1
00:00:01,280 --> 00:00:05,360
तो सभी को जय श्री राम। आशा करते

2
00:00:05,360 --> 00:00:10,760
हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे।

3
00:00:10,760 --> 00:00:15,000
और आपको यह जो सीरीज हमने चालू की

4
00:00:15,000 --> 00:00:19,360
है वर्ड टू वर्ड इनके इन्होंने जो गीता

5
00:00:19,360 --> 00:00:24,000
का अनर्थ किया है रामपाल ने।

6
00:00:24,000 --> 00:00:28,160
तो उसका एक-एक शब्द देखते

7
00:00:28,160 --> 00:00:32,240
चल रहे हैं हम। हमने पिछले जो सेशन

8
00:00:32,240 --> 00:00:37,560
वन हुआ था पिछले एपिसोड में तो उसमें जो

9
00:00:37,560 --> 00:00:41,840
इन्होंने रामपाल ने भगवत गीता का जो अपार्थ

10
00:00:41,840 --> 00:00:45,840
करना शुरू किया है वो किया है 2.6 से मतलब 2.16 से

11
00:00:45,840 --> 00:00:49,840
पहले तक इसने कुछ नहीं कहा। हालांकि उसमें युद्ध भूमि का वर्णन

12
00:00:49,840 --> 00:00:53,920
हो रहा है और युद्ध भूमि का वर्णन

13
00:00:53,920 --> 00:00:58,080
में कोई ऐसा दार्शनिक पक्ष भी नहीं है। धर्म अधर्म का पक्ष नहीं है। वहां पर

14
00:00:58,080 --> 00:01:02,160
वस्तुनिष्ठ जानकारियां है कि ऐसा है ऐसा है। सभी को जय श्री राम। सभी को

15
00:01:02,160 --> 00:01:06,320
जय श्री राम। तो इसने उसमें हस्तक्षेप नहीं

16
00:01:06,320 --> 00:01:10,760
किया और सीधे इसने 2.6 से अपना

17
00:01:10,760 --> 00:01:15,040
जो कूड़े वाला कूड़ा अपना फैलाना

18
00:01:15,040 --> 00:01:16,480
गंदगी फैलाना इसने शुरू

19
00:01:16,480 --> 00:01:18,480
किया। तो 2.16

20
00:01:18,480 --> 00:01:22,960
से ले 2.30 तक हमने पिछले एपिसोड में कवर किया था।

21
00:01:22,960 --> 00:01:27,440
उसमें जो कुछ बुलेट पॉइंट्स है वह हम आपको यहां बता दे रहे हैं।

22
00:01:27,440 --> 00:01:31,680
सबसे पहले इसने यह मान लिया कि आत्मा

23
00:01:31,680 --> 00:01:35,760
नित्य नहीं है। अनित्य है। इसने

24
00:01:35,760 --> 00:01:39,760
2.10 के आसपास जो सबसे पहला हिंदी अर्थ लिखा है तो

25
00:01:39,760 --> 00:01:44,920
उसमें इसने माना है कि आत्मा की भी उत्पत्ति होती है

26
00:01:44,920 --> 00:01:50,200
और परमात्मा से भिन्न कोई भी ऐसा नहीं है

27
00:01:50,200 --> 00:01:54,560
जो सत हो। जो सदैव मतलब सदैव

28
00:01:54,560 --> 00:01:58,560
था है और रहेगा। तो क्या है कि आत्मा को कई जगह सनातन कहा गया है।

29
00:01:58,560 --> 00:02:02,960
देही नित्यम कहा गया है दोती में और

30
00:02:02,960 --> 00:02:07,280
बहुत सी जगह आत्मा को सनातन कहा गया है। तो यहां पर इसका ये झोल पकड़

31
00:02:07,280 --> 00:02:11,280
में आ जाता है। आत्मा सनातन है। वो थी है और रहेगी। तो

32
00:02:11,280 --> 00:02:15,280
इसने कहा कि परमात्मा से भिन्न और कुछ भी नहीं था। अब बात ये आती है कि

33
00:02:15,280 --> 00:02:19,520
परमात्मा से भिन्न और कुछ भी नहीं था। तो इसको ये मानना

34
00:02:19,520 --> 00:02:23,920
पड़े। फिर ये जो आत्मा उत्पन्न हुई है परमात्मा से ही हुई है।

35
00:02:23,920 --> 00:02:28,080
है ना? तो परमात्मा से उत्पन्न होने के बाद भी इसने

36
00:02:28,080 --> 00:02:32,160
आत्मा को जब नित्य नहीं माना है तो परमात्मा से

37
00:02:32,160 --> 00:02:33,600
परमात्मा से निकला होने

38
00:02:33,600 --> 00:02:37,680
के बाद भी क्योंकि अद्वैत जो दर्शन है उसके उसके भिन्न कोई भी

39
00:02:37,680 --> 00:02:41,680
दर्शन जो जीव और परम ब्रह्म में भेद मानता

40
00:02:41,680 --> 00:02:45,760
है तो वो कोई भी दर्शन जो है ये नहीं कहता कि आत्मा जो है नित्य

41
00:02:45,760 --> 00:02:49,760
नहीं है चाहे द्वैत हो चाहे विशिष्टा द्वत हो कोई भी दर्शन ऐसा नहीं

42
00:02:49,760 --> 00:02:53,760
ऐसा नहीं कहता मगर ये परमात्मा से आत्मा को भिन्न भी मान रहे हैं और

43
00:02:53,760 --> 00:02:57,840
फिर ये भी कह रहे हैं कि जो आत्मा है वो नित्य नहीं है, सनातन नहीं है। तो फिर अब इसमें

44
00:02:57,840 --> 00:03:02,000
दिक्कत क्या है कि आत्मा कहां से निकली? परमात्मा से ही निकली। ब्रह्म

45
00:03:02,000 --> 00:03:06,240
से ही निकली। तो फिर आत्मा में वो सारी क्वालिटीज कैसे नहीं आई? जो ब्रह्म

46
00:03:06,240 --> 00:03:10,240
में थी। फिर ये सब चीजें हो जाएंगी। तो आत्मा फिर इसके अलावा

47
00:03:10,240 --> 00:03:14,240
जो इनकी जो फेरी टेल्स हैं जो परिकथाएं हैं इनकी। उसमें

48
00:03:14,240 --> 00:03:18,800
क्या है कि जैसे सृष्टि की रचना होती है।

49
00:03:18,800 --> 00:03:22,880
तो सृष्टि की रचना में इन्होंने बताया कि काल उत्पन्न होता है। काल भी सदैव से नहीं

50
00:03:22,880 --> 00:03:26,960
था। पहले से नहीं था। इनके कुछ लोग आकर के कुतर्क करते हैं कि काल पहले

51
00:03:26,960 --> 00:03:31,040
से था, सदैव था। तो काल भी पहले से नहीं था। परमात्मा से भिन्न इसने

52
00:03:31,040 --> 00:03:35,200
बोला है कि कोई भी नित्य नहीं है। ठीक है?

53
00:03:35,200 --> 00:03:39,760
तो अब दिक्कत ये आती है कि जब आत्मा

54
00:03:39,760 --> 00:03:44,440
एक बार उत्पन्न हो गई। उत्पन्न होने के

55
00:03:44,440 --> 00:03:50,160
बाद काल भी उत्पन्न हुआ और काल ने सृष्टि बनाई।

56
00:03:50,160 --> 00:03:54,160
काल की वजह से यह जो आत्माएं उत्पन्न हुई थी यह जाल में फसी। फिर काल

57
00:03:54,160 --> 00:03:58,160
मरता भी है तो कभी ना कभी जब काल मरेगा अगर इनको वैसे

58
00:03:58,160 --> 00:04:02,240
मोक्ष नहीं मिला अपने कर्मों से तो कभी ना कभी काल मरेगा तो इनको मोक्ष मिलेगा।

59
00:04:02,240 --> 00:04:06,400
तो इन प्रश्नों का जवाब है ही नहीं। पहली बात फिर भी यह मानना तो पड़ेगा ना हमें कि काल

60
00:04:06,400 --> 00:04:10,480
मरता है तो मोक्ष उस समय सभी जीवात्माओं को मिल जाता है। तो

61
00:04:10,480 --> 00:04:14,480
जब सभी जीवात्माओं को मोक्ष मिल जाता है तो उसके बाद काल

62
00:04:14,480 --> 00:04:18,720
जब दोबारा दोबारा जन्म लेता है तो उसके जन्म लेते समय यह जो

63
00:04:18,720 --> 00:04:22,800
सतलोक गई हुई आत्माएं हैं। यहीं से उठाता है वह अपना माल

64
00:04:22,800 --> 00:04:27,280
या फिर नया उत्पन्न किया जाता है। नया प्रोडक्शन हाउस चालू किया जाता है उसके लिए।

65
00:04:27,280 --> 00:04:31,360
तो ये सब चीजें सवाल खड़े हो जाते हैं। इसके साथ

66
00:04:31,360 --> 00:04:35,520
ही साथ काल से रिलेटेड एक बुलेट पॉइंट और है। वो क्या

67
00:04:35,520 --> 00:04:39,520
है कि काल जो है वो समय को भी कहा जाता

68
00:04:39,520 --> 00:04:43,920
है। तो बात यह है कि काल की गणना

69
00:04:43,920 --> 00:04:49,560
माना जा सकता है कि वहां से शुरू होती है जब कल्प चालू होता है। परंतु

70
00:04:49,560 --> 00:04:53,680
क्या जब ईश्वर सृष्टि सृष्टि की रचना कर

71
00:04:53,680 --> 00:04:57,680
रहा है उस समय क्या समय नहीं है उस समय क्या टाइम नहीं

72
00:04:57,680 --> 00:05:01,680
बीत रहा है बीत रहा है तो वो कौन है वो भी तो काल है तो ये भी

73
00:05:01,680 --> 00:05:05,200
एक क्योंकि काल का अर्थ समय भी है समय को भी काल कहा

74
00:05:05,200 --> 00:05:09,440
गया है और इनका जो काल है वो वही है वो जो राक्षस

75
00:05:09,440 --> 00:05:14,080
जैसा है जो लोगों को फंसाता है आत्माओं को खाता है वो

76
00:05:14,080 --> 00:05:18,320
वो नहीं है पूर्ण ईश्वर का नाम काल नहीं है जो हर जगह यत्र तत्र सर्वत्र

77
00:05:18,320 --> 00:05:22,480
है वो नहीं है तो फिर प्रश्न ये आ जाता है कि उस समय कौन सा काल था

78
00:05:22,480 --> 00:05:26,560
जब सृष्टि की रचना हो रही थी तो उस समय कौन सा काल था जब ये

79
00:05:26,560 --> 00:05:30,640
काल नहीं था जो इनका तथाकथित काल है इसके अलावा एक चीज और

80
00:05:30,640 --> 00:05:34,800
है कि आत्मा नित्य नहीं है तो उसके अंदर की प्यास

81
00:05:34,800 --> 00:05:38,800
नहीं बुझ सकती यहां से एक एक बुलेट पॉइंट और आता है कि आत्मा

82
00:05:38,800 --> 00:05:43,200
जब नित्य नहीं है आत्मा के अंदर प्यास किस बात की आ रही है सत

83
00:05:43,200 --> 00:05:47,440
स्वरूप हो जाने की मगर वह सत है ही नहीं वो नित्य है ही

84
00:05:47,440 --> 00:05:51,440
ना कभी ना कभी उसका भाव था तो जो

85
00:05:51,440 --> 00:05:55,520
दो 16 में आया ना कि असत वस्तु का कभी वो सत्ता

86
00:05:55,520 --> 00:05:59,680
नहीं होती और सत जो सत सत रूपी तत्व होता है उसका कभी

87
00:05:59,680 --> 00:06:03,680
अभाव नहीं होता पर इसका अभाव था यानी कि सत नहीं है परंतु इसके

88
00:06:03,680 --> 00:06:07,680
अंदर आत्मा के अंदर सत की प्यास तो आ रही है तो पहली बात तो प्यास क्यों

89
00:06:07,680 --> 00:06:12,080
आ रही है जब यह स्वयं सत्य नहीं है दूसरी बात इसकी प्यास रामपाल

90
00:06:12,080 --> 00:06:16,400
के अनुसार मोक्ष की प्यास नहीं बुझ सकती क्योंकि यह सत स्वरूप नहीं हो सकती

91
00:06:16,400 --> 00:06:20,480
पहली। इसके अलावा एक चीज और है कि जब जीव

92
00:06:20,480 --> 00:06:25,040
की चाह का विषय सिद्ध ही नहीं हो रहा है तो फिर ईश्वर को सिद्ध कहां से करेंगे?

93
00:06:25,040 --> 00:06:29,120
तो रामपाल का ईश्वर भी सिद्ध नहीं होता क्योंकि

94
00:06:29,120 --> 00:06:33,320
आत्मा जो है सत स्वरूप नहीं हो सकती। सत स्वरूप वही हो सकता है जो सत स्वरूप

95
00:06:33,320 --> 00:06:37,440
हो। तो ये आ गया एक। तो ना

96
00:06:37,440 --> 00:06:41,600
ही ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होगा और ना ही मोक्ष का कोई अस्तित्व सिद्ध होगा।

97
00:06:41,600 --> 00:06:45,680
यदि आत्मा को नित्य नहीं माना जाएगा। हालांकि शास्त्रों में भरभर के आत्मा को

98
00:06:45,680 --> 00:06:49,760
नित्य कहा गया है। मगर इनका जो यह ढोल की पोल है उस पर हम बात करते

99
00:06:49,760 --> 00:06:54,000
जा रहे हैं। अच्छा इसके बाद जो काल

100
00:06:54,000 --> 00:06:58,000
है वो नित्य नहीं है। ब्रह्मा विष्णु महेश भी नित्य नहीं है। किसी ना किसी समय पर वो

101
00:06:58,000 --> 00:07:02,560
नहीं थे। फिर हैं तो जब हैं तो वो कहां से आए हैं?

102
00:07:02,560 --> 00:07:06,560
क्या वो अलग है? क्या वो ईश्वर से ही निकले? अगर ईश्वर से निकले हैं तो फिर

103
00:07:06,560 --> 00:07:10,640
वही जब ईश्वर है तो फिर सारी पावर्स होनी चाहिए। ईश्वर

104
00:07:10,640 --> 00:07:14,720
ईश्वर के सभी गुण होने चाहिए क्योंकि ईश्वर पूर्ण है। उससे कुछ भी घटाया बढ़ाया नहीं जा

105
00:07:14,720 --> 00:07:18,880
सकता। ईश्वर में कुछ जाएगा तो भी ईश्वर की क्वांटिटी वही रहेगी और ईश्वर

106
00:07:18,880 --> 00:07:23,200
से कुछ निकलेगा तो निकले हुए की क्वांटिटी भी वही रहेगी। ठीक है?

107
00:07:23,200 --> 00:07:27,200
पूर्ण पूर्ण मददम। अच्छा जब

108
00:07:27,200 --> 00:07:31,280
काल एक बार मर गया और हमने देख लिया कि काल ने

109
00:07:31,280 --> 00:07:35,280
क्या किया था? तो फिर काल को दोबारा क्यों जन्म दिया जाता है? क्यों बनाया जाता है? क्यों

110
00:07:35,280 --> 00:07:35,780
बनने

111
00:07:35,600 --> 00:07:39,840
दिया जाता है? तो ये भी एक बुलेट पॉइंट आ गया था। पिछले सेशन

112
00:07:39,840 --> 00:07:43,840
में जो हमने बातें की थी। इसके अलावा अगला क्या है? इसके अनुसार

113
00:07:43,840 --> 00:07:48,480
ईश्वर ईश्वर जो है वह कण-कण में व्याप्त नहीं है। रामपाल के अनुसार सर्वव्यापक

114
00:07:48,480 --> 00:07:52,480
ईश्वर नहीं है। उसकी निराकार शक्ति जरूर व्याप्त है।

115
00:07:52,480 --> 00:07:56,720
जिस प्रकार से सूर्य की किरणें पूरे संसार को प्रकाशित करती हैं। पर सूर्य

116
00:07:56,720 --> 00:08:01,680
हर जगह नहीं होता। उसी प्रकार से ईश्वर है। उसकी निराकार शक्ति

117
00:08:01,680 --> 00:08:05,760
संसार भर में व्यवस्था करती है। अब इसमें एक

118
00:08:05,760 --> 00:08:09,720
बात यह आ जाती है।

119
00:08:09,720 --> 00:08:14,080
कि यदि ईश्वर यदि

120
00:08:14,080 --> 00:08:18,080
ईश्वर जैसे सूर्य है और सूर्य की रोशनी पूरे संसार को प्रकाशित कर

121
00:08:18,080 --> 00:08:22,080
रही है। परंतु सूर्य की ऊष्मा जहां पर सूर्य है वहां जितनी गर्म

122
00:08:22,080 --> 00:08:26,560
है जहां जितनी उसमें दाहकता है जहां उसका प्रकाश है

123
00:08:26,560 --> 00:08:30,640
जितना दूर वो प्रकाश की दूरी होती जा रही है उतना ही उसकी जो दाहकता

124
00:08:30,640 --> 00:08:34,640
है कम होती जा रही है। तो क्या इसी तरह का ईश्वर है कि ईश्वर से जो जो जितना

125
00:08:34,640 --> 00:08:38,720
दूर है उतना ही क्या कहते हैं? ईश्वर

126
00:08:38,720 --> 00:08:42,720
से जो जितना दूर है उतना ही ईश्वर की पावर उसके ऊपर

127
00:08:42,720 --> 00:08:46,960
जो नियंत्रण है वो कम होता जाएगा। तो दूसरी बात ये आ गई। इसके

128
00:08:46,960 --> 00:08:51,000
अलावा इसने एक षड्यंत्र और किया है

129
00:08:51,000 --> 00:08:55,120
कि दूसरे अध्याय के पता नहीं 10व अथवा

130
00:08:55,120 --> 00:08:59,280
हां 2.10 से 2.30 2.10 से दूसरे

131
00:08:59,280 --> 00:09:03,440
अध्याय के दव श्लोक से और दूसरे अध्याय के 30व श्लोक

132
00:09:03,440 --> 00:09:07,760
तक हमने पिछला सेशन किया था क्योंकि दूसरे अध्याय का 16वा नहीं दव

133
00:09:07,760 --> 00:09:11,840
श्लोक से इसने रामपाल ने अपार्थ करना भगवत गीता का

134
00:09:11,840 --> 00:09:15,920
शुरू किया है। तो 2.10 से 2.30 तक पिछला सेशन है। जिसने

135
00:09:15,920 --> 00:09:20,680
ना देखा वह देख ले। बुलेट पॉइंट्स जो है मुख्य पॉइंट वो हम यहां बता दे रहे

136
00:09:20,680 --> 00:09:24,800
हैं। इसने क्या किया है? 2.10 का अर्थ करते समय पंडित

137
00:09:24,800 --> 00:09:28,880
और विद्वान को अलग-अलग बताया। जबकि वहां पर दो बार पंडित शब्द

138
00:09:28,880 --> 00:09:32,880
आया है। हम फिर इसने क्या किया? पंडित अलग होते हैं, विद्वान

139
00:09:32,880 --> 00:09:37,520
अलग होते हैं। मतलब एक जो जो वो है ना द्वेष

140
00:09:37,520 --> 00:09:41,680
ब्राह्मणों के प्रति, पंडितों के प्रति तो वो इसमें दिखाई देता है।

141
00:09:41,680 --> 00:09:44,840
इसके साथ ही साथ क्या

142
00:09:44,840 --> 00:09:48,960
है? बिना प्रसंग के हां इसके साथ ही साथ हमने

143
00:09:48,960 --> 00:09:53,680
ये देखा कि जब वहां पर अर्जुन अपने नाते रिश्तेदारों को देख के

144
00:09:53,680 --> 00:09:57,680
युद्ध भूमि में और हथियार डालने लगता है, शस्त्र छोड़ने लगता

145
00:09:57,680 --> 00:10:02,160
है तो भगवान उसको यह बता रहे हैं कि तुम किसी को मारते नहीं हो। ये सभी जीवात्माएं

146
00:10:02,160 --> 00:10:06,160
नित्य हैं। आत्मा के गुण बता रहे हैं। विवेचना कर रहे हैं कि आत्मा को तुम मारते

147
00:10:06,160 --> 00:10:10,240
नहीं हो। और उसको कारण बता रहे हैं अलग-अलग कि क्यों तेरे मारने से कोई

148
00:10:10,240 --> 00:10:14,240
नहीं मरता है। यह नित्य है। और अगर तुम यह सोच के मार रहे हो कि

149
00:10:14,240 --> 00:10:18,320
तुम उसके शरीर को बचा रहे हो तो शरीर का नष्ट होना निश्चित है। इसलिए भी तुम्हारा

150
00:10:18,320 --> 00:10:23,040
इनको इनके शरीर मात्र को नष्ट करने के लिए दुखी होना

151
00:10:23,040 --> 00:10:27,320
वो नहीं है। आवश्यक नहीं है। तो

152
00:10:27,320 --> 00:10:31,440
ये जब बोध करा रहे हैं तो उस बीच में परमात्मा की

153
00:10:31,440 --> 00:10:35,600
बात क्यों आ रही है? हालांकि वहां पर और भी बातें हैं जिससे कि सिद्ध होता है कि

154
00:10:35,600 --> 00:10:40,000
वहां पर परमात्मा की नहीं आत्मा की बात हो रही है। जैसे आत्मा को जब नित्य कहा गया तो राम रामपाल

155
00:10:40,000 --> 00:10:44,080
ने कह दिया कि भाई आत्मा जो यहां आत्मा की नहीं परमात्मा की बात हो रही

156
00:10:44,080 --> 00:10:48,080
है। परमात्मा के अलावा कोई भी नित्य नहीं है। आत्मा को सर्व्यापक भी

157
00:10:48,080 --> 00:10:52,240
कहा गया है। तो वहां पर भी इसने कह दिया कि नहीं हां परमा सर्व्यापक

158
00:10:52,240 --> 00:10:56,800
केवल परमात्मा है। तो बात यह आ रही है कि

159
00:10:56,800 --> 00:11:00,960
बिना प्रसंग के वहां पर आत्मा की बात होते होते बीच में अचानक

160
00:11:00,960 --> 00:11:05,200
से परमात्मा की बात क्यों हुई? उससे क्या निकला? अगर कहोगे भक्ति बताना

161
00:11:05,200 --> 00:11:09,360
चाहते तो वहां पर बहुत दूर दूर तक भक्ति की बात भी नहीं की गई है कि तुम भक्ति करो

162
00:11:09,360 --> 00:11:14,040
भक्ति करो। ठीक है? दूसरी बात क्या है

163
00:11:14,040 --> 00:11:18,400
कि एक बात और इन्होंने स्पष्ट करने की कोशिश की है

164
00:11:18,400 --> 00:11:23,760
कि परमात्मा के बिना आत्मा को मारा जा सकता है।

165
00:11:23,760 --> 00:11:28,080
तो परमात्मा मतलब परमात्मा साथ में है इसलिए परमात्मा

166
00:11:28,080 --> 00:11:32,480
वो जो आत्मा है अविनाशी है। यह भी बहुत जरूरी बुलेट पॉइंट है। आत्मा

167
00:11:32,480 --> 00:11:36,960
परमात्मा के सानिध्य में है इसलिए आत्मा अविनाशी है। स्वतंत्र

168
00:11:36,960 --> 00:11:41,360
रूप से आत्मा अविनाशी नहीं है। ये कहीं पर नहीं कहा कि वो स्वतंत्र रूप से भी अविनाशी

169
00:11:41,360 --> 00:11:45,360
है। यदि कहा जाए कि परमात्मा का भजन करके ध्यान करके दुख दूर हो

170
00:11:45,360 --> 00:11:49,680
सकता है तो भजन की वहां पर कोई बात नहीं हुई है। पीछे और आगे के श्लोकों में दूर दूर तक

171
00:11:49,680 --> 00:11:53,920
तो फिर क्यों वहां पर अचानक से अ परमात्मा

172
00:11:53,920 --> 00:11:55,040
की बात आई जब आत्मा की

173
00:11:55,040 --> 00:11:59,280
बातें चल रही। दूसरी बात क्या है कि यदि आत्मा सदा परमात्मा

174
00:11:59,280 --> 00:12:03,320
के साथ होने के कारण अवध्य है तो वह काल के जाल में कैसे

175
00:12:03,320 --> 00:12:07,440
फंसी? जब वो परमात्मा के साथ है क्योंकि इनके हिसाब

176
00:12:07,440 --> 00:12:11,440
से जहां पर अर्जुन है, काल है वहां परमात्मा नहीं है।

