1
00:00:00,880 --> 00:00:04,880
जिन लोगों को नहीं पता एक सीरीज है पूरी रामपाल के पाखंडी गीता

2
00:00:04,880 --> 00:00:10,000
ज्ञान पर पाखंडी का गीता ज्ञान नाम से तो वो सीरीज में ये

3
00:00:10,000 --> 00:00:14,160
नाइंथ एपिसोड है तो आप लोग पीछे से सर्च कर सकते हैं जो

4
00:00:14,160 --> 00:00:19,120
दूसरे चैप्टर से एक्चुअली हमने चालू किया था क्योंकि पहले चैप्टर में तो केवल

5
00:00:19,120 --> 00:00:23,120
ऐतिहासिक तथ्य देखते हुए रामपाल ने उसको छुआ भी नहीं उसने ज्ञान देना

6
00:00:23,120 --> 00:00:29,120
चालू किया है दूसरे से तो

7
00:00:29,360 --> 00:00:33,680
दूसरे दूसरे चैप्टर से अभी तक ये होते इसके नाइन

8
00:00:33,680 --> 00:00:38,880
आठ एपिसोड हो चुके हैं और इस

9
00:00:38,880 --> 00:00:43,120
श्रंखला का जो ये मेन वीडियो होता है जो यहां मेन चैनल पर चलता है इसके

10
00:00:43,120 --> 00:00:47,440
कुछ बुलेट पॉइंट्स होते हैं। तो वो बुलेट पॉइंट्स आपको संक्षिप्त

11
00:00:47,440 --> 00:00:51,440
रूप में इस वीडियो के बुलेट पॉइंट्स आपको वहां

12
00:00:51,440 --> 00:00:55,520
पर भी मिलते हैं। सर्वशक्तिमान पर बुलेट पॉइंट्स की एक सीरीज है वहां पर इसी

13
00:00:55,520 --> 00:00:58,080
पाखंडी के गीता ज्ञान की

14
00:00:58,080 --> 00:01:02,240
और एक अनाउंसमेंट और कर दूं मैं आपको बहुत जल्द देखिए बहुत

15
00:01:02,240 --> 00:01:06,640
सारे तरीके अपनाए जा रहे हैं रामपाल का

16
00:01:06,640 --> 00:01:10,880
जो उसे रोकने के लिए रामपाल की चीजों का प्रतिकार

17
00:01:10,880 --> 00:01:14,880
कर रहे हैं लोग अपने अपने हिसाब से और आधिकारिक रूप से ऑफिशियली

18
00:01:14,880 --> 00:01:19,360
हमने भी कर रखा है हाई कोर्ट में केस अभी चल ही रहा है एफआईआर

19
00:01:19,360 --> 00:01:23,360
दर्ज है वो सब तो है पर अभी एक बहुत बड़ा धमाका हम

20
00:01:23,360 --> 00:01:28,240
लोग करने जा रहे हैं। है ना? आपको बहुत जल्द कुछ

21
00:01:28,240 --> 00:01:32,320
ही दिनों में एक बहुत सारी ऐसी चीजें मिलने वाली है कि आपको भी आनंद

22
00:01:32,320 --> 00:01:36,560
आ जाएगा रामपाल के उसमें कि हां अब कुछ हुआ है।

23
00:01:36,560 --> 00:01:40,640
जैसे हम जब करते हैं तो बिल्कुल 100 सुनार की एक लोहार की वाला काम करते हैं। कुछ वैसा ही

24
00:01:40,640 --> 00:01:44,960
है। अभी डिस्क्लोज नहीं कर रहे हैं। चालू कर देंगे तब आपको आनंदमई

25
00:01:44,960 --> 00:01:50,000
चीजें देंगे। और कहते हैं ना वो

26
00:01:50,000 --> 00:01:54,080
झूठे की हद तक और चोर के घर तक तो कुछ ऐसा ही

27
00:01:54,080 --> 00:01:58,400
है। इस बार जो भी होगा आपको बहुत आनंद आएगा।

28
00:01:58,400 --> 00:02:02,560
बढ़ चढ़ के आप उसमें पार्टिसिपेट कर सकते

29
00:02:02,560 --> 00:02:06,240
हैं।

30
00:02:06,240 --> 00:02:11,120
इसके साथ ही साथ

31
00:02:11,120 --> 00:02:15,120
ये जो वीडियोस होते हैं रामपाल से संबंधित अथवा हमारे चैनल पर

32
00:02:15,120 --> 00:02:19,120
जितने भी पड़े उसका आप जो बिना उसमें मतलब मिलावट के जैसे हमारे

33
00:02:19,120 --> 00:02:23,200
शब्दों को हमारे भाव को बदले बिना जहां भी आप यूज़ करना चाहते हैं कर सकते हैं।

34
00:02:23,200 --> 00:02:27,280
बस ऐसा ना हो कि मैंने बोला यस मैंने बोला यहां से मत जाना। तो

35
00:02:27,280 --> 00:02:31,360
आपने उसका मत काट दिया। यहां से जाना ऐसा नहीं करना।

36
00:02:31,360 --> 00:02:36,800
ठीक है? आप अपने अनुसार उनका उपयोग कर सकते हैं। और इसमें

37
00:02:36,800 --> 00:02:40,880
यह जो सीरीज है इसमें कभी-कभी

38
00:02:40,880 --> 00:02:44,960
बहुत जरूरी मैं ऐसी चीजें बताऊंगा उसको कह

39
00:02:44,960 --> 00:02:49,040
सकते हैं की पॉइंट्स रामपाल के विषय में। तो वो की पॉइंट्स भी आप अगर

40
00:02:49,040 --> 00:02:53,200
एकत्रित करते रहेंगे ना तो वही पर्याप्त होगा रामपाल का मुंह धुआं कर देना। मुंह

41
00:02:53,200 --> 00:02:57,280
सूख जाए रामपाल। जैसे आज का मैं आपको की पॉइंट एक बताने

42
00:02:57,280 --> 00:03:01,680
वाला हूं।

43
00:03:01,680 --> 00:03:05,920
आप चाहे तो यहां से इसको कट करके और रील के रूप में अपने Instagram

44
00:03:05,920 --> 00:03:10,640
वगैरह जो भी आपका सोशल मीडिया हैंडल हो उस पर आप डाल सकते हैं।

45
00:03:10,640 --> 00:03:14,720
और मुझे कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग मिली है जिसमें ये लोग यही सब बातें कर रहे हैं कि

46
00:03:14,720 --> 00:03:18,800
आप इतने वीडियोस बनाइए। आप आप भगत जी आप इतना बनाइए। एक भगत जी को 10

47
00:03:18,800 --> 00:03:23,120
वीडियोस बनाने हैं। इस तरह की रिकॉर्डिंग्स मेरे पास आई है। इनकी लीक हुई है रिकॉर्डिंग्स।

48
00:03:23,120 --> 00:03:27,360
तो यह इस तरह से काम करते हैं। एक-एक व्यक्ति को प्रेशराइज करते हैं अपने भगत

49
00:03:27,360 --> 00:03:31,360
को कि वीडियो बना वीडियो बना। क्योंकि यह जो भी कुछ कर सकते हैं सोशल

50
00:03:31,360 --> 00:03:35,440
मीडिया पे ही कर सकते हैं। धरातल पर ये आपको अपने उस रूप में नहीं

51
00:03:35,440 --> 00:03:39,600
मिलेंगे कभी भी जिस रूप पर सोशल मीडिया पर धरातल पर ये आपको

52
00:03:39,600 --> 00:03:43,760
बकरी बकरी बन के मिलेंगे। और सोशल मीडिया पर आपको ये शेर

53
00:03:43,760 --> 00:03:48,880
बन के मिलेंगे। ठीक है? तो ये प्रेशराइज करते हैं कि भाई

54
00:03:48,880 --> 00:03:53,040
वीडियो बनाओ वीडियो बनाओ। तो आप लोग भी वीडियो बनाइए। आप स्वयं नहीं बना सकते तो हम

55
00:03:53,040 --> 00:03:57,040
लोग हम लोगों के वीडियोस की कटिंग कर करके एक एक दोद मिनट के जो भी आपको

56
00:03:57,040 --> 00:04:01,200
पार्ट अच्छा लगता है वो करिए और अभी जो मैं बोलने जा रहा हूं उसको जरूर

57
00:04:01,200 --> 00:04:05,600
कट कर लीजिएगा ठीक है तो

58
00:04:05,600 --> 00:04:10,400
रामपाल के अनुसार रामपाल वेद गीता

59
00:04:10,400 --> 00:04:14,640
जो शास्त्र है शास्त्र सम्मत चीजें

60
00:04:14,640 --> 00:04:17,200
बताता है ज्ञान देता है

61
00:04:17,200 --> 00:04:21,280
और रामपाल ने ही बताया है कि हमारे शास्त्रों में शिव शिव

62
00:04:21,280 --> 00:04:25,600
दुर्गा काली की पूजा को निषेध किया गया है। व्रत करने को निषेध

63
00:04:25,600 --> 00:04:29,600
किया गया है। या इस तरह के श्राद्ध इत्यादि

64
00:04:29,600 --> 00:04:33,840
कर्म है जो उनको निषेध किया गया है। है ना? या फिर और ऐसी

65
00:04:33,840 --> 00:04:37,920
जो भक्ति भक्ति विधि विषयक बातें हैं उसमें मना की गई।

66
00:04:37,920 --> 00:04:41,920
गीता का आधार लेकर के या जो भी आधार लेकर के वो बताता है। एक निचोड़ वाली

67
00:04:41,920 --> 00:04:46,240
बात आपको बता रहा हूं। बहुत पॉइंट की बात है। तो हमारे शास्त्रों

68
00:04:46,240 --> 00:04:50,480
ने जो जो चीजें हम कर रहे हैं उनको निषेध

69
00:04:50,480 --> 00:04:54,720
किया है। अगर हम ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा कर रहे हैं भगवान को

70
00:04:54,720 --> 00:04:58,720
उनको परमेश्वर के रूप में स्वीकार करके तो वो उसका निषेध करते हैं

71
00:04:58,720 --> 00:05:02,800
हमारे शास्त्र। तो हमारे शास्त्रों का निचोड़ है कि हम जो जो

72
00:05:02,800 --> 00:05:07,360
काम परंपरागत रूप से करते चले आ रहे हैं वह हमें नहीं करना। ठीक है?

73
00:05:07,360 --> 00:05:12,640
अब बात यह आती है कि यदि हमारे शास्त्र ही ऐसा कह रहे हैं

74
00:05:12,640 --> 00:05:16,880
यदि हमारे शास्त्र ही ऐसा कह रहे हैं तो फिर यह चीजें हमारे

75
00:05:16,880 --> 00:05:20,960
पास आई कहां से? हमने ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करना चालू कहां

76
00:05:20,960 --> 00:05:24,960
से किया? कभी ये सोचा? जब गीता ही मना कर

77
00:05:24,960 --> 00:05:29,440
रही है कि कृष्ण जी भगवान नहीं है। जब गीता जी ही मना कर रही हैं

78
00:05:29,440 --> 00:05:32,400
कि वो इसका

79
00:05:32,400 --> 00:05:36,400
रामपाल के अनुसार हमारे शास्त्रों में ज्यादातर इस बारे में बात की

80
00:05:36,400 --> 00:05:40,560
गई कि क्या-क्या नहीं करना है। समझ रहे हैं कि आपको

81
00:05:40,560 --> 00:05:44,720
ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति नहीं करनी है। आपको ये ये नहीं करना

82
00:05:44,720 --> 00:05:48,800
है। नहीं करना बात तब होती है जब कोई कर रहा है। तो क्यों

83
00:05:48,800 --> 00:05:53,040
कर रहे हैं? अब अगर आप यह कहेंगे कि आपने इनहीं शास्त्रों

84
00:05:53,040 --> 00:05:57,040
का गलत मतलब निकाल लिया था। इनहीं शास्त्रों का आपने

85
00:05:57,040 --> 00:06:01,040
गलत मतलब निकाल लिया था। यह शास्त्र तो मना कर रहे थे। गीता तो मना

86
00:06:01,040 --> 00:06:05,440
कर रही है। पुराण तो मना कर रहे हैं। वेद तो मना कर रहे हैं। तो

87
00:06:05,440 --> 00:06:09,440
अगर हमने गलत मतलब निकाल भी लिया और यह शास्त्र वो है जो मना

88
00:06:09,440 --> 00:06:13,600
कर रहे हैं। तो इससे पहले वो कौन से शास्त्र थे जिसमें इनकी पूजा बताई

89
00:06:13,600 --> 00:06:17,600
गई है? उसका प्रमाण क्या है? तुम्हारे हिसाब से

90
00:06:17,600 --> 00:06:21,600
इसमें इनकी पूजा नहीं बताई गई है। इसमें और भी चीजें हैं जो मना

91
00:06:21,600 --> 00:06:25,760
की गई है। यह सारे शास्त्र इसी से ओतप्रोत है।

92
00:06:25,760 --> 00:06:29,920
ब्रह्मा विष्णु महेश भक्ति नहीं करनी है या कृष्ण जी

93
00:06:29,920 --> 00:06:34,640
को परमेश्वर नहीं मानना है जो भी है निषेध किया है जो

94
00:06:34,640 --> 00:06:38,640
हमारे अकॉर्डिंगली वेद गीता पुराण इत्यादि

95
00:06:38,640 --> 00:06:42,800
जो धर्म शास्त्र है उनके अनुसार ये जो चीजें हैं जो हम कर रहे हैं वो बताई

96
00:06:42,800 --> 00:06:46,800
गई है। तुम्हारे अनुसार इनका नाम लेकर के मना किया गया है।

97
00:06:46,800 --> 00:06:47,440
ये ये नहीं

98
00:06:47,440 --> 00:06:51,440
करना है नाम लेकर के। तो इन शास्त्रों का जो अस्तित्व है वह

99
00:06:51,440 --> 00:06:55,440
इस बात में है कि हमको यह यह नहीं करना है। तो यह

100
00:06:55,440 --> 00:06:59,520
सब चीजें हमारे पास आई कहां से? इसका प्रमाण क्या

101
00:06:59,520 --> 00:07:02,160
है?

102
00:07:02,160 --> 00:07:06,720
हमारे पास तो यह सब चीजें हैं। हमारे अनुसार तो इनहीं शास्त्रों से आई है।

103
00:07:06,720 --> 00:07:10,800
मगर इन शास्त्रों का सही अर्थ है कि यह शास्त्र इन

104
00:07:10,800 --> 00:07:14,960
शास्त्रों का आविर्भाव ही इसलिए हुआ है कि

105
00:07:14,960 --> 00:07:19,200
आपको यह बता सके कि कृष्ण की भक्ति नहीं करनी। ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति नहीं करनी है।

106
00:07:19,200 --> 00:07:23,280
इसका मतलब है कि हम पहले से इन शास्त्रों के बाहर से

107
00:07:23,280 --> 00:07:27,520
हम लोग ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति कर रहे हैं। क्यों कर रहे थे?

