1
00:00:03,680 --> 00:00:07,760
तो जय श्री राम सभी लोगों को। आशा करते हैं आप सभी

2
00:00:07,760 --> 00:00:13,760
कुशल पूर्वक होंगे और

3
00:00:14,000 --> 00:00:18,240
मेरी आवाज वगैरह ठीक आ रही है तो कमेंट करके मुझे बता दें कि आवाज

4
00:00:18,240 --> 00:00:22,880
ठीक है। आज का विषय बहुत गंभीर है।

5
00:00:22,880 --> 00:00:25,040
इसलिए

6
00:00:25,040 --> 00:00:29,840
मैंने बहुत प्रयास किए कि

7
00:00:29,840 --> 00:00:34,240
मैं पहले वीडियो ना बना करके और इस तरह से अपने

8
00:00:34,240 --> 00:00:38,960
स्तर पर जो भी कर सकता हूं वह करूं।

9
00:00:38,960 --> 00:00:43,120
परंतु जब कोई रास्ता मुझे नहीं दिखा तो मैंने ये रास्ता

10
00:00:43,120 --> 00:00:47,760
इस मार्ग का चयन किया है अपना संदेश पहुंचाने के लिए।

11
00:00:47,760 --> 00:00:52,000
तो यह जो वीडियो है यह कुल मिलाकर के

12
00:00:52,000 --> 00:00:56,080
तीन विषयों पर आधारित वीडियो है और उसका

13
00:00:56,080 --> 00:01:00,480
आधार है हमारे जो सनातन धर्म ग्रंथ हैं वैदिक वांगमय

14
00:01:00,480 --> 00:01:05,440
है और जिनमें पुराण भी आते हैं।

15
00:01:05,440 --> 00:01:09,840
तीन विषय यह है कि सबसे पहला विषय है जो

16
00:01:09,840 --> 00:01:14,240
धर्मेंद्र धर्मेंद्र हुड्डा जी हैं उनको

17
00:01:14,240 --> 00:01:18,480
एक संदेश पहुंचाना एक गंभीर विषय

18
00:01:18,480 --> 00:01:22,800
से अवगत कराना। दूसरा विषय है

19
00:01:22,800 --> 00:01:26,800
कि यह जो 25 अगस्त को हरियाणा में जो आयोजन हो रहा

20
00:01:26,800 --> 00:01:30,960
है जो कि हुड्डा जी के आहान पर आयोजित

21
00:01:30,960 --> 00:01:35,200
हो रहा है। इसमें जो मूल

22
00:01:35,200 --> 00:01:39,840
सनातन वैदिक आर्य हिंदू हैं जो इस कार्यक्रम से

23
00:01:39,840 --> 00:01:44,000
अपेक्षा कर रहे हैं और करनी भी चाहिए। ये सनातन धर्म की रक्षा के लिए आयोजित हो रहा है। तो

24
00:01:44,000 --> 00:01:48,400
उनकी जो अपेक्षा होने अपेक्षा करने वाली जो स्थिति है

25
00:01:48,400 --> 00:01:54,160
वो यहां पर बिल्कुल भी अनुचित नहीं है। परंतु अपने

26
00:01:54,160 --> 00:01:58,160
मस्तिष्क को और अपने विचारों को पूर्व में ही थोड़ा सा

27
00:01:58,160 --> 00:02:02,320
सतर्क रखते हुए आपको अपेक्षा करनी है और सतर्क किन बातों से

28
00:02:02,320 --> 00:02:06,320
रखना है उनके लिए यह वीडियो आज है। तो

29
00:02:06,320 --> 00:02:10,480
यह दूसरा विषय है। आपकी सतर्कता हिंदुओं को सतर्क रहने की भी आवश्यकता

30
00:02:10,480 --> 00:02:14,480
है। इस कार्यक्रम के प्रति वह क्यों है वह मैं आपको बताने वाला

31
00:02:14,480 --> 00:02:16,800
हूं।

32
00:02:16,800 --> 00:02:21,840
तीसरी बात है कि आज से मैं इस

33
00:02:21,840 --> 00:02:26,080
सीरीज का उद्घाटन कर रहा हूं। बहुत ज्यादा एपिसोड नहीं होंगे। मगर जो मोटे-मोटे आक्षेप

34
00:02:26,080 --> 00:02:30,080
पुराणों के आधार पर या हमारे जो भगवत चरित्र उनको

35
00:02:30,080 --> 00:02:34,560
बदनाम करने के लिए विभिन्न मतों

36
00:02:34,560 --> 00:02:39,120
के द्वारा उठाया जाता है। तो उसमें एक एक करके जो बहुत ज्यादा प्रसिद्धि

37
00:02:39,120 --> 00:02:43,200
प्राप्त जो आक्षेप है उनका निराकरण कर देंगे। यद्यपि हमने कई बार किया

38
00:02:43,200 --> 00:02:47,200
भी है परंतु डेडिकेटेड रूप से इस पर कोई लाइव

39
00:02:47,200 --> 00:02:51,360
या कोई वीडियो डेडिकेटेड रूप से नहीं बनाया है। यहां पर अगर

40
00:02:51,360 --> 00:02:55,680
आप हमारे पुराने वीडियोस में जाएंगे तो उसमें सबसे पहला एक

41
00:02:55,680 --> 00:03:00,880
आपको मिलेगा इस के जो लखनऊ प्रेसिडेंट है उनके साथ जो हमारा

42
00:03:00,880 --> 00:03:05,040
एक पडकास्ट हुआ था तो उसमें उन्होंने भी शिव जी

43
00:03:05,040 --> 00:03:09,040
को इसलिए बताया था कुछ हीन दृष्टि से कि वो भगवान नहीं

44
00:03:09,040 --> 00:03:13,920
है क्योंकि वो मोहिनी से मोहिनी रूप के प्रति आकृष्ट हो गए थे तो

45
00:03:13,920 --> 00:03:17,920
उस उसकी विवेचना में जब हमने उसकी विवेचना की थी तो

46
00:03:17,920 --> 00:03:22,000
उसमें जो शिव शिवम मोहिनी का आदि दैविक आदि

47
00:03:22,000 --> 00:03:26,080
भौतिक आध्यात्मिक अर्थ है उस घटना का वो दृष्टांत उसी

48
00:03:26,080 --> 00:03:30,320
वीडियो में प्रस्तुत कर दिए थे तो ऐसा नहीं है समय-समय

49
00:03:30,320 --> 00:03:34,720
पर हम बताते रहे हैं ब्रह्मा जी ब्रह्मा सरस्वती विवाह है उसके बारे में बताया है

50
00:03:34,720 --> 00:03:37,040
और जो मूल सिद्धांत है वो भी अवगत

51
00:03:37,040 --> 00:03:41,120
कराते रहे जिससे कि हिंदू बार-बार भटके ना परंतु डेडिकेटेड रूप

52
00:03:41,120 --> 00:03:45,120
से कोई वीडियो की आज हम इसी पर बात करने वाले हैं कि ब्रह्मा सरस्वती विवाह

53
00:03:45,120 --> 00:03:50,000
क्यों हुआ या फिर शिव मोहिनी प्रकरण में क्या

54
00:03:50,000 --> 00:03:54,080
हमें अर्थ लेना चाहिए उसका? तो इस तरीके से हमने कभी डेडिकेटेड रूप

55
00:03:54,080 --> 00:03:58,320
से नहीं बनाया। तो आज मैं इसका श्री गणेश कर रहा हूं। उद्घाटन कर रहा हूं। इस सीरीज

56
00:03:58,320 --> 00:04:02,880
का प्रारंभ कर रहा हूं। जिसमें कि आज हम ब्रह्मा सरस्वती विवाह पर बात करेंगे।

57
00:04:02,880 --> 00:04:06,960
ठीक है? तो पुराणों पर आक्षेप ये तीसरा चरण। दूसरा

58
00:04:06,960 --> 00:04:09,920
चरण है

59
00:04:09,920 --> 00:04:14,240
सामान्य हिंदू की सतर्कता 25 अगस्त को होने वाले कार्यक्रम

60
00:04:14,240 --> 00:04:18,400
के प्रति। और पहला है हुड्डा जी को संदेश। तो

61
00:04:18,400 --> 00:04:22,400
जितने भी हिंदू हैं, जितने भी हिंदू भाई हैं, मैं उनसे निवेदन करता हूं

62
00:04:22,400 --> 00:04:26,480
कि मैंने प्रयास किया है हुड्डा जी को संदेश अपना पहुंचाने

63
00:04:26,480 --> 00:04:30,480
का। परंतु मेरे पास उनका शायद यथोचित संपर्क

64
00:04:30,480 --> 00:04:34,480
सूत्र ना हो या फिर जो भी है मेरा

65
00:04:34,480 --> 00:04:38,640
मैसेज उन तक नहीं पहुंच पाया। इसलिए मैं वीडियो के माध्यम से उनको एक संदेश

66
00:04:38,640 --> 00:04:42,640
दे रहा हूं और जितने भी हिंदू हैं मैं

67
00:04:42,640 --> 00:04:46,720
उनसे निवेदन करूंगा कि आप यह वीडियो उन तक पहुंचाएं। निश्चित

68
00:04:46,720 --> 00:04:51,120
रूप से पहुंचाए। तो सबसे पहले तो जो

69
00:04:51,120 --> 00:04:52,160
लोग इस वीडियो

70
00:04:52,160 --> 00:04:56,320
से ही इस प्रकरण को जान रहे हैं उनके लिए थोड़ा सा एक संक्षिप्त

71
00:04:56,320 --> 00:05:00,400
विवरण देते हुए मैं अपने जो पहला विषय मूल विषय

72
00:05:00,400 --> 00:05:04,480
उस पर आना आना आता हूं। तो प्रकरण

73
00:05:04,480 --> 00:05:08,720
क्या है कि जहां जो मेरी जानकारी है जहां तक कि

74
00:05:08,720 --> 00:05:13,120
हुड्डा जी एक समाज सेवक है और वो काफी दिनों से अपनी प्रोफाइल

75
00:05:13,120 --> 00:05:16,240
के द्वारा ऐसे

76
00:05:16,240 --> 00:05:20,240
तंत्र या ऐसे व्यक्तित्व जो अंधविश्वास फैला रहे थे

77
00:05:20,240 --> 00:05:24,560
सनातन धर्म के नाम पर या सनातन धर्म का चोला ओढ़ के तो उनको

78
00:05:24,560 --> 00:05:28,720
अपनी तरीके से वो उनसे जूझ रहे थे

79
00:05:28,720 --> 00:05:32,880
और उनसे समाज को मुक्त करने का प्रयास कर रहे थे। विशेष रूप से हरियाणा

80
00:05:32,880 --> 00:05:36,880
में जो हो रहा है उसको लेकर के वो और कई सारी

81
00:05:36,880 --> 00:05:40,880
समाज को जागरूक करने वाली जो गतिविधियां हैं वो अपने Facebook पेज

82
00:05:40,880 --> 00:05:45,280
इत्यादि से कर रहे थे जहां तक मेरी जानकारी है और संभवत उनको

83
00:05:45,280 --> 00:05:49,440
जानने मानने और अनुगमन करने वाले भी बहुत लोग हैं।

84
00:05:49,440 --> 00:05:53,520
उनका इस इस प्रकार का प्रभाव है हरियाणा में कि उनका अनुगमन

85
00:05:53,520 --> 00:05:58,400
करने वाले करने वाले लोगों की संख्या पर्याप्त है।

86
00:05:58,400 --> 00:06:02,640
तो इसी क्रम में जब हुड्डा जी ने कोई वीडियो बनाकर के टिप्पणी

87
00:06:02,640 --> 00:06:07,120
की रामपाल के ऊपर रामपाल के तंत्र के ऊपर रामपाल की जो अभद्र

88
00:06:07,120 --> 00:06:07,680
टिप्पणियां

89
00:06:07,680 --> 00:06:11,840
हैं हमारे सनातन हिंदू देवी देवताओं के प्रति उनके ऊपर तो इधर से

90
00:06:11,840 --> 00:06:15,920
इनका जो रामपाली गैंग है जो पूरा लगा रहता है कि कोई भी

91
00:06:15,920 --> 00:06:20,080
अगर कुछ बोले वो सामर डियर वाली बात तो मैंने आपको बताई है ना

92
00:06:20,080 --> 00:06:25,520
कि रामपाल का सबसे बड़ा शत्रु कौन है? उसके ही

93
00:06:25,520 --> 00:06:30,000
डंका पीट कर अपने आप को उसका शिष्य बताने वाले जो गैंग है उसका रामपाल

94
00:06:30,000 --> 00:06:34,080
का वही उसका सबसे बड़ा शत्रु है क्योंकि रामपाल जब भी कभी मुसीबत में फंसा है तो

95
00:06:34,080 --> 00:06:38,320
उसको उसकी गैंग ने ही फंसवाया है और इस बार भी यही किया उसकी गैंग

96
00:06:38,320 --> 00:06:42,320
चालू हो गई जवाब देने के लिए हुड्डा जी ने एक

97
00:06:42,320 --> 00:06:46,640
मरदित रहते हुए वीडियो बनाया और उसमें चेतावनी

98
00:06:46,640 --> 00:06:50,720
दी और यहां से गैंग ने व्यक्तिगत प्रहार करना ऐसा करना तू तो यह

99
00:06:50,720 --> 00:06:54,960
है तू तो वो है तेरा व्यक्तिगत ये था तू यह कुत्ता चुराया था तूने बहुत सारी चीजें

100
00:06:54,960 --> 00:06:58,960
चालू कर दी। इसके बाद वह चीज गमा गई। हुड्डा

101
00:06:58,960 --> 00:07:03,200
जी ने भी अपनी वो पहले उनका जो मैंने थोड़ा बहुत उनका Facebook

102
00:07:03,200 --> 00:07:07,440
पेज चेक किया है तो उसमें मैंने जाना कि वो पहले भी अंत तक लड़ने

103
00:07:07,440 --> 00:07:11,440
वाले व्यक्ति हैं और वो लड़ेंगे। उन्होंने डिक्लेअ कर दिया कि मैं पीछे नहीं हटूंगा।

104
00:07:11,440 --> 00:07:16,720
मैं लडूंगा। दोनों तरफ से फिर ये सब चीजें चालू हो गई।

105
00:07:16,720 --> 00:07:21,040
यहां तक भी तो यह मतलब यह पूरा प्रकरण है जो

106
00:07:21,040 --> 00:07:22,880
चल रहा है। अब इसी सिलसिले

107
00:07:22,880 --> 00:07:26,880
में हुड्डा जी ने एक आहान किया है 25 अगस्त को हरियाणा में कहीं पर

108
00:07:26,880 --> 00:07:31,200
एक आयोजन हो रहा है जिसमें उन्होंने बताया कि विभिन्न

109
00:07:31,200 --> 00:07:35,280
जो संप्रदाय हैं उनके आचार्य गणों का आह्वान किया है। हालांकि उसमें

110
00:07:35,280 --> 00:07:39,760
आ कौन-कौन रहा है यह अभी तक मुझे सुनिश्चित रूप से ज्ञात नहीं हुआ है।

111
00:07:39,760 --> 00:07:43,760
पर उन्होंने आहान किया है और नाथ संप्रदाय के कई डेरे हैं ऐसा बताया

112
00:07:43,760 --> 00:07:47,840
जाता है और वह लोग तो वहां पर सम्मिलित होने ही वाले हैं। साथ ही साथ

113
00:07:47,840 --> 00:07:51,920
इस आयोजन में वहां पर आर्य समाज के

114
00:07:51,920 --> 00:07:56,080
बंधुग भी उपस्थित होने वाले हैं। और मैं कहूंगा कि ये जो

115
00:07:56,080 --> 00:08:00,080
अभियान जो चला है इसमें जिस तरीके से आर्य समाज ने स्टैंड लिया है ये

116
00:08:00,080 --> 00:08:04,080
बहुत अच्छा उन्होंने मतलब उनकी पहल

117
00:08:04,080 --> 00:08:08,080
है कि ये अच्छा लगा देख के कि आर्य समाज भी आगे है इस चीज

118
00:08:08,080 --> 00:08:12,560
के लिए कि अपमानजनक तरीके से जो टिप्पणियां रामपाल

119
00:08:12,560 --> 00:08:16,800
कर रहा है। तो उसको लेकर के उन्होंने भी स्टैंड लिया। मैंने कई लोगों के वीडियो

120
00:08:16,800 --> 00:08:20,960
देखे वह आगे आए। इसके लिए उनका भी हृदय से धन्यवाद। तो

121
00:08:20,960 --> 00:08:25,280
यह एक आयोजन होने वाला है हुड्डा जी के द्वारा और यह मूल रूप से ये जो आयोजन

122
00:08:25,280 --> 00:08:29,600
है यह रामपाल के विरुद्ध होने वाला है। वहां पर आगे की चीजें

123
00:08:29,600 --> 00:08:33,760
निश्चित होंगी। ऐसा बताया जा रहा है और हमारे अगले कदम क्या होंगे वह बताया

124
00:08:33,760 --> 00:08:37,840
जा रहा है। अच्छी बात है। बहुत अच्छी बात है। पर बात यह

125
00:08:37,840 --> 00:08:38,340
है

126
00:08:38,000 --> 00:08:42,000
कि इसमें बीच-बीच में मुझे कुछ सुनने को ये आ रहा है। जैसे रामपाल का एक वक्तव्य

127
00:08:42,000 --> 00:08:46,720
आया और रामपाल ने उसमें ये कहा कि भाई मैं जो भी बोलता हूं तुम्हारे शास्त्रों में लिखा है।

128
00:08:46,720 --> 00:08:50,960
तुम अपने अगर तुम मुझे गलत कह रहे हो तुम अपने शास्त्रों को गलत कह दो। तुम्हारे

129
00:08:50,960 --> 00:08:55,520
शास्त्र गलत हो गए। यानी कि मूल रूप से देखा जाए तो जिन शास्त्रों

130
00:08:55,520 --> 00:08:59,520
को जो मूल सनातन परंपरा प्राप्त सनातन वैदिक हिंदू

131
00:08:59,520 --> 00:09:03,520
है वह मानते हैं जिन शास्त्रों को उन शास्त्रों में लिखा है ऐसा रामपाल का

132
00:09:03,520 --> 00:09:07,520
कहना है। तो फिर भीनी सी

133
00:09:07,520 --> 00:09:11,680
ऐसी बातें भी आई कि संभवत यह भी हो सकता है कि

134
00:09:11,680 --> 00:09:14,720
भाई

135
00:09:14,720 --> 00:09:19,600
एक बीच में एक बात यह भी सुनाई दी थी कि जब बहुत ज्यादा ठना

136
00:09:19,600 --> 00:09:23,600
जो ठन गई थी दोनों ओर से मामले को तो एक बैठक हुई जिसमें बताया गया

137
00:09:23,600 --> 00:09:27,680
कि अब ना हम कुछ बोलेंगे ना आप कुछ बोलो यहीं से ड्रॉप

138
00:09:27,680 --> 00:09:31,920
आउट कर दो मामले को शांत कर दो और आप अपनी पोस्ट हटा लो हम अपनी पोस्ट हटा लेंगे हालांकि

139
00:09:31,920 --> 00:09:36,000
दूसरे दिन हुड्डा जी ने इस बात का खंडन कर लिया कर दिया कि मैंने कोई

140
00:09:36,000 --> 00:09:41,040
कॉम्प्रोमाइज वगैरह नहीं किया है किसी से भी।

141
00:09:41,040 --> 00:09:45,760
अब यहां पर बात ये आती है कि यदि रामपाल धर्मेंद्र

142
00:09:45,760 --> 00:09:49,920
जी से यानी धर्मेंद्र हुड्डा तो धर्मेंद्र जी से रामपाल यह

143
00:09:49,920 --> 00:09:54,080
कहता है कि मैं जो कह रहा हूं वो तुम्हारे पुराणों में लिखा हुआ है। शास्त्रों में लिखा

144
00:09:54,080 --> 00:09:58,240
हुआ है। वही कह रहा हूं। एज इट इज बोल रहा हूं। ऐसा है नहीं वो हम आगे बात करेंगे।

145
00:09:58,240 --> 00:10:02,240
पर वह जब यह कहेगा तो जो वह बोल रहा है

146
00:10:02,240 --> 00:10:06,320
उससे मिलताजुलता हालांकि जो एग्जजेक्टली उसने बोला है जिन

147
00:10:06,320 --> 00:10:10,400
बातों को लेकर हमने रिट तक लगा दी हाई कोर्ट में

148
00:10:10,400 --> 00:10:14,480
और जो एग्जजेक्टली उसने जो बोला है वो हमारे इस पूरे वैदिक मांग में कहीं भी नहीं

149
00:10:14,480 --> 00:10:18,640
लिखा है। वो तो उसकी अपनी कल्पना है। परंतु उसी प्रकार

150
00:10:18,640 --> 00:10:22,880
का दूसरा दूसरी घटना वृतांत

151
00:10:22,880 --> 00:10:26,960
प्रतीत होने वाला जो वाक्य है वो वाक्य आपको

152
00:10:26,960 --> 00:10:30,000
पुराण में मिल जाएगा तो जब रामपाल

153
00:10:30,000 --> 00:10:34,000
यह बात कहेगा हुड्डा जी से जो होने वाला है तो वहां पर

154
00:10:34,000 --> 00:10:38,000
हुड्डा जी की ओर से अभी तक जो मुझे दिखाई दे रहे हैं रामपाल

155
00:10:38,000 --> 00:10:42,320
का शास्त्र के आधार पर प्रतिकार करने वाले जो लोग अभी तक जो दिखे हैं

156
00:10:42,320 --> 00:10:46,640
तो वह मुझे दिख रहे हैं आर्य समाज अब यहां पर मैं अभी

157
00:10:46,640 --> 00:10:50,880
हुड्डा जी आपके प्रयास को और आपके एफर्ट

158
00:10:50,880 --> 00:10:54,880
को मैं नमन करता हूं। बहुत सम्मान करता हूं। आपने जो पहल की है बहुत अच्छी पहल है।

159
00:10:54,880 --> 00:10:58,960
मुझे बहुत उससे जो है

160
00:10:58,960 --> 00:11:03,360
प्रसन्नता हुई और आर्य समाज ने भी जिस प्रकार से स्टैंड लिया रामपाल

161
00:11:03,360 --> 00:11:07,600
रामपाल के विरोध में वो भी बहुत अच्छा है। पर

162
00:11:07,600 --> 00:11:11,760
आर्य समाज को अंतिम रूप से अपना

163
00:11:11,760 --> 00:11:15,760
रक्षक बनाते हुए शास्त्र के आधार पर रामपाल से

164
00:11:15,760 --> 00:11:20,240
इस विषय में बात करना यह कहीं से भी उचित नहीं है।

165
00:11:20,240 --> 00:11:25,440
क्यों उचित नहीं है? क्योंकि आज जो रामपाल बोल रहा है इतना

166
00:11:25,440 --> 00:11:29,840
उसका जो बेस है ना जो नीव है वो आर्य समाज

167
00:11:29,840 --> 00:11:33,920
द्वारा ही निर्मित है। यह सब बातें जो है ना जो वेद में

168
00:11:33,920 --> 00:11:37,920
वेद के ऊपर आक्षेप लग रहे हैं। इसमें पहली बार जो बात करने वाला जो

169
00:11:37,920 --> 00:11:42,000
कोई तंत्र है वो आर्य समाज है जो वेद के ऊपर नहीं सॉरी पुराण के ऊपर

170
00:11:42,000 --> 00:11:45,120
जो आक्षेप लग रहे हैं पौराणिक घटनाओं के ऊपर

171
00:11:45,120 --> 00:11:49,280
तो यह जो जो बेस तैयार करके दिया है रामपाल जैसों

172
00:11:49,280 --> 00:11:53,280
को रामपाल ही क्यों जिसको भी विरोध करना होता है सनातन का

173
00:11:53,280 --> 00:11:57,840
मूर्ति पूजा का या फिर ये जितनी पौराणिक

174
00:11:57,840 --> 00:12:02,000
कथाएं हैं इसके आधार पर वो व्यक्ति किसी को भी अगर विरोध करना

175
00:12:02,000 --> 00:12:06,160
होता है तो वो करता है और यह जो आधार है ये बना करके दिया है आर्य समाज और

176
00:12:06,160 --> 00:12:10,240
मैंने अपने कई वीडियोस में बताया भी है कि परंपरा प्राप्त जो

177
00:12:10,240 --> 00:12:14,320
सनातन सिद्धांत है उसका आज जो विरोध कर रहे हैं

178
00:12:14,320 --> 00:12:18,400
उनको छत्रछाया जो सानिध्य है वो आर्य समाज से ही प्राप्त हुआ

179
00:12:18,400 --> 00:12:22,640
है। हालांकि मैं यह नहीं कहूंगा कि आर्य समाज का सिंगल पॉइंट एजेंडा

180
00:12:22,640 --> 00:12:26,800
यही था कि मेरे जैसे और खड़े हो जाए। आर्य समाज खुद भी इनका खंडन करता है। परंतु

181
00:12:26,800 --> 00:12:30,880
आपने ही यह ढांचा उनको बना करके दिया है। इससे इस सत्य से भी मुंह

182
00:12:30,880 --> 00:12:34,960
नहीं फेरा जा सकता। यह बात भी सच है। तो जो आर्य समाज

183
00:12:34,960 --> 00:12:39,600
पहले ही पुराणों को

184
00:12:39,600 --> 00:12:43,680
अप्रामाणिक मानता है। जो आर्य समाज पहले

185
00:12:43,680 --> 00:12:47,680
से ही यह कहता है कि भाई ये राधा कौन है? वो पहले ही आक्षेप लगाता है।

186
00:12:47,680 --> 00:12:51,760
ब्रह्मवरत पुराण में यह लिखा है। फलाना लिखा है, ढिमका लिखा है।

187
00:12:51,760 --> 00:12:55,840
जो आर्य समाजी स्वयं पहले से ही एक तानाबाना तैयार

188
00:12:55,840 --> 00:13:00,560
करके रखे हुए हैं। जिनके आधार पर आज ये रामपाल जैसे लोग खड़े हो रहे हैं।

189
00:13:00,560 --> 00:13:04,640
वो आर्य समाज हमारी रक्षा कैसे करेगा? वहां पर इस विषय में

190
00:13:04,640 --> 00:13:08,720
रामपाल जब सामने खड़ा होगा तो आर्य समाज इस विषय

191
00:13:08,720 --> 00:13:12,880
में हमारा रक्षक नहीं हो सकता। शास्त्रों के आधार पर हां जो

192
00:13:12,880 --> 00:13:17,040
जनबल होता है किसी दैव कार्य के लिए धर्म कार्य

193
00:13:17,040 --> 00:13:21,120
के लिए जनबल चाहिए होता है संख्या बल चाहिए होता है उसके लिए आर्य समाज

194
00:13:21,120 --> 00:13:25,440
का साथ बहुत अपेक्षित है और प्रशंसनीय

195
00:13:25,440 --> 00:13:29,600
अगर वो आता है आर्य समाज आर्य समाज ही आते हैं सामने बहुत अच्छी बात है