177
00:12:11,440 --> 00:12:15,520
है ना? परमात्मा की निराकार शक्ति है। मगर ये क्या है कि ये

178
00:12:15,520 --> 00:12:19,680
तो परमात्मा के साथ में है। सदा परमात्मा के सानिध्य में है।

179
00:12:19,680 --> 00:12:23,760
साथ में है। तो परमात्मा के साथ में है तो फिर काल के

180
00:12:23,760 --> 00:12:27,760
जाल में नहीं फंसना चाहिए था क्योंकि परमात्मा तो वही है

181
00:12:27,760 --> 00:12:31,840
इनकी थ्योरी के हिसाब से जब परमात्मा अलग है वो अद्वैत और द्वैत ये

182
00:12:31,840 --> 00:12:35,840
विशिष्टा द्वैत इत्यादि को के पर्सपेक्टिव से ना देखें अभी इनकी जो

183
00:12:35,840 --> 00:12:40,000
थ्योरी है वो कहती है काल अलग है और ब्रह ब्रह ब्रह्म काल अलग

184
00:12:40,000 --> 00:12:44,000
है परमात्मा अलग है तो इनकी थ्योरी के हिसाब से वहां पर परमात्मा नहीं

185
00:12:44,000 --> 00:12:48,080
था नहीं था ना क्योंकि भगवान कृष्ण थे उन्होंने कहा

186
00:12:48,080 --> 00:12:52,080
कि उस परमात्मा की शरण में जा तो इनकी थ्योरी के हिसाब से वहां पर परमात्मा नहीं था। मगर यह मान

187
00:12:52,080 --> 00:12:57,600
रहे हैं कि था। तो अभी यहां से एक पॉइंट और उत्पन्न होगा बुलेट पॉइंट। मगर

188
00:12:57,600 --> 00:13:02,200
यदि परमात्मा के साथ इन्होंने माना है कि परमात्मा के साथ है

189
00:13:02,200 --> 00:13:06,240
आत्मा नित्य है तो इनको जो

190
00:13:06,240 --> 00:13:10,240
है फिर वह काल के जाल में कैसे फंस रही है? क्योंकि परमात्मा तो सदा

191
00:13:10,240 --> 00:13:14,240
उसके साथ है। यदि परमात्मा के सानिध्य में है तो उसे किसकी शरण

192
00:13:14,240 --> 00:13:18,400
में जाने को कहा? देखो ये बार-बार कहते हैं ना कि अरे वो तो अर्जुन तो पहले

193
00:13:18,400 --> 00:13:22,440
से ही अ भगवान श्री कृष्ण की शरण में था।

194
00:13:22,440 --> 00:13:26,640
तो जो ब्रज जो शब्द का उपयोग हुआ है वहां पर

195
00:13:26,640 --> 00:13:31,480
पहली बात तो इसको थोड़ा समझ लेते हैं। ब्रज जो क्रिया होती है धातु

196
00:13:31,480 --> 00:13:36,080
उसमें गत्यार्थक अर्थ भी होता है और

197
00:13:36,080 --> 00:13:40,120
ज्ञानार्थक अर्थ भी होता है। आप किसी के पास खड़े

198
00:13:40,120 --> 00:13:44,160
हैं तो आपको कोई गति नहीं करनी है। शारीरिक है

199
00:13:44,160 --> 00:13:49,000
ना? आपको चल चलना नहीं है। परंतु आपको

200
00:13:49,000 --> 00:13:53,040
मेंटली उनहीं के जिसके पास आप खड़े हैं। उनहीं की शरण को स्वीकार

201
00:13:53,040 --> 00:13:57,040
करना है। तो मेंटली आपको आपकी जो गति है वो मेंटली करनी

202
00:13:57,040 --> 00:14:01,440
है। तो उस मेंटली गति को ज्ञानार्थक अर्थ हो गया उसका ब्रज

203
00:14:01,440 --> 00:14:05,840
शब्द का। तो गत्यार्थक अर्थ नहीं है वहां पर। ब्रज

204
00:14:05,840 --> 00:14:09,840
का ज्ञानार्थक है कि आप उस ज्ञान को स्वीकार कर लो कि ये परमात्मा

205
00:14:09,840 --> 00:14:13,840
है। ठीक है? मगर फिर भी जब यह

206
00:14:13,840 --> 00:14:18,080
यह कहते हैं कि अर्जुन तो पहले से ही श्री कृष्ण की शरण में था

207
00:14:18,080 --> 00:14:22,160
तो फिर यहां पर इन्होंने यह माना है कि यदि ये यहां पर

208
00:14:22,160 --> 00:14:25,880
इन्होंने कई जगह दूसरे अध्याय में कई जगह यह माना है

209
00:14:25,880 --> 00:14:29,920
कि अ आत्मा जो है

210
00:14:29,920 --> 00:14:34,000
वो सदा परमात्मा के सानिध्य में रहती है। इसलिए अवध्य है। तो यानी कि

211
00:14:34,000 --> 00:14:38,320
अर्जुन उस समय भी आत्मा उसकी भी उस समय परमात्मा के सानिध्य

212
00:14:38,320 --> 00:14:42,400
में थी। तो जब परमात्मा के सानिध्य में थी तो उसके उसको जाने के लिए कहां कहा जा

213
00:14:42,400 --> 00:14:46,480
रहा है? यानी कि परमात्मा कोई और है। अकॉर्डिंग टू इनकी थ्योरी के

214
00:14:46,480 --> 00:14:50,800
अनुसार भी परमात्मा कोई और है। अच्छा अब एक चीज और कह रहे हैं ये कि

215
00:14:50,800 --> 00:14:54,800
एक चीज इन्होंने मान ली क्योंकि ये आगे काम आएगी बुलेट पॉइंट्स में वो क्या है कि

216
00:14:54,800 --> 00:14:59,440
अविनाशी का कभी नाश नहीं होता। क्योंकि इन्होंने कई जगह कहा है अमर।

217
00:14:59,440 --> 00:15:03,760
थोड़ी देर के लिए अमर तो उस पर हम बात करेंगे। जब इन्होंने खुद लिखा है कि अविनाशी

218
00:15:03,760 --> 00:15:07,920
का कभी नाश नहीं होता। परमात्मा के लिए यह

219
00:15:07,920 --> 00:15:12,080
शब्द का उपयोग हुआ है। देखिए दो 16 या 17 में 216

220
00:15:12,080 --> 00:15:16,280
या 17 में रामपाल ने गीता का अर्थ करते हुए

221
00:15:16,280 --> 00:15:20,440
उस कि शाश्वत तो वो

222
00:15:20,440 --> 00:15:24,640
है। है ना? उस परमात्मा को कहते हैं। तो

223
00:15:24,640 --> 00:15:28,640
परमात्मा के लिए उसका शब्द उसका उस शब्द का उपयोग हुआ है।

224
00:15:28,640 --> 00:15:32,640
दो 16 या 17 में 17 में हुआ शायद। तो उस शब्द का उपयोग

225
00:15:32,640 --> 00:15:37,040
यानी कि उस यानी कि हमसे दूर है। हम पास में नहीं है उसके।

226
00:15:37,040 --> 00:15:41,680
मगर यहां पर एक जगह पर

227
00:15:41,680 --> 00:15:46,680
आप डिटेल में देखना है तो आपको पीछे जाना होगा। वो एपिसोड देखना पड़ेगा। मगर

228
00:15:46,680 --> 00:15:50,720
इन्होंने एक जगह पर आत्मा के लिए

229
00:15:50,720 --> 00:15:54,800
जो बात कही जा रही है वो परमात्मा और परमात्मा पर फिट करने के लिए इन्होंने क्या

230
00:15:54,800 --> 00:15:58,960
किया है? यह शब्द का उपयोग यह यह परमात्मा

231
00:15:58,960 --> 00:16:03,040
जैसे यहां खड़ा है कहीं दूर नहीं है उस परमात्मा नहीं यह

232
00:16:03,040 --> 00:16:07,120
परमात्मा तो आत्मा की जगह पर परमात्मा को फिट करने के लिए आत्मा के

233
00:16:07,120 --> 00:16:11,120
लिए जो यह शब्द का उपयोग हुआ था वो इसने रामपाल ने क्या

234
00:16:11,120 --> 00:16:15,360
कहते हैं परमात्मा के लिए यूज़ कर दिया तो अब इसमें दिक्कत क्या है कि जब

235
00:16:15,360 --> 00:16:19,440
यह परमात्मा हो गया तो यानी कि परमात्मा वही है दो तरीके

236
00:16:19,440 --> 00:16:23,520
से सिद्ध हो रहा है परमात्मा वहां पर है एक यह परमात्मा से सिद्ध हो रहा है

237
00:16:23,520 --> 00:16:27,960
और दूसरा कि आत्मा सदैव परमात्मा के सानिध्य में रहती है।

238
00:16:27,960 --> 00:16:32,160
हम तो परमात्मा के सानिध्य में होने की वजह से

239
00:16:32,160 --> 00:16:36,320
वो अबद्ध है। उसके साथ बुरा नहीं हो सकता मगर बुरा हो रहा है। काल के जाल

240
00:16:36,320 --> 00:16:40,480
में फंस रही है। तो दो बातों से सिद्ध हो रहा है कि

241
00:16:40,480 --> 00:16:44,880
रामपाल के ही वचनों के अनुसार वहां पर परमात्मा है।

242
00:16:44,880 --> 00:16:49,200
तो जब वहां पर परमात्मा है तो किस परमात्मा के लिए उस परमात्मा उस परमात्मा

243
00:16:49,200 --> 00:16:53,200
की बात हो रही है। किस परमात्मा के सानिध्य में जाने की बात हो रही

244
00:16:53,200 --> 00:16:56,720
है? यह बुलेट पॉइंट आपको मिल जाता है। इसके

245
00:16:56,720 --> 00:17:00,880
बाद अगला क्या है? जब जब आत्मा की बातें

246
00:17:00,880 --> 00:17:05,040
हो रही है और उसमें अयम अयम करके शब्द आ रहा है जिसको

247
00:17:05,040 --> 00:17:09,040
रूपांतरित करके यह कहा जाएगा तो अयम अय करते

248
00:17:09,040 --> 00:17:13,040
हुए आत्मा के लिए बात हो रही है। अचानक से बीच में ये कहते

249
00:17:13,040 --> 00:17:17,040
हैं कि अब यहां पर आत्मा नहीं परमात्मा की बात हो रही है। तो परमात्मा के

250
00:17:17,040 --> 00:17:21,040
लिए वहां पर परमात्मा शब्द आना चाहिए संस्कृत में। है ना? वो तो

251
00:17:21,040 --> 00:17:25,040
आया नहीं है भगवत गीता में। अय से ही बात हो रही है। पिछले श्लोकों में आत्मा की

252
00:17:25,040 --> 00:17:29,440
बात हो रही है जिसको रामपाल ने भी माना है। तो

253
00:17:29,440 --> 00:17:33,440
अचानक से बात हो और उसमें जब एक बार बता दिया गया आत्मा की बात

254
00:17:33,440 --> 00:17:38,080
हो रही है तो उसमें फिर यह यह करके आगे की बातें हो रही है। अचानक से जब परमा

255
00:17:38,080 --> 00:17:42,320
अचानक से जब रामपाल ने परमात्मा को डाला है तो वहां पर यह

256
00:17:42,320 --> 00:17:46,320
शब्द से यह शब्द अगर उपयोग करेंगे तो हमें आत्मा को पीछे से लेना

257
00:17:46,320 --> 00:17:50,400
पड़ेगा। नहीं तो परमात्मा का अगर हमें अर्थ लेना है तो वहां पर परमात्मा का

258
00:17:50,400 --> 00:17:54,480
दतक कोई शब्द होना चाहिए जो कि संस्कृत में वहां पर अवेलेबल

259
00:17:54,480 --> 00:17:58,720
नहीं है। तो इससे भी इनका जो अपार्थ है जो ढोल की पोल

260
00:17:58,720 --> 00:18:02,800
है वो हमें पता चल जाती है। यदि परमात्मा

261
00:18:02,800 --> 00:18:07,120
के लिए माना जाए तो आत्मा की संस्कृत क्या है? जब अयम शब्द से उन्होंने

262
00:18:07,120 --> 00:18:11,120
किसी एक को पॉइंट आउट किया है तो इसने एक ही

263
00:18:11,120 --> 00:18:12,000
श्लोक में

264
00:18:12,000 --> 00:18:16,160
यह परमात्मा आत्मा को अपनी शरण में रखता है। एक

265
00:18:16,160 --> 00:18:20,240
ही अयम शब्द से वहां पर परमात्मा आत्मा दोनों की बात

266
00:18:20,240 --> 00:18:24,480
कर दी है। तो अगर अयम से मान भी लो के पिछले श्लोक के अनुसार

267
00:18:24,480 --> 00:18:28,640
आत्मा को नहीं लेना है। परमात्मा को ले लेना है अचानक से मान भी लो।

268
00:18:28,640 --> 00:18:32,680
तो फिर वहां पर दिक्कत ये आएगी कि फिर आत्मा शब्द की संस्कृत कहां है? वहां

269
00:18:32,680 --> 00:18:36,720
पर और इसके साथ ही साथ यह कहा गया है के सानिध्य में

270
00:18:36,720 --> 00:18:40,800
रहती है के साथ रहती है तो के सानिध्य में रहने की संस्कृत कहां

271
00:18:40,800 --> 00:18:44,800
है के साथ रहने की संस्कृत कहां है

272
00:18:44,800 --> 00:18:49,520
दो 28 में इसने महा घोटाला कर दिया क्या कर दिया

273
00:18:49,520 --> 00:18:53,520
जो श्लोक है दो 28वा दूसरे अध्याय का 28वा श्लोक है

274
00:18:53,520 --> 00:18:57,760
जो उसमें दो बार अव्यक्त शब्द

275
00:18:57,760 --> 00:19:01,760
आया है और एक बार व्यक्त शब्द आया है। ठीक है? जब भगवान कह रहे होते

276
00:19:01,760 --> 00:19:06,160
हैं कि यह जितने भी तुझे प्राणी दिख रहे हैं ये सब प्राणी जो थे

277
00:19:06,160 --> 00:19:10,480
वो प्रकट वो एक उत्पन्न होने से पहले जन्म से पहले अप्रकट

278
00:19:10,480 --> 00:19:14,560
थे और मृत्यु के बाद भी अप्रकट हो जाएंगे केवल बीच में ही प्रकट है।

279
00:19:14,560 --> 00:19:18,560
तो इसने क्या किया है कि तीनों बार अप्रकट

280
00:19:18,560 --> 00:19:22,880
की बात ही नहीं की है। इसने तीनों बार प्रकट कर दिया है कि जन्म के पहले भी प्रकट थे। मृत्यु

281
00:19:22,880 --> 00:19:26,960
के बाद भी प्रकट रहेंगे और बीच में भी प्रकट है। तो अव्यक्त शब्द का अर्थ ही

282
00:19:26,960 --> 00:19:27,460
नहीं

283
00:19:27,120 --> 00:19:31,120
हुआ। ठीक है? तो यह भी ढोल में बड़ी वाली पोल है। अब जब

284
00:19:31,120 --> 00:19:35,200
हम नहीं लेते हैं तीनों बार जब यह मान लेंगे

285
00:19:35,200 --> 00:19:39,440
कि तीनों बार प्रकट प्रकट प्रकट कह रहे हैं कि जन्म से पहले भी प्रकट थे

286
00:19:39,440 --> 00:19:44,040
बाद में भी प्रकट होंगे और बीच में ही प्रकट है तो दिक्कत क्या आएगी

287
00:19:44,040 --> 00:19:48,760
कि क्या समझाया जा रहा है ये कहकर

288
00:19:48,760 --> 00:19:52,800
कि जो जिन लोगों को तू देख रहा है जिनका तू शोक कर रहा है वो

289
00:19:52,800 --> 00:19:57,040
पहले भी प्रकट थे बीच में भी प्रकट है आगे भी प्रकट रहेंगे इसलिए तू शोक

290
00:19:57,040 --> 00:20:01,240
मत कर तो इसको कुछ समझाया नहीं गया है क्योंकि ये ढोल पोल है।

291
00:20:01,240 --> 00:20:05,520
अच्छा इसने क्या किया है? रामपाल ने सर्वगत का जो अर्थ

292
00:20:05,520 --> 00:20:09,520
है सर्वगत का अर्थ इसने बदल दिया है। सर्वगत का

293
00:20:09,520 --> 00:20:14,040
अर्थ सर्वव्यापक ना लेते हुए वही है कि

294
00:20:14,040 --> 00:20:18,400
अ सर्वगत का अर्थ इसने ये लिया है कि वो सर्व्यापक

295
00:20:18,400 --> 00:20:22,640
इसलिए क्योंकि उसके कारण संसार विस्तार को प्राप्त

296
00:20:22,640 --> 00:20:26,800
हुआ है। है ना? या फिर उसकी निराकार शक्ति पूरे

297
00:20:26,800 --> 00:20:31,360
संसार में व्याप्त है। तो इसलिए वह ईश्वर के लिए सर्वगत

298
00:20:31,360 --> 00:20:35,360
वो आया है। सर्वगत ईश्वर के लिए आया है। पहली बात तो यह है कि वहां

299
00:20:35,360 --> 00:20:39,360
पर निराकार शक्ति के लिए फिर अलग से कोई वो होना चाहिए शब्द। दूसरी बात यह है

300
00:20:39,360 --> 00:20:42,640
कि अगर निराकार

301
00:20:42,640 --> 00:20:47,040
शक्ति व्याप्त है संपूर्ण संसार में तो फिर

302
00:20:47,040 --> 00:20:51,360
ईश्वर के लिए सर्वगत शब्द क्यों आ रहा है? सर्व्यापक शब्द क्यों आ रहा है? और

303
00:20:51,360 --> 00:20:55,840
यदि शक्ति के रूप में अ

304
00:20:55,840 --> 00:20:59,920
व्यापक होने वाले को हम सर्वव्यापक कहते हैं। तो फिर जो शक्ति

305
00:20:59,920 --> 00:21:04,320
स्वयं सर्वव्यापक है जो पूरे संसार में फैली हुई है निराकार

306
00:21:04,320 --> 00:21:08,360
शक्ति फिर उसके लिए कौन सा शब्द होगा? क्योंकि सर्व्यापक तो हमने उसको दे

307
00:21:08,360 --> 00:21:10,840
दिया

308
00:21:10,840 --> 00:21:14,960
जो सर्वव्यापक शब्द हमने उसे दे दिया जिसकी शक्ति पूरे संसार

309
00:21:14,960 --> 00:21:18,960
में व्याप्त है। वो स्वयं नहीं। तो यह भी एक बात आ जाती है। दूसरी बात क्या

310
00:21:18,960 --> 00:21:23,120
है कि अगर हम यह कहेंगे कि शक्ति पूरे

311
00:21:23,120 --> 00:21:27,360
संसार में व्याप्त है। ईश्वर व्याप्त नहीं है तो हमें मानना पड़ेगा कि

312
00:21:27,360 --> 00:21:31,360
ईश्वर का जितना कंट्रोल जहां पर स्वयं ईश्वर है वहां है उतना कंट्रोल

313
00:21:31,360 --> 00:21:35,440
जहां पर वो नहीं उसकी शक्ति है वहां नहीं है। तो एक रस नहीं

314
00:21:35,440 --> 00:21:40,320
है। है ना? शाश्वत नहीं है। ईश्वर घट बढ़ रहा है। ठीक है?

315
00:21:40,320 --> 00:21:44,480
दूसरा क्या है? 217 में सत और असत को तत्व

316
00:21:44,480 --> 00:21:48,560
से बताने वाले को तत्वदर्शी कहा गया है। सत और असत को और यह भी

317
00:21:48,560 --> 00:21:52,560
कहा गया इस प्रकार से जानने वाले इस प्रकार से बताने वाले

318
00:21:52,560 --> 00:21:56,960
तत्वदर्शी है। तो जब ये तत्वदर्शी हो गए सत और असत को बताने वाले

319
00:21:56,960 --> 00:21:57,680
तो भगवान

320
00:21:57,680 --> 00:22:01,840
श्री कृष्ण तत्वदर्शी क्यों नहीं हुए? भगवान श्री कृष्ण ने ही तो बताया है

321
00:22:01,840 --> 00:22:06,000
जो पीछे से समरी चली आ रही है सत और असत की तो सत

322
00:22:06,000 --> 00:22:10,160
और असत को उन्होंने बताया श्री कृष्ण भगवान ने और बताने वाले को तत्वदर्शी

323
00:22:10,160 --> 00:22:14,400
कहते हैं तो दो 17 में तत्वदर्शी श्री कृष्ण भगवान सिद्ध होते

324
00:22:14,400 --> 00:22:18,560
हैं। ठीक है? ये ध्यान रखना ये लोग कभी यहां वाले तत्वदर्शी के श्लोक

325
00:22:18,560 --> 00:22:22,640
की बात नहीं करते। 434 की बात करते हैं क्योंकि उल्टे हैं तो उल्टे पेड़ की बात

326
00:22:22,640 --> 00:22:26,640
इनको ज्यादा समझना है। अच्छा इन्होंने एक जगह और यह कह दिया है

327
00:22:26,640 --> 00:22:30,800
जब यह कहते हैं वेदों में प्रमाण है कबीर भगवान है तो आज के बाद नहीं कहेंगे क्योंकि

328
00:22:30,800 --> 00:22:36,000
इसने अपनी भगवत गीता में एक जगह लिखा है परमात्मा प्रमाण रहित है।

329
00:22:36,000 --> 00:22:40,240
ठीक है? मतलब जो समझदार लोग हैं वही विश्वास

330
00:22:40,240 --> 00:22:44,320
करेंगे बाकी नहीं करेंगे। परमात्मा प्रमाण रहित है। तो जब परमात्मा का प्रमाण है

331
00:22:44,320 --> 00:22:48,400
ही नहीं तो क्यों हाथी बैठ के चिल्लाया करते हो? वेदों में प्रमाण है। वेदों में प्रमाण

332
00:22:48,400 --> 00:22:53,040
है। या प्रमाण रहित ही कहना है। अच्छा यह सब

333
00:22:53,040 --> 00:22:57,120
परमात्मा का ज्ञान आत्मा ज्ञान यह सब गलत था क्योंकि

334
00:22:57,120 --> 00:23:01,440
यह सब काल की चाल थी। दो 30 तक आते-आते

335
00:23:01,440 --> 00:23:05,440
ये बोल दिया है रामपाल ने कि यह सब काल इसलिए बोल रहा है कि उसको

336
00:23:05,440 --> 00:23:09,440
अपने भोजन का इंतजाम करना है। तो

337
00:23:09,440 --> 00:23:12,720
उसमें क्या किया? ये सब उसकी चाल है जिससे कि अर्जुन

338
00:23:12,720 --> 00:23:16,800
युद्ध करे। तो जब चाल है तो परमात्मा का ज्ञान भी चाल हो

339
00:23:16,800 --> 00:23:20,880
गया। परमात्मा के बारे में जो चीजें बताई सारी चीजें जो बताई जा रही है वो

340
00:23:20,880 --> 00:23:24,960
चाल हो गई और अगर नहीं हुई तो स्पेसिफाई करिए कि कौन सी चीज नहीं हुई

341
00:23:24,960 --> 00:23:29,200
है कौन सी है तो स्पेसिफिकेशन ये ढोल की पोल में नहीं किया गया है

342
00:23:29,200 --> 00:23:33,440
और आगे क्या है जो लोग दुखी होते हैं वह तत्वदर्शी

343
00:23:33,440 --> 00:23:38,240
अथवा मुक्त नहीं होते हैं तो

344
00:23:38,240 --> 00:23:42,320
दुखी होने का मतलब रामपाल ने स्वयं अपने एक उसमें

345
00:23:42,320 --> 00:23:46,640
कहा है कि मुझे अफसोस है इंटरव्यू में मीडिया के

346
00:23:46,640 --> 00:23:51,080
तो यानी उसे अफसोस है यानी उसे दुख है। जब दुख है तो इसका अर्थ है

347
00:23:51,080 --> 00:23:56,200
वो मुक्त नहीं है और वह तत्वदर्शी नहीं

348
00:23:56,200 --> 00:24:00,880
है। अच्छा एक और बात कही गई है।

349
00:24:00,880 --> 00:24:05,200
इसने एक जगह यह कहा है कि यदि

350
00:24:05,200 --> 00:24:09,200
मतलब यह बात कही है कि अर्जुन जो भगवान कह रहे हैं ना कि

351
00:24:09,200 --> 00:24:13,680
तू लाभ हानि में समदृष्टि रख जीवन और मृत्यु में समदृष्टि रख है ना

