1
00:00:01,840 --> 00:00:05,920
सभी को जय श्री राम। तो आप सबका स्वागत है और

2
00:00:05,920 --> 00:00:10,240
हम लोग अध्ययन कर रहे हैं श्रीमद् भगवत गीता

3
00:00:10,240 --> 00:00:14,800
का और एक एक श्लोक पर बात कर रहे हैं कि इस रामपाल

4
00:00:14,800 --> 00:00:20,120
नाम के व्यक्ति ने जेल में बंद अपराधी

5
00:00:20,120 --> 00:00:25,320
ने क्या-क्या खिलवाड़ किया है। श्रीमद् भगवत

6
00:00:25,320 --> 00:00:31,320
गीता में जो भगवान श्री कृष्ण ने वचन कहे उनके साथ

7
00:00:31,480 --> 00:00:35,520
और इसी सीरीज में हमारे दो सेशंस हो

8
00:00:35,520 --> 00:00:39,680
चुके हैं। कोशिश हमारी यह थी कि हम एक सप्ताह

9
00:00:39,680 --> 00:00:43,920
में दो बार ये रख सके जिससे कि जल्दी से पूरा एक कोर्स जैसा बन जाए

10
00:00:43,920 --> 00:00:48,040
कि किस श्लोक में क्या छेड़खानी की है और रामपाल के वैसे तो

11
00:00:48,040 --> 00:00:52,080
बहुत गिरे हुए निम्न स्तर के कुतर्क होते हैं। फिर भी

12
00:00:52,080 --> 00:00:56,400
आपको इससे मदद मिल सके और लगभग प्रत्येक

13
00:00:56,400 --> 00:01:00,400
श्लोक का उसने जो अपार्थ किया है उसका उत्तर आपको इस सीरीज

14
00:01:00,400 --> 00:01:04,480
में मिल जाए। आपको केवल हमारी हमारी वो प्लेलिस्ट खोलनी पड़े

15
00:01:04,480 --> 00:01:08,960
और वहां जाकर के देखना पड़े कि यहां पर क्या-क्या बताया गया है।

16
00:01:08,960 --> 00:01:12,960
इसके साथ ही साथ इसी रूप में श्रीमद् भगवत गीता का

17
00:01:12,960 --> 00:01:17,000
आह्वान के साथ एक अध्ययन जैसा भी हो रहा है आप लोगों का।

18
00:01:17,000 --> 00:01:21,040
तो काफी रोचक है मेरे लिए। काफी रोचक है ये। बाकी

19
00:01:21,040 --> 00:01:25,040
आप लोगों का जो व्यू है वह आप लोग बताएंगे। सभी को जय

20
00:01:25,040 --> 00:01:29,600
श्री राम। सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल

21
00:01:29,600 --> 00:01:33,680
पूर्वक होंगे और सभी के लिए

22
00:01:33,680 --> 00:01:38,000
ढेर सारा आशीर्वाद जो प्रणम है उनका

23
00:01:38,000 --> 00:01:43,040
उनको यथोचित आदर पूर्वक प्रणाम।

24
00:01:43,040 --> 00:01:48,840
और सभी का यतोचित

25
00:01:48,840 --> 00:01:51,960
अभिवादन

26
00:01:51,960 --> 00:01:56,560
और आज एक सर्वशक्तिमान धर्म

27
00:01:56,560 --> 00:02:00,960
चैनल जो हमारा दूसरा है वहां पर एक बहुत ही अच्छी सुव्यवस्थित मैत्रीपूर्ण

28
00:02:00,960 --> 00:02:04,960
एक वार्ता हुई है। एक डिस्क डिस्कशन हुआ है। चर्चा हुई

29
00:02:04,960 --> 00:02:09,200
है। किस संबंध में? वर्ण व्यवस्था के संबंध में। आप

30
00:02:09,200 --> 00:02:13,920
लोगों को वो देखनी चाहिए। काफी अह समझने में चीजें मिलेंगी।

31
00:02:13,920 --> 00:02:18,000
हां, आज थोड़ी सी देर हो गई है। तो, सबसे पहले हम लोग बात कर

32
00:02:18,000 --> 00:02:19,760
लेते हैं।

33
00:02:19,760 --> 00:02:24,120
हमने सबसे पहले एपिसोड में ये

34
00:02:24,120 --> 00:02:28,240
जो रामपाल ने भगवत गीता का अपार्थ करना जो शुरू

35
00:02:28,240 --> 00:02:32,800
किया है वो किया है। 2.10 से स्टार्ट किया है। क्योंकि 2.10

36
00:02:32,800 --> 00:02:37,040
तक उसको कुछ ऐसा लगा नहीं जो उसका अपार्थ किया जाए। हालांकि उसने अपनी भूमिका जरूर लिखी

37
00:02:37,040 --> 00:02:41,600
है जिसमें उसने बहुत सारी व्यर्थ की बातें कही है। मगर

38
00:02:41,600 --> 00:02:45,840
अगर श्लोक क्रमांक की बात करें तो 2.10 से उसने

39
00:02:45,840 --> 00:02:50,000
अपार्थ गलत अर्थ करना शुरू किया है भगवत गीता का। तो हमने वहीं

40
00:02:50,000 --> 00:02:54,000
से इस सीरीज को स्टार्ट किया और पहले एपिसोड में हमने 2.10 से

41
00:02:54,000 --> 00:02:58,120
2.30 तक की बात की थी और दूसरे एपिसोड में हमने 2.31

42
00:02:58,120 --> 00:03:02,480
से 2.52 तक बात की और आज हम 2.52

43
00:03:02,480 --> 00:03:06,640
से 2.72 तक बात करने वाले हैं। पर जैसा

44
00:03:06,640 --> 00:03:10,880
कि हम सबसे पहले कुछ बुलेट पॉइंट्स बताते हैं। तो पिछले

45
00:03:10,880 --> 00:03:16,240
एपिसोड्स के कुछ बुलेट पॉइंट्स हम आपको बता देते हैं।

46
00:03:16,240 --> 00:03:20,400
यह 2.31 की जहां बात हो रही है रामपाल ने

47
00:03:20,400 --> 00:03:24,720
जो अपार्थ किया है उस किताब में वह हो रही है पेज

48
00:03:24,720 --> 00:03:29,160
प्रश्न संख्या 23 पर और यहां पर हम बुलेट पॉइंट्स ले लें

49
00:03:29,160 --> 00:03:33,520
तो महाभारत का युद्ध रामपाल के अनुसार धर्म

50
00:03:33,520 --> 00:03:34,960
युक्त धर्म युद्ध नहीं

51
00:03:34,960 --> 00:03:39,280
था धर्म युक्त युद्ध नहीं था पहली बात

52
00:03:39,280 --> 00:03:44,240
दूसरी बात यह है मतलब धर्म संस्थापना के लिए नहीं था वो ठीक है

53
00:03:44,240 --> 00:03:48,560
तो अब यहां पर एक बात आ जाती है कि रामपाल ने आगे

54
00:03:48,560 --> 00:03:52,560
चलकर के इन बातों को माना है कि जब जब धर्म की हानि होती है, अधर्म की वृद्धि

55
00:03:52,560 --> 00:03:56,720
होती है, मैं अवतरित होता हूं। काल धर्म की स्थापना के लिए

56
00:03:56,720 --> 00:04:00,720
अवतरित होता है। मगर यहां पर दिखाया गया है

57
00:04:00,720 --> 00:04:05,040
कि यह जो युद्ध था, यह धर्म युक्त युद्ध नहीं था। तो फिर पहली

58
00:04:05,040 --> 00:04:09,120
बात आती है कि काल ने इसे धर्म युक्त क्यों बोला? तो यहां यह बात झूठ हो

59
00:04:09,120 --> 00:04:13,200
गई। इसी पंक्ति में कुछ आगे अगले पृष्ठ पर

60
00:04:13,200 --> 00:04:17,280
यह कह दिया गया है कि काल ने यह युद्ध करवाने के लिए हर

61
00:04:17,280 --> 00:04:21,840
भरसक प्रयास किया। पुरजोर प्रयास किया। झूठ और सच दोनों का आलंबन लिया।

62
00:04:21,840 --> 00:04:26,080
तो फिर बात वही आ जाती है कि जब काल झूठ और सच दोनों बोल रहा है।

63
00:04:26,080 --> 00:04:30,160
झूठ भी बोल रहा है। कई बार इनको लोग आकर के कुतर्क करते हैं कि

64
00:04:30,160 --> 00:04:34,400
वो अगर थोड़ा सा अपने बारे में बता रहा है तो क्या गलत है। ऐसे ऐसे बोलते बात को घुमाते

65
00:04:34,400 --> 00:04:38,800
हैं। मगर स्पष्ट वहां पर एक्सेप्ट किया है कि काल ने झूठ भी बोला। तो जब काल

66
00:04:38,800 --> 00:04:42,800
झूठ भी बोल रहा है अगले ही पन्ने पर काल

67
00:04:42,800 --> 00:04:46,880
यदि झूठ बोल रहा है तो कैसे पता लगाया जाए कि क्या उसने सच बोला और क्या उसने झूठ

68
00:04:46,880 --> 00:04:50,080
बोला तो इस हिसाब से काल की वाणी को प्रमाण

69
00:04:50,080 --> 00:04:54,640
नहीं माना जा सकता पहली बात दूसरी बात ये आती है

70
00:04:54,640 --> 00:04:58,960
कि धर्म संस्थापना नहीं हो रही बल्कि अधर्म हो रहा है क्योंकि धर्म

71
00:04:58,960 --> 00:05:02,960
युक्त युद्ध नहीं है जबकि युद्ध करवाया जा रहा है मतलब जिस युद्ध से अधर्म होना है

72
00:05:02,960 --> 00:05:07,280
वो युद्ध क्यों करवाया जा रहा है काल के द्वारा यानी कि वो धर्म संस्थापना के लिए

73
00:05:07,280 --> 00:05:12,080
अवतरित नहीं। काल जो है प्रकट नहीं या आता जाता नहीं है। ठीक है?

74
00:05:12,080 --> 00:05:17,040
दूसरी तो यह हो गई कि मैं आता जाता हूं। यह जो काल ने कहा

75
00:05:17,040 --> 00:05:21,000
अब बातें आती है

76
00:05:21,000 --> 00:05:25,040
कि धर्म युक्त युद्ध नहीं था। दूसरी इन्होंने

77
00:05:25,040 --> 00:05:29,200
एक बात कही है कि बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता। इसमें

78
00:05:29,200 --> 00:05:35,040
इन्होंने पृष्ठ संख्या 23 पर कहा है बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता।

79
00:05:35,040 --> 00:05:40,040
तो फिर इसमें बात आ जाती है कि यदि लाभ हानि को

80
00:05:40,040 --> 00:05:44,160
हम लाभ हानि से प्रभावित होते रहेंगे तो हम कभी मुक्त हो सकते हैं

81
00:05:44,160 --> 00:05:48,320
क्या? मुक्त कौन है? ईश्वर। ईश्वर के लिए ना कुछ लाभ है ना हानि है।

82
00:05:48,320 --> 00:05:52,320
यानी कि लाभ हानि में उसके लिए कोई अंतर नहीं। वो ईश्वर है। मगर यह

83
00:05:52,320 --> 00:05:56,560
कह रहे हैं कि लाभ हानि से मतलब होना चाहिए। आपको प्रभावित होना चाहिए। इसका

84
00:05:56,560 --> 00:06:00,640
अर्थ क्या हुआ? यह पृष्ठ संख्या 23 पर ही कह रहे हैं। तो

85
00:06:00,640 --> 00:06:04,640
इसका अर्थ क्या हुआ? कि भाई व्यक्ति मुक्त होगा कैसे? जब वो लाभ हानि से प्रभावित होता

86
00:06:04,640 --> 00:06:05,200
रहेगा।

87
00:06:05,200 --> 00:06:09,440
दूसरी बात लाभ हानि से प्रभावित ना होने के लिए कहकर इन्होंने बहुत

88
00:06:09,440 --> 00:06:13,520
सारे श्लोकों का खंडन कर दिया। हालांकि धर्म युक्त युद्ध नहीं

89
00:06:13,520 --> 00:06:17,600
था। ऐसा कहकर इन्होंने अपनी भूमिका में कहा है कि

90
00:06:17,600 --> 00:06:21,920
महाभारत का युद्ध जो है वो धर्म युक्त युद्ध नहीं था और दो 31

91
00:06:21,920 --> 00:06:26,000
में इस भगवान श्री कृष्ण ने इस युद्ध को धर्म युक्त युद्ध

92
00:06:26,000 --> 00:06:30,400
कहा है। यानी कि रामपाल ने दो 31 का खंडन किया।

93
00:06:30,400 --> 00:06:34,480
नहीं माना इस श्लोक को। यह भी आप गिनते जाइएगा। कितने श्लोक

94
00:06:34,480 --> 00:06:38,960
अस्वीकार किए गए रामपाल के द्वारा भगवत गीता के जो यह लोग दावा करते हैं कि 5%

95
00:06:38,960 --> 00:06:43,040
श्लोक जो है वो काल ने अपने मन से बोल दिए हैं। ठीक है?

96
00:06:43,040 --> 00:06:47,360
और 95% श्लोक बिल्कुल परफेक्ट है। वो सही है। परमात्मा

97
00:06:47,360 --> 00:06:51,360
का ज्ञान है उनमें। तो जो 95% श्लोक जो हैं

98
00:06:51,360 --> 00:06:55,600
उस हिसाब से अगर भगवत गीता में 700 श्लोक हैं तो उसमें से 35

99
00:06:55,600 --> 00:06:59,840
श्लोक केवल ऐसे होने चाहिए जो रामपाल ने ना माने

100
00:06:59,840 --> 00:07:04,560
हो। बाकी के बाकी के जितने भी श्लोक हैं यानी कि 665

101
00:07:04,560 --> 00:07:08,640
श्लोक उनको रामपाल को एज इट इज स्वीकारना

102
00:07:08,640 --> 00:07:13,080
पड़ेगा। उसमें उसमें ये नहीं कर सकता ये बात नहीं मानेंगे यहां जो लिखी है। ठीक है?

103
00:07:13,080 --> 00:07:17,200
मगर अभी तक जब उसने ये बात कही कि धर्म

104
00:07:17,200 --> 00:07:20,640
युक्त युद्ध नहीं था तो उसने दो 31 को नहीं माना। ठीक है?

105
00:07:20,640 --> 00:07:24,640
इसके बाद जब उसने यह कह दिया कि बिना लाभ हानि के युद्ध करना संभव नहीं

106
00:07:24,640 --> 00:07:28,640
है। तो उसने बहुत सारे श्लोकों को नहीं माना है। मगर अभी तक इस सीरीज में

107
00:07:28,640 --> 00:07:32,880
हमने जहां तक पहुंचे हैं वहां तक कौन कौन-कौन से श्लोकों का खंडन है?

108
00:07:32,880 --> 00:07:36,960
दो 47 का खंडन है। इस बात के द्वारा दो 38 का खंडन है। दो 48 का

109
00:07:36,960 --> 00:07:41,280
खंडन है। दो 49 का खंडन है। दो 50 का खंडन है। यह वो श्लोक

110
00:07:41,280 --> 00:07:45,600
है जिनमें कि समत्व बुद्धि लाभ हानि में जय पराजय

111
00:07:45,600 --> 00:07:49,840
में मृत्यु जीवन में सब में समत्व बुद्धि रखने की बात कही जा रही है।

112
00:07:49,840 --> 00:07:53,840
यानी कि परिणाम पर फल पर ध्यान ना देने की बात कही

113
00:07:53,840 --> 00:07:58,000
जा रही है। इत्यादि इत्यादि बातें की जा रही है। फल पर ध्यान ना देने के बारे में भी इसने

114
00:07:58,000 --> 00:08:02,280
बोला है आगे। तो इतने सारे श्लोकों का खंडन अभी तक हमें प्राप्त हो गया।

115
00:08:02,280 --> 00:08:06,400
कितने पहला धर्म युक्त युद्ध नहीं था दो 31 उसके बाद जो

116
00:08:06,400 --> 00:08:10,480
समत्व बुद्धि की बात कही गई है दो 47 2 38 दो 48 दो

117
00:08:10,480 --> 00:08:14,560
49 दो 50 इन सब में समत्व बुद्धि की बात कही गई है लाभ हानि में

118
00:08:14,560 --> 00:08:18,640
समत्व बुद्धि होनी चाहिए जय पराजय में समत्व बुद्धि होनी चाहिए तो इसने जब ये बात कह दी

119
00:08:18,640 --> 00:08:22,880
कि बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता तो इसने इन सारी इन इन श्लोकों

120
00:08:22,880 --> 00:08:26,880
का खंडन कर दिया तो लगभग कितने श्लोक हो गए अभी तक हमारे पास अभी तक हमारे

121
00:08:26,880 --> 00:08:31,120
पास हो गए छह श्लोक ठीक है यहां तक तो 50 52 तक

122
00:08:31,120 --> 00:08:35,360
इसके इसके बाद आगे जब चले तो इसने पृष्ठ संख्या 24 पर एक बात कही

123
00:08:35,360 --> 00:08:35,860
है

124
00:08:35,840 --> 00:08:40,240
कि यदि क्षत्रिय का धर्म होता रक्षा करना युद्ध करना तो भगवान

125
00:08:40,240 --> 00:08:44,400
श्री कृष्ण युद्ध छोड़कर भागते क्यों? हालांकि वो भगवान श्री कृष्ण है। हमने कई

126
00:08:44,400 --> 00:08:48,800
बार बताया है कि वो लीला पुरुषोत्तम है और वो ईश्वर है।

127
00:08:48,800 --> 00:08:53,360
ईश्वर किसी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है बल्कि वो सभी नियमों को बनाने वाला सर्वमक

128
00:08:53,360 --> 00:08:57,920
है। भगवान श्री कृष्ण तो हमारे जो है वो सृष्टि के रचयिता भी है।

129
00:08:57,920 --> 00:09:02,080
तो क्या वो सृष्टि की रचना कर रहे तो यह कौन से धर्म में आता है मनुष्यों के?

130
00:09:02,080 --> 00:09:06,240
मनुष्यों के किस धर्म में आएगा सृष्टि की रचना करना? तो इसलिए भगवान श्री

131
00:09:06,240 --> 00:09:10,560
कृष्ण के द्वारा किए जाने वाले जो की जाने वाली जो लीलाएं हैं उनका उदाहरण

132
00:09:10,560 --> 00:09:14,720
देकर के हम मनुष्यगत जो धर्म है उसका खंडन नहीं कर सकते। पहली

133
00:09:14,720 --> 00:09:19,200
बात। दूसरी बात ये है कि यहां पर इन्होंने ये मान लिया कि भगवान श्री कृष्ण भी क्षत्रिय

134
00:09:19,200 --> 00:09:23,760
थे। मगर यदि क्षत्रिय का धर्म होता यदि क्षत्रिय धर्म होता

135
00:09:23,760 --> 00:09:27,920
कर्म कर्म से भागना ये क्षत्रिय

136
00:09:27,920 --> 00:09:31,920
का धर्म होता है युद्ध लड़ना तो फिर वो युद्ध से भागते क्यों

137
00:09:31,920 --> 00:09:36,000
ये इसने कहा इसका मतलब यह है कि यह मानता है कि

138
00:09:36,000 --> 00:09:40,160
जन्म से वर्ण होता है कर्म से नहीं जो ये लोग कहते हैं ना

139
00:09:40,160 --> 00:09:44,240
कि जिसने ब्रह्म को जान लिया वही ब्राह्मण है। नहीं इसने यहां पर कर्म से

140
00:09:44,240 --> 00:09:49,440
इसने यहां पर जन्म से भगवान श्री कृष्ण को क्षत्रिय माना

141
00:09:49,440 --> 00:09:51,040
ठीक है? क्योंकि

142
00:09:51,040 --> 00:09:55,040
कर्म पर तो प्रश्न उठा रहा है वह कि वह भागे युद्ध लड़ा या नहीं लड़ा।

143
00:09:55,040 --> 00:09:59,440
कर्म पर तो प्रश्न उठा रहा है। मगर वो क्षत्रिय किस हिसाब से कह रहा है? क्षत्रिय

144
00:09:59,440 --> 00:10:04,080
थे तो किस हिसाब से थे? ठीक है? तो ये बात हो गई।

145
00:10:04,080 --> 00:10:08,240
दूसरी आगे की बात क्या है? कि काल ने

146
00:10:08,240 --> 00:10:12,640
युद्ध करवाने के लिए झूठ सच का सहारा लिया। तो फिर पहली तो वही बात आ गई कि

147
00:10:12,640 --> 00:10:16,800
कौन सी बात काल की झूठ है, कौन सी बात सच है? इसका पैरामीटर क्या है?

