1
00:00:03,680 --> 00:00:08,160
तो सभी को जय श्री

2
00:00:08,160 --> 00:00:13,040
राम आशा करते आप सभी कुशल पूर्वक होंगे

3
00:00:13,040 --> 00:00:17,560
और आज आपने देख लिया है

4
00:00:17,560 --> 00:00:21,880
बहुत ही महत्त्वपूर्ण विषय है जिस पर हम

5
00:00:21,880 --> 00:00:25,920
चर्चा करने जा रहे हैं और आज चैनल

6
00:00:25,920 --> 00:00:30,200
पर एक एक अत्य

7
00:00:30,200 --> 00:00:34,720
सम्माननीय विभूति यहां पर पधारने वाले हैं

8
00:00:34,720 --> 00:00:38,880
जिनका नाम है ष महा

9
00:00:38,880 --> 00:00:43,040
ऋषि तो मैं उन्हें ले लेता हूं वल्लभ संप्रदाय

10
00:00:43,040 --> 00:00:47,880
से हैं और अपने बारे में स्वयं भी आपको बताएंगे और

11
00:00:47,880 --> 00:00:52,040
एक व्यवस्थित रूप से एक महत्त्वपूर्ण

12
00:00:52,040 --> 00:00:56,960
चर्चा आपको प्राप्त होगी जानकारिया आपको प्राप्त होंगी

13
00:00:56,960 --> 00:01:00,720
विशेषतः जो

14
00:01:00,720 --> 00:01:04,720
विदेशी धारणाएं विदेशी विचारधाराएं और

15
00:01:04,720 --> 00:01:09,080
जो विदेशी तंत्र है कैसे हमारे धर्म को हमारे

16
00:01:09,080 --> 00:01:13,160
परंपराओं को हमारी संस्कृति को नष्ट करने के

17
00:01:13,160 --> 00:01:17,960
लिए अमादा है और हम अपनी इन

18
00:01:17,960 --> 00:01:22,560
बहुमूल्य अपनी इस बहुमूल्य सामग्री को

19
00:01:22,560 --> 00:01:26,560
उनके हाथों में हाल ही में परोस कर दे रहे हैं यह

20
00:01:26,560 --> 00:01:30,600
कहते हुए कि वो तो भक्ति सिखा रहे हैं चलिए विल करते हुए

21
00:01:30,600 --> 00:01:36,600
ले लेते

22
00:01:36,880 --> 00:01:40,880
हैं प्रत जी आपका स्वागत है जय

23
00:01:40,880 --> 00:01:44,920
श्री रामय श्री कृष्ण जय

24
00:01:44,920 --> 00:01:49,880
श्री राम तो वैसे मैंने

25
00:01:49,880 --> 00:01:54,480
एक प्रयास किया है आपके बारे में यथोचित जानकारी में दे सकू

26
00:01:54,480 --> 00:01:57,320
हमारे दर्शको

27
00:01:57,320 --> 00:02:03,120
को थोड़ा सा आप अपना एक संक्षेप परिचय

28
00:02:03,120 --> 00:02:07,120
दे नाम तो आप बता ही चुके हैं प्रत्युष महर्षि मेरा

29
00:02:07,120 --> 00:02:11,120
नाम है मूल हम लोग मथुरा के रहने वाले हैं

30
00:02:11,120 --> 00:02:16,720
सूर्य घाट बट स्वामी घाट जिसका बंगाली घाट नाम है वहा

31
00:02:16,720 --> 00:02:20,800
से जी एक मिनट बस मैं कहूंगा आप शायद हेडफोन जो

32
00:02:20,800 --> 00:02:25,680
यूज कर रहे हैं ना उसको ना करके आप डायरेक्ट बोलेंगे तो ज्यादा अच्छी आवाज आएगी अच्छा

33
00:02:25,680 --> 00:02:28,160
ठीक

34
00:02:28,160 --> 00:02:32,240
जी और थोड़ा कैमरा ऐसे करले कि आपका फेस है ना यह कट

35
00:02:32,240 --> 00:02:38,240
रहा है आपका ऊपर आधा थोड़ा सा

36
00:02:41,360 --> 00:02:47,360
दिखाई आपका वीडियो दिख नहीं रहा है यह बोल रहे

37
00:02:50,240 --> 00:02:55,040
हैं अभी दिख रहा

38
00:02:55,040 --> 00:02:59,040
है अभी दिखाई दे रहा है इनका चेहरा स्क्रन शेयर नहीं हुआ

39
00:02:59,040 --> 00:03:02,960
है शिवांश

40
00:03:02,960 --> 00:03:07,200
जी दिख रहा है ना हम दोनों का ही ठीक से दिख रहा है

41
00:03:07,200 --> 00:03:11,200
ठीक है मगर बस आपका वो ऊपर का फोरहेड

42
00:03:11,200 --> 00:03:15,360
कट रहा है थोड़ा सा हा असल में क्या है ये टैबलेट है मेरे

43
00:03:15,360 --> 00:03:19,360
पास में और ये टेबलेट जो है टे हो रहा है तो

44
00:03:19,360 --> 00:03:23,560
भी साथ में टेढ़ हो रहा है तो आप ठीक कर लीजिए आप सेंटर में आ जाइए या

45
00:03:23,560 --> 00:03:27,680
तो मैं प्रयास करता हूं श्रीमन नारायण

46
00:03:27,680 --> 00:03:31,720
श्रीमन नारायण आदित्य जी छोटों को

47
00:03:31,720 --> 00:03:37,720
ढेर सारा आशीर्वाद प्रेम स्नेह बनों का

48
00:03:52,160 --> 00:03:58,160
सम्मान जय श्री राम जय श्री राम

49
00:04:03,440 --> 00:04:07,760
हां बात करते हैं भेजिए किसी कश्चन कश्चन

50
00:04:07,760 --> 00:04:11,440
को हा जी अभी

51
00:04:11,440 --> 00:04:16,200
है मेरी स्क्रीन से कमेंट हटा दीजिए ऑपरेटर

52
00:04:16,200 --> 00:04:22,200
जी आपसे नहीं कह रहा प्रतीश जी आपसे नहीं कह रहा

53
00:04:26,480 --> 00:04:31,640
जी ऑपरेटर जी

54
00:04:31,640 --> 00:04:37,640
यह कमेंट हटा दीजिए ऑपरेटर जी स्क्रीन

55
00:04:41,520 --> 00:04:45,840
से चलिए

56
00:04:45,840 --> 00:04:49,880
तो प्रत्युष जी अपने बारे में बताए उससे पहले

57
00:04:49,880 --> 00:04:54,360
मैं एक बार और थोड़ा सा बता दूं वल्लभ संप्रदाय से दीक्षित है प्रामाणिक

58
00:04:54,360 --> 00:04:58,360
परंपरा से और इनके गुरुजनों के

59
00:04:58,360 --> 00:05:02,880
बारे में भी अभी बताया जाए एक बहुत विशेष बात है इन्होंने एक

60
00:05:02,880 --> 00:05:07,720
ग्रंथ लिखा है जिस ग्रंथ में इन्होंने प्रबल

61
00:05:07,720 --> 00:05:12,320
रूप से जितने भी ऐसे सनातन परंपरा विरोधी तत्व है

62
00:05:12,320 --> 00:05:16,400
उन पर जो है इन्होंने प्रतिकार किया है उनका उस ग्रंथ के

63
00:05:16,400 --> 00:05:18,920
माध्यम से

64
00:05:18,920 --> 00:05:23,280
और उसमें इकोन के बारे में भी एक बृहद इन्होंने चर्चा

65
00:05:23,280 --> 00:05:27,440
की है क्योंकि इनका स्कोन पर भी एक वो भी हम सब बातें करने वाले हैं

66
00:05:27,440 --> 00:05:31,520
कोन पर इनकी इतनी वृहद जो है व्याख्या कैसे इन्ह

67
00:05:31,520 --> 00:05:35,760
प्राप्त हो पाई तो सबसे पहले प्रती जी आप अपने बारे में अपना जो जो

68
00:05:35,760 --> 00:05:40,320
आपका जो पारंपरिक बैकग्राउंड है वो आप थोड़ा सा बता

69
00:05:40,320 --> 00:05:45,240
दे जी वंदे श्री वल्लभाचार्य चरण

70
00:05:45,240 --> 00:05:47,280
श्री कृष्णा

71
00:05:47,280 --> 00:05:51,640
आप नाम तो मेरा सबको बता ही चुके हैं और मैं य भी बता च हम

72
00:05:51,640 --> 00:05:55,760
मूल मथुरा के रहने वाले हैं और मथुरा में सूर्य घाट बट स्वामी

73
00:05:55,760 --> 00:05:59,760
घाट यहां पर हमारे पूरे संपूर्ण कुल का ही निवास स्थान था लगभग लगभग जब

74
00:05:59,760 --> 00:06:03,760
महाप्रभु जी मथुरा पधारे श्रीनाथ जी को प्रकट किया और

75
00:06:03,760 --> 00:06:08,040
मथुरा नगरी को घाट के एरिया को पुनः बसाया क्योंकि गजनवी

76
00:06:08,040 --> 00:06:12,520
के कतलम के पश्चात से पूरी मथुरा उजड़ी पड़ी थी तो हमारा पूरा कुल

77
00:06:12,520 --> 00:06:17,200
उस समय जो मथुरा में था सब श्रीम महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के सेवक हुए

78
00:06:17,200 --> 00:06:21,560
ये बात है 1492 ईसवी की 1492

79
00:06:21,560 --> 00:06:25,600
में मैं एक बात क्लियर कर दूं महाप्रभु जब वे

80
00:06:25,600 --> 00:06:29,640
बोल रहे हैं प्रत्यूष जी तो महाप्रभु जी संबोधन हो रहा है

81
00:06:29,640 --> 00:06:33,760
वल्लभाचार्य जी महाराज के लिए क्योंकि महाप्रभु

82
00:06:33,760 --> 00:06:38,160
चैतन्य महाप्रभु के सामने भी लगता है वह भी काफी प्रासंगिक है

83
00:06:38,160 --> 00:06:42,520
इसलिए दर्शक समझ पाए कि महाप्रभु किसकी बात हो रही है तो इसलिए

84
00:06:42,520 --> 00:06:46,560
जी जी जी तो महाप्रभु श वल्लभाचार्य

85
00:06:46,560 --> 00:06:50,960
जी जब पधारे तो हमारा पूरा कुल उनका सेवक हुआ और ऐसे ही मतलब

86
00:06:50,960 --> 00:06:54,960
संपूर्ण कुल व्रज का ही निवासी रहा है प्रारंभ से तो और

87
00:06:54,960 --> 00:07:00,760
सभी वैष्णव संप्रदायों में समस्त संप्रदायों में मेरे अपने पूर्वज

88
00:07:00,760 --> 00:07:02,360
गौड़ीय संप्रदाय में भी

89
00:07:02,360 --> 00:07:06,360
सूरदास मदन मोहन थे गौड़ीय संप्रदाय के सूरदास थे ये

90
00:07:06,360 --> 00:07:10,400
सूरदास मदन मोहन जी नाम से प्रसिद्ध थे सनातन गोस्वामी रूप गोस्वामी के सेवक

91
00:07:10,400 --> 00:07:14,800
थे ये मेरे पूर्वज रहे हैं एक निंबा संप्रदाय के आचार्य

92
00:07:14,800 --> 00:07:19,080
बिहारी दास जी बड़े प्रसिद्ध हुए हैं वोह भी हमारे

93
00:07:19,080 --> 00:07:23,160
पूर्वज माने कहे जाते हैं घर में यही बताया जाता है हमारी कुल परंपरा

94
00:07:23,160 --> 00:07:27,240
में भी यही बताया जाता है मेरा ननिहाल जो है उनका

95
00:07:27,240 --> 00:07:31,520
मेरा ननिहाल वृंदावन में है और नाना जी ये सब इनका परिवार

96
00:07:31,520 --> 00:07:35,840
राधा वल्लभ संप्रदाय को बिलोंग करता है और

97
00:07:35,840 --> 00:07:39,920
सौभाग्य से नाना जी के बहुत अच्छे मित्र थे प्रभुपाद

98
00:07:39,920 --> 00:07:43,960
जब भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद स्कन के संस्थापक जब ये वृंदावन

99
00:07:43,960 --> 00:07:48,120
सन्यास लेकर के आए थे तब अच्छा नाना जीन के बहुत अच्छे

100
00:07:48,120 --> 00:07:52,280
मित्र थे और उससे पहले से ही काफी अच्छे मित्र रहे थे इसका

101
00:07:52,280 --> 00:07:56,440
वर्णन हां मेरे नाना जी बड़े नाना जी मेरे श्री हित

102
00:07:56,440 --> 00:08:00,640
शरण शर्मा उनका नाम था वृंदावन में इनका निवास

103
00:08:00,640 --> 00:08:05,000
था और ये प्रभुपाद भन स्वामी प्रद के बहुत अच्छे मित्र थे तो

104
00:08:05,000 --> 00:08:09,280
प्रभुपाद जी कई बार नाना जी के य घर भी पधारे हैं और

105
00:08:09,280 --> 00:08:13,440
जब उन्होंने भागवत इंग्लिश में पहली बार लिखना प्रारंभ किया प्रभुपाद ने

106
00:08:13,440 --> 00:08:17,840
तो छ पाने के पैसे नहीं थे तब नाना जी ने विदाउट

107
00:08:17,840 --> 00:08:21,880
एनी कॉस्ट अपनी निजी प्रिंटिंग प्रेस राधा प्रेस के नाम से

108
00:08:21,880 --> 00:08:26,000
दिल्ली में जो है उसमें प्रिंट करा कर के छापा था और प

109
00:08:26,000 --> 00:08:30,120
को कहा था प्रभुपाद जी को कि आपके पास जब धन आ जाए तब आप इस पेमेंट कर

110
00:08:30,120 --> 00:08:34,240
दीजिएगा पहला भागवत का सेट और प्रभुपाद की पहली बैक टू गॉड हेड

111
00:08:34,240 --> 00:08:38,320
जब सन्यास लेकर आए थे तब जो छपी है तो राधा प्रेस में छपी है नाना जी की

112
00:08:38,320 --> 00:08:42,520
जो निजी प्रिंटिंग प्रेस थी वहा और उसके पश्चात सत स्वरूप

113
00:08:42,520 --> 00:08:46,640
दास गोस्वामी जिन्होंने यह प्रभुपाद लीलामृत लिखा है उसको लिखने

114
00:08:46,640 --> 00:08:50,680
के समय भी मेरे नाना जी के घर दिल्ली में आकर के काफी महीनों तक उन्होंने

115
00:08:50,680 --> 00:08:55,240
निवास किया और इसके प्रभुपाद लीलामृत के लेखन का कार्य किया है

116
00:08:55,240 --> 00:08:59,960
तो ऐसा था कि वहां पर मेरे ननिहाल में प्रभुपाद के ग्रंथ

117
00:08:59,960 --> 00:09:04,400
शुरू से ही मौजूद थे मैं बचपन से ही उनको मुझे पढ़ने

118
00:09:04,400 --> 00:09:08,760
का और उनको देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो कई सारे इनके ग्रंथ

119
00:09:08,760 --> 00:09:13,320
आत्म साक्षात्कार का विज्ञान हिंदी में भी इंग्लिश में भी थे प्रभुपाद लीलाम

120
00:09:13,320 --> 00:09:17,400
उनका अध्ययन मैंने काफी पहले से ही मेरा हो चुका था

121
00:09:17,400 --> 00:09:21,640
चैतन्य चरिता और भागवत का अध्ययन मैंने तब नहीं किया हमारे

122
00:09:21,640 --> 00:09:25,960
परिवार था वल्लभ संप मथुरा के थे वल्लभ

123
00:09:25,960 --> 00:09:30,640
संपदा तो जब मैं था

124
00:09:30,640 --> 00:09:32,880
तो तब मैं तब भी मैं स्कन

125
00:09:32,880 --> 00:09:37,440
के कांटेक्ट में आया थान पुणे में राधेश्याम प्रभु

126
00:09:37,440 --> 00:09:42,040
राधेश्याम दास ब्रह्मचारी राधेश्याम प्र काफी अच्छे भक्त

127
00:09:42,040 --> 00:09:46,520
है तलंग तैलंग नहीं तमिल ब्राह्मण परिवार से बिलंग करते

128
00:09:46,520 --> 00:09:50,560
थे वो उनके कांटेक्ट में रहा व उनका वॉइस

129
00:09:50,560 --> 00:09:54,800
नाम का ग्रुप चलता है और वहां पर मायापुर वॉइस

130
00:09:54,800 --> 00:09:58,800
नाम से था भारतीय विद्यापीठ के पास वहां मैं जाया करता

131
00:09:58,800 --> 00:10:02,840
था वहां मुझे काफी अच्छा लगता था प्रारंभ

132
00:10:02,840 --> 00:10:06,960
में तो नहीं नहीं भगवान का नाम लिया जा रहा हैको भगवान के नाम लेने के बारे में बताया जा रहा है

133
00:10:06,960 --> 00:10:11,000
आस्तिक बना रहे सब लोगों को और जब उन्ह पता लगा कि मेरे नाना जी

134
00:10:11,000 --> 00:10:15,040
प्रभुपाद के बहुत अच्छे मित्र थे और प्रभुपाद लीलामृत में नाना जी के बारे में

135
00:10:15,040 --> 00:10:20,440
लिखा हुआ है तो तो मुझे आग्रह करके बला

136
00:10:20,440 --> 00:10:22,800
हु

137
00:10:22,800 --> 00:10:27,520
लीला प्रभुपाद लीलामृत में नाना जी के बारे में उन्होंने

138
00:10:27,520 --> 00:10:31,720
काफी लिख रखा है और इवन तो ये आप थोड़ा सा डिस्क्रिप्शन बता

139
00:10:31,720 --> 00:10:35,720
सकते हैं कहां पर लिखा है यह बिल्कुल बता सकता हूं

140
00:10:35,720 --> 00:10:41,360
मैं प्रभुपाद लीलामृत में जो

141
00:10:41,360 --> 00:10:45,480
है अच्छा मेरी स्क्रीन यहां पर शेयर हो पाएगी शायद नहीं हो पाएगी

142
00:10:45,480 --> 00:10:50,560
आपकी वो बुक बुक से दिखाना है ना आपकी

143
00:10:50,560 --> 00:10:55,240
आपकी बुक से दिखाना है प्रती

144
00:10:55,240 --> 00:11:00,920
जी आपकी आवाज नहीं आ रही अभी

145
00:11:00,920 --> 00:11:05,160
हेलो हा जीी आवाज आ रही है मेरी अभी आवाज आ रही है आपकी

146
00:11:05,160 --> 00:11:09,520
बुक से दिखाना है बुक में लेकिन य प्रभुपाद लीलामृत

147
00:11:09,520 --> 00:11:13,880
का वो नहीं है स्क्रीनशॉट नहीं है में प्रभुपाद लीला

148
00:11:13,880 --> 00:11:17,920
कोई बात नहीं बाद में आप दे दीजिएगा हम पिन कमेंट में डाल देंगे कोई बात

149
00:11:17,920 --> 00:11:22,080
इसके पश्चात प्रने ख

150
00:11:22,080 --> 00:11:26,240
को वे सब्रह करके नाना जी को म

151
00:11:26,240 --> 00:11:30,680
मामा जी को दिए गए थे वो सब मेरे पास में है ओरिजनल लेटर प्रभुपाद

152
00:11:30,680 --> 00:11:35,160
के और नान एक चीज मैं क्लियर कर दू

153
00:11:35,160 --> 00:11:39,280
की प्रत्युष जी के जो नाना जी है उनके

154
00:11:39,280 --> 00:11:43,520
प्रभुपाद जी मित्र थे और प्रत्युष जी के जो नाना जी है उनका

155
00:11:43,520 --> 00:11:47,520
नाम जो प्रभुपाद लीलामृत नाम के नाम की पुस्तक

156
00:11:47,520 --> 00:11:51,520
छपती स्कोन द्वारा उसमें दिया गया है

157
00:11:51,520 --> 00:11:55,720
और इसके साथ ही साथ इसके साथ बहुत से ऐसे लेटर्स

158
00:11:55,720 --> 00:11:56,480
है जो इनके

159
00:11:56,480 --> 00:12:01,160
पास अभी भी है जो उनके बीच में जो पत्राचार हुआ है

160
00:12:01,160 --> 00:12:05,640
प्रभुपाद जी और इनके नाना जी के बीच है ना तो ये प्रभुपाद

161
00:12:05,640 --> 00:12:09,720
जी को जानने की जो एक बात है ना कैसे जानते हैं तो उस बारे में बात हो रही

162
00:12:09,720 --> 00:12:13,760
जी बताए तो इसके बाद जब वहा वॉइस

163
00:12:13,760 --> 00:12:19,760
में मैंने चैतन्य चरितामृथम

164
00:12:27,280 --> 00:12:31,600
ने श्रीमद वल्लभ जी के साथ वाद विवाद किया

165
00:12:31,600 --> 00:12:35,720
भक्ति रसा मृत सिंधु नामक ग्रंथ प ये रूप गोस्वामी द्वारा लिखित

166
00:12:35,720 --> 00:12:39,720
ग्रंथ है कथा ऐसी आती है भक्ति रत्नाकर में बंगाली ग्रंथ है इसमें

167
00:12:39,720 --> 00:12:43,880
ऐसी कथा आती कि भक्ति रसा मृत सिंधु का लेखन रूप गोस्वामी ने किया तब जीव

168
00:12:43,880 --> 00:12:48,080
गोस्वामी वही थे और श्री वल्लभाचार्य मिलने आए उनसे तो उन्होंने अपनी

169
00:12:48,080 --> 00:12:52,120
पुस्तक दिखाई वल्लभाचार्य जी कोय भक्ति रसा सिंधु हमने लिखा आप

170
00:12:52,120 --> 00:12:56,320
इसको देखें तो उन्होंने देख कर उसम कुछ त्रुटि बताई तो जीव गोस्वामी

171
00:12:56,320 --> 00:13:00,360
जो थे वो उन्होंने वाद किया उनसे नहीं नहीं आप ऐसा कैसे कह सकते हैं

172
00:13:00,360 --> 00:13:04,360
वाद करके उनको पराजित किया तो वल्लभाचार्य जी चले गए किय तो

173
00:13:04,360 --> 00:13:08,640
आपका शिष्य बड़ा होशियार है तब रूप गोस्वामी ने कहा कि क्यों भाई तुम

174
00:13:08,640 --> 00:13:11,480
वो नहीं तुम्हारे अंदर ऐसे मैनर्स नहीं है ये शिष्टाचार

175
00:13:11,480 --> 00:13:15,520
नहीं आया अभी तुम्हारे अंदर धैर्य नहीं आया तुमने ऐसे इतने

176
00:13:15,520 --> 00:13:19,680
वैष्णव चार्य से कैसे तुमने वाद विवाद किया जब अभी तुम वापस

177
00:13:19,680 --> 00:13:23,840
जाओ बंगाल और जब मन तुम्हारा शांत हो जाए तब यहां आना वृंदावन

178
00:13:23,840 --> 00:13:28,200
और ऐसा कह कर उनका त्याग कर दिया ऐसी स्टोरी आती है

179
00:13:28,200 --> 00:13:32,280
लेकिन इस कथा में कठिनाई यह है कि भक्ति

180
00:13:32,280 --> 00:13:36,600
रसा मृत सिंधु ग्रंथ का लेखन 1542 ईसवी

181
00:13:36,600 --> 00:13:40,680
में हुआ है और महाप्रभु श्रीमद वल्लभाचार्य जी इसके

182
00:13:40,680 --> 00:13:44,160
कई वर्ष पहले 1530

183
00:13:44,160 --> 00:13:48,160
299 ईसवी में लीला प्रवेश कर चुके थे

184
00:13:48,160 --> 00:13:52,280
वाराणसी तो असंभव है कि भक्ति रसा मृत सिंधु

185
00:13:52,280 --> 00:13:56,520
भक्ति रसा सिंधु के ऊपर कोई वाद हुआ हो अथवा यह भी असंभव है कि जीव गोस्वामी

186
00:13:56,520 --> 00:14:00,680
जी ने महाप्रभु वल्लभाचार्य के दर्शन ही किए हो क्योंकि इनका वृंदावन

187
00:14:00,680 --> 00:14:04,760
आगमन का जो संवत दिया जाता है व संवत ही

188
00:14:04,760 --> 00:14:08,960
1535 ईसवी कहा जाता है खुद प्रभुपाद के द्वारा और खाली

189
00:14:08,960 --> 00:14:13,240
प्रभुपाद ही नहीं कई सारे ग्रंथ और भी हमें प्राप्त होते हैं

190
00:14:13,240 --> 00:14:17,240
एक जगदानंद दास जी नाम के गौड़ीय वैष्णव भी थे इन्होंने

191
00:14:17,240 --> 00:14:21,240
भी सेम यही बात लिखी है अपने ब्लॉग में अपने आर्टिकल में कि

192
00:14:21,240 --> 00:14:25,400
यह बात संभव नहीं है वल्लभाचार्य जी से जीव गोस्वामी किसी

193
00:14:25,400 --> 00:14:27,040
भी परिस्थिति में

194
00:14:27,040 --> 00:14:31,600
भेंट कर ही नहीं सकते तो बेट करके वाद करके उनको पराजित करना

195
00:14:31,600 --> 00:14:35,840
तो मैंने उनको कहा जब संभव नहीं है तोय आया कैसे इसका मतलब

196
00:14:35,840 --> 00:14:40,520
किसी ने इसमें इंटरपोलेशन किया है बाद में इसको प्रक्षिप्त कर दिया गया

197
00:14:40,520 --> 00:14:44,600
तो तब से मेरा थोड़ा वहा से टपट प्रारंभ हुई और उसके बाद जब

198
00:14:44,600 --> 00:14:48,720
चैतन्य चिमत को देखा तो उसमें तो बहुत सारी ऐसी चीजें आई जिनके बारे

199
00:14:48,720 --> 00:14:53,080
में अभी हम आगे चर्चा करेंगे तो तब फिर मैं वहां से अलग हुआ

200
00:14:53,080 --> 00:14:57,200
और तभी उसी समय के दौरान मैं मेरे गुरुजी पूज्य गोस्वामी

201
00:14:57,200 --> 00:15:01,200
श्याम मनोहर दीक्षित जी महाराज इनसे मैं मिला तब

202
00:15:01,200 --> 00:15:05,200
तो खर उन्होंने ज्ञान की गंगा ब आप अपने अपने गुरु महाराज

203
00:15:05,200 --> 00:15:09,680
जी अपनी परंपरा का भी थोड़ा उनकी गुरु महाराज जी की और वहां से लेकर वल्लभाचार्य

204
00:15:09,680 --> 00:15:14,040
जी तक की थोड़ी सी बता दे लोगों को जी जी मेरे गुरु जी गोस्वामी

205
00:15:14,040 --> 00:15:18,400
श्याम मनोहर दीक्षित जी महाराज श्री य आप श्री किशनगढ़

206
00:15:18,400 --> 00:15:22,520
से बिलोंग करते हैं किशनगढ़ राज परिवार के गुरु

207
00:15:22,520 --> 00:15:26,680
रहे हैं शुरू से मतलब प्रारंभ से तो उस फैमिली से बिलोंग

208
00:15:26,680 --> 00:15:30,720
करते हैं एंड किशनगढ़ में आप श्री का मूल निवास स्थान है और

209
00:15:30,720 --> 00:15:34,840
फिलहाल मुंबई यूनिवर्सिटी में वल्लभ वेदांत का अध्यापन

210
00:15:34,840 --> 00:15:39,080
करते हैं प्रोफेसर के उस में वो

211
00:15:39,080 --> 00:15:42,080
कोर्स वेदांत में सभी वेदांत उसम

212
00:15:42,080 --> 00:15:46,080
जितने भी वेदांत हमारे सारे दर्शन है उनका इंट्रोडक्टरी रूप में और

213
00:15:46,080 --> 00:15:50,360
वल्लभ वेदांत क्या है कैसा है यह आप श्री वहा अभी पढ़ाते हैं अध्ययन अध्यापन

214
00:15:50,360 --> 00:15:55,000
करते हैं आप ने कई सारे ग्रंथ भी लिखे हैं एंड

215
00:15:55,000 --> 00:16:01,000
पंडित चराज को भी आप श्री ने विष्णु पद गायन सिखाया

216
00:16:01,720 --> 00:16:05,720
बहुत वेदांत पर और इतिहास के विषय पर आप

217
00:16:05,720 --> 00:16:09,720
बहुत बहुत सूक्ष्म और गहन प आप श्री के पिताजी दीक्षित जी महाराज

218
00:16:09,720 --> 00:16:13,760
जो थे बृहण मंदिर मोटा मंदिर मुंबई के उन्हो दीक्षित जी

219
00:16:13,760 --> 00:16:18,200
महाराज का जो मोटा मंदिर था इसकी ऐसी बात है कि प्रभुपाद

220
00:16:18,200 --> 00:16:22,200
जो थे उन्हें यूएस जाना था और इसके लिए

221
00:16:22,200 --> 00:16:26,280
वे मोटा मंदिर में आकर के उन्होंने जो मोटा मंदिर

222
00:16:26,280 --> 00:16:30,360
की सीढ़िया है प्रभुपाद वहां पर बैठ जाते थे और और दीक्षित जी से विनती की आप हमें

223
00:16:30,360 --> 00:16:34,360
वहा भिजवाए यूएस भिजवाए तो ऐसा जब कुछ

224
00:16:34,360 --> 00:16:38,600
दिनों तक हुआ तब दीक्षित जी ने उनकी शिष्या थी सुमति मुरार जी मुरार

225
00:16:38,600 --> 00:16:42,680
जी देसाई की धर्मपत्नी उन्होने सुमति मुरार जी को कहा आप इनको

226
00:16:42,680 --> 00:16:46,840
यूएस भिजवाने का प्रयत्न करें सुमति मु जी ने अपनी गुरु आज्ञा का पालन

227
00:16:46,840 --> 00:16:51,200
किया और प्रभुपाद को अपनी प्राइवेट शिपिंग कंपनी के जहाज जलदूत

228
00:16:51,200 --> 00:16:56,640
में म जलदूत में उनको यूएस पहुंचाया था

229
00:16:56,640 --> 00:16:57,640
तो

230
00:16:57,640 --> 00:17:01,800
बहुत अच्छे इनके संबध रहे थे लेकिन उसके पश्चात कुछ

231
00:17:01,800 --> 00:17:05,920
ऐसी घटनाए हुई जिससे उन्होंने महाप्रभु जी के बारे में जब कुछ

232
00:17:05,920 --> 00:17:09,920
आर्टिकल लिखे तो कुछ प्रश्न उठने लगे तब

233
00:17:09,920 --> 00:17:13,920
श्याम मनोहर दीक्षित जी ने अपने पिताजी से पूछा कि भा

234
00:17:13,920 --> 00:17:18,480
आप ऐसा पत्र छाप रहे हैं तो हमें क्या करना चाहिए तो उन्होने कहा आप उत्तर लिखो इसका

235
00:17:18,480 --> 00:17:23,000
तो दीक्षित जी की आज्ञा से श्याम मनोहर जी ने उनसे पत्राचार भी किया

236
00:17:23,000 --> 00:17:27,160
प्रभुपाद से वो पत्राचार का फिर उन्होंने उत्तर दिया फिर तिलका

237
00:17:27,160 --> 00:17:31,520
महाराज ने जो नाथ द्वारा में श्री जी के प्रधान पीठ के तिलका महाराज

238
00:17:31,520 --> 00:17:35,520
सेवायत आप श्री गोवर्धन लाल जी महाराज श्री ने भी बहुत लंबा

239
00:17:35,520 --> 00:17:39,560
पत्राचार किया प्रभुपाद से उसका भी उत्तर आया और उनकी सबकी

240
00:17:39,560 --> 00:17:43,960
समीक्षा मैंने मेरी पुस्तक में करी हुई है जो जो उत्तर प्रभुपाद की तरफ से आए

241
00:17:43,960 --> 00:17:48,000
श्रीधर स्वामी आदि को लेकर के जो जो बातें उन्होंने कही विष्णु स्वामी आदि

242
00:17:48,000 --> 00:17:52,240
को लेकर के महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को लेकर के जो जो बातें कही उन सबकी समीक्षा

243
00:17:52,240 --> 00:17:56,840
की है उसके पश्चात उनके शिष्यों ने जो जो बातें कही उसकी भी हमने समीक्षा करी

244
00:17:56,840 --> 00:18:00,520
खर सो यहां

245
00:18:00,520 --> 00:18:04,600
प्रारंभ हुआ जी कुल मिलाकर के दर्शकों को

246
00:18:04,600 --> 00:18:08,600
इसमें अब कोई डाउट नहीं होना चाहिए कि यह कितने प्रामाणिक है वल्लभ संप्रदाय

247
00:18:08,600 --> 00:18:12,680
की ओर से और जो प्रभुपाद

248
00:18:12,680 --> 00:18:16,840
जी है उनके बारे में जितना शायद एक आम फॉलोअर

249
00:18:16,840 --> 00:18:20,840
नहीं जानता होगा इनको वो तक बातें पता है तो

250
00:18:20,840 --> 00:18:24,840
आज हम इन्हीं सब बातों बात करने चाह रहे अच्छा मैं यह जो बात

251
00:18:24,840 --> 00:18:29,960
है कि उन्होंने दावा किया गया

252
00:18:29,960 --> 00:18:34,640
कि उन्होंने वल्लभाचार्य जी का खंडन किया यह दावा किया जाता है स्कोन

253
00:18:34,640 --> 00:18:38,760
के द्वारा है ना तो इसमें टाइम लाइन ही अलग अलग है दोनों

254
00:18:38,760 --> 00:18:43,400
की मतलब 10 12 साल 20 साल का अंतर है ऐ

255
00:18:43,400 --> 00:18:47,520
गोस्वामी जी ने महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से वाद किया यह असल में भक्ति

256
00:18:47,520 --> 00:18:51,640
रत्नाकर नाम का बंगाली ग्रंथ है जिसमें आता है और सच्ची बात तो यह है

257
00:18:51,640 --> 00:18:55,880
कि जितने भी रिसर्चर हुए हैं बंगाल के ही या फिर कोई

258
00:18:55,880 --> 00:19:00,040
भी जैसे अमिया पी सेन है इन्होंने चैतन्य हिज

259
00:19:00,040 --> 00:19:04,280
एसोसिएट्स एंड हिज लाइफ ऐसी बुक लिखी है उसमें वो से लेकर

260
00:19:04,280 --> 00:19:08,480
के चाहे राधाश्याम बागची हो इन सभी को इनवेरिएबली स्वीकारना

261
00:19:08,480 --> 00:19:14,480
पड़ा है कि यह चीज संभव नहीं है जो चैतन्य चरितामृथम

262
00:19:15,240 --> 00:19:19,280
ग्रंथों की प्राचीन ग्रंथों की विरोधी है वो संभव ही

263
00:19:19,280 --> 00:19:23,520
नहीं है और फिर भी चैतन्य चरितामृथम पी

264
00:19:23,520 --> 00:19:27,640
सेन कहते हैं कि इन बातों को लेखक ने बाद में जाकर के अपनी ओर से लिखा

265
00:19:27,640 --> 00:19:31,960
है इनका कोई प्रमाण नहीं है ये योग्राफी योग्राफी याने

266
00:19:31,960 --> 00:19:36,120
बढ़ा चढ़ा करके लिखी गई कथा हा हा जैसे किया जाता

267
00:19:36,120 --> 00:19:40,280
है जी ठीक है तो अभी एक हमारे सामने एक वीडियो

268
00:19:40,280 --> 00:19:45,640
आया था जिसमें प्रभुपाद जी के दो शिष्य आपस में बात कर रहे

269
00:19:45,640 --> 00:19:49,880
हैं दोनों फॉरेनर्स ही है ऑपरेटर जी आप वो वीडियो

270
00:19:49,880 --> 00:19:54,080
दिखा सकते हैं अभी आपको भेजा गया था कुछ समय पहले

271
00:19:54,080 --> 00:19:58,080
रिसेंट वीडियो वही भेजा हमने आपको प्रत

272
00:19:58,080 --> 00:20:04,080
जी आप नहीं रहे हैं मतलब आपका फ्रीज हो गया है जो चित्र

273
00:20:18,760 --> 00:20:23,000
है प्रत जी आपका जो चित्र है वो रुक गया

274
00:20:23,000 --> 00:20:27,200
है और अभी कुछ समय पूर्व हमने ऑपरेटर

275
00:20:27,200 --> 00:20:31,520
जी आपको उपलब्ध कराया वीडियो वो थोड़ा सा आप

276
00:20:31,520 --> 00:20:35,720
दिखाए तब तक इनको जवाब देते एलियन जी आप

277
00:20:35,720 --> 00:20:40,080
आना चाहते हैं अ चर्चा के

278
00:20:40,080 --> 00:20:46,080
लिए तो

279
00:20:59,640 --> 00:21:03,920
तो ऐसा है कि पहली बात तो आज हम लोग चर्चा

280
00:21:03,920 --> 00:21:09,920
करेंगे

281
00:21:13,720 --> 00:21:18,160
नहीं सम पायस फ्रड गोइंग न देर

282
00:21:18,160 --> 00:21:24,160
राइट सो देन

283
00:21:29,200 --> 00:21:34,960
यह आप प्ले करिएगा जब वो वापस आ जाए

284
00:21:34,960 --> 00:21:39,280
तो एलियन जी आज जो है हम लोग

285
00:21:39,280 --> 00:21:43,960
वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा नहीं करने बैठे हैं

286
00:21:43,960 --> 00:21:48,080
आज हम लोग इसकन को समझ रहे

287
00:21:48,080 --> 00:21:52,080
हैं इन द पर्सपेक्टिव इन द पर्सपेक्टिव ऑफ

288
00:21:52,080 --> 00:21:56,200
वल्लभ संप्रदाय स्कोन के क्लेम कितने अनर गर्ल

289
00:21:56,200 --> 00:22:01,320
और झूठे हैं

290
00:22:01,320 --> 00:22:05,840
है ना

291
00:22:05,840 --> 00:22:10,600
तो और

292
00:22:10,600 --> 00:22:14,760
कैसे यह सब चीजें अभी सामने आएंगी वह अभी डिस्कनेक्ट हो गए

