1
00:00:01,780 --> 00:00:07,780
[संगीत]

2
00:00:09,160 --> 00:00:13,400
जय श्री राम सभी को काफी देर वेट करा दिया आज आधा

3
00:00:13,400 --> 00:00:18,160
घंटा हो गया ऑलमोस्ट

4
00:00:18,160 --> 00:00:22,400
कारण कार्य ज्यादा कार्य की अधिकता समय

5
00:00:22,400 --> 00:00:26,560
का भाव और अभी जस्ट

6
00:00:26,560 --> 00:00:32,560
आने से पहले ही भी कुछ चीजें

7
00:00:33,840 --> 00:00:38,160
जानने को मिली तो अभी हम लोग ना इनकी

8
00:00:38,160 --> 00:00:42,160
गरिमा गीता की का अध्ययन कर रहे थे

9
00:00:42,160 --> 00:00:47,400
उसका नाम जीजी के आप कह सकते शॉर्ट

10
00:00:47,400 --> 00:00:51,440
में मैं पंक्चुअल कभी नहीं बना पंक्चुअल देखिए वह

11
00:00:51,440 --> 00:00:55,720
एक्सपेक्टेड टाइम देते हैं कि 8:30 बजे आएंगे

12
00:00:55,720 --> 00:01:00,160
मगर अब आप ही का भाई हूं आप

13
00:01:00,160 --> 00:01:05,120
के बीच का व्यक्ति हूं बहुत कोशिश करता

14
00:01:05,120 --> 00:01:09,200
हूं अरे यार सभी लोग लेट लेट के लिए अच्छा

15
00:01:09,200 --> 00:01:13,480
आप पूरा प्रयास करेंगे कि समय पर आ जाए मगर बहुत

16
00:01:13,480 --> 00:01:17,960
जरूरी चीजें लाए आपको अंत तक इस बात का जो वो है ना

17
00:01:17,960 --> 00:01:22,320
अफसोस नहीं होगा कि मैं लेट क्यों आया यह मेरा प्रॉमिस है ठीक

18
00:01:22,320 --> 00:01:26,320
है यह वचन है कि आप लोग अगर आज की

19
00:01:26,320 --> 00:01:30,520
जानकारियों को देखेंगे तो अंत में कहेंगे कि ठीक है अगर यही मिलना है लेट आने

20
00:01:30,520 --> 00:01:35,840
से तो लेट ही सही

21
00:01:35,840 --> 00:01:38,040
हम

22
00:01:38,040 --> 00:01:40,200
जी

23
00:01:40,200 --> 00:01:44,440
तो हम लोग अध्ययन कर रहे हैं इनकी जो गरिमा गीता की

24
00:01:44,440 --> 00:01:48,560
है वह अपने आप में इतना उलझा

25
00:01:48,560 --> 00:01:54,560
देने वाली हालांकि इनके सारे ही ग्रंथ जो है वह ऐसे ही हैं

26
00:01:55,560 --> 00:02:00,000
मगर अगर आप इन ग्रंथों को इनके ग्रंथों को पकड़ लेंगे विशेष तौर

27
00:02:00,000 --> 00:02:04,200
जो मैंने अध्ययन किया गरिमा गीता की तो आपको इनकी

28
00:02:04,200 --> 00:02:08,440
बातों का प्रतिकार करने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता

29
00:02:08,440 --> 00:02:12,800
नहीं पड़ेगी उसी से मिल जाएगा सब कुछ मिल जाएगा आपको गरिमा

30
00:02:12,800 --> 00:02:16,800
गीता की तो मैंने कहा था कि हम काल

31
00:02:16,800 --> 00:02:20,800
के बारे में जरा ठीक से बात करेंगे है ना आज

32
00:02:20,800 --> 00:02:26,800
हम लोग काल के बारे में बात करने वाले हैं

33
00:02:27,280 --> 00:02:31,560
कि काल के लिए इनकी गीता में कहा क्या गया सबसे पहले

34
00:02:31,560 --> 00:02:36,040
तो हम यह समझ ले कि जो मैंने कल एक कंक्लूजन

35
00:02:36,040 --> 00:02:41,000
दिया था आपको कि इनका य जो इन्होंने सटर घट किया है ना शास्त्रों में

36
00:02:41,000 --> 00:02:45,040
जो इन्होंने खिचड़ी पकाई है हा यह

37
00:02:45,040 --> 00:02:49,760
ग्रंथ है गरिमा गीता की तो जो इन्होंने शास्त्रों

38
00:02:49,760 --> 00:02:54,720
में जोय खिचड़ी पकाई है ना उसमें

39
00:02:54,720 --> 00:02:58,760
कुछ ऐसा किया है कि यदि आप कुछ पढ़ने जाएंगे ना

40
00:02:58,760 --> 00:03:02,960
तो आपको लगेगा कि चीज तो गलत लिखी है अब उस चीज के लिए आप दूसरी जगह

41
00:03:02,960 --> 00:03:07,520
इन्होने कुछ दिया होगा रेफरेंस के यहां पर चेक करें अब वहां चक चेक करने जब जाएंगे

42
00:03:07,520 --> 00:03:11,480
तो वहां एक दूसरी चीज गलत मिल जाएगी

43
00:03:11,480 --> 00:03:15,680
आप वहां जब एक दूसरी चीज गलत मिल जाएगी तो वहां भी गलत चीज का रेफरेंस

44
00:03:15,680 --> 00:03:19,760
मिला मिल रहा होगा कि यहां से यहां देखिए तो जब वहां देखने जाएंगे तो वहां एक

45
00:03:19,760 --> 00:03:24,320
और तीसरी चीज आपको गलत मिल जाएगी हर पृष्ठ प आपको

46
00:03:24,320 --> 00:03:28,440
असहनीय पीड़ा होने वाली है अगर आपने इस बुक को पढ़ा तो जो

47
00:03:28,440 --> 00:03:32,760
भी आपके पास जो सर दर्द की दवाइयां हो कुछ भी हो औषधियां हो उसको

48
00:03:32,760 --> 00:03:37,320
लेके आसपास रख के और चक्कर आने की स्थिति में

49
00:03:37,320 --> 00:03:41,480
अपने किसी प्रियजन को आसपास में

50
00:03:41,480 --> 00:03:42,400
खड़ा करके मैं

51
00:03:42,400 --> 00:03:46,440
अब ये इनकी जो जीजी के नाम की जो

52
00:03:46,440 --> 00:03:51,320
पुस्तक है उसको पढ़ने जा रहा हूं और तब पढ़िए वरना आपको

53
00:03:51,320 --> 00:03:55,720
जो क्षति पहुंच सकती है है

54
00:03:55,720 --> 00:04:01,720
ना बहुत बहुत मनगण बातें है

55
00:04:02,480 --> 00:04:07,040
तो सबसे पहले बात करते हैं

56
00:04:07,040 --> 00:04:11,280
कि आज दो तीन चीजों पर बात करेंगे एक तो य मुख्य

57
00:04:11,280 --> 00:04:15,800
विषय तो यह है कि काल काल जो है

58
00:04:15,800 --> 00:04:19,920
वह अपना जो विराट रूप वो वाला जो काल साकार है कि निराकार

59
00:04:19,920 --> 00:04:24,000
है और उसकी उत्पत्ति और क्या

60
00:04:24,000 --> 00:04:28,080
है यह वेदों को क्यों मानते हैं वेदों की बात क्यों करते हैं जैसे कि कल हमने

61
00:04:28,080 --> 00:04:32,120
एक कंक्लूजन दिया वेदों की बात इसलिए करते हैं कि

62
00:04:32,120 --> 00:04:36,760
वेदों के नाम पर वेदों का अर्थ करते समय गीता का अर्थ करते समय

63
00:04:36,760 --> 00:04:41,040
यह आपको यह बता सके कि गीता को क्यों नहीं पढ़ना चाहिए

64
00:04:41,040 --> 00:04:46,880
गीता वेद को क्यों नहीं पढ़ना चाहिए क्यों नहीं मानना चाहिए

65
00:04:46,880 --> 00:04:51,240
और उसमें वर्णित जो पात्र है जो घटनाए हैं उनका गलत

66
00:04:51,240 --> 00:04:55,520
मतलब बुरा अर्थ कैसे है वो क्यों घटना है वो आपके लिए जो है

67
00:04:55,520 --> 00:04:59,680
ठीक नहीं है और जो जो उसके पात्र है जो उसमें जो भगवत

68
00:04:59,680 --> 00:05:04,120
रूप भगवत लीलाए दी गई है वो सब किस प्रकार से आपके लिए

69
00:05:04,120 --> 00:05:08,120
गलत है यह बताने के लिए य लोग वेद और गीता की बात करते

70
00:05:08,120 --> 00:05:13,320
हैं वस्तुतः इन्होंने जगह जगह कह दिया है कि

71
00:05:13,320 --> 00:05:17,520
जो वेदों की भक्ति है वेदों में जो भक्ति बताई

72
00:05:17,520 --> 00:05:22,120
गई है भक्ति का पथ बताया गया है वो जो है

73
00:05:22,120 --> 00:05:26,120
मुक्ति के लिए नहीं है वेदों में बताई गई जो पूजा पद्धति है वो मुक्ति के लिए

74
00:05:26,120 --> 00:05:31,040
नहीं है मैं आपको बता देता हूं कहां-कहां लिखा है इन्होंने

75
00:05:31,040 --> 00:05:35,080
39 नंबर का पेज निकालिए 39

76
00:05:35,080 --> 00:05:39,080
नहीं 90 हां 39

77
00:05:39,080 --> 00:05:45,080
निकाली 39 गरिमा गीता

78
00:05:47,120 --> 00:05:51,200
की जब मैं पेज नंबर बोलूंगा ना तो उसका मतलब है कि

79
00:05:51,200 --> 00:05:55,320
वो पीडीएफ के अंदर का जो पेज नंबर है वह निकालना है और जब मैं

80
00:05:55,320 --> 00:05:59,880
आपको बोलू कि कंप्यूटर पेज नंबर

81
00:05:59,880 --> 00:06:03,920
तो आपकी स्क्रीन का जो कंप्यूटर का नंबर दिया होता है उसका उसके अनुसार फिर

82
00:06:03,920 --> 00:06:08,120
कार्य करिएगा तो अभी आप जो है

83
00:06:08,120 --> 00:06:14,120
39 नंबर का पेज

84
00:06:18,720 --> 00:06:24,520
निकाले थोड़ा बड़ा कर दीजिए तो मैं देख

85
00:06:24,520 --> 00:06:30,520
सकूंगा जी जी बस बस हा 39

86
00:06:36,480 --> 00:06:39,760
32 निकला और आगे

87
00:06:39,760 --> 00:06:43,880
चलिए तेजी से च चार पाच पेज

88
00:06:43,880 --> 00:06:48,640
बस बस आ गया आ गया आ गया आय

89
00:06:48,640 --> 00:06:53,600
इसमें थर्ड पैराग्राफ है

90
00:06:53,600 --> 00:06:57,880
कि मुझ ब्रह्म का उच्चारण करके सुमर करके

91
00:06:57,880 --> 00:07:02,040
करने का केवल एक मा यह प्रणव अक्षर है

92
00:07:02,040 --> 00:07:02,540
जो

93
00:07:02,320 --> 00:07:06,480
इसका जाप अंतिम स्वास तक कर्म करते करते भी करेगा वह मेरी

94
00:07:06,480 --> 00:07:07,400
वाली परम गति को

95
00:07:07,400 --> 00:07:11,480
प्राप्त होगा ठीक है अब इनकी जो परम गति

96
00:07:11,480 --> 00:07:17,480
है वह है क्या इनकी परम गति को भी देख लेते

97
00:07:22,120 --> 00:07:26,560
हैं 95 नंबर का पेज देखिए

98
00:07:26,560 --> 00:07:30,040
य

99
00:07:30,040 --> 00:07:34,160
7.18 फोथ पैरा इसका

100
00:07:34,160 --> 00:07:38,720
मुझे पेज नंबर नहीं पता

101
00:07:38,720 --> 00:07:42,760
है 7.1 अध्याय की बात हो रही

102
00:07:42,760 --> 00:07:46,880
है कहीं पर वहां जाना है लगभग मेरे ख्याल से काफी आगे है व बस

103
00:07:46,880 --> 00:07:52,040
एक यही है जिसका मुझे पेज नहीं पता है

104
00:07:52,040 --> 00:07:56,360
7.1 मतलब इसमें जहां पर 7.1 की बात हो रही हो

105
00:07:56,360 --> 00:08:02,360
सातवे अध्याय पर पहुंचना है

106
00:08:04,200 --> 00:08:09,400
तो 7.18 में इन्होंने कहा है

107
00:08:09,400 --> 00:08:15,400
कि जो ब्रह्म की

108
00:08:16,720 --> 00:08:20,960
जो यह नहीं है 7.1 हां

109
00:08:20,960 --> 00:08:25,320
अध्याय 7 18 में स्वयं गीता जी को बोलने वाला ब्रह्म

110
00:08:25,320 --> 00:08:30,280
यह कह रहा है य नंबर नोट कर लो

111
00:08:30,280 --> 00:08:34,360
यह कह रहा है कि बोलने वाला ब्रह्म ने कहा है कि यह

112
00:08:34,360 --> 00:08:38,720
ज्ञानी आत्मा उदार है जिनको वेद पढ़कर ज्ञान तो हो गया कि एक प्रभु की भक्ति

113
00:08:38,720 --> 00:08:43,000
से पूर्ण मोक्ष होगा परंतु तत्वदर्शी नहीं नहीं य य एक्जेक्टली

114
00:08:43,000 --> 00:08:47,800
वोह वाली बात नहीं है आप 7.18 जहा अध्याय हो वहां जाइए

115
00:08:47,800 --> 00:08:51,800
अध्याय सा 18 में अति श्रेष्ठ अति

116
00:08:51,800 --> 00:08:55,960
देखिए यहां अपनी भक्ति को इसने कहा अनुत्तम अनुत्तम

117
00:08:55,960 --> 00:09:00,000
का अर्थ ये लेते हैं अश्र पूर्ण मोक्ष नहीं होता है

118
00:09:00,000 --> 00:09:04,440
अश्र ठ और और बता दूं

119
00:09:04,440 --> 00:09:08,480
कि वोह अपनी भक्ति के नाम पर फिर भी आप एक बार

120
00:09:08,480 --> 00:09:13,160
वो वहां बहुत अच्छी बात लिखी आप आप वहां चले जाइए

121
00:09:13,160 --> 00:09:17,360
वहां पर आप जाइए बहुत बहुत सही बात है

122
00:09:17,360 --> 00:09:23,360
हम सातवें अध्याय में

123
00:09:27,080 --> 00:09:33,080
पहुंच सातवा अध्याय आ गया

124
00:09:34,520 --> 00:09:40,520
बारवा आ गया पीछे

125
00:09:45,120 --> 00:09:49,280
चलिए तो भाई यहां पर जो है पहली बात

126
00:09:49,280 --> 00:09:53,520
तो यह है कि अगर हम लोग वेदों को फॉलो करते हैं

127
00:09:53,520 --> 00:09:57,800
वेदों के अनुसार जीवन को जीते हैं तो हमें उससे पता है क्या मिलेगा

128
00:09:57,800 --> 00:10:01,840
आपको हमें उस से ब्रह्म की प्राप्ति होगी

129
00:10:01,840 --> 00:10:06,680
और ब्रह्म की प्राप्ति से हमें क्या मिलेगा वह हम देख लेते हैं

130
00:10:06,680 --> 00:10:12,120
यह सात पॉइंट 18 की बात हो रही है यहां पर सातवा अध्याय चल रहा

131
00:10:12,120 --> 00:10:16,800
है बस बस ज्यादा पीछे ना

132
00:10:16,800 --> 00:10:21,040
जाए इसमें इसने ये कहा है कि जो मेरी

133
00:10:21,040 --> 00:10:25,200
भक्ति करते हैं वह कुछ समय के लिए अमर हो जाते

134
00:10:25,200 --> 00:10:29,440
हैं कुछ समय के लिए अमर अब ये कुछ समय

135
00:10:29,440 --> 00:10:33,440
के लिए अमर का अर्थ क्या होता है वो इन्हीं से पूछिए अमर

136
00:10:33,440 --> 00:10:37,760
का अर्थ होता है जो कभी नहीं मरता

137
00:10:37,760 --> 00:10:42,560
जो मर नहीं सकता ऊपर जाइए थोड़ा

138
00:10:42,560 --> 00:10:46,600
पेज नंबर नहीं नोट किया मैंने इसका कुछ समय तक अमर हो जाता है फोर्थ

139
00:10:46,600 --> 00:10:50,360
पहरा में

140
00:10:50,360 --> 00:10:54,720
है अनुत्तम का अर्थ अ श्रेष्ठ है जबकि

141
00:10:54,720 --> 00:10:58,800
समास में अनुत्तम का अर्थ अति उत्तम होता है जिससे उत्तम कोई और

142
00:10:58,800 --> 00:11:03,520
ना हो के विषय में समास में अनुत्तम का अर्थ भी अति उत्तम होता है

143
00:11:03,520 --> 00:11:07,640
तो यह तो यहां दूसरी बात चल रही है खैर मगर कुल

144
00:11:07,640 --> 00:11:12,440
मिलाकर के इन्होंने एंड में यहां पर यह कह दिया

145
00:11:12,440 --> 00:11:16,520
कि वह जो परम गति है वह मेरी वाली परम गति है और

146
00:11:16,520 --> 00:11:21,360
मेरी वाली परम गति क्या है कि वह कुछ समय तक

147
00:11:21,360 --> 00:11:25,400
अमर हो जाता है है ना कुछ

148
00:11:25,400 --> 00:11:29,520
समय तक अमर हो जाता है एक बार 35 नंबर के पेज पर दोबारा जाइए

149
00:11:29,520 --> 00:11:33,800
35 नंबर का पेज था

150
00:11:33,800 --> 00:11:39,800
जो जो सबसे पहले खोला

151
00:11:40,800 --> 00:11:45,280
था कुछ समय के लिए अमर यह देख रहे

152
00:11:45,280 --> 00:11:48,880
इनका मन

153
00:11:48,880 --> 00:11:51,880
गणतहीन

154
00:11:51,880 --> 00:11:56,160
है उनका अर्थ ही बदल दिया वही वाली बात कि बाढ़

155
00:11:56,160 --> 00:12:00,240
का पानी जो है खतरे के निशान तक आ

156
00:12:00,240 --> 00:12:04,400
गया तो क्या किया जाए तो भैया एक काम करो खतरे का निशान दो इंच और ऊपर

157
00:12:04,400 --> 00:12:08,440
कर दो तो अमर शब्द हमारे उसमें टांग

158
00:12:08,440 --> 00:12:13,160
अड़ा रहा है तो क्या करें एक काम करो अमर का अर्थ कर दो कुछ समय के लिए

159
00:12:13,160 --> 00:12:17,320
अमर तो हा इसमें जरा सिक्सथ पैराग्राफ पर जाइए जरा

160
00:12:17,320 --> 00:12:21,400
इसमें सिक्सथ पैराग्राफ है क्या मैंने कहीं और से नोट कर लिया है

161
00:12:21,400 --> 00:12:25,440
वो सेकंड हो गया थर्ड हो गया

162
00:12:25,440 --> 00:12:29,760
और थर्ड के बाद और नीचे जाइए हां और नीचे

163
00:12:29,760 --> 00:12:34,000
चणक ऋषि ये हो गया एक एक मिनट जैसे

164
00:12:34,000 --> 00:12:38,040
बहुत जन्मों के उपरांत जैसे चणक ऋषि

165
00:12:38,040 --> 00:12:42,080
दूसरा रूप लेता है हा यहां कहीं इन्होने लाइन लिखी है

166
00:12:42,080 --> 00:12:46,720
वो आगे कहीं पर बता दिया जाएगा ठीक है तो वो कुछ समय के लिए अमर होता है

167
00:12:46,720 --> 00:12:49,600
अच्छा दूसरी एक बात और है

168
00:12:49,600 --> 00:12:54,560
कि जो लोग ब्रह्म की पूजा करते हैं

169
00:12:54,560 --> 00:12:58,640
वो अंततोगत्वा उसका भोजन बनते हैं उसकी खुराक बनते

170
00:12:58,640 --> 00:13:02,680
हैं यह भी एक बात है मतलब वेद जो आपको

171
00:13:02,680 --> 00:13:06,680
जो ज्ञान दे रहे हैं भक्ति करने का वो ज्ञान

172
00:13:06,680 --> 00:13:11,760
जो है अंततोगत्वा आप उसकी खुराक

173
00:13:11,760 --> 00:13:15,760
बनोगे यह कहां पर लिखा है यह भी कहीं पर लिखा

174
00:13:15,760 --> 00:13:19,960
है मैं बता देता हूं कि काल के आप आप जो है

175
00:13:19,960 --> 00:13:25,960
खुराक बन जाओगे

176
00:13:33,640 --> 00:13:36,320
गीता ने

177
00:13:36,320 --> 00:13:41,040
कृष्ण अगर आप उसकी भक्ति करोगे ब्रह्म की

178
00:13:41,040 --> 00:13:45,080
तो ब्रह्म को आपको खाएगा एक दिन ब्रह्म उसकी भक्ति

179
00:13:45,080 --> 00:13:50,160
करने का यही फायदा

180
00:13:50,160 --> 00:13:54,240
है यह भी इनकी इसी पुस्तक में लिखा हुआ

181
00:13:54,240 --> 00:13:58,240
है कि ब्रह्म की ब्रह्म की पूजा करने का

182
00:13:58,240 --> 00:14:02,320
जो फल है एक तो इतना सारा मैटर हो गया था ना इकट्ठा कर

183
00:14:02,320 --> 00:14:06,360
कर के इसलिए देर लग रही है है ना तो कुल

184
00:14:06,360 --> 00:14:10,400
मिलाकर के यह हमें वेद और गीता का सम्मान करने का

185
00:14:10,400 --> 00:14:14,560
नाटक करते हुए यह बताते हैं पवित्र ग्रंथ सद ग्रंथ

186
00:14:14,560 --> 00:14:19,040
बोल बोल के यह बताते हैं कि अगर तुम इन पवित्र ग्रंथों को सद ग्रंथों

187
00:14:19,040 --> 00:14:23,120
के आधार पर अपने जीवन को जियोगे अगर आगे बढ़ो ग तो

188
00:14:23,120 --> 00:14:27,520
तुमको एक तो ब्रह्म रूपी जो ब्रह्म नाम का जो काल नाम का राक्षस

189
00:14:27,520 --> 00:14:32,440
है घटिया यह घटिया भी कहां लिखा है वह भी देख

190
00:14:32,440 --> 00:14:36,440
लो घटिया कहां लिखा

191
00:14:36,440 --> 00:14:41,880
है अनुत्तम घटिया 10079

192
00:14:41,880 --> 00:14:47,880
नंबर का पेज निकालिए

193
00:14:55,720 --> 00:15:01,720
179 179

194
00:15:07,520 --> 00:15:13,400
एक और आ हा इसमें है फिफ्थ

195
00:15:13,400 --> 00:15:17,480
पैरा हां को अव्यक्त

196
00:15:17,480 --> 00:15:21,720
बताया है उपरोक्त मूर्खों का विवरण

197
00:15:21,720 --> 00:15:25,840
प्राणी मुझे प्राणियों का प्रभु मानते हैं मैं महेश्वर नहीं हूं

198
00:15:25,840 --> 00:15:30,040
महेश्वर तो पूर्ण परमात्मा है इसका फिथ पैराग्राफ

199
00:15:30,040 --> 00:15:34,320
एक मिनट ऊपर से जरा गिनने दीजिए कौन सा है वीडियो क्लियर नहीं

200
00:15:34,320 --> 00:15:38,360
है फिथ पैराग्राफ में यह जो है

201
00:15:38,360 --> 00:15:42,480
यहां पर काल को घटिया कहा गया है तत्व ज्ञान से के अभाव

202
00:15:42,480 --> 00:15:46,800
से मूर्ख प्राणी मुझे सब उसका प्रभु मानते हैं

203
00:15:46,800 --> 00:15:50,960
और मैं महेश्वर नहीं हूं महेश्वर तो पूर्ण परमात्मा है जो

204
00:15:50,960 --> 00:15:55,400
गीता अध्याय मुझे शरीर धारण करने वाला समझ रहा है

205
00:15:55,400 --> 00:16:00,120
इसी और थोड़ा सा नीचे जाइए थोड़ा सा नीचे

206
00:16:00,120 --> 00:16:04,240
इसी का प्रमाण बस बस बस बस बस जाइए तो

207
00:16:04,240 --> 00:16:08,240
उपरोक्त मुहूर्तो का विवरण निम्न श्लोकों में भी दिया गया है समझ

208
00:16:08,240 --> 00:16:11,240
मैं कृष्ण नहीं हूं उसी का प्रमाण गीता में यदि कोई तत्

209
00:16:11,240 --> 00:16:15,400
पूर्ण परमात्मा को तथा कृष्ण जी ने बोला है तथा काल महेश्वर ने नहीं वमू नहीं

210
00:16:15,400 --> 00:16:19,440
मानते तो यहां पर इसको जो है इसने खुद कहा है कि यह

211
00:16:19,440 --> 00:16:23,760
घटिया है तो कुल मिलाकर के वेदों के मार्ग का अनुसरण

212
00:16:23,760 --> 00:16:28,120
करते हुए आप घटिया घटिया

213
00:16:28,120 --> 00:16:32,280
काल ब्रह्म और फिर उसको भगवान भी कह देते हैं उसकी आप भक्ति करते हैं इनके

214
00:16:32,280 --> 00:16:37,040
अनुसार रामपाल एंड कंपनी के अनुसार और वो

215
00:16:37,040 --> 00:16:41,200
भक्ति करके आपको देखो यह आ गया ब्रह्म काल उपासक उसी

216
00:16:41,200 --> 00:16:45,400
का आहार तो ब्रह्म की भक्ति करके आपको मिलने क्या वाला है

217
00:16:45,400 --> 00:16:50,280
कि आपको यह ब्रह्म जो है खाएगा काल यह आपको मिलेगा

218
00:16:50,280 --> 00:16:54,320
तो मतलब यह वेद वेद के नाम पर आपको वेद विरोधी बनाया जा

219
00:16:54,320 --> 00:16:58,400
रहा है समझ में आ रहा है थोड़ा बहुत हिंदुओ कि

220
00:16:58,400 --> 00:17:02,400
हम लोग भक्ति बताते हैं सद भक्ति बताते हैं मगर वेदों की भक्ति वेदों की भक्ति

221
00:17:02,400 --> 00:17:06,440
कहां तक है ब्रह्म तक है वेदों की भक्ति मुक्ति नहीं है

222
00:17:06,440 --> 00:17:10,520
वेदों की भक्ति ब्रह्म तक है ब्रह्म कौन है घटिया और उसके बाद

223
00:17:10,520 --> 00:17:14,520
ब्रह्म और उसकी भक्ति करने पर आपको मिलेगा क्या उसकी

224
00:17:14,520 --> 00:17:18,720
भक्ति करने पर आपको मिलेगा कि वह आपको खाएगा मुक्ति तो दूर

225
00:17:18,720 --> 00:17:23,000
की बात है वह आपको खाएगा यह लिखा है य ठीक

226
00:17:23,000 --> 00:17:26,240
है अच्छा अब एक

227
00:17:26,240 --> 00:17:30,800
बात समझ में आती है किय लोग एक तरफ कहते हैं कि वेद विरु

228
00:17:30,800 --> 00:17:35,600
वेद विरुद्ध भक्ति नहीं होनी चाहिए मगर

229
00:17:35,600 --> 00:17:39,680
वेद विरुद्ध वेद विरुद्ध भक्ति नहीं होनी चाहिए अच्छा एक बात और है

230
00:17:39,680 --> 00:17:43,680
इनके मन में कितना सम्मान है हमारे वेदों के लिए वो भी देख लीजिए 39 नंबर पेज पर

231
00:17:43,680 --> 00:17:46,120
दोबारा

232
00:17:46,120 --> 00:17:51,280
जाइए 39 नंबर पेज

233
00:17:51,280 --> 00:17:56,160
पे जगह जगह जहां पर भी वो सात 24 वाले

234
00:17:56,160 --> 00:18:00,360
श्लोक को भगवत गीता सात 24 वाले श्लोक को

235
00:18:00,360 --> 00:18:04,680
उपयोग करते हुए उसको आधार बनाते हुए जहां भी बात की है ना इन्होंने वहां