148
00:10:16,800 --> 00:10:21,040
तो फिर हम काल की किसी भी बात के आधार पर किसी को तत्वदर्शी क्यों मान ले? काल

149
00:10:21,040 --> 00:10:25,200
की किसी भी बात के आधार पर हम यह क्यों मान ले कि उस उस ब्रह्म की शरण में जा।

150
00:10:25,200 --> 00:10:29,240
हम ये वाली बात हो गई। दूसरी एक बात ये हो गई

151
00:10:29,240 --> 00:10:33,360
कि यह जो युद्ध करवाने के लिए झूठ सच का सहारा ले रहा

152
00:10:33,360 --> 00:10:38,000
है काल। तो क्या उस समय लोग मर नहीं रहे थे? स्वतः

153
00:10:38,000 --> 00:10:42,000
मौतें नहीं होती थी। उस समय मृत्यु नहीं होती थी लोगों की जो उसको युद्ध करवाना पड़ रहा

154
00:10:42,000 --> 00:10:46,000
है और अगर युद्ध करवा के ही लोग मृत्यु को

155
00:10:46,000 --> 00:10:50,000
प्राप्त होने हैं तो ऐसे में फिर

156
00:10:50,000 --> 00:10:54,160
आज वो युद्ध क्यों नहीं करवा रहा है उसको तो प्रतिदिन कहीं ना कहीं युद्ध करवाते

157
00:10:54,160 --> 00:10:58,240
रहना चाहिए लगातार युद्ध होते रहना चाहिए यदि युद्ध से ही उसकी जो भूख

158
00:10:58,240 --> 00:11:03,600
है वो मिटनी है। पहली दूसरी बात ये आ गई।

159
00:11:03,600 --> 00:11:06,320
तीसरी बात यह आ गई यदि उसने चाल चली

160
00:11:06,320 --> 00:11:10,560
थी वह सच झूठ का सहारा ले रहा था युद्ध करवाने के लिए तो उसको

161
00:11:10,560 --> 00:11:14,800
यह मानना फिर हमें ये मानना पड़ेगा कि उसके लिए उसने जो परमात्मा

162
00:11:14,800 --> 00:11:18,880
के बारे में इसके अनुसार जो बातें कही है काल ने वो बातें भी झूठी

163
00:11:18,880 --> 00:11:22,880
हो गई है ना फिर ये कैसे निर्धारण करें भाई परमात्मा के बारे में

164
00:11:22,880 --> 00:11:26,880
उसने ये कहा कि वो ये है वो वो है रामपाल के अनुसार तो फिर वो बातें कैसे

165
00:11:26,880 --> 00:11:30,880
मान ले जब वो युद्ध करवाने के लिए कह रहा हो सकता है परमात्मा के बारे में भी

166
00:11:30,880 --> 00:11:34,960
जो बातें यहां लिखी हुई है वो भी युद्ध करवाने जैसी युद्ध करवाने

167
00:11:34,960 --> 00:11:38,960
के लिए चाल हो। ठीक है? आगे चलते हैं। अच्छा इसने फिर

168
00:11:38,960 --> 00:11:42,960
अगली लाइन में तीनों गुणों ब्रह्मा, विष्णु, महेश

169
00:11:42,960 --> 00:11:47,840
की भक्ति से रहित है ना कि

170
00:11:47,840 --> 00:11:51,840
जो व्यक्ति ये 39 से 45 तक का

171
00:11:51,840 --> 00:11:56,640
अर्थ समबुद्धि योग होकर कर्म बंधन से मुक्त हो जा।

172
00:11:56,640 --> 00:12:02,640
ठीक है? यह 39 से 45 का भी खंडन किया इसने।

173
00:12:03,040 --> 00:12:07,040
कर्म बंधन से मुक्त हो जा। क्यों? क्योंकि यहां पर समबुद्धि की बात हुई

174
00:12:07,040 --> 00:12:12,680
39 से 45 में तो इसका भी खंडन

175
00:12:12,680 --> 00:12:16,120
किया

176
00:12:16,120 --> 00:12:20,720
और इसने खंडन किया और यह कहा कि तीनों गुणों

177
00:12:20,720 --> 00:12:24,960
विष्णु इसने क्योंकि ये ब्रह्मा विष्णु महेश को गुण मानता है।

178
00:12:24,960 --> 00:12:29,040
सत रज और तम तो इसने कहा कि तीनों गुणों की भक्ति से रहित

179
00:12:29,040 --> 00:12:33,040
हो जाते। तो इनके कुछ चेले आकर के जब यह कहते हैं आप लोगों को कि भैया

180
00:12:33,040 --> 00:12:37,040
हम तो ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति बताते हैं तो उनको ये दे मारना उनके मुंह

181
00:12:37,040 --> 00:12:41,200
पे कि ये देख 24 में क्या लिखा हुआ है कि तीनों गुणों की

182
00:12:41,200 --> 00:12:45,200
ब्रह्मा विष्णु महेश को एक गुण मानते हैं और यहां कह रहे हैं कि तीनों गुण ब्रह्मा

183
00:12:45,200 --> 00:12:49,440
विष्णु महेश की भक्ति से रहित हो जा मुख हट जा

184
00:12:49,440 --> 00:12:54,000
ठीक है अच्छा दूसरी बात अगला पॉइंट आता है कि

185
00:12:54,000 --> 00:12:58,240
इसने यह माना है कि वेद यानी ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद

186
00:12:58,240 --> 00:13:02,320
अथर्ववेद यहां पर इसने कहीं नहीं कहा कि वेद माने सूक्ष्म वेद भी है।

187
00:13:02,320 --> 00:13:06,320
यह नहीं माना। इसने बोला वेद यानी ऋग्वेद, यजुर्वेद,

188
00:13:06,320 --> 00:13:12,320
सामवेद, अथर्ववेद। ये मान लिया इसने। ठीक है?

189
00:13:12,680 --> 00:13:17,280
अ ये पष्ठ संख्या 24 चल रही है इस समय।

190
00:13:17,280 --> 00:13:18,080
इसके बाद क्या

191
00:13:18,080 --> 00:13:22,160
है? इसी पैराग्राफ में जहां पर इसने वेद यानी ऋग्वेद,

192
00:13:22,160 --> 00:13:26,320
यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद कहा है। उसी पैराग्राफ में इसने यह बात कही

193
00:13:26,320 --> 00:13:30,320
है कि वो सांसारिक वस्तुओं की कामना करने वाले जो लोग हैं जो

194
00:13:30,320 --> 00:13:34,480
सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए है ना भोग की प्राप्ति

195
00:13:34,480 --> 00:13:39,800
के लिए जो भक्ति करते हैं भगवान की उनको निम्न कहा है।

196
00:13:39,800 --> 00:13:43,840
मतलब ऐसा कहा है कि ऐसी इस विधि

197
00:13:43,840 --> 00:13:47,840
का आलंबन नहीं लेना चाहिए। तो जब इस विधि का आलंबन नहीं

198
00:13:47,840 --> 00:13:52,000
लेना चाहिए तो जितना यह बताते हैं कि मैं वहां गया तो मेरा यह रोग

199
00:13:52,000 --> 00:13:56,160
ठीक हो गया रामपाल के उसमें जाकर के शरण में जाकर के मुझे पैसा मिल गया

200
00:13:56,160 --> 00:14:00,160
मेरे को लॉटरी लग गई मेरा यह हो गया मेरा वो हो गया पोस्टर आते हैं ये सब

201
00:14:00,160 --> 00:14:04,160
तो यह सारी भक्ति जो इनके यहां बताई जा रही है वो कामनाओं के लिए भक्ति

202
00:14:04,160 --> 00:14:08,160
बताई जा रही है तो यहां पर ये क्या कह रहे हैं कि जो सांसारिक वस्तुओं

203
00:14:08,160 --> 00:14:12,480
की कामना करते रहते हैं वो लोग जो है

204
00:14:12,480 --> 00:14:16,640
उनका चित्त तीनों गुणों से मिलने वाले लाभ की वाणी यानी अज्ञान से हर

205
00:14:16,640 --> 00:14:20,880
लिया गया है। ऐसे व्यक्तियों की साधना में निश्चयात्मिका

206
00:14:20,880 --> 00:14:24,960
बुद्धि नहीं होती। तो यहां पर मना किया गया है। निम्न

207
00:14:24,960 --> 00:14:29,920
कहा गया ऐसे लोगों को। इसके आगे क्या है? इसके आगे

208
00:14:29,920 --> 00:14:33,440
इस पूरी जो इन्होंने खिचड़ी पकाई है, इस पूरी खिचड़ी

209
00:14:33,440 --> 00:14:37,680
में जगह-जगह पर अनुवाद लिखा हुआ है कि गीता अध्याय

210
00:14:37,680 --> 00:14:41,840
दो श्लोक 46 का अनुवाद। तो जब यह अनुवाद लिख रहे हैं तो अनुवाद का मतलब

211
00:14:41,840 --> 00:14:46,480
होता है कि ट्रांसलेशन यानी वर्ड टू वर्ड ट्रांसलेशन और अगर हम उसमें अपनी

212
00:14:46,480 --> 00:14:51,280
व्याख्या दे रहे तो वो अलग से होती है। टिप्पणी, व्याख्या, भाष्य, परपट

213
00:14:51,280 --> 00:14:55,360
मगर ये अनुवाद के नाम पर ही बहुत सारे ऐसे शब्द डाल

214
00:14:55,360 --> 00:14:59,520
रहे हैं। लगता है इनको अनुवाद का अनुवाद भी नहीं पता। इतने बड़े गवार

215
00:14:59,520 --> 00:15:03,600
हैं। तो यह क्या कर रहे हैं? अनुवाद

216
00:15:03,600 --> 00:15:07,680
के नाम पर एक एक पैराग्राफ दो दो पैराग्राफ लिख रहे हैं। ट्रांसलेशन नहीं लिख रहे

217
00:15:07,680 --> 00:15:13,560
उसका। तो यह भी ध्यान रखने वाली बात है। उसके बाद क्या

218
00:15:13,560 --> 00:15:17,600
है? आगे चलते हैं। 247

219
00:15:17,600 --> 00:15:21,680
247 में इन्होंने कोई व्याख्या नहीं की है। जबकि वो एक

220
00:15:21,680 --> 00:15:25,760
समझाया जाने वाला श्लोक है 247 मगर इन्होंने 247 में

221
00:15:25,760 --> 00:15:29,840
कोई व्याख्या नहीं की है और सीधे-सीधे लिख दिया है कि 247 में कहा

222
00:15:29,840 --> 00:15:33,840
है कि कर्म फल की इच्छा मत कर। हालांकि हमने पहले ही वहां बता दिया है

223
00:15:33,840 --> 00:15:37,840
कि लाभ हानि की लाभ हानि में समत्व बुद्धि ना रखने की

224
00:15:37,840 --> 00:15:42,040
बात कह करके इन्होंने 247 सहित बहुत सारे श्लोकों का खंडन किया

225
00:15:42,040 --> 00:15:46,080
है। इसके बाद 247 पर इनके तत्व ज्ञान की पिक्चर फ्लॉप

226
00:15:46,080 --> 00:15:48,560
हो गई और तत्व ज्ञान की

227
00:15:48,560 --> 00:15:52,560
जब फिल्म पिट जाने के बाद फिर ये आगे चलते

228
00:15:52,560 --> 00:15:56,800
248 से 250 तक का भाव बताते हैं। जहां पर फिर से वही बिना

229
00:15:56,800 --> 00:16:00,960
बिना संस्कृत शब्दों के अनुवाद के नाम पर यह शास्त्र विधि

230
00:16:00,960 --> 00:16:04,960
अनुसार भक्ति कर्म प्रभु की एक प्रभु की करना ही श्रेयकर है।

231
00:16:04,960 --> 00:16:08,960
साधना करता है। शास्त्र विरुद्ध भक्ति ये बहुत सारे उसमें ऐसे

232
00:16:08,960 --> 00:16:13,280
शब्द डाले जिनका श्लोक में कहीं वर्णन ही नहीं है। है ना? तत्वदर्शी

233
00:16:13,280 --> 00:16:17,440
संत द्वारा बताया गया भक्ति मार्ग और किसी को बुलाकर पाठ

234
00:16:17,440 --> 00:16:21,520
करवाना अपने यहां ये सब इन्होंने गलत बताया है। इसी पैराग्राफ में इन्होंने कहा

235
00:16:21,520 --> 00:16:25,680
है कि गुरुदेव के आदेश का पालन करना ही सत्य भक्ति में हितकर है। अब यहां सवाल

236
00:16:25,680 --> 00:16:29,680
आता है कि गुरु की व्याख्या क्या इनको पता है? गुरु वो है जो

237
00:16:29,680 --> 00:16:33,680
आपके आपकी अविद्या को नष्ट करे। अंधकार को नष्ट करे। तो

238
00:16:33,680 --> 00:16:37,920
अंधकार को नष्ट करने का मतलब यह नहीं होता है कि

239
00:16:37,920 --> 00:16:42,040
फलानी श्लोक संख्या में यह लिखा है या यह लिखा है। अंतत

240
00:16:42,040 --> 00:16:46,080
गत्वा जो प्रमाण है जो शास्त्र है उनके वचनों का

241
00:16:46,080 --> 00:16:50,240
आधार बताते हुए एट द एंड आपको ब्रह्म तत्व की व्याख्या

242
00:16:50,240 --> 00:16:54,240
करनी होगी। ब्रह्म तत्व कैसा है? वो व्याख्या यहां नहीं

243
00:16:54,240 --> 00:16:58,400
मिलती है। है ना? निराकार है, साकार है। इस तरह से जो

244
00:16:58,400 --> 00:17:02,560
तात व्याख्या है कि जब भगवान सृष्टि बना रहे हैं तो वह कहां खड़े होकर के बना

245
00:17:02,560 --> 00:17:04,640
रहे हैं?

246
00:17:04,640 --> 00:17:08,640
या और भी इस तरह के सवाल सवाल

247
00:17:08,640 --> 00:17:12,880
है कि जैसे कि आगे चलकर के इन्होंने यह कहा है कि जो आत्मा

248
00:17:12,880 --> 00:17:17,200
है जो सतलोक में जाकर के परमात्मा की भक्ति करती है।

249
00:17:17,200 --> 00:17:21,200
अंतत गत्वा वो वहां पर अनामी अनामी परमात्मा की भक्ति

250
00:17:21,200 --> 00:17:25,280
करके परमात्मा में लीन हो जाती है। जीवन मरण के बंधनों से छूट जाती है।

251
00:17:25,280 --> 00:17:29,280
तो परमात्मा में लीन होने का क्या मतलब हुआ? आत्मा और परमात्मा

252
00:17:29,280 --> 00:17:33,280
एक हो गए। अब आत्मा परमात्मा से तो आई नहीं है। अलग से आई है।

253
00:17:33,280 --> 00:17:37,440
तो सबसे पहली बात तो यह है कि वह तत्व आया कहां से? वो कहां था? उससे पहले

254
00:17:37,440 --> 00:17:41,440
था कि नहीं था? क्या हुआ था? दूसरी बात है जब वो कोई अलग से कोई

255
00:17:41,440 --> 00:17:45,520
चीज है जो इसमें जाकर के मिल रही है। पानी की एक बूंद वापस पानी में गिर रही है। तो

256
00:17:45,520 --> 00:17:49,680
पानी की क्वांटिटी वहां बढ़ती है तो क्या आ जो परमात्मा है वो घटता बढ़ता

257
00:17:49,680 --> 00:17:54,000
है। ये सारी तात्विक विवेचना इनकी गायब है।

258
00:17:54,000 --> 00:17:58,640
तो ये गुरु कहां से हुए? हां। अब आगे चलते हैं।

259
00:17:58,640 --> 00:18:03,440
अब इसमें दो 51 में कहा है कि सतलोक में जाकर

260
00:18:03,440 --> 00:18:07,680
फिर वहां से आगे अनामी लोक को चला जाता है। कैसे चला जाता

261
00:18:07,680 --> 00:18:11,680
है? भजन शास्त्रानुकूल

262
00:18:11,680 --> 00:18:16,080
अर्थात मतानुसार मेरे बताए अनुसार करता

263
00:18:16,080 --> 00:18:19,680
है। जो भजन मेरे बताए अनुसार। अब इसके इनके बताए अनुसार। तो ये तो

264
00:18:19,680 --> 00:18:23,680
सच और झूठ दोनों बोलते हैं। पहली बात। दूसरी बात सतलोक में जाकर फिर

265
00:18:23,680 --> 00:18:27,840
वहां से आगे अनामी अर्थात जन्म मरण के रोग को समाप्त कर कर

266
00:18:27,840 --> 00:18:31,920
जाता है। लोग सतलोक से आगे अनामी लोक में चला जाता है। अब यहां

267
00:18:31,920 --> 00:18:36,160
ये बात आती है कि

268
00:18:36,160 --> 00:18:40,240
क्या सतलोक परमधाम नहीं है? क्या सतलोक मुक्ति धाम नहीं

269
00:18:40,240 --> 00:18:44,240
है? तो सतलोक का जो ईस्ट है वो कौन है? कबीर तो क्या कबीर

270
00:18:44,240 --> 00:18:48,240
मुक्ति दाता नहीं है? हम क्योंकि सतलोक से आगे जा रही है ना आत्मा

271
00:18:48,240 --> 00:18:52,640
तो मुक्ति के लिए। ठीक है? दूसरी बात क्या है कि

272
00:18:52,640 --> 00:18:57,120
लाभ हानि यहां पर कर्मवादी कार फलेचना में

273
00:18:57,120 --> 00:19:01,120
कर्म कर फल की इच्छा मत कर यह मानकर इसने अपनी ही बात को

274
00:19:01,120 --> 00:19:05,360
कंट्राडिक्ट भी कर दिया क्योंकि इसने वहां क्या माना है कि लाभ हानि

275
00:19:05,360 --> 00:19:09,400
के बिना युद्ध कैसे होगा हम और यहां क्या कह रहा है कि कर्म

276
00:19:09,400 --> 00:19:13,600
कर्म कर फल की इच्छा मत कर और ऐसे बहुत से श्लोकों में इसमें

277
00:19:13,600 --> 00:19:18,400
माना भी है आगे कंट्राडिक्शन वहां आपको दिख जाएगा

278
00:19:18,400 --> 00:19:22,480
तो अब सतलोक में जाकर वहां से आगे अनामी लोक में आत्मा जाकर के

279
00:19:22,480 --> 00:19:27,040
मुक्त हो जाती है तो क्या सतलोक परमधाम नहीं है?

280
00:19:27,040 --> 00:19:31,200
आत्मा का बताया गया है कि कहीं आत्मा जो है मनुष्य के आकार

281
00:19:31,200 --> 00:19:34,960
में रहती है। प्राणी मानव

282
00:19:34,960 --> 00:19:39,120
रूप में मानव रूप में आकार में रहता है। तो प्राणी का वास्तविक

283
00:19:39,120 --> 00:19:43,280
आकार क्या है? जब वो मानव के रूप में रह रहा है। है ना? तो उसका

284
00:19:43,280 --> 00:19:47,280
वास्तविक आकार क्या है? यह तत्व विवेचना गायब है। अच्छा इसने अब

285
00:19:47,280 --> 00:19:51,520
इसमें आगे माना है। बहुत जरूरी बात है इसको ध्यान से सुनिए कि इसमें

286
00:19:51,520 --> 00:19:55,840
आगे इसने उदाहरण दिया है कि जो सतलोक है, अनामी लोक है एक अलग लोक है।

287
00:19:55,840 --> 00:19:59,920
ठीक है? इन तीनों में कबीर ही हैं। मगर इन तीनों अलग-अलग

288
00:19:59,920 --> 00:20:03,920
लोकों में उनका अलग-अलग रोल है। और फिर उदाहरण दिया जैसे प्रधानमंत्री जब

289
00:20:03,920 --> 00:20:08,320
गृह मंत्री के का काम करने लगता है और गृह मंत्री होते हुए जब वो हस्ताक्षर

290
00:20:08,320 --> 00:20:12,320
करता है तो उसके हस्ताक्षर की वैल्यू उतनी नहीं होती है जितनी प्रधानमंत्री

291
00:20:12,320 --> 00:20:16,560
होते हुए होती है। तो यहां इसने क्या माना? एक ही व्यक्ति अलग-अलग

292
00:20:16,560 --> 00:20:20,640
रोल कर सकता है। एक ही तत्व अलग-अलग रोल कर सकता है और वह

293
00:20:20,640 --> 00:20:24,720
किसी रोल में छोटा और किसी रोल में बड़ा हो सकता है। तो ब्रह्मा विष्णु महेश

294
00:20:24,720 --> 00:20:28,920
के बड़ा और छोटा होने वाली लीलाओं से इसे क्या आपत्ति है? जब ये अपने

295
00:20:28,920 --> 00:20:33,040
में कबीर के द्वारा जो लीला है उसको मान रहा

296
00:20:33,040 --> 00:20:37,040
है। अब बात ये आती है कि अगर ये नहीं मानता है उनकी तो हम प्रश्न कर

297
00:20:37,040 --> 00:20:41,200
सकते हैं कि कबीर को भी हम सिद्ध कर सकते हैं कि वो पूर्ण ईश्वर नहीं है। कैसे? क्योंकि

298
00:20:41,200 --> 00:20:45,280
सतलोक में मुक्ति नहीं है। क्योंकि सतलोक से आत्मा आगे जाती

299
00:20:45,280 --> 00:20:49,600
है। तो सतलोक का ईश्वर अगर कबीर है तो मुक्ति नहीं। अब ये कहेंगे कि वहां अनामी

300
00:20:49,600 --> 00:20:50,100
लोक में भी

301
00:20:50,080 --> 00:20:54,160
तो वही है। तो भैया इसी प्रकार से परम ब्रह्म भी तो शिव है। अगर शिव कहीं

302
00:20:54,160 --> 00:20:58,320
पर दासत्व भाव में है तो परमात्म भाव में भी तो शिव है। वहां क्यों नहीं

303
00:20:58,320 --> 00:21:02,880
मानते हो? और यहां क्यों मान रहे हो? तो इसको कहते हैं अन्याय। इसको कहते हैं पक्षपात।

304
00:21:02,880 --> 00:21:07,200
इसको कहते हैं द्वेष। इसको कहते हैं चालाकी,

305
00:21:07,200 --> 00:21:12,160
धूतता, झूठ, धोखा। ठीक है?

