1
00:00:01,130 --> 00:00:07,130
[संगीत]

2
00:00:07,320 --> 00:00:11,560
सभी को जय श्री राम प्रार्थना

3
00:00:11,560 --> 00:00:15,640
करते हैं आप सभी कुशल मंगल होंगे और हम

4
00:00:15,640 --> 00:00:21,640
जो कार्य कर रहे हैं वह आप लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहा होगा

5
00:00:22,000 --> 00:00:26,880
अ एक जो प्यारी बहना करके

6
00:00:26,880 --> 00:00:30,920
हैं उनके घर का प्रारूप बदल चला है और अब वहां

7
00:00:30,920 --> 00:00:35,120
पर जहां पहले जिस स्थान पर भगवान को हटा

8
00:00:35,120 --> 00:00:38,760
दिया गया था और

9
00:00:38,760 --> 00:00:42,760
रामपाल जब जेल में नहीं थे तब की उनका तब का उनका

10
00:00:42,760 --> 00:00:46,760
कोई चित्र है उसको लगा कर के

11
00:00:46,760 --> 00:00:50,920
उसका ईश्वर के रूप में उसकी भक्ति कर रहे थे लोग

12
00:00:50,920 --> 00:00:55,640
अनजाने में अज्ञ वश तो वहां पर पुनः

13
00:00:55,640 --> 00:01:00,000
ईश्वर की स्थापना हो चुकी है पुनः वहां पर भगवान का मंदिर

14
00:01:00,000 --> 00:01:04,640
बन चुका है बजाय किसी तथाकथित जेल धाम निवासी

15
00:01:04,640 --> 00:01:09,560
तत्वदर्शी की फोटो के वहां पर जो हमारे

16
00:01:09,560 --> 00:01:13,680
वेदा आदि शास्त्र सम्मत भगवान के जो स्वरूप है

17
00:01:13,680 --> 00:01:16,720
वह वहां पर आपको दिखने लगे

18
00:01:16,720 --> 00:01:20,760
तो यह एक अच्छा अचीवमेंट है कि सदैव

19
00:01:20,760 --> 00:01:24,760
मन में यही भावना रहती है कि हमारे कार्य करने से

20
00:01:24,760 --> 00:01:28,960
एक जगह भी अगर बदलाव आया तो बस हम लोग हमारा वही

21
00:01:28,960 --> 00:01:33,440
जो हमारा कार्य करना है सार्थक हो

22
00:01:33,440 --> 00:01:37,960
जाएगा तो कल चर्चा चल रही

23
00:01:37,960 --> 00:01:42,040
थी कि गरुण पुराण में क्या क्या लिखा है तो श्राद

24
00:01:42,040 --> 00:01:46,840
वाला भाग जो है वह आज पूरा करेंगे उसके बाद जो है व्रत

25
00:01:46,840 --> 00:01:51,760
पर बात करेंगे वैसे गरुण पुराण में

26
00:01:51,760 --> 00:01:56,720
ही सारी चीजें में मिल जाती है तो

27
00:01:56,720 --> 00:02:01,280
श्रा के पक्ष में पितृ पूजा के पक्ष में हमने वेदों

28
00:02:01,280 --> 00:02:05,560
से प्रमाण दिखा दिया था कल बहुत सारा दो सूक्त

29
00:02:05,560 --> 00:02:10,920
है पूरे पूरे अथर्ववेद के 18 जो अवा जो कांड है

30
00:02:10,920 --> 00:02:15,880
उसमें

31
00:02:15,880 --> 00:02:20,040
तो उसमें अंत में जो दो सूक्त है वह दोनों

32
00:02:20,040 --> 00:02:26,040
सूक्त ही पितृ पूजन के ऊपर है और

33
00:02:26,640 --> 00:02:31,400
एक बहुत इंपॉर्टेंट वाला है कि

34
00:02:31,400 --> 00:02:35,480
इसमें कभी-कभी आर्य समाज की तरफ से ऐसा हो जाता है ऐसा कहा

35
00:02:35,480 --> 00:02:39,600
जाता है कि भाई वह प वो

36
00:02:39,600 --> 00:02:43,800
पित पूजन की बात हो रही तो जो माता-पिता है जो सजीव है जो अभी

37
00:02:43,800 --> 00:02:47,840
जो जिनका देह जिनका देहांत नहीं हुआ

38
00:02:47,840 --> 00:02:51,840
है उनकी बात हो रही है तो उसके

39
00:02:51,840 --> 00:02:56,680
विषय में भी हमने कुछ

40
00:02:56,680 --> 00:03:01,560
प्राप्त किए थे

41
00:03:01,560 --> 00:03:03,800
व

42
00:03:03,800 --> 00:03:08,920
रि उसमें क्या है ना

43
00:03:08,920 --> 00:03:12,920
कि 40 35 और

44
00:03:12,920 --> 00:03:17,480
कौन सा

45
00:03:17,480 --> 00:03:21,680
था उसमें सीधे-सीधे लिखा हुआ है कि जिनको गाढ़ा

46
00:03:21,680 --> 00:03:25,680
गया है जिनको जलाया गया है ऐसा ऐसा हुआ है

47
00:03:25,680 --> 00:03:29,880
तो उन पित्रों की बात हो रही है तो यह सारी

48
00:03:29,880 --> 00:03:34,040
बात तो हम कल कर चुके हैं अब आगे

49
00:03:34,040 --> 00:03:38,040
यह चल रहा है कि श्राद पर एक क्वेश्चन आया

50
00:03:38,040 --> 00:03:42,240
था कि वो एकादश में भोजन करना जो है करने पर जो है

51
00:03:42,240 --> 00:03:46,320
उसको कुत्ते की यनि में मिलता है गरुण पुराण के अनुसार तो उसका जवाब ऐसे

52
00:03:46,320 --> 00:03:50,600
कल पंडित जी ने दे भी दिया था उसका जवाब यही है कि जिसमें मरणा

53
00:03:50,600 --> 00:03:54,840
सोच लगा हो मरणा सोच मरणा सोच का मतलब मरण

54
00:03:54,840 --> 00:03:59,040
असच मतलब मरण के कारण वहां पर अभी अशुद्धि है

55
00:03:59,040 --> 00:04:03,160
तो वहां पर कोई व्यक्ति गवे दिन का

56
00:04:03,160 --> 00:04:07,520
भोजन प्राप्त करता है भोजन कर लेता है जाकर के या फिर वहां पर जो है यज्ञ

57
00:04:07,520 --> 00:04:11,920
करता है अनुष्ठान करता है वहां से कुछ प्राप्त न ले लेता है

58
00:04:11,920 --> 00:04:16,040
कुछ भी करके तो उस प्रकार से उसको क्याक हानि होगी

59
00:04:16,040 --> 00:04:16,680
वो सब उसका

60
00:04:16,680 --> 00:04:20,960
वृतांत वहां पर बताया गया है यह बात उन्होंने कल अच्छे से बताई हु थी जो पंडित

61
00:04:20,960 --> 00:04:25,080
जी आए थे अब यहां बात आती है विधि

62
00:04:25,080 --> 00:04:29,160
को त्याग करके अगर आप कोई कार्य करेंगे तो क्या रामपाल स्वीकार करते

63
00:04:29,160 --> 00:04:33,560
हैं रामपाल भी तो अपनी बातों में यही सब बातें बोलते हैं कि भाई मंत्र

64
00:04:33,560 --> 00:04:37,800
तो है मगर गुरु से नहीं लोगे तो ऐसा हो जाएगा वो हो जाएगा वो हो जाएगा

65
00:04:37,800 --> 00:04:42,120
गुरु नानक जी को कबीर जी ने प्रणव प्रणवा

66
00:04:42,120 --> 00:04:46,200
करर का मंत्र दिया था ऐसा कोई वृतांत आता है वो जा रहे थे उनको

67
00:04:46,200 --> 00:04:50,800
देख कर के कोई और जपने लगा उसके साथ प्रॉब्लम हो गई तो

68
00:04:50,800 --> 00:04:55,200
मंत्र भी आपका तारक तभी सिद्ध होगा ना जब उसको यथोचित

69
00:04:55,200 --> 00:04:59,320
स्थान से आप लेंगे तो उसी तरीके से जो भी विधिया है श्राप दादी की

70
00:04:59,320 --> 00:05:04,040
या भोजन प्राप्त करना तो आपको कहां से प्राप्त करना है विधि

71
00:05:04,040 --> 00:05:08,480
निषेध को तो आपके जो अमुक अमुक स्थितियों में आपके जो तथाकथित

72
00:05:08,480 --> 00:05:13,000
जेल धाव निवासी है वह भी स्वीकार कर रहे हैं

73
00:05:13,000 --> 00:05:17,080
मगर क्या श्राद्ध करने से मुक्ति है कि नहीं

74
00:05:17,080 --> 00:05:22,160
तो आज हम आपको वो दिखा देते गरुण

75
00:05:22,160 --> 00:05:26,320
पुराण जो स विधि पित्रों का यह

76
00:05:26,320 --> 00:05:32,320
गरुण पुराण है गरुण पुराण

77
00:05:36,960 --> 00:05:42,960
अ गरुण पुराण

78
00:05:44,800 --> 00:05:49,280
का हां 107 वा अध्याय

79
00:05:49,280 --> 00:05:55,280
है

80
00:05:56,800 --> 00:06:01,160
और 10 सावा नहीं सॉरी हां 99 वा अध्याय

81
00:06:01,160 --> 00:06:05,200
है और उसका यह श्लोक क्रमांक है

82
00:06:05,200 --> 00:06:09,440
लास्ट है 37 38 39

83
00:06:09,440 --> 00:06:14,000
है ना पहले मैं पढ़ देता हूं फिर आपको दिखा दूंगा क्या लिखा है इसमें जो

84
00:06:14,000 --> 00:06:18,120
स विधि पित्रों का श्राद्ध करते हैं व पुत्र श्रेष्ठ स् सौभाग्य

85
00:06:18,120 --> 00:06:23,000
स्मृद्धि समृद्धि राज्य आरोग्य अपने समाज में श्रेष्ठ

86
00:06:23,000 --> 00:06:27,240
वाणज में प्रभू लाभ तथा नाना शुभ फल पाते

87
00:06:27,240 --> 00:06:31,320
हैं वे यशस्वी तथा शोक हीन होकर अंततः

88
00:06:31,320 --> 00:06:35,720
परम गति को प्राप्त करते हैं परम गति

89
00:06:35,720 --> 00:06:37,920
परम गति ठीक है

90
00:06:37,920 --> 00:06:42,160
वे ऐश्वर्य विद्या वाक सिद्धि ताम्र आदि धातु

91
00:06:42,160 --> 00:06:46,320
गौ बकरे अस्व मतलब संपदा उनकी आयु बढ़ती है सकाम

92
00:06:46,320 --> 00:06:50,360
व्यक्ति कृतिका से भरणी तक प्रति नक्षत्र में शाद

93
00:06:50,360 --> 00:06:54,480
द्वारा यही संपदा पाते हैं आस्तिक ब्राह्मण नवान

94
00:06:54,480 --> 00:06:58,640
तथा नवोद श्राद्ध करें उनके पि तृप्त हो जाते हैं उनको

95
00:06:58,640 --> 00:07:02,680
आयु संत प्रजा ऐश्वर्य विद्या

96
00:07:02,680 --> 00:07:07,280
स्वर्ग मोक्ष क्या देते हैं

97
00:07:07,280 --> 00:07:12,240
क्या देते

98
00:07:12,240 --> 00:07:17,440
हैं यहां पर दिख रहा है

99
00:07:17,440 --> 00:07:21,560
मोक्ष क्या देते हैं पित तृप्त हो जाते हैं और

100
00:07:21,560 --> 00:07:25,560
क्या देते हैं मोक्ष ठीक है अब

101
00:07:25,560 --> 00:07:29,840
कुछ लोग यह कहेंगे कि यहां पर ये लोग कुतर करते मोक्ष

102
00:07:29,840 --> 00:07:34,480
वाला मोक्ष नहीं है जो भाई मोक्ष का मतलब है

103
00:07:34,480 --> 00:07:38,520
बंधनों से मुक्ति ठीक है

104
00:07:38,520 --> 00:07:42,800
तो अगर आप जैसे कई बार उसमें हेरफेर करते

105
00:07:42,800 --> 00:07:47,000
जैसे उन्होंने कहा परम शांति को प्राप्त हो गए तो उसकी वाली परम शांति काल

106
00:07:47,000 --> 00:07:51,120
की परम शांति ठीक है तो शांति

107
00:07:51,120 --> 00:07:55,360
का मतलब है जब आपके अंदर कुछ अशांत ना हो तब शांति है

108
00:07:55,360 --> 00:07:59,840
तो आप यदि यह कह रहे हो कि वो व्यक्ति मुक्त तो हुआ मगर वो वो वाली

109
00:07:59,840 --> 00:08:04,320
है इसका मतलब व उस समय अपने जो उसके जो

110
00:08:04,320 --> 00:08:08,360
त्रिविध ताप है उनसे वह मुक्त हुआ नहीं

111
00:08:08,360 --> 00:08:12,480
है क्योंकि उसके मन में अभी भी यह बात चल रही है कि

112
00:08:12,480 --> 00:08:16,640
अभी तो मैं यह वाली मुक्ति को प्राप्त हुआ हूं यह पूर्ण मुक्ति नहीं है इस

113
00:08:16,640 --> 00:08:20,720
भावना के होते हुए वह वहां पर मुक्त नहीं कहा जा सकता वह अमुक्ति

114
00:08:20,720 --> 00:08:24,760
ही है मुक्त नहीं है वो मक्ष नहीं उसे प्र तो श्राद

115
00:08:24,760 --> 00:08:27,840
करने से मोक्ष प्राप्त हो रहा है

116
00:08:27,840 --> 00:08:30,360
और

117
00:08:30,360 --> 00:08:36,360
शाद करने से और क्या प्राप्त हो रहा

118
00:08:41,080 --> 00:08:45,120
है 18 दो 34

119
00:08:45,120 --> 00:08:48,960
दिखा देता

120
00:08:48,960 --> 00:08:53,000
हूं और यह जो श्राद्ध किया जाता है पित्रों तक पहुंचता है कि नहीं

121
00:08:53,000 --> 00:08:57,400
कल हमने बता दिया था

122
00:08:57,400 --> 00:09:01,800
कि जो

123
00:09:01,800 --> 00:09:06,120
श्राद्ध के द्वारा भी मुक्ति प्राप्त हो रही है लोगों को और अगर

124
00:09:06,120 --> 00:09:10,400
आपका वह कवि कबीर है तो कबीर तक पहुंच रहा है

125
00:09:10,400 --> 00:09:16,400
व्यक्ति ठीक

126
00:09:27,520 --> 00:09:32,400
है ये 18वां

127
00:09:32,400 --> 00:09:38,400
अध्याय आवा कांड

128
00:09:41,240 --> 00:09:44,760
और 18वां

129
00:09:44,760 --> 00:09:49,640
कांड और उसका दूसरा

130
00:09:49,640 --> 00:09:53,080
सू और

131
00:09:53,080 --> 00:09:57,360
उसका 34 वा मंत्र वैसे तो यह पूरा

132
00:09:57,360 --> 00:10:01,480
यह दूसरा सूक्त भी पितृ मेद है यह देख लीजिए

133
00:10:01,480 --> 00:10:06,600
दूसरे नंबर का जो सूक्त है यह भी पितृ मेद ही

134
00:10:06,600 --> 00:10:12,600
है दिख रहा है पितृ

135
00:10:12,680 --> 00:10:18,680
मेद इसका 34 वा मंत्र क्या कह रहा है वह

136
00:10:23,520 --> 00:10:27,720
समझिए सब में पित्रों की बात हो रही है

137
00:10:27,720 --> 00:10:32,000
ये लोग अंधे हैं ना या तो इनको जो फॉलो करता है वो अंधा है

138
00:10:32,000 --> 00:10:36,160
जो पितर गाड़ने के संस्कार से संस्कृत

139
00:10:36,160 --> 00:10:40,400
हुए हैं जो दूर देश में कात के समान त्याग देने से संस्कृत

140
00:10:40,400 --> 00:10:44,880
हुए हैं जो अग्नि से संस्कृत हुए हैं

141
00:10:44,880 --> 00:10:49,240
जो संस्कार के अन ऊपर के लोकों में स्थित है

142
00:10:49,240 --> 00:10:54,200
उन सब पित्रों के लिए अग्नि हे अग्नि देव तू

143
00:10:54,200 --> 00:10:58,240
हविष्य का भक्षण करने के लिए आ मतलब यज्ञ की यज्ञ

144
00:10:58,240 --> 00:11:02,480
में जो हम आहुति दे व आहुति वहां तक पहुंचे इसलिए अग्नि देव प्रकट हो

145
00:11:02,480 --> 00:11:04,880
है

146
00:11:04,880 --> 00:11:09,120
ना तो यह सारे श्राद्ध के प्रमाण है

147
00:11:09,120 --> 00:11:13,720
और श्राद्ध से हमने मुक्ति भी दिखा दी वेद में भी और गरुण पुराण में भी

148
00:11:13,720 --> 00:11:17,760
अब यदि आप गीता की किसी बात का

149
00:11:17,760 --> 00:11:21,840
ऐसा अर्थ निकालते हैं जो वेद विरुद्ध है गरुण पुराण विरुद्ध है आप उसको

150
00:11:21,840 --> 00:11:26,280
मत मानिए हम तो यह अर्थ निकालते हैं कि पित्रों को ही ईश्वर समझ

151
00:11:26,280 --> 00:11:30,680
समझकर पूजा करना वो गलत है पित्रों के लिए ही

152
00:11:30,680 --> 00:11:34,800
वो जो अनुष्ठान होता है वह अनुष्ठान किस और सभी

153
00:11:34,800 --> 00:11:38,520
अनुष्ठानों में कौन प्रतिष्ठित होता है पितृ यज्ञ भी हो रहा है

154
00:11:38,520 --> 00:11:43,440
तो उसमें प्रतिष्ठित कौन है भगवान और इस बात में

155
00:11:43,440 --> 00:11:47,600
एक गीता का ही एक श्लोक और है जिसमें भगवान कह रहे

156
00:11:47,600 --> 00:11:51,640
हैं कि वोह लोग जो मुझसे भिन्न अन्य देवताओं का पूजन करते हैं वह तो

157
00:11:51,640 --> 00:11:55,800
भज तो मुझे ही रहे मगर अविधवा क्यों क्योंकि जब वो किसी

158
00:11:55,800 --> 00:11:59,800
भी देवता की आप भगवान से अलग स्वतंत्र सत्ता मान लोगे कि नहीं

159
00:11:59,800 --> 00:12:04,160
यह हमें मोक्ष दे देगा स्वतंत्र सत्ता कि कृष्ण से ज्यादा य बलशाली

160
00:12:04,160 --> 00:12:08,240
है हमको मोक्ष दे देगा तब आप गलत हो जाओगे तो भगवान श्री

161
00:12:08,240 --> 00:12:12,240
कृष्ण वहां पर कह रहे हैं मुझसे भिन्न किसी को भी अगर तुम भज रहे हो भज तो मुझे

