1
00:00:06,600 --> 00:00:12,280
सभी को ज

2
00:00:12,280 --> 00:00:16,800
श्रीराम

3
00:00:16,800 --> 00:00:20,920
तो आज की वीडियो का लाइव का आपने देख

4
00:00:20,920 --> 00:00:23,280
ही लिया

5
00:00:23,280 --> 00:00:28,120
टॉपिक आज हम लोग इनके द्वारा जो साद का व्रत

6
00:00:28,120 --> 00:00:32,240
का उपहास उड़ाया जाता है खंडन किया जाता है उस पर हम लोग

7
00:00:32,240 --> 00:00:38,240
बात करने वाले हैं [संगीत]

8
00:00:41,360 --> 00:00:45,680
और पता नहीं क्या हो गया सिस्टम में र

9
00:00:45,680 --> 00:00:49,720
कुछ एक चुटकियों भी लेंगे कुछ जरूरी बातें जो

10
00:00:49,720 --> 00:00:54,000
बीच बीच में जो ट्विस्ट होते हैं वह भी आपको बताएंगे कुछ बिल्कुल ऐसी

11
00:00:54,000 --> 00:00:58,320
चीजें जो अन एक्सपेक्टेड होंगी आपके लिए हम

12
00:00:58,320 --> 00:01:03,640
मगर शुरू शुरू करने से

13
00:01:03,640 --> 00:01:07,960
पहले प्यारी बहना क्या कह रही है चलो अच्छा

14
00:01:07,960 --> 00:01:12,000
है आज टाइम आगे बढ़ाने के बाद

15
00:01:12,000 --> 00:01:17,040
तो कम से कम टाइम पर आ गए

16
00:01:17,040 --> 00:01:21,240
भैया अच्छा ठीक है

17
00:01:21,240 --> 00:01:26,280
खर तो मुख्य विषय पर आने से पहले हम लोग

18
00:01:26,280 --> 00:01:30,280
एक बात कर ले हालांकि कल मैंने काफी देर तक इस बारे

19
00:01:30,280 --> 00:01:34,360
में बात की थी तो भाई जो लोग हैं जो

20
00:01:34,360 --> 00:01:38,400
शास्त्रार्थ की चुनौती दिया करते हैं उनके पास शास्त्रार्थ से बचने का

21
00:01:38,400 --> 00:01:42,640
और कोई तरीका तो था नहीं तो इसलिए उन्होंने दो ऐसी

22
00:01:42,640 --> 00:01:47,200
शर्तें रखी जिसको कि सामने वाला

23
00:01:47,200 --> 00:01:51,680
ना मानने के लिए विवश हो जाए और वह यह कहे कि हमें शास्त्रार्थ नहीं करना

24
00:01:51,680 --> 00:01:55,920
पर हो गया इसका उल्टा सामने वाला थोड़ा

25
00:01:55,920 --> 00:01:59,920
हम आदमी जरा दूजे किस्म के वाला निकला उस

26
00:01:59,920 --> 00:02:04,120
ने क्या किया उसने पलट के ऐसी शर्त रख दी कि वो तो कभी मान्य हो ही नहीं

27
00:02:04,120 --> 00:02:08,320
सकती तो वही हुआ हमने जब अपनी चीजें

28
00:02:08,320 --> 00:02:12,520
कहीं और बताया तो हमें रात में फिर एक लेटर प्राप्त

29
00:02:12,520 --> 00:02:16,720
हो गया उसमें भी कुछ निराधार बातें कुछ

30
00:02:16,720 --> 00:02:18,880
उन्हीं के लेटर में ही उन्हीं की चीजें हो रही

31
00:02:18,880 --> 00:02:22,920
है तो उसका मैं संक्षिप्त विवरण देते हुए

32
00:02:22,920 --> 00:02:27,200
उत्तर दे दू उसके बाद हम लोग मुख्य विषय पर आ जाएंगे

33
00:02:27,200 --> 00:02:31,200
सबसे पहली बात जो इन्होंने कही है उसमें जो मैंने पिक

34
00:02:31,200 --> 00:02:36,080
की है कि इन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ के विषय में

35
00:02:36,080 --> 00:02:40,480
और लिखित बातें ही मान्य होती है इस तरीके से यट इत्यादि की बातें

36
00:02:40,480 --> 00:02:44,480
मान्य नहीं होती और फिर अपने ही उसी लेटर में जिसमें

37
00:02:44,480 --> 00:02:48,760
वो यह बता रहे हैं सिद्धांत देखिए यह

38
00:02:48,760 --> 00:02:53,120
लोग वीडियो क्वालिटी खराब है दोबारा है क्या

39
00:02:53,120 --> 00:02:59,120
रुक रही है क्या

40
00:03:23,440 --> 00:03:27,680
हां तो इनका दोहरा चरित्र देखिए कैसे अपने ही पत्रों

41
00:03:27,680 --> 00:03:32,160
में दोगलापन अपना प्रस्तुत करते हैं उसको स्पष्ट करते जाते हैं वो देखिए

42
00:03:32,160 --> 00:03:36,720
इन्होंने वहां पर हमें पत्र में एक बात कही है कि

43
00:03:36,720 --> 00:03:41,000
शास्त्रार्थ के विषय में आपको इतना सामान्य ज्ञान तो होना चाहिए कि शास्त्रार्थ

44
00:03:41,000 --> 00:03:47,000
के विषय में

45
00:04:00,280 --> 00:04:03,320
इसका मतलब है कि हमारे

46
00:04:03,320 --> 00:04:08,240
द्वारा वीडियो क्वालिटी अटक रही है क्या किया जाए

47
00:04:08,240 --> 00:04:14,240
देखते हैं

48
00:04:26,040 --> 00:04:30,080
भाई संभवत अब नहीं हट गगी वाईफाई ऑफ था क्षमा

49
00:04:30,080 --> 00:04:35,960
करिएगा ठीक है अब ठीक आ रही है वीडियो

50
00:04:35,960 --> 00:04:39,960
क्वालिटी राधे राधे राधे राधे ठीक आ रही है

51
00:04:39,960 --> 00:04:44,240
वीडियो क्वालिटी जी तो

52
00:04:44,240 --> 00:04:48,360
आर्य समाज की ओर से जो हमें एक कल के लाइव स्ट्रीम

53
00:04:48,360 --> 00:04:52,560
के बाद एक फिर से उत्तर मतलब लिखित में प्राप्त हुआ

54
00:04:52,560 --> 00:04:56,760
तो उसका कुछ उत्तर दे दे छोटा सा संक्षिप्त में और फिर हम लोग अपने

55
00:04:56,760 --> 00:05:01,120
मुख्य विषय पर चलेंगे तो उस लेटर

56
00:05:01,120 --> 00:05:05,120
में ही ऐसी चीजें हैं जिनसे उन्हीं की बात से वह अपनी ही बात को काट रहे हैं तो उन

57
00:05:05,120 --> 00:05:09,760
बातों पर हम लोग बात करते हुए अपना फिर से एक बार जवाब प्रस्तुत कर दे

58
00:05:09,760 --> 00:05:13,920
उन्होंने ये कहा है जो मैंने मुख्य मुख्य बातें पिक की है उनके लेटर्स में उन्होंने एक

59
00:05:13,920 --> 00:05:18,200
बात यह कही है कि आपको इतना सामान्य ज्ञान होना चाहिए कि शास्त्रार्थ

60
00:05:18,200 --> 00:05:22,640
के विषय में ट वीडियो इत्यादि प्रमाण के रूप में नहीं होते

61
00:05:22,640 --> 00:05:26,840
अच्छा पहली बात यह कि आप हमें यब के माध्यम से ही

62
00:05:26,840 --> 00:05:30,920
जानते हैं कि हमने कुछ बात अगर कही है तो वोह आपने

63
00:05:30,920 --> 00:05:34,960
जाना कैसे ू के माध्यम से ही आप हमें जानते हैं मतलब हमारी जो बात है

64
00:05:34,960 --> 00:05:39,360
कि हमको आपका मन क्यों हुआ हमसे शास्त्रार्थ करने का शास्त्र

65
00:05:39,360 --> 00:05:41,280
चर्चा करने का

66
00:05:41,280 --> 00:05:45,280
वो इसलिए हुआ क्योंकि आपने हमें हमारी किसी टूब की कही हुई बात को

67
00:05:45,280 --> 00:05:49,320
माना कि हम यह कह रहे हैं है ना ट पर कही हुई

68
00:05:49,320 --> 00:05:53,720
किसी बात को आपने माना कि हम यह बात कह रहे हैं तब आपने हमें वो लेटर भेजा

69
00:05:53,720 --> 00:05:57,760
है अच्छा दूसरी एक बात है आपने यह बात मानी कि आपको इतना

70
00:05:57,760 --> 00:06:03,760
सामान्य ज्ञान होना चाहिए कि शास्त्रार्थ के विषय में

71
00:06:10,520 --> 00:06:15,280
youtube1 की पराकाष्ठा तो दोगले पन की पराकाष्ठा

72
00:06:15,280 --> 00:06:19,640
देखिए उसी लेटर में ये भी लिख रहे हैं कि आपके

73
00:06:19,640 --> 00:06:23,640
जो गुरु हैं पूरी पीठाधीश्वर और शंकराचार्य

74
00:06:23,640 --> 00:06:28,360
उनको हमारे रुद्रपुर में एक आर्य समाजी ने हरा दिया शास्त्रार्थ ये

75
00:06:28,360 --> 00:06:32,960
है डगले पन की हम तो भाई कम से कम

76
00:06:32,960 --> 00:06:36,960
शास्त्र चर्चा या आप शास्त्रार्थ विषयक बातें कर रहे

77
00:06:36,960 --> 00:06:41,360
हैं वीडियो के माध्यम से आपका यह जो व्यक्ति है इसने

78
00:06:41,360 --> 00:06:45,600
कौन से नियम तय किए थे कौन सी चुनौती भेजी थी शंकराचार्य जी

79
00:06:45,600 --> 00:06:49,840
को कि यहां होगा फलाना होगा रिकॉर्डिंग नहीं होगी तुम्हारे

80
00:06:49,840 --> 00:06:54,120
कैमरे ऑन नहीं होंगे सिर्फ मेरे कैमरे ऑन होंगे हिंदू शब्द का प्रमाण पर हिंदू

81
00:06:54,120 --> 00:06:56,800
शब्द की प्रामाणिकता पर बात होगी

82
00:06:56,800 --> 00:07:00,120
ये

83
00:07:00,120 --> 00:07:05,080
इस विषय में कौन से लिखित पत्र पत्राचार हुआ था वह जरा बता दीजिए

84
00:07:05,080 --> 00:07:09,200
आप खुद ही कह रहे हो कि शास्त्रार्थ के लिए लिखित पत्राचार

85
00:07:09,200 --> 00:07:13,400
या लिखित चीजें आवश्यक और फिर खुद ही कह रहे हो कि एक व्यक्ति

86
00:07:13,400 --> 00:07:17,520
चलती हुई सभा के बीच में जो पहुंच गया उसने अपना प्रश्न किया

87
00:07:17,520 --> 00:07:22,240
और अपनी ओर से उन्होंने उत्तर दे दिया शास्त्रार्थ के उसमें नहीं है वह

88
00:07:22,240 --> 00:07:26,240
वातावरण में तो आपने उसको शास्त्र का नाम दे दिया

89
00:07:26,240 --> 00:07:30,360
तो जब नाम दे दिया तो आप बताइए ना कि लिखित कौन सी चर्चा लिखित कौन

90
00:07:30,360 --> 00:07:34,640
सी कौन सा पत्राचार हुआ था क्योंकि आपको तो सामान्य ज्ञान है

91
00:07:34,640 --> 00:07:39,080
कि शास्त्रार्थ के विषय में लिखित पत्राचार आवश्यक है

92
00:07:39,080 --> 00:07:43,240
कौन सा लिखित पत्राचार हुआ था चलो वहां पर उस व्यक्ति ने यह कहा था कि मैं शास्त्रार्थ के

93
00:07:43,240 --> 00:07:48,680
लिए आया हूं यह कहा था उसने माइक पकड़

94
00:07:48,680 --> 00:07:52,960
के वाह रे दोगलो

95
00:07:52,960 --> 00:07:57,000
वाह यही तो है जहा बाधित ईश्वर है ईश्वर है ही नहीं वहां से और

96
00:07:57,000 --> 00:08:00,240
क्या निकलेगा दोगलापन इसीलिए

97
00:08:00,240 --> 00:08:04,440
तो और क्या निकलेगा फिर हमसे बता रहे हैं

98
00:08:04,440 --> 00:08:08,720
कि अच्छा ऐसा नहीं है हमने इनको दो बार

99
00:08:08,720 --> 00:08:12,800
लिखित में उत्तर भी दिया हमने इनको यह भी बता दिया कि भाई हम बारबार आपके

100
00:08:12,800 --> 00:08:16,960
साथ पत्राचार नहीं करेंगे आपको हमारी चीजें मंजूर है तो आप आइए और

101
00:08:16,960 --> 00:08:21,720
वो दो ही चीजें थी ईश्वर विषयक चर्चा को प्राथमिकता से लीजिए

102
00:08:21,720 --> 00:08:25,760
जिससे कि अगर उसके बाद में जो बाकी के जो टॉपिक्स है उन पर बात हो पाए या

103
00:08:25,760 --> 00:08:30,120
ना हो पाए मगर एक निर्णायक चीज लेकर के हम बाहर आए क्योंकि

104
00:08:30,120 --> 00:08:34,240
आप लोग सबको मालूम है यह बात जग जाहिर बात है कि वोह चर्चा बाद वाली हो पाएंगी

105
00:08:34,240 --> 00:08:38,520
कि नहीं हो पाए ठीक है उनकी कितनी संभावना है

106
00:08:38,520 --> 00:08:42,560
तो हमने यह कहा था कि भाई ईश्वर विषय चर्चा

107
00:08:42,560 --> 00:08:46,560
को आप प्राथमिकता से लीजिए बाद की चर्चा जो बाकी के

108
00:08:46,560 --> 00:08:50,560
दो है जिसमें आपका बड़ा मन है नहीं नहीं हमें हरा के ही दिखाना है

109
00:08:50,560 --> 00:08:55,280
वोह हम बाद में कर लेंगे ठीक है और

110
00:08:55,280 --> 00:08:59,440
दूसरी थी कि स्वतंत्रता दोनों को होनी चाहिए ना अपने ष

111
00:08:59,440 --> 00:09:03,880
शर्त वो आपने वो शर्त मानी पहली वाली

112
00:09:03,880 --> 00:09:07,920
और ना ही दूसरी मानी कुछ नहीं माना तो हमने इसमें आपको लिखित में बता दिया

113
00:09:07,920 --> 00:09:12,560
था कि हम बार-बार प्रचार नहीं करेंगे हमारे ये अंतिम उत्तर है आपको

114
00:09:12,560 --> 00:09:16,840
लिखित ठीक है तो अब क्या है

115
00:09:16,840 --> 00:09:20,920
कि उनको तो भागना था तो वो ये चाहते थे कि चर्चा

116
00:09:20,920 --> 00:09:24,960
के लिए मना हम करें मगर कल के लाइव में हमने यह कह दिया भाई नहीं बिना कपड़ों के

117
00:09:24,960 --> 00:09:29,120
आओगे और नृत्य करोगे तो हम तुम्हारा हिंदू शब्द को भी प्रामाणिकता से ले लेंगे और रिकॉर्डिंग

118
00:09:29,120 --> 00:09:33,160
भी नहीं करेंगे अब इसमें उनके आग लग

119
00:09:33,160 --> 00:09:37,160
गई होगी भाई ये कैसी च शर्तें रख दी इसने तो ये तो

120
00:09:37,160 --> 00:09:41,560
हम से एक कदम आगे का व्यक्ति निकला हमने तो सोचा ही नहीं था इतना बोल देगा

121
00:09:41,560 --> 00:09:45,760
अगली बार में अगली बार में रखूंगा कि चर्चा में जो व्यक्ति आएगा हवाई जहाज से छलांग

122
00:09:45,760 --> 00:09:49,960
लगाएगा नीचे फिर तुम्हारी हर शर्त मार लूंगा मैं

123
00:09:49,960 --> 00:09:54,080
क्योंकि आप लोग ऐसी ऐसी शर्त दे रहे हैं ना जिसको

124
00:09:54,080 --> 00:09:58,160
पहले से ही डिक्लेयर है कि वो सामने वाला ना माने हम जानबूझ के ऐसी शर्त देंगे

125
00:09:58,160 --> 00:10:02,520
जिससे वो चर्चा हो ही ना है ना

126
00:10:02,520 --> 00:10:06,600
तो हमने कई बार लिखित में उत्तर भी दिया और अपने वीडियोस में भी

127
00:10:06,600 --> 00:10:11,400
बोला कि हम बारबार पत्राचार आपके साथ नहीं करेंगे हमको अगर हमारा चैनल

128
00:10:11,400 --> 00:10:15,520
200 हज लोग सब्सक्राइब किए हुए 18000 लोगों ने सब्सक्राइब किया है

129
00:10:15,520 --> 00:10:19,040
और लगभग हर वीडियोस को 2000 लोग भेजते हैं अगर 2000 लोग रोज

130
00:10:19,040 --> 00:10:23,080
हमें पत्राचार करें 2000 नहीं उसम से 100 तो हम 100 के 100 का जवाब

131
00:10:23,080 --> 00:10:27,160
नहीं देंगे भाई लिखित में ठीक

132
00:10:27,160 --> 00:10:31,520
है अगर हमें कोई ऐसा उसम से पत्र मिल जाएगा कि हां नहीं

133
00:10:31,520 --> 00:10:35,520
इससे बात करना अत्यंत आवश्यक है इससे बात करने से कोई परिवर्तन

134
00:10:35,520 --> 00:10:39,560
आ सकता है तो हम अवश्य उस पर प्रतिक्रिया देंगे पर वह हमारे स्वविवेक

135
00:10:39,560 --> 00:10:44,120
और हमारे ऊपर निर्भर है कि कौन हमें कैसा समझ में आ रहा है

136
00:10:44,120 --> 00:10:47,640
जैसे आपके व स्वामी

137
00:10:47,640 --> 00:10:51,720
जी अच्छा अब ये हमारे इसको

138
00:10:51,720 --> 00:10:55,760
बोलते हैं कि यही शिष्टाचार सिखाया है क्या तुमने ये जो

139
00:10:55,760 --> 00:10:59,760
हमने जो जो सामान्य

140
00:10:59,760 --> 00:11:03,880
ज्ञान के अभाव में इन्होंने हम पर लगाया कि आपको इतना सामान्य ज्ञान होना चाहिए कि

141
00:11:03,880 --> 00:11:07,920
शास्त्रार्थ के विषय में ट वीडियो इत्यादि की

142
00:11:07,920 --> 00:11:12,200
कही हुई बातें प्रमाण नहीं होती तो आपने तो कोई बात हुई

143
00:11:12,200 --> 00:11:16,560
नहीं है शास्त्रार्थ के विषय में उन बात उसको भी शास्त्रार्थ का नाम दे दिया

144
00:11:16,560 --> 00:11:20,960
तो आपका शिष्टाचार क्या है आपका सामान्य ज्ञान क्या है फिर आपकी

145
00:11:20,960 --> 00:11:26,960
बातों से आपकी बातें कट रही है कितने बड़े दोगले

146
00:11:27,120 --> 00:11:31,240
हो जैसे ल र लोग नहीं होते कि कुछ भी कह दो उनके

147
00:11:31,240 --> 00:11:37,120
समझ में नहीं आएगा वो तो अपनी बातें करते रहेंगे यहां पर कुछ वैसा दिखाई देने लगता

148
00:11:37,120 --> 00:11:41,320
है अरे भाई कितने बड़े दोगले हैं आप खुद ही सिद्धांत

149
00:11:41,320 --> 00:11:45,600
बता रहे हो कि शास्त्रार्थ के विषय में

150
00:11:45,600 --> 00:11:50,160
यह जो वीडियो यट वीडियो इत्यादि नहीं होता

151
00:11:50,160 --> 00:11:53,480
लिखित बातें होती

152
00:11:53,480 --> 00:11:57,840
है मैं उस पर नहीं जाऊंगा कि प्रमाणिक है कि नहीं मगर फिर

153
00:11:57,840 --> 00:12:01,960
भी अपने अपनी बात आप ही काट रहे हो फिर आप रुद्रपुर वाली बात

154
00:12:01,960 --> 00:12:06,360
जो एक व्यक्ति प्रश्न पूछता है सभा में से उठकर के

155
00:12:06,360 --> 00:12:10,480
और गुरुदेव अपनी भाषा शैली में उसको उत्तर दे देते हैं व्यक्ति

156
00:12:10,480 --> 00:12:14,760
को नहीं समझ में आया वो असंतुष्ट है वो बड़बड़ा लगा उसको आगे सभा में दूसरों

157
00:12:14,760 --> 00:12:18,880
को अवसर दिया जाना है उसको आप शास्त्रार्थ का नाम दे रहे हो वो वातावरण को बिगाड़ने

158
00:12:18,880 --> 00:12:23,080
के निमित्त वहां पर गया है हमने तो तुम्हारे लोगों से बैठकर

159
00:12:23,080 --> 00:12:27,800
चर्चा की है तब भी हमने उसको कभी शास्त्रार्थ का नाम नहीं दिया बैठकर

160
00:12:27,800 --> 00:12:32,120
घंटों घंटों तक चर्चा की तब भी हमने उसे शास्त्रार्थ

161
00:12:32,120 --> 00:12:37,320
का नाम नहीं दिया यह अंतर है धर्म और अधर्म

162
00:12:37,320 --> 00:12:41,400
का फिर आप बता रहे हो कि वोह परंपरा की

163
00:12:41,400 --> 00:12:42,120
ताल ठोकने

164
00:12:42,120 --> 00:12:46,240
वाले परंपरा पर चर्चा नहीं कर सकते कर सकते हैं परंपरा

165
00:12:46,240 --> 00:12:50,560
पर आपने जो विषय दिया है किसकी परंपरा आश आप अपनी परंपरा बताओ

166
00:12:50,560 --> 00:12:54,640
तो सही आप अपनी परंपरा बता कहां

167
00:12:54,640 --> 00:12:58,840
रहे हो परंपरा की ताल ठोकने

168
00:12:58,840 --> 00:13:03,360
वाले या परंपरा में बात करने से डर जा कहां डर रहे हैं भाई

169
00:13:03,360 --> 00:13:07,520
हमने तो एक बार भी नहीं कहा कि हमें परंपरा में बात नहीं करनी हमने तो आपसे हमने कभी आपकी

170
00:13:07,520 --> 00:13:11,960
परंपरा पर प्रश्न ही नहीं उठाया कि आपकी परंपरा गलत है हमने आपकी परंपरा

171
00:13:11,960 --> 00:13:16,360
पूछी है क्या है हम तो आपके वहां पर कह कर

172
00:13:16,360 --> 00:13:20,760
आए कि भाई आपको जब पता लग जाए आपकी परंपरा तो बता

173
00:13:20,760 --> 00:13:24,960
देना इंदौर में मह में हम जहां गए थे वहां पर जो सज्जन

174
00:13:24,960 --> 00:13:29,280
थे सामने उनसे हम कह कर आए थे कि आपको आपकी परंपरा पता लग जाए

175
00:13:29,280 --> 00:13:33,280
तो बता देना आज तक किसी ने परंपरा प्रस्तुत

176
00:13:33,280 --> 00:13:37,480
की है मैं कह रहा हूं नहीं तुम भगवान तक की परंपरा बताओ अपने

177
00:13:37,480 --> 00:13:41,520
से पीछे की 40 20 पीढ़ियां तो बता दो अरे 10

178
00:13:41,520 --> 00:13:45,520
15 पीढ़ियां तो बता दो तुम भेज दो लेटर में परंपरा हम उसी तुरंत उस पर बात

179
00:13:45,520 --> 00:13:49,640
कर लेंगे अपनी परंपरा भेजो तो लिख के गिरजानंद के गुरु

180
00:13:49,640 --> 00:13:53,720
पूर्णानंद पूर्णानंद के बाद फुल स्टॉप ये

181
00:13:53,720 --> 00:13:57,200
सब होने लगता है देखना आधुनिक गार्गी जी का वीडियो

182
00:13:57,200 --> 00:14:01,080
देखना ये सब होने लगेगा

183
00:14:01,080 --> 00:14:05,360
पूर्णानंद जी के गुरु का नाम नहीं पता है बस तो परंपरा बताइए

184
00:14:05,360 --> 00:14:09,520
तो कहां है परंपरा परंपरा

185
00:14:09,520 --> 00:14:15,520
से भाग गया अपने मन से ही मिया मिट्ठू बन

186
00:14:16,240 --> 00:14:20,520
जाओ हमसे कह रहे हैं कि आपको अपनी परंपरा पर विश्वास नहीं है भाई तुमको

187
00:14:20,520 --> 00:14:24,720
नहीं है क्या परंपरा पर विश्वास क्योंकि जो परंपरा हम तो अपनी परंपरा दिखाते

188
00:14:24,720 --> 00:14:29,280
हैं ग्रंथों में छापते हैं आपकी परंपरा कौन सी कहां पर

189
00:14:29,280 --> 00:14:33,320
छपी हुई है किस कौन सी बुकलेट कौन सी ऐसी बुक है जिसमें आपने

190
00:14:33,320 --> 00:14:37,600
अपनी परंपरा का विवरण दिया है यह हमारी परंपरा है

191
00:14:37,600 --> 00:14:42,640
ूमा फिरा के वही

192
00:14:42,640 --> 00:14:46,760
बात अब आप कह रहे हो कि आप जो है हिंदू शब्द पर बोलते हो हिंदू

193
00:14:46,760 --> 00:14:50,920
शब्द के लिए आप वीडियो बना सकते हो मगर उस पर बात नहीं कर सकते भाई बात कर सकते

194
00:14:50,920 --> 00:14:55,000
हैं बिल्कुल कर सकते हैं मगर हिंदू शब्द

195
00:14:55,000 --> 00:14:59,080
पर बात कर देने से कोई भी बदलाव आने वाला नहीं है मैं हर समाज की मान्यता को

196
00:14:59,080 --> 00:15:05,080
मानने के लिए विवस नहीं हो जाऊंगा मुझे चाहिए सर्वशक्तिमान

197
00:15:06,240 --> 00:15:10,280
ईश्वर और आप भी यहां मानने को तैयार नहीं हो जाएंगे हिंदू शब्द से कुछ नहीं

198
00:15:10,280 --> 00:15:14,320
निकलना है मगर मैंने भी उस चर्चा से मना नहीं किया जैसे आप कह रहे हैं कि आपने उस चर्चा से मना

199
00:15:14,320 --> 00:15:18,360
नहीं किया जैसे आपने ईश्वर विषय

200
00:15:18,360 --> 00:15:23,120
को पीछे रखा है ऐसे ही हमने हिंदू शब्द की प्रमाणिकता के विषय को पीछे रखा है बस

201
00:15:23,120 --> 00:15:27,240
प्राथमिकता से उस पर चर्चा करिए जिसको आपने विकल्प के रूप में दिया था

202
00:15:27,240 --> 00:15:31,240
ईश्वर विषय उस पर कर सबसे पहले जब

203
00:15:31,240 --> 00:15:37,240
हमने उसको चुन लिया तो अपना उसी में शब्दों का खेल खेल रहे व शब्दों का खेल भी टूट

204
00:15:37,320 --> 00:15:41,320
गया अब इस पर चर्चा करने आप आ जाना हमारी लाइव स्ट्रीम चलती

205
00:15:41,320 --> 00:15:45,360
है इस पर ही चर्चा हो जाएगी पहले कि भैया किस विषय पर चर्चा होगी इस पर आप

206
00:15:45,360 --> 00:15:49,520
आ जाना लाइव स्ट्रीम रो आए दिन चला

207
00:15:49,520 --> 00:15:53,760
करती है लिंक दे देंगे आ जाना पहले इस पर चर्चा होगी क्यों तुमने दोगलापन

208
00:15:53,760 --> 00:15:57,640
किया क्यों आप अपनी बात से मुक रहे हो शाब्दिक भेद से विषयात

209
00:15:57,640 --> 00:16:01,760
हो जाता है तो फिर आपने विष यांतर क्यों किया अपने ही दिए हुए को दूसरा

210
00:16:01,760 --> 00:16:07,760
नाम से क्यों लिखा दूसरे शब्दों में क्यों लिखा यह सब बातें हैं है

211
00:16:10,320 --> 00:16:14,440
ना और तुम यह सब बातें जो करते हो कि हिंदू

212
00:16:14,440 --> 00:16:19,200
शब्द आपकी चीजें देखिए हिंदू शब्द जो है मुस्लिमों ने दिया आर्कलॉजिकल एविडेंसेस

213
00:16:19,200 --> 00:16:23,360
मुस्लिमों के आने से पहले हिंदू शब्द का उपयोग हो रहा था तो पता

214
00:16:23,360 --> 00:16:29,360
चल गया आपके अंडर कवर्ड गुंडे को मालूम होगा फिर व्याकरण की बातें करने लगो

215
00:16:29,560 --> 00:16:34,000
पूछना उससे वो

216
00:16:34,000 --> 00:16:38,120
जो संतों को गालियां दिया करता

217
00:16:38,120 --> 00:16:42,240
है तो आपने अच्छा उसमें इन्होंने एक

218
00:16:42,240 --> 00:16:46,320
बात और कही है कि हम तो आपके विषय पर भी बात करने को तैयार है पर आप तैयार नहीं है

219
00:16:46,320 --> 00:16:50,480
आपने कब कहा हमारे विषय पर बात करने के लिए आप किस रूप

220
00:16:50,480 --> 00:16:54,520
में तैयार है यह सबको समझ में आ रहा है उस विषय पर

221
00:16:54,520 --> 00:16:59,080
आप अंत में बात करेंगे और हो सक

222
00:16:59,080 --> 00:17:03,760
है कि हम आपसे हिंदू शब्द की प्रमाणिकता पर शुरू से ही बात कर लेते

223
00:17:03,760 --> 00:17:07,880
मगर आपने जब उसको स्वयं दिया था विकल्प के रूप में ईश्वर

224
00:17:07,880 --> 00:17:11,920
विषय तो फिर आपने उसको क्यों छोड़ दिया शाब्दिक

225
00:17:11,920 --> 00:17:15,400
भेद के कारण

226
00:17:15,400 --> 00:17:19,480
हम तो आपने किस प्रकार से हमारे विषय को

227
00:17:19,480 --> 00:17:23,560
लिया है और अब कैसे बातों इनकी बातों की जलेबी दिखा दीजिए जरा कि हम तो

228
00:17:23,560 --> 00:17:27,600
आपके विषय पर भी चर्चा करने को तैयार है पर आप तैयार नहीं है आपने कौन सी जगह

229
00:17:27,600 --> 00:17:31,800
कहा कि नहीं ठीक है ईश्वर विषय पर हम चर्चा करेंगे कहां कहा आपने आपने

230
00:17:31,800 --> 00:17:35,880
कहा सबसे लास्ट में करेंगे वो लास्ट तक पहुंचेगी नहीं चर्चा

231
00:17:35,880 --> 00:17:39,880
कोई चर्चा पहुंची है क्या आज तक लास्ट तक कि हां ठीक है अब मानते हैं

232
00:17:39,880 --> 00:17:44,000
ये विषय खत्म हो गया होता है क्या ऐसे

233
00:17:44,000 --> 00:17:48,400
वो चर्चा हम लास्ट में करेंगे जैसे

234
00:17:48,400 --> 00:17:52,400
आपने लास्ट के लिए रखा है ना ईश्वर विषय को ऐसे ही हमने

235
00:17:52,400 --> 00:17:53,200
भी रखा है ू

236
00:17:53,200 --> 00:17:57,440
हिंदू शब्द को लास्ट के लिए आप अपने ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध करिए

237
00:17:57,440 --> 00:18:01,600
और नहीं है तोय ढोल पीटना बंद करिए कि हमारा ईश्वर सर्व शक्तिमान है सर्व

238
00:18:01,600 --> 00:18:05,720
सामर्थ मान है बंद करो ढोल पीटना नाटक लोगों

239
00:18:05,720 --> 00:18:10,040
को बेवकूफ बना के रखा है नहीं सर्वशक्तिमान है सर्वशक्तिमान है मगर सर्वशक्तिमान

240
00:18:10,040 --> 00:18:13,480
की परिभाषा कौन सी है जो हमने बनाई

241
00:18:13,480 --> 00:18:17,680
है और आपने हमारी रिकॉर्डिंग की बात

242
00:18:17,680 --> 00:18:22,120
चार बार हो गया रिकॉर्डिंग तुम क्यों करोगे केवल तुम्हारा कैमरा

243
00:18:22,120 --> 00:18:26,240
ऑन क्यों होगा केवल और यह सब बातें मानते हुए हम क्या गुलाम

244
00:18:26,240 --> 00:18:30,280
है क्या कि मरे जा रहे हैं आपके साथ चर्चा हो जाए चर्चा हो

245
00:18:30,280 --> 00:18:34,280
जाए चाहे किसी भी कीमत पर हो जाए तो चाहे किसी भी कीमत पर हो जाए अगर आप

246
00:18:34,280 --> 00:18:38,440
ऐसी कीमत देने के लिए बोल रहे हैं तो हमने भी अपनी कीमत दे दी हवाई जहाज

247
00:18:38,440 --> 00:18:42,480
से कूद के आओगे वेन्यू में सारे आपके जो अभी तक के जो जितनी

248
00:18:42,480 --> 00:18:46,480
भी शर्त थी सब मान लेंगे चलते हुए हवाई जहाज से लैंडिंग करेगा जब

249
00:18:46,480 --> 00:18:50,680
व्यक्ति वहां पर शास्त्र चर्चा स्थल में तब

250
00:18:50,680 --> 00:18:55,080
हम चर्चा करेंगे उससे और बाकी पहले वाली वो ऐड है

251
00:18:55,080 --> 00:18:59,600
जो पहले बोला था चलिए खैर

252
00:18:59,600 --> 00:19:04,400
अब आते हैं मुख्य विषय

253
00:19:04,400 --> 00:19:08,520
पर यह लोग श्राद्ध के लिए बोला करते

254
00:19:08,520 --> 00:19:12,680
हैं रामपाल एंड कंपनी वाले तो आज हम लोग

255
00:19:12,680 --> 00:19:18,680
श्राद के बारे में जानेंगे क्या लिखा है हमारे शास्त्रों

256
00:19:28,840 --> 00:19:31,440
अथर्व वेद

257
00:19:31,440 --> 00:19:37,440
में

258
00:19:39,920 --> 00:19:44,120
अ दो पूरे पूरे सूक्त हैं पित्र

259
00:19:44,120 --> 00:19:48,680
यज्ञ पित्र के लिए यज्ञ करना पित्र के लिए

260
00:19:48,680 --> 00:19:54,240
अमुक अमुक चीजें पित्र के लिए स्तुति करना तो पूरे सूक्त

261
00:19:54,240 --> 00:20:00,240
है अथर वेद 18वां

262
00:20:14,440 --> 00:20:19,320
18 18वां कांड और तीसरा

263
00:20:19,320 --> 00:20:23,640
सूक्त ठीक है इसका नाम ही है यहां से पितृ

264
00:20:23,640 --> 00:20:29,640
मेद सू दिख रहा है

265
00:20:30,720 --> 00:20:34,760
तो आज के बाद ये कहना बंद कर देना कि श्राद्ध जो है ना वो नहीं करना

266
00:20:34,760 --> 00:20:38,920
चाहिए पित्रों का वो भी मैं अभी

267
00:20:38,920 --> 00:20:42,400
बताऊंगा जो

268
00:20:42,400 --> 00:20:46,560
पित्र पहली बात तोय समझ लीजिए कि पित को य ब्रह्म के रूप

269
00:20:46,560 --> 00:20:50,880
में मोक्ष प्राप्ति के रूप में मोक्ष विषयक तत्व के रूप में नहीं

270
00:20:50,880 --> 00:20:55,120
पूजा जा रहा है यहां पर पित्रों की शांति के लिए पित्रों

271
00:20:55,120 --> 00:20:59,360
की मुक्ति के लिए पित्रों की चीजों

272
00:20:59,360 --> 00:21:03,560
के लिए ब्रह्म की ही पूजा की जा रही क्योंकि जितने भी यज्ञ

273
00:21:03,560 --> 00:21:07,640
कर्म है उनमें प्रतिष्ठित कौन है आपके अनुसार आपकी जो जीजी की है

274
00:21:07,640 --> 00:21:13,640
गर्मा गीता की यज्ञ में प्रतिष्ठित कौन है

275
00:21:20,000 --> 00:21:24,480
सर्वगुण होता है वह परमेश्वर की ही पूजा में होता है

276
00:21:24,480 --> 00:21:28,760
तो भगवत गीता में जो एक कहा गया कि पित्रों को पूजने वाले पित

277
00:21:28,760 --> 00:21:33,080
में जाते हैं वो उसके लिए कहा गया कि पित को ही

278
00:21:33,080 --> 00:21:37,120
जो स्वतंत्र सत्ता मान ले नहीं पित जो है मुझे सुखी कर देंगे पित

279
00:21:37,120 --> 00:21:41,160
जो है मुझे मुक्त कर देंगे पित जो है मुझे स्वर्ग दे देंगे जो स्वतंत्र सत्ता

280
00:21:41,160 --> 00:21:45,720
मान ले पित्रों की भगवान से इतर

281
00:21:45,720 --> 00:21:49,720
उसके लिए कहा गया है कि वोह पित्र को लोक में जाएगा मगर पित्रों के लिए

282
00:21:49,720 --> 00:21:54,120
भी पूजन कर रहा है उसका भी जो यज्ञ का जो

283
00:21:54,120 --> 00:21:58,280
वो है अधिष्ठान स्वरूप व परमात्मा ही है तो उसके लिए मना

284
00:21:58,280 --> 00:22:03,240
नहीं किया है यदि आप उसके लिए मना करने की बात करोगे तो आपको अपनी गीता

285
00:22:03,240 --> 00:22:07,520
का जो अर्थ है उसको छोड़ना पड़ेगा क्योंकि आप ही कहते हो गीता का वो अर्थ मान्य

286
00:22:07,520 --> 00:22:12,760
नहीं है जो वेद विरुद्ध हो जैसे गरिमा गीता

287
00:22:12,760 --> 00:22:18,760
की पृष्ठ संख्या दिखाइए इनको व छवा

288
00:22:19,480 --> 00:22:23,560
अध्याय गरिमा गीता की छठवां अध्याय न से 15 में इन्होंने

289
00:22:23,560 --> 00:22:27,160
लिखा है

290
00:22:27,160 --> 00:22:31,200
कि जो अर्थ वेद के विरुद्ध हो उसको मान नहीं

291
00:22:31,200 --> 00:22:35,960
सकते और तीसरे अध्याय में भी लिखा है

292
00:22:35,960 --> 00:22:40,000
तो ये पितृ मेद में बहुत सारे

293
00:22:40,000 --> 00:22:44,040
18वां कांड तीसरा सुक्त और चौथा सुक्त ये दोनों

294
00:22:44,040 --> 00:22:48,200
सुक्त पित पूजा पर ही है पित के निमित्त जो पूजा होती है

295
00:22:48,200 --> 00:22:54,200
उस पर ही है पित्रों के निमित्त तो मैं उसके बारे में आपको बता रहा

296
00:22:55,520 --> 00:23:01,520
हूं आठवा पढ़ते हैं क्या लिखा है

297
00:23:03,840 --> 00:23:07,960
इसमें तीसरा अध्याय में पेज नंबर मुझे याद नहीं है तो देखना पड़ेगा पीछे से आप

298
00:23:07,960 --> 00:23:13,960
जाइए तब तक मैं इनको सुनाता

299
00:23:14,960 --> 00:23:18,960
हूं देखिए पित्रों के लिए बात हो

300
00:23:18,960 --> 00:23:23,280
रही है हे मृता तू इस स्थान से ऊपर स्थित होकर उठ

301
00:23:23,280 --> 00:23:27,760
उत्थान के अनंतर चल फिर शीघ्रता से चल

302
00:23:27,760 --> 00:23:31,960
फिर अंतरिक्ष में घर बना और उस

303
00:23:31,960 --> 00:23:36,760
लोक में पित्र भी पित्रों

304
00:23:36,760 --> 00:23:41,280
बर्षद अग्नि वाता आदि पित्रों से एकमत

305
00:23:41,280 --> 00:23:46,280
होकर सोमन सोम पान करके आनंद को प्राप्त

306
00:23:46,280 --> 00:23:50,520
हो पुत्र आदि के किए हुए स्वाद स्कार

307
00:23:50,520 --> 00:23:54,760
संपन्न श्राद्ध से आनंद को प्राप्त हो ठीक है

308
00:23:54,760 --> 00:23:59,480
यह है पितृ पूजा के लिए

309
00:23:59,480 --> 00:24:02,320
क्या है ये

310
00:24:02,320 --> 00:24:06,480
अथर्ववेद अवा कांड तीसरा सूक्त

311
00:24:06,480 --> 00:24:09,360
और

312
00:24:09,360 --> 00:24:13,720
आठवा मंत्र अब इसके बाद हम देखेंगे दसवा

313
00:24:13,720 --> 00:24:17,760
दसव में क्या है सोम

314
00:24:17,760 --> 00:24:22,640
के पात्र पित देवता पितर

315
00:24:22,640 --> 00:24:26,920
मुझ यजमान को तेज से व्यक्त

316
00:24:26,920 --> 00:24:31,040
संयुक्त करें तथा विश्वे देवा

317
00:24:31,040 --> 00:24:35,360
भी मुझको मधुरता संपन्न दीप्ति प्रद त से संयुक्त