196
00:13:29,600 --> 00:13:33,600
परंतु आर्य समाज वहां जाकर के ये नहीं कह सकता कि हमारे पुराणों में यह नहीं

197
00:13:33,600 --> 00:13:37,600
कहा गया है जो तुम कह रहे हो वो ये नहीं कह सकता आर्य समाज से जब पूछा

198
00:13:37,600 --> 00:13:41,920
जाएगा कि भाई इसका क्या करें जब रामपाल कहेगा यह देखो फलाने

199
00:13:41,920 --> 00:13:46,080
चैप्टर में लिखा है रामपाल ही कहेंगे रामपाल को तो कुछ ज्ञान नहीं है अब इस समय

200
00:13:46,080 --> 00:13:50,560
तो रामपाल के जो गुर्गे हैं उनको ज्यादा रट्टू तोते वाली पढ़ाई इस समय

201
00:13:50,560 --> 00:13:54,720
रामपाल से बात करोगे तो उसको 10 चीजें याद होंगी तो उनके जो रट्टू तोते उनको

202
00:13:54,720 --> 00:13:59,280
50 चीजें इस समय याद होंगी कहां कहां-कहां पर वो छिद्रान्वषण होता है ना कहांहां

203
00:13:59,280 --> 00:14:03,360
पर ऐसी बातें लिखी हुई हैं जिसके आधार पर जो है हम आक्षेप लगा सकते

204
00:14:03,360 --> 00:14:06,640
हैं सनातन धर्म के देवी देवताओं

205
00:14:06,640 --> 00:14:10,800
तो आर्य समाज वह तंत्र नहीं है जो वहां यह कह पाएगा

206
00:14:10,800 --> 00:14:15,200
कि नहीं नहीं तुम गलत बोल रहे हो। पुराण में यह नहीं यह लिखा है। हालांकि

207
00:14:15,200 --> 00:14:19,280
जितनी भी पौराणिक घटनाएं हैं उन सब का आधार वेदों में भी है।

208
00:14:19,280 --> 00:14:23,600
जो मैं अभी ब्रह्मा सरस्वती विवाह वाला प्रसंग जब आपको बताऊंगा

209
00:14:23,600 --> 00:14:27,600
तो उसमें वेदों में उसी प्रकार की घटना कहां पर दी गई जिसके आधार पर पुराणों

210
00:14:27,600 --> 00:14:31,760
की वो घटना चित्रित हुई है। वो मैं बताऊंगा। तो

211
00:14:31,760 --> 00:14:35,840
आर्य समाज क्या करता है? जब वेद में वैसी बातें आती हैं जिसका

212
00:14:35,840 --> 00:14:39,840
एज इट इज अगर शब्दार्थ ले लिया जाए तो बड़ा खराब लगे सुनने में

213
00:14:39,840 --> 00:14:44,000
या असंभव सी चीजें लगे या अश्लीलता सुनाई दे या फिर और

214
00:14:44,000 --> 00:14:48,000
कुछ जो कि सिद्धांत के रूप में जिसको नहीं लिया जा सकता है।

215
00:14:48,000 --> 00:14:52,240
तो आर्य समाज वहां पर क्या करता है? वहां पर

216
00:14:52,240 --> 00:14:57,280
उनके उस अर्थ को लेने का प्रयास करता है जो सही हो। ऐसा अर्थ

217
00:14:57,280 --> 00:15:01,440
परंतु वहीं पर जब पुराणों में वह घटनाएं आती है उसी से मिलती जुलती तो वहां

218
00:15:01,440 --> 00:15:05,440
पर क्योंकि वह विरोध रहा है शुरू से परंपरा प्राप्त आचार्यों

219
00:15:05,440 --> 00:15:09,440
से तो आर्य समाज वहां पर उसका अर्थ एज इट इज लेता है कि

220
00:15:09,440 --> 00:15:09,940
शिव

221
00:15:09,760 --> 00:15:13,760
मोहिनी के प्रकरण का तो यही अर्थ है। आर्य आर्य समाज जब वेदों में

222
00:15:13,760 --> 00:15:18,000
जब बात आती है कि अगर तुमको फल की प्राप्ति करनी है तो मेंढक

223
00:15:18,000 --> 00:15:22,080
से भोग करो, बैल से भोग करो तो वहां भाष्य करते समय उसका भावार्थ बदल देता

224
00:15:22,080 --> 00:15:26,080
है। वह एज इट इज शब्दार्थ नहीं लेता है आर्य समाज भावार्थ में

225
00:15:26,080 --> 00:15:30,400
अपने मन का कुछ उसके उसके पीछे की कुछ दय कुछ आदि दैविक

226
00:15:30,400 --> 00:15:34,640
अर्थ या आदि भौतिक अर्थ या फिर आध्यात्मिक अर्थ डाल देता है आर्य समाज परंतु

227
00:15:34,640 --> 00:15:38,640
जब पुराण की बात आती है उसमें भी यही सब अर्थ है आदि दैविक आदि

228
00:15:38,640 --> 00:15:42,960
भौतिक आदि आध्यात्मिक तो वहां पर आर्य समाज सीधे शब्दार्थ

229
00:15:42,960 --> 00:15:46,960
लेता है और उसकी निंदा कर देता है कि भाई हम पुराण को नहीं मानते उसमें तो यह सब लिखा

230
00:15:46,960 --> 00:15:50,960
हुआ है तो यदि धर्मेंद्र जी सीधा

231
00:15:50,960 --> 00:15:54,960
सा संदेश यह कि धर्मेंद्र जी यदि आप

232
00:15:54,960 --> 00:15:59,280
आर्य समाज को लेकर के इन विषयों में शास्त्र के आधार

233
00:15:59,280 --> 00:16:03,680
पर रामपाल के समक्ष खड़े होने वाले हैं तो यह आपकी बहुत बड़ी भूल है।

234
00:16:03,680 --> 00:16:07,840
आप इसको सुधारें और किसी प्रामाणिक आचार्य को अपने साथ खड़ा करें।

235
00:16:07,840 --> 00:16:11,840
फिर वो श्री संप्रदाय के हो, शंकर संप्रदाय के हो, मद

236
00:16:11,840 --> 00:16:16,800
संप्रदाय के हो, प्रामाणिक आचार्य को अपने साथ खड़ा करें। ठीक है?

237
00:16:16,800 --> 00:16:21,360
परंपरा प्राप्त अब परंपरा के विषय में आप आर्य समाज से पूछ सकते हैं। आर्य समाज हमसे

238
00:16:21,360 --> 00:16:25,040
आर्य समाजी बहुत सारे हैं जो हमें जान गए हैं। तो आर्य समाज से जब आप हमारे

239
00:16:25,040 --> 00:16:29,040
बारे में पूछेंगे तो वह आपको परंपरा इत्यादि के विषय में अच्छे से समझा देंगे।

240
00:16:29,040 --> 00:16:33,280
ना हो तो हमारा नंबर सार्वजनिक है। आप सीधे तौर पर संपर्क

241
00:16:33,280 --> 00:16:37,280
कर सकते हैं। मैंने आपका नंबर जहांजहां से भी मुझे मिल सका मैंने प्रयास

242
00:16:37,280 --> 00:16:41,280
किया पर मेरा संदेश नहीं पहुंच सका। इसीलिए

243
00:16:41,280 --> 00:16:45,440
मैं बार-बार कह रहा हूं कि जितने भी हिंदू हैं और जो इस मुहिम से जुड़े

244
00:16:45,440 --> 00:16:49,440
हैं, जो इस अभियान से कहीं ना कहीं परिचित हैं, वो इस संदेश को धर्मेंद्र

245
00:16:49,440 --> 00:16:53,440
जी तक पहुंचाएं कि ऐसा ना

246
00:16:53,440 --> 00:16:57,440
हो कि वहां पर जब जाएं और जब रामपाल ये

247
00:16:57,440 --> 00:17:01,440
कहे कि भैया मैं तो जो बोल रहा हूं वो आपके शास्त्र में लिखा है और

248
00:17:01,440 --> 00:17:05,920
आप करें आगे आर्य समाज को तो आर्य समाज कह दे हां मैं तो कह ही रहा हूं। हम तो इसीलिए

249
00:17:05,920 --> 00:17:10,160
कहते पुराण पुराण अच्छे नहीं है तो फाड़ के फेंक दो पुराण को।

250
00:17:10,160 --> 00:17:14,320
तो यह हिंदुओं की रक्षा नहीं है। यह वह वाली

251
00:17:14,320 --> 00:17:18,320
बात है कि नेता जी से जब पूछा गया ना कि भैया बाढ़ का पानी

252
00:17:18,320 --> 00:17:22,640
खतरे के निशान तक आ गया है तो नेताजी ने कह दिया बाढ़ का निशान

253
00:17:22,640 --> 00:17:27,040
दो इंच और ऊपर कर दो। यह वो वाली बात है। यह रक्षा नहीं है। जैसे

254
00:17:27,040 --> 00:17:32,080
हमने कहा कि भैया चचेरी बहन से विवाह नहीं होगा। और

255
00:17:32,080 --> 00:17:36,080
सामने लोग यहां से धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। इसलिए कर रहे हैं कि उनको जो

256
00:17:36,080 --> 00:17:40,240
है चचेरी बहन से विवाह करना है। तो जब यह समस्या हुई तो हमने

257
00:17:40,240 --> 00:17:44,240
क्या किया? ठीक है अपने यहां बदल देते हैं चचेरी बहन से विवाह। हमारे यहां भी अलऊ

258
00:17:44,240 --> 00:17:48,400
कर देते हैं। ये वो वाली बात है। तो ऐसा नहीं है। आप इस बात

259
00:17:48,400 --> 00:17:52,720
का ध्यान रखें कि आर्य समाज पुराणों को नहीं मानता है। तो इसलिए

260
00:17:52,720 --> 00:17:56,720
रामपाल के समक्ष खड़े होते समय किसी प्रामाणिक आचार्य को अपने साथ

261
00:17:56,720 --> 00:18:01,200
रखें। शंकर संप्रदाय के हो सकते हैं, श्री संप्रदाय के हो सकते हैं, नार्क

262
00:18:01,200 --> 00:18:05,520
संप्रदाय के हो सकते हैं। प्रामाणिक आचार्य को अपने पास रखें

263
00:18:05,520 --> 00:18:09,760
और यह ग्रंथ है श्री संप्रदाय के आचार्य द्वारा रचित

264
00:18:09,760 --> 00:18:13,840
है पुराण दिग्दर्शन। इसमें पूरा इनहीं सब विषयों में बात

265
00:18:13,840 --> 00:18:18,080
की गई है। हालांकि इसमें जो निशाना है जिस आचार्य ने यह ग्रंथ

266
00:18:18,080 --> 00:18:21,360
लिखा है

267
00:18:21,360 --> 00:18:25,680
शास्त्रार्थ महारथी माधवाचार्य शास्त्री जी

268
00:18:25,680 --> 00:18:29,760
श्री संप्रदाय से थे। तो उन्होंने जब यह लिखा है तो इसमें

269
00:18:29,760 --> 00:18:33,920
उन्होंने रामपाल जैसो को नहीं वो उत्तर दिया है। इसमें उन्होंने आर्य

270
00:18:33,920 --> 00:18:37,920
समाज को ही उत्तर दिया है। आपको जानकर हैरानी होगी क्योंकि आपका वो क्राइटेरिया

271
00:18:37,920 --> 00:18:42,080
नहीं रहा है ना जो आपने कार्य किए हैं उसमें

272
00:18:42,080 --> 00:18:46,160
क्राइटेरिया आपका वो नहीं रहा है शास्त्र वाला। तो इसलिए आपको ये सब नहीं मालूम होगा।

273
00:18:46,160 --> 00:18:50,160
आर्य समाज ही वो है वो तंत्र है जिसने सबसे ज़्यादा और

274
00:18:50,160 --> 00:18:54,160
सबसे प्रारंभ में ये सब आक्षेप और बहुत ही व्यवस्थित रूप से लगाना चालू

275
00:18:54,160 --> 00:18:58,160
हुए। जिसके कारण आज ये सब ये जो कुकुर मुत्ते

276
00:18:58,160 --> 00:19:02,160
जैसे उग आए हैं छोटे-छोटे बरसाती रामपाल

277
00:19:02,160 --> 00:19:06,240
गैंग के जैसे तो आर्य समाज ही वो है। अब देखिए जब

278
00:19:06,240 --> 00:19:10,240
से आर्य समाज आपके साथ आया तब से रामपाली गैंग ने वो चालू

279
00:19:10,240 --> 00:19:14,720
कर दिया ना कि इन्होंने तो कहा है शिव को कहा है।

280
00:19:14,720 --> 00:19:18,720
दयानंद जी की जीवनी में दयानंद जी लेख राम को पत्र लिखते समय यह

281
00:19:18,720 --> 00:19:22,800
कह रहे हैं कि अगर शिवलिंग यहां है तो वहां क्या वो

282
00:19:22,800 --> 00:19:27,440
शिव है क्या ये लिखा है ना जो सच्चिदानंद

283
00:19:27,440 --> 00:19:31,440
स्वामी आज आपके साथ खड़े हुए हैं वही सच्चिदानंद स्वामी अभी

284
00:19:31,440 --> 00:19:35,440
ये जो लड़ी जो ये गहमागहमी तेज हुई है एकदम

285
00:19:35,440 --> 00:19:37,600
से इसलिए हुई है क्योंकि

286
00:19:37,600 --> 00:19:41,680
लास्ट में रीसेंट वीडियोस जो बनाए गए रामपाली गैंग के द्वारा वह

287
00:19:41,680 --> 00:19:45,920
राधा जी के विरुद्ध बनाए गए और उसमें भी प्रेमानंद

288
00:19:45,920 --> 00:19:50,000
जी के विरुद्ध बनाए गए। राधा जी के बारे में सच्चिदानंद स्वामी जी क्या बोल चुके अपने

289
00:19:50,000 --> 00:19:54,560
यहां? यह तक बोल चुके हैं वो वृंदावन नहीं है। वैश्यावन

290
00:19:54,560 --> 00:19:58,720
है। भागवत लिखने वाले तू भागवत लिखने से पहले मर क्यों नहीं गया।

291
00:19:58,720 --> 00:20:02,800
हालांकि थोड़ा सा उसमें पुट दे देते हैं कि दयानंद जी कह कर गए हैं। मगर बोल वो

292
00:20:02,800 --> 00:20:06,880
भी रहे हैं। वो उसका समर्थन करते हुए उस चीज को बताते हैं कि दयानंद जी तो यहां तक कह

293
00:20:06,880 --> 00:20:11,200
कर गए हैं कि भागवत लिखने वाले तू मां के गर्भ में ही मर क्यों नहीं गया? यह

294
00:20:11,200 --> 00:20:15,280
सब आर्य समाज की सच्चाइयां है। यहां मैं आर्य समाज से लड़ने के लिए नहीं बैठा हूं। इन

295
00:20:15,280 --> 00:20:19,760
बातों के आधार पर एक जो गंभीर विषय उसके बारे में सचेत कर रहा हूं लोगों को।

296
00:20:19,760 --> 00:20:24,000
तो धर्मेंद्र जी यदि आप यह सोच रहे हैं कि हमारे

297
00:20:24,000 --> 00:20:28,400
साथ आर्य समाज है शास्त्रों का मर्मज्ञ और वो रामपाल के इन क्वेश्चंस

298
00:20:28,400 --> 00:20:32,560
का आंसर देगा तो यह आपकी भूल है। इस तरह से आप

299
00:20:32,560 --> 00:20:36,800
अपने ही धर्म को क्षति पहुंचाएंगे। इसीलिए एक बात कही जाती है कि

300
00:20:36,800 --> 00:20:40,960
शक्ति के पास भी यदि दिशा नहीं हो सही तो वह भी स्वयं को ही नुकसान

301
00:20:40,960 --> 00:20:45,120
पहुंचा देती है। तो इस तरीके से अगर आप जाएंगे तो आपसे आपके द्वारा

302
00:20:45,120 --> 00:20:49,440
ही क्षति पहुंचेगी। कहीं ना कहीं एक मैसेज जाएगा। बहुत बड़े जन समूह में मैसेज

303
00:20:49,440 --> 00:20:52,800
क्या जाएगा भाई पुराण जो है अप्रामाणिक चीजें हैं। आर्य समाज

304
00:20:52,800 --> 00:20:56,800
ने वहां कहा और आज से हम जो है पुराणों का जो भी आप लोग वहां पर निर्णय

305
00:20:56,800 --> 00:21:00,880
करें उस विषय में तो ऐसा ना हो इस बात का ध्यान रखें। आर्य

306
00:21:00,880 --> 00:21:04,960
समाज को लेकर के इस मुहिम को आगे ना करें। आचार्यों से मिले। अभी तक

307
00:21:04,960 --> 00:21:09,120
मुझे पुष्टि नहीं हुई। जैसा कि मैंने बताया कि कोई आचार्य आपके साथ खड़े

308
00:21:09,120 --> 00:21:13,280
होने वाले हैं और मुझे इस बात की पुष्टि

309
00:21:13,280 --> 00:21:17,280
नहीं हुई है। दूसरी बात यह भी है कि आपने अगर आप चाहते हैं कि आपके यहां कोई ऐसे

310
00:21:17,280 --> 00:21:22,640
आचार्य हो आपके साथ तो आपको थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ेगी। केवल

311
00:21:22,640 --> 00:21:27,040
यह आह्वान करके काम नहीं चलेगा। आचार्य हैं। वह हमसे वरिष्ठ होते हैं।

312
00:21:27,040 --> 00:21:31,120
आप जाएं उनके पास और उनसे निवेदन करें कि आप यहां पर

313
00:21:31,120 --> 00:21:35,120
आए। मेरे ना आने का कारण दूसरा भी यदि आपसे संपर्क होता व्यक्तिगत

314
00:21:35,120 --> 00:21:39,120
तो मैं उसमें बताता कि मैं वहां क्यों नहीं पहुंच पा रहा हूं। वह भी रणनीतिक विषय

315
00:21:39,120 --> 00:21:43,440
है। खैर कुल मिलाकर के प्रामाणिक आचार

316
00:21:43,440 --> 00:21:47,680
लीजिए आप श्री कई सारी प्रामाणिक परंपराएं हैं हमारे यहां। तो उनमें

317
00:21:47,680 --> 00:21:52,080
से किसी को आप अपने साथ खड़ा करिए और तब रामपाल का सामना करिए। क्योंकि आर्य समाज

318
00:21:52,080 --> 00:21:56,240
मौलिक रूप से हमारे धर्म को नहीं बचा सकता। क्योंकि उसने पहले ही कांट

319
00:21:56,240 --> 00:22:00,480
छांट कर रखी अपने बिहाफ पर तो वह कैसे बचाएगा समग्र रूप से सनातन

320
00:22:00,480 --> 00:22:06,160
धर्म को? उसने तो अपने मन का लिया हुआ है तो इसलिए वह

321
00:22:06,160 --> 00:22:08,000
समग्र रूप से हमारी सहायता

322
00:22:08,000 --> 00:22:12,160
नहीं कर सकता। हां वो हमारे साथ खड़ा हो रहा है कंधे से कंधा मिलाकर के

323
00:22:12,160 --> 00:22:16,320
उसके लिए उसका स्वागत है। जन बल है संख्या बल है। ये सब

324
00:22:16,320 --> 00:22:20,560
कलयुग में कलयुग की शक्ति है। संख्या बल जन बल संघ

325
00:22:20,560 --> 00:22:24,880
का बल तो उसके लिए उसका स्वागत है और उसका सम्मान भी है।

326
00:22:24,880 --> 00:22:29,760
इस पर आप ध्यान दें। यह मेरा हुड्डा जी को संदेश है।

327
00:22:29,760 --> 00:22:33,900
अ इसको आप पहुंचाएं। [गला

328
00:22:33,900 --> 00:22:39,900
साफ़ करने की आवाज़] अच्छा एक चीज और है कि

329
00:22:41,200 --> 00:22:45,360
आपने अभी तक एक चीज पर ध्यान नहीं दिया है।

330
00:22:45,360 --> 00:22:49,840
लखनऊ की जो पुलिस है लखनऊ में रामपाल के

331
00:22:49,840 --> 00:22:54,240
जो रामपाल का जो सेंटर है उसके खिलाफ रामपाल तंत्र के खिलाफ एफआईआर

332
00:22:54,240 --> 00:22:58,400
दर्ज है। बड़ी धाराओं में दर्ज है और उसमें इन्वेस्टिगेशन चल रही है। मुकदमा

333
00:22:58,400 --> 00:23:02,560
अभी भी हाई कोर्ट में चल रहा है। लखनऊ की पुलिस

334
00:23:02,560 --> 00:23:07,440
हाई कोर्ट में मुकदमा अभी भी इसलिए चल रहा है कि जितना प्रेशर होना चाहिए पुलिस का

335
00:23:07,440 --> 00:23:11,440
इन पर लखनऊ ये रामपाल के गैंग पर उतना अभी नहीं

336
00:23:11,440 --> 00:23:15,760
हां ये है कि लखनऊ स्तर पर चीजें थम गई है ना यहां पर प्रतिबंधित

337
00:23:15,760 --> 00:23:20,480
हो गया रामपाल ठीक है मगर लखनऊ की पुलिस

338
00:23:20,480 --> 00:23:24,560
की किताबें कहां छपती हैं ये ढूंढ रही है हमसे भी पूछा

339
00:23:24,560 --> 00:23:28,720
गया मैं वहां पर भी गया जहां पर इसकी किताबों का एड्रेस

340
00:23:28,720 --> 00:23:32,800
लिखा होता था कि यहां पर इसकी बुक्स छपती है पर वहां पर

341
00:23:32,800 --> 00:23:36,880
पाउडर बनता है। तो मैं वहां पर भी गया था। पुलिस

342
00:23:36,880 --> 00:23:40,960
भी वहां पर जाकर के आई। उसने भी वहां पर इन्वेस्टिगेशन की। उसको भी वहां पर

343
00:23:40,960 --> 00:23:45,200
वही वही मिला। तो पुलिस भी इस फिराक में है कि हमको सीधे-सीधे

344
00:23:45,200 --> 00:23:49,200
कहीं का बुक्स छपती कहां पर है? ये एड्रेस मिले। तो वहां से वो अपना

345
00:23:49,200 --> 00:23:53,360
आगे की चीजें करें। तो आप हरियाणा में है। आपका लोकल सपोर्ट

346
00:23:53,360 --> 00:23:56,400
है आपके पास। आप इस बात को उठाइए कि

347
00:23:56,400 --> 00:23:58,800
अगर रामपाल

348
00:23:58,800 --> 00:24:03,440
सत्यवादी है तो वह छुपकर अपनी किताबें क्यों छुपवा रहा है?

349
00:24:03,440 --> 00:24:07,520
किताबों का कारखाना कहां है जिनमें ये सब विष मिला हुआ है

350
00:24:07,520 --> 00:24:11,280
इस पर थोड़ा ध्यान दें।

351
00:24:11,280 --> 00:24:15,520
तो इसलिए हिंदुओं को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है कि आप अपना पहले से

352
00:24:15,520 --> 00:24:19,520
प्रिपरेशन रखें कि अगर वहां पर रामपाल का बॉयकॉट होता

353
00:24:19,520 --> 00:24:23,600
है, बहिष्कार होता है, तिरस्कार होता है, बहुत अच्छी बात है। पर इस ओर यदि

354
00:24:23,600 --> 00:24:27,600
दिशा जा रही है कि भाई पुराण ही अमान्य है या ऐसी और कोई बात

355
00:24:27,600 --> 00:24:31,760
होने वाली है तो आप फिर उसको उसके प्रति सतर्क रह। पहले

356
00:24:31,760 --> 00:24:36,000
से ही अपने को प्रिपेयर करके रखें जिससे कि आपको अचानक

357
00:24:36,000 --> 00:24:40,240
से अगर यह बातें ज्ञात हो कि भाई पुराणों की अवमानना हो रही है जिनमें

358
00:24:40,240 --> 00:24:44,320
आपकी श्रद्धा है तो आपको आघात ना पहुंचे इसलिए आप भी

359
00:24:44,320 --> 00:24:48,320
स्वयं को सतर्क रखें। यदि धर्मेंद्र जी तक मेरा संदेश पहुंच जाता है

360
00:24:48,320 --> 00:24:52,960
और वह इसको गंभीरता से लेते हैं विषय को तो बहुत ही अच्छी बात है। यदि नहीं पहुंच सका

361
00:24:52,960 --> 00:24:56,960
वह इस विषय को जान ही नहीं सके और वो उसी आधार पर चले गए आगे

362
00:24:56,960 --> 00:25:01,440
जो संभावनाएं मैंने यहां प्रकट की है तो हो सकता है कि आपकी जो

363
00:25:01,440 --> 00:25:06,320
धारणाएं हैं जो आपकी श्रद्धा है उनको आघात पहुंचे। इसी

364
00:25:06,320 --> 00:25:10,720
इसी अभियान से जिस अभियान से आप बहुत सारी अपेक्षाएं कर रहे हैं।

365
00:25:10,720 --> 00:25:12,480
ये हो गई

366
00:25:12,480 --> 00:25:16,560
चीजें मुख्य। तो हिंदुओं को सतर्क क्यों रहना है

367
00:25:16,560 --> 00:25:20,560
यह आपको समझ में आ गया और धर्मेंद्र जी को जो मेरा संदेश

368
00:25:20,560 --> 00:25:24,860
है वह भी आपको समझ में आ गया। अब

369
00:25:24,860 --> 00:25:29,680
[गला साफ़ करने की आवाज़] अब जरा हम बात कर लेते हैं पुराणों पर आक्षेप की।

370
00:25:29,680 --> 00:25:33,840
जिसका आज मैं उद्घाटन कर रहा हूं आज से पुराणों पर जो बात करने वाले हैं।

371
00:25:33,840 --> 00:25:38,000
सबसे पहली बात तो है कि गीत गोविंद की कुछ पंक्तियों को लेकर के इन्होंने

372
00:25:38,000 --> 00:25:42,080
ड्रामा किया है जो रामपाल गैंग है और जहां से मामला

373
00:25:42,080 --> 00:25:46,080
भड़का है। तो पहली बात तो यह है कि जो गीत गोविंद ये

374
00:25:46,080 --> 00:25:50,080
लोग प्रस्तुत कर रहे हैं वो प्रामाणिक गीत गोविंद है ही नहीं। वो भी किसी ऐसे पब्लिशर के द्वारा

375
00:25:50,080 --> 00:25:54,080
छापी गई जैसा पब्लिशर ये खुद रामपाल है। ठीक है? और

376
00:25:54,080 --> 00:25:58,320
वह बाद की बात है। आगे अगर हमें पता चलता है तो हम उस पर भी कारवाई करेंगे

377
00:25:58,320 --> 00:26:02,480
जिसने गीत गोविंद छापी है। गीत गोविंद प्रामाणिक रूप से कहां छप

378
00:26:02,480 --> 00:26:06,480
रही है? डिस्क्रिप्शन में आपको लिंक मिल जाएगा। उसमें वह सब बातें जिस

