1
00:00:01,840 --> 00:00:07,840
[संगीत]

2
00:00:08,280 --> 00:00:12,960
सभी को जय श्री राम जय श्री राम

3
00:00:12,960 --> 00:00:17,160
जय श्री राम जय श्री राम तो हमें जो है ना आज एक

4
00:00:17,160 --> 00:00:22,080
कुछ सूत्र पकड़ में आ गए हैं कि वैसे देखिए

5
00:00:22,080 --> 00:00:26,760
जो कबीर पंथिया का ईश्वर है जो रामपाल के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो कबीर है

6
00:00:26,760 --> 00:00:30,840
व ईश्वर तो ईश्वर सिद्ध नहीं होता है मोक्ष मोक्ष

7
00:00:30,840 --> 00:00:34,880
सिद्ध नहीं होता है मिलने वाला जो धर्म है धर्म सिद्ध नहीं होता है सनातन

8
00:00:34,880 --> 00:00:39,360
तो सिद्ध होना बहुत दूर की बात है

9
00:00:39,360 --> 00:00:43,520
तो यह सब बातें तो हम कई बार कर चुके हैं कि जब भी यह बातें

10
00:00:43,520 --> 00:00:47,520
आती है कि ईश्वर यदि सर्व शक्तिमान है तो व

11
00:00:47,520 --> 00:00:51,600
क्या ये कर सकता है यदि वह अपने रूप को बदल पा रहा है तो उसका

12
00:00:51,600 --> 00:00:55,720
र रूप शाश्वत कैसे या वो जहां पर बैठा है सब कुछ उसने

13
00:00:55,720 --> 00:01:00,080
बनाया तो वो जगह किसने बनाई और फिर ये

14
00:01:00,080 --> 00:01:04,680
उस रूप को भी बता दिया इन्होंने कि वो भी जो है

15
00:01:04,680 --> 00:01:08,800
एकाद इनके ऐसे फॉलोअर आए जो मुझे लगता है कि वो रामपाल

16
00:01:08,800 --> 00:01:13,040
को फॉलो नहीं कर रहे या य या वो फॉलो अच्छे से कर रहे बाकी

17
00:01:13,040 --> 00:01:17,080
के नहीं कर रहे ऐसा तो

18
00:01:17,080 --> 00:01:21,320
खैर वो यह भी मान लिया कि वो जो परमेश्वर

19
00:01:21,320 --> 00:01:25,760
है इनका वो सबसे पहले निराकार ही होता है वो कोई अनामी

20
00:01:25,760 --> 00:01:30,080
नाम का लोक है अब उसकी व्यवस्था कहां पर है क्या कहां नहीं है शास्त्रों में वो

21
00:01:30,080 --> 00:01:34,240
एक अलग विषय तो यह सब तो जब

22
00:01:34,240 --> 00:01:38,320
भी इस पर आते ना मूलभूत प्रश्नों पर क्योंकि शास्त्रों के साथ तो

23
00:01:38,320 --> 00:01:42,640
छेड़छाड़ कर देते हो उसमें देर लगती है आने में जगह

24
00:01:42,640 --> 00:01:46,840
पर आने में उसमें देर लगती है तो मूलभूत जो प्रश्न

25
00:01:46,840 --> 00:01:51,280
है कि आफ्टर ऑल एट द एंड आप दे क्या रहे हो क्या

26
00:01:51,280 --> 00:01:56,200
कभी ना बदला जाने वाला धर्म दे रहे हो संसार को क्या

27
00:01:56,200 --> 00:02:00,360
सर्वशक्तिमान ईश्वर दे रहे हो क्या परम स्वतंत्र मोक्ष

28
00:02:00,360 --> 00:02:04,680
दे रहे हो क्या सनातन धर्म दे रहे हो तो ये मूलभूत प्रश्नों

29
00:02:04,680 --> 00:02:08,760
का तो उत्तर कभी दिया नहीं आज तक आज तक नहीं दिया ना देंगे इन पर बात

30
00:02:08,760 --> 00:02:12,880
ही नहीं करेंगे हां वो शास्त्रों को यहां ये लिखा है वहां वो लिखा

31
00:02:12,880 --> 00:02:16,880
है य ये लिखा है तो इस तरीके की तो वो बातें जो मूलभूत प्रश्न है उसका

32
00:02:16,880 --> 00:02:21,760
तो कई बार हमारे दर्शकों को हम दे चुके

33
00:02:21,760 --> 00:02:25,800
हैं मूलभूत प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है संत रामपाल वालों के

34
00:02:25,800 --> 00:02:30,000
पास हां मगर यह शास्त्रों के साथ खिलवाड़ करने वाला मामला जो है

35
00:02:30,000 --> 00:02:32,320
इसमें जरूर मैं

36
00:02:32,320 --> 00:02:36,440
कहूंगा कि निचले दर्जे की एक्सपर्टीज प्राप्त है

37
00:02:36,440 --> 00:02:41,000
इनको शास्त्रों के साथ खिलवाड़ कैसे किया जाए तो आज हम

38
00:02:41,000 --> 00:02:45,320
लोग देखते हैं कि रामपाल दास जी ने शास्त्रों

39
00:02:45,320 --> 00:02:50,840
के साथ खिलवाड़ किया है कि नहीं किया उसको थोड़ा सा हम टोले

40
00:02:50,840 --> 00:02:54,960
गे और जाहिर सी बात है कि जब

41
00:02:54,960 --> 00:02:59,040
भाई आप दूसरों के लूप पोल ढूंढने में एक्सपर्ट हो तो ऐसा तो

42
00:02:59,040 --> 00:03:03,080
है नहीं कि आपसे से लूल नहीं होंगे कहीं ऐसा कहीं ना कहीं होगा जब पकड़

43
00:03:03,080 --> 00:03:08,720
में आएगा हैना पकड़ी

44
00:03:08,720 --> 00:03:12,800
है हमने अभी तक इनके शास्त्रों का बहुत गहन अध्ययन नहीं किया था

45
00:03:12,800 --> 00:03:16,880
आज थोड़ा सा मान के चलिए एक दो घंटे इनकी जो गरिमा

46
00:03:16,880 --> 00:03:21,040
गीता की है वो गरिमा जानने का प्रयास किया है

47
00:03:21,040 --> 00:03:25,160
अच्छा सबसे पहले तो मैं यहां से शुरू करूंगा इस बात

48
00:03:25,160 --> 00:03:29,160
को कि यदि हम कह रहे हैं यह वाली बात एक जगह पर हो चुकी

49
00:03:29,160 --> 00:03:33,600
है यदि हम यह कह रहे हैं कि गीता एक पवित्र ग्रंथ

50
00:03:33,600 --> 00:03:37,840
है और फिर हम यह भी कह दे रहे हैं कि उसमें

51
00:03:37,840 --> 00:03:41,840
कुछ बातें ऐसी है जो मन उचित नहीं है मनुष्य के द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं

52
00:03:41,840 --> 00:03:45,840
है मोक्ष प्राप्ति के में सहायक नहीं है तो

53
00:03:45,840 --> 00:03:48,240
फिर वह जिसमें

54
00:03:48,240 --> 00:03:52,360
अपवित्र आ गई ग्रंथ में जिसमें वह फिर पवित्र कैसे रह

55
00:03:52,360 --> 00:03:56,480
जाता है और यदि यही मामला है कि जो चीज

56
00:03:56,480 --> 00:04:00,520
हमारे विचारों से मेल खाएगी या हमारे फलाने फलाने पांचवे नंबर के

57
00:04:00,520 --> 00:04:04,560
सूक्ष्म वेद से मेल खाएगी वही चीज हम ग्रहण करेंगे भगवत

58
00:04:04,560 --> 00:04:08,880
गीता की वेद की भी तो फिर उसमें दिक्कत ये आ जाएगी

59
00:04:08,880 --> 00:04:13,040
कि फिर तो मैं भी कुछ कुछ बातें ऐसी लिख सकता हूं जिसमें से कुछ बातें आपके

60
00:04:13,040 --> 00:04:17,920
सूक्ष्म वेद से मैच खाएगी और कुछ बातें जो है मैच नहीं खाएगी तो

61
00:04:17,920 --> 00:04:22,320
मेरा लिखा हुआ भी आपके लिए क्या पवित्र ग्रंथ हो

62
00:04:22,320 --> 00:04:26,560
जाएगा है ना अगर मैं दो चार पन्नों

63
00:04:26,560 --> 00:04:30,640
की कोई एक बुक लिख दूं जिसमें से कुछ बातें जो इनका जो

64
00:04:30,640 --> 00:04:35,400
सूक्ष्म वेद है इनके लिए जो अंतिम प्रमाण है उससे मेल खा जाए

65
00:04:35,400 --> 00:04:39,560
और कुछ बातें हैं जो मेल ना

66
00:04:39,560 --> 00:04:43,560
खाए तो क्योंकि कुछ बातें मेल खा रही है तो उसके

67
00:04:43,560 --> 00:04:47,760
कारण क्या ये मेरे लिखे हुए को पवित्र ग्रंथ

68
00:04:47,760 --> 00:04:52,120
कहेंगे आखिरकार मैं भी लिख पा रहा हूं तो परमेश्वर की उसमें वही

69
00:04:52,120 --> 00:04:56,200
है परमेश्वर की इच्छा के बिना तो एक पत्ता भी नहीं लि सकता

70
00:04:56,200 --> 00:05:00,320
तो उसको भी पवित्र ग्रंथी कहेंगे तो

71
00:05:00,320 --> 00:05:03,440
अगर पवित्र ग्रंथ की परिभाषा यही है कि उसमें भी मिलावट

72
00:05:03,440 --> 00:05:07,760
हो सकती है उसमें भी गलत बातें हो सकती हैं तो फिर अपवित्र या

73
00:05:07,760 --> 00:05:12,000
जिसको पवित्र नहीं कहा जाएगा उस ग्रंथ की परिभाषा क्या हो जाएगी यह सोचने

74
00:05:12,000 --> 00:05:16,040
वाली बात है तो एक फैक्ट

75
00:05:16,040 --> 00:05:20,840
से तर्क से हमने चालू की आज की बात

76
00:05:20,840 --> 00:05:24,680
अब हम आ जाते

77
00:05:24,680 --> 00:05:28,760
हैं इनके सबसे बड़े जो सबसे पहला इनका

78
00:05:28,760 --> 00:05:32,840
जो दिक्कत वाली बात है ये कहते हैं

79
00:05:32,840 --> 00:05:37,080
कि जो काल है इनके अनुसार जो श्री कृष्ण

80
00:05:37,080 --> 00:05:41,160
से अलग वाला काल है और वो जो

81
00:05:41,160 --> 00:05:45,400
है उसको कई श्लोकों में इन्होंने भी अविनाशी माना है

82
00:05:45,400 --> 00:05:49,680
जैसे की बात करें कहां-कहां पे अविनाशी है इनके

83
00:05:49,680 --> 00:05:54,120
ही द्वारा तो इनकी गीता का

84
00:05:54,120 --> 00:05:58,320
पहले आपके पास वो जय दयाल गोविंद का वाली गीता है क्या तत्व विवेचन

85
00:05:58,320 --> 00:06:02,320
नए संस्करण में ये बा है मेरे पास है जरा शो

86
00:06:02,320 --> 00:06:08,320
कर दीजिए

87
00:06:15,720 --> 00:06:19,760
7.25 तो सा 24 में क्योंकि गीता बोलने

88
00:06:19,760 --> 00:06:23,920
वाला काल है तो वह स्वयं को अविनाशी कह रहा है

89
00:06:23,920 --> 00:06:28,080
और सा 25 में भी वो स्वयं को अविनाशी कह रहा है तो

90
00:06:28,080 --> 00:06:32,120
काल ने स्वयं को अविनाशी कहा जन्म

91
00:06:32,120 --> 00:06:36,280
ना लेने वाला कहा सा 24 में उसने कहा

92
00:06:36,280 --> 00:06:40,480
कि जो मुझे मानव देह में इनके अनुसार अभी बात कर रहा हूं भाई

93
00:06:40,480 --> 00:06:44,560
वो हमारे श्री कृष्ण है जो बोल रहे हैं भगवत गीता को मर

94
00:06:44,560 --> 00:06:49,360
अभी मैं आपके फैक्ट के द्वारा आपकी बात का वो बता रहा हूं

95
00:06:49,360 --> 00:06:53,560
कि 7 24 में भगवान श्री

96
00:06:53,560 --> 00:06:58,160
कृष्ण के अंदर से इनके अनुसार जो काल बोल रहा है

97
00:06:58,160 --> 00:07:02,280
ऐसे बुक्ति खानी तो वो तो मैं भी दिखा देता अच्छा वो शेयर करना

98
00:07:02,280 --> 00:07:06,360
है क्या रुक हां रहा स्क्रीन शेयर करने में थोड़ा आनंद है

99
00:07:06,360 --> 00:07:10,400
वो आनंददायक होता है थोड़ा अभी कर रहा

100
00:07:10,400 --> 00:07:14,560
हूं आ रा

101
00:07:14,560 --> 00:07:18,720
है हम तब तक मैं बता देता हूं

102
00:07:18,720 --> 00:07:23,040
पढ़ के बता देता हूं 724 में क्या

103
00:07:23,040 --> 00:07:27,160
लिखा आज बहुत बहुत इंटरेस्टिंग होने वाली है आज बहुत

104
00:07:27,160 --> 00:07:31,360
बढ़िया लोगों को बहुत कुछ जानने को मिलेगा अभी तो केवल वही

105
00:07:31,360 --> 00:07:37,280
दिखता है ना वो क्या कहते हैं कि इधर से आदान

106
00:07:37,280 --> 00:07:41,920
प्रदान वाणी का आदान प्रदान ही दिखता है मगर आज कुछ इंफॉर्मेशन भी

107
00:07:41,920 --> 00:07:46,040
मिलेगी अभी तो यही दिखता है कि भाई उसको कैसे पटक पटका

108
00:07:46,040 --> 00:07:51,960
गया फलाने तर्क को कैसे निरस्त किया गया

109
00:07:51,960 --> 00:07:56,240
तो बुद्धि हीन पुरुष

110
00:07:56,240 --> 00:08:01,320
मेरे अविनाशी परम भाव को ना जानते हुए

111
00:08:01,320 --> 00:08:05,520
मन इंद्रियों से परे मुझ अब

112
00:08:05,520 --> 00:08:09,560
यहां पर इन लोगों ने जो इनका भाव चल रहा

113
00:08:09,560 --> 00:08:13,640
है उस हिसाब से यहां पर जगह जगह पर इन्होंने जहां पर सच्चिदानंद संस्कृत में नहीं

114
00:08:13,640 --> 00:08:17,640
लिखा है सच्चिदानंद परमात्मा वहां पर इन्होने गीता प्रश् में यूज

115
00:08:17,640 --> 00:08:22,280
किया है क्योंकि इन्होंने कहीं अपना वो दिया है कि हमने सच्चिदानंद क्यों यूज किया

116
00:08:22,280 --> 00:08:26,280
व उसका आधार प्रमाण दिया है मगर अगर

117
00:08:26,280 --> 00:08:29,640
यहां पर काल बोल रहा है इनके हिसाब से है ना

118
00:08:29,640 --> 00:08:34,040
तो वो क्या कह रहा है काल बुद्धिहीन पर पुरुष

119
00:08:34,040 --> 00:08:38,040
मेरे अविनाशी परम भाव को ना जानते हुए

120
00:08:38,040 --> 00:08:42,360
मन इंद्रियों से परे मन इंद्रियों से परे काल

121
00:08:42,360 --> 00:08:46,560
जो है व मन इंद्रियों से परे है है ना मन इंद्रियों

122
00:08:46,560 --> 00:08:50,920
से परे मुझ सच्चिदानंद परमात्मा

123
00:08:50,920 --> 00:08:55,120
को मनुष्य की भाति समझकर परमात्मा छोड़ दो परमात्मा

124
00:08:55,120 --> 00:08:59,480
मत मानो भाई आपके अनुसार भी बोलू तो क्या लिखा है बुद्धिहीन

125
00:08:59,480 --> 00:09:04,440
पुरुष मेरे अविनाशी परम भाव को ना जानते हुए

126
00:09:04,440 --> 00:09:08,840
मन इंद्रियों से परे मुझ को मनुष्य

127
00:09:08,840 --> 00:09:12,920
की भाति जन्म लेने वाला व्यक्ति भाव को

128
00:09:12,920 --> 00:09:17,120
प्राप्त हुआ मानते हैं यानी

129
00:09:17,120 --> 00:09:21,320
कि क्योंकि वह मानव देह में है काल इस समय श्री

130
00:09:21,320 --> 00:09:25,400
कृष्ण के रूप में तो यहां पर इन्होंने यह माना है कि काल यह कह

131
00:09:25,400 --> 00:09:29,840
रहा है कि मैं तो अविनाशी हूं सा 24 में

132
00:09:29,840 --> 00:09:34,000
इन्होंने माना है भगवत गीता 7

133
00:09:34,000 --> 00:09:40,000
24 दिखा दीजिए

134
00:09:53,960 --> 00:09:58,000
इनको क्या लिखा है बुद्धिहीन पुरुष अभी मैं वो जो एक शब्द

135
00:09:58,000 --> 00:10:02,120
है ना अनुत्तम को बाद के लिए रखूंगा अनुत्तम वाला शब्द वो

136
00:10:02,120 --> 00:10:06,600
भी एक अच्छा चैप्टर है आज का तो बुद्धिहीन पुरुष मेरे अविनाशी

137
00:10:06,600 --> 00:10:11,240
परम भाव को ना जानते हुए मन इंद्रियों से परे

138
00:10:11,240 --> 00:10:15,680
मुझको सच्चिदानंद परमात्मा हटा दिया इनके अकॉर्डिंग कर दिया

139
00:10:15,680 --> 00:10:19,760
मुझको मनुष्य की भाति समझकर जन्म

140
00:10:19,760 --> 00:10:24,320
लेने वाला व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं तो यहां पर उन

141
00:10:24,320 --> 00:10:28,520
काल को जन्म लेने वाला मानने वाला

142
00:10:28,520 --> 00:10:32,680
मानने वाले लोगों का खंडन किया जा रहा है कि और काल

143
00:10:32,680 --> 00:10:36,680
को अविनाशी ना मानने वाला मानने वाले लोगों का खंडन

144
00:10:36,680 --> 00:10:40,800
किया जा रहा है इस श्लोक में इसी प्रकार से सा 25

145
00:10:40,800 --> 00:10:44,920
में भी इन्होंने इस काल ने स्वयं को इनके अनुसार जो काल है उसने

146
00:10:44,920 --> 00:10:49,600
स्वयं को कहा है अविनाशी

147
00:10:49,600 --> 00:10:53,640
वो क्या कहा है कि अपनी मैं अपनी योग

148
00:10:53,640 --> 00:10:58,520
माया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता इसलिए

149
00:10:58,520 --> 00:11:03,200
यह अज्ञान समुदाय मुझ जन्म रहित अविनाशी परमेश्वर को

150
00:11:03,200 --> 00:11:07,440
नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने मरने

151
00:11:07,440 --> 00:11:09,760
वाला समझता है

152
00:11:09,760 --> 00:11:13,880
तो यहां पर दो चीजें आ गई कि काल का ना तो जन्म होता है

153
00:11:13,880 --> 00:11:17,920
ना ही म मरता है क्योंकि वह अविनाशी है

154
00:11:17,920 --> 00:11:22,360
ठीक है अब भैया इसको जरा

155
00:11:22,360 --> 00:11:26,560
इनकी गीता दिखा दो आप ऑपरेटर महोदय इनकी

156
00:11:26,560 --> 00:11:30,680
गीता क्या कहती है पेज नंबर इनकी गीता

157
00:11:30,680 --> 00:11:35,400
का खोलना है आपको 40

158
00:11:35,400 --> 00:11:41,400
45 45 वा पेज खोलिए इनकी गीता

159
00:11:43,000 --> 00:11:48,360
का नहीं 45 वा नहीं

160
00:11:48,360 --> 00:11:53,280
सॉरी तीसरा अध्याय चौथा चौथे श्लोक पर जाना है

161
00:11:53,280 --> 00:11:56,920
45 नंबर पर देखिए क्या हो रहा

162
00:11:56,920 --> 00:12:01,360
है अब सबसे पहली बात तो आती है

163
00:12:01,360 --> 00:12:07,360
हां यह 45 एक मिनट मुझे पढ़ने दीजिए क्या लिखा है

164
00:12:08,600 --> 00:12:12,720
ये एक तो इन्होंने इतनी इसमें वो की है

165
00:12:12,720 --> 00:12:17,640
सीधे-सीधे अपना भाष्य नहीं लिख सकते हैं कि गीता का अर्थ करके रख दे

166
00:12:17,640 --> 00:12:22,640
दूसरे का आधा टीटर आधा बटेर करना है ऊपर जाइए भैया

167
00:12:22,640 --> 00:12:26,720
थोड़ा बिल्कुल

168
00:12:26,720 --> 00:12:31,200
हां रुक रुक रुक रु रुकिए रुकिए

169
00:12:31,200 --> 00:12:35,520
हा यही बिल्कुल सही जगह पर आ गए हम लोग

170
00:12:35,520 --> 00:12:40,360
अच्छा इससे पहले थोड़ा आगे चलिए 4.5

171
00:12:40,360 --> 00:12:46,360
देख ले

172
00:12:50,680 --> 00:12:54,760
पहले और आगे और आगे अभी तीसरा ही चल रहा है

173
00:12:54,760 --> 00:12:58,880
चलिए थोड़ा तेजी से तीसरा अध्याय देखिए हेडिंग आ रही

174
00:12:58,880 --> 00:13:02,920
ना पर अभी चौथा अध्याय आ जाएगा अभी और ऊपर

175
00:13:02,920 --> 00:13:06,920
जाइए और मतलब चलते जाइए जिस दिशा में चल रहे

176
00:13:06,920 --> 00:13:10,920
उसी दिशा में चलिए आज इनकी

177
00:13:10,920 --> 00:13:15,760
गरिमा गीता की देखिए कितनी गरमा रखते हैं यह गीता की

178
00:13:15,760 --> 00:13:19,760
मतलब य क्या करते हैं अच्छा अच्छा बोल के उसका खंडन करते हैं और

179
00:13:19,760 --> 00:13:23,800
चलिए तेजी से चलिए अभी इन्होंने बीच में बहुत सारी अपनी मन की मन गणन बातें कर दी

180
00:13:23,800 --> 00:13:29,800
है इसमें

181
00:13:30,240 --> 00:13:34,160
और तेजी से चलिए

182
00:13:34,160 --> 00:13:38,840
थोड़ा अभी लंबा है चैप्टर

183
00:13:38,840 --> 00:13:43,080
अभी भी तीसरा ही चल रहा है और चलिए कौन से चैप्टर में है

184
00:13:43,080 --> 00:13:47,200
चौथा फ फोथ चैप्टर जब फोर्थ आ जाएगा फोर्थ का

185
00:13:47,200 --> 00:13:51,600
पांचवा श्लोक हम देखेंगे फोर्थ

186
00:13:51,600 --> 00:13:55,760
आपका मैं बताता हूं फ आपका है पेज नंबर

187
00:13:55,760 --> 00:13:59,920
94 प आ जाइए सीधा

188
00:13:59,920 --> 00:14:04,040
अच्छा आपके पास भी है ये वाली गीता गमा

189
00:14:04,040 --> 00:14:08,760
गीता अरे वाह क्या बात

190
00:14:08,760 --> 00:14:13,040
है मैं कर दू शेयर हा ये आ गया 94 प 94

191
00:14:13,040 --> 00:14:18,080
प आ तो आप ही को कर देना चाहिए

192
00:14:18,080 --> 00:14:23,080
हा तो 94 में

193
00:14:23,080 --> 00:14:27,440
आप अब यहां पर गीता ज्ञान बोलने वाला भी ज जन्मता

194
00:14:27,440 --> 00:14:31,880
मरता है ठीक है

195
00:14:31,880 --> 00:14:36,160
तो इन्होंने यहां पर उसे जन्मना जन्मना जन्म लेने वाला और मरने

196
00:14:36,160 --> 00:14:40,360
वाला मान लिया और जबकि

197
00:14:40,360 --> 00:14:45,120
वो जो सातवा अध्याय 24 वा श्लोक दिखा दीजिए

198
00:14:45,120 --> 00:14:45,620
वहां

199
00:14:45,320 --> 00:14:51,320
पर वो क्या कह रहा है मैं अविनाशी इन्होंने भी माना है कि वो अविनाशी

200
00:14:52,200 --> 00:14:57,280
है अगर दिखा सकते जल्दी से तो दिखा दीजिए नहीं मैं सराइज करके बोल

201
00:14:57,280 --> 00:15:03,280
दूं रहने दीजिए हटाइए हमें ले आइए मुख्य पटल

202
00:15:04,960 --> 00:15:09,040
पर तो इन्होंने यहां पर

203
00:15:09,040 --> 00:15:13,280
उसको जन्म लेने वाला और मरने वाला मान लिया जबकि

204
00:15:13,280 --> 00:15:17,960
वह स्वयं को सा 24 और 72 में

205
00:15:17,960 --> 00:15:22,120
जन्मने मरने के रूप में समझने वालों का खंडन कर रहा

206
00:15:22,120 --> 00:15:26,400
है अगर इनका वह काल है दूसरी बात उसने स्वयं को अविनाशी

207
00:15:26,400 --> 00:15:29,400
भी कहा है

208
00:15:29,400 --> 00:15:33,560
हां अविनाशी परमेश्वर मत लीजिए मगर उसने स्वयं

209
00:15:33,560 --> 00:15:38,040
को अविनाशी कहा है और यह संस्कृत के शब्द भी देखते हैं तो इनको संस्कृत

210
00:15:38,040 --> 00:15:42,280
का शब्द दिखा दो वयम ये दिख रहा है लास्ट

211
00:15:42,280 --> 00:15:45,400
में मा

212
00:15:45,400 --> 00:15:49,520
माम ये अवम

213
00:15:49,520 --> 00:15:53,800
अ वयम का अर्थ क्या होता है अविनाशी ठीक है

214
00:15:53,800 --> 00:15:58,080
बकल जिसका व ना हो अवम

215
00:15:58,080 --> 00:16:01,600
ठीक है

216
00:16:01,600 --> 00:16:06,120
तो सा 25 में काल ने स्वयं को अविनाशी

217
00:16:06,120 --> 00:16:10,200
मान लिया स्वयं को अविनाशी घोषित कर दिया और जन्म मरण नहीं होता

218
00:16:10,200 --> 00:16:14,280
है यह भी घोषित कर दिया सा 24 में भी कर दिया और और इसके अलावा

219
00:16:14,280 --> 00:16:18,360
भी अनेको नेक जगह करा है अब इनकी गरमा

220
00:16:18,360 --> 00:16:22,600
गीता की पर जाइए तीसरे अध्याय के जहां अभी पहले थे ना

221
00:16:22,600 --> 00:16:28,600
हम तीसरे अध्याय के चौथे 14 श्लोक पर

222
00:16:29,120 --> 00:16:33,160
जाइ बहुत लंबा है इन्होने बीच में बहुत खिचड़ी पकाई है ठीक है तीसरे

223
00:16:33,160 --> 00:16:37,440
अध्याय के 26 में श्लोक पे आ गया 24 में जाना है हां 24

224
00:16:37,440 --> 00:16:41,520
24 नहीं 14वां चवा 13 14 वही होगा एक साथ

225
00:16:41,520 --> 00:16:47,000
ही होगा

226
00:16:47,000 --> 00:16:51,400
वो एक पता नहीं ये रहा 14

227
00:16:51,400 --> 00:16:55,480
हां यही है ना हां यही अब यहां ये क्या कह

228
00:16:55,480 --> 00:17:00,160
रहे हैं इसको देखते हैं कि

229
00:17:00,160 --> 00:17:04,160
प्राणी अनन से उत्पन्न होते हैं अन्न

230
00:17:04,160 --> 00:17:08,160
वर्षा से उत्पन्न होता है वर्षा यानी

231
00:17:08,160 --> 00:17:09,120
वृष्टि

232
00:17:09,120 --> 00:17:15,120
यज्ञ से यानी धार्मिक अनुष्ठान से होती

233
00:17:15,520 --> 00:17:19,960
है यज्ञ यानी धार्मिक अनुष्ठान शास्त्र अनुकूल

234
00:17:19,960 --> 00:17:22,680
कर्मों से सफल होते हैं ठीक

235
00:17:22,680 --> 00:17:26,920
है मैं भी एक मिनट खोल ू इसमें जय दयाल गोविंद का जी में

236
00:17:26,920 --> 00:17:31,440
अब इन्होंने कारण कारण बता है कि जो ब्रह्म है अंततोगत्वा

237
00:17:31,440 --> 00:17:35,840
व अविनाशी नहीं है कुल मिलाकर मैं आपको यह बताना चाह रहा हूं

238
00:17:35,840 --> 00:17:39,880
कि ब्रह्म को या काल को जो इनका काल है जो

239
00:17:39,880 --> 00:17:44,120
कि श्री कृष्ण से अलग है उसने यदि स्वयं को सा

240
00:17:44,120 --> 00:17:48,120
24 और 72 में अविनाशी कह दिया

241
00:17:48,120 --> 00:17:52,360
इन्होंने भी उसको मान लिया कि वह अविनाशी है जन्म लेने वाला

242
00:17:52,360 --> 00:17:56,480
नहीं है मरने वाला नहीं है तो अब ये

243
00:17:56,480 --> 00:18:01,520
तीसरे अध्याय के चव श्लोक में जब ती ब्रह्म को उत्पन्न होने वाला दिखाते

244
00:18:01,520 --> 00:18:05,640
हैं अपनी बात को काटने काट भी रहे हैं और अपनी बात को

245
00:18:05,640 --> 00:18:09,640
बचा भी रहे हैं कैसे बचा रहे हैं क्योंकि भाई ब्रह्म अगर अविनाशी हो जाएगा

246
00:18:09,640 --> 00:18:13,640
तो वो ब्रह्म से अलग एक परम अक्षर ब्रह्म कैसे

247
00:18:13,640 --> 00:18:18,000
सिद्ध होगा कोई तो फिर यहां पर ब्रह्म को परमात्मा

248
00:18:18,000 --> 00:18:22,200
से उत्पन्न होने वाला बताने के लिए क्या कर रहे हैं कि जो वृष्टि

249
00:18:22,200 --> 00:18:26,240
होती है व यज्ञ से होती है और जो यज्ञ होते

250
00:18:26,240 --> 00:18:30,600
हैं यज्ञ भेद जो कर्म होते हैं तो तो ब्रह्म

251
00:18:30,600 --> 00:18:34,600
का जो अर्थ है ब्रह्म का

252
00:18:34,600 --> 00:18:37,800
अर्थ तीसरे अध्याय के 14वें

253
00:18:37,800 --> 00:18:41,800
श्लोक में ब्रह्म का अर्थ

254
00:18:41,800 --> 00:18:45,960
लिया है वेद क्योंकि वेद भी ब्रह्म स्वरूपी है भगवत स्वरूपी

255
00:18:45,960 --> 00:18:50,120
है है ना निश्वास रूप वेद है कई

256
00:18:50,120 --> 00:18:54,360
जगह शास्त्रों में वर्णन आया है तो यहां पर जो अन्य

257
00:18:54,360 --> 00:18:58,440
भाष्य का हैं उन्होंने ब्रह्म का अर्थ वेद माना है

258
00:18:58,440 --> 00:19:02,720
कि वेद से उत्पन्न होने वाले यज्ञ यज्ञ कर्म और

259
00:19:02,720 --> 00:19:07,120
यज्ञ कर्म से होने वाली वृष्टि और वृष्टि से उत्पन्न

260
00:19:07,120 --> 00:19:11,760
होने वाले उत्पन्न होने वाला अन्न

261
00:19:11,760 --> 00:19:15,760
और अन्न से उत्पन्न होने वाला प्राणी ऐसे ये क्रम

262
00:19:15,760 --> 00:19:20,160
है तो यहां पर इन्होंने जब ब्रह्म शब्द इन्होने पा लिया अपने मन का

263
00:19:20,160 --> 00:19:24,400
तो उस ब्रह्म शब्द का अर्थ जो है वो यह सिद्ध

264
00:19:24,400 --> 00:19:28,880
करने के लिए कि भाई ब्रह्म को उत्पन्न करने वाला जो है वह सर्वव्यापी परम

265
00:19:28,880 --> 00:19:33,040
ब्रह्म है तो उन्होंने ब्रह्म का अर्थ जो है वो वेद ना लेकर

266
00:19:33,040 --> 00:19:37,360
के ब्रह्म का अर्थ अपना वाला काल ले लिया तो अब ले तो लिया इन्होंने उत्पन्न

267
00:19:37,360 --> 00:19:41,640
कर दिया उसे मगर प्रॉब्लम ये है कि सा 24 और 725

268
00:19:41,640 --> 00:19:45,760
में वो जब अविनाशी है तो फिर ये तीन 14 के आधार

269
00:19:45,760 --> 00:19:49,840
पर आप ब्रह्म को उत्पन्न होने वाला या नष्ट

270
00:19:49,840 --> 00:19:53,840
होने वाला सिद्ध कैसे कर सकते हैं इसके लिए

271
00:19:53,840 --> 00:19:58,360
आपको मानना पड़ेगा कि तीन

272
00:19:58,360 --> 00:20:02,440
वो इसके लिए आपको मानना पड़ेगा कि 7 24 और 725

273
00:20:02,440 --> 00:20:06,960
में गीता में झूठ लिखा है वह अविनाशी नहीं है

274
00:20:06,960 --> 00:20:11,520
वह जन्म मृत्यु से बाहर नहीं है

275
00:20:11,520 --> 00:20:15,560
हो गया तो अब क्या हुआ आपने अपने पवित्र ग्रंथ को कहीं पर झूठा

276
00:20:15,560 --> 00:20:19,640
साबित कर दिया एक जगह नहीं है ये व अनेका

277
00:20:19,640 --> 00:20:23,880
अनेक जगह 35 श्लोक बहुत कम है उसके हिसाब से 5 पर जो बोला गया है

278
00:20:23,880 --> 00:20:28,280
वो बहुत कम है तो पहली बात तो यह आ जाती है

279
00:20:28,280 --> 00:20:32,480
कि काल यह अविनाशी भी है और फिर ये अब काल को ही

280
00:20:32,480 --> 00:20:36,480
विनाश वान भी सिद्ध कर देते हैं काल जो है जन्म और मृत्यु

281
00:20:36,480 --> 00:20:40,680
से परे भी है और फिर ये काल को ही जन्म मृत्यु वाला सिद्ध

282
00:20:40,680 --> 00:20:44,800
करने का प्रयास करते हैं अब प्रयास करने के लिए जो तर्क देते हैं वहां पर तीन

283
00:20:44,800 --> 00:20:48,880
14 में वो यह तर्क देते हैं कि वो जैसे

284
00:20:48,880 --> 00:20:53,040
कोई माता के गर्भ से जन्म लेता है उस तरह से जन्म नहीं लेता

285
00:20:53,040 --> 00:20:56,360
इसलिए उसे

286
00:20:56,360 --> 00:21:00,560
जन्म ना लेने वाला कहा गया गया है

287
00:21:00,560 --> 00:21:04,960
क्योंकि वह माता के गर्भ से जन्म नहीं ले रहा है मगर ऐसी