293
00:22:14,760 --> 00:22:18,840
किसी कारण वश और हम लोग इंतजार कर रहे हैं कि वह जल्दी से जल्दी आए तब

294
00:22:18,840 --> 00:22:24,840
तक हम लोग बात कर ले एक मैत्रे जी है मातृशक्ति

295
00:22:24,960 --> 00:22:29,920
हैं उनसे भी हमें मिलना है क्योंकि

296
00:22:29,920 --> 00:22:34,440
वो काफी अच्छे से वर्णाश्रम धर्म इत्यादि को रिप्रेजेंट

297
00:22:34,440 --> 00:22:38,600
कर रही हैं प्रत्यूष जी आ गए मगर प्रत्यूष

298
00:22:38,600 --> 00:22:42,800
जी एक बात का हमारा और शिकायत रहेगी कि आपका पूरा वीडियो ऐसे

299
00:22:42,800 --> 00:22:46,880
ही आएगा हां ये कटा हुआ आ रहा है मैं इसका प्रयास कर रहा हूं

300
00:22:46,880 --> 00:22:52,880
क्योंकि ये आप आप मोबाइल से जुड़ सकते हैं

301
00:22:56,720 --> 00:23:01,200
क्या ये ठीक है हां ठीक है

302
00:23:01,200 --> 00:23:03,600
ठीक

303
00:23:03,600 --> 00:23:07,760
है थोड़ा सा उसको और ऐसे कर लीजिए हल्का सा ऊपर

304
00:23:07,760 --> 00:23:11,560
की

305
00:23:11,560 --> 00:23:15,560
ओर अभी ठीक हुआ था अभी ठीक हुआ था

306
00:23:15,560 --> 00:23:21,560
बस नीचे आ जाता है

307
00:23:23,600 --> 00:23:28,960
वापस योगा ऑफ लव का रिप्लाई नहीं आया आपको क्या लगता है आएगा

308
00:23:28,960 --> 00:23:33,360
मुश्किल है अब ठीक है परफेक्ट

309
00:23:33,360 --> 00:23:35,640
ठीक

310
00:23:35,640 --> 00:23:40,240
हा

311
00:23:40,240 --> 00:23:44,320
तो यह एक वीडियो हम हमारे पास आया है जिसमें कि प्रभुपाद

312
00:23:44,320 --> 00:23:48,320
जी के शिष्य हैं दोनों आपस में बात कर रहे हैं एक

313
00:23:48,320 --> 00:23:52,640
प्रभुपाद के शिष्य है एक प्रभुपाद के शिष्य है और एक उनके

314
00:23:52,640 --> 00:23:56,720
शिष्य है अच्छा तो इसको जरा जरा वीडियो दिखा

315
00:23:56,720 --> 00:24:02,720
दीजिए लोगों को ये वीडियो देख लीजिए आप

316
00:24:04,480 --> 00:24:08,640
लोग तो इसमें वो किस तरह से द्वेष भावना

317
00:24:08,640 --> 00:24:13,400
भरी हुई है ये जो कहते हैं ना प्रामाणिक संप

318
00:24:13,400 --> 00:24:18,440
जीय फ्रड गोइंग ऑन देर राइ सो

319
00:24:18,440 --> 00:24:22,440
देन सो व रिली डिस्कसिंग र इ

320
00:24:22,440 --> 00:24:27,080
द बबस देर हिस्टरी टू द बप

321
00:24:27,080 --> 00:24:31,280
नॉट एकली लाइक ए ब दे अ बिट

322
00:24:31,280 --> 00:24:35,400
हिस्टरी देर एंड इन द हिस्ट दे

323
00:24:35,400 --> 00:24:40,160
स्लिंग द थेफ्ट अ अ टी

324
00:24:40,160 --> 00:24:44,600
एंड अ कोर्ट केस एंड अ

325
00:24:44,600 --> 00:24:48,880
अ रिस्टड कोर्ट केस जस्ट ू जंप अहेड इन द स्टोरी

326
00:24:48,880 --> 00:24:53,640
श प्रप आ गु म ड

327
00:24:53,640 --> 00:24:55,360
हिज डिपल

328
00:24:55,360 --> 00:25:00,200
अ ग r महाराज अ

329
00:25:00,200 --> 00:25:04,200
सस अ न् स्टडिंग इन इसन व

330
00:25:04,200 --> 00:25:08,600
बक इन द डे वन गिराज महारा वाज

331
00:25:08,600 --> 00:25:13,040
द टपल प्रेसिडेंट द बमबे

332
00:25:13,040 --> 00:25:18,120
टपल ज इ j जपल इ

333
00:25:18,120 --> 00:25:22,240
बमबे ही रिस्टड गही सेड हि इफ य इफ

334
00:25:22,240 --> 00:25:26,920
यू एवर बम पावरफुल इन र वडस इसकन एवर बम्स पावरफुल र

335
00:25:26,920 --> 00:25:31,120
इन इंडिया एंड इन a स् पो देन य यू शड टेक द

336
00:25:31,120 --> 00:25:35,120
बबस ट कोट ए यू श सु एंड यू

337
00:25:35,120 --> 00:25:39,400
शड ग आटी द दे स्टोल

338
00:25:39,400 --> 00:25:43,560
यू श गट द टी बक वर स्किंग अब द टी अफ

339
00:25:43,560 --> 00:25:48,080
ी इ थ इ न

340
00:25:48,080 --> 00:25:52,280
स there's a हिस्ट हा

341
00:25:52,280 --> 00:25:56,520
आ इ ग p

342
00:25:56,520 --> 00:26:01,000
b वा s बन ट

343
00:26:01,000 --> 00:26:05,400
वशिप गोल दले

344
00:26:05,400 --> 00:26:10,920
ड ठीक है मेरे खल से इतना काफी

345
00:26:10,920 --> 00:26:15,800
है जीय बो रहे

346
00:26:15,800 --> 00:26:20,600
हा जी बताइए प्रभुपाद ने अपने शिष्य गिरिराज

347
00:26:20,600 --> 00:26:24,720
को बोला कि इफ यू कैन गेट एनफ पावर इन फ्यूचर यू शुड टेक

348
00:26:24,720 --> 00:26:28,840
बैक आवर डीटी फ्रॉम लवाइट एंड देम टू कोर्ट कि इनको

349
00:26:28,840 --> 00:26:32,960
आपको कोर्ट में लेकर जाना चाहिए और हमारे जो डीटी है हमारी

350
00:26:32,960 --> 00:26:37,040
जो विग्रह है वो इन्होने चुराए ऐसा यह प्रभुपाद

351
00:26:37,040 --> 00:26:41,120
ने कहा अब यदि ऐसी बात है तो फिर तो यही बात हो गई कि परोक्ष कार्य

352
00:26:41,120 --> 00:26:45,360
अता प्रत्यक्ष प्रिय वाद क्योंकि प्रभुपाद

353
00:26:45,360 --> 00:26:49,480
जो दीक्षित जी महाराज की कृपा से यूएस पहुंचे थे एक

354
00:26:49,480 --> 00:26:53,520
पुष्टि मार्गी वण सुमति मुरार जी ने प्रभुपाद की सहायता करी बहुत

355
00:26:53,520 --> 00:26:57,680
से पुष्टिमार्ग ने और भी प्रभुपाद की सहायता करी उनसे वे पहुंच पाए

356
00:26:57,680 --> 00:27:02,320
यूएस तक तक और वहां पहुंचने के पश्चात जब इसकन पावरफुल हो जाएगा

357
00:27:02,320 --> 00:27:06,600
तो ये श्रीनाथ जी को वल्लभ संप्रदाय से छीन ले

358
00:27:06,600 --> 00:27:11,320
ऐसा कह रहे हैं प्रभुपाद अब ये पता नहीं ने क्यों कहा

359
00:27:11,320 --> 00:27:15,440
अच्छा एक लेकिन इसकन की वैष्णव है दूति

360
00:27:15,440 --> 00:27:19,480
देवी दासी जी परिचित है उनसे बात हुई है

361
00:27:19,480 --> 00:27:23,480
उन्होंने गिरिराज महाराज से पूछा कि महाराज कुछ ऐसा प्रभुपाद ने

362
00:27:23,480 --> 00:27:26,040
आपसे कहा था क्या तो गिरिराज महाराज ने नाय कर दिया कि नो

363
00:27:26,040 --> 00:27:30,040
नोनो ऐसा नहीं कहा था अ तो गिरिराज महाराज झूठ बोल गए

364
00:27:30,040 --> 00:27:34,040
या तो ये झूठ बोल अब एक चीज यहां पर

365
00:27:34,040 --> 00:27:38,040
हम देखेंगे गराज महाराज ने एक बुक लिखी है उस बुक को

366
00:27:38,040 --> 00:27:42,400
हम य पर एनालिसिस करेंगे अभी अंत में उस बुक में हम ये देखेंगे कि गिरिराज

367
00:27:42,400 --> 00:27:46,680
महाराज ने और भी कुछ मिसकनसेप्शन को फैलाने का कार्य किया है

368
00:27:46,680 --> 00:27:51,160
तो मेरे हिसाब से तो य य पर सही बोल रहे हैं कि प्रभुपाद ने ऐसा कहा

369
00:27:51,160 --> 00:27:55,320
होगा क्योंकि जब पत्राचार चल रहा मतलब गिराज जी

370
00:27:55,320 --> 00:27:59,400
ने प्रभुपाद जी से भी अग और भी कुछ मिसकनसेप्शन

371
00:27:59,400 --> 00:28:03,680
फैलाए मतलब ऐसा कुछ है हां बिल्कुल और भी मिसकनसेप्शन

372
00:28:03,680 --> 00:28:08,760
फैलाए हैं मत मतलब एक कदम आगे ऐसा

373
00:28:08,760 --> 00:28:13,160
कहना एक कदमस र है प्रभुपाद के डिपल

374
00:28:13,160 --> 00:28:19,160
ये तो प्रभुपाद से और 10 कदम आ ऐसी निंदा

375
00:28:20,760 --> 00:28:24,840
तो कभी भी किसी भी ना तो वैष्णव संप्रदाय और

376
00:28:24,840 --> 00:28:29,040
ना शंकर संप्रदाय ना कोई स्मार्थ ना कोई शव किसी ने भी ऐसी निंदा

377
00:28:29,040 --> 00:28:33,040
नहीं करी है जैसी ये कर गए हैं वो भी दीक्षित जी

378
00:28:33,040 --> 00:28:37,480
की सहायता लेने के पश्चात पुष्टि मार्गी वैष्णव की सहायता लेने के पश्चात जैसी नि

379
00:28:37,480 --> 00:28:42,240
कर गए हैं नरसिंह स्वामी जी पु मार्गी वैष्णव ने

380
00:28:42,240 --> 00:28:46,520
इनको यथा सामर्थ्य सहायता प्रदान की

381
00:28:46,520 --> 00:28:50,600
इनके ग्रंथ छप वाए गए स्कोन वालों के उनको यहां

382
00:28:50,600 --> 00:28:55,160
से वहां विदेश जाना था तो विदेश यात्रा भी व्यवस्थित करवाई गई

383
00:28:55,160 --> 00:28:59,520
और उसके बाद वहां जाकर के पुष्टि मार्ग मागियो के बारे

384
00:28:59,520 --> 00:29:03,880
में ऐसी बात है जो कि मर्यादा के बाहर है अगर आप तात्विक खंडन

385
00:29:03,880 --> 00:29:07,960
करने निकले तो एक बात अलग है नहीं वो ठीक स्वीकार आप

386
00:29:07,960 --> 00:29:12,200
बिल्कुल खंडन करें वो तो आपका अधिकार है बिल्कुल करें

387
00:29:12,200 --> 00:29:16,440
तवा के आधार पर खंडन करें अपने मत के आधार पर खंडन करें व तो बिल्कुल आपका

388
00:29:16,440 --> 00:29:20,320
अधिकार है उसका उत्तर भी दिया

389
00:29:20,320 --> 00:29:24,440
जाएगा व झूठी खबर फैलाना और

390
00:29:24,440 --> 00:29:30,440
फिर क्या कहते

391
00:29:31,000 --> 00:29:35,440
जी अप प्रामाणिक जानकारिया फैलाना बिल्कुल

392
00:29:35,440 --> 00:29:39,480
अपमा जानकारी ये ब अशोभनीय बात है किसी को भी शोभा नहीं

393
00:29:39,480 --> 00:29:43,680
देता कहा अशोभनीय है हम आ देखेंगे प्रभुपाद की जो भी इनकी चर्चा

394
00:29:43,680 --> 00:29:47,840
वगर है वो हम आगे देख एकज और पूछा

395
00:29:47,840 --> 00:29:52,800
की सबसे पहले अगर देखे तो क्योंकि प्रभुपाद जी

396
00:29:52,800 --> 00:29:56,880
जन्म से ब्राह्मण नहीं थे और उन्होंने

397
00:29:56,880 --> 00:30:00,880
सन्यास भी लिया और जैसे कि उन्हो उनके गुरु जो है फोटो से सन्यास

398
00:30:00,880 --> 00:30:04,880
लिया अच्छा तो सबसे पहले तो हम यह जान ले

399
00:30:04,880 --> 00:30:08,960
कि वल्लभ संप्रदाय का क्योंकि आप देख ही रहे हैं कि कौन

400
00:30:08,960 --> 00:30:13,000
किस तरीके से कार्य कर रहा है कि वह कर्म से भी है जन्म से

401
00:30:13,000 --> 00:30:17,080
भी ऐसी खिचड़ी पकाई हुई है और सबसे बड़ी दिक्कत पता है क्या है

402
00:30:17,080 --> 00:30:21,320
कि इनके लोग अगर एक व्यक्ति एक बात बोलेगा तो दूसरा

403
00:30:21,320 --> 00:30:25,400
व्यक्ति उस उस बात को काटते हुए दूसरी बात बोल देगा

404
00:30:25,400 --> 00:30:30,160
तो फिर दिक्कत य आएगी कौन सी बात को बोरहा

405
00:30:30,160 --> 00:30:34,160
है नहीं ये बात आप बिल्कुल सत्य कह रहे हैं यह बात मैंने भी

406
00:30:34,160 --> 00:30:38,280
बहुत बहुत बात देखी है क्योंकि मैंने महाप्रभु के प्रति इस की चीज

407
00:30:38,280 --> 00:30:42,840
आ रही है इसको लेकर के मैंने बहुत पत्र भी लिखे हैं इसने भी भेजे थे

408
00:30:42,840 --> 00:30:46,000
और कई और भी इनको गौड़ी वैष्णव को मेल भी किए

409
00:30:46,000 --> 00:30:50,320
थे लेकिन जी उसके बारे में र मैं आगे चर्चा करूंगा

410
00:30:50,320 --> 00:30:54,680
उसका कभी कोई उतर सबसे पहले हम इसको जान ले कि वल्लभ संप्रदाय

411
00:30:54,680 --> 00:30:58,840
में जो वर्ण व्यवस्था है वह किस आधार

412
00:30:58,840 --> 00:31:03,240
पर है जन्म के आधार पर है और मैं प्रश्न

413
00:31:03,240 --> 00:31:07,480
पूरी तरीके से रख दूं कि अगर वह जन्म के आधार पर ये तो अपना पर्सपेक्टिव

414
00:31:07,480 --> 00:31:11,720
थोड़ा सा बता दीजिए वल्लभ संप्रदाय में आपको क्या ज्ञान प्राप्त हुआ है और फिर

415
00:31:11,720 --> 00:31:15,920
स्कन जो कर रहा है स्कन जो कर रहा है उसको लेकर

416
00:31:15,920 --> 00:31:20,360
के वल्लभ संप्रदाय के दष्ट दृष्टिकोण में आपको जो आपके गुरुजनों

417
00:31:20,360 --> 00:31:24,520
से जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसके अनुसार व स्कोन की व्यवस्था क्या ठीक

418
00:31:24,520 --> 00:31:28,640
है उचित है या जो भी है वो आप थोड़ा सा बता दें जी देखिए

419
00:31:28,640 --> 00:31:33,400
मैं महाप्रभु जी ने जो स्वयं जो वचन कहे हैं उनके आधार पर ही बात करूंगा

420
00:31:33,400 --> 00:31:37,400
महाप्रभु जी ने सदैव अपने नियत वर्णाश्रम धर्म को

421
00:31:37,400 --> 00:31:41,760
पालन करना जैसे यदि ब्राह्मण है तो आप संध्या वंदन करिए आपका नित्य

422
00:31:41,760 --> 00:31:45,800
कर्म है इस प्रकार से अपने

423
00:31:45,800 --> 00:31:49,840
जन्म से ब्राह्मण यदि आप जम से ब्राह्मण है

424
00:31:49,840 --> 00:31:53,880
दे जाए जन्म से कर्म से तो महाप्रभु जी ने दोनों से माना महाप्रभु

425
00:31:53,880 --> 00:31:57,880
जी स्पष्ट रूप से ऐसा लिखते हैं कि जाति

426
00:31:57,880 --> 00:32:01,240
जैसी चल रही है इसका स्वरूप वैसा ना होकर

427
00:32:01,240 --> 00:32:05,240
के महा आगे पुरुषोत्तम जी ने इसको क्लेरिफाई किया है पुरुषोत्तम

428
00:32:05,240 --> 00:32:09,280
जी ने महाप्रभु जी के सभी ग्रंथों पर टीका लिखी तो इसमें उन्होंने एक

429
00:32:09,280 --> 00:32:13,400
अवतार वादा वाली ग्रंथ में ब्राह्मणवादी देवता वाद में इस

430
00:32:13,400 --> 00:32:17,400
इन सब चीजों को क्लियर किया है कि ब्राह्मण जो है वो देवता कैसे है क्या

431
00:32:17,400 --> 00:32:21,880
है तो उसम आप श्री आज्ञा करते हैं कि ब्राह्मण क्षत्रिय

432
00:32:21,880 --> 00:32:26,000
वैश और शूद्र यह चार असल में है क्या क्या ब्रह्मा जी

433
00:32:26,000 --> 00:32:30,680
से चार शरीरों की उत्पत्ति हुई थी चार आत्माओं की उत्पत्ति हुई थी क्योंकि

434
00:32:30,680 --> 00:32:34,680
ब्राह्मण के शरीर में आत्मा तो जन्मांतर में दूसरी आती रहती है

435
00:32:34,680 --> 00:32:38,720
और शरीर की यदि उत्पत्ति हुई थी तो शरीर कैसे ब्राह्मण हो सकता है

436
00:32:38,720 --> 00:32:42,800
शरीर तो मल मूत्र से भरा हुआ है तो उसके ऊपर उन्होंने उत्तर यह दिया है कि असल

437
00:32:42,800 --> 00:32:47,040
में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश और शूद्र ये चार देवों के नाम है जो ब्रह्मा

438
00:32:47,040 --> 00:32:51,320
जी के शरीर से प्रकट हुए अब जो व्यक्ति ब्राह्मण कुल

439
00:32:51,320 --> 00:32:55,640
में जन्मा है जिसके सात पीढ़ी से पिता सात पीढ़ी से माता ब्राह्मण है

440
00:32:55,640 --> 00:32:59,760
वो यदि अपने संस्कार सारे उसने संस्कारों

441
00:32:59,760 --> 00:33:03,840
को ग्रहण किया है गुरु कृपा से संस्कारवान वह है अब वो यदि अपने

442
00:33:03,840 --> 00:33:08,680
नियत कर्मों को करेगा अर्थात संध्या बंदन या फिर जो भी

443
00:33:08,680 --> 00:33:12,680
अग्नि होत्र उपासना आदि विश् देवद यज्ञ उनको करेगा तब

444
00:33:12,680 --> 00:33:16,320
तो उसमें इन ब्राह्मण देवता का आवेश होगा तब वह

445
00:33:16,320 --> 00:33:20,320
ब्राह्मण कहा जाएगा यदि उसने विरोध में कर्म किया जन्म

446
00:33:20,320 --> 00:33:25,120
लेने के बाद भी तो पतित हो जाएगा तो वो चांडाल समान ब्राह्मण नहीं

447
00:33:25,120 --> 00:33:29,880
जैसे उसने सुरा पान योग्यता है

448
00:33:29,880 --> 00:33:33,960
नॉमिनेटेड है पर सिलेक्टेड नहीं है हा बिल्कुल बिल्कुल

449
00:33:33,960 --> 00:33:38,040
मतलब नॉमिनेटेड है पर सिलेक्टेड नहीं हम भी इसी बात को प्रचारित करते हैं

450
00:33:38,040 --> 00:33:42,080
कि भाई जन्म से होना चाहिए फिर यदि उसके कर्म होंगे तो उसका

451
00:33:42,080 --> 00:33:46,360
सिलेक्शन होगा कर्म नहीं होंगे तो कर्महीन प तो बहिष्कृत हो

452
00:33:46,360 --> 00:33:50,560
जाएगा जाति बहिष्कृत आप हो जाए तो इसलिए महाप्रभु जी ने जन्म

453
00:33:50,560 --> 00:33:55,080
और कर्म दोनों को कहा है और यही चीज भगवान

454
00:33:55,080 --> 00:33:59,440
जन्म और कर्म ही दोनों सारे संप्रदाय जन्म और कर्म को ही लेक चलते हैं

455
00:33:59,440 --> 00:34:03,600
कोई भी व्यास गद्दी पर तभी बैठ पाएगा व्यास गद्दी पर तभी बैठ

456
00:34:03,600 --> 00:34:07,880
पाएगा जब उसने जन्म भी लिया हो फिर जन्मा निसार फिर अपने वर्ण के वर्ण

457
00:34:07,880 --> 00:34:12,040
गत उसने आचरण को धारण भी किया हो मगर

458
00:34:12,040 --> 00:34:16,080
ऐसा नहीं कर सकते केवल जन्म ले लिया मगर उसने सारे कार्य विपरीत किए उसको

459
00:34:16,080 --> 00:34:20,160
व्यास बना दिया जाए गुरु बना दिया जाए और ऐसा भी नहीं किया जाएगा

460
00:34:20,160 --> 00:34:24,480
केवल उसने कर्म अच्छे कर लिए मगर वो उस उस वर्गत

461
00:34:24,480 --> 00:34:28,880
उसमें कुल में जन्म नहीं लिया है तो उसको भी हम वो नहीं करेंगे

462
00:34:28,880 --> 00:34:31,520
मगर हम नहीं करेंगे ऐसी बात नहीं है

463
00:34:31,520 --> 00:34:36,240
हमारे वेदों में ऐसी लिमिटेशन है वेदों में स्पष्ट रूप से इस बात को कहा गया है

464
00:34:36,240 --> 00:34:40,280
जैसे हमारे अवाद मंत्र जो ब्राह्मण लेते

465
00:34:40,280 --> 00:34:44,440
हैं तो उसम प्रवर होते हैं ब्राह्मणों के प्रवर यानी

466
00:34:44,440 --> 00:34:48,760
जो हमारे पूर्वज ऋषि मंत्र दृष्टा ऋषि रहे उनके नाम ही प्रवर है अब

467
00:34:48,760 --> 00:34:52,800
वो जैसे सरकारी काम करने के लिए हम बताते हैं सरकार में कि हमारे फलाने फलाने

468
00:34:52,800 --> 00:34:56,840
मंत्री जी या हमारे फलाने अफसर है तो हमारा काम पहले किया जाए ऐसे देवताओं

469
00:34:56,840 --> 00:35:00,880
को भी अपने पूर्व ऋषियों का नाम लेकर के हम बताते कि हमारे मंत्र

470
00:35:00,880 --> 00:35:05,200
दृष्टा ऋषि रहे हैं कृपा हम पर कृपा करें तो उनका नाम लेने की ऐसी परंपरा

471
00:35:05,200 --> 00:35:09,240
रही है अब वो जन्म से ही होते हैं शाखा जन्म से निर्धारित हो रही

472
00:35:09,240 --> 00:35:13,400
है वेद की शाखा कौन सी है आपकी ग्रहीय सूत्र आपका कौन सा सूत्र

473
00:35:13,400 --> 00:35:17,640
कात्यायन है आलाय है बौधायन ये जन्म से निर्धारित हो रहा है तो

474
00:35:17,640 --> 00:35:21,720
इन सबको आप वो कर ही नहीं सकते आप कौन सी शाखा का आप चयन

475
00:35:21,720 --> 00:35:25,760
करेंगे क्या करेंगे ये आप कर्म से नहीं कर सकते और दूसरी असल बात जो

476
00:35:25,760 --> 00:35:29,800
है जो भी ऐसा कहता है कि कर्म से होता है सब कुछ जन्म से नहीं होता व देखा

477
00:35:29,800 --> 00:35:33,800
जाए तो मूर्ख बना रहा है क्योंकि जन्म भी अंतत तो कर्म से ही हो रहा है ना

478
00:35:33,800 --> 00:35:37,880
पूर्व जन्म के कर्मों से ही तो जन्म हुआ है पूर्व जन्म के कर्मों

479
00:35:37,880 --> 00:35:42,120
से ही तो जन्म हुआ है तो जन्म तो कर्म का ही प्रमाण है तो कोई य ऐसा कहर

480
00:35:42,120 --> 00:35:46,320
कि नहीं नहीं हम तो कर्म से वण मानते जन्म से नहीं मानते तोव मूर्ख बना रहा है सब लोगों को

481
00:35:46,320 --> 00:35:46,820
जन्म

482
00:35:46,560 --> 00:35:50,600
तो कर्म के ही अंतर्गत आ रहा है तो मूर्ख बनाने की बात हो गई

483
00:35:50,600 --> 00:35:55,160
तो इसलिए भगवान कह रहे हैं गुण कर्म विभाग तो गुण और कर्म

484
00:35:55,160 --> 00:35:59,320
तो कर्म तो कह रहे हैं लेकिन गुण जो है वो होते कैरेक्टरिस्टिक और वो जन्म

485
00:35:59,320 --> 00:36:03,600
और परिवेश से ही आते हैं यह सभी आचार्यों का मत है

486
00:36:03,600 --> 00:36:07,640
इवन गौड़ी आचार्यों का भी आप विश्वनाथ मतलब वल्लभाचार्य जी का जो

487
00:36:07,640 --> 00:36:12,280
सिद्धांत है वल्लभ संप्रदाय का उसके अनुसार जोय गुण कर्म विभाग

488
00:36:12,280 --> 00:36:16,840
वाली बात है और जो ये चातु ये जो वर्ण व्यवस्था है

489
00:36:16,840 --> 00:36:20,960
वो आपको जन्म से एक शरीर प्राप्त होगा यदि आपने उसके यथोचित कर्मों का

490
00:36:20,960 --> 00:36:25,120
निर्वाहन किया तो उसमें वो ब्राह्मण देवता का वास होगा यानी कि आप प्रॉपर

491
00:36:25,120 --> 00:36:29,120
एक ब्राह्मण कहलाएंगे अन्यथा आपके पास वो शरीर होने

492
00:36:29,120 --> 00:36:33,200
के कारण शरीर होने के कारण आपके पास एडजेक्टिव तो रहेगा ब्राह्मण

493
00:36:33,200 --> 00:36:37,600
का मगर वो पतित ब्राह्मण बहिष्कृत ब्राह्मण कर्महीन कर्म शंकर इत्यादि

494
00:36:37,600 --> 00:36:42,280
से वो कहा जाएगा गिना जाएगा पंक्ति जिन्ह कहा जाएगा

495
00:36:42,280 --> 00:36:46,280
मतलब उम ब्राह्मण देवता का आवेश नहीं होगा अभ सामान्य मनुष्य

496
00:36:46,280 --> 00:36:50,680
ब्रह्म बंधु हो सकते हैं ब्राह्मण नहीं कहते ऐसा महाप्रभु जी का मत है

497
00:36:50,680 --> 00:36:55,080
स्पष्ट रूप से और ही बात वर्ण व्यवस्था की तो वल्लभ दिग्विजय

498
00:36:55,080 --> 00:36:59,240
नामक ग्रंथ है जिसमें जी प्रभु जी के जीवन का

499
00:36:59,240 --> 00:37:02,240
जो सबसे प्रमाणिक हमारे पास में फिलहाल

500
00:37:02,240 --> 00:37:06,880
जो अकाउंट है वो वल्लभ दि ये महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के पोते

501
00:37:06,880 --> 00:37:11,080
यदुनाथ जी जो थे गोस्वामी विट्ठलनाथ जी प्रभु चरण के पुत्र छठ पुत्र

502
00:37:11,080 --> 00:37:15,200
यदुनाथ जी उन्होंने लिखा हुआ है और ऐसा कहा जाता है उनके द्वारा

503
00:37:15,200 --> 00:37:19,240
लिखा गया है इस वल्लभ दिग्विजय में जिसे यदुनाथ दिग्विजय भी कहा

504
00:37:19,240 --> 00:37:23,600
जाता है इसमें एक इंसीडेंट मेंशन है इसमें

505
00:37:23,600 --> 00:37:27,720
जब महाप्रभु जी भारत परिक्रमा करते हुए त

506
00:37:27,720 --> 00:37:31,960
पदमनाभ से होते हुए जनार्दन क्षेत्र केरल में है जनार्दन क्षेत्र जो वकला

507
00:37:31,960 --> 00:37:36,360
है से होते जब उडपी में पहुंचे तो उपी में व्यास तीर्थ जी ने

508
00:37:36,360 --> 00:37:40,520
श्रीमत वल्लभाचार्य से पूछा कि आपने अनंत पद्मनाम

509
00:37:40,520 --> 00:37:44,680
में भागव का घर्षण क्यों किया उनके आपने निंदा वहा पर क्यों उनसे

510
00:37:44,680 --> 00:37:49,000
वाद क्यों किया तब वहा महाप्रभु जी ने स्पष्ट कहा कि जो वर्णाश्रम धर्म का पालन

511
00:37:49,000 --> 00:37:54,280
नहीं करते वे वैष्णव नहीं हो सकते

512
00:37:54,280 --> 00:37:57,720
यनल इसलिए

513
00:37:57,720 --> 00:38:01,800
दर्शको को बताना चाहूंगा भाई किकन के द्वारा जो क्लेम किया जाता

514
00:38:01,800 --> 00:38:05,960
है ना कि चार संप्रदाय प्रामाणिक है उनमें से एक

515
00:38:05,960 --> 00:38:10,480
संप्रदाय जो राघवाचार्य जी महाराज है उनका वक्तव्य आपने सुन लिया

516
00:38:10,480 --> 00:38:14,840
कि कौन वैष्णव नहीं हो सकता और अभी हमारे सामने प्रामाणिक

517
00:38:14,840 --> 00:38:18,960
एक विभूति विराजमान है मैं नहीं जिस

518
00:38:18,960 --> 00:38:22,960
ग्रंथ की बात कर रहा वो प्रामाणिक मैं ठीक कर दूं

519
00:38:22,960 --> 00:38:27,840
मैंने शायद गलत बोल दिया हमने जो है श्री संप्रदाय

520
00:38:27,840 --> 00:38:32,320
श्री संप्रदाय के जो राघवाचार्य जी महाराज जगतगुरु है प्रामाणिक आचार्य

521
00:38:32,320 --> 00:38:36,480
उनका वक्तव्य सुन लिया कि वैष्णव कौन हो सकता है तो कभी

522
00:38:36,480 --> 00:38:40,840
भी आप जो व्यक्ति वर्णाश्रम विरोधी है जो

523
00:38:40,840 --> 00:38:45,040
व्यक्ति किसी प्रकार से वर्णाश्रम धर्म को

524
00:38:45,040 --> 00:38:49,160
तार तार करते हुए अपने कार्य कर रहा है तो आप उसका प्रतिकार

525
00:38:49,160 --> 00:38:53,720
करते समय कभी भी मन में भावना ना लाए कि आप कोई वैष्णव अपराध कर रहे हैं

526
00:38:53,720 --> 00:38:57,920
आपको एक पर परम पूज्य वैष्णवास्त्र राघवाचार्य

527
00:38:57,920 --> 00:39:02,200
जी का वक्तव्य प्राप्त है जिसमें वो बोल रहे हैं कि ऐसे व्यक्ति वैष्णव हो ही नहीं सकते

528
00:39:02,200 --> 00:39:06,360
जो वर्णाश्रम धर्म का पालन ना करते हो अभी वल्लभाचार्य

529
00:39:06,360 --> 00:39:09,680
जी की संप्रदाय से हम लोग उनके जो आचार्य

530
00:39:09,680 --> 00:39:14,360
गण है उनके पास भी जाएंगे और जो अभी हमारे सामने प्रत जी बैठे हैं यह भी अपमा

531
00:39:14,360 --> 00:39:19,040
नहीं है तो इनका भी वक्त

532
00:39:19,040 --> 00:39:21,800
ग्रंथ में प्राप्त

533
00:39:21,800 --> 00:39:25,960
होगी के आधार पर बोल रहे हैं वल्लभ

534
00:39:25,960 --> 00:39:30,600
दिग्विजय ग्रंथ के आधार पर बोल रहे हैं कि जो

535
00:39:30,600 --> 00:39:34,640
वर्णाश्रम धर्म का यथोचित पालन नहीं करते हैं और यह

536
00:39:34,640 --> 00:39:38,680
जो व्यवस्था जो महाप्रभु जी ने वल्लभ महाप्रभु जी ने जो बताई है

537
00:39:38,680 --> 00:39:42,840
वह नहीं करते हैं तो वह वैष्णव नहीं है

538
00:39:42,840 --> 00:39:46,960
इस बात को आप ध्यान रखिए कई बार य ये वैष्णव अपराध के नाम

539
00:39:46,960 --> 00:39:51,880
पर एक जहर फैला दिया गया मार्केट में कि आप कुछ भी बोलो

540
00:39:51,880 --> 00:39:56,360
कैसे होगा जी वैष्णव जब वर्णाश्रम

541
00:39:56,360 --> 00:40:00,400
धर्म को जो पालन कर वेद का पालन कर रहा है वही वैष्णव है य महाप्रभु जी

542
00:40:00,400 --> 00:40:04,520
के स्पष्ट वचन है और इस अच्छा एक और बात महाप्रभु जी ने कही महाप्रभु जी ने कहा

543
00:40:04,520 --> 00:40:08,840
कि अल सर्वे वृद्धा चार तत्परा स्वाध याद क्रियाना

544
00:40:08,840 --> 00:40:13,000
तथा चार परा मुखा महाप्रभु जी कहते त धर्म कथम भवे ऐसी

545
00:40:13,000 --> 00:40:18,000
स्थिति में धर्म हो कैसे सकता है तो उसम महाप्रभु ने समाधान दिया तथापि धर्म

546
00:40:18,000 --> 00:40:22,040
मार्गे तथापि भक्ति मार्गे इसके बाद भी भक्ति मार्ग में

547
00:40:22,040 --> 00:40:25,320
स्थित हो कर के जो भगवान का भजन पूजन सेवा आदि करें

548
00:40:25,320 --> 00:40:29,400
स कथन चती उसम भी वेद निंदा अथवा वेद विरुद्ध

549
00:40:29,400 --> 00:40:34,880
यदि करेंगे तो कोई उपाय नहीं बस इतना है कि य भक्त होने पर

550
00:40:34,880 --> 00:40:38,960
इनका ये नहीं होगा नरक वास नहीं होगा किंतु

551
00:40:38,960 --> 00:40:42,960
तथापि हीने जायते ऐसा महाप्रभु जी ने आज्ञा करी तत्वार्थ

552
00:40:42,960 --> 00:40:47,160
दप साधन प्रकरण हीन योनि में प्राप्त हो जाएगा

553
00:40:47,160 --> 00:40:51,400
ये यदि वेद निंदा और वेद के आचार के विरुद्ध गया तो

554
00:40:51,400 --> 00:40:55,720
भले वैष्णव हो चाहे कैसा भी हो और वल्लभ में तो आपने स्पष्ट आज्ञा करी है

555
00:40:55,720 --> 00:41:00,040
अच्छा इसमें महाप्रभु जी ने एक और चीज दी है कि भाई इतने सारे सब पतित

556
00:41:00,040 --> 00:41:04,080
होने के पश्चात आचार छूट जाने के पश्चात जब वर्णा सं धर्म से बाहर जो

557
00:41:04,080 --> 00:41:08,080
हो चुके हैं लोग उनकी कैसे क्या गति हो तो उसमें महाप्रभु जी ने ऐसी आज्ञा

558
00:41:08,080 --> 00:41:12,240
करी है यदि आपके कुल में आचार विचार अभी भी चल

559
00:41:12,240 --> 00:41:16,400
रहे हैं वेद शाखा आपकी अभी भी चल रही है तो आपका प्रथम कर्तव्य

560
00:41:16,400 --> 00:41:20,520
आप उसे पढ़े बिल्कुल आप अपने वेद आदि धर्म आप संध्या वंदन आदि

561
00:41:20,520 --> 00:41:24,560
कर सकते हैं कर पा रहे हैं तो बहुत अच्छी बात है नहीं कर पा रहे हैं तो सर्वम

562
00:41:24,560 --> 00:41:28,840
कृष्णम अर्पण तो सब कुछ कृष्ण को अर्पण करें जो भी अपने जीवन में सब कृष्णु

563
00:41:28,840 --> 00:41:33,200
को अर्पण करें और उनकी भक्ति में लगे रहे यही परम

564
00:41:33,200 --> 00:41:37,240
परम सबसे परम कार्य है जो आप कर सकते हैं और इसमें महाप्रभु जी

565
00:41:37,240 --> 00:41:40,600
ऐसा कहते हैं ना तो इससे ऊपर कोई मंत्र है

566
00:41:40,600 --> 00:41:44,680
ना तो इससे ऊपर कोई व्रत है तीर्थम नात परा

567
00:41:44,680 --> 00:41:48,760
ना ही इसके ऊपर कोई तीर्थ ये सबसे परम है आप कृष्ण सेवा

