1
00:00:02,480 --> 00:00:05,720
सभी को जय श्री

2
00:00:05,720 --> 00:00:11,720
राम। आशा करता हूं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे।

3
00:00:13,400 --> 00:00:16,000
अ जय श्री राम। जय श्री राम

4
00:00:16,000 --> 00:00:19,000
सभी

5
00:00:19,000 --> 00:00:21,640
को।

6
00:00:21,640 --> 00:00:25,680
तो गीता के नाम पर रामपाल के

7
00:00:25,680 --> 00:00:30,000
बोल वचन शायद हमारा ये फोर्थ

8
00:00:30,000 --> 00:00:34,760
एपिसोड है और जैसा कि हम हर एपिसोड

9
00:00:34,760 --> 00:00:39,000
में पिछले एपिसोड के जो बुलेट पॉइंट्स

10
00:00:39,000 --> 00:00:43,760
हैं वो उपलब्ध कराते हैं। तो हमने

11
00:00:43,760 --> 00:00:48,080
फर्स्ट एपिसोड में रामपाल ने क्योंकि गीता का अपार्थ

12
00:00:48,080 --> 00:00:52,080
करना शुरू किया था। 2.10 से लेकर के मतलब 2.10 से

13
00:00:52,080 --> 00:00:56,080
उसने शुरू किया है अपार्थ। तो हमने 2.10 से लेकर

14
00:00:56,080 --> 00:01:00,080
के 2.30 तक की समरी जो जो उसने जो

15
00:01:00,080 --> 00:01:04,080
शटर घोट की है श्लोकों के अर्थ में उसके बारे में बात की

16
00:01:04,080 --> 00:01:08,480
है एपिसोड वन में 2.30 से लेकर के 2.52

17
00:01:08,480 --> 00:01:12,720
तक जो उसने शटर घोट की है झोल किया है उस पर हमने

18
00:01:12,720 --> 00:01:16,800
बात की है एपिसोड टू में और 2.53 से

19
00:01:16,800 --> 00:01:20,880
लेकर के उसने जो 2.72 तक जो अपार्थ किया है उसके

20
00:01:20,880 --> 00:01:25,360
बारे में हमने बात की है अह एपिसोड

21
00:01:25,360 --> 00:01:29,440
थ्री में आज तीसरे अध्याय की शुरुआत होने वाली

22
00:01:29,440 --> 00:01:31,120
है। मगर उससे पहले जो एपिसोड

23
00:01:31,120 --> 00:01:35,280
थ्री के बुलेट पॉइंट्स कौन-कौन से हैं उस पर हम बात कर लें। सबसे पहला और

24
00:01:35,280 --> 00:01:39,600
जरूरी पॉइंट है कि रामपाल के अनुसार उसने जो 2.53

25
00:01:39,600 --> 00:01:43,760
से लेकर के 2.72 के बीच में जो गीता का अर्थ किया है, उसमें उसने

26
00:01:43,760 --> 00:01:49,000
कौन-कौन सी मोटी बातें ऐसी की है जो हमारे ध्यान में रखने योग्य है

27
00:01:49,000 --> 00:01:53,120
रामपाल वालों को भगाने के लिए दौड़ा दौड़ा कर। ठीक है?

28
00:01:53,120 --> 00:01:57,120
तो क्या है पहली बात कि रामपाल के अनुसार कोई

29
00:01:57,120 --> 00:02:01,120
भी भक्त नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि उसने मेंशन किया

30
00:02:01,120 --> 00:02:05,200
है कि जिसको तत्व ज्ञान नहीं है, जिसको तत्व ज्ञान प्राप्त नहीं

31
00:02:05,200 --> 00:02:09,360
हुआ है। तत्व ज्ञान के बिना वो भक्ति

32
00:02:09,360 --> 00:02:13,360
नहीं कर सकता। वो भक्त नहीं हो सकता। तो

33
00:02:13,360 --> 00:02:17,680
आप जानते ही हैं रामपाल के अनुसार इस संसार में पूरे संसार में कोई भी

34
00:02:17,680 --> 00:02:21,840
तत्व ज्ञानी नहीं है। तो इसका अर्थ क्या है? कि उसका

35
00:02:21,840 --> 00:02:26,000
भक्त समझ उसका फॉलोअ मानते हुए स्वयं को भक्त कहने वाले जितने

36
00:02:26,000 --> 00:02:30,000
भी लोग हैं वह सब भक्त नहीं है। रामपाल के

37
00:02:30,000 --> 00:02:34,240
अनुसार ये मोटी बात। दूसरी बात क्या है कि रामपाल

38
00:02:34,240 --> 00:02:38,400
ने जो दूसरे अध्याय की शुरुआत में एक जगह कह दिया था

39
00:02:38,400 --> 00:02:42,400
कि लाभ हानि के बिना कोई युद्ध हो सकता है। कोई कर्म हो सकता है भला। तो

40
00:02:42,400 --> 00:02:46,160
हमने उस अभी तक तीन एपिसोड में बार-बार यह बताते आए

41
00:02:46,160 --> 00:02:50,160
कि यह जो बात इसने कही है कि लाभ हानि के बिना कुछ नहीं हो सकता। जिसके आधार पर

42
00:02:50,160 --> 00:02:54,160
उसने गीता बोलने वाले को गलत कहा, गलत ठहराने की कोशिश की है कि उसने

43
00:02:54,160 --> 00:02:58,160
गलत ज्ञान दिया है। हालांकि वो बात और है कि जब वो गलत ज्ञान दे रहा है तो

44
00:02:58,160 --> 00:03:02,320
उसकी कोई भी बात तुम प्रमाण के रूप में कैसे मान रहे हो? खैर

45
00:03:02,320 --> 00:03:05,680
वो तो एक अलग बात है। मगर

46
00:03:05,680 --> 00:03:09,760
यहां पर भी उसने पाप और पुण्य के फल पर ध्यान मत

47
00:03:09,760 --> 00:03:13,920
दो। इस बात को स्वीकार किया है। यानी अपनी उस लाभ हानि वाली बात का खुद ही खंडन

48
00:03:13,920 --> 00:03:18,240
किया है। 2.46 से 2.53 के बीच में उसने क्या-क्या

49
00:03:18,240 --> 00:03:22,320
स्वीकार किया है? उसने मोह रहित होने की बात को

50
00:03:22,320 --> 00:03:26,320
स्वीकार किया है। मतलब मोह नहीं होना चाहिए। लाभ हानि में राग द्वेष में

51
00:03:26,320 --> 00:03:30,680
समान बुद्धि होनी चाहिए। लाभ हानि में समान बुद्धि होनी चाहिए।

52
00:03:30,680 --> 00:03:34,960
हम और पूर्ण परमात्मा में मन होना चाहिए।

53
00:03:34,960 --> 00:03:39,040
छोटे भगवान से दूर मन होना चाहिए। ये भी उसने वहां पर ब्रह्मा विष्णु महेश की

54
00:03:39,040 --> 00:03:43,040
बात वो कर रहा है और उसके हिसाब से पूर्ण परमात्मा कबीर है। तो यहां

55
00:03:43,040 --> 00:03:47,040
पर ये भी हमें यहां पर पता चला यहां पर भी इसने वो जो

56
00:03:47,040 --> 00:03:51,280
ये लोग क्लेम करते हैं ना हम लोग वो हम लोग तो ब्रह्मा विष्णु महेश

57
00:03:51,280 --> 00:03:56,120
की भक्ति बताते हैं। तो यहां पर ये इनके मुंह पर मारना ये वाला

58
00:03:56,120 --> 00:04:00,240
2.53 से लेकर 2.72 के बीच में रामपाल ने ये भी

59
00:04:00,240 --> 00:04:01,520
कहा है कि पूर्ण परमात्मा

60
00:04:01,520 --> 00:04:05,840
में मन लगाओ और ये जो भगवान है ब्रह्मा विष्णु महेश उसके अनुसार भगवान है। हालांकि

61
00:04:05,840 --> 00:04:10,040
वो भी भगवान सिद्ध नहीं होते मगर उनसे अपने मन को दूर

62
00:04:10,040 --> 00:04:14,160
हटाओ। और एक बहुत जरूरी मोटी बात क्या

63
00:04:14,160 --> 00:04:19,120
है कि सतलोक का प्रभु कौन है? कबीर मगर इसने

64
00:04:19,120 --> 00:04:23,120
इसी बीच में जो जहां जिन श्लोकों की हम बात कर रहे उसी बीच

65
00:04:23,120 --> 00:04:27,440
में माना है कि ब्रह्म तथा

66
00:04:27,440 --> 00:04:31,440
परम ब्रह्म से भी आगे एक

67
00:04:31,440 --> 00:04:35,840
और परमेश्वर है उसके पास जाना है। सतलोक से भी आगे

68
00:04:35,840 --> 00:04:40,080
एक और लोक है वहां जाना है। वहां पर जाके मुक्ति होगी। तो सतलोक में मुक्ति

69
00:04:40,080 --> 00:04:44,440
नहीं है। यहां पर भी इसने माना। ठीक है? अच्छा सांसारिक

70
00:04:44,440 --> 00:04:48,480
लालच त्यागने की बात इसने फिर कही वह लाभ हानि वाली बात का अपनी

71
00:04:48,480 --> 00:04:52,480
बात का खंडन किया सुखदख में समान रहो यह भी बात इसने यहां पर की है

72
00:04:52,480 --> 00:04:56,640
इस बीच भौतिक जगत से प्रेम ना करो यह भी बात कही है इस बीच राग

73
00:04:56,640 --> 00:05:01,440
द्वेष रहित रहो यह भी बात कही है इसके बीच और

74
00:05:01,440 --> 00:05:05,520
यह जो व्रत का खंडन करने का प्रयास करता है कि व्रत

75
00:05:05,520 --> 00:05:09,600
के लिए तो भगवान ने मना किया है क्यों मना किया है क्योंकि वो हट

76
00:05:09,600 --> 00:05:13,680
हट पूर्वक जो लोग अपनी इंद्रियों को वो करते हैं तो हठ योग

77
00:05:13,680 --> 00:05:17,200
का मना किया है। मगर

78
00:05:17,200 --> 00:05:21,280
वहां भगवान का कहने का तात्पर्य है कि बिना भगवान की शरणागति हुए

79
00:05:21,280 --> 00:05:25,440
केवल कर्म को आधार बना के कर्म में हम अपनी जो

80
00:05:25,440 --> 00:05:29,680
अपने कर्मों जो इंद्रिय विषय उनसे अपने इंद्रियों को नियंत्रित

81
00:05:29,680 --> 00:05:33,760
कर लेंगे। इंद्रिय विषय आसक्तियों से मुक्त हो जाएंगे। उस

82
00:05:33,760 --> 00:05:37,920
बात को भगवान ने कहा है मगर इसने उस बात को ऐसे ले लिया है कि भगवान ने व्रत करने

83
00:05:37,920 --> 00:05:42,760
को उपवास रखने को ही मना कर दिया। वो खैर आगे आएगी वह वाली बात।

84
00:05:42,760 --> 00:05:46,800
मगर इसने यहां पर इस बीच जो यह बात कर रहा है

85
00:05:46,800 --> 00:05:50,880
तो इस बात कर रहा है कि इंद्रिय नियंत्रण निषेध किया है।

86
00:05:50,880 --> 00:05:55,360
मतलब बिना भक्ति के यह भी यह बात मानता है कि भक्ति के साथ यदि इंद्रिय नियंत्रण

87
00:05:55,360 --> 00:05:59,440
करने का प्रयास किया जाएगा तो पॉसिबल है। इस पर भी हम आगे बात करेंगे। आज के

88
00:05:59,440 --> 00:06:03,440
चैप्टर में भी ये वाली बात है। तो इसने ये माना है कि भक्ति के साथ

89
00:06:03,440 --> 00:06:07,680
अगर इंद्र इंद्रिय नियंत्रण करोगे तो पॉसिबल है तो अच्छा है।

90
00:06:07,680 --> 00:06:11,840
मगर भक्ति के बिना भगवान की शरणागति के बिना करोगे तो वो

91
00:06:11,840 --> 00:06:17,840
कोई लाभ का नहीं है। ठीक है?

92
00:06:19,800 --> 00:06:23,840
और परमात्मा को जानकर इसने माना कि

93
00:06:23,840 --> 00:06:28,080
आसक्ति रहित हुआ जा सकता है। अच्छा इसने शंगी ऋषि

94
00:06:28,080 --> 00:06:32,160
का उदाहरण देकर के दशरथ की जो पुत्री

95
00:06:32,160 --> 00:06:36,160
थी शांता उनके साथ उनके विवाह

96
00:06:36,160 --> 00:06:40,160
का खंडन किया है। इसी बीच और आगे के श्लोकों में खुद

97
00:06:40,160 --> 00:06:44,400
ही विवाह का समर्थन किया। मतलब इस बीच कहा है कि भाई वो श्रृंगी ऋषि थे। उन्होंने

98
00:06:44,400 --> 00:06:48,560
अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल किया हुआ था। परंतु

99
00:06:48,560 --> 00:06:52,560
वो अपनी इंद्रियों पर वो कंट्रोल जो था उसको रख नहीं पाए।

100
00:06:52,560 --> 00:06:56,560
और जो है उन्होंने हट पूर्वक क्योंकि यहां हट पूर्वक खंडन कर रहा है ना

101
00:06:56,560 --> 00:07:00,720
इंद्रियों का इंद्रियों पर नियंत्रण करने का वो व्रत इत्यादि वैराग्य

102
00:07:00,720 --> 00:07:05,440
का खंडन कर रहा है वैराग्य का नहीं

103
00:07:05,440 --> 00:07:09,440
मतलब हमारी जो हमारे जो सनातन की जो प्योर पद्धति

104
00:07:09,440 --> 00:07:13,440
है उसके अनुसार पूजा भक्ति का खंडन कर रहा है तो वहां पर उदाहरण दे रहा है

105
00:07:13,440 --> 00:07:17,520
कि श्रृंगी ऋषि अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं कर पाए और उन्होंने विवाह

106
00:07:17,520 --> 00:07:21,520
कर लिया जबकि आगे विवाह करते हुए

107
00:07:21,520 --> 00:07:25,840
भी गस्त होते हुए भी विषयों में विचरण करते हुए भी

108
00:07:25,840 --> 00:07:30,080
व्यक्ति को मुक्त होने के योग्य बताया है। यदि वह शास्त्र अनुकूल कर्म

109
00:07:30,080 --> 00:07:34,560
करेगा तो वो मुक्त हो जाएगा। तो यह भी बात बहुत ध्यान रखने की है कि इसने

110
00:07:34,560 --> 00:07:35,060
यहां

111
00:07:34,800 --> 00:07:39,280
पर विवाह का खंडन किया है मार्कंडेय ऋषि में मार्कंडेय

112
00:07:39,280 --> 00:07:43,840
पुराण वाली जो बात आती है जहां पे पितृ दर्शन दे रहे होते हैं।

113
00:07:43,840 --> 00:07:47,840
हम वहां पर पित्र भी कह रहे होते हैं कि भाई तू विवाह कर ले गृहस्थ हो जा। तो

114
00:07:47,840 --> 00:07:52,000
वहां पर वो पूछता है उनका जो बेटा होता है जो वो

115
00:07:52,000 --> 00:07:56,080
ऋषि होते हैं वहां पर वो पूछते हैं कि भाई मैं जब ऑलरेडी फ्री हूं इन सब

116
00:07:56,080 --> 00:08:00,080
कर्मों से तो मुझे कर्मों में लिप्त क्यों कर रहे हो तो वहां पर वो जवाब देते हैं कि तुम

117
00:08:00,080 --> 00:08:04,320
विषयों में रहते हुए भी इन कर्मों को करते हुए भी यह श्राद्ध आदि कर्मों

118
00:08:04,320 --> 00:08:08,720
को करते हुए भी मुक्त हो सकते हो वहां पर पित्र उन्हें समझाते हैं तो ये वहां पर भी

119
00:08:08,720 --> 00:08:12,800
विवाह का खंडन करता है और यहां पर भी विवाह का खंडन करता है जबकि इसी चैप्टर में

120
00:08:12,800 --> 00:08:16,960
थोड़ी देर बाद यह विवाह का समर्थन करता है। गृहस्थ होने का समर्थन करता है।

121
00:08:16,960 --> 00:08:21,520
यह खुद इस बात को मानता है कि गृहस्थ होते हुए भी विषयों में विचरण करते हुए भी

122
00:08:21,520 --> 00:08:25,840
यदि भगवान का सानिध्य होगा शास्त्र सम्मत कर्म करेगा तो वो

123
00:08:25,840 --> 00:08:30,000
मुक्ति के योग्य हो जाएगा। ठीक है? तो ये एक बात ध्यान रखने

124
00:08:30,000 --> 00:08:34,240
की है। और दो 61 में इसने एक झोल किया है। वो क्या किया है कि भगवान

125
00:08:34,240 --> 00:08:38,240
ने कहा मत पराह। उन्होंने कहा कि मेरे परायण होकर

126
00:08:38,240 --> 00:08:42,320
तो इसने उसका अर्थ निकाला है मत पराह का कि मेरे से

127
00:08:42,320 --> 00:08:48,320
परे। ठीक है? मत पराह का अर्थ निसय निकाला

128
00:08:50,520 --> 00:08:54,640
है 261 में मेरे से परे

129
00:08:54,640 --> 00:08:58,960
मेरे से दूसरे परमात्मा तो यहां पे ये दिक्कत आएगी कि मेरे से दूसरे

130
00:08:58,960 --> 00:09:03,200
परमात्मा अगर मेरे से दूसरे परमात्मा की बात हो रही है और परह का अर्थ

131
00:09:03,200 --> 00:09:07,200
तुमने दूसरे कहा है तो परमात्मा का भी अर्थ तो आएगा ना वहां पर मेरे

132
00:09:07,200 --> 00:09:11,200
से दूसरे दूसरे का तुमने परह ले लिया हालांकि परह का

133
00:09:11,200 --> 00:09:15,280
अर्थ वो है नहीं और हम इसी का खंडन करेंगे करेगा। अगर पराह का अर्थ है

134
00:09:15,280 --> 00:09:19,360
तो परम का अर्थ अन्य कैसे है वो हम यहां आगे इस बात का

135
00:09:19,360 --> 00:09:23,760
भी प्रतिकार करेंगे। खैर मेरे से दूसरे दूसरे

136
00:09:23,760 --> 00:09:28,000
और परमात्मा परमात्मा की यहां पर कोई संस्कृत नहीं है।

137
00:09:28,000 --> 00:09:32,000
ठीक है? एक सनातन का सार्वभौम सिद्धांत आता है

138
00:09:32,000 --> 00:09:36,320
कि हम कैसे फंसते हैं। तो यह भी दूसरे अध्याय के

139
00:09:36,320 --> 00:09:40,320
श्लोकों में दिया गया है। मेरे ख्याल से 62 से 63 के बीच

140
00:09:40,320 --> 00:09:44,480
में है कि जब हम विषयों का चिंतन करते हैं क्योंकि

141
00:09:44,480 --> 00:09:48,560
हमारा मन अगर भगवान की भक्ति में नहीं लगा है तो हमारा मन कहां लगेगा? विषयों

142
00:09:48,560 --> 00:09:52,800
के चिंतन में। चिंतन करने से उन विषयों के प्रति आसक्ति होगी।

143
00:09:52,800 --> 00:09:57,040
आसक्ति के कारण प्राप्त ना हो पाने की स्थिति में क्रोध आएगा।

144
00:09:57,040 --> 00:10:01,200
क्रोध ना आने के कारण मूर्खता आएगी और मूर्खता के कारण

145
00:10:01,200 --> 00:10:05,680
स्मृति भ्रम आएगा और हमारे जीवन में जो भी हम दुख इत्यादि

146
00:10:05,680 --> 00:10:09,840
या जो भी बंधन हम वो करते हैं वो स्मृति भ्रम के कारण

147
00:10:09,840 --> 00:10:14,000
ही है और अगर अद्वैत सिद्धांत के अनुसार देखें तो स्मृति भ्रम

148
00:10:14,000 --> 00:10:18,240
ही तो है अविद्या के जाल में फंस जाना तो

149
00:10:18,240 --> 00:10:22,240
यहां पर एक सारभम सिद्धांत भी इस बीच हमें प्राप्त होता है। हालांकि इसका