306
00:21:12,160 --> 00:21:16,400
महाभारत में एक श्लोक है कि अन्यों के साथ वैसा ही व्यवहार

307
00:21:16,400 --> 00:21:20,560
करें जैसा स्वयं के लिए चाहते हैं। तो इसका खंडन है कि

308
00:21:20,560 --> 00:21:24,800
जब कबीर की बात आई तो तो मान लिया कि अनामी लोक में भी तो वही बैठा है। मगर

309
00:21:24,800 --> 00:21:28,800
जब ब्रह्मा विष्णु महेश के लिए दो तरह की बातें आ रहे हैं। तो ये नहीं मान रहे कि यहां पर वो एक

310
00:21:28,800 --> 00:21:33,120
लीला में दिख रहे हैं। जैसे सतलोक में कबीर लीला में दिख रहा है। मगर अनामी

311
00:21:33,120 --> 00:21:37,120
भी वही है। अनामी लोक में भी वही है। तो इसी प्रकार से भगवान एक लीला में दासत्व

312
00:21:37,120 --> 00:21:41,280
भाव में दिख रहे हैं। परंतु अंतत वो परम ब्रह्म भी हैं। मुक्ति

313
00:21:41,280 --> 00:21:45,960
दाता भी है। ठीक है? इसके बाद क्या

314
00:21:45,960 --> 00:21:50,080
है? इसके बाद है सतलोक में अनामी

315
00:21:50,080 --> 00:21:54,320
की भक्ति द्वारा मोक्ष होगा। तो यहां ये आप दिखा सकते हो। अनामी की भक्ति द्वारा

316
00:21:54,320 --> 00:21:58,720
मोक्ष होगा। सतलोक में जाकर के भी भक्ति करनी है। सतलोक में परमधाम

317
00:21:58,720 --> 00:22:03,440
नहीं है। जीवन मरण से मुक्ति नहीं है सतलोक में। ठीक है? अच्छा।

318
00:22:03,440 --> 00:22:05,120
ईश्वर में लीन होने वाली बात हमने

319
00:22:05,120 --> 00:22:09,720
पूछ ही ली है कि आत्मा जब ईश्वर में लीन हो जाएगी तो क्या ईश्वर की क्वांटिटी बढ़ती

320
00:22:09,720 --> 00:22:13,840
है? इसके आगे फिर इसने 248 में फिर अपनी बात को काट

321
00:22:13,840 --> 00:22:18,320
दिया। जय पराजय समबुद्धि का पक्ष ले लिया। हां।

322
00:22:18,320 --> 00:22:22,560
अब यहां से एक बात और आती है 248 को जो इसने कहा है कि

323
00:22:22,560 --> 00:22:26,560
समबुद्धि रख के भक्ति कर। तो समबुद्धि रखकर जय पराजय

324
00:22:26,560 --> 00:22:30,560
में समबुद्धि रख के भक्ति कर। तो अब यहां क्या दिक्कत आती है? यहां पे कर्म

325
00:22:30,560 --> 00:22:34,800
की बात हो रही है हमारी भगवत गीता में। मगर इसने इसमें भी भक्ति की बात कर दी। तो जब कर्म

326
00:22:34,800 --> 00:22:38,960
की जगह पर भी भक्ति दिखा दी इसने तो व्यक्ति जो सामान्य कर्म

327
00:22:38,960 --> 00:22:43,120
करता है शास्त्र के अनुसार उस उस समय क्या भाव रखना होगा मन में

328
00:22:43,120 --> 00:22:47,280
ये इसने नहीं बताया क्योंकि जहां पर ये बताया गया वहां तो इसने भक्ति को डाल दिया कि

329
00:22:47,280 --> 00:22:51,760
समभाव रख के तू भक्ति कर तो जो कर्म करना है शास्त्रों

330
00:22:51,760 --> 00:22:55,840
के हिसाब से या मान लीजिए वस्त्र पहनने हैं

331
00:22:55,840 --> 00:22:59,840
कुछ भी करना है विवाह संस्कार होना है कोई भी संस्कार होना

332
00:22:59,840 --> 00:23:03,840
है कोई भी कर्म करना है तो होना तो वो शास्त्रों के हिसाब से ही है मगर तुमने

333
00:23:03,840 --> 00:23:08,000
जहां पर कर्म कर्म करते समय की भावना बताई है जैसे क्षत्रिय को अपना

334
00:23:08,000 --> 00:23:12,000
क्षत्रियत्व का पालन करना है रक्षा करनी है तो ये रक्षा करते समय

335
00:23:12,000 --> 00:23:16,000
उसके अंदर क्या भाव होगा इसकी व्याख्या कहां है क्योंकि यहां तो तुमने भक्ति

336
00:23:16,000 --> 00:23:20,080
ले लिया कि भक्ति करते समय क्या भाव होना चाहिए तो फिर कर्म करते समय

337
00:23:20,080 --> 00:23:20,580
क्या

338
00:23:20,320 --> 00:23:24,800
भाव होना चाहिए ये कहां पर मिलेगा तो ये एक और भांडा फूटा रामपाल

339
00:23:24,800 --> 00:23:29,480
का इसके आगे हम चलते

340
00:23:29,480 --> 00:23:33,680
हैं फल की इच्छा रखने वाला कंजूस ये देखिए यहां पर भी अपनी

341
00:23:33,680 --> 00:23:37,680
बात को काट दिया। उधर क्या कह रहा है? पष्ठ संख्या 23 पर क्या कह रहा

342
00:23:37,680 --> 00:23:41,840
है? कि लाभ हानि के बिना युद्ध हो सकता है क्या?

343
00:23:41,840 --> 00:23:47,840
यह कह रहा है पष्ठ संख्या 23 पर और

344
00:23:53,760 --> 00:23:58,520
लाभ हानि के बिना नहीं हो सकता। ठीक है।

345
00:23:58,520 --> 00:24:02,960
और और क्या कह रहा है कि फल की इच्छा

346
00:24:02,960 --> 00:24:07,760
रखने वाले को कंजूस कहा है। किस में कहा है? पृष्ठ संख्या 30 और

347
00:24:07,760 --> 00:24:12,000
उसमें श्लोक संख्या दो 49 का अनुवाद बताते समय इसने कहा है

348
00:24:12,000 --> 00:24:16,000
कि तत्वदर्शी संत की शरण में जाने का मार्ग खोज क्योंकि फल की

349
00:24:16,000 --> 00:24:20,160
इच्छा रखने वाला तो कृपण यानी कंजूस जैसा जो धन का यथार्थ

350
00:24:20,160 --> 00:24:24,720
अब इसने क्या किया? जहां पर लाभहानि का लाभहानि के बिना

351
00:24:24,720 --> 00:24:28,720
लाभहानि के बिना युद्ध होने का खंडन किया है वहां पर इस श्लोक का इसने खंडन

352
00:24:28,720 --> 00:24:32,800
वहां कर दिया और यहां पे श्लोक का क्योंकि पक्ष ले रहा है तो अपनी उस बात का

353
00:24:32,800 --> 00:24:35,520
यहां पर खंडन कर दिया तालियां कॉमेडी

354
00:24:35,520 --> 00:24:39,840
शो बाय रामपाल तो इसने एक जगह कहा कि लाभानि मत रखो

355
00:24:39,840 --> 00:24:44,080
लाभानि के बिना युद्ध लाभहानि रखो लाभानि के बिना युद्ध नहीं हो सकता

356
00:24:44,080 --> 00:24:47,160
अब यहां कह रहा है

357
00:24:47,160 --> 00:24:51,200
कि फल की इच्छा रखने वाला तो कंजूस होता

358
00:24:51,200 --> 00:24:55,600
है लाभहानि में से किसी लाभ की इच्छा रखने वाला कंजूस होता है।

359
00:24:55,600 --> 00:24:59,600
तो यहां पर खंडन कर दिया। अपनी बात का खंडन करते हैं। हमको

360
00:24:59,600 --> 00:25:03,760
रामपाल को उत्तर देने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। केवल इसकी भगवत

361
00:25:03,760 --> 00:25:07,760
ये जो भगवत गीता का जो भाष्य अपार्थ किया है इसको आप उठा लीजिए।

362
00:25:07,760 --> 00:25:12,120
कोई भी इसकी बुक उठा लीजिए। उसी में इसका खंडन है। आगे चलते

363
00:25:12,120 --> 00:25:16,240
हैं। केवल मोक्ष के लिए भक्ति फिर से कर्म गायब हो गया। इसने कहा

364
00:25:16,240 --> 00:25:20,320
कि केवल मोक्ष के लिए भक्ति कर। तो इसने फिर कर्म को गायब कर दिया। जब कर्म

365
00:25:20,320 --> 00:25:24,320
गायब है तो फिर हमें देखना पड़ेगा कि जब यहां

366
00:25:24,320 --> 00:25:28,400
पर भक्ति के लिए भगवान ने कहा है कि भक्ति इस तरह से कर ऐसा भाव

367
00:25:28,400 --> 00:25:32,400
मन में रख के कर तो फिर कर्म किस किस भाव के साथ करेंगे ठीक

368
00:25:32,400 --> 00:25:36,480
है आगे चलते हैं क्या कहा है सनातन परमधाम किसको कहा

369
00:25:36,480 --> 00:25:40,720
है अनामय लोक को सतलोक को नहीं कहा है सतलोक परमधाम नहीं है भग

370
00:25:40,720 --> 00:25:45,320
इनका जो भगवत गीता है गरिमा गीता की का पृष्ठ

371
00:25:45,320 --> 00:25:49,600
संख्या 30 उसमें दो 51 का अर्थ बताते समय इन्ह उन्होंने

372
00:25:49,600 --> 00:25:50,560
कहा है

373
00:25:50,560 --> 00:25:54,560
कि ज्ञानी उस सनातन परमधाम में चले जाते हैं जहां

374
00:25:54,560 --> 00:25:58,640
पर परम शांति है तथा उस सनात स्थान पर गए साधक फिर लौट

375
00:25:58,640 --> 00:26:02,720
कर संसार में नहीं आए। तो दो 51 में इन्होंने परमधाम अनामय को माना

376
00:26:02,720 --> 00:26:07,640
है। सतलोक को नहीं परमधाम अलग है। ठीक

377
00:26:07,640 --> 00:26:11,440
है? मोह रूप दलदल

378
00:26:11,440 --> 00:26:15,520
भांति भांति पार कर जाएगी। हमने शुरू से ही कहा है कि व्यक्ति फसा क्यों है?

379
00:26:15,520 --> 00:26:19,600
क्योंकि वह मोहित है। अविद्या से ग्रसित है। और

380
00:26:19,600 --> 00:26:23,760
दो 16 में क्या बताया था कि जो व्यक्ति विद्या और अविद्या को ठीक

381
00:26:23,760 --> 00:26:28,080
ठीक समझ लेता है। समझाता है वही तत्वदर्शी होता है। तो विद्या

382
00:26:28,080 --> 00:26:32,160
और ये जो अविद्या है यहां पे वही बात फिर से

383
00:26:32,160 --> 00:26:36,320
आ रही है। मोह रूप दलदल से पार कर जाए। मुक्ति आपकी उसी में है जब

384
00:26:36,320 --> 00:26:40,480
आपको जो ये जो कॉन्शियसनेस है रियलिटी वो आपको प्राप्त

385
00:26:40,480 --> 00:26:44,560
हो जाए। इसके बाद एक बात और कही है दो 52 को दो 52 में कि

386
00:26:44,560 --> 00:26:49,040
लोक वेद उसने कहा लोक वेद अब बात यह आती है

387
00:26:49,040 --> 00:26:53,040
कि यह कहता है कि ये जो हमारे चार वेद है हालांकि पहले

388
00:26:53,040 --> 00:26:57,040
कह चुका है वेद यानी कि ऋग यजुर साम और

389
00:26:57,040 --> 00:27:01,040
अथर्व। ठीक है? मगर अब यहां पे लोक इन

390
00:27:01,040 --> 00:27:05,200
चारों को लोक वेद इसने कह दिया दो 52 का अर्थ करते समय और अलग

391
00:27:05,200 --> 00:27:05,700
से कोई

392
00:27:05,600 --> 00:27:09,680
सूक्ष्म वेद इसने बताया। अब बात यह आती है कि जब इसने इसको लोक

393
00:27:09,680 --> 00:27:13,920
वेद कहा तो लोक वेद का मतलब है लोक

394
00:27:13,920 --> 00:27:18,000
के अंदर वेद। अगर ग्रंथ की बात करें तो तो क्या इसका

395
00:27:18,000 --> 00:27:22,000
जो सूक्ष्म वेद है वो लोक के अंदर नहीं है। लोक से बाहर है। व्यक्ति

396
00:27:22,000 --> 00:27:26,160
उसको परलोक जाकर के पढ़ता है। स्पेसशिप में बैठता है। फिर पढ़ के आता है। फिर नीचे आता

397
00:27:26,160 --> 00:27:30,160
है। ऐसा है क्या? तो ये भी सोचने वाली बात है। अब हम

398
00:27:30,160 --> 00:27:34,320
आगे चलते हैं। ये हमारे यहां तक के बुलेट पॉइंट्स हो गए एपिसोड टू के। फिर से सुन

399
00:27:34,320 --> 00:27:38,400
लीजिए। अगर इसको विस्तार से जानना है तो आपको वो एपिसोड देखना पड़ेगा एपिसोड टू

400
00:27:38,400 --> 00:27:42,400
वाला। अन्यथा संक्षिप्त विवरण हमने यहां पर आपको दे दिया।

401
00:27:42,400 --> 00:27:45,960
अब हम लोग आगे चलते

402
00:27:45,960 --> 00:27:48,680
हैं।

403
00:27:48,680 --> 00:27:52,720
तो भगवत गीता दो श्लोक 46 से 53 का

404
00:27:52,720 --> 00:27:57,960
सारांश फिर से इसमें 46 से 53 का

405
00:27:57,960 --> 00:28:02,400
सारांश हां दो से भगवत गीता दो 53

406
00:28:02,400 --> 00:28:06,880
तत्व ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात हाथी भांति के वचन

407
00:28:06,880 --> 00:28:10,960
यानी अज्ञान से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा के ध्यान में

408
00:28:10,960 --> 00:28:15,040
पूर्ण रूप से निश्चल रूप से स्थाई स्थिर हो जाएगी तब

409
00:28:15,040 --> 00:28:19,600
तू योग यानी यथार्थ भक्ति को प्राप्त

410
00:28:19,600 --> 00:28:23,760
हो जाएगा। अब सबसे बड़ी बात क्या है?

411
00:28:23,760 --> 00:28:28,000
यहां पर एक बहुत बड़ा कैची पॉइंट है। इसको नोट कर लीजिएगा भाई। टाइमिंग टाइम स्लॉट

412
00:28:28,000 --> 00:28:32,240
बहुत बड़ा कैची पॉइंट है। इसने क्या कहा? तत्व ज्ञान प्राप्त

413
00:28:32,240 --> 00:28:37,120
होने के पश्चात तत्व ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात

414
00:28:37,120 --> 00:28:41,520
भांति भांति के वचनों यानी अज्ञान से विचलित हुई तेरी बुद्धि

415
00:28:41,520 --> 00:28:45,840
जब परमात्मा के ध्यान में पूर्ण रूप से निश्चल रूप से स्थाई

416
00:28:45,840 --> 00:28:49,920
स्थिर हो जाएगी तब तू योग को यानी यथार्थ भक्ति को

417
00:28:49,920 --> 00:28:54,160
प्राप्त हो जाएगा। यानी कि यथार्थ भक्ति कब प्राप्त हो रही है? तत्व

418
00:28:54,160 --> 00:28:58,240
ज्ञान के पश्चात। अब रामपाल के अनुसार इस दुनिया

419
00:28:58,240 --> 00:29:03,080
में इस संसार में तत्वज्ञानी कौन है? कौन है

420
00:29:03,080 --> 00:29:04,080
तत्वज्ञानी?

421
00:29:04,080 --> 00:29:08,920
रामपाल के अनुसार इस संसार में

422
00:29:08,920 --> 00:29:13,280
तत्वज्ञानी एकमात्र रामपाल दास ही है।

423
00:29:13,280 --> 00:29:18,360
क्या लिखा है? 28 नंबर पृष्ठ

424
00:29:18,360 --> 00:29:22,400
संख्या इसने अपने बारे में बताया है। वर्तमान में यानी

425
00:29:22,400 --> 00:29:26,640
सन 2012 में मेरे रामपाल दास के अतिरिक्त सात

426
00:29:26,640 --> 00:29:30,840
अरब मनुष्यों में से कोई भी वो संत नहीं है। ठीक

427
00:29:30,840 --> 00:29:34,880
है? तो यानी कि ये लोग जो एक दूसरे को

428
00:29:34,880 --> 00:29:39,720
भगत कहते हैं, भगत कहना बंद कर दे। ये लोग भक्त नहीं है। यथार्थ भक्त नहीं

429
00:29:39,720 --> 00:29:43,920
है। बेवकूफ भक्त हो तुम सब के सब। क्योंकि तुम तत्व

430
00:29:43,920 --> 00:29:48,480
ज्ञानी तो हो नहीं। या तो कहो तत्वज्ञानी है तो रामपाल दास की बात का खंडन करो।

431
00:29:48,480 --> 00:29:53,040
कहो कि हम भी तत्व ज्ञानी है। हम भी तत्व ज्ञानी है। कहो

432
00:29:53,040 --> 00:29:57,760
मूर्खता की पराकाष्ठा करो।

433
00:29:57,760 --> 00:30:03,000
अभी लिंक दिया जाएगा। किसी को आना हो तो आना। ठीक

434
00:30:03,000 --> 00:30:07,120
है। तो रामपाल दास के के

435
00:30:07,120 --> 00:30:11,600
अतिरिक्त कोई भी दुनिया में तत्व ज्ञानी नहीं है। अकॉर्डिंग टू रामपाल

436
00:30:11,600 --> 00:30:16,400
तो यदि नहीं है तो इसका अर्थ क्या हुआ कि जो भी लोग

437
00:30:16,400 --> 00:30:19,120
उसके फॉलोअर्स है वो भक्त नहीं है। इसने कह

438
00:30:19,120 --> 00:30:23,120
दिया तत्व ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात ही तत्व ज्ञानी

439
00:30:23,120 --> 00:30:27,200
होने के बाद ही यथार्थ भक्ति को प्राप्त होगा।

440
00:30:27,200 --> 00:30:31,720
ज्ञानी तब तू भक्त बनेगा। तुम सब भक्त नहीं

441
00:30:31,720 --> 00:30:35,920
हो। तुम्हारे गुरु के अनुसार आना

442
00:30:35,920 --> 00:30:40,000
आप कहना मैं भक्त हूं और एक दूसरे भगत भगत कहना तब बताऊंगा भगत

443
00:30:40,000 --> 00:30:44,320
जी भगत जी दिमाग खराब कर रखा है

444
00:30:44,320 --> 00:30:47,000
आगे चलते

445
00:30:47,000 --> 00:30:51,120
हैं वैसे दो 52 में प्रामाणिक अर्थ क्या

446
00:30:51,120 --> 00:30:55,200
कहता है वो भी हम लोग पढ़ते चले जिससे कि

447
00:30:55,200 --> 00:31:00,600
हम हम लोगों का आत्म कल्याण भी होता

448
00:31:00,600 --> 00:31:05,040
रहे जिस काल में तेरी बुद्धि मोह रूप दलदल को भांति

449
00:31:05,040 --> 00:31:09,360
दलदल को भांति भलीभांति पार कर जाएगी। यह हो गया। भांतिभांति

450
00:31:09,360 --> 00:31:13,920
के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल स्थिर

451
00:31:13,920 --> 00:31:18,280
अब इसने क्या किया ना यहां पे तत्व ज्ञान बोला नहीं गया है। ठीक है?

452
00:31:18,280 --> 00:31:22,560
मगर क्या कहते हैं? इन्होंने यहां तत्व ज्ञान को डाल के अपने भक्तों को फसा

453
00:31:22,560 --> 00:31:26,560
दिया। यहां तत्व ज्ञान नहीं बोला है। मगर तुमने तत्व ज्ञान डाल के अपने

454
00:31:26,560 --> 00:31:30,640
भक्तों को फसा दिया। अपने फॉलोअर्स को फसा दिया। सब के सब भक्त

455
00:31:30,640 --> 00:31:36,640
भक्ति रहित है। क्योंकि कोई तत्व ज्ञान नहीं है रामपाल के अलावा।

456
00:31:37,120 --> 00:31:41,280
यह लोग बस वो ऊथ की तरह कॉपी पेस्ट करते रहेंगे

457
00:31:41,280 --> 00:31:44,480
जो इनको ट्रेनिंग प्रोटोकॉल में सिखाया जाता है। खैर अब आगे

458
00:31:44,480 --> 00:31:48,680
चलते

459
00:31:48,680 --> 00:31:52,720
हैं। पाप दो के श्लोक 46 से

460
00:31:52,720 --> 00:31:57,040
53 का सारांश क्या है? इन श्लोकों का भावार्थ है कि वास्तव में पाप

461
00:31:57,040 --> 00:32:01,120
पुण्य को भूलकर अर्थात पाप पुण्य का फल इसी लोक में त्याग कर पूर्ण

462
00:32:01,120 --> 00:32:04,920
परमात्मा की साधना में लग जा।

463
00:32:04,920 --> 00:32:08,960
यदि अब यह पाप पुण्य की बात को साधना में लगने कह रहा

464
00:32:08,960 --> 00:32:12,960
हालांकि वहां पर कर्म करने की बात कही जा रही है। यही प्रमाण गीता

465
00:32:12,960 --> 00:32:17,120
के ये दूसरे श्लोकों की बात बीचबीच में अपनी वो जो

466
00:32:17,120 --> 00:32:21,280
वो है ना 18 66 18 66 इसका हालांकि खंडन

467
00:32:21,280 --> 00:32:25,680
हो गया इसी के पंक्तियों के द्वारा वो आप एपिसोड वन में देख सकते हैं या फिर सर्वशक्तिमान

468
00:32:25,680 --> 00:32:30,000
धर्म पर हम लोग बुलेट पॉइंट्स डालते हैं। उनमें जाकर के आप देख सकते हैं। एपिसोड

469
00:32:30,000 --> 00:32:34,800
वन के बुलेट पॉइंट्स वहां डाल दिए हैं। ठीक है?