288
00:21:04,960 --> 00:21:09,200
कोई व्याख्या शास्त्र में नहीं आई है कि

289
00:21:09,200 --> 00:21:13,280
माता के गर्भ से जो जन्म नहीं लेगा उसको

290
00:21:13,280 --> 00:21:17,360
जन्म लेने वाला नहीं माना जाएगा वह उत्पन्न हो रहा है तो उसके लिए भी आविर्भव तिरो

291
00:21:17,360 --> 00:21:21,400
भाव यूज हो जाएगा और अगर आविर्भव तिरो भाव यूज

292
00:21:21,400 --> 00:21:25,440
हो रहा है तो आविर्भव रो भाव यदि

293
00:21:25,440 --> 00:21:29,560
यूज हो रहा है तो क्या होगा कि उस का अर्थ जन्म मृत्यु

294
00:21:29,560 --> 00:21:33,720
मान लिया जाएगा वो कैसे माना जाएगा कि

295
00:21:33,720 --> 00:21:37,760
जो ब्रह्मा विष्णु महेश की उत्पत्ति देवी भागवत में बताई गई है जहां पर वो

296
00:21:37,760 --> 00:21:41,880
कर रहे हैं कि मैं हम लोग आप ही से उत्पन्न होते हैं वो माता के गर्भ

297
00:21:41,880 --> 00:21:45,960
से उत्पन्न नहीं होते हैं वो माता की इच्छा शक्ति से

298
00:21:45,960 --> 00:21:50,000
संकल्प मात्र से उत्पन्न होते हैं माता के गर्भ से उत्पन्न नहीं

299
00:21:50,000 --> 00:21:54,360
होते हैं माता उनकी रचना करती है ठीक है मगर

300
00:21:54,360 --> 00:21:58,600
वहां पर जब वो अपने आप आविर्भाव तिरो भाव कहते हैं अपना आविर्भाव कहते हैं

301
00:21:58,600 --> 00:22:02,840
तो उसको आप जन्म मानते हैं ये तो ये रही

302
00:22:02,840 --> 00:22:07,040
बात उसको अगर लीला पूर्वक मान भी लोगे

303
00:22:07,040 --> 00:22:11,320
कि वह जन्म ही है माता के गर्भ से ही जन्म ले रहे हैं मगर माता

304
00:22:11,320 --> 00:22:11,820
के

305
00:22:11,440 --> 00:22:15,440
गर्भ से जन्म लेने वाले को यहां पर कहा गया है कि जन्म

306
00:22:15,440 --> 00:22:19,520
और मृत्यु से रहित है ये इस शास्त्र में कहीं नहीं लिखा है जिस शास्त्र

307
00:22:19,520 --> 00:22:23,520
को आप प्रमाण मान रहे हैं तो पॉइंट ये आता है कि जब वो

308
00:22:23,520 --> 00:22:28,000
अपने और सबसे एट दी एंड जब उसने अपने आप को अविनाशी कह दिया

309
00:22:28,000 --> 00:22:32,560
तो फिर उसके कई मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं 4.5 में

310
00:22:32,560 --> 00:22:36,640
इसको आप कैसे रख सकते हैं फिर वो या तो वह काल नहीं है जो यह कह रहा

311
00:22:36,640 --> 00:22:40,680
मेरे और मे मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं और या तो

312
00:22:40,680 --> 00:22:44,760
व वो काल नहीं है जो कह रहा है कि मैं अविनाशी हूं तो यहां

313
00:22:44,760 --> 00:22:48,920
पर आपकी जो चीजें आपस में क्लश हो रही है आपकी चीजें

314
00:22:48,920 --> 00:22:53,400
यहां पर आपको दोनों में से एक बात को झूठ मानना पड़ेगा तो आपने

315
00:22:53,400 --> 00:22:57,560
अविनाशी को झूठ मान लिया क्योंकि उससे परम कोई ईश्वर आपको सिद्ध

316
00:22:57,560 --> 00:23:01,760
करना था तो इसलिए आपने अविनाशी को झूठ मान लिया तो यह भाई

317
00:23:01,760 --> 00:23:06,720
इन्होंने पवित्र ग्रंथ के साथ छेड़खानी की पहली बात

318
00:23:06,720 --> 00:23:10,760
ठीक है हां रामपाल वालों को लेंगे अभी अब इसमें हम

319
00:23:10,760 --> 00:23:15,080
लोग वो जो 7.25 अभी खोला था उसको जरा दोबारा खोलिए

320
00:23:15,080 --> 00:23:19,000
उसमें एक बात और है मजे

321
00:23:19,000 --> 00:23:24,840
की

322
00:23:24,840 --> 00:23:29,320
7.25 जय दयाल गोविंद का वाला जो अभी

323
00:23:29,320 --> 00:23:32,880
पंडित जी खोल रहे थे

324
00:23:32,880 --> 00:23:38,880
हां अ 7.25 खोलना है हां

325
00:23:39,840 --> 00:23:43,600
हां छटा

326
00:23:43,600 --> 00:23:49,240
अध्याय

327
00:23:49,240 --> 00:23:55,240
81 हम ये आ जा पांचवा दवा 13वां

328
00:23:56,280 --> 00:24:02,280
सवा ये लीजिए 24 25 ये

329
00:24:02,400 --> 00:24:06,480
रहा अब देखिए इन्होंने दोनों में से एक बात को देखिए पहली बात

330
00:24:06,480 --> 00:24:10,720
तो यह है कि मैंने कई बार कहा है कि हमारे शास्त्रों में लिखा

331
00:24:10,720 --> 00:24:14,120
हुआ है

332
00:24:14,120 --> 00:24:18,120
कि हमारे शास्त्रों में लिखा हुआ है यदि दो जगह दो तरह

333
00:24:18,120 --> 00:24:23,080
की बात आ रही है तो उनमें से किसी एक बात को नहीं ले सकते आप दोनों को ही लेना पड़ेगा

334
00:24:23,080 --> 00:24:27,840
तो इन्होंने क्या किया कि एक जगह की बात से दूसरी जगह का खंडन मान लिया

335
00:24:27,840 --> 00:24:31,920
और एक जगह तो अभी अभी अभी लिखा भी है अभी तो ये घुमा फिरा के कह भी देंगे

336
00:24:31,920 --> 00:24:36,040
कि हमने खंडन नहीं माना है मगर एक जगह तो इन्होंने लिखा है कि

337
00:24:36,040 --> 00:24:40,080
हा भाई वो जो वो खंडन हो जाता है उस वाले से इस वाले का खंडन हो

338
00:24:40,080 --> 00:24:44,280
जाता है अच्छा जब दो जगह अलग-अलग तरह

339
00:24:44,280 --> 00:24:48,320
की बातें आ रही है और इस बात से उस बात का खंडन हो रहा है तो वही

340
00:24:48,320 --> 00:24:52,440
बात क्यों मानी जाए उनमें से जो आप कह रहे हो वो बात क्यों नहीं मानी जाए

341
00:24:52,440 --> 00:24:56,640
जिसका आप खंडन कर रहे हो ये प्रॉब्लम आ जाती है तो सा

342
00:24:56,640 --> 00:25:00,680
24 में देखिए क्या लिखा है कि बुद्धिहीन

343
00:25:00,680 --> 00:25:04,880
पुरुष मेरे अभी भी मैं उस वर्ड को छोडूंगा

344
00:25:04,880 --> 00:25:08,880
अनुत्तम वो बात के लिए रखेंगे हां

345
00:25:08,880 --> 00:25:11,840
अभी लिंक दिया जाएगा थोड़ी देर थोड़ा शब

346
00:25:11,840 --> 00:25:17,840
रखें थोड़ा सा धैर रखें भैया

347
00:25:22,120 --> 00:25:26,240
भाई आपकी आवाज चली

348
00:25:26,240 --> 00:25:30,440
गई सा 24 तो सा

349
00:25:30,440 --> 00:25:35,280
24 में ध्यान से पढ़िए क्या लिखा है बुद्धिहीन पुरुष

350
00:25:35,280 --> 00:25:39,280
मेरे अविनाशी परम भाव को ना जानते हुए मन इंद्रियों

351
00:25:39,280 --> 00:25:43,400
से परे अब यह बताइए क्या

352
00:25:43,400 --> 00:25:47,560
इनका जो काल है अगर यह कह रहे

353
00:25:47,560 --> 00:25:51,880
हैं काल है वह मनुष्यों को खाता है तो क्या वह मन इंद्रियों

354
00:25:51,880 --> 00:25:54,160
से परे

355
00:25:54,160 --> 00:25:58,840
है यहां पर काल के लिए चीज ये आई है जगह

356
00:25:58,840 --> 00:26:02,960
अव्यक्त और इसको इन्होंने भी माना है काल को कई जगह मन इंद्रियों

357
00:26:02,960 --> 00:26:07,200
से परे तो

358
00:26:07,200 --> 00:26:11,400
क्या काल मन इंद्रियों से परे है जब आप कह रहे हो कि वह

359
00:26:11,400 --> 00:26:16,040
खाता है तो जब वह आपको खाने आएगा आपको पकड़ेगा

360
00:26:16,040 --> 00:26:20,080
आपको आपको उसकी छुअन अनुभव होगा आपको

361
00:26:20,080 --> 00:26:24,240
उसका तो वह तो आपकी इंद्रियों का विषय हो गया तो यह

362
00:26:24,240 --> 00:26:26,880
कौन सा काल है जो मन इंद्रियों से परे

363
00:26:26,880 --> 00:26:31,360
है यानी कि ये आपका वाला काल नहीं है जो लोगों को खाता

364
00:26:31,360 --> 00:26:35,800
है या जो अन्य कार्य करता है क्योंकि यह जो है

365
00:26:35,800 --> 00:26:40,440
अगर मान लो दिखाई नहीं दे रहा केवल वो बात एक अलग है कि दिखाई नहीं दे रहा

366
00:26:40,440 --> 00:26:45,080
मगर मन इंद्रियों से परे की जब बात आ जाती है

367
00:26:45,080 --> 00:26:49,120
तो मन इंद्रियों से परे के रूप में तो भाई

368
00:26:49,120 --> 00:26:53,960
वो किसी भी प्रकार की इंद्री का विषय नहीं होना चाहिए जैसे वायु है

369
00:26:53,960 --> 00:26:58,760
वो भी हमें दिखाई नहीं दे रही है मगर वो हमारी जो

370
00:26:58,760 --> 00:27:02,840
स्पर्श इंद्रिय है उसका विषय है वायु सही कह रहा हूं

371
00:27:02,840 --> 00:27:06,880
ना मगर यह तो मन इंद्रियों से परे लिखा

372
00:27:06,880 --> 00:27:11,440
है तो मन इंद्रियों से परे

373
00:27:11,440 --> 00:27:15,840
जो काल है उसके लिए यहां पर लिखा हुआ है

374
00:27:15,840 --> 00:27:19,840
अव्यक्त किसी भी प्रकार से एक तो यह बात हो गई अब

375
00:27:19,840 --> 00:27:23,880
बात करते हैं फेवरेट टॉपिक अनुत्तम बहुत चिल्लाया जाता है अनुत्तम के

376
00:27:23,880 --> 00:27:28,280
बारे में ठीक है यह कहते हैं

377
00:27:28,280 --> 00:27:32,280
अनुत्तम का मतलब है जो उत्तम नहीं है यहां पर काल को कहा

378
00:27:32,280 --> 00:27:36,720
गया है कि वो उत्तम नहीं है वो अश्र है व

379
00:27:36,720 --> 00:27:40,960
निम्न है अच्छा पहली बात तो ये है कि अनुत्तम

380
00:27:40,960 --> 00:27:42,080
का जो उत्तम

381
00:27:42,080 --> 00:27:46,080
शब्द है अगर उत्तम का मतलब श्रेष्ठ

382
00:27:46,080 --> 00:27:51,000
है तो जो क्या कहते हैं

383
00:27:51,000 --> 00:27:55,800
ये उत्तम का विलोम होगा वो होगा निम्न विलोम

384
00:27:55,800 --> 00:27:59,800
शब्द उत्तम श्रेष्ठ है तो उत्तम का विलो

385
00:27:59,800 --> 00:28:03,840
विलोम शब्द क्या हुआ निम्न अब इसमें इन्होंने काल के

386
00:28:03,840 --> 00:28:08,280
लिए जो शब्द आया है वो है अनुत्तम तो हम लोग ये

387
00:28:08,280 --> 00:28:13,400
शिवराम आपटे जी की डिक्शनरी है ये भी अवेलेबल है क्या आपके

388
00:28:13,400 --> 00:28:17,520
पास बोल रहा हूं बोल रहा हूं तो मैं

389
00:28:17,520 --> 00:28:23,520
आपको बता देता हूं कहां पर है

390
00:28:24,920 --> 00:28:30,120
अनुत्तम अनुचिंता अनुदान

391
00:28:30,120 --> 00:28:36,120
अनुत्तम य पेज नंबर 37 पर है

392
00:28:42,120 --> 00:28:46,560
यम य है ना वमन शिवराम आपटे जी हा वामन

393
00:28:46,560 --> 00:28:50,640
शिवराम आपटे जी की डिक्शनरी पेज नंबर 37 प्र

394
00:28:50,640 --> 00:28:56,640
संख्या

395
00:28:58,240 --> 00:29:02,280
ये रहा अभी आज कीय जो मैं जोय जो अभी एक दो घंटे की

396
00:29:02,280 --> 00:29:07,160
जो सामग्री लाया हूं य मोटे मोटे तौर पर जो मैंने अध्ययन कर पाया इनका

397
00:29:07,160 --> 00:29:13,160
उसी में इतनी प्राप्त हुई है कि

398
00:29:14,960 --> 00:29:19,280
अभी वह उसी में जो मुझे सामग्री प्राप्त हो गई है वह अभी एंड

399
00:29:19,280 --> 00:29:24,640
होते होते बैंड बच जाएगा टिल द एंड बजेगा

400
00:29:24,640 --> 00:29:29,480
बैंड यय श हा

401
00:29:29,480 --> 00:29:34,360
37 अनुत्तम हा अनुत अतम

402
00:29:34,360 --> 00:29:38,520
बोला ना मैंने अनुत्तम का अर्थ लिखा हुआ

403
00:29:38,520 --> 00:29:42,600
है जिससे अच्छा कोई और ना हो यह शिवराम

404
00:29:42,600 --> 00:29:47,400
अप की वही डिक्शनरी है जिस

405
00:29:47,400 --> 00:29:51,640
अ दिखाते जबक वहा पर चलना भी लिखा है पधार भी लिखा है पहुंचना भी लिखा

406
00:29:51,640 --> 00:29:55,760
है मगर यह वहां पर एक ही अर्थ दिखाते हैं जाना और

407
00:29:55,760 --> 00:30:00,320
दूसरे किसी अर्थ पर ध्यान मत दो यहां पे

408
00:30:00,320 --> 00:30:04,360
यहां पर जो है इसका जो प्राथमिकता से जो अर्थ लिखा

409
00:30:04,360 --> 00:30:08,560
हुआ है सीधे-सीधे जिससे अच्छा कोई और ना हो मैं दिखा दूं क्या

410
00:30:08,560 --> 00:30:12,600
अरे मैं शेयर तो कर रहा हूं अच्छा शेयर हो नहीं रहा

411
00:30:12,600 --> 00:30:16,760
है अ अरे यार अरे अरे मैं कब से दिखा रहा हूं ये देखिए

412
00:30:16,760 --> 00:30:21,560
हे भगवान ये देखिए ना जिससे अच्छा

413
00:30:21,560 --> 00:30:25,640
कोई जिससे अच्छा कोई और ना हो जिससे बढ़िया कोई

414
00:30:25,640 --> 00:30:30,560
और ना हो सबसे अच्छा यहां पर बढ़िया

415
00:30:30,560 --> 00:30:35,120
यहां पर काल से प्रमुख रूप से

416
00:30:35,120 --> 00:30:39,360
सर्वोपरि तो यहां पर बस बस करिए

417
00:30:39,360 --> 00:30:43,400
तो यहां पर काल के लिए अनुत्तम शब्द आया है अब जब

418
00:30:43,400 --> 00:30:48,240
भैया इनका सा 24 दिखा दो

419
00:30:48,240 --> 00:30:54,240
जरा इनकी गीता का गमा गीता का सा 24 दिखा दो

420
00:31:01,960 --> 00:31:06,040
अगर उत्तम का विलोम अर्थ लिखना भी होगा तो

421
00:31:06,040 --> 00:31:10,080
अधम लिखो निम्न लिखो मगर यह जो है

422
00:31:10,080 --> 00:31:13,600
उत्तम का विलोम अर्थ बनाएंगे

423
00:31:13,600 --> 00:31:17,800
अनुत्तम छवा अध्याय सातवा अध्याय अब सिमरा आप इनके

424
00:31:17,800 --> 00:31:21,960
लिए प्रमाण नहीं रह गए तो बात य आती है अगर ये क्लेम करते हैं हमको संस्कृत

425
00:31:21,960 --> 00:31:26,560
नहीं आती है तो फिर इनको अनुत्तम का ये पता कहां से चला फिर

426
00:31:26,560 --> 00:31:30,680
और यह जो करके गए हैं इस जो व्यवस्था है इसमें इतनी खिचड़ी पकाई

427
00:31:30,680 --> 00:31:34,680
है इन्होंने गरमा गीता की में यह खुद पूरा भाष्य क्यों नहीं

428
00:31:34,680 --> 00:31:39,200
लिख दिया इसलिए नहीं लिखा कि संस्कृत आती नहीं है भाई

429
00:31:39,200 --> 00:31:43,240
हा य सा में कह रहे हैं ब्रह्म कह रहा

430
00:31:43,240 --> 00:31:45,880
है कि मूर्ख मेरे अति गंदे अटल

431
00:31:45,880 --> 00:31:50,280
भाव को अब देखिए अति गंदे यह शब्द की संस्कृत

432
00:31:50,280 --> 00:31:54,520
वहां पर कहां है अच्छा यहां पर इन्होने इसको अविनाशी

433
00:31:54,520 --> 00:31:58,880
माना है देख लीजिए क्या माना है काल रूप को नहीं जा मुझ

434
00:31:58,880 --> 00:32:03,160
अव्यक्त अदृश्य मान अर्थात योग माया से छुपे हुए

435
00:32:03,160 --> 00:32:07,320
को व्यक्त श्री कृष्ण के रूप में प्रकट हुआ मानते हैं अर्थात मैं

436
00:32:07,320 --> 00:32:11,440
ही मैं ही श्री कृष्ण मैं श्री कृष्ण नहीं हूं य अपने चलो ठीक

437
00:32:11,440 --> 00:32:15,480
है कर दिया ठीक है अनुत्तम अविनाशी लो

438
00:32:15,480 --> 00:32:19,640
अविनाशी तो इन्होंने भी मान लिया यहां पर अविनाशी मान

439
00:32:19,640 --> 00:32:23,880
लिया ना बिल्कुल जब इन्होंने अविनाशी

440
00:32:23,880 --> 00:32:27,960
मान लिया तो फिर उसकी जन्म मृत्यु होने

441
00:32:27,960 --> 00:32:32,880
वाला उसको क्यों मान रहे हो अविनाशी का अर्थ इसका कभी विनाश नहीं हो सकता

442
00:32:32,880 --> 00:32:37,600
और तो और फिर तुम वहां पर यह भी कह रहे हो कि

443
00:32:37,600 --> 00:32:41,840
क्योंकि उस तरीके से जन्म नहीं होता है तो भैया महाभारत

444
00:32:41,840 --> 00:32:46,800
में कल हमने प्रमाण दिखाया था अभी दिखा देते हैं दोबारा क्या प्रमाण है

445
00:32:46,800 --> 00:32:50,840
कि भगवान वासुदेव जिनकी शरण में जाने के लिए

446
00:32:50,840 --> 00:32:54,960
इस भगवत गीता में कहा गया है सा 19 में

447
00:32:54,960 --> 00:33:00,760
कि वासुदेव ही सब कुछ है वही सर्व शक्तिमान सर्वव्यापक

448
00:33:00,760 --> 00:33:01,760
वासुदेव

449
00:33:01,760 --> 00:33:06,320
महाभारत आदि पर्व 63 वा अध्याय 98 से 104

450
00:33:06,320 --> 00:33:10,320
श्लोक है उसमें वह देवकी मां

451
00:33:10,320 --> 00:33:14,440
के गर्भ से जन्म लेते हैं दिखाई जन्म होता है मगर वह

452
00:33:14,440 --> 00:33:18,440
असल में प्रकट होते हैं व जैसे आपको कह रहे हो

453
00:33:18,440 --> 00:33:22,480
ना कि वो इस तरह से जन्म लेने वो उस तरह से जन्म

454
00:33:22,480 --> 00:33:26,520
लेने वाला नहीं होता है वो सिर्फ व्यवहारिक जगत के लोगों को ऐसा लगता है कि उनका

455
00:33:26,520 --> 00:33:30,840
जन्म हुआ भगवान सदा प्रकट ही होते हैं

456
00:33:30,840 --> 00:33:35,080
तो सबसे पहली बात इन्होंने अपने उसको काट दिया इन्होंने अनुत्तम का गलत

457
00:33:35,080 --> 00:33:39,080
अर्थ लिख दिया कि अनुत्तम का मतलब है सबसे गंदा दूसरी

458
00:33:39,080 --> 00:33:43,120
बात अव्यक्त जो अव्यक्त और छुपा हुआ होना चाहिए वह

459
00:33:43,120 --> 00:33:47,240
केवल आंखों से छुपा हुआ नहीं होता है वह हर प्रकार से छुपा हुआ

460
00:33:47,240 --> 00:33:51,880
होना चाहिए ना ऐसा थोड़ी ना है कि और हर प्रकार से

461
00:33:51,880 --> 00:33:56,040
छुपा हुआ यानी मन से छुपा हुआ स्पर्श इंद्री से छुपा हुआ हर प्रकार से छुपा

462
00:33:56,040 --> 00:34:00,040
हुआ होना चाहिए दूसरी बात यह है कि यह कहीं

463
00:34:00,040 --> 00:34:04,240
पर गीता प्रेस के ग्रंथों का हिंदी अर्थ चेक नहीं करते

464
00:34:04,240 --> 00:34:08,960
हैं कि वहां पर संस्कृत के शब्द क्या लिखे क्योंकि इनके मन की बातें हैं

465
00:34:08,960 --> 00:34:12,960
जैसे देवी भागवत का इन्होंने संक्षिप्त पढ़ा है संस्कृत पढ़ी नहीं है

466
00:34:12,960 --> 00:34:16,840
तो इन्होंने क्यों नहीं चेक किया कि कहीं यहां पर हम जो अर्थ ले रहे

467
00:34:16,840 --> 00:34:21,280
हैं वो वहां संस्कृत के शब्द है कि नहीं अपने मन से क्योंकि अपनी बातें हैं

468
00:34:21,280 --> 00:34:25,800
इसी प्रकार से ब्रज शब्द के मामले में उंगली उठाते हैं गीता ब्रज ने गलत किया है अनुत्तम

469
00:34:25,800 --> 00:34:30,000
पर इन्होंने शिवराम आपटे पर भी प्रश्न उठा दिया अनुत्तम शब्द

470
00:34:30,000 --> 00:34:34,320
के अर्थ में शिवराम आपटे भी प्रश्न उठा दिया तो प्रश्न आता है कि इनको

471
00:34:34,320 --> 00:34:38,360
ये संस्कृत का ज्ञान हुआ कहां से जब इनको संस्कृत आती नहीं है

472
00:34:38,360 --> 00:34:42,520
तो फिर इनके लिए प्रमाण क्या बचा किस पर निर्भर करते हैं संस्कृत

473
00:34:42,520 --> 00:34:47,040
के लिए सवाल नंबर एक दूसरा इन्होंने

474
00:34:47,040 --> 00:34:49,880
कहा

475
00:34:49,880 --> 00:34:53,880
कि ब्रह्म को एक जगह जब आप अविनाशी मान लेंगे तो दूसरी

476
00:34:53,880 --> 00:34:58,560
जगह उसको जो है परमात्मा के द्वारा

477
00:34:58,560 --> 00:35:03,120
विनाश होने वाला या

478
00:35:03,120 --> 00:35:07,120
फिर परमात्मा के द्वारा उत्पन्न होने वाला आप कैसे मान रहे हैं जब व

479
00:35:07,120 --> 00:35:11,280
अविनाशी है तो ठीक है तो इसका

480
00:35:11,280 --> 00:35:15,400
कोई ठोस वो नहीं है आगे चलते

481
00:35:15,400 --> 00:35:19,560
हैं अब आप जो है पा 29 खोलिए

482
00:35:19,560 --> 00:35:23,680
देखिए मिलावट देखिए 529

483
00:35:23,680 --> 00:35:29,680
मैं पढ़ दे रहा हूं आप जो है उनकी खोलिए रामपाल वालों की

484
00:35:54,160 --> 00:35:59,160
हेलो आवाज आ रही है मेरी

485
00:35:59,160 --> 00:36:03,240
नेक्ट हो गए क्या हम लोग आ गए 529 पर

486
00:36:03,240 --> 00:36:07,240
आ जाते हैं इन्होंने यहां पर एक शब्द

487
00:36:07,240 --> 00:36:12,200
है ऋषि वाला री है और रक्षति

488
00:36:12,200 --> 00:36:17,400
इसका अर्थ यहां पर इन्होंने गवा देना किया

489
00:36:17,400 --> 00:36:23,400
है कहां कौन सा है पेज नंबर 126

490
00:36:24,040 --> 00:36:28,760
निकालिए यह तो अभी बहुत थोड़ी सी चीजें है भाई

491
00:36:28,760 --> 00:36:34,280
यह भी बहुत थोड़ी सी चीजें

492
00:36:34,280 --> 00:36:38,600
अभी जब इसका गहन अध्ययन करके आएंगे तब तो बात ही अलग हो जाएगी

493
00:36:38,600 --> 00:36:42,640
अगर आपकी ये ठीक से मतलब पूरा पढ़ लिया तो पता नहीं कितनी

494
00:36:42,640 --> 00:36:46,000
चीजें निकलेंगी 146

495
00:36:46,000 --> 00:36:50,200
निकालिए य खोलो तो 126 ना 529 ये

496
00:36:50,200 --> 00:36:54,280
रहा हा ये ये आ गया हां ठीक है तो यह

497
00:36:54,280 --> 00:36:58,360
इनका गरिमा गीता की रामपाल दास जी के द्वारा प्रकाशित गीता

498
00:36:58,360 --> 00:37:02,760
है इसमें पा 29 में अनुवाद कर रहे हैं गीता

499
00:37:02,760 --> 00:37:06,880
का ज्ञान देने वाला ब्रह्म इनके अनुसार ये काल बोल रहा है क्या बोल रहा

500
00:37:06,880 --> 00:37:09,680
है कि तत्व ज्ञान से

501
00:37:09,680 --> 00:37:10,180
ज्ञान

502
00:37:10,160 --> 00:37:14,520
के अभाव से मुझ काल को यज्ञ तथा

503
00:37:14,520 --> 00:37:19,120
तपों को भोगने वाला संपूर्ण लोकों का

504
00:37:19,120 --> 00:37:20,920
महान ईश्वर यानी

505
00:37:20,920 --> 00:37:25,880
महेश्वर संपूर्ण प्राणियों का सुरत

506
00:37:25,880 --> 00:37:29,360
क्या लिखा है वो

507
00:37:29,360 --> 00:37:33,520
यही तो लिखा है हा मल

508
00:37:33,520 --> 00:37:37,400
सु लिखा हुआ

509
00:37:37,400 --> 00:37:41,720
हैम मतलब सब मतलब एक तरीके से

510
00:37:41,720 --> 00:37:45,920
हृदय में रहने वाला हृदय को सुख पहुंचाने वाला इस तरह से आप मान लीजिए स्वार्थ

511
00:37:45,920 --> 00:37:50,000
रहित दयालु दयालु और प्रेमी तो

512
00:37:50,000 --> 00:37:54,280
ऐसा समझते हैं और इसका नीचे

513
00:37:54,280 --> 00:37:58,320
इसका वो दिखाइए अर्थ क्या किया है भगवत

514
00:37:58,320 --> 00:38:02,480
गीता काने इन्होंने तो ये किया है इन्होंने

515
00:38:02,480 --> 00:38:06,840
किया है कि वो मुझे ऐसा जो समझते हैं वह शांति

516
00:38:06,840 --> 00:38:11,120
को गवा देते हैं शांति को

517
00:38:11,120 --> 00:38:15,280
गवा देते हैं है ना मुझे मतलब तेसी

518
00:38:15,280 --> 00:38:19,680
जान मुझे अपना तेसी समझते हैं कुल मिलाकर इसका भावार्थ य है

519
00:38:19,680 --> 00:38:24,080
कि जो लोग तत्व ज्ञान का भाव है जिनको वो मुझे जो है परमेश्वर

520
00:38:24,080 --> 00:38:28,600
समझते हैं और मुझे जो है उनका त समझते हैं

521
00:38:28,600 --> 00:38:33,240
और इस कारण से वह शांति और यहां पर परम शांति की बात हो रही है

522
00:38:33,240 --> 00:38:36,000
वो परम शांति को वो गवा देते हैं अब बात

523
00:38:36,000 --> 00:38:40,120
आती है कि तत्व ज्ञान के अभाव से यह कहां

524
00:38:40,120 --> 00:38:44,440
लिखा है श्लोक में बताइए अब हम जरा वो खोलिए श्लोक

525
00:38:44,440 --> 00:38:49,200
है जो वास्तविक श्लोक है जो जय दयाल गोविंद का वाला हां

526
00:38:49,200 --> 00:38:53,600
इसमें वो श्लोक दिखाइए थोड़ा ऊपर करिए हां

527
00:38:53,600 --> 00:38:57,760
इसमें कौन सा शब्द है जिस जिसमें लिखा हो कि तत्व

528
00:38:57,760 --> 00:39:02,000
ज्ञान का अभाव है व्यक्ति को पहली

529
00:39:02,000 --> 00:39:06,120
बात तत्व ज्ञान के अभाव की संस्कृत यहां पर है ही नहीं अपने मन

530
00:39:06,120 --> 00:39:10,240
से जड़ दिया ठीक है अपने मन से क्योंकि कितना काटेंगे

531
00:39:10,240 --> 00:39:14,240
भाई हमने तो बोला 5 पर अगर ऐसे काटेंगे तो तो वह पूरी

532
00:39:14,240 --> 00:39:18,440
की पूरी गीता ही काटनी पड़ जाएगी पूरी पूरी गीता को ही कहना पड़ेगा कि पवित्र

533
00:39:18,440 --> 00:39:22,560
तो है मगर मानने योग्य नहीं है तो क्या कर दिया यहां पर अपने

534
00:39:22,560 --> 00:39:27,360
मन से लिख दिया तत्व ज्ञान के अभाव में और यह जो

535
00:39:27,360 --> 00:39:31,400
ऋषि का ऋ आया रक्षति इसका अर्थ इन्होंने

536
00:39:31,400 --> 00:39:36,120
लिख दिया वहां पर गवाना जबकि

537
00:39:36,120 --> 00:39:40,320
इसका अर्थ होता है जाना तो शांति को प्राप्त

538
00:39:40,320 --> 00:39:44,920
होता है शांति में पहुंचता है शांति में जाता है

539
00:39:44,920 --> 00:39:48,920
ठीक है यह शिवराम आपटे जी की डिक्शनरी दिखा दीजिए दोबारा मैं आपको पेज

540
00:39:48,920 --> 00:39:54,920
नंबर बता रहा हूं

541
00:40:17,760 --> 00:40:23,760
लगभग यह पेज आएगा

542
00:40:28,200 --> 00:40:32,200
हां ये रक्षति ये आ

543
00:40:32,200 --> 00:40:37,320
रहा है पेज 2

544
00:40:37,320 --> 00:40:43,320
23 223 पेज शिवराम आपटे जी की

545
00:40:49,000 --> 00:40:53,080
डिक्शनरी इसमें कहां

546
00:40:53,080 --> 00:40:55,240
है

547
00:40:55,240 --> 00:40:59,920
जमन 23 है ये तो ए चल रहा है ना ए

548
00:40:59,920 --> 00:41:04,160
ए प कैसे आएगा 23

549
00:41:04,160 --> 00:41:08,560
आप आगे निकल गए शायद 26 था अभी ओ

550
00:41:08,560 --> 00:41:12,720
ओकेके थोड़ा पीछे जाइए इसमें लेफ्ट

551
00:41:12,720 --> 00:41:17,240
साइड में देखिए लेफ्ट साइड में लिखा हुआ

552
00:41:17,240 --> 00:41:21,840
है रि यह रहा रि

553
00:41:21,840 --> 00:41:26,280
हा उसी में ब्रैकेट में लिखा है रिती

554
00:41:26,280 --> 00:41:30,520
क्या खा है या होना जाना

555
00:41:30,520 --> 00:41:33,000
जाना लि है क्षमता का हा

556
00:41:33,000 --> 00:41:37,040
जाना ठीक है तो अब जाना शांति में जाता

557
00:41:37,040 --> 00:41:41,120
है शांति को जाता है ठीक है यह तो हो रहा

558
00:41:41,120 --> 00:41:46,440
है मगर गवा देता है शांति को व कहां लिखा है रक्षति का

559
00:41:46,440 --> 00:41:50,440
अर्थ अपने मन से तत्व ज्ञान

560
00:41:50,440 --> 00:41:54,800
के अभाव में जोड़ दिया और अपने मन से रक्षति का अर्थ कर दिया

561
00:41:54,800 --> 00:41:59,080
कि वो गवा देता है रक्षति का अर्थ क्या लिखा है अब जब शिवराम

562
00:41:59,080 --> 00:42:03,720
आपटे पर इनको विश्वास नहीं है तो शिवराम आपटे की व्रज पर इनको क्यों विश्वास है

563
00:42:03,720 --> 00:42:09,000
जबकि पाणिनी कह रहे हैं व्रज का अर्थ होता है गतिमान गतिशील

564
00:42:09,000 --> 00:42:13,000
है ना और जबक सं का कोई ज्ञान नहीं है यही होता है

565
00:42:13,000 --> 00:42:17,080
कबीर देव परमात्मा ने इनको जो है संस्कृत का ज्ञान ही दे दिया होता

566
00:42:17,080 --> 00:42:21,440
वो तो है नहीं इनको ये खुद कहते हैं आगे चलते हैं

567
00:42:21,440 --> 00:42:25,560
इसमें एक और पॉइंट है जी एक पॉइंट य इस

568
00:42:25,560 --> 00:42:29,640
इसमें एक पॉइंट ये है कि अपने डिफेंस इसके लिए ये बोल सकते हैं कि शांति चली

569
00:42:29,640 --> 00:42:33,680
जाती है जाती है रिति को जाना आपने बोल दिया है तो अब

570
00:42:33,680 --> 00:42:37,720
इसम देखने उनका तर्क ये आएगा कि शांति चली जाती है जाती है

571
00:42:37,720 --> 00:42:42,360
शांति तो इसमें आ कहां रही है मगर वहा जाने वाला जो वहा पर जो करता है ना

572
00:42:42,360 --> 00:42:46,520
जाने वाला वहां पर वो है व्यक्ति अभी इसमें यह समझना

573
00:42:46,520 --> 00:42:48,080
पड़ेगा शांति में जब लिखा हुआ

574
00:42:48,080 --> 00:42:52,520
है ना तो फिर ये जब म हल लता है तो फिर उसम ये लग रहा है

