीं लिया जाएगा और मैं कुछ चीजों पर दृष्टि डाल दूं कि इन

1266
01:30:25,920 --> 01:30:30,400
दिनों ऐसी कुछ चर्चाएं सामने आ रही है। आने वाले टाइम में हम लोग वीडियो के माध्यम से बताएंगे।

1267
01:30:30,400 --> 01:30:34,720
हमको नोटिस दिए जा रहे हैं। ये जो हमने कल जो वीडियो

1268
01:30:34,720 --> 01:30:39,200
डाला है ना ऑडियो हां जिसमें व्यक्ति हम पर अरेस्ट

1269
01:30:39,200 --> 01:30:43,840
कर रहा है और बार-बार परेशान कर रहा है। जी बिल्कुल। है ना?

1270
01:30:43,840 --> 01:30:47,840
हमने उसका जो ऑडियो डाला उसके संबंध में हमको एक नोटिस आया है। उस

1271
01:30:47,840 --> 01:30:52,640
संबंध में हम एक वीडियो बना देंगे आगे। ठीक है। और

1272
01:30:52,640 --> 01:30:56,640
ये कुछ बातें फैलाई जा रही है कि हम जो है विदेशों से पैसा मांगते

1273
01:30:56,640 --> 01:31:00,960
हैं। ये है वो है। भाई सबसे पहली बात है कि विदेश

1274
01:31:00,960 --> 01:31:04,960
विदेश से आपका यदि संपर्क है तो इसका अर्थ ये नहीं हो गया कि आप जो है वहां

1275
01:31:04,960 --> 01:31:09,120
से विदेश से जो है पैसा मंगाने वाले हो गए। दूसरी बात

1276
01:31:09,120 --> 01:31:13,840
है तो हां जी। दूसरी बात यह है कि भाई

1277
01:31:13,840 --> 01:31:17,920
विदेश से गलत रूप से गलत तरीके से पैसा मंगाना गलत

1278
01:31:17,920 --> 01:31:21,920
है। ठीक है। विदेशों में आश्रम इनके भी

1279
01:31:21,920 --> 01:31:26,080
है। ये खुद ही बोलते हैं ना यहां हो गया, वहां हो गया। तो क्या

1280
01:31:26,080 --> 01:31:30,160
इनमें लेन देन नहीं होगा? विदेशों से होगा ना।

1281
01:31:30,160 --> 01:31:34,400
इनके यहां तो सब फर्जी होगा। हां नहीं फर्जी होगा। मगर लेनदेन

1282
01:31:34,400 --> 01:31:37,120
तो हो ही जाएगा ना। अगर हमारा कोई

1283
01:31:37,120 --> 01:31:41,280
जानने वाला या हमारा कोई फॉलो करने वाला कहीं विदेश

1284
01:31:41,280 --> 01:31:45,440
में शिफ्टेड है जैसे इस समय पहाड़ी जी की बात ही ले ले तो पहाड़ी जी इस समय

1285
01:31:45,440 --> 01:31:49,760
वहां है शायद मलेशिया में तो अब उनसे अगर हमारा आदान

1286
01:31:49,760 --> 01:31:53,840
प्रदान होगा तो क्या इसको ऑफेंस के रूप में लेंगे और फिर दूसरी बात ये भी

1287
01:31:53,840 --> 01:31:58,400
तो देखो कितना आता है क्या आता है कोई बिल्कुल

1288
01:31:58,400 --> 01:32:02,560
देशों से कोई ₹31 भी भेज देता है कहीं-क कभी-कभी ₹51

1289
01:32:02,560 --> 01:32:06,720
भी भेज देता है इसकी इसका उड़ा इसका

1290
01:32:06,720 --> 01:32:10,880
चौआ उड़ाने का जो है इसको आधार बनाने का आहान के अभियान

1291
01:32:10,880 --> 01:32:14,880
को दबाने का इसको आधार बनाया जा रहा है और खुद फर्जी संस्था

1292
01:32:14,880 --> 01:32:18,960
खोल करके विदेशों में यहां ये झंडे गाड़ दिए वो झंडे गाड़ दिए वो वो तब नहीं

1293
01:32:18,960 --> 01:32:22,960
ध्यान है ठीक है इससे कुछ होने वाला नहीं है अगर कोई भेज रहा है तो

1294
01:32:22,960 --> 01:32:27,040
सब सनातनी भेज रहे हैं। कोई रामपाली थोड़ी ना आके भेज रहे हैं इनको। एक

1295
01:32:27,040 --> 01:32:31,040
बात और है अभी एक ब्राह्मण वाला वो हुआ है। उसकी बात भी बोलनी