162
00:12:12,240 --> 00:12:16,400
ही रहे हो मगर अविधवा है क्योंकि मुझसे स्वतंत्र किसी

163
00:12:16,400 --> 00:12:22,400
की सत्ता तुमने स्वीकार कर ठीक है तो यह तो हो

164
00:12:24,080 --> 00:12:28,200
गया आपका श्राद्ध का पूरा कंप्लीट हो गया अब

165
00:12:28,200 --> 00:12:34,200
हम लोग व्रत पर बात करेंगे आज और हमने जो आज का टाइटल दिया है ना

166
00:12:38,240 --> 00:12:42,520
कि भाई पहले हेमंत पाटिल जी सबसे पहले आप शास्त्र सम्मत

167
00:12:42,520 --> 00:12:46,520
बातें करते हैं कि नहीं करते हैं तो अपनी जो भी बात बोलिए वह शास्त्र

168
00:12:46,520 --> 00:12:50,600
से बोलिए आप बोलिए कि आप जो बोल रहे हैं वह कहां पर लिखा है

169
00:12:50,600 --> 00:12:54,600
क्योंकि मैं जो बोल रहा हूं व वेद से दिखा रहा हूं ना आपको है

170
00:12:54,600 --> 00:12:58,760
ना तो आप अपनी शास्त्रों से बोलिए या तो कहिए

171
00:12:58,760 --> 00:13:02,840
कि जो बातें बोलते हैं वो शास्त्र सम्मत नहीं बोलते हैं अपने मन गंत

172
00:13:02,840 --> 00:13:07,160
बोलते हैं मन की बातें मत बोलो

173
00:13:07,160 --> 00:13:11,200
शास्त्र की बातें बोलो शास्त्र शास्त्र सम्मत भक्ति कराते हैं ना

174
00:13:11,200 --> 00:13:15,280
तुम्हारे तत्वदर्शी सभी धर्म सद ग्रंथों को खोल के दिखा देते हैं जेल में रोज

175
00:13:15,280 --> 00:13:19,480
वो चेक करते हैं कितने शिष्य बने उनके है ना तो

176
00:13:19,480 --> 00:13:22,480
शास्त्र से

177
00:13:22,480 --> 00:13:26,680
बोलो तो व्रत के लिए भी हम सबसे पहले

178
00:13:26,680 --> 00:13:32,640
वेद ही खोल लेते हैं ऋग्वेद

179
00:13:32,640 --> 00:13:37,280
में पहला ही मंडल है और उसका

180
00:13:37,280 --> 00:13:43,280
24 वा सूक्त है

181
00:13:47,960 --> 00:13:53,960
और 24 वा सूक्त और उसका 15वां

182
00:13:54,480 --> 00:13:59,520
मंत्र वेद सेही दिखाएंगे ना

183
00:13:59,520 --> 00:14:04,440
आपको भरभर के प्रमाण दे दिए वेद से मत मानो गीता की वो बात

184
00:14:04,440 --> 00:14:08,760
जहां लिखा है अगर आपको ये समझ में आ रहा है कि पित्रों की पूजा करने वाला पितृ लोक में जाएगा पित्रों

185
00:14:08,760 --> 00:14:12,960
को प्राप्त करेगा मत मानो तुमने तो लिखा है ना कि गीता

186
00:14:12,960 --> 00:14:17,880
की वो बात नहीं मान सकते जो वेद विरुद्ध

187
00:14:17,880 --> 00:14:21,920
हो समझे मत मानो गीता की वो

188
00:14:21,920 --> 00:14:25,920
बात हमारे लिए गीता की एक एक बात मान्य है मगर उसका

189
00:14:25,920 --> 00:14:29,960
जो अर्थ हम लेते हैं वो अर्थ है आपके द्वारा दिया गया अर्थ नहीं अगर आपका

190
00:14:29,960 --> 00:14:34,040
अर्थ अलग है मत मानो तुमने ही तो लिखा ना गीता की जो बात वेद से मेल

191
00:14:34,040 --> 00:14:39,600
नहीं खाएगी वो गलत है दिखा दो इनको चवा नंबर पृष्ठ गरमा गीता की

192
00:14:39,600 --> 00:14:43,680
का गरमा गीता की का चवा

193
00:14:43,680 --> 00:14:48,280
पृष्ठ दिखाओ इनके मुंह पर मारो भग

194
00:14:48,280 --> 00:14:52,400
भग भग भग कोई शास्त्र नहीं कोई आधार नहीं बस मन

195
00:14:52,400 --> 00:14:56,560
गणतंत्र सम्मत भक्ति करते हैं ये

196
00:14:56,560 --> 00:15:02,560
लोगों को बेवकूफ बनाते हैं ये

197
00:15:04,360 --> 00:15:08,640
पवा

198
00:15:08,640 --> 00:15:12,680
मंत्र देखो आंखें खोल के क्या लिख रहे हैं तुम्हारे

199
00:15:12,680 --> 00:15:16,360
तथाकथित तत्वदर्शी

200
00:15:16,360 --> 00:15:20,360
देखो पीडीएफ के हिसाब से चवा पेज

201
00:15:20,360 --> 00:15:22,480
है

202
00:15:22,480 --> 00:15:26,600
हां बड़ा करो इसी को आ तो गया था

203
00:15:26,600 --> 00:15:32,600
वही तो था अभी जो ओपन हुआ था वही

204
00:15:35,480 --> 00:15:41,480
था 14वां प्रश्न पीडीएफ के हिसाब

205
00:15:41,640 --> 00:15:46,160
से ये तो चार है

206
00:15:46,160 --> 00:15:52,160
हां बड़ा करिए हां गीता का जो

207
00:15:54,760 --> 00:15:58,760
ज्ञान वेद से मेच मेल मेल नहीं करता वह ज्ञान गलत

208
00:15:58,760 --> 00:16:03,080
है तीसरी लाइन पर अंडरलाइन कर दो बस वह गलत ज्ञान है

209
00:16:03,080 --> 00:16:07,080
और इसमें वह जो धूर्त व्यक्ति है ना जो आकर के कहता है गलत

210
00:16:07,080 --> 00:16:11,520
कुछ भी नहीं है गलत लिखा है

211
00:16:11,520 --> 00:16:15,840
धूर्त गलत गीता का जो ज्ञान वेदों

212
00:16:15,840 --> 00:16:19,960
से मेल नहीं खाता वह गलत ज्ञान है धूर्तता मत

213
00:16:19,960 --> 00:16:24,280
करो वेदों से मेल कराओ

214
00:16:24,280 --> 00:16:28,320
अगर गीता में किसी और परम ब्रह्म

215
00:16:28,320 --> 00:16:33,000
के लिए आ आचरण करना सिखाया तो वेद कह रहा है कि ब्रह्म के लिए आचरण करो

216
00:16:33,000 --> 00:16:37,320
परम ब्रह्म नहीं कह रहा है

217
00:16:37,320 --> 00:16:42,200
वो मत मानो गीता का वो ज्ञान

218
00:16:42,200 --> 00:16:46,480
उसके पास जा अभी बताऊंगा उसके का भी उसके

219
00:16:46,480 --> 00:16:49,360
मामला भी कर

220
00:16:49,360 --> 00:16:55,360
बताऊंगा बात को पकड़ते हो ना तुम लोग

221
00:17:00,800 --> 00:17:06,800
तो यह भैया ऋग्वेद है ऋग्वेद का पहला

222
00:17:06,800 --> 00:17:12,080
मंडल और 24 वा

223
00:17:12,080 --> 00:17:14,520
सूक्त

224
00:17:14,520 --> 00:17:18,800
और पवा मंत्र क्या लिखा

225
00:17:18,800 --> 00:17:23,000
है हे वरुण उत्कृष्ट अर्थात

226
00:17:23,000 --> 00:17:27,400
सिर पर बंधे हुए रस्सी के बंधन को

227
00:17:27,400 --> 00:17:31,920
हमसे ऊपर की ओर खींच शिथिल कीजिए निकृष्ट अर्थात पाव में

228
00:17:31,920 --> 00:17:36,440
अवस्थित पाश को नीचे की ओर खींच करर शिथिल करिए

229
00:17:36,440 --> 00:17:38,560
शरीर

230
00:17:38,560 --> 00:17:43,000
के मध्य भाग श्रय

231
00:17:43,000 --> 00:17:47,080
प्राया अथ आदित्य अदि

232
00:17:47,080 --> 00:17:51,360
तव व्रते आपके व्रत में रहते हुए शरीर

233
00:17:51,360 --> 00:17:52,320
के मध्य भाग

234
00:17:52,320 --> 00:17:57,120
अर्थात नाभी प्रदेश गत पाश को शरीर से प्रथक कर शिथिल करिए

235
00:17:57,120 --> 00:18:01,360
बंधन मुक्ति के अन हे अदिति के पुत्र वरुण अदिति

236
00:18:01,360 --> 00:18:05,360
के लिए समर्पित होकर अथवा खंडन रहित होकर आपके व्रत

237
00:18:05,360 --> 00:18:09,480
में रहते हुए हम पाप रहित हो जाए

238
00:18:09,480 --> 00:18:14,280
आपके व्रत में रहते हुए तव व्रते

239
00:18:14,280 --> 00:18:19,240
यह पढ़

240
00:18:19,240 --> 00:18:24,690
लो दिख रहा

241
00:18:24,690 --> 00:18:28,760
[संगीत] है ये

242
00:18:28,760 --> 00:18:32,760
त व्रते आपके व्रत में रहते हुए हम पाप रहित हो

243
00:18:32,760 --> 00:18:36,840
जाए ठीक है तो वेद क्या कह

244
00:18:36,840 --> 00:18:41,400
रहे हैं व्रत रखो व्रत रखने से पाप रहित होते

245
00:18:41,400 --> 00:18:47,400
हैं और दिखाता

246
00:18:48,240 --> 00:18:50,360
हूं

247
00:18:50,360 --> 00:18:54,400
यजुर्वेद पहला अध्याय तुम लोग

248
00:18:54,400 --> 00:18:58,960
को जब मैं ग्रंथ खोलता हगा वेद तो कितना डर लगता होगा ना

249
00:18:58,960 --> 00:19:03,440
खोल रहा है यार हमारी तो पूरी सल्तनत मिटी जा रही है है ना

250
00:19:03,440 --> 00:19:09,440
ऐसे ही भाव आते होंगे डर लगता

251
00:19:12,920 --> 00:19:17,040
होगा यह क्या है यार य तो वेदों से निकाल रहा है अब क्या करेंगे हमारा

252
00:19:17,040 --> 00:19:21,240
जो ताना बाना पूरा कसा हुआ वो काल और गीता पर कसा

253
00:19:21,240 --> 00:19:25,840
हुआ

254
00:19:25,840 --> 00:19:30,000
है वेदों से तो हमने इशारा ले लि लिया है बस

255
00:19:30,000 --> 00:19:34,040
अपने मन का तो पहला ही अध्याय

256
00:19:34,040 --> 00:19:40,040
है यजुर्वेद का और पहले अध्याय में

257
00:19:40,400 --> 00:19:46,400
ही पांचवा

258
00:19:46,400 --> 00:19:51,360
मंत्र व्रत का पालन करने वाले अग्नि

259
00:19:51,360 --> 00:19:55,920
मैं व्रत का आचरण करूंगा वह व्रत

260
00:19:55,920 --> 00:20:00,320
मुझसे शक्य हो मेरा वह व्रत सिद्ध

261
00:20:00,320 --> 00:20:04,400
हो यह मैं झूठ छोड़ छोड़कर सत्य

262
00:20:04,400 --> 00:20:08,520
के पास जाऊं असत से सत की ओर

263
00:20:08,520 --> 00:20:12,600
यह देखिए यजुर्वेद है ठीक

264
00:20:12,600 --> 00:20:16,680
है और अपना खुद का पब्लिकेशन नहीं है यह पांचवा

265
00:20:16,680 --> 00:20:21,240
मंत्र देखिए हे व्रत का पालन करने वाले

266
00:20:21,240 --> 00:20:25,240
अग्नि व्रत का मैं आचरण करूंगा तो

267
00:20:25,240 --> 00:20:29,520
यह वेदों से हो गया हो

268
00:20:29,520 --> 00:20:33,760
गया अब लाओ इसका वेदों से मैच नहीं खा रही अगर

269
00:20:33,760 --> 00:20:37,920
अगर तुम भगवत गीता के किसी श्लोक का ऐसा अर्थ निकालते

270
00:20:37,920 --> 00:20:41,000
हो जो वेदों का वेदों से मैच नहीं करता तो गीता का वो

271
00:20:41,000 --> 00:20:45,280
ज्ञान गलत है मत मानो यदि तुम गीता का अर्थ य निकालते

272
00:20:45,280 --> 00:20:49,920
हो कि व्रत नहीं रखना चाहिए तो

273
00:20:49,920 --> 00:20:54,440
ठीक

274
00:20:54,440 --> 00:20:58,920
है अब गरुण पुराण से ले लो आप

275
00:20:58,920 --> 00:21:02,600
के बारे

276
00:21:02,600 --> 00:21:06,720
में गरु पुराणों में तो पुराणों में तो इतने हैं कि पूछो

277
00:21:06,720 --> 00:21:12,720
ही मत यह देखो लाइन लगी पड़ी है कहां से खोल के

278
00:21:13,560 --> 00:21:17,720
दिखाऊ पहले सुना देता हूं पढ़ के विभिन्न तिथियों

279
00:21:17,720 --> 00:21:22,200
में व्रतों का वर्णन एक अध्याय पूरा अनंग

280
00:21:22,200 --> 00:21:26,200
त्रयोदशी व्रत वर्णन अखंड द्वादशी व्रत वर्णन

281
00:21:26,200 --> 00:21:28,760
अगस्त

282
00:21:28,760 --> 00:21:32,880
व्रत वर्णन रंभ तृतीया व्रत वर्णन यह

283
00:21:32,880 --> 00:21:36,920
सब अध्याय है पूरे पूरे हां ठीक है

284
00:21:36,920 --> 00:21:41,200
व्रत किसको कहते हैं य भी अभ खोल के दिखा देंगे आपको इसी में

285
00:21:41,200 --> 00:21:45,880
और भैया इतनी बकर बकर जो कर रहे हो आओ ना भाई

286
00:21:45,880 --> 00:21:50,160
ऊपर आओ तुमने व्रत को कैसे निषेध कर दिया

287
00:21:50,160 --> 00:21:54,200
जहां पर व्रत नहीं लिखा है वहां पर तुम कह रहे हो कि य व्रत करने को मना

288
00:21:54,200 --> 00:21:58,200
किया गया है जहां व्रत लिखा है करने को वहां तुम

289
00:21:58,200 --> 00:22:03,000
क कि नहीं यहां पर व्रत का मीनिंग कुछ और है बहुत बड़े दोगले हो भाई

290
00:22:03,000 --> 00:22:07,360
कहां से सीखा है दोगलापन जेल से हां जेल में

291
00:22:07,360 --> 00:22:11,480
भाई अपराधी बहुत होते हैं जेल में अपराधी बहुत

292
00:22:11,480 --> 00:22:16,120
होते हैं सही बात है तो जेल से जो है

293
00:22:16,120 --> 00:22:21,680
वो सीखने को मिल सकता है ये सब दोगलापन

294
00:22:21,680 --> 00:22:25,680
तो इतने सारे व्रतों का वर्णन है

295
00:22:25,680 --> 00:22:29,680
एकादशी का महात्म पढ़ लेते हैं एकादशी व्रत का तो क्या है

296
00:22:29,680 --> 00:22:33,800
एकादशी व्रत का महात्म शिवरात्रि का भी है

297
00:22:33,800 --> 00:22:38,920
दोनों का पढ़ते हैं 417 और 420

298
00:22:38,920 --> 00:22:44,920
ठीक है

299
00:22:44,920 --> 00:22:49,320
417 हां यह आ गया

300
00:22:49,320 --> 00:22:54,120
यह सब माघ मास के शुक्ल पक्ष में

301
00:22:54,120 --> 00:23:00,120
और वैसे ही द्वादशी पापों का नाश कर देती है

302
00:23:02,120 --> 00:23:08,120
ना

303
00:23:10,040 --> 00:23:14,120
और यह सब व्रतों का वर्ण व्रत से व्रत कैसे करना

304
00:23:14,120 --> 00:23:18,680
है ये सब उसमें आ रहा है और एकादशी का महात्म

305
00:23:18,680 --> 00:23:24,680
भी

306
00:23:26,880 --> 00:23:31,240
है ठीक है शिवरात्रि का भी है इसी में शिवरात्रि

307
00:23:31,240 --> 00:23:35,520
व्रत वर्णन मैं अब सर्व काम प्रद शिवरात्रि व्रत कहता हूं गौरी

308
00:23:35,520 --> 00:23:39,560
ने इस व्रत के संबंध में शिव शंकर से पूछा था तब महेश महेश्वर

309
00:23:39,560 --> 00:23:43,600
ने कहा था कि माग तथा फागुन मास के बी इस तरह से इन्होंने

310
00:23:43,600 --> 00:23:48,280
बताया कौन सी तिथि में किया जाता है जैसे एकादशी में उपवास रहकर द्वादशी

311
00:23:48,280 --> 00:23:53,200
को भगवान विष्णु की अर्चना द्वारा सभी मानवीय कामनाएं पूरी हो जाती है त तत

312
00:23:53,200 --> 00:23:57,480
शिवरात्रि व्रत करने वाला व्यक्ति भी नरक से भी

313
00:23:57,480 --> 00:24:01,640
मुक्त हो जाता है इस विषय में प्राचीन इतिहास है और

314
00:24:01,640 --> 00:24:05,680
यह सारा वहां का चल रहा है और फिर आगे विधि बताई

315
00:24:05,680 --> 00:24:10,240
जा रही है अर्पित करें

316
00:24:10,240 --> 00:24:15,640
ऐसे यह सब व्रत का वर्णन ही हो रहा है ठीक

317
00:24:15,640 --> 00:24:17,480
है तो

318
00:24:17,480 --> 00:24:21,760
यह इतना है ना इसमें ही केवल इतना है अभी तो बहुत सारे और शास्त्र

319
00:24:21,760 --> 00:24:25,960
बाकी है व्रतों के वर्णन के लिए

320
00:24:25,960 --> 00:24:29,960
हम व्रत का वर्णन है व्रत का

321
00:24:29,960 --> 00:24:34,040
अगर बहुत सरल मीनिंग अगर करें तो हम लोग अपनी इंद्रियों

322
00:24:34,040 --> 00:24:38,440
पर नियंत्रण करते हैं नियंत्रण करना सीखते हैं

323
00:24:38,440 --> 00:24:42,640
जिससे कि हम उ उनके जो विषय है उनमें होने वाली आसक्ति

324
00:24:42,640 --> 00:24:46,640
से दूर हो पाए इसके साथ ही साथ अगर भौतिक रूप से देखें तो

325
00:24:46,640 --> 00:24:50,800
अगर हम लोग उप क्या कहते हैं उपवास रखते मतलब

326
00:24:50,800 --> 00:24:54,840
जो वो अगर निराहार रहते हैं तो उससे भी क्या होता है कि अगर