318
00:24:35,360 --> 00:24:39,680
करें सूक्ष्म दृष्टि से देखने के लिए और मुझको

319
00:24:39,680 --> 00:24:43,840
अच्छी प्रकार दीर्घ काल तक देखते रहने के लिए

320
00:24:43,840 --> 00:24:48,440
रोग आदि के पार उतारते हुए और वृद्धावस्था तक के लिए

321
00:24:48,440 --> 00:24:52,840
भोजन को जीण कराते हुए मुझको वर्ध संतु

322
00:24:52,840 --> 00:24:57,040
यानी बढ़ावे यह पितृ पूजा की बात हो रही

323
00:24:57,040 --> 00:25:01,800
है और मैं आप सब लोगों को जो भी यहां पर देख रहे हैं उन सबको एक बात याद दिला दूं

324
00:25:01,800 --> 00:25:06,000
कि हम लोग जो जो हमारा जो सनातन धर्म

325
00:25:06,000 --> 00:25:10,040
है उसमें पित्रों के निमित्त बहुत अधिक महत्व

326
00:25:10,040 --> 00:25:14,040
दिया गया है तो आप जो पित्रों के लिए तर्पण किया जाता

327
00:25:14,040 --> 00:25:18,440
है जो घर में जो गाय की रोटी निकाली जाती है

328
00:25:18,440 --> 00:25:22,800
स्वान के लिए रोटी निकाली जाती है यह सब चीजें करके देखिएगा

329
00:25:22,800 --> 00:25:24,760
आपको तुरंत

330
00:25:24,760 --> 00:25:29,080
आपको जो है आपकी चीजें जो है सुनियोजित होती हुई दिखाई

331
00:25:29,080 --> 00:25:33,720
देंगी और ये प्रैक्टिकली मैंने किया है

332
00:25:33,720 --> 00:25:38,000
मैंने देखा है इस चीज को जो जल देते हैं ना पित्रों

333
00:25:38,000 --> 00:25:42,280
को वो करना चाहिए उससे मतलब काफी बदलाव

334
00:25:42,280 --> 00:25:46,600
आते हैं परिवर्तन होते हैं अच्छा 18वां

335
00:25:46,600 --> 00:25:50,800
कांड तीसरा सूक्त अब देखिए यहां पर यह कह रहे

336
00:25:50,800 --> 00:25:55,080
हैं भूत और पित पूजा करोगे तो भूत बनोगे

337
00:25:55,080 --> 00:25:59,160
भाई हम पित का ब्रह्म के रूप में नहीं कर रहे

338
00:25:59,160 --> 00:26:03,440
उनके लिए भगवान की पूजा हो रही है पित्रों के लिए पहली बात दूसरी

339
00:26:03,440 --> 00:26:07,720
बात अगर तुम य यहां कही हुई बातों को नहीं मानते तो क्या वेद विरोधी हो

340
00:26:07,720 --> 00:26:11,720
तुम्हारी शास्त्र समत भक्ति भाड़ के चूले में चली गई कहां चली

341
00:26:11,720 --> 00:26:16,600
गई जो तुम चलाते हो शास्त्र सारे शास्त्र खोल के दिखा दिए तत

342
00:26:16,600 --> 00:26:22,240
ने कहां चली गई

343
00:26:22,240 --> 00:26:26,400
हेलो कहां चली गई भाई या केवल

344
00:26:26,400 --> 00:26:30,640
लट्टू तोते की तरह ही हो बस यही सीखा है चाहे

345
00:26:30,640 --> 00:26:34,640
कुछ भी हो रहा हो वेद खुल रहे हो कुछ भी हो रहा हो कबीर सागर खुल रहा हो कबीर भी स्वयं

346
00:26:34,640 --> 00:26:38,880
आ कर के कह रहा हो कि नहीं रामपाल जो है ढोंगी है तब भी नहीं

347
00:26:38,880 --> 00:26:44,880
यह गलत है दाढ़ी वाला सफेद दाढ़ी वाला कहीं भगवान हो सकता है

348
00:26:47,600 --> 00:26:51,920
हा आना अभी

349
00:26:51,920 --> 00:26:55,960
पूछेंगे तो इस तरीके से इसमें भर

350
00:26:55,960 --> 00:27:00,360
भर के प्रमाण है अथर्ववेद के 18

351
00:27:00,360 --> 00:27:04,360
कांड के तीसरे सूक्त में और उसके बाद चौथे

352
00:27:04,360 --> 00:27:08,680
सूक्त में और कौन सा है दवा

353
00:27:08,680 --> 00:27:12,680
हो गया अब देखते चवा क्या कह रहा है चवा कह

354
00:27:12,680 --> 00:27:16,760
रहा है हे पित देवताओं पितर तुम हमारे लिए हमारे

355
00:27:16,760 --> 00:27:21,280
किए हुए पित्र यज्ञ रूप कर्म से संतुष्ट हो परा

356
00:27:21,280 --> 00:27:25,720
मुख होकर हो अपने स्थान को जाओ और जब हम फिर तुम्हारा आवान

357
00:27:25,720 --> 00:27:30,120
करें तो भी आ भी जाना ठीक है

358
00:27:30,120 --> 00:27:34,240
तुमको अब भाई कुल मिलाकर आपने यही देख लिया ना

359
00:27:34,240 --> 00:27:37,960
इसका नाम ही है पितृ मेद सूक्त

360
00:27:37,960 --> 00:27:42,400
इसको कैसे बदल देगा

361
00:27:42,400 --> 00:27:46,880
कोई सतलोक भेज दी हमारी शिकायत अरे भाई सतलोक मत भेजिए शिकायत

362
00:27:46,880 --> 00:27:51,200
वहां काल है सतलोक में

363
00:27:51,200 --> 00:27:55,520
अभी वो भी बताएंगे सतलोक में काल है कि नहीं है सतलोक

364
00:27:55,520 --> 00:28:01,480
में कबीर नहीं है सतलोक में काल है अभी बताएंगे

365
00:28:01,480 --> 00:28:05,960
देखना हां तो यह कुल

366
00:28:05,960 --> 00:28:09,960
मिला के यहां पर भी 14 में भी पित्र पूजा ही हो रही है और आगे देखें क्या

367
00:28:09,960 --> 00:28:14,640
हो रहा

368
00:28:14,640 --> 00:28:19,240
है नहीं नहीं 18 तीन

369
00:28:19,240 --> 00:28:23,400
और 19 19 वा देखते हैं वैसे पूरा भरा हुआ है इसी

370
00:28:23,400 --> 00:28:27,520
से पित पित्रों के निमित्त जो अनुष्ठान होता है उसी से भरा

371
00:28:27,520 --> 00:28:32,720
हुआ है ये पूरा दोनों सूक्त मगर अभी हम 19 देख रहे

372
00:28:32,720 --> 00:28:36,840
हैं हे पित्रों पितर शब्द आ रहा है बार-बार

373
00:28:36,840 --> 00:28:42,840
बार-बार पितर शब्द आ रहा है ये ध्यान रखना

374
00:29:12,920 --> 00:29:18,920
नहीं नहीं यह वाली नहीं वहां जिम के अंदर

375
00:29:21,360 --> 00:29:25,360
तो कुछ गड़बड़ी हो गई थी तो

376
00:29:25,360 --> 00:29:28,440
अभी जो है

377
00:29:28,440 --> 00:29:32,560
19 वा पढ़ रहे थे हम हे पित्रों जो तुम्हारा हर्ष

378
00:29:32,560 --> 00:29:36,600
जनक सौम्य कार्य उस धन के साथ तुम

379
00:29:36,600 --> 00:29:40,840
हमसे संयुक्त हो क्योंकि तुम्हारा तुम

380
00:29:40,840 --> 00:29:44,920
स्वाधीन यश वाले भूत हो

381
00:29:44,920 --> 00:29:49,200
अतः हो अतः तुमको ईष्ट फल

382
00:29:49,200 --> 00:29:53,840
प्रदान करना उचित ही है ऐसे गतिशील और

383
00:29:53,840 --> 00:29:58,120
शोभन भूत का मतलब केवल एक वही भूत वाला भूत नहीं होता

384
00:29:58,120 --> 00:30:02,560
जो पुरानी हवेली में आता है जो पंचभूत

385
00:30:02,560 --> 00:30:06,800
भी होते ठीक है प्रकृति के पंचभूत

386
00:30:06,800 --> 00:30:11,760
भी होते

387
00:30:11,760 --> 00:30:15,840
हैं अभी वाईफाई नहीं है थोड़ी दिक्कत आ रही होगी

388
00:30:15,840 --> 00:30:20,400
वीडियो क्वालिटी खराब है पाच

389
00:30:20,400 --> 00:30:24,840
मिनट में कुछ ठीक हो जाएगी तब तक आप लोग काम चला लीजिए

390
00:30:24,840 --> 00:30:29,000
तो भूत का अर्थ केवल वही नहीं होता

391
00:30:29,000 --> 00:30:33,040
सब नहीं होता भूत का अर्थ केवल भूत उनको भी

392
00:30:33,040 --> 00:30:38,000
कहा जाता है जो वो वाले भूत नहीं होते हैं कौन से वाले

393
00:30:38,000 --> 00:30:44,000
जो आप जिनके जिनके नाम पर आप द्वेष फैलाते हो ठीक

394
00:30:44,600 --> 00:30:48,680
है तो ऐसे गतिशील क्रांत दर्शी यहां

395
00:30:48,680 --> 00:30:53,080
पर भी कव शब्द आया है कव क्रांत दर्शी और

396
00:30:53,080 --> 00:30:57,280
सोवन धन से संपन्न तुम हमारे यज्ञ में आहत होकर हमारी

397
00:30:57,280 --> 00:31:01,600
प्रार्थनाएं आकर सुनो यहां क्या हो रहा है प्रार्थना

398
00:31:01,600 --> 00:31:05,600
सुनो यह जो एक बात कहते ना गरुण पुराण गरुण

399
00:31:05,600 --> 00:31:10,640
पुराण को मरने के बाद क्यों सुनाया जा रहा है भाई यह देख लो आकर

400
00:31:10,640 --> 00:31:14,760
सुनो और गरुण पुराण को मरणोपरांत इसलिए भी पढ़ा जाता

401
00:31:14,760 --> 00:31:18,800
है कि व्यक्ति केवल उसी को नहीं सुनाया जा रहा क्योंकि उसने

402
00:31:18,800 --> 00:31:23,000
अपने जीते जी जब उसके य किसी और का स्वर्गवास हुआ था या निधन हुआ था तब उसने सुना

403
00:31:23,000 --> 00:31:27,080
था यह भी समझो गरुण पुराण को उस समय

404
00:31:27,080 --> 00:31:31,240
पढ़ा इसलिए जाता है कि व्यक्ति जीवन की सत्यता को समझे सबका

405
00:31:31,240 --> 00:31:35,560
यही गत्य है राम नाम सत्य है उस समय वो हावी

406
00:31:35,560 --> 00:31:39,880
होता है और उसकी जो आम जीवन जो होता है उसमें जब मृत्यु

407
00:31:39,880 --> 00:31:43,960
वाली बातें होती है कि मृत्यु के बाद क्या होगा कैसे मुक्ति मिलेगी मोक्ष कैसे

408
00:31:43,960 --> 00:31:48,400
मिलेगा तो वो व्यक्ति उसको सुनना नहीं चाहता है मगर जब उसके यहां पर

409
00:31:48,400 --> 00:31:52,640
किसी का निधन हुआ होता है तो उसके ज्यादा वो अपीलिंग होता है कि उस

410
00:31:52,640 --> 00:31:56,640
उसके आसपास उस उस प्रकार का वातावरण होता है कि वो उससे जुड़ सके

411
00:31:56,640 --> 00:31:59,760
उस पर ध्यान दे सके इसलिए भी गरुण

412
00:31:59,760 --> 00:32:03,800
पुराण का जो श्रवण होता है उस समय अच्छा होता है मगर पहली

413
00:32:03,800 --> 00:32:08,120
बात ये कि यहां पर देखो आकर सुनने की बात हो रही है मरण उपरांत

414
00:32:08,120 --> 00:32:14,120
पित्रों को ठीक दूसरी बात ये कि

415
00:34:20,600 --> 00:34:21,600
हां

416
00:34:21,600 --> 00:34:25,680
क्षमा करिए भाई बाधा के लिए तो गरुण पुराण

417
00:34:25,680 --> 00:34:29,760
के लिए य लोग क्लेम करते हैं कि गरु पुराण जो है मरणो प्रांत क्यों सुनाया जाता

418
00:34:29,760 --> 00:34:35,400
है फिर उसको क्या फायदा है पहली बात तो यहां पर अथर्ववेद

419
00:34:35,400 --> 00:34:39,520
के अवे कांड के तीसरे सूक्त के 19

420
00:34:39,520 --> 00:34:43,600
में मंत्र में आकर सुनो आ शोत बात

421
00:34:43,600 --> 00:34:47,800
हो रही है यानी पूजन होता है अनेक जगह स्तुति हो रही है

422
00:34:47,800 --> 00:34:52,400
मरण उपरांत पित्रों के लिए दूसरी बात कि

423
00:34:52,400 --> 00:34:56,520
ऐसा नहीं है कि जो प जो पित के रूप में हो गया है वो उसने कभी सुना

424
00:34:56,520 --> 00:35:00,720
नहीं था उसने उसके जब पूर्वज गए थे तब

425
00:35:00,720 --> 00:35:04,760
उसने भी वोह गरुण पुराण जब वो किसी के मरणोपरांत

426
00:35:04,760 --> 00:35:08,920
पढ़ा जाता है तो उसने भी तब सुना था ऐसा नहीं है

427
00:35:08,920 --> 00:35:13,440
कि किसी के मरणोपरांत ही सुना जाता है मगर मरणोपरांत का

428
00:35:13,440 --> 00:35:17,480
कारण यह होता है सुनने का कि उस समय व्यक्ति गरुण

429
00:35:17,480 --> 00:35:21,600
पुराण की जो बातें हैं कि आपका जो लाइफ आफ्टर डेथ वो

430
00:35:21,600 --> 00:35:25,680
क्या होगी तो उससे वह कनेक्टिविटी प्राप्त कर पाता

431
00:35:25,680 --> 00:35:29,720
है इसलिए पुराण को वहां पर आवश्यक रूप से

432
00:35:29,720 --> 00:35:33,800
कहा जाता है बाकी ऐसा नहीं है कि गरुण पुराण को पढ़ना निषेध है

433
00:35:33,800 --> 00:35:36,920
अन्य दिनों

434
00:35:36,920 --> 00:35:42,920
में और इसके बाद आगे चलते हैं

435
00:35:44,600 --> 00:35:49,440
कि 18 और

436
00:35:49,440 --> 00:35:52,760
तीन और

437
00:35:52,760 --> 00:35:57,640
42 ये लोग बहुत श्राद्ध श्राद्ध किया करते हैं

438
00:35:57,640 --> 00:36:02,280
इसीलिए मैंने कहा श्राद और इसका भी भांडा फोड़ ही दो वो व्यक्ति तो बेचारा

439
00:36:02,280 --> 00:36:06,920
यह सब कर कुरा के जेल पहुंच गया जेल में अपना जो है पापों का

440
00:36:06,920 --> 00:36:11,440
प्रश्चित भी कर रहा है ऐसा सुनने में आया है मगर यह लोग अब

441
00:36:11,440 --> 00:36:15,960
उस चीज को आगे बढ़ा रहे हैं तो क्या है

442
00:36:15,960 --> 00:36:20,320
42 में क्या लिखा है हे अरुण वर्ण

443
00:36:20,320 --> 00:36:24,440
माली माता उषा की गोद में बैठने वाले

444
00:36:24,440 --> 00:36:29,120
पितर तुम हवी देने वाले मरण धर्मी

445
00:36:29,120 --> 00:36:33,280
यजमान के लिए धन दो पितरों से धन

446
00:36:33,280 --> 00:36:37,680
मांगा जा रहा है ठीक है तुम हमें नामक

447
00:36:37,680 --> 00:36:42,760
नरक से बचाने वाले पुत्रों के लिए उस प्रसिद्ध धन

448
00:36:42,760 --> 00:36:47,000
दो ठीक है बल बल प्रदान करो तो पित्रों से

449
00:36:47,000 --> 00:36:51,320
प्रार्थना की जा रही है मगर स्वतंत्र रूप से पित्रों से प्रार्थना

450
00:36:51,320 --> 00:36:52,040
नहीं की जा रही

451
00:36:52,040 --> 00:36:56,520
है जैसे कि आप ही की बात अगर मान ली जाए कि

452
00:36:56,520 --> 00:37:00,920
भाई क्या कहते हैं रामपाल भगवान है

453
00:37:00,920 --> 00:37:05,000
ठीक है आप ही की बात मान ली आपने कहा रामपाल भगवान है

454
00:37:05,000 --> 00:37:09,440
तो क्या अपने माता-पिता की ओर आदर सम्मान की भावना बंद कर

455
00:37:09,440 --> 00:37:13,920
दोगे आप कहते हो कि परमात्मा

456
00:37:13,920 --> 00:37:18,040
की भक्ति करनी कबीर की भक्ति करनी है मगर फिर भी काल की पूजा करने का

457
00:37:18,040 --> 00:37:22,040
ढोंग तो करते हो ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करने का ढोंग तो करते

458
00:37:22,040 --> 00:37:26,520
हो अगर उससे ढोंग हटा दी जाए तो पूजा करते

459
00:37:26,520 --> 00:37:31,360
हो क्यों कर रहे हो भाई उनकी पूजा गुण तीनों की भक्ति करके तो व्यक्ति गुण

460
00:37:31,360 --> 00:37:36,240
बनेगा अपनी बातों में फसते हो

461
00:37:36,240 --> 00:37:40,360
ठीक है यह हो गया तो 42वां हो गया और प्रमाण ले लो

462
00:37:40,360 --> 00:37:44,400
भर भर के प्रमाण है पूरे पूरे सूक्त है दो कम से कम 100 से ज्यादा मंत्र

463
00:37:44,400 --> 00:37:49,720
है पित पूजा के निमित्त पित यज्ञ के निमित्त 100 से ज्यादा प्रमाण

464
00:37:49,720 --> 00:37:53,840
है क्या है एक और अच्छा सा ले लेते

465
00:37:53,840 --> 00:37:58,520
हैं कोई हां इसको ते

466
00:37:58,520 --> 00:38:01,480
183

467
00:38:01,480 --> 00:38:05,560
63 अच्छा पहले

468
00:38:05,560 --> 00:38:11,560
18 च लेते हैं

469
00:38:14,600 --> 00:38:16,840
प

470
00:38:16,840 --> 00:38:21,040
देखिए पित्रों की पूजा करने से भी

471
00:38:21,040 --> 00:38:25,640
जीवन मृत्यु से परे होने की बात लिखी हुई है

472
00:38:25,640 --> 00:38:29,640
इसलिए 39 ले रहा हूं वैसे तो पूरा ही पितृ

473
00:38:29,640 --> 00:38:34,680
पूजा के निमित्त में है ठीक

474
00:38:34,680 --> 00:38:38,920
है यह देखिए यह मधुर रस

475
00:38:38,920 --> 00:38:43,120
वाला आचमन के योग्य जल पुत्र

476
00:38:43,120 --> 00:38:47,160
व पत्रों को तृप्त करता रहता है पिंडो जीवी

477
00:38:47,160 --> 00:38:51,200
पित्रों के लिए अमरता का साधन

478
00:38:51,200 --> 00:38:55,200
अपने को प्रसन्न करने वाली स्वधा को देता रहता है अमरता

479
00:38:55,200 --> 00:38:59,440
का साधन इसीलिए कहता हूं

480
00:38:59,440 --> 00:39:03,640
मत पढ़ो चक्कर में क्यों क्यों खामा खा

481
00:39:03,640 --> 00:39:07,600
अपनी चीजें बिगाड़ से

482
00:39:07,600 --> 00:39:11,600
हो अब तो दूसरे लोग भी यह वाला जो अपना

483
00:39:11,600 --> 00:39:15,600
वो है ना स्लोगन यूज करने लगे हैं मत पढ़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर

484
00:39:15,600 --> 00:39:18,600
में अपने साथी

485
00:39:18,600 --> 00:39:22,760
जो साथ मतलब अपने ही समर्थन वाले वो इसको

486
00:39:22,760 --> 00:39:26,840
यूज करने लगे अपने वीडियोस में अच्छा है मनुवाद हों

487
00:39:26,840 --> 00:39:32,840
का नारा हो जाएगा मत पढो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर

488
00:39:33,080 --> 00:39:37,880
में और देखिए 40 में क्या कह रहे

489
00:39:37,880 --> 00:39:42,360
हैं 40 में कह रहे हैं

490
00:39:42,360 --> 00:39:46,920
कि अव सेचन के साधन रूप तुम अपने द्वारा

491
00:39:46,920 --> 00:39:51,280
अवश दक्षिणा अग्नि को यज्ञ में दिए हुए पिंडों को पहुंचाने

492
00:39:51,280 --> 00:39:56,160
के लिए पिता पितामह आदि पित्रों के समीप पहुंचाओ

493
00:39:56,160 --> 00:40:00,600
मेरे पितर इस पिंड पित यज्ञ नामक यज्ञ का सेवन करें

494
00:40:00,600 --> 00:40:04,960
मरणोपरांत हो रहा है भैया ये सब

495
00:40:04,960 --> 00:40:09,080
तो अब मैं कुछ हास्यास्पद बातें

496
00:40:09,080 --> 00:40:13,520
बता दूं उसमें आपको थोड़ा रोचकता

497
00:40:13,520 --> 00:40:17,520
आ जाएगी तो भैया

498
00:40:17,520 --> 00:40:22,200
पितरों को कबीर भी कहा गया है वेदों में प्रमाण है ओय

499
00:40:22,200 --> 00:40:22,720
व

500
00:40:22,720 --> 00:40:27,320
कबीर तो पितर है हा तुम्हारे हिसाब से तुम्हारी भाषा में

501
00:40:27,320 --> 00:40:31,360
183 63 अब दिखाता हूं आपको कवि का

502
00:40:31,360 --> 00:40:35,480
अर्थ क्या है कबीर तो कबीर तो पितर है पितरों

503
00:40:35,480 --> 00:40:39,680
की पूजा करने वाले तो पितर लोग जाएंगे मत करो कबीर की पूजा

504
00:40:39,680 --> 00:40:44,000
दिखाते हैं दिखाते हैं

505
00:40:44,000 --> 00:40:48,080
मान लिया ओए मान लिया ओ कबी को कबीर कबीर

506
00:40:48,080 --> 00:40:51,520
मान लिया

507
00:40:51,520 --> 00:40:55,600
ओए ये देखिए वो जो मैंने

508
00:40:55,600 --> 00:41:00,200
आपको एक भेजा था ना ज स्क्रीनशॉट दिखा दीजिए

509
00:41:00,200 --> 00:41:06,160
दयानंद जी वाला वो दिखा

510
00:41:06,160 --> 00:41:10,000
दीजिए तो

511
00:41:10,000 --> 00:41:14,400
भाई इसमें जो है दो तरीके के अर्थ

512
00:41:14,400 --> 00:41:18,400
है 18 3 63 में दो तरीके के अर्थ

513
00:41:18,400 --> 00:41:23,200
है एक कि जो

514
00:41:23,200 --> 00:41:28,800
कवि यानी क्रांत दर्शी यानी परमात्मा मान लो जो परमात्मा

515
00:41:28,800 --> 00:41:32,920
प्रकट अथवा श्रेष्ठ बुद्धि वाला है अपनी

516
00:41:32,920 --> 00:41:37,280
महिमा से स्तुति करने वाले पित्रों को अंतरिक्ष

517
00:41:37,280 --> 00:41:41,960
लोक में धारण करता है यानी कि यह जो पित पूजन हो रहा है उससे व्यक्ति कहां

518
00:41:41,960 --> 00:41:46,120
पहुंचेगा कबीर के पास अब तुम इस अर्थ को अगर

519
00:41:46,120 --> 00:41:50,400
नहीं मानोगे परमात्मा के पास पहुंचेगा यानी पितृ पूजा से

520
00:41:50,400 --> 00:41:54,600
मुक्ति वो वाली जो तुम बता रहे हो ठीक है कबीर के पास पहुंचेगा परमात्मा

521
00:41:54,600 --> 00:41:58,680
के पास अब तुम अगर इस अर्थ को नहीं मानोगे क्योंकि हमें पित पूजा को नकारना

522
00:41:58,680 --> 00:42:02,720
है तो नहीं मानोगे तो तुम कौन सी चीज मानोगे

523
00:42:02,720 --> 00:42:07,880
दयानंद जी का दयानंद जी का भी दिखा देता हूं

524
00:42:07,880 --> 00:42:12,320
मैं अवे दयानंद जी का है कि नहीं मेरे

525
00:42:12,320 --> 00:42:18,320
पास और गया देखता हूं

526
00:42:22,060 --> 00:42:28,060
[संगीत]

527
00:43:27,920 --> 00:43:32,560
दयानंद जी का तो नहीं है पर आर्य समाज का जरूर

528
00:43:32,560 --> 00:43:36,640
है इसमें देखिए क्या कहा जा रहा है इसमें जो शब्द

529
00:43:36,640 --> 00:43:37,140
आया ना

530
00:43:37,080 --> 00:43:43,080
कवि उसको कबीर कहा जा रहा है

531
00:44:08,160 --> 00:44:12,760
हम हां भाई जिस परमात्मा

532
00:44:12,760 --> 00:44:17,160
ने पितरों में कवि यह देख लो भैया

533
00:44:17,160 --> 00:44:22,240
पितरों में कौन वो पितर जो बुद्धिमान

534
00:44:22,240 --> 00:44:26,520
है पित्रों में कवि अब इन्होंने कवि का अर्थ बुद्धिमान

535
00:44:26,520 --> 00:44:30,840
लिया है आप कबीर ले लेना ठीक है जिस परमात्मा

536
00:44:30,840 --> 00:44:35,200
ने पित्रों में कवि इन्होंने बुद्धिमान किया आप जो

537
00:44:35,200 --> 00:44:41,160
है ले लेना कबीर तो क्या हो जाएगा

538
00:44:41,160 --> 00:44:45,360
फिर यह देखो दिख रहा है जिस परमात्मा

539
00:44:45,360 --> 00:44:49,840
ने पित्रों में कवि यानी कबीर

540
00:44:49,840 --> 00:44:53,920
ठीक है पितरों में कौन जो पित्रों में जो कबीर

541
00:44:53,920 --> 00:44:57,520
है

542
00:44:57,520 --> 00:45:01,800
उसके लिए बात आगे हो रही है कि बुद्धिमान होकर

543
00:45:01,800 --> 00:45:05,880
जो कबीर है आकाश के बीच प्रबंध के साथ

544
00:45:05,880 --> 00:45:10,240
अपनी महिमा से उसने सब लोगों को

545
00:45:10,240 --> 00:45:14,640
धारण किया तो कबीर कौन हो गए पितरों में जो बुद्धिमान

546
00:45:14,640 --> 00:45:18,640
पितर है वह कबीर है और परमात्मा अलग है तो फिर आगे क्या हो रहा

547
00:45:18,640 --> 00:45:23,040
है परमात्मा को सबके मित्र होकर

548
00:45:23,040 --> 00:45:27,240
तुम आत्म समर्पण से अर्चित पूजो ठीक है

549
00:45:27,240 --> 00:45:31,360
तो या तो आप इसको मान लो इसके अनुसार

550
00:45:31,360 --> 00:45:34,560
जो कबीर है

551
00:45:34,560 --> 00:45:38,760
वो पितरों में बुद्धिमान जो पितर होंगे पितरों में जो बुद्धिमान

552
00:45:38,760 --> 00:45:43,120
पितर वो हो जाएंगे कबीर और या फिर

553
00:45:43,120 --> 00:45:47,280
अगर दूसरा हमारा वाला मानोगे तो क्या होगा कि

554
00:45:47,280 --> 00:45:51,520
पित पूजा पित यज्ञ करने से वह मुक्ति प्राप्त होती जिसको तुम मुक्ति कहते

555
00:45:51,520 --> 00:45:55,680
हो कवि को प्राप्त होता हमारे अनुसार कभ परमात्मा सर्वज्ञ

556
00:45:55,680 --> 00:45:59,680
को कहा गया है तुमने अपना कभ नाम दे दिया तो पि पूजा को तुम गलत नहीं

557
00:45:59,680 --> 00:46:04,040
बता पाओगे आना इस पहले की अपनी बात ठीक

558
00:46:04,040 --> 00:46:08,240
है मैंने सुना है कि

559
00:46:08,240 --> 00:46:12,240
हमारे लिए भाई तैयारियां चल रही है कैसे जवाब दिया जाएगा शिवांश नारायण

560
00:46:12,240 --> 00:46:12,740
द्विवेदी

561
00:46:12,680 --> 00:46:16,880
को अच्छी बात है करो तैयारी शिवांश नारायण

562
00:46:16,880 --> 00:46:21,000
द्विवेदी को कैसे उत्तर दिया जाए तो

563
00:46:21,000 --> 00:46:27,000
यह है

564
00:46:27,440 --> 00:46:32,320
और आपको एक रोचक बात बताते हैं ठीक है

565
00:46:32,320 --> 00:46:38,240
कि अथर वेद 18वां

566
00:46:38,240 --> 00:46:42,600
कांड

567
00:46:42,600 --> 00:46:48,600
1832 देखिए बहुत बढ़िया

568
00:46:53,640 --> 00:46:58,240
बात ये लोग क्या कहते हैं

569
00:46:58,240 --> 00:47:02,280
देखिए एक तो इनके दयानंद जी के भाष से सिद्ध हो रहा है कि जो कबीर है वो

570
00:47:02,280 --> 00:47:07,000
कौन है पितरों में पितर है बुद्धिमान पित्र है पर पितर है

571
00:47:07,000 --> 00:47:11,040
पित्र ठीक है और

572
00:47:11,040 --> 00:47:15,520
हमारे वाले से पित्रों की पूजा से वो मोक्ष की प्राप्ति हो रही है

573
00:47:15,520 --> 00:47:20,000
जो जिसको आप मोक्ष कहते हो तो आप पित्रों की पूजा से बताओ कैसे मुक रहे हो

574
00:47:20,000 --> 00:47:23,680
अब

575
00:47:23,680 --> 00:47:28,200
आना फिर क्या है आगे अभी एक और चीज बताता हूं

576
00:47:28,200 --> 00:47:34,200
बढ़िया ये लोग कहते ना सुकृत ऋषि सुकृत ऋषि

577
00:47:35,360 --> 00:47:41,360
बताता 18वां अध्याय और तीसरा

578
00:47:44,320 --> 00:47:50,320
सूक 18 तीन और 20वां

579
00:47:51,560 --> 00:47:57,560
मंत्र यह देखिए

580
00:47:57,680 --> 00:48:02,200
इसमें जो है आपको सुकृत शब्द दिखाई दे रहा है

581
00:48:02,200 --> 00:48:06,200
सुकृत और नीचे उसके शब्दार्थ में सुकृत है

582
00:48:06,200 --> 00:48:10,440
सुकृत तो यहां पर सुकृत किसे कहा गया है

583
00:48:10,440 --> 00:48:14,680
कि हे पित्रों अत्री के गोत्र के

584
00:48:14,680 --> 00:48:19,040
हो जो अत्री के गोत्र के हो अंगिरा के गोत्र के हो

585
00:48:19,040 --> 00:48:23,360
नव मास तक सत्र याग करके

586
00:48:23,360 --> 00:48:28,000
स्वर्ग को प्राप्त हुए नव

587
00:48:28,000 --> 00:48:32,120
हो द पूर्ण मास आदि योगों से पूजन कर चुके

588
00:48:32,120 --> 00:48:37,800
हो तो तुम सब दक्षिणा प्रदान करने वाले पुण्यात्मा

589
00:48:37,800 --> 00:48:42,200
हो तो यहां पर पुण्यात्मा यहां तो पुण्यात्मा

590
00:48:42,200 --> 00:48:46,320
मगर आपका जो सुकृत है है कबीर ही है सुकृत के रूप में आता है तो यहां

591
00:48:46,320 --> 00:48:50,520
पर जो पितर है ना वही कबीर बन रहे हैं ठीक है

592
00:48:50,520 --> 00:48:54,920
कबीर बन सुकृत बनू आपके अनुसार

593
00:48:54,920 --> 00:48:59,840
क्या है तो तुम दक्षिणा प्रदान करने वाले सुकृत हो

594
00:48:59,840 --> 00:49:04,040
हो जाओ बन जाओ हो गया कान

595
00:49:04,040 --> 00:49:08,280
को किधर से भी पकड़ लो एक तो पित पूजा को मना नहीं कर पा रहे

596
00:49:08,280 --> 00:49:12,320
य सुकृत मिल गया आपका और कहां

597
00:49:12,320 --> 00:49:16,760
पर है और सुकृत दिखा दूं आपको सुकृत था ना

598
00:49:16,760 --> 00:49:20,800
सुकृत के रूप में आया था ना कबीर तो लो सुकृत वेदों

599
00:49:20,800 --> 00:49:25,720
में मगर किसी और रूप

600
00:49:25,720 --> 00:49:29,720
में 18 चती इसमें

601
00:49:29,720 --> 00:49:33,840
क्या है 18 चती

602
00:49:33,840 --> 00:49:39,840
में क्या है

603
00:49:57,920 --> 00:50:02,040
18 चार और यह आ गया तीसरा यह भी पितृ मेद

604
00:50:02,040 --> 00:50:08,040
सूक्त है दोनों पितृ मेद सूक्त

605
00:50:18,360 --> 00:50:22,600
है फिर आ

606
00:50:22,600 --> 00:50:27,320
जाएगा बताओ पितरों की पूजा करने से तो पितर जो

607
00:50:27,320 --> 00:50:31,320
कबीर बनना है और क्या है तुम उसी चीज से रोक रहे हो जिससे कोई और कबीर ना

608
00:50:31,320 --> 00:50:37,320
बन जाए है ना क्यों दयाल दास

609
00:50:40,840 --> 00:50:45,080
जी आ जाओ दयाल दी

610
00:50:45,080 --> 00:50:49,200
व्यर्थ बातें करना अच्छा नहीं है आ जाओ लगता है

611
00:50:49,200 --> 00:50:53,760
माता जी ने निष्ठा पूर्वक आपको दुग्ध पान नहीं कराया

612
00:50:53,760 --> 00:50:57,960
है इसीलिए केवल कमेंट में ही सामर्थ्य का प्रदर्शन

613
00:50:57,960 --> 00:51:02,240
कर पा रहे हैं तो यहां

614
00:51:02,240 --> 00:51:06,560
देखिए यहां भी शब्द देख लीजिए

615
00:51:06,560 --> 00:51:11,480
सुकृत शब्द आपको दिख जाएगा ठीक है

616
00:51:11,480 --> 00:51:15,680
सुकृत रूप में इनके कबीर आते हैं ना अब यहां

617
00:51:15,680 --> 00:51:21,680
सुकृत कौन है यहां सुकृत है

618
00:51:22,080 --> 00:51:26,600
भाई सत्य भूत यज्ञ के मार्गों या यज्ञ से

619
00:51:26,600 --> 00:51:32,600
संबंधित मार्गों को भली प्रकार देख अथवा जान

620
00:51:32,920 --> 00:51:37,320
और सुकृत अंगी गोत्र

621
00:51:37,320 --> 00:51:41,440
में उत्पन्न हुए महा ऋषि किसम उत्पन्न हुए

622
00:51:41,440 --> 00:51:45,560
अंगी गोत्र में उत्पन्न हुए महा ऋषि

623
00:51:45,560 --> 00:51:50,240
अंगी गोत्र में कौन उत्पन्न होता है गोत्र किसे मिलता

624
00:51:50,240 --> 00:51:54,360
है जिसका वंशा अनुक्रमण किसका पुत्र है उससे

625
00:51:54,360 --> 00:51:58,680
गोत्र प्राप्त हुआ ीरा के गोत्र में उत्पन्न हुए मषि जिस

626
00:51:58,680 --> 00:52:03,160
मार्ग से स् स्वर्ग लोक को गए तो महा ऋषि य जो सुकृत है

627
00:52:03,160 --> 00:52:07,280
यह कहां जाते हैं स्वर्ग लोक को जाते

628
00:52:07,280 --> 00:52:11,720
हैं सुकृत सतलोक को नहीं जाते हैं स्वर्ग लोक को जाते हैं

629
00:52:11,720 --> 00:52:16,840
तो भैया कबीर जो है व सतलोक को नहीं वो स्वर्गलोक को जाता है

630
00:52:16,840 --> 00:52:20,920
वो सतलोक को नहीं जाता है ध्यान रखना नित्य लोक आपका वाला जो नित्य

631
00:52:20,920 --> 00:52:25,080
लोक वो अलग है जहां जिस स्वर्ग में

632
00:52:25,080 --> 00:52:29,240
अदिति के पुत्र देव देता मधु के समान प्रसन्न करने वाले मधुर

633
00:52:29,240 --> 00:52:33,400
अमृत का आस्वादन लेते हैं वहां देवता कौन है वहां आपके कबीर

634
00:52:33,400 --> 00:52:37,640
देव देव नहीं है ये तो वहा जाते हैं वहां तो

635
00:52:37,640 --> 00:52:41,960
अतिथि के पुत्र है जो वो मधु का

636
00:52:41,960 --> 00:52:46,000
मधु समान प्रसन्न करने वाले मधुर अमृत का आस्वादन लेते

637
00:52:46,000 --> 00:52:49,800
हैं

638
00:52:49,800 --> 00:52:53,800
और उस स्वर्ग लोक में तू प्रतिष्ठित

639
00:52:53,800 --> 00:52:57,880
हो तो यहां पर सुकृत कौन है जो स्वर्गलोक में

640
00:52:57,880 --> 00:53:02,040
जाता है सतलोक में नहीं ठीक है तो

641
00:53:02,040 --> 00:53:06,160
यह तुम्हारा कबीर जो है मिल गया कहां पर एक तो अगर कवि

642
00:53:06,160 --> 00:53:10,160
का अर्थ कबीर है तो पित पूजन से कबीर की प्राप्ति हो रही है

643
00:53:10,160 --> 00:53:14,280
पित पूजन का खंडन नहीं कर सकते दूसरी बात अगर दयानंद पर भी जाओगे

644
00:53:14,280 --> 00:53:18,480
दयानंद जी का व आर समाज का भाष लोगे उसमें कभ का

645
00:53:18,480 --> 00:53:22,560
कभी को इसी मंत्र का अर्थ कुछ इस प्रकार से है कि आपका

646
00:53:22,560 --> 00:53:27,160
जो व्यक्ति है वो सिद्ध हो जाएगा पितर ठीक

647
00:53:27,160 --> 00:53:31,760
है वो पितर सिद्ध हो जाएगा

648
00:53:31,760 --> 00:53:36,000
और यह जो सुकृत के रूप में आप जो बताते हो कि हमारे परमात्मा सुकृत

649
00:53:36,000 --> 00:53:40,080
रूप में आए थे व य सुकृत कौन है पितर

650
00:53:40,080 --> 00:53:44,560
स्वर्ग लोक जाने वाले हैं सतलोक जाने वाले नहीं है अच्छा अब इनकी

651
00:53:44,560 --> 00:53:49,120
एक टांग और खींची जाए वो कैसे खींच

652
00:53:49,120 --> 00:53:52,880
यह लोग कहते हैं कि अज्ञ का मतलब है

653
00:53:52,880 --> 00:53:56,880
जिसका वध ना किया जा सके नहीं यह लोग कह

654
00:53:56,880 --> 00:54:02,880
अग्न का मतलब है पहले तो अग्न को

655
00:54:03,840 --> 00:54:08,160
अधनपुर गा र इनके

656
00:54:08,160 --> 00:54:12,520
बात करने से ढंग से ही पता चल जाता है कि कितनी पढ़े

657
00:54:12,520 --> 00:54:16,520
लिखों वाली बात है या फिर गवार बुद्धि वाली बात है

658
00:54:16,520 --> 00:54:21,440
मगर मान लिया ओ मान लिया तुम्हारे ही तरीके से चलेंगे

659
00:54:21,440 --> 00:54:27,440
जिस तरीके से तुम चलोगे उसी तरीके से बात करेंगे आपसे

660
00:54:29,880 --> 00:54:33,880
उसमें क्या है अग्न्या का 18

661
00:54:33,880 --> 00:54:38,640
वा कांड अथर्ववेद और तीसरा सूक्त

662
00:54:38,640 --> 00:54:43,480
और चौथा

663
00:54:43,480 --> 00:54:49,480
मंत्र है ना चौथा

664
00:54:50,200 --> 00:54:56,200
मन 183 च

665
00:55:04,560 --> 00:55:09,480
यह देखिए आपको इसमें अग्ने

666
00:55:09,480 --> 00:55:12,880
शब्द दिखाई दे रहा होगा

667
00:55:12,880 --> 00:55:17,200
अग्नि ठीक है बाद में जब इसकी संधि हुई है

668
00:55:17,200 --> 00:55:21,600
तो यह सबसे पहले ये अग्नि

669
00:55:21,600 --> 00:55:25,640
लिखा हुआ है दिख रहा है अग्नि अब ये

670
00:55:25,640 --> 00:55:27,960
है धन्य

671
00:55:27,960 --> 00:55:31,960
मगर यह कौन है मालूम है ये एक स्त्री को गौ के

672
00:55:31,960 --> 00:55:36,040
रूप में बताया जा रहा है तो वह स्त्री है जिसका पति