352
00:24:13,680 --> 00:24:17,840
सबको समान भाव से देख तो ये वहां पर कटाक्ष कर रहे हैं उनकी एक

353
00:24:17,840 --> 00:24:21,920
बात पर भगवान की बात पर और इसीलिए आगे चलके ये कहा है कि ये सब काल

354
00:24:21,920 --> 00:24:26,800
की चाल है। क्या कटाक्ष कर रहा है रामपाल वहां पर कि भैया

355
00:24:26,800 --> 00:24:28,680
क्या भला

356
00:24:28,680 --> 00:24:34,120
अर्जुन है ना उसमें कटाक्ष ये कर रहा है कि

357
00:24:34,120 --> 00:24:38,160
बताओ कि जिसको जिसके चोट

358
00:24:38,160 --> 00:24:42,240
लगेगी वही तो जानेगा ये कैसी बात है कोई भला किसी को ऐसा कुछ

359
00:24:42,240 --> 00:24:47,880
कह रहा है वो बताता हूं क्या कह रहा है

360
00:24:47,880 --> 00:24:51,920
हां बिना बिना लाभ हानि क्या युद्ध हो सकता है

361
00:24:51,920 --> 00:24:56,400
क्या क्या आवश्यकता पड़ी है छाती में तीर खाने की? हां।

362
00:24:56,400 --> 00:25:00,400
सब लोग किसी ना किसी कारण से ही कुछ करते हैं। तो यहां पे ये

363
00:25:00,400 --> 00:25:04,400
जो बात कह रहा है काल रामपाल का काल कि भैया तुम लाभ

364
00:25:04,400 --> 00:25:08,800
हानि में समदृष्टि रखो। यह सब गलत बातें हैं और ये उसकी चाल है उसको फंसाने

365
00:25:08,800 --> 00:25:14,800
के

366
00:25:18,200 --> 00:25:22,320
लिए। हम ये सब ब्रह्म की चाल थी। है ना? यह लिखा

367
00:25:22,320 --> 00:25:26,400
हुआ है। देखिए यह पेज नंबर 22 दिखा दीजिए इनको। पेज

368
00:25:26,400 --> 00:25:30,480
नंबर 22 इसकी गीता का। इसमें इसने

369
00:25:30,480 --> 00:25:34,880
लिखा है कि द्रोणाचार्य तो विद्वान गुरु थे।

370
00:25:34,880 --> 00:25:38,960
वे भी अपने पुत्र अश्वत्थामा के मरने का समाचार सुनकर कलेजा

371
00:25:38,960 --> 00:25:43,040
पकड़ कर बैठ गए। युद्ध नहीं कर सके। फिर अर्जुन कौन

372
00:25:43,040 --> 00:25:47,120
से खेत की मूली था जो स्वजनों की मौत पर दुखी ना हो। यह सब काल

373
00:25:47,120 --> 00:25:51,360
ब्रह्म की चाल है। मतलब यह कहना कि तू मौत किसी की मृत्यु से दुखी

374
00:25:51,360 --> 00:25:55,360
मत हो। यह बस हां जो नीचे हेडिंग है ना नकली

375
00:25:55,360 --> 00:26:00,760
संत की कथा इससे ठीक ऊपर वाला जो पैराग्राफ है वही है

376
00:26:00,760 --> 00:26:04,880
हम तो इसमें इसने स्वीकार कर लिया कि

377
00:26:04,880 --> 00:26:09,040
ये सब काल की चाल है मतलब जो भगवान ये कह रहे हैं कि तुझे सर्दी

378
00:26:09,040 --> 00:26:13,440
गर्मी धूप छांव और मृत्यु जीवन इन सब में

379
00:26:13,440 --> 00:26:17,600
किसी के प्रति आसक्त भेद नहीं देखना चाहिए तो सम दृष्टि रख और प्रभावित

380
00:26:17,600 --> 00:26:21,600
मत हो इनमें आने वाली चीजों से तो ये यहां पर इसने डिक्लेअ किया

381
00:26:21,600 --> 00:26:25,600
है कि ये ऐसा नहीं है। यह गलत बात है। व्यक्ति का कोई मरेगा तो

382
00:26:25,600 --> 00:26:29,760
वो दुखी उसको होना चाहिए। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। ठीक है? तो इसने खंडन

383
00:26:29,760 --> 00:26:33,840
किया है समदृष्टि का। ये मैं क्यों बता रहा हूं? क्योंकि आगे इसी ने पक्ष भी लिया है

384
00:26:33,840 --> 00:26:38,080
समदृष्टि का। क्योंकि कैसे करेगा भाई? कितना झूठ बोलेंगे? कहीं तो गलती

385
00:26:38,080 --> 00:26:42,080
होगी ना। अच्छा इसके आगे क्या है? कुल मिला

386
00:26:42,080 --> 00:26:46,160
के इसने यहां पर ये कहा है कि अर्जुन कौन से हेतु मूली था जो स्वजनों की मौत पर दुखी

387
00:26:46,160 --> 00:26:50,320
ना हो। तो ये सब काल ब्रह्म की चाल थी। यानी इसने खंडन कर दिया। दुखी

388
00:26:50,320 --> 00:26:54,480
होने दुखी ना होने वाले जो शिक्षा है भगवत गीता की लाभहानि

389
00:26:54,480 --> 00:26:58,960
में वो नहीं करना चाहिए अंतर

390
00:26:58,960 --> 00:27:03,440
तो इसने वहां खंडन कर दिया

391
00:27:03,440 --> 00:27:07,600
अच्छा सच्चाई क्या है कि अर्जुन के दुखी होने और ना होने में व्यवहार और परमार्थ का

392
00:27:07,600 --> 00:27:11,960
अंतर है जो हम आगे चलकर के समझाएंगे। तो यह बुलेट पॉइंट्स हैं जो

393
00:27:11,960 --> 00:27:14,360
हमने

394
00:27:14,360 --> 00:27:16,000
अह जो सेशन

395
00:27:16,000 --> 00:27:20,320
वन है इसका भगवत गीता को लेके हम जो चल रहे हैं एक-एक श्लोक इसने क्या-क्या बिगाड़ा

396
00:27:20,320 --> 00:27:24,400
है क्या-क्या अपार्थ किया है तो वो हम ले चल रहे हैं और इसने अपार्थ करना

397
00:27:24,400 --> 00:27:28,960
शुरू किया 2.10 से ले 2.10 से तो हमने वहां से समराइज

398
00:27:28,960 --> 00:27:33,200
किया है कि भाई 2.10 से लेकर के 2.30 तक जो इसने अपार्थ

399
00:27:33,200 --> 00:27:37,520
किया था भगवत गीता का उसके बारे में हमने अभी बताया उसको समराइज किया। पहले एपिसोड

400
00:27:37,520 --> 00:27:39,920
के बुलेट पॉइंट्स आपको बता दिए। अब हम आगे

401
00:27:39,920 --> 00:27:45,920
चलते हैं। अब क्या है

402
00:27:48,440 --> 00:27:52,640
आगे? तो ये हमारे पास दोनों हैं। यह जय

403
00:27:52,640 --> 00:27:58,640
दयाल गोविंदका जी की है। समय आने पे आपको प्रदर्शित कर दी जाएगी।

404
00:28:03,880 --> 00:28:08,800
और तो अब हम चालू करते हैं यह

405
00:28:08,800 --> 00:28:11,560
इनकी गीता

406
00:28:11,560 --> 00:28:16,440
का 23 नंबर का पेज खोल दीजिए जरा

407
00:28:16,440 --> 00:28:22,440
23 हां इससे

408
00:28:22,600 --> 00:28:26,720
अगला इसमें आप देख सकते हैं

409
00:28:26,720 --> 00:28:30,880
ये कोई दृष्टांत बता रहा है रामपाल और

410
00:28:30,880 --> 00:28:35,280
देखिए कितना मूर्ख मूर्खता की पराकाष्ठा देखिए कितना कितना अज्ञानी

411
00:28:35,280 --> 00:28:39,280
है ये खुद ही पूरे पूरे जीवन पूरे सब जगह पर

412
00:28:39,280 --> 00:28:43,280
यह करता रहता है कि भगवत गीता कृष्ण ने

413
00:28:43,280 --> 00:28:47,680
नहीं काल ने कही है। मगर यहां देखिए पहले पैराग्राफ

414
00:28:47,680 --> 00:28:52,320
की लास्ट लाइन पे क्या लिखा है? यही ज्ञान

415
00:28:52,320 --> 00:28:56,440
भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्री गीता जी के माध्यम से दिया है। अब

416
00:28:56,440 --> 00:29:01,560
बताइए कहां-कहां तक

417
00:29:01,560 --> 00:29:05,600
भागोगे? है ना? मूर्खता की पराकाष्ठा है और कुछ

418
00:29:05,600 --> 00:29:10,160
नहीं है। हम ऐसा है ना यह जो हम चला रहे हैं असल में वास्तविकता

419
00:29:10,160 --> 00:29:14,240
में हम लोग आपके साथ भगवत भगवत गीता पर डिस्कशन कर रहे हैं। ये मान के

420
00:29:14,240 --> 00:29:19,200
चलिए ऐसा नहीं है कि हम रामपाल के लिए विशेष टाइम निकाल रहे हैं। क्योंकि ये हर

421
00:29:19,200 --> 00:29:23,200
पेज पर लगभग हर पंक्ति में मूर्खता से भरी हुई किताब

422
00:29:23,200 --> 00:29:28,160
है। रामपाल की प्रत्येक किताब कोई सर पैर नहीं कुछ नहीं है।

423
00:29:28,160 --> 00:29:32,480
अब देखिए यही ज्ञान भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्री गीता जी के माध्यम से

424
00:29:32,480 --> 00:29:36,640
दिन भर ढिंढोरा पिटेंगे कि नहीं कृष्ण ने नहीं काल ने दिया कृष्ण ने नहीं काल ने दिया

425
00:29:36,640 --> 00:29:40,800
है उनको प्रमाण दिखा देंगे महाभारत से सब सब जगह से की नहीं कृष्ण

426
00:29:40,800 --> 00:29:44,800
भगवान ने नहीं दिया भागवत से मगर नहीं कृष्ण ने नहीं काल ने दिया कृष्ण ने नहीं काल

427
00:29:44,800 --> 00:29:49,040
ने दिया है मगर खुद ही मान रहे है यही

428
00:29:49,040 --> 00:29:53,440
ज्ञान भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्री गीता जी के माध्यम से दिया

429
00:29:53,440 --> 00:29:59,240
आगे चलते है अब इसमें आता है

430
00:29:59,240 --> 00:30:04,000
कि अध्याय दो 31 वे श्लोक में

431
00:30:04,000 --> 00:30:08,080
हमारी भगवत गीता क्या कह रही है

432
00:30:08,080 --> 00:30:14,080
जय दयालका जी की खोल दीजिए भगवत

433
00:30:22,280 --> 00:30:28,280
गीता 31वा श्लोक

434
00:30:46,400 --> 00:30:50,480
तो इसमें 31 वे श्लोक में कहा जा रहा है कि अपने धर्म को

435
00:30:50,480 --> 00:30:54,560
देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है। अब यहां तक बता दिया गया कि ना कोई

436
00:30:54,560 --> 00:30:58,720
मतलब वह आत्मा कभी मरती नहीं है और अगर तू उनके शरीर के नष्ट होने की

437
00:30:58,720 --> 00:31:02,800
आत्मा कभी मरती नहीं तो आत्मा को लेकर तुझे चिंता नहीं करनी है और यदि तू उनके शरीर

438
00:31:02,800 --> 00:31:06,880
को नष्ट होने को लेकर के परेशान हो रहा है तो उनका नष्ट होना निश्चित है तो फिर भी तेरा

439
00:31:06,880 --> 00:31:11,440
शोक करना उचित नहीं है। फिर आगे कहा जा रहा है कि अपने धर्म को देखकर जो

440
00:31:11,440 --> 00:31:15,440
लौकिक धर्म है व्यवहारिक धर्म है अर्जुन का

441
00:31:15,440 --> 00:31:19,600
उसको देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है। यानी तुझे भय नहीं

442
00:31:19,600 --> 00:31:23,600
करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म युद्ध धर्म

443
00:31:23,600 --> 00:31:27,840
युक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है।

444
00:31:27,840 --> 00:31:32,080
अगर आपके सामने कोई ऐसा युद्ध है आप अगर क्षत्रिय

445
00:31:32,080 --> 00:31:36,080
हो और आपके सामने कोई ऐसा युद्ध है जिसमें आपको

446
00:31:36,080 --> 00:31:37,280
धर्म के पक्ष की ओर

447
00:31:37,280 --> 00:31:41,920
से लड़ना है तो यह आपके लिए सौभाग्य की बात है। है ना?

448
00:31:41,920 --> 00:31:46,080
तो अब इस व्यक्ति ने क्या कहा

449
00:31:46,080 --> 00:31:50,160
है? इस व्यक्ति ने यहां पर इस बात

450
00:31:50,160 --> 00:31:55,040
को ज्यादा उससे नहीं लिया है।

451
00:31:55,040 --> 00:31:59,120
यहां पर इस बात को इसने प्रायोरिटी से नहीं लिया है। मगर इसने

452
00:31:59,120 --> 00:32:05,000
ये भगवत गीता में इसका पेज नंबर आप खोलिए।

453
00:32:05,000 --> 00:32:09,720
अ दो नंबर पेज पर

454
00:32:09,720 --> 00:32:15,720
जाइए। दो नंबर पेज पर ऊपर से सेकंड लाइन

455
00:32:20,080 --> 00:32:24,080
जो यह बोलता है ना कि 5% श्लोक जो है वो

456
00:32:24,080 --> 00:32:28,240
काल ने अपने मन से बोले हैं। इसकी खाट खड़ी हो जाएगी।

457
00:32:28,240 --> 00:32:33,200
इसको इतने श्लोकों को मानना पड़ जाएगा। कभी सामने तो आए।

458
00:32:33,200 --> 00:32:37,280
हां। इसमें देखिए क्या कहा जा रहा है। पहली लाइन में अंत

459
00:32:37,280 --> 00:32:41,280
में देखिए क्वेश्चन मार्क के बाद से पहली लाइन में क्वेश्चन मार्क जो

460
00:32:41,280 --> 00:32:46,560
दिख रहा है लास्ट में एकदम

461
00:32:46,560 --> 00:32:51,120
इस युद्ध को धर्म युद्ध की संज्ञा नहीं दी जा सकती।

462
00:32:51,120 --> 00:32:56,120
पहली लाइन के लास्ट में देखिए राइट

463
00:32:56,120 --> 00:33:02,120
कॉर्नर इस युद्ध को धर्म युद्ध की संज्ञा नहीं दी जा

464
00:33:02,360 --> 00:33:06,640
सकती। जैसे अर्जुन ने युद्ध करने से

465
00:33:06,640 --> 00:33:11,040
इंकार कर दिया था। युद्ध क्यों हो रहा था? इस युद्ध को धर्म

466
00:33:11,040 --> 00:33:15,920
युद्ध की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती। तो इसने यहां ये मान लिया

467
00:33:15,920 --> 00:33:20,080
कि यह जो युद्ध है वह धर्म युक्त नहीं है।

468
00:33:20,080 --> 00:33:24,080
हम और उसके आगे उसने बात की है कि वो क्यों हो रहा है क्यों नहीं हो रहा

469
00:33:24,080 --> 00:33:28,080
है। तो ये जो इसके हिसाब से जो ये युद्ध था वो धर्म युक्त नहीं

470
00:33:28,080 --> 00:33:33,880
था। मगर भगवत गीता में दूसरे अध्याय के 31 वे श्लोक

471
00:33:33,880 --> 00:33:37,920
में भगवान श्री कृष्ण ने और अगर इनकी भाषा में कहा जाए तो

472
00:33:37,920 --> 00:33:42,160
गीता कहने वाले काल ब्रह्म ने इसको धर्म युक्त युद्ध कहा

473
00:33:42,160 --> 00:33:46,240
है तो ये भी इसने अपनी मर्जी से बोला होगा अब कितने श्लोकों को आप

474
00:33:46,240 --> 00:33:50,480
नहीं मानोगे जैसे कि आपने उस श्लोक को नहीं माना

475
00:33:50,480 --> 00:33:55,440
है जो अभी ये सब काल की चाल है हां सम विषम

476
00:33:55,440 --> 00:33:59,520
जो होने को बोल रहा है भगवान श्री कृष्ण बोल रहे हैं

477
00:33:59,520 --> 00:34:01,760
कि लाभ आदि में समांतर एक तो वहां पे इसने

478
00:34:01,760 --> 00:34:06,000
माना कि काल की चाल है समस अंतर करना चाहिए समदृष्टि

479
00:34:06,000 --> 00:34:10,160
नहीं रखनी चाहिए और अभी आगे खुद ही बोलेगा समदृष्टि रखनी चाहिए

480
00:34:10,160 --> 00:34:15,800
मूर्खता का पहाड़ पहाड़ है मूर्खता

481
00:34:15,800 --> 00:34:19,840
का तो दो दो

482
00:34:19,840 --> 00:34:23,840
श्लोक तो यही हो गए जिसमें इसने अस्वीकार कर दिया क्योंकि

483
00:34:23,840 --> 00:34:29,840
इन्होंने यहां पर भगवान श्री कृष्ण ने इसको धर्म युक्त युद्ध कहा

484
00:34:31,320 --> 00:34:35,520
है। इसके बाद क्या है आगे? इसका पहले

485
00:34:35,520 --> 00:34:39,680
पढ़ देते हैं जो इसने बोला है। तो अध्याय

486
00:34:39,680 --> 00:34:43,760
दो के श्लोक 31 37 में कहा है कि

487
00:34:43,760 --> 00:34:47,840
क्षत्रिय का धर्म नहीं है कि युद्ध में कायरता दिखाए और फिर युद्ध में मर भी गया तो

488
00:34:47,840 --> 00:34:52,000
स्वर्ग का दरवाजा खुला। इसने समराइज किया 31 37 को।

489
00:34:52,000 --> 00:34:56,000
जीत गया तो राज्य का सुख भोगेगा। ऐसा अवसर बड़े भाग्य से मिलता है। अर्जुन तेरे

490
00:34:56,000 --> 00:35:00,480
तो दोनों हाथों में लड्डू है। क्षत्रिय

491
00:35:00,480 --> 00:35:04,960
की अपकीर्ति ये 23 नंबर का प्रश्न है। लास्ट पैराग्राफ

492
00:35:04,960 --> 00:35:08,960
क्षत्रिय की अपकीर्ति मरने से भी दुस्तर है।

493
00:35:08,960 --> 00:35:13,480
मतलब क्षत्रिय की जो अपकीर्ति होती है वो मरने से भी

494
00:35:13,480 --> 00:35:17,120
ज्यादा खराब मानी जाती है। मरने

495
00:35:17,120 --> 00:35:21,440
से भी दुस्तर है। इसलिए अर्जुन मान जा मेरी बात युद्ध कर ले। अध्याय

496
00:35:21,440 --> 00:35:25,600
दो के श्लोक 38 में कहा है कि हारजीत दुख सुख लाभ हानि

497
00:35:25,600 --> 00:35:29,800
को समान समझकर युद्ध करे तुझे पाप नहीं लगेंगे

498
00:35:29,800 --> 00:35:33,920
हम अब बिना लाभ हानि के अब यहां

499
00:35:33,920 --> 00:35:38,000
ये कटाक्ष कर रहा है इस श्लोक में भी कटाक्ष कर रहा है ना

500
00:35:38,000 --> 00:35:42,000
यहां पे इन्होंने फिर से लाभ हानि की बात कर दी है ना तो इस श्लोक में

501
00:35:42,000 --> 00:35:46,000
भी कटाक्ष कर रहा है कहां की है लाभ हानि

502
00:35:46,000 --> 00:35:51,040
की बात

503
00:35:51,040 --> 00:35:55,200
हां जय पराजय लाभ हानि और सुख दुख को समान समझकर उसके बाद

504
00:35:55,200 --> 00:35:59,520
युद्ध के लिए तैयार हो जाए। तो इसने ये तीसरा श्लोक है जो इसने

505
00:35:59,520 --> 00:36:03,920
गलत सिद्ध किया। क्या कह रहा है कि अब कृपया पाठक

506
00:36:03,920 --> 00:36:07,920
विचार करें बिना लाभ हानि के युद्ध कैसे हो सकता है?

507
00:36:07,920 --> 00:36:12,160
बिना लाभ हानि के नहीं कहा जा रहा है। कहा जा रहा है वहां पर कि लाभ और हानि

508
00:36:12,160 --> 00:36:16,960
में समदृष्टि रख। हानि से दूर मत भाग और

509
00:36:16,960 --> 00:36:21,120
लालच के लिए दौड़ मत लगा उसके निकट जाने के लिए। अच्छा दूसरी

510
00:36:21,120 --> 00:36:25,120
बात अब यह आती है कि यदि समदृष्टि नहीं है व्यक्ति के पास तो क्या वो

511
00:36:25,120 --> 00:36:29,360
कभी मुक्त है? यदि वो व्यक्ति लाभ हानि से प्रभावित

512
00:36:29,360 --> 00:36:33,640
होने वाला है तो वो कभी मुक्त कहला सकता

513
00:36:33,640 --> 00:36:37,920
है? नहीं कहला सकता। मुक्त वही है

514
00:36:37,920 --> 00:36:42,080
जो लाभ हानि में प्रभावित ना हो। समदृष्टि वाला मुक्त है।

515
00:36:42,080 --> 00:36:46,120
ईश्वर मुक्त है क्योंकि उनके लिए सब कुछ एक बराबर है।

516
00:36:46,120 --> 00:36:51,480
इक्वल इसीलिए ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है।

517
00:36:51,480 --> 00:36:55,760
खैर तो सम विषम परिस्थिति

518
00:36:55,760 --> 00:37:00,000
को मानने से मना कर दिया इसने। जीवन मृत्यु के में

519
00:37:00,000 --> 00:37:04,320
समानता जो देखने को भगवान ने कहा है। समत्व बुद्धि और समत्व

520
00:37:04,320 --> 00:37:06,240
का अर्थ भी कुछ निराला कर दिया है।

521
00:37:06,240 --> 00:37:10,560
समत्व बुद्धि मतलब दो अलग-अलग प्रकार के तत्वों में समान बुद्धि

522
00:37:10,560 --> 00:37:14,800
रखो। तो समत्व का कुछ अलग ही अर्थ कर दिया है।

523
00:37:14,800 --> 00:37:18,800
है ना? तो विद्यावान कौन

524
00:37:18,800 --> 00:37:22,800
हो जाता है? जो ये जो हम लोग प्रभावित हो रहे हैं

525
00:37:22,800 --> 00:37:27,040
ना कि अरे ये हो गया वो हो गया। विद्यावान वो है अविद्या

526
00:37:27,040 --> 00:37:31,120
से मुक्त वो ही है जो जो जानता है कि कुछ नहीं हुआ

527
00:37:31,120 --> 00:37:35,360
है सब खेल है और दोनों चीजों को इक्वली देख रहा है

528
00:37:35,360 --> 00:37:40,080
वो विद्यावान है जैसे कि एक छोटे बालक के कंपैरेटिवली

529
00:37:40,080 --> 00:37:44,160
उसके जो माता-पिता होते हैं वो विद्यावान होते हैं। क्यों होते हैं? क्योंकि जो छोटा

530
00:37:44,160 --> 00:37:48,320
शिशु है वह कई ऐसी छोटी छोटी चीजों में परेशान

531
00:37:48,320 --> 00:37:52,800
होता है खुश होता है जो नगण्य है बड़े लोगों के अनुसार तो वो विद्यावान

532
00:37:52,800 --> 00:37:56,880
है इसलिए उनके पर्सेक्टिव से वो कुछ नहीं है नथिंग तो वो जो छोटे

533
00:37:56,880 --> 00:38:00,960
बच्चे के लिए जो चीजें जो प्रभाव डालने वाली है वही चीजें जो

534
00:38:00,960 --> 00:38:05,840
उसके माता-पिता है उनके लिए प्रभाव डालने वाली नहीं है तो

535
00:38:05,840 --> 00:38:09,920
वो एक तरीके से उन चीजों से मुक्त है उन परेशानियों से मुक्त

536
00:38:09,920 --> 00:38:14,000
है जिन परेशानियों से घिरा हुआ वह बालक तो इनका

537
00:38:14,000 --> 00:38:20,000
कहना है कि नहीं समत्व बुद्धि नहीं रखनी चाहिए।

538
00:38:21,480 --> 00:38:25,600
अगर इसने यहां पर मना कर दिया। अब काल ब्रह्म

539
00:38:25,600 --> 00:38:29,600
ने इसी नेक्स्ट पेज पर 24व पेज पर

540
00:38:29,600 --> 00:38:34,560
इसने कहा है कि फिर स्वयं काल

541
00:38:34,560 --> 00:38:38,800
काल ब्रह्म ने ये पांचवी लाइन है काल ब्रह्म ने अपना स्वार्थ सिद्ध