236
00:18:04,680 --> 00:18:08,800
पर काल को घटिया भाव वाला घटिया मेरा अश्र देखिए

237
00:18:08,800 --> 00:18:12,960
सात श्लोक 18 में अति अश्र अर्थात अति व्यर्थ बताया नीचे

238
00:18:12,960 --> 00:18:17,840
करिए जरा नीचे करिए हल्का सा नीचे

239
00:18:17,840 --> 00:18:22,440
करिए नीचे नहीं मतलब ऊपर जाइए वापस वापस ऊपर जाइए

240
00:18:22,440 --> 00:18:27,120
य बड़ी प्रॉब्लम है इसमें इन्होने ये देखिए यह जो

241
00:18:27,120 --> 00:18:31,320
ऊपर से रुक जाइए

242
00:18:31,320 --> 00:18:35,320
टॉप से जरा गिनना चालू करिए कौन सा पैराग्राफ है अध्याय ये

243
00:18:35,320 --> 00:18:38,280
लिखा हुआ है अध्याय आ श्लोक सात में कहा है

244
00:18:38,280 --> 00:18:42,400
कि हर समय मेरा स्मरण कर कर तथा युद्ध भी कर इस प्रकार

245
00:18:42,400 --> 00:18:46,520
मेरे आदेश का पालन करते हुए अर्थात सांसारिक कर्म करते

246
00:18:46,520 --> 00:18:51,200
हुए साधना करते हुए मुझे ही प्राप्त होगा भले ही अपनी परम गति को

247
00:18:51,200 --> 00:18:55,800
गीता अध्याय सात श्लोक 18 में अति अश्र अति घटिया

248
00:18:55,800 --> 00:18:59,880
अर्थात अति व्यर्थ बताया और यहां पर इन लोगों ने

249
00:18:59,880 --> 00:19:03,880
घटिया शब्द का प्रॉपर उपयोग किया है तो वेदों

250
00:19:03,880 --> 00:19:08,320
का अनुसरण करके आपको मुक्ति नहीं मिलने वाली है वेदों का अनुसरण

251
00:19:08,320 --> 00:19:12,320
ब्रह्म प्राप्ति तक है ब्रह्म की प्राप्ति जो है ब्रह्म की प्राप्ति से आपको

252
00:19:12,320 --> 00:19:16,480
क्या मिलेगा ब्रह्म की प्राप्ति घटिया है क्योंकि ब्रह्म घटिया है

253
00:19:16,480 --> 00:19:20,480
और इनके अनुसार अगर आपने ब्रह्म को प्राप्त

254
00:19:20,480 --> 00:19:24,720
कर भी लिया तो वह आपको खाएगा अब एक एक

255
00:19:24,720 --> 00:19:28,720
वेदों को ना मानने के संबंध में एक और प्रूफ ले लीजिए

256
00:19:28,720 --> 00:19:32,240
39 नंबर पेज पर

257
00:19:32,240 --> 00:19:36,240
जाइए यही है क्या हा तो इसमें

258
00:19:36,240 --> 00:19:42,240
39 नंबर जो पेज

259
00:19:50,400 --> 00:19:52,600
है

260
00:19:52,600 --> 00:19:56,600
हां इसमें नीचे आइए

261
00:19:56,600 --> 00:20:00,040
एक बड़ा सा पैराग्राफ होगा

262
00:20:00,040 --> 00:20:04,160
हां यही वाला यही है यही है बस बस पवित्र वेदों को बोलने वाला

263
00:20:04,160 --> 00:20:08,160
कौन है ब्रह्म वह जो राक्षस जैसा

264
00:20:08,160 --> 00:20:12,160
एक एंटिटी है वही पवित्र वेदों को बोलने वाला है पहली बात तो यह हो

265
00:20:12,160 --> 00:20:16,680
गई अब पवित्र वेदों को बोलने वाला ब्रह्म है

266
00:20:16,680 --> 00:20:20,880
और आगे इसने कहा है कि पूर्ण

267
00:20:20,880 --> 00:20:25,200
परमात्मा कैसा है वह कैसे प्रकट होता है पूर्ण परमात्मा

268
00:20:25,200 --> 00:20:29,480
की पूरी जानकारी मुझे नहीं पता है मैं वेद ज्ञान

269
00:20:29,480 --> 00:20:34,360
देने वाला ब्रह्म भी नहीं जानता क्या है अज्ञानी

270
00:20:34,360 --> 00:20:38,360
यह जो वेद कहने वाला है यह वेदों को कितना मानते हैं यह

271
00:20:38,360 --> 00:20:42,480
देखिए मैं वेद ज्ञान देने वाला ब्रह्म भी नहीं जानता कि

272
00:20:42,480 --> 00:20:46,720
पूर्ण परमात्मा कैसा है यानी कि वेद से भी

273
00:20:46,720 --> 00:20:47,440
अलग ज्ञान

274
00:20:47,440 --> 00:20:51,480
है इनको वेद से अलग ज्ञान है अय एक जगह लिखते कि

275
00:20:51,480 --> 00:20:55,880
वेद विरुद्ध ज्ञान जो है स्वीकार नहीं जो वेद से मैच नहीं खाएगा वो स्वीकार नहीं

276
00:20:55,880 --> 00:21:00,000
मगर यहां पर कह रहे हैं कि वेद में तो पूर्ण ज्ञान है ही

277
00:21:00,000 --> 00:21:04,080
नहीं है ना अच्छा अब इनकी ये बात एक जगह

278
00:21:04,080 --> 00:21:08,120
और से भी कट जाती है इनका देखिए दोगला चरित्र दिखाऊं मैं आपको कितना

279
00:21:08,120 --> 00:21:14,120
दोगलापन है हद है दोगले पन की

280
00:21:14,120 --> 00:21:18,280
कि वेद का ज्ञान वेद

281
00:21:18,280 --> 00:21:22,480
में क्या है मंत्र और मंत्र का ज्ञान

282
00:21:22,480 --> 00:21:26,480
जो है किसने दिया है अब इन्होंने कह

283
00:21:26,480 --> 00:21:30,520
दिया कि वेदों को कहने वाला मूर्ख है ये 39 में नंबर पर कह

284
00:21:30,520 --> 00:21:34,600
दिया इन्होंने मगर 40 में पर यह मान लिया कि वेदों का ज्ञान देने

285
00:21:34,600 --> 00:21:38,880
वाला कौन है कबीर अब इनसे कोई ये पूछो कि कबीर मूर्ख है अज्ञानी

286
00:21:38,880 --> 00:21:42,960
है वो पूर्ण परमात्मा है कि नहीं है एक जगह कह रहे कि ब्रह्म है वेदों का

287
00:21:42,960 --> 00:21:47,000
ज्ञान देने वाला हर जगह यही कहा है मगर क्योंकि भाई वो होता है

288
00:21:47,000 --> 00:21:51,040
ना छिपाए कैसे तो छिपा तो ना छिपा

289
00:21:51,040 --> 00:21:55,840
पाए तो यहां देखिए पूर्ण परमात्मा ने कल्प के प्रारंभ में यज्ञों

290
00:21:55,840 --> 00:21:59,920
अब यज्ञों का ज्ञान हम सभी जानते हैं किसका ज्ञान है वेदों का ज्ञान

291
00:21:59,920 --> 00:22:02,520
नहीं तो इनके कौन से कबीर सागर में कौन से यज्ञ

292
00:22:02,520 --> 00:22:06,760
का विधान है बता दीजिए जरा यज्ञों का ज्ञान

293
00:22:06,760 --> 00:22:11,480
किसने दिया पूर्ण परमात्मा ने कबीर ने दिया

294
00:22:11,480 --> 00:22:15,040
अब इनकी कौन सी बात

295
00:22:15,040 --> 00:22:19,720
मानोगे क्या कोई काल घुस गया था क्या गरमा गीता की लिखते समय

296
00:22:19,720 --> 00:22:23,960
इसी से दिमाग पंचर होता है अब देखिए एक पेज

297
00:22:23,960 --> 00:22:28,080
पहले लिख रहे हैं कि ब्रह्म ने दिया है ज्ञान ज्ञान काल ने दिया

298
00:22:28,080 --> 00:22:29,200
और यहां लिख रहे हैं

299
00:22:29,200 --> 00:22:33,440
कि पूर्ण परमात्मा ने कल्प के प्रारंभ में यज्ञों यज्ञों यानी

300
00:22:33,440 --> 00:22:36,120
धार्मिक अनुष्ठानों का ज्ञान तथा प्रजा को उत्पन्न

301
00:22:36,120 --> 00:22:40,320
करने के उससे कहा था ठीक है तो यज्ञ का ज्ञान

302
00:22:40,320 --> 00:22:44,880
देने वाला कौन हुआ यज्ञों का ज्ञान देने वाला खुद कबीर हुआ

303
00:22:44,880 --> 00:22:49,040
और यज्ञों से मुक्ति मिलती नहीं है ऊपर जाइए जरा

304
00:22:49,040 --> 00:22:53,680
इसी में ऊपर लिखा है यज्ञों से मुक्ति नहीं मिलती है

305
00:22:53,680 --> 00:22:57,840
यज्ञ कर्मों से मुक्ति नहीं मिलती और ऊपर जाइए और ऊपर जाइए यही

306
00:22:57,840 --> 00:23:01,880
तो था 39 में ही लिखा है ना नीचे 39

307
00:23:01,880 --> 00:23:06,680
और ऊपर जाइए हां ये

308
00:23:06,680 --> 00:23:10,960
यज्ञों से मुक्ति मिलती नहीं है मगर यज्ञ जो है काल ब्रह्म

309
00:23:10,960 --> 00:23:15,760
कहते हैं मगर अपनी बात को पचाने के लिए उसमें सटर घोट करने के लिए

310
00:23:15,760 --> 00:23:19,840
फिर यज्ञों को कहने वाला यज्ञों को कहने वाला वह भी

311
00:23:19,840 --> 00:23:23,880
हो जाता है कबीर पूर्ण पूर्ण परमेश्वर भी हो जाता है वही वाली

312
00:23:23,880 --> 00:23:27,000
बात के कोई कंक्लूजन

313
00:23:27,000 --> 00:23:31,400
अगर कह दो तो पकड़ हो जाएगी तो सब बातें कह दो भा स्कोन

314
00:23:31,400 --> 00:23:35,960
के तरीके से सब बातें कहो ठीक है

315
00:23:35,960 --> 00:23:40,280
अच्छा अब एक बात और है एक लड़का कल चिल्लाया था

316
00:23:40,280 --> 00:23:44,520
कि आज तक मुक्ति किसको मिली है इन्होंने कहा वेदों का ज्ञान

317
00:23:44,520 --> 00:23:48,560
वेदों का ज्ञान जो है वेदों के ज्ञान

318
00:23:48,560 --> 00:23:51,200
में पूर्ण ब्रह्म का ज्ञान नहीं है पूर्ण

319
00:23:51,200 --> 00:23:55,240
ब्रह्म का ज्ञान क्यों नहीं है क्योंकि अभी हमने देखा 39 नंबर के पेज

320
00:23:55,240 --> 00:23:59,160
पर ऊ परर जाइए थोड़ा सा

321
00:23:59,160 --> 00:24:03,480
थोड़ा सा इसी में हां बस ब ब बस बस ज्यादा ऊपर नहीं नीचे जाइए नीचे जाइए

322
00:24:03,480 --> 00:24:06,760
नीचे जाइए

323
00:24:06,760 --> 00:24:11,760
हां पवित्र वेदों को बोलने वाला और और नीचे

324
00:24:11,760 --> 00:24:16,360
जाइए बस तो वास्तव में पूर्ण परमात्मा

325
00:24:16,360 --> 00:24:20,480
कैसा है यह है वह है यह सब मैं वेद ज्ञान

326
00:24:20,480 --> 00:24:25,320
देने वाला ब्रह्म भी नहीं जानता ठीक है तो

327
00:24:25,320 --> 00:24:29,480
ब्रह्म किसी अज्ञानी ने वो वेद किसी अज्ञानी ने बोले

328
00:24:29,480 --> 00:24:34,040
वेदों के द्वारा ब्रह्म की पूजा होती है जो ब्रह्म घटिया है और

329
00:24:34,040 --> 00:24:38,280
उसकी पूजा करके अंततोगत्वा आपको क्या प्राप्त होता है कि वह आपको

330
00:24:38,280 --> 00:24:42,680
खाता है और जो यज्ञ

331
00:24:42,680 --> 00:24:46,760
है इनसे भी मुक्ति के लिए उपयोगी नहीं है

332
00:24:46,760 --> 00:24:50,840
यज्ञ तो ऐसे ही है वो मुक्ति में कोई काम नहीं है तो कुल मिलाकर इनके

333
00:24:50,840 --> 00:24:55,400
अकॉर्डिंग धर्मशास्त्र भी सिद्ध नहीं होते जो यज्ञ है

334
00:24:55,400 --> 00:24:59,520
यज्ञों को बताने वाले मंत्र इत्यादि है यह धर्मशास्त्र भी सिद्ध नहीं होते यानी

335
00:24:59,520 --> 00:25:03,600
वेद जो है धर्मशास्त्र नहीं है क्यों क्योंकि धर्म का वास्तविक लय क्या

336
00:25:03,600 --> 00:25:06,240
है धर्म का वास्तविक गंतव्य स्थान

337
00:25:06,240 --> 00:25:10,360
है मोक्ष तो मोक्ष की बात ही नहीं हो रही जब तो जब बात ही

338
00:25:10,360 --> 00:25:14,520
नहीं हो रही तो कहां से उनको आप धर्मशास्त्र कहोगे उसमें

339
00:25:14,520 --> 00:25:18,640
तो किसी शैतान की पूजा करने की बात हो रही है इनके

340
00:25:18,640 --> 00:25:22,640
अकॉर्डिंग और वह शैतान अगर उसकी पूजा करोगे

341
00:25:22,640 --> 00:25:27,120
तो अंत में आपको खाएगा यह भी नहीं कि वो शैतान कुछ आपको रियायत दे दे

342
00:25:27,120 --> 00:25:31,160
ठीक है तो एक तो ये वाली बात हो गई अब

343
00:25:31,160 --> 00:25:35,480
इस इसके दूसरे पहलू पर हम लोग नजर डालते

344
00:25:35,480 --> 00:25:39,480
हैं कि अब यह कह रहे हैं कि यज्ञों यज्ञों

345
00:25:39,480 --> 00:25:44,440
से पूर्ण मुक्ति नहीं मिलती है

346
00:25:44,440 --> 00:25:50,440
मगर

347
00:25:50,720 --> 00:25:55,200
182 सर्व यज्ञों में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा यह

348
00:25:55,200 --> 00:26:01,200
है 182 नंबर पेज निकालिए

349
00:26:02,880 --> 00:26:08,080
या 40 में भी यही लिखा है 40 नंबर पेज निकालिए

350
00:26:08,080 --> 00:26:14,080
40 4 में भी य लिखा है फर्स्ट

351
00:26:15,280 --> 00:26:21,280
पैराग्राफ हां इसमें क्या लिखा है

352
00:26:21,720 --> 00:26:26,240
कि धर्म यज्ञ होता है खाद आवश्यक होती

353
00:26:26,240 --> 00:26:30,560
है परंतु पूर्ण का नाम लेकर

354
00:26:30,560 --> 00:26:34,640
हा रहते हुए अंतिम समय तक अनन्य नाम से नाम जप य

355
00:26:34,640 --> 00:26:35,140
रहता

356
00:26:34,960 --> 00:26:39,080
है उसको यज्ञ में फल स्वरूप सांसारिक सुधा अधिक मिलती है वही यज्ञ में प्रतिष्ठित

357
00:26:39,080 --> 00:26:43,680
ये देखिए अब यहां पर फिर आ गया अब यह कह रहे हैं कि

358
00:26:43,680 --> 00:26:47,920
जो वेद के जो मंत्र है जो यज्ञ है उनमें उनका

359
00:26:47,920 --> 00:26:51,920
मतलब उनके द्वारा जो पूर्ण परमात्मा है पूर्ण ब्रह्म उसकी बात

360
00:26:51,920 --> 00:26:56,280
नहीं होती मगर यहां क्या कह रहे हैं यहां कह रहे हैं वही

361
00:26:56,280 --> 00:27:00,360
यज्ञों में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा ही मन

362
00:27:00,360 --> 00:27:04,840
मन इच्छित यज्ञों का फल देता है तो अब क्या हुआ कि पूर्ण

363
00:27:04,840 --> 00:27:08,920
परमात्मा यज्ञों में प्रतिष्ठित है यज्ञ द्वारा कौन पूजा जा

364
00:27:08,920 --> 00:27:12,920
रहा है पूर्ण परमात्मा और 181

365
00:27:12,920 --> 00:27:18,920
182 लाइए

366
00:27:21,440 --> 00:27:27,160
182 180

367
00:27:27,160 --> 00:27:31,320
182 इतना इन्होंने इसमें खिचड़ी पकाई है यह दो मिनट

368
00:27:31,320 --> 00:27:35,360
सामने नहीं बैठ सकते जो नते पाते किया करते हैं

369
00:27:35,360 --> 00:27:39,360
हां एक मिनट थोड़ा धीरे चलिए धीरे धीरे वेदों के अनुसार

370
00:27:39,360 --> 00:27:45,360
साधना करने वाला हूं इसी में होगा ऊपर जाइए पहले

371
00:27:45,800 --> 00:27:50,760
जरा बस बस बस बस बस बस बस बस बस ज्यादा ऊपर

372
00:27:50,760 --> 00:27:54,760
नहीं एक ब्रह्म भक्ति की

373
00:27:54,760 --> 00:27:59,000
रक्षा मैं करता हूं यहां कह रहे हैं जो निष्काम थोड़ा सा नीचे

374
00:27:59,000 --> 00:28:03,080
चलिए नीचे चलिए थोड़ा सा प

375
00:28:03,080 --> 00:28:08,480
सेकंड हो ग अब 182 नंबर पर य लिख रहे

376
00:28:08,480 --> 00:28:12,880
हैं क्या लिख रहे हैं कि

377
00:28:12,880 --> 00:28:17,120
यज्ञों का मैं ही व भक्त मुझे अच्छी तरह नहीं जानते हैं काल है इसलिए इसकी

378
00:28:17,120 --> 00:28:21,480
पूजा करके पतन को प्राप्त होते हैं 84 लाख यज्ञ के सर्पण

379
00:28:21,480 --> 00:28:25,560
की जाती है वह परमा हा जिसको यह यज्ञ समर्पण की

380
00:28:25,560 --> 00:28:29,640
जाती है वह परमात्मा पूर्ण ब्रह्म है

381
00:28:29,640 --> 00:28:34,480
अब लो फिर पूर्ण ब्रह्म हो गया यज्ञ किसको समर्पित है

382
00:28:34,480 --> 00:28:37,080
पूर्ण ब्रह्म को समर्पित है और 181

383
00:28:37,080 --> 00:28:40,640
में देखिए क्या लिखा है

384
00:28:40,640 --> 00:28:45,120
99 यज्ञों में यह अपनी ही बात पर नहीं टिक रहे हैं

385
00:28:45,120 --> 00:28:49,680
ऊपर चलिए बस बस बस बस बस बस

386
00:28:49,680 --> 00:28:55,680
तो लास्ट पैराग्राफ देखिए क्या है क्या लिखा है

387
00:28:59,400 --> 00:29:03,920
हां मनोकामना सिद्धि के लिए मेरी पूजा तीनों वेदों में वर्णित

388
00:29:03,920 --> 00:29:08,160
शास्त्र अनुकूल करते हैं हां क्योंकि यह देखिए 9

389
00:29:08,160 --> 00:29:12,360
24 यह देखिए इसका अर्थ देखिए गीता में क्या बोल रहे हैं क्योंकि

390
00:29:12,360 --> 00:29:16,440
सब यज्ञों को भोगने वाला केवल अय अब खुद ही कह रहे

391
00:29:16,440 --> 00:29:20,440
हैं केवल 21 ब्रह्मांड का स्वामी मैं हूं इनका

392
00:29:20,440 --> 00:29:24,720
सटर घोंट देखिए कि किस तरह से आपको उलझा करके प्रश्नों

393
00:29:24,720 --> 00:29:28,800
में चार तरह की बातें करके आपको आप के वेदों से

394
00:29:28,800 --> 00:29:34,000
आपकी गीता से आपके धर्म से आपके सनातन से दूर ले जाया जा रहा है

395
00:29:34,000 --> 00:29:38,240
दूर कि यहां पर कह दिया भगवत गीता का अर्थ

396
00:29:38,240 --> 00:29:43,280
करते समय कि यज्ञों का भोक्ता कौन है यज्ञ किसको समर्पित

397
00:29:43,280 --> 00:29:47,320
है यज्ञ जो है भैया इनका जो काल ब्रह्म

398
00:29:47,320 --> 00:29:51,880
है घटिया ब्रह्म है उनको समर्पित है

399
00:29:51,880 --> 00:29:52,880
और

400
00:29:52,880 --> 00:29:57,120
आगे कह दिया कि वो तो नहीं वो तो यज्ञ

401
00:29:57,120 --> 00:30:01,800
भी जो है सब तरीके से उसी को जाते हैं अब

402
00:30:01,800 --> 00:30:05,880
यहां पर एक बात आती है यह ये कह सकते हैं कि इसमें एक लाइन आई

403
00:30:05,880 --> 00:30:10,120
है कि यदि तत्व ज्ञानी से ज्ञान ले

404
00:30:10,120 --> 00:30:14,160
लिया तो जरूर वह जो यज्ञ आपका

405
00:30:14,160 --> 00:30:18,280
है वह पूर्ण उसकी ओर जाने लगेगा मगर तत्व ज्ञानी जो ज्ञान दे रहा

406
00:30:18,280 --> 00:30:23,120
है क्या वह यज्ञों का दे रहा है दूसरी बात

407
00:30:23,120 --> 00:30:27,120
अर्जुन को तो कोई तत्व ज्ञानी मिला नहीं था इनके अनुसार

408
00:30:27,120 --> 00:30:31,120
और कल एक व्यक्ति कह भी रहा था अब इनकी सारी चीजों का देखो इन्हीं

409
00:30:31,120 --> 00:30:35,720
की किताबों में पोल खुलेगी इनकी सारी चीजों की पोल इन्हीं की किताबों में खुलेगी

410
00:30:35,720 --> 00:30:40,000
क्यों क्योंकि इनका कहना है कि वेदों

411
00:30:40,000 --> 00:30:44,240
के द्वारा पूर्ण मुक्ति नहीं मिलती है मोक्ष नहीं मिलता है वेदों को अज्ञानी

412
00:30:44,240 --> 00:30:48,720
ने कहा है और हमने यह भी बता दिया कि वेदों को

413
00:30:48,720 --> 00:30:52,840
इनके ही कबीर ने कहा है इसके बाद

414
00:30:52,840 --> 00:30:57,080
इनका कहना है कि यज्ञों के द्वारा मुक्ति प्राप्त नहीं होती है

415
00:30:57,080 --> 00:31:01,400
और बिना तत्वदर्शी के अगर तत्वदर्शी मिल

416
00:31:01,400 --> 00:31:06,040
जाएगा तो अवश्य आपके यज्ञों के द्वारा यज्ञ आपके सफल हो सकते हैं

417
00:31:06,040 --> 00:31:08,080
मगर तत्वदर्शी जो इनके अनुसार

418
00:31:08,080 --> 00:31:12,280
है क्या वह यज्ञ करवाता है यज्ञ करने

419
00:31:12,280 --> 00:31:16,920
को कहता है नहीं व यज्ञ नहीं बता रहा है

420
00:31:16,920 --> 00:31:21,320
दूसरी बात अर्जुन को तो यज्ञ मिला नहीं था मगर भाई अर्जुन को मुक्ति जरूर मिल

421
00:31:21,320 --> 00:31:25,520
गई कल एक व्यक्ति ने पूछा था किसको मुक्ति मिली है उसी के शास्त्र में लिखा

422
00:31:25,520 --> 00:31:30,880
है मुक्ति किसे मिली निकाल भैया 99 नंबर

423
00:31:30,880 --> 00:31:36,880
पैराग्राफ 99 नंबर पेज

424
00:31:38,600 --> 00:31:43,320
सॉरी आज जो खुलासे होने वाले हैं ना

425
00:31:43,320 --> 00:31:49,320
वह बहुत ही

426
00:31:55,040 --> 00:31:59,200
ज्यादा पूरा जिसको अपने दिमाग में ड्रिल

427
00:31:59,200 --> 00:32:03,240
चलाना हो ना वोह इनकी एक गरमा गीता की का

428
00:32:03,240 --> 00:32:07,760
नाम का जो नाम की पुस्तक है उसको उसका अध्ययन करें

429
00:32:07,760 --> 00:32:12,600
99 नंबर 99

430
00:32:12,600 --> 00:32:15,920
थोड़ा सा

431
00:32:15,920 --> 00:32:20,240
आगे हां थोड़ा पीछे

432
00:32:20,240 --> 00:32:24,080
यही होगा यही इसमें पहला पैराग्राफ है हा अर्जुन

433
00:32:24,080 --> 00:32:28,080
यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा को ईस्ट रू में

434
00:32:28,080 --> 00:32:32,120
मानकर यज्ञ करता है तथा यज्ञों के साथ-साथ वास्तविक नाम का

435
00:32:32,120 --> 00:32:36,400
सुमेर करके पूर्ण रूप पूर्ण मोक्ष रूपी अवंत

436
00:32:36,400 --> 00:32:40,440
को प्राप्त हो जाता है अर्थात पूर्ण परमात्मा को प्राप्त

437
00:32:40,440 --> 00:32:45,080
हो जाता है वाह अब यह कौन सा अर्जुन है भाई

438
00:32:45,080 --> 00:32:49,200
यज्ञों के द्वारा मुक्ति नहीं है यज्ञ बताने

439
00:32:49,200 --> 00:32:53,440
वाला मूर्ख है उसको पूर्ण परमात्मा का पता नहीं

440
00:32:53,440 --> 00:32:57,520
है य और वेदों के अनुसार वेदों के मार्ग पर चलने

441
00:32:57,520 --> 00:33:01,680
वाला कोई मुक्त नहीं होता क्योंकि वेदों में पूर्ण ब्रह्म की भक्ति

442
00:33:01,680 --> 00:33:05,480
नहीं है पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति नहीं है मगर अर्जुन जो है

443
00:33:05,480 --> 00:33:09,520
यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा को इष्ट रूप में मानकर यज्ञ करता है

444
00:33:09,520 --> 00:33:13,880
तथा यज्ञों के साथ-साथ वास्तविक नाम का स्मरण करके पूर्ण

445
00:33:13,880 --> 00:33:14,440
मोक्ष रूपी

446
00:33:14,440 --> 00:33:18,840
अनंत को प्राप्त हो जाता है अब इसको कौन से तत्वदर्शी मिल गए थे भैया

447
00:33:18,840 --> 00:33:23,080
अर्जुन को इनके अनुसार तो अर्जुन को तत्वदर्शी

448
00:33:23,080 --> 00:33:27,240
मिले ही नहीं इनके अनुसार तो अर्जुन को मोक्ष ही नहीं मिला था तो ये कैसे लिख

449
00:33:27,240 --> 00:33:33,160
दिया इन्होंने

450
00:33:33,160 --> 00:33:37,240
अच्छा इतनी सारी चीजें है ना कि आपको मैं बताते बताते कुछ भूल

451
00:33:37,240 --> 00:33:41,320
भी जाऊंगा इतनी सारी गड़बड़ है इनकी इनके

452
00:33:41,320 --> 00:33:45,560
उसमें कुछ भी है ही नहीं जो एक सिद्धांत पर टके हो

453
00:33:45,560 --> 00:33:49,640
क्योंकि वेदों को कहने वाला अज्ञानी है वह जानता ही नहीं पूर्ण ब्रह्म को दूसरी

454
00:33:49,640 --> 00:33:53,680
जगह कह रहे पूर्ण ब्रह्म ही वेदों को कह रहा है एक जगह कह रहे यज्ञ से

455
00:33:53,680 --> 00:33:57,960
जो है पूर्ण ब्रह्म नहीं मिलता है पूर्ण ब्रम मुक्ति नहीं मिलती है मगर दूसरी

456
00:33:57,960 --> 00:34:01,840
कह रहे कि अर्जुन को देखो मुक्ति मिल

457
00:34:01,840 --> 00:34:06,000
गई अब कोई आएगा

458
00:34:06,000 --> 00:34:10,160
नहीं और कह रहे हैं कि वेद विरुद्ध भक्ति जो है गलत

