1
00:00:03,320 --> 00:00:07,000
तो सभी को जय श्री

2
00:00:07,000 --> 00:00:11,280
राम जैसा कि आप सबको पता है कि

3
00:00:11,280 --> 00:00:15,360
आज हम जो यह बुलंद

4
00:00:15,360 --> 00:00:19,480
शहर के पास में एक शास्त्रार्थ हुआ है

5
00:00:19,480 --> 00:00:24,120
तो वहां पर जो करपात्री जी के जो

6
00:00:24,120 --> 00:00:28,400
सानिध्य में जो अध्ययन किया जिन्होंने

7
00:00:28,400 --> 00:00:32,560
और उनके सिद्धांतों को लेकर के शंकर

8
00:00:32,560 --> 00:00:37,000
परंपरा के सिद्धांतों को लेकर के जो आज आगे बढ़ रहे हैं उनका गुरुकुल है

9
00:00:37,000 --> 00:00:41,720
अपने निवास स्थान में भी वह करीब 30 से 40

10
00:00:41,720 --> 00:00:46,120
शिष्यों को लेकर उनके साथ में ही रहते हैं वहां पर तो ऐसे एक आचार

11
00:00:46,120 --> 00:00:50,200
है डॉक्टर ज्ञानेंद्र शर्मा जी जो सोरो नाम की

12
00:00:50,200 --> 00:00:54,400
जगह है संभवतः जहां पर होने वाले जो शास्त्रार्थ है उसमें

13
00:00:54,400 --> 00:00:58,920
वो विजय हुए

14
00:00:58,920 --> 00:01:03,160
और ई होने के साथ-साथ वहां पर कई आसपास

15
00:01:03,160 --> 00:01:07,200
के गुरुकुल से भी आए हुए लोग थे आर्य समाज भी वहां पर था तो एक

16
00:01:07,200 --> 00:01:11,240
बहुत ही रोचक वहां पर चीजें देखने को मिली तो आज हम उनसे उनका

17
00:01:11,240 --> 00:01:15,320
अनुभव और प्राप्त करेंगे उनका

18
00:01:15,320 --> 00:01:19,680
सानिध्य प्राप्त करेंगे और इसके साथ ही साथ बहुत सारे अन्य

19
00:01:19,680 --> 00:01:24,480
विषय भी है जिन पर वो हमें अपने वक्तव्य द्वारा

20
00:01:24,480 --> 00:01:28,800
अपना जो आशीर्वाद है वो कृपा है वो प्रदान करेंगे

21
00:01:28,800 --> 00:01:34,600
तो हम ले लेते हैं उन्हें

22
00:01:34,600 --> 00:01:38,640
चरण स्पर्श आचार्य श्री आपका भया जय हो भैया

23
00:01:38,640 --> 00:01:43,240
जय हो जय हो तो आचार्य श्री

24
00:01:43,240 --> 00:01:47,640
हमारे बीच आ चुके हैं आचार्य श्री

25
00:01:47,640 --> 00:01:51,680
वैसे मैंने प्रयास किया आपका परिचय देने का जो दर्शक है

26
00:01:51,680 --> 00:01:56,200
उनको पर मैं स्वयं को उतना योग्य नहीं समझता हूं तो

27
00:01:56,200 --> 00:02:00,400
आप थोड़ा सा अगर कुछ अपने बारे में बता दे हमारे दर्शकों को

28
00:02:00,400 --> 00:02:05,080
जिससे कि हम फिर इस प्रवाह को आगे

29
00:02:05,080 --> 00:02:09,760
बढ़ाए हमारा जो है

30
00:02:09,760 --> 00:02:14,520
वंश सना वंश है उसमें

31
00:02:14,520 --> 00:02:18,560
लगभग सात पीढ़ियों से तो महाकाव्य बनते चले ही आ रहे

32
00:02:18,560 --> 00:02:22,600
हैं जी और सबसे प्रसिद्ध अपने बाबा

33
00:02:22,600 --> 00:02:26,720
हुए पर बाबा बाबा के भाई शास्त्रार्थ

34
00:02:26,720 --> 00:02:31,360
मारती करन अखला जी जो

35
00:02:31,360 --> 00:02:36,920
जो कभी शास्त्रार्थ में हारे ही नहीं

36
00:02:36,920 --> 00:02:41,360
और बहुत रोचक तथ्य है हमारे परम परिवारी

37
00:02:41,360 --> 00:02:45,920
परंपरा रही तीन हो चार

38
00:02:45,920 --> 00:02:49,880
हो सीधे काशी में जाकर अध्यन रत रहते

39
00:02:49,880 --> 00:02:54,520
थे तो हमारे चार बाबा थे वो काशी में पढ़े गांव आए

40
00:02:54,520 --> 00:02:58,600
और पहले गांव में ये परंपरा थी जब कोई सनातन गांव प्रवेश करता

41
00:02:58,600 --> 00:03:02,960
था वहा के राजा जमी लोग बड़ा उनका आदर करते थे

42
00:03:02,960 --> 00:03:07,680
और भोजन इत्यादि व्यवस्था करते थे तो संयोग ऐसा हुआ

43
00:03:07,680 --> 00:03:11,920
कि भोजन के लिए जमीदार ने बुलाए तो

44
00:03:11,920 --> 00:03:15,920
संगीता का पाठ करते स्वाध्याय बलव करते विलंब

45
00:03:15,920 --> 00:03:20,680
हो गया और प जमीदारी का तो आप शासन समझते ही है

46
00:03:20,680 --> 00:03:24,760
जी तो वो नाराज हो गए और भोजन कराने के बाद बोले आचार्य

47
00:03:24,760 --> 00:03:30,040
जी हमारी जमीदारी में रहना है तो हमारी बात तो माननी ही पड़ेगी

48
00:03:30,040 --> 00:03:34,080
तो पर बाबा थे वो चार भाई थे

49
00:03:34,080 --> 00:03:40,000
इसमें दोनों तक्षण निर्णय कर लिया हम किसी की जमीदारी में रहना ही नहीं

50
00:03:40,000 --> 00:03:44,480
है परवा टीकाराम जी थे वो गंगा किनारे

51
00:03:44,480 --> 00:03:48,560
हमेशा रहे और हमारे य कवास है यह

52
00:03:48,560 --> 00:03:52,800
बड़ा सिद्ध क्षेत्र है तो गंगा किनारे ने विद्यालय बनाया

53
00:03:52,800 --> 00:03:57,040
और अयाचित वृत्ति से विद्यालय चला और सा स उसम

54
00:03:57,040 --> 00:04:01,560
विद्यार्थी रहे सबकी अलग अलग प कुटीर थी और

55
00:04:01,560 --> 00:04:05,000
पहले गांव की परंपरा थी ना जो है चाकी वगर हास

56
00:04:05,000 --> 00:04:09,120
से चलाते थे ना उसमें पहला एक मुट्ठी आटा घड़े

57
00:04:09,120 --> 00:04:13,320
में डालते थे व घड़ा भर जाता था विद्या रखते थे खाली घर

58
00:04:13,320 --> 00:04:17,400
आ जाता था तो उसी समय दयानंद जी

59
00:04:17,400 --> 00:04:21,480
भी वहां थे और वो काल उनका अच्छा था जो सही है

60
00:04:21,480 --> 00:04:25,960
व कहना चाहिए और हमारे पर बाबा का

61
00:04:25,960 --> 00:04:30,080
और उनका दयान जी का कु सक भावी था व साधना

62
00:04:30,080 --> 00:04:34,080
कर रहे थे तो उसी समय जो है

63
00:04:34,080 --> 00:04:38,360
उसी काल में हमारे बाबा अखला जी का जो उत्पत्ति

64
00:04:38,360 --> 00:04:42,840
हुई वह भी एक अवंत का तीर्थ है देवी

65
00:04:42,840 --> 00:04:46,880
व झाड़ियों में हुई तो हमारे परवा बोले की जो

66
00:04:46,880 --> 00:04:51,440
है बच्चा बंधन कर झाड़ी में छोड़ गए उनके लिए

67
00:04:51,440 --> 00:04:55,760
तीन दिन बाद माता जी ने बहुत आग्रह किया तो झाड़ी में जो है

68
00:04:55,760 --> 00:05:01,200
शास्त्र जी जो है अंगूठा पीते हुए मिले

69
00:05:01,200 --> 00:05:05,400
और उनके बस पिता का आशीर्वाद रहा

70
00:05:05,400 --> 00:05:09,480
कवास में साधना कराई अवंत काद साधना कराई तो बाल्यावस्था

71
00:05:09,480 --> 00:05:13,600
से ही व संस्कृत बोलते थे अच्छा हा

72
00:05:13,600 --> 00:05:17,760
बाल्यावस्था से उनका यग पीत गोत्री में हुआ और इसके

73
00:05:17,760 --> 00:05:20,080
बाद काशी में शिवकुमार शास्त्री जी थे

74
00:05:20,080 --> 00:05:24,240
पूरे भारतवर्ष में जो है महान विद्वान थे जब महाभाष्य

75
00:05:24,240 --> 00:05:28,280
का पाठ पढ़ाते थे शिवकुमार शास्त्री जी तो नाग लोक से

76
00:05:28,280 --> 00:05:32,680
जो है मनुष्य का रूप धारण महावास का अध्ययन करने आते थे ऐसे विद्वान शिवकुमार

77
00:05:32,680 --> 00:05:36,720
शास्त्री जी तो तीन वर्ष की अवस्था से वार्ता हमारे बाबा की

78
00:05:36,720 --> 00:05:42,080
तो त्रहा वार्षि का पंडिता की उपाधि शिवकुमार शास्त्री जी

79
00:05:42,080 --> 00:05:46,320
ने तो वो बड़े अद्भुत थे शास्त्र कभी

80
00:05:46,320 --> 00:05:50,400
नहीं हारे उस समय का उस समय आर समाज में दयान जी नहीं थे तो

81
00:05:50,400 --> 00:05:54,480
उन पर कुछ प्रभाव रहा तो कुछ वर्ष जो है वो आर्य

82
00:05:54,480 --> 00:05:59,200
समाज में रहे किंतु उने देखा कि यह लोग जो है

83
00:05:59,200 --> 00:06:03,600
मन मा ढंग से वेद की व्याख्या कर रहे हैं तो

84
00:06:03,600 --> 00:06:08,360
उनसे नहीं रहा नहीं रहा गया तो मैं आपको स्मर दिला हं

85
00:06:08,360 --> 00:06:13,000
उनकी माता जी ने जो पत्र लिखा शास्त्रार्थ

86
00:06:13,000 --> 00:06:17,160
महारथी कवित खिलान जी के लिए अरे भाई अब ये

87
00:06:17,160 --> 00:06:21,320
बताओ कि मरल से संगते नीच ही का कुल

88
00:06:21,320 --> 00:06:25,560
प कोहो श्रुति दूसर राध सला नियस तथा

89
00:06:25,560 --> 00:06:30,760
तदा भवे हे कोयल

90
00:06:30,760 --> 00:06:35,800
कौए के घोंसले में तब तक बच्चे रखती है जब तक उड़ने लाक ना हो

91
00:06:35,800 --> 00:06:39,960
जाए और जैसे ही उने लाग हो जाते हैं तो कोयल

92
00:06:39,960 --> 00:06:44,240
जो है कौए के घोसे से बच्चा निकाल लेती है पालन पोषण भण

93
00:06:44,240 --> 00:06:48,280
पोषण कौवा करता है जब उसका फल हुआ तो

94
00:06:48,280 --> 00:06:52,840
कोयल वहां से उसके बच्चों को निकाल ले जाती है तो वही क ठीक है आपने

95
00:06:52,840 --> 00:06:56,960
उनके रहस्य को जान लिया अब आपका वहां रहना

96
00:06:56,960 --> 00:07:00,960
सही नहीं है कि सुरति दूस शति दूष लोग है आर्य

97
00:07:00,960 --> 00:07:05,560
समाज है यह लोग जो श्रुति मतलब वेद का

98
00:07:05,560 --> 00:07:09,800
जो रहस्य होना चाहिए वेद का जो अर्थ होना चाहिए उसके अनुसार

99
00:07:09,800 --> 00:07:14,040
ना करके मन मान ढंग से अर्थ करते हैं तो उस पत्र

100
00:07:14,040 --> 00:07:18,040
को देख कर के हमारे बाबा सनातन धर्म में आए थे फिर उने

101
00:07:18,040 --> 00:07:22,200
बहुत सनातन धर्म महाकाव्य और आ समाज का आपका

102
00:07:22,200 --> 00:07:27,400
द सत्या सत्यार्थ प्रकाश तो वैदिक सत्यार्थ प्रकाश लिखा

103
00:07:27,400 --> 00:07:32,040
मेरा वैदिक सत्यार्थ प्रकाश तो आ समाज अ हो ही

104
00:07:32,040 --> 00:07:36,160
गया तो बस उनका जो

105
00:07:36,160 --> 00:07:40,920
संकल्प है उनकी जो परंपरा थोड़ा हम लोग उसका प्रभाव है

106
00:07:40,920 --> 00:07:45,120
और अधिकांश जहां भी धन कपा महाराज

107
00:07:45,120 --> 00:07:49,280
थे उनको साथ में रखते थे और साक्षात

108
00:07:49,280 --> 00:07:50,840
सरस्वती कृपा थी हमारे

109
00:07:50,840 --> 00:07:55,040
पर बाबा ने शिवा बीज का जो है अनुष्ठान कराया वंतिका में उने

110
00:07:55,040 --> 00:07:59,560
पुस्तक में लिखा है किंतु बाबा इतनी कंजूसी कर विधि नहीं लिखी उन्होंने

111
00:07:59,560 --> 00:08:03,560
इतना ही संकेत करके छोड़ दिया है सेवा

112
00:08:03,560 --> 00:08:07,680
बीज का हमने अनुष्ठान किया है और उसी का प्रतिफल है

113
00:08:07,680 --> 00:08:12,200
कि हमारा हम कहीं शास्त्रार्थ में नहीं हारे बहुत उने 121

114
00:08:12,200 --> 00:08:16,560
पुस्तक लिखी है बड़ी अद्भुत पुस्तक हैं और

115
00:08:16,560 --> 00:08:20,600
बहुत उनका भ रहा और

116
00:08:20,600 --> 00:08:24,720
कपाती जी महाराज जी की जहा बात है वह तो भगवान आवेश

117
00:08:24,720 --> 00:08:28,920
के अवतार रहे और जो आपसे

118
00:08:28,920 --> 00:08:33,320
पूरे भारत व्याकरण की परंपरा है ना महाशय जी की

119
00:08:33,320 --> 00:08:37,560
वो महाशय जी ने जो है उनसे सन्यास लिया

120
00:08:37,560 --> 00:08:41,880
तो उनके शिष्य बोले हम तो कपा महाराज शास्त्र करते थे आपने

121
00:08:41,880 --> 00:08:45,920
उनसे सन्यास क्यों लिया नरवर के प्रधानाचार्य थे प्र

122
00:08:45,920 --> 00:08:50,040
विजय प्रकाश जी तो यहां धर्म महाराज

123
00:08:50,040 --> 00:08:54,120
र पढ़ते थे तो उनका उसे शास्त्रार्थ होता था और इसके बाद

124
00:08:54,120 --> 00:08:58,160
में उनके गुरु जी से बनारस में जाकर उनके गुरुजी सन्यास ले

125
00:08:58,160 --> 00:09:02,360
लिया इसके उसके बाद फिर वो जो हल्के हो गए तो उन्होंने कहा गुरु

126
00:09:02,360 --> 00:09:06,360
जीी हम तो बोले नहीं आप नहीं जानते हो य चक्र चूड़ामण

127
00:09:06,360 --> 00:09:10,560
धर्म स्वा कर पात्र जी महाराज कोई साधारण पुरुष नहीं है भग

128
00:09:10,560 --> 00:09:14,720
आवेश के अवतार है जब मंच पर बोलते हैं

129
00:09:14,720 --> 00:09:19,000
तो इतने विशेषण लगते चले जाएंगे साधारण मनुष्य की कल्पना से परे

130
00:09:19,000 --> 00:09:23,800
होते हैं तो हमारा य था उनका जो सिद्धांत है

131
00:09:23,800 --> 00:09:28,080
उनका जो आचार विचार आचरण है वह जो है समाज

132
00:09:28,080 --> 00:09:32,760
में जाना चाहिए और वैसे बच्चों को पढ़ाते भी हैं

133
00:09:32,760 --> 00:09:37,400
कि जो उसमें लिखा है कि जो है आ चोति

134
00:09:37,400 --> 00:09:41,640
शास्त्रनी शास्त्रार्थ स्थापना दप

135
00:09:41,640 --> 00:09:45,960
सती जो है संत है सन्यासी है महात्मा है गुरु है आचार्य

136
00:09:45,960 --> 00:09:50,320
है व क्या काम करते हैं कि आच शास्त्र जितने भी शास्त्र

137
00:09:50,320 --> 00:09:54,520
है उनका जो जो रहस्य विधि है निषेध

138
00:09:54,520 --> 00:09:58,840
है उसका जो तत्व है उसको जान करके

139
00:09:58,840 --> 00:10:03,200
क्या कर आचार स्थापना दती अन्य जो संसार

140
00:10:03,200 --> 00:10:07,320
के जो लोग में उसकी स्थापना करते हैं ये नहीं है हम

141
00:10:07,320 --> 00:10:11,800
तो त्रिकाल संध्या करें त्रिकाल भजन करें और कुई

142
00:10:11,800 --> 00:10:16,120
चीज समाज में न जाए तो उसका उतना प्रभाव नहीं होता तो उन्होने

143
00:10:16,120 --> 00:10:20,440
कहा आचार्य स्थापना दप जो हमारे आचार्य है संत

144
00:10:20,440 --> 00:10:21,400
है महात्मा है

145
00:10:21,400 --> 00:10:25,640
जो सनातन धर्म के पुरोधा है उनके जो आचार

146
00:10:25,640 --> 00:10:29,960
विचार जो आचरण है वो समाज में जाना चाहिए उनको प्रयास करना चाहिए

147
00:10:29,960 --> 00:10:34,880
जभी जो है लिखा स्वयं आच स्मात

148
00:10:34,880 --> 00:10:38,920
स्वयं में आचरण भी करें तस्मा आचार्य प्रते

149
00:10:38,920 --> 00:10:43,360
ज भी जाकर के आचार्य है और संत महात्मा पराव

150
00:10:43,360 --> 00:10:47,720
जो सं संज्ञा होती है व इसके द्वारा ही होती है बाकी

151
00:10:47,720 --> 00:10:53,160
व्यक्तिगत अपना सब कल्याण करते ही है प्रहलाद ने कहा जो

152
00:10:53,160 --> 00:10:57,160
है भगवान आपसे मैं यही जो है वरदान मांगता

153
00:10:57,160 --> 00:11:01,160
हूं कि आपकी जो माया है ना य मनुष्य

154
00:11:01,160 --> 00:11:05,160
को बहुत परेशान करती है और आप इस मनुष्य से अपनी माया

155
00:11:05,160 --> 00:11:09,800
को दूर कर लीजिए तो भगवान बोले कि अपना कल्याण करो

156
00:11:09,800 --> 00:11:14,040
ये संसार का आपने ठेका लेखा रखा है और तत्व ज्ञान की ज बात

157
00:11:14,040 --> 00:11:18,120
है व मुनियो जो मुनि है ऋषि है संत महात्मा है व

158
00:11:18,120 --> 00:11:22,120
संसार को उपदेश देंगे उनके तत्व ज्ञान हो मुक्त हो जाएंगे आपको तो

159
00:11:22,120 --> 00:11:26,320
मुक्त में करही देता हूं बो आपको महाराज बड़ा भ्रम है

160
00:11:26,320 --> 00:11:30,680
उन्होंने कहा कि जो है प्राय मु स मुक्त

161
00:11:30,680 --> 00:11:34,960
काम प्राय देव मुनि प्राया करके देवता है मनुष्य

162
00:11:34,960 --> 00:11:36,520
है ऋषि है म मनमा

163
00:11:36,520 --> 00:11:40,880
चरती वो मन धारण करके गुफा में प्रवेश कर जाते हैं और

164
00:11:40,880 --> 00:11:45,600
भरता संसार में चले गए तो संसार हमसे न चिपक जाए

165
00:11:45,600 --> 00:11:49,760
इस भै से कंदरा में पहाड़ों में जाकर के अपने कल्याण के लिए

166
00:11:49,760 --> 00:11:53,800
भजन करते हैं उन्हें संसार के कल्याण की इच्छा

167
00:11:53,800 --> 00:11:57,920
नहीं रहती ये लगता है कहीं हम जो भटक ना जाए उनका

168
00:11:57,920 --> 00:12:02,400
कल्याण ऋषि महर्षि की अपेक्षा आप कृपा करेंगे ज भी होगा अन्यथा

169
00:12:02,400 --> 00:12:06,520
नहीं होगा हमारा यह है कि अपना कल्याण यद

170
00:12:06,520 --> 00:12:11,000
भी कंदराम गुफा व्यक्तिगत के द्वारा हो सकता है

171
00:12:11,000 --> 00:12:15,200
किंतु नहीं प्रहलाद जी यह कह रहे अपने कल्याण के साथ साथ दूसरे का भी कल्याण

172
00:12:15,200 --> 00:12:19,760
होना चाहिए वह कौन है वो सनातन धर्म है

173
00:12:19,760 --> 00:12:24,440
उस सनातन जो धर्म है उसका में एक

174
00:12:24,440 --> 00:12:28,840
बहुत बढ़िया श्लोक है उसका देख रहस्य क्या है लोकप

175
00:12:28,840 --> 00:12:32,920
का करय सनातन स्मिन

176
00:12:32,920 --> 00:12:37,240
धर्मे प्रतिष्ठित पदे भ भाव का नाम

177
00:12:37,240 --> 00:12:41,480
भेदन कर्म नियतम नमन यस्य

178
00:12:41,480 --> 00:12:45,720
सं सेव नाथ परम सर्म जन समिति य सनातन

179
00:12:45,720 --> 00:12:51,040
धर्म का रहस्य है लोको उपकार करनाय

180
00:12:51,040 --> 00:12:52,040
सनातनम

181
00:12:52,040 --> 00:12:56,120
लोक के उपकार की जो भावना है व सनातन धर्म ही है

182
00:12:56,120 --> 00:13:00,200
अन्य मत मजहब है उनमें लोक के उपकार कि नहीं ईसाई है