673
00:55:36,040 --> 00:55:40,120
मर गया है जिसके पति का देहांत

674
00:55:40,120 --> 00:55:44,240
हो गया उसके बारे में बात हो रही है मैं युवावस्था

675
00:55:44,240 --> 00:55:45,240
वाली सबके

676
00:55:45,240 --> 00:55:49,600
समीप लाई जाती हूं जीवित स्त्री को

677
00:55:49,600 --> 00:55:53,800
मृत पुरुष के प्रसव मिलाने से अनुस्क कहलाती

678
00:55:53,800 --> 00:55:58,000
है यह सब प्रकरण चल और वहां पर उस

679
00:55:58,000 --> 00:56:02,000
स्त्री को जिसका पति जो है जा चुका

680
00:56:02,000 --> 00:56:06,040
है देवास उसका देहांत हो चुका है उसको यहां पर अगन

681
00:56:06,040 --> 00:56:10,240
गौ के समान ग की उपमा दी गई उस स्त्री को तो इन्होंने तो

682
00:56:10,240 --> 00:56:14,840
कहा कि अन्या का अर्थ है जो कुमारी हो अगर

683
00:56:14,840 --> 00:56:19,320
यहां तो विवाहिता को अगन कहा गया हो गया

684
00:56:19,320 --> 00:56:25,320
हो गया बंडल फिर फैक्ट बाई अश कुछ ना कुछ करेगा

685
00:56:27,760 --> 00:56:31,800
तो अच्छा और और भी एक चीज ले

686
00:56:31,800 --> 00:56:36,040
लेते हैं कि अच्छा आप तब तक वो दे दीजिए

687
00:56:36,040 --> 00:56:40,120
लिंक अगर किसी को आना हो चर्चा करनी हो इस बारे में

688
00:56:40,120 --> 00:56:44,400
तो व कर सकता है लिंक दे दीजिए आप

689
00:56:44,400 --> 00:56:48,560
तो हमने शास्त्रों से जो

690
00:56:48,560 --> 00:56:53,120
पित्र पूजन है उसकी प्रामाणिकता देख ली अब हम

691
00:56:53,120 --> 00:56:58,360
एक जगह से और बात करते हैं

692
00:56:58,360 --> 00:57:04,360
पितृ पूजन की

693
00:57:12,080 --> 00:57:16,120
प्रामाणिकता यह ग गरुण पुराण है यह वाले पुराण आपने देखे

694
00:57:16,120 --> 00:57:20,600
नहीं होंगे क्योंकि आपके जो भाई साहब है

695
00:57:20,600 --> 00:57:24,720
तत्वदर्शी वो गीता प्रस्त सीमित रहते हैं ज्यादातर मेरी जानकारी मुझे

696
00:57:24,720 --> 00:57:29,040
मैंने कभी देखा नहीं जो उन्होंने संक्षिप्त छापा तो उनके पास संक्षिप्त

697
00:57:29,040 --> 00:57:33,200
ही है फिर वो तो इसमें हम आ जाते

698
00:57:33,200 --> 00:57:39,200
हैं भाई गरुण पुराण में पूरा पूरा एक अध्याय है श्राद्ध

699
00:57:41,280 --> 00:57:45,280
वाला अच्छा परमात्मा जो है मुक्ति देता है कैसे

700
00:57:45,280 --> 00:57:50,760
देता है पापों से सबसे मुक्त कर देता है वही है ना

701
00:57:50,760 --> 00:57:56,760
परमात्मा तो यहां पर देखिए क्या हो रहा है 103

702
00:57:58,680 --> 00:58:02,800
श्राद्ध विधि देखिए कहां

703
00:58:02,800 --> 00:58:08,160
तक जाओगे भाई आप डाल डाल अ पात पात दिख रहा है श्राद्ध

704
00:58:08,160 --> 00:58:12,000
विधि दिख गई श्राद्ध

705
00:58:12,000 --> 00:58:16,080
विधि श्राद्ध विधि वर्णन 333

706
00:58:16,080 --> 00:58:18,280
वा

707
00:58:18,280 --> 00:58:22,040
पेज

708
00:58:22,040 --> 00:58:28,040
यह इसमें क्या लिखा है

709
00:58:29,280 --> 00:58:33,440
कि अब सर्व पाप नाश करने

710
00:58:33,440 --> 00:58:38,320
वाली श्राद्ध विधि सुनिए क्या नाश करने वाली

711
00:58:38,320 --> 00:58:42,880
सब पाप नाश करने वाली श्राद्ध विधि तो यह भी श्राद्ध की प्रामाणिकता

712
00:58:42,880 --> 00:58:47,200
हो

713
00:58:47,200 --> 00:58:51,560
गई अच्छा एक मैंने वीडियो देखा इन भाई साहब का

714
00:58:51,560 --> 00:58:56,280
जिसमें यह सुकृत के बारे में ही बात कर रहे हैं वहां पर

715
00:58:56,280 --> 00:59:00,360
पर प्रमाण देने के लिए कि सुकृत की बात किसी ने सुनी नहीं थी हालाकि उसने

716
00:59:00,360 --> 00:59:04,360
झूठ लपेट लगा लाग लपेट कर दिया कि उसको मन सुना नहीं अनसुना कर दिया

717
00:59:04,360 --> 00:59:08,480
मगर वहीं पर य कहा जा रहा है कि जो सुकृत जिसको वामदेव बता र वामदेव

718
00:59:08,480 --> 00:59:12,720
शिव के भक्त है और शिवजी परम ब्रह्म

719
00:59:12,720 --> 00:59:17,120
वही उसी जगह मगर य उसको नहीं मान रहे प्रमाण इनकी उंगलिया

720
00:59:17,120 --> 00:59:21,360
जहा चल रही है य जो बोल रहे हैं वही पर लिखा हुआ है शिवजी जो है

721
00:59:21,360 --> 00:59:26,680
परम ब्रह्म है और जो वामदेव सुकृत है वो शिवजी के वो है भक्त

722
00:59:26,680 --> 00:59:30,880
मगर उसको प्रमाण ना मानते हुए अपनी लाग लपेट उसम अपने मन से मनम

723
00:59:30,880 --> 00:59:35,640
कीी भक्ति और फिर कहते हैं हमने शास्त्र सम्मत भक्ति की है

724
00:59:35,640 --> 00:59:39,760
अब मैं आपको बता दूं इनकी एक और स्टोरी

725
00:59:39,760 --> 00:59:43,800
मैं तो आपसे कहता ही हूं ब्रह्मचारी सन्यासी होना चाहिए यहां पर क्या बात

726
00:59:43,800 --> 00:59:47,840
हो रही है वो पेज दिखा दीजिए रोच मनु रोच मनु

727
00:59:47,840 --> 00:59:53,840
की उत्पत्ति कथा इनको

728
01:00:20,000 --> 01:00:24,520
तो यहां पर क्या है यह जो आपके तथाकथित

729
01:00:24,520 --> 01:00:28,600
जेल धाम ने जो तत्वदर्शी

730
01:00:28,600 --> 01:00:33,200
है

731
01:00:33,200 --> 01:00:37,240
उन्होंने यह दिखाया है कि जो पितर होते हैं यह दिखाना

732
01:00:37,240 --> 01:00:41,280
चाहते थे कि पितर होते हैं वो आपके आपको मोक्ष मार्ग से भटका हैं हमने बहुत सारे

733
01:00:41,280 --> 01:00:45,320
प्रमाण ले लिए वेदों का प्रमाण दिखा दिया अमरता तक अमरता

734
01:00:45,320 --> 01:00:49,720
का साधन पितृ पितृ से होकर पितृ पूजा से होकर निकल रहा है

735
01:00:49,720 --> 01:00:53,800
मगर यह दिखाने के लिए कि पितृ पूजा पितृ जो होते हैं वो भटकाने वाले

736
01:00:53,800 --> 01:00:58,600
होते हैं यह दिखाने के लिए उन्होंने प्रमाण लिया मार्कंडेय मनु

737
01:00:58,600 --> 01:01:03,720
की उत्पत्ति की कथा तो य मैं आपको थोड़ा सा पढ़कर सुनाऊंगा आप थोड़ा सा

738
01:01:03,720 --> 01:01:09,720
सुनो तब तक आप अगर हो सके तो इनको व शेयर कर

739
01:01:13,000 --> 01:01:17,120
दो वो शेयर वीडियो अच्छा नहीं आ रहा

740
01:01:17,120 --> 01:01:20,720
है मुझे पता है मेरी आवाज तो सुनिए

741
01:01:20,720 --> 01:01:24,920
आप मेरी आवाज सुनिए आप

742
01:01:24,920 --> 01:01:30,920
तब तक आप इनको वो पेज शेयर करो रोच मनु की उत्पत्ति

743
01:01:31,560 --> 01:01:37,560
कथा उसका कारण यह है कि वो जो

744
01:02:25,120 --> 01:02:28,560
हां जी थोड़ा सा

745
01:02:28,560 --> 01:02:32,960
संसाधन का अभाव है इसलिए थोड़ा सा क्षमा करिए उसके लिए जो विघ्न

746
01:02:32,960 --> 01:02:37,760
आ रहा है है अभी ठीक चल रहा होगा मेरे ख्याल

747
01:02:37,760 --> 01:02:42,280
से है ना टी आर पहाड़ी जी ऊपर ले

748
01:02:42,280 --> 01:02:48,280
लीजिए और दास जी

749
01:02:49,400 --> 01:02:52,360
[संगीत]

750
01:02:52,360 --> 01:02:56,480
आए जी जय श्री राम अभी आप से बात करेंगे दो

751
01:02:56,480 --> 01:03:02,480
मिनट में जय श्री राम पाड़ी जी जय श्री राम

752
01:03:05,360 --> 01:03:09,480
तो हम यह जो रोच मनु की उत्पत्ति कथा

753
01:03:09,480 --> 01:03:13,560
है इसको जरा सुनिए इसमें इन्होंने रामपाल जी ने क्या गुल खिलाया

754
01:03:13,560 --> 01:03:17,880
उसको देखिए ब्रह्मण पूर्व काल की बात है प्रजापति रुचि ममता

755
01:03:17,880 --> 01:03:21,960
और अहंकार से रहित इस पृथ्वी पर विचरण करते थे उन्हें किसी से

756
01:03:21,960 --> 01:03:26,480
भय नहीं था वह बहुत कम सोते थे उनका ना तो अग्नि स्थापना

757
01:03:26,480 --> 01:03:30,720
की थी और ना अपने लिए

758
01:03:30,720 --> 01:03:34,720
घर ही बना रखा था व एक बार भोजन करते तो बिना आश्रम

759
01:03:34,720 --> 01:03:39,120
के ही रहते थे उन्हें सब प्रकार की आसक्ति हों से रहित

760
01:03:39,120 --> 01:03:43,280
एवं मुनि वृत्ति से रहते देख उनके पितरों ने उनसे

761
01:03:43,280 --> 01:03:47,320
कहा बेटा विवाह स्वर्ग और अपवर्ग का हेतु

762
01:03:47,320 --> 01:03:50,160
होने के

763
01:03:50,160 --> 01:03:54,160
कारण है ना अब ये क्यों कहा क्योंकि

764
01:03:54,160 --> 01:03:58,600
अग्नि होत्र जो यज्ञ आदि कर्म होते हैं शास्त्र वेद जो कर्म होते हैं उसमें

765
01:03:58,600 --> 01:04:02,800
स पत्नी गृहस्थ का ही अधिकार होता है तो क्या क्या कहा

766
01:04:02,800 --> 01:04:07,280
पितर पितरों ने क्या कहा विवाह स्वर्ग और अपवर्ग

767
01:04:07,280 --> 01:04:11,280
का हेतु होने के कारण एक पुण्य

768
01:04:11,280 --> 01:04:15,440
पुण्य मय कार्य है उसे तुमने क्यों नहीं किया गृहस्थ पुरुष

769
01:04:15,440 --> 01:04:19,440
समस्त देवताओं पित्रों ऋषियों और अतिथियों की पूजा करके पुण्यम लोगों को

770
01:04:19,440 --> 01:04:21,160
प्राप्त हो जाता है

771
01:04:21,160 --> 01:04:25,160
वह स्वाहा के उच्चारण से देवताओं को स्वधा शब्दों

772
01:04:25,160 --> 01:04:29,840
शब्द से पि को तथा अन्न दान आदि से भूत आदि प्राणियों एवं

773
01:04:29,840 --> 01:04:33,960
अतिथियों को उनका भाग समर्पित करता है बेटा हम ऐसा मानते हैं कि

774
01:04:33,960 --> 01:04:38,160
गृहस्थ आश्रम को स्वीकार ना करने पर तुम्हें इस जीवन में क्लेश पर क्लेश उठाना

775
01:04:38,160 --> 01:04:42,960
पड़ेगा तथा मृत्यु के बाद और दूसरे जन्म में भी क्लेश ही भोगने पड़ेंगे

776
01:04:42,960 --> 01:04:47,200
रुचि ने कहा पित गण परिग्रह मात्र ही अत्यंत दुख

777
01:04:47,200 --> 01:04:51,280
एवं पाप का कारण होता है परिग्रह मात्र मतलब यह जो

778
01:04:51,280 --> 01:04:56,320
है जो यहां पर जिनकी बात हो रही है रोच मनु

779
01:04:56,320 --> 01:05:00,440
आपके तत्वदर्शी ने इनको कहा है कि मोक्ष मार्ग पर चल रहे हैं पॉइंट टू भी नोटे

780
01:05:00,440 --> 01:05:05,000
सबसे पहले और यह कौन है वैरागी

781
01:05:05,000 --> 01:05:09,760
जो विवाहित जीवन से गृहस्थ के जीवन से दूर होना चाह रहे हैं

782
01:05:09,760 --> 01:05:13,760
वैराग्य इनके जीवन में मैं कहता हूं ना

783
01:05:13,760 --> 01:05:17,920
कि सबसे बड़ा जो वो होना चाहिए वह वैराग्य होना

784
01:05:17,920 --> 01:05:21,920
चाहिए उसके जीवन में तो पितृ गण परिग्रह मात अत्यंत दुख एवं पाप का

785
01:05:21,920 --> 01:05:25,960
कारण होता है यह मोक्ष के मार्ग पर है यह आप

786
01:05:25,960 --> 01:05:30,000
आपके तथा तत्वदर्शी ने अपनी बात को सिद्ध करने के चक्कर में स्वीकार

787
01:05:30,000 --> 01:05:34,000
लिया है तो ये यहां पर क्या

788
01:05:34,000 --> 01:05:36,600
कह रहे हैं परिग्रह मात्र यानी विवाह

789
01:05:36,600 --> 01:05:40,680
इत्यादि मात्र ही अत्यंत दुख एवं पाप का कारण होता है तथा

790
01:05:40,680 --> 01:05:44,800
उससे मनुष्य की अधु होती यही सोचकर मैंने पहले स्त्री संग्रह नहीं किया क्या

791
01:05:44,800 --> 01:05:49,120
नहीं किया स्त्री संग्रह मन और इंद्रियों को नियंत्रण

792
01:05:49,120 --> 01:05:53,440
में रखकर जो यह आत्म संयम किया जाता है वह भी परिग्रह

793
01:05:53,440 --> 01:05:57,200
करने पर मोक्ष का साधक नहीं होता

794
01:05:57,200 --> 01:06:01,360
ममता रूप कीचर में सना हुआ होने पर भी यह आत्मा जो परिग्रह शून्य चि रूप

795
01:06:01,360 --> 01:06:05,680
जल से प्रतिदिन धोया जाता है व श्रेष्ठ प्रयत्न है

796
01:06:05,680 --> 01:06:10,040
तो ये जो है परिग्रह से दूर रहने को ही श्रेष्ठ

797
01:06:10,040 --> 01:06:14,320
बता रहे हैं वैराग्य को तो पितर बोल रहे हैं

798
01:06:14,320 --> 01:06:18,560
जितेंद्रीय होकर आत्मा का प्रक्षालन करना उचित ही है किंतु

799
01:06:18,560 --> 01:06:22,600
तुम जिस पर चल रहे हो वह मोक्ष का मार्ग है किंतु पलक्षा रहित दान

800
01:06:22,600 --> 01:06:26,680
और शुभाशुभ के उपभोग से भी पूर्व कत अशुभ कर्म

801
01:06:26,680 --> 01:06:30,680
दूर हो जाता है ये यहां पर बता रहे हैं कि अगर तुम अगर तुम प्रवृत्ति

802
01:06:30,680 --> 01:06:34,720
मार्ग में भी जाओगे अगर उसमें आप फल की लिया सक्त नहीं होंगे वही

803
01:06:34,720 --> 01:06:38,960
वाली बात जो वहा फलाक शक्ति से दूर रहने की बात भगवान श्री कृष्ण

804
01:06:38,960 --> 01:06:43,240
ने कही है यहां पर पितर वही बात कह रहे हैं कि अगर तुम प्रवृत्ति मार्ग

805
01:06:43,240 --> 01:06:47,600
में जाओगे तो वहां पर फल स्वरूप जो फल है उनकी अगर इच्छा

806
01:06:47,600 --> 01:06:51,840
उनमें आसक्ति नहीं रखोगे फल में तो वहां पर भी तुम वही

807
01:06:51,840 --> 01:06:55,880
प्राप्त करोगे जो तुम यहां से प्राप्त कर रहे हो इसी प्रकार दया भा

808
01:06:55,880 --> 01:07:00,320
से प्रेरित होकर जो कर्म किया जाता है व बंधन कारक नहीं होता बंधन कारक नहीं होता

809
01:07:00,320 --> 01:07:04,600
मतलब मोक्ष बंधन कारक जो नहीं है तो क्या है वोह

810
01:07:04,600 --> 01:07:08,920
मोक्ष कारक पल कामना से रहित

811
01:07:08,920 --> 01:07:13,080
कर्म भी बंधन में नहीं डालता पूर्व जन्म में किया हुआ मानवों का शुभाशुभ

812
01:07:13,080 --> 01:07:17,360
कर्म यह वह पृष्ठ है जिसका उपयोग आपके जेल धाम

813
01:07:17,360 --> 01:07:21,480
निवासी ने इस बात को सिद्ध करने में किया है कि पितर आपको

814
01:07:21,480 --> 01:07:25,960
जो है मोक्ष से दूर घसीटते हैं मगर वो भूल गया है यह करते समय

815
01:07:25,960 --> 01:07:30,520
यहीं से उसके हजारों खंडन हो रहे हैं

816
01:07:30,520 --> 01:07:35,120
क्यों क्योंकि जिस श्लोक का उपयोग भगवत गीता का वो करता है व्रत

817
01:07:35,120 --> 01:07:39,760
व्रत को ठुकराने के लिए वहां पर कहा गया है कि बहुत कम सोना गलत है

818
01:07:39,760 --> 01:07:43,880
इसके अनुसार कम सोना गलत

819
01:07:43,880 --> 01:07:48,080
है और यहां पर क्या लिखा है कि ये जो मोक्ष के मार्ग पर चल रहे

820
01:07:48,080 --> 01:07:52,160
थे बहुत कम सोते थे

821
01:07:52,160 --> 01:07:56,480
ये उसने पढ़ा भी है आपके जेल धाम निवासी ने सोचिए यह

822
01:07:56,480 --> 01:08:00,800
देखिए बहुत कम सोते थे देख लीजिए लिखा है पहले

823
01:08:00,800 --> 01:08:05,400
पैराग्राफ में दिख रहा है यह

824
01:08:05,400 --> 01:08:07,360
बहुत कम सोते थे

825
01:08:07,360 --> 01:08:11,560
और यह भी माना है तत्वदर्शी ने आपके यह जो है

826
01:08:11,560 --> 01:08:15,880
मोक्ष के मार्ग पर चल रहा था ऐसे ही नहीं है

827
01:08:15,880 --> 01:08:21,120
और

828
01:08:21,120 --> 01:08:25,480
सुनिए इस प्रकार विद्वान पुरुष आत्मा का प्रक्षालन करते हैं उसकी

829
01:08:25,480 --> 01:08:29,720
बंधनों से रक्षा करते हैं ऐसा करने से व अविवेक यहां पर जो आपका

830
01:08:29,720 --> 01:08:33,800
तत्वदर्शी वो ये दिखाना चाहता है कि पितर जो है वो कोई व्यक्ति मोक्ष के मार्ग पर

831
01:08:33,800 --> 01:08:37,960
चल रहा है मगर पितर उसको विवाह की ओर खींच रहे हैं जो मोक्ष का मार्ग

832
01:08:37,960 --> 01:08:41,960
नहीं है तो पहली बात तो जितने भी रामपाल को

833
01:08:41,960 --> 01:08:46,080
मानने वाले लोग हैं वह शादी करना छोड़ दो फिर क्यों 17 मिनट

834
01:08:46,080 --> 01:08:50,120
की शादी करवा रहे हो और अगर शादी करने

835
01:08:50,120 --> 01:08:54,360
करवाने वाला मोक्ष से दूर नरक में लाने वाला है

836
01:08:54,360 --> 01:08:58,440
तो इसका मतलब 17 मिनट की शादी करवाने वाला जो है वो

837
01:08:58,440 --> 01:09:02,720
तो फिर पितर हो गया रामपाल पितर है क्या

838
01:09:02,720 --> 01:09:06,720
रामपाल की भक्ति कर रहे हो पितर की भक्ति कर रहे हो पित्रों की भक्ति आपके अनुसार ही आपका

839
01:09:06,720 --> 01:09:10,720
खंडन है यार क्या करें इतना ज्यादा तुम लोगों ने हलवा कर रखा है

840
01:09:10,720 --> 01:09:15,320
कि कहीं से भी पकड़ो तुम्हारा हो जाता

841
01:09:15,320 --> 01:09:20,080
है तास के पत्तों का महल बना रखा है उसको कहीं से भी छू तोख

842
01:09:20,080 --> 01:09:23,200
पूरा गिर जाता है

843
01:09:23,200 --> 01:09:26,840
हां इनके जो

844
01:09:26,840 --> 01:09:31,440
अभी एक न्यूज आई थी 17 17 मिनट में विवाह संपन्न हुआ

845
01:09:31,440 --> 01:09:35,600
अब भाई जब वो मोक्ष का मार्ग है ही नहीं तो तुम क्यों विवाह विवाह में उसको

846
01:09:35,600 --> 01:09:39,600
व्यक्ति को 17 मिनट की सुविधा दे रहे हो सबको कर दो बैरागी अभी देखो तुम्हारे

847
01:09:39,600 --> 01:09:43,120
सारे आश्रम खाली हो

848
01:09:43,120 --> 01:09:48,400
जाएंगे अभी तुम एक लाइन लिख दो विवाह करना मना

849
01:09:48,400 --> 01:09:52,400
है सारे आश्रम खाली हो जाएंगे या तो ओशो

850
01:09:52,400 --> 01:09:56,400
का आश्रम बनाना पड़ेगा बक हां अरे शिवांश भाई

851
01:09:56,400 --> 01:10:00,560
यहां पर से व यह सिद्ध करना चाहते हैं जो वेदों में कर्मकांड लिखे हैं वह

852
01:10:00,560 --> 01:10:05,400
अविद्या कहा गया है रुचि मुनि ने पर उसके नीचे रु

853
01:10:05,400 --> 01:10:10,120
उसके नीचे रुचि मुनि ने क्या कहा कर्मकांड को वो भी तो दिखाइए

854
01:10:10,120 --> 01:10:14,120
लास्ट वेद में वेद में कर्म मार्ग

855
01:10:14,120 --> 01:10:18,440
को अविद्या कहा गया है फिर क्यों आप लोग मुझे उस मार्ग में लगाते

856
01:10:18,440 --> 01:10:22,920
हैं तो यह वो पहली बात तो यह है जैसे जो

857
01:10:22,920 --> 01:10:27,040
तर्क भी सुनते जाइए जो व्यक्ति धरती

858
01:10:27,040 --> 01:10:31,440
पर गिरा हुआ होता है वह धरती का ही सहारा लेकर के उठता है

859
01:10:31,440 --> 01:10:35,640
तो धरती का जो गुरुत्वाकर्षण है उसका कै किस प्रकार का यूज

860
01:10:35,640 --> 01:10:38,400
है जो आपके उठ खड़े होने में सहायक

861
01:10:38,400 --> 01:10:42,520
होगा इसी प्रकार से यह जो कर्म है अविद्या है

862
01:10:42,520 --> 01:10:48,200
ठीक है मगर यह अविद्या का वो रूप है जो आपको अविद्या से मुक्त होने में सहायता

863
01:10:48,200 --> 01:10:52,200
कराएगा समझ गए जैसे कि पृथ्वी

864
01:10:52,200 --> 01:10:56,360
गोल है और साइंस की साइंस

865
01:10:56,360 --> 01:11:00,880
के अनुसार पृथ्वी गोल है अब आपको पृथ्वी

866
01:11:00,880 --> 01:11:05,040
के चपटे पन आपको पृथ्वी चपटी दिखाई दे रही है अब इस चपटे पन से आपको मुक्ति

867
01:11:05,040 --> 01:11:09,640
पानी है इस चपटे पन का किस प्रकार का उपयोग हो

868
01:11:09,640 --> 01:11:13,720
कि आप जो है इस चपटे पन से मुक्त हो सके तो इस चपटे पन का उपयोग

869
01:11:13,720 --> 01:11:17,920
ऐसे करो कि आप एक स्पेसशिप बना सको इधर-उधर जाओ

870
01:11:17,920 --> 01:11:22,080
तो इस चपटे पन का ही ऐसा उपयोग आपने किया स्पेसशिप बनाने में कि

871
01:11:22,080 --> 01:11:26,240
आप इस चपटे पन से मुक्ति पा गए और आपने देखा कि पृथ्वी ग

872
01:11:26,240 --> 01:11:30,400
उसी प्रकार से यह जो यह जो कर्म है अविद्या में तो है मगर

873
01:11:30,400 --> 01:11:35,920
यह वो वाले अविद्या रूपी कर्म है जो आपको अविद्या से छुड़ाए तो

874
01:11:35,920 --> 01:11:40,200
कैसे यह सत्य है कि कर्म को अविद्या ही कहा गया है इसमें तनिक

875
01:11:40,200 --> 01:11:44,440
भी मिथ्या नहीं है फिर भी इतना तो निश्चित है कि उस विद्या की प्राप्ति में कर्म

876
01:11:44,440 --> 01:11:48,480
ही कारण है यह वह अविद्या है जो आपको

877
01:11:48,480 --> 01:11:52,520
अविद्या से छुड़ाएी जैसे नदी पार करते समय चप्पू चलाते हैं

878
01:11:52,520 --> 01:11:53,440
ना

879
01:11:53,440 --> 01:11:57,600
तो नदी का ही प्र होता है व आपको सहायता देता है इस

880
01:11:57,600 --> 01:12:01,800
प्रकार से उसका उपयोग आप करते हो कि आप आगे बढ़ते हो

881
01:12:01,800 --> 01:12:05,960
ठीक है और अगर तो पहली बात तो यह है

882
01:12:05,960 --> 01:12:10,240
कि कर्म को अविद्या कहा गया है कर्म को और अगर वैदिक मार्ग

883
01:12:10,240 --> 01:12:14,280
वैदिक वैदिक कर्म में अविद्या ही है और वह नरक ले जाने वाली

884
01:12:14,280 --> 01:12:18,520
है तो फिर क्यों तुम उसको नरक ले जाने वाले शास्त्रों के

885
01:12:18,520 --> 01:12:22,760
आदर सम्मान देकर के लोग पाखंड करते हो कि हम बहुत मानते हैं सद

886
01:12:22,760 --> 01:12:25,480
ग्रंथ है

887
01:12:25,480 --> 01:12:29,480
तो है नहीं यह सत्य की कर्म को अविद्या कहा गया इसमें

888
01:12:29,480 --> 01:12:33,560
तनिक भी मिथ्या नहीं है फिर भी इतना तो निश्चित है कि उस अविद्या की प्राप्ति में कर्म

889
01:12:33,560 --> 01:12:37,560
ही कारण है इतना इस इस वाली

890
01:12:37,560 --> 01:12:42,240
बात से तो इतना इनके इतने हर बात पर इनका जो है आंसर है

891
01:12:42,240 --> 01:12:46,560
भेद कर्म का पालन ना करके जो अधम मनुष्य संयम करते हैं

892
01:12:46,560 --> 01:12:51,480
वह संयम अंत में मोक्ष की प्राप्ति नहीं कराता

893
01:12:51,480 --> 01:12:55,560
अब यहां पर अगर यहां पितरों के साथ नहीं है तो आप पता है

894
01:12:55,560 --> 01:12:59,840
अपनी बात का खंडन कर रहे हैं क्यों आप अपनी बात का खंडन

895
01:12:59,840 --> 01:13:05,840
क्यों कर रहे हैं इसलिए कर रहे हैं अपनी बात का खंडन

896
01:13:07,040 --> 01:13:11,200
कि आप आपने एक जगह पर वहा जो जिसको

897
01:13:11,200 --> 01:13:15,520
आपने हट योग नाम दे दिया ना हट योग इंद्रियों को वश में करके

898
01:13:15,520 --> 01:13:19,520
ठीक है यहां पर पित जो है वही इंद्रियों को

899
01:13:19,520 --> 01:13:23,560
वश में करके चलने चलते हुए प्रवृत्ति मार्ग में रहने को बोल रहे हैं और आप

900
01:13:23,560 --> 01:13:27,640
कह रहे हो नहीं वो नहीं करना

901
01:13:27,640 --> 01:13:31,920
पित्र जो है वो यहां पर जो है

902
01:13:31,920 --> 01:13:36,160
जो ये रुचि मुनि है भाई बंद करो

903
01:13:36,160 --> 01:13:38,960
गेट बंद

904
01:13:38,960 --> 01:13:42,960
करो जो रुचि मुनि है वो आप जिस हट

905
01:13:42,960 --> 01:13:47,320
योग को मना कर रहे हो रुचि मुनि उस हट योग पर जाने की बात कर रहे हैं

906
01:13:47,320 --> 01:13:51,320
इंद्रियों को वश में करके बिल्कुल कंट्रोल करके और आपने वहा अयोग

907
01:13:51,320 --> 01:13:55,480
की हठयोग नाम दे दिया छव अध्याय के न से 15 वाले लोक

908
01:13:55,480 --> 01:13:59,520
हठयोग नाम देक के मना किया है ना हठयोग के लिए और यहां पर रुचि

909
01:13:59,520 --> 01:14:04,240
मुनि वही कर रहे फिर अब रुचि मुनि का यहां पर हठयोग आपने स्वीकार कर लिया

910
01:14:04,240 --> 01:14:08,320
अभी आपकी भाषा में बात कर रहा हूं आप अपना ही खंडन कर रहे षि मुनि को स्वीकार

911
01:14:08,320 --> 01:14:12,560
करके और जबक आपने वहां कहा व एकांत में नहीं जाना चाहिए ऐसा

912
01:14:12,560 --> 01:14:16,560
नहीं करना चाहिए वैसा नहीं करना चाहिए यहां पर रुचि मनी वही सब कर रहे हैं आपने उनकी बात य

913
01:14:16,560 --> 01:14:20,760
मान ली क्यों क्योंकि यहां पर आपको पित्रों को गलत कहना है वैदिक कर्मों

914
01:14:20,760 --> 01:14:22,160
को आपको अविद्या स्वीकार

915
01:14:22,160 --> 01:14:26,280
करना है आगे चलते हैं तो वे कर्म का पालन

916
01:14:26,280 --> 01:14:30,600
करके जो अधम मनुष्य संयम करते हैं वह संयम

917
01:14:30,600 --> 01:14:34,960
अंत में मोक्ष की प्राप्ति नहीं कराता भद

918
01:14:34,960 --> 01:14:38,960
कर्म का पालन ना करके जो अधम मनुष्य संयम करते हैं

919
01:14:38,960 --> 01:14:43,120
भद कर्म का पालन ना करके त शास्त्र भत

920
01:14:43,120 --> 01:14:47,280
कर्म उनका पालन ना करके जो मनुष्य संयम करते हैं अगर

921
01:14:47,280 --> 01:14:51,600
शास्त्र त कर्म का त्याग कर दिया और हमने संयम करने का प्रयास किया

922
01:14:51,600 --> 01:14:55,680
तो क्या होगा अंत में मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी अतु अो में ले जाने

923
01:14:55,680 --> 01:15:00,360
वाला होगा तुम तो समझते हो मैं आत्मा का प्रक्षालन करता

924
01:15:00,360 --> 01:15:04,680
हूं किंतु वास्तव में तुम शास्त्र वेद कर्मों के ना

925
01:15:04,680 --> 01:15:08,840
करने के कारण पापों से दगद हो रहे हो कर्म अविद्या होने पर भी विधि

926
01:15:08,840 --> 01:15:12,960
के पालन द्वारा शोध हुए विष की बाती मनुष्यों का उपकार करने

927
01:15:12,960 --> 01:15:17,360
वाला ही होता है इसके विपरीत व विद्या भी विधि की अवेल

928
01:15:17,360 --> 01:15:21,880
से निश्चय ही हमारे बंधन का कारण बन जाती यानी कि यहां पर ये बता दिया गया

929
01:15:21,880 --> 01:15:25,960
है कि अगर

930
01:15:25,960 --> 01:15:30,240
वैदिक कर्मों का शास्त्र वेद कर्मों का आपने त्याग किया है

931
01:15:30,240 --> 01:15:34,320
और आप उससे इतर किसी विद्या को सोच रहे हो वो विद्या है तो

932
01:15:34,320 --> 01:15:37,280
वह विद्या भी आपके बंधन

933
01:15:37,280 --> 01:15:43,280
के हे का हेतु हो

934
01:15:44,720 --> 01:15:48,720
जाएगी तुम विधि पूर्वक स्त्री संग्रह करो ऐसा ना हो कि

935
01:15:48,720 --> 01:15:53,440
इस लोक का लाभ ना मिलने के कारण तुम्हारा जन्म निष्फल हो

936
01:15:53,440 --> 01:15:57,560
जाए फिर वो आगे कह रहे हैं पित्र अब तो मैं बूढ़ा हो गया भला मुझे कौन

937
01:15:57,560 --> 01:16:02,120
स्त्री देगा वो समझ गए इस बात को

938
01:16:02,120 --> 01:16:06,880
अब एक बात समझ लो पितर यहां पर विवाह के पक्ष में

939
01:16:06,880 --> 01:16:10,960
और अगर आप यहां रुचि मुनि को सही बता रहे हैं तो आपके जो

940
01:16:10,960 --> 01:16:15,120
तत्वदर्शी है व विवाह के पक्ष में नहीं है तो तुरंत सन्यासी

941
01:16:15,120 --> 01:16:20,760
होईए आप सब

942
01:16:20,760 --> 01:16:25,600
लोग कहीं का कहीं इधर उधर सब कुछ

943
01:16:25,600 --> 01:16:30,160
अब तो मैं बूढ़ा हो गया भला मुझको कौन स्त्री देगा इसके

944
01:16:30,160 --> 01:16:34,240
जवाब दरिद्र के लिए स्त्री को रखना कठिन कार्य है यदि हमारी

945
01:16:34,240 --> 01:16:38,280
बात नहीं मानोगे तो हम लोगों का पतन हो जाएगा तुम्हारी भी अधोगति होगी यह सब

946
01:16:38,280 --> 01:16:42,880
यहां पर बातें हो रही है प्रवती मार्ग यहां पर वैराग्य

947
01:16:42,880 --> 01:16:46,880
में चले गए थे वह भी अविधवा इसको वहां पर

948
01:16:46,880 --> 01:16:50,680
इसका निस्तारण कर रहे हैं वहां

949
01:16:50,680 --> 01:16:55,080
पर और आगे पढ़ना है इसे रहने दे अब

950
01:16:55,080 --> 01:17:01,080
जी काफी हो

951
01:17:02,400 --> 01:17:07,680
गया रहने दीजिए आप समझने वाले इतने में समझ जाएंगे

952
01:17:07,680 --> 01:17:11,800
हा ठीक है ना तो यह हो गया मार्क जी से

953
01:17:11,800 --> 01:17:16,360
आपे उस मार्ग पर लगाते है प बोले य सत्य है

954
01:17:16,360 --> 01:17:21,120
कम को अही कहा है इस नहीं फिर

955
01:17:21,120 --> 01:17:25,560
क्या अरा बता नहीं है इन पत्रों

956
01:17:25,560 --> 01:17:29,800
की निकलवाने वालो की अब वो लड़का ठीक साना कर रहा था

957
01:17:29,800 --> 01:17:35,600
वेद के आधार से य भी मानते है आप साधना

958
01:17:35,600 --> 01:17:40,240
कर और ये क रहा रहा मेंा

959
01:17:40,240 --> 01:17:44,880
बता अ और ख मान बा

960
01:17:44,880 --> 01:17:50,160
गा क्या गाद में रिजेक्ट कर दिया साधना नहीं करनी चाहिए

961
01:17:50,160 --> 01:17:54,840
पूजा यही होता है इनके साथ एक लाइन

962
01:17:54,840 --> 01:17:59,040
सबसे पहले तो अगर राम पाली अगर सच्चा राम पाली है

963
01:17:59,040 --> 01:18:03,280
तो क्योंकि वो मोक्ष मार्ग था शादी ना करना तो तुम सारे

964
01:18:03,280 --> 01:18:07,560
लोग अपनी अपनी स्त्री को तिलांजलि दे दो तुरंत जितने

965
01:18:07,560 --> 01:18:11,800
भी राम पाली हैं तुरंत और बोट लगवा दो सतलोक आश्रम में विवाह

966
01:18:11,800 --> 01:18:16,280
करना मना है बात कुछ और हो रही

967
01:18:16,280 --> 01:18:20,400
है वहां पितर यह समझा रहे हैं कि अगर तू प्रवृत्ति मार्ग

968
01:18:20,400 --> 01:18:24,800
पर चलेगा मगर उसमें फलों के प्रति आसक्त नहीं रहेगा तो भी तू सही तरीके से मुक्ति

969
01:18:24,800 --> 01:18:29,040
की और आगे बढ़ेगा यहां पर तेरी जो मुक्ति है इस तरह से बिना विधि के सन्यास

970
01:18:29,040 --> 01:18:33,120
जो तू ले रहा है इसमें बाधा आ सकती है शास्त्र वृद्धि

971
01:18:33,120 --> 01:18:37,840
का त्याग होने के कारण तू आगे चल कर के फस सकता है

972
01:18:37,840 --> 01:18:42,240
तो तुमने इसका उपयोग विनियोग इसमें ले लिया कि वो मोक्ष मार्ग में था

973
01:18:42,240 --> 01:18:47,000
और पितर एक तो उसको नरक के तरफ कट रहे हैं और वैदिक मार्ग जो है वो नहीं है

974
01:18:47,000 --> 01:18:50,920
अविद्या है मगर वो वास्तविकता

975
01:18:50,920 --> 01:18:55,000
ये है कि वैदिक वैदिक कर्म वो अविद्या है जो आपको

976
01:18:55,000 --> 01:18:59,320
अविद्या से मुक्त कराएगी और दूसरी बात यह कि अगर वो

977
01:18:59,320 --> 01:19:03,480
जो रोच मुनि है वो अगर सही मार्ग पर चल रहे हैं मोक्ष

978
01:19:03,480 --> 01:19:07,800
मार्ग पर चल रहे तो तुम क्यों 17 मिनट की शादी करवा रहे हो लोगों की क्यों नोरा

979
01:19:07,800 --> 01:19:12,120
पीट रहे हो दहेज मुक्त विवाह का नरा पीटो विवाह बंद सतलोक

980
01:19:12,120 --> 01:19:17,760
आश्रम वाले विवाह बंद कर

981
01:19:17,760 --> 01:19:21,960
दो अभी देखो सब सारे आश्रम खाली पड़े रहेंगे

982
01:19:21,960 --> 01:19:26,000
जैसे इन्होंने किया विवाह मना है चलो भैया जय राम राम

983
01:19:26,000 --> 01:19:29,320
सत [हंसी]

984
01:19:29,320 --> 01:19:33,560
साहेब अधूरा ज्ञान बड़ा घातक होता है इसलिए मैं इनसे कहता हूं कि अधूरा

985
01:19:33,560 --> 01:19:38,840
ज्ञान नहीं पूरा ज्ञान लिया करो क्या लिखा है पूरा पढ़ो उसको उसके बाद ही कोई निष्कर्ष

986
01:19:38,840 --> 01:19:43,760
निकालिए सामने वाला तो अपनी दुकान चलाने के लिए वो तुमको दिखा रहा है

987
01:19:43,760 --> 01:19:47,760
आधा पूरा पढ़िए पूरी बात हो रही है उस चीज के बारे में

988
01:19:47,760 --> 01:19:52,880
ये मैं बहुत बार हर किसी को मैं बोल इनको बोल भेज दो भैया लिंक भेज दो

989
01:19:52,880 --> 01:19:57,280
लिंक लिंक भेजो कई लोग आना चाहते

990
01:19:57,280 --> 01:20:01,480
हैं ये लोग बोलते हैं कि सबकी दुकाने बंद हो रही है पर दुकान तो उसने

991
01:20:01,480 --> 01:20:05,920
खोली थी ना जो प्रचार कर रहा है जब दुकान खोलेगा प्रचार करेगा ना

992
01:20:05,920 --> 01:20:09,920
सड़कों पर कौन प्रचार कर रहा है

993
01:20:09,920 --> 01:20:15,200
सड़कों पे या किसी दुकान पे मॉल पे

994
01:20:15,200 --> 01:20:19,320
अभी मैं महोत्सव में गया था लखनऊ महोत्सव जहां पिछले साल