459
00:34:10,160 --> 00:34:14,280
है शास्त्र विरुद्ध भक्ति गलत है मगर फिर खुद ही कह रहे हैं कि वेदों में जो है मुक्ति का ज्ञान

460
00:34:14,280 --> 00:34:18,400
है ही नहीं वेदों में ब्रह्म की पूजा बताई गई है और ब्रह्म तुम्हें खाता है तो ब्रह्म की पूजा

461
00:34:18,400 --> 00:34:22,880
करना तो गलत है तो उसमें वेदों में गलत ज्ञान दिया गया है तो क्या है ये वेद विरोध

462
00:34:22,880 --> 00:34:27,040
सनातन विरोध क्या है ये इसको कहते हैं सनातन

463
00:34:27,040 --> 00:34:29,440
विरोध सनातन के नाम पर

464
00:34:29,440 --> 00:34:34,240
सनातन विरोध मैं सदैव यही बात कहता हूं ना

465
00:34:34,240 --> 00:34:38,360
सनातन के नाम पर सनातन विरोध अच्छा

466
00:34:38,360 --> 00:34:43,680
इनकी कॉमेडी वाली लाइन देखते जरा 179 पेज नंबर खोलिए

467
00:34:43,680 --> 00:34:48,080
जरा 179 एक कॉमेडी

468
00:34:48,080 --> 00:34:53,840
देखिए थोड़ा हस भी लिया

469
00:34:53,840 --> 00:34:58,080
करो थोड़ा हस भी लिया करो ओ अच्छा

470
00:34:58,080 --> 00:35:02,320
एक बात और है यह कहते हैं कि वेदों में प्रमाण है कबीर भगवान है जबकि यह कहते

471
00:35:02,320 --> 00:35:06,680
कि वेदों को बोलने वाला पूर्ण परमात्मा को जानता नहीं है जब वो पूर्ण परमात्मा

472
00:35:06,680 --> 00:35:12,400
को जानता नहीं है तो वह कैसे बता रहा है कि वेदों कबीर पूर्ण परमात्मा

473
00:35:12,400 --> 00:35:16,680
है या तो कबीर पूर्ण परमात्मा नहीं है या फिर वेदों को बोलने

474
00:35:16,680 --> 00:35:21,040
वाला जो है वो पूर्ण परमात्मा

475
00:35:21,040 --> 00:35:25,080
को ना जानने वाला नहीं है और यदि वो पूर्ण परमात्मा को जानने वाला है

476
00:35:25,080 --> 00:35:29,360
तो यह जो गरमा गीता की जो लिख रहा है वो अज्ञानी है व तत्वदर्शी

477
00:35:29,360 --> 00:35:33,880
नहीं है व तिरछा दर्शी है 179

478
00:35:33,880 --> 00:35:38,480
में देखिए जो गीता अध्याय न

479
00:35:38,480 --> 00:35:42,720
श्लोक 11 इनकी मूर्खता की पराकाष्ठा देखिए पराकाष्ठा

480
00:35:42,720 --> 00:35:44,480
न श्लोक 11 का

481
00:35:44,480 --> 00:35:49,520
अनुवाद दिखाइए इ सेकंड पैराग्राफ

482
00:35:49,520 --> 00:35:53,600
है गीता ये अरे अरे ऊपर चला गया वापस

483
00:35:53,600 --> 00:35:57,680
जाइए ये है ना इस पर जरा अंडरलाइन करिए इसको

484
00:35:57,680 --> 00:36:01,720
गीता अध्याय न श्लोक 11 का अनुवाद अंडरलाइन

485
00:36:01,720 --> 00:36:05,920
करिए नीरा नीरा इसको हां

486
00:36:05,920 --> 00:36:10,160
मूर्ख जन मुझको मनुष्य का

487
00:36:10,160 --> 00:36:14,200
शरीर धारण करने वाला तुच्छ जानते हैं यह इन्होंने अर्थ

488
00:36:14,200 --> 00:36:18,680
किया है क्या जानते हैं तुच्छ जानते हैं

489
00:36:18,680 --> 00:36:22,880
मूर्ख जन मुझे साधारण समझते हैं तुच्छ समझते हैं यह इन्होंने

490
00:36:22,880 --> 00:36:27,160
अर्थ कर दिया ठीक है अब मूर्खता देखिए इनकी

491
00:36:27,160 --> 00:36:31,480
मूर्ख देखिए आपका दिमाग पंचर हो जाएगा इसके नीचे भावार्थ

492
00:36:31,480 --> 00:36:36,440
देखिए क्या लिख रहे हैं दिखाइए भाई

493
00:36:36,440 --> 00:36:40,840
भावार्थ तत्व ज्ञान के अभाव से मूर्ख प्राणी मुझे सर्व

494
00:36:40,840 --> 00:36:45,760
प्राणियों का ईश्वर मानते हैं प्रभु मानते हैं यह लो

495
00:36:45,760 --> 00:36:49,920
न 11 का अर्थ करते समय कह रहे हैं कि मूर्ख मुझको तुच्छ मानते

496
00:36:49,920 --> 00:36:54,400
हैं और भावार्थ में कह रहे हैं कि मूर्ख मुझको ईश्वर मानते

497
00:36:54,400 --> 00:36:58,520
हैं क्या करोगे इसका

498
00:36:58,520 --> 00:37:03,120
क्या करोगे

499
00:37:03,120 --> 00:37:07,800
भाई चक्कर आ जाएगा इसको ज्यादा देर तक पढ़ा

500
00:37:07,800 --> 00:37:12,080
तो चलो और बताता

501
00:37:12,080 --> 00:37:16,120
हूं वेदों में महिमा पूर्ण ब्रह्म की

502
00:37:16,120 --> 00:37:20,560
है परंतु भक्ति के मंत्र यज्ञ ब्रह्म तक है

503
00:37:20,560 --> 00:37:26,560
तो इसको निकालो 181 थर्ड पैरा

504
00:37:37,440 --> 00:37:41,800
181 182 आ गया

505
00:37:41,800 --> 00:37:46,080
181 पहले तो डलाइन ही पढ़ लीजिए पवित्र वेदों के अनुसार देखिए

506
00:37:46,080 --> 00:37:50,360
कितने कितने मतलब इनको नीचता की हद है इनको

507
00:37:50,360 --> 00:37:54,440
शर्म नहीं आती पवित्र वेद और फिर वेदों के द्वारा मुक्ति नहीं

508
00:37:54,440 --> 00:37:58,200
है

509
00:37:58,200 --> 00:38:01,920
इसका थर्ड पहरा क्या

510
00:38:01,920 --> 00:38:05,960
है वेदों में महिमा तो अमर परमात्मा यानी परम अक्षर ब्रह्म

511
00:38:05,960 --> 00:38:10,280
की है परंतु भक्ति के मंत्र

512
00:38:10,280 --> 00:38:14,400
यज्ञ आदि क्रियाएं काल ब्रह्म तक है यानी

513
00:38:14,400 --> 00:38:19,280
कि वेदों का कोई भी मंत्र ऐसा नहीं है जो

514
00:38:19,280 --> 00:38:23,840
पूर्ण ब्रह्म की बात कर रहा हो ठीक है

515
00:38:23,840 --> 00:38:27,800
भक्ति की बात कर रहा पूर्ण ब्रह्म की

516
00:38:27,800 --> 00:38:32,560
अच्छा एक दसव नंबर का वो है मंत्र चौथे

517
00:38:32,560 --> 00:38:36,600
अथर्ववेद का उसके अनुसार य बोलते हैं कि उसमें जो

518
00:38:36,600 --> 00:38:41,560
है तत्वदर्शी जाने के पास जाने को कहा है जबक उसमें कहा नहीं है मगर

519
00:38:41,560 --> 00:38:45,680
यदि वेद का कोई भी मंत्र पूर्ण ब्रह्म तक जाने की जाने के लिए है ही

520
00:38:45,680 --> 00:38:50,200
नहीं तो फिर वह मंत्र भी तो नहीं है भाई

521
00:38:50,200 --> 00:38:52,960
जिससे कि तुम जाने को कह रहे

522
00:38:52,960 --> 00:38:58,960
हो वो मंत्र भी नहीं है पूण ब्रम का अच्छा

523
00:39:01,720 --> 00:39:05,960
और देखिए और इनका क्या है अब इन्होंने

524
00:39:05,960 --> 00:39:10,160
197 नंबर का पेज निकालिए

525
00:39:10,160 --> 00:39:15,000
ज

526
00:39:15,000 --> 00:39:21,000
197 लगभग 16 पेजेस आगे

527
00:39:30,160 --> 00:39:36,160
हद कर दी है इन्होंने हद हद कर रखी

528
00:39:44,360 --> 00:39:48,600
है अब भाई इन्होंने एक बात कही है

529
00:39:48,600 --> 00:39:52,600
पीछे कि वेदों के द्वारा क्या मिलेगा ब्रह्म की प्राप्ति

530
00:39:52,600 --> 00:39:56,800
होगी और यहां क्या लिखा है ब्रह्म

531
00:39:56,800 --> 00:40:00,800
काल भगवान की प्राप्ति भी असंभव है तो वेदों के द्वारा

532
00:40:00,800 --> 00:40:04,000
क्या मिलेगा

533
00:40:04,000 --> 00:40:08,040
पंचर रामपाल दास एंड कंपनी के द्वारा जो आपको ज्ञान

534
00:40:08,040 --> 00:40:12,320
मिलेगा उसके अनुसार वेदों के द्वारा आपको क्या मिलेगा

535
00:40:12,320 --> 00:40:16,440
दिमाग को पंचर करने का तरीका

536
00:40:16,440 --> 00:40:20,920
हालांकि वेद तो बहुत पवित्र है मगर इनकी

537
00:40:20,920 --> 00:40:25,040
यह जो किताबें इनको पढ़कर जरूर आप लोग एक आद बार बीच में सोचोगे कि मैं

538
00:40:25,040 --> 00:40:29,800
जो है जिन आंखों से मैंने इस पुस्तक को पढ़ा उसमें मैं हार पिक डाल लू

539
00:40:29,800 --> 00:40:34,280
या फिर ड्रिल मशीन से अपना जो भेजा है उसमें जो है होल कर

540
00:40:34,280 --> 00:40:40,280
दूं अरे भैया किसी बात पर तो टिक

541
00:40:40,560 --> 00:40:44,560
जाओ किसी एक बात पर तो खड़े हो जाओ नहीं हमने यह

542
00:40:44,560 --> 00:40:48,600
कहा है वेदों के द्वारा पूर्ण ब्रम की प्राप्ति

543
00:40:48,600 --> 00:40:52,880
संभव नहीं है मुक्ति संभव नहीं है किसकी प्राप्ति संभव है ब्रह्म की प्राप्ति

544
00:40:52,880 --> 00:40:57,640
जो घटिया है जो अपने भक्तों को खाता है

545
00:40:57,640 --> 00:41:01,960
और अंत में ब्रह्म की प्राप्ति भी असंभव है

546
00:41:01,960 --> 00:41:07,960
ठीक

547
00:41:08,760 --> 00:41:12,960
है तो यह सारी चीजें हैं कि यह कितना

548
00:41:12,960 --> 00:41:17,880
पवित्र मानते हैं इन ग्रंथों को अब हम लोग चलते

549
00:41:17,880 --> 00:41:23,880
हैं

550
00:41:24,120 --> 00:41:28,720
कि जो भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण

551
00:41:28,720 --> 00:41:32,840
ने इनको दर्शन दिए थे विराट रूप में उसमें

552
00:41:32,840 --> 00:41:36,880
जो इन्होंने कुतर्क किए हैं कि वह कृष्ण नहीं थे इस बारे में आज हम

553
00:41:36,880 --> 00:41:42,880
चर्चा कर रहे हैं तीन नंबर पेज पर चलिए तीन नंबर

554
00:42:00,760 --> 00:42:05,040
हां यही यही है जब कुरुक्षेत्र के मैदान

555
00:42:05,040 --> 00:42:09,120
में पवित्र गीता इसकी हेडिंग जरा पढ़िए क्या है इस पैराग्राफ की हेडिंग क्या

556
00:42:09,120 --> 00:42:13,560
है ऊपर जाइए

557
00:42:13,560 --> 00:42:18,120
थोड़ा हां गीता का ज्ञान श्री कृष्ण ने नहीं दिया

558
00:42:18,120 --> 00:42:23,400
ठीक है इसको पढ़ते हैं

559
00:42:23,400 --> 00:42:27,600
नीचे आइए थोड़ा बड़ा कर लीजिए स्क्रीन

560
00:42:27,600 --> 00:42:29,880
पर

561
00:42:29,880 --> 00:42:34,280
करिए जब कुरुक्षेत्र के मैदान में पवित्र गीता जी का ज्ञान सुनाते

562
00:42:34,280 --> 00:42:38,280
समय अध्याय 11 श्लोक 32 में पवित्र गीता बोलने वाले यह

563
00:42:38,280 --> 00:42:42,400
बार-बार पवित्र क्यों कह रहे हैं मालूम है आपको यह पवित्र

564
00:42:42,400 --> 00:42:46,640
इसलिए कह रहे हैं कि आपके मन में य बैठ जाए कि आपके ग्रंथों का कितना सम्मान

565
00:42:46,640 --> 00:42:50,760
करते हैं जबकि उसको लिखने वाले अज्ञानी है मूर्ख है

566
00:42:50,760 --> 00:42:55,000
उसको र उसको समझाने वाले अज्ञानी है मूर्ख है उसके

567
00:42:55,000 --> 00:43:00,320
द्वारा मुक्ति नहीं है उसमें पूर्ण ब्रह्म की बात नहीं है

568
00:43:00,320 --> 00:43:04,400
और उसके द्वारा आपको प्राप्त क्या होगा कि

569
00:43:04,400 --> 00:43:09,440
वह आपको खाएगा और यह भी हो सकता है कि वह आपको प्राप्त ना

570
00:43:09,440 --> 00:43:15,080
हो ठीक है यह सारी चार

571
00:43:15,080 --> 00:43:18,000
चीजें

572
00:43:18,000 --> 00:43:22,000
तो जब कुरुक्षेत्र के मैदान में पवित्र गीता जी

573
00:43:22,000 --> 00:43:26,320
का ज्ञान सुनाते समय अध्याय 11 श्लोक 32 में पवित्र गीता बोलने वाले प्रभु

574
00:43:26,320 --> 00:43:31,120
प्रभु कह रहा कि अर्जुन मैं बड़ा हुआ काल हूं

575
00:43:31,120 --> 00:43:35,120
अब सर्व लोकों को खाने के लिए प्रकट हुआ हूं जरा सोचे कि कृष्ण जी

576
00:43:35,120 --> 00:43:40,040
तो पहले से ही अर्जुन के साथ थे अब यहां पर देखिए

577
00:43:40,040 --> 00:43:44,280
यदि पवित्र गीता जी के ज्ञान को कृष्ण जी बोल रहे होते तो वह

578
00:43:44,280 --> 00:43:48,880
यह नहीं कहते कि मैं अब प्रवृत हुआ हूं अच्छा यह

579
00:43:48,880 --> 00:43:53,640
बताइए कोई व्यक्ति यह कब बोलेगा कि मैं बढ़ा हुआ हूं

580
00:43:53,640 --> 00:43:57,720
अगर वह कहीं और से आने वाला कोई और है तो वह यह

581
00:43:57,720 --> 00:44:01,720
बोलेगा कि मैं आया हूं कहीं से यहां पर तू अब

582
00:44:01,720 --> 00:44:05,720
तक जिससे बातें कर रहा था व कहीं और से मगर अपने

583
00:44:05,720 --> 00:44:09,920
आप को बड़ा हुआ क्यों बोलेगा क्यों क्योंकि वह अभी तक आपको सूक्ष्म

584
00:44:09,920 --> 00:44:14,240
थोड़ा छोटा दिखाई दे रहा था वही अब बड़ा हुआ बड़ा अब वो बड़

585
00:44:14,240 --> 00:44:18,800
बड़ा हो गया पहली बात

586
00:44:18,800 --> 00:44:22,800
दूसरी बात इन्होंने कहा है कि इससे सिद्ध होता है

587
00:44:22,800 --> 00:44:27,160
वही रहिए धीरे धीरे चलिए ऊपर जाइए हा

588
00:44:27,160 --> 00:44:31,360
तो जरा इससे इन्होंने यहां कहीं कहा है कि इससे सिद्ध होता है कि वह

589
00:44:31,360 --> 00:44:33,040
ज्ञान जो है पहला तर्क इन्होंने

590
00:44:33,040 --> 00:44:37,160
जो दिया है कुतर्क यह ज्ञान जो है श्री कृष्ण ने नहीं दिया

591
00:44:37,160 --> 00:44:41,640
बल्कि उनके शरीर में प्रेत वत प्रेत वत घुसकर

592
00:44:41,640 --> 00:44:45,680
ब्रह्म ने दिया है यह कहीं पर लिखा है प्रेत वत वाली बात

593
00:44:45,680 --> 00:44:50,960
प्रेत वत जैसे प्रेत किसी के शरीर में घुस जाता है वैसे

594
00:44:50,960 --> 00:44:55,240
ही जो है काल ब्रह्म ने ये ज्ञान दिया है तो सबसे

595
00:44:55,240 --> 00:45:00,080
बड़ी बात है यह प्रेत वत घुसना कहां लिखा है

596
00:45:00,080 --> 00:45:04,360
उसमें शास्त्र में कहीं लिखा है क्या प्रेत वत घुसा वो काल

597
00:45:04,360 --> 00:45:08,600
श्री कृष्ण के शरीर में दूसरी बात दूसरा

598
00:45:08,600 --> 00:45:12,600
कुतर केय करते हैं कि श्री कृष्ण कौन थे अर्जुन ने

599
00:45:12,600 --> 00:45:16,680
य कहा कि आप कौन है यहां पर इन्होने

600
00:45:16,680 --> 00:45:20,880
कुतर किया है कि उसको देखकर ऊपर जाइए भैया थोड़ा

601
00:45:20,880 --> 00:45:26,880
सा हां श्री ये दूसरी

602
00:45:28,960 --> 00:45:33,600
हां और ऊपर

603
00:45:33,600 --> 00:45:37,840
जाइए बस बस बस बस

604
00:45:37,840 --> 00:45:41,920
बस फिर अध्याय 11 श्लोक 21 में अर्जुन कह रहा है

605
00:45:41,920 --> 00:45:46,400
यह देख लो जो हमें अभी सभ्यता सिखा रहे थे ना

606
00:45:46,400 --> 00:45:50,840
वो देख लो यहां क्या क्या कहा जा रहा है अर्जुन कह रहा है काल कह रहा है

607
00:45:50,840 --> 00:45:55,000
ठीक है कह रहे होना चाहिए था

608
00:45:55,000 --> 00:45:59,440
तो सुन लो तुम्हारे वो जेल धाम निवासी की भाषा क्या है

609
00:45:59,440 --> 00:46:03,600
अर्जुन कह रहा है कि भगवन आप तो यह हैं खा रहे

610
00:46:03,600 --> 00:46:07,720
हो आपका गुणवान चरित वेदों मंत्रों द्वारा चारण कर रहे हैं

611
00:46:07,720 --> 00:46:11,720
तथा जीवन के लिए कामना कर रहे हैं कुछ आपके ये हैं

612
00:46:11,720 --> 00:46:16,000
मैं आपके इस विकराल रूप को देखकर धीरज

613
00:46:16,000 --> 00:46:20,040
नहीं धर पा रहा हूं ठीक है तो यहां पर जो इन्होंने

614
00:46:20,040 --> 00:46:24,240
यह कहा है कि वह भय खाने लगा अर्जुन जो है भय खाने लगे

615
00:46:24,240 --> 00:46:28,440
उनके रूप को देख कर के और उन्होंने आगे कहा कि महानुभाव उग्र

616
00:46:28,440 --> 00:46:33,040
रूप वाले आप कौन है मुझे बतलाइए श्री कृष्ण जी तो अर्जुन के साले थे

617
00:46:33,040 --> 00:46:37,680
श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा का विवाह अर्जुन से हुआ था क्या

618
00:46:37,680 --> 00:46:41,720
व्यक्ति अपने साले को भी नहीं जानता इससे सिद्ध है कि गीता

619
00:46:41,720 --> 00:46:43,960
का ज्ञान श्री कृष्ण ने दिया है तो सबसे पहले हम

620
00:46:43,960 --> 00:46:48,040
आश्चर्य वाली बात देख ले धर्मदास जो थे वह

621
00:46:48,040 --> 00:46:52,080
कबीर को देखकर अचरज में पड़ गए थे मुक्ति बोध का

622
00:46:52,080 --> 00:46:56,320
पेज क्रमांक निकालिए 38 आपके कंप्यूटर के अनुसार

623
00:46:56,320 --> 00:46:59,160
3

624
00:46:59,160 --> 00:47:01,640
मुक्ति

625
00:47:01,640 --> 00:47:06,000
बोध शास्त्र चेंज होगा यहां पर मुक्ति

626
00:47:06,000 --> 00:47:10,080
बोध और पेज नंबर 384 आपकी कंप्यूटर स्क्रीन

627
00:47:10,080 --> 00:47:13,760
के

628
00:47:13,760 --> 00:47:17,840
अनुसार जब धर्मदास कबीर जी को पहले से जानते थे

629
00:47:17,840 --> 00:47:23,840
तो क्यों अचरज में पढ़ रहे भाई उसे उन्हें देख कर के

630
00:47:32,280 --> 00:47:36,600
यह जो इन्होंने य चक्कर चलाया ना कि गीता जी काल ने नहीं बोली यह

631
00:47:36,600 --> 00:47:40,720
मेन जो सीन उठाया वही वाला सीन उठाया है जहां पर भगवान अपना विराट

632
00:47:40,720 --> 00:47:44,720
स्वरूप दिखाते हैं वहां इन्होंने तमाम सारे कुतर्क किए हैं उन सभी कुत

633
00:47:44,720 --> 00:47:50,000
को का आज एक एक करके सारी चीजें करने वाले

634
00:47:50,000 --> 00:47:54,120
हैं अब नहीं आएंगे वो लोग

635
00:47:54,120 --> 00:47:58,240
हम आपने पढ़ा है आ जाओ जाओ आप आ

636
00:47:58,240 --> 00:48:03,800
जाओ आपने पढ़ा है ना अच्छे से आप आ जाओ

637
00:48:03,800 --> 00:48:08,600
ऊपर डेली ब्लॉग आ जाओ

638
00:48:08,600 --> 00:48:14,600
भैया ऊपर आ जाओ क्या

639
00:48:14,800 --> 00:48:18,880
दिक्कत लिंक दे दो इनको डेली ब्लॉग वालों को

640
00:48:18,880 --> 00:48:24,880
इन्होंने अच्छे से पढ़ा

641
00:48:25,080 --> 00:48:31,080
है जरा मैं स्वरूप वाला पूरा कर लू फिर मैं लिंक देता

642
00:48:32,920 --> 00:48:37,000
हूं वो मिला आपको मुक्ति बोध नाम का जो ग्रंथ है

643
00:48:37,000 --> 00:48:41,240
उसमें लिखा है 384 नंबर पेज पर के धर्मदास कबीर को देखकर

644
00:48:41,240 --> 00:48:45,280
अचरण में पड़ गए तो पहले तो यह होना चाहिए जब मिल जाए तब बता

645
00:48:45,280 --> 00:48:49,760
देना अब मैं वापस वहीं पर आ जाता हूं जो वो पेज

646
00:48:49,760 --> 00:48:54,320
था आप एक काम करते वो पेज भी खुला रहने देते

647
00:48:54,320 --> 00:49:00,320
सारे कुतर्क वहीं पर है एक साथ

648
00:49:13,440 --> 00:49:16,280
हां

649
00:49:16,280 --> 00:49:20,440
तो अब यह श्री कृष्ण जी ने श्री

650
00:49:20,440 --> 00:49:24,560
कृष्ण कौन है यह अर्जुन ने क्यों पूछा तो पहली बात

651
00:49:24,560 --> 00:49:28,480
तो यह है कि

652
00:49:28,480 --> 00:49:34,160
अर्जुन ने उनसे यह इसलिए पूछा था

653
00:49:34,160 --> 00:49:38,480
कि वह उनका एक बढ़ा हुआ स्वरूप था जो इससे पहले उन्होंने

654
00:49:38,480 --> 00:49:43,160
कभी नहीं देखा था एक दूसरा रूप श्री कृष्ण का जो वह

655
00:49:43,160 --> 00:49:47,240
अब तक समझते थे एक सामान्य सखा भाव में जिसके लिए उन्होंने सात 24

656
00:49:47,240 --> 00:49:51,280
में भी कहा कि मुझे सामान्य मनुष्य के शरीर में देख कर के मुझे जो

657
00:49:51,280 --> 00:49:55,480
है सामान्य समझते हैं मेरे ब्रह्म भाव को नहीं समझते व मूर्ख है

658
00:49:55,480 --> 00:49:59,720
उसी तरीके से अर्जुन उनको समझता था तो इसलिए जब उन्होंने

659
00:49:59,720 --> 00:50:05,720
उनका व विकराल रूप देखा विराट रूप तो क्या

660
00:50:06,760 --> 00:50:11,160
हुआ जब उसने वह देखा तो वह चकित हुआ और चकित आपके धर्मदास

661
00:50:11,160 --> 00:50:15,240
भी हो रहे हैं कबीर को देख कर के जो जिसको पहले से जानते हैं ठीक

662
00:50:15,240 --> 00:50:19,280
है मगर अब बात यह है कि वह जो यह प्रमाण हमें और मिल

663
00:50:19,280 --> 00:50:22,800
जाता है

664
00:50:22,800 --> 00:50:28,800
कि उन्होंने जो है

665
00:50:29,960 --> 00:50:34,000
वो जो सखा वाला भाव था ना उसमें

666
00:50:34,000 --> 00:50:38,320
उत्तर था हां भगवत गीता 11वां

667
00:50:38,320 --> 00:50:44,080
अध्याय और 35 वा श्लोक इसमें इस बात का उत्तर

668
00:50:44,080 --> 00:50:50,080
है 11वां अध्याय 41 से 42 वा

669
00:50:50,800 --> 00:50:54,880
श्लोक कि अर्जुन ने यह क्यों कहा था कि मैं आप

670
00:50:54,880 --> 00:50:59,240
आप कौन हो मैं आपको पहचान नहीं पा रहा हू

671
00:50:59,240 --> 00:51:03,280
और यह पहले तो यह बताए धर्मदास ने क्यों कहा था कि मैं

672
00:51:03,280 --> 00:51:09,280
आपको पहचान नहीं पा रहा हूं तो 11वां अध्याय

673
00:51:09,280 --> 00:51:15,280
और 41 वा श्लोक 41 से

674
00:51:16,280 --> 00:51:21,040
42 देखिए आपके इस भाव को ना जानते हुए

675
00:51:21,040 --> 00:51:25,120
आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा परमाथ

676
00:51:25,120 --> 00:51:29,120
से मैंने हे कृष्ण हे यादव हे सके इस प्रकार से जो

677
00:51:29,120 --> 00:51:33,280
कुछ बिना सोचे समझे हटात का जब उन्होंने वो दर्शन कर लिए ना

678
00:51:33,280 --> 00:51:37,880
बड़े उनके वो विकराल रूप देखा विराट स्वरूप विश्वरूप

679
00:51:37,880 --> 00:51:42,600
तब उन्होंने ये बात कही कि आपके इस भाव को मैं नहीं जानता था कि आप ऐसे भी

680
00:51:42,600 --> 00:51:46,640
हैं तो जो कुछ मैंने आपको सामान्य व्यक्ति समझ कर के जो

681
00:51:46,640 --> 00:51:50,840
बोला है जो आपके सब सका भाव से बोला है उसके लिए मुझे क्षमा

682
00:51:50,840 --> 00:51:56,840
कर दीजिए तो ये उत्तर मिला आपको

683
00:51:58,400 --> 00:52:03,160
और इसमें अभी आ गया बहुत पोल खुलने वाली

684
00:52:03,160 --> 00:52:08,040
अगला कुतर्क लाइए वही पेज पर आ जाइए दोबारा गीता अध्याय

685
00:52:08,040 --> 00:52:12,080
गीता अध्याय 11 कुछ दिखा रहे थे क्या यह हमने

686
00:52:12,080 --> 00:52:16,320
अपनी गीता से दिखाया है यह जो गीता है उसमें दिखाया

687
00:52:16,320 --> 00:52:21,080
अर्जुन ने 11 अध्याय के 41 से 42 में श्लोक में इस बात को