542
00:38:38,800 --> 00:38:42,960
करने यानी महाभारत का युद्ध करवाने के लिए पूरा जोर लगाया।

543
00:38:42,960 --> 00:38:47,040
झूठ सच का सहारा लिया। यहां पे फिर से इसने काल को झूठा कहा। तो प्रश्न फिर से

544
00:38:47,040 --> 00:38:51,120
आ जाता है यदि काल झूठ बोल सकता है तो हम उस पर विश्वास किस

545
00:38:51,120 --> 00:38:55,280
आधार पर करें। किसी भी बात के लिए अगर कहे तत्वदर्शी जो कहेगा उस बात पर

546
00:38:55,280 --> 00:38:59,360
विश्वास करो तो तत्वदर्शी तत्वदर्शी तब बनेगा जब काल की कोई भी एक बात मान ली

547
00:38:59,360 --> 00:39:03,440
जाए वो बात किस आधार पर मानी जाए ये इन्होंने

548
00:39:03,440 --> 00:39:07,440
कभी नहीं बताया तो सच झूठ का सारा अच्छा अब एक बात ये

549
00:39:07,440 --> 00:39:12,000
आती है कि ये इसकी चाल है काल की कि वो महाभारत के युद्ध को करवा करके

550
00:39:12,000 --> 00:39:16,760
और अपना का काम निकलवाना चाहता है। ये काल की चाल है।

551
00:39:16,760 --> 00:39:20,960
तो मैं यह मान सकता हूं कि उसको श्राप मिला है और वह सूंघता

552
00:39:20,960 --> 00:39:25,360
है या खाता है मगर उसको जीवात्माएं चाहिए। प्रतिदिन सवा लाख जीवात्माएं

553
00:39:25,360 --> 00:39:29,760
चाहिए। तो फिर क्या उस समय

554
00:39:29,760 --> 00:39:35,760
लोग मर नहीं रहे थे। अपनी मृत्यु जो होती है वो मर नहीं रहते मरते नहीं है

555
00:39:35,800 --> 00:39:36,800
और

556
00:39:36,800 --> 00:39:40,960
जो उसको खाने के लिए जीवात्मा जो चाहिए वो

557
00:39:40,960 --> 00:39:44,960
जो है उसके लिए युद्ध ही करवाना पड़ रहा है तो ऐसे में उन दिनों क्या होता

558
00:39:44,960 --> 00:39:49,000
है जिस दिन पूरे संसार में कोई युद्ध नहीं होता है तब क्या होता

559
00:39:49,000 --> 00:39:53,280
है तो ये एक बात सोचने की है अगर यह कहा जाए कि

560
00:39:53,280 --> 00:39:57,360
पूरे संसार में लगभग कुल मिलाकर के इतने लोग मर जाते हैं

561
00:39:57,360 --> 00:40:01,760
कि उसकी स उसको जो है सवा लाख का भोजन मिल मगर महाभारत

562
00:40:01,760 --> 00:40:06,080
के काल में नहीं मिल रहे थे तो यह कितनी हंसी की बात होगी भाई चींटियां मरती होंगी

563
00:40:06,080 --> 00:40:10,160
बहुत सारे जीव जंतु होते हैं जो डेली प्रतिदिन मरते होंगे जीवात्मा तो सबकी

564
00:40:10,160 --> 00:40:14,280
एक है हम अच्छा इसमें एक पॉइंट और आता

565
00:40:14,280 --> 00:40:17,400
है

566
00:40:17,400 --> 00:40:21,480
कि जब सृष्टि रचना होती

567
00:40:21,480 --> 00:40:26,000
है तो सृष्टि रचना होते समय

568
00:40:26,000 --> 00:40:30,400
कुछ जीवात्माओं को जानवर के रूप में जन्म दिया जाता है

569
00:40:30,400 --> 00:40:34,720
हम क्यों यहां सारी पहले पूरी सृष्टि में केवल मनुष्य

570
00:40:34,720 --> 00:40:38,800
होते हैं तो ये सब सोचने वाली बातें हैं। प्रश्न की बातें हैं। जब इनके

571
00:40:38,800 --> 00:40:43,040
वो आएंगे ना दोनों आते हैं चंगूमंगू

572
00:40:43,040 --> 00:40:47,280
या कोई और तब पूछा जाएगा। खैर

573
00:40:47,280 --> 00:40:51,280
आगे चलते हैं। अब यहां तक इन्होंने जो है 38 तक

574
00:40:51,280 --> 00:40:56,830
अर्थ बता दिया तो हम अपने अर्थ पढ़ लें 38 तक। तो

575
00:40:56,830 --> 00:41:00,240
[संगीत]

576
00:41:00,240 --> 00:41:04,480
यहां पर फिर हम अपने अर्थ पढ़ रहे हैं क्योंकि जितनी भी वैसी चीजें

577
00:41:04,480 --> 00:41:09,480
थी वो हमने ले ली है विवादास्पद

578
00:41:09,480 --> 00:41:13,760
तो 335 में 235 में कह रहे हैं भगवान कि जिनकी

579
00:41:13,760 --> 00:41:17,840
दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब वो बता रहे हैं कि लघुता को अब लघुता

580
00:41:17,840 --> 00:41:21,840
को प्राप्त होगा वह महारथी तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे तेरे

581
00:41:21,840 --> 00:41:26,960
वैरी लोग तेरे सामर्थ की निंदा करते हुए तुझे बहुत से ना कहने योग्य वचन कहेंगे

582
00:41:26,960 --> 00:41:31,120
36 में 37 में क्या है? या तो तू युद्ध में मारा जाकर

583
00:41:31,120 --> 00:41:35,280
स्वर्ग को प्राप्त हो जा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।

584
00:41:35,280 --> 00:41:39,360
इस कारण हे अर्जुन तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा। तो इन्होंने जो

585
00:41:39,360 --> 00:41:43,360
ये समराइज किया था उन सबको उसने तिलांजलि दे

586
00:41:43,360 --> 00:41:47,920
दी। अपने घटिया ज्ञान के आधार पर जय पराजय

587
00:41:47,920 --> 00:41:51,920
लाभ हानि और सुखदख को समान समझकर उसके बाद युद्ध के लिए तैयार

588
00:41:51,920 --> 00:41:55,920
हो जा। यह 38वा है। इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप

589
00:41:55,920 --> 00:41:59,920
को प्राप्त नहीं होगा। अब 39वा आता है तो हम

590
00:41:59,920 --> 00:42:04,080
39 नंबर का अपना वाला पढ़ लेते हैं। हे पार्थ यह बुद्धि तेरे

591
00:42:04,080 --> 00:42:08,240
लिए ज्ञान योग के विषय में कही गई। यहां तक क्या चल रहा था? ज्ञान योग्य सांख्य

592
00:42:08,240 --> 00:42:12,560
योग्य योग विषय में कही गई। और अब तू इस इसको

593
00:42:12,560 --> 00:42:15,280
कर्म योग के विषय में सुन। जिस बुद्धि से युक्त

594
00:42:15,280 --> 00:42:19,600
हुआ तू कर्मों के बंधन को भलीभांति त्याग देना देगा। यानी सर्वथा

595
00:42:19,600 --> 00:42:24,560
नष्ट कर डालेगा। तो अब कर्म योग ज्ञान क्या सोचे

596
00:42:24,560 --> 00:42:28,880
जिसके कारण हम मुक्ति की ओर बढ़े अब बताया जा रहा है क्या करें हाथ पैरों

597
00:42:28,880 --> 00:42:34,040
से क्या करें जिसके कारण हम मुक्ति की ओर बढ़े ठीक

598
00:42:34,040 --> 00:42:38,320
है उसने अगला जो वो किया है 39 से 45 तो हम अपने पहले 39

599
00:42:38,320 --> 00:42:42,560
से 45 तक के पढ़ लेते हैं। इस कर्म योग में आरंभ का अर्थात

600
00:42:42,560 --> 00:42:47,920
बीज का नाश नहीं होता और उल्टा फल रूप दोष भी नहीं है। है ना?

601
00:42:47,920 --> 00:42:52,240
बल्कि इस कर्म योग रूप कर्म योग रूप धर्म का

602
00:42:52,240 --> 00:42:56,720
थोड़ा सा भी साधन जन्म मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है।

603
00:42:56,720 --> 00:43:01,280
यह 40वा हो गया। अब 41वा है वो क्या है? हे अर्जुन

604
00:43:01,280 --> 00:43:05,360
इस कर्म योग में निश्चय निश्चयात्मिका

605
00:43:05,360 --> 00:43:09,440
बुद्धि एक ही होती है। किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन

606
00:43:09,440 --> 00:43:13,520
सकाम मनुष्यों की बुद्धियां निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनंत

607
00:43:13,520 --> 00:43:16,720
होती है।

608
00:43:16,720 --> 00:43:20,720
क्या कहा जा रहा है? हे अर्जुन जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं जो कर्म फल

609
00:43:20,720 --> 00:43:24,720
के प्रशंसक वेद वाक्यों में प्रीति रखते हैं जैसे वेदों में क्या है ना ऐसे

610
00:43:24,720 --> 00:43:29,600
वाक्य आते हैं ना आप ये करोगे तो ये मिलेगा ये करोगे तो ये मिलेगा तो

611
00:43:29,600 --> 00:43:33,760
उसको करना गलत नहीं है परंतु यदि हम

612
00:43:33,760 --> 00:43:38,000
अंतिम रूप से देखें जैसे कोई शुरुआत कर रहा है तो उसके लिए बिल्कुल

613
00:43:38,000 --> 00:43:42,160
ठीक है कि वो अभी भगवान की शरण में नहीं है तो किसी लालच के कारण ही वो धर्म का रास्ता

614
00:43:42,160 --> 00:43:46,240
अपना लेता है। जैसे एक एक जो बालक है सामान्य बालक वो पहली बार

615
00:43:46,240 --> 00:43:50,240
मंदिर की ओर कब देखता है जब उसकी मां वहां खड़ी होती है। लालच

616
00:43:50,240 --> 00:43:54,560
उसकी मां वहां पर है। है ना? तो इसी तरीके से शुरुआत

617
00:43:54,560 --> 00:43:59,640
है तो आप धर्म में प्रवेश कर रहे हैं। मगर जब आपका

618
00:43:59,640 --> 00:44:04,080
जो क्या कहते हैं? उद्देश्य मुक्ति है तो उस मुक्ति

619
00:44:04,080 --> 00:44:08,320
के उद्देश्य के रूप में आपका भोगों के लिए

620
00:44:08,320 --> 00:44:12,800
बात करने वाले जो वाक्य हैं उन उनमें उनकी प्रीति का गुणगान

621
00:44:12,800 --> 00:44:16,800
करना प्रशंसा करना है ना तो उन लोगों को यहां पर

622
00:44:16,800 --> 00:44:19,480
निम्न कहा गया

623
00:44:19,480 --> 00:44:23,600
है जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है जो ऐसा सोचते

624
00:44:23,600 --> 00:44:27,600
हैं ऐसा कहने वाले वे अविवेकी जन है इस प्रकार

625
00:44:27,600 --> 00:44:31,680
जिस पुष्पित यानी दिखाऊ शोभा युक्त वाणी को कहा करते जो

626
00:44:31,680 --> 00:44:32,180
कि

627
00:44:31,840 --> 00:44:36,080
जन्म रूप कल कर्म फल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति

628
00:44:36,080 --> 00:44:40,240
के लिए नाना प्रकार की बहुत सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है।

629
00:44:40,240 --> 00:44:44,240
उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है जो भोग और ऐश्वर्य

630
00:44:44,240 --> 00:44:48,640
में अत्यंत आसक्त है उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चयात्मिका

631
00:44:48,640 --> 00:44:52,960
बुद्धि नहीं होती। मतलब जो धर्माचरण में जैसे कर्मकांड करना

632
00:44:52,960 --> 00:44:56,960
या ऐसे यज्ञ करना जो इसी में ही कर रहे हैं

633
00:44:56,960 --> 00:45:01,200
सदैव उससे आगे नहीं बढ़ रहे हैं और किसी ना किसी फल की प्राप्ति

634
00:45:01,200 --> 00:45:05,200
के लिए कर रहे हैं तो वो कभी मुक्ति के पथ पर नहीं पहुंच पाएंगे क्योंकि वो

635
00:45:05,200 --> 00:45:09,200
भोगों को प्राप्त करने के लिए कर रहे हैं। ये सब कहा गया

636
00:45:09,200 --> 00:45:13,440
37 38 से लेकर 44 तक 45वा भी पढ़ लेते हैं।

637
00:45:13,440 --> 00:45:17,600
हे अर्जुन वेद उपयुक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य

638
00:45:17,600 --> 00:45:21,600
रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन कराने वाले

639
00:45:21,600 --> 00:45:25,760
हैं। तो वेदों में सब बताया गया कि आपको ये लक्ष्मी

640
00:45:25,760 --> 00:45:29,840
की कमी है तो वो उसके लिए कैसा पूजन होना चाहिए ये सारी चीजों की

641
00:45:29,840 --> 00:45:33,920
बात की गई है। ऐसा नहीं है हर मंत्र में केवल मुक्ति की बात हो रही है। मगर उसका

642
00:45:33,920 --> 00:45:38,160
भी परवसान किस में है कि व्यक्ति किसी प्रकार से लक्ष्मी के कारण

643
00:45:38,160 --> 00:45:42,320
रोग दोष दूर हो जाने के कारण या किसी फल की प्राप्ति हेतु धर्म का मार्ग

644
00:45:42,320 --> 00:45:46,560
अपनाएगा जिससे कि उसकी बौद्धिक क्षमता प्रज्ञा शक्ति का विकास होगा जिससे

645
00:45:46,560 --> 00:45:47,060
कि वो

646
00:45:46,960 --> 00:45:51,120
फिर आगे मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ेगा तो वेद

647
00:45:51,120 --> 00:45:55,440
ने उपयुक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों

648
00:45:55,440 --> 00:46:00,000
का प्रतिपादन करने वाले हैं। इसलिए तू

649
00:46:00,000 --> 00:46:04,400
उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्ति हीन हर्ष

650
00:46:04,400 --> 00:46:08,400
शोका आदि द्वंदों से रहित यहां फिर वही कहा जा रहा है यहां क्या कहा

651
00:46:08,400 --> 00:46:12,720
जा रहा है 45 वे श्लोक में हर्ष शोक मतलब ये

652
00:46:12,720 --> 00:46:17,040
विषम बुद्धि मत रख समुद्धि रख द्वंदों से रहित नित्य वस्तु

653
00:46:17,040 --> 00:46:21,440
यानी जो परमात्मा है परमात्मा में स्थित

654
00:46:21,440 --> 00:46:25,920
योगक्षेम को ना चाहने वाला और स्व यानी योगक्षेम

655
00:46:25,920 --> 00:46:30,000
मतलब परमात्मा तुम्हें फल की प्राप्ति देंगे ये करेंगे वो करेंगे तो ऐसी बुद्धि

656
00:46:30,000 --> 00:46:34,080
रखने वाला और ऐसी बुद्धि ना

657
00:46:34,080 --> 00:46:39,240
रखने वाला और स्वाधीन अंतःकरण वाला हो जा

658
00:46:39,240 --> 00:46:43,680
मतलब जो वेदों का आलंबन लो या धर्म का आलंबन

659
00:46:43,680 --> 00:46:47,760
लो तो लालच की वजह से मत लो यदि आपको मोक्ष के मार्ग पर

660
00:46:47,760 --> 00:46:51,840
आगे बढ़ना है यदि आपको स्वयं को विद्यावान कहलवाना है तो तो

661
00:46:51,840 --> 00:46:56,000
यहां तक हमने 45 तक सही अर्थ क्या है वह पढ़ लिया अब हम देखते हैं इन्होंने

662
00:46:56,000 --> 00:47:00,480
क्या किया तो 39 से 45 का अर्थ है समबुद्धि

663
00:47:00,480 --> 00:47:03,480
होकर कर्म बंधन

664
00:47:03,480 --> 00:47:07,680
से मुक्त हो जा। ऐसे

665
00:47:07,680 --> 00:47:13,160
डगमग बुद्धि वाले कामयाब नहीं

666
00:47:13,160 --> 00:47:18,200
होते। अच्छा इसमें एक और है इससे थोड़ा सा ऊपर चलते हैं।

667
00:47:18,200 --> 00:47:21,960
पहले

668
00:47:21,960 --> 00:47:26,800
कि क्षत्रिय का धर्म होता है क्षत्रिय

669
00:47:26,800 --> 00:47:30,880
का धर्म होता है युद्ध करना। ठीक है? ऊपर सेकंड

670
00:47:30,880 --> 00:47:36,200
पैराग्राफ है इसी पेज में। क्षत्रिय का धर्म होता

671
00:47:36,200 --> 00:47:40,280
है तो कृष्ण भगवान के लिए क्या कह रहा है ये

672
00:47:40,280 --> 00:47:44,480
व्यक्ति? कि यदि श्री कृष्ण

673
00:47:44,480 --> 00:47:48,560
जी यह ज्ञान कहते तो काल वन के साथ

674
00:47:48,560 --> 00:47:52,720
युद्ध छोड़कर नहीं भाग भागते। यानी कि क्षत्रिय का जो युद्ध करने

675
00:47:52,720 --> 00:47:56,960
वाली बात है। है ना? वो वो

676
00:47:56,960 --> 00:48:01,200
उस श्लोक का भी खंडन है कि क्षत्रिय का धर्म युद्ध करना तो उसका भी खंडन कर दिया।

677
00:48:01,200 --> 00:48:06,120
चार श्लोक हो गए अभी तक खंडन। चार श्लोकों को अमान्य कर दिया।

678
00:48:06,120 --> 00:48:10,240
तो अब ये यहां कह रहे हैं यदि श्री कृष्ण जी

679
00:48:10,240 --> 00:48:14,240
यह ज्ञान कहते तो कालवन के साथ युद्ध छोड़कर कभी नहीं भागते।

680
00:48:14,240 --> 00:48:19,480
वो भी क्षत्रिय थे। इसने क्या माना कि भगवान श्री

681
00:48:19,480 --> 00:48:23,600
कृष्ण जो काल्यावन को मारा था राक्षस को

682
00:48:23,600 --> 00:48:27,680
मकुंद जी महाराज की कथा वो कभी और सुनाएंगे अ

683
00:48:27,680 --> 00:48:31,680
मगर उसको जो मारा था काल्यावन को तो उसको एक लीला के

684
00:48:31,680 --> 00:48:35,760
रूप में मारा था कि वो उससे पहले भाग के गए कहीं पर मचकुंद जी

685
00:48:35,760 --> 00:48:40,120
महाराज सो रहे थे भाग के वहां पर जाकर उसको मरवाया खुद नहीं मारा भाग के गए

686
00:48:40,120 --> 00:48:45,040
रणछोड़ तो यहां पर एक बात सोचने की है पहली

687
00:48:45,040 --> 00:48:49,120
कि यह व्यक्ति वर्ण को जन्म से मानता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र

688
00:48:49,120 --> 00:48:51,280
ये क्या मानता है? जन्म से। जो ये कहता

689
00:48:51,280 --> 00:48:55,520
है ना जो ब्रह्म को जान गया वो ब्राह्मण ना है। क्यों? क्योंकि जब

690
00:48:55,520 --> 00:48:59,840
यह खुद कह रहा है कि कृष्ण जी मैदान छोड़कर

691
00:48:59,840 --> 00:49:04,000
भागे नहीं भागते। तो जब वो भागे हैं तो उनको क्षत्रिय क्यों

692
00:49:04,000 --> 00:49:08,080
कह रहा है? या तो तू यह मान ले कि क्षत्रिय का धर्म नहीं है

693
00:49:08,080 --> 00:49:12,480
युद्ध करना। या फिर तू यह मान ले कि भागने के बाद भी वो क्षत्रिय

694
00:49:12,480 --> 00:49:18,120
थे। तो तू जब दोनों ही बातें मान रहे हो तो यहां पर

695
00:49:18,120 --> 00:49:22,240
इसने वर्णाश्रम आचरण के विपरीत कार्य करने की

696
00:49:22,240 --> 00:49:26,800
स्थिति में भी यहां पर क्या कहा है? भगवान श्री कृष्ण को

697
00:49:26,800 --> 00:49:30,800
क्षत्रिय कहा है। तो इसने भी वर्ण को जन्म से माना है। ये ध्यान रखने योग्य

698
00:49:30,800 --> 00:49:34,880
बात है। अब नीचे आ जाइए थर्ड पैराग्राफ। तो 39

699
00:49:34,880 --> 00:49:38,880
से 45 तक का अर्थ है समबुद्धि होकर कर्म बंधन से मुक्त

700
00:49:38,880 --> 00:49:43,360
हो जा। ऐसे डगमग बुद्धि वाले कामयाब नहीं होते। राग द्वेष

701
00:49:43,360 --> 00:49:47,360
मत रख तथा तीनों गुणों ब्रह्मा

702
00:49:47,360 --> 00:49:51,680
रजोगुण रजोगुण विष्णु सतगुण शिव तमोगुण

703
00:49:51,680 --> 00:49:55,840
की भक्ति से रहित हो जा। अब ये लोग क्या कहते हैं कि कौन कहता

704
00:49:55,840 --> 00:50:00,080
है हम ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति नहीं बताते। तो यहां नोट कर लीजिए

705
00:50:00,080 --> 00:50:04,560
ये लोग अब की बार जब ये झूठ बोले तो ये तमाचा मारना इनके मुंह पर।

706
00:50:04,560 --> 00:50:06,320
क्यों? क्योंकि ये क्या सिखा रहा है? ब्रह्मा

707
00:50:06,320 --> 00:50:10,920
विष्णु महेश की भक्ति से भी रहित हो जा।

708
00:50:10,920 --> 00:50:15,440
जबरदस्ती यहां पर तीन गुणों के प्रति आसक्त नहीं होना है।

709
00:50:15,440 --> 00:50:19,440
राजसिक, तामसिक और ये जो सात्विक भाव होते हैं

710
00:50:19,440 --> 00:50:23,440
उनके प्रति आसक्त ना होने की बात कही जा रही है। तो इसने बिना सोचे समझे वो

711
00:50:23,440 --> 00:50:27,440
सारी थ्योरी एक है। बुलेट पॉइंट्स बताए थे पहले वाले भाग में तो वो सारी

712
00:50:27,440 --> 00:50:32,080
थ्योरी एक है। ब्रह्मा जी

713
00:50:32,080 --> 00:50:36,320
ब्रह्मा विष्णु महेश यदि गुण है और यदि शिव जी तामस

714
00:50:36,320 --> 00:50:40,560
गुण है और उनकी उत्पत्ति प्रकृति से हो रही है तो शिवजी के उत्पन्न

715
00:50:40,560 --> 00:50:44,640
होने से पहले जो काल ने गलत चीजें

716
00:50:44,640 --> 00:50:48,720
की तामस गुण वाली चीजें की वो कैसे कर दी यानी कि शिवजी

717
00:50:48,720 --> 00:50:52,800
तब भी थे किसी और रूप में विद्यमान थे जिसके कारण जो है काल

718
00:50:52,800 --> 00:50:58,360
प्रभावित हुआ यदि शिवजी गुण है केवल गुण है हां

719
00:50:58,360 --> 00:51:03,000
तो पहली बात वो बात हो नहीं रही है मगर फिर भी

720
00:51:03,000 --> 00:51:07,040
इसने अपने मन से ब्रह्मा जी की ब्रह्मा विष्णु महेश की

721
00:51:07,040 --> 00:51:11,040
भक्ति को त्याग दे जबकि भक्ति की यहां बात ही नहीं हो रही

722
00:51:11,040 --> 00:51:15,360
है हम देखिए

723
00:51:15,360 --> 00:51:19,520
राग द्वेष वाला जो है वो खोल ले जरा यहां बीच

724
00:51:19,520 --> 00:51:25,520
में

725
00:51:39,320 --> 00:51:43,360
हम तो यहां पे भक्ति की कोई बात नहीं हो रही है। फिर भी ये भक्ति को

726
00:51:43,360 --> 00:51:47,440
त्यागने की बात कर रहा है कि जो है राग द्वेष मत

727
00:51:47,440 --> 00:51:51,440
रख तथा तीनों गुणों से तीनों गुणों से दूर होने की बात हुई बात

728
00:51:51,440 --> 00:51:55,760
की है। तो गुणों से दूर होने का मतलब हो गया कि ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति

729
00:51:55,760 --> 00:51:59,840
से दूर हो जा। योगक्षेम से भी रहित हो जा। योगक्षेम का

730
00:51:59,840 --> 00:52:04,000
अर्थ इसको मालूम नहीं है क्योंकि कम पढ़ा लिखा है। हिंदी में भी कमजोर है।

731
00:52:04,000 --> 00:52:08,000
तो योगक्षेम का अर्थ नहीं समझ पाया है ये। योगक्षेम से रहित

732
00:52:08,000 --> 00:52:12,560
हो जा। इसने बताया नहीं योगक्षेम का अर्थ क्या है? योगक्षेम

733
00:52:12,560 --> 00:52:16,880
का अर्थ क्या है? कि भगवान से इस तरह से सोचना कि वह मुझे फल की प्राप्ति

734
00:52:16,880 --> 00:52:22,240
दे। ऐसा करें, वैसा करें तो इससे भी आप रहित हो जाओ।

735
00:52:22,240 --> 00:52:26,400
अब यहां पर कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा के

736
00:52:26,400 --> 00:52:30,480
परायण हो जा। ये कहां पे माना

737
00:52:30,480 --> 00:52:33,640
है

738
00:52:33,640 --> 00:52:37,760
इसने? स्वाधीन अंतःकरण आत्मवान होने की बात की

739
00:52:37,760 --> 00:52:41,760
जा रही है। 45 वे श्लोक में। तो ये आत्मवान होने की बात

740
00:52:41,760 --> 00:52:46,080
नहीं कह रहा है। वहां पे क्या बोल रहा है? पूर्ण पूर्ण परमात्मा

741
00:52:46,080 --> 00:52:50,160
45 व श्लोक में लास्ट में जो लाइन आई है वही है कि योगक्षम को ना

742
00:52:50,160 --> 00:52:54,360
चाहने वाला और स्वाधीन अंतःकरण वाला यानी कि

743
00:52:54,360 --> 00:52:58,560
आत्मवान हम आत्मवान हो जा तो इसने

744
00:52:58,560 --> 00:53:04,560
क्या कर दिया पूर्ण परमात्मा के आश्रित हो जा

745
00:53:04,600 --> 00:53:08,960
तो अब क्या दिक्कत आती है कि

746
00:53:08,960 --> 00:53:13,200
यहां पर पूर्ण परमात्मा को इंगित करने वाला कौन सा शब्द है 45 4

747
00:53:13,200 --> 00:53:17,200
वे श्लोक में कौन सा शब्द है? कोई शब्द नहीं

748
00:53:17,200 --> 00:53:21,520
है। यह है ढोल का पोल। ठीक है? आगे चलते हैं।

749
00:53:21,520 --> 00:53:25,600
आगे देखिए नेक्स्ट इनका एक

750
00:53:25,600 --> 00:53:29,680
दावा है जो इनहीं की देखो हम लोग तीन चार तरीके से यहां

751
00:53:29,680 --> 00:53:34,440
पे प्रतिकार कर रहे हैं। पहला प्रतिकार तो है

752
00:53:34,440 --> 00:53:38,480
कि रामपाल ने संस्कृत का कुछ अलग

753
00:53:38,480 --> 00:53:42,560
ही हिंदी कर दिया। जैसे अव्यक्त अव्यक्त और व्यक्त तो

754
00:53:42,560 --> 00:53:46,720
उसने कर दिया प्रकट प्रकट और प्रकट ठीक है तो यानी संस्कृत की हिंदी

755
00:53:46,720 --> 00:53:48,800
नहीं आती दूसरा क्या है उसने

756
00:53:48,800 --> 00:53:52,800
अपने ही सिद्धांतों को कई जगह खुद ही मना किया है तो यानी कि

757
00:53:52,800 --> 00:53:57,040
उसी की वाणी से जो है गलत सिद्ध होता है तीसरा क्या है तर्क से

758
00:53:57,040 --> 00:54:01,920
उसकी बातें तार्किक रूप से जब हम कुछ ऐसा पूछते हैं कि अगर वो

759
00:54:01,920 --> 00:54:06,480
गुणों से प्रभावित था तामस उसने आचरण किया तो

760
00:54:06,480 --> 00:54:10,480
वो तामस आचरण कैसे किया जब शिव थे ही तमोगुण था

761
00:54:10,480 --> 00:54:14,560
ही नहीं जब तो उसने तामस आचरण कैसे किया? कैसे प्रभावित हुआ? वो किससे

762
00:54:14,560 --> 00:54:18,560
प्रभावित हुआ? तो ये तीसरी बात हो गई। और चौथी बात

763
00:54:18,560 --> 00:54:22,560
हो गई प्रमाण से। चौथी बात क्या हो गई? प्रमाण से कि

764
00:54:22,560 --> 00:54:26,640
हमारे पास शास्त्रों के प्रमाण है। तो चार तरीके से प्रतिकार कर रहे हैं रामपाल

765
00:54:26,640 --> 00:54:30,800
का। तो अब यहां पे क्या आ रहा है? देखिए जस्ट

766
00:54:30,800 --> 00:54:34,880
39 से 45 तक इसने जो अपार्थ किया उसके बाद क्या लिखा है अगली लाइन

767
00:54:34,880 --> 00:54:38,960
में? यह जो व्यक्ति वेदों यानी

768
00:54:38,960 --> 00:54:43,440
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद की वाणी

769
00:54:43,440 --> 00:54:47,440
यानी मंत्रों पर वाद विवाद करते रहते हैं। ये

770
00:54:47,440 --> 00:54:51,680
पूर्ण परमात्मा वाला जो पैराग्राफ है ना इससे जस्ट पहले वाला जो पैराग्राफ है उसमें

771
00:54:51,680 --> 00:54:56,560
अंडरलाइन करिए। जो व्यक्ति इसके नीचे वाला इसके नीचे वाला

772
00:54:56,560 --> 00:55:00,640
जो हां नीचे वाला जो व्यक्ति ये

773
00:55:00,640 --> 00:55:04,000
अब इसमें देखिए क्या कहा है? जो व्यक्ति वेदों

774
00:55:04,000 --> 00:55:08,160
यानी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद वेदों

775
00:55:08,160 --> 00:55:12,800
का अर्थ क्या बताया इसने? और एक नहीं कई बार बताया है। चार वेद।

776
00:55:12,800 --> 00:55:16,960
इसने यहां पे माना चार ही वेद हैं। वेदों का अर्थ क्या बताया?

777
00:55:16,960 --> 00:55:21,040
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। तो अब इसकी

778
00:55:21,040 --> 00:55:25,120
ही बात से इसकी बात कट रही है। पांचवा वेद होना चाहिए था यहां पर। अगर

779
00:55:25,120 --> 00:55:29,280
इसका सिद्धांत है तो मगर क्या है ना यह यह क्या है? वह 250

780
00:55:29,280 --> 00:55:33,360
ग्राम मिर्ची वाले हैं। यह बेईमानी करने

781
00:55:33,360 --> 00:55:37,440
में भी आलसी है। मन से बेईमानी नहीं करते हैं।

782
00:55:37,440 --> 00:55:41,840
यू ही जो मन में आए लिख दो और लोग मान लेंगे।

783
00:55:41,840 --> 00:55:45,840
मतलब होता है ना एक मेहनत करता है बेईमानी करने के लिए वो

784
00:55:45,840 --> 00:55:50,280
नहीं है। मेहनत नहीं है। कुछ भी कुछ भी कहो सब चल

785
00:55:50,280 --> 00:55:54,400
जाएगा। तो इसने यहां ये मान लिया कि वेद जो है

786
00:55:54,400 --> 00:55:58,400
चार है। इसने यहां सूक्ष्म वेद की बात नहीं कही। अच्छा

787
00:55:58,400 --> 00:56:02,480
वह सांसारिक वस्तुओं की कामना करते हैं। तो

788
00:56:02,480 --> 00:56:06,560
अब यहां सांसारिक वस्तुओं की कामना करते हैं। कौन? जो विवाद

789
00:56:06,560 --> 00:56:11,040
करते हैं मंत्रों पर उनको वेदों का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है। तो मंत्रों पर विवाद

790
00:56:11,040 --> 00:56:15,120
ये लोग करते ही हैं। ठीक है? दूसरा उनको वेदों का पूर्ण ज्ञान नहीं

791
00:56:15,120 --> 00:56:19,200
होता। अब इसमें एक कैच और आता है। यह लोग बहुत चिल्लाते हैं कि

792
00:56:19,200 --> 00:56:23,520
वो मर गया, यह मर गया। है ना? सांसारिक चीजों की कामना

793
00:56:23,520 --> 00:56:27,600
करते। मैं वहां गया तो मेरी ये ठीक हो गई। मेरा ऐसा

794
00:56:27,600 --> 00:56:32,000
हो गया, मेरा वैसा हो गया। हां। तो ये सांसारिक वस्तुओं

795
00:56:32,000 --> 00:56:36,000
की कामना करते हैं। तो रामपाल की शरण में जाने वाले कितने लोग हैं जो ये सब बताते

796
00:56:36,000 --> 00:56:40,920
हैं। मुझे वहां जाने से ये मिल गया, वो मिल गया, ऐसा हो गया, वैसा हो

797
00:56:40,920 --> 00:56:44,960
गया। सांसारिक चीजों की कामना करते हैं।

798
00:56:44,960 --> 00:56:48,960
तो ऐसे व्यक्तियों की साधना में लास्ट लाइन ऐसे व्यक्तियों की

799
00:56:48,960 --> 00:56:53,200
साधना में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। यानी कि

800
00:56:53,200 --> 00:56:57,440
यह जो यह बातें हैं इनहीं के ऊपर फिट हो रही है। वेद मंत्रों

801
00:56:57,440 --> 00:57:01,840
पर वाद विवाद करने वाले ये ठीक है। उसके बाद ये क्या बताते हैं

802
00:57:01,840 --> 00:57:05,840
कि मुझे ये मिला मेरा ये मरने से बच गया। मेरा ये कैंसर ठीक हो गया। ये है वो

803
00:57:05,840 --> 00:57:10,080
है। ये सब तो बताते हैं। गरीबों को पिछड़े हुए को इसी तरीके

804
00:57:10,080 --> 00:57:14,080
से अपने उसमें लाते हैं। ज्ञान से नहीं आते। आज तक उन्हें ज्ञान नहीं होगा। और

805
00:57:14,080 --> 00:57:18,520
अभी मैं इनहीं के लेख के द्वारा सिद्ध करूंगा कि कितने बड़े ज्ञानी

806
00:57:18,520 --> 00:57:22,240
है। अब

807
00:57:22,240 --> 00:57:26,320
आगे चलते हैं। 246 का

808
00:57:26,320 --> 00:57:32,320
अनुवाद 246 पढ़ लेते हैं। पहले हमारा क्या लिखा है?

809
00:57:35,040 --> 00:57:39,120
सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय

810
00:57:39,120 --> 00:57:43,120
में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है ब्रह्म को तत्व

811
00:57:43,120 --> 00:57:47,360
से जानने वाला ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता

812
00:57:47,360 --> 00:57:53,360
है। ब्रह्म शब्द आया है तो हम एक बार देख ले ब्राह्मणस्य

813
00:58:02,720 --> 00:58:07,120
अर्थ प्रयोजन रहता है ब्रह्म को तत्व से विजानतः ठीक

814
00:58:07,120 --> 00:58:11,120
है यहां शब्द नहीं आया कोई बात नहीं तो ब्रह्म को

815
00:58:11,120 --> 00:58:15,280
तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है तो व्यक्ति

816
00:58:15,280 --> 00:58:19,280
जो निष्काम होकर के कर्म करता है ना वो वाली बात यहां कही जा रही है कि आपको

817
00:58:19,280 --> 00:58:23,280
मन में ये नहीं सोचना है कि मैं

818
00:58:23,280 --> 00:58:27,640
अगर यह युद्ध जीतूंगा अभी अगला हमारा वही है कर्म्यवादी अधिकार माले

819
00:58:27,640 --> 00:58:31,680
गदाच तो दो 46 में यही कहा जा

820
00:58:31,680 --> 00:58:35,680
रहा है कि सब ओर से परिपूर्ण जलाशय प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय

821
00:58:35,680 --> 00:58:39,760
में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त

822
00:58:39,760 --> 00:58:43,760
वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है तो वहां वो उनको उनको

823
00:58:43,760 --> 00:58:47,840
लेकर के जब उसको परमात्मा की हो जाती है ना चीजें परमात्मा से जब वो जुड़ जाता है तो

824
00:58:47,840 --> 00:58:52,000
जो छोटी चीजें होती हैं जो उसको फिर व्यर्थ दिखने लगती

825
00:58:52,000 --> 00:58:56,160
है तो क्योंकि वो मनुष्य देह में है तो आचरण तो करता है मगर सदा सदा

826
00:58:56,160 --> 00:59:00,160
परमात्मा में लीन रहता है। यानी ज्ञानार्थक रूप से परमात्मा में

827
00:59:00,160 --> 00:59:04,960
और गत्यार्थक रूप से यहां की चीजों में।

828
00:59:04,960 --> 00:59:08,960
तो अब इसने क्या किया है 246 में देखते हैं जिस

829
00:59:08,960 --> 00:59:13,560
प्रकार सब ओर से अब पहली बात ये समझ लीजिए कि

830
00:59:13,560 --> 00:59:16,120
ये

831
00:59:16,120 --> 00:59:18,000
अ दो

832
00:59:18,000 --> 00:59:22,480
के श्लोक 46 का अनुवाद कह रहा है। अनुवाद। ठीक है? अनुवाद

833
00:59:22,480 --> 00:59:26,480
क्या होता है? जिसमें अपने मन की बातें हम नहीं डालते। शब्द का

834
00:59:26,480 --> 00:59:30,720
हिंदी अर्थ करते चलते हैं। कुछ एक दो

835
00:59:30,720 --> 00:59:35,040
कुछ सेंटेंस को समझने के लिए कुछ एक दो चीजें डाल दी जाए बात अलग है। मगर

836
00:59:35,040 --> 00:59:40,600
बहुत सारे भावनाएं भावार्थ सब नहीं डाल देते उसमें

837
00:59:40,600 --> 00:59:45,240
अनुवाद। तो जिस प्रकार से सब ओर

838
00:59:45,240 --> 00:59:49,280
से परिपूर्ण जलाशय को प्राप्त हो जाने पर

839
00:59:49,280 --> 00:59:53,360
छोटे से तलैया के प्रति जो आस्था रह जाती है। इसी प्रकार

840
00:59:53,360 --> 00:59:57,360
तत्व ज्ञान को प्राप्त तत्वदर्शी संत की आस्था अन्य ज्ञानों में रह जाती

841
00:59:57,360 --> 01:00:01,520
है। ठीक है कोई बात नहीं। तत्व ज्ञान के आधार पर तत्वद

842
01:00:01,520 --> 01:00:05,520
संत को पूर्ण परमात्मा की जानकारी हो जाती है। जिस कारण से उसकी

843
01:00:05,520 --> 01:00:09,600
अन्य प्रभुओं ब्रह्मा विष्णु महेश तथा छर ब्रह्म

844
01:00:09,600 --> 01:00:13,760
परब्रह्म व देवी देवताओं में आस्था कम रह जाती है। अर्थात वह विद्वान

845
01:00:13,760 --> 01:00:18,000
पूर्ण परमात्मा के आश्रित हो जाता है। तीन लोक की साधना त्याग

846
01:00:18,000 --> 01:00:22,240
कर सतलोक की साधना करता है। ठीक। अब इसने

847
01:00:22,240 --> 01:00:26,760
यहां पर भी ब्रह्मा विष्णु महेश के पूजा

848
01:00:26,760 --> 01:00:30,880
से खंडन कर दिया। पूर्व समय में अब

849
01:00:30,880 --> 01:00:33,120
इसने एक बहुत सारा वृतांत दे दिया तो हम थोड़ा

850
01:00:33,120 --> 01:00:38,440
सा आगे चलते हैं। अब सीधे आ जाते हैं 247

851
01:00:38,440 --> 01:00:43,120
में। अब 247 में क्या बात है? 247

852
01:00:43,120 --> 01:00:47,280
बड़ा टिपिकल भगवत गीता का 247 वाला

853
01:00:47,280 --> 01:00:51,760
जो श्लोक है कर्मवादी कारस्ते माले सुदाच ये एक जटिल

854
01:00:51,760 --> 01:00:56,320
मतलब श्लोक समझने में लोगों को परेशानी होती है तो इस पे

855
01:00:56,320 --> 01:01:00,800
यहां पर ये ज्यादा बात नहीं करते देखिए क्या लिखा है इन्होंने 247 के अर्थ में 247

856
01:01:00,800 --> 01:01:05,360
में कहा है कि कर्म फल की इच्छा मत कर बस देखिए क्या लिखा है

857
01:01:05,360 --> 01:01:09,560
246 का कितना लंबा चौड़ा भाव बात की थी और 247 में क्या लिखा

858
01:01:09,560 --> 01:01:14,080
है अंडरलाइन करके दिखाइए यह है इनका तत्व ज्ञान।

859
01:01:14,080 --> 01:01:18,480
ऐसे होती है तत्व ज्ञानी की पिक्चर पढ़ो क्योंकि जटिल है ना इसका मतलब बताना।

860
01:01:18,480 --> 01:01:22,720
तो अभी हम बात करेंगे इस पे क्रमबद्धता से। फिलहाल

861
01:01:22,720 --> 01:01:26,800
हम दो 47 का अर्थ बता दें। जैसे

862
01:01:26,800 --> 01:01:30,960
भगवान कहते हैं कि तुम्हारी परिणाम में कोई अधिकार नहीं है। केवल

863
01:01:30,960 --> 01:01:36,280
कर्म करने में अधिकार है। तो यहां पर प्रश्न कई बार यह आ जाता है कि

864
01:01:36,280 --> 01:01:40,560
यदि व्यक्ति जीतने के लिए नहीं लड़ रहा है तो उसके

865
01:01:40,560 --> 01:01:44,720
लड़ने में वो जो स्तर है उसका

866
01:01:44,720 --> 01:01:48,800
लड़ने का वो उतना प्रभावशाली नहीं हो पाएगा। यदि उसके मन में लक्ष्य

867
01:01:48,800 --> 01:01:53,680
नहीं होगा कि मुझे जीतना है। है ना? तो

868
01:01:53,680 --> 01:01:57,680
यानी कि परिणाम को तो ध्यान में रखकर ही करना है। तो फिर यहां क्या कहा जा रहा

869
01:01:57,680 --> 01:01:58,480
है कि परिणाम

870
01:01:58,480 --> 01:02:02,640
को ध्यान मतलब परिणाम पर तेरा अधिकार नहीं है। तो बात यह

871
01:02:02,640 --> 01:02:06,640
है कि ऐसा नहीं है कि आपको युद्ध जी युद्ध लड़ना है तो जीतने के

872
01:02:06,640 --> 01:02:11,520
लिए लड़ना है। ऐसा नहीं है कि नहीं लड़ना है। जीतने के लिए लड़ना है।

873
01:02:11,520 --> 01:02:15,520
पर उस जीत से आपको क्या मिलेगा?

874
01:02:15,520 --> 01:02:19,760
सिर्फ एक भाव। क्या कि मैं वह करूंगा जो शास्त्र कहते हैं।

875
01:02:19,760 --> 01:02:23,840
सिंपल यहां अगर आपके मन में यह भाव है कि मैं

876
01:02:23,840 --> 01:02:28,000
जो लड़ रहा हूं युद्ध वो इसलिए मैं जो जीतने के लिए युद्ध

877
01:02:28,000 --> 01:02:32,080
लड़ रहा हूं। जीतने के लिए लड़ रहा हूं। परिणाम पे ध्यान दे रहा हूं। मगर

878
01:02:32,080 --> 01:02:36,080
उस परिणाम पर मेरा ध्यान इसलिए भोग करना है। उस परिणाम पर

879
01:02:36,080 --> 01:02:40,160
मेरा ध्यान इसलिए है कि शास्त्र ने कहा है।

880
01:02:40,160 --> 01:02:44,320
ठीक है? अब जैसे जीत जाओगे तो क्या मिलेगा? जीत जाओगे

881
01:02:44,320 --> 01:02:48,400
तो महल मिलेगा। तो ठीक है। मैं महल के लिए जीत रहा

882
01:02:48,400 --> 01:02:52,480
हूं। मगर मैं महल के लिए इसलिए जीत रहा हूं क्योंकि शास्त्र ने कहा

883
01:02:52,480 --> 01:02:57,120
है। मुझे पर्सनल कोई इंटरेस्ट नहीं है।

884
01:02:57,120 --> 01:03:01,280
अच्छा महल में जाऊंगा तो ऐसे रहूंगा

885
01:03:01,280 --> 01:03:05,440
वैसे रहूंगा। वहां भोग होगा तो ठीक है। मैं वहां के महलों के भोग

886
01:03:05,440 --> 01:03:09,600
भोग रहा हूं। मगर इसलिए भोग रहा हूं क्योंकि शास्त्र ने कहा है

887
01:03:09,600 --> 01:03:13,600
मेरी अपनी कोई प्रीति नहीं है। अपनी कोई आसक्ति नहीं है उन

888
01:03:13,600 --> 01:03:17,840
भोगों के प्रति। यह बात भगवान शंकराचार्य जी ने अपनी

889
01:03:17,840 --> 01:03:23,840
भगवत गीता में

890
01:03:23,960 --> 01:03:28,400
बताई। तो जब ऐसा जटिल समस्या वाला आया जैसे योगक्षेम

891
01:03:28,400 --> 01:03:32,400
का कोई अर्थ बताया ही नहीं इन्होंने। उसी तरीके से यहां पर भी धीरे से

892
01:03:32,400 --> 01:03:36,400
आगे सरक गए कि वह तेरा कर्म में वह है

893
01:03:36,400 --> 01:03:40,640
और बस आगे बढ़ दिए। तेरा कर्म

894
01:03:40,640 --> 01:03:45,040
में ही अधिकार है। ज्ञान निष्ठा में नहीं। वहां कर्म करते हुए तेरा फल में भी अधिकार नहीं है। अर्थात

895
01:03:45,040 --> 01:03:49,200
यह भगवान शंकराचार्य जी ने अर्थ किया है इसका 247 का। अर्थात तुझे

896
01:03:49,200 --> 01:03:53,520
किसी भी अवस्था में कर्म फल की इच्छा नहीं होनी चाहिए। यदि कर्म फल में तेरी तृष्णा होगी

897
01:03:53,520 --> 01:03:57,520
तो कर्म फल प्राप्ति का का कारण होगा। अतः इस प्रकार

898
01:03:57,520 --> 01:04:01,520
कर्म फल प्राप्ति का कारण तू मत बन। क्योंकि जब मनुष्य कर्म

899
01:04:01,520 --> 01:04:05,520
फल की कामना से प्रेरित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है तब वह

900
01:04:05,520 --> 01:04:09,520
कर्म कर्म फल रूप पुनर्जन्म का हेतु बन जाता है। यदि

901
01:04:09,520 --> 01:04:13,680
कर्म फल की इच्छा ना करें तो दुख रूप कर्म करने की आवश्यकता क्या है? तो

902
01:04:13,680 --> 01:04:17,760
इसका जवाब आगे दिया है कि योग में स्थित

903
01:04:17,760 --> 01:04:21,760
होकर 48व में योग में स्थित होकर केवल ईश्वर के लिए कर्म कर। क्यों कर रहा हूं

904
01:04:21,760 --> 01:04:26,000
मैं? मैं क्यों जीत रहा हूं? मेरा जीतने

905
01:04:26,000 --> 01:04:28,720
का उद्देश्य यह नहीं है कि मुझे भोग प्राप्त

906
01:04:28,720 --> 01:04:33,200
हो। मेरा जीतने का उद्देश्य इसलिए है क्योंकि मुझे वो करना है जो

907
01:04:33,200 --> 01:04:37,200
ईश्वर ने कहा है। तो केवल ईश्वर के लिए कर्म कर। उनमें

908
01:04:37,200 --> 01:04:41,600
भी ईश्वर मुझ पर प्रसन्न हो। इस आशा रूप आसक्ति को छोड़ दे।

909
01:04:41,600 --> 01:04:45,600
ईश्वर मुझसे प्रसन्न होंगे। यह भी ध्यान मत दे। केवल एक मुझसे

910
01:04:45,600 --> 01:04:49,600
कहा है मुझे करना है बस मुझे क्रेडिट

911
01:04:49,600 --> 01:04:53,760
नहीं लेना है कौन क्या कहता है यह सब नहीं देखना

912
01:04:53,760 --> 01:04:57,840
है ईश्वर प्रसन्न होंगे मुझसे इसके प्रति आसक्ति भी नहीं रखनी है