150
00:10:22,240 --> 00:10:26,560
रामपाल से कोई लेन देन नहीं मगर एक अच्छी चीज आई तो मैंने वह भी आपको बता दी।

151
00:10:26,560 --> 00:10:29,800
अच्छा इसके

152
00:10:29,800 --> 00:10:34,080
बाद 2.64 से 65 के बीच इसने यह समर्थन

153
00:10:34,080 --> 00:10:38,080
किया। पीछे श्रृंगी ऋषि के विवाह का खंडन किया। अब यहां पर ये समर्थन कर

154
00:10:38,080 --> 00:10:42,080
रहा है। क्या कह रहा है? इंद्रियों को वश में करने का समर्थन है। विचरण करते हुए

155
00:10:42,080 --> 00:10:46,600
भी 2.64 से 65 यहां ध्यान रखिएगा।

156
00:10:46,600 --> 00:10:50,640
पीछे शंगी ऋषि का जो दशरथ जी की पुत्री शांता के साथ

157
00:10:50,640 --> 00:10:54,640
विवाह हुआ उसका खंडन कर रहा है। देखो देखो वो अपने पर कंट्रोल नहीं कर पाए।

158
00:10:54,640 --> 00:10:58,720
ठीक है? वहां पर उसने यह नहीं सोचा कि भाई वो विवाह करते हुए भी मुक्त हो सकते

159
00:10:58,720 --> 00:11:02,880
हैं। अगर यहां पर दो 6465 के अर्थ में ये माना कि

160
00:11:02,880 --> 00:11:07,040
उसके अनुसार जो परमात्मा है उसकी उसकी शरणागति होने पर उसके

161
00:11:07,040 --> 00:11:11,200
अनुसार जो बताए गए शास्त्र शास्त्रों के अर्थ है उसके अनुसार

162
00:11:11,200 --> 00:11:15,360
कर्म करने पर भक्ति करने पर हालांकि इसने कर्म की बात तो कहीं की नहीं है केवल

163
00:11:15,360 --> 00:11:19,520
भक्ति की बात की है वो भी उसकी कबीर की तो उसके अनुसार कर्म करने

164
00:11:19,520 --> 00:11:20,960
पर यदि व्यक्ति

165
00:11:20,960 --> 00:11:24,960
विवाहित भी होगा गृहस्थ भी होगा तो मुक्ति के योग्य हो जाएगा

166
00:11:24,960 --> 00:11:28,960
ठीक है तो अब इसने यहां पर 64 65 में अपनी किस बात को खुद

167
00:11:28,960 --> 00:11:33,040
खंडित कर दिया। खुद ही जो शंगी ऋषि का के विवाह का

168
00:11:33,040 --> 00:11:37,200
खंडन किया उसको उसका खंडन यहां कर दिया। और जो मार्कंडेय पुराण

169
00:11:37,200 --> 00:11:41,680
में पितरों का खंडन किया है इसने। है ना? इसने कई वीडियोस में किया है।

170
00:11:41,680 --> 00:11:46,720
तो वो जो मार्कंडेय पुराण में जो इसने पितरों का खंडन किया है।

171
00:11:46,720 --> 00:11:51,040
यहां पर अपनी उस अपने उस खंडन का भी खंडन यहां पर कर दिया। क्यों?

172
00:11:51,040 --> 00:11:55,200
कि गृहस्थ होते हुए भी विचरण करता होते हुए भी व्यक्ति

173
00:11:55,200 --> 00:11:59,360
मुक्त हो सकता है। फिर 66 से

174
00:11:59,360 --> 00:12:04,080
68 में फिर से झोल है। यहां पर इसने शब्दों शब्दार्थ जो है

175
00:12:04,080 --> 00:12:08,080
नहीं है। संस्कृत के शब्द वहां पर नहीं है। मगर अपनी तरफ से पूर्ण

176
00:12:08,080 --> 00:12:12,240
संत के अभाव ये सब वहां पर लिख दिया है। जिसका वहां पर संस्कृत

177
00:12:12,240 --> 00:12:16,280
में कोई वर्ण नहीं है। और इसके बाद क्या लिखा

178
00:12:16,280 --> 00:12:20,560
है? फिर इसने यहां पर इस इन श्लोकों में 66 से 68

179
00:12:20,560 --> 00:12:24,560
के बीच में भक्ति के साथ इंद्रिय नियंत्रण का समर्थन किया है। मैं ये बार-बार

180
00:12:24,560 --> 00:12:28,640
क्यों कह रहा हूं कि इसने इंद्रिय नियंत्रण का समर्थन किया है। भक्ति के साथ क्योंकि

181
00:12:28,640 --> 00:12:32,720
इसने इसी इनहीं जो भगवान के भाव है कि

182
00:12:32,720 --> 00:12:36,320
यदि तू भगवान की भक्ति नहीं कर रहा है और भगवान का चिंतन

183
00:12:36,320 --> 00:12:40,320
नहीं कर रहा हो मन में विषयों का चिंतन कर रहा हो अपनी इंद्रियों को तू कंट्रोल कर रहा है तो

184
00:12:40,320 --> 00:12:44,400
क्या होगा कि तू अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल को यथावत रख नहीं पाएगा

185
00:12:44,400 --> 00:12:48,480
ये भगवान कह रहे हैं तो ऐसे कंट्रोल के लिए भगवान मना कर रहे हैं कि

186
00:12:48,480 --> 00:12:52,960
तू चिंतन उसी उनहीं विषयों का कर और उन विषयों से अपने

187
00:12:52,960 --> 00:12:57,040
इंद्रियों को कंट्रोल कर ले तो इसमें उसका फायदा उठाते हुए हमारे व्रतों का

188
00:12:57,040 --> 00:13:01,280
उपवास का खंडन किया इसने। ठीक है? इस बात का और बार-बार

189
00:13:01,280 --> 00:13:05,680
खुद ही भक्ति के साथ इंद्रिय नियंत्रण को इंद्रिय नियंत्रण

190
00:13:05,680 --> 00:13:09,680
को यह समर्थन दे रहा है। इसलिए मैं ये बात बार-बार बता रहा हूं। अच्छा फिर

191
00:13:09,680 --> 00:13:14,080
एक बात आ गई 66 से 68 के बीच में केवल तत्व ज्ञानी

192
00:13:14,080 --> 00:13:18,080
ही शास्त्र के अनुकूल कर्म करता है। ये भी बात ध्यान रखने

193
00:13:18,080 --> 00:13:22,240
की है। इसका अर्थ क्या है? कि रामपाल के अलावा कोई भी दुनिया में

194
00:13:22,240 --> 00:13:26,320
शास्त्र के अनुसार कर्म नहीं कर रहा है। क्यों नहीं कर रहा है? क्योंकि वो तत्वज्ञानी

195
00:13:26,320 --> 00:13:30,480
नहीं है। और रामपाल ने यह माना है कि केवल तत्वज्ञानी ही शास्त्र के

196
00:13:30,480 --> 00:13:34,800
अनुकूल कर्म करता है। एक दुनिया में एक है जो शास्त्र

197
00:13:34,800 --> 00:13:39,360
के अनुकूल कर्म कर रहा है। वो है रामपाल और वो क्या कर्म कर रहा है

198
00:13:39,360 --> 00:13:44,720
वो आप लोग जानते ही हैं बबीता इत्यादि को हम

199
00:13:44,720 --> 00:13:48,120
आगे चलिए।

200
00:13:48,120 --> 00:13:52,520
2.69 से 72 इंद्रिय

201
00:13:52,520 --> 00:13:57,120
नियंत्रण फिर से इसने इंद्रिय नियंत्रण को समर्थन दिया है 2.69

202
00:13:57,120 --> 00:14:01,600
से 72 के बीच इसका अर्थ क्या है कि व्रत को समर्थन दिया उपवास

203
00:14:01,600 --> 00:14:05,600
को समर्थन दिया जिसका ये खंडन करता है आगे है ना

204
00:14:05,600 --> 00:14:09,680
और सांसारिक आसक्ति से मुक्त हो जाना हो जाने

205
00:14:09,680 --> 00:14:13,920
के लिए प्रेरित किया और यानी कि यहां पे जो हम लोग कहते हैं ना कि जो

206
00:14:13,920 --> 00:14:18,080
अंतिम निर्णायक कौन होता है सन्यासी तो वैराग्य का इसने स्वयं

207
00:14:18,080 --> 00:14:22,080
समर्थन किया है। है ना? कि वैराग्य आ जाता है जीवन में

208
00:14:22,080 --> 00:14:26,720
उसके तत्व ज्ञान जो जिसको होता है।

209
00:14:26,720 --> 00:14:31,440
आगे की चरणों में विवाह का समर्थन 2

210
00:14:31,440 --> 00:14:35,520
70 में किया है। पीछे श्रृंगी ऋषि के विवाह का खंडन किया। मार्कंडेय पुराण

211
00:14:35,520 --> 00:14:39,920
में रुचि मुनि के विवाह का खंडन करता है। पित उसको उनको समझा रहे होते हैं। जब

212
00:14:39,920 --> 00:14:43,920
यहां पर विवाह का इसने प्योर समर्थन किया है। 2.70 में

213
00:14:43,920 --> 00:14:47,920
ध्यान रखने वाली बात है। 2.71 में फिर

214
00:14:47,920 --> 00:14:52,080
इसने समत्व बुद्धि का समर्थन किया। समत्व बुद्धि का समर्थन फिर लाभानि वाले

215
00:14:52,080 --> 00:14:56,720
अपने कथन का खंडन कर दिया। और 2.72 में इसने

216
00:14:56,720 --> 00:15:00,720
इसने कुछ नहीं मगर इसने एक तो सार्वभौम सिद्धांत आता

217
00:15:00,720 --> 00:15:03,120
है कि अविद्या से मुक्ति अज्ञानता

218
00:15:03,120 --> 00:15:07,200
ही है जो आपको बंधन में डाले हुए और अज्ञानता

219
00:15:07,200 --> 00:15:11,520
से मुक्ति ही आपकी मुक्ति का हेतु है। और इसका

220
00:15:11,520 --> 00:15:15,600
क्या झोल है? सार्वभौम सिद्धांत तो हमने सुन लिया। इसने क्या जो किया

221
00:15:15,600 --> 00:15:20,400
है यहां पर? इसने ब्रह्म का अर्थ पूर्ण परमात्मा माना है। 2.72

222
00:15:20,400 --> 00:15:24,720
में। यह ध्यान रखने योग्य बात है। क्योंकि जब हमारे आचार्य

223
00:15:24,720 --> 00:15:28,800
गण एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ लेते हैं जो कि अभी आगे आने

224
00:15:28,800 --> 00:15:32,880
वाला है आज के चैप्टर में। तो ये वहां पर कहता है कि देखो देखो इसने वहां

225
00:15:32,880 --> 00:15:36,880
पर तो इस शब्द का ये अर्थ लिया है। देखो देखो इसने वहां पर तो इस शब्द का ये अर्थ लिया

226
00:15:36,880 --> 00:15:41,040
है और यहां पर ये ले लिया। ठीक है? ये बात ध्यान रखना। तो यहां पर इसने ब्रह्म

227
00:15:41,040 --> 00:15:44,480
का अर्थ पूर्ण परमात्मा लिया है 2.72 में

228
00:15:44,480 --> 00:15:50,480
तो अब हम आज का प्रारंभ करते हैं।

229
00:15:53,600 --> 00:15:58,480
तीसरा अध्याय तीसरे अध्याय में सबसे पहले

230
00:15:58,480 --> 00:16:02,640
अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से वही पूछा जो

231
00:16:02,640 --> 00:16:07,040
मार्कंडेय पुराण का जो संदर्भ देते हैं कि पित्र अपने

232
00:16:07,040 --> 00:16:11,120
वंशज को बता रहे हैं कि तू हमारा तू गृहस्थ हो जा विवाह

233
00:16:11,120 --> 00:16:15,440
कर ले और हमारा श्राद्धारी कर्म कर है ना जिससे हमको

234
00:16:15,440 --> 00:16:19,960
भी हमको भी सद्गति प्राप्त हो और तू भी वहां से मुक्त हो तो वहां

235
00:16:19,960 --> 00:16:24,160
पर जो मुनि होते हैं अपने पितरों से

236
00:16:24,160 --> 00:16:28,240
यही प्रश्न करते हैं जो यहां पर अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से किया

237
00:16:28,240 --> 00:16:34,240
है। क्या प्रश्न है वो

238
00:16:34,360 --> 00:16:38,640
कि जब कर्मों में फंसने से ही बंधन है

239
00:16:38,640 --> 00:16:42,640
तो फिर आप मुझे कर्मों के बारे में कर्म में लिप्त होने के लिए

240
00:16:42,640 --> 00:16:46,720
क्यों बोल रहे हैं? हम कर्म करने

241
00:16:46,720 --> 00:16:48,920
की

242
00:16:48,920 --> 00:16:53,920
आप बात क्यों कह रहे हैं? क्या कहा है? हे जनार्दन

243
00:16:53,920 --> 00:16:57,920
यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो

244
00:16:57,920 --> 00:17:03,920
फिर हे केशव मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते

245
00:17:04,040 --> 00:17:08,240
हैं? और यहां पे एक बात ध्यान देने की है कि भगवान श्री कृष्ण

246
00:17:08,240 --> 00:17:12,480
ने गीता बोली है। है ना? यह बात भी ध्यान देने की।

247
00:17:12,480 --> 00:17:17,040
यहां पर इन्होंने केशव कहा है। भगवान श्री कृष्ण का नाम लिया है यहां पर। हे केशव।

248
00:17:17,040 --> 00:17:21,440
तो ये लोग कहते हैं ना कहां लिखा है कि गीता भगवान श्री कृष्ण ने बोली है।

249
00:17:21,440 --> 00:17:25,920
या यह अर्जुन और कृष्ण के बीच का संवाद है। तो देखिए क्या कह रहे हैं अर्जुन? हे केशव

250
00:17:25,920 --> 00:17:30,760
नाम ले रहे हैं उनका। ठीक है? हालांकि यह बहुत ही

251
00:17:30,760 --> 00:17:34,960
निम्न दर्जे का व्याख्यान है। पर क्या करें?

252
00:17:34,960 --> 00:17:39,160
इसकी आवश्यकता है रामपाल जैसे असामाजिक

253
00:17:39,160 --> 00:17:43,280
तत्व को रोकने के लिए। हम

254
00:17:43,280 --> 00:17:47,520
अच्छा फिर आगे अर्जुन ने अगले श्लोक में भी यही कहा है कि आप मिलेजुले वचनों

255
00:17:47,520 --> 00:17:49,840
से मेरी बुद्धि को मानु मोहित कर रहे हैं।

256
00:17:49,840 --> 00:17:54,160
इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे कि मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊं।

257
00:17:54,160 --> 00:17:58,160
भगवान ने ज्ञान भी दिया अभी तक और शास्त्र वेद कर्मों को करते हुए भी

258
00:17:58,160 --> 00:18:02,720
मुक्त हो जाने वाली बात कही है। तो अब भगवान बता रहे हैं

259
00:18:02,720 --> 00:18:06,600
कि तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा

260
00:18:06,600 --> 00:18:12,600
है? तो इसने क्या किया है कि

261
00:18:14,880 --> 00:18:18,960
सीधे तीन से आठ का अर्थ किया है तो हम पहले पढ़

262
00:18:18,960 --> 00:18:22,960
ले तीन से आठ में क्या कहा भगवान ने हे निष्पाप इस श्लोक में

263
00:18:22,960 --> 00:18:27,200
दो प्रकार की निष्ठा मेरे ये भगवान बोल रहे हैं हे

264
00:18:27,200 --> 00:18:31,200
निष्पाप इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा

265
00:18:31,200 --> 00:18:35,360
पहले कही गई है। उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से

266
00:18:35,360 --> 00:18:41,360
है और योगियों की निष्ठा कर्म योग से होती है। ठीक है?

267
00:18:42,080 --> 00:18:46,240
अब यहां यह जो सांख योग वाली बात है सांख योग और कर्म

268
00:18:46,240 --> 00:18:50,400
योग इन सब के बारे में इस मनचले ने बात ही नहीं की है और

269
00:18:50,400 --> 00:18:54,720
जानते ही है क्यों करेगा क्योंकि ये जटिल बातें हैं सांख योग

270
00:18:54,720 --> 00:18:58,880
कर्म योग ज्ञान योग ये सब जो है इनके पल्ले

271
00:18:58,880 --> 00:19:02,960
कहां आने वाली तो इसलिए धीरे से खुदक जाते हैं आगे की ओर आगे

272
00:19:02,960 --> 00:19:07,120
चलते हैं मनुष्य ना तो अब ये बता रहे हैं कि मैंने तुम्हें

273
00:19:07,120 --> 00:19:11,120
शास्त्र सम्मत कर्म करने के लिए क्यों कहा जैसे वहां पर पित बता

274
00:19:11,120 --> 00:19:15,360
रहे हैं कि अविद्या से मुक्त होने के लिए अविद्या का आलंबन

275
00:19:15,360 --> 00:19:19,440
लेना पड़ता है। धरती पर गिरा हुआ जो व्यक्ति होता है वो धरती का ही

276
00:19:19,440 --> 00:19:23,760
धक्का लेकर के उठ खड़ा होता है। आकाश में जिस हवाई जहाज को उड़ना

277
00:19:23,760 --> 00:19:28,000
है वो आकाश हवा हवा में उड़ने से पहले

278
00:19:28,000 --> 00:19:32,160
वो हवाई जहाज हवा में उड़ने से पहले आकाश में उड़ने से पहले धरती

279
00:19:32,160 --> 00:19:36,320
का ही आलंबन लेता है। उसी प्रकार से कर्मों

280
00:19:36,320 --> 00:19:40,320
के बंधन से मुक्त होने के लिए कर्म ऐसे कर्मों को करना आवश्यक है

281
00:19:40,320 --> 00:19:45,040
जिससे कि मुक्ति को प्राप्त की जा किया जा सके। ठीक है? तो

282
00:19:45,040 --> 00:19:49,040
अब यहां भगवान कह रहे हैं मनुष्य ना तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता को

283
00:19:49,040 --> 00:19:53,280
यानी योग निष्ठा को प्राप्त हो सकता है और ना कर्मों

284
00:19:53,280 --> 00:19:58,280
के केवल त्याग मात्र से सिद्धि यानी सांख्य निष्ठा को प्राप्त हो सकता

285
00:19:58,280 --> 00:20:02,480
है। निसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षण

286
00:20:02,480 --> 00:20:06,560
मात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता है। क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय

287
00:20:06,560 --> 00:20:11,360
प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है।

288
00:20:11,360 --> 00:20:15,360
तो आप कहने का तात्पर्य यहां पर यह है पहले

289
00:20:15,360 --> 00:20:19,360
और पढ़ लूं थोड़ा सा जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इंद्रियों को

290
00:20:19,360 --> 00:20:23,360
हट पूर्वक ऊपर से रोक कर मन से उन इंद्रियों के विषयों

291
00:20:23,360 --> 00:20:28,920
का चिंतन करता रहता है वह मिथ्याचारी अर्थात दंभी कहा जाता

292
00:20:28,920 --> 00:20:33,120
है। किंतु हे अर्जुन जो पुरुष मन से इंद्रियों को वश में

293
00:20:33,120 --> 00:20:37,200
करके अनासक्त हुआ समस्त इंद्रियों का इंद्रियों द्वारा

294
00:20:37,200 --> 00:20:41,440
कर्म योग का आचरण करता है वही श्रेष्ठ है। ठीक है? और

295
00:20:41,440 --> 00:20:45,600
तू शास्त्र भेद कर कर्तव्य कर्म कर क्योंकि कर्म ना करने

296
00:20:45,600 --> 00:20:49,600
की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म ना करने से तेरा

297
00:20:49,600 --> 00:20:54,000
शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा तो एक साध्य

298
00:20:54,000 --> 00:20:58,160
कोटि का धर्म है ही साध्य नहीं सिद्ध कोटि का धर्म है ही कि

299
00:20:58,160 --> 00:21:02,240
आपको ये तो करना जैसे सांस तो आपको लेनी ही है और भी बहुत कुछ

300
00:21:02,240 --> 00:21:06,320
भोजन आपको करना ही है तो भगवान

301
00:21:06,320 --> 00:21:10,640
यहां पर ये कह रहे हैं कि कर्म किए बिना आप नहीं रह पाओगे तो अगर आप उसमें शास्त्र

302
00:21:10,640 --> 00:21:13,280
सम्मत्तता को नहीं डालोगे तो आपसे शास्त्र

303
00:21:13,280 --> 00:21:17,280
विरोधी कर्म होंगे जिनके उस स्थिति में आपके मुक्त होने के

304
00:21:17,280 --> 00:21:21,280
चांसेस घटेंगे। जैसे ही आप शास्त्र विरुद्ध जाओगे शास्त्र

305
00:21:21,280 --> 00:21:25,280
की सीमा के बाहर जाओ क्योंकि कर्म तो आप करोगे ही मगर शास्त्र सम्मत नहीं होंगे तो

306
00:21:25,280 --> 00:21:29,600
कौन से कर्म होंगे? शास्त्र विरुद्ध कर्म होंगे जिन्हें पाप भी कहा जाएगा। तो ऐसे

307
00:21:29,600 --> 00:21:33,760
कर्म होंगे जिनके कारण आप बंधन से मुक्त नहीं बल्कि बंधन में ही लिप्त होते

308
00:21:33,760 --> 00:21:37,920
चले जाओगे। यह भगवान का यहां पे कहना है। इसलिए तू शास्त्र वेद

309
00:21:37,920 --> 00:21:42,160
कर्तव्य कर्म कर क्योंकि कर्म ना करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ

310
00:21:42,160 --> 00:21:46,880
है। एक बार जगतगुरु शंकराचार्य जी ने बताया था

311
00:21:46,880 --> 00:21:51,040
कि जैसे ये मुट्ठी खोली ये एक कर्म है।

312
00:21:51,040 --> 00:21:55,280
मगर मुट्ठी को ना खोलना भी अपने आप में एक कर्म है।

313
00:21:55,280 --> 00:21:59,680
तो कर्म ना करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। मगर शास्त्र

314
00:21:59,680 --> 00:22:03,200
वेद। ठीक है?