575
00:42:52,520 --> 00:42:57,640
ता है जो करता है वो वो है

576
00:42:57,640 --> 00:43:01,720
क्या पहली बात तो ये है कि गवाने गवाने की संस्कृत तो नहीं

577
00:43:01,720 --> 00:43:06,200
है अगर इनको जाना था तो जाने को एडजस्ट करना था वहां प तत्वदर्शी है

578
00:43:06,200 --> 00:43:10,600
ना अगर उसका मतलब जाना है तो जाने को एडजस्ट

579
00:43:10,600 --> 00:43:14,600
करो ना भाई गवा देना क्यों एडजस्ट कर रहे हो जिसकी संस्कृत नहीं

580
00:43:14,600 --> 00:43:18,840
है वहां बिल्कुल आप अपने मत की सिद्धि के लिए ऐसा कर रहे

581
00:43:18,840 --> 00:43:22,880
हो है ना आप उसी को जाने को एडजस्ट

582
00:43:22,880 --> 00:43:28,360
करते तब पता चलता अब उसमें क्या होता दिक्कत कि जो

583
00:43:28,360 --> 00:43:32,360
तत्व ज्ञान के अभाव में जो लोग मेरे को

584
00:43:32,360 --> 00:43:36,760
कुछ वहां पर जो भी है यह करते हैं वह शांति को जाते

585
00:43:36,760 --> 00:43:40,760
हैं उनकी शांति चली जाती है के लिए उनकी की संस्कृत आनी

586
00:43:40,760 --> 00:43:44,880
चाहिए श्लोक में उनकी की संस्कृत शब्द

587
00:43:44,880 --> 00:43:49,560
आना चाहिए उनकी शांति चली जाती है तो यह

588
00:43:49,560 --> 00:43:53,640
यहां पर पॉइंट है अपने मन से अर्थ कर दिया और लिख दिया

589
00:43:53,640 --> 00:43:57,680
वो शांति को गवा देते हैं भाई जब हर चीज में डिक्शनरी खो और

590
00:43:57,680 --> 00:44:01,760
बिल्कुल सारे शास्त्र खोल के बता रहे हो तो यहां गवाने की संस्कृत क्यों

591
00:44:01,760 --> 00:44:04,680
नहीं दिखा दी तुमने खोल

592
00:44:04,680 --> 00:44:08,960
के और से जाना और में जाना

593
00:44:08,960 --> 00:44:13,160
यह भी समझ लो जब हम कहेंगे कि आजा

594
00:44:13,160 --> 00:44:18,000
बंदे शरण नाम की वो एक बार जरा प्ले कर दीजिए मधुर आवाज है

595
00:44:18,000 --> 00:44:22,000
जो गाते हैं व जेल धाम

596
00:44:22,000 --> 00:44:26,600
निवासी जरा एक बार प्ले करिए आजा बंदे

597
00:44:26,600 --> 00:44:30,280
शरण रा

598
00:44:30,280 --> 00:44:35,280
की लिए भाई जी बैकग्राउंड बैकग्राउंड कैसे चेंज हो रहा है एक बार देख

599
00:44:35,280 --> 00:44:39,920
लीजिएगा य हेलोवीन का कुछ थ लग गया है क्या बाय डिफॉल्ट है क्या

600
00:44:39,920 --> 00:44:45,160
ये हा वालो का

601
00:44:45,160 --> 00:44:49,240
ऐसा लग रहा है ऐसा लग रहा है कि रामपाल दास जी के लोक

602
00:44:49,240 --> 00:44:53,520
में बैठे हुए [हंसी]

603
00:44:53,520 --> 00:44:59,480
हैं शरण राम की आजा

604
00:44:59,480 --> 00:45:05,040
बंदे शरण राम की अब यहां

605
00:45:05,040 --> 00:45:09,720
पर अब यहां पर क्या है बस करिए आजा

606
00:45:09,720 --> 00:45:14,000
अगर जाने का अर्थ ब्रज है

607
00:45:14,000 --> 00:45:18,160
तो आने का आने का अर्थ आ ब्रज है

608
00:45:18,160 --> 00:45:23,000
तो यहां पर हमें लिखना पड़ेगा आजा के लिए आव्रजन

609
00:45:23,000 --> 00:45:27,280
शब्द लेने पड़ेंगे दोनों शब्द लेने पड़ेंगे अगर इंग्लिश करेंगे

610
00:45:27,280 --> 00:45:31,640
अगर इंग्लिश में कन्वर्ट करेंगे तो कम गो तो कम गो बंदे

611
00:45:31,640 --> 00:45:36,000
शरण राम की या संस्कृत में करेंगे तो

612
00:45:36,000 --> 00:45:40,000
करेंगे कि आवज व्रज शरण राम की यही

613
00:45:40,000 --> 00:45:44,200
करेंगे ना या फिर यह वो वाला जाना है जिसमें आना

614
00:45:44,200 --> 00:45:48,680
होता है यह मानना पड़ेगा यह वह वाला जाना

615
00:45:48,680 --> 00:45:52,840
है जिसमें आना भी होता है यानी कि ऐसा

616
00:45:52,840 --> 00:45:57,000
जाना होता है जिसमें आना अंडरस्टूड होता है

617
00:45:57,000 --> 00:46:01,760
ठीक है हम नहीं तो आप इसकी संस्कृत करके दिखाओ अपने नियम के हिसाब से

618
00:46:01,760 --> 00:46:05,800
भाई आजा जब वो कह र आजा आने

619
00:46:05,800 --> 00:46:08,680
को कह रहे हैं पहली बात तो ये कि दो बातें हो गई आने को कह

620
00:46:08,680 --> 00:46:12,920
रहे हैं कि जाने को कह रहे हैं अब आ जा दोनों अलग-अलग चीजें

621
00:46:12,920 --> 00:46:16,920
हैं तो दोनों के लिए कम गो या आ

622
00:46:16,920 --> 00:46:21,080
व्रज और व्रज ये करना पड़ेगा फस जाएंगे बिल्कुल मकड़ी

623
00:46:21,080 --> 00:46:25,200
जाले में फस जाएंगे पूरी तरह से खैर आगे चलते हैं

624
00:46:25,200 --> 00:46:29,320
ये धीरे-धीरे धीरे-धीरे इतना तार्किक और इतना अका होता जाएगा

625
00:46:29,320 --> 00:46:34,240
जो आज का य विश्लेषण है कि आपको मतलब हैप्पी बहुत बहुत बहुत प्रसन्नता

626
00:46:34,240 --> 00:46:38,600
होगी इसके बाद देखिए यह जो शास्त्र

627
00:46:38,600 --> 00:46:42,640
समत भक्ति बताते हैं यह क्या है कि भगवत

628
00:46:42,640 --> 00:46:47,520
गीता छठ अध्याय के दसव श्लोक को निकालिए जय दयाल गोविंद का जी

629
00:46:47,520 --> 00:46:51,720
का कन सा दवा लोक किसका छवा

630
00:46:51,720 --> 00:46:54,280
अध्याय दवा

631
00:46:54,280 --> 00:46:59,760
श रा

632
00:46:59,760 --> 00:47:03,760
छवा अध्याय सवा

633
00:47:03,760 --> 00:47:07,440
लोक आ गया

634
00:47:07,440 --> 00:47:11,680
बताइए हा योगी यजत इसमें

635
00:47:11,680 --> 00:47:14,360
द लोक

636
00:47:14,360 --> 00:47:18,840
में ध्यान कैसे करना है परमेश्वर का वह बताया जा रहा है

637
00:47:18,840 --> 00:47:23,120
ऐसे ऐसे ध्यान करना है ठीक है अब ये देखिए कितनी गरिमा

638
00:47:23,120 --> 00:47:27,640
है इनके इनके लिए गीता की जो गरिमा गीता की लिखते हैं

639
00:47:27,640 --> 00:47:33,640
और जो पवित्र बोलते

640
00:47:35,760 --> 00:47:39,960
हैं योगी जंत जो गीता को पवित्र

641
00:47:39,960 --> 00:47:44,320
बोलते हैं जो गीता की गर्मा कहते हैं गर्मा गीता की वो कितनी गर्मा

642
00:47:44,320 --> 00:47:48,520
मानते हैं गीता की अब देखिए यहां पर भक्ति करने

643
00:47:48,520 --> 00:47:53,200
का तरीका बता रहे हैं भगवान श्री कृष्ण या इनके हिसाब से

644
00:47:53,200 --> 00:47:57,280
वो उनके रूप में काल बोल रहा है मगर बोल तो परमात्मा के लिए ही रहा है ना

645
00:47:57,280 --> 00:48:01,360
तो इनकी गर्मा गीता की देखिए भाई क्या कह रहे हैं छवा

646
00:48:01,360 --> 00:48:07,360
अध्याय दसवा य प पढ़ के मैं बता देता

647
00:48:07,520 --> 00:48:11,920
हूं मन और इंद्रियों सहित शरीर को वश में रखने

648
00:48:11,920 --> 00:48:15,920
वाला हा मन और इंद्रियो सहित शरीर को वश में

649
00:48:15,920 --> 00:48:20,040
रखने वाला आशा रहित और संग्रह रहित योगी अकेला ही

650
00:48:20,040 --> 00:48:24,560
एकांत स्थान में स्थिर होक आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाने लगाए

651
00:48:24,560 --> 00:48:28,720
तो यहां पर ध्यान ध्यान कर वाला ध्यान योग जो है भक्ति

652
00:48:28,720 --> 00:48:32,800
योग का य ध्यान योग के विषय में भगवान बात कर रहे ध्यान कैसे

653
00:48:32,800 --> 00:48:36,880
करना है परमात्मा का तो वो बता रहे हैं ऐसे ऐसे करना है ध्यान कैसे

654
00:48:36,880 --> 00:48:41,720
लगेगा एकांत में लगेगा शुद्ध भूमि में अगला ही है श्लोक गवा

655
00:48:41,720 --> 00:48:46,080
शुद्ध भूमि में जिसके ऊपर कुष ब्रग छाला और वस्त्र बिछे

656
00:48:46,080 --> 00:48:50,360
हैं जो ना बहुत ऊंचा है जो ना बहुत नीचा है ऐसे

657
00:48:50,360 --> 00:48:50,880
अपने

658
00:48:50,880 --> 00:48:55,680
आसन को स्थिर स्थापन करके आसन बिछा के कुछ का आसन

659
00:48:55,680 --> 00:49:00,360
ठीक है उस आसन पर बैठकर चित्त और इंद्रियों की क्रियाओं को

660
00:49:00,360 --> 00:49:05,080
वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके

661
00:49:05,080 --> 00:49:09,600
अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें बिल्कुल

662
00:49:09,600 --> 00:49:13,720
और फिर लिखा है कि काया अपना शरीर

663
00:49:13,720 --> 00:49:18,200
सिर यानी कि सर और गले को

664
00:49:18,200 --> 00:49:22,960
समान यानी अलाइन रखते हुए स्थिर रखते हुए

665
00:49:22,960 --> 00:49:27,960
और अचल धारण करें जो उपव स्त्र धारण

666
00:49:27,960 --> 00:49:33,960
करते अचल धारण करते

667
00:49:36,520 --> 00:49:40,880
हैं अचल का दूसरा भी कुछ सता है खैर और

668
00:49:40,880 --> 00:49:45,240
स्थिर होकर अपनी नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि जमाकर

669
00:49:45,240 --> 00:49:49,400
है ना मतलब बिल्कुल स्थिर

670
00:49:49,400 --> 00:49:53,520
और एकाग्र चित होकर कुल मिलाकर के और आगे

671
00:49:53,520 --> 00:49:57,560
दिया हुआ है वो इधर उधर ना देखना

672
00:49:57,560 --> 00:50:01,840
दिशाओं को ना देखता हुआ इधर उधर ना देखना वो बिल्कुल एकाग

673
00:50:01,840 --> 00:50:05,920
एक सिंगल पॉइंट पर ध्यान लगाना तो ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित

674
00:50:05,920 --> 00:50:10,040
भय रहित तथा भली भाती त शांत अंतःकरण

675
00:50:10,040 --> 00:50:14,280
वाला सावधान योगी मन को रोक कर मुझ में चित्त वाला

676
00:50:14,280 --> 00:50:18,360
और मेरे परायण होकर स्थित होवे अब यहां पर

677
00:50:18,360 --> 00:50:22,480
इनका खोलिए जरा छठवां अध्याय इन्होंने सीधे इसका

678
00:50:22,480 --> 00:50:27,480
खंडन कर दिया और कैसे किया वो मैं आपको दिखा

679
00:50:27,480 --> 00:50:31,640
इन्होंने मान लिया कि यह जो चीज यह जो चार श्लोक है

680
00:50:31,640 --> 00:50:35,960
यह गलत बोले क्योंकि इसका खंडन जो है वो लिखा

681
00:50:35,960 --> 00:50:40,880
हायह 10 से 15 ऊपर निकला ऊ परर निकल गया हाय

682
00:50:40,880 --> 00:50:44,880
हट गीता अध्याय छ श्लोक 10 से 15

683
00:50:44,880 --> 00:50:49,000
का सारांश इन श्लोकों में एक स्थान पर बैठकर हट योग

684
00:50:49,000 --> 00:50:51,600
द्वारा अभ्यास करने को कहा है अब पहली

685
00:50:51,600 --> 00:50:56,040
बात यह है क्या यहां पर हट योग लिखा है

686
00:50:56,040 --> 00:51:00,160
अपनी बात मन गणन ूस रहे हैं ना यहां पर हट योग

687
00:51:00,160 --> 00:51:04,720
नहीं लिखा है इंद्रियों को वश में हटात

688
00:51:04,720 --> 00:51:09,160
कहां पर यूज हुआ है उसके आधार पर ये काट रहे हैं अभी मैं अभी बात करूंगा

689
00:51:09,160 --> 00:51:13,960
तो अपने मन से इन्होंने हट शब्द यहां पर यूज कर दिया

690
00:51:13,960 --> 00:51:18,280
तो हट क्या है वश करना वश में करना क्या है

691
00:51:18,280 --> 00:51:22,560
कि हमने इंद्रियों को जीत लिया कि हमारी इंद्रियां हमारे काबू

692
00:51:22,560 --> 00:51:26,720
में है हमारे नियंत्रण में है और हमारे मन में भी उनका चिंतन

693
00:51:26,720 --> 00:51:31,000
नहीं चल रहा है जो उनका विषय है है ना

694
00:51:31,000 --> 00:51:35,120
जो उनका विषय है उनका चिंतन हमारे मन में नहीं चल रहा है यह तो हो गया

695
00:51:35,120 --> 00:51:39,320
इंद्रियों को वश में करना और हट क्या है हट को वहां

696
00:51:39,320 --> 00:51:43,760
पर बताया गया है हट वो है कि हमने अपने

697
00:51:43,760 --> 00:51:47,760
कर्मेंद्रियों को तो रोक लिया मगर मन से उन्हीं के विषयों का चिंतन

698
00:51:47,760 --> 00:51:52,000
कर रहे हैं समझ रहे हैं हमने अपने हाथों

699
00:51:52,000 --> 00:51:56,000
को रोक लिया जैसे मान लीजिए कि भोजन के प्रति हम आसक्त होते

700
00:51:56,000 --> 00:52:00,560
हैं तो ने उसको तो रोक लिया कि हम नहीं खाएंगे चाहे जो हो जाए मगर ध्यान

701
00:52:00,560 --> 00:52:05,040
उसी का कर रहे हैं कि आज क्या बना होगा मक्के की रोटी छोला भटूरा

702
00:52:05,040 --> 00:52:06,720
पनीर की सब्जी यह

703
00:52:06,720 --> 00:52:11,520
सब बना पकवान बने होंगे अच्छे अच्छे 5 भोग बना होगा तो हम

704
00:52:11,520 --> 00:52:16,000
ध्यान उसी का कर रहे हैं यह हट है और

705
00:52:16,000 --> 00:52:20,560
इंद्रियों को वश में करने वाला और

706
00:52:20,560 --> 00:52:24,840
अंतःकरण में सावधान रहने वाला

707
00:52:24,840 --> 00:52:29,040
और यहां पर जो है उसे तो इन्होंने क्या किया यहां पर सबसे

708
00:52:29,040 --> 00:52:33,680
पहले हट को अपने मन से डाल दिया कि यहां पर जो है

709
00:52:33,680 --> 00:52:37,680
हट करके ध्यान लगाने की बात की जा रही जबकि यहां पर हट पूर्वक ध्यान

710
00:52:37,680 --> 00:52:41,840
लगाने की बात श्लोक में नहीं कही गई है अगर कही गई है

711
00:52:41,840 --> 00:52:46,680
तो कोई आए और यहां पर सिद्ध करे कि 6

712
00:52:46,680 --> 00:52:50,920
पॉइंट 14 में 6.1 में हट पूर्वक योग कहां लिखा

713
00:52:50,920 --> 00:52:55,320
है हट पूर्वक ध्यान लगाना कहां लिखा है हट

714
00:52:55,320 --> 00:52:59,760
पूर्वक इंद्रियों को रोक लेना कहां लिखा है ठीक

715
00:52:59,760 --> 00:53:03,920
है अच्छा अब इन्होंने इसके लिए देखिए सीधे-सीधे क्या

716
00:53:03,920 --> 00:53:07,920
लिखा है गीता अध्याय तीन

717
00:53:07,920 --> 00:53:11,920
श्लोक तीन से आठ तक इसके विपरीत का है जो एक

718
00:53:11,920 --> 00:53:17,920
स्थान पर बैठकर हट कर के इंद्रियों को रोककर साधना करते हैं वे पाखंडी

719
00:53:18,320 --> 00:53:22,080
हैं एक स्थान पर बैठा रहा तो निर्वाह कैसे होगा

720
00:53:22,080 --> 00:53:26,480
इस इस अध्याय छ श्लोक 10 से 15 के आधार पर आजकल

721
00:53:26,480 --> 00:53:30,840
बोले जिज्ञासु ऐसा वैसा करते हैं अढ़ाई घंटे सुबह शाम आवश्यक

722
00:53:30,840 --> 00:53:34,920
बताता है यह है वो है और आगे चलकर के इन्होंने खंडन

723
00:53:34,920 --> 00:53:39,120
शब्द का उपयोग भी किया है ऊपर जाइए जरा ऊपर ऊपर

724
00:53:39,120 --> 00:53:45,120
ऊपर ऊपर जाइए क्या लिखा है

725
00:53:45,440 --> 00:53:50,080
ऊपर 40 15 और ऊपर जाइए और ऊपर

726
00:53:50,080 --> 00:53:54,920
जाइए हा नीचे नीचे जाइए नीचे जाइए ये कहां आ गए

727
00:53:54,920 --> 00:53:57,560
रु

728
00:53:57,560 --> 00:54:02,840
छठवें में ही है ना छठ में 10 से 15

729
00:54:02,840 --> 00:54:08,480
में सारांश बता रहे हैं

730
00:54:08,480 --> 00:54:14,240
हां और और नीचे चलिए हा यहां

731
00:54:14,240 --> 00:54:18,640
रुकिए छ श्लोक तीन का सारांश पाच से छ का सारांश

732
00:54:18,640 --> 00:54:24,120
आठ से न का

733
00:54:24,120 --> 00:54:28,320
सारांश और हां बस बस रुक जाइए रुक

734
00:54:28,320 --> 00:54:33,000
जाइए क्या प्रयोग किया उन्होने शब्द खंडन

735
00:54:33,000 --> 00:54:38,320
हां देखिए 10 से 15 का सारांश इसमें क्या बोल रहे हैं

736
00:54:38,320 --> 00:54:42,560
देखिए यहां पर इस इन श्लोकों में

737
00:54:42,560 --> 00:54:46,640
इन श्लोकों में गीता ज्ञान दाता ने अपना मत बता दिया है

738
00:54:46,640 --> 00:54:50,680
जो वेद विरुद्ध है और एक जगह स्पेशली खंडन शब्द

739
00:54:50,680 --> 00:54:54,880
का उपयोग किया है कि इन मंत्रों का जो खंडन है

740
00:54:54,880 --> 00:55:00,880
वह तीसरे अध्याय में गया व तीसरा अध्याय खोलिए इन्होने खंडन क्या किया

741
00:55:01,040 --> 00:55:05,400
देखें तीसरे अ कौन से श्लोक में चौथे

742
00:55:05,400 --> 00:55:09,520
देखता हूं खंडन कहां दिया है उन्होने वो

743
00:55:09,520 --> 00:55:13,600
तीसरे अध्याय में वही पर जाइए मैं बता रहा हूं खंडन

744
00:55:13,600 --> 00:55:18,000
कहां दिया इसका तीसरे अध्याय में पाच से आठ

745
00:55:18,000 --> 00:55:24,000
तीसरा अध्याय पाच से आठवा श्लोक

746
00:55:31,160 --> 00:55:36,560
ये तो भूमिका प ही है अभी तीसरा

747
00:55:36,560 --> 00:55:39,800
अध्याय दूसरा

748
00:55:39,800 --> 00:55:44,080
अध्याय तीसरा अध्याय हां

749
00:55:44,080 --> 00:55:48,120
तीन से 14 से 19 और

750
00:55:48,120 --> 00:55:52,480
और जाइ पाच से आ छ से नौ

751
00:55:52,480 --> 00:55:56,480
हा में आ जाएगा ना पाच से आठ नहीं छ

752
00:55:56,480 --> 00:56:00,600
न नहीं हा हा आ जाए लोक ना श्लोक नाइन है ना

753
00:56:00,600 --> 00:56:04,720
ये और और पीछे चलिए अध्याय दो

754
00:56:04,720 --> 00:56:09,160
यही इधर ही है आ गया ये रहा तीसरा अध्याय

755
00:56:09,160 --> 00:56:13,960
न से आ तीसरा अध्याय आ गया हाय तीन से आ जो बोल रहे है ना

756
00:56:13,960 --> 00:56:18,760
इस लोक में ज्ञानी तो ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं निष्कर्ष

757
00:56:18,760 --> 00:56:23,000
भावार्थ है कि जैसे किसी व्यक्ति के उद्देश प्राप्त

758
00:56:23,000 --> 00:56:28,880
नहीं होता आगे और नीचे चलिए

759
00:56:28,880 --> 00:56:32,880
इसमें इन्होंने कुल मिलाकर यहां पर यह कहा है मैं बता देता हूं संक्षिप्त में इन्होंने

760
00:56:32,880 --> 00:56:37,440
यह कहा है यहां पर कुल मिलाकर कि जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों

761
00:56:37,440 --> 00:56:41,600
को मैं यहां से पढ़ के बता देता हूं इसको इन्होने बदला नहीं है

762
00:56:41,600 --> 00:56:45,760
तो मैं इससे पढ़ के बता देता हूं क्या कहा जा रहा है गीता ज्ञान

763
00:56:45,760 --> 00:56:49,760
दाता के बारे में आपके अनुसार यदि वो काल है हमारे अनुसार

764
00:56:49,760 --> 00:56:55,760
कृष्ण है तो गीता ज्ञानदाता एट द एंड क क्या रहे वो देख

765
00:57:05,040 --> 00:57:09,840
तीसरा तो कर्मों का आरंभ किए बिना मतलब

766
00:57:09,840 --> 00:57:13,960
जो कर्म से हम लोग मतलब य प्रवृत्ति मार्ग में रहते हुए भी हम कैसे काम

767
00:57:13,960 --> 00:57:17,960
कार्य कर सकते हैं तो यहां पर वह बताया जा रहा है कि आप

768
00:57:17,960 --> 00:57:22,000
क्योंकि एक क्षण के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकते हैं इसलिए आपको शास्त्रो चित कर्म

769
00:57:22,000 --> 00:57:26,240
में लगे रहना चाहिए तो पहली बात कि यदि व्यक्ति वहां

770
00:57:26,240 --> 00:57:30,680
पर भगवान के द्वारा बताई जाने वाली विधि के

771
00:57:30,680 --> 00:57:34,880
अनुसार या जिस ग्रंथ को आप पवित्र मानते

772
00:57:34,880 --> 00:57:38,960
हैं उसके अनुसार यदि वहां वो भक्ति कर रहा है तो वह चौथे

773
00:57:38,960 --> 00:57:43,000
ये जो पांचवा श्लोक है वो इसका विरोध नहीं कर रहा है क्यों

774
00:57:43,000 --> 00:57:43,880
क्योंकि यज्ञ का

775
00:57:43,880 --> 00:57:48,200
अर्थ आपने भी माना है कि तप है और यदि वो वहां पर तप कर रहा है भक्ति

776
00:57:48,200 --> 00:57:52,360
कर रहा है तो फिर वो इसका विरोध कहां से हुआ वो तो शास्त्र वेद कर्म कर रहा

777
00:57:52,360 --> 00:57:56,360
है ना यहां पर यही कहा जा रहा है क्योंकि मनुष्य किसी भी काल में

778
00:57:56,360 --> 00:57:56,880
एक क्षण

779
00:57:56,880 --> 00:58:01,600
के लिए भी बिना कोई कर्म किए नहीं रह सकता है इसलिए तू लगातार

780
00:58:01,600 --> 00:58:02,120
शास्त्र

781
00:58:02,120 --> 00:58:06,800
भद कर्म करता रह यही सब बताया जा रहा है य पर

782
00:58:06,800 --> 00:58:10,960
अब मेन बात आती है जो मनुष्य समस्त

783
00:58:10,960 --> 00:58:15,680
इंद्रियों को हट पूर्वक

784
00:58:15,680 --> 00:58:19,760
है ना हट पूर्वक ऊपर से रोककर

785
00:58:19,760 --> 00:58:24,000
अब सबसे पहली बात है हट पूर्वक

786
00:58:24,000 --> 00:58:28,160
यहां पर गीता प्रेस वालों ने अपनी र से शब्द लिया है

787
00:58:28,160 --> 00:58:32,320
और यदि उनके द्वारा अपनी ओर से लिए जाने वाले अन्य शब्दों को आप नहीं

788
00:58:32,320 --> 00:58:36,680
लेते हैं तो आपने कैसे यहां पर मान लिया कि यहां पर हट पूर्वक

789
00:58:36,680 --> 00:58:41,520
की संस्कृत शब्द आया है

790
00:58:41,520 --> 00:58:45,600
बताइए आपने कैसे माना कि यहां पर हट पूर्वक शब्द आया है यह

791
00:58:45,600 --> 00:58:51,600
देखिए मैं आपको दिखा रहा हूं इनको दिखा दीजिए भैया तीसरा अध्याय छवा श्लोक दिखा

792
00:58:51,840 --> 00:58:56,400
दीजिए जो हट पूर्वक शब्द इन्होंने अपने आप यूज किया

793
00:58:56,400 --> 00:59:00,560
कि वहां पर वह जो भक्ति बताई जा रही है वह हट पूर्वक भक्ति

794
00:59:00,560 --> 00:59:04,920
है और यहां पर हट पूर्वक भक्ति का खंडन किया है इसलिए वह जो

795
00:59:04,920 --> 00:59:09,120
छठवें से 15 तक का जो मामला है वह

796
00:59:09,120 --> 00:59:13,960
स्वीकार करने योग्य नहीं है भले ही गीता पवित्र ग्रंथ है

797
00:59:13,960 --> 00:59:17,320
इन्होंने अनेकानेक प्रकार से भगवत गीता के ही कई

798
00:59:17,320 --> 00:59:21,600
श्लोकों को कभी काल के नाम पर और कभी विरोधाभास के नाम

799
00:59:21,600 --> 00:59:25,600
पर काट दिया तो इन्होने ब्रैकेट में लिखा है

800
00:59:25,600 --> 00:59:29,600
नाय हा ये इन्होने ब्रैकेट में लिखा है जब ये

801
00:59:29,600 --> 00:59:33,600
ब्रैकेट वाले शब्दों को नहीं मानते हैं उसका जब

802
00:59:33,600 --> 00:59:37,920
तक संस्कृत शब्द नहीं होता है तो यहां पर क्यों मान रहे हैं कि हट पूर्वक की संस्कृत

803
00:59:37,920 --> 00:59:42,040
है यहां पर हट पूर्वक की संस्कृत तो नहीं है दूसरी बात

804
00:59:42,040 --> 00:59:46,080
यदि अगर मान भी लिया जाए तो हट पूर्वक का अर्थ यहां पर क्या है

805
00:59:46,080 --> 00:59:50,280
कि उसने शारीरिक रूप से अपनी इंद्रियों को रोक तो रखा है मगर

806
00:59:50,280 --> 00:59:54,680
मन से उन्हीं के विषयों का चिंतन कर रहा है है ना

807
00:59:54,680 --> 00:59:58,720
और वहां पर हट पूर्वक की संस्कृत व पर भी नहीं

808
00:59:58,720 --> 01:00:02,840
आ जबरदस्ती हो गया ना जबरदस्ती जबर य जबरदस्ती

809
01:00:02,840 --> 01:00:06,920
हट पूर्वक को इन्होंने अपने अनुसार स्वीकार कर लिया और

810
01:00:06,920 --> 01:00:11,440
वहां छठ अध्याय में हट पूर्वक भक्ति का जो है

811
01:00:11,440 --> 01:00:15,520
खंडन किया गया है भगवत गीता के तीसरे अध्याय में यह

812
01:00:15,520 --> 01:00:19,760
दिखा दिया जबकि हट पूर्वक शब्द कहीं पर है ही नहीं ना तीसरे अध्याय

813
01:00:19,760 --> 01:00:23,960
में है यहां पर और ना ही छठवें अध्याय में वहां

814
01:00:23,960 --> 01:00:28,840
पर कहा जा रहा है कि जो व्यक्ति अपनी पर वश कर लेता है इसका मतलब वह स्थिति

815
01:00:28,840 --> 01:00:32,440
जब उसने इंद्रियों पर संयम ऐसा पा लिया है कि व मन से भी उनके विषयों

816
01:00:32,440 --> 01:00:36,560
का चिंतन नहीं कर रहा है और यहां पर उस स्थिति के लिए मना

817
01:00:36,560 --> 01:00:41,920
किया गया है जब उसने अपने शरीर को तो रोक लिया

818
01:00:41,920 --> 01:00:45,920
परंतु वह अपने मन से उनके विषयों का चिंतन कर रहा है तो ऐसे

819
01:00:45,920 --> 01:00:50,360
लोगों को मिथ्या चारी कहा है ऐसे लोगों को दंभी कहा है

820
01:00:50,360 --> 01:00:54,360
या ऐसे लोगों का खंडन किया है तो पहली बात

821
01:00:54,360 --> 01:00:58,600
य आती है यदि गीता पवित्र ग्रंथ है

822
01:00:58,600 --> 01:01:02,600
तो उसकी किसी भी बात को आप काट कैसे रहे हैं अब इन्होंने

823
01:01:02,600 --> 01:01:07,240
कहा कि वहां पर काल ने अपना ज्ञान दे दिया ऐसा मेरा मत है

824
01:01:07,240 --> 01:01:11,440
है ना तो यदि उसने यह कह दिया कि ऐसा

825
01:01:11,440 --> 01:01:15,680
मेरा मत है तो उसके बाकी के ज्ञान परमात्मा

826
01:01:15,680 --> 01:01:19,760
का है तो उसने कहा है क्या यह वह ज्ञान है जो परमात्मा दे रहे हैं वह

827
01:01:19,760 --> 01:01:23,920
मैं बोल रहा हूं और जो व्यक्ति एक जगह झूठ बोल सकता

828
01:01:23,920 --> 01:01:28,240
है वह दूसरी जगह क्यों नहीं बोलेगा तो यदि आपको गीता

829
01:01:28,240 --> 01:01:32,520
के किसी भी एक श्लोक पर विश्वास नहीं है तो किसी भी श्लोक पर विश्वास

830
01:01:32,520 --> 01:01:36,640
होना आपको सिद्धि नहीं होता है पहली बात और दूसरी बात यहां पर आपने अपनी मन मर्जी

831
01:01:36,640 --> 01:01:40,640
से हट पूर्वक शब्द का उपयोग कर लिया जहां पर नहीं

832
01:01:40,640 --> 01:01:44,880
था वहां पर अपने अनुसार ले लिया और जहां पर था

833
01:01:44,880 --> 01:01:47,760
वहां पर

834
01:01:47,760 --> 01:01:48,760
भी

835
01:01:48,760 --> 01:01:53,080
जहां पर था जहां पर नहीं था वहां पर अपने आप उसको जन्म दे दिया

836
01:01:53,080 --> 01:01:56,880
ठीक है इतना हो गया

837
01:01:56,880 --> 01:02:01,080
जो लोग यह पूछ रहे हैं कि श्री कृष्ण ने यह कहा है कि उस परमात्मा की शरण

838
01:02:01,080 --> 01:02:05,120
में जा उनसे वो मुझे यह बताए कि वहां

839
01:02:05,120 --> 01:02:09,120
पर उसकी संस्कृत आई है क्या उस

840
01:02:09,120 --> 01:02:13,120
परमात्मा की शरण में जा 18 66

841
01:02:13,120 --> 01:02:17,480
में उस परमात्मा की बात हुई है उसकी संस्कृत

842
01:02:17,480 --> 01:02:19,920
आई है

843
01:02:19,920 --> 01:02:24,000
क्या खैर आगे चलते हैं अभी

844
01:02:24,000 --> 01:02:28,360
इनका देखिए दूध का दूध और पानी पानी अभी भी इनको संतुष्टि नहीं हो रही होगी

845
01:02:28,360 --> 01:02:32,760
अभी देखिए कुल मिलाकर के गीता प्रेस वालों की जो ब्रैकेट

846
01:02:32,760 --> 01:02:37,000
वाली बात है वो क्या कहते

847
01:02:37,000 --> 01:02:41,040
हैं इन्होंने मान ली अपने अनुसार दूसरी बात जहां पर हट का

848
01:02:41,040 --> 01:02:45,520
उपयोग नहीं हुआ है वहां पर भी इन्होंने हट

849
01:02:45,520 --> 01:02:49,960
का उपयोग मान लिया तो संस्कृत का शब्द अवेलेबल नहीं है यह मनमुक भक्ति है

850
01:02:49,960 --> 01:02:54,320
यह शास्त्र सम्मत भक्ति नहीं है क्योंकि

851
01:02:54,320 --> 01:02:58,400
यह अच्छा एक एक बात और है जो

852
01:02:58,400 --> 01:03:02,640
छव अध्याय का पवा श्लोक है और छव अध्याय का चवा श्लोक है

853
01:03:02,640 --> 01:03:03,800
उसमें ब्रह्मचारी

854
01:03:03,800 --> 01:03:08,120
शब्द भी आया है ब्रह्मचर्य और ब्रह्मचारी कौन है कॉपी

855
01:03:08,120 --> 01:03:12,240
मेखला पहनकर जो ब्रह्मचर्य धारण करता है वह ब्रह्मचारी

856
01:03:12,240 --> 01:03:16,400
है ठीक है तो ब्रह्मचर्य शब्द भी आया है

857
01:03:16,400 --> 01:03:20,680
तो इन शब्दों से इन चीजों से उसके आसन से बचने के लिए

858
01:03:20,680 --> 01:03:24,760
एकांत में ध्यान लगाने से बचने के लिए इन्होंने अपना मन