327
00:24:54,840 --> 00:24:59,160
बायोलॉजिकली हम देखें य ये जो साइंस के साइंटिफिकली

328
00:24:59,160 --> 00:25:03,160
अगर हम देखें तो हमारी बॉडी रिटॉक्स होती है और अब

329
00:25:03,160 --> 00:25:07,360
मैं यह पूछता हूं जो इन्होंने गीता का एक अर्थ निकाला है कि बिल्कुल ना

330
00:25:07,360 --> 00:25:11,600
खाने वाला गलत है तो क्या व्रत का मतलब यह लिखा है कहीं पर कि बिल्कुल ना

331
00:25:11,600 --> 00:25:15,640
खाना व्रत है बिल्कुल ना खाने का मतलब तो यह

332
00:25:15,640 --> 00:25:19,680
भी हो सकता है ना कि एक पूरी जीवन ना खाने वाला

333
00:25:19,680 --> 00:25:24,080
अच्छा आप बताओ आपको अगर कई ऐसे मेडिकल टेस्ट होते हैं

334
00:25:24,080 --> 00:25:28,440
जिसके लिए आपको भूखा रहना पड़ता है कि उसके एक दिन

335
00:25:28,440 --> 00:25:32,760
पहले आपको कुछ नहीं खाना या सुबह भूखे पेट रहना है तो हम कहते य चार घंटे

336
00:25:32,760 --> 00:25:36,800
बिल्कुल नहीं खा रहा है इसलिए अय नरक में जाएगा क्योंकि गीता के अनुसार य मना किया गया

337
00:25:36,800 --> 00:25:40,920
है क्या य बात सही है ऐसा कहना अपने मन से कुछ भी

338
00:25:40,920 --> 00:25:45,040
कहीं भी कोई भी अर्थ लगा लो और चले आओ रामपाल

339
00:25:45,040 --> 00:25:50,400
के आश्रम

340
00:25:50,400 --> 00:25:54,720
में सीखा जाता है किसी के बात नहीं मानने के लिए आयुर्वेदिक

341
00:25:54,720 --> 00:25:59,240
पाखंडी है यह सिखाया जाता है तो भाई

342
00:25:59,240 --> 00:26:03,520
जो भी शत्रु हैं यह सनातन संविधान के वेदों के

343
00:26:03,520 --> 00:26:08,520
पुराणों के वह आ जाए आ जाए

344
00:26:08,520 --> 00:26:12,680
ऊपर और हो जाए दूध का दूध और पानी का

345
00:26:12,680 --> 00:26:18,400
पानी ठीक

346
00:26:18,400 --> 00:26:22,480
है दे दो इनको भाई लिंक कोई आना चाहता हो

347
00:26:22,480 --> 00:26:26,560
और भी बहुत सारे व्रत है चंद्रायण व्रत पापों से मुक्त होने वाले बहुत सारे

348
00:26:26,560 --> 00:26:31,800
व्रत हैं से मुक्ति कराने वाले भी व्रत है

349
00:26:31,800 --> 00:26:35,880
देखिए अगर व्रत का मतलब वह नहीं है जो तुम जान रहे हो तो

350
00:26:35,880 --> 00:26:40,000
तुमने व्रतों को निषेध कैसे किया कैसे लिखा तुमने कि व्रत करना

351
00:26:40,000 --> 00:26:43,800
गलत

352
00:26:43,800 --> 00:26:46,480
है

353
00:26:46,480 --> 00:26:50,640
हां ऊपर आजा बता दूंगा यही भाषा सिखाई

354
00:26:50,640 --> 00:26:56,640
है ना रामपाल ने तुझको

355
00:26:56,760 --> 00:27:00,760
आजा अब हम लोग देखते हैं इसमें एक जगह व्रतों की

356
00:27:00,760 --> 00:27:06,760
और व्याख्या जहां

357
00:27:19,760 --> 00:27:24,480
पर सनातन शास्त्र द्रोही है यह लोग

358
00:27:24,480 --> 00:27:28,600
जो स्वयं को सनातन अच्छा एक वो ठाकुर नाम की कोई

359
00:27:28,600 --> 00:27:32,760
महिला है वोह अपने उसमें कह रही है कि यह जो शिवांश

360
00:27:32,760 --> 00:27:37,360
नारायण द्विवेदी है यह सनातनी नहीं है वैदिक है वैदिक धर्मी है

361
00:27:37,360 --> 00:27:41,760
ऐसे ऐसे गंवार है लोग शिवांश नारायण द्विवेदी

362
00:27:41,760 --> 00:27:46,640
सनातन धर्मी नहीं है वैदिक धर्मी है अब लोग वेद अलग हो गया

363
00:27:46,640 --> 00:27:52,640
बाहर से हो बाहर हो गया वेद

364
00:28:06,680 --> 00:28:10,840
तो भैया किसी ने भी जिसकी मां ने निष्ठा पूर्वक दुग्ध पान

365
00:28:10,840 --> 00:28:15,320
कराया हो और वह आकर के

366
00:28:15,320 --> 00:28:19,760
रामपाल की जो शिक्षाएं हैं सनातन विरुद्ध शास्त्र

367
00:28:19,760 --> 00:28:23,800
विरुद्ध उनको यहां पर सही शास्त्र सम्मत

368
00:28:23,800 --> 00:28:28,320
या सनातन सम्मत सिद्ध करने का गुर्दा रखता हो

369
00:28:28,320 --> 00:28:32,920
तो वो आ जाए बात करें है ना

370
00:28:32,920 --> 00:28:38,120
मैं आपको बता रहा था प्रायश्चित हां प्रायश्चित में व्रतों का ही दिया है

371
00:28:38,120 --> 00:28:42,360
344 प्रायश्चित में व्रतों का ही दिया

372
00:28:42,360 --> 00:28:48,360
है कि किस चीज में कैसा प्रायश्चित

373
00:28:51,920 --> 00:28:56,200
करें 333 ये क्या है प्रायश्चित

374
00:28:56,200 --> 00:29:02,200
वर्णन 344

375
00:29:06,480 --> 00:29:10,800
ये आ गया अब इसमें सब जगह प्रायश्चित में चंद्रायण

376
00:29:10,800 --> 00:29:14,800
व्रत करो यह करो है ना यही सब लिखा हुआ है

377
00:29:14,800 --> 00:29:20,600
इससे आप ये पापों से मुक्त हो जाओगे यह

378
00:29:20,600 --> 00:29:25,280
देखिए यह सब प्रायश्चित में वृति व्रत लिखे हैं

379
00:29:25,280 --> 00:29:29,840
कितना दिखाऊ व्रत आपको थक जाएंगे आप चंद्रायण व्रत

380
00:29:29,840 --> 00:29:32,800
दिख रहा

381
00:29:32,800 --> 00:29:37,040
है हर जगह व्रत व्रत व्रत और फिर व्रत की विधि

382
00:29:37,040 --> 00:29:41,160
बताई गई है ना जिसको अर्थ समझ में ना आ रहा हो विधि से समझ ले यह व्रत

383
00:29:41,160 --> 00:29:47,160
है व्रत की विधि भी लिखाई गई

384
00:29:48,960 --> 00:29:53,000
है तो भाई लिंक दे दीजिए टी

385
00:29:53,000 --> 00:29:57,040
आर पहाड़ी जी आए हैं आप मंच संभालिए पहाड़ी

386
00:29:57,040 --> 00:30:01,080
जी इनका कु इनका कुछ बचा नहीं है जो थोड़ा बहुत बचा

387
00:30:01,080 --> 00:30:05,120
था ना उसका मैंने वो किया है पहले तो हर हर

388
00:30:05,120 --> 00:30:09,320
महादेव सभी लोगों को हर हर हर महादेव नहीं

389
00:30:09,320 --> 00:30:13,400
जिस देवी भागवत पुराण कोय सीने से लगा के बैठते

390
00:30:13,400 --> 00:30:17,400
हैं कि देखो देवी भागवत पुराण में यह लिखा है वो लिखा है उसी

391
00:30:17,400 --> 00:30:22,160
देवी भागवत पुराण में स्कंद तीन के 26 27

392
00:30:22,160 --> 00:30:28,160
अध्याय में नवरात्रि व्रतों का विधान है

393
00:30:28,200 --> 00:30:32,520
इसका क्या करेंगे 26 में 26 वा जो अध्याय

394
00:30:32,520 --> 00:30:36,760
है नवरात्र विधान कुमार कुमारी पूजा में प्रसत

395
00:30:36,760 --> 00:30:40,760
कन्याओं का वर्णन इसका क्या करेंगे अब ये मत

396
00:30:40,760 --> 00:30:44,800
हो जाएगा ऋषियों का अरे तो ये ऋषियों का

397
00:30:44,800 --> 00:30:48,800
है तो वो क्यों नहीं है जहां से तुम ब्रह्मा विष्णु महेश को वो नाशवान घोषित

398
00:30:48,800 --> 00:30:52,800
कर रहे हो एक तरफ

399
00:30:52,800 --> 00:30:57,400
से जाकिर नायक की अवैध वो है ये सब

400
00:30:57,400 --> 00:31:01,120
चीजें

401
00:31:01,120 --> 00:31:05,600
एक तरफ से धगला पनी है जी

402
00:31:05,600 --> 00:31:09,800
अच्छा यह जो पितृ पूजा के लिए

403
00:31:09,800 --> 00:31:14,040
ये मना कर रहे हैं गीता से जब

404
00:31:14,040 --> 00:31:18,120
हम व पूरा अध्याय पढ़ेंगे नौ का अध्याय पढ़ेंगे तो समझ में आ जाएगा कि यहां पर पितृ

405
00:31:18,120 --> 00:31:23,320
पूजा के लिए मना नहीं किया उनकी सत्ता को मान के आपने बता दिया

406
00:31:23,320 --> 00:31:27,440
उसे कई बार अलग अलग तरह से कहा है जैसे मेरे को छोड़

407
00:31:27,440 --> 00:31:31,680
के कोई देवता को मतलब इसमें यह नहीं है कृष्ण के अलावा शिव उपास्य नहीं है

408
00:31:31,680 --> 00:31:35,680
आप जब यह मान लोगे नहीं शिव ही स्वतंत्र रूप से कृष्ण अलग है

409
00:31:35,680 --> 00:31:39,680
शिव अलग है जब उनकी स्वतंत्र सत्ता स्वीकार कर लोगे तब दिक्कत

410
00:31:39,680 --> 00:31:43,720
है जैसे आमतौर पर ये वाली चीज होती है ना ब्रह्मा बड़े विष्णु

411
00:31:43,720 --> 00:31:47,800
बड़े तो जब आप विष्णु से भिन्न किसी की सत्ता

412
00:31:47,800 --> 00:31:52,280
को स्वीकार कर ले नहीं विष्णु अलग है शिव अलग है और शिव बड़े हैं

413
00:31:52,280 --> 00:31:56,360
तब दिक्कत है आप यह मानो कि वही कृष्ण

414
00:31:56,360 --> 00:32:00,600
यहां पर शिव है वही शिव य कृष्ण तो कोई दिक्कत नहीं है मुझसे

415
00:32:00,600 --> 00:32:05,080
भिन्न मुझसे भिन्न मुझसे अलग

416
00:32:05,080 --> 00:32:10,040
यदि मुझसे अलग आप किसी को देवता को पूज रहे हैं तब दिक्कत

417
00:32:10,040 --> 00:32:14,960
है यह तो साफ लिखा है इसी अध्याय में लिखा है

418
00:32:14,960 --> 00:32:16,200
जी

419
00:32:16,200 --> 00:32:20,200
इसमें जब आप ये 25 वावा तो पढ़ लेते हैं 25

420
00:32:20,200 --> 00:32:24,400
वा जब 26 27 28 पढ़ोगे तो उसमें यह बोल रहे कि जो भी तू

421
00:32:24,400 --> 00:32:28,520
कर्मकांड कर रहा है तू मेरे को अर्पण कर तू कर्म न से मुक्त

422
00:32:28,520 --> 00:32:32,640
हो जाएगा तो सर्वदा मुक्त र हो जाएगा उसका जो कर्म फल

423
00:32:32,640 --> 00:32:36,720
है उसका जो कर्म फल है यहां पर आ रही है निष्काम और सकाम भाव की

424
00:32:36,720 --> 00:32:41,120
बात अगर हम सकाम भाव से ये चीज करेंगे तो हम उन्हीं को प्राप्त होंगे

425
00:32:41,120 --> 00:32:45,520
अगर हम निष्काम भाव से ये सब परमपिता परमात्मा के लिए ही है

426
00:32:45,520 --> 00:32:51,000
इस भाव से हम करेंगे तो हम मुक्त हो जाएंगे जैसे

427
00:32:51,000 --> 00:32:55,400
कि एक बात आती है कि अर्जुन से कहा गया

428
00:32:55,400 --> 00:32:59,560
कि अर्जुन तेरी परिणाम में वृति नहीं होनी चाहिए

429
00:32:59,560 --> 00:33:03,920
आसक्ति नहीं होनी परिणाम की चिंता मत कर तू युद्ध कर मगर यदि

430
00:33:03,920 --> 00:33:08,040
जीतने के लिए व्यक्ति युद्ध नहीं करेगा तो फिर व्यक्ति

431
00:33:08,040 --> 00:33:12,200
युद्ध करेगा क्यों युद्ध करतो करने का तो यही

432
00:33:12,200 --> 00:33:16,600
है कि जीतना है इसलिए ही तो लड़ रहे हैं तो फिर युद्ध करेगा

433
00:33:16,600 --> 00:33:20,880
इसका एक अर्थ यह आता है सामने कि जीतने से मिलने

434
00:33:20,880 --> 00:33:25,080
वाले जो भोग है जी जी उनमें आसक्ति

435
00:33:25,080 --> 00:33:29,160
रख के त युद्ध मत लड़ कि मैं युद्ध जीत जाऊ तो मुझे महल भी मिल

436
00:33:29,160 --> 00:33:31,240
जाएगा मगर महल से मिलने वाला जो सुख

437
00:33:31,240 --> 00:33:35,360
है उसकी लालसा मत रख तो फिर किसम लालसा करें कि मैं लड़

438
00:33:35,360 --> 00:33:39,520
रहा हूं मैं युद्ध जीतना चाहता हूं क्योंकि ईश्वर ने कहा है मैं

439
00:33:39,520 --> 00:33:43,960
महल में रहना चाहता हूं क्योंकि ईश्वर ने कहा है क्योंकि शास्त्र ने कहा है

440
00:33:43,960 --> 00:33:48,080
जब आप इस बुद्धि से काम करेंगे तब वो आसक्ति रहित काम

441
00:33:48,080 --> 00:33:52,120
कहलाएगा बिल्कुल और आप ये रख लेंगे कि मैं महल में रहना

442
00:33:52,120 --> 00:33:56,360
चाहता हूं क्योंकि महल में मुझे ठंडी ठंडी हवा मिलेगी सोने के लिए बहुत अच्छा

443
00:33:56,360 --> 00:34:00,360
आरामदायक कमरा मिलेगा तो उससे भोग भोग में जब आ सक्ति

444
00:34:00,360 --> 00:34:04,560
हो जाएगी वहा के तो दिक्कत है और यही बात कल जो हमने

445
00:34:04,560 --> 00:34:08,560
वो रुचि मुनि वाला जो देखा था उसम प भी

446
00:34:08,560 --> 00:34:12,840
यही बात समझा रहे हैं कि जब तुम प्रवृत्ति मार्ग से होते हुए जाओगे

447
00:34:12,840 --> 00:34:17,120
तो प्रवृति मार्ग से मिलने वाले भोगों में अपनी वो मत रखो मगर वह

448
00:34:17,120 --> 00:34:21,400
कार्य करते रहो कि क्यों कर रहा हूं यह कार्य क्यों कर रहा हूं विवाह ईश्वर

449
00:34:21,400 --> 00:34:25,560
ने कहा है शास्त्र ने कहा है शास्त्र वेद कर्मों को करके

450
00:34:25,560 --> 00:34:30,480
आप मुक्ति मार्ग पर आसानी से जा सकते हो बिल्कुल

451
00:34:30,480 --> 00:34:34,480
भगवान श्री कृष्ण ने 24 श्लोक में कह दिया कि

452
00:34:34,480 --> 00:34:39,160
क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता मैं हूं स्वामी भी मैं हूं

453
00:34:39,160 --> 00:34:43,360
परंतु व मुझे तत्व से नहीं जानते हैं इसलिए उनका पतन हो जाता है

454
00:34:43,360 --> 00:34:46,280
इसलिए 25 श्लोक में कहा कि जो देवताओ का

455
00:34:46,280 --> 00:34:50,360
पूजन करते हैं वो देवताओं को प्राप्त होते हैं जो पि को पूजन करते हैं

456
00:34:50,360 --> 00:34:55,120
पित्रों को प्राप्त होते हैं तो 26 श्लोक में लिखा है कि जो भक्त

457
00:34:55,120 --> 00:34:59,160
कि जो भी मुझे चढ़ावा देता है पुष्प फल

458
00:34:59,160 --> 00:35:03,800
जल आदि जो भी देता प्रेम पूर्वक अर्पण कर लेता हूं उनको

459
00:35:03,800 --> 00:35:06,240
बिल्कुल

460
00:35:06,240 --> 00:35:10,440
हा मैं एक व्यक्ति अभी कोई पूछ रहा था व्रत

461
00:35:10,440 --> 00:35:14,480
का बहुत बढ़िया वो बता दूं शरीर इंद्रिय

462
00:35:14,480 --> 00:35:19,000
और मन पर विजय पाने के लिए तासन तासन

463
00:35:19,000 --> 00:35:23,400
और जिता हार होने की परम आवश्यकता है यह एक अनिवार्य

464
00:35:23,400 --> 00:35:27,440
नियम है अध्यात्म मार्ग का पथिक तब तक इस पथ में अग्रसर हो ही नहीं

465
00:35:27,440 --> 00:35:31,480
स जब तक कि वह तासन और खासकर जिता हार

466
00:35:31,480 --> 00:35:36,360
ना हो जाए जिता हार होने का एकमात्र उपाय विधिवत तत

467
00:35:36,360 --> 00:35:40,920
व्रत और उपवास करना ही शास्त्र में बतलाया गया है वैदिक वांगम में

468
00:35:40,920 --> 00:35:45,360
एकादशी आदि के साधारण व्रतों से लेकर चांद्रायण

469
00:35:45,360 --> 00:35:49,840
प्रक्ष चांद्रायण और पराग आदि नाना वि व्रतों एवं

470
00:35:49,840 --> 00:35:54,120
उपवास की इति कर्तव्य और अनुष्ठान से होने वाली आत्म

471
00:35:54,120 --> 00:35:58,240
शुद्धि का विषद वर्णन विद्यमान है व्रत और स से

472
00:35:58,240 --> 00:36:01,360
जहां एक जहां अनेक शारीरिक व्याधियों

473
00:36:01,360 --> 00:36:07,360
समूल नष्ट हो जाती है वहां मानसिक

474
00:36:14,440 --> 00:36:18,560
आदियोगी महात्मा गांधी जैसे विशिष्ट व्यक्तियों ने भी स्वयं अनुभव