315
00:22:03,200 --> 00:22:07,600
तो अब इनका झोल देख लेते हैं। तीन से आठ में क्या किया है?

316
00:22:07,600 --> 00:22:11,760
गीता अध्याय तीन से आठ में अब ये रामपाल का लिखा हुआ

317
00:22:11,760 --> 00:22:15,400
पढ़ रहा

318
00:22:15,400 --> 00:22:19,680
हूं। अर्जुन इस श्लोक में इस श्लोक

319
00:22:19,680 --> 00:22:23,840
में ज्ञानी तो ज्ञान को श्रेष्ठ

320
00:22:23,840 --> 00:22:28,000
मानते हैं तथा योगी कर्म योग को फिर भी ऐसा कोई नहीं जो कर्म

321
00:22:28,000 --> 00:22:32,520
के बिना बचे। अब यह श्रेष्ठ मानने वाली बात कहां कौन

322
00:22:32,520 --> 00:22:36,840
से शब्द का अर्थ है यह

323
00:22:36,840 --> 00:22:41,360
इसने नहीं बताया। ठीक है?

324
00:22:41,360 --> 00:22:47,360
ये है झोल। इसको कहते हैं

325
00:22:47,720 --> 00:22:52,240
झोल। ये श्रेष्ठ और निम्न की बात यहां पे कहां से आ गई?

326
00:22:52,240 --> 00:22:56,320
खैर आगे चलते हैं। ऐसा कोई

327
00:22:56,320 --> 00:23:00,400
नहीं है जो कर्म किए बिना बचे। निष्कर्मता नहीं बन सकती और कर्म

328
00:23:00,400 --> 00:23:04,400
त्यागने मात्र से भी उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता। अध्याय

329
00:23:04,400 --> 00:23:08,720
तीन से चार में निष्कर्मता का भावार्थ है कि जैसे किसी व्यक्ति ये

330
00:23:08,720 --> 00:23:12,720
इसके तटपुंजी कुछ उदाहरण है यहां पर तो उसमें पढ़

331
00:23:12,720 --> 00:23:16,960
उनको पढ़कर कोई फायदा नहीं है। आगे चलते हैं। इसने अपार्थ क्या किया?

332
00:23:16,960 --> 00:23:21,040
यह देखते हैं। ठीक इसी प्रकार शास्त्र विधि अनुसार भक्ति

333
00:23:21,040 --> 00:23:25,040
कर्म। अब देखिए बात यहां पर कर्म करने की हो रही है कि कर्म

334
00:23:25,040 --> 00:23:29,440
करें तो कैसे करें? किस प्रकार से अपने कर्म करें

335
00:23:29,440 --> 00:23:30,760
जो हमारी

336
00:23:30,760 --> 00:23:35,200
जो नित्य प्रति की जो सुबह प्रातः

337
00:23:35,200 --> 00:23:39,200
काल से लेकर के रात्रि काल तक जो हमारी दिनचर्या होनी चाहिए वो किस

338
00:23:39,200 --> 00:23:43,200
तरह से होनी चाहिए इस बारे में यहां पर बात हो रही है उनके सिद्धांत क्या होने चाहिए

339
00:23:43,200 --> 00:23:47,600
कर्म को करने के मगर यहां पर हर बात में भक्ति को ही डाल रहा है क्योंकि

340
00:23:47,600 --> 00:23:51,920
क्योंकि ले दे के इसने भक्ति को पकड़ा वो भी किसकी अपने

341
00:23:51,920 --> 00:23:57,640
अनुसार बनाए गए एक तथाकथित काल्पनिक ईश्वर की

342
00:23:57,640 --> 00:24:01,680
खैर अगर तू भक्ति कर्म प्रारंभ

343
00:24:01,680 --> 00:24:06,640
करने से ही परमात्मा प्राप्ति रूपी कार्य पूरा होगा। हम

344
00:24:06,640 --> 00:24:10,640
ये इसने क्या डाल दिया? अपने मन से सब डाल दिया। और क्या डाल दिया अपने

345
00:24:10,640 --> 00:24:14,800
मन से? यदि भक्ति कर्म नहीं करेंगे तो यह त्रिगुण माया।

346
00:24:14,800 --> 00:24:18,880
यहां पे देखिए यह त्रिगुण माया यानी रजगुण ब्रह्मा सद्गुण विष्णु

347
00:24:18,880 --> 00:24:23,040
तथा तमगुण शिव बल पूर्वक अन्य

348
00:24:23,040 --> 00:24:27,120
व्यर्थ के कार्यों में लगाएंगे तो यहां ब्रह्मा विष्णु महेश

349
00:24:27,120 --> 00:24:31,280
अन्य कार्यों में लगाने वाले हो गए जीव से

350
00:24:31,280 --> 00:24:35,280
जबरदस्ती कर्म करवाते हैं ये भगवान कर ये ब्रह्मा विष्णु

351
00:24:35,280 --> 00:24:39,280
महेश करवाते हैं ध्यान रखने वाली बात है अर्थ का अनर्थ तो कर ही रहे हैं

352
00:24:39,280 --> 00:24:43,280
मगर यहां पे इसके ढोल की पोल कैसे खुलेगी देखिए जीव

353
00:24:43,280 --> 00:24:46,000
से जबरदस्ती कर्म कर्म करवाते हैं। जैसे

354
00:24:46,000 --> 00:24:50,640
जुआ खेलना, शराब आदि नशीली वस्तुओं का सेवन। उरी लूट व्यभचार।

355
00:24:50,640 --> 00:24:55,280
व्यभचार क्या है? बलात्कार भी व्यभचार में आता है।

356
00:24:55,280 --> 00:24:59,520
और इसके अनुसार सृष्टि रचना में काल ने क्या किया? व्यभचार किया।

357
00:24:59,520 --> 00:25:04,000
जबरदस्ती किया ना प्रकृति के साथ। तो वो जो जबरदस्ती

358
00:25:04,000 --> 00:25:08,240
हुई है वहां पर वो इसके अनुसार ब्रह्मा विष्णु महेश

359
00:25:08,240 --> 00:25:12,240
के प्रभाव में आकर के किया। यहां से क्लियर हो गया। क्योंकि कोई भी व्यभचार कर

360
00:25:12,240 --> 00:25:16,880
रहा है तो किसके प्रभाव में है? ब्रह्मा विष्णु महेश में से एक के प्रभाव में इसके अनुसार

361
00:25:16,880 --> 00:25:19,720
आगे चलते

362
00:25:19,720 --> 00:25:23,840
हैं। जैसे मिलावट, धोखाधड़ी आदि कर्म जीव

363
00:25:23,840 --> 00:25:28,000
तीनों देवताओं से निकल रहे गुणों के प्रभाव से करता है। अब

364
00:25:28,000 --> 00:25:32,400
यहां ध्यान देने योग्य बात है। जीव तीनों देवताओं

365
00:25:32,400 --> 00:25:36,720
से निकल रहे गुणों के प्रभाव से करता है। यानी

366
00:25:36,720 --> 00:25:40,720
यह जो गुण है यह इसने भी मान लिया कि गुण ही

367
00:25:40,720 --> 00:25:45,120
ब्रह्मा, विष्णु, महेश नहीं है। इनसे निकल रहे ब्रह्मा

368
00:25:45,120 --> 00:25:49,200
विष्णु महेश से गुण निकल रहे हैं। तो यहां पर इसने अपनी बात का खंडन कर

369
00:25:49,200 --> 00:25:53,360
लिया। ठीक है? गुण निकल रहे हैं। वो स्वयं नहीं आ

370
00:25:53,360 --> 00:25:57,600
रहे हैं। उनसे गुण निकल रहे हैं। खैर कितना

371
00:25:57,600 --> 00:26:01,360
झूठ बोलोगे भाई? फसोगे ना?

372
00:26:01,360 --> 00:26:05,600
फिर आगे इसने अपनी वही चरखी चलाई है। जब तक मानव की नौका

373
00:26:05,600 --> 00:26:09,800
जो हवा के झोंकों तथा पानी की है वो सद्गुरु रूपी मल्ला

374
00:26:09,800 --> 00:26:13,920
ये पूर्ण गुरु नहीं मिलता। फिर पूर्ण गुरु का इसने डाल दिया। उनका मन

375
00:26:13,920 --> 00:26:18,240
इंद्रियों से प्रभावी रहता है। निष्काम

376
00:26:18,240 --> 00:26:22,240
भाव से शास्त्र अनुकूल तो इसने ये यहां पर

377
00:26:22,240 --> 00:26:26,520
तीन से आठ के बीच में अर्थ का अनर्थ किया है।

378
00:26:26,520 --> 00:26:32,520
और निष्कर्मता की बात भगवान ने क्या कही थी?

379
00:26:40,160 --> 00:26:44,720
कर्मों को किए बिना निष्कर्मता को प्राप्त नहीं हो सकता। मगर

380
00:26:44,720 --> 00:26:48,200
इसने जो

381
00:26:48,200 --> 00:26:52,640
है भक्ति कर्म को उसको लगा दिया। मतलब जैसे संसार

382
00:26:52,640 --> 00:26:56,720
में आया तो संसार से होके गुजर करके और इस तरह

383
00:26:56,720 --> 00:27:01,200
से गुजर करके संसार से संसार की यात्रा इस तरह से तय करिए

384
00:27:01,200 --> 00:27:05,280
कि आप सांसारिक प्रपंच से मुक्त हो पाए। यहां पर यह कहने का

385
00:27:05,280 --> 00:27:09,680
अर्थ है भगवान का और इसने उसका अर्थ का अनर्थ किया। बहुत सारे झूठ चपेट

386
00:27:09,680 --> 00:27:13,760
इसने डाले। ठीक है? इसके बाद

387
00:27:13,760 --> 00:27:17,760
तीन से नौ की इसने कहानी कही है। तो पहले हम अपना तीन से नौ पढ़ ले। क्या

388
00:27:17,760 --> 00:27:21,920
कह रहे हैं भगवान श्री कृष्ण तीन से नौ में यज्ञ

389
00:27:21,920 --> 00:27:25,920
के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ

390
00:27:25,920 --> 00:27:30,400
ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है। इसलिए हे अर्जुन

391
00:27:30,400 --> 00:27:34,640
तू आसक्ति रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभांति कर्तव्य

392
00:27:34,640 --> 00:27:38,640
कर्म कर। ठीक है? कर्तव्य कर्म को ही यज्ञ कर्म कहा गया

393
00:27:38,640 --> 00:27:42,720
है। मतलब कर्तव्य क्या है? तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय

394
00:27:42,720 --> 00:27:46,800
में एकमात्र शास्त्र प्रमाण है। तो शास्त्र सम्मत जो कर्म है

395
00:27:46,800 --> 00:27:50,800
वह कर्तव्य है। कई बार यहां पर क्या होता है जो कम्युनिस्ट वाले लोग

396
00:27:50,800 --> 00:27:54,800
होते हैं वो क्या कहते हैं कि मैं तो भगवान को प्रसाद

397
00:27:54,800 --> 00:27:55,300
चढ़ाने

398
00:27:55,200 --> 00:28:00,400
से अच्छा मैं तो ये दिव्यकांत वगैरह हम

399
00:28:00,400 --> 00:28:04,480
जो आर्य समाज की वो हैं

400
00:28:04,480 --> 00:28:08,480
आर्य समाज की उपज दिव्यकांत तो यह

401
00:28:08,480 --> 00:28:12,960
लोग क्या कहते हैं? कि मैं तो भगवान का नाम जपने से अच्छा

402
00:28:12,960 --> 00:28:17,200
नाम जपने से क्या होगा? भगवान का चिंतन चलेगा मन में। भगवान

403
00:28:17,200 --> 00:28:21,280
का चिंतन होने से क्या होगा? विषयों का चिंतन नहीं होगा। ठीक है?

404
00:28:21,280 --> 00:28:25,920
तो वो कहता है कि मैं तो नाम जपने से अच्छा गरीबों की मदद करना। इस तरह के कम्युनिस्ट

405
00:28:25,920 --> 00:28:30,160
लोग भी आपको मिलेंगे कि भाई मैं तो यह करना ज्यादा अच्छा समझता हूं। ऐसा अच्छा समझता

406
00:28:30,160 --> 00:28:34,240
हूं। तो यहां पर भगवान ने इसके बारे में बताया है

407
00:28:34,240 --> 00:28:38,240
कि जब तुम केवल कम पर ही

408
00:28:38,240 --> 00:28:42,400
ध्यान देते हो और चिंतन पर ध्यान नहीं देते कि मुझे चिंतन किसका अधिक

409
00:28:42,400 --> 00:28:46,640
करना है। सोचते हो केवल अपनी जो कर्मेंद्र उनके द्वारा यह कर्म करवा

410
00:28:46,640 --> 00:28:50,800
करके और मैं जो है मुक्ति के पथ पर आगे बढ़ जाऊंगा। हम तो

411
00:28:50,800 --> 00:28:55,120
वहां पर तुम्हारा वो सस्टेंड नहीं रह पाता है। आपका वो

412
00:28:55,120 --> 00:28:59,280
क्या कहते हैं? इंद्रियों का नियंत्रण

413
00:28:59,280 --> 00:29:03,840
सस्टेंड नहीं रह पाता है क्योंकि वहां चिंतन आप उन्हीं विषयों का कर रहे हो जिन विषयों

414
00:29:03,840 --> 00:29:07,840
से आप मुक्त जिन विषयों से मुक्त होने के लिए इंद्रियों पर

415
00:29:07,840 --> 00:29:11,120
आप कंट्रोल कर रहे हो तो

416
00:29:11,120 --> 00:29:15,200
ये भगवान ने यहां पर इसीलिए कहा कि आप

417
00:29:15,200 --> 00:29:19,600
जो है शास्त्रों के द्वारा बताए हुए जो कर्म है उनको करिए

418
00:29:19,600 --> 00:29:24,000
जिससे कि आप धीरे-धीरे वो इस तरह से उसको व्यवस्थित

419
00:29:24,000 --> 00:29:28,080
किया गया है शास्त्रों के द्वारा कर्मों को कि आप धीरे-धीरे

420
00:29:28,080 --> 00:29:32,480
इससे मुक्त होंगे। आप अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर पाएंगे। सस्टेंड

421
00:29:32,480 --> 00:29:36,560
वाला नियंत्रण आपके पास आ पाएगा। अन्यथा आप जो सोच रहे हैं ना कि मैं केवल

422
00:29:36,560 --> 00:29:40,800
केवल कर्म इंद्रियों के द्वारा ऐसा ऐसा कर्म करता रहूं। मुझे जो है वो नियंत्रण

423
00:29:40,800 --> 00:29:45,040
मिल जाए। मुझे लाभ हानि में समत्व बुद्धि आ जाए और जो है मुझे राग द्वेष

424
00:29:45,040 --> 00:29:49,360
में समत्व बुद्धि आ जाए तो वो नहीं आ पाएगी। क्योंकि आपके मन में चिंतन क्योंकि

425
00:29:49,360 --> 00:29:53,360
नहीं चलेगा। किसका? विषयों से भिन्न भगवान का। मुक्त

426
00:29:53,360 --> 00:29:57,360
का मोक्ष स्वरूप का चिंतन नहीं चलेगा। चिंतन किसका चलेगा? भाई

427
00:29:57,360 --> 00:30:01,880
सांसारिक प्रपंच की जो विषय है उनका चिंतन चलेगा।

428
00:30:01,880 --> 00:30:07,880
खैर आगे चलते हैं। तो क्या है

429
00:30:08,120 --> 00:30:12,400
कि तू आसक्ति से रहित होकर। आसक्ति मतलब कि

430
00:30:12,400 --> 00:30:16,400
आप जो धर्म कर्म कर रहे हैं उनसे मिलने वाले फल के प्रति आसक्ति

431
00:30:16,400 --> 00:30:20,880
मत रख। यह बात हम लोग पिछले सेशंस में कर चुके हैं। तो आसक्ति

432
00:30:20,880 --> 00:30:23,880
से रहित होकर

433
00:30:23,880 --> 00:30:28,000
तुम कर्म करो। इसके बाद क्या कहा है? प्रजापति ब्रह्मा

434
00:30:28,000 --> 00:30:32,160
ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर

435
00:30:32,160 --> 00:30:36,400
उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो जाओ

436
00:30:36,400 --> 00:30:40,760
और यह यज्ञ तुम लोगों को इक्षित भोग प्रदान करने वाला

437
00:30:40,760 --> 00:30:44,880
हो। तो यहां पर वेदों की बात हो रही

438
00:30:44,880 --> 00:30:50,000
है।

439
00:30:50,000 --> 00:30:54,080
तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और देवता

440
00:30:54,080 --> 00:30:58,240
तुम लोगों को उन्नत करें। आगे बढ़ गए हम लोग थोड़ा सा

441
00:30:58,240 --> 00:31:02,240
तीन से नौ की बात दोबारा कर ले। तो तीन से नौ में इसने दोबारा

442
00:31:02,240 --> 00:31:06,320
कहा है पहले एक बार बता दिया एक पैराग्राफ में। फिर से दोबारा बता रहा है अध्याय

443
00:31:06,320 --> 00:31:10,320
तीन से नौ में इसने कहा है कि निष्काम भाव से शास्त्र अनुकूल किए

444
00:31:10,320 --> 00:31:14,320
हुए धार्मिक कर्म यज्ञ लाभदायक हैं।

445
00:31:14,320 --> 00:31:18,480
यज्ञ यानी धार्मिक अनुष्ठान जैसे पांचों यज्ञ तथा नाम जप

446
00:31:18,480 --> 00:31:22,560
करने के अतिरिक्त जुआ खेलना, शराब, तंबाकू, मांस सेवन

447
00:31:22,560 --> 00:31:26,560
करना, फिल्म देखना, निंदा करना, व्याभचार करना आदि आदि कर्मों को करने

448
00:31:26,560 --> 00:31:30,720
वाला व्यक्ति कर्मों में बंधता है। इसलिए परमात्मा के निमित्त

449
00:31:30,720 --> 00:31:34,960
शास्त्र वर्णित कर्तव्य कर्म कर। ठीक है? तो अभी

450
00:31:34,960 --> 00:31:39,280
हमने बताया कि कम्युनिस्ट का खंडन कहां पर हो जाता है? जब हम जब कोई कम्युनिस्ट