470
00:32:34,800 --> 00:32:38,800
तो एपिसोड टू के बुलेट पॉइंट्स में है वह। तो एपिसोड टू

471
00:32:38,800 --> 00:32:42,800
के बुलेट पॉइंट्स का आप वो करिए, प्रतीक्षा करिए। डाल दिए

472
00:32:42,800 --> 00:32:46,880
जाएंगे वहां पर या फिर आप एपिसोड वन में जाकर के विस्तृत रूप से

473
00:32:46,880 --> 00:32:51,040
देख सकते हैं। फिर आगे क्या है कि जब

474
00:32:51,040 --> 00:32:55,560
तू मोह रहित हो जाएगा उसी वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा। देखिए हम लोग कहते हैं ना

475
00:32:55,560 --> 00:32:59,680
कि जो प्रामाणिक आचार्य है वो कौन है?

476
00:32:59,680 --> 00:33:03,920
प्रामाणिक आचार्य कौन है? उसका पहला लक्षण क्या है? ब्रह्मचारी सन्यासी

477
00:33:03,920 --> 00:33:08,080
होना चाहिए। अथर्ववेद 11 5 16 मनुस्मृति 12वा अध्याय 112

478
00:33:08,080 --> 00:33:12,080
से 114 मगर यहां पर भी जब तू मोह रहित

479
00:33:12,080 --> 00:33:16,440
हो जाएगा उसी वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा। वैराग्य

480
00:33:16,440 --> 00:33:20,480
सन्यास तत्वदर्शी का तत्वदर्शी की पहचान है। सन्यास

481
00:33:20,480 --> 00:33:26,480
उसके अंदर वैराग्य आ चुका होगा। पष्ठ संख्या

482
00:33:27,080 --> 00:33:31,120
31 इसके बाद मत वेदी शास्त्रों के द्वारा विचलित ना रहकर एक

483
00:33:31,120 --> 00:33:37,120
तत्व ज्ञान पर आधारित हो जाएगी फिर तू योगी भक्त बनेगा हम

484
00:33:37,720 --> 00:33:41,760
तो जो शास्त्र है ये शास्त्रों से अब यहां पर हटने

485
00:33:41,760 --> 00:33:45,960
की बात कर रहा

486
00:33:45,960 --> 00:33:50,400
है पूर्ण परमात्मा का ज्ञान हो जाने के बाद छोटे भगवानों

487
00:33:50,400 --> 00:33:54,560
ब्रह्मा विष्णु महेश देवी देवताओं माता तथा काल यानी

488
00:33:54,560 --> 00:33:58,800
ब्रह्म तथा परबह्म आदि से मन हट जा मन हटकर पूर्ण

489
00:33:58,800 --> 00:34:02,960
परमात्मा की भक्ति करके उसके अनामी परम पद को अर्थात

490
00:34:02,960 --> 00:34:07,200
सतलोक से भी आगे अनामी लोक में चला जाएगा। सतलोक से भी

491
00:34:07,200 --> 00:34:11,440
आगे जन्म मरण से छूट जाएगा। सतलोक में आप जन्म मरण से नहीं छूट

492
00:34:11,440 --> 00:34:15,440
रहे हो। इसलिए तू पूर्ण परमात्मा का भक्त बन योगी

493
00:34:15,440 --> 00:34:19,520
हो जा। ठीक है? ये दो दो से वो दो 53 तक की

494
00:34:19,520 --> 00:34:23,680
बात हो गई।

495
00:34:23,680 --> 00:34:28,000
253 का अर्थ यहां क्या बताया गया है कि अर्थात तेरा पद्म परमात्मा

496
00:34:28,000 --> 00:34:32,040
से नित्य संयोग हो

497
00:34:32,040 --> 00:34:36,480
जाएगा। अब हम बात कर रहे हैं दो 54

498
00:34:36,480 --> 00:34:40,560
254 में हमारे 254 में क्या

499
00:34:40,560 --> 00:34:46,560
कहा गया है? पहले देख लें।

500
00:34:48,800 --> 00:34:53,000
अर्जुन ने प्रश्न किया है 254 में

501
00:34:53,000 --> 00:34:57,920
कि देखिए अर्जुन ने किससे प्रश्न किया है हे केशव

502
00:34:57,920 --> 00:35:01,920
यहां नाम ले रहा है क्योंकि ये लोग कहते हैं ना कि वो काल ने अपना असली रूप दिखाया था

503
00:35:01,920 --> 00:35:05,920
श्री कृष्ण के शरीर से बाहर निकल कर के ये भी एक ध्यान रखने वाली बात है कि जब काल

504
00:35:05,920 --> 00:35:10,000
अपने शरीर से बाहर निकल के उसने अपना असली रूप दिखा दिया तो वापस

505
00:35:10,000 --> 00:35:14,800
जब वो अंदर आया कृष्ण के तो फिर उसने केशव क्यों कहा काल क्यों नहीं कहा

506
00:35:14,800 --> 00:35:18,880
अगर अगर केशव और काल अलग-अलग है। उन्होंने वापस अर्जुन ने वहां पर वापस

507
00:35:18,880 --> 00:35:23,040
मधुसूदन हे मधुसूदन इत्यादि द्वारा संबोधित करना शुरू

508
00:35:23,040 --> 00:35:27,200
कर दिया था। तो इन्होंने पूछा है प्रश्न के

509
00:35:27,200 --> 00:35:31,520
अर्जुन ने प्रश्न किया कि पूर्ण रूप से एक पूर्ण परमात्मा में आश्रित अर्थात

510
00:35:31,520 --> 00:35:35,520
पूर्ण परमात्मा में स्थिर बुद्धि रखने वाले भक्त के लक्षण क्या होते हैं? उसका बोलना,

511
00:35:35,520 --> 00:35:38,720
चलना, बैठना आदि कैसा होता है? तो भक्ति के लक्षण बताए

512
00:35:38,720 --> 00:35:42,440
जा रहे हैं। आगे के श्लोकों

513
00:35:42,440 --> 00:35:46,880
में भगवान ने क्या उत्तर दिया है? इन्होंने 55

514
00:35:46,880 --> 00:35:51,840
से 68 एक बार में ले लिया। तो हम 55 से 68

515
00:35:51,840 --> 00:35:55,920
पहले हम लोग देख लेते हैं। 55 क्या है? हे अर्जुन जिस काल में

516
00:35:55,920 --> 00:35:59,920
यह पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को भलीभांति त्याग देता

517
00:35:59,920 --> 00:36:03,920
है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है

518
00:36:03,920 --> 00:36:08,080
उस काल में वह स्थित प्रज्ञ कहा जाता है। यहां स्थित

519
00:36:08,080 --> 00:36:12,240
प्रज्ञ की प्रज्ञ प्रज्ञ की संज्ञा दी गई है।

520
00:36:12,240 --> 00:36:16,320
दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में द्वेग नहीं होता। सुखों

521
00:36:16,320 --> 00:36:20,560
की प्राप्ति में जो सर्वथा निष्प्रह है। यहां पर फिर से देखिए इस श्लोक

522
00:36:20,560 --> 00:36:24,720
का भी खंडन हुआ है वहां पर दो 56 कहां पर? जहां

523
00:36:24,720 --> 00:36:28,880
उसने कहा है कि लाभ हानि में इंटरेस्टेड इंटरेस्टेड होना चाहिए

524
00:36:28,880 --> 00:36:32,880
युद्ध लड़ते समय। है ना? दो क्या

525
00:36:32,880 --> 00:36:35,240
है ये?

526
00:36:35,240 --> 00:36:39,760
56 ठीक है। इन्होंने फिर खंडन किया है। और

527
00:36:39,760 --> 00:36:43,760
यहां पर यह यह जो श्लोक है अभी देखते इसने क्या कहा है

528
00:36:43,760 --> 00:36:47,840
कि जो सर्वथा जिसके राग भय और क्रोध नष्ट हो

529
00:36:47,840 --> 00:36:52,320
गए ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है।

530
00:36:52,320 --> 00:36:54,520
अब इसने क्या कहा

531
00:36:54,520 --> 00:36:58,640
है? गीता अध्याय दो श्लोक 55 में क्या कहा

532
00:36:58,640 --> 00:37:03,280
है इसने? कि जब साधक मन की उपज कामनाओं को भलीभांति

533
00:37:03,280 --> 00:37:07,760
त्याग देता है स्वयं संतुष्ट रहता है तब वह स्थित प्रज्ञानी

534
00:37:07,760 --> 00:37:11,840
निश्चल बुद्धि कहा जाता है। अब देखिए

535
00:37:11,840 --> 00:37:16,000
यहां पर सांसारिक लालच को त्याग देने की बात फिर से हो रही है। हो

536
00:37:16,000 --> 00:37:20,400
रही है ना? मगर ये लोग अपने साथ किसी को किस आधार पर जोड़ते हैं? सांसारिक

537
00:37:20,400 --> 00:37:24,480
लालच के आधार पे। कि उनके यहां जाओगे तो

538
00:37:24,480 --> 00:37:28,480
ऐसा हो जाएगा। तुम्हारे देखो तुम्हारे अगर तुम्हारे यहां सही भक्ति बता रहे हैं तो ये क्यों

539
00:37:28,480 --> 00:37:32,560
हो रहा है? वह क्यों हो रहा है? सांसारिक लालच है ना। तो सांसारिक

540
00:37:32,560 --> 00:37:36,720
लालच को त्यागने की बात यहां पर की जा रही है। दो 56 में क्या कहा

541
00:37:36,720 --> 00:37:40,880
है? कि जिसके राग,

542
00:37:40,880 --> 00:37:45,120
भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं। वह मुनि यानी भक्त स्थिर बुद्धि

543
00:37:45,120 --> 00:37:49,120
कहा जाएगा। यहां पे फिर से समबुद्धि की बात हो रही है। है ना? दो

544
00:37:49,120 --> 00:37:55,120
सत्ता दो 25 दो 25 दो6 में।

545
00:37:58,560 --> 00:38:02,880
समुद्धि की बात हो रही है। हमने बात कर ली। फिर दो 57 से 58

546
00:38:02,880 --> 00:38:07,200
का श्लोक इसने अर्थ बताया है कि भौतिक जगत से प्रेम ना रखकर परमात्मा

547
00:38:07,200 --> 00:38:11,520
में रुचि रखता है। राग द्वेष रहित होता है। राग द्वेष रहित यानी

548
00:38:11,520 --> 00:38:17,520
लाभ हानि रहित तो फिर से समबुद्धि का वो हो गया।

549
00:38:21,840 --> 00:38:25,920
भौतिक जगत से प्रेम ना रखकर और यह लोग अपने साथ किसी को

550
00:38:25,920 --> 00:38:30,080
किस आधार पर जोड़ रहे हैं? भौतिक जगत की चीजें बता के देखो देखो

551
00:38:30,080 --> 00:38:34,160
ये तुम्हारा ये रोग हालांकि उसमें वही होता है। वो नेटवर्क मार्केटिंग वाले आपने

552
00:38:34,160 --> 00:38:38,400
बिजनेस देखे। मैं पहले ऐसा था, मैं काला था, मैं गोरा था, मैं ऐसा हो गया। मेरे

553
00:38:38,400 --> 00:38:42,400
पास एक साइकिल हुआ करती थी। मगर आज मेरे पास बहुत बड़ी कार है। ये सब

554
00:38:42,400 --> 00:38:46,560
जो आपने देखा होगा। उसी तरीके से नाटक ये लोग करते हैं। हालांकि

555
00:38:46,560 --> 00:38:50,720
मगर अगर यह लोग यहां पर यह माने भौतिक जगत से प्रेम ना रखकर

556
00:38:50,720 --> 00:38:54,800
परमात्मा में रुचि रखता है। राग द्वेष रहित होता है।

557
00:38:54,800 --> 00:38:58,960
उसी प्रकार भक्त अपनी इंद्रियों को शांत कर लेता है। यहां पर क्या हुआ? इंद्रियों को

558
00:38:58,960 --> 00:39:03,200
शांत करने की बात हो रही है। ये मैं क्यों दिखा रहा हूं इंद्रियों को शांत होने की बात? क्योंकि

559
00:39:03,200 --> 00:39:07,760
आगे इंद्रियों इंद्रियों पर नियंत्रण की बात का खंडन भी किया है भाई साहब ने।

560
00:39:07,760 --> 00:39:11,840
यहां पर माना है आगे वो शायद छठवा अध्याय

561
00:39:11,840 --> 00:39:13,760
वहां पर इंद्रियों के नियंत्रण की बात हो रही है। व्रत

562
00:39:13,760 --> 00:39:17,760
उपासना का इसको अपमान करना था रामपाल को तो इसलिए वहां पर कहा

563
00:39:17,760 --> 00:39:21,760
कि हट हट द्वारा जो इंद्रिय जो इंद्रियों को नियंत्रित करता है वो

564
00:39:21,760 --> 00:39:25,760
गलत होता है। भाई कोई भक्ति में नियंत्रित करता है तो वो

565
00:39:25,760 --> 00:39:29,760
तो सही होता है ना। वहां यह कहा जा रहा है यदि किसी ने

566
00:39:29,760 --> 00:39:33,840
अपने इंद्रियों को वो किसी ने कुछ खाने पीने को

567
00:39:33,840 --> 00:39:37,920
त्याग दिया है निराहारी हो गया है व्रत रख रहा है कोई तो

568
00:39:37,920 --> 00:39:42,160
केवल इससे काम नहीं चलेगा क्योंकि उसके अभी बीज बाकी है

569
00:39:42,160 --> 00:39:46,320
उसकी तृष्णाओं का उसकी भूख का उसकी कामनाओं का बीज उसमें बाकी

570
00:39:46,320 --> 00:39:50,720
है बीज मिटता है भगवान की भक्ति से तो यह नहीं कहा गया कि व्रत रखो मत

571
00:39:50,720 --> 00:39:54,720
व्रत रखो मगर भगवान की भक्ति करने के साथ में यह नहीं कहा गया

572
00:39:54,720 --> 00:39:58,720
कि इंद्रियों पर कंट्रोल करो ही मत इंद्रियों पर कंट्रोल करो मगर भगवान

573
00:39:58,720 --> 00:40:02,960
की भक्ति के साथ में जिससे कि उनका जो बीज तुम्हारे अंदर रह गया है वो ना रहे

574
00:40:02,960 --> 00:40:07,040
मगर इस व्यक्ति ने आगे चलकर के उसका खंडन किया है कि जो व्यक्ति हट पूर्वक

575
00:40:07,040 --> 00:40:12,320
हठ योग हठ योग का खंडन है ये है वो है मगर यहां पर देखिए क्या हो रहा है

576
00:40:12,320 --> 00:40:16,480
यहां पर हठ योग का समर्थन है अगर उसको वो हठ योग कहता है तो

577
00:40:16,480 --> 00:40:20,480
उसका यहां समर्थन है क्यों कि भक्त अपनी इंद्रियों को शांत कर

578
00:40:20,480 --> 00:40:24,560
लेता है तो भक्ति साथ में होनी चाहिए तब आपका

579
00:40:24,560 --> 00:40:28,960
जो त्याग है इंद्रियों को शांत शांत करने का जो प्रयास है वो उचित है। केवल

580
00:40:28,960 --> 00:40:33,520
इंद्रियों को प्रयास करने इंद्रियों को शांत रखने का प्रयास अनुचित है।

581
00:40:33,520 --> 00:40:37,760
ठीक है? आगे चलते हैं।

582
00:40:37,760 --> 00:40:42,080
258 पढ़ ले इनका क्या है?

583
00:40:42,080 --> 00:40:46,080
257 जो पुरुष सर्वत्र स्नेह रहित उस शुभ या

584
00:40:46,080 --> 00:40:50,160
अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर ना प्रसन्न होता है। ना द्वेष

585
00:40:50,160 --> 00:40:54,400
करता है। उसकी बुद्धि स्थिर है। तो ये हमने 257 लिख देख लिया।

586
00:40:54,400 --> 00:40:58,400
इसका भी खंडन है लाभहानि के लिए मना करने वाला।

587
00:40:58,400 --> 00:41:02,560
ठीक है? समत्व बुद्धि का उसने वहां जो खंडन किया इस श्लोक को भी अमान्य

588
00:41:02,560 --> 00:41:06,640
घोषित कर दिया है। और कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट

589
00:41:06,640 --> 00:41:10,720
लेता है दो 58 में वैसे ही जब यह पुरुष इंद्रियों के विषय विषयों

590
00:41:10,720 --> 00:41:14,800
से इंद्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है तब उसकी बुद्धि स्थिर

591
00:41:14,800 --> 00:41:18,960
है। ऐसा समझना चाहिए। दोस्त में क्या कहा है रामपाल ने?

592
00:41:18,960 --> 00:41:23,120
इन श्लोकों में कहा है कि जो व्यक्ति हठ पूर्वक इंद्रियों को विषयों से दूर

593
00:41:23,120 --> 00:41:27,680
करता है उसकी स्थिति ऐसे होती है जैसे कोई व्यक्ति निराहार

594
00:41:27,680 --> 00:41:31,840
यानी भोजन के बिना रहता है। यहां वही वाली बात आ गई। तो हट पूर्वक नहीं करना

595
00:41:31,840 --> 00:41:36,240
है। कैसे करना है? है ना? हट

596
00:41:36,240 --> 00:41:40,480
पूर्वक नहीं करना है। कैसे करना है? भगवान की भक्ति के साथ साथ करना है। हट पूर्वक

597
00:41:40,480 --> 00:41:44,240
करेंगे। हट पूर्वक यानी कि

598
00:41:44,240 --> 00:41:48,320
भगवान की भक्ति का आलंबन नहीं है। मगर फिर भी हम जो है अपनी इंद्रियों को शांत

599
00:41:48,320 --> 00:41:52,400
करने की चेष्टा कर रहे हैं। और यह भी कहा गया है कि वो लोग भी गलत है

600
00:41:52,400 --> 00:41:56,560
कि वो लोग दूर तो रह रहे हैं मगर चिंतन उनहीं का कर रहे हैं। जैसे हम मुझे टीवी देखना

601
00:41:56,560 --> 00:42:01,040
है। मुझे टीवी देखने की लालसा है। मेरी इंद्र इंद्रिय वो है कृष्णा।

602
00:42:01,040 --> 00:42:05,200
तो मैं नहीं देख रहा हूं। अपने आप को कंट्रोल कर रहा हूं। मगर चिंतन उसी

603
00:42:05,200 --> 00:42:09,200
का चल रहा है। तो भी वो हम उससे छुटकारा नहीं पाएंगे। तो भक्ति

604
00:42:09,200 --> 00:42:13,200
भी चाहिए और चिंतन भी उसका नहीं चाहिए। तो क्या करें? चिंतन

605
00:42:13,200 --> 00:42:16,040
किसका करें? भगवान

606
00:42:16,040 --> 00:42:20,160
का। तो इंद्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण ना करने वाले

607
00:42:20,160 --> 00:42:24,400
पुरुष के पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं।

608
00:42:24,400 --> 00:42:28,720
परंतु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। यही बात कही जा रही है कि मैंने

609
00:42:28,720 --> 00:42:33,280
टीवी देखना तो बंद कर दिया तो मेरे मैं विषयों से दूर हो गया मगर

610
00:42:33,280 --> 00:42:37,520
उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। तो जो स्थित प्रज्ञ

611
00:42:37,520 --> 00:42:41,520
होता है क्योंकि वह भगवान के चिंतन में लगा है। उसके चिंतन में टीवी नहीं है।

612
00:42:41,520 --> 00:42:45,840
उसके चिंतन में भौतिक वस्तुएं नहीं है। इसलिए उसके चिंतन में क्योंकि भगवान

613
00:42:45,840 --> 00:42:50,200
है इसलिए वो जो है उनसे पूर्णतया मुक्त हो जाता है उन लालसाओं से।

614
00:42:50,200 --> 00:42:54,400
तो स्थित पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात

615
00:42:54,400 --> 00:42:58,640
करके निवृत्त हो जाती है। परमात्मा में ध्यान लगा के उसकी वो उस जो आसक्ति

616
00:42:58,640 --> 00:42:59,360
हो रही है भौतिक

617
00:42:59,360 --> 00:43:03,600
संसार से वह भी दूर हो जाती है। यह हो गया 59

618
00:43:03,600 --> 00:43:07,600
का और इसने क्या कहा है 59

619
00:43:07,600 --> 00:43:11,840
में कि इस प्रकार इंद्रियों को हट हट पूर्वक

620
00:43:11,840 --> 00:43:16,080
विषयों से रोकने से संयम तो कर लिया आसक्ति समाप्त नहीं हुई साधक

621
00:43:16,080 --> 00:43:20,480
की विषयों का रस यानी आनंद लेने वाली आसक्ति काल

622
00:43:20,480 --> 00:43:24,560
ब्रह्म से परम पर यानी अन्य

623
00:43:24,560 --> 00:43:29,040
परमात्मा से अब देखिए यहां पर इसने परम

624
00:43:29,040 --> 00:43:35,040
यहां पर इसने 59 में

625
00:43:41,440 --> 00:43:45,840
259 में इसने क्या किया है?