475
00:36:18,560 --> 00:36:23,040
करके व्रत पवास को आत्म शोधन का सर्वश्रेष्ठ उपाय प्रकट किया है

476
00:36:23,040 --> 00:36:27,800
इस शारीरिक केवा मानसिक रोग की निवृत्ति के लिए किस विधि से मिताहार

477
00:36:27,800 --> 00:36:31,920
दुहार जलार केवा निर्जल उपवास और किस प्रकार

478
00:36:31,920 --> 00:36:36,160
का कौन सा व्रत धारण व्रत मतलब कि हम यह नहीं करेंगे

479
00:36:36,160 --> 00:36:40,480
इस बात का हम व्रत धारण करते हैं व्रत धारण

480
00:36:40,480 --> 00:36:44,520
करना चाहिए यह विस्तार तो व्रत विधायक ग्रंथों में ही दृष्ट

481
00:36:44,520 --> 00:36:48,960
है परंतु व्र तोप वास सर्वथा और सर्वदा आचरण है

482
00:36:48,960 --> 00:36:53,240
एक वैज्ञानिक अनुष्ठान है इतना मात्र प्रकट कर देना यहां हमें अभीष्ट

483
00:36:53,240 --> 00:36:57,680
है र्थ पहले इसका शास्त्रीय स्वरूप आगे बताए

484
00:36:57,680 --> 00:37:02,120
फिर विषद व्याख्या है है ना सभी

485
00:37:02,120 --> 00:37:05,000
धर्मानुसार

486
00:37:05,000 --> 00:37:09,480
मानुष का अंतिम लक्ष्य क्या है धर्म पर

487
00:37:09,480 --> 00:37:15,480
सभी [प्रशंसा]

488
00:37:15,960 --> 00:37:21,960
धर्मानुसार धर्मानुसार

489
00:37:27,560 --> 00:37:32,360
उन्हीं विषय वासनाओं का भोग इस प्रकार से हमें करने के लिए विधि बताता है

490
00:37:32,360 --> 00:37:36,560
कि हम उन भोगों में रहते हुए भी उनसे हम निवृत हो सके जैसे

491
00:37:36,560 --> 00:37:41,520
कि एक व्यक्ति पैदा हुआ जन्म हुआ उसका अब उसकी तो

492
00:37:41,520 --> 00:37:45,560
वो है व्यक्ति जो उसको जन्म से प्राप्त है वो क्या है कि किसी भी स्त्री के

493
00:37:45,560 --> 00:37:49,720
साथ गमन कर लेना यह उसका जो प्राकृतिक है मगर इसमें धर्म

494
00:37:49,720 --> 00:37:53,720
ने क्या किया विवाह एक नारी सदा ब्रह्मचारी लगाम

495
00:37:53,720 --> 00:37:57,800
लगा दी तो क्या हुआ भोग तो आपने किया तब भी वो मगर

496
00:37:57,800 --> 00:38:02,000
इस तरह से किया कि धीरे धीरे धीरे धीरे आप उस जो आसक्ति हो रही

497
00:38:02,000 --> 00:38:06,000
है आपके मन में उससे आप मुक्त हो पाओ इसको धर्म कहते

498
00:38:06,000 --> 00:38:10,120
हैं और अब क्या है मन के

499
00:38:10,120 --> 00:38:14,600
संयत होने पर समस्त इंद्रिया अपने आप वशीभूत हो जाएंगी

500
00:38:14,600 --> 00:38:19,280
यह तत्व उपनिषदों में शरीर को रथ इंद्रियों को घोड़े

501
00:38:19,280 --> 00:38:20,000
और मन को

502
00:38:20,000 --> 00:38:24,360
घोड़ों की लगाम रूपा कल

503
00:38:24,360 --> 00:38:28,480
रूप का अलंकार से प्रकट करते हुए स्पष्ट किया त अनुसार 10

504
00:38:28,480 --> 00:38:32,480
इंद्रियों के बाद मन को भी 11वी इंद्रिय शास्त्र ने माना है सो

505
00:38:32,480 --> 00:38:36,760
एकादशी तिथि को मन शक्ति को केंद्र चंद्रमा क्षितिज की एकादश कक्षा

506
00:38:36,760 --> 00:38:41,120
का अवस्थित होता है यदि इस अनुकूल समय में मनो निग्रह

507
00:38:41,120 --> 00:38:45,120
की साधना की जाए मन को निग्रह करने की साधना के मन इधर

508
00:38:45,120 --> 00:38:49,240
उधर भागे ना तो ऐसा नहीं है कि व्रत धारण करने वाले दिन

509
00:38:49,240 --> 00:38:53,240
आप केवल निराहार रहते हो उस दिन आप झूठ वचन ना बोलने के

510
00:38:53,240 --> 00:38:57,440
लिए भी अपने आप को सीमित करते हो उस दिन आप स्त्री संग ना करने के लिए भी

511
00:38:57,440 --> 00:39:01,800
जितनी भी इंद्रिया सक्ति हो सकती है जिसके विषय हो सकते हैं उन सबसे आपको

512
00:39:01,800 --> 00:39:06,200
आप अपने आप को दूर रखने का उपाय करते हो प्रयास करते

513
00:39:06,200 --> 00:39:10,280
हो उसको कहते हैं व्रत तो साधना की जाए तो वह

514
00:39:10,280 --> 00:39:14,480
सद फल पति होती है इसी वैज्ञानिक आशय से एकादश सेंद्रिय भूत

515
00:39:14,480 --> 00:39:20,480
मन को एकादशी तिथि के दिन व्रत उपवास धर्मानुसार

516
00:39:27,920 --> 00:39:32,680
तो अब कोई आना चाहता है चक्कर में पड़ना चाहता है तो वह

517
00:39:32,680 --> 00:39:37,200
बताए अमित दास जी गायब हो गए अभी तो थे

518
00:39:37,200 --> 00:39:41,320
अमित दास जी को बुलाइए अब

519
00:39:41,320 --> 00:39:45,560
देखो चेहरा हो तो आइए अमित दास जी अमित

520
00:39:45,560 --> 00:39:51,560
दास

521
00:39:52,600 --> 00:39:56,640
जी जब एक कंटिन्यू जब बात चल रही होती है सिर बीच का एक

522
00:39:56,640 --> 00:40:00,640
सिलेक्ट श्लोक लेना यह सबसे बड़ा दोगलापन

523
00:40:00,640 --> 00:40:04,720
है पूरी बात को सुनिए पहले वहां पर किस चीज के बारे में बात हो रही है आगे

524
00:40:04,720 --> 00:40:09,480
पीछे के श्लोक पढ़िए खाली ये

525
00:40:09,480 --> 00:40:13,720
ना खाना ज्यादा खाना ज्यादा सोना कम सोने वाली बात नहीं कहे गई उस ध्यान

526
00:40:13,720 --> 00:40:18,160
योग के बारे में बहुत सी चीजें कही गई है कि शुद्ध भूमि पर

527
00:40:18,160 --> 00:40:22,280
कुछ मृग छाला और वस्त्र बिछे हैं ना अत्यंत

528
00:40:22,280 --> 00:40:26,280
ऊंचा है ना अत्यंत नीचा होना चाहिए अपने आसन को स्थिर स्थापन

529
00:40:26,280 --> 00:40:30,640
करके [संगीत] जय श्री

530
00:40:30,640 --> 00:40:35,000
राम जय श्री राम कैसे हैं आप

531
00:40:35,000 --> 00:40:39,560
बढ़िया बढ़िया वीडियो चल रहे हैं हमारे

532
00:40:39,560 --> 00:40:43,560
बिल्कुल चट बन रहा है हमारा

533
00:40:43,560 --> 00:40:47,640
बिल्कुल बिल्कुल अ पहले तो मैं आपको इस बात

534
00:40:47,640 --> 00:40:51,760
के लिए धन्यवाद कहना चाहूंगा कि आपकी

535
00:40:51,760 --> 00:40:56,480
वजह से मुझे भगवत गीता पढ़ने में रुचि बड़ी

536
00:40:56,480 --> 00:41:00,480
और दूसरा धन्यवाद मैं टी आर पड़िया जी से कहूंगा

537
00:41:00,480 --> 00:41:05,560
कि उन्होंने अच्छे से समझाया मुझे

538
00:41:05,560 --> 00:41:09,920
लेकिन भगवत गीता में कई चीजें ऐसी रह जाती हैं जिनकी

539
00:41:09,920 --> 00:41:14,400
वजह से कंफ्यूजन पैदा होते हैं बताइए आप अपनी कंफ्यूजन

540
00:41:14,400 --> 00:41:18,680
बताइए मैं प्रयास करूंगा दूर करने शिवांश भाई आप बात करिए

541
00:41:18,680 --> 00:41:24,280
मैं जरा पाच मिनट में फ्री होता हूं ठीक है

542
00:41:24,280 --> 00:41:28,400
जी मेरी और टी आर पाया जी की एक डिबेट हुई

543
00:41:28,400 --> 00:41:32,720
थी शायद उनमें आपने देखा हो

544
00:41:32,720 --> 00:41:37,160
नहीं मैंने देखा नहीं सुना है पर मैं देख नहीं पाया

545
00:41:37,160 --> 00:41:41,160
तो मैंने उनसे बात की तो कई मैंने उन्हें

546
00:41:41,160 --> 00:41:45,520
प्रमाण दिखाए जहां पर कृष्ण भगवान उस परमेश्वर

547
00:41:45,520 --> 00:41:49,640
की शरण में जाने के लिए और वही परमात्मा है और

548
00:41:49,640 --> 00:41:54,120
मतलब कई जगह उस और वह का प्रयोग किया गया है

549
00:41:54,120 --> 00:41:59,080
ठीक है ठीक है तो मैं आपसे यह पूछना चाहता हूं क्या

550
00:41:59,080 --> 00:42:04,360
परमात्मा की निगाह में उस वह

551
00:42:04,360 --> 00:42:08,400
और ऐसे शब्द अपने लिए प्रयोग होते हैं या

552
00:42:08,400 --> 00:42:12,560
किसी दूसरे के लिए प्रयोग होते हैं ठीक है ऑपरेटर महोदय

553
00:42:12,560 --> 00:42:16,640
इनको वह प्रमाण दिखाइए उस वाला अमित

554
00:42:16,640 --> 00:42:19,280
दास जी

555
00:42:19,280 --> 00:42:23,520
को आज ही हम लोगों ने अभी अभी शेयर किया ना लास्ट ट

556
00:42:23,520 --> 00:42:27,600
में शायद लास्ट में दो प्रमाण है लास्ट उनमें

557
00:42:27,600 --> 00:42:33,600
से वो उस वाला प्रमाण

558
00:42:33,720 --> 00:42:37,800
दिखाइए जिनदा फकीर के रूप में कबीर जी ने उसी ब

559
00:42:37,800 --> 00:42:41,880
नदी के किनारे पहुंचकर श्री नानक जी को राम राम कहा उस समय

560
00:42:41,880 --> 00:42:45,920
श्री नानक जी ने कपड़े उतारकर स्नान कर लिए तैयार थे जिंदा

561
00:42:45,920 --> 00:42:50,160
महात्मा केवल आगे दिखाइए श्री नानक जी को दिखाई

562
00:42:50,160 --> 00:42:54,160
दे रहे थे अन्य को नहीं श्री नानक जी से वार्ता करने लगे कबीर जी

563
00:42:54,160 --> 00:42:58,400
ने कहा कि आप मेरी बात पर विश्वास करो एक पूर्ण परमात्मा है

564
00:42:58,400 --> 00:43:02,880
तथा उसका सतलोक उसका किसका किसका

565
00:43:02,880 --> 00:43:07,440
अमित दास जी किसका उसका सतलोक उसका

566
00:43:07,440 --> 00:43:11,640
उसका सतलोक स्थान है जहां की भक्ति करने से जीव

567
00:43:11,640 --> 00:43:16,960
सदा के लिए जन्म मरण से छूट सकता है और नीचे दिखा दीजिए उस

568
00:43:16,960 --> 00:43:21,480
स्थान नीचे दिखा दीजिए तीसरा तीसरी लाइन उस स्थान

569
00:43:21,480 --> 00:43:26,120
तथा उस परमात्मा किसकी किसकी उस परमा

570
00:43:26,120 --> 00:43:30,360
परमात्मा की प्राप्ति की साधना का केवल मुझे ही पता

571
00:43:30,360 --> 00:43:34,440
है तो यहां पर रामपाल जी के हिसाब

572
00:43:34,440 --> 00:43:39,600
से वह परमात्मा अलग हो गया उस शब्द के उपयोग के

573
00:43:39,600 --> 00:43:43,640
कारण नहीं क्योंकि वहां पे बात आप कबीर जी नहीं बात कर

574
00:43:43,640 --> 00:43:47,800
रहे हैं ना कौन कर रहा है कबीर जी बात

575
00:43:47,800 --> 00:43:49,640
कर रहे

576
00:43:49,640 --> 00:43:53,880
हैं अच्छा कबीर जी बात कर रहे हैं

577
00:43:53,880 --> 00:43:57,920
ऐसा है मैं आपको बताऊं ठीक है

578
00:43:57,920 --> 00:44:01,920
अब मैं आपको बता दूं बात क्या देखिए कुछ समय के उपरांत जिंदा फकीर के रूप

579
00:44:01,920 --> 00:44:06,360
में कबीर जी ने उसी बन दी कबीर जी ने ठीक है

580
00:44:06,360 --> 00:44:10,520
ठीक है भैया कबीर जी ही बात कर रहे हैं नानक जी ऐसा

581
00:44:10,520 --> 00:44:15,040
होता है जब व्यक्ति कुछ जानता नहीं है ठीक है

582
00:44:15,040 --> 00:44:19,360
कि भैया मुझे उस परमात्मा के बारे में बताइए तो मैं तुझे बताना

583
00:44:19,360 --> 00:44:23,360
मैं जानता हूं मैं ही परमात्मा हूं मगर मैं तुझे बताना अभी वो

584
00:44:23,360 --> 00:44:27,840
अभी वो परमात्मा को मुझ में नहीं देख रहा है मुझसे अलग समझ रहा है तो मैं

585
00:44:27,840 --> 00:44:32,080
ऐसे बताना चालू करता हूं कि वो परमात्मा ऐसा है वह परमात्मा ऐसा है उस

586
00:44:32,080 --> 00:44:36,240
परमात्मा के बारे में ऐसे ऐसे करता है वो सर्वशक्तिमान है वो सब कुछ है

587
00:44:36,240 --> 00:44:40,560
वो फिर फिर यह भी बताता है कि वो मैं ही

588
00:44:40,560 --> 00:44:44,600
हूं वो जिस परमात्मा के बारे में मैंने पूरी व्याख्या की है वो

589
00:44:44,600 --> 00:44:49,000
मैं ही हूं तो वो तो अध्याय 18

590
00:44:49,000 --> 00:44:53,280
में बता चुके हैं ना मैं काल हूं सर्वव्यापी हूं मैं देखो तुमने बात का घुमाना

591
00:44:53,280 --> 00:44:57,360
शुरू किया विषय ये चल रहा है क्या उस शब्द के कह

592
00:44:57,360 --> 00:45:01,360
देने से परमात्मा कोई और हो जाएगा या नहीं हो जाएगा पहले इसको क्लियर करो

593
00:45:01,360 --> 00:45:05,040
हो जाएगा या नहीं हो जाएगा देखो

594
00:45:05,040 --> 00:45:09,320
सराम मेरी बात सुनो सकारात्मक तरीके से बात करने का कोशिश

595
00:45:09,320 --> 00:45:13,400
करोगे अमित दास तो कोई ना कोई निष्कर्ष पर पहुंच पाओगे इसका

596
00:45:13,400 --> 00:45:17,520
मतलब यह है हमने आपकी गीता से ही यह दिखाया कि उस

597
00:45:17,520 --> 00:45:21,680
शब्द का इस्तेमाल होने पर यह सिद्ध नहीं होगा कि वह जो व्यक्ति बोल

598
00:45:21,680 --> 00:45:25,800
रहा है परमात्मा उससे कोई अलग है क्योंकि आपके अनुसार जो परमात्मा है

599
00:45:25,800 --> 00:45:30,360
वो भी परमात्मा के लिए कहीं कहीं मुझ शब्द का इस्तेमाल ना करके

600
00:45:30,360 --> 00:45:34,560
उस और इस इस इस शब्द का इस्तेमाल तो उन्होंने इतना

601
00:45:34,560 --> 00:45:38,600
किया कि पूछो नहीं अगर बात व्याकरण पर ही आ जाएगी तो

602
00:45:38,600 --> 00:45:42,840
मैं अपनी बात जब भी करूंगा तो मैं मैं कहूंगा अपने लिए मेरी

603
00:45:42,840 --> 00:45:47,000
मैं जैसे जब रामपाल जी ने यह कहा मंच

604
00:45:47,000 --> 00:45:51,280
पर कि वो परमात्मा मैं ही हूं वहां पर उन्होंने ये नहीं कहा वो परमात्मा

605
00:45:51,280 --> 00:45:55,400
मैं ही हूं वो परमात्मा मेरे रूप में आपके सामने है उन्होंने ये नहीं कहा

606
00:45:55,400 --> 00:45:59,440
उन्होंने कहा वो परमात्मा इस दास के रूप में आपके सामने है

607
00:45:59,440 --> 00:46:03,520
तो जब इस शब्द का इस्तेमाल होता है वो भी थर्ड पर्सन के लिए होता है

608
00:46:03,520 --> 00:46:07,640
मगर ये उनकी शैली है अपने लिए बात करने के लिए इस दास इस दास दिन भर

609
00:46:07,640 --> 00:46:11,720
यही करते हैं उन्होंने ये नहीं कहा कि मुझ दास के रूप में वो वहा विद्यमान

610
00:46:11,720 --> 00:46:15,920
है तो इसका अर्थ क्या होता है कि अगर भगवान ने उस शब्द का उपयोग

611
00:46:15,920 --> 00:46:19,920
कर लिया तो इससे सिद्ध नहीं होगा कि परमात्मा कोई और है

612
00:46:19,920 --> 00:46:20,420
हमने

613
00:46:20,200 --> 00:46:24,320
आप ही से दिखा दया आपको नहीं तो यह मान लो कि कबीर जी ने

614
00:46:24,320 --> 00:46:28,480
यहां पर किसी और परमात्मा की बात की है व अपने लिए बात नहीं नहीं की कोई और है परमात्मा

615
00:46:28,480 --> 00:46:31,920
कबीर से भी

616
00:46:31,920 --> 00:46:36,080
ऊपर अच्छा जी तो मतलब इसमें 18

617
00:46:36,080 --> 00:46:40,160
के 62 में और 66 में यहां अंतर

618
00:46:40,160 --> 00:46:44,200
क्यों है जैसे कि 66 में के 62 में

619
00:46:44,200 --> 00:46:48,280
18 के 62 में आप शब्द पढ़ो क्या लिखा है संस्कृत शब्द पढ़ा

620
00:46:48,280 --> 00:46:52,800
है आपने 18 62 का 18 शब्द पढ़ा है

621
00:46:52,800 --> 00:46:57,640
नहीं नहीं मैंने नहीं पढ़ा 18 62 का संस्कृत शब्द पढ़ो क्या लिखा है