379
00:26:06,480 --> 00:26:10,720
तरीके से इन्होंने परोसी है वैसे नहीं है और

380
00:26:10,720 --> 00:26:14,960
गीत गोविंद आप वहां से लेकर डाउनलोड कर सकते हैं। इनके द्वारा दिखाई जाने वाली जो गीत

381
00:26:14,960 --> 00:26:19,360
गोविंद है वो अप्रामाणिक है। [गला साफ़ करने की आवाज़]

382
00:26:19,360 --> 00:26:23,600
अब हम बात करते हैं कि पुराणों में पुराणों पर जो आक्षेप लगते हैं उसके संबंध

383
00:26:23,600 --> 00:26:27,760
में और फिर उदाहरण के रूप में हम एक ब्रह्मा सरस्वती विवाह का जो

384
00:26:27,760 --> 00:26:32,080
प्रकरण है उसको लेंगे। तो पहली बात तो यह है कि पुराणों

385
00:26:32,080 --> 00:26:37,200
में जो यह वाली घटनाएं होती हैं यह कह सकते हैं अलंकारिक

386
00:26:37,200 --> 00:26:41,600
अलंकारिक रूप से प्रदर्शित की गई प्रतीकात्मक

387
00:26:41,600 --> 00:26:45,760
व्याख्या होती है। जो पुराण होते हैं उसमें बहुत सारे प्रसंग

388
00:26:45,760 --> 00:26:50,080
होते हैं। उनमें से एक प्रसंग होता है सृष्टि कैसे बनती है? कुछ आध्यात्मिक पहलू बताए

389
00:26:50,080 --> 00:26:54,240
जाते हैं कि आप अपने चित्त को शुद्ध कैसे करें? आपके आचरण कैसे होने

390
00:26:54,240 --> 00:26:58,400
चाहिए? और या फिर यह बताया जाता है वंश परंपरा इत्यादि

391
00:26:58,400 --> 00:27:02,560
मनु कब हुए उनके बाद क्या हुआ उनके बाद क्या हुआ यह परंपरा इत्यादि बताई जाती

392
00:27:02,560 --> 00:27:06,560
है तो यह मुख्य

393
00:27:06,560 --> 00:27:10,640
विषय होते हैं पुराण के अब इसमें क्या होता है कि जब यह

394
00:27:10,640 --> 00:27:14,640
वाली जैसे कोई हमें प्रोसेस हमें समझानी है कोई

395
00:27:14,640 --> 00:27:18,720
सीख हमें देनी है तो उसको प्रतीकात्मक व्याख्या के रूप में ये

396
00:27:18,720 --> 00:27:22,720
जो पौराणिक घटनाएं हैं लीलाएं हैं उनके रूप में उनको

397
00:27:22,720 --> 00:27:27,200
प्रदर्शित किया गया है जो पौराणिक घटना हैं वह हुई है मगर

398
00:27:27,200 --> 00:27:31,280
वह हमें कुछ समझाने के लिए हुई है। वह क्या समझाना चाहते हैं? तो

399
00:27:31,280 --> 00:27:35,680
वह घटनाएं हमें समझाना चाहती हैं आदि दैविक, आदि भौतिक और आध्यात्मिक

400
00:27:35,680 --> 00:27:39,680
अर्थ। उन सभी घटनाओं के जो भी ऐसे समझ में ना आने वाली अचानक से

401
00:27:39,680 --> 00:27:42,800
ऐसी घटनाएं दिख रही हैं जिसमें हमको आक्षेप

402
00:27:42,800 --> 00:27:47,920
जिसके आधार पर लोग आक्षेप कर रहे हैं। इन सब घटनाओं के मर्म है।

403
00:27:47,920 --> 00:27:52,000
इनके अंदर कुछ वास्तविक तथ्य कुछ और है जो हमें दिख रहा है वैसा नहीं है।

404
00:27:52,000 --> 00:27:56,000
परोक्ष रूप से हमको कुछ समझाया गया है शास्त्रों

405
00:27:56,000 --> 00:28:00,080
के द्वारा परोक्ष रूप से अप्रत्यक्ष रूप से। तो

406
00:28:00,080 --> 00:28:04,160
वो तीन प्रकार के अर्थ होते हैं जो इस प्रकार की घटनाओं के होते हैं। आदि दैविक, आदि

407
00:28:04,160 --> 00:28:08,240
भौतिक, आध्यात्मिक। अब अगर हम यह ना

408
00:28:08,240 --> 00:28:12,800
माने कि नहीं नहीं भाई उसमें तो एज इट इज शिव जी ने यह किया ही किया है।

409
00:28:12,800 --> 00:28:17,120
है ना? अगर हम ये बात ना माने तो क्या होगा

410
00:28:17,120 --> 00:28:21,280
कि परम तत्व शिव जी को परम तत्व कहा गया है। ब्रह्मा जी को भी परम

411
00:28:21,280 --> 00:28:25,440
तत्व कहा गया है। ब्रह्म पुराण में ब्रह्मा जी को परम तत्व कहा गया है। शिव जी को परम

412
00:28:25,440 --> 00:28:29,440
तत्व कहा गया शिव पुराण में और अनेकानेक भागवत में भी कहा गया है। और

413
00:28:29,440 --> 00:28:33,600
विष्णु जी को भी कहा गया है। तो जो परम तत्व है वह

414
00:28:33,600 --> 00:28:37,920
ज्ञान स्वरूप है। उसमें कोई लिंग इत्यादि

415
00:28:37,920 --> 00:28:43,360
का भेद है ही नहीं। तो यह अश्लीलता भरे आरोप उन पर कैसे लगेंगे?

416
00:28:43,360 --> 00:28:47,440
यहां बात परम तत्व की हो रही है। वहां पर तो लिंग भेद है ही नहीं।

417
00:28:47,440 --> 00:28:51,520
वो तो ज्ञान स्वरूप है। अद्वय है। उनके जैसा कोई

418
00:28:51,520 --> 00:28:54,320
दूसरा है ही नहीं।

419
00:28:54,320 --> 00:28:58,000
तो जब कोई दूसरा है ही नहीं। अच्छा शास्त्र में कई जगह यह भी बात

420
00:28:58,000 --> 00:29:02,320
आ रही है कि उन्होंने अपने आप को एक से दो किया।

421
00:29:02,320 --> 00:29:06,640
तो यदि रमण की बात आ रही है तो वहां पर रमण कैसे सिद्ध होगा? रमण

422
00:29:06,640 --> 00:29:10,960
तो किसी अगर रमण का अर्थ यह जो जो

423
00:29:10,960 --> 00:29:15,120
हमारा जो मनुष्यगत दृष्टि है अगर इसके

424
00:29:15,120 --> 00:29:19,280
हिसाब से रमण का अर्थ ले तो रामपाल अपनी किताबों में लिखता है सेक्स

425
00:29:19,280 --> 00:29:23,520
या रति क्रिया को ये लिखता है सेक्स। परंतु जहां पर दो

426
00:29:23,520 --> 00:29:27,680
जहां पर एक शक्ति विभाजित हुई दो प्रकार की शक्तियों में और फिर

427
00:29:27,680 --> 00:29:31,840
वह आपस में संग कर रही है और इसी संघ को रति का नाम दिया है।

428
00:29:31,840 --> 00:29:36,720
इसी संघ को रमण का नाम दिया है। तो क्या इसको आप वो जो

429
00:29:36,720 --> 00:29:40,960
मनुष्यों के बीच जो संभोग क्रिया होती है आप

430
00:29:40,960 --> 00:29:44,960
उसको ये नाम दे सकते हो? उसको वही समझ सकते हो

431
00:29:44,960 --> 00:29:49,680
और ये मैं रामपाल की चीजों से भी सिद्ध करूंगा ये बात।

432
00:29:49,680 --> 00:29:53,760
तो भगवान सच्चिदानंद स्वरूप है। ज्ञान स्वरूप है। इसका मैं प्रमाण दे

433
00:29:53,760 --> 00:29:59,760
देता हूं। ज्ञान स्वरूप भगवान का।

434
00:30:22,880 --> 00:30:28,880
[गला साफ़ करने की आवाज़] ये देखिए विष्णु पुराण

435
00:30:29,440 --> 00:30:35,440
प्रथम अंश अध्याय चार और श्लोक है

436
00:30:36,160 --> 00:30:40,160
39 इसमें भगवान को सीधे-सीधे ज्ञान स्वरूप कहा

437
00:30:40,160 --> 00:30:46,160
गया है। 40वा

438
00:30:46,320 --> 00:30:51,120
आप ही का रूप है। यह जो कुछ भी मूर्तिमान जगत दिखाई देता है।

439
00:30:51,120 --> 00:30:55,840
ज्ञान स्वरूप आप ही का आप ही का स्वरूप है।

440
00:30:55,840 --> 00:31:01,530
ठीक है? और कहां कहा गया है?

441
00:31:01,530 --> 00:31:07,530
[गला साफ़ करने की आवाज़]

442
00:31:09,840 --> 00:31:13,920
देखिए ब्रह्म पुराण ये मैं

443
00:31:13,920 --> 00:31:19,920
आपके सामने रख के पढ़ रहा हूं। ब्रह्म पुराण और

444
00:31:22,400 --> 00:31:28,400
प्रथम अध्याय और इसका पूर्व भाग है ये

445
00:31:29,600 --> 00:31:33,920
ब्रह्म पुराण पूर्व भाग प्रथम अध्याय और श्लोक

446
00:31:33,920 --> 00:31:37,040
है

447
00:31:37,040 --> 00:31:43,040
28 29

448
00:31:46,800 --> 00:31:50,800
25 से लेकर 29 तक इसमें बार-बार इन्हें ज्ञान स्वरूप कहा

449
00:31:50,800 --> 00:31:55,120
गया है। क्या कहा गया है? कि वह पुरुषोत्तम अचुत

450
00:31:55,120 --> 00:31:59,600
देव सभी प्राणी समूह में स्थित रहते हैं। वह मेरे प्रणम्य

451
00:31:59,600 --> 00:32:03,600
है। वह प्रभु परमार्थ यानी कि

452
00:32:03,600 --> 00:32:07,680
तत्वत अत्यंत ज्ञान स्वरूप है। ज्ञान

453
00:32:07,680 --> 00:32:11,680
स्वरूप अंतत गतवा भगवान का स्वरूप क्या है? ज्ञान स्वरूप है। वहां

454
00:32:11,680 --> 00:32:16,960
कोई लिंग इत्यादि नहीं है और यह अभी हम आगे और सिद्ध करेंगे।

455
00:32:16,960 --> 00:32:21,120
तो जब [गला साफ़ करने की आवाज़] भगवान में उस तरह के अवयव है

456
00:32:21,120 --> 00:32:25,760
ही नहीं जिनके आधार पर ऐसी घटनाएं होती हैं तो इन घटनाओं का सीधे-सीधे

457
00:32:25,760 --> 00:32:30,080
वही अर्थ ले लेना जिस प्रकार से अ

458
00:32:30,080 --> 00:32:34,080
मैंने कहा चंद्रमुखी है ना तो चंद्रमुखी

459
00:32:34,080 --> 00:32:38,640
का मतलब यही हो गया कि वो जो मुख है उसका वो चंद्रमा है।

460
00:32:38,640 --> 00:32:42,800
चंद्र के समान नहीं है। चंद्रमा है। ऐसा अर्थ नहीं लिया जाता है।

461
00:32:42,800 --> 00:32:47,280
उसी प्रकार से है यहां पर कि भगवान जब ज्ञान स्वरूप हैं

462
00:32:47,280 --> 00:32:52,000
तो उनके पास यह जो अवयव है जिनके आधार पर इस तरह की घटनाएं

463
00:32:52,000 --> 00:32:52,500
मनुष्यों

464
00:32:52,480 --> 00:32:56,480
के तरीके से जोड़ के दिखाई जाती है। आक्षेप

465
00:32:56,480 --> 00:33:00,480
लगाया जाता है। मनुष्य मनुष्यों की भांति देखने का प्रयास किया जाता है। तो जब

466
00:33:00,480 --> 00:33:04,800
मनुष्यों की भांति वहां पर वो अवयव ही नहीं है। ज्ञान स्वरूप है भगवान।

467
00:33:04,800 --> 00:33:08,880
वहां पर यह जो कर्मेंद्रियां है ज्ञानेंद्र वाली सब थोड़ी ना भगवान की तो

468
00:33:08,880 --> 00:33:13,440
सच्चिदानंद स्वरूप है तो यह वाले आरोप उनके निरस्त हो जाते हैं सीधे सीधे

469
00:33:13,440 --> 00:33:17,600
फिर क्या है ये जो लीलात्मक घटनाओं का वर्णन है इनसे आदि दैविक

470
00:33:17,600 --> 00:33:22,000
आदि भौतिक आध्यात्मिक अर्थ आपको बताने का प्रयास किया जा रहा है जैसा कि ब्रह्मा सरस्वती

471
00:33:22,000 --> 00:33:26,240
विवाह में भी बताया गया है वो मैं आज आपको बताऊंगा अच्छा

472
00:33:26,240 --> 00:33:30,400
अब एक सवाल मैं सीधे-सीधे रामपाली गैंग से ही पूछूंगा यहां पर हालांकि रामपाली

473
00:33:30,400 --> 00:33:35,200
गैंग से बात करना बेकार की चीजें हैं इस तरह की तर्क और

474
00:33:35,200 --> 00:33:39,280
प्रामाणिक युक्ति युक्त या शास्त्रोक्त बातें करना रामपाल ही गैंग से बेकार

475
00:33:39,280 --> 00:33:43,360
है। उसमें सर मारने जैसा है। फिर भी रामपाल के आधार

476
00:33:43,360 --> 00:33:47,920
पर ब्रह्मा विष्णु महेश जो है वो देवता है। कौन होते हैं देवता?

477
00:33:47,920 --> 00:33:52,320
मतलब हम मनुष्यों जैसे नहीं है। कुछ अलग है। कौन होते हैं? अच्छा

478
00:33:52,320 --> 00:33:56,480
रामपाल के अनुसार जो ब्रह्मा विष्णु महेश है वह गुण है तो

479
00:33:56,480 --> 00:34:00,640
भाई गुण आपस में वो जो आपका वाला जो जिसको आप ब्रैकेट

480
00:34:00,640 --> 00:34:05,600
में लिखते हो सेक्स वो कैसे कर रहे हैं गुण

481
00:34:05,600 --> 00:34:07,920
गुण जो है वो सेक्स

482
00:34:07,920 --> 00:34:12,240
करता है क्या वो तो प्राणी करता है गुण तो

483
00:34:12,240 --> 00:34:18,160
धारण करता है प्राणी गुण का कोई शरीर होता है क्या

484
00:34:18,160 --> 00:34:22,240
तो यहां पर ये वो हो जाते हैं।

485
00:34:22,240 --> 00:34:26,320
असफल सिद्ध हो जाते हैं। यह जो आक्षेप करता है। अच्छा इसके

486
00:34:26,320 --> 00:34:30,400
बाद एक बात और है कि रामपाल की जो

487
00:34:30,400 --> 00:34:34,720
कपोल कल्पित कहानी है उसके अनुसार जो उसका तथाकथित

488
00:34:34,720 --> 00:34:38,880
वो राक्षस है काल उसने जब अपनी जो

489
00:34:38,880 --> 00:34:43,040
वो कथा है वो जो भी उसके बारे में कहा गया उसने जब रमण किया

490
00:34:43,040 --> 00:34:48,000
एक स्त्री के साथ है ना तब ब्रह्मा विष्णु महेश का जन्म हुआ

491
00:34:48,000 --> 00:34:52,080
और ब्रह्मा विष्णु महेश जो है यह इन गुणों से उत्पन्न

492
00:34:52,080 --> 00:34:56,160
होने वाली एक क्रिया है इन गुणों के प्रभाव से होने वाली एक क्रिया

493
00:34:56,160 --> 00:35:00,160
है। कौन सी संभोग? तो भाई जब

494
00:35:00,160 --> 00:35:04,400
ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पन्न हो रहे हैं कहां से? काल और उसकी

495
00:35:04,400 --> 00:35:08,480
पत्नी से। तुम्हारे अनुसार फिलहाल बात कर रहा हूं। तो अभी तो गुण है ही नहीं

496
00:35:08,480 --> 00:35:12,720
ना। जब तक गुण जन्मे नहीं है तो तो काल काल प्रभावित

497
00:35:12,720 --> 00:35:16,800
कैसे हो गया? जब सत रज और तम गुणों

498
00:35:16,800 --> 00:35:20,800
की उत्पत्ति ही नहीं हुई। तो काल कैसे प्रभावित हो गया

499
00:35:20,800 --> 00:35:23,120
उन गुणों से? या तो यह मान लो कि ब्रह्मा विष्णु

500
00:35:23,120 --> 00:35:28,560
महेश काल से उत्पन्न नहीं है। तुम्हारे हिसाब से ही बात कर लेते हैं।

501
00:35:28,560 --> 00:35:32,560
तो यहां पर भी तुम फेल हो गए। तो ये सब कुछ टू द पॉइंट बातें

502
00:35:32,560 --> 00:35:36,800
हैं जो याद रखने की और सभी हिंदुओं को ध्यान देना चाहिए। तो ब्रह्मा

503
00:35:36,800 --> 00:35:41,120
विष्णु महेश रामपाल के अनुसार काल और उसकी भार्या

504
00:35:41,120 --> 00:35:47,120
से उत्पन्न हुए हैं। तो काल के लिए ऐसे लिखा है कि वो जो है

505
00:35:47,120 --> 00:35:51,120
प्रवर्त हो गया। वहां पर बलात्कार इत्यादि शब्दों का उपयोग किया गया है।

506
00:35:51,120 --> 00:35:55,120
यह सब कैसे आ रहा है? ब्रह्मा विष्णु महेश के उत्पन्न होने से पहले क्योंकि

507
00:35:55,120 --> 00:35:59,600
वह गुण है और उन गुणों के द्वारा जनित होने वाला ये जो ये जो गतिविधि

508
00:35:59,600 --> 00:36:03,680
है संभोग क्रिया है। तो यह जो चीज है यह वहां

509
00:36:03,680 --> 00:36:07,920
पर कैसे ली जा सकती है जिसको तुमने ब्रैकेट में लिख दिया सेक्स। तो

510
00:36:07,920 --> 00:36:12,480
कहने का मतलब यह है कि वहां पर रामपाल

511
00:36:12,480 --> 00:36:16,560
भी यह कह के फंसा हुआ है। अगर उनकी गैंग वाले अगर ऐसा कुछ अर्थ बताते हैं

512
00:36:16,560 --> 00:36:20,640
तो अब आगे और चलते हैं।

513
00:36:20,640 --> 00:36:25,440
भगवान ज्ञान स्वरूप है। ये समझ गए आप और

514
00:36:25,440 --> 00:36:29,760
हमारे अनुसार ब्रह्मा विष्णु महेश ज्ञान स्वरूप है तो उनके पास ये जो ये

515
00:36:29,760 --> 00:36:34,000
संभोग इत्यादि उन पर लागू ही नहीं होता। और जो लीलात्मक वर्णन

516
00:36:34,000 --> 00:36:38,320
रति क्रिया रमण करने इत्यादि से है उसका वैसा ही अर्थ है जैसे वेदों का अर्थ

517
00:36:38,320 --> 00:36:42,480
आर्य समाज निकाल लेता है उसी प्रकार के अर्थ पुराणों के भी है पर

518
00:36:42,480 --> 00:36:46,560
यहां पर वो थोड़ी सी आर्य समाज वो कर देता है क्या कहते हैं उसको कहते

519
00:36:46,560 --> 00:36:50,560
हैं कि अरे वो दोहरा व्यवहार करना होता है

520
00:36:50,560 --> 00:36:56,400
ना शब्द नहीं आ रहा है तो वो कर देता है आर्य समाज

521
00:36:56,400 --> 00:37:00,720
कि [गला साफ़ करने की आवाज़] वहां पक्षपात कह सकते हैं पक्षपात कर देता है कि भेदभाव टाइप का कि

522
00:37:00,720 --> 00:37:04,880
जो उसे अपने पास रख रखना है उसका तो वह रक्षा करने के लिए अर्थ निकाल

523
00:37:04,880 --> 00:37:08,960
लेगा सही और जिसकी रक्षा नहीं करनी है जिसको पहले से ही उसने दुश्मन बना

524
00:37:08,960 --> 00:37:12,960
रखा है कुछ उसका अपना व्यक्तिगत कारण है तो उसके लिए वो

525
00:37:12,960 --> 00:37:17,120
वही सिद्धांत लागू नहीं करेगा और वहां पर वो जो है उनका वैसा एज

526
00:37:17,120 --> 00:37:22,000
इट इज अर्थ ले लेगा यह आर्य समाज करता है। खैर

527
00:37:22,000 --> 00:37:26,000
अब बात यह आती है कि 3 6 9 देवी

528
00:37:26,000 --> 00:37:30,080
भागवत में जो भगवती हैं वो कह रही है

529
00:37:30,080 --> 00:37:36,080
ना ही मैं स्त्री हूं ना ही मैं पुरुष हूं और वहीं पर

530
00:37:37,120 --> 00:37:43,120
मैं बता देता हूं

531
00:37:43,710 --> 00:37:49,710
[खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] [नाक से की जाने वाली आवाज़]

532
00:38:00,800 --> 00:38:04,960
देखिए तीन छ सात भगवती ना ही स्त्री है ना ही पुरुष

533
00:38:04,960 --> 00:38:08,960
है ना ही नपुंसक ही है जब वो ना स्त्री है ना पुरुष

534
00:38:08,960 --> 00:38:13,040
है तो ये वाली जो आप संभोग की क्रिया है हमारे जो देवी देवता है इनसे

535
00:38:13,040 --> 00:38:17,200
कैसे जुड़ रहे हो जो हमारे आराध्य इनसे कैसे जुड़ रहे हो ये सब बातें तुम्हारी

536
00:38:17,200 --> 00:38:21,760
तभी तक है रामपाल जब तक तुम अपने सुरक्षित कहीं पर वो कारबोर्ड

537
00:38:21,760 --> 00:38:26,000
टारगेट वाला मामला होता है ना जब तक तुम वहां पर बैठे हुए खूब चकोल लो जैसे

538
00:38:26,000 --> 00:38:30,240
कोई कपड़ों का दुकानदार होता है ना कपड़ों का कपड़े बेचता है जो वैसे साइड में काउंटर

539
00:38:30,240 --> 00:38:34,400
पर बैठकर के खड़े होकर के अपनी दो चार बातें कर ली गप्पे मार ली और कोई

540
00:38:34,400 --> 00:38:38,880
भी ताल ठोक दी अपने कमरे में सामने कोई है ही नहीं प्रश्न करने वाला काउंटर

541
00:38:38,880 --> 00:38:43,440
काउंटर करने वाला है ना तो भगवती जो है दुर्गा

542
00:38:43,440 --> 00:38:47,760
वह खुद कह रही है कि ना ही मैं स्त्री हूं ना ही मैं पुरुष हूं वो खुद कह रही है

543
00:38:47,760 --> 00:38:52,000
तीन छ तीन छ सात में है ना और

544
00:38:52,000 --> 00:38:52,500
देवी

545
00:38:52,480 --> 00:38:56,560
और परम ब्रह्म एक है देवी और उसमें किंचित मात्र

546
00:38:56,560 --> 00:39:00,640
भी भेद नहीं है तो जब भेद है ही नहीं तो उनके बीच में कोई इस प्रकार की

547
00:39:00,640 --> 00:39:04,880
क्रिया आप कैसे आरोपित कर सकते हैं ये सब रामपाल जो ये आरोप लगाता

548
00:39:04,880 --> 00:39:08,880
है पार्वती माता ने ये किया वो किया इस तरह से अभद्र तरीके

549
00:39:08,880 --> 00:39:12,960
से कहता है तो यह सब देवी परम ब्रह्म से यह कहां लिखा

550
00:39:12,960 --> 00:39:16,960
है देवियों परम ब्रह्म एक है देवी भागवत तीन छ दो देवी परम ब्रह्म से

551
00:39:16,960 --> 00:39:21,120
भिन्न नहीं है। अपितु परमेश्वर परमात्मा नित्य सनातन सच्चिदानंद स्वरूप परम तत्व

552
00:39:21,120 --> 00:39:25,360
ही है। लो ही है। तो देवी परम ब्रह्म

553
00:39:25,360 --> 00:39:31,360
से अभिन्न है। यानी भिन्न नहीं है। कहां ऋग्वेद 10 125

554
00:39:34,480 --> 00:39:38,480
द्वैत भाव को प्राप्त होता है। मैं और ब्रह्म एक ही है तो

555
00:39:38,480 --> 00:39:42,720
भी माया रूपी कार्य कारण की उपाधि भेद से हमारा प्रतिबिंब प्रथक प्रथक

556
00:39:42,720 --> 00:39:47,440
दिखाई देने लगता है। जगत का निर्माण करने के लिए भेद दिखता है। देवी भागवत

557
00:39:47,440 --> 00:39:51,600
तीन छ चार से छ ब्रह्म एक और सनातन है।

558
00:39:51,600 --> 00:39:56,000
रचना करते समय वह द्वैत भाव को प्राप्त हो जाता है। देवी भागवत तीन छ

559
00:39:56,000 --> 00:40:00,080
इसमें कहां से आप तुम्हारा वो जो बबीता कांड वाला जो ब्रैकेट

560
00:40:00,080 --> 00:40:04,800
वाला जो शब्द है ना सेक्स वो कहां से डालोगे इसमें कहां

561
00:40:04,800 --> 00:40:08,880
से डालोगे वो वो शब्द इसमें कहां से डालोगे जो तुम्हारे अड्डों से जुड़ा

562
00:40:08,880 --> 00:40:13,040
हुआ शब्द है वो यहां कहां से डालोगे भाई सोचने वाली बात

563
00:40:13,040 --> 00:40:17,630
है तो यह

564
00:40:17,630 --> 00:40:23,200
[गला साफ़ करने की आवाज़] भी कुछ तथ्यात्मक है

565
00:40:23,200 --> 00:40:27,360
चीजें अब आगे चलते हैं।

566
00:40:27,360 --> 00:40:31,840
अब बात आती है कि कुल

567
00:40:31,840 --> 00:40:36,000
मिलाकर के जो मुख्य आरोप लग रहा है मैथुन से जुड़े हुए आरोप लग रहे हैं।

568
00:40:36,000 --> 00:40:40,240
पर ध्यान देने वाली बात यह है कि ब्रह्मा ब्रह्मा विष्णु

569
00:40:40,240 --> 00:40:44,800
महेश का जो लेवल है जो उनका लोक इत्यादि

570
00:40:44,800 --> 00:40:48,880
उनकी जो व्याख्या की गई है वहां पर मैथुन तो है ही नहीं। वो तो अमैथुन

571
00:40:48,880 --> 00:40:53,440
ही सृष्टि है। मैथुन सृष्टि तो यहां से चालू होती है मनु जी से।

572
00:40:53,440 --> 00:40:57,440
वहां तो मैथुनी सृष्टि है ही नहीं उनके लोक में और

573
00:40:57,440 --> 00:41:02,880
इसका मैं प्रमाण दे देता हूं कहां पर प्रमाण है

574
00:41:02,880 --> 00:41:07,040
भाई जो काम क्रिया को बनाने वाले गुणों

575
00:41:07,040 --> 00:41:11,040
को उत्पन्न कर रहा है वो खुद थोड़ी ना उसमें प्रवर्त होगा वो तो उत्पन्न कर

576
00:41:11,040 --> 00:41:15,200
रहा है वहां से तो उत्पन्न हो रहे है वो थोड़ी ना उसी से प्रभावित होगा वो

577
00:41:15,200 --> 00:41:19,120
तो उनका रिष्ट आता है ना

578
00:41:19,120 --> 00:41:23,280
जैसे काल से तुमने माना कि ब्रह्मा विष्णु महेश हो रहे हैं तो प्रश्न उठ गया कि अगर

579
00:41:23,280 --> 00:41:27,280
काल से ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पन्न हो रहे हैं। ब्रह्मा विष्णु महेश गुण है और इनहीं गुणों

580
00:41:27,280 --> 00:41:31,280
से इनहीं गुणों के प्रभाव से उत्पन्न होने वाली क्रिया है। मैथुन क्रिया जिसका

581
00:41:31,280 --> 00:41:35,600
तुम आरोप लगाते हो। तो फिर ये जो चीज है ब्रह्मा विष्णु महेश से उत्पन्न

582
00:41:35,600 --> 00:41:39,760
होने वाली क्रिया है। फिर ये वहां कैसे पहुंच गई? या तो यह है कि वहां पर कुछ

583
00:41:39,760 --> 00:41:44,160
और है जिसको कि इस क्रिया से जोड़ा जा रहा है जिसमें तुम ब्रैकेट में सेक्स

584
00:41:44,160 --> 00:41:48,240
लिख देते हो। है ना? जो तुम्हारे अड्डों से जुड़ा हुआ शब्द है

585
00:41:48,240 --> 00:41:52,240
जो वहां दिन और रात गूंजता रहता है उसको तुम यहां पर आरोपित कर देते

586
00:41:52,240 --> 00:41:56,400
हो ब्रैकेट में लिख के और तुम्हारे चेले चेलिया भी कर देते हैं।

587
00:41:56,400 --> 00:42:00,400
खैर अब मैं दिखाता हूं सृष्टि कैसे वैसे जहां

588
00:42:00,400 --> 00:42:04,400
पर भी सृष्टि वर्णन आएगा वहां पर ब्रह्मा विष्णु महेश

589
00:42:04,400 --> 00:42:09,360
के द्वारा इनमें से किसी के द्वारा काम को उत्पन्न किया जाएगा।

590
00:42:09,360 --> 00:42:13,360
गुणों को उत्पन्न किया जाएगा। तो उस गुण को

591
00:42:13,360 --> 00:42:17,440
उत्पन्न करने से पहले वह हैं। उनका अपना लोक है। उनका अपना

592
00:42:17,440 --> 00:42:17,940
अस्तित्व

593
00:42:17,920 --> 00:42:23,840
है। तो फिर वह उनसे प्रभावित कहां से हो जाएंगे?