451
00:31:39,280 --> 00:31:43,360
आपसे यह कहे कि भाई मैं तो केवल गरीबों को खाना

452
00:31:43,360 --> 00:31:47,520
खिला के ही अपना वो मानता हूं। मुक्ति का हेतु वो अच्छा है। वो गलत

453
00:31:47,520 --> 00:31:51,680
नहीं है। मगर यदि साथ में आपकी भक्ति नहीं होगी, ईश्वर पर विश्वास नहीं

454
00:31:51,680 --> 00:31:55,920
होगा, ईश्वर का चिंतन नहीं होगा, ईश्वरीय चिंतन नहीं होगा

455
00:31:55,920 --> 00:32:00,080
तो आपकी वो सस्टेनेबिलिटी नहीं बन पाएगी। तो

456
00:32:00,080 --> 00:32:04,160
एक तो वो सार्वभौम सिद्धांत आपको यहां प्राप्त हो गया। कम्युनिस्टों के खंडन

457
00:32:04,160 --> 00:32:05,120
के लिए और

458
00:32:05,120 --> 00:32:10,800
दूसरी बात यह है कि

459
00:32:10,800 --> 00:32:15,280
यहां पर मार्कंडेय पुराण में जो पितर जो हैं

460
00:32:15,280 --> 00:32:19,360
जो कह रहे हैं कि तुम भाई गृहस्थ हो जाओ हमारा श्राद्ध इत्यादि

461
00:32:19,360 --> 00:32:23,760
कर हमको भी सद्गति प्राप्त होगी। उसका समर्थन भी हो रहा है इस बात से

462
00:32:23,760 --> 00:32:27,760
कि अगर हम कर्मों में लिप्त होंगे भी गृहस्थ जीवन जिएंगे

463
00:32:27,760 --> 00:32:31,760
भी मगर शास्त्र सम्मत तरीके से रहेंगे तो भी हम मुक्ति के पथ

464
00:32:31,760 --> 00:32:35,840
पर आगे बढ़ेंगे तो मार्कंडेय पुराण का यहां पर समर्थन हो गया।

465
00:32:35,840 --> 00:32:40,120
तीन श्लोक छ से नौ तक एक स्थान पर एकांत में विशेष आसन पर

466
00:32:40,120 --> 00:32:44,400
बैठकर कान आंखें आदि बंद करके हट

467
00:32:44,400 --> 00:32:48,560
योग करने की मनाई की है तथा यहां पे फिर से अपनी उस भावना

468
00:32:48,560 --> 00:32:52,800
को पुष्ट कर रहा है कि व्रत इत्यादि मत करो ठीक है खुद

469
00:32:52,800 --> 00:32:57,040
ही खुद ही की बात का खंडन करता है बार-बार अब

470
00:32:57,040 --> 00:33:01,120
भाई गृहस्थ जीवन का समर्थन हो गया तो

471
00:33:01,120 --> 00:33:05,280
वहां पर जो गृहस्थ हुए श्रृंगी ऋषि दशरथ के दशरथ

472
00:33:05,280 --> 00:33:09,280
महाराज की पुत्री जो भगवान श्री राम की बड़ी बहन मानी गई है उनसे

473
00:33:09,280 --> 00:33:13,600
विवाह करने का खंडन किया। फिर बाद में पिछले

474
00:33:13,600 --> 00:33:18,320
चैप्टर में भी इसने मान लिया कि हां गस्थ होते हुए भी मुक्त हो सकते हैं। कर्तव्य कर्म करके

475
00:33:18,320 --> 00:33:20,480
यहां पे भी मान रहा है कि शास्त्र वर्णित कर्तव्य

476
00:33:20,480 --> 00:33:24,560
कर्म करके गस्त व्यक्ति भी विषयों में विचरण करता हुआ भी

477
00:33:24,560 --> 00:33:29,160
वो मुक्त हो सकता है। फिर आगे क्या कह रहा है

478
00:33:29,160 --> 00:33:33,200
कि हठ योग करने की मनाही है। अब यहां हठ योग करने की मनाई

479
00:33:33,200 --> 00:33:37,200
के रूप में भी यह विवाह का समर्थन कर रहा है। गस्त हो जाने का समर्थन

480
00:33:37,200 --> 00:33:41,720
कर रहा है। अपनी इंद्रियों को ऐसे कंट्रोल मत करो।

481
00:33:41,720 --> 00:33:45,840
हम यानी कि कहने का तात्पर्य यह है कि यहां पर ये

482
00:33:45,840 --> 00:33:50,160
इस बात का समर्थन कर रहा है कि यदि हम भगवान

483
00:33:50,160 --> 00:33:54,480
के सानिध्य में भगवान का चिंतन करते हुए उनके नाम इत्यादि

484
00:33:54,480 --> 00:33:58,640
का स्मरण करते हुए अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल करने का प्रयास

485
00:33:58,640 --> 00:34:02,960
करेंगे तो वो मुक्ति का हेतु होगा। हां बिना भगवान के सानिध्य

486
00:34:02,960 --> 00:34:06,960
के यदि कंट्रोल करने का प्रयास करेंगे तो चिंतन विषयों का

487
00:34:06,960 --> 00:34:11,600
होने के कारण हमारी मुक्ति में बाधा आएगी। ठीक है?

488
00:34:11,600 --> 00:34:15,680
मगर यहां पे क्या किया इसने? ये जो भगवान से कनेक्ट होने वाली

489
00:34:15,680 --> 00:34:19,760
बात है इसको हटा दिया एक साइड और सीधे-सीधे कह दिया

490
00:34:19,760 --> 00:34:24,080
कि यहां पे तो इंद्रियों पर कंट्रोल करने को मना किया है भगवान ने।

491
00:34:24,080 --> 00:34:28,240
ऐसा नहीं है मना नहीं किया है। अच्छा इससे आगे चलते हैं तो एक मोटी

492
00:34:28,240 --> 00:34:33,840
बात यहां पर दिख रही है हमें।

493
00:34:33,840 --> 00:34:37,840
यह पृष्ठ संख्या 39 पर यह मोटी

494
00:34:37,840 --> 00:34:42,000
बात है। पवित्र वेदों को बोलने वाला ब्रह्म है।

495
00:34:42,000 --> 00:34:47,000
जिसको ये काल कहता है। यह थर्ड पैराग्राफ है। ऊपर

496
00:34:47,000 --> 00:34:53,000
से 39 नंबर पेज और उसमें ऊपर से थर्ड पैराग्राफ

497
00:34:55,560 --> 00:34:59,840
है। इसमें इसने कहा है कि पवित्र वेदों को बोलने वाला

498
00:34:59,840 --> 00:35:04,080
ब्रह्म है और यह भी कहा है कि पूर्ण परमात्मा

499
00:35:04,080 --> 00:35:08,120
के बारे में उसको पूरी जानकारी नहीं है। ठीक

500
00:35:08,120 --> 00:35:12,400
है? पूर्ण परमात्मा की जानकारी उसको

501
00:35:12,400 --> 00:35:14,680
नहीं

502
00:35:14,680 --> 00:35:18,800
है। और एक और वो कुतर्क है कुछ समय तक अमर हो जाने

503
00:35:18,800 --> 00:35:23,840
वाला और मेरी वाली परमगति। इसके बारे में बाद में बात करेंगे।

504
00:35:23,840 --> 00:35:28,480
आगे अगले पृष्ठ पर आ जाते हैं। 40 नंबर।

505
00:35:28,480 --> 00:35:32,800
अब इसमें आता है श्लोक 10। तो इसमें प्रजापति

506
00:35:32,800 --> 00:35:36,800
ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग

507
00:35:36,800 --> 00:35:40,880
इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो जाओ और यह यज्ञ तुम

508
00:35:40,880 --> 00:35:44,880
लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो। अब

509
00:35:44,880 --> 00:35:47,000
देखिए

510
00:35:47,000 --> 00:35:49,200
इसका आप एक बात समझ

511
00:35:49,200 --> 00:35:53,360
लीजिए कि इन श्लोकों में जो यज्ञ की बात हुई है ये

512
00:35:53,360 --> 00:35:57,520
यज्ञ डायरेक्ट वो यज्ञ नहीं है। धर्म स्वधर्म आचरण को

513
00:35:57,520 --> 00:36:03,200
यज्ञ कहा गया है। धर्म आचरण को यज्ञ कहा गया है।

514
00:36:03,200 --> 00:36:07,320
ठीक है? तो यह यहां पर ध्यान रखने वाली बात

515
00:36:07,320 --> 00:36:10,200
है।

516
00:36:10,200 --> 00:36:14,400
और श्लोक 10 में इसने क्या

517
00:36:14,400 --> 00:36:18,480
झोल किया है बहुत बड़ा वह देखिए क्या किया है। पहली बात तो ध्यान रखिए

518
00:36:18,480 --> 00:36:22,480
कि अनुवाद लिख रहा है। यह व्याख्या नहीं लिख रहा है। भाष्य नहीं लिख रहा है।

519
00:36:22,480 --> 00:36:27,640
कमेंट्री नहीं लिख रहा है। पेज नंबर 40 पे आ जाइए।

520
00:36:27,640 --> 00:36:31,960
रामपाल तो इसने क्या लिखा है? श्लोक 10 का अर्थ

521
00:36:31,960 --> 00:36:37,960
प्रजापति यानी कुल के मालिक

522
00:36:39,000 --> 00:36:40,000
ने

523
00:36:40,000 --> 00:36:45,120
कुल के मालिक ने कल्प के आदि में

524
00:36:45,120 --> 00:36:49,200
यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे

525
00:36:49,200 --> 00:36:53,440
कहा कि अनेन यानी अन्य द्वारा

526
00:36:53,440 --> 00:36:55,120
अन्न द्वारा होने वाला धार्मिक

527
00:36:55,120 --> 00:37:00,200
कर्म। अब देखिए अनेन का अर्थ इसने क्या

528
00:37:00,200 --> 00:37:04,320
किया? अनेन के अनेन का अर्थ इसने क्या किया?

529
00:37:04,320 --> 00:37:08,320
अन्न के द्वारा होने वाला धार्मिक कर्म। जिसमें अनाज

530
00:37:08,320 --> 00:37:12,320
पड़े। अब अनेन का अर्थ

531
00:37:12,320 --> 00:37:16,480
यह कहां से निकाला इसने कि अनेन का अर्थ है कि अन्न के द्वारा

532
00:37:16,480 --> 00:37:20,560
होने वाला धार्मिक कर्म यह यही बताएगा यह झोल है इसका और आगे क्या

533
00:37:20,560 --> 00:37:24,840
है इसका अर्थ बताते हुए इसने स्पष्ट किया जिसमें

534
00:37:24,840 --> 00:37:30,440
भोजन भंडारे यानी लंगर करना है

535
00:37:30,440 --> 00:37:34,640
यानी जो वास्तविक अर्थ है अनेन का वह है

536
00:37:34,640 --> 00:37:39,200
कि इस यज्ञ के द्वारा जिस यज्ञ की बात चल रही है किस की बात चल रही

537
00:37:39,200 --> 00:37:43,280
जो हम स्वधर्म आचरण करते हैं वो यज्ञ है अपने आप में एक उस यज्ञ की

538
00:37:43,280 --> 00:37:47,680
बात चल रही है कि इस यज्ञ के द्वारा तुम

539
00:37:47,680 --> 00:37:51,680
लोग वृद्धि को प्राप्त हो जाओ यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित

540
00:37:51,680 --> 00:37:55,840
भोग प्रदान करने वाला सिद्ध हो और यहां पर इसने

541
00:37:55,840 --> 00:38:00,000
क्या किया कि यज्ञ को नाम दे दिया अनाज के द्वारा

542
00:38:00,000 --> 00:38:04,240
होने वाला यज्ञ यानी कि भंडारा इसको हमेशा भंडारा ही दिखाई देता

543
00:38:04,240 --> 00:38:08,320
है भंडारा लंगड़ ये सब क्योंकि इसने ज्यादा वो लपका लपकी की

544
00:38:08,320 --> 00:38:10,640
होगी इजादत अधिकांशता

545
00:38:10,640 --> 00:38:15,040
तो इसको वही दिखता है। इस यज्ञ के द्वारा बुद्धि को प्राप्त हो जाओ।

546
00:38:15,040 --> 00:38:19,280
बुद्धि को प्राप्त हो जाओ। वहां पर वृद्धि की बात आ रही है

547
00:38:19,280 --> 00:38:25,080
और ये व्यक्ति बुद्धि कर रहा है।

548
00:38:25,080 --> 00:38:29,560
हम अब बताइए बुद्धि कहां से आ गई इसमें?

549
00:38:29,560 --> 00:38:33,760
हम अच्छा चलिए इसके इसका खंडन यही मिल गया।

550
00:38:33,760 --> 00:38:38,440
बहुत बढ़िया। देखिए ध्यान से देखिए। जब

551
00:38:38,440 --> 00:38:42,480
इसने अध्याय तीन का श्लोक 10 में अर्थ किया

552
00:38:42,480 --> 00:38:46,560
है तो इसने कहा है इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को

553
00:38:46,560 --> 00:38:49,360
प्राप्त हो जाओ।

554
00:38:49,360 --> 00:38:53,600
ठीक है? वृद्धि को प्राप्त हो जाओ। कहा है?

555
00:38:53,600 --> 00:38:58,680
और इसके बाद तुरंत जब भावार्थ लिखा है तो उसमें क्या कहा

556
00:38:58,680 --> 00:39:02,800
है? इस यज्ञ तीसरी लाइन में देखिए इस यज्ञ के

557
00:39:02,800 --> 00:39:06,960
द्वारा बुद्धि को प्राप्त हो जाओ।

558
00:39:06,960 --> 00:39:10,960
तो यहां पर वृद्धि और बुद्धि में वृद्धि को इसने बुद्धि कर

559
00:39:10,960 --> 00:39:15,040
दिया। इतनी बुद्धि है रामपाल की। देख लीजिए

560
00:39:15,040 --> 00:39:19,120
ये बिल्कुल जो निचले स्तर की बातें हो सकती है वो ये

561
00:39:19,120 --> 00:39:23,600
करता है अपनी किताबों में। अब क्या कहे ऐसा

562
00:39:23,600 --> 00:39:25,920
मतलब दो टके की बातें

563
00:39:25,920 --> 00:39:30,160
सीधी सरल इसके जैसी भाषा तब भी इसकी भाषा से अच्छी भाषा है दो

564
00:39:30,160 --> 00:39:34,400
टके की बातें करता है पहले करता है वृद्धि को प्राप्त हो जाओ

565
00:39:34,400 --> 00:39:38,480
फिर करता है बुद्धि को प्राप्त हो जाओ चलो ठीक है हो सकता है

566
00:39:38,480 --> 00:39:42,560
भाई किसी ने सुनने सुलाने में सुनाने में टाइपिंग मिस्टेक कर दी होगी मगर यह अनेन

567
00:39:42,560 --> 00:39:46,560
का अर्थ अनाज के द्वारा होने वाला धार्मिक यज्ञ कैसे हो गया कहां लिखा

568
00:39:46,560 --> 00:39:50,640
है अनेन यही बताएगा

569
00:39:50,640 --> 00:39:56,640
कभी जेल से बाहर आ पाया तो अच्छा फिर क्या

570
00:39:58,520 --> 00:40:02,840
है कि यहां पर कहीं

571
00:40:02,840 --> 00:40:07,040
भी पूर्ण परमात्मा जो

572
00:40:07,040 --> 00:40:11,200
कि यज्ञ में प्रतिष्ठित ही इच्छित भोग प्रदान करने

573
00:40:11,200 --> 00:40:15,520
वाला हो हम ये नहीं लिखा है

574
00:40:15,520 --> 00:40:19,520
यहां पर लिखा है यह यज्ञ अनेन अनेन का मतलब

575
00:40:19,520 --> 00:40:23,520
क्या है यह यज्ञ तुम लोगों को इक्षित

576
00:40:23,520 --> 00:40:27,680
भोग प्रदान करने वाला हो। तो यहां पर जबरदस्ती बिना किसी

577
00:40:27,680 --> 00:40:31,760
बात के पूर्ण परमात्मा को इसने डाल दिया। अब इसके

578
00:40:31,760 --> 00:40:35,720
बाद क्या है

579
00:40:35,720 --> 00:40:39,920
कि पूर्ण परमात्मा ने कल्प के प्रारंभ में यज्ञों

580
00:40:39,920 --> 00:40:43,920
यानी धार्मिक अनुष्ठानों का ज्ञान तथा प्रजा को उत्पन्न करके उनसे

581
00:40:43,920 --> 00:40:48,160
कहा था कि अन्न से होने वाले धार्मिक कर्म जिसे धर्म यज्ञ कहते हैं जिसमें

582
00:40:48,160 --> 00:40:52,160
भोजन भंडारा यानी लंगर करना इस यज्ञ के द्वारा बुद्धि को प्राप्त

583
00:40:52,160 --> 00:40:56,320
हो जाओ यानी धर्म करने से धन प्राप्त होता है। तुम साधकों को

584
00:40:56,320 --> 00:41:00,400
यज्ञ में पूज्य इष्ट देव की मनोवांछित भोग प्रदान करें। यहां इष्ट देव

585
00:41:00,400 --> 00:41:03,760
को इसने जबरदस्ती डाला है।

586
00:41:03,760 --> 00:41:07,840
ठीक है? यह पूर्ण परमात्मा जबरदस्ती इन्होंने इसने डाल

587
00:41:07,840 --> 00:41:11,840
दिया है। इसका यहां पे कोई बात नहीं हुई ना और अनुवाद में

588
00:41:11,840 --> 00:41:13,520
भी डाला है और उसके भावार्थ

589
00:41:13,520 --> 00:41:17,600
में भी भावार्थ में अगर अपने मन की बात डाल दे तब समझ में आता है। मगर अनुवाद में

590
00:41:17,600 --> 00:41:21,600
कैसे डाल सकते हो? अनुवाद तो एज इट इज होना चाहिए ना। प्रधान यानी

591
00:41:21,600 --> 00:41:25,760
धन चाहिए तो दान धर्म कर। मुक्ति चाहिए तो भज सतनाम

592
00:41:25,760 --> 00:41:29,920
वाले सिद्धांत अनुसार पूर्ण परमात्मा साधक को लाभ देता है। उसे प्राप्त

593
00:41:29,920 --> 00:41:34,360
करो। लो हो

594
00:41:34,360 --> 00:41:39,200
गया। अब 11 पे आ जाए।

595
00:41:39,200 --> 00:41:43,680
11 का हिंदी अनुवाद इसने कहा। इसने किया है। यज्ञ के द्वारा

596
00:41:43,680 --> 00:41:47,760
पहले अपना 11 का अर्थ पढ़ ले। तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत

597
00:41:47,760 --> 00:41:52,000
करो और वह देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निस्वार्थ

598
00:41:52,000 --> 00:41:56,920
भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को

599
00:41:56,920 --> 00:42:01,040
प्राप्त हो जाओ। ठीक है? अब इसने

600
00:42:01,040 --> 00:42:03,920
क्या किया है?