622
00:46:57,640 --> 00:47:03,640
मैं बताता हूं क्या लिखा है बताइए

623
00:47:12,880 --> 00:47:17,080
बताइए अमित दास जी आपके चैनल पर आके आपको मैं इतनी अच्छी

624
00:47:17,080 --> 00:47:22,440
से एक्सप्लेन कर गया 62 और 66

625
00:47:22,440 --> 00:47:27,800
देखिए में 182 में क्या लिखा है हे

626
00:47:27,800 --> 00:47:31,880
सब प्रकार से उस वो परमेश्वर नहीं लिखा है क्या

627
00:47:31,880 --> 00:47:36,760
लिखा है परम शांति परम शांति

628
00:47:36,760 --> 00:47:40,840
तो अर्जुन को अगर परम शांति मुझे व परम शांति कैसे मिलेगी तुझे व परम शांति

629
00:47:40,840 --> 00:47:45,160
कैसे मिलेगी मेरी शरण में आके यहां पर परमेश्वर की बात नहीं हुई है श्लोक

630
00:47:45,160 --> 00:47:50,080
में यहां श्लोक में परम शांति स्थान की बात हुई

631
00:47:50,080 --> 00:47:54,880
है यहां श्लोक में परम शांति स्थान

632
00:47:54,880 --> 00:47:59,000
यानी मोक्ष का स्थान उसकी बात हुई है परमेश्वर की बात नहीं हुई

633
00:47:59,000 --> 00:48:03,120
है परम गति परम स्थिति तो वो तुझे परम

634
00:48:03,120 --> 00:48:08,160
स्थिति कैसे मिलेगी 18 मेरी शरण में

635
00:48:08,160 --> 00:48:14,160
आके देवेंद्र जी जय श्री

636
00:48:17,840 --> 00:48:21,960
राम अरे क्या हुआ कहां चले गए

637
00:48:21,960 --> 00:48:26,240
आपकी आवाज नहीं आ रही देवेंद्र जी राम

638
00:48:26,240 --> 00:48:30,920
राम जी अब आ रही है आवाज जी आ रही है

639
00:48:30,920 --> 00:48:34,960
हां मैं यह जो 18 का जो 62 वा श्लोक है इस पर

640
00:48:34,960 --> 00:48:39,080
थोड़ी सी मैं अपने पॉइंट रखना चाहता

641
00:48:39,080 --> 00:48:43,080
हूं जी जी बोलिए बोलिए यह अमित दास

642
00:48:43,080 --> 00:48:49,080
जी सीधे आउट आउट क्यों हो गए भाई यह कंटेंट लेने आए थे क्या फिर

643
00:48:52,600 --> 00:48:56,760
से अमिन दास जी आ जाए तब मैं एक्सप्लेन करूंगा तब

644
00:48:56,760 --> 00:49:01,080
थोड़ा सा और ज्यादा अच्छा र सम आ जाएगा आप कर दीजिए अमित दास जी आएंगे

645
00:49:01,080 --> 00:49:05,160
नहीं वो उनका हो गया वो जितना लेने आए थे वो आके लेक चले गए अब वो

646
00:49:05,160 --> 00:49:09,560
मेरी ऐसा है इस समय जो मेरा जो नाम है

647
00:49:09,560 --> 00:49:13,720
मैं मतलब बढ़ई नहीं बड़ती नहीं मार रहा हूं मेरे नाम का उपयोग करके इनके

648
00:49:13,720 --> 00:49:17,920
ठंडे पड़े हुए चैनल चल रहे हैं सबके चल रहे हैं

649
00:49:17,920 --> 00:49:22,040
सब लोग शिवा द्वेदी एक्सपो बना रहे हैं और कम से कम एक पहला

650
00:49:22,040 --> 00:49:26,760
वीडियो तो सभी का चल जाता है एक व

651
00:49:26,760 --> 00:49:31,200
व्यक्ति ने थंबनेल में ऐसे फोटो डाली है मुझे सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र

652
00:49:31,200 --> 00:49:36,640
मोक्ष शाश्वत धर्म दे दो मैं तुम्हारा हो

653
00:49:36,640 --> 00:49:40,880
जाऊंगा तो इसीलिए वो आए थे चले गए बिना

654
00:49:40,880 --> 00:49:44,920
बताए हां जी मेन चीज ये लोग सेंस नहीं

655
00:49:44,920 --> 00:49:49,320
समझते कि उसका अर्थ क्या निकल रहा है जैसे यहां पर भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि

656
00:49:49,320 --> 00:49:53,320
परम शांति परम धाम इन दोनों की चीज की जो प्राप्ति

657
00:49:53,320 --> 00:49:57,320
हो जाए उसी ईश्वर के बारे में कहा गया है इसमें तो अब ये पहले

658
00:49:57,320 --> 00:50:01,400
वाले श्लोक तो पढ़ते नहीं एक श्लोक जो रामपाल ने बता दिया वही इन्होंने देख

659
00:50:01,400 --> 00:50:05,680
लिया अब 18 का जो 5वा श्लोक है उसमें भगवान ने साफ

660
00:50:05,680 --> 00:50:09,800
साफ शब्दों में कहा है कि मेरे परायण हुआ कर्म

661
00:50:09,800 --> 00:50:14,080
योगी संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी

662
00:50:14,080 --> 00:50:18,560
मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परम पद को प्राप्त होता है

663
00:50:18,560 --> 00:50:22,560
तो जो परम शांति है परम धाम है वो अपनी कृपा से कह रहे

664
00:50:22,560 --> 00:50:26,680
व में श्री कृष्ण भगवान तो इसको ये समझना चाहिए मतलब पहले

665
00:50:26,680 --> 00:50:31,120
लोक पढ़े नहीं इन्होंने अगर ये 56 वा श्लोक पढ़ लेते तो 62

666
00:50:31,120 --> 00:50:35,360
वाला ऑटोमेटिक क्लियर हो जाता कि परम शांति कहां से आ रही है व भगवान कृष्ण की शरण

667
00:50:35,360 --> 00:50:39,480
से आ रही है तो इन्ह ये समझना चाहिए ऐसे ही गीता जी

668
00:50:39,480 --> 00:50:43,720
में अनेकों श्लोक है मैं आपको बहुत है बहुत है भाई

669
00:50:43,720 --> 00:50:48,360
मैं तो इनसे यह कह रहा हूं पूरे सतलोक आश्रम वाले

670
00:50:48,360 --> 00:50:51,680
पूरे सतलोक आश्रम वाले सबसे पहले मुझे

671
00:50:51,680 --> 00:50:55,920
वो 35 श्लोक बता दो जिनको मानना नहीं है

672
00:50:55,920 --> 00:50:59,960
हां जी हां पहले वो 3 श्लोक बता दो इनको नहीं मानना फिर

673
00:50:59,960 --> 00:51:04,360
मैं तुम्ह श्लोक निकाल के दूंगा कि हा इनको मान इनको मानने

674
00:51:04,360 --> 00:51:08,520
का 665 लोक में से मैं दे दूंगा आपको कि भगवान श्री कृष्ण

675
00:51:08,520 --> 00:51:12,640
भगवान सिद्ध हो रहे हैं क्योंकि भगवान श्र

676
00:51:12,640 --> 00:51:16,680
क इनको थोड़ा सा ना मना कर रखा है कि खुद से अध्ययन

677
00:51:16,680 --> 00:51:20,720
नहीं करना और जो हमने जो श्लोकों का वर्णन कर रखा बस

678
00:51:20,720 --> 00:51:26,720
उन्हीं का अध्ययन करना है तो अधूरा ज्ञान है अधूरा जन

679
00:51:26,720 --> 00:51:31,000
इन्होंने अपनी अपनी किताबों में कहीं लिखा है कि तुम जो ये

680
00:51:31,000 --> 00:51:35,240
मेरी जो किताबें पढ़ोगे ना तो तुमको इतना इतना मिलेगा और मेरी किताब

681
00:51:35,240 --> 00:51:39,600
में नहीं पढ़ोगे तो ऐसा होगा वैसा होगा हां जी हा जी

682
00:51:39,600 --> 00:51:43,680
हां जी अब जैसे ही एक श्लोक है

683
00:51:43,680 --> 00:51:47,680
गीता जी के अध्याय आठ का ये 21 वा श्लोक है इसमें भी

684
00:51:47,680 --> 00:51:51,960
भगवान अपने लिए कह रहे हैं कि अव्यक्त अक्षर

685
00:51:51,960 --> 00:51:56,080
इस नाम से कहा गया है उसी अव्यक्त अक्षर नाम अव्यक्त

686
00:51:56,080 --> 00:52:00,200
भाव को परम गति कहते हैं जिस सनातन अव्यक्त भाव के

687
00:52:00,200 --> 00:52:04,520
प्राप्त होकर जन्म मरण से मुक्त हो जाते हैं वही मेरा परम

688
00:52:04,520 --> 00:52:07,240
धाम है

689
00:52:07,240 --> 00:52:11,320
यही उस 62 वाले श्लोक में बताया कि जो परम शांति परम धाम की प्राप्ति होती

690
00:52:11,320 --> 00:52:15,440
है वही भगवान श्री कृष्ण अपने लिए हर जगह बोल रहे हैं तो

691
00:52:15,440 --> 00:52:19,480
इन्ह अगर कहीं पसे कंफ्यूजन हो रहा है तो भगवान के अनेको स्वरूप है

692
00:52:19,480 --> 00:52:23,800
अब अपने इस समय भगवान कृष्ण स्वरूप में आए उनका एक अवतार है

693
00:52:23,800 --> 00:52:28,000
लेकिन वो वहा पर जो उस शब्द का जो इस्तेमाल हु व उनके परब्रह्म

694
00:52:28,000 --> 00:52:32,320
जो ब्रह्म स्वरूप है उसके बारे में कहा गया है तो इनको य समझना

695
00:52:32,320 --> 00:52:36,320
चा सब अरे भाई फैक्ट भाई अरुण इनको जरा वो

696
00:52:36,320 --> 00:52:40,520
दिखा दो यह कौन सा ईश्वर है कबीर से अलग दोबारा

697
00:52:40,520 --> 00:52:44,560
दिखाओ इनको प्रमाण जरा फैक्ट बाई अरुण को इनको इनको

698
00:52:44,560 --> 00:52:49,480
देखिए मैं एक बात समझ में आई है मुझे डिफेंड करने से कुछ नहीं

699
00:52:49,480 --> 00:52:53,880
होगा अटैक करने से ही होगा कुछ हम अपने शास्त्रों

700
00:52:53,880 --> 00:52:57,880
की समरी इनको बताते जाएंगे इनके कुछ बल्ले नहीं पड़ इनका मुह इनके मुह पर

701
00:52:57,880 --> 00:53:01,880
टेप तब लगेगा जब इनके शस्त्रों से ही खोल के दिखाओ कि

702
00:53:01,880 --> 00:53:05,960
अब ये वाला मना कर य तर्शी ने गलत कह दिया हा

703
00:53:05,960 --> 00:53:10,000
जी ने गलत कह दिया इसको मना करो वहा तो तुम कह देते हो

704
00:53:10,000 --> 00:53:14,000
मषि की वाणी अपनी सोच काल ने कह दिया होगा मानना नहीं है कुछ भी है इसको

705
00:53:14,000 --> 00:53:18,920
कैसे छोड़ोगे तो भैया तत्वदर्शी की किताब दिखाइए इनको अभी जो खोली

706
00:53:18,920 --> 00:53:23,000
थी यह देखिए बा अरु

707
00:53:23,000 --> 00:53:27,120
हां भाई यह कबीर कह रहे कि मैं

708
00:53:27,120 --> 00:53:31,440
तुम्हे सतलोक में रहने वाले परमात्मा के बारे में उस परमात्मा

709
00:53:31,440 --> 00:53:36,000
के बारे में बताऊंगा नीचे लाइए हा

710
00:53:36,000 --> 00:53:40,040
ये कबीर जी कह रहे हैं एक मेरी बात पर विश्वास

711
00:53:40,040 --> 00:53:44,600
करो एक पूर्ण परमात्मा है तथा उसका सतलोक

712
00:53:44,600 --> 00:53:48,640
स्थान है यह किसका सतलोक स्थान है कबीर तो स्वयं वहां खड़े हैं

713
00:53:48,640 --> 00:53:52,720
बताओ भाई फैक्ट बाई अरुण माता

714
00:53:52,720 --> 00:53:57,960
जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पान तो कराया ही होगा तो बताइए

715
00:53:57,960 --> 00:54:02,640
ये कहां कौन से सतलोक आश्रम में कौन सा परमात्मा है उस उस

716
00:54:02,640 --> 00:54:08,640
उस उस पर खेलोगे ना खेल उस परही हम भी

717
00:54:11,720 --> 00:54:17,720
खेलेंगे तो [संगीत]

718
00:54:18,360 --> 00:54:22,480
भाई कौन है जो भी आए वो अपना चेहरा

719
00:54:22,480 --> 00:54:26,920
लेकर के आए श्रीमद भगवत

720
00:54:26,920 --> 00:54:31,000
गीता का जो ऋग्वेद

721
00:54:31,000 --> 00:54:35,080
के रूप में दूसरे शब्दों में गागर में सागर है चारों वेदों में 18 हज ये

722
00:54:35,080 --> 00:54:39,320
है वो है इसमें क्या पढ़ना है भाई

723
00:54:39,320 --> 00:54:43,480
उनको गीता में 574 श्लोकों में लिखा

724
00:54:43,480 --> 00:54:47,960
है अच्छा 574 श्लोक

725
00:54:47,960 --> 00:54:52,280
काल ब्रह्म ने श्री कृष्ण के मुख से कहे हैं शेष

726
00:54:52,280 --> 00:54:57,760
श्लोक संजय तथा अर्जुन के कहे गए हैं

727
00:54:57,760 --> 00:55:01,880
जो ज्ञान से संबंधित नहीं है अब

728
00:55:01,880 --> 00:55:06,160
काल ने कहे 576 74 श्लोक जबकि इन्होंने

729
00:55:06,160 --> 00:55:10,520
कहा कि गीता का 5 पर ज्ञान जो है वह गलत है

730
00:55:10,520 --> 00:55:15,080
व देखना पड़ेगा इनको समरा दिखाना पड़ेगा अब भाई ऊपर आ

731
00:55:15,080 --> 00:55:21,080
जाइए कोई है क्या

732
00:55:27,240 --> 00:55:32,280
[संगीत] एक भाई साहब है जो यह बोल बता रहे

733
00:55:32,280 --> 00:55:37,640
हैं

734
00:55:37,640 --> 00:55:42,400
कि एक

735
00:55:42,400 --> 00:55:47,600
मिनट सतलोक आश्रम में कोई गया था

736
00:55:47,600 --> 00:55:51,680
उन्होंने कहा कि हु इज गॉड व्ट इस मंत्र ऑफ मोक्ष एंड हु इ

737
00:55:51,680 --> 00:55:57,680
प्योर संत टुडे इन तीन बातों पर ही बात होगी केवल

738
00:55:59,040 --> 00:56:03,120
हां तो हम भी तो इन्हीं तीन बातों पर बात करते हैं

739
00:56:03,120 --> 00:56:07,160
इसी को तो कहते हैं सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष

740
00:56:07,160 --> 00:56:11,200
शाश्वत धर्म शाश्वत धर्म का मतलब प्रमाणिक

741
00:56:11,200 --> 00:56:16,080
आचार्य के द्वारा प्रतिपादित होने वाला धर्म परम स्वतंत्र मोक्ष

742
00:56:16,080 --> 00:56:20,160
कैसे मिलेगा क्या है और सर्व शक्तिमान ईश्वर जो पूर्ण

743
00:56:20,160 --> 00:56:25,080
हो सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म है ना

744
00:56:25,080 --> 00:56:29,240
कुछ लोग कहते हैं कि बोनस नाड़ी में के बंधनों में नहीं आता

745
00:56:29,240 --> 00:56:33,400
भाई नहीं आता लीला पूर्वक आपको दिखाई देता है हमको दिखाई देता

746
00:56:33,400 --> 00:56:37,400
है नहीं आता उसका जो अगर इधर की ओर से

747
00:56:37,400 --> 00:56:41,800
देखे भी तो उसका जो शरीर होता है दिव्य होता है पाप से विद्ध नहीं होता

748
00:56:41,800 --> 00:56:42,880
कुछ लोग

749
00:56:42,880 --> 00:56:47,920
निराकार अवतार ना लेने वाला घोषित करने का प्रयास करते हैं

750
00:56:47,920 --> 00:56:51,920
मूर्ख तो वो भी बाद करते हैं वो भी वेदों का

751
00:56:51,920 --> 00:56:57,360
विरोधी करते हैं अरे भाई जब तुम्हें वेदों का वो मंत्र दिख रहा है जहां पर वो

752
00:56:57,360 --> 00:57:01,440
क्या कहते शरीर धारण ना करने वाला है तो वह मंत्र क्यों नहीं देखते हो जहा वो अपने माया

753
00:57:01,440 --> 00:57:05,840
का आलंबन लेकर के अनेक अनेक रूप धारण करने वाला बन रहा है

754
00:57:05,840 --> 00:57:09,880
वो क्यों नहीं देखते हो उसको छोड़ दोगे और फिर मनुस्मृति

755
00:57:09,880 --> 00:57:14,160
का दूसरे अध्याय का चवा श्लोक क्यों नहीं देखते हो जहां पर लिखा हुआ है कि जब सुतिया

756
00:57:14,160 --> 00:57:20,160
परस्पर विरोध होने लगे तो दोनों सुतिया मानने मान

757
00:57:22,360 --> 00:57:26,480
लो अरे ये देखिए राम राम जी आप बारबार मैसेज म

758
00:57:26,480 --> 00:57:30,480
करिए वो सब बातें हो चुकी है ईश्वर

759
00:57:30,480 --> 00:57:35,160
वही है जो कुछ भी कर सकता है ईश्वर वही

760
00:57:35,160 --> 00:57:41,160
है ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता

761
00:57:42,160 --> 00:57:46,520
है तो भैया इनको दे दो

762
00:57:46,520 --> 00:57:50,760
मेरे ख्याल से अब तो कोई चीज रह नहीं गई है रामपाल की ऐसी जो

763
00:57:50,760 --> 00:57:54,880
इसका हमने निराकरण प्रस्तुत ना किया हो श्राद्ध है व्रत है हर

764
00:57:54,880 --> 00:57:58,920
चीज हमने बताई और इनके ही इनका य

765
00:57:58,920 --> 00:58:03,080
जो उस का खेल है इसका भी निस्तारण हो गया आज अच्छा मैं एक बात

766
00:58:03,080 --> 00:58:07,320
कह रहा था यह लोग कहां कौन से अध्याय में कहते हैं कि ऐसा

767
00:58:07,320 --> 00:58:12,280
मेरा मत है कहते हैं ना कहीं पर ऐसा मेरा मत

768
00:58:12,280 --> 00:58:16,400
है ऐसा मेरा मत है जिसके कारण सिद्ध होता है छ अध्याय का

