1
00:00:01,120 --> 00:00:05,720
तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक

2
00:00:05,720 --> 00:00:08,440
होंगे

3
00:00:08,440 --> 00:00:12,480
और इस श्रंखला का आनंद ले रहे होंगे।

4
00:00:12,480 --> 00:00:16,720
वैसे मेरा व्यक्तिगत मत था कि इस श्रंखला को नाम दिया जाए रामपाल

5
00:00:16,720 --> 00:00:21,480
कॉमेडी सीरीज। जिसमें कि रामपाल ने क्या-क्या कॉमेडीज की

6
00:00:21,480 --> 00:00:25,680
है तत्वदर्शी होने के नाम पर वह

7
00:00:25,680 --> 00:00:30,880
सब आपको पता चलता रहे। खैर

8
00:00:30,880 --> 00:00:34,960
तो हमने कल जाना कि 40

9
00:00:34,960 --> 00:00:39,760
10 यजुर्वेद के आधार पर यह धीरा

10
00:00:39,760 --> 00:00:44,760
नाम पुरुषों को तत्वदर्शी कहता है जेलधाम निवासी

11
00:00:44,760 --> 00:00:49,040
और 40 13 में उन्हीं तत्वदर्शियों का खंडन

12
00:00:49,040 --> 00:00:53,480
भी स्वयं करता है। इसके साथ ही साथ कल हमने

13
00:00:53,480 --> 00:00:57,840
जाना कि गीता बोलने वाले

14
00:00:57,840 --> 00:01:02,000
को यह अच्छा सिद्ध कर रहा है यह कहते हुए कि भगवान

15
00:01:02,000 --> 00:01:06,000
श्री कृष्ण ने अगर गीता बोली होती तो जब वह यह श्लोक बोल रहे

16
00:01:06,000 --> 00:01:10,160
हैं कि मैं अच्छे कर्म करता रहता हूं। जबकि भगवान श्री कृष्ण

17
00:01:10,160 --> 00:01:14,720
के तो बड़े हीन आचरण इसने बताने का सिद्ध करने का प्रयास किया

18
00:01:14,720 --> 00:01:16,800
तो वहां पर इसने कंपैरेटिवली

19
00:01:16,800 --> 00:01:20,960
ये बताने का प्रयास किया कि भाई अगर श्री कृष्ण यह गीता बोल रहे होते

20
00:01:20,960 --> 00:01:24,960
तो या तो वह वैसे कर्म करने वाले ना होते और अगर उन्होंने वैसे

21
00:01:24,960 --> 00:01:28,960
कर्म किए हैं तो उनको यह नहीं बोलना चाहिए था कि मनुष्य मुझे

22
00:01:28,960 --> 00:01:33,760
अच्छे कर्म मैं अच्छे कर्म इसलिए करता हूं कि मुझे देखकर भी मनुष्य अच्छे कर्म करेंगे।

23
00:01:33,760 --> 00:01:37,840
तो वहां पर इसने सिद्ध किया ये कहना चाह रहा है कि गीता बोल इससे सिद्ध होता है

24
00:01:37,840 --> 00:01:41,920
क्योंकि भगवान श्री कृष्ण अच्छे कर्म करने वाले नहीं है और इस श्लोक में वो

25
00:01:41,920 --> 00:01:46,160
स्वयं को अच्छे कर्म करने वाला ऐसे कर्म करने वाला कह रहा है गीता

26
00:01:46,160 --> 00:01:51,160
बोलने वाला जिसको फॉलो किया जाए लोगों के

27
00:01:51,160 --> 00:01:55,840
द्वारा तो इससे पता लगता है कि गीता बोलने वाला

28
00:01:55,840 --> 00:02:00,640
कोई और है कृष्ण नहीं है जबकि काल

29
00:02:00,640 --> 00:02:04,800
अगर रामपाल की व्याख्या के अनुसार देखा जाए तो काल जो है भगवान

30
00:02:04,800 --> 00:02:09,200
श्री कृष्ण से भी ज्यादा गलत कर्म करने वाला है।

31
00:02:09,200 --> 00:02:13,360
तो अगर रामपाल की थ्योरी को माना जाए कि गीता

32
00:02:13,360 --> 00:02:18,560
बोलने वाले ने कहा है कि मैं अच्छे कर्म इसलिए करता हूं क्योंकि मुझे देखकर लोग फॉलो करेंगे।

33
00:02:18,560 --> 00:02:22,560
तो इसका मतलब इस बात के आधार

34
00:02:22,560 --> 00:02:26,640
पर क्योंकि गीता बोलने वाले ने यह बात कही है। इस बात के आधार पर जिस प्रकार से

35
00:02:26,640 --> 00:02:31,360
वह कृष्ण को गीता बोलने वाला नहीं मान रहा है। उसी प्रकार से वो

36
00:02:31,360 --> 00:02:31,860
उसको

37
00:02:31,840 --> 00:02:35,920
काल को भी गीता बोलने वाला नहीं मानना चाहिए। तो किसको मानना चाहिए?

38
00:02:35,920 --> 00:02:40,320
इसने स्वयं इसी अध्याय में प्रजापति

39
00:02:40,320 --> 00:02:44,640
का अर्थ पूर्ण परमेश्वर बताया है और शास्त्रों में प्रजापति ब्रह्मा

40
00:02:44,640 --> 00:02:48,880
जी को कहा गया है तो ब्रह्मा जी को मान लो भाई पूर्ण ब्रह्म

41
00:02:48,880 --> 00:02:52,880
तुम्हारे कबीर नहीं है ठीक है और इसके साथ

42
00:02:52,880 --> 00:02:57,040
ही साथ हमने कल ये भी पता किया कि जो गीता

43
00:02:57,040 --> 00:03:01,160
बोलने वाला है वो कह रहा है मुझे कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं है

44
00:03:01,160 --> 00:03:05,360
हम मुझे ना ही कोई ऐसी वस्तु है जिसको मुझे मुझे

45
00:03:05,360 --> 00:03:09,520
प्राप्त करना है ना ही मुझे किसी वस्तु के खो जाने का भय है। मतलब

46
00:03:09,520 --> 00:03:13,600
परम मुक्त है। मगर यदि गीता बोलने वाला काल

47
00:03:13,600 --> 00:03:17,680
है तो उसको तो हर रोज अपने आहार का इंतजाम करना है भाई। सवा लाख प्राणियों

48
00:03:17,680 --> 00:03:21,760
का जिसको वो खाएगा। तो ये सब चीजें हमें कल तक कल जो है हमने

49
00:03:21,760 --> 00:03:26,040
जो अध्ययन किया था उसमें पता

50
00:03:26,040 --> 00:03:30,560
चली। और हां एक और कॉमेडी वाली बात हमें कल पता चली थी।

51
00:03:30,560 --> 00:03:35,000
कि जो तत्वदर्शी के पास पढ़ने जाते हैं, वह कौन होते हैं?

52
00:03:35,000 --> 00:03:39,480
अविद्वान अर्थात भोलेभाले अशिक्षित

53
00:03:39,480 --> 00:03:43,840
लोग पृष्ठ संख्या 49 पर है। ये हालांकि इसके जो ये बुलेट

54
00:03:43,840 --> 00:03:48,080
पॉइंट्स हैं कल के और आज के ये हम अगले वाले जो

55
00:03:48,080 --> 00:03:52,160
एपिसोड आएगा इस श्रंखला का अगले सप्ताह उसमें हम बुलेट

56
00:03:52,160 --> 00:03:57,080
पॉइंट्स में दोबारा से कवर करेंगे। फिर भी मैंने एक बार रिवाइज करा दिया आप लोगों को

57
00:03:57,080 --> 00:04:01,120
कि रामपाल को तत्वदर्शी मानकर उससे उससे

58
00:04:01,120 --> 00:04:05,200
उसके अनुसार शास्त्र का अर्थ

59
00:04:05,200 --> 00:04:09,400
लेने वाले और उसके अनुसार पूजा भक्ति करने वाले कौन लोग होते हैं?

60
00:04:09,400 --> 00:04:13,600
भोलेभाले, अशिक्षित, अनपढ़, गवार। ये मैं नहीं कह

61
00:04:13,600 --> 00:04:19,600
रहा हूं। ये इसकी गीता में लिखा हुआ है। ठीक

62
00:04:21,880 --> 00:04:24,040
है?

63
00:04:24,040 --> 00:04:28,320
हम अब हम लोगों ने कल

64
00:04:28,320 --> 00:04:33,720
27 से 29 तक पढ़ लिया था।

65
00:04:33,720 --> 00:04:37,760
हम अब हम तीसरे अध्याय के 30व श्लोक को

66
00:04:37,760 --> 00:04:42,000
पढ़ रहे हैं। क्या कह रहा है यह? अर्जुन ज्ञान योग्य

67
00:04:42,000 --> 00:04:46,160
द्वारा मेरे पर आश्रित होकर सर्व धार्मिक कम कर्मों को मुझ में त्याग

68
00:04:46,160 --> 00:04:50,640
कर नि इच्छा ममता रहित युद्ध में होने वाले संभावित

69
00:04:50,640 --> 00:04:56,640
दुख को त्याग कर युद्ध कर।

70
00:04:59,400 --> 00:05:03,680
हम अब इसने कई बार कहा है कि धार्मिक यज्ञ में प्रतिष्ठित

71
00:05:03,680 --> 00:05:07,760
कौन होता है? पूर्ण परमात्मा। जबकि आगे क्या

72
00:05:07,760 --> 00:05:11,840
कह रहा है? गीता अध्याय तीन के श्लोक 31 32 का सार है

73
00:05:11,840 --> 00:05:12,340
कि

74
00:05:12,080 --> 00:05:16,320
जो ऊपर लिखे मेरे मत का अनुसरण करते हैं वह बुरे

75
00:05:16,320 --> 00:05:19,200
कर्मों से बच जाते हैं। जो ऐसा नहीं

76
00:05:19,200 --> 00:05:23,200
करते वह मूर्ख अज्ञानी हैं। तो सबसे पहली

77
00:05:23,200 --> 00:05:27,200
बात यह लोग कहते कहते रहते हैं कि कई जगह

78
00:05:27,200 --> 00:05:31,360
काल ने अपना मत दे दिया है। मगर यहां पे रामपाल

79
00:05:31,360 --> 00:05:35,920
ने भी काल के मत को मान लिया है। ये प्रश्न संख्या 50 है

80
00:05:35,920 --> 00:05:40,240
और इसमें सबसे लास्ट पैराग्राफ पे हूं मैं

81
00:05:40,240 --> 00:05:44,480
गीता अध्याय तीन के श्लोक 31 32 का स्टार तो इसमें

82
00:05:44,480 --> 00:05:48,640
इसने क्या कहा कि जो

83
00:05:48,640 --> 00:05:49,140
मेरे

84
00:05:49,040 --> 00:05:53,040
मत का अनुसरण करते हैं वह बुरे कर्मों से बच जाते हैं। जो

85
00:05:53,040 --> 00:05:55,440
ऐसा नहीं करते वह मूर्ख अज्ञानी है। अब देखिए

86
00:05:55,440 --> 00:05:59,600
पहली बात काल का मत क्या है? काल का मत

87
00:05:59,600 --> 00:06:03,600
है अपना उल्लू सीधा करना रामपाल के अनुसार

88
00:06:03,600 --> 00:06:07,760
काल का मत है। लोगों को बहकाना, बरगलाना, झूठ बोलना। यह

89
00:06:07,760 --> 00:06:11,920
सब भी तो काल का मत है। मगर अब

90
00:06:11,920 --> 00:06:16,400
काल काल की यहां पर इस बात को ये मान रहा है। रामपाल

91
00:06:16,400 --> 00:06:20,720
के काल अपने मत से जो बताता है वो भी मानना है। जबकि

92
00:06:20,720 --> 00:06:25,040
काल का मत तो क्या-क्या है? तो क्यों मान लिया इसने? हम

93
00:06:25,040 --> 00:06:29,040
मगर ये जो मेरा मत मेरा मत वाली बात जो चिल्लाया करते हैं तो यहां पे इन्होंने

94
00:06:29,040 --> 00:06:33,360
मान लिया काल का मत। इसका मतलब काल का मत भी माना जा सकता

95
00:06:33,360 --> 00:06:38,600
है।

96
00:06:38,600 --> 00:06:40,840
हम

97
00:06:40,840 --> 00:06:46,000
अच्छा इसमें गीता अध्याय तीन के श्लोक 30 में

98
00:06:46,000 --> 00:06:50,080
यहीं पर विचार करें इसे थोड़ा सा ऊपर वाला जो पैराग्राफ है हम ये

99
00:06:50,080 --> 00:06:54,320
वाला जहां अभी कर्सर आया था ना आपका हां ये

100
00:06:54,320 --> 00:06:58,880
तो इसमें क्या लिख रहा है कि

101
00:06:58,880 --> 00:07:03,120
ज्ञान योग द्वारा मेरे पर आश्रित होकर सर्व धार्मिक

102
00:07:03,120 --> 00:07:07,280
कर्मों को मुझ में त्याग कर तो सर्व धार्मिक कर्मों

103
00:07:07,280 --> 00:07:11,280
को किस में त्यागने की बात की जा रही है? सर्व धार्मिक

104
00:07:11,280 --> 00:07:15,760
कर्मों के द्वारा पूज्य कौन होता है? इसी ने पिछले

105
00:07:15,760 --> 00:07:20,280
उसमें कहा है ना कई जगह कि धार्मिक यज्ञों में प्रतिष्ठित कौन

106
00:07:20,280 --> 00:07:22,440
है?