859
01:03:24,760 --> 01:03:29,040
मुखी एक शब्द उठा लिया गीता प्रेस गोरखपुर

860
01:03:29,040 --> 01:03:33,200
अगर कहीं पर भाव पिछले भाव को पकड़ते हुए

861
01:03:33,200 --> 01:03:38,040
यहां पर सच्चिदानंद स्वरूप अ परमेश्वर

862
01:03:38,040 --> 01:03:42,120
शब्द लिख रही है वो नहीं मानेंगे मगर यहां पर अगर उसने गीता प्रेस गोरखपुर

863
01:03:42,120 --> 01:03:46,200
ने हट पूर्वक शब्द का उपयोग कर लिया तो उसको मानेंगे और

864
01:03:46,200 --> 01:03:50,440
फिर आगे चलकर के ना गीता प्रेस ने माना ना संस्कृत में वो शब्द है अपने हिसाब

865
01:03:50,440 --> 01:03:54,440
से छठवें अध्याय के और अपने श्लोकों में कि नव

866
01:03:54,440 --> 01:03:58,600
से लेकर 15वें श्लोक तक जो है हट पूर्वक भक्ति बताई जा रही है तो यह भक्ति

867
01:03:58,600 --> 01:04:03,160
जो है काल ने अपने मन से दे दी है क्योंकि उसने कहा है कि ऐसा मेरा मत है

868
01:04:03,160 --> 01:04:07,200
तो जब वोह अपना मत बताएगा तो उसके लिए अगर यह सिद्धांत है कि वोह यह

869
01:04:07,200 --> 01:04:11,200
कह रहा है कि ऐसा मेरा मत है तो जब वह परमेश्वर का मत बताएगा तो

870
01:04:11,200 --> 01:04:15,480
वहां पर उस उसको कहना होगा कि यह परमेश्वर का मत है दूसरी

871
01:04:15,480 --> 01:04:18,840
बात झूठ बात कहने वाला भी यदि वही

872
01:04:18,840 --> 01:04:23,000
है जिसकी बात को आप सच मान रहे हो तो उसकी बात को सच

873
01:04:23,000 --> 01:04:29,000
किस आधार पर मान रहे हो यह भी एक पॉइंट बनता है आगे चलते

874
01:04:31,600 --> 01:04:37,600
हैं सातवा अध्याय 19 वा श्लोक

875
01:04:39,480 --> 01:04:45,480
खोलिए सातवा अध्याय 19 वा

876
01:04:48,080 --> 01:04:51,080
श्लोक

877
01:04:51,080 --> 01:04:55,680
हां इसमें देखिए सातवा अध्याय

878
01:04:55,680 --> 01:04:59,760
19 श्लोक में खोल लू मुझे इसमें ठीक से दिखाई नहीं देता

879
01:04:59,760 --> 01:05:04,440
है हां बहुत जन्मों के

880
01:05:04,440 --> 01:05:08,680
अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष सब कुछ

881
01:05:08,680 --> 01:05:13,240
वासुदेव ही है इस प्रकार मुझको भजता

882
01:05:13,240 --> 01:05:16,480
है ठीक

883
01:05:16,480 --> 01:05:21,040
है सब कुछ वासुदेव ही है

884
01:05:21,040 --> 01:05:25,840
वासुदेव से भिन्न और कुछ नहीं है इस प्रकार मुझको माम

885
01:05:25,840 --> 01:05:29,920
मुझको भजता है तो यहां पर वासुदेव को सब कुछ मानने

886
01:05:29,920 --> 01:05:33,920
वाले को तत्व ज्ञानी कह दिया इन्होंने कहा था ना तत्व ज्ञानी

887
01:05:33,920 --> 01:05:38,360
के पास जाओ तत्वदर्शी के पास जाओ तो यहां

888
01:05:38,360 --> 01:05:42,640
पर तत्व ज्ञान को तत्व ज्ञानी

889
01:05:42,640 --> 01:05:46,680
कह दिया हो सकता है यहां पर अपनी मन मर्जी से यहां ना माने अभी पिछली बार ब्रैकेट

890
01:05:46,680 --> 01:05:50,840
में मान लिया था अब यहां पर ना माने मगर ज्ञानवान तो है तो

891
01:05:50,840 --> 01:05:55,000
वासुदेव ही सब कुछ है अब यहां पर इनके हिसाब से फिर से काल झूठ ही

892
01:05:55,000 --> 01:05:59,000
बोलेगा कि वासुदेव ही सब कुछ है ऐसा मान नहीं मानना चाहिए

893
01:05:59,000 --> 01:06:03,600
तो काल यहां पर फिर से झूठ बोलेगा तो फिर से काल झूठ बोलने वाला सिद्ध हुआ

894
01:06:03,600 --> 01:06:06,080
तो जो झूठ बोल रहा है वह सच कैसे बोलेगा यह

895
01:06:06,080 --> 01:06:10,920
वाली

896
01:06:10,920 --> 01:06:14,960
बात क्योंकि अगर आप काल को नहीं पकड़ोगे तो आप अपने बाबा जी

897
01:06:14,960 --> 01:06:19,520
को तत्वदर्शी सिद्ध नहीं कर पाओगे यह भी सोचने वाली बात

898
01:06:19,520 --> 01:06:23,520
है अब आप अब आगे बात आती बहुत एक

899
01:06:23,520 --> 01:06:29,320
के बाद एक क्रमशः

900
01:06:29,320 --> 01:06:32,760
बोलिए

901
01:06:32,760 --> 01:06:36,760
नारायण तो इनका एक भक्त भी है बाबा जी का पवन दास

902
01:06:36,760 --> 01:06:41,120
उसने कहा भी है कि रामपाल दास जी के अंदर काल आकर

903
01:06:41,120 --> 01:06:45,600
के उनसे कुछ बुलवा सकता है ऐसा उसने कहा है ठीक

904
01:06:45,600 --> 01:06:50,720
है तो यह जो इन्होंने अर्थ का अनर्थ किया

905
01:06:50,720 --> 01:06:54,880
है उससे वही सिद्ध हो रहा है कि उनके अंदर वास्तविकता में कोई

906
01:06:54,880 --> 01:06:58,960
शैतान आ गया था और उसने यह गरिमा गीता की इनसे

907
01:06:58,960 --> 01:07:03,320
लिखवाया है गीता की गरिमा भंग कर दी है गीता की गरिमा

908
01:07:03,320 --> 01:07:07,520
दिखाने की बजाय गरिमा गीता

909
01:07:07,520 --> 01:07:11,000
की गरिमा भंग कर दी

910
01:07:11,000 --> 01:07:15,200
है ठीक है

911
01:07:15,200 --> 01:07:20,560
तो अब हम आ जाते कौन सा बोला मैंने

912
01:07:20,560 --> 01:07:24,800
88.5 जो पुरुष अंत काल में मुझको स्मरण करता हुआ

913
01:07:24,800 --> 01:07:28,800
शरीर को त्याग कर जाता है वह मेरे साक्षात स्वरूप को स्वरूप को प्राप्त

914
01:07:28,800 --> 01:07:32,880
होता है अब यहां काल स्वयं को स्मरण करने की बात कह रहा

915
01:07:32,880 --> 01:07:36,920
है क्यों कह रहा है भाई जब स्मरण नहीं करना है वह

916
01:07:36,920 --> 01:07:41,160
बात क्यों कह रहे हो उससे क्या मतलब है ठीक

917
01:07:41,160 --> 01:07:45,920
है अच्छा एक बात और है

918
01:07:45,920 --> 01:07:50,720
यहां पर मेरे साक्षात स्वरूप को तो साक्षात तो हो गया वो

919
01:07:50,720 --> 01:07:55,640
नेत्रों का विषय भी हो गया है ना

920
01:07:55,640 --> 01:08:00,360
मेरे साक्षात स्वरूप को नेत्रों का विषय भी हो गया

921
01:08:00,360 --> 01:08:04,400
आगे देखते हैं 8.7 में

922
01:08:04,400 --> 01:08:10,400
क्या कह रहा है वह जो काल

923
01:08:13,280 --> 01:08:17,480
है तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर अब यहां

924
01:08:17,480 --> 01:08:22,280
काल फिर से अपनी भक्ति करने की बात कर रहा है

925
01:08:22,280 --> 01:08:26,280
तो क्यों कर रहा है और अगर वो झूठ बोल यहां पर गलत

926
01:08:26,280 --> 01:08:30,360
बोल रहा है तो फिर जहां से जिसके आधार पर तुम तत्वदर्शी सिद्ध करते हो

927
01:08:30,360 --> 01:08:35,600
अपने आप को वोह सच है यह कैसे पता चला

928
01:08:35,600 --> 01:08:41,600
तो यहां वो कह रहा है तू सब समय में निरंतर मेरा ही स्मरण कर

929
01:08:41,720 --> 01:08:45,760
और मेरा स्मरण करते हुए युद्ध भी कर अपने कर्तव्य

930
01:08:45,760 --> 01:08:49,800
को कर अब देखिए यहां पर देखिए ये एक तरफ को कहते हैं युद्ध ना

931
01:08:49,800 --> 01:08:53,960
करो और दूसरी जगह तीसरे अध्याय के

932
01:08:53,960 --> 01:08:58,040
पांचवे श्लोक से लेकर के के तीसरे अध्याय के तीसरे श्लोक

933
01:08:58,040 --> 01:09:02,680
से लेकर के और आगे के श्लोकों में छठवें अध्याय में जो

934
01:09:02,680 --> 01:09:07,080
एकांत में जाकर सभी कर्मों को दूरी बनाकर सांसारिक जीवन

935
01:09:07,080 --> 01:09:11,200
से दूरी बनाकर जो साधना करने की बात की जा रही है उसका खंडन करता

936
01:09:11,200 --> 01:09:15,240
है यह कहते हुए कि नहीं कर्मों को छोड़कर कर्तव्य कर्मों को छोड़कर

937
01:09:15,240 --> 01:09:19,400
तुम नहीं जा सकते वहां पर प्रवृत्ति मार्ग की बात एक तरीके से हो रही है तो

938
01:09:19,400 --> 01:09:23,400
सभी कर्मों को छोड़कर तुम नहीं जा सकते कर्म करते हुए भी मेरा चिंतन

939
01:09:23,400 --> 01:09:28,720
करो वहां पर ये बात हो रही है तीसरे अध्याय में तो यह भाई साहब वहां

940
01:09:28,720 --> 01:09:33,360
पर यह वहा उसके आधार पर छठवें अध्याय का खंडन कर रहे हैं

941
01:09:33,360 --> 01:09:37,560
मगर अब जब यह बात आ रही है कि भैया युद्ध करते हुए भी कर्तव्य तेरा युद्ध

942
01:09:37,560 --> 01:09:41,600
करना अभी कल हमने फोटो दिखाई थी कि अपनी रक्षा जब हमने फोटो दिखाई

943
01:09:41,600 --> 01:09:45,600
थी कि बाबा जी के साथ गन मैन क्यों खड़ा है गन मैन का मतलब युद्ध करने के लिए

944
01:09:45,600 --> 01:09:49,600
खड़ा है क्यों खड़ा है इनके अनुसार भाई रक्षा के लिए खड़ा है तो रक्षा के

945
01:09:49,600 --> 01:09:53,600
लिए बंदूक उठाना गलत बात नहीं है धर्म है हम भी

946
01:09:53,600 --> 01:09:57,600
मानते हैं तो यहां पर जो युद्ध करने की बात हो रही है इसमें कहेंगे

947
01:09:57,600 --> 01:10:01,800
वो युद्ध करने के लिए क्यों कहेगा तो अपने लिए मीठा मठा

948
01:10:01,800 --> 01:10:07,800
गप गप और फिर दूसरे के लिए कड़वा कड़वा तू यह इनका न्याय

949
01:10:09,360 --> 01:10:15,360
है है ना यह इनका न्याय

950
01:10:16,160 --> 01:10:18,960
है

951
01:10:18,960 --> 01:10:23,040
तो अब यहां पर ये जो युद्ध की बात आ रही है य इसका खंडन

952
01:10:23,040 --> 01:10:27,320
किससे करेंगे नहीं नहीं इससे दूर हट और वहां

953
01:10:27,320 --> 01:10:31,880
पर कर्तव्य कर्मों को करने की बात करेंगे और

954
01:10:31,880 --> 01:10:36,080
उनके आधार पर छठवें अध्याय का खंडन करेंगे यानी कि

955
01:10:36,080 --> 01:10:40,800
छठवें अध्याय का खंडन तीसरे अध्याय के आधार पर

956
01:10:40,800 --> 01:10:45,640
और तीसरे अध्याय का खंडन यहां पर य युद्ध वाले

957
01:10:45,640 --> 01:10:49,760
उसके आधार पर यह सब अपना मनमुक इन्होंने डाल रखा है

958
01:10:49,760 --> 01:10:54,640
अब मैं जरूरी जरूरी और जल्दी जल्दी इनका दिखाऊंगा

959
01:10:54,640 --> 01:10:59,120
जल्दी से पूरा करूंगा नौवा अध्याय खोलिए इनका

960
01:10:59,120 --> 01:11:04,280
ये पेज नंबर है 181 इनका खोलिए अब हमारे की जरूरत नहीं

961
01:11:04,280 --> 01:11:10,280
है इनका

962
01:11:15,080 --> 01:11:21,080
खोलिए नवा अध्याय पेज नंबर 81

963
01:11:22,640 --> 01:11:28,640
हां 181 181

964
01:11:28,840 --> 01:11:32,880
18 अब यहां पर क्या है ना बिल्कुल क्रिस्टल क्लियर चीजें हो

965
01:11:32,880 --> 01:11:38,880
जाएंगी क्रिस्टल

966
01:11:39,240 --> 01:11:43,320
क्लियर पवित्र वेदों के अनुसार साधना का परिणाम केवल

967
01:11:43,320 --> 01:11:49,040
स्वर्ग महा स्वर्ग प्राप्ति मुक्ति नहीं

968
01:11:49,040 --> 01:11:53,160
वाह अब इन्होंने क्या है कि 91 में

969
01:11:53,160 --> 01:11:57,960
कहा है कि योग यज्ञों का भोक्ता कौन है

970
01:11:57,960 --> 01:12:03,880
इन्होंने य यज्ञों का भोक्ता माना है ब्रह्म को ठीक

971
01:12:03,880 --> 01:12:07,880
है देखिए जरा किसे माना इन्होंने यज्ञों

972
01:12:07,880 --> 01:12:12,280
का भोक्ता ऊपर जाइए ऊपर

973
01:12:12,280 --> 01:12:17,120
जाइए अच्छा श्लोक 18 में है क्या

974
01:12:17,120 --> 01:12:21,160
अध्याय न के शलोक 18 में कहा है कि 21 ब्रह्मांड का

975
01:12:21,160 --> 01:12:24,160
ही मैं ही स्वामी [संगीत]

976
01:12:24,160 --> 01:12:28,200
हूं 18 में क्या कहा है अविनाशी

977
01:12:28,200 --> 01:12:32,200
विधान कर एक मिनट मैं खोल लू जरा अपने में

978
01:12:32,200 --> 01:12:36,160
खोल ल 18वां

979
01:12:36,160 --> 01:12:40,560
अध्याय 18 अध्याय नवा अध्याय हा

980
01:12:40,560 --> 01:12:46,560
नौवा अध्याय अवा

981
01:12:53,400 --> 01:12:59,400
श्लोक नौवा अध और यह है 18वां

982
01:13:07,160 --> 01:13:13,160
श्लोक

983
01:13:15,680 --> 01:13:20,120
नारायण सबका स्वामी 18 में

984
01:13:20,120 --> 01:13:24,400
18 श्लोक में कहा गया है कि प्राप्त

985
01:13:24,400 --> 01:13:28,960
करने योग जो परम धाम है वो मैं ही हूं

986
01:13:28,960 --> 01:13:33,640
अविनाशी कारण मैं ही हूं ठीक है

987
01:13:33,640 --> 01:13:37,640
बीज बीज को कारण कहा गया है अविनाशी कारण मैं ही

988
01:13:37,640 --> 01:13:41,760
हूं और यहां पर भी काल के लिए इनके अकॉर्डिंग काल

989
01:13:41,760 --> 01:13:46,320
के लिए यहां पर भी अवम यानी कि अविनाशी

990
01:13:46,320 --> 01:13:50,520
शब्द आया है तो यहां पर काल कह रहे हैं दो बातें हैं प्राप्त होने

991
01:13:50,520 --> 01:13:55,920
योग्य परम धाम मैं हूं परम गति मैं हूं और

992
01:13:55,920 --> 01:14:00,280
अविनाशी कारण समस्त चराचर जगत का मैं ही हूं उत्पत्ति प्रलय

993
01:14:00,280 --> 01:14:04,480
का हेतु मैं ही हूं स्थिति का आधार मैं ही हूं यह कह रहे हैं यह काल कह रहे हमारे अनुसार

994
01:14:04,480 --> 01:14:08,400
श्री कृष्ण कह रहे अब इनके अनुसार क्या क्या कहा जा

995
01:14:08,400 --> 01:14:12,640
रहा है वहां पर उत्पत्ति

996
01:14:12,640 --> 01:14:16,880
व विनाश करता वाले इस अविनाशी विधान का कारण अब यहां पर देखिए

997
01:14:16,880 --> 01:14:20,960
थोड़ा सा बचा लिया इन्होंने काल को अविनाशी इन्होंने

998
01:14:20,960 --> 01:14:25,360
नहीं कहा क्योंकि इनके अनुसार काल बोल रहा है ना ये सब मगर आगे

999
01:14:25,360 --> 01:14:29,720
व हो जाएगा ठीक है और प्राप्त

1000
01:14:29,720 --> 01:14:33,800
होने योग्य वो जो स्थिति है उसको तो खाई गए व गति का इन्होने

1001
01:14:33,800 --> 01:14:37,880
कुछ कहा ही नहीं है बिल्कुल की गति कौन सी मिलती है

1002
01:14:37,880 --> 01:14:42,040
मगर आगे चलते हैं अब आ जाता है 21 वा इसी

1003
01:14:42,040 --> 01:14:48,040
का 21 वा आप खोल लीजिए मैं भी खोलता हूं इधर आप इसका खोलिए

1004
01:14:48,320 --> 01:14:52,560
9.21 नहीं 20 20 पले 20 ईस्ट

1005
01:14:52,560 --> 01:14:57,160
मानकर

1006
01:14:57,160 --> 01:15:01,240
इसमें लिखा है तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम

1007
01:15:01,240 --> 01:15:05,400
कर्मों को करने वाले सोम रस को पीने वाले पाप रहित

1008
01:15:05,400 --> 01:15:09,720
पुरुष मुझको यज्ञों के द्वारा पूजक स्वर्ग की प्राप्ति

1009
01:15:09,720 --> 01:15:13,840
चाहते हैं वे पुरुष अपने पुण्यं के फल स्वरूप

1010
01:15:13,840 --> 01:15:18,160
स्वर्ग लोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य

1011
01:15:18,160 --> 01:15:22,400
देवताओं के भोगों को भोगते हैं ठीक है अब

1012
01:15:22,400 --> 01:15:26,640
यहां पर इन्होंने एक शब्द डाल दिया आप मत खोलो मैं इधर से पढ़ के बता दूंगा

1013
01:15:26,640 --> 01:15:30,880
आप वही वाला खोलो हां अब इन्होंने यहां क्या किया 920

1014
01:15:30,880 --> 01:15:35,560
में एक शब्द डाल दिया है कि मुझको ईष्ट

1015
01:15:35,560 --> 01:15:39,880
मानकर मुझको पूज्य मानकर यहां

1016
01:15:39,880 --> 01:15:44,080
पर जो इतवा शब्द आया है

1017
01:15:44,080 --> 01:15:48,240
स्वा संस्कृत में जो इतवा शब्द आया है वह

1018
01:15:48,240 --> 01:15:53,120
एक बार आया है अगर उसका अर्थ मुझको पूज्य मानकर कर लेंगे

1019
01:15:53,120 --> 01:15:57,280
तो पूजा करते हैं कि संस्कृत प्राप्त नहीं होगी और

1020
01:15:57,280 --> 01:16:01,440
यदि पूजा करते हैं कि संस्कृत मान रहे हैं इटवा को

1021
01:16:01,440 --> 01:16:05,520
तो फिर मुझको ईट मानकर इसकी संस्कृत नहीं है

1022
01:16:05,520 --> 01:16:09,840
तो इसका अर्थ ये है यहां पर वा वास्तविकता

1023
01:16:09,840 --> 01:16:12,600
में यह कहा जा रहा है कि मुझको

1024
01:16:12,600 --> 01:16:17,120
मेरी पूजा करते हैं है ना किसलिए स्वर्ग की प्राप्ति हेतु

1025
01:16:17,120 --> 01:16:21,120
मेरी पूजा करते हैं वो स्वर्ग को भोगते तो हैं मगर उन्हें वापस आना पड़ता है यह

1026
01:16:21,120 --> 01:16:25,320
भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं मगर इन्होंने अपने छल को

1027
01:16:25,320 --> 01:16:29,520
अपने सिद्धांत को प्रतिपादित करने के लिए एक बात अपने मन से घुसे

1028
01:16:29,520 --> 01:16:33,840
दी कि मुझको ईट मानकर

1029
01:16:33,840 --> 01:16:38,160
मुझको पूज्य मानकर यह देखिए मुझको ईट

1030
01:16:38,160 --> 01:16:42,960
देव यानी पूज्य देव रूप में यज्ञों द्वारा पूजक

1031
01:16:42,960 --> 01:16:47,120
अब जब या तो पूजक या तो पूजक की संस्कृत नहीं है

1032
01:16:47,120 --> 01:16:51,320
श्लोक में और या फिर आप जो बोल रहे हो कि

1033
01:16:51,320 --> 01:16:55,560
ईस्ट देव यानी पूज्य देव रूप में इसकी संस्कृत श्लोक में नहीं

1034
01:16:55,560 --> 01:16:59,920
है यहां यह चाह रहे हैं यह बताना कि

1035
01:16:59,920 --> 01:17:04,160
इनके अनुसार काल यह बोल रहा है कि मुझको ईस्ट नहीं मानना चाहिए

1036
01:17:04,160 --> 01:17:08,400
पर मानते हैं लोग तो उस बात के लिए अपने मन से एक बात फिट

1037
01:17:08,400 --> 01:17:12,600
कर दी कि ईस्ट देव यानी पूज्य देव रूप में पूजक

1038
01:17:12,600 --> 01:17:16,800
जबकि यहां पर ईस्ट देव यानी पूज्य देव रूप में की

1039
01:17:16,800 --> 01:17:20,880
कोई संस्कृत यहां पर नहीं है आगे चलते

1040
01:17:20,880 --> 01:17:25,200
हैं न 2 न

1041
01:17:25,200 --> 01:17:27,600
में देखिए क्या लिखा है इन्होंने क्या लिखा है न

1042
01:17:27,600 --> 01:17:31,960
का

1043
01:17:31,960 --> 01:17:37,080
अर्थ न का अर्थ इन्होने क्या लिखा है

1044
01:17:37,080 --> 01:17:41,160
इन्होने है जो साधक अन्य देवी देवताओं की साधना ना

1045
01:17:41,160 --> 01:17:45,280
करे पूण ब्रह्म के ब्रम में ब्रह्म में मेरी

1046
01:17:45,280 --> 01:17:49,640
साधना करते हैं उनकी योग भक्ति क्षेम

1047
01:17:49,640 --> 01:17:53,840
रक्षा नहीं करता मैं रक्षा करता हूं अब पहली बात तो ये

1048
01:17:53,840 --> 01:17:58,320
हैय जो काल है इतना सारा ज्ञान गलत वाला दे क्यों रहा है जब यह

1049
01:17:58,320 --> 01:18:02,400
सही ज्ञान देने आया है पहली बात तो यह हो गई अब दूसरी बात

1050
01:18:02,400 --> 01:18:06,400
यह है कि अगर मान भी लिया कि इनके पास कोई और कोई ना कोई

1051
01:18:06,400 --> 01:18:11,320
तो बनाया होगा इतने सालों का तंत्र कुछ ना कुछ जवाब इसका बनाया हो मगर

1052
01:18:11,320 --> 01:18:15,720
काय सोचने वाली बात यह है कि यहां पर पूर्ण ब्रह्म

1053
01:18:15,720 --> 01:18:19,920
के भ्रम में इसकी संस्कृत नहीं है संस्कृत

1054
01:18:19,920 --> 01:18:24,200
दिखा दीजिए इनको इस श्लोक में

1055
01:18:24,200 --> 01:18:28,320
जो इन् ने ये लगा दिया जो लोग पूर्ण ब्रह्म के पूर्ण

1056
01:18:28,320 --> 01:18:32,760
ब्रह्म के भ्रम में मेरी पूजा करते हैं उनकी

1057
01:18:32,760 --> 01:18:36,760
रक्षा उनकी भक्ति की रक्षा मैं करता हूं तो इसमें

1058
01:18:36,760 --> 01:18:41,440
देख हां न 22 तो न 2 में पूर्ण

1059
01:18:41,440 --> 01:18:42,960
पूर्ण ब्रह्म के भ्रम

1060
01:18:42,960 --> 01:18:47,160
में कहां लिखा है पूरे में दिखाइए कहां पर इसकी

1061
01:18:47,160 --> 01:18:51,240
संस्कृत है अपने मन से

1062
01:18:51,240 --> 01:18:55,680
जहां मन चाहा वहां अपना मत लिख दिया

1063
01:18:55,680 --> 01:19:00,000
कहां पर संस्कृत है इसकी कि पूर्ण ब्रह्म के भ्रम

1064
01:19:00,000 --> 01:19:04,080
में इसकी कोई संस्कृत नहीं है दूसरी बात एक बात ध्यान

1065
01:19:04,080 --> 01:19:08,240
रखने की है कि यहां पर वो अभी भी जो काल है वह

1066
01:19:08,240 --> 01:19:12,480
स्वयं को भजने की बात कर रहा है इनके अनुसार भगवत गीता में

1067
01:19:12,480 --> 01:19:17,360
ज्यादातर काल ने स्वयं को भजने की बात की है

1068
01:19:17,360 --> 01:19:21,680
ठीक है अच्छा

1069
01:19:21,680 --> 01:19:26,000
अब देखिए आगे चलिए 9 2

1070
01:19:26,000 --> 01:19:30,160
नते खोलिए इसमें इन्होंने क्या कहा

1071
01:19:30,160 --> 01:19:35,000
है जो अन्य देवताओं वे अन्य पूर्ण परमात्मा

1072
01:19:35,000 --> 01:19:40,640
को भी पूजते हैं पूजते हैं

1073
01:19:40,640 --> 01:19:45,800
हा वे मुझको ही पूजते हैं वे मुझको ही पूजते

1074
01:19:45,800 --> 01:19:50,400
हैं यानी काल जाल मेंही रहते हैं हम

1075
01:19:50,400 --> 01:19:55,000
और उनकी वह पूजा यहां देखिए जो अन्य देवताओ

1076
01:19:55,000 --> 01:19:58,120
वह अन्य पूर्ण परमात्मा को यानी कि इन्होंने यहां पर

1077
01:19:58,120 --> 01:20:01,160
यह माना है

1078
01:20:01,160 --> 01:20:05,320
कि कोई अन्य पूर्ण परमात्मा भी है

1079
01:20:05,320 --> 01:20:09,760
काल के अलावा एक पूर्ण परमात्मा और एक अन्य पूर्ण परमात्मा भी है और

1080
01:20:09,760 --> 01:20:14,320
इसकी भी कोई अलग से संस्कृत प्राप्त नहीं है

1081
01:20:14,320 --> 01:20:18,560
यहां पर जो वास्तविकता है वो क्या है कि जो अन्य देवी देवताओं

1082
01:20:18,560 --> 01:20:22,800
को बचते हैं वो पूजते तो मुझी को है

1083
01:20:22,800 --> 01:20:26,960
किंतु उनका वह पूजन अधि पूर्वक अर्थात अज्ञान पूर्वक है यहां पर

1084
01:20:26,960 --> 01:20:29,200
यह

1085
01:20:29,200 --> 01:20:33,640
जो तर्क सम्मत प्राप्त है वह है ठीक है

1086
01:20:33,640 --> 01:20:37,880
अब इनकी पूजा जो है वह अधि पूर्वक क्यों है क्योंकि काल

1087
01:20:37,880 --> 01:20:42,160
यहां पर यह कह रहा है कि जो लोग मुझसे

1088
01:20:42,160 --> 01:20:46,360
अन्य मुझसे भिन्न किसी को भजते हैं

1089
01:20:46,360 --> 01:20:50,440
और यहां पर काल ने यह भी कह दिया कि अन्य पूर्ण परमात्मा को तो इसकी

1090
01:20:50,440 --> 01:20:55,240
संस्कृत कहां है और अगर

1091
01:20:55,240 --> 01:20:59,400
अन्य पूर्ण अगर पूर्ण परमात्मा को व्यक्ति काल को छोड़कर भज रहा

1092
01:20:59,400 --> 01:21:04,080
है तो यहां तो काल को यह कहना चाहिए था ना कि वोह सही कर रहा है

1093
01:21:04,080 --> 01:21:08,400
मगर ऐसे व्यक्ति को यह कह रहे हैं कि अज्ञानी है जो पूर्ण

1094
01:21:08,400 --> 01:21:13,120
परमात्मा को भज रहा है वह अज्ञानी है देखिए

1095
01:21:13,120 --> 01:21:17,360
ठीक है और अगर इसमें यह ले ले कि जो इनका कबीर

1096
01:21:17,360 --> 01:21:22,280
है उस पूर्ण परमात्मा को छोड़कर जो अन्य देवताओं को बजते हैं

1097
01:21:22,280 --> 01:21:27,800
वो अज्ञानी है तो भाई

1098
01:21:27,800 --> 01:21:31,840
जो यहां पर अगर इनका जो अन्य पूर्ण परमात्मा

1099
01:21:31,840 --> 01:21:36,400
शब्द को हटा देंगे अगर क्योंकि वह उसकी कोई संस्कृत तो है नहीं

1100
01:21:36,400 --> 01:21:41,320
तो संस्कृत के हिसाब से यहां पर इनके द्वारा काल यह कह रहा है कि मुझसे

1101
01:21:41,320 --> 01:21:46,720
अलग जो अन्य देवताओं को भजता है वह अज्ञानी है

1102
01:21:46,720 --> 01:21:50,800
तो अब बात यह आती है कि काल से

1103
01:21:50,800 --> 01:21:54,880
अलग देव कौन है उस देव में तो कबीर देव भी आ जाते हैं इनके अनुसार

1104
01:21:54,880 --> 01:21:59,080
कबीर देव है वेदों में प्रमाण है ओए कबीर देव भगवान

1105
01:21:59,080 --> 01:22:04,320
है तो इनके अनुसार

1106
01:22:04,320 --> 01:22:08,760
जो कबीर देव है उनकी पूजा करने वाला ज्ञानी और

1107
01:22:08,760 --> 01:22:12,880
अगर मेरा य तर्क ना भी ले तो इन्होंने यहां पर मान लिया पूर्ण परमात्मा

1108
01:22:12,880 --> 01:22:18,880
को पूजते हैं वह भी अज्ञानी है अंत तो

1109
01:22:19,000 --> 01:22:23,200
गत्वा यदि कोई पूर्ण परमात्मा को पूज रहा है तो वो भी काल को ही पूज

1110
01:22:23,200 --> 01:22:27,280
रहा है मत पूजो भैया पू परमात्मा को देख लो आप ही के लोग कह रहे हैं

1111
01:22:27,280 --> 01:22:28,240
थोड़ा बड़ा कर दीजिए

1112
01:22:28,240 --> 01:22:32,640
इस लाइन को यदि कोई पूर्ण परमात्मा को पूज रहा है

1113
01:22:32,640 --> 01:22:36,800
तो वह भी काल को ही पूज रहा है इसलिए पूर्ण परमात्मा को पूजने की कोई

1114
01:22:36,800 --> 01:22:41,120
आवश्यकता नहीं है हो गया अच्छा

1115
01:22:41,120 --> 01:22:45,400
और इसमें बहुत बढ़िया है आगे और चलिए अब

1116
01:22:45,400 --> 01:22:49,400
न 24 देखिए यहां पर इनका सबसे बड़ा खुलासा होगा

1117
01:22:49,400 --> 01:22:53,520
94 में अब 94 में क्या

1118
01:22:53,520 --> 01:22:58,200
है क्योंकि सब यज्ञों का भोगता

1119
01:22:58,200 --> 01:23:00,680
भोगने

1120
01:23:00,680 --> 01:23:05,080
वाला प्रभु केवल 21 ब्रह्मांड का स्वामी

1121
01:23:05,080 --> 01:23:09,520
यहां पर वैसे इन सबकी संस्कृत है नहीं अपने आप लगा दिए मैं हूं

1122
01:23:09,520 --> 01:23:13,960
समस्त यज्ञों को भोगने वाला मैं हूं और इसको

1123
01:23:13,960 --> 01:23:18,160
मुझ इस प्रकार मुझको तत्व से नहीं

1124
01:23:18,160 --> 01:23:22,240
जानते तो वह जन्म मरण के चक्कर में फसे रहते हैं पहली बात

1125
01:23:22,240 --> 01:23:26,880
तो यह है कि जिसको से जानना ही नहीं है

1126
01:23:26,880 --> 01:23:31,040
जिसको तत्व से जानना तत्व ज्ञान नहीं है उसको तत्व से जानने की आवश्यकता क्या है

1127
01:23:31,040 --> 01:23:35,120
पहली बात चलो अगर जान भी रहे हो तो यहां

1128
01:23:35,120 --> 01:23:39,400
पर आपने यज्ञों का भोक्ता किसको माना

1129
01:23:39,400 --> 01:23:43,520
है यहां पर आपने यज्ञों का भोक्ता माना है

1130
01:23:43,520 --> 01:23:48,000
ब्रह्म को अब इनका तीसरे अध्याय का

1131
01:23:48,000 --> 01:23:51,560
चवा श्लोक

1132
01:23:51,560 --> 01:23:57,560
खोलिए इन्हीं का

1133
01:24:16,360 --> 01:24:22,360
वही था शायद वह 45 था क्या था

1134
01:24:43,320 --> 01:24:49,320
आया पीछे है पीछे

1135
01:24:58,640 --> 01:25:02,640
इन्होंने इसमें तीसरे अध्याय में इतने वो दे दिए अपनी कहानिया

1136
01:25:02,640 --> 01:25:07,360
मन की पूछो नहीं चलिए

1137
01:25:07,360 --> 01:25:11,400
और पीछे चलिए और पीछे चलिए इन कहानियों

1138
01:25:11,400 --> 01:25:15,720
से पहले हा रुक जा रुक जाइ रुक जाइए 14 से 15

1139
01:25:15,720 --> 01:25:18,000
हां

1140
01:25:18,000 --> 01:25:22,000
हा सब प्राणी उससे उत्पन्न और थोड़ा पीछे जाइए जहां से शुरुआत

1141
01:25:22,000 --> 01:25:26,880
हो रही हो इसकी इससे पहले या तो कोई और श्लोक हो

1142
01:25:26,880 --> 01:25:31,560
और ऊपर जाइए जरा

1143
01:25:31,560 --> 01:25:35,920
स जहां पर इन्होंने वो माना था ना ब्रह्म का अर्थ वेद

1144
01:25:35,920 --> 01:25:40,000
अभी देखा था हमने पहले ब्रह्म का अथ इन्होने

1145
01:25:40,000 --> 01:25:46,000
वेद नहीं माना था अपना काल माना था

1146
01:25:52,000 --> 01:25:56,520
काल ये

1147
01:25:56,520 --> 01:26:01,920
संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं है ना