601
00:42:03,920 --> 00:42:08,240
यज्ञ के द्वारा देवताओं अर्थात संसार रूपी पौधे

602
00:42:08,240 --> 00:42:12,640
की शाखाओं को उन्नत करो और वह देवता

603
00:42:12,640 --> 00:42:16,960
अर्थात शाखाएं तुम लोगों को उन्नत करें। यदि यानी पौधा पेड़

604
00:42:16,960 --> 00:42:20,960
बनेगा। शाखाएं फल देंगी। इस प्रकार एक दूसरे को उन्नत करके परम

605
00:42:20,960 --> 00:42:25,120
कल्याण को प्राप्त हो जाओ। इसने यहां पर एक बात ध्यान रखिएगा परम का अर्थ

606
00:42:25,120 --> 00:42:31,120
परम ही लिया है। यह ध्यान

607
00:42:33,720 --> 00:42:39,720
रखिएगा। आगे चलते हैं। पेज नंबर 43

608
00:42:44,680 --> 00:42:48,960
लीजिए। इसमें गीता अध्याय तीन

609
00:42:48,960 --> 00:42:52,960
का 12वा श्लोक यज्ञ के द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम लोगों

610
00:42:52,960 --> 00:42:57,040
को बिना मांगे ही यह मैं अपना पढ़ रहा हूं। बिना मांगे ही

611
00:42:57,040 --> 00:43:01,920
इक्षित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार

612
00:43:01,920 --> 00:43:06,080
उन देवताओं के द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष

613
00:43:06,080 --> 00:43:10,360
उनको बिना दिए स्वयं भोगता है वह चोर ही है। अब क्या

614
00:43:10,360 --> 00:43:14,400
है? जैसे हमारे यहां कहा जाता है ना कि हर कर्म को भगवान से जोड़

615
00:43:14,400 --> 00:43:18,640
दो। सोते हैं तो क्यों सोते हैं? कि सुबह उठकर के भगवान को भगवान

616
00:43:18,640 --> 00:43:22,880
की सेवा कर सके, भक्ति कर सके। भोजन

617
00:43:22,880 --> 00:43:27,040
बनाते हैं तो किस भावना के साथ बनाएं कि भगवान को भोग लगा सके और उस

618
00:43:27,040 --> 00:43:31,040
भोग लगाने में भी सबका कल्याण है। है ना

619
00:43:31,040 --> 00:43:35,040
कि सबको कुछ ना कुछ मिले। भगवान को भोग लगाएंगे, भगवान की पूजा करेंगे। तो

620
00:43:35,040 --> 00:43:39,200
इस भावना के साथ हमने हमारे शास्त्रों के द्वारा

621
00:43:39,200 --> 00:43:43,200
हर बात को भगवान से जोड़ा गया है। हमारे जीवन के हर क्षेत्र

622
00:43:43,200 --> 00:43:48,120
के किसी भी कर्म को भगवान से होकर गुजारा गया है।

623
00:43:48,120 --> 00:43:49,280
तो

624
00:43:49,280 --> 00:43:53,360
यहां पर वही बात कही जा रही है कि जो इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिए

625
00:43:53,360 --> 00:43:57,680
हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है वह चोर ही है।

626
00:43:57,680 --> 00:44:02,160
अब इसने यहां पर क्या अर्थ किया है? पहली बात यहां ध्यान से देखिए।

627
00:44:02,160 --> 00:44:06,720
तीन तीसरे अध्याय के 12व श्लोक का अर्थ करते हुए इसने फिर से लिखा है अनुवाद।

628
00:44:06,720 --> 00:44:10,800
अनुवाद का मतलब होता है कि अपनी बातें नहीं डाल सकते। भावार्थ में डाल सकते

629
00:44:10,800 --> 00:44:14,800
हो। भाष्य में डाल सकते हो। अनुवाद में नहीं डाल सकते। अनुवाद में एज

630
00:44:14,800 --> 00:44:19,120
इट इज आपको अर्थ करना होता है। तो इसने अनुवाद में भी अपने मतलब

631
00:44:19,120 --> 00:44:23,520
की चीजें डाल दी है। तो अब क्या डाला है? यज्ञ यानी धार्मिक अनुष्ठानों

632
00:44:23,520 --> 00:44:27,680
के द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम साधकों को इच्छित भोग

633
00:44:27,680 --> 00:44:33,680
यानी सुख पदार्थ बिना मांगे निश्चय ही देते रहेंगे। रहेंगे।

634
00:44:33,800 --> 00:44:38,400
हम निश्चय ही देते रहेंगे। भावार्थ

635
00:44:38,400 --> 00:44:42,560
है कि अब यहां भावार्थ भी आ गया। भक्ति रूपी पौधे के मूल

636
00:44:42,560 --> 00:44:46,720
सिंचाई करके पेड़ बना लेते हैं। शाखाएं बढ़ जाती है। उन शाखाओं को अपने आप फल

637
00:44:46,720 --> 00:44:50,160
लगते हैं। बिना मांगे ही सेवक को फल देते हैं। इस प्रकार

638
00:44:50,160 --> 00:44:54,160
पूर्ण परमात्मा रूपी मूल यानी जड़ की ईष्ट के रूप

639
00:44:54,160 --> 00:44:58,160
में प्रतिष्ठित करके पूजा करने वाले शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म का फल तीनों

640
00:44:58,160 --> 00:44:58,960
देवता

641
00:44:58,960 --> 00:45:02,960
ब्रह्मा, विष्णु शिव ही बिना मांगे देते रहते हैं। अब

642
00:45:02,960 --> 00:45:07,040
यहां पे ब्रह्मा, विष्णु, महेश को जबरदस्ती डाला गया। राग देवताओं की

643
00:45:07,040 --> 00:45:11,520
हो रही है और अगर डाला भी गया है तो फिर वहां पर अलग से

644
00:45:11,520 --> 00:45:15,520
ईस्ट की भक्ति करके और करने से ब्रह्मा विष्णु महेश आपको फल

645
00:45:15,520 --> 00:45:19,520
देते रहे। ये सब अपने आप मटियामेट अर्थ का अनर्थ। इसको कहते

646
00:45:19,520 --> 00:45:23,920
हैं झोल। इसको कहते हैं टोटल झोल। तो

647
00:45:23,920 --> 00:45:28,160
अपने से ही मूल मालिक ईस्ट को डाल दिया। अपने से ही ब्रह्मा विष्णु महेश को डाल दिया। सबको

648
00:45:28,160 --> 00:45:32,640
डाल दिया अपने मन से। यहां कोई ऐसी बात नहीं हो रही। अब

649
00:45:32,640 --> 00:45:37,280
अपनी अपना अर्थ पढ़ लेते हैं। तीसरे अध्याय का 13व श्लोक का अर्थ जो है

650
00:45:37,280 --> 00:45:41,600
यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों

651
00:45:41,600 --> 00:45:45,920
से मुक्त हो जाते हैं। और जो पापी लोग अपना शरीर पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते

652
00:45:45,920 --> 00:45:50,240
हैं वे तो पाप को ही खाते हैं। अब यहां देखिए

653
00:45:50,240 --> 00:45:54,840
यज्ञ का अर्थ बहुत बहद रूप में भी लिया जा सकता है कि हम धार्मिक अनुष्ठानों

654
00:45:54,840 --> 00:45:59,040
को करते हुए जो हमें अन्न प्राप्त हो जाए

655
00:45:59,040 --> 00:46:03,200
धर्म के अनुसार चलते हुए स्वधर्म के पालन करते हुए जो हमें

656
00:46:03,200 --> 00:46:07,520
अनाज प्राप्त हो उसी को हम ग्रहण करके अपनी पूर्ति करें। केवल

657
00:46:07,520 --> 00:46:11,600
पूर्ति के लिए अनाज को ना पकाए। एक तो यह हो गया। दूसरा इसका अर्थ

658
00:46:11,600 --> 00:46:14,800
यह भी लिया जा सकता है कि

659
00:46:14,800 --> 00:46:19,280
एक अर्थ यह भी निकलता है कि भाई हम केवल अपनी

660
00:46:19,280 --> 00:46:23,680
आपूर्ति के लिए अनाज ना पकाए बल्कि इस भावना से पकाएं कि हम पकाएंगे

661
00:46:23,680 --> 00:46:27,920
तो गाय को भी जाएगा, शान को भी जाएगा और सबसे

662
00:46:27,920 --> 00:46:32,080
पहले भगवान को भी भोग लगाएंगे। इस भावना के साथ भी लगाएं। तो यह दोनों

663
00:46:32,080 --> 00:46:36,200
ही बातें यहां पर हमको दोनों ही अर्थ मिल रहे हैं। मगर उन

664
00:46:36,200 --> 00:46:40,240
कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोगों के लिए भी यहां पर एक सार्वभौम

665
00:46:40,240 --> 00:46:44,480
सिद्धांत है। केवल शरीर के पोषण के लिए पकाया गया जो अन्न

666
00:46:44,480 --> 00:46:48,480
है। यानी अगर सबसे सरल भाषा में कहें तो भगवान को बिना भोग

667
00:46:48,480 --> 00:46:52,720
लगाए जो खा रहे हैं अन्न खा रहे हैं। भगवान को भोग लगाने के लिए नहीं अपने

668
00:46:52,720 --> 00:46:56,800
लिए अपने लिए जो पका रहे हैं केवल भोग खाना बना रहे हैं।

669
00:46:56,800 --> 00:47:00,960
तो वो पाप कहा गया भगवत गीता में। अब कई कम्युनिस्ट ऐसे हैं जो हमारे

670
00:47:00,960 --> 00:47:05,200
घरों में भी बैठे हुए हैं। हमारे घर में है। हमारे यहां पर जो सार्वभम सिद्धांत

671
00:47:05,200 --> 00:47:09,600
की बात कर रहा हूं। यहां पर रामपाल की बात नहीं कर रहा हूं। यहां पर हमारे और आपके

672
00:47:09,600 --> 00:47:14,560
घर में भी कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोग बैठे हुए हैं। जो सिर्फ अपने लिए

673
00:47:14,560 --> 00:47:18,560
करने की बात करते हैं कि भाई मैं भी तो इंसान हूं। मेरे को भी तो यह चाहिए। मैं भी

674
00:47:18,560 --> 00:47:23,400
तो यह करूंगा। तो वहां पर आप इस श्लोक को दे सकते हो उन्हें

675
00:47:23,400 --> 00:47:27,600
कि जो धर्म धर्म कार्य करते हुए जो अन्न प्राप्त

676
00:47:27,600 --> 00:47:30,000
होता है वही अन्न ग्रहण करने

677
00:47:30,000 --> 00:47:34,080
योग्य है अन्यथा पाप है अथवा भगवान को भोग लगाए

678
00:47:34,080 --> 00:47:38,320
बिना जो हम लोग भोजन करते हैं भगवान को भोग लगाने से इत

679
00:47:38,320 --> 00:47:42,560
जो हम अपनी पूर्ति के लिए जो क्या कहते हैं

680
00:47:42,560 --> 00:47:48,560
अन्न पकाते हैं वह सब पाप का आ गया है। ठीक है आगे चलते हैं।

681
00:47:49,280 --> 00:47:55,280
अब इसमें क्या किया इसने?

682
00:47:56,080 --> 00:48:01,240
तीन 13 में इसने कहा है अब इसने बहुत अनर्थ किया है

683
00:48:01,240 --> 00:48:05,680
इसमें। जैसे गीता अध्याय तीन के श्लोक 12 में कहा है ये रामपाल

684
00:48:05,680 --> 00:48:09,760
बोल रहे हैं। अह लास्ट पैराग्राफ है। गीता

685
00:48:09,760 --> 00:48:13,920
अध्याय तीन श्लोक 13 का अनुवाद। जैसे गीता अध्याय तीन के श्लोक 12

686
00:48:13,920 --> 00:48:17,920
में कहा है कि यज्ञ शास्त्र विधि से किए हुए धार्मिक अनुष्ठान से

687
00:48:17,920 --> 00:48:22,080
पुष्ट इष्ट देवता आपको सांसारिक

688
00:48:22,080 --> 00:48:26,160
सुविधा कर्म फल के आधार पर देते हैं। ये क्या हो रहा है भाई? यहां पर ये सब

689
00:48:26,160 --> 00:48:30,280
बातें कहां हो रही है कि देवता आपको देते

690
00:48:30,280 --> 00:48:34,400
हैं। अनुवाद कहा है ना इसने? तो जब ये अनुवाद

691
00:48:34,400 --> 00:48:38,560
कह रहा है तो देवता शब्द की संस्कृत क्या है? तीन 13 में आगे

692
00:48:38,560 --> 00:48:44,560
चलते हैं। क्या इसने 12 का उदाहरण दिया है कि देवता आपको देते

693
00:48:44,840 --> 00:48:45,840
हैं।

694
00:48:45,840 --> 00:48:50,160
फिर उसके बाद एक गीता अध्याय तीन के 13 में बात कर रहा है

695
00:48:50,160 --> 00:48:54,560
कि यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा इष्ट देव को भोग लगाकर फिर भंडारा

696
00:48:54,560 --> 00:48:58,560
करें। तो ये कुल मिलाकर के सब बातों को ले आता है अपने भंडारे पे।

697
00:48:58,560 --> 00:49:03,440
और उसमें भी उसका जो इष्ट है वो कौन है? वो है

698
00:49:03,440 --> 00:49:07,680
इसका कबीर और ये खुद रामपाल। ठीक है? भोग लगाकर भंडारा

699
00:49:07,680 --> 00:49:12,240
करें। वह साधक यज्ञ के द्वारा होने वाले लाभ को प्राप्त हो जाएंगे।

700
00:49:12,240 --> 00:49:16,240
तो इसने जो उसका जो एक समष्टि वाला जो रूप था ना वो उस

701
00:49:16,240 --> 00:49:20,320
बारे में बात नहीं की। उसके आउट ऑफ सिलेबस की बात है ये समष्टि वाले

702
00:49:20,320 --> 00:49:24,400
रूप से बात करना इस श्लोक के अर्थ में कि जो अन्न जो

703
00:49:24,400 --> 00:49:28,640
अनाज या जो धन जो द्रव्य हमें स्वधर्म का पालन

704
00:49:28,640 --> 00:49:32,880
करते हुए प्राप्त होता है वही द्रव्य वही धन वही अनाज

705
00:49:32,880 --> 00:49:37,040
ग्रहण करने योग्य है और जो स्वधर्म का पालन किए बिना

706
00:49:37,040 --> 00:49:41,120
हमें प्राप्त होता है जो धर्म से प्राप्त नहीं होता अधर्म से प्राप्त होता है

707
00:49:41,120 --> 00:49:47,120
वह सब कुछ पाप है।

708
00:49:48,160 --> 00:49:54,160
क्या देखना है बताएं?

709
00:50:00,280 --> 00:50:04,560
तो हां यज्ञ यानी

710
00:50:04,560 --> 00:50:08,800
तीनों देवता श्री ब्रह्मा विष्णु महेश शिव

711
00:50:08,800 --> 00:50:13,040
ही बिना मांगे देते रहते हैं। हां हां

712
00:50:13,040 --> 00:50:19,040
इसने ये वाली बात यहां पर कही है कि बिना मांगे देते

713
00:50:22,440 --> 00:50:26,720
हैं। हां यह भी कहा गया है यह देखिए बहुत अच्छी बात

714
00:50:26,720 --> 00:50:30,800
यहां पर नजर आ रही है कि यहां पर क्या कह रहे हैं कि जीव से जबरदस्ती

715
00:50:30,800 --> 00:50:34,960
कर्म करवाते हैं गलत कर्म और

716
00:50:34,960 --> 00:50:39,520
वहां पर क्या कह रहे हैं क्या कहा जा रहा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश

717
00:50:39,520 --> 00:50:43,520
बिना मांगे देते रहते हैं एक जगह उनको क्या दिखाया जा रहा

718
00:50:43,520 --> 00:50:47,680
है विलन और यहां पे उनको ठीक ठीक

719
00:50:47,680 --> 00:50:51,680
बताया जा रहा है हम अगर

720
00:50:51,680 --> 00:50:55,760
ये कहे कि भगवान के प्रभाव के कारण कबीर के प्रभाव के कारण यहां पर दे रहे

721
00:50:55,760 --> 00:50:59,760
हैं तो वहां क्या कबीर का प्रभाव नहीं होता जब वह गलत कर्म करवाते हैं तो बहुत

722
00:50:59,760 --> 00:51:05,760
सारी बातें यहां पर आ जाती

723
00:51:06,840 --> 00:51:11,040
हैं। तो आगे चलते हैं। तो सर्व पापों से मुक्त होने

724
00:51:11,040 --> 00:51:15,120
का अभिप्राय यह है कि जो यज्ञ नहीं करते वह पापी कहे गए हैं। जो शास्त्र

725
00:51:15,120 --> 00:51:19,440
विधि के अनुसार मतानुसार यज्ञ करते हैं। वह उन सर्व पापों

726
00:51:19,440 --> 00:51:24,000
से बच जाते हैं जो यज्ञ ना करने से लगने थे। यदि कोई यज्ञ

727
00:51:24,000 --> 00:51:28,320
आदि धार्मिक अनुष्ठान नहीं करता वह तो चोर बताया गया है। अब इसका मतलब है कि

728
00:51:28,320 --> 00:51:32,560
हर व्यक्ति को भंडारा ही करना है। अगर भंडारा नहीं करता

729
00:51:32,560 --> 00:51:36,640
है तो वो चोर पापी है। इसने कह दिया तो जितने रामपाल

730
00:51:36,640 --> 00:51:40,880
के ऐसे लोग हैं जिन्होंने भंडारा नहीं किया है करवाया है तो वो सारे

731
00:51:40,880 --> 00:51:44,880
चोर हैं, पापी हैं। जबकि यहां पर अह अर्थ केवल इतना

732
00:51:44,880 --> 00:51:49,400
है कि स्वधर्म के पालन से ही जो अन्न प्राप्त हो उसको ग्रहण करें।

733
00:51:49,400 --> 00:51:53,600
अथवा दूसरा अर्थ यह है कि अनाज को इस भावना

734
00:51:53,600 --> 00:51:57,840
से ही पकाएं कि भगवान को भोग लगाना है अथवा

735
00:51:57,840 --> 00:52:02,160
किसी भूखे को भोजन कराना है। इन दोनों में से किसी एक मगर

736
00:52:02,160 --> 00:52:06,160
यही नहीं है कि आप भंडारा करोगे तो आप ठीक हो नहीं करोगे तो

737
00:52:06,160 --> 00:52:10,120
आप पापी हो। ठीक

738
00:52:10,120 --> 00:52:14,400
है? और इसने यही बताया प्रतिदिन या सत्संग के समय भोजन प्रसाद

739
00:52:14,400 --> 00:52:20,160
बनता है। सर्वप्रथम कुछ भोजन यही सब बातें इसने कही।

740
00:52:20,160 --> 00:52:26,160
आगे चलते

741
00:52:26,840 --> 00:52:30,880
हैं। अध्याय तीन 14 से 19 इसने एक

742
00:52:30,880 --> 00:52:33,960
साथ लिया

743
00:52:33,960 --> 00:52:38,640
है। हम अनुवाद चल रहा है। ठीक है?

744
00:52:38,640 --> 00:52:42,640
तो पहले हम अपना 141 का अनुवाद पढ़ लें। संपूर्ण प्राणी

745
00:52:42,640 --> 00:52:46,720
अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न की उत्पन्न उत्पत्ति वृष्टि

746
00:52:46,720 --> 00:52:50,720
से होती है। वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से

747
00:52:50,720 --> 00:52:55,040
उत्पन्न होने वाला है। यज्ञ किससे उत्पन्न होता है? शास्त्र सम्मत

748
00:52:55,040 --> 00:52:59,120
कर्मों से। यज्ञ विहित विहित कर्मों से उत्पन्न होता है। कर्म

749
00:52:59,120 --> 00:53:03,360
समुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी

750
00:53:03,360 --> 00:53:07,520
परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। यहां पे एक इसने ढोल किया है जिसके

751
00:53:07,520 --> 00:53:11,680
बारे में जिस ढोल के बारे में आगे बात करेगा। मगर फिलहाल हम लोग जो इसने

752
00:53:11,680 --> 00:53:15,760
यहां पर बात की है उसी के बारे में बात करेंगे। इससे सिद्ध होता है कि

753
00:53:15,760 --> 00:53:20,160
सर्वव्यापी परमक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है। तो

754
00:53:20,160 --> 00:53:24,400
यहां पे एक ध्यान देकर के देखिए कि गीता प्रेस गोरखपुर

755
00:53:24,400 --> 00:53:28,560
के अनुवाद में अक्षर जो शब्द

756
00:53:28,560 --> 00:53:32,560
आया है वहां पर अक्षर के लिए अविनाशी परमात्मा अर्थ लिया

757
00:53:32,560 --> 00:53:35,800
गया है। ठीक है?