107
00:07:22,440 --> 00:07:26,760
इसने ये देखिए पृष्ठ

108
00:07:26,760 --> 00:07:31,360
संख्या ये दिखाइए। पृष्ठ संख्या 40

109
00:07:31,360 --> 00:07:35,440
धार्मिक यज्ञ में प्रतिष्ठित पूज्य इष्ट देव है

110
00:07:35,440 --> 00:07:39,920
और धार्मिक कर्म भी धार्मिक यज्ञ है। है ना?

111
00:07:39,920 --> 00:07:44,720
तो धार्मिक यज्ञ में पूज्य कौन है? प्रतिष्ठित कौन है?

112
00:07:44,720 --> 00:07:49,000
ईष्ट कौन है? वो है पूर्ण परमेश्वर।

113
00:07:49,000 --> 00:07:53,200
हम यह देख लीजिए पष्ठ संख्या

114
00:07:53,200 --> 00:07:54,400
40 पर

115
00:07:54,400 --> 00:07:58,560
तीसरे अध्याय का दवा श्लोक का इसने अर्थ कर रखा है

116
00:07:58,560 --> 00:08:02,800
कि यह पूर्ण परमात्मा यज्ञ में प्रतिष्ठित ईष्ट ही इच्छित

117
00:08:02,800 --> 00:08:07,200
भोग प्रदान करने वाला हो पूर्ण परमात्मा धार्मिक यज्ञ में प्रतिष्ठित

118
00:08:07,200 --> 00:08:11,600
है और यहां पर यह क्या मान रहा है

119
00:08:11,600 --> 00:08:15,760
यहां पर ये मान रहा है कि धार्मिक कर्म यानी धार्मिक

120
00:08:15,760 --> 00:08:20,000
यज्ञ धर्म यज्ञ को मुझ में त्याग कर तो

121
00:08:20,000 --> 00:08:24,160
धर्म यज्ञ को किस में त्यागा जा सकता है जो उस धर्म यज्ञ में प्रतिष्ठित

122
00:08:24,160 --> 00:08:28,160
हो तो यहां पर प्रतिष्ठित कौन कौन है यज्ञ

123
00:08:28,160 --> 00:08:32,400
में गीता बोलने वाला जबकि इसके अनुसार यज्ञ

124
00:08:32,400 --> 00:08:36,760
धार्मिक यज्ञ में प्रतिष्ठित कौन

125
00:08:36,760 --> 00:08:40,760
है पूर्ण परमेश्वर हम पूर्ण

126
00:08:40,760 --> 00:08:44,800
परमात्मा तो अब इससे पूछो कि धार्मिक यज्ञ में जब

127
00:08:44,800 --> 00:08:48,800
पूर्ण परमात्मा प्रतिष्ठित है तो तो ये गीता बोलने वाले को कैसे

128
00:08:48,800 --> 00:08:53,720
त्याग? गीता बोलने वाले को कैसे मिल जाएगा धार्मिक कर्मों का त्याग?

129
00:08:53,720 --> 00:08:58,040
हम यह भी बात ध्यान रखने की है। आगे चलते

130
00:08:58,040 --> 00:09:01,560
हैं। पृष्ठ संख्या

131
00:09:01,560 --> 00:09:05,560
51 गीता अध्याय तीन के श्लोक 33

132
00:09:05,560 --> 00:09:10,520
34 में कहा है कि शिक्षित व्यक्ति जो तत्व ज्ञान हीन

133
00:09:10,520 --> 00:09:14,640
है वे मूढ़ स्वभाव वश आंखें देख आंखों से

134
00:09:14,640 --> 00:09:18,800
देखकर भी सत्य को स्वीकार नहीं करते। तथा उन

135
00:09:18,800 --> 00:09:22,960
चातुर व्यक्तियों के अनुयाई भी यहां पर इसने जो

136
00:09:22,960 --> 00:09:27,360
एक शब्द आया था ना लोक संग्रह। लोक संग्रह क्या होता है कि जो लोकाचार

137
00:09:27,360 --> 00:09:31,360
की जो मर्यादा है वह बनी रहे। इसको लोक संग्रह कहा गया है। तो

138
00:09:31,360 --> 00:09:36,320
इसने लोक संग्रह का मतलब यह है कि लोगों का संग्रह अपने अनुयाई बनाओ।

139
00:09:36,320 --> 00:09:41,120
ये तो इसकी हिंदी है। ये तो इसका संस्कृत का अर्थ है।

140
00:09:41,120 --> 00:09:45,520
लोगों को संग्रह करो। अपने अनुयाय बढ़ाओ। तो लोक संग्रह का अर्थ

141
00:09:45,520 --> 00:09:49,680
ये समझता है मूर्ख। तो क्या है? तथा उन

142
00:09:49,680 --> 00:09:51,760
चातुर व्यक्तियों के अनुयाई भी अपने

143
00:09:51,760 --> 00:09:55,760
स्वभावव सत्य को स्वीकार ना करके उन चालाक गुरुओं के साथ

144
00:09:55,760 --> 00:10:00,000
ही चिपके रहते हैं। वह भी मूढ़ है। समझाने से भी नहीं मानते। हट

145
00:10:00,000 --> 00:10:04,080
के भी उन्हें समझाना अति कठिन है। कबीर परमेश्वर से तत्व ज्ञान

146
00:10:04,080 --> 00:10:08,800
प्राप्त करके संत गरीब दास जी महाराज ने कहा है

147
00:10:08,800 --> 00:10:12,800
जो व्यक्ति तत्व ज्ञान को सुनकर सद ग्रंथों में आंखों से देखकर

148
00:10:12,800 --> 00:10:16,800
भी अभिमानवश यथार्थ भक्ति मार्ग स्वीकार नहीं करते

149
00:10:16,800 --> 00:10:20,880
वह चालाक प्राणी परमात्मा के चोर हैं। जो उनके

150
00:10:20,880 --> 00:10:24,880
अनुयाई हैं। वह भी सत्य को आंखों से देखकर भी उन चालाक

151
00:10:24,880 --> 00:10:28,960
गुरुओं को नहीं त्यागते। वह मूर्ख हैं।

152
00:10:28,960 --> 00:10:33,040
ऐसे व्यक्ति संतों के काम के नहीं है। परमात्मा उनको एक

153
00:10:33,040 --> 00:10:37,040
दूसरे से बांधे रखे। अर्थात वह शुभ शुभ कर्महीन

154
00:10:37,040 --> 00:10:41,120
है। उनके भाग्य में सत्य साधना नहीं है। तत्वदर्शी संतों

155
00:10:41,120 --> 00:10:45,480
को चाहिए कि उनके साथ अधिक ज्ञान चर्चा ना

156
00:10:45,480 --> 00:10:49,640
करें।

157
00:10:49,640 --> 00:10:54,960
तो अध्याय 30 का हम लोग अपना अर्थ भी पढ़ ले।

158
00:10:54,960 --> 00:10:58,840
अध्याय तीन श्लोक

159
00:10:58,840 --> 00:11:02,880
30 क्या कहा है वास्तविकता में क्योंकि ये तो

160
00:11:02,880 --> 00:11:08,880
अर्थ का अनर्थ करता है सब

161
00:11:17,000 --> 00:11:22,400
जगह मुझ अंतर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा

162
00:11:22,400 --> 00:11:26,560
यहां पे इन्होंने मुझ अंतर अंतर्यामी किया है। कहीं-कहीं पर वो अपनी अंतरात्मा

163
00:11:26,560 --> 00:11:30,640
में लगे हुए चित्त द्वारा संपूर्ण कर्मों को मई मुझ

164
00:11:30,640 --> 00:11:34,960
में अर्पण करके आशा रहित ममता रहित और संताप रहित होकर

165
00:11:34,960 --> 00:11:39,440
युद्ध कर और इसने क्या कर दिया इसका

166
00:11:39,440 --> 00:11:43,440
कि ज्ञान योग द्वारा मेरे पर आश्रित होकर सर्व

167
00:11:43,440 --> 00:11:47,520
धार्मिक कर्मों को मुझ में त्याग कर इच्छा ममता रहित युद्ध में

168
00:11:47,520 --> 00:11:52,160
होने वाले संभावित दुख को त्याग कर युद्ध कर

169
00:11:52,160 --> 00:11:56,160
ठीक है तो इससे यहां पर देखना होगा कि

170
00:11:56,160 --> 00:12:00,360
यह जो इसने अर्थ किया है इसके जो शब्द है वह उसमें है कि

171
00:12:00,360 --> 00:12:05,320
नहीं। जैसे

172
00:12:05,320 --> 00:12:10,520
कि अ इसने एक जगह कहा

173
00:12:10,520 --> 00:12:15,320
है ममता रहित निर्मम। ठीक है विगत

174
00:12:15,320 --> 00:12:20,560
जरा संताप रहित ठीक है भूतवा होकर

175
00:12:20,560 --> 00:12:26,280
सन्यस अर्पण करके निराश ही आशा

176
00:12:26,280 --> 00:12:30,560
रहित ज्ञान योग ज्ञान योग कहां

177
00:12:30,560 --> 00:12:35,200
लिखा है जो इसने अर्थ किया ज्ञान योग

178
00:12:35,200 --> 00:12:39,360
ज्ञान योग की संस्कृत कहा है कोई पूछो इससे

179
00:12:39,360 --> 00:12:43,360
बाबा से लिखा है कहीं ज्ञान ठीक

180
00:12:43,360 --> 00:12:47,600
है। आगे चलते हैं। जो कोई मनुष्य दोष

181
00:12:47,600 --> 00:12:51,760
दृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण

182
00:12:51,760 --> 00:12:56,200
करते हैं, वह भी संपूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं। ठीक

183
00:12:56,200 --> 00:13:00,400
है? परंतु जो मनुष्य मुझ में दोषारोपण करके करते हुए

184
00:13:00,400 --> 00:13:04,560
मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते, उन मूर्खों को तू संपूर्ण ज्ञानों

185
00:13:04,560 --> 00:13:09,040
में मोहित और नष्ट हुए ही समझ।

186
00:13:09,040 --> 00:13:13,040
आगे 33 में क्या कहा है? सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते

187
00:13:13,040 --> 00:13:17,520
हैं। अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं।

188
00:13:17,520 --> 00:13:20,400
ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा

189
00:13:20,400 --> 00:13:24,400
करता है। फिर इसमें किसी का हट क्या करेगा?

190
00:13:24,400 --> 00:13:28,640
मतलब यहां पर प्रकृति के अधीन बताया जा रहा है

191
00:13:28,640 --> 00:13:32,800
कि जो भी प्राणी कर्म करता है वह प्रकृति के अधीन है इसलिए

192
00:13:32,800 --> 00:13:37,200
करता है। तो ऐसे में

193
00:13:37,200 --> 00:13:41,360
इंद्रिय प्रत्येक इंद्रिय के विषय में राग और द्वेष छुपे हुए स्थित

194
00:13:41,360 --> 00:13:45,440
है। मनुष्य को उन दोषों के वश में नहीं होना चाहिए। क्योंकि वह

195
00:13:45,440 --> 00:13:49,600
दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु हैं। तो

196
00:13:49,600 --> 00:13:53,840
ऐसे में उसे राग द्वेष में समत्व बुद्धि रखनी चाहिए।

197
00:13:53,840 --> 00:13:57,840
और पीछे हम लोग देख आए हैं कि क्या सोचना चाहिए कि मैं

198
00:13:57,840 --> 00:14:02,080
नहीं कर रहा हूं। गुण ही गुण में बरत रहे हैं। इस प्रकार की भावना होनी

199
00:14:02,080 --> 00:14:06,280
चाहिए। कर्तापन अहंकार यही बंधन का कारण

200
00:14:06,280 --> 00:14:10,560
है। तो इसने यहां पे सत्यानाश कर दिया कुल मिलाकर

201
00:14:10,560 --> 00:14:14,560
के अर्थ का। अच्छा एक पॉइंट की

202
00:14:14,560 --> 00:14:18,800
बात है कि तत्वदर्शी को चाहिए कि उनके साथ अधिक चर्चा

203
00:14:18,800 --> 00:14:22,960
ना करें तो यह पता कैसे

204
00:14:22,960 --> 00:14:27,200
चलेगा कौन ये तय करने वाला है जो भी व्यक्ति स्वयं

205
00:14:27,200 --> 00:14:31,200
को तत्वदर्शी कहेगा वो व्यक्ति किसी भी कोई भी उससे आकर के

206
00:14:31,200 --> 00:14:35,440
जो आर्गुममेंट करेगा उसको कह देगा कि भैया ये तो

207
00:14:35,440 --> 00:14:39,600
वो वाला है जो ज्ञानी है जो शुभ कर्मों से हीन है इससे

208
00:14:39,600 --> 00:14:43,600
मैं चर्चा नहीं करूंगा तो ऐसे से तो काम चलेगा ही नहीं। भाई

209
00:14:43,600 --> 00:14:47,840
कोई भी मैं तत्वदर्शी हूं। मुझसे कोई भी ज्ञान चर्चा करने आएगा तो मैं कह दूंगा कबीर

210
00:14:47,840 --> 00:14:52,400
ने मना किया है। तत्वदर्शी को इनके साथ ज्यादा चर्चा नहीं करनी चाहिए।

211
00:14:52,400 --> 00:14:57,840
तो निर्णय कैसे होगा? कुल मिलाकर के

212
00:14:57,840 --> 00:15:01,960
अगर ऐसे व्यक्ति को ना समझाएं तो किसे समझाएं? इसने वहां पे कहा

213
00:15:01,960 --> 00:15:06,160
है। देखिए क्या कहा है। कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि मूर्ख

214
00:15:06,160 --> 00:15:10,240
को समझाने से अपने तत्व ज्ञान को ना गवाएं। अब कोई भी

215
00:15:10,240 --> 00:15:14,560
व्यक्ति जो है मैंने भर भर के बता दिया जिसको तत्व

216
00:15:14,560 --> 00:15:18,560
ज्ञान नहीं है वह मूर्ख ही है तो फिर समझाएं किसको

217
00:15:18,560 --> 00:15:22,560
अगर मूर्ख को ज्ञान नहीं देना है अज्ञानी को ज्ञान नहीं देना है तो किसको

218
00:15:22,560 --> 00:15:26,800
देना है हमारे पास इसका

219
00:15:26,800 --> 00:15:30,960
आंसर है अभी हम इनकी टोपी इनहीं के सर पर रख के चल रहे है

220
00:15:30,960 --> 00:15:35,120
हमारे पास ये आंसर है ठीक है तो अभी इनहीं की

221
00:15:35,120 --> 00:15:39,200
भाषा में इनहीं से बात कर रहे हैं इसलिए बोल रहे हैं कि भाई तुमने हमने कहा कि

222
00:15:39,200 --> 00:15:43,520
मूर्खों को मत समझाओ और जो भी व्यक्ति आज रामपाल के अनुसार

223
00:15:43,520 --> 00:15:48,080
नहीं चल रहा है वो मूर्ख है तो फिर समझाओगे किसे

224
00:15:48,080 --> 00:15:51,440
प्रचार किसको करोगे?