568
00:41:48,760 --> 00:41:52,880
और कृष्ण भक्ति कर रहे हैं तो इसके परे कुछ भी नहीं है इसको आप ध्यान रखें

569
00:41:52,880 --> 00:41:56,880
वर्णाश्रम जहां तक आपका देहा भिमान है कि हम इस वर्ण के

570
00:41:56,880 --> 00:42:00,880
हैं तब तक आपको पालन करना धर्म कर्तव्य और यदि आपके अंदर

571
00:42:00,880 --> 00:42:05,200
वो देहा विमान नहीं रह गया आपको नहीं लग रहा कि आप ब्राह्मण हो या क्षत्रिय

572
00:42:05,200 --> 00:42:09,240
हो वैश्य हो तब आप केवल कृष्ण भक्ति करें और जो वैष्णव के आचार

573
00:42:09,240 --> 00:42:13,960
विचार है उनका आप यथा यथोचित पालन करें भगवत सेवा में लगे

574
00:42:13,960 --> 00:42:17,960
सात्विक मगर इसका मतलब ये तो नहीं है ना मगर इसका मतलब यह तो नहीं है

575
00:42:17,960 --> 00:42:21,960
ना कि फिर वो जो है अगर कोई अधिकारी नहीं है तो वो जनेऊ पहने या

576
00:42:21,960 --> 00:42:26,000
लोगों को जनेऊ देने लगे क्योंकि ये दावा करने लगे

577
00:42:26,000 --> 00:42:30,360
क्योंकि वो दावा कर लगे कि मैं जो है अब मुझे जो है वो अपने

578
00:42:30,360 --> 00:42:34,400
देहा विवान नहीं रहा है तो इसलिए मैं कुछ भी करने लगू मैं यज्ञ कराऊ

579
00:42:34,400 --> 00:42:38,440
मैं जो है जने वाक् ऐसा कहने वाला व्यक्ति यह

580
00:42:38,440 --> 00:42:42,440
देहा भिमान बोल रहा है वो व्यक्ति नहीं बोल रहा है वो ये देहान भी नहीं है

581
00:42:42,440 --> 00:42:46,600
य थ का विमान जब आपका जन्म व भगवान ने आपको

582
00:42:46,600 --> 00:42:50,760
जन्म दिया नहीं है आप जबरदस्ती वहा क्यों चा रहे हो भक्ति छोड़ कर के क्या

583
00:42:50,760 --> 00:42:54,800
भक्ति जो है अपने आप में परिपूर्ण नहीं है महाप्रभु जी कहते हैं कृष्ण भक्ति सबसे

584
00:42:54,800 --> 00:42:55,600
परम है इसके

585
00:42:55,600 --> 00:42:58,360
ऊपर कुछ भी नहीं

586
00:42:58,360 --> 00:43:02,440
ना तो कोई है ना तो कोई तीर्थ है ना तो कुछ भी इसके ऊपर नहीं

587
00:43:02,440 --> 00:43:06,720
तो जबसे आपने प्रात कर तो आपको काहे को जन के पीछे पड़ना

588
00:43:06,720 --> 00:43:12,240
है जब आप नहीं है उसके अधिकारी वेद के

589
00:43:12,240 --> 00:43:16,240
क्रम धर्म जैसे ही आप दोबारा व्यवहारिक दुनिया

590
00:43:16,240 --> 00:43:20,640
में आ जाएंगे तो दोबारा से व वर्णाश्रम धर्म लागू हो जाएगा और जब आप व्यवहारिक

591
00:43:20,640 --> 00:43:25,040
दुनिया से प्र हो चुके हैं तो आप वहां पर उसका आपका अपना स्वांता

592
00:43:25,040 --> 00:43:29,160
सुखा है कि आप किस तरह से जीवन को आगे ले जा जाते मगर जब आप और लोगों

593
00:43:29,160 --> 00:43:33,280
के साथ व्यवहार करने में आ जाएंगे तो आपका वर्णाश्रम धर्म पुनः आपको

594
00:43:33,280 --> 00:43:37,360
आपका आपको आलंबन लेना ही पड़ेगा तो इस हिसाब

595
00:43:37,360 --> 00:43:41,960
से देखा जाए तो जैसे कि आपने बताया कि आपके जो

596
00:43:41,960 --> 00:43:45,960
नाना जी थे उनके साथ इनकी मित्रता थी तो इस बारे में क्या

597
00:43:45,960 --> 00:43:49,960
पर्सपेक्टिव था कि उन्होंने सन्यास लिया हुआ था सन्यास

598
00:43:49,960 --> 00:43:54,040
लिया था उन्होंने उनके गुरु ने संन्यास लिया था तो क्या वल्लभ

599
00:43:54,040 --> 00:43:58,600
संप्रदाय के अकॉर्डिंग वो एक प्रामाणिक सन्यासी है

600
00:43:58,600 --> 00:44:03,440
तो इनके सन्यास को लेकर के क्या कहना है मतलब

601
00:44:03,440 --> 00:44:07,840
अब देखि सन्यास देखिए मैं इस बारे में डायरेक्ट टीका टिप्पणी करने से तो बूंगा

602
00:44:07,840 --> 00:44:10,680
लेकिन इतना है कि सन्यास आदि जो

603
00:44:10,680 --> 00:44:15,280
धर्म है वो आश्रम है सन्यास चतुर्थ आश्रम है और इसके नियम वर्णाश्रम

604
00:44:15,280 --> 00:44:19,280
से ही डिसाइड होंगे तो जो वर्णाश्रम के शास्त्र है यही इसे डिसाइड

605
00:44:19,280 --> 00:44:23,560
करेंगे किसी कोई मन से डिसाइड कर नहीं सकता यह महाप्रभु जी का स्पष्ट

606
00:44:23,560 --> 00:44:27,560
मत है इनको अधिकार है तो है इनको नहीं है तो नहीं

607
00:44:27,560 --> 00:44:31,720
इतने से यदि आप पवित्र हो जाएंगे इतने को चीज को छूने पर तो आप होंगे

608
00:44:31,720 --> 00:44:36,080
और इतने से अपवित्र हो जाएंगे तो आप अपवित्र हो जाएंगे आपको जन कंठी बदलनी पड़े

609
00:44:36,080 --> 00:44:40,960
इसमें आप छेड़खानी नहीं कर सकते इस वर्णाश्रम धर्म में तो इसलिए

610
00:44:40,960 --> 00:44:45,440
ज येन क्लेम कर रहा है हमारे इसकन

611
00:44:45,440 --> 00:44:49,640
जो क्लेम कर रहा है कि सन्यास का हमारे पास सन्यास था तो

612
00:44:49,640 --> 00:44:53,920
क्या यह इनके यहां जो संन्यास आया है जो आप नाम ना लीजिए

613
00:44:53,920 --> 00:44:58,280
हम नाम नहीं लेते मगर इसकन जो क्लेम कर रहा है कि हमारे य सन्यास सन्यासी

614
00:44:58,280 --> 00:45:02,320
थे हमारे हमारे यहां सन्यास की परंपरा है तो वो परंपरा जो

615
00:45:02,320 --> 00:45:06,760
सन्यास की है तो क्या वो प्रामाणिक है इनके यहां की आपके वल्लभाचार्य

616
00:45:06,760 --> 00:45:10,840
संप्रदाय के अकॉर्डिंग असंभव है ये बात

617
00:45:10,840 --> 00:45:14,920
क्योंकि सन्यास आश्रम है वर्णाश्रम धर्म का भाग है और वर्णाश्रम के

618
00:45:14,920 --> 00:45:19,280
जो शास्त्र है उसमें जन्मना ब्राह्मण जिसके प्रवर

619
00:45:19,280 --> 00:45:23,760
गोत्र शाखा सूत्र ज्ञात हो उसी को अधिकार है

620
00:45:23,760 --> 00:45:25,680
जिनके प्रवर शाखा

621
00:45:25,680 --> 00:45:30,280
पूत्र आदि नहीं है वे तो संन्यास के अधिकारी नहीं है हां वे

622
00:45:30,280 --> 00:45:34,560
वैष्णव संन्यास अधिकारी अवश्य है वैराग्य दशा के अधिकारी अवश्य है

623
00:45:34,560 --> 00:45:38,600
कि आप सब कुछ छोड़ छाड़ करके कृष्ण की भजन कर कृष्ण का भक्ति करें इसको

624
00:45:38,600 --> 00:45:43,040
वैष्णव सन्यास बोला जाता है व सन्यास के मैं इसको अगर ऐसे समझ

625
00:45:43,040 --> 00:45:47,040
उस सन्यास के अधिकारी नहीं है जिसकी उपयोगिता

626
00:45:47,040 --> 00:45:51,160
ऐसे प्रामाणिक सन्यासी जो क्योंकि वो जो सन्यासी

627
00:45:51,160 --> 00:45:55,160
होता है वो फिर उसकी उपयोगिता की जाती कि आप यहां के आचार्य बन जाइए या यहां

628
00:45:55,160 --> 00:45:57,320
के

629
00:45:57,320 --> 00:46:01,960
जा उसके अपने स्वांता सुखाय के लिए विरक्त हो सकता है वो

630
00:46:01,960 --> 00:46:06,280
हां बिल्कुल विरक्त हो सकता है विरक्त होकर कृष्ण का भजन करें य यही वैष्णव संन्यास

631
00:46:06,280 --> 00:46:10,480
है और प्राचीन गड़िया में यही वैष्णव सन्यास यानी बाबाजी वेश इसको

632
00:46:10,480 --> 00:46:14,640
गड़िया में कहा जाता था इसकी परंपरा रही है पुष्टि मार्ग

633
00:46:14,640 --> 00:46:18,960
में भी ऐसे कई विरक्त वैष्णव रहे हैं जो महाप्रभु जी के सेवक थे अवधूत दास वगर

634
00:46:18,960 --> 00:46:23,040
इन सबका नाम वार्ता ग्रंथों में आता है ये विरक्त थे सन्यासी नहीं विरक्त

635
00:46:23,040 --> 00:46:27,080
थे अवधूत दास तो इस तरह से कई सारे भक्त आते हैं जो वैरागी हु

636
00:46:27,080 --> 00:46:31,520
विरक्त होकर के भजन में तल्लीन रहने वाले लेकिन जबरदस्ती

637
00:46:31,520 --> 00:46:35,760
सन्यास यदि आप लेंगे वर्ण की मर्यादा के बाहर जाकर के उसके लिए महाप्रभु

638
00:46:35,760 --> 00:46:39,880
जी ने चेतावनी भी दी महाप्रभु जी ने कहा ऐसे कराल कली काल में यदि

639
00:46:39,880 --> 00:46:40,680
आप फिर भी

640
00:46:40,680 --> 00:46:44,760
घर छोड़ कर के भक्तो का संग छोड़ कर के कहीं सन्यास अपने अहंकार से जाकर

641
00:46:44,760 --> 00:46:48,920
के लोगे तो स्वयं च विष क्रांत पाखंडी सातु काल

642
00:46:48,920 --> 00:46:53,360
अब स्वयं तो विषयों से आक्रांत हो जाओगे और समय के साथ पाखंडी हो जाओ ये महाप्रभु

643
00:46:53,360 --> 00:46:57,520
जी की चेतावनी है सन्यास लेने की तरीके से

644
00:46:57,520 --> 00:47:03,520
चेतावनी कहा फिट हो रही है वो मुझे समझ में आ रहा हैता

645
00:47:04,520 --> 00:47:08,800
ही यदि आप मनमाना आचरण करेंगे जो संन्यास

646
00:47:08,800 --> 00:47:12,920
के जो वर्णाश्रम धर्म के जो ग्रंथ है जिनम संन्यास लेना लिखा है उन्ही में उसके नियम

647
00:47:12,920 --> 00:47:16,960
दिए जब आप उसी के विरुद्ध चले गए तो सन्यास आपका वैसे ही सिद्ध नहीं हो पाया

648
00:47:16,960 --> 00:47:21,200
और महाप्रभु जी कृष्ण भक्ति में माना ही नहीं है इसकी कोई आवश्यकता है

649
00:47:21,200 --> 00:47:25,880
महाप्रभु जी ने कहा जैसे सन्यास असल गोपिका गुरु

650
00:47:25,880 --> 00:47:29,960
पुष्टि मार्ग में मार्ग में गोपिका गुरु जैसे गोपिका केवल और केवल भगवान

651
00:47:29,960 --> 00:47:34,000
में लगी हुई थी उनका घर बार आदि से कोई अधिक नाता नहीं

652
00:47:34,000 --> 00:47:38,040
था उसमें आसक्त बिल्कुल नहीं थी केवल और केवल भगवान में आ सकती उनको महाप्रभु जी

653
00:47:38,040 --> 00:47:42,040
ने कहा ये असल सन्यास है और यदि ऐसी दशा सिद्ध हो गई भजन करते

654
00:47:42,040 --> 00:47:46,080
करते गृह में तुम्हारे अपने ठाकुर जी में इतने आसक्त हो गए तब संन्यास लेना केवल

655
00:47:46,080 --> 00:47:50,160
औपचारिकता मात्र रह जाएगी उस दशा में संन्यास आप विधिवत धारण

656
00:47:50,160 --> 00:47:54,840
करो केवल औपचारिकता मात्र आपका संन्यास ठाकुर जी ने वही सिद्ध कर दिया तो

657
00:47:54,840 --> 00:47:56,040
समय सन्यास की आवश्यकता

658
00:47:56,040 --> 00:48:00,160
य होती किसी अन्य को जब हमें प्रमाणिक बताना है कि मैं सन्यासी हूं

659
00:48:00,160 --> 00:48:04,280
किसी अन्य को तो किसी अन्य को बताने की आवश्यकता तब पड़ेगी

660
00:48:04,280 --> 00:48:08,440
ना जब आपको व्यवहारिक उसम जाना है ना

661
00:48:08,440 --> 00:48:12,480
आपके स्ता सुकाय के लिए आपकी जो विरक्ति है वो पर्याप्त है

662
00:48:12,480 --> 00:48:16,680
बिल्कुल वो पर्याप्त महाप्रभु जी ने तो भक्ति मार्ग को एकाकी बताया

663
00:48:16,680 --> 00:48:21,160
है कि आपकी भक्ति आपके लिए है

664
00:48:21,160 --> 00:48:25,680
प्रीत हि में राखि प्रकट किए रस जाए तो महाप्रभु जी तो इतनी गोपनीयता

665
00:48:25,680 --> 00:48:29,920
से ठाकुर जी की से भक्ति आदि करने की आज्ञा करते हैं तो इसलिए

666
00:48:29,920 --> 00:48:34,120
महाप्रभु जी ने घर छोड़ कर के अपने ठाकुर जी को छोड़ कर के आप अलग से सन्यास लो

667
00:48:34,120 --> 00:48:38,680
और दीक्षा लो इसको महाप्रभु जी ने सावधान किया है

668
00:48:38,680 --> 00:48:41,880
चलिए ये

669
00:48:41,880 --> 00:48:45,960
तोता जी इसमें इसमें मैं एक तरफ ध्यान खींचना चाहूंगा कि

670
00:48:45,960 --> 00:48:50,160
अब जब सन्यास की बात चल रही है तो एक चीज और आती है जो

671
00:48:50,160 --> 00:48:54,360
मैंने आपके यहां के प्रामाणिक आचार्य हैं उनको सुना था

672
00:48:54,360 --> 00:48:58,440
उनका परिचय आप भी बता देंगे वो आपने बताया

673
00:48:58,440 --> 00:49:02,640
था कि उनके भतीजे

674
00:49:02,640 --> 00:49:06,760
हैं क्या नाम था उनका

675
00:49:06,760 --> 00:49:12,760
गोविंद राय जी की बात आप कर रहे हैं गोविंद गोविंद

676
00:49:14,040 --> 00:49:18,280
गोविंद जी वह महाराज जी भी अपने वीडियो

677
00:49:18,280 --> 00:49:22,600
में यही बोल रहे थे कि भाई अच्छा

678
00:49:22,600 --> 00:49:26,720
जब यह क्लेम करते हैं कि चैत यह इतना स्वीकार करते हैं

679
00:49:26,720 --> 00:49:30,960
चैतन्य महाप्रभु जी ने सन्यास लिया

680
00:49:30,960 --> 00:49:35,000
है शंकर परंपरा से तो

681
00:49:35,000 --> 00:49:39,160
जब शंकर परंपरा से आपका सन्यास आया है तो आगे आपका सन्यास उसी

682
00:49:39,160 --> 00:49:43,200
परंपरा से आना था है ना बिल्कुल

683
00:49:43,200 --> 00:49:47,240
सन्यास की परंपरा बदल नहीं सकती फिर आपके य सन्यास अपने

684
00:49:47,240 --> 00:49:51,320
मन किसी और परंपरा से ला रहे हो आप सन्यास

685
00:49:51,320 --> 00:49:55,720
बास की परंपरा सन्यास की परंपरा

686
00:49:55,720 --> 00:49:57,040
ही नहीं है जाए

687
00:49:57,040 --> 00:50:01,040
मायावादी मायावादी शब्द का उपयोग जो करते हैं तो वह खुद को कह रहे

688
00:50:01,040 --> 00:50:05,080
हैं व चेतन महाप्रभु जी कि मैं मायावादी सन्यासी हूं तो आगे

689
00:50:05,080 --> 00:50:09,080
उनके लोग जो है उनके फॉलोअर वो भी मायावादी सन्यासी होने चाहिए अगर सन्यासी हो

690
00:50:09,080 --> 00:50:13,080
रहे हैं तो विशेष रूप से जो फोटो से संन्यास

691
00:50:13,080 --> 00:50:17,120
लेते हैं जो वो असल में फोटो से संन्यास

692
00:50:17,120 --> 00:50:21,520
लेने वाली बात तो जो है वो तो मतलब उसको हम प्रमाणिक परंपरा

693
00:50:21,520 --> 00:50:25,800
नहीं कह सकते नई परंपरा का सजन अवश्य कह सकते हैं लेकिन प्रमाणिक परंपरा

694
00:50:25,800 --> 00:50:29,840
नहीं कह सकते उसके लिए तो आपको जो परंपरा चली आ रही है उससे सन्यास लेना चाहिए

695
00:50:29,840 --> 00:50:33,840
यदि आप फोटो से ले रहे हैं तो आपने एक नई परंपरा सृजन कर दी इतना आप

696
00:50:33,840 --> 00:50:37,960
कह सकते होलो इतना कहो तो भी ठीक है लेकिन उसको आप बोलो नहीं नहीं हम इस

697
00:50:37,960 --> 00:50:42,160
परंपरा के हैं वो तो गलत बात हो जाएगी वो तो बात ठीक नहीं पीछे वाले

698
00:50:42,160 --> 00:50:46,160
से क्लेम म कर अपने को जी जी बिल्कुल आप पीछे

699
00:50:46,160 --> 00:50:50,800
वाले से क्लेम कर नहीं सकते संभव नहीं रह जाएगा और बात सही है क्योंकि

700
00:50:50,800 --> 00:50:55,040
गौड़ीय संप्रदाय में यह बाबाजी वेष और वैरागी

701
00:50:55,040 --> 00:50:59,080
होना ही सन्यास परंपरा नहीं थी गड़ी

702
00:50:59,080 --> 00:51:03,600
वैष्णव चार में पुष्टि मार्ग में थी ना राधा वल्लभ में

703
00:51:03,600 --> 00:51:07,920
थी बात अलग है गड़ वैष्णव की तो बात अलग है अभी

704
00:51:07,920 --> 00:51:12,120
कोन की बात अगर करें तो स्कोन का जो प्रादुर्भाव है वो बड़ा

705
00:51:12,120 --> 00:51:16,120
ही मतलब ऐसे तरीको से हो रहा है कि जिसका जहा मनाया वो वो करने

706
00:51:16,120 --> 00:51:20,520
लगा मैं कहूंगा कि रामपाल जो चल रहा है व मनमाना

707
00:51:20,520 --> 00:51:25,080
अपना कुछ भी करता रहता है वो अगर पढ़ लिख जाए इंग्लिश

708
00:51:25,080 --> 00:51:29,160
इंग्लिश बोलने लगे रामपाल वाले रामपाल वाले गैंग में

709
00:51:29,160 --> 00:51:33,320
भी विदेशी आ जाए और वह संस्कृत भी थोड़ा बहुत पढ़ने लगे

710
00:51:33,320 --> 00:51:37,400
तो फिर वह बिल्कुल हुबहू वो जो है स्कोन जैसा दिखाई देने लगेगा रामपाल

711
00:51:37,400 --> 00:51:41,600
का गैंग है पूरा पूरा स्कन जैसा क्योंकि थोड़ा सा अंतर

712
00:51:41,600 --> 00:51:45,960
कर ले बस कबीर और कृष्ण का बाकी सारी चीजें सेम चल रही है दोनों

713
00:51:45,960 --> 00:51:50,240
की एक ही बात असल में आप य वेद आदि शास्त्रों को वर्ण

714
00:51:50,240 --> 00:51:54,640
व्यवस्था को छोड़ोगे तो फिर तो आपका धरातल रहा नहीं

715
00:51:54,640 --> 00:51:58,960
आप फिर वैष्णव आचार्य मतलब महाप्रभु जी के हिसाब से फिर वैष्णव

716
00:51:58,960 --> 00:52:03,120
कहने के अधिकारी तो नहीं रहे ऐसा है हां लेकिन नहीं हो पा रहे कोई

717
00:52:03,120 --> 00:52:07,120
परंपरा खंडित हो गई है तो आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है महाप्रभु जी कह रहे हैं

718
00:52:07,120 --> 00:52:11,440
आप कृष्ण को समर्पित करो उनकी भक्ति करो उससे परम कुछ है नहीं तो आपको क्यों जबरदस्ती जन

719
00:52:11,440 --> 00:52:15,480
में जाना है और क्यों जबरदस्ती और चीज करनी है वेदों के विरुद्ध जाकर के इससे क्या लाभ

720
00:52:15,480 --> 00:52:19,600
होगा क्योंकि धार्मिक सत्ता अयानी है ना

721
00:52:19,600 --> 00:52:23,760
धार्मिक सत्ता हथनी लोगों का गुरु बनना

722
00:52:23,760 --> 00:52:27,280
है र्म सत्ता हतया

723
00:52:27,280 --> 00:52:31,320
करके लोगों का गुरु बन कर के कृष्ण के नाम पर क्राइस्ट को घुसे

724
00:52:31,320 --> 00:52:35,320
करना है यह सब चीजें है ना जी ठीक है तो अभी

725
00:52:35,320 --> 00:52:39,400
हम आगे चलते हैं थोड़ा सा काफी हो गई चीजें अब

726
00:52:39,400 --> 00:52:43,640
एक जो माधवेंद्र पुरी जी है

727
00:52:43,640 --> 00:52:48,520
इनके गुरु जी थे लक्ष्मीपति तीर्थ जी और जिस कारण से

728
00:52:48,520 --> 00:52:52,720
इसकन क्लेम करता है कि हम जो है मधुवा संप्रदाय से हैं

729
00:52:52,720 --> 00:52:57,640
तो ये इनके बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालिए में

730
00:52:57,640 --> 00:53:01,640
ठीक माधवेंद्र पुरी पर बात करते माधवेंद्र पुरी जो थेय तैलंग

731
00:53:01,640 --> 00:53:06,360
ब्राह्मण थे इनका वर्णन भी वल्लभ दिग्विजय में प्राप्त होता है और

732
00:53:06,360 --> 00:53:10,680
महाप्रभु श्रीमद वल्लभाचार्य जी को वैष्णव शास्त्र माधवेंद्र पुरी ने ही पढ़ाए

733
00:53:10,680 --> 00:53:14,680
हैं माधवेंद्र पुरी द्वारा ही महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने वैष्णव

734
00:53:14,680 --> 00:53:19,080
शास्त्रों का अध्ययन किया है वाराणसी में और इसीलिए ये माधवेंद्र पुरी

735
00:53:19,080 --> 00:53:23,080
जो थे ये मधु संप्रदाय के आचार्य लक्ष्मीपति तीर्थ जी लक्ष्मीपति

736
00:53:23,080 --> 00:53:27,920
तीर्थ जी व्यास तीर्थ जी के शिष्य थे व्यास तीर्थ जी

737
00:53:27,920 --> 00:53:32,200
दरब में राज गुरु पद पर सुशोभित मध

738
00:53:32,200 --> 00:53:37,280
संप जी इन्होने तर्क तांडव और न्यायाम

739
00:53:37,280 --> 00:53:41,320
जैसे मिनट क्लियर कर चैत महाप्रभु जी का जिनको गुरु बताया

740
00:53:41,320 --> 00:53:43,400
जा रहा है माधवेंद्र

741
00:53:43,400 --> 00:53:48,440
माधवेंद्र जी को ददा दादा दादा

742
00:53:48,440 --> 00:53:50,760
चैतन्य

743
00:53:50,760 --> 00:53:54,760
ईश्वर गुरु चत मभु के इनके अकॉर्डिंग

744
00:53:54,760 --> 00:53:58,480
इसन केडिंग

745
00:53:58,480 --> 00:54:02,600
गर गणोश दीपिका नाम का ग्रंथ है प्राचीन ग्रंथ है गौर गणो

746
00:54:02,600 --> 00:54:06,760
देश दीपिका वो उसके अनुसार उसमें यह परंपरा इनकी वर्णित

747
00:54:06,760 --> 00:54:10,760
है गौर गण देश दीपिका में कि चैतन्य महाप्रभु के गुरु जो

748
00:54:10,760 --> 00:54:14,880
थे भक्ति मार्गी दीक्षा गुरु ईश्वर पुरी और ईश्वर

749
00:54:14,880 --> 00:54:18,880
पुरी के गुरु जी ये माधवेंद्र पुरी और माधवेंद्र पुरी के

750
00:54:18,880 --> 00:54:23,200
गुरुजी लक्ष्मीपति थ अब माधवेंद्र पुरी जी ने पुरी

751
00:54:23,200 --> 00:54:27,440
उपनाम जो धारण किया है उसके बारे में कथा ऐसी है कि वि पु जी

752
00:54:27,440 --> 00:54:31,560
को भी गुरु रूप में मानते थे तो इस कारण उन्होने विष्णु पुरी से ऐसा उपनाम

753
00:54:31,560 --> 00:54:35,720
धारण सन्यास उन्होने पुरी उससे वहां

754
00:54:35,720 --> 00:54:39,720
से प्राप्त किया है लेकिन वैष्णव दीक्षा उन्होंने मध संप्रदाय

755
00:54:39,720 --> 00:54:43,880
में प्राप्त की है यह बात मध संप्रदाय में भी स्वीकार और वल्लभ संप्रदाय

756
00:54:43,880 --> 00:54:48,400
के ग्रंथों में भी यह बात का स्पष्ट वर्णन है कि

757
00:54:48,400 --> 00:54:52,640
यह जो थे मद्व संप्रदाय के जैसे वल्लभ दिग्जा में आता है कि

758
00:54:52,640 --> 00:54:56,680
महाप्रभु जी को जब इन्होंने पढ़ाया वल्लभाचार्य जी को माधवेंद्र

759
00:54:56,680 --> 00:54:58,440
पुरी ने और गुरु

760
00:54:58,440 --> 00:55:02,800
दक्षिणा की जब बारी आई तो उन्होंने कहा कि आप हमें श्रीनाथ जी की सेवा दोगे

761
00:55:02,800 --> 00:55:06,840
ऐसी माधवेंद्र पु ने वि महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से

762
00:55:06,840 --> 00:55:10,840
तब महाप्रभु जी ने कहा वल्लभाचार्य ठीक है अभी आप भारत यात्रा पर पधारे जब

763
00:55:10,840 --> 00:55:14,840
समय आएगा और श्रीनाथ जी का गोवर्धन पर्वत पर मंदिर स्थित होगा

764
00:55:14,840 --> 00:55:19,680
तब आपको तब आपको सेवा प्रदान करें तो 1519

765
00:55:19,680 --> 00:55:23,680
ईसवी में जब श्रीनाथ जी का मंदिर पूरा बनकर तैयार हुआ

766
00:55:23,680 --> 00:55:27,760
तब महाप्रभु जी ने माधवेंद्र पुरी को वहां नियुक्त

767
00:55:27,760 --> 00:55:32,640
किया और माधवेंद्र पुरी के साथ में उनके बंगाली

768
00:55:32,640 --> 00:55:36,840
ब्राह्मण वैष्णव जो थे उनको भी नियुक्त किया था यह बात वल्लभ

769
00:55:36,840 --> 00:55:40,880
दिग्विजय में भी आती है 84 वैष्णव वार्ता श्रीनाथ जी की प्राकट्य

770
00:55:40,880 --> 00:55:45,080
वार्ता इन सभी ग्रंथों में आती है वल्लभ दिग्जा में स्पष्ट

771
00:55:45,080 --> 00:55:49,760
रूप से आता है माधव माधव सिष्य नियुक्त यानी माधव

772
00:55:49,760 --> 00:55:53,760
माधव जो थे यानी माधवेंद्र पुरी उनको स शिष्यों के साथ

773
00:55:53,760 --> 00:55:58,760
में नियुक्त किया महाप्रभु जी ने श्रीनाथ जी की सेवा पाक कार्य

774
00:55:58,760 --> 00:56:02,800
रामदास नियुक्त पाक कार में साचो रा ब्राह्मणों

775
00:56:02,800 --> 00:56:06,920
को और गायने कुंभन कुंभन दास जी को गायन कार्य में नियुक्त किया

776
00:56:06,920 --> 00:56:11,520
सूरदास जी को नियुक्त किया ऐसा पूरा बहुत सुंदर विवरण वल्लभ दिवज ग्रंथ में आता है संस्कृत

777
00:56:11,520 --> 00:56:13,440
ग्रंथ इसम य स्पष्ट

778
00:56:13,440 --> 00:56:17,680
रूप उख है की माधव जी को नियुक्त किया गया और

779
00:56:17,680 --> 00:56:21,840
य पर विस जो आ जाता है य आता है कि कन यह बात प्रचारित

780
00:56:21,840 --> 00:56:27,840
करता है कि श्रीनाथ जी का प्राकट्य माधवेंद्र पुरी ने किया

781
00:56:28,600 --> 00:56:34,480
यह बात गौड़ीय ग्रंथ जो पूर्ती ग्रंथ है

782
00:56:34,480 --> 00:56:39,280
चैतन्य पर यह बात असत्य सिद्ध हो जाती चैतन्य भागवत

783
00:56:39,280 --> 00:56:45,280
में यह बात स्पष्ट रूप से आती है आवाज आ रही है

784
00:56:47,640 --> 00:56:51,680
क्लियर जी आ रही है आही मेरी आवाज क्लियर आ रही है जी

785
00:56:51,680 --> 00:56:55,880
क्लियर आ रही है चैतन्य भागवत य चैतन्य भागवत

786
00:56:55,880 --> 00:56:59,280
में बात आती है

787
00:56:59,280 --> 00:57:03,480
कि माधवेंद्र पुरी जो वो नित्यानंद

788
00:57:03,480 --> 00:57:07,800
प्रभु के साथ कई वर्षों तक रहे कन आपका आपका चित्र

789
00:57:07,800 --> 00:57:12,200
है फ्रीज हो गया आपका

790
00:57:12,200 --> 00:57:18,200
चित्र आपका वीडियो जो है थोड़ा सा फ्रीज हो रहा है अटक अटक के चल रहा है मुझे भी यहां

791
00:57:18,400 --> 00:57:22,560
पर मुझे भी यहां पर थोड़ा थोड़ा ऐसे ही वीडियो फ्रीज फ्रीज

792
00:57:22,560 --> 00:57:26,600
सा दिख रहा है बार बार बार बार

793
00:57:26,600 --> 00:57:30,760
अभी ठीक है थोड़ा

794
00:57:30,760 --> 00:57:34,800
फिर फ्रीज हो गया आपका वो

795
00:57:34,800 --> 00:57:38,880
जो टेबलेट जिससे आप कर रहे हैं वीडियो कॉन्फ्रेंस वह गर्म तो नहीं हो

796
00:57:38,880 --> 00:57:44,880
गया है कभी कभी हीट हो जाने के कारण ऐसा होने लगता

797
00:57:46,360 --> 00:57:50,560
है जी जी शायद संभव हो सो अभी

798
00:57:50,560 --> 00:57:56,560
आवाज क्लियर है क्या

799
00:57:57,440 --> 00:58:03,440
हा अभी भी कोई देखिए वैष्णव

800
00:58:05,040 --> 00:58:09,640
अपराध देखो वैष्णव अपराध का

801
00:58:09,640 --> 00:58:13,640
डर दिखा रहा है किसको डर दिखा रहे हो भाई जिसको

802
00:58:13,640 --> 00:58:18,040
आत्मा का बोध हो जाता है उसे भय नहीं होता नैनम

803
00:58:18,040 --> 00:58:22,120
छिंदंति शस्त्राणि नैनम दती पाव का नम

804
00:58:22,120 --> 00:58:26,200
क्लेंप ना सो सति मारुता ठीक

805
00:58:26,200 --> 00:58:30,720
जी अभी आवाज आ रही जी जी जी जी

806
00:58:30,720 --> 00:58:34,840
ठीक है तो मैं ये बात कह रहा था कि चैतन्य

807
00:58:34,840 --> 00:58:39,520
एक मैं एक बात थोड़ा सा क्लियर कर दूं दर्शकों को कि

808
00:58:39,520 --> 00:58:43,760
चैतन्य महाप्रभु जी का गुरु स्कोन के द्वारा

809
00:58:43,760 --> 00:58:49,360
जिसको क्लेम किया जाता है ईश्वर पुरी जी उनके गुरु माधवेंद्र

810
00:58:49,360 --> 00:58:54,040
जी जी वो वो भी वो क्लेम उनकी ओर से किया जाता है

811
00:58:54,040 --> 00:58:59,440
फिर उनके जो गुरु है माधवेंद्र जी जिनके गुरु

812
00:58:59,440 --> 00:59:03,480
हैद लक्ष्मीपति तीर्थ जी है ना

813
00:59:03,480 --> 00:59:07,880
माद पुरी जी से ही जो

814
00:59:07,880 --> 00:59:12,200
वल्लभाचार्य जी महाराज थे वल्लभ महाप्रभु थे उन्होंने अध्ययन

815
00:59:12,200 --> 00:59:16,400
किया था जो वैष्णव ग्रंथ है उनका वैष्णव शस्त्र

816
00:59:16,400 --> 00:59:20,080
इस तरीके से भागवत है भगवत गीता है हा

817
00:59:20,080 --> 00:59:24,160
यानी चैतन्य महाप्रभु जी के दादा गुरु से वल्लभ महाप्रभु

818
00:59:24,160 --> 00:59:28,200
जी ने वैष्णव ग्रंथों का अध्ययन किया था यह भी एक बहुत

819
00:59:28,200 --> 00:59:32,280
रोचक जानकारी है अब इसके बाद इनके द्वारा य

820
00:59:32,280 --> 00:59:36,600
क्लेम किया जाता है स्कन के द्वारा

821
00:59:36,600 --> 00:59:40,640
कि माधवेंद्र पुरी जी के द्वारा ही श्रीनाथ जी को प्रकट करवाया गया जिसके

822
00:59:40,640 --> 00:59:44,920
कारण अभी व जो दो अंग्रेज थे वोय बातें कर रहे थे कि जो है हमें वह मंदिर

823
00:59:44,920 --> 00:59:50,920
वापस लेना है ऐसा प्रभुपाद जी कह कर के गए हैं ठीक

824
00:59:51,000 --> 00:59:56,360
है जी जी तो

825
00:59:56,360 --> 01:00:00,480
तो अब इससे आगे की जानकारी आपको दी जा रही है प्रत्यूष जी बोल रहे हैं जी प्रत

826
01:00:00,480 --> 01:00:04,840
जी बताइए जी जी तो यह माधवेंद्र पुरी

827
01:00:04,840 --> 01:00:08,840
जो थे इन्होंने ऐसा

828
01:00:08,840 --> 01:00:12,840
चैतन्य भागवत में आता है चैतन्य भागवत चैतन्य महाप्रभु के जीवन

829
01:00:12,840 --> 01:00:17,200
के ऊपर प्रकाश डालने वाले सबसे प्रथम ग्रंथ में से एक वृंदावन

830
01:00:17,200 --> 01:00:21,360
दास ठाकुर द्वारा य लिखा गया बंगाली ग्रंथ है और सर्वाधिक प्रमाणिक

831
01:00:21,360 --> 01:00:25,520
स्वीकार किया जाता है इस बात कर रहे चैतन्य

832
01:00:25,520 --> 01:00:29,720
भागत नहीं नहीं चैतन्य भागवत चैतन्य भागवत एक प्राचीन

833
01:00:29,720 --> 01:00:35,720
ग ये चैतन्य चरितामृथम

834
01:00:37,720 --> 01:00:42,160
प्रभु के लीला प्रवेश कुछ ही वर्षों के अनंतर इसे लिखा गया था

835
01:00:42,160 --> 01:00:46,480
तो यह सर्वाधिक प्रमाणिक भी है इसकी प्राचीन हस्तलिखित मैनु स्क्रिप्ट

836
01:00:46,480 --> 01:00:50,800
भी प्राप्त है तो इसलिए वो इसकी प्रमाणिकता को और भी बढ़ा देती है

837
01:00:50,800 --> 01:00:54,840
तो इस ग्रंथ के अनुसार आपका आपका

838
01:00:54,840 --> 01:01:00,840
चेहरा अगर आ जाए चेहरा नहीं आ

839
01:01:07,280 --> 01:01:11,280
पाएगा हेलो जी हेलो

840
01:01:11,280 --> 01:01:16,240
हां जी आवाज आ रही है आपका आवाज आ रही है चेहरा नहीं दिख रहा

841
01:01:16,240 --> 01:01:20,680
है हां मैंने असल में ये वीडियो जो है बंद करी थी

842
01:01:20,680 --> 01:01:25,120
ये मेरे को लग रहा था थ

843
01:01:25,120 --> 01:01:30,000
से ज्यादा आगा महत्वपूर्ण जानकारी चेहरा

844
01:01:30,000 --> 01:01:34,160
आवश या तो आप किसी और डिवाइस से कनेक्ट होना चाहे तो आप हो सकते

