1
00:00:01,680 --> 00:00:05,880
सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक से

2
00:00:05,880 --> 00:00:08,280
होंगे

3
00:00:08,280 --> 00:00:12,840
और अपने से सभी छोटों को ढेर सारा प्यार

4
00:00:12,840 --> 00:00:17,040
आशीर्वाद और सभी वरिष्ठ

5
00:00:17,040 --> 00:00:21,520
हैं जो प्रणम में है जो सभी को

6
00:00:21,520 --> 00:00:24,280
यथोचित

7
00:00:24,280 --> 00:00:29,120
अभिवादन देर ना करते हुए क्योंकि ऑलरेडी आज लेट है

8
00:00:29,120 --> 00:00:33,200
मेरे लेट होने की कारण को मैं आशा करता हूं

9
00:00:33,200 --> 00:00:35,760
आप सभी समझते होंगे।

10
00:00:35,760 --> 00:00:41,320
तो देर ना करते हुए सबसे पहले हम

11
00:00:41,320 --> 00:00:45,680
जो बुलेट पॉइंट्स हैं अ जो चौथा

12
00:00:45,680 --> 00:00:49,920
एपिसोड हमारा हुआ है जिसमें कि हम चैप्टर

13
00:00:49,920 --> 00:00:53,880
तीन

14
00:00:53,880 --> 00:00:58,320
के 38वें चैप्टर तीन के

15
00:00:58,320 --> 00:01:04,320
तीन की जो शुरुआत है उसको हम लोग पढ़ेंगे।

16
00:01:04,720 --> 00:01:08,720
तो बुलेट पॉइंट्स में हमने पिछले एपिसोड में जाना था। अर्जुन

17
00:01:08,720 --> 00:01:12,800
ने भी ठीक वैसा ही प्रश्न किया जैसा मार्कंडेय पुराण

18
00:01:12,800 --> 00:01:16,800
में जो मुनि की कथा है जिनके पितर

19
00:01:16,800 --> 00:01:21,040
उनको दर्शन देते हैं और यह कहते हैं कि भाई तुमने तुम

20
00:01:21,040 --> 00:01:25,120
इस तरह से विरक्त हो गए हो और तुमने सभी जो कार्य हैं

21
00:01:25,120 --> 00:01:29,200
कर्म है उनको छोड़ दिया है तो वहां पर जो मुनि होते

22
00:01:29,200 --> 00:01:33,360
हैं रुचि मुनि थे संभवत उनका नाम तो वो अपने पितरों से कहते

23
00:01:33,360 --> 00:01:37,360
हैं कि जब मैं ऑलरेडी कर्मों से कर्मों के बंधन से मुक्त हो गया हूं तो तुम मुझे

24
00:01:37,360 --> 00:01:41,840
मुझे दोबारा कर्म में लिप्त होने को क्यों कह रहे हो? तो वहां पर उनका अभिप्राय

25
00:01:41,840 --> 00:01:45,840
था कि कर्म ना करने से अच्छा होता है कर्म

26
00:01:45,840 --> 00:01:50,080
करना परंतु आसक्ति रहित होकर। और वहां पर उनका कहना था कि व्यक्ति कर्म

27
00:01:50,080 --> 00:01:51,040
मार्ग पर चलते

28
00:01:51,040 --> 00:01:55,040
हुए ग्रस्त होते हुए भी मुक्ति को प्राप्त हो सकता है।

29
00:01:55,040 --> 00:01:59,280
तो ऐसा ही प्रश्न यहां पर चैप्टर तीन की शुरुआत में

30
00:01:59,280 --> 00:02:03,840
अर्जुन जी ने किया भगवान श्री कृष्ण से। अब मार्कंडेय

31
00:02:03,840 --> 00:02:08,480
पुराण में इस कथा के आधार पर रामपाल

32
00:02:08,480 --> 00:02:12,720
और उसके मूर्ख अनुयाई यह कहते

33
00:02:12,720 --> 00:02:17,680
हैं कि अ ये

34
00:02:17,680 --> 00:02:21,680
देखो देखो पितर जो जब व्यक्ति खुद जो है अविद्या से दूर

35
00:02:21,680 --> 00:02:25,680
हो गया है कर्म बंधनों से दूर हो गया तो पितर देखो दोबारा घसीट रहे हैं। जबकि

36
00:02:25,680 --> 00:02:31,000
दूसरे अध्याय में भी और यह जो तीसरा हम लोग अध्ययन करने जा रहे हैं, इसमें

37
00:02:31,000 --> 00:02:35,280
भी कई बार उसने यह माना है कि कर्म यानी गृहस्थ

38
00:02:35,280 --> 00:02:39,280
होते हुए भी गस्थ सांसारिक संसार में रहते हुए भी व्यक्ति यदि

39
00:02:39,280 --> 00:02:43,280
आसक्ति रहित कर्मों को करने लगेगा तो वह भी मुक्ति पाएगा।

40
00:02:43,280 --> 00:02:47,400
ठीक है? तो हम बुलेट पॉइंट्स को ले लेते हैं। सबसे

41
00:02:47,400 --> 00:02:50,720
पहले इसमें

42
00:02:50,720 --> 00:02:55,120
यहां पर भी चैप्टर तीन की शुरुआत में भी

43
00:02:55,120 --> 00:02:59,600
चैप्टर तीन की शुरुआत हम निकाल लेते हैं।

44
00:02:59,600 --> 00:03:03,960
चैप्टर तीन की जो शुरुआत है उसमें भी इसने जो अर्थ

45
00:03:03,960 --> 00:03:06,080
है जहां पर कर्म

46
00:03:06,080 --> 00:03:10,080
आया है कि कर्म हमको क्या शास्त्र सम्मत कर्म हमको किस तरह से करने

47
00:03:10,080 --> 00:03:14,080
होते हैं उस उसको उनको करते समय हमारे अंदर क्या भावना होनी

48
00:03:14,080 --> 00:03:18,280
चाहिए जैसे कि मान लीजिए

49
00:03:18,280 --> 00:03:22,480
कि विवाह तो विवाह को करते समय हमारी भावना

50
00:03:22,480 --> 00:03:26,560
क्या होनी चाहिए हमारे मन में किस तरह का होना चाहिए क्या

51
00:03:26,560 --> 00:03:30,560
कर्म से मिलने वाले जो भोग हैं उसमें उसमें आसक्ति होनी चाहिए

52
00:03:30,560 --> 00:03:34,760
या नहीं होनी चाहिए। तो ये सब बताया गया है यहां पर। परंतु ये हर

53
00:03:34,760 --> 00:03:39,320
जगह जहां पर कर्म की बात हो रही है वहां पर भक्ति कर्म कर देता है

54
00:03:39,320 --> 00:03:43,320
रामपाल। तो ये इसका एक ढोल चल रहा है लगातार

55
00:03:43,320 --> 00:03:47,360
और अगर जहां पर भी कर्म की बात हो

56
00:03:47,360 --> 00:03:51,680
रही है वहां ये भक्ति कर्म कह देता है। यानी कि भक्ति कैसे करनी है और क्या सोचते

57
00:03:51,680 --> 00:03:55,760
हुए करनी है ये बताया गया। बाकी जो जीवन के अन्य कर्म है जो

58
00:03:55,760 --> 00:04:00,080
शास्त्रों द्वारा वर्णित है कि तुम्हें ऐसे करना है विवाह ऐसे करना है इससे

59
00:04:00,080 --> 00:04:04,880
करना है उससे करना है ये सब शास्त्रों की जो आज्ञा है जिसके लिए कहा गया है कि

60
00:04:04,880 --> 00:04:09,040
16 23 और 24 में कि तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के

61
00:04:09,040 --> 00:04:13,120
लिए एकमात्र शास्त्र प्रमाण है। तो ये सब जो चीजें बताई गई है कर्मों के लिए ये

62
00:04:13,120 --> 00:04:17,200
इसमें भी कह देता है कि भक्ति ऐसे करनी है। तो अगर भक्ति ऐसे करनी है तो

63
00:04:17,200 --> 00:04:21,280
व्यक्ति को अपने जीवन में कर्म किस भावना के साथ करने हैं यह

64
00:04:21,280 --> 00:04:25,280
कहां पर बताया गया है? यह बहुत बड़ा एक फैक्ट है जो रामपाल ने कहीं पर भी

65
00:04:25,280 --> 00:04:29,760
बताया ही नहीं है कि आपको अपने जीवन में कर्म

66
00:04:29,760 --> 00:04:34,080
नॉट भक्ति कर्म क्या सोचते हुए करने हैं। पहली बात

67
00:04:34,080 --> 00:04:38,080
दूसरी बात इसी में ये पष्ठ संख्या 38 चल रही है

68
00:04:38,080 --> 00:04:42,920
गमा गीता की पृष्ठ संख्या 38 और उसके

69
00:04:42,920 --> 00:04:47,040
पहले श्लोक में अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से यही कहा है कि

70
00:04:47,040 --> 00:04:51,040
भाई वही मार्कंडेय पुराण की तरह कि जब मैं कर्मों से जब कर्मों से विरक्त होने में

71
00:04:51,040 --> 00:04:55,040
ही मुक्ति है। कर्म से मतलब जो मन में

72
00:04:55,040 --> 00:04:59,360
जो कर्मों से दूर हो जाने की जो कर्म बंधन से ही मुक्ति का नाम मुक्ति

73
00:04:59,360 --> 00:05:03,360
है तो फिर आप मुझे कर्म में क्यों जोड़ रहे हैं? ये करने को क्यों कह रहे वो करने को क्यों

74
00:05:03,360 --> 00:05:08,000
कह रहे हैं? तो भगवान श्री कृष्ण ने यहां पर बताना शुरू किया

75
00:05:08,000 --> 00:05:12,000
और जो भी उन्होंने बताया मगर इसने इसने झोल क्या किया वो हम

76
00:05:12,000 --> 00:05:16,240
बात कर रहे हैं मोटे उसको ही बुलेट पॉइंट्स का नाम दिया है। तो सबसे पहले तो इसने

77
00:05:16,240 --> 00:05:20,720
प्रत्येक जहां पर कर्म की बात हो रही है उसको भक्ति कर्म कर दिया। दूसरी बात

78
00:05:20,720 --> 00:05:24,440
इसके आगे

79
00:05:24,440 --> 00:05:28,720
इसने माना है कि जो क्योंकि

80
00:05:28,720 --> 00:05:32,960
ये कहता है ना कि ब्रह्मा विष्णु महेश सत रज

81
00:05:32,960 --> 00:05:36,960
और तम गुण है। गुण के अधिष्ठाता नहीं है या गुण

82
00:05:36,960 --> 00:05:41,360
के वो उस डिपार्टमेंट को संभालने वाले नहीं है। वो स्वयं गुण ही है। ठीक है?

83
00:05:41,360 --> 00:05:45,440
तो अभी यहां पर इसने क्या किया है? पृष्ठ

84
00:05:45,440 --> 00:05:49,600
संख्या 38 में कि इसने ये स्वीकार किया

85
00:05:49,600 --> 00:05:54,280
है कि जीव तीनों देवताओं से निकल रहे गुणों के प्रभाव

86
00:05:54,280 --> 00:05:58,560
से गलत कर्म करता है। पाप कर्म करता है।

87
00:05:58,560 --> 00:06:02,640
तो तीनों देवताओं से निकल रहे

88
00:06:02,640 --> 00:06:06,640
गुणों के प्रभाव से। ठीक है? गुण उनसे निकल रहे हैं।

89
00:06:06,640 --> 00:06:10,960
देवता स्वयं गुण नहीं। और यदि वह स्वयं गुण है तो निकल भी

90
00:06:10,960 --> 00:06:15,120
वही देवता रहे तो फिर बात बनेगी नहीं।

91
00:06:15,120 --> 00:06:19,600
ठीक है? तो यह हम लोग करते चलेंगे। इसमें कई प्रकार से

92
00:06:19,600 --> 00:06:23,760
इसकी ही बातों से इसी की बातों का प्रतिकार होगा, खंडन होगा।

93
00:06:23,760 --> 00:06:28,320
जो मूर्खता की पराकाष्ठा इसने की है तो गुण निकल रहे हैं

94
00:06:28,320 --> 00:06:32,320
यानी कि वह स्वयं गुण नहीं है। इसके

95
00:06:32,320 --> 00:06:36,560
बाद क्या है कि त्रिदेव पाप करवाते

96
00:06:36,560 --> 00:06:39,760
हैं। इसने यहां पर ये माना है कि त्रिदेव

97
00:06:39,760 --> 00:06:43,760
जो है ब्रह्मा विष्णु महेश ये व्यक्ति से पाप कराते हैं।

98
00:06:43,760 --> 00:06:49,280
जबकि इसी अध्याय में थोड़ा आगे क्या कहा है?

99
00:06:49,280 --> 00:06:53,360
पष्ठ संख्या 43 पष्ठ संख्या 43

100
00:06:53,360 --> 00:06:57,600
में इसने कहा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश जब कोई व्यक्ति भक्ति

101
00:06:57,600 --> 00:07:01,880
कर रहा होता है इसके अनुसार तो उसको ब्रह्मा विष्णु महेश बिन

102
00:07:01,880 --> 00:07:06,000
मांगे मतलब सभी जो इक्षित फल होते हैं सब दे देते हैं

103
00:07:06,000 --> 00:07:10,080
यानी कि वहां पर त्रिदेव किसको पोषित कर रहे हैं जो व्यक्ति

104
00:07:10,080 --> 00:07:14,160
पुण्य करने वाला है इसके ही अनुसार और यहां पर क्या कह

105
00:07:14,160 --> 00:07:18,160
रहा है कि त्रिदेव का पाप करवाते हैं तो या तो यहां

106
00:07:18,160 --> 00:07:22,400
पे रामपाल सही हो सकता है या फिर वहां पर सही हो सकता है या फिर कोई आके

107
00:07:22,400 --> 00:07:26,400
बता सकता है कि भैया त्रिदेव पाप करवाते हैं या पुण्य करवाते हैं

108
00:07:26,400 --> 00:07:30,800
क्योंकि यदि वो पुण्य करने वाले को फल दे रहे हैं अच्छा इक्षित

109
00:07:30,800 --> 00:07:35,120
फल तो फिर वो पाप करवाने वाले सिद्ध नहीं होंगे

110
00:07:35,120 --> 00:07:39,200
है ना पहली बात अच्छा और आगे चलते हैं बुलेट

111
00:07:39,200 --> 00:07:43,360
पॉइंट और क्या है इसने इस पृष्ठ

112
00:07:43,360 --> 00:07:47,360
में पृष्ठ संख्या 38 में भक्ति के बिना इंद्रिय

113
00:07:47,360 --> 00:07:51,520
इंद्रिय निग्रह करने का खंडन किया है जो कि वो भी है। मगर हम ये बात

114
00:07:51,520 --> 00:07:55,120
उठा क्यों रहे हैं? क्योंकि ये ये कई जगह पर इंद्रिय

115
00:07:55,120 --> 00:07:59,200
निग्रह करने जब जब व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण की पूजा करेगा

116
00:07:59,200 --> 00:08:03,200
ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करेगा उनका नाम जप करेगा एक स्थान पर

117
00:08:03,200 --> 00:08:07,320
बैठकर करेगा तो ये कहेगा नहीं एक स्थान पर बैठ के नहीं करना चलते फिरते करना

118
00:08:07,320 --> 00:08:11,600
है। चलते फिरते भी कर सकते हैं। मगर एक स्थान पर बैठने का खंडन

119
00:08:11,600 --> 00:08:16,080
तो नहीं है। यह कहा जा रहा है कि हठ पूर्वक यदि कोई व्यक्ति

120
00:08:16,080 --> 00:08:20,200
अ हम अपने कर्मेंद्रियों पर तो कंट्रोल कर ले मगर मन में

121
00:08:20,200 --> 00:08:24,240
चिंतन जो जिन चीज जिन जिन विषयों से अपने आप

122
00:08:24,240 --> 00:08:28,320
को रोक रखा है कर्मेंद्र्रियों के द्वारा उन विषयों का ही चिंतन मन में

123
00:08:28,320 --> 00:08:32,480
यदि करता रहेगा तो बात नहीं बनेगी वो मूर्ख है फिर उसको मन से भी

124
00:08:32,480 --> 00:08:36,960
उसका चिंतन त्यागना होगा जिसको उसने अपने तन से त्यागा

125
00:08:36,960 --> 00:08:40,960
ये भगवान का कहने का तात्पर्य है कि वो मूर्ख होते हैं जो हठ पूर्वक अपनी

126
00:08:40,960 --> 00:08:45,040
इंद्रियों को तुम कर लेते हैं कंट्रोल कर लेते

127
00:08:45,040 --> 00:08:49,200
हैं और मन में उसी का उनहीं विषयों का चिंतन करते रहते हैं। वो मूर्ख होते हैं। तो

128
00:08:49,200 --> 00:08:53,360
इसने वहां पर क्या कर दिया कि नहीं हठ पूर्वक में भक्ति करना एक जगह आसन बिछाकर

129
00:08:53,360 --> 00:08:57,680
भक्ति करना और ध्यान लगाना ये सब गलत है। ये है

130
00:08:57,680 --> 00:09:01,840
मूर्खता की पराकाष्ठा। खैर आगे

131
00:09:01,840 --> 00:09:06,080
चलते हैं। और क्या किया इसमें? इसमें इसने फिर

132
00:09:06,080 --> 00:09:10,400
यहां पर निष्काम कर्म का समर्थन किया है। अब निष्काम कर्म का समर्थन

133
00:09:10,400 --> 00:09:14,400
जब कर दिया 3.9 में तो 3.9 में

134
00:09:14,400 --> 00:09:18,920
इसने निष्काम कर्म करने का समर्थन कर दिया तो इसने एक जगह

135
00:09:18,920 --> 00:09:23,040
दो बिना लाभ के युद्ध नहीं। इसने दूसरे अध्याय में ये

136
00:09:23,040 --> 00:09:27,040
कहा था बिना लाभ के कैसा युद्ध? तो फिर यहां पर निष्काम कर्म करने

137
00:09:27,040 --> 00:09:31,120
का समर्थन करके अपनी उस बात का खंडन कर दिया। तो बिना लाभ के

138
00:09:31,120 --> 00:09:35,120
युद्ध नहीं हो सकता। यह कहकर इसने कम से कम अब तक हमने नोट

139
00:09:35,120 --> 00:09:39,280
कर लिए हैं। एक दो तीन चार पांच छ सात 8 9

140
00:09:39,280 --> 00:09:43,360
10 11 12 13 14 15 16 अभी तक के अध्ययन

141
00:09:43,360 --> 00:09:47,360
में बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता। बिना लाभ

142
00:09:47,360 --> 00:09:51,760
के युद्ध कैसे होगा? यह वाली बात कहकर कम से कम अभी तक 16

143
00:09:51,760 --> 00:09:56,960
श्लोक ऐसे हैं भगवत गीता के जिसका इसने खंडन किया है। ठीक है?