108
00:07:27,520 --> 00:07:31,520
धर्म ही ना पशु भी समाना हमको ये ज्ञान मिला कहां

109
00:07:31,520 --> 00:07:35,600
से? उस बात का प्रमाण कहां है? अगर इन शास्त्रों ने इनकी पूजा

110
00:07:35,600 --> 00:07:39,600
निषेध की है तो इनकी पूजा का बताने वाला विधान वाला शास्त्र

111
00:07:39,600 --> 00:07:45,200
कहां है? यहीं पर टफिस हो जाएगी। पूरी

112
00:07:45,200 --> 00:07:50,640
पूरा इनका जो स्ट्रक्चर है सब तबाह हो जाएगा। केवल इसी बात से यह दिखाए

113
00:07:50,640 --> 00:07:55,040
अगर तुमने ये घोषित कर दिया कि जो हमारे सनातन शास्त्र

114
00:07:55,040 --> 00:07:59,120
हैं उनमें ये ये चीजें नाम लेके मना की गई है और

115
00:07:59,120 --> 00:08:03,360
इसी रूप में इनका अस्तित्व है मना करने के रूप में। इसका

116
00:08:03,360 --> 00:08:07,440
मतलब वो चीजें पहले से एक्सिस्ट करती हैं। जिसको हम जिसको

117
00:08:07,440 --> 00:08:11,440
हम फॉलो करते हैं। तो जय श्री राम। वो यहां पर

118
00:08:11,440 --> 00:08:15,600
पावर कट हो गया था। लाइव चल रहा है। मैं दिख रहा हूं ना सबको पावर कट

119
00:08:15,600 --> 00:08:20,080
हो गया था। इन्वर्टर की एक जरूरत है। अगर कोई व्यवस्था

120
00:08:20,080 --> 00:08:24,080
कर सकता है इन्वर्टर की तो देखें। अच्छा

121
00:08:24,080 --> 00:08:30,080
तो मैं बात कर रहा था कि

122
00:08:30,160 --> 00:08:34,400
सीधी बात यह है कि हमारे जो शास्त्र हैं जिनके आधार पर हम ब्रह्मा विष्णु

123
00:08:34,400 --> 00:08:38,480
महेश की भक्ति करते हैं वो बहुत सी चीजें जो रामपाल मना करता है कि

124
00:08:38,480 --> 00:08:42,880
आपके शास्त्रों में इन चीजों को मना किया गया है। ठीक है? मना किया गया। इन शास्त्रों

125
00:08:42,880 --> 00:08:46,880
का स्वरूप ही है कि यह चीज मना कर रहे हैं। तो फिर वो कौन से

126
00:08:46,880 --> 00:08:51,040
शास्त्र थे जिनके कारण हमने इन चीज को अपनाया क्योंकि धर्मे हीना पशु

127
00:08:51,040 --> 00:08:55,120
भी समाना मनुष्य अपने आप धर्म नहीं सीखता है। यानी क्या करना है? क्या डज

128
00:08:55,120 --> 00:08:59,120
एंड डोंट्स उसके उसके पास अपने आप नहीं आते हैं। तो यह कहां से

129
00:08:59,120 --> 00:09:03,360
आए उसके पास? उसका प्रमाण क्या है? तो इस बारे में इनके मुंह पे लग जाएगा

130
00:09:03,360 --> 00:09:07,680
ताला। उसका कोई प्रमाण नहीं है। वेद शास्त्र इत्यादि से हटकर

131
00:09:07,680 --> 00:09:11,840
कौन से शास्त्र से जिनके कारण हम लोगों ने ब्रह्मा विष्णु महेश

132
00:09:11,840 --> 00:09:15,920
की पूजा करना शुरू किया। जबकि वेद इत्यादि तो वो मना कर रहे हैं। तो ये एक

133
00:09:15,920 --> 00:09:20,160
की पॉइंट है जो आप लोग नोट करिएगा और इस पर आप बहुत लंबी-लंबी बात कर सकते हैं।

134
00:09:20,160 --> 00:09:24,480
ठीक है? और भी है की पॉइंट तो अलग-अलग एपिसोड्स में मैं आपको बताता

135
00:09:24,480 --> 00:09:26,640
चलूंगा।

136
00:09:26,640 --> 00:09:30,720
जैसे पिछले वाले में तत्व ज्ञानी के बारे में बताया था। अच्छा

137
00:09:30,720 --> 00:09:34,880
कुछ लोग हैं जो यह कहते रहते हैं समाज सेवा के बहाने धर्मांतरण

138
00:09:34,880 --> 00:09:40,880
का आधार हां यह तो ठीक है। कुछ लोग यह कहते हैं कि

139
00:09:42,480 --> 00:09:46,960
कुछ लोग यह कहते हैं कि रामपाल जो है वो धरातल पर

140
00:09:46,960 --> 00:09:51,600
मदद कर रहा है। लोगों की सेवा कर रहा है। इसलिए रामपाल अच्छा है। तो रामपाल

141
00:09:51,600 --> 00:09:55,600
लोगों को धरातल पे पाइप बना पाइप बांट रहा है। अनाकोंडा के

142
00:09:55,600 --> 00:09:59,680
बराबर लंबे-लंबे पाइप यदि वह बांट रहा है तो आप सब लोग अपने घर की मातृ शक्तियों

143
00:09:59,680 --> 00:10:03,680
को उसके पास भेज देंगे किसी भी तरह से

144
00:10:03,680 --> 00:10:07,920
उपयोग में लेने के लिए है ना यही है ना क्योंकि

145
00:10:07,920 --> 00:10:12,240
वो पाइप बांट रहा है इसलिए भेज दो अपने घर की मातृशक्तियों को तुम भेज सकते हो

146
00:10:12,240 --> 00:10:16,400
ये नपुंसकता आप लोग दिखा सकते हैं कट्टर मनुवादी

147
00:10:16,400 --> 00:10:20,560
कट्टर सनातनी नहीं चलिए अब हम लोग शुरू करते

148
00:10:20,560 --> 00:10:24,560
हैं जो पिछला वाला एपिसोड था उसका उसके बुलेट पॉइंट्स देख लेते

149
00:10:24,560 --> 00:10:29,680
फटाफट क्या थे

150
00:10:29,680 --> 00:10:34,560
बुलेट पॉइंट्स

151
00:10:34,560 --> 00:10:39,120
सबसे पहली बात है हमने

152
00:10:39,120 --> 00:10:43,200
रामपाल की जो गरिमा गीता की पुस्तक है

153
00:10:43,200 --> 00:10:48,000
उसका 102 नंबर का पृष्ठ है उसमें हमने बुलेट पॉइंट्स

154
00:10:48,000 --> 00:10:52,160
जो हम बता रहे हैं जिस पर पिछली लाइव में विस्तृत चर्चा

155
00:10:52,160 --> 00:10:56,240
हुई थी तो उसमें बुलेट पॉइंट क्या-क्या निकले थे? सबसे पहला बुलेट पॉइंट निकला

156
00:10:56,240 --> 00:11:00,560
था कि 5 14 के अर्थ में रामपाल यह कहता है कि परमात्मा

157
00:11:00,560 --> 00:11:04,560
किसी के शुभ कर्मों का फल नहीं देता। और थोड़ी देर बाद उसी पैराग्राफ

158
00:11:04,560 --> 00:11:08,720
में यह भी कह देता है कि परमात्मा उसकी भक्ति। भक्ति यानी

159
00:11:08,720 --> 00:11:12,800
कि क्या है? शुभ कर्म। तो भक्ति करने को भक्ति करने

160
00:11:12,800 --> 00:11:16,960
पर जो रामपाल का ईश्वर है वह क्षमा

161
00:11:16,960 --> 00:11:20,960
कर देता है। तो इधर कह रहा है फल नहीं देता। इधर कह रहा है क्षमा कर देता है। यह

162
00:11:20,960 --> 00:11:25,120
दोहरी बातें दोगली बातें मूर्खता पूर्ण बातें हैं। दोगली

163
00:11:25,120 --> 00:11:29,120
क्या दोगलेपन के लिए दोगलापन करने के लिए भी अकल चाहिए होती है।

164
00:11:29,120 --> 00:11:33,200
मगर यहां तो फड़ता है। ठस बुद्धि है तो वहां अकल की भी

165
00:11:33,200 --> 00:11:37,200
जरूरत नहीं है। तो ये दोगली बातें हैं। वैसे भी रामपाल खुद ही दावा करता

166
00:11:37,200 --> 00:11:41,280
है। मैं जो है फलाने को करंट से बता बचा के आया। यह आया वो

167
00:11:41,280 --> 00:11:45,360
बात और है कि खुद ही जमानत के लिए रोता रहता हो। अपनी

168
00:11:45,360 --> 00:11:49,520
ढलती हुई उम्र का वास्ता देकर के बाहर आता हो। लिखित में देता हो वह बात और

169
00:11:49,520 --> 00:11:53,840
है मगर वह दावे तो करता है ना कि मेरी भक्ति करने से यह हो जाएगा वह हो जाएगा

170
00:11:53,840 --> 00:11:58,240
मगर यहां पर वह खुद कह रहा है 5 14 में पृष्ठ क्रमांक 102 नंबर

171
00:11:58,240 --> 00:12:02,240
पृष्ठ पर कि परमात्मा किसी के शुभ कर्म

172
00:12:02,240 --> 00:12:06,480
का फल नहीं देता लो भाई इनका तत्व ज्ञान नहीं है इनका ज्ञान

173
00:12:06,480 --> 00:12:10,560
इनका ज्ञान है पंचर ज्ञान क्या ज्ञान है पंचर ज्ञान पांच

174
00:12:10,560 --> 00:12:15,040
16 का अर्थ करते हुए आत्मज्ञान और परमात्म

175
00:12:15,040 --> 00:12:19,440
ज्ञान को तत्व ज्ञान कह रहा है अच्छी बात आत्मज्ञान, परमात्म ज्ञान, तत्वज्ञान

176
00:12:19,440 --> 00:12:23,760
है। अच्छी बात है। मगर उस उसके बाद थोड़ी देर बाद ही

177
00:12:23,760 --> 00:12:27,920
उसी पैराग्राफ में कह रहा है कि उसका महिमा और नाम

178
00:12:27,920 --> 00:12:32,000
दीक्षा इत्यादि। उसकी महिमा गाना कि उसने यह किया है। उसने वहां फलाने

179
00:12:32,000 --> 00:12:36,080
गांव में यह हो गया था वो किया। वहां डेरा डाल दिया। वहां डेरे में भविता

180
00:12:36,080 --> 00:12:41,760
कांड हो गया। वहां पर यह निकला। इतने सारे वो निकले। सामग्रियां

181
00:12:41,760 --> 00:12:45,840
काम वासना को तृप्त करने में। संतान उत्पत्ति को रोकने के

182
00:12:45,840 --> 00:12:50,080
लिए जो सामग्री होती है ना आजकल जो वैज्ञानिकों द्वारा बनाई गई वो सब सामग्रियां

183
00:12:50,080 --> 00:12:54,320
एक किलो निकली ये निकली तो यह जो इसके ईश्वर की जो इनके

184
00:12:54,320 --> 00:12:58,400
ईश्वर की रामपालियों का ईश्वर रामपाल तो यह जो इसकी महिमा है तो

185
00:12:58,400 --> 00:13:00,800
इस महिमा का बखान करना ही तत्वज्ञान

186
00:13:00,800 --> 00:13:04,960
है तो पहले कह रहा है आत्मज्ञान और परमात्म ज्ञान तत्व ज्ञान है फिर जो इस तरह

187
00:13:04,960 --> 00:13:08,960
की चीजें हैं उसकी महिमा बखान करना जेल कैसे गया जेल में क्या-क्या हुआ

188
00:13:08,960 --> 00:13:13,200
उसके साथ उसने सफाई की शौचालय की या क्या किया बगीचा

189
00:13:13,200 --> 00:13:17,200
बगीचा संभाला या भंडारी बना वहां का। तो यह सब महिमा गान इसका जो

190
00:13:17,200 --> 00:13:21,200
है वो उसका तत्व ज्ञान है। तो अब एक ही पैराग्राफ में दो तरह

191
00:13:21,200 --> 00:13:25,200
की बातें फिर 57 में कह रहा है तत्व ज्ञान यानी नाम

192
00:13:25,200 --> 00:13:29,200
दीक्षा। मैंने पिछली लाइव में भी चैलेंज किया था। मैं इस

193
00:13:29,200 --> 00:13:33,440
लाइव में भी चैलेंज कर रहा हूं। जिसने भी अपनी मां का निष्ठा पूर्वक दूध पिया

194
00:13:33,440 --> 00:13:37,600
हो। जिसने भी अपनी मां का दूध पिया हो या जिसकी मां ने उसको निष्ठा पूर्वक

195
00:13:37,600 --> 00:13:41,920
दूध पिलाया हो। वह पूरे सनातन शास्त्र वांगमय

196
00:13:41,920 --> 00:13:46,560
में वैदिक वांगमय से दिखा दे कि तत्व का अर्थ होता है नाम दीक्षा।

197
00:13:46,560 --> 00:13:48,880
दिखा

198
00:13:48,880 --> 00:13:53,120
ऐसी चीज बोलते हैं ना कि

199
00:13:53,120 --> 00:13:57,920
अकाट्य चीजों पर बात करते हैं। फालतू की बातें नहीं करते हैं। अकाट्य चीज

200
00:13:57,920 --> 00:14:02,000
व्यर्थ की बातें नहीं करते हम कि अरे तुम्हारा फोटो बिगाड़ दिया। कुत्ते

201
00:14:02,000 --> 00:14:06,560
जैसा मुंह बना दिया। उसकी आवश्यकता ही नहीं है। उसकी आवश्यकता है क्या? आप ही लोग बताओ।

202
00:14:06,560 --> 00:14:11,440
रामपाल का फोटो बिगाड़ करके उसको कुत्ते जैसा दिखा करके या

203
00:14:11,440 --> 00:14:16,000
और कोई प्राणी के रूप में दिखा दिखाने की आवश्यकता है।

204
00:14:16,000 --> 00:14:20,000
आज मैंने एक वीडियो देखा था सुबह-सुबह उसका चेहरा देख लो तो वैसे ही दिन खराब हो जाता

205
00:14:20,000 --> 00:14:24,480
है। तो इस सब की हमें आवश्यकता नहीं है। कट

206
00:14:24,480 --> 00:14:28,640
अकाट्य बातें बोलते बिल्कुल अकाट उसमें जब

207
00:14:28,640 --> 00:14:32,880
बात आ जाएगी तो खत्म टू स्टॉप द ट्रेन पुल

208
00:14:32,880 --> 00:14:37,280
द चिन। ठीक है? तो क्या है कि जिसने जिसकी

209
00:14:37,280 --> 00:14:41,280
भी मां ने उसको निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो वह यह बता

210
00:14:41,280 --> 00:14:45,360
दे मुझे सिद्ध कर दे शास्त्रों से सनातन शास्त्रों से

211
00:14:45,360 --> 00:14:50,160
कि तत्व का अर्थ होता है तुम्हारे वो जेल

212
00:14:50,160 --> 00:14:54,400
कट्टू रामपाल के द्वारा दी जाने वाली नाम दीक्षा। ठीक है। आगे

213
00:14:54,400 --> 00:14:57,200
चलते हैं।

214
00:14:57,200 --> 00:15:03,040
अच्छा अब जो है यह कहता है 51 18 में तत्वज्ञानी

215
00:15:03,040 --> 00:15:07,040
कि तत्वज्ञानी जो होता है वह समदर्शी होता है। यही तत्वज्ञानी

216
00:15:07,040 --> 00:15:11,120
कहता है कि ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करने वाले नीच होते

217
00:15:11,120 --> 00:15:15,360
हैं। ये कैसा समदर्शी? समदर्शी मतलब सबको एक समान देखने

218
00:15:15,360 --> 00:15:19,360
वाला। मगर यह तो ऊंचानीचा कर रहा है। अगर हमारा सिद्धांत

219
00:15:19,360 --> 00:15:23,360
है तो उसमें व्यवहार और परमार्थ के भेद से परमार्थ की दृष्टि से देखें तो

220
00:15:23,360 --> 00:15:27,520
सब तत्व की दृष्टि से देखें तो सब उसमें

221
00:15:27,520 --> 00:15:31,200
समदर्शिता आ जाती है। और व्यवहार के जिसके साथ जो जैसा

222
00:15:31,200 --> 00:15:35,760
व्यवहार कर रहा है उसके अनुसार व्यवहार हो जाता है। मगर तुम्हारे यहां तो एक ही एस्पेक्ट

223
00:15:35,760 --> 00:15:40,000
है। एक ही डायमेंशन है। पर व्यवहार परमार्थ का कोई भेद नहीं है। ये सब गढ़

224
00:15:40,000 --> 00:15:44,240
विषय है। तुम्हारे बल्ले नहीं पड़गी। रामपालियों सीधी बात है कि

225
00:15:44,240 --> 00:15:48,240
तत्वज्ञानी वो होता है जो 5 18 के

226
00:15:48,240 --> 00:15:52,320
अर्थ में ले तत्वज्ञानी जो होता है वो सब में एकता देख एक समान देखता है नहीं

227
00:15:52,320 --> 00:15:56,320
देखता भाई तू बबिता को अलग देखता है और तेरी बेटी जो आकर के

228
00:15:56,320 --> 00:16:00,640
तेरे पैरवैर छूती है उसको तू अलग देखता है अभी कुछ दिन पहले हुआ था कि सौम्य

229
00:16:00,640 --> 00:16:04,880
सौम्या माथुर ने क्या किया था कि वो समझ नहीं पाई थी कि वो इसकी बेटी

230
00:16:04,880 --> 00:16:08,960
क्योंकि इसके पास आकर के महिलाएं ऐसी चीजें करती हैं और

231
00:16:08,960 --> 00:16:13,360
इसका नाम ऐसा उड़ा हुआ है अखबारों के जरिए से बबीता इत्यादि के साथ

232
00:16:13,360 --> 00:16:17,680
तो वो इसकी जब स्वयं की सगी पुत्री ऐसा कर रही थी तो सौम्या

233
00:16:17,680 --> 00:16:22,160
माथुर को गलती हो गई। उसने कहा देखो देखो कि जो

234
00:16:22,160 --> 00:16:26,320
बूढ़ी है अधेड़ उम्र की औरत औरतें हैं उन पर महिलाएं हैं उन पर ये ध्यान नहीं दे

235
00:16:26,320 --> 00:16:30,800
रहा है। मगर जो बिल्कुल थोड़ा क्या कहते हैं

236
00:16:30,800 --> 00:16:34,800
युवावस्था में ज्यादा कम आयु वाली आई हैं तो उन पर ध्यान दे रहा है। इस तरह का

237
00:16:34,800 --> 00:16:39,120
कटाक्ष कर दिया था। बाद में सौम्या माथुर ने उसके लिए क्षमा भी मांगी थी उन्होंने

238
00:16:39,120 --> 00:16:43,680
कि मेरे से गलती हो गई। मैं जानती नहीं थी पुत्री हैं। तो

239
00:16:43,680 --> 00:16:46,320
बबिता में और अपनी पुत्री में अंतर करता है। फिर ये

240
00:16:46,320 --> 00:16:50,880
बता कहां से किया तूने अंतर? इन सवालों का जवाब सिद्धांतवादी आचार्यों

241
00:16:50,880 --> 00:16:55,520
के पास होता है। है ना? तुम्हारे जैसे मूर्ख जेल कट्टू

242
00:16:55,520 --> 00:16:59,600
और खीर पिवैया खीर पिलाने वालों के पास नहीं होता है। जो अपनी खीर पिलाते

243
00:16:59,600 --> 00:17:04,160
हैं। वह खीर कहां-कहां से होकर के आती है? अखबारों के अनुसार अखबारों

244
00:17:04,160 --> 00:17:08,160
की बात यदि सत्य है तो रामपाल के नहाए हुए की खीर पीते