594
00:42:23,840 --> 00:42:28,480
मैथुनी सृष्टि का प्रारंभ ही होता है मनुसतूपा से।

595
00:42:28,480 --> 00:42:32,560
और तुम मैथुन को आरोपित कहां कर रहे हो? जहां पर मैथुन है ही

596
00:42:32,560 --> 00:42:36,720
नहीं। एक्सिस्ट ही नहीं करता। वो क्रिया एक्सिस्ट ही नहीं करती। मनोमई सृष्टि

597
00:42:36,720 --> 00:42:41,200
मनोमई मैथुन ही सृष्टि नहीं है वो। कहां

598
00:42:41,200 --> 00:42:45,760
है?

599
00:42:45,760 --> 00:42:49,840
ब्रह्म पुराण से ही दिखा देता हूं। इसमें रति का निर्माण हो रहा है। कहां

600
00:42:49,840 --> 00:42:52,720
पर हो रहा है?

601
00:42:52,720 --> 00:42:58,720
पूर्व भाग 142

602
00:43:04,960 --> 00:43:09,040
देखिए क्या लिखा है।

603
00:43:09,040 --> 00:43:13,120
अप्सु पारिपलवाम पृथ्वी दस

604
00:43:13,120 --> 00:43:19,120
दशदा दधे तत्र कालम मनोवाचम काममम क्रोध मथोरतिम

605
00:43:20,240 --> 00:43:24,320
उन प्रभु ने स्वयं जल में प्लावित पृथ्वी को तथा 10

606
00:43:24,320 --> 00:43:29,040
दिशाओं को धारण किया तब काल मन वाणी

607
00:43:29,040 --> 00:43:33,840
काम क्रोध रति की उन्होंने सृष्टि की

608
00:43:33,840 --> 00:43:37,920
सृष्टि कर रहे हैं ये लोग रति की तो ये रति रति इनके

609
00:43:37,920 --> 00:43:42,720
अंदर कहां से आ जाएगी यह तो बना रहे हैं ना रति को

610
00:43:42,720 --> 00:43:47,200
अगली पीढ़ी के लिए जो अगला सर्ग होना है। ठीक है?

611
00:43:47,200 --> 00:43:51,440
तो यहां से निश्चित हो गया। यानी कि कहने

612
00:43:51,440 --> 00:43:55,440
का मतलब यह है कि ब्रह्मा विष्णु महेश जो हैं वहां पर यदि रति शब्द

613
00:43:55,440 --> 00:43:59,440
आ रहा है उनके लिए ब्रह्मा विष्णु महेश या और जो हमारे आराध्य देवी

614
00:43:59,440 --> 00:44:03,440
देवता हैं उनके लिए यदि रति या फिर रमण का शब्द आ रहा

615
00:44:03,440 --> 00:44:07,520
है तो वहां पर जो हमारे मनुष्यों के लिए जो उपयोग

616
00:44:07,520 --> 00:44:11,520
में आता है ना जो संभोग शब्द वो एज इट इज अर्थ वहां पर नहीं है

617
00:44:11,520 --> 00:44:15,600
उनकी रति का उनकी रति का मतलब है योग करना संयोग करना उसके

618
00:44:15,600 --> 00:44:20,240
साथ मिलकर काम करना जो काम कर रही हैं वह शक्तियां पारलौकिक

619
00:44:20,240 --> 00:44:24,240
शक्तियां है। वो हमारी तरह आड़मास के इंसान नहीं है। जिनके पास लिंग भेद

620
00:44:24,240 --> 00:44:28,320
है। वो शक्तियां है जो सृष्टि की रचना कर रही है। वो

621
00:44:28,320 --> 00:44:32,480
रचना कैसे करती है? पहले एक से दो हुए। एक को कहा गया प्रकृति,

622
00:44:32,480 --> 00:44:36,880
एक को कहा गया पुरुष। अब दोनों आपस में ही संयोग करके आगे का काम कर रहे हैं।

623
00:44:36,880 --> 00:44:41,200
जीव जंतुओं को उत्पन्न कर रहे हैं। मगर वो रति क्रिया नहीं है वाली जो मनुष्यों

624
00:44:41,200 --> 00:44:45,200
की रति क्रिया है। ठीक है? तो रति को उत्पन्न करने वाले हैं। रति

625
00:44:45,200 --> 00:44:49,120
से प्रभावित होने वाले नहीं है।

626
00:44:49,120 --> 00:44:53,280
संसार के अधष्ठाता पर ही संसार का आरोप लगा दो। संसार में होने वाली

627
00:44:53,280 --> 00:44:59,200
चीजों का कि वह उससे प्रभावित होते हैं। खैर

628
00:44:59,200 --> 00:45:02,720
और [गला साफ़ करने की आवाज़] दिखा देता हूं।

629
00:45:02,720 --> 00:45:06,720
इसमें एक ब्रह्म पुराण में ही दो

630
00:45:06,720 --> 00:45:10,960
दूसरे अध्याय में चार से पांच में देखिए क्या लिखा है। देखिए

631
00:45:10,960 --> 00:45:14,960
जो यह जो वीर इत्यादि की बातें करते हैं ना यह देखिए

632
00:45:14,960 --> 00:45:19,280
यहां पर क्या कहा जा रहा है।

633
00:45:19,280 --> 00:45:23,520
यही तेजवान पुरुष ही स्वयंभू मनु कहे जाते हैं। 71 युगों

634
00:45:23,520 --> 00:45:27,680
का उनका एक मनवंतर होता है। उन पुरुष द्वारा शत्रूपा को

635
00:45:27,680 --> 00:45:31,120
वीर नामक पुत्र

636
00:45:31,120 --> 00:45:35,360
वीर नामक अब कुछ समझ में आ रहा है? तेज

637
00:45:35,360 --> 00:45:40,000
वीर की स्त्री थी कदम प्रजापति की जेष्ठ कन्या काम्या

638
00:45:40,000 --> 00:45:45,120
वीर की वीर वीर किससे जन्मा है? मनु से और

639
00:45:45,120 --> 00:45:49,280
जो वीर्य है वीर है उसकी स्त्री का नाम क्या

640
00:45:49,280 --> 00:45:53,280
है? काम्या। तो यह प्रतीकात्मक व्याख्या

641
00:45:53,280 --> 00:45:57,600
है। इन घटनाओं के रूप में प्रतीकात्मक व्याख्या हो रही है कि मनुष्यों

642
00:45:57,600 --> 00:46:02,000
के कौन-कौन से तत्व होते हैं? कौन-कौन से गुण होते हैं? उनके पास कौन-कौन से उनकी

643
00:46:02,000 --> 00:46:06,080
भावनाएं कैसी होती है? उनका उनकी अलंकारिक व्याख्या मात्र है। अब

644
00:46:06,080 --> 00:46:10,320
इसको आप शब्दार्थ के रूप में ले लो कि उनका जो पुत्र था वो तो वीर

645
00:46:10,320 --> 00:46:14,320
यानी वीर्य था और जो वीर की पत्नी थी वो काम्य यानी काम थी।

646
00:46:14,320 --> 00:46:18,320
उसमें ब्रैकेट में लिख दो सेक्स तो दिक्कत ये है। ठीक है?

647
00:46:18,320 --> 00:46:22,320
अब इसका जो उपाय है वो भी मैं बताऊंगा कि ये जो

648
00:46:22,320 --> 00:46:26,400
मनोरोग है इनको किस प्रकार के चिकित्सालय की जरूरत है। उस पर

649
00:46:26,400 --> 00:46:30,640
भी मैं प्रकाश डाल दूंगा। तो इस तरीके से अलंकारिक रूप में प्रतीकात्मक

650
00:46:30,640 --> 00:46:34,800
व्याख्या वेदों में भी है और यहां पर भी है। यह मैं कहना चाह रहा हूं। एक पांच 29

651
00:46:34,800 --> 00:46:40,800
में भी मनोमय सृष्टि कहा गया है।

652
00:46:41,840 --> 00:46:47,760
29 पे आ जाते हैं।

653
00:46:47,760 --> 00:46:53,760
विष्णु पुराण मनोम सृष्टि

654
00:46:58,960 --> 00:47:03,200
देखिए पहले आ जाते हैं एक पांच

655
00:47:03,200 --> 00:47:07,200
और 41 ठीक है फिर ब्रह्मा जी ने

656
00:47:07,200 --> 00:47:11,200
एक और रजो मात्रात्मक शरीर धारण किया उसके

657
00:47:11,200 --> 00:47:15,360
द्वारा ब्रह्मा जी से छुदा और छुदा से

658
00:47:15,360 --> 00:47:19,440
काम की उत्पत्ति हुई भूख और भूख से काम की उत्पत्ति हुई

659
00:47:19,440 --> 00:47:23,520
है। काम उत्पन्न हो रहा है भूख से और भूख को उत्पन्न कर रहे हैं ब्रह्मा

660
00:47:23,520 --> 00:47:27,680
जी तो ब्रह्मा जी उससे प्रभावित कैसे हैं या तो उनसे पहले

661
00:47:27,680 --> 00:47:31,680
वह होना चाहिए अस्तित्व में जो काम है काम तो

662
00:47:31,680 --> 00:47:35,680
उत्पन्न हो रहा है यहां पर ये कहां लिखा है पांच 41

663
00:47:35,680 --> 00:47:41,680
में और मैं दिखा देता हूं अमैतुनी सृष्टि की बात

664
00:47:41,840 --> 00:47:45,600
1529

665
00:47:45,600 --> 00:47:51,040
ये देखिए पाराशर जी बोले हे मैत्रेय

666
00:47:51,040 --> 00:47:55,040
संपूर्ण प्रजा अपने पूर्व शुभशुभ कर्मों से युक्त है।

667
00:47:55,040 --> 00:47:59,120
अतः प्रलय काल में सबका लय होने पर भी वह उनके संस्कारों

668
00:47:59,120 --> 00:48:03,120
से मुक्त नहीं होती। हे ब्राह्मण ब्रह्मा जी के सृष्टि कर्म में प्रवृत्त होने

669
00:48:03,120 --> 00:48:08,160
पर देवताओं से लेकर स्थावर पर्यंत चार प्रकार की सृष्टि हुई।

670
00:48:08,160 --> 00:48:12,320
वह केवल मनोमई थी। मनोमई मैथुनी सृष्टि नहीं थी। वो

671
00:48:12,320 --> 00:48:16,400
मनोमई सृष्टि थी। ठीक है?

672
00:48:16,400 --> 00:48:20,400
तो मनोमई सृष्टि के बहुत सारे प्रमाण है। देवी भागवत से दे देता

673
00:48:20,400 --> 00:48:24,400
हूं। देवी भागवत से आपको एक अलग से विशेष

674
00:48:24,400 --> 00:48:29,600
रूप से प्रेम है। वो भी दिखा देता हूं। देवी भागवत यह मेरे पास है। ठीक है?

675
00:48:29,600 --> 00:48:34,780
इसका है 7 एक 10

676
00:48:34,780 --> 00:48:40,780
[गला साफ़ करने की आवाज़]

677
00:49:00,240 --> 00:49:03,120
देखिए

678
00:49:03,120 --> 00:49:07,440
तत्पश्चात प्रजापति ब्रह्मा जी ने अपने सात मानस

679
00:49:07,440 --> 00:49:11,840
पुत्रों का सृजन किया। मानस पुत्र मरीच अंगीरा

680
00:49:11,840 --> 00:49:16,560
अत्री वशिष्ठ पुल कृतु और पुलस्तय

681
00:49:16,560 --> 00:49:20,960
पुलस्त्य इन नामों से उन सात मानस पुत्रों की प्रसिद्धि

682
00:49:20,960 --> 00:49:25,040
हुई। मानस पुत्र मानसिक सृष्टि है। तो

683
00:49:25,040 --> 00:49:29,200
यानी कि इनका जो डायमेंशन है ब्रह्मा विष्णु महेश

684
00:49:29,200 --> 00:49:33,280
का कहने का तात्पर्य यह है कि जो इनका डायमेंशन है उसको हम

685
00:49:33,280 --> 00:49:37,440
लोक कहते हैं या फिर जो भी है वहां पर यह जो मैथुन क्रिया

686
00:49:37,440 --> 00:49:41,760
है एकिस्ट ही नहीं करती है। तो फिर हम मैथुन क्रिया से जोड़

687
00:49:41,760 --> 00:49:45,920
के उनको कैसे देख सकते हैं? वहां पर बात इतनी

688
00:49:45,920 --> 00:49:50,960
है कि अगर उनके लिए इस प्रकार के संस्कृत के कुछ शब्दों का उपयोग हो रहा है तो वहां पर केवल

689
00:49:50,960 --> 00:49:55,120
जो आदि दैविक घटनाएं हैं, आदि भौतिक घटनाएं, वह आपको समझाया जा रहा है

690
00:49:55,120 --> 00:49:59,200
प्रतीकात्मक व्याख्या से और गुरु चरणों में बैठकर के सुनने समझने पर

691
00:49:59,200 --> 00:50:03,200
आपको उसी प्रकार से उसका सही अर्थ प्राप्त हो जाता है। जैसे तथाकथित जो

692
00:50:03,200 --> 00:50:07,520
वेद वैदिक वेदों की रक्षा करने का दावा करने वाला आर्य समाज है।

693
00:50:07,520 --> 00:50:11,680
जिस प्रकार से यह वेदों के कहीं-क पर जहां पर इस प्रकार के प्रसंग आते हैं

694
00:50:11,680 --> 00:50:15,360
वहां पर अपने अनुसार अर्थ निकाल लेता है। जबकि वहां पर ना परंपरा

695
00:50:15,360 --> 00:50:19,520
है ना आचार्य। और जहां परंपरा है आचार्य वहां पर लोग कह रहे हैं कि नहीं नहीं

696
00:50:19,520 --> 00:50:23,600
शास्त्रों में यह कैसे वो कैसे ठीक है और रही बात यह कि अगर

697
00:50:23,600 --> 00:50:27,600
कोई ऐसा सोच रहा है कि नहीं नहीं

698
00:50:27,600 --> 00:50:32,000
अगर शास्त्रों में ऐसा लिखा है तो हम उनको हटा देंगे तो आपको ध्यान रखिएगा कि वेद

699
00:50:32,000 --> 00:50:36,080
में भी यह सब लिखा हुआ है तो क्या आप वेद को भी हटाएंगे अगर आर्य

700
00:50:36,080 --> 00:50:40,320
समाज जैसी सोच कोई रखता है तो तो कहने का तात्पर्य यह है कि अगर बाढ़

701
00:50:40,320 --> 00:50:44,480
का पानी खतरे के निशान तक आ गया है तो हमें आवश्यकता है उपयुक्त

702
00:50:44,480 --> 00:50:48,560
प्रयास करने की एक सही अप्रोच की कि

703
00:50:48,560 --> 00:50:52,640
व्यक्ति वह जो बाढ़ से लोग बच पाए ना कि उसका खतरे का निशान

704
00:50:52,640 --> 00:50:56,720
ऊपर बढ़ा दो। अगर व्यक्ति नहीं समझ पा रहा है कि बहन से विवाह नहीं करना चाहिए

705
00:50:56,720 --> 00:51:01,040
और अपना धर्म परिवर्तन करा रहा है तो हम यह अप्रोच सही नहीं है कि नहीं नहीं अपने आप भी

706
00:51:01,040 --> 00:51:05,200
धर्म परिवर्तन ना करें इसलिए अपने यहां जो है बहन से विवाह अलऊ कर दो। यह अप्रोच

707
00:51:05,200 --> 00:51:10,160
सही नहीं है। अप्रोच सही है कि उसको हम शिक्षित करें। उसको बताएं

708
00:51:10,160 --> 00:51:14,240
कि बहन से विवाह क्यों नहीं होना चाहिए? तर्क और प्रमाण और युक्त प्रमाण और युक्ति

709
00:51:14,240 --> 00:51:20,240
दोनों तरीकों से। यह अप्रोच सही है। ठीक है?

710
00:51:20,800 --> 00:51:24,880
अच्छा कुछ लोग कह रहे हैं कि भाई बुक दिखाओ तो मैं बता

711
00:51:24,880 --> 00:51:28,960
दूं कि मैंने जो श्लोक क्रमांक बोले हैं उन उन श्लोक क्रमांकों पे आप इस

712
00:51:28,960 --> 00:51:33,280
बुक को खुद चेक कर लीजिए जाकर के और नहीं हो तो आकर के हमें बताइए।

713
00:51:33,280 --> 00:51:37,360
ठीक है? मेरे पास चार कैमरे नहीं लगे हैं जो मैं जब बुक पढूं

714
00:51:37,360 --> 00:51:41,360
तो कैमरा घुमा करके इधर लगा दूं और ये सब करूं। तुम्हारी तरह

715
00:51:41,360 --> 00:51:45,760
मेरे पास समय भी नहीं है कि भैया कैमरा जब खोल के बैठूं तो

716
00:51:45,760 --> 00:51:49,920
तुरंत जो है एडिट करके और जो है फिर बुक का निशान दिखाऊं फिर पीछे अपनी वॉइस ओवर

717
00:51:49,920 --> 00:51:54,720
लगा दूं। ये सब मेरे पास नहीं है। मैंने श्लोक क्रमांक बताए हैं और

718
00:51:54,720 --> 00:51:58,800
अ आप खुद उसको वेरीिफाइड कर ले। वैसे भी अगर

719
00:51:58,800 --> 00:52:03,200
मैं बुक दिखा भी दूंगा अगर तुम जैसे जो क्या कहते हैं? लकड़बग्गे

720
00:52:03,200 --> 00:52:07,280
या फिर क्या कहें? हुड़ुक चुल्लू। हां हुक चुल्लू। तुम जैसे उड़क

721
00:52:07,280 --> 00:52:11,440
चुल्लू हैं। तुम बुक तुमको बुक दिखा भी दूंगा तो यह कैसे सिद्ध होगा कि

722
00:52:11,440 --> 00:52:15,600
बुक प्रामाणिक बुक है देवी भागवत की मैंने खुद से नहीं छपवा

723
00:52:15,600 --> 00:52:19,600
ली है। थोड़ा बहुत बुद्धि है कि नहीं है? इसलिए खुद से उसे

724
00:52:19,600 --> 00:52:23,280
वेरीिफाइड करना होगा तुम्हें।

725
00:52:23,280 --> 00:52:26,560
अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़]

726
00:52:26,560 --> 00:52:30,640
अब दिखाते हैं तो अमैथुनी सृष्टि आपको समझ में आ गई। परम तत्व

727
00:52:30,640 --> 00:52:36,560
आपको समझ में आ गया और यह भी समझ में आ गया कि जो

728
00:52:36,560 --> 00:52:40,800
देवी हैं और जो भगवान है उनके

729
00:52:40,800 --> 00:52:44,800
ही दो स्वरूप है प्रकृति और पुरुष के रूप में एक में वो देवी है और एक में वो

730
00:52:44,800 --> 00:52:49,920
भगवान है। एक में पुरुषवाची है और एक में स्त्रीवाची उनका रूप है।

731
00:52:49,920 --> 00:52:54,640
तो ये सब चीजें आपको समझ में आ गई।

732
00:52:54,640 --> 00:52:58,640
अब बात आती है अब इसका एक उदाहरण ले लेते हैं

733
00:52:58,640 --> 00:53:02,640
जो मैं कहता चला आ रहा हूं। ब्रह्मा सरस्वती विवाह वाला जो प्रसंग है उससे ले

734
00:53:02,640 --> 00:53:06,640
लेते हैं। उससे पहले पुराण दिग्दर्शन में कुछ मोटी मोटी बातें कही गई है

735
00:53:06,640 --> 00:53:10,640
आचार्य श्री के द्वारा तो वो मैं आपको कुछ पढ़ के सुनाना चाहता हूं जो

736
00:53:10,640 --> 00:53:14,880
आवश्यक है आपको जानने और आपको अच्छा भी लगेगा। आचार्य जी ने जो बातें

737
00:53:14,880 --> 00:53:20,880
कही है अपने ग्रंथ में इस संबंध में जो विषय मैं इस समय बात कर रहा हूं।

738
00:53:28,560 --> 00:53:32,720
वाक्य विचार तो इन्होंने यहां पर अपने ग्रंथ

739
00:53:32,720 --> 00:53:36,880
में पुराण दिग्द दर्शन में इन्होंने बात की है उदाहरण दे देकर और इन्होंने

740
00:53:36,880 --> 00:53:41,200
वाक्य विचार कहे हैं। यह कह रहे हैं जिन अनेक शब्दों के यथावत मेल

741
00:53:41,200 --> 00:53:45,440
से अभीष्ट अर्थ प्राप्त का बोध होता है। उसी सार्थक शब्द

742
00:53:45,440 --> 00:53:49,600
समुदाय को हमारी परिभाषा में वाक्य वचन समझना चाहिए। प्रायः

743
00:53:49,600 --> 00:53:53,840
सभी शास्त्रों में विधि निषेधात्मक जितने वचन पाए जाते हैं उन्हें

744
00:53:53,840 --> 00:53:58,320
प्राचीन ऋषियों ने तीन विभागों में विभक्त किया है। रोचक, भयानक

745
00:53:58,320 --> 00:54:02,480
और यथार्थ। यानी इसमें जो जो वाक्य आते हैं वो

746
00:54:02,480 --> 00:54:06,480
तीन प्रकार के होते हैं। रोचक, भयानक और एक बिल्कुल सीधे-सीधे

747
00:54:06,480 --> 00:54:10,560
जो बात है उसको एज इट इज कह दिया। तो रोचक कौन से होते हैं?