769
00:58:16,400 --> 00:58:20,400
है शायद 36 श्लोक है अध्याय का

770
00:58:20,400 --> 00:58:26,400
36 शलोक है 3 ऐसा मेरा मत है

771
00:58:36,640 --> 00:58:40,640
यह कहीं कहीं पर यह कह देते यह मेरा मत है तो

772
00:58:40,640 --> 00:58:45,000
छव अध्याय के 36 में श्लोक

773
00:58:45,000 --> 00:58:49,320
में भगवान ने कहा यह मेरा मत है ठीक है तो इन्होंने यह

774
00:58:49,320 --> 00:58:53,440
कैसे पता किया कि इससे पहले के कितने श्लोक है जहां

775
00:58:53,440 --> 00:58:57,580
से इनका ये मत शुरू हुआ था

776
00:58:57,580 --> 00:59:00,080
[संगीत]

777
00:59:00,080 --> 00:59:04,080
हा जी जो छवा अध्याय है वो योग और सन्यासियों के लिए

778
00:59:04,080 --> 00:59:08,200
बताया गया है और वहा पर जो बात हो रही थी व योग की बात हो रही थी

779
00:59:08,200 --> 00:59:12,240
और उन्होने इसे जबरदस्ती व्रत बना दिया और व्रत

780
00:59:12,240 --> 00:59:16,560
को जबरदस्ती कोयोग बना दिया हयो और फिर कल खुद

781
00:59:16,560 --> 00:59:20,920
हयो का साथ दे रहे महा रुचि मुनि रुचि मुनियो

782
00:59:20,920 --> 00:59:25,040
कर रहे इनके हिब वाला हयो रुचि मुनि कर रहे प कह रहेर

783
00:59:25,040 --> 00:59:29,160
आ और ये फिर उसको समझा रहे तत्वदर्शी देखो देखो मोक्ष के मार्ग

784
00:59:29,160 --> 00:59:33,560
पर चल रहा है अपनी बातों का खुद ही कूड़ा कर लेते हैं इसीलिए कहते है र्

785
00:59:33,560 --> 00:59:37,560
दर्शी है तत्वदर्शी नहीं हैय ते

786
00:59:37,560 --> 00:59:41,080
हां जी हां

787
00:59:41,080 --> 00:59:45,200
जी और ये जैसे त को बोलते श विद्ध श विरुद्ध हो

788
00:59:45,200 --> 00:59:49,320
कैसे सकता है व्रत का परिभाषा ब्रह्मा जी ने गरुण पुराण में जो दी है

789
00:59:49,320 --> 00:59:53,320
वो ये दी है कि जो शास्त्र के अनुसार नियम और पालन

790
00:59:53,320 --> 00:59:57,520
है वही व्रत है हा अब ये ब्रह्मा जी से ज्यादा

791
00:59:57,520 --> 01:00:01,680
तो ज्ञानी है नहीं नहीं नहीं ये ज्ञानी है य लिखते हैं ब्रह्मा ब्रह्मा

792
01:00:01,680 --> 01:00:06,560
विष्णु म ज्ञानी ऐसा लिखते हैं य धूर्त

793
01:00:06,560 --> 01:00:10,720
ये धूर्त नीच अपनी किताबों में ये भी दिखाते हैं लोगों को

794
01:00:10,720 --> 01:00:14,920
कि ब्रह्मा विष्णु म अ ज्ञानी है

795
01:00:14,920 --> 01:00:19,320
इनके लिए तो ऋषि मुनि है वेदव्यास जी है यह भी अज्ञानी है जबकि यह समझते

796
01:00:19,320 --> 01:00:23,440
नहीं कि कहां वेदव्यास और कहां ये देखिए इनकी

797
01:00:23,440 --> 01:00:27,520
पकड़ देखिए य 36 में

798
01:00:27,520 --> 01:00:32,120
श्लोक में कहते हैं कि काल का अपना मत है वो नहीं मानना है ठीक

799
01:00:32,120 --> 01:00:36,240
है गता की का पेज नंबर 70 निकालिए

800
01:00:36,240 --> 01:00:40,880
जरा गर्मा गीता की पेज नंबर 70

801
01:00:40,880 --> 01:00:45,720
स्न के हिसाब

802
01:00:45,720 --> 01:00:49,720
से और इसका पैराग्राफ

803
01:00:49,720 --> 01:00:54,360
नंबर तीसरे से चौथा आय

804
01:00:54,360 --> 01:00:59,480
ये य बस बस हां

805
01:00:59,480 --> 01:01:02,920
तीन के श्लोक 30 में कहा है कि अर्जुन अब

806
01:01:02,920 --> 01:01:07,160
ज्ञान योग द्वारा मेरे पर आश्रित होकर अर्थात सर्व धार्मिक कर्मों को मुझ में त्याग

807
01:01:07,160 --> 01:01:11,200
कर निक्षा ममता रहित युद्ध में होने वाले संभावित

808
01:01:11,200 --> 01:01:15,440
दुख को त्याग कर युद्ध कर गीता अध्याय तीन के श्लोक 31

809
01:01:15,440 --> 01:01:19,560
32 का सार है जो ऊपर लिखे मेरे मत का अनुसरण करते व बुरे

810
01:01:19,560 --> 01:01:21,200
कर्मों से बच जाते हैं जो ऐसा

811
01:01:21,200 --> 01:01:25,520
नहीं करते मूर्ख अज्ञानी है वह सर्व शास्त्र विरुद्ध ज्ञान पर आसक्त

812
01:01:25,520 --> 01:01:29,800
है जो हानिकारक है उनका पतन निश्चय है ऊपर लिखे

813
01:01:29,800 --> 01:01:34,080
मत से तात्पर्य है कि देवी देवताओं की यहां पर इन्होंने मत मान

814
01:01:34,080 --> 01:01:38,480
लिया अगर यह गीता को बोलने वाले काल है कोई

815
01:01:38,480 --> 01:01:42,760
श्री कृष्ण नहीं है और काल का अपना मत नहीं मानना है तो यहां पर इन्होंने

816
01:01:42,760 --> 01:01:47,360
काल के मत को मान लिया है

817
01:01:47,360 --> 01:01:51,920
यज्ञ व प्रणवा करर नाम जब नाम का जाप भी

818
01:01:51,920 --> 01:01:55,960
निष्काम भाव से नीचे करिए और करत

819
01:01:55,960 --> 01:02:00,040
था पूरा गुरु बनाकर शास्त्र अनुकूल करना

820
01:02:00,040 --> 01:02:04,040
चाहिए इन्होंने नहीं कहा य ये यहां पर य इसका मत हैय मानना

821
01:02:04,040 --> 01:02:08,040
नहीं है अतु स्वयं की शास्त्र विधि अनुसार साधना को

822
01:02:08,040 --> 01:02:12,040
खोकर स्वीकार करके आत्म कल्याण करना चाहिए तो यहां पर इन्होंने

823
01:02:12,040 --> 01:02:16,040
उसका मत मान लिया है काल का और दूसरी बात यह भी है कि अभी हम जो

824
01:02:16,040 --> 01:02:20,080
बात बता रहे थे ना कि शास्त्र विधि मरणा सोच की

825
01:02:20,080 --> 01:02:24,240
अगर आप बात कर रहे हैं अगर शास्त्र विधि त्याग कर आप वहां पर भोजन करेंगे तो हां आपका

826
01:02:24,240 --> 01:02:28,720
कुत्ते का जन्म होगा शास्त्र त्याग कर यहां आपने कहा ना शास्त्र विधि को

827
01:02:28,720 --> 01:02:33,080
अपना कर ही जो करोगे वही आपके काम आएगा ठीक

828
01:02:33,080 --> 01:02:37,520
है राधे राधे राधे राधे

829
01:02:37,520 --> 01:02:41,760
भैया कौन आया है पहाड़ी जी

830
01:02:41,760 --> 01:02:45,760
है जो भी आए भैया फेस दिखाए तो उन्हें स्ट्रीम में जोड़ा

831
01:02:45,760 --> 01:02:50,160
जाएगा अब कुछ बचा नहीं है वैसे रामपाल वालों के पास एक वो श्राद्ध था

832
01:02:50,160 --> 01:02:54,160
व्रत था वो भी छीन लिया मुक्ति के दो

833
01:02:54,160 --> 01:03:00,160
साधन बचे थे वो भी छीन लिए

834
01:03:02,800 --> 01:03:06,840
हां कुछ वीडियो बनाते हैं ना आप प्रमाण दिखाते

835
01:03:06,840 --> 01:03:10,960
हैं वो लोग वीडियो बनाते कि ना यहां पर यह लिखा है वहां पर यह लिखा है

836
01:03:10,960 --> 01:03:15,240
हमने एक दिन प्रमाण दिखाया था कि देवी जी कह रही मैं ही ब्रह्मा हूं मैं ही विष्णु

837
01:03:15,240 --> 01:03:19,680
मैं ही शिव हूं तो वहां पर एक व्यक्ति

838
01:03:19,680 --> 01:03:23,920
यह वीडियो बना रहे हैं कि ना वहां पर यह कह रहे हैं कि यह सब चीज मैंने बनाया तो तभी

839
01:03:23,920 --> 01:03:28,560
ऐसा बोलली कि मैं यही हूं पर य अ अलग है

840
01:03:28,560 --> 01:03:32,880
तो इनका अर्थ फिर क्यों माना जाए वही

841
01:03:32,880 --> 01:03:37,240
तो बात है फिर फिर वो आ जाएगा प्रमाणिक गुरु कौन परंपरा प्राप्त आचार्य

842
01:03:37,240 --> 01:03:41,520
इसीलिए तो परंपरा चाहिए

843
01:03:41,520 --> 01:03:45,600
भाई अच्छा की बा बोलो आपके सभी

844
01:03:45,600 --> 01:03:49,760
धर्मों के इंसानियत पर बात पूछनी थी वर्ण व्यवस्था छुआछूत पर अगली बार जुड़ने का

845
01:03:49,760 --> 01:03:53,800
लिंक में कमेंट में रखना देव जाट जी आप जो है

846
01:03:53,800 --> 01:03:57,280
हमारा नंबर नोट कर लीजिए

847
01:03:57,280 --> 01:04:01,400
4369 इस पर आप ट करिए आप फर्म को भर दीजिए हम

848
01:04:01,400 --> 01:04:06,200
आपके साथ सुनियोजित ढंग से चर्चा कर लेंगे अजीत सिंह जी

849
01:04:06,200 --> 01:04:10,720
अपना फेस दिखाए चले गए अजीत सिंह जी चले गए

850
01:04:10,720 --> 01:04:14,880
तो ऐसा

851
01:04:14,880 --> 01:04:19,080
है इस समय हमारे ऊपर अलग अलग तरह से बहुत सारे प्रहार

852
01:04:19,080 --> 01:04:23,200
होते हैं दिन भर मेरे जो चैनल है उसको मेंशन कर देता है कोई ना

853
01:04:23,200 --> 01:04:27,200
कोई डेली कोई ना कोई मेंशन जरूर करता है कभी आर समाज से कर देते हैं

854
01:04:27,200 --> 01:04:31,360
मेंशन इस समय शायद आर समाज में व चल भी रही होगी वो

855
01:04:31,360 --> 01:04:36,440
जो हमने कहा था ना कि भाई जो भी विद्वान आएगा

856
01:04:36,440 --> 01:04:40,880
वार्ता करने के लिए चर्चा करने के लिए जो विद्वान आएगा वह कच्छे में होना चाहिए

857
01:04:40,880 --> 01:04:44,960
और वह नृत्य करेगा पहले और फिर नाक रगड़े उसके बाद

858
01:04:44,960 --> 01:04:48,960
उसके साथ वो होगी चर्चा क्यों क्योंकि वह पता है क्या कह रहे वो यह कह रहे हैं

859
01:04:48,960 --> 01:04:53,040
कि आप हमसे चर्चा तो करो मगर कैमरा केवल हमारा

860
01:04:53,040 --> 01:04:59,040
चलेगा हमने कहा ठीक है आपकी य शर्त मान हमारी य वाली शर्त मान

861
01:05:00,040 --> 01:05:04,120
लो अच्छा य एक ये जो आचरण की बात

862
01:05:04,120 --> 01:05:09,000
करते हैं आचरण का अर्थ होता है अपना बिहेव

863
01:05:09,000 --> 01:05:13,040
यहां पर जिन आचरण की बात हो रही है श्लोक संख्या 16 के 2 में

864
01:05:13,040 --> 01:05:17,920
वो तीन आचरण की बात हो रही है काम क्रोध और लोभ की

865
01:05:17,920 --> 01:05:22,000
बात अरु आपने विषय क्यों बदला पहले तो यह बताओ

866
01:05:22,000 --> 01:05:26,480
अभी आप उस पर बात कर रहे थे ना अब उससे डर

867
01:05:26,480 --> 01:05:30,560
लगा भूत है क्या तत्वदर्शी में उस तत्वदर्शी

868
01:05:30,560 --> 01:05:36,400
में भूत है क्या जो डर लग रहा है आपने उसको छोड़ क्यों

869
01:05:36,400 --> 01:05:42,400
दिया ये लोग ऐसे छोड़ते हैं अपनी कही हुई बात को

870
01:05:42,760 --> 01:05:46,920
दोगले और अब सुनो तुम्हारे सवाल का उत्तर हां हम वेद को मानते

871
01:05:46,920 --> 01:05:51,440
हैं मगर पूरा पूरा मानते हैं अधूरा

872
01:05:51,440 --> 01:05:55,640
नहीं कि तुमने जो हमें मंत्र बता दिया बस उतने को मान कर के बैठ जा त

873
01:05:55,640 --> 01:06:00,520
तत्व जपने लगे समझ में आ रहा

874
01:06:00,520 --> 01:06:05,040
है जी बोलिए पड़ी जी हा तो यहां पर आचरण

875
01:06:05,040 --> 01:06:09,200
की मैं थोड़ा इनका क्लियर कर दूं जब 20वें श्लोक से आप पढ़ना शुरू करोगे

876
01:06:09,200 --> 01:06:13,400
हे कुंती नंदन मण मनुष्य मुझे प्राथना करके

877
01:06:13,400 --> 01:06:17,800
ही जन्म जन्मांतर में आसुरी योनि को प्राप्त होते है यहां पर भी देखो

878
01:06:17,800 --> 01:06:22,120
भगवान श्री कृष्ण क्या बोलने जो मुझको प्राप्त नहीं होते हैं वो जन्म जन्मांतर

879
01:06:22,120 --> 01:06:26,160
में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं और भी अधिक

880
01:06:26,160 --> 01:06:30,160
अधम गति को अर्थात भयंकर नरक में चले जाते हैं 20 में

881
01:06:30,160 --> 01:06:34,440
21 में क्या बोला काम क्रोध और लोभ यह तीन प्रकार

882
01:06:34,440 --> 01:06:38,600
के नरक के दरवाजे जीव आत्मा का पतन करने वाले हैं इसलिए

883
01:06:38,600 --> 01:06:42,640
इन तीनों को तीनों का त्याग कर देना चाहिए 2 में बोला फिर

884
01:06:42,640 --> 01:06:46,960
22 में बोला हे कुंती नंदन इन नरक के तीनों दरवाजे

885
01:06:46,960 --> 01:06:51,200
दरवाजों से रहित हुआ मनुष्य अपने कल्याण का आचरण

886
01:06:51,200 --> 01:06:55,600
अपने कल्याण का आचरण करता है उस उससे परम

887
01:06:55,600 --> 01:06:57,760
गति को प्राप्त हो जाता है अब आचरण की

888
01:06:57,760 --> 01:07:01,960
बात आई 22वें में या फिर 23 में बोला कि जो शास्त्र विधि को छोड़कर

889
01:07:01,960 --> 01:07:06,080
अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह ना सिद्धि को

890
01:07:06,080 --> 01:07:10,080
प्राप्त होता है ना सुख को प्राप्त होता है ना परम गति को प्राप्त होता है यहां पर कहने का अर्थ

891
01:07:10,080 --> 01:07:14,160
है जब हम कोई शुभ कार्य कर रहे हो या कोई ऐसा कार्य कर रहे हो मन में

892
01:07:14,160 --> 01:07:18,240
कोई भाव रख के मन में क्रोध है लोभ है मोह है माया है अगर

893
01:07:18,240 --> 01:07:22,400
यह करके हम यह कार्य करेंगे क्योंकि शास्त्रों में इसको वर्जित बताया

894
01:07:22,400 --> 01:07:26,760
गया है कि जब तुम कुछ ऐसा कार्य करो किसी को तुम दान दे रहे हो पर मन में तुम्हारे

895
01:07:26,760 --> 01:07:31,160
क्रोध है तो यह नरक का दरवाजा खोलेगा हमारे लिए

896
01:07:31,160 --> 01:07:35,320
कहने का अर्थ यह है तो 24 में फिर बोला कि अंतः तेरे लिए

897
01:07:35,320 --> 01:07:41,320
कर्तव्य और

898
01:07:54,440 --> 01:07:58,480
अकर्वेंट री काम क्रोध और लोभ इन तीन

899
01:07:58,480 --> 01:08:03,120
आचरण को त्याग के हमें कर्तव्य कर्म करना

900
01:08:03,120 --> 01:08:08,200
चाहिए बिल्कुल मैं इनको इनके

901
01:08:08,200 --> 01:08:12,640
एक इनके डगले पन की पराकाष्ठा दिखाऊं

902
01:08:12,640 --> 01:08:17,080
आपको देखिए गरमा गीता की का पेज

903
01:08:17,080 --> 01:08:22,120
खोलिए कंप्यूटर स्क्रीन के अनुसार 19

904
01:08:22,120 --> 01:08:26,280
लेपन की पराकाष्ठा वो जेल धाम निवासी की परा या

905
01:08:26,280 --> 01:08:31,160
उनके नाम से छापने वालों की पराकाष्ठा है मगर लेपन की पराकाष्ठा

906
01:08:31,160 --> 01:08:35,440
है 19 पेज नंबर पैराग्राफ

907
01:08:35,440 --> 01:08:41,440
नंबर तीसरे से

908
01:08:49,040 --> 01:08:53,120
चौथा चेहरा दिखाओ धुलाई करने वाले तत्वदर्शी

909
01:08:53,120 --> 01:08:59,120
चेहरा दिखाइए

910
01:09:04,600 --> 01:09:08,680
हां यह क्या है और थोड़ा नीचे

911
01:09:08,680 --> 01:09:13,280
चलिए तत्व ज्ञान के अव से मूर्ख पाण

912
01:09:13,280 --> 01:09:18,720
ये और और नीचे चलिए पेज वही है

913
01:09:18,720 --> 01:09:22,880
ये हा पेज वही है ये पेज वो नहीं लग रहा

914
01:09:22,880 --> 01:09:28,240
मुझे पेज चेक करिए जरा 199 होना

915
01:09:28,240 --> 01:09:32,560
चाहिए पीडीएफ के अनुसार 179 हां

916
01:09:32,560 --> 01:09:35,960
चलिए नीचे

917
01:09:35,960 --> 01:09:40,760
चलिए तत्व ज्ञान क्या हा ये ये ये ये बस बस बस बस बस

