1
00:00:02,240 --> 00:00:06,720
तो सभी को जय श्री राम और

2
00:00:06,720 --> 00:00:11,280
एक बहुत ही शुभ समाचार प्राप्त हुआ है। हद्वानी

3
00:00:11,280 --> 00:00:15,360
के जो हिमांशु शुक्ल जी हैं उनके अथक

4
00:00:15,360 --> 00:00:19,760
प्रयासों द्वारा उनका जो उनकी जो संस्था है उनका जो संगठन है

5
00:00:19,760 --> 00:00:24,520
उसके अथक प्रयासों द्वारा जो हद्वानी का

6
00:00:24,520 --> 00:00:28,960
जो ये रामपाल का आश्रम था उसमें आप

7
00:00:28,960 --> 00:00:33,040
उसमें आज ताला लग चुका है तो हमारे और आपके लिए ये बड़े

8
00:00:33,040 --> 00:00:37,120
ही हर्ष का समाचार है और

9
00:00:37,120 --> 00:00:41,120
इसी प्रकार से हम प्रार्थना करते भगवान से

10
00:00:41,120 --> 00:00:45,120
आने वाले भविष्य में जगह-जगह पर रामपाल

11
00:00:45,120 --> 00:00:49,440
के जो कुकृत करने वाले केंद्र

12
00:00:49,440 --> 00:00:53,600
खुल गए हैं वो सब इसी प्रकार से बंद हो। इसी प्रकार से जन

13
00:00:53,600 --> 00:00:58,000
सामान्य में चेतना आए और वो अपने आसपास हो रहे अधर्म

14
00:00:58,000 --> 00:01:02,040
के विरोध में खड़ा हो जाए।

15
00:01:02,040 --> 00:01:06,160
क्योंकि हम कितना भी प्रयास कर ले मगर हमारी एक सीमा हो

16
00:01:06,160 --> 00:01:10,280
सकती है। हम हर जगह जाकर के खड़े नहीं हो सकते।

17
00:01:10,280 --> 00:01:14,400
तो हमें ऐसे धर्मज्ञ महानुभावों को

18
00:01:14,400 --> 00:01:17,360
जगह-जगह पर खड़े करना है जो हिमांशु

19
00:01:17,360 --> 00:01:21,520
शुक्ल जी जैसों के रूप में वहां पर अपने

20
00:01:21,520 --> 00:01:25,720
आसपास अपने आसपास हो रहे इस प्रकार के अधर्म

21
00:01:25,720 --> 00:01:30,080
को प्रतिकार करने लगे। जिसके फलस्वरूप आपके

22
00:01:30,080 --> 00:01:34,320
आसपास से अधर्म की जो छाया है काली छाया वो समाप्त

23
00:01:34,320 --> 00:01:38,400
होने लगेगी। स्वतः ही हिंदू राष्ट्र का निर्माण

24
00:01:38,400 --> 00:01:42,800
होने लगेगा। स्वतः ही धर्म संस्थापना होने लगेगी। यदि

25
00:01:42,800 --> 00:01:46,800
प्रत्येक व्यक्ति अपने आसपास अधर्म को

26
00:01:46,800 --> 00:01:50,960
ना होने दे। बहुत शुरुआती स्तर पर यह बहुत

27
00:01:50,960 --> 00:01:55,240
आसानी से आप कर सकते हैं। समस्या क्या है कि हम यह

28
00:01:55,240 --> 00:01:59,440
सदैव इस प्रतीक्षा में रहते हैं कि कोई और

29
00:01:59,440 --> 00:02:03,520
कुछ करे हम ना करें। हमें कुछ ना करना पड़े। हम केवल

30
00:02:03,520 --> 00:02:08,280
बता दें मगर करें कोई और। तो इस भावना को त्यागते हुए

31
00:02:08,280 --> 00:02:12,480
केवल समीक्षक ना बने, केवल तटस्थ ना बने

32
00:02:12,480 --> 00:02:17,280
और मैदान में उतरे यदि कुछ बदलाव लाना है तो। और

33
00:02:17,280 --> 00:02:21,760
इसी प्रकार से मैदान में उतर के जो हमारे एक ध्राता

34
00:02:21,760 --> 00:02:26,200
हैं हिमांशु शुक्ल जी उन्होंने और उनके संगठन

35
00:02:26,200 --> 00:02:30,320
ने यथोचित शक्ति का प्रदर्शन करके बल

36
00:02:30,320 --> 00:02:32,640
बुद्धि और शौर्य के साथ

37
00:02:32,640 --> 00:02:37,120
आज हलवानी में वहां पर ताला लगवा दिया है रामपाल

38
00:02:37,120 --> 00:02:41,440
के एक आश्रम में और जल्द ही यह लहर

39
00:02:41,440 --> 00:02:45,600
एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन के रूप में उद्भाषित हो

40
00:02:45,600 --> 00:02:49,760
और जगह-जगह राम भोपाल के जो तथाकथित आश्रम है

41
00:02:49,760 --> 00:02:53,920
उनमें ताला लगे ऐसी हम कामना करते हैं। ऐसी हम प्रार्थना करते

42
00:02:53,920 --> 00:02:59,920
हैं। ठीक है। एक मिनट जरा।

43
00:03:11,480 --> 00:03:15,840
अच्छा अब एक आवश्यक बात

44
00:03:15,840 --> 00:03:20,600
कि आज से जो सीरीज शुरू हो रही है

45
00:03:20,600 --> 00:03:25,040
कि श्रीमद् भगवत गीता पर रामपाल के बोल वचन

46
00:03:25,040 --> 00:03:29,040
इस सीरीज में हम एक एक अध्याय का एक एक श्लोक लेते

47
00:03:29,040 --> 00:03:33,600
चलेंगे कि क्या-क्या उसने किया है रामपाल ने किस तरह से

48
00:03:33,600 --> 00:03:37,600
मैंने प्लेट किया है। यह देखिए आज के

49
00:03:37,600 --> 00:03:41,680
वह चित्र हैं जो हमें प्राप्त हुए हैं। यह वहां ताला लगाया

50
00:03:41,680 --> 00:03:45,680
जा रहा है। सील किया जा रहा है आश्रम को। देखिए ये

51
00:03:45,680 --> 00:03:48,000
है आप चिल्लाते रहो।

52
00:03:48,000 --> 00:03:52,360
वेदों में प्रमाण है। वेदों में प्रमाण है। हम यह करेंगे धरती

53
00:03:52,360 --> 00:03:56,400
पर। है ना? आप चिल्लाते रहो। वीडियो बना के खुश

54
00:03:56,400 --> 00:04:00,400
हो जाओ। फैक्ट फैक्टफुल डिबेट्स बना लो और वह क्या

55
00:04:00,400 --> 00:04:04,400
कहते हैं? वह बना लो। क्या नाम है उसका टीवी

56
00:04:04,400 --> 00:04:08,560
चैनल का? ऐसे न्यूज़ चैनल। वाह दिखाओ

57
00:04:08,560 --> 00:04:12,640
उसमें ये न्यूज़ कैसे बंद किया गया तुम्हारे आश्रम को? कैसे ताला लगाया

58
00:04:12,640 --> 00:04:16,800
गया? हम दिखाओ ये न्यूज़। तुम वो करो। तुम

59
00:04:16,800 --> 00:04:20,880
वीडियो बनाओ। हम धरती पर काम करेंगे। हम अवैध रूप

60
00:04:20,880 --> 00:04:25,040
से छापी जाने वाली किताबों को जलाएंगे चौराहे पर।

61
00:04:25,040 --> 00:04:29,040
आश्रमों में ताला लगवाएंगे। तुम वो करो। तुम उसमें

62
00:04:29,040 --> 00:04:34,360
खुश रहो। हम यह करेंगे।

63
00:04:34,360 --> 00:04:38,600
तो आज हम ये जो सीरीज शुरू करने वाले हैं

64
00:04:38,600 --> 00:04:43,240
इसमें रामपाल के द्वारा ये जो भगवत गीता

65
00:04:43,240 --> 00:04:47,360
ये इसका अर्थ अपार्थ रामपाल

66
00:04:47,360 --> 00:04:51,440
ने किया है और एक-एक

67
00:04:51,440 --> 00:04:55,680
श्लोक को हम लेते चलेंगे कि उसने कहां क्या-क्या गड़बड़ की है और बहुत ही रोचक

68
00:04:55,680 --> 00:05:00,080
रहेगा ये ये यात्रा। इसमें एक तरीके से आप प्रॉपर

69
00:05:00,080 --> 00:05:04,440
हमारी जो प्रामाणिक अर्थ है उसमें क्या लिखा है और

70
00:05:04,440 --> 00:05:08,720
इस गपोड़ बाज ने क्या लिखा है अपनी गीता में गीता

71
00:05:08,720 --> 00:05:12,720
गीता में नहीं मतलब अपने किताब में क्या लिखा है गीता का अर्थ के गीता के अर्थ

72
00:05:12,720 --> 00:05:17,520
के नाम पर यह सब आपको पता चलेगा और

73
00:05:17,520 --> 00:05:21,680
साथ ही साथ आपको क्रमबद्धता से प्रत्येक श्लोक

74
00:05:21,680 --> 00:05:25,840
की व्याख्या एक प्राप्त हो जाएगी कि यदि कोई व्यक्ति कहीं पर आपको रामपाल

75
00:05:25,840 --> 00:05:29,920
के बताए हुए अर्थ के आधार पर दबाने की कोशिश कर रहा है

76
00:05:29,920 --> 00:05:34,000
भगवत गीता के किसी श्लोक के आधार पर तो आप यहां से यह

77
00:05:34,000 --> 00:05:38,160
जो प्लेलिस्ट बन के तैयार होगी आने वाले कुछ समय में यहां प्लेलिस्ट

78
00:05:38,160 --> 00:05:42,400
में जाएंगे और अध्याय कौन सा है किस अध्याय का वो श्लोक

79
00:05:42,400 --> 00:05:46,400
है जैसे आज हम दूसरे अध्याय के 30वें श्लोक तक बात करने

80
00:05:46,400 --> 00:05:49,360
वाले हैं। तो आप प्लेलिस्ट

81
00:05:49,360 --> 00:05:53,680
के अनुसार जिस जो श्लोक आपको परेशान कर रहा है उस श्लोक के

82
00:05:53,680 --> 00:05:57,840
उस श्लोक को फॉलो करते हुए वहां पहुंचेंगे। प्लेलिस्ट में वीडियो में और आपको वो

83
00:05:57,840 --> 00:06:01,920
जवाब आपका मिल जाएगा। है ना? एक तो

84
00:06:01,920 --> 00:06:05,240
यह

85
00:06:05,240 --> 00:06:09,440
है। अच्छा अब सबसे पहले ये सीरीज शुरू

86
00:06:09,440 --> 00:06:13,440
करने से पहले हम कुछ बुलेट पॉइंट्स जो है वो

87
00:06:13,440 --> 00:06:17,480
एक बार सरसरी निगाहों से देख देख लें। वैसे

88
00:06:17,480 --> 00:06:20,240
तो अ

89
00:06:20,240 --> 00:06:24,400
आप लोग जो भी इस चैनल के रेगुलर फॉलोअर्स हैं जो इसको

90
00:06:24,400 --> 00:06:28,760
फॉलो करते हैं चैनल्स को आह्वान को और सर्वशक्तिमान धर्म को

91
00:06:28,760 --> 00:06:31,320
तो

92
00:06:31,320 --> 00:06:35,520
उसमें उन लोगों को ये मालूम होंगे जो हमारे बुलेट पॉइंट्स हैं। मगर

93
00:06:35,520 --> 00:06:39,760
फिर भी क्योंकि आज ये बिगिनिंग है। आज ये प्रारंभ हो रही है

94
00:06:39,760 --> 00:06:44,640
श्रंखला। तो इसमें आपको बुलेट पॉइंट्स हम बता देते हैं।

95
00:06:44,640 --> 00:06:48,800
देखिए जो रामपाल के द्वारा दिया

96
00:06:48,800 --> 00:06:53,040
जाने वाला ज्ञान है उसको प्रारंभिक स्तर पर जब आप श्लोकों

97
00:06:53,040 --> 00:06:57,120
को ना खोलें जब आप प्रमाण को ना खोलें उससे

98
00:06:57,120 --> 00:07:01,880
पहले वो कौन से सवाल हैं जो रामपाल के लोग कभी नहीं दे सकते

99
00:07:01,880 --> 00:07:06,400
हम तो वो पहला सवाल तो है क्या रामपाल

100
00:07:06,400 --> 00:07:11,040
के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है

101
00:07:11,040 --> 00:07:15,040
यदि वह सर्वशक्तिमान है तो क्या वह माता के

102
00:07:15,040 --> 00:07:19,040
गर्भ से जन्म ले सकता है। क्या वह अपने रूप को बदल सकता है?

103
00:07:19,040 --> 00:07:23,200
यदि माता के गर्भ से जन्म लेगा तो उनका ही एक सिद्धांत खंडित खंडित हो जाएगा

104
00:07:23,200 --> 00:07:27,200
जिसमें वो ये प्रचारित करते हैं कि जो ईश्वर है वो माता के

105
00:07:27,200 --> 00:07:31,400
गर्भ से जन्म नहीं ले सकता। इसकी व्याख्या किसी और दिन करेंगे। मगर

106
00:07:31,400 --> 00:07:35,280
फिलहाल इतना है कि रामपाल के ईश्वर

107
00:07:35,280 --> 00:07:39,600
के सामने एक बाधक बंधन है कि वो दुनिया

108
00:07:39,600 --> 00:07:45,320
में कुछ कार्य ऐसे हैं जो नहीं कर सकता जैसे कि माता के गर्भ से जन्म नहीं ले सकता।

109
00:07:45,320 --> 00:07:49,360
दूसरा वह अपनी देह का नाश करके नहीं दिखा सकता। नष्ट नहीं कर

110
00:07:49,360 --> 00:07:53,680
सकता। क्यों? क्योंकि वो सका शरीर आता है। अगर वो

111
00:07:53,680 --> 00:07:57,920
ऐसा हो कि परमार्थ जो एक स्पिरिचुअल वर्ल्ड

112
00:07:57,920 --> 00:08:02,000
है स्पिरिचुअल जो दुनिया है उसमें उसका उसकी जो देह है वो अलग है।

113
00:08:02,000 --> 00:08:06,320
मगर यहां पे वो आपको देह प्रकट करके दिखाता है इस प्रपंच रूपी संसार

114
00:08:06,320 --> 00:08:10,520
में। तो उस प्रकट होने वाली देह को वो आपको नष्ट करके भी दिखा सकता

115
00:08:10,520 --> 00:08:14,880
है। क्योंकि वो उसके द्वारा सृजन किया हुआ है। सजाम

116
00:08:14,880 --> 00:08:19,120
में हम है ना? तो वह उसको नष्ट करके भी दिखा सकता है लीला पूर्वक

117
00:08:19,120 --> 00:08:23,200
क्योंकि यहां पर इस प्रपंच रूपी संसार में भगवान जो भी करते हैं वह

118
00:08:23,200 --> 00:08:27,200
उनकी लीला होती है तो वो उसमें सब कुछ

119
00:08:27,200 --> 00:08:31,280
करके दिखा सकता है जो एक व्यक्ति सोच सकता है मगर रामपाल का ईश्वर क्योंकि सशरीर

120
00:08:31,280 --> 00:08:35,600
आता जाता है तो वो तो जैसा वहां था वैसे ही आता है थोड़ा सा अपने जो

121
00:08:35,600 --> 00:08:39,680
ग्लो है वो कहते हैं वो कहता है कि तेज

122
00:08:39,680 --> 00:08:43,760
को कम कर लेता है प्रकाश को कम कर लेता है थोड़ा सा ग्लो है उसको वो

123
00:08:43,760 --> 00:08:48,000
कम कर लेता है मगर आता है रामपाल का मैं कबीर कबीर

124
00:08:48,000 --> 00:08:50,320
जी जो संत कबीर दास जी है उनकी बात

125
00:08:50,320 --> 00:08:54,640
नहीं कर रहा हूं। रामपाल के द्वारा बनाया गया गाढ़ा गया एक तथाकथित

126
00:08:54,640 --> 00:08:59,200
ईश्वर उसकी बात कर रहा हूं। काल्पनिक ईश्वर तो वो

127
00:08:59,200 --> 00:09:03,440
अपने शरीर का नाश नहीं कर सकता है। तीसरी बात क्या है कि वो

128
00:09:03,440 --> 00:09:07,440
अपने शरीर को परिवर्तित भी नहीं कर सकता है। क्योंकि अगर परिवर्तित कर लेगा तो शाश्वत

129
00:09:07,440 --> 00:09:11,840
शरीर नहीं रह जाएगा। शाश्वत तो वही है ना जो परिवर्तन जो परिवर्तनी

130
00:09:11,840 --> 00:09:15,840
परिवर्तनशील ना हो। यदि वह शरीर जिस रूप में वह

131
00:09:15,840 --> 00:09:20,000
दिखाई दे रहा है और उसको परिवर्तित कर सकता है। यदि वह करता

132
00:09:20,000 --> 00:09:24,080
है तो वह सर्वशक्तिमान रहेगा। मगर जब जब वो कर लेगा तो वो शाश्वत

133
00:09:24,080 --> 00:09:28,640
नहीं रहेगा और अगर वो नहीं कर पाता है तो वो सर्वशक्तिमान

134
00:09:28,640 --> 00:09:33,720
नहीं रहेगा। तो इस तरीके से बहुत

135
00:09:33,720 --> 00:09:38,400
से कारण हैं जो उसके

136
00:09:38,400 --> 00:09:42,480
रामपाल के ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं करते हैं। दूसरा

137
00:09:42,480 --> 00:09:46,640
क्या है कि जो रामपाल का ईश्वर है वो

138
00:09:46,640 --> 00:09:51,040
सर्वव्यापक भी नहीं है। वैसे रामपाल

139
00:09:51,040 --> 00:09:55,200
के ही द्वारा बताया गया जो जितनी भी वो है

140
00:09:55,200 --> 00:09:59,680
क्या कहेंगे उसको फिलॉसफी तो नहीं कह सकते। कूड़ा कूड़ा है वह क्योंकि

141
00:09:59,680 --> 00:10:03,840
मगर क्या कहें उसको रामपाल के द्वारा दी गई जो भी जानकारी है जो भी तथ्य

142
00:10:03,840 --> 00:10:07,840
प्रस्तुत किए गए हैं उसके अनुसार जो काल है वो मन

143
00:10:07,840 --> 00:10:12,000
भी है और काल जो है वो इस तरीके का है कि वो सब जगह

144
00:10:12,000 --> 00:10:16,000
मौजूद है और काल को इसने रामपाल ने महाविष्णु भी माना है

145
00:10:16,000 --> 00:10:21,160
विष्णु को सर्व्यापक भी माना है इसी भगवत गीता की ट्रांसलेशन

146
00:10:21,160 --> 00:10:25,680
तो उस हिसाब से देखा जाए तो काल काल तब भी सर्व्यापक

147
00:10:25,680 --> 00:10:30,080
है जो रामपाल का काल वह सर्वव्यापक है। मगर रामपाल

148
00:10:30,080 --> 00:10:34,680
का ईश्वर सर्वव्यापक नहीं है। ईश्वर क्या है?

149
00:10:34,680 --> 00:10:38,800
ईश्वर ईश्वर की जो शक्ति है वह सब जगह है जिसमें रामपाल

150
00:10:38,800 --> 00:10:43,440
उदाहरण भी देता है कि भाई जिस प्रकार से सूर्य की जो रोशनी

151
00:10:43,440 --> 00:10:47,600
सूर्य की जो किरणें होती है सूर्य वही रहता है मगर किरणें सब जगह जाती है और

152
00:10:47,600 --> 00:10:48,800
उसमें पूरे जगत में

153
00:10:48,800 --> 00:10:53,520
व्यवस्था बनाती है तो उसी प्रकार से

154
00:10:53,520 --> 00:10:57,600
जो ईश्वर है रामपाल का रामपाल का पूर्ण ब्रह्म कबीर

155
00:10:57,600 --> 00:11:01,760
तो वो जो है एक जगह रहता है और उसके उसके द्वारा प्रकाशित

156
00:11:01,760 --> 00:11:06,160
होता है पूरा संसार और उस प्रकाश से उस निराकार शक्ति से व्याप्त है।

157
00:11:06,160 --> 00:11:10,160
तो सर्वव्यापक का अर्थ वो यह नहीं लेता कि वो स्वयं सर्वव्यापी है।

158
00:11:10,160 --> 00:11:14,480
वो यह लेता है कि वो शक्ति के रूप में उसकी शक्ति सर्वव्यापी है।

159
00:11:14,480 --> 00:11:18,480
उसकी शक्ति सब जगह है। वो बात आगे देखेंगे कि सर्वव्यापक का अर्थ

160
00:11:18,480 --> 00:11:22,640
क्या होता है? वो सही से अर्थ लेता है कि नहीं लेता। मगर उसका ईश्वर

161
00:11:22,640 --> 00:11:26,800
सर्वशक्तिमान नहीं है। फर्स्ट दूसरा उसका ईश्वर सर्वव्यापक

162
00:11:26,800 --> 00:11:31,120
भी नहीं है। अच्छा सर्वव्यापक में एक दिक्कत क्या आती कि जैसे उसने कहा कि

163
00:11:31,120 --> 00:11:35,680
जो सूर्य है उसकी जो

164
00:11:35,680 --> 00:11:39,760
किरणों के समान ईश्वर एक जगह है और उसकी क्या कहते हैं शक्ति सब

165
00:11:39,760 --> 00:11:43,840
जगह व्याप्त है। प्रॉब्लम यह है कि सूर्य से जितना दूर हम

166
00:11:43,840 --> 00:11:48,160
हैं उसके हिसाब से उसकी जो किरणों की जो

167
00:11:48,160 --> 00:11:52,320
गर्मी होती है, उसकी जो लपट होती है, जो उसका उसकी दाहक

168
00:11:52,320 --> 00:11:56,400
क्षमता होती है, वो प्रभावित होती है। यानी कि जहां पर सूर्य

169
00:11:56,400 --> 00:12:00,560
है वहां उसकी दाह क्षमता बहुत है। और जहां हम लोग हैं वहां

170
00:12:00,560 --> 00:12:04,160
ऐसा नहीं है कि सूर्य की किरण पड़ी और हम जल गए। मगर

171
00:12:04,160 --> 00:12:08,480
जहां पर सूर्य स्वयं है वहां हम जाएंगे तो वहां पर उसकी इतनी

172
00:12:08,480 --> 00:12:13,280
दाहकता है, इतनी दाहक क्षमता है कि हम उससे जल जाएंगे।

173
00:12:13,280 --> 00:12:17,600
इसका अर्थ क्या हुआ? यदि सूर्य के समान ईश्वर को माना जाए तो

174
00:12:17,600 --> 00:12:21,680
ईश्वर की पकड़ उतनी यहां पर नहीं है जितनी पकड़ वो जहां पर

175
00:12:21,680 --> 00:12:26,400
स्वयं बैठा है वहां पर है। इसका मतलब ईश्वर

176
00:12:26,400 --> 00:12:30,400
समान रूप से सब जगह पावरफुल नहीं है। जितना पावरफुल वो वहां पर

177
00:12:30,400 --> 00:12:34,480
है उतना पावरफुल यहां पर नहीं है। जिस प्रकार से सूरज जितना पावरफुल

178
00:12:34,480 --> 00:12:38,560
जहां पर सूरज है वहां पर है उतना उतना पावरफुल

179
00:12:38,560 --> 00:12:42,560
सूरज सूरज की किरणों के द्वारा जो जो सूरज अपनी ऊष्मा को

180
00:12:42,560 --> 00:12:46,720
भेजता है एनर्जी को भेजता है पृथ्वी पर उतनी ऊर्जा

181
00:12:46,720 --> 00:12:51,040
सूरज की नहीं होती है जितनी ऊर्जा जहां पर सूरज स्वयं है वहां पर होती है

182
00:12:51,040 --> 00:12:55,200
तो इस नजरिए से सर्वव्यापकता जब हम नहीं स्वीकारते हैं ईश्वर की

183
00:12:55,200 --> 00:12:59,280
तो ईश्वर वहां भी बाधित सिद्ध होता है और उसके जो ईश्वर

184
00:12:59,280 --> 00:13:05,280
होने में ही दोष आ जाता है ठीक

185
00:13:08,040 --> 00:13:12,160
है। अच्छा अब इसके बाद क्या आता

186
00:13:12,160 --> 00:13:16,400
है? कुछ इनके द्वारा जो गढ़ी गई चीजें हैं जो बेची जाने

187
00:13:16,400 --> 00:13:20,640
वाली किताबें हैं समाज में उसमें कुछ एक

188
00:13:20,640 --> 00:13:25,040
जरूरी प्रश्न है जिनका जवाब उसने कभी दिया ही नहीं है। जैसे कि रामपाल

189
00:13:25,040 --> 00:13:29,200
ने कभी भी नास्तिकता का खंडन नहीं किया। रामपाल ने

190
00:13:29,200 --> 00:13:33,200
पहले से जो आस्तिक है उनको यह बताया कि तुम जिसे भगवान मान रहे हो वह

191
00:13:33,200 --> 00:13:37,440
भगवान नहीं है। मैं बता रहा हूं वास्तविक भगवान मगर

192
00:13:37,440 --> 00:13:41,520
उसने कभी भी यह किसी को नहीं बताया कि भगवान है ये कैसे सिद्ध होता है?