995
01:20:19,320 --> 01:20:24,080
से कहानी शुरू हुई थी ना दोबारा महोत्सव लगाया हां हां

996
01:20:24,080 --> 01:20:30,080
तो वहां महोत्सव में गया तो मैंने एक व्यक्ति से

997
01:20:30,120 --> 01:20:34,680
पूछा भैया वो दे दिया आपको लिंक दे दिया है

998
01:20:34,680 --> 01:20:39,520
माता जीी ने निष्ठा पूर्वक पिलाया होया हो तोइए

999
01:20:39,520 --> 01:20:45,520
प बोले

1000
01:20:45,520 --> 01:20:50,360
बेटा पि बोले बेटा जितेंद्रीय होकर आत्मा का

1001
01:20:50,360 --> 01:20:54,360
करना उचित ही है तुम जिस पर चल रहे हो व मोक्ष मार्ग

1002
01:20:54,360 --> 01:20:58,520
है ये देख लो मोक्ष का मार्ग है षि मुनि शादी नहीं करना

1003
01:20:58,520 --> 01:21:04,520
चाहते विवाह नहीं करना चाहते यही मोक्ष का मार्ग

1004
01:21:04,520 --> 01:21:10,440
है

1005
01:21:10,440 --> 01:21:14,680
बने काम की बा जदा काम

1006
01:21:14,680 --> 01:21:20,680
की जदा काम की

1007
01:21:20,720 --> 01:21:24,760
बा अपने काम की बात बताएंगे आपको पूरा प

1008
01:21:24,760 --> 01:21:28,920
सुनाते हैं क्योंकि ये जो जिस बात को आपके मन में डालना चाहते

1009
01:21:28,920 --> 01:21:33,120
हैं केवल उतनी बात दिखाएंगे आप देखो

1010
01:21:33,120 --> 01:21:39,120
सुनो ध्यान से दोबारा एक बार और सुन तो

1011
01:21:43,280 --> 01:21:47,440
भैया प बोले बेटा अपने

1012
01:21:47,440 --> 01:21:52,400
काम की बात प हम ज्यादा ना प अपने काम की बात पगे

1013
01:21:52,400 --> 01:21:57,480
प बोले ज्यादा ना अपने

1014
01:21:57,480 --> 01:22:02,440
काम जी ब्रजलाल ब्रजराज शर्मा जी

1015
01:22:02,440 --> 01:22:08,440
जय श्री राम नमस्कार भैया जय श्री राम

1016
01:22:09,240 --> 01:22:13,440
भ बस आज देखा तो मैं करके

1017
01:22:13,440 --> 01:22:17,720
बस आप मैं आपको देखता रहता हूं सुनता रहता हूं

1018
01:22:17,720 --> 01:22:22,000
सपोर्ट में भी है मेरा भतीजा भी है आपसे

1019
01:22:22,000 --> 01:22:26,640
के लिए आपको शुभकामना देने आ बस सत साब

1020
01:22:26,640 --> 01:22:32,640
जी दसके जी जय श्री राम

1021
01:22:32,920 --> 01:22:37,160
बताइए आप जो है कबीर साहिब जी के बारे में जानना

1022
01:22:37,160 --> 01:22:41,760
चाहते हैं इसीलिए हम

1023
01:22:41,760 --> 01:22:47,240
पहले आपने एक वीडियो बनाया ना हमारे ऊपर जी

1024
01:22:47,240 --> 01:22:51,320
जी क्या वीडियो है वो वो वीडियो

1025
01:22:51,320 --> 01:22:56,880
है जो परमात्मा को लेकर और क्या

1026
01:22:56,880 --> 01:23:02,880
उसको संसार रूपी वृक्ष के बारे में जो

1027
01:23:03,800 --> 01:23:08,320
जर आप सुन रहे हैं हा बोलिए बोलिए दास

1028
01:23:08,320 --> 01:23:12,400
जी नी की जो जर रूपी

1029
01:23:12,400 --> 01:23:16,520
जो मूल है ना ईश्वर और शाखा रूपी ब्रह्मा विष्णु महेश जी के

1030
01:23:16,520 --> 01:23:20,560
बारे में लेक वीडियो बनाया आप यह बताइए पहले

1031
01:23:20,560 --> 01:23:26,560
तो कि आपके लिए प्रमाण कौन-कौन से ग्रंथ है

1032
01:23:28,320 --> 01:23:32,400
मेरे पास एक शीफ कबीर साहेब जी का है बस पास

1033
01:23:32,400 --> 01:23:36,880
नहीं पूछ रहा हूं आपके लिए प्रमाण कौन-कौन से ग्रंथ है

1034
01:23:36,880 --> 01:23:41,400
कौन सा वही तो हम प्रमाण के र प्रमाण की तौर पर तो कहे

1035
01:23:41,400 --> 01:23:45,800
आपको कौन सा है कबीर

1036
01:23:45,800 --> 01:23:50,000
सागर कबीर सागर आपका प्रमाणिक ग्रंथ है सबसे ज्यादा

1037
01:23:50,000 --> 01:23:55,720
ठीक है जीरब

1038
01:23:55,720 --> 01:23:59,880
अब क्या आप ये कहना चाहते हो कि वेदों के अनुसार गीता के अनुसार जो है

1039
01:23:59,880 --> 01:24:04,520
जो कवि जो कबीर है वो परमात्मा है या कबीर सागर के

1040
01:24:04,520 --> 01:24:09,080
अनुसार किसके अनुसार हम हम जो है

1041
01:24:09,080 --> 01:24:13,440
उनको बाणी के अनुसार और कबीर सागर के

1042
01:24:13,440 --> 01:24:17,560
अनुसार परमात्मा कहते हैं जी पहली बात

1043
01:24:17,560 --> 01:24:21,600
तो हमने इस बारे में कोई वीडियो बनाया ही नहीं है कि कबीर सागर के अनुसार व परमात्मा

1044
01:24:21,600 --> 01:24:25,920
है कि नहीं बनाया है क्या जी नहीं आपने

1045
01:24:25,920 --> 01:24:30,160
वो क्या कहते कबीर सागर के अनुसार परमात्मा के बारे में तो आप नहीं बनाए

1046
01:24:30,160 --> 01:24:34,240
हैं पर आप जो है कबीर साहेब जी को बारे में लेके कुछ

1047
01:24:34,240 --> 01:24:38,640
कहते इस रामपाल के जो क्लेम है वेदों के अनुसार

1048
01:24:38,640 --> 01:24:42,840
गीता के अनुसार पुराणों के अनुसार कबीर भगवान है उस क्लेम

1049
01:24:42,840 --> 01:24:47,320
पर हमने वीडियो बनाए हालाकि हम यह बात भी नहीं मानेंगे कि

1050
01:24:47,320 --> 01:24:51,560
कबीर सागर के अनुसार जो प्रतिपादित होने वाला ईश्वर है अगर वो कबीर

1051
01:24:51,560 --> 01:24:55,640
है तो वो ईश्वर है उस बात प भी काउंटर करेंगे मगर अभी

1052
01:24:55,640 --> 01:24:59,640
मैं बता दूं मैंने ऐसा कोई वीडियो अभी तक नहीं बनाया है कि कबीर

1053
01:24:59,640 --> 01:25:03,760
सागर के अनुसार जो है कबीर परमात्मा है कि नहीं हमारा

1054
01:25:03,760 --> 01:25:07,800
हमारी दिक्कत मेन उससे है जो यह कहता है कि

1055
01:25:07,800 --> 01:25:10,720
कबीर वेदों के अनुसार कबीर भगवान

1056
01:25:10,720 --> 01:25:14,760
है पुराण के अनुसार कबीर भगवान है गीता के अनुसार कबीर भगवान है

1057
01:25:14,760 --> 01:25:18,800
तो आपके लिए प्रमाणिक ग्रंथ नहीं है तो सबसे पहले तो ये हिसा अलग कर देते

1058
01:25:18,800 --> 01:25:23,480
हैं गीता वेद पुराण ठीक है ठीक है जी

1059
01:25:23,480 --> 01:25:27,960
अब आ जाते हैं अब आ जाते हैं की

1060
01:25:27,960 --> 01:25:31,960
आप कबीर के अनुसार कबीर सागर कबीर वाणी के

1061
01:25:31,960 --> 01:25:36,520
अनुसार जो है आप मानते हैं कि कबीर जो है भगवान है

1062
01:25:36,520 --> 01:25:40,520
अच्छा तो मुझे आप ये बता दीजिए भगवान

1063
01:25:40,520 --> 01:25:46,520
के लक्षण क्या क्या होते हैं आपके

1064
01:25:47,480 --> 01:25:51,880
अनुसार भगवान को लक्षण

1065
01:25:51,880 --> 01:25:55,880
सबसे पहले प्रथम तो ईश्वर का लक्षण क्या है

1066
01:25:55,880 --> 01:25:59,920
कि वो अविनाशी होता है

1067
01:25:59,920 --> 01:26:04,040
ठीक है दूसरी में वो जन्म लेकर

1068
01:26:04,040 --> 01:26:08,520
गर्भ से नहीं आता है अच्छा व

1069
01:26:08,520 --> 01:26:12,720
इंसान के प्रमाण के तौर पर है और मरने के बाद अर्थात जो इंसान

1070
01:26:12,720 --> 01:26:17,000
को शरीर दिखाई देता है वह गुप्त हो जाता है तो उनका

1071
01:26:17,000 --> 01:26:21,360
शरीर नहीं पाया जाता है व इंसान को प्रमाण

1072
01:26:21,360 --> 01:26:26,680
के लिए निरा नहीं नहीं निराकार निराकार नहीं

1073
01:26:26,680 --> 01:26:30,680
हा शबद रूपी शबद

1074
01:26:30,680 --> 01:26:35,320
रूप अच्छा मुझे एक बात बताइए

1075
01:26:35,320 --> 01:26:39,480
यह जो कबीर वाणी है य स्वयं कबीर कबीर कबीर जी ने ही बोली किसी

1076
01:26:39,480 --> 01:26:43,840
और ने बोली है जी कबीर साहिब जी ने बोले

1077
01:26:43,840 --> 01:26:48,520
कबीर साहब ने बोली और कबीर परमात्मा है जी

1078
01:26:48,520 --> 01:26:52,680
ठीक है तो अब मुझे एक बात बताइए

1079
01:26:52,680 --> 01:26:58,680
कि इस दुनिया की हर चीज को कबीर जी ने ही बनाया है कि नहीं बनाया

1080
01:26:58,800 --> 01:27:02,520
है सबसे पहले प्रथम

1081
01:27:02,520 --> 01:27:07,000
उस चीज को जानने के लिए आपको अभी

1082
01:27:07,000 --> 01:27:11,160
भौतिक चीज को जानना पड़ेगा जैसे आप वर्तमान

1083
01:27:11,160 --> 01:27:15,320
में अभी कुछ कर रहे हैं तो आप श्वर कर रहा

1084
01:27:15,320 --> 01:27:21,120
है कि आप कर रहे हैं पहले इसको परखना पड़ेगा फिर उसको जवाब

1085
01:27:21,120 --> 01:27:25,760
मिलेगा ईश्वर कर रहे हैं कि मैं कर रहा हूं

1086
01:27:25,760 --> 01:27:30,480
जी अगर पार मर्थक दृष्टि से देखेंगे तो ईश्वर ही कर रहे हैं

1087
01:27:30,480 --> 01:27:35,160
और व्यावहारिक दृष्टि से देखेंगे तो मैं कर रहा हूं ठीक ठीक

1088
01:27:35,160 --> 01:27:40,200
तो आप परमार्थिक हिसाब से पूछ रहे हैं कि व्यवहारिक हिसाब

1089
01:27:40,200 --> 01:27:44,520
से दोनों हिसाब से बता दीजिए नहीं

1090
01:27:44,520 --> 01:27:48,720
दोनों में से एक छानना पड़ेगा आपको फिर आसर मिले

1091
01:27:48,720 --> 01:27:52,920
जैसे मैंने आपको दोनों बताया ऐसे आप दोनों बताइए इस संसार

1092
01:27:52,920 --> 01:27:56,960
की हर चीज को इस संसार इस संसार की हर चीज को

1093
01:27:56,960 --> 01:28:01,040
आपके कबीर परमात्मा ने ब बनाया है कि नहीं बनाया है यह

1094
01:28:01,040 --> 01:28:05,240
बताइए जैसे अब सुनिए जैसे

1095
01:28:05,240 --> 01:28:09,520
हुकुम रूप में वो कर रहा है

1096
01:28:09,520 --> 01:28:13,800
और कार्य रूप में जो शरीर वो शरीर

1097
01:28:13,800 --> 01:28:17,920
कर रहा है भौतिक में मैं भाई साहब ये पूछ रहा हूं

1098
01:28:17,920 --> 01:28:22,120
मेरा प्रश्न ये नहीं कर क्या रहा है मेरा प्रश्न है कि

1099
01:28:22,120 --> 01:28:26,360
उसने सब कुछ बनाया है कि नहीं यह पूछ रहा हूं

1100
01:28:26,360 --> 01:28:30,360
मैं भी तो वही बात आप पृथ्वी सूरज चंद्रमा य सब

1101
01:28:30,360 --> 01:28:34,640
उसने ही बनाया है किसी और ने बनाया है पहली बात सुनिए

1102
01:28:34,640 --> 01:28:38,760
ना आपको हम पहले ही क्या कहे हैं कि आपको भौतिक

1103
01:28:38,760 --> 01:28:42,760
रूप और परमार्थिक रूप दोनों अलग जैसे आप खुद बोले हैं कि दोनों अलग

1104
01:28:42,760 --> 01:28:46,880
है अरे मेरे भाई मेरी जो बात करने की

1105
01:28:46,880 --> 01:28:51,040
चीज है कि मैं बात कर रहा हूं या कुछ लिख रहा हूं इसको आप सूर्य चंद्रमा के निर्माण

1106
01:28:51,040 --> 01:28:55,040
से जोड़ रहे हैं हर चीज का जो है

1107
01:28:55,040 --> 01:28:59,280
ना एक जैसे आप कुछ बोल रहे हैं तो आप

1108
01:28:59,280 --> 01:29:03,640
शरीर रूप में निर्वाण कर रहे हैं मगर शद रूप

1109
01:29:03,640 --> 01:29:07,920
कह रहा क्या इस जगत की हर चीज का निर्माता व कबीर

1110
01:29:07,920 --> 01:29:12,560
है कि नहीं य जानना चाहता हूं सब कुछ उसने

1111
01:29:12,560 --> 01:29:17,280
ब सुनिए शबद रूप सब का उत्पन्न किया है

1112
01:29:17,280 --> 01:29:21,520
शरीर रूप में जिसका अलग अलग विभाग है जैसे कि

1113
01:29:21,520 --> 01:29:25,840
शरीर की बात नहीं कर रहा मेरे भाई य सारी जो सृष्टि

1114
01:29:25,840 --> 01:29:29,880
बनाई है सूरज चंद्रमा तारे य सब कुछ उसी ने बनाया है

1115
01:29:29,880 --> 01:29:32,000
कि

1116
01:29:32,000 --> 01:29:33,000
नहीं

1117
01:29:33,000 --> 01:29:38,120
हम आपको क्या कर रहे हैं पहले यही बात सुनिए तभी तो

1118
01:29:38,120 --> 01:29:42,480
हा आप डरेक्ट मनुष पर क्यों आ रहे केवल

1119
01:29:42,480 --> 01:29:46,680
आप केवल मनुष्य पर क्यों आ रहे हैं मैं संपूर्ण संसार की बात कर रहा हूं आप

1120
01:29:46,680 --> 01:29:50,920
केवल मनुष्य का जवाब दे रहे हो आप

1121
01:29:50,920 --> 01:29:55,000
संपूर्ण संसार की बात कर रहे हैं तो हम पूछ रहा हूं पर

1122
01:29:55,000 --> 01:29:59,000
एक बात बताइए संपूर्ण संसार जो है ना उनको हुकुम से बन रहा है मगर

1123
01:29:59,000 --> 01:30:03,000
शरीर रूप में जैसे इंसान हर कार्य अपना अपना कर रहा है नासे हर व्यक्ति

1124
01:30:03,000 --> 01:30:07,040
विभाग में बांटा गया वो कर रहा है तो मैं

1125
01:30:07,040 --> 01:30:11,600
ये आपसे कहां पूछ रहा हूं कि कोई व्यक्ति क्या कर रहा है कोई व्यक्ति क्या नहीं कर रहा है

1126
01:30:11,600 --> 01:30:16,480
मैं आपसे अभी प्रश्न ये पूछ रहा हूं क्या उन्होंने सब कुछ बनाया है कि

1127
01:30:16,480 --> 01:30:20,600
नहीं मैं भी तो वही कह रहा हूं शब्द रूप में व सब कुछ किया

1128
01:30:20,600 --> 01:30:25,040
है आकार रूप में अलग अलग विभाग दिया गया है यानी

1129
01:30:25,040 --> 01:30:29,120
कि सब कुछ उसी ने बनाया है ना जी सबद रूप में

1130
01:30:29,120 --> 01:30:33,560
सब कुछ वही बनाया सब एक ही है अलग नहीं है एक है

1131
01:30:33,560 --> 01:30:37,840
अब दूसरी बात यह है कि बुराई करने वालों को किसने

1132
01:30:37,840 --> 01:30:40,120
बनाया

1133
01:30:40,120 --> 01:30:44,440
है हम आपको क्या कहे हैं पहले ही भौतिक या

1134
01:30:44,440 --> 01:30:49,560
परमार्थिक दोनों वहार में उसने नहीं

1135
01:30:49,560 --> 01:30:53,600
बनाया हुकम उन्ही का चलता है व्यवहार में इंसान कर रहा है दिखाने

1136
01:30:53,600 --> 01:30:58,160
केलिए मैं कर रहा हूं दिखावटी जो है जैसे आप पूछ रहे हैं कोई ऐसा

1137
01:30:58,160 --> 01:31:02,240
सवाल तो आप वात सचा यही है

1138
01:31:02,240 --> 01:31:06,240
कि उसी ने बनाया है जी वास्तविक में हुकुम उन्ही

1139
01:31:06,240 --> 01:31:10,600
का चलता है वही करता है यानी कि जो

1140
01:31:10,600 --> 01:31:15,120
अच्छाई है या बुराई है वो उन्होने बनाई है अब

1141
01:31:15,120 --> 01:31:19,440
सुनिए अच्छाई और बुराई इंसान को दृष्टि

1142
01:31:19,440 --> 01:31:24,000
में है परमाथ दृष्टि में एक ही है ज

1143
01:31:24,000 --> 01:31:28,360
एक है तो अच्छाई और बुराई कहां से आ गया नहीं नहीं हमारी

1144
01:31:28,360 --> 01:31:33,120
दृष्टि से जो अच्छाई और बुराई है वो दोनों चीज उन्होंने ही बनाई है

1145
01:31:33,120 --> 01:31:37,120
अच्छाई और बुराई देखने का अनुभव अपने अंदर होना पड़ता

1146
01:31:37,120 --> 01:31:41,440
है तो मैं वही कह रहा हूं हमारी दृष्टि से जो अच्छाई और बुराई

1147
01:31:41,440 --> 01:31:45,440
है वो दोनों उन्होंने बनाई है क्योंकि उनकी दृष्टि में अच्छाई बुराई में कोई अंतर

1148
01:31:45,440 --> 01:31:49,480
नहीं है आप सही कह रहे हो मैं आपके साथ हूं इस बात जी है

1149
01:31:49,480 --> 01:31:55,480
ना अच्छा यानी झूठ और सच दोनों उन्होने ही बनाया है

1150
01:31:56,080 --> 01:32:00,120
यानी कि झूठ और सत वो इंसान का व्यवहार बनाता है

1151
01:32:00,120 --> 01:32:04,120
वो तो सिर्फ उनका एक जैसे कहे ना आप कुछ बोल रहे

1152
01:32:04,120 --> 01:32:08,160
हैं पहले सुनिए आप कुछ बोल रहे हैं तो उसमें

1153
01:32:08,160 --> 01:32:13,080
सच और झूठ छिटका है आप छिटका अपने बुद्धि के अनुसार क् उनको

1154
01:32:13,080 --> 01:32:17,080
अनुसार भाई मैं वही कह रहा हूं जो हमारी मैं अभी अपनी दृष्टि की

1155
01:32:17,080 --> 01:32:21,280
बात कर रहा हूं हमारी दृष्टि में जो झूट और सच है गलत और स सही गलत

1156
01:32:21,280 --> 01:32:25,480
और सही न्याय और अन्याय हमारी में जो न्याय और अन्याय है

1157
01:32:25,480 --> 01:32:29,920
वो उन्होंने ही बनाया है ना दोनों चीज

1158
01:32:29,920 --> 01:32:34,680
देखिए जैसे हमारी दृष्टि में न्याय और अन्याय

1159
01:32:34,680 --> 01:32:38,680
य जब चीज आता है ना तो इसमें लिक शेयर कर

1160
01:32:38,680 --> 01:32:42,680
दीजिए जी बोलिए इसमें क्या है

1161
01:32:42,680 --> 01:32:46,680
कि दो हिसाब आ जाता है जैसे हम देखते हैं कोई ऐसा चीज को

1162
01:32:46,680 --> 01:32:51,080
तो बुद्धि से पहले विवेक द्वारा विचार किया जाता है फिर

1163
01:32:51,080 --> 01:32:55,640
ज्ञान द्वारा टाइम टेकिंग क्यों कर रहे हैं

1164
01:32:55,640 --> 01:32:59,720
कट टू कट जब बात हो रही क्यों टाइम टेकिंग बातें कर रहे हैं सिंपल बात जब

1165
01:32:59,720 --> 01:33:04,280
चल रही है कि हां भाई उसकी दृष्टि से सब कुछ एक है

1166
01:33:04,280 --> 01:33:08,520
बनाया सब कुछ उसी ने है यह जो अच्छाई और बुराई का अंतर है

1167
01:33:08,520 --> 01:33:11,280
या न्याय और अन्याय का अंतर है सच और झूठ का अंतर

1168
01:33:11,280 --> 01:33:15,280
है हमारी दृष्टि से है तो बनाया उसने ही है मगर उसने

1169
01:33:15,280 --> 01:33:19,280
सच और झूठ नहीं बनाया मगर हमारे लिए कुछ चीजें सही है कुछ चीजें गलत है कुछ

1170
01:33:19,280 --> 01:33:23,440
चीज सच है और कुछ चीज झूठ है ठीक है जी

1171
01:33:23,440 --> 01:33:27,680
ठीक तो भौतिक में आ गया ना परमार्थिक में नहीं है कहा कह रहा

1172
01:33:27,680 --> 01:33:31,880
परमार्थिक में बनाया परमार्थिक में बनाया नहीं क्यों इस इसम पीछे

1173
01:33:31,880 --> 01:33:37,160
पड़े मैंने

1174
01:33:37,160 --> 01:33:41,400
क मतलब य है इसका मतलब यह है कि हमारे लिए जो गलत

1175
01:33:41,400 --> 01:33:45,680
चीज है व भी कबीर ने बनाई है हमारी दृष्टि

1176
01:33:45,680 --> 01:33:49,760
से हमारी दृष्टि से गतिक

1177
01:33:49,760 --> 01:33:54,160
दुनिया में दुनिया में हमारी दृष्टि से जो गलत

1178
01:33:54,160 --> 01:33:58,560
व भी कबीर नेही बनाई है और जो सही चीज व भी कबीर ने ही बनाई है

1179
01:33:58,560 --> 01:34:02,840
सही है हम आपको पहले

1180
01:34:02,840 --> 01:34:06,960
ही क्या चीज कहे थे कि सबका अलग अलग विभाग है

1181
01:34:06,960 --> 01:34:11,360
जैसे परमात्मा शब्द रूप रचा गया है सब यानी शबद शब्द

1182
01:34:11,360 --> 01:34:15,920
एक ही है दूसरी बात जब शरीर का निर्वाण हुआ

1183
01:34:15,920 --> 01:34:20,880
तो वहां पर बहुत सारे शरीर का निर्माण किया गया तो उसमें से

1184
01:34:20,880 --> 01:34:25,440
एक सत्पुरुष आता है और उस सत पुरुष के निर्माण से

1185
01:34:25,440 --> 01:34:26,320
काल निरंजन

1186
01:34:26,320 --> 01:34:30,360
जी आता है और 16 पुत्र है और काल निरंजन जी

1187
01:34:30,360 --> 01:34:34,400
के निर्वाण से और उसमें से जो सत्पुरुष रचना किया जाता है

1188
01:34:34,400 --> 01:34:38,640
उसमें से दुर्गा जी भी आता है और दुर्गा जी के निर्माण से और काल निरंजन जी के निर्माण

1189
01:34:38,640 --> 01:34:42,680
से ब्रह्मा विष्णु महेश जी का निर्माण होता है और ब्रह्मा

1190
01:34:42,680 --> 01:34:47,560
विष्णु महेश जी का निर्माण से जैसे कि ब्रह्मा जी का गुण है रगुण

1191
01:34:47,560 --> 01:34:51,800
उसमें डाला गया है तो उनको निर्माण से जन्म

1192
01:34:51,800 --> 01:34:55,800
होता है और विष्णु जी के गुण के

1193
01:34:55,800 --> 01:34:59,920
अनुसार से पालन होता है और शकर जी

1194
01:34:59,920 --> 01:35:03,960
गु केस से रं कहा इतनी डिटेलिंग पूछ रहा हूं आप क्यों जा

1195
01:35:03,960 --> 01:35:09,960
रहे डिटेलिंग प एक का

1196
01:35:12,440 --> 01:35:16,960
नाम खा देर लगा रहे भक रूप

1197
01:35:16,960 --> 01:35:21,240
से आपका जो ईश्वर है भौतिक रूप से सब कुछ कर सकता है कि नहीं

1198
01:35:21,240 --> 01:35:25,640
लीला में क्योंकि उसके हिसाब से तो कुछ एक ही है तो भौतिक

1199
01:35:25,640 --> 01:35:31,640
रूप से हमारे हमारी जानकारी में ईश्वर सब कुछ कर सकता है कि नहीं यह

1200
01:35:31,840 --> 01:35:35,840
बताइए भौतिक रूप से ईश्वर सब कुछ कर सकता है

1201
01:35:35,840 --> 01:35:40,160
कि नहीं वो तो जो चाहेगा वो कर सकता

1202
01:35:40,160 --> 01:35:44,160
है स पर भौतिक रूप में एक भौतिक

1203
01:35:44,160 --> 01:35:48,600
रूप में एक कंडीशन है जो हम पहले ही बताए थे ईश्वर

1204
01:35:48,600 --> 01:35:52,640
यानी की व माना जाएगा इसी हाल में कि वो अविनाशी

1205
01:35:52,640 --> 01:35:57,080
रहेगा दूसरा गर्भ से जन्मे नहीं

1206
01:35:57,080 --> 01:36:01,480
तीसरा वो गुप्त होगा तो शरीर उनका मिलेगा नहीं ठीक

1207
01:36:01,480 --> 01:36:05,600
है ठीक ये आपने न गर्भ

1208
01:36:05,600 --> 01:36:09,640
से जन्म नहीं लेगा और अपने अपना नाश नहीं करेगा ठीक है

1209
01:36:09,640 --> 01:36:13,920
जी और खाना नहीं खाएगा ठीक है खाना नहीं खाएगा

1210
01:36:13,920 --> 01:36:19,440
अभी मैं पूछ रहा आपसे वो झूठ तो बोल सकता है कि

1211
01:36:19,440 --> 01:36:23,560
नहीं उनको झूठ बोलने का क्या आवश्यकता है कभी

1212
01:36:23,560 --> 01:36:27,600
झूठ नहीं बोलेगा आप देखिए

1213
01:36:27,600 --> 01:36:31,600
आवश्यकता उसको सट बनाने की क्या है

1214
01:36:31,600 --> 01:36:35,760
अब सुनिए सृष्टि हम पहले ही आपको जर

1215
01:36:35,760 --> 01:36:39,800
में बताए थे कि सृष्टि जैसे सुनिए एक

1216
01:36:39,800 --> 01:36:44,360
मिनट जैसे आप खेती क्यों कर रहे

1217
01:36:44,360 --> 01:36:50,160
हैं खेती क्यों कर रहे हैं खेती जीना

1218
01:36:50,160 --> 01:36:54,520
है र खाने के लिए

1219
01:36:54,520 --> 01:36:59,400
खेती आप क्यों कर रहे खाने के लिए खाना खाने के लिए हा

1220
01:36:59,400 --> 01:37:03,720
पर इस प्रकृति के अंदर पा तत्व के अंदर आप पा तत्व

1221
01:37:03,720 --> 01:37:09,280
को उस खेती से क्या लोभ था

1222
01:37:09,280 --> 01:37:13,280
क्या आप इस संसार में आकाश के

1223
01:37:13,280 --> 01:37:17,600
नीचे रह रहे हैं भाई साहब मैं इतना

1224
01:37:17,600 --> 01:37:21,680
ज्यादा समय नहीं दे सकता चार लोग और है मैं आपको सीधा सिंपल

1225
01:37:21,680 --> 01:37:25,840
प्रश्न पूछा हूं क्या व्यवहार में यानी

1226
01:37:25,840 --> 01:37:30,080
की भौतिक सृष्टि में आप मुझे इसका आंसर दीजिए कि आपका जो ईश्वर

1227
01:37:30,080 --> 01:37:34,160
है वो सब कुछ कर सकता है या नहीं अगर कर सकता है तो वो झूठ बोल सकता है कि नहीं या

1228
01:37:34,160 --> 01:37:38,240
फिर वो सीमित है नहीं बोल सकता सिंपल बोलिए वो

1229
01:37:38,240 --> 01:37:42,920
झूठ नहीं बोलेगा झूठ क्यों बोलेगा यानी वो झूठ नहीं बोल सकता

1230
01:37:42,920 --> 01:37:47,160
व क्यों बोलेगा झूठ मतलब नहीं बोल सकता

1231
01:37:47,160 --> 01:37:51,200
ना जी जी जी नहीं बोलेगा झूठ बोलने वालों को बना

1232
01:37:51,200 --> 01:37:55,040
सकता है

1233
01:37:55,040 --> 01:37:59,280
वो जो ईश्वर है वहां से डिवाइड होते हुए आया जैसे

1234
01:37:59,280 --> 01:38:03,400
तो डिवाइड होने के बाद झूठ बोलने वालों को बना सकता है कि

1235
01:38:03,400 --> 01:38:07,600
नहीं सिंपल बात बोलिए ना भाई क्यों इतना आपकी आप जो आप

1236
01:38:07,600 --> 01:38:11,800
जो वो लेके आए हैं पूरा का पूरा य बताने की आवश्यकता नहीं सिंपल

1237
01:38:11,800 --> 01:38:15,800
सिंपल बात कर दर्शको को भी समझ में आए कि वो झूठ

1238
01:38:15,800 --> 01:38:20,080
बोलने वालो को बना सकता है नहीं पहले सुनिए

1239
01:38:20,080 --> 01:38:24,320
हम आपको हर सवाल को जो आप पूछ रहे हैं उस का जवाब

1240
01:38:24,320 --> 01:38:28,440
जो है जिस तरह से हम पूछ रहे हैं आप पूछ रहे हैं उस तरह से हम बता के ही

1241
01:38:28,440 --> 01:38:33,120
दे रहे हैं आप सिर्फ कह रहे हैं कि जैसे जज होता है एक मिनट सुन लीजिए

1242
01:38:33,120 --> 01:38:37,160
एक भी सवाल रहे आप अपना रायता फैला रहे हैं मैं आपसे

1243
01:38:37,160 --> 01:38:41,360
पूछ रहा हं आपको उस आपको उसी में जवाब है

1244
01:38:41,360 --> 01:38:45,520
जो मैं बोलता हूं उसी में जवाब है किस

1245
01:38:45,520 --> 01:38:50,160
जो मैं बोलता हूं उसी में जवाब है बोलिए

1246
01:38:50,160 --> 01:38:54,160
जैसे आप जैसे जज होता हैसे कहते हैं

1247
01:38:54,160 --> 01:38:58,120
यस यस और नो में बताने के लिए तो ऐसे ईश्वर के लिए नहीं बताया

1248
01:38:58,120 --> 01:39:02,440
जाता है क्यों मुझसे आप पूछिए मैं अभी तड़ त बता दूं

1249
01:39:02,440 --> 01:39:06,560
पूछिए अभी त आप बता दीजिएगा तो ठीक

1250
01:39:06,560 --> 01:39:10,600
है आप बताइए आपका ईश्वर कौन है आपका ईश्वर कौन है

1251
01:39:10,600 --> 01:39:14,640
सचिदानंद सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर कौन

1252
01:39:14,640 --> 01:39:18,640
कौन उनका नाम सच्चिदानंद तो मान गए नाम है

1253
01:39:18,640 --> 01:39:23,600
आपका अगर नाम सच्चिदानंद ही नाम है और बोलो

1254
01:39:23,600 --> 01:39:28,320
ब्रह्म ही नाम है उनका तो ठीक है उनका आकार रूप क्या

1255
01:39:28,320 --> 01:39:32,360
है आकार रूप क्या है जो व्यवहार में नहीं आ सकता जो

1256
01:39:32,360 --> 01:39:35,600
मनुष्य बुद्धि में नहीं आ

1257
01:39:35,600 --> 01:39:40,040
सकता पहली बात सुनिए व्यवहार में नहीं आ सकता

1258
01:39:40,040 --> 01:39:44,160
पर परमार्थी में तो है हा

1259
01:39:44,160 --> 01:39:48,560
तो परमार्थी में कौन सा है बता तो दिया जो आपकी

1260
01:39:48,560 --> 01:39:52,560
व्यवहार में नहीं आ सकता अनिर्वचनीय है जो

1261
01:39:52,560 --> 01:39:56,720
हम आपसे व्यवहार में नहीं आ सकता है परमार्थिक में तो है

1262
01:39:56,720 --> 01:40:01,520
मैं आपको एक तरीका बताता हूं आप तब समझ पाएंगे मेरी बात अगर

1263
01:40:01,520 --> 01:40:05,880
आपको व्यवहार में कुछ भी कर सकने वाला ईश्वर ईश्वर

1264
01:40:05,880 --> 01:40:10,640
के रूप में स्वीकार कब होगा आप किसी को भी ईश्वर के रूप में स्वीकार कब कर सकते हैं

1265
01:40:10,640 --> 01:40:13,960
जब वोह सर्वशक्तिमान अपने आप को सिद्ध कर दे

1266
01:40:13,960 --> 01:40:18,160
उसके बाद अगर वह सर्वशक्तिमान आपके व्यवहार में सिद्ध हो गया

1267
01:40:18,160 --> 01:40:22,320
तो आवश्यकता नहीं है कि व्यवहार वो पमा ईश्वर को भी सिद्ध

1268
01:40:22,320 --> 01:40:26,320
किया जाए तो इसका मतलब है ईश्वर को ईश्वर सिद्ध

1269
01:40:26,320 --> 01:40:30,560
करने के लिए उसका व्यवहार में सिद्ध होना आवश्यक है व्यवहार में सर्वशक्तिमान सि

1270
01:40:30,560 --> 01:40:35,440
होना आवश्यक है तो आप

1271
01:40:35,440 --> 01:40:39,480
मेसे तो मे व्यवहारिक प्रश्न कर क्या ईश्वर य कर सकता है क्या

1272
01:40:39,480 --> 01:40:43,520
ई कर सकता है तब तो व जाइए क्योंकि आपको वहा की

1273
01:40:43,520 --> 01:40:49,000
बात सब समझ में नहीं आएगा मैं तो

1274
01:40:49,000 --> 01:40:53,360
आपसे ठीक है मिनट ईश्वर जो है रिक

1275
01:40:53,360 --> 01:40:57,400
हिसाब से नपा जाता है कि परमार्थिक के हिसाब से व्यवहार के

1276
01:40:57,400 --> 01:41:01,440
हिसाब से अभी मैंने बात की ना अविद्या अविद्या का वो रूप

1277
01:41:01,440 --> 01:41:05,720
जो आपको विद्या तक पहुंचाए तो व्यवहारिक स्वरूप आपको अव्यावहारिक

1278
01:41:05,720 --> 01:41:09,760
स्वरूप तक पहुंचाएगा तो इसका मतलब आलंबन किसका

1279
01:41:09,760 --> 01:41:14,320
लेना पड़ेगा आलंबन किस आलंबन किसका लेना

1280
01:41:14,320 --> 01:41:18,560
पड़ेगा व्यवहारिक ईश्वर का क्यों क्योंकि जो आपका परमार्थिक

1281
01:41:18,560 --> 01:41:22,720
ईश्वर है वो तो व्यवहार का विषय है ही नहीं तो उसका ना

1282
01:41:22,720 --> 01:41:26,960
कैसे रहे हो आपने कहा आपने एक बात कही ईश्वर नापा जाता है व्यवहारिक

1283
01:41:26,960 --> 01:41:29,360
के हिसाब से कि परमार्थिक के हिसाब से यने

1284
01:41:29,360 --> 01:41:33,480
फस गए य मिनट नापना

1285
01:41:33,480 --> 01:41:37,720
क्या है नापना क्या है उनका गुण के हिसाब

1286
01:41:37,720 --> 01:41:41,760
क्या है मैं आपसे पूछ रहा हं नापना क्या है नापने का

1287
01:41:41,760 --> 01:41:46,720
अर्थ है गुण उनका क्या क्या है कैसे है परमार्थ के य

1288
01:41:46,720 --> 01:41:50,880
भी वहार है कि नहीं आप बोल भी रहे उका गुण क्या क्या है यह

1289
01:41:50,880 --> 01:41:54,240
भी व्यवहार

1290
01:41:54,240 --> 01:41:58,920
नापना भी वहार इसलिए आपसे पूछ

1291
01:41:58,920 --> 01:42:02,920
सुनिए देखिए किसी निष्कर्ष पर ऐसे नहीं पहुंचेगी मैं जानता हूं आप

1292
01:42:02,920 --> 01:42:07,000
तैयार हो करके आए हैं घुमाने के लिए बातो नहीं नहीं

1293
01:42:07,000 --> 01:42:11,800
नहीं आप आप सोच रहे जो बात अलग है मैं रामपाल जी का चेला

1294
01:42:11,800 --> 01:42:16,040
हूं नहीं मैं ये नहीं कह रहा जी के ले कक आपने

1295
01:42:16,040 --> 01:42:20,400
अपने वीडियो में उनका खंडन कर दिया रामपाल

1296
01:42:20,400 --> 01:42:24,520
मैं य जानता हूं मगर मैं अभी आपसे सिपल पूछ रहा हूं

1297
01:42:24,520 --> 01:42:28,880
कि क्या आपके ईश्वर ने यदि ये सृष्टि बनाई है हमारे लिए अच्छाई बुराई

1298
01:42:28,880 --> 01:42:33,080
है उसके लिए नहीं है उसने ही सब कुछ बनाया यानी बुराई भी उसी ने बनाई

1299
01:42:33,080 --> 01:42:37,080
तो पहली बात तो ये है कि आप ये कह रहे हो कि व्यवहार में आकर के जो ईश्वर है

1300
01:42:37,080 --> 01:42:40,400
आपका वो झूठ नहीं बोल

1301
01:42:40,400 --> 01:42:44,680
सकता आप जो है दो तरह की बात कर रहे हैं जैसे कि

1302
01:42:44,680 --> 01:42:48,880
आप जब खुद कह रहे हैं कि ईश्वर उनको हिसाब से बुराई

1303
01:42:48,880 --> 01:42:53,280
नहीं है ईश्वर के हिसाब से भौतिक हिसाब से बुराई है और अच्छाई है

1304
01:42:53,280 --> 01:42:57,680
हिसाब से पूछ रहा हूं हमारी जानकारी के अनुसार हमारे व्यवहारिक

1305
01:42:57,680 --> 01:43:01,800
दृष्टि के अनुसार क्या ईश्वर झूठ बोल सकता है कि नहीं उसकी अनुसार

1306
01:43:01,800 --> 01:43:05,920
नहीं बोल सकता वो छोड़ दो मैं पूछ रहा हूं हमारी जानकारी में आने के लिए

1307
01:43:05,920 --> 01:43:10,400
लीला पूर्वक वो ऐसी लीला कर सकता है जिसम उसने झूठ बोला

1308
01:43:10,400 --> 01:43:14,400
हो झूठ बोलने वाला देखि ईश्वर झूठ बोलेगा तो फिर ईश्वर

1309
01:43:14,400 --> 01:43:18,600
नहीं रहेगा झूठ नहीं बोलता है इसका मतलब उसकी सीमा है वो

1310
01:43:18,600 --> 01:43:24,600
झूठ ना बोलने की मर्यादा में है नहीं एक मिनट सुनिए

1311
01:43:25,000 --> 01:43:29,360
मर्यादा क्या चीज को कहा जाता है

1312
01:43:29,360 --> 01:43:33,520
भाई साहब आप बारबार किसी एक टॉपिक को लेकर के आगे निकल

1313
01:43:33,520 --> 01:43:37,880
जाते मैं अभी आपसे पूछ रहा हूं कि आपका ईश्वर अनंत सामर्थ

1314
01:43:37,880 --> 01:43:42,320
वान है कि नहीं पहले आप सुनिए ना आप मर्यादा में बांधे

1315
01:43:42,320 --> 01:43:46,480
हैं ना सच बोलेगा तो मर्यादित हो जाएगा झूठ नहीं बोला