913
01:04:57,840 --> 01:05:01,840
केवल मुझे वो करना है जो ईश्वर ने कहा है

914
01:05:01,840 --> 01:05:06,320
ठीक है इस भावना के साथ अपना कर्म करिए तो

915
01:05:06,320 --> 01:05:10,320
यह समय पर आ जाती है कांकर भाष्य से

916
01:05:10,320 --> 01:05:15,560
चीजें समझ में तो

917
01:05:15,560 --> 01:05:19,680
48 पर आ जाते हैं हम। 47वा हो गया। अब

918
01:05:19,680 --> 01:05:23,760
इसने 48 से 50 तक एक साथ लिया। तो हम 48 से 50 पहले इसका

919
01:05:23,760 --> 01:05:27,760
पढ़ लेते हैं। इसका पढ़ते हैं। पहले 48 से 50

920
01:05:27,760 --> 01:05:31,920
क्या लिख रहा है ये? 48 से 50 तक का

921
01:05:31,920 --> 01:05:37,920
भाव है कि शास्त्र विधि अनुसार।

922
01:05:38,480 --> 01:05:42,560
अच्छा इसने यहां पर एक बात और है 247 में जब इसने कहा कि कर्म फल

923
01:05:42,560 --> 01:05:48,560
की इच्छा मत कर तो जब इसने वहां पीछे कहा था कि लाभ हानि

924
01:05:48,880 --> 01:05:53,200
लाभ हानि वाले लाभ हानि में समत्व बुद्धि रखने का खंडन

925
01:05:53,200 --> 01:05:57,280
किया था तो इसका मतलब ये दो 47 वाला जो श्लोक है

926
01:05:57,280 --> 01:06:01,280
इसका भी खंडन हो गया क्यों खंडन हो गया क्योंकि यहां भी यही कहा जा

927
01:06:01,280 --> 01:06:05,440
रहा है लाभ हानि पर ध्यान मत रख हमने बताया था पीछे पीछे के दो

928
01:06:05,440 --> 01:06:09,440
श्लोक ऐसे थे इसमें लाभ हानि और समत्व बुद्धि रखने को कहा जा रहा है तो उसने

929
01:06:09,440 --> 01:06:13,600
मना कर दिया था कि नहीं अर्जुन कौन से खेत की मूली है जो

930
01:06:13,600 --> 01:06:17,600
दुखी नहीं होगा है ना

931
01:06:17,600 --> 01:06:21,600
और लाभ हानि के बिना युद्ध कैसे हो सकता है दो श्लोकों में इसने मना किया

932
01:06:21,600 --> 01:06:25,920
था तो इसका अर्थ है कि यहां कर्म फल की इच्छा मत कर यहां पर भी

933
01:06:25,920 --> 01:06:30,160
खंडन हो रहा है ठीक है क्योंकि पीछे

934
01:06:30,160 --> 01:06:30,720
इसने माना

935
01:06:30,720 --> 01:06:34,880
है लाभ हानि में समुद्धि नहीं रखनी है और राग द्वेष

936
01:06:34,880 --> 01:06:39,120
में समुद्धि नहीं रखनी है तो

937
01:06:39,120 --> 01:06:43,200
247 का भी खंडन हो गया। लगभग मेरे ख्याल से अभी तक पांच श्लोक हो गए हैं।

938
01:06:43,200 --> 01:06:47,360
यह श्लोक भी ध्यान रखिएगा कि इसने हम लोग कितने श्लोक निकालेंगे जो इसने नहीं

939
01:06:47,360 --> 01:06:51,760
माने। एज इट इज नहीं माने या तो गलत कह दिया सीधे-सीधे

940
01:06:51,760 --> 01:06:56,160
अर्थ बदलने की तो बात दूर है। इसने गलत कह दिया।

941
01:06:56,160 --> 01:07:00,640
मैं पेज नंबर बता दूं क्या आपको?

942
01:07:00,640 --> 01:07:04,960
दिखाना है आपको तो। वैसे वह हो चुका है। पेज नंबर 23

943
01:07:04,960 --> 01:07:09,040
देखिए।

944
01:07:09,040 --> 01:07:13,200
लास्ट लाइन देखिए 23 में बिना लाभ हानि के युद्ध

945
01:07:13,200 --> 01:07:19,200
हो सकता है। हां।

946
01:07:20,240 --> 01:07:24,400
ठीक है? तो यहां पर इसने 31

947
01:07:24,400 --> 01:07:28,400
से 37 के बीच में कोई श्लोक है जिसमें

948
01:07:28,400 --> 01:07:32,160
लाभहानि को समान समझकर युद्ध करने की बात कही है भगवान ने तो उसका खंडन कर रहा

949
01:07:32,160 --> 01:07:36,240
है। ये बिना लाभहानि के युद्ध हो सकता है और इससे और

950
01:07:36,240 --> 01:07:42,240
पीछे एक और है।

951
01:07:59,680 --> 01:08:04,080
यह देखिए इसने क्या कहा है 24वें पेज पर काल

952
01:08:04,080 --> 01:08:08,080
ब्रह्म ने अपना स्वार्थ सिद्ध करने यानी महाभारत का युद्ध करवाने

953
01:08:08,080 --> 01:08:12,080
के लिए पूरा जोर लगाया। यह वाली बात है जो लाभहानि

954
01:08:12,080 --> 01:08:18,080
वाली

955
01:08:27,040 --> 01:08:31,440
ठीक है। आगे चलते हैं। हम

956
01:08:31,440 --> 01:08:37,440
तो अब थोड़ा सा आगे बढ़ते

957
01:08:39,320 --> 01:08:43,760
हैं। तो 48 में क्या कहा जा रहा है कि 48

958
01:08:43,760 --> 01:08:47,960
से 50 तक इसने कहा है कि भाव है कि शास्त्र विधि अनुसार भक्ति

959
01:08:47,960 --> 01:08:52,800
कर्म एक प्रभु का ही करना श्रेयकर है।

960
01:08:52,800 --> 01:08:56,800
अब यह कहा जा रहा है शास्त्र विधि के अनुसार भक्ति कर्म एक प्रभु का

961
01:08:56,800 --> 01:09:00,800
ही करना श्रेयकर है। आपको सिद्धि प्राप्त हो या ना हो

962
01:09:00,800 --> 01:09:04,880
इस बात को भूल जाओ। प्रभु जो करता है वह अच्छा ही होता है।

963
01:09:04,880 --> 01:09:08,960
यह ध्यान में रखकर साधना करता रहे। अब यहां साधना की बात नहीं हो रही

964
01:09:08,960 --> 01:09:13,040
है। यहां बात हो रही है कि तुमको कर्म जो शास्त्रों में

965
01:09:13,040 --> 01:09:17,360
वर्णित कर्म है उनको किस भाव के साथ करना चाहिए। यानी कि

966
01:09:17,360 --> 01:09:22,080
अगर तुम युद्ध किसी की रक्षा करने जा रहे हो तो वो कैसे करना चाहिए? अगर तुम्हें

967
01:09:22,080 --> 01:09:26,080
क्या कहते हैं कोई यज्ञ करना है तो वो किस भाव के साथ करना चाहिए?

968
01:09:26,080 --> 01:09:30,080
क्योंकि ईश्वर ने कहा है। ईश्वर प्रसन्न होगा इस भाव को भी नहीं। ईश्वर ने

969
01:09:30,080 --> 01:09:34,240
कहा बस मुझे करना है। तो इस बात

970
01:09:34,240 --> 01:09:38,320
को ध्यान में ना रखकर करना चाहिए। तो आपको सिद्धि

971
01:09:38,320 --> 01:09:42,080
प्राप्त हो या ना हो इस बात को भूल जाओ। प्रभु जो करता है अच्छा ही होता है। ये ध्यान

972
01:09:42,080 --> 01:09:46,240
में रखकर साधना करता है। तो इसने यहां पे शास्त्र विधि के अनुसार भक्ति

973
01:09:46,240 --> 01:09:50,480
साधना यह सब बताया है। पहले वाले सर्व शास्त्र विरुद्ध भक्ति

974
01:09:50,480 --> 01:09:54,720
कर्म त्याग दे। चाहे वे तुझे अच्छे लगते हैं तथा अन्य दूषित

975
01:09:54,720 --> 01:09:59,280
कर्म जैसे मांस निद्रा यह सब इसने बातें की है। त्याग कर तत्वदर्शी

976
01:09:59,280 --> 01:10:03,520
संत द्वारा बताए गए भक्ति मार्ग है ना यह सब कुछ त्याग

977
01:10:03,520 --> 01:10:07,600
दो। अच्छा और क्या त्यागना है जैसे किसी को बुलाकर

978
01:10:07,600 --> 01:10:11,920
पाठ इत्यादि करवाना भिखारी को पैसे देना वह भिखारी उन

979
01:10:11,920 --> 01:10:16,240
पैसों से शराब का सेवन भी कर सकता है। तो अब

980
01:10:16,240 --> 01:10:21,920
यहां देखिए कि 48 से 50 में

981
01:10:21,920 --> 01:10:26,000
क्या यह सब बातें हो रही है? भक्ति की बात हो रही है या यह बताया जा

982
01:10:26,000 --> 01:10:30,320
रहा है कि आपको कर्म कर एक बात आई है ना कि कोई व्यक्ति

983
01:10:30,320 --> 01:10:35,400
एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए हुए नहीं रह सकता।

984
01:10:35,400 --> 01:10:39,520
तो इसलिए तुझे शास्त्र भेद कर्म करना है। तो यानी तुम्हें शास्त्र

985
01:10:39,520 --> 01:10:43,600
भेद कर्म तो करते रहना है। तो यहां उन कर्मों की बात जब हो रही है कि तुम्हें कर्म

986
01:10:43,600 --> 01:10:47,840
जो करने हैं अपने जीना उठना रहना खाना पीना शास्त्र के अनुसार

987
01:10:47,840 --> 01:10:52,000
वो किस भाव को मन में रखकर करने यहां भक्ति की बात नहीं हो रही है। मगर इसने

988
01:10:52,000 --> 01:10:56,160
क्या किया? साधना भक्ति और तत्वदर्शी द्वारा बताया

989
01:10:56,160 --> 01:10:57,360
गया भक्ति मार्ग

990
01:10:57,360 --> 01:11:03,360
शास्त्र विरुद्ध सब डाल दिया।

991
01:11:03,800 --> 01:11:08,000
जबकि अब हम अपना पढ़ लेते हैं क्या लिखा है? तू आसक्ति

992
01:11:08,000 --> 01:11:12,080
को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर। अब देखिए इस

993
01:11:12,080 --> 01:11:16,400
इसका भी खंडन हो रहा है कि सिद्धि और असिद्धि में समान

994
01:11:16,400 --> 01:11:21,040
बुद्धि वाला हो। एक ही बात हो गई। सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला हो।

995
01:11:21,040 --> 01:11:25,200
योग में स्थित हुआ कर्तव्यों को कर्तव्य कर्मों को समत्व कर। तो

996
01:11:25,200 --> 01:11:29,280
यह छठवां श्लोक हो गया जिसका इसने खंडन कर दिया

997
01:11:29,280 --> 01:11:33,680
यह कहकर कि लाभ हानि में समत्व बुद्धि नहीं रखनी है क्योंकि यहां पर भी सिद्धि असिद्धि

998
01:11:33,680 --> 01:11:37,920
में समान बुद्धि वाला होने की बात कही जा रही है 48व में 49

999
01:11:37,920 --> 01:11:42,240
में क्या जा रहा है कहा जा रहा है इस समत्व रूप बुद्धि योग से सकाम कर्म अत्यंत

1000
01:11:42,240 --> 01:11:46,600
ही निम्न श्रेणी का है अब जब हम लोग शास्त्र में वर्णित

1001
01:11:46,600 --> 01:11:50,800
कर्म ऐसे करते हैं मैं तो सिर्फ ईश्वर के लिए कर रहा हूं ईश्वर ने कहा है इसलिए

1002
01:11:50,800 --> 01:11:54,880
कर रहा हूं तो वो तो ठीक है मगर यदि हम सकाम किसी

1003
01:11:54,880 --> 01:11:59,040
फल की प्राप्ति के लिए करते हैं तो उसको निम्न श्रेणी

1004
01:11:59,040 --> 01:12:03,200
का कहा जाएगा। इसलिए हे धनंजय तू समबुद्धि की में ही रक्षा

1005
01:12:03,200 --> 01:12:07,760
का उपाय ढूंढ अर्थात बुद्धि योग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि

1006
01:12:07,760 --> 01:12:12,080
फल के हेतु बनने वाला अत्यंत दीन है। तो इस श्लोक का भी खंडन

1007
01:12:12,080 --> 01:12:12,800
हो गया है।

1008
01:12:12,800 --> 01:12:16,880
लाभ हानि में समत बुद्धि नहीं। राग द्वेष में समत्व बुद्धि नहीं होनी

1009
01:12:16,880 --> 01:12:21,120
चाहिए। रामपाल कह चुके तो ये कौन सा? सातवा

1010
01:12:21,120 --> 01:12:25,640
ये सातवां हो गया। सातवा श्लोक है जिसका खंडन

1011
01:12:25,640 --> 01:12:29,800
इसने किया परंतु यहां नहीं कर रहा

1012
01:12:29,800 --> 01:12:33,840
है हम अच्छा यहां पे इसने बदल दिया सिद्धि असिद्धि

1013
01:12:33,840 --> 01:12:38,160
में समान बुद्धि वाला नहीं कहा है इसने इसने कहा है आपको सिद्धि

1014
01:12:38,160 --> 01:12:42,160
प्राप्त हो या ना हो इस बात को भूल जा अब बात ये है कि अगर यह नहीं कहा है

1015
01:12:42,160 --> 01:12:46,400
समान बुद्धि वाला हो तो यहां पे समत्वम 48 नंबर

1016
01:12:46,400 --> 01:12:50,560
के श्लोक में समत्व समत्वम नामक एक समत्वम शब्द

1017
01:12:50,560 --> 01:12:55,280
आया है तो समत्वम जो शब्द उसका उसकी हिंदी

1018
01:12:55,280 --> 01:12:59,600
कहां गई? खा गए क्या? तुम्हें समत्व का खंडन

1019
01:12:59,600 --> 01:13:03,680
करना है वो ठीक है। मगर यहां पर समत्व शब्द आया है तो तुम्हें इसका खंडन करना पड़ेगा।

1020
01:13:03,680 --> 01:13:07,760
यदि तुम यहां पर इसका अर्थ ना लिखकर कुछ अपना मनमाना अर्थ लिख

1021
01:13:07,760 --> 01:13:11,760
रहे हो कि सिद्धि प्राप्त हो या ना हो इस बात को भूल जा प्रभु जो

1022
01:13:11,760 --> 01:13:15,840
करता है अच्छा होता है। ठीक है? ये बात भी ठीक है। मगर यहां समत्व की बात

1023
01:13:15,840 --> 01:13:21,360
की जा रही है। तो आपको समत्व की बात करनी पड़ेगी जो कि आपने नहीं की।

1024
01:13:21,360 --> 01:13:25,600
इसी प्रकार से समत्व की बात आगे भी की है। क्या की है कि

1025
01:13:25,600 --> 01:13:27,920
सम बुद्धि योग से सकाम कर्म

1026
01:13:27,920 --> 01:13:32,160
49 में तो इसका भी आपने यहां पे भी समत्व

1027
01:13:32,160 --> 01:13:35,880
शब्द आया है।

1028
01:13:35,880 --> 01:13:40,080
हम सकाम कर्म बुद्धि योग

1029
01:13:40,080 --> 01:13:44,080
बुद्धि योग को समत्व कहा गया। चलिए ठीक है। इसमें मान लेंगे समत्व

1030
01:13:44,080 --> 01:13:48,080
की बात नहीं की है। शब्द नहीं आया क्योंकि ठीक है। जब

1031
01:13:48,080 --> 01:13:53,080
मगर बुद्धि युक्त तो वो समबुद्धि युक्ति ही कहा जा रहा है। मगर ठीक

1032
01:13:53,080 --> 01:13:57,200
है। और 50 में क्या जा कहा जा रहा है? इस प्रकार

1033
01:13:57,200 --> 01:14:01,280
की बुद्धि से युक्त पुरुष यानी किस प्रकार की बुद्धि

1034
01:14:01,280 --> 01:14:05,320
सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम सम समत्व रूप बुद्धि उसी की बात हो रही है

1035
01:14:05,320 --> 01:14:09,680
तो ये आठवां और ये यानी कि

1036
01:14:09,680 --> 01:14:13,760
49वा और 50वा श्लोक भी क्योंकि वहां समत्व बुद्धि

1037
01:14:13,760 --> 01:14:18,320
रखने की बात कर रहे हैं भगवान तो रामपाल ने लाभ हानि में समदृष्टि

1038
01:14:18,320 --> 01:14:22,480
ना रखने के लिए राग द्वेष में समदृष्टि ना रखने के लिए कहा है तो यहां पर भी

1039
01:14:22,480 --> 01:14:26,720
इन दोनों श्लोकों का भी उसने खंडन किया है पहले भी बाकी इसने

1040
01:14:26,720 --> 01:14:30,880
इनमें जो बुद्धि की बात हो रही है यहां पे कोई बात नहीं की है और अपने मन

1041
01:14:30,880 --> 01:14:35,200
से कुछ भी अर्थ कर दिया है तत्वदर्शी

1042
01:14:35,200 --> 01:14:39,200
संत द्वारा बताए गए भक्ति मार्ग तो इन इन अर्थों को प्रकट

1043
01:14:39,200 --> 01:14:43,640
करने वाले शब्द भी संस्कृत में होने चाहिए जो कि नहीं

1044
01:14:43,640 --> 01:14:47,760
है। अब एक चीज और है अह यह

1045
01:14:47,760 --> 01:14:52,480
जो पैराग्राफ है दो 48 से 50 तक इसका

1046
01:14:52,480 --> 01:14:56,640
रामपाल का इसमें इसने क्या कहा है कि गुरुदेव के आदेश

1047
01:14:56,640 --> 01:15:00,800
का पालन करना ही सत्य भक्ति में हितकर है। अब

1048
01:15:00,800 --> 01:15:05,120
रामपाल कभी गुरु शब्द गुरु किसे कहते हैं? ये नहीं

1049
01:15:05,120 --> 01:15:10,000
बताता है। गुरु वो है जो अंधकार को मिटाए। ठीक है?

1050
01:15:10,000 --> 01:15:14,080
अंधकार क्या है? कि मैं कौन हूं? मुझे कहां जाना है? मुझे क्या करना

1051
01:15:14,080 --> 01:15:18,640
है? यह सब अंधकार है। असतो मादम तमसो मागमया मृत्युमा

1052
01:15:18,640 --> 01:15:23,040
मृतमय ये सब अंधकार है। तो गुरु वो है जो तत्व

1053
01:15:23,040 --> 01:15:27,360
से आपको आपके बारे में बताए और आपका जो प्रतिपाद्य

1054
01:15:27,360 --> 01:15:31,440
विषय है उसके बारे में बताए। तो वो तो इसने बताया नहीं है कभी। तो

1055
01:15:31,440 --> 01:15:35,600
उल्टा पेड़ करता रहता है। उल्टी व्याख्या यह सब करता रहता। तो यह गुरु कहां

1056
01:15:35,600 --> 01:15:39,680
से हो गया? खैर आगे बढ़ते हैं। अब देखिए यहां पे एक बहुत जरूरी

1057
01:15:39,680 --> 01:15:43,840
पॉइंट आने वाला है। 251 में यह क्या

1058
01:15:43,840 --> 01:15:48,240
कह रहा है? ध्यान से देखिए। यह कह रहा है कि जो भजन

1059
01:15:48,240 --> 01:15:53,080
अभ्यास शास्त्रानुकूल अर्थात

1060
01:15:53,080 --> 01:15:57,360
मतानुसार मेरे बताए अनुसार करता है। मत परायण होकर करता

1061
01:15:57,360 --> 01:15:58,880
है। वह सतलोक

1062
01:15:58,880 --> 01:16:03,120
में जाकर फिर वहां से आगे अनामी लोक को चला जाता है। अब देखिए

1063
01:16:03,120 --> 01:16:07,120
प्रॉब्लम क्या है? यहां पर भगवान कह रहे हैं जो मेरे बताए हुए

1064
01:16:07,120 --> 01:16:11,200
अनुसार चलता है वह अमुक अमुक जगह पहुंच

1065
01:16:11,200 --> 01:16:15,440
जाता है। यह तो भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं। ठीक है? वो भी हम अपना

1066
01:16:15,440 --> 01:16:19,440
अपना अर्थ भी पढ़ लेंगे। मगर पॉइंट यह इसने भी माना है कि जो

1067
01:16:19,440 --> 01:16:23,760
गीता कहने वाले के अनुसार चलता है वह अमुक अमुक जगह पहुंच जाता है। तो गीता

1068
01:16:23,760 --> 01:16:27,840
कहने वाले के अनुसार चलता है तो गीता कहने वाला तो कई जगह चाल चल रहा है। कई

1069
01:16:27,840 --> 01:16:31,840
जगह झूठ बोल रहा है। सात आठ श्लोकों का तो नौ श्लोकों का तो आप

1070
01:16:31,840 --> 01:16:36,080
अभी तक खंडन कर चुके हो गीता कहने वाले के और कह रहे हो 5%

1071
01:16:36,080 --> 01:16:40,480
ज्ञान उसका गलत है। 5% नहीं गीता जब तक पूरी होगी तुम्हारी

1072
01:16:40,480 --> 01:16:44,480
तुम्हारा 90 पर तुम्हारे अनुसार 80 या 90% जो है गीता

1073
01:16:44,480 --> 01:16:49,400
में लिखी हुई बातें गलत होगी। 5% नहीं।

1074
01:16:49,400 --> 01:16:53,840
खैर तो एक तो बात रही यह कि गीता कहने

1075
01:16:53,840 --> 01:16:57,840
वाले के अनुसार जो चलता है जो उनको फॉलो करेगा वो

1076
01:16:57,840 --> 01:17:02,000
कहां पहुंच जाएगा? सतलोक में अमुक अमुक

1077
01:17:02,000 --> 01:17:07,400
स्थान पर पहुंच जाएगा। ठीक है?

1078
01:17:07,400 --> 01:17:13,400
फिर हमारे में दो 51 में क्या कहा गया है?

1079
01:17:14,560 --> 01:17:18,640
क्योंकि समबुद्धि से युक्त वो वही पीछे से बुद्धि जो चली आ

1080
01:17:18,640 --> 01:17:22,800
रही समुद्धि समुद्धि से युक्त ज्ञानी जन कर्मों

1081
01:17:22,800 --> 01:17:27,440
से उत्पन्न होने वाले फलों को त्याग कर जन्म रूप बंधन से मुक्त होकर निर्विकार

1082
01:17:27,440 --> 01:17:32,000
परम पद को प्राप्त हो जाते हैं। ये जो अनामयम शब्द आया है

1083
01:17:32,000 --> 01:17:36,080
ये इसका अर्थ है निर्विकार। विकार रहित परम तत्व

1084
01:17:36,080 --> 01:17:40,400
को प्राप्त हो जाते हैं। विकार रहित क्या है? जैसे हमने पूछा ना कि

1085
01:17:40,400 --> 01:17:44,480
कबीर जब कहीं एक जगह बैठा है और सूर्य की तरह उसकी रोशनी जिस तरह फैलती

1086
01:17:44,480 --> 01:17:48,640
है उसी तरह उसकी शक्ति फैली हुई है तो सूर्य की रोशनी जितना सूर्य

1087
01:17:48,640 --> 01:17:53,120
से दूर होती है उतनी उसकी दाहक क्षमता कम होती है हम

1088
01:17:53,120 --> 01:17:57,200
तो क्या कबीर की दा कबीर का जो नियंत्रण है

1089
01:17:57,200 --> 01:18:02,000
संसार में वो भी कम होता जाता है जितना दूर है कबीर से कोई तो

1090
01:18:02,000 --> 01:18:06,800
अगर नियंत्रण कम हो रहा है क्योंकि शक्ति है वो स्वयं तो है नहीं तो कम होगा

1091
01:18:06,800 --> 01:18:10,880
तो जब नियंत्र नियंत्रण कम हो रहा है तो विकार आ गया। कम हो गया। यहां इसको

1092
01:18:10,880 --> 01:18:15,200
कहते हैं विकार। विकार आ गया। तो

1093
01:18:15,200 --> 01:18:19,680
कबीर जो है निर्विकार नहीं है। परंतु वहां रामपाल

1094
01:18:19,680 --> 01:18:22,560
को भजने वाले लोग निर्विकार परम परम पद को प्राप्त

1095
01:18:22,560 --> 01:18:26,560
अवश्य हो जाएंगे। ये दावा है जेल में बैठे हुए व्यक्ति का।

1096
01:18:26,560 --> 01:18:30,720
वो बात अलग है कि उसकी तबीयत खराब होती है। उसके जीवन में स्वयं विकार आते हैं। चश्मा लगाता

1097
01:18:30,720 --> 01:18:34,960
है। उसका ऐसेसे हंठ फड़कता है। यहां ऐसेसे बात

1098
01:18:34,960 --> 01:18:39,200
करता है रामपाल। वह सब विकार है सब और क्या है?