245
00:17:08,160 --> 00:17:12,160
हैं लोग और वो खीर कहां-कहां से होते हो के आती है जो अगर नहा रहा

246
00:17:12,160 --> 00:17:16,240
है कोई व्यक्ति तो आप सोच के देखिए शरीर के प्रत्येक अंग से वह

247
00:17:16,240 --> 00:17:22,240
जो दूध है वह बह करके आता है। अब प्रत्येक अंग में आंख, नाक, कान, गला

248
00:17:22,560 --> 00:17:26,800
उधर फिर गुदा द्वार सब आता है। मल त्याग का जो गुदा

249
00:17:26,800 --> 00:17:30,880
द्वार होता है वो भी आता है और वहां से आने वाला जो दूध है वो निकल के

250
00:17:30,880 --> 00:17:36,400
आता है और फिर जो है उसको भक्तगण ग्रहण करते हैं।

251
00:17:36,400 --> 00:17:40,400
जो अपने आप को भगत कहते हैं वो ग्रहण करते हैं। ऐसा अखबारों के अनुसार

252
00:17:40,400 --> 00:17:46,400
बताया गया है। अब बाकी उसमें कितनी सच्चाई है बाद की बात है। तो

253
00:17:46,720 --> 00:17:50,880
तो समदर्शी की बात हो गई। जिसका मन जो तत्वज्ञानी

254
00:17:50,880 --> 00:17:54,240
होता है वह

255
00:17:54,240 --> 00:17:58,320
समदर्शी होता है। मगर यहां तो ये ऊंचनीच देख रहा है। भविता

256
00:17:58,320 --> 00:18:02,400
में अपनी पुत्री में अंतर कर रहा है। अच्छा और आगे चलते हैं। तो

257
00:18:02,400 --> 00:18:06,560
जिसका मन समदर्शी है वह पूर्ण ब्रह्म में स्थित है।

258
00:18:06,560 --> 00:18:10,880
अब ये पूर्ण ब्रह्म में स्थित होने वाली बात बता दे भाई।

259
00:18:10,880 --> 00:18:14,960
पूर्ण ब्रह्म में स्थित होने वाली बात तू बता पाएगा कभी? नहीं बता पाएगा।

260
00:18:14,960 --> 00:18:19,040
इसकी विवेचना ही नहीं कर पाएगा। पूर्ण ब्रह्म में

261
00:18:19,040 --> 00:18:23,920
स्थित होने की बात है कि जिसका मन

262
00:18:23,920 --> 00:18:27,920
रमा हुआ हो भगवान की भक्ति में

263
00:18:27,920 --> 00:18:32,240
जो अपने विचारों से अपनी आत्मा से भगवान में संलग्न हो

264
00:18:32,240 --> 00:18:36,640
भले ही उस शारीरिक रूप से वो इधर-उधर जाता हुआ दिखाई दे रहा हो

265
00:18:36,640 --> 00:18:40,800
पर मन से सदैव वो भगवान के साथ अटैच्ड हो। यह

266
00:18:40,800 --> 00:18:44,800
तो यह रही बात। मगर तुम जैसे मूर्ख तो यह कहते हो ना कि भगवान ने

267
00:18:44,800 --> 00:18:49,200
भगवान तो अर्जुन के पास ही खड़े थे। 1866

268
00:18:49,200 --> 00:18:53,280
तुम तो वह मूर्ख हो ना जो कहते भगवान तो उसके पास ही खड़े थे। फिर वो कहां जाने को

269
00:18:53,280 --> 00:18:57,280
कह रहे हैं भगवान अर्जुन से? कहां जाने को कह रहे

270
00:18:57,280 --> 00:19:01,360
जब वो उसके पास में है स्वयं तो यानी कि तुम्हारे लिए क्रिया एक ही होती

271
00:19:01,360 --> 00:19:05,600
है। गत्यार्थक भौतिक रूप से ही तुम्हारे क्रिया होती

272
00:19:05,600 --> 00:19:09,440
है। मनन चिंतन वाली क्रिया नहीं होती है। ज्ञानार्थक होती नहीं है। क्योंकि

273
00:19:09,440 --> 00:19:14,240
ये यहां पर ये ज्ञानार्थक क्रिया में लेंगे स्थित होना तो तो चल जाएगा।

274
00:19:14,240 --> 00:19:18,720
वरना कैसे स्थित हो रहा है? घुस रहा है क्या तुम्हारे परमेश्वर के कबीर के अंदर?

275
00:19:18,720 --> 00:19:22,720
तुम्हारे यहां तो अद्वैत भी नहीं है जो घुसने वाली बात हो। कबीर के अंदर घुस

276
00:19:22,720 --> 00:19:26,720
रहा है क्या? कि वही उसी वो जो खीर जहां से होकर आती है उसमें

277
00:19:26,720 --> 00:19:30,720
घुस रहा है। कहां घुस रहा है? यह सोचने वाली बात है। यह

278
00:19:30,720 --> 00:19:35,040
स्थित होने का अर्थ कर पाएंगे तुम्हारे बुऊ। इसी में फंस जाएंगे। दो-तीन

279
00:19:35,040 --> 00:19:39,760
जन्म लग जाएंगे। इसी में इसी में पकड़ लूंगा तो जीभ बिल्कुल सूख जाएगी।

280
00:19:39,760 --> 00:19:44,000
इसलिए अपनी खैर चाहते हो तो कभी भूल

281
00:19:44,000 --> 00:19:48,160
करके शिवश नारायण द्विवेदी के सामने आने की हिम्मत मत करना। यह रामपाल

282
00:19:48,160 --> 00:19:52,320
के लिए उसकी गैंग की तो बाद दूर है ना मत पड़ो चक्कर

283
00:19:52,320 --> 00:19:56,320
में कोई है नहीं टक्कर में बस अपना वो कपड़े की दुकान जो चलाते हो ना

284
00:19:56,320 --> 00:20:00,320
काउंटर लगा के कपड़े की दुकान चलाते हो

285
00:20:00,320 --> 00:20:04,560
खड़े हो के जैसे आदमी नहीं यहां कौन सी दिखाऊं सिल्क दिखाऊं बनारसी दिखाऊं

286
00:20:04,560 --> 00:20:08,560
काजीवरम दिखाऊं इस तरह से खड़ा हो खड़ा हो जाता है काउंटर के बगल में वो इसका

287
00:20:08,560 --> 00:20:12,960
वो है प्रवचन पॉइंट वहां प्रवचन देता है

288
00:20:12,960 --> 00:20:18,000
तो जिसका मन समदती समदर्शी है वह ब्रह्म में स्थित

289
00:20:18,000 --> 00:20:22,080
यहां पर ब्रह्म का अर्थ इसने सच्चिदानंद स्वरूप लिया। जबकि यह ब्रह्म कहते हैं

290
00:20:22,080 --> 00:20:24,480
काल को। 520 में जो

291
00:20:24,480 --> 00:20:28,560
सुखदख को परमात्मा की रजा समझता है। 520 में इसने

292
00:20:28,560 --> 00:20:32,720
मान लिया है कि तत्वज्ञानी को भी दुख

293
00:20:32,720 --> 00:20:36,800
होता है। जबकि यह दावा करते हैं अपने लोगों को बहकाने के लिए,

294
00:20:36,800 --> 00:20:41,200
अपनी खीर पिलाने के लिए अ कि

295
00:20:41,200 --> 00:20:43,840
जो

296
00:20:43,840 --> 00:20:47,840
उसकी शरण में आ जाएगा रामपाल की शरण में उसको दुख नहीं होगा। जबकि यहां पर क्या है? दुख

297
00:20:47,840 --> 00:20:51,840
तो होगा मगर वो यह समझेगा कि यह तो सब भगवान की मर्जी है।

298
00:20:51,840 --> 00:20:55,840
है ना? तो प्रत्येक आस्तिक यही समझता है। जो भी आस्तिक है वही समझता है कि

299
00:20:55,840 --> 00:21:00,720
भगवान की मर्जी से ही हुआ जो हुआ है। और उसमें मेरे अपने कर्म है।

300
00:21:00,720 --> 00:21:04,880
तो दुख तो होगा। यह बात मान ली रामपाल ने। नोट कर लेना। ऊपर मान लिया

301
00:21:04,880 --> 00:21:09,200
कि परमात्मा किसी शुभ कर्म का फल नहीं देता। नीचे मान लिया 5:20 में

302
00:21:09,200 --> 00:21:13,280
कि सुखदख होता है रामपालियों को भी होता तो है

303
00:21:13,280 --> 00:21:17,760
वह मान रहा है यहां पर लिखित रूप से वो तो होता ही है

304
00:21:17,760 --> 00:21:21,920
सुबह संडास जाता ही होगा रामपाल गैस बनती ही है उसके दिख

305
00:21:21,920 --> 00:21:26,000
रहा है उसकी शक्ल से है ना पेट में दर्द ऐंठन इत्यादि होती होगी

306
00:21:26,000 --> 00:21:30,080
रोते-रोते आंखों की बीमारी के लिए तमाम बुढ़ापा दिखाते हुए

307
00:21:30,080 --> 00:21:34,480
भीख मांग करके बाहर आया है तो दुख तो होता है

308
00:21:34,480 --> 00:21:39,200
अच्छा 5 24

309
00:21:39,200 --> 00:21:43,280
ब्रह्म का अर्थ इसने फिर से 52 24 में मान लिया पूर्ण परमात्मा जबकि यह लोग कहते हैं

310
00:21:43,280 --> 00:21:47,520
ब्रह्म अलग है और सच्चिदानंद जो परमेश्वर है

311
00:21:47,520 --> 00:21:51,680
सच्चिदानंद स्वरूप सच्चिदानंद घन ब्रह्म वो अलग है। परम ब्रह्म

312
00:21:51,680 --> 00:21:56,000
अलग है। तो यहां ब्रह्म का अर्थ फिर मान लिया पूर्ण परमात्मा। अच्छा

313
00:21:56,000 --> 00:22:00,080
नाम दीक्षा से संशय कट जाते हैं। नाम दीक्षा

314
00:22:00,080 --> 00:22:04,800
मिलने से संशय कट जाते हैं। और

315
00:22:04,800 --> 00:22:08,960
इसी 5:25 में इसने कहा है नाम दीक्षा जिसको मिल जाती है उसके संशय कट

316
00:22:08,960 --> 00:22:13,120
जाते हैं। अब जरा सोच के देखो इनके जो सूखे हुए छुआारे जैसे चेहरे वाले लोग आते

317
00:22:13,120 --> 00:22:17,360
हैं चर्चा करने उनके संशय कट चुके हैं क्या? जो

318
00:22:17,360 --> 00:22:21,360
डडियल युवराज सिंह है और जो सचिन वगैरह हैं गंजा

319
00:22:21,360 --> 00:22:25,680
इन लोगों के संशय कट चुके हैं। क्यों नहीं आते पता है मेरे सामने? इनको मालूम

320
00:22:25,680 --> 00:22:29,680
है यह ऐसी ज्ञानार्थक कुटाई करेगा ना वह सब कोई काम नहीं आएगा

321
00:22:29,680 --> 00:22:34,400
पीछे गन मैन खड़े खड़े करना बिल्कुल ऐसी

322
00:22:34,400 --> 00:22:40,080
ज्ञानार्थक कुटाई कि रात में सोते समय भी मेरे सपने आएंगे

323
00:22:40,080 --> 00:22:44,240
कि वो कौन सा समय था बुरा जो मैंने ये सोच लिया कि मैं शिवाश नारायण द्विवेदी

324
00:22:44,240 --> 00:22:48,880
के सामने चला जाऊं वास्तविक सनातनी के सामने चला जाऊं

325
00:22:48,880 --> 00:22:53,280
इसलिए नहीं आते तो इनका संशय कट चुका है तो पवन दास से बात हुई थी

326
00:22:53,280 --> 00:22:54,240
बत्ती ही बाहर

327
00:22:54,240 --> 00:22:58,480
आ गई थी। संशय संशयात्मक प्रश्न है ना कि कबीर

328
00:22:58,480 --> 00:23:03,120
जब सृष्टि बना रहा है तो कहां खड़ा है? वो सृष्टि किसने बनाई

329
00:23:03,120 --> 00:23:07,200
तो फेल हो गए। फिर तो इस पर कहने लगे भैया ऐसा है आग लगा

330
00:23:07,200 --> 00:23:11,200
दूंगा उसमें देख लेंगे। जिसका परमेश्वर सत्य होगा वो यानी कि संशय

331
00:23:11,200 --> 00:23:15,200
नहीं कटे हैं। अब तो सीधे आस्था की बात है। संशय नहीं

332
00:23:15,200 --> 00:23:19,520
कटे तुम्हारे। ठीक है? तो तत्व

333
00:23:19,520 --> 00:23:23,520
ज्ञान की बात मत करो। तुम पंचल जोड़ो। पंच ज्ञान लोगों

334
00:23:23,520 --> 00:23:27,680
को दो अपना। तो यहां पर 5:25 में इसने कहा नाम दीक्षा

335
00:23:27,680 --> 00:23:31,760
से संशय कट जाते हैं। अच्छा इसी में इसने ये कहा है कि जो काल ब्रह्म

336
00:23:31,760 --> 00:23:36,000
है वो उग्र है। काल ब्रह्म तो उग्र उग्र

337
00:23:36,000 --> 00:23:40,000
है। उग्र। अच्छा ये उग्रता एक्सिस्ट कहां करती थी? काल

338
00:23:40,000 --> 00:23:44,160
ब्रह्म तो था नहीं इस दुनिया में। तो उग्रता भी नहीं थी। तो काल ब्रह्म

339
00:23:44,160 --> 00:23:48,240
निकल के कहां से आया है? किसने बनाया? काल

340
00:23:48,240 --> 00:23:52,640
ब्रह्म को। काल ब्रह्म को किसने बनाया? कबीर

341
00:23:52,640 --> 00:23:56,640
ने। तो कबीर के पास काल ब्रह्म नहीं था। यानी कि काल ब्रह्म जो जो चीजें

342
00:23:56,640 --> 00:24:00,720
कर रहा है वह कबीर के पास नहीं थी। अच्छा वो छोड़ो। काल ब्रह्म को जो शक्ति

343
00:24:00,720 --> 00:24:04,960
दी है उग्रता वाली यह कहां था? यह

344
00:24:04,960 --> 00:24:08,960
कहां था? किसने बनाया? काल ब्रह्म के पास अपने आप कुछ आ गया। यानी काल ब्रह्म अपने

345
00:24:08,960 --> 00:24:09,680
आप स्वयंभू

346
00:24:09,680 --> 00:24:13,120
है क्या?

347
00:24:13,120 --> 00:24:17,120
और उत्पत्ति, स्थिति और लय लय

348
00:24:17,120 --> 00:24:21,360
करने में उग्रता नहीं चाहिए। लय कैसे करोगे? प्रलय कैसे

349
00:24:21,360 --> 00:24:26,080
आएगी? सृष्टि समाप्त कैसे होगी? तुम्हारे यहां तो एक ही बार होती है।

350
00:24:26,080 --> 00:24:30,160
वह बात अलग है। काल ब्रह्म बार-बार बार-बार जन्म भी लेता रहता है।

351
00:24:30,160 --> 00:24:34,240
अरे भाई एक बार काल ब्रह्म ने जब गलती कर दी तो फिर क्यों बना रहे हो काल

352
00:24:34,240 --> 00:24:38,240
ब्रह्म को? कि 70 बार जब शिव जी शिव जी के प्राण छूट जाते

353
00:24:38,240 --> 00:24:42,400
हैं उसके बाद एक बार काल ब्रह्म का अंत होता है। तो फिर क्यों बनाता

354
00:24:42,400 --> 00:24:46,480
है कबीर? काल ब्रह्म और उसके मरने के बाद कहां ये लोग कहां जाते हैं? जो

355
00:24:46,480 --> 00:24:50,560
फंसे हुए हैं। उस बीच काल ब्रह्म के मरने से लेकर काल ब्रह्म

356
00:24:50,560 --> 00:24:54,960
के दोबारा जन्म होने के बीच में ये लोग कहां जाते हैं जो काल ब्रह्म ने फंसा रखे हैं।

357
00:24:54,960 --> 00:24:59,600
हम मुंह सूख जाएगा मुंह पांच

358
00:24:59,600 --> 00:25:03,680
26 के अर्थ में इसने कहा है कि परमात्मा इसने मान लिया परमात्मा पहले मान

359
00:25:03,680 --> 00:25:07,920
लिया सर्वव्यापक है। उसके बाद कहता है यानी

360
00:25:07,920 --> 00:25:12,160
उसकी सत्ता सब जगह है। अब यहां पर वही वाला प्रश्न फस जाएगा वह अब्रामिक

361
00:25:12,160 --> 00:25:16,240
आईडियोलॉजी वाला कि सत्ता और उसमें अगर अंतर होगा तो

362
00:25:16,240 --> 00:25:21,440
एक रस नहीं कहलाएगा विकार वाला हो जाएगा

363
00:25:21,440 --> 00:25:25,440
और उसकी यहां पे इसने चतुर ये तो एक

364
00:25:25,440 --> 00:25:29,520
अलग विषय मगर सत्ता जब मान ली तो उसने काल पर भी अपनी सत्ता मान ली

365
00:25:29,520 --> 00:25:33,760
5 26 में काल पर कबीर की सत्ता यानी काल

366
00:25:33,760 --> 00:25:37,840
जो भी कर रहा है जो भी सोच रहा है कुछ भी हो रहा है उस पर सत्ता है उसकी

367
00:25:37,840 --> 00:25:42,720
यानी उसकी अनुमति के सीमा के अंदर है काल ब्रह्म का कुछ भी।

368
00:25:42,720 --> 00:25:45,200
ठीक है?