845
01:01:34,160 --> 01:01:38,200
हैं थोड़ी देर के लिए रोक लेते हैं नहीं

846
01:01:38,200 --> 01:01:42,480
ठीक है अभी ठीक है क्या ठीक है बोलिए

847
01:01:42,480 --> 01:01:46,200
हा जी तो माधवेंद्र

848
01:01:46,200 --> 01:01:50,200
इन्होंने नित्यानंद प्रभु यानी चैतन्य के गौर

849
01:01:50,200 --> 01:01:54,160
निताई जो कहे जाते हैं

850
01:01:54,160 --> 01:01:58,200
नित्यानंद तो प्रभु के साथ बहुत कई दिनों तक

851
01:01:58,200 --> 01:02:03,040
इन्होने वास किया और क यात्रा भी करी

852
01:02:03,040 --> 01:02:07,160
लंबी हेलो जी जी बोलिए वीडियो

853
01:02:07,160 --> 01:02:11,200
आपका जो फ्रीज हो गया है क्या आपके

854
01:02:11,200 --> 01:02:15,280
दिक्कत आ रही है आप ऐसा करिए केवल आवाज आप अपना

855
01:02:15,280 --> 01:02:19,480
कैमरा ऑफ कर लीजिए और आप केवल ऑडियो दे

856
01:02:19,480 --> 01:02:23,480
दीजिए या फिर अगर कोई डिवाइस दूसरे

857
01:02:23,480 --> 01:02:29,480
से कनेक्ट होना चाहे तो एक और दूसरे डिवाइस

858
01:02:29,760 --> 01:02:34,040
से दूसरी डिवाइस से आप कनेक्ट हो जाए वो ज्यादा बेटर

859
01:02:34,040 --> 01:02:37,880
प्रयास करता हूं जी

860
01:02:37,880 --> 01:02:42,040
जी तब तक थोड़ी सी बातें कर लेते हैं हम

861
01:02:42,040 --> 01:02:48,040
टॉपिक चल रहा है जो माधवेंद्र पुरी जी

862
01:02:51,320 --> 01:02:55,400
का हरे कृष्णा आपके कारण मैं प्रामाणिक गौरिया

863
01:02:55,400 --> 01:02:59,480
परंपरा से जुड़ रहा हूं चलिए बहुत अच्छी बात है बहुत अच्छी

864
01:02:59,480 --> 01:03:04,200
बात है प्रामाणिक गौड़ीय परंपरा से आप जुड़ी है इस कौन से नहीं

865
01:03:04,200 --> 01:03:09,200
इसकन सनातन

866
01:03:09,200 --> 01:03:13,200
विरोधी तंत्र है अभी तक तो यही पता

867
01:03:13,200 --> 01:03:17,640
चला है कोई आकर के उन चीजों का अगर वोह कर दे तो

868
01:03:17,640 --> 01:03:22,760
बात अलग

869
01:03:22,760 --> 01:03:26,760
है मेरे ख्याल से प्रत्य जी आ गए परी उनका चेहरा

870
01:03:26,760 --> 01:03:30,880
दिखाई नहीं दे क्या प्रत जीय चैनल चलाते हैं

871
01:03:30,880 --> 01:03:36,880
यह अभी बताएंगे हमें भी नहीं पता है यह बात चलाते हैं कि

872
01:03:45,080 --> 01:03:49,240
नहीं कथा यह है कि श्री संप्रदाय के नाथ श्रीनाथ स्वामी

873
01:03:49,240 --> 01:03:55,240
श्री नाथ जी को प्रकट किया जब वे वृंदावन आए फिर वापस

874
01:03:55,310 --> 01:04:01,310
[संगीत]

875
01:04:10,360 --> 01:04:14,920
तब तक कुछ क्वेश्चंस ले सकते हैं उस कन वालों को शंकराचार्य

876
01:04:14,920 --> 01:04:20,920
जी के चरणों में जाकर इसका समाधान पूछना चाहिए

877
01:04:28,660 --> 01:04:34,660
[संगीत]

878
01:04:42,760 --> 01:04:47,240
तो कुछ क्वेश्चन हो आपके तो आप तब तक कर सकते हैं जब तक वो आ रहे हैं दोबारा

879
01:04:47,240 --> 01:04:51,800
किसी और डिवाइस से जुड़ेंगे वो अच्छा आ गए जी

880
01:04:51,800 --> 01:04:56,240
अभी आवाज आ रही है हां बहुत बढ़िया जी ठीक है

881
01:04:56,240 --> 01:05:00,800
तो हा बात हो रही थी माधवेंद्र पुरी जी की सो माधवेंद्र पुरी

882
01:05:00,800 --> 01:05:04,800
के बारे में चैतन्य भागवत ग्रंथ में हमें प्राप्त होता है

883
01:05:04,800 --> 01:05:09,040
माने बताया चैतन्य भागवत ग्रंथ बंगाली ग्रंथ है

884
01:05:09,040 --> 01:05:13,040
और वह चैतन्य महाप्रभु जी के बारे में सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना

885
01:05:13,040 --> 01:05:17,280
जाता है और चैत चैत चमत

886
01:05:17,280 --> 01:05:21,920
है उससे भी पूर्व में उसका वो कालखंड है ब

887
01:05:21,920 --> 01:05:25,800
60 7 वर्ष पूर्व लिखा गया हैसन

888
01:05:25,800 --> 01:05:29,840
हमें प्राचीन मनुस्क्रिप्ट प्राप्त नहीं है इसके बारे में हम बाद में डिटेल में

889
01:05:29,840 --> 01:05:33,880
आएंगे चैतन्य भागवत के प्राप्त चैतन्य भागवत में आता

890
01:05:33,880 --> 01:05:37,960
है कि माधवेंद्र पुरी ने नित्यानंद प्रभु का संग कई दिनों तक

891
01:05:37,960 --> 01:05:42,160
किया कत दिन माधवेंद्र संगे नित्यानंद धकिया चलीला देखे

892
01:05:42,160 --> 01:05:43,680
यथा सेतु बंद मतलब थोड़े

893
01:05:43,680 --> 01:05:47,840
समय पश्चात कई दिनों तक उनका संग करने के पश्चात नित्यानंद

894
01:05:47,840 --> 01:05:52,240
प्रभु जो थे वो सेतु बंद रामेश्वर देखने गए और माधवेंद्र

895
01:05:52,240 --> 01:05:56,720
चलीला सरीय देखी बारे कृष्णा वेश

896
01:05:56,720 --> 01:06:00,880
कृष्णा देहा नि निज देह नहीं कुछ ऐसा

897
01:06:00,880 --> 01:06:04,920
ही भल रहा लेकिन ऐसा मतलब अर्थ उसका यह है कि माधवेंद्र

898
01:06:04,920 --> 01:06:09,080
पुरी जी कई दिनों तक नित्यानंद प्रभु के संग रहने के पश्चात कत दिन

899
01:06:09,080 --> 01:06:13,720
कई दिनों तक नित्यानंद जो थे दक्षिण में गए और

900
01:06:13,720 --> 01:06:17,760
माधव पु जो सरय देखने अब यहां पर मूल बात यह है कि

901
01:06:17,760 --> 01:06:23,040
नित्यानंद प्रभु ने जो अपना गृह त्याग किया है वो

902
01:06:23,040 --> 01:06:27,400
1491 में किया है 92 में किया

903
01:06:27,400 --> 01:06:33,400
यह बात चैतन्य भागवत से ही सिद्ध होती है चैतन्य चरितामृथम

904
01:06:35,360 --> 01:06:39,400
में हम बाद में देखेंगे और एक और ग्रंथ है अद्वैत प्रकाश

905
01:06:39,400 --> 01:06:43,520
नाम से जिसको कुछ गड़िया अपमा मानते हैं भक्ति

906
01:06:43,520 --> 01:06:47,760
सिद्धांत सरस्वती उसको अपमा कहते हैं खैर प्रभुपाद जी के गुरु उस ग्रंथ

907
01:06:47,760 --> 01:06:52,560
में जो तिथि दी हुई है गृह त्याग की उस ग्रंथ के हिसाब से है

908
01:06:52,560 --> 01:06:57,320
1487 चलिए 1487 को भी लेले कि 1487

909
01:06:57,320 --> 01:07:01,320
में नित्यानंद प्रभु ने अपना घर छोड़ा तो इस समय

910
01:07:01,320 --> 01:07:06,240
माधवेंद्र पुरी नित्यानंद प्रभु के साथ कुछ वर्षों बाद होने चाहिए

911
01:07:06,240 --> 01:07:10,240
नित्यानंद प्रभु ने लक्ष्मीपति तीर्थ के साथ अपना घर छोड़ा था ऐसा माना जाता

912
01:07:10,240 --> 01:07:14,560
है गौड़ीय संप्रदाय में और उस बीच लक्ष्मीपति तीर्थ का जब

913
01:07:14,560 --> 01:07:18,600
तिरोधन हुआ तो माधव पुरी का इनको सघ हुआ भारत में कहीं

914
01:07:18,600 --> 01:07:23,000
और मध्य भारत में गई और वो उसके कई दिनों बाद दक्षिण गए माधरी

915
01:07:23,000 --> 01:07:26,120
स अब

916
01:07:26,120 --> 01:07:30,320
जी तो लक्षमी माधवेंद्र पुरी जी तो लक्ष्मीपति तीर्थ के शिष्य

917
01:07:30,320 --> 01:07:36,280
थे ना है बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल

918
01:07:36,280 --> 01:07:40,440
तो नित्यानंद गुरु है ये भी लक्ष्मी पति

919
01:07:40,440 --> 01:07:44,560
जी के शिष्य है अब यहां पर जो है गौड़ी वैष्णव

920
01:07:44,560 --> 01:07:48,760
में मतभेद है कुछ इनको लक्ष्मीपति बताते हैं और कुछ कहते

921
01:07:48,760 --> 01:07:50,560
माधव पुरी के शिष्य थे

922
01:07:50,560 --> 01:07:55,560
प्रभुपाद का ही वक्त स्थानों पर जो कह रहे माधव पुरी के शिष्य थे

923
01:07:55,560 --> 01:07:59,760
और कुछ स्थानों पर तो प्रभुपाद ऐसा भी कहते कि इन्होंने 20 वर्षों तक माधवन

924
01:07:59,760 --> 01:08:04,360
पुरी का संग किया अब ये जो चैतन्य भागवत की बात है

925
01:08:04,360 --> 01:08:08,680
कि 1490 के आसपास माधवेंद्र पुरी को इनके साथ होना चाहिए

926
01:08:08,680 --> 01:08:13,360
अच्छा श्रीनाथ जी का प्राकट्य कब हुआ है 478 में

927
01:08:13,360 --> 01:08:17,360
तो 1478 में श्रीनाथ जी का प्राकट्य हुआ और इकोन

928
01:08:17,360 --> 01:08:23,360
वाले ऐसा प्रचारित करते हैं चैतन्य चरितामृथम

929
01:08:23,440 --> 01:08:27,600
वत्स दुई करीले सेवन उसके पश्चात

930
01:08:27,600 --> 01:08:31,640
उनको ठाकुर जी ने चंदन यात्रा के लिए भेज दिया और वो चंदन लाने

931
01:08:31,640 --> 01:08:36,000
चले गए यदि यह बात इनकी सत्य होती तो ना तो महाप्रभु

932
01:08:36,000 --> 01:08:40,280
वल्लभाचार्य को माधवेंद्र पुरी पढ़ा सकते थे और ना ही नित्यानंद प्रभु

933
01:08:40,280 --> 01:08:44,320
से कभी मिल सकते थे क्योंकि वो तो दो वर्ष पीछे 1480 में ही उनका

934
01:08:44,320 --> 01:08:50,320
लीला प्रवेश हो गया होगा फिर तो यहां पर चैतन्य चरितामृथम

935
01:08:53,040 --> 01:08:57,080
पी सेन आदि जो भी अध्ययन करने वाले हैं और जिन्होंने

936
01:08:57,080 --> 01:09:01,360
चैतन्य भागवत का अध्ययन किया हुआ है वे इस बात को एग्री

937
01:09:01,360 --> 01:09:05,480
करते हैं कि हा यहां पर विरोध हो गया है और कई इस बात को

938
01:09:05,480 --> 01:09:10,880
एग्री करते हैं कि ये प्रक्षिप्त है ग्रंथ चैतन्य चरितामृथम

939
01:09:10,880 --> 01:09:14,960
नहीं है खैर कहने की बात य है कि चैतन्य भागवत के

940
01:09:14,960 --> 01:09:19,080
यदि हम प्रमाणिक मान रहे चैतन्य भागवत को तो माधवेंद्र पुरी जी ने

941
01:09:19,080 --> 01:09:23,760
श्रीनाथ जी को प्रकट नहीं किया श्रीनाथ जी का प्रकट 1478

942
01:09:23,760 --> 01:09:27,920
में हो चुका है मुख प्रकट हुआ है और श्रीनाथ जी स्वयं प्रकट हुए हैं

943
01:09:27,920 --> 01:09:32,000
ब्रजवासी को श्रीनाथ जी ने दर्शन दिए हैं और तत्पश्चात 1492

944
01:09:32,000 --> 01:09:36,360
में महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को स्वप्न में आज्ञा देकर के गोवर्धन बुलाया

945
01:09:36,360 --> 01:09:41,080
कि हमारी सेवा प्रकट कर तब महाप्रभु जी ने एक छोटा मंदिर वहां बनवाया है गोवर्धन

946
01:09:41,080 --> 01:09:45,280
महाप्रभु वल्लभाचार्य जी वहां पहुंचे गोकुल में आप श्री को ब्रह्म संबंध

947
01:09:45,280 --> 01:09:49,840
की आज्ञा हुई और उसके दो दिन पश्चात श्रावण शुक्ल एकादशी

948
01:09:49,840 --> 01:09:54,160
दो दिन पश्चात त्रयोदशी के दिन महाप्रभु जी का प्रथम मिलन हुआ है श्रीनाथ

949
01:09:54,160 --> 01:09:58,320
जी से और महा प्रभु जी ने मंदिर बनवाया है श्रीनाथ जी का और रामदास चौहान

950
01:09:58,320 --> 01:10:02,920
जी को सेवा सौपी है इसके पश्चात लगभग 25

951
01:10:02,920 --> 01:10:06,920
26 वर्ष पश्चात 1519 में जब नया मंदिर बन केर

952
01:10:06,920 --> 01:10:11,080
पूर्ण हुआ है पूर्णमल क्षत्रिय के द्वारा जो महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के सेवक

953
01:10:11,080 --> 01:10:15,200
थे तब उस नए मंदिर में माधवेंद्र पुरी को आपने सेवा सौंपी

954
01:10:15,200 --> 01:10:19,200
है और उनके साथ में बंगाली ब्राह्मणों को वहां पर सेवा

955
01:10:19,200 --> 01:10:23,480
में रखा है कुन दास जी को रखा है सूरदास जी को रखा है सूरदास

956
01:10:23,480 --> 01:10:25,960
जी जो लीला का दर्शन होता था

957
01:10:25,960 --> 01:10:30,200
व महाप्रभु जी की कृपा थी कि सूरदास जी को महाप्रभु जी ने ऐसी दिव्य

958
01:10:30,200 --> 01:10:34,240
दृष्टि प्रदान करी कि उन्ह प्रत्यक्ष लीला का दर्शन हो जाता था और इस बात का

959
01:10:34,240 --> 01:10:39,040
तो हमारे य वार्ता प्रसिद्ध है कि इस बात की इस बात को कौतुक

960
01:10:39,040 --> 01:10:43,040
हमारे ही आचार्यों ने गोकुलनाथ जी नेतो इसको देखना चाहा

961
01:10:43,040 --> 01:10:47,080
कि हमने ऐसा सुना है कि इनके दिव्य दृष्टि और य जो भी श्रीनाथ

962
01:10:47,080 --> 01:10:51,280
जी के दर्शन होते हैं हुबहू वैसे वर्णन कर देते हैं तो उन्होने कहा हमें देखने की इच्छा

963
01:10:51,280 --> 01:10:55,440
है तब उनके बड़े भ्राता जो थे गिरधर जी गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी के बड़े

964
01:10:55,440 --> 01:10:59,840
पुत्र महाप्रभु जी के सबसे बड़े पोते उन्होंने कही की

965
01:10:59,840 --> 01:11:03,920
है उनकी महाप्रभु जी के सेवक है उनकी परीक्षा ना लोने कहा हम कौतुक देखने

966
01:11:03,920 --> 01:11:07,920
की इच्छा है तो हम उन्ह दर्शन करने य बलाए तो उने गोकुल

967
01:11:07,920 --> 01:11:11,960
बुलाया सूरदास को दर्शन करने और नवनीत प्रिया जी बालकृष्ण जी

968
01:11:11,960 --> 01:11:16,040
के जो स्वरूप है उनको गर्मी बहुत थी उसन केवल मोतियों के श्रृंगार धराए

969
01:11:16,040 --> 01:11:20,240
और कुछ भी नहीं धराया और सूरदास जी से विनती की जो सूरदास जी ठाकुर जी के श्रृंगार

970
01:11:20,240 --> 01:11:24,720
का वर्णन करो तो सूरदास जी ने तब पद गाया था देख हरि नंगम नंगा

971
01:11:24,720 --> 01:11:28,840
जलस भूषण अंग विराजत वसन हीन छवि उठी तरंगा

972
01:11:28,840 --> 01:11:33,360
अंग अंग प्रति अमित माधुरी निरखी लज्जित रति कोटि अनंगा

973
01:11:33,360 --> 01:11:37,440
किलकत दधि सुत मुख लेपन करी सूर हसत ब्रज योन संगा

974
01:11:37,440 --> 01:11:41,040
देखी हरि नंगम तो सभी गोकुलनाथ

975
01:11:41,040 --> 01:11:45,040
जी समत सभी आचार्य बालकों ने भी उनको प्रणाम किया कि आप

976
01:11:45,040 --> 01:11:49,080
अद्भुत आपने ऐसे सामर्थ के दर्शन कराए कि आपने ऐसे

977
01:11:49,080 --> 01:11:53,080
कैसे गाया आपने तो उन्होने कहा जैसे आपने श्रृंगार कि हमने तो वैसे ही गाया तो

978
01:11:53,080 --> 01:11:57,840
ये स क्लेम एक क्लेम आ रहा है

979
01:11:57,840 --> 01:12:02,040
कि यह कह रहे हैं कि माधवेंद्र पुरी पाद का

980
01:12:02,040 --> 01:12:06,240
तिरो भाव आपने बताया 1490 में हो गया मैंने नहीं

981
01:12:06,240 --> 01:12:10,320
बताया चैतन्य चरितामृथम के हिसाब

982
01:12:10,320 --> 01:12:14,800
से 1490 नहीं 1480 में होना चाहिए क्योंकि श्रीनाथ जी का प्राक

983
01:12:14,800 --> 01:12:18,520
1478 में हुआ

984
01:12:18,520 --> 01:12:22,600
147 और उसके दो वर्ष बाद चैतन्य चरिता वो हो गया रोन

985
01:12:22,600 --> 01:12:26,800
1480 में हो गया तो इसमें होने प माधवेंद्र

986
01:12:26,800 --> 01:12:31,880
पुरी कभी नित्यानंद प्रभु से मिल ही नहीं सकें असंभव यहा

987
01:12:31,880 --> 01:12:36,240
आपर है यहां पर आप अगर स् कन के पक्षधर है

988
01:12:36,240 --> 01:12:40,720
तो यहां पर आप अपने ही उसका विरोध कर रहे हैं य कह के कि भाई 1530

989
01:12:40,720 --> 01:12:45,000
तक के उनके प्रमाण मिलते माधवन पुरी के तो चैत चता

990
01:12:45,000 --> 01:12:50,840
चैतन्य चरितामृथम

991
01:12:50,840 --> 01:12:55,320
भाव करवाया प्रकट करवाया श्रीनाथ जी को प्रकट किया

992
01:12:55,320 --> 01:12:59,360
उसके दो वर्ष बाद वह जो है उनकी लीला समाप्त हो

993
01:12:59,360 --> 01:13:03,360
गई तो जो फैक्ट है व यह बताते

994
01:13:03,360 --> 01:13:08,080
हैं कि जो श्रीनाथ जी प्रकट हु व 1978 में हुए हैं

995
01:13:08,080 --> 01:13:12,480
तो उसके दो वर्ष है हा

996
01:13:12,480 --> 01:13:17,240
यानी कि 1480 में आपकी चेतन चरता मृत के अनुसार माधवे

997
01:13:17,240 --> 01:13:22,120
जी का रो भाव हो गया जी प्र

998
01:13:22,120 --> 01:13:26,320
जी जी तो अब जब हमारे पास में ऐसी बात आ रही

999
01:13:26,320 --> 01:13:30,640
है कि महाप्रभु माधवेंद्र पुरी जी काव 1480

1000
01:13:30,640 --> 01:13:34,720
में संभव नहीं है ना तो वार्ता साहित्य के हिसाब

1001
01:13:34,720 --> 01:13:39,200
से और ना ही चैतन्य भागवत के हिसाब से तो यहां पर वार्ता साहित्य

1002
01:13:39,200 --> 01:13:43,320
और म पुष्टि मार्गी साहित्य और चैतन्य भागवत ये एक मत

1003
01:13:43,320 --> 01:13:47,480
हो जाते हैं दोनों ग्रंथ ऐसी बात है वार्ता

1004
01:13:47,480 --> 01:13:51,920
साहित्य और च भागवत जब एकमत हो जाते हैं यहां पर इस स्थान पर

1005
01:13:51,920 --> 01:13:56,200
तो यहां से सत्य प्रकट हो के सामने आ जाता है कि जो भी दूसरी बात जा रही है

1006
01:13:56,200 --> 01:14:00,560
वे मिथ्या बात हैं और बाद में जोड़ी गई है माधवेंद्र पुरी

1007
01:14:00,560 --> 01:14:04,720
को 1519 में महाप्रभु जी ने श्रीनाथ जी की सेवा दी

1008
01:14:04,720 --> 01:14:06,200
और उन्होंने

1009
01:14:06,200 --> 01:14:10,280
आगे 14 वर्ष तक श्रीनाथ जी की सेवा करी है इसका स्पष्ट

1010
01:14:10,280 --> 01:14:14,360
उल्लेख श्रीनाथ जी की प्राकट्य वार्ता में प्राप्त होता है और

1011
01:14:14,360 --> 01:14:19,200
महाप्रभु जी को सन्यास दीक्षा भी माधवेंद्र पुरी नेही दी है 1530

1012
01:14:19,200 --> 01:14:23,640
मेंब महाप्रभु जी काशी पधारे और आपने सन्यास लिया तब

1013
01:14:23,640 --> 01:14:28,080
माधवेंद्र पुरी ने ही का नाम पूर्णानंद रखा

1014
01:14:28,080 --> 01:14:34,080
यह बात वल्लभ दिग्ज नामक संस्कृत ग्रंथ में हमें प्राप्त होती

1015
01:14:34,120 --> 01:14:38,240
है माधवेंद्र प्रेश दर्शित

1016
01:14:38,240 --> 01:14:44,240
और प्रेश दर्शा कर केसा पूर्णानंद नाम आपका रखा यह बात हमें

1017
01:14:44,360 --> 01:14:48,720
वल्लभ तो अब वल्लभ दिग्विजय जो सबसे प्रमाणिक

1018
01:14:48,720 --> 01:14:54,000
ग्रंथ है इसकी बात है और की प्राकट्य वार्ता है

1019
01:14:54,000 --> 01:14:58,080
और तन भागवत है यह तीनों मैच कर रहे हैं आपस में आप

1020
01:14:58,080 --> 01:15:02,240
देखें इनको ध्यान से तो जाहिर सी बात है बात इतने ग्रंथों में आ रही

1021
01:15:02,240 --> 01:15:06,280
है इतनी जगहो पर आ रही है वही सत्य है और अन्य बातें सत्य नहीं है

1022
01:15:06,280 --> 01:15:10,440
अर्थात चैतन्य भागवत के अनुसार श्रीनाथ जी का प्राकट्य माधवेंद्र पुरी

1023
01:15:10,440 --> 01:15:14,800
ने नहीं किया यह सिद्ध होता है श्रीनाथ जी का स्वत

1024
01:15:14,800 --> 01:15:19,440
हुआ और महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने उनकी सेवा प्रकट करके मंदिर बनवाया

1025
01:15:19,440 --> 01:15:21,360
यह बात हमें स्पष्ट

1026
01:15:21,360 --> 01:15:26,800
रूप से पता यहां पर ल

1027
01:15:26,800 --> 01:15:31,160
ठीक तो मुझे लग रहा है इनके प्रश्न का उत्तर हो गया होगा यहां पर

1028
01:15:31,160 --> 01:15:35,320
जी जी जी बिल्कुल हो गया और मैं आफ्टर ल एक बात कहूंगा एक काम आप करिएगा

1029
01:15:35,320 --> 01:15:39,480
जब आपको ऐसा लग ही रहा है कि श्रीनाथ जी का प्राकट्य जो

1030
01:15:39,480 --> 01:15:45,400
है वो माधवेंद्र पुरी जी ने करवाया

1031
01:15:45,400 --> 01:15:49,640
है अ वल्लभ जी ने नहीं करवाया

1032
01:15:49,640 --> 01:15:53,920
है ना वल्लभाचार्य जी महाराज जी ने नहीं करवाया और इनके हिसाब से माधवेंद्र

1033
01:15:53,920 --> 01:15:58,480
पुरी जी ने करवाया हां ये

1034
01:15:58,480 --> 01:16:03,120
चैतन्य चरितामृथम करते हैं ऐसा लेकिन चैतन्य च

1035
01:16:03,120 --> 01:16:07,200
अगर यय क्लेम कर रहे तो आप ऐसा करिएगा कि आप जो वो दो लोग बातें कर

1036
01:16:07,200 --> 01:16:11,360
रहे थे आपस में कोर्ट केस में जाने की तो आप भी चले जाइएगा ले लीजिएगा

1037
01:16:11,360 --> 01:16:15,360
श्रीनाथ मंदिर फिर क्या है हम लोगों हम लोग भी देखेंगे भाई कैसे

1038
01:16:15,360 --> 01:16:19,520
क्या हुआ है ना कोर्ट केस जाने से पहले एक बात मैं बता हूं कोर्ट

1039
01:16:19,520 --> 01:16:23,880
के जाने से पहले एक बार विश्वनाथ चक्रवर्ती जी को उठाकर पढ़ लीजिएगा यदि विश्वनाथ चक्रवर्ती

1040
01:16:23,880 --> 01:16:28,120
को प्रमाणिक मानते हो तो विश्वनाथ चक्रवर्ती पा गोपाल देवाक

1041
01:16:28,120 --> 01:16:32,440
नाम का स्त्र लिखा है उसम आप लिखते तमल

1042
01:16:32,440 --> 01:16:35,240
हद थाम

1043
01:16:35,240 --> 01:16:36,520
माधवन कर रहे

1044
01:16:36,520 --> 01:16:40,680
हैं अच्छा य ऐसा मैं ये पूछ रहा थाय ऐसा

1045
01:16:40,680 --> 01:16:44,800
क्लेम करते क्यों है कि माधवेंद्र पुरी जी ने व करा है जबक

1046
01:16:44,800 --> 01:16:49,160
उन्हीं के तो शिष्य है वल्लभाचार्य जी महाराज भी उन्होंने पढ़ाई की है उनसे

1047
01:16:49,160 --> 01:16:53,240
तो ये क्लेम क्यों करते हैं माधवेंद्र पुरी जी ने प्रकट किया है वल्लभाचार्य

1048
01:16:53,240 --> 01:16:57,880
जी ने नहीं किया है मैं बताया मैंने चैतन्य चरितामृथम

1049
01:16:57,880 --> 01:17:02,000
जो है वो प्रक्षिप्त हो चुका है मूल रूप में हमारे पास विद्यमान

1050
01:17:02,000 --> 01:17:06,000
नहीं रह गया है अच्छा दूसरी एक बात ये भी है इनके अनुसार वल्लभाचार्य

1051
01:17:06,000 --> 01:17:10,120
जी प्रामाणिक थे प्रामाणिक संप्रदाय है तो

1052
01:17:10,120 --> 01:17:14,200
जो प्रामाणिक है उसकी प्रामाणिकता पर आप झूठ बोलने वाली वो अप

1053
01:17:14,200 --> 01:17:18,320
प्रामाणिकता का दोष लगा रहे हो आप पहले आप त

1054
01:17:18,320 --> 01:17:22,360
कर लोगे प्रामाणिक कौन है और कौन नहीं है हां आप एक पक्ष

1055
01:17:22,360 --> 01:17:26,360
तो ग्रहण करें वो पक्ष ग्रहण जो है क्लियर नहीं

1056
01:17:26,360 --> 01:17:30,520
है मैं विष्णुनाथ चक्रवर्ती पाद प आता हूं

1057
01:17:30,520 --> 01:17:34,560
विष्णुनाथ चकवती पाद ने श्रीनाथ जी की जो स्तुति लिखी है गोपाल

1058
01:17:34,560 --> 01:17:38,560
देवाक उसमें आप शी लिख रहे हैं कि तमल हृद थाम प्रेम

1059
01:17:38,560 --> 01:17:43,160
सेवाम विन प्रकट निज शक्त वल्लभाचार्य

1060
01:17:43,160 --> 01:17:47,360
भक्ता स्मति दद सव शील गोपाल देव यानी

1061
01:17:47,360 --> 01:17:51,440
जो अपनी निज शक्ति महाप्रभु वल्लभाचार्य की भक्ति के द्वारा

1062
01:17:51,440 --> 01:17:52,240
प्रकट

1063
01:17:52,240 --> 01:17:56,360
हुए वे सरती हद स श्रील गोपाल देव वे

1064
01:17:56,360 --> 01:18:00,480
श्रील गोपाल देव यानी श्री नाथ जी मेरे हृदय में स् फुरित हो

1065
01:18:00,480 --> 01:18:04,720
यह स्तुति श्री नाथ जी की ये प्रार्थना श्रीनाथ जी से मा

1066
01:18:04,720 --> 01:18:08,800
ये कर रहे हैं विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर अब यहां पर तो व कह रहे हैं कि प्रकट

1067
01:18:08,800 --> 01:18:13,160
निज शक्त वल्लभाचार्य भक्त तो अब आप बताएं आप

1068
01:18:13,160 --> 01:18:17,160
किसको रिजेक्ट कर रहे हैं और किसके ऊपर आप कोर्ट केस कर रहे हैं विष चकवती

1069
01:18:17,160 --> 01:18:21,400
पाद कोर्ट केस कर रहे हैं या चैतन्य भागवत पर कोर्ट केस कर रहे हैं

1070
01:18:21,400 --> 01:18:25,560
या रघुनाथ दास गोस्वामी जी पर कोर्ट केस कर रहे हैं जो कि ग स्वामी विठ्ठल नाथ

1071
01:18:25,560 --> 01:18:29,600
जी की और महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की स्तुति कर रहे हैं या फिर आप जीव गोस्वामी को

1072
01:18:29,600 --> 01:18:34,080
कोर्ट केस कर रहे हैं जो कि अपने भागवत की टीका में महाप्रभु

1073
01:18:34,080 --> 01:18:38,440
जी को कोट कर रहे हैं वल्लभाचार्य जी को कोट कर रहे हैं विष्ण चक्रवर्ती ने सारा दर्शनी

1074
01:18:38,440 --> 01:18:42,880
में तो झड़ी लगा दी है महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को कोट करने की और

1075
01:18:42,880 --> 01:18:46,880
आप केस कर रहे हैं तो आप किसके ऊपर केस कर रहे हैं पहले आप ये देखें वो आपके

1076
01:18:46,880 --> 01:18:51,200
ही पूर्वा चार्य है अन्य नहीं अब खर केस करना है कर सकते हैं

1077
01:18:51,200 --> 01:18:55,280
कलयुग है संभव हो आगे जाकर के भविष्य में जीत भी जाए

1078
01:18:55,280 --> 01:18:59,280
लेकिन वह विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद के अनुवर्ती तो नहीं होंगे विश्वनाथ

1079
01:18:59,280 --> 01:19:03,360
चक्रवर्ती पाद तो प्रकट निज शक्त वल्लभाचार्य भक्त यही कह रहे

1080
01:19:03,360 --> 01:19:07,240
हैं और यही सत्य है तो ऐसे संस्कृत ग्रंथों का आलंबन यद

1081
01:19:07,240 --> 01:19:12,000
करें प्राचीन मनु स्कृत ऐसे चैतन्य भागवत का आलंबन करें

1082
01:19:12,000 --> 01:19:16,040
वल्लभ दिवजा का आलंबन करें तो सारी चीज क्लियर हो जाती है

1083
01:19:16,040 --> 01:19:20,120
श्रीनाथ जी को महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने ही आपकी

1084
01:19:20,120 --> 01:19:24,120
सेवा प्रकट करी और मंदिर पहली बार बनवाया आपके शिष्य

1085
01:19:24,120 --> 01:19:28,200
पूर्ण क्षत्री ने नया मंदिर बनवाया जब तब माधवेंद्र पुरी

1086
01:19:28,200 --> 01:19:32,360
को सेवा आपने गुरु दक्षिणा के रूप में सौंपी तत्पश्चात सन्यास

1087
01:19:32,360 --> 01:19:36,480
भी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने माधवेंद्र पुरी जी से ही प्राप्त किया इसका

1088
01:19:36,480 --> 01:19:41,440
स्पष्ट वर्णन हमें वल्लभ निजन में प्राप्त हो रहा है जो संस्कृत ग्रंथ

1089
01:19:41,440 --> 01:19:45,480
बिल्कुल तो अच्छा इसमें एक चीज ये वाली आती है कि ये जो क्लेम

1090
01:19:45,480 --> 01:19:49,880
करते कि मधवा संप्रदाय से है इस बारे में आपका क्या विचार है जो

1091
01:19:49,880 --> 01:19:53,880
क्योंकि पीछे रा विचार देखने बिल्कुल अब इस

1092
01:19:53,880 --> 01:19:58,040
बारे में मैं अपना विचार बताऊ उससे बेटर है कि

1093
01:19:58,040 --> 01:20:02,360
राधारमण परिवार के गोस्वामी जी है श्रीवत्स गोस्वामी जी

1094
01:20:02,360 --> 01:20:06,480
ये उन्हीं को सुन ले एक बार श्रीव गोस्वामी जी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि

1095
01:20:06,480 --> 01:20:10,520
हम लोग ब्रह्म मद्व गड़िया नहीं है हम लोग ब्रह्म मद्व

1096
01:20:10,520 --> 01:20:15,200
गौड़ीय संप्रदाय नहीं है हमारा संप्रदाय का नाम है चैतन्य संप्रदाय

1097
01:20:15,200 --> 01:20:19,280
ना तो हमारा ब्रह्म म से कोई रिलेशन है और ना तो हमारी पूजा

1098
01:20:19,280 --> 01:20:22,320
पद्धति उनके उनसे ली गई है और ना ही हम

1099
01:20:22,320 --> 01:20:26,400
गौड़ वैष्णव है वो ये भी कहते हैं कि हम गौड़ या वैष्णव नहीं है

1100
01:20:26,400 --> 01:20:30,480
क्योंकि जो नरोत्तम दास ठाकुर है उनके ग्रंथ में उन्होंने लिखा है कि

1101
01:20:30,480 --> 01:20:34,880
गौड़ भक्त गौड़ देश के भक्त और उत्कल देश के भक्त दोनों चैतन्य महाप्रभु के

1102
01:20:34,880 --> 01:20:38,920
आकर के नित्य करते गौड़ी भक्ति है तो क्या उत्कल देश के भक्त

1103
01:20:38,920 --> 01:20:43,200
भक्त नहीं रह जाए तो इसलिए उन्होंने कहा कि यदि ऐसी बात हम खाली गड़िया कहेंगे

1104
01:20:43,200 --> 01:20:47,440
स्वयं को तो महाप्रभु जी के भक्तो चैतन्य महाप्रभु के भक्त उत्कल देश के भीत नरोत्तम

1105
01:20:47,440 --> 01:20:51,720
दास ठाकुर स्पष्ट लिख रहे हैं तो वो बात गलत हो जाएगी तो इसलिए हमारा संप्रदाय

1106
01:20:51,720 --> 01:20:55,760
चैतन्य संप्रदाय होना चाहिए गौड़ी संप्रदाय कहना गलत ये मैं नहीं कह रहा हूं

1107
01:20:55,760 --> 01:20:59,800
श्रीवत्स गोस्वामी जी कह रहे हैं जो राधा रमण परिवार के राधा रमण जी

1108
01:20:59,800 --> 01:21:03,920
के सेवायत है जो राधा रमण जी की सेवा करते हैं और उन्ही का

1109
01:21:03,920 --> 01:21:07,960
य प्रामाणिक होते उनमें से एक बिल्कुल बिल्कुल जो

1110
01:21:07,960 --> 01:21:12,240
षड गो स्वामियों की परंपरा है उसम गोपाल भट्ट गोस्वामी जी की परंपरा में राधा रमण

1111
01:21:12,240 --> 01:21:16,360
जी के घर के यह सदस्य हैं और प्रमाणिक गोस्वामी जी

1112
01:21:16,360 --> 01:21:20,720
हैं और इन्होंने यह बात को प्रकट किया है कि हमारा ब्रह्म

1113
01:21:20,720 --> 01:21:24,880
मद्व से हमारा कोई रिलेशन नहीं है क्योंकि एक दूसरी

1114
01:21:24,880 --> 01:21:28,960
बात यह भी है कि गौड़ीय संप्रदाय में और इसकन में

1115
01:21:28,960 --> 01:21:32,960
भीय गोपाल मंत्र दीक्षा की अखंड परंपरा हम

1116
01:21:32,960 --> 01:21:37,360
देखते हैं लेकिन ऐसी गोपाल मंत्र की अखंड परंपरा मध संप्रदाय