918
01:09:40,760 --> 01:09:44,800
हा देखिए गीता ज्ञान गीता अध्याय

919
01:09:44,800 --> 01:09:49,960
न श्लोक 11 का अनुवाद इस पर जरा अंडरलाइन कर

920
01:09:49,960 --> 01:09:54,320
दीजिए हां ये अंडरलाइन करिए ये देखिए तत्वदर्शी

921
01:09:54,320 --> 01:09:58,480
का ज्ञान देखिए तत्वदर्शी को कितना ज्ञान है देखिए ऊपर वाली

922
01:09:58,480 --> 01:10:02,600
लाइन अंडरलाइन करिए ऊपर वाली जो सेकंड लाइन है ना ऊपर से सेकंड

923
01:10:02,600 --> 01:10:06,720
मनुष्य से ना मनुष्य शरीर ऊपर से सेकंड ना ना लाइए मत

924
01:10:06,720 --> 01:10:12,720
स्क्रीन मनुष्य शरीर से जस्ट अगली लाइन गीता अध्याय न श्लोक

925
01:10:13,000 --> 01:10:17,240
11 और ऊपर मनुष्य शरीर के बाद अगली लाइन

926
01:10:17,240 --> 01:10:21,440
हा गीता अध्याय न श्लोक 11 का अनुवाद

927
01:10:21,440 --> 01:10:25,560
मूर्ख जन मुझ को मनुष्य का शरीर धारण करना

928
01:10:25,560 --> 01:10:29,560
वाला तु जानते हैं क्या है मूर्ख जन

929
01:10:29,560 --> 01:10:34,640
मुझे तु जानते हैं अब भावार्थ में दिखाइए क्या

930
01:10:34,640 --> 01:10:38,760
है भावार्थ में दिखा दीजिए क्या है यह है तत्वदर्शी के ज्ञान

931
01:10:38,760 --> 01:10:43,080
की पराकाष्ठा तत्व ज्ञान के अभाव में मूर्ख प्राणी

932
01:10:43,080 --> 01:10:47,240
मुझे सब प्राणियों का ईश्वर मानते हैं प्रभु मानते हैं अरे भाई तू

933
01:10:47,240 --> 01:10:51,040
त तो कर ले के मूर्ख ईश्वर कहता है या तुच्छ कहता है

934
01:10:51,040 --> 01:10:55,400
तू त तो कर ले पहले फिर तो तू किताब छाप

935
01:10:55,400 --> 01:10:59,400
तू किताब पहले छाप रहा है तुझको ही नहीं मालूम है अरे पहले

936
01:10:59,400 --> 01:11:03,640
त तो कर ले कि मूर्ख वो जो गीता कह रहा है

937
01:11:03,640 --> 01:11:08,040
उसको प्रभु कहते हैं या तुच्छ कहते हैं

938
01:11:08,040 --> 01:11:13,400
तु और प्रभु में तो विलोम हो गया बिल्कुल

939
01:11:13,400 --> 01:11:17,480
ये है तत्वदर्शी तथा कथित देख लीजिए

940
01:11:17,480 --> 01:11:23,480
तत्वदर्शी का

941
01:11:23,560 --> 01:11:27,680
ज्ञान अर्थ होगा अनर्थ ऐसे कर रखा है ये

942
01:11:27,680 --> 01:11:31,880
जो तत्वदर्शी आए हैं यहां पर ये अपना चेहरा

943
01:11:31,880 --> 01:11:36,160
नहीं दिखा पा रहे हैं शायद इनका मुंह काला हो गया है कहीं पर इनकी

944
01:11:36,160 --> 01:11:40,360
ऐसी धुलाई हुई होगी जिसके कारण धुला धुलने से हालांकि कालिक

945
01:11:40,360 --> 01:11:44,360
मिटटी है मगर इनका चेहरा काला पड़ गया जो चेहरा नहीं दिखा पा रहे

946
01:11:44,360 --> 01:11:49,320
तो इनको हटा दीजिए रमेश करके कोई आए हैं रमेश प्रजापति जी

947
01:11:49,320 --> 01:11:53,560
आपका स्वागत है बताइए क्या कहना चाहते हैं ठीक है हटा

948
01:11:53,560 --> 01:11:58,280
ली हो गया स्क्रीन ये जो शेयर कर रहे हैं

949
01:11:58,280 --> 01:12:02,400
इनको हटाइए जो तहस नहस कर रहे हैं अपनी जिंदगी को बोलिए

950
01:12:02,400 --> 01:12:08,400
रमेश प्रजापति चेहरा दिखाइए

951
01:12:13,160 --> 01:12:17,160
अपना भाई भाई तत्वदर्शी है ये जो कह रहे हैं

952
01:12:17,160 --> 01:12:21,200
कि मूर्ख लोग गीता कहने वाले को तुच्छ समझते हैं मूर्ख लोग

953
01:12:21,200 --> 01:12:25,440
गीता कहने वाले को भगवान समझते हैं यह है तत्वदर्शी अरे

954
01:12:25,440 --> 01:12:29,480
भाई खुद पहले तय कर ले मूर्ख लोग करते क्या है फिर एक बात

955
01:12:29,480 --> 01:12:33,720
बता

956
01:12:33,720 --> 01:12:37,880
दे अर्थों का अनर्थ कर रखा है और बोलते

957
01:12:37,880 --> 01:12:42,120
हैं कि इसमें ज्ञानी ज्ञान है ज्ञान गंगा राहुल कुमार माता जी ने निष्ठा

958
01:12:42,120 --> 01:12:46,160
पूर्वक दुध पान कराया है तो आप ऊपर आए बात करें सामने

959
01:12:46,160 --> 01:12:52,160
आकर के है

960
01:12:52,560 --> 01:12:56,680
ना टू स्टॉप द ट्रेन पुल द जाती है ना पर

961
01:12:56,680 --> 01:12:59,120
आने के नाम

962
01:12:59,120 --> 01:13:03,200
पर बाजार जिसने खोला था

963
01:13:03,200 --> 01:13:07,440
उसके अनुयाई अभी भी उसका प्रचार कर रहे हैं क्योंकि मार्केट में जब नया प्रोडक्ट

964
01:13:07,440 --> 01:13:10,880
आता है तो उसका खूब प्रचार होता

965
01:13:10,880 --> 01:13:15,680
है वही हो रहा है

966
01:13:15,680 --> 01:13:19,960
ना हमको कहने की आवश्यकता

967
01:13:19,960 --> 01:13:25,440
यह कहते हैं कि जो काल है उसको डेली

968
01:13:25,440 --> 01:13:30,120
खाना खाना है काल को है ना

969
01:13:30,120 --> 01:13:34,200
डेली खाना खाना है मगर काल तो कह रहा है इनकी

970
01:13:34,200 --> 01:13:38,400
भगवत गीता के चौथे अध्याय के 14 श्लोक में कि मेरे लिए

971
01:13:38,400 --> 01:13:42,480
कुछ भी प्राप्त करने को शेष नहीं है काल तो यह कह रहा है

972
01:13:42,480 --> 01:13:46,640
मुझे कुछ भी प्राप्त नहीं करना 32 में कह रहा है मैं मेरी किसी फल

973
01:13:46,640 --> 01:13:50,840
में आ सक्ति नहीं है और मुझे कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं मैं तो यूं ही करता

974
01:13:50,840 --> 01:13:55,280
हूं मेरे लिए कुछ भी आवश्यक नहीं है तो

975
01:13:55,280 --> 01:13:59,520
कह रहा है फिर तुम कह रहे हो काल को तो खाना खाना है डेली य कौन सा काल

976
01:13:59,520 --> 01:14:03,680
है भाई आज अमित

977
01:14:03,680 --> 01:14:08,200
दास जी का आपने छल देख लिया आज बड़े शरीफ बन के आए थे

978
01:14:08,200 --> 01:14:12,200
आज मैंने तो देखा नहीं मैं तो कहीं थोड़ा काम था काम में चला गया

979
01:14:12,200 --> 01:14:16,400
था क्या बोल रहे थे मैंने सुना नहीं वो बात जहां

980
01:14:16,400 --> 01:14:20,560
पर कुछ हुई बिना बोले चले गए क्योंकि शायद उनको यहां कुछ मानना पड़ने वाला

981
01:14:20,560 --> 01:14:24,560
था मानना मानने वाले थे चले गए

982
01:14:24,560 --> 01:14:28,920
बिना कुछ अब वो अपना कुछ कंटेंट बनाएंगे

983
01:14:28,920 --> 01:14:34,920
कुछ ये देखो ये ऐसे इस पर कह रहे

984
01:14:34,960 --> 01:14:38,960
थे चलिए ठीक है फिर आज के लिए इतना काफी है आवश्यक

985
01:14:38,960 --> 01:14:43,200
नहीं हर स्ट्रीम दो दो घंटे ढाई ढाई घंटे तीन तीन घंटे चलाया अब कुछ है ही नहीं

986
01:14:43,200 --> 01:14:47,880
इन कुछ मिलेगा तो बताएंगे आ जाना भाई

987
01:14:47,880 --> 01:14:52,080
जिसकी माता जी ने निष्ठा पूर्वक दुध पान कराया हो

988
01:14:52,080 --> 01:14:56,280
वो आए और यहां पर जो है ब्रह्मा विष्णु महेश को भगवान ना मानते

989
01:14:56,280 --> 01:15:00,400
हुए ईश्वर ना मानते हुए श्री कृष्ण को ईश्वर ना

990
01:15:00,400 --> 01:15:05,120
मानते हुए सिद्ध कर दे कुछ भी सिद्ध कर दे तत्वदर्शी सिद्ध कर दो तुम

991
01:15:05,120 --> 01:15:09,400
तुम्हारे ही शास्त्र में मैं तुम्हे तत्वदर्शी दिखाऊ कौन है

992
01:15:09,400 --> 01:15:14,120
कबीर ने कभी रामपाल को तत्वदर्शी बोला है क्या मैं दिखाता हूं

993
01:15:14,120 --> 01:15:18,800
किसने

994
01:15:18,800 --> 01:15:22,800
बोला हां पर कबीर दूसरे की पूजा

995
01:15:22,800 --> 01:15:28,800
करने की बात कर रहे हैं ना

996
01:15:30,520 --> 01:15:34,560
कबीर जी ने यह यह ज्ञान गंगा यह

997
01:15:34,560 --> 01:15:38,640
ज्ञान गंगा में ज्ञान गंगा खोलिए जरा

998
01:15:38,640 --> 01:15:42,680
देखिए तत्वदर्शी कौन है हमें अपने शास्त्रों की

999
01:15:42,680 --> 01:15:46,720
जरूरत नहीं है अपनी चीजों को सिद्ध करने के

1000
01:15:46,720 --> 01:15:52,000
लिए इन्हीं के शास्त्रों से हमारी चीजें सिद्ध होती

1001
01:15:52,000 --> 01:15:58,000
है ज्ञान गंगा खोलिए

1002
01:16:00,080 --> 01:16:05,320
ज्ञान गंगा का पेज नंबर

1003
01:16:05,320 --> 01:16:09,760
30 हां पर कबीर जी का भजन है

1004
01:16:09,760 --> 01:16:13,960
कबीर जी वहां कह रहे हैं मैं तो उसको बजता हूं जिसके इतने हजारों हाथ

1005
01:16:13,960 --> 01:16:18,080
है अब क्या करोगे मैं तो उसका भजन

1006
01:16:18,080 --> 01:16:22,880
करता

1007
01:16:22,880 --> 01:16:26,960
हूं अरे भाई तो भी तो यह कह सकते हैं कि तुम बात को

1008
01:16:26,960 --> 01:16:32,960
समझ नहीं पा रहे हो गीता की कि वह किस विषय में बोला जा रहा

1009
01:16:33,680 --> 01:16:37,880
है तुम भी तो नहीं समझ रहे हो अपने मन से मुह

1010
01:16:37,880 --> 01:16:42,000
उठा के चल दिए गीता का अर्थ करने हमको बता रहे हो तुम

1011
01:16:42,000 --> 01:16:46,000
समझ नहीं रहे हो बात को ऊपर आओ ना

1012
01:16:46,000 --> 01:16:50,040
माता जी ने नहीं दुख पान कराया निष्ठा पूर्वक आ जाओ य देखो मैं

1013
01:16:50,040 --> 01:16:54,240
कह किससे रहा हूं सबसे पहले बात समझो मैं तो नहीं आ रहा आपके चैनल पर कमेंट

1014
01:16:54,240 --> 01:16:58,360
करने आज एक लड़के ने मुझसे यह कहा मैसेज में आकर के बातचीत

1015
01:16:58,360 --> 01:17:02,560
करने लगा फिर मैंने कहा माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पान कराया

1016
01:17:02,560 --> 01:17:06,720
है तो आप आइए हमारे चैनल पर लाइव यह बात तो मैं भी कह सकता हूं तुम आ जाओ मैंने

1017
01:17:06,720 --> 01:17:10,960
कहा मैं तो तुम्हारे पास नहीं आया ना मैसेज करने यदि तुम यहां पर मैसेज

1018
01:17:10,960 --> 01:17:14,960
करके मुझसे तर्क वितर्क कर रहे हो तो सामने से बात करने

1019
01:17:14,960 --> 01:17:18,960
में किस बात का भय है जो चीज

1020
01:17:18,960 --> 01:17:23,080
आप लिख के कर सकते हो वो सामने से बोल के क्यों नहीं कर सकते क्योंकि तुम्हें

1021
01:17:23,080 --> 01:17:27,480
पता है कि तुम्हारी बात में कम री है इसलिए तुम डरते

1022
01:17:27,480 --> 01:17:31,760
हो और मैं तो कह रहा हूं यदि कोई भी आवश्यक व्यक्ति हो मुझसे

1023
01:17:31,760 --> 01:17:35,760
बात करे कहां बीच का स्थान चुना जाएगा ना मेरा ना

1024
01:17:35,760 --> 01:17:40,320
आपका क्यों जाऊ मैं आश्रम और ऐसा नहीं है कि गया नहीं हूं

1025
01:17:40,320 --> 01:17:44,440
गया हूं तुम्हारा स्टॉल लगा है वहां पर तुम्हारे 20 20 25 प लोग

1026
01:17:44,440 --> 01:17:48,520
हैं वहां पर मैं उनसे भेड़ा भी हूं और तुम्हारे नाम

1027
01:17:48,520 --> 01:17:49,020
दान

1028
01:17:48,680 --> 01:17:52,720
केंद्रों में फोन किया मैंने कि भैया मैं आया हूं तो उन्होंने

1029
01:17:52,720 --> 01:17:58,440
कहा हमारे पास कोई विद्वान नहीं है फि विद्वान कहां से टपक रहे हैं कमेंट्स

1030
01:17:58,440 --> 01:18:02,640
में तो एक बार वो वीडियो चला दीजिएगा जाओ आश्रम

1031
01:18:02,640 --> 01:18:08,360
में फोन किया था जो आपने हा वो बड़े मजेदार

1032
01:18:08,360 --> 01:18:12,360
है आश्रम में फोन किया था भाई मैं आ गया हूं मथुरा आ जाओ

1033
01:18:12,360 --> 01:18:16,360
ज्ञान चर्चा कर लेते हैं थोड़ी बताओ तो वो बोले नहीं नहीं पहले

1034
01:18:16,360 --> 01:18:20,920
बोले कल आ जाओ 11 बजे तो पहले की रिकॉर्डिंग नहीं हुई थी

1035
01:18:20,920 --> 01:18:26,600
फिर पहले बोले कल आ जाओ फिर उसके बाद

1036
01:18:26,600 --> 01:18:30,760
उसके बाद अगली अगली बार फिर वहां से कोई और बोलता है फिर

1037
01:18:30,760 --> 01:18:35,080
बोलते कि क्या कहते हैं यह हमारे

1038
01:18:35,080 --> 01:18:39,280
पास अभी कोई विद्वान है नहीं सब गए हुए हैं कब आएंगे 6

1039
01:18:39,280 --> 01:18:43,360
तारीख को आएंगे भाई कोई व्यक्ति बाहर से आया हुआ है जब तो वह

1040
01:18:43,360 --> 01:18:48,440
कहां तक रुकेगा 15 20 दिन तक ड़ी ना

1041
01:18:48,440 --> 01:18:52,880
रुकेगा ठीक

1042
01:18:52,880 --> 01:18:57,120
है इनके सारे

1043
01:18:57,120 --> 01:19:01,360
चैलेंज देते रहते कि तुम रामपाल के किसी भी चेले से

1044
01:19:01,360 --> 01:19:05,360
ज्ञान चर्चा कर लो तो वही तुमको वो कर देगा मिट्टी में

1045
01:19:05,360 --> 01:19:09,360
मिला देगा अब किधर गए विद्वान अब कहां है

1046
01:19:09,360 --> 01:19:13,400
विद्वान कोई नहीं है क्या कोई मायका लाल ऐसा नहीं है

1047
01:19:13,400 --> 01:19:17,920
जो अपने तत्वदर्शी की इज्जत की रक्षा करने

1048
01:19:17,920 --> 01:19:22,800
आए अरे रोते होंगे आपके तत्वदर्शी आओ

1049
01:19:22,800 --> 01:19:26,720
भैया पहले खुद की

1050
01:19:26,720 --> 01:19:32,720
जो जो लोग भी कमेंट में बकबक कर रहे हैं वो ऊपर आए ना

1051
01:19:35,160 --> 01:19:39,280
भाई तो जो भी कोई मायका

1052
01:19:39,280 --> 01:19:43,640
लाल है जिसको उसकी माने दुग्ध पान कराया है निष्ठा पूर्वक

1053
01:19:43,640 --> 01:19:48,560
आपने इनको हां

1054
01:19:48,560 --> 01:19:53,320
क्या वो संपर्क करें हमारा नंबर नोट करें 7408

1055
01:19:53,320 --> 01:19:59,040
30169 वो आके बात करे चर्चा करें ठीक

1056
01:19:59,040 --> 01:20:03,880
है चर्चा करिए आकर के

1057
01:20:03,880 --> 01:20:08,120
आपने निरुत्तर कर दिया है ै बंद कमरे में वीडियो बना सकते

1058
01:20:08,120 --> 01:20:13,160
हैं बाकी कुछ नहीं कर सकते

1059
01:20:13,160 --> 01:20:17,240
हां कुछ रह गया है क्या अरे किसी को पकड़

1060
01:20:17,240 --> 01:20:21,480
लोगे तुम्हारा तत्वदर्शी इतना ज्ञानी इतना महात्मा इतना परमात्मा स्वयं

1061
01:20:21,480 --> 01:20:25,480
है और वो एक लाइन में कह रहा है कि जो

1062
01:20:25,480 --> 01:20:29,600
मूर्ख है वो गीता बोलने वाले को तुच्छ समझते हैं अगली लाइन में कह

1063
01:20:29,600 --> 01:20:33,840
रहा है जो मूर्ख है वो गीता बोलने वाले को भगवान समझते हैं प्रभु समझते हैं