183
00:13:00,200 --> 00:13:04,280
व अपने उसी की कल्पना करते हमारा ही भला हो कोई

184
00:13:04,280 --> 00:13:08,480
मत मज संप्रदाय अपने से संबंध रखते हैं केवल जो हमारा

185
00:13:08,480 --> 00:13:12,760
सनातन धर्म है ई संसार के कल्याण की भावना रखता है संसार

186
00:13:12,760 --> 00:13:16,800
में ऐसा कोई मत मज संप्रदाय नहीं है जो हमारे

187
00:13:16,800 --> 00:13:20,880
पूरे विश्व के कल्याण की भावना रखे विश्व के कल्याण की भावना तो केवल

188
00:13:20,880 --> 00:13:25,040
सनातन धर्म में है और सनातन धर्म के अर्थ किसी में नहीं

189
00:13:25,040 --> 00:13:29,160
है धर्म में प्रतिष्ठित भाव का नाम

190
00:13:29,160 --> 00:13:33,160
और धर्म की जो प्रतिष्ठा है वो सनातन धर्म मेंही है क्यों है

191
00:13:33,160 --> 00:13:37,360
कि भेदन कर्म नितम नेन यस्य सं

192
00:13:37,360 --> 00:13:41,800
सेव नाथ परम सर्म जना समिति भेदन कर्म नियतम

193
00:13:41,800 --> 00:13:45,840
जो हमारे ध कपा जी महाराज की घोषणा के

194
00:13:45,840 --> 00:13:49,880
स्व धर्मा चरण पर धर्मा च नि वतम अपने जो

195
00:13:49,880 --> 00:13:54,400
अपना जो धर्म है उसके द्वारा ही कल्याण होगा जो परम धर्म है

196
00:13:54,400 --> 00:13:59,120
उसके द्वारा कल्याण नहीं हो सकता है देवा लब्ध संतोषम

197
00:13:59,120 --> 00:14:03,440
देवताओं के द्वारा जो प्राप्त हो जा संतोष करना चाहिए व आत्म

198
00:14:03,440 --> 00:14:07,240
वि चरण अर्चन जो आत्म वेता है जो ऋषि

199
00:14:07,240 --> 00:14:11,400
है महर्षि है तत्व ज्ञानी है उनकी चरण सेवा करके आप

200
00:14:11,400 --> 00:14:15,600
जो चाहो सो प्राप्त कर सकते हो किंतु उसमें स्वधर्मा चरण

201
00:14:15,600 --> 00:14:19,840
की आवश्यकता है उनको महाराज घोषणा थी और नरवर

202
00:14:19,840 --> 00:14:24,000
तो सबका वो रहा ही है उड़िया बाबा आपके हरि बाबा

203
00:14:24,000 --> 00:14:28,080
इत्यादि य रहते थे तो हा हा

204
00:14:28,080 --> 00:14:32,280
सब तपस्थली नर जो है सब तप ये तो सब महापुरुष है इनके

205
00:14:32,280 --> 00:14:36,480
तो गुरुदेव के जो जगत शंकराचार्य जी है उनके मुख से इनके

206
00:14:36,480 --> 00:14:40,480
बारे में सुना करते हैं जब कभी इनम से किसी ना किसी एक का

207
00:14:40,480 --> 00:14:44,640
जो नाम है वह आता रहता है उनके मु पर हा तो उसमें जो

208
00:14:44,640 --> 00:14:48,960
है अपने अलग अलग सिद्धांत थे हरि बाबा थे उ हरि बाबा बांध

209
00:14:48,960 --> 00:14:53,080
बनवाया 44 किलोमीटर का उधर के गांव जो बाढ में

210
00:14:53,080 --> 00:14:57,080
गंगा से बह जाती थ सरकार से कहा सरकार ने मना कर दिया हमसी आर्थिक

211
00:14:57,080 --> 00:15:01,280
व्यवस्था नहीं है किंतु बाबा जी ने हरि बाबा जी ने हमारे महाराज

212
00:15:01,280 --> 00:15:05,560
जी ने बना उठाया तो 44 किलोमीटर उस समय बांध बनवाया

213
00:15:05,560 --> 00:15:09,760
जिससे हजारों लाखों की संख्या में लोगों का कल्याण हुआ ऐसी विभूतियां

214
00:15:09,760 --> 00:15:13,840
थी अच्छा और बा मतलब अपने से

215
00:15:13,840 --> 00:15:18,520
अपने बल पर बांध निर्माण करवा लिया हा बिल्कुल अपने बल पर कराया

216
00:15:18,520 --> 00:15:22,240
और अन्नपूर्णा व्यवस्था बाबा जी ने संभाली

217
00:15:22,240 --> 00:15:27,200
और कीर्तन करते करते हर की हर संकीर्तन करते करते बनाया

218
00:15:27,200 --> 00:15:31,600
तो उसमें हर महाराज जी का उसम थोड़ा निवेश था

219
00:15:31,600 --> 00:15:35,800
बोले के दुजे तर है अथवा स्त्रिया है माता

220
00:15:35,800 --> 00:15:40,000
है उनका तो केवल संकीर्तन से कल्याण हो जाएगा किंतु ब्राह्मण

221
00:15:40,000 --> 00:15:44,080
है क्षत्रिय है वैश्य है उनका संध्या वंदना आद

222
00:15:44,080 --> 00:15:48,320
की सह संकीर्तन से काम होगा अहा नि जम कर्म कृषण

223
00:15:48,320 --> 00:15:52,560
कृष्ण वाना आपने जो अपने कर्म को छोड़े केवल कृष्ण कृष्ण

224
00:15:52,560 --> 00:15:56,680
राधे राधे कहते रहे तो कल्याण नहीं होना है इन लोगों के लिए जो है

225
00:15:56,680 --> 00:16:00,720
साथ में जो अपना स्वधर्मा चरण जो वेद का विधान है

226
00:16:00,720 --> 00:16:04,960
जो वेद का सिद्धांत उसका परिपालन करते हुए भगवान नाम का

227
00:16:04,960 --> 00:16:09,000
कीर्तन करेंगे तो कल्याण होगा करते में य नाम

228
00:16:09,000 --> 00:16:13,360
त कयास उसके द्वारा बाद में जो है

229
00:16:13,360 --> 00:16:17,520
विष्णवे नम विष्णवे नम विष्ण न बोलते ही है तो उनका

230
00:16:17,520 --> 00:16:21,520
य घोषणा थी तो उसमें एक बार जो

231
00:16:21,520 --> 00:16:26,280
है आपका ओम जगदीश हरे है ना

232
00:16:26,280 --> 00:16:30,480
प्र का उच्चारण सभी माताए बोलती है तो कोठी पर

233
00:16:30,480 --> 00:16:34,480
सतना कथा थी जैसे भक्त लोगों ने हुआ शुरू हुआ प्रा

234
00:16:34,480 --> 00:16:37,400
उठ ग वो चले गए और या

235
00:16:37,400 --> 00:16:41,560
बाबा जी से भी एक बार कीर्तन करा रहे थे बोले कि नहीं इसम जो है ओमकार

236
00:16:41,560 --> 00:16:45,600
का ना कर तो महाराज सब लोग मानते थे उनकी बात मालवी जी

237
00:16:45,600 --> 00:16:50,320
से उन्होने कहा मालवी जी का उनका व शास्त्र मतलब विचार विम

238
00:16:50,320 --> 00:16:54,640
हुआ आपके हरिद्वार में तो बोले

239
00:16:54,640 --> 00:16:58,680
किसकी जीत किसकी पराजय बोले के नहीं जीत पराजय का मामला

240
00:16:58,680 --> 00:17:02,800
नहीं महाराज का जो अनुभव है जो तपस्या है इसके सामने मनुष्य कौन टिक सकता

241
00:17:02,800 --> 00:17:06,960
है तो ऐसा करके समाज में नहीं कह सकते मालवी विश्वविद्यालय

242
00:17:06,960 --> 00:17:11,120
बनवाना था ना हम तो बात टाल गए तो धर्म

243
00:17:11,120 --> 00:17:15,560
स्वामी करपात्री महाराज का जो वक्तव्य होता था समझौता

244
00:17:15,560 --> 00:17:19,760
वाला नहीं जो है वह है एक बार की घटना है मैंने

245
00:17:19,760 --> 00:17:23,800
वीडियो में भी डाली है वो यब केदार घाट पर रहते थे तो

246
00:17:23,800 --> 00:17:27,920
साथ में जो है संत महात्मा दंडी महात्मा भी रहते थे तो वो

247
00:17:27,920 --> 00:17:31,920
गंगा स्नान ध्यान में जा रहे थे तो उने अपने शिष्य को देखा

248
00:17:31,920 --> 00:17:36,760
तो उन्होने कहा ये आप गलत कर रहे हैं ये तो शास्त्र के अनुकूल नहीं है

249
00:17:36,760 --> 00:17:40,800
तो शिष्य ने यही कहा कि गुरु जी मैं तो आपको शास्त्र

250
00:17:40,800 --> 00:17:45,040
मानता हूं आप आपको ही भगवान मानता हूं आप जैसा आचरण करते

251
00:17:45,040 --> 00:17:49,120
वैसा करता हूं मैं तो बड़ा क्रोध में

252
00:17:49,120 --> 00:17:52,720
बोले डाट कर के अरे ये धर्म स स्वामी करपात

253
00:17:52,720 --> 00:17:56,880
जो शास्त्र नहीं है ये हाड़ मास का जो है पुंज है इससे

254
00:17:56,880 --> 00:18:00,960
गलती हो सकती है आचरण की बात करो तो शास

255
00:18:00,960 --> 00:18:04,960
के आचरण की बात करना आप पहले शस मिलान करि मुझ पर घटती

256
00:18:04,960 --> 00:18:09,120
है तो करना केव मुझ मत मानि ऐसा कोई कह सकता है किसी

257
00:18:09,120 --> 00:18:13,920
में सामर्थ्य नहीं है ऐसा शम कोपन पर

258
00:18:13,920 --> 00:18:18,200
जब कोई शिष्य गुरु से प्रश्न करे और

259
00:18:18,200 --> 00:18:22,800
गुरु जी उत्तर देने में सामर्थ्य वान ना तो क्रोध कर शांत कर देते हैं

260
00:18:22,800 --> 00:18:27,080
शेषम कोपन पूरे उसे बोलती बंद हो जाती है किंतु नहीं

261
00:18:27,080 --> 00:18:31,920
यह अदभुत धन कपाती महाराज में थी

262
00:18:31,920 --> 00:18:36,320
और उनका यही था का भेदन कर्मत ने

263
00:18:36,320 --> 00:18:40,440
जिसका जो कर्म है उसमें प्रवत होकर के वह कल्याण कर सकता

264
00:18:40,440 --> 00:18:44,720
है हमारी माता है उनका केवल धर्म जो है पति की सेवा

265
00:18:44,720 --> 00:18:48,920
से कल्याण हो जाएगा उ अन्य जब तब की आवश्यकता नहीं है जिनका सेवा

266
00:18:48,920 --> 00:18:53,280
धर्म है वह जो है अपने सेवा से अपना कल्याण कर सकते हैं

267
00:18:53,280 --> 00:18:57,600
और ब्राह्मण का जो धर्म है व ब्राह्मण भीत जो कर्म है उसके द्वारा

268
00:18:57,600 --> 00:19:01,640
क्षत्रिय का कर्म सुद्धे किससे संग्राम क्षत्रिय

269
00:19:01,640 --> 00:19:06,400
स्मत ब्रह्मचर्य तपो मंत्र ब्राहमम ित सर्वदा

270
00:19:06,400 --> 00:19:08,000
क्षत्र जो होंगे ध के द्वारा

271
00:19:08,000 --> 00:19:12,400
कल्याण करेंगे वैसे व्यापार के द्वारा करेंगे और ब्राह्मण

272
00:19:12,400 --> 00:19:16,640
जो है वह तो ब्रह्मचर्य तप है सम दम दया दान

273
00:19:16,640 --> 00:19:21,920
सबसे विशिष्ट होने के बाद ही कल्याण कर सकता है सबसे बड़ा जो भरोसा

274
00:19:21,920 --> 00:19:26,880
है भगवान का ब्राह्मणों परही है क्यों उनके अंदर वो गुण है

275
00:19:26,880 --> 00:19:30,920
अब जैसे आपका फोन आ आया था उससे पहले

276
00:19:30,920 --> 00:19:34,960
जो है वहा से एक व्यक्ति ने

277
00:19:34,960 --> 00:19:38,960
बात की हमसे आसाम की शायद उन्होने कहा कि

278
00:19:38,960 --> 00:19:43,640
जो स्कोन वार है हरे कृष्णा वह जो है

279
00:19:43,640 --> 00:19:48,960
कर्म के द्वारा जाति का निर्धारण करते हैं

280
00:19:48,960 --> 00:19:53,040
वो कर्म ठीक है तो ब्राह्मण के लिए भी जो दीक्षा दे देते

281
00:19:53,040 --> 00:19:57,280
हैं ये क्या सही है मैंने नहीं ये सही नहीं है

282
00:19:57,280 --> 00:20:02,560
क्योंकि जो जाति है नित्य सति अनेक समत

283
00:20:02,560 --> 00:20:06,800
जाति जाति नित्य है और अनेक में स संबंध से रहती

284
00:20:06,800 --> 00:20:11,400
है जैसे ब्राह्मण में क्या जाती ब्राह्मण व ब्राह्मण में ही रहेगी

285
00:20:11,400 --> 00:20:15,600
व क्षत्रिय में रहेगी क्षत्र में क्या क्षत्रिय क्त्र में व वव

286
00:20:15,600 --> 00:20:20,320
व में रहेगा हा आप ये कहो कि जो है

287
00:20:20,320 --> 00:20:23,040
यदि ब्राह्मण है और कर्म नहीं करता है

288
00:20:23,040 --> 00:20:27,720
तो वे जो है पतित की संगा आते हैं उसमें लिखा है त्र

289
00:20:27,720 --> 00:20:32,040
गोचरा यह भेद नहीं किया कवि शास्त्र ने त्र शन गोचरा

290
00:20:32,040 --> 00:20:36,080
अ शति माने वेद का जो पठन पाठ है स्त्री भी नहीं कर सकती है ना

291
00:20:36,080 --> 00:20:40,360
सेवा धर्म जिनका सेवा धर्म है वो भी नहीं कर सकते हैं और जो पतित

292
00:20:40,360 --> 00:20:44,440
ब्राह्मण है वह भी जो है वेद का स्वाध्याय

293
00:20:44,440 --> 00:20:48,600
नहीं कर सकता है और किसी अनुष्ठान में जो है वो पात श्राद्ध

294
00:20:48,600 --> 00:20:53,320
का भोजन भी नहीं कर सकता है तो कर्म भ्रष्ट होने से इससे जो है उसका बहिष्कार हो जाएगा

295
00:20:53,320 --> 00:20:57,480
किंतु उसकी व जाति नहीं रहेगी यह नहीं कहा जा सकता

296
00:20:57,480 --> 00:21:01,480
जाति तो नित्य वो कहीं जो है आने जाने वाली नहीं है

297
00:21:01,480 --> 00:21:05,560
यदि कर्म के आधार पर जाति का निर्णय करोगे तो व्यक्ति दिन में कितने

298
00:21:05,560 --> 00:21:09,640
प्रकार के क्रोध भी करता है पुरुष भी करता है व्यापार

299
00:21:09,640 --> 00:21:14,160
भी करता है तो दिन में चार जातिया बदलनी

300
00:21:14,160 --> 00:21:18,400
चाहिए जी आचार्य मैंने इस बारे में ना यह जो

301
00:21:18,400 --> 00:21:23,080
कर्म से जो प्रचार करते हैं वर्ण का

302
00:21:23,080 --> 00:21:27,160
मैंने आज तक मतलब कई बार ऐसा हुआ कि एक तो यह जो आर्य समाज

303
00:21:27,160 --> 00:21:31,280
द्वारा इसका शुरुआत की जाती है मतलब अपने जो जो वेदों को मानने वाले

304
00:21:31,280 --> 00:21:35,400
होते हुए और कर्म के आधार पर जो है वर्ण को बताने का प्रयास

305
00:21:35,400 --> 00:21:39,640
करते हैं तो उसका पर्य अवसान किसम है कर्म

306
00:21:39,640 --> 00:21:43,640
पर आधारित भाई व्यवस्था यह होती है कि

307
00:21:43,640 --> 00:21:47,840
हम जब ब्राह्मण की आवश्यकता हो तो हमें ब्राह्मण प्राप्त हो जाए

308
00:21:47,840 --> 00:21:52,680
मगर जब हम जब ब्राह्मण को लेने जाए तो वो ये कह सकता है कर्म आधारित

309
00:21:52,680 --> 00:21:57,160
वण व्यवस्था में मैंने 15 मिनट पहले क्षत्रिय हो गया हूं

310
00:21:57,160 --> 00:22:01,160
और क्षत्रिय को लेने गए कि चलो भैया हमारी रक्षा कर दो

311
00:22:01,160 --> 00:22:06,080
तो वह कहेगा मैं पाच मिनट पहले ब्राह्मण हो गया हूं कर्म से

312
00:22:06,080 --> 00:22:10,080
अब अर्जुन को श्री कृष्ण ने कहा कि जा अर्जुन तेरा धर्म है

313
00:22:10,080 --> 00:22:14,160
युद्ध करना रक्षा करना तो अर्जुन वहां फ कहने लगेगा कि मैंने अभी

314
00:22:14,160 --> 00:22:18,440
अभी कथा वाचना शुरू कर दिया है और मैं जा रहा हूं कथा बाच तोव ब्राह्मण

315
00:22:18,440 --> 00:22:22,880
हो गए तो ये उत्तर

316
00:22:22,880 --> 00:22:27,080
पू मतलब एक ऐसा उत्तर जिससे कोई सामान्य व्यक्ति संतुष्ट

317
00:22:27,080 --> 00:22:29,160
हो सके कोई भी व्यक्ति नहीं देते

318
00:22:29,160 --> 00:22:33,720
वो ना ये आर समाज ना ही स्कोन तो आचार्य श्री में

319
00:22:33,720 --> 00:22:37,840
जी जी उसमें ऐसा आर्य समाज देखिए

320
00:22:37,840 --> 00:22:41,840
ना ये दोले अपनी बात करता है वो

321
00:22:41,840 --> 00:22:45,960
देते कहते हैं हमारे जो है इनके

322
00:22:45,960 --> 00:22:50,040
जो आका है जिनको जो आदर्श मानते हैं कि जन्मन

323
00:22:50,040 --> 00:22:54,360
जायत शुद्र संस्कार दरते वेदा ब्यास विप त्र

324
00:22:54,360 --> 00:22:59,000
सत्री मुच और जबकि ये कहीं है नहीं

325
00:22:59,000 --> 00:23:03,600
पाठ है कि जन्मना ब्राह्मण गया संस्कारो दते

326
00:23:03,600 --> 00:23:07,920
वेदा ब्यास प्रतम त्र सत्र मु जन्मना ब्राह्मणो

327
00:23:07,920 --> 00:23:11,960
गया जन्म से ब्राह्मण है और संस्कार

328
00:23:11,960 --> 00:23:16,200
से दुज होता है द्या संस्काराम जन्मना जाति दज

329
00:23:16,200 --> 00:23:20,720
जिका योग संस्कार विवा संस्कार हो य पर मीमांसा करनी पड़ती है

330
00:23:20,720 --> 00:23:25,080
दो संस्कार का मतलब है कि योग संस्कार

331
00:23:25,080 --> 00:23:29,480
तक सब संस्कार जिसके हो गए हो ये नहीं है केवल पूरे जीवन

332
00:23:29,480 --> 00:23:34,320
संस्कार कर लेगा हो जाएगा वो उससे पहले जो

333
00:23:34,320 --> 00:23:38,360
है संस्कार विहित है शास्त्र में व यग प

334
00:23:38,360 --> 00:23:42,560
से पहले हो जाए और दो संस्कार हो जाए द बन जाएगा व और वेद

335
00:23:42,560 --> 00:23:44,280
का अभ्यास कर विप हो जाए तीनों

336
00:23:44,280 --> 00:23:48,320
चीज मिल जाए स हो जाएगा और सत्री

337
00:23:48,320 --> 00:23:52,480
तो आज के युग में मुझे लगता है कि बड़ा कठिन है कौन

338
00:23:52,480 --> 00:23:56,880
सोत्री कौन सोत्री कहना बड़ा कठिन है पहले

339
00:23:56,880 --> 00:24:01,360
सोत्री ब्राह्मण होते थ सोतिया हो गया है तो जब सोत्री

340
00:24:01,360 --> 00:24:06,160
लोग सोने लगे तो सोतिया हो गई जो है अप भ्रम होते होते

341
00:24:06,160 --> 00:24:10,160
और यह है पाठ व का किंतु उन्होने अपने मन माने से क्या कर

342
00:24:10,160 --> 00:24:14,200
दिया जन्म जा शुद्र

343
00:24:14,200 --> 00:24:18,480
देखो जन्म से शुद्र होता इनकी बात इही से कट रही है

344
00:24:18,480 --> 00:24:22,960
हमारे जो जितने भी इस लाइ में जुड़े हुए थोड़ा ध्यान पूर्वक सुनेंगे तो

345
00:24:22,960 --> 00:24:27,480
आप कभी भी भ्रमित नहीं होंगे कि जन्मन

346
00:24:27,480 --> 00:24:31,680
जायते आप जन्म से शूद्र मान रहे

347
00:24:31,680 --> 00:24:36,080
हैं और संस्कार से आप क्या मान रहे हैं दज मान रहे