369
00:25:45,200 --> 00:25:47,840
और

370
00:25:47,840 --> 00:25:51,920
वहीं पे काल को जो है मन कहा गया है। और यह

371
00:25:51,920 --> 00:25:56,080
कहा गया कि काल जो मन को जो जीत लेता है वह पार लग जाता है। तो काल को जीतना

372
00:25:56,080 --> 00:26:00,160
है क्या? क्योंकि मन तो काल है। काल

373
00:26:00,160 --> 00:26:06,160
से जीतेंगे कैसे? काल का तो वैसा घटिया स्वरूप है।

374
00:26:08,720 --> 00:26:12,720
फड़ पंचर ज्ञान पंचर करने वालों

375
00:26:12,720 --> 00:26:16,880
सीट की पेटी और कमर की बेल्ट बांध एक नंबर का

376
00:26:16,880 --> 00:26:20,880
फड़ ज्ञान है इस ज्ञान को सुनने समझने के लिए भी

377
00:26:20,880 --> 00:26:24,880
गुर्दा चाहिए गुर्दा अच्छा तो ये हो

378
00:26:24,880 --> 00:26:28,880
गई अभी तक अपनी मर्जी आगे चलते हैं अब जो है

379
00:26:28,880 --> 00:26:32,960
मेन कोर्स पे आ जाते हैं

380
00:26:32,960 --> 00:26:37,200
तो इसकी गरिमा गीता का पृष्ठ ये अभी तक बुलेट पॉइंट्स हो गए।

381
00:26:37,200 --> 00:26:39,920
ठीक है? बुलेट पॉइंट्स आप लोग कट कर करके डाला करिए।

382
00:26:39,920 --> 00:26:44,080
तो बुलेट पॉइंट्स हो गए अभी तक के। अब आ जाइए पष्ठ क्रमांक 102

383
00:26:44,080 --> 00:26:48,640
पर।

384
00:26:48,640 --> 00:26:50,880
हां,

385
00:26:50,880 --> 00:26:56,880
102 में चालू हो रहा है यह।

386
00:27:02,480 --> 00:27:06,480
अध्याय पांच के श्लोक एक में अर्जुन ने प्रश्न किया कि

387
00:27:06,480 --> 00:27:11,040
कर्म सन्यास और कर्म योग में कौन सा श्रेष्ठ है? ठीक है?

388
00:27:11,040 --> 00:27:15,200
हम लोग अपना भी पढ़ते जाएंगे। भगवत गीता जय दयाल गोविंद

389
00:27:15,200 --> 00:27:21,200
का जी की पढ़ रहा हूं मैं भगवत गीता गीता प्रेस की।

390
00:27:23,920 --> 00:27:28,000
अर्जुन बोले हे कृष्ण आप कर्मों के सन्यास की और फिर कर्म योग की

391
00:27:28,000 --> 00:27:32,160
प्रशंसा करते हैं। यह बात इसने पचा ली क्योंकि इसको

392
00:27:32,160 --> 00:27:36,240
अपने अनुसार चीजें फिट करनी है इसलिए ये चीजें काट दी इसने। क्यों नहीं बताता

393
00:27:36,240 --> 00:27:40,240
भाई? आप कर्मों की कर्मों के सन्यास की और फिर

394
00:27:40,240 --> 00:27:45,760
कर्म योग की प्रशंसा करते। कर्मों का सन्यास क्या कि कर्मों के प्रति

395
00:27:45,760 --> 00:27:49,840
मतलब कर्म से सन्यास लेना कर्म से निवृत्त हो जाना और

396
00:27:49,840 --> 00:27:54,000
फिर कर्म योग एक तो कर्मों से दूर रह के

397
00:27:54,000 --> 00:27:58,000
मुक्ति के पथ पर चलना और एक कर्म

398
00:27:58,000 --> 00:28:02,320
यानी ये समझ लीजिए गृहस्थ मान लीजिए इसको एक गृहस्थ संसार

399
00:28:02,320 --> 00:28:06,560
से दूर रह के मुक्ति के पथ पर चलना और एक गृहस्थ संसार में रह

400
00:28:06,560 --> 00:28:12,240
के मुक्ति के पथ पर चलना। ठीक है? जैसे सुखदेव जी को मान लीजिए

401
00:28:12,240 --> 00:28:17,600
सन्यास वाला मामला और जनक जी को मान लीजिए गृहस्थ वाला मामला।

402
00:28:17,600 --> 00:28:21,760
तो यहां पर कह रहे हैं अर्जुन जी कि आप कर्मों के सन्यास

403
00:28:21,760 --> 00:28:26,000
की और फिर कर्म योग की प्रशंसा करते हैं। इसलिए इन दोनों में से जो मेरे लिए श्रेष्ठ

404
00:28:26,000 --> 00:28:30,240
श्रेष्ठ है तो वो आप मुझे बताइए। मैं पहले

405
00:28:30,240 --> 00:28:34,400
अभी अपना वाला जो है पूरा बता दे रहा हूं आपको। गीता क्या कह रही है? वास्तविक

406
00:28:34,400 --> 00:28:38,720
रूप में गीता क्या कह रही है? तो फिर भगवान कह रहे हैं कि कर्म

407
00:28:38,720 --> 00:28:39,280
सन्यास

408
00:28:39,280 --> 00:28:43,360
और कर्म योग यह दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं।

409
00:28:43,360 --> 00:28:47,440
परंतु उन दोनों में से भी कर्म सन्यास से कर्म

410
00:28:47,440 --> 00:28:52,320
योग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है। मतलब

411
00:28:52,320 --> 00:28:56,960
पहली बात तो यह है कि इस कर्म सन्यास क्या है?

412
00:28:56,960 --> 00:29:01,040
कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं। इस प्रकार

413
00:29:01,040 --> 00:29:05,360
से कर्म होते हुए उनको साक्षी भाव से देखना और उसमें कर्तापन

414
00:29:05,360 --> 00:29:09,520
ना रखना। यानी कि अद्वैत सिद्धांत को धारण करते हुए

415
00:29:09,520 --> 00:29:12,800
जब व्यक्ति कर्म

416
00:29:12,800 --> 00:29:17,040
व्यवहार करता है तो वह हो गया कर्म सन्यास। ठीक है?

417
00:29:17,040 --> 00:29:21,040
और एक होता है द्वैत भाव को रखते हुए जिसमें जिसमें वो यह सोचता है

418
00:29:21,040 --> 00:29:25,200
कि मैं कर्म तो मैं ही कर रहा हूं। कर्तापन अपने को मानता है। परंतु वह यह

419
00:29:25,200 --> 00:29:29,200
सोच करके करता है कर्म कि मैं यह कर्म भगवान के लिए कर रहा

420
00:29:29,200 --> 00:29:33,280
हूं। अनासक्त होकर के कर्म करता है कि मुझे उनका फल नहीं चाहिए।

421
00:29:33,280 --> 00:29:37,360
तो फल ना चाहने के रूप में भगवान को अर्पित करते हुए कर्म करने के रूप में

422
00:29:37,360 --> 00:29:41,760
वो हो गया कर्म योगी और

423
00:29:41,760 --> 00:29:46,000
यह सोचते हुए कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं। साक्षी भाव से अपने

424
00:29:46,000 --> 00:29:50,640
कर्मों को देखना यह हो गया कर्म सन्यासी।

425
00:29:50,640 --> 00:29:54,880
द्वैत भाव वाला कर्म योगी और अद्वैत भाव वाला कर्म सन्यासी।

426
00:29:54,880 --> 00:29:58,320
तो इसमें आगे

427
00:29:58,320 --> 00:30:02,320
आगे चल रहा है कि साधन में सुगम। अब क्या

428
00:30:02,320 --> 00:30:06,480
है यह वाली बात कि ऐसा सोच पाना कठिन होता है कि मैं नहीं

429
00:30:06,480 --> 00:30:10,480
कर रहा हूं। तो यह वाली बात कठिन होती है। सन्यासत्व आ जाए।

430
00:30:10,480 --> 00:30:14,560
है ना? विरक्तता तो मुझे भूख लग रही

431
00:30:14,560 --> 00:30:18,640
है या बहुत सारी इंद्र इंद्रिय विषय हैं। उन सबका पर्यावसान आप भगवान

432
00:30:18,640 --> 00:30:22,720
के चरणों को बना दो। तो ये हो गया द्वैत कि मेरा जो भी कर्म है भगवान के लिए

433
00:30:22,720 --> 00:30:27,280
है। ठीक है? और एक केवल साक्षी भाव से देखना

434
00:30:27,280 --> 00:30:31,280
देख पाना उसको और ज्यादातर कर्मों से निवृत्त हो जाना

435
00:30:31,280 --> 00:30:35,360
यह हो गया द्वैत भाव। तो यह थोड़ा कठिन होता है।

436
00:30:35,360 --> 00:30:39,360
इसलिए साधन में सुगम होने के कारण यह जो है गृहस्थ संसार

437
00:30:39,360 --> 00:30:43,440
से होते हुए निकलना मुक्ति के पथ पर चलना उसके

438
00:30:43,440 --> 00:30:47,680
आगे की स्टेज में वह आना ही है सन्यास वो भी बात है।

439
00:30:47,680 --> 00:30:51,760
तो डायरेक्ट सन्यास की ओर जाना वह कठिन है। ठीक है? तो यहां पर

440
00:30:51,760 --> 00:30:55,840
यह कहा जा रहा है। इसके बाद चार में कह रही है

441
00:30:55,840 --> 00:31:00,080
गीता कि उपयुक्त सन्यास और कर्म योग को मूर्ख लोग पथक पथक

442
00:31:00,080 --> 00:31:04,160
फल देने वाला कहते हैं ना कि पंडित जन। तो मूर्ख होते हैं जो अलग-अलग फल

443
00:31:04,160 --> 00:31:08,560
देने वाला कहते हैं। कठिन है जो वाला सन्यास है कर्म सन्यास

444
00:31:08,560 --> 00:31:13,200
वह कठिन जरूर है मगर अलग-अलग फल देने वाला

445
00:31:13,200 --> 00:31:13,700
है।

446
00:31:13,520 --> 00:31:17,680
यह ऐसा सोचना गलत है क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक प्रकार से

447
00:31:17,680 --> 00:31:22,160
स्थित पुरुष दोनों के फल स्वरूप परमात्मा को ही प्राप्त होता है। सन्यास

448
00:31:22,160 --> 00:31:26,320
का मार्ग भी वास्तविकता में तत्व बोध

449
00:31:26,320 --> 00:31:30,480
ज्ञान प्राप्ति है और इसमें भी आगे जाकर के ज्ञान प्राप्ति है। इसमें भी आगे जाकर

450
00:31:30,480 --> 00:31:34,560
के विरक्तता आएगी ही दोनों में। यह हमारी गीता कह रही है।

451
00:31:34,560 --> 00:31:38,880
अच्छा अब यह क्या कह रहा है? अब देखो इसका कचरा

452
00:31:38,880 --> 00:31:42,960
इसका कचरा अब चालू होगा। यह क्या कह रहा है? अब पहले इसने कर्म

453
00:31:42,960 --> 00:31:47,360
सन्यास का विवरण दिया है। कर्म सन्यास क्या है? कर्म सन्यास दो प्रकार का होता है।

454
00:31:47,360 --> 00:31:51,520
एक तो सन्यास वह होता है जिसमें साधक परमात्मा की प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर घर

455
00:31:51,520 --> 00:31:56,240
त्याग कर हटके जंगल में बैठ जाता है। विरक्तता तथा

456
00:31:56,240 --> 00:32:00,320
शास्त्र विधि रहित साधना करता है। दूसरा घर पर रहते

457
00:32:00,320 --> 00:32:04,480
हुए भी हठ योग करके घंटों एक स्थान पर बैठकर शास्त्र विधि त्याग

458
00:32:04,480 --> 00:32:09,040
कर साधना करता है। यह दोनों ही कर्म सन्यासी

459
00:32:09,040 --> 00:32:14,000
कर्म सन्यासी हैं। मतलब अब इसने क्या किया कि

460
00:32:14,000 --> 00:32:18,240
घर पर रहते हुए वाले को अगर वह हठ योग कर रहा है

461
00:32:18,240 --> 00:32:22,320
तो हठ पहली बात तो यह है कि प्रयास पूर्वक

462
00:32:22,320 --> 00:32:26,400
अपनी इंद्रियों को कंट्रोल करने का प्रयास नहीं किया करना चाहिए। इसके हिसाब

463
00:32:26,400 --> 00:32:30,720
से तो इस मैंने इस ये वाला जो एपिसोड है इसका नाम क्यों रखा है कि रामपाल

464
00:32:30,720 --> 00:32:34,960
का ग्रस्त संसार तो रामपाल का जो कहना है कि

465
00:32:34,960 --> 00:32:38,960
हठ पूर्वक अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं करना चाहिए इसकी निंदा कर रहा है

466
00:32:38,960 --> 00:32:43,040
कुल मिलाकर के इसने कई जगह की है छठवें अध्याय में भी की है

467
00:32:43,040 --> 00:32:47,360
तो इसका मतलब यह है कि अगर यह किसी स्त्री के प्रति आसक्त होता है

468
00:32:47,360 --> 00:32:52,480
रामपाल तो यह अपने आप को जबरदस्ती नहीं रोकता

469
00:32:52,480 --> 00:32:56,640
ठीक है और इनके जितने लोग हैं चुवा भगत

470
00:32:56,640 --> 00:33:00,960
वो सब अगर किसी स्त्री के प्रति या मदिरापान के प्रति या किसी भी दुर्वसन

471
00:33:00,960 --> 00:33:05,040
के प्रति आसक्त होते हैं तो वो अपने ऊपर कंट्रोल नहीं करते नहीं

472
00:33:05,040 --> 00:33:09,120
कंट्रोल करो वो प्रयास पूर्वक अपने आप को नहीं रोकते हो गए

473
00:33:09,120 --> 00:33:13,760
आसक्त तो हो गए लट्टू बबिता पे बबिता पे लट्टू हो गए तो हो गए

474
00:33:13,760 --> 00:33:17,840
अगर अखबार में छपी खबर के अनुसार गुदा द्वार से बहकर आने वाले दूध की खीर

475
00:33:17,840 --> 00:33:22,000
खाने के लिए आसक्त हो गए तो हो गए अब रोकेंगे नहीं नहीं नहीं खीर नहीं खानी

476
00:33:22,000 --> 00:33:24,080
है भाई यह कैसे मल मल

477
00:33:24,080 --> 00:33:28,080
त्याग का जो द्वार वहां से बह के दूध आ रहा है। उसकी खीर बन रही है। तो नहीं नहीं

478
00:33:28,080 --> 00:33:32,240
आसक्त हो गए तो हो गए। तो यह लोग रोकेंगे नहीं क्योंकि हठ योग इनके यहां पर निषेध

479
00:33:32,240 --> 00:33:36,960
है। ठीक है? तो पहली बात तो यह हो गई।

480
00:33:36,960 --> 00:33:39,520
फिर आगे यह कह रहा है कर्म योग का विवरण क्या है?

481
00:33:39,520 --> 00:33:43,520
यह भी दो प्रकार का होता है। एक तो बाल बच्चों सहित सांसारिक कार्य करता

482
00:33:43,520 --> 00:33:47,680
हुआ शास्त्र विधि अनुसार भक्ति साधना करता है या शादी ना करवा

483
00:33:47,680 --> 00:33:51,760
करवा शादी ना करवा करके घर पर या किसी आश्रम में

484
00:33:51,760 --> 00:33:55,840
रहता हुआ सांसारिक कर्म अथवा अर्थात सेवा करता हुआ

485
00:33:55,840 --> 00:33:58,640
शास्त्र विधि अनुसार साधना करता है। तो

486
00:33:58,640 --> 00:34:02,960
इसने क्या किया? कर्म सन्यास को शास्त्र

487
00:34:02,960 --> 00:34:07,120
विरुद्ध बता दिया। ठीक है? कर्म सन्यास को शास्त्र

488
00:34:07,120 --> 00:34:11,280
विरुद्ध बता दिया कि जो शास्त्र विरुद्ध तरीके से करता है

489
00:34:11,280 --> 00:34:15,360
वह कर्म सन्यास है और जो शास्त्र सम्मत तरीके से

490
00:34:15,360 --> 00:34:19,360
करता है वो कर्म योग है। ठीक है? समझ रहे हैं ना?