193
00:13:41,520 --> 00:13:45,920
भगवान है। ये कभी इसने बात नहीं की। ना ही इसका कोई ग्रंथ है नास्तिकता

194
00:13:45,920 --> 00:13:50,320
के खंडन में ना ही इसका कोई लेक्चर है। हां अब हमारे

195
00:13:50,320 --> 00:13:54,320
वीडियोस को देख कर के जरूर इनके जो चेले हैं इनके गुरु ने तो इनको वो

196
00:13:54,320 --> 00:13:58,400
ज्ञान नहीं दिया। मगर हमारे वीडियो से वो ज्ञान ले ले के जरूर ये लोग आकर के

197
00:13:58,400 --> 00:14:02,560
जवाब दे सकते हैं कि हां ये नास्तिकता का खंडन है। मगर सवाल ये उठता है कि इनके गुरु

198
00:14:02,560 --> 00:14:08,040
ने वो इनको सिखाया है कि नहीं सिखाया है ना उन

199
00:14:08,040 --> 00:14:12,240
और धर्म की जो वास्तविक परिभाषा है वो

200
00:14:12,240 --> 00:14:16,560
भी रामपाल ने अपने लोगों को नहीं सिखाई। तो ये तो हो गई

201
00:14:16,560 --> 00:14:20,640
ये तो हो गए कुछ बुलेट पॉइंट्स। ठीक है? एक और है तात्विक विवेचना

202
00:14:20,640 --> 00:14:23,360
में अगर जाए तो यदि कबीर

203
00:14:23,360 --> 00:14:27,520
ने सृष्टि को बनाया है पूरी की पूरी तो हमें यह मानना पड़ेगा कि

204
00:14:27,520 --> 00:14:31,840
कबीर ने जब सृष्टि बनाई है सूरज चंदा जो भी बनाया है

205
00:14:31,840 --> 00:14:36,000
उस समय अगर कबीर को सरीर मानेंगे तो हमें

206
00:14:36,000 --> 00:14:40,160
मानना पड़ेगा कि उसके कंधे के आसपास के बाहर की जगह कंधे के बाहर

207
00:14:40,160 --> 00:14:44,320
की जगह वहां स्पेस है जहां कबीर था तो उस स्पेस

208
00:14:44,320 --> 00:14:48,480
को किसने बनाया इस तरीके के सवालों का जवाब भी उसने नहीं

209
00:14:48,480 --> 00:14:52,640
दिया है। ठीक है? अब बात

210
00:14:52,640 --> 00:14:56,640
आती है कि आगे चलते हैं

211
00:14:56,640 --> 00:15:00,800
तो उसने कुछ गपोड़ बाजियां भी की है रामपाल ने। जैसे षष्ठी रचना की अगर

212
00:15:00,800 --> 00:15:05,920
बात करें तो काल का कहना है कि वो

213
00:15:05,920 --> 00:15:10,080
काल का कहना है कि वो उसका भी

214
00:15:10,080 --> 00:15:14,440
जन्म जन्म मरण होता है। चलो यही बात ले लेते हैं। काल का भी जन्म मरण होता है।

215
00:15:14,440 --> 00:15:18,560
मगर प्रॉब्लम यह है कि जब काल मर जाता है तो काल

216
00:15:18,560 --> 00:15:22,640
की वजह से ही लोग फंसे हुए हैं। जब काल की वजह से जीवात्माएं

217
00:15:22,640 --> 00:15:26,960
फंसी हुई हैं। जब काल मर जाता है तो उन जीवात्माओं को

218
00:15:26,960 --> 00:15:31,360
मुक्ति मिल जाती है। मोक्ष मिल जाता है। क्या होता है उन जीवात्माओं को?

219
00:15:31,360 --> 00:15:35,600
अगर मोक्ष नहीं मिलता तो फिर उसको उनको फंसाने वाला काल नहीं है।

220
00:15:35,600 --> 00:15:38,480
और अगर मोक्ष मिल जाता है तो उसके बाद काल का दोबारा जन्म

221
00:15:38,480 --> 00:15:42,560
होता है तो वो जो मोक्ष में चली गई थी जीवात्मा उनको उनको ही दोबारा फसाया

222
00:15:42,560 --> 00:15:46,680
जाता है। दोबारा से वो जीवात्मा उससे अट्रैक्ट होती

223
00:15:46,680 --> 00:15:51,480
हैं। एक बात और है अह

224
00:15:51,480 --> 00:15:56,840
कि अह आत्माओं को अविनाशी तो माना

225
00:15:56,840 --> 00:16:01,280
है रामपाल ने मगर आत्माओं को जीवात्मा

226
00:16:01,280 --> 00:16:05,360
को रामपाल ने नित्य नहीं माना है। मतलब कि जो आत्मा

227
00:16:05,360 --> 00:16:09,680
है वो हमेशा से नहीं थी। यानी कि वो उसका

228
00:16:09,680 --> 00:16:13,680
जन्म हुआ है उसके बाद वह अविनाशी। अब उसका नाश नहीं हो सकता। ऐसा है। अब

229
00:16:13,680 --> 00:16:18,560
जब अविनाशी कह दिया आत्मा का तो

230
00:16:18,560 --> 00:16:22,720
जब हमने काल जब काल को बनाया था और काल मर जाता

231
00:16:22,720 --> 00:16:26,800
है तो काल का अभाव हुआ कि नहीं हुआ या उसमें क्या थ्योरी

232
00:16:26,800 --> 00:16:31,040
है ये सब बातें ये नहीं बताते रामपाल के लोग तब उसमें

233
00:16:31,040 --> 00:16:35,040
प्रॉब्लम यह है कि आत्मा की कभी

234
00:16:35,040 --> 00:16:39,200
आत्मा जो है अविनाशी है उसका उसका जन्म होता है मगर वो अविनाशी

235
00:16:39,200 --> 00:16:43,200
उसको मारा नहीं जा सकता मगर उसका जन्म नित्य है नित्य नहीं है शाश्वत नहीं

236
00:16:43,200 --> 00:16:47,440
है तो इसमें जब आत्माओं को मुक्ति

237
00:16:47,440 --> 00:16:51,600
मिल जाती है। है ना? और यह काल

238
00:16:51,600 --> 00:16:55,600
की मृत्यु हो जाती है। आत्माओं को मुक्ति मिल जाती है। काल की मृत्यु

239
00:16:55,600 --> 00:16:59,680
हो जाती है। तो दोबारा जब सृष्टि रचनी होती है। है

240
00:16:59,680 --> 00:17:04,080
ना? तो वहां पर क्या काल को दोबारा से उत्पन्न

241
00:17:04,080 --> 00:17:08,080
करता है? क्या काल भी अविनाशी वो क्या काल भी शाश्वत था जो पहले से

242
00:17:08,080 --> 00:17:12,320
था? है और रहेगा क्योंकि आत्माएं तो नहीं है। तो यह कुछ

243
00:17:12,320 --> 00:17:16,320
खिचड़ी पकाई जाती है जो अभी धीरे-धीरे जब हम इसको इस सफर में

244
00:17:16,320 --> 00:17:20,560
आगे चलेंगे इस यात्रा में तो आपको रोचकता के साथ जानने को मिलेगी चीजें।

245
00:17:20,560 --> 00:17:25,560
इसके बाद एक बुलेट पॉइंट और है कि

246
00:17:25,560 --> 00:17:30,040
हम जो काल है

247
00:17:30,040 --> 00:17:34,160
वो बताया जाता है कि काल ने

248
00:17:34,160 --> 00:17:38,560
प्रकृति के साथ रमण किया। अपनी भाषा में ये लोग नीचता के साथ परोसते

249
00:17:38,560 --> 00:17:42,640
हैं उस तथ्य को प्रकृति देवी के साथ उसने रमण किया काल ने

250
00:17:42,640 --> 00:17:46,880
और जो है ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पन्न हुए उनकी संतान है यानी कि ब्रह्मा

251
00:17:46,880 --> 00:17:50,960
विष्णु और ब्रह्मा विष्णु महेश को ये कहता है ये गुण है सतराज और

252
00:17:50,960 --> 00:17:55,040
तम गुण है ये इन इनका गुण के गुण के बिना

253
00:17:55,040 --> 00:17:59,280
इनका कोई अस्तित्व नहीं है ये ये कहता है तो ब्रह्मा विष्णु

254
00:17:59,280 --> 00:18:03,280
महेश अगर गुण है तो क्योंकि इसके अनुसार

255
00:18:03,280 --> 00:18:07,400
रामपाल के अनुसार काल ने देवी दुर्गा के

256
00:18:07,400 --> 00:18:11,520
साथ छोड़ो देवी दुर्गा नहीं प्रकृति

257
00:18:11,520 --> 00:18:16,000
के साथ रमण किया वह भी उसकी इच्छा के विरुद्ध जाकर के

258
00:18:16,000 --> 00:18:20,160
और उससे ये लोग उत्पन्न हुए हैं तो जब इच्छा के विरुद्ध जाकर के काल ऐसा कार्य

259
00:18:20,160 --> 00:18:24,160
कर रहा है तो वहां पर ये मानना पड़ेगा कि काल जो है तमोगुण

260
00:18:24,160 --> 00:18:28,160
से प्रभावित है यानी कि शिवजी से प्रभावित है। मगर शिव जी कौन है?

261
00:18:28,160 --> 00:18:32,480
शिवजी उत्पन्न कब होते हैं? इसके अनुसार जब काल

262
00:18:32,480 --> 00:18:36,720
प्रकृति से रमण करता है तो यदि वह प्रकृति से जोर जबरदस्ती

263
00:18:36,720 --> 00:18:40,800
से रमण कर रहा है तो वो शिवजी से प्रभावित

264
00:18:40,800 --> 00:18:44,800
मानना उसे शिवजी से प्रभावित मानना पड़ेगा और अन्यथा

265
00:18:44,800 --> 00:18:49,040
यदि शिवजी को काल से उत्पन्न मानना माना जा रहा है तो फिर यह मानना

266
00:18:49,040 --> 00:18:49,540
पड़ेगा

267
00:18:49,280 --> 00:18:53,440
कि वह रमण नहीं था कुछ और था जिसको इसने लोगों को मूर्ख बनाने

268
00:18:53,440 --> 00:18:58,000
के लिए कुछ का कुछ बोला है। इसके अलावा काल के ऊपर ही और मीमांसा

269
00:18:58,000 --> 00:19:02,080
अगर करें तो काल यह कहता है कि काल की भक्ति

270
00:19:02,080 --> 00:19:06,160
जो करेगा उसको काल खाएगा जबकि आत्माओं को

271
00:19:06,160 --> 00:19:10,400
कोई खा नहीं सकता है। अच्छा दूसरी बात कहीं-कहीं पर मिलेगा कि उनको तप्तशिला

272
00:19:10,400 --> 00:19:14,400
पर भूजा जाएगा फिर उसकी महक सूंघेगा तो फिर खाएगा वाली बात कट जाती

273
00:19:14,400 --> 00:19:18,960
है। सूंघेगा या खाएगा दोनों अलग-अलग चीजें हैं। तो यह भी कंट्राडिक्शन है।

274
00:19:18,960 --> 00:19:22,960
इसके बाद काल को लेकर के यह भी बातें आती है कि काल

275
00:19:22,960 --> 00:19:27,280
ने जब अपना रूप दिखा दिया था वैसे वो अपना रूप दिखा। हां उसकी एक प्रतिज्ञा

276
00:19:27,280 --> 00:19:31,280
है कि वह अपना रूप किसी को दिखाता नहीं है। काल की एक प्रतिज्ञा है कि

277
00:19:31,280 --> 00:19:35,440
वह अपना रूप दिखाता नहीं है। मगर रामपाल के ही अनुसार अर्जुन

278
00:19:35,440 --> 00:19:40,120
को उसने अपना रूप दिखा दिया। क्यों दिखाया? दूसरी बात यह

279
00:19:40,120 --> 00:19:44,320
है कि जब अर्जुन ने काल

280
00:19:44,320 --> 00:19:48,400
का रूप देख लिया। पता चल गया कि कृष्ण नहीं है। गीता बोलने

281
00:19:48,400 --> 00:19:52,720
वाला कोई और है। उसके बाद भी अर्जुन ने गीता बोलने वाले को कृष्ण

282
00:19:52,720 --> 00:19:56,720
ही कहा। हे कृष्ण हे मधुसूदन यह सब उसमें

283
00:19:56,720 --> 00:20:02,720
आगे कहा है। ठीक है? अभी किसी को आप वो ना

284
00:20:05,000 --> 00:20:09,520
दीजिएगा। कबीर सागर के कबीर सागर के अनुसार

285
00:20:09,520 --> 00:20:13,520
अभी इसमें आपको लिंक दे दिया जाएगा थोड़ी देर बाद। कबीर सागर के

286
00:20:13,520 --> 00:20:17,600
अनुसार जो काल को पहले ही शब्द के रूप में उत्पन्न कर दिया गया था। तो

287
00:20:17,600 --> 00:20:21,760
बहुत सी चीजें हैं। यदि हम काल से उत्पन्न ब्रह्मा विष्णु महेश

288
00:20:21,760 --> 00:20:25,840
को मानेंगे तो हम तो काल

289
00:20:25,840 --> 00:20:29,840
का ब्रह्मा विष्णु महेश को अगर गुण मानते हैं तो काल का

290
00:20:29,840 --> 00:20:35,360
इस तरह की ऐसी कोई गतिविधि

291
00:20:35,360 --> 00:20:39,440
जो जिसको तामस कहा जा सके तो उसमें लिप्त होना नहीं मान सकते और

292
00:20:39,440 --> 00:20:43,680
यदि लिप्त मान रहे हैं और ब्रह्मा विष्णु महेश को गुण मान रहे हैं तो हमें मानना

293
00:20:43,680 --> 00:20:47,840
पड़ेगा काल से उत्पन्न नहीं हुए ब्रह्मा विष्णु महेश का जो अस्तित्व है वो काल

294
00:20:47,840 --> 00:20:52,160
से भी पहले है और काल ब्रह्मा विष्णु महेश के अनुगत है क्योंकि

295
00:20:52,160 --> 00:20:57,280
वो प्रभावित हो रहा है उनसे। ठीक है? ये भी एक चीज हो गई।

296
00:20:57,280 --> 00:21:01,400
अब इसके बाद यह सारी जो खिचड़ी इसने पकाई है रामपाल

297
00:21:01,400 --> 00:21:05,520
ने वह हां जी पहाड़ी जी आज

298
00:21:05,520 --> 00:21:09,600
ताला लग गया है तो इसके बाद ये सारी खिचड़ी

299
00:21:09,600 --> 00:21:14,200
जो पकाई है रामपाल

300
00:21:14,200 --> 00:21:17,560
ने

301
00:21:17,560 --> 00:21:21,840
वो यह कहते हुए पकाई है कि मैं तत्वदर्शी हूं।

302
00:21:21,840 --> 00:21:26,320
है ना? तो सबसे पहले एक बोले मैं तत्वदर्शी हूं। इसलिए और तत्वदर्शी

303
00:21:26,320 --> 00:21:30,400
के पास जाने के लिए भगवत गीता में कहा गया है। इसलिए तुम्हें

304
00:21:30,400 --> 00:21:34,480
मेरे से मेरी बात को प्रमाण मानना चाहिए। अब इसमें प्रॉब्लम क्या है

305
00:21:34,480 --> 00:21:38,800
कि ये लोग कहते हैं कि काल वो है जो धोखेबाजी भी करता है। अपना काम निकालता

306
00:21:38,800 --> 00:21:42,960
है। झूठ भी बोलता है। यहां तक कि ये भी कहते हैं कि भगवत

307
00:21:42,960 --> 00:21:47,440
गीता में पांच पांच% जो श्लोक

308
00:21:47,440 --> 00:21:51,520
हैं वो काल ने अपने मन से कह दिए। उनको माना नहीं जा सकता। मानना

309
00:21:51,520 --> 00:21:55,520
नहीं है और बाकी 95% जो श्लोक है वह सही

310
00:21:55,520 --> 00:21:59,600
है। वह परमेश्वर की वाणी है जो काल ने कही है। तो सबसे पहली बात है कि

311
00:21:59,600 --> 00:22:03,600
इन्होंने कहीं पर भी यह नहीं बताया कि एग्जैक्ट वो 5%

312
00:22:03,600 --> 00:22:07,600
श्लोकों का अर्थ हो जाता है 35 श्लोक। 700 श्लोक

313
00:22:07,600 --> 00:22:12,280
है अगर भगवत गीता में तो 10% हुआ 70 और 35

314
00:22:12,280 --> 00:22:16,320
श्लोक। तो 35 जो श्लोक है वो कौन से हैं

315
00:22:16,320 --> 00:22:20,400
ये स्पष्ट नहीं करते। स्पष्ट इसलिए नहीं करते क्योंकि अगर उन 35

316
00:22:20,400 --> 00:22:24,400
श्लोकों को छोड़ के बात की जाएगी तो उसके बाद ये कभी किसी श्लोक के लिए नहीं कह

317
00:22:24,400 --> 00:22:28,560
सकते कि ये नहीं माना जाएगा। है ना? तो इसलिए कभी ये क्लियर

318
00:22:28,560 --> 00:22:32,640
नहीं करेंगे कि 35 श्लोक कौन से हैं जिनको नहीं मानना है। दूसरी बात ये है

319
00:22:32,640 --> 00:22:36,640
कि काल जब झूठ बोल सकता है तो वो ये बात भी तो झूठ बोल सकता

320
00:22:36,640 --> 00:22:40,640
है कि तत्वदर्शी के पास जाओ। या वो ये बात भी तो झूठ

321
00:22:40,640 --> 00:22:45,760
बोल सकता है कि तत्वदर्शी वो होगा जो उल्टे वृक्ष की व्याख्या करेगा।

322
00:22:45,760 --> 00:22:50,200
तो यहां पर भी यह फस जाते हैं कि यह भगवत गीता के

323
00:22:50,200 --> 00:22:54,800
अकॉर्डिंगली रामपाल को तत्वदर्शी सिद्ध नहीं कर सकते।

324
00:22:54,800 --> 00:22:59,320
और अगर रामपाल भगवत गीता के अनुसार तत्वदर्शी

325
00:22:59,320 --> 00:23:03,680
है तो इन्होंने अपने गीता

326
00:23:03,680 --> 00:23:07,680
में कई जगह पर ये लिख दिया है कि ज्ञान यज्ञ से भी मुक्ति

327
00:23:07,680 --> 00:23:11,760
नहीं मिलेगी। और भगवत गीता में जिस चार 34 की

328
00:23:11,760 --> 00:23:15,760
बात करते हैं तत्वदर्शी के पास जाने की तो

329
00:23:15,760 --> 00:23:19,760
भगवत गीता में वह तत्वदर्शी उसे किया उसे कहा गया है जो

330
00:23:19,760 --> 00:23:23,760
ज्ञान यज्ञ का ज्ञान आपको देगा यानी कि ऐसा ज्ञान देगा जो

331
00:23:23,760 --> 00:23:28,000
रामपाल के अनुसार मुक्ति दायक नहीं है। तो रामपाल के ही अनुसार

332
00:23:28,000 --> 00:23:32,480
वो जो तत्वदर्शी है भगवत गीता का रामपाल

333
00:23:32,480 --> 00:23:36,800
के अनुसार वो मोक्ष देने वाला नहीं है। मोक्ष का ज्ञान बताने वाला नहीं है।

334
00:23:36,800 --> 00:23:40,960
तो इसका मतलब क्या हुआ? रामपाल के ही अनुसार रामपाल मोक्ष

335
00:23:40,960 --> 00:23:44,520
दायक नहीं है।

336
00:23:44,520 --> 00:23:48,640
और तो यहां से इसकी रामपाल की जो तत्वदर्शी होने का वो

337
00:23:48,640 --> 00:23:52,800
है वो खत्म हो जाता है। अगर काल को झूठा मान लेंगे अप्रामाणिक

338
00:23:52,800 --> 00:23:56,200
मान लेंगे

339
00:23:56,200 --> 00:24:00,240
तो अरे हटाओ भाई इनको। अगर काल

340
00:24:00,240 --> 00:24:04,320
को हम झूठा मान लेंगे तो हमारा उसकी क्रेडिबिलिटी पे फर्क वो आ

341
00:24:04,320 --> 00:24:08,400
जाता है कि भाई अह क्या कहते हैं कि इसने कहां पर सच बोला है,

342
00:24:08,400 --> 00:24:12,480
कहां पर झूठ बोला है। इसके अलावा एक बात और है। ये शास्त्र हमें प्रदान

343
00:24:12,480 --> 00:24:16,960
करने वाले ब्रह्मा, विष्णु, महेश, व्यास जी इन सबको इसने अज्ञानी भी बोला है रामपाल

344
00:24:16,960 --> 00:24:21,120
ने। तो जब ये सब अज्ञानी है तो इसकी इन बातों पर विश्वास कैसे किया जाए

345
00:24:21,120 --> 00:24:25,200
कि तत्वदर्शी वही होगा जो उल्टे वृक्ष के रूप में व्याख्या कर देगा संसार की या

346
00:24:25,200 --> 00:24:29,200
कोई भी बात जिसके आधार पर अपनी बिल्डिंग खड़ी कर रहा है। उस बात को क्यों मान लिया

347
00:24:29,200 --> 00:24:33,280
जाए? जब वो काल ने बोली या व्यास जी ने कही है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से किसी एक ने

348
00:24:33,280 --> 00:24:38,960
कही है। क्योंकि

349
00:24:38,960 --> 00:24:43,200
तो एक यह भी बात आ जाती है। इसके अलावे बहुत से बुलेट पॉइंट्स

350
00:24:43,200 --> 00:24:48,600
हैं जरूरी जरूरी। इसमें से ज्यादातर मैंने आपको बता दिए

351
00:24:48,600 --> 00:24:49,600
हैं।

352
00:24:49,600 --> 00:24:53,600
तो अब हम लोग शुरू करते हैं। ये गरिमा गीता की मेरे पास है।

353
00:24:53,600 --> 00:24:57,840
इसको मैं पढूंगा और इसमें हम लोग संस्कृत हिंदी

354
00:24:57,840 --> 00:25:02,640
जो शब्दकोश है इसका भी सहारा लेंगे कई जगह रामपाल को

355
00:25:02,640 --> 00:25:07,040
वो करने के लिए और मुख्य रूप से जो भगवत गीता हम

356
00:25:07,040 --> 00:25:11,360
कंपेयर करेंगे वह यह होगी जय दयाल गोविंद जी की भगवत

357
00:25:11,360 --> 00:25:15,440
गीता श्रीमद् भगवत गीता तत्व विवेचनी और साथ

358
00:25:15,440 --> 00:25:19,600
ही साथ कहीं-कहीं पर जहां पर पूर्ण अर्थ हमें समझने

359
00:25:19,600 --> 00:25:23,600
होंगे भगवत गीता के वहां पर हम शंकर

360
00:25:23,600 --> 00:25:27,760
भाष्य का भी संदर्भ लेंगे। ठीक है?