626
00:43:45,840 --> 00:43:51,840
260

627
00:43:52,120 --> 00:43:56,240
में आसक्ति काल ब्रह्म से परम पर यानी अन्य

628
00:43:56,240 --> 00:44:00,640
परमात्मा को देखकर यानी सत्य साधना से परमात्मा

629
00:44:00,640 --> 00:44:04,640
का साक्षात्कार हो जाता है। अब देखिए यहां पे एक छोटी-छोटी सी बातें हैं जो आप

630
00:44:04,640 --> 00:44:08,640
ध्यान रख सकते हैं। जैसे इसने कहा कि आसक्ति काल ब्रह्म से

631
00:44:08,640 --> 00:44:12,720
पर यानी कि अन्य परमात्मा को तो काल ब्रह्म के लिए शब्द कौन

632
00:44:12,720 --> 00:44:16,800
सा है? यहां पर काल ब्रह्म से पर तो काल ब्रह्म

633
00:44:16,800 --> 00:44:21,680
के लिए पर कौन सा शब्द है

634
00:44:21,680 --> 00:44:25,840
जिसमें कि काल ब्रह्म की बात हो रही है फिर वहां पर पर लगा हुआ है

635
00:44:25,840 --> 00:44:29,840
वैसे पर दूसरे के लिए परे आएगा है ना पर नहीं आएगा

636
00:44:29,840 --> 00:44:34,280
पर तो परम के लिए आ जाएगा

637
00:44:34,280 --> 00:44:38,320
खैर आगे चलते हैं यहां पे कहीं भगवान

638
00:44:38,320 --> 00:44:42,320
ने अपनी बात की है तो इसने उसको उसमें जोड़ दिया है अ क्या

639
00:44:42,320 --> 00:44:47,320
कहते हैं। यहां पर परम की बात हो रही है। आगे चलते

640
00:44:47,320 --> 00:44:51,360
हैं। तो परमात्मा से साक्षात्कार होने

641
00:44:51,360 --> 00:44:55,520
पर आसक्ति से निवृत्त हो जाएगा।

642
00:44:55,520 --> 00:44:56,480
मुक्त हो जाएगा।

643
00:44:56,480 --> 00:45:00,720
इसने मान लिया हे अर्जुन जिनको तत्व ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। अब

644
00:45:00,720 --> 00:45:04,720
देखिए हट योग का खंडन नहीं कर रहा है। हट

645
00:45:04,720 --> 00:45:09,040
योग का खंडन नहीं कर रहा है। मतलब इंद्रियों को वश में करने का खंडन नहीं कर रहा है।

646
00:45:09,040 --> 00:45:13,040
तो जिन्होंने तत्व ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। उन्होंने यदि हठ योग करके

647
00:45:13,040 --> 00:45:17,040
इंद्रियों को विषय विषय भोगों से रोक भी ली तो इंद्रियां तो यहां पे जो

648
00:45:17,040 --> 00:45:21,200
हम बात कह रहे हैं वही बात इसने भी मानी है। ठीक है? एकांत

649
00:45:21,200 --> 00:45:25,200
वास वन में किया। परंतु पूर्ण परमात्मा के सत्य मंत्रों की साधना के अभाव के

650
00:45:25,200 --> 00:45:29,360
कारण राजा तो ये सब इसने अब

651
00:45:29,360 --> 00:45:34,760
देखिए यहां पर इसने क्या किया है

652
00:45:34,760 --> 00:45:39,200
कि इसने एक आरोप लगाया है पूर्ण परमात्मा

653
00:45:39,200 --> 00:45:43,200
के सत्य मंत्रों की साधना के अभाव के कारण राजा दशरथ

654
00:45:43,200 --> 00:45:47,360
की बेटी शांता के रूप पर आस आसक्त होकर सर्व

655
00:45:47,360 --> 00:45:51,760
रसों के भोग का आनंद लिया विवाह किया किसने? श्रृंगी

656
00:45:51,760 --> 00:45:57,120
ऋषि ने। अब यहां पर इन्होंने हालांकि

657
00:45:57,120 --> 00:46:01,400
इनका बात करने का तरीका तो इस व्यक्ति का निर्लज्जता वाला है ही है।

658
00:46:01,400 --> 00:46:07,400
खैर मगर इसने क्या कहा है? श्रृंगी ऋषि

659
00:46:07,640 --> 00:46:11,680
ने विवाह का

660
00:46:11,680 --> 00:46:15,840
जो है विवाह किया। सर्व रसों के भोग का आनंद लिया। तो

661
00:46:15,840 --> 00:46:19,840
यहां पर ये खंडन कर रहा है। कि विवाह इत्यादि से दूर रहना ही उचित

662
00:46:19,840 --> 00:46:24,000
है। ठीक है? अब ये मैं क्यों बता रहा हूं? क्योंकि मार्कंडेय पुराण में

663
00:46:24,000 --> 00:46:28,160
कोई कथा आती है जहां पर शायद ऋषि का नाम मुझे याद नहीं आ रहा है। वह

664
00:46:28,160 --> 00:46:33,160
वन में रह रहे होते हैं। उनके पित उन्हें दिखाई दे रहे होते हैं और वो कह रहे होते हैं

665
00:46:33,160 --> 00:46:37,360
कि क्या कहते हैं बेटा विवाह कर ले गृहस्थ संसार

666
00:46:37,360 --> 00:46:43,360
क्या कहते

667
00:46:43,560 --> 00:46:47,760
हैं कहीं पर इसने ऐसा किया है कि

668
00:46:47,760 --> 00:46:52,080
अपनी विवाह का यहां पर इसने विवाह करने का खंडन

669
00:46:52,080 --> 00:46:56,160
किया है और कहीं पर इसने ऐसा किया है इस व्यक्ति ने कि विवाह करने का

670
00:46:56,160 --> 00:47:00,480
समर्थन किया है। ठीक है? तो हम देख लेंगे अभी

671
00:47:00,480 --> 00:47:04,480
स्मरण नहीं आ रहा है एक्सजेक्टली कहां पर है वह बात खैर आगे चलते हैं

672
00:47:04,480 --> 00:47:08,640
हां दो 261 में आ गया मत पर अब

673
00:47:08,640 --> 00:47:12,800
देखिए मत पर ये भगवान ने कहा 261 में मत

674
00:47:12,800 --> 00:47:16,800
पर इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन संपूर्ण इंद्रियों

675
00:47:16,800 --> 00:47:21,040
को वश में करके समाहित हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे

676
00:47:21,040 --> 00:47:25,040
भगवान ने स्पष्ट कर दिया मेरे परायण मगर यहां पर इसने मत पराह

677
00:47:25,040 --> 00:47:29,200
क्या मत पराह का अर्थ क्या हुआ है मेरे से दूसरे परमात्मा

678
00:47:29,200 --> 00:47:33,560
तो इसकी अगर संधि करेंगे तो क्या निकलेगा? मत

679
00:47:33,560 --> 00:47:37,920
परह हम तो इसमें जो है भगवान

680
00:47:37,920 --> 00:47:42,000
कह रहे हैं कि मेरे परायण होकर मगर यह कह रहा है कि मेरे से

681
00:47:42,000 --> 00:47:46,000
दूसरे परमात्मा के शरण में आकर तो यहां दूसरे शब्द

682
00:47:46,000 --> 00:47:50,560
की संस्कृत क्या है? परायण का पर है,

683
00:47:50,560 --> 00:47:56,560
मेरे का मत है। दूसरा मेरे से दूसरे

684
00:47:56,680 --> 00:47:58,960
परमात्मा की साधना करो।

685
00:47:58,960 --> 00:48:02,960
तो यहां पर उसकी संस्कृत क्या है? मेरे से दूसरे मत पर। इसमें दूसरे

686
00:48:02,960 --> 00:48:07,320
शब्द की संस्कृत क्या है? तो इसने यहां पे झोल कर दिया दोबारा

687
00:48:07,320 --> 00:48:13,320
से। इसके बाद क्या

688
00:48:13,480 --> 00:48:17,760
है? भगवान ने यहां मत पराह कह के कहा है कि मेरे परायण होकर।

689
00:48:17,760 --> 00:48:21,760
इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके समाहित चित्त

690
00:48:21,760 --> 00:48:25,920
हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इंद्रियां वश में होती

691
00:48:25,920 --> 00:48:29,920
है उसी की बुद्धियां स्थिर हो उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है तो भगवान क्या कह

692
00:48:29,920 --> 00:48:33,920
रहे हैं कि इंद्रियों को वश में तो करो मगर ध्यान में मेरे परायण ध्यान

693
00:48:33,920 --> 00:48:37,920
में मेरे भी रहो अगर मेरे ध्यान में नहीं रहे तो तुम्हारी जो इंद्रियां है वो वश

694
00:48:37,920 --> 00:48:42,000
में नहीं हो पाएंगी ये आप मत परा का अर्थ देख

695
00:48:42,000 --> 00:48:46,320
सकते हैं मेरे परायण को इसने करा है मेरे से दूसरे परमात्मा तो इससे पूछो

696
00:48:46,320 --> 00:48:50,560
कौन सी डिक्शनरी में मत पहा का ये अर्थ लिखा है। ठीक है? वो

697
00:48:50,560 --> 00:48:54,560
डिक्शनरी दिखाए और इसकी इसको संस्कृत कितनी आती है? किसी दिन आ

698
00:48:54,560 --> 00:48:58,960
के संस्कृत में बात करे आ के किसी संस्कृत

699
00:48:58,960 --> 00:49:03,160
किसी संस्कृत को खड़ा कर देंगे। उससे बात करे आराम से

700
00:49:03,160 --> 00:49:07,760
हम खैर मुझे लगता नहीं है कि वो कभी बाहर आने वाला है।

701
00:49:07,760 --> 00:49:12,440
वो उसी में ही उसका सब हो जाएगा। काल कपाल

702
00:49:12,440 --> 00:49:14,800
महाकाल दो 62

703
00:49:14,800 --> 00:49:19,240
इन श्लोकों में बताया गया है। अब यह रामपाल का अर्थ पढ़ रहे हैं हम दो

704
00:49:19,240 --> 00:49:23,600
62 इन श्लोकों में बताया गया है कि विषयों यानी विकारों

705
00:49:23,600 --> 00:49:27,840
का चिंतन करने वाले व्यक्ति की उन विशेष विषयों में आसक्ति

706
00:49:27,840 --> 00:49:31,840
हो जाती है। आसक्ति से उनको प्राप्त करने की कामना उत्पन्न हो जाती है।

707
00:49:31,840 --> 00:49:36,160
कामना पूर्ण होने की स्थिति से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मूर्खता उत्पन्न

708
00:49:36,160 --> 00:49:40,400
होती है। और मूर्खता से स्मरण शक्ति में भ्रम हो जाता है।

709
00:49:40,400 --> 00:49:44,400
स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि यानी विवेक का नाश हो जाता

710
00:49:44,400 --> 00:49:49,360
है। बुद्धि का नाश होने से व्यक्ति मानवता से गिर जाता है। ये स्नेहा

711
00:49:49,360 --> 00:49:53,360
और हम भी पढ़ ले अपना वाला। तो विषयों का चिंतन करने वाले

712
00:49:53,360 --> 00:49:57,360
पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न

713
00:49:57,360 --> 00:50:01,360
हो जाती है। यह मतलब एग्जैक्ट वही इसने यहां लिखा है।

714
00:50:01,360 --> 00:50:05,360
अब देखिए ये आपको ये यहां पर

715
00:50:05,360 --> 00:50:09,760
अब मैं रामपाल की बात नहीं कर रहा। एक जीवन के एक विशेष विषय की बात कर रहा हूं

716
00:50:09,760 --> 00:50:13,920
कि हमारे जीवन में उतारचाव हो कैसे रहा है। हमको प्राप्त

717
00:50:13,920 --> 00:50:18,560
करनी है अविद्या। सॉरी हमको प्राप्त करनी है विद्या।

718
00:50:18,560 --> 00:50:22,960
अविद्या से हमें मुक्ति चाहिए। हमको प्राप्त करनी है मुक्ति। अविद्या से मुक्ति।

719
00:50:22,960 --> 00:50:27,200
ठीक है? तो अविद्या से मुक्ति कैसे होगी? जब हमारी जब हमारी चेतना

720
00:50:27,200 --> 00:50:30,080
में उतनी शक्ति होगी कि हम अविद्या से मुक्त हो सके

721
00:50:30,080 --> 00:50:34,160
और विद्या को ग्रहण कर सकें। ठीक है?

722
00:50:34,160 --> 00:50:38,320
अब हमारी जो चेतना शक्ति है उसमें दिक्कत कहां आ रही है? मनुस्मृति बार अध्याय

723
00:50:38,320 --> 00:50:43,040
37 वे श्लोक में कहा गया है कि जिन कर्मों को करते समय

724
00:50:43,040 --> 00:50:47,520
हमारे मन में छिपाने का भाव उत्पन्न होता है वह तामसिक होते हैं। छिपाने का भाव

725
00:50:47,520 --> 00:50:52,480
आपकी प्रज्ञा शक्ति को कमजोर करता है। इसलिए वो आपको दूर कर रहा है।

726
00:50:52,480 --> 00:50:56,880
विद्या से दूर कर रहा है। अविद्या से लिप्त कर रहा है। तो यह जो

727
00:50:56,880 --> 00:51:00,960
आपकी जो प्रज्ञा शक्ति है कैसे हो रही है? इफेक्टेड कैसे हो रही

728
00:51:00,960 --> 00:51:05,040
है? कि आप विषयों का चिंतन करते हैं। टीवी देखना है,

729
00:51:05,040 --> 00:51:09,040
कपड़े लाने हैं, वस्त्र पहनने हैं, चश्मा लगाना है या फिर

730
00:51:09,040 --> 00:51:13,040
भोग करना है। ये ये वाला फलाना आइटम मुझे आहार के

731
00:51:13,040 --> 00:51:17,280
रूप में खाना है। ये सब हम लोग चिंतन करते हैं। चिंतन उसका चिंतन

732
00:51:17,280 --> 00:51:21,760
करते रहने से उसके प्रति आसक्ति होती है। कि मुझे अब वो प्राप्त करना है।

733
00:51:21,760 --> 00:51:25,760
अभी तक हम सोच रहे थे वो ऐसा होता है, वह वैसा होता है। यह हो गया चिंतन। उसके बाद

734
00:51:25,760 --> 00:51:30,000
अब उसे प्राप्त करता है। प्राप्त करना है। मगर प्राप्त ना हो पाने की स्थिति

735
00:51:30,000 --> 00:51:34,000
में क्या होता है? कामना पूर्ण ना होने की स्थिति में क्रोध उत्पन्न होता

736
00:51:34,000 --> 00:51:38,400
है। क्रोध से मूर्खता उत्पन्न होती है। मूर्खता से स्मृति

737
00:51:38,400 --> 00:51:42,560
भ्रम होता है। हम लोग जो बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात में पूरे दिन में कई बार कहते हैं ना भूल गया भूल

738
00:51:42,560 --> 00:51:45,280
गया भूल गया। ये क्या है? वही

739
00:51:45,280 --> 00:51:49,600
उसी का इफेक्ट है। जो हम चिंतन कर रहे हैं। चिंतन से वो पूरी नहीं हो रही। तो हमारी

740
00:51:49,600 --> 00:51:53,600
मूर्खता उत्पन्न हो रही। क्रोध उत्पन्न हो रहा है। क्रोध से मूर्खता उत्पन्न हो रही है। मूर्खता से क्या

741
00:51:53,600 --> 00:51:57,680
उत्पन्न हो रहा है? भूल जाना तो हम लोग सोचते हैं भूल जाना बहुत

742
00:51:57,680 --> 00:52:01,680
छोटी सी बात है किसी मतलब कोई बात नहीं भूल भूल सकता है कोई भूल

743
00:52:01,680 --> 00:52:06,080
सकता है सही बात है हम सब जितने भी लोग मगर प्रपंच रूपी संसार से निकलने

744
00:52:06,080 --> 00:52:10,080
की जो लक्षण है वो ना भूलना ही है व्यक्ति भूलना उसका कम

745
00:52:10,080 --> 00:52:14,400
होता जाएगा जिसकी प्रज्ञा शक्ति का लेवल जितना ज्यादा होता जाएगा उसका जो

746
00:52:14,400 --> 00:52:18,400
बौद्धिक स्तर है वो बहुत बढ़ता जाएगा उसका जो भूलने का लेवल है बहुत कम

747
00:52:18,400 --> 00:52:22,640
होता जाएगा हम जैसे कि भूल क्या हुई

748
00:52:22,640 --> 00:52:26,800
अब भूल से आपके जीवन में प्रभाव प्रभाव क्या पड़ता है? आपको एक

749
00:52:26,800 --> 00:52:31,040
छोटा सा नुकसान बता देता हूं। कई बार रोड एक्सीडेंट

750
00:52:31,040 --> 00:52:35,600
जब होता है तो व्यक्ति जब किसी समय

751
00:52:35,600 --> 00:52:39,680
रोड एक्सीडेंट होने के बाद जब वो कहीं पर बैठा होता है तो

752
00:52:39,680 --> 00:52:43,760
ध्यान करता है कि उसको अपने मन में मालूम होता है। वो लोगों को कितना भी बता दे

753
00:52:43,760 --> 00:52:47,920
कि मैं ऐसा कर मतलब मैंने ऐसा मैंने कोई गलती नहीं की। मैंने ये नहीं किया मैंने वो

754
00:52:47,920 --> 00:52:51,920
नहीं किया। मगर कई बार लोगों को अपने मन में मालूम होता है कि मैं लास्ट

755
00:52:51,920 --> 00:52:55,920
मोमेंट पे अगर यह कर देता तो मैं बच जाता। मैं गिरता नहीं। मगर वो क्यों

756
00:52:55,920 --> 00:52:59,920
नहीं कर पाया? वो ब्रेक नहीं दबा पाया। उस हैंडल को सही जगह मोड़ नहीं

757
00:52:59,920 --> 00:53:00,480
पाया।

758
00:53:00,480 --> 00:53:04,800
क्यों नहीं कर पाया? क्योंकि वो भूला और उसका एक्सीडेंट हुआ।

759
00:53:04,800 --> 00:53:08,880
तो इसी प्रकार से ये जो स्मरण शक्ति क्षीण हो रही है, आपकी प्रज्ञा शक्ति क्षीण हो

760
00:53:08,880 --> 00:53:13,120
रही है, आपकी जो चेतना शक्ति क्षीण हो रही है, इसका प्रभाव आपके जीवन में

761
00:53:13,120 --> 00:53:17,680
हर क्षण पड़ रहा है। इसीलिए ऐसे कार्यों को करने से बचें।

762
00:53:17,680 --> 00:53:21,840
जिन कामों को करते समय छिपाने का भाव उत्पन्न हो इसीलिए

763
00:53:21,840 --> 00:53:25,840
ऐसे भौतिक भौतिक संसार का चिंतन करने से बचे

764
00:53:25,840 --> 00:53:29,920
कम से कम चिंतन करें तो किसका चिंतन करें क्योंकि जैसे भगवत

765
00:53:29,920 --> 00:53:34,000
गीता में भगवान ने एक जगह ये भी कहा है कि जो क्या कहते

766
00:53:34,000 --> 00:53:38,240
हैं तू एक भी क्षण बिना कर्म किए नहीं रह सकता तो यदि आपका मन

767
00:53:38,240 --> 00:53:42,240
है यदि आपके पास चिंतन करने की शक्ति है तो वो चिंतन तो करेगी

768
00:53:42,240 --> 00:53:46,320
ही बिना चिंतन के नहीं रहेगी तो किसका चिंतन करें तो उसी

769
00:53:46,320 --> 00:53:50,560
चिंतन के लिए भगवान ने स्वयं का स्वरूप दिया, स्वयं का

770
00:53:50,560 --> 00:53:54,560
स्वयं की लीलाएं दी, अपना चरित्र दिया कि इसका चिंतन करो।

771
00:53:54,560 --> 00:53:58,800
जब तुम इसके चिंतन में रहोगे तो तुम्हारा उधर चिंतन नहीं होगा। आसक्ति

772
00:53:58,800 --> 00:54:02,800
नहीं होगी। ना प्राप्त होने की स्थिति में क्रोध नहीं होगा तो मूर्खता नहीं होगी।

773
00:54:02,800 --> 00:54:08,560
मूर्खता नहीं होगी तो स्मरण शक्ति नहीं होगी। बुद्धि का नाश नहीं होगा।

774
00:54:08,560 --> 00:54:12,560
ठीक है? अब रामपाल पे वापस आ जाते हैं। 264 से 65 में

775
00:54:12,560 --> 00:54:16,400
रामपाल क्या कह रहा है? ये कह रहा है कि

776
00:54:16,400 --> 00:54:20,960
शास्त्र विधि अनुसार पूर्ण परमात्मा की साधना करने वाला साधक

777
00:54:20,960 --> 00:54:26,600
सत्य साधना से अपने वश में की हुई राग द्वेष रहित की हुई इंद्रियों

778
00:54:26,600 --> 00:54:30,800
द्वारा राग द्वेष रहित से वही लाभ हानि का इसने खंडन

779
00:54:30,800 --> 00:54:35,480
कर दिया यहां पर भी देखिए कितनी जगह अपनी बात का ही खंडन किया है

780
00:54:35,480 --> 00:54:41,320
ना 264 में भी राग द्वेष की बात हो रही

781
00:54:41,320 --> 00:54:45,680
है तो यहां पर भी इसने अपनी बात का खंडन कर दिया

782
00:54:45,680 --> 00:54:50,000
और अगर लाभहानि वाली बात को माने तो कम से कम अभी तक

783
00:54:50,000 --> 00:54:54,400
आठ नौ श्लोक हो चुके हैं जिनका खंडन किया इसने लाभ हानि वाली बात कह करके

784
00:54:54,400 --> 00:54:58,480
खैर आगे चलते हैं तो वाला साधक सत्य साधना से अपने

785
00:54:58,480 --> 00:55:02,640
वश में की हुई राग द्वेष रहित की हुई इंद्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ

786
00:55:02,640 --> 00:55:07,360
यानी संसार में रहकर कर्म करता हुआ परिवार पोषण करता हुआ भी परमात्मा

787
00:55:07,360 --> 00:55:11,360
प्राप्ति रूपी कृपा प्रसाद को यानी पूर्ण सुखदाई मोक्ष को प्राप्त

788
00:55:11,360 --> 00:55:15,360
कर सकता है। अब क्या हुआ? यह जो पीछे इसने

789
00:55:15,360 --> 00:55:19,440
विवाह का खंडन कर दिया है। यदि दशरथ यदि वह

790
00:55:19,440 --> 00:55:23,840
दशरथ जी की बेटी के प्रति जो श्रृंगी ऋषि थे वो जो है उनको प्राप्त हुए थे। देखिए