144
00:09:56,960 --> 00:10:01,080
दूसरी बात और क्या है कि इस इसमें भी

145
00:10:01,080 --> 00:10:05,360
इसने कहीं पर आज के जो बुलेट पॉइंट्स मैं आपको बता रहा हूं उसमें

146
00:10:05,360 --> 00:10:11,360
भी इसने राग

147
00:10:13,400 --> 00:10:18,120
द्वेष राग द्वेष में

148
00:10:18,120 --> 00:10:22,160
अंतर मतलब करना सिखाया है कि राग द्वेष तो होना ही चाहिए।

149
00:10:22,160 --> 00:10:26,240
राग द्वेष के बिना जो है काम कर्म नहीं होंगे। ठीक है? तो

150
00:10:26,240 --> 00:10:30,400
यह इसने इसमें सिखाया। कहने का मतलब है अपनी बात को खुद ही काट रहा है। आगे

151
00:10:30,400 --> 00:10:34,480
चलते हैं और क्या है आज के में? आज के बुलेट पॉइंट्स में अनुवाद के नाम पर

152
00:10:34,480 --> 00:10:39,600
इसने बार-बार वो तो किया ही है अपना बकवाद

153
00:10:39,600 --> 00:10:44,200
अनुवाद के नाम पर। अच्छा और क्या है? अब आ जाते

154
00:10:44,200 --> 00:10:48,280
हैं प्रश्न संख्या 39।

155
00:10:48,280 --> 00:10:52,640
हम 39 पेज पर क्या है? कि

156
00:10:52,640 --> 00:10:56,800
सबसे पहले तो मार्कंडेय पुराण में जो कर्म करने का

157
00:10:56,800 --> 00:11:01,120
समर्थन किया गया है वही समर्थन इसने यहां पर भी किया है

158
00:11:01,120 --> 00:11:05,120
रामपाल ने जिस मार्कंडेय पुराण की जिस बात का खंडन करता है जो पितरों

159
00:11:05,120 --> 00:11:09,280
के द्वारा कही गई थी वही अपनी बात का यहां खंडन करता है ये

160
00:11:09,280 --> 00:11:13,520
क्या कह रहा है यहां पर ये कि इसलिए परमात्मा के निमित्त शास्त्र वर्णित

161
00:11:13,520 --> 00:11:17,840
कर्तव्य कर्म कर्म यानी कर्तव्य कर्म जो है करते रहना

162
00:11:17,840 --> 00:11:23,840
चाहिए। ठीक है? अच्छा अब आगे क्या है?

163
00:11:23,840 --> 00:11:28,240
तीन छ 9 के अर्थ में इसने लिखा है एकांत

164
00:11:28,240 --> 00:11:28,740
में

165
00:11:28,480 --> 00:11:32,680
बैठकर ध्यान लगाने का खंडन किया है। वो हमने आपको बता ही दिया।

166
00:11:32,680 --> 00:11:36,720
जबकि भगवान श्री कृष्ण ने क्या कहा है कि केवल

167
00:11:36,720 --> 00:11:40,960
इंद्रिय निग्रह करने से काम नहीं चलेगा। चिंतन मनन भी विषयों

168
00:11:40,960 --> 00:11:45,040
का छोड़ना पड़ेगा और उसके लिए आवश्यक है कि आप चिंतन मनन किसका

169
00:11:45,040 --> 00:11:49,440
कर रहे हो? ईश्वर का। और यही बात

170
00:11:49,440 --> 00:11:54,240
भगवान ने क्या कहते हैं?

171
00:11:54,240 --> 00:11:59,560
इसने यहां पर उदाहरण दिए हैं कुछ श्लोकों के। तो यही बात इस भगवान

172
00:11:59,560 --> 00:12:05,560
ने उपाय उपाय के रूप में बताया

173
00:12:05,640 --> 00:12:10,000
है कि भाई यदि हां

174
00:12:10,000 --> 00:12:14,320
अध्याय आठ के श्लोक सात में इसने

175
00:12:14,320 --> 00:12:18,560
कहा है कि अर्थ गलत किया है कि हर समय मेरा स्मरण

176
00:12:18,560 --> 00:12:22,560
भी कर मेरा युद्ध भी कर इस प्रकार से मेरे आदेश का पालन करते हुए

177
00:12:22,560 --> 00:12:26,640
अर्थात सांसारिक कर्म करते करते साधना करते हुए मुझे ही प्राप्त

178
00:12:26,640 --> 00:12:30,640
होगा। भले ही अपनी परम गति को अब यह इसने फिर वो अपनी बकवास

179
00:12:30,640 --> 00:12:34,640
व्याख्या चालू कर दी। भले ही अपनी परम गति को श्लोक सात

180
00:12:34,640 --> 00:12:38,640
अध्याय सात श्लोक 18 में अनुत्तम बताया। इसके अनुसार जो है

181
00:12:38,640 --> 00:12:42,800
घटिया जो ये कहता है गीता बोलने वाले की भ जो भक्ति है वो

182
00:12:42,800 --> 00:12:47,120
घटिया है। मगर वहां भगवान ने क्या कहा है कि तुम निरंतर

183
00:12:47,120 --> 00:12:51,120
मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो। तो क्या हुआ कि विषयों

184
00:12:51,120 --> 00:12:57,120
का चिंतन छोड़कर मेरा चिंतन करो। अपना कर्तव्य कर्म करते रहो। ठीक है?

185
00:12:57,560 --> 00:13:01,680
तो यह सब इसने यहां पर किया है। अब यहां पर एक बात

186
00:13:01,680 --> 00:13:06,920
ध्यान रखने की यजुर्वेद 40 वे अध्याय

187
00:13:06,920 --> 00:13:11,720
में 10वें मंत्र का भावार्थ ये करता है

188
00:13:11,720 --> 00:13:15,840
कि जो पूर्ण परमात्मा की जानकारी

189
00:13:15,840 --> 00:13:20,080
है वो वेद का ज्ञान देने वाला ब्रह्म भी

190
00:13:20,080 --> 00:13:20,760
नहीं

191
00:13:20,760 --> 00:13:25,040
जानता उसे धीरा नाम

192
00:13:25,040 --> 00:13:29,360
अर्थात तत्वदर्शी संतों से सुनो ये इसने अर्थ किया है किसका

193
00:13:29,360 --> 00:13:33,600
अर्थ किया है वेद के 40वें

194
00:13:33,600 --> 00:13:37,680
अध्याय के दव मंत्र का जबकि वेद

195
00:13:37,680 --> 00:13:41,680
के 40वें अध्याय के 10वें मंत्र का जो अर्थ है

196
00:13:41,680 --> 00:13:47,680
वो मैं आपको पढ़कर सुना दे रहा

197
00:13:53,080 --> 00:13:57,120
हूं। ये आ गया। संग या

198
00:13:57,120 --> 00:14:01,280
संभूति का फल भिन्न प्रकार का है। ऐसा कहते हैं। असंग भावना

199
00:14:01,280 --> 00:14:05,280
का फल भिन्न ऐसा धी अर्थात बुद्धि

200
00:14:05,280 --> 00:14:09,600
में रमण करने वाले विद्वानों से सुनते आ रहे हैं। उनके

201
00:14:09,600 --> 00:14:13,760
पास जाकर सुनना नहीं है। जो यहां बताया जा रहा है वो किनसे सुना

202
00:14:13,760 --> 00:14:17,920
गया है? विद्वानों से। ठीक है? उनके पास

203
00:14:17,920 --> 00:14:22,160
जाने को नहीं कहा। जाने को कहा है तो यह बताएं कहां कहा है। ठीक है?

204
00:14:22,160 --> 00:14:26,840
जिन्होंने हमको इस विषय में उपदेश किया है। तो पहली बात क्या

205
00:14:26,840 --> 00:14:31,040
है कि यहां पर धीरा नाम पुरुषों

206
00:14:31,040 --> 00:14:35,440
पुरुषों को धीरा नाम पुरुषों को यहां पर इसने तत्वदर्शी

207
00:14:35,440 --> 00:14:35,940
माना

208
00:14:35,760 --> 00:14:39,920
है। किस कहां पर माना है तत्वदर्शी? 39 पृष्ठ संख्या

209
00:14:39,920 --> 00:14:44,320
पर इसने धीरा नाम पुरुषों को तत्वदर्शी माना है। ठीक है?

210
00:14:44,320 --> 00:14:49,440
और ये ये बात ध्यान रखने की है कि इसने कहा है ना संतों से सुनो।

211
00:14:49,440 --> 00:14:53,680
यहां संतों से सुनने का आदेश नहीं दिया गया है। निर्देश नहीं दिया गया है। ऐसा

212
00:14:53,680 --> 00:14:58,080
हमने उनसे सुना है। मतलब जो बताने वाला है उसने

213
00:14:58,080 --> 00:15:02,240
सुना है। वो ये नहीं कह रहा जाके सुनो आप।

214
00:15:02,240 --> 00:15:06,240
ठीक है? पहली बात। अब ये धीरा नाम की बात हो ही गई है तो

215
00:15:06,240 --> 00:15:10,760
हम आगे कर ले। क्या है वो बात? वो जरूरी

216
00:15:10,760 --> 00:15:14,960
है। इसने अपनी भगवत गीता के पृष्ठ संख्या 49

217
00:15:14,960 --> 00:15:19,000
में भगवत गीता का अर्थ करते समय फिर लिखा

218
00:15:19,000 --> 00:15:23,200
है गीता अध्याय तीन श्लोक 25 से 29 तक का भावार्थ

219
00:15:23,200 --> 00:15:27,480
करते हुए लिखा है कि यजुर्वेद अध्याय 40 श्लोक

220
00:15:27,480 --> 00:15:31,760
13 श्लोक नहीं है महा मंत्र होता है हालांकि यह श्लोक ही लिखता है

221
00:15:31,760 --> 00:15:36,000
ठीक है कोई बात नहीं तो श्लोक 13 में वेद ज्ञान दाता ब्रह्म

222
00:15:36,000 --> 00:15:40,080
ने कहा कि जिस व्यक्ति को अक्षर ज्ञान हो जाएगा जिस व्यक्ति को

223
00:15:40,080 --> 00:15:44,440
अक्षर ज्ञान है उसे विद्वान कहते हैं। जिसे अक्षर ज्ञान नहीं

224
00:15:44,440 --> 00:15:49,320
है उसे अविद्वान कहते हैं। यह कौन कह रहा है?

225
00:15:49,320 --> 00:15:51,120
इसी जिस

226
00:15:51,120 --> 00:15:55,120
जिस अध्याय के जिस 40 वे अध्याय के दव मंत्र

227
00:15:55,120 --> 00:15:59,680
का ये समर्थन ले रहा है अपने लिए कि भैया उसे तत्वदर्शी

228
00:15:59,680 --> 00:16:04,000
से सुनो जाकर के धीरा नाम से सुनो जाकर के। उनहीं

229
00:16:04,000 --> 00:16:08,160
के लिए यहां पर यह कह रहा है कि वेद ज्ञान

230
00:16:08,160 --> 00:16:12,400
दाता ने कहा कि जिस व्यक्ति को अक्षर ज्ञान है उसे विद्वान

231
00:16:12,400 --> 00:16:16,720
कहते हैं। जिसे अक्षर ज्ञान नहीं है उसे विद्वान कहते हैं। परंतु विद्वान

232
00:16:16,720 --> 00:16:20,720
तथा अविद्वान की वास्तविक जानकारी तत्वदर्शी संत ही बताते

233
00:16:20,720 --> 00:16:24,880
हैं। उनसे सुनो। ये बात

234
00:16:24,880 --> 00:16:29,200
ये बात इसके ही अनुसार ब्रह्म ने नहीं कही है। वेद में

235
00:16:29,200 --> 00:16:33,200
ये खुद बोल रहा है कि ब्रह्म ने यहां पर गलत बात कह दी।

236
00:16:33,200 --> 00:16:37,920
40 13 में वेद ज्ञान दाता ने रामपाल

237
00:16:37,920 --> 00:16:42,080
के अनुसार गलत बात कही है कि भाई जिसको

238
00:16:42,080 --> 00:16:46,560
अक्षर का ज्ञान है उसे विद्वान कहते हैं। जिसे अक्षर का ज्ञान नहीं है उसे अविद्वान

239
00:16:46,560 --> 00:16:50,640
कहते हैं। ये वाला मैंने आपको अभी फोटो भेजा है तो थोड़ा

240
00:16:50,640 --> 00:16:53,240
सा दिखा

241
00:16:53,240 --> 00:16:58,720
दीजिए। तो अब यहां पर वास्तविकता क्या है?

242
00:16:58,720 --> 00:17:02,960
वास्तविकता है कि आत्म ज्ञान का फल भिन्न

243
00:17:02,960 --> 00:17:06,240
है। ऐसा कहते हैं। अनात्म ज्ञान का

244
00:17:06,240 --> 00:17:10,320
फल भिन्न है। कहते हैं। ऐसा विद्वत जनों से

245
00:17:10,320 --> 00:17:14,560
सुनते आए हैं। यह भी सुनने को कहा है कि हम सुनते आए

246
00:17:14,560 --> 00:17:18,640
हैं। यहां पर ऐसा कहीं नहीं कहा जा रहा है कि अक्षर का ज्ञान

247
00:17:18,640 --> 00:17:22,720
जिसको होगा उसको जो है वो कहा जाएगा और अक्षर का ज्ञान

248
00:17:22,720 --> 00:17:26,800
नहीं होगा उसको वो कहा जाएगा। यह आप सामने देख सकते हैं। यह दवा

249
00:17:26,800 --> 00:17:31,640
है। वो 13वा दिखाइए जो दूसरा चित्र आपको प्राप्त हुआ

250
00:17:31,640 --> 00:17:34,800
होगा। हम

251
00:17:34,800 --> 00:17:38,800
यहां पर अक्षर का ज्ञान कहीं नहीं है कि भाई जिसको

252
00:17:38,800 --> 00:17:42,880
अक्षर का ज्ञान होता है वो विद्वान है। जिसको नहीं होता है वो अविद्वान

253
00:17:42,880 --> 00:17:47,360
है। पहली बात तो इसने अपने मन से वो किया है। दूसरी बात यह है

254
00:17:47,360 --> 00:17:51,400
कि इस मंत्र में भी यह जो ज्ञान है यह कौन दे रहा

255
00:17:51,400 --> 00:17:55,920
है? यह दे रहा है धीरा नाम

256
00:17:55,920 --> 00:18:00,080
धीरा नाम जो होते हैं यानी जिनको विद्वत जन कहा गया है। ठीक है? यह

257
00:18:00,080 --> 00:18:04,080
बड़ा करके दिखा दीजिए धीरा नाम राइट साइड में विद्वत

258
00:18:04,080 --> 00:18:08,840
जन और रामपाल के अनुसार ये तत्वदर्शी है

259
00:18:08,840 --> 00:18:13,680
तो रामपाल यजुर्वेद के 40 वे मंत्र के

260
00:18:13,680 --> 00:18:17,920
रामपाल यजुर्वेद के 40 वे अध्याय के दव मंत्र में

261
00:18:17,920 --> 00:18:21,440
बताता है कि वेदों को कहने वाले को पूर्ण ज्ञान नहीं

262
00:18:21,440 --> 00:18:26,160
है। पूर्ण ज्ञान जाइए आप धीरा नाम पुरुषों से लीजिए। यह

263
00:18:26,160 --> 00:18:30,640
अर्थ करता है रामपाल जबकि अर्थ वहां पर कुछ और है। कि रियाणाम

264
00:18:30,640 --> 00:18:35,800
ने हमें बताया है जो हम आपको बता रहे हैं। ठीक है?

265
00:18:35,800 --> 00:18:40,320
मगर अगले ही पल दो तीन पष्ठों के बाद

266
00:18:40,320 --> 00:18:44,400
यह उनहीं धीर नाम पुरुषों को क्योंकि 40व अध्याय का 13

267
00:18:44,400 --> 00:18:48,400
वे मंत्र में भी जो ज्ञान दिया जा रहा है वो विद्वान जनों यानी

268
00:18:48,400 --> 00:18:52,560
धीर नाम पुरुषों के द्वारा बताया गया ज्ञान दिया जा रहा है उनके द्वारा जो भी

269
00:18:52,560 --> 00:18:56,640
चीज बताई गई है वो उस मंत्र का अर्थ है तो अगर यह कह रहा है कि

270
00:18:56,640 --> 00:19:00,720
उस मंत्र का अर्थ क्या है कि अक्षर का ज्ञान जिसे है वो विद्वान है

271
00:19:00,720 --> 00:19:04,960
जिसको नहीं है वो अविद्वान है तो यह ज्ञान भी किसने दिया धीम पुरुषों

272
00:19:04,960 --> 00:19:09,840
ने और धीम पुरुष कौन है? यह मान चुका है कि वो तत्वदर्शी है।

273
00:19:09,840 --> 00:19:14,160
धीम मगर यहां पर तत्वदर्शियों की बात को काटते

274
00:19:14,160 --> 00:19:18,240
हुए और फिर कह रहा है कि भैया पूर्ण परमात्मा कबीर

275
00:19:18,240 --> 00:19:22,560
जी ने अमृत वाणी में विद्वान और विद्वान की बात की है। तो या तो

276
00:19:22,560 --> 00:19:26,800
ये मान ले कि धीराम जो है वो तत्वदर्शी नहीं है। एक बात तो मान ले भाई

277
00:19:26,800 --> 00:19:30,960
और यदि उनको तत्वदर्शी मान रहा है तो इनसे भिन्न मत बता। तत्वदर्शी

278
00:19:30,960 --> 00:19:35,120
को या तो मान ले कि धीरा नाम जो है वो तत्वदर्शी नहीं

279
00:19:35,120 --> 00:19:36,720
होते क्योंकि दोनों

280
00:19:36,720 --> 00:19:41,120
जगह धीरा नाम आया है। 40 10 में भी धीरा नाम है और 40

281
00:19:41,120 --> 00:19:45,440
क्या कहते हैं? 13 में भी धीरा नाम है। दोनों जगह ज्ञान बताने वाला जो है

282
00:19:45,440 --> 00:19:49,840
बताने वाले के रूप में धीरा नाम का उपयोग हुआ है। ठीक है?

283
00:19:49,840 --> 00:19:55,840
तो यह भी एक बुलेट पॉइंट था। अभी हम अध्ययन करते टाइम इसको पढ़ेंगे आगे

284
00:19:56,520 --> 00:20:02,520
और इसके बाद क्या है?

285
00:20:02,560 --> 00:20:06,560
एक बात आती है इसने 39 नंबर पर कहा है

286
00:20:06,560 --> 00:20:10,560
कि काल यह कहता है आठव अध्याय के 13 वे श्लोक में

287
00:20:10,560 --> 00:20:14,640
कि जो ऐसा ऐसा करेगा मेरे मेरे अनुसार चलेगा वो जो

288
00:20:14,640 --> 00:20:18,880
है मेरी वाली परम गति को प्राप्त होगा। अब ये मेरी वाली परम

289
00:20:18,880 --> 00:20:23,600
गति क्या है? परम गति क्या है? पहले समझिए।

290
00:20:23,600 --> 00:20:27,600
जो सबसे परम हो वह गति आपको प्राप्त हो जाएगी।

291
00:20:27,600 --> 00:20:31,600
मगर मेरी वाली परम गति यानी कि मेरी कई मेरी

292
00:20:31,600 --> 00:20:35,760
मेरे मान लिया। इसकी बात को थोड़ी देर मान लेते हैं कि मेरे से मिलने वाली गति

293
00:20:35,760 --> 00:20:39,920
इसको प्राप्त होगी। मगर जब हम कह रहे हैं कि मेरे से मिलने वाली परम

294
00:20:39,920 --> 00:20:43,920
गति प्राप्त होगी। तो यानी कि मेरे से मिलने वाली अन्य कई गतियां भी

295
00:20:43,920 --> 00:20:48,160
तो होंगी। वो उनका वर्णन कहां पर है? कि जो

296
00:20:48,160 --> 00:20:51,840
मुझे प्राप्त करने पर एक लोअर क्लास की गति होगी। फिर एक मिडिल क्लास

297
00:20:51,840 --> 00:20:56,240
की गति होगी। यह 39 पर इसने कहा है। ठीक है?