361
00:25:27,760 --> 00:25:31,840
और आज एक सरप्राइज भी है कि आज जो

362
00:25:31,840 --> 00:25:36,080
है यह इस की यथारूप का भी संदर्भ लेना पड़ेगा

363
00:25:36,080 --> 00:25:42,080
क्योंकि इसमें इसने बात की है रामपाल ने इस के बारे

364
00:25:43,560 --> 00:25:47,920
में कुछ और बुलेट पॉइंट्स मुझे अगर याद आएंगे तो मैं कल बताऊंगा

365
00:25:47,920 --> 00:25:52,960
आपसे।

366
00:25:52,960 --> 00:25:57,040
हां एक बात और है कि अभी थोड़ी देर में जब आज की व्याख्या कंप्लीट हो जाएगी

367
00:25:57,040 --> 00:26:01,120
तो थोड़ी देर के लिए लिंक दे दिया जाएगा तब आप लोग जुड़ सकते

368
00:26:01,120 --> 00:26:07,120
हैं और जो कुछ अगर

369
00:26:07,120 --> 00:26:09,480
ठीक है

370
00:26:09,480 --> 00:26:13,520
दिखाइए तो ये रामपाल वाले भगवान को किस तरह से गाली दे रहे हैं वह

371
00:26:13,520 --> 00:26:17,880
आप देख सकते हैं। कुछ अभी कमेंट्स आए थे हमारे

372
00:26:17,880 --> 00:26:22,600
सामने तो हमने प्रथम अध्याय छोड़ दिया है क्योंकि प्रथम अध्याय

373
00:26:22,600 --> 00:26:26,800
में ना तो इसने कोई कुतर्क किया है। कुतर्क इसलिए

374
00:26:26,800 --> 00:26:30,880
नहीं किया क्योंकि वहां पर युद्ध स्थल की व्याख्या हो रही है और इसने इसमें बहुत सारी

375
00:26:30,880 --> 00:26:35,120
खिचड़ी भी पकाई है। मगर हम लोग अभी बहुत सारी चीजों

376
00:26:35,120 --> 00:26:39,120
पर बात ना करते हुए इसमें इसने पहले

377
00:26:39,120 --> 00:26:43,840
अध्याय को एक एक पेज में ही समाप्त कर दिया है। यह पहला अध्याय है।

378
00:26:43,840 --> 00:26:47,840
एक पेज में ही समाप्त हो गया पहला अध्याय तो पहले अध्याय पर इसने

379
00:26:47,840 --> 00:26:52,040
ज्यादा बात नहीं की है और उससे पहले काफी कुछ खिचड़ी पका चुका है यहां पर आने से

380
00:26:52,040 --> 00:26:56,000
पहले अच्छा एक बुलेट पॉइंट और मुझे याद आया

381
00:26:56,000 --> 00:27:00,320
कि इसका कहना है कि अह भगवत

382
00:27:00,320 --> 00:27:04,640
गीता में जो ज्ञान वेदों से मैच खाएगा वेद से मैच खाएगा

383
00:27:04,640 --> 00:27:08,720
उस ज्ञान को ही माना जाएगा और जो ज्ञान वेद से मैच नहीं खाएगा उसको नहीं

384
00:27:08,720 --> 00:27:13,280
माना जाएगा। अब यह कहता है कि

385
00:27:13,280 --> 00:27:17,280
भगवत भगवत गीता को बोलने वाला जो काल ब्रह्म है

386
00:27:17,280 --> 00:27:21,280
वो उसने कहा कि तुम मेरी मेरी शरण से किसी

387
00:27:21,280 --> 00:27:25,440
और की शरण में जाओ है ना यानी कि किसी

388
00:27:25,440 --> 00:27:29,520
और के लिए आचरण करो इसका कहना है ब्रज किसी और के

389
00:27:29,520 --> 00:27:33,680
लिए गति करो किसी और के लिए जाओ किसी और की शरण में जाओ ये भग इसके

390
00:27:33,680 --> 00:27:37,840
अनुसार भगवत गीता कहने वाले ने कहा है अब यहां पर वेदों

391
00:27:37,840 --> 00:27:41,840
में आता है एक ब्रह्मचर्य सूक्त पूरा का पूरा वेदों में पूरा

392
00:27:41,840 --> 00:27:45,840
कई जगह जगह ब्रह्मचर्य के बारे में बात हो रही है। ब्रह्मचारी कौन है? ब्रह्म के लिए

393
00:27:45,840 --> 00:27:50,080
आचरण करने वाला। ब्रह्म के लिए गति करने वाला। है ना? तो अब

394
00:27:50,080 --> 00:27:54,240
वेदों में कहा जा रहा है ब्रह्म के लिए गति करो। ब्रह्म के लिए आचरण करो।

395
00:27:54,240 --> 00:27:58,480
और गीता में यदि इनके अनुसार से कहा जा रहा है कि जाओ मेरी शरण से

396
00:27:58,480 --> 00:28:02,640
किसी और की शरण में जाओ। ब्रह्म की शरण से पूर्ण ब्रह्म की शरण

397
00:28:02,640 --> 00:28:06,720
में जाओ। तो वहां कहा जा रहा है ब्रह्म की शरण में जाने के लिए और

398
00:28:06,720 --> 00:28:10,720
यहां कहा जा रहा है ब्रह्म की शरण से जाने। वहां कहा जा रहा है ब्रह्म की शरण में

399
00:28:10,720 --> 00:28:11,220
जाने के

400
00:28:11,120 --> 00:28:15,200
लिए और यहां कहा जा रहा है ब्रह्म की शरण से कहीं और जाने के लिए तो भगवत गीता की

401
00:28:15,200 --> 00:28:19,280
इस बात को क्यों मान रहे हो हम इसी प्रकार से

402
00:28:19,280 --> 00:28:23,360
और भी कई बातें हैं जो अगर इनका अर्थ लेंगे भगवत गीता का तो वो मैच

403
00:28:23,360 --> 00:28:27,520
नहीं करती वेदों से तो ये कुछ बुलेट पॉइंट्स

404
00:28:27,520 --> 00:28:33,080
हैं और कुछ याद आते रहेंगे तो हम बताते रहेंगे

405
00:28:33,080 --> 00:28:37,440
तो ये तत्व विवेचनी जय दयाल गोविंदका जी की आप

406
00:28:37,440 --> 00:28:41,840
स्क्रीन पे ला दीजिए और श्लोक क्रमांक आप लाइए दवां दूसरे

407
00:28:41,840 --> 00:28:46,160
अध्याय का दवा श्लोक यहां से इसने

408
00:28:46,160 --> 00:28:50,800
व्याख्या करना शुरू किया है दूसरे अध्याय के दव श्लोक से

409
00:28:50,800 --> 00:28:54,800
रामपाल ने क्यों किया है क्योंकि यहां तक युद्ध क्षेत्र की चीजें थी

410
00:28:54,800 --> 00:28:58,800
अर्जुन का शोक था अर्जुन की बातें थी तो उसको इसने नहीं कहा जब

411
00:28:58,800 --> 00:29:02,880
भगवान ने बोलना शुरू किया है कि अर्जुन तू दुखी क्यों होता है तो

412
00:29:02,880 --> 00:29:07,120
तब से इसने व्याख्या करना शुरू की है तो आप जो है भगवत गीता

413
00:29:07,120 --> 00:29:13,120
का दूसरे दूसरे अध्याय का दवां श्लोक स्क्रीन पर लगा दें

414
00:29:13,720 --> 00:29:17,760
और हम पहले देख लेते हैं हमारी प्रामाणिक भगवत गीता में क्या

415
00:29:17,760 --> 00:29:21,840
कहा जा रहा है दूसरे अध्याय के दव श्लोक से लेकर 16व

416
00:29:21,840 --> 00:29:27,400
श्लोक

417
00:29:27,400 --> 00:29:32,000
तक और एक बात और याद रखिएगा यह जो सीरीज

418
00:29:32,000 --> 00:29:36,000
है यह प्रत्येक बुधवार और प्रत्येक

419
00:29:36,000 --> 00:29:40,320
शनिवार शाम 7 या 8:00 बजे यह एपिसोड्स

420
00:29:40,320 --> 00:29:46,320
आएंगे। तो आप इन दोनों दिनों के लिए तैयार रह।

421
00:29:48,440 --> 00:29:52,600
तो स्क्रीन पर लगा

422
00:29:52,600 --> 00:29:57,040
दीजिए। हे भरतवंशी धृतराष्ट्र

423
00:29:57,040 --> 00:30:01,440
दूसरा अध्याय दसवां श्लोक। इसमें कह रहे हैं

424
00:30:01,440 --> 00:30:05,840
अंतर्यामी श्री कृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक

425
00:30:05,840 --> 00:30:10,640
करते हुए उस अर्जुन को हंसते हुए यह वचन बोले

426
00:30:10,640 --> 00:30:15,200
तो यह कौन कह रहा है? यह संजय कह रहा है। है ना?

427
00:30:15,200 --> 00:30:18,240
किसको बता रहा है?

428
00:30:18,240 --> 00:30:22,480
संजय को संजय जो है बता रहा है धृतराष्ट्र

429
00:30:22,480 --> 00:30:26,480
को कि श्री कृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक

430
00:30:26,480 --> 00:30:30,880
करते हुए उस अर्जुन को हंसते हुए यह वचन बोले क्या बोले

431
00:30:30,880 --> 00:30:35,040
तो प्रमाणिक भगवत गीता में कहा गया है कि हे अर्जुन

432
00:30:35,040 --> 00:30:41,040
तू ना शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है

433
00:30:42,280 --> 00:30:46,720
और तू ना शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पंडितों

434
00:30:46,720 --> 00:30:51,840
कैसे वचनों को कहता है। परंतु

435
00:30:51,840 --> 00:30:55,920
जिनके प्राण चले गए हैं उनके लिए और जिनके

436
00:30:55,920 --> 00:31:00,320
प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पंडित जन शोक

437
00:31:00,320 --> 00:31:06,320
नहीं करते। इसमें भी इसने यही कहा है

438
00:31:07,400 --> 00:31:11,520
कि अर्जुन शोक ना करने वाली बात पर बात का

439
00:31:11,520 --> 00:31:15,600
शोक कर रहा है और ज्ञान कह रहा है

440
00:31:15,600 --> 00:31:20,080
पंडितों जैसा। अब देखिए यहां पर इसने क्या किया है रामपाल ने कि

441
00:31:20,080 --> 00:31:24,160
वहां पे ये कहा जा रहा है कि तुम्हारे जो वचन है वो पंडितों

442
00:31:24,160 --> 00:31:28,240
जैसे दिख रहे हैं। सुनाई दे रहे हैं। है ना? तुम्हारे

443
00:31:28,240 --> 00:31:32,800
जो वचन है वह पंडितों जैसे दिख रहे हैं, सुनने में लग रहे हैं। मगर

444
00:31:32,800 --> 00:31:36,800
वास्तविकता यह है कि तुम ऐसी बातों पर

445
00:31:36,800 --> 00:31:41,040
शोक कर रहे हो जिन पर शोक जो शोक करने योग्य नहीं है।

446
00:31:41,040 --> 00:31:45,120
और वास्तविकता में जो पंडित जन होते हैं वो ऐसी बातों

447
00:31:45,120 --> 00:31:49,120
के लिए शोक नहीं करते हैं। है ना? यह

448
00:31:49,120 --> 00:31:53,360
यहां पर है। मगर यहां क्या किया गया कि एक पंडित

449
00:31:53,360 --> 00:31:57,440
शब्द से इसको रामपाल को एक प्रॉब्लम है। क्योंकि

450
00:31:57,440 --> 00:32:02,160
पंडित के पंडित शब्द के प्रति अगर अ

451
00:32:02,160 --> 00:32:06,160
नफरत द्वेष नहीं भरेगा तो व्यक्ति कहीं ना कहीं किसी ना

452
00:32:06,160 --> 00:32:10,880
किसी वास्तविक जो ज्ञानी भी हो जो आचरण से भी

453
00:32:10,880 --> 00:32:15,200
सही हो और ज्ञान से भी सही हो ऐसे पंडित के पास अगर चला जाएगा

454
00:32:15,200 --> 00:32:19,360
तो इसके जो ताश के पत्तों के महल जो इसने खड़ा किया ताश के पत्तों

455
00:32:19,360 --> 00:32:23,360
पर एक महल बनाया है तो उसको हल्की सी हवा लग जाएगी वह गिर जाएगा तो

456
00:32:23,360 --> 00:32:27,360
यह शुरुआत से ही पंडितों के विरुद्ध ब्राह्मणों के

457
00:32:27,360 --> 00:32:31,440
विरुद्ध एक लोगों के मन में जहर भरने की

458
00:32:31,440 --> 00:32:35,600
कोशिश करता है। तो इसलिए इसने क्या कहा है यहां पर? इसने उसको

459
00:32:35,600 --> 00:32:39,600
थोड़ा सा मैनपुलेट किया और यहां कहा कि हे अर्जुन शोक

460
00:32:39,600 --> 00:32:44,320
ना करने वाली बात का शोक कर रहा है तथा ज्ञान कह रहा है पंडितों जैसा।

461
00:32:44,320 --> 00:32:50,320
पंडितों जैसा ज्ञान कह रहा है। पंडितों जैसा ज्ञान की बात नहीं हो रही

462
00:32:51,000 --> 00:32:55,280
है। आगे क्या लिखा है कि विद्वान लोग मरने जीने की चिंता

463
00:32:55,280 --> 00:32:59,280
नहीं करते। मतलब पंडित लोग इसके अनुसार विद्वान नहीं है। कुल

464
00:32:59,280 --> 00:33:03,440
मिला के इसने कहने का प्रयास ये किया है कि तुम जो बोल रहे

465
00:33:03,440 --> 00:33:07,680
हो वो ऐसा पंडित लोग कहते हैं और पंडित विद्वान

466
00:33:07,680 --> 00:33:12,200
नहीं होते। विद्वान लोग पंडित से अलग है। इसलिए ये लिखा

467
00:33:12,200 --> 00:33:16,480
जबकि आगे क्या आया है? आगे आया है पंडित जन

468
00:33:16,480 --> 00:33:21,400
शोक नहीं करते। इस श्लोक में आया है आगे नानु शोचती

469
00:33:21,400 --> 00:33:25,520
पंडितः तो इस श्लोक में आगे ये आया है। मैं

470
00:33:25,520 --> 00:33:29,560
अपने ऑपरेटर से कहूंगा कि भाई आप भगवत

471
00:33:29,560 --> 00:33:35,560
गीता क्यों नहीं दिखा रहे हैं?

472
00:33:42,680 --> 00:33:46,800
तो क्योंकि इसे विद्वान से पंडित को अलग करना था

473
00:33:46,800 --> 00:33:50,800
तो इसने क्या किया कि तू जो मूर्खता कर

474
00:33:50,800 --> 00:33:55,200
रहा है मतलब जो अज्ञानता वश जो बोल रहा है वो पंडितों जैसा है

475
00:33:55,200 --> 00:33:59,520
ना वो वो सही है वो पंडित पंडित ऐसा बोलते हैं पंडितों जैसा

476
00:33:59,520 --> 00:34:03,680
ज्ञान कह रहा है पंडित जैसा और उसके बाद विद्वान लोग जीने मरने की

477
00:34:03,680 --> 00:34:07,840
चिंता नहीं करते मतलब मतलब विद्वान को पंडित से अलग कर दिया इससे।

478
00:34:07,840 --> 00:34:12,000
ठीक है? खैर आगे चलते हैं। तो छोटी सी चीज है

479
00:34:12,000 --> 00:34:18,000
मगर किया इसने। इसके बाद इसने

480
00:34:19,880 --> 00:34:23,920
कहा दूसरे अध्याय का 12वा श्लोक है। उसका अर्थ मैं पढ़ रहा

481
00:34:23,920 --> 00:34:28,400
हूं। ना तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था

482
00:34:28,400 --> 00:34:32,600
या तू नहीं था अथवा यह राजा लोग नहीं थे और ना

483
00:34:32,600 --> 00:34:36,800
ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे

484
00:34:36,800 --> 00:34:40,800
और इसने अर्थ क्या किया है इस श्लोक का दूसरे अध्याय

485
00:34:40,800 --> 00:34:46,800
के 13 वे श्लोक का

486
00:34:47,240 --> 00:34:51,440
अ यह नहीं है कि हम तुम और यह सभी सैनिक पहले कभी नहीं

487
00:34:51,440 --> 00:34:55,600
थे या आगे ना होंगे इसलिए सुख दुख सहन करने की हिम्मत रख

488
00:34:55,600 --> 00:34:59,800
और हम तुम यह सब सदा जन्म मरण में ही है।

489
00:34:59,800 --> 00:35:04,320
तो यह इसने अपने आप ही एक यहां पर खिचड़ी पका दी।

490
00:35:04,320 --> 00:35:08,400
यहां पर वह जो श्लोक है 12वा उसका अर्थ ना करते हुए अपने

491
00:35:08,400 --> 00:35:12,560
मन से खिचड़ी पका दी है। हालांकि इसने यह कहा है कि दूसरे अध्याय के 10व

492
00:35:12,560 --> 00:35:17,000
से 16व श्लोक का यह अर्थ है जो यह बता रहा है। ठीक

493
00:35:17,000 --> 00:35:21,200
है? अब ये मुख्य आता है सीधे

494
00:35:21,200 --> 00:35:27,200
गीता अध्याय दो श्लोक 16 पे।

495
00:35:29,720 --> 00:35:35,360
एक यह है यह

496
00:35:35,360 --> 00:35:39,760
श्रीमद् भगवत गीता और इसका यह

497
00:35:39,760 --> 00:35:43,920
तत्व वेदनी है और इसमें दूसरे

498
00:35:43,920 --> 00:35:49,120
अध्याय के 16व श्लोक तक आते हैं हम

499
00:35:49,120 --> 00:35:53,600
तो यहां पे भगवान

500
00:35:53,600 --> 00:35:57,920
आत्मा अमर है, अविनाशी है और

501
00:35:57,920 --> 00:36:02,000
नित्य है। यह श्लोक 17 से लेकर के 30 31 तक यही

502
00:36:02,000 --> 00:36:06,720
बताएंगे अर्जुन को और यहां पर जो

503
00:36:06,720 --> 00:36:11,200
क्या कहते हैं संदर्भ है जो विषय है वो भी यही है कि अर्जुन

504
00:36:11,200 --> 00:36:15,440
ऐसे लोगों के ऐसी चीज के लिए श्लोक शोक कर रहा है जो

505
00:36:15,440 --> 00:36:19,920
शोक करने योग्य नहीं है। क्यों? क्योंकि आत्मा जो है वह कभी मरती नहीं है।

506
00:36:19,920 --> 00:36:24,720
तो यहां पर आत्मा के बारे में पूरा बताया है।

507
00:36:24,720 --> 00:36:30,720
मगर इसने कैसे मैनपुलेशन किया है वह अभी आप देखेंगे।

508
00:36:32,080 --> 00:36:37,080
खोल कर तो मैं खोल कर ही दिखा रहा हूं। यह है तत्व

509
00:36:37,080 --> 00:36:41,120
विवेचनी भगवत गीता जय दयाल गोविंद का द्वारा रचित इसको तत्व

510
00:36:41,120 --> 00:36:47,120
विवेचनी कहते हैं। और ये इसका

511
00:36:49,320 --> 00:36:55,320
है 13वां श्लोक है फिलहाल।

512
00:36:56,080 --> 00:37:00,080
तो आप देख सकते हैं इसी में अगला पेज है। फिर अगला पेज भी दिखा देंगे। तो

513
00:37:00,080 --> 00:37:04,480
13वा श्लोक क्या कह रहा है? जैसे जीवात्मा इस देह में बालकपन,

514
00:37:04,480 --> 00:37:08,480
जवानी और वृद्धावस्था जैसे जीवात्मा की

515
00:37:08,480 --> 00:37:12,560
इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है। वैसे ही अन्य

516
00:37:12,560 --> 00:37:17,040
शरीर की प्राप्ति होती है। उस विषय में भी धीर पुरुष मोहित नहीं होता।

517
00:37:17,040 --> 00:37:21,120
देखिए मोहित होना ही व्यक्ति के

518
00:37:21,120 --> 00:37:25,200
दुखों का कारण है। इस बात को समझ लीजिए सारांश है और

519
00:37:25,200 --> 00:37:29,600
इसको भी एक बुलेट पॉइंट में डाल लीजिएगा। जीवात्मा

520
00:37:29,600 --> 00:37:33,600
ये जो जैसे भगवान ने कहा कि हे अर्जुन अभी मैं

521
00:37:33,600 --> 00:37:37,760
रामपाल की गीता को साइड में रख के जो प्रामाणिक भाष्य हैं उनका

522
00:37:37,760 --> 00:37:41,840
अर्थ आपको बता रहा हूं। कि भगवत गीता में भगवान ने कहा हे अर्जुन तेरे और मेरे

523
00:37:41,840 --> 00:37:46,240
बहुत से जन्म हो चुके हैं। मैं जानता हूं तू नहीं जानता। ये तू नहीं जानता।

524
00:37:46,240 --> 00:37:47,560
यही बंधन

525
00:37:47,560 --> 00:37:51,640
है। यही है जो वह मुक्त नहीं है। जो नहीं

526
00:37:51,640 --> 00:37:55,680
जानता जो मोहित है इस प्रपंच रूपी संसार से

527
00:37:55,680 --> 00:38:00,000
जो मोहित है तो जो जानता है वो मोहित नहीं होता।

528
00:38:00,000 --> 00:38:04,920
जो इस आत्मा की सच्चाई को जानता है वो मोहित नहीं होता।

529
00:38:04,920 --> 00:38:09,120
तो भगवान जैसे कि यह भी मानता

530
00:38:09,120 --> 00:38:13,920
है कि जो आत्मा है वो

531
00:38:13,920 --> 00:38:18,000
अविनाशी है उसका वध नहीं हो सकता। तो जिसका वध नहीं हो सकता

532
00:38:18,000 --> 00:38:22,080
और उसका मूल स्वरूप वही है। तो फिर वो किस चीज के लिए डर रहा है? क्यों

533
00:38:22,080 --> 00:38:26,880
डर रहा है? क्योंकि जो उसका नहीं है उसको उसने मान रखा है अपना।

534
00:38:26,880 --> 00:38:30,880
यानी शरीर जो शरीर पंच भौतिक शरीर है

535
00:38:30,880 --> 00:38:36,880
वह उसका नहीं है। उसने वही मान रखा है

536
00:38:37,880 --> 00:38:41,920
अपना। है ना? तो इसको अपना ना मानने वाला

537
00:38:41,920 --> 00:38:45,920
मुक्त है और इसको अपना मानने वाला फसा हुआ है।

538
00:38:45,920 --> 00:38:50,320
बंधन में है। इसी को अहंकार मान लीजिए। यह मेरा शरीर है।

539
00:38:50,320 --> 00:38:54,320
यह मेरे पिता हैं। यह मेरी मां है। तो अपना मानने वाला शरीर के

540
00:38:54,320 --> 00:38:58,320
द्वारा प्राप्त होने वाले प्रपंच रूपी संसार में प्राप्त होने वाले जो बंधन

541
00:38:58,320 --> 00:39:02,400
है उनको अपना मानने वाला बंधन हो गया। बंधक हो गया और यहां फंसा

542
00:39:02,400 --> 00:39:06,640
हुआ हो गया और जो भगवान है वो मुक्त

543
00:39:06,640 --> 00:39:10,720
है। क्योंकि उनको पता है कि ये सब कुछ प्रपंच रूपी संसार

544
00:39:10,720 --> 00:39:14,880
है। माया है। तो जो लोग कहते हैं ना कि जो भगवान है वो जीवन

545
00:39:14,880 --> 00:39:19,200
मरण में नहीं आता। ऐसा नहीं है। भगवान जीवन मरण में आ

546
00:39:19,200 --> 00:39:23,280
सकते हैं। परंतु इस बोध के साथ कि मैं कौन

547
00:39:23,280 --> 00:39:28,240
हूं उनको पता है। इसलिए वो जीवन मरण में आते हुए भी मुक्त है।

548
00:39:28,240 --> 00:39:32,640
और जिसको नहीं पता है वो बंधन में है। वो मुक्त नहीं है। ये सारांश

549
00:39:32,640 --> 00:39:36,720
है। बुलेट पॉइंट है। तो क्या है कि

550
00:39:36,720 --> 00:39:40,960
जैसे आत्मा जैसे जीवात्मा की इस देह

551
00:39:40,960 --> 00:39:44,960
में बालकपन, जवानी और वृद्धा अवस्था होती है। वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति

552
00:39:44,960 --> 00:39:49,200
होती है। उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता। यह 13वा

553
00:39:49,200 --> 00:39:52,960
श्लोक हो गया। अब यहां पर देखिए पूरी आत्मा की

554
00:39:52,960 --> 00:39:57,200
बातें चल रही है। अब ये कैसे घुमाएगा बात को वो देखिएगा। रामपाल

555
00:39:57,200 --> 00:40:01,680
सर्दी गर्मी और सुख दुख को देने वाले इंद्रिय और विषयों के

556
00:40:01,680 --> 00:40:06,080
संयोग को संयोग तो उत्पत्ति विनाशील और अनित्य

557
00:40:06,080 --> 00:40:10,160
है तो यह जो इंद्रिय विषयों

558
00:40:10,160 --> 00:40:14,800
के संयोग है इनकी उत्पत्ति होती है। यह विनाशशील

559
00:40:14,800 --> 00:40:18,880
है। इनका विनाश भी होता है और यह नित्य नहीं है। ऐसा नहीं है पहले भी

560
00:40:18,880 --> 00:40:22,960
थे आगे भी रहेंगे। इसलिए हे भारत

561
00:40:22,960 --> 00:40:27,040
तू उनको सहन कर। तो यानी कि जो ज्ञानी है

562
00:40:27,040 --> 00:40:31,520
जिसके पास वास्तव में विद्या है कौन सी विद्या असतो

563
00:40:31,520 --> 00:40:35,520
मा सदमयातमया वाली विद्या जिसके पास

564
00:40:35,520 --> 00:40:39,760
विद्या है ये आपके सामने अब 14वा श्लोक

565
00:40:39,760 --> 00:40:45,760
ला दीजिए ये तो हो गया वाला इसके बाद

566
00:40:46,680 --> 00:40:51,440
वाला हां 14वा तो

567
00:40:51,440 --> 00:40:55,680
यहां पे भी आत्मा के लिए ही बताया जा रहा है कि देखो देखो आत्मा जो है वो नित्य

568
00:40:55,680 --> 00:40:59,680
है, अविनाशी है और नित्य

569
00:40:59,680 --> 00:41:04,760
है यानी कि उसकी उत्पत्ति भी कभी नहीं हुई। हालांकि इसने उत्पत्ति मानी है

570
00:41:04,760 --> 00:41:08,960
और इसलिए तुझे उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए और जो

571
00:41:08,960 --> 00:41:13,040
यह जो विनाशशील अनित्य ये जो कष्ट तुझे आ रहे

572
00:41:13,040 --> 00:41:17,360
हैं इनको तू सहन कर। ये कहा जा रहा है दो श्लोक 14।

573
00:41:17,360 --> 00:41:21,600
इसके बाद भगवान

574
00:41:21,600 --> 00:41:25,920
कह रहे हैं अच्छा यह हो क्यों रहा है मैंने थोड़ा सा प्रीफिक्स

575
00:41:25,920 --> 00:41:30,000
नहीं बताया समय जिन लोगों को ना पता हो वो जान ले कि

576
00:41:30,000 --> 00:41:34,240
जब अर्जुन युद्ध में पहुंचा प्रभु जो

577
00:41:34,240 --> 00:41:38,240
भगवान श्री कृष्ण उसके सारथी थे तो जब वो युद्ध में

578
00:41:38,240 --> 00:41:42,480
पहुंचे अर्जुन और सामने अपने गुरु द्रोणाचार्य को देखा अपने नाते

579
00:41:42,480 --> 00:41:46,560
रिश्तेदारों को देखा कि उनसे उसे युद्ध लड़ना है और

580
00:41:46,560 --> 00:41:50,560
उनको देखा अपने भाइयों को चचेरे भाइयों को

581
00:41:50,560 --> 00:41:55,040
बहुत से लोगों को देखा उसने तो उसका हृदय जो है विदर्ण हो

582
00:41:55,040 --> 00:41:59,200
और उसके मन में भाव आया कि मैं इनको ना मारू मैं इनसे ना लडू इससे अच्छा है कि मैं स्वयं

583
00:41:59,200 --> 00:42:01,760
ही मर जाऊं। तो इस तरह का जब भाव आया

584
00:42:01,760 --> 00:42:05,760
तो भगवान उसको समझा रहे हैं कि तुम्हारे मारने से ना कोई मरता

585
00:42:05,760 --> 00:42:09,760
है और ना कोई तुम्हारे ना मारने से बचता है और ना कोई

586
00:42:09,760 --> 00:42:13,840
तुम्हारे मारने से मरता है। ठीक है? वही सब यहां चल रहा है। उसी को

587
00:42:13,840 --> 00:42:18,000
भगवान समझा रहे हैं कि वह अपना जो उसके अंदर यह जो इस

588
00:42:18,000 --> 00:42:22,000
भाव को नपुंसकता भी कहा गया है आगे। तो ऐसे जो

589
00:42:22,000 --> 00:42:27,600
भाव उत्पन्न हुए हैं वो ना आए।

590
00:42:27,600 --> 00:42:32,120
तो अब यहां पर दूसरे अध्याय के 15 वे श्लोक

591
00:42:32,120 --> 00:42:36,320
में कहा जा रहा है कि क्योंकि हे पुरुष श्रेष्ठ

592
00:42:36,320 --> 00:42:40,320
दुख सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये

593
00:42:40,320 --> 00:42:44,320
इंद्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते वह

594
00:42:44,320 --> 00:42:49,200
मोक्ष के योग्य है। मोक्ष के योग्य कौन है?