791
00:55:23,840 --> 00:55:28,080
ये बात आ गई ना? अभी पीछे हम लोग पढ़ के आए हैं। ये

792
00:55:28,080 --> 00:55:31,520
जरा वो पैराग्राफ दिखाइए। 32वा 32

793
00:55:31,520 --> 00:55:35,640
वे पृष्ठ पर पैराग्राफ है कि एकांत ये

794
00:55:35,640 --> 00:55:40,160
उदाहरण श्रृंगी ऋषि ने अपनी इंद्रियों को हठ योग से रोका था।

795
00:55:40,160 --> 00:55:44,160
ठीक है? शंगी ऋषि ने अपनी इंद्रियों को हठ योग से रोका था। तो

796
00:55:44,160 --> 00:55:48,240
यह हमारे जो ऋषि मुनि होते हैं उनका अपमान करने के लिए खामखा उनका उदाहरण लेता

797
00:55:48,240 --> 00:55:52,560
है। खैर रोका था हट योग से। फिर भी वो जो है शांता

798
00:55:52,560 --> 00:55:56,640
के रूप पर आसक्त हो गए और सर्व वर्षों के भोग का आनंद लिया तो और

799
00:55:56,640 --> 00:56:01,000
विवाह किया यानी कि विवाह करना नहीं। विवाह करने वाला जो है वो जो

800
00:56:01,000 --> 00:56:05,520
है विवाह करने का मतलब है कि वो मुक्त नहीं हो सकता। उसकी

801
00:56:05,520 --> 00:56:11,000
उसकी इंद्रियां वश में नहीं हो सकती और वो जो है परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता।

802
00:56:11,000 --> 00:56:15,760
मगर अगले ही पष्ठ पर 33 वे पृष्ठ पर दो

803
00:56:15,760 --> 00:56:20,880
64 का या 65 का अर्थ करते समय

804
00:56:20,880 --> 00:56:24,880
64 65 का अर्थ करते समय ये क्या कह रहा है

805
00:56:24,880 --> 00:56:28,880
कि वाला साधक सत्य साधना से अपने वश में की हुई राग

806
00:56:28,880 --> 00:56:32,960
द्वेष द्वेष रहित की हुई इंद्रियों द्वारा विषयों में

807
00:56:32,960 --> 00:56:37,520
विचरण करता हुआ यानी संसार में रहकर कर्म करता हुआ परिवार

808
00:56:37,520 --> 00:56:41,680
पोषण करता हुआ भी परमात्मा प्राप्ति रूपी कृपा

809
00:56:41,680 --> 00:56:45,840
प्रसाद को यानी पूर्ण सुखदाई मोक्ष को प्राप्त करता है। तो पहले इसने

810
00:56:45,840 --> 00:56:46,640
विवाह का खंडन

811
00:56:46,640 --> 00:56:51,480
किया। अब यहां विवाह का समर्थन कर दिया। ये है रामपाल कॉमेडी शो

812
00:56:51,480 --> 00:56:55,760
तालियां और मार्कंडेय ऋषि के जो वो देता है ये क्लेम

813
00:56:55,760 --> 00:57:00,160
करता है वो ऋषि का नाम नहीं याद आ रहा है वहां पर

814
00:57:00,160 --> 00:57:04,160
रुचि नाम है शायद संभवत तो वहां पर ये कहता है कि उसके

815
00:57:04,160 --> 00:57:08,320
पित उसको उनको उनके पित दर्शन दे रहे थे जो ऋषि थे जो एकांत वास

816
00:57:08,320 --> 00:57:12,320
कर रहे थे तो पित उनको दर्शन देकर के समझाते बेटा गृहस्थ जीवन

817
00:57:12,320 --> 00:57:16,400
जी और वो अपने कर्मों को कर और वो यही समझा रहे होते हैं कि तू अपने

818
00:57:16,400 --> 00:57:20,640
कर्मों को करता हुआ भी मुक्ति को प्राप्त हो सकता है। जब वो कहते हैं कि अगर वो सारे कर्म

819
00:57:20,640 --> 00:57:24,640
अविद्या है तो आप मुझे अविद्या से क्यों जोड़ रहे हो? तो वो वहां पर

820
00:57:24,640 --> 00:57:28,800
यही भाव बताया जा रहा है कि अविद्या रूपी संसार में प्रपंच रूपी संसार

821
00:57:28,800 --> 00:57:32,960
में आप जो अविद्या से जुड़े हुए कर्म उनको करते हुए

822
00:57:32,960 --> 00:57:37,120
भी मोक्ष को प्राप्त हो सकते हो। तो वही यहां बताया जा रहा है। यहां पे इसने उसी

823
00:57:37,120 --> 00:57:41,280
बात को स्वीकार कर लिया। इससे जस्ट एक पृष्ठ पहले और मार्कंडेय ऋषि

824
00:57:41,280 --> 00:57:45,440
वाला वाली बात का उदाहरण देते हुए अपनी इस बात का खंडन कर लिया। इसको कहते

825
00:57:45,440 --> 00:57:51,040
हैं रामपाल द कॉमेडी शो। ठीक है?

826
00:57:51,040 --> 00:57:55,440
तो मार्कंडेय ऋषि की अगर कोई कभी भी बात करे अब कि देखो मार्कंडेय

827
00:57:55,440 --> 00:58:00,000
ऋषि तो पित को पित को इन कर्मों की मना कर रहे हैं। मार्कंडेय

828
00:58:00,000 --> 00:58:04,240
पुराण की बात अगर करे मार्कंडेय पुराण की अगर कभी भी कोई रामपाल वाला बात करे

829
00:58:04,240 --> 00:58:08,320
और यह कहे देखो पितरों की बात ना मानने को कहा जा रहा है क्योंकि पितर उनको विवाह

830
00:58:08,320 --> 00:58:12,480
इत्यादि गृहस्थ आश्रम में घसीट रहे हैं और वो जो है ऋषि पहले से ही देखो मुक्ति

831
00:58:12,480 --> 00:58:16,480
का जीवन जी रहे हैं तो उनके मुंह पे ऐसे लोगों के मुंह पे ये दे मारना है ये

832
00:58:16,480 --> 00:58:20,480
यहां पर टाइम स्लॉट नोट कर लेना ये मुंह पे दे मारना है इनहीं

833
00:58:20,480 --> 00:58:24,640
का रामपाल लिख रहा है कि क्या लिख रहा है संसार

834
00:58:24,640 --> 00:58:28,880
में रहकर कर्म करता हुआ परिवार पोषण कर करता हुआ

835
00:58:28,880 --> 00:58:33,040
भी परमात्मा प्राप्ति रूपी कृपा प्रसाद को यानी

836
00:58:33,040 --> 00:58:38,240
पूर्ण सुखदाई मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।

837
00:58:38,240 --> 00:58:42,320
ठीक है? तो ऐसा नहीं है कि अगर गस्त हो गया कोई व्यक्ति तो

838
00:58:42,320 --> 00:58:46,320
वह गलत ही है। तो यानी शी ऋषि भी गलत नहीं हुए और ना

839
00:58:46,320 --> 00:58:50,320
ही मार्कंडेय पुराण में जो उनके जो पित्र थे वो वहां पर ऋषि हैं

840
00:58:50,320 --> 00:58:54,480
उनके पित्र थे जो उनको कह रहे थे बेटा तू विवाह कर ले गस्थ आश्रम में

841
00:58:54,480 --> 00:58:58,560
जी और हम लोग अतृप्त है हमको जो है वो कर तब भी तू अच्छे मार्ग

842
00:58:58,560 --> 00:59:02,720
पर आकर आगे जाएगा वो भी गलत नहीं थे ना ही शंगी ऋषि गलत है गलत

843
00:59:02,720 --> 00:59:06,280
कोई है तो जेलधाम निवासी रामपाल ठीक

844
00:59:06,280 --> 00:59:10,400
है आगे चलते है 268 में ये कह रहा है

845
00:59:10,400 --> 00:59:14,480
जिसको तत्वदर्शी संत नहीं मिला अब 268 समय ये अनुवाद कर रहा है।

846
00:59:14,480 --> 00:59:18,600
अब अनुवाद करते समय तत्वदर्शी संत नहीं मिला तो पहले इसकी हिंदी आनी चाहिए

847
00:59:18,600 --> 00:59:24,600
ना। हालांकि हम लोग 68 59 का अपना अर्थ भी पढ़ लेते

848
00:59:25,080 --> 00:59:30,000
हैं। नहीं 64 65 का अपना अर्थ

849
00:59:30,000 --> 00:59:34,000
ना जीते हुए मन और इंद्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं

850
00:59:34,000 --> 00:59:38,080
होती है। 64 65 अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर 65वा है

851
00:59:38,080 --> 00:59:42,160
ये। इसके संपूर्ण दुखों का अभाव हो जाता है और उस

852
00:59:42,160 --> 00:59:46,160
प्रसन्नित वाले कर्म योगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा

853
00:59:46,160 --> 00:59:50,320
में भलीभांति स्थिर हो जाती है। हालांकि इसने जो अर्थ दिया

854
00:59:50,320 --> 00:59:54,720
था 64 65 में वो अर्थ सही नहीं था।

855
00:59:54,720 --> 00:59:59,520
संस्कृत की धज्जियां उड़ाई है उसने। ठीक है?

856
00:59:59,520 --> 01:00:03,680
तो यहां पर क्या कहा जा रहा 64 में परंतु अपने अधीन किए हुए अंतःकरण

857
01:00:03,680 --> 01:00:07,840
वाला साधक अपने वश में की हुई राग द्वेष से रहित इंद्रियों द्वारा विषयों

858
01:00:07,840 --> 01:00:12,080
में विचरण करता हुआ भी देखिए अभी आरोप लगा था ना शींगी ऋषि पर विषय

859
01:00:12,080 --> 01:00:16,400
विषयों में पड़ गए विषयों में विचरण करता हुआ भी अंतःकरण

860
01:00:16,400 --> 01:00:20,480
की प्रसन्नता को प्राप्त हो जाता है और ये बात इसने भी मान ली

861
01:00:20,480 --> 01:00:21,360
अपनी भाषा में

862
01:00:21,360 --> 01:00:25,400
क्योंकि इसको संस्कृत आती नहीं है संस्कृत का अर्थ ये नहीं कर

863
01:00:25,400 --> 01:00:29,600
पाएगा ना जीते हुए मन और इंद्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका

864
01:00:29,600 --> 01:00:33,680
बुद्धि नहीं और उस अयुक्त मनुष्य के अंतकरण में यह मैं 66व का

865
01:00:33,680 --> 01:00:38,160
प्रामाणिक अर्थ पढ़ रहा हूं। अंतःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन

866
01:00:38,160 --> 01:00:42,400
मनुष्य को शांति नहीं मिलती और शांति रहित मनुष्य को सुख

867
01:00:42,400 --> 01:00:46,400
कैसे मिल सकता है? तो 66वें का अर्थ हमने

868
01:00:46,400 --> 01:00:50,480
ये पढ़ा। अब 66व में ये क्या कह रहा है? इसने 66

869
01:00:50,480 --> 01:00:54,720
से 68 तक का जो अर्थ है वो एक साथ कर दिया। तो हम अपने 66

870
01:00:54,720 --> 01:00:59,440
से 68 का अर्थ बाद में पढ़ेंगे। पहले इसका पढ़ ले। क्या है?

871
01:00:59,440 --> 01:01:01,880
क्या

872
01:01:01,880 --> 01:01:05,920
है? जिसको तत्वदर्शी संत नहीं मिला। देखो भाई, अनुवाद

873
01:01:05,920 --> 01:01:09,680
में यह पहले अपना तत्वदर्शी घुसे देते हैं। जिसको तत्वदर्शी

874
01:01:09,680 --> 01:01:13,760
संत नहीं मिला, वह परमात्मा के स्मरण में स्थिर नहीं हो सकता क्योंकि उसका मन

875
01:01:13,760 --> 01:01:15,280
वश में नहीं है। उस

876
01:01:15,280 --> 01:01:19,680
अयुक्त यानी परमात्मा पर ना टिके। अब जबरदस्ती यहां पे वो

877
01:01:19,680 --> 01:01:23,920
किया है क्योंकि यहां पे क्या लिखा है? ना जीते हुए मनो इंद्रिय

878
01:01:23,920 --> 01:01:28,000
वाले पुरुष में निश्चत्म बुद्धि नहीं होती। तो इनका यह तत्वदर्शी

879
01:01:28,000 --> 01:01:32,000
संत नहीं मिला। कहां से आया? पहले तो आप वर्ड टू वर्ड कम से कम पहले आप वो

880
01:01:32,000 --> 01:01:36,080
तो करो। आप तो हर जगह अपना प्रोपग वो प्रोपगेंडा ले चल रहे। अपना जो

881
01:01:36,080 --> 01:01:40,640
सिंगल पॉइंट एजेंडा है कि लोगों के मन में तत्वदर्शी को डाल देना है।

882
01:01:40,640 --> 01:01:44,880
जिसको तत्वदर्शी संत नहीं मिला वह परमात्मा के स्मरण में स्थिर नहीं हो सकता। फिर

883
01:01:44,880 --> 01:01:49,080
आगे उन्होंने वही सब बातें जोड़ दी। इसमें है जिसकी इंद्रियां वश में नहीं

884
01:01:49,080 --> 01:01:53,440
हुई वो जो है स्थिरता को प्राप्त नहीं होगा। सुख

885
01:01:53,440 --> 01:01:57,440
को कैसे प्राप्त हो सकता है? और यहां पर इसने क्या कर दिया इंद्रियां वश में नहीं

886
01:01:57,440 --> 01:02:01,520
तत्वदर्शी संत नहीं मिला तो बात खत्म मतलब व्यक्ति वो जान ही ना

887
01:02:01,520 --> 01:02:05,520
पाए कि ग्रंथ क्या कह रहा है ईश्वरीय वाणी क्या कह रही है हम क्या

888
01:02:05,520 --> 01:02:08,440
कह रहे हैं वो सुनो

889
01:02:08,440 --> 01:02:12,360
आप अच्छा

890
01:02:12,360 --> 01:02:14,240
उस आगे इसने कहा

891
01:02:14,240 --> 01:02:18,400
है क्योंकि पूर्ण संत रूपी

892
01:02:18,400 --> 01:02:22,480
खेवट नाव के साथ नहीं है तो उस नाव को जल में

893
01:02:22,480 --> 01:02:26,720
वायु हर लेती है यानी अपनी इच्छा अनुसार भटकाती है।

894
01:02:26,720 --> 01:02:30,960
वैसे ही पूर्ण संत के अभाव से तत्व ज्ञान ना होने से जल

895
01:02:30,960 --> 01:02:35,480
में नाव की भांति विषयों में विचरती हुई इंद्रियों से

896
01:02:35,480 --> 01:02:39,920
मन जिस इंद्रिय के साथ लगा है वह एक ही इंद्रिय उस अभक्त

897
01:02:39,920 --> 01:02:43,760
की बुद्धि को हर लेती है। अब

898
01:02:43,760 --> 01:02:48,000
यहां पर दोबारा से इंद्रियों को वश में करने का समर्थन

899
01:02:48,000 --> 01:02:52,160
कर रहा है। ये ठीक है?

900
01:02:52,160 --> 01:02:56,240
और यह जो अपने आप को पूर्ण संत पूर्ण संत कह रहा है बार-बार तो पूर्ण

901
01:02:56,240 --> 01:03:02,240
संत के लिए इसको तत्व ज्ञान भी तो होना

902
01:03:03,560 --> 01:03:07,600
चाहिए। अच्छा एक एक चीज और है। हां ये तो बड़ी अच्छी चीज

903
01:03:07,600 --> 01:03:10,440
मैं भूल

904
01:03:10,440 --> 01:03:14,640
गया। दो 64 से 65 में क्या कहा गया है कि उसके जो

905
01:03:14,640 --> 01:03:18,800
दुख होते हैं वो सब दुख रहित हो जाता है। वो विषयों

906
01:03:18,800 --> 01:03:22,880
में रहकर के भी विषयों का मतलब विषयों में रह के भी सुख को

907
01:03:22,880 --> 01:03:27,040
प्राप्त हो जाता है। ये दो 64 65 के अर्थ में

908
01:03:27,040 --> 01:03:31,040
कहा जा रहा है। मगर बात ये आती है कि ये जो रामपाल है ये

909
01:03:31,040 --> 01:03:35,200
तो दुख से मुक्त नहीं हुआ तो ये तत्वज्ञानी कैसे? क्योंकि इससे एक इसका वीडियो

910
01:03:35,200 --> 01:03:39,920
है उसमें प्रेस रिपोर्टर्स पूछ रहे हैं कि आपकी वजह से कई लोग मरे। हालांकि

911
01:03:39,920 --> 01:03:44,240
और भी कहा होगा उसने अर्जी लगाई थी मेरा स्वास्थ्य खराब है। बाहर आने के लिए तड़पता

912
01:03:44,240 --> 01:03:48,240
रहता है वो। हालांकि इसके जो फॉलोवरर्स हैं वो कहते रहते हैं वो तो लीला

913
01:03:48,240 --> 01:03:52,400
लीला है। हालांकि वह बाहर आने के लिए तड़पता रहता है तो उसका भी उसे दुख होगा। मगर

914
01:03:52,400 --> 01:03:56,640
एक दुख उसने ऑन कैमरा नोट कराया क्या कि कई लोग आपको

915
01:03:56,640 --> 01:03:58,880
जब पकड़ा जा पकड़े जा रहे थे तो उसमें कई लोगों

916
01:03:58,880 --> 01:04:03,120
की जान चली गई या जो भी हुआ तो आप क्या कहना चाहेंगे? तो वो बोला

917
01:04:03,120 --> 01:04:07,200
मुझे अफसोस है। अफसोस दुख है। दुख है

918
01:04:07,200 --> 01:04:11,440
ना? तो दुख कैसे हो गया? वह तो तत्व ज्ञानी है। दुख नहीं होना चाहिए।

919
01:04:11,440 --> 01:04:14,720
तत्वदर्शी है ना?

920
01:04:14,720 --> 01:04:18,720
आगे चलते हैं। इसने 66 से 68 में आगे

921
01:04:18,720 --> 01:04:22,960
कहा है कि पूर्ण संत के अभाव पूर्ण संत के अभाव से तत्व

922
01:04:22,960 --> 01:04:28,000
ज्ञान ना होने से जल में नाव की भांति ये होता है। तो

923
01:04:28,000 --> 01:04:32,080
तत्व ज्ञान ना होने से दोबारा से नोट करिए। तत्व ज्ञान ना होने

924
01:04:32,080 --> 01:04:36,160
से व्यक्ति क्या करेगा? कि वो

925
01:04:36,160 --> 01:04:40,240
क्या कहते हैं? तत्व ज्ञान ना होने से तत्व ज्ञान नहीं है। तो इसका मतलब है तत्व

926
01:04:40,240 --> 01:04:44,240
ज्ञान नहीं है उसे। तत्व ज्ञान नहीं है तो इसके जितने वो है फॉलोअर्स वो तत्व

927
01:04:44,240 --> 01:04:48,360
ज्ञानी नहीं है इसके अनुसार तो तत्वज्ञानी नहीं है तो वह सब कौन है

928
01:04:48,360 --> 01:04:52,720
वो जल में नाव की भांति विषयों में विचरती हुई इंद्रियों

929
01:04:52,720 --> 01:04:56,800
में से मन जिस वह एक

930
01:04:56,800 --> 01:05:00,960
ही इंद्रिय उस अभक्त की बुद्धि को हर लेगी तो ये जितने भी लोग हैं इनकी बुद्धि

931
01:05:00,960 --> 01:05:05,280
हरी गई है रामपाल के अनुसार क्यों हरी गई है इनकी इंद्र के इंद्र

932
01:05:05,280 --> 01:05:09,360
के द्वारा ही हरी गई है क्यों क्योंकि इनके पास तत्व ज्ञान नहीं है तत्व ज्ञानी नहीं है

933
01:05:09,360 --> 01:05:13,680
यह सब जिस व्यक्ति की इंद्रियां इंद्रियों के विषयों यानी

934
01:05:13,680 --> 01:05:14,320
विकारों

935
01:05:14,320 --> 01:05:18,640
काम, क्रोध, मोह, लोभ से सब प्रकार से निग्रह की हुई है।

936
01:05:18,640 --> 01:05:22,840
यानी पूर्ण से संयमित है। उसी की बुद्धि स्थिर

937
01:05:22,840 --> 01:05:26,920
है। ये इसने मान लिया। निग्रह की हुई

938
01:05:26,920 --> 01:05:31,600
जो इंद्रिय है निग्रह की हुई इंद्रिय है।

939
01:05:31,600 --> 01:05:35,840
वही जो है मुक्त हो पाएगा। आगे मतलब वही फलदाई है। इंद्रियों

940
01:05:35,840 --> 01:05:39,920
का निग्रह। तो यानी यहां पर यह इंद्रियों का निग्रह करने का समर्थन कर रहा है। यह

941
01:05:39,920 --> 01:05:45,480
ध्यान रखिएगा। इंद्रियों का निग्रह करने का समर्थन है यहां पर कई

942
01:05:45,480 --> 01:05:49,600
जगह क्योंकि आगे इसने खंडन किया है। जहां व्रत उपवास की बात

943
01:05:49,600 --> 01:05:53,920
आएगी वहां खंडन किया है इसने। ठीक है? आगे

944
01:05:53,920 --> 01:05:58,080
क्या कह रहा है? अध्याय दो के श्लोक 55 से 68

945
01:05:58,080 --> 01:06:01,960
में कहा है कि

946
01:06:01,960 --> 01:06:06,000
जब जब भक्त इच्छाओं से रहित

947
01:06:06,000 --> 01:06:10,160
होकर भाग्य पर संतुष्ट है उस समय वह स्थिर बुद्धि वाला है।

948
01:06:10,160 --> 01:06:14,160
दुख सुख को बराबर समझने वाला है। राग द्वेष रहित है। देखिए

949
01:06:14,160 --> 01:06:18,160
यहां पर फिर अपनी बात का खंडन किया। लाभ हानि में बुद्धि ना

950
01:06:18,160 --> 01:06:22,320
रखने की बात जब भगवान कह रहे थे तो क्या कहा? यह तो काल की चाल है। अब खुद

951
01:06:22,320 --> 01:06:26,560
अपनी बात कुछ माननी है। परमा अपने अपनी ओर करना है डायवर्ट।

952
01:06:26,560 --> 01:06:30,560
तो यहां पर क्या कह रहा है? जो सुख दुख को बराबर समझता है राग द्वेष से

953
01:06:30,560 --> 01:06:34,640
रहित होता है। जिसने इंद्रियों का दमन कर लिया है। क्योंकि

954
01:06:34,640 --> 01:06:38,880
बुरे विचारों से इच्छाएं उत्पन्न होती है। फिर क्रोध और ये वो वही पूरा

955
01:06:38,880 --> 01:06:43,200
इसके बाद पतन निश्चित है। तत्व ज्ञानी योग युक्त है। वह शास्त्र अनुकूल

956
01:06:43,200 --> 01:06:47,520
भक्ति कर्म करता हुआ इंद्रियों के वश में नहीं होता। ठीक है?