758
00:53:35,800 --> 00:53:36,800
अक्षर

759
00:53:36,800 --> 00:53:40,240
समुद्भवम

760
00:53:40,240 --> 00:53:44,840
अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ अक्षर

761
00:53:44,840 --> 00:53:48,880
समुद्भवम परम अक्षर नहीं कहा गया है। मगर अर्थ में गीता

762
00:53:48,880 --> 00:53:52,960
प्रस के अनुसार ब्रह्म अक्षर और परम अक्षर ये सब

763
00:53:52,960 --> 00:53:57,200
एक ही है और निरुक्त में भी एक ही है। मगर रामपाल तो इसमें अलग-अलग

764
00:53:57,200 --> 00:54:01,440
करता है ना कि ब्रह्म अलग है। हालांकि ब्रह्म का अर्थ उसने पूर्ण परमात्मा माना।

765
00:54:01,440 --> 00:54:05,440
पिछले वाले अध्याय में हमने देखा। खैर अब यहां पे इसने अर्थ क्या

766
00:54:05,440 --> 00:54:09,840
लिया है? अक्षर का अर्थ इसने परम अक्षर लिया है। तो अकॉर्डिंग

767
00:54:09,840 --> 00:54:14,200
टू रामपाल की नियमावली वो तथाकथित

768
00:54:14,200 --> 00:54:18,320
काल्पनिक मेंटल वाली उस नियमावली के अकॉर्डिंग

769
00:54:18,320 --> 00:54:22,400
यहां पर इसको अक्षर का अर्थ परमात्मा नहीं लेना था

770
00:54:22,400 --> 00:54:27,200
क्योंकि अक्षर का अर्थ क्या है? अक्षर पुरुष जो ईश्वर है।

771
00:54:27,200 --> 00:54:31,440
है ना? अभी आगे आएगा। इसने आगे बताया है ईश का अर्थ है

772
00:54:31,440 --> 00:54:37,040
पेज नंबर 46 एक मिनट निकालिए इसकी गीता का।

773
00:54:37,040 --> 00:54:42,800
ई का अर्थ है क्षर पुरुष।

774
00:54:42,800 --> 00:54:46,800
ईश्वर का अर्थ है अक्षर पुरुष। परम ब्रह्म। ईश का अर्थ है

775
00:54:46,800 --> 00:54:51,240
क्षर पुरुष यानी ब्रह्म। ईश्वर का अर्थ

776
00:54:51,240 --> 00:54:55,280
है अक्षर पुरुष यानी परम ब्रह्म। और परमेश्वर का

777
00:54:55,280 --> 00:54:59,440
अर्थ है परम अक्षर पुरुष यानी पूर्ण ब्रह्म। यानी अक्षर

778
00:54:59,440 --> 00:55:03,520
पुरुष का मतलब परम अक्षर पुरुष नहीं है। ठीक है? अब इसने यहां जो

779
00:55:03,520 --> 00:55:06,680
अर्थ किया वह देखिए क्या

780
00:55:06,680 --> 00:55:11,120
किया? प्राणी अन्न से उत्पन्न होता है। अन्न

781
00:55:11,120 --> 00:55:15,600
वर्षा से उत्पन्न होता है। वृष्टि यज्ञ से

782
00:55:15,600 --> 00:55:20,480
यानी धार्मिक अनुष्ठान से होती है। यज्ञ यानी धार्मिक अनुष्ठान

783
00:55:20,480 --> 00:55:24,720
शास्त्र अनुकूल कर्मों से सफल होते हैं। सफल होते हैं।

784
00:55:24,720 --> 00:55:28,720
अरे भाई उत्पन्न होने की बात है। सफल कहां होने की

785
00:55:28,720 --> 00:55:33,200
बात है यहां? अपने मन से।

786
00:55:33,200 --> 00:55:37,360
खैर चलिए आगे देख फिर इसने क्या कहा है

787
00:55:37,360 --> 00:55:41,360
कर्मों को तू ब्रह्म यह 14व का इसने अर्थ किया अब 15व का

788
00:55:41,360 --> 00:55:45,360
अर्थ कर रहा है गीता प्रेस में 14 और 15 का एक साथ अर्थ है पिछले प्रश्न पे आ

789
00:55:45,360 --> 00:55:49,520
जाइए भाई 44 पे

790
00:55:49,520 --> 00:55:52,160
तो गीता प्रस में 14 और 15 का एक

791
00:55:52,160 --> 00:55:56,720
साथ दिया है अर्थ और इसने अलग-अलग दिया है तो इसने क्या कहा पहले

792
00:55:56,720 --> 00:56:00,800
कि अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है प्राणी अन्न से उत्पन्न होता है अन्न

793
00:56:00,800 --> 00:56:05,040
वर्षा से उत्पन्न होता है। होती है होता है वृष्टि यानी

794
00:56:05,040 --> 00:56:09,360
वर्षा यज्ञ से धर्म यानी धार्मिक अनुष्ठान से उत्पन्न होती है।

795
00:56:09,360 --> 00:56:14,320
अह यज्ञ यानी धार्मिक अनुष्ठान शास्त्र अनुकूल कर्मों से सफल होते हैं।

796
00:56:14,320 --> 00:56:19,720
यहां पे इसने सफल कर दिया। जबकि सफल का तो अर्थ है नहीं यहां से।

797
00:56:19,720 --> 00:56:25,720
हम धार्मिक अनुष्ठान के लिए क्या आया है?

798
00:56:28,320 --> 00:56:32,400
विहित कर्मों से होते हैं। तो सफल जो इसने लिखा है

799
00:56:32,400 --> 00:56:36,480
सफल होते हैं। तो इसकी कोई संस्कृत इसका कोई संस्कृत शब्द यहां पर

800
00:56:36,480 --> 00:56:40,800
नहीं है सफल का। ठीक है? आगे देखिए इसने 15 का क्या अर्थ किया है? कर्मों

801
00:56:40,800 --> 00:56:44,800
को तू ब्रह्म यानी काल ब्रह्म से उत्पन्न जान। अब देखिए सबसे पहली

802
00:56:44,800 --> 00:56:48,960
बात है कि इसने पिछले अध्याय में ब्रह्म का अर्थ पूर्ण ब्रह्म माना

803
00:56:48,960 --> 00:56:53,360
है। तो यहां पे अपने मन से क्यों कर रहा है? कि

804
00:56:53,360 --> 00:56:57,680
कर्मों को तू ब्रह्म यानी काल ब्रह्म से उत्पन्न जान। जबकि कर्म किससे

805
00:56:57,680 --> 00:57:01,680
उत्पन्न हो रहे हैं? वेद से। भगवत गीता के अनुसार

806
00:57:01,680 --> 00:57:06,000
जो वहां पर ब्रह्मोदभवम कहा गया है

807
00:57:06,000 --> 00:57:10,400
वो ब्रह्म से ब्रह्म वहां पर वेद लिया गया है। ब्रह्म का अर्थ वेद लिया गया है जो कि निरुक्त

808
00:57:10,400 --> 00:57:16,400
में दिया गया है। मैं दिखा देता हूं।

809
00:57:16,810 --> 00:57:21,120
[संगीत] क्योंकि इस श्लोक इस श्लोक के बारे में

810
00:57:21,120 --> 00:57:25,520
इसने आगे कटाक्ष किया है कि इन्होंने ब्रह्म का अर्थ वेद कर दिया है।

811
00:57:25,520 --> 00:57:30,200
तो ऐसा नहीं है। निरुक्त में ब्रह्म का अर्थ वेद बताया गया

812
00:57:30,200 --> 00:57:36,120
है।

813
00:57:36,120 --> 00:57:42,120
अच्छा ये देखिए निरुक्त

814
00:57:42,520 --> 00:57:46,720
में परमात्मा अथवा वेद को भी ब्रह्म कहा जाता

815
00:57:46,720 --> 00:57:51,480
है ये देखिए एक मिनट मेरा वाला बड़ा कर दीजिए

816
00:57:51,480 --> 00:57:56,160
यह निरुक्त है वैदिक डिक्शनरी है

817
00:57:56,160 --> 00:58:01,520
इसको शायद यह जान नहीं पाया है अपने जीवन में और इसकी अभी

818
00:58:01,520 --> 00:58:05,920
जिस तरह की हालत है उसमें जान भी नहीं पाएगा। उसकी आने वाली कई पीढ़ियां नहीं जान पाएंगी।

819
00:58:05,920 --> 00:58:09,920
निरुक्त होता क्या है? खैर निरुक्त इसको आप सीधे

820
00:58:09,920 --> 00:58:14,400
सरल शब्दों में कह सकते हैं वैदिक डिक्शनरी। तो

821
00:58:14,400 --> 00:58:18,800
निरुक्त में ब्रह्म का अर्थ वेद भी कहा गया है।

822
00:58:18,800 --> 00:58:23,120
तो प्रसंग अनुसार क्योंकि वहीं पर ब्रह्म की दोबारा बात हो रही है।

823
00:58:23,120 --> 00:58:27,120
बार-बार ब्रह्म आया है। ब्रह्मोद भवम। ठीक है? कर्म कहां से जनित हो

824
00:58:27,120 --> 00:58:31,320
रहे हैं? ब्रह्मोदभम। उसके बाद वेद कहां से जनित हो रहे

825
00:58:31,320 --> 00:58:32,320
हैं?

826
00:58:32,320 --> 00:58:36,320
ब्रह्म वेद को अक्षर समुद्भवम।

827
00:58:36,320 --> 00:58:40,320
तो यहां पे ब्रह्म से कर्म ब्रह्म यानी वेद से उत्पन्न

828
00:58:40,320 --> 00:58:44,400
हुए। फिर ब्रह्म यानी वेद अक्षर यानी अविनाशी

829
00:58:44,400 --> 00:58:48,560
परमात्मा से उत्पन्न हुए। इसलिए ब्रह्म को अलग किया गया। क्योंकि दोबारा

830
00:58:48,560 --> 00:58:52,640
से परमात्मा की बात हो रही है। इसलिए ब्रह्म का अर्थ परमात्मा ना लेकर वेद कहा गया।

831
00:58:52,640 --> 00:58:56,800
और क्योंकि यज्ञ और जो कर्म है वह कहां से उत्पन्न होते

832
00:58:56,800 --> 00:59:00,880
हैं? वेद से ही वेद बताते हैं ना कि कर्म कैसे करना

833
00:59:00,880 --> 00:59:04,880
है, कैसे नहीं करना है। खैर इसने क्या किया है? इसने झोल करने के

834
00:59:04,880 --> 00:59:07,680
चक्कर में क्या किया? अब इसने पहली बात तो यह है कि

835
00:59:07,680 --> 00:59:11,760
ब्रह्म यानी काल ब्रह्म की उत्पन्न उत्पत्ति

836
00:59:11,760 --> 00:59:15,800
अविनाशी परमात्मा यानी परम अक्षर पुरुष से हुई है।

837
00:59:15,800 --> 00:59:16,800
तो

838
00:59:16,800 --> 00:59:22,400
इसने ब्रह्म को उत्पन्न मान लिया।

839
00:59:22,400 --> 00:59:26,800
इसने कर्म को उत्पन्न माना है ब्रह्म से।

840
00:59:26,800 --> 00:59:30,880
कर्मों को तू ब्रह्म यानी काल ब्रह्म से उत्पन्न जान। तो पहले इसको

841
00:59:30,880 --> 00:59:34,960
इसको समझाना पड़ेगा कि काल ब्रह्म से कर्म कैसे उत्पन्न हो रहे हैं।

842
00:59:34,960 --> 00:59:38,960
वेद से तो उत्पन्न हो रहे हैं। वेद के अनुसार तुम्हें कार्य करना है। मगर

843
00:59:38,960 --> 00:59:42,960
ब्रह्म से कैसे उत्पन्न हो रहे हैं। पहली बात। दूसरी बात है

844
00:59:42,960 --> 00:59:48,960
कि फिर वह जो ब्रह्म है वह पुनः

845
00:59:49,280 --> 00:59:53,600
किससे उत्पन्न हो रहा है? अक्षर समुदभवम।

846
00:59:53,600 --> 00:59:58,560
हां। तो इसने यहां पर अक्षर को परम अक्षर मान लिया।

847
00:59:58,560 --> 01:00:03,320
क्या कहा है?

848
01:00:03,320 --> 01:00:07,520
कि कर्मों को तू ब्रह्म यानी काल ब्रह्म से उत्पन्न जान।

849
01:00:07,520 --> 01:00:11,600
क्योंकि जीव सतलोक को त्याग कर कालोक में आए तो कर्म करके

850
01:00:11,600 --> 01:00:15,680
सर्व पदार्थ प्राप्त करते हैं। लोग अपनी थ्योरी बता दी। और

851
01:00:15,680 --> 01:00:20,480
यह अनुवाद चल रहा है। ध्यान दीजिएगा। यह भावार्थ नहीं है। तो इसमें सतलोक

852
01:00:20,480 --> 01:00:25,040
और सर्व पदार्थ प्राप्त होते हैं। इन सब की संस्कृत कहां गई? वहां निष्करम

853
01:00:25,040 --> 01:00:29,520
मुक्ति जीव को प्राप्त होते हैं। प्राप्त होती है।

854
01:00:29,520 --> 01:00:30,880
इस श्लोक में आगे कहा है

855
01:00:30,880 --> 01:00:35,280
कि ब्रह्म यानी काल ब्रह्म की उत्पत्ति अविनाशी

856
01:00:35,280 --> 01:00:37,760
परमात्मा यानी परम अक्षर पुरुष से हुई है। अब

857
01:00:37,760 --> 01:00:43,760
यहां पे फंस गया क्योंकि इसने अक्षर समुद्भवम का अर्थ मान लिया।

858
01:00:46,880 --> 01:00:51,360
इसने अक्षर समद भवम का अर्थ मान लिया

859
01:00:51,360 --> 01:00:55,360
परम अक्षर पुरुष हमने अभी देखा ना अक्षर पुरुष कौन है अक्षर ब्रह्म

860
01:00:55,360 --> 01:00:59,440
कौन है जो परम अक्षर नहीं है जो पूर्ण परमात्मा नहीं

861
01:00:59,440 --> 01:01:03,520
है इसके हिसाब से हमारे हिसाब से है मगर इसने यहां पे क्या किया भगवत

862
01:01:03,520 --> 01:01:07,840
गीता में परम अक्षर समुद्भवम नहीं आया है भगवत गीता में

863
01:01:07,840 --> 01:01:11,840
अक्षर समुद्भवम आया है तो इसके अनुसार अक्षर का अर्थ

864
01:01:11,840 --> 01:01:15,920
परम अक्षर नहीं है हमारे अनुसार है तो इसने यहां पर

865
01:01:15,920 --> 01:01:20,560
मान लिया क्या माना कि ब्रह्म की उत्पत्ति सर्वव्यापी

866
01:01:20,560 --> 01:01:24,880
परम अक्षर ब्रह्म से हुई है। ठीक है?

867
01:01:24,880 --> 01:01:28,880
जो कि सदा ही यज्ञों यानी धार्मिक अनुष्ठानों में प्रतिष्ठित है। ये सब

868
01:01:28,880 --> 01:01:33,280
अपने मन से इसने डाल दिया। इष्ट के रूप में

869
01:01:33,280 --> 01:01:37,360
पूज्य है। यह इसने डाला है। इष्ट के रूप में पूज्य है। अपने मन से डाला है। सर्वव्यापी

870
01:01:37,360 --> 01:01:41,760
परमक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है। यह तो लिखा

871
01:01:41,760 --> 01:01:44,400
है।

872
01:01:44,400 --> 01:01:48,880
और एक दोबारा गौर करने वाली बात है कि

873
01:01:48,880 --> 01:01:52,800
यहां पर दो बार इस श्लोक में दो बार परमात्मा की बात

874
01:01:52,800 --> 01:01:56,880
हो रही है। एक बार वेद को उत्पन्न करने वाले यानी ब्रह्म

875
01:01:56,880 --> 01:02:01,440
को उत्पन्न करने वाले के रूप में परमात्मा की बात हुई है। वहां पर अक्षर समुद्भवम

876
01:02:01,440 --> 01:02:05,600
कहा गया है और दूसरी बार यज्ञों में प्रतिष्ठित होने

877
01:02:05,600 --> 01:02:09,760
की बात की गई है। तो उस समय उसको ब्रह्म कहा गया है। तो

878
01:02:09,760 --> 01:02:14,160
इसने क्या किया है? अक्षर का मतलब भी परमात्मा मान लिया

879
01:02:14,160 --> 01:02:18,240
कि जो पहली बात तो जो ब्रह्म का अर्थ वेद मानना था वेद ना मान करके

880
01:02:18,240 --> 01:02:22,480
इसने काल ब्रह्म अपना प्रायता फैला दिया उसके बाद चलो फैला

881
01:02:22,480 --> 01:02:26,560
दिया उसके बाद उसको किससे उत्पन्न माना इसने परम अक्षर

882
01:02:26,560 --> 01:02:30,720
पुरुष से परमात्मा से जबकि वहां पर अक्षर कहा गया अक्षर का अर्थ

883
01:02:30,720 --> 01:02:34,800
इसने परमात्मा मान लिया ठीक है और उसके बाद

884
01:02:34,800 --> 01:02:38,800
यज्ञों में प्रतिष्ठित यहां पर ब्रह्म कहा गया है। कि

885
01:02:38,800 --> 01:02:43,040
कौन प्रतिष्ठित है यज्ञों में? ब्रह्म नित्यम यज्ञ प्रतिष्ठितम

886
01:02:43,040 --> 01:02:47,200
लिखा है ना श्लोक में ब्रह्म नित्यम यज्ञ प्रतिष्ठितम

887
01:02:47,200 --> 01:02:51,760
ये 15वा श्लोक की अंतिम जो लाइन है ब्रह्म प्रतिष्ठित

888
01:02:51,760 --> 01:02:56,480
है तो इसने यहां पर फिर से ब्रह्म का अर्थ क्या मान लिया है

889
01:02:56,480 --> 01:03:02,480
इसने फिर से ब्रह्म का अर्थ मान लिया

890
01:03:03,960 --> 01:03:09,960
कि ठीक है। अब एक बात और है यहां पर

891
01:03:11,160 --> 01:03:15,360
कि सतलोक में भी सतलोक में आए

892
01:03:15,360 --> 01:03:19,360
क्योंकि जीव सतलोक को त्याग कर काल के लोक में आए तो कर्म करके

893
01:03:19,360 --> 01:03:23,440
सर्व पदार्थ को प्राप्त करते हैं। तो कर्म कहां से स्टार्ट हो

894
01:03:23,440 --> 01:03:27,600
रहा है? कर्म कहां से स्टार्ट हो रहा है?

895
01:03:27,600 --> 01:03:31,840
कर्म स्टार्ट हो रहा है सतलोक से निकलने के बाद। यह भी बात ध्यान रखने

896
01:03:31,840 --> 01:03:36,000
की है क्योंकि यह सारे कर्म तो वही दिखा देता है। व्यभचार इत्यादि सब कुछ दिखा

897
01:03:36,000 --> 01:03:40,480
देता है। जबकि सतलोक से निकल कर्म

898
01:03:40,480 --> 01:03:44,800
स्टार्ट हो रहा है यहां पर और इसने सतलोक में भी बहुत सारे कर्म दिखाए हैं।

899
01:03:44,800 --> 01:03:50,040
तो यहां पे भी फसा है। खैर आगे चलते

900
01:03:50,040 --> 01:03:54,200
हैं। जो व्यक्ति इस काल ब्रह्म के लोक में इस प्रकार

901
01:03:54,200 --> 01:03:58,480
प्रचलित विधान यह सोलवा पढ़ रहा हूं। तो पहले सोलवे

902
01:03:58,480 --> 01:04:02,560
का अपना अर्थ पढ़ ले हम लोग। कि हे पार्थ जो पुरुष इस

903
01:04:02,560 --> 01:04:06,800
लोक में इस प्रकार परंपरा से प्रचलित सृष्टि चक्र के अनुकूल

904
01:04:06,800 --> 01:04:10,880
नहीं बरतता। कहने का मतलब है कि जो शास्त्र वेद कर्म है उनको

905
01:04:10,880 --> 01:04:14,880
नहीं करता। अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता। वह इंद्रियों

906
01:04:14,880 --> 01:04:19,360
द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापा पुरुष व्यर्थ ही जीता है। शास्त्र

907
01:04:19,360 --> 01:04:23,680
सम्मत कर्म नहीं करेगा। शास्त्र सम्मतता से नहीं चलेगा तो फंसेगा।

908
01:04:23,680 --> 01:04:27,920
और फिर वो पाप करेगा, पाप करेगा तो व्यर्थ ही जी रहा है। क्योंकि वो और

909
01:04:27,920 --> 01:04:32,160
फंसता चला जाएगा। ठीक है। अब इसने क्या किया है? 36

910
01:04:32,160 --> 01:04:36,160
में इस काल ब्रह्म के लोक में। अब यह काल ब्रह्म के

911
01:04:36,160 --> 01:04:40,160
लोक में कहां लिखा है? यह काल ब्रह्म का लोक इसकी संस्कृत

912
01:04:40,160 --> 01:04:44,720
कहां है? ध्यान देने वाली बात है। ये अनुवाद है। भावार्थ नहीं है। ध्यान दीजिए।

913
01:04:44,720 --> 01:04:48,800
ऊपर हेडिंग में हमने आपको बताया था ना 14 से 19 का हिंदी अनुवाद। तो

914
01:04:48,800 --> 01:04:53,280
ये 14 से 19 का अनुवाद चल रहा है। तो इसमें काल ब्रह्म का लोक कहां लिखा है?