298
00:20:56,240 --> 00:21:00,400
तो यह परम गति को डिफाइन करें कि उसकी जो लोअर क्लास

299
00:21:00,400 --> 00:21:04,560
की गति होगी वो उसको क्या कहा जाएगा। उसका वर्णन

300
00:21:04,560 --> 00:21:08,560
कहां पर है? और अगर इसकी

301
00:21:08,560 --> 00:21:12,560
गति है जो कि और कोई गति नहीं है तो इसको परम गति क्यों

302
00:21:12,560 --> 00:21:16,720
कहा जा रहा है? खाली गति कहो। मेरी वाली गति प्राप्त होगी।

303
00:21:16,720 --> 00:21:20,800
जो मुझसे मिलती है वो गति प्राप्त होगी। जो मेरी गति है

304
00:21:20,800 --> 00:21:24,880
वो प्राप्त होगी। यह कहो। परम गति क्यों कह रहे हो? किस

305
00:21:24,880 --> 00:21:29,200
हिसाब से कह रहे हो? तब तो यह है ना कि और भी गतियां हो मुझसे मिलने वाली वो गतियों

306
00:21:29,200 --> 00:21:33,360
का वर्णन कहां है? ठीक है ये हो गया

307
00:21:33,360 --> 00:21:38,600
और चलते हैं

308
00:21:38,600 --> 00:21:42,720
आगे पूर्ण परमात्मा की पूरी जानकारी केवल तत्वदर्शी जानता

309
00:21:42,720 --> 00:21:46,960
है। इसने कहा पूर्ण परमात्मा की पूर्ण जानकारी केवल

310
00:21:46,960 --> 00:21:51,360
तत्वदर्शी जानता है। मगर जब इनके भक्तों से पूछा जाता है भक्तों

311
00:21:51,360 --> 00:21:55,360
से कि आत्मा को नित्य क्यों कहा? जब जब कबीर जो है संसार

312
00:21:55,360 --> 00:21:59,440
बना रहा था तो वो कहां पर खड़ा था? उस संसार को उसने बनाया था कि नहीं

313
00:21:59,440 --> 00:22:03,560
बनाया था? और भी बहुत सारी तात्विक विवेचना के

314
00:22:03,560 --> 00:22:07,600
सर्वशक्तिमान परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म जैसे

315
00:22:07,600 --> 00:22:11,840
कि इसमें इन्होंने मान लिया है कि मोक्ष जो कोई

316
00:22:11,840 --> 00:22:15,840
लोक है जहां पर जो काल के जाल में फंसी हुई जो आत्माएं होती

317
00:22:15,840 --> 00:22:19,840
है वो होती हैं। तो काल जब दोबारा जन्म लेता है तो उसके जाल में फिर फंस

318
00:22:19,840 --> 00:22:24,000
जाती हैं। तो अब बात यह है काल जब दोबारा जन्म लेता है तो इनके अनुसार

319
00:22:24,000 --> 00:22:28,240
अब तक तो एक आध बार तो लिया ही होगा। तो उसके जाल में वह आत्माएं

320
00:22:28,240 --> 00:22:32,480
फंसती है जो काल के जाल में पहले से होती हैं या वह आत्माएं फंसती

321
00:22:32,480 --> 00:22:36,720
है जिनको अभी भी उसने उत्पन्न किया है कबीर ने नई आत्माओं

322
00:22:36,720 --> 00:22:41,040
को या वो आत्माएं फंसती है जिनको मोक्ष प्राप्त हो गया था

323
00:22:41,040 --> 00:22:46,440
ठीक है तो ये बात

324
00:22:46,440 --> 00:22:50,640
है अब आगे चलते हैं

325
00:22:50,640 --> 00:22:53,600
और क्या है आगे तो

326
00:22:53,600 --> 00:22:57,920
तत्व तत्व ज्ञान तो इनसे मिलता मिलता नहीं है झोलाचा

327
00:22:57,920 --> 00:23:02,240
जेलधाम निवासी से। खैर आगे चलते हैं।

328
00:23:02,240 --> 00:23:06,400
फिर इसने इसी में कुछ समय तक अमर कहा है। जब हमें यह ज्ञात

329
00:23:06,400 --> 00:23:11,280
है कि यह व्यक्ति आगे चलकर के मर भी सकता है तो हम उसको अमर कैसे कहेंगे?

330
00:23:11,280 --> 00:23:15,440
अमर की डेफिनेशन कहां पर लिखी है? कुछ समय के लिए

331
00:23:15,440 --> 00:23:19,600
जो व्यक्ति मरेगा नहीं उसको अमर कह सकते हैं।

332
00:23:19,600 --> 00:23:25,440
यह इन्होंने तात्विक रचना कहीं नहीं बताई है। और देखो

333
00:23:25,440 --> 00:23:29,680
आक्षेप तो यह लगाता ही चलता है कि यज्ञों का लाभ केवल जो है वह

334
00:23:29,680 --> 00:23:33,680
सांसारिक सुविधाएं हैं। मुक्ति नहीं है। जबकि यज्ञों

335
00:23:33,680 --> 00:23:37,920
में प्रतिष्ठित बार-बार कहता है कि पूर्ण परमात्मा है जैसा कि इसने

336
00:23:37,920 --> 00:23:42,000
श्लोक

337
00:23:42,000 --> 00:23:46,000
तीन 10 में कहा है। यज्ञ से कौन पूजा जा रहा है?

338
00:23:46,000 --> 00:23:50,160
ये पृष्ठ संख्या 40 दिखाइए। यज्ञ से कौन पूछ

339
00:23:50,160 --> 00:23:55,080
पूजा जा रहा है? यज्ञ से पूजा जा रहा है। पूर्ण

340
00:23:55,080 --> 00:23:59,280
परमात्मा 40वा पृष्ठ दूसरा

341
00:23:59,280 --> 00:24:03,360
तीसरा पैराग्राफ हम यज्ञ में पूर्ण

342
00:24:03,360 --> 00:24:07,760
परमात्मा प्रतिष्ठित है। यज्ञ से पूज्य

343
00:24:07,760 --> 00:24:12,160
इष्ट देव ही मनवांछित भोग प्रदान करें। और इष्ट देव कौन है?

344
00:24:12,160 --> 00:24:16,560
पूर्ण परमात्मा। तो जब

345
00:24:16,560 --> 00:24:20,640
यज्ञ से पूर्ण परमात्मा वो पूजा जा रहा है तो फिर

346
00:24:20,640 --> 00:24:24,720
वह सांसारिक सुख तक सीमित क्यों है? ठीक है?

347
00:24:24,720 --> 00:24:28,880
और वैसे तो यहां पर धर्म यज्ञ की बात हो रही थी। इसके बाद और आगे चलते

348
00:24:28,880 --> 00:24:32,000
हैं। तो

349
00:24:32,000 --> 00:24:36,240
तीन 10 में इसने झोल किया है। पहली

350
00:24:36,240 --> 00:24:40,240
बात तो एक अर्थ का अनर्थ कर दिया है। अनेन शब्द आया है तीन

351
00:24:40,240 --> 00:24:45,240
10 में और इसने अनेन का अर्थ लिखा है अन्न द्वारा होने

352
00:24:45,240 --> 00:24:49,360
वाला। अनेन का मतलब इसने लिखा है इससे जस्ट ऊपर

353
00:24:49,360 --> 00:24:51,760
वाला पैराग्राफ।

354
00:24:51,760 --> 00:24:55,760
हां यही यही इसमें देखिए अनेन का मतलब इसने

355
00:24:55,760 --> 00:24:59,760
लिखा है। इस समय मेरी फोटो के मेरे स्क्रीन के

356
00:24:59,760 --> 00:25:03,480
पीछे चला गया है वो

357
00:25:03,480 --> 00:25:07,720
पैराग्राफ। सेकंड पैराग्राफ है जिसमें एक श्लोक का अर्थ बताते

358
00:25:07,720 --> 00:25:11,840
हुए अनुवाद में सेकंड लाइन में यह लिखता है कि अनेन

359
00:25:11,840 --> 00:25:16,160
ब्रैकेट में और फिर लिखता है अन्य द्वारा होने वाला धार्मिक कर्म।

360
00:25:16,160 --> 00:25:20,160
जबकि अनेन का अर्थ है कि इस प्रकार या फिर यह

361
00:25:20,160 --> 00:25:24,480
है अनन तो यह अर्थ का अनर्थ

362
00:25:24,480 --> 00:25:28,800
किया और क्या किया है

363
00:25:28,800 --> 00:25:33,280
इसने कहा है कि यज्ञ में जो है पूर्ण प्रतिष्ठित जो है वो पूर्ण परमात्मा

364
00:25:33,280 --> 00:25:37,920
है जबकि वहां पर पूर्ण परमात्मा की कोई बात ही नहीं हो रही है। श्लोक में पूर्ण परमात्मा

365
00:25:37,920 --> 00:25:42,480
को दर्शाने वाला कोई अर्थ नहीं है। यह है गपोड़ बाबा जेलधाम

366
00:25:42,480 --> 00:25:46,560
निवासी। आगे चलते हैं। अच्छा एक पॉइंट टू

367
00:25:46,560 --> 00:25:50,720
बी नोटेड कि इसने यहां पर 3.1 के

368
00:25:50,720 --> 00:25:54,880
अर्थ में हिंदी अनुवाद में परम का अर्थ परम माना

369
00:25:54,880 --> 00:25:59,040
है। जबकि आगे चलके गीता प्रेस गोरखपुर के अनुवादकों

370
00:25:59,040 --> 00:26:03,200
और अन्य आचार्यों के अनुवाद में जब परम का अर्थ कहीं पर पर

371
00:26:03,200 --> 00:26:07,360
माना गया या परम का अर्थ कहीं पर परम माना गया। तो इस व्यक्ति ने वहां

372
00:26:07,360 --> 00:26:11,360
पर कहा देखो देखो यह लोग तो परम का अर्थ पर मानते हैं। फिर भी यहां पर परम का अर्थ

373
00:26:11,360 --> 00:26:15,440
परम मान रहे हैं। जबकि यह खुद व्यक्ति परम का अर्थ परम मानता है।

374
00:26:15,440 --> 00:26:18,760
यहां पर देखिए। ठीक

375
00:26:18,760 --> 00:26:21,880
है?

376
00:26:21,880 --> 00:26:25,920
और यह इसने इसी प्रश्न में बताया है। सबसे लास्ट पैराग्राफ

377
00:26:25,920 --> 00:26:30,000
दिखा दीजिए इनको। हां। इसमें देखिए परम का अर्थ इसने परम

378
00:26:30,000 --> 00:26:34,080
ही माना है। श्लोक में आया है

379
00:26:34,080 --> 00:26:37,480
परम

380
00:26:37,480 --> 00:26:40,520
अवाप्सत

381
00:26:40,520 --> 00:26:44,560
और हिंदी अनुवाद में इसने हिंदी अनुवाद की

382
00:26:44,560 --> 00:26:48,720
लास्ट लाइन में परम कल्याण लिखा है। ठीक है?

383
00:26:48,720 --> 00:26:52,720
तो इसने परम का अर्थ परम माना और आगे चलकर के

384
00:26:52,720 --> 00:26:56,880
गीता प्रेस वालों ने जो अनुवाद किया है उन पर उंगली उठाई।

385
00:26:56,880 --> 00:27:01,960
ठीक है? ये सब ध्यान रखने वाली चीजें हैं कपूर बाबा की। कॉमेडी

386
00:27:01,960 --> 00:27:06,320
है। जिनको हंसना हो वह रुके रहे। बहुत सारी चीजें

387
00:27:06,320 --> 00:27:10,320
इनका जब ये जो लिखा हुआ कचरा है वो जब पढ़ते हैं

388
00:27:10,320 --> 00:27:14,400
तो बहुत सारी चीजें हंसने वाली हमें प्राप्त होती है। अब आ जाइए पष्ठ

389
00:27:14,400 --> 00:27:18,400
संख्या इनकी 43 तक। यहां पर हमें

390
00:27:18,400 --> 00:27:22,960
एक सार्वभौम सिद्धांत प्राप्त होता है

391
00:27:22,960 --> 00:27:27,040
भगवत गीता का कि जो व्यक्ति अपने केवल शरीर को

392
00:27:27,040 --> 00:27:31,040
पोषित करने के लिए शरीर के पोषण के निमित्त भगवान ने क्या किया

393
00:27:31,040 --> 00:27:34,240
ना कि हम हमारे हर कर्म को

394
00:27:34,240 --> 00:27:38,320
भक्ति से वैराग्य से जोड़ दिया है कि अपने लिए मत करो

395
00:27:38,320 --> 00:27:42,480
उसको भक्ति से उसको शास्त्र की आज्ञा के रूप में समझते हुए

396
00:27:42,480 --> 00:27:46,560
कार्य करो तो तुम उन कर्म बंधनों से लिप्त नहीं होगे तो

397
00:27:46,560 --> 00:27:50,640
इसलिए इसलिए जो व्यक्ति स्वयं के भूख मिटाने के लिए भोजन बनाएगा, भोजन

398
00:27:50,640 --> 00:27:54,880
को पकाएगा, उसे पापी कहा गया है। और वहीं पर अनुष्ठान के निमित्त

399
00:27:54,880 --> 00:27:58,880
पकाए हुए यज्ञ यानी धार्मिक यज्ञ से बचे हुए अन्न को

400
00:27:58,880 --> 00:28:03,200
ग्रहण करने वाले को पुण्य पुण्यत्मा कहा गया। यह सार्वभौम सिद्धांत है। बीच-बीच

401
00:28:03,200 --> 00:28:09,160
में आएंगे तो आपको वो भी देते चले। इसके बाद फिर

402
00:28:09,160 --> 00:28:13,360
उसने ब्रह्मा विष्णु महेश बिन मांगे दे देते हैं। देखिए

403
00:28:13,360 --> 00:28:17,440
यहां पर इसने मान लिया बिन मांगे देते रहते हैं।

404
00:28:17,440 --> 00:28:21,440
ये दूसरे पैराग्राफ में आइए इस पृष्ठ के 43

405
00:28:21,440 --> 00:28:26,680
के दूसरे पैराग्राफ में। इसने यहां मान लिया

406
00:28:26,680 --> 00:28:30,720
कि पूर्ण परमात्मा रूपी मूल यानी

407
00:28:30,720 --> 00:28:35,000
जड़ की इष्ट रूप में प्रतिष्ठित करके पूजा करने वाले के शास्त्र

408
00:28:35,000 --> 00:28:39,760
अनुकूल भक्ति कर्मों का फल तीनों देवता ठीक है

409
00:28:39,760 --> 00:28:43,840
भक्ति कर्मों का फल यानी कि पुण्य का पुण्य का फल

410
00:28:43,840 --> 00:28:47,880
तो यहां पे पुण्य करने में सहायक बन रहे हैं ब्रह्मा विष्णु महेश इसके ही

411
00:28:47,880 --> 00:28:49,440
अनुसार देख लो

412
00:28:49,440 --> 00:28:54,000
इसको झूठे की झूठ की पराकाष्ठा

413
00:28:54,000 --> 00:28:58,400
पीछे कह रहा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश क्या करवाते हैं? पाप

414
00:28:58,400 --> 00:29:02,480
जुआ खेलना विचार करना ये सब करवाते हैं। अभी हमने पीछे नोट किया था

415
00:29:02,480 --> 00:29:06,560
और यहां क्या कह रहा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश बिना मांगे जो पुण्य पुण्य

416
00:29:06,560 --> 00:29:10,680
आत्मा है उसको देते रहते हैं। ठीक आगे चलते

417
00:29:10,680 --> 00:29:14,960
हैं। अच्छा अब एक बहुत बढ़िया बात आ रही है। टाइम नोट कर लीजिए

418
00:29:14,960 --> 00:29:19,040
भाई। पहले 3.12 का और देख लें। इस यहां पर फिर से

419
00:29:19,040 --> 00:29:23,120
इसने अर्थ करने में झोल कर दिया है। वहां देवताओं की पूजा बताई जा रही है कि यज्ञ में

420
00:29:23,120 --> 00:29:27,480
जो देवता होते हैं वह

421
00:29:27,480 --> 00:29:32,160
हमको हमारा इक्षित जो फल है वो प्रदान करें।

422
00:29:32,160 --> 00:29:36,160
मगर यहां पे इसने जबरदस्ती क्योंकि वो त्रिदेव को ले चलना है। देवताओं

423
00:29:36,160 --> 00:29:40,320
की जगह बिठाना है उनको साधारण। तो इसलिए यहां पर त्रिदेव की पूजा करने

424
00:29:40,320 --> 00:29:44,320
वाले त्रिदेव होते हैं। उनकी पूजा करते हैं प्रतिष्ठित

425
00:29:44,320 --> 00:29:50,320
करके और यह सब इसने यहां त्रिदेव को डाल दिया

426
00:29:50,520 --> 00:29:54,880
है। इसके बाद अब यहां का टाइम आप लोग नोट कर लीजिएगा।

427
00:29:54,880 --> 00:29:58,880
बहुत जरूरी बात आ रही है। हम क्या है

428
00:29:58,880 --> 00:30:04,880
वो बात

429
00:30:05,720 --> 00:30:11,720
कि प्रजापति ब्रह्मा ने

430
00:30:41,360 --> 00:30:45,760
[संगीत]

431
00:30:45,760 --> 00:30:49,760
यहां एक बहुत ही आवश्यक बात है

432
00:30:49,760 --> 00:30:54,000
जो आपको चौंका देने वाली है। तो इसलिए थोड़ा सा

433
00:30:54,000 --> 00:31:00,000
धैर्य

434
00:31:00,360 --> 00:31:04,840
रखें। अत्यंत लाभदायक होगी।

435
00:31:04,840 --> 00:31:08,960
वैसे इन लोगों से बात करने का कोई अर्थ है

436
00:31:08,960 --> 00:31:13,040
नहीं जो कि यह भी मानते हैं। इसने भी अपने

437
00:31:13,040 --> 00:31:17,040
उसमें कहा है कि मूर्खों को मत समझाओ। परंतु यदि

438
00:31:17,040 --> 00:31:23,040
मूर्खों को नहीं समझाएंगे तो समझाएंगे किसको? तो देखिए

439
00:31:24,120 --> 00:31:28,240
जो भगवत गीता तीन 10 में कहा जा रहा है

440
00:31:28,240 --> 00:31:32,400
कि प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित ये टाइम नोट

441
00:31:32,400 --> 00:31:36,640
कर लीजिएगा है ना तो भगवत गीता के तीसरे

442
00:31:36,640 --> 00:31:40,640
अध्याय के 10व श्लोक में क्या कहा गया है प्रजापति प्रजापति ब्रह्मा

443
00:31:40,640 --> 00:31:44,880
ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित यानी धर्म सहित

444
00:31:44,880 --> 00:31:49,040
प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि धर्म

445
00:31:49,040 --> 00:31:53,040
के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम लोगों को