1296
01:32:31,040 --> 01:32:35,040
थी कि ये वो ब्राह्मणों ने ऐसा किया। देखो सबसे पहली बात जो है वो

1297
01:32:35,040 --> 01:32:39,360
जो इटावा वाला जो वो हुआ है इटावा

1298
01:32:39,360 --> 01:32:43,360
इटावा में एक घटना हुई है कि कहीं पे कोई यादव

1299
01:32:43,360 --> 01:32:47,520
जो है ऐसा दिखाया जा रहा है। हालांकि वो प्रायोजित घटना दिखाई दे रही है।

1300
01:32:47,520 --> 01:32:51,600
मैं बता देता हूं क्या है कि इटावा में कोई यादव जो है यादव

1301
01:32:51,600 --> 01:32:52,880
जी जो है

1302
01:32:52,880 --> 01:32:56,880
प्रवचन दे रहे थे या भागवत कह रहे थे तो उनको आकर के ब्राह्मणों के एक समूह

1303
01:32:56,880 --> 01:33:00,880
ने तिरस्कृत किया और नीचे उतार के मतलब उनको

1304
01:33:00,880 --> 01:33:05,200
जो अपमानित किया उनके जो है उनको सर के बाल जो है मुंडवा

1305
01:33:05,200 --> 01:33:09,520
दिए गए। सर मुंडा दिया गया उनका चोटी सब

1306
01:33:09,520 --> 01:33:13,680
और भी अपमानजनक बातें हुई हैं। ऐसा प्रायोजित किया

1307
01:33:13,680 --> 01:33:17,760
जा रहा है। परंतु वास्तविकता क्या दिख रही है

1308
01:33:17,760 --> 01:33:21,920
कि क्या आज के वातावरण में यह घटना आपको

1309
01:33:21,920 --> 01:33:26,080
प्रासंगिक दिख रही है। यह एक नाटकीय प्रस्तुति

1310
01:33:26,080 --> 01:33:30,320
है। राजनीतिज्ञों के द्वारा यादव और ब्राह्मण

1311
01:33:30,320 --> 01:33:34,480
यादव और ब्राह्मण में लड़ाई कराने के लिए हिंदू हिंदू में लड़ाई कराने के लिए और यादव

1312
01:33:34,480 --> 01:33:38,640
ब्राह्मण के नाम पर वोट कमाने के लिए ठीक है

1313
01:33:38,640 --> 01:33:42,800
ये ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भाई यह सारी

1314
01:33:42,800 --> 01:33:47,040
चीजें जो है यह पूर्व में ही सुनिश्चित थी क्या होना है क्या नहीं होना है और

1315
01:33:47,040 --> 01:33:51,200
उसको आधार बना करके और यह जो है कार्य किया गया है

1316
01:33:51,200 --> 01:33:55,680
तो इसलिए जो वास्तविकता में धर्म के पक्षधर है सत्य के पक्षधर

1317
01:33:55,680 --> 01:33:59,680
हैं वो इस यह जो विवाद खड़ा किया जा रहा है

1318
01:33:59,680 --> 01:34:04,160
जबरदस्ती का उसके आधार पर उस पर टीका टिप्पणी

1319
01:34:04,160 --> 01:34:07,920
तर्क वितर्क करने से स्वयं को बचाएं। हां ठीक है

1320
01:34:07,920 --> 01:34:13,920
जो व्यवस्था आज लागू ही नहीं है आज जब

1321
01:34:13,920 --> 01:34:18,240
जो व्यवस्था आज लागू ही नहीं है उस व्यवस्था को गरियाने

1322
01:34:18,240 --> 01:34:22,400
के नाम पे बुरा भला कहने के नाम पर वोट कमाने की राजनीति दिखाई दे रही

1323
01:34:22,400 --> 01:34:26,640
है जैसे कि आर्य समाज क्या करता है या इस

1324
01:34:26,640 --> 01:34:30,960
क्या करता है कि देखो तुम्हारे जैसे जातिवादियों के चक्कर

1325
01:34:30,960 --> 01:34:35,360
में आज धर्म परिवर्तन हो रहा है। अरे भैया जातिवाद आज लागू जो जातिवाद

1326
01:34:35,360 --> 01:34:39,600
शास्त्र सम्मत जातिवाद जातिवाद घृणा मूलक नहीं व्यवस्था

1327
01:34:39,600 --> 01:34:43,920
मूलक जो वर्ण व्यवस्था है वो आज लागू कहां है

1328
01:34:43,920 --> 01:34:48,160
आज लागू ही नहीं है कोई व्यक्ति बाहर अपने घर से बाहर भोजन प्राप्त