915
01:04:53,280 --> 01:04:57,680
इस प्रकार प्रचलित विधान चक्र के अनुकूल नहीं बरतता। यानी

916
01:04:57,680 --> 01:05:01,680
शास्त्रों में दिए हुए व्याख्यान के अनुसार भक्ति कर्म नहीं करता। अब

917
01:05:01,680 --> 01:05:05,680
देखिए हर चीज की बात भक्ति कर्म नहीं करता। तो बाकी के कर्मों का

918
01:05:05,680 --> 01:05:09,680
विधान कहां पर है? सोचने वाली बात। वह

919
01:05:09,680 --> 01:05:13,760
इंद्रियों के भोगों में रमण करने वाला पायु यानी जीवन भर पाप

920
01:05:13,760 --> 01:05:17,760
करने वाला व्यक्ति व्यर्थ ही जीवन जीता है। यह झोल। आगे

921
01:05:17,760 --> 01:05:22,160
देखिए तीन 17 में क्या किया है? पहले तीन सत्र अपना पढ़ते हैं। परंतु

922
01:05:22,160 --> 01:05:26,160
जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा

923
01:05:26,160 --> 01:05:30,640
आत्मा में ही संतुष्ट हो उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।

924
01:05:30,640 --> 01:05:34,640
अब यहां पे बहुत बढ़िया बात आने वाली है। बहुत बढ़िया क्या?

925
01:05:34,640 --> 01:05:39,040
कि इसने माना है परंतु जो मानव आत्मा यानी सच्चे मन से परमात्मा

926
01:05:39,040 --> 01:05:43,040
के विधान का पालन करता है। यह कैसे हुआ भाई?

927
01:05:43,040 --> 01:05:47,280
जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला आत्म रति

928
01:05:47,280 --> 01:05:51,280
क्या कहा गया है? आत्म रति आत्मा में रमण करने

929
01:05:51,280 --> 01:05:55,280
वाला। मगर यहां इसने क्या कर दिया? इसका अर्थ परमात्मा

930
01:05:55,280 --> 01:05:59,600
के विधान का पालन करता है। यह कहां गया?

931
01:05:59,600 --> 01:06:03,600
कहां से आ गया? इसकी संस्कृत कौन बताएगा? और

932
01:06:03,600 --> 01:06:07,840
जो अपने शास्त्र अनुकूल कर्म से तृप्त है

933
01:06:07,840 --> 01:06:12,000
शास्त्र अनुकूल की खैर वो नहीं है मगर फिर भी चलिए मान लेते हैं और

934
01:06:12,000 --> 01:06:16,000
आत्मा में ही तृप्त है मतलब आत्मा में तृप्त है उसको अन्य

935
01:06:16,000 --> 01:06:20,160
बा चीजों की बहुत न्यूनतम वो रह जाती है आवश्यकता

936
01:06:20,160 --> 01:06:24,240
तो वो तृप्त है मगर ये हमारा है इसकी इसके

937
01:06:24,240 --> 01:06:27,960
झोल को सुन लीजिए क्या कह रहा है ये

938
01:06:27,960 --> 01:06:32,080
कि शास्त्र अनुकूल कर्म से संतुष्टि हो उसके

939
01:06:32,080 --> 01:06:37,240
लिए अन्य पदार्थ की प्राप्ति के लिए कोई प्रयोजन नहीं

940
01:06:37,240 --> 01:06:42,000
रहता। और यहां यह कहा जा रहा है कि उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।

941
01:06:42,000 --> 01:06:46,240
ठीक है? तो जो मनुष्य आत्मा

942
01:06:46,240 --> 01:06:49,680
में ही रमण करने वाला है उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है। ये हमारी भगवत गीता

943
01:06:49,680 --> 01:06:53,760
ने कहा मगर इसने कहा कि जो मनुष्य सच्चे मन से परमात्मा के विधान

944
01:06:53,760 --> 01:06:58,160
का पालन करता है। मतलब आत्मा में रमण की बात तो भूल ही जाओ।

945
01:06:58,160 --> 01:07:02,320
ठीक है? आत्मा यानी सच्चे मन से

946
01:07:02,320 --> 01:07:06,640
परमात्मा के विधान का पालन। वाह। खैर आगे चलते हैं। अब

947
01:07:06,640 --> 01:07:10,720
तीन 18 में क्या कहा भगवान ने? उस महापुरुष का इस विश्व में ना तो

948
01:07:10,720 --> 01:07:14,720
कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है ना कर्मों के ना करने से

949
01:07:14,720 --> 01:07:18,800
कोई प्रयोजन रहता है तथा कर्म करने से भी कोई प्रयोजन नहीं

950
01:07:18,800 --> 01:07:23,080
है और कर्म ना करने से भी यहां पे भी वही समत्व बुद्धि आ रही है लाभ हानि राग

951
01:07:23,080 --> 01:07:27,280
द्वेष कर्म निवाद कारस्त फले सुदाच यहां पे भी वही

952
01:07:27,280 --> 01:07:31,520
चीज आ रही है समत्व बुद्धि कि तू केवल इसलिए कर कि ईश्वर

953
01:07:31,520 --> 01:07:35,520
ने कहा है इसलिए कर कि शास्त्र ने कहा है तेरा अपना कोई उसमें प्रयोजन

954
01:07:35,520 --> 01:07:39,600
नहीं होना चाहिए क्योंकि तू स्वयं आत्मरति आत्मरति हो जा आत्मा में

955
01:07:39,600 --> 01:07:43,600
ही रमण कर तो कुल मिलाकर के गीता में वही बात चल

956
01:07:43,600 --> 01:07:47,760
रही है आत्मरति हो जा और राग द्वेष में समान बुद्धि ले ले अपनी इंद्रियों को

957
01:07:47,760 --> 01:07:51,920
समेट ले मगर विषयों का चिंतन करते हुए मत समेट भगवान का सानिध्य प्राप्त

958
01:07:51,920 --> 01:07:56,160
करते हुए समेट भगवत गीता में वही बातें चल रही है अलग-अलग

959
01:07:56,160 --> 01:08:00,320
प्रकार से वही सब कहा जा रहा है तथा संपूर्ण प्राणियों में भी इसका किंचित

960
01:08:00,320 --> 01:08:04,400
किंचित किंचित मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता ठीक है

961
01:08:04,400 --> 01:08:05,040
अब इसने

962
01:08:05,040 --> 01:08:08,400
क्या किया 3 18 में

963
01:08:08,400 --> 01:08:12,480
इसने तीन 18 में कहा है उस महापुरुष के लिए विश्व में ना तो व्यर्थ के पाप

964
01:08:12,480 --> 01:08:17,720
कर्म करने से कोई प्रयोजन रह जाता

965
01:08:17,720 --> 01:08:21,840
है। जो व्यक्ति जिसको मालूम है जो

966
01:08:21,840 --> 01:08:25,920
ये मान रहा है कि पाप कर्म है उसको पाप कर्म करने में

967
01:08:25,920 --> 01:08:30,960
प्रयोजन कैसे स्वीकार करेगा? हां।

968
01:08:30,960 --> 01:08:35,280
तो यह कह रहा है कि इसने

969
01:08:35,280 --> 01:08:39,920
इसका पूरा अर्थ ही बदल दिया इस व्यक्ति ने। यहां पर

970
01:08:39,920 --> 01:08:44,640
इसने पूरा अर्थ बदल दिया यहां पर। भगवान ने कहा है कि इस

971
01:08:44,640 --> 01:08:48,640
जो महापुरुष कौन सा महापुरुष जो आत्मा में ही

972
01:08:48,640 --> 01:08:52,800
रमण करने वाला है आत्मा में ही संतुष्ट है आत्मा में ही संतुष्ट

973
01:08:52,800 --> 01:08:56,880
है उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है उस महापुरुष का इस विश्व में

974
01:08:56,880 --> 01:09:00,960
ना तो कर्म करने से कोई प्रयोजन है ना कर्मों को ना करने से कोई

975
01:09:00,960 --> 01:09:05,120
प्रयोजन है क्यों कर रहा है फिर क्योंकि ईश्वर ने कहा है बस और

976
01:09:05,120 --> 01:09:09,120
उसका कोई व्यक्तिगत या आत्मिक कोई

977
01:09:09,120 --> 01:09:13,360
प्रयोजन नहीं है कि मैं अपने लिए कर रहा हूं केवल ईश्वर ने कहा इसलिए क्योंकि वो आत्मा में

978
01:09:13,360 --> 01:09:17,680
संतुष्ट है। ठीक है? यहां तो यह कहा भगवान मगर इसने क्या कर दिया? इसने

979
01:09:17,680 --> 01:09:20,480
कर दिया कि जो महापुरुष के लिए उस महापुरुष

980
01:09:20,480 --> 01:09:24,480
के लिए विश्व में ना तो व्यर्थ के पाप करने से कोई प्रयोजन रह जाता है

981
01:09:24,480 --> 01:09:28,560
तथा ना शास्त्रानुकूल धर्म धार्मिक कर्म ना करने से

982
01:09:28,560 --> 01:09:33,680
कोई प्रयोजन रह जाता है। भाई मेरे यह कहना क्या चाहते हो?

983
01:09:33,680 --> 01:09:37,760
शास्त्र अनुकूल धार्मिक कर्म ना करना भी पाप है

984
01:09:37,760 --> 01:09:41,760
और पाप कर्म करना भी पाप है। तो उसी बात को तुमने दो बार

985
01:09:41,760 --> 01:09:46,640
यहां कर दिया और अर्थ का अनर्थ कर दिया मटियामेट कर दिया।

986
01:09:46,640 --> 01:09:50,960
शास्त्रानुकूल धर्म धार्मिक कर्म ना करने से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता।

987
01:09:50,960 --> 01:09:55,360
ठीक है? यानी तत्व ज्ञान परिचित व्यक्ति अशुभ कर्म कदापि

988
01:09:55,360 --> 01:09:59,400
नहीं करता। लो वहां भगवान और ही कुछ कह रहे

989
01:09:59,400 --> 01:10:03,440
हैं कि वहां पे उसको राग द्वेष से मुक्त हो के बात करनी है।

990
01:10:03,440 --> 01:10:07,520
काम करना है। लाभ हानि में समत्व बुद्धि रख के काम

991
01:10:07,520 --> 01:10:11,560
करना है। मगर यहां पे इसने क्या कर

992
01:10:11,560 --> 01:10:17,560
दिया? अपने दिमाग की उपज यहां पूरी डाल दी।

993
01:10:17,960 --> 01:10:22,720
तो अशुभ कर्म कदापि नहीं करता तथा शुभ

994
01:10:22,720 --> 01:10:26,800
व शास्त्रोक्त साधना किए बिना भी नहीं रह सकता। वह

995
01:10:26,800 --> 01:10:30,800
केवल परमार्थ के लिए कार्य करता है। किसी भी प्राणी से स्वार्थ सिद्धि

996
01:10:30,800 --> 01:10:35,440
के लिए ही संबंध नहीं रखता। वह सबका शुभचिंतक होता है। अब इससे पूछो

997
01:10:35,440 --> 01:10:35,940
कि

998
01:10:35,680 --> 01:10:39,920
तू भाई अपने इस तीन 18 की संस्कृत दिखा।

999
01:10:39,920 --> 01:10:44,560
संस्कृत दिखा जो तूने यहां पर किया है उसकी

1000
01:10:44,560 --> 01:10:49,000
तीन 18 की संस्कृत दिखा जो तूने अनुवाद लिखा है तीन

1001
01:10:49,000 --> 01:10:53,200
18 खैर आगे चलते हैं तो अब इसने विश्लेषण किया

1002
01:10:53,200 --> 01:10:57,280
क्या विश्लेषण किया कि गीता अध्याय तीन

1003
01:10:57,280 --> 01:11:01,680
के श्लोक 19 में मूल पाठ में लिखा है कि साधक

1004
01:11:01,680 --> 01:11:05,680
शास्त्रोक्त साधना करके परम आपनोति

1005
01:11:05,680 --> 01:11:10,320
पुरुष अन्य परमात्मा को प्राप्त होता है। अन्य परमात्मा

1006
01:11:10,320 --> 01:11:14,480
परम परमात्मा को नहीं अन्य परमात्मा क्योंकि इसको गीता

1007
01:11:14,480 --> 01:11:18,880
कहने वाले से अलग हटाना है परमात्मा को तो इसका वो जो सिंगल पॉइंट एजेंडा

1008
01:11:18,880 --> 01:11:23,040
है वो चलता रहेगा तो क्या है अब ये यहां पर बता रहा है कि

1009
01:11:23,040 --> 01:11:27,120
परम का अर्थ अन्य श्लोकों में 42 43 में

1010
01:11:27,120 --> 01:11:31,280
परम का अर्थ पर लिया है पर किया है पर का अर्थ श्रेष्ठ

1011
01:11:31,280 --> 01:11:33,800
किया है

1012
01:11:33,800 --> 01:11:38,640
यानी हिंदी की बात करें तो पर का अर्थ अन्य या आगे

1013
01:11:38,640 --> 01:11:42,800
आगे वाला होता है। जैसे दादा फिर परदादा

1014
01:11:42,800 --> 01:11:46,800
अब देखिए पहली बात तो क्या होता है कि परदादा का मतलब

1015
01:11:46,800 --> 01:11:51,120
अन्य नहीं होता है। एक और दादा परम दादा इसलिए परदादा

1016
01:11:51,120 --> 01:11:55,360
कहते हैं। ठीक है? तो यहां पे खुद ही फंस रहा है उदाहरण देके। जैसे दादा

1017
01:11:55,360 --> 01:11:59,760
फिर परदादा जैसे आत्मा परमात्मा

1018
01:11:59,760 --> 01:12:03,800
ब्रह्म परम ब्रह्म तो ब्रह्म परम ब्रह्म को परब्रह्म भी कहते

1019
01:12:03,800 --> 01:12:09,040
हैं। है ना? और इसने भी पर का मतलब परम माना है।

1020
01:12:09,040 --> 01:12:13,040
यहां पर यह कहने का प्रयास कर रहा है तीन 19 का विश्लेषण करते

1021
01:12:13,040 --> 01:12:17,280
हुए कि पर का अर्थ परम नहीं लेना है। पर का अर्थ अन्य

1022
01:12:17,280 --> 01:12:21,680
लेना है। कोई और दूसरा जबरदस्ती। ठीक है?

1023
01:12:21,680 --> 01:12:25,760
तो क्या है? इसने ही पर का अर्थ परम माना है। अभी हम दिखाएंगे

1024
01:12:25,760 --> 01:12:30,080
आपको पर पहले इसको पढ़ ले थोड़ा सा। परम का अर्थ अन्य गीता

1025
01:12:30,080 --> 01:12:34,480
अनुवादकों ने परम का अर्थ परमात्मा किया है। इनहीं अनुवादों

1026
01:12:34,480 --> 01:12:39,280
ने इसी अध्याय के तीन के श्लोक 42 43 में परम का अर्थ पर किया है

1027
01:12:39,280 --> 01:12:43,360
और पर का अर्थ श्रेष्ठ किया है। यानी यदि हिंदी की बात करें तो पर का अर्थ

1028
01:12:43,360 --> 01:12:47,760
अन्य आगे वाला होता है। नहीं पर का अर्थ परम होता है।

1029
01:12:47,760 --> 01:12:52,920
अगर दादा के आगे पर लग रहा है परदा यानी दादा से परम दादा।

1030
01:12:52,920 --> 01:12:56,960
हम जैसे दादा फिर परदादा तथा ब्रह्म फिर

1031
01:12:56,960 --> 01:13:01,560
परबह्म यानी दूसरा ब्रह्म परबह्म का अर्थ दूसरा हो गया।

1032
01:13:01,560 --> 01:13:06,240
वाह दूसरा ब्रह्म दो ब्रह्म हो गए। खैर

1033
01:13:06,240 --> 01:13:10,320
इनहीं अनुवादों ने गीता अध्याय फिर इसने बार-बार पर का अर्थ परे किया

1034
01:13:10,320 --> 01:13:14,560
है। मतलब इसने ये दिखाया है कि पर पर जो संस्कृत में लिखा

1035
01:13:14,560 --> 01:13:18,560
हुआ है उसका मतलब इन्होंने परे कर दिया है। मगर जब हिंदी में

1036
01:13:18,560 --> 01:13:22,640
पर लिख रहे हैं तो उसका अर्थ लिख रहे हैं परम। ठीक है? यहां पर

1037
01:13:22,640 --> 01:13:26,720
यह क्लेम कर रहा है, आरोप लगा रहा है। फिर इसने बहुत सारे उदाहरण दिए कि

1038
01:13:26,720 --> 01:13:30,800
आठ आठ श्लोक आठव अध्याय के श्लोक 22 में परह का अर्थ परम

1039
01:13:30,800 --> 01:13:35,120
किया है। एक जगह पर का अर्थ परे किया है और एक जगह पर का अर्थ परम

1040
01:13:35,120 --> 01:13:39,160
किया है। जबकि मूल पाठ से स्पष्ट है कि परह का अर्थ यानी

1041
01:13:39,160 --> 01:13:43,280
दूसरे परे की बात हो रही है। अगर मान लीजिए एक

1042
01:13:43,280 --> 01:13:47,360
बार को मान भी लिया जाए कि दूसरे परमात्मा की बात हो रही है। तो पहली बात तो वहां पे

1043
01:13:47,360 --> 01:13:51,360
परमात्मा की संस्कृत होनी चाहिए। दूसरी बात है भाई

1044
01:13:51,360 --> 01:13:56,000
तू खुद एक जगह कह रहा है कि ब्रह्म का अर्थ है

1045
01:13:56,000 --> 01:14:01,880
क्षर पुरुष मगर यहां पर जब ऊपर इसका दिखाइए

1046
01:14:01,880 --> 01:14:04,920
जरा

1047
01:14:04,920 --> 01:14:09,280
हम एक एक चीज और ले लेते हैं

1048
01:14:09,280 --> 01:14:13,360
पेज पृष्ठ संख्या 45 निकाली है इसकी उसमें भी इसी तरह

1049
01:14:13,360 --> 01:14:18,800
की क्लेम कर रहा है कि

1050
01:14:18,800 --> 01:14:22,880
चार श्लोक 31 में अन्य परमात्मा का स्पष्ट वर्णन मूल पाठ

1051
01:14:22,880 --> 01:14:26,880
में है। तो अनुवादों ने स्पष्ट अनुवादों को स्पष्ट लिखना पड़ा।

1052
01:14:26,880 --> 01:14:31,600
ये 45वें का लास्ट पैराग्राफ है यही जो पढ़ रहा हूं।

1053
01:14:31,600 --> 01:14:35,680
चार श्लोक 31 में अन्य परमात्मा का स्पष्ट वर्णन है। वर्णन मूल

1054
01:14:35,680 --> 01:14:39,840
पाठ में है तो अनुवादों ने स्पष्ट लिखना पड़ा। परंतु श्लोक 32 में सांकेतिक

1055
01:14:39,840 --> 01:14:43,920
वर्णन है। वहां अर्थ का अनर्थ करके गलत अनुवाद किया है। इसमें

1056
01:14:43,920 --> 01:14:48,800
ब्रह्मण शब्द का अर्थ वेद कर दिया है। जबकि इन्होंने ही

1057
01:14:48,800 --> 01:14:53,440
इन्होंने गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में ब्रह्मणा का अर्थ सच्चिदानंद

1058
01:14:53,440 --> 01:14:58,400
घन ब्रह्म यानी पूर्ण ब्रह्म ठीक किया है। यानी ब्रह्म का अर्थ

1059
01:14:58,400 --> 01:15:02,400
जब इसके अनुकूल हो तो ब्रह्म का अर्थ भी परम ब्रह्म है। ठीक