446
00:31:53,040 --> 00:31:57,200
इक्षित भोग प्रदान करने वाला हो तो

447
00:31:57,200 --> 00:32:01,440
धर्म को करने से धर्मानुष्ठान में लगे रहने से धर्म यज्ञ में लगे रहने

448
00:32:01,440 --> 00:32:05,520
से जो आपको सदा सिद्ध परिणाम है फल है वो मिलते

449
00:32:05,520 --> 00:32:09,520
रहे ऐसा यहां पर श्लोक में कहा जा रहा है कि ब्रह्मा जी ने

450
00:32:09,520 --> 00:32:13,600
यहां पर उनको प्रजापति को ब्रह्मा कहा गया है।

451
00:32:13,600 --> 00:32:17,600
ठीक है? और प्रजापति ब्रह्मा को ही कहा जाता है। ये

452
00:32:17,600 --> 00:32:21,680
हम सिद्ध करेंगे। मगर इसने तीसरे अध्याय के दव

453
00:32:21,680 --> 00:32:25,680
श्लोक से लेकर और तीसरे

454
00:32:25,680 --> 00:32:29,680
अध्याय के दव श्लोक में क्या कहा है कि

455
00:32:29,680 --> 00:32:33,760
पूर्ण परमात्मा ने यहां पर इसने प्रजापति किसको माना

456
00:32:33,760 --> 00:32:37,760
प्रजापति कौन है? पूर्ण परमात्मा बहुत ध्यान रखने वाली बात

457
00:32:37,760 --> 00:32:39,440
है। इसने प्रजापति

458
00:32:39,440 --> 00:32:43,760
किसको माना है? पूर्ण परमात्मा ने कल्प के प्रारंभ में यज्ञों

459
00:32:43,760 --> 00:32:48,640
यानी धार्मिक अनुष्ठानों इसने ऊपर प्रजापति का अर्थ किया है।

460
00:32:48,640 --> 00:32:52,960
ये 40वा पृष्ठ संख्या है। देखिए इसने प्रजापति का अर्थ किया है।

461
00:32:52,960 --> 00:32:57,640
तीन 10 श्लोक इसमें अर्थ दिखाइए इनको ब्रैकेट में लिखा है

462
00:32:57,640 --> 00:33:01,560
प्रजापति अनुवाद के

463
00:33:01,560 --> 00:33:05,600
समय 39 40वा ही है पेज। हां यही है। यही है।

464
00:33:05,600 --> 00:33:10,240
इसमें लाइए हां यह तीन 10 का अनुवाद हो रहा है ना सेकंड पैराग्राफ में।

465
00:33:10,240 --> 00:33:14,400
सेकंड पैराग्राफ कर लिया। हां, यह अनुवाद हो रहा है।

466
00:33:14,400 --> 00:33:18,480
तो, इसने क्या कहा है? प्रजापति का अर्थ क्या माना है? प्रजापति यानी

467
00:33:18,480 --> 00:33:22,560
कुल के मालिक ने। ठीक है? इसके बाद अगले अगला इसका

468
00:33:22,560 --> 00:33:26,960
जो भावार्थ है उसमें आ जाइए। भावार्थ में आ जाइए इसके नीचे। हां।

469
00:33:26,960 --> 00:33:31,920
पूर्ण परमात्मा ने कल्प के प्रारंभ में।

470
00:33:31,920 --> 00:33:36,000
ठीक है? तो यहां पर प्रजापति का अर्थ

471
00:33:36,000 --> 00:33:40,080
इसने माना। कौन है? प्रजापति का अर्थ इसने माना

472
00:33:40,080 --> 00:33:44,160
पूर्ण परमात्मा। अब देखिए यहां पर इसके ही अनुसार ब्रह्मा जी पूर्ण परमात्मा

473
00:33:44,160 --> 00:33:49,520
सिद्ध होंगे। कैसे? श्रीमद् भागवत

474
00:33:49,520 --> 00:33:53,680
तीसरा स्कंध 12वा अध्याय 33वा श्लोक

475
00:33:53,680 --> 00:33:54,560
वहां पर ब्रह्मा

476
00:33:54,560 --> 00:33:58,880
जी को प्रजापति कहा गया। और ऋग्वेद

477
00:33:58,880 --> 00:34:03,520
में कई जगह भाष्य करते समय अर्थ करते समय

478
00:34:03,520 --> 00:34:07,920
ब्रह्मा जी को प्रजापति कहा गया है और ब्रह्म

479
00:34:07,920 --> 00:34:12,000
को भी प्रजापति कहा गया है। तो

480
00:34:12,000 --> 00:34:16,040
इसका अर्थ क्या हुआ? कि

481
00:34:16,040 --> 00:34:20,880
ब्रह्मा इसके अनुसार प्रजापति जो है

482
00:34:20,880 --> 00:34:24,960
वह ब्रह्मा है। इसके अनुसार प्रजापति क्योंकि पूर्ण

483
00:34:24,960 --> 00:34:29,360
ब्रह्म कबीर है तो पूर्ण परमात्मा है। कबीर नहीं

484
00:34:29,360 --> 00:34:34,240
इसके अनुसार प्रजापति पूर्ण परमात्मा है। यहां पर लिखा हुआ है। तो

485
00:34:34,240 --> 00:34:38,960
ब्रह्मा जी पूर्ण परमात्मा है। और ब्रह्म

486
00:34:38,960 --> 00:34:43,040
और ब्रह्मा में अंतर नहीं है। ऋग्वेद में आ जाएगा। प्रजापति

487
00:34:43,040 --> 00:34:47,160
ब्रह्मा जी को कहां कहा गया? यह मैंने आपको भागवत से बता दिया। अन्य अनेकों अनेक

488
00:34:47,160 --> 00:34:51,680
अनेकों जगह ब्राह्मण ग्रंथ है जो है ना शतपत

489
00:34:51,680 --> 00:34:55,760
ब्राह्मण इत्यादि अनेक जगह आपको प्रमाण मिल जाएंगे कि

490
00:34:55,760 --> 00:34:59,920
ब्रह्मा जी को प्रजापति कहा गया है। तो इसने

491
00:34:59,920 --> 00:35:03,920
यहां मान लिया कि प्रजापति कौन है? पूर्ण परमात्मा। कबीर नहीं। तो यहां पे ब्रह्मा

492
00:35:03,920 --> 00:35:07,920
जी पूर्ण परमात्मा इसने मान लिया। ठीक है?

493
00:35:07,920 --> 00:35:09,560
अब दूसरी बात एक बात और

494
00:35:09,560 --> 00:35:13,920
है। ये लोग जो लांछन लगाते हैं ब्रह्मा सरस्वती विवाह

495
00:35:13,920 --> 00:35:18,000
का अर्थ समझ नहीं पाते हैं। वो हम लोग किसी और दिन बात करके उसको समझा

496
00:35:18,000 --> 00:35:22,000
भी चुके हैं कई बार मगर आगे भी समझा देंगे। मगर ये लोग जो

497
00:35:22,000 --> 00:35:26,000
लांछन लगाते हैं कि ब्रह्मा जी अपनी पुत्री पर मोहित

498
00:35:26,000 --> 00:35:30,400
हो गए। तो ये जो प्रजापति शब्द आ रहा है भागवत पुराण में तीसरे

499
00:35:30,400 --> 00:35:34,560
स्कंध के 12 वे अध्याय के 33 वे श्लोक में जो प्रजापति शब्द

500
00:35:34,560 --> 00:35:38,720
आ रहा है ब्रह्मा जी के लिए वहां पर वही सरस्वती

501
00:35:38,720 --> 00:35:42,800
माता वाला प्रकरण ही चल रहा है। तो यदि पूर्ण परमात्मा प्रजापति

502
00:35:42,800 --> 00:35:47,040
है इसके अनुसार तो पूर्ण परमात्मा स्वयं

503
00:35:47,040 --> 00:35:51,280
रामपाल का पूर्ण परमात्मा वहां पर अपनी पुत्री के लिए मोहित

504
00:35:51,280 --> 00:35:55,520
हो रहा है। वहां पर वो सृष्टि की रचनाएं नहीं बताई जा रही है। जो हम बताते

505
00:35:55,520 --> 00:35:59,520
हैं उसका अर्थ। जो ये आरोप लगाता है वो इसके ही पूर्ण परमात्मा पर

506
00:35:59,520 --> 00:36:03,840
लग रहा है। क्यों? क्योंकि प्रजापति कौन है? पूर्ण परमात्मा।

507
00:36:03,840 --> 00:36:07,920
शास्त्र में प्रजापति कौन है? ब्रह्मा जी। और ब्रह्मा जी का वही प्रकरण वहां

508
00:36:07,920 --> 00:36:12,080
पर चल रहा है सरस्वती माता वाला। ठीक है? अब यह

509
00:36:12,080 --> 00:36:16,080
उस उस आधार पर जो है लांछन लगाते हैं, आक्षेप लगाते हैं, मजाक उड़ाते

510
00:36:16,080 --> 00:36:20,400
हैं। तो इनका ही पूर्ण परमात्मा क्योंकि प्रजापति है तो वहां पर इनका

511
00:36:20,400 --> 00:36:24,400
ही पूर्ण परमात्मा उस लीला में इन्वॉल्व है।

512
00:36:24,400 --> 00:36:24,900
अब

513
00:36:24,560 --> 00:36:29,120
ये उसका मजाक उड़ाएं। रामपाल के पूर्ण परमात्मा का मजाक उड़ाएं।

514
00:36:29,120 --> 00:36:33,960
ठीक है? तो ये बहुत रोचक बात है। आप लोग याद रखिएगा। भागवत

515
00:36:33,960 --> 00:36:38,080
पुराण तीसरा स्कंध 12वा अध्याय 33वा श्लोक

516
00:36:38,080 --> 00:36:42,560
ब्रह्मा जी को प्रजापति कहा गया और यहां पर रामपाल ने प्रजापति

517
00:36:42,560 --> 00:36:46,640
को क्या माना है पूर्ण परमात्मा तो ब्रह्मा

518
00:36:46,640 --> 00:36:50,880
जी यहां पर पूर्ण परमात्मा सिद्ध हो गए आपको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी

519
00:36:50,880 --> 00:36:55,440
ब्रह्मा जी को पूर्ण परमात्मा सिद्ध करने के लिए इसकी गीता से ही सिद्ध होगा

520
00:36:55,440 --> 00:36:59,440
ठीक है अब अगर ये संदर्भ बदलेगा कि

521
00:36:59,440 --> 00:37:03,520
अरे वो किसी और संदर्भ में कहा था किसी और संदर्भ में कहा था तो भाई ऐसे ही

522
00:37:03,520 --> 00:37:07,680
एक ही शब्द के कई अर्थ होते हैं। अलग-अलग संदर्भों में उनका

523
00:37:07,680 --> 00:37:11,760
अर्थ अलग-अलग लिया जाता है। पर तुम तो उनका मना करते हो ना। नहीं

524
00:37:11,760 --> 00:37:15,760
वही अर्थ लो जो एक जगह ले लिया। दूसरा अर्थ नहीं ले सकते। जबकि तुम लेते

525
00:37:15,760 --> 00:37:19,960
हो तो हम भी तो तुम्हारे पीछे पीछे फिर चलेंगे कि तुमने यहां क्यों

526
00:37:19,960 --> 00:37:24,640
लिया? वो बोलेंगे ना पूछेंगे ना तुमसे। तुम तो श्रेष्ठ हो।

527
00:37:24,640 --> 00:37:29,600
और श्रेष्ठ लोगों को तो बिल्कुल वही बात करनी चाहिए।

528
00:37:29,600 --> 00:37:33,600
तो यह बात हो गई बहुत काम की है। इसके बाद फिर से अनुवाद के

529
00:37:33,600 --> 00:37:37,600
नाम पर इसने बकवात की है और पष्ठ संख्या 44 पे आ जाइए

530
00:37:37,600 --> 00:37:40,000
इसकी और पृष्ठ संख्या 44

531
00:37:40,000 --> 00:37:44,000
में इसने फिर वही वही वाली बात इसने वही आरोप लगाया

532
00:37:44,000 --> 00:37:48,240
है कि देखिए देखिए इन्होंने ये लास्ट पैराग्राफ दिखाइए। इसने

533
00:37:48,240 --> 00:37:53,560
वही आरोप लगाया है। देखो देखो इसने इन्होंने जो है

534
00:37:53,560 --> 00:37:57,080
अह

535
00:37:57,080 --> 00:38:01,600
ये वेद को परम

536
00:38:01,600 --> 00:38:05,760
परम वाला मामला चल रहा है कि देखो देखो इन्होंने परम का अर्थ वहां तो पर

537
00:38:05,760 --> 00:38:09,840
किया है। अन्य श्लोकों में पर किया है कि मेरे से मतलब कुछ और

538
00:38:09,840 --> 00:38:13,840
परे जैसे मन वहां कह रहे हैं भगवान मन बुद्धि से परे

539
00:38:13,840 --> 00:38:18,000
तो वहां पे परे का अर्थ पर किया है। है ना? अन्य मन बुद्धि

540
00:38:18,000 --> 00:38:22,000
से परे अलग और यहां पर देखो परम का अर्थ कुछ और किया

541
00:38:22,000 --> 00:38:26,160
है तो पहली बात तो वहां पर पर जो आ रहा है वो बाद में आ रहा है मन

542
00:38:26,160 --> 00:38:30,160
बुद्धि से परे वो हम आगे देखेंगे मन बुद्धि से परे वाली बात

543
00:38:30,160 --> 00:38:34,320
और यहां क्या आ रहा है पहले आ रहा है परमात्मा परमेश्वर

544
00:38:34,320 --> 00:38:38,560
है ना परम ईश्वर तो खैर मगर ये बातें

545
00:38:38,560 --> 00:38:42,720
अगर छोड़ भी दें तो ये जो आरोप लगा रहा है यहां पे लास्ट पैराग्राफ में कि

546
00:38:42,720 --> 00:38:46,800
देखो देखो इन्होंने परम का अर्थ जो है परमात्मा किया जबकि इनहीं

547
00:38:46,800 --> 00:38:50,800
अनुवादों ने इसी अध्याय के आगे के श्लोकों में परम का अर्थ पर

548
00:38:50,800 --> 00:38:55,040
किया है। तो भाई तू भी तो कर रहा है परम का अर्थ परम एक श्लोक

549
00:38:55,040 --> 00:38:59,760
एक पृष्ठ पहले ही दिखाओ इनका पष् 40 नंबर

550
00:38:59,760 --> 00:39:03,760
जब परम का अर्थ पर ही है तो तूने क्यों किया है यहां पर परम का

551
00:39:03,760 --> 00:39:09,560
अर्थ परम बेवकूफी की

552
00:39:09,560 --> 00:39:13,600
पराकाष् 39 नंबर पर है 40 40 40

553
00:39:13,600 --> 00:39:17,680
का बिल्कुल लास्ट हां यहां परम का अर्थ परम

554
00:39:17,680 --> 00:39:21,760
क्यों किया भाई तूने? परम कल्याण क्यों किया तूने?

555
00:39:21,760 --> 00:39:25,880
परम का अर्थ हो गया। ये है बाबा

556
00:39:25,880 --> 00:39:31,880
जी वाले बाबा जी। इसके

557
00:39:33,000 --> 00:39:37,600
बाद अच्छा इसने ये आरोप भी लगाया है यही कहीं

558
00:39:37,600 --> 00:39:41,760
कि भाई इन्होंने वेद का अर्थ ब्रह्म ब्रह्म का अर्थ एक जगह वेद

559
00:39:41,760 --> 00:39:46,000
बता दिया है। है ना? और जबकि ब्रह्म का अर्थ

560
00:39:46,000 --> 00:39:50,720
काल होता है। और इसने स्वयं

561
00:39:50,720 --> 00:39:54,960
पष् संख्या 36 निकालिए। इसने स्वयं ब्रह्म का अर्थ परमेश्वर

562
00:39:54,960 --> 00:39:59,520
बताया है। तो यह एक ही शब्द के कई अर्थ क्यों कर रहा है?

563
00:39:59,520 --> 00:40:03,760
संदर्भ के अनुसार एक ही शब्द के जो अलग-अलग अर्थ होते हैं, वह यूज़ होते हैं।

564
00:40:03,760 --> 00:40:07,760
मगर अन्य लोग कर रहे हैं तो उन्हें टारगेट कर रहा है और खुद कर

565
00:40:07,760 --> 00:40:11,760
रहा है। परम का अर्थ खुद भी परम कर रहा है। मगर सामने वाला परम का अर्थ परम

566
00:40:11,760 --> 00:40:16,400
कर रहा है तो उससे इसको प्रॉब्लम है। वहां ये कह रहा है अनुवाद गलत।

567
00:40:16,400 --> 00:40:20,400
फिर ब्रह्म का अर्थ खुद परमेश्वर बोल रहा है। जबकि ब्रह्म का अर्थ यह खुद

568
00:40:20,400 --> 00:40:25,120
बोलता है काल है। यह पष्ठ संख्या

569
00:40:25,120 --> 00:40:29,200
36 पर है। 2.72 का अर्थ बताते समय इसने ब्रह्म

570
00:40:29,200 --> 00:40:34,320
का अर्थ पूर्ण परमात्मा किया है।

571
00:40:34,320 --> 00:40:39,280
हां दो के श्लोक 72 हां ये देखिए

572
00:40:39,280 --> 00:40:43,280
ब्रह्म निर्वाणम वृक्षति उस परमेश्वर के धाम को प्राप्त होता

573
00:40:43,280 --> 00:40:47,600
है। यह क्यों किया भाई तूने? तो एक ये बात हो गई।

574
00:40:47,600 --> 00:40:48,240
अब इसने

575
00:40:48,240 --> 00:40:52,240
आगे क्या किया है? दोबारा से वही

576
00:40:52,240 --> 00:40:56,400
आ जाइए 44 पर। तीन 15

577
00:40:56,400 --> 00:41:00,480
का अर्थ करते समय पृष्ठ संख्या 44 तीन

578
00:41:00,480 --> 00:41:05,280
15 का अर्थ करते समय इसने एक चीज और कर दी है।

579
00:41:05,280 --> 00:41:09,440
संस्कृत में आया है अक्षर। हमारे

580
00:41:09,440 --> 00:41:13,680
लिए तो ब्रह्म अक्षर परम अक्षर सब एक ही है। कहीं

581
00:41:13,680 --> 00:41:17,760
कहीं पर लीला भेद होने के कारण जब लीला में भगवान इन्वॉल्व है तो उनको कुछ कहा गया

582
00:41:17,760 --> 00:41:22,000
फिर उनके पूर्ण स्वरूप को परम ब्रह्म कह दिया गया बताने

583
00:41:22,000 --> 00:41:26,400
के लिए अंतर लीलात्मक अंतर बताने के लिए। मगर

584
00:41:26,400 --> 00:41:30,520
ये तो नहीं मानता ये अंतर इस तरह से कि सब एक ही है।

585
00:41:30,520 --> 00:41:34,720
तो इसने क्या कहा है? अक्षर को इसने

586
00:41:34,720 --> 00:41:38,880
परम अक्षर माना है। जबकि अक्षर और परम अक्षर में अंतर करता है।