688
00:52:21,080 --> 00:52:25,240
स्पष्ट किया है कि वो आश्चर्य चकित क्यों हुआ था

689
00:52:25,240 --> 00:52:30,920
और यह देखिए य आ गया इसमें पेज नंबर है

690
00:52:30,920 --> 00:52:35,040
384 आपकी स्क्रीन के अनुसार पीडीएफ

691
00:52:35,040 --> 00:52:39,080
के अनुसार नहीं आपकी स्क्रीन में ऊपर जो

692
00:52:39,080 --> 00:52:44,440
पेज आते हैं ना टोटल वसे इतने पेज पर है यह अभी भी आ रहे हैं

693
00:52:44,440 --> 00:52:46,840
शायद

694
00:52:46,840 --> 00:52:52,840
हां धर्मदास अचरज है

695
00:52:52,920 --> 00:52:57,720
रहेव हो गया अचरज में गए

696
00:52:57,720 --> 00:53:01,800
धर्मदास लीला देखकर आप तीन

697
00:53:01,800 --> 00:53:05,960
रूप प्रकट दिखावा एक तीन होए एक

698
00:53:05,960 --> 00:53:09,960
समावा लीला देखत लीला देखी चकित भए

699
00:53:09,960 --> 00:53:14,400
दासा पुनि विनती एक कीन प्रकासा हो

700
00:53:14,400 --> 00:53:18,400
गया अब उत्तर देना ये लीला

701
00:53:18,400 --> 00:53:22,480
देख कर के धर्मदास चकित क्यों हो रहे हैं और उसके बाद मैंने आपको उत्तर

702
00:53:22,480 --> 00:53:26,760
दे दिया वहां आपका पता नहीं उत्तर है कि नहीं मगर वहां उत्तर है

703
00:53:26,760 --> 00:53:30,880
दवा अध्याय 35 में कि वोह चकित क्यों हो रहे हैं क्योंकि उन्होंने उसका यह

704
00:53:30,880 --> 00:53:34,960
रूप इससे पहले नहीं देखा था जो विश्व रूप के रूप में ईश्वर

705
00:53:34,960 --> 00:53:38,960
को उन्होंने देखा था उस समय और तो और कई

706
00:53:38,960 --> 00:53:43,120
जगह इन्होंने खुद माना है कि वह जो काल है वह यह कहता भी है इनके

707
00:53:43,120 --> 00:53:47,600
अनुसार कि मेरा यह रूप इससे पहले किसी ने नहीं देखा है

708
00:53:47,600 --> 00:53:51,760
इस पर भी हम आएंगे तो पहली बात

709
00:53:51,760 --> 00:53:55,000
तो ये हो

710
00:53:55,000 --> 00:54:01,000
गई अच्छा अच्छा एक बात और

711
00:54:03,400 --> 00:54:08,200
है उसी पर आ जाते हैं नहीं तो चैप्टर खो

712
00:54:08,200 --> 00:54:13,000
जाएंगे अच्छा पहले किसी ने नहीं

713
00:54:13,000 --> 00:54:17,800
देखा यह काल काल ने जो है

714
00:54:17,800 --> 00:54:22,080
वहां पर श्री कृष्ण से यह कहा मतलब अगर सही भाषा

715
00:54:22,080 --> 00:54:27,320
में बोले तो जो विश्वर रूप में भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि यह जो

716
00:54:27,320 --> 00:54:31,680
रूप है मेरा यह तेरे से पहले किसी ने नहीं देखा इससे पहले किसी ने नहीं देखा

717
00:54:31,680 --> 00:54:36,000
तो वहां पर उनका कहने का अर्थ है कि जिनके पास दिव्य दृष्टि सामान्य

718
00:54:36,000 --> 00:54:40,360
जो मनुष्य है उन्होंने नहीं देखा मगर दिव्य दृष्टि युक्त

719
00:54:40,360 --> 00:54:44,960
या जो भी दिव्यता को प्राप्त होने वाले हैं वो तो देख रहे हैं अच्छा

720
00:54:44,960 --> 00:54:49,080
इसमें इन्होंने कहा कि भगवान श्री कृष्ण तो अपना विराट रूप पहले

721
00:54:49,080 --> 00:54:53,120
ही दिखा चुके थे कौरवों को भगवान श्री

722
00:54:53,120 --> 00:54:57,240
कृष्ण कौरवों को अपना यह रूप पहले ही दिखा हो गए थे

723
00:54:57,240 --> 00:55:03,240
इसके लिए हमको जाना पड़ेगा

724
00:55:08,720 --> 00:55:12,720
अ इन्होंने अपनी गीता में ही लिखा

725
00:55:12,720 --> 00:55:16,720
है गीता का ज्ञान किसने दिया पेज नंबर दो पर जाइए

726
00:55:16,720 --> 00:55:22,720
आप वहां लिखा है

727
00:55:32,160 --> 00:55:36,800
हां इससे थोड़ा ऊपर चलिए ऊपर चलिए थोड़ा थोड़ा ऊपर

728
00:55:36,800 --> 00:55:41,160
चलिए पवित्र श्रीमद भगवत गीता का ज्ञान किसने दिया ठीक है

729
00:55:41,160 --> 00:55:44,840
इसमें यह बोल रहे हैं नीचे

730
00:55:44,840 --> 00:55:48,880
जाइए कि यहां

731
00:55:48,880 --> 00:55:54,280
पर यह खुद यह बात मान रहे हैं

732
00:55:54,280 --> 00:55:58,320
कि जो श्री कृष्ण ने यहां पर रूप दिखाया

733
00:55:58,320 --> 00:56:02,480
था वो चतुर्भुज रूप था वो विश्वर रूप नहीं था विराट रूप

734
00:56:02,480 --> 00:56:06,960
नहीं था और यहां पर उन्होंने ये भी माना है कि श्री कृष्ण का चतुर्भुज

735
00:56:06,960 --> 00:56:11,120
रूप और काल का विराट रूप अलग है

736
00:56:11,120 --> 00:56:15,200
ठीक है तो अगर यह जो तर्क दे

737
00:56:15,200 --> 00:56:19,240
रहे हैं कि श्री कृष्ण का विराट रूप तो पहले ही देख लिया

738
00:56:19,240 --> 00:56:23,360
था इन्होंने यहीं पर कहीं पर तर्क दे रहे हैं इसी पेज प

739
00:56:23,360 --> 00:56:23,860
यहां पर

740
00:56:23,840 --> 00:56:28,040
तर्क दे रहे हैं कि श्री कृष्ण का विराट रूप तो पहले ही देख लिया था तो

741
00:56:28,040 --> 00:56:32,720
फिर ये यहां क्यों कह रहे हैं कि यह रूप किसी ने नहीं देखा जबकि इन्होंने खुद माना है

742
00:56:32,720 --> 00:56:36,920
कि वह जो श्री कृष्ण ने वहां जो रूप दिखाया था वह चतुर्भुज रूप था वह

743
00:56:36,920 --> 00:56:40,280
विराट रूप था ही

744
00:56:40,280 --> 00:56:44,480
नहीं पांडवों के सेंसले से श्री कृष्ण बहुत प्रसन्न हुए दुर्योधन

745
00:56:44,480 --> 00:56:48,520
ने कहा हा यहां यहां पर है श्री कृष्ण से नाराज

746
00:56:48,520 --> 00:56:52,520
होकर दुर्योधन ने सभा में हां अब

747
00:56:52,520 --> 00:56:56,960
यहां देखिए यहां पर देखिए इसका विवरण

748
00:56:56,960 --> 00:57:01,360
महाभारत में है महाभारत के अनुसार

749
00:57:01,360 --> 00:57:05,440
श्री कृष्ण ने वहां पर अपना चतुर्भुज रूप दिखाया था इस बात को यह भी

750
00:57:05,440 --> 00:57:09,720
मान रहे हैं वह विश्वरूप उन्होंने नहीं दिखाया था और

751
00:57:09,720 --> 00:57:14,080
उस रूप में और वहां पर दिखाए जाने वाले जो काल का जो विराट

752
00:57:14,080 --> 00:57:18,360
का जो ये रूप बता रहे वहां पर दिखाए जाने वाले रूप में अंतर

753
00:57:18,360 --> 00:57:22,400
हैय लोग खुद मान रहे हैं मगर फिर अपनी बात को वहां पर गलत सिद्ध कर दे रहे हैं यह कह

754
00:57:22,400 --> 00:57:26,520
कर के कि श्री कृष्ण ने तो अपना विराट रूप पहले दिखा

755
00:57:26,520 --> 00:57:30,840
दिया था श्री कृष्ण ने अपना विराट रूप नहीं चतुर्भुज रूप दिखाया था

756
00:57:30,840 --> 00:57:35,840
और चतुर्भुज रूप दोबारा से

757
00:57:35,840 --> 00:57:39,560
जब अर्जुन वहा प्रार्थना करते हैं कि आप मुझे अपना

758
00:57:39,560 --> 00:57:43,600
चतुर्भुज रूप दोबारा दिखाइए मैं आपको यह विराट

759
00:57:43,600 --> 00:57:47,840
रूप में नहीं देख पा रहा हूं तो अर्जुन जब प्रार्थना करते हैं अगले ही श्लोकों में वही

760
00:57:47,840 --> 00:57:52,000
11 अध्याय में शायद 35 में में

761
00:57:52,000 --> 00:57:56,160
11 अध्याय के 35 में में करते हैं कि भाई मुझे आप जो है चतुर्भुज रूप

762
00:57:56,160 --> 00:58:00,440
में वापस आ जाइए तब वापस भी आते हैं अर्जुन के कहने पर यानी कि

763
00:58:00,440 --> 00:58:04,480
वो जो ये बात कह रहे हैं कि पहले किसी ने नहीं देखा अच्छा एक कुतर को और कर रहे है

764
00:58:04,480 --> 00:58:08,720
कि संजय भी देख रहा है संजय भी देख रहा है दिव्य दृष्टि

765
00:58:08,720 --> 00:58:12,920
वाले देख रहे हैं मेरे भाई क्या उस समय ब्रह्मा विष्णु महेश नहीं देख रहे हैं आपके

766
00:58:12,920 --> 00:58:17,680
कबीर नहीं देख रहे हैं जो इस ग्रंथ को लिख रहा है वो नहीं देख रहा है

767
00:58:17,680 --> 00:58:21,680
सामान्य मनुष्य नहीं देख रहे हैं और अर्जुन भी तभी देख रहा है

768
00:58:21,680 --> 00:58:25,760
जब उसको दिव्य दृष्टि दी भगवान ने तो ये कुतर किनका

769
00:58:25,760 --> 00:58:31,320
हो गया

770
00:58:31,320 --> 00:58:35,640
अब इन्होंने एक कुतर्क और किया है कि पहले और बाद में कभी

771
00:58:35,640 --> 00:58:40,560
कृष्ण ने यह नहीं कहा कि वह काल

772
00:58:40,560 --> 00:58:44,800
है ठीक है श्री कृष्ण

773
00:58:44,800 --> 00:58:49,200
के शरीर में प्रेत वत यह देखिए प्रेत वत यह आ गया प्रेत वत घुसने

774
00:58:49,200 --> 00:58:53,480
का है ना प्रेत वत य कह रहे हैं ना ये

775
00:58:53,480 --> 00:58:59,480
लोग कि श्री कृष्ण के शरीर में प्रेत घुसे

776
00:59:02,280 --> 00:59:06,320
थे यह ब्रैकेट वाली चीज दिखाइए जरा

777
00:59:06,320 --> 00:59:10,840
ब्रैकेट ब्रैकेट में जो लिखा है आगे हां

778
00:59:10,840 --> 00:59:14,960
यह देखिए श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रेत वत प्रवेश करके

779
00:59:14,960 --> 00:59:18,960
अपना विराट रूप काल ने दिखाया था अब देखिए इनकी

780
00:59:18,960 --> 00:59:23,480
बातें कितनी कटती है श्री कृष्ण के शरीर में प्रेत वत प्रवेश करके

781
00:59:23,480 --> 00:59:27,720
अपना विराट रूप काल ने दिखाया था अब देखिए इनका

782
00:59:27,720 --> 00:59:33,720
कैसे यह होगा

783
00:59:33,960 --> 00:59:38,080
मामला इसी में आगे है आगे चलिए इसी

784
00:59:38,080 --> 00:59:42,400
में नीचे जाइए

785
00:59:42,400 --> 00:59:47,160
जरा आप आप आप नीचे चलिए

786
00:59:47,160 --> 00:59:51,360
हां धीरे धीरे चलिए धीरे धीरे दूसरी बात रुक जाइए मुझे पढ़ने

787
00:59:51,360 --> 00:59:55,480
दीजिए एक तो इनका वो तीन दिन का भंडारा है ना उसके कारण इनकी

788
00:59:55,480 --> 01:00:00,120
वो किताब मेरे हाथ में हार्ड कॉपी में नहीं आ रही है ऊपर जाइए

789
01:00:00,120 --> 01:00:04,240
थोड़ा इसलिए थोड़ी सी दिक्कत बस बस बस बस बस एक एक पैराग्राफ मुझे

790
01:00:04,240 --> 01:00:08,240
पढ़ लेने दीजिए दूसरी बात सिद्ध हुई की पवित्र गीता जी को बोलने वाला

791
01:00:08,240 --> 01:00:12,240
काल ब्रह्म ना की श क्योंकि कृष्ण ने पहले कभी नहीं कहा कि मैं काल

792
01:00:12,240 --> 01:00:16,520
हूं तथा बाद में भी नहीं कहा इस बारे में हम लोग प्रमाण दे चुके हैं श्री

793
01:00:16,520 --> 01:00:20,680
कृष्ण को अनेकानेक जगह काल कहा गया है श्री कृष्ण ने स्वयं भी काल कहा

794
01:00:20,680 --> 01:00:24,880
है व उद्धव से जब बात हो रही तब भी कहा है कि मैं हूं सनातन काल खूब जगह

795
01:00:24,880 --> 01:00:29,040
पर ये बात हम लोग प्रमाण चुके खैर उनके दर्शन मात्र

796
01:00:29,040 --> 01:00:33,120
को दूर दूर से क्षेत्र के स्त्री तथा पुरुष तड़पा करते थे पशु पक्षी भी उनको

797
01:00:33,120 --> 01:00:37,520
प्यार करते थे और

798
01:00:37,520 --> 01:00:41,960
सा 24 के अनुसार गीता ज्ञान दाता प्रभु ने कहा कि बुद्धिहीन जन समुदाय

799
01:00:41,960 --> 01:00:46,800
मेरे उस घटिया देख लीजिए मैं घटिया शब्द दिखा रहा था ना यह देखिए

800
01:00:46,800 --> 01:00:49,000
वेदों के द्वारा प्राप्त होने वाला जो

801
01:00:49,000 --> 01:00:52,200
ब्रह्म है वह

802
01:00:52,200 --> 01:00:56,200
घटिया घटिया अनुत्तम अटल विधान को नहीं जा घटिया शब्द

803
01:00:56,200 --> 01:01:00,200
उपयोग हुआ है कई बार मैं कभी मनुष्य की तरह किसी के सामने प्रकट नहीं

804
01:01:00,200 --> 01:01:06,160
होता मैं अपनी योग माया से छिपा रहता हूं और नीचे

805
01:01:06,160 --> 01:01:10,240
चलिए चार श्लोक नौ में कहा है कि अर्जुन मेरे जन्म कर्म दिव्य

806
01:01:10,240 --> 01:01:14,560
है ये है वो है जिस समय काल ब्रह्म ने श्री कृष्ण के शरीर से देखिए

807
01:01:14,560 --> 01:01:18,640
इनकी चोरी देखिए ये देखिए काल ब्रह्म ने श्री

808
01:01:18,640 --> 01:01:22,680
कृष्ण जी के शरीर से बाहर निकलकर अपना विराट रूप दिखाया

809
01:01:22,680 --> 01:01:27,120
था और ऊपर क्या लिख रहे हैं ऊपर जाइए अभी

810
01:01:27,120 --> 01:01:31,240
वापस श्री कृष्ण के शरीर में प्रेत वत घुस कर

811
01:01:31,240 --> 01:01:35,320
के विराट स्वरूप दिखाया था देखो श्री कृष्ण जी

812
01:01:35,320 --> 01:01:39,320
के शरीर में प्रेत वत प्रवेश करके अपना विराट रूप काल ने दिखाया

813
01:01:39,320 --> 01:01:43,360
था अब कौन सी बात मानोगे भाई कौन

814
01:01:43,360 --> 01:01:45,880
सी बात मानोगे

815
01:01:45,880 --> 01:01:49,920
आप प्रेत वत घुस करके दिखाया था या बाहर

816
01:01:49,920 --> 01:01:54,040
निकल कर दिखाया था अच्छा बाहर निकल कर दिखाया

817
01:01:54,040 --> 01:01:58,240
था आ जाते हैं एक मिनट अगर बाहर निकल के दिखाया

818
01:01:58,240 --> 01:02:02,400
को मान लेते हैं तो इसका मतलब उस समय अर्जुन

819
01:02:02,400 --> 01:02:04,880
को यह बिल्कुल फिक्स हो गया

820
01:02:04,880 --> 01:02:09,000
यह जो ज्ञान दिया जा रहा है यह काल के द्वारा दिया जा रहा है और कृष्ण अलग है

821
01:02:09,000 --> 01:02:13,440
ठीक है पहली बात बाहर निकलने की बात जो

822
01:02:13,440 --> 01:02:17,640
संजय तरा जी को यह कहानी यह जो भगवत गीता

823
01:02:17,640 --> 01:02:21,680
सुना रहे हैं क्या उन्होंने माना है कि भाई कृष्ण के शरीर

824
01:02:21,680 --> 01:02:26,040
से कोई बाहर निकला फिर उसने विराट रूप धारण किया नहीं इस बात

825
01:02:26,040 --> 01:02:30,360
का कोई प्रमाण नहीं है प्रेत वत घुसने का प्रमाण नहीं है बाहर निकलने का प्रमाण

826
01:02:30,360 --> 01:02:34,680
नहीं है ठीक है दूसरी बात

827
01:02:34,680 --> 01:02:38,960
कि क्या वहां पर ऐसा आया है कि श्री कृष्ण भी खड़े हैं और वह काल

828
01:02:38,960 --> 01:02:44,320
भी खड़ा है अलग नहीं आया तीसरी बात

829
01:02:44,320 --> 01:02:49,520
कि जब वह वापस अपने चतुर्भुज रूप में आ

830
01:02:49,520 --> 01:02:53,880
गए जब उन्होंने अपना चतुर्भुज रूप में नहीं आए

831
01:02:53,880 --> 01:02:57,920
सॉरी 1135 में नाम लेकर

832
01:02:57,920 --> 01:03:01,960
जब 11 जब 1132 में कृष्ण

833
01:03:01,960 --> 01:03:06,160
से अलग होकर के काल ने विराट रूप धारण कर लिया है 1132 में

834
01:03:06,160 --> 01:03:10,160
और सा 24 में काल यह कह चुका है कि मैं घटिया मेरा

835
01:03:10,160 --> 01:03:14,200
जो वो मेरा भाव मेरा काम करने

836
01:03:14,200 --> 01:03:18,400
का तरीका सब कुछ घटिया है ठीक है और मैं लोगों

837
01:03:18,400 --> 01:03:20,000
को खाता हूं मुझे प्राप्त करने

838
01:03:20,000 --> 01:03:24,720
पर परम गति नहीं मिलती है अमरता मिलती है कुछ समय के लिए

839
01:03:24,720 --> 01:03:30,720
अमरता मिलती है उस समय के लिए

840
01:03:32,840 --> 01:03:36,960
तो उनका वह विकराल रूप काल को कृष्ण से

841
01:03:36,960 --> 01:03:41,400
अलग देखने के बाद भी

842
01:03:41,400 --> 01:03:46,040
कृष्ण जो अर्जुन है वह क्या कर रहे हैं

843
01:03:46,040 --> 01:03:49,280
देखिए 1135

844
01:03:49,280 --> 01:03:53,720
में कृष्ण जी के वचन सुनकर जब काल

845
01:03:53,720 --> 01:03:57,760
का काल अपने रूप में आकर के विराट स्वरूप दिखा कर के उनको

846
01:03:57,760 --> 01:04:02,400
यह बोल रहा है कि मैं ऐसा हूं वैसा हूं

847
01:04:02,400 --> 01:04:08,400
क्या बोला था उन्होंने पिछले

848
01:04:08,520 --> 01:04:12,600
में हां द्रोणाचार्य और भी पितामह

849
01:04:12,600 --> 01:04:16,880
तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे

850
01:04:16,880 --> 01:04:21,080
हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार भय मत कर निसंदेह तू

851
01:04:21,080 --> 01:04:25,080
युद्ध में बैरियो को जीतेगा इसलिए युद्ध कर तो यह वचन बोल रहा

852
01:04:25,080 --> 01:04:29,280
है इस समय काल क्योंकि उसने अपना रूप धारण कर लिया है

853
01:04:29,280 --> 01:04:33,280
1132 के अनुसार मैं बड़ा हुआ काल हूं ठीक है

854
01:04:33,280 --> 01:04:37,400
और अब वो बात अब वो अपनी चीजें बोल रहा है कि तू मार वैसे भी यह कहते

855
01:04:37,400 --> 01:04:41,480
कि कृष्ण जी युद्ध नहीं कराना चाहते थे काल युद्ध कराना चाहता था तो यह जो

856
01:04:41,480 --> 01:04:45,480
बात कह रहा है यह काल कह रहा है इनके अनुसार यह जो बात

857
01:04:45,480 --> 01:04:49,560
कह रहा है य काल कह रहा है 1134 में तो अब जब यह

858
01:04:49,560 --> 01:04:53,560
बात ये काल कह रहा है तो अर्जुन तो अभी भी इनको कृष्ण कह रहे हैं

859
01:04:53,560 --> 01:04:56,480
क्या कह रहे हैं

860
01:04:56,480 --> 01:05:00,600
संजय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं तो यह नहीं बता रहे कि वहां पर काल बोल

861
01:05:00,600 --> 01:05:04,600
रहा है जो कृष्ण के बॉडी से बाहर निकला है ना बाहर निकलने

862
01:05:04,600 --> 01:05:08,880
का कोई श्लोक नहीं अंदर घुसने का कोई श्लोक नहीं और जब काल बाहर

863
01:05:08,880 --> 01:05:13,080
निकल कर के इनके अकॉर्डिंग वह विश्वरूप धारण कर करके बोल

864
01:05:13,080 --> 01:05:17,480
रहा है तो संजय बता रहे हैं 11

865
01:05:17,480 --> 01:05:21,480
अध्याय के 35 में श्लोक में केशव भगवान के इस ये

866
01:05:21,480 --> 01:05:24,640
नाम लिया है

867
01:05:24,640 --> 01:05:29,120
केशवसुत ये नाम लिया है केशव भगवान के इस वचन को

868
01:05:29,120 --> 01:05:33,680
सुनकर ठीक है नाम लिया है नाम

869
01:05:33,680 --> 01:05:38,200
इसमें हेर फेर नहीं कर पाओगे केशव और

870
01:05:38,200 --> 01:05:41,440
सुनो उसके

871
01:05:41,440 --> 01:05:44,920
बाद

872
01:05:44,920 --> 01:05:50,920
जो 35 वा श्लोक है

873
01:05:53,480 --> 01:05:58,040
शायद देखिए 35 में श्लोक में क्या है

874
01:05:58,040 --> 01:06:02,160
कि केशव भगवान के इस वचन को सुनकर आप कैसे अलग

875
01:06:02,160 --> 01:06:06,560
करोगे बात देखो केशव भगवान के इस वचन को सुनकर अत्यंत

876
01:06:06,560 --> 01:06:10,640
भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान श्री कृष्ण के पति गदगद वाणी

877
01:06:10,640 --> 01:06:14,840
से बोला कौन अर्जुन किसके प्रति बोला कृष्ण के प्रति

878
01:06:14,840 --> 01:06:18,840
किसके वचन थे केशव के वचन थे तुम जब यह कह रहे

879
01:06:18,840 --> 01:06:22,880
हो कि वोह बड़ा हुआ काल है तो बढ़ने के बाद भी वो केशव है बढ़ने के बाद

880
01:06:22,880 --> 01:06:27,240
भी वो कृष्ण है उसका अंदर घुसना सिद्ध नहीं हो रहा उसका बाहर निकलना

881
01:06:27,240 --> 01:06:31,240
सिद्ध नहीं हो रहा तुम ही कह रहे हो कि अंदर घुस कर के बड़ा हुआ तुम ही कह रहे हो कि बाहर

882
01:06:31,240 --> 01:06:34,440
निकल के बड़ा

883
01:06:34,440 --> 01:06:40,040
हुआ हद होती है दोगले पन

884
01:06:40,040 --> 01:06:42,200
की

885
01:06:42,200 --> 01:06:46,640
अच्छा श्री कृष्ण के दर्शन को सब तड़पा करते थे सामान्य

886
01:06:46,640 --> 01:06:50,840
दृष्टि से कृष्ण रूप के लिए भगवान श्री कृष्ण के दर्शन

887
01:06:50,840 --> 01:06:54,840
को सब तसा करते थे किस रूप के लिए

888
01:06:54,840 --> 01:06:58,160
जो

889
01:06:58,160 --> 01:07:02,360
जो उनका कृष्ण रूप था ना जिसको देख कर जो सबके लिए सुगम में था

890
01:07:02,360 --> 01:07:06,400
उस रूप को उस रूप के लिए सब लोग तरसा करते थे ठीक है जो आपने ये वाला

891
01:07:06,400 --> 01:07:10,400
कुतर्क किया है वहां पर कि भाई वो कृष्ण के दर्शन को तो सब

892
01:07:10,400 --> 01:07:14,560
तड़पा करते थे तो वो दर्शन को तड़पा करते थे जो उनका कृष्ण रूप था मगर

893
01:07:14,560 --> 01:07:18,600
आप ही के अनुसार उन्होंने जो चतुर्भुज रूप लिया था कौरवों के

894
01:07:18,600 --> 01:07:22,800
सामने तो उस रूप को देख कर के सब भाग गए थे तो आपका यह

895
01:07:22,800 --> 01:07:27,040
कहना भी गलत है कि अगर कृष्ण और काल एक होते तो अर्जुन डरता क्यों

896
01:07:27,040 --> 01:07:31,160
हो गया गलत आप ही कह रहे हो कि कृष्ण का चतुर्भुज रूप

897
01:07:31,160 --> 01:07:35,280
देख कर के कौरव भाग गए जरा ऊपर जरा

898
01:07:35,280 --> 01:07:41,280
लाइए वही पर जहां चल रहा था दो तीन नंबर का पेज था

899
01:07:43,680 --> 01:07:47,880
जो इन्होंने इतना दोगलापन किया है इतना दोगलापन

900
01:07:47,880 --> 01:07:52,120
किया है कोई इनकी बात इन्हीं की बात से कट रही है

901
01:07:52,120 --> 01:07:56,200
प्रेत मत घुस के बड़ा हुआ बाहर निकल के बड़ा हुआ

902
01:07:56,200 --> 01:07:59,240
किस बात को

903
01:07:59,240 --> 01:08:03,480
मानोगे जय श्री राम जी जय श्री राम जय श्री राम आवाज

904
01:08:03,480 --> 01:08:06,860
कम है आपकी संदीप जी

905
01:08:06,860 --> 01:08:11,080
[संगीत] आवाज हां यहां

906
01:08:11,080 --> 01:08:15,400
ले आए कोई ठीक हो गया

907
01:08:15,400 --> 01:08:19,720
ऊपर लाइए ऊपर मैदान जब वहां पर वो वाली बात आई थी ना कृष्ण से

908
01:08:19,720 --> 01:08:23,720
कृष्ण ने अपना विराट रूप लिया अभी जहां पर आप बारबार अंडरलाइन कर रहे

909
01:08:23,720 --> 01:08:27,760
थे अब रही सर ना ना धीमे

910
01:08:27,760 --> 01:08:32,760
आ रही है एक बार जाके आइए

911
01:08:32,760 --> 01:08:37,040
आप हां अर्जुन ने युद्ध करने से इंकार कर दिया था नीचे आइए

912
01:08:37,040 --> 01:08:41,120
नीचे आइए नीचे आइए नीचे आइए श्री कृष्ण श्री एक मिनट

913
01:08:41,120 --> 01:08:45,320
एक मिनट विचार एक मिनट विचार करले पांडवों के इस फैसले से श्री कृष्ण बहुत

914
01:08:45,320 --> 01:08:50,240
प्रसन्न हुए हां इसी में नीचे आइए इसी में नीचे आइए