1316
01:43:46,480 --> 01:43:51,040
तो मर्यादा का परिभाषा क्या है पहले बताइए मर्यादा क्या

1317
01:43:51,040 --> 01:43:55,280
कहा जाता हैमा जिसको ला लगे मर्यादा सीमा जिको

1318
01:43:55,280 --> 01:43:59,360
लांग नहीं सकता अच्छा अच्छा सुनिए

1319
01:43:59,360 --> 01:43:59,860
सीमा

1320
01:43:59,840 --> 01:44:03,920
को अंदर जो रहता है उसको लिए सीमा है कि सीमा से बाहर रहता

1321
01:44:03,920 --> 01:44:08,120
है उसको लिए जो सीमा के अंदर रह

1322
01:44:08,120 --> 01:44:12,280
रहा है जो अंदर आ रहा है उसके लिए सीमा है उसके लिए है

1323
01:44:12,280 --> 01:44:16,760
ना तो आप एक बात बताइए जैसे आप कह रहे हैं कि ईश्वर

1324
01:44:16,760 --> 01:44:21,040
झूठ नहीं बोलेगा तो बांध बाथी हो गया क्या कहते हैं मर्यादा

1325
01:44:21,040 --> 01:44:25,400
में हो गया अरे श्वर सब कुछ कर सकता है

1326
01:44:25,400 --> 01:44:30,000
हां सब कुछ करने तो कहा ना आप लाओ मत उसको बाहर से यहां

1327
01:44:30,000 --> 01:44:34,240
यहां करने वाले के रूप में आप ला क्यों रहे हो आप ही तो उसको गेम

1328
01:44:34,240 --> 01:44:39,120
के अंदर ला रहे हो ईश्वर के दो स्वरूप है एक व्यवहारिक

1329
01:44:39,120 --> 01:44:43,200
और एक परमार्थिक आप परमार्थिक ईश्वर को यहां ले आए आप गेम

1330
01:44:43,200 --> 01:44:47,440
के अंदर ले आए लकीर के इस तरफ ले आए आप जो आप कह रहे हो ना मैं सम

1331
01:44:47,440 --> 01:44:51,480
रहा जो सीमाओं से बाहर होगा वो ईश्वर होगा कि जो सीमाओं

1332
01:44:51,480 --> 01:44:55,480
के अंदर होगा वो ईश्वर होगा ठीक है वो नियमों से परे है आप ये

1333
01:44:55,480 --> 01:44:59,520
कह रहे वो नियमों से परे है तो नियमों से परे ईश्वर को आप गेम के

1334
01:44:59,520 --> 01:45:03,600
अंदर ले आए ना नियमों के बीच में ले आए ना इसलिए पूछ रहा हूं या तो

1335
01:45:03,600 --> 01:45:07,760
ये कहो नीचे नहीं आ सकता नीचे आ सकता विय

1336
01:45:07,760 --> 01:45:11,880
बन सकता है यहां से चालू हो रहा है य पर खत्म हो रहा है यहां से चालू

1337
01:45:11,880 --> 01:45:15,280
हो र हो रहा है पहले सुनिए

1338
01:45:15,280 --> 01:45:19,760
एक मिनट नियम के अंदर नहीं लाए हैं कैसे है

1339
01:45:19,760 --> 01:45:23,800
हम आपको पहले ही शुरू में क्या बताए थे कि परमा हुकम

1340
01:45:23,800 --> 01:45:27,920
चलता है हुकम से हर काम हो रहा हैको आपने जो बताया है

1341
01:45:27,920 --> 01:45:32,200
मैं उसी को खोद रहा हूं आपने जो बताया है उसकी

1342
01:45:32,200 --> 01:45:36,360
प्रमाणिकता को जांच रहा हूं अभी वह बातें आपकी बोली हुई प्रमाण

1343
01:45:36,360 --> 01:45:40,440
नहीं हो गई कि आपने जो कह दिया मान लिया अभी जो आपने

1344
01:45:40,440 --> 01:45:44,440
कहा है जो आपने क्लेम किया है उसी क्लेम की जांच कर रहे हम

1345
01:45:44,440 --> 01:45:48,440
लोग ठीक है इसलिए मैं आपसे पूछ रहा हूं कि इस

1346
01:45:48,440 --> 01:45:53,320
दुनिया में अगर झूठ का अस्तित्व है है कि नहीं हैय बताओ

1347
01:45:53,320 --> 01:45:57,760
हमारे अनुसार है भक अनुसार है

1348
01:45:57,760 --> 01:46:01,880
हा भौतिक के अनुसार तो क्या उस झूठ का कारण भी कबीर है

1349
01:46:01,880 --> 01:46:05,720
कि

1350
01:46:05,720 --> 01:46:10,040
नहीं देखिए झूठ का करूंगा

1351
01:46:10,040 --> 01:46:14,960
ठीक है हो गया आपको जवाब नहीं देना है आपको सीधे सीधे

1352
01:46:14,960 --> 01:46:19,320
बात सुनिए सुनिए बा ईश्वर

1353
01:46:19,320 --> 01:46:23,400
की नर्मल सी बात है इस दुनिया में जिस भी चीज का अस्तित्व

1354
01:46:23,400 --> 01:46:27,440
है उसका कारण ईश्वर है अब मैं आपसे

1355
01:46:27,440 --> 01:46:33,200
पूछ रहा हूं झूठ का अगर अस्तित्व है तो उसका कारण ईश्वर है कि

1356
01:46:33,200 --> 01:46:37,320
नहीं देखिए कारण जो है इंसान

1357
01:46:37,320 --> 01:46:41,440
को लालच बनाता है और व्यवहार में आता है उससे कारण बनता है पूछ रहा

1358
01:46:41,440 --> 01:46:46,360
हूं भाई साहब की झूठ का कारण आपका ईश्वर है कि नहीं

1359
01:46:46,360 --> 01:46:50,360
एक मिनट सुन लीजिए हमारा भी बात सुनिए मुझे नहीं सुनना प्

1360
01:46:50,360 --> 01:46:54,480
आप जाइए नहीं सुनना है दूसरी बात नहीं सुननी आपको ये बताना है

1361
01:46:54,480 --> 01:46:58,640
इस दुनिया में हर चीज का कारण ईश्वर है आपका या नहीं है

1362
01:46:58,640 --> 01:47:02,800
तो आप ज्ञान चर्चा कर रहे कि क्या कर रहे हैं प हम जा

1363
01:47:02,800 --> 01:47:07,280
जा आप जाइए आप जा

1364
01:47:07,280 --> 01:47:11,360
सकते इता भैया घी नहीं पिया है ना आप जो दूसरी

1365
01:47:11,360 --> 01:47:15,440
दूसरी बातें भटका रहोगे हम आपसे झक लड़ाते रहे आपको

1366
01:47:15,440 --> 01:47:19,440
अपनी बात फसना है क्योंकि आप बोलोगे नहीं तो सीधा साधा

1367
01:47:19,440 --> 01:47:23,480
जवाब देते नहीं है घुमाते हैं बात एक तरफ

1368
01:47:23,480 --> 01:47:27,720
कह रहे कि सर्वशक्तिमान है फिर एक तरफ बोलने की फिर ऐसा

1369
01:47:27,720 --> 01:47:31,760
हैसा है झूट नहीं बोल सच बोलने की नियमों में आ सकता है वो सिर्फ सच

1370
01:47:31,760 --> 01:47:35,760
बोलेगा ये भी तो नियम है नियमों के बीच में तो आप ला रहे

1371
01:47:35,760 --> 01:47:39,760
हो फिर कह नियमों के परे है अबे नियमों के परे तो फिर

1372
01:47:39,760 --> 01:47:43,920
सच बोलने वाला क्यों कह रहे हो उसको हां भैया रामपाल दास जी आप जेल

1373
01:47:43,920 --> 01:47:48,040
से कब आए अच्छा आप रामपाल नहीं है

1374
01:47:48,040 --> 01:47:52,840
आप उनका नाम आपका नाम प्रॉपर यही है आप नाम लिखते हो केवल

1375
01:47:52,840 --> 01:47:57,440
ना यही है यही नाम

1376
01:47:57,440 --> 01:48:01,680
है यही नाम है हां यही है

1377
01:48:01,680 --> 01:48:05,960
यही है आप तो पहले कई बार आ चुके हैं एक दो बार

1378
01:48:05,960 --> 01:48:10,200
हां तीसरी बार हम

1379
01:48:10,200 --> 01:48:14,240
बताइए मैं रात्र पूजा को

1380
01:48:14,240 --> 01:48:18,520
गलत मानते हैं आप मैं ये कह रहा हूं आप

1381
01:48:18,520 --> 01:48:22,880
बात करही थी हां शादी के बाद

1382
01:48:22,880 --> 01:48:26,960
बात कर रहे थे शदी हो जाती है क्या हो

1383
01:48:26,960 --> 01:48:31,680
जाती है अरे अभी आप

1384
01:48:31,680 --> 01:48:35,760
शादी अरे वो हो रहा था 17 मिनट में ना उसके बारे में बात करना चाह

1385
01:48:35,760 --> 01:48:39,840
रहे हैं थोड़ा आवाज क्लियर नहीं आ रही इनकी हां बताइए

1386
01:48:39,840 --> 01:48:45,320
बताइए बताइए क्या बात कर

1387
01:48:45,320 --> 01:48:50,000
फ 84 लामा

1388
01:48:50,000 --> 01:48:54,800
फ आप अपनी पूरी बात बोल लीजिए आप क्या कहने आए हैं बोलिए

1389
01:48:54,800 --> 01:48:59,000
हां जैसे जी

1390
01:48:59,000 --> 01:49:03,000
अगर से शादी नहीं कर तो योग क्रिया

1391
01:49:03,000 --> 01:49:07,160
से बच्चे होते हैं व आवाज

1392
01:49:07,160 --> 01:49:11,320
कट रही है इंटरनेट कनेक्शन आपका कमजोर है

1393
01:49:11,320 --> 01:49:14,160
अच्छा

1394
01:49:14,160 --> 01:49:20,160
दोबारा दोबारा आइए आप एक बार

1395
01:49:20,840 --> 01:49:26,840
हटके 84 लाख यो में भटक रहे हैं बोल रहे चलो बढ़िया

1396
01:49:29,560 --> 01:49:35,560
है और कौन आया है गोस्वामी जी

1397
01:49:36,080 --> 01:49:42,080
हैं चेहरा दिखाइए

1398
01:49:48,680 --> 01:49:53,400
भाई आज लाइट नहीं है शिवांश भैया

1399
01:49:53,400 --> 01:49:57,600
लाइट नहीं है तो रहने देते हैं थोड़ी देर आप रूम में वेटिंग

1400
01:49:57,600 --> 01:50:02,560
रूम में आ जाइए आरन कुशवा जी जय श्री

1401
01:50:02,560 --> 01:50:06,960
राम जय श्री राम शिवांश आवाज आ रही है मेरी जी आ रही

1402
01:50:06,960 --> 01:50:12,360
है शिवांश मैंने आपको वो मैसेज किया था स्कन का

1403
01:50:12,360 --> 01:50:16,520
ऑडियो हां हां हां हम लोग उस पर बनाएंगे लाइव करेंगे उस

1404
01:50:16,520 --> 01:50:21,120
पर हा तो मैंने भ दोबारा कर दीजिएगा

1405
01:50:21,120 --> 01:50:25,600
कल करेंगे ठीक देख लेंगे कल शायद हो सके कल करें

1406
01:50:25,600 --> 01:50:31,600
अच्छा शंकर जी आप मेरे को वहां उनके चैनल प मिले

1407
01:50:31,640 --> 01:50:37,640
थे शंकर जी बोलिए क्या सिद्ध करना है

1408
01:50:39,080 --> 01:50:43,320
आपको अन म्यूट कीजिए आप अपना आवाज

1409
01:50:43,320 --> 01:50:47,400
नहीं जी मैं कहू कहिए चलो शंकर जी आप

1410
01:50:47,400 --> 01:50:53,400
म्यूट हो जाओ फिर थोड़ी देर म्यूट हो जाओ बताओ रामपाल

1411
01:50:53,720 --> 01:50:56,520
आवाज ठीक आ रही

1412
01:50:56,520 --> 01:51:00,680
है जी बोलिए आ रही है मैं

1413
01:51:00,680 --> 01:51:04,800
कह रहा ज 84 में जीवात्मा फस रही है

1414
01:51:04,800 --> 01:51:08,840
हम तो बिना शादी किए हुए बच्चे उत्पन्न नहीं

1415
01:51:08,840 --> 01:51:13,080
हो सकते यो क्रिया से जो और बच्चे नहीं होंगे तो

1416
01:51:13,080 --> 01:51:19,080
फिर आदमी भक्ति करेगा कैसे मनुष्य रूप में करेगा

1417
01:51:20,120 --> 01:51:25,000
ना आप ये कहना चाह रहे

1418
01:51:25,000 --> 01:51:29,160
हा हा तो इसीलिए शादी करवाई जाती है योग क्रिया

1419
01:51:29,160 --> 01:51:33,360
से बच्चे होते हैं और जब मान रूप भ भक्ति करेंगे

1420
01:51:33,360 --> 01:51:36,880
मो का मिल सकता

1421
01:51:36,880 --> 01:51:39,840
है

1422
01:51:39,840 --> 01:51:44,800
देख आपको आपका उत्तर दे दू कि आपके

1423
01:51:44,800 --> 01:51:49,160
जो तत्वदर्शी है वो यह कह रहे हैं कि

1424
01:51:49,160 --> 01:51:53,480
जो विवाह नहीं करना चाहता है है ना

1425
01:51:53,480 --> 01:51:57,520
क्या कह रहे देख परिग्रह मात्र ही अत्यंत दुख एवं पाप का कारण

1426
01:51:57,520 --> 01:52:01,560
होता है उससे मनुष्य की अधोगति होती है यह ऐसा कह

1427
01:52:01,560 --> 01:52:05,560
रहा है व्यक्ति वैरागी रहना चाहता है यह विवाह नहीं करना चाहता है इससे

1428
01:52:05,560 --> 01:52:09,640
पितृ गण बोल रहे विवाह कर ले तो यह कह रहा है मुझे विवाह नहीं

1429
01:52:09,640 --> 01:52:14,160
करना है ठीक है और आगे बोल रहा है इसलिए मैंने स्त्री संग्रह

1430
01:52:14,160 --> 01:52:18,520
नहीं किया इसलिए मैंने क्या नहीं किया स्त्री

1431
01:52:18,520 --> 01:52:22,800
संग्रह नहीं किया ठीक है आगे इसके

1432
01:52:22,800 --> 01:52:26,800
प पितर बोल रहे हैं बेटा जो तू जिस मार्ग पर चल रहा है वो मोक्ष का मार्ग तो

1433
01:52:26,800 --> 01:52:31,080
है वैराग्य ही है मगर ये वो वैराग्य है जो अ विधि पूर्वक

1434
01:52:31,080 --> 01:52:35,160
आया है विधि पूर्वक नहीं आया तो अ विधि पूर्वक जो वैराग्य

1435
01:52:35,160 --> 01:52:39,440
भी आ जाएगा तो वो भी मोक्ष का दायक नहीं तो मार्ग तो तेरा सही है मगर विधि पूर्वक मार्ग

1436
01:52:39,440 --> 01:52:44,240
नहीं है यह पितर कह रहे हैं तो इस बात में जो पितर इसको

1437
01:52:44,240 --> 01:52:48,280
शादी की ओर लाने की बात कह रहे हैं आपके तत्वदर्शी कह रहे हैं गलत कह

1438
01:52:48,280 --> 01:52:50,440
रहे

1439
01:52:50,440 --> 01:52:55,160
हैं मैं ये कह रहा हूं जी ये कौन कह रहा है

1440
01:52:55,160 --> 01:53:00,360
मतलब बाल ब्रचा मोक्ष होगा आपके

1441
01:53:00,360 --> 01:53:04,560
आपके जो तत्वदर्शी है वो य पर कह

1442
01:53:04,560 --> 01:53:08,760
रहे जो व्यक्ति है वो सही कर रहा है और जो उसको शादी

1443
01:53:08,760 --> 01:53:14,760
के लिए इधर ला रहे हैं व गलत ला रहे

1444
01:53:16,400 --> 01:53:20,520
हैं ऐसा ब्रमर हिसाब से होता है

1445
01:53:20,520 --> 01:53:25,800
सकते शदी के बाद बचा भाई

1446
01:53:25,800 --> 01:53:29,960
सा आप तो ये बताओ कि उन्होंने यहां पर जो इसको कहा है ना

1447
01:53:29,960 --> 01:53:34,360
मोक्ष का मार्ग स्वीकार किया है रुचि मुनि है जो

1448
01:53:34,360 --> 01:53:38,640
रुचि मुनि है जो इनको मोक्ष के मार्ग पर चलने वाला स्वीकार

1449
01:53:38,640 --> 01:53:42,760
किया है और यह बाल ब्रह्मचारी है इन्होंने शादी की ही नहीं

1450
01:53:42,760 --> 01:53:46,840
है विवाह किया ही नहीं है इन्होने अब यहां पर इनके जो पितर है वो

1451
01:53:46,840 --> 01:53:50,960
कह रहे बेटा विवाह करके तू जब वैराग्य में आएगा ना तो वो ज्यादा सही

1452
01:53:50,960 --> 01:53:55,560
है मगर त विवा नहीं करेगा तो ये तेरा वैराग्य जो है वो

1453
01:53:55,560 --> 01:53:59,880
अधि पूर्वक है य तुझे मोक्ष नहीं दिलाएगा कुछ ऐसी वार्ता य हो रही है

1454
01:53:59,880 --> 01:54:04,400
तो आपके जो तत्वदर्शी है जेलम निवासी वो यह कह रहे हैं

1455
01:54:04,400 --> 01:54:08,560
कि यहां पर य जो रुचि मुनि है य मोक्ष के मार्ग पर चल रहे हैं और पितर

1456
01:54:08,560 --> 01:54:12,600
जो उनसे कह रहे विवाह कर ले विवाह करके जो जब तू वैराग्य में आएगा

1457
01:54:12,600 --> 01:54:16,600
मोक्ष के मार्ग पर आएगा त ज्यादा सही रहेगा वो गलत कह रहे पितरों को

1458
01:54:16,600 --> 01:54:20,720
गलत कहा और उस पित्रों को गलत कहने के लिए

1459
01:54:20,720 --> 01:54:24,760
उधर जो कर्म है और जो कर्म है शास्त्र वेद कर्म

1460
01:54:24,760 --> 01:54:28,760
उनको गलत कहा तो वो कह रहे हैं कि देखो ये

1461
01:54:28,760 --> 01:54:31,480
व्यक्ति मोक्ष के मार्ग पर चल रहा है फिर भी उसको वहां से घसीट

1462
01:54:31,480 --> 01:54:35,800
रहे मतलब उन्होंने माना आपके तत्वदर्शी ने कि बाल ब्रह्मचारी

1463
01:54:35,800 --> 01:54:39,920
रहना और स्त्री संग ना करना ही

1464
01:54:39,920 --> 01:54:44,120
मोक्ष का मार्ग है यहां पर उन्होंने यह मान लिया नहीं तो उनको

1465
01:54:44,120 --> 01:54:48,160
पितरों का साथ देना चाहिए सही कह रहे हैं पितर वो यहां पर रुचि मुनि को सही कह

1466
01:54:48,160 --> 01:54:52,480
रहे हैं ऐसा पि पूजा करेंगे

1467
01:54:52,480 --> 01:54:56,560
मोक्ष कहां मिल पाएगा ये बताइए मोक्ष मिल पाएगा नहीं मिलेगा भाई साहब मैं आपसे कह

1468
01:54:56,560 --> 01:55:00,640
रहा हूं आपके जेल धाम निवासी कह रहे हैं ये कि रुचि मुनि सही

1469
01:55:00,640 --> 01:55:04,720
है यहां पर और सही इसलिए सही हो

1470
01:55:04,720 --> 01:55:08,920
इसलिए बता रहे थे ना पित्र पूजा नहीं करना चाहते थे ना चीज

1471
01:55:08,920 --> 01:55:12,960
ा नहीं करना यहां पितर पूजा की बात नहीं

1472
01:55:12,960 --> 01:55:16,960
है उन्होंने कहा कि रुचि मुनि मोक्ष के मार्ग पर चल रहे हैं पितर उन्हें मोक्ष से घसीट

1473
01:55:16,960 --> 01:55:21,320
रहे हैं पित्र पूजा के लिए घसीट रहे थे ना

1474
01:55:21,320 --> 01:55:24,400
वो वीडियो दिखा दो

1475
01:55:24,400 --> 01:55:29,480
वीडियो दिखा दो इनको

1476
01:55:29,480 --> 01:55:33,800
जरा रामपाल दास जी वहां पर अच्छे से पढ़िए वहां पर विवाह की बात

1477
01:55:33,800 --> 01:55:39,240
कर रहे हैं वहां सरात की बात नहीं कर रहे

1478
01:55:39,240 --> 01:55:44,880
हैं तुम जिस पर हो व मोक्ष मार्ग

1479
01:55:44,880 --> 01:55:49,360
है ने पता वेद में कम मार्ग

1480
01:55:49,360 --> 01:55:55,360
कोस मत दिखा पीछे यही का मार्ग

1481
01:55:56,960 --> 01:56:01,040
हैब एक मिनट कहते देखलो

1482
01:56:01,040 --> 01:56:06,760
य मोक्ष के मार्ग पर चल रहा है फिर भी उसको घसीट रहेर

1483
01:56:06,760 --> 01:56:10,240
रे विवा

1484
01:56:10,240 --> 01:56:16,240
दिखा देखो वहा से कैसे उने

1485
01:56:16,440 --> 01:56:20,800
प पीछे दिखाओ अभी विवाह शब्द आया था नाय

1486
01:56:20,800 --> 01:56:25,000
देखो बेटा विवाह म जी कहते पूव काल

1487
01:56:25,000 --> 01:56:29,640
की बात है

1488
01:56:29,640 --> 01:56:35,640
तते उन्होने तो अगनि की स्थापना की थी और अपने घरही बना

1489
01:56:37,120 --> 01:56:41,960
रखा वे एक बार भोजन करते और बिना आश्रम केही रहते थे

1490
01:56:41,960 --> 01:56:46,120
उन्ह सब प्रकार की आसक्ति रहित मुव में रहते देख उनके पि

1491
01:56:46,120 --> 01:56:52,120
ने उनसे कहा अब देखो क्या

1492
01:56:52,480 --> 01:56:56,600
चोरी हैय चोरी है इन्होने पढ़ नहीं पि ने

1493
01:56:56,600 --> 01:57:01,680
क्या कहा दोबारा दिखाओ क्या कहा प ने देखो पि ने क्या

1494
01:57:01,680 --> 01:57:06,800
क प बोले बेटा देख

1495
01:57:06,800 --> 01:57:10,840
देख हटा दो इनको और देखो मोक्ष का

1496
01:57:10,840 --> 01:57:15,000
आगे देखो मोक्ष का मार्ग थोड़ा आगे आगे बढ़ दो मोक्ष का मार्ग दिखा

1497
01:57:15,000 --> 01:57:19,280
दो दादा का पिताजी दादा कादा य

1498
01:57:19,280 --> 01:57:23,520
चार अब क्या इशन दे रहे प

1499
01:57:23,520 --> 01:57:27,760
बोले बेटा पुरुष समस्त देवताओ प ऋषियो

1500
01:57:27,760 --> 01:57:32,520
और अतिथियो की पूजा करके व

1501
01:57:32,520 --> 01:57:36,600
और अपवग का हेतु होने के कारण एक पु कार्य है उसे तुमने क्यों नहीं

1502
01:57:36,600 --> 01:57:41,000
किया पु समस्त देवताओ प ष और अतिथियो की पूजा करके

1503
01:57:41,000 --> 01:57:45,240
पु लो को प्राप्त करता है वह स के उचार से देवताओ को श

1504
01:57:45,240 --> 01:57:51,240
के श से प को था अन

1505
01:57:59,280 --> 01:58:03,280
तो सामने सामने स्कम कर दिया ये देखो बेटा जितेंद्र होकर

1506
01:58:03,280 --> 01:58:07,280
आत्मा कालन करना उचित ही है तुम जिस पर चल रहे हो

1507
01:58:07,280 --> 01:58:11,040
वह मोक्ष मार्ग

1508
01:58:11,040 --> 01:58:15,120
बस और इसमें इस वीडियो में आपके तत्वदर्शी

1509
01:58:15,120 --> 01:58:19,160
ने यह भी कहा है जो पितर होते हैं व्यक्ति मोक्ष मार्ग पर

1510
01:58:19,160 --> 01:58:23,080
चल रहा है तो उससे घसीट रहे हैं आपको

1511
01:58:23,080 --> 01:58:27,920
घसीट इसलिए रहे क रहे थे पित्र पूजा करो इसलिए

1512
01:58:27,920 --> 01:58:32,000
घ पूजा कर भाई साहब पितर

1513
01:58:32,000 --> 01:58:36,680
पूजा का शब्द कहां आया इसमें वो पितर दिख किसलिए लिए

1514
01:58:36,680 --> 01:58:40,840
हमा पि पूजा करते पूजा नहीं कर रहे वहा पर वो

1515
01:58:40,840 --> 01:58:44,960
वो पुत्र पित्र पूजा नहीं कर रहे वैरागी जीवन जी रहे हैं तो व पर पित आ करके

1516
01:58:44,960 --> 01:58:49,360
कह रहे बेटा तू विवाह कर ले सम

1517
01:58:49,360 --> 01:58:53,480
में आर कह रहे बे कर लेता तो हमारी पितर मतलब

1518
01:58:53,480 --> 01:58:57,600
पूजा करता अब वो कह मुझे मोक्ष प्राप्त करना है पिताजी मैं

1519
01:58:57,600 --> 01:59:01,720
ये नहीं कर सकता तो भाई वो क तो ल एट द

1520
01:59:01,720 --> 01:59:05,720
एंड विवाह के लिए रहे ना वहां पे विवाह के लिए कह रहे नहीं

1521
01:59:05,720 --> 01:59:08,480
कह

1522
01:59:08,480 --> 01:59:14,480
रहे हां क रहे कि नहीं कह रहे ये

1523
01:59:16,200 --> 01:59:20,320
बताओ अरे जो पितर है उनके वो कह रहे हैं शादी करते तो हमारी पि

1524
01:59:20,320 --> 01:59:24,720
पूजा करते आप तो उन्होने मुझे मुझे मोक्ष कर

1525
01:59:24,720 --> 01:59:28,920
करवाना भाई साहब इसका मतलब यह माना जाएगा कि विवाह करने का अर्थ

1526
01:59:28,920 --> 01:59:32,960
होता है पित पूजन यह मान लो

1527
01:59:32,960 --> 01:59:37,200
नहीं ऐसे कने मतलब य है शादी किए बना मक्ष

1528
01:59:37,200 --> 01:59:43,200
हो

1529
01:59:44,240 --> 01:59:48,880
जाएगा अभी सिच को क्लियर समझ थोड़ा

1530
01:59:48,880 --> 01:59:53,080
एक व्यक्ति है जो विवाह नहीं करना चाहता है और

1531
01:59:53,080 --> 01:59:57,720
आपके अनुसार पतर आ कर के उससे कहते हैं कि भाई तू विवाह कर ले

1532
01:59:57,720 --> 02:00:01,720
विवाह कर लेगा तो अन्य शास्त्र वेद जो कर्म है उनको कर पाएगा और तू

1533
02:00:01,720 --> 02:00:06,280
उस पर चलते हुए भी मोक्ष को प्राप्त कर सकेगा यह पितर आक के कह रहे हैं

1534
02:00:06,280 --> 02:00:10,400
आपके जो रामपाल दास जी है वह यह कह रहे हैं कि पितर

1535
02:00:10,400 --> 02:00:14,400
उससे गलत गलत चीज की ओर घसीट रहे हैं वो जो कर रहा है वह मोक्ष है

1536
02:00:14,400 --> 02:00:18,520
वह अपने मोक्ष के मार्ग पर चल रहा है मगर पितर जो उसको विवाह करने के लिए कह रहे

1537
02:00:18,520 --> 02:00:23,960
हैं वो गलत कह रहे हैं तो आप ये मानते हैं विवाह गलत है

1538
02:00:23,960 --> 02:00:28,160
नहीं ब्या करना गलत नहीं है भक्ति सही करो तो उचित

1539
02:00:28,160 --> 02:00:32,160
है मोक्ष हो जाएगा ब्या करना गलत नहीं य पर जो बात चल रही है उसकी

1540
02:00:32,160 --> 02:00:36,200
बात करो यह जो पढ़ रहे हो इसमें य कहां दिखाओ आपकी बात जो सही हो रही है

1541
02:00:36,200 --> 02:00:40,520
वो बताओ मुझे ये जो उन्होने प्रमाण दिया

1542
02:00:40,520 --> 02:00:45,480
है उस उन्होने य दिखाया है मैं दोबारा दिखा दू आपको दोबारा समझा दू

1543
02:00:45,480 --> 02:00:50,120
एक व्यक्ति है जो बिना विवाह के अपना जीवन का निर्वाह कर रहा है

1544
02:00:50,120 --> 02:00:55,080
उसके पितर आ कर के उसको बोल कि अगर तू अगर तू विवाह करके

1545
02:00:55,080 --> 02:00:59,120
और शास्त्र भद कर्मों को करेगा तो तू सही तरीके से मोक्ष के मार्ग पर

1546
02:00:59,120 --> 02:00:59,620
आगे

1547
02:00:59,400 --> 02:01:03,480
चल पाएगा आपके रामपाल दास जी कह रहे हैं कि देखो जो

1548
02:01:03,480 --> 02:01:08,400
व्यक्ति मोक्ष के मार्ग पर चल रहा है उसको यह लोग नरक के मार्ग पर घसीट रहे हैं

1549
02:01:08,400 --> 02:01:12,440
तो यानी कि वैराग्य विवाह के विवाह

1550
02:01:12,440 --> 02:01:18,440
के बिना चलने वाला इंसान ही सही है आपके

1551
02:01:19,680 --> 02:01:23,880
अनुसार व विवाग में कह रहे थे वो ये कह रहे थे पित्र पूजा मैं क्यों

1552
02:01:23,880 --> 02:01:28,040
करू मुझे मोक्ष करवाना है ये कह रहे थे अपने पित्रों से यहां पर सबसे पहला शब्द

1553
02:01:28,040 --> 02:01:32,560
क्या लिखा है बेटा विवाह क्या लिखा है

1554
02:01:32,560 --> 02:01:36,720
सबसे पहला शब्द हा वो विवाह के लिए इसलिए कह रहे थे

1555
02:01:36,720 --> 02:01:40,920
कि हमारी पित पूजा करते विवाह करने के बाद उन्होने की पिताजी मैं पित पूजा नहीं

1556
02:01:40,920 --> 02:01:45,200
करूंगा तो विवाह के लिए कहा ना पित्रों ने आपके

1557
02:01:45,200 --> 02:01:49,360
जेल धाम निवासी को कहना चाहिए था कि विवाह करना तो सही है

1558
02:01:49,360 --> 02:01:53,440
मगर विवाह करने के की पूजा है गलत है उन्होंने तो कहा

1559
02:01:53,440 --> 02:01:58,000
कि नहीं पितर उनको ग गलत कर रहे पूरी तरीके से गलत कर दिया ना

1560
02:01:58,000 --> 02:02:02,160
क्यों कहा व पित पूजा के लिए शादी

1561
02:02:02,160 --> 02:02:06,520
के लिए नहीं अरे मेरे भाई इसमें

1562
02:02:06,520 --> 02:02:10,640
कहां पर पित पूजा के लिए आ रहा है इसमें विवाह के लिए बात हो रही है वो

1563
02:02:10,640 --> 02:02:14,440
कह रहे मैंने स्त्री संघ नहीं किया फिर वो उसको स्त्री संघ के लिए मना

1564
02:02:14,440 --> 02:02:18,560
रहे हैं इसमें जो मूल विषय है उनके बीच में बात होने का वो

1565
02:02:18,560 --> 02:02:23,400
विवाह है वो तोला पित

1566
02:02:23,400 --> 02:02:27,440
पूजा पित तब तो ऐसा होना चाहिए था कि व पित पूजा

1567
02:02:27,440 --> 02:02:31,640
नहीं कर रहे थे तो वो आकर के ये कहते कि तू पित पूजा क्यों नहीं कर रहा

1568
02:02:31,640 --> 02:02:35,840
है पित पूजा कर बात तो पित पूजा की हुई और पित

1569
02:02:35,840 --> 02:02:40,280
पूजा और पित पूजा करने के लिए विवाह कर यह कहते

1570
02:02:40,280 --> 02:02:44,520
यहां तो विवाह कोही विवाह की बात चल रही है पूरी और आप उसको पितृ

1571
02:02:44,520 --> 02:02:49,200
पूजा से जोड़ रहे हो नहीं बेवा के लिए नहीं मना करेवा

1572
02:02:49,200 --> 02:02:53,280
के लिए मना थोड़ी किया प पूजा के लिए मनाया होता है

1573
02:02:53,280 --> 02:02:57,680
आपके कहने से नहीं होता है यहां पर एक व्यक्ति वैराग गुरु

1574
02:02:57,680 --> 02:03:01,720
गुरुजी ने कहा ये बताओ ये बताओ कि पितृ पूजा नहीं कर रहा

1575
02:03:01,720 --> 02:03:05,720
है वो व्यक्ति ठीक है पितृ पूजा के बिना रह रहा है अब वो पितृ पूजा

1576
02:03:05,720 --> 02:03:09,720
के लिए घसीट रहे हैं और पित पूजा के लिए विवाह होना आवश्यक है मगर

1577
02:03:09,720 --> 02:03:13,800
यहां पर यहां पर आपके व्यक्ति ने यह कहा कि वो व्यक्ति सही जीवन

1578
02:03:13,800 --> 02:03:18,320
जी रहा था मोक्ष मार्ग था उसका वैरागी

1579
02:03:18,320 --> 02:03:22,360
मोक्ष मार्ग था उसका आपके व्यक्ति ने कहा और

1580
02:03:22,360 --> 02:03:26,440
विवा सुनो विवाह प्लस पित पूजा यह मार्ग

1581
02:03:26,440 --> 02:03:28,800
गलत

1582
02:03:28,800 --> 02:03:29,800
है

1583
02:03:29,800 --> 02:03:35,040
पि पूजा करो तो गलत हो जाएगा सही बात है प लो प

1584
02:03:35,040 --> 02:03:39,200
जा य पर बात हो रही है विवा की उसको के लिए बना रहे

1585
02:03:39,200 --> 02:03:45,200
य

1586
02:03:49,440 --> 02:03:53,040
परने माग

1587
02:03:53,040 --> 02:03:57,240
मुझे दिखाने दो मुझे दिखाने दो मुझे दिखाने दो

1588
02:03:57,240 --> 02:04:01,320
परिग्रह मात्र ही अत्यंत दुख एवं पाप का कारण

1589
02:04:01,320 --> 02:04:05,600
होता है तो यहां पर ये ये कह रहे हैं जो जिस जो व्यक्ति

1590
02:04:05,600 --> 02:04:09,600
आपके तत्वदर्शी के अनुसार मोक्ष मार्ग पर चल रहा है वो यह कह रहा

1591
02:04:09,600 --> 02:04:13,720
है कि स्त्री को ग्रहण करना विवाह करना दुख

1592
02:04:13,720 --> 02:04:19,080
एवं पाप का कारण होता है ये ये कह रहा है व्यक्ति मानते हैं

1593
02:04:19,080 --> 02:04:24,840
आप वो ऐसा है ना वो सोच रहे फ में

1594
02:04:24,840 --> 02:04:28,960
कर बताओ मुझे आपके र् ने कहा य व्यक्ति मोक्ष

1595
02:04:28,960 --> 02:04:33,080
के मार्ग पर चल रहा है यह व्यक्ति यह सोच रहा है कि शादी

1596
02:04:33,080 --> 02:04:37,240
करना क्या कहते बंधन का कारण होता है

1597
02:04:37,240 --> 02:04:40,760
आप यह बात मानते

1598
02:04:40,760 --> 02:04:44,760
हैं बंधन फसो तो हो जाए

1599
02:04:44,760 --> 02:04:47,680
गलत नहीं

1600
02:04:47,680 --> 02:04:52,240
फ कोई क्लियर बात करो ना

1601
02:04:52,240 --> 02:04:56,520
क्लियर बता तो रहा हूं शादी करने के बाद केवल उसम क्यों फसो भक्ति भी करो

1602
02:04:56,520 --> 02:05:00,600
ना आपके तत्वदर्शी के अनुसार ये जो व्यक्ति य मोक्ष मार्ग पर

1603
02:05:00,600 --> 02:05:04,600
चल रहा है कि नहीं चल रहा है पहले ये बताओ हां मोक्ष पर

1604
02:05:04,600 --> 02:05:08,640
चल रहा है वो तो मोक्ष मार्ग पर चल रहा है ना मोक्ष मार्ग पर

1605
02:05:08,640 --> 02:05:12,760
चलने वाले व्यक्ति की सोच ये है वो यह कह रहा है

1606
02:05:12,760 --> 02:05:16,920
कि स्त्री संग्रह से अधोगति होती है पाप

1607
02:05:16,920 --> 02:05:20,960
का कारण होता है अब यह व्यक्ति यह बात मानते हो कि

1608
02:05:20,960 --> 02:05:25,000
नहीं मानते हो स्त्री संग्रह से यानी विवाह से अधोगति होती

1609
02:05:25,000 --> 02:05:29,080
है पाप का कारण होता है मोक्ष के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति ये

1610
02:05:29,080 --> 02:05:33,200
कह रहा है या तो ये मोक्ष का मार्ग

1611
02:05:33,200 --> 02:05:37,840
नहीं है एक मिनट या तो ये मोक्ष का मार्ग नहीं

1612
02:05:37,840 --> 02:05:42,080
है या तो ये मोक्ष का मार्ग नहीं है और या फिर

1613
02:05:42,080 --> 02:05:46,160
जो पित्र है वो उसको सही दिशा में ला रहे हैं दोनों ही तरीके से आपकी बात

1614
02:05:46,160 --> 02:05:49,920
कट रही

1615
02:05:49,920 --> 02:05:53,920
है अच्छा अभी बताओ जी पित पूजा से मुक्त कैसे हो

1616
02:05:53,920 --> 02:05:59,600
जाएगा पित पूजा त्यानी पड़ेगी ना आगे बढ़ना

1617
02:05:59,600 --> 02:06:03,680
पड़ेगा करना पड़ेगा ये बताओ पूजा पड़ेगी

1618
02:06:03,680 --> 02:06:07,720
म होगा ये बताओ आप मुझे कि कबीर की

1619
02:06:07,720 --> 02:06:11,320
पूजा करने से मोक्ष कैसे हो

1620
02:06:11,320 --> 02:06:15,760
जाएगा बिल्कुल हो जाएगा सतलोक चले जाएंगे

1621
02:06:15,760 --> 02:06:20,840
अच्छा कबीर सतलोक में रहता है

1622
02:06:20,840 --> 02:06:24,840
हा स जो लोग पाप करते हैं वो कहां

1623
02:06:24,840 --> 02:06:29,720
जाते हैं नरक में जाएंगे

1624
02:06:29,720 --> 02:06:32,480
अच्छा

1625
02:06:32,480 --> 02:06:37,240
जो जो लोग पाप करेंगे और ब्रह्म की पूजा करने वाले कहां

1626
02:06:37,240 --> 02:06:42,680
जाएंगे ब्रह्मलोक जाए

1627
02:06:42,680 --> 02:06:46,680
ब्रह्मलोक अच्छा तो मरने के बाद

1628
02:06:46,680 --> 02:06:52,520
जो पाप करने वाले हैं वो ब्रह्म के पास जाएंगे

1629
02:06:52,520 --> 02:06:57,200
नहीं च में जाएंगे वहा कैसे प जाए भगवान तो बहुत बड़ी चीज है

1630
02:06:57,200 --> 02:07:01,440
ब्रह्म ब्रम काल का ता

1631
02:07:01,440 --> 02:07:05,920
है काल भगवान जी है भगत जी काल भगवान जी केवल काल नहीं है

1632
02:07:05,920 --> 02:07:10,000
काल भगवान जी है अभी इस पर बात करेंगे भगवान प अभी मैं बात कर रहा

1633
02:07:10,000 --> 02:07:15,200
हूं कि जो पाप करते हैं वह किस कहा जाते हैं मृत्यु के

1634
02:07:15,200 --> 02:07:19,640
बादन पहुच जाए व मान शरीर नहीं मि

1635
02:07:19,640 --> 02:07:23,800
करने शास्त्र कर्म ना करने वालों को शास्त्रों के अनुसार

1636
02:07:23,800 --> 02:07:28,040
ना चलने वालों को ब्रह्म लोक जो ब्रह्म आपका जो काल ब्रह्म है वो मिलता

1637
02:07:28,040 --> 02:07:31,360
है य मैं दिखा दूं

1638
02:07:31,360 --> 02:07:35,400
आपको पाप करने वालो पर जो शास्त्र ओम नाम

1639
02:07:35,400 --> 02:07:39,800
की तो बताया भवान जी के लिए अरे चाहे व पाप

1640
02:07:39,800 --> 02:07:44,440
करहे वो पाप करे चाहे

1641
02:07:44,440 --> 02:07:47,520
वो की पूजा करें वो

1642
02:07:47,520 --> 02:07:51,640
पहुंचते वही ब्रह्म के पास है र पाप करने वाले का