491
00:34:19,360 --> 00:34:23,520
उसमें कर्म सन्यास में गृहस्थ भी है और विरक्त भी है।

492
00:34:23,520 --> 00:34:27,760
और इधर कर्म योग में गृहस्थ भी है और विरक्त भी। जबकि गृहस्थ क्या है? कर्म

493
00:34:27,760 --> 00:34:31,840
योग और विरक्त क्या है? कर्म सन्यास।

494
00:34:31,840 --> 00:34:36,000
दूसरी प्रकार अच्छा एक कर्म योगी इसने यह भी माने जो बाल बच्चों में रहते

495
00:34:36,000 --> 00:34:40,160
हैं तथा शास्त्र तथा साधना शास्त्र विधि

496
00:34:40,160 --> 00:34:43,440
विरुद्ध करते हैं या शादी ना करवाकर किसी अब

497
00:34:43,440 --> 00:34:47,520
यह देखो पंचर करने वाली बातें क्या है इसने कर्म सन्यास

498
00:34:47,520 --> 00:34:51,520
में शास्त्र विरुद्ध चीजों को ले लिया कि वो जंगल

499
00:34:51,520 --> 00:34:55,600
में जाकर रहेंगे घर त्याग कर रहेंगे शास्त्र विधि के विरुद्ध करेंगे वो कर्म

500
00:34:55,600 --> 00:34:59,600
सन्यास है ठीक है इसने यह मान लिया इसके बाद इसने यह

501
00:34:59,600 --> 00:35:04,000
भी कह दिया के घर में रह के हठ पूर्वक अपनी इंद्रियों को कंट्रोल करेंगे।

502
00:35:04,000 --> 00:35:08,320
वह भी संयमित रह के जीवन जिएंगे।

503
00:35:08,320 --> 00:35:12,560
शास्त्र विधि के विरुद्ध वो भी कर्म सन्यास है। यानी कि यह जो शास्त्र विधि

504
00:35:12,560 --> 00:35:16,560
के विरुद्ध इसने यह कह दिया कि इसको कहते हैं कर्म सन्यास। भले ही

505
00:35:16,560 --> 00:35:20,720
वो विरक्त होकर के रहे या फिर गृहस्थ होकर के। उसके बाद कर्म

506
00:35:20,720 --> 00:35:25,040
योगी की व्याख्या बता दी कि जो शास्त्र विधि के अनुसार चाहे विरक्त

507
00:35:25,040 --> 00:35:29,040
हो करके रहे चाहे गृहस्थ होकर के रहे वह कर्म योगी है। मगर फिर कर्म

508
00:35:29,040 --> 00:35:33,600
योगी को भी यह बता रहा है कि यदि यदि कोई व्यक्ति

509
00:35:33,600 --> 00:35:37,680
गृहस्थ होकर के या गृहस्थ होकर के या

510
00:35:37,680 --> 00:35:41,760
विरक्त हो के शास्त्र विधि के विरुद्ध अगर करेगा वो भी

511
00:35:41,760 --> 00:35:46,000
कर्म योगी कहलाता है। अरे दिमाग पंचर वाले फिर तूने कर्म सन्यास

512
00:35:46,000 --> 00:35:50,000
को क्या कहा है? फिर फिर कर्म सन्यास में कर्म योगी में अंतर क्या रह गया

513
00:35:50,000 --> 00:35:54,000
पंचर दिमाग वाले इसलिए कहता हूं आप लोगों से कि

514
00:35:54,000 --> 00:35:58,560
यह सीरीज जिसको भी सुननी समझनी है वो अपने

515
00:35:58,560 --> 00:36:02,640
झंडू बाम इत्यादि लेकर के बैठे इसी से ले आओ कोई सर

516
00:36:02,640 --> 00:36:06,800
दर्द का कोई बाम इत्यादि इसने बनाया हो अपने यहां वो बढ़िया बनाया होगा इसने

517
00:36:06,800 --> 00:36:10,960
झंडू तो है ही है तो बाम बनाने में क्या दिक्कत है तो झंडू

518
00:36:10,960 --> 00:36:15,040
बाम लेके बैठा करो इसने शास्त्र विधि के विरुद्ध

519
00:36:15,040 --> 00:36:19,040
चीजें करना गस्त और विरक्त दोनों को कर्म सन्यास का नाम

520
00:36:19,040 --> 00:36:23,120
दे दिया और शास्त्र विधि के अनुसार गृहस्थ या विरक्त दोनों को कर्म

521
00:36:23,120 --> 00:36:27,280
योगी नाम दे दिया। फिर कर्म योगी में भी लिख दिया कि वो वो भी कर्म योगी

522
00:36:27,280 --> 00:36:31,280
कहलाता है जो शास्त्र विधि के विरुद्ध जाकर के यह दोनों चीजें करता है। गस्त हो या

523
00:36:31,280 --> 00:36:35,280
विरक्त पागल है पागल और इसके द्वारा वो

524
00:36:35,280 --> 00:36:40,240
तत्व ज्ञान प्राप्त करने वाले सूखे मुके छुआारे वो भी पागल है।

525
00:36:40,240 --> 00:36:44,320
आगे चलते हैं। अब ये कह रहा है

526
00:36:44,320 --> 00:36:48,320
कि कर्म सन्यासी से कर्म योगी उत्तम है।

527
00:36:48,320 --> 00:36:52,560
वहां वह कह रहे हैं कि साधन में सुगम होने के कारण श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें

528
00:36:52,560 --> 00:36:56,880
जाना सरल है। गृहस्थ होते हुए पार करना नदी को क्योंकि

529
00:36:56,880 --> 00:37:01,040
हमारी इंद्रियां हमें खींचती है ना तो गृहस्थ आश्रम

530
00:37:01,040 --> 00:37:05,200
से होते हुए जाना उनको धर्म के द्वारा संयमित रहते

531
00:37:05,200 --> 00:37:09,200
हुए निकलना वहां से वह ज्यादा सुगम होता है। तो वो इसलिए सुगमता के

532
00:37:09,200 --> 00:37:13,200
कारण एक नंबर ज्यादा है। फल दोनों का सेम है। यदि किसी के जीवन

533
00:37:13,200 --> 00:37:13,840
में स्वतः

534
00:37:13,840 --> 00:37:18,320
विरक्तता आ रही है तो वो उसका मोस्ट वेलकम है। अगर हठ

535
00:37:18,320 --> 00:37:22,400
पूर्वक विरक्तता लेकर के वो छोड़ गई मुझे अब मैं मुझे संसार

536
00:37:22,400 --> 00:37:26,400
से कोई लाभ नहीं मैं जा रहा हूं तो अगर ऐसी चीजों के लिए कर

537
00:37:26,400 --> 00:37:30,400
रहा है तो यह जो है वो विरक्तता नहीं है जो उसके

538
00:37:30,400 --> 00:37:34,400
स्वभाव से उत्पन्न हो गई खैर तो अब

539
00:37:34,400 --> 00:37:40,400
ये पांच एक का

540
00:37:41,920 --> 00:37:46,400
अब ये जो है

541
00:37:46,400 --> 00:37:50,560
पांच एक का इसने अनुवाद कर दिया

542
00:37:50,560 --> 00:37:55,280
और केवल हिंदी में लिखा है

543
00:37:55,280 --> 00:37:59,280
कि एक ओर तो कर्मों के सन्यास के महिमा मंडन कर रहे हैं। दूसरी

544
00:37:59,280 --> 00:38:03,440
ओर कर्म के योग यानी कर्म के कर्मों के संयोग की अर्थात कर्म करने

545
00:38:03,440 --> 00:38:07,440
की प्रशंसा कर रहे हैं। इन दोनों में से जो एक मेरे लिए कल्याणकारक हो

546
00:38:07,440 --> 00:38:11,440
वह सुनिश्चित करिए। अब पांच दो पे आते हैं। पांच दो

547
00:38:11,440 --> 00:38:15,440
पे अब ये क्या कह रहा है? पांच एक का उसने सही

548
00:38:15,440 --> 00:38:20,320
कर दिया। हम लोग ये जो पहले देख रहे थे ना कि भाई इसने बात नहीं की है

549
00:38:20,320 --> 00:38:24,640
सन्यास से सन्यास की प्रशंसा और फिर कर्म योग

550
00:38:24,640 --> 00:38:29,040
की प्रशंसा कर्म सन्यास की प्रशंसा फिर कर्म योग की प्रशंसा

551
00:38:29,040 --> 00:38:33,040
दोनों यानी एक तरीके से गृहस्थ और विरक्त दोनों की प्रशंसा तो वो

552
00:38:33,040 --> 00:38:37,200
इसने बाद में अनुवाद किया है। ठीक है? फिर अब ये पांच

553
00:38:37,200 --> 00:38:41,280
दो के अर्थ में क्या कह रहा है? गीता अध्याय पांच श्लोक दो का भावार्थ है कि

554
00:38:41,280 --> 00:38:45,440
तत्वदर्शी संत के अभाव में जो शास्त्र अब ये

555
00:38:45,440 --> 00:38:50,080
यहां पर अनुवाद तो किया ही नहीं है इसने पांच दो का सीधे

556
00:38:50,080 --> 00:38:54,240
अनुवाद तथा भावार्थ मिक्स कर दिया क्योंकि यहां पर अनुवाद

557
00:38:54,240 --> 00:38:58,240
में क्या करेगा शब्दार्थ तो कर नहीं पाएगा वो तो इसके बिल्कुल उलट है

558
00:38:58,240 --> 00:39:02,080
तो फिर इसने क्या कर दिया कि

559
00:39:02,080 --> 00:39:06,480
तत्वदशी तत्वदर्शी संत के अभाव से जो शास्त्र विरुद्ध साधक

560
00:39:06,480 --> 00:39:12,000
है वह दो प्रकार के हैं एक तो कर्म ब्रह्म सन्यासी

561
00:39:12,000 --> 00:39:16,320
और दूसरे कर्म योगी दोनों की साधना अमंगलकारी

562
00:39:16,320 --> 00:39:20,480
है। ना करने वाली अर्थात व्यर्थ है। क्योंकि गीता अध्याय

563
00:39:20,480 --> 00:39:24,480
16 23 अरे भाई तू यहां पर पहले पांच दो का हिंदी

564
00:39:24,480 --> 00:39:28,640
अनुवाद तो कर। इसमें ये सब बातें तो आए ना करने योग्य है।

565
00:39:28,640 --> 00:39:32,720
यह है फलाना ढिमका है। या तो ये कह दे ये श्लोक प्रक्षिप्त है। या

566
00:39:32,720 --> 00:39:37,440
तो ये कह दे काल ने अपने मन से बोला। मगर कितने श्लोकों को कहेगा?

567
00:39:37,440 --> 00:39:41,600
इसलिए हर जगह दूसरी चीजें लाने ला के और

568
00:39:41,600 --> 00:39:46,400
जो यहां की चीज है उसको मिटाने की कोशिश करता है कि कितने श्लोकों को मैं डिनाई करूंगा।

569
00:39:46,400 --> 00:39:50,400
यहां पर ऐसी कोई त्यागने की बात हो ही नहीं रही है। पांच दो में पांच

570
00:39:50,400 --> 00:39:54,880
दो में भगवान तो यह कह रहे हैं कि कर्म सन्यास और कर्म योग दोनों ही परम कल्याण को

571
00:39:54,880 --> 00:39:58,960
परम कल्याण के करने वाले हैं। परंतु उन दोनों में से भी कर्म सन्यास सन्यास

572
00:39:58,960 --> 00:40:02,960
श्रेष्ठ है। साधन में सुगम होने की वजह से। इसमें कहां आ गया कि

573
00:40:02,960 --> 00:40:06,960
इनको नहीं करना इनको नहीं करना है। अगर 16 23 के आधार पर काटना है

574
00:40:06,960 --> 00:40:10,960
तो तू यह कहना है श्लोक गलत है। मगर दिमाग को

575
00:40:10,960 --> 00:40:15,360
पंचर करने वाला ज्ञान फड़ ज्ञान फड़ ज्ञानी जेल कट्टू

576
00:40:15,360 --> 00:40:17,280
वो ऐसा क्यों करेंगे?

577
00:40:17,280 --> 00:40:21,520
है ना? तो क्या कह रहा है कि क्योंकि गीता अध्याय

578
00:40:21,520 --> 00:40:25,520
16 23 में कहा है कि शास्त्र विधि को त्याग कर जो मनमाना आचरण अर्थात पूजा करते

579
00:40:25,520 --> 00:40:29,520
हैं उनको लाभ नहीं होगा। 24 में कहा है कि पूर्ण मोक्ष के लिए जो साधना

580
00:40:29,520 --> 00:40:30,160
त्यागने की

581
00:40:30,160 --> 00:40:34,320
है अर्थात ना करने वाली है तथा जो करने वाली है उनके

582
00:40:34,320 --> 00:40:38,160
लिए शास्त्रों को ही प्रमाण मानना चाहिए।

583
00:40:38,160 --> 00:40:39,120
तो

584
00:40:39,120 --> 00:40:43,200
यह यह जो बताया जा रहा है कर्म सन्यास और कर्म

585
00:40:43,200 --> 00:40:47,440
योगी यह कट कहां से गया जो इसको प्रमाण ना माने

586
00:40:47,440 --> 00:40:51,600
कहां से कट गया वो कटने की बात इसने नहीं कही है कि क्यों कट

587
00:40:51,600 --> 00:40:55,600
गया और यहां पर वो वाला प्रश्न आता है कि जब गीता

588
00:40:55,600 --> 00:40:59,760
इन साधनाओं को काटने की बात कर रही है ब्रह्मा विष्णु महेश

589
00:40:59,760 --> 00:41:04,000
के निषेध कर रही है गीता पुराण भी निषेध कर रहे हैं वेद भी निषेध कर रहे हैं

590
00:41:04,000 --> 00:41:08,160
तो ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा आई कहां से एकिस्ट में

591
00:41:08,160 --> 00:41:13,680
कहां किसने किस कारण पर

592
00:41:13,680 --> 00:41:19,680
चालू किया करना ये भी सोचने वाली बात है

593
00:41:19,920 --> 00:41:24,160
ठीक है आगे चलते हैं क्योंकि इसने बार-बार हमारे शास्त्रों में यही बताया

594
00:41:24,160 --> 00:41:28,320
है ये नहीं करना ये नहीं करना है वो नहीं करना है इसका मतलब ये शास्त्र

595
00:41:28,320 --> 00:41:32,640
इस रूप में लिखे गए हैं कि ये ये नहीं करना है तो इन जिन

596
00:41:32,640 --> 00:41:36,720
चीजों को ना करने की बात शास्त्र कर रहे हैं वो चीजें एकिस्टेंस इसमें आई

597
00:41:36,720 --> 00:41:41,040
कहां से? अस्तित्व में कैसे आई है पूजा? और उसका प्रमाण क्या है?

598
00:41:41,040 --> 00:41:45,520
तो तुम करोगे ठेंगा। तुम्हारे पास है ठेंगा।

599
00:41:45,520 --> 00:41:49,760
अब इसने आगे उदाहरण दिए हैं कुछ तो मैं एक आध उदाहरण लूंगा

600
00:41:49,760 --> 00:41:54,960
और फिर सीधे इसकी जो इसने मक्कारी की है गीता का अर्थ करने में

601
00:41:54,960 --> 00:41:59,920
उस मक्कारी पे आ जाऊंगा। पृष्ठ संख्या 108 निकालिए आप।

602
00:41:59,920 --> 00:42:04,080
अब इसने बार-बार यही बताया कि जो सन्यास है वो बेकार है। व्यर्थ की

603
00:42:04,080 --> 00:42:08,320
चीज है। यानी सन्यास नहीं होना चाहिए। जबकि गीता में भरभर के सन्यासी है मगर सन्यास

604
00:42:08,320 --> 00:42:12,640
नहीं होना चाहिए और फिर कहीं-कहीं पर मान मिलेगा सन्यास होना चाहिए। जैसे कर्म

605
00:42:12,640 --> 00:42:16,640
योगी की व्याख्या करते हुए मान लिया कि शास्त्र विधि के अनुसार यदि सन्यास है तो वो

606
00:42:16,640 --> 00:42:21,840
ठीक है। फिर कर्म योगी की व्याख्या करते हुए मान लिया कि

607
00:42:21,840 --> 00:42:25,920
यदि आप शास्त्र विधि के विरुद्ध जाकर के भी सन्यासी हो रहे हो

608
00:42:25,920 --> 00:42:31,200
तो भी आप कर्म योगी कहलाओगे। पागल व्यक्ति है। पागल

609
00:42:31,200 --> 00:42:35,680
हां अब

610
00:42:35,680 --> 00:42:36,560
इसने

611
00:42:36,560 --> 00:42:40,400
पांच अध्याय के पांच

612
00:42:40,400 --> 00:42:44,480
श्लोक तीन के शास्त्र में ये कह रहा है हिंदी कर

613
00:42:44,480 --> 00:42:47,360
रहा है नीचे है भावार्थ हां इस

614
00:42:47,360 --> 00:42:51,440
अध्याय पांच श्लोक तीन में शास्त्र विधि अनुसार साधना

615
00:42:51,440 --> 00:42:55,760
करने वाले कर्म योगी का विवरण है जो श्रद्धालु भक्त चाहे

616
00:42:55,760 --> 00:42:59,760
बाल बच्चों सहित है या बाल बच्चों सह रहित है या किसी आश्रम में

617
00:42:59,760 --> 00:43:01,920
रहकर सतगुरु व संगत की सेवा में रत

618
00:43:01,920 --> 00:43:05,920
है वह सर्वथा राग राग द्वेष रहित होता है। वो बात

619
00:43:05,920 --> 00:43:10,080
और है कि इनके यहां जो है फिर डंडे चलते हैं। फिर गन मैन लेकर

620
00:43:10,080 --> 00:43:14,320
खड़े होते हैं। राग द्वेष रहित होते हैं। ये क्योंकि वह सेवा

621
00:43:14,320 --> 00:43:18,560
कर रहे हैं वहां पर गन मैन के साथ। अच्छा किसी आश्रम

622
00:43:18,560 --> 00:43:19,120
में सद्गुरु

623
00:43:19,120 --> 00:43:23,280
व संगत की सेवा में रत है। वह सर्वथा राग द्वेष रहित होता है। वास्तव में वही

624
00:43:23,280 --> 00:43:24,000
सन्यासी है।

625
00:43:24,000 --> 00:43:28,080
वो सन्यासी हो गया। ठीक है भाई हो गया। वही फिर अन्य शास्त्र

626
00:43:28,080 --> 00:43:32,800
साधकों को पूर्ण निश्चय के साथ सत्य साधना ज्ञान बताता है।

627
00:43:32,800 --> 00:43:37,440
जबकि हमारी जो वास्तविक अर्थ है वह क्या बता रहा है

628
00:43:37,440 --> 00:43:41,520
कि जो पुरुष ना किसी से द्वेष करता है ना किसी की आकांक्षा करता है वह

629
00:43:41,520 --> 00:43:45,600
कर्म योगी सदा सन्यासी ही समझने योग्य है। अब यहां पे यह

630
00:43:45,600 --> 00:43:49,680
जो सन्यासी है यह किस प्रकार का सन्यासी है? जो द्वैत भाव में

631
00:43:49,680 --> 00:43:53,680
रहते हुए भी जो कर्म कर रहा है और उसमें अपने आप को कर्ता

632
00:43:53,680 --> 00:43:57,840
मान रहा है उससे मिलने वाले फल के प्रति

633
00:43:57,840 --> 00:44:02,240
अनासक्त है इसलिए वह सन्यासी सन्यासी ही मानने योग्य

634
00:44:02,240 --> 00:44:06,240
तो यहां उस रूप में सन्यासी कहा गया क्योंकि राग द्वेष आदि द्वंदों से रहित पुरुष

635
00:44:06,240 --> 00:44:12,240
सुख पूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। ठीक है?