1117
01:21:37,360 --> 01:21:41,400
में विद्यमान नहीं यदि ऐसी अखंड परंपरा होती तो सर्वत्र सभी को

1118
01:21:41,400 --> 01:21:45,640
मध संप्रदाय में गोपाल मंत्र ही लेना देना चाहिए था लेकिन ऐसा दृष्टि कोच

1119
01:21:45,640 --> 01:21:49,680
नहीं होता वहान जो टीका लगाता है वो

1120
01:21:49,680 --> 01:21:54,560
भी मध संप्रदाय का टीका नहीं है वो भी मध संप्रदाय का तिलक नहीं है

1121
01:21:54,560 --> 01:21:58,760
जी तिलक नहीं है जीव गोस्वामी जी ने तत्ववादी है तो अब

1122
01:21:58,760 --> 01:22:02,760
इस विषय में जीव गोस्वामी जी

1123
01:22:02,760 --> 01:22:06,880
एक तरीके से मधवा संप्रदाय का जो तात्विक विवेचना

1124
01:22:06,880 --> 01:22:12,200
है उसका खंडन करते खंडन कर रहे बिल्कुल तत्ववादी जी

1125
01:22:12,200 --> 01:22:16,640
तो फिर वो मध संप्रदाय यद आप उनको कहोगे स्वयं को ब्रह्म म गौड़ीय परंपरा कहोगे

1126
01:22:16,640 --> 01:22:20,760
तो आप इनडायरेक्टली जीव गोस्वामी को गुरु द्रोही सिद्ध कर रहे हो और कोई नहीं

1127
01:22:20,760 --> 01:22:24,840
आप स्वयं कर रहे हैं ये कह के हमारी तो ब्रह्म म परम

1128
01:22:24,840 --> 01:22:28,880
अरे ब्रह्म गड़ी परंपरा तो गुरु परंपरा के अपने गुरु

1129
01:22:28,880 --> 01:22:33,120
को उनके मत का खंडन करना य गुरु द्रोह कहा जाए

1130
01:22:33,120 --> 01:22:37,920
और ये आपके एरर के कारण उपज रहा है क्योंकि

1131
01:22:37,920 --> 01:22:42,080
आप ए गुरु द्रोही कहा भी जाएगा एट द एंड आपके पास व

1132
01:22:42,080 --> 01:22:46,160
फिर जो ज्ञान आ रहा है व उस परंपरा से नहीं आ रहा क्योंकि आप अपना दे रहे हो गुरु ने कुछ और दिया

1133
01:22:46,160 --> 01:22:50,920
था बिल्कुल गुरु ने तो वैसे भी कुछ दि प्राप्त ज्ञान तो नहीं कहेंगे उसे

1134
01:22:50,920 --> 01:22:52,360
परंपरा नहीं ठीक है चलो

1135
01:22:52,360 --> 01:22:57,000
परंपरा चैतन्य महाप्रभु से भी प्रारंभ हो स है तो चैतन्य संप्रदाय कहा जाए ठीक

1136
01:22:57,000 --> 01:23:01,000
है चैत संप्रदाय कहा जाए वो ठीक हैलिए ब्रम

1137
01:23:01,000 --> 01:23:05,240
गड़िया का जो क्लेम है ये तो मतलब बात ठीक नहीं है और यह बात

1138
01:23:05,240 --> 01:23:09,640
खैर मैं ना भी कहू तो इसको कहने वाले कई प्रमाणिक गौड़ी आचार्य स्वयं विद्यमान

1139
01:23:09,640 --> 01:23:13,960
है वृंदावन के मंदिर में गलत नहीं हो तो लाल बाबू मंदिर है

1140
01:23:13,960 --> 01:23:18,280
गड़िया मंदिर है वहां पर एक लेख लगा हुआ है खुदा हुआ

1141
01:23:18,280 --> 01:23:22,280
अच्छा के पत्थर प कि गौड़ीय संप्रदाय का

1142
01:23:22,280 --> 01:23:28,280
मध संप्रदाय से कोई संबंध नहीं है स्वतंत्र

1143
01:23:30,040 --> 01:23:34,360
ब कर लिखाया हमारा गौड़ी संप्रदाय का इनसे मधु

1144
01:23:34,360 --> 01:23:39,120
संप्रदाय से रिलेशन नहीं है हम स्वतंत्र वैष्णव संप्रदाय क्या बात

1145
01:23:39,120 --> 01:23:43,320
देख ले

1146
01:23:43,320 --> 01:23:47,400
भया उस मंदिर जरूर जाऊंगा और जो पत्थर

1147
01:23:47,400 --> 01:23:51,600
है उसको जरूर देख बिल्कुल बक य तो आपको नेट

1148
01:23:51,600 --> 01:23:55,600
पर भी मिल ही जाएगा काफी प्रस बात है और ऐसा कहने

1149
01:23:55,600 --> 01:23:59,680
वाले गोस्वामी परिवारों में आचार्य अभी भी विद्यमान है तो उसमें

1150
01:23:59,680 --> 01:24:03,720
हमारे हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है य गोस्वामी परिवार ही इसको

1151
01:24:03,720 --> 01:24:07,760
प्रमाणिक रूप से खंडन और युक्ति से इसका उत्तर

1152
01:24:07,760 --> 01:24:11,960
देते हैं क्यों हम बडिया नहीं है ब्रह्म

1153
01:24:11,960 --> 01:24:16,320
मद्व नहीं है क्योंकि जो परंपरा हमारी मंत्र

1154
01:24:16,320 --> 01:24:20,360
दीक्षा की वोह असल में एक बात आपको य भी बताऊ कि

1155
01:24:20,360 --> 01:24:24,360
माधवेंद्र पुरी जी मध संप्रदाय में दीक्षित थे ले

1156
01:24:24,360 --> 01:24:28,640
लेकिन उन्होने गोपाल मंत्र कहां से लिया

1157
01:24:28,640 --> 01:24:32,680
इसके बारे में

1158
01:24:32,680 --> 01:24:35,160
कहीं

1159
01:24:35,160 --> 01:24:39,600
उले नहीं है ना तो गौड़ीय संप्रदाय में ना मध संप्रदाय

1160
01:24:39,600 --> 01:24:44,480
ऐसी [संगीत]

1161
01:24:44,480 --> 01:24:48,560
विड आवाज आ आवाज आपकी आवाज

1162
01:24:48,560 --> 01:24:52,600
आगे पीछे हो गई क्या बोलिए नहीं

1163
01:24:52,600 --> 01:24:56,800
शायद बीच में कुछ गच हुआ था अभी ठीक

1164
01:24:56,800 --> 01:25:00,800
ठीक ठीक है तो यह पुरी

1165
01:25:00,800 --> 01:25:04,880
जी के मंत्र दीक्षा जो ली थी माधव पुपा जी ने

1166
01:25:04,880 --> 01:25:09,320
वह कौन से संप्रदाय से ली थी इस बारे में संदेह है मलब य हमें

1167
01:25:09,320 --> 01:25:13,320
गौड़ी संप्रदाय में किसी भी ग्रंथ में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता

1168
01:25:13,320 --> 01:25:17,760
कि गोपाल मंत्र दीक्षा इनसे ली थी अब गुरु तो रहे हो गुरु तो स

1169
01:25:17,760 --> 01:25:21,840
के जो गुरु है उन्हे भी गुरु कहेंगे वैष्णव शास्त्र पढ़े उन्हे भी गुरु कहेंगे

1170
01:25:21,840 --> 01:25:26,400
लेकिन गोपाल मंत्र दीक्षा ली स्प उल्लेख नहीं

1171
01:25:26,400 --> 01:25:30,440
कौन सा मंत्र लिया मध संप्रदाय से इसका कोई उल्लेख नहीं है मध संप्रदाय में कई

1172
01:25:30,440 --> 01:25:34,600
सारे मंत्र है एक मध मंत्र रत्नाकर नाम का ग्रंथ है मधवा चार्य

1173
01:25:34,600 --> 01:25:38,600
द्वारा रचित कहा जाता है इसमें सभी मंत्रों का संग्रह है

1174
01:25:38,600 --> 01:25:43,120
इसमें शिव जीी के मंत्र पार्वती जी के मंत्र सब नवग्रहों के मंत्र

1175
01:25:43,120 --> 01:25:47,360
सभी मंत्र है वैष्णव मंत्र तंत्रोक्त मंत्र अ वैष्णव सभी मंत्र हैम

1176
01:25:47,360 --> 01:25:47,960
इसमें गोपाल

1177
01:25:47,960 --> 01:25:52,320
मंत्र भी है लेकिन इससे अखंड परंपरा सिद्ध नहीं होती

1178
01:25:52,320 --> 01:25:56,680
क खाली एक कले एक मंत्र वहा पर गोपाल मंत्र है

1179
01:25:56,680 --> 01:26:00,800
इसका अर्थ यह नहीं है कि वो पूरा का पूरा किताब ही दीक्षा के स्वरूप दी जाती

1180
01:26:00,800 --> 01:26:06,240
थी सबको यह बात ठीक नहीं है इसके

1181
01:26:06,240 --> 01:26:10,440
प्रमाण इनका जो मंत्र है वह परंपरा से नहीं है मधवा चार

1182
01:26:10,440 --> 01:26:14,520
जी की इनका जो तिलक

1183
01:26:14,520 --> 01:26:19,960
है इसका उल्लेख कहीं नहीं है इसका उल्लेख नहीं है

1184
01:26:19,960 --> 01:26:25,200
मधवा इनका जो तिलक है व मधवा परंपरा से नहीं हैन

1185
01:26:25,200 --> 01:26:29,360
स्न की बात करें तो जो इनकी स्कोन की जो वर्णाश्रम व्यवस्था

1186
01:26:29,360 --> 01:26:33,480
है वो मतवा परंपरा से नहीं

1187
01:26:33,480 --> 01:26:38,200
है इनका जो तात्विक सिद्धांत है तात्विक सिद्धांत

1188
01:26:38,200 --> 01:26:42,200
वर्णाश्रम में तो गड़िया के भी विरोधी है हा ब इनका जो तात्विक

1189
01:26:42,200 --> 01:26:46,320
सिद्धांत है वो भी मधवा परंपरा से नहीं है जिसके बारे में खुल के गड़िया

1190
01:26:46,320 --> 01:26:50,320
परंपरा कहती है कि हम मधवा संप्रदाय से नहीं है मगर इस कौन क्लेम

1191
01:26:50,320 --> 01:26:54,880
करता है कि मधवा संप्रदाय से है

1192
01:26:54,880 --> 01:26:58,960
इसका मतलब ना तो धर्म आ रहा है मधवा संप्रदाय से इनका ना तो

1193
01:26:58,960 --> 01:27:03,560
धर्म आ रहा है ना ब्रह्म आ रहा है दो फैक्ट है अथातो धर्म जिज्ञासा अथातो

1194
01:27:03,560 --> 01:27:07,560
ब्रह्म जिज्ञासा तो दोनों में से इनका मधवा चार्य जी से कुछ

1195
01:27:07,560 --> 01:27:12,800
नहीं आ रहा ना तो ब्रह्म आ रहा है ना धर्म आ रहा है

1196
01:27:12,800 --> 01:27:17,160
जी हाद पुरी से अवश्य आ रहा है इतना त

1197
01:27:17,160 --> 01:27:21,200
है माधव के साथ मा

1198
01:27:21,200 --> 01:27:25,320
एक बात और कहूंगा जैसे मान लीजिए कोन के कई लोग

1199
01:27:25,320 --> 01:27:29,440
दीक्षित है स्कोन से और आज भी मैं स्कोन

1200
01:27:29,440 --> 01:27:33,680
से जब वार्तालाप करता हूं तो जो स्कोन से दीक्षित है वो आकर के अगर कुछ गलत चलत

1201
01:27:33,680 --> 01:27:37,800
बातें बोल देते हैं तो लोग मुझे कहते हैं कि इसकन के ऑथेंटिक

1202
01:27:37,800 --> 01:27:42,240
लीडर्स के पास जाइए इनसे क्यों बात कर रहे हैं अगर इसकन

1203
01:27:42,240 --> 01:27:46,400
के विरोध में इसकन से दीक्षित व्यक्ति भी बोलेगा तो

1204
01:27:46,400 --> 01:27:50,600
उसको यह नहीं माना जाएगा कि इसकन क्लेम कर रहा है

1205
01:27:50,600 --> 01:27:55,080
क्योंकि वो इसकन से दीक्षित जरूर है यानी कि वो इकन का एक फॉलोअर है इकोन

1206
01:27:55,080 --> 01:27:59,560
का एक स्टूडेंट है मगर इकोन की ओर से बोलने वाला एक ऑथेंटिक

1207
01:27:59,560 --> 01:28:03,600
प्रीचर इकोन की ओर से बोलने वाला एक ऑथेंटिक स्पीकर या

1208
01:28:03,600 --> 01:28:07,680
ऑथेंटिक लीडर नहीं है तो जब तक जब तक जो

1209
01:28:07,680 --> 01:28:09,880
मधवा चार परंपरा है वह किसी

1210
01:28:09,880 --> 01:28:14,120
को अपने ऑथेंटिक लीडर के रूप में नहीं बोल देगी तब तक उसके

1211
01:28:14,120 --> 01:28:18,120
द्वारा कहा जाने वाला जो वचन है वो यह नहीं माना जा सकता कि यह

1212
01:28:18,120 --> 01:28:22,200
मधवा संप्रदाय का ही वचन है वो उसका एक फॉलोअर है वो

1213
01:28:22,200 --> 01:28:26,280
उसका एक फॉलोअर है अब वो उसकी उसके मन की बात है कि वो जो

1214
01:28:26,280 --> 01:28:30,560
सिद्धांत दे रहा है वो मधवा संप्रदाय का दे रहा है या उसने कोई और सिद्धांत

1215
01:28:30,560 --> 01:28:34,720
प्रतिपादित कर लिए या जो भी है मगर बकुल

1216
01:28:34,720 --> 01:28:38,840
मगर जब तक खूंटा गाड़ करके मधवा संप्रदाय की ओर सेय

1217
01:28:38,840 --> 01:28:43,000
नहीं कहा जाएगा कि भैया यह आज से हमारे वो आगे उत्तराधिकारी

1218
01:28:43,000 --> 01:28:47,080
है यह आज से हमारा जो सिद्धांत उसका प्रचार करने वाले हैं यह

1219
01:28:47,080 --> 01:28:51,440
बताएंगे कि मधवा संप्रदाय का क्या है और क्या नहीं है

1220
01:28:51,440 --> 01:28:56,120
बिल्कुल क्योंकि दीक्षा तो अभी अभी मैं अपनी बात करूं दीक्षा

1221
01:28:56,120 --> 01:29:00,160
गुरुदेव से बहुत लोग दीक्षा लेते हैं बहुत सारे शिष्य गुरुदेव के तो ऐसा नहीं

1222
01:29:00,160 --> 01:29:04,400
है कि सब लोग ऑथेंटिक वक्ता हो गए शंकर परंपरा की ओर से बोलने

1223
01:29:04,400 --> 01:29:08,600
के रू वाले के रूप में और जो वो कहेंगे वही शंकराचार्य का मत है ये संभव नहीं

1224
01:29:08,600 --> 01:29:12,640
हा ऐसा नहीं है जब तक उसकी वाणी मैच खा रही है शंकर

1225
01:29:12,640 --> 01:29:16,680
शंकर सिद्धांतों के अंतर्गत तब तक ठीक है मगर यदि

1226
01:29:16,680 --> 01:29:20,840
कहीं पर विरोध होगा तो ये नहीं विरोध होने के बावजूद भी हम कह रहे कि नहीं नहीं ये तो शंकराचार्य

1227
01:29:20,840 --> 01:29:25,160
परंपरा से आया हमारे पास संभव नहीं मान लीजिए दीक्षित

1228
01:29:25,160 --> 01:29:29,160
हूं और मैं कल को जो है कहने लग कृष्ण एंड क्राइस्ट आर सेम

1229
01:29:29,160 --> 01:29:33,200
तो वो लोग कहे हमारे हमारा जो ज्ञान है व शिवांस से नहीं आया वो तो

1230
01:29:33,200 --> 01:29:36,760
शंकर शंकराचार्य जी से आया

1231
01:29:36,760 --> 01:29:41,280
हैकरा तो ये गड़बड़ बात है जब तक पीछे से

1232
01:29:41,280 --> 01:29:45,560
परंपरा जब तक पीछे से परंपरा घोषित नहीं करती कि वो हमारा उत्तराधिकारी

1233
01:29:45,560 --> 01:29:49,840
है वो हमारा रिप्रेजेंटेटिव है तब तक हम ये नहीं कर सकते कि भाई

1234
01:29:49,840 --> 01:29:54,120
हमारे पास उस परंपरा से प्राप्त ज्ञान है जबकि ना तिलक है ना

1235
01:29:54,120 --> 01:29:58,400
सिद्धांत है ना क्या कहते हैं दूसरी चीज है

1236
01:29:58,400 --> 01:30:02,440
ना धर्म ब्रम शर्ट में कहा जाए ना ही मध परंपरा का हमारे

1237
01:30:02,440 --> 01:30:06,720
पास ब्रह्म है ना ही मध परंपरा का हमारे पास धर्म है आचरण

1238
01:30:06,720 --> 01:30:10,840
भी नहीं है और अध्यात्म भी नहीं है जी जी

1239
01:30:10,840 --> 01:30:15,080
खर इस बारे में तो जो श्रीव गोस्वामी जी है उनसे मैं एग्री करता

1240
01:30:15,080 --> 01:30:19,080
हूं माधवाचार्य लेकिन सॉरी माधवेंद्र पुरी जो थे

1241
01:30:19,080 --> 01:30:23,440
इनको पुष्टि मार्ग के ग्रंथों में भी माधव कहा गया है माधव

1242
01:30:23,440 --> 01:30:27,480
माधव स नियुक्त तो ये माधव संप्रदाय के थे और इन्हीं

1243
01:30:27,480 --> 01:30:31,560
से महाप्रभु जी ने जो वैष्णव शास्त्र पढ़े तो इसलिए महाप्रभु जी को भी

1244
01:30:31,560 --> 01:30:35,800
वल्लभाचार्य जी को भी वैष्णव शास्त्रों के ऊपर स्पेशली भागवत

1245
01:30:35,800 --> 01:30:40,000
के ऊपर मधवा चार्य का मत मान्य है तो जैसे मधवा चार्य

1246
01:30:40,000 --> 01:30:40,500
अध्याय

1247
01:30:40,440 --> 01:30:44,440
तय प्रक्षिप्त वाद की बात करते हैं कि भागत में ब्रह्मा मोहन लीला जो

1248
01:30:44,440 --> 01:30:48,480
है वह प्रक्षिप्त है तो इसको महाप्रभु जी भी समर्थन करते

1249
01:30:48,480 --> 01:30:52,880
हैं कि ये अन्य पुराण से भागवत में आ गया है लीला है

1250
01:30:52,880 --> 01:30:57,080
लीला है निश्चय तो श्री महाप्रभु जी ने तत्वार्थ दीप

1251
01:30:57,080 --> 01:31:01,520
निबंध में भागवता प्रकरण में उस पर अपना व्याख्यान भी दिया है सुबोध

1252
01:31:01,520 --> 01:31:05,600
में भी व्याख्यान इसका दिया है लेकिन तथापि इसको प्रक्षिप्त बोला है कि यह अन्य पुराण से

1253
01:31:05,600 --> 01:31:09,600
यहां पर आ गया है श्रीमद् भागवत की सारस्वत कल्प की लीला का समाधि

1254
01:31:09,600 --> 01:31:13,600
भाषा का यह भाग नहीं है और यह मूल रूप से मधवा चार्य का

1255
01:31:13,600 --> 01:31:18,960
इसको महाप्रभु जी मान्य करते हैं लेकिन इस कौन नहीं

1256
01:31:18,960 --> 01:31:24,240
बताइए करय थोड़ा

1257
01:31:24,240 --> 01:31:29,880
अधिक मध संप्रदाय के निकट महाप्रभु वल्लभाचार्य जी हो गए

1258
01:31:29,880 --> 01:31:34,800
गा कहने वाले मध के इतने क्लोज नहीं है जितने श्रीमद वल्लभाचार्य

1259
01:31:34,800 --> 01:31:38,840
शु जी जी इसमें इसमें एक जो रोचक तथ्य आ रहा है वय आ

1260
01:31:38,840 --> 01:31:43,040
रहा है मधवा संप्रदाय से जो होने का क्लेम कर रहे हैं

1261
01:31:43,040 --> 01:31:47,160
मधुवा संप्रदाय से जो भागवत आ रही है उसको जो

1262
01:31:47,160 --> 01:31:51,880
य क्लेम कर रहे कि हम मधवा चार संप्रदाय के वो उस

1263
01:31:51,880 --> 01:31:56,760
भागवत को ज की त्य नहीं मान रहे है ना और जो बचार

1264
01:31:56,760 --> 01:32:00,960
वो ज की त्य मान रहे हैं और वो जो लोग बचार परंपरा से

1265
01:32:00,960 --> 01:32:04,960
स्वयं को घोषित कर रहे हैं वो ज की त्य ना मान कर के वो

1266
01:32:04,960 --> 01:32:10,720
भागवत पढ़ने के लिए जा रहे हैं शंकराचार्य के पास हा

1267
01:32:10,720 --> 01:32:14,840
व श्रीधर स्वामी को मान रहे हैं लेकिन जीव गोस्वामी

1268
01:32:14,840 --> 01:32:19,000
य भी उद्घोष करते हैं कि श्रीधर स्वाम्य द

1269
01:32:19,000 --> 01:32:23,280
पिता श्री कृष्ण चैत की मैं उनकी स्तुति करता हूं जिनकी कृपा

1270
01:32:23,280 --> 01:32:27,440
से मैं भागवत के उन अर्थों का भी प्रकट य पर कर

1271
01:32:27,440 --> 01:32:31,840
शर स्वामी को अदित श्रीधर स्मिता या शीर

1272
01:32:31,840 --> 01:32:36,640
स्मी स्पष्टीकरण नहीं दे पाए ठीक से उनको उनकी कृपा से मैं कर रहा

1273
01:32:36,640 --> 01:32:41,600
स्वामी जी

1274
01:32:41,600 --> 01:32:46,360
सनातन चता उस वाले विषय पर आ जाता हूं

1275
01:32:46,360 --> 01:32:50,360
पहले तो हम एक स्टेटमेंट लेले कि मधवा चार

1276
01:32:50,360 --> 01:32:55,080
जी से जो भागवत आई उसको जयो की त्य नहीं माना है इकोन ने

1277
01:32:55,080 --> 01:32:59,320
और इकोन के अनुसार चैतन्य महाप्रभु

1278
01:32:59,320 --> 01:33:03,760
भागवत पढ़ने जाते हैं श्रीधर स्वामी जी के पास और

1279
01:33:03,760 --> 01:33:07,800
वो ये भी कोट करते हैं चेतन चरता मृत में कि मैं

1280
01:33:07,800 --> 01:33:12,120
उनकी वजह से उनकी श्रीधर स्वामी के कारण के द्वारा

1281
01:33:12,120 --> 01:33:16,120
मैं कृष्ण को जान पाया हूं मेरे नजरों में वह जो है

1282
01:33:16,120 --> 01:33:20,240
वह जगत गुरु हैं यह कोट किया गया है मगर एट द सेम टाइम

1283
01:33:20,240 --> 01:33:24,360
वहां पर एक बात आती है जो मुझे थोड़ी सी ठीक नहीं लगी वो

1284
01:33:24,360 --> 01:33:28,360
ये कि वहां पर जो वल्लभाचार्य जी है उनकी वहां पर अवमानना सी

1285
01:33:28,360 --> 01:33:32,400
दिखाई देती है जैसे कि वो अपना ग्रंथ

1286
01:33:32,400 --> 01:33:38,160
दिखाने गए और फिर चैतन्य महाप्रभु जी ने कुछ वक्तव्य कहे

1287
01:33:38,160 --> 01:33:42,840
तो तो इस पर थोड़ा सा प्रकाश डाल दीजिए ये जो अवमानना

1288
01:33:42,840 --> 01:33:46,880
दिख रही है चेतन चरता मृत में

1289
01:33:46,880 --> 01:33:50,880
जी बिल्कुल मैं मानता हूं कि वहां पर भाई शंकर

1290
01:33:50,880 --> 01:33:55,000
मत की वो हो रही है मगर मैं इस शर्त पर शंकर

1291
01:33:55,000 --> 01:33:56,840
मत की जो

1292
01:33:56,840 --> 01:34:01,040
महिमा मंडन है शंकर मत का महिमा मंडन है इस शर्त पर स्वीकार करना मुझे ठीक

1293
01:34:01,040 --> 01:34:05,440
नहीं लग रहा कि वहां पर एक और प्रामाणिक आचार्य हमारे वल्लभाचार्य

1294
01:34:05,440 --> 01:34:09,960
जी उनका जो उनकी जो है अवमानना की गई है तो यह

1295
01:34:09,960 --> 01:34:14,080
तरीका मुझे ठीक नहीं लगा मुझे मुझे वहां पर खुद ही फील हुआ कि यह कहीं ना कहीं

1296
01:34:14,080 --> 01:34:18,840
मिलावट है इस तरह से नहीं बोल सकते तो वो थोड़ा सा आप बताए

1297
01:34:18,840 --> 01:34:22,920
बिल्कुल असल में इसका सत्य यह है कि शंकर

1298
01:34:22,920 --> 01:34:27,080
संप्रदाय की श्रीधर स्वामी थे यह बात आप कह रहे हैं यह बात हम कह रहे

1299
01:34:27,080 --> 01:34:31,080
हैं लेकिन इकन वाले ये बात नहीं कह रहे हैं इसकन वाले

1300
01:34:31,080 --> 01:34:35,160
कह रहे हैं श्रीधर स्वामी विष्णु स्वामी मतान आई थे ये बात विष्णु स्वामी

1301
01:34:35,160 --> 01:34:39,760
संप्रदाय जो है मैं विष्णु स्वामी संप्रदाय

1302
01:34:39,760 --> 01:34:43,880
वालों से भी बात कर चुका हूं वो भी उनको भी लाने वाला हूं मैं विष्णु स्वामी

1303
01:34:43,880 --> 01:34:48,240
संप्रदाय वालों से भी बात कर चका वल्लभ संप्रदाय विष्णु स्वामी संप्रदाय

1304
01:34:48,240 --> 01:34:52,320
का अनुवर्तन करते हुए महाप्रभु अल्फ चार्य जी ने हर जगह अपने हर लेख पत्र में आज

1305
01:34:52,320 --> 01:34:56,600
भी महाप्रभु जी के लेख पत्र विद्यमान उन सब में महाप्रभु जी ने स्वयं

1306
01:34:56,600 --> 01:35:01,000
विष्णु स्वामी मता अनुवर्ती वल्लभ यही लिखा है महाप्रभु

1307
01:35:01,000 --> 01:35:05,640
जी स्वयं विष्णु स्वामी मता आई है वे जब एक बात कह रहे हैं

1308
01:35:05,640 --> 01:35:09,720
हम विष्णु स्वामी मताने उन्होंने क स्वामी का नाम उल्लेख तक नहीं किया है

1309
01:35:09,720 --> 01:35:11,920
निंदा तो छोड़िए नाम उल्लेख नहीं

1310
01:35:11,920 --> 01:35:16,040
किया है उनका और महाप्रभु कहीं किसी की भी निंदा नहीं करी

1311
01:35:16,040 --> 01:35:20,280
सिवाय बस इतना आवश्यक है कृष्ण सत्य है कृष्ण

1312
01:35:20,280 --> 01:35:24,360
को असत्य कहने वाला नरक गामी इतना महाप्रभु जी ने कहा है बस और रही बात

1313
01:35:24,360 --> 01:35:28,360
श्रीधर स्वामी की तो पते की बात ये है कि श्रीधर स्वामी ने विष्णु पुराण

1314
01:35:28,360 --> 01:35:32,520
की भी टीका लिखी है और उसमें वो स्वयं को शंकर मतानु घोषित करते हैं

1315
01:35:32,520 --> 01:35:36,840
वे स्वयं को गुरु रूप में स्वयं के चित्सु काचार्य जी को

1316
01:35:36,840 --> 01:35:40,960
चिस काचार्य जी का उल्लेख करते हैं शंकर संप्रदाय के आचार्य रहे थे

1317
01:35:40,960 --> 01:35:45,280
जिन और चितक आचार्य जी ने जो भागवत पर टीका लिखी थी उसके आधार पर श्रीधर

1318
01:35:45,280 --> 01:35:49,600
स्वामी ने भागवत की टीका लिखी श्रीधर स्वामी पूरी शंकराचार्य

1319
01:35:49,600 --> 01:35:53,920
के पद पर भी विद्यमान रहे हैं कुछ शायद गलत नहीं तो 116

1320
01:35:53,920 --> 01:35:58,160
शंकराचार्य थे शायद जग

1321
01:35:58,160 --> 01:36:02,240
में नहीं थे और थोड़ा सा कम है नंबर मेरे पास ग्रंथ

1322
01:36:02,240 --> 01:36:08,240
से [संगीत]

1323
01:36:13,600 --> 01:36:17,600
देख अब जब वोह विष्णु स्वामी संप्रदाय के हैं और

1324
01:36:17,600 --> 01:36:21,720
उनके अनुसार मान लीजिए स्मार्थ मत गलत है तब उनको शंकराचार्य

1325
01:36:21,720 --> 01:36:26,040
पद पर बैठकर और शक मत के प्रचार को करने की रक्षा

1326
01:36:26,040 --> 01:36:30,200
करने की और आगे उत्तराधिकार हों उत्तराधिकारी शंकर

1327
01:36:30,200 --> 01:36:34,400
मत का घोषित करने की क्या आवश्यकता पड़ी फिर यह भी एक सवाल आ जाता

1328
01:36:34,400 --> 01:36:38,600
है और एक सन्यासी के ऊपर झूठ बोलने का आक्षेप

1329
01:36:38,600 --> 01:36:41,360
लग जाता

1330
01:36:41,360 --> 01:36:47,360
है झूठ बोलने का आक्षेप आ जाता है और इस पर य व

1331
01:36:47,960 --> 01:36:52,240
केर झूठ करने का प्रयास करते हैं कि नहीं नहीं पूरी पीठ की जो परंपरा

1332
01:36:52,240 --> 01:36:56,440
है वही खंडित है और माना नहीं जा सकता स्वामी शंकराचार्य

1333
01:36:56,440 --> 01:37:00,560
उनकी परंपरा वो ऐसा करने का प्रयास करते

1334
01:37:00,560 --> 01:37:05,080
हैं जबकि सत्य बात तो ये है श्रीधर स्वामी की श्रीधरी टीका

1335
01:37:05,080 --> 01:37:09,240
जो थी वो प्रथम टीका नहीं है भागवत की क्योंकि श्रीधर

1336
01:37:09,240 --> 01:37:13,280
स्वामी चवी शताब्दी में हुए हैं उनसे पूर्व च काचार्य लिख ही चुके हैं श

1337
01:37:13,280 --> 01:37:17,600
स्वामी स्वयं कह रहे हैं मधवा चार्य भी भागवत पर टीका प्रारंभ

1338
01:37:17,600 --> 01:37:21,640
कर ही चुके थे वो 11वी शताब्दी में हु है बोपदेव वो भी भागवत

1339
01:37:21,640 --> 01:37:26,120
पर टीका कर ही चुके हैं वो बवी 13वीं शताब्दी में तो बोपदेव इतने

1340
01:37:26,120 --> 01:37:30,240
सब टी काकार श्रीधर स्वामी होके थे और दूसरी बात य

1341
01:37:30,240 --> 01:37:34,440
की मधवा चार्य के पश्चात मध संप्रदाय के आचार्य हुए

1342
01:37:34,440 --> 01:37:39,040
हैं विजय ध्वजा चार्य इन्होंने शी

1343
01:37:39,040 --> 01:37:43,080
टीका का शकर संप्रदाय के मायावादी

1344
01:37:43,080 --> 01:37:47,120
टीका बोल उसका खंडन किया है म संप्रदाय में

1345
01:37:47,120 --> 01:37:52,440
श्रीधरी टीका का खंडन किया अब यद आप

1346
01:37:52,440 --> 01:37:56,600
ब्रह्म श्रीधरी टीका मान्य होनी नहीं चाहिए इसी से य

1347
01:37:56,600 --> 01:38:00,680
भी पता लग जाता है कि आप ब्रह्म मधु गड़िया नहीं है क्योंकि मध संप्रदाय में

1348
01:38:00,680 --> 01:38:04,720
शरी नहीं है उन्होंने खंडन किया है श्रीधरी टीका का खर

1349
01:38:04,720 --> 01:38:08,800
खंडन मंडन अपने भारतवर्ष की पुरानी परंपरा सम्मानजनक परंपरा रही

1350
01:38:08,800 --> 01:38:12,920
है तो उसम कोई वैसा आशय लेकिन ऐसा ही खंडन

1351
01:38:12,920 --> 01:38:17,160
विजय वीर राघवाचार्य ने किया श्री संप्रदाय के आचार्य वीर

1352
01:38:17,160 --> 01:38:21,360
राघवाचार्य अपनी मतलब मचार वाले उसको मायावादी

1353
01:38:21,360 --> 01:38:25,040
कहते हुए

1354
01:38:25,040 --> 01:38:29,040
मधवा चार वाले जिसको मायावादी कहते हुए और अलग कर रहे

1355
01:38:29,040 --> 01:38:33,560
हैं खंडन कर रहे हैं उसको फॉलो करने का दावा

1356
01:38:33,560 --> 01:38:37,600
फॉलो नहीं कर रहा है फॉलो करने का क्लेम करता है कौन

1357
01:38:37,600 --> 01:38:41,640
श्रीधर स्वामी के टीके को प्रामाणिक मानता है और फिर कहता है कि

1358
01:38:41,640 --> 01:38:45,720
हम मधवा संप्रदाय के हैं और जब यहां वो ये क्लेम कर देता है कि हम हमारे

1359
01:38:45,720 --> 01:38:49,960
पास जो भागवत आई है वो सीदर स्वामी से आई है तो यहां पर एक कैची

1360
01:38:49,960 --> 01:38:54,480
पॉइंट और है कि वो यह कहता है कि भैया श्रीधर स्वामी जो है

1361
01:38:54,480 --> 01:38:58,840
वो क्या कहते विष्णु स्वामी संप्रदाय के थे अरे तो फिर दिक्कत

1362
01:38:58,840 --> 01:39:03,160
य आती है फिर आप अपने को विष्णु स्वामी संप्रदाय का घोषित कर दो

1363
01:39:03,160 --> 01:39:07,560
अगर ऐसी बात है तो चलो वो बाद की बात है शंकराचार्य

1364
01:39:07,560 --> 01:39:11,800
थे कि नहीं थे वो एक अलग बात है कि आप सारे सबकी आंखों में मिर्ची झोक दो आधा

1365
01:39:11,800 --> 01:39:15,960
किलो मगर कम से कम अपने को विष्णु स्वामी संप्रदाय का तो

1366
01:39:15,960 --> 01:39:20,800
कहो आप जिसका विरोध कर रहे हो उसका अपने आप को कह रहे हो

1367
01:39:20,800 --> 01:39:24,800
सबका विरोध करके आपको आप उसी से कनेक्ट बता रहे यहां तक कि मैं

1368
01:39:24,800 --> 01:39:29,080
तो देखता हूं कि ये कई जगहो पर भगवान श्री कृष्ण का भी विरोध करते हैं

1369
01:39:29,080 --> 01:39:33,600
और खुद को उन्हीं का भक्त बताते हैं बिल्कुल जी

1370
01:39:33,600 --> 01:39:37,760
अब इस पर यहां पर अब मैं एक बात य जरूर बताना

1371
01:39:37,760 --> 01:39:40,520
चाहूंगा कि जी ध्वजा

1372
01:39:40,520 --> 01:39:44,720
चार्य वीर राघवाचार्य और वल्लभ

1373
01:39:44,720 --> 01:39:48,800
संप्रदाय में वल्लभ संप्रदाय में तो श्रीधर स्वामी का नाम उल्लेख करके कभी निंदा तो कहीं

1374
01:39:48,800 --> 01:39:52,920
की नहीं गई है लेकिन हां उनको शंकर संप्रदाय का स्वीकारा

1375
01:39:52,920 --> 01:39:57,040
गया तीन वैष्णव संप्रदाय हैं वल्लभ संप्रदाय मधु संप्रदाय रामानुज

1376
01:39:57,040 --> 01:40:01,200
संप्रदाय यह तीनों श्रीधर स्वामी को शंकर मतान शंकर संप्रदाय

1377
01:40:01,200 --> 01:40:05,560
का मान रहे हैं और श्रीधर स्वामी स्वयं भी स्वयं को शकर संप्रदाय

1378
01:40:05,560 --> 01:40:09,760
का कह रहे हैं लेकिन दृष्टि है उनको विष्णु

1379
01:40:09,760 --> 01:40:15,040
स्वामी संप्रदाय वाला कह रहे हैं और विष्णु स्वामी संप्रदाय वाले हाथ जोड़ नहीं

1380
01:40:15,040 --> 01:40:19,040
संप्रदाय वो स्वयं कह रहे श्रीधर स्वामी लिख रहे हैं श्रीमत

1381
01:40:19,040 --> 01:40:25,040
चित सुख योगी मुख्य रचित व्याख्या रीम तन

1382
01:40:25,600 --> 01:40:29,880
आत्म प्रकाशा विधाम श्रीमद विष्णु पुराण सार वि

1383
01:40:29,880 --> 01:40:34,240
करता यति श्रीधर यह श्रीधर स्वामी विष्णु में कह रहे हैं

1384
01:40:34,240 --> 01:40:38,360
तो अब अपने गुरु का चितक योगी जो है श्रीमत चिस

1385
01:40:38,360 --> 01:40:42,520
योगी उनका उल्लेख यहां पर कर रहे हैं और

1386
01:40:42,520 --> 01:40:46,560
क्लियर कर दे रहे हैं कि मैं इस यहां के से बिलोंग कर रहा हूं तो