348
00:24:36,080 --> 00:24:41,320
हैं संस्कार से क्या मानने है दज

349
00:24:41,320 --> 00:24:47,320
तो देखि एक श्लोक

350
00:24:55,840 --> 00:24:59,960
में तो एक श्लोक में जो है जाति

351
00:24:59,960 --> 00:25:04,320
भी जन्म से जाति का निर्णय कर रहे हैं और

352
00:25:04,320 --> 00:25:08,360
उसी श्लोक में आप जो है कर्म से दुज मानने

353
00:25:08,360 --> 00:25:12,680
हैं आप देखिए तो या तो आप

354
00:25:12,680 --> 00:25:16,680
जाति से जो है

355
00:25:16,680 --> 00:25:20,760
जाति को मानी जो है जन्म से जो जाति होती है ही

356
00:25:20,760 --> 00:25:25,000
जाति मानी जाती है अथवा कर्म से मानि है हमारे जिनका

357
00:25:25,000 --> 00:25:29,160
सेवा धर्म है जो शूद्र लोग है जो कह रहे हो उने ने क्या बिगाड़ा

358
00:25:29,160 --> 00:25:33,160
उनको जन्म से क्यों मानने आप आप जो है आर्य समाधि

359
00:25:33,160 --> 00:25:37,160
से प्रश्न करिए कि जन्मना जायते शुद्र

360
00:25:37,160 --> 00:25:41,320
संस्कारो दते कि

361
00:25:41,320 --> 00:25:45,800
जन्म से आप शुद्र मानने और कर्म से आप जो है छ

362
00:25:45,800 --> 00:25:50,000
ब्राह्मण मान रहे हैं तो ऐसी

363
00:25:50,000 --> 00:25:54,080
स्थिति में जो है या तो जन्म से मान कर्म से दोनों

364
00:25:54,080 --> 00:25:58,400
से नहीं मानना चाहिए दोनों से नहीं मानना चाहिए

365
00:25:58,400 --> 00:26:02,520
जी अध कचरा जो मामला है ना इनका यह गलत है

366
00:26:02,520 --> 00:26:06,720
जी जी इसमें इसमें इसमें आचार्य श्री

367
00:26:06,720 --> 00:26:10,960
इन्होंने क्या किया है ना पहले तो ये जो जन्म जाति

368
00:26:10,960 --> 00:26:15,320
शूद्र वाली बात पूज्य गुरुदेव जो है जगतगुरु शंकराचार्य जी

369
00:26:15,320 --> 00:26:20,360
उनके सामने भी आया था तो उन्होंने भी मतलब इस पर यही कहा था

370
00:26:20,360 --> 00:26:24,400
कि अगर मान लो यह कहीं है भी शास्त्र में स्कंद पुराण का

371
00:26:24,400 --> 00:26:28,400
नाम लिया जाता है तो इस तरह से उन्होंने कहा था अगर है

372
00:26:28,400 --> 00:26:32,720
भी तो अन्य शास्त्रों का जो वक्तव्य है

373
00:26:32,720 --> 00:26:37,000
जो प्रमाण है उनका खंडन ना हो तो हमें इसका अर्थ लेना पड़ेगा कि शूद्र

374
00:26:37,000 --> 00:26:41,040
वत होता है जन्म से कोई भी शूद्र वत

375
00:26:41,040 --> 00:26:45,040
होता है मगर शूद्र ही नहीं होता है जैसे कई बार

376
00:26:45,040 --> 00:26:49,240
कई जगह पर भ्रूण की हत्या करने वाले को भ्रूण को खाने वाले को राक्षस

377
00:26:49,240 --> 00:26:53,520
कहा गया शास्त्र में उ प्र भी नहीं अब उसकी

378
00:26:53,520 --> 00:26:57,560
योनि राक्षस तो नहीं मान लेंगे तो हमें मानना पड़ेगा जो भ्रूण

379
00:26:57,560 --> 00:27:02,000
को खा रहा है वो राक्षस वत है वो राक्षस वत है

380
00:27:02,000 --> 00:27:06,520
तो ये उन्होंने अर्थ किया अच्छा इसमें ये सत्यार्थ प्रकाश में

381
00:27:06,520 --> 00:27:10,520
भी एक मंत्र है उसका

382
00:27:10,520 --> 00:27:14,560
हालांकि हमारे जो परंपरा प्राप्त आचार्य है वोह अर्थ नहीं लिया है जो

383
00:27:14,560 --> 00:27:18,720
इन्होंने किया मगर यह अपनी ही बात से ऐसे कट रहा है

384
00:27:18,720 --> 00:27:23,080
कि वहां पर इन्होंने कोट कर दिया कि ब्राह्मण क्षत्रिय

385
00:27:23,080 --> 00:27:26,040
वैश्य शूद्र सभी को वेद पढ़ने का अधिकार है

386
00:27:26,040 --> 00:27:30,040
यजुर्वेद 26 दो अब हुआ क्या

387
00:27:30,040 --> 00:27:34,280
कि शूद्र तो वही है जो जिसका उपनयन संस्कार

388
00:27:34,280 --> 00:27:38,280
नहीं है जो वेद नहीं पढ़ता इनके हिसाब से

389
00:27:38,280 --> 00:27:42,440
इनके ही अनुसार शूद्र वही है जो द्विज नहीं है और जो वेद

390
00:27:42,440 --> 00:27:46,600
पढ़ता है व द्विज है तो इन्होंने अपनी ही बात को वहां काट

391
00:27:46,600 --> 00:27:50,640
दिया जहां कहा कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश शूद्र सभी को वेद पढ़ने

392
00:27:50,640 --> 00:27:54,760
का अधिकार है तो इसका अर्थ है कि इन्होंने वहां पर मान लिया ब्राह्मण क्षत्रिय

393
00:27:54,760 --> 00:27:58,800
वैश शूद्र यह जन्म से हैं

394
00:27:58,800 --> 00:28:03,280
इन्होंने स्वयं ही मान लिया क्योंकि शूद्र तो इनके इनकी जो

395
00:28:03,280 --> 00:28:07,280
जो इनकी थ्योरी है उसके अनुसार शूद्र तो वही है

396
00:28:07,280 --> 00:28:11,440
जो वेद नहीं पढ़ रहा है जो वेद में अधिकृत नहीं है जिसका

397
00:28:11,440 --> 00:28:15,640
उपनयन नहीं हुआ जो द्विज नहीं है और यदि कोई वेद पढ़ रहा है इनके यहां

398
00:28:15,640 --> 00:28:19,720
तो वो द्विज है अगर कोई वेद पढ़ रहा है तो वो द्विज

399
00:28:19,720 --> 00:28:24,160
है तो फिर जब शूद्र का किसी भी स्थिति में वेद पढ़ना

400
00:28:24,160 --> 00:28:28,400
सिद्ध ही नहीं हो रहा है तो इन्होंने अपना 26 दो के मंत्र में कौ ब

401
00:28:28,400 --> 00:28:32,440
छत्रीय व शूद्र कहा व किस आधार पर कहा तो वहा इन्होंने जन्म से

402
00:28:32,440 --> 00:28:36,840
माना अभी हम इनके इनका एक गुरुकुल है

403
00:28:36,840 --> 00:28:40,920
शाहजहांपुर में वहां पर जो आचार्य है

404
00:28:40,920 --> 00:28:41,420
आर्य

405
00:28:41,320 --> 00:28:45,760
समाज के रक्षपाल देव आर्य उनके साथ भी हमने

406
00:28:45,760 --> 00:28:50,320
चर्चा मतलब उनका एक इंटरव्यू लिया तो उन्होंने इस बात को एडमिट किया

407
00:28:50,320 --> 00:28:54,440
उन्होंने मान लिया कि हां सबसे पहले किसी का

408
00:28:54,440 --> 00:29:00,440
भी जो वर्ण होता है व उसके माता पिता से ही माना जाएगा [संगीत]

409
00:29:00,720 --> 00:29:04,920
तो ये इन्होंने मान लिया अब वो अब वेद का हीय कोट कर रहे हैं जिस पर ये जन्म

410
00:29:04,920 --> 00:29:09,840
आधारित है अब वेद के कोर्ट के आधार पर ये नहीं कह सकते कर्म से बदलता है खैर

411
00:29:09,840 --> 00:29:14,520
तो मैं आचार्य शी थोड़ा सा मुख्य विषय पर ध्यान लाना चाहूंगा

412
00:29:14,520 --> 00:29:18,760
वो जो सोरो में जो अभी शास्त्रार्थ स्पर्धा हुई

413
00:29:18,760 --> 00:29:22,880
थी जिसमें कि आर्य समाज भी आपके समक्ष था

414
00:29:22,880 --> 00:29:27,000
और अन्य भी थे और वहां पर आप जो है विजय हुए

415
00:29:27,000 --> 00:29:31,200
तो उसका अनुभव कैसा क्या था कौन सा थोड़ा सा उस पर थोड़ा

416
00:29:31,200 --> 00:29:35,400
सा प्रकाश डाले कि किस एक किस क्रम में आप जो है आपको विजय

417
00:29:35,400 --> 00:29:39,520
विजय प्राप्त हुई वो कैसा था हा उसमें वो लोग

418
00:29:39,520 --> 00:29:43,520
प्रश्न कर रहे थे हम लोग उत्तर देते जा रहे थे उसमें ऐसा था

419
00:29:43,520 --> 00:29:48,200
कि सबके लिए 1515 मिनट का अवसर मिला था बोलने का

420
00:29:48,200 --> 00:29:52,280
और जो विपक्ष लोग था उसमें से किसी को प्रश्न

421
00:29:52,280 --> 00:29:56,360
करना है तो उसको उत्तर देना था और उस उत्तर से संतुष्ट भी

422
00:29:56,360 --> 00:30:00,640
होना था वो तो लोगों ने प्रश्न

423
00:30:00,640 --> 00:30:05,440
किए हम लोगों ने उत्तर दिए और हमारा

424
00:30:05,440 --> 00:30:09,920
विषय सा विषय था वेदो खिलो धर्म मूलम यह विषय

425
00:30:09,920 --> 00:30:15,040
था और ऐसा होता है कि जो है

426
00:30:15,040 --> 00:30:19,960
उसमें निर्णायक मंडल में सभी तरह के लोग होते ही है

427
00:30:19,960 --> 00:30:24,000
तो वेद खलो धर्म हमारे सिद्धांत है उसमें

428
00:30:24,000 --> 00:30:28,000
यह है कि सनातन धर्म धर्म का जो

429
00:30:28,000 --> 00:30:32,040
मल है जो वेद जो है अखिल भाग ही धर्म का

430
00:30:32,040 --> 00:30:36,280
मूल है ये अन्य जो परंपरा

431
00:30:36,280 --> 00:30:40,440
है धर्मिल मंत्र भाग को ही वेद

432
00:30:40,440 --> 00:30:44,840
मानते हैं सतपति ब्राह्मण को ही वेद नहीं मानते हैं ई

433
00:30:44,840 --> 00:30:48,920
जो है शतपथ ब्राह्मण और वेद दोनों आपस में एक ही चीज

434
00:30:48,920 --> 00:30:53,160
है किंतु ये लोग नहीं मानते हैं तो हमने वहा यही कहा

435
00:30:53,160 --> 00:30:55,840
कि वेदो खिलो धर्म मूलम में जो है सनातन

436
00:30:55,840 --> 00:31:00,520
धर्म का जो मूल है व अखिल वेद है आखिर वेद से तात्पर्य है

437
00:31:00,520 --> 00:31:01,840
विधि मंत्र

438
00:31:01,840 --> 00:31:06,160
विधि अर्थवा इन तीनों के द्वारा जब

439
00:31:06,160 --> 00:31:11,040
आप अर्थ करोगे जब जाकर के वेदार्थ होगा

440
00:31:11,040 --> 00:31:15,040
किंतु वो तो केवल फिर हमने उदाहरण भी दिया उसमें जो

441
00:31:15,040 --> 00:31:19,840
है सा भाष में लिखा भी है इष्ट परिहार लोक वेदा

442
00:31:19,840 --> 00:31:24,600
वेद उसको कहेंगे जो इष्ट की प्राप्ति करे अनिष्ट का परिहार करे

443
00:31:24,600 --> 00:31:28,640
उसी का नाम वेद है प्रवृति मार्ग में ही वेद प्रवृत करता है

444
00:31:28,640 --> 00:31:32,680
परिवन निवृति मार्ग में है उसका जो परिवन है

445
00:31:32,680 --> 00:31:36,920
वह निवृति मार्ग में है और सबसे अधिक उनका जो अवतारवाद

446
00:31:36,920 --> 00:31:40,920
का खंडन करना था मूर्ति का खंडन करना था

447
00:31:40,920 --> 00:31:46,040
तो उसका हम लोगों ने खंडन किया कि

448
00:31:46,040 --> 00:31:50,200
आप उन्होंने अपने प्रवचन में यह कहा था कि निराकार

449
00:31:50,200 --> 00:31:54,280
की उपासना करते हैं जो निर्गुण है निराकार है

450
00:31:54,280 --> 00:31:58,040
उपासना करते हैं तो आप देखिए

451
00:31:58,040 --> 00:32:02,440
जो जिसके जो निर्गुण है और निराकार है जिसके

452
00:32:02,440 --> 00:32:06,520
आकार निकल गया है उसकी उपासना कर रहे हैं और उपासना क्या अर्थ

453
00:32:06,520 --> 00:32:10,800
है उप समीपे आसनम उप समीपे आसनम

454
00:32:10,800 --> 00:32:14,920
जो पास में बैठा उसकी उपासना करोगे निराकार

455
00:32:14,920 --> 00:32:17,800
निर्ण का उपासना से

456
00:32:17,800 --> 00:32:21,920
आकाश पाताल की तरह विरोध हो गया नहीं हो गया यह भी कह रहे हैं कि

457
00:32:21,920 --> 00:32:26,040
नि निराकार भी कह रहे हैं उसम उपासना शब्द भी जोड़ रहे हैं उपासना की

458
00:32:26,040 --> 00:32:30,440
व्याख्या करोगे उप समप आसन में की उपासना के पास में है

459
00:32:30,440 --> 00:32:34,640
क्या बात अच्छा दूसरी बात ये कह रहे हैं कि य निर्गुण

460
00:32:34,640 --> 00:32:38,640
रा का सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान भी है तो हमने कही कि जो

461
00:32:38,640 --> 00:32:42,640
बद तो व्याघात क्यों है कोई एक बोले कि भाई मैं मेरे मुख में

462
00:32:42,640 --> 00:32:47,480
जुआ नहीं है इसलिए नहीं बोल पा रहा हूं मैं म मुखे जुआ नास्ति

463
00:32:47,480 --> 00:32:51,480
मेरे मुख में जुआ नहीं है जुआ नहीं है ये कैसे कह रहे मेरे मुख में जुआ नहीं

464
00:32:51,480 --> 00:32:55,520
है इसको कहते हैं बद तो व्याघात अपनी

465
00:32:55,520 --> 00:32:59,680
बात अपने से ही कटे अपनी बात जो है अपने से

466
00:32:59,680 --> 00:33:04,080
कट जाए उसका नाम है बद तो व्याघात तो हमने कहा रा

467
00:33:04,080 --> 00:33:08,080
का सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान है तो सगुण साकार होने में

468
00:33:08,080 --> 00:33:12,080
जो है क्या आपत्ति है जो सगुण साकार है उसम होने में क्या

469
00:33:12,080 --> 00:33:16,160
आपत्ति है जो सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान तो कुछ भी

470
00:33:16,160 --> 00:33:20,800
हो सकता है तो आप ये कहो कि सर्व शक्तिमान है

471
00:33:20,800 --> 00:33:24,920
ना के अल्प शक्तिमान विशेषण दीजिए उसके लिए जो है

472
00:33:24,920 --> 00:33:29,040
क्यों लिखा गुण ही अन भूतम सपास गुण गुण

473
00:33:29,040 --> 00:33:33,400
होते हुए गुण से अनुभूत रहता है

474
00:33:33,400 --> 00:33:34,400
वो

475
00:33:34,400 --> 00:33:38,560
गुण होते हुए भी गुणों से अन भूत रहता है सभी जगह लिखा हुआ

476
00:33:38,560 --> 00:33:43,240
है तो फिर उन्होने वही उसम प्रश्न कर दिया कि

477
00:33:43,240 --> 00:33:47,680
यदि हम जो परमात्मा को मूर्तिया मानेंगे तो फिर वह अल्पज्ञ

478
00:33:47,680 --> 00:33:52,440
हो जाएगा म भ्रम आपके कि सर्वम खलम ब्रह्म

479
00:33:52,440 --> 00:33:56,440
जो पर परात पुरुषोत्तम परम परमात्मा

480
00:33:56,440 --> 00:34:00,560
है वो में विद्यमान है अणु अणु में विद्यमान

481
00:34:00,560 --> 00:34:04,560
है ऐसा कोई स्थान नहीं अण अयान महतो मया खूब

482
00:34:04,560 --> 00:34:08,920
उस पर विस्तार से चर्चा हुई और अंत तोवा

483
00:34:08,920 --> 00:34:13,480
फिर यह निर्णय हुआ कि समाज बैठा हुआ है वह किसको मानता

484
00:34:13,480 --> 00:34:17,960
है तो समाज ने जो है हमारी बात मानी

485
00:34:17,960 --> 00:34:22,040
मने य आज सगुण साकार रूप में नहीं मानो क्षेत्र में बैठे

486
00:34:22,040 --> 00:34:26,440
हुई भगवान बा का अवतार हुआ है तो वो भी कहा मानोगे आप

487
00:34:26,440 --> 00:34:30,440
नहीं मान सकते और फिर वो तो वो

488
00:34:30,440 --> 00:34:34,520
लोग तो जो है ना वो गन ऐसा अर्थ किया हम

489
00:34:34,520 --> 00:34:38,960
आपको बता भी नहीं सकते वो तो यह समझिए

490
00:34:38,960 --> 00:34:43,800
कि उस समय जो कान है कु सुनने में बड़ा अटपटा लगा

491
00:34:43,800 --> 00:34:48,640
और अवा बोलने लगे की उनकी

492
00:34:48,640 --> 00:34:49,560
भगवान वेद

493
00:34:49,560 --> 00:34:54,440
व्यास की जो माता जी है जो मछली से उत्पन्न हुई है सत्यवती

494
00:34:54,440 --> 00:34:59,040
उससे व्यास जी उत्पन्न हुए हैं तो ऋषि गर्भ म जाती तो य

495
00:34:59,040 --> 00:35:03,080
इतना विनाश नहीं होता तो हमने उनसे कहा कि भाई

496
00:35:03,080 --> 00:35:07,520
देखिए दयान जी के कहने से अथवा

497
00:35:07,520 --> 00:35:11,600
किसी के कहने से व्यास जी को अस पड़ने वाला नहीं है व्यक्ति कोई किसी

498
00:35:11,600 --> 00:35:15,680
में कुछ भी कह सकता है उसको

499
00:35:15,680 --> 00:35:19,880
सिद्धांत नहीं मान सकते हमने पिता महने जो हमा रमा मह

500
00:35:19,880 --> 00:35:24,200
संवाद लिखा था उसम 27 श्लोक है तो मैंने इतना

501
00:35:24,200 --> 00:35:28,600
27 श्लोक है उसको हम समाज में कह भी नहीं सकते

502
00:35:28,600 --> 00:35:32,600
अय व्यास जी पर आक्षेप कर रहे हैं और हम जो है

503
00:35:32,600 --> 00:35:36,640
आपके उन पर आक्षेप करने लगे और 27

504
00:35:36,640 --> 00:35:40,960
शलोक सुनाने लगे तो आप नहीं सुन सकते बकला जाओगे

505
00:35:40,960 --> 00:35:45,280
फिर हमने एक शलोक सुना दिया था अत पुरातन जी नाम कुले सव

506
00:35:45,280 --> 00:35:49,560
दसी तनतम रमा महर्षि विचार ते

507
00:35:49,560 --> 00:35:53,760
काद लोकता तो यह लोक हमने सुनाया उस व्याख्या

508
00:35:53,760 --> 00:35:57,800
भी व की हमने तो कहने का तात्पर्य

509
00:35:57,800 --> 00:36:01,960
हु कि कोई किसी महापुरुष के संबंध कुछ कह दे मनुष्य

510
00:36:01,960 --> 00:36:04,680
तो व मानी नहीं जाएग जैसे वेद लो

511
00:36:04,680 --> 00:36:09,360
हमारा प कहते तो कहा त संगत

512
00:36:09,360 --> 00:36:13,600
हा ये लोग अनित्य उने अनित्य है

513
00:36:13,600 --> 00:36:17,640
वा वा वेद अत्य हो जा फिर संसार में वेद में अनित्य

514
00:36:17,640 --> 00:36:22,320
का रहा प्रमाणिकता भी भंग हो जाएगी वेद की

515
00:36:22,320 --> 00:36:28,320
अगर उसको बोल हा प्रत्यक्ष अवा

516
00:36:29,720 --> 00:36:33,920
तस्मा वेद वेद जो किसी के द्वारा सिद्ध ना वेद के द्वारा

517
00:36:33,920 --> 00:36:38,240
सिद्ध होती है वही उस स्वत प्रमाण कहते हैं उदाहरण दिया था

518
00:36:38,240 --> 00:36:42,400
जैसे आख का देखने का काम है वो काम जो है

519
00:36:42,400 --> 00:36:46,600
कर्र नहीं कर सकती है ना का सूखने काम रसना नहीं कर सकती

520
00:36:46,600 --> 00:36:50,680
अप स्वत प्रमाण है ये ऐसे वे स्वत प्रमाण है किसी के द्वारा

521
00:36:50,680 --> 00:36:54,800
प्रमाणित नहीं है असम भावना विपरीत भावना यह

522
00:36:54,800 --> 00:36:59,320
सब अन्य में हो सकती है वेद में नहीं हो सकती

523
00:36:59,320 --> 00:37:03,880
अच्छा आचार्य श्री मैंने अक्सर यह देखा है कि जब इनकी कोई