225
00:15:51,440 --> 00:15:55,600
फिर आगे चलते हैं। तीन श्लोक 33 34 में यह

226
00:15:55,600 --> 00:15:59,760
भी कहा है कि राग द्वेष स्वयं नहीं करना चाहिए। अब देखो यहां पे इसने

227
00:15:59,760 --> 00:16:03,760
फिर से वही कर दिया। वही

228
00:16:03,760 --> 00:16:07,760
लाभ हानि के बिना युद्ध नहीं हो सकता। यानी लाभ हानि

229
00:16:07,760 --> 00:16:12,200
के बिना क्या नहीं हो सकता?

230
00:16:12,200 --> 00:16:16,400
कर्म है ना आसक्ति रहित कर्म नहीं हो सकता।

231
00:16:16,400 --> 00:16:20,480
लाभ हानि राग द्वेष के बिना कर्म नहीं हो सकता। यहां पे पीछे

232
00:16:20,480 --> 00:16:24,480
इसने मना किया। बीच में इसने सपोर्ट किया। यहां पे फिर उस सपोर्ट का

233
00:16:24,480 --> 00:16:28,560
खंडन कर रहा है कि लाभ हानि के बिना और

234
00:16:28,560 --> 00:16:33,280
एक बात ध्यान रखने की यह भी है कि

235
00:16:33,280 --> 00:16:37,400
कुछ श्लोक कैंसिल होते जा रहे हैं। जैसे

236
00:16:37,400 --> 00:16:42,000
जब जहां पर उसने यह कह दिया काल ने इसके अनुसार

237
00:16:42,000 --> 00:16:46,160
कि मुझे कुछ भी पाना शेष नहीं है। जबकि उसको प्रतिदिन सवा

238
00:16:46,160 --> 00:16:50,720
लाख जीवात्माओं को खाना है। जो भी है खाना है उसको चाहिए।

239
00:16:50,720 --> 00:16:54,880
तो यानी कि यह श्लोक नहीं माना जाएगा कि गीता वाला

240
00:16:54,880 --> 00:16:59,040
गीता बोलने वाले ने यह बात सही कही है और मैं अच्छे कर्म नहीं करूंगा तो

241
00:16:59,040 --> 00:17:03,200
फिर दुनिया में जो है अव्यवस्था फैल जाएगी। यह श्लोक भी कैंसिल

242
00:17:03,200 --> 00:17:06,560
मानना पड़ेगा। अभी तक बहुत सारे श्लोक ऑलरेडी कैंसिल हो चुके

243
00:17:06,560 --> 00:17:10,560
हैं। और अब यह 33 34 वाले श्लोक का भी खंडन कर रहा है। देखिए

244
00:17:10,560 --> 00:17:14,800
क्या कह रहा है। क्या कह रहा है कि अध्याय

245
00:17:14,800 --> 00:17:19,040
तीन श्लोक 33 34 में यह भी कहा गया है कि राग द्वेष नहीं करना चाहिए। स्वयं

246
00:17:19,040 --> 00:17:23,040
भगवान अब आगे कह रहा है स्वयं भगवान कृष्ण जी पांडवों के

247
00:17:23,040 --> 00:17:27,040
राग में महाभारत के युद्ध के दौरान अश्वत्थामा के बारे में युधिष्ठिर से

248
00:17:27,040 --> 00:17:31,120
भी झूठ बुलवाई मतलब यहां पे बता रहा है ये लोग राग द्वेष को कंट्रोल नहीं

249
00:17:31,120 --> 00:17:35,120
कर पाए क्यों भाई व्यक्ति अनासक्त होते

250
00:17:35,120 --> 00:17:39,880
हुए युद्ध नीतियां नहीं अपना सकता क्या हम

251
00:17:39,880 --> 00:17:44,160
खैर मगर इसने यहां पर राग द्वेष

252
00:17:44,160 --> 00:17:48,320
में अंतर ना करने का खंडन किया है मतलब जो समत्व बुद्धि

253
00:17:48,320 --> 00:17:52,480
बार-बार बता रहे है ना मरने का भय हो ना जीने की लालसा हो ना

254
00:17:52,480 --> 00:17:56,800
लाभ ना हानि राग ना द्वेष है ना इससे अपनी

255
00:17:56,800 --> 00:18:00,960
बुद्धि में यह भाव लाने मैं जो भी कर्म कर रहा हूं शास्त्र के कारण कर रहा हूं ईश्वर

256
00:18:00,960 --> 00:18:05,360
की वाणी के कारण कर रहा हूं भगवान बार-बार आपको ये सिखा रहे हैं

257
00:18:05,360 --> 00:18:09,800
मगर यहां पर जब पिछले इसने भी कई जगह पर माना है कि

258
00:18:09,800 --> 00:18:14,000
मनुष्य आसक्ति रहित कर्मों को करेगा यदि तो मुक्त हो जाएगा

259
00:18:14,000 --> 00:18:20,000
जैसे इसने जनक वाले माना तीन दिखाइए

260
00:18:41,360 --> 00:18:47,360
तीन 10 का क्या था?

261
00:18:47,760 --> 00:18:53,760
जनक जी को मुक्ति मिली थी

262
00:18:56,440 --> 00:19:00,840
ना ये

263
00:19:00,840 --> 00:19:05,960
है 20वां

264
00:19:05,960 --> 00:19:11,960
हम ये 20वा

265
00:19:17,600 --> 00:19:23,600
हां प्रश्न संख्या 48

266
00:19:23,640 --> 00:19:28,000
देखिए इसने कई जगह माना है कि आसक्ति रहित

267
00:19:28,000 --> 00:19:32,240
कर्म से मुक्ति हो जाती है। हालांकि जहां पर जनक जी को मुक्ति प्राप्त

268
00:19:32,240 --> 00:19:36,320
होने की बात आई इसने वहां पर मुक्ति होने वाली बात को छुपा लिया कि जनक

269
00:19:36,320 --> 00:19:41,040
जी को मुक्ति हुई थी। भगवान भगवत गीता में कहा गया है इसलिए

270
00:19:41,040 --> 00:19:45,040
तो यह भी श्लोक कैंसिल मानना पड़ेगा जनक जी को मुक्ति

271
00:19:45,040 --> 00:19:49,360
हुई क्यों मानना पड़ेगा यह मानना पड़ेगा इसके अनुसार जो कहता है कहीं-क

272
00:19:49,360 --> 00:19:53,440
काल ने अपने मन से बोल दिया तो ये श्लोक भी खंडित है क्योंकि यहां स्पष्ट कहा गया कि जनक

273
00:19:53,440 --> 00:19:58,760
जी को मुक्ति प्राप्त हुई थी तो अब यहां पे बात आती है

274
00:19:58,760 --> 00:20:03,120
कि राजा जनक जी भी यज्ञ आदि करते थे परंतु इच्छा

275
00:20:03,120 --> 00:20:07,360
रूपी नहीं मनुष्य का कर्तव्य समझकर ठीक

276
00:20:07,360 --> 00:20:11,440
ठीक है? मनुष्य का कर्तव्य समझकर यदि हम कर्म

277
00:20:11,440 --> 00:20:15,600
को कर रहे हैं तो हम जो है मुक्ति को प्राप्त होंगे। ये यहां पर इसने

278
00:20:15,600 --> 00:20:19,920
माना है कि श्रद्धालु किसी मनोकामना की पूर्ति की इच्छा ना रखकर

279
00:20:19,920 --> 00:20:23,920
रखकर अपना धार्मिक कर्तव्य जानकर जब करता है कर्म

280
00:20:23,920 --> 00:20:28,080
ऐसा व्यक्ति अमरलोक में चला जाता है। मोक्ष को प्राप्त कर जाता है।

281
00:20:28,080 --> 00:20:32,080
ये इसने यहां माना। मगर

282
00:20:32,080 --> 00:20:36,320
यहां पे राग द्वेष ना रखने की बुराई कर रहा है। उसमें उदाहरण क्या दे रहा है? भगवान

283
00:20:36,320 --> 00:20:38,640
श्री कृष्ण वो राग द्वेष

284
00:20:38,640 --> 00:20:42,640
नहीं कर पाए। यहां पर इसने अपमान किया है। विष्णु जी ने शिव जी के राग में पार्वती का

285
00:20:42,640 --> 00:20:47,040
रूप बनाया। राग द्वेष में भगवान भी नहीं बचे क्योंकि पांडवों

286
00:20:47,040 --> 00:20:51,120
से राग तो कौरवों से द्वेष द्वेष बिना युद्ध नहीं हो

287
00:20:51,120 --> 00:20:57,120
युद्ध हो ही नहीं सकता। है

288
00:20:57,640 --> 00:21:01,760
ना? इससे सिद्ध है कि गीता जी में अध्यात्म

289
00:21:01,760 --> 00:21:05,840
ज्ञान तो काल भगवान ने सही दिया है। परंतु जीव

290
00:21:05,840 --> 00:21:09,920
में विकार देखिए कितना गलत है जो गीता बोलने वाला है ना जो कह रहा है

291
00:21:09,920 --> 00:21:14,160
मेरा अनुसरण करेंगे तो क्या गीता बोलने वाले का अनुसरण कर सकते हैं क्या देखिए

292
00:21:14,160 --> 00:21:18,400
क्या है गीता बोलने बोलने वाले ने क्या-क्या गलत किया है

293
00:21:18,400 --> 00:21:22,640
जीव में काम क्रोध मोह लोभ अहंकार राग द्वेष

294
00:21:22,640 --> 00:21:26,640
तथा ये सब भर दिए जिनसे परवश होकर भगवान

295
00:21:26,640 --> 00:21:30,960
के काल भी काल के भगवान काल के अवतार भी विवश हो गए

296
00:21:30,960 --> 00:21:35,400
जिसके कारण काल जाल से निकल नहीं सकते अब अब अब मामला यह

297
00:21:35,400 --> 00:21:39,600
आएगा कि भगवान काल के अवतार कौन है? यह कहता है ना काल

298
00:21:39,600 --> 00:21:43,600
अलग है और भगवान श्री कृष्ण

299
00:21:43,600 --> 00:21:47,600
ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश अलग-अलग है। ये पेज पृष्ठ

300
00:21:47,600 --> 00:21:52,400
संख्या 51 की बात कर रहा हूं मैं। 51 ले आइए।

301
00:21:52,400 --> 00:21:55,240
प्रश्न संख्या

302
00:21:55,240 --> 00:22:00,280
51 इसमें लास्ट पैराग्राफ देखिए। बहुत अच्छी बात आई है। यहां

303
00:22:00,280 --> 00:22:05,520
पर सबसे पहली बात तो यह कह रहा है कि

304
00:22:05,520 --> 00:22:09,600
राग द्वेष के बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। यानी यहां पर कुल मिलाकर यह कह

305
00:22:09,600 --> 00:22:14,480
रहा है कि राग, द्वेष, लाभ हानि के बिना

306
00:22:14,480 --> 00:22:18,640
जो है कर्म नहीं हो सकता। तो इसने अपनी बातों

307
00:22:18,640 --> 00:22:23,280
का खंडन किया। गीता की बातों का खंडन किया। खैर यहां मुख्य बात क्या है?