636
00:44:12,560 --> 00:44:17,840
तो यहां पर इसने कर दिया कि

637
00:44:17,840 --> 00:44:22,480
या तो वह सहित रहे या रहित रहे, ग्रस्त रहे या विरक्त रहे।

638
00:44:22,480 --> 00:44:26,480
जंगल वाला तो बिल्कुल काट दिया इसने। जंगल वाला नहीं या तो

639
00:44:26,480 --> 00:44:30,720
अपना नौकरी करके कमा के मुझे लाके देते रहो और या फिर मेरे आश्रम

640
00:44:30,720 --> 00:44:34,800
में सेवा करो। ये दो चीजें कर सकते हैं। रामपाल के भगत जंगल में जाके वो

641
00:44:34,800 --> 00:44:38,880
नहीं करना है। तप वो मत करना। ठीक है? और

642
00:44:38,880 --> 00:44:42,960
प्रसन्न इनका भगवान उसी पे होता है जो सब कुछ छोड़ के तप करता है। जैसे उसने किया था

643
00:44:42,960 --> 00:44:47,120
इनके काल ने। उसने तप किया तो उसको दे दिए फलाने ब्रह्मांड फलाने

644
00:44:47,120 --> 00:44:51,200
ब्रह्मांड यह दे दिया उसके बाद इन रामपालियों का

645
00:44:51,200 --> 00:44:55,200
कोई ऐसा बाप नहीं है जो किसी भक्त को ऐसी चीज दे पाया हो

646
00:44:55,200 --> 00:44:59,280
जो उसको मिली थी काल को तप करने पर सब कुछ छोड़ के तप

647
00:44:59,280 --> 00:45:03,440
करने पर है ना इन्हीं के अनुसार ठोको ताली

648
00:45:03,440 --> 00:45:07,520
खैर अब अध्याय पांच के श्लोक

649
00:45:07,520 --> 00:45:11,600
चार में ज्ञान योगी व गृहस्ती दोनों की एक ही उपलब्धि बताई है

650
00:45:11,600 --> 00:45:12,100
यदि

651
00:45:11,760 --> 00:45:15,840
कोई कहता है कि ज्ञान योगी श्रेष्ठ या गृहस्ती श्रेष्ठ है। वह

652
00:45:15,840 --> 00:45:19,920
पंडित नहीं है। यदि दोनों की भक्ति शास्त्र अनुकूल है तथा

653
00:45:19,920 --> 00:45:24,080
गुरु मर्यादा में रहते हैं तो दोनों ही सफल है। यदि भक्ति शास्त्र विधि

654
00:45:24,080 --> 00:45:28,480
अनुसार नहीं है तो वह चाहे गस्ती है या ज्ञान योगी है दोनों ही असफल

655
00:45:28,480 --> 00:45:30,640
है।

656
00:45:30,640 --> 00:45:35,120
स्वयं भगवान कह रहे हैं। वैसे यह खुद कह रहा है। तो

657
00:45:35,120 --> 00:45:39,440
रामपाल की गीता में प्रमाण है भगवान श्री कृष्ण भगवान है।

658
00:45:39,440 --> 00:45:43,600
ठीक है? स्वयं भगवान कह रहे हैं कि शास्त्र विधि रहित

659
00:45:43,600 --> 00:45:46,880
साधक कर्म सन्यासियों से कर्म योगी

660
00:45:46,880 --> 00:45:51,120
गस्ती उत्तम है। अब यहां पर इसने क्या माना है? देखो इसका

661
00:45:51,120 --> 00:45:55,120
पंचर कर देने वाला ज्ञान नोट करना। अध्याय

662
00:45:55,120 --> 00:45:59,440
पांच के श्लोक चार में इसने ठीक ठीक अनुवाद कर लिया है। थोड़ा सा मिक्स

663
00:45:59,440 --> 00:46:04,000
किया है कि चाहे वह गृहस्थ हो

664
00:46:04,000 --> 00:46:08,240
या विरक्त हो। ठीक है? ज्ञान योगी हो या कर्म

665
00:46:08,240 --> 00:46:12,320
योगी हो। दोनों की भक्ति शास्त्रानुकूल है। हालांकि यह

666
00:46:12,320 --> 00:46:16,320
चीज नहीं यह शास्त्रानुकूल शास्त्रानुकूल इसलिए कहता है कि वह मेरी वाली चीज

667
00:46:16,320 --> 00:46:20,560
अपाइड हो जाए। मगर चलो ले लेते शास्त्रानुकूल तथा गुरु

668
00:46:20,560 --> 00:46:24,640
गुरु मर्यादा में रहते हुए दोनों ही सफल है। यह तो हम भी मानते हैं भाई कि जो

669
00:46:24,640 --> 00:46:28,640
परंपरा प्राप्त आचार्यों द्वारा बताई गई चीजें हैं उनके उनके

670
00:46:28,640 --> 00:46:32,800
साथ में जब आप गृहस्थ या विरक्त हैं तब जो है आप आपके

671
00:46:32,800 --> 00:46:36,800
लिए फलदाई है। मगर इसने क्या किया यहां पर

672
00:46:36,800 --> 00:46:42,800
लगभग लगभग अनुवाद वैसा ही माना जो अनुवाद उसका होना चाहिए।

673
00:46:43,600 --> 00:46:47,600
फिर जो है मगर आगे इसने क्या किया है? पांच चार का

674
00:46:47,600 --> 00:46:51,840
ही अनुवाद करते हुए बताया है कि नहीं इसमें इसने मान लिया अनुवाद

675
00:46:51,840 --> 00:46:54,880
करते समय कि

676
00:46:54,880 --> 00:46:59,440
जो क्या कहते हैं ये जो कर्म सन्यास है

677
00:46:59,440 --> 00:47:03,920
कर्म सन्यास से कर्म योग उत्तम है

678
00:47:03,920 --> 00:47:08,160
क्योंकि वो सरल है यहां पे इसने मान लिया मगर आगे चलकर

679
00:47:08,160 --> 00:47:12,160
के ये कहने वाला रामपाल यह कह रहा है पांच चार के

680
00:47:12,160 --> 00:47:16,480
ही अर्थ में कि नहीं नहीं यहां पे तो भगवान ने कहा है कि कर्म सन्यास

681
00:47:16,480 --> 00:47:20,560
जो है नहीं करना दुखदाई है वो उसका निषेध

682
00:47:20,560 --> 00:47:25,280
किया गया है। यहां पर श्रेष्ठ बताया गया कि साधन में सुगम है।

683
00:47:25,280 --> 00:47:31,280
मगर वहां पे इसने मान लिया कि नहीं नहीं उसका निषेध किया इन्होंने। देखिए बताता हूं।

684
00:47:32,560 --> 00:47:36,320
तो कर्म सन्यास में।कि

685
00:47:36,320 --> 00:47:40,720
कर्म सन्यास में त्याग का अभिमान होना स्वाभाविक है। अब ये इसने अपने मन से घुसेड़

686
00:47:40,720 --> 00:47:44,720
दिया। घुसेड़ दिया ठोक दिया। त्याग

687
00:47:44,720 --> 00:47:49,040
का अभिमान होना स्वाभाविक है। तो इसका मतलब इसने जो बबिता का त्याग

688
00:47:49,040 --> 00:47:53,360
किया होगा रामपाल ने उसका अभिमान है इसको रामपाल

689
00:47:53,360 --> 00:47:57,360
को पूछना भाई रिपोर्टर्स जो पत्रकारता करते हैं इससे

690
00:47:57,360 --> 00:48:02,000
पूछना बबीता को त्यागने का अभिमान है कि नहीं क्योंकि तुमने बबीता को त्यागा है ना

691
00:48:02,000 --> 00:48:07,040
और जिन जिन लोगों ने अपने घर को त्याग करके

692
00:48:07,040 --> 00:48:11,280
जो इसकी खीर खाई है

693
00:48:11,280 --> 00:48:15,360
अखबारों के अनुसार तो उनसे भी पूछ लेना तुमको

694
00:48:15,360 --> 00:48:19,360
अभिमान है कि नहीं घर को त्यागने का क्योंकि भाई त्यागने का अभिमान

695
00:48:19,360 --> 00:48:23,520
होता है यदि आप कोई चीज त्यागोगे तो अभिमान होगा तो ये जो भी चीजें

696
00:48:23,520 --> 00:48:28,000
मना कर रहा है उसका अभिमान होगा

697
00:48:28,000 --> 00:48:32,480
तो अभिमान होना परमात्मा प्राप्ति में पूर्ण रूप से बाधक है।

698
00:48:32,480 --> 00:48:32,980
अध्याय

699
00:48:32,960 --> 00:48:36,960
पांच के श्लोक पांच में कहा है कि ज्ञान योगी तथा कर्म योगी एक ही स्थान

700
00:48:36,960 --> 00:48:41,120
प्राप्त करते जिनकी साधना यदि शास्त्रानुकूल है और जो कोई ऐसा

701
00:48:41,120 --> 00:48:45,360
जानता है उसे सही ज्ञान है। यह इसने अपने हिसाब से पंचर

702
00:48:45,360 --> 00:48:49,920
करने वाली चीजें बता दी। अब क्या है?

703
00:48:49,920 --> 00:48:53,920
अब विशेष रूप से बता रहा है। उपरोक्त अध्याय पांच श्लोक चार

704
00:48:53,920 --> 00:48:58,000
से पांच का भावार्थ है कि भावार्थ है कि कोई तो कहता है जिसको ज्ञान हो गया

705
00:48:58,000 --> 00:49:02,160
वह शादी नहीं करवाता तथा आजीवन ब्रह्मचारी रहता है।

706
00:49:02,160 --> 00:49:06,160
वही पार हो सकता है। इसने मतलब सन्यास

707
00:49:06,160 --> 00:49:10,240
की बातों को मना किया है। इसमें आगे कह रहा है कि

708
00:49:10,240 --> 00:49:14,320
यह पष्ठ क्रमांक वो है। हां ठीक है खुला हुआ है।

709
00:49:14,320 --> 00:49:18,400
तो फिर आगे कह रहा है कि जिसको वह चाहे घर रहे चाहे किसी आश्रम में रहे।

710
00:49:18,400 --> 00:49:22,480
कारण व्यक्ति कुछ ज्ञान प्राप्त करके अन्य जिज्ञासुओं को अच्छी प्रकार उदाहरण देकर

711
00:49:22,480 --> 00:49:26,640
समझाने लग जाता है। तो भोलीभाली आत्माएं समझती हैं कि यह तो बहुत बड़ा ज्ञानी

712
00:49:26,640 --> 00:49:30,720
हो गया। यह तो पार है। हमारा गस्थियों का नंबर कहां है? कुछ

713
00:49:30,720 --> 00:49:33,680
एक कहते हैं

714
00:49:33,680 --> 00:49:37,760
कुछ एक कहते हैं कि बाल बच्चों में रहता हुआ ही कल्याण को प्राप्त होता है। कारण

715
00:49:37,760 --> 00:49:42,400
गृहस्थ व्यक्ति दान धर्म करता है इसलिए श्रेष्ठ है। इसलिए कहा कि वह तो दोनों पार

716
00:49:42,400 --> 00:49:46,480
प्रकार के विचार व्यक्त कर करने वाले बच्चे हैं। उन्हें विद्वान ना

717
00:49:46,480 --> 00:49:50,560
समझो। अब खुद कह रहा है। इसलिए कहा है कि वह तो दोनों प्रकार

718
00:49:50,560 --> 00:49:52,160
के विचार व्यक्त करने वाले बच्चे

719
00:49:52,160 --> 00:49:56,560
हैं। उन्हें विद्वान ना समझो। वास्तविक ज्ञान तो पूर्ण संत जो तत्वदर्शी

720
00:49:56,560 --> 00:50:00,560
है वही बताता है। यह सब कहां लिखा है इसमें? पांच चारों पांच चार

721
00:50:00,560 --> 00:50:04,720
से पांच में कहां लिखा है अपने मन से तो भाई यह अपना मनगढ़ंत

722
00:50:04,720 --> 00:50:08,800
यहां पर बताता जा रहा है कुल मिलाकर के यह पहले क्या करता है कि शास्त्र

723
00:50:08,800 --> 00:50:12,880
जिस चीज को कह रहे हैं उस चीज को पहले डिनाय करता है मना करता है

724
00:50:12,880 --> 00:50:17,120
कि चाहे विरक्त हो विरक्त इसके लिए वो है जो आश्रम में रहे

725
00:50:17,120 --> 00:50:21,600
अगर जंगल में रहने वाला विरक्त है तो इसके काम का नहीं है इसलिए वह तो पूर्णता

726
00:50:21,600 --> 00:50:25,760
निषेध है मगर आश्रम में रह के इसके हाथ पांव दबाने वाला

727
00:50:25,760 --> 00:50:30,160
या इसके लिए भविता जैसी व्यवस्थाएं करने वाला यदि है तो वो

728
00:50:30,160 --> 00:50:34,320
विरक्त ठीक है तो वो शास्त्र सम्मत है तो पहले क्या करता

729
00:50:34,320 --> 00:50:38,400
है कि यह कहता है कि शास्त्रों जो पहले

730
00:50:38,400 --> 00:50:42,800
जो विरक्त है और ग्रस्त दोनों दोनों गलत विरक्त हो चाहे ग्रस्त

731
00:50:42,800 --> 00:50:46,800
फिर उसके बाद कहता है कि यदि वह शास्त्रानुकूल भक्ति करते हुए कह रहा है

732
00:50:46,800 --> 00:50:51,280
तो विरक्त ग्रस्त दोनों स्वीकार रहे हैं। अरे भाई तो तूने जब उनको कैंसिल

733
00:50:51,280 --> 00:50:55,280
किया था गस्थ और विरक्त को तो तब किसने कहा था कि वो शास्त्रों

734
00:50:55,280 --> 00:50:59,280
के अनुसार नहीं चल रहा है या शास्त्रों के अनुसार वाला विरक्त है वो

735
00:50:59,280 --> 00:51:03,520
जब तू मना कर रहा है ये एक तरीके से ब्रेन वाशिंग का तरीका

736
00:51:03,520 --> 00:51:07,360
कि बार-बार बार-बार बार-बार अपनी वो चीज रटाते

737
00:51:07,360 --> 00:51:11,920
रहो हर जगह एक ही एजेंडा वो बोलते रहो शास्त्रानुकूल शास्त्रानुकूल

738
00:51:11,920 --> 00:51:17,920
शास्त्रानुकूल तत्वदर्शी तत्वदर्शी तत्वदर्शी तत्वदर्शी तत्वदर्शी

739
00:51:18,480 --> 00:51:24,400
हम बाद में पता चले पंचरदर्शी पंचरदर्शी

740
00:51:24,400 --> 00:51:28,480
खैर तो फिर यह बताते हुए इसमें आता है कि भैया

741
00:51:28,480 --> 00:51:32,480
ज्ञान तो वही मिलेगा परंतु तत्व ज्ञान से परिचित गृहस्ती ब्रह्मचारी

742
00:51:32,480 --> 00:51:36,560
अच्छा इसने एक बात और है इसने यहां पर यह मान लिया है

743
00:51:36,560 --> 00:51:40,560
कि ब्रह्मचारी का अर्थ है शादी ना करवाने वाले रूप शादी ना करने वाले के रूप में

744
00:51:40,560 --> 00:51:44,720
वह ब्रह्मचारी इसने मान लिया ठीक है अब बात यहां पर यह आती

745
00:51:44,720 --> 00:51:48,800
है कि वेद जो है कभी भी परम ब्रह्मचारी

746
00:51:48,800 --> 00:51:52,800
की बात नहीं कर रहे हैं। ब्रह्मचारी ही आचार्य बनता है। 11

747
00:51:52,800 --> 00:51:56,960
5 16 ब्रह्मचारी उसमें ब्रह्मचारी का ही पूरा सूक्त

748
00:51:56,960 --> 00:52:01,520
है। ठीक है? उसमें आचार्य किसी को नहीं कहा गया हो

749
00:52:01,520 --> 00:52:05,520
कि इनके कबीर कबीर कबीर चारी या

750
00:52:05,520 --> 00:52:09,600
रामपाल चारी ब्रह्मचारी ही आचार्य बनता है तो इसका कोई तोड़

751
00:52:09,600 --> 00:52:13,680
नहीं है तो इसने माना है ना इसका वीडियो आजकल आया है इसने गीता में भी लिखा

752
00:52:13,680 --> 00:52:17,680
है कि वेद के सीमा में जितना ज्ञान है गीता का

753
00:52:17,680 --> 00:52:21,840
उतना स्वीकार है और जितना उसके बाहर है स्वीकार्य

754
00:52:21,840 --> 00:52:22,720
नहीं है

755
00:52:22,720 --> 00:52:26,880
तो भाई वेद तो यह कह रहा है कि ब्रह्म की ओर जाओ ब्रह्मचारी

756
00:52:26,880 --> 00:52:30,960
बनो ब्रह्मचारी ही आचार्य बनेगा। तो फिर तू गीता के आधार पर क्यों

757
00:52:30,960 --> 00:52:36,720
कैंसिल कर रहा है कि नहीं नहीं ब्रह्म की ओर मत जाओ। कबीर की तरफ जाओ।

758
00:52:36,720 --> 00:52:41,760
तो खैर अब क्या है कि इसने शादी ना करने वाले को

759
00:52:41,760 --> 00:52:46,000
आजीवन ब्रह्मचारी वगैरह के रूप में यहां बता दिया।

760
00:52:46,000 --> 00:52:50,480
फिर आगे बोल रहा है इसी पैराग्राफ में कि वास्तविक ज्ञान तो पूर्ण संत जो तत्वदर्शी

761
00:52:50,480 --> 00:52:54,720
है। तत्वदर्शी का मतलब वही इसकी नाम दीक्षा और परंतु तत्व

762
00:52:54,720 --> 00:52:58,800
ज्ञान से परिचित गृहस्ती व ब्रह्मचारी जानता है कि ज्ञान

763
00:52:58,800 --> 00:53:03,120
तो सद्गुरु का बताया हुआ है। ज्ञान से नहीं नाम जप गुरु

764
00:53:03,120 --> 00:53:08,080
मर्यादा में से रहने से मुक्ति होगी। अब देखो क्या बोल रहा है। यह मूर्ख लुच्चा

765
00:53:08,080 --> 00:53:12,480
क्या बोल रहा है। ज्ञान से नहीं ज्ञान से नहीं।

766
00:53:12,480 --> 00:53:16,480
नाम जप व गुरु मर्यादा में रहने से मुक्ति होगी। यह क्या है? यह

767
00:53:16,480 --> 00:53:20,800
ज्ञान नहीं है। क्या है बे यह?