587
00:41:38,880 --> 00:41:42,880
कैसे अंतर करता है? पहले 44 पे दिखा दीजिए।

588
00:41:42,880 --> 00:41:46,200
44 प्रश्न

589
00:41:46,200 --> 00:41:52,200
संख्या प्रश्न संख्या 44 दिखाइए इनको।

590
00:41:56,880 --> 00:42:00,880
प्रश्न संख्या 44 में 14

591
00:42:00,880 --> 00:42:04,920
से 19 हिंदी अनुवाद ये जो पैराग्राफ

592
00:42:04,920 --> 00:42:08,960
है इसमें देखिए नीचे से सेकंड लास्ट लाइन

593
00:42:08,960 --> 00:42:13,280
नीचे से तीन 15 से हां यहां से इसके ऊपर जस्ट

594
00:42:13,280 --> 00:42:19,240
लाइन देखिए इसने क्या माना

595
00:42:19,240 --> 00:42:23,600
कि ब्रह्म यानी काल की उत्पत्ति अविनाशी परमात्मा

596
00:42:23,600 --> 00:42:28,080
यानी परम अक्षर पुरुष से हुई है। जबकि ब्रह्म को

597
00:42:28,080 --> 00:42:32,160
गीता प्रेस वालों ने वेद माना है। ठीक है? चलो

598
00:42:32,160 --> 00:42:36,480
मान लिया काल की उत्पत्ति या वेद की उत्पत्ति किससे हुई है? अक्षर

599
00:42:36,480 --> 00:42:40,720
से हुई है। श्लोक दिखाइए। संस्कृत वाला

600
00:42:40,720 --> 00:42:46,720
संस्कृत वाला श्लोक दिखा दीजिए। हम ये देखिए अक्षर

601
00:42:46,920 --> 00:42:51,200
समुद्भवम लिखा है यहां। परम अक्षर नहीं लिखा भाई जेल

602
00:42:51,200 --> 00:42:55,280
वाले बाबा जी। अब क्या करें? यह ध्यान रखने लायक

603
00:42:55,280 --> 00:42:59,720
बात है। फिर आगे चलते

604
00:42:59,720 --> 00:43:03,960
हैं। इसने एक बात और कही है 44 व पष्ठ

605
00:43:03,960 --> 00:43:08,040
पर कि यज्ञों से मुक्ति नहीं

606
00:43:08,040 --> 00:43:13,080
मिलती।

607
00:43:13,080 --> 00:43:17,200
हम 44 वे पे हां जब

608
00:43:17,200 --> 00:43:21,360
यज्ञों से मुक्ति नहीं मिलती। जबकि यहां 44 में बार-बार कह रहा है यज्ञ

609
00:43:21,360 --> 00:43:25,360
में प्रतिष्ठित कौन है? पूर्ण परमात्मा पर पर यज्ञों से

610
00:43:25,360 --> 00:43:29,440
मुक्ति नहीं मिलती। इसके बाद इसने तीन 17 का अर्थ

611
00:43:29,440 --> 00:43:33,440
करते हुए पष्ठ संख्या 44 में तीन 17 का अर्थ

612
00:43:33,440 --> 00:43:38,000
करते हुए फिर झोल किया है। क्यों झोल किया है? कि

613
00:43:38,000 --> 00:43:42,000
वहां कहा जा रहा है कि जो व्यक्ति आत्मा में ही संतुष्ट होता है। आत्मा में ही रमण

614
00:43:42,000 --> 00:43:46,000
करता है। वो व्यक्ति के लिए कोई भी कर्म करने की आवश्यकता नहीं

615
00:43:46,000 --> 00:43:51,320
होती है। प्रयोजन नहीं होता है। परंतु लोक संग्रह के लिए

616
00:43:51,320 --> 00:43:55,360
और मतलब पाप से बचने के लिए क्योंकि अगर कुछ नहीं करेंगे

617
00:43:55,360 --> 00:43:59,360
तो ऐसा ना हो कि शास्त्र सम्मत कर्मों में लिप्त ना रहे तो ऐसा

618
00:43:59,360 --> 00:44:03,880
ना हो अशास्त्रीय कर्म हो जाए इस कारण से आप कर्मों को करते रहिए शास्त्र

619
00:44:03,880 --> 00:44:08,000
सम्मत बिल्कुल छोड़िए मत तो यहां यह भाव है कहने

620
00:44:08,000 --> 00:44:12,240
का परंतु इसने क्या वहां पर पूरा अर्थ बदल दिया है और इसने

621
00:44:12,240 --> 00:44:14,880
कर दिया है आत्मा से ही संतुष्ट होने

622
00:44:14,880 --> 00:44:19,200
को इसने कर दिया है आत्मा के लिए शास्त्र अनुकूल कर्म से संतुष्ट

623
00:44:19,200 --> 00:44:23,920
तो इसकी संस्कृत बतानी पड़ेगी ना बाबा जी संस्कृत कहां है इसकी

624
00:44:23,920 --> 00:44:28,240
तीन 18 में भी झोल है वहां बात की जा रही है तीन 18 में देखिए बहुत

625
00:44:28,240 --> 00:44:34,240
हंसी वाली बात है तीन 18 में क्या किया है

626
00:44:34,680 --> 00:44:39,040
कि उस महापुरुष के लिए विश्व में ना तो

627
00:44:39,040 --> 00:44:43,680
व्यर्थ के पाप कर्म करने से कोई प्रयोजन रह जाता है यानी

628
00:44:43,680 --> 00:44:48,320
पाप कर्म करने का भी कोई प्रयोजन होता है तो

629
00:44:48,320 --> 00:44:52,400
जो महापुरुष होते हैं उनके लिए ना तो पाप कर्म करने के लिए कोई प्रयोजन रह जाता

630
00:44:52,400 --> 00:44:57,360
है ना ही शास्त्र अनुकूल धर्म कर्म ना करने के लिए बताइए

631
00:44:57,360 --> 00:45:01,360
तो यहां यहां कहा जा रहा है कि ना तो कर्म

632
00:45:01,360 --> 00:45:05,520
ना तो कर्म करने के लिए कोई प्रयोजन रह जाता है जो जो आत्मा में रमण

633
00:45:05,520 --> 00:45:09,600
करने लगता है जो भगवान को समझ लेता है तो यह भाव

634
00:45:09,600 --> 00:45:13,840
यहां पर प्रकट किया जा रहा है कि उसके लिए कोई प्रयोजन नहीं होता है कि तुझे करना ही है क्योंकि आसक्ति

635
00:45:13,840 --> 00:45:17,840
नहीं है उसको कुछ भी फल प्राप्त करने की आसक्ति। उसका मन तो

636
00:45:17,840 --> 00:45:21,920
भगवान में लगा हुआ है। भगवान के चिंतन में रमा हुआ है। तो उसको कुछ भी

637
00:45:21,920 --> 00:45:26,000
ऐसा नहीं लगता मेरा ये करना जरूरी है। पर वो इसलिए करता है

638
00:45:26,000 --> 00:45:30,680
उसको इसलिए करना चाहिए कि शास्त्र ने कहा है शास्त्र अनुकूल कर्म करते रहो

639
00:45:30,680 --> 00:45:34,880
बस। मगर यहां पर इसने कितना अर्थ का अनर्थ कर दिया कि

640
00:45:34,880 --> 00:45:39,120
पाप कर्म करने से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। भाई पाप कर्म पाप

641
00:45:39,120 --> 00:45:43,520
की तू यहां पर दिखा। संस्कृत कहां है? तीन 18 में

642
00:45:43,520 --> 00:45:46,880
कहां लिखा है पाप?

643
00:45:46,880 --> 00:45:51,680
यह है ढोल की पोल बाबा जी की।

644
00:45:51,680 --> 00:45:57,680
चलिए और आगे का क्या है

645
00:45:58,200 --> 00:46:02,240
कि परम पुरुष पर पुरुष और तीन 11

646
00:46:02,240 --> 00:46:06,240
में परम परम हम ये बात बताए हैं। एक ही शब्द के दो अलग-अलग अर्थ

647
00:46:06,240 --> 00:46:10,240
नहीं हो सकते। ऐसा यह कहता है जबकि खुद ही एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ करता रहता है

648
00:46:10,240 --> 00:46:14,480
अपने अनुसार। एक सार्वभौम सिद्धांत क्या है जो हमने अभी बताया कि आत्मा

649
00:46:14,480 --> 00:46:18,480
में जो व्यक्ति संतुष्ट होने लगता है भक्ति में लीन हो जाता है आत्मा में ही रमण करने

650
00:46:18,480 --> 00:46:22,520
लगता है उसको कोई कर्म करने का प्रयोजन नहीं है

651
00:46:22,520 --> 00:46:27,040
किंतु जो लौकिक मर्यादा है उसकी रक्षा हेतु

652
00:46:27,040 --> 00:46:31,360
ऐसा ना हो कि आपको देखकर जो व्यक्ति अभी आत्मा

653
00:46:31,360 --> 00:46:35,520
में रमण करने वाला परमात्मा में चिंतन मनन करते रहने वाला नहीं बना है

654
00:46:35,520 --> 00:46:40,320
वो व्यक्ति भी आपको देख के कर्मों से विरक्त ना हो जाए है ना तो इसलिए

655
00:46:40,320 --> 00:46:44,320
आपको कर्म करते रहना होगा। इसको लोक संग्रह संग्रह भी कह सकते हैं।

656
00:46:44,320 --> 00:46:45,760
और साथ ही

657
00:46:45,760 --> 00:46:49,840
साथ अपनी शास्त्र सम्मतता की रक्षा हेतु ऐसा ना हो कि

658
00:46:49,840 --> 00:46:54,000
आप कर्म नहीं कर रहे हैं तो कर्म ना करना भी अपने आप में एक कर्म है। तो कर्म ना

659
00:46:54,000 --> 00:46:58,240
करने के कारण कहीं शास्त्र विरुद्ध आचरण ना हो जाए। इसलिए कोई प्रयोजन

660
00:46:58,240 --> 00:47:02,320
नहीं है। परंतु केवल इस कार्य के लिए आसक्ति रहित होते हुए हमें

661
00:47:02,320 --> 00:47:06,320
कर्तव्य कर्मों में लगे रहना चाहिए। यह सार्वभौम सिद्धांत भी हमें

662
00:47:06,320 --> 00:47:10,480
प्राप्त होता है। यहां तक अब हम

663
00:47:10,480 --> 00:47:14,560
जरा जल्दी से क्विक क्विकली वैसे आज का चैप्टर थोड़ा बड़ा है। बुलेट

664
00:47:14,560 --> 00:47:16,560
पॉइंट्स भी थोड़े बड़े हो गए। 45

665
00:47:16,560 --> 00:47:21,440
मिनट्स तो बुलेट पॉइंट्स में ही हो गए। हम जरा जल्दी से चालू करेंगे।

666
00:47:21,440 --> 00:47:27,440
क्या किसने ढोल ढोल किया

667
00:47:34,040 --> 00:47:38,320
है? हम देखिए भगवान ने

668
00:47:38,320 --> 00:47:42,400
भगवत गीता के 20वें श्लोक में कहा है कि इसी

669
00:47:42,400 --> 00:47:46,400
प्रकार से जनक आदि ज्ञानी जन भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम

670
00:47:46,400 --> 00:47:50,640
सिद्धि को प्राप्त हुए थे। है ना? विरक्त नहीं हो गए मगर

671
00:47:50,640 --> 00:47:54,640
आसक्ति रहित कर्मों के कारण परम सिद्धि को प्राप्त हुए। यहां भगवान ने

672
00:47:54,640 --> 00:47:58,640
कह दिया आपको प्रमाण दिया गया

673
00:47:58,640 --> 00:48:02,720
कि आसक्ति रहित कर्मों के द्वारा भी परम सिद्धि को प्राप्त हो सकते है। जैसा

674
00:48:02,720 --> 00:48:06,880
वहां मार्कंडेय पुराण में वो जो पितरगण है वो कह रहे हैं भगवान ने भी

675
00:48:06,880 --> 00:48:11,120
यहां तक कई बार ये बात समझाई है कि अगर आसक्ति रहित कर्म

676
00:48:11,120 --> 00:48:15,200
करते रहोगे भोगों की भोगों में आसक्ति नहीं रखोगे तो

677
00:48:15,200 --> 00:48:19,600
आप कर्म करते हुए भी आप जो है मुक्ति प्राप्त कर सकते हो

678
00:48:19,600 --> 00:48:23,920
और यह बात इस मूर्ख ने भी मानी है कई जगह मगर

679
00:48:23,920 --> 00:48:27,920
क्या करें? खंडन भी करना है भगवान की बातों का,

680
00:48:27,920 --> 00:48:31,600
गीता का और यहां यह तो कहे कहना ही नहीं है कि

681
00:48:31,600 --> 00:48:36,000
जनक को मोक्ष मिला था क्योंकि फिर ये हो जाएगा कि उसको कौन सा तत्वदर्शी मिला था।

682
00:48:36,000 --> 00:48:40,240
तो इसने क्या किया है अपनी यहां जनक जनक आदि यानी जनक

683
00:48:40,240 --> 00:48:45,200
में बहुत से लोग आ गए। उसमें वह भी आ गए।

684
00:48:45,200 --> 00:48:49,520
प्रह्लाद जी आ गए और भी कई मुक्त आत्माएं हैं। वह सब आ गए।

685
00:48:49,520 --> 00:48:54,640
मगर इसने क्या किया?

686
00:48:54,640 --> 00:49:00,640
14 का श्लोक करते करते क्या क्या कह रहे हैं? दव

687
00:49:00,920 --> 00:49:06,920
दवा क्या झोल किया है

688
00:49:07,000 --> 00:49:11,440
कि इसने सीधे-सीधे वो नहीं लिखा है

689
00:49:11,440 --> 00:49:15,760
इसने ऐसा कहा है कि जो श्रद्धालु इसने

690
00:49:15,760 --> 00:49:19,760
तीन 20 का अर्थ नहीं किया है। ये ध्यान देने वाली बात है। और क्यों

691
00:49:19,760 --> 00:49:24,000
नहीं किया? क्योंकि यहां पर जनक को मुक्ति प्राप्त हो रही है तीन 20

692
00:49:24,000 --> 00:49:28,240
में। तो यह हम कैसे कह दे कि जनक जी को मुक्ति प्राप्त हुई

693
00:49:28,240 --> 00:49:32,240
सारा चरमरा जाएगा। तो यहां पर इसने तीन 20 का अर्थ

694
00:49:32,240 --> 00:49:36,240
ही नहीं किया। इसने क्या कहा कि तीन के श्लोक 20 में

695
00:49:36,240 --> 00:49:40,480
प्रमाण है कि बिना इच्छा जो देत है सो दान कहावे पल

696
00:49:40,480 --> 00:49:45,280
बा नहीं तासका सो अमरापुर जावे। ठीक है?

697
00:49:45,280 --> 00:49:49,920
अमरापुर जाने वाला है। यह तो इसने यहां पर दे दिया ना दोहा।

698
00:49:49,920 --> 00:49:54,080
अमरापुर जावे। अब इसने अर्थ क्या लिखा है? इसने

699
00:49:54,080 --> 00:49:55,200
अर्थ क्या लिखा? जो

700
00:49:55,200 --> 00:49:59,280
श्रद्धालु किसी मनोकामना की पूर्ति की इच्छा ना रखकर अपना

701
00:49:59,280 --> 00:50:02,400
धार्मिक कर्तव्य जानकर दान करता है, वह वास्तविक दान है।

702
00:50:02,400 --> 00:50:06,720
ऐसा व्यक्ति पूर्ण रूप से दीक्षित होकर दीक्षा लेकर अमरलोक शाश्वत

703
00:50:06,720 --> 00:50:10,800
स्थान में चला जाता है। यानी मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अब इसने राजा जनक की

704
00:50:10,800 --> 00:50:15,040
बात कही है। क्या कही है? राजा जनक भी यज्ञ आदि करते थे। परंतु

705
00:50:15,040 --> 00:50:19,200
इच्छा रूपी नहीं। मनुष्य का कर्तव्य समझकर किया गया यज्ञ

706
00:50:19,200 --> 00:50:23,360
परमात्मा प्राप्ति में सहयोग देता है तथा यज्ञ का फल भी देता है। यह

707
00:50:23,360 --> 00:50:28,160
क्या है भाई? यह आपने जो लिखा है श्लोक का

708
00:50:28,160 --> 00:50:32,320
अर्थ कहां है? बाबा जी पी गए

709
00:50:32,320 --> 00:50:36,320
क्या अर्थ? खीर के साथ। चलिए आगे

710
00:50:36,320 --> 00:50:40,400
चलते हैं। फिर इसने क्या किया है? अध्याय तीन के श्लोक 21 से

711
00:50:40,400 --> 00:50:44,640
24 में कहा है कि हे अर्जुन ज्ञानी

712
00:50:44,640 --> 00:50:49,640
साधु संतों को अच्छे कर्म शास्त्र अनुकूल करने चाहिए

713
00:50:49,640 --> 00:50:54,160
क्योंकि उन्हीं का अनुसरण अन्य समाज भी करता है।

714
00:50:54,160 --> 00:50:58,240
जबकि मुझे तीन लोक में कोई कर्म करने की आवश्यकता नहीं

715
00:50:58,240 --> 00:51:02,240
है। क्योंकि तीन लोक की सर्व सुविधा मैं बिना कर्म किए भी प्राप्त

716
00:51:02,240 --> 00:51:06,240
कर सकता हूं। फिर भी अच्छे कर्म करता हूं। ताकि अन्य

717
00:51:06,240 --> 00:51:10,400
प्राणी भी मेरा अनुसरण करें। नहीं तो मैं समाज का

718
00:51:10,400 --> 00:51:14,400
नाश करने वाला और वर्ण संकरता पैदा करने वाला साबित हो

719
00:51:14,400 --> 00:51:17,400
जाऊं। यहां ध्यान से सुनिए। बहुत मजेदार जोक है यहां

720
00:51:17,400 --> 00:51:21,600
पे। अब यहां पे इन्होंने यह सिद्ध करने के

721
00:51:21,600 --> 00:51:25,760
लिए कि गीता बोलने वाला गीता बोलने वाले भगवान श्री कृष्ण

722
00:51:25,760 --> 00:51:29,920
नहीं है। बल्कि वो इनका तथाकथित जो एक इनका कार्टून कररेक्टर है

723
00:51:29,920 --> 00:51:34,800
राक्षस काल वो है। तो इन्होंने क्या किया है?