308
00:22:23,280 --> 00:22:27,280
यहां मुख्य बात है काल यह काल को जो है वो

309
00:22:27,280 --> 00:22:31,520
बता रहा है कि काल के अंदर भी राग द्वेष है। और जब काल के अंदर राग द्वेष

310
00:22:31,520 --> 00:22:35,520
है तो उसके अवतार कैसे बच जाएंगे? अब काल के अवतार कौन है? यह देखिए

311
00:22:35,520 --> 00:22:39,760
आप यह सोचने वाली बात है। काल के अवतार तो इससे

312
00:22:39,760 --> 00:22:44,280
सिद्ध है कि गीता जी में अध्यात्म ज्ञान तो काल भगवान ने सही दिया है।

313
00:22:44,280 --> 00:22:48,360
परंतु जीभ में विकार, काम, क्रोध, मोह, लोभ,

314
00:22:48,360 --> 00:22:52,560
अहंकार यह सब भर दिए। जिनसे परवश होकर

315
00:22:52,560 --> 00:22:56,560
भगवान काल के अवतार भी विवश हो गए। जिसके कारण

316
00:22:56,560 --> 00:23:00,560
काल जाल से नहीं निकल सकते। अब यहां सवाल

317
00:23:00,560 --> 00:23:04,800
उठता है कि काल के अवतार कौन है? जैसे

318
00:23:04,800 --> 00:23:09,360
कबीर का अवतार है यह रामपाल

319
00:23:09,360 --> 00:23:10,240
तो रामपाल में और

320
00:23:10,240 --> 00:23:14,320
कबीर में कोई अंतर तो है नहीं रामपाल के रूप में परमेश्वर ही है अकॉर्डिंग

321
00:23:14,320 --> 00:23:18,720
टू रामपाल तो काल

322
00:23:18,720 --> 00:23:22,960
के अवतार कौन है और उनके रूप में क्या काल स्वयं नहीं है

323
00:23:22,960 --> 00:23:27,200
तो यहां पे वैसे इसने इंगित किया है जो ऊपर बातें चली हैं जिनका उदाहरण

324
00:23:27,200 --> 00:23:31,200
लिया है कि शिव जी राग द्वेष से नहीं बच पाए विष्णु जी राग द्वेष

325
00:23:31,200 --> 00:23:35,200
से नहीं बच पाए श्री कृष्ण राग द्वेष से नहीं बच पाए और यहां पर इसने

326
00:23:35,200 --> 00:23:39,280
काल का अवतार होना मान लिया। इसका अर्थ क्या हुआ कि

327
00:23:39,280 --> 00:23:43,520
काल के अवतार भी विवश हो गए। कौन विवश कौन हुए पीछे?

328
00:23:43,520 --> 00:23:47,520
शिव जी श्री कृष्ण जी तो यहां इसने मान लिया कि

329
00:23:47,520 --> 00:23:51,680
गीता बोलने वाले के जो गीता बोलने वाला है

330
00:23:51,680 --> 00:23:55,760
उसी के उसी के अवतार हैं ये सब। तो काल यानी

331
00:23:55,760 --> 00:24:00,000
गीता बोलने वाले वेद कहने वाले और ब्रह्मा

332
00:24:00,000 --> 00:24:04,200
विष्णु महेश भगवती गणेश में जो अंतर करता है ये पूरी यहां

333
00:24:04,200 --> 00:24:08,240
पे इसने अपने कौन से अ के नशे में पवे के नशे

334
00:24:08,240 --> 00:24:14,240
में जो है मान लिया उसको खैर आगे चलते

335
00:24:17,720 --> 00:24:22,040
हैं दरदर्द है इसकी जो इसने अर्थ किया

336
00:24:22,040 --> 00:24:28,040
है हम

337
00:24:34,040 --> 00:24:36,360
इसको

338
00:24:36,360 --> 00:24:40,640
इसको काल को डर बना रहता है कि कहीं जीव मेरे

339
00:24:40,640 --> 00:24:41,200
जाल से

340
00:24:41,200 --> 00:24:45,440
निकल ना जाए। इसलिए तत्व ज्ञान सुनकर पूर्ण संत की शरण

341
00:24:45,440 --> 00:24:48,560
में ग्रहण करके पूर्ण परमात्मा की भक्ति करो। काल

342
00:24:48,560 --> 00:24:52,560
को डर बना रहता है कि लोग मेरी शरण से मेरे जाल से निकल ना जाए।

343
00:24:52,560 --> 00:24:56,720
ठीक है? तो वह काहे के लिए गीता में अच्छी अच्छी बातें बताएगा। वह क्यों

344
00:24:56,720 --> 00:25:00,720
गीता में सही तत्वदर्शी के पास भेजेगा? तो गीता

345
00:25:00,720 --> 00:25:05,360
के अनुसार आप तत्वदर्शी के पास नहीं जा सकते अकॉर्डिंग टू रामपाल। क्योंकि

346
00:25:05,360 --> 00:25:09,520
काल क्या करता है? काल को डर बना रहता है। कहीं जीव मेरे जाल

347
00:25:09,520 --> 00:25:13,600
से निकल ना जाए। तो फिर उसकी कही हुई बातों का आलंबन लेकर के

348
00:25:13,600 --> 00:25:17,680
हम तत्वदर्शी के पास क्यों जाए? हम ठीक

349
00:25:17,680 --> 00:25:21,920
है। और जब हम तत्वदर्शी

350
00:25:21,920 --> 00:25:26,880
की शरण ग्रहण करके पूर्ण परमात्मा की भक्ति करेंगे तब राग द्वेष समाप्त होंगे।

351
00:25:26,880 --> 00:25:30,880
हम अब देखिए पीछे कह रहा है राग द्वेष के बिना बात नहीं बन सकती।

352
00:25:30,880 --> 00:25:35,520
कर्म नहीं हो सकता। अब यहां फिर कह रहा है कि राग द्वेष जो है

353
00:25:35,520 --> 00:25:39,520
समाप्त हो सकते हैं। ये खुद ही अपनी उसमें ही कैसेट में फंस गया

354
00:25:39,520 --> 00:25:43,680
है। पहले ऑडियो टेप आते थे ना इसमें कहीं-क वो फंस जाती

355
00:25:43,680 --> 00:25:47,760
ये अजीब सी आवाज आने लगती थी। वही

356
00:25:47,760 --> 00:25:51,760
ऐसे ऐसे करके आवाज आने लगती थी। वैसे ही इसकी

357
00:25:51,760 --> 00:25:55,240
गीता का अर्थ भी

358
00:25:55,240 --> 00:25:59,680
है। चलिए आगे चलते हैं। तो गीता

359
00:25:59,680 --> 00:26:03,760
अध्याय तीन श्लोक 35 में इसने क्या कहा है? पहले

360
00:26:03,760 --> 00:26:09,400
अपना पढ़ लेते

361
00:26:09,400 --> 00:26:15,360
हैं। हमारी गीता का अर्थ है

362
00:26:15,360 --> 00:26:19,680
तीन 35 में अच्छी प्रकार से आचरण

363
00:26:19,680 --> 00:26:23,840
में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित

364
00:26:23,840 --> 00:26:27,920
भी अपना धर्म ही अति उत्तम है। अपने धर्म में तो

365
00:26:27,920 --> 00:26:32,080
मरना भी पर मरना भी कल्याण कारक है और

366
00:26:32,080 --> 00:26:36,640
दूसरे का धर्म भय को देने वाला है। यहां एक तरीके से स्वधर्म

367
00:26:36,640 --> 00:26:40,960
की बात हो रही है। जैसे स्वधर्म क्या है

368
00:26:40,960 --> 00:26:45,040
कि मेरा धर्म है अगर ब्राह्मण कुल

369
00:26:45,040 --> 00:26:49,080
में जन्म हुआ है तो मेरा कर्तव्य है धर्म है कि मैं जो

370
00:26:49,080 --> 00:26:53,440
है जो सनातन ज्ञान विज्ञान है उसका प्रचार प्रसार करूं

371
00:26:53,440 --> 00:26:58,840
लोगों तक पहुंचाऊं क्षत्रिय का धर्म है कि वो रक्षा

372
00:26:58,840 --> 00:27:03,120
करे वैश्य का धर्म है कि वो जो

373
00:27:03,120 --> 00:27:07,520
क्या कहते हैं आपूर्ति है समाज की वो पूरी करे

374
00:27:07,520 --> 00:27:11,600
और शूद्र का धर्म है कि वो सेवा के प्रकल्प

375
00:27:11,600 --> 00:27:15,760
ों द्वारा कहीं पर भी अव्यवस्था ना फैलने देती। तो यह

376
00:27:15,760 --> 00:27:18,880
सारी चीजें धर्म है। अब

377
00:27:18,880 --> 00:27:23,680
किसी को लग रहा है भाई वो जो है गुणवान धर्म है उसका।

378
00:27:23,680 --> 00:27:27,680
जैसे मुझे लालच आ गया कि देखो वो जो वैश्य है वो

379
00:27:27,680 --> 00:27:31,760
ज्यादा अच्छी कमाई कर ले रहा है। उसको धन ज्यादा मिल रहा है। गुण दिखने लगे

380
00:27:31,760 --> 00:27:35,760
मुझे। यहां बताया जा रहा है कि भले ही तुमको अपना जो धर्म

381
00:27:35,760 --> 00:27:39,920
है वह गुण रहित भी दिखे फिर भी जो दूसरे वाले का जो

382
00:27:39,920 --> 00:27:44,000
दूसरे का जो गुणवान धर्म है वह भी तुम्हारे गुण

383
00:27:44,000 --> 00:27:48,240
रहित धर्म से धर्म के कंपैरिजन में व्यर्थ है।

384
00:27:48,240 --> 00:27:52,560
तो अब जो वर्ण व्यवस्था को कर्म से मानते हैं यहां पर उनके

385
00:27:52,560 --> 00:27:56,800
लिए एक सवाल आता है कि यदि दूसरे

386
00:27:56,800 --> 00:28:01,120
के धर्म का पालन कर लेना कर लेना भी यानी

387
00:28:01,120 --> 00:28:05,280
अपना जो कर्म है आज मेरी ड्यूटी है मान लो आज कर्म के अनुसार

388
00:28:05,280 --> 00:28:09,680
मैं बना पुलिस वाला मेरी ड्यूटी आज से हो गई रक्षा

389
00:28:09,680 --> 00:28:14,960
करने की व्यवस्था बनाने की उसके बाद

390
00:28:14,960 --> 00:28:19,120
कल को मैं अपनी ड्यूटी छोड़ छोड़ के अभी मैंने

391
00:28:19,120 --> 00:28:23,120
कर्म से ही माना है। जन्म से नहीं माना है। मगर कर्म से भी मानेंगे तो

392
00:28:23,120 --> 00:28:27,360
आज आज से मेरा धर्म क्या हो गया? रक्षा करना पुलिस वाले

393
00:28:27,360 --> 00:28:31,360
की तरह। मगर मुझे कल को लालच आया कि मैं मैं जो है जनरल स्टोर खोल

394
00:28:31,360 --> 00:28:35,120
लूं या कपड़े का शोरूम खोल लूं। तो

395
00:28:35,120 --> 00:28:39,280
यहां मना किया जा रहा है कि तुम दूसरे के गुणवान धर्म

396
00:28:39,280 --> 00:28:43,440
को देख के अपने गुण रहित धर्म को मत छोड़ो। यहां उसी का निषेध किया

397
00:28:43,440 --> 00:28:47,520
जा रहा है। इसका अर्थ है कि जो आप हो वही रहो।

398
00:28:47,520 --> 00:28:51,520
दूसरे का धर्म मत अपनाओ। जो दायित्व आपको मिला है उसी दायित्व

399
00:28:51,520 --> 00:28:55,680
को आगे कंटिन्यू करो। और इसमें फिर और भी चीजें आ जाती

400
00:28:55,680 --> 00:28:59,680
हैं। जैसे मेरा धर्म है कि मैं एक भाई होते हुए इसकी

401
00:28:59,680 --> 00:29:03,680
सेवा करूं या ऐसा करूं या वैसा करूं अपने माता ये सब स्वधर्म में

402
00:29:03,680 --> 00:29:07,680
आते हैं। तो स्वधर्म जो है वह

403
00:29:07,680 --> 00:29:11,840
हमको लग रहा है कि उसके जो दूसरे का जो स्वधर्म है तमस्ती

404
00:29:11,840 --> 00:29:16,000
वाला नहीं दूसरे का जो स्वधर्म है उसमें मुझे लालच दिख रहा है कि उसके

405
00:29:16,000 --> 00:29:20,000
स्वधर्म जैसे वो अपने माता-पिता की सेवा कर रहा है तो उसको एसी का

406
00:29:20,000 --> 00:29:24,080
कमरा मिल रहा है और मैं अपने माता-पिता की सेवा कर रहा हूं तो मुझे जो है एसी

407
00:29:24,080 --> 00:29:28,080
का कमरा नहीं मिल रहा है। एयर कंडीशन कमरा नहीं मिल रहा है। तो मैं सोच रहा हूं

408
00:29:28,080 --> 00:29:32,160
कि मैं एक काम करता हूं। मैं भी उसके माता-पिता की सेवा कर लेता हूं। मैं भाई किसी

409
00:29:32,160 --> 00:29:36,160
ना किसी की सेवा करनी तो सेवा तो मैं वहां भी कर लूंगा। परंतु क्या है कि वहां पर

410
00:29:36,160 --> 00:29:40,160
मुझे वो मिल जाएगा। एयर कंडीशन माहौल मिल जाएगा। तो ये क्या

411
00:29:40,160 --> 00:29:44,320
हुआ? मैंने दूसरे के गुणवान धर्म के लालच में अपने गुण

412
00:29:44,320 --> 00:29:48,400
रहित धर्म का त्याग किया। तो क्या है? दूसरे के धर्म

413
00:29:48,400 --> 00:29:50,160
से गुण रहित भी अपना धर्म अति

414
00:29:50,160 --> 00:29:54,160
उत्तम है। ये बात यहां पर कही गई। तो वर्ण व्यवस्था यहां पर ना