1099
01:18:39,200 --> 01:18:43,400
मगर वो स्वयं परमात्मा का वो है अवतार है

1100
01:18:43,400 --> 01:18:47,440
भाई। अच्छा तो यहां पर कहा

1101
01:18:47,440 --> 01:18:51,520
जा रहा है 51 में कि जो लोग

1102
01:18:51,520 --> 01:18:55,880
इस प्रकार समबुद्धि से युक्त ज्ञानी

1103
01:18:55,880 --> 01:18:59,920
जन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्याग कर जन्म रूप

1104
01:18:59,920 --> 01:19:04,560
बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम तत्व को प्राप्त हो जाते हैं।

1105
01:19:04,560 --> 01:19:08,800
और इसने क्या लिखा है? दो 51 में स्पष्ट है कि जो भजन

1106
01:19:08,800 --> 01:19:12,880
अभ्यास शास्त्र अनुकूल ये मतलब कोई अनुवाद है क्या

1107
01:19:12,880 --> 01:19:17,000
ये ये कौन से एंगल से अनुवाद

1108
01:19:17,000 --> 01:19:21,760
है दो के श्लोक 51 में स्पष्ट है कि जो भजन अभ्यास शास्त्रानुकूल

1109
01:19:21,760 --> 01:19:26,720
अर्थात मतानुसार मत परायण होकर मेरे अनुसार

1110
01:19:26,720 --> 01:19:30,800
करता है वह सतलोक में जाकर फिर वहां से आगे अनामी लोक को चला

1111
01:19:30,800 --> 01:19:34,800
जाता है। अब देखिए सतलोक जाकर

1112
01:19:34,800 --> 01:19:37,760
वहां से आगे अनामी लोक को चला जाता है। यानी

1113
01:19:37,760 --> 01:19:41,840
कि सतलोक इस नॉट द एंड सतलोक भी शाश्वत

1114
01:19:41,840 --> 01:19:46,360
नहीं रहा फिर क्योंकि उससे आगे भी कोई लोक है अनामी

1115
01:19:46,360 --> 01:19:50,480
लोक और क्या है? अर्थात अनामी परमात्मा को

1116
01:19:50,480 --> 01:19:54,560
प्राप्त हो जाता है। अर्थात जन्म मरण का रोग समाप्त हो जाता है। तो

1117
01:19:54,560 --> 01:19:58,720
कहां जाके जन्म मरण का रोग समाप्त होता है? सतलोक जाके नहीं

1118
01:19:58,720 --> 01:20:02,720
अनामी लोग जाकर के और सतलोक में यदि कबीर है तो

1119
01:20:02,720 --> 01:20:06,800
फिर अनामी लोक में कौन है तो अभी बात करेंगे वो भी बहुत मजेदार

1120
01:20:06,800 --> 01:20:10,960
चीज है। तो यह अनामी

1121
01:20:10,960 --> 01:20:15,480
लोक की बात हो गई।

1122
01:20:15,480 --> 01:20:19,840
अब आगे चलते हैं। इसने बहुत सारी बातें कही हैं।

1123
01:20:19,840 --> 01:20:23,920
हम लोग जहां से आ जाते हैं। जो अंतिम गति बताई

1124
01:20:23,920 --> 01:20:28,000
है ना पूर्ण परमात्मा का ज्ञान होने पर अगले पेज पर 26वें पेज पर लास्ट पैराग्राफ

1125
01:20:28,000 --> 01:20:32,320
पढ़ रहा हूं। पांचवी गति यानी कि मुक्ति का स्थान। सतलोक

1126
01:20:32,320 --> 01:20:36,640
में मुक्ति नहीं है। पहले ध्यान रख लीजिए। सतलोक से आगे जाना है आपको।

1127
01:20:36,640 --> 01:20:40,640
इसमें क्या लिखा है? पूर्ण परमात्मा का ज्ञान होने पर उसी परमात्मा

1128
01:20:40,640 --> 01:20:44,640
प्राप्ति की साधना करते हैं। इसी प्रकार यह आत्मा तत्वदर्शी संत

1129
01:20:44,640 --> 01:20:48,720
से उपदेश मंत्र प्राप्त करके सत्य भक्ति की कमाई

1130
01:20:48,720 --> 01:20:52,960
करके उसके आधार से सतलोक चली जाती है।

1131
01:20:52,960 --> 01:20:57,440
क्या करती है? यह आत्मा तत्वदर्शी संत से उपदेश

1132
01:20:57,440 --> 01:21:02,160
मंत्र प्राप्त करके सत्य भक्ति की कमाई करके

1133
01:21:02,160 --> 01:21:06,400
उसके आधार पर सतलोक चली जाती है। तो सत्य भक्ति

1134
01:21:06,400 --> 01:21:10,560
करके कहां पहुंचे हैं? सतलोक। उसके बाद यह

1135
01:21:10,560 --> 01:21:14,880
वह स्थान है जहां प्राणी मानव रूप में आकार

1136
01:21:14,880 --> 01:21:18,880
मानव रूप के आकार में रहता है। अब दिक्कत क्या है

1137
01:21:18,880 --> 01:21:22,960
यहां पर? कि प्राणी मानव रूप के आकार में रहता है। तो क्या

1138
01:21:22,960 --> 01:21:27,840
प्राणी का और कोई आकार भी है?

1139
01:21:27,840 --> 01:21:31,920
मानव रूप के आकार में रहता है। यानी कि उसका कोई और आकार भी है। यहां

1140
01:21:31,920 --> 01:21:37,920
इसने ये

1141
01:21:39,160 --> 01:21:43,280
माना। आगे और भी कुछ कह रहा है। यहां पर गए प्राणी आत्मा कभी

1142
01:21:43,280 --> 01:21:47,440
नहीं मरते। इसका तो मतलब ही क्या है? जब आत्मा को अविनाशी कहा है। तुम समझ

1143
01:21:47,440 --> 01:21:51,920
से बाहर है। खैर सतलोक वह स्थान है जिसमें हंस

1144
01:21:51,920 --> 01:21:56,080
आत्मा आकार में मौज करती है। सतलोक से आगे अलख लोक

1145
01:21:56,080 --> 01:22:00,240
है। अलक लोक में अलक पुरुष का राज्य है। ये बहुत ध्यान से सुनिए।

1146
01:22:00,240 --> 01:22:04,320
बहुत जरूरी बात है यहां पर। देखिए जो ये लोग कहते हैं ना ब्रह्मा विष्णु महेश वो

1147
01:22:04,320 --> 01:22:08,320
तो यहां पर उनकी भक्ति करने मना किया जा रहा है। वही पॉइंट आ रहा है

1148
01:22:08,320 --> 01:22:12,400
क्या है कि अलक्ष लोक से आगे आगम लोक है। आगम लोक

1149
01:22:12,400 --> 01:22:16,560
में अगम पुरुष का राज्य है। अगम लोक के आगे अकह लोक है।

1150
01:22:16,560 --> 01:22:21,280
अर्थात अनामी लोक है। इसमें अनामी परमात्मा पुरुष का राज्य है।

1151
01:22:21,280 --> 01:22:25,440
ऊपर के तीनों लोकों में एक ही परमात्मा पूर्ण ब्रह्म कबीर देव है।

1152
01:22:25,440 --> 01:22:29,840
वह तीन अलग-अलग स्थितियों में रहता है। एक ही परमात्मा

1153
01:22:29,840 --> 01:22:34,160
तीनों लोकों में अलग-अलग स्थितियों में रहता है। मगर एक ही

1154
01:22:34,160 --> 01:22:39,040
एक ही परम तत्व स्वयं को पांच अलग-अलग रूपों में प्रकट नहीं कर सकता।

1155
01:22:39,040 --> 01:22:43,280
आई बात समझ में? और सुनिए। जैसे

1156
01:22:43,280 --> 01:22:47,600
भारत के प्रधानमंत्री जी के शरीर का नाम कुछ और होता है। परंतु प्रधानमंत्री

1157
01:22:47,600 --> 01:22:51,680
उनका पद का उप्मक नाम होता है। उपाधि। कई बार

1158
01:22:51,680 --> 01:22:54,320
प्रधानमंत्री जी अपने पास अन्य विभाग रख

1159
01:22:54,320 --> 01:22:58,400
लेते हैं। यह लेता है बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री जी भी कहा और

1160
01:22:58,400 --> 01:23:02,800
लेता है भी कहा। तो इससे भी इसका गवारपन देख लो। जैसे गृह

1161
01:23:02,800 --> 01:23:06,800
विभाग अपने पास रख लिया। जब गृह मंत्रालय के दस्तावेजों

1162
01:23:06,800 --> 01:23:11,040
पर हस्ताक्षर करता है तो वह अपने आप को गृह मंत्री लिखता है। उस समय

1163
01:23:11,040 --> 01:23:15,760
उनकी शक्ति प्रधानमंत्री वाले हस्ताक्षरों से कम होती है।

1164
01:23:15,760 --> 01:23:20,000
हो गया। एक ही परमेश्वर परम तत्व होते

1165
01:23:20,000 --> 01:23:24,320
हुए भी जब किसी और किसी विभाग को अपनाता है

1166
01:23:24,320 --> 01:23:28,480
वहां का रोल निभा रहा होता है तो उसमें कई बार वो

1167
01:23:28,480 --> 01:23:32,800
ऐसा रोल भी निभाता है जिसमें कि उसके परम तत्व वाले रूप से उसकी शक्ति यहां पर

1168
01:23:32,800 --> 01:23:36,800
कम दिख रही है। यहां इसने माना परमेश्वर जो

1169
01:23:36,800 --> 01:23:41,040
है अलग-अलग लोकों में अलग-अलग स्तर

1170
01:23:41,040 --> 01:23:45,600
की शक्तियों से युक्त होता है। इनका भी क्यों भाई या तो मान लो

1171
01:23:45,600 --> 01:23:49,760
कि कम वाला परमेश्वर नहीं है खंडन कर दो कबीर

1172
01:23:49,760 --> 01:23:53,840
का बड़े वाले से वो अकाल पुरुष से सतलोक

1173
01:23:53,840 --> 01:23:58,240
के कबीर का खंडन हो जाता है क्योंकि मुक्ति धाम तो वही है अकाल लोक

1174
01:23:58,240 --> 01:24:02,320
जब अकाल लोक मुक्ति है तो जो

1175
01:24:02,320 --> 01:24:06,800
सतलोक का कबीर है उसकी भक्ति करना बेकार है

1176
01:24:06,800 --> 01:24:09,760
ना और तुम खुद मान भी रहे हो

1177
01:24:09,760 --> 01:24:14,160
कि प्रधान कई ये जब गृह मंत्रालय

1178
01:24:14,160 --> 01:24:18,240
के दस्तावेजों पर प्रधानमंत्री हस्ताक्षर करता है

1179
01:24:18,240 --> 01:24:22,560
तो अपने को गृह मंत्री लिखता है। उस समय उनकी शक्ति प्रधानमंत्री

1180
01:24:22,560 --> 01:24:26,800
वाले हस्ताक्षरों से कम होती है। हो गया। तो इसी

1181
01:24:26,800 --> 01:24:30,880
प्रकार से ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश के रूप में जब वह प्रकट होते हैं

1182
01:24:30,880 --> 01:24:35,200
तो कई बार ऐसे रोल निभाते हैं जो कि उनका जो पूर्ण

1183
01:24:35,200 --> 01:24:39,760
रूप है जो परम तत्व वाला रूप है उसकी अपेक्षाकृत

1184
01:24:39,760 --> 01:24:43,760
वो दासत्व भाव में होता है तो वहां पर उनका जो पावर्स है उनकी

1185
01:24:43,760 --> 01:24:47,760
वो सब कम बताई जाती है। जैसे यहां तुम अपने ईश्वर के बारे में बता रहे हो।

1186
01:24:47,760 --> 01:24:51,840
खैर यही बात हम समझाते हैं तो समझ में नहीं आती है। अब यहां अपने

1187
01:24:51,840 --> 01:24:55,840
लिए मान लिया। मगर अब तुम उस आधार पर शिव जी की तो यहां पूजा करने मना

1188
01:24:55,840 --> 01:24:59,840
किया तो हम कहेंगे कि सतलोक सतलोक में जो कबीर है वह तो मोक्ष दे नहीं रहा

1189
01:24:59,840 --> 01:25:04,600
वहां से आगे वाला देगा जिसको कहा गया है अलख

1190
01:25:04,600 --> 01:25:08,720
पुरुष जब अलग पुरुष से भक्ति मिलनी है तो कबीर की भक्ति क्यों करें

1191
01:25:08,720 --> 01:25:12,880
हम तो ये कहेंगे तुम्हारी चाल चाल चलेंगे खैर आगे

1192
01:25:12,880 --> 01:25:16,960
चलते हैं ठीक इसी प्रकार पूर्ण ब्रह्म सत्पुरुष का वास्तविक नाम कबीर देव

1193
01:25:16,960 --> 01:25:22,960
कबीर देव है भाषा भिन्न होने से वो यह वो सब इसने बता दिए

1194
01:25:23,120 --> 01:25:25,200
जो आत्मा सतलोक में जाकर अनामी

1195
01:25:25,200 --> 01:25:29,440
पुरुष की साधना करती है। देखिए वहां वहां जाकर के भी भक्ति

1196
01:25:29,440 --> 01:25:33,600
होनी है। सतलोक में पूर्ण मुक्ति नहीं है। वह आत्मा भक्ति

1197
01:25:33,600 --> 01:25:37,760
के कारण उस परमात्मा की परम गति को प्राप्त होकर भगवान में लीन हो जाती लीन हो जाती

1198
01:25:37,760 --> 01:25:42,160
है। और अनामय अर्थात

1199
01:25:42,160 --> 01:25:46,560
पूर्ण रूप से जन्म मरण रूपी दीर्घ रोग से रहित कर होकर

1200
01:25:46,560 --> 01:25:50,800
अनामी पद यानी मुक्ति स्थान को प्राप्त हो जाती है। इसको अनाम है पद प्राप्ति

1201
01:25:50,800 --> 01:25:55,120
कहते हैं। तो क्या हुआ? सतलोक

1202
01:25:55,120 --> 01:25:59,280
में जाने के बाद जीवन मरण से मुक्ति नहीं होगी। सतलोक में अगर कबीर

1203
01:25:59,280 --> 01:26:03,920
है तो फिर परमात्मा कोई और है। ऐसे ही पकड़ेंगे।

1204
01:26:03,920 --> 01:26:08,400
खैर आगे चलते हैं। अभी जो लीन होने वाली बात आई है परमात्मा

1205
01:26:08,400 --> 01:26:12,960
में वह लीन हो जाती है। सबसे पहली बात है कि

1206
01:26:12,960 --> 01:26:16,960
यह जो आत्मा है क्योंकि वो

1207
01:26:16,960 --> 01:26:20,960
एक अलग से एक तत्व है। यह तत्व आया कहां से? अब जब

1208
01:26:20,960 --> 01:26:25,040
वो अलग तत्व है क्योंकि उसमें परमात्मा के गुण तो है नहीं। तो जब गुण नहीं है

1209
01:26:25,040 --> 01:26:29,480
परमात्मा के तो उसको अलग तत्व मानना पड़ेगा। जब अलग तत्व

1210
01:26:29,480 --> 01:26:33,600
मानेंगे तो फिर वह परमात्मा में जब जाएगा तो

1211
01:26:33,600 --> 01:26:37,760
परमात्मा की क्वांटिटी जो होगी बढ़ जाएगी। ना जाने कितनी आत्मा

1212
01:26:37,760 --> 01:26:40,240
उसमें जा रही है। और जब वह आत्माएं उससे निकल

1213
01:26:40,240 --> 01:26:44,840
रही है जब वह उत्पन्न हो रही है परमात्मा से तो क्वांटिटी कम हो जाएगी। तो

1214
01:26:44,840 --> 01:26:49,040
परमात्मा पूर्ण नहीं है। सर्वशक्तिमान नहीं है। घट बढ़ रहा है, निर्विकार

1215
01:26:49,040 --> 01:26:53,200
नहीं है। यदि आप आत्मा को

1216
01:26:53,200 --> 01:26:57,360
अभेद दृष्टि से नहीं देखते। आत्मा में भी परमात्मा वाले गुण नहीं देखते। जैसे आत्मा

1217
01:26:57,360 --> 01:27:01,360
सर्वव्यापी नहीं है। हम बहुत से नित्य नहीं है आत्मा।

1218
01:27:01,360 --> 01:27:05,600
तो जब गुणों में वह अलग है तो तत

1219
01:27:05,600 --> 01:27:09,600
स्वरूप नहीं है आत्मा तो क्या है जब वह अलग है तो

1220
01:27:09,600 --> 01:27:13,680
फिर ये वाली चीजें लग जाएंगी आत्मा लीन हो रही है तो क्वांटिटी बढ़ेगी आत्मा

1221
01:27:13,680 --> 01:27:19,680
उत्पन्न हो रही है तो क्वांटिटी घटेगी ये भी एक मेजर पॉइंट

1222
01:27:21,400 --> 01:27:25,480
है इन्होंने एक पांचवी मुक्ति और बताई

1223
01:27:25,480 --> 01:27:31,480
है वही अद्वैत वाली मुक्ति है शायद संभवत

1224
01:27:32,320 --> 01:27:36,680
अब इन्होंने आगे अगले पेज पर आ जाइए। अगले पेज

1225
01:27:36,680 --> 01:27:41,120
पर इन्होंने कहा है भक्त भक्त मती अपनी आस्था

1226
01:27:41,120 --> 01:27:46,840
पूर्ण मोक्ष प्राप्ति के लिए दृढ़ कर।

1227
01:27:46,840 --> 01:27:50,960
हम हां यह याद रखने वाली बात है। इस

1228
01:27:50,960 --> 01:27:55,040
पैराग्राफ में इन्होंने यह भी कह दिया है कि वर्तमान में मेरे

1229
01:27:55,040 --> 01:27:59,120
रामपाल दास के अतिरिक्त अरब मनुष्यों में कोई भी वह संत

1230
01:27:59,120 --> 01:28:03,280
नहीं है। कौन सा संत नहीं है जो तत्वदर्शी हो। इस दुनिया में एक

1231
01:28:03,280 --> 01:28:07,760
ही तत्वदर्शी है और वो है रामपाल। इस

1232
01:28:07,760 --> 01:28:12,320
इसका आलंबन हमें आगे लेना है तो वो हमें देखना है।

1233
01:28:12,320 --> 01:28:16,320
अब क्या है? अब आ जाते हैं दो श्लोक 56

1234
01:28:16,320 --> 01:28:21,040
से 53 का अनुवाद। अगला प्रश्न पर आ जाइए। अगले प्रश्न पर

1235
01:28:21,040 --> 01:28:27,040
यह है

1236
01:28:36,200 --> 01:28:40,400
30वां। अनुवाद पढ़ लें 56 से 53 का। फिर उसके बाद हम लोग लिंक

1237
01:28:40,400 --> 01:28:44,400
दे देते हैं। किसी को अगर आना

1238
01:28:44,400 --> 01:28:49,880
होगा थोड़ा सा आ

1239
01:28:49,880 --> 01:28:55,240
जाएगा

1240
01:28:55,240 --> 01:28:59,280
हम तो अनुवाद क्या है दो श्लोक 56 से

1241
01:28:59,280 --> 01:29:03,360
53 का पहले सारा कर आए हैं मगर इनका मन नहीं भरा

1242
01:29:03,360 --> 01:29:07,360
होगा कुछ रह गया होगा जो तो फिर दोबारा लिख रहे हैं सब ओर

1243
01:29:07,360 --> 01:29:11,360
से परिपूर्ण जलाशय वाली बात हो चुकी है 247 13 कर्म करना अधिकार है फल की

1244
01:29:11,360 --> 01:29:15,440
इच्छा मत कर इसलिए कर्तव्य कर्म बिना आसक्ति के कर इसका खंडन कर

1245
01:29:15,440 --> 01:29:19,600
दिया है। हे धनंजय तू आसक्ति को त्याग कर सिद्ध यानी सिद्धि यानी जय

1246
01:29:19,600 --> 01:29:23,600
तथा सिद्धि यानी पराजय में समुद्धि होकर योग यानी सत्य साधना

1247
01:29:23,600 --> 01:29:27,600
में लगा हुआ भक्ति कर्म कर यहां पर इन्होंने भक्ति को बिना अर्थ के डाल दिया उसका

1248
01:29:27,600 --> 01:29:31,600
कोई शब्द नहीं है वहां पर हम अच्छा एक बात और है एक

1249
01:29:31,600 --> 01:29:35,680
पॉइंट की बात है यदि भगवान ये कह रहे हैं कि तू अपने जीवन के जो कर्म करता

1250
01:29:35,680 --> 01:29:39,680
है उनको शास्त्रों के अनुसार इस बुद्धि से कर कि तू फल की प्राप्ति के

1251
01:29:39,680 --> 01:29:43,720
लिए नहीं बल्कि इसलिए कर रहा है क्योंकि ईश्वर ने कहा है इस बुद्धि के साथ कर

1252
01:29:43,720 --> 01:29:47,840
तो अगर यहां पर भक्ति की बात

1253
01:29:47,840 --> 01:29:51,520
हो रही है तो कर्मों की बात कहां पर हो रही है यह भी तो बताना पड़ेगा।

1254
01:29:51,520 --> 01:29:55,600
अगर यहां पर इन्होंने इसको भक्ति का दे दिया है कि तू भक्ति कर्म कर

1255
01:29:55,600 --> 01:30:00,160
तो कर्म के बारे में कहां बताया है कि हमको कर्म किस किस तरह से करने चाहिए

1256
01:30:00,160 --> 01:30:04,240
वो कहां बताया है? समत्व का भावार्थ है परमात्मा

1257
01:30:04,240 --> 01:30:08,400
की इच्छा पर आश्रित रहकर फल की इच्छा ना करें। यह

1258
01:30:08,400 --> 01:30:12,400
समत्व का भावार्थ है दो 48 गीता अध्याय दो 49

1259
01:30:12,400 --> 01:30:16,720
तत्व ज्ञान से प्राप्त बुद्धि से समझ ले कि इच्छा रखकर किए गए भक्ति कर्म

1260
01:30:16,720 --> 01:30:20,880
अत्यंत निम श्रेणी के हैं। वही रिपीट कर रहा है। तत्वदर्शी की शरण

1261
01:30:20,880 --> 01:30:24,880
में जाने का मार्ग खोज क्योंकि फल की इच्छा रखने वाला तो कृपण यानी कंजूस होता

1262
01:30:24,880 --> 01:30:26,400
है। जो धन का यथार्थ

1263
01:30:26,400 --> 01:30:30,560
प्रयोग यहां पे देखिए फिर से तत्वदर्शी की शरण में कौन जाता है?