595
00:42:49,200 --> 00:42:53,520
मोक्ष के योग्य वो है जो सुख दुख को समान समझे।

596
00:42:53,520 --> 00:42:59,160
सुखदख को समान कौन समझेगा? जो विद्या और अविद्या में अंतर जानता

597
00:42:59,160 --> 00:43:03,440
है। विद्या और अविद्या के सही स्वरूप को जानता है।

598
00:43:03,440 --> 00:43:07,520
यह बात वेद में भी आई है। यानी कि फंसे

599
00:43:07,520 --> 00:43:12,000
होने और ना फंसे होने में ज्ञान और अज्ञान

600
00:43:12,000 --> 00:43:17,960
विद्या और अविद्या का ही फर्क है। अगर

601
00:43:17,960 --> 00:43:23,200
बहुत गुण दृष्टि से देखा जाए। ठीक है?

602
00:43:23,200 --> 00:43:27,200
तो इसीलिए भगवान यह कहते हैं कि मैं जानता हूं पर तू

603
00:43:27,200 --> 00:43:31,360
नहीं जानता। तो भगवान जन्म मरण में होते हुए भी मुक्त क्यों

604
00:43:31,360 --> 00:43:35,360
है? ईश्वर क्यों है? क्योंकि वो जानते हैं वो विद्यावान

605
00:43:35,360 --> 00:43:39,520
हैं। विद्यावान और हम अविद्यावान हैं।

606
00:43:39,520 --> 00:43:43,520
इसलिए हम नहीं जानते कि हमारे कितने जन्म हो चुके हैं। हम

607
00:43:43,520 --> 00:43:47,520
शब्द प्रमाण से जानते हैं मगर हमें फील नहीं होता है कि हमारे बहुत से जन्म हो

608
00:43:47,520 --> 00:43:51,680
चुके हैं। ठीक है? तो मैंने अभी जैसा

609
00:43:51,680 --> 00:43:56,080
कि कहा कि मुक्त कौन है

610
00:43:56,080 --> 00:44:00,080
या मुक्ति के योग्य कौन है? मोक्ष के योग्य कौन है? जो

611
00:44:00,080 --> 00:44:04,640
अविद्या और विद्या को जानता है। तो आगे देखिए

612
00:44:04,640 --> 00:44:08,640
दो 16 में क्या कहा जा रहा है? असत वस्तु की तो

613
00:44:08,640 --> 00:44:12,880
सत्ता नहीं है और सत का अभाव नहीं है। इस

614
00:44:12,880 --> 00:44:16,960
प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्व ज्ञानी

615
00:44:16,960 --> 00:44:18,240
पुरुषों द्वारा देखा गया है।

616
00:44:18,240 --> 00:44:22,320
तो सबसे पहली बात क्या है कि मुक्ति और बंधन में

617
00:44:22,320 --> 00:44:26,480
विद्या और अविद्या ही हेतु है। और इस तरीके से

618
00:44:26,480 --> 00:44:30,720
जानने वाला विद्या और अविद्या को जानने वाला होने के लिए वेद में भी कहा गया है।

619
00:44:30,720 --> 00:44:34,800
यजुर्वेद के कुछ अंतिम अध्याय है। उनमें 39वा या 40वा है। उसमें

620
00:44:34,800 --> 00:44:39,360
कहा गया है। ठीक है? तो

621
00:44:39,360 --> 00:44:43,440
इसमें क्या कहा जा रहा है? दो 16 में कि असत वस्तु की तो सत्ता

622
00:44:43,440 --> 00:44:47,840
नहीं है और सत का अभाव नहीं है। तो यहां आत्मा के लिए बताया जा रहा है

623
00:44:47,840 --> 00:44:51,840
कि जो जो आत्मा है उसको कोई मार नहीं

624
00:44:51,840 --> 00:44:56,000
सकता। और अगर तू इसके शरीर इत्यादि को बचाने सामने वालों

625
00:44:56,000 --> 00:45:00,000
के शरीर इत्यादि को बचाने के लिए वो कर रहा है। प्रयत्न या दुख शोक

626
00:45:00,000 --> 00:45:04,000
कर रहा है तो उसकी कभी सत्ता नहीं हो सकती। उसको कभी

627
00:45:04,000 --> 00:45:08,880
तू बचा नहीं सकता। तो तू तेरा शोक शोक करना तो व्यर्थ है।

628
00:45:08,880 --> 00:45:13,120
तो इस तरीके से यहां पर और इस प्रकार से दोनों और इन दोनों

629
00:45:13,120 --> 00:45:17,200
के सही सही स्वरूप को जानने वाला कौन है? तत्वज्ञानी और यहां पर इसे

630
00:45:17,200 --> 00:45:21,440
तत्वदर्शी कहा गया है। ध्यान रखना। तो विद्या और अविद्या सत

631
00:45:21,440 --> 00:45:25,440
और असत के इस फर्क को इस अंतर को जानने वाले को

632
00:45:25,440 --> 00:45:29,520
भी तत्वदर्शी यहां कह दिया गया है। भगवत गीता में दो में। ठीक है?

633
00:45:29,520 --> 00:45:33,280
अब यहां दो6 तक इन्होंने क्या खिचड़ी पकाई

634
00:45:33,280 --> 00:45:37,440
है? वह यह है कि

635
00:45:37,440 --> 00:45:41,600
अविनाशी का अस्तित्व सदा रहता है। यहां देखिए यह बुलेट पॉइंट है याद रखने

636
00:45:41,600 --> 00:45:46,560
योग्य। यहां इसने बोला रामपाल ने कि

637
00:45:46,560 --> 00:45:51,160
असत यानी नाशवान का अस्तित्व चिर काल

638
00:45:51,160 --> 00:45:55,360
तक नहीं रहता है। सत यानी अविनाशी का

639
00:45:55,360 --> 00:45:59,520
अस्तित्व सदा रहता है। यानी कि यहां पर इसने मान लिया यह

640
00:45:59,520 --> 00:46:05,520
पेज नंबर 17 है इसकी भगवत गीता के अनुसार।

641
00:46:06,560 --> 00:46:11,360
हां यही है लास्ट पैराग्राफ

642
00:46:11,360 --> 00:46:15,560
यही यही है जो सामने है नहीं नहीं ऊपर मत करिए ऊपर मत

643
00:46:15,560 --> 00:46:19,800
करिए है ना तो क्या है

644
00:46:19,800 --> 00:46:24,000
कि दो के श्लोक 16 में वर्णन है कि असत यानी

645
00:46:24,000 --> 00:46:28,080
नाशवान का अस्तित्व चिरकाल तक नहीं रहता तथा सत्य यानी

646
00:46:28,080 --> 00:46:33,200
अविनाशी का अस्तित्व सदा रहता है। तो इसने यानी यहां क्या मान लिया?

647
00:46:33,200 --> 00:46:37,200
कि अविनाशी का अस्तित्व सदा रहता है। इसका अर्थ क्या

648
00:46:37,200 --> 00:46:41,520
है? कि यदि कहीं पर भी किसी के लिए भी अविनाशी

649
00:46:41,520 --> 00:46:45,760
शब्द आ जाएगा तो मानना पड़ेगा कि अविनाशी जो है वह

650
00:46:45,760 --> 00:46:50,000
सदा रहने वाला है। वहां पर यह नहीं कह सकते कि थोड़ी देर के लिए क्योंकि

651
00:46:50,000 --> 00:46:54,160
इसने यहां स्वयं माना है कि अविनाशी का अस्तित्व सदा

652
00:46:54,160 --> 00:46:58,160
रहता है। उसका अंश आत्मा भी

653
00:46:58,160 --> 00:47:02,480
अविनाशी है और परमात्मा भी अविनाशी है। परमात्मा से संपूर्ण

654
00:47:02,480 --> 00:47:06,560
संसार व्याप्त है। देखिए यहां पर इसने मान लिया परमात्मा से

655
00:47:06,560 --> 00:47:10,960
संपूर्ण संसार व्याप्त है यानी विस्तार

656
00:47:10,960 --> 00:47:15,120
को प्राप्त हुआ है। अब यह बताइए कि परमात्मा

657
00:47:15,120 --> 00:47:19,360
से संपूर्ण संसार व्याप्त है। व्याप्त

658
00:47:19,360 --> 00:47:21,840
मतलब संपूर्ण संसार के कण-कण में ईश्वर

659
00:47:21,840 --> 00:47:26,480
है। मगर इसने आगे क्या कहा? यानी

660
00:47:26,480 --> 00:47:31,200
उसके कारण विस्तार को प्राप्त हुआ है। तो भाई

661
00:47:31,200 --> 00:47:35,440
कौन सी डिक्शनरी ऐसी है जहां पर व्याप्त होने

662
00:47:35,440 --> 00:47:39,440
का अर्थ जो है यह हो कि उस व्याप्त होने का अर्थ यह

663
00:47:39,440 --> 00:47:43,440
है कि उसके द्वारा विस्तार को प्राप्त हुआ है। तो यहां पर

664
00:47:43,440 --> 00:47:47,080
इसका यह भी एक

665
00:47:47,080 --> 00:47:51,200
झोल जो है पकड़ के रखिए कि भाई

666
00:47:51,200 --> 00:47:55,440
व्याप्त होने का मतलब है कि व्याप्त है रमा हुआ है।

667
00:47:55,440 --> 00:47:59,920
व्याप्त होने का मतलब ये नहीं है कि उसके कारण वो विस्तार को प्राप्त हुआ है।

668
00:47:59,920 --> 00:48:03,920
तो ये अपने मन से इसने डाल दिया यहां पर क्योंकि इसको अपनी आईडियोलॉजी

669
00:48:03,920 --> 00:48:07,920
लेकर चलनी है ना। इसलिए उस अविनाशी परमात्मा का

670
00:48:07,920 --> 00:48:11,920
अभाव किसी समय में नहीं

671
00:48:11,920 --> 00:48:15,920
होता है। अविनाशी परमात्मा का अभाव किसी समय में

672
00:48:15,920 --> 00:48:20,400
नहीं होता है। यह बोल दिया। फिर गीता अध्याय दो श्लोक 17

673
00:48:20,400 --> 00:48:25,280
के अर्थ में इसने ये बताया है कि यहां पे

674
00:48:25,280 --> 00:48:29,360
परमात्मा की महिमा बताई है। अब देखिए

675
00:48:29,360 --> 00:48:33,360
यहां पर इसने खेल क्या खेला है?

676
00:48:33,360 --> 00:48:36,880
बात हो रही है भगवान श्री कृष्ण उसको यह समझा रहे हैं

677
00:48:36,880 --> 00:48:40,960
अर्जुन को कि अर्जुन आत्मा ना

678
00:48:40,960 --> 00:48:45,040
कभी मरती है और ना ही उसका कभी अभाव होता है और

679
00:48:45,040 --> 00:48:49,040
यदि तू शरीर के लिए चिंतित है तो शरीर की कभी सत्ता नहीं होती

680
00:48:49,040 --> 00:48:53,200
जैसे यहां असत वस्तु की सत्ता नहीं होती और सत का अभाव नहीं होता

681
00:48:53,200 --> 00:48:57,280
ठीक है आत्मा की बात चल रही है लगातार अचानक से दो

682
00:48:57,280 --> 00:49:01,520
17 में भगवान की बात कैसे आ जाएगी जबकि इसके बाद वाले श्लोक

683
00:49:01,520 --> 00:49:06,040
में भी आत्मा की ही बात चल रही है। तो यहां क्यों क्यों इसने

684
00:49:06,040 --> 00:49:10,160
कहा परमात्मा की बात वह समझिए। तो

685
00:49:10,160 --> 00:49:14,320
आत्मा की उत्पत्ति परमात्मा से परमात्मा ने अपने वचन

686
00:49:14,320 --> 00:49:18,640
से अपने शरीर से की है।

687
00:49:18,640 --> 00:49:22,960
गीता अध्याय दो श्लोक 17 में उस अविनाशी परमात्मा की महिमा

688
00:49:22,960 --> 00:49:27,040
बताई गई है कि परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी नित्य नहीं

689
00:49:27,040 --> 00:49:31,040
है। क्योंकि आत्मा की उत्पत्ति परमात्मा ने अपने

690
00:49:31,040 --> 00:49:35,440
वचन से अपने शरीर से की है। यह तो इसने अपने मन से बता दिया। उत्पत्ति

691
00:49:35,440 --> 00:49:39,440
से पहले आत्मा का अभाव था। यानी कि आत्मा नित्य नहीं है।

692
00:49:39,440 --> 00:49:43,440
यहां इसने मान लिया। अभी देखिए आत्मा को आगे कितनी बार नित्य कहा

693
00:49:43,440 --> 00:49:47,400
गया है। ठीक है?

694
00:49:47,400 --> 00:49:51,680
और दो श्लोक 17 में सीधे सीधे आत्मा

695
00:49:51,680 --> 00:49:55,920
की ही बात हो रही है कि भाई अगर

696
00:49:55,920 --> 00:50:00,400
हम प्रसंग अनुसार चलेंगे तो यहां पर भगवान श्री कृष्ण अर्जुन

697
00:50:00,400 --> 00:50:04,640
को समझा रहे हैं कि जिसको मारने के लिए तू दुख प्रकट कर रहा है जिसको मारने

698
00:50:04,640 --> 00:50:08,720
से तू कतरा रहा है वो तो कभी मरती नहीं है तो तू दुखी

699
00:50:08,720 --> 00:50:12,800
क्यों हो रहा है और जिसको बचाने के लिए तू प्रयत्न कर रहा है वह तू कभी बचा नहीं

700
00:50:12,800 --> 00:50:17,360
सकता तो तू दुखी क्यों हो रहा है तो तू वह कार्य कर

701
00:50:17,360 --> 00:50:22,320
तो तू इसके मरने और ना मरने दोनों की स्थिति में समान देख

702
00:50:22,320 --> 00:50:26,320
और अपना कर्म कर शास्त्र भेद कर्म कर अपने धर्म का रक्ष अपने धर्म

703
00:50:26,320 --> 00:50:30,880
की रक्षा कर तो इसी को कहा गया धीरवान

704
00:50:30,880 --> 00:50:35,120
और जो मोह नहीं मोह को प्राप्त जो मोहित नहीं होता और जो

705
00:50:35,120 --> 00:50:39,120
सत और असत दोनों को सही से जानता है वही मोक्ष के योग्य है।

706
00:50:39,120 --> 00:50:44,240
यही सब कहा ना भगवान ने केवल जानने का जानने की बात है।

707
00:50:44,240 --> 00:50:48,240
विद्या से जितना लिप्त होते जाएंगे और अविद्या से जितना दूर

708
00:50:48,240 --> 00:50:52,240
होते जाएंगे हम मोक्ष के करीब जाते जाएंगे। तो जो यह बात कहते

709
00:50:52,240 --> 00:50:56,240
हैं ना कि नहीं परमात्मा जो है जीवन मरण में नहीं आ सकते। हां वो जानता है कि

710
00:50:56,240 --> 00:51:00,480
मैं जीवन मरण में नहीं हूं। मगर जो हम लोग जिसको जीवन मरण

711
00:51:00,480 --> 00:51:02,560
कहते हैं उस जीवन मरण में परमात्मा आ

712
00:51:02,560 --> 00:51:06,720
सकता है। परमात्मा स्वयं ये जानता है कि मैं जीवन मरण में नहीं गया हूं। मगर

713
00:51:06,720 --> 00:51:10,720
हमारी दृष्टि में वह ऐसी लीलाएं कर सकता है कि वह आया वो गया

714
00:51:10,720 --> 00:51:14,800
जीवन मरण में और जीवन मरण में आते हुए

715
00:51:14,800 --> 00:51:18,880
भी क्योंकि वो जानता है इसलिए वो मुक्त है और हम नहीं जानते तो

716
00:51:18,880 --> 00:51:22,880
हम मुक्त नहीं है। ये अंतर है जो उस बात का गलत अर्थ निकालते

717
00:51:22,880 --> 00:51:26,880
हैं कि तू जानता है मैं नहीं मैं जानता हूं तू नहीं जानता है। खैर आगे चलते

718
00:51:26,880 --> 00:51:30,880
हैं। तो 217 में यहां पर इसने क्या किया कि जब लगातार

719
00:51:30,880 --> 00:51:35,040
आत्मा की बात आ रही है। दो6 तक आत्मा के बारे में बातें की

720
00:51:35,040 --> 00:51:39,040
गई है और इससे आगे भी आत्मा के बारे में भी बात की गई है। मगर

721
00:51:39,040 --> 00:51:44,440
यहां पर क्योंकि आत्मा को ये कहा गया है

722
00:51:44,440 --> 00:51:49,120
कि आत्मा को यहां पर अविनाशी कहा गया है। नित्य कहा गया है।

723
00:51:49,120 --> 00:51:53,280
तो और दूसरी बात संपूर्ण जगत दृश्य वर्ग

724
00:51:53,280 --> 00:51:57,280
व्याप्त है। ये भी कहा गया है आत्मा के लिए। हालांकि

725
00:51:57,280 --> 00:52:01,800
इस श्लोक को लेकर के जैसे कुछ ऐसे

726
00:52:01,800 --> 00:52:06,560
हैं हमारे संप्रदाय भी वह भी नहीं मानते कि भाई यहां पर जो है

727
00:52:06,560 --> 00:52:10,720
क्या कहते हैं आत्मा को सर्वव्यापी कहा गया है। जैसे स्कॉन वालों

728
00:52:10,720 --> 00:52:14,720
ने आत्मा को यहां पर सर्वव्यापी नहीं माना है और कुछ और

729
00:52:14,720 --> 00:52:18,040
माना है जिसके बारे

730
00:52:18,040 --> 00:52:22,080
में इसने बात की है रामपाल ने अपने इसमें भाष्य में

731
00:52:22,080 --> 00:52:26,600
क्या माना है देख लेते हैं

732
00:52:26,600 --> 00:52:31,840
हां जो सारे शरीर में व्याप्त है। तो जैसे

733
00:52:31,840 --> 00:52:35,840
यहां पर क्या माना गया? सर्वम का अर्थ संपूर्ण जगत

734
00:52:35,840 --> 00:52:40,080
माना गया। सर्वम मतलब सब मगर यहां पर इन्होंने

735
00:52:40,080 --> 00:52:44,160
कर दिया कि आत्मा जो है जो सारे

736
00:52:44,160 --> 00:52:48,240
शरीर में व्याप्त है। हालांकि वहां पर शरीर शब्द नहीं आया है। ये मैं बात कर रहा हूं

737
00:52:48,240 --> 00:52:52,240
इस की भगवत गीता की स्मृति। इसमें इन्होंने

738
00:52:52,240 --> 00:52:56,640
क्या अर्थ किया है कि जो सारे शरीर में व्याप्त है। क्यों? इन्होंने

739
00:52:56,640 --> 00:53:01,120
ऐसा अर्थ क्यों किया? इन्होंने एक अच्छी चीज की कि इन्होंने

740
00:53:01,120 --> 00:53:05,520
आत्मा का प्रसंग चल रहा है। तो ये नहीं कहा कि यहां दो

741
00:53:05,520 --> 00:53:09,600
अध्याय दो श्लोक 17 में आत्मा की बात नहीं परमात्मा की बात हो रही है।

742
00:53:09,600 --> 00:53:14,000
इन्होंने ये अच्छा कार्य किया। परंतु क्योंकि इनको आत्मा को परमात्मा

743
00:53:14,000 --> 00:53:18,160
की तरह सर्वव्यापक नहीं मानना था। क्योंकि ये द्वैतवादी है। आत्मा के कुछ

744
00:53:18,160 --> 00:53:22,800
लक्षण अलग बताते हैं। द्वैतवादी भी नहीं है। इनका तो खैर कुछ और ही है। अचिंत वेदावेद

745
00:53:22,800 --> 00:53:26,960
और पता नहीं क्या है। उसमें भी मिक्स है। मगर इन्होंने कम

746
00:53:26,960 --> 00:53:31,040
से कम यह कहा कि यहां परमात्मा की बात नहीं हुई है। आत्मा की हुई है

747
00:53:31,040 --> 00:53:33,040
और आत्मा के इन्होंने संपूर्ण

748
00:53:33,040 --> 00:53:37,360
शरीर में व्याप्त कर दिया। संपूर्ण विश्व में व्याप्त नहीं संपूर्ण

749
00:53:37,360 --> 00:53:41,560
शरीर में व्याप्त कर दिया। तो इसने यहां पर इनकी आलोचना की

750
00:53:41,560 --> 00:53:45,760
है इस वालों की और कहा है कि भैया यह

751
00:53:45,760 --> 00:53:50,000
जो दो श्लोक 17 का इस का अर्थ है वो गलत है क्योंकि उसने कह दिया

752
00:53:50,000 --> 00:53:54,160
कि जो आत्मा है वो पूरे शरीर में व्याप्त है जबकि शरीर की बात वहां हो ही नहीं रही

753
00:53:54,160 --> 00:53:58,160
है। तो इसको दोनों को काटना पड़ेगा। क्यों? क्योंकि अगर आत्मा

754
00:53:58,160 --> 00:54:02,480
को सर्वव्यापी मान लेगा तो वो ईश्वर जैसी हो जाएगी। तो जब

755
00:54:02,480 --> 00:54:06,560
ईश्वर ही सर्वव्यापी नहीं है तो आत्मा को सर्व्यापी कैसे कहे भाई? है

756
00:54:06,560 --> 00:54:10,720
ना? दूसरी बात कि उसको

757
00:54:10,720 --> 00:54:15,040
नित्य कहा गया है और व्यापकता वाला शब्द भी आ गया है।

758
00:54:15,040 --> 00:54:19,360
तो इसलिए वो यह भी नहीं मान सकता इनकी बात नहीं मान सकता।

759
00:54:19,360 --> 00:54:23,600
इस कौन की बात भी नहीं मान सकता कि वह शरीर की बात हो रही है। तो यहां पर इसने

760
00:54:23,600 --> 00:54:27,840
बिना किसी अर्थ के बिना किसी प्रयोजन के दो 17 में कह दिया

761
00:54:27,840 --> 00:54:32,000
कि यहां पर जो है परमात्मा की बात हो रही है। जबकि यहां पर भी आत्मा की ही बात हो

762
00:54:32,000 --> 00:54:36,080
रही है। और इसने यह भी

763
00:54:36,080 --> 00:54:40,320
कह दिया यह बताते बताते कि आत्मा अविनाशी

764
00:54:40,320 --> 00:54:44,320
तो है। आत्मा का आत्मा को मारा तो नहीं जा सकता।

765
00:54:44,320 --> 00:54:48,320
मगर कभी ना कभी एक समय ऐसा था जब आत्मा

766
00:54:48,320 --> 00:54:52,400
का भी अभाव था। यानी कि आत्मा सत नहीं है।

767
00:54:52,400 --> 00:54:56,560
आत्मा सत नहीं है। सत का मतलब जब वो

768
00:54:56,560 --> 00:55:00,720
सत नहीं है तो यह समझ लो कि रामपाल के अनुसार मोक्ष हो ही

769
00:55:00,720 --> 00:55:04,720
नहीं सकता। क्योंकि वो सत है ही नहीं। आत्मा

770
00:55:04,720 --> 00:55:09,280
सत है ही नहीं तो उसको मोक्ष कहां से मिलेगा? सत वाला। उसको तो

771
00:55:09,280 --> 00:55:15,280
बनती और वो होती रहेगी। ठीक है?