1387
01:40:46,560 --> 01:40:50,880
जब श्रीधर स्वामी एक बात स्वयं कह रहे हैं वही बात तीन तीन वैष्णव संप्रदाय

1388
01:40:50,880 --> 01:40:54,920
कह रहे हैं पूरी पीठ वो बात कह रही है कि नहीं हमारे शंकराचार्य

1389
01:40:54,920 --> 01:40:59,320
पद पर रहे हैं तो उन्हें जबरदस्ती विष्णु स्वामी संप्रदाय

1390
01:40:59,320 --> 01:41:03,640
का बोला जा रहा है और ये कहा जा नहीं नहीं तो जो है इन्होंने इन्होंने

1391
01:41:03,640 --> 01:41:07,680
जो यहां पर शंकर मत का अनुसरण किया है जिन स्थानों पर वो

1392
01:41:07,680 --> 01:41:11,720
तो केवल इसलिए किया है क्योंकि शंकर संप्रदाय का प्रभाव बहुत ज्यादा था

1393
01:41:11,720 --> 01:41:16,000
तो शंकर संप्रदाय के लोगों को भक्त ने के लिए ऐसा किया है वो सन्यासी

1394
01:41:16,000 --> 01:41:20,040
थोड़ी ना थे वो तो 10 वर्ष के बालक थे जो बात बात पर डर जाते थे

1395
01:41:20,040 --> 01:41:24,880
जिनको प्राणों वो जीवन का मोह था सन्यासी थो नाथे

1396
01:41:24,880 --> 01:41:28,880
ये भी आता है अगर द अगर ये दबाब की बात को स्वीकार

1397
01:41:28,880 --> 01:41:32,880
करते हैं तो सन्यासी के लिए तो मोहो को त्याग देना वाली बात की

1398
01:41:32,880 --> 01:41:37,080
गई तो आप्रामा सन्यासी हो गए वो अब इस

1399
01:41:37,080 --> 01:41:41,080
बारे में तो क्या ही कहा जाए और यहां परर स्वामी

1400
01:41:41,080 --> 01:41:47,080
की भागवत व्याख्या में

1401
01:41:49,320 --> 01:41:53,720
मायावादी जीव गोस्वामी जीव गोस्वामी कह रहे त माया वादन

1402
01:41:53,720 --> 01:41:57,720
कबत लिपि ना यानी वो मायावादी कबत लिपि है उनकी श्रीधर

1403
01:41:57,720 --> 01:42:01,760
स्वामी की श्रीधर स्वामी चरणा नाम शुद्ध वैष्णव सिद्धांता अनु

1404
01:42:01,760 --> 01:42:06,040
गता चे तरही थाव देव लिखते जो शुद्ध वैष्णव

1405
01:42:06,040 --> 01:42:10,400
सिद्धांत है हम उसी को मानेंगे बाकी नहीं माने ये फैक्ट

1406
01:42:10,400 --> 01:42:14,760
आपकी बुक में दिया गया है ये आपने अलग से बोलाय नहीं मैं बुक में

1407
01:42:14,760 --> 01:42:19,640
कोट करके पढ़ रहा हूं आपकी बुक की पीडीएफ का लिंक हम डाल देंगे

1408
01:42:19,640 --> 01:42:24,120
मतलब नीचे कमेंट सेक्शन में एक बार एक बार पूरी

1409
01:42:24,120 --> 01:42:28,400
फाइनल हो जाए तो अभी दर्शको को बता रहा हूं

1410
01:42:28,400 --> 01:42:32,560
ये जो प्र जी की जो बुक है इसका पीडीएफ नीचे

1411
01:42:32,560 --> 01:42:37,840
डाल दिया जाएगा डिस्क्रिप्शन में तो आपको य सारे फैक्ट मिल जाएंगे जी आप अपनी बात बोले

1412
01:42:37,840 --> 01:42:42,240
जी सनातन गोस्वामी जी स्त कह रहे हैं सनातन गोस्वामी

1413
01:42:42,240 --> 01:42:47,520
कह रहे वंदे चैतन्य देवम तम तद व्याख्या विशेषत

1414
01:42:47,520 --> 01:42:51,560
योय में लोकान श्रीधर स्वाम्य द पिता

1415
01:42:51,560 --> 01:42:56,120
यानी जिनम श्रीधर स्वामी अदीप रहे वे

1416
01:42:56,120 --> 01:43:00,200
यह बात का घटस्फोट कर रहे हैं स्वयं श्री सनातन गोस्वामी जी बृहद

1417
01:43:00,200 --> 01:43:04,360
वषण तोषण नामक अपने ग्रंथ में तो भाई अब बात

1418
01:43:04,360 --> 01:43:08,880
यहां पर ऐसी आती है कि जब जीव गोस्वामी और

1419
01:43:08,880 --> 01:43:13,720
सनातन गोस्वामी जी भी एक बात कह रहे हैं और चैतन्य चरितामृथम

1420
01:43:13,720 --> 01:43:18,040
प्रभु ऐसा बो मायावादी बाले सर्वनाश

1421
01:43:18,040 --> 01:43:22,360
और वही दूसरे स्थान पर वीर राघवाचार्य

1422
01:43:22,360 --> 01:43:26,400
और श्रीधर स्वामी की निंदा करने वाले वीर राघवाचार्य और

1423
01:43:26,400 --> 01:43:30,440
ये अपने विजय ध्वजा चार्य इन दोनों को भी भागवत टीका परम

1424
01:43:30,440 --> 01:43:34,480
वैष्णव बोल कर के सम्मान दिया जा रहा है तो फिर बात यहां

1425
01:43:34,480 --> 01:43:39,200
पर प्रकट हो जाती है कि श्रीधर स्वामी की टीका का अस्वीकार

1426
01:43:39,200 --> 01:43:43,320
अस्वीकार या फिर उसको जबरदस्ती उसको निंदा बोल करके जबक महाप्रभु

1427
01:43:43,320 --> 01:43:47,800
जी ने निंदा करी नहीं है जबरदस्ती महाप्रभु जी को गाली देना एकमात्र का उद्देश्य

1428
01:43:47,800 --> 01:43:51,880
उस अध्याय का दिखाई देता है क्योंकि जब आपको वीर

1429
01:43:51,880 --> 01:43:56,000
राघवाचार्य से कोई कार्य क नहीं है जिन्होने श्रीधर स्वामी भयंकर निंदा करी है विजय

1430
01:43:56,000 --> 01:44:00,080
द से कोई कलह नहीं है वो भी श्रीधर स्वामी का खंडन कर रहे हैं

1431
01:44:00,080 --> 01:44:04,160
तो फिर आप ऐसे महाप्रभु वल्लभाचार्य जिन्होने श्रीधर स्वामी का उल्लेख ही

1432
01:44:04,160 --> 01:44:08,280
नहीं किया है नाम उल्लेख ही नहीं किया है और जिनकी टीका पूरी नहीं हुई आज तक सुबोधिनी

1433
01:44:08,280 --> 01:44:11,360
जी अपूर्ण है क्योंकि दशम मभु

1434
01:44:11,360 --> 01:44:15,600
ने अंतिम दो वर्षों में लिखा था और उसके पश्चात भगवत धाम पधारने

1435
01:44:15,600 --> 01:44:19,640
की आज्ञा हो गई थी तो आप श भगवत धाम पधार तो वो तो हमेशा अधूरा ही रह

1436
01:44:19,640 --> 01:44:23,720
गया सुबोध जी तो पूरी नहीं हु तो महाप्रभु जी सुना अनुन

1437
01:44:23,720 --> 01:44:27,760
विन कैसे कर सकते हैं श्री चैतन्य यह ऐतिहासिक प्रश्न आता है और

1438
01:44:27,760 --> 01:44:32,080
दूसरा यह कि जब सभी की वंदना की जा रही है जिन्होंने

1439
01:44:32,080 --> 01:44:36,120
श्रीधर स्वामी की निंदा करी है उनको गुरु रूप में कहा जा रहा है तो

1440
01:44:36,120 --> 01:44:40,200
महाप्रभु जी जिन्होने निंदा करी नहीं है उनको जबरदस्ती गालिया जा रही है

1441
01:44:40,200 --> 01:44:44,280
वैश भीतर तार करि गणन कहा जा रहा है उनको कहा जा रहा है फल प्राय

1442
01:44:44,280 --> 01:44:48,520
भट्ट नामा आदि सब व्याख्या फल प्राय भट्टे नामद सब व्याख्या

1443
01:44:48,520 --> 01:44:52,560
की इनकी नाम आदि जितनी भी व्याख्या है सब फल्गु प्रा और वही आपके

1444
01:44:52,560 --> 01:44:56,720
सभी विश्वनाथ चक्रवर्ती ले लीजिए

1445
01:44:56,720 --> 01:45:00,880
अथवा रघुनाथ दस गोस्वामी जी की स्तुति ले लीजिए

1446
01:45:00,880 --> 01:45:04,920
अथवा जीव गोस्वामी जी के आप अपने लघु

1447
01:45:04,920 --> 01:45:09,360
वैष्णव तोषण बहत वैष्णव तोषण ये ले लीजिए सनातन गोस्वामी गोस्वामी

1448
01:45:09,360 --> 01:45:13,880
इन सब में महाप्रभु जी को कोट किया जा रहा है लगातार तो फल प्र तो कैसे

1449
01:45:13,880 --> 01:45:18,160
कैसे कोट किया जा रहा है यहा किसका अनुसरण कर रहे सबसे बड़ी बात

1450
01:45:18,160 --> 01:45:22,360
जिसको प्रमाणिक दिखाया जा रहा है उसको जो अन्य वैष्णव संप्रदाय

1451
01:45:22,360 --> 01:45:26,760
जो आपके सार प्रामाणिक है बल्कि वो वैष्णव संप्रदाय जिस वैष्णव

1452
01:45:26,760 --> 01:45:30,920
संप्रदाय से स्कन क्लेम कर रहा है खुद का होने का वो तक जिस

1453
01:45:30,920 --> 01:45:35,240
टीका को त्याज्य मान रहे हैं तो आप उस टीका को प्रेस

1454
01:45:35,240 --> 01:45:39,360
करने वाले को या तो वो नहीं कर सकते हो और उसके आधार पर वहां

1455
01:45:39,360 --> 01:45:43,520
पर वल्लभ महाप्रभु को इस तरह का जो अवमानना वहां

1456
01:45:43,520 --> 01:45:48,400
पर प्रकट की गई है यह मुझे लग रहा है कि वो जो आपसी वैमनस्यता

1457
01:45:48,400 --> 01:45:53,520
निकालनी थी वो जो कुछ ऐसा है उसके कारण से भरा गया

1458
01:45:53,520 --> 01:45:57,720
यह बात कहां से आई इसका मैंने इस पर रिसर्च किया

1459
01:45:57,720 --> 01:46:01,880
तो इस बारे में ऐसा पता लगा कि माधवेंद्र पुरी के चंदन यात्रा

1460
01:46:01,880 --> 01:46:06,120
कर जाने के पश्चात बंगाली ब्राह्मण श्रीनाथ जी की सेवा

1461
01:46:06,120 --> 01:46:10,600
किया करते थे लेकिन कुछ समय पश्चात बंगाली ब्राह्मणों ने श्रीनाथ

1462
01:46:10,600 --> 01:46:14,760
जी का जो द्रव्य आता था भेंट का द्रव्य आता था उसको अपनी कुटिया

1463
01:46:14,760 --> 01:46:18,960
में ले जाना और अपने ऐश्वर्य के साधन जुटाने प्रारंभ

1464
01:46:18,960 --> 01:46:23,040
कर दिया था तो श्रीनाथ जी ने ऐसा वार्ता में आता है कि अवधूत दास

1465
01:46:23,040 --> 01:46:27,080
जी को स्वप्न में आकर कहा कि बंगाली मेरो द्रव्य चुराए ले जाते

1466
01:46:27,080 --> 01:46:31,360
या को हमारी सेवा का तो अवधूत दास दस अधिकारी

1467
01:46:31,360 --> 01:46:35,480
जी जो अष्टछाप के कवि थे महाप वल्लभाचार्य जी के सेवक थे उनको कहा कि

1468
01:46:35,480 --> 01:46:39,680
बंगाली श्रीनाथ जी का द्रव्य चुरा रहे तो उन्होने कहा हमको अवगत है लेकिन को महाप्रभु

1469
01:46:39,680 --> 01:46:41,880
जी ने रखा है तो ब्राह्मण है

1470
01:46:41,880 --> 01:46:45,920
हम तो शूद्र हम इनसे कैसे कहे कुछ तो उन्होंने कहा कि ठीक है या बात के लिए

1471
01:46:45,920 --> 01:46:50,080
हम गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी को अल में पूछेंगे वो जैसी आज्ञा करेंगे

1472
01:46:50,080 --> 01:46:54,200
वैसा करें तो वे विठ्ठल नाथ जी के पास जाकर पूछते हम ऐसा

1473
01:46:54,200 --> 01:46:58,320
ऐसा अवू दास जी को श्रीनाथ जी ने स्वपन में आकर आज्ञा करी तो उन्होने क तुरंत इनको हटाना

1474
01:46:58,320 --> 01:47:02,320
चाहिए यदि देव द्रव य लोग उपभोग कर रहे हैं तो ब्राह्मण के लिए देव

1475
01:47:02,320 --> 01:47:06,320
द्रव्य का उपभोग करना ठीक नहीं तो उन्होने कहा ठीक है आप एक बार बीरबल और

1476
01:47:06,320 --> 01:47:10,640
टोडरमल को बोल दीजिए तो गोस्वामी विठ्ठल नाथ जी ने बीरबल और टोडरमल यह

1477
01:47:10,640 --> 01:47:15,040
गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के शिष्य थे तो उनको उन्होंने पत्र लिखे

1478
01:47:15,040 --> 01:47:20,200
कि भाई कृष्णदास जी यदि हटाए तो आप इनको एक बार ठीक

1479
01:47:20,200 --> 01:47:24,480
तो जतीपुरा आकर के बंगाली ब्राह्मणों की जो कुटिया

1480
01:47:24,480 --> 01:47:28,960
थी जिसमें श्रीनाथ जी का पैसा देव द्रव्य इकट्ठा किया ग के रखा गया था

1481
01:47:28,960 --> 01:47:33,000
वैभव के साधन थे उनको कृष्णदास जी ने कहा कि ये अब जो वैभव

1482
01:47:33,000 --> 01:47:37,040
संपत्ति के साधन है इनको वापस तो प्रभु के उपयोग में ले नहीं सकते ये

1483
01:47:37,040 --> 01:47:41,720
अर्ध भुक्त हो चुके हैं और अर्ध भुक्त प्रभु के उपयोग में आ नहीं सकता ठाकुर जी के उपयोग

1484
01:47:41,720 --> 01:47:45,760
तो इसको क्या किया जाए तो उन्होंने कहा अब इसको हम यद और

1485
01:47:45,760 --> 01:47:50,000
ब्राह्मण इसका उपयोग करते रहेंगे तो इनका पतन होगा क्योंकि ये देव द्रव्य है देव

1486
01:47:50,000 --> 01:47:54,360
द्रव्य का उपभोग महापा की तो उन्होंने कहा कि ठीक है इसको

1487
01:47:54,360 --> 01:47:57,040
आंच लगा दी उन्होंने मतलब अग्नि के समर्पित कर दिया

1488
01:47:57,040 --> 01:48:00,840
उनकी कुटिया में कृष्णदास जी ने आग लगवा

1489
01:48:00,840 --> 01:48:05,040
दी अच्छा जी जी कुटिया

1490
01:48:05,040 --> 01:48:09,320
में जब कृष्णदास जी की उन्होंने आग लगवा दी तो बंगाली ब्राह्मण उस समय श्रीनाथ जी का श्रृंगार

1491
01:48:09,320 --> 01:48:13,320
कर रहे थे और श्रृंगार वो सब धरती पर पटक करके आए अपनी

1492
01:48:13,320 --> 01:48:17,320
कुटियां में आग भुजने के लिए कनाथ जी को अकेला छोड़ कर के तब इस

1493
01:48:17,320 --> 01:48:21,440
बीच कृष्णदास अधिकारी जी ने अन्य गुर्जर ब्राह्मणों को श्रीनाथ

1494
01:48:21,440 --> 01:48:25,560
जी की सेवा में पहुंचा दिया और स्वयं गिरिराज जी के नीचे

1495
01:48:25,560 --> 01:48:29,600
लाठी लेकर के खड़े हो गए कि अब आप हमारे प्रभु को छोड़ कर के

1496
01:48:29,600 --> 01:48:33,960
अकेले गए अब हम आपको वापस जो है यहां आने नहीं देंगे

1497
01:48:33,960 --> 01:48:38,080
तो अब आपका अधिकार नहीं रहा हमने दूसरे ब्राह्मण सेवा में रख लिए ऐसा

1498
01:48:38,080 --> 01:48:42,160
उन्होंने कहा और उसके बाद इन ब्राह्मणों ने कृष्णदास जी पर अटैक किया

1499
01:48:42,160 --> 01:48:46,200
और कृष्णदास जी ने उन सबको वहां से भगा दिया

1500
01:48:46,200 --> 01:48:50,360
एक मिनट जरा मुझे थोड़ा सा समय

1501
01:48:50,360 --> 01:48:54,360
तो यह कारण रहा जिस वजह से इस तरह की मिलावट भरी बात फैलाई जाती

1502
01:48:54,360 --> 01:48:59,280
है और यह जो बात कही जाती

1503
01:48:59,280 --> 01:49:03,560
है खैर इनका इस तरह की स्कन के द्वारा

1504
01:49:03,560 --> 01:49:07,760
इस तरह के ताश के पत्तों का महल खड़ा किया गया है कि आप वो जहां से छू दोगे वहीं

1505
01:49:07,760 --> 01:49:11,920
से चरमरा के पूरा महल गिर जाता है आप मधवा मधवा चार

1506
01:49:11,920 --> 01:49:12,420
परंपरा

1507
01:49:12,320 --> 01:49:16,600
से होने का दावा छू लो आप चैतन्य महाप्रभु को फॉलो करने का दावा

1508
01:49:16,600 --> 01:49:20,880
छू लो आप गौड़ीय संप्रदाय से होने का दावा छू लो आप जो है

1509
01:49:20,880 --> 01:49:25,080
भागवत को मानने वाला दावा छू लो श्रीधन स्वामी को विष्णु

1510
01:49:25,080 --> 01:49:29,880
स्वामी संप्रदाय का होने वाला दावा छू लो है ना

1511
01:49:29,880 --> 01:49:34,120
आप इनका जो दावा है परंपरा प्राप्त ज्ञान उसको छू लो इनका

1512
01:49:34,120 --> 01:49:38,240
जो दावा है कि हम श्री कृष्ण जी की भक्ति करते हैं भगवान की

1513
01:49:38,240 --> 01:49:42,440
वो छूलो इनका कोई भी क्लेम आप छूलो जैसे रामपाल की कहानी

1514
01:49:42,440 --> 01:49:46,760
हुई है ना रामपाल का मामला यही है कि जो भी उसके क्लेम है वो कहीं से भी छू लो

1515
01:49:46,760 --> 01:49:50,920
सब चरमरा जाते हैं तो ऐसा ही इनका चल रहा है बस ये है कि

1516
01:49:50,920 --> 01:49:55,080
थोड़े आपको वेल टू डेट जरूर दिखेंगे वो अगर भौतिक

1517
01:49:55,080 --> 01:49:59,240
दृष्टि से देखे तो व अंग्रेजी अंग्रेजी बोल रहे होंगे बस रामपाल वाले

1518
01:49:59,240 --> 01:50:03,600
थोड़े आपको गवार उसमें ज्यादा मिलेंगे और इनमें थोड़े

1519
01:50:03,600 --> 01:50:08,280
आपको पढ़े लिखे मिलेंगे बस इतनी सी बात

1520
01:50:08,280 --> 01:50:14,280
जी जी अब तो यह हम लोग क पर

1521
01:50:17,000 --> 01:50:21,120
थे किस बात का किस का उल्लेख चल रहा था आप एक बार

1522
01:50:21,120 --> 01:50:25,200
ही चल रहा था को फिर उन्होने भगा दिया बाहर जो ल लेकर

1523
01:50:25,200 --> 01:50:29,320
के खड़े हुए इन्होने फिर भट हो

1524
01:50:29,320 --> 01:50:33,680
ग बिल्कुल अकबर के दरबार में उन्होंने फरियाद करी कंप्लेन

1525
01:50:33,680 --> 01:50:37,680
करी तो वहां बीरबल ने कहा कि श्रीनाथ जी जो है वल्लभाचार्य

1526
01:50:37,680 --> 01:50:41,680
जी के ठाकुर हैं और उन्होंने बंगाली माधव पु जी को रखा था उनके संबंध

1527
01:50:41,680 --> 01:50:45,920
से सेवा कर रहे थे अब उनका मन दूसरों को रखने का है तो उन्होंने दूसरे ब्राह्मण

1528
01:50:45,920 --> 01:50:50,440
जब सेवा में रखे तो अकबर ने तबका ठीक है तो नौकर है तो नौकर को

1529
01:50:50,440 --> 01:50:54,840
मालिक के सामने बोलने का कैसे हक है ऐसा कहके अकबर ने कहा ठीक है इनका

1530
01:50:54,840 --> 01:50:59,320
केस बनता नहीं है इसलिए जाइए उनका दीक्षित जी का मंदिर

1531
01:50:59,320 --> 01:51:03,480
अकबर गोस्वामी विट्ठलनाथ जी को दीक्षित जी बोला करता था और

1532
01:51:03,480 --> 01:51:07,600
यह सभी इतिहासकार मानते हैं कि गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के

1533
01:51:07,600 --> 01:51:11,600
प्रभाव से ही अकबर ने आगे चलकर के जजिया कर और तीर्थ यात्रा

1534
01:51:11,600 --> 01:51:15,880
कर को समाप्त किया था और जतीपुरा और समेत पूरे व्रज

1535
01:51:15,880 --> 01:51:20,200
मंडल में किसी भी प्रकार के जो वृक्षों

1536
01:51:20,200 --> 01:51:24,400
को किसी प्रकार की हानि पहुंचाना निषेध किया था गौ हत्या का पूर्ण

1537
01:51:24,400 --> 01:51:28,440
रूप से प्रतिबंध किया था और पूरा गोकुल और जतीपुरा गांव

1538
01:51:28,440 --> 01:51:32,200
श्री विट्ठलनाथ जी को भेंट कर दिया था अकबर ने इसके

1539
01:51:32,200 --> 01:51:36,280
फरमान आज भी नाथ द्वारा में विराजित है आज भी अकबर के

1540
01:51:36,280 --> 01:51:40,640
फरमान मरियम उज जमानी बेगम जो थी इनके फरमान

1541
01:51:40,640 --> 01:51:44,800
यह आज भी मौजूद है जो कि विट्ठलनाथ जी के प्रति लिखे गए थे

1542
01:51:44,800 --> 01:51:49,040
खर इसकी कथा दूसरी आती है यह मैंने बुक में कही है

1543
01:51:49,040 --> 01:51:53,480
अब अच्छा ऐसा नहीं है कि चैतन्य चरितामृथम

1544
01:51:53,480 --> 01:51:56,600
चैतन्य चरितामृथम

1545
01:51:56,600 --> 01:52:01,040
ऐतिहासिक विवरण नहीं दिया गया है व चैतन्य भागवत का विरोध

1546
01:52:01,040 --> 01:52:05,040
और विष चक्रवर्ती का भी विरोधी है और इसी तरह से एक

1547
01:52:05,040 --> 01:52:09,360
और आती है बात जो कि स्वयं इनको स्वीकार पड़ी है

1548
01:52:09,360 --> 01:52:15,360
भक्ति सिद्धांत सरस्वती को भी स्वीकारने पड़ी जसे चैतन्य चरितामृथम

1549
01:52:17,360 --> 01:52:21,520
चमत्कार ल दुई पुत्र आनी प्रभु चरण पड़ी

1550
01:52:21,520 --> 01:52:26,040
इसमें इसका बैकग्राउंड ऐसा है कि जब चैतन्य महाप्रभु अडल

1551
01:52:26,040 --> 01:52:30,480
में श्रीमत वल्लभाचार्य जी महाप्रभु जी से मिले तो चैतन्य

1552
01:52:30,480 --> 01:52:36,480
चरितामृथम

1553
01:52:36,640 --> 01:52:41,160
महाप्रभु के चरणों में रख दिया दुई पुत्र आनी प्रभु

1554
01:52:41,160 --> 01:52:45,240
और यहां पर जो भक्ति सिधांत सरस्वती है

1555
01:52:45,240 --> 01:52:49,440
भक्ति जो भी इतिहासकार है वो भी यही चीज कहेंगे कि

1556
01:52:49,440 --> 01:52:53,560
जो दोनों पुत्र थे महाप्रभु जी के विट्ठलनाथ

1557
01:52:53,560 --> 01:52:57,760
जी और गोपीनाथ जी उनका भी तो एक जन्म ही इस समय नहीं हुआ था केवल गोपीनाथ जी का जन्म

1558
01:52:57,760 --> 01:53:01,880
हुआ था दई पुत्रा वाली बात यहां पर झूठी है ये बंगाली में लिखते

1559
01:53:01,880 --> 01:53:06,040
हैं दई पुत्र गोपीनाथ और विट्ठले शवर महाप्रभु

1560
01:53:06,040 --> 01:53:10,280
1434 व 1435 शकाब दय प्रयाग उपनीत

1561
01:53:10,280 --> 01:53:14,720
तत्काल विट्ठले शव जन्म है नाय द टू सनस ऑफ वल्लभाचार्य

1562
01:53:14,720 --> 01:53:18,840
गोपीनाथ एंड विट्ठलेश न श्री चैतन्य विजिटेक इन

1563
01:53:18,840 --> 01:53:22,880
द ईयर 1434 और 1435 शकाब विलेश्वर

1564
01:53:22,880 --> 01:53:27,000
वाज नॉट यट बोर्न यह बात स्वयं प्रभुपाद जी भी लिख रहे हैं और यहां पर

1565
01:53:27,000 --> 01:53:31,000
चैतन्य चरितामृथम उभर करके सामने

1566
01:53:31,000 --> 01:53:32,480
आ गई है जिसे स्वीकारना

1567
01:53:32,480 --> 01:53:36,640
पड़ेगा ही पड़ेगा और पड़ा ही है अब इसमें आगे

1568
01:53:36,640 --> 01:53:40,640
जाकर के इस अध्याय में और भी बहुत सारी बहुत सारी समस्याएं

1569
01:53:40,640 --> 01:53:44,720
आती हैं जिनको मैंने डिटेल में वर्णन

1570
01:53:44,720 --> 01:53:49,280
किया है सारी असंगति हों का यदि

1571
01:53:49,280 --> 01:53:54,200
आप कहे तो हम उस पर जाए अथवा हम लोगन के

1572
01:53:54,200 --> 01:53:58,240
आते जी आगे हम चलते स्न की जो आगे अन्य चीज क्योंकि

1573
01:53:58,240 --> 01:54:02,320
बाकी तो आपकी जो बुक है उसका पीडीएफ का लिंक हम डाल देंगे यहां

1574
01:54:02,320 --> 01:54:07,600
पर जिनको पढ़ना होगा

1575
01:54:07,600 --> 01:54:11,720
पढ़ेंगे अच्छा एक यह भी चीज जैसे जो परंपरा की बात चल रही

1576
01:54:11,720 --> 01:54:15,880
थी यह भी चीज थी की स्कोन जब क्लेम करता है कि भाई जो

1577
01:54:15,880 --> 01:54:20,080
क्या कहते हैं हम जो है एक संप्रदाय है तो इन्होंने अपना

1578
01:54:20,080 --> 01:54:24,760
कुछ भी अलग से भागवत पर भाष्य किया जबकि

1579
01:54:24,760 --> 01:54:29,480
संप्रदाय का एक तत्व होता है कि व भाष्य करता है नहीं

1580
01:54:29,480 --> 01:54:33,600
भागवत भागवत भाष्य का जो भागवत का उन्होने ट्रांसलेशन और टीका

1581
01:54:33,600 --> 01:54:37,800
करी है इंग्लिश में उसी को अपना भाष्य मानते नहीं तो

1582
01:54:37,800 --> 01:54:42,040
वो तो कहते हैं ये कॉपी है उसकी श्रीधर स्वामी जी की अपना चिंतन

1583
01:54:42,040 --> 01:54:46,040
थोड़ी ना बताते हैं नहीं पूरी श्रीधर स्वामी जी की कॉपी ये लोग नहीं करते हैं

1584
01:54:46,040 --> 01:54:50,080
श्रीधर स्वामी जी कई जगहो पर जहां पर श्रीधर स्वामी ने शंकर मत का

1585
01:54:50,080 --> 01:54:54,400
अनुसरण किया है वो तो नहीं किया है और कई ऐ स्थान भी है जहा पर श्रीधर स्वामी ने शंकर

1586
01:54:54,400 --> 01:54:58,720
मत का अनुसरण नहीं किया है वे भी गौड़ी आचार्य को अमान्य है

1587
01:54:58,720 --> 01:55:03,160
ऐसा स्पष्ट हमें सारा अर्थ दर्शनी देखेंगे विष चक जी प्रकट

1588
01:55:03,160 --> 01:55:07,280
है क्या जब व्यवहार की बात चल रही होती है तो शंकर शंकर मत में

1589
01:55:07,280 --> 01:55:11,480
भी जो भी सिद्धांत है वो सब मैच खाएंगे भक्ति वाले सिद्धांत जितने

1590
01:55:11,480 --> 01:55:15,680
भी है शक मैच खाएंगे अन्य भक्ति संप्रदाय से जहां

1591
01:55:15,680 --> 01:55:19,840
तात्विक विवेचन होगा केवल वही पर डिफरेंसेस ऑफ ओपिनियन आएगा

1592
01:55:19,840 --> 01:55:22,600
जहा न हो बिल्कुल

1593
01:55:22,600 --> 01:55:27,760
भक्ति तो क्योंकि भक्ति तो भक्ति अपने आप में खैर अलग

1594
01:55:27,760 --> 01:55:32,560
य थोड़ा सा मुझे एक वो फैक्ट जानना था कि मधुसूदन

1595
01:55:32,560 --> 01:55:36,640
सरस्वती जी के साथ इनका जो

1596
01:55:36,640 --> 01:55:40,880
क्या कहते हैं यह वल्लभ महाप्रभु जी का

1597
01:55:40,880 --> 01:55:45,200
नहीं मधुसूदन सरस्वती जी के साथ

1598
01:55:45,200 --> 01:55:49,240
बहुत अच्छे संबंध थे वल्लभ महाप्रभु के उनके बारे में थोड़ा सा

1599
01:55:49,240 --> 01:55:53,520
बताइए शंकर संप्रदाय का और संप्रदाय का आपसी

1600
01:55:53,520 --> 01:55:58,240
संबंध कैसा रहा वो थोड़ा सा असल

1601
01:55:58,240 --> 01:56:02,680
में बात य है कि जो प्रामाणिक हमारे संप्रदाय

1602
01:56:02,680 --> 01:56:06,920
हैं इन संप्रदायों में आज जो देखने

1603
01:56:06,920 --> 01:56:11,200
को मिलती है वास्तव में कोई ऐसी दूरी है नहीं

1604
01:56:11,200 --> 01:56:15,480
मगर वह जो देखने को दिखाई दे रही है सब अपने अपने उसम

1605
01:56:15,480 --> 01:56:19,680
लीन है या मगन है तो इस बात का फायदा यह जो विदेशों

1606
01:56:19,680 --> 01:56:23,920
से आने वाले तंत्र है मल तंत्र इस तरह के तंत्र जो

1607
01:56:23,920 --> 01:56:28,000
रूप बदल कर आते हैं आजकल इसको नाम दिया गया मलेच्छ राज के भेजे

1608
01:56:28,000 --> 01:56:32,680
हुए तत्व जी तो ऐसे जो तंत्र

1609
01:56:32,680 --> 01:56:36,720
है तो इनको फायदा उठता है फायदा मिलता है तो मैं थोड़ा

1610
01:56:36,720 --> 01:56:37,600
सा इस बारे में जानना

1611
01:56:37,600 --> 01:56:41,680
चाह रहा था कि वल्लभ संप्रदाय का शंकर संप्रदाय के साथ किस तरह का

1612
01:56:41,680 --> 01:56:45,760
वोह है तो मधुसूदन सरस्वती जी और वल्लभ महाप्रभु जो है वोह

1613
01:56:45,760 --> 01:56:50,440
समकालीन थे तो उनके बीच का थोड़ा सा मुझे आप बताए

1614
01:56:50,440 --> 01:56:56,120
बिल्कुल ये अब असल में महाप्रभु श्रीमद वल्लभाचार्य

1615
01:56:56,120 --> 01:57:00,320
जी हमारे संप्रदाय में प्रचलित अनुश्रुति के अनुसार कि

1616
01:57:00,320 --> 01:57:04,440
महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने अपने पुत्र गोपीनाथ जी और द्वितीय पुत्र श्री विट्ठलनाथ

1617
01:57:04,440 --> 01:57:08,520
जी प्रभु चरण को विद्या अध्ययन मधुसूदन सरस्वती जी के द्वारा

1618
01:57:08,520 --> 01:57:12,520
करवाया था किंतु इस बात का उल्लेख हमें प्राचीन ग्रंथों

1619
01:57:12,520 --> 01:57:16,680
में नहीं मिलता है अनुसूची में प्राप्त होता है लेकिन प्राचीन एक गृह

1620
01:57:16,680 --> 01:57:20,720
वार्ता है महाप्रभु वल्लभाचार्य ग्रह में जब निवास कर रहे थे तो

1621
01:57:20,720 --> 01:57:25,320
उस समय के इड ग्रह नाम से रिकॉर्ड किए गए हैं गोकुल नाथ जी द्वारा

1622
01:57:25,320 --> 01:57:29,640
उसमें माधव सरस्वती जी का नाम अवश्य आता है कि माधव

1623
01:57:29,640 --> 01:57:33,760
सरस्वती जी जो थे वे महाप्रभु जी के समकालीन

1624
01:57:33,760 --> 01:57:37,880
थे और महाप्रभु जी के मित्र थे उन्होंने ही महाप्रभु जी को य सुझाव दिया कि

1625
01:57:37,880 --> 01:57:43,880
आप वाराणसी से पधार कर के

1626
01:57:47,200 --> 01:57:51,440
अड़ेलते मधुसूदन सरस्वती तो मधुसूदन सरस्वती

1627
01:57:51,440 --> 01:57:55,680
जी मतलब सीनियर डिसाइल रहे माधव सरस्वती जी के और इन्हीं

1628
01:57:55,680 --> 01:58:00,240
माधव सरस्वती जी के यहां जब गोपीनाथ जी और विट्ठलनाथ जी पढ़े तो मधुसूदन

1629
01:58:00,240 --> 01:58:04,360
सरस्वती जी को भी वो गुरु रूप में ही देखते थे और मधुसूदन सरस्वती उनको अपने

1630
01:58:04,360 --> 01:58:08,560
गुरु भता के रूप में देखते थे ये और मधुसूदन

1631
01:58:08,560 --> 01:58:12,600
सरस्वती और महाप्रभु श्रीमंत वल्लभाचार्य जी में इतना प्रेम था कि महाप्रभु

1632
01:58:12,600 --> 01:58:16,760
जी ने आज्ञा करी है गोपीनाथ जी प्रभु चरण ने आज्ञा करी है सुयान

1633
01:58:16,760 --> 01:58:21,240
भक्तान प्रदर्श यानी अपने ठाकुर जी के दर्शन जो सुय हो

1634
01:58:21,240 --> 01:58:25,440
और जो भक्त हो उन्ही को कराए जा सकते हैं अन्य को नहीं जो सुई

1635
01:58:25,440 --> 01:58:29,480
नहीं है लेकिन भक्त है उसको भी आप बचे और जो सुई है लेकिन भक्त नहीं

1636
01:58:29,480 --> 01:58:33,720
है उससे भी आप बचे महाप्रभु जी ने मधुसूदन सरस्वती जी को अपने ठाकुर

1637
01:58:33,720 --> 01:58:37,720
जी के दर्शन कराए हैं क्योंकि मधुसूदन सरस्वती ने महाप्रभु जी के

1638
01:58:37,720 --> 01:58:41,840
जो ठाकुर जी थे जितने स्वरूप विराज सबकी स्तुति करी

1639
01:58:41,840 --> 01:58:45,880
उन सभी की स्तुति करी उनके दर्शन कर तो महाप्रभु जी ने उनको अपने दर्शन कराए ठाकुर जी के

1640
01:58:45,880 --> 01:58:50,160
यानी इतना उन्हें सुई मान रहे हैं इतना उन्हें भक्त मान रहे हैं मायावादी

1641
01:58:50,160 --> 01:58:54,520
होने के पश्चात अपने ठाकुर जी के दर्शन कराने और मधुसूदन सरस्वती

1642
01:58:54,520 --> 01:58:58,720
जी ने इंटर्न महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की स्तुति करी है

1643
01:58:58,720 --> 01:59:02,440
प्रचंड प्रचंड शंकर मता अनुय होते हुए भी अब जैसे इनके

1644
01:59:02,440 --> 01:59:06,600
बारे में प्रसिद्ध है कि व्यास तीर्थ जी ने तत्ववादी

1645
01:59:06,600 --> 01:59:10,600
स्थापना करने के लिए न्यायाम ग्रंथ लिखा

1646
01:59:10,600 --> 01:59:14,920
और तर्क तांडव ग्रंथ लिखा तो यह जो न्यायाम

1647
01:59:14,920 --> 01:59:18,920
था यह बड़ा प्रचंड ग्रंथ था उस समय इस ग्रंथ को लेकर के

1648
01:59:18,920 --> 01:59:22,920
अप्प दीक्षित ने ऐसा कहा है कि मधवा चार्य का तत्व जो था

1649
01:59:22,920 --> 01:59:27,640
इसका कद्दू बहुत पहले फट चुका होता व्यास तीर्थ जी ने बचा लिया न्यायाम