1148
01:26:01,920 --> 01:26:07,920
तो आठ के श्लोक 22 का यथार्थ अनुवाद और पीछे

1149
01:26:08,680 --> 01:26:13,400
जाइए विशेषण गीता अध्याय 3 199 में और पीछे

1150
01:26:13,400 --> 01:26:17,680
जाइए और पीछे जाइए 31

1151
01:26:17,680 --> 01:26:21,720
और पीछे जाइए हां हां अब आ गया अब आ गया अब

1152
01:26:21,720 --> 01:26:26,080
आ गया काल ब्रह्म की उत्पत्ति करता बस बस बस बस आगे आ जाइए

1153
01:26:26,080 --> 01:26:30,280
आगे आ जाइए बस बस बस बस 14

1154
01:26:30,280 --> 01:26:35,680
से श्लोक हिंदी का अनुवाद प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं

1155
01:26:35,680 --> 01:26:40,480
और ऐसा ऐसा है प्राणी अन्न से उत्पन्न होते

1156
01:26:40,480 --> 01:26:44,680
हैं एक मिनट जरा इससे पहले वाला पेज एक बार और दिखा दीजिए मुझे

1157
01:26:44,680 --> 01:26:50,680
इससे पहले वाला पेज एक बार और दिखा दीजिए

1158
01:26:54,760 --> 01:26:58,760
अच्छा ठीक है ठीक है अब अब आ जाइए वही आ जाइए वही आ जाइए जहां

1159
01:26:58,760 --> 01:27:03,000
थे हां तो भाई इन्होंने तीसरे अध्याय के 14

1160
01:27:03,000 --> 01:27:07,000
श्लोक से 19 में श्लोक का हिंदी अनुवाद किया है प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न

1161
01:27:07,000 --> 01:27:07,500
वर्षा से

1162
01:27:07,400 --> 01:27:11,600
उत्पन्न होता है वृष्टि यज्ञ से यानी धार्मिक अनुष्ठान

1163
01:27:11,600 --> 01:27:15,680
से होती है यज्ञ यानी धार्मिक अनुष्ठान शास्त्र अनुकूल कर्मों से सफल होते

1164
01:27:15,680 --> 01:27:19,680
हैं ठीक है कर्मों को त ब्रह्म यानी काल ब्रह्म से उत्पन्न

1165
01:27:19,680 --> 01:27:23,960
जान क्योंकि जीव सतलोक को त्याग कर काल लोक में आए

1166
01:27:23,960 --> 01:27:28,040
तो कर्म करके सर्व पदार्थ प्राप्त करते हैं सतलोक में बिना कर्म

1167
01:27:28,040 --> 01:27:32,280
किए सर्व पदार्थ प्राप्त होते हैं वहां

1168
01:27:32,280 --> 01:27:36,520
नस कर्म में मुक्ति जीव को प्राप्त होती है इस श्लोक में आगे

1169
01:27:36,520 --> 01:27:40,560
कहा गया है ब्रह्म यानी काल ब्रह्म की उत्पत्ति अविनाशी परमात्मा यानी परम अक्षर

1170
01:27:40,560 --> 01:27:42,120
पुरुष से हुई है ऐसा

1171
01:27:42,120 --> 01:27:46,360
जान इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम

1172
01:27:46,360 --> 01:27:50,640
अक्षर ब्रह्म सदा ही यज्ञों यानी धार्मिक अनुष्ठानों में

1173
01:27:50,640 --> 01:27:56,000
प्रतिष्ठित है ईष्ट रूप में पूज्य है यज्ञों द्वारा कौन पूज्य

1174
01:27:56,000 --> 01:28:01,560
भाई यज्ञों द्वारा कौन पूज्य

1175
01:28:01,560 --> 01:28:06,320
है परम अक्षर ब्रह्म ठीक

1176
01:28:06,320 --> 01:28:10,320
है अब वहां पर वा वहां पर वापस आ जाइए

1177
01:28:10,320 --> 01:28:16,240
जहां हम लोग 9 24 में

1178
01:28:16,240 --> 01:28:20,680
थे यहां पर इन्होंने मान लिया 3 15

1179
01:28:20,680 --> 01:28:25,000
में कि जो सर्वव्यापी परमेश्वर है

1180
01:28:25,000 --> 01:28:29,760
वो यज्ञों द्वारा पूज्य

1181
01:28:29,760 --> 01:28:33,800
है ठीक है यज्ञों द्वारा

1182
01:28:33,800 --> 01:28:39,800
वो पूज्य

1183
01:28:40,240 --> 01:28:44,520
है और यहां पर क्या कह रहे हैं यज्ञों

1184
01:28:44,520 --> 01:28:47,680
का विषय कौन

1185
01:28:47,680 --> 01:28:52,440
है वहां पर यज्ञों का विषय कौन

1186
01:28:52,440 --> 01:28:56,520
है एक मिनट आपको आना है वो

1187
01:28:56,520 --> 01:29:00,840
जो 9 24 था ना हम लोग पढ़ रहे थे जो हां यहां

1188
01:29:00,840 --> 01:29:04,840
पर यहां पर यज्ञों का पूज्य कौन है यज्ञों द्वारा कौन

1189
01:29:04,840 --> 01:29:09,280
पूज रहा है

1190
01:29:09,280 --> 01:29:13,280
वो जिसको यज्ञ परंतु

1191
01:29:13,280 --> 01:29:17,400
उनकी यह पूजा विधि पूर्वक होती है देवी देवता मुझे अच्छी

1192
01:29:17,400 --> 01:29:21,400
तरह से नहीं जानते हैं यह काल है इसलिए उनकी पूजा करके भी पतन को प्राप्त होते

1193
01:29:21,400 --> 01:29:25,560
हैं जिससे नरक में 84 लाख जैसे गीता अध्याय तीन श्लोक में कहा गया

1194
01:29:25,560 --> 01:29:29,560
सर्व यज्ञों में प्रतिष्ठित अर्थात सम्मानित जिसको यज्ञ समर्पण की जाती है

1195
01:29:29,560 --> 01:29:31,320
वह परमात्मा पूर्ण

1196
01:29:31,320 --> 01:29:35,760
ब्रह्म है वही कर्मा आधार बनकर सर्व प्राणियों को प्रदान

1197
01:29:35,760 --> 01:29:38,520
पीछे चलिए

1198
01:29:38,520 --> 01:29:42,640
पीछे यज्ञों का एक मिनट नीचे आइए एक मिनट नीचे आइए

1199
01:29:42,640 --> 01:29:47,840
नीचे आइए और नीचे आइए

1200
01:29:47,840 --> 01:29:52,200
हां कि काल काल ही भोगता

1201
01:29:52,200 --> 01:29:56,200
है परंतु पूर्ण संत नाम मिलने तक सर्व यज्ञों का भोग अब यह

1202
01:29:56,200 --> 01:30:00,480
जो व्याख्या है इन्होंने अपने मन से इसमें डाल दी कि पूर्ण

1203
01:30:00,480 --> 01:30:04,520
संत ना मिलने तक इसकी संस्कृत कहां है कि

1204
01:30:04,520 --> 01:30:08,520
पूर्ण संत ना मिलने तक यज्ञों का जो भोगता होता है वो काल होता

1205
01:30:08,520 --> 01:30:12,520
है और इसलिए कह रहा है कि

1206
01:30:12,520 --> 01:30:16,600
मैं सब सभी यज्ञों का भोक्ता व स्वामी हूं क्योंकि इन्होंने क्यों

1207
01:30:16,600 --> 01:30:21,160
डाली ये बात कुल मिलाकर के

1208
01:30:21,160 --> 01:30:25,200
ये गीता को पूरा का पूरा नहीं मानते हैं एक जगह की लिखी हुई

1209
01:30:25,200 --> 01:30:29,280
बात को दूसरी अपने मन के अपने मन से जहां पर

1210
01:30:29,280 --> 01:30:33,520
बात दिख रही है उसके आधार पर काट देते हैं अपने मन के अनुसार कहीं

1211
01:30:33,520 --> 01:30:37,760
पर गीता प्रेस गोरखपुर का हिंदी अनुवाद स्वीकार कर लेते हैं

1212
01:30:37,760 --> 01:30:42,000
और अपने मन के अनुसार जो शब्दों की संस्कृत वहां पर नहीं भी होती है

1213
01:30:42,000 --> 01:30:46,440
वो भी वहां पर डाल देते हैं मगर ये तिरछा दर्शी नहीं है

1214
01:30:46,440 --> 01:30:50,480
ये तत्वदर्शी है अब अंत तो गत्वा ये देख लेते हैं यहीं

1215
01:30:50,480 --> 01:30:54,800
पर एक और चीज है वेदों के अनुसार साधना

1216
01:30:54,800 --> 01:30:59,360
ना करने वाला पूर्ण मुक्त नहीं है ठीक

1217
01:30:59,360 --> 01:31:03,440
है यह लिखा है 182 में वेदों के

1218
01:31:03,440 --> 01:31:07,600
अनुसार जो साधना नहीं करेगा वह पूर्ण मुक्त नहीं

1219
01:31:07,600 --> 01:31:11,720
है ठीक है भैया कौन वे को मानते हैं अरे सुनिए

1220
01:31:11,720 --> 01:31:15,920
तो सुन तो लीजिए एक मिनट वेदों के अनुसार जो साधना

1221
01:31:15,920 --> 01:31:20,240
नहीं करेगा वह पूर्ण मुक्त नहीं है अब अब 181 पर आ जाइए

1222
01:31:20,240 --> 01:31:24,240
यह आज का सबसे बड़ा खुलासा है दीजिए

1223
01:31:24,240 --> 01:31:28,680
फिर मैं कुछ कहना चाहता हूं एक मिनट एक मिनट

1224
01:31:28,680 --> 01:31:34,560
181 में देखिए थोड़ा छोटा कर लीजिए मुझे लगता है बड़ा

1225
01:31:34,560 --> 01:31:40,520
है और और ऊपर

1226
01:31:40,520 --> 01:31:44,760
जाइए हां यह भावार्थ

1227
01:31:44,760 --> 01:31:49,080
वेदों में यह भावार्थ प आइए भावार्थ नीचे आइए नीचे

1228
01:31:49,080 --> 01:31:53,920
यह भावार्थ ये भावार्थ दिख रहा है वेदों में हा इसको बड़ा कर दीजिए

1229
01:31:53,920 --> 01:31:58,080
वेदों में महिमा तो अमर परमात्मा यानी परम

1230
01:31:58,080 --> 01:32:02,880
अक्षर ब्रह्म की भी है जिसमें उसकी भक्ति के साधक

1231
01:32:02,880 --> 01:32:07,040
पाप रहित होकर अमर सुख यानी पूर्ण मुक्ति को प्राप्त होते हैं

1232
01:32:07,040 --> 01:32:11,240
परंतु भक्ति के जो मंत्र हैं यज्ञ आदि

1233
01:32:11,240 --> 01:32:15,520
की जो क्रियाएं हैं वो ब्रह्म तक सीमित है

1234
01:32:15,520 --> 01:32:20,040
अरे मेरे भाई अभी तुम दो बार कह रहे हो कि यज्ञों का भोक्ता

1235
01:32:20,040 --> 01:32:24,400
वास्तविकता में जो है जब तत्वदर्शी की शरण में आ जाता है

1236
01:32:24,400 --> 01:32:28,560
तो यज्ञ जो वेदा दि शास्त्र सम्मत जो यज्ञ है

1237
01:32:28,560 --> 01:32:32,920
उनका भोक्ता सच्चिदानंद स्वरूप सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान

1238
01:32:32,920 --> 01:32:37,040
परमेश्वर है परम अक्षर ब्रह्म है अब यहां पर क्या कह रहे हो

1239
01:32:37,040 --> 01:32:41,240
कि वेदों द्वारा बताए गए जो मंत्र और यज्ञ है उनकी क्रियाएं कहां

1240
01:32:41,240 --> 01:32:45,360
तक सीमित है काल यज्ञ तक अच्छा दूसरी

1241
01:32:45,360 --> 01:32:49,400
बात यह कह रहे हो कि जब यह जो क्रियाएं है यह पूर्ण ब्रह्म तक की नहीं

1242
01:32:49,400 --> 01:32:50,400
है

1243
01:32:50,400 --> 01:32:54,400
काल ब्रह्म तक की सीमित है तो इसका मतलब है

1244
01:32:54,400 --> 01:32:58,520
कि पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति के लिए तुम्हें वेदों से बाहर जाना

1245
01:32:58,520 --> 01:33:03,240
पड़ेगा वेदों की सीमा से बाहर जाना पड़ेगा तो 182

1246
01:33:03,240 --> 01:33:07,640
में तुम लिख रहे हो जो वेदों के अनुसार नहीं चलता है

1247
01:33:07,640 --> 01:33:11,760
वह जो है मुक्ति को प्राप्त नहीं करता है तो जब तुम यहां पर

1248
01:33:11,760 --> 01:33:16,480
वेदों से बाहर जाने की बात स्वयं कर रहे हो तो

1249
01:33:16,480 --> 01:33:20,480
फिर दूसरी जगह कैसे कह पा रहे हो कि जो वेदों के अनुसार

1250
01:33:20,480 --> 01:33:24,480
नहीं चलता है वो मुक्ति को प्राप्त नहीं होता है मतलब वेदों का वेदों

1251
01:33:24,480 --> 01:33:28,640
का जो ताकत है वहां दिखा दो जहां व्यक्ति को बेवकूफ दिखाना

1252
01:33:28,640 --> 01:33:32,680
बनाना हो और उसके बाद यह भी बोल दो कि वेदों के

1253
01:33:32,680 --> 01:33:36,960
बाहर तो आपको जाना ही पड़ेगा क्योंकि हम एक सूक्ष्म वेद ले आए हैं

1254
01:33:36,960 --> 01:33:41,280
600 साल पहले का अब यदि पूर्ण

1255
01:33:41,280 --> 01:33:45,520
ब्रह्म तक जाने की बात वेदों में नहीं है जो अनादि काल से वेद

1256
01:33:45,520 --> 01:33:49,760
हैं 600 साल पहले आए सूक्ष्म वेद में पूर्ण वेद

1257
01:33:49,760 --> 01:33:53,920
पूर्ण ब्रह्म तक जाने की बात है तो फिर उसमें कुछ

1258
01:33:53,920 --> 01:33:57,960
ऐसा ज्ञान है जो 600 साल पहले से पहले नहीं था

1259
01:33:57,960 --> 01:34:02,920
वो कबीर ने आके दिया और था तो किस रूप में था सबूत दे

1260
01:34:02,920 --> 01:34:06,160
कोई प्रमाण नहीं है तो जब

1261
01:34:06,160 --> 01:34:10,320
प्रमाण नहीं है तो इसको क्या माना जाएगा कि 600 साल पहले आया जो ज्ञान

1262
01:34:10,320 --> 01:34:14,480
है उसको माना जाता है इनके द्वारा क्योंकि पूर्ण

1263
01:34:14,480 --> 01:34:18,480
ब्रह्म की प्राप्ति कैसे की जाए इनके अनुसार वो वेदों

1264
01:34:18,480 --> 01:34:22,600
में नहीं है अब ये अपनी ही बात को तो पहले

1265
01:34:22,600 --> 01:34:26,880
तो काट रहे हैं कि वेदों के बाहर जो जाएगा वो जो है मुक्ति नहीं पा पाएगा

1266
01:34:26,880 --> 01:34:32,240
फिर यहां पर वेदों के बाहर जाने की बात कर रहे हैं तो भाई किया क्या है

1267
01:34:32,240 --> 01:34:36,920
तुमने क्या किया ये खिचड़ी

1268
01:34:36,920 --> 01:34:40,600
पकाई

1269
01:34:40,600 --> 01:34:44,760
है यह दो तीन घंटे का

1270
01:34:44,760 --> 01:34:48,800
कार्य है जो हमने इनकी भगवत गीता में देखा है खुद ही कह

1271
01:34:48,800 --> 01:34:52,800
रहे हैं कि वेदों की सीमा के बाहर मत जाओ खुद ही कह रहे हैं कि

1272
01:34:52,800 --> 01:34:57,400
वेदों में पूर्ण की प्राप्ति का मार्ग नहीं है इससे बड़ा और

1273
01:34:57,400 --> 01:35:01,600
पंचरंगी ड्रामा क्या

1274
01:35:01,600 --> 01:35:07,600
होगा क्या

1275
01:35:10,280 --> 01:35:14,600
होगा अरे भाई तुम सूक्ष्म वेद के आधार पर और टूटा

1276
01:35:14,600 --> 01:35:19,000
फूटा वेद और गीता लेने के आधार पर जब चल रहे हो और सूक्ष्म

1277
01:35:19,000 --> 01:35:23,680
वेद तुम्हारा मेन है तो यह कहो कि हम सनातनी नहीं है

1278
01:35:23,680 --> 01:35:27,800
क्योंकि जो सूक्ष्म वेद है वो सनातन नहीं है आप

1279
01:35:27,800 --> 01:35:33,800
उसकी पहले की वो दिखाइए कहां है उससे पहले का प्रमाण

1280
01:35:35,120 --> 01:35:39,280
दिखाइए वह सूक्ष्म वेद स्वयं वेदों पर डिपेंड है

1281
01:35:39,280 --> 01:35:43,280
और उसको आप प्रमाण मान रहे हो वेदों के आगे और वेदों को तुम खंडन

1282
01:35:43,280 --> 01:35:47,320
कर रहे हो कि वेदों में भगवत प्राप्ति का मार्ग नहीं है वेद का मतलब है

1283
01:35:47,320 --> 01:35:51,440
ज्ञान और ज्ञान का मतलब फिर ज्ञान होता है ज्ञान का मतलब फिर अज्ञान नहीं होता

1284
01:35:51,440 --> 01:35:55,640
है

1285
01:35:55,640 --> 01:36:01,640
हां भैया विशाल भाटिया जी जय श्री

1286
01:36:01,680 --> 01:36:06,360
राम तो यह इनकी गरमा गीता की का जांच पड़ताल था

1287
01:36:06,360 --> 01:36:10,800
एक सूत्रा क्मक शैली में मैं एंड कर दूं आज जो हमने जाना

1288
01:36:10,800 --> 01:36:14,960
कि यह कहीं पर कोई सिद्धांत नहीं है कि यदि एक जगह

1289
01:36:14,960 --> 01:36:19,040
की शिक्षा दूसरी जगह का खंडन कर रही होगी तो उसको खंडित कर दो

1290
01:36:19,040 --> 01:36:23,120
नहीं दोनों जगह को मानना पड़ेगा यदि आप इन दोनों

1291
01:36:23,120 --> 01:36:27,840
ग्रंथों को प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हो यह शास्त्र कहते हैं

1292
01:36:27,840 --> 01:36:32,400
दूसरी बात कि इन्होंने अनेका अनेक जगह

1293
01:36:32,400 --> 01:36:36,400
भगवत जो गीता प्रेस गोरखपुर है उसके ब्रैकेट वाले जो

1294
01:36:36,400 --> 01:36:40,560
शब्द होते उनको माना है स्वीकार कर लिया जबकि उसकी संस्कृत

1295
01:36:40,560 --> 01:36:44,680
वहां नहीं दी गई है वहां पर उनके ज्ञान को स्वीकार कर लिया क्योंकि उस

1296
01:36:44,680 --> 01:36:49,400
समय उनके जो शब्द है इनके मत की सिद्धि करने वाले हैं

1297
01:36:49,400 --> 01:36:50,520
और अनेकानेक

1298
01:36:50,520 --> 01:36:54,680
जगह उनकी चीजों का खंडन कर दिया जो ब वाले शब्द उनको हटा

1299
01:36:54,680 --> 01:36:59,160
दिया बल्कि अनेकानेक जगह अपने मन से

1300
01:36:59,160 --> 01:37:03,560
जो जिन शब्दों का संस्कृत शब्द है ही नहीं उसको ले आए

1301
01:37:03,560 --> 01:37:08,120
जैसे हट पूर्वक यह दूसरा प्राप्त हुआ

1302
01:37:08,120 --> 01:37:12,200
तीसरा वही बात आ जाती है यदि काल अपने मन से कोई

1303
01:37:12,200 --> 01:37:16,280
ज्ञान दे रहा है यानी वह अज्ञानता फैला रहा है तो

1304
01:37:16,280 --> 01:37:20,400
जब वोह झूठ बोलेगा दोबारा तो जरूरी नहीं है तुमको

1305
01:37:20,400 --> 01:37:25,160
बता के बोलेगा कि अी भी मैं झूठ ही बोल रहा हूं जिसका

1306
01:37:25,160 --> 01:37:29,720
जिसका उद्देश्य आपको भटकाने का है वह आपको भटका जाएगा

1307
01:37:29,720 --> 01:37:34,680
आपको बता के नहीं भटका जाएगा तो खुद ही खंडन तीसरा

1308
01:37:34,680 --> 01:37:38,760
यह जो है एक जगह काल को अविनाशी कहते हैं तो दूसरी जगह कह देते

1309
01:37:38,760 --> 01:37:42,840
कि वो उत्पन्न है वो जन्म और मरण ये वो सब खिचड़ी पका देते

1310
01:37:42,840 --> 01:37:46,840
हैं कहीं पर काल के आधार पर कहीं पर खंडन

1311
01:37:46,840 --> 01:37:51,000
के आधार पर कहीं पर अपने मन से ही यह भगवत गीता

1312
01:37:51,000 --> 01:37:55,120
के ही श्लोकों का आपस में खंडन करते हो फिर कहते हैं गरिमा गीता की

1313
01:37:55,120 --> 01:38:00,680
गीता तेरा ज्ञान अमृत और गीता जो है पवित्र

1314
01:38:00,680 --> 01:38:05,440
ग्रंथ और अंततोगत्वा दो चीजें कहते हैं ये अच्छा

1315
01:38:05,440 --> 01:38:06,000
पूरे

1316
01:38:06,000 --> 01:38:10,080
वही मैंने कहा ना कि तुम मुझे अगर 35 श्लोक वो बता दो 35 श्लोक वो

1317
01:38:10,080 --> 01:38:14,200
कौन-कौन से हैं तो उनके अलावा मैं आपको बताऊंगा कि देखो कहां कहां

1318
01:38:14,200 --> 01:38:18,880
पर जो गीता को बोलने वाला है वह स्वयं की भक्ति करने की बात कह रहा है

1319
01:38:18,880 --> 01:38:23,560
एक मिनट बस बस पूरा कर रहा हूं बस लास्ट वो तो बताओ नहीं पाओगे

1320
01:38:23,560 --> 01:38:27,880
जीवन निकल जाएगा जेल धाम निवासी बाहर आएंगे कि नहीं आएंगे वह नहीं पता मगर

1321
01:38:27,880 --> 01:38:32,080
आप बता नहीं पाओगे कि वह 35 श्लोक कौन-कौन से हैं जो नहीं मानने

1322
01:38:32,080 --> 01:38:34,560
दूसरी

1323
01:38:34,560 --> 01:38:39,080
बात दूसरी बात ये है मालूम होगा में कितने पव है

1324
01:38:39,080 --> 01:38:43,200
अंततोगत्वा अंततोगत्वा जो बात है वोह क्या है खुद ही

1325
01:38:43,200 --> 01:38:47,480
कह रहे हो कि वेदों के बाहर की भक्ति जो है वोह

1326
01:38:47,480 --> 01:38:51,480
मुक्ति नहीं दिला पाएगी फिर खुद ही कह रहे हो कि वेदों की बाहर ही जाना पड़ेगा मुक्ति तो है

1327
01:38:51,480 --> 01:38:55,480
ही नहीं वेदों में अब तुम डिसाइड कर लो करना क्या है

1328
01:38:55,480 --> 01:38:59,520
हां जी विशाल भाटिया जी बताइए

1329
01:38:59,520 --> 01:39:04,640
जय श्री राम शिवाज सर्वप्रथम आपको जय श्री

1330
01:39:04,640 --> 01:39:08,760
राम वैसे तो मैं एक प्रमाण लेकर आया हूं मैं अभी प्रमाण तो दिखाऊंगा मैं

1331
01:39:08,760 --> 01:39:12,760
फिर भी आपको बता दूं आप यह लोग सुधरने वाले नहीं है आप

1332
01:39:12,760 --> 01:39:16,840
कितना भी प्रमाण दिखा चुके हैं हमने जैसे कल वो जो

1333
01:39:16,840 --> 01:39:20,880
ये कौन थे वो बाबू रामदास नाम से हमने इनको महाभारत से प्रमाण दिखाया

1334
01:39:20,880 --> 01:39:21,380
आपने

1335
01:39:21,160 --> 01:39:25,200
उनको महाभारत के अनुशासन प से यहां तक दिखाया कृष्ण काल है वो तो भी नहीं

1336
01:39:25,200 --> 01:39:29,240
माना आपने वो जो अमित दास था आपने उसको शिव पुराण से दिखाया कि हनुमान जी

1337
01:39:29,240 --> 01:39:33,360
की भक्ति से मोक्ष मिल सकते है नहीं वो नहीं माना तो ये जो इनका खंडन है ये लोग नहीं

1338
01:39:33,360 --> 01:39:37,360
मानेंगे इनका इनका पूरा मनवाना नहीं है देखिए होता

1339
01:39:37,360 --> 01:39:41,440
क्या है सुनिए विशाल जी बात ये है हम यहां किसी को मनवाने बैठे ही

1340
01:39:41,440 --> 01:39:45,720
नहीं है जब यह लोग उल्टी हरकतें करते हैं जो तार्किक

1341
01:39:45,720 --> 01:39:50,240
नहीं होती है इलॉजिकल होती है मूर्खता करते हैं तो इससे

1342
01:39:50,240 --> 01:39:54,480
लोग लोगों में चेतना आती है जागरूक होते देख देखो कितना मूर्ख

1343
01:39:54,480 --> 01:39:58,520
व्यक्ति हैय समझ रहे हैं वो कभी नहीं बोलेंगे वो रोबोट

1344
01:39:58,520 --> 01:40:03,720
है वो चाबी भर के आए हैं अपने अंदर रट्टा मार के आए

1345
01:40:03,720 --> 01:40:07,920
हां अभ ये देखिए मैं आया हूं ये मा माभारत का ये तीसरा

1346
01:40:07,920 --> 01:40:12,120
खंड है मेरे पास ठीक है और मैं एक चीज बोलूंगा आप एक कवि पंथी

1347
01:40:12,120 --> 01:40:16,200
आप चाहो तो उसको ले लीजिए र बहुत वो उछल कूद कर रहा है इसमें अभी

1348
01:40:16,200 --> 01:40:20,440
अ नहीं वर्मा नाम से मेरे ही नाम का एक व्यक्ति है

1349
01:40:20,440 --> 01:40:25,280
किसको कोट कर रहे हैं विशाल वर्मा

1350
01:40:25,280 --> 01:40:29,360
क्या कह रहे मतलब है कबीर पंती बहुत उपत करता वो सामने

1351
01:40:29,360 --> 01:40:33,720
नहीं आता बुलाने पर भी अरे तो कायर है भाई उनकी माता जी ने उन्हें निष्ठा पूर्वक

1352
01:40:33,720 --> 01:40:36,280
नहीं पिलाया है तो य

1353
01:40:36,280 --> 01:40:40,680
देखिए मा है उनकी बातो पर क्या ध्यान दोगे व तो बकते रहेंगे बल्कि

1354
01:40:40,680 --> 01:40:44,880
उनकी यह जो वो कमेंट करते हैं वह जानते नहीं है कि इसके कारण

1355
01:40:44,880 --> 01:40:49,600
हमारी इंगेजिंग बढ़ रही रीच बढ़ रही हैय हमारा और दिखाएगा लोगों को चैनल

1356
01:40:49,600 --> 01:40:53,720
क्योंकि उसको उसको वहां पर इंटरनेट का उपयोग कर रहे ना जितनी वो कमेंट

1357
01:40:53,720 --> 01:40:59,720
कर रहे हैं बारबार बार बार बार बार तो

1358
01:41:23,480 --> 01:41:27,520
ठीक है तो यह महाभारत के भीष्म पर्व में आती है

1359
01:41:27,520 --> 01:41:31,640
य भगवत गीता तो अब देखिए ये

1360
01:41:31,640 --> 01:41:35,920
ये देखिए दिख रहा है अब यहां से

1361
01:41:35,920 --> 01:41:40,080
देखिए ये यहां से भगवत गीता जो है पूरी होती है सा श्लोकों की

1362
01:41:40,080 --> 01:41:44,320
अब उसके भगवत गीता के बाद की जो घटना हुई थी उसको बताते हैं य पर भगवत गीता का

1363
01:41:44,320 --> 01:41:48,400
महात्म इसमें दिया गया है जैसा आप पढ़ सकते हैं इसमें मैं पढ़ के सुना

1364
01:41:48,400 --> 01:41:51,400
देता हूं कुछ लोक लोकी जी अगर हो तो जरा

1365
01:41:51,400 --> 01:41:56,560
वो ये पेज नंबर बता दीजिए वो खोल देंगे कीत

1366
01:41:56,560 --> 01:42:01,400
का तीसरा खंड है महाभारत का य

1367
01:42:01,400 --> 01:42:05,520
नहीं है गए अच्छा गए अच्छा ठीक

1368
01:42:05,520 --> 01:42:09,760
है आप आप आप मुझे पेज नंबर बताइए

1369
01:42:09,760 --> 01:42:15,760
तीसरा खंड पेज नंबर

1370
01:42:20,760 --> 01:42:26,760
869 भीष्म पर

1371
01:42:30,280 --> 01:42:34,760
जी आप दिखा दीजिए पढ़ मैं दूंगा 869

1372
01:42:34,760 --> 01:42:39,560
पेज नंबर

1373
01:42:39,560 --> 01:42:44,480
869 लग रहा है आज मैंने बोर कर दिया

1374
01:42:44,480 --> 01:42:48,640
क्या नहीं नहीं को

1375
01:42:48,640 --> 01:42:54,640
राम है तो हाथ उठाए स्टेज

1376
01:42:54,760 --> 01:42:59,320
आओ भाई सास जटाओ खंडन कर रहे महाभारत से आ गया

1377
01:42:59,320 --> 01:43:03,760
कितना बताया आपने 860 869

1378
01:43:03,760 --> 01:43:06,760
ना आ

1379
01:43:06,760 --> 01:43:10,880
गए आप स्क्रीन पर दिखाइए कहां से पढ़ना है

1380
01:43:10,880 --> 01:43:14,080
शलोक क्रमांक बता

1381
01:43:14,080 --> 01:43:18,240
दीजिए यह देखिए पहले आप श्लोक नंबर एक और दो

1382
01:43:18,240 --> 01:43:23,680
आप इसका अर्थ सही पढ़ दीजिए आप अर्थ है

1383
01:43:23,680 --> 01:43:28,040
जन्म जाए अ अन्य बहुत से शास्त्रों का संग्रह

1384
01:43:28,040 --> 01:43:32,200
करने की क्या आवश्यकता है गीता का ही अच्छी तरह से गान

1385
01:43:32,200 --> 01:43:36,800
श्रवण कीर्तन पठन पाठन मनन और धारण करना चाहिए

1386
01:43:36,800 --> 01:43:40,920
क्योंकि वह स्वयं पदमनाभ भगवान के साक्षात मुख कमल से निकली हुई

1387
01:43:40,920 --> 01:43:44,920
है लो पद्मना भगवान क्या काल को पद्मना

1388
01:43:44,920 --> 01:43:46,080
बोला जाता

1389
01:43:46,080 --> 01:43:50,800
है पमना विष्णु जी को कहा जाता है हा

1390
01:43:50,800 --> 01:43:54,960
अभी आगे है ना गीता सर्व शत्र मय है भगवान

1391
01:43:54,960 --> 01:43:59,080
श्री हरि सर्व देव मय है गंगा सर्व तीर्थ

1392
01:43:59,080 --> 01:44:03,440
मय है और मनु सर्व वेद मय है

1393
01:44:03,440 --> 01:44:08,520
अभय बस इसका चार और पांच लोक आप पढ़ दीजिए

1394
01:44:08,520 --> 01:44:12,720
चौथा और इस गीता में 620 श्लोक भगवान

1395
01:44:12,720 --> 01:44:17,080
श्री कृष्ण ने कहे हैं 57 श्लोक अर्जुन ने कहे हैं

1396
01:44:17,080 --> 01:44:21,120
67 श्लोक संजय ने कहे हैं और एक श्लोक धृतराष्ट्र का

1397
01:44:21,120 --> 01:44:25,200
कहा हुआ है यह गीता का मान बताया जा रहा है कहीं

1398
01:44:25,200 --> 01:44:29,640
लिखा है काल ने बोला श्लोक महाभारत से देख दिखा रहा हूं

1399
01:44:29,640 --> 01:44:34,080
अब इसका आगे पढ़िए पांच नंबर भारत रूपी

1400
01:44:34,080 --> 01:44:38,200
अमृत राशि के आप स्क्रीन पर दिखा दो ना

1401
01:44:38,200 --> 01:44:42,800
स्क्रीन पर दिखा दो इनकी स्क्रीन बड़ी कर

1402
01:44:42,800 --> 01:44:47,080
दो भारत रूपी अमृत राशि के सर्वस्व सार भूत

1403
01:44:47,080 --> 01:44:51,360
गीता का मंथन करके उसका सार निकालकर श्री कृष्ण

1404
01:44:51,360 --> 01:44:55,080
ने अर्जुन के मुख में

1405
01:44:55,080 --> 01:44:59,560
कानों द्वारा मन बुद्धि में डाल दिया

1406
01:44:59,560 --> 01:45:03,760
बस ठीक है तो भैया य तोय हो गया महाभारत

1407
01:45:03,760 --> 01:45:07,880
में बता दिया गया किसने कही है भगवत गीता गीता कहने के आगे

1408
01:45:07,880 --> 01:45:12,680
ही यह कह दिया गया कि किसने कही है भगवत गीता

1409
01:45:12,680 --> 01:45:16,880
चीज हमको समझाइए बस एक चीज इसमें लिखा है श्लोक नंबर चार

1410
01:45:16,880 --> 01:45:21,120
में कि 620 श्लोक श्री कृष्ण ने बोले 57 श्लोक अर्जुन

1411
01:45:21,120 --> 01:45:25,200
ने कहे और 67 शलोक ने क और एक श्लोक धृतराष्ट्र ने कहा तो

1412
01:45:25,200 --> 01:45:29,360
लेकिन गीता में 700 श्लोक है ना कुल तो ये तो उससे ज्यादा नहीं हो

1413
01:45:29,360 --> 01:45:33,520
जाएंगे वो एकाद जो उसका जो सम्मान

1414
01:45:33,520 --> 01:45:38,640
में बोला जाता है ना उसमें ले लिया जाता है अच्छा

1415
01:45:38,640 --> 01:45:43,320
हां एकाद जो श्लोक है जो उसके आगे पीछे उसका वर्णना

1416
01:45:43,320 --> 01:45:47,440
होता है उसमें गिन लिया जाता है फिर आ बाबूराम दास