524
00:37:03,880 --> 00:37:07,880
बात कटने लगती है तर्क और प्रमाण से युक्ति

525
00:37:07,880 --> 00:37:12,200
और प्रमाण से तो यह क्या करते हैं जो

526
00:37:12,200 --> 00:37:16,720
संवेदनशील बातें हैं हो सकती हैं जिससे कि

527
00:37:16,720 --> 00:37:19,720
जो आम जन है जिसको अभी ज्यादा गहराई

528
00:37:19,720 --> 00:37:23,880
से ज्ञान नहीं है उन बातों का आलंबन लेने का प्रयास करते

529
00:37:23,880 --> 00:37:28,240
हैं अपने आप को मजबूत स्थिति में लाने के लिए बात

530
00:37:28,240 --> 00:37:32,360
बोलते हैं जैसे कि मान लीजिए कोई यही कहने लगे मतलब इस

531
00:37:32,360 --> 00:37:36,360
तरह की बातें जिसको कि परोक्ष रूप से बोलना उचित रहता है वह

532
00:37:36,360 --> 00:37:40,400
बातें भी ऐसे बोलने लगते हैं जिसका

533
00:37:40,400 --> 00:37:44,520
फायदा उठाने का प्रयास करते हैं मजबूत स्थिति में आने के लिए मैं जैसे

534
00:37:44,520 --> 00:37:48,520
कोई व्यक्ति उल्टी सीधी बातें जैसे करने लगता है उससे ही यह प्रश्न किया जाता

535
00:37:48,520 --> 00:37:52,560
है आपके माता-पिता ने कौन सी ऐसी क्रिया की

536
00:37:52,560 --> 00:37:56,640
जिससे कि आप उत्पन्न हुए तो इस

537
00:37:56,640 --> 00:38:00,800
बात को कोई व्यक्ति परोक्ष रूप से ही बोलेगा है सत्य वो

538
00:38:00,800 --> 00:38:05,000
क्रिया सत्य है मगर ये ऐसी बातों का फायदा उठाने लगते

539
00:38:05,000 --> 00:38:09,000
हैं कि इसकी वजह से व्यक्ति थोड़ा सा लज्जित भाव से थोड़ा धीमा पड़ेगा थोड़ा

540
00:38:09,000 --> 00:38:13,280
ढीला पड़ेगा अच्छा मेरे साथ क्या हुआ

541
00:38:13,280 --> 00:38:17,520
जैसे जैसे किसी आर्य समाजी से मैं बात कर रहा हूं तो वो इन बातों

542
00:38:17,520 --> 00:38:21,680
को ही लेकर के आता है कि भाई देखिए अगर वो ईश्वर है तो वो

543
00:38:21,680 --> 00:38:25,800
कपड़े कैसे चुरा सकता है कपड़े कैसे लेकर भाग सकता है या वो

544
00:38:25,800 --> 00:38:29,960
वामन जो अवतार था वो अगर ईश्वर

545
00:38:29,960 --> 00:38:34,640
था तो वह छल कैसे कर सकता है तो मैंने दोनों दोनों पर प्रश्न

546
00:38:34,640 --> 00:38:35,640
किया

547
00:38:35,640 --> 00:38:39,680
एक बार मैं एक पहाड़ पर गया था तो वहां पर अचानक से

548
00:38:39,680 --> 00:38:44,240
ऐसी आंधी चली आचार्य श्री कि वहां की जो मातृ शक्तियां

549
00:38:44,240 --> 00:38:48,560
थी उनके जो वस्त्र थे वो निर्वस्त्र सी हो

550
00:38:48,560 --> 00:38:52,800
चली ऐसी आंधी चली अब मैंने उनसे

551
00:38:52,800 --> 00:38:57,560
जो हमसे तर्क कर रहे थे हमने पूछा कि यह कार्य किसका है

552
00:38:57,560 --> 00:39:01,600
जो वहां की मातृ शक्तियों को लगभग लगभग नगन अवस्था में

553
00:39:01,600 --> 00:39:05,720
पहुंचा दे रहा है आंधी के द्वारा प्राकृतिक आपदाएं ऐसी हो सकती हैं

554
00:39:05,720 --> 00:39:09,920
जिसके द्वारा ऐसी स्थिति आ जाए तो यह किसका कार्य है उनको मानना

555
00:39:09,920 --> 00:39:13,920
पड़ा कि भाई ये कर्मों का फल इसका अर्थ है कि किसी कारण से आपका

556
00:39:13,920 --> 00:39:17,760
ईश्वर भी ऐसा कर सकता

557
00:39:17,760 --> 00:39:21,800
है आपका ईश्वर भी ऐसा कर रहा है मातृ शक्तियों को हवा

558
00:39:21,800 --> 00:39:26,080
के द्वारा उनका कोई वस्त्र है वो उड़ रहा है अब मान लीजिए

559
00:39:26,080 --> 00:39:30,080
कि चलिए हम यहां की मातृ शक्तिया तो तब भी बहुत सा वैसा वस्त्र

560
00:39:30,080 --> 00:39:34,160
धारण करती है अगर जो दूसरे पाश्चात्य

561
00:39:34,160 --> 00:39:38,280
जगह है वहां की मातृ शक्तियों का वस्त्र तो और ज्यादा अजीब होता

562
00:39:38,280 --> 00:39:42,360
है तो ऐसी स्थिति में कोई प्राकृतिक आपदा में उसका वस्त्र

563
00:39:42,360 --> 00:39:46,360
भी उ तो वो तो ईश्वरीय कार्य माना गया तो उस स्थिति में भी

564
00:39:46,360 --> 00:39:50,400
तो ईश्वर वस्त्रों को हटा कर के वो उस नगन अवस्था में मातृ

565
00:39:50,400 --> 00:39:50,900
शक्तियों

566
00:39:50,800 --> 00:39:54,840
का तो ऐसी स्थिति ऐसी चीजों का आलंबन

567
00:39:54,840 --> 00:39:59,120
लेते हैं अपने आप को मजबूत स्थिति में लाने के लिए यह नहीं सोचते यह कार्य

568
00:39:59,120 --> 00:40:03,560
हमारा ईश्वर भी कर रहा है बस वो व्यवहारिक रूप से नहीं

569
00:40:03,560 --> 00:40:07,680
है व्यवहारिक रूप से नहीं है कि ईश्वर नहीं किया और

570
00:40:07,680 --> 00:40:11,720
ये जो ये जो वामन अवतार का बताते

571
00:40:11,720 --> 00:40:16,360
हैं तो यह तो वो जो रक्षपाल देवार्य जी थे जो

572
00:40:16,360 --> 00:40:20,440
सजापुर में जिनका गुरुकुल है उन्होंने बोला था कि वो ईश्वर जो है

573
00:40:20,440 --> 00:40:25,040
छल नहीं कर सकता तो मैंने उनसे यही पूछा था कि

574
00:40:25,040 --> 00:40:29,040
कोई व्यक्ति कहीं पर खड़ा है और उसके ऊपर एक उल्का

575
00:40:29,040 --> 00:40:33,120
पिंड आकर गिर गया प्राकृतिक अब ये

576
00:40:33,120 --> 00:40:37,160
छल है कि नहीं है बोले छल मानना पड़ा छल है भाई

577
00:40:37,160 --> 00:40:41,560
उसको बता के थोड़ी ना गिरा उल्का पिंड बिना बताए गिर गया उल्का पिंड

578
00:40:41,560 --> 00:40:45,600
तो इसका अर्थ है कि आपके द्वारा माना जाने वाला ईश्वर भी छल

579
00:40:45,600 --> 00:40:49,800
करता है मगर आप बैंड मतलब आप जो है डंका पीटते हो कि हमारा ईश्वर

580
00:40:49,800 --> 00:40:53,920
नहीं कर स फिर उन्होंने बोला कि जिसके साथ जो छल करता है जो पाप

581
00:40:53,920 --> 00:40:57,960
करता है व तो ईश्वर उसको किसी भी प्रकार से सजा दे सता जो उसके

582
00:40:57,960 --> 00:41:02,120
लिए अचित होग तो वही तो हमारा ईश्वर कर रहा है बस आप

583
00:41:02,120 --> 00:41:05,800
आप जो है उसको सीमित कर रहे हैं और हम जो है असीमित ईश्वर कर

584
00:41:05,800 --> 00:41:10,280
रहे हैं हमारा जो मुख्य बात होती है किसी से भी

585
00:41:10,280 --> 00:41:14,480
कि परंपरा के विरुद्ध जो भी कोई व्यक्ति धर्म का प्रचार प्रसार करने

586
00:41:14,480 --> 00:41:18,680
की बात कर रहा है तो हमारा सबसे पहला यही होता है कि

587
00:41:18,680 --> 00:41:23,600
क्या आपके द्वारा पूजित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है या

588
00:41:23,600 --> 00:41:27,640
नहीं सर्वशक्तिमान बहुत सारे आर समाजी बहुत

589
00:41:27,640 --> 00:41:31,800
कोन वाले बहुत सारे ब्रह्मा कुमारी यह रामपाल वाले इन सब से

590
00:41:31,800 --> 00:41:35,840
एक जो मुख्य क्वेश्चन हमने पूछा है कि इन

591
00:41:35,840 --> 00:41:39,960
सबका ईश्वर बाधित है सीमित है सर्वशक्तिमान नहीं है

592
00:41:39,960 --> 00:41:44,120
उसके अंदर बाधा है और जब बाधा हो गई तो व ईश्वर ही नहीं है

593
00:41:44,120 --> 00:41:48,320
और जब ईश्वर नहीं है तो जब ईश्वर नहीं है तो उसको प्राप्त

594
00:41:48,320 --> 00:41:52,320
करने के निमित्त बताई जाने वाली जो नियमावली है वो धर्म नहीं है

595
00:41:52,320 --> 00:41:56,360
त्रिकाला बाम सत्य त्व तीनों कारण

596
00:41:56,360 --> 00:42:00,920
बाना हु वही तो सत्य है जी

597
00:42:00,920 --> 00:42:05,240
तो ये ऐसे करते हैं कि सर्वशक्ति ये

598
00:42:05,240 --> 00:42:09,480
मैंने देखा था वो सर्वशक्तिमान विषय भी बड़ा रोचक सा था जो

599
00:42:09,480 --> 00:42:14,440
बात चली थी अवतार के विषय में वो उन्होंने बातें की थी हा उन्होने य कहा कि वो जो है

600
00:42:14,440 --> 00:42:18,880
मूर्ति मानेंगे तो अल्पज्ञ हो जाएगा मैंने कुछ भी नहीं सर्व शक्तिमान आप

601
00:42:18,880 --> 00:42:20,800
कह रहे हैं तो सर्वज्ञ

602
00:42:20,800 --> 00:42:25,640
शक्तिमान दोनों वि अलग कर द तो बात मान लेंगे हम आपकी

603
00:42:25,640 --> 00:42:30,040
स शक्तिमान है परात पुरुषोत्तम सर्व

604
00:42:30,040 --> 00:42:34,600
शक्तिमान इसको विशेषण हटा दीजिए तो कोई आपत्ति नहीं है जी

605
00:42:34,600 --> 00:42:38,680
विशेषण लगाओगे निराकार में तो फिर संगति नहीं

606
00:42:38,680 --> 00:42:42,800
बैठेगी स संगति है ना छ संगति एक भी संगति नहीं बैठ

607
00:42:42,800 --> 00:42:46,880
पाएगी आपके आपकी कट रही है

608
00:42:46,880 --> 00:42:51,160
ये कभी कभी ये भी कहते हैं जो अपने कार्य स्वयं कर सकता है किसी

609
00:42:51,160 --> 00:42:55,800
बिना किसी की सहायता के वो है तो मैंने मैं कभी कभी भी पूछ लेता हूं

610
00:42:55,800 --> 00:43:00,320
तो फिर जब यह सर्वशक्तिमान है तो आत्मनिर्भर किसे

611
00:43:00,320 --> 00:43:04,440
कहेंगे आत्मनिर्भर व होता है जिसको किसी की सहायता के लेने की आवश्यकता

612
00:43:04,440 --> 00:43:08,720
नहीं है तो सर्वशक्तिमान आत्मनिर्भर

613
00:43:08,720 --> 00:43:13,840
है मगर प्रत्येक आत्मनिर्भर सर्वशक्तिमान नहीं

614
00:43:13,840 --> 00:43:18,240
है आत्मनिर्भर सर्वशक्तिमान आत्मनिर्भर भी है मगर

615
00:43:18,240 --> 00:43:22,360
प्रत्येक आत्मनिर्भर सर्वशक्तिमान तो नहीं हो सकता सर्व का विशेषण

616
00:43:22,360 --> 00:43:27,120
लगेगा या जैसे दयानंद जी लिखते हैं अनंत सामर्थ वान अनंत

617
00:43:27,120 --> 00:43:31,120
अनंत सामर्थ तो जब अनंत कह रहे हैं तो फिर अंत क्यों बता रहे हैं कि

618
00:43:31,120 --> 00:43:36,400
नहीं ये नहीं कर सकता ये इनका नहीं समझ में आता है

619
00:43:36,400 --> 00:43:41,040
और नकारात्मक सोच है हमारे गए थे ना मनीष

620
00:43:41,040 --> 00:43:45,240
व विदेशों में तो उन्होंने जो है सभा

621
00:43:45,240 --> 00:43:49,560
में यह पूछा कि आपके यहां खरगोश के सिंह होते हैं बोले

622
00:43:49,560 --> 00:43:53,920
के नहीं होते हैं कछुआ दूध देता है कि नहीं देता है आकाश

623
00:43:53,920 --> 00:43:58,440
में फूल होते हैं कि नहीं होते हैं तो ऐसे नकारा

624
00:43:58,440 --> 00:44:02,680
कुछ होता ही नहीं है तो फिर क्या मतलब तुम्हारा जो है हमारे आ बताएंगे हम

625
00:44:02,680 --> 00:44:06,760
उसी ढंग के नकारात्मक प्रश्न करते जिसका उतर नहीं में

626
00:44:06,760 --> 00:44:10,920
हो जी उ जो कम बुद्धि वा लोग हो जाता

627
00:44:10,920 --> 00:44:15,600
देखो जैसे सबसे कहते हैं कि जो है भगवान श्री कृष्ण ने

628
00:44:15,600 --> 00:44:19,680
स्त्रियों के वस्त्र ह आप ये तो स्त्री शब्द संज्ञा ही गलत

629
00:44:19,680 --> 00:44:23,680
है क्योंकि छ वर्ष की अवस्था में जो है भगवान श्री कृष्ण

630
00:44:23,680 --> 00:44:27,920
ने गोपा के वस्त्रों का चिर किया छ वर्ष की अवस्था में

631
00:44:27,920 --> 00:44:32,400
उस एक वर्ष बाद उने गोवर्धन पर्वत उठाया उसमें सात वर्ष की अवस्था है उनकी आप

632
00:44:32,400 --> 00:44:36,880
आज भी छ वर्ष का बालक जो है उसे कौन सा ज्ञान है

633
00:44:36,880 --> 00:44:41,240
हमें स्वयं ज्ञान छ वर्ष तो हमने जो हमने बस्त नहीं पह ऐसी माता जी झगड़

634
00:44:41,240 --> 00:44:45,280
डाल देती तो पड़ा उसको फेंक देती निकाल करके और उनमें

635
00:44:45,280 --> 00:44:49,480
अपनी वासना वासित इंद्रियों के द्वारा उनकी व्याख्या करना यह

636
00:44:49,480 --> 00:44:51,400
केवल इन्ही कामां के

637
00:44:51,400 --> 00:44:56,200
द्वारा ही हो सकती है ये स्वयं कामां लोग है वही कल्पना करेंगे ऐसी क

638
00:44:56,200 --> 00:45:00,200
छ वर्ष का बालक जो है इस विषय में क्या ज्ञान रख सकता है

639
00:45:00,200 --> 00:45:04,840
अब एक जबक उसके दूसरे अर्थ है नूतन जल गोब

640
00:45:04,840 --> 00:45:08,960
चराय तस्म कृष्णाय नम संसार महीस जायो

641
00:45:08,960 --> 00:45:13,120
गोपा नाम बधु जो गोपों की स्त्री है उनके

642
00:45:13,120 --> 00:45:17,320
वस्त्रों को ह करने अज्ञान को ह करने वाले वो अज्ञान

643
00:45:17,320 --> 00:45:21,400
क्या था उनका कि जो है उसमें

644
00:45:21,400 --> 00:45:25,640
निर्वस्त्र होकर के जो है जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिए बड़े

645
00:45:25,640 --> 00:45:29,680
नियम है यदि आपने और वार्ता भी नहीं करनी चाहिए हसी मजाक भी नहीं

646
00:45:29,680 --> 00:45:33,720
करनी चाहिए तो हमारी जो गोपियां है तो स्नान

647
00:45:33,720 --> 00:45:37,960
निर्वस्त्र कर रही थी जबक ये लिखा है भोजन करते समय

648
00:45:37,960 --> 00:45:41,960
आपने बोला तो आपका जो तेज का यमराज कर

649
00:45:41,960 --> 00:45:46,200
लेते हैं और स्नान करते समय उच्चारण हुआ और विधि

650
00:45:46,200 --> 00:45:50,280
से स्नान नहीं किया तो आपका जो तेज है आपका जो

651
00:45:50,280 --> 00:45:54,360
बल है वो ब्रम देवता ग्रहण कर लेते हैं और हवन

652
00:45:54,360 --> 00:45:58,920
देते समय य आपने बीच में कोई हिंदी का शब्द बोल दिया

653
00:45:58,920 --> 00:46:03,040
और बात आपस में कर ली तो उसके फल का जो हरण

654
00:46:03,040 --> 00:46:06,720
है वो अग्नि देव कर लेते हैं ये हमारी शास्त्री विधि है

655
00:46:06,720 --> 00:46:10,720
तो उनने कमी देखी भगवान के लिए तो उस अज्ञान को दूर

656
00:46:10,720 --> 00:46:14,920
करने केने वो लीला की तो वहां वस्त्रों से को लेना

657
00:46:14,920 --> 00:46:19,560
देना नहीं है पर इन् तो दोष दृष्टि देखनी है तो उसमें तो असूया

658
00:46:19,560 --> 00:46:23,560
असूया पर दोष कि नाम अस दसों के दूसर गु में दोष

659
00:46:23,560 --> 00:46:27,560
देखना है तो जी इसमें एक बात

660
00:46:27,560 --> 00:46:31,560
आती है आचार्य श्री महाभारत में मैं गलत हूं तो आप ठीक कर

661
00:46:31,560 --> 00:46:35,720
दीजिएगा कि वहां कहा गया है कि जो पुराण आदि

662
00:46:35,720 --> 00:46:40,040
स्मृति ग्रंथ है उनकी सीमा में उनके द्वारा जो

663
00:46:40,040 --> 00:46:44,320
व्याख्या की गई है उनकी व्याख्या की सीमा में रहकर हमें

664
00:46:44,320 --> 00:46:48,480
वेदों का अर्थ करना चाहिए वेद भी डरते हैं जो जो

665
00:46:48,480 --> 00:46:52,920
जो है स्मृति को पढ़े बिना जो उनका अर्थ करने जाता है उनसे वेद डरते हैं

666
00:46:52,920 --> 00:46:56,920
महाभारत में माद प्र जो मेरा

667
00:46:56,920 --> 00:47:01,680
जो अर्थ का अनर्थ करता है तो मुझे लगता है कि मुझ दंडे से प्रहार कर रहा है

668
00:47:01,680 --> 00:47:05,880
जी जी जी वही आप जो कह रहे हैं वही है जी अब अब

669
00:47:05,880 --> 00:47:10,080
क्या है कि इस तरह के जब श्लोक हम देते हैं तो इनके

670
00:47:10,080 --> 00:47:14,120
पास एक पुराना एक सिक्का रहता है परंपरा

671
00:47:14,120 --> 00:47:18,240
विरुद्ध लोगों का वो होता है प्रक्षिप्त जो भी

672
00:47:18,240 --> 00:47:21,880
इनके विरोध में जो शास्त्रों की कोई भी बात जाए

673
00:47:21,880 --> 00:47:27,880
तो बात आ जाती है कि ये तो प्रक्षिप्त है ये तो प्रक्षिप्त है ये तो मिलावट है

674
00:47:28,960 --> 00:47:33,080
जी तो इसको आप कैसे देखते हैं जोय प्रक्षिप्त वाली प्रक्षिप्त

675
00:47:33,080 --> 00:47:37,200
वाद है इसको कैसे देखते हैं आप की तो कहा

676
00:47:37,200 --> 00:47:41,400
तो कुछ भी जा सकता है कि सिद्ध करना है दवा सिद्ध

677
00:47:41,400 --> 00:47:46,240
नहीं हो जब य स्वय में प्रक्षिप्त है जी उस नाने

678
00:47:46,240 --> 00:47:50,880
लिखा दया जी महाराज दया जीने 294 पृ लोक

679
00:47:50,880 --> 00:47:56,880
है जो है ना मास भक्ष दोष ति

680
00:47:57,000 --> 00:48:01,440
ताना नितु महा फला यह लिखा की जो है य 294

681
00:48:01,440 --> 00:48:05,440
प पर पांडव गीता में है जब खोल कर देखा

682
00:48:05,440 --> 00:48:09,640
294 क्या 300 प भी कही ना मिला

683
00:48:09,640 --> 00:48:13,760
तो इन दवारा ही इनके द्वारा ही प्रक्षिप्त है जन्मना जाद कहीं

684
00:48:13,760 --> 00:48:18,240
नहीं हैने प्रक्षेप किया है तो इनके द्वारा जो कारनाम

685
00:48:18,240 --> 00:48:22,880
है तो दूसरो को थोपना चाहते हैं य हमारे सनातन धर्म में

686
00:48:22,880 --> 00:48:27,240
तो एक अक्षर प्रक्षिप्त नहीं है किसी पुराण में जो ये

687
00:48:27,240 --> 00:48:31,240
तो अपना मन गण ज कोई बात नहीं कटती है तो कह देते