1064
01:20:33,840 --> 01:20:39,840
अब बताइए यह तत्वदर्शी

1065
01:20:43,440 --> 01:20:48,000
है तत्वदर्शी कैसा होता है उसके बारे में पारस

1066
01:20:48,000 --> 01:20:52,080
ल अव दिया जी जय श्री

1067
01:20:52,080 --> 01:20:56,240
राम जय सियाराम भैया जी सादर प्रणाम जी जी खुश रहिए

1068
01:20:56,240 --> 01:21:00,600
भया जी मैं आपकी वीडियो देख के बहुत अधिक प्रभावित

1069
01:21:00,600 --> 01:21:05,160
हूं और आपको बारंबार धन्यवाद है कि

1070
01:21:05,160 --> 01:21:09,280
आपकी वीडियो से बहुत ज्यादा समाज में चेतना आ रही है और

1071
01:21:09,280 --> 01:21:14,160
व्यक्तिगत रूप से मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैं भी इसी

1072
01:21:14,160 --> 01:21:18,240
रामपाल के तो प्रत्यक्ष नहीं पर एक और धर्मदास द्वारा रचित

1073
01:21:18,240 --> 01:21:22,440
एक कबीर पंथ जो चल रहा है जिसका काशी बनारस दामाखेड़ा

1074
01:21:22,440 --> 01:21:26,680
इत्यादि स्थानों से संचालन होता है तो ये लोग भी अपने आप को वैसे तो संत

1075
01:21:26,680 --> 01:21:28,360
बोलते हैं पर वास्तविकता

1076
01:21:28,360 --> 01:21:32,400
ये है कि ये लोग संत के नाम पर ये भी वही रामपाल का ही काम कर रहे हैं इनके साहित्य भी

1077
01:21:32,400 --> 01:21:36,640
वैसे के वैसे ही जैसे रामपाल के है पर हम आप केवल

1078
01:21:36,640 --> 01:21:40,760
रामपाल का विरोध कर रहे हैं पर ये जो अभी जो कुंभ होने वाला

1079
01:21:40,760 --> 01:21:44,760
है भैया जी इसमें ना छानिया उनकी भी लगने वाली है सब कबीर

1080
01:21:44,760 --> 01:21:48,920
पंथ की ये जो क अगर लगेगी तो

1081
01:21:48,920 --> 01:21:53,040
वहां उनको शिवांश नारायण द्विवेदी मिलेगा क्योंकि शिवांश नारायण द्विवेदी

1082
01:21:53,040 --> 01:21:56,720
मार्ग में जाता है इसलिए

1083
01:21:56,720 --> 01:22:00,920
जीरा जाता इसलिए कौन कौन अपना नकली वाला काउंटर

1084
01:22:00,920 --> 01:22:05,680
खोल के बैठा है गुरु परंपरा

1085
01:22:05,680 --> 01:22:09,800
जी जी लखनऊ में आदि शंकराचार्य वैदिक गुरुकलम जो है हमारे

1086
01:22:09,800 --> 01:22:14,000
पूज्य गुरुदेव आचार दनल मण त्रिपाठी जी का उनका शिष्य

1087
01:22:14,000 --> 01:22:18,160
अरे वाह अरे वाह अरे वाह अरे वाह आप

1088
01:22:18,160 --> 01:22:22,960
तो गुरु भाई समान है हमारे परंपरा से तोही है

1089
01:22:22,960 --> 01:22:26,960
और उनका तो बहुत समान आचार श्री का जी

1090
01:22:26,960 --> 01:22:31,160
जी उनके गुरुकुल के आप गुरुकुल में अध्यन कि

1091
01:22:31,160 --> 01:22:36,760
गु नहीं नहीं अध्यन नहीं करे

1092
01:22:36,760 --> 01:22:40,880
उनसे बहुत बढ़िया बहुत बढिया बहुत अच्छे बत अच्छे है

1093
01:22:40,880 --> 01:22:45,200
बहुत ज्ञानी है बहुत अनुशासित है बहुत सिित

1094
01:22:45,200 --> 01:22:50,000
है उनकी कितनी वो करें बारंबार आचार्य

1095
01:22:50,000 --> 01:22:55,240
दनल अच्छा हमारे भी कई बार प्रश्नों का निराकरण

1096
01:22:55,240 --> 01:22:59,280
निराकरण हम भी उनसे मांग लेते हैं कभी कभी जी जी जी उनका

1097
01:22:59,280 --> 01:23:04,240
एक व्यक्तिगत समूह है ब्रह्मसूत्र उसम हम लोग है गुरुदेव की कृपा से

1098
01:23:04,240 --> 01:23:08,320
अच्छा तो बहुत आशीर्वाद प्राप्त होते रहता है गुरुजी का बिल्कुल

1099
01:23:08,320 --> 01:23:12,560
बक बहुत बढ़िया ल

1100
01:23:12,560 --> 01:23:16,720
नहीं नहीं मैं मध्य प्रदेश से हूं अच्छा बालाघाट जिला

1101
01:23:16,720 --> 01:23:22,000
बालाघाट से तो यहां से कैसे संपर्क हुआ आपका आचार्य श्री का चैनल

1102
01:23:22,000 --> 01:23:26,240
से चैनल से तो नहीं उनके ब्रह्मसूत्र समूह में

1103
01:23:26,240 --> 01:23:30,240
एक लवी भारद्वाज भैया जी है दिल्ली के उनके आग्रह पर

1104
01:23:30,240 --> 01:23:34,360
गुरुजी से संपर्क होना हुआ था और 2014 में जो धर्म संसद लगी

1105
01:23:34,360 --> 01:23:38,440
थी स्वरूपानंद जी की छत्तीसगढ़ में कवर्धा में तो उसमें

1106
01:23:38,440 --> 01:23:43,160
हम लोग गए थे शंकराचार्य जी की आईटी सेल में थे हम लोग साई विरोधी अभियान में थे

1107
01:23:43,160 --> 01:23:47,480
तो वहां से परिचय हुआ था जी अच्छा अच्छा बहुत बढ़िया

1108
01:23:47,480 --> 01:23:51,680
ठीक है भैया कभी आना हुआ तो बालाघाट की तरफ से हम आपसे संपर्क करेंगे

1109
01:23:51,680 --> 01:23:53,440
जीरा

1110
01:23:53,440 --> 01:23:57,560
न हा हमारा नंबर

1111
01:23:57,560 --> 01:24:03,560
नहीं आप करिए हमारा नंबर

1112
01:24:08,400 --> 01:24:12,600
74836 यह राधा स्वामी वालों का भी कबीर कबीर

1113
01:24:12,600 --> 01:24:16,640
पंथ जैसा ही सिस्टम है बिल्कुल जी जी जी बहुत

1114
01:24:16,640 --> 01:24:21,920
सारे पाखंड चल रहे हैं भैया

1115
01:24:21,920 --> 01:24:26,120
जी राधा स्वामी वाले क्या करते जैसे सबको ये कबीर

1116
01:24:26,120 --> 01:24:30,360
वाले कबीर को सबसे ऊपर वाले लोक में दिखाते हैं परमधाम में ऐसे ही राधा

1117
01:24:30,360 --> 01:24:34,400
स्वामी वाले राधा स्वामी को दिखाते सबसे परम धाम में जब आपको

1118
01:24:34,400 --> 01:24:38,600
परम मोक्ष मिलेगा तो आप राधा स्वामी वाले लोक में पहुंच जाए

1119
01:24:38,600 --> 01:24:42,600
इसीलिए ऐसे लोगों से बात करने जाता हूं ना मैं ऐसे

1120
01:24:42,600 --> 01:24:46,680
लोगों से बात करने जब मैं जाता हूं तो मैं खामखा शास्त्र इत्यादि पहले नहीं

1121
01:24:46,680 --> 01:24:50,680
खोलता पहले तो सीधे कहता हूं क्या आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान

1122
01:24:50,680 --> 01:24:55,280
है कि नहीं इसी व फ जाता है

1123
01:24:55,280 --> 01:25:00,040
दुनिया का कोई भी तंत्र कोई भी यह जो तथाकथित स्वघोषित

1124
01:25:00,040 --> 01:25:04,160
तंत्र और संत है यह सब इस जगह आकर के फस

1125
01:25:04,160 --> 01:25:08,600
जाते हैं कि इनके द्वारा जो नकली जितने भी आचार्य होते हैं

1126
01:25:08,600 --> 01:25:12,720
इनके द्वारा प्रतिपादित होने वाला मिलने वाला जो भगवान है व भगवान

1127
01:25:12,720 --> 01:25:17,680
ही नहीं होता क्योंकि वह सर्वशक्तिमान नहीं होता व बाधित होता

1128
01:25:17,680 --> 01:25:21,920
है इनके य पर मैं इनके एक व्यक्ति से मिला था यह कबीर

1129
01:25:21,920 --> 01:25:26,440
पंथ का एक व्यक्ति आया था द बाट उसको मैंने

1130
01:25:26,440 --> 01:25:30,840
पूछा क्या तुम्हारा ईश्वर अपनी देह का नाश करके दिखा सकता

1131
01:25:30,840 --> 01:25:34,960
है वो सद है उसका वध नहीं होता सव

1132
01:25:34,960 --> 01:25:39,320
मैं पूछ के रहा हूं देह का नाश कर सकता है कि नहीं

1133
01:25:39,320 --> 01:25:43,320
नहीं कर इनके य इनके य पर देह का नाश है इनके

1134
01:25:43,320 --> 01:25:47,360
य पर निराकार माना है कि एक कोई अनामय लोक

1135
01:25:47,360 --> 01:25:51,560
है अनामय लोक से जो इनका कबीर है वो सतलोक

1136
01:25:51,560 --> 01:25:55,840
में आता है और वो सब सद वहां से

1137
01:25:55,840 --> 01:25:59,840
यह मिथ्या फला नहीं वो साकार ही है मगर वो निराकार से साकार

1138
01:25:59,840 --> 01:26:04,120
हो रहा है पहली बात दूसरी बात फिर फर मैंने उससे

1139
01:26:04,120 --> 01:26:08,240
पूछा की वो कह रहा है कि अगर ईश्वर

1140
01:26:08,240 --> 01:26:12,240
ईश्वर नष्ट हो जाएगा मैं ईश्वर के नष्ट होने की बात नहीं कर रहा हूं उसकी देह के नष्ट होने

1141
01:26:12,240 --> 01:26:16,240
की बात कर रहा हूं अच्छा क्या दे के

1142
01:26:16,240 --> 01:26:20,240
ईश्वर इस समय सद हमारे आसपास बगल में है क्या सदे तो

1143
01:26:20,240 --> 01:26:23,680
नहीं है प्रकट रूप से तो नहीं है मगर उसकी

1144
01:26:23,680 --> 01:26:28,080
सत्ता तो विराजमान इससे सिद्ध होता है कि देह के कारण सत्ता

1145
01:26:28,080 --> 01:26:32,280
नहीं है जी और दूसरी बात यह है कि अगर हम

1146
01:26:32,280 --> 01:26:36,640
उसकी देह को अंतिम मान लेंगे तो बहुत से कार्य करने में असमर्थ

1147
01:26:36,640 --> 01:26:40,800
हो जाएगा वो जैसे अपना रूप नहीं बदल पाएगा क्योंकि उसकी देह जो है व न

1148
01:26:40,800 --> 01:26:44,880
बदल नहीं सकती दे का नष्ट होने का मतलब क्या है गायब

1149
01:26:44,880 --> 01:26:48,040
कर दिया होगा

1150
01:26:48,040 --> 01:26:52,160
नष्ट का नष्ट होने का मतलब क्या है यही है ना तो एक ही

1151
01:26:52,160 --> 01:26:56,240
सवाल है दुनिया के जितने भी शास्त्र विरोधी है जितने भी

1152
01:26:56,240 --> 01:27:00,280
परंपरा विरोधी है जितने भी जो सनातन परंपरा परंपरा

1153
01:27:00,280 --> 01:27:04,320
प्राप्त आचार्य हैं उनका विरोध करने वाला जितना भी तंत्र हो दुनिया का संसार

1154
01:27:04,320 --> 01:27:08,560
का वो सुन ले केवल एक सवाल है उन सबसे

1155
01:27:08,560 --> 01:27:13,080
क्या तुम्हारा ईश्वर सर्व शक्तिमान है या नहीं

1156
01:27:13,080 --> 01:27:17,120
सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है या नियम के नीचे आने वाला

1157
01:27:17,120 --> 01:27:21,120
पादित है बस इसलिए ये सब ये

1158
01:27:21,120 --> 01:27:25,240
सब कंफ्यूज हो गए इनके यहां पर अब तैयारियां चल रही है कबीर ये जो रामपाल

1159
01:27:25,240 --> 01:27:31,240
है इनके यहां तैयारिया चल रही है इस प्रश्न का क्या जवाब

1160
01:27:31,640 --> 01:27:35,840
दे जी भैया अया भैया जी बड़ा अच्छा लगा आप आए

1161
01:27:35,840 --> 01:27:40,320
और आपने अपनी बात कही बड़ा अच्छा लगा जी भैया जी

1162
01:27:40,320 --> 01:27:44,400
जी जी आप तो आप हमारे लिए एकदम देवदूत है क्योंकि

1163
01:27:44,400 --> 01:27:48,600
आपने जो कार्य किया है यह हम लोग बहुत परेशान है लेकिन हम लोग

1164
01:27:48,600 --> 01:27:52,600
इतने बड़े स्तर पर नहीं कर पा रहे आप हमें जब भी साथ हमें आप

1165
01:27:52,600 --> 01:27:57,280
ले लीजिए हम आपके साथ सयो पूरा करने के लिए तैयार है

1166
01:27:57,280 --> 01:28:01,560
बिल्कुल बिल्कुल धरातल पर जुड़िए आप उसम हमें संपर्क करिएगा नंबर

1167
01:28:01,560 --> 01:28:06,040
हमारे डिस्क्रिप्शन में भी लिखा हुआ है और वैसे यहां पर प्रदर्शित

1168
01:28:06,040 --> 01:28:09,400
भी हो जाता है

1169
01:28:09,400 --> 01:28:14,440
74036 और आप जुड़िए बिल्कुल साथ में

1170
01:28:14,440 --> 01:28:18,600
धीरे बोलिए स्मरण कर लेता 7 नहीं

1171
01:28:18,600 --> 01:28:23,000
य लिख के आ रहा है स्क्रीन पर वो आप बाद में

1172
01:28:23,000 --> 01:28:27,040
स्क्रीन ले आप ले सकते हैं धन्यवाद

1173
01:28:27,040 --> 01:28:31,040
जी जी धन्यवाद जय श्रीम जी जय

1174
01:28:31,040 --> 01:28:35,400
श्री राम ठीक है पड़ी जी

1175
01:28:35,400 --> 01:28:41,400
आज की लाइव को छोटा ही रखते हैं और ये भाई साहब है जो कह रहे माता जी

1176
01:28:41,520 --> 01:28:45,760
ने इं प्रो दुध पान कराया कि नहीं कराया

1177
01:28:45,760 --> 01:28:50,080
इ प्रो वाला दुध पान कौन सा है इं पर कराते क्या बहुत

1178
01:28:50,080 --> 01:28:54,160
जल्दी पता लग जाएगा तू एक बार मेरे सामने तो आ

1179
01:28:54,160 --> 01:28:58,480
आज मैं तेरे को देख रहा हूं यह क्या कह रहे हो यार

1180
01:28:58,480 --> 01:29:02,560
एक बार मेरे सामने तो आज मैं तेरे को देख रहा हूं यह क्या है

1181
01:29:02,560 --> 01:29:06,720
समझ में नहीं आ रहा तुम भी तिचा दर्शी हो गए क्या क्या कहना है क्या नहीं कहना पता

1182
01:29:06,720 --> 01:29:11,520
नहीं है सेंटेंस तो सही लिख लो

1183
01:29:11,520 --> 01:29:13,640
और

1184
01:29:13,640 --> 01:29:18,160
सुनो ऐसा गुरुदेव ने

1185
01:29:18,160 --> 01:29:22,240
शास्त्र के साथ साथ शस्त्र की विद्या भी दी है तो रा गहरा मत समझना है

1186
01:29:22,240 --> 01:29:25,760
नाना

1187
01:29:25,760 --> 01:29:29,280
सातो को साथ

1188
01:29:29,280 --> 01:29:33,480
मारूंगा वो घातक का डायलॉग एक फिल्म है उसका डायलॉग

1189
01:29:33,480 --> 01:29:37,720
है सातो को सात मारूंगा एक त मारूंगा य

1190
01:29:37,720 --> 01:29:42,320
धमकी मत देना सामने आ तो ये

1191
01:29:42,320 --> 01:29:46,360
वो संदेश आर जी आ जाइए आप आना चाहते

1192
01:29:46,360 --> 01:29:52,120
हैं क्या सामने संदेश आर्य

1193
01:29:52,120 --> 01:29:56,200
जी मुझे लग रहा कह रहे हैं जो सामने आने को हमसे कह रहे हैं उनसे कह

1194
01:29:56,200 --> 01:30:00,600
रहे हैं संभव चलिए फिर

1195
01:30:00,600 --> 01:30:04,640
बिल्कुल बिल्कुल जय श्री राम सभी को आने के

1196
01:30:04,640 --> 01:30:09,240
लिए और आज इनका ये चैप्टर खत्म हो गया श्राद्ध और व्रत से जो आपको घृणा

1197
01:30:09,240 --> 01:30:13,400
करवाई है कुछ छोटी मोटी चीजें बचें तो लाएंगे और हम बहुत जल्द

1198
01:30:13,400 --> 01:30:17,840
एक बुकलेट बनाने वाले हैं उसमें चैप्टर्स है

1199
01:30:17,840 --> 01:30:22,000
कि कहां पर अर्थ में गपला किया कहां पर विरोध दो तरह की बातें

1200
01:30:22,000 --> 01:30:26,200
की कहां पर वो तत्वदर्शी के लिए वो त सिद्ध नहीं होता भगवान भगवान

1201
01:30:26,200 --> 01:30:30,200
सिद्ध नहीं होता कबीर की दो बातें इस तरह से चैप्टर वाइज उसको खोलो

1202
01:30:30,200 --> 01:30:34,240
पढ़ो और आनंद लो और किसी चीज के लिए नहीं है केवल कॉमेडी के लिए

1203
01:30:34,240 --> 01:30:38,400
है वो आप आनंद प्राप्त करिए उसको पढ़ के ठीक

1204
01:30:38,400 --> 01:30:40,960
है तत्वदर्शी तत्वदर्शी क्यों

1205
01:30:40,960 --> 01:30:45,680
नहीं है वो श्री कृष्ण से अलग काल क्यों नहीं है तत्वदर्शी की दोरी बातें

1206
01:30:45,680 --> 01:30:50,480
ये सब उसम हम लोग एक सिलसिले बार क्रमानुसार लिख देंगे

1207
01:30:50,480 --> 01:30:54,480
सभी को पास आपको शेयर करूंगा पीडीएफ

1208
01:30:54,480 --> 01:30:59,080
बना के रखा है तो वो भी आप उसम ड कर लीजिए जो भी अच्छा लगे आपको

1209
01:30:59,080 --> 01:31:05,080
बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल सभी को जय श्री राम जय श्री राम

1210
01:31:06,620 --> 01:31:10,620
[संगीत]