1264
01:30:30,560 --> 01:30:34,880
जो धन इत्यादि की मतलब इच्छा नहीं करता है।

1265
01:30:34,880 --> 01:30:38,880
तो जो लोग यह सोचकर हमारे वहां जाने से यह काम बन गए, वह काम बन

1266
01:30:38,880 --> 01:30:43,120
गए। हम इसलिए जा रहे हैं जो ऐसा पाखंड फैला रखा है

1267
01:30:43,120 --> 01:30:47,360
तो उनके गाल पर ये तमाचा है रामपाल

1268
01:30:47,360 --> 01:30:53,360
के ही उसके द्वारा अर्थ के

1269
01:30:56,680 --> 01:31:00,720
द्वारा दो 31 से 37 की चीजों को यहां काट दिया है।

1270
01:31:00,720 --> 01:31:05,120
क्यों? क्योंकि यहां पर समत्व बुद्धि होने की बात कर रहे हैं। यहां अनुवाद

1271
01:31:05,120 --> 01:31:09,360
में समत्व बुद्धि होने की बात हो रही है। वहां लाभ हानि को मना कर दिया।

1272
01:31:09,360 --> 01:31:13,360
यहां कर्मवादी कारस्ते मा फलेशु कदाचना कहा जा रहा है। वहां कहा जा रहा है कि

1273
01:31:13,360 --> 01:31:17,440
कोई ऐसा कैसे कर सकता है? उसका कोई मरेगा तो वो तो दुख तो होगा। वो लाभानि

1274
01:31:17,440 --> 01:31:21,600
में सब बुद्धि कैसे रख सकता है? तो काट कर दी।

1275
01:31:21,600 --> 01:31:25,920
दो श्लोक 50 में तत्व ज्ञान प्राप्त साधक पाप

1276
01:31:25,920 --> 01:31:31,200
तथा पुण्य की कामना ना करके केवल मोक्ष उद्देश्य से भक्ति करता है।

1277
01:31:31,200 --> 01:31:35,360
हम किसके उद्देश्य से भक्ति होती है? मोक्ष से। मोक्ष

1278
01:31:35,360 --> 01:31:39,680
तो इनको मिलता नहीं है। खैर पूर्ण रूप से मुक्त होकर

1279
01:31:39,680 --> 01:31:41,640
51 में कहा जा रहा है

1280
01:31:41,640 --> 01:31:46,000
अनामयंम जन्म जन्म मरण के रोग से रहित अनामी

1281
01:31:46,000 --> 01:31:50,160
परम पद को प्राप्त हो जाते हैं। यानी उस सनातन परमधाम

1282
01:31:50,160 --> 01:31:54,480
में चले जाते हैं। जहां पर परम शांति है। यानी कि सतलोक में परम शांति

1283
01:31:54,480 --> 01:31:58,480
नहीं है। उस स्थान पर आए गए

1284
01:31:58,480 --> 01:32:03,200
उस उस स्थान पर गए साधक फिर लौट कर संसार में नहीं आते। कहां कहां जाकर?

1285
01:32:03,200 --> 01:32:07,800
अनामय लोक में। तो सतलोक में शांति नहीं

1286
01:32:07,800 --> 01:32:12,200
है। अब यह दो श्लोक 52 से हम लोग अगले वाले चैप्टर में

1287
01:32:12,200 --> 01:32:16,560
देखेंगे। है ना? आप लिंक दे दीजिए। कोई आया आना

1288
01:32:16,560 --> 01:32:20,880
चाहे तो आ सकता है।

1289
01:32:20,880 --> 01:32:26,560
जय श्री राम श्याम। श्याम जी जय श्री राम। राधे राधे

1290
01:32:26,560 --> 01:32:31,920
जी। अभी बीच में आपने बंद कर दिया था वीडियो बनाना।

1291
01:32:31,920 --> 01:32:36,000
नहीं दूसरी चीजों में व्यक्त हो गए थे। मैं काफी दिन

1292
01:32:36,000 --> 01:32:40,280
से देख रहा था। आप आ रहे नहीं क्या बात हुई पता नहीं क्या

1293
01:32:40,280 --> 01:32:46,280
नहीं ऐसा कुछ नहीं है।

1294
01:32:46,400 --> 01:32:51,120
ऐसा कुछ नहीं है। किसी को कोई आपत्ति है तो आ सकता है भाई चेहरा लेकर।

1295
01:32:51,120 --> 01:32:55,280
किसी प्रकार की कोई आपत्ति है और आज के जो बुलेट पॉइंट्स

1296
01:32:55,280 --> 01:32:59,320
है यह हम अगले

1297
01:32:59,320 --> 01:33:03,600
वाले अगला जो सेशन होगा दो श्लोक

1298
01:33:03,600 --> 01:33:07,880
अध्याय दो श्लोक 52 से दो 72

1299
01:33:07,880 --> 01:33:12,280
तक उस सेशन में इसके आज के जो बुलेट पॉइंट्स है वो हम बता

1300
01:33:12,280 --> 01:33:16,320
देंगे जरूरी जरूरी हमने क्या-क्या सीखा ऐसे

1301
01:33:16,320 --> 01:33:20,400
ही 20 25 पॉइंट्स श्लोक लेकर के चलना

1302
01:33:20,400 --> 01:33:24,560
पड़ेगा क्योंकि इसने बहुत कचरा कर रखा है। रायता

1303
01:33:24,560 --> 01:33:30,360
फैला रखा है अपने अर्थ में रामपाल ने।

1304
01:33:30,360 --> 01:33:34,880
आपने आपने नंबर से संपर्क किया है शायद फोन द्वारा।

1305
01:33:34,880 --> 01:33:40,000
हां श्याम स्टूडियो

1306
01:33:40,000 --> 01:33:44,160
जी जी तो मैंने आपको मैसेज भी

1307
01:33:44,160 --> 01:33:48,320
किया था मैंने बात भी थी। जी जी काफी

1308
01:33:48,320 --> 01:33:52,600
समय से आप लाइव नहीं कर रहे थे तो आप आ रहे

1309
01:33:52,600 --> 01:33:56,640
थे के बारे में क्योंकि मुझे इसमें ज्यादा इंटरेस्ट

1310
01:33:56,640 --> 01:34:01,280
रहता है कि आप इसके इनके बारे में बात करते

1311
01:34:01,280 --> 01:34:04,000
सबका अपना

1312
01:34:04,000 --> 01:34:08,080
बताया था ससुर साहब जुड़े हैं

1313
01:34:08,080 --> 01:34:14,080
हां आपने बताया था बताया था

1314
01:34:15,440 --> 01:34:21,440
तो कोई आना आना चाहे तो आ सकता है भाई। [संगीत]

1315
01:34:21,600 --> 01:34:27,600
लाइव स्ट्रीम का दिया हुआ है।

1316
01:34:31,920 --> 01:34:36,160
[संगीत] अगर किसी के अंदर सामर्थ्य

1317
01:34:36,160 --> 01:34:42,160
हो कोई प्रतिकार करना चाहता हो वैचारिक मतभेद के निमित्त

1318
01:34:44,720 --> 01:34:48,720
ठीक है। तो आशा करते हैं आपको यह सीरीज

1319
01:34:48,720 --> 01:34:52,720
पसंद आ रही हो। हमने एक-एक करके कई बातें

1320
01:34:52,720 --> 01:34:58,720
की हैं और दो श्लोक 52 से 72 के बीच का

1321
01:34:59,440 --> 01:35:04,400
टीवी चैनल बुक करवा लीजिए। उस पर चर्चा करेंगे।

1322
01:35:04,400 --> 01:35:08,640
करवाइए आप आपत्ति आपको है ना? करवा लीजिए बुक।

1323
01:35:08,640 --> 01:35:12,720
वहां आ जाएंगे। और किसी ठीकठाक व्यक्ति को

1324
01:35:12,720 --> 01:35:16,880
जो जिसको निरुत्तर कर देने पर

1325
01:35:16,880 --> 01:35:21,120
जिसको निरुत्तर कर देने पर प्रभाव पड़े ये नहीं कोई अमित

1326
01:35:21,120 --> 01:35:25,120
दास जैसा कोई व्यक्ति है उसको रोज आए दिन हम लोग निरुत्तर करते हैं उससे फर्क

1327
01:35:25,120 --> 01:35:29,520
कुछ पड़ता नहीं किसी बड़े व्यक्ति को लाइए तब हम उसके लिए बाहर निकले

1328
01:35:29,520 --> 01:35:33,720
टीवी चैनल तक जाए वहां पर बात करेंगे ठीक

1329
01:35:33,720 --> 01:35:38,480
है कोई खड़ा तो करिए आपकी तरफ से कोई खड़ा हो रहा है क्या

1330
01:35:38,480 --> 01:35:42,720
आज तक नहीं हुआ यही चिलांटू जैसे लोग चूर्ण

1331
01:35:42,720 --> 01:35:46,800
चटनी वाले वो आया करते हैं। अब आप पता नहीं हो कि नहीं चूरन

1332
01:35:46,800 --> 01:35:52,800
चटनी वाले मगर जो आए हैं अभी तक वो ऐसे ही होते हैं। अब्बा डब्बा

1333
01:36:04,280 --> 01:36:08,320
चब्बा ये आप पर भी लागू होता है। भाई आप यह चर्चा को

1334
01:36:08,320 --> 01:36:14,320
बुक करने के बारे में आप आ

1335
01:36:14,440 --> 01:36:18,560
जाइए। इसी बारे में बात कर लीजिए। तू बड़ा आदमी है क्या?

1336
01:36:18,560 --> 01:36:23,520
तो हम थोड़ी ना आए हैं आपके पास। आप ही तो आ रहे हैं यहां कमेंट करने।

1337
01:36:23,520 --> 01:36:27,680
मैंने कहा ना अगर आपको आपत्ति है तो आप यहां आ जाइए और

1338
01:36:27,680 --> 01:36:31,760
टीवी चैनल पर लाना है, कहीं बुलाना है तो किसी ऐसे व्यक्ति को खड़ा

1339
01:36:31,760 --> 01:36:35,840
करिए दूसरी ओर से जिसको चुप कराने से हमारा कुछ फल प्राप्त

1340
01:36:35,840 --> 01:36:38,600
हो। हमें।

1341
01:36:38,600 --> 01:36:42,800
हम मालूम पड़ा आप जैसे चूर्ण चटनी टाइप के लोगों को मुंह बंद

1342
01:36:42,800 --> 01:36:48,800
करा भी दिया प्रभाव उससे कुछ हुआ नहीं भटके हुए लोगों

1343
01:36:48,840 --> 01:36:53,240
में

1344
01:36:53,240 --> 01:36:57,360
हम चलिए तो आज की चर्चा आज की इस लाइव स्ट्रीम को

1345
01:36:57,360 --> 01:37:01,640
हम यहीं विराम देते हैं और हमने आज

1346
01:37:01,640 --> 01:37:05,680
अ बुलेट पॉइंट्स तो हम अगली बार दे देंगे मगर हमने

1347
01:37:05,680 --> 01:37:09,680
कुछ जरूरी जरूरी चीजें हमने जानी है कि आठ नौ श्लोक ऐसे हैं जो

1348
01:37:09,680 --> 01:37:14,920
इसके इसने खंडित किए हैं क्योंकि इसने समत्व

1349
01:37:14,920 --> 01:37:19,440
बुद्धि का समत्व बुद्धि के लिए इसने मना किया है

1350
01:37:19,440 --> 01:37:23,680
कि समबुद्धि नहीं रखनी चाहिए। लाभ हानि में समानता नहीं देखनी चाहिए। बाद में

1351
01:37:23,680 --> 01:37:27,680
गीता में कई जगह पे समत्व बुद्धि की बातें हो रही है। वो अर्थ इसने भी किया

1352
01:37:27,680 --> 01:37:30,680
है कई जगह।

1353
01:37:30,680 --> 01:37:34,960
और इसके साथ ही साथ एक चीज हमने जानी कि वर्ण को जन्म से माना। इसने

1354
01:37:34,960 --> 01:37:38,960
एक चीज हमने जानी कि ब्रह्मा विष्णु महेश की जो भक्ति करने की

1355
01:37:38,960 --> 01:37:43,120
लोग बात कहते हैं तो दूसरे अध्याय में ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति ना करने के

1356
01:37:43,120 --> 01:37:47,280
लिए स्पष्ट रहित हो जाने के लिए लिखा हुआ है। है ना? यह भी जाना

1357
01:37:47,280 --> 01:37:51,920
कि भगवान श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान कहा है रामपाल के अनुसार हम

1358
01:37:51,920 --> 01:37:55,960
और क्या जाना है कि सतलोक से आगे भी एक लोक

1359
01:37:55,960 --> 01:38:00,320
है। यानी कि सतलोक में पूर्ण मुक्ति नहीं है। यानी कि सतलोक

1360
01:38:00,320 --> 01:38:05,680
में पूर्ण ईश्वर नहीं है। और

1361
01:38:05,680 --> 01:38:08,560
जो आत्मा है वह उसमें

1362
01:38:08,560 --> 01:38:12,640
भगवान के गुण नहीं है। अगर गुण नहीं है तो वह एक अलग तत्व

1363
01:38:12,640 --> 01:38:16,840
है। जब वो अलग तत्व है तो वो जब अंदर

1364
01:38:16,840 --> 01:38:20,960
जाएगी नहीं तो आपको आपत्ति है ना यहां आप आके बात कर रहे हो ना

1365
01:38:20,960 --> 01:38:25,120
आप आपको ऐसा लग रहा है कि मुझे निरत्तर करना आवश्यक है तो करिए। आपको नहीं

1366
01:38:25,120 --> 01:38:29,200
लग रहा तो मत करिए। राकेश दास जी मैंने कब कहा मैं थोड़ी ना आपके घर

1367
01:38:29,200 --> 01:38:33,440
पे आया हूं। यह सवाल आप तब करिएगा जब मैं आपके घर पे आऊं। आपकी चीजों पे आऊं।

1368
01:38:33,440 --> 01:38:37,440
आप कुछ कर रहे हो। मैं उसमें आकर के बोलूं कि मुझे बात करनी है। टीवी चैनल पर आ जाओ। तब

1369
01:38:37,440 --> 01:38:41,600
आप यह बात बोल सकते हैं। मैंने कुछ ऐसा किया जिससे आपको दिक्कत हो रही है।

1370
01:38:41,600 --> 01:38:45,920
जिससे आप मुझे ये बात कह रहे हो कि टीवी चैनल पे आ जाओ। ठीक है?

1371
01:38:45,920 --> 01:38:50,080
तो आप कुछ ऐसा करिए कि मुझे आपसे दिक्कत हो जाए।

1372
01:38:50,080 --> 01:38:54,480
सिंपल ऐसे बन जाइए। आप जब ऐसे बन जाएंगे तो मैं जरूर आपसे

1373
01:38:54,480 --> 01:38:58,880
बात करने के लिए टीवी चैनल पर आना चाहूंगा।

1374
01:38:58,880 --> 01:39:04,880
फिलहाल आप नगण्य हैं।

1375
01:39:08,000 --> 01:39:12,240
और क्या जाना हमने कि सतलोक में पूर्ण ईश्वर नहीं है क्योंकि सतलोक

1376
01:39:12,240 --> 01:39:18,240
में पूर्ण मुक्ति नहीं है और क्या जाना

1377
01:39:20,600 --> 01:39:26,600
है और भी कुछ चीजें थी

1378
01:39:27,320 --> 01:39:31,360
जरूरी हां वेद वेद केवल चार

1379
01:39:31,360 --> 01:39:35,520
हैं। यह भी जाना हमने। पांचवा कोई वेद नहीं है। रामपाल

1380
01:39:35,520 --> 01:39:41,520
ने खुद ही कहा

1381
01:39:43,160 --> 01:39:47,600
है। और हां धर्म युक्त युद्ध ने खंडन

1382
01:39:47,600 --> 01:39:52,240
किया है इस बात का। ठीक है? ये कुछ मोटी-मोटी चीजें। बाकी अगले

1383
01:39:52,240 --> 01:39:56,560
एपिसोड में हम जो बुलेट पॉइंट्स होंगे इस

1384
01:39:56,560 --> 01:40:01,360
स्ट्रीम के वो बता देंगे। जय श्री राम भैया।

1385
01:40:01,360 --> 01:40:05,440
जय श्री राम। जय श्री राम। बताइए भैया। मैं आज थोड़ा

1386
01:40:05,440 --> 01:40:09,840
सा अपना नाम बदल के आया हूं यहां पे वैसे क्योंकि अपनी पहचान

1387
01:40:09,840 --> 01:40:14,560
राम हनुमान हम बताइए।

1388
01:40:14,560 --> 01:40:19,040
जय श्री राम। सबसे पहले तो जो पहला मंगल था उसकी आपको शुभकामनाएं

1389
01:40:19,040 --> 01:40:23,040
देता हूं। लेट लेट से ही लेकिन बहुत-बहुत शुभकामनाएं आपको जो पहला मंगल था चेष्ट

1390
01:40:23,040 --> 01:40:27,120
का और मैं आपको एक बहुत-बहुत आभार व्यक्त करना चाहूंगा।

1391
01:40:27,120 --> 01:40:31,280
बहुत बड़ा थैंक यू। कल जो आपने वीडियो बनाया ना और जो आप खूब गरजे

1392
01:40:31,280 --> 01:40:35,360
इन लोगों के ऊपर खूब गरजे खूब खूब खूब आपको मैंने पहली बार इतना तब देखा

1393
01:40:35,360 --> 01:40:40,000
था जब आपने उसको एक्सपोज किया हुआ था हाइपर क्वेस्ट को अच्छा उसमें

1394
01:40:40,000 --> 01:40:44,080
और कल जो जो हनुमान जी के रूप को जो लेके बातें बोली थी ना मैं

1395
01:40:44,080 --> 01:40:48,080
सच में बहुत अंदर से इतना आहत था आपने जो उस पर बनाया तो एक हनुमान भक्त

1396
01:40:48,080 --> 01:40:52,400
होने के नाते उसका तो मैं आपको बहुत-बहुत आभार व्यक्त करना चाहूंगा आपने

1397
01:40:52,400 --> 01:40:57,200
पढ़ा था आपका आपका जो वीडियो वो कमेंट था वो पढ़ लिया था

1398
01:40:57,200 --> 01:41:01,200
बहुत-बहुत आभार आपका। आप ऐसे ही घर से रहो। मत पड़ो चक्कर में कोई नहीं

1399
01:41:01,200 --> 01:41:05,200
है टक्कर में। इनसे पूछिए ना हनुमान जी

1400
01:41:05,200 --> 01:41:09,200
की पूंछ थोप दी हिंदुओं ने जो भाषा बोली भाई फिर लंका कैसे जली?

1401
01:41:09,200 --> 01:41:13,440
हनुमान जी की पूंछ कहां से आई? फिर क्या बातें करते हो भाई?

1402
01:41:13,440 --> 01:41:17,440
और बोलते हो पूंछ नकली वो नकली पूंछ लगाकर घूमते थे। अरे तो भाई वो उसमें ये

1403
01:41:17,440 --> 01:41:22,080
भी तो प्रसंग आता है ना कि वो पता है वो अलंकार

1404
01:41:22,080 --> 01:41:26,320
समाजियों से भी आगे का दोगला व्यक्ति है वो। इन हिंदुओं ने हनुमान

1405
01:41:26,320 --> 01:41:30,880
जी की ठोक दी। अरे अंजनी इंसान

1406
01:41:30,880 --> 01:41:35,040
उनकी मां पवन इंसान उनके पिता

1407
01:41:35,040 --> 01:41:38,080
और बेटा बंदर पैदा हो जाएगा। दुनिया में कहीं

1408
01:41:38,080 --> 01:41:42,800
ऐसा होता है कि अनसाइटिफिक बातों को क्यों लीला का नाम देकर ये हिंदू लोग स्वीकृति

1409
01:41:42,800 --> 01:41:46,800
देते। जो उनके इष्ट है उनके लिए किस संबंध से कृष्ण

1410
01:41:46,800 --> 01:41:51,120
की बहन राधा। यहां कहीं पर भी किसी भी पुराण

1411
01:41:51,120 --> 01:41:55,440
में हमको ये देखने को नहीं मिला कि कृष्ण की प्रेमिका राधा

1412
01:41:55,440 --> 01:41:59,840
तो हम क्यों कह रहे हैं अगर आप इस प्रमाण को माने तो कृष्ण

1413
01:41:59,840 --> 01:42:04,080
का राधा के साथ ये ये संबंध है तीन संबंध जो मैंने बताए

1414
01:42:04,080 --> 01:42:08,160
अगर आप विशुद्ध चरित्र माने तो कृष्ण का राधा के साथ सभी लोग

1415
01:42:08,160 --> 01:42:13,200
ये वीडियो देखें इंपॉर्टेंट वीडियो है

1416
01:42:13,200 --> 01:42:17,280
और कोई आया है क्या अब यहां पे इन्होंने क्या कहा इन्होने कहा कि

1417
01:42:17,280 --> 01:42:21,440
अंजनी उनकी की माता इंसान पवन उनके पिता इंसान तो अब इनको यह तक नहीं पता

1418
01:42:21,440 --> 01:42:25,600
कि जो हनुमान जी की माता अंजना थी वो एक देव कन्या थी और जो हनुमान जी की पिता पवन

1419
01:42:25,600 --> 01:42:30,720
थे वो वायु देव थे और ये केसरी

1420
01:42:30,720 --> 01:42:35,400
मैं ये कह रहा हूं ईश्वर का कांसेप्ट ही शुरू होता है चमत्कार

1421
01:42:35,400 --> 01:42:39,400
से विज्ञान मानता है क्या कोई ईश्वर

1422
01:42:39,400 --> 01:42:44,000
है मानता है क्या कोई ईश्वर है विज्ञान

1423
01:42:44,000 --> 01:42:48,560
कोई ऐसी सुपर कॉन्शियसनेस है जो ये सब बना रही है चला रही

1424
01:42:48,560 --> 01:42:53,320
शिवश जी इस प्रश्न का जवाब दीजिए। यह

1425
01:42:53,320 --> 01:42:57,440
संसार पंच देव यानी ब्रह्मा विष्णु महेश दुर्गा जी की भक्ति

1426
01:42:57,440 --> 01:43:01,920
कर रहा है। फिर भी लोग सभी बुराइयों में लिप्त

1427
01:43:01,920 --> 01:43:07,120
हैं। जैसे चोरी बेईमानी मांस खाना कहां कर रहा है?

1428
01:43:07,120 --> 01:43:11,600
जो जो भक्ति कर रहे हैं वह नहीं पढ़े हैं। जो भक्ति नहीं कर रहे हैं वह पढ़े हैं।

1429
01:43:11,600 --> 01:43:15,680
और दूसरी बात तुम्हारे अनुसार अगर चले तो

1430
01:43:15,680 --> 01:43:20,080
तुम्हारे बाबा जी कह तो रहे हैं कि जो आत्मा है वो सदा

1431
01:43:20,080 --> 01:43:26,080
उसके सानिध्य में है परमात्मा के। वो कैसे फस गई काल के जाल

1432
01:43:26,440 --> 01:43:31,840
में? कभी आओ तो हवेली पे तब तो पता चले।

1433
01:43:31,840 --> 01:43:36,160
दूर सही बातें करते हैं। अरे

1434
01:43:36,160 --> 01:43:40,160
भाई जब वह सुख में थी, सतलोक में थी तो उनके मन

1435
01:43:40,160 --> 01:43:44,240
में क्या कमी रह गई थी जो उनके मन में आया कि काल के पीछे जाए हम लोग और काल

1436
01:43:44,240 --> 01:43:49,040
तो मरने के बाद दोबारा फिर जन्मेगा फिर पीछेंगी

1437
01:43:49,040 --> 01:43:53,840
क्योंकि काल तो जीता मरता है। कोई एक बार का खेल थोड़ी ना है तुम्हारा।

1438
01:43:53,840 --> 01:43:57,840
काल से याद आया। काल से याद आया। अभी एक महीना पहले

1439
01:43:57,840 --> 01:44:01,920
ना मैं गीता गीता प्रेस गोरखपुर की दुकान पे गया हुआ था अपने कानपुर में

1440
01:44:01,920 --> 01:44:05,920
तो इस बार मैं वहां से दो खंडों की शिव पुराण ले आया जिसमें संस्कृत हिंदी दोनों

1441
01:44:05,920 --> 01:44:10,000
है तो अभी मेरा वो चल रहा है उसमें तो लिखा ही हुआ है कि जो ब्रह्मा विष्णु

1442
01:44:10,000 --> 01:44:14,080
महेश है वो सदा शिव का ही रूप है उनमें कोई भेदभाव नहीं है और जो भेदभाव करता है वो

1443
01:44:14,080 --> 01:44:18,240
नरक में पड़ता है सदा शिव ने खुद ये बात बोली है उसमें जो संस्कृत हिंदी वाली

1444
01:44:18,240 --> 01:44:22,320
शिव पुराण है दो खंडों की वो है मेरे पास

1445
01:44:22,320 --> 01:44:26,720
बहुत बढ़िया तो ठीक है चलते

1446
01:44:26,720 --> 01:44:31,640
सभी को जय श्री

1447
01:44:31,640 --> 01:44:35,760
राम और हम लोग वीक में

1448
01:44:35,760 --> 01:44:40,080
ट्वाइस इन ए वीक ना करके वंस इन ए वीक ही करेंगे। जो हमारे

1449
01:44:40,080 --> 01:44:46,080
कार्यों से सहमत हैं वो अ

1450
01:44:46,560 --> 01:44:50,560
यहां पर डिटेल दी गई है। इसका आलंबन लेते हुए हमारी सहायता कर सकते

1451
01:44:50,560 --> 01:44:56,000
हैं। आर्थिक बल हमें प्रदान कर सकते हैं। और

1452
01:44:56,000 --> 01:45:00,240
वेडनेसडे की शाम को हम लोग फिर मिलते हैं 8:00 बजे।

1453
01:45:00,240 --> 01:45:04,240
जय श्री राम।