688
00:48:31,240 --> 00:48:35,560
नहीं ये तो प्रक्षिप्त है इसमें इसम

689
00:48:35,560 --> 00:48:36,880
इसमें ये देखिए इनका

690
00:48:36,880 --> 00:48:41,280
जो आपने जो एक अभी दोगलापन कहा था

691
00:48:41,280 --> 00:48:45,960
कि एक तरफ कहते हैं पुराण को मानते नहीं है

692
00:48:45,960 --> 00:48:50,360
और पुराणों से ही उधत होने वाला है जन्मन जाते शूद्र इनको ये

693
00:48:50,360 --> 00:48:54,800
स्कंद पुराण में कहीं पर है हां अगर है तो तो

694
00:48:54,800 --> 00:48:59,080
किसी किसी नहीं है वहा पाठ नहीं है जन्म ब्राह्मण गया

695
00:48:59,080 --> 00:49:03,160
अपने मनमा ढंग से फिट कर देते मगर मगर जब ये

696
00:49:03,160 --> 00:49:07,600
जन्म जाते शूद्र बोलते तो उसम शास्त्र का नाम ही स्कंद पुराण बताते हैं

697
00:49:07,600 --> 00:49:11,600
ये लोग भी जब उधत करते हैं उसे तो किसी शास्त्र का नाम नहीं बोलते बोलते हैं

698
00:49:11,600 --> 00:49:15,680
तो स्कंद पुराण बोलते हैं तो अगर स्कंद पुराण में चलो मिल भी गया

699
00:49:15,680 --> 00:49:20,040
तो ये पुराण का पुराण को मानने वाले कहां से हो गए फिर ये हां

700
00:49:20,040 --> 00:49:24,120
इसका खंडन करते हैं पुराण का खंडन करते हैं ये

701
00:49:24,120 --> 00:49:28,160
और मैंने देखा है मैंने देखा है जितने लोग ये आर्य समाज को

702
00:49:28,160 --> 00:49:32,440
मानने वाले हैं ये अपनी बात को रखने के लिए

703
00:49:32,440 --> 00:49:36,440
मतलब वहां पर उन बातों का ही आलंबन ले लेते हैं जिन बातों

704
00:49:36,440 --> 00:49:41,240
का थोड़ी देर पहले खुद ही खंडन कर रहे थे जैसे कि मैंने देखा आपका जो

705
00:49:41,240 --> 00:49:45,480
चल रहा था स्पर्धा चल रही थी जब तो वहां पर वो लोग आपको रामचरित

706
00:49:45,480 --> 00:49:49,600
मानस का जो है प्रमाण के रूप में कर दे रहे

707
00:49:49,600 --> 00:49:52,240
थे रामचरित मानस अब रामचरित

708
00:49:52,240 --> 00:49:56,960
मानस इनके लिए प्रमाण कैसे हो गई और अगर प्रमाण है तो फिर उसमें तो खूब

709
00:49:56,960 --> 00:50:02,400
सगुण सकार की भक्ति खूब बताई है गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज जी ने

710
00:50:02,400 --> 00:50:07,120
बताइए एक तरफे निग

711
00:50:07,120 --> 00:50:11,280
कोई भेद नहीं है किंतु निगम तो के जो है निर्गुण का तो एक बार

712
00:50:11,280 --> 00:50:15,440
प्रतिपादन हो सकता है कि सण का नहीं हो सकता वो बहुत कठिन है

713
00:50:15,440 --> 00:50:19,520
निर् निराकार में क्या कहना है बस बात खत्म य सग साकार

714
00:50:19,520 --> 00:50:23,720
के भ्रम के प्रतिपादन की जहा बात होती है वहा जो पसीने छूट जाते

715
00:50:23,720 --> 00:50:27,840
हैं जी और ये का जो जैसे एक उदाहरण

716
00:50:27,840 --> 00:50:31,960
के बताता हूं मैं जो है इनका कोई सिद्धांत नहीं है कोई योग्यता

717
00:50:31,960 --> 00:50:36,920
भी नहीं अपने ढंग से इन्होने व्याख्या की है एक जो है

718
00:50:36,920 --> 00:50:42,200
उसमें

719
00:50:42,200 --> 00:50:46,200
वो एक ममम तवा करके मंत्र आया

720
00:50:46,200 --> 00:50:50,760
था उसम तो उसम ये लिखा था जो है

721
00:50:50,760 --> 00:50:54,840
य आपका ऋगवेद का मंत्र है ये

722
00:50:54,840 --> 00:50:59,600
इमाम त्वा मिंद्र म सुता स्याम

723
00:50:59,600 --> 00:51:03,800
पुत्रा आद पति मेका दशम क इसका

724
00:51:03,800 --> 00:51:07,920
अपना जो है अर्थ है कि

725
00:51:07,920 --> 00:51:12,080
विवाह के समय में इस मंत्र

726
00:51:12,080 --> 00:51:16,640
के द्वारा पति इंद्र से प्रार्थना करता है विवाह होता है ना

727
00:51:16,640 --> 00:51:20,680
प पत्नी दोनों साथ में रहते हैं तो पति जो अपने पत्नी

728
00:51:20,680 --> 00:51:24,840
के लिए प्रार्थना करता है ब सीधा स्पष्ट है में आप देखि अपने

729
00:51:24,840 --> 00:51:29,360
ढंग से कैसे लगाते य लोग कि हे इंद्र

730
00:51:29,360 --> 00:51:33,520
इस मेरी पत्नी को तुम सुपुत्र जब आपके

731
00:51:33,520 --> 00:51:37,720
सामने आपसे प्रार्थना करता हूं तोय मेरी पत्नी है तो

732
00:51:37,720 --> 00:51:41,840
उसको पुत्र देना तो सुपुत्र देना और सुभ बनाओ

733
00:51:41,840 --> 00:51:46,160
और इसमें द पुत्र करने का बल दो क्योंकि

734
00:51:46,160 --> 00:51:50,200
जो इसमें जो है द पुत्र करने का बल दो इसके पति

735
00:51:50,200 --> 00:51:54,480
अर्था मुझको भी दीर्घायु बनाओ जब यह बात पूरी होगी

736
00:51:54,480 --> 00:51:56,840
तो

737
00:51:56,840 --> 00:51:57,480
इसका आशय

738
00:51:57,480 --> 00:52:01,720
है कि एक कुटुंब में एक स्त्री हो गई एक पुरुष हो गया और

739
00:52:01,720 --> 00:52:05,840
10 पुत्र हो 12 संख्या ई केवल तो

740
00:52:05,840 --> 00:52:10,000
पुत्रा विदा मही बहु लिखा भी है

741
00:52:10,000 --> 00:52:14,480
अधिक से पुत्र होने चाहिए 10 संख्या तो सीमित कर दिया

742
00:52:14,480 --> 00:52:18,840
है और वैसे केवल शब्दार्थ इसका

743
00:52:18,840 --> 00:52:23,200
करोगे तब भी बन जाएगा सामर्थ्य मान इंद्र स्त्री को तुम

744
00:52:23,200 --> 00:52:27,400
सौभाग्यवती सुपुत्र करो इससे दु पुत्र दो और

745
00:52:27,400 --> 00:52:31,520
11 पति की रक्षा हो 12 संख्या हो गई अब

746
00:52:31,520 --> 00:52:35,520
इनका अर्थ देखिए आप संक्षिप्त में कह देता हूं मैं

747
00:52:35,520 --> 00:52:39,920
विधर्मी क्या कहते हैं व तुम 10 पुत्र 11

748
00:52:39,920 --> 00:52:43,960
पति दो उसका अर्थ कर दिया उन्होने

749
00:52:43,960 --> 00:52:48,960
पति मेकम दशा कृति कैसे अर्थ रहे

750
00:52:48,960 --> 00:52:51,400
जो

751
00:52:51,400 --> 00:52:55,400
मतलब ये इन्होने अपने इन्होने ये इन्होने अपने भाष्य में

752
00:52:55,400 --> 00:52:59,440
लिखा है 10 द पुत्र हा अपने इन दया जी की भाष

753
00:52:59,440 --> 00:53:03,680
में दयान जी के द्वारा कथित है ओ

754
00:53:03,680 --> 00:53:07,760
एक पुत्र और 11 पति हा अर्थात 11 पतियों

755
00:53:07,760 --> 00:53:11,960
से भी एक एक पति से 10 द पुत्र अब लगाओ तो 100 संख्या

756
00:53:11,960 --> 00:53:12,560
बन गई ना

757
00:53:12,560 --> 00:53:16,930
तो पूरा कौ मतलब पूरा कौ भी पैदा करना चाह रहे हैं एक स्त्री से जो

758
00:53:16,930 --> 00:53:19,080
[हंसी]

759
00:53:19,080 --> 00:53:21,840
है

760
00:53:21,840 --> 00:53:26,000
चलिए हा तो ये मैं कह रहा हं तो इनका जो अर्थ है ना व शति

761
00:53:26,000 --> 00:53:30,360
दूक शति दूक है शति माने वेद है उसका जो है अपना अन

762
00:53:30,360 --> 00:53:34,720
ंग से प एकम दशा का अर्थ कर रहेला जी नेका

763
00:53:34,720 --> 00:53:38,880
खंडन किया है सब तो उन्होने वेद भाष्य भूमिका

764
00:53:38,880 --> 00:53:43,000
में सब इनके जो अर्थ के अनर्थ कि खंडन

765
00:53:43,000 --> 00:53:48,480
किया उने उन्ही का

766
00:53:48,480 --> 00:53:52,560
खंडन ये एक क्या कहते हैं यह हिंदू शब्द

767
00:53:52,560 --> 00:53:56,720
पर भी बड़ी वो करते हैं और समय आने पर हिंदू शब्द

768
00:53:56,720 --> 00:54:01,000
भी बोलते हैं मतलब हिंदू बोलते भी हैं और यह भी कहते कि हिंदू

769
00:54:01,000 --> 00:54:05,320
शब्द जो है प्रामाणिक नहीं है अभी हुआ क्या था कुछ समय

770
00:54:05,320 --> 00:54:09,360
पूर्व उत्तराखंड में कहीं पर जगतगुरु शंकराचार्य जी

771
00:54:09,360 --> 00:54:13,480
का शिर शिविर था वहां पर प्रवास था तो

772
00:54:13,480 --> 00:54:18,360
वो उनकी सभा चल रही थी प्रश्न उत्तरी वाली तो उसमें एक आगंतुक

773
00:54:18,360 --> 00:54:22,600
जो द्वेष भावना से संभवत घुसा हो आर्य समाज

774
00:54:22,600 --> 00:54:26,760
से था उसने जाकर के प्रश्न किया हिंदू शब्द पर हिंदू

775
00:54:26,760 --> 00:54:30,880
शब्द वैदिक कैसे आप बताए तो जो प्रश्न उत्तर होता

776
00:54:30,880 --> 00:54:35,600
है अगर हम प्रश्न करता है तो उसमें

777
00:54:35,600 --> 00:54:39,760
जो उत्तर सामने से दिया गया उसको लेकर के शांत हो जाना

778
00:54:39,760 --> 00:54:45,160
होता है शास्त्रार्थ का भूमिका ही बिल्कुल अलग होती

779
00:54:45,160 --> 00:54:49,240
है जी तो गुरुदेव ने उसको यथोचित जो समाधान

780
00:54:49,240 --> 00:54:53,240
था वो दे दिया अब यदि वो संतुष्ट हुआ उसको नहीं

781
00:54:53,240 --> 00:54:57,240
मानना वो तो पहले से सोच के ही गया था कि नहीं मानना है तो जब

782
00:54:57,240 --> 00:55:01,360
वो संतुष्ट नहीं हुआ तो वहां से बाहर आने के बाद उसको

783
00:55:01,360 --> 00:55:04,120
इन आर्य समाधि हों ने नाम दे दिया है

784
00:55:04,120 --> 00:55:08,480
कि भैया वहां पर एक शास्त्रार्थ हुआ था जिसमें शंकराचार्य जो है हार

785
00:55:08,480 --> 00:55:12,520
गए हिंदू शब्द पर ये उनका छल

786
00:55:12,520 --> 00:55:16,520
रहता है छल और अब हा ये

787
00:55:16,520 --> 00:55:21,280
छल है पुरा महादेव का यज्ञ हुआ वहा उस समय तो जो है

788
00:55:21,280 --> 00:55:25,640
परम शास्त्र के परम बतरा जो रंजन थ महाराज जी थे उसमें

789
00:55:25,640 --> 00:55:30,000
और उन्ही का व्याख्यान होता था उन्ही का शास्त्रार्थ होता अगवे जीने चैलेंज

790
00:55:30,000 --> 00:55:34,160
कर दिया उनके लिए आपसे शास्त्रार्थ करेंगे आपने सती प्रथा

791
00:55:34,160 --> 00:55:38,240
समर्थन कर दिया और सती प्रथा का क्या

792
00:55:38,240 --> 00:55:42,680
उसमें जो मंत्र है विस्तार से चर्चा होगी उस एक

793
00:55:42,680 --> 00:55:46,800
विधि होती है ज अवाम गवाल सन्यास

794
00:55:46,800 --> 00:55:51,200
पल पत्र देवरा पत्र पति कलो पंच

795
00:55:51,200 --> 00:55:55,560
वहा अवाल गवाल अद का अर्थ स्पर्श

796
00:55:55,560 --> 00:55:59,600
करना है तो पहले जो वेदों में जो वेद है जो वेद का अर्थ

797
00:55:59,600 --> 00:56:03,760
है उसमें ऐसा घर के बुजुर्ग भी जाते हैं अन्य

798
00:56:03,760 --> 00:56:08,200
भी जाते हैं तो महिला पति के साथ जाती थी और उसपे

799
00:56:08,200 --> 00:56:12,800
पति के साथ ही मतलब सती होने का प्रयास करती थी मतलब

800
00:56:12,800 --> 00:56:16,800
तो वहां स्पर्श करने का विधान है तो वहां के जो उनके

801
00:56:16,800 --> 00:56:19,560
माता-पिता है बुजुर्ग हैं तो उसको समझाते

802
00:56:19,560 --> 00:56:23,840
थे कि भाई तुम्हारा भी आपके पुत्र है इनकी रक्षा करने का भार

803
00:56:23,840 --> 00:56:28,120
है आप पति के साथ सती मत होइए अपना कर्तव्य का पालन करिए

804
00:56:28,120 --> 00:56:32,240
इसके बाद में सुभाग मूर्ति से म ये मंत्र का अर्थ है वहां पर जो सती

805
00:56:32,240 --> 00:56:36,400
प्रथा वीडियो डाला सब विस्ता से बात कही है किंतु विधर्मी ने

806
00:56:36,400 --> 00:56:40,800
कहां से कहां जो है वो तो सती प्रथा में जो है आज भी

807
00:56:40,800 --> 00:56:45,160
पति के साथ में जो है पत्नी के लिए चिता में जल जाना चाहिए ज

808
00:56:45,160 --> 00:56:49,240
ऐसा अर्थ था ही नहीं महाराजा ने अपने ढंग से अर्थ किया अब भी है वो हमने

809
00:56:49,240 --> 00:56:53,640
वीडियो में से स्पष्ट किया है तो वो सती प्रथा का लेकर के उसके बहाने

810
00:56:53,640 --> 00:56:58,120
मैं ये करूंगा वो करूंगा हमें उन्होने पहले कह दिया दो चार किलोमीटर

811
00:56:58,120 --> 00:57:02,640
रह जाएंगे तो स्वय भाग जाएंगे कि अपना प्रचार कर लिया लोगों

812
00:57:02,640 --> 00:57:06,960
ने विशेष व्यक्ति का नाम ले लेकर प्रचार कर लिया इतना नका

813
00:57:06,960 --> 00:57:11,080
यही रहता है शंकराचार्य से प्रश्न किया हिंदू के विषय में उत्तर

814
00:57:11,080 --> 00:57:15,280
मिल गया अब जो देखने वाले होंगे कि सा प्रश्न भी किया है

815
00:57:15,280 --> 00:57:19,960
और ने उत्तर भी दिया है इसका मतलब शास्त्रार्थ हुआ ही है

816
00:57:19,960 --> 00:57:24,080
और उसम व्यक्ति देखता तो है नहीं ज्यादा बोले हा हा निरुत्तर हो गए होंगे

817
00:57:24,080 --> 00:57:28,480
शंकराचार्य जी इतना समय लोगों पर तो 990

818
00:57:28,480 --> 00:57:32,600
प्रत लोगों से अपनी बात जो है ना वो छल के द्वारा

819
00:57:32,600 --> 00:57:34,840
जो सिद्ध कर ही देते हैं ये लोग

820
00:57:34,840 --> 00:57:38,920
इसमें इसमें आचार्य शी ये चीज आती है कि

821
00:57:38,920 --> 00:57:42,960
भाई अगर वह शास्त्रार्थ था जबकि अभी कुछ दिन पहले हमें शास्त्रार्थ के

822
00:57:42,960 --> 00:57:47,040
खूब सारे वो आए थे निमंत्रण जब ये हमारी चीजों से

823
00:57:47,040 --> 00:57:51,040
थोड़ा गड़बड़ा गए थे इन्होंने हमारे बारे में एक पर्चा भी लिखवा दिया और

824
00:57:51,040 --> 00:57:55,280
फतवा जारी कर दिया कि ये व्यक्ति से दूर रहे करपात्री जी का जो परम

825
00:57:55,280 --> 00:57:59,320
भक्त है ये और जो है आर समाज को नीचा दिखाना चाहता है इसके

826
00:57:59,320 --> 00:58:03,400
साथ चर्चा ना करें किसी उच्च कोटि के विद्वान को ही बिठाए यह भी

827
00:58:03,400 --> 00:58:07,600
उसमें अंकन मैंने कहा मैं तो एक बहुत तुच्छ सा एक शिष्य

828
00:58:07,600 --> 00:58:11,600
हूं जब मेरी कारण इनको लिखना पड़ रहा है कि एक उच्च कोटि

829
00:58:11,600 --> 00:58:16,000
के विद्वान को बिठाए तो जब हमारे यहां के विद्वान आएंगे तो इनका क्या हाल

830
00:58:16,000 --> 00:58:20,400
होगा मैं मेरा तो बहुत बिल्कुल जमीनी

831
00:58:20,400 --> 00:58:24,600
स्तर का मामला है तो तो है क्या कि

832
00:58:24,600 --> 00:58:28,880
ये अपने जो इन्होंने हमको को जो निमंत्रण भेजे थे हम वो शास्त्रार्थ

833
00:58:28,880 --> 00:58:33,160
के लिए उनमें यही बात लिखी थी कि शास्त्रार्थ का निमंत्रण

834
00:58:33,160 --> 00:58:37,160
लिखित में होता है शास्त्रार्थ के बारे में कोई भी चीज जो डिसाइड होती

835
00:58:37,160 --> 00:58:41,280
है वो लिखित में होती है पर जब ये अपनी ऐसे अफवा उड़ा रहे

836
00:58:41,280 --> 00:58:45,400
हैं शंकराचार्य शास्त्रार्थ में हारे तो ये ये नहीं बता रहे

837
00:58:45,400 --> 00:58:49,440
कि वो कहां पर उसका निमंत्रण गया था कौन उसका निर्णायक

838
00:58:49,440 --> 00:58:50,680
बना था

839
00:58:50,680 --> 00:58:54,760
कहां पर वो होना सुनिश्चित हुआ था कौन सा पत्राचार हुआ था उस शास्त्रार्थ

840
00:58:54,760 --> 00:58:59,320
के निमित्त वो नहीं बताते क्योंकि वो तो मतलब नियम और सिद्धांत

841
00:58:59,320 --> 00:59:03,560
दूसरे के लिए है अपने लिए वही नियम और सिद्धांत

842
00:59:03,560 --> 00:59:07,720
नहीं है और महाभारत में आया है कि आप दूसरों से उसी प्रकार

843
00:59:07,720 --> 00:59:11,720
के व्यवहार की अपेक्षा करें जो स्वयं को स्वयं के लिए

844
00:59:11,720 --> 00:59:16,080
अपेक्षा करें तो वही धर्म है वही धर्म है

845
00:59:16,080 --> 00:59:20,160
आत्म प्रकला परे समाच जो अपने प्रक

846
00:59:20,160 --> 00:59:25,040
लगा उसका दूसरे के साथ व्यवहार ना करें जी जी

847
00:59:25,040 --> 00:59:29,040
जी सितो को जो दूसरों पर मढ रहे हैं उन्हीं

848
00:59:29,040 --> 00:59:33,240
सिद्धांतों को खुद खंडित करते हैं और इस तरह की झूठी अवाए फैला

849
00:59:33,240 --> 00:59:37,320
देंगे कि व्यक्ति य भूल ही जाएगा जैसे कौवा कान ले गया कौवा कान

850
00:59:37,320 --> 00:59:41,320
ले गया कौवा कान ले गया तो लोगों ने सोचना ही भूल गए कि कान मेरा

851
00:59:41,320 --> 00:59:45,320
यहीं पर तो नहीं है कहीं तो ये ऐसे ही इन्होने एक एक

852
00:59:45,320 --> 00:59:49,440
अवा य भी फला फैलाने का प्रयास किया है कि

853
00:59:49,440 --> 00:59:53,680
युधिष्ठिर में मानस कोई थे इनके आ के बहुत बरी विद्वान जिन्होंने

854
00:59:53,680 --> 00:59:58,240
कपाती जी को शास्त्र में पराजित किया था

855
00:59:58,240 --> 01:00:02,520
तो इस बारे में कुछ संज्ञान में हो तो आप थोड़ा प्रकाश डाल द

856
01:00:02,520 --> 01:00:05,800
नहीं नहीं ये केवल भ्रम है और देखो कहां

857
01:00:05,800 --> 01:00:10,000
राजा भोज आगे तो नहीं कहेंगे हम आप स्वय

858
01:00:10,000 --> 01:00:14,000
समझ लीजिए कोई तुलना नहीं है ये तो केवल जो है एक