724
00:51:34,800 --> 00:51:39,040
यह सिद्ध करने के लिए अब यहां पर यह बताया कि देखिए यहां पर स्वयं

725
00:51:39,040 --> 00:51:43,040
भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं कि भैया मैं मैं

726
00:51:43,040 --> 00:51:47,040
कर्म मेरे लिए कर्म करने की कोई भी आवश्यकता नहीं है और मैंने मेरे

727
00:51:47,040 --> 00:51:51,360
को जो सारी चीजें बिना कर्म किए ही प्राप्त हो सकती हैं।

728
00:51:51,360 --> 00:51:55,440
ठीक है? तो अब आगे कह रहे हैं कि यदि यह भगवान

729
00:51:55,440 --> 00:51:59,680
श्री कृष्ण होते तो भगवान श्री कृष्ण ने तो इतने बुरे बुरे कर्म किए हैं

730
00:51:59,680 --> 00:52:03,800
तो वह यह बात कैसे कहते हैं कि लोग मेरा अनुसरण करते हैं या अनुसरण

731
00:52:03,800 --> 00:52:08,160
करेंगे। है ना? तो इसने बहुत सारी

732
00:52:08,160 --> 00:52:12,160
वृतांत बताए हैं यहां पर। इसी की गीता का पष् खोल दीजिए। फिर हम 21

733
00:52:12,160 --> 00:52:16,320
से 24 अपना अपनी गीता का दिखाएंगे। तो इसने बहुत सारे वृतांत बताए

734
00:52:16,320 --> 00:52:20,640
हैं। अब पहले कहा है इसने कि श्री

735
00:52:20,640 --> 00:52:24,800
कृष्ण के चरित्र का अनुसरण करने से तो समाज में अराजकता

736
00:52:24,800 --> 00:52:28,800
अश्लीलता फैल जाएगी। जैसे कुमारी राधा से रमण

737
00:52:28,800 --> 00:52:32,480
कुमारी कुजा के साथ भोग ये सारी चीजें हम अपने कई बार

738
00:52:32,480 --> 00:52:37,200
कवर कर चुके हैं। इनका अर्थ क्या था लीलाओं का मगर इसने

739
00:52:37,200 --> 00:52:42,160
आक्षेप लगाया है कि कृष्ण भगवान का अनुसरण करने पर तो ऐसा ऐसा हो जाएगा।

740
00:52:42,160 --> 00:52:46,400
तो यहां पर यह उदाहरण देकर के कि देखिए भगवान कृष्ण

741
00:52:46,400 --> 00:52:50,560
के कर्म तो ऐसे हैं ही नहीं जिनका अनुसरण किया जाए। इसका मतलब

742
00:52:50,560 --> 00:52:54,720
है कि गीता बोलने वाला कोई और है। वो भगवान श्री कृष्ण नहीं

743
00:52:54,720 --> 00:52:59,040
है। काल है। तो क्या भैया काल के अच्छे कर्म है?

744
00:52:59,040 --> 00:53:03,400
ये सोचने वाली बात है। है ना? लगा ना

745
00:53:03,400 --> 00:53:07,880
जैकपॉट। क्या काल के अच्छे कर्म है? रामपाल के

746
00:53:07,880 --> 00:53:11,920
अनुसार जो यहां पर बताया जा रहा है। यानी

747
00:53:11,920 --> 00:53:16,320
कि रामपाल की इस थ्योरी को अगर माने तो काल ने भी गीता नहीं बोली।

748
00:53:16,320 --> 00:53:20,320
क्योंकि रामपाल यहां पर यह कह रहा है कि कृष्ण जी बुरे कर्म करने वाले हैं।

749
00:53:20,320 --> 00:53:24,800
जबकि यहां पर गीता बोलने वाला कह रहा है कि यदि मैं अच्छे कर्म ना करूं

750
00:53:24,800 --> 00:53:29,280
तो लोग समाज में जो है हीनता आ जाएगी, संकीर्णता आ जाएगी।

751
00:53:29,280 --> 00:53:33,280
यानी कि गीता बोलने वाला अच्छे कर्म करने वाला है। जबकि रामपाल के

752
00:53:33,280 --> 00:53:37,280
अनुसार काल तो अच्छे कर्म करने वाला है नहीं। वो तो व्यभचारी

753
00:53:37,280 --> 00:53:41,520
बलात्कारी वो तो लोगों को भटकाने वाला अपना उल्लू सीधा करने

754
00:53:41,520 --> 00:53:45,520
वाला अपने लिए झूठ अपने काम को बनाने के लिए झूठ

755
00:53:45,520 --> 00:53:47,920
बोलने वाला क्या-क्या नहीं है वो

756
00:53:47,920 --> 00:53:51,920
तो फिर वो क्या अच्छा है क्या और यहां तक कि वो मन के

757
00:53:51,920 --> 00:53:56,000
रूप में आकर के सभी को जो वो परेशान करता है सबसे

758
00:53:56,000 --> 00:54:00,000
जो गलत काम करवाता है वो तो काल ही करवाता है तो इसका

759
00:54:00,000 --> 00:54:04,080
अर्थ है अगर तुम्हारी इस थ्योरी को मान लिया जाए तो काल

760
00:54:04,080 --> 00:54:08,160
ने भी भगवत गीता नहीं बोली तो किसने ने बोली क्योंकि

761
00:54:08,160 --> 00:54:12,160
काल भी अच्छे कर्म करने वाला नहीं आया। बोल दो अच्छे कर्म करने वाला है। वो लोगों को

762
00:54:12,160 --> 00:54:16,240
खाता नहीं है। दूसरी एक बात और है। यहां पर गीता बोलने

763
00:54:16,240 --> 00:54:20,320
वाला इसके अनुसार कह रहा है कि मुझे कोई भी

764
00:54:20,320 --> 00:54:24,400
कर्म करना शेष नहीं है। मैं बिना कोई भी कर्म किए सब कुछ प्राप्त कर सकता हूं। सारा

765
00:54:24,400 --> 00:54:29,200
सुख यही बोल रहा है। देखो क्या बोल रहा है

766
00:54:29,200 --> 00:54:33,680
कि मुझे तीनों लोकों में कोई कर्म करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि

767
00:54:33,680 --> 00:54:38,520
सभी सुविधा मैं बिना कर्म किए ही प्राप्त कर सकता हूं।

768
00:54:38,520 --> 00:54:42,960
हम जबकि यहां क्या है? बेचारे को झूठ बोलना पड़ रहा है।

769
00:54:42,960 --> 00:54:47,200
यहां क्या है कि उसको रोज इंतजाम करना पड़ रहा है। सवा लाख वो खाना

770
00:54:47,200 --> 00:54:51,680
है। इसको तो सब कुछ प्राप्त है। फिर इसको क्यों ये सब तड़म

771
00:54:51,680 --> 00:54:55,760
भिानी पड़ रही है? यही तो अपने पीछे के अभी तक जो अध्ययन किया उसी

772
00:54:55,760 --> 00:55:00,400
में काल की बहुत सारी बुराई है। आगे भी काल की बहुत बुराई है।

773
00:55:00,400 --> 00:55:03,120
मगर यहां पर श्री कृष्ण से अलग करना था तो भूल

774
00:55:03,120 --> 00:55:09,120
गया कि मैं काल को भी बुरा बताता हूं। ये है बाबा जी का ज्ञान।

775
00:55:09,120 --> 00:55:13,600
तो इसने श्री कृष्ण जी का यहां पर कई बार

776
00:55:13,600 --> 00:55:17,480
खंडन किया कि

777
00:55:17,480 --> 00:55:21,840
अगर देखिए यहां पर कह गीता कहने वाला गीता जी में कहता है

778
00:55:21,840 --> 00:55:26,160
कि मैं यदि सोच समझकर कर्म ना करूं तो मैं वर्ण संकरता का कारण साबित

779
00:55:26,160 --> 00:55:30,160
हो जाऊं। यानी कि जो गीता बोलने वाला है

780
00:55:30,160 --> 00:55:34,320
यहां के हिसाब से वो बुरा करने वाला नहीं है।

781
00:55:34,320 --> 00:55:40,320
अच्छा करने वाला है। जबकि काल कौन है? बुरा करने

782
00:55:40,440 --> 00:55:44,640
वाला पवित्र श्रीमद् भगवत गीता जी श्री कृष्ण के जी के शरीर

783
00:55:44,640 --> 00:55:48,640
में प्रविष्ट होकर करके काल ब्रह्म यहां पे देखो काल ब्रह्म भगवान

784
00:55:48,640 --> 00:55:52,800
ने अपना उल्लू सीधा करवाकर युद्ध करवाकर लाखों व्यक्तियों

785
00:55:52,800 --> 00:55:56,800
का श्रृंगार करवाता था करने के लिए कही क्योंकि काल ब्रह्म ने गीता

786
00:55:56,800 --> 00:56:00,960
के सब इसने फिर आगे दर्शन नहीं दूंगा सर्वकार मेरे द्वारा गुप्त

787
00:56:00,960 --> 00:56:05,040
शक्ति से होते हैं ये सब कर दिया मगर ये ये भूल गया कि हम

788
00:56:05,040 --> 00:56:09,200
भगवान कृष्ण की बुराई करते करते हम यह भूल रहे हैं कि भगवान कृष्ण

789
00:56:09,200 --> 00:56:13,360
को काल से अलग करने के चक्कर में हम यहां काल को सही कहने का प्रयास कर रहे हैं

790
00:56:13,360 --> 00:56:17,680
और जबकि हमारे अनुसार तो काल बहुत बुरा है। भगवान श्री कृष्ण तुम्हारे अनुसार

791
00:56:17,680 --> 00:56:21,760
भगवान श्री कृष्ण अच्छे नहीं है पर काल तो और अच्छा नहीं है भाई।

792
00:56:21,760 --> 00:56:26,080
तो क्या काल का अनुसरण करना चाहिए लोगों को? तो

793
00:56:26,080 --> 00:56:30,240
तो गीता कहने वाला यदि ये बात कह रहा है कि मेरा अनुसरण करेंगे

794
00:56:30,240 --> 00:56:34,320
इसलिए मुझे अच्छा कार्य करना पड़ेगा। तो क्या

795
00:56:34,320 --> 00:56:38,320
काल के कार्य ऐसे हैं रामपाल के अनुसार जो लोग उसका

796
00:56:38,320 --> 00:56:42,400
अनुसरण करें? नहीं है। अब हम लोग 21

797
00:56:42,400 --> 00:56:46,400
से 24 का जो हमारा अर्थ है वो पढ़ लेते हैं और वो व्याख्या भी बता

798
00:56:46,400 --> 00:56:50,720
देते हैं आपको वो क्या है? श्रेष्ठ पुरुष जो जो

799
00:56:50,720 --> 00:56:54,800
आचरण करता है अन्य पुरुष भी वैसा वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ

800
00:56:54,800 --> 00:56:55,520
प्रमाण कर देते

801
00:56:55,520 --> 00:56:59,760
हैं मतलब जो करते हैं समस्त मनुष्य समुदाय उसी के अनुसार बरतने

802
00:56:59,760 --> 00:57:02,480
लग जाता है।

803
00:57:02,480 --> 00:57:06,000
हे हे अर्जुन मुझे इन तीनों

804
00:57:06,000 --> 00:57:10,160
लोकों में ना तो कुछ कर्तव्य है और ना कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु

805
00:57:10,160 --> 00:57:11,120
अप्राप्त है।

806
00:57:11,120 --> 00:57:15,360
ठीक है? क्यों? क्योंकि भगवान परम मुक्त है। और कई बार जो लोग ऐसी

807
00:57:15,360 --> 00:57:19,440
बातें करते हैं ना भगवान ये क्यों नहीं किया? वो क्यों नहीं किया? ये क्यों नहीं बचाया? ये क्यों किया? वो

808
00:57:19,440 --> 00:57:23,440
क्यों किया? वो जो भी कर रहे हैं उनके पास उसको करने का

809
00:57:23,440 --> 00:57:27,520
कोई कारण नहीं है। वो बस कर रहे हैं। वो मुक्त है। उनकी कोई

810
00:57:27,520 --> 00:57:31,200
आवश्यकता नहीं है।

811
00:57:31,200 --> 00:57:36,000
तो भी मैं कर्म में बरतता हूं। उनकी कोई आवश्यकता नहीं है।

812
00:57:36,000 --> 00:57:40,000
इसलिए यदि मैं कर्म ना करूं। अच्छा फिर क्या है? यदि कदाचित मैं

813
00:57:40,000 --> 00:57:44,720
सावधान होकर कर्मों में ना बरतू तो अब ये लौकिक रूप से अपना बता रहे हैं।

814
00:57:44,720 --> 00:57:48,800
जो व्यवहारिक स्वरूप है। अब यहां पे उसके अनुसार अपनी व्याख्या बता रहे हैं। तो

815
00:57:48,800 --> 00:57:53,200
भी मैं कदाचित होकर कर्मों में ना बरतू तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि सब मनुष्य

816
00:57:53,200 --> 00:57:58,400
सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। ठीक है?

817
00:57:58,400 --> 00:58:02,720
यदि मैं कर्म ना करूं तो सब मनुष्य नष्ट भ्रष्ट हो जाए और मैं संकरता

818
00:58:02,720 --> 00:58:06,880
का कारण करने वाला हो जाऊं। इस समस्त प्रजा को नष्ट करने

819
00:58:06,880 --> 00:58:11,640
वाला बनूं। मेरे ही मार्ग का मेरे बताए हुए मार्ग

820
00:58:11,640 --> 00:58:15,680
का भगवान यहां पर अपने बताए जाने वाले कर्मों की बात

821
00:58:15,680 --> 00:58:20,240
करते हुए ये कह रहे हैं कि मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

822
00:58:20,240 --> 00:58:23,560
ठीक है?

823
00:58:23,560 --> 00:58:27,560
क्योंकि लीला पुरुषोत्तम भगवान है तो उनका

824
00:58:27,560 --> 00:58:31,560
अनुकरण नहीं किया जा सकता। वो तो सृष्टि भी बनाते

825
00:58:31,560 --> 00:58:35,680
हैं। है ना? विराट स्वरूप भी दिखाते हैं। तो

826
00:58:35,680 --> 00:58:40,240
क्या ये भी भगवान का मनुष्य का धर्म है। विराट स्वरूप दिखाना या

827
00:58:40,240 --> 00:58:44,240
सृष्टि रचना करना। तो भगवान के द्वारा बताए

828
00:58:44,240 --> 00:58:48,560
हुए मार्ग के अनुसार चलते। इसलिए

829
00:58:48,560 --> 00:58:52,640
यदि मैं कर्म ना करूं यानी जो धर्म स्थापना भगवान कर रहे हैं तो

830
00:58:52,640 --> 00:58:56,800
ना करें तो क्या हो मनुष्य समाज जो है नष्ट भ्रष्ट हो जाए और जो

831
00:58:56,800 --> 00:59:00,960
ये मनुष्य संकरता को करने वाला हो जाऊं समस्त प्रजा को नष्ट

832
00:59:00,960 --> 00:59:05,120
करने वाला बन तो भगवान को कोई भी ऐसा नहीं है कि

833
00:59:05,120 --> 00:59:09,440
ये नहीं किया तो उनका काम नहीं चलेगा ये केवल उनके व्यवहारिक स्वरूप की व्याख्या

834
00:59:09,440 --> 00:59:13,680
यहां पर की गई और इस बेवकूफ ने क्या किया ये जो गीता

835
00:59:13,680 --> 00:59:18,400
का अर्थ जिसने भी लिखा है मुझे लगता नहीं है रामपाल ने भी लिखा लिखा है

836
00:59:18,400 --> 00:59:22,800
रामपाल तो कोई आई वो क्या है आरटीआई

837
00:59:22,800 --> 00:59:26,880
से मंगाया गया था कोई पुस्तक लिख लिखी जाती है क्या जेल में तो वहां से

838
00:59:26,880 --> 00:59:30,880
तो मना किया गया फिर भी ये पुस्तकें उसके जेल जाने के बाद आ रही

839
00:59:30,880 --> 00:59:35,400
छप रही तो कौन लिख रहा है ये भी बात है खैर आगे चलते

840
00:59:35,400 --> 00:59:38,720
हैं तो फिर आगे क्या कहा है

841
00:59:38,720 --> 00:59:42,200
भगवान

842
00:59:42,200 --> 00:59:47,400
ने और इसकी ढोल की पोल भी हमने देख

843
00:59:47,400 --> 00:59:51,680
ली। तो जो ये ये बातें जो लोग कहते हैं कि भगवान

844
00:59:51,680 --> 00:59:55,680
शिवलिंग थी उस पर चूहे चढ़ रहे थे। भगवान ने उन्हें हटाया क्यों

845
00:59:55,680 --> 00:59:59,680
नहीं? ये सब कहानियां यहां से हो जाती है कि

846
00:59:59,680 --> 01:00:00,560
मुझे इन तीनों

847
01:00:00,560 --> 01:00:05,120
लोकों में ना तो कुछ कर्तव्य है और ना ही कोई प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त

848
01:00:05,120 --> 01:00:06,480
है। उनके

849
01:00:06,480 --> 01:00:10,640
पास कोई ऐसा हेतु नहीं है कर्म को करने का। चूहे कूद रहे हैं या नहीं कूद

850
01:00:10,640 --> 01:00:14,800
रहे हैं। वह अपनी परम मुक्ति में परम शांति में उन्हें प्राप्त है। उन्हें

851
01:00:14,800 --> 01:00:19,280
कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। तो सबसे पहले चूहे कूदने से शिवलिंग को परेशानी

852
01:00:19,280 --> 01:00:23,520
हो। ये जो दयानंद एंड कंपनी द्वारा बताई गई चीजें आर्य

853
01:00:23,520 --> 01:00:28,000
समाज अलंकार समाज द्वारा बताई गई चीजें हैं। तो यदि

854
01:00:28,000 --> 01:00:31,960
इनके द्वारा बताई गई जो चीजें हैं

855
01:00:31,960 --> 01:00:36,080
कि शिवलिंग पर चूहे कूद रहे थे तो भगवान ने क्यों नहीं

856
01:00:36,080 --> 01:00:40,240
अपनी रक्षा की? अरे भाई उनको फर्क तो पड़े। फर्क

857
01:00:40,240 --> 01:00:44,720
आपको पड़ेगा चूहे कूदने से क्योंकि आप परम शांति को प्राप्त नहीं है।

858
01:00:44,720 --> 01:00:49,280
ईश्वर को नहीं पड़ता है। इसलिए ईश्वर का जहां पर मन होता है वहां वो

859
01:00:49,280 --> 01:00:53,280
अपने अनुसार कर्म कोई भी कर सकता है और जहां पर मन होता है नहीं कर

860
01:00:53,280 --> 01:00:57,360
सकता है। ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। परम स्वतंत्र है

861
01:00:57,360 --> 01:01:01,360
ईश्वर। ठीक है? तो यह

862
01:01:01,360 --> 01:01:07,040
सार्वभम सिद्धांत भी लेते चले। अब

863
01:01:07,040 --> 01:01:11,600
यहां यह ध्यान रखिए जो कहा गया श्लोक में कि कर्म ना करना

864
01:01:11,600 --> 01:01:15,960
कर्म करना शेष नहीं है। मगर काल के तो कर्म शेष

865
01:01:15,960 --> 01:01:20,160
है। काल को यहां पर क्या कहा गया कि मुझे ऐसी कोई वस्तु

866
01:01:20,160 --> 01:01:25,480
नहीं है जो मुझे प्राप्त ना हो और मुझे प्राप्त करनी है। क्या कहा गया

867
01:01:25,480 --> 01:01:30,000
कि कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु ऐसी नहीं जो मुझे अप्राप्त

868
01:01:30,000 --> 01:01:34,240
है। यहां कहा गया ना श्लोक में 22 में मगर उसको तो अप्राप्त

869
01:01:34,240 --> 01:01:38,480
है। सवा लाख जीभ चाहिए ना डेली कहां

870
01:01:38,480 --> 01:01:43,640
गए काल वाले खैर चलिए आगे चलते

871
01:01:43,640 --> 01:01:49,160
हैं हम इसके

872
01:01:49,160 --> 01:01:53,200
बाद अच्छा एक बात और है काल यहां पर कह रहा है

873
01:01:53,200 --> 01:01:57,360
24व में इसके ही अनुसार नहीं तो

874
01:01:57,360 --> 01:02:01,520
मैं समाज का करने वाला हो जाऊं और जबकि

875
01:02:01,520 --> 01:02:05,600
काल खुद ही समाज का नाश करता है जिसको को भी बरगलाता है।

876
01:02:05,600 --> 01:02:09,600
राम जी को ऐसा दिखाया, फिर शिव जी को ऐसा दिखाया, फिर पार्वती माता

877
01:02:09,600 --> 01:02:14,080
को ऐसा दिखाया। ये बार-बार खुद ही कह रहा है। ये काल ही दिखाता है।

878
01:02:14,080 --> 01:02:18,400
और यहां क्या कह रहा है कि नहीं नहीं मैं समाज को नष्ट करने वाला ना हो जाऊं।

879
01:02:18,400 --> 01:02:22,240
अरे भैया तू ही तो फसा के लाया जीवात्माओं को वहां सतलोक

880
01:02:22,240 --> 01:02:27,240
से। तेरी कार्टून फिल्म में यही चल रहा है ना। रामपाल ही है क्या

881
01:02:27,240 --> 01:02:33,240
काल? वही लाया है क्या जीवात्माओं को?