1650
01:59:27,640 --> 01:59:32,080
लिख कर के उस न्यायाम न उस समय मधुसूदन

1651
01:59:32,080 --> 01:59:36,520
सरस्वती ने लिखा अद्वैत सिद्धि नामक ग्रंथ में लिख कर के

1652
01:59:36,520 --> 01:59:40,640
जिसमें वो व्यास तीर्थ जी का खंडन कर रहे हैं अद्वैतवाद की स्थापना कर रहे

1653
01:59:40,640 --> 01:59:44,720
हैं वे मधुसूदन सरस्वती ऐसे प्रचंड अद्वैतवाद वे

1654
01:59:44,720 --> 01:59:48,760
महाप्रभु श्रीमद वल्लभाचार्य जी की स्तुति कर गए हैं करी है

1655
01:59:48,760 --> 01:59:52,920
उन्होंने अपने आनंद मंदाकिनी नामक ग्रंथ में और और आनंद मंदाकिनी

1656
01:59:52,920 --> 01:59:57,360
में वे लिखते है मधुसूदन सरस्वती जी यह श्री वल्लभ हृदय सदय

1657
01:59:57,360 --> 02:00:03,360
सम्यक विराजते नम सही कृष्ण भावात्मक

1658
02:00:04,320 --> 02:00:08,520
भु वल्लभ के हृदय में जो कृष्ण विराजित है वे ही

1659
02:00:08,520 --> 02:00:12,600
मेरे मानस में नित्य विराज वसतु में मान ऐसी स्तुति कर रहे

1660
02:00:12,600 --> 02:00:16,760
हैं और आगे अगले श्लोक में लिखते हैं सद धरता स्वेम परम ऋषि

1661
02:00:16,760 --> 02:00:21,360
करता हरि गुण विकर्ता चित्तस्य स्व गुण गण रोमांच निच

1662
02:00:21,360 --> 02:00:25,440
पराक प्रायो निज जन निखिल दोषा शयाम स

1663
02:00:25,440 --> 02:00:29,960
भरता में नित्य स भरता में नित्य जयति सततम श्री विठ्ठल

1664
02:00:29,960 --> 02:00:34,120
हरि ये जो विट्ठल हरि ही यहां पर इन्होंने पद

1665
02:00:34,120 --> 02:00:38,320
उपयोग किया है ये जो आनंद मंदाकिनी को पढ़ने

1666
02:00:38,320 --> 02:00:42,560
वाले सभी रिसर्चर है जैसे आनंद मंदाकिनी डॉक्टर सुनीता

1667
02:00:42,560 --> 02:00:46,840
शर्मा ने जयपुर से प्रकाशित कराई है इस पर अच्छा आलेख

1668
02:00:46,840 --> 02:00:50,960
लिख कर के इस पर रिसर्च करके उसमें उन्होंने लिखा है कि यहां जो विट्ठल

1669
02:00:50,960 --> 02:00:55,440
हरि ही आ रहा है यह गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ

1670
02:00:55,440 --> 02:00:59,600
जी प्रभु चरण को इंगित कर रहा है उनको उनके प्रति सम्मान दर्शा

1671
02:00:59,600 --> 02:01:04,120
रहा है स श्री विट्ठल हरि ऐसा कहते हुए सो

1672
02:01:04,120 --> 02:01:08,360
इतना प्रेम इनके मध्य परस्पर था अब यह है शंकर मतान

1673
02:01:08,360 --> 02:01:12,680
आई जो व्यास तीर्थ जी का विरोध कर रहे हैं व्यास तीर्थ जी कौन है महाप्रभु

1674
02:01:12,680 --> 02:01:17,520
जी के वैष्णव शास्त्र पढ़ाने वाले गुरु माधवेंद्र पुरी के गुरु के

1675
02:01:17,520 --> 02:01:19,360
यानी आप वो देख रहे रि

1676
02:01:19,360 --> 02:01:23,400
महाप्रभु जी के जो दादा गुरु के पद पर है उनका खंडन य कर

1677
02:01:23,400 --> 02:01:26,440
रहे हैं

1678
02:01:26,440 --> 02:01:30,640
लेकिन त् खंडन कर रहे महाप्रभु जी की भक्ति की स्तुति कर रहे

1679
02:01:30,640 --> 02:01:34,720
और महाप्रभु जी उनकी भक्ति से इतने प्रसन्न है कि य भक्ति

1680
02:01:34,720 --> 02:01:38,880
आप कर रहे हो तो ठीक है पर हमको आपको अपना शिष्य नहीं बनाना ऐसा नहीं कना

1681
02:01:38,880 --> 02:01:42,920
कि आप हमारे संपदा हमारे सेवक वैष्णव बन हो आप भक्ति करें ठाकुर

1682
02:01:42,920 --> 02:01:46,920
जी परस्पर प्रगा प्रेम के दर्शन हमें हो रहे हैं आनंद मंदा

1683
02:01:46,920 --> 02:01:51,040
ग्रंथ य मधुसूदन सरस्वती जी का ग्रंथ मधुसूदन

1684
02:01:51,040 --> 02:01:55,600
सरने रसायन नाम का ग्रंथ और लिखा है जिसमें वो भक्ति

1685
02:01:55,600 --> 02:01:59,880
बताते हैं भक्ति के रस शास्त्र होने के बारे में बताते हैं और

1686
02:01:59,880 --> 02:02:03,960
इन्हीं मधुसूदन सरस्वती का एक और श्लोक है जो बड़ा प्रसिद्ध है वल्लभ संप्रदाय

1687
02:02:03,960 --> 02:02:08,000
में भी वंशी विभूषित करान अरविंद नेत्रा ये

1688
02:02:08,000 --> 02:02:12,200
शायद आपने सुना हो भी लगभग इसमें उन्होंने लिखता लिखा है कि

1689
02:02:12,200 --> 02:02:16,400
कृष्णा परम किम तत्वम हम न जाने कृष्ण से परे कोई तत्व

1690
02:02:16,400 --> 02:02:21,240
है ऐसा मैं नहीं जानता ये लिख रहे हैं मधुसूदन सरस्वती जी जो शंकर भता आई

1691
02:02:21,240 --> 02:02:25,440
सो ऐसी उनकी अनन्य भक्ति से महाप्रभु जी प्रसन्न थे

1692
02:02:25,440 --> 02:02:29,680
कि ठीक है आप ऐसी अनन्य भक्ति कर रहे हैं तो आप बिल्कुल यही सबसे ठीक है उत्तम

1693
02:02:29,680 --> 02:02:33,840
है आप बिल्कुल य भक्ति करें और ऐसा कोई कभी ऐसा

1694
02:02:33,840 --> 02:02:34,560
कोई द्वेष भाव

1695
02:02:34,560 --> 02:02:39,960
का दर्शन नहीं हो रहा है य पर कि अन्य संप्रदाय के साथ

1696
02:02:39,960 --> 02:02:44,040
में प्रेम दवे भाव का दर्शन तो यहां होता है

1697
02:02:44,040 --> 02:02:48,960
भैया हम कोर्ट में जाएंगे और जो अपना मंदिर छुड़ाए और जो है

1698
02:02:48,960 --> 02:02:52,000
कुछ ऐसी बा

1699
02:02:52,000 --> 02:02:56,080
किसके अगेंस्ट आप जाए आप बिल्कुल जाए विषण चक्रवर्ती जी के अगेंस्ट जाए आप

1700
02:02:56,080 --> 02:03:00,080
चैतन्य भागवत के ऊपर केस करें कि गलत है गलत कह रहे हैं ये लोग आप केस करें

1701
02:03:00,080 --> 02:03:04,120
रघुनाथ दास गोस्वामी जी के ऊपर कि उन्होंने विट्ठलनाथ जी की स्तुति करी कैसे ये

1702
02:03:04,120 --> 02:03:08,160
कैसे कह रहे हैं किय विट्ठलनाथ जी श्रीनाथ जी को ऐसा लाड़ लड़ा रहे कि श्रीनाथ जी मोटे

1703
02:03:08,160 --> 02:03:12,200
हो गए हैं ये पुष्ट होते जा रहे मोटे होते जा रहे हैं इनको इतना प्रेम किया जा

1704
02:03:12,200 --> 02:03:16,360
रहा है ऐसा कहने वाले आचार पर पहले आप केस करें उसके बाद

1705
02:03:16,360 --> 02:03:20,480
आप वल्लभ संप्रदाय प आए तो ठीक रहेगा नहीं ठीक

1706
02:03:20,480 --> 02:03:23,400
है वो केस में भी आज देख लेंगे है

1707
02:03:23,400 --> 02:03:27,560
लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर और हम तैयार है सीना लिए

1708
02:03:27,560 --> 02:03:30,600
अपना

1709
02:03:30,600 --> 02:03:31,840
इधर आए

1710
02:03:31,840 --> 02:03:36,120
तो मैदान में ये लोग मैदान में ही तो नहीं आते ये लोग आते

1711
02:03:36,120 --> 02:03:40,440
कहां है अद्भुत लीला है ठाकुर जी र क्या

1712
02:03:40,440 --> 02:03:44,480
ठीक है अब इस बारे में फिर अब आगे आते हैं कि इस सब चीजों

1713
02:03:44,480 --> 02:03:48,680
के बाद कई ऐसे वक्तव्य कह दिए गए जो ना

1714
02:03:48,680 --> 02:03:52,960
तो प्रक्षिप्त ग्रंथों में लिखित हैं यानी जो चैतन्य ता जिसे प्रक्षिप्त

1715
02:03:52,960 --> 02:03:57,120
कह रहे हैं ना तो उसमें लिखित है मन गंत कपूल कल्पित

1716
02:03:57,120 --> 02:04:01,280
कहे गए और ऐसी गालियां जो कहीं नहीं प्राप्त हो रही

1717
02:04:01,280 --> 02:04:05,920
वो चीजें न में अनफॉर्चूनेटली प्रभुपाद

1718
02:04:05,920 --> 02:04:09,920
जी के द्वारा प्रकट हुई और उनके शिष्यों द्वारा बहुत बढ़ा दी

1719
02:04:09,920 --> 02:04:14,000
गई उनको अब जरा यहां पर देखते कि कन से

1720
02:04:14,000 --> 02:04:18,080
जो वल्लभ संप्रदाय का पर्टिकुलर संबंध था वो किस

1721
02:04:18,080 --> 02:04:22,120
प्रकार का रहा है तो यह भी खैर पुस्तक

1722
02:04:22,120 --> 02:04:26,560
में मैंने डिटेल में विमर्श तो किया है

1723
02:04:26,560 --> 02:04:31,120
इसको आप शेयर कर पाएंगे क्याय निष्कर्ष भ्रमण कु शंका एव समाधान

1724
02:04:31,120 --> 02:04:36,040
कौन से प्रश्न पर है बोल दीजिए हो जाएगा दिखाय

1725
02:04:36,040 --> 02:04:41,240
प्रभ अभी मेरे ख्याल से नहीं हो पाएगा व कुछ

1726
02:04:41,240 --> 02:04:45,920
ठीक है ठीक है तो फिर मैं ही य बताता बता देता हूं य

1727
02:04:45,920 --> 02:04:50,320
पर यहां परम आपके पास स्क्रीन

1728
02:04:50,320 --> 02:04:54,800
है अगर बैक कैमरे से उसे दिखा सकते हैं

1729
02:04:54,800 --> 02:04:57,800
अच्छा

1730
02:04:57,800 --> 02:05:03,800
जीय बैक कैमरा होगा

1731
02:05:04,520 --> 02:05:08,520
कैसे एक सवाल आ रहा है हमारे पास कि जब आप विदेशियों

1732
02:05:08,520 --> 02:05:12,560
के कल्चर को ऐसा करते हो वैसा करते हो तो आप यह यूज

1733
02:05:12,560 --> 02:05:16,560
क्यों करते हो विदेशियों के द्वारा पहली बात तो

1734
02:05:16,560 --> 02:05:20,640
यह कि विदेशियों के मूल में भी हमारा विज्ञान

1735
02:05:20,640 --> 02:05:24,640
है दूसरी बात यह है कि धरती

1736
02:05:24,640 --> 02:05:29,120
पर गिरे हुए व्यक्ति को धरती का ही सहारा लेकर के उठना पड़ता है

1737
02:05:29,120 --> 02:05:33,480
माया में फसे हुए व्यक्ति को ही जो पराशक्ति है भगवान

1738
02:05:33,480 --> 02:05:37,720
की उसका सहारा लेकर के निकलना पड़ता है इसी प्रकार से

1739
02:05:37,720 --> 02:05:41,920
अगर हम हर तरह से जो पैशा चिक उससे घिरे

1740
02:05:41,920 --> 02:05:46,000
हुए हैं तो उस पैशा चिक जो वातावरण है उसी की चीजों

1741
02:05:46,000 --> 02:05:50,080
का आलंबन लेकर के हम उस पैशा चिक वातावरण से निकलेंगे

1742
02:05:50,080 --> 02:05:51,080
है ना

1743
02:05:51,080 --> 02:05:55,120
जैसे कि आकाश में जो हवाई जहाज जिसका उड़ना लक्ष्य है

1744
02:05:55,120 --> 02:05:59,560
हवाई हवाई जहाज का आकाश में उड़ना लक्ष्य है धरती

1745
02:05:59,560 --> 02:06:03,560
से अलग होना उसका लक्ष्य है पर धरती से अलग होने के लिए वह पहले धरती पर ही

1746
02:06:03,560 --> 02:06:09,000
दौड़ता है उसी तरह से हम दौड़ रहे हैं ठीक है

1747
02:06:09,000 --> 02:06:13,080
और बहुत सारी चीजें इसमें बाकी जो यह बातें कर

1748
02:06:13,080 --> 02:06:17,080
रहे हैं अगर व इस कन से जुड़े हुए हैं तो यह ऐसी चीजें नहीं है जिनका

1749
02:06:17,080 --> 02:06:21,320
उपयोग करना जो है वो हो जाए बाधित

1750
02:06:21,320 --> 02:06:25,720
हो जाए ठीक है जिसका उपयोग हम नहीं कर सकते हम उपयोग कर रहे हैं

1751
02:06:25,720 --> 02:06:30,160
उसके लिए यथोचित जो उन्होंने अपने जो मूल्य निर्धारित

1752
02:06:30,160 --> 02:06:34,400
किए हैं अपने श्रम के वो मूल्य भी दे कर के कर रहे हैं मगर

1753
02:06:34,400 --> 02:06:38,480
आप यदि आप इस कौन से हैं तो

1754
02:06:38,480 --> 02:06:42,560
आप त्रिदन संन्यास भागवत ये सब क्यों ले रहे हैं जब

1755
02:06:42,560 --> 02:06:46,920
आप शंकरा शंकर मत का खंडन करते हैं तो ये

1756
02:06:46,920 --> 02:06:52,920
सन्यास सन्यास सन्यास आप सन्यास और ये

1757
02:06:54,040 --> 02:06:58,160
मेरा मत ऐसा है कि रही बात इसकी परिधान वगैरह की तो परिधान ऐसा

1758
02:06:58,160 --> 02:07:02,240
कहना कि नहीं सब विदेशी ही है यह बात ठीक नहीं है सब प्रधान तो तो भारत में ही

1759
02:07:02,240 --> 02:07:06,240
बन रहा है प्रधान का स्वरूप बस बदला हुआ है लेकिन है तो सब भारतीय ही भारत में जो

1760
02:07:06,240 --> 02:07:10,160
आ गया

1761
02:07:10,160 --> 02:07:14,680
हमारा जिन्होने बनाई है उन्होंने उन चीजों का एक मूल्य निर्धारित

1762
02:07:14,680 --> 02:07:19,320
किया है हम उस मूल्य को दे रहे और ले रहे

1763
02:07:19,320 --> 02:07:23,440
मगर सन्यास का कोई मूल्य नहीं होता है का कोई मूल्य नहीं होता है सिद्धांतों

1764
02:07:23,440 --> 02:07:27,000
का कोई मूल्य नहीं होता

1765
02:07:27,000 --> 02:07:31,200
है हा वो बिना परमिशन के ले भी रहे हो और उनको

1766
02:07:31,200 --> 02:07:35,200
आप गालिया भी दे रहे

1767
02:07:35,200 --> 02:07:39,400
हो यह चीज वव अपरा अंतर्गत आ जाएगी खर अब

1768
02:07:39,400 --> 02:07:44,320
यहां पर जरा आते हैं तो इस प्रकार से अतिहा सिक बातें

1769
02:07:44,320 --> 02:07:48,960
करनाय र प्राचीन समय से ही प्रारंभ हो गया था जैसे

1770
02:07:48,960 --> 02:07:53,200
भक्ति सिद्धांत सरस्वती के पिताजी भक्ति विनो ठाकुर ये

1771
02:07:53,200 --> 02:07:57,480
संभ कायस्थ थे शायद इन्होंने इनसे ही गौड़ीय

1772
02:07:57,480 --> 02:08:01,720
मठ प्रारंभ हुआ ऐसा आदि आचार्य है ऐसा कहा जाता है गौड़ी मठ की स्थापना

1773
02:08:01,720 --> 02:08:05,800
भक्ति स सरस्वती ने की थी इनके पुत्र थे अभी सज्जन तोषण नाम

1774
02:08:05,800 --> 02:08:10,360
के अपने मासिक पत्र में लिखते हैं कि श्री जीवा वंस श्री वल्लभाचार्य

1775
02:08:10,360 --> 02:08:14,360
शड हि बुक तत्वार्थ जीव गोस्वामी

1776
02:08:14,360 --> 02:08:18,920
एंड श्री जीव पॉइंटेड आउट मेनी इंपर्सनल थॉट्स इन हिस बुक एंड एक्सपोज

1777
02:08:18,920 --> 02:08:23,280
द श्री वल्लभाचार्य ओपनि यानी

1778
02:08:23,280 --> 02:08:27,360
वल्लभाचार्य जी के जो पुस्तक में तत्वा निबंध में

1779
02:08:27,360 --> 02:08:31,640
कई जगहों पर मायावादी जीव गोस्वामी ने दिखाया वल्लभाचार्य को

1780
02:08:31,640 --> 02:08:36,080
और उनकी डिसग्रेसफुल हो मायावा मायावा कोट करते हुए दिखाया मायावा

1781
02:08:36,080 --> 02:08:40,400
शब्द का उपयोग करते हुए इंपर्सनल थॉट्स इंपर्सनल

1782
02:08:40,400 --> 02:08:45,720
थॉट्स को ये वो कहते हैं

1783
02:08:45,720 --> 02:08:50,080
मायावादी वल्लभाचार्य अमेंडेड द मेजर पोर्शन ऑफ हिस बुक अकॉर्डिंग

1784
02:08:50,080 --> 02:08:54,240
टू द गाइडेंस ऑफ श्री जीव यह सज्जन तोषण के पत्र में इन्होंने

1785
02:08:54,240 --> 02:08:58,720
लिखा है अब हम इस बात को हम पहले देख चुके हैं कि जीव गोस्वामी वृंदावन आए ही

1786
02:08:58,720 --> 02:09:02,760
कई वर्षों बाद है इनकी का वल्लभाचार्य जी का दर्शन करना भी असंभव

1787
02:09:02,760 --> 02:09:07,480
है तो भक्ति र साम सिंधु पर डिबेट भी नहीं हो सकती और ही यह हो सकता है

1788
02:09:07,480 --> 02:09:11,480
तत्वार्थ दीप महाप्रभु वल्लभाचार्य जी का सबसे प्रथम ग्रंथ है जो आज

1789
02:09:11,480 --> 02:09:15,480
भी प्राप्त है और महाप्रभु जी ने कभी भी वो दोबारा नहीं लिखा तो

1790
02:09:15,480 --> 02:09:19,760
ये एक तरह से यहां पर एक मिस इंफॉर्मेशन का प्रचार कर दिया गया ये

1791
02:09:19,760 --> 02:09:23,880
अपने गसु क्या है महाप्रभु जी

1792
02:09:23,880 --> 02:09:28,360
मिला कोई इनको कोई कुल मिलाकर वल्लभाचार्य

1793
02:09:28,360 --> 02:09:32,520
जी से इनको कोई द्वेष था मामला जो ऐसी चीज मिलाई गई

1794
02:09:32,520 --> 02:09:36,800
है उसम ग में यहां पर डिसग्रेसफुल क्या है केदारनाथ

1795
02:09:36,800 --> 02:09:40,960
दत्त जी द्वारा ऐसी असत्य कल्पित बातों का प्रचार प्रसार डिसग्रेसफुल है

1796
02:09:40,960 --> 02:09:45,160
महाप्रभु जी ने जो ग्रंथ अपने सबसे पहले लिखा सबसे प्रारंभिक

1797
02:09:45,160 --> 02:09:49,600
जो ग्रंथ लिखा तत्वा निबंध उसमें डिसग्रेसफुल ओपिनियन आ रही

1798
02:09:49,600 --> 02:09:53,640
सीधी सी बात है जो चीज संभव नहीं है ऐतिहासिक रूप से जीव गोस्वामी का मिलना

1799
02:09:53,640 --> 02:09:58,520
ही जब संभव नहीं है तो ये कैसे बात संभव है झूठी बात क्यों प्रचारित की जा रही है

1800
02:09:58,520 --> 02:10:00,800
यह प्रश्न यहां पर उठता है

1801
02:10:00,800 --> 02:10:05,040
अच्छा एक लेख में अपने ये केदारनाथ दत्त जी जो है भक्ति विनोद

1802
02:10:05,040 --> 02:10:09,240
ठाकुर ये सभी वैष्णव संप्रदायों की भी निंदा कर गए ये क्या लिखा

1803
02:10:09,240 --> 02:10:13,280
है उन्होंने कि चतु वैष्णव

1804
02:10:13,280 --> 02:10:17,400
संप्रदायों की त्रुटिपूर्ण व्याख्या करते हैं और कहते हैं मधवा चार्य का सिद्धांत जो है

1805
02:10:17,400 --> 02:10:21,400
वो एक बीज की भाति अपस्फीति

1806
02:10:21,400 --> 02:10:27,400
प्रस्फुटित नहीं हुआ है भक्ति का अब प्रस्फुटित है रामानुजाचार्य

1807
02:10:28,360 --> 02:10:32,480
कावा केदारनाथ दत्त जी जीव गोस्वामी नहीं यानी भक्ति विनोद

1808
02:10:32,480 --> 02:10:36,840
ठाकुर यानी जी के दादा गुरु भक्ति विनोद

1809
02:10:36,840 --> 02:10:41,160
ठाकुर यह अंग्रेजों के मजिस्ट्रेट थे और प्रारंभ में

1810
02:10:41,160 --> 02:10:45,280
मांसाहार भी उन्होंने किया है उसके पश्चात य जब वैष्णव हो गए तो

1811
02:10:45,280 --> 02:10:49,280
उन्होने कं धारण करने लगे और उन्होने नि त्याग किया

1812
02:10:49,280 --> 02:10:53,280
था लेकिन ये लिख देखा जाए कि मधवा चार्य

1813
02:10:53,280 --> 02:10:57,440
का सिद्धांत बीज की तरह अपस है रामानुजाचार्य का सिद्धांत एक

1814
02:10:57,440 --> 02:11:01,520
कली की भाति अप्र फलित है जैसे कली है लेकिन प्रफुल्लित नहीं अप

1815
02:11:01,520 --> 02:11:05,720
प्रफुल्लित है निंबार्काचार्य का सिद्धांत एक पुष्प की भाति फल

1816
02:11:05,720 --> 02:11:09,040
रहित होने से

1817
02:11:09,040 --> 02:11:13,240
असंपर्क चार्य का और वल्लभाचार्य का सिद्धांत तो यत्र तत्र उ

1818
02:11:13,240 --> 02:11:17,320
घास की तरह स्पष्ट है जिसमें साध्य और साधन क्या हैय पता नहीं लग

1819
02:11:17,320 --> 02:11:21,480
रहा है अब महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ऐसे आचार्य जिन्होंने

1820
02:11:21,480 --> 02:11:25,520
सोडस ग्रंथ से लेकर के तत्वार्थ दप निबंध में स्पेशल एक साधन

1821
02:11:25,520 --> 02:11:29,560
प्रकरण लिखा है कि हमारा साधन क्या है उन्होंने

1822
02:11:29,560 --> 02:11:33,760
अपने दोनों पुत्र पुत्र द्वय को ठाकुर जी की सेवा

1823
02:11:33,760 --> 02:11:37,760
का संपूर्ण साधन किस प्रकार के भाव से सेवा करनी पूरा

1824
02:11:37,760 --> 02:11:41,880
उन दोनों को सिखाया है किस प्रकार से सेवा करनी सब महाप्रभु जी बता रहे

1825
02:11:41,880 --> 02:11:46,040
हैं अब यह स्पष्ट होता है महाप्रभु

1826
02:11:46,040 --> 02:11:50,560
जी को पढ़े तो कि केदारनाथ दत्त जी ने यहां पर अपने अधूरे अध्ययन के द्वारा

1827
02:11:50,560 --> 02:11:54,600
जनित जलपा लाप की और कुछ नहीं किया क्योंकि वल श्री

1828
02:11:54,600 --> 02:11:58,880
वल्लभ ने अपना सिद्धांत जो है सभी ग्रंथों में बताया है अपने प्रथम ग्रंथ तत्वा दप निबंध

1829
02:11:58,880 --> 02:12:03,240
में बताया है साधन प्रकरण में बताया है निरोध लक्षण आदि में भागवत

1830
02:12:03,240 --> 02:12:07,400
टीका आदि में सुबोधिनी में भी बताया है सिद्धांत मुक्तावली जो सोडस ग्रंथ

1831
02:12:07,400 --> 02:12:11,440
में आता है उसमें भी सिद्धांत बताया है और किस भावना और किस रीति से भगवत सेवा की

1832
02:12:11,440 --> 02:12:15,760
जानी चाहिए यह भी अपने दोनों पुत्रों को सिखाया है और इसे दोनों ने बाद

1833
02:12:15,760 --> 02:12:19,840
सेवा शकी नाम से लिपिबद्ध भी किया है एक ही सेवा श्लोकी के शलोक हमें प्राप्त

1834
02:12:19,840 --> 02:12:24,080
होते हैं जो दोनों ने यानी जब ठाकुर जी को जगाए तो

1835
02:12:24,080 --> 02:12:28,360
किस भाव से जगाना जैसे वो श्लोक है उद सविता नाथ प्रिया स

1836
02:12:28,360 --> 02:12:32,600
जाग की सविता के नाथ जो उदय हो चुके सविता उदय हो चुके सूर्य

1837
02:12:32,600 --> 02:12:36,720
उदय हो चुके हे नाथ तो आप प्रिया के से जागे प्रिया जी के संग आप जागे प्रियाज

1838
02:12:36,720 --> 02:12:40,800
के साथ उद सविता नाथ प्रिया जाग

1839
02:12:40,800 --> 02:12:45,120
अंगी कुरु मत सेवा मेरी सेवा को आप स्वीकार करें स्की

1840
02:12:45,120 --> 02:12:49,160
माम तो यह भाव परक मंत्र यानी इस भाव के साथ ठाकुर जी

1841
02:12:49,160 --> 02:12:53,480
को मंगला में जगाना चाहिए महाप्रभु जी ने अपने दोनों पुत्रों को सिखाया है

1842
02:12:53,480 --> 02:12:58,120
दोनों ने यही श्लोक लिखा है सीधी सी बात है महाप्रभु जी ने ही रचना की श्लोक

1843
02:12:58,120 --> 02:13:02,440
तो इस प्रकार के भावों के साथ आपको सेवा करनी है महाप्रभु जी ने पूरी सेवा श्लोकी

1844
02:13:02,440 --> 02:13:06,600
दोनों पुत्रों को सिखाई उ सब क्लियर है यहां यदि कुछ क्लियर नहीं है तो इन्ह क्लियर

1845
02:13:06,600 --> 02:13:10,680
नहीं था केदारनाथ दत्त जी खैर इसके

1846
02:13:10,680 --> 02:13:14,880
आगे इसी तरीके इसी परिपाटी का अनुसरण करते हुए भक्ति विधान स्वामी

1847
02:13:14,880 --> 02:13:18,880
जी भी कई बार बहुत अनर्गल चीजें कह गए और सभी के

1848
02:13:18,880 --> 02:13:23,200
लिए कह गए खाली पुष्टि मार्ग के लिए नहीं जैसे इनका 31

1849
02:13:23,200 --> 02:13:27,240
मार्च 1975 स्टेटमेंट जो दे

1850
02:13:27,240 --> 02:13:31,880
रहे वाले इनका गौड़ीय संप्रदाय से कोई मतलब नहीं है य अपने दे रहे

1851
02:13:31,880 --> 02:13:36,040
ये यह गौड़ी संप्रदाय को तो अप संप्रदाय कहते हैं

1852
02:13:36,040 --> 02:13:39,200
भक्ति विनोद ठाकुर जो थे उन्होंने कहा कि यह सब जो है जितने भी

1853
02:13:39,200 --> 02:13:43,360
षट गो स्वामियों के आज वंशज है यह सब के सब

1854
02:13:43,360 --> 02:13:47,560
हो चुके हैं यह मूल गौड़ वैष्णव नहीं है मूल ग वैष्णव हमसे

1855
02:13:47,560 --> 02:13:51,960
हम है हम जो को

1856
02:13:51,960 --> 02:13:56,080
जने दे रहे हैं कक वैव तो सबको जने

1857
02:13:56,080 --> 02:14:00,160
का अधिकार हो गया इनकी जोय खिचड़ी है इनकी खिचड़ी देख के कभी

1858
02:14:00,160 --> 02:14:04,480
कभी मन करता है जैसे ज्यादा उसम डीप में जाने लोगो एक कोई ईटा

1859
02:14:04,480 --> 02:14:08,760
लो अपने सर पर मार लो क्या कर प्रभु

1860
02:14:08,760 --> 02:14:12,840
लीला है खर कलुक बढ़ रहा है कलुक बढ़ाने की ठाकुर जी लीला कर रहे

1861
02:14:12,840 --> 02:14:17,200
हैं जी आगे ये कह रहे हैं तमाल कृष्ण गोस्वामी

1862
02:14:17,200 --> 02:14:21,640
एक तमाल कृष्ण प्रभुपाद के शिष्य थे इन्होंने बोला प्रभुपाद से

1863
02:14:21,640 --> 02:14:25,920
इन चैतन्य चरिता वेरी क्लियर ट वन डज नॉट एक्सेप्ट

1864
02:14:25,920 --> 02:14:30,120
लर्ड चैतन्य महाप्रभु देन ही कैन नॉट एक्चुअली वशिप कृष्णा

1865
02:14:30,120 --> 02:14:34,280
प्रप प्रभुपाद कहते ट्स फैक्ट अब तमाल कृष्ण बोल रहे

1866
02:14:34,280 --> 02:14:38,520
ना जस्ट टू कैरी ऑन विद अचिता अंद महाराज पॉइंट इट वड सीम

1867
02:14:38,520 --> 02:14:42,560
ट द रामानुज एंड द मधवा मधवा दे डू नॉट

1868
02:14:42,560 --> 02:14:46,560
एक्सेप्ट चैतन्य महाप्रभु एस सुप्रीम पर्सनालिटी ऑफ गड हैड सो

1869
02:14:46,560 --> 02:14:50,760
हाउ कैन दे पॉसिबली वो कैसे सेवा कर सकते हैं कृष्ण की क्योंकि

1870
02:14:50,760 --> 02:14:54,640
म रामानु चैतन्य महाप्रभु कृष्ण तो मानते नहीं प्रभुपाद

1871
02:14:54,640 --> 02:14:58,680
कह रहे देरर दे कैन नॉट अंडरस्टैंड हायर रसा दोनों

1872
02:14:58,680 --> 02:15:02,840
वैष्णव संप्रदाय हायर रसों को नहीं समझ सकता अंडरस्टैंड

1873
02:15:02,840 --> 02:15:07,080
नहीं कर सकते प्रभुपाद क उन्नत उज्जवल रसम दे

1874
02:15:07,080 --> 02:15:11,760
कैन नॉट अंडरस्टैंड कमाल दे कैन अंडरस्टैंड शांत रस

1875
02:15:11,760 --> 02:15:16,080
प्रभुपाद बोले यस दास रस बट नॉट सख

1876
02:15:16,080 --> 02:15:20,320
नॉट मोर देन ट दे कैन नॉट मेडिट देर इ नो पैटरनल रस

1877
02:15:20,320 --> 02:15:24,600
और माधुर इन देयर कम्युनिटी यह प्रभुपाद कह रहे हैं

1878
02:15:24,600 --> 02:15:28,640
अब यहां पर श्री अंडल कौन थी अलवार संत कौन

1879
02:15:28,640 --> 02:15:32,720
हुए हैं उन्होंने कैसे पद लिखे हैं यहां इनसे तो अनभिज्ञता दिख ही रही है

1880
02:15:32,720 --> 02:15:37,240
और श्री संप्रदाय के आचार्य जो सुंदर माधुर्य भाव युक्त जो

1881
02:15:37,240 --> 02:15:41,520
स्तुति लिखी है उससे भी अनभिज्ञता दिख रही है अपने संप्रदाय

1882
02:15:41,520 --> 02:15:45,520
की भक्ति और परंपरा पर अनन्य अति श्रद्धा होना बहुत अच्छी बात है निश्चय अच्छी बात है किंतु

1883
02:15:45,520 --> 02:15:49,600
इसके लिए अन्य भक्ति पर मार्गी परंपराओं पर अनर्गल टिप्पणी करना उने नीचा

1884
02:15:49,600 --> 02:15:55,200
दिखाना ये शोभ नहीं कहा जाता और सत्य

1885
02:15:55,200 --> 02:15:59,320
तोय पना फिर उन बातो को पब्लिक

1886
02:15:59,320 --> 02:16:03,560
भी कराना चलिए मान लीजिए कि आपका कुछ ऐसा हुआ

1887
02:16:03,560 --> 02:16:07,800
कि आप में वि बात हुई तो आपने अपने अंतरंगता में अपना

1888
02:16:07,800 --> 02:16:09,680
आपने जो भी बोला फिर उसको आप प्रचार भी

1889
02:16:09,680 --> 02:16:14,160
कर रहे हो हा आप उसका प्रचार कर रहे हैं और इसी सेक्टर

1890
02:16:14,160 --> 02:16:18,200
में मधवा चार को इस प्रकार से बोला तो विश्वेश तीर्थ स्वामी जी जो थे

1891
02:16:18,200 --> 02:16:22,200
उडपी म के गादीपति आचार्य वो

1892
02:16:22,200 --> 02:16:26,480
विश्वेश दर स्वामी जी शायद आप जानते हो राम मंदिर के लिए उन्होंने बहुत योगदान दिया है

1893
02:16:26,480 --> 02:16:31,120
विश्वेश तीर जी ने तो उनको इकोन को लेटर लिखना पड़ा था

1894
02:16:31,120 --> 02:16:35,520
उन्होंने य लेटर लिखा कि वी आर वेरी मच पेन टू नोट ट यू हैव बीन अंडरटेकिंग

1895
02:16:35,520 --> 02:16:39,680
पब्लिक प्रोपेगेशन ऑफ सम इमेजिनरी फैब्रिकेशन फैब्रिकेटेड

1896
02:16:39,680 --> 02:16:43,920
इंसीडेंट सच ट द स्टोरी ऑफ गौरांग च वुड डिसग्रेस द एस्टीम पर्सनालिटी ऑफ

1897
02:16:43,920 --> 02:16:49,840
जगतगुरु श्री मधवा चार इट हैज

1898
02:16:49,840 --> 02:16:54,800
क्रिएटेड्रॉअर्नेविगेटर बज फॉर क्राइसिस एंड

1899
02:16:54,800 --> 02:16:59,080
हारमोनियसली एडवाइज यू टू विड्रॉ द स्टेटमेंट्स ऑफ सच बेसलेस

1900
02:16:59,080 --> 02:17:03,160
मैटर्स एंड टू एश्योर दैट इट विल नॉट बी कंटिन्यूड इन फ्यूचर येय उने विनती

1901
02:17:03,160 --> 02:17:07,960
करनी पड़ी खैर इसको हटाया नहीं गया और ये आज भी जारी है

1902
02:17:07,960 --> 02:17:11,960
ये लेटर आपकी बुक में भी है ना आपकी बुक में भी लेटर बिल्कुल

1903
02:17:11,960 --> 02:17:16,040
विश्वेश तीर्थ जी का लेटर ही बुक में तो जो लोग भाई अभी हम मधवा चार्य जी

1904
02:17:16,040 --> 02:17:20,520
के पास भी जाने वाले हैं मधवा चार्य विष्णु स्वामी संप्रदाय और अभी वल्लभाचार्य

1905
02:17:20,520 --> 02:17:25,160
जी के जो इस समय के आचार्य गण है उनके पास भी जाएंगे वल्लभ संप्रदाय के

1906
02:17:25,160 --> 02:17:29,280
और रामानु संप्रदाय का आप देख ही चुके हैं मगर फिलहाल मधवा चार्य

1907
02:17:29,280 --> 02:17:33,360
जी की तरफ से मधवा चार्य संप्रदाय की तरफ से एक लेटर दिया

1908
02:17:33,360 --> 02:17:37,640
गया कि आप यह जो मन गंत स्टेटमेंट दे रहे हैं देना बंद करिए उनकी

1909
02:17:37,640 --> 02:17:41,960
ओर से कोई प्रामाणिक नहीं माना जाता है इस कन

1910
02:17:41,960 --> 02:17:46,840
को जीय लेटर य है दिख रहा हो लेटर तो

1911
02:17:46,840 --> 02:17:51,160
जी जी दिख रहा है आप जूम कर दीजिए थोड़ा

1912
02:17:51,160 --> 02:17:55,480
ये है उडपी श्री कृष्ण मठ उडपी

1913
02:17:55,480 --> 02:18:00,640
द्वारा ये लेटर लिखा गया है नारायण

1914
02:18:00,640 --> 02:18:03,960
मिनट

1915
02:18:03,960 --> 02:18:09,200
ये यह लेटर लिखा गया है श्री विश्वेश तीर्थ

1916
02:18:09,200 --> 02:18:13,200
स्वामी आप लोग देख सकते हैं यह स्क्रीन

1917
02:18:13,200 --> 02:18:18,200
पर लेटर है जो लिखा हुआ है उडपी मठ सेन

1918
02:18:18,200 --> 02:18:22,320
के लिए वी आर वेरी यह देख लीजिए ी म

1919
02:18:22,320 --> 02:18:26,920
से लेटर दिया गया है री मच प नोट ट य हैव बीन अंडरटेकिंग