859
01:00:14,000 --> 01:00:18,280
बस इनका भ्रम प्रचार है ऐसा कुछ नहीं है हा आप

860
01:00:18,280 --> 01:00:22,320
उनकी बात कहेंगे य ममास है भीमसेन शास्त्री जी

861
01:00:22,320 --> 01:00:26,480
भी है ये सब आर समाज के प्रोधा मानते हैं हम जब धर्म

862
01:00:26,480 --> 01:00:30,800
संघ विद्यालय में पढ़ाते थे तो उस समय भीमसेन शास्त्री ने बहुत बढ़िया भैमी

863
01:00:30,800 --> 01:00:35,000
टीका लिखी है तो हम लोग आपस में विचार विन करते थे

864
01:00:35,000 --> 01:00:39,000
हमारे जैसे बैकुंठ जी हैं बहुत अच्छे वैद ज्ञ है और

865
01:00:39,000 --> 01:00:43,320
कवास में वेद के विद्यालय उन कई विद्यालय हैं

866
01:00:43,320 --> 01:00:47,720
और ऐसा कोई वेद विद्यालय उनका छात्र ना हो तो

867
01:00:47,720 --> 01:00:51,880
हम धर्म संघ में पढ़ाते थे वो भी वहां लाल बहादुर

868
01:00:51,880 --> 01:00:56,040
में गुरुजी के यहां पढ़ते तो सास चर्चा होती थी तो अंता दे वच्चे प जो है

869
01:00:56,040 --> 01:01:00,040
एक सूत्र अंता दिव तो वो टीका लेकर

870
01:01:00,040 --> 01:01:04,080
आए तो बोले भाई साब हम लोग जो विचार कर रहे हैं वो तो इससे

871
01:01:04,080 --> 01:01:08,560
अर्थ नहीं लगता भ टीका से और है नहीं उसमें जो है

872
01:01:08,560 --> 01:01:13,000
तो हमने अर्थ ने बताया तो व बैकुंठ जी भीमसेन

873
01:01:13,000 --> 01:01:17,120
शास्त्री जी के यहां उसको लेकर गए कि अंता दव कास अर्थ लिखा

874
01:01:17,120 --> 01:01:21,120
है उसके अनुसार यह सि सिद्ध हो ही नहीं सकती

875
01:01:21,120 --> 01:01:25,280
इस जन्म में नहीं सात जन्म में नहीं होगी ऐसा वैकुंठ जी ने कहा तो वो

876
01:01:25,280 --> 01:01:29,360
फिर लेकर बैठे पू अत परा ऐसे घुमाते रहे

877
01:01:29,360 --> 01:01:33,480
उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि अगले जब अगला संस्करण निकलेगा तो

878
01:01:33,480 --> 01:01:37,640
आपका बताए जो अर्थ है वही इसमें लिखा जाएगा क्या

879
01:01:37,640 --> 01:01:41,960
बात है तो यह है कि बस

880
01:01:41,960 --> 01:01:46,200
कुछ भी कह सकते हैं ये लोग दयानंद जी के बारे में भी उड़ा रखा है कि दो दो

881
01:01:46,200 --> 01:01:50,280
ती स पंडितों को जो है इन्होने हरा दिया कि फलाने शास्त्रार्थ में फलाने

882
01:01:50,280 --> 01:01:54,520
व उसम तो अच्छा मैंने देखा कि इनका जो ताना

883
01:01:54,520 --> 01:01:58,760
बाना खड़ा है वो या तो बुराई

884
01:01:58,760 --> 01:02:02,840
करने पर ही खड़ा है कि तुम सती प्रथा को मानते हो तुम वेदों

885
01:02:02,840 --> 01:02:07,160
में बलि मानते हो तुम जो है तुम जो है स्त्रियों को यज्ञ पवित

886
01:02:07,160 --> 01:02:11,200
का अधिकार नहीं देते तुम इस मतलब दूसरे की बुराई

887
01:02:11,200 --> 01:02:15,200
करने के आधार पर ही हमारा अस्तित्व है हमारा अपनी कोई सौंदर्य

888
01:02:15,200 --> 01:02:19,320
नहीं है देखो ये जो है ना इतनी अल्पज्ञ है इनम

889
01:02:19,320 --> 01:02:24,080
जो ये कह बली का मतलब समते सिर काट देना

890
01:02:24,080 --> 01:02:28,080
इनका अर्थ बलि का मतलब यही तो बकरा की बली हो गई तो बकरा को जो है काट

891
01:02:28,080 --> 01:02:32,080
कर चढ़ा दिया ये तो बली का अर्थ करते हैं बल मंत्री नमस्कार बलि का

892
01:02:32,080 --> 01:02:36,120
अर्थ पूजा है हमारे य शास्त्र में वेद में

893
01:02:36,120 --> 01:02:40,240
बली का अर्थ होता है पूजा तो पूजा किसकी नहीं की जा सकती

894
01:02:40,240 --> 01:02:44,440
है हमारे यहां तो जो है स

895
01:02:44,440 --> 01:02:48,520
सभी प्राणियों भगवान के दर्शन करते हैं जी भगवान ने जो

896
01:02:48,520 --> 01:02:52,720
शुक्र अवतार लिया भगवान ने अमस्या अवतार लिया वो तो किसी से भेद करते

897
01:02:52,720 --> 01:02:57,600
ही नहीं है तो वहा बलि का अर्थ पूजा है अवाल

898
01:02:57,600 --> 01:03:02,080
उसम लिखा जो है कि लोके विवा

899
01:03:02,080 --> 01:03:06,560
मध्य सेवा नित्या जंतु प्रेरणा वव

900
01:03:06,560 --> 01:03:10,640
विरास रास निव ष क्योंकि व्यक्ति की

901
01:03:10,640 --> 01:03:14,840
मैथुन में शराब पीने में और मांस भक्षण

902
01:03:14,840 --> 01:03:18,960
में रागता प्रवृति होती है उसका जो शास्त्र है ना

903
01:03:18,960 --> 01:03:23,120
वो सीमित करता है उसका विधान नहीं करता है

904
01:03:23,120 --> 01:03:27,200
परिस के द्वारा भाई रात दिन आपकी मांस खाने में प्रवृति

905
01:03:27,200 --> 01:03:31,760
है तो पंच पंच नक्षा कह देगा और आप जो आपको जो स्त्री

906
01:03:31,760 --> 01:03:36,840
से संयोग की इच्छा है तो विवाह के द्वारा संयोग करि कोई आपत्ति नहीं है

907
01:03:36,840 --> 01:03:40,880
और आपके लिए शराब का है तो जो सौत मण याग में जो

908
01:03:40,880 --> 01:03:45,080
विधान है उसका करिए यद गता सुराया तो दूसरा

909
01:03:45,080 --> 01:03:49,120
शलोक लिखाने पहला बकवास करेंगे ये लोग उसके नीचे का शलोक

910
01:03:49,120 --> 01:03:51,120
नहीं उसम लिखा है

911
01:03:51,120 --> 01:03:55,880
ता सुराया केवल सुना लिखा है

912
01:03:55,880 --> 01:04:00,120
व केवल सुघना मात्र है भक्षण नहीं है तो इनके शास्त्र

913
01:04:00,120 --> 01:04:04,360
में उनका शराब पीना का विधान है य तो महान पतित है

914
01:04:04,360 --> 01:04:09,240
तो काट काट करके जनता के सामने शब्द ले जाती है ना बुराई

915
01:04:09,240 --> 01:04:13,640
बुराई मतलब अपनी सौंदर्य का प्रचार नहीं करके

916
01:04:13,640 --> 01:04:17,880
यह जो परंपरा प्राप्त जो सिद्धांत है उनकी बुराई

917
01:04:17,880 --> 01:04:22,760
करके अपना इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करते हैं जैसे कुछ

918
01:04:22,760 --> 01:04:27,680
कुछ जो क्रिश्चन मिशनरी जैसे ध्वनित होता है ना अरे तुझको इन्होंने दूर

919
01:04:27,680 --> 01:04:31,680
रखा है तू यह है तू वो है जैसे जो पीड़ित पक्ष

920
01:04:31,680 --> 01:04:35,880
होता है प्रताड़ित पक्ष होता है उसको पकड़ लेंगे और उसको कहेंगे या पिछड़ा पक्ष

921
01:04:35,880 --> 01:04:39,960
होता है उसको पकड़ लेंगे और कहेंगे भैया इन्होने तेरे साथ यह किया वो किया तू

922
01:04:39,960 --> 01:04:43,960
हमारे में आजा तो यह वो हो गए धर्मा भाषी

923
01:04:43,960 --> 01:04:48,080
और यह हो गए सनातना भाषी सनातना भाषी

924
01:04:48,080 --> 01:04:52,440
सनातन का आभास है सनातन है नहीं तो अंदर

925
01:04:52,440 --> 01:04:57,000
सनातन की सीमा के अंदर दिखने वाले जो लोग हैं भाषी

926
01:04:57,000 --> 01:05:01,040
ये तरह से आभास भी ना कहा जा

927
01:05:01,040 --> 01:05:05,040
तो और अच्छा है इनको तो केवल जो रज्जू

928
01:05:05,040 --> 01:05:06,240
में सर्व की भ्रांति

929
01:05:06,240 --> 01:05:11,320
तो अधिष्ठान में तो एक बत बिना रजू के भ्रांति हो जाती

930
01:05:11,320 --> 01:05:15,560
है परम धर्म आस अधर्म शाखा

931
01:05:15,560 --> 01:05:19,840
पंचे धर्म ये केवल धर्मा

932
01:05:19,840 --> 01:05:24,960
भास कह लो कुछ ना कुछ तो कहना ही पड़ेगा

933
01:05:24,960 --> 01:05:29,200
कोई ना देना ही पड़ेगा ये हिंदू शब्द की अगर बात करूं

934
01:05:29,200 --> 01:05:33,200
तो ये लोग कभी कहते थे कभी कहते मिलेंगे कि

935
01:05:33,200 --> 01:05:37,320
400 साल पहले तक हिंदू शब्द नहीं बोला जाता था फिर कभी कहते

936
01:05:37,320 --> 01:05:41,400
मिलेंगे कि 600 साल पहले तक हिंदू शब्द नहीं

937
01:05:41,400 --> 01:05:45,600
बोला जाता था कभी कहते मिलेंगे 1400 साल और जब इनको

938
01:05:45,600 --> 01:05:49,760
यह पता चल जाता है कि 1400 साल पहले के भी प्रमाण प्राप्त है सिद्ध

939
01:05:49,760 --> 01:05:53,960
है तो फिर ये कहने लगेंगे कि राम कृष्ण ने कब स्वयं

940
01:05:53,960 --> 01:05:58,120
को हिंदू बोला अच्छा राम कृष्ण बहुत सी

941
01:05:58,120 --> 01:06:02,320
ऐसी चीजें करते हैं जिसका आलंबन खुद नहीं लेते जैसे मैंने

942
01:06:02,320 --> 01:06:06,440
प्रश्न किया एक बार एक आर्य समाजी से तो मैंने

943
01:06:06,440 --> 01:06:11,040
कहा कि भाई क्या कहते हैं ये

944
01:06:11,040 --> 01:06:15,720
जब राज गद्दी पर राज राज्याभिषेक होना है

945
01:06:15,720 --> 01:06:19,760
तो यह बताओ कि कौन सी चुनावी प्रक्रिया हुई क्योंकि कर्म

946
01:06:19,760 --> 01:06:21,280
के आधार अगर हम क्षत्रिय

947
01:06:21,280 --> 01:06:25,840
स्वीकार करते हैं तो हमें कर्म चेक करने

948
01:06:25,840 --> 01:06:30,440
है कि कोई श्रीराम से भी ज्यादा गुणवान व्यक्ति हो

949
01:06:30,440 --> 01:06:34,600
है ना तो हम तो फिर प्रतिस्पर्धा करेंगे ना कि कौन गद्दी पर बैठेगा

950
01:06:34,600 --> 01:06:38,600
चुनावी प्रक्रिया कि कौन गद्दी पर बैठेगा जो कर्मों

951
01:06:38,600 --> 01:06:42,600
जो जिसके आचरण सबसे ज्यादा उचित हो राजगद्दी के लिए

952
01:06:42,600 --> 01:06:46,640
उसको माना जाएगा मगर वहां तो निर्विवाद रूप से सबसे पहले

953
01:06:46,640 --> 01:06:50,920
श्री राम और श्री राम अगर वनवास गए तो बिना पूछे अगला जो उनसे

954
01:06:50,920 --> 01:06:55,120
छोटे हैं भरत बना दिया गया तो यह तो वंशवाद

955
01:06:55,120 --> 01:06:59,200
है यह तो वंशवाद है तो ये आपकी

956
01:06:59,200 --> 01:07:03,200
थ्योरी में कहां फिट बैठ जाता है जब आप कर्मानुसार चलेंगे तो

957
01:07:03,200 --> 01:07:07,200
यह तो जन्म से माना जा रहा है यहां पर सीधे-सीधे बिल्कुल

958
01:07:07,200 --> 01:07:11,280
बिल्कुल बिल्कुल हा तो यहां पर वो राम और कृष्ण को चेक नहीं करेंगे कि

959
01:07:11,280 --> 01:07:15,280
यह चीज अच्छा जैसे मैंने आपके में देखा वो एक प्रसंग ले रहे थे बार-बार

960
01:07:15,280 --> 01:07:19,280
कि आपने कभी देखा है क्या कि चार प्रकार के

961
01:07:19,280 --> 01:07:23,400
चार हाथ पैर हो जिसके ऐसा कोई इंसान देखा है क्या ऐसी बातें बोल रहे

962
01:07:23,400 --> 01:07:27,560
थे और खुद ये नहीं सोचते आप भाई ईश्वर है तो

963
01:07:27,560 --> 01:07:31,560
कहीं से जहां से उसने सृष्टि की रचना की वहां पर आपको

964
01:07:31,560 --> 01:07:35,600
ईश्वर को चमत्कार करने वाला मानना पड़ेगा इसमें

965
01:07:35,600 --> 01:07:36,720
क्या संदेह

966
01:07:36,720 --> 01:07:41,040
है तो आपके य जो तिब्बत में आलू से मनुष्य

967
01:07:41,040 --> 01:07:45,200
उपज रहे हैं जो तो वो नहीं सोचते कि कौन से इंसान तुमने देखे

968
01:07:45,200 --> 01:07:49,320
जो आलू से इंसान बने वो नहीं सोचते इसम थोड़ा सा कुछ

969
01:07:49,320 --> 01:07:53,760
बोले थोड़ा दर्शकों को कुछ बताए इस मामले पर

970
01:07:53,760 --> 01:07:58,080
नहीं बात ये है कि वो जो परात्पर

971
01:07:58,080 --> 01:08:02,240
परम परमात्मा है वह सगुण साकार

972
01:08:02,240 --> 01:08:06,520
में जो चाहेगा वह रूप होगा इनका जन्म कर्म बड़ दिव्य

973
01:08:06,520 --> 01:08:10,760
होता है यह लोग जो है यह समझते हैं कि

974
01:08:10,760 --> 01:08:15,280
परमात्मा का जन्म गर्भ से हुआ है ऐसा नहीं व चर्चा चली हु थी

975
01:08:15,280 --> 01:08:19,640
और तुलसीदास जी का जो है वह रामायण का भी उन्होंने प्रमाण दिया

976
01:08:19,640 --> 01:08:23,880
बहम ने कहा कि उसम तो यदि आप ऐसा मानोगे तो आगे भय प्रकट कपाला

977
01:08:23,880 --> 01:08:27,920
दन दयाला कौशल हित प्रकट शब्द आया गर्भ से उत्पन्न उत्पत्ति

978
01:08:27,920 --> 01:08:32,000
आई कहां है जो आपके पक्ष में है तो वो रावण

979
01:08:32,000 --> 01:08:36,320
में सही है और विपक्ष में चला गया तो रावण ठीक नहीं है

980
01:08:36,320 --> 01:08:40,520
ऐसा अधिक चरा मामला नहीं माना जाएगा और हमा जो सनातन आपका

981
01:08:40,520 --> 01:08:44,640
जो आर समाज है व कितने समय आर समाज हो या जैन हो बौद्ध

982
01:08:44,640 --> 01:08:48,800
हो तो हमने जो है उसकी श्लोक

983
01:08:48,800 --> 01:08:51,920
भी बोला था वो जो है दबा

984
01:08:51,920 --> 01:08:56,320
देती है ना उसम जो है लिखा उसम अध्या वि प्रतम

985
01:08:56,320 --> 01:09:00,760
जगत तत मनुष्य जना जनम मता नाम आद्यम

986
01:09:00,760 --> 01:09:04,920
जनम ना दिगंतर ततर मतान जने निट

987
01:09:04,920 --> 01:09:08,960
माते आपके जितने भी मत मज संप्रदाय है जो व्यक्ति का

988
01:09:08,960 --> 01:09:13,040
जो जन्म है उसी जन्म से उनका समय निर्धारित होता है

989
01:09:13,040 --> 01:09:17,160
आप इस्लाम धर्म में तो जोको उत्पत्ति करने वाला है

990
01:09:17,160 --> 01:09:21,200
वही उसका उतना ही काल माना जाएगा दयानंद जी का भी जो है

991
01:09:21,200 --> 01:09:25,600
उतना ही आ समाज का काल माना जाएगा बौद्ध का जो जन्म दिन उतना ही काल मान

992
01:09:25,600 --> 01:09:29,880
जाएगा किंतु हमारा जो सनातन धर्म

993
01:09:29,880 --> 01:09:34,680
है धर्मो पय सनातन एव मन यमाम

994
01:09:34,680 --> 01:09:39,080
गता नाद जन परच

995
01:09:39,080 --> 01:09:43,680
संपता विचार थोड़ा इसमें विचार करेंगे तो

996
01:09:43,680 --> 01:09:48,000
सृष्टि के हर गण के अनुसार जो हमारा इस सम काल चल रहा है

997
01:09:48,000 --> 01:09:52,080
तो उसमें एक अरब 8 करोड़

998
01:09:52,080 --> 01:09:56,360
और 2 खज

999
01:09:56,360 --> 01:10:01,160
2000 के लगभग हमारा जो सृष्टि का एक क्रम है के अनुसार

1000
01:10:01,160 --> 01:10:05,360
तो इसका तो जो है गत लग गया किंतु ऋषि

1001
01:10:05,360 --> 01:10:09,400
महर्षि एक बार सभा की यह पता लगा कि सनातन

1002
01:10:09,400 --> 01:10:13,720
धर्म इसका जन्म दिवस कब से है उसी पर लिखा धर्मो

1003
01:10:13,720 --> 01:10:18,320
प्यम सनातन ए मन समाम तो गणता

1004
01:10:18,320 --> 01:10:22,560
गत की सभा हुई जो गत है उनकी

1005
01:10:22,560 --> 01:10:26,640
क्या हुई सभा हुई यमा नेता और

1006
01:10:26,640 --> 01:10:31,280
सभा करते करते बहुत दिन बीत गए अध्या

1007
01:10:31,280 --> 01:10:35,360
जन परच संप्रा प्रता वि विचार

1008
01:10:35,360 --> 01:10:39,400
आज तक व जन्म दिवस नहीं निकाल पाए कि सनातन धर्म का

1009
01:10:39,400 --> 01:10:43,560
कितना काल है गणित के अनुसार इसका जन्म

1010
01:10:43,560 --> 01:10:47,600
दिवस क्या है इसका आदि क्या है इसका अंत क्या इसका मध्य क्या आज तक पता नहीं

1011
01:10:47,600 --> 01:10:51,600
चला अन्य का बताओ जिसका हम जो है बता देंगे आपके लिए इसका जन्म

1012
01:10:51,600 --> 01:10:55,720
दिवस कब है जी जी हमारा तो जो है ना

1013
01:10:55,720 --> 01:10:59,760
जो वेद में प्रतिपादक को सनातन धर्म है तो प्रतिपाद्य प्रतिपादक

1014
01:10:59,760 --> 01:11:04,000
से पहले वेद से ही पहले कल्पना की जा सकती है इसकी जो है

1015
01:11:04,000 --> 01:11:08,120
हमारा सनातन धर्म वेद के द्वारा प्रतिपाद्य है ना तो प्रतिपाद्य वस्तु

1016
01:11:08,120 --> 01:11:11,760
प्रतिपादक से पहले होगी तो प्रतिपा बहुत बढ़िया बत

1017
01:11:11,760 --> 01:11:14,800
बहुत अच्छी बात आपने

1018
01:11:14,800 --> 01:11:19,480
बताई आपने जो बात कही ना उससे एक बात और मुझे याद आ गई कि भाई

1019
01:11:19,480 --> 01:11:23,840
ये लोग जो ये कर्मा आधारित बात पर चलते हैं अलंकार हम लोग इन्ह

1020
01:11:23,840 --> 01:11:27,840
अलंकार भी कहते हैं अलंकार समाजी यह लोग पौराणिक कहते हैं ना

1021
01:11:27,840 --> 01:11:31,920
केवल तो उसमें ऐसा ध्वनित होता है कि भाई यही एक वेद को मानने

1022
01:11:31,920 --> 01:11:36,280
वाले हैं और दूसरा सिर्फ पुराण तक सीमित है

1023
01:11:36,280 --> 01:11:40,360
जबकि हम वैदिक पौराणिक है वैदिक भी है

1024
01:11:40,360 --> 01:11:44,480
पौराणिक भी है स्मृति को भी मानने वाले हैं तो हम लोग अलंकार समाजी भी कहते

1025
01:11:44,480 --> 01:11:49,000
हैं इहे तो इनकी ये जो बात है जो

1026
01:11:49,000 --> 01:11:53,360
जो दोहरी बातें हैं वो ऐसे मिल जाती

1027
01:11:53,360 --> 01:11:57,560
जैसे यह लोग कहेंगे भाई कर्म से ही जांच होगी अब जब कर्म

1028
01:11:57,560 --> 01:12:01,840
से जांच होगी तो यह जो वो अभी

1029
01:12:01,840 --> 01:12:05,920
कौन सा एक बिल पास हुआ था कि रोहिंग्या मुसलमानों को अंदर