415
00:29:54,160 --> 00:29:58,400
बदलने की बात की जा रही है। क्या भले ही आपको दूसरे के धर्म में अच्छा लग रहा हो। जैसे

416
00:29:58,400 --> 00:30:02,800
कई कहते हैं ना अरे उसका भी मन होता है। उसको भी ऐसा मन होता है। अरे ब्राह्मण

417
00:30:02,800 --> 00:30:06,800
ब्राह्मण का भी मन होता है कि उसके बच्चे कारों में चले। ऐसे एक बार

418
00:30:06,800 --> 00:30:10,800
एक ब्राह्मण मिले थे जो

419
00:30:10,800 --> 00:30:15,280
जब फेरे हो रहे होते हैं तो उस समय उन्होंने कुछ ऐसा कहा था

420
00:30:15,280 --> 00:30:19,360
अपनी दक्षिणा को मांगने के लिए फिक्स करने के लिए तो मैंने उनको कहा

421
00:30:19,360 --> 00:30:23,680
कि ब्राह्मण को जो दान स्वरूप जो मिल जाए दक्षिणा स्वरूप जो मिल जाए वही उसको

422
00:30:23,680 --> 00:30:27,760
लेना जो है धर्म है और वहां पर वो बाध्य करे

423
00:30:27,760 --> 00:30:31,760
नहीं नहीं इतना ही दो तो वो फिर ब्राह्मण को शोभा नहीं देता है ब्राह्मण के

424
00:30:31,760 --> 00:30:35,760
लिए उचित नहीं है तो वहां ये डायलॉग मारा मारा जा

425
00:30:35,760 --> 00:30:39,760
सकता है। कई बार जो नहीं इतना ज्यादा धर्म और अधर्म में ध्यान रख

426
00:30:39,760 --> 00:30:44,400
पाते हैं। तो यह डायलॉग मार देते हैं कि भाई क्यों हमारे बच्चे अच्छे कपड़े नहीं पहने।

427
00:30:44,400 --> 00:30:48,720
तो क्या हुआ कि अच्छे कपड़े पहनाने के लिए यानी

428
00:30:48,720 --> 00:30:52,720
सामने वाले का गुण देख के और वह गुण हमारे पास नहीं है।

429
00:30:52,720 --> 00:30:56,960
हमारे धर्म में उसकी कमी है कि धन कम आ रहा है। तो हमारा

430
00:30:56,960 --> 00:31:01,040
हमारा जो धर्म है ब्राह्मण का ब्राह्मण के अनुसार वो वो धर्म है

431
00:31:01,040 --> 00:31:05,040
वो गुण रहित सिद्ध हो रहा है। हमारी नजरों में हमारे पर्सपेक्टिव में फिर

432
00:31:05,040 --> 00:31:05,540
भी

433
00:31:05,200 --> 00:31:09,520
उसी धर्म का आलंबन लिए रहो। उसको छोड़ना नहीं है। यानी यहां पर कर्म

434
00:31:09,520 --> 00:31:13,600
कर्म कर्मणा वर्ण व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई गई है। ठीक है?

435
00:31:13,600 --> 00:31:17,960
यह सार्वभौम सिद्धांत आपको प्राप्त

436
00:31:17,960 --> 00:31:22,240
हुआ। इसने क्या अनर्थ किया है? गीता अध्याय

437
00:31:22,240 --> 00:31:24,080
तीन के श्लोक 35 में कि

438
00:31:24,080 --> 00:31:28,080
दूसरों की गलत साधना से जो शास्त्र अनुकूल नहीं

439
00:31:28,080 --> 00:31:32,080
है। चाहे वे कितनी अच्छी नजर आए या वे अज्ञानी

440
00:31:32,080 --> 00:31:36,160
चाहे आपको कितना ही डराए उनकी साधना भयवश

441
00:31:36,160 --> 00:31:40,160
होकर स्वीकार नहीं करनी चाहिए।

442
00:31:40,160 --> 00:31:40,660
अब

443
00:31:40,560 --> 00:31:44,920
लोग साधना कहां से आ गई भाई? संस्कृत कहां है? साधना

444
00:31:44,920 --> 00:31:49,040
की साधना की। संस्कृत कहां है? अब

445
00:31:49,040 --> 00:31:53,200
इसने एक कहानी आगे सुनाई है ऐसी साधना के लिए कि

446
00:31:53,200 --> 00:31:57,520
अपनी साधना मत छोड़ना। चाहे जितना लालच हो, चाहे जितना वो हो। खुद

447
00:31:57,520 --> 00:32:01,680
लालच दे दे के ला रहा है। खुद लालच दे दे के मैं पहले

448
00:32:01,680 --> 00:32:05,760
ऐसा था, फिर ऐसा हो गया। मैं भय दे के ला रहा है। कि अगर

449
00:32:05,760 --> 00:32:10,240
तुम ये करोगे तो तुमको काल खाएगा। मगर तुम ये ये करोगे तो काल नहीं खाएगा।

450
00:32:10,240 --> 00:32:14,240
खुद लालच भय दिखाकर लोगों को कन्वर्ट कर रहा है। मगर

451
00:32:14,240 --> 00:32:20,040
फिर अपने लोगों को यह कह रहा है कि तुम लालच के कारण कहीं और मत चले जाना।

452
00:32:20,040 --> 00:32:24,320
हां तो आगे इसने कपोल कल्पित कथाएं सुनाई है।

453
00:32:24,320 --> 00:32:29,040
रमेश जैन पुत्र श्री ओम प्रकाश जैन ये शांति नगर ये सब

454
00:32:29,040 --> 00:32:33,120
कहानियां सुना दी। उसका दमा नहीं रहा। लड़की को दौरे ये सब बंद हो

455
00:32:33,120 --> 00:32:37,240
गए। और अंत तक आते

456
00:32:37,240 --> 00:32:41,280
आते प्रश्न संख्या 53 पर देखिए लालच रामपाल के

457
00:32:41,280 --> 00:32:46,040
द्वारा किस तरह से धर्मांतरण कराया जा रहा है। मतांतरण कराया जा रहा है।

458
00:32:46,040 --> 00:32:50,240
देखिए पुराना मकान बेचकर नई कोठी बना ली है। कर्ज

459
00:32:50,240 --> 00:32:54,560
मुक्त हो गया है। जो कह रहा है ना जो लोग कहते हैं कि नहीं शरीर

460
00:32:54,560 --> 00:32:55,840
शरीर को पोषित करना

461
00:32:55,840 --> 00:32:59,840
एक व्यक्ति आया था कि भाई तुम अपना कैंसर का है। मैंने उससे पूछा कि तुम अपना कैंसर के इलाज

462
00:32:59,840 --> 00:33:04,160
के लिए रामपाल की शरण में गए हो तो इसके लिए तो रामपाल ने मना किया सांसारिक

463
00:33:04,160 --> 00:33:08,160
सुख के लिए तो व्यक्ति कहने लगा नहीं शरीर का इलाज और सांसारिक सुख अलग-अलग

464
00:33:08,160 --> 00:33:12,160
है। अब यहां पे भाई तू अब ये धन के लालच में कोठी के लालच

465
00:33:12,160 --> 00:33:16,160
में जा रहा है कि नहीं व्यक्ति उपासना में लालच दिया जा

466
00:33:16,160 --> 00:33:21,040
रहा है ना पुराना मकान बेचकर नई कोठी बना ली है। कर्ज मुक्त भी हो गया है।

467
00:33:21,040 --> 00:33:27,040
तीसरा पैराग्राफ 53 नंबर पेज

468
00:33:31,760 --> 00:33:35,320
तो यहां पर धन के लिए

469
00:33:35,320 --> 00:33:39,360
भक्ति बताई गई। ये देख लीजिए तीसरा पैराग्राफ

470
00:33:39,360 --> 00:33:43,880
पृष्ठ संख्या 53 पुराना मकान बेचकर नई कोठी बना ली

471
00:33:43,880 --> 00:33:48,000
है। स्वस्थ तो हुआ ही हुआ। बाकी धन का लालच भी यहां दिया जा

472
00:33:48,000 --> 00:33:54,000
रहा है। ऐसे होता है मतांतरण। ऐसे होता है धर्मांतरण।

473
00:33:55,760 --> 00:33:59,080
आगे चलते

474
00:33:59,080 --> 00:34:03,360
हैं। अब आगे मान बढ़ाई जान की दुश्मन अज्ञानी

475
00:34:03,360 --> 00:34:07,360
अपनी गलत पूजा को नहीं त्यागते। चाहे कितना आग्रह करें चाहे

476
00:34:07,360 --> 00:34:11,520
सद ग्रंथों के प्रमाण दिखा दें। दिखा दिए जाए

477
00:34:11,520 --> 00:34:12,800
वे नहीं मानते। इसी

478
00:34:12,800 --> 00:34:17,000
प्रकार ज्ञानी विद्वान पुरुष मानव वस पैसा प्राप्ति व अधिक

479
00:34:17,000 --> 00:34:21,120
शिष्य बनाने की इच्छा के कारण गलत त्याग

480
00:34:21,120 --> 00:34:25,200
कर सच्चाई का अनुसरण नहीं करते। दोनों ज्ञानी व अज्ञानी

481
00:34:25,200 --> 00:34:29,360
स्वभाव वश चल रहे हैं। इसलिए भक्ति मार्ग गलत

482
00:34:29,360 --> 00:34:29,860
दिशा

483
00:34:29,680 --> 00:34:34,760
में दिशा पकड़ चुका है। इन दोनों को

484
00:34:34,760 --> 00:34:39,480
समझाना ये लोक संग्रह को यहां पर फिर उन्होंने बताया

485
00:34:39,480 --> 00:34:44,920
है। अच्छा एक बात

486
00:34:44,920 --> 00:34:50,920
है कबीर ने गीता पर भाष्य किया क्या?

487
00:34:51,920 --> 00:34:55,920
या कबीर ने वेदों का भाष्य किया क्या? क्यों नहीं किया

488
00:34:55,920 --> 00:35:00,000
भाई? कबीर ज्ञानी नहीं थे क्या? क्यों नहीं ज्ञान भाष्य

489
00:35:00,000 --> 00:35:04,160
किया? और जब तुम्हारे गुरु ने नहीं किया, किसी भी धार्मिक ग्रंथ का भाष्य

490
00:35:04,160 --> 00:35:08,600
किया ही नहीं है तो तुम कहां से कर रहे हो?

491
00:35:08,600 --> 00:35:12,720
हम तुम कैसे कर रहे हो? कभी वेद भाष्य

492
00:35:12,720 --> 00:35:16,840
किया ही नहीं है। अब यहां पर लिख रहा है विवेचन

493
00:35:16,840 --> 00:35:21,520
मेरे ज्ञानी

494
00:35:21,520 --> 00:35:26,240
मेरे यानी रामपाल दास के अतिरिक्त अन्य सब अनुवादकों

495
00:35:26,240 --> 00:35:30,480
ने गीता अध्याय तीन श्लोक 35 का अर्थ गलत किया है जो

496
00:35:30,480 --> 00:35:34,480
इस प्रकार है। अच्छी प्रकार से लाए हुए दूसरे के धर्म से

497
00:35:34,480 --> 00:35:38,480
गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में मरना भी

498
00:35:38,480 --> 00:35:43,480
कल्याण का कारक है। दूसरे का धर्म भय देने वाला

499
00:35:43,480 --> 00:35:47,600
है। अब ये कह रहा है इस बात का खंडन कर रहा है। विचार करें यदि

500
00:35:47,600 --> 00:35:51,600
यह अनुवाद सही है तो गीता के 18 अध्यायों के ज्ञान

501
00:35:51,600 --> 00:35:55,720
की क्या आवश्यकता थी? फिर तो जैसे साधना कर रहा था करता

502
00:35:55,720 --> 00:35:59,840
रहे। यह साधना कहां से आ गई भाई? स्वधर्म

503
00:35:59,840 --> 00:36:05,840
की बात की जा रही है। बेवकूफ मूर्ख व्यक्ति

504
00:36:06,680 --> 00:36:10,800
स्वधर्म जो सबसे पहले मनुष्य होते हुए फिर

505
00:36:10,800 --> 00:36:15,120
मनुष्य में सनातनी होते हुए फिर सनातन में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य

506
00:36:15,120 --> 00:36:20,440
शद्र इत्यादि होते हुए फिर उसमें किसी का पिता पुत्र

507
00:36:20,440 --> 00:36:24,800
भाई इत्यादि होते हुए जो तुम्हें धर्म प्राप्त होता है उसको स्वधर्म

508
00:36:24,800 --> 00:36:30,800
कहते हैं।

509
00:36:33,840 --> 00:36:38,320
जैसे मनुष्य होते हुए क्या कि तुम्हें दिख रहा है कि भाई फलाने

510
00:36:38,320 --> 00:36:42,320
पशु का जो जीवन है बड़ा सरल है। मेरा जीवन कठिन

511
00:36:42,320 --> 00:36:46,320
है तो क्यों ना मैं उसी की तरह आचरण करने लगूं। मनुष्य के पर्सेक्टिव से।

512
00:36:46,320 --> 00:36:50,640
तो मनुष्य होते हुए उसका स्वधर्म क्या है? उसको

513
00:36:50,640 --> 00:36:54,960
उसी का आलंबन लेना चाहिए। अगर उसे लग रहा है कि नहीं पशुओं को यह आसान

514
00:36:54,960 --> 00:36:59,360
जीवन है। मैं केवल एग्जांपल के लिए बोल रहा हूं तो उसे वो नहीं अपनाना चाहिए।