1643
02:07:51,640 --> 02:07:57,640
जाएंगे पाप करने वाले आपके परमात्मा के पास तो जाएंगे

1644
02:07:57,760 --> 02:08:02,160
नहीं नहीं ये भी परमात्मा अवस्था है ब्रह्म भगवान की ये भी परमात्मा

1645
02:08:02,160 --> 02:08:06,200
अवस्था है पर उनसे अलग है सतलो कबीर साब से अलग है अच्छा

1646
02:08:06,200 --> 02:08:11,360
सय भी अपने स परमात्मा है ब्रह्म परमात्मा

1647
02:08:11,360 --> 02:08:15,520
है हां अपने सत के है जितनी मतलब उन

1648
02:08:15,520 --> 02:08:19,840
लिखा है ब्रह्म को परमात्मा रामपाल

1649
02:08:19,840 --> 02:08:22,960
ने कहां माना है बताओ

1650
02:08:22,960 --> 02:08:28,960
काफी सारी वीडियो में अपने अपने स् के सब परमात्मा है विष्णु

1651
02:08:29,320 --> 02:08:35,320
जी ब्रह्म को परमात्मा कहां पर लिखा है आपके

1652
02:08:35,320 --> 02:08:40,840
इसने आपके रामपाल

1653
02:08:40,840 --> 02:08:44,840
ने अपने अपने स के परमात्मा

1654
02:08:44,840 --> 02:08:50,440
ख अच्छा परमात्मा का अर्थ क्या

1655
02:08:50,440 --> 02:08:54,600
है परमात्मा त है जो आपको बताया

1656
02:08:54,600 --> 02:08:58,720
लोक में रहते है त की बात करोगे और जी तुम सबके अंदर रम

1657
02:08:58,720 --> 02:09:02,240
रहे

1658
02:09:02,240 --> 02:09:06,640
हैं परमात्मा शब्द

1659
02:09:06,640 --> 02:09:11,240
क्या परमात्मा शब्द का अर्थ क्या बता श रूप

1660
02:09:11,240 --> 02:09:17,240
में भाई साहब

1661
02:09:18,400 --> 02:09:22,440
परमात्मा परमात्मा शब्द का अर्थ क्या है परमात्मा बता

1662
02:09:22,440 --> 02:09:26,440
दो हा परमात्मा इसके

1663
02:09:26,440 --> 02:09:30,680
अर्थ में कहीं पर ये आ रहा है क्या ये लिख कर के आ रहा है क्या कि वह अपने लोक

1664
02:09:30,680 --> 02:09:36,680
में जो परम हो वह परमात्मा होता

1665
02:09:36,840 --> 02:09:41,000
है परमात्मा का शब्द मालिक भी तो हो गया अपने अपने श

1666
02:09:41,000 --> 02:09:45,040
का मालिक ये परमात्मा का ये अर्थ कहां पर

1667
02:09:45,040 --> 02:09:51,040
लिखा है अपने अपने लोग का मालिक होगा उसको भी परमात्मा कहा जाएगा

1668
02:09:56,160 --> 02:10:01,400
शास्त्र में लिखा कहां लिखा कहां पे हां

1669
02:10:01,400 --> 02:10:05,760
लिखा परमात्मा कह सकते भगवान कह सकते हो अपने अपने सतक है अपने

1670
02:10:05,760 --> 02:10:10,040
अपने सक इंसान भी अपने अप ऐसे बात नहीं होती है ना आप तो शास्त्र सम्मत

1671
02:10:10,040 --> 02:10:14,520
भक्ति करते हैं ना भाई

1672
02:10:14,520 --> 02:10:18,560
साहब हम मैं लेक बैठ नहीं अब

1673
02:10:18,560 --> 02:10:24,560
मैं अब मेरी बात सुनो मैं आपको थोड़ा बताऊ

1674
02:10:24,760 --> 02:10:29,000
कि पितृ पूजा करने वाले परमात्मा

1675
02:10:29,000 --> 02:10:33,920
को प्राप्त होते हैं यह मैं लिखा दिखा

1676
02:10:33,920 --> 02:10:37,920
दूं परमात्मा को भगत जी कैसे कृष्ण जी ने मना कर दिया ब्रह्म

1677
02:10:37,920 --> 02:10:42,000
भगवान जी मना कर दिया साब देखिए

1678
02:10:42,000 --> 02:10:46,320
शास्त्रों में जब दो तरह की बातें हो रही होती है तो हमें ऐसा अर्थ निकालना

1679
02:10:46,320 --> 02:10:50,400
होता है कि दोनों में से एक भी बात कटे नहीं इसके बारे में भी मेरे

1680
02:10:50,400 --> 02:10:54,840
पास प्रमाण व्यास स्मति पांचवा दूसरा अध्याय

1681
02:10:54,840 --> 02:10:59,280
उसका पांचवा वो है ठीक है श्लोक और

1682
02:10:59,280 --> 02:11:03,440
मनुस्मृति में भी है मगर मैं अभी फिलहाल बात ये कर रहा हूं

1683
02:11:03,440 --> 02:11:07,840
कि पितृ पूजा करने वाले भी भगवान

1684
02:11:07,840 --> 02:11:13,200
आपका कबीर है ना जो उसको प्राप्त हो रहे हैं दिखा

1685
02:11:13,200 --> 02:11:17,400
दूं ना प्राप्त जब होंगे ना वो त्याग उसे त्याग

1686
02:11:17,400 --> 02:11:22,120
के आगे बढ़ेंगे तब हो जाएंगे त्यागना पड़ती है अवस्था

1687
02:11:22,120 --> 02:11:26,160
डायरेक्ट हो रहे पित पूजा करने वाले पि पूजा करने

1688
02:11:26,160 --> 02:11:30,600
वाले प्राप्त हो रहे हैं परमात्मा

1689
02:11:30,600 --> 02:11:31,600
को

1690
02:11:31,600 --> 02:11:35,720
प्राप्त ऐ अवस्था छोड़नी पड़ेगी आगे बढ़ना पड़ेगा जब हो

1691
02:11:35,720 --> 02:11:39,880
ना क्लास तो छोड़नी पड़ेगी आगे बढ़ नहीं है ना कि छोड़नी

1692
02:11:39,880 --> 02:11:45,880
पड़ेगी ये नहीं ये नहीं लिखा है में जाने के लिए दवी छोड़नी

1693
02:11:46,120 --> 02:11:50,200
पड़ेगी मैं एक बात बता रहा हूं आपने एक बात कही कि पाप

1694
02:11:50,200 --> 02:11:55,440
कर्म करने वाले ब्रह्म के लोक में भी नहीं जाते हैं

1695
02:11:55,440 --> 02:11:59,080
यानी परमात्मा के लोक

1696
02:11:59,080 --> 02:12:03,200
में नहीं जा सकते नहीं जाएंगे ना हा जब तक व

1697
02:12:03,200 --> 02:12:07,920
बरे त्याग देंगे मान ज ले सही भक्ति नहीं करेंगे शास्त्र का आधार

1698
02:12:07,920 --> 02:12:12,040
पर ठीक है ठीक तो मतलब वो जैसे ही वो

1699
02:12:12,040 --> 02:12:16,760
बुरे कर्म करने वाला अपनी दे का नाश मतलब मृत्यु को प्राप्त होगा तो ऑटोमेटिक

1700
02:12:16,760 --> 02:12:20,800
वो जो है नरक में चला जाएगा या फ 84 लाख योनियों में अगला जन्म

1701
02:12:20,800 --> 02:12:25,400
ले ट अगर पुण हो थोड़

1702
02:12:25,400 --> 02:12:29,600
मिल आपको लालिए जेलिए बना

1703
02:12:29,600 --> 02:12:32,560
में

1704
02:12:32,560 --> 02:12:35,240
जाओ

1705
02:12:35,240 --> 02:12:39,320
जाएगा नहीं व बता जब तक नहीं जाएगा जब

1706
02:12:39,320 --> 02:12:43,520
तक जम आक सार भक्ति नहीं करेगा शस्त्र

1707
02:12:43,520 --> 02:12:49,200
के आधार पर जब तक नहीं जाएगा इनको दिखा दो

1708
02:12:49,200 --> 02:12:55,200
भाई पापी लोग पर के लोक में जा रहे

1709
02:12:55,200 --> 02:13:01,200
हैं जीने की राह पेज

1710
02:13:02,480 --> 02:13:06,800
नंबर 10 और आठ

1711
02:13:06,800 --> 02:13:10,840
पहले 10 दिखा दो दसवे का

1712
02:13:10,840 --> 02:13:16,120
लास्ट पैराग्राफ है लास्ट यह

1713
02:13:16,120 --> 02:13:20,720
देखिए परमात्मा के दरबार में मृत्यु के उपरांत पापों

1714
02:13:20,720 --> 02:13:25,120
की माल गाड़ी भरकर मृत्यु के उपरांत परमात्मा के दरबार में मुंह

1715
02:13:25,120 --> 02:13:29,000
लटका

1716
02:13:29,000 --> 02:13:33,040
कर हो गया और और दिखा दो इसके

1717
02:13:33,040 --> 02:13:39,040
आगे वो आठवा पेज दिखाओ

1718
02:13:41,640 --> 02:13:47,640
आठवा इसमें सबसे बड़ा पैराग्राफ जो होगा आठवे पेज का

1719
02:13:52,440 --> 02:13:58,440
और ऊपर आठवा ही

1720
02:13:59,280 --> 02:14:05,280
हैय ये आठवा है

1721
02:14:16,960 --> 02:14:21,200
क्या कौन सी जन गंगा है

1722
02:14:21,200 --> 02:14:25,360
कौन सी वाली गीता इसमें

1723
02:14:25,360 --> 02:14:29,520
सबसे बड़ा वाला पैराग्राफ है जो वो है और

1724
02:14:29,520 --> 02:14:34,360
ऊपर थोड़ा हा उस परमात्मा के दरबार

1725
02:14:34,360 --> 02:14:40,360
में ठीक

1726
02:14:43,840 --> 02:14:49,840
है और ऊपर थोड़ा सा

1727
02:14:52,920 --> 02:14:56,920
परमात्मा के घर में जाकर पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ नहीं हाथ लगेगा ये

1728
02:14:56,920 --> 02:15:00,280
परमात्मा के घर क्यों जा रहा है

1729
02:15:00,280 --> 02:15:04,400
भाई परमात्मा के घर जा रहा हैय व

1730
02:15:04,400 --> 02:15:08,400
परमात्मा के परमात्मा के घर नहीं है व पहले ही

1731
02:15:08,400 --> 02:15:12,400
रास्ते में खड़े राज कर लेते व कैसे चला जाएगा

1732
02:15:12,400 --> 02:15:16,840
तो ये लिखा है ना आपके परमात्मा के घर जाकर होगा वो होगा

1733
02:15:16,840 --> 02:15:22,680
हटा लो ये लिखा है ना

1734
02:15:22,680 --> 02:15:27,280
नंबर धर्म धर्मराज के धर्मराज

1735
02:15:27,280 --> 02:15:32,760
होता है तो परमात्मा की रस्ता बता व उसके लिए कहा जा रहा है व नहीं जा सकता

1736
02:15:32,760 --> 02:15:36,880
पर आपको सीधे सधे दिखाया है परमात्मा के घर

1737
02:15:36,880 --> 02:15:42,880
जाकर परमात्मा के लोक में

1738
02:15:45,600 --> 02:15:48,200
जाकर

1739
02:15:48,200 --> 02:15:52,200
सेकंड यानी जाता तो है निकाल के फेंक दिए जाएंगे

1740
02:15:52,200 --> 02:15:56,400
बाद की बात है जाता तो है वो धर्म केर

1741
02:15:56,400 --> 02:16:00,480
में खड़े हो जाते फैसला होता क्या किया क्या नहीं हम

1742
02:16:00,480 --> 02:16:04,560
आपको लिखा दिखा रहे परमात्मा के घर जा रहा है ये नहीं मानते रामपाल ने गलत लिखा

1743
02:16:04,560 --> 02:16:09,040
है य नहीं जाता राम वो परमात्मा के घर

1744
02:16:09,040 --> 02:16:13,360
रामपाल ने गलत पनला य पर बीच में रोक लिया है ना जाहा

1745
02:16:13,360 --> 02:16:18,040
कहा रोक लिया दोबारा दिखाओ दवा पेज इनको दोबारा दिखाओ बीच में

1746
02:16:18,040 --> 02:16:24,040
दवा पेज दोबारा दिखाओ इनको

1747
02:16:27,560 --> 02:16:32,240
ऊपर अलवा ये देखो

1748
02:16:32,240 --> 02:16:36,320
परमात्मा के दरबार में लटका कर

1749
02:16:36,320 --> 02:16:40,440
ओ भैया परमात्मा के दरबार

1750
02:16:40,440 --> 02:16:45,960
में लटका कर खड़ा हो

1751
02:16:45,960 --> 02:16:50,320
जाएगा हा तो ये गलत लिखा हैने रामपाल

1752
02:16:50,320 --> 02:16:56,320
ने हटा लो दवा पेज है

1753
02:16:56,680 --> 02:17:00,680
दसवा कंप्यूटर स्क्रीन के हिसाब से दसवा है आपकी किताब के

1754
02:17:00,680 --> 02:17:06,680
हिसाब से है दूसरा

1755
02:17:09,080 --> 02:17:14,360
नंबर बस हटा लीजिए

1756
02:17:14,360 --> 02:17:20,360
बस देखी पट

1757
02:17:22,720 --> 02:17:27,720
ति के पश्चा परमात्मा दर में खड़ा होता है देख य

1758
02:17:27,720 --> 02:17:32,000
कौन पज दूसरा बता अपनी बातों

1759
02:17:32,000 --> 02:17:36,960
को सिद्ध करने के लिए अपने गुरु की गुरु की बातों का ही खंडन करने लगे

1760
02:17:36,960 --> 02:17:41,800
वो कर चुके पहले कई बार उनका क्यों कर उ क कर

1761
02:17:41,800 --> 02:17:46,560
हा करा तुमने कर रहे हो ना आप अभी

1762
02:17:46,560 --> 02:17:51,160
कहां करा क करा बताओ अभी आप

1763
02:17:51,160 --> 02:17:53,520
निराकार

1764
02:17:53,520 --> 02:17:58,200
है हां तो दिखाऊ वीडियो दिखा दू क्या खा चलिए वी चला

1765
02:17:58,200 --> 02:18:01,000
तो तुम

1766
02:18:01,000 --> 02:18:05,840
लोग फिर ये क्यों कहते हो परमात्मा कहो ना निराकार

1767
02:18:05,840 --> 02:18:10,200
है वो तीसरी अवस्था में है ना सतलोक में सतलोक में साकार

1768
02:18:10,200 --> 02:18:14,440
है तो भाई पूरी बात क्यों नहीं बता रहे तुम लोगों को कि वो

1769
02:18:14,440 --> 02:18:19,160
सतलोक वाला जो रूप है वो असली रूप नहीं है उससे और भी कोई रूप है

1770
02:18:19,160 --> 02:18:23,760
ऊपर बता तो सत्संग में सारा बता दिया है

1771
02:18:23,760 --> 02:18:24,260
सारा

1772
02:18:24,120 --> 02:18:28,120
बता दिया तीन चर हज वीडियो एकदम तो सुन नहीं लेगा कोई भगत आदमी धीरे धीरे तो सुन

1773
02:18:28,120 --> 02:18:32,240
पाएगा ना वो चलो तुम अ पहले ये वाली

1774
02:18:32,240 --> 02:18:36,840
बात करो फिर फिर उसपे आएंगे निराकार वाले मैं वीडियो

1775
02:18:36,840 --> 02:18:41,920
दिखाती क्या कहते आ बा पहले बात करो

1776
02:18:41,920 --> 02:18:46,360
तुम कौन सी वाली कि परमात्मा

1777
02:18:46,360 --> 02:18:50,360
के लोक में जा रहा है कि नहीं जा रहा है आदमी पाप कर्म करने वाला जीने की

1778
02:18:50,360 --> 02:18:55,480
रात कौन सी

1779
02:18:55,480 --> 02:18:59,840
लानन सेकंड पेज सेकंड

1780
02:18:59,840 --> 02:19:05,840
म दूसरा

1781
02:19:08,160 --> 02:19:12,520
हैम परमात्मा के दरबार में ले जाया जाएगा

1782
02:19:12,520 --> 02:19:18,520
जाएगा

1783
02:19:27,760 --> 02:19:31,920
गीता जी में तो निराकार स्वरूप की तो भर भर के प्रमाण है

1784
02:19:31,920 --> 02:19:37,920
बावा अध्याय पढ़ोगे तो पूरा निराकार के रूप

1785
02:19:45,080 --> 02:19:49,400
में साकार भी है निराकार भी है ये भगत

1786
02:19:49,400 --> 02:19:53,480
जी उसके लिए कहा व जाएंगे दरबार में तो परमात्मा थ मला

1787
02:19:53,480 --> 02:19:59,480
धम के लिए खड़े हो जा नीचे

1788
02:19:59,520 --> 02:20:03,880
कुते बात नहीं होती है लिखा दिखा धर्मराज है व पर परमात्मा

1789
02:20:03,880 --> 02:20:06,840
नहीं

1790
02:20:06,840 --> 02:20:11,080
है अगर धर्मराज परमात्मा है तो धर्मराज परमात्मा लिखा

1791
02:20:11,080 --> 02:20:15,120
दिखाइ कहा पर है मैं बता र मृत्यु

1792
02:20:15,120 --> 02:20:19,240
उपरांत परमात्मा के दरबार में मुह लटका कर भयभीत होकर

1793
02:20:19,240 --> 02:20:23,640
जाएगा कुते सर के जन्म पाएगा बात ये है ना व

1794
02:20:23,640 --> 02:20:27,760
फैसला चे अब देखो कितना तुम लोग अपनी

1795
02:20:27,760 --> 02:20:33,640
बात पलटते हो अभी अभी ये कह रहे रास्ते में ही पकड़ लेगा धर्मराज अब

1796
02:20:33,640 --> 02:20:37,840
अपने आप आप स्कन खुद पढो वो परमात्मा

1797
02:20:37,840 --> 02:20:42,080
के यहा नहीं जाता वो धर्मराज के पास जाएगा धर्मराज उसको रास्ते में पकड़ लेगा नरक

1798
02:20:42,080 --> 02:20:47,280
जाएगा 84 लाख योयो में

1799
02:20:47,280 --> 02:20:53,280
जाएगा अब प्रधानमंत्री चे

1800
02:20:57,040 --> 02:21:00,160
पूरी बात कहा करो

1801
02:21:00,160 --> 02:21:02,560
ना

1802
02:21:02,560 --> 02:21:06,800
क्या पूरी बात कहा करो नीचे भी तो लिखा है कुत्ते क सर की

1803
02:21:06,800 --> 02:21:11,440
सर के जन्म पाएगा फिर वो बात ये है ना तो क्या हुआ वहा से फेंक दिया जाएगा

1804
02:21:11,440 --> 02:21:15,800
परमात्मा के लोक में गया कि नहीं गया लो

1805
02:21:15,800 --> 02:21:19,920
ऐसा ज प्रधानमंत्री होता है उसके नीचे बैठे होते हैं कार्य

1806
02:21:19,920 --> 02:21:24,080
करने वाले तो परमात्मा के दरबार में गया कि नहीं गया

1807
02:21:24,080 --> 02:21:28,240
परमात्मा के घर प गया कि नहीं गया दरबार

1808
02:21:28,240 --> 02:21:33,320
ना की परमात्मा के पास दरबार परमात्मा के घर गया कि नहीं गया घर

1809
02:21:33,320 --> 02:21:37,360
घर घर कैसे चला गया वो रस्ते में रोक दिया फेंक दिया मैं पूछ रहा

1810
02:21:37,360 --> 02:21:41,880
हूं परमात्मा के घर गया कि नहीं गया घर परमात्मा का

1811
02:21:41,880 --> 02:21:46,480
घर परमात्मा का दरबार लिखा हुआ दरबार ना कि उसके

1812
02:21:46,480 --> 02:21:52,120
परमा नहीं पूछ रहा हूं परमात्मा के घर गया कि नहीं गया

1813
02:21:52,120 --> 02:21:55,040
नहीं घर क गया

1814
02:21:55,040 --> 02:21:59,280
पक्का अरे दरबार अलग है घर अलग है भत जीसे

1815
02:21:59,280 --> 02:22:02,480
पूछ रहा हूं घर गया कि नहीं गया इस टको ना अपनी

1816
02:22:02,480 --> 02:22:08,000
बात प मजबूत क्यों नहीं रहते हो घर कहां

1817
02:22:08,000 --> 02:22:12,360
जाएगी आपसे पूछ रहा घर गया नहीं

1818
02:22:12,360 --> 02:22:18,360
नहीं घर नहीं गया घर नहीं गया इनको पीछे आठ नंबर वाला पन्ना

1819
02:22:18,560 --> 02:22:22,680
दिखाओ ये फिर फसने वाला

1820
02:22:22,680 --> 02:22:26,760
शायद फसाने से ना फसाने से बात नहीं होती आप खुद खुद

1821
02:22:26,760 --> 02:22:30,760
समझिए इस बात को पापी आदमी अगर मोक्ष पा जाए तो हो गया काम भक्ति की

1822
02:22:30,760 --> 02:22:34,920
क्या जरूरत है फिर तो पाप करेंगे नहीं कर रहा आपकी बातें गलत है आपका तत्वदर्शी

1823
02:22:34,920 --> 02:22:39,040
गलत लिखता है ये बता रहा हूं आपको मैं अरे नहीं अब

1824
02:22:39,040 --> 02:22:43,040
आपको समझ में गलत आ हम क्या कर सकते हैं आप आप देखिए आपने

1825
02:22:43,040 --> 02:22:47,200
कहा घर नहीं गया अब मैं आपको घर दिखा रहा हूं

1826
02:22:47,200 --> 02:22:51,320
ये देख अब एक दो शब्द में फसा लेना ये कोई वो बात हो रही देखो परमात्मा

1827
02:22:51,320 --> 02:22:56,080
के घर में जाकर इसको देखो सबसे पहली लाइन पढ़ो इस समय स्क्रीन पर क्या लिखी

1828
02:22:56,080 --> 02:23:00,240
है इनको पेज नंबर बता दो भैया

1829
02:23:00,240 --> 02:23:05,680
पेज नंबर कौन सा है इनकी बुक का खोलो यह

1830
02:23:05,680 --> 02:23:11,680
भूमिका पहला पहला प्रश्न खोलो अपनी बुक में पहला

1831
02:23:14,560 --> 02:23:18,760
प्रश्न खोल लिया इसी में थोड़ा ऊपर जाइए

1832
02:23:18,760 --> 02:23:24,200
भैया ऊपर जाइए जरा

1833
02:23:24,200 --> 02:23:29,080
वो लाइन क परमात्मा के घर में जाएगा मुह लटका कर खड़ा हो जाएगा

1834
02:23:29,080 --> 02:23:33,080
अभी सबसे पहली लाइन वही तो थी अभी हा ये देखिए यह पढ़ो

1835
02:23:33,080 --> 02:23:37,080
ये लाइन अब देखो आप फस गए

1836
02:23:37,080 --> 02:23:41,080
परमात्मा के घर पहुंचा कि नहीं पहुंचा य तो

1837
02:23:41,080 --> 02:23:45,360
क्या मोक्ष हो गया उसका मैं कहा कह रहा हूं मोक्ष हो गया अभी

1838
02:23:45,360 --> 02:23:50,600
तुमने कहा परमात्मा के घर नहीं दरबार पहुंचा है

1839
02:23:50,600 --> 02:23:54,800
चार बार पूछा घर पहुचा कि नहीं पहुचा तुमने कहा घर नहीं दरबार घर नहीं दरबार अब मैंने

1840
02:23:54,800 --> 02:23:58,880
घर दिखा दिया तो अब क्या मोक्ष हो गया

1841
02:23:58,880 --> 02:24:03,840
नहीं तो मान ली घर दर मत

1842
02:24:03,840 --> 02:24:08,520
पहु मानने से काम नहीं चलता है क्यों मान ले

1843
02:24:08,520 --> 02:24:14,280
खरी बात क खरी दो प्रकार की बात

1844
02:24:14,280 --> 02:24:18,320
नहीं सुनो आप य मान लेना तब कह देते

1845
02:24:18,320 --> 02:24:22,400
चलो मान लो घरही गया हो उससे क्या मतलब थोड़ी ना मिला मगर तब क्या कहा था नहीं

1846
02:24:22,400 --> 02:24:26,600
घर थोड़ी ना गया है दरबार गया है

1847
02:24:26,600 --> 02:24:30,920
चार बार कहा घर नहीं गया दरबार गया

1848
02:24:30,920 --> 02:24:36,920
आपने पहले देख लिया होगा ना व सारा तो हम ऐसे ही थोड़ी ना बात करते

1849
02:24:37,240 --> 02:24:41,240
हैं कोई बात तो वहा रुक नहीं सकती जीमा चला तो व रुक

1850
02:24:41,240 --> 02:24:45,360
नहीं सकती पाप आसे क आप पहले क अभी

1851
02:24:45,360 --> 02:24:51,360
से दो मिनट पहले आप गुरु विरोध कर रहे थे अपना कहिए

1852
02:24:51,560 --> 02:24:56,000
ग गुरु विरो क्यों करेंगे क्यों गुरु ने लिखा था कि घर गई

1853
02:24:56,000 --> 02:25:00,080
आप कह रहे घर नहीं दरबार गई मैंने चार बार पूछा घर गई कि नहीं गई आपने

1854
02:25:00,080 --> 02:25:04,400
कहा नहीं घर नहीं जी अब ऐ ऐसा तो आप सब भी विरोध

1855
02:25:04,400 --> 02:25:10,400
करवा रहे हो गुरु भगवान सब क्या कहते पि

1856
02:25:12,200 --> 02:25:16,400
पूजाते इसलिए कहते अधूरी जानकारी प आप उसको जब

1857
02:25:16,400 --> 02:25:21,080
आप उसम कन्फर्म नहीं है तो उस चीज के लिए क्यों आ कर के लड़ रहे हैं

1858
02:25:21,080 --> 02:25:26,840
आपकी हर चीज आपको छोड़नी पड़ रही

1859
02:25:26,840 --> 02:25:30,960
है ना मैं रहा इतनी

1860
02:25:30,960 --> 02:25:35,120
सी बात है पापी आत्मा कैसे टिक जाए स गीता की वो

1861
02:25:35,120 --> 02:25:41,120
चीज मानोगे जो वेद विरुद्ध होंगी कि नहीं

1862
02:25:42,680 --> 02:25:47,880
मानोगे देखो कितना दिक्कत है इसको कहते

1863
02:25:47,880 --> 02:25:52,200
हमसे पूछे कोई हमारा सिद्धांत सटा सिद्धांत बताएंगे यह

1864
02:25:52,200 --> 02:25:56,440
है सिद्धांत नता व्यक्ति बोलने में घबराता

1865
02:25:56,440 --> 02:26:00,800
है अरे कैसे सिद्धांत है तुम्हारे वेद शस्त्र

1866
02:26:00,800 --> 02:26:04,960
सब परमात्मा दिखा इ गलत

1867
02:26:04,960 --> 02:26:09,080
इन्ह गलत हम क्यों मानेंगे इनसे ही तो परमात्मा की दस्ता वेद को क्यों

1868
02:26:09,080 --> 02:26:15,080
मानेंगे बताओ मैं आपसे ये पूछ रहा हूं मैंने जो

1869
02:26:15,400 --> 02:26:19,400
पूछा मैंने जो पूछा है उसका जवाब दो गीता की ऐसी

1870
02:26:19,400 --> 02:26:23,560
बात मानोगे वेदों के बाहर होगी वेदों से मेल नहीं खा रही होगी वेदों का विरोध

1871
02:26:23,560 --> 02:26:27,480
कर रही होगी कि नहीं

1872
02:26:27,480 --> 02:26:31,760
मानोगे जो परमात्मा का जो रास्ता बता र वो सारे वेद मान्य

1873
02:26:31,760 --> 02:26:37,240
होंगे चाहे वो वेद हो उपनिषद हो या गीता हो दे

1874
02:26:37,240 --> 02:26:42,600
पर मैंने आपसे क्वेश्चन क्या पूछा है भाई

1875
02:26:42,600 --> 02:26:47,160
साहब क्या क्वेश्चन पूछा बाहर और अंदर सुना

1876
02:26:47,160 --> 02:26:52,960
बाहर और अंदर से क्या मतलब है परमात्मा की

1877
02:26:52,960 --> 02:26:57,080
आपसे मैं पूछ रहा हूं गीता की जो बात वेद से मैच नहीं

1878
02:26:57,080 --> 02:27:03,080
खाएगी वो आप मानते हो कि नहीं मानते

1879
02:27:03,080 --> 02:27:07,600
हो गीता की बात वेदों से मैच नहीं ई

1880
02:27:07,600 --> 02:27:13,200
व्यक्ति को और तलवार की धार प रहना पड़ता

1881
02:27:13,200 --> 02:27:17,200
है ये भाई लवाई नी बता तो दिया मैंने आपके लिए सारा

1882
02:27:17,200 --> 02:27:21,880
बता दिया जो परमात्मा की रस्ता बता सारे वेद मान्य है वो आप

1883
02:27:21,880 --> 02:27:26,080
बहुत कुछ होता अपने सितो की रक्षा करने नहीं आए हो सब

1884
02:27:26,080 --> 02:27:30,480
पहले तोय समझ लो क्योंकि आपको आपके सिद्धांत क्लियर नहीं है जिसको जिसके सिद्धांत

1885
02:27:30,480 --> 02:27:34,840
क्लियर होते हैं वो अपने सिद्धांत बोलता है ना भाई हा

1886
02:27:34,840 --> 02:27:39,400
अगर गीता से और वेद की बात है अगर गीता की कोई बात वेद का विरोध करेगी

1887
02:27:39,400 --> 02:27:43,720
उसको नहीं मानेंगे यह सिद्धांत है मगर आपको अपने सिद्धांतों की रक्षा

1888
02:27:43,720 --> 02:27:48,080
नहीं करनी है सिद्धांतों की रक्षा तो तब करोगे जब सिद्धांत पता होंगे

1889
02:27:48,080 --> 02:27:52,120
तो आपको य क्या करना है पता है किसी तरीके से रामपाल का

1890
02:27:52,120 --> 02:27:57,160
विरोध करने वाले का विरोध करना है भले ही

1891
02:27:57,160 --> 02:28:01,400
उ विरोध क्यों ना करना पड़ जाए नहीं सारी आत्मा

1892
02:28:01,400 --> 02:28:05,920
परमिता परमात्मा की है कोई किसी का विरोध नहीं है रजत प्रेम का म पर

1893
02:28:05,920 --> 02:28:09,920
प्रेम के पाय प्रेम

1894
02:28:09,920 --> 02:28:14,240
से गमा गीता की लो अब भाई साब जाइए आप

1895
02:28:14,240 --> 02:28:20,240
ठीक है हो गया बहुत हो गया जा ठीक है

1896
02:28:21,720 --> 02:28:27,720
शिवा को धर्म स्थापना से कोई लेना देना नहीं है ना उची करने

1897
02:28:29,560 --> 02:28:35,560
आते ने चले ग

1898
02:28:35,680 --> 02:28:39,840
ह कोई बात सीधी सीधी बोलनी नहीं है कि यह सिद्धांत है

1899
02:28:39,840 --> 02:28:44,920
हमारा शंकर सिंह को

1900
02:28:44,920 --> 02:28:50,920
लो सिधांत

1901
02:28:51,000 --> 02:28:55,040
सिद्धांत ही अधूरे इनके से चर्चा करेंगे किस बात

1902
02:28:55,040 --> 02:28:59,280
पर चर्चा करेंगे पले परमात्मा

1903
02:28:59,280 --> 02:29:03,640
साकार ही है अब बताने लगे कि नहीं परमात्मा पहले निराकार फिर साकार

1904
02:29:03,640 --> 02:29:07,760
होगा और इनका विरोध बात कि नहीं यह

1905
02:29:07,760 --> 02:29:11,840
लोग निराकार कहते हैं अरे हम भी तो वही कहते निर्ग निराकार जो अपने

1906
02:29:11,840 --> 02:29:15,880
आप को व्यक्त करते हैं पाच रूपों में हा भैया शंकर

1907
02:29:15,880 --> 02:29:20,440
सिंह जी बोलिए मेरी आवाज आ रही है

1908
02:29:20,440 --> 02:29:24,880
हा सीधे बैठ के बात करिए भाई साब मैं सीध नहीं बैठ

1909
02:29:24,880 --> 02:29:30,240
हा सीधे नहीं बैठे ठीक है

1910
02:29:30,240 --> 02:29:35,520
बोलिए आप य भैया से जब क्वेश्चन कर रहे

1911
02:29:35,520 --> 02:29:39,720
थे आपका जो तर्जुमा जो है मतलब वो गलत आप इनको

1912
02:29:39,720 --> 02:29:43,760
गाइड कर रहे हो मतलब व बोल नहीं पा रहे इसका मतलब आप य मत य नहीं उनको

1913
02:29:43,760 --> 02:29:48,000
आप अपनी बात बोलिए भाई साब आप वहा पर जवाब दे रहे हैं उनसे

1914
02:29:48,000 --> 02:29:52,160
पूछे हुए प्रश्न का उनका जवाब यह है जैसा

1915
02:29:52,160 --> 02:29:56,160
आप बता रहे हो ना परमात्मा के घर जाकर पाप की जो लाइन बता रहे थे

1916
02:29:56,160 --> 02:30:00,120
आप जीने की रा से अभी

1917
02:30:00,120 --> 02:30:04,200
तो प्रश् चल रहा था अभी प्रश्न ये चल रहा था

1918
02:30:04,200 --> 02:30:08,200
की गीता की वो बात मानोगे जो वेद

1919
02:30:08,200 --> 02:30:13,160
से मैच नहीं खाएगी या नहीं

1920
02:30:13,160 --> 02:30:17,400
मानोगे वेद गीता और मब जैसे उनका सारांश है गीता

1921
02:30:17,400 --> 02:30:21,480
जी चार चारों वेद का भाई साहब मैंने आपसे

1922
02:30:21,480 --> 02:30:25,640
सवाल क्या बो गीता जी के अंदर वेद

1923
02:30:25,640 --> 02:30:29,640
की बात नहीं मिलेगी तो उसको नहीं मानेंगे हम नहीं मानेंगे तो ऐसे

1924
02:30:29,640 --> 02:30:33,760
बोलो ना क्यों लंबा खीच रहे हो लंबा क खच रहे

1925
02:30:33,760 --> 02:30:38,480
बोल रहे दो तीन बात और फालतू बोली

1926
02:30:38,480 --> 02:30:43,760
फल नहीं बोली आप लाइन की बता रहे हो दरबार में जाके मालि के दरब

1927
02:30:43,760 --> 02:30:48,720
में भी लिखा हुआ है तीसरे अध्याय के

1928
02:30:48,720 --> 02:30:53,440
पाच से आठ में श्लोक की व्याख्या करते समय आपके

1929
02:30:53,440 --> 02:30:57,480
जो जेल धाम निवासी रामपाल जी हैं उन्होंने भी इस बात को माना

1930
02:30:57,480 --> 02:31:01,640
है कि जो गीता की जो बात वेद

1931
02:31:01,640 --> 02:31:05,640
से मैच नहीं खाएगी वह स्वीकार नहीं है ठीक है

1932
02:31:05,640 --> 02:31:10,080
बिल्कुल नहीं है अब यह बताइए यह पितृ पूजा का जो

1933
02:31:10,080 --> 02:31:14,080
खंडन है यह गीता के अनुसार किया है कि

1934
02:31:14,080 --> 02:31:15,920
नहीं रामपाल जी

1935
02:31:15,920 --> 02:31:20,320
ने कौन सा पि पूजा

1936
02:31:20,320 --> 02:31:24,400
पित पूजा के लिए मना करते हैं ना गीता में बिल्कुल

1937
02:31:24,400 --> 02:31:28,600
मना करते हैं पि की पूजा करेंगे पित लोक में फिर उनके नौकर लगेंगे

1938
02:31:28,600 --> 02:31:32,840
फिर हा ठीक है तो करते हो आप

1939
02:31:32,840 --> 02:31:36,920
आप करते होंगे अरे भाई जब आगे जो बात पूछ रहा

1940
02:31:36,920 --> 02:31:41,840
वो करो अगर य मस्करा गिरी करने आए हो तो निकाल दिया जाएगा बहुत जल्दी

1941
02:31:41,840 --> 02:31:46,560
निकालने से कोई फायदा नहीं पालतू बात मत करना य पर

1942
02:31:46,560 --> 02:31:52,560
मस्कारा गिरी करोगे हटा दिया जाएगा

1943
02:31:59,240 --> 02:32:04,960
जो चर्चा करनी है वो तो नहीं बाबू राम

1944
02:32:04,960 --> 02:32:10,960
बोलो अच्छा बाबूराम बड़े प्यारे

1945
02:32:15,360 --> 02:32:19,880
हैं अब बाबूराम से मैं बात करूंगा

1946
02:32:19,880 --> 02:32:24,720
जी सर सबको नमस्ते नमस्ते नमस्ते आज क्या लाए हो नया बाबूराम

1947
02:32:24,720 --> 02:32:28,720
भैया आज जो हमारे शिवांश भैया का टॉपिक है उसी पर

1948
02:32:28,720 --> 02:32:32,840
बात करेंगे चसे करिए फिर चलो

1949
02:32:32,840 --> 02:32:36,920
बोलो नहीं मैं टीआर पहाड़ी जी से भी बात कर सकता हूं ऐसा कोई

1950
02:32:36,920 --> 02:32:41,360
दिक्कत नहीं है अरे अभी तुम बोलो जो बोलने आए वो बोलो अभी

1951
02:32:41,360 --> 02:32:45,640
हम यह बात करने आए हैं कि गरुड़ पुराण के आधार पर

1952
02:32:45,640 --> 02:32:50,080
आपने जो टॉपिक रखे हैं कि नरक मार्ग

1953
02:32:50,080 --> 02:32:54,240
नरक लोक में जाने के लिए और स्वर्ग लोक में जाने के लिए मक्ष प्राप्ति के लिए इसके बारे

1954
02:32:54,240 --> 02:32:58,360
में तो हम ये जानना चाहते हैं कि क्या

1955
02:32:58,360 --> 02:33:02,520
आप लोग ने लोगों को जब गरुड़ पुराण का पाठ सुनाते हैं तो

1956
02:33:02,520 --> 02:33:06,760
क्या बताते हैं कि यह मार्ग मोक्ष मार्ग है और यह मार्ग नरक

1957
02:33:06,760 --> 02:33:11,200
मार्ग है पहले एक बात कान खुल कर के

1958
02:33:11,200 --> 02:33:14,280
सुनो कि हमारा

1959
02:33:14,280 --> 02:33:18,720
जो धर्म है वो केवल गरुण पुराण से प्रतिपादित नहीं होता है

1960
02:33:18,720 --> 02:33:22,720
जी समझ गए जी तो आप हमें डेडलाइन नहीं दे सकते कि गरुण

1961
02:33:22,720 --> 02:33:27,080
पुराण के आधार पर ही बात होगी बात होगी सनातन

1962
02:33:27,080 --> 02:33:31,640
धर्म के आधार पर जिसमें की वेद है रामायण है

1963
02:33:31,640 --> 02:33:35,880
गीता है 18 महापुराण है और भी बहुत सारे ग्रंथ है ठीक

1964
02:33:35,880 --> 02:33:40,240
है अब आप अब आप अपनी बात अब आप अपनी बात बताइए

1965
02:33:40,240 --> 02:33:44,560
कि आपकी समस्या क्या है वो बताइए हमारा समस्या

1966
02:33:44,560 --> 02:33:48,600
यह है कि आपने अपने हेडिंग में लिखे हैं कि संत रामपाल जी महाराज

1967
02:33:48,600 --> 02:33:52,680
के वंशज लोग वो लोग मोक्ष प्राप्ति नहीं किए पितृ लोक में गए

1968
02:33:52,680 --> 02:33:56,800
इस प्रकार से आपने हेडिंग में लिखे हैं तो हम इसी को जानना चाहते हैं कि

1969
02:33:56,800 --> 02:34:00,800
आप लोगों ने जो पित पूजा करवाते हैं तो आपके भी वंशज तो पित लोक में

1970
02:34:00,800 --> 02:34:05,120
गए होंगे मोक्ष प्राप्ति नहीं किए प तो ये बताओ यह कहा लिखा

1971
02:34:05,120 --> 02:34:09,200
है कि पितृ लोक में प पित्रों की पूजा करने

1972
02:34:09,200 --> 02:34:13,560
से पितृ लोक प्राप्त होगा यह बताओ गीता अध्याय

1973
02:34:13,560 --> 02:34:17,560
न श्लोक नंबर 25 में लिखा हुआ है ठीक है अब मैंने

1974
02:34:17,560 --> 02:34:23,560
तुमसे पूछूंगा गीता की वो बात नगे जो वेद से मैच नहीं खाएगी

1975
02:34:23,920 --> 02:34:28,000
देखिए गीता में दो प्रकार का ज्ञान है देखा देखा

1976
02:34:28,000 --> 02:34:32,080
मेरे को सीधी बात बोलो जो बात वेद से मैच नहीं खाएगी वो मानोगे

1977
02:34:32,080 --> 02:34:36,080
कि नहीं दोनों ज्ञान अपने अपने लेवल

1978
02:34:36,080 --> 02:34:40,120
में अच्छे हैं अपने अपने लेवल में है मैं तुमसे पूछ रहा हूं जो बात वेद से