1060
01:15:02,400 --> 01:15:06,720
है? इसने यहां ये मान लिया। ब्रह्म का अर्थ परम ब्रह्म मान लिया। ब्रह्माणा

1061
01:15:06,720 --> 01:15:10,960
का अर्थ सच्चिदानंद घन ब्रह्म मान लिया।

1062
01:15:10,960 --> 01:15:15,360
ठीक है? ठीक है? अब कुल मिलाकर के

1063
01:15:15,360 --> 01:15:19,440
यहां पर निचोड़ यह निकलता है कि यह आरोप लगा रहा है कि एक ही शब्द का कहीं

1064
01:15:19,440 --> 01:15:20,080
पर कोई अर्थ

1065
01:15:20,080 --> 01:15:24,400
कर रहे हैं। कहीं पर कोई अर्थ कर रहे हैं। यह आरोप यह लगा रहा है। तो अब इसके

1066
01:15:24,400 --> 01:15:28,480
इसके इस आरोप का हम जवाब देते हैं। पहले तो पर का अर्थ इसने स्वयं

1067
01:15:28,480 --> 01:15:32,640
ने परम लिया है कि नहीं वह दिखाते हैं आपको। कहां पर लिया है पर

1068
01:15:32,640 --> 01:15:36,800
का अर्थ परम? यह देखिए आ जाइए। इसकी

1069
01:15:36,800 --> 01:15:42,800
भगवत गीता में प्रश्न संख्या 40

1070
01:15:46,320 --> 01:15:51,280
पृष्ठ संख्या 40 में बिल्कुल लास्ट पैराग्राफ देखिए।

1071
01:15:51,280 --> 01:15:55,640
उसमें लिखा हुआ है यज्ञ के द्वारा देवताओं

1072
01:15:55,640 --> 01:16:00,080
अर्थात संसार रूपी पौधे की शाखाओं को उन्नत करो।

1073
01:16:00,080 --> 01:16:04,680
और इसी अनुवाद की अंतिम लाइन में लिखा हुआ है इस

1074
01:16:04,680 --> 01:16:08,960
प्रकार दूसरे को उन्नत करके परम कल्याण

1075
01:16:08,960 --> 01:16:13,640
को प्राप्त हो जाओगे। तो इसने यहां पर परम का अर्थ परम

1076
01:16:13,640 --> 01:16:18,000
माना स्वयं ने माना। तो गीता प्रेस

1077
01:16:18,000 --> 01:16:22,000
के जो अनुवादक हैं या जो आचार्य गण है पारंपरिक वह

1078
01:16:22,000 --> 01:16:26,480
अगर परम का अर्थ परम मान रहे हैं और अपने प्रसंग प्रसंग अनुसार

1079
01:16:26,480 --> 01:16:30,480
कहीं कहीं पर परम का अर्थ कोई दूसरा मान रहे हैं तो उस पर आरो उन पर आरोप

1080
01:16:30,480 --> 01:16:34,560
लगा रहे हैं। मगर खुद ही एक ही शब्द के अलग-अलग

1081
01:16:34,560 --> 01:16:35,120
अर्थ अपने

1082
01:16:35,120 --> 01:16:39,200
अनुसार मान रहा है। जैसे कि ब्रह्म का अर्थ हमने पिछले अध्याय में बताया। इसने

1083
01:16:39,200 --> 01:16:45,200
पूर्ण ब्रह्म मान लिया। ब्रह्म का अर्थ इसने यहां पर भी मान लिया।

1084
01:16:46,120 --> 01:16:50,240
तीन तीन 15 में ब्रह्म का अर्थ इसने सर्वगत

1085
01:16:50,240 --> 01:16:54,240
ब्रह्म मान लिया और तीन 15 में इसने अक्षर का अर्थ

1086
01:16:54,240 --> 01:16:59,960
परम अक्षर पुरुष मान लिया और

1087
01:16:59,960 --> 01:17:04,600
अ 432 में इसने ब्रह्मण का ब्रह्मण का

1088
01:17:04,600 --> 01:17:08,960
अर्थ क्या कहते हैं सच्चिदानंद धन ब्रह्म

1089
01:17:08,960 --> 01:17:13,680
मान लिया तो इसने अपने अनुसार मान लिया मगर वहीं पर

1090
01:17:13,680 --> 01:17:17,680
यदि यदि परंपरा प्राप्त आचार्य गण या गीता प्रस के

1091
01:17:17,680 --> 01:17:21,840
जो अनुवादक हैं जो आचार्य गण है वो अगर

1092
01:17:21,840 --> 01:17:25,920
प्रसंग अनुसार एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ हैं। मगर

1093
01:17:25,920 --> 01:17:30,000
वो यदि प्रसंग अनुसार करेंगे तो ये क्लेम करेगा जबकि ये खुद

1094
01:17:30,000 --> 01:17:34,000
भी परम का अर्थ परम मानता है। मगर भगवत

1095
01:17:34,000 --> 01:17:38,000
जो गीता प्रेस के ट्रांसलेटर्स है वो अगर इसके अनुकूल नहीं दिखेंगे इसे तो

1096
01:17:38,000 --> 01:17:42,000
ये कह देगा कि यहां पर इन्होंने गलत अर्थ किया

1097
01:17:42,000 --> 01:17:46,160
है। भले ही इसको संस्कृत का सा भी ना आता हो, इसको संस्कृत बोलनी ना आती हो।

1098
01:17:46,160 --> 01:17:50,480
मगर जो संस्कृतज्ञ है उन पर यह आरोप लगाएगा। भले ही इसको निरुक्त ना पता हो,

1099
01:17:50,480 --> 01:17:54,560
कुछ भी ना पता हो मगर यह आरोप लगाएगा। तो यहां तक

1100
01:17:54,560 --> 01:17:58,640
हमने पढ़ लिया। इसके बाद आगे

1101
01:17:58,640 --> 01:18:02,720
से शुरू होगा क्योंकि आगे जनक जी को परम सिद्धि

1102
01:18:02,720 --> 01:18:06,800
प्राप्त हुई है। ठीक है? जनक आदि ज्ञानी जन भी आसक्ति

1103
01:18:06,800 --> 01:18:10,800
रहित कर्म द्वारा ही मतलब ये गृहस्थ जनक

1104
01:18:10,800 --> 01:18:14,880
आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। ये अगला

1105
01:18:14,880 --> 01:18:18,880
है श्लोक। तो वो कहा जा रहा है ना

1106
01:18:18,880 --> 01:18:22,960
कि गृहस्थ होते हुए भी तुम मुक्ति को प्राप्त हो जाओगे। हम तो यहां पर

1107
01:18:22,960 --> 01:18:27,840
जनक जी का उदाहरण दिया जा रहा है कि परम सिद्धि को प्राप्त हो गए। तो

1108
01:18:27,840 --> 01:18:31,840
ये अगला अगले अगली बार हम बात करेंगे। हम थोड़ी सी अपनी बातें

1109
01:18:31,840 --> 01:18:35,840
कर लेते हैं। गोपाल जी शायद आने वाले थे। उनको लिंक

1110
01:18:35,840 --> 01:18:39,840
अगर आपने ना भेजा हो तो भेज दीजिए। लाइव स्ट्रीम का लिंक यहां दे दीजिए। किसी को कोई

1111
01:18:39,840 --> 01:18:43,920
चर्चा करनी हो वैचारिक मतभेद के निमित्त तो वह आ सकता है या फिर अपने विचार

1112
01:18:43,920 --> 01:18:48,000
प्रकट करने हो तो वह आ सकता है। हमने अभी एक

1113
01:18:48,000 --> 01:18:52,160
बड़ी चीज यहां पर निकाली है कि भाई यह क्लेम कर रहा है कि एक

1114
01:18:52,160 --> 01:18:56,320
ही शब्द के अलग-अलग अर्थ अनुवादक कर रहे हैं जो कि गलत है। और जबकि

1115
01:18:56,320 --> 01:19:00,560
इसने स्वयं ने एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ किए हैं। कहीं पर ब्रह्म का अर्थ

1116
01:19:00,560 --> 01:19:04,640
अपना काल राक्षस वाला ब्रह्म किया है। कहीं पर ब्रह्म का अर्थ पूर्ण ब्रह्म

1117
01:19:04,640 --> 01:19:06,160
किया है। सच्चिदानंद

1118
01:19:06,160 --> 01:19:10,160
घन ब्रह्म किया है। ठीक है? कहीं पर अक्षर का अर्थ इसने

1119
01:19:10,160 --> 01:19:14,320
खुद बताया है कि परम अक्षर और कहीं पर अक्षर का अर्थ बताया है

1120
01:19:14,320 --> 01:19:18,480
कि अक्षर। ठीक है? और कहीं पर परम का अर्थ

1121
01:19:18,480 --> 01:19:22,800
खुद परम बताया है और कहीं पर का अर्थ इसने अन्य बताया

1122
01:19:22,800 --> 01:19:27,120
है। तो यह सब इसने खुद झोल किया है। मगर इसके झोला

1123
01:19:27,120 --> 01:19:31,120
अनुसार जो अर्थ प्राप्त हो उसको मानना चाहिए और

1124
01:19:31,120 --> 01:19:35,200
संस्कृतज्ञ परंपरा प्राप्त आचार्यों के प्रसंगानुसार जो अर्थ

1125
01:19:35,200 --> 01:19:40,440
प्राप्त हो वो नहीं मानना चाहिए क्योंकि यह है जेलधाम

1126
01:19:40,440 --> 01:19:44,720
निवासी कौन है जेलधाम निवासी जिन

1127
01:19:44,720 --> 01:19:48,800
पर चलिए छोड़िए। खैर हमने स्ट्रीम

1128
01:19:48,800 --> 01:19:53,040
का लिंक दे दिया है संभवत। तो आप कोई आना

1129
01:19:53,040 --> 01:19:59,040
चाहे तो आ सकता है। अन्यथा हम फिर इसको बढ़ाएंगे

1130
01:20:03,960 --> 01:20:06,200
आगे।

1131
01:20:06,200 --> 01:20:10,400
हम हां एक बात और बता दें। Instagram अकाउंट को बैन किया

1132
01:20:10,400 --> 01:20:14,560
गया है इंडिया में। भारत में Instagram अकाउंट

1133
01:20:14,560 --> 01:20:19,240
को बैन किया गया। आप अगर हमारे अकाउंट पर जाएंगे तो वहां आपको लिखा दिखाई देगा

1134
01:20:19,240 --> 01:20:23,680
कि यह जो अकाउंट है यह इंडिया में बैन है।

1135
01:20:23,680 --> 01:20:28,440
तो आप जो है अगर विदेश

1136
01:20:28,440 --> 01:20:32,560
वाले होते हुए उसको अगर चेक करेंगे तो

1137
01:20:32,560 --> 01:20:36,560
आपको हमारा पेज दिखेगा। उस पर हम कार्य कर रहे हैं कि ऐसा क्यों किया

1138
01:20:36,560 --> 01:20:40,880
है? किसने कर क्लेम किसने किया है। अभी हमें कुछ भी बताया नहीं गया इस बारे में।

1139
01:20:40,880 --> 01:20:45,720
उस पर चल रहे

1140
01:20:45,720 --> 01:20:49,920
हैं। कमेंट कर दिया ना स्ट्रीम का लिंक और किसी भी प्रकार

1141
01:20:49,920 --> 01:20:54,000
की वैचारिक मतभेद के निमित्त आप चर्चा के लिए हमें संपर्क

1142
01:20:54,000 --> 01:21:00,000
कर सकते हैं। नंबर यहां पर स्क्रीन पर दिया जा रहा है। मैं बोल भी देता हूं।

1143
01:21:00,440 --> 01:21:04,800
7408301869 कोई आवश्यक कमेंट हो तो आप यहां उसको प्रदर्शित कर दीजिए

1144
01:21:04,800 --> 01:21:10,800
क्योंकि मैं पढ़ नहीं पा रहा हूं।

1145
01:21:12,160 --> 01:21:16,240
सरकार को रामपाल जैसे लोगों पर एक्शन लेना चाहिए। बिल्कुल लेना

1146
01:21:16,240 --> 01:21:20,720
चाहिए और हम और आप अपने

1147
01:21:20,720 --> 01:21:24,760
ध्वनि सरकार के कानों तक कानून तक पहुंचाएंगे। आह्वान

1148
01:21:24,760 --> 01:21:29,560
करिए सरकार का और

1149
01:21:29,560 --> 01:21:33,760
संगठन तैयार कीजिए। अपने स्थानीय

1150
01:21:33,760 --> 01:21:37,840
लेवल पर संगठन होना चाहिए कि आपके घर के आसपास रामपाल मुक्त रहे।

1151
01:21:37,840 --> 01:21:42,240
हर व्यक्ति यही बीड़ा उठा ले कि मेरे घर के आसपास रामपाल मुक्त होगा तो भी रामपाल

1152
01:21:42,240 --> 01:21:46,320
मुक्त हो जाएगा हमारा देश। हम ठीक

1153
01:21:46,320 --> 01:21:52,320
है

1154
01:21:53,800 --> 01:21:59,800
ना? और कोई कमेंट

1155
01:22:02,800 --> 01:22:08,400
काल के जाल में रामपाल जेल में

1156
01:22:08,400 --> 01:22:13,960
ठीक है तो आने के लिए बहुत-बहुत आभार सबका

1157
01:22:13,960 --> 01:22:18,000
हम जॉइ करके मुझे

1158
01:22:18,000 --> 01:22:24,000
कमेंट दिख क्यों नहीं रहे हैं?

1159
01:22:50,000 --> 01:22:54,880
ये जो रीसेंट कमेंट आ रहा है इसको जरा प्रदर्शित करिए

1160
01:22:54,880 --> 01:22:58,880
कि क्या लिखा है ये जो तमीज से बात करेंगे ऊपर

1161
01:22:58,880 --> 01:23:03,720
वाला कमेंट है इसको जरा स्क्रीन पर

1162
01:23:03,720 --> 01:23:08,200
दिखाइए दिख नहीं रहा है कोई भी

1163
01:23:08,200 --> 01:23:09,200
कमेंट

1164
01:23:09,200 --> 01:23:15,200
इससे पहले वाला है जस्ट पहले

1165
01:23:16,040 --> 01:23:20,800
वाला क्या लिखा है 8 21 22 में देवी भागवत महापुराण

1166
01:23:20,800 --> 01:23:24,800
को वंशजों को श्राप दिया है भाई सामने

1167
01:23:24,800 --> 01:23:29,080
आकर बात करना यह क्या सब बकवास कर रहा है अच्छा वो है क्या

1168
01:23:29,080 --> 01:23:33,240
बाबू बाबू अर्जुन को मोक्ष मिला था कि नहीं सीधी बात है

1169
01:23:33,240 --> 01:23:37,440
भाई सर्वशक्तिमान सिद्ध करो ले जाओ सब कुछ सारी बातें तुम्हारी

1170
01:23:37,440 --> 01:23:42,000
मान लेंगे आप भगवान को सर्वशक्तिमान परम स्वतंत्र मोक्ष

1171
01:23:42,000 --> 01:23:46,000
इसकी बात करिए हां बाबू है समझ गया अंकित

1172
01:23:46,000 --> 01:23:50,080
दास नाम से आया था बाबू अब स्मार्ट हो गया थोड़ा पहले हैप्पी डेंट वाइट चिंगम का

1173
01:23:50,080 --> 01:23:54,280
ऐड करता रहता था बाबू वैसे एपिडेंट

1174
01:23:54,280 --> 01:23:58,320
वाइटम ज्यादा चलती है अगर बाबू कोस में लिया जाता है

1175
01:23:58,320 --> 01:24:04,320
ना क्या कहना है आप लोगों का पहाड़ी

1176
01:24:07,400 --> 01:24:12,120
जी चलिए ठीक है कोई है नहीं जो इस समय आए

1177
01:24:12,120 --> 01:24:16,320
क्योंकि रामपाल के किसी भी फॉलोअ ने लगता है बचपन

1178
01:24:16,320 --> 01:24:20,400
में माता जी का निष्ठा पूर्वक दूध नहीं पिया है जिस कारण से वह

1179
01:24:20,400 --> 01:24:24,400
आते नहीं है और यही चंगू मंगू जो 50ों बार पिट चुके

1180
01:24:24,400 --> 01:24:29,720
हैं और केवल उधम मचाने के लिए

1181
01:24:29,720 --> 01:24:33,840
वो एक क्या कहते हैं अवस्था फैलाने के लिए आते

1182
01:24:33,840 --> 01:24:38,720
हैं इनका हो गया बार-बार क्या इन्हीं को लेते रहे

1183
01:24:38,720 --> 01:24:43,200
अमित दास आता है अपने चैनल के लिए कंटेंट लेने वो उसने कल डाल दिया

1184
01:24:43,200 --> 01:24:47,360
यहां की चर्चा में अपना शटर घोट कर के डाल दिया देखो देखो एम ये वो

1185
01:24:47,360 --> 01:24:51,360
फलाना ढिमका सब करके उसने डाल दिया ठीक है चलिए सभी

1186
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को जय श्री राम। आशा करता हूं यह श्रंखला आपको अच्छी लग रही हो। इसके बुलेट

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पॉइंट्स आपको सर्वशक्तिमान धर्म नाम का

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01:24:59,760 --> 01:25:04,760
जो हमारा दूसरा चैनल है उस पर मिल जाएंगे और

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01:25:04,760 --> 01:25:08,920
अगले सेशन तक के लिए आप

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लोगों से आज्ञा चाहते

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हैं। खीर का कर्ज उतारो

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भाई रामपालियों माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया तो आ

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जाना शिवश नारायण द्विवेदी तुमको तुम्हारे रास्ते में खड़ा मिलेगा

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हम वो गरुड़ पुराण में ही है बस गरुड़

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पुराण में ही फस गया है वो लगता है वो वो कौन सी नदी है

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गरुण पुराण में वेतरणी नदी है ना वही फसा

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है वह इसीलिए बेचारा

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आता रहता है। चलिए

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और हम कौन है? वहां के जो हंटर चलाते

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हैं ना वैतरणी नदी में जब यातनाएं दी जाती हैं।

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हम लोग वो हैं। इसीलिए आता है वह भी मुझे वैतरणी नदी में

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यातना दो मुझे। खैर चलिए यह तो हो गया विनोद की

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बातें। सभी को जय श्री राम।

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और आप लोग हमारे कई कई प्रकार के प्रकल्प चल

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रहे हैं। तो अगर आप हमें आर्थिक बल प्रदान करना चाहते

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हैं तो यहां पर हम डिटेल्स आपको दिखा देते हैं। तो आप

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अमित

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दास ने जो वीडियो बनाई है उस पर हमने कई वीडियो बनाई हैं।

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हां अमित दास जो टॉपिक लेकर आया था उस पर हमारी बहुत सारी वीडियोस बनी

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हुई है। आप लोग वह देख सकते हैं। उसको लगता है कि वो पहली बार

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लेके आया। उसने शायद विद्या वाली वीडियो देखी नहीं। माया

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वाली वीडियो नहीं देखी तो आप लोग वो सब देख सकते हैं। हालांकि अमित

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दास के प्रतिकार स्वरूप हमें कुछ स्पेशली बनाना हम आवश्यक नहीं

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समझते। उनके जो बाबा जी हैं जब वो ही इस स्तर के नहीं है

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अमित दास तो क्या है फिर अमित

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दास जी बाबा जी हैं जिनका ऊंट जो इस तरह से

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हुआ करता है हम वो

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ही इस तरह के नहीं है तो फिर केवल अमित दास की क्या ही प्रार

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करें आर्य समाजी भी इस तरह की बातें कर चुके हैं

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ठीक है तो चलते हैं एक महाशय आए हैं मगर वो अपना चेहरा लेकर

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के नहीं आए हैं तो फिर किसी दिन बात करते हैं। कोई बात नहीं आप कभी

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साहस जुटाइए। माता जी का निष्ठा पूर्वक दूध प्राप्त किया है जिसने वो

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संपर्क करें

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7408301869 जय श्री

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राम। वो डिटेल्स यहां पर दिखा दीजिए।

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जो जानकारी हां यह आपको जानकारी

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दी जा रही है तो बारकोड

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भी अच्छा ठीक है तो ठीक है सभी

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को जय श्री राम