882
01:02:34,000 --> 01:02:38,080
रामपाल ही काल है। तभी कह रहा है। कभी-कभी वह काल के उसमें आ जाता

883
01:02:38,080 --> 01:02:42,160
है। कभी-कभी वह जो अपने संत कबीर थे उनके उसमें आ जाता है। तो वो

884
01:02:42,160 --> 01:02:47,360
समझ नहीं पा रहा है मैं किसके पीछे [हंसी] चलूं।

885
01:02:47,360 --> 01:02:51,440
क्या झोल है भाई। चलिए 25व

886
01:02:51,440 --> 01:02:55,680
पे आते हैं। अब 25 से 29 तक इसने

887
01:02:55,680 --> 01:02:59,760
क्या कहा है? 25 से 29 में इसने फिर वही अपनी बातें शुरू कर दी जो हम पीछे बात

888
01:02:59,760 --> 01:03:04,080
कराए हैं कि इसने 40 13 यजुर्वेद का उदाहरण

889
01:03:04,080 --> 01:03:08,080
देते हुए धीरा नाम पुरुषों का खंडन किया है और अपनी

890
01:03:08,080 --> 01:03:12,720
ही किताब में 40 10 यजुर्वेद का 40 10 का

891
01:03:12,720 --> 01:03:16,960
संदर्भ देते हुए धीर नाम पुरुषों का समर्थन किया है। इससे पूछ

892
01:03:16,960 --> 01:03:21,200
लो धीर नाम पुरुषों के पुरुषों की बात को मानना है

893
01:03:21,200 --> 01:03:25,280
कि नहीं मानना है? उनके पीछे चलना है कि नहीं चलना है? वह

894
01:03:25,280 --> 01:03:29,280
तत्वदर्शी है कि नहीं है। इनहीं से पूछ लो महाराज जी

895
01:03:29,280 --> 01:03:35,280
से इनका प्रकट दिवस आ रहा है ना पूछ लो इनहीं

896
01:03:35,960 --> 01:03:40,320
से। क्या ही अनर्थ कर रखा है। खैर

897
01:03:40,320 --> 01:03:44,840
चलिए पढ़ते हैं। तो लास्ट पैराग्राफ है 49

898
01:03:44,840 --> 01:03:49,120
का श्लोक 25 में कहा है कि शास्त्रानुकूल साधना

899
01:03:49,120 --> 01:03:53,440
रूपी कर्तव्य कर्म में आसक्त अविद्वान अर्थात अशिक्षित। अच्छा

900
01:03:53,440 --> 01:03:57,440
यहां पे एक बहुत बढ़िया जोक आने वाला है। बहुत अच्छा जोक सब लोग टाइमिंग नोट

901
01:03:57,440 --> 01:04:01,760
कर लेना और इसकी कटिंग बनाना बहुत बढ़िया जोक आ रहा है भाई।

902
01:04:01,760 --> 01:04:06,240
क्या जोक आ रहा है सुनिए आप लोग हिल जाओगे

903
01:04:06,240 --> 01:04:10,320
इसको सुन के। मेरा वचन है आप लोगों को। हिल

904
01:04:10,320 --> 01:04:14,320
जाओगे सुन के। देखो क्या कह रहा है। श्लोक 25 में

905
01:04:14,320 --> 01:04:19,120
कहा है कि शास्त्र अनुकूल साधना रूपी कर्तव्य कर्म में आसक्त

906
01:04:19,120 --> 01:04:23,520
अविद्वान अर्थात अशिक्षित

907
01:04:23,520 --> 01:04:28,200
किस किस में किस में आसक्त है? शास्त्र

908
01:04:28,200 --> 01:04:32,640
अनुकूल यानी कि रामपाल के द्वारा बताई जाने वाली भक्ति।

909
01:04:32,640 --> 01:04:36,680
शास्त्र अनुकूल साधना रूपी कर्तव्य कर्म में

910
01:04:36,680 --> 01:04:40,960
आसक्त अविद्वान अविद्वान है।

911
01:04:40,960 --> 01:04:43,160
कौन

912
01:04:43,160 --> 01:04:47,520
जो रामपाल के द्वारा बताई जाने वाली भक्ति क्योंकि इसके हिसाब से शास्त्र

913
01:04:47,520 --> 01:04:51,200
अनुकूल भक्ति कौन सी है? इसके

914
01:04:51,200 --> 01:04:55,600
अनुसार शास्त्र अनुकूल भक्ति वही है जो रामपाल बताता है। तो शास्त्र अनुकूल

915
01:04:55,600 --> 01:04:57,680
साधना रूपी कर्तव्य कर्म में आसक्त

916
01:04:57,680 --> 01:05:01,760
अविद्वान अर्थात अशिक्षित जिस प्रकार भक्ति कर्म

917
01:05:01,760 --> 01:05:05,840
करते हैं। विद्वान शिक्षित भी

918
01:05:05,840 --> 01:05:10,080
लोक संग्रह अधिक अनुयाई इकट्ठे करना चाहता

919
01:05:10,080 --> 01:05:12,960
हुआ उसी प्रकार करें।

920
01:05:12,960 --> 01:05:17,120
ठीक है? तो शास्त्र अनुकूल साधना

921
01:05:17,120 --> 01:05:21,120
भक्ति कौन करता है? अशिक्षित अविद्वान

922
01:05:21,120 --> 01:05:25,120
और आगे बहुत बड़ी बात है बहुत बड़ी बात इसमें

923
01:05:25,120 --> 01:05:29,200
लाइए भैया कहां गए पष्ठ संख्या 49 लास्ट में आ जाइए

924
01:05:29,200 --> 01:05:33,600
बिल्कुल सीधे सीधे नीचे आइए हां

925
01:05:33,600 --> 01:05:37,840
बहुत बड़ी बात आपके सामने आ रही है क्या

926
01:05:37,840 --> 01:05:41,600
लिख रहा है

927
01:05:41,600 --> 01:05:46,080
नीचे की दो लाइन देखिए एक ब्रैकेट में जो लिखा है जैसे

928
01:05:46,080 --> 01:05:50,600
जैसे से स्टार्ट करिए हां सारे रामपाली अनपढ़

929
01:05:50,600 --> 01:05:54,640
है। ठीक है? देखो क्या लिखा है।

930
01:05:54,640 --> 01:05:59,320
जैसे अविद्वान अर्थात भोलेभाले

931
01:05:59,320 --> 01:06:03,360
अशिक्षित शास्त्र अनुकूल साधना तत्वदर्शी

932
01:06:03,360 --> 01:06:07,320
संत से प्राप्त करते

933
01:06:07,320 --> 01:06:12,000
हैं। कौन प्राप्त करते हैं?

934
01:06:12,000 --> 01:06:16,480
अशिक्षित भोले भाले पिछड़े हुए तत्वदर्शी

935
01:06:16,480 --> 01:06:20,480
संत से प्राप्त करते हैं साधना वैसे ही जो

936
01:06:20,480 --> 01:06:25,200
शिक्षित है ये हमको बताया जा रहा है ठीक है

937
01:06:25,200 --> 01:06:29,200
जो बुद्धि वाले हैं ना उनको यहां बताया जा रहा है कि जैसे

938
01:06:29,200 --> 01:06:33,440
वो बिना बुद्धि वाले जो लोग हैं अशिक्षित है अनपढ़ है गवार है

939
01:06:33,440 --> 01:06:37,760
वो तत्वदर्शी के पास जाकर के जो वो भक्ति करते हैं उसी प्रकार

940
01:06:37,760 --> 01:06:41,920
हम जैसे लोगों को भी करनी चाहिए यहां यहां ये बताया जा रहा है

941
01:06:41,920 --> 01:06:45,920
इस प्रकार हम पाप को प्राप्त नहीं होंगे तो हमें उनको फॉलो करना

942
01:06:45,920 --> 01:06:50,080
चाहिए और जबकि वहां क्या कहा जा रहा है अभी तीन 23 में हम क्या देख

943
01:06:50,080 --> 01:06:53,840
आए हैं कि

944
01:06:53,840 --> 01:06:58,320
तीन 23 में क्या देखा था कि तीन

945
01:06:58,320 --> 01:07:04,320
21 में

946
01:07:04,680 --> 01:07:08,720
हम श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण करता है अन्य पुरुष

947
01:07:08,720 --> 01:07:12,840
भी वैसा ही वैसा करते हैं। तो भाई श्रेष्ठ कौन है? शिक्षित या

948
01:07:12,840 --> 01:07:16,880
अशिक्षित विद्वान या अविद्वान अनपढ़ या

949
01:07:16,880 --> 01:07:21,440
फिर पढ़ा लिखा कौन है श्रेष्ठ? तो हमको बोल रहा है मूर्ख

950
01:07:21,440 --> 01:07:25,440
यहां पर खुद ही कह रहा है कि श्रेष्ठ को फॉलो करो और फिर मूर्ख खुद ही कह रहा

951
01:07:25,440 --> 01:07:29,800
है कि जो है अनपढ़ गवारों को फॉलो करो। ये है मूर्खता की

952
01:07:29,800 --> 01:07:34,760
पराकाष्ठा। द कॉमेडी

953
01:07:34,760 --> 01:07:39,520
शो। देखिए क्या लिख रहा है।

954
01:07:39,520 --> 01:07:43,760
भोले भाले अशिक्षित शास्त्र अनुकूल साधना तत्वदर्शी

955
01:07:43,760 --> 01:07:47,760
संत से प्राप्त करते हैं। कौन लोग फंसते हैं? तत्व

956
01:07:47,760 --> 01:07:52,080
इसके जाल में इसके जाल में कौन लोग फंसते हैं?

957
01:07:52,080 --> 01:07:56,080
तत्वदर्शी के नाम पे ये रामपाल के जाल में कौन फंसते

958
01:07:56,080 --> 01:08:00,720
हैं? अनपढ़ अविद्वान भोलेभाले। अशिक्षित

959
01:08:00,720 --> 01:08:04,960
ये सब ये जितने भी घूम रहे हैं ना कल तक तेल बेच रहे थे। अब आजकल

960
01:08:04,960 --> 01:08:09,320
वीडियो बना रहे हैं। ये भोलेभाले लोग थे। पकड़ लिया

961
01:08:09,320 --> 01:08:12,440
इनको काल

962
01:08:12,440 --> 01:08:16,480
ने फसा लिया अब हमसे कहा जा रहा है

963
01:08:16,480 --> 01:08:19,840
कि तुम भी इनके ही जैसा करो अब आगे देखिए

964
01:08:19,840 --> 01:08:25,600
क्या है पष्ठ संख्या 50

965
01:08:25,600 --> 01:08:29,720
तीन श्लोक 26 का भावार्थ है कि तत्वदर्शी संत द्वारा शास्त्र विधि

966
01:08:29,720 --> 01:08:34,240
अनुसार साधना प्राप्त अशिक्षित व्यक्ति की बुद्धि में शिक्षित

967
01:08:34,240 --> 01:08:38,240
अक्षर ज्ञान युक्त व्यक्ति भ्रम भ्रम उत्पन्न ना करे देखिए हमको कहा जा रहा

968
01:08:38,240 --> 01:08:42,240
है कि भैया वो जो अशिक्षित व्यक्ति है उसको तुम भ्रम उत्पन्न

969
01:08:42,240 --> 01:08:46,640
मत करो उसको मत बताओ तुम्हारा रामपाल जो है वो

970
01:08:46,640 --> 01:08:50,640
तत्वदर्शी नहीं है ये देख लो क्या कह

971
01:08:50,640 --> 01:08:55,800
रहा है तीन श्लोक 26 का भावार्थ हा

972
01:08:55,800 --> 01:08:59,840
बल्कि स्वयं भी उसकी शास्त्र अनुसार

973
01:08:59,840 --> 01:09:03,840
जो वो साधना कर रहा है यानी कि वो तत्वद के जाल में फंस के जो काम

974
01:09:03,840 --> 01:09:07,920
कर रहा है स्वयं भी वैसे ही करो ये हमको वो अप्रत्यक्ष रूप से कह रहा है भाई हाथ

975
01:09:07,920 --> 01:09:11,920
जोड़ रहा हूं भाई है ना मैं हाथ जोड़ रहा हूं भाई

976
01:09:11,920 --> 01:09:15,920
शिवश नारायण द्विवेदी टीआर पहाड़ी जी मैं आपके यहां मैं तुम लोगों के

977
01:09:15,920 --> 01:09:20,160
हाथ जोड़ रहा हूं मैं हाथ जोड़ रहा हूं भाई इनके इनको इनको फंसा

978
01:09:20,160 --> 01:09:24,160
रहने दो मेरे जाल में और तुम इनको दिखाने के लिए वही करो जो ये कर

979
01:09:24,160 --> 01:09:26,360
रहे

980
01:09:26,360 --> 01:09:29,720
हैं

981
01:09:29,720 --> 01:09:33,760
खैर फिर क्या है तत्वदर्शी संत की भूमिका करने के लिए काशी नगर

982
01:09:33,760 --> 01:09:37,960
में यह अपना उदाहरण इसने दिया है कोई बकवास टाइप तो

983
01:09:37,960 --> 01:09:42,800
गीता अध्याय यहां पर इसने बार-बार कहा है

984
01:09:42,800 --> 01:09:46,800
भोलेभाले अशिक्षित तत्वदर्शी से ज्ञान प्राप्त

985
01:09:46,800 --> 01:09:50,960
करते हैं और तत्वदर्शी के नाम पर जो बताई जाने वाली साधना जिसको वो शास्त्र

986
01:09:50,960 --> 01:09:55,560
अनुकूल कह रहे हैं वो वो करते हैं। ठीक

987
01:09:55,560 --> 01:09:59,840
है? इसने खुद ही मान लिया कि मेरी मेरे झपट्टे में कौन

988
01:09:59,840 --> 01:10:04,040
आता है? अनपढ़ गवार अशिक्षित अविद्वान बेवकूफ

989
01:10:04,040 --> 01:10:08,680
मूर्ख ये सब आते हैं इसके लपेटे

990
01:10:08,680 --> 01:10:11,000
में

991
01:10:11,000 --> 01:10:15,360
खैर अ इसमें बाबूराम कह रहा है कि

992
01:10:15,360 --> 01:10:19,520
टीआर पहाड़ी और कथा कीर्तन

993
01:10:19,520 --> 01:10:23,520
यज्ञ हवन करने का अधिकारी नहीं क्योंकि गौतम ऋषि ने श्राप दिया है।

994
01:10:23,520 --> 01:10:28,520
बाबूराम पागल हो गया है। भटकती आत्मा।

995
01:10:28,520 --> 01:10:32,720
खैर अ आगे चलते हैं। तो हम

996
01:10:32,720 --> 01:10:36,880
लोग अपना अर्थ पढ़ लें 25 और 26 का। कर्म में आसक्त

997
01:10:36,880 --> 01:10:40,960
हुए अज्ञानी जन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्ति रहित विद्वान

998
01:10:40,960 --> 01:10:44,880
को भी लोक संग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार

999
01:10:44,880 --> 01:10:49,040
कर्म करें। यहां यह बात नहीं हो रही है कि

1000
01:10:49,040 --> 01:10:53,440
जो अज्ञानी जन कर रहे हैं वही करना है। मगर अज्ञानी

1001
01:10:53,440 --> 01:10:57,520
जन की जो आसक्ति है भोगों के प्रति

1002
01:10:57,520 --> 01:11:01,680
और उस आसक्ति के स्तर के कारण वह जो जो काम जो

1003
01:11:01,680 --> 01:11:05,680
अपनी तीव्रता जिस स्तर का बल वेग लगाते हुए

1004
01:11:05,680 --> 01:11:09,920
जो अपना कर्म कर रहे हैं आप भी पूर्ण मतलब पूरी

1005
01:11:09,920 --> 01:11:14,400
निष्ठा से क्योंकि अभी क्या है कि आसक्ति नहीं है तो आपका कोई प्रयोजन नहीं है

1006
01:11:14,400 --> 01:11:19,120
कर्म करने का तो उसमें ऐसा ना हो कि आपकी आपकी जो परफॉर्मेंस

1007
01:11:19,120 --> 01:11:23,360
है जैसे मान लीजिए के ना कोई मतलब तू

1008
01:11:23,360 --> 01:11:27,600
ना किसी को मारेगा ना तेरे मरने से कोई मरेगा और ना ही तेरे बचाने

1009
01:11:27,600 --> 01:11:31,600
से कोई बचेगा। ठीक है? वो जो हमने पढ़ा दूसरे अध्याय के 17

1010
01:11:31,600 --> 01:11:35,840
से लेकर के 31 में ठीक है तो तुझे आसक्ति रहित

1011
01:11:35,840 --> 01:11:40,000
होना है। तुझे अपने कर्म कर्मण्यवादी कारस्ते मा फलेशु कदाचना कर्म

1012
01:11:40,000 --> 01:11:44,000
से मिलने वाले भोग के प्रति आसक्ति नहीं है। तो आसक्ति ना होने के

1013
01:11:44,000 --> 01:11:48,080
कारण तेरा जो कर्तव्य कर्म है उसमें तेरा परफॉर्मेंस ना बिगड़े

1014
01:11:48,080 --> 01:11:52,080
तो तेरा परफॉर्मेंस कैसा होना चाहिए? जैसा आसक्ति होने वालों को होता है

1015
01:11:52,080 --> 01:11:56,080
वैसा ही परफॉर्मेंस तेरा होना चाहिए। वेग बल उतने ही निष्ठा

1016
01:11:56,080 --> 01:12:00,160
के साथ लड़ो जैसा जब आसक्ति होती है तो लड़ते हैं। तो उसमें अंतर

1017
01:12:00,160 --> 01:12:04,840
नहीं आना चाहिए। ठीक है? तो अपने कर्तव्य कर्म को वैसे

1018
01:12:04,840 --> 01:12:10,840
ही करें।

1019
01:12:11,120 --> 01:12:15,120
परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह

1020
01:12:15,120 --> 01:12:19,120
शास्त्र भेद कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में

1021
01:12:19,120 --> 01:12:23,120
भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न ना करे किंतु

1022
01:12:23,120 --> 01:12:27,280
स्वयं शास्त्र भेद समस्त कर्म भलीभांति करता हुआ उनसे

1023
01:12:27,280 --> 01:12:31,760
भी वैसे ही करवावे तो यहां क्या हो रहा है कि क्योंकि तुम्हारा कोई प्रयोजन

1024
01:12:31,760 --> 01:12:35,760
नहीं है तो अगर तुम का कार्य करना बंद कर दोगे तो तुम्हें देखकर