768
00:53:20,800 --> 00:53:24,800
पागल कहीं के कभी-कभी इतनी गुस्सा आ जाती है ना कहीं मिल जाए तो बाल सर से ऐसे

769
00:53:24,800 --> 00:53:28,720
ही नोच लूं अगर मिल जाए तो।

770
00:53:28,720 --> 00:53:32,800
क्या लिखता है? भांग का नशा किया था। क्या ये लिखते समय? इसमें अनुवादक का नाम तेरा

771
00:53:32,800 --> 00:53:38,800
ही लिखा हुआ है। यह अनुवादक रामपाल

772
00:53:42,080 --> 00:53:46,160
इसीलिए कहता हूं झंडू बाम लेकर के बैठा करो इसकी बातें

773
00:53:46,160 --> 00:53:50,560
सुनने के लिए तो ज्ञान से मुक्ति नहीं है नाम जब

774
00:53:50,560 --> 00:53:54,880
गुरु मर्यादा में रहने से मुक्ति है यह भी तो ज्ञान है बे मूर्ख कहीं

775
00:53:54,880 --> 00:53:58,880
का गुरु से नाम मिलेगा नाम का ज्ञान हुआ कि

776
00:53:58,880 --> 00:54:02,880
नहीं हुआ मूर्ख और यह जो तू

777
00:54:02,880 --> 00:54:08,880
बता रहा है कि ऐसे मुक्ति होगी यह भी तो ज्ञान है

778
00:54:13,760 --> 00:54:17,920
अच्छा नहीं तो दोनों ही पाप के भागी

779
00:54:17,920 --> 00:54:22,000
भक्ति हो जाएंगे। ठीक है। वह चाहे ब्रह्मचारी या गृहस्ती है दोनों

780
00:54:22,000 --> 00:54:26,320
ही वास्तविकता को जानते हैं। तो तत्वज्ञानी हो गए। यानी कि 15 करोड़ तत्वज्ञानी

781
00:54:26,320 --> 00:54:30,480
है इस दुनिया में। क्योंकि जो जो नाम दीक्षा लिए हुए

782
00:54:30,480 --> 00:54:34,880
वो वो तत्वज्ञानी हो गया। नाम तत्वज्ञान क्या है? नाम दीक्षा

783
00:54:34,880 --> 00:54:38,960
जितनों को तूने बांट दी तेरे अनुसार 15 करोड़ को बांटी है। हालांकि मुझे

784
00:54:38,960 --> 00:54:43,040
लगता है कि मुश्किल से 10 20 लाख भी निकला है। बहुत बड़ी बात है। तो

785
00:54:43,040 --> 00:54:47,040
तूने बांटी है 15 करोड़ को। तो 15 करोड़ तत्वदर्शी हैं रामपाल के अनुसार

786
00:54:47,040 --> 00:54:51,440
इस दुनिया में। ठीक है?

787
00:54:51,440 --> 00:54:57,440
और

788
00:54:58,240 --> 00:55:04,240
अब इसी प्रश्न पर

789
00:55:09,840 --> 00:55:14,080
इसी पृष्ठ पर अब इसने विशेष रूप से लिखा है गीता जी के अन्य

790
00:55:14,080 --> 00:55:18,560
अनुवादकर्ताओं ने जो अनुवाद गीता पांच श्लोक चार का किया है

791
00:55:18,560 --> 00:55:22,800
उसमें सन्यास और कर्म योग दोनों द्वारा एक ही फल मिलता

792
00:55:22,800 --> 00:55:27,280
है। यह ऐसा लिखा है। ठीक है?

793
00:55:27,280 --> 00:55:33,280
विशेष में बात कर रहा है। तो

794
00:55:36,160 --> 00:55:40,160
देखिए यह खुद ही अपने आप को ही कह रहा है

795
00:55:40,160 --> 00:55:44,240
कि यह मूर्ख है। रामपाल यहां पर अपने आप को ही कह रहा है

796
00:55:44,240 --> 00:55:48,320
कि मैं मूर्ख हूं। क्यों? क्योंकि पांच चार का अर्थ इसने भी किया है।

797
00:55:48,320 --> 00:55:52,560
थोड़ी देर पहले मैंने आपको बताया था। पृष्ठ संख्या 108 दिखाइए

798
00:55:52,560 --> 00:55:56,960
जरा। देखो पंचर करने वाला ज्ञान देखिए आप रामपाल का। पंचर

799
00:55:56,960 --> 00:56:02,240
ज्ञान यह सबसे लास्ट पैराग्राफ।

800
00:56:02,240 --> 00:56:06,320
अध्याय पांच के श्लोक चार में ज्ञान योगी व गृहस्ती

801
00:56:06,320 --> 00:56:10,320
दोनों की एक ही उपलब्धि बताई गई है। किसने लिखा?

802
00:56:10,320 --> 00:56:14,320
रामपाल ने। उसके बाद प्रश्न संख्या 109

803
00:56:14,320 --> 00:56:17,760
दिखाओ। विशेष वाला।

804
00:56:17,760 --> 00:56:21,760
भांग खाकर के लिखी गई है क्या? देखो क्या लिख

805
00:56:21,760 --> 00:56:25,840
रहा है। गीता जी के अन्य अनुवाद्ताओं ने अनुवाद

806
00:56:25,840 --> 00:56:30,000
क्या किया है इसके अनुसार कि सन्यास और कर्म योग दोनों के द्वारा

807
00:56:30,000 --> 00:56:34,000
एक ही फल मिलता है। लो जी खुद ही कह के आ रहा है कि इन

808
00:56:34,000 --> 00:56:38,080
दोनों के द्वारा एक ही उपलब्धि बताई गई है। फिर खुद ही कह रहा है

809
00:56:38,080 --> 00:56:42,320
कि यह जो अन्य अनुवादकर्ताओं ने जो अर्थ किया है कि एक ही उपलब्धि

810
00:56:42,320 --> 00:56:46,560
बताई गई है। एक ही फल है दोनों का वो ठीक नहीं है।

811
00:56:46,560 --> 00:56:50,800
और यह जो चीज है यह अब इसमें आगे यह कहता है अपनी बात को पुष्ट

812
00:56:50,800 --> 00:56:55,840
करने के लिए अध्याय पांच के श्लोक छ से यह बात कट जाती है। क्यों?

813
00:56:55,840 --> 00:56:59,840
कट जाती है। क्योंकि अध्याय छह के श्लोक अध्याय पांच के श्लोक छह में

814
00:56:59,840 --> 00:57:04,000
क्या कहा गया है? वास्तविकता में क्या कहा गया है? कर्म

815
00:57:04,000 --> 00:57:08,400
योग के बिना सन्यास अर्थात मन, इंद्रिय और शरीर द्वारा

816
00:57:08,400 --> 00:57:12,400
होने वाले संपूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त हो पाना कठिन

817
00:57:12,400 --> 00:57:16,720
है। अब यह जो कठिनाई है ना जो पहले भी बताई जा चुकी है कि

818
00:57:16,720 --> 00:57:20,960
कर्म योग सरल होता है। गृहस्थ होकर के पार करना भवसागर को

819
00:57:20,960 --> 00:57:25,040
सरल होता है। कर्म योग से होते हुए विरक्तता को प्राप्त

820
00:57:25,040 --> 00:57:29,040
करना सरल है। मगर कर्म योग से बिल्कुल अलग हटकर के सीधे विरक्त हो

821
00:57:29,040 --> 00:57:32,800
जाना कठिन है। यह शुरू में भी बताई गई है और यहां पर भी बताई

822
00:57:32,800 --> 00:57:36,880
गई है। वहां पर कर्म योग को सरल बता करके यह बात कह

823
00:57:36,880 --> 00:57:40,960
दी गई और यहां पर सन्यास को कर्म सन्यास को

824
00:57:40,960 --> 00:57:45,040
कठिन बता के ये बात कह दी गई। मगर यहां से क्या कह रहा है कि

825
00:57:45,040 --> 00:57:49,040
कर्म सन्यास तो निषेध किया है। यह कह रहा है। क्या कह

826
00:57:49,040 --> 00:57:54,240
रहा है ये? इसका अर्थ सुनो कि

827
00:57:54,240 --> 00:57:58,240
यह गीता अध्याय पांच श्लोक छह के आधार से गलत सिद्ध होता है। जिसमें लिखा

828
00:57:58,240 --> 00:58:02,240
है फला फला फला कि सन्यास मार्ग तो शास्त्र विरुद्ध साधना

829
00:58:02,240 --> 00:58:05,760
होने से दुख का हेतु है। लो

830
00:58:05,760 --> 00:58:09,920
दुख का हेतु नहीं है। सन्यास मार्ग कठिन है। वहां पर दुख का अर्थ

831
00:58:09,920 --> 00:58:14,960
कठिनाई से है। ठीक है? क्योंकि

832
00:58:14,960 --> 00:58:19,040
सीधे किसी चीज से हो के उनकी वास्तविकता

833
00:58:19,040 --> 00:58:23,200
देख के और तब जाना वो सरल होता है और उनसे फेस

834
00:58:23,200 --> 00:58:28,000
ऑफ आमनासामना हुआ ही नहीं और सीधे पहुंचना कठिन होता है तब तक वो

835
00:58:28,000 --> 00:58:32,240
जैसे वो एक कहावत है साधु शादी का लड्डू जो खाए वो पचता

836
00:58:32,240 --> 00:58:36,240
है जो ना खाए वह भी पचता है खाने वाला उसका साक्षी हो जाता है

837
00:58:36,240 --> 00:58:41,040
कि भैया इसमें यह दिक्कतें आती है अंतत गतवा जो है यहां परम

838
00:58:41,040 --> 00:58:45,040
सुख नहीं है वह फिर आगे बढ़ता है। मगर जिसने

839
00:58:45,040 --> 00:58:47,840
खाया ही नहीं है तो वह यह सोचता है कि भैया

840
00:58:47,840 --> 00:58:51,920
उसमें सुख है। उसके सुख के लालच होने की संभावना बढ़ जाती है।

841
00:58:51,920 --> 00:58:56,080
तो जिसके जीवन में सीधे सन्यास आता है वो अपना प्रारब्ध लेकर के आता

842
00:58:56,080 --> 00:59:00,080
है पूर्व जन्म का। यानी उसने पूर्व जन्म में वो जो यात्रा है वो पार कर रखी है।

843
00:59:00,080 --> 00:59:04,480
उसके जीवन में सीधे सन्यास आ गए। ऐसा नहीं है कि सीधे सन्यास आने वाले गलत है।

844
00:59:04,480 --> 00:59:08,880
वह अपना प्रारब्ध लेकर के आए हैं उनके जीवन में। सीधे सन्यास इसलिए आ गए

845
00:59:08,880 --> 00:59:12,960
और या फिर इस जन्म में कर्म गृहस्थ मार्ग से होते हुए सन्यास

846
00:59:12,960 --> 00:59:17,040
आएगा उनके जीवन में। ठीक है? तो यह तो हमारी

847
00:59:17,040 --> 00:59:21,040
गीता कह रही है। यह कह रहा है कि यह जो अध्याय पांच का

848
00:59:21,040 --> 00:59:25,040
श्लोक छ है इसके कारण पांच चार की यह बात कट जाती है

849
00:59:25,040 --> 00:59:29,600
अनुवादों की। जबकि खुद ही वही अनुवाद कर रहा है।

850
00:59:29,600 --> 00:59:33,680
खुद भी वही अनुवाद कर रहा है। तो तू अनुवादों को गलत कहने

851
00:59:33,680 --> 00:59:37,680
की बजाय यह कहना कि गीता का ये श्लोक गलत है। अध्याय पांच

852
00:59:37,680 --> 00:59:41,920
के श्लोक छह के कारण अध्याय पांच का

853
00:59:41,920 --> 00:59:46,160
श्लोक चार गलत है। तू ये कह यह मत कह के कि अनुवाद गलत है क्योंकि तूने

854
00:59:46,160 --> 00:59:50,240
भी वही अनुवाद किया है। मूर्ख ठीक। दूसरी बात ये

855
00:59:50,240 --> 00:59:54,240
है कि पांच छ के कारण पांच चार को गलत क्यों माना जाए? पांच चार के

856
00:59:54,240 --> 00:59:58,560
कारण पांच छ को गलत क्यों ना माना जाए यह भी सोचा करिए इतनी बारीकी

857
00:59:58,560 --> 01:00:02,560
से सोचना शुरू करिए पांच छ के कारण यह कह रहा है पांच चार को

858
01:00:02,560 --> 01:00:03,440
मत मानो

859
01:00:03,440 --> 01:00:07,440
अनुवाद गलत हो या श्लोक गलत हो जो भी हो मत मानो मगर

860
01:00:07,440 --> 01:00:11,680
पांच चार के कारण पांच छ को मत मानना क्योंकि

861
01:00:11,680 --> 01:00:16,400
वहां तेरी दाल नहीं गल रही यह है पंचर कर देने वाला ज्ञान

862
01:00:16,400 --> 01:00:20,400
तो खुद ही कह रहा है पष्ठ संख्या 108 पर

863
01:00:20,400 --> 01:00:25,120
कि ज्ञान योगी जिसे सन्यास कहा गया है कर्म सन्यास

864
01:00:25,120 --> 01:00:29,600
कि ज्ञान योगी व गृहस्ती पांच चार के अर्थ में कह रहा है

865
01:00:29,600 --> 01:00:33,680
कि ज्ञान योगी अर्थात कर्म सन्यास वाले और गृहस्ती अर्थात कर्म

866
01:00:33,680 --> 01:00:37,760
योग वाले दोनों की ही एक ही उपलब्धि है और फिर पष्ठ संख्या

867
01:00:37,760 --> 01:00:42,000
109 पे खुद ही कह रहा है कि ये अनुवाद गलत किया है।

868
01:00:42,000 --> 01:00:46,320
गीता का अनुवाद 109 में 109 पृष्ठ संख्या पे कह रहा है कि पांचवे

869
01:00:46,320 --> 01:00:50,320
अध्याय के चार चौथे श्लोक में गलत किया है। यह कहकर कि सन्यास

870
01:00:50,320 --> 01:00:54,400
और कर्म योग का एक ही फल है। कैसा घन चक्कर है रे तू?

871
01:00:54,400 --> 01:00:58,400
हैं तो आज के लिए इतना ही पर्याप्त

872
01:00:58,400 --> 01:01:02,480
है। कई बार विद्युत का विच्छेद भी

873
01:01:02,480 --> 01:01:06,560
हुआ जिसके कारण बाधा आई। क्षमा प्रार्थी है उसके लिए और यदि कोई

874
01:01:06,560 --> 01:01:10,640
सहायता करने के उद्देश्य से व्यवस्था कर सकता है कि

875
01:01:10,640 --> 01:01:14,960
हमारी यह बाधा ना हुआ करे तो संपर्क कर सकता है। वीडियो में

876
01:01:14,960 --> 01:01:19,760
वीडियो के अंत में दिए गए नंबर पर।

877
01:01:19,760 --> 01:01:25,760
ठीक है। लिंक दे दिया गया है।

878
01:01:26,640 --> 01:01:29,040
यदि किसी

879
01:01:29,040 --> 01:01:33,040
माई के लाल को उसकी माता ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो वो यहां

880
01:01:33,040 --> 01:01:37,280
आ सकता है। हम लोग सामंजस्य पूर्ण ढंग से बात

881
01:01:37,280 --> 01:01:43,280
करेंगे। ठीक है?