957
01:06:47,520 --> 01:06:51,840
और तत्व ज्ञानी कौन है? केवल रामपाल तो किसकी

958
01:06:51,840 --> 01:06:55,840
इंद्रियां वश में है? केवल रामपाल की। और रामपाल वो है जो

959
01:06:55,840 --> 01:06:59,840
जेल से बाहर आने के लिए तड़पता रहता है। रामपाल वो है जो दुख

960
01:06:59,840 --> 01:07:04,360
जो सुखदख को बराबर नहीं समझता उसको अफसोस होता है। है

961
01:07:04,360 --> 01:07:09,040
ना? और भी बहुत सी चीजें।

962
01:07:09,040 --> 01:07:13,360
अच्छा आगे क्या कहा जा रहा है? चारों वेदों में वर्णित ज्ञान व साधना से उपरोक्त

963
01:07:13,360 --> 01:07:17,040
स्थिति यानी स्थिर बुद्धि नहीं हो सकती। विकार नहीं मरते। अब यहां पे सूक्ष्म

964
01:07:17,040 --> 01:07:21,120
वेद आ गया। पहले क्या कहा था? वेद यानी ऋग, यजुर,

965
01:07:21,120 --> 01:07:24,320
साम इत्यादि।

966
01:07:24,320 --> 01:07:26,760
ठीक

967
01:07:26,760 --> 01:07:31,040
है? वेदों में वर्णित अगले पृष्ठ पर इनकी हेडिंग पढ़ लीजिए।

968
01:07:31,040 --> 01:07:35,120
हालांकि अगर इनके पूरे पूरे पेजेस पृष्ठों को हम पढ़ते

969
01:07:35,120 --> 01:07:39,120
जाएंगे तो हर पष्ठ में कूड़ा मिलेगा। मगर हम केवल जहांजहां इसने

970
01:07:39,120 --> 01:07:43,280
श्लोकों का अर्थ किया है वो वो पढ़ते चल रहे हैं। तो वेदों में वर्णित साधना

971
01:07:43,280 --> 01:07:47,360
विधि विकार से नहीं मरते। इनकी हेडिंग तो अब जब ये आपको कहे कि वेद में ये

972
01:07:47,360 --> 01:07:51,360
लिखा है तो आप क्या कहोगे? वेदों में वर्णित साधना से विकार नहीं मिटते। हमको

973
01:07:51,360 --> 01:07:55,520
वेदों के आधार पर तुम कुछ मत बताओ। क्योंकि तुमने ये कहा है कि वेदों में वर्णित साधना से

974
01:07:55,520 --> 01:07:59,600
हम नहीं मानते। वेदों में वर्णित साधना से विकार मिटते हैं। मगर तुम ये कह

975
01:07:59,600 --> 01:08:03,600
रहे हो कि वेदों में वर्णित साधना से विकार नहीं मिटते। तो तुम हमको ये मत बताओ वेदों में

976
01:08:03,600 --> 01:08:07,680
क्या लिखा है? ठीक है? क्योंकि वेदों में गीता जी में ज्ञान तो श्रेष्ठ है।

977
01:08:07,680 --> 01:08:12,240
अगले प्रश्न पर ये प्रश्न है

978
01:08:12,240 --> 01:08:16,880
35वा। क्योंकि वेदों में गीता जी में ज्ञान तो श्रेष्ठ है

979
01:08:16,880 --> 01:08:20,880
कि जो साधक काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, राग, द्वेष रहित

980
01:08:20,880 --> 01:08:25,040
हो जाता है, वह पूर्ण मुक्त है। परंतु भक्ति की साधना

981
01:08:25,040 --> 01:08:29,520
केवल काल ब्रह्म की प्राप्ति है। तो

982
01:08:29,520 --> 01:08:32,160
भक्ति की साधना केवल का

983
01:08:32,160 --> 01:08:36,400
मतलब जो भगवत गीता और वेद में जो भक्ति बताई गई है वो केवल काल तक की

984
01:08:36,400 --> 01:08:39,200
भक्ति है। उसके आगे की नहीं है।

985
01:08:39,200 --> 01:08:43,920
जिससे विकार रहित नहीं हो सकता। उस परमात्मा को प्राप्त होने के योग्य

986
01:08:43,920 --> 01:08:47,760
मंत्र के जाप से हो सकता है। वह किसी शास्त्र में नहीं है। ठीक

987
01:08:47,760 --> 01:08:51,760
है? तो यह इनके मन ये मनमुखी देंगे। जो ये आपको

988
01:08:51,760 --> 01:08:56,400
नाम देंगे, मंत्र देंगे वो मनमुखी होगा क्योंकि वो किसी शास्त्र में नहीं है।

989
01:08:56,400 --> 01:09:00,640
यह भी पढ़ने लोग। यह ब्रह्म साधना की घटिया स्थिति है। यहां इसने

990
01:09:00,640 --> 01:09:04,880
घटिया कहा। ये सब चीजें हैं। जिसका प्रमाण स्वयं ब्रह्म भगवान देते

991
01:09:04,880 --> 01:09:10,000
हैं। वो आगे की बात है। आगे आएगा वो।

992
01:09:10,000 --> 01:09:12,080
यहां देखिए क्या कह रहा है। मेरी

993
01:09:12,080 --> 01:09:16,080
भक्ति वेदों व गीता में वर्णित विधि से करता है। वह मेरे भाव में

994
01:09:16,080 --> 01:09:20,240
ही भावित रहता है तथा मेरे जैसे गुण वाले वाला अर्थात

995
01:09:20,240 --> 01:09:22,560
काल का दूसरा रूप हो जाता है। जैसे

996
01:09:22,560 --> 01:09:26,560
चुणक ऋषि यहां इसने माना कि जो काल की भक्ति

997
01:09:26,560 --> 01:09:30,720
करता है वो काल के काल का दूसरा

998
01:09:30,720 --> 01:09:35,680
रूप हो जाता है। काल के गुण आ जाते हैं उसमें। यानी वो भी काल बन जाता है।

999
01:09:35,680 --> 01:09:39,680
ठीक है? देखते जाइएगा। काल की भक्ति करने में कितना डिफरेंस आएगा? कहीं

1000
01:09:39,680 --> 01:09:43,680
कहा जाएगा काल उन्हें खाता है। कहीं कहा जाएगा काल को वो देख नहीं सकता। वो

1001
01:09:43,680 --> 01:09:47,840
काल काल को प्राप्त नहीं हो सकता। कहीं कहा जाएगा काल उसे सूंघता है। कहीं

1002
01:09:47,840 --> 01:09:51,920
कहा जाएगा वो काल जैसा ही बन जाता है। ये सब देखते रहिएगा। आते

1003
01:09:51,920 --> 01:09:57,920
हैं इसके अर्थ पर।

1004
01:09:58,400 --> 01:10:00,760
क्योंकि

1005
01:10:00,760 --> 01:10:04,960
जैसे जल में चलने वाली नाव को पहले हम अपना अर्थ पढ़ रहे हैं 67

1006
01:10:04,960 --> 01:10:09,040
68 का क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर

1007
01:10:09,040 --> 01:10:10,960
लेती है वैसे ही विषयों में

1008
01:10:10,960 --> 01:10:15,040
विचरती हुई इंद्रियों में से मन जिस इंद्रिय के साथ रहता है वह एक

1009
01:10:15,040 --> 01:10:15,600
ही इंद्रिय

1010
01:10:15,600 --> 01:10:19,680
उस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है। इसलिए

1011
01:10:19,680 --> 01:10:23,840
हे महाबाहु जिस पुरुष की इंद्रियां इंद्रियों के विषयों से सब

1012
01:10:23,840 --> 01:10:27,840
प्रकार निग्रह की हुई है उसी की बुद्धि स्थिर है और वह होगा कैसे भगवान

1013
01:10:27,840 --> 01:10:31,840
की भक्ति करके अब 59 का इसने आगे अर्थ करना

1014
01:10:31,840 --> 01:10:35,920
शुरू किया 59 से 72 तो हम पहले अपना अर्थ पढ़ लेते हैं 59

1015
01:10:35,920 --> 01:10:39,920
से 72 का फिर इसका पढ़ेंगे संपूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि

1016
01:10:39,920 --> 01:10:44,080
के समान है उस नित्य ज्ञान स्वरूप परमानंद की प्राप्ति में स्थित प्रज्ञ योगी

1017
01:10:44,080 --> 01:10:48,240
जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब

1018
01:10:48,240 --> 01:10:52,400
प्राणी जागते हैं परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के

1019
01:10:52,400 --> 01:10:56,480
लिए वह रात्रि के समान है। मतलब सुख में जागना रात्रि के समान

1020
01:10:56,480 --> 01:11:00,880
है। और ज्ञान स्वरूप और जो

1021
01:11:00,880 --> 01:11:04,960
लोगों के लिए जो रात्रि के समान है यानी कि भगवान की भक्ति में बैठना भगवान के मंदिर

1022
01:11:04,960 --> 01:11:09,040
जाना ये सब क्या है? जो भौतिकवादी लोग होते हैं उससे उचटते हैं। तो वो

1023
01:11:09,040 --> 01:11:13,120
क्या कहा जा रहा है? जो लोगों के लिए रात्रि है वो भगवान की

1024
01:11:13,120 --> 01:11:17,120
भक्ति करने वाले के लिए दिन है। है ना? और

1025
01:11:17,120 --> 01:11:21,440
जो क्या कहते हैं उनके लिए जो उनके

1026
01:11:21,440 --> 01:11:26,320
लिए दिन है वो आपके लिए रात्रि है कुल मिला के जैसे

1027
01:11:26,320 --> 01:11:30,320
नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले

1028
01:11:30,320 --> 01:11:30,820
समुद्र

1029
01:11:30,800 --> 01:11:34,960
में उसको विचलित ना करते हुए ही समा जाते हैं वैसे ही सब

1030
01:11:34,960 --> 01:11:39,040
भोग जिस स्थित प्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए

1031
01:11:39,040 --> 01:11:43,440
बिना उसी में बिना ही उसमें समा जाते हैं। कर्म कर्म

1032
01:11:43,440 --> 01:11:47,520
योग बता रहे हैं कि हमको अगर कर्म करते हुए प्राप्त करना

1033
01:11:47,520 --> 01:11:51,680
है भगवान को तो कर्मों को कैसे अपने मैनेज करें उसमें भावना

1034
01:11:51,680 --> 01:11:55,680
क्या होनी चाहिए तो उसमें एक मोटा पॉइंट आएगा कर्म ये सोच के करो

1035
01:11:55,680 --> 01:11:59,680
ये सोच के नहीं लाभहानि कुछ मिलनी है कर्म ये सोच के करो ईश्वर ने कहा

1036
01:11:59,680 --> 01:12:05,000
है ये भी मत सोचो कि ईश्वर प्रसन्न होगा ईश्वर ने कहा है तो करना

1037
01:12:05,000 --> 01:12:09,120
है वैसे ही सब भोग स्थित प्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार

1038
01:12:09,120 --> 01:12:13,360
उत्पन्न किए बिना ही समा जाते वही पुरुष परम शांति को प्राप्त होता है।

1039
01:12:13,360 --> 01:12:17,680
भोगों को चाहने वाला नहीं होता है। जो पुरुष संपूर्ण कामनाओं

1040
01:12:17,680 --> 01:12:21,840
को त्याग त्याग कर ममता रहित, अहंकार रहित और स्प्र रहित

1041
01:12:21,840 --> 01:12:25,920
हुआ विचरता है। वही शांति को प्राप्त होता है।

1042
01:12:25,920 --> 01:12:28,720
अर्थात

1043
01:12:28,720 --> 01:12:34,720
यहां पे परम शांति की बात हो रही है। अर्थात वह शांति को प्राप्त

1044
01:12:37,960 --> 01:12:43,960
है। इसके बाद क्या है? यह ब्रह्म को

1045
01:12:44,120 --> 01:12:47,960
प्राप्त यह ब्रह्म को

1046
01:12:47,960 --> 01:12:52,160
प्राप्त पुरुष की स्थिति है। इसको प्राप्त होकर योगी

1047
01:12:52,160 --> 01:12:56,400
कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में इसी ब्राह्मी स्थिति में स्थित

1048
01:12:56,400 --> 01:13:00,400
होकर ब्रह्मानंद को प्राप्त

1049
01:13:00,400 --> 01:13:04,960
हो जाता है। अब देखते हैं इसने क्या यहां पर खिचड़ी पकाई है। ठीक है? यह हमारा

1050
01:13:04,960 --> 01:13:09,040
दो 72 तक यह कंप्लीट हो गया दूसरा अध्याय। और अब हम इसका देखते हैं इसने

1051
01:13:09,040 --> 01:13:13,080
क्या खिचड़ी पकाई। तो इसने दो 69 में क्या कहा

1052
01:13:13,080 --> 01:13:14,800
है कि

1053
01:13:14,800 --> 01:13:19,200
रात्रि में दो प्रकार के व्यक्ति जागते हैं। एक तो सांसारिक भोगों की इच्छा वाला

1054
01:13:19,200 --> 01:13:23,200
सोते हुए भी स्वप्न में उन्हीं में भटकता रहता है। दूसरा परमात्मा की

1055
01:13:23,200 --> 01:13:26,800
भक्ति में लगा स्थिर बुद्धि वाला साधक रात्रि में स्वप्न में भी परमात्मा का

1056
01:13:26,800 --> 01:13:30,960
विचार करता है। नहीं यहां ऐसा कुछ नहीं कहा जा रहा है। रात्रि में दो

1057
01:13:30,960 --> 01:13:36,960
लोग जागते हैं। ये कहां कहा गया इसको? तो इसने अर्थ ही बदल दिया।

1058
01:13:42,720 --> 01:13:48,720
संपूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है

1059
01:13:48,920 --> 01:13:53,040
हम उस नित्य ज्ञान स्वरूप परमा परमानंद की प्राप्ति

1060
01:13:53,040 --> 01:13:57,040
में स्थित प्रज्ञ योगी जागता है। तो इसमें स्वप्न का अगर ये

1061
01:13:57,040 --> 01:14:01,440
कह रहे हैं कि वो स्वप्न देखता है। जो सामान्य व्यक्ति है

1062
01:14:01,440 --> 01:14:05,680
वह भोगों का स्वप्न देखता है रामपाल के अनुसार और जो स्थित

1063
01:14:05,680 --> 01:14:10,320
प्रज्ञ है वह परमात्मा का स्वप्न देखता है रामपाल के अनुसार

1064
01:14:10,320 --> 01:14:14,560
तो जब स्वप्न देखने की बात बार-बार हो रही है तो यहां स्वप्न की संस्कृत

1065
01:14:14,560 --> 01:14:18,800
भी तो होनी चाहिए ऐसे ही अर्थ बदल दोगे क्या मनमाने तरीके

1066
01:14:18,800 --> 01:14:23,880
से नहीं है फिर आगे क्या कहा जा रहा

1067
01:14:23,880 --> 01:14:28,560
है दूसरा परमात्मा की भक्ति में लगा हुआ परमात्मा

1068
01:14:28,560 --> 01:14:33,800
अब यहां भावार्थ क्या

1069
01:14:33,800 --> 01:14:36,360
है?

1070
01:14:36,360 --> 01:14:40,560
सांसारिक अब देखिए पहली बात तो ये सांसारिक भोगों की इच्छा

1071
01:14:40,560 --> 01:14:44,800
वाला सोते हुए भी स्वप्न में उन्हीं में भटकता है। यानी कि

1072
01:14:44,800 --> 01:14:49,040
सांसारिक भोगों की इच्छा रखने वाला गलत है। तो यानी

1073
01:14:49,040 --> 01:14:53,040
कि व्रत करना, सांसारिक भोगों से दूर होने की इच्छा करना,

1074
01:14:53,040 --> 01:14:57,440
त्याग करना, सन्यास इसका यहां पर समर्थन किया। किसने? रामपाल ने।

1075
01:14:57,440 --> 01:15:01,760
ध्यान रखिए छठवे अध्याय में इसने खंडन किया है क्योंकि संभता

1076
01:15:01,760 --> 01:15:05,840
छवा ही है पता नहीं कहां पर किया है एक्सैक्ट नहीं पता मगर किया है कहीं पर बहुत व्रत

1077
01:15:05,840 --> 01:15:11,000
उपवास का खंडन तो यहां पर समर्थन है ध्यान

1078
01:15:11,000 --> 01:15:15,280
रखिएगा सांस अब ये भावार्थ बता रहा है जो सांसारिक व्यक्ति

1079
01:15:15,280 --> 01:15:19,440
भौतिक पदार्थों की प्राप्ति के लिए दिन भर भटकता है संयमी साधक की इच्छा उन

1080
01:15:19,440 --> 01:15:23,440
पदार्थों की नहीं होती तो भाई अगर कोई व्यक्ति व्रत रख रहा है तो

1081
01:15:23,440 --> 01:15:27,920
तुझे क्या प्रॉब्लम है तब क्यों कह रहा है कि व्रत के लिए मना किया क्या है

1082
01:15:27,920 --> 01:15:32,160
जब तू यहां पर व्रत उपवास को मान रहा है त्याग करना

1083
01:15:32,160 --> 01:15:36,800
उसके बिना रहना परमात्मा की भक्ति के साथ बिना परमात्मा की भक्ति के नहीं

1084
01:15:36,800 --> 01:15:40,880
परमात्मा में बुद्धि रखते हुए व्रत उपवास करने का खंडन क्यों कर रहा है जब तू

1085
01:15:40,880 --> 01:15:45,440
यहां पर यह कह रहा है कि संयमी साधक उन

1086
01:15:45,440 --> 01:15:47,520
की इच्छा उन पदार्थों में नहीं होती उसके

1087
01:15:47,520 --> 01:15:51,520
लिए वह दिन भी रात्रि के समान है अन्य लोग तो सांसारिक पदार्थों के

1088
01:15:51,520 --> 01:15:56,240
लिए सजग रहते हैं परंतु स्थिर बुद्धि वाला उनसे

1089
01:15:56,240 --> 01:16:00,040
मुख मोड़े रहता

1090
01:16:00,040 --> 01:16:01,440
है। बहुत

1091
01:16:01,440 --> 01:16:05,440
बड़ा पाखंडी है यह रामपाल। वह रात्रि में सोने के तुल्य विकारों

1092
01:16:05,440 --> 01:16:10,840
से परे है। वह सोया हुआ है।

1093
01:16:10,840 --> 01:16:15,520
हम तो व्रत का समर्थन, उपवास का समर्थन,

1094
01:16:15,520 --> 01:16:19,520
सन्यास का समर्थन यहां पर फिर से हो गया। तत्व ज्ञान

1095
01:16:19,520 --> 01:16:23,600
में परिचित 70 का देखिए 70 का क्या कहा जा रहा है?