915
01:08:50,240 --> 01:08:54,400
श्री कृष्ण को घेर लिया बस बस बस बस बस श्री कृष्ण को चारों तरफ

916
01:08:54,400 --> 01:08:58,480
से घेर लिया श्री जी ने जब अपना विराट रूप यह विराट रूप व वाला नहीं है

917
01:08:58,480 --> 01:09:03,000
यह चतुर्भुज रूप है य इन्होंने माना है ठीक है

918
01:09:03,000 --> 01:09:07,080
श्री कृष्ण ने जब अपना विराट रूप लिया था व चतुर्भुज रूप था यानी य वो वाला विराट

919
01:09:07,080 --> 01:09:11,120
रूप नहीं है यहां पर जो लिया है तो जिस कारण सर्व योद्धा कौरव

920
01:09:11,120 --> 01:09:15,200
डर करर भाग गए लो हो गया आप यह कुतर्क कर

921
01:09:15,200 --> 01:09:19,360
रहे हो कि श्री कृष्ण का विश्वर रूप देख कर के अर्जुन

922
01:09:19,360 --> 01:09:23,400
डर क्यों रहा है पहली बात तो तुम्हारा धर्मदास भी डर रहा है दूसरी

923
01:09:23,400 --> 01:09:27,520
बात है कि तुही यहां पर मान रहे हो कि उनका विराट रूप

924
01:09:27,520 --> 01:09:32,440
जो चतुर्भुज वाला था उसको देख कर के यहां पर कौरव भाग रहे

925
01:09:32,440 --> 01:09:36,080
हैं हो गया

926
01:09:36,080 --> 01:09:40,240
सर अध्याय 11 श्लोक 41 42 में भी अर्जुन ने

927
01:09:40,240 --> 01:09:44,240
माना है उन्होंने बोला है कि आपका यह वाला रूप मतलब

928
01:09:44,240 --> 01:09:47,800
जो मैं आपको ना अपना मैंने बता दिया 41 42 बता दिया बता दिया

929
01:09:47,800 --> 01:09:52,480
41 आपने शायद देखा नहीं वो बता दिया दे वही

930
01:09:52,480 --> 01:09:56,640
जी जी 41 42 में बता दिया कि मैं आप का यह रूप पहले कभी

931
01:09:56,640 --> 01:10:01,400
नहीं देखा है मैं आपको सामान्य समझा था यह है वो है

932
01:10:01,400 --> 01:10:05,520
तो ये जो 9 ब 11 की बात करते हैं ना व इ इसी बात के ऊपर

933
01:10:05,520 --> 01:10:09,680
भी है 9/1 की बात कर यहां पर य हो गया अब एक बात और

934
01:10:09,680 --> 01:10:14,280
है बहुत गजब की बात है वो क्या है सुन 198

935
01:10:14,280 --> 01:10:20,280
नंबर पेज दिखाइए जरा

936
01:10:33,890 --> 01:10:39,890
[संगीत]

937
01:10:51,000 --> 01:10:57,000
198 आ गया ऊपर जाइए

938
01:10:59,000 --> 01:11:03,840
जरा और ऊपर हेडिंग होगी ना

939
01:11:03,840 --> 01:11:07,880
हा देखिए काल के दर्शन वेदों से तप

940
01:11:07,880 --> 01:11:11,880
से दान से यज्ञ से आदि से नहीं है केवल अनन्य भक्ति

941
01:11:11,880 --> 01:11:16,640
से हैं तो पहला प्रश्न ये आएगा कि काल का जो रूप है

942
01:11:16,640 --> 01:11:21,560
आगे यह भी लिखा है कि काल का वास्तविक रूप तो देखने को मिलेगा ही नहीं

943
01:11:21,560 --> 01:11:25,960
देखने को क्या मिलेगा जो अनन्य भक्ति से देखने को मिलेगा वो उसका चतुर्भुज

944
01:11:25,960 --> 01:11:30,120
रूप मिलेगा देखने को तो जब काल का चतुर्भुज रूप जब

945
01:11:30,120 --> 01:11:34,160
देखने को मिलेगा काल का वास्तविक रूप देखने को मिलेगा ही नहीं

946
01:11:34,160 --> 01:11:38,320
कोई साधन ही नहीं है उसको देखने का यह भी लिखा है कि काल का कोई

947
01:11:38,320 --> 01:11:43,880
साधन नहीं है इसी में नीचे लिखा है इसी में 198 में नीचे

948
01:11:43,880 --> 01:11:48,400
जाइए थोड़ा सा थोड़ा ज्यादा नहीं और नीचे

949
01:11:48,400 --> 01:11:52,440
हां देखिए देखिए विराट रूप तो किसी भी साधना से नहीं देखा

950
01:11:52,440 --> 01:11:56,520
जा सकता जो काल का वास्तविक रूप

951
01:11:56,520 --> 01:12:00,520
लो विराट रूप किसी साधन से देखा नहीं जा सकता फिर तुम

952
01:12:00,520 --> 01:12:04,680
कह रहे हो कि वहा काल ने अपना विराट रूप दिखा दिया क्या किया

953
01:12:04,680 --> 01:12:06,040
है तुमने

954
01:12:06,040 --> 01:12:10,080
भाई इसको इसको संदीप जी आप पढ़ोगे ना आपको सर

955
01:12:10,080 --> 01:12:14,480
में दर्द हो जाएगा एक बात है ही नहीं

956
01:12:14,480 --> 01:12:19,880
कुछ नहीं है अच्छा इसके

957
01:12:19,880 --> 01:12:23,880
बाद अब सबसे बड़ी बात ये आती है कि यदि अनन्य भक्ति से

958
01:12:23,880 --> 01:12:28,080
उस रूप को मान लेते देख भी जा सकता है तो अर्जुन को आपने सा

959
01:12:28,080 --> 01:12:32,800
24 में बताया है कि मेरा यह अनुत्तम भाव मेरा घटिया भाव इसकी भक्ति कर

960
01:12:32,800 --> 01:12:37,280
मान लो थोड़ी देर के लिए तो अर्जुन ने भक्ति कब कर

961
01:12:37,280 --> 01:12:41,720
दी एक तो ना इन भक्ति कब कर दी अर्जुन ने भाई

962
01:12:41,720 --> 01:12:45,880
सर आपके तुमने अपना विराट स्वरूप दिखा दिया और जबक विराट

963
01:12:45,880 --> 01:12:49,920
स्वरूप तो तुम किसी भी कारण से दिखाते ही नहीं हो विराट रूप तो किसी भी साधना से देखा

964
01:12:49,920 --> 01:12:53,920
ही नहीं जा सकता अच्छा दूसरी

965
01:12:53,920 --> 01:12:58,160
बात कुतर करते हैं कि वो खाना खाता

966
01:12:58,160 --> 01:13:02,600
है लोगों को खाने वाला है अच्छा उसके मुंह में तुमने धृतराष्ट्र

967
01:13:02,600 --> 01:13:06,880
को देखा उसके मुंह में तुमने द्रोणाचार्य जी को देखा बाद में युद्ध

968
01:13:06,880 --> 01:13:10,160
किससे हुआ था अर्जुन

969
01:13:10,160 --> 01:13:14,200
का बाद में युद्ध किससे हुआ था मतलब वहां पर विश्व रूप

970
01:13:14,200 --> 01:13:18,560
लेकर के भगवान ने दिखाया था कि इनका उत्पत्ति स्थिति

971
01:13:18,560 --> 01:13:21,880
और समार तीनों मैं तय करता हूं

972
01:13:21,880 --> 01:13:25,920
जी उस विराट स्वरूप से भगवान अर्जुन को यह बता रहे हैं मगर

973
01:13:25,920 --> 01:13:30,080
तुम तो कह रहे हो कि नहीं वो खा रहे हैं प्राणियों को तो

974
01:13:30,080 --> 01:13:34,120
खा रहे हैं तो तरा तो उनके मुंह में था गीता का ज्ञान सुन कौन

975
01:13:34,120 --> 01:13:38,360
रहा है उन्होंने यह दिखाया था कि मैं बड़ा हुआ काल

976
01:13:38,360 --> 01:13:42,400
हूं इसका मतलब है उन्होंने अपना भविष्य काल दिखा रहे थे अपने अंदर ही सारा

977
01:13:42,400 --> 01:13:46,400
दिखा दिया देखो सारे मेरे अंदर जाएंगे तुम अपना सिर्फ तीर कमान उठा लो इसका

978
01:13:46,400 --> 01:13:50,440
मतलब भविष्य काल भी वह स्वयं भूत भविष्य वर्तमान सब वो स्वयं ही

979
01:13:50,440 --> 01:13:54,760
है व वो बता रहे थे कि भाई मैं कौन सी शक्ति हूं

980
01:13:54,760 --> 01:13:58,800
मैं वो शक्ति हू जिससे यह जगत उत्पन्न होता है जिससे

981
01:13:58,800 --> 01:14:03,080
जिससे जगत की स्थिति होती है और जिससे इस जगत का समार होता है

982
01:14:03,080 --> 01:14:07,120
मगर अगर ये बता रहे कि वो खाता है अच्छा इन्होने एक जगह ये भी

983
01:14:07,120 --> 01:14:11,120
माना है इसी ग्रंथ में कि उसको जब वो खाता है

984
01:14:11,120 --> 01:14:15,200
ना तब देखा जा सकता है जब वो प्राणियों को खाता है पहली बात तो उसको

985
01:14:15,200 --> 01:14:19,200
किसी प्रकार से देखा नहीं जा सकता अनन्य भक्ति से भी नहीं देखा

986
01:14:19,200 --> 01:14:23,600
जा सकता फिर अर्जुन को बिना अनन्य भक्ति के वो अपना रूप दिखा देता है

987
01:14:23,600 --> 01:14:27,880
वो के रूप में क पता नहीं चलता है कोई श्लोक नहीं है वो कृष्ण

988
01:14:27,880 --> 01:14:32,040
के शरीर से कब बाहर निकला कोई पता नहीं है बाहर निकल

989
01:14:32,040 --> 01:14:36,360
भी गया तब भी क तब भी अर्जुन उसको जो है कृष्ण कहते हैं

990
01:14:36,360 --> 01:14:37,800
ठीक है

991
01:14:37,800 --> 01:14:41,800
और उसका जो सबसे अविनाशी और घटिया नियम है

992
01:14:41,800 --> 01:14:46,160
ना वोह क्या है उसका वोह दिखाता हूं

993
01:14:46,160 --> 01:14:50,160
179 पेज नंबर

994
01:14:50,160 --> 01:14:56,160
179 नंबर

995
01:14:57,560 --> 01:15:02,000
उन्होंने अर्जुन को यह दिखाया कि ये ऑलरेडी ये होना है अभी जो तभी

996
01:15:02,000 --> 01:15:06,160
कर रहा है आप एक बार जाके वापस आ जाइए

997
01:15:06,160 --> 01:15:10,920
अच्छा मैं देखता हूं एक सेकंड हर हर

998
01:15:10,920 --> 01:15:14,960
महादेव हर हर महादेव पाड़ी जी कैसा चल रहा है आज का

999
01:15:14,960 --> 01:15:19,240
अरे बिल्कुल लाजवाब चल रहा है पूरा पोस्टमार्टम कर दिया आज

1000
01:15:19,240 --> 01:15:23,520
तो अरे अभी आप देखना अभी लास्ट तक तो बिल्कुल यह

1001
01:15:23,520 --> 01:15:27,000
हो जाएगा ये है क्या भाई

1002
01:15:27,000 --> 01:15:33,000
170

1003
01:15:37,840 --> 01:15:43,840
ना पीछे

1004
01:15:50,920 --> 01:15:55,640
जाइए भगवान श्री कृष्ण ने पहले कह दिया ना जो होने वाला

1005
01:15:55,640 --> 01:15:59,760
और जो हो चुका है और जो होगा उन सबको मैं

1006
01:15:59,760 --> 01:16:02,480
जानता

1007
01:16:02,480 --> 01:16:06,800
हूं इस यह मुझे नहीं लगता कि

1008
01:16:06,800 --> 01:16:11,360
जो पता नहीं क्या किसी बुद्धि वाले व्यक्ति ने इस किताब को लिखा

1009
01:16:11,360 --> 01:16:15,440
है ऐसा रायता फैलाया ना इसमें

1010
01:16:15,440 --> 01:16:19,640
जहां आप जहां जो पढ़ने लगो उसी में दिक्कत हां

1011
01:16:19,640 --> 01:16:24,000
रुक जाइए देखिए ब्रह्म काल कभी आकार

1012
01:16:24,000 --> 01:16:28,600
में नहीं आता आकार अब देखो

1013
01:16:28,600 --> 01:16:32,640
और यह देखिए नीचे लिखा है मेरा घटिया भाव पहली

1014
01:16:32,640 --> 01:16:37,800
बात तो वो ध्यान करो वेदों के द्वारा मिलने वाला जो ब्रह्म है वह घटिया

1015
01:16:37,800 --> 01:16:41,920
है सुन लो हिंदुओं जो यह सोचते हो कि यह

1016
01:16:41,920 --> 01:16:47,560
रामपाल हमको जो है सद भक्ति बता रहा है सद ग्रंथों की भक्ति बता रहा

1017
01:16:47,560 --> 01:16:51,840
है मेरा घटिया भाव

1018
01:16:51,840 --> 01:16:53,080
मैं कभी आकार

1019
01:16:53,080 --> 01:16:57,160
में नहीं आता अब मेरे भाई यह बताओ जब तुम आकार में

1020
01:16:57,160 --> 01:17:02,160
आते नहीं हो तो तुम किसी को कैसे विश्वरूप दिखा रहे

1021
01:17:02,160 --> 01:17:06,360
हो यह मेरा अविनाशी अटल नियम है मैं कभी

1022
01:17:06,360 --> 01:17:10,600
शरीर धारण करके नहीं आता लो क्या है

1023
01:17:10,600 --> 01:17:15,080
यह दो बातें हो गई ना यहां पर तो

1024
01:17:15,080 --> 01:17:18,160
यानी

1025
01:17:18,160 --> 01:17:24,160
कि यानी कि क्या हुआ कि

1026
01:17:25,000 --> 01:17:29,040
रूप में नहीं आ सकता किसी के मतलब समक्ष नहीं हो रूप में आही नहीं सकता

1027
01:17:29,040 --> 01:17:33,080
तो वो कैसे श्री कृष्ण से बाहर निकल के अगर वो वाली बात मान ले श्री कृष्ण के

1028
01:17:33,080 --> 01:17:37,400
अंदर ही है और अंदर रहकर ही वह अपना दिखा रहा है तब

1029
01:17:37,400 --> 01:17:41,680
तो एक बार को सोचा जा सकता है श्री कृष्ण बड़े हुए तब तो मान सकते हैं

1030
01:17:41,680 --> 01:17:45,800
मगर इसने तो यह माना ना कि श्री कृष्ण के शरीर से बाहर निकल के उसने अपना रूप

1031
01:17:45,800 --> 01:17:50,360
दिखाया दूसरी बात बिना भक्ति के क्यों दिखा दिया

1032
01:17:50,360 --> 01:17:54,840
अनन्य भक्ति कहां है कब कर दी अर्जुन ने

1033
01:17:54,840 --> 01:17:58,920
अर्जुन जब तुमको जान गया तब भी तुमको कृष्ण क्यों कह रहा है काल क्यों नहीं कह रहा

1034
01:17:58,920 --> 01:18:03,000
है संजय तो जान गया संजय तो सब कुछ देख

1035
01:18:03,000 --> 01:18:07,840
रहे हैं ना वहां पर जो धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं

1036
01:18:07,840 --> 01:18:12,120
हद होती है दोगले पन की हद अर्जुन

1037
01:18:12,120 --> 01:18:16,120
जी को पता नहीं चला पर हां 6000 साल बाद

1038
01:18:16,120 --> 01:18:20,120
रामपाल जी को पता चल गया कि वह काल है ये

1039
01:18:20,120 --> 01:18:24,160
लोग गजब का लॉजिक है एक लॉजिक इनका और है

1040
01:18:24,160 --> 01:18:28,320
कि वहां पर जब उन्होंने यह कहा कि तेरे अतिरिक्त इस रूप को किसी ने नहीं देखा

1041
01:18:28,320 --> 01:18:32,400
है मगर संजय तो देख रहा है भाई और भी बहुत से लोग देख

1042
01:18:32,400 --> 01:18:36,440
रहे थे ना जो इस गाथा को लिख रहे हैं वह भी देख रहे हैं ब्रह्मा

1043
01:18:36,440 --> 01:18:40,000
विष्णु महेश देख रहे हैं मां भगवती देख रही है अर्जुन

1044
01:18:40,000 --> 01:18:44,040
भी तब देख रहा है जब उसको दिव्य दृष्टि मिली है संजय भी तब देख रहा है उसको दिव्य

1045
01:18:44,040 --> 01:18:48,160
दृष्टि मिली है मगर कौन-कौन उस रूप

1046
01:18:48,160 --> 01:18:52,240
को देख पा रहा है इस बात से इसका क्या संबंध है कि वो ब्रह्म जो

1047
01:18:52,240 --> 01:18:56,800
काल है वो कृष्ण से अलग है यह देख लो

1048
01:18:56,800 --> 01:19:01,080
वेदों की वेदों की वेदों के अनुसार चलोगे तो तुमको

1049
01:19:01,080 --> 01:19:05,120
ब्रह्म काल अंत में खाएगा क्योंकि वेदों के द्वारा किसकी पूजा

1050
01:19:05,120 --> 01:19:09,200
बताई है ब्रह्म की पूजा और इनके अनुसार वेद विरुद्ध भक्ति

1051
01:19:09,200 --> 01:19:13,720
जो करते हैं वोह गलत होते हैं कौन सी बात पकड़ोगे इनकी भाई

1052
01:19:13,720 --> 01:19:17,720
हर लाइन का कांट्रडिक्शन इ इन्हीं के अनुसार है नीचे ये

1053
01:19:17,720 --> 01:19:21,720
कमेंट्स कर रहे होंगे कि वेद वेद को पढ़ने वाले

1054
01:19:21,720 --> 01:19:27,720
वेद को समझना और गीता को समझना बच्चों का खेल नहीं है

1055
01:19:28,840 --> 01:19:34,840
अच्छा एक बात और है यह भी

1056
01:19:37,040 --> 01:19:42,200
समझिए 198 नंबर का पेज जरा

1057
01:19:42,200 --> 01:19:48,200
निकालिए 198

1058
01:20:05,920 --> 01:20:09,960
फट पैरा हां इसके दर्शन बहुत ही दुर्लभ है देवता

1059
01:20:09,960 --> 01:20:14,440
भी इस रूप के दर्शन को सदा तरसते हैं यह चतुर्भुज हां

1060
01:20:14,440 --> 01:20:18,680
यह वेदों में वर्णित विधि से ना तप से ना दान से ना यज्ञ

1061
01:20:18,680 --> 01:20:23,440
से देखा जा सकता है समझ गए वेदों के

1062
01:20:23,440 --> 01:20:29,440
पहले कहेंगे ब दीजिए

1063
01:20:30,920 --> 01:20:36,520
इसको पहले कहेंगे हमारी मेन स्क्रीन ले आइए

1064
01:20:36,520 --> 01:20:40,960
आप मेन स्क्रीन ले आइए पहले कहेंगे

1065
01:20:40,960 --> 01:20:45,160
कि वेदों के द्वारा पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति नहीं है पहले सबसे पहले समझिए वेदों

1066
01:20:45,160 --> 01:20:49,640
में ये कहेंगे वेदों में पूर्ण ब्रह्म का ज्ञान नहीं है

1067
01:20:49,640 --> 01:20:53,720
और सबसे पहली लाइन तो ये कहेंगे वेदों में पूर्ण ब्रह्म का ज्ञान है मैं भी आप ही की तरह

1068
01:20:53,720 --> 01:20:57,840
बात कर रहा हूं अगर कोई रामपाल वालों का फलो रामपाल का फॉलोअर को सुन रहा हो तो मैं इस

1069
01:20:57,840 --> 01:21:01,880
समय आप ही की भाषा में बात कर रहा हूं आप चार तरह की बात करते हो तो मुझे चार तरह

1070
01:21:01,880 --> 01:21:06,080
की बात करनी पड़ रही है तो सबसे पहले कहेंगे वेदों में पूर्ण

1071
01:21:06,080 --> 01:21:10,360
ब्रह्म का ज्ञान तो है महिमा तो है मगर उसको प्राप्त करने की विधि

1072
01:21:10,360 --> 01:21:14,560
नहीं है ठीक है मान लिया उसके

1073
01:21:14,560 --> 01:21:18,720
बाद कहेंगे कि वेदों का ज्ञान जिसने दिया है ना वो पूर्ण ब्रहम को जानता ही नहीं है अरे

1074
01:21:18,720 --> 01:21:24,720
भाई जब वो नहीं जानता है पूर्ण ब्रह्म को तो उसका ज्ञान कहां से आ जाएगा वेदों में

1075
01:21:24,760 --> 01:21:28,840
जब वेद और गीता को बोलने वाला पूर्ण ब्रह्म को जानता ही नहीं है तो पूर्ण

1076
01:21:28,840 --> 01:21:33,000
ब्रह्म का ज्ञान कहां से आ गया वेद और गीता में फिर क्या हुआ कि इसका

1077
01:21:33,000 --> 01:21:37,120
मतलब तुम जो ये ताल ठोकते हो कि वेदों में प्रमाण है कबीर भगवान है वो गलत

1078
01:21:37,120 --> 01:21:41,200
है क्योंकि वो जिसने कबीर वहां कहा है आपके

1079
01:21:41,200 --> 01:21:45,200
अनुसार वो कबीर जो है

1080
01:21:45,200 --> 01:21:49,280
वो पूर्ण ब्रह्म नहीं है क्योंकि वो वो तो कहने वाला खुद कह रहा है मैं जानता ही नहीं हूं

1081
01:21:49,280 --> 01:21:53,560
पूर्ण ब्रह्म कौन है वेद को कहने वाला पहली बात

1082
01:21:53,560 --> 01:21:57,640
फिर आगे कहेंगे वेद के द्वारा किसकी किसकी पूजा होती

1083
01:21:57,640 --> 01:22:01,840
है वेद के द्वारा ब्रह्म की पूजा होती है अच्छा उस पूजा से क्या मिलता

1084
01:22:01,840 --> 01:22:06,120
है कुछ देर के लिए अमरता मिलती है अच्छा

1085
01:22:06,120 --> 01:22:10,400
अमरता कुछ देर के लिए होती है परम गति मेरी वाली कौन सी वाली जिसमें

1086
01:22:10,400 --> 01:22:14,400
मैं खाता हूं जिसमें मैं अपना उल्लू सीधा करता हूं यही भाषा है वहा

1087
01:22:14,400 --> 01:22:17,800
प उल्लू सीधा करता हूं

1088
01:22:17,800 --> 01:22:21,840
अच्छा और फिर बाद में यह भी कह दिया कि नहीं नहीं वेद से तो

1089
01:22:21,840 --> 01:22:24,720
ब्रह्म भी नहीं मिलता

1090
01:22:24,720 --> 01:22:29,160
वेद से मिलता क्या है मेरे भाई कुछ तो बता दे

1091
01:22:29,160 --> 01:22:33,400
कुछ नहीं घुमा फिरा के ंग बंग डंग श यह

1092
01:22:33,400 --> 01:22:37,520
करके वेद से बाहर निकलो घुमा फिरा के गीता में

1093
01:22:37,520 --> 01:22:39,800
एंग बंग डंग श करके गीता से

1094
01:22:39,800 --> 01:22:44,040
बाहर निकलो यह है पूरा प्रोपेगेंडा ये वेद

1095
01:22:44,040 --> 01:22:48,360
वेद की बात कर कर के गीता की बात कर कर के गीता से बाहर निकलो वेद

1096
01:22:48,360 --> 01:22:52,440
से बाहर निकलो अच्छा इनका एक भांडा और

1097
01:22:52,440 --> 01:22:58,080
फोड़ता हूं मैं

1098
01:22:58,080 --> 01:23:03,080
सबसे पहले हम यह देख ले किय यज्ञ का मतलब क्या मानते

1099
01:23:03,080 --> 01:23:07,840
हैं तो चावा पेज

1100
01:23:07,840 --> 01:23:13,840
निकालिए 4 वा पेज

1101
01:23:15,400 --> 01:23:19,960
निकालिए अर्जुन को मोक्ष मिल गया बिना तत्वदर्शी संत के

1102
01:23:19,960 --> 01:23:24,480
अर्जुन ने तो कहीं नहीं जपा कबीर कबीर जपा क्या

1103
01:23:24,480 --> 01:23:28,800
फिर ये अर्जुन को मोक्ष दिला रहे हैं अच्छा यज्ञों से मोक्ष नहीं मिलता वेदों से मोक्ष

1104
01:23:28,800 --> 01:23:34,240
नहीं मिलता मगर अर्जुन को यज्ञ करने से पूर्ण परमात्मा मोक्ष मिल

1105
01:23:34,240 --> 01:23:39,000
गया अच्छा ये लोग बोलते हैं कि पांडवों को मोक्ष नहीं मिला

1106
01:23:39,000 --> 01:23:43,000
महाभारत पढ़िए तो सही अरे भाई अरे खुद ही खुद ही बोल रहे

1107
01:23:43,000 --> 01:23:48,960
हैं मिला अर्जुन को मोक्ष मिला खुद ही बोल रहे

1108
01:23:48,960 --> 01:23:54,960
हैं हां अभी तुम्हारे तत्वदर्शी की पोल खोल रहा हूं रुको

1109
01:23:54,960 --> 01:23:59,560
अभी तुम्हारे तत्वदर्शी की पोल खोल रहा हूं रुक जाओ उसी पोल खोल रहा हूं

1110
01:23:59,560 --> 01:24:03,960
40 नंबर का पेज है इसमें पहले पैराग्राफ में फोर्थ

1111
01:24:03,960 --> 01:24:07,960
लाइन यज्ञ यज्ञ में कौन-कौन से यज्ञ है धर्म

1112
01:24:07,960 --> 01:24:12,240
यज्ञ जरा ब्लू कर दीजिए धर्म यज्ञ हवन

1113
01:24:12,240 --> 01:24:16,360
यज्ञ ध्यान यज्ञ प्रणाम

1114
01:24:16,360 --> 01:24:21,800
यज्ञ और लास्ट में ज्ञान यज्ञ ठीक

1115
01:24:21,800 --> 01:24:27,040
है अच्छा तो यज्ञ

1116
01:24:27,040 --> 01:24:31,200
से ऊपर जाइए जरा ऊपर जाइए इसी की हेडिंग क्या लिखी है जरा

1117
01:24:31,200 --> 01:24:35,960
पढ़िए जरा यज्ञ से वो नहीं मिलता हां

1118
01:24:35,960 --> 01:24:40,160
यज्ञ से मुक्ति नहीं मिलती पढ़ लीजिए भाई य

1119
01:24:40,160 --> 01:24:45,160
यज्ञ से मुक्ति नहीं मिलती अभी तुम्हारे तत्वदर्शी की बैंड बजेगी

1120
01:24:45,160 --> 01:24:49,240
अब यज्ञ से मुक्ति नहीं मिलती और यज्ञ में

1121
01:24:49,240 --> 01:24:53,800
पांचों यज्ञ है धर्म यज्ञ और लास्ट में ज्ञान यज्ञ भी है अच्छा

1122
01:24:53,800 --> 01:24:58,440
अब 434 पर चलते हैं भगवत गीता 434

1123
01:24:58,440 --> 01:25:04,440
तो भगवत गीता 434 मैं यहां से दिखा देता

1124
01:25:04,880 --> 01:25:10,080
हूं भगवत गीता 4 34 में

1125
01:25:10,080 --> 01:25:14,760
क्या कह रहे हैं

1126
01:25:14,760 --> 01:25:19,920
इस ये तो कहीं के नहीं रहे जो मैंने इनकी गीता पढ़

1127
01:25:19,920 --> 01:25:25,920
ली आपने तो खोल दि अध

1128
01:25:28,040 --> 01:25:32,040
देखिए अध्याय तीन चार पाच कर्म योग और सांख्य योग

1129
01:25:32,040 --> 01:25:36,160
के बारे में पूरा सुनिए अध्याय 4

1130
01:25:36,160 --> 01:25:40,280
33 में भगवान कह रहे हैं कि ज्ञान

1131
01:25:40,280 --> 01:25:44,520
यज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है ठीक है बिल्कुल इन्होंने

1132
01:25:44,520 --> 01:25:49,400
माना यज्ञों से मुक्ति नहीं मिलती

1133
01:25:49,400 --> 01:25:53,400
में भगवान ने कहा ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है यानी यज्ञ श्रेष्ठ