1030
01:12:05,920 --> 01:12:10,000
नहीं आने देंगे तो इनको कैसे मालूम कि

1031
01:12:10,000 --> 01:12:14,200
हर रोहिंग्या मुसलमान जो है वह गलत है बॉर्डर पर जाकर के खड़े

1032
01:12:14,200 --> 01:12:18,480
हो जाओ सबके कर्म चेक करो और फिर अंदर आने दो जिसको आना है

1033
01:12:18,480 --> 01:12:22,800
वो कह देगा मैं हो गया मैं हो गया पूजा करने वाला

1034
01:12:22,800 --> 01:12:26,920
और मुझे अंदर ले लो आप भारत में जगह दे दो मुझे तो यह

1035
01:12:26,920 --> 01:12:30,920
कोई आधार तो नहीं है हमारे भारत में बुलाने का बाहर के लोगों

1036
01:12:30,920 --> 01:12:35,080
को वहां पर ये खुद ही की थ्योरी का खंडन करते हुए

1037
01:12:35,080 --> 01:12:39,160
फिर वह जो बिल पास कर रही है उसका समर्थन करते हैं कि नहीं नहीं

1038
01:12:39,160 --> 01:12:43,160
रोहिंग्या मुसलमान को हम अंदर नहीं आने देंगे अरे भाई क्यों पहले उसका कर्म

1039
01:12:43,160 --> 01:12:47,320
देख लो हो सकता है वो भी पांडित्य कर रहा हो वो भी वेद पढ़ रहा हो अगर

1040
01:12:47,320 --> 01:12:51,760
ऐसा करने लगे तो उनको भी ले लो आप अंदर तब नहीं ऐसा करेंगे

1041
01:12:51,760 --> 01:12:55,920
तो ये तो चीजें है इसमें

1042
01:12:55,920 --> 01:13:00,760
आचार्य श य मैं पूछूंगा एक बात कि

1043
01:13:00,760 --> 01:13:04,960
अ यह जो इस बारे में मतलब जैसे

1044
01:13:04,960 --> 01:13:09,000
जो आखरी में मैंने देखा कि जो पूरा जो जो आपका शास्त्रार्थ

1045
01:13:09,000 --> 01:13:13,240
स्पर्धा चली उसमें जो निर्णायक मंडल था मतलब वह कौन

1046
01:13:13,240 --> 01:13:17,240
से पहलू थे जिनके आधार पर निर्णय कर सके वह कि

1047
01:13:17,240 --> 01:13:21,280
आप विजेता है वह कौन से घटक थे जिसके कारण

1048
01:13:21,280 --> 01:13:25,600
मतलब ये जो विजय आपको प्राप्त हुई हां एक तो ये था प्रश्न उतर

1049
01:13:25,600 --> 01:13:29,640
था और उसमें एक शालीनता थी हम लोग बात जो है

1050
01:13:29,640 --> 01:13:33,800
सीधे सच्चे ढंग से रख रहे थे बाकी वो लोग जो है कटता

1051
01:13:33,800 --> 01:13:38,480
भाष कट भी थी अपने पर नियंत्रण भी नहीं था दूसरा

1052
01:13:38,480 --> 01:13:42,240
यह भी था कि उनका जो प्रश्न करते थे उसका उत्तर

1053
01:13:42,240 --> 01:13:46,240
जो है हम लोगों के द्वारा देने के बाद हम प्रश्न करते थे उत्तर

1054
01:13:46,240 --> 01:13:50,600
नहीं होता था यदि उस पैनल में जो है आर्य

1055
01:13:50,600 --> 01:13:54,760
समाज की मानसिकता वाले अधिक लोग थे और मैं समझता

1056
01:13:54,760 --> 01:13:58,920
हूं उसम बहुत विशिष्ट विद्वान भी थे आपके जो है राजस्थान

1057
01:13:58,920 --> 01:14:03,320
विश्वविद्यालय कुलपति थे वहां के प्रोफेसर थे एक तो वो जो है मंत्र पर

1058
01:14:03,320 --> 01:14:07,440
तंत्र पर बहुत बड़ा रिसर्च कर रहे हैं वो भी थे तो हम

1059
01:14:07,440 --> 01:14:11,880
लोगों का यह था कि जो है इसको शास्त्रार्थ

1060
01:14:11,880 --> 01:14:16,120
ना देकर के बाद संवाद दिया जा सकता है शास्त्रार्थ में आमने

1061
01:14:16,120 --> 01:14:20,400
सामने टक्कर होती है जब पता लगता है कौन कितने पानी में है ये तो अपना

1062
01:14:20,400 --> 01:14:24,840
बीच में से कुछ ना कुछ बोलते रहते थे कि तारतम

1063
01:14:24,840 --> 01:14:28,880
नहीं था उसमें तारतम्य नहीं निंदा ज्यादा थी

1064
01:14:28,880 --> 01:14:33,240
हम ये कह रहे हैं आप ठीक है महर्षि दयानंद जी है आपके आराध्य पास

1065
01:14:33,240 --> 01:14:37,400
करय मानिए उनके लिए किंतु हम ऋषि महर्षि

1066
01:14:37,400 --> 01:14:41,840
हों की निंदा करें उनकी आलोचना करें यह सहन नहीं है

1067
01:14:41,840 --> 01:14:45,920
हम आपकी दयानंद जी की आलोचना निंदा करें अपने भाषण प्रवचन में तो बात मानी

1068
01:14:45,920 --> 01:14:49,920
जाए कुछ कहो हमने किसी का नाम मैंने देखा था एक जगह

1069
01:14:49,920 --> 01:14:53,920
थोड़ा सा मर्यादित हो रहे थे सुन ले इस तरह से तू तड़ाक की भाषा पर आ गए

1070
01:14:53,920 --> 01:14:57,240
थे हा और अनियंत्रित से हो गए

1071
01:14:57,240 --> 01:15:01,320
थे जो निर्णायक मंडल है वो कह रहा है कि आप

1072
01:15:01,320 --> 01:15:05,400
थोड़ा संयम भरती मर्यादित हो जाइए तो वो खड़े होकर के

1073
01:15:05,400 --> 01:15:10,120
मैं ओपन चैलेंज दे रहा हूं यह सब चीजें वो कर रहे थे देखा था मैंने

1074
01:15:10,120 --> 01:15:14,400
तो तो वो अहंकार था उका कुछ नहीं है वो तो केवल

1075
01:15:14,400 --> 01:15:18,440
क्या करेंगे वो जो है कोई मतलब ही नहीं है खैर अच्छा मैंने

1076
01:15:18,440 --> 01:15:22,560
एक चीज और देखी यहां पर मैंने यह देखा

1077
01:15:22,560 --> 01:15:26,640
कि यहां पर मतलब प्रॉपर

1078
01:15:26,640 --> 01:15:30,720
तरीके से आमंत्रित हुए दोनों पक्ष और वहां

1079
01:15:30,720 --> 01:15:34,840
लिखा है कि वह शास्त्रार्थ हो रहा है शास्त्रार्थ स्पर्धा लिखा हुआ

1080
01:15:34,840 --> 01:15:39,360
है उसके बाद जब आप वि विजय घोषित होते तो उसमें

1081
01:15:39,360 --> 01:15:43,520
जो आर्य समाजी पक्ष है वो यह निकाल रहा है कि वो शास्त्रार्थ नहीं था या वो

1082
01:15:43,520 --> 01:15:47,600
विषय अलग था वो यह था वो वो था और जहां पर

1083
01:15:47,600 --> 01:15:51,880
एक व्यक्ति प्रश्न पूछने गया है उसको शास्त्रार्थ का नाम देकर तो कितना

1084
01:15:51,880 --> 01:15:56,120
बड़ा यह जो है जो कहेंगे इसको त्र

1085
01:15:56,120 --> 01:16:00,160
चरित्र कि एक जगह पर शास्त्रार्थ दूर दूर

1086
01:16:00,160 --> 01:16:04,320
तक का कोई संबंध नहीं है उसको शास्त्रार्थ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हो और

1087
01:16:04,320 --> 01:16:08,360
कह रहे हो कि शास्त्रार्थ में हार गए कौन जगतगुरु शंकराचार्य और

1088
01:16:08,360 --> 01:16:12,480
दूसरी तरफ जहां पर शास्त्रार्थ लिखा हुआ है आप हारे

1089
01:16:12,480 --> 01:16:16,640
हुए घोषित हुए हो सामने वाला वि विजय को विजय को प्राप्त

1090
01:16:16,640 --> 01:16:20,720
हुआ है और वहां पर आप कह रहे हो कि नहीं नहीं यहां विषय दूसरा था य ये था

1091
01:16:20,720 --> 01:16:24,920
वहा वो था वहा निर्णायक ये भी ये भी हमको सुनने को मिला कि

1092
01:16:24,920 --> 01:16:29,000
व निर्णायक दूसरा था बताइए नहीं नहीं सभी थे पांच

1093
01:16:29,000 --> 01:16:33,040
पैनल के थे सब और अधिकांश जो है ना वो हमारे आर समाज

1094
01:16:33,040 --> 01:16:37,240
की मानसिकता के लोग थे किंतु वो वहा शकर क्षेत्र भगवान

1095
01:16:37,240 --> 01:16:41,400
का आशीर्वाद है कृपा है तो हा उनकी कृपा

1096
01:16:41,400 --> 01:16:45,440
से जो है भगवान की कृपा से सब रहा और शास्त्रार्थ नहीं

1097
01:16:45,440 --> 01:16:49,800
था तो फिर आए क्यों आप निमंत्रण तो शास्त्रार्थ का था ना

1098
01:16:49,800 --> 01:16:54,200
जी जी जी जी और नहीं साथ चले जाते फिर आप जो है

1099
01:16:54,200 --> 01:16:59,720
नहीं वो ये मानते हैं व अपनी बारी आने

1100
01:16:59,720 --> 01:17:03,920
पर ठीक ठीक अपनी बारी आने पर य उसे शास्त्रार्थ

1101
01:17:03,920 --> 01:17:08,400
मानते हैं कि आप चलती हुई सभा है जो किसी संत की उसमें जाकर के प्रश्नोत्तरी

1102
01:17:08,400 --> 01:17:12,440
कर लोगे वो शास्त्रार्थ में आपने हरा दिया और जहां पर शास्त्रार्थ

1103
01:17:12,440 --> 01:17:16,880
के नाम पर आयोजन हुआ है वह शास्त्रार्थ नहीं है यह सिद्धांत

1104
01:17:16,880 --> 01:17:21,160
है आर्य समाज का हा यदि प्रथम आते ये प्रथम

1105
01:17:21,160 --> 01:17:26,440
आते तो वो हेडलाइन लिकड़ जाते कि हां आर समाज ने को जीत

1106
01:17:26,440 --> 01:17:27,640
लिया जो

1107
01:17:27,640 --> 01:17:31,920
सोरो है बहुत विशिष्ट परंपरा बहुत विद्वान लोग रहते हैं इससे

1108
01:17:31,920 --> 01:17:36,280
पहले हम जब पहुंचे थे उससे पहले वहा के विद्वान का प्रवचन हो रहा था बड़ा

1109
01:17:36,280 --> 01:17:40,880
गंभीर प्रवचन था और 15 वो भी बोले और

1110
01:17:40,880 --> 01:17:45,120
किंतु वो है ना ये होला मचाने लगते हैं तो हम तो ये चाहते

1111
01:17:45,120 --> 01:17:49,200
हैं जैसे हमारे महाशय जी थे उनके सोरो में

1112
01:17:49,200 --> 01:17:53,400
जो विद्यालय था धर्मानंद जी अंग्रेजों के समय का था इतने विशिष्ट

1113
01:17:53,400 --> 01:17:57,560
विद्वान थे वो धर्मानंद जी जी तो ये समझिए अंग्रेजों डीएम

1114
01:17:57,560 --> 01:18:01,840
वगैरह उस समय होते थे उन्होंने आजीवन प्रधानाचार्य के लिए लिख गए थे आजीवन

1115
01:18:01,840 --> 01:18:06,360
प्रधानाचार्य रहेंगे वहां के महाविद्यालय के जो प्रधानाचार्य

1116
01:18:06,360 --> 01:18:10,600
रहे तो हमारे विद्यालय के प्रधानाचार्य महास जी के शिष्य सवर

1117
01:18:10,600 --> 01:18:14,720
के प्रधानाचार्य जी महाशय जी के शिष्य और धर्म स महाविद्यालय वृंदावन

1118
01:18:14,720 --> 01:18:18,960
हरिवंश जी है वो भी जो है महाशय जी के शिष्य हमारा पूरा विद्याम

1119
01:18:18,960 --> 01:18:22,960
से एक ही है और हमको जब प्रथम पुरस्कार मिला तो हमने

1120
01:18:22,960 --> 01:18:27,840
यह समझा सोर को ही मिला है कि हमारे न्याय

1121
01:18:27,840 --> 01:18:31,880
इसका आ आशय है हमारा शरीर है उसका जो है

1122
01:18:31,880 --> 01:18:36,040
अंग कौन है हमारा हाथ है उसका अंग कौन है अंगुली है तो हमारे

1123
01:18:36,040 --> 01:18:40,560
शरीर के अंग से अंगली भिन्न नहीं मानी जाती वैसे

1124
01:18:40,560 --> 01:18:42,800
जिस विद्या वंश से हम जुड़े हुए उसी विद्या

1125
01:18:42,800 --> 01:18:46,800
वंश से सर जुड़ा हुआ है तो हमको जो प्रथम स्थान मिला व सर के

1126
01:18:46,800 --> 01:18:51,480
प्रथम स्थान है क्यों तद भिन्ना भि भिन हमसे भिन्न नहीं है

1127
01:18:51,480 --> 01:18:55,560
विद्या दोनों का एक ही है किंतु उस समय ला

1128
01:18:55,560 --> 01:18:59,720
ज्यादा मचा गए तो इसलिए जो है वो अपने

1129
01:18:59,720 --> 01:19:03,760
को दूसरा स्थान ले गए बाकी सर का दूसरा स्थानी था उनके

1130
01:19:03,760 --> 01:19:08,160
उनकी टीम बहुत अच्छी थी और बहुत अच्छा बोले वो ऐसी बात नहीं है कि

1131
01:19:08,160 --> 01:19:14,160
कभी कभी ऐसा होता आधी में जो है ना वो कुछ चीज उड़ जाती

1132
01:19:14,320 --> 01:19:19,120
है ऐसा होता हो जाते

1133
01:19:19,120 --> 01:19:23,480
अंत में जो उनका रोष देखा ना वो जो अपनी पराजय को स्वीकार

1134
01:19:23,480 --> 01:19:27,680
ना कर पाने की जो जो सदैव रही है इनकी उसमें देखा मैं तुम्हें

1135
01:19:27,680 --> 01:19:31,920
चैलेंज देता हूं यह है वो है तो अभी देखिएगा

1136
01:19:31,920 --> 01:19:36,200
मेरे साथ तो हुआ भी है और मैं आपको एक आप तो खैर अनुभवी

1137
01:19:36,200 --> 01:19:40,240
है आप वरिष्ठ है पर मैं आपको एक जो अपना

1138
01:19:40,240 --> 01:19:44,280
जो अनुभव है यह वाला यय चैनल वाला क्योंकि इसके माध्यम से

1139
01:19:44,280 --> 01:19:48,600
हमने प्रचार प्रसार किया और हमने काफी बार पूछा लो इनके गण

1140
01:19:48,600 --> 01:19:53,080
में जा जा कर के आर्य समाज मंदिर में जा जा कर के अरे एक बात की बात बताऊं

1141
01:19:53,080 --> 01:19:57,680
एक बार हम इनके आर्य समाज मंदिर में चले गए और हमने साधारण सा प्रश्न कर लिया

1142
01:19:57,680 --> 01:19:58,180
कि

1143
01:19:58,040 --> 01:20:02,400
आपके पास ये जो आप कह रहे हैं कि हम वेदों को मानने वाले हैं

1144
01:20:02,400 --> 01:20:06,480
तो यह वेद मंत्र कैसे आए आपके पास अब

1145
01:20:06,480 --> 01:20:10,720
आपको अगर वेदों आपको वैदिक होना है तो आपको मानना पड़ेगा कि गुरु

1146
01:20:10,720 --> 01:20:14,920
शिष्य परंपरा से हमारे पास आए तो आपकी तो अपनी कोई गुरु शिष्य

1147
01:20:14,920 --> 01:20:19,480
परंपरा है ही नहीं और जिसकी है

1148
01:20:19,480 --> 01:20:23,480
उस पर आप अविश्वास प्रस्तुत कर रहे हैं कि हम यण को नहीं मानते

1149
01:20:23,480 --> 01:20:26,760
शंकराचार्य को नहीं मानते

1150
01:20:26,760 --> 01:20:30,960
तो वो जो दो अरब सा दो अरब वर्ष पूर्व जो चले आ रहे

1151
01:20:30,960 --> 01:20:35,160
हैं वेद श्रुति परंपरा से तो वो आपके पास

1152
01:20:35,160 --> 01:20:39,200
आप यदि शंकराचार्य जो परंपरा प्राप्त आचार्य हैं

1153
01:20:39,200 --> 01:20:43,600
उनको यदि मानने वाले हैं आप तब तो आप वैदिक है

1154
01:20:43,600 --> 01:20:47,640
वरना आप जो वेदों का अर्थ अगर उनका नहीं मानेंगे जिससे आपको वेद

1155
01:20:47,640 --> 01:20:51,800
के मंत्र प्राप्त हुए हैं तो फिर आप

1156
01:20:51,800 --> 01:20:56,120
वेदों को मानने वाले कैसे अ अपने आप को सिद्ध कर पाएंगे

1157
01:20:56,120 --> 01:21:00,160
क्योंकि मेरे से ही आपको वेद का मंत्र मिला और मेरे से ही आपको

1158
01:21:00,160 --> 01:21:04,640
वेद का अर्थ मिला आपने मंत्र को मान लिया आपने अर्थ को नहीं माना

1159
01:21:04,640 --> 01:21:08,920
जब अर्थ को नहीं माना तो फिर आपका मेरे ऊपर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता

1160
01:21:08,920 --> 01:21:13,760
जब मेरे पर विश्वास नहीं तो मुझसे प्राप्त होने वाले मंत्र पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता

1161
01:21:13,760 --> 01:21:17,960
और यदि मंत्र पर विश्वास है तो फिर वेद के अर्थ पर विश्वास होना सिद्ध

1162
01:21:17,960 --> 01:21:22,200
नहीं होता ना होना सिद्ध नहीं होता तो मैंने ये कुछ

1163
01:21:22,200 --> 01:21:26,200
समीकरण में इसी समीकरण में मैंने मंद में जाक पूछ लिया अब

1164
01:21:26,200 --> 01:21:30,360
भाई इन्होंने इतना मेरे ऊपर व्यक्तिगत षडयंत्र करना

1165
01:21:30,360 --> 01:21:34,560
व्यक्तिगत मेरे परिवार के बारे में मतलब बातें

1166
01:21:34,560 --> 01:21:38,640
करना अलग अलग तरीके की उपाधियां देना और टी का

1167
01:21:38,640 --> 01:21:42,680
टिप्पणी मतलब व्यक्तिगत धमकियां देना कोर्ट तक

1168
01:21:42,680 --> 01:21:47,440
की धमकी तक बात पहुंच गई और तो और जिस व्यक्ति

1169
01:21:47,440 --> 01:21:51,440
से मैंने सर्व प्रथम य पूछा था कि आर्य समाज की परंपरा

1170
01:21:51,440 --> 01:21:55,480
क्या है उसका मेरे पास फौन आता है वो आ जी मेरे को फोन कर

1171
01:21:55,480 --> 01:21:59,760
रहा है वो बोल रहा है भैया मेरी नौकरी चली जाएगी मेरे छोटे-छोटे

1172
01:21:59,760 --> 01:22:05,240
बच्चे हैं लोग मेरे को नौकरी से निकाल देंगे आप वो वीडियो हटा

1173
01:22:05,240 --> 01:22:09,880
दीजिए पर गुरुदेव ने सिखाया था हमको के जो

1174
01:22:09,880 --> 01:22:13,880
कर्तव्य का निर्णय जो होता है व्यक्तिगत नहीं होता

1175
01:22:13,880 --> 01:22:18,080
है भले ही संबंधों का त्याग करना पड़े मगर सिद्धांतों का त्याग

1176
01:22:18,080 --> 01:22:22,320
ना करना तो ये जो पूरी भा भावुकता वाली पंक्तियां

1177
01:22:22,320 --> 01:22:26,480
है कि मेरी छोटे-छोटे बच्चे हैं पर हमको समाज के सामने समष्टि

1178
01:22:26,480 --> 01:22:29,080
रूप से देखे तो हमें सिद्धांत लाना है

1179
01:22:29,080 --> 01:22:33,880
तो हमने नहीं हटाया उन्होंने हमसे फोन मैं यह देख रहा हूं कि

1180
01:22:33,880 --> 01:22:38,440
कितने मतलब जो कहते हैं ना दया ये कितने

1181
01:22:38,440 --> 01:22:42,480
निर्दय हो सकते हैं जो अपने ही व्यक्ति जिसने अपने जीवन भर इनको अपनी सेवा

1182
01:22:42,480 --> 01:22:46,680
प्रदान की किसी भी रूप में और उसको धमका रहे

1183
01:22:46,680 --> 01:22:51,120
हैं कि तुमने जो है उसको इंटरव्यू क्यों दिया और उस इंटरव्यू

1184
01:22:51,120 --> 01:22:55,120
के कारण आर समाज का वो हो रहा है तो आप जो है आपको हमन उसने वही बात

1185
01:22:55,120 --> 01:22:59,320
बोली जो ये उसको सिखाते रहे उसने वही बात बोली जोय

1186
01:22:59,320 --> 01:23:04,000
उसको सिखा उसने कहा आर्य समाज गुरु परंपरा को नहीं