515
00:36:59,360 --> 00:37:03,520
उसके बाद सनातनी होते हुए उसका स्वधर्म क्या है? जो भी है। परंतु

516
00:37:03,520 --> 00:37:07,520
यदि उसको दिख रहा है कि नहीं मुसलमान मुस्लिमों में ये अच्छी चीज है या

517
00:37:07,520 --> 00:37:11,600
फलाने में ये अच्छी चीज है या उसको ये अच्छा दिखाया है या

518
00:37:11,600 --> 00:37:15,680
देवताओं का धर्म ऐसा बताया है, वानरों का धर्म ऐसा बताया है तो उसको

519
00:37:15,680 --> 00:37:20,080
वहां पर उसको अपनाना नहीं चाहिए।

520
00:37:20,080 --> 00:37:22,240
ठीक है? और

521
00:37:22,240 --> 00:37:26,560
इसके बाद फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र होते हुए मैंने बता ही दिया

522
00:37:26,560 --> 00:37:30,880
कि ब्राह्मण होते हुए आपको जो धर्म प्राप्त है ब्राह्मण की सीमा में तो

523
00:37:30,880 --> 00:37:34,960
क्षत्रिय का धर्म देखकर या वैश्य का या शूद्र का

524
00:37:34,960 --> 00:37:39,120
स्वधर्म देखकर आजकल हो क्या रहा है? कि ब्राह्मण

525
00:37:39,120 --> 00:37:43,520
जो शूद्रों के जीवन में जो सरलता है उसके कारण अपने ब्राह्मण

526
00:37:43,520 --> 00:37:47,520
ब्राह्मणोचित जो आचरण है उसको छोड़कर जो शूद्रों का कार्य

527
00:37:47,520 --> 00:37:51,680
है वो अपना रहे हैं और शूद्रों को भड़का रहे हैं कि तुम ब्राह्मण बनो जाके कठिन जीवन

528
00:37:51,680 --> 00:37:56,400
जीने के लिए शूद्रों को प्रेरित करते हैं आजकल के जो ये वाले ब्राह्मण

529
00:37:56,400 --> 00:38:00,480
ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाले आर्य समाधि टाइप के जो बन जाते हैं

530
00:38:00,480 --> 00:38:04,760
तो वो क्या कर रहे हैं खुद तो शूद्र वाले सारे कार्य करेंगे उनकी

531
00:38:04,760 --> 00:38:09,360
जो सरल जीवन यापन है शूद्र का उसको अपनाएंगे

532
00:38:09,360 --> 00:38:13,600
और शूद्र को प्रेरित करेंगे। तुम जाओ दिन भर में अनाज अन्न

533
00:38:13,600 --> 00:38:17,680
खाने के बाद 16 कुल दातून के बाद 12 कुल इत्यादि इत्यादि

534
00:38:17,680 --> 00:38:21,760
ये वाला सारा जीवन आचरण करो। ब्राह्मण बन जाओ। तुम ब्राह्मण दीक्षा ले लो और

535
00:38:21,760 --> 00:38:25,760
खुद बैठेंगे। आराम ढूंढेंगे।

536
00:38:25,760 --> 00:38:28,680
ऐसे भी ब्राह्मण

537
00:38:28,680 --> 00:38:32,880
है जिनमें से एक जो

538
00:38:32,880 --> 00:38:36,880
उदाहरण है आर्य समाज में ऐसा थोड़ी है ना ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाले बहुत से

539
00:38:36,880 --> 00:38:37,520
आर्य समाजी

540
00:38:37,520 --> 00:38:42,400
होंगे ना तो ये सब क्या कर रहे हैं

541
00:38:42,400 --> 00:38:46,400
खुद ब्राह्मण धर्म जो अपन जो ब्राह्मण धर्म पर जो

542
00:38:46,400 --> 00:38:50,480
चलना है उसको छोड़कर खुद तो क्षत्रिय का धर्म वैश्य

543
00:38:50,480 --> 00:38:55,120
का धर्म अपना रहे हैं क्योंकि वहां उनको अनु वो अनुकूलता दिख रही है

544
00:38:55,120 --> 00:38:59,200
और उन लोगों को प्रेरित करेंगे जाओ ब्राह्मण दीक्षा ले लो ब्राह्मण दीक्षा ले लो राशन

545
00:38:59,200 --> 00:39:03,360
राशन की दुकान पर बटती है ब्राह्मण दीक्षा और

546
00:39:03,360 --> 00:39:08,200
राशन की दुकान पर और कुछ राशन नहीं मिलता है केवल ब्राह्मण दीक्षा मिलती

547
00:39:08,200 --> 00:39:10,440
है

548
00:39:10,440 --> 00:39:14,720
खैर तो अब यहां पे साधना की बात ले आया भाई धर्म

549
00:39:14,720 --> 00:39:19,320
की बात हो रही है आचरण की बात हो रही है भक्ति की बात नहीं हो रही है

550
00:39:19,320 --> 00:39:23,440
हम तो इसने उसको अलग ही एक वो दे दिया अन्य किसी की बात नहीं सुनते

551
00:39:23,440 --> 00:39:27,760
हुए राक्षस स्वभाव के धारण किए हुए मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले मूर्ख

552
00:39:27,760 --> 00:39:32,000
मेरी भक्ति भी नहीं करते। मेरी भक्ति भी नहीं करते। मेरी

553
00:39:32,000 --> 00:39:36,080
भक्ति नहीं करते को कर दिया। मेरी भक्ति भी नहीं करते। खैर आगे

554
00:39:36,080 --> 00:39:40,240
चलते हैं। अब कुछ अगले कुछ प्रश्नों में

555
00:39:40,240 --> 00:39:44,640
कुछ जरूरी वैसे श्लोकों की बात इसने नहीं की है।

556
00:39:44,640 --> 00:39:49,200
और अगले कुछ प्रश्नों में इसने क्या किया है? तो कुछ जरूरी

557
00:39:49,200 --> 00:39:54,400
चीजें जो हमारे नजर में पड़ गई।

558
00:39:54,400 --> 00:39:58,120
उसको हमने आपके

559
00:39:58,120 --> 00:40:02,960
सामने रखा है। तो 55 नंबर पृष्ठ पर देखिए

560
00:40:02,960 --> 00:40:07,120
तीसरे पैराग्राफ में चारों वेदों

561
00:40:07,120 --> 00:40:11,120
18 पुराणों गीता जी व छह शास्त्रों में

562
00:40:11,120 --> 00:40:15,440
केवल ब्रह्म की उपासना की जानकारी है।

563
00:40:15,440 --> 00:40:21,440
सत्पुरुष की उपासना का ज्ञान नहीं है। ठीक है?

564
00:40:25,120 --> 00:40:29,120
इसके बाद अगला प्रश्न सीधे आ जाइए 59

565
00:40:29,120 --> 00:40:34,600
पर। यह इन प्रश्नों में क्या चल रहा

566
00:40:34,600 --> 00:40:39,120
है कि अपनी बात को पुष्ट करने के लिए इसने कबीर

567
00:40:39,120 --> 00:40:43,280
वाणी नानक साहब की वाणी वो पता नहीं मिलावट के साथ दी है कि कैसे दी है

568
00:40:43,280 --> 00:40:47,280
पर यहां वाणी दे दे के अपनी बात को पुष्ट कर रहा है तो

569
00:40:47,280 --> 00:40:51,600
उस वो पुष्ट करते समय इससे इसके झोल

570
00:40:51,600 --> 00:40:55,600
ढोल में जो पोल है वो हमने कहीं-कहीं पर पकड़ी है उसको हम

571
00:40:55,600 --> 00:40:59,920
आपको दिखा रहे है अब देखिए यहां बहुत बड़ा खुलासा होने वाला 59

572
00:40:59,920 --> 00:41:03,080
नंबर

573
00:41:03,080 --> 00:41:07,520
पर बहुत बड़ा खुलासा गरिमा

574
00:41:07,520 --> 00:41:12,080
गीता की पृष्ठ संख्या 59 पैराग्राफ

575
00:41:12,080 --> 00:41:16,080
वन भावार्थ में रामपाल दास क्या लिख

576
00:41:16,080 --> 00:41:20,160
रहा है? सर्व प्राणी भगवान की साधना करते

577
00:41:20,160 --> 00:41:24,320
हैं। परंतु काल प्रभु यानी ज्योति निरंजन किसी को

578
00:41:24,320 --> 00:41:28,800
भी पूर्ण परमात्मा के भेद नहीं देता। पूर्ण परमात्मा

579
00:41:28,800 --> 00:41:33,200
के भेद नहीं देता। ठीक है? पहली बात।

580
00:41:33,200 --> 00:41:37,360
तो यानी कि वह झूठा है, द्वेषी है, षड्यंत्रकारी

581
00:41:37,360 --> 00:41:42,240
है। तो उसकी किसी भी बात पर भरोसा क्यों किया जाए भाई?

582
00:41:42,240 --> 00:41:46,320
संसार के नर नारी। अब यहां बहुत जरूरी बात है। ये बहुत

583
00:41:46,320 --> 00:41:47,360
जरूरी। संसार

584
00:41:47,360 --> 00:41:51,600
के नर नारी सनक सनंदन सना सनातन

585
00:41:51,600 --> 00:41:55,600
तथा संत कुमार तथा नारद जी व्यास जी

586
00:41:55,600 --> 00:41:59,680
उनके पिता ऋषि पहराचार्य जी प्रह्लाद तथा

587
00:41:59,680 --> 00:42:03,760
मुनिंद्र ऋषि जो स्वयं परमात्मा कबीर

588
00:42:03,760 --> 00:42:05,360
जी ही थे।

589
00:42:05,360 --> 00:42:08,040
लो

590
00:42:08,040 --> 00:42:12,320
भाई प्रहलाद जी कौन थे? स्वयं परमात्मा

591
00:42:12,320 --> 00:42:15,600
कबीर

592
00:42:15,600 --> 00:42:18,560
ठीक है।

593
00:42:18,560 --> 00:42:22,880
तो यहां क्या हो गया? यदि प्रह्लाद जी कबीर थे

594
00:42:22,880 --> 00:42:27,120
तो कबीर ने किसकी पूजा की? प्रह्लाद के रूप में। और

595
00:42:27,120 --> 00:42:31,360
जो प्रह्लाद का अवतार बताया गया भविष्य पुराण में कबीर को

596
00:42:31,360 --> 00:42:36,000
वो बात भी यहां से सिद्ध हो गई। इसकी बात से सिद्ध हो गई। और क्यों

597
00:42:36,000 --> 00:42:40,360
कहीं पर कबीर वाणी में इनके नाम आ गए

598
00:42:40,360 --> 00:42:46,360
होंगे। पष्ठ संख्या 58 पर दिखाइए जरा। कबीर वाणी दी गई है।

599
00:42:46,560 --> 00:42:50,880
सबसे नीचे हां यह घर होए पुरुष

600
00:42:50,880 --> 00:42:54,960
की सेवा पुरुष निरंजन कहे ना भवा

601
00:42:54,960 --> 00:42:59,000
ताकी भक्ति करे संसारा नर नारी मिल करें

602
00:42:59,000 --> 00:43:03,440
पुकारा सनकादिक नारद मुख गावे ब्रह्मा

603
00:43:03,440 --> 00:43:07,640
विष्णु महेश्वर ध्यावे मुनि व्यास पारासर

604
00:43:07,640 --> 00:43:11,680
ज्ञानी प्रहलाद और विभीषण धानी

605
00:43:11,680 --> 00:43:15,920
द्वादश भगत भगती सोराचे ते ते तारी

606
00:43:15,920 --> 00:43:20,560
नर नारी नाचे जुग जुग भगत भए बहु तेरे

607
00:43:20,560 --> 00:43:24,640
सब पर सब परे काल के घेरे काहु

608
00:43:24,640 --> 00:43:28,720
भगत ना राम ही पाया भक्ति करत सर्व

609
00:43:28,720 --> 00:43:32,720
जन्म गवाया तो इसी के अर्थ में

610
00:43:32,720 --> 00:43:37,040
मूर्ख खुद ही लिख रहा है अगले पृष्ठ पर 59 में

611
00:43:37,040 --> 00:43:41,280
कि संसार के नर नारी सनक सनंदन नर

612
00:43:41,280 --> 00:43:45,360
नारी भी सनक सनंदन यहां अद्वैत मत की स्थापना हो

613
00:43:45,360 --> 00:43:49,520
रही है। सनातन तथा संत कुमार तथा नारद जी व्यास जी

614
00:43:49,520 --> 00:43:53,600
उनके पिता ऋषि पाराशर जी अगर अद्वैत ना भी माने तो कम

615
00:43:53,600 --> 00:43:57,840
से कम प्रह्लाद मुनि ऋषि जो स्वयं परमात्मा कबीर

616
00:43:57,840 --> 00:44:01,080
जी ही थे। हो

617
00:44:01,080 --> 00:44:07,080
गया। आगे देखते हैं। प्रश्न संख्या

618
00:44:10,760 --> 00:44:14,960
निकालिए। 63 63

619
00:44:14,960 --> 00:44:19,040
अब यहां पर देखिए जो यह लोग कहते हैं ना कि अगर वह स्वयं

620
00:44:19,040 --> 00:44:23,200
कबीर हैं तो वह यू क्यों कहेंगे कि वो परमात्मा उस

621
00:44:23,200 --> 00:44:27,760
परमात्मा उसकी शरण में जा वो तुझे मिलेगा यह होगा वो होगा

622
00:44:27,760 --> 00:44:31,760
वो अपने से भिन्न किसी और की बात क्यों कर रहे हैं मगर यहां

623
00:44:31,760 --> 00:44:36,640
पे कबीर भी बात कर रहे हैं क्या कह रहे हैं पष्ठ संख्या 63 में

624
00:44:36,640 --> 00:44:41,720
पृष्ठ संख्या 63

625
00:44:41,720 --> 00:44:45,760
में कबीर साहब साहब ने बताया है कि वह

626
00:44:45,760 --> 00:44:49,160
परमात्मा जिसका काल ना हो यानी

627
00:44:49,160 --> 00:44:53,360
अविनाशी सत्पुरुष वह सच्चा परमात्मा जिसका नाश

628
00:44:53,360 --> 00:44:57,560
हो नाश हो ना हो यानी

629
00:44:57,560 --> 00:45:01,840
अविनाशी शब्द स्वरूपी राम वह परमात्मा जिसका वास्तविक

630
00:45:01,840 --> 00:45:06,400
स्वरूप शब्द है वास्तविक स्वरूप शब्द है

631
00:45:06,400 --> 00:45:10,880
और शब्द खंड नहीं होता वह नाश में नहीं आता यानी अविनाशी

632
00:45:10,880 --> 00:45:14,960
उस परमात्मा को जो अविनाशी है जिसको शब्द स्वरूपी

633
00:45:14,960 --> 00:45:19,040
राम अकाल मूरत व सत्पुरुष आदि नामों से

634
00:45:19,040 --> 00:45:20,400
जाना जाता है।

635
00:45:20,400 --> 00:45:24,400
को पाना है। किसको पाना है?