748
00:54:10,560 --> 00:54:14,560
यह पुराणों की बात चल रही है। पुराणों पर आक्षेप जो आर्य समाज ने लगा

749
00:54:14,560 --> 00:54:19,120
रखे उसका उत्तर देते समय आचार्य कह रहे हैं। पुरुषों

750
00:54:19,120 --> 00:54:23,280
को धर्म मार्ग में प्रवर्त करने के लिए जो रुचिकर वाक्य कहे जाते हैं, वह

751
00:54:23,280 --> 00:54:27,440
रोचक नाम से स्मरण करना चाहिए। वैदिक प्रक्रिया में इन्हीं वाक्यों

752
00:54:27,440 --> 00:54:31,600
को विधि प्रसंगक अर्थवाद भी कहते हैं। अब देखिए इन्होंने

753
00:54:31,600 --> 00:54:37,600
यहां कुछ उदाहरण दिए हैं।

754
00:54:37,840 --> 00:54:41,920
एक वेदों से ही कुछ अर्थ हैं। वेद में कहीं पर

755
00:54:41,920 --> 00:54:46,080
एक वाक्य आया है जहां पर लिखा है मेंढकों ने 100 गाय

756
00:54:46,080 --> 00:54:50,240
दान की। इस बात का क्या अर्थ है? मेंढकों ने 100

757
00:54:50,240 --> 00:54:54,480
गाय दान की। यदि कोई पुरुष उपयुक्त वेद वाक्यों

758
00:54:54,480 --> 00:54:58,560
की रोचकता पर ध्यान ना देकर वास्तव में पशु सर्प आदि द्वारा किए गए यज्ञ

759
00:54:58,560 --> 00:55:02,560
दान और साम सामगान के स्वप्न देखने लगे और प्रत्यक्ष रूप

760
00:55:02,560 --> 00:55:06,960
में पशु आदि का ऐसे कार्यों में प्रवृत्त होना असंभव जानकर वेदों

761
00:55:06,960 --> 00:55:11,040
पर भी असंभव प्रतिपादन का आक्षेप लगाए तो उसे महामूर्ख ही

762
00:55:11,040 --> 00:55:15,120
समझना चाहिए। तो क्या है? वेदों में भी इस प्रकार की प्रतीकात्मक व्याख्या

763
00:55:15,120 --> 00:55:19,200
चली है। जैसा कि मैंने अभी पहले बताया आर्य समाज के

764
00:55:19,200 --> 00:55:23,200
भी शब्दार्थ में आपको मिल जाएगा कि आपको अभी फलाने फल

765
00:55:23,200 --> 00:55:27,280
की प्राप्ति करनी है। तो आप जो मेंढकी से भोग करिए, मेंढक से यह मनुष्यों

766
00:55:27,280 --> 00:55:31,360
को कहा जा रहा है। मेंढक से भोग करिए, बैल से भोग करिए। यह सब वहां

767
00:55:31,360 --> 00:55:35,360
लिखा है। तो क्या इसका एज इट इज अर्थ ले? मगर वहां आर्य समाज ने एज इट इज अर्थ नहीं

768
00:55:35,360 --> 00:55:39,440
लिया है। अपने भाष्य में कुछ और बताने का प्रयास किया है। इसी

769
00:55:39,440 --> 00:55:43,520
प्रकार से पुराणों में भी यही बात है। एज इट इज अर्थ ना लेकर के उसमें जो प्रतीकात्मक

770
00:55:43,520 --> 00:55:47,680
व्याख्या है किस चीज की है वो लेना चाहिए। और क्यों ऐसा

771
00:55:47,680 --> 00:55:52,000
लिखा गया है? सबसे पहली बात तो रुचिकर बनाने के लिए अनुसंध की बुद्धि रहे।

772
00:55:52,000 --> 00:55:53,200
शास्त्र के प्रति जानने

773
00:55:53,200 --> 00:55:57,280
की ललक रहे और एक ही वाक्य से कितने सारे अर्थ

774
00:55:57,280 --> 00:56:01,600
हमें प्राप्त हो जाते हैं। इसलिए ऐसा ऐसी रचना

775
00:56:01,600 --> 00:56:07,200
की जाती है।

776
00:56:07,200 --> 00:56:11,520
अब जो है भयानक वचन देखते हैं। अधर्म आचरण से पुरुषों

777
00:56:11,520 --> 00:56:15,760
की प्रवृत्ति हटाने के लिए जो भयानक वाक्य कहे गए हैं उन्हें

778
00:56:15,760 --> 00:56:19,920
भयानक नाम से याद किया जाना चाहिए। वेदा आदि सभी शास्त्रों में ऐसे

779
00:56:19,920 --> 00:56:24,320
वचन का समावेश पाया जाता है। यथा उन्होंने उदाहरण दिया।

780
00:56:24,320 --> 00:56:28,720
यजुर्वेद 409 इसमें क्या कहा गया है? जो मनुष्य

781
00:56:28,720 --> 00:56:32,800
माया जन्य जड़ दे आदि की उपासना करते हैं

782
00:56:32,800 --> 00:56:37,040
वह घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं।

783
00:56:37,040 --> 00:56:42,080
और आगे इन्होंने एक उदाहरण और दिया है कात्यायन अनुक्रमणिका का

784
00:56:42,080 --> 00:56:46,160
एक एक उसमें क्या है? जो मनुष्य मंत्रों

785
00:56:46,160 --> 00:56:50,640
के ऋषि देवता आदि को ना जानता हुआ वेद पढ़ता है वह मर जाता है। उपयुक्त

786
00:56:50,640 --> 00:56:54,640
वचनों में माया के फंदे से निकलने की और ऋषि आदि को जानने

787
00:56:54,640 --> 00:56:58,800
की आवश्यकता प्रकट की गई है। वस्तुतः माया उपासक किसी काल

788
00:56:58,800 --> 00:57:03,280
कोठरी में डाल दिए जाते हो या ऋषि आदि

789
00:57:03,280 --> 00:57:07,280
ज्ञान शून्य मंत्र पाठी व्यक्ति तत्काल मर जाते हो। ऐसी बात तो

790
00:57:07,280 --> 00:57:08,240
नहीं है।

791
00:57:08,240 --> 00:57:12,560
जो ऋषि को नहीं जानता है कि यह जो वैदिक सूक्त

792
00:57:12,560 --> 00:57:16,560
है इसका ऋषि कौन है? वह मंत्र को पढ़े तो मर जाता है। ऐसा तो नहीं

793
00:57:16,560 --> 00:57:20,880
है। पर यहां लिखा हुआ है कि जो ऐसा करता है वह मर जाता है। तो फिर यहां किस ओर इशारा

794
00:57:20,880 --> 00:57:25,600
किया गया? तो यहां भी आक्षरिक अर्थ को छोड़कर

795
00:57:25,600 --> 00:57:29,680
तात तात्पर्यार्थ का ही ग्रहण होना चाहिए। जो

796
00:57:29,680 --> 00:57:33,680
आक्षरिक अर्थ लिया जा रहा है कि एज इट इज जो हमें जो लिखा

797
00:57:33,680 --> 00:57:37,760
हुआ है उसको ग्रहण कर ले। वो नहीं बल्कि उसमें तात्पर्य का

798
00:57:37,760 --> 00:57:42,320
ही ग्रहण होना चाहिए। यह केवल इतना ही है कि माया की उपासना करना

799
00:57:42,320 --> 00:57:46,480
और ऋष्यादि का ना जानना पाप है। माया जनित

800
00:57:46,480 --> 00:57:50,640
चीजों की उपासना करना माया की उपासना करना यानी भोग की उपासना करना जैसे

801
00:57:50,640 --> 00:57:54,720
वो भी कहता है तीन गुणों की करे और भक्ति हालांकि वहां पर वो ब्रह्मा विष्णु महेश

802
00:57:54,720 --> 00:57:58,800
को जोड़ देता है। जबकि वहां पर ब्रह्मा विष्णु महेश नहीं है। ब्रह्मा विष्णु महेश

803
00:57:58,800 --> 00:58:03,200
तो ये तीन जो विभाग है सत रजत तम के इसके एक एक के कंट्रोलर

804
00:58:03,200 --> 00:58:07,360
है। वह भी देवता रूप में जो एक परम तत्व के रूप में ब्रह्मा

805
00:58:07,360 --> 00:58:11,360
विष्णु महेश विद्यमान होते हैं और एक जो है वह यह जो कार्य

806
00:58:11,360 --> 00:58:15,760
कारण भेद से यहां पर चीजों को संभालने

807
00:58:15,760 --> 00:58:21,600
वाले देवता के रूप में भी उपस्थित होते हैं।

808
00:58:21,600 --> 00:58:24,800
तो

809
00:58:24,800 --> 00:58:28,880
यहां पे इनको यह समझाना था वेद को कि भाई ऐसा करना पाप है। मगर उसके लिए उसने

810
00:58:28,880 --> 00:58:32,960
क्या कहा वेद ने? वेद भगवान कहते हैं कि

811
00:58:32,960 --> 00:58:37,520
जो व्यक्ति ऋषियों को जाने बिना यदि मंत्र पढ़ेगा तो मर जाएगा।

812
00:58:37,520 --> 00:58:41,760
सीधे सीधे कह दिया। अब इसको सीधे-सीधे मानता है हर समाज नहीं मानता

813
00:58:41,760 --> 00:58:45,910
है या शायद मानता हो।

814
00:58:45,910 --> 00:58:51,120
[गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा और

815
00:58:51,120 --> 00:58:55,280
आगे चलते हैं। अब यथार्थ वचन पर थोड़ा सा देखते हैं। इसी प्रकार

816
00:58:55,280 --> 00:58:59,360
अच्छा जो अभी हमने जो बात की है उससे मिलताजुलता हमें ब्रह्म पुराण में

817
00:58:59,360 --> 00:59:03,440
मिलता है और वरा पुराण में भी मिलता है। क्या मिलता है? जो पुरुष काले रंग का

818
00:59:03,440 --> 00:59:08,160
वस्त्र पहनकर ईश्वर पूजना आदि कार्यों को करता है। वह पांच वर्ष पर्यंत

819
00:59:08,160 --> 00:59:12,000
घान की भुनी हुई खीलों में

820
00:59:12,000 --> 00:59:16,320
घुण का कीड़ा बनकर रहता है। बताइए।

821
00:59:16,320 --> 00:59:20,560
अब इसको एज इट इज मानेंगे या पाप के उसमें मानेंगे जो पुरुष दूसरा ब्रह्म

822
00:59:20,560 --> 00:59:25,040
पुराण जो पुरुष स्त्री संग करके जीता जमाता

823
00:59:25,040 --> 00:59:29,680
है या जीने जमाने के बाद स्त्री संग करता है उन दोनों के पितर

824
00:59:29,680 --> 00:59:33,840
उसे उस महीने वीर मूत्र आदि को खाते हैं। यह

825
00:59:33,840 --> 00:59:37,840
लिखा है। तो इनको भी एज इट इज

826
00:59:37,840 --> 00:59:40,160
नहीं लिया जा सकता है। उपयुक्त वचनों के अक्षरार्थ

827
00:59:40,160 --> 00:59:44,320
के अनुसार कोई ईश्वर पूजन एक साधारण भूल के कारण साक्षात गुण

828
00:59:44,320 --> 00:59:48,400
बन जाता हो अथवा श्राद्ध करता पुत्रा आदि के स्त्री संग रूप पाप

829
00:59:48,400 --> 00:59:52,640
से निर अपराध पितरों को घणित वस्तु खाने का दंड भोगना

830
00:59:52,640 --> 00:59:56,720
पड़ता हो ऐसा यहां पुराणकर्ता का अभिप्राय नहीं है किंतु इनका तात्पर्य इतना ही है

831
00:59:56,720 --> 01:00:01,360
कि शुभ कार्यों में काले कपड़े पहनना और श्राद्ध कार्य में अ्रह्मचर्य

832
01:00:01,360 --> 01:00:05,440
से रहना महापाप है। इसी प्रकार अन्यान्य भयानक वचनों का

833
01:00:05,440 --> 01:00:09,520
तात्पर्यर्थ समझना चाहिए। अब यथार्थ वचन देखिए। रोचकता और

834
01:00:09,520 --> 01:00:14,400
भयानकता दोनों से परे रहकर जो अक्षरार्थ अक्षरार्थ अनुसारी

835
01:00:14,400 --> 01:00:18,560
विधि निषेध प्रतिपादक वचन है वह यथार्थ कहे जाने चाहिए। तो

836
01:00:18,560 --> 01:00:22,560
वेद में देखिए क्या आया है। अब वेद में सीधे-सीधे जिनका अर्थ लेना है।

837
01:00:22,560 --> 01:00:26,800
तो क्या आया? जुआ मत खेल खेती कर उक्त शिक्षा को मानने

838
01:00:26,800 --> 01:00:31,040
पर धन में रमण करने वाला बन। अब लो।

839
01:00:31,040 --> 01:00:35,200
यहां पे रमण शब्द आ गया। तो यहां पे क्या यह कहा जा रहा है कि धन के साथ रमण

840
01:00:35,200 --> 01:00:40,080
करो। यहां ब्रैकेट में रामपाल तू इतना बड़ा पागल है कि यहां लिख देगा सेक्स

841
01:00:40,080 --> 01:00:44,080
धन के साथ सेक्स लिख दे यहां पर भी रमण शब्द आ

842
01:00:44,080 --> 01:00:49,040
गया क्योंकि यही मूर्खता बताने के लिए आज की ये लाइव चल रही है

843
01:00:49,040 --> 01:00:51,360
ठीक है

844
01:00:51,360 --> 01:00:55,440
तो दूसरे के धन का लालच मत कर तप करने वाले की बहुत कीर्ति होती

845
01:00:55,440 --> 01:00:59,440
है यह कहां लिखा है मतलब ऋग्वेद 10 34 13 से लिया

846
01:00:59,440 --> 01:01:03,600
है यजुर्वेद 40 एक से लिया है और इसी प्रकार के आगे उदाहरण दिए गए

847
01:01:03,600 --> 01:01:07,840
हैं फिर भाषा विचार चालू होता है। अच्छा

848
01:01:07,840 --> 01:01:11,920
यहां पर हम पुराण से भी उदाहरण ले लें। जो

849
01:01:11,920 --> 01:01:16,240
पुरुष श्रद्धा पूर्वक यज्ञ आदि के द्वारा देवों और पितरों का पूजन करता है। वह सकाम

850
01:01:16,240 --> 01:01:20,560
कर्मों के प्रताप से चंद्रोक में यथा समय निवास करके पुनः

851
01:01:20,560 --> 01:01:24,960
जन्म धारण करता है। तो यह सीधे तौर पर अक्षरार्थ

852
01:01:24,960 --> 01:01:29,040
जो अर्थ लेना है उसके बारे में बात हुई है। अब भाषा

853
01:01:29,040 --> 01:01:35,040
पर विचार किया है आचार्य ने। इन्होंने लिखा है समाधि भाषा

854
01:01:35,040 --> 01:01:39,120
भाषा विचार क्या है? जिस प्रकार अन्वत शब्द समुदाय को वाक्य या

855
01:01:39,120 --> 01:01:43,520
वचन कहते हैं। इसी प्रकार यथावत वाक यथावत अन्वत

856
01:01:43,520 --> 01:01:47,840
वाक्य समुदाय को संदर्भ या कथानक कहा जाता है। यहां हमारे

857
01:01:47,840 --> 01:01:51,840
भाषा विचार का क्षेत्र वही कथानक या संदर्भ है। वेदादि शास्त्रों

858
01:01:51,840 --> 01:01:55,920
के संदर्भों को प्राचीन ऋषियों ने भाषा तत्व के आधार पर तीन भागों में

859
01:01:55,920 --> 01:02:00,080
विभक्त किया है। यह भारद्वाज समिता में लिखा हुआ है।

860
01:02:00,080 --> 01:02:04,400
समाधि भाषा प्रथमा लौकिकीति तथा परा

861
01:02:04,400 --> 01:02:08,800
तृतीया पर कीति शास्त्र भाषा त्रिधा

862
01:02:08,800 --> 01:02:10,560
स्मृता शास्त्रों

863
01:02:10,560 --> 01:02:14,880
की भाषा तीन प्रकार की है। पहली समाधि भाषा दूसरी लौकिकी

864
01:02:14,880 --> 01:02:18,880
भाषा और तीसरी पर किया भाषा। अब समाधि

865
01:02:18,880 --> 01:02:23,200
भाषा की इन्होंने विवेचना की है। जो बातें जागृत स्वप्न और सुशुप्ति तीनों अवस्थाओं

866
01:02:23,200 --> 01:02:27,200
में भी पुरुष को प्रत्यक्ष ना हो सकती हो और इंद्रिय

867
01:02:27,200 --> 01:02:31,280
मन आदि भी जिन रहस्यों के अनुभव करने में समर्थ ना

868
01:02:31,280 --> 01:02:35,360
हो। ऐसी समाधिगम मतलब समाधि से जिन चीजों

869
01:02:35,360 --> 01:02:39,840
का ज्ञान प्राप्त होता हो सकता है समाधि की स्थिति से तो वह

870
01:02:39,840 --> 01:02:43,920
भाषा है समाधि भाषा उन उन चीजों का जब चित्रण होगा तो वहां

871
01:02:43,920 --> 01:02:47,520
पर समाधि भाषा का उपयोग होगा

872
01:02:47,520 --> 01:02:53,360
तो ऐसे समाधि गम में

873
01:02:53,360 --> 01:02:57,600
अवांगमन सुगोचर एवं लोकोत्तर तत्वों को जहां नीति

874
01:02:57,600 --> 01:03:01,840
नीति शब्दों द्वारा व्यक्त करके करने का प्रयत्न किया गया हो वह

875
01:03:01,840 --> 01:03:06,320
समाधि भाषा कहलाती है। वेदों में समाधि भाषा का अत्यधिक समावेश

876
01:03:06,320 --> 01:03:10,560
पाया जाता है। है ना? वेदों में मतलब ऐसी

877
01:03:10,560 --> 01:03:14,560
भाषा जिस जो उन चीजों के बारे में बात करना

878
01:03:14,560 --> 01:03:19,600
जिन चीजों का ज्ञान हमें इंद्रियों के द्वारा सीधे तौर पर नहीं हो सकता।

879
01:03:19,600 --> 01:03:23,680
तो समाधिगम्य चीजें हैं समाधि के स्थिति में ही उन्हें

880
01:03:23,680 --> 01:03:28,320
जाना जा सकता है। जोज्यों देखिए इसमें उदाहरण दिया उन्होंने

881
01:03:28,320 --> 01:03:32,560
तो कैसे है? तो ऐसे सैकड़ों मंत्र उपस्थित

882
01:03:32,560 --> 01:03:36,720
किए जा सकते हैं जिनका अक्षरार्थ वेदों की बात कर रहा हूं मैं। पुराणों

883
01:03:36,720 --> 01:03:40,800
की बात करने के लिए वेदों की बात कर रहा हूं। ठीक है? ऐसे वेदों

884
01:03:40,800 --> 01:03:44,960
में ऐसे सैकड़ों मंत्र उपस्थित किए जा सकते हैं जिनका अक्षरार्थ तो अत्यंत सरल

885
01:03:44,960 --> 01:03:49,040
और सीधा है। परंतु मंत्रोक्त भावों को हजार बार मस्तिष्क

886
01:03:49,040 --> 01:03:53,360
में बिालने का प्रयत्न करने पर भी हृदयंगम नहीं हो सकते। और ज्योंज्यों

887
01:03:53,360 --> 01:03:57,920
मानवीय बुद्धि उस अज्ञयता के

888
01:03:57,920 --> 01:04:01,920
अगाध सागर में निरवलंब होकर डूबती हुई सी जान पड़ती है

889
01:04:01,920 --> 01:04:06,960
त्यों त्यों अप्रतिभा की

890
01:04:06,960 --> 01:04:08,720
अप्रतिम प्रतिभा की वह दयनीय

891
01:04:08,720 --> 01:04:12,880
दशा तटस्थ आत्मा को रहरह कर अनुभूत होने लगती है। हम पाठकों

892
01:04:12,880 --> 01:04:17,040
को अधिक उत्कंठित करना नहीं चाहते। तदर्थ नीचे कतप

893
01:04:17,040 --> 01:04:21,200
उदाहरण देकर वास्तविक तात्पर्य को हृदयंगम करने कर लेने की सिफारिश

894
01:04:21,200 --> 01:04:25,280
करते हैं। तो यहां इन्होंने नासदी

895
01:04:25,280 --> 01:04:30,000
सूक्तम का शायद उदाहरण दिया है। उस समय ना ऋग्वेद

896
01:04:30,000 --> 01:04:34,080
10 एक 100 29 एक

897
01:04:34,080 --> 01:04:38,400
से तीन उस समय ना असत था और ना सत्य था ना पृथ्वी लोक था ना अंतरिक्ष

898
01:04:38,400 --> 01:04:42,400
और ना ही उससे ऊपर का दक था। ना

899
01:04:42,400 --> 01:04:46,400
जीवों को आवरण करने वाला कर्मकलाप था और ना ही कोई सुखादि का

900
01:04:46,400 --> 01:04:50,720
भोगता था। सृष्टि का आदिम तत्व दो प्रवेश एवं अगाद

901
01:04:50,720 --> 01:04:54,960
आप भी नहीं था। ना उस समय मृत्यु थी और ना ही

902
01:04:54,960 --> 01:04:59,520
अमरपण था। रात और दिन की कुछ भी पहचान ना थी। माया से

903
01:04:59,520 --> 01:05:03,600
अभिभक्त वह एक ब्रह्म ही था। उसके अतिरिक्त

904
01:05:03,600 --> 01:05:07,680
अन्य कुछ भी ना था। अंधकार था और उसी अंधकार से सब कुछ

905
01:05:07,680 --> 01:05:12,240
ढका हुआ सा था। यह सब नाम रूपात्मक जगत सलि

906
01:05:12,240 --> 01:05:16,400
कार्य कारण रूप में अभिभक्त था। जो इस प्रकार

907
01:05:16,400 --> 01:05:20,560
तुच्छ सद असद विलक्षणता से छुपा हुआ था।

908
01:05:20,560 --> 01:05:23,920
वही एक तपह की महिमा से प्रादुर्भूत

909
01:05:23,920 --> 01:05:28,080
हो गया। तो यहां पर अब इसको हृदयंगम

910
01:05:28,080 --> 01:05:32,080
करने के लिए आपको बार-बार बार-बार इसका मनन चिंतन करना पड़ेगा। इस

911
01:05:32,080 --> 01:05:36,320
श्लोक का मैं बहुत ज्यादा नहीं चलता हूं। मैं आगे चलता हूं। ऐसा

912
01:05:36,320 --> 01:05:40,560
ही एक उदाहरण हम ले लेते हैं शिव पुराण का। यह देखिए मिलती जुलती

913
01:05:40,560 --> 01:05:44,640
बात लिखी है वही वही जैसी। यह स्थूल दृश्य जगत सब उत्पन्न

914
01:05:44,640 --> 01:05:49,120
नहीं हुआ था। कहां लिखा है? शिव पुराण धर्म समिता दो

915
01:05:49,120 --> 01:05:53,280
एक से 64 के बीच में थोड़ा सा

916
01:05:53,280 --> 01:05:57,600
यहां पर कुछ मिस प्रिंट हुआ है। यह [गला साफ़ करने की आवाज़] स्थूल दृश्य

917
01:05:57,600 --> 01:06:02,080
जगत सब उत्पन्न नहीं हुआ था। उस महाप्रलय के अंत समय में सब

918
01:06:02,080 --> 01:06:06,080
सत और असत कुछ भी नहीं था। वही बात लिखी है यहां पर भी। उस

919
01:06:06,080 --> 01:06:10,240
समय निरंतर व्याप्ति रूप ब्रह्म में तेज ही था। वह तेज ना स्थूल

920
01:06:10,240 --> 01:06:14,400
था, ना सूक्ष्म था, ना शीत था और ना उष्म था। उस अलौकिक

921
01:06:14,400 --> 01:06:18,480
दिव्य तेज का आदि व अंत कुछ भी ना था। वह

922
01:06:18,480 --> 01:06:24,400
केवल सत्य ज्ञान स्वरूप और अनंत था। इस तरह से

923
01:06:24,400 --> 01:06:27,200
अनुसंधयात्मक

924
01:06:27,200 --> 01:06:31,200
विचार हमारे शास्त्रों में दिए गए हैं। परोक्ष रूप से बहुत गहरी

925
01:06:31,200 --> 01:06:35,600
गहरी बातें लिखी हुई है।

926
01:06:35,600 --> 01:06:39,840
अच्छा अब लौकिक भाषा की बात करते हैं। जिन संदर्भों में किसी

927
01:06:39,840 --> 01:06:44,000
धार्मिक गण रहस्य को प्रकट करने के लिए लौकिक पद्धति का अनुसरण किया गया

928
01:06:44,000 --> 01:06:48,000
हो ऐसे तात्पर्य प्रधान अलंकारिक वर्णनों

929
01:06:48,000 --> 01:06:52,080
को लौकिकी भाषा में निबद्ध समझना चाहिए। अब इसके उदाहरण दे रहे हैं।

930
01:06:52,080 --> 01:06:56,160
ऋग्वेद का उदाहरण है। एक 164 20 इसमें क्या

931
01:06:56,160 --> 01:07:00,240
कह रहे हैं? एक साथ रहने परस्पर संयुक्त और सुंदर पंखों वाले दो

932
01:07:00,240 --> 01:07:04,720
पक्षी हैं। अब देखिए यहां सांसारिक चीजों की व्याख्या में

933
01:07:04,720 --> 01:07:08,800
ब्रह्म और जीव के बारे में बताया जा रहा है। क्या बता रहे हैं? एक

934
01:07:08,800 --> 01:07:12,880
साथ रहने वाले अमूमन यह जो मंत्र है इसका उपयोग करते हुए

935
01:07:12,880 --> 01:07:16,880
द्वैत मत की स्थापना के लिए वो है। ये बहुत प्रसिद्ध

936
01:07:16,880 --> 01:07:20,960
है। ये एक साथ रहने वाले परस्पर संयुक्त और सुंदर पंखों वाले दो

937
01:07:20,960 --> 01:07:25,040
पक्षी हैं। जो दोनों एक वृक्ष का आश्रय लेते हैं। तो यहां क्या

938
01:07:25,040 --> 01:07:29,360
हो गया? जीव ब्रह्म प्रकृति उनमें से एक तो उस वृक्ष के पीपल

939
01:07:29,360 --> 01:07:33,440
फल खाता है। दूसरा बिना खाए ही प्रकाशमान होता है। वह

940
01:07:33,440 --> 01:07:37,760
केवल दृष्टा है। तो यहां क्या हुआ? यहां पहले उदाहरण में जीव और ब्रह्म

941
01:07:37,760 --> 01:07:41,840
का दो पक्षियों के रूप में प्रतिपादन किया गया है। जिस प्रकार लोक

942
01:07:41,840 --> 01:07:42,400
में पक्षियों

943
01:07:42,400 --> 01:07:46,400
के जोड़े वृक्ष पर बैठा करते हैं। उसी को

944
01:07:46,400 --> 01:07:50,480
फलों को इच्छा इच्छा उसके फलों को इच्छा अनुसार खाया करते हैं या

945
01:07:50,480 --> 01:07:54,800
ना खाया करते हैं। उसी लोक प्रसिद्ध बर्ताव के अनुरूप संसार

946
01:07:54,800 --> 01:07:58,800
रूपी वृक्ष के आश्रित जीव रूपी पक्षी को तो अपने किए कर्मों

947
01:07:58,800 --> 01:08:04,080
के फलों को भोगने वाला परंतु ब्रह्म रूप दूसरे पक्षी को कृत्व

948
01:08:04,080 --> 01:08:08,400
भोक्तत्व से दूर रहते हुए केवल साक्षी मात्र कहा है

949
01:08:08,400 --> 01:08:12,400
यानी कि यहां पर तो प्रतीकात्मक व्याख्या है किसकी जीव और ब्रह्म

950
01:08:12,400 --> 01:08:16,800
की कहां बैठे हैं प्रकृति रूपी डाल पर और एक है जो भोग

951
01:08:16,800 --> 01:08:20,800
कर रहा है फल को खा रहा है प्रकृति के और दूसरा है जो केवल साक्षी

952
01:08:20,800 --> 01:08:26,800
है तो इस तरह से भी व्याख्या की गई हमारे शास्त्रों में।

953
01:08:26,900 --> 01:08:31,760
[गला साफ़ करने की आवाज़] इसी तरह की व्याख्या आपको और बहुत सारी मिल जाएंगी।

954
01:08:31,760 --> 01:08:35,920
भागवत का यहां पर उन्होंने आचार्य श्री ने उदाहरण दिया है। आप लोग पढ़ सकते हैं।

955
01:08:35,920 --> 01:08:40,240
मैं थोड़ा सा शॉर्ट रखना चाह रहा हूं जिससे कि यह संदेश

956
01:08:40,240 --> 01:08:44,320
है ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच जाए। अब पर किया भाषा का उदाहरण इन्होंने दिया

957
01:08:44,320 --> 01:08:48,400
आचार्य जी ने। जो संदर्भ प्रत्यक्ष में अटपटे प्रतीत होते हैं और

958
01:08:48,400 --> 01:08:52,400
जो बातें ना कभी सुनी और ना देखी हैं ऐसी लोकोत्तर एवं

959
01:08:52,400 --> 01:08:56,560
असंभव सी जचने वाली भाषा जहां द्वारा जहां गुणतम वैज्ञानिक

960
01:08:56,560 --> 01:08:57,760
सिद्धांतों का निरूपण

961
01:08:57,760 --> 01:09:03,200
किया हो वह परकीय भाषा समझनी चाहिए। तो

962
01:09:03,200 --> 01:09:07,360
अब यहां पर क्या है? एक उदाहरण इन्होंने दिया है

963
01:09:07,360 --> 01:09:11,520
ऋग्वेद का। ऋग्वेद चार 58

964
01:09:11,520 --> 01:09:16,080
तीन एक वृषभ बैल है जिसके चार सींग हैं

965
01:09:16,080 --> 01:09:20,080
तीन पांव हैं दो सिर हैं और सात हाथ है

966
01:09:20,080 --> 01:09:24,160
ये ये वेद में लिखा है ठीक है वह तीन जगह से

967
01:09:24,160 --> 01:09:28,400
बंधा हुआ है और बार-बार दडूकता हुआ मनुष्यों में आ घुसा

968
01:09:28,400 --> 01:09:32,640
है परंतु है वह सब देवों में उत्तम

969
01:09:32,640 --> 01:09:36,800
उत्तम देव इस मंत्र में जैसे बैल का वर्णन किया जा रहा है लोक में कभी

970
01:09:36,800 --> 01:09:40,880
किसी ने ऐसे बैल को आज तक नहीं देखा होगा और ना ही

971
01:09:40,880 --> 01:09:45,280
सुना होगा। यदि इस मंत्र के वर्णनुसार उक्त बैल का चित्र

972
01:09:45,280 --> 01:09:49,440
खींचा जाए तो देखने वाले दंग रह जाएंगे। भला चार सींग और दो

973
01:09:49,440 --> 01:09:53,440
सिर तो हुए सो हुए तथा पांव भी तीन ही रहने

974
01:09:53,440 --> 01:09:57,920
दो। परंतु वह सात हाथ कहां लटकाए जाएंगे?