1134
01:25:53,400 --> 01:25:57,680
है और उसका ज्ञान तू तत्वदर्शी से ले भगवान

1135
01:25:57,680 --> 01:26:01,880
ने नहीं कहा पूर्ण परमात्मा का ज्ञान तत्वदर्शी से ले भगवान ने क्या

1136
01:26:01,880 --> 01:26:06,880
कहा यज्ञ का ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है उसका ज्ञान तू तत्वदर्शी से

1137
01:26:06,880 --> 01:26:11,160
ले तो तत्वदर्शी आपको कौन सा ज्ञान बताएगा गीता के

1138
01:26:11,160 --> 01:26:15,200
अनुसार यज्ञ का ज्ञान यज्ञ

1139
01:26:15,200 --> 01:26:20,790
का ज्ञान बताएगा और ये लिख रहे हैं कि यज्ञ से मुक्ति नहीं

1140
01:26:20,790 --> 01:26:26,790
[संगीत] मिलती यानी कि

1141
01:26:27,560 --> 01:26:31,680
यानी कि यज्ञ से जब मुक्ति नहीं मिलती है मान

1142
01:26:31,680 --> 01:26:36,400
लिया तो यज्ञ का ज्ञान देने वाला आपका पूर्ण गुरु भी नहीं हुआ

1143
01:26:36,400 --> 01:26:40,520
क्योंकि पूर्ण परमात्मा को बताने वाला नहीं है वो वो क्या वो क्या ज्ञान दे रहा है

1144
01:26:40,520 --> 01:26:44,560
आपको यज्ञ का ज्ञान दे रहा है यज्ञ और आप खुद ही

1145
01:26:44,560 --> 01:26:48,760
कह रहे हो यज्ञ से मुक्ति नहीं

1146
01:26:48,760 --> 01:26:52,920
होती तो यह हो गया इसको हम लोग एक बुक बना देंगे

1147
01:26:52,920 --> 01:26:57,320
कुछ दिनों में और उसको प्रकाशित करवा के संदीप जी

1148
01:26:57,320 --> 01:27:01,440
आप लोग मिलकर के उसको पब्लिश करवा के और जो है सर्कुलेट कर

1149
01:27:01,440 --> 01:27:05,600
दीजिएगा इसको अभी इतना जो अध्ययन किया है ना मैंने इसम मेरा भेजा फ्राई

1150
01:27:05,600 --> 01:27:10,160
हो गया बिल्कुल जो अभी पिछले तीन दिन तीन बार किया है आज

1151
01:27:10,160 --> 01:27:14,240
आज ज्यादा किया है पूरे दिन हर बात को बदल दिया अपनी ही कही

1152
01:27:14,240 --> 01:27:18,320
हुई बात को हर बात को बदला है हर बात को प्रत्येक बात आप देखो

1153
01:27:18,320 --> 01:27:22,520
ना एक बड़ा इंपोर्टेंट मैटर हमने उठाया था अभी वो जो जब आपने

1154
01:27:22,520 --> 01:27:26,560
कहा था जब ये बूढ़े हो जाते हैं तो ये लोग कहते वो लीला कर

1155
01:27:26,560 --> 01:27:30,640
रहे हैं तो क्या श्री कृष्ण जी लीला नहीं कर सकते उन्होंने जो

1156
01:27:30,640 --> 01:27:34,680
बकल बिल्कुल बिल्कुल उसमें तो इनकी छुट्टी हो गई व अजर

1157
01:27:34,680 --> 01:27:37,840
का जवाब नहीं था इनके

1158
01:27:37,840 --> 01:27:41,840
पास आप देख नहीं रहे वो लीला इन्होने माननी नहीं है

1159
01:27:41,840 --> 01:27:45,960
जो हमारे भगवान कर रहे वो लीला नहीं मानेंगे कबीर दास ने कर दी वो लीला वही

1160
01:27:45,960 --> 01:27:49,960
बात है वही बात है जैसे स्न वाले करते हैं शिवजी

1161
01:27:49,960 --> 01:27:54,440
करे तो वो सत्य है और भगवान श्री

1162
01:27:54,440 --> 01:27:58,640
कर तो लीला है ऐसे ही ये लोग करते हैं कृष्ण ब्रह्मा विष्णु महेश करें

1163
01:27:58,640 --> 01:28:02,760
तो वो सत्य है और कबीर करेंगे तो वो लीला है तुम करो

1164
01:28:02,760 --> 01:28:07,800
तो लीला हम करे तो करेक्टर ला

1165
01:28:07,800 --> 01:28:11,840
ली अच्छा जो इकोन की जो भागत तो भाई ज्ञान

1166
01:28:11,840 --> 01:28:15,960
यज्ञ जो है वो यज्ञ में से एक है और इन्होंने कहा कि यज्ञ से मुक्ति

1167
01:28:15,960 --> 01:28:20,120
नहीं मिलती ठीक है तो ज्ञान यज्ञ का ज्ञान देने वाला इन्होंने कहा

1168
01:28:20,120 --> 01:28:24,240
है वो चा 34 में वो तत्वदर्शी है पूर्ण ब्रह्म की जानकारी देने वाला नहीं ज्ञान

1169
01:28:24,240 --> 01:28:28,240
यज्ञ का अब ज्ञान यज्ञ यदि अलग हो पूर्ण ब्रम की बात करने वाला अलग

1170
01:28:28,240 --> 01:28:32,280
हो मगर इन्होने ज्ञान यज्ञ को यज्ञ में स्वीकार किया है

1171
01:28:32,280 --> 01:28:36,280
हमने पहले दिखा दिया यज्ञ में क्या क्या है और इन्होंने कहा कि

1172
01:28:36,280 --> 01:28:40,440
यज्ञ से पूर्ण मुक्ति नहीं मिलती यानी कि मुक्ति का ज्ञान

1173
01:28:40,440 --> 01:28:44,480
नहीं है तत्वदर्शी के पास गीता के अनुसार और भी सिद्ध हो जाता है जब

1174
01:28:44,480 --> 01:28:48,800
हम 15 एक पढ़ते हैं तो उसमें कहते कि अगर 15 एक के अनुसार वो तत्वदर्शी

1175
01:28:48,800 --> 01:28:52,840
है तो वेदों को जानने वाला है और वेदों के अनुसार भी मुक्ति नहीं है

1176
01:28:52,840 --> 01:28:55,840
तुम ने कहा

1177
01:28:55,840 --> 01:29:00,560
अब यह मैंने बताया क्यों आपको पता है यह इसलिए बताया य आपको

1178
01:29:00,560 --> 01:29:05,000
कि जब हम यह कह देते हैं कि वेद में कुछ नहीं है वेद में कुछ नहीं है

1179
01:29:05,000 --> 01:29:09,040
वेद से ब्रह्म मिलेगा ब्रह्म तुमको खा जाएगा ब्रह्म भी नहीं मिलेगा पूर्ण ब्रह्म भी

1180
01:29:09,040 --> 01:29:13,200
नहीं मिलेगा कुछ नहीं मिलेगा धर्म भी नहीं मिलेगा कुछ नहीं है

1181
01:29:13,200 --> 01:29:17,560
वो जो महाभारत का युद्ध हुआ था उसके लिए भी उन्होने लिख दिया वो धर्म युद्ध नहीं था

1182
01:29:17,560 --> 01:29:21,920
क्या कहो हमारा कोई भी धर्म ग्रंथ धार्मिक

1183
01:29:21,920 --> 01:29:26,160
है ही नहीं नाटक हैको धार्मिक मानने का पवित्र मानने

1184
01:29:26,160 --> 01:29:30,200
का सद ग्रंथ मानने का ये कहते श्री कृष्ण जी ने युद्ध करवा

1185
01:29:30,200 --> 01:29:34,480
के इतने लोग कटवा दिए और इसने रामपाल ने अपनी बुक में लिखा हुआ है के

1186
01:29:34,480 --> 01:29:38,640
इसके 64 लाख शिष्यों को जो है नरक प्राप्त हुआ था कबीर दास की भक्ति

1187
01:29:38,640 --> 01:29:43,040
करने से इसकी बुक में लिखा हुआ है पेज नंबर चार प ज्ञान गंगा में

1188
01:29:43,040 --> 01:29:47,760
और मैं आपको बता दूं एक जो डेढ़ सवा डेढ़

1189
01:29:47,760 --> 01:29:51,840
क्या कितने एक लाख आत्माओं को वो रोज खा रहा है वो

1190
01:29:51,840 --> 01:29:56,120
किसकी परमिशन किसकी आज्ञा से खा रहा है नहीं आ आत्मा

1191
01:29:56,120 --> 01:30:00,200
इनको ये पूछो आत्मा को खाने से क्या होगा आत्मा तो अजर अविनाशी है उसको

1192
01:30:00,200 --> 01:30:04,200
खाने से क्या हो जाएगा और सुनो और सुनो और मैं बताऊ एक बात

1193
01:30:04,200 --> 01:30:08,080
आपको ये कह रहे हैं रामायण में इनको असली

1194
01:30:08,080 --> 01:30:13,800
अभी श मुक्ति बोध दिखाइए जरा मुक्ति बोध 351 पेज

1195
01:30:13,800 --> 01:30:18,080
नंबर मुक्ति बोध हम केवल उन किताबों

1196
01:30:18,080 --> 01:30:22,240
को पकड़ रहे हैं जिसको इन्होंने लिख दिया अपने से मतलब हम लोग

1197
01:30:22,240 --> 01:30:26,560
कबीर दास और ये जो कबीर सागर और कबीर वाणी गरीब

1198
01:30:26,560 --> 01:30:30,720
दास इनको भी नहीं उठा रहे क्योंकि इनको भी उठा के लाएंगे तो उसम कह सकते हैं कि मिलावट

1199
01:30:30,720 --> 01:30:34,720
है जो इन्होने खुद लिखी है किताबें हम उनमें से

1200
01:30:34,720 --> 01:30:37,440
दिखा रहे

1201
01:30:37,440 --> 01:30:41,720
हैं 367 है मुक्ति बोध में आपना ज्ञान

1202
01:30:41,720 --> 01:30:45,840
गंगा पेज ं चा आपकी कपर

1203
01:30:45,840 --> 01:30:50,240
स्क्रीन के अनुसार हा पीछे जाइए नहीं नहीं आपकी कंप्यूटर

1204
01:30:50,240 --> 01:30:54,360
की स्क्रीन क्या कह रही है ऊपर हा

1205
01:30:54,360 --> 01:30:58,400
ये 351 होना चाहिए य प एक

1206
01:30:58,400 --> 01:31:03,120
ना ज्ञान गंगा का नंबर च लिखा हुआ है कि

1207
01:31:03,120 --> 01:31:08,240
जो युद्ध है वह कबीर ने करवाया था जो रामायण का युद्ध

1208
01:31:08,240 --> 01:31:13,520
है

1209
01:31:13,520 --> 01:31:17,600
हा मुझसे उत्पन्न है सब कुछ ऐसे कुछ कह रहे

1210
01:31:17,600 --> 01:31:21,800
हैं सूर उत्पन्न किए धरती पर चले वेधारी

1211
01:31:21,800 --> 01:31:26,160
परमेश्वर दिखाई नहीं देता उत्पन्न शरीर प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है तो निराकार है

1212
01:31:26,160 --> 01:31:30,280
आपने ही मुझे भेजा था आप एक बार चेक करो

1213
01:31:30,280 --> 01:31:34,520
आपको ना सुन के हंसी आएगी एक बात बड़ी इंपोर्टेंट बताता हूं आपको ये लोग कहते

1214
01:31:34,520 --> 01:31:38,640
हैं कि जो मारता है ना वो परमात्मा नहीं हो सकता

1215
01:31:38,640 --> 01:31:42,720
श्री कृष्ण जी को उन्होने उन्होंने मारा तो इस कर परमात्मा नहीं फिर दूसरी तरफ

1216
01:31:42,720 --> 01:31:46,920
कहेंगे कि कबीर दास ने हिरना कश्यप को मार दिया अबे साले दोलो एक तरफ

1217
01:31:46,920 --> 01:31:51,200
से बात कर लो क्या बोल रहे हो नहीं वर्ड

1218
01:31:51,200 --> 01:31:57,200
का ध्यान रखिए जी जी जी जी

1219
01:31:59,400 --> 01:32:03,480
उनको हमने आज क्या क्या जाना वेद और गीता

1220
01:32:03,480 --> 01:32:07,800
से मुक्ति नहीं मिलेगी वेद और गीता में पूर्ण परम ब्रह्म का ज्ञान भी नहीं

1221
01:32:07,800 --> 01:32:11,800
है और वेद और गीता को फॉलो

1222
01:32:11,800 --> 01:32:17,240
करने वाला ब्रह्म की साधना करता है ब्रह्म कौन है घटिया

1223
01:32:17,240 --> 01:32:21,880
और ये ये सिखाते हैं जनता को सर

1224
01:32:21,880 --> 01:32:26,320
पवित्र करके ये देखिए मैंने रामचंद्र के

1225
01:32:26,320 --> 01:32:31,280
पूर्व जन्म के संस्कार के कारण उसकी गुप्त सहायता की थी समुद्र का पलपल

1226
01:32:31,280 --> 01:32:35,280
देखिए इनकी तमीज देखिए रामचंद्र के

1227
01:32:35,280 --> 01:32:39,400
उसके है ना और आगे चलकर के इन्होने ये यहां

1228
01:32:39,400 --> 01:32:43,440
स्वीकार किया है कि कबीर जो है उन्हीं ने उसने

1229
01:32:43,440 --> 01:32:48,000
ही कबीर ने ही रामायण का युद्ध करवाया था बो

1230
01:32:48,000 --> 01:32:52,680
खैर तो हमने सूत्रा क्मक शैली में जान ले आज क्या सीखा है कि वेद

1231
01:32:52,680 --> 01:32:58,680
वेद और गीता को गीता में पूर्ण ब्रह्म का ज्ञान नहीं है मुक्ति नहीं है

1232
01:32:59,040 --> 01:33:03,160
और हां वेद ठीक है हटा लीजिए

1233
01:33:03,160 --> 01:33:07,520
अब वेद और गीता में पूर्ण ब्रह्म का ज्ञान नहीं है मुक्ति

1234
01:33:07,520 --> 01:33:11,720
का ज्ञान नहीं है और उस उस वो परम ब्रह्म

1235
01:33:11,720 --> 01:33:15,760
तक वो परम ब्रह्म की बात नहीं करते वो ब्रह्म की बात करते हैं पूर्ण पूर्ण ब्रह्म की

1236
01:33:15,760 --> 01:33:20,360
बात नहीं करते एक एक और कैरेक्टर पकड़ रखा है परम ब्रह्म अलग है

1237
01:33:20,360 --> 01:33:25,080
ब्रह्म अलग है परम ब्रह्म अलग है पूर्ण ब्रह्म अलग है तो

1238
01:33:25,080 --> 01:33:29,240
वेद गीता में पूर्ण ब्रह्म नहीं है पूर्ण मुक्ति नहीं है और

1239
01:33:29,240 --> 01:33:33,360
क्या है कि ब्रह्म की साधना है ब्रह्म क्या है कि वो घटिया है

1240
01:33:33,360 --> 01:33:37,560
और अश्र है और उसकी भक्ति

1241
01:33:37,560 --> 01:33:41,560
करने से उसकी जो उसकी वाली जो परम गति

1242
01:33:41,560 --> 01:33:45,720
है उसकी वाली परम गति प्राप्त होगी कुछ समय के लिए अमरता प्राप्त होगी

1243
01:33:45,720 --> 01:33:50,640
उसके बाद आपको फिर वो कच्चा चवा जाएगा और

1244
01:33:50,640 --> 01:33:54,760
और फिर उसके बाद थोड़ी देर बाद वो भी नहीं प्राप्त होगी उसको प्राप्त नहीं किया

1245
01:33:54,760 --> 01:33:59,120
जा सकता असंभव है वेद गीता के अनुसार ठीक है अब अब

1246
01:33:59,120 --> 01:34:03,760
अब इनको ना संपूर्ण ब्रह्म की वो बताओ पूर्ण तो पूर्ण तो इनको पता लगे गया संपूर्ण

1247
01:34:03,760 --> 01:34:09,760
ब्रह्म का नहीं पता इनको तो ये

1248
01:34:09,840 --> 01:34:13,960
इसके आप आप ब्लॉक तो नहीं है किसी ने आपको

1249
01:34:13,960 --> 01:34:14,460
ब्लॉक

1250
01:34:14,280 --> 01:34:18,200
नहीं किया

1251
01:34:18,200 --> 01:34:22,960
है तो ये एक बात मालूम पड़ी और इनका जो कुतर्क थे

1252
01:34:22,960 --> 01:34:27,120
कि भाई वो क्या कहते हैं वो हां

1253
01:34:27,120 --> 01:34:31,120
तो अब जब यह सब नहीं है आपके पास वेद और गीता

1254
01:34:31,120 --> 01:34:35,240
में यह सब नहीं है तो कुल मिला केर है क्या कुल मिला केर इनके अनुसार

1255
01:34:35,240 --> 01:34:39,720
वेद और गीता में काल ब्रह्म ने कहा कि हे प्रभु

1256
01:34:39,720 --> 01:34:44,120
आप कह रहे हैं कि मैं जीवों को तेरे जाल से निकालकर वापस

1257
01:34:44,120 --> 01:34:48,200
सतलोक लेकर जाऊं हां यहां पर देखिए काल के कहने

1258
01:34:48,200 --> 01:34:52,400
पर मान गए कबीर कि तू खा डेली एक

1259
01:34:52,400 --> 01:34:56,400
लाख मानव शरीर जीवों को खाली हा सही बात

1260
01:34:56,400 --> 01:35:00,480
है है ना यह है आपके कबीर ये है

1261
01:35:00,480 --> 01:35:04,680
आपका परमेश्वर ठीक है अच्छ किसी शैतान

1262
01:35:04,680 --> 01:35:08,880
को बोलोगे तू आदमी आदमियों को खा ये उसके लिए वरदान हुआ कि श्राप

1263
01:35:08,880 --> 01:35:14,880
हुआ पहले यह पूछिए रा दिया था

1264
01:35:15,440 --> 01:35:19,600
बोल अच्छा एक एक पॉइंट पर और आऊंगा पहले मैं सूत्रम शैली

1265
01:35:19,600 --> 01:35:24,120
में जरा बता दूं क्या है दोबारा से एक बार रिपीट कर

1266
01:35:24,120 --> 01:35:28,440
वेद और गीता के द्वारा रामपाल एंड गैंग के अनुसार

1267
01:35:28,440 --> 01:35:31,120
कंपनी के अनुसार

1268
01:35:31,120 --> 01:35:35,440
आपको ना तो पूर्ण मुक्ति मिलेगी ना ही उसमें पूर्ण ब्रह्म की बात है

1269
01:35:35,440 --> 01:35:39,720
उसके बाद आपको मिलेगा क्या उससे क्या सीखने को मिलता है ब्रह्म की भक्ति ब्रह्म

1270
01:35:39,720 --> 01:35:44,280
की भक्ति से आपको पांच छ ऑप्शन है उसमें से जो समझ में आ जाए वो आप मान लीजिएगा

1271
01:35:44,280 --> 01:35:48,560
ब्रह्म की भक्ति से हो सकता है ब्रह्म आपको खाए ब्रह्म की भक्ति

1272
01:35:48,560 --> 01:35:52,880
से हो सकता है आपको ब्रह्म वाली जो परम गति है वो मिले जो कुछ देर के लिए अमरता

1273
01:35:52,880 --> 01:35:56,920
है वो मिले ब्रह्म ब्रह्म की भक्ति से ब्रह्म भी नहीं मिलता

1274
01:35:56,920 --> 01:36:01,640
असंभव है उसे प्राप्त करना तो इनम से जो आपको समझ में आए वो आप मान लेना

1275
01:36:01,640 --> 01:36:05,720
ठीक है दो चार ऑप्शन है आपके पास क्या मिलेगा उसके

1276
01:36:05,720 --> 01:36:09,800
बाद अब यह सब तो इन्होने मना कर दिया जो मैं पॉइंट की बात कर रहा हूं उस पर ध्यान

1277
01:36:09,800 --> 01:36:13,840
दीजिए यह सब तो इन्होंने मना कर दिया मगर इसमें अपनी सूक्ष्म

1278
01:36:13,840 --> 01:36:17,840
चाल को बना कर के रखा है वह क्या है कि वेद को छोड़ो

1279
01:36:17,840 --> 01:36:22,800
तत्वदर्शी के पास जाओ गीता को छोड़ो और तत्वदर्शी के पास जाओ

1280
01:36:22,800 --> 01:36:26,840
तो भाई तुम ने जो एक करा है ना उसमें सबसे बड़ी गलती कर ये कर

1281
01:36:26,840 --> 01:36:30,600
बैठे कि आप जो है तत्वदर्शी को वेद और गीता

1282
01:36:30,600 --> 01:36:33,920
के अनुसार सिद्ध नहीं कर

1283
01:36:33,920 --> 01:36:37,960
पाओगे क्योंकि क्योंकि मुक्ति कैसे मिलेगी उन

1284
01:36:37,960 --> 01:36:42,040
ग्रंथों को मानने से उन बातों को मानने से जिनको जो है

1285
01:36:42,040 --> 01:36:46,400
ये रामपाल डिसाइड करेंगे तो रामपाल को कौन डिसाइड करेगा

1286
01:36:46,400 --> 01:36:51,280
ये रामपाल गीता से डिसाइड कर रहे अब क्यों क्यों तत्वदर्शी नहीं है रामपाल

1287
01:36:51,280 --> 01:36:55,360
या पूर्ण पूर्ण पूर्ण ब्रह्म के बारे में बताने वाले गुरु

1288
01:36:55,360 --> 01:36:59,760
क्यों नहीं है इसको देख लीजिए गीता और वेद को कहने वाला कौन

1289
01:36:59,760 --> 01:37:04,040
है काल काल तो ज्ञानी है

1290
01:37:04,040 --> 01:37:08,120
वो तो जो बात कह रहा है गलत कहेगा उसको मालूम ही नहीं है पूर्ण ब्रह्म के पास

1291
01:37:08,120 --> 01:37:12,560
कैसे जाया जाएगा वो तो अज्ञानी है दूसरी

1292
01:37:12,560 --> 01:37:16,800
बात कि काल तो खाने के लिए लोगों

1293
01:37:16,800 --> 01:37:20,840
को फसा है तो वो क्यों सच्ची बात बताएगा कि वो

1294
01:37:20,840 --> 01:37:25,680
तुम तत्वदर्शी के पास चले जाओ तीसरी बात कि

1295
01:37:25,680 --> 01:37:29,840
इनके अनुसार 15.1 में के अनुसार जो

1296
01:37:29,840 --> 01:37:34,000
तत्वदर्शी है वो वेदों को जानने वाला है और वेदों को जानने वाला वह

1297
01:37:34,000 --> 01:37:38,480
है देवी भागवत के अनुसार जो मा भगवती की पूजा करे अन्य

1298
01:37:38,480 --> 01:37:43,200
अन्य पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु की पूजा करे है ना

1299
01:37:43,200 --> 01:37:46,000
तो तो तत्वदर्शी वो है

1300
01:37:46,000 --> 01:37:50,720
तो वो भी सिद्ध नहीं हुआ तत्वदर्शी अच्छा इसके बाद अंततोगत्वा आप

1301
01:37:50,720 --> 01:37:55,520
कह रहे हो कि उस उस यज्ञ का ज्ञान

1302
01:37:55,520 --> 01:37:59,680
तू तत्वदर्शी के पास जाकर ले तो तत्वदर्शी कौन

1303
01:37:59,680 --> 01:38:05,680
है जो यज्ञ का ज्ञान देगा और आप ही कह रहे हो कि यज्ञ से मुक्ति नहीं

1304
01:38:05,720 --> 01:38:09,840
है तो आपका तत्वदर्शी जो आपने जो ये चाल चली

1305
01:38:09,840 --> 01:38:14,080
है बहुत बड़ी सी वेदों को नकार दो गीता को नकार दो ब्रह्मा विष्णु

1306
01:38:14,080 --> 01:38:18,240
महेश को नकार दो सबको न नकार दो उस चाल के बाद

1307
01:38:18,240 --> 01:38:24,240
भी आप जो है आपका तत्वदर्शी वो सिद्ध नहीं हुआ

1308
01:38:25,320 --> 01:38:30,720
अब देखिए ये जो षष्ठी रचना

1309
01:38:30,720 --> 01:38:34,960
है इसके अनुसार जो काल

1310
01:38:34,960 --> 01:38:39,080
की उत्पत्ति यह वाला रहने दीजिए मैं बता रहा हूं वो निकालिए आप यह

1311
01:38:39,080 --> 01:38:44,360
रहने

1312
01:38:44,360 --> 01:38:48,760
दीजिए हां अब जरा इस पर आइए यह लोग जो कहते हैं ना वो परमात्मा

1313
01:38:48,760 --> 01:38:52,880
कौन है वो परमात्मा कौन है 62 में क्या कहा है भगवान ने

1314
01:38:52,880 --> 01:38:58,880
जरा देख लेते 11 व 12 18

1315
01:38:59,440 --> 01:39:03,680
62 और हमने आज क्या जाना कि इनकी जो

1316
01:39:03,680 --> 01:39:07,720
थ्योरी है उसके हिसाब से सिद्ध नहीं होता

1317
01:39:07,720 --> 01:39:11,800
कि काल जो है कोई अलग था भगवान

1318
01:39:11,800 --> 01:39:15,920
श्री कृष्ण से क्योंकि काल कभी अपने काल

1319
01:39:15,920 --> 01:39:19,920
कभी आकार ही नहीं ले सकता और तुम कह रहे हो श्री कृष्ण के शरीर से बाहर निकलकर उसने अपना

1320
01:39:19,920 --> 01:39:24,200
आकार लिया काल को देखने समझने के बाद भी उसको

1321
01:39:24,200 --> 01:39:28,200
संजय जो है केशव कह रहे हैं कृष्ण कह रहे हैं क्यों कह रहे

1322
01:39:28,200 --> 01:39:31,480
हैं है

1323
01:39:31,480 --> 01:39:35,520
ना अच्छा 18वां अध्याय एक बार निकाल ले उसकी पोल भी

1324
01:39:35,520 --> 01:39:41,520
खोल दे यह भी एक बहुत बहुत रोचक बात

1325
01:39:44,480 --> 01:39:49,240
हैय खिचड़ी तो बनाए बनाए खिचड़ी में

1326
01:39:49,240 --> 01:39:53,640
चीनी चाय पत्ती सब चीज

1327
01:39:53,640 --> 01:39:56,760
लास्ट में रेत डाल दिए

1328
01:39:56,760 --> 01:40:01,000
देखिए सुनिए यहां पर जो

1329
01:40:01,000 --> 01:40:05,240
6 में बात करते हैं कि उस परमेश्वर की शरण में जा उस परमेश्वर

1330
01:40:05,240 --> 01:40:09,440
की शरण में जा यहां पर परमेश्वर परमेश्वर की बात नहीं

1331
01:40:09,440 --> 01:40:13,680
हो रही है यहां पर परम पद की बात हो रही है यहां परम शांति

1332
01:40:13,680 --> 01:40:18,360
है ठीक है वो क्या है देखिए

1333
01:40:18,360 --> 01:40:22,680
तू सब प्रकार से ये भगवत ये गीता प्रेस वालों ने यहां पर परमेश्वर

1334
01:40:22,680 --> 01:40:27,200
को बोला है परमेश्वर शब्द उपयोग में लाया ये क्या कहते हैं

1335
01:40:27,200 --> 01:40:31,440
क्या वहा पर परमेश्वर की संस्कृत है तो परमेश्वर की संस्कृत यहां नहीं

1336
01:40:31,440 --> 01:40:35,920
है इस श्लोक में इस लोक में क्या है शरणम गच्छ

1337
01:40:35,920 --> 01:40:40,640
सर्व भावे भारत त प्रसादा पराम

1338
01:40:40,640 --> 01:40:45,040
शांति स्थानम पपसी

1339
01:40:45,040 --> 01:40:49,960
शाश्वतम तो इसमें कहीं भी परमेश्वर की

1340
01:40:49,960 --> 01:40:54,200
परमेश्वर की संस्कृत यूज नहीं हुई है इन्होने अपने अपने पीछे

1341
01:40:54,200 --> 01:40:58,200
से कनेक्ट करते हुए लिखा है मगर आप तो ऐसे नहीं मानते हो ना शब्द