772
00:55:19,360 --> 00:55:23,520
अब इसमें एक प्रश्न और आ जाता है कि आत्मा अविनाशी है मगर उसका कभी

773
00:55:23,520 --> 00:55:27,680
अभाव था तो क्या काल का भी कभी अभाव था तो फिर कहां से उत्पन्न

774
00:55:27,680 --> 00:55:31,880
हुए हैं ये लोग वो तत्व कहां से आए यह सब सोचने वाली बातें हो जाती है

775
00:55:31,880 --> 00:55:37,480
फिर अच्छा अब इसके बाद आगे चलते

776
00:55:37,480 --> 00:55:41,600
हैं तो इसने क्या कहा प्रभुपाद जी की गीता का

777
00:55:41,600 --> 00:55:46,080
खंडन करते हुए कि गीता अध्याय दो श्लोक 17 के एस्कॉन

778
00:55:46,080 --> 00:55:50,400
वाले श्रील प्रभुपाद द्वारा किए गए अनुवाद में गड़बड़ी की है। आत्मा

779
00:55:50,400 --> 00:55:54,400
की महिमा बताइए। जबकि मूल पाठ उस अविनाशी परमात्मा का गुणगान कर रहा

780
00:55:54,400 --> 00:55:58,640
है। देखिए आत्मा को स्कॉन के अनुसार

781
00:55:58,640 --> 00:56:02,720
संपूर्ण शरीर में शरीर में व्याप्त मान लीजिए या

782
00:56:02,720 --> 00:56:06,800
फिर आत्मा को क्या कहते हैं? जो अन्य

783
00:56:06,800 --> 00:56:11,200
भाष्यकार है उनके अनुसार संपूर्ण विश्व में व्याप्त मान लीजिए। मगर

784
00:56:11,200 --> 00:56:15,200
दो अध्याय दो श्लोक 17 में बात किसकी हो रही है? आत्मा

785
00:56:15,200 --> 00:56:19,280
की। मगर इसको क्योंकि आत्मा को

786
00:56:19,280 --> 00:56:23,280
भी अनित्य सिद्ध करना है कि कोई एक समय था जब आत्मा

787
00:56:23,280 --> 00:56:27,520
का अभाव था। तो अगर आत्मा का अभाव मान लेंगे

788
00:56:27,520 --> 00:56:31,600
तो फिर आत्मा अपनी सत वाले रूप में कभी पहुंच

789
00:56:31,600 --> 00:56:35,840
ही नहीं सकती। सत स्वरूप हो ही नहीं सकती। तो पूर्ण

790
00:56:35,840 --> 00:56:40,560
मोक्ष उसको मिल ही नहीं सकता। है ना?

791
00:56:40,560 --> 00:56:44,760
तो यह भी एक बात है सोचने वाली इनके

792
00:56:44,760 --> 00:56:50,320
अनुसार इसके बाद क्या है? आगे क्या लिखा है?

793
00:56:50,320 --> 00:56:52,720
जिससे यह संपूर्ण जगत

794
00:56:52,720 --> 00:56:56,800
यानी दृश्य वर्ग व्याप्त है। यानी विद्यमान

795
00:56:56,800 --> 00:57:01,040
है। एस्कॉन वालों ने अनुवाद गलत किया है। यह एस्कॉन नहीं बोलता है। एस्कॉन

796
00:57:01,040 --> 00:57:05,120
बोलता है क्योंकि ये थोड़ा गवार रहा है इसलिए एस्कॉन वालों

797
00:57:05,120 --> 00:57:09,280
ने अनुवाद गलत किया है। शब्दों के अर्थ अनुवाद

798
00:57:09,280 --> 00:57:12,600
से पहले लिखे हैं।

799
00:57:12,600 --> 00:57:16,960
जिनमें शब्द का अर्थ तो ठीक किया जिससे परंतु अनुवाद

800
00:57:16,960 --> 00:57:20,960
मैं कर दिया जो उनके द्वारा किया अनुवाद इस प्रकार है जो

801
00:57:20,960 --> 00:57:25,040
सारे शरीर में व्याप्त है उसे ही तुम अविनाशी समझो उस

802
00:57:25,040 --> 00:57:29,600
अव्यय आत्मा को नष्ट करने में कोई भी समर्थ नहीं है ठीक है

803
00:57:29,600 --> 00:57:33,840
तो आत्मा को क्योंकि इसे नित्य नहीं मानना था तो इसलिए

804
00:57:33,840 --> 00:57:37,840
ना तो इसने अन्य भाष्यकारों का लिया है कि वहां आत्मा की

805
00:57:37,840 --> 00:57:42,560
बात हो रही है और

806
00:57:42,560 --> 00:57:46,960
क्योंकि वहां पर इसको परमात्मा को डालना था। तो इसलिए

807
00:57:46,960 --> 00:57:51,760
जो श्रील प्रभुपाद जी ने इस की भगवत गीता में आत्मा को

808
00:57:51,760 --> 00:57:56,080
पूरे शरीर में व्याप्त बताया है। तो वहां आत्मा

809
00:57:56,080 --> 00:58:00,480
की बात ना होकर के परमात्मा की बात हो रही है। यह बताने के लिए इस का भी खंडन

810
00:58:00,480 --> 00:58:04,920
है और जितने भी अन्य भाष्यकार है उनका खंडन

811
00:58:04,920 --> 00:58:09,040
है। इसके बाद इसी गीता अध्याय दो श्लोक

812
00:58:09,040 --> 00:58:13,120
17 का अनुवाद गीता गोरखपुर से मुद्रित प्रकाशित है। जय

813
00:58:13,120 --> 00:58:17,360
दयाल गोविंद का द्वारा अनुवादित वो उसमें ठीक किया है जो इस प्रकार है

814
00:58:17,360 --> 00:58:21,520
नाश रहित तो तू उसको जान जिससे संपूर्ण जगत यानी दृश्य वर्ग

815
00:58:21,520 --> 00:58:25,600
व्याप्त है उसे अविनाशी का उस अविनाशी का विनाश करने में

816
00:58:25,600 --> 00:58:29,760
कोई भी समर्थ नहीं है तो अब यहां आगे इसने तर्क

817
00:58:29,760 --> 00:58:34,480
दिया है कि दोनों अनुवाद ऊपर लिखे हैं पाठक जन स्वयं निर्णय कर सकते हैं

818
00:58:34,480 --> 00:58:38,720
सत्य तथा असत्य का वर्तमान में एस्कॉन वालों के श्रील प्रभुपाद

819
00:58:38,720 --> 00:58:44,560
जी द्वारा इसने फिर उनकी आलोचना की है श्रील प्रभुपाद

820
00:58:44,560 --> 00:58:48,880
अच्छा इसने एक बात और मान ली है कि दो 16

821
00:58:48,880 --> 00:58:53,280
में सत और असत को तत्वदर्शी संत ही ठीक ठीक

822
00:58:53,280 --> 00:58:57,360
बताते हैं। उन्होंने दोनों को देखा है यानी जाना है।

823
00:58:57,360 --> 00:59:01,680
तो सबसे पहली बात हमको अभी तक क्या जानने को मिल गई? रामपाल के अनुसार

824
00:59:01,680 --> 00:59:06,080
जो आत्मा है वो नित्य नहीं है। वो सत नहीं है।

825
00:59:06,080 --> 00:59:10,160
जब वो सत्य नहीं है तो इसका अर्थ क्या हुआ? कि कभी

826
00:59:10,160 --> 00:59:14,240
भी पूर्ण मोक्ष आपको मिल ही नहीं सकता है। आप सत स्वरूप

827
00:59:14,240 --> 00:59:18,400
हो ही नहीं सकते हो। क्यों नहीं हो सकते हो? क्योंकि आप

828
00:59:18,400 --> 00:59:22,480
सत हो ही नहीं। तो जब हो ही नहीं तब तो सत्य

829
00:59:22,480 --> 00:59:26,720
तक पहुंचोगे कैसे? भाई अपने मूल स्वरूप को प्राप्त करने का संघर्ष एक अलग

830
00:59:26,720 --> 00:59:30,720
है कि तुम कुछ थे और यहां फस गए। मगर तुम जो हो

831
00:59:30,720 --> 00:59:35,200
ही नहीं वो तो तुम्हें प्राप्त हो ही नहीं सकता। तो तुम सत्य नहीं हो।

832
00:59:35,200 --> 00:59:41,160
अच्छा यहां से उत्पन्न करने वाली बात से एक बात और आती है

833
00:59:41,160 --> 00:59:45,680
कि जब आत्माएं मुक्त हो जाती हैं तो वो

834
00:59:45,680 --> 00:59:50,320
जब काल दोबारा जन्म लेता है एक बार मृत्यु होने के बाद और

835
00:59:50,320 --> 00:59:54,640
जब मृत्यु होती है उस समय सारी आत्माएं मुक्त हो जाती है और वो मुक्ति

836
00:59:54,640 --> 00:59:58,720
धाम में पहुंच गई जब उसके बाद काल दोबारा जब जन्म लेता

837
00:59:58,720 --> 00:59:59,600
है तो

838
00:59:59,600 --> 01:00:04,200
दोबारा काल के जन्म होने से पहले क्या ये

839
01:00:04,200 --> 01:00:08,480
जो इनके कबीर हैं वो नई आत्माएं

840
01:00:08,480 --> 01:00:12,560
फिर से उत्पन्न करते हैं इनकी सृष्टि रचना के अनुसार या फिर वो जो

841
01:00:12,560 --> 01:00:16,840
पुरानी आत्माएं मुक्त हो चुकी थी उन्हीं को दोबारा से समेटता

842
01:00:16,840 --> 01:00:20,880
है काल अपने जाल में तो ये सब चीजें इन्होंने

843
01:00:20,880 --> 01:00:25,040
बताई नहीं है। आगे अगर आगे बात करते

844
01:00:25,040 --> 01:00:29,040
हैं अध्याय दो के श्लोक 17 का भावार्थ इन्होंने किया

845
01:00:29,040 --> 01:00:33,120
है कि गीता ज्ञान दाता काल भगवान ने ऊपर

846
01:00:33,120 --> 01:00:37,200
के श्लोकों में कहा है कि अर्जुन हम सब मैं और

847
01:00:37,200 --> 01:00:41,200
तू तथा सर्व प्राणी जन्म मरण में है। श्लोक

848
01:00:41,200 --> 01:00:45,360
17 में कहा है कि वास्तव में अविनाशी तो तू उसी परमेश्वर को

849
01:00:45,360 --> 01:00:51,360
ही जान जिससे यह सर्व ब्रह्मांड व्याप्त है।

850
01:00:51,440 --> 01:00:55,680
यहां पर परमेश्वर की बात बताई क्यों गई? क्यों

851
01:00:55,680 --> 01:00:59,840
बताई जा रही है? भाई परमेश्वर की बात जब बताई जाएगी तो इसलिए

852
01:00:59,840 --> 01:01:04,640
बताई जाएगी जाएगी ना कि परमेश्वर आपको उनकी शरण में जाना है।

853
01:01:04,640 --> 01:01:08,640
परमेश्वर को भजना है। परमेश्वर की भक्ति करना है। जबकि

854
01:01:08,640 --> 01:01:12,720
यहां बात क्या चल रही है कि आत्मा कभी मरती नहीं है। तो उसके लिए दुख क्यों मना रहा

855
01:01:12,720 --> 01:01:14,880
है? तो सबसे बड़ा इनका झोल

856
01:01:14,880 --> 01:01:19,200
यहीं से शुरू हो गया। रामपाल का बोल वचन कि दो श्लोक

857
01:01:19,200 --> 01:01:23,360
17 में आत्मा की नहीं परमात्मा की बात हो रही है।

858
01:01:23,360 --> 01:01:27,840
ठीक है? अब दूसरी बात यह है कि आत्मा

859
01:01:27,840 --> 01:01:32,000
को संपूर्ण परमात्मा को इसने मान लिया कि संपूर्ण

860
01:01:32,000 --> 01:01:36,800
विश्व में व्याप्त है। यह भी ध्यान रखने योग्य बात है। ठीक है?

861
01:01:36,800 --> 01:01:41,120
तो क्या है? इसने कहा दो श्लोक 17 में कहा है कि वास्तव

862
01:01:41,120 --> 01:01:45,280
में अविनाशी तो उसी परमेश्वर को ही जान जिससे यह सर्व

863
01:01:45,280 --> 01:01:49,280
ब्रह्मांड व्याप्त है। अब इसने व्याप्त होने

864
01:01:49,280 --> 01:01:53,440
को मान लिया कि परमेश्वर से ये पूरा जो संसार है

865
01:01:53,440 --> 01:01:57,520
वो व्याप्त है। मगर समस्या क्या है? समस्या यह है

866
01:01:57,520 --> 01:02:01,760
कि इसका जो ईश्वर है वो एक जगह बैठा है। उसकी शक्ति

867
01:02:01,760 --> 01:02:05,760
सब जगह है। तो क्या दिक्कत है? कि वो सर्वव्यापी नहीं

868
01:02:05,760 --> 01:02:09,920
हो सकता। वह व्यापक नहीं है। इसीलिए आगे कह रहा है

869
01:02:09,920 --> 01:02:13,920
कि उसी की शक्ति प्रत्येक जीव में और कण कण में विद्यमान

870
01:02:13,920 --> 01:02:18,080
है। तो क्या हो गया? इनका ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है।

871
01:02:18,080 --> 01:02:22,080
शक्ति व्याप्त है। जब शक्ति व्याप्त है तो जैसे सूर्य

872
01:02:22,080 --> 01:02:26,080
की जो ऊष्मा है, जो दाहकता है, जहां पर सूर्य

873
01:02:26,080 --> 01:02:29,920
है वहां बहुत ज्यादा है और जहां पर जहां जैसे

874
01:02:29,920 --> 01:02:34,200
जैसे दूर होते जाते हैं तो दाहकता उसकी कम होती जाती है। इसने सूर्य का उदाहरण दिया कई

875
01:02:34,200 --> 01:02:38,480
बार इस बात को समझने के लिए कि कैसे जो

876
01:02:38,480 --> 01:02:42,560
ईश्वर है उसकी जो शक्ति है वह पूरे विश्व में

877
01:02:42,560 --> 01:02:46,800
ब्रह्मांड में फैली हुई है। तो

878
01:02:46,800 --> 01:02:50,880
अब यहां पर इसने यह तो मान लिया एक तरफ कि वह सर्वव्यापक है। मगर

879
01:02:50,880 --> 01:02:54,880
सर्व्यापक का पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है ईश्वर। यह मान लिया। मगर

880
01:02:54,880 --> 01:02:58,880
पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त होने का अर्थ क्या बता रहा है? कि उसकी

881
01:02:58,880 --> 01:03:02,880
शक्ति प्रत्येक जीव और कण-कण में विद्वान है। अब इससे पूछो कि ये अर्थ

882
01:03:02,880 --> 01:03:06,880
कहां लिखा है? पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त होने का यह

883
01:03:06,880 --> 01:03:11,520
अर्थ कहां लिखा है कि उसकी शक्ति व्याप्त है। वह नहीं व्याप्त है।

884
01:03:11,520 --> 01:03:15,920
अगर तुम यह कहोगे कि शक्ति के रूप में वो स्वयं है तो तो ठीक है।

885
01:03:15,920 --> 01:03:20,000
शक्ति और उसमें कोई भेद नहीं है। यदि तुमने भेद किया

886
01:03:20,000 --> 01:03:24,400
शक्ति और उसमें भेद है तो तुम्हें तो तुम ये अर्थ दिखाओ।

887
01:03:24,400 --> 01:03:28,480
देखो आगे जैसे बता रहा है जैसे सरलार्थ करके बता

888
01:03:28,480 --> 01:03:32,720
रहा है जैसे सूर्य के सामने होते हैं यह सब चीजें आगे बता

889
01:03:32,720 --> 01:03:35,560
रहा है। इसके

890
01:03:35,560 --> 01:03:40,240
बाद दूसरे अध्याय का 18वा श्लोक हम पढ़ रहे हैं।

891
01:03:40,240 --> 01:03:45,080
उसका अर्थ पढ़ रहे हैं। इस नाश रहित

892
01:03:45,080 --> 01:03:49,280
अप्रममेय नित्य स्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान

893
01:03:49,280 --> 01:03:53,280
कहे गए हैं। इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन

894
01:03:53,280 --> 01:03:59,280
तू युद्ध कर वो वाला दिखा दीजिए जय दयाल जय दयाल गोका जी

895
01:04:04,920 --> 01:04:09,520
का तो अभी तक इनकी दो चोरियां पकड़ी गई

896
01:04:09,520 --> 01:04:13,600
क्या पकड़ी है वैसे तो हर शब्द

897
01:04:13,600 --> 01:04:17,600
में ही चोरी है इसकी मगर एक चोरी पकड़ी गई

898
01:04:17,600 --> 01:04:21,760
कि इसने आत्मा को नित्य नहीं माना तो मोक्ष हो ही नहीं सकता। सत

899
01:04:21,760 --> 01:04:26,160
सत स्वरूप नहीं हो सकते हो क्योंकि सत है नहीं और

900
01:04:26,160 --> 01:04:30,280
मतलब इनका जो अभाव है वह होता रहेगा क्योंकि सत नहीं है तो उसका अभाव

901
01:04:30,280 --> 01:04:34,320
होगा तो अभाव होता रहेगा। दूसरी बात तो

902
01:04:34,320 --> 01:04:38,960
इसका अर्थ हो गया कि यहां इसके हिसाब से मुक्ति है ही नहीं।

903
01:04:38,960 --> 01:04:42,960
दूसरा क्या है कि इसने आत्मा की

904
01:04:42,960 --> 01:04:47,520
बात हो रही है और बीच में अचानक से अपने विपरीत बात जाते हुए देखी

905
01:04:47,520 --> 01:04:51,520
तो दूसरे अध्याय के 17व श्लोक में यह कह दिया कि यहां तो परमात्मा की

906
01:04:51,520 --> 01:04:56,160
बात हो रही है और तीसरा क्या जाना कि परमात्मा

907
01:04:56,160 --> 01:05:00,760
के लिए इसको यह मानना पड़ा कि संपूर्ण ब्रह्मांड में परमात्मा व्याप्त

908
01:05:00,760 --> 01:05:05,040
है। मगर वहां पर यह कहना मगर अपनी आईडियोलॉजी को सेफ

909
01:05:05,040 --> 01:05:09,440
करने के लिए इसको यह कहना पड़ा कि परमात्मा की शक्ति व्याप्त है। परमात्मा

910
01:05:09,440 --> 01:05:13,440
व्याप्त नहीं है। तो कितने झूठ पहले तो यह है कि आत्मा की

911
01:05:13,440 --> 01:05:17,440
जगह परमात्मा को ले आया। अब जब ले आया तो फिर वहां पर तब भी

912
01:05:17,440 --> 01:05:21,520
परमात्मा को पूरी तरीके से नहीं वहां रखा। वहां क्या कर दिया कि वो सर्वव्यापी

913
01:05:21,520 --> 01:05:26,160
नहीं है। उसकी शक्ति व्याप्त है।

914
01:05:26,160 --> 01:05:30,160
ठीक है? और एक बहुत बड़ी चीज है यहां ध्यान

915
01:05:30,160 --> 01:05:34,160
रखिएगा क्योंकि यह कभी भी तत्वदर्शी सिद्ध करने के

916
01:05:34,160 --> 01:05:38,400
लिए चार 34 के अलावा किसी और श्लोक का वो नहीं लेते हैं रेफरेंस जबकि

917
01:05:38,400 --> 01:05:43,040
यहां दो 16 में भी तत्वदर्शी की व्याख्या की गई है। कौन है?

918
01:05:43,040 --> 01:05:47,120
जो सत और असत तत्व को जानता है कि इसकी

919
01:05:47,120 --> 01:05:52,080
क्या प्रकृति है और इसकी क्या प्रकृति? जो विद्या और अविद्या को जानता है।

920
01:05:52,080 --> 01:05:56,160
ठीक है? यह चार चीजें आपको यहां से बुलेट पॉइंट्स मिल गए अभी तक की व्याख्या

921
01:05:56,160 --> 01:06:01,960
से। अब आगे हम लोग चलते

922
01:06:01,960 --> 01:06:06,520
हैं। 18वा श्लोक यह कह रहा है कि इस नाश रहित

923
01:06:06,520 --> 01:06:10,800
अप्रममेय नित्य स्वरूप जीवात्मा के यह सब शरीर नाशवान कहे

924
01:06:10,800 --> 01:06:14,280
गए हैं।

925
01:06:14,280 --> 01:06:18,400
और आगे कहा जा रहा है 19 में कि जो इस आत्मा को

926
01:06:18,400 --> 01:06:22,560
मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है वह दोनों

927
01:06:22,560 --> 01:06:26,640
ही अज्ञानी है। देखिए बार-बार

928
01:06:26,640 --> 01:06:30,640
देखिए जानने वाला और ना जानने वाला विद्या और अविद्या

929
01:06:30,640 --> 01:06:35,040
सत और असत इसी के बीच में अंतर है।

930
01:06:35,040 --> 01:06:39,440
यहीं पर ईश्वर और जीव है। जीव और ब्रह्म है।

931
01:06:39,440 --> 01:06:43,520
ब्रह्म वो है जो जानता है। जीव वो है जो नहीं जानता है। ब्रह्म वो

932
01:06:43,520 --> 01:06:47,600
है जो विद्यावान है। जीव वो है जो अविद्या से ग्रसित है। तो

933
01:06:47,600 --> 01:06:51,600
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है। जो इसको मरा मानता है वह दोनों

934
01:06:51,600 --> 01:06:55,840
ही नहीं जानते हैं क्योंकि यह आत्मा वास्तव में

935
01:06:55,840 --> 01:06:59,840
ना तो किसी को मारता है और ना किसी के द्वारा मारा जाता है। अब एक बात

936
01:06:59,840 --> 01:07:04,160
बताइए जब इसने दो 17 में यह कहा कि परमात्मा

937
01:07:04,160 --> 01:07:08,320
की बात हो रही है अचानक से पीछे से आत्मा की बात होती

938
01:07:08,320 --> 01:07:12,640
चली आ रही है और आगे भी आत्मा की बात हो रही है। अचानक से दो

939
01:07:12,640 --> 01:07:16,640
में परमात्मा की बात होती है। परमात्मा वो जो कि नाश रहित तो तुम

940
01:07:16,640 --> 01:07:17,140
परमात्मा

941
01:07:17,120 --> 01:07:21,200
को जानो जिनसे संपूर्ण जगत व्याप्त है। उसमें झोल

942
01:07:21,200 --> 01:07:25,360
कर दिया कि संपूर्ण जगत उसकी शक्ति से व्याप्त है। मगर अचानक से परमात्मा

943
01:07:25,360 --> 01:07:29,360
की बात आगे वो क्यों की भगवान ने? भाई उसका कोई

944
01:07:29,360 --> 01:07:33,680
कारण तो हो जब अचानक से आत्मा की बात करते परमात्मा की बात कर दी।

945
01:07:33,680 --> 01:07:37,680
तो आगे कहे तो कि तुझे उसकी शरण में जाना है। तुझे उसकी भक्ति करनी है, तुझे ये

946
01:07:37,680 --> 01:07:41,920
करना है, तुझे वो करना है। कुछ तो बताते मगर कुछ नहीं बताया। अगले

947
01:07:41,920 --> 01:07:46,000
श्लोक में भी जैसे क्योंकि वास्तविकता यह है यहां पर परमात्मा नहीं आत्मा