636
00:45:24,400 --> 00:45:29,480
उस परमात्मा को। तो यहां हो गया 63 नंबर पृष्ठ

637
00:45:29,480 --> 00:45:33,680
पर हो गया ना? किसको पाना है?

638
00:45:33,680 --> 00:45:37,760
उस परमात्मा को। वह जिसका

639
00:45:37,760 --> 00:45:41,840
मुझे नहीं पाना है। कबीर ने यह नहीं कहा कि मुझे पाना है। उस परमात्मा

640
00:45:41,840 --> 00:45:46,240
को पाना है। यानी कबीर से भी अलग कोई परमात्मा है। अकॉर्डिंग टू रामपाल

641
00:45:46,240 --> 00:45:51,000
थ्योरी। अकॉर्डिंग टू रामपाल कॉमेडी। इसके

642
00:45:51,000 --> 00:45:55,200
बाद जो मुख्य बात है वो है हां।

643
00:45:55,200 --> 00:45:59,600
69 नंबर पेज निकालिए। बहुत बढ़िया बढ़िया तथ्य

644
00:45:59,600 --> 00:46:03,760
मिले हैं। कुछ सरसरी निगाहों से देखा है। सरसरी एक दृष्टि मारी

645
00:46:03,760 --> 00:46:07,760
बस और उसी में जो चीजें पकड़ में आ गई वही हम आपको

646
00:46:07,760 --> 00:46:13,240
प्रस्तुत कर रहे हैं। तो 69 नंबर पेज पर क्या हुआ

647
00:46:13,240 --> 00:46:17,280
है? काल जब दोबारा सृष्टि रचेगा तो

648
00:46:17,280 --> 00:46:21,760
फिर 84 लाख योनियों में कर्म कष्ट भोगने के लिए

649
00:46:21,760 --> 00:46:27,760
दोबारा चले जाएंगे। कौन चले जाएंगे?

650
00:46:30,800 --> 00:46:35,640
जो काल की भक्ति करते हैं, ठीक

651
00:46:35,640 --> 00:46:39,760
है? वो काल के लोक में जाकर निश्चिंत रहते हैं। पहली बात तो

652
00:46:39,760 --> 00:46:44,320
निश्चिंत कैसे रह रहे हैं? काल तो उनको खाता है। ये कंट्राडिक्शन।

653
00:46:44,320 --> 00:46:48,400
दूसरी बात क्या है कि उनको महाप्रलय तक मृत्यु की चिंता नहीं है।

654
00:46:48,400 --> 00:46:52,480
ठीक है? परंतु महाप्रलय में

655
00:46:52,480 --> 00:46:56,480
फिर समाप्त हो जाएंगे और काल जब

656
00:46:56,480 --> 00:47:01,040
दोबारा सृष्टि रचेगा तो फिर 84 लाख योनियों में

657
00:47:01,040 --> 00:47:05,400
कर्म कष्ट भोगने के लिए चले जाएंगे। तो

658
00:47:05,400 --> 00:47:09,600
काल दोबारा सृष्टि कब रचेगा? जब काल मरने

659
00:47:09,600 --> 00:47:14,320
के बाद दोबारा जन्म लेगा। जब काल मर गया तो किसके जाल में फंसा रहा

660
00:47:14,320 --> 00:47:18,640
व्यक्ति वो जीव? पहली बात। दूसरी बात

661
00:47:18,640 --> 00:47:22,880
क्या काल जब दोबारा जन्म लेगा और दोबारा वही सब चीजेंगी तो वो

662
00:47:22,880 --> 00:47:26,960
लोग जिनको यह मालूम पड़ चुका है जैसा कि यह कहते हैं कि अब थोड़ी ना आएंगे हम

663
00:47:26,960 --> 00:47:30,960
लोग वहां से तो ये कह रहे हैं कि काल जब दोबारा सृष्टि रचेगा

664
00:47:30,960 --> 00:47:35,120
तो दोबारा आएंगे यानी ये लोग उस समय मुक्त हो गए होते हैं जब काल मर जाता है दोबारा

665
00:47:35,120 --> 00:47:39,440
सृष्टि रचने के लिए जब वो जन्म लेता है तो ये जो लोग हैं

666
00:47:39,440 --> 00:47:43,520
ये दोबारा काल को देख के हाथ खड़ा करते हैं मुझे फिर जाना है मुझे

667
00:47:43,520 --> 00:47:46,320
फिर जाना है काल के साथ पहली बात

668
00:47:46,320 --> 00:47:51,080
और या फिर यह माना जा सकता है

669
00:47:51,080 --> 00:47:55,280
कि जो आत्माएं मुक्त होती जाती है वह भर

670
00:47:55,280 --> 00:47:59,360
दी गई वापस और नई नई आत्माओं को बनाया जाता है। फैक्ट्री है ना वहां

671
00:47:59,360 --> 00:48:04,000
पर आत्मा बनाने की आत्मा नित्य नहीं है ना इसलिए

672
00:48:04,000 --> 00:48:08,480
खैर आगे चलते हैं। पृष्ठ संख्या 72

673
00:48:08,480 --> 00:48:12,480
उस भगवान पूर्ण ब्रह्म को पाने का मंत्र ये कौन कह रहा

674
00:48:12,480 --> 00:48:14,960
है?

675
00:48:14,960 --> 00:48:18,960
कबीर जी दे रहे हैं उस भगवान को पाने का मंत्र तो अपने से भिन्न

676
00:48:18,960 --> 00:48:24,960
भगवान की व्याख्या 72 पद तीसरा पैराग्राफ

677
00:48:34,360 --> 00:48:38,920
है हां अब यह बहुत बढ़िया चीज आ

678
00:48:38,920 --> 00:48:44,920
गई 75 नंबर का प्रश्न है

679
00:48:45,080 --> 00:48:49,320
और 75 नंबर के पृष्ठ

680
00:48:49,320 --> 00:48:53,360
पर क्या लिखा है नीचे नाम देने

681
00:48:53,360 --> 00:48:57,520
का अधिकारी वही है जिसको गुरु जी ने आदेश दे रखा

682
00:48:57,520 --> 00:49:01,600
है तथा सत्यनाम व सारनाम साधना बताता है।

683
00:49:01,600 --> 00:49:05,600
अब पॉइंट यहां पर ये है कि रामपाल का गुरु था कौन? क्या

684
00:49:05,600 --> 00:49:09,680
वो तत्वदर्शी था? क्या उसको तत्व का

685
00:49:09,680 --> 00:49:14,880
ज्ञान था? कि नहीं था

686
00:49:14,880 --> 00:49:18,880
और अगर वह तत्वदर्शी नहीं था तो रामपाल को यह नाम देने

687
00:49:18,880 --> 00:49:23,200
का अधिकार मिला कहां से चलो कबीर को मान लिया

688
00:49:23,200 --> 00:49:27,600
थोड़ी देर के लिए पूर्ण परमात्मा रामपाल को कहां से मिला क्योंकि रामपाल का गुरु तो तत्वदर्शी

689
00:49:27,600 --> 00:49:33,600
नहीं था क्या था तो बताओ

690
00:49:33,800 --> 00:49:38,320
परंपरा उसको उसको कहां से मिला हम

691
00:49:38,320 --> 00:49:42,360
यहां पे यहां पे इन्होंने परंपरा का समर्थन किया है।

692
00:49:42,360 --> 00:49:46,480
परंतु परंपरा का खंडन ये स्वयं करते हैं। क्योंकि

693
00:49:46,480 --> 00:49:49,920
कबीर जी के स्वयं के गुरु थे रामानंदाचार्य।

694
00:49:49,920 --> 00:49:54,000
मगर ये कबीर को रामानंदाचार्य के विरोध में खड़ा करते हैं।

695
00:49:54,000 --> 00:49:59,000
ठीक है ना? आगे देखिए 76 नंबर पृष्ठ

696
00:49:59,000 --> 00:50:03,200
पर अध्याय श्लोक अध्याय सात श्लोक 12 से 15

697
00:50:03,200 --> 00:50:07,360
12 से 15 20 से 23 में स्पष्ट किया है कि

698
00:50:07,360 --> 00:50:11,360
तीनों गुणों रजगुण ब्रह्मा सद्गुण विष्णु तमगुण शिव की

699
00:50:11,360 --> 00:50:15,440
उपासना करने वाले मूर्ख हैं। वह राक्षस स्वभाव को धारण किए

700
00:50:15,440 --> 00:50:19,680
गए। यह वह आक्षेप है जो आप नोट कर सकते हैं। राक्षस स्वभाव

701
00:50:19,680 --> 00:50:23,680
को धारण किए हुए मनुष्यों में नीच दुष्कर्म करने

702
00:50:23,680 --> 00:50:27,680
वाले हैं। वह मेरी ज्ञान दात गीता ज्ञान

703
00:50:27,680 --> 00:50:31,680
दाता ब्रह्म की पूजा भी नहीं करते। ऐसा कुछ नहीं लिखा है

704
00:50:31,680 --> 00:50:37,680
यहां पर। आगे के प्रश्नों में हम लोग देखेंगे। आगे चलते हैं।

705
00:50:38,640 --> 00:50:42,800
यहां ये बीच में श्लोक 35 वहां से छोड़ा हुआ है। कहीं पर भी इसने श्लोक

706
00:50:42,800 --> 00:50:46,880
की बात नहीं की है। अगर की हो तो भाई मुझे बताना क्योंकि मैंने काफी देख

707
00:50:46,880 --> 00:50:50,960
लिया। इसमें बीच में 35 के बाद 36 वे श्लोक की बात ही नहीं हुई

708
00:50:50,960 --> 00:50:55,200
है कहीं भी। तीसरे अध्याय तीन

709
00:50:55,200 --> 00:50:59,520
श्लोक 35 के बाद इसने अभी तक कोई बात नहीं की है। और इसके

710
00:50:59,520 --> 00:51:02,600
करते करते करते

711
00:51:02,600 --> 00:51:08,600
इसने ये जो है यहां आ

712
00:51:10,600 --> 00:51:14,800
गया। फिर वही 89 नंबर प्रश्न पर अपमान

713
00:51:14,800 --> 00:51:18,880
किया है जो सीता माता का। आप लोग देख सकते हैं। उमा ने ऊपरले मन

714
00:51:18,880 --> 00:51:23,280
से कहा कि अच्छा परीक्षा नहीं लूंगी। परंतु शिव के दूर जाते ही शिवकर

715
00:51:23,280 --> 00:51:27,280
सीता जी का रूप रूप बनाकर यह सोचकर कि मुझे सीता जानकर

716
00:51:27,280 --> 00:51:31,600
प्यार व संतोष करेगा। प्यार किसको करेगा?

717
00:51:31,600 --> 00:51:35,680
तो प्यार व संतोष ये समझ में आ रहा है।

718
00:51:35,680 --> 00:51:41,080
रामचंद्र जी के सामने गई।

719
00:51:41,080 --> 00:51:45,120
हम बात इसके विपरीत हुई। रामचंद्र जी बोले

720
00:51:45,120 --> 00:51:49,120
हे दक्षत्री फिर यह सब है। हां देखिए उधर से काल

721
00:51:49,120 --> 00:51:53,280
मन ने शिव जी को उकसाया तथा पूछ बैठा ले आई

722
00:51:53,280 --> 00:51:57,360
परीक्षा देखिए काल उकसाता है कोई भी दुनिया में कोई

723
00:51:57,360 --> 00:52:01,440
भी गलत कार्य कर रहा है तो काल उकसा रहा है उसको क्योंकि काल मन

724
00:52:01,440 --> 00:52:05,520
भी है तो ये श्री कृष्ण भगवान को काल की

725
00:52:05,520 --> 00:52:09,680
अपेक्षा कर बुरा क्यों सिद्ध कर रहा है भाई तेरा काल ही बुरा

726
00:52:09,680 --> 00:52:13,840
है फिर तू गीता बोलने वाला काल को कैसे सिद्ध कर रहा है जब गीता बोलने वाला ये

727
00:52:13,840 --> 00:52:17,840
कह रहा है कि मैं अगर अच्छे कर्म ना करूं तो दुनिया दुनिया में संसार

728
00:52:17,840 --> 00:52:21,840
में अवस्था फैल जाए और देखिए आगे

729
00:52:21,840 --> 00:52:25,760
पृष्ठ संख्या 91

730
00:52:25,760 --> 00:52:31,760
यहां क्या किया है इसने?