1920
02:18:26,920 --> 02:18:31,400
पब्लिक प्रोप इमेजिनरी फैब्रिक और यह लिखा है

1921
02:18:31,400 --> 02:18:35,400
विश्वे अब र इसके आगे देखते आगे तमाल कृषण जो है

1922
02:18:35,400 --> 02:18:39,560
कह रहे हैं ए अ हमारे ऊ

1923
02:18:39,560 --> 02:18:43,840
परर ल् एकली चैतन्य महाप्रभु

1924
02:18:43,840 --> 02:18:48,600
दे सेलर महाप्रभु एंड दे वशिप इन

1925
02:18:48,600 --> 02:18:52,640
अब य एक बात बताना चाहूंगा कि महाप्रभु वल्लभाचार्य

1926
02:18:52,640 --> 02:18:56,680
जी के बड़े भाई श्री राम कृष्ण भट्ट जी ने बद्रीनाथ

1927
02:18:56,680 --> 02:19:01,080
के तीर्थ पुरोहित वासुदेव तैलंग को एक लेख पत्र लिखा था 1511

1928
02:19:01,080 --> 02:19:05,560
ईसवी तब चैतन्य महाप्रभु ने नया नया सन्यास लिया ही था जगन्नाथ

1929
02:19:05,560 --> 02:19:09,720
पुरी नहीं पहुंचे छ वर्ष बाद पहुंचेंगे जगन्नाथ पुरी और उसके

1930
02:19:09,720 --> 02:19:14,240
कुछ वर्षों बाद चैतन्य महाप्रभु नाम से प्रसिद्ध होंगे अभी नहीं थे

1931
02:19:14,240 --> 02:19:18,240
इस लेख पत्र में लेकिन महाप्रभु जी के बड़े भाई राम कृष्ण

1932
02:19:18,240 --> 02:19:19,320
भट्ट जी

1933
02:19:19,320 --> 02:19:23,400
वे श्री वल्लभाचार्य को महाप्रभु के नाम से संबोधित कर रहे हैं

1934
02:19:23,400 --> 02:19:28,440
और वे कह रहे हैं श्री वल्लभाचार्य महाप्रभु नाम नियोग तो बुद्धिमता

1935
02:19:28,440 --> 02:19:32,480
विभव श्री राम कृष्ण भट्ट तम लेख तानी उके

1936
02:19:32,480 --> 02:19:36,520
बड़े भाई तन महाप्रभु चैतन्य महाप्रभु के बड़े भाई वल्लभाचार्य

1937
02:19:36,520 --> 02:19:40,880
जी के बड़े भाई जो थे राम कृष्ण भट्ट जी उन्होंने लेख पत्र लिखा है

1938
02:19:40,880 --> 02:19:45,160
जब बद्रीनाथ की तीर्थ यात्रा करी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के साथ में

1939
02:19:45,160 --> 02:19:49,320
तो उस लेख पत्र ये अपने तीर्थ पुरोहित को लिख

1940
02:19:49,320 --> 02:19:52,600
पत्र लिखते हैं जो

1941
02:19:52,600 --> 02:19:56,720
तो वहां पर उन्होंने उनको वृत्ति पत्र जो दिया जो दक्षिणा दी उसके साथ

1942
02:19:56,720 --> 02:20:01,400
में वृत्ति पत्र लिखा और इस वृत्ति पत्र में

1943
02:20:01,400 --> 02:20:05,560
महाप्रभु जी को उन्होंने वल्लभाचार्य महाप्रभु नाम नियोग तो बुद्धि

1944
02:20:05,560 --> 02:20:09,840
मताम विभाव इसको मैं आपको दिखाता हूं यह यहां से

1945
02:20:09,840 --> 02:20:14,440
प्रारंभ होता है गोभी वतम प्रकृति सुंदर मंद हास भाषा

1946
02:20:14,440 --> 02:20:18,840
यह वो वृत्ति पत्र है समल सित मंजुल वक्र

1947
02:20:18,840 --> 02:20:23,200
श्री नंद नंदन मंडित मंडला बा

1948
02:20:23,200 --> 02:20:28,640
अब आगे इसमें वर्णन दिया गया कुल का ग्राम

1949
02:20:28,640 --> 02:20:32,680
काकरवा दक्षण पंच द्रा के बड़े भाई

1950
02:20:32,680 --> 02:20:35,040
वल्लभाचार्य जी के लिए बता रहे

1951
02:20:35,040 --> 02:20:39,760
बिल्कुल अभी अपने कुल का परिचय दे रहे भव तलंग जाति प्र भारतवज

1952
02:20:39,760 --> 02:20:44,400
कु गुणा स्तम सूत्र स ग्र राष्

1953
02:20:44,400 --> 02:20:48,680
ततर सोम यजत फिर उस सोम यज्ञ में

1954
02:20:48,680 --> 02:20:52,680
साक्षात अग्नि से नारायण प्रकट यज्ञ यज्ञ ञ नारायण

1955
02:20:52,680 --> 02:20:57,600
साक्षात विष्णु विप्र वंशा तस्मा लोके सो मया

1956
02:20:57,600 --> 02:21:01,880
उसके बाद स सोज जब होंगे तो आपके यहां पर हमारा प्राकट्य

1957
02:21:01,880 --> 02:21:06,200
होगा ऐसी आकाशवाणी तो ततो भव भव

1958
02:21:06,200 --> 02:21:10,880
लक्ष्मण भट्ट नामा महानुभाव विष वष श्री वल्लभाचार्य

1959
02:21:10,880 --> 02:21:15,360
नरा नि ब्रम निग तत्व अब

1960
02:21:15,360 --> 02:21:19,680
यहर जी लक्षमण भट्ट जी के प्रकट हुआ वैष्णव

1961
02:21:19,680 --> 02:21:23,680
सकल समत संप्रदाय यो वल्लभाया तनो मिन बाल्य

1962
02:21:23,680 --> 02:21:27,680
विहाय निज देश समुद वे श्रीमद ्र स्वयं

1963
02:21:27,680 --> 02:21:31,680
वास समं हास की ब्रज में महाप्रभु जी ने

1964
02:21:31,680 --> 02:21:35,840
पदार्पण किया वृंदावना महीराज रम श्री गोकुले

1965
02:21:35,840 --> 02:21:40,160
विमले च शोभ मानम आम याम तरंग समीर गोलोक तो

1966
02:21:40,160 --> 02:21:44,240
मस्तम सुरा यानी जो गोलोक से भी अधिक जिसको कहा गया है

1967
02:21:44,240 --> 02:21:48,400
उस वृंदावन में तत्र स्वयंवर सगत वहां पर स्वयं श्री

1968
02:21:48,400 --> 02:21:50,080
कृष्ण महाप्रभु जी के सामने प्रकट

1969
02:21:50,080 --> 02:21:54,120
हुए हृद विद्या विद्युत मान भव ताप हीन और महाप्रभु जी के

1970
02:21:54,120 --> 02:21:58,120
हृदय को विद्या से आलोकित करके सबका ताप हरा

1971
02:21:58,120 --> 02:22:02,480
यहां जिस विद्या की बात की जा रही है वह है ब्रह्म संबंध की मंत्र दीक्षा

1972
02:22:02,480 --> 02:22:06,520
जिसके अंदर भव ताप के सूचन का शब्द

1973
02:22:06,520 --> 02:22:10,800
भी आता है ताप हीन शब्द जो है उसमें प्रयुक्त होता है तो यहां ब्रह्म संबंध

1974
02:22:10,800 --> 02:22:14,840
मंत्र भगवान ने प्रकट होकर महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को दिया इसका वर्णन

1975
02:22:14,840 --> 02:22:19,040
इनके बड़े कर 1511 ईसवी में यानी चैतन्य

1976
02:22:19,040 --> 02:22:23,120
महाप्रभु के सन्यास के जस्ट एक वर्ष बाद का ये लेख और यहां पर

1977
02:22:23,120 --> 02:22:27,240
उन्होंने संवत भी लिखा है सोहम श्री बद्री वना तगम

1978
02:22:27,240 --> 02:22:31,360
शुक्रे शकाब तथा देवा भूपति मिति

1979
02:22:31,360 --> 02:22:35,720
स नरम नारायण तु तत्र व्यास मुनी संगति भूला कमिक

1980
02:22:35,720 --> 02:22:39,880
में शभ अ श्री वासुदेवा पहित वित्तो

1981
02:22:39,880 --> 02:22:44,000
मया तैलंग वंश संभू स्वाध्याय चार च य उन्होने अपने

1982
02:22:44,000 --> 02:22:48,240
पुरोहित के बारे में की वासुदेव तैलंग जो है वल्लभाचार्य

1983
02:22:48,240 --> 02:22:52,720
महाप्रभु नाम नियोग तो बुद्धिमता तो यहां पर य जो वल्लभाचार्य

1984
02:22:52,720 --> 02:22:56,920
महाप्रभु नाम जो पद का उपयोग किया गया है ये इतना सिद्ध

1985
02:22:56,920 --> 02:23:01,120
कर रहा है कि 1511 ईसवी में श्रीमद

1986
02:23:01,120 --> 02:23:05,120
वल्लभाचार्य जी महाप्रभु नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे पुष्टि मार्ग में

1987
02:23:05,120 --> 02:23:09,240
तो महाप्रभु कहा जा रहा था और ये चैतन्य महाप्रभु के पहले की बात है

1988
02:23:09,240 --> 02:23:13,840
जिसका ऐतिहासिक प्रमाण स्वरूप पत्र आज भी एज इट विद्यमान है बद्रीनाथ

1989
02:23:13,840 --> 02:23:18,120
जी के तीर्थ पु के वंशजों के पास इसका दर्शन कई गोस्वामी बालकों

1990
02:23:18,120 --> 02:23:22,160
ने स्वयं किया है आज भी य पत्र विद्यमान है और

1991
02:23:22,160 --> 02:23:26,560
वे इसकी सेवा करते हैं क्योंकि वल्लभाचार्य जी के हस्ताक्षर है सो

1992
02:23:26,560 --> 02:23:30,960
यह ऐतिहासिक प्रमाण आज भी विद्यमान है महाप्रभु जी के बड़े भाई का लिखा हु

1993
02:23:30,960 --> 02:23:35,200
अब इसमें महाप्रभु जो पद उपयोग हुआ है ये बता रहा है कि भारतवर्ष

1994
02:23:35,200 --> 02:23:39,480
में वैष्णव चार्य को सबसे प्रथम महाप्रभु कहा गया

1995
02:23:39,480 --> 02:23:43,560
तो वे श्री वल्लभाचार्य जी इनके पश्चात श्री चैतन्य को

1996
02:23:43,560 --> 02:23:47,720
भी महाप्रभु कहा गया फिर तत्पश्चात श्रीहित हरिवंश जी जब वृंदावन

1997
02:23:47,720 --> 02:23:51,720
पधारे तो श्रीत हरिवंश ने भी कहा मैं

1998
02:23:51,720 --> 02:23:55,840
एक बात यह कहूंगा कि मतलब जो

1999
02:23:55,840 --> 02:24:00,240
इसकन ये क्लेम करता है कि वो जो

2000
02:24:00,240 --> 02:24:04,320
श्री राधा कृष्ण के युग्म अवतार है चैतन्य महाप्रभु

2001
02:24:04,320 --> 02:24:08,360
तो मतलब बाकी के जो वैष्णव संप्रदाय है वोय नहीं मानते जिनको वो प्रमाणिक

2002
02:24:08,360 --> 02:24:12,360
मानता है बिल्कुल गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी

2003
02:24:12,360 --> 02:24:17,200
यही बात महाप्रभु वल्लभाचार्य के लिए कह रहे हैं और इसीलिए उ महाप्रभु बता रहे

2004
02:24:17,200 --> 02:24:20,400
जैसे श्री भागवत पियूष सबद मथन

2005
02:24:20,400 --> 02:24:24,400
त सार भूत रास स्त्री भाव पूरित रास स्त्री

2006
02:24:24,400 --> 02:24:28,920
के भाव से पूरित विग्रह जिनका है रास स्त्री यानी श्री राधा जी मुख्य

2007
02:24:28,920 --> 02:24:33,120
रास उनके भाव से पूरित विग्र और आगे गोस्वामी श्री विठ्ठल नाथ

2008
02:24:33,120 --> 02:24:37,200
जी कहते हैं वस्तुत कृष्ण श्री वल्लभ स् कृष्ण

2009
02:24:37,200 --> 02:24:41,240
का ही स्वरूप है तो मार्ग में यह बात मान्य है और य गोस्वामी

2010
02:24:41,240 --> 02:24:45,680
श्री विट्ठलनाथ जी कह और इन्ही गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी की स्तुति

2011
02:24:45,680 --> 02:24:49,720
रघुनाथ दास गोस्वामी कर रहे और यद यह

2012
02:24:49,720 --> 02:24:54,480
गलत क तो रघुनाथ दास जी उनकी स्तुति कैसे कर सकते

2013
02:24:54,480 --> 02:24:58,600
थे जब रघुनाथ दासवा बारे में आपकी इस बारे

2014
02:24:58,600 --> 02:25:02,680
में क्योंकि मैं अभी देख रहा हूं कि आपका जो है प्रभुपाद जी को लेकर के काफी

2015
02:25:02,680 --> 02:25:06,720
अच्छी एक्सपर्टीज है मैंने अभी देखा आपका उनका क्योंकि पहले से उनका

2016
02:25:06,720 --> 02:25:10,960
काफी हिस्ट्री भी पता है तो इस बारे में आपका क्या मतलब कहना

2017
02:25:10,960 --> 02:25:15,120
होगा कि प्रभुपाद जी जो लिख गए सो लिख गए जो उस समय

2018
02:25:15,120 --> 02:25:19,120
लिखा गया जो भी है अभी क्या आपको ऐसा लगता है इसकन

2019
02:25:19,120 --> 02:25:23,200
उनके भी अगेंस्ट जा रहा प्रभुपाद जी के अगस्ट यह बात मैं नहीं

2020
02:25:23,200 --> 02:25:27,360
कह रहा हूं यह बात ना मैं इस बारे में बोलना चाहूंगा यह बात स्वयं

2021
02:25:27,360 --> 02:25:31,480
स्कन वाले कह रहे आप स्कन बेंगलोर अथवा य

2022
02:25:31,480 --> 02:25:35,440
जो अभी दो अंग्रेजों का जो वीडियो चलाया गया इसम जो पहले वाले थे

2023
02:25:35,440 --> 02:25:39,880
बीजी नरस स्वामी यह बात बीज नरस स्वामी कहते ये बात

2024
02:25:39,880 --> 02:25:43,880
बंगलोर ते हम बे पढ़े तो ठीक है

2025
02:25:43,880 --> 02:25:47,960
ये इ के निपट ले तो ज्यादा ठीक है ये बात गड़िया मठ वाले कहते हैं

2026
02:25:47,960 --> 02:25:51,960
यह बात अन्य लोग कहते हैं कि बंगलोर वाले

2027
02:25:51,960 --> 02:25:56,240
सब प्रमाण बताते हैं कि प्रभुपाद के जो ग्रंथ थे उनको इन्होंने बदल दिया व

2028
02:25:56,240 --> 02:26:00,280
ए इट नहीं मैंने भी देखा है कि कई जगह

2029
02:26:00,280 --> 02:26:04,720
गीता में ट्रांसलेशन जो 1972 वाला जो एडिशन है

2030
02:26:04,720 --> 02:26:08,840
उसम और आज की जो इनकी भगवत गीता उसम चेंज हो रहा है चीज चेंज

2031
02:26:08,840 --> 02:26:13,040
हो रही है का काफी उसम अंतर आ चुका है सो वो प्रभुपाद का

2032
02:26:13,040 --> 02:26:17,240
एज इट तो नहीं रह गया है और इवन जब विडंबना य है इवन

2033
02:26:17,240 --> 02:26:22,000
जब प्रभुपाद ने लिखा था तो भी वो विषण का

2034
02:26:22,000 --> 02:26:26,160
क्योंकि वो तो वर्ण व्यवस्था की बात कर रहे हैं वो जन्म से जिस चीज की बात कर रहे

2035
02:26:26,160 --> 02:26:30,160
प्रभुपाद ने उसको हटा दिया बात ये बात सही हो सकती है

2036
02:26:30,160 --> 02:26:33,240
कि हा चलो विदेशों में

2037
02:26:33,240 --> 02:26:37,320
मले हो मले में

2038
02:26:37,320 --> 02:26:41,400
बात करेंगे तो गड़बड़ हो जाएगी तो इसलिए इसकी बात ना करें

2039
02:26:41,400 --> 02:26:45,480
लेकिन चीज यहां पर बताना जैसे इसकन वालो

2040
02:26:45,480 --> 02:26:49,760
से आप पूछेंगे कि क्राइस्ट को क्यों आप कृष्ण के तुल्य कह रहे

2041
02:26:49,760 --> 02:26:50,920
तो बहुदा

2042
02:26:50,920 --> 02:26:55,040
यही उत्तर आता है कि भाई वो क्रिश्चन कंट्री में प्रचार प्रसार कर रहे

2043
02:26:55,040 --> 02:26:59,120
हैं तो क्रिश्चन कंट्री में प्रचार प्रसार करने के लिए कुछ तो पॉजिटिव बोलना पड़ेगा ताकि वो सुने तो सही आ

2044
02:26:59,120 --> 02:27:03,840
कर उनको कृष्ण की तरफ लाने के लिए बोला है वैसे नहीं बोला है

2045
02:27:03,840 --> 02:27:07,880
इसको ये इसको लिटरल सेंस में नहीं लेना चाहिए कि प्रभुपाद ने क्राइस्ट को कृष्ण

2046
02:27:07,880 --> 02:27:12,000
के तुल्य बोल दिया ये तो उन्होंने वहा भक्ति का प्रचार प्रसार करने के लिए बोल दिया अब यदि

2047
02:27:12,000 --> 02:27:16,080
ऐसी बात है तो कौन सी बात प्रभुपाद ने वही के लिए बोली

2048
02:27:16,080 --> 02:27:20,240
है इसका निश्चय कौन करेगा और कैसे होगी मैं भी यही कहता हूं

2049
02:27:20,240 --> 02:27:24,240
अगर हम खुद कह रहे हैं मैं भी यही कहता हूं कि यदि

2050
02:27:24,240 --> 02:27:28,280
हम खुद कह रहे हैं कि उन्होंने किसी कारणवश झूठ बोला तो

2051
02:27:28,280 --> 02:27:32,480
तुमको झूठ नहीं बोला जा रहा है किसी कारण बस ये कैसे पता चलेगा

2052
02:27:32,480 --> 02:27:36,720
बिल्कुल नहीं क्रेडिबिलिटी सवाल हो जाता है जो बाकी बातें वो सत्य

2053
02:27:36,720 --> 02:27:40,920
कैसे हैं ये कैसे पता लगेगा और भी और भी फिर बहुत सारी चीजें हैं फिर

2054
02:27:40,920 --> 02:27:44,920
आप जब लोगों को खुश करने के लिए कर रहे हो तो लोगों को खुश

2055
02:27:44,920 --> 02:27:48,960
करो ना यहां पर वो किताबें क्यों ला रहे हो आप हां फिर मतलब फिर यहां

2056
02:27:48,960 --> 02:27:53,440
के लिए वो चीज अलग होनी चाहिए

2057
02:27:53,440 --> 02:27:57,920
दूसरी बात व वाली किताब छाप रहे हो उसम

2058
02:27:57,920 --> 02:28:02,120
उसमें लिख दो आप क्रिश्चन प्रभावित किताब

2059
02:28:02,120 --> 02:28:07,120
क्रिश्चन प्रभावित सामग्री यह मत लिखो

2060
02:28:07,120 --> 02:28:11,320
सनातन आप प्रचार कर रहे हो क्रिश्चन प्रभावित सामग्री का

2061
02:28:11,320 --> 02:28:15,640
और आप कह रहे हो कि हमने दुनिया भर में जो है सनातन का प्रचार कर

2062
02:28:15,640 --> 02:28:19,680
दिया य तो अच्छा एक बात बताइए मैं मेरा क्वेश्चन य

2063
02:28:19,680 --> 02:28:24,160
पर य होता है इस बात के लिए अगर आप मुस्लिम कंट्रीज

2064
02:28:24,160 --> 02:28:28,360
में है और मुस्लिम वाले आपसे जब यह प्रश्न करेंगे कि

2065
02:28:28,360 --> 02:28:32,360
आपने इसमें जो है उनके चीजों को प्रेज क्यों किया

2066
02:28:32,360 --> 02:28:36,480
है हिंदुओं की चीजों को प्रेज क्यों किया है अगर अल्लाह

2067
02:28:36,480 --> 02:28:40,520
हमारे अल्लाह को ही आप पूछ रहे हैं तो आपने हिंदुओं की चीजों को प्रेस क्यों

2068
02:28:40,520 --> 02:28:44,600
किया तो ये वहां उनका मुंह बंद कराने के लिए क्या बात कहेंगे अरे

2069
02:28:44,600 --> 02:28:48,600
वो तो हिंदू कंट्रीज में हम लोगों को प्रचार करना था इसलिए बातें लिखी गई

2070
02:28:48,600 --> 02:28:53,280
है वरना वास्तविक तो हम तुम्हारे अल्लाह को ही मानते हैं

2071
02:28:53,280 --> 02:28:57,720
जबकि बात ऐसी है कि उन लोगों में बहुत ज्यादा निष्ठा है अपने अल्लाह के प्रति कभी ऐसा नहीं

2072
02:28:57,720 --> 02:29:02,000
कहे यहां ये सन्यासी के लक्षण

2073
02:29:02,000 --> 02:29:06,040
नहीं है ये अगर आप सन्यासी एक तरफ कह रहे हो तो

2074
02:29:06,040 --> 02:29:08,480
आपका कोई भी सिद्धांत ये नहीं कहता है कि आप जो

2075
02:29:08,480 --> 02:29:12,520
है धर्म का अपार्ट करके धर्म का प्रचार करो क्योंकि जब आपने

2076
02:29:12,520 --> 02:29:16,640
धर्म का जब आपने धर्म का अर्थ ही कर दिया

2077
02:29:16,640 --> 02:29:21,360
तो फिर धर्म धर्म

2078
02:29:21,360 --> 02:29:25,480
आपने मन प्रचार कर दिया हा खर

2079
02:29:25,480 --> 02:29:29,760
लेकिन इस बारे में भी इतना तो ठीक है कि भगवन नाम का प्रचार प्रसार तो हुआ

2080
02:29:29,760 --> 02:29:33,760
ले वो तो भगवत नाम के साथ में

2081
02:29:33,760 --> 02:29:38,080
जो गायत्री और जनेऊ और सन्यास और ंड इनका जो चला गया है

2082
02:29:38,080 --> 02:29:42,120
यह मतलब एक तरफ य पुण्य गए हैं तो एक तरफ पापा आचरण पाप का भी

2083
02:29:42,120 --> 02:29:47,000
मार्ग खुल गया है और

2084
02:29:47,000 --> 02:29:51,320
जिसका पूरी एक स्ट्रेटजी है कि अंत तो गत्वा

2085
02:29:51,320 --> 02:29:55,560
हमारा ही ऐसा देश है जो धर्म से नहीं चल रहा ज्यादातर देश धर्म से ही चलते मतलब उनके

2086
02:29:55,560 --> 02:30:00,160
यहां की जो मान्यता होती है उनसे वह देश चलते हैं ज्यादातर

2087
02:30:00,160 --> 02:30:04,280
तो अभी क्या है कि हमारा ही एक ऐसा देश

2088
02:30:04,280 --> 02:30:08,600
है जो जिसमें धर्म को साइड कर दिया अपना एक नया वो किया तो अब उसमें

2089
02:30:08,600 --> 02:30:12,960
क्या है कि इनको मालूम है कि धार्मिक सत्ता अगर हमने हतया ली

2090
02:30:12,960 --> 02:30:17,160
तो पूरा हमारे पास आ जाएगा फिर से तो धार्मिक

2091
02:30:17,160 --> 02:30:21,480
सत्ता हटने का एक तरीका भा ये लोग इन लोगों के य तो वर्ण व्यवस्था है दूसरा

2092
02:30:21,480 --> 02:30:25,520
वो काम करता ही नहीं है सब स्वा स्वा कर्मणा वाले लोग हैं अपने अपने

2093
02:30:25,520 --> 02:30:30,200
स् का कार्य तो इसको तोड़े कैसे कि नहीं वर्ण व्यवस्था जन्म से नहीं कर्म से

2094
02:30:30,200 --> 02:30:34,400
और जब उस पर बात करने जाते हैं तो बहुत सी चीजें चलिए आपने बहुत सारा समय

2095
02:30:34,400 --> 02:30:39,160
हमें दिया है और आपने बहुत ही सुंदर सा वो ग्रंथ लिखा है

2096
02:30:39,160 --> 02:30:43,200
उसको हम इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन में भी डाल देंगे और

2097
02:30:43,200 --> 02:30:47,360
मेरे ख्याल से आपने हमें लगभग ढाई घंटे दे दिए अभी वो ग्रंथ

2098
02:30:47,360 --> 02:30:51,920
वैसे पूरी तरह से रेडी नहीं है तो मैं चाहूंगा मैं रेडी करके उसको आपको भेज दूं

2099
02:30:51,920 --> 02:30:56,640
तो तब आप उसको अवश्य ले एंड अभी आगे

2100
02:30:56,640 --> 02:31:01,400
मैं और बताना चाहूं क्योंकि इसके आगे

2101
02:31:01,400 --> 02:31:02,400
जो

2102
02:31:02,400 --> 02:31:06,880
बाद में बाद में जो आप और अन्य चीज जोड़ेंगे उसम वो जोड़ते रहिएगा

2103
02:31:06,880 --> 02:31:10,320
अभी हम पीडीएफ के रूप

2104
02:31:10,320 --> 02:31:14,320
में ठीक है संभव है लेकिन इसका कुछ मतलब ऐसा

2105
02:31:14,320 --> 02:31:18,920
भी कुछ बात जहा तक है इसको एक बार प्रूफ रीडिंग

2106
02:31:18,920 --> 02:31:22,960
ग आश्वस्त लेंगे उसके बाद ही आप आश्वस्त लेंगे उसके बाद

2107
02:31:22,960 --> 02:31:27,400
दीजिएगा तो हम उसको है हा जी जी क्योंकि

2108
02:31:27,400 --> 02:31:31,440
चीज जो है प्रामाणिक जानी चाहिए अगर उसमें कुछ आप अच्छे से चेक

2109
02:31:31,440 --> 02:31:35,640
कर लीजिएगा कुछ अगर ऊपर नीचे हो तो उसको आप आश्वास स

2110
02:31:35,640 --> 02:31:39,640
कर ली मैं आपको इमेजेस ये कुछ कुछ भेज देता हूं

2111
02:31:39,640 --> 02:31:44,440
जिनको डालना मुझे आवश्यक लग रहा है कि जिसमें

2112
02:31:44,440 --> 02:31:48,480
और उनके वक्तव्य और उनके शिष्यों के वक्तव्य हैं जो हम य ले नहीं

2113
02:31:48,480 --> 02:31:52,520
पाए तो मैं आप बिल्कुल मैं

2114
02:31:52,520 --> 02:31:56,760
आपको ये इमेजेस भेज देता हूं एक साथ करके आप

2115
02:31:56,760 --> 02:32:00,760
इनको अवश्य डालने ये तो जो जरूरी जो जरूरी

2116
02:32:00,760 --> 02:32:04,760
इमेजेस है या वो जो लेटर था उपी मट से निकला इस

2117
02:32:04,760 --> 02:32:09,240
तरह की जो सामग्री है वह आप एक पीडीएफ के रूप में हमें दे दीजिएगा तो हम उस पीडीएफ

2118
02:32:09,240 --> 02:32:14,160
को लिंक दे देंगे यहां पर तो जो भी लेना चाहेगा वहां से डाउनलोड कर लेगा

2119
02:32:14,160 --> 02:32:17,920
बिल्कुल ठीक ठीक ठीक क्योंकि इसमें आगे

2120
02:32:17,920 --> 02:32:22,400
पाद के शिष्य ने और प्रभुपाद ने कई जग पर जो बात प्रचारित

2121
02:32:22,400 --> 02:32:26,400
कर जैसे राधा जी का इनके कोई रोल नहीं है य लोग

2122
02:32:26,400 --> 02:32:30,520
राधा जी को नहीं मानते और वल्लभाचार्य जीने कहीं राधा जी का नाम नहीं लिखा है इस बात

2123
02:32:30,520 --> 02:32:34,560
का स्पष्टीकरण है शीम वल्लभाचार्य राधा जी का नाम लिखा है

2124
02:32:34,560 --> 02:32:38,640
स्तुति भी की है वे माधुर्य भाव

2125
02:32:38,640 --> 02:32:44,640
में भी स्तुति कर रहे हैं संपूर्ण

2126
02:32:50,040 --> 02:32:54,160
बाल वदेश्वर पूर्ण काम विवत तमाश विम देही दस्यम ऐसा

2127
02:32:54,160 --> 02:32:58,320
भी आदास की स्तुति महाप्रभु कर तो महाप्रभु जी ऐसा कहते स सदा सर्वदा

2128
02:32:58,320 --> 02:33:02,600
सर्व भावे भजनी और जा सर्व भावों

2129
02:33:02,600 --> 02:33:06,800
को भजना चाहिए और यही आप के ग्रंथों में प्रकट होता है तो य महाप्रभु

2130
02:33:06,800 --> 02:33:10,920
जी ने राधा जी का भी नाम उल्लेख किया है स्पष्ट रूप से अपने समस्त

2131
02:33:10,920 --> 02:33:15,000
ग्रंथों में किया है तत्वा दवाद विं तो नहीं

2132
02:33:15,000 --> 02:33:19,200
पुरुषोत्तम सहस्त्रनाम है सुबोधिनी जी है इन सब में हमें प्रकट रूप से

2133
02:33:19,200 --> 02:33:23,480
राधा जी का नाम मिलता है तो इससे हमें कई सारी चीज

2134
02:33:23,480 --> 02:33:27,880
क्लियर होती है कि बहुत से मिसकनसेप्शन मिस इंफॉर्मेशन फैलाई गई है

2135
02:33:27,880 --> 02:33:32,400
और अ महाप्रभु जी प्र प्रसिद्धि के द्वेष वष किया गया है

2136
02:33:32,400 --> 02:33:33,040
या फिर

2137
02:33:33,040 --> 02:33:37,320
अपने संप्रदाय के प्रति श्रद्धा तिरेक वष किया गया है य तो प्रभु जाने लेकिन

2138
02:33:37,320 --> 02:33:41,720
असत्य तो असत्य होता है और गलत तो गलत जी

2139
02:33:41,720 --> 02:33:47,720
कई बार प्रभुपाद ने य भी कहा है कि इनिशियली वल्लभाचार्य वास वेरी मच डिवोेडली

2140
02:33:49,920 --> 02:33:53,960
प्रॉपर रिस्पेक्ट फम लेटर ज विष्णु स्वामी संप्रदा अब यह

2141
02:33:53,960 --> 02:33:58,680
बात पूरी तरह से असत्य है क्योंकि महाप्रभु जी के प्रारंभ से लेकर के अंत तक

2142
02:33:58,680 --> 02:34:02,840
लेख पत्र विन आठ से अधिक लेख पत्र श्री महाप्रभु जी विद्यमान

2143
02:34:02,840 --> 02:34:07,000
है जिनम आपी स्वयं को विष्णु स्वामी मतानु ही लिख रहे प्रारंभ

2144
02:34:07,000 --> 02:34:11,880
से 1490 का भी है 1492 का भी है 1511

2145
02:34:11,880 --> 02:34:16,000
का भी है उजागर चौबे के मथुरा में है वो है वो जैन

2146
02:34:16,000 --> 02:34:20,280
के तीर्थ पुरोहित को दिया गया है बद्रीनाथ के तीर्थ पुरोहित जगन्नाथ पु तीर्थ पुत

2147
02:34:20,280 --> 02:34:24,480
द्वारका के तीर्थ पुत इन सबको दि ग वित् पत्र है तत्वार्थ दप निबंध में स्वयं को विष्णु

2148
02:34:24,480 --> 02:34:28,840
स्वामी मतान कह रहे हैं तो ये चीज कहना कि बाद में विष्णु स्वामी मतान

2149
02:34:28,840 --> 02:34:32,960
हो गए ये मिथ्या है और झूठी कपोल कल्पित बात नहीं सो ऐसी

2150
02:34:32,960 --> 02:34:36,960
बातों का त्याग करना चाहिए और अ इना क यदि आपको किसी भी

2151
02:34:36,960 --> 02:34:41,680
किसी भी व्यक्ति को ऑथेंटिक चीजों का अध्ययन करना है

2152
02:34:41,680 --> 02:34:45,680
तो आप संस्कृत ग्रंथों को पकड़े आप षड गो

2153
02:34:45,680 --> 02:34:48,120
स्वामियों के संस्कृत ग्रंथों को पकड़े आप विश्वनाथ

2154
02:34:48,120 --> 02:34:52,480
चक्रवर्ती जी की सारा दर्शनी आप विश्वनाथ चक्रवर्ती जी के गोपाल देवाक

2155
02:34:52,480 --> 02:34:56,840
को पकड़े आपको पता लगेगा कि शना जी का प्राकट्य कैसे हुआ विश्वनाथ चक्र जी ने लिखा है प्रकट

2156
02:34:56,840 --> 02:35:01,160
नि शता वल्लभाचार्य आप जीव गोस्वामी जी के संस्कृत

2157
02:35:01,160 --> 02:35:05,200
ग्रंथों को पढ़े आपको पता लगेगा जीव गोस्वामी जी ने महाप्रभु अचार्य जी को प्रमाणिक मान

2158
02:35:05,200 --> 02:35:09,440
कर कई स्थानों पर कोट किया है इन्होने कोट किया है विष्णुनाथ चक्रवर्ती

2159
02:35:09,440 --> 02:35:13,800
जी ने कोट किया और व्याख्या भी करी है विना चक्रवर्ती जीने सारा दर्शन महाप्रभु अचार्य

2160
02:35:13,800 --> 02:35:18,160
की सुबोध की व्याख्या कर रहे तो इतना जब उन आचार्यों में प्रेम रहा था

2161
02:35:18,160 --> 02:35:22,440
तो आपको ऐसे ग्रंथों को पकड़ना ना कि मन गंत

2162
02:35:22,440 --> 02:35:26,800
कहानियों को आपको पकड़ कर प्रचारित करना चाहिए और यही बात यदाय

2163
02:35:26,800 --> 02:35:31,160
के बारे किसी को जानना है तो महाप्रभु जी के गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी प्रभु चरण

2164
02:35:31,160 --> 02:35:35,720
के जो गोकुलनाथ जी रचित 84 वैष्णव वार्ता दो

2165
02:35:35,720 --> 02:35:39,760
वैष्ण वाता के प्रमाणिक ग्रंथों को आपको पकड़ना चाहिए हर कुछ जो

2166
02:35:39,760 --> 02:35:43,800
यहां वहा से छप गए हैं बिना किसी मैनु स्क्रिप्ट के अध्ययन

2167
02:35:43,800 --> 02:35:48,080
किए हुए ऐसे ग्रंथों से दूरी बनाए रखनी चाहिए तोही उचित है संस्कृत ग्रंथों

2168
02:35:48,080 --> 02:35:52,160
को पकड़े तो कुछ बिगाड़ नहीं होगा ठीक रहेंगी बा ठीक है तो मैं

2169
02:35:52,160 --> 02:35:56,280
आपको यह भेज देता हूं इनको आप जी जी आप हमें भेज दीजिएगा य चीज तो हम

2170
02:35:56,280 --> 02:36:00,720
इसका जो है उपलब्ध करा देंगे दर्शकों को और आपने इतना सारा समय निकाला

2171
02:36:00,720 --> 02:36:03,400
आपने हमारे लिए दर्शकों को काफी सारे तथ्य

2172
02:36:03,400 --> 02:36:09,040
जो है उन पर प्रकाश डाला इसके लिए मैं आपका अभिनंदन करता हूं

2173
02:36:09,040 --> 02:36:13,280
आपको आगे भविष्य में भी इस तरह की वार्ता आपके साथ होती रहे तो

2174
02:36:13,280 --> 02:36:17,760
उसके लिए मैं मतलब प्रयासरत रहूंगा और

2175
02:36:17,760 --> 02:36:21,760
दर्शकों को अगर कुछ प्रश्न वगैरह हो तो आप हमें लिखिए तो अगली किसी

2176
02:36:21,760 --> 02:36:25,880
दिन वार्ता इनकी लेकर के दोबारा से इनको आपके सामने आएंगे और समय

2177
02:36:25,880 --> 02:36:30,760
देने के लिए सभी का आभार देखने के लिए सभी का यथोचित अभिवादन

2178
02:36:30,760 --> 02:36:34,880
और आज की क्योंकि जो पूरा समर्पित है वल्लभ

2179
02:36:34,880 --> 02:36:39,000
महाप्रभु के लिए तो उनके चरण वंदना करते हुए

2180
02:36:39,000 --> 02:36:43,040
मैं इस लाइव स्ट्रीम को आगे बढ़ाता हूं समाप्त करता हूं

2181
02:36:43,040 --> 02:36:47,600
सभी को जय श्री राम जय श्री राधे और जय श्री नाथ जी

2182
02:36:47,600 --> 02:36:51,600
भगवान जय श्री वल्लभाचार्य जय श्रीव