948
01:07:46,000 --> 01:07:50,160
की बात हो रही जीवात्मा की बात हो रही है तो अगले श्लोक में भी

949
01:07:50,160 --> 01:07:54,720
जीवात्मा के बारे में ही बात हो रही है कि इस नाश रहित अप्रममेय

950
01:07:54,720 --> 01:07:58,720
नित्य स्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं

951
01:07:58,720 --> 01:08:03,200
इसलिए हे भरतवंशी तू युद्ध कर यानी नाशवान यानी कि असत है

952
01:08:03,200 --> 01:08:07,200
तो असत के लिए तू शोक मत कर सत और असत के स्वरूप को समझ वही

953
01:08:07,200 --> 01:08:11,440
तत्व ज्ञानी होता है वही तत्वदर्शी होता है तो तत्वदर्शी का ज्ञान कौन

954
01:08:11,440 --> 01:08:15,760
दे रहे हैं यहां पर? भगवान श्री कृष्ण। मगर इसके हिसाब से भगवान श्री कृष्ण

955
01:08:15,760 --> 01:08:19,840
के अंदर काल था और काल और भगवान श्री कृष्ण दोनों ही इसके हिसाब से तत्वदर्शी

956
01:08:19,840 --> 01:08:24,240
नहीं है। ठीक है? जबकि सत और असत

957
01:08:24,240 --> 01:08:28,480
को तत्व के तत्व को बताने वाला भी तत्वदर्शी है।

958
01:08:28,480 --> 01:08:32,160
और सत्य के और असत के तत्व को यहां बता दिया उन्होंने। आगे

959
01:08:32,160 --> 01:08:36,240
भी बता रहे हैं जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो

960
01:08:36,240 --> 01:08:40,480
इसको मरा मानता है वह दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव

961
01:08:40,480 --> 01:08:44,600
में ना तो किसी को मारता है और ना किसी के द्वारा मारा जाता

962
01:08:44,600 --> 01:08:48,640
है। 20वा और पढ़ ले 20वा इसके

963
01:08:48,640 --> 01:08:52,640
आगे का और यह आत्मा किसी भी

964
01:08:52,640 --> 01:08:56,640
काल में ना तो जन्मता है। ठीक है? यह देखिए ना

965
01:08:56,640 --> 01:09:00,800
मरता ही है तथा ना यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही

966
01:09:00,800 --> 01:09:05,600
है। क्योंकि यह अजन्मा नित्य, सनातन और पुरातन है।

967
01:09:05,600 --> 01:09:11,600
ठीक है? और शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा

968
01:09:12,360 --> 01:09:17,960
जाता। अब दिक्कत क्या है? देखिए इसने क्या कहा

969
01:09:17,960 --> 01:09:22,160
कि कोई एक काल ऐसा था जब आत्मा का अभाव था मगर

970
01:09:22,160 --> 01:09:26,240
परमात्मा का नहीं था। मगर यहां पर इन्होंने क्या कह दिया कि आत्मा

971
01:09:26,240 --> 01:09:30,400
किसी भी काल में ना तो जन्मता है ना मरता है

972
01:09:30,400 --> 01:09:34,400
तो ना मरने की बात तो उसने भी मानी कि नहीं अविनाशी है मगर जन्मने

973
01:09:34,400 --> 01:09:38,640
की बात उसने नहीं मानी उसने क्या माना है पीछे कि उसकी

974
01:09:38,640 --> 01:09:42,800
भी उत्पत्ति होती है किसी ना किसी समय एक समय था जब उसका अभाव

975
01:09:42,800 --> 01:09:47,040
था यानी वो सत नहीं है आत्मा को यहां पर क्या क्या

976
01:09:47,040 --> 01:09:51,200
कहा गया है देखिए इस श्लोक में यह

977
01:09:51,200 --> 01:09:55,360
आत्मा किसी भी काल में ना तो जन्मता है थोड़ा नीचे कर दीजिए

978
01:09:55,360 --> 01:09:59,360
वो वाली लाइन दिख नहीं रही होगी दर्शकों को हां

979
01:09:59,360 --> 01:10:03,680
ठीक है ठीक है ठीक है ठीक है दिख रहा है दिख रहा है

980
01:10:03,680 --> 01:10:07,680
यह आत्मा किसी भी काल में ना तो जन्मता है ना मरता ही

981
01:10:07,680 --> 01:10:12,240
है ना यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला देखिए उत्पन्न होकर

982
01:10:12,240 --> 01:10:16,560
यहां आ गया स्पष्ट ना यह उत्पन्न होकर

983
01:10:16,560 --> 01:10:21,760
और ये किस शब्द का अर्थ है भूत्वा

984
01:10:21,760 --> 01:10:25,840
ठीक ठीक है? ये भूत्वा शब्द दिया है। उसका अर्थ है उत्पन्न होकर।

985
01:10:25,840 --> 01:10:27,360
तो उत्प उत्पन्न

986
01:10:27,360 --> 01:10:32,680
होकर फिर होने वाला ही है। मतलब ये उत्पन्न नहीं होता है। और

987
01:10:32,680 --> 01:10:37,200
इसने दो 17 के अर्थ में माना है पीछे

988
01:10:37,200 --> 01:10:42,000
कि आत्मा भी उत्पन्न होती है। ठीक है? क्योंकि

989
01:10:42,000 --> 01:10:46,240
दिखा दीजिए एक बार इनका। ये पेज नंबर 17 दिखा दीजिए। गरिमा

990
01:10:46,240 --> 01:10:50,560
गीता की का पेज नंबर 17 दिखा दीजिए। वही लास्ट का पैराग्राफ था जो

991
01:10:50,560 --> 01:10:54,560
आत्मा की उत्पत्ति सेकंड लास्ट

992
01:10:54,560 --> 01:11:00,440
पैराग्राफ

993
01:11:00,440 --> 01:11:04,640
है। पहली बात तो तर्क से समझ लीजिए कि यदि आप

994
01:11:04,640 --> 01:11:08,640
सत हैं तो ही आप सत स्वरूप हो सकते हैं। यदि यदि आप किसी

995
01:11:08,640 --> 01:11:12,960
समय मुक्त थे तो ही आप मुक्त हो सकते हैं। ठीक है?

996
01:11:12,960 --> 01:11:17,600
आप मोक्ष में थे तो आप मोक्ष तक पहुंच सकते हैं। तो

997
01:11:17,600 --> 01:11:22,240
अगर आप सत स्वरूप है ही नहीं तो आपका आप सत्य कहां से हो जाएंगे फिर?

998
01:11:22,240 --> 01:11:26,400
यदि आप असत हैं तो तो ये देखिए इसमें

999
01:11:26,400 --> 01:11:30,480
मेरी फोटो के जस्ट पीछे ही है। हां परमात्मा

1000
01:11:30,480 --> 01:11:34,800
अपने वचन से अपने शरीर से की है। आत्मा की उत्पत्ति

1001
01:11:34,800 --> 01:11:39,280
किसने की है? क्योंकि आत्मा की उत्पत्ति परमात्मा

1002
01:11:39,280 --> 01:11:42,560
ने अपने वचन से अपने शरीर से की है। यहां पर इसने

1003
01:11:42,560 --> 01:11:46,720
मान लिया आत्मा की उत्पत्ति होती है। मगर भगवत गीता

1004
01:11:46,720 --> 01:11:51,120
अध्याय दो श्लोक 20 यह कह रहा है कि आत्मा

1005
01:11:51,120 --> 01:11:55,440
कभी भी उत्पन्न होकर फिर दोबारा होने वाली नहीं है।

1006
01:11:55,440 --> 01:11:59,440
ना तो उत्पन्न होती है ना ही नष्ट होती है। दोनों का आप

1007
01:11:59,440 --> 01:12:03,840
मैच कर सकते हैं। ठीक है? तो यह इसके

1008
01:12:03,840 --> 01:12:07,920
मूल वचन अभी तक के अब इसने क्या किया है

1009
01:12:07,920 --> 01:12:12,160
1820 में ज्यादा बात नहीं की है इसने ज्यादा लिखा नहीं है वो

1010
01:12:12,160 --> 01:12:16,400
पेज लाइए 19वा इसकी बुक का 19वा पेज लाइए रामपाल

1011
01:12:16,400 --> 01:12:20,610
की बुक

1012
01:12:20,610 --> 01:12:24,960
[संगीत] का अब इसने क्या किया है

1013
01:12:24,960 --> 01:12:29,160
श्लोक क्रमांक 18 से 20 में ज्यादा बात नहीं की है क्या बात की

1014
01:12:29,160 --> 01:12:33,440
है कि यह पंच भौतिक शरीर नाशवान

1015
01:12:33,440 --> 01:12:39,440
है ठीक है नाशवान तो कोई बात नहीं भैया आगे

1016
01:12:40,680 --> 01:12:44,960
चलो शरीर नाशवान है। ठीक है। अविनाशी परमात्मा

1017
01:12:44,960 --> 01:12:48,960
नाश रहित है। अब इसमें अविनाशी परमात्मा की बात कहां

1018
01:12:48,960 --> 01:12:53,360
से आ गई? जब यहां पे शरीर की बात हो रही है।

1019
01:12:53,360 --> 01:12:57,440
अब यहां देखिए परमात्मा की बात क्यों नहीं हो सकती? यहां आत्मा की

1020
01:12:57,440 --> 01:13:02,760
बात ही क्यों माननी पड़ेगी? क्योंकि इसमें एक शब्द आया है

1021
01:13:02,760 --> 01:13:07,200
देह शरीर। ठीक है? और

1022
01:13:07,200 --> 01:13:11,560
एक शब्द आया है शरीरण।

1023
01:13:11,560 --> 01:13:16,840
शरीरण तो इसका मतलब है जीवात्मा के

1024
01:13:16,840 --> 01:13:21,600
शरीरण देहा तो इसमें परमात्मा का

1025
01:13:21,600 --> 01:13:25,920
किसी भी प्रकार से सिद्धि नहीं हो रही।

1026
01:13:25,920 --> 01:13:28,600
वो

1027
01:13:28,600 --> 01:13:33,280
वाला आगे देखिए।

1028
01:13:33,280 --> 01:13:37,520
यह आत्मा किसी भी काल में ना तो जन्मता है ना मरता है। तो

1029
01:13:37,520 --> 01:13:41,800
यह सब बातें तो इसने गण कर दी।

1030
01:13:41,800 --> 01:13:45,960
अब इसने एक बात कही है। प्रमाण

1031
01:13:45,960 --> 01:13:50,080
रहित अर्थात सामान्य साधक नहीं समझ

1032
01:13:50,080 --> 01:13:55,000
सकते। इसने यह बात कही है। प्रमाण रहित

1033
01:13:55,000 --> 01:14:01,000
अर्थात यह सेकंड पैराग्राफ में कही है इसने बात।

1034
01:14:01,600 --> 01:14:05,840
यह देखिए प्रमाण रहित अर्थात सामान्य साधक नहीं

1035
01:14:05,840 --> 01:14:10,080
समझ सकते। अब इसमें प्रमाण रहित इसका क्या अर्थ माना जाए कि इसके पास

1036
01:14:10,080 --> 01:14:14,240
अपनी बात को कहने का प्रमाण नहीं है और जो मना करेगा तो वो

1037
01:14:14,240 --> 01:14:18,240
कहेगा कि साधारण जो सामान्य साधक है वो

1038
01:14:18,240 --> 01:14:22,240
समझ नहीं सकते। भाई प्रमाण के बिना बात कह रहा हूं। इसलिए

1039
01:14:22,240 --> 01:14:27,960
आपको माननी है तो मानो और अगर आप नहीं मानते हो तो आप मूर्ख हो

1040
01:14:27,960 --> 01:14:32,320
और परमात्मा नाश रहित है। जीवात्मा के साथ नित्य

1041
01:14:32,320 --> 01:14:36,560
रहने वाला है। ये कहां से आ रहा है? ना तो यहां पर परमात्मा की संस्कृत

1042
01:14:36,560 --> 01:14:41,200
है। ना ही के साथ रहने वाला है। इसकी संस्कृत है।

1043
01:14:41,200 --> 01:14:45,200
परमात्मा को नित्य कहा जा रहा है। मगर ये क्या चल रहा

1044
01:14:45,200 --> 01:14:48,800
है? आत्मा को नित्य ना मानना पड़े इसलिए परमात्मा

1045
01:14:48,800 --> 01:14:52,800
के साथ नित्य रहने वाला है। तो जब हम यह कहेंगे कि परमात्मा के

1046
01:14:52,800 --> 01:14:56,880
साथ नित्य रहने वाला है तो भाई साहब उसकी संस्कृत आपको

1047
01:14:56,880 --> 01:15:01,200
देनी पड़ेगी ना के साथ नित्य रहने वाला इतनी

1048
01:15:01,200 --> 01:15:06,160
संस्कृत लानी पड़ेगी ना और परमात्मा को लाना पड़ेगा।

1049
01:15:06,160 --> 01:15:10,160
यह सब शब्द तो है नहीं क्योंकि यहां बात लगातार आत्मा की भी

1050
01:15:10,160 --> 01:15:14,880
हो रही है। अच्छा यह अभी और सिद्ध हो जाएगा। आगे

1051
01:15:14,880 --> 01:15:20,040
आगे चलते हैं। फिर इन्होंने जो है

1052
01:15:20,040 --> 01:15:24,080
अपनी अज्ञानता दिखाई है कुछ इधर-उधर के श्लोकों की बात

1053
01:15:24,080 --> 01:15:27,720
करके

1054
01:15:27,720 --> 01:15:31,840
और इन्होंने एक वो और दिया है। परमात्मा की

1055
01:15:31,840 --> 01:15:36,080
निराकार शक्ति आत्मा के साथ ऐसे है जानो जैसे मोबाइल फोन

1056
01:15:36,080 --> 01:15:40,160
की रेंज। अब जैसे मोबाइल फोन की रेंज फिर से वही बात आ गई

1057
01:15:40,160 --> 01:15:44,400
कि मोबाइल फोन की जो रेंज होती है वो दूरी

1058
01:15:44,400 --> 01:15:48,560
के साथ-साथ कम होती है। हम

1059
01:15:48,560 --> 01:15:53,320
फिर इन्होंने एक जगह निराकार शक्ति की बात की। तो इतना जान लीजिए कि इसने यह

1060
01:15:53,320 --> 01:15:57,520
तो ठोस तरीके से माना है रामपाल

1061
01:15:57,520 --> 01:16:01,680
ने कि जो परमात्मा है वह सर्वव्यापक नहीं है

1062
01:16:01,680 --> 01:16:06,240
बल्कि उसको सर्वव्यापक कहने का अर्थ है कि उसकी जो शक्ति है

1063
01:16:06,240 --> 01:16:12,240
वो संपूर्ण विश्व में व्याप्त

1064
01:16:13,400 --> 01:16:19,400
है। एक मिनट हां

1065
01:16:34,120 --> 01:16:38,240
तो इसकी अभी ये जो पोल है ना ढोल की पोल वो खुल जाएगी

1066
01:16:38,240 --> 01:16:42,480
अभी कुछ ही देर में। अब यह बात

1067
01:16:42,480 --> 01:16:48,080
आगे बात करता है कि श्लोक

1068
01:16:48,080 --> 01:16:52,080
अब देखिए एक बात और है यहां बात पहली बात

1069
01:16:52,080 --> 01:16:56,080
तो यह है कि आत्मा की बात इसलिए की जा रही है प्रसंग

1070
01:16:56,080 --> 01:17:00,080
को भी ध्यान में रखना पड़ेगा कि हम यह बता रहे हैं कि आत्मा को कुछ हो नहीं सकता है। अर्जुन

1071
01:17:00,080 --> 01:17:04,080
का वो जो शोक हो रहा है ना कि मैं इसको मार रहा हूं ये कर रहा हूं तो भगवान वहां बता रहे

1072
01:17:04,080 --> 01:17:08,080
हैं कि आत्मा को कुछ नहीं हो रहा। तुम किसी को नहीं मार रहे हो। और यदि तुम किसी को बचाने

1073
01:17:08,080 --> 01:17:12,160
की शरीर इत्यादि को बचाने की कोशिश कर रहे हो तो शरीर कभी बच नहीं सकता है। उसका तो नाश

1074
01:17:12,160 --> 01:17:16,720
होना ही है। और आत्मा को यहां पर क्या-क्या कहा गया है?

1075
01:17:16,720 --> 01:17:20,880
20 20 वे श्लोक में कि यह आत्मा किसी

1076
01:17:20,880 --> 01:17:25,440
काल में ना तो जन्मता है ना मरता है ना

1077
01:17:25,440 --> 01:17:28,400
उत्पन्न होता है हम ये सब कह दिया

1078
01:17:28,400 --> 01:17:32,720
गया यहां पर सनातन पुरातन नित्य अजन्मा सब कुछ कह दिया गया

1079
01:17:32,720 --> 01:17:36,960
मगर इसने यहां पर क्या किया पूरा अपना गड़बड़

1080
01:17:36,960 --> 01:17:41,040
झाला कर दिया और यहां पर कुछ बोला ही नहीं शांत हो के

1081
01:17:41,040 --> 01:17:45,520
थोड़ा बहुत बोल के आगे निकल गया क्योंकि भाई उसकी भी एक सीमा

1082
01:17:45,520 --> 01:17:50,080
सीमा है ना उसको कितना वो करेगा कहीं ना कहीं तो वो फंसेगा

1083
01:17:50,080 --> 01:17:56,080
तो इसलिए यहां पर ज्यादा ना बोल के आगे निकल

1084
01:17:59,080 --> 01:18:03,120
गया तो इसने कहा दो श्लोक के 19 से 21 तक का भाव

1085
01:18:03,120 --> 01:18:07,200
यह है कि सर्वव्यापक पूर्ण परमात्मा आत्मा के साथ ऐसे रहता है। अब

1086
01:18:07,200 --> 01:18:11,200
जब आत्मा के साथ रहने की बारी आ रही है तो आत्मा के

1087
01:18:11,200 --> 01:18:15,600
साथ रहना इसकी संस्कृत आपको बतानी होगी। मिस्टर

1088
01:18:15,600 --> 01:18:19,760
रामपाल जी आत्मा के साथ रहने की बात यहां कहां हो रही

1089
01:18:19,760 --> 01:18:24,160
है? रहना रहने की बात तो यहां कहीं नहीं हो रही जिससे

1090
01:18:24,160 --> 01:18:28,320
पता लगता है कि यहां आत्मा की बात हो रही है। यहां पर

1091
01:18:28,320 --> 01:18:33,040
परमात्मा की बात नहीं हो रही है। दूसरी बात परमात्मा करके

1092
01:18:33,040 --> 01:18:37,040
भगवान आगे ये बताएंगे ना फिर कि अगर परमात्मा की बात हो रही है तो ठीक

1093
01:18:37,040 --> 01:18:41,200
है उनकी भक्ति कर। मगर यहां तो आगे के बहुत से पेजेस में भक्ति

1094
01:18:41,200 --> 01:18:44,640
की बात नहीं होगी। ठीक है? चलिए।

1095
01:18:44,640 --> 01:18:48,800
तो फिर परमात्मा के बारे में बताने का प्रयोजन क्या रहा?

1096
01:18:48,800 --> 01:18:52,960
कुछ नहीं। तो अभी बुलेट पॉइंट क्या आए हैं?

1097
01:18:52,960 --> 01:18:56,960
कि रहने की संस्कृत नहीं है। आत्मा के साथ रहने

1098
01:18:56,960 --> 01:19:01,120
की संस्कृत नहीं है और परमात्मा के बारे में बताने का प्रसंग

1099
01:19:01,120 --> 01:19:06,440
नहीं है। प्रसंग अनुसार नहीं

1100
01:19:06,440 --> 01:19:10,480
है। ये देखिए वो वाला उदाहरण इसने दे दिया इस पेज में। दूर रहते हुए

1101
01:19:10,480 --> 01:19:14,720
भी सूर्य के सूर्य के निराकार प्रभाव

1102
01:19:14,720 --> 01:19:18,720
उष्णता से प्रत्येक प्राणी प्रभावित रहता है। तो दूर

1103
01:19:18,720 --> 01:19:22,880
रहते हुए भी सूर्य के सूर्य के निराकार

1104
01:19:22,880 --> 01:19:27,040
प्रभाव उष्णता से प्रभावित रहता है। यानी कि क्या उतनी ही उष्णता

1105
01:19:27,040 --> 01:19:31,120
होती है जितनी जब सूर्य के पास होते हैं वहां होती है नहीं होती। इसका

1106
01:19:31,120 --> 01:19:35,120
मतलब हमें मानना पड़ेगा सूर्य की तरह परमात्मा भी जहां

1107
01:19:35,120 --> 01:19:39,360
स्वयं है वहां ज्यादा पावरफुल है। जहां वो नहीं है उसकी शक्ति है। वहां वो

1108
01:19:39,360 --> 01:19:43,360
थोड़ा बहुत कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ कम है।

1109
01:19:43,360 --> 01:19:47,360
तो वो एक रस नहीं है। वो भी

1110
01:19:47,360 --> 01:19:51,840
घट बढ़ रहा है। आगे देखते हैं

1111
01:19:51,840 --> 01:19:56,320
21व में क्या कहा है। जो पुरुष इस आत्मा

1112
01:19:56,320 --> 01:19:59,760
को नाश रहित नित्य अजन्मा और

1113
01:19:59,760 --> 01:20:03,840
अव्यय जानता है। वह पुरुष कैसे किसी को मरवाता है? फिर

1114
01:20:03,840 --> 01:20:07,840
से वही कह रहे हैं। जो पुरुष आत्मा की सच्चाई को जान लेता है

1115
01:20:07,840 --> 01:20:11,920
तो वो ये कैसे सोच सकता है कि हम किसी को मरवा रहे हैं, मार रहे हैं

1116
01:20:11,920 --> 01:20:16,000
या कुछ कर रहे हैं। ठीक है? तो इसने 21वें का क्या

1117
01:20:16,000 --> 01:20:20,240
किया है? इसने कुछ नहीं किया है। इसने अपनी अपनी

1118
01:20:20,240 --> 01:20:24,480
बातें की है। इसने 21व का अर्थ ही नहीं किया। जहां पर इसको ज्यादा टिपिकल

1119
01:20:24,480 --> 01:20:28,640
लग रहा होता है वहां पर यह अर्थ ना करके आगे बढ़ जाता है। अब

1120
01:20:28,640 --> 01:20:32,880
यहां पर यहां पर साफ साफ हो गया कि जो पुरुष इस

1121
01:20:32,880 --> 01:20:36,880
आत्मा को नाश रहित नित्य अजन्मा और अव्यय जानता है।

1122
01:20:36,880 --> 01:20:40,880
यहां बात लगातार हो रही है शरीर में रहने वाली आत्मा की देही की जो

1123
01:20:40,880 --> 01:20:45,200
नित्य है जो शाश्वत है जो पुरातन है जो

1124
01:20:45,200 --> 01:20:49,760
अजन्मा है जो कभी उत्पन्न होने वाला नहीं है हम

1125
01:20:49,760 --> 01:20:53,760
उसकी बात हो रही है और जो उसको इस स्वरूप में जानता है तो वो

1126
01:20:53,760 --> 01:20:58,640
कैसे उसको मारे जाने के दुख में दुख से प्रभावित हो सकता है

1127
01:20:58,640 --> 01:21:02,640
अब 22वा पढ़ते हैं जयदयाल गोविंदका जी का

1128
01:21:02,640 --> 01:21:06,640
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नए वस्त्रों को

1129
01:21:06,640 --> 01:21:10,720
ग्रहण करता है। वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे

1130
01:21:10,720 --> 01:21:14,720
नए शरीरों को प्राप्त होता है। और 23वां क्या है?

1131
01:21:14,720 --> 01:21:15,220
नैनम

1132
01:21:15,120 --> 01:21:19,200
चिनती शस्त्राण मेरा फेवरेट है ये। इस आत्मा को

1133
01:21:19,200 --> 01:21:23,440
शस्त्र काट नहीं सकते। आग जला नहीं सकती। इसको जल

1134
01:21:23,440 --> 01:21:29,440
नहीं गला सकता और वायु सुखा नहीं सकती। अब इसने क्या किया

1135
01:21:31,720 --> 01:21:36,480
है? इसने क्या किया है?

1136
01:21:36,480 --> 01:21:40,560
दो के श्लोक 22 का अनुवाद जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे

1137
01:21:40,560 --> 01:21:44,560
नए वस्त्रों को ग्रहण करता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों

1138
01:21:44,560 --> 01:21:48,560
को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है। अब देखिए परमात्मा

1139
01:21:48,560 --> 01:21:52,640
का संदर्भ आया बीच में जहां पर आत्मा को

1140
01:21:52,640 --> 01:21:57,800
नित्य कहा गया है वहां पर परमात्मा का संदर्भ आया और यहां गायब हो

1141
01:21:57,800 --> 01:22:02,240
गया। अब यहां पर इसने परमात्मा की बात नहीं की। दूसरे अध्याय

1142
01:22:02,240 --> 01:22:06,400
के 22 वे श्लोक में इसने सिर्फ आत्मा की बात की है। 23

1143
01:22:06,400 --> 01:22:10,880
में क्या कहा है? दूसरे अध्याय के 23 वे श्लोक में

1144
01:22:10,880 --> 01:22:15,120
इस जीवात्मा को शस्त्र काट नहीं सकते तो इस

1145
01:22:15,120 --> 01:22:19,120
इसको वायु सुखा नहीं सकती। ये सब इसने मान लिया। तो क्या

1146
01:22:19,120 --> 01:22:23,360
हुआ कि परमात्मा की बात हुई क्यों है? पीछे जो परमात्मा का गुणगान

1147
01:22:23,360 --> 01:22:27,440
हुआ परमात्मा की महिमा गान हुई गान हुआ वो क्यों हुआ?