1979
02:34:40,120 --> 02:34:44,200
मैच नहीं खाएगी वो मानने की है कि नहीं अभी आपने बोला

1980
02:34:44,200 --> 02:34:48,560
कि गरुड़ पुराण का ज्ञान हम पूरा नहीं मानते हैं तो जो ज्ञान

1981
02:34:48,560 --> 02:34:53,280
अपने अपने लिए अपने अपने लेवल में अच्छा है आप बोले थे

1982
02:34:53,280 --> 02:34:57,440
आपने अभी बोले ण का पूरा नहीं मानते आपने अभी

1983
02:34:57,440 --> 02:35:01,560
बोले थे कि गरुड़ पुराण का जञा केवल गरुण पुराण से हमारा धर्म नहीं

1984
02:35:01,560 --> 02:35:06,080
है जब गरुड़ पुराण की कोई एक बात लिखी मिलेगी जो हमारे

1985
02:35:06,080 --> 02:35:10,240
सिद्धांतों को क्रॉस कर रही होगी तो हम सभी धर्म ग्रंथों से उसका

1986
02:35:10,240 --> 02:35:14,480
मिलान करेंगे और फिर सामंजस की शिक्षा मत पुराण

1987
02:35:14,480 --> 02:35:18,480
में ये भी लिखा है कि स्रोत स्मा धर्म का पालन करना

1988
02:35:18,480 --> 02:35:22,560
समस्त सुति स्मति शास्त्रों में सामंजस्य बिठा करके उसका ज्ञान

1989
02:35:22,560 --> 02:35:26,720
निकालना वो साधु समत धर्म है ऐसा थोड़ी ना करें ग

1990
02:35:26,720 --> 02:35:30,760
पुराण की कोई एक बात आ गई तो शिव पुराण में कुछ भी लिखा हो अथर्ववेद में कुछ

1991
02:35:30,760 --> 02:35:34,800
भी लिखा हो और सारे 17 महापुराण में कोई भी लिखा हो वो गरु पुराण की उस

1992
02:35:34,800 --> 02:35:38,800
बात का जो अर्थ आपके तत्वम ये जेलम निवासी जी बता रहे बस उनकी

1993
02:35:38,800 --> 02:35:39,300
बात

1994
02:35:38,960 --> 02:35:43,200
मान ली ऐसे नहीं दूसरों से भी मिलान करेंगे आप

1995
02:35:43,200 --> 02:35:47,200
अपने अभी सुनिए अभी टॉपिक से भटक मत अभी

1996
02:35:47,200 --> 02:35:51,680
हम यह कह रहे हैं कि जो भगवत गीता है उसके अनुसार

1997
02:35:51,680 --> 02:35:56,160
यह कहा गया है कि पित्रों की पूजा करने वाले पित लोग जाते हैं

1998
02:35:56,160 --> 02:36:00,280
जी ठीक है जी और अगर मैंने आपको दिखा दिया कि पितरों

1999
02:36:00,280 --> 02:36:05,160
की पूजा करने वाले कबीर के लोग जाते हैं तो कबीर की पूजा करना बंद कर

2000
02:36:05,160 --> 02:36:09,200
दोगे अभी हम गरु पुराण पर बात करने इसको गरु पुराण से भी दिखा सकते

2001
02:36:09,200 --> 02:36:13,600
हैं य हमारे पास गरु पुराण है देख लीजिए अरे मेरे भाई मैं आपसे

2002
02:36:13,600 --> 02:36:18,040
पूछ रहा हूं कि आप पुराण की गीता की

2003
02:36:18,040 --> 02:36:22,840
वो बातें मानोगे जो वेद के बाहर होंगी कि नहीं मानोगे

2004
02:36:22,840 --> 02:36:27,600
हम अभी गरु पुराण पर बात करेंगे अगर बात करना हो तो आपसे टी बात करा दीजिए

2005
02:36:27,600 --> 02:36:31,600
हम से बा पले आप पहले गरुण पुराण की बात बता दीजिए

2006
02:36:31,600 --> 02:36:37,600
चलिए

2007
02:36:40,160 --> 02:36:46,160
बता

2008
02:36:47,640 --> 02:36:53,640
बोलिए आप बहुत दिनों से गरुण प्रण लेकर के आते हैं

2009
02:36:54,080 --> 02:36:58,160
मगर अधूरे में वापस लौट जाते ये गरुण पुराण का

2010
02:36:58,160 --> 02:37:02,160
सवा अध्याय खोलने वाले हैं गरुण जी और विष्णु जी की बात

2011
02:37:02,160 --> 02:37:06,200
भगवान विष्णु की बातो का अ बहुत अध्याय है सर कहे

2012
02:37:06,200 --> 02:37:10,440
आप लोग टेंशन में पड़े हैं अरे

2013
02:37:10,440 --> 02:37:15,040
ठीक है ल लेने दो भाई शेर का बच्चा एक ही अच्छा बोलो

2014
02:37:15,040 --> 02:37:19,240
मैं भी मैं भी तो आप ही लोगों के बीच में पले पस के बड़े होकर तैयार हुए

2015
02:37:19,240 --> 02:37:24,280
हैं क्या हमारा अधिकार नहीं बनता है हमारा प्रन

2016
02:37:24,280 --> 02:37:28,280
म अपना काम करो कोई बात कोई बात नहीं

2017
02:37:28,280 --> 02:37:31,040
जी

2018
02:37:31,040 --> 02:37:35,640
सर हम आते हैं सर यहां पर अध्याय

2019
02:37:35,640 --> 02:37:39,960
पच अध्याय पाचवा अध्याय है सर

2020
02:37:39,960 --> 02:37:44,120
पाचवा अध्याय में लोक नंबर

2021
02:37:44,120 --> 02:37:50,120
श्लोक नंबर 32 एक मिनट

2022
02:38:03,440 --> 02:38:09,440
पांचवा अध्याय श्लोक नंबर 32

2023
02:38:10,040 --> 02:38:14,440
जी बोलो इसमें लिखा हुआ है कि मृतक

2024
02:38:14,440 --> 02:38:18,440
के एकादश में भोजन करने वाला कुत्ता बनता

2025
02:38:18,440 --> 02:38:22,640
है ग्राम यज्ञ के यज्ञ करने वाले देव

2026
02:38:22,640 --> 02:38:26,760
लक ब्राह्मण को कुक योनियों में प्राप्त होते हैं

2027
02:38:26,760 --> 02:38:30,840
एक मिनट रुको जी लोक नंबर 32

2028
02:38:30,840 --> 02:38:36,840
पांचवा अध्याय

2029
02:38:37,520 --> 02:38:43,520
जी यहां तो यह नहीं है

2030
02:38:46,160 --> 02:38:50,200
भाई यहां परा अन्य की बात हो रही है सरा प्राण नहीं खाते

2031
02:38:50,200 --> 02:38:54,400
ना वो जो श्र जो करते हैं व अरे यहां कहां लिखा है कुत्ते

2032
02:38:54,400 --> 02:38:58,640
की योनि वगैरा यहां तो 32 नंबर

2033
02:38:58,640 --> 02:39:02,720
में क्या लिखा है मैं बता दूं आपको जी 32 नंबर में

2034
02:39:02,720 --> 02:39:07,560
लिखा है इसके

2035
02:39:07,560 --> 02:39:11,680
पश्चात श्रद्धा ने काम को लक्ष्मी ने दर्प को धृति ने

2036
02:39:11,680 --> 02:39:15,840
नियम को दृष्टि ने संतोष को पुष्टि ने लोभ को मेदा

2037
02:39:15,840 --> 02:39:20,240
ने श्रुत को क्रिया ने दंड को लय तथा विनय को पुत्र रूपेण

2038
02:39:20,240 --> 02:39:24,280
जन्म दिया बुद्धि का पुत्र था बोध इसी प्रकार कीर्ति का

2039
02:39:24,280 --> 02:39:28,440
पुत्र था यश धर्म की 13 पत्नियों से इस प्रकार से

2040
02:39:28,440 --> 02:39:32,440
16 पुत्र उत्पन्न हुए धर्म पुत्र काम की पत्नी थी रति

2041
02:39:32,440 --> 02:39:36,640
काम का पुत्र था हर्ष इसके पश्चात दक्ष प्रजापति ने अश्वमेध यज्ञ

2042
02:39:36,640 --> 02:39:41,320
का प्रारंभ किया जिसमें पुत्री सती तथा

2043
02:39:41,320 --> 02:39:45,400
जा माता महादेव को छोड़कर सभी पुत्रियों तथा ज

2044
02:39:45,400 --> 02:39:51,080
माता को आमंत्रित किया था ये ज माता

2045
02:39:51,080 --> 02:39:55,360
निमंत्रित होने के कारण अपनी पत्नियों के साथ यज्ञ में आए यद्यपि सति

2046
02:39:55,360 --> 02:39:59,480
को निमंत्रण प्राप्त नहीं था तताप यह उसकी उपेक्षा किए बिना

2047
02:39:59,480 --> 02:40:01,360
यज्ञ देखने आई इससे

2048
02:40:01,360 --> 02:40:05,520
दक्ष ने उनका अपमान किया इसमें कहां है

2049
02:40:05,520 --> 02:40:09,520
सर पांचवा अध्याय में लिखा है पापियों का किन किन योनियों में जन्म होता है

2050
02:40:09,520 --> 02:40:14,760
इसके बारे में दिया है देखिए विष सूची से देखिए तो विष सूची

2051
02:40:14,760 --> 02:40:19,880
से आप अपना गरुण पुराण दिखाइए कौन सा है पहले

2052
02:40:19,880 --> 02:40:24,960
हमारा ग्रम पुराण है प्रकाशक सावित्री ठाकुर प्रकाशन

2053
02:40:24,960 --> 02:40:29,520
वाराणसी और इसका वाराणसी सर्वाधिकार

2054
02:40:29,520 --> 02:40:35,520
प्रकाशन मुद्रक सावित्री प्रिंटिंग प्रेस

2055
02:40:40,400 --> 02:40:44,400
वाराणसी इसमें पांचवा पाचवा जो पांचवा

2056
02:40:44,400 --> 02:40:48,680
अध्याय उस जी उसम खंड

2057
02:40:48,680 --> 02:40:53,320
देखो खंड कौन सा इसमें लिखा पंचम अध्याय

2058
02:40:53,320 --> 02:40:57,480
इसमें विष इसमें लिखा है कि पापियों का किन किन योनियों में जन्म

2059
02:40:57,480 --> 02:41:02,120
होता है अरे मेरे भाई खंड कौन सा है पूर्व खंड है उत्तर खंड

2060
02:41:02,120 --> 02:41:06,440
है इसमें तो सर खंड नहीं दिया गया सिर्फ अध्याय ही दे दिया गया है

2061
02:41:06,440 --> 02:41:10,680
डायरेक्ट हा तो पांचवा खंड वो नहीं है नाम बताओ

2062
02:41:10,680 --> 02:41:14,680
खंड वो अध्याय का नाम क्या बोल हो पापियों का

2063
02:41:14,680 --> 02:41:20,680
किन किन योनियों में जन्म होता है

2064
02:41:36,560 --> 02:41:40,760
हमें नहीं मिल रहा तो ऐसे पढ़

2065
02:41:40,760 --> 02:41:44,440
सकते

2066
02:41:44,440 --> 02:41:48,600
हैं ऐसे मैं पढ़ सकता हूं पापियों का किन किन योनियों

2067
02:41:48,600 --> 02:41:53,400
में जन्म होता है ही नहीं इसमें

2068
02:41:53,400 --> 02:41:57,640
तो पढ़िए पढ़िए क्या लिखा ये आपके प्रश्न संख्या

2069
02:41:57,640 --> 02:42:02,120
कौन सी है ये बताओ हमारे पृष्ठ संख्या है

2070
02:42:02,120 --> 02:42:06,280
65 65 यानी शुरू का ही है ज्यादा आगे का नहीं

2071
02:42:06,280 --> 02:42:10,400
है जी सर अरे यहां प की बात

2072
02:42:10,400 --> 02:42:14,520
करी है इसमें हो गया पढ़ देते हैं जैसा आप लोगों

2073
02:42:14,520 --> 02:42:19,280
को इच्छा होहुआ कोई दिक्कत नहीं हमको इस पढ़ो

2074
02:42:19,280 --> 02:42:23,520
मृतक के मृतक के एकादश में भोजन करने वाला

2075
02:42:23,520 --> 02:42:28,040
कुत्ता होता है ग्राम यज्ञ करने वाला देवल

2076
02:42:28,040 --> 02:42:32,520
ब्राह्मण को कुकुट योनियों में प्राप्त होते हैं य

2077
02:42:32,520 --> 02:42:36,840
ग्राम ञ क्या बोला क्या ग्राम

2078
02:42:36,840 --> 02:42:42,360
ग्राम यज्ञ करने वाले

2079
02:42:42,360 --> 02:42:46,880
देवलकर उसकी क्या है संस्कृत

2080
02:42:46,880 --> 02:42:50,720
पढ़ रहे सर 3 का

2081
02:42:50,720 --> 02:42:55,160
मृत मृत इसक का एकादश त बुजन

2082
02:42:55,160 --> 02:42:59,560
स्वाभि जायते ल देवा लो को पपयो योनि कुक

2083
02:42:59,560 --> 02:43:05,520
संज

2084
02:43:05,520 --> 02:43:09,520
काम इसमें इसका हिंदी में दिया है कि मृतक

2085
02:43:09,520 --> 02:43:13,640
के एकादश में भोजन करने वाला कुत्ता होता है

2086
02:43:13,640 --> 02:43:19,480
ग्राम यग ग्राम यज करने वाला देवलकर

2087
02:43:19,480 --> 02:43:23,880
को कुकुट योनि प्राप्त होती है

2088
02:43:23,880 --> 02:43:27,880
धन के लिए हां सर

2089
02:43:27,880 --> 02:43:31,880
और कुछ पढ़ना है इसमें बहुत सारे नरक के

2090
02:43:31,880 --> 02:43:36,040
बारे में दिया गया है सर यदि आप कहे तो पढ़ सकते हैं यदि नहीं कहेंगे कोई बात नहीं नहीं मतलब

2091
02:43:36,040 --> 02:43:40,240
कुल मिलाकर के तुम यहां से खंडन कर रहे हो ना पित पित पूजा

2092
02:43:40,240 --> 02:43:44,360
का जी सर जी सर पहले तो मैं बता दूं कि

2093
02:43:44,360 --> 02:43:48,400
यदि कोई व्यक्ति केवल ये जो श्राद्ध

2094
02:43:48,400 --> 02:43:52,600
कर्म है इन्हीं पर निर्भर होकर के भोजन इत्यादि

2095
02:43:52,600 --> 02:43:57,160
करेगा कि वोह कुछ और नहीं करेगा वह केवल श्राद्ध कर्मों का ही खाएगा

2096
02:43:57,160 --> 02:43:57,660
तो उसके

2097
02:43:57,520 --> 02:44:02,480
लिए क्या व्यवस्था होगी अच्छा इसमें और चीज

2098
02:44:02,480 --> 02:44:06,560
इस होते हुए भी क्षत्रीय कुल में उत्पन्न होते हुए

2099
02:44:06,560 --> 02:44:10,680
भी यदि कोई रक्षा का कार्य नहीं करेगा और वहां जाकर के

2100
02:44:10,680 --> 02:44:15,000
केवल उसी उसी खाने के आशित हो जाएगा तो उसकी क्या गति

2101
02:44:15,000 --> 02:44:19,160
होगी भाई तो मृतक के गवे दिन का भोजन करना

2102
02:44:19,160 --> 02:44:23,640
ये तो ये तो मेरा पक्ष रहा अब मैं तुम्हें तुम्हारे तरीके से ही बंद करता हूं

2103
02:44:23,640 --> 02:44:27,640
पुराण और गीता की वो बात जो वेद से मैच नहीं खाएगी वो मानोगे

2104
02:44:27,640 --> 02:44:32,200
कि नहीं मानोगे अच्छा सर इसको आप नहीं मानते हैं ना सर

2105
02:44:32,200 --> 02:44:36,240
अरे मैं तो मानता हूं मैंने तुम्हें बता दिया ना मैंने तुम्हें बता दिया

2106
02:44:36,240 --> 02:44:40,400
यहां प स्वतंत्र यहां पे ऐसे स्वतंत्र यज्ञों में ना खाने

2107
02:44:40,400 --> 02:44:44,560
की अनुष्ठानों में ना खाने की बात हो रही है जिन अनुष्ठानों

2108
02:44:44,560 --> 02:44:49,240
को एक तो पुत्र पूजा को ही ब्रह्म के रूप में मान लिया यही हमारे

2109
02:44:49,240 --> 02:44:53,520
मोक्ष देंगे पितृ पूजा को मोक्ष रूपी मान लिया कि ये हमारा ये पित

2110
02:44:53,520 --> 02:44:57,960
को ब्रह्म के रूप में समझ लिया ब्रह्म से स्वतंत्र सत्ता स्वीकार कर ली

2111
02:44:57,960 --> 02:45:02,080
और दूसरा ये कि कोई व्यक्ति जो कि क्षत्रिय कुल में उत्पन्न

2112
02:45:02,080 --> 02:45:06,160
है वैश्य कुल में उत्पन्न है वो अपनी वृत्ति का आलंबन ना लेकर के और जो

2113
02:45:06,160 --> 02:45:10,520
है केवल जाकर के वहां पर भोजन खा कर के जिंदा है उसको ऐसी ऐसी नी

2114
02:45:10,520 --> 02:45:12,520
मिलेगी ये तो ये हो गया अब तुम्हे मेरा

2115
02:45:12,520 --> 02:45:17,160
अर्थ मानने है नहीं अच्छा सर इस पर

2116
02:45:17,160 --> 02:45:21,200
हम ये क रहे हैं सर थोड़ सुन लीजिए सुन लीजिए क्या है कि हर

2117
02:45:21,200 --> 02:45:25,440
जनता को यह प्रश्न जानना उचित है कि अगर ये चीज अगर पुराण

2118
02:45:25,440 --> 02:45:29,440
में हमारे लिखा है कि इसको करने से ऐसे मिलता है तो आप लोगों का भी एक फर्ज

2119
02:45:29,440 --> 02:45:33,520
बनता है कि हमें जनता को सही दिशा दे सही दिशा दे तो रहा

2120
02:45:33,520 --> 02:45:37,680
हूं ऐसा मत करो कि श्राद्ध वो जो

2121
02:45:37,680 --> 02:45:41,760
जो श्राद्ध का जो भोजन है केवल उसी पर निर्भर हो जाओ

2122
02:45:41,760 --> 02:45:45,760
यह बताया जा रहा है अगर आपके दो हाथ दिए हैं दो पैर

2123
02:45:45,760 --> 02:45:49,960
दिए हैं तो आप अपना काम करके कमाओ और जो जिसकी

2124
02:45:49,960 --> 02:45:54,120
वृति है वो जो जिसकी वृत्ति है वो वहा जाकर के उससे

2125
02:45:54,120 --> 02:45:58,240
भोजन प्राप्त करेगा अब क्यों ऐसा कहना पड़ रहा है इसको समझो क्यों ऐसा

2126
02:45:58,240 --> 02:46:01,600
कहना पड़ रहा है इसको

2127
02:46:01,600 --> 02:46:05,760
समझो यह है गरुण पुराण जी ठीक

2128
02:46:05,760 --> 02:46:11,760
है जी रुण पुराण का

2129
02:46:13,640 --> 02:46:17,720
एक 133 वा अध्याय

2130
02:46:17,720 --> 02:46:21,800
नहीं अध्याय जी जी

2131
02:46:21,800 --> 02:46:26,120
जी जी जी जी जी ठीक है जी जी

2132
02:46:26,120 --> 02:46:30,400
क्या है ना बाबू भाई जी हां हम केवल शास्त्र

2133
02:46:30,400 --> 02:46:34,480
के किसी एक हिस्से से प्रमाण नहीं मान लेंगे हम उसका मिलान करेंगे कई

2134
02:46:34,480 --> 02:46:38,920
हिस्सों से तब ऐसी बात निकालनी पड़ेगी जिसमें

2135
02:46:38,920 --> 02:46:43,000
की किसी का भी खंडन ना हो ना तो इस बात का खंडन हो और ना

2136
02:46:43,000 --> 02:46:47,280
ही दूसरी बात का खंडन हो समझ गए समझ गए ना

2137
02:46:47,280 --> 02:46:52,200
जी जी तो अच्छा एक चीज और अब सुनो

2138
02:46:52,200 --> 02:46:58,120
मैंने ये बात क्यों कही रुको मैंने ये बात क्यों कही

2139
02:46:58,120 --> 02:47:02,120
क्योंकि अगर हम यह नहीं मानेंगे कि वहां श्राद्ध का किसी ने

2140
02:47:02,120 --> 02:47:06,320
अगर खा ही लिया तो नरक गामी हो गया तो जहां पर श्राद्ध

2141
02:47:06,320 --> 02:47:10,400
की बढ़ाई हो रही है उसको हमें काटना पड़ेगा फिर जी जहां

2142
02:47:10,400 --> 02:47:14,440
श्राद्ध की बढ़ाई हो रही है उसको हमें काटना पड़ेगा अच्छा

2143
02:47:14,440 --> 02:47:19,400
परमात्मा जो मोक्ष हमें देता है वो हमारे सारे पाप कर्मों को

2144
02:47:19,400 --> 02:47:23,480
मिटा देता है ना मुक्त कर देता है ना पाप कर्मों से अच्छा थोड़ा

2145
02:47:23,480 --> 02:47:27,560
इसमें और समझ लेते हैं सर इस थो सम जवाब देने आया तो थोड़ा

2146
02:47:27,560 --> 02:47:28,800
और समझ लो अभी कह रहे थे

2147
02:47:28,800 --> 02:47:33,200
जनता जानना चाहती है

2148
02:47:33,200 --> 02:47:37,800
बताइए सर जनता जाना जनता जाना

2149
02:47:37,800 --> 02:47:41,920
है समझ लेते सुनो सुनो बहुत ज्यादा

2150
02:47:41,920 --> 02:47:46,120
उसम विस्तार की आवश्यकता नहीं है जी उसम बहुत ज्यादा विस्तार

2151
02:47:46,120 --> 02:47:50,480
की आवश्यकता नहीं मैं आपको सार रूप में बात बता दे रहा हूं वो सुन लीजिए

2152
02:47:50,480 --> 02:47:54,600
जी की पहली बात तो मैं आपको शास्त्र से प्रमाण दे चुका

2153
02:47:54,600 --> 02:47:58,680
हूं जब दो शास्त्र में दो अलग अलग जगह दूसरी बातें हो रही होती

2154
02:47:58,680 --> 02:48:02,680
है तो हमें दोनों को मानना पड़ेगा और या फिर ऐसा अर्थ

2155
02:48:02,680 --> 02:48:06,880
निकालना पड़ेगा जिसमें दोनों का मान रह जाए समझ

2156
02:48:06,880 --> 02:48:11,360
गए समझ गए कि नहीं समझे अच्छा दूसरी बात यह है

2157
02:48:11,360 --> 02:48:15,440
कि आप खुद कहते हैं अब यह तो रही मेरी बात कि

2158
02:48:15,440 --> 02:48:19,440
मैं तो दोनों का ऐसा अर्थ निकालू जिसम दोनों जगह का मान रह जाए मैं आपसे पूछ

2159
02:48:19,440 --> 02:48:23,520
रहा हूं कि जब परमात्मा जो मोक्ष देता

2160
02:48:23,520 --> 02:48:28,240
है वो हम हमारे सारे पाप कर्मों से मुक्त कर सकता है कि नहीं कर सकता है

2161
02:48:28,240 --> 02:48:32,240
कर सकता है कर सकता है यानी मोक्ष का मतलब होता है पाप

2162
02:48:32,240 --> 02:48:36,400
कर्मों से मुक्ति जी है ना जी

2163
02:48:36,400 --> 02:48:40,880
जी जी ठीक अच्छा सर इसमें और थोड़ा समझते हैं

2164
02:48:40,880 --> 02:48:43,840
अरे भाई मुझे दिखाने तो दो ना जितनी बार

2165
02:48:43,840 --> 02:48:48,280
दिखाने चलता हूं फिर थोड़ा और समझ लो

2166
02:48:48,280 --> 02:48:53,040
तो ये गरुड़ पुराण के बारे में जनता समझेगी सर आप लोग कुछ बताएंगे गरुण

2167
02:48:53,040 --> 02:48:57,800
पुराण से ही तो दिखा रहा हूं ये देखो श्रा विधि

2168
02:48:57,800 --> 02:49:01,880
वर्णन दिख रहा है जी श्राद

2169
02:49:01,880 --> 02:49:06,640
विधि वर्णन दिख रहा है जी जी दिख रहा पढ़ दीजिए

2170
02:49:06,640 --> 02:49:11,560
कि पाप का नाश हो जाने से मुक्ति होती है

2171
02:49:11,560 --> 02:49:15,640
पाप से मुक्त हो जाने पर मुक्ति होती है इसमें पहली लाइन

2172
02:49:15,640 --> 02:49:19,880
है पाप का नाश करने वाला श्राद्ध

2173
02:49:19,880 --> 02:49:24,080
पहली लाइन जी पाप का नाश

2174
02:49:24,080 --> 02:49:28,400
करने वाला श्राद्ध विधि जी

2175
02:49:28,400 --> 02:49:32,960
ठीक है पढ़ पढ़िए सर

2176
02:49:32,960 --> 02:49:37,400
पढ़िए सर्व पाप नाश करने वाली श्राद्ध

2177
02:49:37,400 --> 02:49:41,400
विधि अमावस्या अष्ट का वृद्धि वो विधि बताई गई

2178
02:49:41,400 --> 02:49:46,360
है फिर आगे उसका कोई औ चित नहीं है मगर किसका नाश करती है

2179
02:49:46,360 --> 02:49:50,480
सर्व पाप नाश क्या करती है जी सर्व पाप सर्व पाप

2180
02:49:50,480 --> 02:49:54,520
नाश तो अब क्योंकि इसी ग्रंथ में सर्व पाप नाश भी हो

2181
02:49:54,520 --> 02:49:58,640
रहा है श्राद्ध से और आपके अनुसार मैंने तो खैर अभी देखा भी नहीं

2182
02:49:58,640 --> 02:50:02,640
आपके अनुसार इसी ग्रंथ में कहीं पर श्राद का खंडन है

2183
02:50:02,640 --> 02:50:06,920
तो हमें ये निकालना पड़ेगा अर्थ कि इसका भी मान रह

2184
02:50:06,920 --> 02:50:11,240
जाए अब अगर आपसा अगर आप ऐसा अर्थ नहीं निकालते

2185
02:50:11,240 --> 02:50:16,080
बाबू जी तो हम आपको और परम प्रमाण दे देते हैं

2186
02:50:16,080 --> 02:50:20,120
परम प्रमाण आपके गीता की में उन्होंने लिखा

2187
02:50:20,120 --> 02:50:20,620
है कि

2188
02:50:20,520 --> 02:50:24,760
जो बात गीता की पुराणों की वेद से मैच नहीं खाएगी वो

2189
02:50:24,760 --> 02:50:26,840
बात मान्य नहीं है

2190
02:50:26,840 --> 02:50:31,240
इसको मानते हो ना तत्वदर्शी की इस बात को

2191
02:50:31,240 --> 02:50:35,360
जो हमारे गुरु जी लिखे होंगे वो तो पूरा बात मानेंगे हम अरे भाई साहब मैं पूछ रहा हूं

2192
02:50:35,360 --> 02:50:40,320
गीता और पुराण की जो बात वेद से मैच नहीं खाएगी वो

2193
02:50:40,320 --> 02:50:44,360
बात आप मानोगे कि नहीं मानोगे उसको तो हम शुरु

2194
02:50:44,360 --> 02:50:48,440
में बता दिए कि गीता में दो प्रकार का ज्ञान है भाई साहब मैं पूछ रहा

2195
02:50:48,440 --> 02:50:52,440
हूं वेद से जो चीज मैच खाएगी कि नहीं खाएगी उसको मानते हो प्रमाण

2196
02:50:52,440 --> 02:50:56,680
के रूप में कि नहीं मानते हो करने योग्य है कि नहीं हम गीता

2197
02:50:56,680 --> 02:51:00,800
को भी बांधते हैं वेद को भी बांधते हैं वो लोग अपने अपने य पूछ रहा हूं

2198
02:51:00,800 --> 02:51:05,200
कि गीता की जो बात वेद से मैच नहीं खाएगी उसको आप

2199
02:51:05,200 --> 02:51:10,000
मानोगे कि हां इसे हमें करना चाहिए कि नहीं करना

2200
02:51:10,000 --> 02:51:14,120
चाहिए देखिए वो अपने स्तर में सही है हम उसको अपने उके स्तर से

2201
02:51:14,120 --> 02:51:18,120
कह रहा हू किसके स्तर से तुम उस बात को करोगे कि नहीं जो गीता करने को कह

2202
02:51:18,120 --> 02:51:22,120
रही है और वो वेद में नहीं

2203
02:51:22,120 --> 02:51:26,320
है गीता में नहीं गीता

2204
02:51:26,320 --> 02:51:31,280
में दो प्रकार का ज्ञान है शुरू में बता दिया आपको अरे यार देख रहे हो

2205
02:51:31,280 --> 02:51:35,320
मैं तुमसे सवाल पूछ रहा हूं क्या कि कितने प्रकार का ज्ञान है मैं

2206
02:51:35,320 --> 02:51:39,520
आपसे पूछ रहा हूं बाबू बाबू भाई कि

2207
02:51:39,520 --> 02:51:41,840
गीता की जो बात वेद से

2208
02:51:41,840 --> 02:51:45,880
मैच नहीं खाएगी वो अच्छी है बुरी है सही बोला है नहीं बोला है

2209
02:51:45,880 --> 02:51:50,400
वो बात जाने दो तुम अगर वो वेद विरोध कर रही होगी तो

2210
02:51:50,400 --> 02:51:54,920
तो क्या तुम उस बात को करोगे जैसे मान लो वह कह रहे हैं

2211
02:51:54,920 --> 02:51:58,920
कि फुटबॉल खेलो जी मान लो वो कह रहे हैं

2212
02:51:58,920 --> 02:52:02,920
कि फुटबॉल खेलो वेद में लिखा है मत खेलो तो

2213
02:52:02,920 --> 02:52:07,040
यह जो फुटबॉल खेलने वाली बात है गीता जी की वो उन्होंने अच्छे के लिए कही होगी अपने

2214
02:52:07,040 --> 02:52:13,040
हिसाब से मगर वह वेद से मैच नहीं खा रही तो क्या तुम

2215
02:52:14,480 --> 02:52:18,520
मानोगे देखिए बड़ी शम आती है

2216
02:52:18,520 --> 02:52:24,520
इसीलिए दिक्कत है जाओ चलो हटो यहां

2217
02:52:28,280 --> 02:52:32,600
से भाई जी जय श्री राम जय श्री राम

2218
02:52:32,600 --> 02:52:36,800
ये गरुड़ पुराण का जो प्रश्न कर रहे थे वो पांचवे अध्याय में

2219
02:52:36,800 --> 02:52:40,800
है हमें दिख नहीं रहा पांचवे में वो प्रेत

2220
02:52:40,800 --> 02:52:45,000
कल्प में जाइए प्रेत कल्प में है तो

2221
02:52:45,000 --> 02:52:49,320
मैं बता दूं इसका लिखा है कि ब्रह्म हत्या करने वाला उसको पाप मिलेगा

2222
02:52:49,320 --> 02:52:53,360
गो हत्या करने वाला बालक ये कह रहे थे सही उसम लिखा

2223
02:52:53,360 --> 02:52:57,720
एकाद का जो भोजन लिखा हुआ है इसलिए नहीं

2224
02:52:57,720 --> 02:53:02,080
करना कौन सा बताया आपने क्या कल्प का नाम बताया प्रेत

2225
02:53:02,080 --> 02:53:06,480
कल्प जो 16 अध्याय में प्रेत कल्प दिया है महर्षि

2226
02:53:06,480 --> 02:53:10,480
वेदव्यास जी ने प्रेत कल्प है 16 अध्याय में 16 अध्याय में

2227
02:53:10,480 --> 02:53:14,560
य पर लिखा विष्णु ध्यान वर्णन 16 शुरु के 16

2228
02:53:14,560 --> 02:53:18,840
अध्याय प्रेत क पर प्रेत कल्प हो प्रेत कल्प है 16 अध्याय में

2229
02:53:18,840 --> 02:53:22,920
जहां पर म बैत नदी का वर्णन हो 21 28 प्रधान

2230
02:53:22,920 --> 02:53:26,960
21 प्रधान नर कों का वर्णन होगा 16 पयों का वर्णन होगा नरक

2231
02:53:26,960 --> 02:53:29,520
का वर्णन प्रश्चित का

2232
02:53:29,520 --> 02:53:34,160
वर्णन ब्राह्मण आदि वर्णों का धर्म पालन प्रश्चित

2233
02:53:34,160 --> 02:53:38,320
आठों निधियों के फल का वर्णन भुवन कोष का वर्णन लावत आदि वर्षों

2234
02:53:38,320 --> 02:53:43,840
का वर्णन नरक का वर्णन यही नहीं

2235
02:53:43,840 --> 02:53:48,080
र उसम यह है ना कि आपको उस पांचवा अध्याय में आपको

2236
02:53:48,080 --> 02:53:52,080
आप अने पहले जन्म में ये ये पाप किए होंगे तो अगले जन्म में आपको ये ये

2237
02:53:52,080 --> 02:53:56,360
चिन्ह मिलेंगे बोला जैसे बाल हत्यारा करने वाला कुबड़े

2238
02:53:56,360 --> 02:54:00,520
को लात मारने वाला लंगड़ा उसम सब दिया हुआ है और उसके बाद

2239
02:54:00,520 --> 02:54:04,640
एकादश का एकादश का ये है कि जब तक सपन सराध

2240
02:54:04,640 --> 02:54:08,920
ना हो जाए जब तक रवी ना हो जाए जो उस अशुद्ध भोजन

2241
02:54:08,920 --> 02:54:13,120
को करता है बोला तो कुत्ता होता है ब्राह्मण को एकादश का भोजन

2242
02:54:13,120 --> 02:54:17,680
नहीं करना चाहिए बोलो जब तक स पिंडन श्राद ना हो जाए जब सिंडी

2243
02:54:17,680 --> 02:54:21,720
करण होता है पहले तीन पिंड जो है य पितामह य पुरुष है

2244
02:54:21,720 --> 02:54:25,880
तो पितामह पर पितामह वृद्ध पर पितामह और एक प्रेत का पिंड बनता

2245
02:54:25,880 --> 02:54:29,880
है जब तक यह विधि ना हो जाए कर्मकांड के द्वारा तब

2246
02:54:29,880 --> 02:54:34,160
तक उनके यहां बोला अशुद्ध में भोजन नहीं करना चाहिए फ

2247
02:54:34,160 --> 02:54:38,160
वो ग्राम वो कह रहा था हवन तो जब तक कहा दिन पूर्ण ना हो

2248
02:54:38,160 --> 02:54:42,760
यदि कोई उससे पहले धन के याचक में लोभ में हवन करा लेता है

2249
02:54:42,760 --> 02:54:44,520
यजमान भी नरक का अधिकारी है

2250
02:54:44,520 --> 02:54:48,920
और वो ब्राह्मण भी नरक का अधिकारी है उसमें

2251
02:54:48,920 --> 02:54:53,000
वा क्या बात है आप इसलिए

2252
02:54:53,000 --> 02:54:57,080
समझाना था आपको क्या और एक इनसे मेरी बड़ी वो परसों में वो एमपी फास्ट

2253
02:54:57,080 --> 02:55:01,240
देख रहा था वहां पर कोई अमित शर्मा नाम का एक व्यक्ति है बड़ी गाली दे रहा

2254
02:55:01,240 --> 02:55:05,440
था वो मुझे बाबूराम से कहे कि ये म संस्कार

2255
02:55:05,440 --> 02:55:09,560
है आपके कि वो वो एमपी फास्ट में सनातन हों

2256
02:55:09,560 --> 02:55:14,040
को ठीक है अपने आप अपनी बात रखी अपनी सोच रखिए वो कह रहा था हरिद्वार

2257
02:55:14,040 --> 02:55:18,440
से एक किताब छपी है और ऐसा लिखा है कि ब्रह्मा विष्णु जो है कबीर दास

2258
02:55:18,440 --> 02:55:22,640
की जो पैर की नोक के बराबर है अब ऐसी ऐसी बातें आप कह

2259
02:55:22,640 --> 02:55:27,240
रहे हो यह कहां का मतलब की न्याय है जब तुम इतने मतलब

2260
02:55:27,240 --> 02:55:31,440
कहेंगे आपको कुछ ज्ञान का संस्कृत पढ़ रहे थे अभी जिनको संस्कृत

2261
02:55:31,440 --> 02:55:35,800
का अ का ब नहीं है संस्कृत आप एक श्लोक शुद्ध नहीं बोल पा रहे हो

2262
02:55:35,800 --> 02:55:39,960
क्या हिंदी में तो कौन नहीं पढ़ सकता बाबूराम जी हिंदी में तो पांचवी क्लास

2263
02:55:39,960 --> 02:55:44,200
का बच्चा को अच्छी इमला हमारे य पले इमला लिखते थे हम लोग पांचवी छठवीं

2264
02:55:44,200 --> 02:55:48,440
में गुरुजी बोलते थे इमला लिखते थे राइटिंग सुधारने आपकी बात का जवाब

2265
02:55:48,440 --> 02:55:52,600
दे दिया है मैंने मुझे तो वो मिल ही नहीं रहा था ना जो मैं इनके बात

2266
02:55:52,600 --> 02:55:56,760
का समझ सक क्या है वहा पर मेरे

2267
02:55:56,760 --> 02:56:00,560
को स सूरज प्रकाश जी से बात करने

2268
02:56:00,560 --> 02:56:04,680
दीजिए आप उनसे बात मत करिए बाबू हमसे बात करिए

2269
02:56:04,680 --> 02:56:08,800
आपको यह बताना है कि गीता और पुराण की वह बातें

2270
02:56:08,800 --> 02:56:13,000
जो वेद से मैच नहीं खाएगी वह आप मानोगे कि नहीं देखिए सूरज प्रका

2271
02:56:13,000 --> 02:56:17,080
जी ऐ है एक मिनट बाब मिनट सूरज प्रकाश जी

2272
02:56:17,080 --> 02:56:21,120
हम लोग इनको जब तक करेंगे ना तब तक ये लोग

2273
02:56:21,120 --> 02:56:25,760
इनके इनकी असलियत इनके सामने नहीं आएगी जनता के सामने नहीं आएगी तो

2274
02:56:25,760 --> 02:56:30,280
मेरे वाला तरीका ही इनके लिए सही है बिल्कुल 100%

2275
02:56:30,280 --> 02:56:34,320
जब इनके पास तो कुछ है ही नहीं सारा झूठ और मन गंत है

2276
02:56:34,320 --> 02:56:38,800
हम लोग कितना भी इनको प्रमाण दे दे समीक्षा दे दे व्याख्या दे दे

2277
02:56:38,800 --> 02:56:42,880
प्रमाण यही ग्रंथों से दे दे इनको समझ में नहीं आएगा इनको समझ में तब आएगा जब उनकी गरमी

2278
02:56:42,880 --> 02:56:47,080
गीता की से देंगे प्रमाण हां तो भाई बाबू बताओ

2279
02:56:47,080 --> 02:56:51,320
जो बात बता रहे की वो बात जो वेदों

2280
02:56:51,320 --> 02:56:55,640
से मैच नहीं खाएगी तो वो आपको

2281
02:56:55,640 --> 02:56:59,640
मान्य होगी कि नहीं होगी अभी सूरज प्रकाश

2282
02:56:59,640 --> 02:57:03,920
जी जो बात बताया क्या आप उसे संतुष्ट बाबू अब मैं लास्ट बार तुमसे

2283
02:57:03,920 --> 02:57:08,080
पूछ रहा हूं एक बार और गीता और पुराण की व बात जो मेद

2284
02:57:08,080 --> 02:57:12,120
से मैच नहीं खाएगी उसको व मानोगे या नहीं मानोगे मैं आपके

2285
02:57:12,120 --> 02:57:17,160
टॉपिक प बात करने आया हूं गण पर आप

2286
02:57:17,160 --> 02:57:21,640
जाइए मैं इन को गरुड़ पुराण काने शुरू से गरुड़ पुराण पढ़ा है वो क्या

2287
02:57:21,640 --> 02:57:25,760
इन्होने गरुड़ पुराण को शुरू से देखा है गरुड़ पुराण को अरे

2288
02:57:25,760 --> 02:57:30,520
कुछ नहीं हैय ये कौवा पुराण पढ़े

2289
02:57:30,520 --> 02:57:34,600
खाली हिंदी पढ़ लिया गरुड़ पुराण में शुरू से सांग पांग को पढ़ा

2290
02:57:34,600 --> 02:57:38,960
है कुछ एकांकी शब्दों को पढ़ा है इन्होंने

2291
02:57:38,960 --> 02:57:43,120
टी भोजन ब्राह्मण को कहां कराते है इनको इतना तक इनको ज्ञान नहीं है

2292
02:57:43,120 --> 02:57:47,160
और य आ ग यहा पर ज्ञान है प्रेत कर्म का प्रेत का

2293
02:57:47,160 --> 02:57:51,280
कितना बड़ा विध विधान बो सी बात वेद

2294
02:57:51,280 --> 02:57:55,400
से खंडित कर रहा हूं ना ये देखिए हम

2295
02:57:55,400 --> 02:57:59,400
तोय क ब्राह्मण कौन है बोलो ब्राह्मण कौन है हमारी भाषा में जो