882
01:01:46,800 --> 01:01:49,760
और

883
01:01:49,760 --> 01:01:55,760
शास्त्रवाद जी या टीआर पहाड़ी जी अगर देख रहे हैं तो वो भी आ सकते हैं।

884
01:01:57,840 --> 01:02:02,400
केवल कॉमेडी और सर दर्द दोनों एक साथ जब लेने हो,

885
01:02:02,400 --> 01:02:07,680
बहुत ज्यादा कंफ्यूजन और बहुत ज्यादा हास्यास्पद

886
01:02:07,680 --> 01:02:12,480
चीजें दोनों एक साथ जब लेनी हो तो इस सीरीज को आप देखा करें।

887
01:02:12,480 --> 01:02:16,640
ठीक है ना? कहां बुलाया है माननीय? रामपाल का नंबर

888
01:02:16,640 --> 01:02:20,720
दीजिए। क्या नंबर है रामपाल का? मैं बात करता हूं। देखूं

889
01:02:20,720 --> 01:02:24,800
आपने बुलाया। कहां बुलाया भाई? और मैंने भी तो बुलाया

890
01:02:24,800 --> 01:02:30,080
बहुत दिनों से। आप ही आ जाइए।

891
01:02:30,080 --> 01:02:34,560
मैंने भी बहुत दिनों से बुलाया हुआ है। वो नहीं वो आएगा तब आएगा। आप आ जाइए।

892
01:02:34,560 --> 01:02:38,560
तो जिसने भी

893
01:02:38,560 --> 01:02:42,720
जिसने भी जो भी अपने आप को रामपाल का भगत मानता

894
01:02:42,720 --> 01:02:47,040
है रामपाल की कोई भी ऐसी बात सिद्ध

895
01:02:47,040 --> 01:02:51,200
कर सकता है जो हमारे द्वारा मानी जाने वाली बातों के विरुद्ध है और उसको

896
01:02:51,200 --> 01:02:55,360
उसकी माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया है। वह कुपोषित नहीं है।

897
01:02:55,360 --> 01:02:59,360
वह आ सकता है और यहां बैठकर के मेरे

898
01:02:59,360 --> 01:03:04,720
साथ चर्चा कर सकता है। कहां है भाई रामपाली? कोई नहीं आना चाहता।

899
01:03:04,720 --> 01:03:09,440
इसीलिए मैं कहता हूं मत पड़ो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में

900
01:03:09,440 --> 01:03:15,440
पहाड़ी जी जुड़े हैं

901
01:03:17,600 --> 01:03:23,600
जी पहाड़ी जी जय श्री राम

902
01:03:24,720 --> 01:03:29,600
जय शिवश भाई जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जी

903
01:03:29,600 --> 01:03:33,920
कैसे हो बस कृपा है राम की आप बताइए

904
01:03:33,920 --> 01:03:38,560
सीरीज कैसी लग रही है दोबारा से चालू हुई है जो

905
01:03:38,560 --> 01:03:43,200
बहुत बढ़िया लग रही है लोगों को ये

906
01:03:43,200 --> 01:03:47,280
रामपाल के से लोग नहीं ये हमारे सनातनी भाई है उनके लिए ज्यादा

907
01:03:47,280 --> 01:03:51,520
है क्योंकि वो लोग देखिए किताबों से जब भी कहीं

908
01:03:51,520 --> 01:03:55,600
देखे हो वो लोग सवाल पूछे इसलिए है और सवाल पूछ

909
01:03:55,600 --> 01:03:58,720
भी रहे हैं लोग

910
01:03:58,720 --> 01:04:03,440
और किताबें हैं ये तो राम है

911
01:04:03,440 --> 01:04:06,320
जी

912
01:04:06,320 --> 01:04:10,880
रामपाल की आत्मा है और आत्मा का ज्ञान ऐसा है।

913
01:04:10,880 --> 01:04:14,960
अच्छा आप बिना हसे कैसे पढ़ लेते हो ये मतलब ये किताबें आप अरे मेरे सर

914
01:04:14,960 --> 01:04:18,960
में दर्द होता है भाई मैं जब ये चालू होने वाला था

915
01:04:18,960 --> 01:04:22,960
लाइव स्ट्रीम तो उससे पहले मैं थोड़ा मतलब अपने सर को ठीक कर रहा था।

916
01:04:22,960 --> 01:04:27,200
बहुत ज्यादा पंचर ज्ञान है। क्या बताऊं मैं?

917
01:04:27,200 --> 01:04:31,920
मैं तो 5 से 10 मिनट से ज्यादा की किताबों को देख तक नहीं सकता।

918
01:04:31,920 --> 01:04:36,080
हंसी आ जाती है मेरे को हंसी छूट गई उनको ये किताबें देख

919
01:04:36,080 --> 01:04:38,640
के

920
01:04:38,640 --> 01:04:41,280
जैसे

921
01:04:41,280 --> 01:04:45,680
जो ये मनोरंजन वाली कहानियां नहीं होती है जो ठीक

922
01:04:45,680 --> 01:04:49,680
उसी प्रकार की इसी में घपोड़ भर रखी है और ये बोलते हैं कि इसमें ज्ञान

923
01:04:49,680 --> 01:04:53,840
भर रखा है कोई मेरे को एक पॉइंट में गलत सिद्ध कर दो हर

924
01:04:53,840 --> 01:04:58,160
पेज पर गलत भर रखा है हमने इसको हर पेज पर हर श्लोक

925
01:04:58,160 --> 01:05:02,640
में हर श्लोक में हर बात में

926
01:05:02,640 --> 01:05:06,640
मुश्किल से कोई एक आध लाइन ऐसी होती है जिसको काउंटर करने का मन नहीं करता। हालांकि

927
01:05:06,640 --> 01:05:11,440
मूर्खता तो उसमें भी दिखती है।

928
01:05:11,440 --> 01:05:15,520
थोड़ा सा आपकी आवाज है ना वो ब्रेक हो के आ रही है। पता नहीं क्या

929
01:05:15,520 --> 01:05:19,520
आप हेडफोन लगाए? हां हल्का वो कट

930
01:05:19,520 --> 01:05:22,880
कट नहीं हेडफोन तो नहीं लगा।

931
01:05:22,880 --> 01:05:27,600
नेटवर्क इशू हो सकता है शायद।

932
01:05:27,600 --> 01:05:31,760
तो मगर यह मतलब जो जनता है जो देख

933
01:05:31,760 --> 01:05:35,760
रही है उसके लिए बड़ी उपयोगी है ये कि वो राम हमें कुछ कहने

934
01:05:35,760 --> 01:05:40,640
की जरूरत नहीं रामपाल की किताबें ही पर्याप्त है उसके लिए

935
01:05:40,640 --> 01:05:44,880
और देखिए कितना अच्छा ये एक सूत्र निकला है कि हमारे सारे

936
01:05:44,880 --> 01:05:49,200
शास्त्रों का ज्ञान रामपाल दे रहा है और रामपाल ये बता रहा है कि हमें व्रत नहीं रखना

937
01:05:49,200 --> 01:05:53,280
है तो व्रत आया कहां से हमारे पास हमें ब्रह्मा विष्णु महेश

938
01:05:53,280 --> 01:05:57,280
की भक्ति नहीं करनी नहीं तो वो आई कहां से हमारे पास? उसके लिए भी तो वो शास्त्र दिखा जहां

939
01:05:57,280 --> 01:06:01,840
से वो आई हमारे पास उसका सबूत है ही नहीं कोई।

940
01:06:01,840 --> 01:06:05,920
हां। भाई ये शास्त्र तो इसी लिखे ही इस रूप में गए हैं कि

941
01:06:05,920 --> 01:06:10,000
नहीं करना है। तो यानी कि जब ये लिखे

942
01:06:10,000 --> 01:06:14,160
गए तो इस कारण से लिखे गए कि हम ये कर रहे थे। है

943
01:06:14,160 --> 01:06:18,160
कि नहीं? ये शास्त्र जो लिखे गए वो इसलिए लिखे गए कि हम

944
01:06:18,160 --> 01:06:22,160
ये कर रहे थे। हमें कब रोका जाएगा? गलत करने से। जब

945
01:06:22,160 --> 01:06:26,960
हम गलत कर रहे होंगे तभी तो रोका जाता है। बिल्कुल बिल्कुल

946
01:06:26,960 --> 01:06:32,800
तो हम कहां से किस आधार पे कर रहे थे वो तो आधार बता।

947
01:06:32,800 --> 01:06:36,800
वो कभी नहीं बता पाएगा। इतने इतने डीप कहां जा रही है? इतना डीप

948
01:06:36,800 --> 01:06:40,960
तो है नहीं। अभी एक आप जब जैसे इंटरव्यू सुन रहे थे रामपाल

949
01:06:40,960 --> 01:06:45,520
का देखो खड़ेखड़े कैसा मूर्ख बना गया उन दोनों को। वो

950
01:06:45,520 --> 01:06:49,600
एक बार पहले बोला कि आवाज कट रही है आवाज बहुत

951
01:06:49,600 --> 01:06:53,680
ज्यादा। वह मूर्ख है नहीं मतलब मूर्ख बनाया नहीं

952
01:06:53,680 --> 01:06:57,760
गया है उनको मूर्ख जन्मजात मूर्ख है जो उसकी यह बातें

953
01:06:57,760 --> 01:07:00,720
सुन लेते हैं

954
01:07:00,720 --> 01:07:06,400
संदीप जी आप अपना चेहरा दिखाएं

955
01:07:06,400 --> 01:07:10,560
और आर्य आपने लिख रखा है अपने नाम के आगे अगर रामपाल से संबंधित

956
01:07:10,560 --> 01:07:15,200
बात है तो आप आए उसका पक्ष लेना है तो

957
01:07:15,200 --> 01:07:19,840
और यदि आर्य समाज से संबंधित कोई समस्या है तो

958
01:07:19,840 --> 01:07:24,080
WhatsApp नंबर दिया गया है। वहां सूचित करें

959
01:07:24,080 --> 01:07:29,120
और एक विशेष समय लेकर के आपके साथ बैठेंगे।

960
01:07:29,120 --> 01:07:33,520
वैसे भी सर में दर्द हो रहा है। रामपाल का ज्ञान पड़ा है। फड़

961
01:07:33,520 --> 01:07:36,480
ज्ञान

962
01:07:36,480 --> 01:07:40,560
एक बार उसने कहा जब पूछा ये सवाल कि आपके ऊपर आरोप

963
01:07:40,560 --> 01:07:44,640
लगता है। रामपाल से पूछा आपकी आवाज

964
01:07:44,640 --> 01:07:50,640
कट रही है। आप एक बार ना जाके जाके वापस आ जाइए आप एक बार।

965
01:07:51,600 --> 01:07:57,600
ठीक

966
01:08:00,480 --> 01:08:04,480
ये क्या कह रहे हैं भाई साहब ये रामपाल वाले सारे गधे हैं। सही कह

967
01:08:04,480 --> 01:08:08,800
रही हैं आप गीतांजलि जी।

968
01:08:08,800 --> 01:08:13,440
कोई नहीं है भाई। यह सब बस

969
01:08:13,440 --> 01:08:18,240
सांप और बिच्छू शेरों से टकराया नहीं करते। शेरों को काटा नहीं करते।

970
01:08:18,240 --> 01:08:24,240
दूर ही दूर से रैंक कर निकल जाते हैं। इनका वो वाला हाल है।

971
01:08:28,000 --> 01:08:34,000
जी पहाड़ी जी

972
01:08:34,240 --> 01:08:38,640
मेरी आवाज सही आ रही है? हां बोलिए बोलिए।

973
01:08:38,640 --> 01:08:42,720
नहीं भी आ रही होगी तो अब काम चला लेंगे क्योंकि ये समझ में आ जाएगा। डिस्कनेक्ट

974
01:08:42,720 --> 01:08:47,520
करके कोई फायदा नहीं है। बताइए

975
01:08:47,520 --> 01:08:51,680
थोड़ा सा नेटवर्क इशू है। मैं ये कह रहा था कि खाने

976
01:08:51,680 --> 01:08:55,840
को कैसे मूर्ख बनाया उसने? हां।

977
01:08:55,840 --> 01:09:00,000
जब आप वेदों को नहीं मानते।

978
01:09:00,000 --> 01:09:06,000
नहीं नहीं बहुत बहुत डिस्टर्बिंग आ रही है पहाड़ी जी। पहाड़ी जी बहुत डिस्टर्ब आ रही है आवाज।

979
01:09:06,720 --> 01:09:11,520
तो रहने दीजिए फिर भी। जी जी जी कोई

980
01:09:11,520 --> 01:09:15,280
तो ले लीजिए।

981
01:09:15,280 --> 01:09:18,960
खीर खाने गए हैं।

982
01:09:18,960 --> 01:09:23,040
चलिए ठीक है। फिर आज की लाइव यही पूरी करते हैं। जितने भी गुरु

983
01:09:23,040 --> 01:09:27,280
रामपाल जी के भक्त हैं वह अपना समय यहां खराब ना करें।

984
01:09:27,280 --> 01:09:31,360
भक्ति करें इनसे दूर रह। हां वहां खराब करो जहां पर ये सब बातें

985
01:09:31,360 --> 01:09:35,680
हो रही होती है ना। महिलाओं के अंतरंग

986
01:09:35,680 --> 01:09:40,160
वस्त्रों की बातें जहां हो रही होती है। गंजा बैठकर के मातृशक्तियों

987
01:09:40,160 --> 01:09:45,520
के अंतरंग वस्त्रों का नाम लेता है। उनके

988
01:09:45,520 --> 01:09:49,760
अंतरंग जो अंग है उनका नाम लेता है।

989
01:09:49,760 --> 01:09:53,760
वहां जाकर समय खराब करो। यहां क्या मिलेगा तुम्हें? यह सब तुम्हारे काम की

990
01:09:53,760 --> 01:09:58,160
चीजें थोड़ी ना है कि आत्मज्ञान, परमात्म

991
01:09:58,160 --> 01:10:04,160
ज्ञान, तत्व बोध, नित्य, स्थाई, सनातन, शाश्वत

992
01:10:04,240 --> 01:10:08,400
सच्चिदानंद घन ब्रह्म। यही अर्थ पूछ लूंगा ना। सच्चिदानंद घन

993
01:10:08,400 --> 01:10:12,560
ब्रह्म। इसका अर्थ क्या है? इसी में तुम्हारे रामपाल दोबारा कहेंगे मैं जा रहा हूं जेल काटने

994
01:10:12,560 --> 01:10:16,560
दोबारा और मुझे अबकी बार लेके मत आना। जब तक शिवा नारायण द्विवेदी इस पृथ्वी

995
01:10:16,560 --> 01:10:20,800
पर जीवित है या कोई भी एक शंकर का सैनिक जीवित

996
01:10:20,800 --> 01:10:24,960
है मनुवादी जीवित जीवित है मुझे बाहर मत निकालना

997
01:10:24,960 --> 01:10:29,200
दोबारा और तड़पेंगे बाहर सब लोग हाय हमारी

998
01:10:29,200 --> 01:10:33,600
खीर हाय हमारी खीर अब खीर कैसे आएगी फिर

999
01:10:33,600 --> 01:10:38,640
जेलर से कह के व्यवस्था की जाएगी

1000
01:10:38,640 --> 01:10:42,720
इतना तो कर ही देता होगा प्रशासन कि खीर की व्यवस्था

1001
01:10:42,720 --> 01:10:46,160
हो जाए

1002
01:10:46,160 --> 01:10:50,320
ठीक है भाई। तो इसके साथ ही अब आज की यह चर्चा समाप्त

1003
01:10:50,320 --> 01:10:53,760
करते हैं।

1004
01:10:53,760 --> 01:10:57,760
हां कल कल या परसों रामपाली एक है जो आने वाले हैं

1005
01:10:57,760 --> 01:11:02,960
उनके साथ होगी चर्चा। तो इसीलिए

1006
01:11:02,960 --> 01:11:06,960
चर्चा अभी की समाप्त कर रहे हैं। बने रहिए सीरीज

1007
01:11:06,960 --> 01:11:12,960
के साथ रामपाल की यदि पोल देखनी है तो और

1008
01:11:13,040 --> 01:11:17,200
संभवत पूरी चांस है कि जो

1009
01:11:17,200 --> 01:11:21,200
सर्वशक्तिमान धर्म पर वहां पर कल वो सीरीज हम स्टार्ट करने

1010
01:11:21,200 --> 01:11:25,520
वाले हैं। नीलिमा जी के साथ जो

1011
01:11:25,520 --> 01:11:29,760
उनका ब्रह्मा कुमारियों का जो सेवन डेज कोर्स है ना वह कल चालू हो जाएगा

1012
01:11:29,760 --> 01:11:33,840
शाम से तो जो भी ब्रह्मा कुमारियों से त्रस्त

1013
01:11:33,840 --> 01:11:37,920
हैं वो उससे जरूर जुने जय श्री राम सभी

1014
01:11:37,920 --> 01:11:43,920
को

1015
01:12:03,120 --> 01:12:07,120
आ