975
01:09:57,920 --> 01:10:02,240
पाठक जरा कल्पना करके देखें। इस प्रकार का विलक्षण बैल कहीं

976
01:10:02,240 --> 01:10:06,720
मनुष्यों में दडुकता हुआ आग घुसे तो एक बार तो सर्वसाधारण

977
01:10:06,720 --> 01:10:10,880
के चक्के छूट जाए। पुराण विरोधी आलोचक परकिया भाषा

978
01:10:10,880 --> 01:10:13,040
के पुराण

979
01:10:13,040 --> 01:10:17,040
पुराण पुराण वर्णित ठीक है थोड़ा सा मिस

980
01:10:17,040 --> 01:10:21,040
प्रिंटिंग है इसमें। पुराण वर्णित ऊपर

981
01:10:21,040 --> 01:10:25,120
जैसे अंशों पर जो मखल जो उपहास और जो बेपर की

982
01:10:25,120 --> 01:10:29,600
उड़ाया करते हैं उससे कहीं अधिक मजाक एक वेदान विज्ञ

983
01:10:29,600 --> 01:10:33,840
पामर उपयुक्त मंत्र पर भी खूब उड़ा सकता है। यहां

984
01:10:33,840 --> 01:10:38,400
आचार्य श्री उन लोगों की बात कर रहे हैं जो वेद की रक्षा

985
01:10:38,400 --> 01:10:42,800
के नाम पर जो है पुराणों की निंदा करते हैं और वेद का ही यह वाक्य

986
01:10:42,800 --> 01:10:46,960
है। बैल के इतने हाथ, इतने पैर ये सब

987
01:10:46,960 --> 01:10:51,120
तो यहां उनको कह रहे हैं। हालांकि फिलहाल हमारे संदर्भ में यह

988
01:10:51,120 --> 01:10:55,360
बात जो है आचार्य जी की जा रही है रामपालियों पर। ठीक है?

989
01:10:55,360 --> 01:10:59,440
तो क्या कह रहे हैं वह कि पुराण विरोधी आलोचक परकिया भाषा के

990
01:10:59,440 --> 01:11:03,520
पुराण वर्णित ऊपर जैसे अंशों पर जो मखल जो उपहास

991
01:11:03,520 --> 01:11:08,400
और जो पेपर की उड़ाया करते उससे कहीं अधिक मजाक एक वेदानभिज्ञ

992
01:11:08,400 --> 01:11:13,120
जो वेदों को ना जानने वाला है। पामर उपयुक्त

993
01:11:13,120 --> 01:11:18,960
मंत्र पर भी खूब उड़ा सकता है। लेकिन साक्षरों की दृष्टि में इस प्रकार की अनर्गल

994
01:11:18,960 --> 01:11:23,750
आलोचनाएं हिंदू ग्रंथों के महत्व को घटाने के बजाय उल्टा

995
01:11:23,750 --> 01:11:28,080
[गला साफ़ करने की आवाज़] समालोचक ही खुश खोपड़ी

996
01:11:28,080 --> 01:11:32,800
की खुराफात व्यक्त करती हैं। निसंदेह

997
01:11:32,800 --> 01:11:37,040
जो यह बात है अब इसका वो अर्थ बता रहे हैं। सुतराम वह

998
01:11:37,040 --> 01:11:41,200
बैल क्या पदार्थ है? इसका स्पष्टीकरण सुनिए। याज्ञ लोग कहते हैं कि

999
01:11:41,200 --> 01:11:46,320
यज्ञ ही सर्व कामनाओं का बरसाने वाला पूरा करने वाला है। यज्ञ

1000
01:11:46,320 --> 01:11:50,320
अत वही वृषभ है। यानी यहां पर यज्ञ को वृषभ कहा

1001
01:11:50,320 --> 01:11:54,400
है। चारों ऋत्विक उसके सींग रक्षक स्थानीय हैं।

1002
01:11:54,400 --> 01:11:58,640
यानी वो जो चार सींग है बैल के वो उसके ऋत्विक है जो चार ऋत्विक

1003
01:11:58,640 --> 01:12:02,640
होते हैं। वेद त्रय तीनों वेद ही पाव हैं। तीन

1004
01:12:02,640 --> 01:12:06,960
वेद जिनके आधार पर यज्ञ को खड़ा किया जाता है।

1005
01:12:06,960 --> 01:12:10,960
यजमान और उसकी पत्नी दोनों सिर हैं।

1006
01:12:10,960 --> 01:12:15,200
ठीक है? गायत्री आदि सातों छंद हाथ हैं

1007
01:12:15,200 --> 01:12:19,200
जिनके द्वारा समस्त यज्ञ कार्य संपादन होता है। प्रातः

1008
01:12:19,200 --> 01:12:23,600
मध्यान और साय काल के तीनों सवनों से ही वह बंधा हुआ है।

1009
01:12:23,600 --> 01:12:27,680
वाह अत यह यह देवों का देव है तथा

1010
01:12:27,680 --> 01:12:31,680
मनुष्यों द्वारा आचरणीय होने के कारण उनमें प्रवेश करता है। आपने

1011
01:12:31,680 --> 01:12:35,680
कुछ दिनों पूर्व एक शॉर्ट फिल्म बहुत वायरल हुई थी YouTube पर जिसमें

1012
01:12:35,680 --> 01:12:39,920
वो शेषनाग के ऊपर पृथ्वी है। पृथ्वी घूमती नहीं है। बच्चे को पूछा

1013
01:12:39,920 --> 01:12:43,520
जाता है कि पृथ्वी कितने चक्कर लगाती है? इस तरह के कुछ वैज्ञानिक

1014
01:12:43,520 --> 01:12:47,520
क्वेश्चन पूछे जाते हैं तो वह पौराणिक कथा को वहां पर बोल देता है और इस

1015
01:12:47,520 --> 01:12:51,760
तरीके से इस तरह की शॉर्ट फिल्म बना करके हमारे सनातन धर्म पर आक्षेप

1016
01:12:51,760 --> 01:12:57,760
लगाने का प्रयास किया जा रहा है। उसी का निराकरण है ये जो मैं बता रहा हूं आज।

1017
01:12:58,080 --> 01:13:02,080
यह सब प्रतीकात्मक व्याख्याएं और इनका जब हम गढ़ अर्थ देखेंगे

1018
01:13:02,080 --> 01:13:06,240
इसके पीछे का अर्थ देखेंगे तो उनकी सुंदरता से हमारे हृदय में बहुत संतोष

1019
01:13:06,240 --> 01:13:11,040
आएगा और ऐसी ही रुचि बनाए रखने के लिए ही इस प्रकार की प्रतीकात्मक

1020
01:13:11,040 --> 01:13:15,040
व्याख्या में यह शास्त्र ढले हुए हैं जिससे कि

1021
01:13:15,040 --> 01:13:20,560
हमारी बुद्धि इनके प्रति खोजी की रहे खोजी

1022
01:13:20,560 --> 01:13:25,040
कि अब कौन सा रहस्य निकलने वाला है इस वाक्य से ठीक है

1023
01:13:25,040 --> 01:13:29,360
तो और आगे चलते चलते हैं थोड़ा सा। अब इन्होंने

1024
01:13:29,360 --> 01:13:34,000
और भी बहुत सी बातें की है।

1025
01:13:34,000 --> 01:13:38,720
अब देखिए एक अब इसी प्रकार की व्याख्या यहां पर कर रहे हैं।

1026
01:13:38,720 --> 01:13:44,720
पद्म पुराण में उत्तरखंड में छ

1027
01:13:47,040 --> 01:13:51,200
96 38 नारद जी कहते हैं कि मैंने

1028
01:13:51,200 --> 01:13:55,280
यमुना तट पर देखा कि वहां एक खिन्न मुख वाली

1029
01:13:55,280 --> 01:13:59,360
युवती स्त्री बैठी है। और उसके पास ही दो बूढ़े

1030
01:13:59,360 --> 01:14:03,440
अचेत हुए लंबी सांस ले रहे हैं। अब यहां पर यह लोग आएंगे

1031
01:14:03,440 --> 01:14:07,520
रामपाली गैंग वाले और इसको पकड़ के दुष्प्रचार करने लगे

1032
01:14:07,520 --> 01:14:11,600
कि भैया एक युवती है और उसके पास दो जो है वृद्ध बैठे हुए

1033
01:14:11,600 --> 01:14:15,760
हैं। लंबी सांसे अचेत पड़े हुए हैं। लंबी सांसे ले रहे हैं।

1034
01:14:15,760 --> 01:14:20,080
और नारद जी के पूछने पर उस स्त्री ने आश्चर्य पूर्वक कहा कि उसने

1035
01:14:20,080 --> 01:14:24,080
बताया क्या बताया? मैं माता हूं और यह दोनों

1036
01:14:24,080 --> 01:14:28,160
मेरे पुत्र हैं। मैं युवती क्यों हूं और यह दोनों मेरे पुत्र वृद्ध

1037
01:14:28,160 --> 01:14:32,160
क्यों हो गए हैं? वास्तव में तो माता का जरठ

1038
01:14:32,160 --> 01:14:36,320
होना और पुत्रों का युवा होना ही घटित होता है। अब

1039
01:14:36,320 --> 01:14:40,560
यहां पर आचार्य बात कर रहे हैं। वास्तव में तो माता का जरठ होना

1040
01:14:40,560 --> 01:14:44,560
और पुत्रों का युवा होना ही घटित होता है। यहां पर प्रत्यक्ष में माता

1041
01:14:44,560 --> 01:14:48,640
का युवती होना और पुत्रों का महावद्ध होना हो जाना यह

1042
01:14:48,640 --> 01:14:49,360
असंभव

1043
01:14:49,360 --> 01:14:53,360
सा प्रतीत होता है। वास्तव में उक्त संदर्भ में भक्ति को ही

1044
01:14:53,360 --> 01:14:57,840
माता कहा गया है। यहां पर माता कौन है? भक्ति

1045
01:14:57,840 --> 01:15:02,240
और ज्ञान वैराग्य को उसके पुत्र बतलाया

1046
01:15:02,240 --> 01:15:06,240
गया है। कलिकाल के आरंभ में और अब भी ज्ञान की बात कृपाण की

1047
01:15:06,240 --> 01:15:10,320
धारा के अनुसार धारणा ध्यान समाधि आदि अष्टांग योग

1048
01:15:10,320 --> 01:15:14,560
द्वारा जितात्मा होकर ज्ञान एवं वैराग्य को धारण

1049
01:15:14,560 --> 01:15:18,560
करने वाले पुरुष बिरले ही मिलते हैं। अतः ग्राहकों के ना होने

1050
01:15:18,560 --> 01:15:22,640
से उक्त दोनों साधनों को यहां मृत प्रायः एवं

1051
01:15:22,640 --> 01:15:26,640
महावृद्ध प्रकट किया गया है। मतलब इनका साधन करने वाले लोग कम होते

1052
01:15:26,640 --> 01:15:31,280
हैं। तो इसलिए वृद्ध है लुप्त लुप्त से प्रायः

1053
01:15:31,280 --> 01:15:35,920
तो क्या वृद्ध उनको वृद्ध के रूप में दिखाया है मृत्यु के निकट जैसे

1054
01:15:35,920 --> 01:15:39,920
और महावद्ध प्रकट किया है परंतु सुगम

1055
01:15:39,920 --> 01:15:44,640
होने के कारण सरल सरलता से अनुगम में होने के कारण

1056
01:15:44,640 --> 01:15:48,960
इस गई गुजरी दशा में भी भक्ति मार्ग को अधिकारी भक्ति

1057
01:15:48,960 --> 01:15:53,120
मार्ग के जो अधिकारी होते हैं वो निकलते रहते हैं। अतः उसे तरुणी यानी युवा

1058
01:15:53,120 --> 01:15:57,120
बताया गया है। यही आशय यहां विवक्षित है। अब देखिए कितनी सुंदरता

1059
01:15:57,120 --> 01:16:01,120
से वर्णन किया गया कि एक जो है युवती बैठी थी उसके दो पुत्र बैठे थे और

1060
01:16:01,120 --> 01:16:04,400
दो पुत्र जो है वृद्ध थे दो पुत्र वृद्ध थे

1061
01:16:04,400 --> 01:16:08,800
और युवती जो है उनकी मां थी और पुत्र वृद्ध थे

1062
01:16:08,800 --> 01:16:12,480
इसको देख के किसी को भी

1063
01:16:12,480 --> 01:16:16,560
रुचि भी आएगी संशय भी आएगा और उसी संशय के कारण उसकी बुद्धि इसमें

1064
01:16:16,560 --> 01:16:20,640
प्रवृत्त होने लगेगी इन शास्त्रों को पढ़ने में कि और कौन बातें मुझे

1065
01:16:20,640 --> 01:16:24,720
पता चल ठीक है इसीलिए इस भाषा

1066
01:16:24,720 --> 01:16:29,840
में उपयोग करते

1067
01:16:29,840 --> 01:16:35,360
हां

1068
01:16:35,360 --> 01:16:41,360
तो ये स्कूटी रखी है

1069
01:16:51,920 --> 01:16:56,640
जय श्री राम जय श्री राम अच्छा तो

1070
01:16:56,640 --> 01:17:00,720
इस तरह की शैली में प्रतीकात्मक व्याख्या के रूप में विभिन्न जो गुण अर्थ होते

1071
01:17:00,720 --> 01:17:04,800
हैं वह हमारे बताए जाते हैं पुराणों के भी द्वारा

1072
01:17:04,800 --> 01:17:08,800
और वेदों के भी द्वारा मैं क्योंकि वेदों का भी उदाहरण इन्होंने लगातार दिया है तो वो उदाहरण

1073
01:17:08,800 --> 01:17:11,680
भी देता चल रहा हूं।

1074
01:17:11,680 --> 01:17:15,680
अब अर्थ विचार की बात भी कर लेते हैं। पूर्वाचार्यों ने वेद मंत्रों की व्याख्या

1075
01:17:15,680 --> 01:17:20,240
करते हुए उन्हें कई कई अर्थों में व्याख्यात किया है। वेदार्थ

1076
01:17:20,240 --> 01:17:24,480
निर्णय में आजकल निरुक्त का प्राधान्य माना जाता है या यूं समझिए

1077
01:17:24,480 --> 01:17:28,480
कि इस समय वैदिक साहित्य सागर का यही एक रत्न हमारे पास शेष

1078
01:17:28,480 --> 01:17:32,400
बचा है। तो

1079
01:17:32,400 --> 01:17:36,560
उक्त ग्रंथ में एक ही वेद मंत्र के आध्यात्मिक आदि दैविक

1080
01:17:36,560 --> 01:17:39,200
और आदि भौतिक

1081
01:17:39,200 --> 01:17:43,200
पद्धतियों से भिन्नभिन्न अर्थ किए गए हैं। तो इन्होंने

1082
01:17:43,200 --> 01:17:49,200
एक ऋग्वेद का उदाहरण दिया है। वो मैं नहीं बता रहा हूं। मैं आगे

1083
01:17:51,840 --> 01:17:56,080
एक ऋग्वेद का इन्होंने उदाहरण दे रखा है। जिसके कई अर्थ हैं। आध्यात्मिक

1084
01:17:56,080 --> 01:18:00,480
और आदि भौतिक। इसके बाद इन्होंने यहां पर ब्रह्म

1085
01:18:00,480 --> 01:18:04,880
विवर्त पुराण से और यहां पर इन्होंने ब्रह्मा सरस्वती

1086
01:18:04,880 --> 01:18:08,880
विवाह वाला प्रकरण इन्होंने दिया है। जैसे वेदों में ये

1087
01:18:08,880 --> 01:18:13,040
वाली बातें हैं जिसके आदि दैविक आदि भौतिक और आध्यात्मिक अर्थ निकलते हैं।

1088
01:18:13,040 --> 01:18:17,120
उसी प्रकार से हमारे शास्त्रों में भी जो पुराण आदि शास्त्र उनमें

1089
01:18:17,120 --> 01:18:21,360
भी इस तरह की बातें हैं। अब उनमें से एक जो आक्षेप लगता है ब्रह्मा सरस्वती

1090
01:18:21,360 --> 01:18:25,440
विवाह उस पर आज मैं बात करने वाला हूं। आज मैं शॉर्ट में करूंगा

1091
01:18:25,440 --> 01:18:29,520
और जब अलग से इस पर इसका अगले भाग आएंगे तब जो

1092
01:18:29,520 --> 01:18:33,600
है वेदों का प्रमाण कि वेदों में भी वो घटना कहां पर किस किन रूपों

1093
01:18:33,600 --> 01:18:37,680
में दर्शाई गई है और फिर यह बताऊंगा कि इसका आदिविक अर्थ क्या है इसमें कौन

1094
01:18:37,680 --> 01:18:41,920
सा गुण अर्थ छुपा है कि ब्रह्मा जी ने ब्रह्मा जी ने बायोलॉजिकली जो

1095
01:18:41,920 --> 01:18:45,920
मनुष्यों के बीच में संभोग क्रिया होती है वो उन पर लागू नहीं होती

1096
01:18:45,920 --> 01:18:47,440
है परम तत्व होने के कारण

1097
01:18:47,440 --> 01:18:51,440
एक से दो होने के कारण अमथनी सृष्टि होने के कारण ये तो हो गया क्लियर

1098
01:18:51,440 --> 01:18:55,440
तो अब जब उनके लिए इस प्रकार के शब्द आ रहे हैं जिनका अर्थ यह पागल

1099
01:18:55,440 --> 01:18:59,840
रामपाली गैंग वो ब्रैकेट में लिखता है सेक्स तो उनके वास्तविक

1100
01:18:59,840 --> 01:19:04,400
अर्थ क्या है यह अर्थ मैं उस सीरीज में आपको एक-एक करके बताऊंगा इसमें भगवान

1101
01:19:04,400 --> 01:19:08,640
शिव शिव मोहिनी का प्रकरण भी आएगा ब्रह्मा सरस्वती विवाह भी आएगा

1102
01:19:08,640 --> 01:19:12,640
और मैं देखूंगा कि कौन से मोटे-मोटे प्रासंगिक जो इन्होंने आक्षेप लगाए उन पर

1103
01:19:12,640 --> 01:19:16,640
मैं बात करूंगा और हां उसमें जो है जो भगवान श्री कृष्ण की

1104
01:19:16,640 --> 01:19:20,640
रास लीला और जो कुब्जा समागम और जो

1105
01:19:20,640 --> 01:19:24,640
राधा जी उनकी मामी है ये सब जो ये लोग किया करते हैं, टपली बजाया करते हैं।

1106
01:19:24,640 --> 01:19:28,800
इसीलिए मैं कह रहा हूं कि किसी प्रामाणिक व्यक्ति को वहां पर होना

1107
01:19:28,800 --> 01:19:32,880
पड़ेगा जो हमारे प्रामाणिक आचार्य होंगे। बहुत अच्छी बात है या फिर उनसे

1108
01:19:32,880 --> 01:19:38,880
जुड़े हुए किसी ना किसी प्रामाणिक व्यक्ति को। तो अब

1109
01:19:39,360 --> 01:19:43,520
मैं ब्रह्मा सरस्वती पर इन्होंने यहां पर संक्षिप्त में जो बात की है उस पर हम बात करके

1110
01:19:43,520 --> 01:19:47,520
चीज को चीजों को विराम देंगे। तो वेदानिज्ञ यानी वेदों को

1111
01:19:47,520 --> 01:19:52,320
जान ना जानने वाले मनुष्य को एक मंत्र के कई अर्थ देखकर यह भ्रम हो सकता है कि वस्तुतः

1112
01:19:52,320 --> 01:19:56,400
सत्य अर्थ कौन सा है। परंतु एक वेदज्ञ की दृष्टि में सभी अर्थ यथार्थी

1113
01:19:56,400 --> 01:20:00,640
होते हैं। उनमें से किसी एक को सत्य मानकर दूसरे को मिथ्या बताने का भी का

1114
01:20:00,640 --> 01:20:04,720
किसी भी संप्रदाय को अधिकार नहीं है। नहीं हो सकता। जिस

1115
01:20:04,720 --> 01:20:08,800
प्रकार पूर्वोक्त सोम पवते आदि मंत्र का

1116
01:20:08,800 --> 01:20:13,440
अर्थ आदि देव पक्षवादी पुरुष सूर्य परक कर सकता है। परंतु उसे

1117
01:20:13,440 --> 01:20:17,840
इसके आत्म परक आध्यात्मिक अर्थ के निषेध करने का कोई स्वत

1118
01:20:17,840 --> 01:20:22,160
नहीं है। तथा इंद्र वृत्रासुर संग्राम प्रतिपादक

1119
01:20:22,160 --> 01:20:26,400
मंत्रों में निरुक्तवादी लोग वृत्त शब्द का अर्थ मेघ कर सकते हैं। परंतु

1120
01:20:26,400 --> 01:20:30,560
उन्हें इतिहासवादियों के अभिमत त्वास्ट्र असुर अर्थ

1121
01:20:30,560 --> 01:20:34,560
को मिथ्या कहने का अधिकार नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि व्याकरण आदि वेदांगों से

1122
01:20:34,560 --> 01:20:38,640
अरुद्ध और युक्ति युक्त जितने भी अर्थ होंगे वह सभी यथार्थ

1123
01:20:38,640 --> 01:20:42,880
माने जावेंगे। अधिकारियों को रुचि भेद से उनमें से जो रुचिकर

1124
01:20:42,880 --> 01:20:46,960
हो वह उसे ग्रहण कर सकते हैं या साध्य हो साध सकते हैं। यहां तक

1125
01:20:46,960 --> 01:20:51,200
हमने ऋषि समवत वेदार्थ निर्णय शैली का विवेचन किया। अब पुराणों

1126
01:20:51,200 --> 01:20:54,640
के संबंध में भी जो अर्थ करने की शैली प्राचीन

1127
01:20:54,640 --> 01:20:59,120
काल से चली आती है। उस पर विचार कीजिए। पुराणों में अधिकांशत

1128
01:20:59,120 --> 01:21:03,440
यह बहुत इंपॉर्टेंट है। यहां से आप लोग जरूर इसको सुन लीजिएगा। अपने

1129
01:21:03,440 --> 01:21:07,440
पास कट करके रख लीजिएगा। एक बहुत एक उपयोगी

1130
01:21:07,440 --> 01:21:11,600
बात आपको अभी तक जो हमने बातें की उसके संबंध में एक संक्षिप्त विवरण

1131
01:21:11,600 --> 01:21:15,760
प्राप्त होने वाला है। पुराणों में अधिकांशतः वर्णन ऐसे हैं जो

1132
01:21:15,760 --> 01:21:19,760
जो कि आध्यात्मिक, आदि दैविक और आदि भौतिक तीनों प्रकार के अर्थों

1133
01:21:19,760 --> 01:21:23,920
में पूर्ण रूप से घटित होते हैं। एक पुराण में यदि उसे आध्यात्मिक अर्थ

1134
01:21:23,920 --> 01:21:28,480
का प्राधान्य माना सामने रखकर कहा गया है तो पुराणांतर

1135
01:21:28,480 --> 01:21:32,800
में उसे ही आदि भौतिक या आदि दैविक अर्थ की मुख्यता से वर्णन

1136
01:21:32,800 --> 01:21:37,040
किया गया। उदाहरणार्थ अब यहां उदाहरण है। उदाहरण क्या है? जैसे ब्रह्मा

1137
01:21:37,040 --> 01:21:41,200
द्वेता के संबंध द्वता से संबंध रखने वाली प्रसिद्ध वैदिक कथा को

1138
01:21:41,200 --> 01:21:45,200
ही सामने रखते हैं। यह कथा प्रायः सभी पुराणों में आती

1139
01:21:45,200 --> 01:21:49,360
है। श्रीमद् भागवत पुराण स्कंध तीन अध्याय 12 में

1140
01:21:49,360 --> 01:21:53,440
ब्रह्म वैवर्त पुराण खंड चार और अध्याय

1141
01:21:53,440 --> 01:21:57,600
36 में और देवी भागवत स्कंध एक अध्याय

1142
01:21:57,600 --> 01:22:01,680
14 और श्लोक 68 में भी इसका संकेत

1143
01:22:01,680 --> 01:22:06,240
मिलता है। परंतु उक्त तीनों पुराणों में यह भिन्नभिन्न अर्थों को मुख्य रखकर

1144
01:22:06,240 --> 01:22:09,680
लिखी गई है। यह बात उन उन पुराणों में

1145
01:22:09,680 --> 01:22:13,920
उक्त कथा का उपसंहार देखने से भली-भांति स्पष्ट हो जाती है। मतलब उनमें

1146
01:22:13,920 --> 01:22:18,000
जो अंतर आ रहा है कि थोड़े से वस्तुनिष्ठ चीजों के अंतर से

1147
01:22:18,000 --> 01:22:22,480
अर्थ क्या निकल कर के आ रहा है। तो यह बात जब लास्ट का

1148
01:22:22,480 --> 01:22:26,560
फाइनल देखते हैं ना कि एंड में क्या हुआ? कहानी के अंत में क्या

1149
01:22:26,560 --> 01:22:30,640
हुआ? उससे समझ में आ जाता है कि इन तीनों में क्या अंतर है। तो देखिए क्या

1150
01:22:30,640 --> 01:22:34,640
है। श्रीमद् भागवत में यह कथा आदि भौतिक अर्थ में कही गई है।

1151
01:22:34,640 --> 01:22:38,720
आदि भौतिक अर्थ क्या है? यह वहां इसका

1152
01:22:38,720 --> 01:22:43,040
तात्पर्य है कि प्रजापति सूर्य यानी यहां पर सूर्य कहा गया।

1153
01:22:43,040 --> 01:22:47,200
अपनी दुहिता उषा यानी जो उसकी जो लालामी होती है के पीछे

1154
01:22:47,200 --> 01:22:51,200
पीछे दौड़ता है। यानी जो सूर्य की लालामी होती है उसके पीछे पीछे सूर्य

1155
01:22:51,200 --> 01:22:55,280
उदय होता है। मरीच आदि पुत्र छह किरणें उसे

1156
01:22:55,280 --> 01:22:59,440
रोकती हैं। तो छह किरणें होती हैं वहां रोकने वाली कही गई। वह लज्जित होकर

1157
01:22:59,440 --> 01:23:04,000
अपने कलेवर। अब यहां पर कलेवर यानी कि वाष्पमय

1158
01:23:04,000 --> 01:23:07,360
प्रभात कालीन बादल।

1159
01:23:07,360 --> 01:23:11,360
उसका कलेवर यानी उसका शरीर क्या है? सूर्य का शरीर क्या है?