2296
02:57:59,400 --> 02:58:03,760
सतचंडी सिंडी और कुष कंडी को जानने वाला हो वो पूर्ण ब्राह्मण

2297
02:58:03,760 --> 02:58:08,440
है सतचंडी सिंडी और कुस कंडी यज्ञ में कुस कंडी

2298
02:58:08,440 --> 02:58:12,800
मा भगवती का सतचंडी का विधान जानने वाला हो और सपिंड श्रा

2299
02:58:12,800 --> 02:58:17,440
को जानने वाला हो वही पूर्ण ब्राह्मण है जी

2300
02:58:17,440 --> 02:58:21,560
ये देखिए मैं मैं मैं जो है ना इनको वो दे रहा था

2301
02:58:21,560 --> 02:58:24,600
क्या

2302
02:58:24,600 --> 02:58:28,760
कि पित्रों की पूजा करने से व्यक्ति कवि के पास पहुंच

2303
02:58:28,760 --> 02:58:33,800
रहा है अब बताइए किसकी बात

2304
02:58:33,800 --> 02:58:38,920
मानोगे 183 63

2305
02:58:38,920 --> 02:58:42,960
अथर्ववेद पहली बात तो यह लास्ट के जो दो सूक्त अवेद

2306
02:58:42,960 --> 02:58:47,360
के दोनों पूरे पूरे सूक्त पित पूजा पही है पित

2307
02:58:47,360 --> 02:58:50,080
पूजा प

2308
02:58:50,080 --> 02:58:54,160
16 अध्याय प्रीत मंजरी में प्रीत कल्प है ना 16 अध स अध्याय

2309
02:58:54,160 --> 02:58:58,280
में फल है महातम है जो कह रहे थे 16 अध्याय में तत्व ज्ञान बताया

2310
02:58:58,280 --> 02:59:02,480
गया है लास्ट में गरुड़ पुराण की जी

2311
02:59:02,480 --> 02:59:06,560
हा नहीं अ दिखा रहा हूं यह देख लेना

2312
02:59:06,560 --> 02:59:10,640
भाई आप जो पिंड दान से भाग

2313
02:59:10,640 --> 02:59:14,680
रहे हो वो पित पूजा से भाग रहे हो गीता और पुराण

2314
02:59:14,680 --> 02:59:18,800
बा मत मानो देखिए हमारे लिए गीता और जो पुराण की जो बातें

2315
02:59:18,800 --> 02:59:22,920
उनका सही अर्थ हम लोगों ने निकाल लिया हम लोग उनको मान रहे हैं मगर आपको वो अर्थ

2316
02:59:22,920 --> 02:59:27,240
मानना नहीं है एक मिनट आपको वो अर्थ मानना नहीं है तो इसका

2317
02:59:27,240 --> 02:59:31,360
मतलब है कि गीता और पुराण का अर्थ बताया जा रहा है कि भैया

2318
02:59:31,360 --> 02:59:35,360
पिंड दान व पितृ पूजा मत करो मगर वेद कह रहा है

2319
02:59:35,360 --> 02:59:39,440
कि जो पित पूजा करेगा वो कवि के पास जाएगा

2320
02:59:39,440 --> 02:59:39,940
लिखा

2321
02:59:39,760 --> 02:59:43,800
है पु पुन नरका तारत पुन नाम नरका

2322
02:59:43,800 --> 02:59:48,080
रते इत पुत्र जो अपने पित्रों को पुन नामक

2323
02:59:48,080 --> 02:59:52,880
नरक से तारता है उसी को पुत्र की संज्ञा दी जाती है

2324
02:59:52,880 --> 02:59:57,800
ये देखिए इसमें कवि शब्द आपको दिखाई दे रहा है कि

2325
02:59:57,800 --> 03:00:02,560
कवि यह जो ये ये देखिए

2326
03:00:02,560 --> 03:00:07,080
कवि जी जी दिख र

2327
03:00:07,080 --> 03:00:11,120
क नाम ठीक है रहा है बिल्कुल

2328
03:00:11,120 --> 03:00:15,760
ब की बात हो रही है कवि की बात हो रही है ये देखिए

2329
03:00:15,760 --> 03:00:20,720
पित पम क

2330
03:00:20,720 --> 03:00:25,520
प्राप्ति अब देखिए नीचे क्या लिखा है

2331
03:00:25,520 --> 03:00:29,520
जो कवि यानी कबीर इनका

2332
03:00:29,520 --> 03:00:34,240
कबीर इनके अनुसार बात कर रहे तो इनके अनुसार बात करेंगे

2333
03:00:34,240 --> 03:00:38,840
तो जो कबीर प्रकट अथवा श्रेष्ठ बुद्धि वाला है

2334
03:00:38,840 --> 03:00:42,880
यानी ईश्वर है जो और हमारे हिसाब से कवि

2335
03:00:42,880 --> 03:00:47,000
यानी सर्वज्ञ सब कुछ जानने वाला जो ईश्वर है

2336
03:00:47,000 --> 03:00:51,360
अपनी महिमा से स्तुति करने वाले पित्रों को अंतरिक्ष

2337
03:00:51,360 --> 03:00:55,480
लोक में धारण करता है यह पि पूजा से धारण हो रहा

2338
03:00:55,480 --> 03:00:59,880
है पि पित्र कहां पहुंच रहे हैं कवि धारण कर रहा है अपने

2339
03:00:59,880 --> 03:01:04,240
पास यहां पर उसके लोग को बोला गया है कि वो उसके पास

2340
03:01:04,240 --> 03:01:08,280
वो अपने पास धारण करता है कवि तो

2341
03:01:08,280 --> 03:01:12,320
अब जो है आज से आप लोग पित्र पूजा शुरू कर देना क्योंकि गीता और

2342
03:01:12,320 --> 03:01:16,440
पुराण की वो बातें मान्य नहीं है जो वेदों से मैच नहीं खाएगी इस बात को

2343
03:01:16,440 --> 03:01:20,440
हम लोग आपको दिखा देते हैं आपकी गरमा गीता की से गरमा गीता की खोल

2344
03:01:20,440 --> 03:01:22,560
दीजिए

2345
03:01:22,560 --> 03:01:26,720
भैया ये इनके बुक में है या हमारी बुक में है मैं ये कन्फ्यूज

2346
03:01:26,720 --> 03:01:31,520
हूं थोड़ा ये अथर्ववेद है अथर्ववेद में

2347
03:01:31,520 --> 03:01:35,800
अथर्ववेद में पित्रों के लिए जो यज्ञ किया जाएगा पित्रों की जो पूजा की जाएगी

2348
03:01:35,800 --> 03:01:40,040
उससे पित पि पहुंचेंगे मुक्ति को प्राप्त करेंगे तृप्त होंगे वो बिल्कुल

2349
03:01:40,040 --> 03:01:44,320
तृप्त तर्पण का मतलब ही तृप्त करना है पितरों को

2350
03:01:44,320 --> 03:01:50,320
तीसरा अध्याय खोलिए तीसरा ज्यादा आगे नहीं जाना है

2351
03:01:52,360 --> 03:01:56,400
तीसरा है ना इसमें वो चल रहा है वो अपन को जाना है पांच में से

2352
03:01:56,400 --> 03:02:02,400
आठवे श्लोक की व्याख्या की

2353
03:02:05,880 --> 03:02:10,000
है अथर्ववेद में तो पितरों का जो भाग

2354
03:02:10,000 --> 03:02:14,680
है वह देने की बात कर रखी है हा बिल्कुल पित

2355
03:02:14,680 --> 03:02:19,120
मेद नाम के दो सूक्त पूरे पूरे

2356
03:02:19,120 --> 03:02:23,200
छोड़ दो गीता की वो बात मान लो कि वो भी काल ने कही है छोड़ दो पित पूजा

2357
03:02:23,200 --> 03:02:27,320
को त्यागना तुरंत पकड़ लो पित पूजा काल ने कह दिया होगा भाई वेद

2358
03:02:27,320 --> 03:02:31,720
विरुद्ध बात है य यजुर्वेद में यजुर्वेद

2359
03:02:31,720 --> 03:02:35,920
में उनका जो भाग दिया गया बोले उसम लिखा कि बैल जिस प्रकार अपना

2360
03:02:35,920 --> 03:02:40,160
जो वो पाके खुश होता है उसे ही हमारे पितृ गण अपना भाग

2361
03:02:40,160 --> 03:02:44,360
पाके खुश होते हैं ये लिख रखा है उस

2362
03:02:44,360 --> 03:02:48,360
मैं आपको पाच से आठ प आना है अपने को इससे

2363
03:02:48,360 --> 03:02:54,360
पहले था वो शायद पाच से

2364
03:02:57,120 --> 03:03:01,440
आठ इसमें रुकिए सूची में देखने दीजिए रुकिए

2365
03:03:01,440 --> 03:03:04,360
शास्त्र विधि

2366
03:03:04,360 --> 03:03:10,360
रहित 38 नंबर पेज

2367
03:03:13,280 --> 03:03:19,040
निकालिए ये इनकी किताब लग रही है

2368
03:03:19,040 --> 03:03:23,040
ज्ञानवर्धक अब अब इसमें थोड़ा सा तीन से आठ में भगवान ने

2369
03:03:23,040 --> 03:03:27,440
कहा है कि निष्पाप अर्जुन में ज्ञान तो ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं योगी

2370
03:03:27,440 --> 03:03:31,600
फसल काटने रुक जाइए रुक जाइ पढ़ने दीजिए यही कहीं लिखा होगा

2371
03:03:31,600 --> 03:03:36,360
यदि भक्ति कर्म नहीं होते जुआ और नीचे आइए नीचे

2372
03:03:36,360 --> 03:03:40,640
आइए रुक जाइए रुक जा रुक जा रुक जाइए ऊपर जाइए ऊपर जाइए

2373
03:03:40,640 --> 03:03:44,760
ऊपर जाइए गीता अध्याय तीन

2374
03:03:44,760 --> 03:03:48,920
से आ में भगवान ने कहा है कि अच्छा ये तो वही प और

2375
03:03:48,920 --> 03:03:54,280
नीचे आइए नीचे आइए

2376
03:03:54,280 --> 03:04:00,280
अध्याय तीन से श्लोक में आठ में क निष्काम होकर और नीचे

2377
03:04:05,160 --> 03:04:10,120
आइए एक मिनट एक

2378
03:04:10,120 --> 03:04:14,360
मिनट हा ये देखि उपरोक्त गीता अध्याय तीन श्लोक छ

2379
03:04:14,360 --> 03:04:18,360
से न तक एक स्थान पर भक्ति बताई है और यह कहा

2380
03:04:18,360 --> 03:04:22,590
है कि गीता अध्याय

2381
03:04:22,590 --> 03:04:26,880
[संगीत] वो आदेश नीचे जाइए

2382
03:04:26,880 --> 03:04:29,160
थोड़ा

2383
03:04:29,160 --> 03:04:33,160
और नीचे नीचे नीचे नीचे नीचे आप ऊपर जा

2384
03:04:33,160 --> 03:04:37,160
रहे हैं हां एक

2385
03:04:37,160 --> 03:04:41,240
मिनट एक मिनट फिर अध्याय ये कहा है ये सात में कहा है

2386
03:04:41,240 --> 03:04:45,280
अध्याय ये कहा है ये शरीर त्याग कर 15 से 14

2387
03:04:45,280 --> 03:04:49,760
में पवित्र वेदों बोलने वाले भवा

2388
03:04:49,760 --> 03:04:54,320
यहां नहीं है यहां नहीं है आप छठवें अध्याय प जाइए छव अध्याय प

2389
03:04:54,320 --> 03:04:59,400
जाइए छठ में अध्याय

2390
03:04:59,400 --> 03:05:03,280
पहुंच ना ना

2391
03:05:03,280 --> 03:05:07,480
इस हां ये ये ये ये गीता में दो प्रकार के ज्ञान

2392
03:05:07,480 --> 03:05:11,720
है बस बस बस रुक जा ऊपर जाइए गीता में दो प्रकार के ज्ञान है

2393
03:05:11,720 --> 03:05:16,000
गीता का जो ज्ञान वेदों ठीक है

2394
03:05:16,000 --> 03:05:20,120
गीता का जो ज्ञान वेदों से नहीं खाता है उसे

2395
03:05:20,120 --> 03:05:24,400
जो है अपने मन से बोल दिया है उससे मेल

2396
03:05:24,400 --> 03:05:28,400
नहीं करता है वह गलत ज्ञान है पहली बात तो य जो ढंडोरा पीटते हैं ना गलत

2397
03:05:28,400 --> 03:05:32,400
कुछ नहीं है तो यहां गलत लिखा है ये जो ढंडोरा पीटते

2398
03:05:32,400 --> 03:05:36,840
है ना इसको नोट कर लेना चव पेज प हैय गीता

2399
03:05:36,840 --> 03:05:42,840
का जो ज्ञान वेदों से मैच नहीं खा रहा है वह गलत ज्ञान है

2400
03:05:49,840 --> 03:05:53,960
ठीक है अब अगर गीता कह रही है कि पितृ

2401
03:05:53,960 --> 03:05:58,040
पूजा से पित्रों के लोग जाएंगे और वेद कह रहे हैं

2402
03:05:58,040 --> 03:06:02,320
कि पितृ पूजा से कहां जाएंगे

2403
03:06:02,320 --> 03:06:06,480
कवि धारण करेंगे कवि के पास पहुंचेंगे तो किसकी बात

2404
03:06:06,480 --> 03:06:10,560
मानोगे अब गीता की वेद की या अपने जेल धाम

2405
03:06:10,560 --> 03:06:14,600
निवासी

2406
03:06:14,600 --> 03:06:18,640
की चलिए खैर अब हम लाइव स्ट्रीम को बढ़ाते

2407
03:06:18,640 --> 03:06:22,840
हैं काफी देर हो गई 7:00 बजे से कर रहे हैं बहुत आने

2408
03:06:22,840 --> 03:06:27,480
के लिए धन्यवाद आज पंडित जी आपने भी बहुत बढ़िया चीज बताई

2409
03:06:27,480 --> 03:06:31,480
क्योंकि मुझे तो मिल ही नहीं रहा अभी भी नहीं मिल रहा मुझे जरा ना उस जगह

2410
03:06:31,480 --> 03:06:35,680
की किसी के पास फोटो हो तो फोटो खीच के भेजिएगा तो मैं अपने पास जो ग्रंथ है उसम मिलान कर लूंगा

2411
03:06:35,680 --> 03:06:40,000
कहां पर है ऐसा है ना भाई जी टीका का ने भी थोड़ा अपना अपना मत दिया है ना

2412
03:06:40,000 --> 03:06:44,040
किसी ने ज्वाला प्रसाद का है बना र था टीका काने अपने अपने भा ऐसा

2413
03:06:44,040 --> 03:06:48,040
करना मैं बताऊ ऐसा करना उसके आगे पीछे के

2414
03:06:48,040 --> 03:06:52,280
चैप्टर्स के नाम बता देना मैं आपको दे दूंगा हा हा वो

2415
03:06:52,280 --> 03:06:56,440
मिल जाएगा जी मैं आपको बकुल ठीक है

2416
03:06:56,440 --> 03:07:00,840
अच्छा तो आने के लिए सभी का धन्यवाद राजा राय

2417
03:07:00,840 --> 03:07:05,400
जी एक बात और है इनसे सटी जोय क

2418
03:07:05,400 --> 03:07:09,600
राधे राधे जो ये मतलब

2419
03:07:09,600 --> 03:07:13,960
की राधे राधे भाई जी जो ये मतलब की इतना

2420
03:07:13,960 --> 03:07:17,960
मतलब अनाप सनाप बोलते हैं भाई जी मतलब एक

2421
03:07:17,960 --> 03:07:22,240
भाषा की अमर्यादित होकर के नहीं इनको ज्ञान नहीं है

2422
03:07:22,240 --> 03:07:26,280
नहीं इतना अमर्यादित भाषा थी इनकी मैं कह नहीं सकता हूं भाई जी भी

2423
03:07:26,280 --> 03:07:30,440
आए थे पहाड़ी जी भी उन्होंने कुछ कहा फिर व भी चले गया मैं तो कमेंट करता रहा

2424
03:07:30,440 --> 03:07:33,760
आप एक बात

2425
03:07:33,760 --> 03:07:37,960
बताइए कुछ दिन पहले गए थेना उन लोगों के ग्रुप में र पड़ जी

2426
03:07:37,960 --> 03:07:42,600
गया था मे आने नहीं दिया

2427
03:07:42,600 --> 03:07:47,800
लिक आने नहीं दिया एक एक करके राजा जी आप बोल लीजिए

2428
03:07:47,800 --> 03:07:51,800
टी आर पहाड़ी जी जी आप गए थे तीन

2429
03:07:51,800 --> 03:07:55,840
चार दिन पहले आपने बहुत अच्छा चारचार बीच बीच में उसम

2430
03:07:55,840 --> 03:08:00,360
आ रहे थे एक एक करके एक को चार चार प अकेले भारी पड़ रहे थे समझा रहे थे

2431
03:08:00,360 --> 03:08:04,520
बोले गीता का मजाक बना के रखा है तुम लोगों ने बहुत अच्छा समझा रहे थे े

2432
03:08:04,520 --> 03:08:08,640
याद है व क्या था उत्तम का उल्टा अनुत्तम होगा जब उसने उत्तम का उल्टा

2433
03:08:08,640 --> 03:08:12,760
अनुत्तम बोला तभी मैं बोल रहा था मेरे माइंड में आ गया था कि टी आर प जी को बोलना

2434
03:08:12,760 --> 03:08:16,800
चाहिए उत्तम का जो विलोम होगा वो अधम होगा लेकिन आपने फिर तुरंत

2435
03:08:16,800 --> 03:08:20,400
गगल किया आपने भी वही अर्थ निकाला उत्तम का अ अदम होगा तो

2436
03:08:20,400 --> 03:08:24,480
वो कह रहा है हमारी बचपन से पढ़ाई लिखाई बेकार हो गई क्या उत्तम का तो अनुत्तम

2437
03:08:24,480 --> 03:08:28,800
होता है और जब की ये ना मतलब बेसिक

2438
03:08:28,800 --> 03:08:33,520
भाई जिस जिस डिरी से

2439
03:08:33,520 --> 03:08:37,760
पढ़े थे ना जिस डिक्शनरी से तुम ब्रज का अर्थ जाना

2440
03:08:37,760 --> 03:08:42,000
ले रहे हो उसी डिक्शनरी में लिखा है कि अनुत्तम का अर्थ है कि जिससे

2441
03:08:42,000 --> 03:08:46,080
श्रेष्ठ कोई नहीं है हा बा

2442
03:08:46,080 --> 03:08:50,080
ये बात रखी मैंने हम लोग बचपन में पढ़े थे ना तीसरी क्लास में अनुलोम विलोम

2443
03:08:50,080 --> 03:08:54,840
याद किए थे उसमें लिखा होता है उत्तम का विलोम है अधम

2444
03:08:54,840 --> 03:08:58,920
अधम उत्तम माने बहुत श्रेष्ठ अधम माने नीचा

2445
03:08:58,920 --> 03:09:03,280
चच नीच भाई उनको हिंदी का ही ज्ञान नहीं है उन्होने हिंदी पढ़ ली थोड़ किताबों

2446
03:09:03,280 --> 03:09:09,280
से देख लिया कोई पूछे उनको संस्कृत कौन सा सूत्र लगता

2447
03:09:10,000 --> 03:09:14,200
है दिखा देते ये लिखा है उनका आजकल

2448
03:09:14,200 --> 03:09:18,400
उनका देखा मैंने शिवांश भाई का एक दुर्गा दुर्गा नाम की कोई की एक ली है

2449
03:09:18,400 --> 03:09:22,680
बड़ा खंडन करी थी शिवांश भाई को बड़ी

2450
03:09:22,680 --> 03:09:27,120
आपको एक बात बताऊ यहां पर नाम मत लिया करिए इनका

2451
03:09:27,120 --> 03:09:31,960
इनको और पब्लिक देखेगी जा कर

2452
03:09:31,960 --> 03:09:35,720
क्यों नाम ले

2453
03:09:35,720 --> 03:09:41,720
रहे बता नाम मत

2454
03:09:41,840 --> 03:09:45,880
लीजिए पर आपका भाई है हर चैनल पर शिवांश जी का

2455
03:09:45,880 --> 03:09:50,000
भाई है हर चैनल क्या उन्होने

2456
03:09:50,000 --> 03:09:54,000
हम आने ही नहीं दिया हमने कहा लिंक भेजो लिंक भेजो हम तो पूरी

2457
03:09:54,000 --> 03:09:58,080
खुली छूट देते हैं पर हमने 100 बार रिक्वेस्ट की पर उन्होंने हमें बिल्कुल भी

2458
03:09:58,080 --> 03:10:03,720
नहीं आने दिया नहीं देंगे भाई

2459
03:10:03,720 --> 03:10:07,760
और और एक पता है क्या है एक आश्चर्य की बात है

2460
03:10:07,760 --> 03:10:12,200
कि जैसे कुछ छोटे छोटे चैनल है मतलब सब्सक्राइबर बहुत कम है व्यू बहुत कम होते हैं

2461
03:10:12,200 --> 03:10:16,320
तो देखने में ऐसा लगता है किय सब अलग अलग लोग है सुने ना देख

2462
03:10:16,320 --> 03:10:20,520
के लगता है सब अलग लोग है एक दिन मैंने देखा कि जितने

2463
03:10:20,520 --> 03:10:25,040
भी बंदे हैं वो सब आपस में मिलकर बात कर रहे हैं जसे चांडाल चौकड़ी

2464
03:10:25,040 --> 03:10:29,760
ला सब बैठ थे एक साथ सब एक ही

2465
03:10:29,760 --> 03:10:34,240
हैय आया कबीर कबीर पंथ से था व रामपाल

2466
03:10:34,240 --> 03:10:38,600
का भी खंडन करता है दाढी में आया था मगर उसने

2467
03:10:38,600 --> 03:10:44,560
बहुत मगर उसने बहुत प्रेशन की थी आने के लिए मैं इस फस

2468
03:10:44,560 --> 03:10:48,680
नहीं फस नहीं क्योंकि ग की बात तो एक तरफ हो गई

2469
03:10:48,680 --> 03:10:52,680
जब ग्रंथों की बात साइड हो जाती है जब तो सामने वाले से बिल्कुल

2470
03:10:52,680 --> 03:10:56,760
लॉजिकल केवल बात करने में बड़ा आसान ग्रंथ में क्या तोड़ मरोड़ के

2471
03:10:56,760 --> 03:11:01,320
करेंगे य नहीं मानेंगे आता भैया मुझे कौन सा

2472
03:11:01,320 --> 03:11:06,840
विद्या तप ज्ञानम दानम शलम गुण

2473
03:11:06,840 --> 03:11:11,080
धूता मनुष्य

2474
03:11:11,080 --> 03:11:15,240
रूप गुजरे है नहीं

2475
03:11:15,240 --> 03:11:20,600
मुझको ना भगवान का व लोक है काते कि माया

2476
03:11:20,600 --> 03:11:24,600
पह जिनकी बुद्धि मेरी माया के द्वारा

2477
03:11:24,600 --> 03:11:28,680
मारी हुई है वो मुझे साधारण मनुष्य समझते हैं और मैं तीनों लोगों

2478
03:11:28,680 --> 03:11:32,760
का ईश्वर हूं इस बार ऐसा नहीं समझ पाते बोला गया

2479
03:11:32,760 --> 03:11:37,440
ना गता भगवान बिल्कुल बिलकुल

2480
03:11:37,440 --> 03:11:42,000
ठीक है तो अब हम लोग चर्चा को विराम देते हैं काफ

2481
03:11:42,000 --> 03:11:46,240
ी आप 7 बजे से लगे हैं बिल्कुल आपका बहुत बहुत

2482
03:11:46,240 --> 03:11:50,240
धन्यवाद काफी देर हो ग तीन घंटा से ऊपर हो ग

2483
03:11:50,240 --> 03:11:55,360
बकुल बक

2484
03:11:55,360 --> 03:11:59,560
मेहन भाई जी मैं भी थक के आया मैं भी भागवत कथा में हूं आजकल थका हुआ

2485
03:11:59,560 --> 03:12:04,200
हूं फिर मैंने देखा खुला हुआ था मैं फिर जाग में तो सो गया कंबल अंबल लेके

2486
03:12:04,200 --> 03:12:08,720
जागत हो गया पुराण वक्तव्य दे रहा था तो मेरा एकदम

2487
03:12:08,720 --> 03:12:12,880
आज मैं वही प्रसंग पर सुन रहा था वही प्रसंग पढ़ रहा था भागवत में भी

2488
03:12:12,880 --> 03:12:17,240
भागवत में 28 प्रधान रकों का वर्णन है तो मेरे को झट से आ गया मैंने कहा

2489
03:12:17,240 --> 03:12:21,560
थोड़ा विस्तार करो तब तक वो चला गया भाई साब एक सवाल आ रहा

2490
03:12:21,560 --> 03:12:25,800
है कि मुसलमानों को आना चाहिए कि नहीं आना चाहिए कुंभ

2491
03:12:25,800 --> 03:12:29,880
में एक शंकराचार्य बोल रहे हैं आना चाहिए एक शंकराचार्य बोल रहे हैं कि

2492
03:12:29,880 --> 03:12:33,880
नहीं आना चाहिए पहली बात कि अभी हमने क्या

2493
03:12:33,880 --> 03:12:38,000
देखा जब दो प्रमाण जो होते हैं व अलग अलग बात कर रहे होते तो हमें ऐसा

2494
03:12:38,000 --> 03:12:42,440
अर्थ निकालना होता है जिससे कि दोनों का मान रह जाए

2495
03:12:42,440 --> 03:12:47,360
तो अर्थ क्या होगा कि अगर कोई मुसलमान जो दवे

2496
03:12:47,360 --> 03:12:51,760
आना चाहता है उसको नहीं आने दिया जाए और कोई श्रद्धावन

2497
03:12:51,760 --> 03:12:56,160
है रसखान रहीम जैसा उसको आने दिया जाए

2498
03:12:56,160 --> 03:13:00,800
सिंपल आज हो कौन द रहा हैसे

2499
03:13:00,800 --> 03:13:04,920
मैं एक बात बता रहा दूसरी बात य है कि अगर शंकराचार्य की आपस में

2500
03:13:04,920 --> 03:13:08,920
बात को लेकर के कोई मैच नहीं खा रही है तो

2501
03:13:08,920 --> 03:13:10,440
उससे आपके धर्म और ब्रह्म

2502
03:13:10,440 --> 03:13:14,440
पर क्या अंतर आ जा रहा है भाई आध्यात्मिक

2503
03:13:14,440 --> 03:13:18,720
दृष्टि से एक रूप में शंकराचार्य की गद्दी

2504
03:13:18,720 --> 03:13:22,760
पर बैठे हुए हैं तो उनका धर्म ब्रह्म को लेकर के

2505
03:13:22,760 --> 03:13:26,800
निर्णय एक है मगर उसके साथ ही साथ वो मानव

2506
03:13:26,800 --> 03:13:30,800
देह में भी है तो उनके व्यवहारिक दृष्टि में क्या करते हो

2507
03:13:30,800 --> 03:13:34,800
क्या मतलब दृष्टि से उनके जो वो हो सकते हैं मार्गदर्शन मार्ग

2508
03:13:34,800 --> 03:13:38,840
का दिखाने का रास्ता अलग हो सकते हैं उससे आपके धर्म ब्रह्म पर

2509
03:13:38,840 --> 03:13:43,000
क्या असर पड़ जा रहा है क्या धर्म की व्याख्या बदल गई कि ब्रह्म

2510
03:13:43,000 --> 03:13:47,160
की व्याख्या बदल गई कि इसके आधार पर तुम आ गए हमारे पास क्या कौन सा शंकराचार्य

2511
03:13:47,160 --> 03:13:51,160
सही है रिपोर्टर था

2512
03:13:51,160 --> 03:13:55,440
रिपोर्टर था उसने कर की बात किससे हो रही

2513
03:13:55,440 --> 03:13:59,680
है है ना ऐसे प्रश्नों का रोज नित्य प्रति

2514
03:13:59,680 --> 03:14:05,680
हम आंसर देते हैं बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल इसमें

2515
03:14:06,880 --> 03:14:11,120
कोई आप अस्वस्थ है जिसकी वजह से कोर्ट में पेश नहीं हो पाए

2516
03:14:11,120 --> 03:14:16,160
स्व हो गया पहले बीमार था ये देखिए

2517
03:14:16,160 --> 03:14:20,760
स्व हो बर भी देख लीजिए

2518
03:14:20,760 --> 03:14:25,000
बस बस बस बस बस बस पहली बात तो इनका बुढ़ापा देख लीजिए

2519
03:14:25,000 --> 03:14:29,760
भैया अजर अमर अविनाशी यह तत्वदर्शी

2520
03:14:29,760 --> 03:14:33,200
है और

2521
03:14:33,200 --> 03:14:38,160
सुनिए कि यह पहले बीमार थे तो बीमार व्यक्ति क्यों होता है कोई

2522
03:14:38,160 --> 03:14:42,760
जब उसने पाप कि हो वो कह रहा पले बीमार थे

2523
03:14:42,760 --> 03:14:47,040
अब सही हो गया अरे वो बीमार नहीं गलत उन अर

2524
03:14:47,040 --> 03:14:52,160
कास के बोल रहा है बीमार नहीं है व बीमार नहीं काल बोल रहा

2525
03:14:52,160 --> 03:14:56,480
है में भी काल सकता है

2526
03:14:56,480 --> 03:15:02,480
श्री कृष्ण के अंदर सकता अंदर सकता बताइ

2527
03:15:05,120 --> 03:15:09,240
आपसे वैसे जो काल से प्रभावित तो हो सकता है

2528
03:15:09,240 --> 03:15:13,560
ईश्वर यह हमने पिछले अपने लाइव में सिद्ध किया था

2529
03:15:13,560 --> 03:15:17,600
कि जब कोई किसी को श्राप देता है तो इनकी पुस्तको में लिखा वो

2530
03:15:17,600 --> 03:15:21,880
जो श्राप देने वाली वृति आती है वह काल के प्रभाव से आती है

2531
03:15:21,880 --> 03:15:26,000
तो कबीर ने भी काल को श्राप ही दिया है मैं

2532
03:15:26,000 --> 03:15:30,200
तो कबीर दास भी ऊपर से देखते होंगे तो उनके आंसू टपकते होंगे

2533
03:15:30,200 --> 03:15:34,280
थोड़ा मुझे ना मुझे को स्वामी जी की एक लाइन याद

2534
03:15:34,280 --> 03:15:38,400
आती है की जेना तर भव सिं नर समाज असि

2535
03:15:38,400 --> 03:15:42,480
पाय और काल कर्मही ईश्वर ही मिथ्या दोष

2536
03:15:42,480 --> 03:15:46,480
लगाए काल को कर्म को ईश्वर को बचारे मिथ्या दोष लगाते

2537
03:15:46,480 --> 03:15:50,680
हैं ऐसा मनुष्य शरीर पाकर और सनातन धर्म पाकर अपना उद्धार

2538
03:15:50,680 --> 03:15:54,760
नहीं करते बालम की रामायण में हील

2539
03:15:54,760 --> 03:15:59,120
श्री राम से कह रहे हैं कि मैं आपके अंश से उत्पन्न हुआ इसलिए मैं आपका पुत्र हुआ

2540
03:15:59,120 --> 03:16:04,120
और ये लोग कहते केत्र

2541
03:16:04,120 --> 03:16:08,360
ह जब वाल्मीकि जी भी अपना दे रहे थे भगवान को अपने

2542
03:16:08,360 --> 03:16:12,720
विषय में बता रहे थे तो कह रहे थे

2543
03:16:12,720 --> 03:16:17,080
अंगुली बाबू है मैं ये सोच रहा थाय बाबू है कुछ गरु पुराण

2544
03:16:17,080 --> 03:16:21,280
लाएगा तो कुछ बहुत बड़ी कोई ऐसी समस्या लाएगा हम दिक्कत

2545
03:16:21,280 --> 03:16:26,200
हो जाएगी वो बाबू नहीं बाबू भैया है

2546
03:16:26,200 --> 03:16:30,600
वो आप उनको बोल बाबू भैया जरा गरुड़ पुराण का संधि विच्छेद

2547
03:16:30,600 --> 03:16:34,880
कीजिए गरुड़ पुराण शब्द का निर्वचन करिए गरुड़ पुराण

2548
03:16:34,880 --> 03:16:39,240
शब्द में कौन सी विभक्ति लगती है कभी पूछिए भाई सा में उतरते

2549
03:16:39,240 --> 03:16:43,360
जा रहे कहा गहराई में उतर रहे भाई वो लोग केवल उतना

2550
03:16:43,360 --> 03:16:47,520
ही जानते हैं जितनी चाबी ली पालने उतना चले खिलौना

2551
03:16:47,520 --> 03:16:52,680
बाबू भैया है बाबू भैया याद है बाब भैया बाबू भैया है

2552
03:16:52,680 --> 03:16:58,280
अच्छ सभी को समय देने के लिए

2553
03:16:58,280 --> 03:17:02,560
आभार लगे रहे आप बस आपसे बहुत प्रेरित

2554
03:17:02,560 --> 03:17:06,920
है आप लगे रहे आप बिल्कुल बैठिए नहीं

2555
03:17:06,920 --> 03:17:11,160
रन

2556
03:17:11,160 --> 03:17:15,480
र बिल्कुल बिल्कुल ब

2557
03:17:15,480 --> 03:17:19,480
विरामम को हो लंबा य

2558
03:17:19,480 --> 03:17:23,600
कह रहा था हा जो पहली बात है कि बहुत दिन

2559
03:17:23,600 --> 03:17:28,160
होन प वीडियो बनाते हुए तो लोग उछल रहे आजकल बहुत ज्यादा

2560
03:17:28,160 --> 03:17:32,280
बहुत जदा नहीं नहीं हम कोई बात ऐसी देखेंगे

2561
03:17:32,280 --> 03:17:36,880
तो अवश्य बात करेंगे उस आपने जो ऑडियो भेजा है नाम को वो हमें भेजिएगा

2562
03:17:36,880 --> 03:17:41,520
दोबारा हा वो पड़ा हुआ है ठीक है ठीक व

2563
03:17:41,520 --> 03:17:45,840
हमा एक दिन में डिलीट हो जाता है नहीं आपने से

2564
03:17:45,840 --> 03:17:50,080
कर कर लिया था वो अभी भी है वहां ठीक है ठीक

2565
03:17:50,080 --> 03:17:54,200
और दूसरी बात है वो एक आर्य समाज के वो है नाम

2566
03:17:54,200 --> 03:17:58,280
तो नहीं लूंगा गौतम और वो आज फिर से शंकराचार्य जी के ऊपर टिप्पणी

2567
03:17:58,280 --> 03:18:02,320
की उन्होंने शंकराचार्य जी पर टिप्पणी करते हुए वो

2568
03:18:02,320 --> 03:18:06,360
बागेश्वर ही तो बोल रहे हैं बागेश्वर का ही तो रूप है वो बागेश्वर वालो ने

2569
03:18:06,360 --> 03:18:10,360
हा हा हा मेरा ही मेरा ही स्वरूप है दूसरा ऐसा है

2570
03:18:10,360 --> 03:18:13,600
ना देखिए बात ये है कि सभी को

2571
03:18:13,600 --> 03:18:17,920
यह भाव सभी के मन में है कि मैं धर्म रक्षा करूं ऐसा नहीं भागेश्वर

2572
03:18:17,920 --> 03:18:22,480
वाले बाबा भी धर्म की रक्षा ही करना चाहते हैं मगर क्या है कि शास्त्रों

2573
03:18:22,480 --> 03:18:26,600
का समग्र रूप से अध्ययन और उसके अनुसार बिल्कुल

2574
03:18:26,600 --> 03:18:30,760
कांटे की नोक वाली बातें करना यह कहां से हमें लेना है

2575
03:18:30,760 --> 03:18:35,080
हम तय करना होगा बिल्कुल ब या फर हम लोग य सोच ले शास्त्र

2576
03:18:35,080 --> 03:18:39,080
किसी काम के है ही नहीं पालतू की चीज तो फिर किसकी रक्षा

2577
03:18:39,080 --> 03:18:43,120
कर रहे हैं सही शास्त्र में अपने हर समस्या

2578
03:18:43,120 --> 03:18:47,280
का निदान दिया गया है पाच काल का धर्म भी बया

2579
03:18:47,280 --> 03:18:51,400
गया इस पर मुझे एक बात याद आई सुना दूं अगर आप बोले तो इस

2580
03:18:51,400 --> 03:18:55,520
घटना पर मुझे एक बात याद आ गई है सुना दूं अगर आप बोले तो जी इस

2581
03:18:55,520 --> 03:18:59,520
इस विषय पर हम उनसे बात करेंगे मेरा उनसे एक बार मिलना हुआ था बागेश्वर धाम जी

2582
03:18:59,520 --> 03:19:03,600
से वृंदावन में हमारी थोड़ा उनसे अच्छी वो है दो चार हम करेंगे इस विषय

2583
03:19:03,600 --> 03:19:07,800
पर अ भले व्यक्ति है उनके करेंगे उन बा

2584
03:19:07,800 --> 03:19:11,800
क्योंकि वो वृंदावन में है ठाकुर जी आना जाना है हमारा

2585
03:19:11,800 --> 03:19:16,360
भी वहा आना जाना लगा रहता है हम इस विषय पर बात कर भैया शवास भैया

2586
03:19:16,360 --> 03:19:20,520
जी हमने एक प्रसंग सुना है राजेंद्र दास जी महाराज बता रहे थे कि

2587
03:19:20,520 --> 03:19:24,640
एक बार धर्म समराट करपात्री जी महाराज वृंदावन आए तो उनके जो गुरु

2588
03:19:24,640 --> 03:19:28,600
थे गण गणेश दास जी उन्होंने बोला कि ब्रिज में हमारे यहां गीता जयंती नहीं होती

2589
03:19:28,600 --> 03:19:33,040
है तो तो स्वामी जी ने कहा कि आप गीता जयंती मनाइए

2590
03:19:33,040 --> 03:19:37,200
पहली बार तभी से शुरू हो गई वहां पर हम स्वयं आएंगे तो कपात जी महाराज

2591
03:19:37,200 --> 03:19:41,480
गीता जयंती के अवसर पर वृंदावन आए तो उस उस सभा का जो आयोजन

2592
03:19:41,480 --> 03:19:45,600
करता लोग थे वो आरएसएस के लोग थे तो जब स्वामी जी को बोलने का मौका मिला

2593
03:19:45,600 --> 03:19:49,800
तो स्वामी जी जी भाई वो तो उनके वैसे वक्ता थे उन्होंने आरएसएस का खंडन

2594
03:19:49,800 --> 03:19:53,880
करना शुरू किया तो वहां पर जितने जो वक्ता थे वो लोग बिगड़ गए बाबा जी तो हमारा ही

2595
03:19:53,880 --> 03:19:58,280
खंडन कर रहे हैं तो उनके जो गुरु थे उन्होंने बोला तुम लोग शांत बैठो

2596
03:19:58,280 --> 03:20:02,680
देश में इस समय ऐसे महात्मा विराज रहे हैं जो धर्म को उसी

2597
03:20:02,680 --> 03:20:06,960
स्वरूप में स्वीकार करते हैं जिस स्वरूप में हमारे पूर्वजों ने स्वीकार किया है इसीलिए

2598
03:20:06,960 --> 03:20:11,080
वो जो बोल रहे हैं शांति से सुन लो और तुम सबका मंगल होगा तुम अपने

2599
03:20:11,080 --> 03:20:15,280
मन में उनके प्रति मन मैला मत करो कि हमारे आ का खंडन कर रहे हैं अगर

2600
03:20:15,280 --> 03:20:19,400
वो खंडन भी कर रहे हैं ना और तुम चुपचाप सुन लोगे तो तुम्हारा कल्याण

2601
03:20:19,400 --> 03:20:23,400
होगा मंगल होगा ठीक है क्योंकि उनका तुम खंडन सुन रहे हो

2602
03:20:23,400 --> 03:20:27,440
वो केवल बाहरी है उनका जो अंतःकरण इतना है इतना कोमल

2603
03:20:27,440 --> 03:20:31,520
है कि उनको खंडन को सुन लो उनके द्वारा तुम्हारा तिरस्कार भी हो जाए और

2604
03:20:31,520 --> 03:20:35,880
तुम उसको सह जाओ तो तुम्हारा उसम परम मंगल होगा तो सब लोग चुप हो गए

2605
03:20:35,880 --> 03:20:40,440
और सबने बड़े प्रेम से सुना हमारे पूज्य गुरुदेव को बचपन में बहुत सानिध्य मिला

2606
03:20:40,440 --> 03:20:43,800
है सुनी हुई बात बता रहा हूं जी महाराज ने बताया है

2607
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सुनाया था बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया उनके एक शिष्य गु

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चन के परम विवान जी जी

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गुरु चरण दास जी को जानते आप सभी को जय

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श जानता जानता हं गु चरण जी को जानता हूं

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बिल्कुल परम विद्वान है संस्कृत के बहुत अच्छे विदत है

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बहुत मलक पठ मलक पठ

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हा हा जानता मेरी बात होती है झारखंड के हैं जी

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जी जय श्री

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राम हर हर महादेव हरर महाद महादेव

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[संगीत]