1148
01:22:27,440 --> 01:22:30,240
ना तो परमात्मा के साथ रहने वाली

1149
01:22:30,240 --> 01:22:34,280
संस्कृत है यहां पर अगर है तो यह दिखाएं बाबा

1150
01:22:34,280 --> 01:22:38,800
जी जेलधाम निवासी और

1151
01:22:38,800 --> 01:22:42,960
ना ही प्रसंग है और जिस कारण से आपको

1152
01:22:42,960 --> 01:22:47,040
बाद में स्वयं ही प्रसंग को छोड़कर आगे बढ़ना पड़ेगा तो आगे बड़े हैं

1153
01:22:47,040 --> 01:22:51,040
यह इसके बाद फिर दूसरे

1154
01:22:51,040 --> 01:22:55,360
अध्याय के 24 वे और 25 वे श्लोक में फिर उस सर्व व्यापक परमात्मा

1155
01:22:55,360 --> 01:22:59,520
की महिमा कही गई है देखिए पहले आई परमात्मा की

1156
01:22:59,520 --> 01:23:04,240
महिमा फिर गई और अब फिर आ गई। क्यों आ गई? क्योंकि बार-बार

1157
01:23:04,240 --> 01:23:08,560
जो आत्मा की जो नित्यता है वह इनको इनको दिक्कत

1158
01:23:08,560 --> 01:23:12,800
दे रही है। जो मोक्ष स्वरूप आत्मा है उससे इन्हें प्रॉब्लम

1159
01:23:12,800 --> 01:23:17,200
है। तो गीता अध्याय दो श्लोक 24

1160
01:23:17,200 --> 01:23:21,440
25 के अनुवाद में एस्कॉन एस्कॉन वालों सहित

1161
01:23:21,440 --> 01:23:25,680
अन्य सब ने गलत अनुवाद किया है। इन दोनों श्लोकों में परमात्मा

1162
01:23:25,680 --> 01:23:29,760
का वर्णन है। श्लोक 24 में सर्वगत शब्द आया है। अब देखो इसने

1163
01:23:29,760 --> 01:23:34,000
सर्वगत शब्द मान लिया जिसका अर्थ तो सर्वव्यापी सभी अनुवादकों

1164
01:23:34,000 --> 01:23:38,240
ने ठीक किया है परंतु आत्मा को सर्वव्यापी बताया है।

1165
01:23:38,240 --> 01:23:42,320
इसी एक शब्द से भावार्थ बदल जाता है। आत्मा सर्वव्यापी नहीं

1166
01:23:42,320 --> 01:23:45,600
है। परमात्मा सर्वव्यापी है। अधिक स्पष्ट जानकारी

1167
01:23:45,600 --> 01:23:49,840
के लिए आगे इन्होंने श्लोकों के संदर्भ दिए हैं।

1168
01:23:49,840 --> 01:23:54,000
ठीक है? अब बात यह आती है कि पहले

1169
01:23:54,000 --> 01:23:58,240
तो फिर वही आ गया कि जब तुम खुद मान रहे हो कि परमात्मा चलो सर्व्यापी

1170
01:23:58,240 --> 01:24:02,400
है। तो फिर तुम यह कैसे कह सकते हो कि वह नहीं है। उसकी आत्मा है सब जगह।

1171
01:24:02,400 --> 01:24:06,480
उसकी निराकार शक्ति है सब जगह। हम तो पहले तो

1172
01:24:06,480 --> 01:24:10,720
यहां पर तुम्हारा ही वो हो जाता है। मगर अब इन्होंने आगे अपना अर्थ

1173
01:24:10,720 --> 01:24:14,880
भी दिया है। और यहां पर बहुत एक कैची पॉइंट है। वो क्या है? तो इन्होंने क्या

1174
01:24:14,880 --> 01:24:19,360
अर्थ किया है? अध्याय दो के श्लोक 24 का अनुवाद।

1175
01:24:19,360 --> 01:24:25,360
यह अच्छे है। यह परमात्मा अधाय

1176
01:24:25,480 --> 01:24:30,160
है। हां। यह यहां पर कहा जा रहा है यह आत्मा

1177
01:24:30,160 --> 01:24:34,400
आत्मा के लिए आयाम यह है आत्मा तो

1178
01:24:34,400 --> 01:24:38,480
यहां इसने परमात्मा कर दिया तो अब जो आत्मा के लिए यह परमात्मा

1179
01:24:38,480 --> 01:24:42,560
कर रहा है तो इसको वहां पर देना

1180
01:24:42,560 --> 01:24:46,880
पड़ेगा संस्कृत का वर्ड कि परमात्मा शब्द को दर्शाने वाला संस्कृत

1181
01:24:46,880 --> 01:24:50,960
का वर्ड कौन सा है और अगर इसको

1182
01:24:50,960 --> 01:24:55,240
यह कहेंगे कि जिसकी बात पीछे हो रही थी उसी के बारे में आगे हुई है

1183
01:24:55,240 --> 01:24:59,280
अयम यह तो पहली बात तो पीछे आत्मा की बात

1184
01:24:59,280 --> 01:25:00,720
हो रही थी। उसकी बात आगे हो

1185
01:25:00,720 --> 01:25:04,800
रही है क्योंकि इसने खुद माना कि श्लोक 22 और 23 में

1186
01:25:04,800 --> 01:25:08,880
जीवात्मा की स्थिति बताई गई है। जीवात्मा की बात हो रही है। परमात्मा की बात तो हो नहीं

1187
01:25:08,880 --> 01:25:13,040
रही। तो अयम का अर्थ हम ये नहीं ले सकते कि यह परमात्मा अयम

1188
01:25:13,040 --> 01:25:17,440
का अर्थ यह आत्मा लेना पड़ेगा। दूसरी बात

1189
01:25:17,440 --> 01:25:22,000
दूसरी बात यह है कि अब इसकी भाषा शैली के अनुसार

1190
01:25:22,000 --> 01:25:26,080
जैसे कि यह करता है कि इसने यहां पर ये

1191
01:25:26,080 --> 01:25:30,520
बोला है यह परमात्मा कर रहा है अगले

1192
01:25:30,520 --> 01:25:35,040
और निसंदेह अशोष है तथा यह परमात्मा

1193
01:25:35,040 --> 01:25:39,360
नित्य सर्व्यापी अचल स्थिर रहने वाला और सनातन है।

1194
01:25:39,360 --> 01:25:43,840
अब इसकी टांग खींची जाए थोड़ी सी यहां टांग खींची जाए कि

1195
01:25:43,840 --> 01:25:48,080
हम लोग यह शब्द किसके लिए इस्तेमाल करते हैं? किसके लिए प्रयोग में लाते

1196
01:25:48,080 --> 01:25:52,160
हैं? यह जब कोई हमारी पहुंच

1197
01:25:52,160 --> 01:25:56,160
में होती है कोई चीज यह है यह यह है। यही खड़ा है। तो

1198
01:25:56,160 --> 01:26:00,240
हम कहते हैं यह है। ठीक है? तो इसके अनुसार परमात्मा

1199
01:26:00,240 --> 01:26:04,400
वहीं पर है। जबकि इसके अनुसार हमारे अनुसार हमारी

1200
01:26:04,400 --> 01:26:08,480
जो चीज है वह मान लोगे तब तुम यह कह भी दोगे परमात्मा वहीं पर है। मगर इसका तो

1201
01:26:08,480 --> 01:26:12,880
परमात्मा कहीं और बैठा है। उसकी शक्ति वहीं पर है और शक्ति को परमात्मा कह नहीं सकते।

1202
01:26:12,880 --> 01:26:16,080
तो ये कह रहा है यह परमात्मा यानी

1203
01:26:16,080 --> 01:26:20,480
जो अर्जुन है वो परमात्मा की शरण में था उस समय।

1204
01:26:20,480 --> 01:26:25,040
इसके अनुसार क्योंकि इसने क्या कहा? यह परमात्मा

1205
01:26:25,040 --> 01:26:29,440
अधाय है। तो यह परमात्मा यानी वहां पर परमात्मा था।

1206
01:26:29,440 --> 01:26:33,440
तो फिर अगर हम बाद में जाएंगे कि तू उस परमात्मा की शरण में जा जैसा

1207
01:26:33,440 --> 01:26:37,440
कि उस उस उस यह सब खेल खेलता है यह जो

1208
01:26:37,440 --> 01:26:41,520
है ना अब देखिए अब इसको

1209
01:26:41,520 --> 01:26:45,520
कैसे पकड़ेंगे 217 में इसने परमात्मा के लिए कहा

1210
01:26:45,520 --> 01:26:49,760
है ना रहित तो तू उसको जान ये उस और इसका

1211
01:26:49,760 --> 01:26:53,840
बहुत खेल खेलता है ना तो इसने क्या खेला है दो7 में उस

1212
01:26:53,840 --> 01:26:57,920
परमात्मा को वहां तो नहीं कहा है यह परमात्मा को जान इस परमात्मा

1213
01:26:57,920 --> 01:27:02,160
को जान मगर मगर यहां पे क्या कह रहा है? यह परमात्मा

1214
01:27:02,160 --> 01:27:06,800
अवध्य है। है ना? अवध्य है। अबाध्य है। यह परमात्मा

1215
01:27:06,800 --> 01:27:10,800
तो इसका मतलब इसके अनुसार वहां पर परमात्मा है।

1216
01:27:10,800 --> 01:27:14,960
है ना? अब हमारे अनुसार क्या है? भगवान

1217
01:27:14,960 --> 01:27:19,120
श्री कृष्ण ज्ञान दे रहे हैं और बताते

1218
01:27:19,120 --> 01:27:23,360
टाइम अलग-अलग प्रसंग अनुसार उसमें सीएस भी होता है। मगर भगवान

1219
01:27:23,360 --> 01:27:27,440
श्री कृष्ण ज्ञान दे रहे हैं तो वो अर्जुन को जीवात्मा के बारे में बता रहे हैं तो

1220
01:27:27,440 --> 01:27:31,200
जीवात्मा वहां पर है अर्जुन के शरीर में और

1221
01:27:31,200 --> 01:27:35,360
अन्यों के शरीर में जीवात्मा है तो उसके लिए तो यह कहा

1222
01:27:35,360 --> 01:27:39,520
जा सकता है कि यह जीवात्मा मगर यह परमात्मा

1223
01:27:39,520 --> 01:27:44,000
नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसके अनुसार भी परमात्मा वहां पर नहीं है।

1224
01:27:44,000 --> 01:27:48,240
हमारे अनुसार तो है परमात्मा वहां पर भगवान कृष्ण के रूप में मगर

1225
01:27:48,240 --> 01:27:52,320
इसके अनुसार तो नहीं है ना तो यह क्यों बोल रहा है यह परमात्मा ऐसा

1226
01:27:52,320 --> 01:27:56,560
है वैसा है सदा स्थिर रहने वाला है और देखिए और आगे 25

1227
01:27:56,560 --> 01:28:00,560
के अनुवाद में क्या कह रहा है यह परमात्मा गुप्त है

1228
01:28:00,560 --> 01:28:04,560
परंतु तेजोमय सूक्ष्म शरीर सहित

1229
01:28:04,560 --> 01:28:08,720
अचिंत है और विकार रहित है हालांकि यह आत्मा के बारे में बताया जा रहा है

1230
01:28:08,720 --> 01:28:12,800
2425 का मैं आपको पढ़ के बता देता हूं जय दयाल गोविंद का जी का क्या

1231
01:28:12,800 --> 01:28:17,000
है कि क्योंकि यह आत्मा

1232
01:28:17,000 --> 01:28:21,400
अच्छेद्य यह आत्मा अदाहाय

1233
01:28:21,400 --> 01:28:25,840
अकले निसंदेह अशोष्य है तथा

1234
01:28:25,840 --> 01:28:29,840
यह आत्मा नित्य सर्वव्यापी अचल स्थिर

1235
01:28:29,840 --> 01:28:34,160
रहने वाला और सनातन है। यह 24वें

1236
01:28:34,160 --> 01:28:38,840
का अर्थ है और आगे यह आत्मा अव्यक्त

1237
01:28:38,840 --> 01:28:43,120
है। यह आत्मा अचिंत है। यह आत्मा

1238
01:28:43,120 --> 01:28:46,800
विकार रहित है। इससे हे अर्जुन

1239
01:28:46,800 --> 01:28:51,120
इस आत्मा को उपयुक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने

1240
01:28:51,120 --> 01:28:55,200
योग्य नहीं है। अर्थात तुझे शोक करना उचित नहीं है। भगवान

1241
01:28:55,200 --> 01:28:59,360
यहां पर आत्मा की जो शाश्वतता

1242
01:28:59,360 --> 01:29:03,840
है उसको बता रहे हैं। वो ना ही कभी जन्मती है ना ही कभी मारी जा सकती है। इसलिए तुझे

1243
01:29:03,840 --> 01:29:08,080
आत्माओं के मरने का शोक नहीं होना चाहिए। ठीक है? ये 25

1244
01:29:08,080 --> 01:29:12,400
वे तक बताया। मगर इसके अनुसार वहां पर परमात्मा

1245
01:29:12,400 --> 01:29:16,400
नहीं है। हमारे अनुसार तो परमात्मा है भी। यदि कोई भगवान श्री कृष्ण

1246
01:29:16,400 --> 01:29:20,960
को परमात्मा मानते हुए यह बात कहे कि यह परमात्मा

1247
01:29:20,960 --> 01:29:24,960
सर्वव्यापी है। हालांकि यहां पर परमात्मा की बात हम

1248
01:29:24,960 --> 01:29:29,200
क्यों नहीं मान सकते कि यहां परमात्मा की बात हो रही है। क्योंकि पिछले

1249
01:29:29,200 --> 01:29:33,440
श्लोक में इसने स्वयं माना है कि जीवात्मा की बात हो रही है।

1250
01:29:33,440 --> 01:29:37,760
तो आगे जब अयम शब्द आएगा तो हम यह नहीं कह सकते कि पीछे

1251
01:29:37,760 --> 01:29:41,840
वाले श्लोक में परमात्मा अगर पीछे वाले श्लोक में परमात्मा की बात इसने कम से कम

1252
01:29:41,840 --> 01:29:45,920
मान ली होती। हालांकि हमारे में तो कहीं नहीं मानी है। मगर इसने कम से कम अगर पिछले

1253
01:29:45,920 --> 01:29:50,240
श्लोकों में मान ली होती है ना तो यह माना

1254
01:29:50,240 --> 01:29:54,720
जा सकता था कि यहां पे अयम जो कहा जा रहा है उसमें कहा जा रहा है यह परमात्मा।

1255
01:29:54,720 --> 01:29:58,720
मगर पिछले श्लोकों में तो इसने खुद माना है कि आत्मा की बात है।

1256
01:29:58,720 --> 01:30:01,920
तो फिर जब पिछले श्लोकों में आत्मा की बात है और जब यहां पर

1257
01:30:01,920 --> 01:30:06,000
अयम शब्द आएगा तो फिर अयम शब्द पिछले श्लोकों में जिसकी बात

1258
01:30:06,000 --> 01:30:10,560
हो रही है उसी के लिए आएगा ना तो यह आत्मा मानना पड़ेगा। परंतु

1259
01:30:10,560 --> 01:30:15,000
इस बात को थोड़ी देर साइड में रख भी दिया जाए तो फिर

1260
01:30:15,000 --> 01:30:19,040
भी इसके अनुसार तो परमात्मा वहां पर नहीं है। युद्ध

1261
01:30:19,040 --> 01:30:23,200
के मैदान में नहीं है। क्योंकि भैया ये लोग तो बड़ा वो करते हैं कि

1262
01:30:23,200 --> 01:30:27,200
अर्जुन तो पहले से कृष्ण जी की शरण में था। तो किस परमात्मा के

1263
01:30:27,200 --> 01:30:31,520
पास जाने की बात कर रहा है? तो ये देख लो। तुम्हारे बाबा जी क्या कर रहे हैं?

1264
01:30:31,520 --> 01:30:36,080
अर्जुन को यहां पर परमात्मा के बगल में खड़ा हुआ दिखा रहे हैं कि नहीं? यह परमात्मा

1265
01:30:36,080 --> 01:30:40,320
यह परमात्मा। हां। अरे भाई वो परमात्मा करो

1266
01:30:40,320 --> 01:30:44,720
ना फसोगे ना चोरी करोगे तो फसोगे

1267
01:30:44,720 --> 01:30:50,720
पग पग पर फसोगे आगे

1268
01:30:55,400 --> 01:30:59,520
देखिए अब देखिए आगे दो अध्याय दो श्लोक 12

1269
01:30:59,520 --> 01:31:04,000
से 25 का भाव इसने बताया कि अर्जुन सर्व प्राणी

1270
01:31:04,000 --> 01:31:08,240
मैं तथा तू जन्म मरण में है परंतु अविनाशी तो तू उसे जान जिससे

1271
01:31:08,240 --> 01:31:12,240
संपूर्ण जगत व्याप्त है। इस अविनाशी पूर्ण ब्रह्म का विनाश

1272
01:31:12,240 --> 01:31:16,320
करने में कोई भी समर्थ नहीं है। इसने अपनी फिर फिजूल की वो उदाहरण वगैरह सब

1273
01:31:16,320 --> 01:31:20,800
दोहरा दिए हैं। उसके बाद अध्याय दो

1274
01:31:20,800 --> 01:31:25,760
श्लोक 26 से 30 हम पढ़ लेते हैं। फिर इसका हम देखेंगे मीमांसा।

1275
01:31:25,760 --> 01:31:30,320
तो अध्याय दो श्लोक 26 में क्या है? अथ किंतु

1276
01:31:30,320 --> 01:31:34,960
यदि तू इस आत्मा को सदा है ना

1277
01:31:34,960 --> 01:31:39,040
किंतु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने

1278
01:31:39,040 --> 01:31:43,760
वाला मानता है तब भी हे महाबाहु

1279
01:31:43,760 --> 01:31:47,840
तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है। ये

1280
01:31:47,840 --> 01:31:51,920
26व वे का अर्थ है। अब देखिए अगर हमने पिछले

1281
01:31:51,920 --> 01:31:55,920
श्लोकों में परमात्मा को मान लिया तो इन श्लोकों

1282
01:31:55,920 --> 01:32:00,000
से उसका कोई कनेक्शन ही फिट नहीं होगा। आगे क्योंकि भगवान क्या कह

1283
01:32:00,000 --> 01:32:04,240
रहे हैं? भगवान कह रहे हैं कि यदि वैसे तो आत्मा कभी नहीं मरती।

1284
01:32:04,240 --> 01:32:08,320
मगर यदि तू आत्मा को जन्म लेने वाला और मरने वाला भी

1285
01:32:08,320 --> 01:32:10,560
समझता है तब भी तेरा शोक जो है वो

1286
01:32:10,560 --> 01:32:15,120
व्यर्थ है। क्यों? क्योंकि अगर तू उसको ऐसा समझता है कि वह जन्मेगी और मरेगी

1287
01:32:15,120 --> 01:32:20,640
तो फिर तू उसमें शोक करके क्या कर लेगा। उसका तो जन्मना मरना निश्चित है।

1288
01:32:20,640 --> 01:32:24,640
ठीक है? और यदि हम पीछे वाले श्लोक में परमात्मा को

1289
01:32:24,640 --> 01:32:28,720
मान लेंगे तो यहां पे क्या अर्जुन परमात्मा के जन्म और मरण का

1290
01:32:28,720 --> 01:32:33,000
शोक शोक में डूबा हुआ होगा। परमात्मा

1291
01:32:33,000 --> 01:32:37,200
के जन्म जन्म और मरण के शोक से मुक्त करने

1292
01:32:37,200 --> 01:32:41,880
को कह रहे होंगे भगवान श्री कृष्ण। तो यह कोई कनेक्शन रिलेटिव

1293
01:32:41,880 --> 01:32:45,920
प्रासंग अप्रासंगिक अर्थ तो

1294
01:32:45,920 --> 01:32:50,000
26व का पढ़ लिया 27 वे का पढ़ते हैं क्योंकि

1295
01:32:50,000 --> 01:32:54,160
इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित

1296
01:32:54,160 --> 01:32:59,040
है। देखिए वही वाली बात जो मैंने कही तो इससे भी

1297
01:32:59,040 --> 01:33:03,120
इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं। जिसमें तू कुछ कर

1298
01:33:03,120 --> 01:33:07,120
नहीं सकता। तूने मान लिया कि उसका जन्म और मरण होता है तो तू कुछ कर नहीं सकता।

1299
01:33:07,120 --> 01:33:09,280
तो फिर तू शोक कर करना तेरा व्यर्थ

1300
01:33:09,280 --> 01:33:13,600
है। संपूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने

1301
01:33:13,600 --> 01:33:17,600
के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं। केवल बीच में ही प्रकट है। फिर

1302
01:33:17,600 --> 01:33:18,800
ऐसी स्थिति में शोक

1303
01:33:18,800 --> 01:33:23,120
क्या करना? अगर तू उनके दिखाई देने वाले स्वरूप की चिंता

1304
01:33:23,120 --> 01:33:27,440
कर रहा है कि ये नष्ट हो जाएगा। तो जन्म लेने से पहले वो अप्रकट

1305
01:33:27,440 --> 01:33:31,600
थे। और मृत्यु के बाद उनको अप्रकट होना ही है। तू उसको मारे या ना मारे।

1306
01:33:31,600 --> 01:33:35,680
केवल वो बीच में जो प्रपंच रूपी संसार है उस

1307
01:33:35,680 --> 01:33:39,960
खेल में वो प्रकट है तो ऐसे अस्थाई

1308
01:33:39,960 --> 01:33:44,320
अस्तित्व को बचाने के लिए अस्थाई जो अस्तित्व

1309
01:33:44,320 --> 01:33:48,320
मिट जाना ही है निश्चित है उसके मिट जाने का तू शोक क्यों कर रहा

1310
01:33:48,320 --> 01:33:52,400
है यहां पर ये कहा जा रहा है 28व वे में ठीक है और आगे क्या

1311
01:33:52,400 --> 01:33:56,640
कहा जा रहा है हम कोई एक

1312
01:33:56,640 --> 01:34:01,200
महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भांति देखता

1313
01:34:01,200 --> 01:34:05,680
और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का

1314
01:34:05,680 --> 01:34:10,320
आश्चर्य की भांति वर्णन करता है। जय दयाल गोका जी वाली लगा दीजिए

1315
01:34:10,320 --> 01:34:14,400
तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भांति सुनता

1316
01:34:14,400 --> 01:34:18,800
है और कोई कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता। यह 29व

1317
01:34:18,800 --> 01:34:23,560
का हो

1318
01:34:23,560 --> 01:34:28,000
गया। और यह आत्मा अयम देही।

1319
01:34:28,000 --> 01:34:32,560
अब देखिए यहां पर यह आत्मा आ गया स्पष्ट आ गया अय देही

1320
01:34:32,560 --> 01:34:36,640
सबके शरीरों में सदा ही अवध्य है देह नित्यम

1321
01:34:36,640 --> 01:34:38,840
ठीक

1322
01:34:38,840 --> 01:34:42,880
है इस कारण संपूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने

1323
01:34:42,880 --> 01:34:47,120
योग्य नहीं है तो क्या हुआ यहां पर किसकी

1324
01:34:47,120 --> 01:34:51,840
बात हो रही है यह आत्मा और इसका ये वर्ण

1325
01:34:51,840 --> 01:34:55,920
एक मिनट वो शब्दार्थ दिखाइए

1326
01:34:55,920 --> 01:35:01,920
दूसरे अध्याय का तीसवा श्लोक

1327
01:35:04,280 --> 01:35:08,400
30वां ये देखिए देह नित्यम इसमें यह

1328
01:35:08,400 --> 01:35:12,480
दिखाइए अयम अयम देही

1329
01:35:12,480 --> 01:35:17,200
अयम का मतलब यह और आगे देही आ गया देही

1330
01:35:17,200 --> 01:35:21,200
यह आत्मा

1331
01:35:21,200 --> 01:35:25,280
ठीक है देह में रहने वाली आत्मा इसको नित्य कह

1332
01:35:25,280 --> 01:35:29,640
दिया गया अवध्य कह कह दिया

1333
01:35:29,640 --> 01:35:33,680
गया। तो यहां पर हमें दूसरे अध्याय के 30 वे श्लोक