1160
01:23:11,360 --> 01:23:15,920
वाष्पमय प्रभात कालीन जो बादल होते हैं यानी कि संगणनित

1161
01:23:15,920 --> 01:23:20,000
हुआ हुआ जो बादल जैसा बन गया होता

1162
01:23:20,000 --> 01:23:24,160
है वो तो जब किरणों के प्रभाव से

1163
01:23:24,160 --> 01:23:24,800
उसका वो जो

1164
01:23:24,800 --> 01:23:28,880
शरीर होता है वो जो बादल है जो कि कोहरा बन के टपकता है बाद

1165
01:23:28,880 --> 01:23:33,040
में। तो किस कारण से वो टपका? किरणों के प्रभाव से।

1166
01:23:33,040 --> 01:23:37,120
सर्दियों के समय में जो बादल होते हैं

1167
01:23:37,120 --> 01:23:41,360
वो क्यों टपकते हैं? सूर्य की गर्मी के कारण। ओस बन के टपकते हैं तो

1168
01:23:41,360 --> 01:23:45,600
वो त्याग देता है। शरीर सब दिशाओं में

1169
01:23:45,600 --> 01:23:49,840
फैल जाता है जिसे कोहरा कहते हैं। उसको कोहरा

1170
01:23:49,840 --> 01:23:55,840
कहते हैं। तो यह शब्द आया वहां पर निहारम यद विदुस्तमः

1171
01:23:57,680 --> 01:24:01,680
भागवत तीन 12 34 इसमें क्या कहा गया है? निहार कोहरा धुंध

1172
01:24:01,680 --> 01:24:06,000
कहते हैं। यहां उस संवार से स्पष्ट हो गया कि कोहरे की उत्पत्ति बताने

1173
01:24:06,000 --> 01:24:10,080
के लिए इस रूपक का उल्लेख किया गया। यानी कि सूर्य

1174
01:24:10,080 --> 01:24:14,160
निकलता है उससे पहले उसकी लालिमा निकलती है। तो यहां पर देखने में

1175
01:24:14,160 --> 01:24:18,320
यह लग सकता है कि सूर्य पीछे पीछे और उसकी लालिमा उसी से उत्पन्न

1176
01:24:18,320 --> 01:24:22,320
होने वाली इसलिए उसकी पुत्री तो वह अपनी पुत्री के पीछे पीछे किरणों

1177
01:24:22,320 --> 01:24:26,560
के प्रभाव से सूर्य का जो शरीर है यानी कि वो बादल जो

1178
01:24:26,560 --> 01:24:30,880
नमी के बादल बने हुए हैं वो उसकी जो किरणें

1179
01:24:30,880 --> 01:24:34,880
हैं उसके कारण उसका जो शरीर है वह त्याग देते हैं जो कोहरा

1180
01:24:34,880 --> 01:24:39,040
बन के गिरता है और वहां पर बाकायदा कोहरा शब्द आया है भागवत

1181
01:24:39,040 --> 01:24:39,840
में जो

1182
01:24:39,840 --> 01:24:44,080
कोहरा बनकर गिरता है निहार ठीक है अब दूसरी जगह

1183
01:24:44,080 --> 01:24:49,120
पर यही कथा आती है। उसका क्या अर्थ है? देखिए बहुत रोचक है।

1184
01:24:49,120 --> 01:24:53,280
ब्रह्म व्यवही कथा आध्यात्मिक अर्थ को मुख्य मानकर लिखी

1185
01:24:53,280 --> 01:24:58,400
गई है। वहां उपसहार में स्पष्ट कर दिया गया है। क्या है?

1186
01:24:58,400 --> 01:25:02,480
चार 36 58 मन रूप ब्रह्मा वाणी रूप

1187
01:25:02,480 --> 01:25:06,480
सरस्वती के पीछे पीछे दौड़ता है। वाणी कहां से उत्पन्न हो रही है? मन से। तो

1188
01:25:06,480 --> 01:25:10,640
वाणी हो गई पुत्री। और मन कौन हो गया? ब्रह्मा। तो ब्रह्मा जी किसके पीछे

1189
01:25:10,640 --> 01:25:14,640
दौड़ रहे हैं? पुत्री के पीछे तो अब कहने को तो ब्रह अरे पिता ने

1190
01:25:14,640 --> 01:25:19,680
पुत्री से वह कर लिया भाई वहां पर तो बायोलॉजिकल यह संभोग क्रिया है ही नहीं

1191
01:25:19,680 --> 01:25:24,960
तो इनके आपको अर्थों को समझना होगा गुरु चरणों में बैठकर

1192
01:25:24,960 --> 01:25:29,920
जैसे वेद के अर्थों को समझना होगा गुरु चरणों में बैठकर

1193
01:25:29,920 --> 01:25:33,920
तो मन रूप ब्रह्मा वाणी रूप सरस्वती के पीछे पीछे दौड़ता है तब

1194
01:25:33,920 --> 01:25:38,160
ज्ञान रूप शिव शिव जी कौन है ज्ञान स्वरूप तो ज्ञान

1195
01:25:38,160 --> 01:25:42,160
रूप शिव अपने पिता मन का अहंकार रूप मस्तक काट डालते हैं। यह

1196
01:25:42,160 --> 01:25:46,880
वहां पर मस्तक काटने का प्रसंग है। यानी उनका

1197
01:25:46,880 --> 01:25:51,120
एक तरीके से वहां पर भी शरीर छूटने वाली बात हो गई। तो यहां मरीच आदि

1198
01:25:51,120 --> 01:25:55,040
के बजाय शिव द्वारा ब्रह्मा के मस्तक काटने का उल्लेख है। क्योंकि आध्यात्मिक

1199
01:25:55,040 --> 01:25:59,200
अर्थ में मरीच आदि छह पुत्र किरणें घटित नहीं हो सकते

1200
01:25:59,200 --> 01:26:03,200
और ना ही ब्रह्मा का शरीर त्याग उचित जचता था। बल्कि ज्ञान

1201
01:26:03,200 --> 01:26:07,440
रूप महेश्वर द्वारा मन रूप ब्रह्मा का अहंकार रूप पांचवा मस्तक काट डालना

1202
01:26:07,440 --> 01:26:11,520
ही उचित प्रतीत होता था। अतः ब्रह्म वर्त में वह लिखा

1203
01:26:11,520 --> 01:26:15,760
है जो कि आध्यात्मिक अर्थ में सर्वथा घटित होता है। देवी

1204
01:26:15,760 --> 01:26:19,920
भागवत में उत कथा के आध्यात्म आदि दैविक अर्थ को मुख्य

1205
01:26:19,920 --> 01:26:24,000
मानकर इसका संकेत किया गया है। अतः वहां ब्रह्मलोक के अधिष्ठाता श्री ब्रह्मा

1206
01:26:24,000 --> 01:26:28,000
जी अभिप्रेत है। तात्पर्य यह हुआ कि यह एक ही कथा

1207
01:26:28,000 --> 01:26:32,240
तीन पुराणों में तीन अर्थों से प्रयुक्त हुई है। और इसी प्रकार से

1208
01:26:32,240 --> 01:26:36,240
ये सारी जो लीलाएं हैं, घटनाएं हैं जो

1209
01:26:36,240 --> 01:26:40,400
पुराणों में है और वेद में भी है। बस बात इतनी है जो इनके जनक

1210
01:26:40,400 --> 01:26:44,640
भाई साहब है ना इनके रामपाली जैसों के जनक जनक यानी कि आर समाज तो उन्होंने

1211
01:26:44,640 --> 01:26:48,720
क्या किया वेदों में जब इस तरह की बातें आती है तो वहां पर अपना जो सुरक्षात्मक

1212
01:26:48,720 --> 01:26:52,720
रवैया अपना लेते हैं मगर उनके ही भाई बंधु

1213
01:26:52,720 --> 01:26:57,040
जो पुराणों में आस्था है उनके जो उनकी आस्था

1214
01:26:57,040 --> 01:27:01,200
के केंद्र जो पुराण आदि शास्त्र उनमें जब इस तरह की बातें आती है तो वो वहां पर इस तरह के आदि

1215
01:27:01,200 --> 01:27:05,650
दैविक आदि भौतिक आध्यात्मिक अर्थ नहीं निकालते तो

1216
01:27:05,650 --> 01:27:10,320
[गला साफ़ करने की आवाज़] इस समय पुराणों का अनुसंधान करने वाले महानुभाव

1217
01:27:10,320 --> 01:27:14,320
अर्थ विचार में एक दूसरे से किंचित मतभेद रख सकते हैं। तो यहां पर इन्होंने

1218
01:27:14,320 --> 01:27:18,800
और कुछ चीजें बताई हैं। अब यहां पर पुराण शैली की

1219
01:27:18,800 --> 01:27:23,040
विशेषता बताई है। यहां तक हमने प्रायः

1220
01:27:23,040 --> 01:27:27,360
समस्त शास्त्रों में अवशेष रूप से दिख पड़ने वाली शैली का निरूपण

1221
01:27:27,360 --> 01:27:31,680
किया है। लौकिक वैदिक किवा आर्ष शब्दों

1222
01:27:31,680 --> 01:27:36,160
का प्रयोग रोचक भयानक और यथार्थ वचनों का अस्तित्व समाधि लौकिकी

1223
01:27:36,160 --> 01:27:40,480
और परकीय तीनों भाषाओं का समावेश एवं आध्यात्मिक आदि भौतिक

1224
01:27:40,480 --> 01:27:44,880
और आदि दैविक आदि अनेक अर्थों का सामंजस्य और यह सामंजस्य वेदों

1225
01:27:44,880 --> 01:27:49,120
के साथ हो रहा है पुराणों का। जिस प्रकार की घटनाएं

1226
01:27:49,120 --> 01:27:53,600
यहां है उसी प्रकार की घटनाएं

1227
01:27:53,600 --> 01:27:57,680
पुराणों में है। ठीक है?

1228
01:27:57,680 --> 01:28:01,760
अब एक जो लास्ट में इन्होंने वही बात कही

1229
01:28:01,760 --> 01:28:04,720
है जो मैं बार-बार

1230
01:28:04,720 --> 01:28:09,520
कहता आ रहा हूं। इसी तरह ब्रह्मा पुत्री इंद्रवत्रासुर इंद्र अहिल्या

1231
01:28:09,520 --> 01:28:13,600
और उतथ ममता आदि से संबंध रखने वाली 50ों कथाएं

1232
01:28:13,600 --> 01:28:18,080
भी इतिहास के साथ-साथ अध्यात्म देव चारित्र्य

1233
01:28:18,080 --> 01:28:22,080
भौतिक विज्ञान और धर्म तत्व आदि रहस्यों के विमर्शण से

1234
01:28:22,080 --> 01:28:26,240
परिपूरित हैं। जिनका उचित विश्लेषण करने पर ही जिज्ञासु

1235
01:28:26,240 --> 01:28:30,480
को ऐतिहासिक तथ्य उपलब्ध हो सकता है। यही पुराण शैली की शैली

1236
01:28:30,480 --> 01:28:35,520
की विशेषता है जिस जिसका मनन करने पर पुराणों में प्रतीत होने वाले असंभव

1237
01:28:35,520 --> 01:28:40,080
अश्लील परस्पर विरोध और धर्म विरोध आदि दोष दोषाभास

1238
01:28:40,080 --> 01:28:44,240
में परिणित हो जाते हैं। दोष किस में परिणित हो जाते हैं? दोषाभास

1239
01:28:44,240 --> 01:28:48,320
दोष नहीं है। दोषाभास है। ठीक है? अपने पुराणों को अपने धर्म ग्रंथों

1240
01:28:48,320 --> 01:28:52,480
को जानिए। तो प्रश्न अच्छा इसके बाद मैं एक

1241
01:28:52,480 --> 01:28:56,560
चीज और यहां पर बता दूं। जैसे वो ईश्वर सर्व सामर्थ्यवान है।

1242
01:28:56,560 --> 01:29:00,560
तो अब ये लीलात्मक उन्होंने विवेचना तो कर दी। उनके उन्होंने जो भी लीला की उसके

1243
01:29:00,560 --> 01:29:06,160
क्या अर्थ है वो मैंने आपको ब्रह्मा सरस्वती विवाह से बता दिया।

1244
01:29:06,160 --> 01:29:08,880
पर इसमें एक बात ये आती है कि ईश्वर

1245
01:29:08,880 --> 01:29:12,960
सर्व सामर्थ्यवान है। जैसे कि भगवान ने चार 13 में कहा समस्त कर्मों को

1246
01:29:12,960 --> 01:29:16,960
करते हुए भी तू करने वाला होते हुए भी तू मुझको अकर्ता जान क्योंकि

1247
01:29:16,960 --> 01:29:20,960
मैं कर्मों के फल में लिप्त नहीं होता। आसक्त नहीं हूं मैं।

1248
01:29:20,960 --> 01:29:25,040
क्योंकि भगवान को उन कर्मों से कुछ चाहिए नहीं और अगर आर्य समाज का अर्थ ले लें

1249
01:29:25,040 --> 01:29:29,040
आर्य समाज के अनुसार वाला ईश्वर ले लें तो कर्मों का फल देने के लिए

1250
01:29:29,040 --> 01:29:33,440
और आर्य समाज के अनुसार जीव केवल प्रेरणा करता है सभी

1251
01:29:33,440 --> 01:29:37,440
जो बल लगाता है वो ईश्वर ही करता है कार्य आर्य समाज के अनुसार सारे

1252
01:29:37,440 --> 01:29:41,600
कार्य इसका मतलब दुनिया में अच्छा बुरा कुछ भी जो भी क्रियाएं हो रही है वो सब

1253
01:29:41,600 --> 01:29:45,600
ईश्वर ही कर रहा है और यही बात गीता भगवान भी कह रहे हैं समस्त कर्मों को करते हुए भी तू

1254
01:29:45,600 --> 01:29:49,600
मुझे करता जान और अगर हम किसी को मानते हैं अगर रामपाली को ले

1255
01:29:49,600 --> 01:29:53,680
लो ब्रह्मा कुमारी को ले लो। उनसे भी जब ये पूछा जाएगा कि सर्वाधार है कि नहीं

1256
01:29:53,680 --> 01:29:58,080
ईश्वर हर चीज का आधार है कि नहीं? अगर आप ईश्वर को सर्वाधार नहीं मानोगे

1257
01:29:58,080 --> 01:30:02,400
तो ईश्वर की सिद्धि ही नहीं हो पाएगी। तो आपको सर्वाधार मानना पड़ेगा

1258
01:30:02,400 --> 01:30:06,400
ईश्वर को। तो जब सर्वाधार ईश्वर है तो सब कुछ उससे ही तो निकल रहा है। जिसको

1259
01:30:06,400 --> 01:30:10,480
आप अच्छा मान रहे हो। अच्छा या बुरा जो भी कुछ है उससे ही निकल रहा है। वो बात

1260
01:30:10,480 --> 01:30:14,640
और है कि आप अच्छे आपके लिए कुछ अच्छा और कुछ बुरा हो सकता है। परंतु ईश्वर

1261
01:30:14,640 --> 01:30:18,880
के लिए नहीं। तो इसलिए ईश्वर उनसे प्रभावित नहीं होता। तो ईश्वर

1262
01:30:18,880 --> 01:30:22,880
यहां पर अपनी सामर्थ्य का और अपने बंधन मुक्त होने का प्रस्तुति भी दे

1263
01:30:22,880 --> 01:30:24,240
देते हैं इस प्रकार की लीलाओं

1264
01:30:24,240 --> 01:30:28,320
से कि मैं किसी भी प्रकार के कर्मों में लिप्त नहीं हूं और ना

1265
01:30:28,320 --> 01:30:32,320
ही मुझे कुछ पाना शेष है। जैसे कि भगवत गीता भगवान श्री कृष्ण ने

1266
01:30:32,320 --> 01:30:37,600
कहा कि मुझे भी कोई भी अप्राप्त वस्तु नहीं है जिसको मुझे पाना है।

1267
01:30:37,600 --> 01:30:41,760
तो तो यह भगवान यह जो समस्त जितनी भी इस प्रकार

1268
01:30:41,760 --> 01:30:45,920
की लीलाएं होती है जो प्रतीकात्मक व्याख्या होती है आदि दैविक आदिक भौतिक और आध्यात्मिक

1269
01:30:45,920 --> 01:30:49,920
अर्थों वाली इन सब लीलाओं में एक मोती पिरा हुआ पिरोया

1270
01:30:49,920 --> 01:30:54,640
गया है वो मोती क्या है ईश्वर ही सर्वाधार

1271
01:30:54,640 --> 01:30:59,120
है समस्त करने वाले कर्मों को करने वाले होते हुए भी वह अकर्ता

1272
01:30:59,120 --> 01:31:03,120
है ईश्वर सर्वशक्तिमान है ईश्वर वो है जो किसी

1273
01:31:03,120 --> 01:31:07,520
भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है बल्कि सभी नियम सर्व निय नियामक

1274
01:31:07,520 --> 01:31:11,520
है। ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। तो इस प्रकार से इस प्रकार

1275
01:31:11,520 --> 01:31:15,600
की लीलाओं में गुथे हुए गुण अर्थों को प्रकट करते हुए ईश्वर अपनी सर्व

1276
01:31:15,600 --> 01:31:19,760
सामर्थ्यता और बंधन से मुक्त होने की स्थिति

1277
01:31:19,760 --> 01:31:24,240
को भी प्रदर्शित कर देते हैं। ठीक है?

1278
01:31:24,240 --> 01:31:28,560
अब यहां पर आचार्य श्री एक बात कह रहे हैं कि प्रश्न

1279
01:31:28,560 --> 01:31:33,040
हो सकता है कि आखिर श्री वेदव्यास जी ने विमिश्रण

1280
01:31:33,040 --> 01:31:37,200
का यह गड़बड़ झाला किया क्यों है? ठीक है? तो इस पर उन्होंने आगे

1281
01:31:37,200 --> 01:31:39,360
बताया है कि सर्वसाधारण जो

1282
01:31:39,360 --> 01:31:43,440
शास्त्र के प्रति एक खोजी बुद्धि अनुसंधयात्मक बुद्धि

1283
01:31:43,440 --> 01:31:47,520
आपकी बनी रहे रुचिकर बने आपके लिए शास्त्र और शास्त्रों में बुद्धि प्रवर्त

1284
01:31:47,520 --> 01:31:51,680
हो उनके मन उनका मनन चिंतन हो और उनके गुण अर्थों के प्रति

1285
01:31:51,680 --> 01:31:55,760
उनकी जो सौंदर्यता जब वो निकल के आए जैसे गणित का कोई सवाल होता है ना

1286
01:31:55,760 --> 01:32:00,320
आप कभी भी देखना जब उसको आप सुलझा रहे होते हैं और जब वो निकल के आता है ना तो

1287
01:32:00,320 --> 01:32:04,320
जो आपको सुख की एक प्राप्त गणित के प्रति रुचि बनती है एक उसी प्रकार

1288
01:32:04,320 --> 01:32:08,320
से जब इन शास्त्रों का गुरु गुरु चरणों में बैठकर के इस प्रकार से अर्थ प्राप्त होता

1289
01:32:08,320 --> 01:32:12,320
है तो उसके प्रति एक रुचि बनती है। उस रुचि के कारण आप उन शास्त्रों

1290
01:32:12,320 --> 01:32:16,480
को पढ़ते हैं और जितना ज्यादा पढ़ते जाते हैं उतना ज्यादा आप बंधन से मुक्ति की

1291
01:32:16,480 --> 01:32:22,480
ओर आगे बढ़ते हैं। ठीक है? अब

1292
01:32:23,120 --> 01:32:27,120
यह सारी बातें तो एक तरफ हो गई। अब बात करते हैं कि

1293
01:32:27,120 --> 01:32:31,200
गुरु गीता में कहा गया है कि मनुष्य चाहे चारों

1294
01:32:31,200 --> 01:32:36,000
वेद पढ़ ले, सारे पुराण पढ़ ले, सारे उपनिषद पढ़ ले, जप तप,

1295
01:32:36,000 --> 01:32:40,560
यज्ञ, दान, कर्म इत्यादि जितने भी हैं वो सब व्यर्थ हैं।

1296
01:32:40,560 --> 01:32:45,520
यदि उसका कोई प्रामाणिक गुरु नहीं है। तो

1297
01:32:45,520 --> 01:32:49,520
भाई आप पुराण को नहीं मानते कोई बात

1298
01:32:49,520 --> 01:32:53,680
नहीं। मगर जिन पुराणों की किसी घटना के आधार पर आप पुराण पर आक्षेप

1299
01:32:53,680 --> 01:32:57,680
लगा रहे हो या हिंदुओं के आराध्य देवी देवता हैं उन उन पर

1300
01:32:57,680 --> 01:33:02,080
आक्षेप लगा रहे हो शीलता भरा कुछ भी आप बोल रहे हो जो मनगढ़ंत बातें उनहीं पुराणों

1301
01:33:02,080 --> 01:33:06,160
में यह भी तो लिखा है कि इनको आपको

1302
01:33:06,160 --> 01:33:10,240
गुरु से समझना है और जब आप गुरु से समझोगे और किस गुरु से समझना है ये

1303
01:33:10,240 --> 01:33:14,320
भी लिखा है तो उनकी बात को समझने के लिए तो आपको गुरु के पास ही

1304
01:33:14,320 --> 01:33:18,640
जाना होगा ना फिर और जिस प्रकार का गुरु वो बता रहे हैं उस प्रकार के गुरु के पास जाना होगा

1305
01:33:18,640 --> 01:33:22,880
अपनी चीजों को आप मत समझो जिनमें आपकी आस्था है और

1306
01:33:22,880 --> 01:33:26,880
एक तरफा रूप से स्वतंत्र हो के आप कर रहे हो वो बात की आपका सिद्धांत पुष्ट होता

1307
01:33:26,880 --> 01:33:31,040
है कि नहीं मगर आप इन शास्त्रों को अंतत गतवा ये बात आ जाती है

1308
01:33:31,040 --> 01:33:35,120
भाई ठीक है ये सब लिखा है हम नहीं समझ पा रहे तो हम तो वही समझेंगे जो हमें समझ में आ रहा है

1309
01:33:35,120 --> 01:33:38,160
तो उनहीं शास्त्रों में यह भी लिखा है कि इन शास्त्रों को खुद

1310
01:33:38,160 --> 01:33:42,240
से मत पढ़ो गुरु के बिना ये शास्त्र आपको भटका सकते हैं।

1311
01:33:42,240 --> 01:33:48,240
भ्रम फैला सकते हैं। भ्रांति में डाल सकते हैं। कहां कहा गया बता दे रहा हूं।

1312
01:34:07,200 --> 01:34:13,200
हम

1313
01:34:31,920 --> 01:34:37,920
तो स्कंद पुराणोक्त गुरु गीता है।

1314
01:34:39,840 --> 01:34:43,840
उसमें यह सब बातें हैं। और गुरु के बारे में

1315
01:34:43,840 --> 01:34:49,840
भी जगह जगह पर बातें स्पष्ट रूप से की गई हैं।

1316
01:34:55,440 --> 01:34:59,440
यह देखिए स्कंद पुराणोक्त गुरु गीता 19

1317
01:34:59,440 --> 01:35:03,920
20 21 में क्या लिखा है? वेद शास्त्र पुराण आदि मंत्र

1318
01:35:03,920 --> 01:35:08,080
यंत्र मोहन उच्चाटन आदि विद्या शैव शास्त्र और अन्य सभी मत मतांतर यह

1319
01:35:08,080 --> 01:35:12,160
सभी बातें गुरु तत्व को जाने बिना भ्रांति भ्रांतित में

1320
01:35:12,160 --> 01:35:16,240
भ्रांतित वालों का पथ भ्रष्ट करने वाली हैं और गुरु के बिना

1321
01:35:16,240 --> 01:35:20,720
जप तप व्रत तीर्थ दान यज्ञ यह सब व्यर्थ हो जाते हैं।

1322
01:35:20,720 --> 01:35:24,880
स्कंद पुराणोक्त गुरु गीता 98वा श्लोक

1323
01:35:24,880 --> 01:35:29,200
मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले वेदों के छह अंग पढ़ ले अध्यात्म शास्त्र

1324
01:35:29,200 --> 01:35:33,360
पढ़ ले आदि सभी शास्त्र पढ़ ले फिर भी गुरु के बिना

1325
01:35:33,360 --> 01:35:37,440
ज्ञान नहीं मिलता गुरु कृपा से सब संशय नष्ट

1326
01:35:37,440 --> 01:35:41,600
हो जाते हैं गुरु गीता 191 और भगवत गीता 440 क्या

1327
01:35:41,600 --> 01:35:45,680
कह रही है संशय आत्मा विनश्यति देखिए भगवत गीता 440 कह

1328
01:35:45,680 --> 01:35:47,120
रही है संशय से आपका विनाश

1329
01:35:47,120 --> 01:35:51,200
होगा ना तो इस लोक में सुखी रह पाओगे परलोक की तो बात तो आपके मन में

1330
01:35:51,200 --> 01:35:55,440
संशय है। संशय को काटेगा कौन? गुरु। तो जिन पुराणों पुराण

1331
01:35:55,440 --> 01:35:59,520
शास्त्रों के आधार पर आप पुराणों की घटनाओं पर आक्षेप

1332
01:35:59,520 --> 01:36:04,240
लगा रहे हैं। आप पुराणों में वर्णित जो दय चरित्र उन पर उंगली उठा रहे हैं।

1333
01:36:04,240 --> 01:36:08,400
उन्हीं पुराण शास्त्रों में उनको समझने के लिए गुरु के पास जाने को कहा गया

1334
01:36:08,400 --> 01:36:13,200
है। क्या आप गए गुरु के पास? अब आप कहोगे कि नहीं नहीं हम तो अपने

1335
01:36:13,200 --> 01:36:17,360
रामपाल के पास गए थे। रामपाल को कितना ज्ञान है वो तो ठीक है। कभी

1336
01:36:17,360 --> 01:36:21,360
उससे सामना होगा तब पता चलेगा। फिलहाल गुरु की चीजें बताई गई

1337
01:36:21,360 --> 01:36:25,360
है। स्पष्ट है कि गुरु किसे बनाना है। तो गुरु किसे बनाना है?