1417
01:45:47,440 --> 01:45:51,600
जी जय श्री राम नारायण सभी को

1418
01:45:51,600 --> 01:45:54,760
जय श्री राम जय श्री राम

1419
01:45:54,760 --> 01:45:57,840
बाबूराम जी फिर आ गए अभी अभी हमने

1420
01:45:57,840 --> 01:46:01,880
पढ़ा आप गलत टाइम पर आ गए एन मौके पर

1421
01:46:01,880 --> 01:46:06,000
आना चाहिए था आपको अभी अभी माबाद से आपका

1422
01:46:06,000 --> 01:46:10,120
खंडन हुआ है कल जो इतना बोल रहे थे गीता दिखा दिखा के हमको दिखाने दो ना

1423
01:46:10,120 --> 01:46:14,680
हमको दिखाने दो ना बाबू राम जी मुझे

1424
01:46:14,680 --> 01:46:19,080
बताइए क्या आप अपनी चेहरा दिखाइए बाबूराम

1425
01:46:19,080 --> 01:46:23,240
जी जो ये लोग अब शा से दिखाएंगे वही शा सम्मत होगा हम अगर

1426
01:46:23,240 --> 01:46:27,280
दिखाएंगे तो वो गलत है बाबूराम जी

1427
01:46:27,280 --> 01:46:31,600
चेहरा हां बा सर हां

1428
01:46:31,600 --> 01:46:36,320
बाबू राम जीय बताइए क्या रामपाल

1429
01:46:36,320 --> 01:46:41,080
दास जी के द्वारा जो ईश्वर बताया जाता है

1430
01:46:41,080 --> 01:46:45,280
उसने ही समस्त ब्रह्मांड की रचना की है सब कुछ

1431
01:46:45,280 --> 01:46:49,880
उसी ने बनाया है कि नहीं सर वो तो बताए से ही

1432
01:46:49,880 --> 01:46:54,000
है क्या एक बार कह के गए थे पता करके आऊंगा उसके

1433
01:46:54,000 --> 01:46:58,080
बाद आप आए तो दूसरी बातें की हम

1434
01:46:58,080 --> 01:47:02,680
दूसरी बात से गीता पर च करने आए हैं सर नहीं नहीं नहीं आपके

1435
01:47:02,680 --> 01:47:07,240
आप जिसको ईश्वर मानते हो उसने सब कुछ बनाया है कि नहीं नहीं

1436
01:47:07,240 --> 01:47:11,360
मानते मानते हैं सर मानते हैं मानते हैं

1437
01:47:11,360 --> 01:47:12,880
तो वो साकार

1438
01:47:12,880 --> 01:47:17,200
है यह मानते हो या वो मूल रूप से निराकार है यह मानते

1439
01:47:17,200 --> 01:47:21,360
हो साकार है सर मानते हैं हम लोग तो

1440
01:47:21,360 --> 01:47:25,560
साकार मानते हैं आपकी ज्ञान गंगा में तो यह लिखा

1441
01:47:25,560 --> 01:47:30,440
हुआ है कि ईश्वर प्रकट हुआ सतलोक में

1442
01:47:30,440 --> 01:47:34,680
हां तो जो ज्ञान गंगा में लिखा है उसको आप पक्के में पक्का मानिए उसमें हम कोई फेर बदल

1443
01:47:34,680 --> 01:47:38,760
नहीं कर सकते हैं जो लिखा हो पता है क्या हम तो पढ़े हैं आप

1444
01:47:38,760 --> 01:47:42,840
भी पड़े हैं उसमें छिपाने वाली क्या बात है आप भी पढ़े ही है अरे तो आए

1445
01:47:42,840 --> 01:47:47,000
क्यों हो जब पढ़े नहीं हो तो हम तुम्ह बता दे रहे हैं श्री

1446
01:47:47,000 --> 01:47:51,920
कृष्ण भगवान परमात्मा है मान लो जाओ पूजा करो आपने नहीं पढ़ा ना जाओ

1447
01:47:51,920 --> 01:47:56,120
क्यों आए हो आपसे पढ आपसे पढ़ने के लिए आए

1448
01:47:56,120 --> 01:48:00,440
सर कि आप हमको भी कुछ पढ़ा दीजिए मैंने पढ़ दिया तुमको

1449
01:48:00,440 --> 01:48:04,640
अभी अभी हुआ है आप ठीक

1450
01:48:04,640 --> 01:48:08,880
उसके बाद आए हो विशाल टया जी मुझे बात करने दीजिए आप लोग तब बोलिएगा जब मैं आपको

1451
01:48:08,880 --> 01:48:13,520
कहू बोलने को मुझे बात करने द बाबू राम दास

1452
01:48:13,520 --> 01:48:17,720
जी रामपाल दास के द्वारा जो ईश्वर बताया जा रहा है उसने

1453
01:48:17,720 --> 01:48:22,920
सब कुछ बनाया है कि नहीं बनाया है दोबारा पूछ रहा हूं

1454
01:48:22,920 --> 01:48:27,040
जी सर ज्ञान गंगा में ऐसे ही लिखा हुआ है

1455
01:48:27,040 --> 01:48:28,000
क्या लिखा

1456
01:48:28,000 --> 01:48:32,320
है उन्हीं ने सब कुछ बनाया है वोह साकार

1457
01:48:32,320 --> 01:48:36,360
है कि निराकार है साकार लिखा हुआ है

1458
01:48:36,360 --> 01:48:41,160
सर अच्छा तो उसने जो है

1459
01:48:41,160 --> 01:48:45,280
सतलोक को भी उसी ने बनाया है हां

1460
01:48:45,280 --> 01:48:49,640
सर अच्छा तो सतलोक को जब उसने बनाया

1461
01:48:49,640 --> 01:48:53,960
था तो जिस समय वो सतलोक को बना रहा था था

1462
01:48:53,960 --> 01:48:58,120
तो वो जहां खड़ा था वो जगह किसने बनाई थी

1463
01:48:58,120 --> 01:49:02,120
उसी ने बनाई थी मतलब वो

1464
01:49:02,120 --> 01:49:06,400
जगह उसने वो मान लो यह एक पेन

1465
01:49:06,400 --> 01:49:11,240
है जी इस पेन के अलावा दुनिया में कोई स्पेस नहीं है

1466
01:49:11,240 --> 01:49:15,760
जी तो उसने वोह जगह कहां

1467
01:49:15,760 --> 01:49:20,280
बनाई उसने पहले शब्द रूप में था

1468
01:49:20,280 --> 01:49:24,320
इसके बाद यानी कि वो सा नहीं था पहले पहले

1469
01:49:24,320 --> 01:49:28,560
उसने शब्द रूप में था इसके बाद उसने सृष्टि की यानी

1470
01:49:28,560 --> 01:49:32,120
कि वह साकार रूप में नहीं

1471
01:49:32,120 --> 01:49:36,200
था हां तो भाई शब्द रूप में यही हुआ कि शब्द रूप

1472
01:49:36,200 --> 01:49:41,160
में जब था तो सकार में नहीं था रूप में नहीं था जी

1473
01:49:41,160 --> 01:49:43,960
साकार रूप में नहीं था

1474
01:49:43,960 --> 01:49:48,160
पहले व साकार रूप में नहीं था पहले शब्द रूप में था शब्द से फिर उसने सृष्टि रची सृष्टि

1475
01:49:48,160 --> 01:49:52,360
र देखो ज्यादा मत बोलो मैं पहले जो एक एक करके जो क्लियर

1476
01:49:52,360 --> 01:49:56,920
कर वो क्लियर करो वो साकार नहीं था सबसे

1477
01:49:56,920 --> 01:50:00,920
पहले इसको देखिए पूरा हम अच्छी तरह से क्लियर नहीं कर पाएंगे

1478
01:50:00,920 --> 01:50:05,120
हम इसको गन अध्ययन नहीं किए आगे का नहीं तो तुम उसको

1479
01:50:05,120 --> 01:50:09,160
उसको जब तुम यह कह रहे हो कि उसी ने सब कुछ बनाया है तो कैसे ठोक के

1480
01:50:09,160 --> 01:50:13,360
कह रहे हो भाई यहां तक हम इसको पढ़े हैं ज्ञान गंगा में

1481
01:50:13,360 --> 01:50:17,400
रामपाल जी का य पर पक्ष रखने चले आए हो आपको यह नहीं पता है

1482
01:50:17,400 --> 01:50:21,440
कि उसने सब कुछ बनाया है कि नहीं बनाया है ज्ञान गंगा में लिखा हुआ है

1483
01:50:21,440 --> 01:50:25,520
सर उ सब कुछ बनाया अरे तो मुझे बताओ ना कि कैसे

1484
01:50:25,520 --> 01:50:29,760
बनाया जहां पर वो खड़ा है वो जगह किसने बनाई उसी

1485
01:50:29,760 --> 01:50:33,840
ने बनाया है उसी ने बनाया अरे तो जब जब उसी ने

1486
01:50:33,840 --> 01:50:38,080
बनाया है तो जब उससे भिन्न कोई जगह है ही नहीं वही

1487
01:50:38,080 --> 01:50:43,200
वही है तो उसने जो भी कुछ बनाया वह कहां

1488
01:50:43,200 --> 01:50:47,360
बनाया पहले उसने जब शब्द रूप में था इसके बाद उसने जब

1489
01:50:47,360 --> 01:50:50,520
सकार में आया तो

1490
01:50:50,520 --> 01:50:54,640
था निराकार था वो भाई

1491
01:50:54,640 --> 01:50:58,720
जब सबद रूप में था तो निराकार रहा होगा होगा नहीं

1492
01:50:58,720 --> 01:50:59,220
क्लियर

1493
01:50:59,160 --> 01:51:03,560
करो निराकार था इसको हम देखि कन्फर्म नहीं कर सकते

1494
01:51:03,560 --> 01:51:07,560
हम जब उसको गन अध्ययन कर लेंगे नहीं तो ो के

1495
01:51:07,560 --> 01:51:11,600
क्यों बोल रहे नहीं उसी ने सब कुछ बनाया जब तुम्ह पता नहीं है तो क्यों बोल रहे हो ताल

1496
01:51:11,600 --> 01:51:15,600
ठोक के जाओ जाक पढ़ाई करो हा इसको

1497
01:51:15,600 --> 01:51:19,760
देखिए हम वहा तक का तो अपनी

1498
01:51:19,760 --> 01:51:23,800
चीज मूलभूत चीज तुम ईश्वर को क्यों मान रहे हो धर्म

1499
01:51:23,800 --> 01:51:27,840
को धर्म क्यों मान रहे हो और मोक्ष को मोक्ष क्यों मान रहे हो य क्लियर

1500
01:51:27,840 --> 01:51:33,440
करो जाकर के अच्छा यह बताओ धर्म क्या

1501
01:51:33,440 --> 01:51:37,520
है रामपाल दास ने धर्म की कोई डेफिनेशन बताई

1502
01:51:37,520 --> 01:51:42,000
है जी सर जी सर बताई है क्या है

1503
01:51:42,000 --> 01:51:46,120
उन्होंने बताया है कि जीव हमारी जाति है मानव धर्म हमारा हिंदू मुस्लिम सिख

1504
01:51:46,120 --> 01:51:50,200
ईसाई धर्म नहीं कोई नहीं आ रहा अरे ये तो उसके वो हो गए

1505
01:51:50,200 --> 01:51:54,680
व्यवहारिक लक्षण धर्म क्या है

1506
01:51:54,680 --> 01:51:59,120
वो क्या नहीं है यह बता रहे हो वो क्या है यह तो

1507
01:51:59,120 --> 01:52:03,200
बताओ वो किसके जैसा है यह बता रहे हो वो क्या है

1508
01:52:03,200 --> 01:52:06,200
वो नहीं बता रहे

1509
01:52:06,200 --> 01:52:10,360
हो अब उन्होंने तो भाई परमात्मा तक का भक्ति देते हैं

1510
01:52:10,360 --> 01:52:14,520
भक्ति करने की ताकि आपका मोक्ष हो जाए अरे मेरे भाई

1511
01:52:14,520 --> 01:52:18,560
धर्म की क्या आवश्यकता है धर्म क्यों धर्म की आवश्यकता क्यों

1512
01:52:18,560 --> 01:52:22,840
है धर्म का आलंबन क्यों लिया जाए धर्म में क्या बात है धर्म की वास्

1513
01:52:22,840 --> 01:52:26,880
परिभाषा क्या है चलिए मैं अभी

1514
01:52:26,880 --> 01:52:31,760
चलता हूं ठीक है जय श्री राम उन्होने बताया कि जो सनातन परमात्मा है

1515
01:52:31,760 --> 01:52:35,760
उसकी भक्ति करने से मोक्ष प्राप्ति होगा तो सब लोग एक परमात्मा

1516
01:52:35,760 --> 01:52:39,800
की भक्ति करिए और अपना कल्याण बता हो सनातन

1517
01:52:39,800 --> 01:52:44,840
है तुम तो कह पहले व साकार है

1518
01:52:44,840 --> 01:52:48,200
साकार है ना सर

1519
01:52:48,200 --> 01:52:52,560
उने शब्द रूप में था शब्द रूप

1520
01:52:52,560 --> 01:52:56,880
जो है हमको क्लियर नहीं है उसको हम कंफर्म कर लेंगे इसके बाद कह सकते हैं लेकिन

1521
01:52:56,880 --> 01:53:01,000
इसका मतलब तुमको नहीं पता ना तुमको नहीं पता ना कि वो वो

1522
01:53:01,000 --> 01:53:06,040
क्या कहते पूर्ण परमात्मा है कि नहीं जिसको तुम मन पूर्ण परमात्मा मानते

1523
01:53:06,040 --> 01:53:10,040
हो भाई देखिए ज्ञान गंगा में तो पूर्ण परमात्मा ही लिखा हुआ है उसका कि

1524
01:53:10,040 --> 01:53:14,120
वो अरे मेरे भाई सुनो मैंने सुनो मैंने तुमको कह

1525
01:53:14,120 --> 01:53:18,120
दिया कि भाई मैं जो है पूर्ण परमात्मा हूं मैंने कह दिया

1526
01:53:18,120 --> 01:53:22,760
तुमको मगर मैं ना उड़ पा रहा हूं ना मैं गायब हो पा रहा हूं

1527
01:53:22,760 --> 01:53:27,000
बहुत से ऐसे काम है जो नहीं कर पा रहा और तुम्ह मेरे बारे में ज्यादा मालूम भी नहीं है

1528
01:53:27,000 --> 01:53:29,640
तो तुम मुझे पूर्ण परमात्मा मानोगे

1529
01:53:29,640 --> 01:53:33,800
क्या नहीं माने नहीं मानेंगे

1530
01:53:33,800 --> 01:53:38,480
कबीर को मानते हो क्या राइट माते

1531
01:53:38,480 --> 01:53:43,400
मानते हैं मानते तो बताओ फिर वो साकार था कि निराकार था

1532
01:53:43,400 --> 01:53:48,440
व साकार में था उस उनका बहुत सारा लक्षण उन्होने दिखाया पुस्तको से

1533
01:53:48,440 --> 01:53:52,440
प्रकार जब पहली बार उन्होने बनाई

1534
01:53:52,440 --> 01:53:56,320
तो वो साकार था

1535
01:53:56,320 --> 01:54:01,080
हां उसने उन्होंने सृष्टि को जब रचा

1536
01:54:01,080 --> 01:54:05,240
उन्होंने साकार हो कर सृष्टि को शुरुआत सबसे जो मूल रूप है वह

1537
01:54:05,240 --> 01:54:09,800
क्या है परमात्मा का देखिए

1538
01:54:09,800 --> 01:54:14,120
मूल रूप को हम अगली बार आपको बताएंगे उसको अध्ययन करके

1539
01:54:14,120 --> 01:54:18,480
नहीं फोटो दिखाओ फोटो दिखाओ

1540
01:54:18,480 --> 01:54:24,480
दिखाइए इनको फोटो दिखाओ

1541
01:54:24,720 --> 01:54:29,120
आप उसको अध्ययन किए हम उसको अध्ययन नहीं किया तो आपको हम क्लियर कैसे कर सकते हैं

1542
01:54:29,120 --> 01:54:34,320
जब तुमने किसी का अध्ययन नहीं किया है तो तुमने उसको परमात्मा क्यों मान लिया

1543
01:54:34,320 --> 01:54:38,440
बोलो उनके बहुत सारे लक्षण हमको मिले इसके वजह से हम परमात्मा

1544
01:54:38,440 --> 01:54:42,640
माने है भाई जिसने सृष्टि बनाई और तुम

1545
01:54:42,640 --> 01:54:46,640
बता रहे हो मुझे नहीं बताया कि उसने सृष्टि बनाई कि नहीं बनाई कैसे बनाई कुछ

1546
01:54:46,640 --> 01:54:52,640
पता ही नहीं है तुमको फिर तुम कैसे मान रहे हो कि वो पूर्ण परमात्मा है

1547
01:54:52,880 --> 01:54:57,200
उ किसी किसी ने केवल कह दिया ये जो गिलास

1548
01:54:57,200 --> 01:55:01,320
है यह परमात्मा है बस इसलिए हम इसको परमात्मा

1549
01:55:01,320 --> 01:55:05,520
मान रहे हैं हमें नहीं पता इसने ऐसा क्या है जो ये परमात्मा

1550
01:55:05,520 --> 01:55:09,720
है जी क्यों ना धर्म पता

1551
01:55:09,720 --> 01:55:13,840
ना ईश्वर पता और तुम तुम तुम तुम्हारे जैसे

1552
01:55:13,840 --> 01:55:18,000
लोग संत रामपाल दास जी जो तुम कहते हो कि वो संत है उनका

1553
01:55:18,000 --> 01:55:22,080
पक्ष आ कर के कमजोर करवाते हो मजाक उड़ते हो तुम

1554
01:55:22,080 --> 01:55:26,080
लोग और पता है क्यों क्योंकि तुम उनके लिए नहीं

1555
01:55:26,080 --> 01:55:30,240
आते हो तुम अपने लिए आते हो देखो देखो मैं शिवांश को जाकर के चुप कराऊंगा

1556
01:55:30,240 --> 01:55:36,240
आके य ब दिखा देते हो नहीं पता निराकार कह देते

1557
01:55:36,320 --> 01:55:40,320
हो सबसे बड़े दुश्मन तो तुम लोग हो उ

1558
01:55:40,320 --> 01:55:43,720
जेलम में बैठे हुए हैं जो

1559
01:55:43,720 --> 01:55:49,720
उनके ऐसा मत कहिए उन्होने बताया है कि

1560
01:55:52,480 --> 01:55:56,560
नाक कटवाने फिर हमको लोग कहते हैं कि आप अज्ञानी हों को क्यों ले

1561
01:55:56,560 --> 01:56:01,880
लेते हो स्ट्रीम में फोन आता है

1562
01:56:01,880 --> 01:56:05,960
हमको जबकि यह प्रश्न तुमसे हो चुका है 10 15

1563
01:56:05,960 --> 01:56:10,040
दिन 10 दिन पहले हफ्ते भर

1564
01:56:10,040 --> 01:56:14,320
पहले दिखाओ इनको फोटो दिखाओ भैया कहां गए

1565
01:56:14,320 --> 01:56:18,360
ठीक है फोटो दिखाइए फोटो

1566
01:56:18,360 --> 01:56:22,480
दिखाइए अभी देखो दूध दू गंगा में

1567
01:56:22,480 --> 01:56:27,200
कितना सच है व ज्ञान गंगा की फोटो दिखाओ जहा पर हा ये

1568
01:56:27,200 --> 01:56:31,240
यहां पर यह जो चित्र दिखाई दे रहा है इसके ऊपर इन्होने लिखा

1569
01:56:31,240 --> 01:56:34,560
है पूर्ण परमात्मने

1570
01:56:34,560 --> 01:56:38,600
नम इसका अर्थ है कि ज्ञान गंगा के अनुसार ये जो

1571
01:56:38,600 --> 01:56:42,720
चित्र है यही परमात्मा का वास्तविक स्वरूप है मानते

1572
01:56:42,720 --> 01:56:48,720
हो कि नहीं हेलो हेलो

1573
01:56:49,200 --> 01:56:53,440
हेलो जी सर सुन रहेर सुन रहे सुन रहे हैं सुन

1574
01:56:53,440 --> 01:56:58,040
रहे सर ये वास्तविक स्वरूप है कि नहीं

1575
01:56:58,040 --> 01:57:02,320
हेलो नहीं बोलो क्लियर बोलो नहीं है नहीं है वास्तविक

1576
01:57:02,320 --> 01:57:06,360
स्वरूप नहीं है वास्क स्वरूप नहीं है पॉइंट टू बी नोटे यानी किय पूर्ण

1577
01:57:06,360 --> 01:57:09,640
ब्रम परमात्मा नहीं

1578
01:57:09,640 --> 01:57:14,600
है यह पूर्ण ब्रहम परमात्मा नहीं है परमात्मा ही है लेकिन

1579
01:57:14,600 --> 01:57:19,000
वास्त अरे परमात्मा ही है लेकिन वास्तविक स्वरूप नहीं उस

1580
01:57:19,000 --> 01:57:25,000
तुमने वास्तविक स्वरूप नहीं है ना छलावा है ना

1581
01:57:26,640 --> 01:57:30,720
हेलो देखि यहां पर जब आते

1582
01:57:30,720 --> 01:57:34,400
हैं हमको सुना

1583
01:57:34,400 --> 01:57:38,480
रन आवाज देखो जी जी जी फिर

1584
01:57:38,480 --> 01:57:42,760
से फोटो लाओ फोटो दिखा के बात कर फोटो फोटो लाओ

1585
01:57:42,760 --> 01:57:46,840
हा बोलो अगर यह पूर्ण

1586
01:57:46,840 --> 01:57:50,920
ब्रम परमात्मा नहीं है तो य के काल ने लिख दिया पूर्ण ब्रम

1587
01:57:50,920 --> 01:57:54,440
परमात्मा हैय

1588
01:57:54,440 --> 01:57:58,560
जी जी बता रहे हैं बता रहे सुन लीजिए उन्होंने बताया है गीता के अंदर

1589
01:57:58,560 --> 01:58:02,560
कि परमात्मा वहां पर युवा शरीर में रहता है

1590
01:58:02,560 --> 01:58:07,200
और वहां से जब मृत्यु लोक में आता है तो गति करके आता है अपना

1591
01:58:07,200 --> 01:58:11,440
आपने बोला ये पूर्ण ब्रह्म परमात्मा नहीं है अभी आपने यह

1592
01:58:11,440 --> 01:58:16,040
बोला यानी कि यह वास्तविक नहीं है यह झूठ

1593
01:58:16,040 --> 01:58:20,320
है जो वास्तविक नहीं है वो क्या है एक

1594
01:58:20,320 --> 01:58:24,560
मिनट वातक लेन यहां पर जब उन्होने आते लीला

1595
01:58:24,560 --> 01:58:28,680
कर लिए नहीं नहीं आपने अभी बोला

1596
01:58:28,680 --> 01:58:32,120
किय वास्तविक रूप नहीं

1597
01:58:32,120 --> 01:58:36,560
है ये वास्तविक रूप कैसे है उन्होने हल्का तेज शर बना कर

1598
01:58:36,560 --> 01:58:39,960
आते नहीं है

1599
01:58:39,960 --> 01:58:42,240
ना बिल्कुल माया

1600
01:58:42,240 --> 01:58:46,560
रूप है वास्क शरीर सतलोक में बिल्कुल बिल्कुल अरे

1601
01:58:46,560 --> 01:58:51,280
भाई उसके जैसा उसके जैसे रूप की बात कर रहा हूं मैं

1602
01:58:51,280 --> 01:58:53,920
उस कागज

1603
01:58:53,920 --> 01:58:58,000
बता ये अच्छा दोबारा

1604
01:58:58,000 --> 01:59:02,160
दिखाओ दोबारा दिखाओ बात सुनि दिखाई

1605
01:59:02,160 --> 01:59:06,160
दे रही है वास्तविक छ है पूर्ण ब्रम

1606
01:59:06,160 --> 01:59:10,160
परमात्मा की अरे मैं जो किताब में

1607
01:59:10,160 --> 01:59:15,440
पढ़ा हूं उसको तो सुन

1608
01:59:15,440 --> 01:59:19,600
लीजिए आपसे किताब पूछ नहीं रहा हूं मैं आपसे

1609
01:59:19,600 --> 01:59:23,640
पूछ रहा हूं कि क्याय जा रही है यह जो

1610
01:59:23,640 --> 01:59:28,720
फोटो दिखाई जा रही है यह पूर्ण परमात्मा की फोटो है

1611
01:59:28,720 --> 01:59:31,960
वास्तविक

1612
01:59:31,960 --> 01:59:36,360
वास्तविक क्या पूण ही है

1613
01:59:36,360 --> 01:59:38,760
वास्तव

1614
01:59:38,760 --> 01:59:42,920
में अ वहां पर हम जाक देखे थोड़ी है वहा पर कैसा

1615
01:59:42,920 --> 01:59:47,680
है और यहां पर कैसे है अब इसको कैसे डिफाइन कर सकते

1616
01:59:47,680 --> 01:59:52,080
है प ू बी नोटे भाई पॉइंट टू बी नोटे इनको

1617
01:59:52,080 --> 01:59:58,080
विश्वास नहीं है कि परमात्मा ऐसा ही है कि कैसा है आपको विश्वास नहीं है

1618
01:59:58,160 --> 02:00:02,160
ना आप हम आप सिर्फ अपना बात को ऊंचा रखने के चक्कर

1619
02:00:02,160 --> 02:00:06,200
में आप हमको बोलने ही नहीं दे रहे हैं हम अपना बात को ं रख देंगे ता

1620
02:00:06,200 --> 02:00:10,520
जनता देख र इधर उधर की बात मत

1621
02:00:10,520 --> 02:00:15,240
करिए जब आप ये बताइए आपको विश्वास है हमारा भी सुनेंगे तब

1622
02:00:15,240 --> 02:00:19,880
तो मैंने अरे तो जो चैप्टर चल रहा है उसको

1623
02:00:19,880 --> 02:00:23,960
करो उसको पूरा करो ना चैप्टर को जो चैप्टर चल

1624
02:00:23,960 --> 02:00:29,960
रहा है हमको विश्वास है किस पर विश्वास है इसका

1625
02:00:35,000 --> 02:00:39,840
मतलब बोलो बता रहे हैं बात को

1626
02:00:39,840 --> 02:00:43,840
आप ऐसे ही आपका बात ऐसे ही ऊंचा नहीं हो जाएगा जनता आपको

1627
02:00:43,840 --> 02:00:47,760
भी फैसला कर रही है हमको भी देख रही

1628
02:00:47,760 --> 02:00:52,000
है का बोलोगे मुझे हटाना पड़ेगा

1629
02:00:52,000 --> 02:00:56,640
व्यर्थ बोलोगे हटा दूंगा व्यर्थ मत बोलो पॉइंट की बात बोलो

1630
02:00:56,640 --> 02:01:00,680
मैं मैं मैं व्यर्थ नहीं बोल रहा हूं वास्तविक बता

1631
02:01:00,680 --> 02:01:04,760
रहा हूं अगर हटा ही देंगे तो उसमें कौन सी बड़ी बात है हटा दीजिए हम अपने

1632
02:01:04,760 --> 02:01:08,800
हट जा रहे उसम कौन तुमने चार लाइन बोली मैं आपसे पूछ रहा हूं

1633
02:01:08,800 --> 02:01:12,800
आपके अनुसार यह जो चित्र है यह वास्तविक पूर्ण परम

1634
02:01:12,800 --> 02:01:18,040
ब्रह्म परमात्मा का वास्तविक चित्र है कि नहीं

1635
02:01:18,040 --> 02:01:24,040
वास्तविक चित्र नहीं है ना वास्तविक क मतलब व ऐसा नहीं दिखता

1636
02:01:24,120 --> 02:01:28,120
है नहीं वहां वहां पर युवा शरीर है यहां पर वो

1637
02:01:28,120 --> 02:01:32,440
हल्का तेज पुंज का शरीर करके आते हैं हल्का शरीर करके आते हैं

1638
02:01:32,440 --> 02:01:37,760
यानी कि ये जो ये जो छवि है ये नकली है ना झूठी है ना

1639
02:01:37,760 --> 02:01:41,760
ये अगर वो वास्तविक शरीर में यहां पर खड़े हो जाएंगे तो उनके

1640
02:01:41,760 --> 02:01:45,920
इतना प्रकाश है पूछ रहा हं नहीं तो मैं हटा दूंगा आपको मैं पूछ रहा हूं ये

1641
02:01:45,920 --> 02:01:49,960
जो शरीर लेके वो आए ये जो शरीर दिखाया जा रहा है जिसके सामने

1642
02:01:49,960 --> 02:01:50,460
पूर्ण

1643
02:01:50,320 --> 02:01:54,360
परम ब्रह्म परमात्मा लिखा यह वास्तविक छवि है कि

1644
02:01:54,360 --> 02:02:00,080
नहीं झूठी है या वास्तविक है

1645
02:02:00,080 --> 02:02:04,360
बताओ मैं गीता मैं गीता पर बात करने आया हूं गीता पर हमसे बात करिए

1646
02:02:04,360 --> 02:02:08,400
देखिए आप अगर सवाल पगा पहले

1647
02:02:08,400 --> 02:02:12,640
सवाल का जवाब दीजिए उसके बाद आइएगा आपका नेट भी अटक रहा

1648
02:02:12,640 --> 02:02:18,640
है

1649
02:02:20,360 --> 02:02:24,480
मैं अगली बार आप आइए तो

1650
02:02:24,480 --> 02:02:30,480
इन बातों का उत्तर लेकर आइए आकाश दास जी आ चुके

1651
02:02:31,120 --> 02:02:35,880
हैं जी आकाश दास जी बोलिए जय श्री राम

1652
02:02:35,880 --> 02:02:41,240
ठीक जी स साहेब राम

1653
02:02:41,240 --> 02:02:45,240
राम ऐसा है मुझे आप सबसे पहले जब हम लोग धर्म

1654
02:02:45,240 --> 02:02:49,600
चर्चा करने बैठे हैं तो आप मुझे आपकी जो धर्म की जो परिभाषा

1655
02:02:49,600 --> 02:02:53,800
है पहले वो बता दीजिए अगर अगर वो गलत हो तो मैं उसको क्लियर कर दूं जिससे

1656
02:02:53,800 --> 02:02:57,880
की क्योंकि मुझे लगता है कि हम लोग हम लोग धर्म को लेकर के

1657
02:02:57,880 --> 02:03:01,920
ही यह सोचते हैं कि आपका धर्म कुछ और है हमारा धर्म कुछ और है मैं नाम की बात नहीं कर

1658
02:03:01,920 --> 02:03:06,320
रहा हूं हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई वो मत बताना

1659
02:03:06,320 --> 02:03:10,480
वस्तुत धर्म क्या है वो क्या नहीं है किसके जैसा

1660
02:03:10,480 --> 02:03:16,480
है वो नहीं धर्म होता क्या है वो क्या है बताइए

1661
02:03:23,920 --> 02:03:28,120
देखिए सभी लोग धर्म जो है जो हम

1662
02:03:28,120 --> 02:03:32,400
किसी भी के प्रति मन वचन कर्म से किसी का

1663
02:03:32,400 --> 02:03:36,400
इतना हा आपकी आवाज बहुत कम आ रही

1664
02:03:36,400 --> 02:03:41,920
है एक बार जाके वापस आइए आप एक बार

1665
02:03:41,920 --> 02:03:47,920
जा ब्लूटूथ लगा के बात कर रहे हैं

1666
02:03:49,960 --> 02:03:54,480
क्या अभिषेक सिं आपका चेहरा

1667
02:03:54,480 --> 02:03:58,840
अभिषेक जी जी बताइए

1668
02:03:58,840 --> 02:04:03,840
सीधे हो जाइए अभिषेक जी लेट के बातें ना

1669
02:04:03,840 --> 02:04:07,960
करें आपका परिचय मेरा नाम

1670
02:04:07,960 --> 02:04:12,320
अभिषेक दास है अभिषेक दास तो सिंह क्यों लिखा है

1671
02:04:12,320 --> 02:04:16,360
आपने वो प्रोफाइल पर लिख रखा होगा टेबलेट न लिया था ध्यान नहीं

1672
02:04:16,360 --> 02:04:20,440
रहा होगा अच्छा तो बदल लीजिए इसको बदल लीजिए फिर

1673
02:04:20,440 --> 02:04:22,720
आइए

1674
02:04:22,720 --> 02:04:25,440
क्यों बदल

1675
02:04:25,440 --> 02:04:29,440
लीजिए बेवकूफ बनाने के लिए लिखा है ना नहीं नहीं

1676
02:04:29,440 --> 02:04:33,480
ऐसा कुछ नहीं है अरे जो नहीं हो वो क्यों लिख रहे हो सच

1677
02:04:33,480 --> 02:04:38,040
बोलो ना सच में है सच में है चलिए

1678
02:04:38,040 --> 02:04:39,040
बोलिए

1679
02:04:39,040 --> 02:04:43,040
धर्म की परिभाषा क्या है आपके अनुसार नहीं मैं उस

1680
02:04:43,040 --> 02:04:47,080
बात का उत्तर दूंगा जो आपने पिछले में बताया जो अध्याय में बोला

1681
02:04:47,080 --> 02:04:51,240
है उसने मैंने अभी आपसे कोई प्रश्न नहीं पूछा है देखिए सबसे

1682
02:04:51,240 --> 02:04:55,400
पहले हमारी चर्चा किस टॉपिक पर होनी है ये डिसाइड हो जाए आप धर्म

1683
02:04:55,400 --> 02:04:59,440
की बात करने आए है तो मुझे जानना है कि आपके अनुसार धर्म

1684
02:04:59,440 --> 02:05:03,520
है क्या आपका पहला वाला टॉपिक मैं क्लियर कर दूं

1685
02:05:03,520 --> 02:05:07,560
जो उसने बताया था ब्र के देखिए मैं आपकी कोई बात तब सुनूंगा

1686
02:05:07,560 --> 02:05:12,000
जब मैं यह जान लू कि आपके अनुसार धर्म है क्या पहले

1687
02:05:12,000 --> 02:05:16,040
मैं वही वाला क्लियर करूंगा तो फिर जाइए आप जा सकते

1688
02:05:16,040 --> 02:05:22,040
हैं ठीक

1689
02:05:22,290 --> 02:05:27,600
[संगीत] धर्म की जानकारी आवश्यक क्यों

1690
02:05:27,600 --> 02:05:32,360
है क्योंकि जब हमारे जो बेस है जब उसको हम क्लियर कर लेंगे

1691
02:05:32,360 --> 02:05:38,360
तो व्यक्ति उससे इधर उधर नहीं जाएगा ना कुछ भी करते

1692
02:05:43,960 --> 02:05:48,120
हुए बाबूराम तुम्हारे पास जब इन सवालों का

1693
02:05:48,120 --> 02:05:52,320
उत्तर हो तब आना और अपने प्रश्न भी लाना

1694
02:05:52,320 --> 02:05:56,840
और इन सवालों का उत्तर लेकर के आना और नेटवर्क

1695
02:05:56,840 --> 02:06:01,040
अच्छा हो तब आना आकाश दास

1696
02:06:01,040 --> 02:06:05,160
जी जी अभी फिर आपकी आवाज कम

1697
02:06:05,160 --> 02:06:09,440
आ रही है अभी भी आवाज कम आ रही है

1698
02:06:09,440 --> 02:06:14,000
ठीक है हा बोलिए बोलिए आप थोड़ा हेडफोन निकाल लीजिए हेडफोन निकाल के