1334
01:35:33,680 --> 01:35:37,680
में प्रमाण के साथ यह क्लियर हो गया कि पीछे से श्लोकों में बात

1335
01:35:37,680 --> 01:35:42,080
किसकी चली आ रही है? आत्मा की। ये है आत्मा। परमात्मा

1336
01:35:42,080 --> 01:35:46,160
की बात कहीं नहीं हुई है। मगर क्योंकि कहीं-क आत्मा के गुण इसके

1337
01:35:46,160 --> 01:35:50,400
विरोध में जा रहे थे। इसने कहीं-कहीं पे बिना प्रसंग के परमात्मा को

1338
01:35:50,400 --> 01:35:54,720
डाल दिया और वहां पे अपनी आईडियोलॉजी को भी खंडित कर दिया कि यह परमात्मा

1339
01:35:54,720 --> 01:35:58,800
यह परमात्मा। भाई जब अयम के साथ लिखोगे तो यह मानना

1340
01:35:58,800 --> 01:36:03,120
पड़ेगा ना परमात्मा का अपने स्वतंत्र शब्दार्थ

1341
01:36:03,120 --> 01:36:07,200
तो है नहीं संस्कृत का और अयम के रूप में लोगे तो उसी को मानना पड़ेगा

1342
01:36:07,200 --> 01:36:11,200
जिसकी बात पीछे हो रही है हम और

1343
01:36:11,200 --> 01:36:15,680
तीसरी बात उसके आने और जाने का कोई प्रसंग ही नहीं है।

1344
01:36:15,680 --> 01:36:19,360
चलो तो इसने अब क्या कहा है दो से दूसरे अध्याय के 26

1345
01:36:19,360 --> 01:36:23,440
से 30 में कहा है कि जीवात्मा शरीर ना रहने पर

1346
01:36:23,440 --> 01:36:27,520
भी नहीं मरती है क्योंकि परमात्मा इसके साथ अदृश्य रूप से

1347
01:36:27,520 --> 01:36:32,000
रहता है यह कहां लिखा है ये अदृश्य का

1348
01:36:32,000 --> 01:36:36,160
परमात्मा इसके साथ अदृश्य रूप से रहता है ये रहते की संस्कृत

1349
01:36:36,160 --> 01:36:40,800
दिखानी पड़ेगी इसको रामपाल बाबा को दिखाओ

1350
01:36:40,800 --> 01:36:45,120
परमात्मा रहता है रहता है रहता है कर रहा है ना ये हर श्लोक में आत्मा

1351
01:36:45,120 --> 01:36:49,200
की नित्यता को अस्वीकार करने के लिए वहां पर परमात्मा को डालते

1352
01:36:49,200 --> 01:36:53,200
हुए यह घुसेड़ दे रहा है कि आत्मा के

1353
01:36:53,200 --> 01:36:57,520
साथ वो रहता है तो आत्मा के साथ रहता है कि संस्कृत दिखाइए

1354
01:36:57,520 --> 01:37:01,600
कहां है हम जब यह परमात्मा

1355
01:37:01,600 --> 01:37:05,760
की बात हो रही है तो अलग से आत्मा शब्द भी आना चाहिए। जब

1356
01:37:05,760 --> 01:37:09,840
आपने अयम का अर्थ तो ले लिया कि यह परमात्मा की बात हो रही है। चलो मान लिया

1357
01:37:09,840 --> 01:37:14,080
पीछे वाले से कनेक्शन नहीं है। मगर जब अयम का अर्थ आपने यह आत्मा

1358
01:37:14,080 --> 01:37:18,080
नहीं माना है। यह परमात्मा माना है तो आपको आत्मा के लिए

1359
01:37:18,080 --> 01:37:22,240
अलग से शब्द लेना लाना पड़ेगा ना संस्कृत का

1360
01:37:22,240 --> 01:37:26,560
और उसके साथ रहने के साथ रहना ये संस्कृत में दिखाना

1361
01:37:26,560 --> 01:37:32,120
पड़ेगा। तो नहीं दिखाया इन्होंने बाबा जी ने

1362
01:37:32,120 --> 01:37:34,640
आगे कि क्योंकि परमात्मा इसके

1363
01:37:34,640 --> 01:37:40,640
साथ अदृश्य रूप से रहता है तो

1364
01:37:40,840 --> 01:37:45,040
इसीलिए जीवात्मा को ना काटा जा सकता ना जलाया जा सकता है। मतलब

1365
01:37:45,040 --> 01:37:49,440
परमात्मा के रहने के कारण जीवात्मा ऐसी है। अन्यथा जीवात्मा

1366
01:37:49,440 --> 01:37:53,840
को काटा जा सकता होता। इनके हिसाब से ये कहे तो ऐसा ही रहे।

1367
01:37:53,840 --> 01:37:57,920
यह परमात्मा जो जीवात्मा के साथ उपदृष्टा रूप में रहता है जो

1368
01:37:57,920 --> 01:38:02,000
निर्विकार है। देखिए आत्मा को निर्विकार कहा गया है तो उपदृष्टा

1369
01:38:02,000 --> 01:38:06,320
के रूप में खड़ा करके बिना किसी सर पैर के और

1370
01:38:06,320 --> 01:38:10,320
यहां पर खड़ा कर दिया और उसको निर्विकार कहा गया।

1371
01:38:10,320 --> 01:38:14,400
आत्मा को नहीं परमात्मा को निर्विकार। यदि जीवात्मा को

1372
01:38:14,400 --> 01:38:18,400
नित्य मरने जन्मने वाली भी माने तो भी

1373
01:38:18,400 --> 01:38:21,840
दुखी नहीं होना चाहिए।

1374
01:38:21,840 --> 01:38:25,840
अब यहां पर तो यह नित्य मरने जन्मने वाले में खुद ही वर्तनी

1375
01:38:25,840 --> 01:38:30,000
का दोष है इसकी क्योंकि पुराने वस्त्र त्याग कर नए पहन लिए इसलिए शोक

1376
01:38:30,000 --> 01:38:34,240
मत कर जिसका जन्म हुआ वह अवश्य मरेगा मरेगा उसका जन्म अवश्य है भगवान

1377
01:38:34,240 --> 01:38:38,240
कह रहा है तू तथा मैं तथा सर्व प्राणी पहले भी थे आगे

1378
01:38:38,240 --> 01:38:42,520
भी होंगे फिर चिंता

1379
01:38:42,520 --> 01:38:47,400
कैसी तर्क

1380
01:38:47,400 --> 01:38:51,440
वितर्क इस श्लोक अब यहां पर इसने

1381
01:38:51,440 --> 01:38:57,440
एस्कॉन वालों की चीज को मान लिया है।

1382
01:38:57,800 --> 01:39:01,840
हम क्या माना है कि

1383
01:39:01,840 --> 01:39:06,160
इस शरीर में एक अन्य दिव्य भोक्ता है जो ईश्वर है। यहां पे इस

1384
01:39:06,160 --> 01:39:10,400
वालों को प्रमाण के रूप में ले लिया है। परम स्वामी है और साक्षी तथा

1385
01:39:10,400 --> 01:39:14,400
अनुमति देने वाले के रूप में विद्यमान है। यही मैं कहता हूं ना रामपाल

1386
01:39:14,400 --> 01:39:18,640
जैसे लोग कब बनते हैं? जब विकृति इन जैसे

1387
01:39:18,640 --> 01:39:23,080
लोग विकृति को जन्म देते हैं।

1388
01:39:23,080 --> 01:39:27,200
खैर स इसके अलावा अन्य सभी अनुवादों ने गलत

1389
01:39:27,200 --> 01:39:31,440
अर्थ किया है जो इस प्रकार है। इस देह में स्थित आत्मा वास्तव में परमात्मा

1390
01:39:31,440 --> 01:39:35,440
ही है। साक्षी होने से उपदृष्टा और

1391
01:39:35,440 --> 01:39:39,520
अच्छा ये 22 23वें का किया है। 13वा अध्याय

1392
01:39:39,520 --> 01:39:43,600
तो आगे आएगा। खैर अब इसने क्या करा

1393
01:39:43,600 --> 01:39:47,680
है? तो इसके दो दूसरे अध्याय के 26व श्लोक

1394
01:39:47,680 --> 01:39:52,680
का अर्थ इसने क्या लिखा है? अगले पेज पर आ जाइए। पेज नंबर

1395
01:39:52,680 --> 01:39:56,880
22 हां तो इसमें देखिए गीता अध्याय दो श्लोक

1396
01:39:56,880 --> 01:39:58,080
26

1397
01:39:58,080 --> 01:40:02,160
यदि तू इस आत्मा को सदा मरने वाला व जन्म लेने वाला मानता है तो

1398
01:40:02,160 --> 01:40:06,800
भी शोक करने योग्य नहीं है। क्योंकि तेरी मान्यता के अनुसार जन्मे हुए

1399
01:40:06,800 --> 01:40:11,040
की मृत्यु और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इस बिना उपाय वाले विषय

1400
01:40:11,040 --> 01:40:14,960
में तू शोक करने के योग्य नहीं है। यह सर्व

1401
01:40:14,960 --> 01:40:19,520
प्राणी जन्म से पहले भी प्रकट थे। मरने के बाद भी प्रकट होंगे

1402
01:40:19,520 --> 01:40:21,360
और बीच में भी है। देखिए

1403
01:40:21,360 --> 01:40:25,680
सबसे बड़ा आज का बुलेट पॉइंट क्या है?

1404
01:40:25,680 --> 01:40:29,920
सबसे बड़ा बुलेट पॉइंट क्या है? इसने अप्रकट को प्रकट

1405
01:40:29,920 --> 01:40:34,400
कर दिया। यह है बाबा जी का गवारपन। क्या किया इसने?

1406
01:40:34,400 --> 01:40:38,480
यह परमात्मा यह सर्व प्राणी जन्म

1407
01:40:38,480 --> 01:40:42,720
से पहले भी प्रकट थे। मतलब यह जो प्राणी है पहले भी प्रकट थे।

1408
01:40:42,720 --> 01:40:48,160
अप्रकट नहीं थे। वहां कहा जा रहा अप्रकट। देखिए

1409
01:40:48,160 --> 01:40:54,160
कौन सा श्लोक है ये? यह है 29वा

1410
01:40:54,680 --> 01:41:00,360
श्लोक। हम 28वा श्लोक

1411
01:41:00,360 --> 01:41:04,480
है। अब देखिए साफ-साफ लिखा है।

1412
01:41:04,480 --> 01:41:08,480
अव्यक्ता दीनी लगाइए जरा जय दयाल गोविंद का

1413
01:41:08,480 --> 01:41:14,480
जी का लगाइए। वाह।

1414
01:41:15,040 --> 01:41:19,760
इनका गमपन देखिए कैसे मैनपुलेट किया है।

1415
01:41:19,760 --> 01:41:23,920
हां ये देखिए अव्यक्ता दीनी अव्यक्त यानी

1416
01:41:23,920 --> 01:41:28,240
जन्म से पहले अप्रकट थे। अव्यक्त दोबारा आया है। मरने

1417
01:41:28,240 --> 01:41:32,320
के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं। केवल बीच में ही

1418
01:41:32,320 --> 01:41:36,720
व्यक्त है। एक बार व्यक्त आया है और दो बार अव्यक्त

1419
01:41:36,720 --> 01:41:41,280
आया है। ठीक है? तो इससे हमारी बात सिद्ध हो रही है

1420
01:41:41,280 --> 01:41:45,440
कि जन्म से पहले अव्यक्त थे और मृत्यु के बाद अव्यक्त होने वाले केवल

1421
01:41:45,440 --> 01:41:49,520
बीच में ही व्यक्त है। जन्म से पहले अप्रकट थे। बाद में

1422
01:41:49,520 --> 01:41:53,520
भी अप्रकट हो जाने वाले केवल बीच में ही प्रकट है। मगर इसने क्या

1423
01:41:53,520 --> 01:41:58,000
माना है बाबा ने? रामपाल ने क्या माना है?

1424
01:41:58,000 --> 01:42:02,080
यह आत्मा परमा श्लोक 28 का

1425
01:42:02,080 --> 01:42:06,160
अर्थ क्या लिखा है इसने? यह प्राणी जन्म से पहले

1426
01:42:06,160 --> 01:42:09,760
भी प्रकट थे। मरने के बाद भी प्रकट होंगे

1427
01:42:09,760 --> 01:42:13,920
और बीच में भी प्रकट है। ऐसे में शोक क्या करना है? यह है बाबा जी

1428
01:42:13,920 --> 01:42:18,160
का अर्थ। देख लीजिए। तीन बार

1429
01:42:18,160 --> 01:42:22,960
प्रकट कर दिया। तीन बार प्रकट का मतलब संस्कृत में अप्रकट

1430
01:42:22,960 --> 01:42:28,960
तीन बार होना चाहिए। हो गया।

1431
01:42:30,520 --> 01:42:34,800
तो अब इसने 30 के श्लोक में फिर कर दिया हे भारतवंशी

1432
01:42:34,800 --> 01:42:38,960
अर्जुन यह आत्मा परमात्मा के सानिध्य में है। इस

1433
01:42:38,960 --> 01:42:42,960
शरीर में है। इसलिए यह अवध्य है। यानी इसका

1434
01:42:42,960 --> 01:42:47,040
वध नहीं किया जा सकता। कुल मिला के जीवात्मा स्वतंत्र रूप से

1435
01:42:47,040 --> 01:42:51,280
अवध्य अवध्य नहीं है। परमात्मा के सानिध्य में ही जीवात्मा

1436
01:42:51,280 --> 01:42:55,440
जो है अवध्य है। परमात्मा अगर अपना वो हटा लेगा तो आत्मा

1437
01:42:55,440 --> 01:42:59,520
को भी जला मारा जा सकता है। काटा जा सकता है। ये सब यहां से आ रहा है।

1438
01:42:59,520 --> 01:43:03,600
दूसरी बात इनके अनुसार आत्मा नित्य नहीं है। तीसरी बात

1439
01:43:03,600 --> 01:43:07,680
यह खुद कहते हैं कि जो संसार है वह ईश्वर

1440
01:43:07,680 --> 01:43:11,760
से व्याप्त है। मगर फिर खुद कहते हैं कि ईश्वर से व्याप्त

1441
01:43:11,760 --> 01:43:15,840
नहीं है। की शक्ति से व्याप्त है। श्लोक नंबर 28 में यह पूरी

1442
01:43:15,840 --> 01:43:20,000
गड़बड़ कर देते हैं। दो बार अव्यक्त और एक एक बार व्यक्त है

1443
01:43:20,000 --> 01:43:24,080
तो दो बार प्रकट और एक बार प्रकट मानना पड़ेगा। मगर इन्होंने तीनों बार प्रकट

1444
01:43:24,080 --> 01:43:25,120
माना है।

1445
01:43:25,120 --> 01:43:29,600
ठीक है? और इन्होंने संस्कृत नहीं बताई।

1446
01:43:29,600 --> 01:43:33,840
आत्मा के साथ रहने वाला आत्मा के साथ रहने वाला। कई श्लोकों

1447
01:43:33,840 --> 01:43:37,840
में इन्होंने कर दिया। जैसे यहां दो दूसरे अध्याय के 30व श्लोकों में भी श्लोक में भी

1448
01:43:37,840 --> 01:43:41,920
कर दिया कि यह आत्मा परमात्मा के सानिध्य में शरीर में है। इसलिए

1449
01:43:41,920 --> 01:43:46,840
परमात्मा के सानिध्य में है। यह कहां लिखा है संस्कृत

1450
01:43:46,840 --> 01:43:51,360
में? मन घंत मन घड़ंत बात है।

1451
01:43:51,360 --> 01:43:55,440
कहां लिखा है? दूसरी बात जब अयम की बातें करेंगे तो पीछे

1452
01:43:55,440 --> 01:43:59,440
के श्लोकों में जब आत्मा की बात हो रही है तो इस श्लोक में भी अयम का अर्थ हमें

1453
01:43:59,440 --> 01:44:03,520
आत्मा से लेना पड़ेगा। यह है आत्मा। मगर इसने कई जगह पर यह परमात्मा

1454
01:44:03,520 --> 01:44:07,520
कर दिया है पीछे के श्लोक से। तो पहली बात तो वहां पर

1455
01:44:07,520 --> 01:44:11,680
संस्कृत ठीक नहीं बनती। दूसरी बात प्रसंग भी ठीक नहीं बनता।

1456
01:44:11,680 --> 01:44:15,760
और तीसरी बात कि जब इसने यह परमात्मा कह दिया

1457
01:44:15,760 --> 01:44:20,000
यह परमात्मा यह परमात्मा तो क्या हुआ? इसको ये मानना

1458
01:44:20,000 --> 01:44:24,160
पड़ेगा कि अर्जुन परमात्मा के सानिध्य में था। इसका मतलब जब

1459
01:44:24,160 --> 01:44:28,160
ये ये कहता है कि 1866 में कि जा उस परमात्मा

1460
01:44:28,160 --> 01:44:32,240
में उस परमात्मा की शरण में जा तो जो इसका ये परमात्मा है जो

1461
01:44:32,240 --> 01:44:36,400
वहां पर पहले से था उसको छोड़ के जाने की बात हो रही है। ये हम लोग टांग

1462
01:44:36,400 --> 01:44:40,400
खींच लेंगे थोड़ी सी। ठीक है? तो यह आज का था। हमने

1463
01:44:40,400 --> 01:44:44,720
दूसरे अध्याय के 30 तक की इसकी व्याख्या पढ़ी है और 30 से ले

1464
01:44:44,720 --> 01:44:48,720
आगे की व्याख्या हम लोग अगले एपिसोड में करेंगे। एक

1465
01:44:48,720 --> 01:44:53,240
बार सभी को दोबारा से बहुत सारी शुभकामनाएं। जो

1466
01:44:53,240 --> 01:44:57,680
रामपाल का एक अड्डा अज्ञानता का और विधर्म

1467
01:44:57,680 --> 01:45:03,680
का वो बंद

1468
01:45:05,000 --> 01:45:09,120
हुआ और थोड़ा सा लिंक दे दीजिए। किसी को दिक्कत हो तो वो

1469
01:45:09,120 --> 01:45:15,120
आ सकता

1470
01:45:20,120 --> 01:45:24,480
है। आज के बारे में या कोई

1471
01:45:24,480 --> 01:45:30,480
थोड़ी बहुत बात करनी हो तो आ सकता है। ज्यादा समय नहीं है। बस 15 मिनट रुकेंगे।

1472
01:45:41,520 --> 01:45:45,840
आशा करते हैं कि आपको ये सीरीज पसंद आने वाली है।

1473
01:45:45,840 --> 01:45:50,000
जहां से इसने गड़बड़ करना चालू किया है भगवत गीता में

1474
01:45:50,000 --> 01:45:54,160
दूसरे अध्याय का दव से लेकर के श्लोक

1475
01:45:54,160 --> 01:46:00,160
से आज हमने आपको व्याख्या प्रस्तुत कर दी है।

1476
01:46:07,760 --> 01:46:11,840
हां भाई निखिल सिंह जी जय श्री राम जय श्री राम

1477
01:46:11,840 --> 01:46:14,960
जय श्री राम

1478
01:46:14,960 --> 01:46:18,320
आवाज आपकी कम आ रही है

1479
01:46:18,320 --> 01:46:24,320
जी जी बताइए बताइए बस कृपा है आप बताएं

1480
01:46:25,440 --> 01:46:29,760
मेरे दो तीन क्वेश्चन वर्ण व्यवस्था को ले थे

1481
01:46:29,760 --> 01:46:34,000
तो उसका आज रामपाल के विषय में आप बात करें

1482
01:46:34,000 --> 01:46:38,080
क्योंकि वर्ण व्यवस्था को लेकर के हम मेरा गला अभी थक गया है ना मैं काफी देर से लगातार

1483
01:46:38,080 --> 01:46:42,400
बोल रहा हूं तो हम एक लंबी चर्चा को अभी जन्म नहीं दे सकते

1484
01:46:42,400 --> 01:46:45,760
अभी की जो चर्चा है उससे

1485
01:46:45,760 --> 01:46:49,760
इनको ले कोई डाउट नहीं है

1486
01:46:49,760 --> 01:46:54,400
इनको ले डाउट नहीं है आप मेरे को हटा दीजिए ठीक

1487
01:46:54,400 --> 01:46:58,880
ठीक आप फॉर्म भर दीजिएगा निखिल जी को मेरे मेरा वो है संदेश

1488
01:46:58,880 --> 01:47:02,440
आप फॉर्म भरिए। किसी दिन हम

1489
01:47:02,440 --> 01:47:06,640
लोग व्यवस्थित एक चर्चा रखते वर्ण व्यवस्था

1490
01:47:06,640 --> 01:47:11,280
पर।

1491
01:47:11,280 --> 01:47:15,520
तो देखिए अब दो से लेकर 30 तक के बीच के किसी श्लोक का

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01:47:15,520 --> 01:47:19,840
रेफरेंस देकर के अगर आपको कोई कुछ कहता है तो आप यहां पर आ सकते हैं

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01:47:19,840 --> 01:47:24,000
और इस सीरीज में जो प्लेलिस्ट बन जाएगी वहां से उठा करके वो देख समझ

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01:47:24,000 --> 01:47:28,360
सकते हैं कहां-कहां पर उनके पीक पॉइंट्स है कहां-कहां गलती की है

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01:47:28,360 --> 01:47:32,640
और ये अनुवाद में भी गलतियां की है इन्होंने अपनी ये

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01:47:32,640 --> 01:47:36,960
रामपाल ने अपनी गीता में तो क्या है कि तीन दो बार अव्यक्त

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01:47:36,960 --> 01:47:40,960
शब्द आया है और एक बार व्यक्त और इसने तीनों बार व्यक्त

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01:47:40,960 --> 01:47:44,960
कर दिया है तो इसको तीन बार व्यक्त की संस्कृत

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01:47:44,960 --> 01:47:49,200
देनी पड़ेगी। इसको के सानिध्य में रहता है के साथ रहता

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01:47:49,200 --> 01:47:53,200
है। इसकी संस्कृत देनी पड़ेगी। अगर इसने अय का अर्थ यह

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01:47:53,200 --> 01:47:57,280
परमात्मा माना है तो इसे आत्मा की संस्कृत लानी पड़ेगी। ये

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01:47:57,280 --> 01:48:01,280
सब पॉइंट की बातें हैं। कोई नहीं आ रहा है तो फिर हम आज की पूरी

1503
01:48:01,280 --> 01:48:07,200
करते हैं। अरनव करके कोई हैं उनसे मैं कहूंगा कि अपना चेहरा दिखाएं।

1504
01:48:07,200 --> 01:48:11,200
पहाड़ी जी अगर देख रहे हो तो थोड़ा सा आ जाए। उनसे कुछ बातें करके हम

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01:48:11,200 --> 01:48:15,520
लोग आज का इस जो शुभारंभ किया है उसका

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01:48:15,520 --> 01:48:21,520
आज के इस एपिसोड का समापन

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01:48:22,680 --> 01:48:27,200
करेंगे। अगला एपिसोड शनिवार सायं

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01:48:27,200 --> 01:48:33,200
काल में 7 या 8:00 बजे आपको प्राप्त हो जाएगा।

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01:48:35,640 --> 01:48:39,680
एक धरातल पर कार्य करने वाला योद्धा भी हूं भाई।

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01:48:39,680 --> 01:48:44,280
तो इसलिए समय का थोड़ा हेरफेर हो जाया करें तो उसको इग्नोर किया करें आप

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01:48:44,280 --> 01:48:48,400
लोग क्योंकि केवल शास्त्र नहीं शस्त्र की भी

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01:48:48,400 --> 01:48:52,440
बात करते हैं इसलिए। चलिए तो कोई नहीं है

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01:48:52,440 --> 01:48:56,200
अभी

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01:48:56,200 --> 01:49:01,120
और आज ये ताला पड़ा है हद्वानी में।

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01:49:01,120 --> 01:49:05,200
जल्द ही ऐसे बहुत से ताले लगेंगे रामपाल के अन्य

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01:49:05,200 --> 01:49:09,360
केंद्रों में और

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01:49:09,360 --> 01:49:13,520
सनातन की शक्ति लोगों को दिखाई देगी। तो

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01:49:13,520 --> 01:49:17,520
सभी को जय श्री राम। समय देने के लिए आभार। आशा करते हैं आपको

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01:49:17,520 --> 01:49:21,680
यह एक विवेचना जो है यह अच्छी

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01:49:21,680 --> 01:49:25,760
लगी हो और अगले एपिसोड में मिलेंगे हम लोग

1521
01:49:25,760 --> 01:49:31,520
शनिवार के दिन। उससे पहले भी कुछ चीजें होती रहेंग तो आप

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अपडेटेड रहिएगा। सभी को जय श्री राम। और अपने घर के

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01:49:35,520 --> 01:49:39,840
बाहर अवश्य लिखवाएं। मेरा घर हिंदू राष्ट्र

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01:49:39,840 --> 01:49:43,840
हमारा घर हिंदू राष्ट्र हर घर हिंदू राष्ट्र जय श्री राम।