1329
01:34:48,160 --> 01:34:52,400
भोजन करते समय ये नहीं देखता है इस भोजन को किसने बनाया तो आपका ये कहना

1330
01:34:52,400 --> 01:34:56,720
गलत है कि उस व्यवस्था के कारण धर्म परिवर्तन हो रहा है

1331
01:34:56,720 --> 01:35:02,400
और वो एक समाज को चलाने की व्यवस्था थी और आज तक की व्यवस्था

1332
01:35:02,400 --> 01:35:06,880
पिछले 1400 सालों में जो व्यवस्था लागू हुई है वर्ण व्यवस्था के विरोध में

1333
01:35:06,880 --> 01:35:10,960
आज वो लागू है और यदि जो वातावरण है उसके अनुसार

1334
01:35:10,960 --> 01:35:15,120
आप ये मानते हो कि धर्म परिवर्तन हो रहा है तो आपकी व्यवस्था वर्णाश्रम

1335
01:35:15,120 --> 01:35:19,120
के विरोध में जो व्यवस्था खड़ी की गई है उसके कारण धर्म परिवर्तन हो रहा है।

1336
01:35:19,120 --> 01:35:23,120
मैं अभी हो सका समय मिला तो वीडियो बनाऊंगा। बहुत सारे मंदिर ऐसे बहुत

1337
01:35:23,120 --> 01:35:27,200
सारे जिसमें पुजारी अ्राह्मण है। कौन

1338
01:35:27,200 --> 01:35:31,520
जाकर के उनको हस्तक्षेप कर रहा है कि तुम हटो तो फिर ये नाटकीय रूपांतरण

1339
01:35:31,520 --> 01:35:35,680
प्रस्तुत करने की आवश्यकता क्यों है कि देखो देखो वो ब्राह्मणों

1340
01:35:35,680 --> 01:35:40,000
ने यादव को हटा दिया। यह सारी प्रस्तुति है। राजनीतिक प्रस्तुति

1341
01:35:40,000 --> 01:35:44,000
है। इसलिए जो पक्षधर है धर्म के वो इस पर टीका टिप्पणी

1342
01:35:44,000 --> 01:35:48,320
करने से दूर रहे। इसमें अपना समय इसमें

1343
01:35:48,320 --> 01:35:52,400
अपना समय देने से दूर रहे। उसका

1344
01:35:52,400 --> 01:35:57,920
चैट मैंने पढ़ लिया है उस व्यक्ति का। ठीक है। और

1345
01:35:57,920 --> 01:36:02,480
चलिए आज के लिए इतना कार्य काफी है। इतना हमने बताया। अमित जी आप आए अच्छा लगा।

1346
01:36:02,480 --> 01:36:06,960
और जिसकी मां ने निष्ठा पूर्वक

1347
01:36:06,960 --> 01:36:11,440
दूध पिलाया हो वह आकर के रामपाल की बकवास

1348
01:36:11,440 --> 01:36:15,440
को शास्त्र सम्मत तत्व ज्ञान सिद्ध

1349
01:36:15,440 --> 01:36:19,600
करें उसके लिए आमंत्र उसके लिए स्वागत है। यदि

1350
01:36:19,600 --> 01:36:24,880
कोई है हमसे संपर्क करें 7408301869

1351
01:36:24,880 --> 01:36:27,280
ठीक है

1352
01:36:27,280 --> 01:36:32,160
और बुलेट पॉइंट्स इस एपिसोड के आपको मिल जाएंगे

1353
01:36:32,160 --> 01:36:35,520
अमित जी आप बोले

1354
01:36:35,520 --> 01:36:39,520
नहीं बिल्कुल ठीक बात है शिवास जी और आप अगर हमारे राम मंदिर में

1355
01:36:39,520 --> 01:36:44,480
भी देख लीजिए वहां पे सभी जातियों के पंडित हैं उनको अपनी योग्यता के अनुसार

1356
01:36:44,480 --> 01:36:50,320
अपॉइंट किया गया है जो नया राम मंदिर बना है वहां भी

1357
01:36:50,320 --> 01:36:52,640
जी

1358
01:36:52,640 --> 01:36:56,720
देखिए सार ये है कि जो व्यवस्था लागू ही नहीं है जिस व्यवस्था

1359
01:36:56,720 --> 01:37:00,880
को लागू करवाने के लिए हम लोग दिन रात परिश्रम कर रहे हैं उस व्यवस्था

1360
01:37:00,880 --> 01:37:05,120
को आधार बना करके आप जो है समाज का नुकसान दिखा रहे हो। अगर

1361
01:37:05,120 --> 01:37:07,840
वास्तव में

1362
01:37:07,840 --> 01:37:12,000
जो क्रियान्वित व्यवस्था है उसके आधार पर अगर आप मान रहे हो कि विप्लव

1363
01:37:12,000 --> 01:37:16,000
है तो आपको अपनी व्यवस्था को दोष देना चाहिए जो आपने वर्णाश्रम के विरोध में

1364
01:37:16,000 --> 01:37:22,000
खड़ी की है। वर्णाश्रम को दोष नहीं दे सकते। वर्णाश्रम लागू कहां पर है?