1699
02:06:14,000 --> 02:06:18,040
बा हेडो ह ईयरफोन निकाल के त फिर

1700
02:06:18,040 --> 02:06:23,400
बात की

1701
02:06:23,400 --> 02:06:29,400
हा आपके अनुसार धर्म क्या है वह

1702
02:06:29,920 --> 02:06:34,000
बताइए धर्म देखिए जो सत्य को धारण करना

1703
02:06:34,000 --> 02:06:38,280
ही धर्म है और मन वचन क्रम से हम किसी का

1704
02:06:38,280 --> 02:06:42,520
हित ना करें और जो प्राणी भूला भटका है उसको

1705
02:06:42,520 --> 02:06:47,160
सत्य के मार्ग पर जोड़ना ही हमारा सबसे बड़ा धर्म है

1706
02:06:47,160 --> 02:06:51,560
देखिए यह इस तरह से है जैसे शिवांश

1707
02:06:51,560 --> 02:06:55,640
नारायण द्वेदी कौन है तो शिवांश नारायण द्विवेदी जो य

1708
02:06:55,640 --> 02:06:59,640
चैनल पर संत रामपाल दास जी के बारे में

1709
02:06:59,640 --> 02:07:04,120
बातें करता है वो है इकन के बारे में बातें करता है वो है

1710
02:07:04,120 --> 02:07:08,280
या फिर आर समाज के साथ बातें करता है वो है नास्तिकों

1711
02:07:08,280 --> 02:07:12,600
से बातें करता है वो है मगर शिवांश द्विवेदी

1712
02:07:12,600 --> 02:07:18,600
का स्वरूप भूत लक्षण क्या है वो आपने नहीं

1713
02:07:19,440 --> 02:07:24,160
बताया मैं बता देता हूं जी बताइए

1714
02:07:24,160 --> 02:07:28,240
जीव की एक चा है जीव की एक

1715
02:07:28,240 --> 02:07:32,280
चा है वास्तविक चा तो जो भी

1716
02:07:32,280 --> 02:07:37,000
कुछ जीव कर रहा है उसमें एक चा छुपी हुई है

1717
02:07:37,000 --> 02:07:41,320
जीव की जीव की चा का वास्तविक विषय जो है

1718
02:07:41,320 --> 02:07:46,120
सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है

1719
02:07:46,120 --> 02:07:50,320
जो भी कुछ कर रहा है उसमें मूल रूप से वही है

1720
02:07:50,320 --> 02:07:54,400
तो जीव की का वास्तविक विषय सच्चिदानंद

1721
02:07:54,400 --> 02:07:59,040
स्वरूप परमेश्वर को परिभाषित कर सकने वाले शास्त्र

1722
02:07:59,040 --> 02:08:03,920
द्वारा बताई जाने वाली जीव की चा के वास्तविक

1723
02:08:03,920 --> 02:08:07,920
विषय सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त

1724
02:08:07,920 --> 02:08:13,920
करने के निमित्त बताई गई विधि का नाम धर्म

1725
02:08:14,160 --> 02:08:18,560
है सुना जी सही

1726
02:08:18,560 --> 02:08:23,840
है तो इसका मतलब क्या है कि

1727
02:08:23,840 --> 02:08:28,560
जीव की जो चा है व है मोक्ष और जो मोक्ष

1728
02:08:28,560 --> 02:08:32,600
जिन कार्यों को करके जिस विधि का आलंबन लेकर के आप मोक्ष प्राप्त कर

1729
02:08:32,600 --> 02:08:36,600
सकते हैं धर्म का उसी में परवन है उसी में

1730
02:08:36,600 --> 02:08:40,840
विनियोग है उसी में उपयोग है ठीक है तो इसका

1731
02:08:40,840 --> 02:08:44,840
मतलब यह है कि आप उसका धर्म मानेंगे उसके द्वारा दी जाने वाली

1732
02:08:44,840 --> 02:08:50,840
नियमावली को मानेंगे जो आपको मोक्ष देती हो

1733
02:08:51,720 --> 02:08:56,560
ठीक है ना जी अब ये बताइए कबीर

1734
02:08:56,560 --> 02:09:01,200
संत रामपाल दास जी के द्वारा जो दिया जाने वाला मोक्ष है

1735
02:09:01,200 --> 02:09:05,200
मुक्ति क्या वो मुक्ति है

1736
02:09:05,200 --> 02:09:09,360
जी हां बताइए

1737
02:09:09,360 --> 02:09:13,520
आपका आज जो है सबसे ज्यादा प्यारा

1738
02:09:13,520 --> 02:09:17,880
आपकी चाह का जो सबसे प्यारी चीज है वो क्या है

1739
02:09:17,880 --> 02:09:21,840
अकॉर्डिंग टू रामपाल दास जी

1740
02:09:21,840 --> 02:09:26,040
ज्ञान गंगा सबसे प्यारा

1741
02:09:26,040 --> 02:09:30,920
जन्म मरण से छुटकारा शाश्वत स्थान को प्राप्त करना

1742
02:09:30,920 --> 02:09:35,160
मतलब आपका सबसे प्यारा परमेश्वर नहीं है शाश्वत सुख आपका

1743
02:09:35,160 --> 02:09:39,240
वह है परमेश्वर नहीं है आपका सबसे

1744
02:09:39,240 --> 02:09:43,400
प्यारा और परमेश्वर को प्राप्त करना वही है जब शत

1745
02:09:43,400 --> 02:09:47,480
स्थान प्राप्त हो जाएगा तो परमेश्वर प्राप्त हो जाएंगे

1746
02:09:47,480 --> 02:09:51,560
आपका ध्यान सुख प है शाश्वत सुख परमेश्वर

1747
02:09:51,560 --> 02:09:55,960
आपका आपकी मुख्य चाह नहीं है परमेश्वर केवल एक जरिया है

1748
02:09:55,960 --> 02:10:01,640
वो शाश्वत स्थान प्राप्त कराने वाला ऐसा

1749
02:10:01,640 --> 02:10:06,840
है परमेश्वर और सा स्थान दोनों

1750
02:10:06,840 --> 02:10:11,000
है परमेश्वर और शाश्वत स्थान

1751
02:10:11,000 --> 02:10:15,360
दोनों दोनों आपका प्यार है दोनों में आपकी निष्ठा है भक्ति

1752
02:10:15,360 --> 02:10:17,480
है

1753
02:10:17,480 --> 02:10:21,520
ठीक तो आप मुझे बताइए जब आप मुक्त हो जाते हैं तो

1754
02:10:21,520 --> 02:10:25,840
आप कहां पहुंचते हैं सतलोक में सतलोक

1755
02:10:25,840 --> 02:10:30,040
में तो वहां जाने के बाद जो परमेश्वर के प्रति जो आपकी

1756
02:10:30,040 --> 02:10:34,840
आसक्ति थी प्रेम था वो खत्म हो जाता है

1757
02:10:34,840 --> 02:10:38,920
नहीं बढ़ जाता है मतलब अभी

1758
02:10:38,920 --> 02:10:44,320
भी आपको परमात्मा को प्राप्त करने की इच्छा होती है

1759
02:10:44,320 --> 02:10:48,320
क्या ऐसा है जब वहां इच्छा तो नहीं

1760
02:10:48,320 --> 02:10:52,320
होती है लेकिन जो है परमात्मा के प्रति प्रेम बना र इसने मना रता

1761
02:10:52,320 --> 02:10:56,440
है मैं यह कह रहा हूं यदि आप परमात्मा से प्यार

1762
02:10:56,440 --> 02:11:00,440
करते हैं उसे प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं तो क्या

1763
02:11:00,440 --> 02:11:04,440
सतलोक पहुंच करके आप वो उस दुनिया में

1764
02:11:04,440 --> 02:11:08,520
पहुंच जाते हैं जहां पर परमात्मा है मगर परमात्मा तो आपसे तब

1765
02:11:08,520 --> 02:11:12,560
भी अलग रहते हैं

1766
02:11:12,560 --> 02:11:17,240
ना अलग रहते हैं ना जी

1767
02:11:17,240 --> 02:11:23,240
हा हा तो फिर वहां जाकर के आपका प्यार खत्म हो जाता है

1768
02:11:23,400 --> 02:11:27,680
नहीं स्ने बना रहता है परमात्मा के परमात्मा

1769
02:11:27,680 --> 02:11:31,920
को प्राप्त करने की जो यहां पर जो इच्छा हो रही है वह खत्म हो जाती

1770
02:11:31,920 --> 02:11:35,960
है प्राप्त करने की इच्छा तो खत्म होही जाती है जब परमात्मा प्राप्त हो

1771
02:11:35,960 --> 02:11:39,960
जाते हैं परमात्मा प्राप्त कैसे हो गया आप तो सतलोक पहुंचे हैं

1772
02:11:39,960 --> 02:11:44,720
परमात्मा से थोड़ी ना चिपक गए आप सतलोक में परमात्मा

1773
02:11:44,720 --> 02:11:48,760
का एक सतलोक में परमात्मा स्वयं विराजमान रहते हैं

1774
02:11:48,760 --> 02:11:52,760
हमेशा एक तखत पर वरे भाई वो तो वो तो अभी जहां पर आप

1775
02:11:52,760 --> 02:11:57,000
रह रहे हो वहां पर भी विराजमान है नहीं है

1776
02:11:57,000 --> 02:11:59,560
यहां ऐसा यहां वो रूप नहीं है लेकिन वहां

1777
02:11:59,560 --> 02:12:03,720
हमेशा जब भी चाहो तब उनको दर्शन कर सकते हो उनकी सेवा कर सकते

1778
02:12:03,720 --> 02:12:08,200
हो जब चाहे तब हा अच्छा

1779
02:12:08,200 --> 02:12:11,640
यानी कि चाहत

1780
02:12:11,640 --> 02:12:16,120
है सतलोक में भी चाहत

1781
02:12:16,120 --> 02:12:20,480
है सतलोक में चाहत है कि नहीं है

1782
02:12:20,480 --> 02:12:24,680
चाहत नहीं व यानी ईश्वर की चा खत्म सतलोक पहुंच

1783
02:12:24,680 --> 02:12:29,040
के अपना वो बादाम काजू वो सब मिल गया ईश्वर की चा

1784
02:12:29,040 --> 02:12:33,360
खत्म जी यानी कि ईश्वर के लिए

1785
02:12:33,360 --> 02:12:37,360
जो प्रेम है यह केवल वहां तक पहुंचने के लिए वहां पहुंच के ईश्वर के

1786
02:12:37,360 --> 02:12:41,480
प्रति प्रेम खत्म हो जाएगा प्रेम नहीं खत्म होता है प्रेम रहता

1787
02:12:41,480 --> 02:12:45,480
है अरे प्रेम है तो जब तक ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पा

1788
02:12:45,480 --> 02:12:49,720
रहे हो जब तक ईश्वर दूर बैठा है बीच-बीच में उसे देखने की चाह

1789
02:12:49,720 --> 02:12:54,480
आ रही है तो फिर सुखी कैसे

1790
02:12:54,480 --> 02:12:58,480
हो सेवा करने से आनंद आता है और आनंद आता है

1791
02:12:58,480 --> 02:13:02,520
ईश्वर की सेवा करने से आनंद आता

1792
02:13:02,520 --> 02:13:07,040
है ईश्वर की सेवा करने से आनंद आता है सतलोक

1793
02:13:07,040 --> 02:13:11,040
में अच्छा तो जैसे फॉर एग्जांपल कोई

1794
02:13:11,040 --> 02:13:17,040
एक सेवा बता दीजिए सतलोक की क्या

1795
02:13:18,480 --> 02:13:22,520
कर सेवा में तो यही परमात्मा सेवा

1796
02:13:22,520 --> 02:13:26,760
की जब चर वगैरा विराजमान होते हैं

1797
02:13:26,760 --> 02:13:30,840
तो जो चब वगैरा की जाती है कर लेते है क्या समझा

1798
02:13:30,840 --> 02:13:35,800
नहीं च वगैरा क्या होता है व समझाइए थोड़ा सा अने

1799
02:13:35,800 --> 02:13:39,920
देखा होगा राजा के ऊपर दो तीन लोग साइड में रहते हैं वो ऐसे ऐसे

1800
02:13:39,920 --> 02:13:44,280
करते रहते हैं ही अच्छा

1801
02:13:44,280 --> 02:13:48,760
तो जैसे मान लीजिए कि आपने पंखा

1802
02:13:48,760 --> 02:13:53,000
डला ये है ना इसमें आपको

1803
02:13:53,000 --> 02:13:57,120
आनंद मिल रहा है इसीलिए आप सतलो जा रहे हैं क्योंकि

1804
02:13:57,120 --> 02:14:01,240
आप भगवान की सेवा कर रहे हैं व और भी और भी

1805
02:14:01,240 --> 02:14:05,560
आनंद है और बताइए क्या है वहा

1806
02:14:05,560 --> 02:14:09,680
आनंद ही आनंद है संख लहर मह की और क्या है

1807
02:14:09,680 --> 02:14:14,280
और बताइए और क्या है वहां कोई दुख नहीं है

1808
02:14:14,280 --> 02:14:19,240
अरे ठीक है मैं समझ गया दूसरा कोई आनंद बता दीजिए

1809
02:14:19,240 --> 02:14:23,400
अब जैसे ही आनंद यही दूसरा कि

1810
02:14:23,400 --> 02:14:27,600
हमें जैसे कोई भी चीज खाने की इच्छा हो रही है तो हम

1811
02:14:27,600 --> 02:14:31,760
वहा कोई भी चीज के लिए परिश्रम नहीं या सतलोक

1812
02:14:31,760 --> 02:14:34,880
जाने के बाद भी इच्छा

1813
02:14:34,880 --> 02:14:39,040
है इच्छा हो सकती है तो इच्छा

1814
02:14:39,040 --> 02:14:43,720
हो सकती है तो अब आपको एक सीन दिखा रहा हूं जरा मुझे करेक्ट करिएगा

1815
02:14:43,720 --> 02:14:48,120
जैसे आप पंखा डला रहे हैं खूब देर तक आपने पंखा लाया ईश्वर के सामने

1816
02:14:48,120 --> 02:14:52,160
खूब देर तक उनकी सेवा की फिर उसके बाद आपके अंदर इच्छा आई तो हमने

1817
02:14:52,160 --> 02:14:56,440
सोचा कि हम काजू खा ले बादाम खा ले फिर जाकर के हमने काजू बादाम खाया

1818
02:14:56,440 --> 02:15:00,440
ऐसा ही है चाहे कुछ भी

1819
02:15:00,440 --> 02:15:05,320
करिए हा अरे भाई मैं सही बोल रहा हूं कि नहीं बोल रहा हूं

1820
02:15:05,320 --> 02:15:09,480
हां सही बोल रहे हो सही बोल रहे हैं जी तो जब आप पंखा

1821
02:15:09,480 --> 02:15:13,480
डला रहे थे तब आपको आनंद आ रहा था अब आपके

1822
02:15:13,480 --> 02:15:17,800
अंदर इच्छा हुई है कि मैं जा कर के काजू बादाम खा लू काजू बादाम खाते

1823
02:15:17,800 --> 02:15:21,840
समय आपको आनंद आएगा मगर पंखा डुलाना छोड़ करके जब

1824
02:15:21,840 --> 02:15:25,480
आप जाएंगे काजू बादाम खाने

1825
02:15:25,480 --> 02:15:29,920
उतनी देर आप आनंदित तो नहीं हुए वहां

1826
02:15:29,920 --> 02:15:34,520
कोई दुख भी नहीं है कोई कष्ट नहीं है किसी प्रकार का आनंद क्या क

1827
02:15:34,520 --> 02:15:38,520
काजू बादाम को खाना आनंद है सेवा आनंद है

1828
02:15:38,520 --> 02:15:42,840
वो परम आनंद है म आनंद है हा सही है

1829
02:15:42,840 --> 02:15:47,200
परम आनंद नहीं है मतलब नहीं आनंद

1830
02:15:47,200 --> 02:15:51,360
है मैं पूछ रहा हूं आपसे भगवान की सेवा

1831
02:15:51,360 --> 02:15:57,360
करना आनंद है परमानंद है क्या

1832
02:15:58,080 --> 02:16:02,640
है हा हा परम आनंद सेवा करना परम आनंद

1833
02:16:02,640 --> 02:16:06,760
है सेवा करना परमानंद है और वो काजू बादाम की इच्छा

1834
02:16:06,760 --> 02:16:10,800
हो गई या इस तरह की और कोई इच्छा हो गई तो वो भोग करना वो परमानंद

1835
02:16:10,800 --> 02:16:16,800
है आनंद

1836
02:16:18,800 --> 02:16:22,480
है भाई साहब

1837
02:16:22,480 --> 02:16:26,840
आवाज हा बोलिए आवाज आपकी अटक गई थी

1838
02:16:26,840 --> 02:16:31,240
मेरी आवाज अटक रही क्या सुजीत जी हा

1839
02:16:31,240 --> 02:16:35,760
नहीं नहीं ठीक है अच्छा दोबारा हमा

1840
02:16:35,760 --> 02:16:39,920
आ मैं पूछ रहा हूं कि जो आप भोग करेंगे वहां पर जो काजू बादाम

1841
02:16:39,920 --> 02:16:44,080
वगैरह खाएंगे वो परमानंद है या केवल

1842
02:16:44,080 --> 02:16:48,240
सतलोक पहुंच जाना परमानंद है या ईश्वर की सेवा परमानंद है इसमें

1843
02:16:48,240 --> 02:16:52,800
से परमानंद कौन सा है

1844
02:16:52,800 --> 02:16:57,200
परमानंद सेवा करना सेवा करना परमानंद

1845
02:16:57,200 --> 02:17:01,200
है तो यानी कि जब आप जब आप काजू बादाम खा रहे

1846
02:17:01,200 --> 02:17:06,080
होंगे तब आप परमानंद नहीं होंगे तब आनंदित होंगे

1847
02:17:06,080 --> 02:17:10,400
आनंदित होंगे परमानंद नहीं होंगे

1848
02:17:10,400 --> 02:17:16,120
तो इसका मतलब जो परमानंद है वह शाश्वत सुख नहीं

1849
02:17:16,120 --> 02:17:20,280
है क्यों शाश्वत सु तोई

1850
02:17:20,280 --> 02:17:24,360
शाश्वत क्या होता है हां हां परम आनंद सास

1851
02:17:24,360 --> 02:17:28,400
जिसम बाधा ना आए जिसमें बाधा ना आए आप अगर पंखा

1852
02:17:28,400 --> 02:17:32,520
भी डला रहे हो आप यहां से ले गए हवा करते हुए आप

1853
02:17:32,520 --> 02:17:37,000
जब वापस लाओगे तो वहां से जब वापस लाना शुरू किया

1854
02:17:37,000 --> 02:17:41,800
तो इसमें भी बाधा आ गई क्योंकि रुके

1855
02:17:41,800 --> 02:17:45,800
अगर रुके वापस आने के लिए तो बाधा आ गई ये यह

1856
02:17:45,800 --> 02:17:49,800
बाधा आ गई दूसरी बात काजू बादाम खाने चले गए तो बाधा आ

1857
02:17:49,800 --> 02:17:52,840
गई रुक गया

1858
02:17:52,840 --> 02:17:56,960
तो यानी कि जो आपका मोक्ष है वो नित्य सुखदाई

1859
02:17:56,960 --> 02:18:00,960
नहीं है वहां पर भी रुकता है सुख बीच-बीच में

1860
02:18:00,960 --> 02:18:05,240
कमी आती है सुख

1861
02:18:05,240 --> 02:18:09,480
में और कितना सुखी शोख है यहां तो कितना

1862
02:18:09,480 --> 02:18:13,600
दुख है इस लोक में अरे यहां से बेटर है मैं मान

1863
02:18:13,600 --> 02:18:17,720
रहा हूं मगर आपका वो नित्य सुख है कि नहीं सतलोक मैं

1864
02:18:17,720 --> 02:18:22,000
पूछ रहा हूं सतलोक में नित्य सुख है कि नहीं

1865
02:18:22,000 --> 02:18:26,320
नित्य सुख नि तो नित्य सुख है तो मुझे समझाओ

1866
02:18:26,320 --> 02:18:30,920
ना कि जब आप काजू बादाम खाने जाओगे तो रास्ते में आप

1867
02:18:30,920 --> 02:18:35,000
सुखी नहीं हो ना अगर काजू बादाम खाना जो है परमानंद है या

1868
02:18:35,000 --> 02:18:39,040
तो यह केवल या तो यह कहो कि केवल सतलोक पहुंच

1869
02:18:39,040 --> 02:18:43,280
जाना ही परमानंद है या तो यह कहो

1870
02:18:43,280 --> 02:18:47,560
केवल सतलोक पहुंच ग तो परमानंद है कहो देखो

1871
02:18:47,560 --> 02:18:52,760
वहा सुख का मतलब यह है कि अनंत

1872
02:18:52,760 --> 02:18:56,840
एक से बढ़ सम नहीं आपको दो चीज माननी पड़ेंगी

1873
02:18:56,840 --> 02:19:00,880
या तो आपको यह मानना पड़ेगा कि वहां पर सुख जो है बाधित

1874
02:19:00,880 --> 02:19:04,960
हो रहा है क्योंकि आप जब सेवा कर रहे हो तब सुखी हो जब सेवा नहीं कर रहे हो तब सुखी

1875
02:19:04,960 --> 02:19:09,160
नहीं हो और या फिर यह मानना पड़ेगा अगर केवल या फिर यह मानना

1876
02:19:09,160 --> 02:19:13,320
पड़ेगा कि सतलोक अगर पहुंच भी गए भले ही सेवा कर रहे हैं नहीं कर रहे वो

1877
02:19:13,320 --> 02:19:16,720
भी परमानंद

1878
02:19:16,720 --> 02:19:20,800
है है ना तो सतलोक पहुच गए

1879
02:19:20,800 --> 02:19:25,040
भले ही सेवा कर रहे हैं नहीं कर रहे वोह भी परमानंद है

1880
02:19:25,040 --> 02:19:29,080
हां वो भी आनंदित है इसका मतलब आप अपने

1881
02:19:29,080 --> 02:19:33,760
प्रभु की सेवा नहीं कर रहे हो उनसे दूर खड़े हो तब भी सुखी हो

1882
02:19:33,760 --> 02:19:38,040
जी जी तो फिर यहां पर जो आपकी जो ईश्वर

1883
02:19:38,040 --> 02:19:42,440
की भक्ति है वो ईश्वर की भक्ति नहीं है वो सतलोक पहुंचकर सुख

1884
02:19:42,440 --> 02:19:46,520
प्राप्त करने की भक्ति है अरे सतलोक पहुंचेंगे

1885
02:19:46,520 --> 02:19:50,760
तो वही जो जिनकी भक्ति करोगे वही तो पहुंचाएंगे अरे भाई ईश्वर

1886
02:19:50,760 --> 02:19:54,920
ईश्वर से तो दूर होगे ना ईश्वर हमेशा वहां

1887
02:19:54,920 --> 02:19:58,960
पास में ही रहते ईश्वर की सेवा किए बिना भी सुखी

1888
02:19:58,960 --> 02:20:02,960
हो ना वहा पर ईश्वर की भक्ति कि बिना भी सुखी

1889
02:20:02,960 --> 02:20:07,080
हो ना वहा हा वहा भक्ति की आवश्यकता नहीं है तो

1890
02:20:07,080 --> 02:20:07,800
इसका मतलब

1891
02:20:07,800 --> 02:20:11,920
यह है कि ईश्वर आपका एक सहारा है वहां पहुंचने का

1892
02:20:11,920 --> 02:20:16,080
बस बस बस बस मेन है वो सतलोक

1893
02:20:16,080 --> 02:20:21,200
का सुख बस सतलोक

1894
02:20:21,200 --> 02:20:26,040
ईश्वर का प्रेम जो है व वही तक है जब एक बार सतलो पहुंच गए तो ईश्वर से कोई मतलब नहीं

1895
02:20:26,040 --> 02:20:29,800
फिर कोई मतलब [संगीत]

1896
02:20:29,800 --> 02:20:33,800
नहीं अब ये बताओ चलो ये अच्छा हुआ अब

1897
02:20:33,800 --> 02:20:38,400
ये बताओ कि जब व जो

1898
02:20:38,400 --> 02:20:43,280
यह है आपने कहा कि वहां पर किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होती है

1899
02:20:43,280 --> 02:20:47,440
जी व ऐसी जगह है जी

1900
02:20:47,440 --> 02:20:51,840
जी तो ये बताइए ये सृष्टि बनते

1901
02:20:51,840 --> 02:20:56,040
समय लोगों के मन में काल के पीछे

1902
02:20:56,040 --> 02:21:00,040
जाने की इच्छा क्यों हो रही है देखि

1903
02:21:00,040 --> 02:21:04,160
यह विस्तृत जानकारी ज्ञान गंगा पुस्तक में दी गई है भाब

1904
02:21:04,160 --> 02:21:08,640
आप जन गंगा पढ़ के आए हैं कि नहीं आए आप क्यों आए

1905
02:21:08,640 --> 02:21:12,920
जी पढ़ के आया बता रहा हूं बता देखिए

1906
02:21:12,920 --> 02:21:16,920
जब परमात्मा ने इन लोगों की रचना की

1907
02:21:16,920 --> 02:21:21,520
तो हमारे जी लोगों के प्रति एक जो

1908
02:21:21,520 --> 02:21:23,720
जो आत्मा थी उसके अंदर

1909
02:21:23,720 --> 02:21:27,960
एक कमी आ गई थी कि लोक में रहने वाली

1910
02:21:27,960 --> 02:21:32,680
आत्माओ के अंदर कमी आ सकती है पॉइंट टू बी

1911
02:21:32,680 --> 02:21:36,960
नोटे हा नोट कर

1912
02:21:36,960 --> 02:21:41,320
लीजिए जो ब्रम था नहीं

1913
02:21:41,320 --> 02:21:45,360
है नित सुख है अरे कहा से जब

1914
02:21:45,360 --> 02:21:49,520
तुम कह रहे हो कि सतलोक की आत्माओ के अंदर भी कमी

1915
02:21:49,520 --> 02:21:55,520
आ सकती है के अंदर दूसरी चीज को प्राप्त करने का मन हो सकता है

1916
02:21:55,800 --> 02:21:59,960
हा यानी की वो संतुष्ट नहीं है

1917
02:21:59,960 --> 02:22:03,960
संतुष्ट संतुष्ट है लेकिन वो बात ऐसा है कि जैसे

1918
02:22:03,960 --> 02:22:08,200
जब उन्होने देखा की य ब्रह्म काल जिसे कहते हैं

1919
02:22:08,200 --> 02:22:12,320
यह साधना करने लगा तो इसके प्रति देख के हमारा यह भाव

1920
02:22:12,320 --> 02:22:16,800
एक उदारता का जग गया इसके प्रति उदारता नहीं जाती

1921
02:22:16,800 --> 02:22:21,760
है मतलब ममता आ ममता उदारता

1922
02:22:21,760 --> 02:22:25,880
हां ममता इसने कुछ भी कहिए तो तो

1923
02:22:25,880 --> 02:22:30,800
यानी ममता का भाव य आया कि हमें इसकी ओर जाना चाहिए

1924
02:22:30,800 --> 02:22:34,880
जी तो परमा हमें कहीं पर जाने

1925
02:22:34,880 --> 02:22:38,880
की इच्छा तब होती है जब हमें लगता है कि हमें इसकी ओर जाना चाहिए वहां

1926
02:22:38,880 --> 02:22:42,880
जाने से हमें सुख मिलेगा सुख की सुख

1927
02:22:42,880 --> 02:22:47,000
की वजह से नहीं ऐसा है कहीं कहीं हा वहा

1928
02:22:47,000 --> 02:22:51,200
कारण सुका नहीं क्या वो

1929
02:22:51,200 --> 02:22:56,040
आसक्त हो गए और परमात्मा मना किया नित्य

1930
02:22:56,040 --> 02:23:00,520
नित्य जो सुख वाला लोक है वहां पर भी सतलोक को छोड़ के

1931
02:23:00,520 --> 02:23:04,880
किसी अन्य चीज में आसक्त हो सकती है

1932
02:23:04,880 --> 02:23:08,920
आत्मा जी पहले पहले मेरी बात क्लियर कर दो आसक्त

1933
02:23:08,920 --> 02:23:13,280
हो सकती है कि नहीं हो सकती है जब

1934
02:23:13,280 --> 02:23:16,120
बता तोहा

1935
02:23:16,120 --> 02:23:21,000
जब उ के लिए आसक्ति तब होगी

1936
02:23:21,000 --> 02:23:25,120
जब मेरे को किसी चीज की कोई कमी होगी आप कह रहे हो आसक्त हुई

1937
02:23:25,120 --> 02:23:29,360
आत्मा आसक्त हो गई कमी की वजह से नहीं हुई वहा

1938
02:23:29,360 --> 02:23:33,480
जो है उसके भाव को देखकर आसक्त हो गई अरे तो भाव को

1939
02:23:33,480 --> 02:23:38,120
देख कर के आसक्ति एट द एंड आसक्ति तो हुई आसक्ति का

1940
02:23:38,120 --> 02:23:42,240
काम वो हम मान रहे आप आसक्ति लेकिन व यह ना क की सुख

1941
02:23:42,240 --> 02:23:46,280
की वो मतलब सुख संपूर्ण सुखी लेकिन कह

1942
02:23:46,280 --> 02:23:51,000
रहा हूं किसी कारण वस उसके मन में कमी आ

1943
02:23:51,000 --> 02:23:55,360
जिसके कारण वह फसी हा

1944
02:23:55,360 --> 02:23:59,400
तो यानी की सतलोक में जाने के बाद भी सतलोक भी ऐसी जगह नहीं है

1945
02:23:59,400 --> 02:24:03,360
जहां पर रहने वाला फसता नहीं

1946
02:24:03,360 --> 02:24:07,440
है अगर आप आसक्त होगे तो गिर जाओगे फिर तो फसने

1947
02:24:07,440 --> 02:24:12,320
तो काल के मुख में आ जा जा कर के भी वापस लौटने की आशंकाएं

1948
02:24:12,320 --> 02:24:16,400
है आशंका है अगर आप पतिव्रता से

1949
02:24:16,400 --> 02:24:21,880
गिरोगे तो

1950
02:24:21,880 --> 02:24:26,080
भाई आप लोग रामपाल जी के भक्तही हो कि उनके शत्रु

1951
02:24:26,080 --> 02:24:29,400
हो

1952
02:24:29,400 --> 02:24:34,320
य बताओ मोक्ष क्या है प

1953
02:24:34,320 --> 02:24:40,320
म जन्म और मरण से के लिए हमेशा मुक्ति मिल [प्रशंसा]

1954
02:24:40,840 --> 02:24:46,840
जाएगी क्या मिली क्या व जाके

1955
02:24:48,480 --> 02:24:52,840
मुक्ति जब पहुंचेंगे सतलोक में तभी मिलेगी

1956
02:24:52,840 --> 02:24:56,880
मैं पूछ रहा सतलोक में जाकर के मुक्ति मिल रही है क्या

1957
02:24:56,880 --> 02:25:01,560
आपके अनुसार आप क तो फिर आ जाती है फिर आ जाएगी

1958
02:25:01,560 --> 02:25:07,080
क रहे हो अरे एक

1959
02:25:07,080 --> 02:25:12,160
बार से गलती हो गई एक बार

1960
02:25:12,160 --> 02:25:16,520
पली बार गलती क्यों हुई

1961
02:25:16,520 --> 02:25:21,100
थी पहली बार हो गई

1962
02:25:21,100 --> 02:25:24,920
[संगीत]

1963
02:25:24,920 --> 02:25:29,280
अच्छा ठीक है अब हमने देख लिया कि आपका जो मोक्ष

1964
02:25:29,280 --> 02:25:33,800
है वो लोगों ने देख लिया वह कैसा है ठीक है अब हम आगे चलते

1965
02:25:33,800 --> 02:25:37,840
हैं आपका ईश्वर है वो कैसा है इनको

1966
02:25:37,840 --> 02:25:43,840
जरा रामपाल य कबीर दास जी की फोटो दिखा

1967
02:25:46,440 --> 02:25:51,000
दीजिए हम देख चुके हैं फोटो आपकी नहीं

1968
02:25:51,000 --> 02:25:55,640
नहीं बार बार देखो देखने की चीज है हजार बार

1969
02:25:55,640 --> 02:25:59,840
देखो जय

1970
02:25:59,840 --> 02:26:03,880
हो नहीं छूट रही भाई बंदी तो वहा भी है

1971
02:26:03,880 --> 02:26:08,480
नहीं व नहीं आ जाओ

1972
02:26:08,480 --> 02:26:12,520
वापस मको कहते जिसको प्राप्त करने के बाद

1973
02:26:12,520 --> 02:26:16,360
कुछ भी प्राप्त करना शेष ना रह

1974
02:26:16,360 --> 02:26:20,600
जाए जाने के बाद भी आपके अंदर वो आ रहा है पनी उनको

1975
02:26:20,600 --> 02:26:25,120
तोड़ रहे हो वो गलती हुई एक बार हो गई तो

1976
02:26:25,120 --> 02:26:29,400
तो गलती हो रही है ना वहां पर भी सतलोक में जाने के बाद भी अरे

1977
02:26:29,400 --> 02:26:33,640
वो समय था अब नहीं चलो चलो अच्छा

1978
02:26:33,640 --> 02:26:37,800
ये बताओ ये जो अभी हमने फोटो देखी

1979
02:26:37,800 --> 02:26:41,920
है ये आपका जो ईश्वर है वो अजर अमर

1980
02:26:41,920 --> 02:26:47,160
सर्वशक्तिमान है कि नहीं जी बिल्कुल अजर अमर सर्वशक्तिमान

1981
02:26:47,160 --> 02:26:51,480
पूर्ण ब्रह्म अच्छा अजर

1982
02:26:51,480 --> 02:26:57,480
अमर सर्वशक्तिमान शाश्वत पूर्ण ब्रह्म

1983
02:26:57,520 --> 02:27:01,640
ठीक अब ये बताओ ये जो दिख रहे हैं कबीर

1984
02:27:01,640 --> 02:27:05,680
ये बूढ़े हैं अधेड़

1985
02:27:05,680 --> 02:27:10,000
है व्यस्त है किशोर है बालक है या शिशु

1986
02:27:10,000 --> 02:27:14,040
है कौन है देखिए यह मृत्यु लोक में परमात्मा शिशु रूप में आए

1987
02:27:14,040 --> 02:27:14,960
थे और अंत

1988
02:27:14,960 --> 02:27:20,760
समय तक 120 वर्ष तक उन्होंने भाई साहब मैं आपसे पूछ रहा हूं

1989
02:27:20,760 --> 02:27:24,960
मैं आपसे रहा हूं य जो रूप है परमात्मा का यह बूढ़ा

1990
02:27:24,960 --> 02:27:29,640
है यह जवान है अधेड़ है

1991
02:27:29,640 --> 02:27:34,720
क्या है ये यह वृद्ध अवस्था का है वृद्ध

1992
02:27:34,720 --> 02:27:39,400
है और आप कह रहे हो यही पूर्ण परमात्मा का वास्तविक रूप