1342
01:40:58,200 --> 01:40:59,760
आना चाहिए तो यहां

1343
01:40:59,760 --> 01:41:03,760
पर उस परम धाम को प्राप्त करने की परम शांति

1344
01:41:03,760 --> 01:41:07,880
को उस ये जो उस शब्द आया है ना ये इसलिए नहीं आया

1345
01:41:07,880 --> 01:41:11,880
कि उनसे अलग कोई परमात्मा है यह उस शब्द

1346
01:41:11,880 --> 01:41:16,160
आया है कि जब तू परमात्मा की शरण में जाता है तो तुझे वो वाली वो वाली

1347
01:41:16,160 --> 01:41:20,240
शांति प्राप्त होगी उस उस परम पद को तू प्राप्त कर उस परम

1348
01:41:20,240 --> 01:41:25,000
शांति को तू प्राप्त कर यहां ये कहा है ठीक है

1349
01:41:25,000 --> 01:41:29,040
अब अब बात आती है कि जब अगर मान मान भी लिया जाए कि

1350
01:41:29,040 --> 01:41:33,240
भगवान ने य पर उस शब्द का उपयोग क्यों किया यद

1351
01:41:33,240 --> 01:41:38,280
उन्ही के पास एक मिनट यदि उन्हीं के पास शांति थी तो

1352
01:41:38,280 --> 01:41:42,360
वो उस शब्द का उपयोग क्यों कर रहे हैं वोह जो

1353
01:41:42,360 --> 01:41:46,400
है यह कहते कि तू मेरी शरण में आ मतलब उस शब्द का उपयोग

1354
01:41:46,400 --> 01:41:52,400
से इनको दिक्कत है तो अब मैं आपको बता दू

1355
01:41:54,880 --> 01:41:58,920
कि 922 में 933 में भगवान ने

1356
01:41:58,920 --> 01:42:03,240
सीधे-सीधे कहा है कि मैं करता हूं भगवान ने सीधे-सीधे

1357
01:42:03,240 --> 01:42:07,360
कहा है कि मैं यह करता हूं मैं मेरी शरण में आजा

1358
01:42:07,360 --> 01:42:11,960
मैं तेरे यह कर दूंगा मैं यह कर दूंगा 9233 में भगवान ने

1359
01:42:11,960 --> 01:42:16,480
यहां पर इन्होंने बिना संस्कृत वर्ड के और 933

1360
01:42:16,480 --> 01:42:20,760
और 92 में उस उस शब्द को फिट कर दिया

1361
01:42:20,760 --> 01:42:24,840
जब भगवान सीधे-सीधे कह रहे मैं तेरी रक्षा करू लाइए जरा 922

1362
01:42:24,840 --> 01:42:28,920
182 नंबर पेज निकालिए जय श्री

1363
01:42:28,920 --> 01:42:33,600
राम जय श्री राम विशाल भाटिया जी और अभी पांडे जी आके चले गए मैं

1364
01:42:33,600 --> 01:42:37,600
आपको सुनूंगा बहुत बहुत अच्छा लगा आपने कॉल किया मेरे

1365
01:42:37,600 --> 01:42:43,600
को अच्छा अच्छा पेज नंबर

1366
01:42:45,160 --> 01:42:49,240
182 हा इसमें देखिए 92 में

1367
01:42:49,240 --> 01:42:53,360
क्या अर्थ कर रहे हैं 922 का ये अरे ऊपर जाइए ऊपर

1368
01:42:53,360 --> 01:42:57,680
ऊपर लिखा है ऊपर था हां अध्याय न श्लोक 22

1369
01:42:57,680 --> 01:43:01,840
में कहा कि जो निष्काम भाव से मेरा चिंतन करते हु देखि इनकी इनकी

1370
01:43:01,840 --> 01:43:06,440
बातें देखी मेरा चिंतन कर उस पूर्ण परमात्मा की शान शास्त्र

1371
01:43:06,440 --> 01:43:10,440
अनुकूल भक्ति भक्ति कर यह क्या है भाई

1372
01:43:10,440 --> 01:43:14,960
जब भगवान की भक्ति करनी है तो भगवान का चिंतन करे ना व्यक्ति

1373
01:43:14,960 --> 01:43:19,560
हा सही बात है चिंतन मेरा कर और पूजा

1374
01:43:19,560 --> 01:43:23,800
परमात्मा की कर और य पर उस शब्द कहां से आ गया इसकी संस्कृत

1375
01:43:23,800 --> 01:43:28,040
कहां है कोई संस्कृत नहीं है इसकी और

1376
01:43:28,040 --> 01:43:32,560
इसी प्रकार से 9 33 इसी में नीचे जाइए 933

1377
01:43:32,560 --> 01:43:36,560
उसम भी इन्होने यही कहा है यह देखो बारबार लिखा देख लो हिंदुओ जो

1378
01:43:36,560 --> 01:43:40,640
तुम सोचते वेदों के अनुसार चलना सिखाते हैं ऊपर देखो ऊपर

1379
01:43:40,640 --> 01:43:45,280
जाइए और ऊपर क्या

1380
01:43:45,280 --> 01:43:49,720
और ऊपर अभी हेडिंग आई थी ना वेदों के अनुसार

1381
01:43:49,720 --> 01:43:53,880
हा ये वेदों के अनुसार साधना ना

1382
01:43:53,880 --> 01:43:58,120
करने वाला पूर्ण मुक्त नहीं और वेदों के अनुसार पूर्ण

1383
01:43:58,120 --> 01:44:00,240
मुक्ति नहीं यह दूसरी जगह

1384
01:44:00,240 --> 01:44:04,320
लिखा है वेदों के अनुसार साधना ना करने वाला पूर्ण मुक्त

1385
01:44:04,320 --> 01:44:08,320
नहीं और वेदों के अनुसार पूर्ण मुक्ति है ही नहीं ये सबसे शुरू

1386
01:44:08,320 --> 01:44:12,360
में दिखा दिया

1387
01:44:12,360 --> 01:44:16,400
था और शिवांशी सुनिए भैया ये लोग ना

1388
01:44:16,400 --> 01:44:21,520
मारकंडे पुराण से कुछ दिखाते हैं गीता प्रस के मांड पुराण

1389
01:44:21,520 --> 01:44:25,720
से एक बात कर रहा हूं उसको पूरा कर लू बस

1390
01:44:25,720 --> 01:44:31,720
तो 9 33 सिखाइए इन्होने 9 33 का क्या दिया है

1391
01:44:34,480 --> 01:44:38,480
अनुवाद वेद को नहीं मानते तो बोलना बंद करो ना वेदों में प्रमाण

1392
01:44:38,480 --> 01:44:44,080
है ओए ज्यादा आगे आ गए

1393
01:44:44,080 --> 01:44:48,160
क्या चलिए चलिए आगे चलिए अभी अभी अभी यही सब

1394
01:44:48,160 --> 01:44:54,160
चल रहा है बाकी जय श्रीराम हमारा

1395
01:44:55,920 --> 01:45:01,920
9 प और आगे चलिए और आगे चलिए 9.33

1396
01:45:06,440 --> 01:45:11,240
निकालना और आगे और

1397
01:45:11,240 --> 01:45:15,240
आगे पीछे आ गए क्या 933 पर

1398
01:45:15,240 --> 01:45:21,240
पहुंचना है नवा यह 8 पेज नंबर

1399
01:45:21,960 --> 01:45:26,040
पर यह वो है इनका गरमा गीता

1400
01:45:26,040 --> 01:45:31,640
तेरा ज्ञान अमृत हां बाहर से अमृत है अंदर से जहर

1401
01:45:31,640 --> 01:45:36,120
है सही बात है हा ये आ गया

1402
01:45:36,120 --> 01:45:40,560
इसमें पैराग्राफ नंबर है हां ये 931

1403
01:45:40,560 --> 01:45:44,720
है इसमें नीचे जाइए 933 आ जाएगा हां ये देखिए 933

1404
01:45:44,720 --> 01:45:48,720
में क्या कर रहे हैं अनुवाद पुण्य आत्माओं में

1405
01:45:48,720 --> 01:45:54,240
ब्राह्मण राज ऋषि का तो कहना ही क्या पूर्ण मोक्ष के लिए उस परमात्मा का

1406
01:45:54,240 --> 01:45:59,720
भाई कहां लिखा है उस शब्द की संस्कृत कहां

1407
01:45:59,720 --> 01:46:04,400
है गलत किया हु उन्होने देखिए

1408
01:46:04,400 --> 01:46:08,560
माम ये अनन्यास चिंत माम जन परिपास

1409
01:46:08,560 --> 01:46:11,960
तेम युक्ता नाम

1410
01:46:11,960 --> 01:46:16,120
योगम भा माम शब्द है उस शब्द की कहा है संस्कृत

1411
01:46:16,120 --> 01:46:21,920
भाई और 9 को भी देख लीजिए इसमें भी माम शब्द है

1412
01:46:21,920 --> 01:46:26,440
जहा उस नहीं है वहां भी तुम उस लगा दे रहे

1413
01:46:26,440 --> 01:46:31,040
हो माम भज माम मेरा भजन कर

1414
01:46:31,040 --> 01:46:35,080
क्यों लिख रहे हो कि उस परमात्मा का भजन कर झूठ लिख रहे हो ना

1415
01:46:35,080 --> 01:46:39,200
झूठे झूठो क्यों लिख रहे हो यहां पे उसका

1416
01:46:39,200 --> 01:46:43,120
भजन कर जब यहां लिखा है कि भज

1417
01:46:43,120 --> 01:46:47,120
माम और सुनिए अब जरा

1418
01:46:47,120 --> 01:46:51,160
इनका पोल खोलते हैं ये लोग कहते हैं जब वो स्वयं है तो वो

1419
01:46:51,160 --> 01:46:55,440
उसका उसका क्यों कर रहे हैं अब मैं पूछता हूं

1420
01:46:55,440 --> 01:46:59,520
ये इनका पेज नंबर निकालिए भगवत भक्त और

1421
01:46:59,520 --> 01:47:03,760
भगवान का 38 नंबर पेज निकालिए

1422
01:47:03,760 --> 01:47:07,920
अब कहां चले गए एकम एव दयम फैक्ट बाय

1423
01:47:07,920 --> 01:47:12,800
अभिषेक सामने आ बना सकते हैं हिम्मत नहीं है

1424
01:47:12,800 --> 01:47:16,960
इनम सही बात शिवाजी जो ये

1425
01:47:16,960 --> 01:47:21,200
पढ़ के देखिए वेदों में वर्णित भक्ति विधि के अनुसार

1426
01:47:21,200 --> 01:47:25,480
साधना करने वाला भक्त अपने स्वर्ग में अपने पुण्य को समाप्त

1427
01:47:25,480 --> 01:47:30,000
करके फिर जन्म और मरण के नीच योनियों कुत्ता कुतिया गधा गधी

1428
01:47:30,000 --> 01:47:34,120
इनमें आकर कष्ट पाएगा ये है ये है इनके

1429
01:47:34,120 --> 01:47:37,120
सद

1430
01:47:37,120 --> 01:47:41,160
ग्रंथ समझ गए ये है इनके

1431
01:47:41,160 --> 01:47:45,160
सद ग्रंथ कुत्ता कुतिया गधे में ही आएगा ये भी बात है

1432
01:47:45,160 --> 01:47:49,360
ये भी नहीं कि मानव में आ जाए कुता कुत्ता कुतिया

1433
01:47:49,360 --> 01:47:53,520
गधा गधी में आएगा वो ये इन ये इनका तमीज है और ये लोग हमें

1434
01:47:53,520 --> 01:47:57,600
तमीज सिखा रहे थे शिवा

1435
01:47:57,600 --> 01:48:01,840
जी ये जो भी 18 ब 62 की बात होती है ना जो

1436
01:48:01,840 --> 01:48:05,880
जी इसमें आप देखोगे ना 18 ब 61 में ये लिखा हुआ है कि

1437
01:48:05,880 --> 01:48:10,000
भी वो परमात्मा के बारे में लिखा हुआ है कि वो परमात्मा जो है ना

1438
01:48:10,000 --> 01:48:14,600
वो कहते सभी प्राणियों को जो है वह सबके हृदय निवास में रहते हैं

1439
01:48:14,600 --> 01:48:18,600
तो वोह जो है ना उनके कर्मों के अनुसार उनको चलाते हैं फिर उन्होने 18 ब

1440
01:48:18,600 --> 01:48:23,000
62 में क्या लिखा हुआ है कि आप ना अपने अंतर मन में जाके

1441
01:48:23,000 --> 01:48:27,600
मन में जाने की बात हैय सोच रहे घर से बाहर निकलना उने बोला

1442
01:48:27,600 --> 01:48:31,600
मैं इनको इ की भाषा में उत्तर दे रहा हूं चिंता मत करो इनको

1443
01:48:31,600 --> 01:48:36,200
जो भाषा समझ में आती है उसी में उत्तर दूंगा निकालिए

1444
01:48:36,200 --> 01:48:40,320
इनका भगवान और भक्त वसे

1445
01:48:40,320 --> 01:48:44,960
आप सही तरीके से ढूंढ के करते हो बढ़िया तरीके से यह बात सही है

1446
01:48:44,960 --> 01:48:49,640
भगवान और भक्त का पेज नंबर 38 आपकी कप

1447
01:48:49,640 --> 01:48:52,280
मान भी ले अगर वो काल कह रहा है कि वो एक लाख जीव

1448
01:48:52,280 --> 01:48:56,520
खाता है रोज तो ये क्यों बोल रहा है नव अध्याय के 26 श्लोक में बत्र पुष्पम

1449
01:48:56,520 --> 01:48:59,320
फल तोय यो

1450
01:48:59,320 --> 01:49:03,560
भक्ति मुझको चढ़ते हैं वो सब व ये क्यों बो

1451
01:49:03,560 --> 01:49:07,640
वो ये क्यों नहीं कह रहा कि मैं रोज एक लाख जीव खाता हूं इसमें वो इस वाली बात

1452
01:49:07,640 --> 01:49:12,280
थी कहीं पर इस दास की बात थी

1453
01:49:12,280 --> 01:49:17,760
हां ये रहा नहीं

1454
01:49:17,760 --> 01:49:21,760
नहीं या तो 38 आपका जो वो वो वाला पेज नंबर

1455
01:49:21,760 --> 01:49:24,360
है जो

1456
01:49:24,360 --> 01:49:28,520
जो आपकी कंप्यूटर की स्क्रीन के अनुसार है या फिर वो पेज नंबर वो वाला पेज नंबर है

1457
01:49:28,520 --> 01:49:31,720
ये आपको चेक करना

1458
01:49:31,720 --> 01:49:35,960
पड़ेगा गंगादास की तरह परमात्मा प्राप्ति होनी चाहिए समय

1459
01:49:35,960 --> 01:49:40,680
संत आप वो निकाल लीजिए ना जो ् प आपने मुझे दिए थे

1460
01:49:40,680 --> 01:49:46,360
वो वाले पिक्चर आप तो दे

1461
01:49:46,360 --> 01:49:51,520
दीजिए ये 38 नंबर का पेज है

1462
01:49:51,520 --> 01:49:54,360
और आगे चलिए

1463
01:49:54,360 --> 01:50:00,360
और आगे चलिए 38 है 38 प

1464
01:50:00,640 --> 01:50:05,880
जाइए हा ये आ गया 38 इसमें देखिए क्या लिखा

1465
01:50:05,880 --> 01:50:10,520
है धर्मदास [संगीत]

1466
01:50:10,520 --> 01:50:15,200
जीवन उपरोक्त विवरण से यह भी नहीं है वो

1467
01:50:15,200 --> 01:50:19,680
ढूंढना पड़ेगा आप वो वीडियो दिखा दीजिए इस दास बोला हो

1468
01:50:19,680 --> 01:50:23,720
जिसमें इन्होंने अपने ग्रंथों में मैं आपको बता दू मैं क्या दिखाने जा

1469
01:50:23,720 --> 01:50:28,120
रहा हूं इन्होंने अपनी किताबों में हां देखिए अब इस दास

1470
01:50:28,120 --> 01:50:32,480
रामपाल दास जब भाई मैं खुद हूं रामपाल तो मैं कहूंगा

1471
01:50:32,480 --> 01:50:37,760
मैं रामपाल इस दास का मतलब यहां पर कोई तीसरा

1472
01:50:37,760 --> 01:50:41,880
है यानी कि कोई एक काल खड़ा हुआ था वहां पर जिसकी बात कर रहे

1473
01:50:41,880 --> 01:50:46,160
हैं बारबार रामपाल इस दात तो वहां कोई तीसरी अदृश शक्ति

1474
01:50:46,160 --> 01:50:50,400
भी है जिसकी बात हो रही है इस दास व्यक्ति अपने लिए इस

1475
01:50:50,400 --> 01:50:54,480
नहीं बोलता है वो कहता है मैं हां जैसे ये बोल रहे ना

1476
01:50:54,480 --> 01:50:58,640
व्यक्ति अपने लिए उस नहीं बोलता वो बोलता मैं तो वैसे ही

1477
01:50:58,640 --> 01:51:01,680
मैं बता रहा हूं इनके जो रामपाल है जगह

1478
01:51:01,680 --> 01:51:06,440
जगह पर अपने लिए इस दास इस दास किया करते हैं जगह जगह

1479
01:51:06,440 --> 01:51:10,480
पर तो इसका मतलब वो रामपाल स्वयं नहीं है और

1480
01:51:10,480 --> 01:51:14,720
रामपाल के साथ में कोई भूत खड़ा हुआ है वो उसकी बात करते हैं

1481
01:51:14,720 --> 01:51:20,640
देखिए प्र अंदर चला नहीं नहीं अंदर साथ में इस

1482
01:51:20,640 --> 01:51:24,640
दास और इन्ही दास

1483
01:51:24,640 --> 01:51:29,160
चुप रहि एक मिनट चुप रहि सुनिए इसका इसकी वाणी सुनिए हाके

1484
01:51:29,160 --> 01:51:33,360
खड़ा कर दिया न डूबने वाला है

1485
01:51:33,360 --> 01:51:37,880
और साथ में इस दास ने ओके खड़ा कर दिया

1486
01:51:37,880 --> 01:51:41,920
नका इस दास का क्या म और साथ में इस दास ने ओके

1487
01:51:41,920 --> 01:51:46,560
खड़ा कर दिया

1488
01:51:46,560 --> 01:51:50,720
नका बस बस कर और कई जगह

1489
01:51:50,720 --> 01:51:54,840
इनके ग्रंथों में कई जगह इसने लिए लिखने वाले ने

1490
01:51:54,840 --> 01:51:59,120
अपने लिए इस शब्द का उपयोग किया है तो वो खुद कहेगा

1491
01:51:59,120 --> 01:52:03,280
ना मैं इसका उपयोग क्यों कर रहा है भाई तो

1492
01:52:03,280 --> 01:52:09,280
इसका मतलब वहां पर कोई और है कोई और परालु

1493
01:52:22,720 --> 01:52:27,080
जी की तरह ये सीधे इन्होंने कुछ नहीं किया सब कुछ जो ये जाल फैलाया

1494
01:52:27,080 --> 01:52:32,480
है वो उस दास ने फैलाया जिसकी रामपाल दास जी बात कर रहे हैं

1495
01:52:32,480 --> 01:52:36,720
द सांकेतिक

1496
01:52:36,720 --> 01:52:40,800
भक्ति और मैं क्या बताऊ

1497
01:52:40,800 --> 01:52:46,800
तो यह सारी चीज आज हमने जान जानी है अब कोई आना चाहे

1498
01:52:47,040 --> 01:52:51,280
भाई हरियाणी वो आओ आओ बताओ वेदों

1499
01:52:51,280 --> 01:52:55,600
में कहां प्रमाण है भवान आजम तुम्हारी किताबों से

1500
01:52:55,600 --> 01:52:59,600
उए आज मुझे मौका दो आज आज इ को

1501
01:52:59,600 --> 01:53:04,000
मखाना चाता थोड़ा सा आज बिल्कुल लिंक

1502
01:53:04,000 --> 01:53:09,280
को पब्लिक कर दीजिए तब तक विशाल भाटिया जी आप अपनी वो करिए

1503
01:53:09,280 --> 01:53:13,280
बात आपने अभी जो फोन में को पूछा था की ग

1504
01:53:13,280 --> 01:53:17,360
दिखा श्री कृष्ण ने अपने को काल कहा है तो मिला है

1505
01:53:17,360 --> 01:53:21,400
मुझे प्रमाण ज दूसरी बार भी अपने को श्री कृष्ण ने वो

1506
01:53:21,400 --> 01:53:26,520
है मेरे पास श्रीमद भागवत महापुराण

1507
01:53:26,520 --> 01:53:30,840
देख सकते हैं अब मैं इसका गवा स्कंद खोलूंगा

1508
01:53:30,840 --> 01:53:34,920
इसमें भगवान श्री कृष्ण जैसे दव अध्याय में अब जैसे दव

1509
01:53:34,920 --> 01:53:39,000
अध्याय में इन्होने अपनी विभूतियों का वर्णन किया था ना अर्जुन को वैसे ही

1510
01:53:39,000 --> 01:53:43,600
स्क में उ को करते कौन सा स्क स्वा

1511
01:53:43,600 --> 01:53:47,880
स्कं 10 ब 33 में इन्होने अपने को कालों का काल महाकाल

1512
01:53:47,880 --> 01:53:53,040
भी बोला है श्रीमद भागवत

1513
01:53:53,040 --> 01:53:58,080
स्कंद और अध्याय नहीं नहीं मैं ढूंढ रहा

1514
01:53:58,080 --> 01:54:04,000
हूं इसी में है ढूंढ एक

1515
01:54:04,000 --> 01:54:08,200
सेकंड उ जी से

1516
01:54:08,200 --> 01:54:14,200
बा ढूंढ रहा मिल गया मिल गया सवा

1517
01:54:15,840 --> 01:54:20,000
अध्याय पेज नंबर 809

1518
01:54:20,000 --> 01:54:23,200
सवा अध्याय शलोक

1519
01:54:23,200 --> 01:54:29,200
एक सेट मैं आ तो जाऊ 809 पेज नंबर [संगीत]

1520
01:54:29,440 --> 01:54:34,120
है एक

1521
01:54:34,120 --> 01:54:38,200
सेकंड आप ये बात समझिए जो ये जो चक्र चलाया है

1522
01:54:38,200 --> 01:54:42,200
ना वेदों में प्रमाण है ये रामपाल दास जी ने नहीं चलाया

1523
01:54:42,200 --> 01:54:46,880
उनके पास कोई काल खड़ा हुआ है शैतान ने चलाया

1524
01:54:46,880 --> 01:54:51,200
वो बोलते हैं ना इस दास इस दास ये सब कुछ जो चक्कर चक्कर

1525
01:54:51,200 --> 01:54:55,200
चलाने वाला वो वो है काल देखिए मुझको मिल गया है मैं

1526
01:54:55,200 --> 01:54:59,560
अभी स्टार्ट करने वाला हूं बस दो मिनट में ठीक है

1527
01:54:59,560 --> 01:55:05,180
मैं आ रहा हूं दो एक

1528
01:55:05,180 --> 01:55:09,040
[संगीत]

1529
01:55:09,040 --> 01:55:13,160
सेकंड मैं निकाल ू

1530
01:55:13,160 --> 01:55:17,800
क्या आप निकालो मैं जब तक कुछ काम करके आ रहा हूं

1531
01:55:17,800 --> 01:55:23,800
क्या नंबर क्या 809

1532
01:55:25,840 --> 01:55:31,520
आ बस प्रभु को भोग लगा

1533
01:55:31,520 --> 01:55:35,520
के पहाड़ी जी आज कोई द दास गगर नहीं आ रहा क्या चक्कर आज

1534
01:55:35,520 --> 01:55:39,760
सारे बजी लग रहे हैं क मंडारा चल रहा है ना बोलने

1535
01:55:39,760 --> 01:55:43,920
लायक नहीं शिवांश भाने उनको क्या बोलेंगे भंडारे

1536
01:55:43,920 --> 01:55:48,680
में नचे नचे करके बैठे हुए लगता है पड़े होंगे रस्ते में

1537
01:55:48,680 --> 01:55:52,920
अभी ये पता है क्या है ये लोग बहुत ज्यादा तीन पा दोय

1538
01:55:52,920 --> 01:55:57,160
सब किया करते अब ये लोग आएंगे नहीं क्योंकि इनका जो प्रतिकार

1539
01:55:57,160 --> 01:56:02,040
है इनके हम अपने ग्रंथ खोलने की आवश्यकता ही नहीं है

1540
01:56:02,040 --> 01:56:06,160
नहीं होगा काल सिद्ध नहीं होगा कुछ सिद्ध नहीं कर पाओगे भैया तुम्हारी ही मटिया मेट

1541
01:56:06,160 --> 01:56:10,760
हो जाएगी आओगे तो सुनि देखिए ये लोग

1542
01:56:10,760 --> 01:56:14,840
इनको हम सनातनी बोलना ही सनातन शब्द का अमान है ली हमेशा

1543
01:56:14,840 --> 01:56:19,600
रामली रहेंगे अलंकारी हमेशा अलंकारी ही रहेंगे

1544
01:56:19,600 --> 01:56:23,920
क्या बात है शेर की तर

1545
01:56:23,920 --> 01:56:28,440
आर्य समाज वाले हमेशा अलंकारी रहेंगे और सतलोक वाले हमेशा राम पाली रहेंगे बस

1546
01:56:28,440 --> 01:56:32,800
सनातनी वो रत्ती भर के भी नहीं है नहीं रामपाल वालों को तो सनातन

1547
01:56:32,800 --> 01:56:36,920
की लिस्ट में स्वीकार करना बिल्कुल गलत है क्योंकि ये लोग वेद की

1548
01:56:36,920 --> 01:56:41,240
बात करते हुए वेद का खंडन करते हैं हा वेद में मुक्ति

1549
01:56:41,240 --> 01:56:45,560
नहीं है वेद में ईश्वर नहीं है वेदों को कहने वाला ज्ञानी है मूर्ख है

1550
01:56:45,560 --> 01:56:49,720
ला है घटिया है मुझे एक चीज पता चली है

1551
01:56:49,720 --> 01:56:54,920
पर पुता प्रमाण

1552
01:56:54,920 --> 01:56:59,200
राम जेल जाने से पहले एक बार सरकार के व से पिटीशन

1553
01:56:59,200 --> 01:57:04,080
लगा चुके हैं कि हमको एक अलग धर्म का वो दिया जाए दर्जा दिया जाए और

1554
01:57:04,080 --> 01:57:08,920
और कोटा दिया जाए मैं न्यूज देख रहा था

1555
01:57:08,920 --> 01:57:12,920
कहीं रद कर द इनकी जो दिया था इने कि

1556
01:57:12,920 --> 01:57:17,040
पहले से 12 पंथ है कबीर दास के तो अब को भी उसना

1557
01:57:17,040 --> 01:57:22,480
जाएगा

1558
01:57:22,480 --> 01:57:26,760
ये मैं ढूंढू ये है इसमें

1559
01:57:26,760 --> 01:57:30,760
इसका ये लोग अपनी वोटिंग पावर बढ़ा के करना चाहते हैं

1560
01:57:30,760 --> 01:57:35,040
लोगों को मिसगाइड करना चाहते हैं यह चकर

1561
01:57:35,040 --> 01:57:39,440
जिसम 2014 में जो दंगे हुए थे ना धर य बरवाला कांड हुआ था जो

1562
01:57:39,440 --> 01:57:44,400
उस समय य चीज बात निकल के आई थी आई होगी पक्का आई

1563
01:57:44,400 --> 01:57:47,400
होगी

1564
01:57:47,400 --> 01:57:53,400
य हा यह चल रहा है प्रिय उद्धव तुम

1565
01:57:54,200 --> 01:57:59,000
प्रश्न मर्म समझने वाले हो शिरोमणि हो जिस समय कुरुक्षेत्र में

1566
01:57:59,000 --> 01:58:03,120
कौरव पांडवों का युद्ध छिड़ा हुआ था उस समय शत्रुओं से

1567
01:58:03,120 --> 01:58:07,160
युद्ध करने के लिए तत्पर अर्जुन ने मुझसे यही प्रश्न किया था

1568
01:58:07,160 --> 01:58:11,400
अर्जुन मन में ऐसी धारणा हुई कि कुटुंब हों को मारना

1569
01:58:11,400 --> 01:58:15,600
मैं मारने वाला हूं ऐसा है तब मैंने रणभूमि में बहुत सी युक्तियां