1365
01:37:23,680 --> 01:37:29,680
बिल्कुल जी भैया जी।

1366
01:37:31,120 --> 01:37:35,440
चलिए ठीक है अमित जी आप आए अच्छा लगा

1367
01:37:35,440 --> 01:37:38,160
और

1368
01:37:38,160 --> 01:37:42,320
तो आने वाले समय में हमारी

1369
01:37:42,320 --> 01:37:46,800
जो धरातल पर कारवाही हो रही है चल रही है उसको लेकर के एक समीक्षा

1370
01:37:46,800 --> 01:37:50,960
और जो हमें नोटिस प्राप्त हो रहे हैं उनका उत्तर देने

1371
01:37:50,960 --> 01:37:55,040
का प्रयास करेंगे क्योंकि हमारे पास इतना समय नहीं है कि ऐसे जो कोई भी

1372
01:37:55,040 --> 01:37:59,040
व्यक्ति कुछ भी बकवास करता रहे हम बार-बार उसको जो है श्रम करके

1373
01:37:59,040 --> 01:38:03,280
और उसको उसकी अपेक्षा अनुसार उत्तर देते

1374
01:38:03,280 --> 01:38:07,360
रहे। तुम करो तुम बस ये याद रखना कि

1375
01:38:07,360 --> 01:38:13,360
तुम प्रारंभ करोगे और हम उसका अंत

1376
01:38:13,520 --> 01:38:19,520
तुम बस यह याद रखना कि

1377
01:38:24,400 --> 01:38:28,400
यह क्या बोल रहा है? अरे मूर्ख छह लोगों की मौत

1378
01:38:28,400 --> 01:38:34,400
हरियाणा सरकार के द्वारा हुआ है।

1379
01:38:37,280 --> 01:38:41,280
तुम बस ये याद रखना कि तुम यह जो सोच

1380
01:38:41,280 --> 01:38:45,520
रहे हो कि हम इस तरह से दबा देंगे, यह कर देंगे, वह कर देंगे।

1381
01:38:45,520 --> 01:38:50,720
तो यह व्यक्ति जिससे तुम्हारा इस बार सामना है, यह

1382
01:38:50,720 --> 01:38:55,520
अ जो शिष्य है अल्पज्ञ

1383
01:38:55,520 --> 01:38:59,600
शिष्य श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर

1384
01:38:59,600 --> 01:39:03,760
जी का जिसके साथ तुम इस समय सामना कर रहे हो तो

1385
01:39:03,760 --> 01:39:08,080
यह अपने अंतिम सांस तक तुमसे

1386
01:39:08,080 --> 01:39:12,640
पीछे तुम्हारे पीछे पड़ा रहेगा और तुम्हारे

1387
01:39:12,640 --> 01:39:16,640
लिए जो है कार्य करता रहेगा तुम्हारा

1388
01:39:16,640 --> 01:39:20,640
प्रतिकार करता रहेगा तो तुम यह समझना भूल जाओ कि

1389
01:39:20,640 --> 01:39:24,960
तुम इस तरह के नोटिस भेज के 15 लाख का यह नोटिस ढाई लाख का यह नोटिस भेज

1390
01:39:24,960 --> 01:39:28,960
के मेरी आवाज को दबाओगे या करोड़ों रुपए का लालच देकर के

1391
01:39:28,960 --> 01:39:32,960
मुझे खरीद लोगे। यह सारी चीजें तुम भूल

1392
01:39:32,960 --> 01:39:37,280
जाओ कि ऐसा तुम्हें कुछ मिलने वाला है। ठीक है?

1393
01:39:37,280 --> 01:39:40,000
और फिर कह रहा हूं व्यक्तिगत राय

1394
01:39:40,000 --> 01:39:46,000
कि मत पड़ो चक्कर में। कोई नहीं है टक्कर में।

1395
01:39:51,280 --> 01:39:57,280
सभी को जय श्री राम।

1396
01:39:59,660 --> 01:40:03,660
[संगीत]