731
00:52:48,800 --> 00:52:53,120
यहां इसने क्या किया है? यह विचार कर भगवान

732
00:52:53,120 --> 00:52:57,680
विष्णु अंतर्ध्य हो गए। कुछ दूरी पर

733
00:52:57,680 --> 00:53:03,120
यह सेकंड पैराग्राफ है जो बड़ा सा उसमें

734
00:53:03,120 --> 00:53:07,440
नीचे से अगर गिने तो एक दो तीन चार पांच छ सात आठ

735
00:53:07,440 --> 00:53:11,680
आठवीं लाइन है नीचे से सेकंड पैराग्राफ में नीचे से आठवीं लाइन

736
00:53:11,680 --> 00:53:15,680
क्या लिखा है यह विचार कर भगवान विष्णु

737
00:53:15,680 --> 00:53:19,760
अंतर्ध्यान हो गए कुछ दूरी पर एक सुंदर युवा मतलब

738
00:53:19,760 --> 00:53:24,000
भगवान शंकर भगवान विष्णु से कह रहे हैं कि आपने अमुक अमुक अवसर

739
00:53:24,000 --> 00:53:28,040
पर जो रूप बनाया था वो रूप मुझे दोबारा दिखाओ तो पहले मना कर रहे हैं। फिर उन्होंने

740
00:53:28,040 --> 00:53:32,400
दिखाया। हां। तो इसमें देखिए इसने मिलावट क्या की है।

741
00:53:32,400 --> 00:53:36,640
यह विचार कर विष्णु अंतर्ध्य हो गए। कुछ दूरी पर एक सुंदर

742
00:53:36,640 --> 00:53:40,800
युवा स्त्री के रूप में अर्ध नग्न शरीर युक्त पोशाक पहने हुए

743
00:53:40,800 --> 00:53:45,600
दिखाई दिए। अब कोई है माई का लाल जो लाकर दिखाए

744
00:53:45,600 --> 00:53:49,760
कि अर्ध नग्न शरीर युक्त पोशाक पहने हुए दिखाई

745
00:53:49,760 --> 00:53:53,920
दिए थे। भगवान विष्णु स्त्री के रूप में भगवान शिव को।

746
00:53:53,920 --> 00:53:58,320
यह है इसकी नीचता जो इसने मिलाई है।

747
00:53:58,320 --> 00:54:02,560
ठीक है? और आगे चलते हैं।

748
00:54:02,560 --> 00:54:06,640
मन स्वयं काल है। आगे के पन्नों में भी यही सब है। और इस प्रकार से

749
00:54:06,640 --> 00:54:11,600
इसने तीसरा अध्याय पूरा कर दिया। इसने 35वें के बाद

750
00:54:11,600 --> 00:54:16,680
चर्चा ही नहीं की है। अपनी क्या है? कचरा है, क्या

751
00:54:16,680 --> 00:54:20,960
है? 35व श्लोक के बाद इसने बात ही नहीं की कि अध्याय

752
00:54:20,960 --> 00:54:25,440
तीन में 36 वे श्लोक में क्या है? 37 श्लोक में क्या है?

753
00:54:25,440 --> 00:54:29,520
तो अब क्या होगा कि एक तरीके से यह खंडित खंडन हो

754
00:54:29,520 --> 00:54:34,600
गया इनका जब 36 37 38 39 40

755
00:54:34,600 --> 00:54:38,640
और 41 है ना

756
00:54:38,640 --> 00:54:42,840
शायद संभवत 45 श्लोक है 43 है 45

757
00:54:42,840 --> 00:54:46,960
43 तो 43 36 से लेकर 43 यानी

758
00:54:46,960 --> 00:54:52,400
यहां सीधेसीधे इसने एक तरीके से बिना कुछ कहे

759
00:54:52,400 --> 00:54:56,000
कितने श्लोकों का खंडन कर दिया? पांच और तीन आठ।

760
00:54:56,000 --> 00:55:00,000
ठीक है? मगर हम अपने श्लोकों की व्याख्या और फिर हम आप

761
00:55:00,000 --> 00:55:04,000
तब तक वो स्ट्रीम का वो दे दीजिए लिंक हम अपना अर्थ

762
00:55:04,000 --> 00:55:08,000
पढ़ लेते हैं। तो 36व में भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन

763
00:55:08,000 --> 00:55:12,080
से अर्जुन बोले भगवान श्री कृष्ण से 36व में

764
00:55:12,080 --> 00:55:16,400
हे कृष्ण तो फिर यह मनुष्य स्वयं ना चाहता हुआ भी बलात लगाए हुए

765
00:55:16,400 --> 00:55:21,440
की भांति किससे प्रेरित होकर पाप आचरण करता है?

766
00:55:21,440 --> 00:55:25,760
भगवान बोले रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है।

767
00:55:25,760 --> 00:55:29,840
यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से भी कभी ना गाने वाला और

768
00:55:29,840 --> 00:55:35,840
बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में बैरी

769
00:55:36,200 --> 00:55:40,480
जान। है ना? यह देख लेना भाई। मुझे मैंने

770
00:55:40,480 --> 00:55:44,720
कोशिश की है कि मुझे मिल जाए। मगर मुझे दिखा नहीं कि 35

771
00:55:44,720 --> 00:55:48,960
नंबर के बाद से श्लोकों का कहीं पर अर्थ किया हो। इस

772
00:55:48,960 --> 00:55:51,600
व्यक्ति ने

773
00:55:51,600 --> 00:55:56,600
तो आप लोग देखना किया है कि नहीं किया है और

774
00:55:56,600 --> 00:56:00,600
बताना तो इन्होंने काम को

775
00:56:00,600 --> 00:56:04,640
अ व्यक्ति के पसने का कारण बताया

776
00:56:04,640 --> 00:56:08,720
है काम ही क्रोध है

777
00:56:08,720 --> 00:56:12,800
रजोगुण से उत्पन्न जिस प्रकार धुएं से अग्नि ये

778
00:56:12,800 --> 00:56:16,880
हम लोग पढ़ रहे हैं 38वा जिस प्रकार

779
00:56:16,880 --> 00:56:20,960
धुएं से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जिस

780
00:56:20,960 --> 00:56:25,280
प्रकार जेर से गर्भ ढका रहता है वैसे ही

781
00:56:25,280 --> 00:56:30,360
काम के द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है।

782
00:56:30,360 --> 00:56:34,480
39वा हे अर्जुन इस अग्नि के समान कभी ना पूर्ण होने

783
00:56:34,480 --> 00:56:38,720
वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी के द्वारा मनुष्य

784
00:56:38,720 --> 00:56:42,800
का ज्ञान ढका हुआ है। इंद्रियां, मन

785
00:56:42,800 --> 00:56:47,120
और बुद्धि ये हम 40वा पढ़ रहे हैं। यह सब इसके वास

786
00:56:47,120 --> 00:56:51,200
स्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इंद्रियों

787
00:56:51,200 --> 00:56:55,440
के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा

788
00:56:55,440 --> 00:57:01,440
को मोहित करता

789
00:57:03,640 --> 00:57:07,680
है। इसलिए हे अर्जुन तू पहले इंद्रियों को वश में करके

790
00:57:07,680 --> 00:57:11,760
इस ज्ञान का और विज्ञान का नाश करने वाले महान

791
00:57:11,760 --> 00:57:16,000
पापी काम को अवश्य ही बल पूर्वक मार डाल। काम

792
00:57:16,000 --> 00:57:20,000
को वश में करने की बात की जा रही है। इंद्रियों को स्थूल

793
00:57:20,000 --> 00:57:24,000
शरीर से पर यानी श्रेष्ठ बलवान

794
00:57:24,000 --> 00:57:28,400
और सूक्ष्म कहते हैं। इन इंद्रियों से पर मन है।

795
00:57:28,400 --> 00:57:32,480
मन से भी पर बुद्धि है और बुद्धि से भी अत्यंत

796
00:57:32,480 --> 00:57:37,120
पर वह आत्मा है।

797
00:57:37,120 --> 00:57:41,280
ठीक है? यहां पे इन्होंने पर का अर्थ क्यों लिया है? क्योंकि

798
00:57:41,280 --> 00:57:45,360
परे परे परे परह परतः यह कई बार

799
00:57:45,360 --> 00:57:49,440
आ रहा है और यहां पर दिखाई दे रहा है कि एक क्रम बताया जा

800
00:57:49,440 --> 00:57:53,520
रहा है कि इंद्रियों से परे मन है। मन से परे बुद्धि

801
00:57:53,520 --> 00:57:58,600
है। बुद्धि से परे जो बुद्धि से भी अत्यंत परे है वह आत्मा

802
00:57:58,600 --> 00:58:04,600
है। तो यहां

803
00:58:07,040 --> 00:58:11,840
यही बताया गया कठोपनिषद अह

804
00:58:11,840 --> 00:58:15,920
में भी यही बात बताई गई है। और 43वें में कहा गया

805
00:58:15,920 --> 00:58:19,920
है इस प्रकार बुद्धि से परे अर्थात सूक्ष्म बलवान और

806
00:58:19,920 --> 00:58:24,000
अत्यंत श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को

807
00:58:24,000 --> 00:58:28,240
वश में करके हे महाबाहु तू निष्काम रूप दुर्जन शत्रु

808
00:58:28,240 --> 00:58:32,320
को मार डाल। तो यह जो है भगवत

809
00:58:32,320 --> 00:58:36,760
गीता का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ। अब हम लोग बात कर सकते

810
00:58:36,760 --> 00:58:40,880
हैं। किसी ने अगर ज्वाइन किया हो तो आज आपको कॉमेडी अच्छी

811
00:58:40,880 --> 00:58:43,920
लगी हो संभवतः

812
00:58:43,920 --> 00:58:48,440
रामपाल की और दे दीजिए भाई एक बार

813
00:58:48,440 --> 00:58:52,160
लिंक कोई अगर आना चाहे किसी वैचारिक मतभेद के निमित्त

814
00:58:52,160 --> 00:58:56,520
चर्चा करना चाहे तो छोटी-मोटी तो कर सकता

815
00:58:56,520 --> 00:59:01,160
है किसी प्रकार का कोई विचार प्रकट करना चाहे तो आ सकता

816
00:59:01,160 --> 00:59:05,360
है और यदि एक कोई बड़ा

817
00:59:05,360 --> 00:59:09,360
टॉपिक है तो उसके लिए वह हमसे हमारे

818
00:59:09,360 --> 00:59:13,920
दिए गए नंबर पर संपर्क कर सकता है नंबर नंबर दिखा दीजिए और

819
00:59:13,920 --> 00:59:18,720
हमें आर्थिक बल प्रदान करने के लिए अभी

820
00:59:18,720 --> 00:59:22,720
भी आप यहां पर आपको जानकारी मिल जाएगी। अभियान को

821
00:59:22,720 --> 00:59:28,720
आर्थिक बल जो प्रदान करना चाहते हैं वो अवश्य

822
00:59:36,360 --> 00:59:40,640
करें। तो हमने काफी सारी कॉमेडी इस ग्रंथ इसमें पढ़ी

823
00:59:40,640 --> 00:59:44,840
और सबसे बड़ी एक चीज है कि व्यक्ति इतना उसमें

824
00:59:44,840 --> 00:59:49,280
अपने नशे में हो गया कि श्लोक

825
00:59:49,280 --> 00:59:53,880
35 के बाद

826
00:59:53,880 --> 00:59:58,240
उसने 36 से ले और 43 तक उसने कुछ

827
00:59:58,240 --> 01:00:02,240
अर्थ ही नहीं बताया। ना भावार्थ ना अनुवाद ना कुछ। यह

828
01:00:02,240 --> 01:00:06,560
यहां पर हमारे संस्था का डिटेल आ रही है। आप

829
01:00:06,560 --> 01:00:10,880
इसमें हमें आर्थिक बल इसके द्वारा उपलब्ध

830
01:00:10,880 --> 01:00:14,600
करा सकते

831
01:00:14,600 --> 01:00:18,880
हैं। अगले सप्ताह चौथा अध्याय शुरू होगा और

832
01:00:18,880 --> 01:00:22,960
धीरे-धीरे रोचकता बढ़ती जाएगी। बुलेट पॉइंट्स आपको मिलते

833
01:00:22,960 --> 01:00:27,120
रहेंगे। बुलेट पॉइंट्स का

834
01:00:27,120 --> 01:00:31,200
एक व्याख्या देखने के लिए आप को इन वीडियोस पर आना पड़ेगा।

835
01:00:31,200 --> 01:00:35,200
मेरे ख्याल से कोई है नहीं अभी आने का इच्छुक। तो हम लोग अब इस चर्चा को विराम

836
01:00:35,200 --> 01:00:39,800
देते हैं। अगले सप्ताह मिलेंगे बुधवार को

837
01:00:39,800 --> 01:00:44,240
सायल 78 या 9:00 बजे।

838
01:00:44,240 --> 01:00:48,240
तब तक के लिए जय श्री राम।