1570
01:58:15,600 --> 01:58:19,760
देकर वीर शिरोमणि अर्जुन को समझाया था उस समय अर्जुन ने भी मुझसे

1571
01:58:19,760 --> 01:58:23,760
यही प्रश्न किया था जो तुम कर रहे हो

1572
01:58:23,760 --> 01:58:28,640
मैं समस्त प्राणियों का आत्मा तैसी सुर

1573
01:58:28,640 --> 01:58:32,720
और ईश्वर नियामक हूं मैं ही इन समस्त प्राणियों और पदार्थों

1574
01:58:32,720 --> 01:58:36,880
के रूप में हूं और इनकी उत्पत्ति स्थिति एवं प्रलय

1575
01:58:36,880 --> 01:58:38,080
का कारण हूं

1576
01:58:38,080 --> 01:58:42,160
गतिशील पदार्थों में मैं गति हूं अपने अधीन करने वाला मैं

1577
01:58:42,160 --> 01:58:46,440
काल लो तो इनका वो जो इन्होने

1578
01:58:46,440 --> 01:58:50,680
वो स्क्रीन पर दिखा दीजिए भैया इन्होने कहा थाजी

1579
01:58:50,680 --> 01:58:56,320
आपसे मिलना चाहते हैं मेरे पिताजी

1580
01:58:56,320 --> 01:59:00,320
है

1581
01:59:00,320 --> 01:59:04,360
ह मेरे पिताजी है जी जी

1582
01:59:04,360 --> 01:59:09,040
आभार आप प्रणाम जी

1583
01:59:09,040 --> 01:59:13,040
तो बताए बताए आप कुछ कहेंगे नहीं बस कुछ

1584
01:59:13,040 --> 01:59:17,040
नहीं बस आपसे मिलना था जो है मैं ये देख रहा

1585
01:59:17,040 --> 01:59:21,520
था कि आप लोगों के साथ ये काफी घुलमिल गया है बहुत ज्यादा जो है

1586
01:59:21,520 --> 01:59:25,600
आप लोग का इंतजार रहता है इसको कि कब रात में जो है ये आप लोगों

1587
01:59:25,600 --> 01:59:29,600
के साथ जो है अपना बैठे वार्तालाप करे बहुत खुश होता है ये आप

1588
01:59:29,600 --> 01:59:34,000
लोगों से जो है बात करके और ये सब अच्छा लगता है इसको का

1589
01:59:34,000 --> 01:59:38,160
नहीं बहुत वो जो है बौद्धिक स्तर

1590
01:59:38,160 --> 01:59:42,880
बहुत अच्छा है विशाल का और अच्छा अध्ययन है उसका

1591
01:59:42,880 --> 01:59:47,000
प्रेरणादाई अन अन्य किशोर अवस्था में जो आज है किशोरों

1592
01:59:47,000 --> 01:59:53,000
के लिए युवाओं के लिए प्रेरणादाई है

1593
01:59:56,000 --> 02:00:00,360
तो एक बार वो इनका इनका जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम

1594
02:00:00,360 --> 02:00:04,720
एक बार इनका वो कुतर्क दिखा दीजिए स्क्रीन पर पेज नंबर दो

1595
02:00:04,720 --> 02:00:09,720
जीजी के नाम की इनकी पुस्तक है जो [संगीत]

1596
02:00:09,720 --> 02:00:13,800
उसका गरिमा गीता की

1597
02:00:13,800 --> 02:00:19,800
दिखाइए पेज नंबर टू

1598
02:00:28,600 --> 02:00:32,600
जहां पर इन्होंने कुतर कि ना कि वो अगर

1599
02:00:32,600 --> 02:00:36,760
वह अगर वह का वो होते हां नीचे जाइए

1600
02:00:36,760 --> 02:00:40,920
नीचे जाइए आ गया इसी में बस मुझे पढ़ने दीजिए मैं

1601
02:00:40,920 --> 02:00:45,240
देख

1602
02:00:45,240 --> 02:00:50,400
लूंगा और नीचे चलिए

1603
02:00:50,400 --> 02:00:53,960
थोड़ा और नीचे

1604
02:00:53,960 --> 02:00:58,880
नीचे चलिए यहां पर इन्होंने कुतर्क किए बहुत सारे

1605
02:00:58,880 --> 02:01:04,880
और नीचे चलिए थोड़ा सा

1606
02:01:06,320 --> 02:01:11,000
हम

1607
02:01:11,000 --> 02:01:15,720
हां थोड़ा ऊपर जाइए ऊपर जाइए

1608
02:01:15,720 --> 02:01:19,800
थोड़ा हां जब कुरुक्षेत्र के मैदान में पवित्र गीता जी का ज्ञान

1609
02:01:19,800 --> 02:01:24,160
सुनाते समय 1132 में पवित्र गी बोलने वाला प्रभु कह रहा है

1610
02:01:24,160 --> 02:01:28,200
कि अर्जुन मैं बड़ा हुआ काल हूं अब सर्व लोकों को खाने के लिए ऐसा ऐसा प्रकट हुआ हूं

1611
02:01:28,200 --> 02:01:32,280
जरा सोचे श्री कृष्ण जी तो पहले से ही अर्जुन के साथ

1612
02:01:32,280 --> 02:01:36,520
थे यदि पवित्र जी गीता जी के ज्ञान को श्री कृष्ण

1613
02:01:36,520 --> 02:01:40,560
जी बोल रहे होते तो व यह नहीं कहते कि मैं प्रवृत हुआ हूं

1614
02:01:40,560 --> 02:01:44,640
फिर अध्याय 11 श्लोक 21 और 46 में अर्जुन कह

1615
02:01:44,640 --> 02:01:48,920
रहा है कि भगवान आप तो ऐसा ऐसा कर रहे हैं लटक रहे हैं

1616
02:01:48,920 --> 02:01:53,080
कामना कर रहे हैं हे सहस्त्र आप चतुर्भुज रूप

1617
02:01:53,080 --> 02:01:57,680
में आइए मैं आपके विकराल रूप को देखकर धीरज नहीं रख पा रहा हूं चलिए

1618
02:01:57,680 --> 02:02:00,440
1131 में अर्जुन ने पूछा कि

1619
02:02:00,440 --> 02:02:04,640
हे महानुभाव उग रूप वाले आप कौन है मुझे बतलाइए कृष्ण जी ने तो कृष्ण

1620
02:02:04,640 --> 02:02:09,200
जी तो अर्जुन के साले थे तो उनको

1621
02:02:09,200 --> 02:02:13,760
उनको पहचान नहीं पा रहे थे गीता जी का ज्ञान कृष्ण ने नहीं दिया है आगे 1147

1622
02:02:13,760 --> 02:02:17,760
में गीता जी को बोलने वाले प्रभु काल ने कहा हे अर्जुन यह मेरा वास्तविक काल रूप है जिसे

1623
02:02:17,760 --> 02:02:22,040
तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा है उपरोक्त विवरण से एक तत्व

1624
02:02:22,040 --> 02:02:26,440
सदुआ के कौरवों की सभा में विराट रूप श्री कृष्ण जी ने दिखाया था

1625
02:02:26,440 --> 02:02:30,520
मगर इन्हो इन लोगों ने यह बात माना है कि वो जो रूप था ना विराट रूप कह तो रहे

1626
02:02:30,520 --> 02:02:35,000
हैं उसे मगर वो चतुर्भुज रूप दिखाया था इन्होंने वहां पर माना है

1627
02:02:35,000 --> 02:02:39,320
ठीक है तो दिखाया था श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रेत वत प्रवेश करके उन्होंने

1628
02:02:39,320 --> 02:02:43,320
वोह विराट रूप दिखाया था काल दिखाया था नहीं तो यह नहीं

1629
02:02:43,320 --> 02:02:47,360
कहता कि यह विराट रूप तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा है और क्योंकि श्री

1630
02:02:47,360 --> 02:02:51,480
कृष्ण जी अपना विराट रूप कौरवों की सभा में पहले भी दिखा चुके थे दूसरी बात य सई

1631
02:02:51,480 --> 02:02:56,320
के पवित्र गीता जी को बोलने वाला

1632
02:02:56,320 --> 02:03:00,600
अ काल ब्रह्म ज्योति निरंजन है ना कि श्री कृष्ण क्योंकि श्री कृष्ण

1633
02:03:00,600 --> 02:03:05,280
जी ने पहले कभी नहीं कहा कि मैं काल हूं ना ही बाद में कभी कहा कि मैं काल हूं लो

1634
02:03:05,280 --> 02:03:09,600
हो गया लो

1635
02:03:09,600 --> 02:03:13,640
भैया पहले कभी नहीं कहा कि मैं काल हूं और बाद में

1636
02:03:13,640 --> 02:03:15,640
भी कभी नहीं कहा कि मैं काल हूं और

1637
02:03:15,640 --> 02:03:19,800
ये बाद में कह रहे हैं कि मैं काल हूं अब क्या करें प

1638
02:03:19,800 --> 02:03:24,200
पहले कह चुके हैं कि मैं काल हूं विराट रूप दिखाने से पहले गीता

1639
02:03:24,200 --> 02:03:28,840
में 10 33 में हा 10

1640
02:03:28,840 --> 02:03:33,000
में कह चुके हैं तो पहले

1641
02:03:33,000 --> 02:03:37,240
और बाद दोनों में कहा है

1642
02:03:37,240 --> 02:03:41,800
इनके सभी को तर्को का समाधान हो गया अब अगर कोई आना चाहता है तो वह आ सकता

1643
02:03:41,800 --> 02:03:45,840
है सात्विक जी बताए चेहरा थोड़ा लेक आया करय

1644
02:03:45,840 --> 02:03:51,840
चेहरा ना होने की वजह से थोड़ा वो ठीक नहीं रहता है

1645
02:03:53,960 --> 02:03:58,080
तो अब हम लोग कुल मिलाकर के आज जो चीजें हमने जानी है उससे

1646
02:03:58,080 --> 02:04:02,120
आप इतना जान लीजिए इसको और थोड़ा क्लेरिफाई करके फिर कभी लाएंगे आपके

1647
02:04:02,120 --> 02:04:06,200
सामने इतना जान लीजिए कंक्लूजन सर वही

1648
02:04:06,200 --> 02:04:10,440
है जो मैंने कई बार बता दिया कि यह वेदों की बात

1649
02:04:10,440 --> 02:04:14,560
इसलिए करते हैं कि यह आपको वेद विरोधी बना सके सनातन की बात इसलिए

1650
02:04:14,560 --> 02:04:18,720
करते हैं सनातन विरोधी बना सके हिंदुत्व की बात इसलिए करते

1651
02:04:18,720 --> 02:04:22,880
कि हिंदुत्व की विरोधी आपको बना सके क्यों क्योंकि वेदों

1652
02:04:22,880 --> 02:04:27,400
द्वारा मुक्ति नहीं है वेदों में पूर्ण ब्रह्म नहीं है वेदों को बोलने वाला घटिया है वेदों को

1653
02:04:27,400 --> 02:04:31,400
बोलने वाला अज्ञानी है वेदों के द्वारा प्राप्त होने वाला जो

1654
02:04:31,400 --> 02:04:35,400
ब्रह्म है वो यह सब है और अंततोगत्वा वो प्राप्त होगा कि नहीं

1655
02:04:35,400 --> 02:04:39,440
यह नहीं पता वो आपको खाएगा कि नहीं ये नहीं पता वो दिखाई देगा कि नहीं

1656
02:04:39,440 --> 02:04:43,800
यह नहीं पता वो तीन में से कौन सी बात माननी है वो आप लोग डिसाइड

1657
02:04:43,800 --> 02:04:47,880
करना येय कालनेमी टाइप से लोगों को मिस करने

1658
02:04:47,880 --> 02:04:52,120
कालनेमी जैसे किया हनुमान जी कोरे मैं

1659
02:04:52,120 --> 02:04:56,200
देखता हूं ना कि इनके य के जितने भी लोग आते हैं वो थोड़ा सा मानसिक रोग क्यों

1660
02:04:56,200 --> 02:05:00,320
दिखता है उनके क्यों दिखता ड़ी विक्षिप्त क्यों उनको

1661
02:05:00,320 --> 02:05:04,640
कुछ समझ में नहीं आता है इसलिए दिखता है क्योंकि वह इनकी ऐसी

1662
02:05:04,640 --> 02:05:08,800
जो किताब है जो अपना ही बार बार बार बार बार बार उल्टी सीधी वो कर रही

1663
02:05:08,800 --> 02:05:09,560
है

1664
02:05:09,560 --> 02:05:13,760
इन किताबों के आधार पर व्यक्ति इनको पढ़ने वाला क्या

1665
02:05:13,760 --> 02:05:19,000
होगा क्या होगा इनकी बुद्धि में कालनेमी आया हुआ

1666
02:05:19,000 --> 02:05:23,080
चक्कर नहीं वो जो रामपाल दास जी के बगल में

1667
02:05:23,080 --> 02:05:26,960
कोई खड़ा रहता है ना जिसकी ओर वो इशारा करते

1668
02:05:26,960 --> 02:05:31,000
हैं वो कोई छुपी हुई कोई शक्ति है वो जिसके बारे में बारबार

1669
02:05:31,000 --> 02:05:35,240
संकेत करते हैं खुल के नहीं बता पाते डर के मारे वो संकेत करते

1670
02:05:35,240 --> 02:05:39,400
इस दास इस दास वो छुपी ई धूर्त शक्ति है कोई बात सही

1671
02:05:39,400 --> 02:05:44,160
है हा वो कोई गलत शक्ति है

1672
02:05:44,160 --> 02:05:49,000
नकारात्मक चलिए कोई आना चाहता है तो आ सकता है

1673
02:05:49,000 --> 02:05:53,120
वेदों में प्रमाण है कभीर भगवान है वही शक्ति जैसे दुर्योधन

1674
02:05:53,120 --> 02:05:59,120
के आसपास थी कंस के आसपास थी शिशुपाल के आसपास थी वही है उस टाइप की शक्ति

1675
02:05:59,320 --> 02:06:03,560
है आए भैया कोई आना है या भंडारे में गए

1676
02:06:03,560 --> 02:06:07,680
सब के सब भंडारे भंडारे या फ जवाब नहीं है कोई

1677
02:06:07,680 --> 02:06:11,880
भी पुड़िया खाके बेहोश हुए पड़े हैं और मैं एक बात

1678
02:06:11,880 --> 02:06:16,040
और बता दूं की जो लोग

1679
02:06:16,040 --> 02:06:20,400
भी शास्त्रों के नाम पर पाखंड फैलाते हुए सनातन

1680
02:06:20,400 --> 02:06:24,400
के नाम पर सनातन का विरोध करते हुए हिंदू समाज

1681
02:06:24,400 --> 02:06:24,900
को

1682
02:06:24,560 --> 02:06:28,600
सनातन समाज को क्षति पहुंचा रहे हैं

1683
02:06:28,600 --> 02:06:33,360
उनके बारे में जिनके बारे में मैंने अभी तक बात नहीं की है वो लोग ये ना

1684
02:06:33,360 --> 02:06:37,800
सोचे कि उनका नंबर कभी आएगा नहीं

1685
02:06:37,800 --> 02:06:42,040
भगवान से प्रार्थना करें जिस रूप में भी आप मानते हो कि आहवान

1686
02:06:42,040 --> 02:06:46,200
की रडार प आप आए नहीं क्योंकि जिस दिन आएंगे

1687
02:06:46,200 --> 02:06:50,920
उस दिन से फिर आप सबकी आपकी भी उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी

1688
02:06:50,920 --> 02:06:56,920
हम

1689
02:06:59,520 --> 02:07:03,720
चलिए पूरा करते हैं कोई है नहीं आज

1690
02:07:03,720 --> 02:07:08,880
लगता है दास सारे गायब है

1691
02:07:08,880 --> 02:07:13,000
आज नहीं एक दो है वो जो होंगे भी तो व ये सोच रहे

1692
02:07:13,000 --> 02:07:17,320
होंगे अब क्या करें हमारी गरमा गीता कीने तो कोई गरमा नहीं रखी हमारी

1693
02:07:17,320 --> 02:07:22,800
अब वो सोच रहे हैं कि बेजती करा के जाएगा कौन अब ये भी तो चक्कर है

1694
02:07:22,800 --> 02:07:27,440
अब कितनी बेजती करवाएंगे भी तो बात है

1695
02:07:27,440 --> 02:07:31,720
नारा जय श्री राम जय श्री राम निशांत

1696
02:07:31,720 --> 02:07:35,800
जी अरे वाह प्रणाम भैया हा खुश रही

1697
02:07:35,800 --> 02:07:41,440
आप पहुंच ग कोटा हा [संगीत] हा

1698
02:07:41,440 --> 02:07:45,720
बताइए यह पूछ रहे हैं बाबू राम जी

1699
02:07:45,720 --> 02:07:50,000
कि कल तुमने उसको क्यों हटाया था

1700
02:07:50,000 --> 02:07:54,080
लाइव से क्योंकि वह यह कह रहा था कि बता

1701
02:07:54,080 --> 02:07:58,280
देंगे तो जब वहां उसके पास कुछ बताने के लिए था

1702
02:07:58,280 --> 02:08:02,320
नहीं तो फिर उसको क्यों रखे

1703
02:08:02,320 --> 02:08:08,320
और तुम तो गुरु द्रोही हो तुम किस मुह से बात कर रहे

1704
02:08:08,880 --> 02:08:13,160
हो तुम तो जो बोल रहे हो व तुम्हारे गुरु मना कर रहे हैं वो तुम बोल रहे बताया

1705
02:08:13,160 --> 02:08:16,320
झूठ बोल रहे हो गुरु के नाम

1706
02:08:16,320 --> 02:08:22,320
पर न जी बताए जय श्रीराम

1707
02:08:25,680 --> 02:08:31,680
खिचड़ी देख के आए हैं अभी एक किताब का खिचड़ी क्या

1708
02:08:32,680 --> 02:08:37,520
इस सारा सब्जी मिला दिया है अरे

1709
02:08:37,520 --> 02:08:42,080
अगर तुमने स्वयं यह पढ़ी तो

1710
02:08:42,080 --> 02:08:48,080
भाई सर में दर्द हो जाएगा

1711
02:08:48,960 --> 02:08:53,160
निश्चित हर बात को अपनी बात को काट दिया काल

1712
02:08:53,160 --> 02:08:57,200
आकार नहीं लेता है मगर वह श्री कृष्ण के शरीर से बाहर निकल के अपना विराट

1713
02:08:57,200 --> 02:09:01,280
स्वरूप दिखा रहा है वेदों के द्वारा ब्रह्म प्राप्त होता है मगर ब्रह्म

1714
02:09:01,280 --> 02:09:05,400
को प्राप्त भी नहीं हो कर सकते आप क्या बात कर रहे

1715
02:09:05,400 --> 02:09:09,400
हो यज्ञ के द्वारा जो अर्जुन को मोक्ष मिलता है मगर यज्ञों के द्वारा

1716
02:09:09,400 --> 02:09:12,200
मोक्ष नहीं मिलता

1717
02:09:12,200 --> 02:09:16,440
है यज्ञ को बताने वाला तत्वदर्शी है मगर

1718
02:09:16,440 --> 02:09:21,640
यज्ञों से मुक्ति नहीं मिलती

1719
02:09:21,640 --> 02:09:25,520
क्या

1720
02:09:25,520 --> 02:09:29,600
करोगे और यह तो मैं बताओ मैं अभी इनको खैर बनानी चाहिए

1721
02:09:29,600 --> 02:09:33,680
ये तो अभी यह मान के चलिए चलते फिरते जो नहीं किया जाता है बस

1722
02:09:33,680 --> 02:09:37,800
केवल उतना है ये अगर लेके बैठ ही गए इनकी अभी

1723
02:09:37,800 --> 02:09:41,880
क्या है इनका भंडारा चल रहा है ना तो मेरे हाथ में किताबें नहीं

1724
02:09:41,880 --> 02:09:46,840
आ रही है तो थोड़ी अड़चन आई पढ़ने में पीडीएफ के थ्रू

1725
02:09:46,840 --> 02:09:51,040
मेरे पास है नहीं गरमा गीता की पीडीएफ वो हार्ड कॉपी अब

1726
02:09:51,040 --> 02:09:55,040
ये लोग अपने सबको कहेंगे देखो शिवांश द्वेदी के हाथ में गरमा गीता

1727
02:09:55,040 --> 02:09:59,240
की नहीं पहुच अरे जय श्री

1728
02:09:59,240 --> 02:10:03,440
राम जय श्री राम जम अरे अभी

1729
02:10:03,440 --> 02:10:07,480
अभी अभी कोई लॉजिक इन लोगों का आया था कि उन्होंने जो

1730
02:10:07,480 --> 02:10:11,680
है अपना रूप वो कौरवों के राज्यसभा

1731
02:10:11,680 --> 02:10:15,920
में दिखाया था और यहां पर रूप दिखाया था तो उसमें दोनों रूपों में इन लोगों

1732
02:10:15,920 --> 02:10:20,560
को य नहीं पता कि बहुत बड़ा अंतर था

1733
02:10:20,560 --> 02:10:25,000
यहां पर अर्जुन ने डिमांड किया था कि मैं आपके जितने रूप अब तक हुए हैं

1734
02:10:25,000 --> 02:10:29,160
चाहे वो द्वादश मतलब 12 आदित्य के रूप है 11 रुद्र

1735
02:10:29,160 --> 02:10:33,280
के रूप है आठ जो है वसु के रूप है 49 मरुद गणों के रूप है

1736
02:10:33,280 --> 02:10:37,440
उस सारे रूप को अर्जुन ने एक ही बार में देखना चाहा था

1737
02:10:37,440 --> 02:10:40,960
ये इच्छा अर्जुन ने जाहिर की थी कि मैंने अ आपके विभिन्न

1738
02:10:40,960 --> 02:10:45,160
गुणों को विभिन्न कर्मों को विभिन्न रूपों को सुना है उन सारे रूपों

1739
02:10:45,160 --> 02:10:49,320
को मैं एक ही बार में देखना चाहता हूं तो उन्होंने कहा भी था कि मैं यह

1740
02:10:49,320 --> 02:10:53,800
सारे रूप तू अपनी इस दृष्टि से देख नहीं सकता

1741
02:10:53,800 --> 02:10:58,200
ये बात सही है इसीलिए मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि मतलब वहां पर उन्होंने उनको चतुर्भुज

1742
02:10:58,200 --> 02:11:02,640
रूप दिखाया था राज्यसभा में जो कि विराट था और यहां पर उन्होंने

1743
02:11:02,640 --> 02:11:06,840
अपने जितने रूप उनके थे वो सारे रूप एक साथ दिखाए

1744
02:11:06,840 --> 02:11:10,880
थे असीमित रूप हां

1745
02:11:10,880 --> 02:11:15,000
मतलब असीमित क्या जितने रूप है उसमें बता तो ना है 12 आदित्य थे

1746
02:11:15,000 --> 02:11:19,280
11 रुद्र थे आठों वसु थे और 4 मरुद गण

1747
02:11:19,280 --> 02:11:23,440
थे अंतिम बात है कि जब

1748
02:11:23,440 --> 02:11:27,520
यह रूप दिखा दिया तब भी संजय ने उसको

1749
02:11:27,520 --> 02:11:31,880
उस रूप वाले को कृष्ण कहा महा कृष्ण नाम है

1750
02:11:31,880 --> 02:11:36,280
अरे संजय ने अरे सुनो संजय ने छोड़ो श

1751
02:11:36,280 --> 02:11:40,360
सुनो संजय ने कहा वो अलग छोड़ दो ना उसके बाद

1752
02:11:40,360 --> 02:11:44,360
फिर अर्जुन ने यह जो है इच्छा प्रकट की कि मैं आपके चतुर्भुज रूप को देखना

1753
02:11:44,360 --> 02:11:48,400
चाहता हूं तो उन्होंने फिर चतुर्भुज रूप भी दिखाया है आठ या न

1754
02:11:48,400 --> 02:11:52,560
श्लोक के बाद हम इस

1755
02:11:52,560 --> 02:11:56,200
बात का वर्णन है और अर्जुन ने उनको विष्णु शब्द कहकर संबोधित किया

1756
02:11:56,200 --> 02:12:00,200
है 41 42 में कृष्ण जी भी बोला उने 11

1757
02:12:00,200 --> 02:12:04,720
ब 412 हा बो वही तो कहा

1758
02:12:04,720 --> 02:12:08,720
है वो शिवास जी ने बता दिया वो उसने क्या

1759
02:12:08,720 --> 02:12:13,160
बोला कि मैंने आपको आज तक सखा समझा था तो क्या काल को सखा समझा

1760
02:12:13,160 --> 02:12:17,240
था सही बात काल को सखा समझा था काल तो उसी समय

1761
02:12:17,240 --> 02:12:21,280
निकला ना अरे जो है सो है इन लोगों को

1762
02:12:21,280 --> 02:12:25,960
समझाने में बड़ा मजा आता है लेकिन समझे तब तो

1763
02:12:25,960 --> 02:12:30,080
बड़े ी टाइप सुनो ना पता है पैसे से मैं एक टीचर हूं लेकिन

1764
02:12:30,080 --> 02:12:34,120
यह बड़े ट टाइप के स्टूडेंट है ट टाइप के स्टूडेंट होते

1765
02:12:34,120 --> 02:12:36,920
डंडे से समझते

1766
02:12:36,920 --> 02:12:40,280
हैं अरे

1767
02:12:40,280 --> 02:12:44,360
यार पते को स्टूडेंट होता डेली मार खाता

1768
02:12:44,360 --> 02:12:50,360
था उसने बस मार खानी और कुछ नहीं करना

1769
02:12:51,920 --> 02:12:55,920
क्या हुआ चलिए फर बढ़ते हैं किसी

1770
02:12:55,920 --> 02:13:01,040
प्रकार के वैचारिक मतभेद के निमित चर्चा करनी हो तो

1771
02:13:01,040 --> 02:13:06,320
आप संपर्क कर सकते हैं ट करिएगा 74036

1772
02:13:06,320 --> 02:13:10,400
नामा हम लोग नाम जप करते हैं आप लोग उसमें हमारे साथ दे सकते हैं

1773
02:13:10,400 --> 02:13:14,560
ना मास्त्र में किसी प्रकार से अभियान को सहायता करना

1774
02:13:14,560 --> 02:13:18,680
चाहते हैं तो वो कर सकते हैं और जो

1775
02:13:18,680 --> 02:13:22,760
हमारी कक्षाएं हैं उसमें आप आ सकते सभी चीजों

1776
02:13:22,760 --> 02:13:25,960
के लिए एक ही नंबर

1777
02:13:25,960 --> 02:13:29,960
74036 जी जी किसी प्रकार के प्रश्न के समाधान के लिए सबसे

1778
02:13:29,960 --> 02:13:34,080
पहले टब पर गोवर्धन मट का चैनल है उस पर चेक करें आपके प्रश्न का उत्तर

1779
02:13:34,080 --> 02:13:38,080
मिल जाएगा आदित्य वाहिनी से जुड़ने के लिए जो गुरुदेव पुरी शंकराचार्य की

1780
02:13:38,080 --> 02:13:43,200
सेना है उससे जुड़ने के लिए आपको

1781
02:13:43,200 --> 02:13:47,360
वहीं पर उनकी जो प है गोवर्धन मटकी पप है उसको डाउनलोड करिए

1782
02:13:47,360 --> 02:13:51,520
उसमें अपना नाम रजिस्टर करवा लीजिए जब भी आपकी आवश्यकता होगी तो वहां

1783
02:13:51,520 --> 02:13:55,960
शंकराचार्य जी आपको आवाज देंगे मेरे सैनिक कहां है उस समय आपको पहुंचना

1784
02:13:55,960 --> 02:13:58,240
होगा

1785
02:13:58,240 --> 02:14:02,400
और अगर विधि विषयक प्रश्नों के उत्तर चाहिए तो आप आचार्य

1786
02:14:02,400 --> 02:14:07,080
रामशंकर शुक्ल जी है उनका चैनल है वो आप फॉलो करें

1787
02:14:07,080 --> 02:14:11,280
विधि विषेक आपको हां

1788
02:14:11,280 --> 02:14:15,400
जी जी ठीक है तो आज मेरे ख्याल से काफी हो गया है

1789
02:14:15,400 --> 02:14:19,440
जी जी जी जी सभी को जय श्री राम जी

1790
02:14:19,440 --> 02:14:23,520
आपका बहुत-बहुत धन्यवाद जय श्री राम जय श्री राम जय

1791
02:14:23,520 --> 02:14:29,330
श्री राम

1792
02:14:29,330 --> 02:14:33,330
[संगीत]