1025
01:12:35,760 --> 01:12:39,840
के अन्य लोग भी समझेंगे कार्य करने से फायदा जैसे मान लीजिए नाम जप

1026
01:12:39,840 --> 01:12:44,000
करते हैं। अरे नाम जप करने से क्या हो जाएगा? यह क्या हो जाएगा? वो क्या हो जाएगा? इस

1027
01:12:44,000 --> 01:12:48,080
कई बार जो महापुरुष होते हैं तब भी अपने उस कार्य में लगे रहते हैं। जबकि उनके

1028
01:12:48,080 --> 01:12:52,320
मन में सदैव चिंतन मनन चल रहा है। मगर लोग प्रभावित होकर के गलत मार्ग

1029
01:12:52,320 --> 01:12:56,320
पर ना पड़ जाए। जो अभी मुक्त नहीं हुए हैं। जो अभी चिंतन मनन

1030
01:12:56,320 --> 01:13:00,480
में नहीं आए हैं। जिनके परमात्मा नहीं आया है। वो उनको देखकर

1031
01:13:00,480 --> 01:13:04,800
के अरे इससे कुछ नहीं। देखो उन्होंने महाराज जी ने भी तो छोड़ दिया। उन्होंने भी तो छोड़ दिया।

1032
01:13:04,800 --> 01:13:08,800
तो कई बार इस कारण से इसको भी लोक संग्रह कहते हैं। इस कारण से

1033
01:13:08,800 --> 01:13:12,880
अपने कर्म को करते रहना चाहिए। अब यहां पर देखिए एक बात और आ रही है सारभम

1034
01:13:12,880 --> 01:13:15,880
सिद्धांत वाली बात वो क्या

1035
01:13:15,880 --> 01:13:20,000
है कि ये जो वर्ण व्यवस्था वाली बात है कई बार

1036
01:13:20,000 --> 01:13:24,240
ऐसा कहा जाता है वो संत हो गए वो महान हो गए। तो वहां पर क्या है कि क्योंकि

1037
01:13:24,240 --> 01:13:28,560
सामाजिक व्यवस्था बिगड़ ना जाए। इसलिए वर्ण व्यवस्था का

1038
01:13:28,560 --> 01:13:32,800
जो लोकाचार है वो बंद नहीं होता कभी। कभी

1039
01:13:32,800 --> 01:13:36,880
भी ऐसा नहीं है जो कि भाई कोई बहुत बड़ा ज्ञानी हो गया

1040
01:13:36,880 --> 01:13:40,960
मगर उसने जो है वह जिन कर्मों के लिए अधिकृत नहीं है उन

1041
01:13:40,960 --> 01:13:45,120
कर्मों को भी करने लगा अगर वास्तविकता में वो धर्माचरण करने वाला व्यक्ति

1042
01:13:45,120 --> 01:13:49,240
है तो तो

1043
01:13:49,240 --> 01:13:53,360
इसीलिए अ विरक्त होते हुए

1044
01:13:53,360 --> 01:13:57,920
भी अपने जो शास्त्रों के द्वारा बताई हुई जो सीमाएं हैं मर्यादाएं

1045
01:13:57,920 --> 01:14:02,040
हैं उनमें रहने वाला व्यक्ति और अपना स्वधर्म आचरण करने वाला व्यक्ति

1046
01:14:02,040 --> 01:14:06,400
ही ठीक माना गया है। तो क्या कहा गया? परमात्मा

1047
01:14:06,400 --> 01:14:10,640
के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वे शास्त्र

1048
01:14:10,640 --> 01:14:14,720
भेद कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों

1049
01:14:14,720 --> 01:14:18,800
में श्रद्धा अश्रद्धा उत्पन्न ना करे किंतु स्वयं शास्त्र

1050
01:14:18,800 --> 01:14:23,600
भेद समस्त कर्म भलीभांति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवावे।

1051
01:14:23,600 --> 01:14:27,840
ठीक है? अब आगे 27 पे 27 से 29 का भावार्थ

1052
01:14:27,840 --> 01:14:31,200
इसने क्या लिखा है? कि प्राणी जब तक पूर्ण संत की

1053
01:14:31,200 --> 01:14:35,280
शरण ग्रहण नहीं करता तब तक अपने संस्कार ही प्राप्त करता है।

1054
01:14:35,280 --> 01:14:39,440
संस्कार संस्कार का फल तीनों भगवानों रजगुण ब्रह्मा सद्गुण विष्णु तथा

1055
01:14:39,440 --> 01:14:43,560
तमगुण शिव द्वारा दिया जाता है। तीनों

1056
01:14:43,560 --> 01:14:47,840
गुणों तीनों गुणों यानी ब्रह्मा विष्णु महेश अर्थात प्रकृति

1057
01:14:47,840 --> 01:14:51,920
अर्थात दुर्गा से उत्पन्न है। ये तीनों बार-बार इसको अपना एजेंडा तो चलाना ही

1058
01:14:51,920 --> 01:14:56,360
है। उसके बाद क्या है? अहंकार

1059
01:14:56,360 --> 01:15:00,400
वश सर्व शास्त्रों को तत्वज्ञानी द्वारा अच्छी तरह समझकर

1060
01:15:00,400 --> 01:15:04,720
भी अपने अहंकार युक्त हट को स्वभाव वश नहीं छोड़ता।

1061
01:15:04,720 --> 01:15:08,720
अर्थात वास्तविकता को आंखों से देखकर भी स्वीकार नहीं करता। परंतु

1062
01:15:08,720 --> 01:15:12,800
तत्वदर्शी संत तत्व ज्ञान के आधार से प्रत्येक प्रभु की शक्ति

1063
01:15:12,800 --> 01:15:17,680
से परिचित होकर इन भगवानों व शास्त्रों

1064
01:15:17,680 --> 01:15:21,760
के विरुद्ध साधना पर आसक्त नहीं होता।

1065
01:15:21,760 --> 01:15:26,160
तत्वदर्शी कौन है? तत्वदर्शी वह है

1066
01:15:26,160 --> 01:15:30,480
जो तत्व ज्ञान के आधार पर प्रत्येक प्रभु की शक्ति से परिचित

1067
01:15:30,480 --> 01:15:34,720
होकर इन भगवानों व शास्त्र विरुद्ध साधना

1068
01:15:34,720 --> 01:15:39,440
पर आसक्त नहीं होता। ये पॉइंट टू बी नोटेड है। क्यों? क्योंकि

1069
01:15:39,440 --> 01:15:43,640
इसके अनुसार तत्वदर्शी वो सब लोग हैं जो रामपाल को मानने

1070
01:15:43,640 --> 01:15:46,480
लगे। जिन जिनने जिन

1071
01:15:46,480 --> 01:15:50,640
लोगों ने ब्रह्मा विष्णु महेश को मतलब पूर्ण परमात्मा नहीं

1072
01:15:50,640 --> 01:15:54,880
माना है वो सब तत्वदर्शी है आज से। तो तो तदशी की जो

1073
01:15:54,880 --> 01:15:59,160
यूनिकनेस है वह समाप्त हो गई।

1074
01:15:59,160 --> 01:16:03,440
ठीक? आगे चलते हैं। 27 से 29

1075
01:16:03,440 --> 01:16:07,760
का हमारा भावार्थ भी पढ़ ले। क्या है? वास्तव में संपूर्ण कर्म

1076
01:16:07,760 --> 01:16:11,760
सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा ही किए जाते हैं। तो भी

1077
01:16:11,760 --> 01:16:16,160
जिसका अंतःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है। ऐसा अज्ञानी

1078
01:16:16,160 --> 01:16:20,240
मैं करता हूं। ऐसा मानता है तो यह जो कर्तापन है ना

1079
01:16:20,240 --> 01:16:24,240
यही बंधन का कारण है कि आई एम समथिंग मैं यह

1080
01:16:24,240 --> 01:16:28,240
हूं मैं वो हूं यही हमारे बंधन का कारण होता है और

1081
01:16:28,240 --> 01:16:32,240
कई जो फिलॉसफी है जैसे कि हम

1082
01:16:32,240 --> 01:16:36,400
भगवान से जो है ये कहा जाता है भगवान से अलग होकर

1083
01:16:36,400 --> 01:16:40,640
के भोग करना था अलग होकर के भोग करना था इसलिए संसार

1084
01:16:40,640 --> 01:16:44,800
के प्रपंच में फंस गए तो वो अलग होकर के अपने अस्तित्व को स्वीकार

1085
01:16:44,800 --> 01:16:49,440
किया ना कि मैं अलग हूं भगवान भगवान से भिन्न भी मेरी कोई आइडेंटिटी है।

1086
01:16:49,440 --> 01:16:53,520
तो यहां पर यह जो अपनी आइडेंटिटी होना अपने मन

1087
01:16:53,520 --> 01:16:57,600
में यही बंधन का कारण है। और ये अविद्या से अविद्या

1088
01:16:57,600 --> 01:17:01,600
भी है ये। तो मैं करता हूं। इसी बात को छुड़ाने के लिए कई

1089
01:17:01,600 --> 01:17:05,840
बार कहा जाता है कि भगवत कृपा से ये हुआ। भगवत कृपा से हुआ। किसी भी

1090
01:17:05,840 --> 01:17:09,920
अच्छे कार्य को ऐसे नहीं जोड़ा जाता। कहा जाता है, सिखाया जाता है कि सब कुछ जो

1091
01:17:09,920 --> 01:17:14,080
भी हो रहा है, भगवत कृपा से हो रहा है। जब आप ऐसे अभ्यास करेंगे, धीरे-धीरे

1092
01:17:14,080 --> 01:17:18,080
आपके मन के अंदर वो चिंतन होने लगेगा क्योंकि आप कर्म अपनी जीभा

1093
01:17:18,080 --> 01:17:22,080
के द्वारा बार-बार वो उच्चारित कर रहे हैं। भगवत कृपा से हुआ। तो जब भी आपके

1094
01:17:22,080 --> 01:17:26,160
जीवन में जो कोई श्रेष्ठ कर्म होंगे, बड़ी बड़ी चीजेंगी, उपलब्धियां होंगी

1095
01:17:26,160 --> 01:17:30,320
तो भगवत कृपा से, भगवत कृपा से इस तरह से आपको अनुभूति होने

1096
01:17:30,320 --> 01:17:34,920
लगेगी कि भाई जो भी कर रहे हैं भगवान ही करवा रहे हैं।

1097
01:17:34,920 --> 01:17:39,280
तो किसी भी प्रकार से हम अपने कर्मों में लिप्त

1098
01:17:39,280 --> 01:17:43,520
नहीं होंगे। मेरे अंदर जो अहम भाव है वह कम होने लगेगा। तो यहां पर इसके

1099
01:17:43,520 --> 01:17:48,000
बारे में भी कहा जा रहा है कि मैं करता हूं। यह मानना नहीं चाहिए।

1100
01:17:48,000 --> 01:17:52,080
यही मोहित होने का लक्षण है कि मैं करता हूं।

1101
01:17:52,080 --> 01:17:56,400
और मुक्त कौन है? देखिए भगवान ने क्या कहा? भगवान ने क्या कहा?

1102
01:17:56,400 --> 01:18:01,040
कि मुझे कुछ भी कर्म करने का प्रयोजन नहीं है।

1103
01:18:01,040 --> 01:18:05,040
वो मुख्य है। परंतु हे महाभाव गुण विभाग और कर्म विभाग

1104
01:18:05,040 --> 01:18:09,040
के तत्व को जानने वाला ज्ञान योगी संपूर्ण गुण ही गुण में बरत

1105
01:18:09,040 --> 01:18:13,280
रहे हैं। ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता। तो कर्मों

1106
01:18:13,280 --> 01:18:17,120
के फल में आसक्त नहीं होता है। ये 28व

1107
01:18:17,120 --> 01:18:21,600
श्लोक का अर्थ दिखा दिया। इसके बाद 29व श्लोक का अर्थ क्या है? प्रकृति

1108
01:18:21,600 --> 01:18:25,680
के गुणों से अत्यंत मोहित हुए मनुष्य गुणों में कर्मों

1109
01:18:25,680 --> 01:18:29,920
में आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया ना समझने वाले मंद

1110
01:18:29,920 --> 01:18:34,160
बुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाली जानने वाला ज्ञानी विचलित

1111
01:18:34,160 --> 01:18:38,120
ना करे। क्या

1112
01:18:38,120 --> 01:18:42,160
हुआ कि जो लोग कर्म करने

1113
01:18:42,160 --> 01:18:46,240
में बुद्धि रख रहे हैं कि भैया हमें कर्म से फल प्राप्त होगा। तो

1114
01:18:46,240 --> 01:18:50,480
कर्म ना करके क्योंकि कर्म करते ही उन्हें कर्म से विरक्त होना है।

1115
01:18:50,480 --> 01:18:54,480
तो कर्म ना करके ऐसा ना हो कि आप कर्म करना बंद कर दे क्योंकि

1116
01:18:54,480 --> 01:18:58,560
आपको वास्तविकता पता चल गई तो ऐसा ना हो कि वह जो वह लोग जो है मंद

1117
01:18:58,560 --> 01:19:02,560
बुद्धि जिनको कहा गया ज्ञानी जो है वो आपको फॉलो करने लगे और

1118
01:19:02,560 --> 01:19:07,480
वो जो है अपना कर्म करना छोड़ दे तो अवस्था फैल जाए तो इसलिए

1119
01:19:07,480 --> 01:19:12,400
आपको आसक्ति रहित होकर कर्म करते रहना चाहिए।

1120
01:19:12,400 --> 01:19:17,520
यह इसने 3 से 29 में कहा मैं

1121
01:19:17,520 --> 01:19:21,600
ठीक है अब आज के लिए इतना ही वह बुलेट पॉइंट्स आज के बहुत ज्यादा हो गए हम एक काम

1122
01:19:21,600 --> 01:19:25,600
करेंगे कल रात को भी सेशन ले लेते हैं जिससे कि ये चैप्टर बहुत

1123
01:19:25,600 --> 01:19:29,600
लंबा ना हो जाए क्योंकि इससे आगे बहुत महत्वपूर्ण बातें हैं तो

1124
01:19:29,600 --> 01:19:32,320
हम कल एक एक्स्ट्रा एक चैप्टर ले लेंगे जिसमें

1125
01:19:32,320 --> 01:19:36,400
कि इसके जो आज जो और 10 12 श्लोक होने थे वो हम

1126
01:19:36,400 --> 01:19:40,480
कल उनको कवर कर लेंगे। बहुत जरूरी

1127
01:19:40,480 --> 01:19:44,600
और आवश्यक बातें हैं।

1128
01:19:44,600 --> 01:19:48,880
मगर आज के लिए अभी इतना ही बहुत है। लिंक दे दीजिए।

1129
01:19:48,880 --> 01:19:53,040
यदि कोई अभी वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा नहीं करनी है। पीआर

1130
01:19:53,040 --> 01:19:57,280
पहाड़ी जी जैसे इत्यादि जो कोई सज्जन हो भगवान के भक्त

1131
01:19:57,280 --> 01:20:01,280
हो वो कुछ आकर के कुछ विचार छोटा मोटा कुछ समय देना चाहे

1132
01:20:01,280 --> 01:20:07,280
तो वह आ सकते हैं।

1133
01:20:11,920 --> 01:20:17,920
लिंक दिया

1134
01:20:23,800 --> 01:20:28,040
है। मेरे ख्याल से कोई है

1135
01:20:28,040 --> 01:20:34,040
नहीं। लिंक दे दीजिए।

1136
01:20:41,520 --> 01:20:46,400
लिंक दे दिया गया है। कोई जुड़ना चाहे तो जुड़ सकता है।

1137
01:20:46,400 --> 01:20:50,480
आशा करते हैं आपको ये जो श्रंखला है वो ठीक लग रही

1138
01:20:50,480 --> 01:20:54,720
हो। हमारा एक प्रयास है। क्या है ऐसी बहाने? भगवत गीता का एक अध्ययन

1139
01:20:54,720 --> 01:21:00,720
भी चल रहा है हमारा। भगवत गीता का अध्ययन इन

1140
01:21:02,440 --> 01:21:07,200
द भगवत गीता का अध्ययन प्रतिकार स्वरूप किसके

1141
01:21:07,200 --> 01:21:11,360
रामपाल एंड कंपनी के तो मेरे ख्याल से कोई

1142
01:21:11,360 --> 01:21:16,320
है नहीं अभी जो आना चाहे और बाकी वैचारिक मतभेद के निमित्त

1143
01:21:16,320 --> 01:21:21,040
किसी को भी यदि चर्चा करनी है तो

1144
01:21:21,040 --> 01:21:26,160
वह जो है हमारे संपर्क सूत्र पर संपर्क कर सकता

1145
01:21:26,160 --> 01:21:30,240
यदि किसी को कहीं हमें चर्चा के लिए बुलाना है

1146
01:21:30,240 --> 01:21:34,320
या कोई भी इस तरह की चर्चा करनी है कि भाई वहां आ जाओ यहां आ जाओ तो वह हमें

1147
01:21:34,320 --> 01:21:38,320
अधिकृत रूप से यदि कोई आश्रम बुला रहा है आश्रम बुलाने की

1148
01:21:38,320 --> 01:21:42,320
बात कर रहा है तो पहले आश्रम से फोन करवाओ हम आश्रम का

1149
01:21:42,320 --> 01:21:46,320
कोई बॉस होगा ना कोई प्रबंधक होगा वो वहां

1150
01:21:46,320 --> 01:21:50,320
से फोन करे कि भाई यहां आ जाओ तब हम ये सोचेंगे कि वहां जाना है कि

1151
01:21:50,320 --> 01:21:54,320
कहां जाना है ठीक है बाकी निष्ठा माता जी

1152
01:21:54,320 --> 01:21:58,400
ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो

1153
01:21:58,400 --> 01:22:01,480
तो आओ आकर

1154
01:22:01,480 --> 01:22:05,520
के बताओ कि रामपाल में कितना दम है भाई क्या-क्या

1155
01:22:05,520 --> 01:22:10,200
गपोड़ बाजी करके गया है रामपाल मूर्खता की

1156
01:22:10,200 --> 01:22:14,240
पराकाष्ठा मूर्खता की पराकाष्ठा

1157
01:22:14,240 --> 01:22:17,760
अब लोग कहते हैं कि भाई तुम मूर्ख क्यों कह रहे हो भाई ब्रह्मा विष्णु महेश को अज्ञानी

1158
01:22:17,760 --> 01:22:21,920
कह रहे हो ऋषियों को अज्ञानी कह रहे हो आचार्यों को अज्ञानी कह रहे हो मूर्ख

1159
01:22:21,920 --> 01:22:26,000
कह रहे हो अश्लील शब्दों का उपयोग कर रहे हो तो

1160
01:22:26,000 --> 01:22:31,240
हम चुप रहे। चलिए ठीक

1161
01:22:31,240 --> 01:22:35,680
है। सभी को जय श्री राम।

1162
01:22:35,680 --> 01:22:39,680
ये क्या कह रहे हैं? अमित जी बता रहे हैं

1163
01:22:39,680 --> 01:22:44,280
कि इनके जो आश्रम है उसमें

1164
01:22:44,280 --> 01:22:48,600
इनको।

1165
01:22:48,600 --> 01:22:52,640
चलिए जय श्री राम सभी को और कल हम प्रयास करेंगे

1166
01:22:52,640 --> 01:22:56,640
कि 8:00 बजे उपस्थित हो जाए। जय श्री राम सभी को।