1096
01:16:23,600 --> 01:16:27,840
श्लोक 70 का अर्थ तत्व ज्ञान से परिचित स्थिर बुद्धि

1097
01:16:27,840 --> 01:16:32,080
वाले का विश्वास ऐसा अचल होता है जैसे जल से पूर्ण रूप से परिपूर्ण

1098
01:16:32,080 --> 01:16:36,480
अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में अनेकों नदियां समा जाती है। उनसे समुद्र विचलित

1099
01:16:36,480 --> 01:16:40,800
नहीं होता। वैसे ही स्थिर बुद्धि वाले में भोग समा जाते हैं। यानी गृहस्ती

1100
01:16:40,800 --> 01:16:44,800
साधक संतान उत्पत्ति भी करता है। परंतु अन्य स्त्रियों को माता बहन बेटी

1101
01:16:44,800 --> 01:16:48,800
की दृष्टि से देखता है। अपने धर्म से गिरता नहीं है। उसमें सब भोग

1102
01:16:48,800 --> 01:16:52,960
समा जाते हैं। वही साधक शांति को प्राप्त हो जाता है। अब देखिए

1103
01:16:52,960 --> 01:16:57,040
इसने पिछले प्रश्न पर दशरथ की पुत्री के लिए दशरथ महाराज

1104
01:16:57,040 --> 01:17:01,280
की पुत्री जो थी उनके लिए जो शंगी

1105
01:17:01,280 --> 01:17:05,520
ऋषि थे जो शांता उनकी पुत्री थी उनके लिए उनके साथ विवाह करने को

1106
01:17:05,520 --> 01:17:09,600
खंडन किया और यहां पर विवाह करने वाले व्यक्ति का भी समर्थन किया

1107
01:17:09,600 --> 01:17:13,840
कि वो भी जो है शांति को प्राप्त हो जाता है। भोग विलास में लिप्त

1108
01:17:13,840 --> 01:17:19,760
साधक शांति प्राप्त नहीं कर पाता।

1109
01:17:19,760 --> 01:17:23,920
केवल केवल भोग विलास में लिप्त ठीक है तो भोग भोग

1110
01:17:23,920 --> 01:17:28,000
उसमें समा जाते हैं जो विषयों में विचरण करते हुए भी

1111
01:17:28,000 --> 01:17:32,320
अपनी जो बुद्धि है वो परमात्मा में लगा के रखता है तो यहां पर इसने

1112
01:17:32,320 --> 01:17:36,880
स्वयं ही अपनी वो दशरथ जी का जो उदाहरण दिया उस बात का खंडन किया और जो मार्कंडेय

1113
01:17:36,880 --> 01:17:40,960
ऋषि वाला जो उदाहरण देता है उसका जो उदाहरण देता है कि उसके पित उसको कह रहे

1114
01:17:40,960 --> 01:17:45,280
थे तुम गस्थ गस्त हो जाओ और जो है हमको तर्पण वगैरह करो

1115
01:17:45,280 --> 01:17:49,280
श्राद्ध करो हमारा ये सब उसके पित कह कह रहे थे तो ये मना कर रहा था वहां पर

1116
01:17:49,280 --> 01:17:53,280
वहां पर ये मना करता है कि देखो देखो वो तो विरक्त है उसको घसीट रहा

1117
01:17:53,280 --> 01:17:58,280
है गस्थ में और यहां पर खुद कह रहा है ये व्यक्ति

1118
01:17:58,280 --> 01:18:02,480
कि गृहस्थ साधक संतान उत्प उत्पत्ति भी करता

1119
01:18:02,480 --> 01:18:06,560
है अन्य स्त्रियों को माता बहन बेटी की दृष्टि से देखता है अपने धर्म से

1120
01:18:06,560 --> 01:18:10,800
गिरता नहीं है उसमें सब भोग समा जाते हैं और ऐसा साधक

1121
01:18:10,800 --> 01:18:14,880
शांति को प्राप्त हो जाता है हो गया रामपाल के द्वारा ही रामपाल

1122
01:18:14,880 --> 01:18:19,680
का खंडन कितनी अच्छी बात है जो पवित्र आत्मा

1123
01:18:19,680 --> 01:18:23,920
संपूर्ण कामनाओं को त्याग करे 71 का अर्थ बताया जा रहा है जो

1124
01:18:23,920 --> 01:18:28,800
रामपाल के अनुसार उसका जो उसने जो कचरा किया है

1125
01:18:28,800 --> 01:18:33,040
तो जो पवित्र आत्मा संपूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममता रहित अहंकार

1126
01:18:33,040 --> 01:18:34,880
रहित और स्प्र

1127
01:18:34,880 --> 01:18:39,040
रहित यानी इच्छा रहित जीवन यापन करता है वह शांति को प्राप्त हो जाता है। यहां

1128
01:18:39,040 --> 01:18:43,360
पर भी समत्व समत्व बुद्धि की बात की गई है। ठीक है?

1129
01:18:43,360 --> 01:18:47,440
तो यानी कि लाभ हानि का खंडन करके दो 71 श्लोक का खंडन

1130
01:18:47,440 --> 01:18:51,440
भी हो गया। ठीक है? यहां

1131
01:18:51,440 --> 01:18:55,840
पर भी समत्व बुद्धि की बात हो रही है। क्यों हो रही है? क्योंकि ममता रहित,

1132
01:18:55,840 --> 01:18:59,920
अहंकार रहित, स्प्र रहित, इच्छा रहित जीवन यापन करता

1133
01:18:59,920 --> 01:19:04,000
व शांति को प्राप्त हो जाता है। समत बुद्धि की बात हो रही है। और 72

1134
01:19:04,000 --> 01:19:08,720
में क्या कहा गया है? इस स्थिति को प्राप्त साधक

1135
01:19:08,720 --> 01:19:12,720
अंत समय तक अज्ञान वश यहां पर

1136
01:19:12,720 --> 01:19:17,040
दोबारा आ गया। देखिए मैंने कहा ना पूरे प्रकरण में जीव को प्रपंच

1137
01:19:17,040 --> 01:19:21,600
रूपी संसार में फसाने वाली मुख्य चीज क्या है? मुख्य तत्व क्या है? अविद्या

1138
01:19:21,600 --> 01:19:25,840
यहां पे फिर आ गया कि साधक अंत समय तक अज्ञान वश नहीं होता।

1139
01:19:25,840 --> 01:19:31,840
अंतकाल में इसी स्थिति में रहकर ब्रह्म निर्माण

1140
01:19:31,880 --> 01:19:36,080
वृक्षति उस परमेश्वर के धाम को प्राप्त हो जाता है।

1141
01:19:36,080 --> 01:19:40,160
ब्रह्म हम परमेश्वर के धाम को प्राप्त

1142
01:19:40,160 --> 01:19:44,240
हो जाता है। तो यहां पर किसकी बात हो

1143
01:19:44,240 --> 01:19:48,240
रही है? परमेश्वर की। इसने मान लिया ब्रह्म

1144
01:19:48,240 --> 01:19:50,080
के नाम से ब्रह्म निर्वाणम

1145
01:19:50,080 --> 01:19:54,160
रिच्छति उस परमेश्वर के धाम को प्राप्त हो जाता है।

1146
01:19:54,160 --> 01:20:00,160
अच्छा अब एक बात और आती है यहां पर इच्छति से अच्छा याद

1147
01:20:00,920 --> 01:20:06,280
आया। देखिए इसमें कहा गया है

1148
01:20:06,280 --> 01:20:08,520
अधिगच्छति।

1149
01:20:08,520 --> 01:20:14,320
अधिगच्छति अब गच्छति का अर्थ क्या होना चाहिए?

1150
01:20:14,320 --> 01:20:17,240
72 में

1151
01:20:17,240 --> 01:20:21,880
अधि 72वा श्लोक दिखाइए जरा अच्छा 71वा

1152
01:20:21,880 --> 01:20:26,080
है 71वा श्लोक है जो देखिए 71

1153
01:20:26,080 --> 01:20:30,080
वे श्लोक में देखिए आना जाना इनको बताते

1154
01:20:30,080 --> 01:20:33,160
हैं आना

1155
01:20:33,160 --> 01:20:37,520
जाना 71वा श्लोक लगाइए जरा हां ये देखिए

1156
01:20:37,520 --> 01:20:42,000
क्या शब्द आया है अधिगच्छति ठीक है

1157
01:20:42,000 --> 01:20:46,240
प्राप्त होता है। परमेश्वर के परमधाम

1158
01:20:46,240 --> 01:20:50,560
को प्राप्त होता है। अधिगच्छति शांति को प्राप्त

1159
01:20:50,560 --> 01:20:54,800
होता है। अब यहां गच्छति का अर्थ होता है जाना। तो इसने क्यों मान लिया

1160
01:20:54,800 --> 01:20:58,840
यहां पर कि शांति को प्राप्त होता है। 271 में इनका अर्थ बता दो

1161
01:20:58,840 --> 01:21:02,680
जरा।

1162
01:21:02,680 --> 01:21:06,720
देखो 271 का अर्थ दिखाओ। वह शांति को प्राप्त

1163
01:21:06,720 --> 01:21:10,880
होता है। इससे जस्ट ऊपर वाला। हां। येलो वाला। इसकी लास्ट लाइन दिखाइए।

1164
01:21:10,880 --> 01:21:15,520
लास्ट लाइन। वह शांति को प्राप्त होता है। ये देखिए

1165
01:21:15,520 --> 01:21:19,600
वह शांति को प्राप्त होता है। अब ये गच्छति से इन्होंने शांति को

1166
01:21:19,600 --> 01:21:24,320
प्राप्त होना क्यों मान लिया? हम

1167
01:21:24,320 --> 01:21:28,640
ठीक है इसको नोट करके रखिएगा। ब्रज में जो कहते हैं ना आना जाना।

1168
01:21:28,640 --> 01:21:32,640
कम का मतलब आना और गो का मतलब जाना। अब यहां गच्छति का अर्थ

1169
01:21:32,640 --> 01:21:36,720
क्यों मान लिया? इनसे पूछो। अधिगच्छति का अर्थ तुमने शांति को

1170
01:21:36,720 --> 01:21:42,720
प्राप्त होना क्यों माना? शांति से जाना क्यों नहीं माना?

1171
01:21:42,960 --> 01:21:47,160
आगे देखिए इसने क्या किया है 72 वे के अर्थ

1172
01:21:47,160 --> 01:21:51,280
में कि ब्रह्म निर्वाणम वृच्छति

1173
01:21:51,280 --> 01:21:55,360
तो रिच्छति का अर्थ प्राप्त

1174
01:21:55,360 --> 01:21:59,440
हो जाता है और ब्रह्म का

1175
01:21:59,440 --> 01:22:03,440
अर्थ जिसने माना है उस परमेश्वर के धाम को प्राप्त हो जाता है। रामपाल ने

1176
01:22:03,440 --> 01:22:07,600
मान लिया। इसके में आइए रामपाल वाले अर्थ

1177
01:22:07,600 --> 01:22:12,360
में आइए। रामपाल ने

1178
01:22:12,360 --> 01:22:16,720
स्वयं 72 वे श्लोक का अर्थ करते समय ब्रैकेट

1179
01:22:16,720 --> 01:22:21,040
में लिखा है ब्रह्म निर्वाणमति यानी ब्रह्म शब्द से इसने

1180
01:22:21,040 --> 01:22:25,400
क्या माना उस परमेश्वर के धाम को प्राप्त होता है यानी

1181
01:22:25,400 --> 01:22:29,680
परमेश्वर ब्रह्म का अर्थ परमेश्वर ध्यान रखने

1182
01:22:29,680 --> 01:22:33,920
वाली बात है रामपाल ने अपनी जो भगवत

1183
01:22:33,920 --> 01:22:38,160
गीता का अर्थ करते हुए जो किताब लिखी है

1184
01:22:38,160 --> 01:22:42,240
गरिमा गीता की उसके पष्ठ संख्या 36 पे ब्रह्म को

1185
01:22:42,240 --> 01:22:46,800
माना है। ब्रह्म कौन है? परमेश्वर। देख लीजिए स्क्रीन पर है आपके।

1186
01:22:46,800 --> 01:22:50,840
इसने अपनी लुटिया खुद डुबोई है। हर पेज पे हर पृष्ठ पे अपनी लुटिया डुबोता रहता

1187
01:22:50,840 --> 01:22:55,280
है। तो इसने मान लिया।

1188
01:22:55,280 --> 01:22:58,000
अब आगे क्या है? दो श्लोक 69 से 72 में

1189
01:22:58,000 --> 01:23:02,160
लिखा है कि रात्रि में दो प्रकार के प्राणी ये अपनी उसको बड़ा बताने

1190
01:23:02,160 --> 01:23:06,680
के लिए पता नहीं क्यों बार-बार चीजों को रिपीट भी करता

1191
01:23:06,680 --> 01:23:10,880
है। केवल वही प्राणी इसकी

1192
01:23:10,880 --> 01:23:14,960
इस पैराग्राफ की सेकंड लास्ट लाइन पे लाइए जरा जो नेक्स्ट

1193
01:23:14,960 --> 01:23:20,120
पैराग्राफ है उसकी सेकंड लास्ट लाइन नीचे से

1194
01:23:20,120 --> 01:23:25,760
दूसरी हां सेकंड लास्ट सेकंड लास्ट

1195
01:23:25,760 --> 01:23:29,760
हां ये ये वाली ये हां इसमें देखिए

1196
01:23:29,760 --> 01:23:34,440
क्या लिखा है इससे जस्ट ऊपर जस्ट

1197
01:23:34,440 --> 01:23:39,240
ऊपर इस लाइन से जस्ट ऊपर

1198
01:23:39,240 --> 01:23:43,760
हम हां ये देखिए ब्रह्म का अर्थ क्या है

1199
01:23:43,760 --> 01:23:47,840
वह प्राणी ब्रह्म पूर्ण परमात्मा पूर्ण ब्रह्म को

1200
01:23:47,840 --> 01:23:52,080
प्राप्त हो जाता है तो ब्रह्म का अर्थ क्या है पूर्ण

1201
01:23:52,080 --> 01:23:56,320
परमात्मा पूर्ण ब्रह्म ठीक है

1202
01:23:56,320 --> 01:24:00,640
और आगे इसने अपमान किया है ब्रह्मा विष्णु महेश से

1203
01:24:00,640 --> 01:24:04,960
काम सेक्स वस नहीं हुआ वो हम देखेंगे

1204
01:24:04,960 --> 01:24:08,960
आगे के प्रश्नों में आगे जब अपमान किया वो

1205
01:24:08,960 --> 01:24:13,040
एक अलग चीजें हैं ब्रह्मा विष्णु

1206
01:24:13,040 --> 01:24:17,120
महेश सेक्स जो है कंट्रोल नहीं हुआ तो

1207
01:24:17,120 --> 01:24:21,280
यानी कि जो सेक्स यानी जो भोग वाला

1208
01:24:21,280 --> 01:24:25,920
पदार्थ है यह उनसे इतर है और उन पर हावी है।

1209
01:24:25,920 --> 01:24:30,240
यानी कि एक और कोई जो ये कहते हैं ब्रह्मा विष्णु महेश स्वयं सतरज

1210
01:24:30,240 --> 01:24:34,880
तम है। तो जब वो स्वयं तमो तमोगुण है तो तमोगुणी

1211
01:24:34,880 --> 01:24:38,880
तमोगुणी उससे प्रभावित थोड़ी होंगे भाई वो खुद तमोगुण तो दूसरे को प्रभावित

1212
01:24:38,880 --> 01:24:43,200
करेंगे। स्वयं प्रभावित है यानी कि कोई और उनको कंट्रोल कर रहा है। तमोगुणी

1213
01:24:43,200 --> 01:24:47,440
तमोगुण उनको कंट्रोल कर रहा है। तो ये तो रही इसकी वो मगर

1214
01:24:47,440 --> 01:24:51,520
आज के लिए इतना ही। दूसरा अध्याय हमारा पूर्ण हुआ है और

1215
01:24:51,520 --> 01:24:55,760
इसमें कुछ नहीं तो मेरे ख्याल से कम से कम 30 से 40

1216
01:24:55,760 --> 01:24:59,760
चीजें हमें प्राप्त हुई है। और पढ़ते अगर इसको विस्तार से तो और

1217
01:24:59,760 --> 01:25:04,840
भी बहुत कुछ प्राप्त होता। लिंक दे दीजिए यदि कोई आना चाहे तो आ सकता

1218
01:25:04,840 --> 01:25:09,120
है। हां यहां पे यहां पे ब्रह्म का अर्थ इसने

1219
01:25:09,120 --> 01:25:13,520
काल नहीं माना। यही मैं कह रहा हूं। पष्ठ संख्या 36 गरिमा

1220
01:25:13,520 --> 01:25:17,920
गीता की श्लोक 72 में

1221
01:25:17,920 --> 01:25:22,280
ब्रह्म का अर्थ इसने काल नहीं माना है। ठीक

1222
01:25:22,280 --> 01:25:26,480
है? इसने ब्रह्म का अर्थ पूर्ण परमात्मा

1223
01:25:26,480 --> 01:25:30,280
माना है। और

1224
01:25:30,280 --> 01:25:34,400
ऊपर क्या कहते हैं? एक जगह और इसने ब्रह्म का अर्थ

1225
01:25:34,400 --> 01:25:38,480
जो है काल नहीं माना है। इसी पृष्ठ में

1226
01:25:38,480 --> 01:25:42,480
हां यह दो 72 में ब्रह्म का अर्थ इसने काल नहीं माना है। यही

1227
01:25:42,480 --> 01:25:46,640
है। ठीक है? तो इसी के द्वारा ये पता चल गया

1228
01:25:46,640 --> 01:25:51,200
ब्रह्म का अर्थ क्या है? पूर्ण परमात्मा पहली बात। और

1229
01:25:51,200 --> 01:25:55,200
बहुत सी चीजें हैं। फिर हम बुलेट पॉइंट में नोट करेंगे अगले सेशन में। में

1230
01:25:55,200 --> 01:25:59,360
अगला सेशन हम अगले हफ्ते ही करेंगे क्योंकि इतना समय नहीं है कि हर बार

1231
01:25:59,360 --> 01:26:03,360
हम जो है अह बार-बार सप्ताह में

1232
01:26:03,360 --> 01:26:09,360
दो बार हम आ जाए लाइव।

1233
01:26:11,760 --> 01:26:16,640
यहां इसने काल का अर्थ वो लिया है।

1234
01:26:16,640 --> 01:26:20,880
अंत काल ही संहार करता है। खैर अगले उसमें बुलेट पॉइंट्स

1235
01:26:20,880 --> 01:26:26,880
में हम लोग देख लेंगे। अभी कोई आना चाहता है तो आ सकता है।

1236
01:26:28,480 --> 01:26:33,120
वैचारिक मतभेद के निमित्त किसी को आज की जो हमने यह

1237
01:26:33,120 --> 01:26:37,120
दूसरा अध्याय समाप्त हो गया। इसका जो कचरा है इसने जो कचरा किया

1238
01:26:37,120 --> 01:26:41,280
है रामपाल ने और आपको वो

1239
01:26:41,280 --> 01:26:47,280
दे दिया गया है।

1240
01:26:48,160 --> 01:26:54,160
लाइव स्ट्रीम के लिए लिंक दे दिया गया है। अगर कोई आना चाहे तो आ सकता है।

1241
01:27:12,720 --> 01:27:18,360
क्या क्या बातें कह रहे

1242
01:27:18,360 --> 01:27:24,360
हैं आज भी बहुत से रोचक तथ्य हमें प्राप्त हुए हैं।

1243
01:27:25,920 --> 01:27:29,920
आगे तीसरा अध्याय है। उसमें भी काफी सारी बातें जानने को

1244
01:27:29,920 --> 01:27:34,160
मिलेगी। और यदि कोई हमें सहायता

1245
01:27:34,160 --> 01:27:39,040
करने का इच्छुक है, वह आर्थिक बल प्रदान कर सकता है। हमें

1246
01:27:39,040 --> 01:27:45,040
यहां पर आपके सामने डिटेल्स दी जा रही

1247
01:27:49,960 --> 01:27:54,000
हैं। चलिए ठीक है। फिर आज के लिए इतना ही

1248
01:27:54,000 --> 01:28:00,000
और

1249
01:28:01,920 --> 01:28:06,280
कोई आना नहीं चाहता है। फिलहाल मेरे ख्याल से किसी में

1250
01:28:06,280 --> 01:28:10,400
इतना साहस नहीं है। किसी ने अपनी माता जी का निष्ठा

1251
01:28:10,400 --> 01:28:14,560
पूर्वक दूध नहीं पिया है जो वो आकर के सामना कर सके और

1252
01:28:14,560 --> 01:28:18,800
जिसकी वो भक्ति करने को कह रहा है। रामपाल के पथ

1253
01:28:18,800 --> 01:28:23,040
पर चलने को रामपाल की खीर खाने को रामपाल की भक्ति करने को सिखा

1254
01:28:23,040 --> 01:28:27,760
रहा है। वह आकर के यहां नहीं रख सकता है अपनी बात

1255
01:28:27,760 --> 01:28:31,920
सामना करते हुए। यह सोचने वाली बात है। इतना

1256
01:28:31,920 --> 01:28:36,000
बड़ा करोड़ों लोगों का इतना बड़ा ग्रुप उसमें से कोई

1257
01:28:36,000 --> 01:28:40,160
नहीं है। कोई माई का लाल ऐसा नहीं है जो सामने आ सके। अच्छा है।

1258
01:28:40,160 --> 01:28:41,040
यह भय होना

1259
01:28:41,040 --> 01:28:45,600
चाहिए।

1260
01:28:45,600 --> 01:28:50,240
ठीक है? तो सभी को जय श्री राम। समय देने के लिए आभार आप सभी का

1261
01:28:50,240 --> 01:28:55,040
और अगला सेशन हम फिर से अगले बुधवार को ही रखेंगे।

1262
01:28:55,040 --> 01:28:59,120
वहां पे फिर तीसरा अध्याय हम स्टार्ट करेंगे। इसने क्या-क्या कचरा किया है वो

1263
01:28:59,120 --> 01:29:03,280
सब हम देखेंगे। सभी को जय श्री राम। आया

1264
01:29:03,280 --> 01:29:06,800
है क्या कोई?

1265
01:29:06,800 --> 01:29:12,800
चेहरा दिखाएं। अरर्नव

1266
01:29:13,720 --> 01:29:19,720
जी अरर्नव जी चेहरा दिखाएं।

1267
01:29:32,360 --> 01:29:38,360
महामूर्ख क्या लिखा है ये महामूर्ख रामपाल

1268
01:29:48,160 --> 01:29:52,480
कोई जेल से वीडियो कॉल नहीं करता है। तब इनको मूर्ख

1269
01:29:52,480 --> 01:29:57,400
बनाया जाता है। रामपाल अपनी रिहाई के लिए तरसता है

1270
01:29:57,400 --> 01:30:03,400
भाई। ये सब उसके नाम पर अब वो चल रहा है बस

1271
01:30:06,840 --> 01:30:10,880
धंधा। तो ठीक है सभी को जय श्री राम। अगले सप्ताह

1272
01:30:10,880 --> 01:30:15,040
बुधवार को मिलते हैं। एक अर्नभ सरकार करके आए हैं। पर वह अपना चेहरा

1273
01:30:15,040 --> 01:30:19,040
दिखाने में असमर्थ हैं। संभवत कोई कारण है। जय श्री राम सभी।