1187
01:23:04,000 --> 01:23:08,280
मानता आर समाज में कोई गुरु परंपरा नहीं है उन्होंने

1188
01:23:08,280 --> 01:23:12,720
ये कहा इन्होंने उसको ऐसा कर दिया कि वह व्यक्ति आर्य

1189
01:23:12,720 --> 01:23:17,520
समाजी होते हुए हमको फोन करके यह इनके लिए शर्म की बात

1190
01:23:17,520 --> 01:23:21,560
है ये इनके लिए शर्म की बात है कि उनका व्यक्ति हमको

1191
01:23:21,560 --> 01:23:25,560
फोन करके मतलब एक तरीके से कुछ मांगना पड़ रहा है उसको

1192
01:23:25,560 --> 01:23:29,720
हमसे भैया आप हमारी मदद करिए रक्षा किससे करनी है आर्य

1193
01:23:29,720 --> 01:23:33,760
समाज से ये स्थिति है तो मैं वही

1194
01:23:33,760 --> 01:23:37,840
कह रहा था कि अभी आपका जो ये जो शास्त्रार्थ में विजय को प्राप्त हुए ये

1195
01:23:37,840 --> 01:23:41,960
आप पर भी ऐसा हो सकता है वैसे तो अभी तक किया भी होगा कि व्यक्तिगत

1196
01:23:41,960 --> 01:23:44,240
हमला करें आपके बारे में टीका

1197
01:23:44,240 --> 01:23:48,600
टिप्पणी चालू हो यहां वहां अवाय फैलाए आपके विरोध

1198
01:23:48,600 --> 01:23:52,680
में षड्यंत्र हो तो इन सबके लिए मैं पहले से ही आपको बताऊंगा

1199
01:23:52,680 --> 01:23:56,920
कि भाई मैं तोसे गुजर आप को तो खैर आप तो बड़े हैं तो आप ही मुझे बताने

1200
01:23:56,920 --> 01:24:01,120
वाले हैं फिर भी मैं बताऊंगा कि यह सब चीजें ये लोग करेंगे और

1201
01:24:01,120 --> 01:24:05,320
इन्होंने कई बार की है इसलिए हा ना बिल्कुल जब एक बार

1202
01:24:05,320 --> 01:24:09,720
रामदेव जी ने जब बहुत ऐसा वक्तव्य दिया ब्राह्मणों के प्रति

1203
01:24:09,720 --> 01:24:13,960
अन्यों के प्रति तो हमारा जो पुत्र

1204
01:24:13,960 --> 01:24:18,200
है वो सोशल मीडिया में उसने वीडियो बनाया और 36 चैनल

1205
01:24:18,200 --> 01:24:22,440
ने जो है उसको प्रसारित किया करोड़ों लोगों ने देखा उनके

1206
01:24:22,440 --> 01:24:26,520
व्यापार को हानि हुई तो कमेटी उन्होने कहा किय वाले उन्होने जो

1207
01:24:26,520 --> 01:24:31,240
है सब कुछ आपकी छवि खराब कर रखी है तो सबसे अधिक जो

1208
01:24:31,240 --> 01:24:36,560
हम लोगों के जो वीडियो था बहुत ही मतलब प्रचारित हुआ करोड़ों लोगों ने देखा

1209
01:24:36,560 --> 01:24:40,600
देखिए अच्छा ये लोग हा फिर यह लोग जो है उस

1210
01:24:40,600 --> 01:24:45,000
वीडियो को डिलीट कराने के लिए वहा दिल्ली जाते हैं कोर्ट में

1211
01:24:45,000 --> 01:24:49,000
हाई कोर्ट में अच्छा हा और भाई इनके पास पैसा है

1212
01:24:49,000 --> 01:24:53,280
एक से अच्छे लोग थे सब तो

1213
01:24:53,280 --> 01:24:57,400
हमारे भाई साहब भी जो सुप्रीम कोर्ट से वकालत की हु देखा कि इसमें ऐसा कुछ बात

1214
01:24:57,400 --> 01:24:59,320
है नहीं को जो इसे

1215
01:24:59,320 --> 01:25:03,360
निकाला जाए तो इनके जो है वकीलों

1216
01:25:03,360 --> 01:25:08,040
ने बहस की यूट के तरफ से जो वकील थे उन्होंने बहस की

1217
01:25:08,040 --> 01:25:12,240
उन्होंने यह कहा कि इन्होंने जो है मंत्र और पुराण

1218
01:25:12,240 --> 01:25:16,600
धर्मशास्त्र से आपकी बात को काटा है और

1219
01:25:16,600 --> 01:25:20,600
गलत सिद्ध किया है और आप जो उसी आधार पर उनकी बात

1220
01:25:20,600 --> 01:25:24,600
को काट दीजिए तो आपका भीय चलाएगा वही हां आप इन की

1221
01:25:24,600 --> 01:25:29,200
बात का खंडन करें य ना चलाए तो य का दोष है

1222
01:25:29,200 --> 01:25:33,840
और यह कहां तक संगत हो जाएगी बात जो है शास्त्र का सिद्धांत दे करके जो है

1223
01:25:33,840 --> 01:25:37,840
आपकी बात को का खंडन किया जा रहा है उसको हम इसको नहीं निकाल

1224
01:25:37,840 --> 01:25:42,400
सकते य ने नहीं माना व वीडियो आज तक भी चल रही है

1225
01:25:42,400 --> 01:25:46,440
और हां यह कह आती थी हम यह करेंगे वो करें

1226
01:25:46,440 --> 01:25:50,480
को धर्म रक्षित रक्षता है इन लोगों से किसी से भय नहीं

1227
01:25:50,480 --> 01:25:54,680
है हम धर्म रक्षा धर्म हमारी रक्षा करेगा और दूसरा त

1228
01:25:54,680 --> 01:25:58,680
कहा विरोध है विचारधारा का तो विरोध है शास्त्र का अपने ंग

1229
01:25:58,680 --> 01:26:02,680
से मनमान ढंग से आप जो है प्रयोग करते हैं उस खंडन करते हैं इसको ऐसा

1230
01:26:02,680 --> 01:26:06,760
मान लीजिए हमने कहा कि हम मूर्ति पूजा का हम

1231
01:26:06,760 --> 01:26:10,800
भी मूर्ति पूजा खंडन करते हैं किस परिस्थिति में करते हैं भगवान

1232
01:26:10,800 --> 01:26:15,200
ने स्वयं कहा है कि जो है कि

1233
01:26:15,200 --> 01:26:19,520
कि जितने भी प्राणी है उस मेरा दर्शन कीजिए संसार में

1234
01:26:19,520 --> 01:26:24,480
और उनमें अपनी आत्मा मुनका दर्शन की ऐसी स्थिति हो जाए

1235
01:26:24,480 --> 01:26:28,680
तो फिर वो जो है मूर्ति पूजा नहीं करनी चाहिए न त समान त पर

1236
01:26:28,680 --> 01:26:32,760
भूत भगवान की मेरी पू मेरी मूर्ति पूजा जबी तक विहित

1237
01:26:32,760 --> 01:26:36,920
है जब तक सही प्राणी मेरा दर्शन ना हो हम का मूर्ति पूजन मान

1238
01:26:36,920 --> 01:26:41,000
रहे है कि उस स्थिति में जाकर के मान रहे है तुम पहले में खंडन

1239
01:26:41,000 --> 01:26:45,000
करने लगते हो आप ये कहते हो जो तत्व

1240
01:26:45,000 --> 01:26:49,000
ज्ञानी ब्रह्म जाना ब्राह्मण के जो है बहुत ये

1241
01:26:49,000 --> 01:26:53,280
तो बहुत व्याख्या करते हैं कि जो ब्र को ब्रह्म को जाने ब्राह्मण हो जाएगा अरे ब्रह्म

1242
01:26:53,280 --> 01:26:57,680
जाना ब्र बनेगा ब्राह्मण बन कहां से जाएगा

1243
01:26:57,680 --> 01:27:01,760
तो व्याकरण काही बोध नहीं है बस कुछ शब्द उन्होने सुन लिए

1244
01:27:01,760 --> 01:27:06,000
रट लिए उसके लिए कहने लगते हैं

1245
01:27:06,000 --> 01:27:10,160
तो मुझे तो जो है कि ऐसा लगता है कि

1246
01:27:10,160 --> 01:27:15,560
इनके विषय में विशेष ज्यादा चर्चा करना भी जो है अपने समय को बद करना

1247
01:27:15,560 --> 01:27:19,600
है क्योंकि सिद्धांत नहीं है सिद्धांत होना तो अच्छा

1248
01:27:19,600 --> 01:27:23,600
चार सिद्धांत होता है कुछ ना कुछ कोई भी आप दर्शन उठ के

1249
01:27:23,600 --> 01:27:28,600
कुछ को सिद्धांत नहीं है

1250
01:27:28,600 --> 01:27:30,200
अच्छा सिद्धांत

1251
01:27:30,200 --> 01:27:34,640
से मुझे एक बात याद आई आचार्य श्री वैसे

1252
01:27:34,640 --> 01:27:39,160
यह हमारा विषय नहीं है यह लोग एक जगह कह देते हैं

1253
01:27:39,160 --> 01:27:44,440
कि ब्रह्म और जीव और प्रकृति

1254
01:27:44,440 --> 01:27:48,840
में स्वरूप भेद है स्थान

1255
01:27:48,840 --> 01:27:53,400
भेद नहीं है तो ये

1256
01:27:53,400 --> 01:27:57,520
अप्रत्यक्ष रूप सेय अद्वैत को ही दूसरे शब्दों में मान

1257
01:27:57,520 --> 01:28:03,360
रहे

1258
01:28:03,360 --> 01:28:08,200
हैं क

1259
01:28:08,200 --> 01:28:12,240
कैसे ये है की वैसे हमारा सिद्धांत है

1260
01:28:12,240 --> 01:28:16,280
मुक्ति स्वरूप व्यस्थ जी जी ये कुछ

1261
01:28:16,280 --> 01:28:20,320
दिखा रहे है आपको ये ये आचार्य श्री कीय

1262
01:28:20,320 --> 01:28:24,440
फेसबुक आईडी है आप यहां से आचार्य श्री से जुड़ सकते हैं

1263
01:28:24,440 --> 01:28:28,560
और इनका गुरुकुल है संपर्क करके आप जो

1264
01:28:28,560 --> 01:28:32,560
है जो भी धर्मा अनुष्ठान के

1265
01:28:32,560 --> 01:28:36,680
निमित्त आप जो है जुड़ना चाहे आचार्य श्री से जुड़ सकते हैं और

1266
01:28:36,680 --> 01:28:40,760
उनका पूरा यहां पर आपको फेसबुक दिख रहा है संपर्क कर सकते

1267
01:28:40,760 --> 01:28:44,760
हैं इनका गुरुकुल है बहुत सारे यहां पर आने वाली पीढ़ी के

1268
01:28:44,760 --> 01:28:48,800
लिए ऐसे ही आचार्य निर्मित हो

1269
01:28:48,800 --> 01:28:52,880
रहे हैं जिनका निर्माण हो रहा है इस समय अध्ययनरत है बहुत सारे

1270
01:28:52,880 --> 01:28:57,160
बच्चे हैं वहां पर और काफी बाल्यावस्था में भी है और

1271
01:28:57,160 --> 01:29:01,400
किशोर अवस्था में भी है तो आप यहां से

1272
01:29:01,400 --> 01:29:05,600
जो पूज आचार्य श्री है इनका सानिध्य प्राप्त कर सकते हैं किसी

1273
01:29:05,600 --> 01:29:09,640
प्रकार से आप जो है इनके गुरुकुल का विकास देखना चाहते हैं तो उसके

1274
01:29:09,640 --> 01:29:13,880
निमित्त भी इनसे आप संपर्क कर सकते हैं और बहुत

1275
01:29:13,880 --> 01:29:18,280
अच्छा लगा आचार्य श्री आपका जो है हमें यह व्याख्यान प्राप्त हुआ

1276
01:29:18,280 --> 01:29:22,800
इतना आपने समय निकाला आप जिस समय मैंने आपको संपर्क किया था

1277
01:29:22,800 --> 01:29:23,300
उस समय

1278
01:29:23,280 --> 01:29:27,320
भी आपके यहां को अध्ययन कार्य ही हो रहा था इसमें

1279
01:29:27,320 --> 01:29:31,560
जो वहां के आपके शिष्य गण थे उस समय पीछे से आवाज आ रही थी और

1280
01:29:31,560 --> 01:29:35,920
फिर भी आपने वेद का स्वाध्याय हो रहा था उस समय जो है

1281
01:29:35,920 --> 01:29:39,920
जी जी वेद का उस समय स्वाध्याय हो रहा था ये इग्राम

1282
01:29:39,920 --> 01:29:43,920
है क्या अच्छा यह आपका य चैनल है शायद हा हाय चैनल है

1283
01:29:43,920 --> 01:29:47,920
हा दोन एक तो म हा एक

1284
01:29:47,920 --> 01:29:52,240
तो है दोनों ही जो है तो

1285
01:29:52,240 --> 01:29:56,360
अभी हो सकता है मुझे दिख रहा है एक करोड़ हमारी

1286
01:29:56,360 --> 01:30:00,480
एक करोड़ व्यक्ति तक हम लोगों ने जो है अपना सनातन धर्म पहुंचा दिया

1287
01:30:00,480 --> 01:30:04,480
है बहुत बढ़ महाराज को एक करोड़ व्यक्तियों तक पहुंचा

1288
01:30:04,480 --> 01:30:08,480
दिया है ये ऐसा उसम लिखा हुआ आ रहा है साथ सोशल मीडिया ने जो

1289
01:30:08,480 --> 01:30:12,520
है ये अभी की होगी रिसर्च तो

1290
01:30:12,520 --> 01:30:16,560
एक करोड़ लोगों तक हमारा ये वक्तव्य पहुंच चुका है और हम

1291
01:30:16,560 --> 01:30:21,480
चाहते हैं कि जो है एक अरब तक तो कम से कम पहुंचे

1292
01:30:21,480 --> 01:30:25,480
हीस बिल्कुल बिल्कुल भगवान से सता है जी

1293
01:30:25,480 --> 01:30:29,480
जी जी आचार्य श्री का य चैनल है अभी जो आपको

1294
01:30:29,480 --> 01:30:34,040
दिखाया गया तो आप आचार्य श्री का जो ज्ञान

1295
01:30:34,040 --> 01:30:38,080
ज्ञान है उसको प्राप्त करने के निमित्त आप

1296
01:30:38,080 --> 01:30:38,580
वहां

1297
01:30:38,440 --> 01:30:42,600
पर जुड़ सकते हैं उन्हें फॉलो कर लीजिए और हम

1298
01:30:42,600 --> 01:30:46,640
आचार्य श्री से यही आशीर्वाद मांगेंगे कि हम

1299
01:30:46,640 --> 01:30:50,960
जो अभियान लेकर के चल रहे हैं हिंदू राष्ट्र के लिए और

1300
01:30:50,960 --> 01:30:55,000
जिसके लिए हम जो है सनातन समाज को जागरूक करते

1301
01:30:55,000 --> 01:30:59,560
हुए उनका जो सार्वभौम सिद्धांत है वास्तविकता में सनातन धर्म क्या है

1302
01:30:59,560 --> 01:31:03,760
यह बताते हुए जो समाज में एकत्व लाने का प्रयास कर रहे हैं वो

1303
01:31:03,760 --> 01:31:08,400
उस प्रयास में हम लोग सफल हो पाए आशीर्वाद हमें प्रदान करें

1304
01:31:08,400 --> 01:31:12,600
और जी में जो है एक लोक

1305
01:31:12,600 --> 01:31:17,160
के साथ संघार करते हैं इस विषय का जो है जी जी

1306
01:31:17,160 --> 01:31:21,880
बल सत भव भूत भारते धर्म भाव

1307
01:31:21,880 --> 01:31:26,720
प्रसन भूते भारती प्रताप प्रत

1308
01:31:26,720 --> 01:31:32,000
धर्म चर्चा नित बाधा पामर संप

1309
01:31:32,000 --> 01:31:36,080
गीत बिल सत भूते भारते धर्म भावा

1310
01:31:36,080 --> 01:31:40,760
हमारे भारतवर्ष के प्रत्येक घर में

1311
01:31:40,760 --> 01:31:45,760
प्रत्येक घर घर में जो है सनातन धर्म की विजय पताका फराई

1312
01:31:45,760 --> 01:31:49,920
जाए भारत बिल सत भव भूत

1313
01:31:49,920 --> 01:31:53,880
भारते धर्म भावा भारत में जितने भी घर है विश्व

1314
01:31:53,880 --> 01:31:58,160
जितने भी घर में घर घर हमारे सनातन धर्म की गुज होनी चाहिए

1315
01:31:58,160 --> 01:32:02,360
और प्रसन भ भारती प्रतापा धर्म चर्चा

1316
01:32:02,360 --> 01:32:06,360
के साथ साथ हमारा प्रताप भी बढ़े हमारा सौर्य तेज

1317
01:32:06,360 --> 01:32:10,640
है तपस्या है जो कुछ है व रा दिन दना रात चना बढ़े

1318
01:32:10,640 --> 01:32:14,760
और प बंद धर्म चर्चा जो आप सा चर्चा

1319
01:32:14,760 --> 01:32:19,960
हुई यह धर्म चर्चा घर घर फैले

1320
01:32:19,960 --> 01:32:24,040
जी धर्म चर्चा आध्यात्मिक चर्चा चली

1321
01:32:24,040 --> 01:32:28,160
जो धर्म की चर्चा चली है जो भव बंधन को काटने वाली है मुक्ति को देने

1322
01:32:28,160 --> 01:32:32,560
वाली है ये जो चर्चा है वो भी घर घर में चले केवल

1323
01:32:32,560 --> 01:32:37,040
शौर्य से काम नहीं चलेगा क्योंकि हमारा जो भारतवर्ष आध्यात्मिक

1324
01:32:37,040 --> 01:32:41,760
प्रधान भारत वर्ष है और निप तत मत बाधा जो

1325
01:32:41,760 --> 01:32:46,200
जो है निप तत मत बाधा जो मतवाद है देखो जो

1326
01:32:46,200 --> 01:32:50,560
जो मत होता है ना व अपने मन माने ढंग से हो जाता है कि मते इष्टम

1327
01:32:50,560 --> 01:32:54,680
मान इष्टम मान अभिम मान अमत जो अपने अच्छा लगता लो बना

1328
01:32:54,680 --> 01:32:58,840
लेते हैं उसका पतन हो पामर ही संप गीता

1329
01:32:58,840 --> 01:33:02,880
पामर माने मूर्खों के द्वारा बनाया गया है वो मत

1330
01:33:02,880 --> 01:33:06,880
मत मत मजब है संप्रदाय तो अपने जो व्यक्ति आकांक्षा को लेकर

1331
01:33:06,880 --> 01:33:08,880
अपने मनमा से बना देते हैं

1332
01:33:08,880 --> 01:33:14,080
उनका जो विनाश हो और सनातन धर्म की जय हो

1333
01:33:14,080 --> 01:33:18,560
जय बहुत बहुत आपका आभार बहुत सारा

1334
01:33:18,560 --> 01:33:22,600
आपके चरणों में बार-बार प्रणाम आचार श्री जो आपने हमें जो है

1335
01:33:22,600 --> 01:33:26,800
अपने जो है कृतार्थ वो आपका ये

1336
01:33:26,800 --> 01:33:30,960
वक्तव्य व्याख्यान प्रदान किया और इतना समय दिया आपका

1337
01:33:30,960 --> 01:33:35,040
बहुत-बहुत आभार और दर्शकों से मैं कहूंगा यह थे

1338
01:33:35,040 --> 01:33:40,080
हमारे आचार्य श्री जो सोरो में अभी कुछ दिन पूर्व

1339
01:33:40,080 --> 01:33:44,240
जो शास्त्रार्थ स्पर्धा आयोजित हुई थी जिसमें कि यह प्रथम

1340
01:33:44,240 --> 01:33:48,680
स्थान पर इनको जो है विजय प्राप्त हुई और सामने

1341
01:33:48,680 --> 01:33:52,880
इनके आर समाज भी था जो कि इनसे पराजित होते हुए द्वितीय

1342
01:33:52,880 --> 01:33:57,080
स्थान उसको किसी प्रकार से प्राप्त हो गया और बहुत

1343
01:33:57,080 --> 01:34:01,880
ही रोचक कुछ दृश्य है जो आचार्य श्री के

1344
01:34:01,880 --> 01:34:05,960
जो फेसबुक है उस पर भी पड़ा है और भी कहीं से उसकी वो कुछ दृश्य मिल

1345
01:34:05,960 --> 01:34:09,960
जाएंगे बाकी जो सर्वशक्तिमान वाली जो हमारी कहानी है

1346
01:34:09,960 --> 01:34:14,000
वो उस शास्त्रार्थ में भी आपको देखने को मिलेगी ईश्वर वही

1347
01:34:14,000 --> 01:34:18,520
है जो कुछ भी कर सकता है उसके सामने आ यदि आपने

1348
01:34:18,520 --> 01:34:22,680
बाधा लगा दी तो आबाद नहीं है अनंत सामर्थ्य वान नहीं है सर्वशक्तिमान

1349
01:34:22,680 --> 01:34:24,000
नहीं है व श्

1350
01:34:24,000 --> 01:34:28,160
ही नहीं है और जब वह ईश्वर ही नहीं है तो फिर वह उसे

1351
01:34:28,160 --> 01:34:32,320
प्राप्त करने के निमित्त जो आपको धर्म के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा

1352
01:34:32,320 --> 01:34:35,920
है वह धर्म नहीं धर्मा

1353
01:34:35,920 --> 01:34:41,920
भास तो बहुत बहुत आभार आचार्य श्री आपका आने का

1354
01:34:42,560 --> 01:34:46,600
और सभी को जय श्री राम जय श्री

1355
01:34:46,600 --> 01:34:51,000
राम सनातन धर्मो विजयते

1356
01:34:51,000 --> 01:34:55,000
राम सनातन धर्मो विजयते सताराम