1338
01:36:25,360 --> 01:36:29,920
यह तो मुझे मौखिक रूप से ही वो हो गया है। अथर्ववेद

1339
01:36:29,920 --> 01:36:34,080
11 पांच 16 ब्रह्मचारी ही आचार्य बनता है। मनुस्मृति

1340
01:36:34,080 --> 01:36:38,080
12वा अध्याय 112 से 114 धर्म में

1341
01:36:38,080 --> 01:36:42,240
संशय होने पर अधिष्ठाता ब्रह्मचारी को बनाएं।

1342
01:36:42,240 --> 01:36:46,640
और भगवत गीता में आप देख लीजिए तत्व ज्ञान बताने वाले को बार-बार बार-बार

1343
01:36:46,640 --> 01:36:50,720
विरक्त कहा गया है। वैराग्य कहा गया है। वैराग्य रूपी हथियार से

1344
01:36:50,720 --> 01:36:54,800
वैराग्य रूपी शस्त्र से वो संसार रूपी जो वृक्ष

1345
01:36:54,800 --> 01:36:58,800
है प्रपंच रूपी वृक्ष है उसकी जड़ को काट डालता है। वैराग्य

1346
01:36:58,800 --> 01:37:02,160
से तो यानी कि लक्षण क्या है गुरु का कि वो

1347
01:37:02,160 --> 01:37:06,160
विरक्त होना चाहिए। दूसरा क्या है कि

1348
01:37:06,160 --> 01:37:10,080
मुंडकोपनिषद में

1349
01:37:10,080 --> 01:37:16,080
दिखा ही देता हूं। मुंडकोपनिषद

1350
01:37:16,320 --> 01:37:20,320
छंदोक उपनिषद में कह रहे हैं। छंदोक उपनिषद में छठव अध्याय में कहा जा

1351
01:37:20,320 --> 01:37:24,400
रहा है कि यह विद्या यह गुरुगम्य विद्या है। आचार्य

1352
01:37:24,400 --> 01:37:28,480
चरणों में बैठकर ही प्राप्त होती है। यानी कि निर्देश

1353
01:37:28,480 --> 01:37:32,480
दिए जा रहे हैं गुरु के सानिध्य में जाकर इसको प्राप्त

1354
01:37:32,480 --> 01:37:38,480
करने के। अब मैं वो दिखा दूं आपको मुंडकोपनिषद।

1355
01:37:38,480 --> 01:37:43,040
मुंडकोपनिषद में जो ऋषि हैं वह अपनी परंपरा

1356
01:37:43,040 --> 01:37:47,280
बता रहे हैं। यानी गुरु का लक्षण क्या हुआ कि विरक्त होना चाहिए।

1357
01:37:47,280 --> 01:37:51,360
गुरु की प्रामाणिकता क्या हुई कि वो परंपरा से होना चाहिए। ऐसे नहीं मन मुखी कोई

1358
01:37:51,360 --> 01:37:57,360
भी अपने आप को गुरु कहने लगे। परंपरा से होना चाहिए।

1359
01:38:05,120 --> 01:38:07,280
मुंडकोपनिषद

1360
01:38:07,280 --> 01:38:13,280
443

1361
01:38:13,600 --> 01:38:16,560
ये देखिए

1362
01:38:16,560 --> 01:38:22,240
आचार्य परंपरा मुंडकोपनिषद

1363
01:38:22,240 --> 01:38:26,480
तो [गला साफ़ करने की आवाज़] संपूर्ण देवताओं में पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुए

1364
01:38:26,480 --> 01:38:30,560
वह विश्व के रचयिता और त्र केक

1365
01:38:30,560 --> 01:38:34,720
थे। उन्होंने अपने जेष्ठ पुत्र अथवा को समस्त

1366
01:38:34,720 --> 01:38:39,600
विद्याओं की आश्रयभूत ब्रह्म विद्या का उपदेश किया। ऋषि गण अपने

1367
01:38:39,600 --> 01:38:44,000
जो ये दय जो विभूतियां है वो अपनी परंपरा

1368
01:38:44,000 --> 01:38:48,480
बता रही है। मगर आजकल क्या हो गया कि कोई भी व्यक्ति उठ खड़ा होता है

1369
01:38:48,480 --> 01:38:52,480
और खुद को जो है स्वयंभू गुरु बन जाता है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि

1370
01:38:52,480 --> 01:38:56,480
इन मंत्रों का क्या करेंगे? क्या व्यर्थ में लिखे गए ये

1371
01:38:56,480 --> 01:39:01,440
मंत्र? यह हमको वर्णन व्यर्थ में दिया है उपनिषदों में।

1372
01:39:01,440 --> 01:39:05,520
क्यों बता रहे हैं यहां पर यह लोग अपनी परंपरा अथर्व को ब्रह्मा जी ने

1373
01:39:05,520 --> 01:39:10,720
ब्रह्मा ने जिसका उपदेश किया था वह ब्रह्म विद्या पूर्व काल में अथवा ने अंगी को सिखाई।

1374
01:39:10,720 --> 01:39:14,960
अंगी ने उस उसे भरद्वाज के पुत्र सत्यवाह से कहा

1375
01:39:14,960 --> 01:39:19,120
तथा भरद्वाज पुत्र सत्यवाह ने इस प्रकार श्रेष्ठ से

1376
01:39:19,120 --> 01:39:20,160
कनिष्ठ को प्राप्त

1377
01:39:20,160 --> 01:39:25,520
होती हुई वह विद्या अंगिरा से कही। इस तरह से

1378
01:39:25,520 --> 01:39:30,800
यह दय विभूतियां अपनी परंपरा बता रही है।

1379
01:39:30,800 --> 01:39:34,800
शौनक नामक प्रसिद्ध महागस्थ ने अंगीरा के पास विधि

1380
01:39:34,800 --> 01:39:40,800
पूर्वक जाकर फिर उनसे आगे ज्ञान लिया।

1381
01:39:42,080 --> 01:39:46,480
ठीक है? तो यानी कि प्रामाणिकता क्या है? परंपरा।

1382
01:39:46,480 --> 01:39:50,880
भगवत गीता चार दो में भी कहा जा रहा है कि ज्ञान

1383
01:39:50,880 --> 01:39:54,960
परंपरा से प्राप्त होने की बात कही जा रही है और पुराणों में तो भरभर के है बहुत

1384
01:39:54,960 --> 01:39:59,040
जगह पर है मैं शिव पुराण का एक उदाहरण दे देता हूं आपको संभता मिल

1385
01:39:59,040 --> 01:40:05,040
जाए मुझे बहुत दिन पहले देखा था

1386
01:40:08,480 --> 01:40:13,620
अगर मिल जाता है तो बताता हूं शिव पुराण का उदाहरण

1387
01:40:13,620 --> 01:40:18,160
[गला साफ़ करने की आवाज़]

1388
01:40:18,160 --> 01:40:24,160
सीधी सी बात है ना भाई कि वो जिनसे कह रहे हैं उनसे उन्हें समझ लो आप।

1389
01:40:40,880 --> 01:40:44,080
नहीं अभी वो

1390
01:40:44,080 --> 01:40:48,320
मैंने पढ़ा था पर वो एग्जैक्ट कहां देर लग जाएगी ढूंढने में। खैर भगवत

1391
01:40:48,320 --> 01:40:52,400
गीता चार दो में परंपरा की बात हो रही है। आचार्य यास्क ने

1392
01:40:52,400 --> 01:40:56,720
परंपरा से कहा है कि परंपरा से मुझे ज्ञान विज्ञान प्राप्त हुआ है जो मैं बता रहा हूं।

1393
01:40:56,720 --> 01:41:01,760
भगवत गीता 36 में बात हो रही है कि जो अह

1394
01:41:01,760 --> 01:41:05,920
कालचक्र से जो प्रसिद्ध है ज्ञान विज्ञान यानी परंपरा

1395
01:41:05,920 --> 01:41:09,920
से उसमें जो प्रवर्त होता है उसका जो अनुसंधान करता है उसका जो आलंबन

1396
01:41:09,920 --> 01:41:14,000
लेता है वही सुख प्राप्त कर पाता है। इसी प्रकार से भगवत गीता में एक जगह जो

1397
01:41:14,000 --> 01:41:18,080
है जो हमारे परंपरा से पूर्वज जो करते चले आ रहे हैं जिस ज्ञान का प्रभाव उसी

1398
01:41:18,080 --> 01:41:22,560
को आगे बढ़ाता है लेकर आगे चलता है। तो वही

1399
01:41:22,560 --> 01:41:23,520
उसका अभीष्ट फल

1400
01:41:23,520 --> 01:41:27,680
प्राप्त कर पाता है। इस प्रकार से अनेकानेक जगहों पर प्रकरंतर

1401
01:41:27,680 --> 01:41:31,840
प्रकरणांतर भेद से परंपरा पर प्रकाश डाला गया है। तो

1402
01:41:31,840 --> 01:41:36,240
गुरु वही जो परंपरा से हो गुरु के लक्षण वो विरक्त हो।

1403
01:41:36,240 --> 01:41:40,320
फिर तीसरा कि श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा दे। जैसे

1404
01:41:40,320 --> 01:41:44,400
अभी मैंने आपको बताया कि वेदों में भी वो बात है। पुराणों में भी वो बात है। एक

1405
01:41:44,400 --> 01:41:48,560
ही स्त्रोत से दोनों चीजें हमें प्राप्त हो रही है। उनहीं आचार्यों से वेद प्राप्त हुए। उनहीं

1406
01:41:48,560 --> 01:41:52,560
आचार्यों से पुराण प्राप्त हुए। मगर कोई व्यक्ति क्या कर रहा है कि वेद को तो प्रमाण

1407
01:41:52,560 --> 01:41:56,560
मान रहा है। पुराण को प्रमाण नहीं मान रहा। जो व्यक्ति आपको ये दोनों शास्त्र दे

1408
01:41:56,560 --> 01:42:00,640
रहा है। अगर वह पुराण झूठे दे सकता है तो वेद भी तो झूठे दे सकता

1409
01:42:00,640 --> 01:42:04,720
है। पर आप अपने मन से कुछ भी कर रहे हो। खैर कोई बात नहीं। लोकतंत्र कर सकते हो।

1410
01:42:04,720 --> 01:42:08,800
सबको अधिकार है। मगर मगर क्या

1411
01:42:08,800 --> 01:42:13,760
है कि जो आचार्य वास्तविक वही जो

1412
01:42:13,760 --> 01:42:17,760
प्रामाणिक शास्त्र में प्राप्त हुए हैं परंपरा से उनमें भेद बुद्धि ना

1413
01:42:17,760 --> 01:42:21,760
रख के उनमें सामंजस्य रूपी ज्ञान दे। ऐसा ना हो

1414
01:42:21,760 --> 01:42:25,760
कि हमारे हमने इस ग्रंथ के वाक्य को परस्पर विरोधी वाक्य दिख रहे

1415
01:42:25,760 --> 01:42:29,760
हैं तो हमने इसको ले लिया। उसको उसको त्याग दिया। नहीं नहीं यह गलत है।

1416
01:42:29,760 --> 01:42:33,760
अगर हम यह करेंगे तो हमने उसका विरोध कर दिया। उसका विरोध कर दिया तो उसको देने वाले का

1417
01:42:33,760 --> 01:42:37,920
विरोध कर दिया। देने वाले का विरोध कर दिया तो देने वाले के द्वारा दूसरी दी गई चीज

1418
01:42:37,920 --> 01:42:38,640
जिसको हम प्रमाण

1419
01:42:38,640 --> 01:42:42,720
मान रहे हैं उसका भी विरोध कर दिया। ठीक है? तो इस प्रकार से सामंजस्य

1420
01:42:42,720 --> 01:42:46,880
की शिक्षा दे वो गुरु है। और इसका इसके

1421
01:42:46,880 --> 01:42:50,960
लिए प्रमाण ले सकते हैं। न्याय जो वो है न्याय शास्त्र वहां से अर्ध कुकुट

1422
01:42:50,960 --> 01:42:55,520
न्याय के लिए मना किया गया। दोष है अर्ध कुकुट न्याय करना। और एक है

1423
01:42:55,520 --> 01:42:59,680
मत्स्य पुराण 152वा अध्याय 45वा श्लोक श्रोत

1424
01:42:59,680 --> 01:43:03,840
स्मार्थ जो धर्म है उनमें सामंजस्य से जो धर्म हमें प्राप्त होता है वो साधु

1425
01:43:03,840 --> 01:43:08,160
सम्मत धर्म ठीक है तो यह हो गया और अंतत

1426
01:43:08,160 --> 01:43:12,240
गत्वा गुरु कौन गु का मतलब अंधकार अद्वतार का उपनिषद रू का

1427
01:43:12,240 --> 01:43:16,480
मतलब निकालने वाला अंधकार से निकालने वाला चार पांच

1428
01:43:16,480 --> 01:43:20,640
तात्विक प्रश्न पूछ लिए जाएंगे ना रामपाल से उसका बिल्कुल कचूमर

1429
01:43:20,640 --> 01:43:24,720
निकल जाएगा भेजे का ऐसे जो तात्विक प्रश्न जो सब

1430
01:43:24,720 --> 01:43:28,800
बातें किया करते हैं ना आर्य समाज आर्य समाज वाले तो बहुत बहुत आगे रामपाल से

1431
01:43:28,800 --> 01:43:32,800
बहुत आगे हैं तो यह सब जो यह तात्विक बातें होती है

1432
01:43:32,800 --> 01:43:36,800
ना ये सब बातें उसके सामने उसको जो है ग्लूकोस की बोतल चढ़वानी पड़

1433
01:43:36,800 --> 01:43:40,880
जाएंगी रामपाल को देखा है ना जितनी बार बात हुई है उतनी बार बिल्कुल

1434
01:43:40,880 --> 01:43:45,360
100 की स्पीड में वापस हो गए पवन दास बहुत बड़ा चेला था

1435
01:43:45,360 --> 01:43:49,520
रामपाल का पवन दास जो है जब उससे

1436
01:43:49,520 --> 01:43:53,520
पूछा मैंने कि कंधे के इधर क्या है कबीर के कंधे के उधर क्या है किसने बनाया

1437
01:43:53,520 --> 01:43:54,400
बस

1438
01:43:54,400 --> 01:43:58,400
मैं तो आग में कूद के दिखा दूंगा जिसका अगर मेरा गुरु

1439
01:43:58,400 --> 01:44:02,800
सत्य होगा तो मैं बच जाऊंगा। यह सब बातें करने लगा। तो बच जाओ ना भाई।

1440
01:44:02,800 --> 01:44:06,880
फिर ये कहना बंद करो ना हम तो वेदों से दिखा रहे हैं। आग से दिखा रहे हैं। बोलो आग

1441
01:44:06,880 --> 01:44:10,960
में प्रमाण है। और कबीर भगवान है आग में प्रमाण है। रामपाल

1442
01:44:10,960 --> 01:44:16,560
भगवान है। ये सब बोलो। हमको हम रोकने आ रहे हैं क्या? अच्छा

1443
01:44:16,560 --> 01:44:20,560
तो गुरु वही जो आपके अज्ञानता रूपी अंधकार को नष्ट कर

1444
01:44:20,560 --> 01:44:24,720
दे। यह सारी बातें मैंने ब्रह्मा सरस्वती

1445
01:44:24,720 --> 01:44:28,800
विवाह का उदाहरण देकर के बहुत सारी चीजें आपको बताई आज और थोड़ा सा डिफरेंट

1446
01:44:28,800 --> 01:44:33,840
टॉपिक पर आज का ये हुआ है। अब मैं आपको जाते-जाते एक

1447
01:44:33,840 --> 01:44:38,400
बोनस देता जा रहा हूं। वो भी आप ले लीजिए।

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01:44:38,400 --> 01:44:42,480
वो क्या है? बोनस के रूप में दो चीजें हैं। बहुत ज्यादा

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01:44:42,480 --> 01:44:46,480
समय नहीं लूंगा। मुझे मालूम है आप लोगों का काफी समय ले लिया है। बोनस

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01:44:46,480 --> 01:44:50,640
में पहली चीज है कि अब मैं आपको लिंग शब्द के बारे में

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शिव पुराण में क्या लिखा हुआ है वह बता रहा हूं। तो शिव

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01:44:54,880 --> 01:44:59,760
पुराण विदेश्वरी समिता 16 106

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01:44:59,760 --> 01:45:03,840
तो लिंग शब्द का ही एक अर्थ क्या और लिया गया है जो

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01:45:03,840 --> 01:45:08,080
हमें वहां पर लेना चाहिए वो यहां पर बताया गया है।

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01:45:08,080 --> 01:45:09,760
लिंग का अर्थात

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01:45:09,760 --> 01:45:13,840
लीन अव्यक्तावस्थापन वस्तु के गमक

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01:45:13,840 --> 01:45:17,840
बताने वाले निशान को निशान को लिंग कहते हैं।

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01:45:17,840 --> 01:45:21,840
अब यहां पर ये जो निशान है ना प्रतीक चिन्ह मान लो अब इसको वहां वहां

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01:45:21,840 --> 01:45:25,840
पर फिट करो तो आपके जो आरोप है क्या सिद्ध हो पाएंगे जो आप लगाने चल

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01:45:25,840 --> 01:45:29,840
रहे हो और यह जो चीज है मैंने वहां से नहीं ली है मैं अपने मन

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से ले लिया लिंगार्थ ये शिव पुराण में लिखा हुआ है लिंगार्थ और

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01:45:33,840 --> 01:45:38,240
इसी प्रकार से जो भग यानी जो स्त्री का

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01:45:38,240 --> 01:45:42,240
स्त्री स्त्री का जो गुप्त होती है उसकी बात

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01:45:42,240 --> 01:45:46,320
है तो वहां क्या है भग का अर्थ क्या लिया है शिव पुराण में विद्युसरी

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01:45:46,320 --> 01:45:51,440
समिता 16 106 वह है भि

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01:45:51,440 --> 01:45:55,760
प्राप्त होने वाली वस्तु को भग कहते हैं। वृद्धि को प्राप्त होने वाली वस्तु

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01:45:55,760 --> 01:45:59,920
को भग कहते हैं। जिसका अर्थ है प्रकृति। ठीक

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01:45:59,920 --> 01:46:04,160
है? तो लिंग का और भग का दोनों का हो गया। अब इन दोनों को आप वहां जाकर सेट

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01:46:04,160 --> 01:46:08,160
करो। और इसी तरीके से जो अंडकोष है अब ये अंडकोष क्या?

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01:46:08,160 --> 01:46:12,400
अंडपिंड ब्रह्मांड। ब्रह्मांड में भी आया ना अंड

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शब्द। तो ये सारी चीजें प्रतीकात्मक व्याख्या किस रूप से लेनी ये

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01:46:16,400 --> 01:46:20,400
आपको गुरु चरणों से प्राप्त होगा। आप लगे मगमखौल उड़ाने और फिर अब

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01:46:20,400 --> 01:46:24,400
जो सेना जा रही है वह पता नहीं क्या वहां पर करेगी। इस तरीके से हमारा पक्ष रख

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01:46:24,400 --> 01:46:25,040
पाएगी

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01:46:25,040 --> 01:46:29,120
पुराणों में आस्थावान लोगों का कि नहीं रख पाएगी मुझे नहीं ज्ञात है पर मैं

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01:46:29,120 --> 01:46:33,200
अपेक्षा करूंगा और निवेदन करूंगा प्रार्थना करूंगा कि जो

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01:46:33,200 --> 01:46:37,440
लोग इस तरह का अभियान चला रहे हैं उससे जुड़ रहे हैं तो वो वहां

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01:46:37,440 --> 01:46:41,440
पर हमारे पक्ष को इसी तरीके से प्रस्तुत करें और हां एक दूसरा

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01:46:41,440 --> 01:46:45,760
टॉपअप और था मैं भूल गया था वह भी देता चलूं कि गरीब

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01:46:45,760 --> 01:46:49,840
दास की वाणी में क्या लिखा हुआ है मेरे पास कल

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01:46:49,840 --> 01:46:55,840
ही आया था वह मामला

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01:47:02,000 --> 01:47:08,000
जाइएगा नहीं बहुत जरूरी चीज बताने जा रहा हूं।

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01:47:12,320 --> 01:47:18,320
गरीब दास की वाणी में कुछ भड़वाहड़वा ये सब लिखा हुआ है।

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01:47:28,320 --> 01:47:34,320
अपनी जीवा को भी दूषित करना पड़ता है।

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01:47:46,320 --> 01:47:50,480
ये देखिए। अरे मैं पढ़ तो नहीं सकता हूं। मैं

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01:47:50,480 --> 01:47:56,480
एक काम करता हूं। मैं ऑपरेटर को भेजता हूं। वह जरा यहां प्रदर्शित कर दें इसे।

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01:48:00,480 --> 01:48:05,040
गरीब दास जी के ग्रंथ में पेज नंबर 710

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01:48:05,040 --> 01:48:09,680
और 722 पर देखिए क्या लिखा हुआ है। देखते हैं।

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01:48:09,680 --> 01:48:13,680
मैं जरा उनको ऑपरेटर को भेज रहा हूं। ऑपरेटर जी जरा ये 710 नंबर का पेज

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01:48:13,680 --> 01:48:19,520
यहां पर शो कर दीजिए। गरीब दास वाणी

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01:48:19,520 --> 01:48:25,520
710 और 722 जी ऑपरेटर जी

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01:48:25,530 --> 01:48:31,530
[गहरी सांस लेने की आवाज़]

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01:48:33,600 --> 01:48:37,840
गरीब दास के ग्रंथ में क्या लिखा है वो भी लेते चलो।

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01:48:37,840 --> 01:48:41,840
वो बात ऐसी है ना कि

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01:48:41,840 --> 01:48:46,000
मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर में। कितनी बार कहा है पर समझ

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01:48:46,000 --> 01:48:51,120
नहीं पाते मूर्ख।

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01:48:51,120 --> 01:48:57,120
ऑपरेटर जी हैं। यहां पर उपलब्ध हैं।

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01:49:01,560 --> 01:49:05,760
[नाक से की जाने वाली आवाज़] शब्द ऐसे हैं कि मैं बोलकर भी नहीं बता सकता। इसलिए ऑपरेटर जी

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01:49:05,760 --> 01:49:11,760
से मेरा प्रार्थना है कि वो इसको दिखा दें यहां पर।

1500
01:49:45,520 --> 01:49:49,520
तो ऑपरेटर जी अभी उपलब्ध नहीं है पर मैं आपको पढ़ के बताने का प्रयास

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01:49:49,520 --> 01:49:55,520
करता हूं।

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01:50:05,100 --> 01:50:11,100
[गला साफ़ करने की आवाज़]

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01:50:36,880 --> 01:50:40,800
ये गरीब दास वाणी में

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01:50:40,800 --> 01:50:44,800
710 है देखिए 90 है। यह लिखा

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01:50:44,800 --> 01:50:50,800
हुआ है। आप लोग पढ़ पाए तो शायद कैसे दिखाऊं?

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01:50:51,040 --> 01:50:57,040
चलिए इसको फिर कभी दिखाऊंगा मैं।

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01:51:00,400 --> 01:51:05,840
बेटी के बाद वह शब्द लिखा हुआ है बहन के।

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01:51:05,840 --> 01:51:11,040
फिर वो वहां गुप्तांक का नाम दिया गया है। इस तरीके से

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01:51:11,040 --> 01:51:15,040
710 पेज है। इससे ऊपर से मैं थोड़ा

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01:51:15,040 --> 01:51:19,040
पढ़ देता हूं।

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01:51:19,040 --> 01:51:23,040
मार पड़ेगी जम के द्वारा। हंसी आ जाएगी आपको। ये पढ़ के।

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01:51:23,040 --> 01:51:27,120
खैर इसका मैं लिंक डाल दूंगा यहां पर। लिंक दे दूंगा तो

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01:51:27,120 --> 01:51:31,120
आप जो है इसको पढ़कर देख लीजिएगा इनके गरीब दास के गरीब दास

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01:51:31,120 --> 01:51:35,200
का जो ग्रंथ है उसमें क्या लिखा है बेटी बोलने

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01:51:35,200 --> 01:51:41,200
में भी ठीक नहीं है चलिए ठीक है तो आज के लिए बहुत कुछ

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01:51:41,200 --> 01:51:43,680
अ

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01:51:43,680 --> 01:51:47,680
हमने बताया है काफी आवश्यक जानकारी

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01:51:47,680 --> 01:51:51,760
आपको मिली होगी आशा करते हैं आप सभी अपने धर्म में प्रवृत होंगे

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01:51:51,760 --> 01:51:56,480
और नाम जप हमेशा करते रह नाम जप सवा घंटे का अवश्य गुरुदेव

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01:51:56,480 --> 01:52:00,560
पूरी के शंकराचार्य जग गुरु शंकराचार्य जी सदैव बताते हैं। तो आप

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01:52:00,560 --> 01:52:04,800
लोग नाम जप अवश्य करें जिससे कि यह जो विपरीत स्थितियां

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01:52:04,800 --> 01:52:08,880
हैं इनसे संघर्ष करने का बल आपको प्राप्त

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01:52:08,880 --> 01:52:13,360
हो। और बाकी जितने

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01:52:13,360 --> 01:52:15,600
भी विरोधी तत्व हैं उनको फिर से मैं कहूंगा एक

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01:52:15,600 --> 01:52:19,680
बार कि मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं

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01:52:19,680 --> 01:52:24,080
टक्कर में। और जिसने भी अपनी मां का दूध पिया हो विशेष

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01:52:24,080 --> 01:52:28,080
रूप से रामपाल ही गैंग जिसको भी लगता है कि रामपाल के पास ज्ञान

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है तत्व ज्ञान ठीक है वो आए सामना

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01:52:32,320 --> 01:52:36,480
करें अगर रामपाल घोषणा करेगा रामपाल स्वयं आएगा तो किसी मध्य

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01:52:36,480 --> 01:52:40,720
की जगह पर मिलेंगे वहां नहीं बरवाला वो सब नहीं बता दिया ना शॉर्ट

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01:52:40,720 --> 01:52:44,880
में रामपाल या रामपाल के द्वारा घोषित कोई व्यक्ति होगा

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01:52:44,880 --> 01:52:49,280
तो किसी मध्यस्थ स्थान में आ सकते हैं और यदि उसके बिना खुजली है

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01:52:49,280 --> 01:52:53,440
खुजली मिटानी मिटाना चाहते हो, दवाई चाहिए तो हमारे चैनल पर आकर हमसे

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01:52:53,440 --> 01:52:57,440
बात कर लो। ठीक है? ज्ञान चर्चा वगैरह जो भी करनी है

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कर लो। और यह जैसे अरुण कुमार जी हैं। अरुण कुमार जी इस वीडियो के

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01:53:01,520 --> 01:53:04,160
लास्ट में आपको

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01:53:04,160 --> 01:53:10,160
नंबर प्राप्त होगा। उस नंबर पर आप WhatsApp करें। WhatsApp करके

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01:53:10,560 --> 01:53:16,560
निश्चित होगी हमारी चर्चा और इसी तरीके से बैठकर के हम आमने सामने बात करेंगे।

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जय श्री राम। सभी का बहुत-बहुत आभार। जय श्री राम सभी को।

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[संगीत]