1993
02:27:39,400 --> 02:27:44,160
है जी वास्तविक परमात्मा का रूप सतलोक में

1994
02:27:44,160 --> 02:27:48,160
है भाई साहब देखिए हमको ज्यादा इतना घी

1995
02:27:48,160 --> 02:27:52,200
नहीं पिया है हमको एट द डेडलाइन बोलिए

1996
02:27:52,200 --> 02:27:56,560
डेडलाइन डेडलाइन बोलिए डेडलाइन अंतिम बात

1997
02:27:56,560 --> 02:28:02,160
बोलिए वास्तविक स्वरूप है परमात्मा का या नहीं

1998
02:28:02,160 --> 02:28:06,360
है वास्तविक स्वरूप परमात्मा का ये

1999
02:28:06,360 --> 02:28:10,600
नहीं है यह मृत्यु लोक का ये जो हमारे मृत्यु लोक है

2000
02:28:10,600 --> 02:28:15,040
यानी ये नकली स्वरूप है ये ये

2001
02:28:15,040 --> 02:28:19,120
हा इसे आप कुछ भी मान लिए नकली स्वरूप मान लीजिए या कुछ मान लीजिए नहीं मैं नहीं

2002
02:28:19,120 --> 02:28:23,800
मानूंगा आप बताइए क्लियर करिए वही मानू

2003
02:28:23,800 --> 02:28:27,880
हां यह स्वरूप नकली है यह असली स्वरूप नहीं वहा परमात्मा बहुत सुंदर शरीर

2004
02:28:27,880 --> 02:28:30,240
है तो जब यह असली स्वरूप

2005
02:28:30,240 --> 02:28:34,320
नहीं है तो उसके सामने ये जो लिखा हुआ

2006
02:28:34,320 --> 02:28:38,640
है कि पूर्ण ब्रह्म परमात्मा एक तो गलत लिखा है

2007
02:28:38,640 --> 02:28:42,800
वो इस इस शरीर में आए थे ना इसलिए उनको पूर्ण परमात्मा लिखा है

2008
02:28:42,800 --> 02:28:47,000
लीला की थी मालिक ने इस रूप में अच्छा यह कहां लिखा

2009
02:28:47,000 --> 02:28:52,400
है आपके उसम यह जो शरीर है वास्तविक रूप

2010
02:28:52,400 --> 02:28:56,840
ये हर चीज लिखी नहीं होती ज्ञान दिया परमात्मा ने लीला की और वो चली गई

2011
02:28:56,840 --> 02:29:00,840
शरीर और नोटे भैया

2012
02:29:00,840 --> 02:29:05,600
कबीर सागर में आप हर बात को ग्रंथों से दिखाते हो

2013
02:29:05,600 --> 02:29:09,720
मैं आपसे पूछ रहा हूं यह जो परमात्मा का आपने रूप दिखाया

2014
02:29:09,720 --> 02:29:14,080
है यह वास्तविक रूप नहीं है

2015
02:29:14,080 --> 02:29:18,240
यह आपके ग्रंथों में कहां लिखा है रामपाल दास जी ने कहा लिखा

2016
02:29:18,240 --> 02:29:23,200
है य वास्तविक नहीं है मैं और कोई ग्रंथ नहीं मांग

2017
02:29:23,200 --> 02:29:27,920
रहा इसके बारे में नहीं लिखा है कि परमात्मा ये लिखा

2018
02:29:27,920 --> 02:29:32,800
हैल दास जी से भी दो कदम आगे चल रहे

2019
02:29:32,800 --> 02:29:37,400
हो आगे नहीं चल रहे हैं यह नहीं लिखा है मालिक

2020
02:29:37,400 --> 02:29:41,560
ने आप उनसे भी बड़े तत्वदर्शी हो क्या आप कुछ

2021
02:29:41,560 --> 02:29:45,360
ऐसा बता रहे हो जो उन्होंने नहीं बताया उन्होंने

2022
02:29:45,360 --> 02:29:49,360
बताया है नकली नहीं है ये लीला

2023
02:29:49,360 --> 02:29:53,640
स्वरूप शरीर उनका नकली नहीं है ला ये वास्तविक परम परम सत्य

2024
02:29:53,640 --> 02:29:58,120
नहीं है ना ये मैं वही पूछ रहा हूं हां ये जो सतलोक

2025
02:29:58,120 --> 02:30:02,200
में जो शरीर है वो नहीं है कहने का भाव सीधा समझो डला

2026
02:30:02,200 --> 02:30:06,600
वास्तविक परम सत्य कहां पर है सतलोक में

2027
02:30:06,600 --> 02:30:11,360
तलोक यानी कि यह जो शरीर है वो सत्य नहीं है

2028
02:30:11,360 --> 02:30:15,480
परम सत्य नहीं है ये हमने बता तो दिया जो सतलोक

2029
02:30:15,480 --> 02:30:19,520
में शरीर है वो ये नहीं है आखरी शद में मैं पूछ रहा हूं ये परम

2030
02:30:19,520 --> 02:30:23,640
सत्य है कि नहीं तो कितनी बार होता है ये परम सत्य

2031
02:30:23,640 --> 02:30:27,720
नहीं है ये उनका लीला बता रहे हो आप ऐसी बात बोल रहे हो

2032
02:30:27,720 --> 02:30:32,640
जिसम बाद में अपने आप को बचा सक इसलिए उ कर रहा

2033
02:30:32,640 --> 02:30:36,760
ये लीलाम शरीर है यानी कि ये वास्तविक शरीर नहीं

2034
02:30:36,760 --> 02:30:40,840
है ऐसे बो ये वास्तविक स्वरूप

2035
02:30:40,840 --> 02:30:44,880
नहीं है उनका वास्तविक स्वरूप उका बात रामपाल दास जी ने कहां पर

2036
02:30:44,880 --> 02:30:47,400
लिखी

2037
02:30:47,400 --> 02:30:51,880
है अरे लिखी नहीं है हम बता रहे

2038
02:30:51,880 --> 02:30:56,320
आपको देख लो भैया रामपाल दास जी वालों

2039
02:30:56,320 --> 02:31:00,640
जब आप दूसरे की दूसरे की वाणी में ग्रंथों

2040
02:31:00,640 --> 02:31:04,960
में अपने मन मर्जी की चलाओगे तो ये प्रोडक्ट

2041
02:31:04,960 --> 02:31:09,400
बाहर आएगा निकल कर के इस तरह की बातें बाहर आएंगी निकल कर के

2042
02:31:09,400 --> 02:31:14,200
अब आपने जो नहीं बोला है वो ये बोल रहे हैं ठीक है

2043
02:31:14,200 --> 02:31:18,200
तो यह वास्तविक स्वरूप नहीं है अच्छा अब यह बताइए जब वो वास्तविक स्वरूप नहीं

2044
02:31:18,200 --> 02:31:22,400
है तो इतना तो है कि जो स्वरूप दिखाया

2045
02:31:22,400 --> 02:31:25,320
जा रहा

2046
02:31:25,320 --> 02:31:29,320
है बूढ़ा दिख रहा है आप कह रहे हो कि वो लीला वाला शरीर है

2047
02:31:29,320 --> 02:31:33,600
तो बूढ़ा दिखेगा जी और वहां पर जो शरीर

2048
02:31:33,600 --> 02:31:37,800
है वह बूढ़ा नहीं है यह कह रहे है नहीं वहा नहीं है ब

2049
02:31:37,800 --> 02:31:42,160
व बूढ़ा नहीं है तो वहां से जब वो यहां आता है

2050
02:31:42,160 --> 02:31:46,400
तो अपना रूप बदल लेता है हां अपना रूप बदल

2051
02:31:46,400 --> 02:31:50,400
लेते हैं अपना रूप हल्का कर लेते हैं नहीं हल्का और

2052
02:31:50,400 --> 02:31:55,320
तेज करना अलग बात है और रूप बदल लेना अलग बात है

2053
02:31:55,320 --> 02:31:59,440
हल्का और तेज तो ये है कि उससे निकलने वाली जो रोशनी है वो कम हो गई

2054
02:31:59,440 --> 02:32:03,560
अरे वही है चेंजिंग हुआ चाहे कुछ भी मान लिए बदल लेते हैं एक ही बा ऐसे

2055
02:32:03,560 --> 02:32:07,800
नहीं होता है सुनो मेरी बात ऐसे नहीं करते आप

2056
02:32:07,800 --> 02:32:13,800
कहां गए ज

2057
02:32:13,800 --> 02:32:18,120
भा कहां गए

2058
02:32:18,120 --> 02:32:22,280
भाई य हां हम

2059
02:32:22,280 --> 02:32:26,320
यह कह रहे हैं कि सतलोक से जब वो आते हैं तो अपना

2060
02:32:26,320 --> 02:32:31,120
पूरा का पूरा रूप बदलते हैं लाइट कम कर लेते हैं अपने शरीर की

2061
02:32:31,120 --> 02:32:36,000
आपने कहा वोज को हल्का करता है मगर

2062
02:32:36,000 --> 02:32:40,240
यह लिखा है कि वो अपने तेज पुंज को कम कर लेते

2063
02:32:40,240 --> 02:32:44,280
हैं तो यानी लाइट जो है कम हो रही है तेज कम हो रहा

2064
02:32:44,280 --> 02:32:48,280
है प्रकाश कम हो रहा है जी रूप नहीं बदल गया कि पहले

2065
02:32:48,280 --> 02:32:53,040
सा फट के थे तो फट हो गए ऐसा है क्या

2066
02:32:53,040 --> 02:32:57,400
जी हां यही है हां तो वो जैसे वहां

2067
02:32:57,400 --> 02:33:01,520
है वहां से यहां आ गए तो जब वो यहां पर ऐसे दिख रहे हैं दाढ़ी वाले सफेद

2068
02:33:01,520 --> 02:33:05,800
दाढ़ी वाले तो वो वहां पर भी तो वही हो गए ना बस वहां रोशनी

2069
02:33:05,800 --> 02:33:09,960
ज्यादा है हां तो फिर

2070
02:33:09,960 --> 02:33:14,000
वो जवान कहां हो गए वहां वहां जवान

2071
02:33:14,000 --> 02:33:18,920
इसलिए करवा देते हैं वहां जाके सेविंग करवा देते हैं देखो

2072
02:33:18,920 --> 02:33:22,960
वहां जन बुढ़ापा ही नहीं य ल वृप आ जाता

2073
02:33:22,960 --> 02:33:27,280
है वहां तेजम शरीर है ये वैसा शरीर हो जाता है मृत्युलोक

2074
02:33:27,280 --> 02:33:28,920
में पहली बात तो

2075
02:33:28,920 --> 02:33:32,960
यह भाई साहब आपने एक बात कही कि यह जो

2076
02:33:32,960 --> 02:33:37,360
शरीर है यह परमात्मा का वास्तविक शरीर नहीं है ठीक है

2077
02:33:37,360 --> 02:33:41,600
यह रामपाल दास जी ने कहां लिखा है यह आपको पता नहीं है

2078
02:33:41,600 --> 02:33:45,640
दूसरी बात आपने कही कि लीला

2079
02:33:45,640 --> 02:33:50,000
मय जो शरीर होता है वो जो है उम्र का प्रभाव उसम दिखता है

2080
02:33:50,000 --> 02:33:54,240
वहां पर बैठा हुआ जो रूप है उसमें उम्र का प्रभाव नहीं दिखता है मगर

2081
02:33:54,240 --> 02:33:58,280
यह जो लीलाम स्वरूप है जिसमें सफेद दाढ़ी है यही स्वरूप वहां बैठा

2082
02:33:58,280 --> 02:34:02,360
है तो यह कैसी बातें कर रहे हो या तो यह कहो वहां पर सफेद

2083
02:34:02,360 --> 02:34:06,480
दाढ़ी नहीं है यहां लीला में सफेद दाढ़ी है देखो

2084
02:34:06,480 --> 02:34:10,840
ऐसा है स्वरूप बता दो दिया वहां तेज पुंज और

2085
02:34:10,840 --> 02:34:15,080
एकदम स्वस्थ युवा और यछ रहा हूं ये जो सफेद

2086
02:34:15,080 --> 02:34:19,720
दा दिख रही है दिख रहा है ये दिखता है क्या वहा

2087
02:34:19,720 --> 02:34:23,800
वहां बुढ़ापा नहीं दिखता है यानी कि वो अपना रूप बदल

2088
02:34:23,800 --> 02:34:27,800
के आते हैं काली तेज कम नहीं करते

2089
02:34:27,800 --> 02:34:31,800
हैं अब तुम चाहे कुछ भी मान लीजिए

2090
02:34:31,800 --> 02:34:36,240
नहीं नहीं क्लियर ऐसे तो हमने बता तो

2091
02:34:36,240 --> 02:34:40,280
वो अपना स्वरूप तेज जो तेज पुंज है वो हल्का करके आते

2092
02:34:40,280 --> 02:34:43,960
हैं और लीला करते हैं और 120 वर्ष तक उन्होंने लीला की और फिर

2093
02:34:43,960 --> 02:34:48,320
वो सासरी चली गई मेरी बात आप

2094
02:34:48,320 --> 02:34:52,400
समझिए कि जो वहां से आ रहे

2095
02:34:52,400 --> 02:34:56,680
हैं वोद दाढ़ी में है सफेद दाढ़ी में है

2096
02:34:56,680 --> 02:35:00,680
या नहीं है जब वो आते हैं तो शिशु रूप में आते हैं

2097
02:35:00,680 --> 02:35:04,920
और जिंदा महात्मा के रूप में जैसा वहां जिंदा महात्मा

2098
02:35:04,920 --> 02:35:08,920
जैसा इसमें दिख रहा है ऐसे ही कई रूप में कई बार आ चुके हैं परमात्मा

2099
02:35:08,920 --> 02:35:13,560
मैं आपसे पूछ रहा हूं वहां पर सफेद दाढ़ी वाला रूप है कि नहीं है

2100
02:35:13,560 --> 02:35:17,640
हां सफेद दाढ़ी वाला रूप है परमात्मा का सफेद दाढ़ी रूप है वहां प

2101
02:35:17,640 --> 02:35:21,720
सतलोक में जी तो फिर इस रूप को

2102
02:35:21,720 --> 02:35:25,840
आप क्या मानेंगे सतलोक में भी वो बूढ़े दिख रहे हैं

2103
02:35:25,840 --> 02:35:29,880
अरे बूढ़ा बता दो दिया वहां अलग हिसाब

2104
02:35:29,880 --> 02:35:34,360
है य वहां तेज पुंज है तेज पुंज का शरीर है अलग चमक है वहां हमेशा य

2105
02:35:34,360 --> 02:35:38,480
दिख रहे हैं कि नहीं दिख रहे हैं ये बताओ वहां पे नहीं बूढ़े नहीं दिखते

2106
02:35:38,480 --> 02:35:42,560
हैं वहां वहां हर चीज सफेद ही है यहां हम तुम काला सफेद

2107
02:35:42,560 --> 02:35:47,480
है वहां हर चीज स्वेत है यानी कि वहां पे

2108
02:35:47,480 --> 02:35:51,880
कुछ भी नहीं है सिर्फ सफेद ही सफेद है सब कुछ और कुछ नहीं है जो

2109
02:35:51,880 --> 02:35:55,880
जो वस्तुत चीज है वो सफेद है जैसे फल है य पीले है हरे

2110
02:35:55,880 --> 02:35:59,200
वहा सफेद है नहीं हर चीज सफेद

2111
02:35:59,200 --> 02:36:05,200
का मतलब क्या है ना कुछ पता ही नहीं चलेगा कि वहा है

2112
02:36:05,960 --> 02:36:10,040
क्या सुनो हर चीज जब सफेद कर दोगे

2113
02:36:10,040 --> 02:36:15,440
एक जैसी तो कुछ पता ही नहीं चलेगा कि है क्या

2114
02:36:15,440 --> 02:36:19,680
अरे पता क्यों नहीं चलेगा जब जैसे हम यहां देख रहे

2115
02:36:19,680 --> 02:36:24,040
ये जो स्किन है सुनो ये जो स्किन है यहां प स्किन कलर दिख रहा है

2116
02:36:24,040 --> 02:36:28,040
तुमने कहा वहा सबज सफेद है वहा जाके ये भी सफेद हो जाएगी बाल भी सफेद हो

2117
02:36:28,040 --> 02:36:32,520
जाएंगे सब कुछ सफेद हो जाएगा कपड़े सफेद हो जाएंगे फल सफेद हो जाएंगे

2118
02:36:32,520 --> 02:36:37,360
तो दिखेगा क्या क्या है क्या नहीं है देखो

2119
02:36:37,360 --> 02:36:41,960
सो मतलब बर्फ बारी होती रहती है

2120
02:36:41,960 --> 02:36:46,320
अब कम ज्यादा सफेद हो जाता है ना इसलिए नहीं बता

2121
02:36:46,320 --> 02:36:50,320
सकते दिखता है सब कुछ इसका मतलब

2122
02:36:50,320 --> 02:36:54,320
यह आपने माना कि कबीर का जो

2123
02:36:54,320 --> 02:36:58,680
रूप है वह शाश्वत नहीं है वहां

2124
02:36:58,680 --> 02:37:03,120
शाश्वत रूप है यहां नहीं है शाश्वत रूप वहां शाश्वत

2125
02:37:03,120 --> 02:37:07,400
रूप है यहां पर शाश्वत नहीं है यहां पर बदलता है हा

2126
02:37:07,400 --> 02:37:12,200
य रूप बदलता है उनका य रूप बदलता है

2127
02:37:12,200 --> 02:37:14,720
यागा य वो जब

2128
02:37:14,720 --> 02:37:18,720
आएगा तो लीला पूर्वक अपने शरीर को नष्ट करके भी दिखा सकता

2129
02:37:18,720 --> 02:37:23,480
है हां वो दिखाना चाहे तो दिखा सकते

2130
02:37:23,480 --> 02:37:27,480
हैं यानी कि ऐसी लीला कर सकता है जिसके

2131
02:37:27,480 --> 02:37:31,720
कारण यह कहा जा सके कि कबीर की भी जन्म मृति होती है

2132
02:37:31,720 --> 02:37:36,400
लीला लीला उसम लीला लोक में

2133
02:37:36,400 --> 02:37:41,320
हां कर सकते हैं क्यों नहीं व तो परमात्मा है क्या नहीं कर सकते हैं

2134
02:37:41,320 --> 02:37:46,160
तो बचा के अभय रामपाल दाने लिखा है वो

2135
02:37:46,160 --> 02:37:50,360
बताओ कि कबीर अपनी अपनी देह को नष्ट करने

2136
02:37:50,360 --> 02:37:54,640
की लीला दिखा सकते हैं कबीर की जो देह है वो लीला

2137
02:37:54,640 --> 02:37:58,760
ये जो य नाशवान लो है यहां पर शाश्वत नहीं है और परम

2138
02:37:58,760 --> 02:38:02,920
जो सतलोक है वहां पर शाश्वत है और यहां पर वो बूढ़ा

2139
02:38:02,920 --> 02:38:07,040
दिखता है मगर वहां पर वो जवान दिखता है और दिखता वैसा ही

2140
02:38:07,040 --> 02:38:10,080
है जैसा यहां पर दिख रहा

2141
02:38:10,080 --> 02:38:15,920
है ये दिखाओ कहां पे है कहां लिखा

2142
02:38:15,920 --> 02:38:20,640
है अब हम यहां किताब तो लेकर बैठे नहीं है

2143
02:38:20,640 --> 02:38:24,840
परमात्मा का वर्णन सुनना हम तो देखिए ये कोई हम लोग गिल्ली

2144
02:38:24,840 --> 02:38:29,480
डंडा खेलने तो आते नहीं एंटरटेन करने के लिए चलो भाई पार्क में घूमने चले

2145
02:38:29,480 --> 02:38:33,520
आपको आना हिए आपके पास प्रमाण हो अपनी बातो का

2146
02:38:33,520 --> 02:38:37,520
प्रमाण है बता तो रहे हैं आप उसम ज्ञान गंगा में आप जो

2147
02:38:37,520 --> 02:38:41,840
है उसम पूरा वर्णन है परमात्मा के स्वरूप का और कैसे आते हैं

2148
02:38:41,840 --> 02:38:46,160
क्या करते हैं सब कुछ है अरे तो वो वो लाओ ना

2149
02:38:46,160 --> 02:38:50,560
ऐसे बातों से थोड़ी ना होगा वो लाओ दिखाओ

2150
02:38:50,560 --> 02:38:55,440
ज्ञान गंगा खोलिए उसमें सब लिखा है दिखाइए स्क्रीन पर

2151
02:38:55,440 --> 02:39:00,240
ज्ञान गंगा नहीं रखते अपने पास कौन से

2152
02:39:00,240 --> 02:39:04,320
पेज कौन से पेज

2153
02:39:04,320 --> 02:39:09,800
क्या

2154
02:39:09,800 --> 02:39:12,680
देख

2155
02:39:12,680 --> 02:39:16,680
रना अगली बत वो ष रचना हमने पढ़ी उसम क नहीं लिखा है

2156
02:39:16,680 --> 02:39:21,800
वो निराकार था पहले आपने बोला पहले निराकार

2157
02:39:21,800 --> 02:39:25,920
निराकार नहीं है वो निराकार नहीं है तो फिर जहां वो

2158
02:39:25,920 --> 02:39:28,880
बैठा है वो जगह किसने

2159
02:39:28,880 --> 02:39:33,320
बनाई वो देखिए पहले अनामी लोग और

2160
02:39:33,320 --> 02:39:37,480
और किसी दिन आना और किसी को ले लेते हैं आपसे चर्चा हो गई काफी देर

2161
02:39:37,480 --> 02:39:43,480
किसी और को ले लेते

2162
02:39:46,000 --> 02:39:50,840
हैं हां भाई दिनेश दास जी जय श्री

2163
02:39:50,840 --> 02:39:55,520
राम जी राम राम जी हां

2164
02:39:55,520 --> 02:40:00,320
वेदों में प्रमाण है कबीर भगवान है कहां लिखा

2165
02:40:00,320 --> 02:40:04,760
है देखा नहीं अभी तक आपने देखिए

2166
02:40:04,760 --> 02:40:08,760
कट टू कट बात करिए हसी ट्टा करेंगे मुझे इसमें कोई इंटरेस्ट नहीं

2167
02:40:08,760 --> 02:40:12,840
है अभी जो टॉपिक चल रहा है आप उस पर बात कीजिए उस पर आया हूं मैं करने के

2168
02:40:12,840 --> 02:40:17,240
लिए अच्छा तो बताइए

2169
02:40:17,240 --> 02:40:21,720
कि क्या सब कुछ कभी कबीर ने ही बनाया है

2170
02:40:21,720 --> 02:40:25,360
जी सही बात है कबीर जी ने बनाया है सब कुछ

2171
02:40:25,360 --> 02:40:29,480
अच्छा कबीर साकार है कि निराकार है

2172
02:40:29,480 --> 02:40:33,480
साकार है साकार है जी तो

2173
02:40:33,480 --> 02:40:37,600
ये कबीर खड़ा है और यदि वह सतलोक को बना रहा

2174
02:40:37,600 --> 02:40:42,360
है तो फिर जहां पर कबीर खड़ा है उस दुनिया को किसने

2175
02:40:42,360 --> 02:40:47,200
बनाया ये जो आप प्रश्न कर रहे हैं ना

2176
02:40:47,200 --> 02:40:51,440
ये आपकी बुद्धि की सोच है एक जीव की सोच है आप

2177
02:40:51,440 --> 02:40:56,320
आप य मुझे बताए आपके पास प्रश्न का उत्तर है तो दीजिए वरना जाइए

2178
02:40:56,320 --> 02:41:02,320
तो एक अच्छा एक मिनट सुनिए जैसे आप प्रश्न कर रहे उसका

2179
02:41:02,560 --> 02:41:06,680
अ अच्छा आप जो प्रश्न या उदाहरण देते हैं या इधर

2180
02:41:06,680 --> 02:41:10,760
उधर की बातें करते हैं उसका आपको अधिकार है आप जा सकते भाई

2181
02:41:10,760 --> 02:41:15,240
चाहिए आप जाइए और बहुत सारे

2182
02:41:15,240 --> 02:41:21,240
लोग अपने

2183
02:41:27,720 --> 02:41:31,800
इनको हटा दो भैया दिनेश दास जी को य यह केवल यह बताने आए थे

2184
02:41:31,800 --> 02:41:37,800
हम क्या करते हैं क्या नहीं करते हैं बाबूराम आपका जो नेटवर्क है वो सही

2185
02:41:38,160 --> 02:41:42,240
है जी सर नेटवर्क में जी

2186
02:41:42,240 --> 02:41:46,480
जी जी नेटवर्क में है सर हा चेहरा दिखाइए

2187
02:41:46,480 --> 02:41:51,880
अपना दिखा रहे है एलियन

2188
02:41:51,880 --> 02:41:57,880
पु दिखा रहे सर दिखा

2189
02:42:02,440 --> 02:42:06,480
रहे

2190
02:42:06,480 --> 02:42:10,800
हां तो मुझे य

2191
02:42:10,800 --> 02:42:15,000
बताइए कि आप जिस धर्म का पालन कर रहे हैं जिन सिद्धांतों

2192
02:42:15,000 --> 02:42:21,000
का पालन कर रहे हैं जी वो शाश्वत है कि नहीं

2193
02:42:21,320 --> 02:42:25,520
सर मेरा आपसे एक विनती है हाथ जोड़ कर के आप बड़े भाई हैं मैं छोटा

2194
02:42:25,520 --> 02:42:29,800
मैं आप आपसे मेरा एक विनती है आप मुझसे ये सब बातें मत करिए

2195
02:42:29,800 --> 02:42:33,800
मैं जानता हूं आपकी फिराक क्या है ये सब करके ये चापलूसी

2196
02:42:33,800 --> 02:42:38,200
करके आप क्या करने आए हैं मुझे मालो में मैं ये कहने आया हूं

2197
02:42:38,200 --> 02:42:42,200
ये नाटक मत करिए यहां जी जी आज का टॉपिक

2198
02:42:42,200 --> 02:42:46,320
ये नाटक मत करिए बड़े भाई का नाटक मत करिए

2199
02:42:46,320 --> 02:42:50,560
मेरे इससे बात करिए आप मैं गीता प बात कर रहा हूं इससे बात करेंगे इससे

2200
02:42:50,560 --> 02:42:54,880
बात करेंगे इससे बात करेंगे पहले चुप हो जाओ पहले चुप हो जाओ

2201
02:42:54,880 --> 02:42:59,320
अब तुम्हारा प्रश्न है वो बोलो मेरा

2202
02:42:59,320 --> 02:43:03,480
प्रश्न ये है कि कृष्ण भगवान

2203
02:43:03,480 --> 02:43:07,560
से अन्य दो कौन सा भगवान है उनको बताइए गीता अध्याय आ श्लोक नंबर 20

2204
02:43:07,560 --> 02:43:11,040
और

2205
02:43:11,040 --> 02:43:15,920
21 भगवान श्री कृष्ण ही लीला पूर्वक

2206
02:43:15,920 --> 02:43:19,920
सर्वव्यापी परमेश्वर विष्णु है जो

2207
02:43:19,920 --> 02:43:24,040
श्री कृष्ण के रूप में आकर लीलाए करते हैं

2208
02:43:24,040 --> 02:43:28,240
जी देवकी के मा देवकी के गर्भ से बाहर आ जाते हैं

2209
02:43:28,240 --> 02:43:32,480
प्रकट होते हैं लीला करते हैं जी अब आपका कहना

2210
02:43:32,480 --> 02:43:36,520
यह है आपका कहना यह है

2211
02:43:36,520 --> 02:43:40,520
कि जो श्री कृष्ण है वह ईश्वर नहीं है वह

2212
02:43:40,520 --> 02:43:44,920
परमेश्वर नहीं है तो अब मैं आपसे शास्त्र की बात करने से

2213
02:43:44,920 --> 02:43:50,000
पहले शास्त्र को आप कितना मानते हैं यह पूछूंगा

2214
02:43:50,000 --> 02:43:54,480
जिससे कि मैं आपको जब मेहनत करूं इसको नीचे कर दो बाबू

2215
02:43:54,480 --> 02:43:59,520
इसको नीचे कर दो जिससे कि मैं जब आपको मेहनत करके शास्त्र

2216
02:43:59,520 --> 02:44:03,520
दिखाऊं तो उसको आप मानो तो मुझे पता होना

2217
02:44:03,520 --> 02:44:07,680
चाहिए कि आप शास्त्र को कितना मानते हैं कितना नहीं मानते ठीक

2218
02:44:07,680 --> 02:44:11,920
है मैं आप आपके हिसाब से मैंने कृष्ण भगवान को

2219
02:44:11,920 --> 02:44:16,440
मैं स्वीकार कर लिया दो घड़ी आगे मत चलिए

2220
02:44:16,440 --> 02:44:20,680
जी पहले मैं आपके सिद्धांत को जान जाऊ शास्त्र का मान शास्त्र

2221
02:44:20,680 --> 02:44:25,080
को मानने का सिद्धांत क्या है आपका ठीक है हमारा मान

2222
02:44:25,080 --> 02:44:26,080
जी

2223
02:44:26,080 --> 02:44:30,160
पहला प्रश्न यह है कि आप गीता को

2224
02:44:30,160 --> 02:44:35,680
आप गीता दिखाइए ऊपर

2225
02:44:35,680 --> 02:44:41,680
करिए इसमें कितने पृष्ठ है खोलिए

2226
02:44:54,040 --> 02:44:59,680
कितने पृष्ठ है मुझे बता दो मुझे दिखाओ मत बोल दो मुं से

2227
02:44:59,680 --> 02:45:03,840
428 428 है गीता में

2228
02:45:03,840 --> 02:45:08,040
टोटल श्लोक 700 है जी ठीक है अब

2229
02:45:08,040 --> 02:45:14,040
तुम एक बार दोबारा से ऊपर गीता

2230
02:45:14,640 --> 02:45:20,640
दिखाओ आगे पीछे से दोनों साइड से दिखा दो

2231
02:45:21,680 --> 02:45:25,920
बढ़िया अब नीचे कर लो अगर अब

2232
02:45:25,920 --> 02:45:30,240
यह बताओ मैं इस गीता में से कुछ पन्ने कैची से फाड़

2233
02:45:30,240 --> 02:45:34,520
दूं जी तो यह वही गीता रहेगी

2234
02:45:34,520 --> 02:45:38,760
जो अभी है या बदल जाएगी वही गीता

2235
02:45:38,760 --> 02:45:43,480
रहेगी फाड़ने के बाद फने आपके

2236
02:45:43,480 --> 02:45:47,880
पास आप फाड़ देंगे मेरे पास तो है गीता है

2237
02:45:47,880 --> 02:45:52,560
उसम से पन्ने काट दिए फाड़ के अलग कर दिए जला दिए

2238
02:45:52,560 --> 02:45:57,120
तो यह वही गीता रहेगी जो अभी है

2239
02:45:57,120 --> 02:46:01,120
मेरा ला फट जाएगी आप ला तो है ना आप बला तो सही है मैं

2240
02:46:01,120 --> 02:46:05,600
आपकी हाथ में गीता पूछ रहा हूं क्या वो गीता वही रहेगी जो

2241
02:46:05,600 --> 02:46:09,960
है मैं आपकी गीता पूछ रहा हूं

2242
02:46:09,960 --> 02:46:14,280
अगर अगर वही रहेगी तो इसका मतलब अभी जो आप पकड़े

2243
02:46:14,280 --> 02:46:18,640
वो गीता नहीं है क्योंकि वो फटने के बाद भी वही है

2244
02:46:18,640 --> 02:46:22,800
और और अगर फटने के बाद में वो नहीं रहेगी तो फिर आप

2245
02:46:22,800 --> 02:46:26,920
खुद उसको फाड़ने की बात करते हो कई जगह पर गीता के

2246
02:46:26,920 --> 02:46:29,800
लोको को मानने से मना करते हो

2247
02:46:29,800 --> 02:46:34,120
ठीक है तो इसलिए मैं पूछ रहा हूं कि क्या इसके

2248
02:46:34,120 --> 02:46:38,160
कुछ पन्ने कुछ श्लोक काट दिए जाए कैची से तब भी

2249
02:46:38,160 --> 02:46:42,280
ये वही गीता रहेगी जिस गीता को मानने का अभी आप दावा कर रहे

2250
02:46:42,280 --> 02:46:46,360
हो बताओ वही गीता हम मान करेंगे जो

2251
02:46:46,360 --> 02:46:50,440
पहले वाली गीता है मैं अलग से नहीं बनाऊंगा मैं आपसे ये पूछ रहा हूं

2252
02:46:50,440 --> 02:46:54,640
बाबू भाई देखो मेरे पास बहुत ज्यादा समय नहीं है मुझे हो

2253
02:46:54,640 --> 02:46:58,960
चुका ढाई घंटा पौने तीन घंटा हम अगर जो गीता

2254
02:46:58,960 --> 02:47:03,120
आप पकड़े हो उसमें से अच्छा ये बताओ मेरे पास

2255
02:47:03,120 --> 02:47:07,480
भी गीता

2256
02:47:07,480 --> 02:47:11,640
है ये गीता है पूरी है इसमें

2257
02:47:11,640 --> 02:47:15,840
से मैं तत्वदर्शी वाला जो आपका पार्ट है वो फाड़ दूं

2258
02:47:15,840 --> 02:47:19,920
जी फिर कहूं साबित करके दिखाओ तत्वदर्शी है कि नहीं

2259
02:47:19,920 --> 02:47:23,920
कर दोगे भाई अगर एक में फाड़ देंगे लेकिन

2260
02:47:23,920 --> 02:47:28,000
एक और तो है डबल है ना उसमें से दिखा देंगे अरे मेरे भाई तो

2261
02:47:28,000 --> 02:47:32,400
इसका मतलब ये इसका मतलब यह गीता नहीं रह जाएगी ना

2262
02:47:32,400 --> 02:47:36,720
गीता तो वही कगी जो पूरी हो एक मिनट गीता वही कहलाए

2263
02:47:36,720 --> 02:47:41,040
गी जो पूरी हो जिसको रा ना गया हो जिसम कटिंग

2264
02:47:41,040 --> 02:47:45,280
ना की गई हो ये तो गीता नहीं कहलाए ना

2265
02:47:45,280 --> 02:47:50,200
कंप्लीट नहीं कहलाए कहलाए इनकंप्लीट ऐसे नहीं

2266
02:47:50,200 --> 02:47:54,360
ऐसे नहीं गीता को मानने का दावा तब करो जब गीता को कंप्लीट मानते

2267
02:47:54,360 --> 02:47:58,640
हो मानते हो कि नहीं अब ये बताओ जी मैं इस गीता को कंप्लीट

2268
02:47:58,640 --> 02:48:02,880
मानता हूं पूरा कारा मानते हो पूरा

2269
02:48:02,880 --> 02:48:07,520
का पूरा मानता हूं अच्छा तो भैया

2270
02:48:07,520 --> 02:48:13,520
छठवें अध्याय खोलो इनको छठवां अध्याय दिखाओ अभी जो खोला

2271
02:48:14,720 --> 02:48:19,920
था मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं द गीता

2272
02:48:19,920 --> 02:48:24,320
मैं आपकी जानकारी कर रहा हूं आप गीता को पूरा मानते हो कि नहीं पहले मैं तसल्ली

2273
02:48:24,320 --> 02:48:26,440
करूंगा

2274
02:48:26,440 --> 02:48:31,000
ठी कर लीजिए कर लीजिए कर लीजिए

2275
02:48:31,000 --> 02:48:37,000
हा छवा अध्याय खोलो

2276
02:48:47,240 --> 02:48:51,320
जी श्लोक नंबर बोलिए पहले मुझे

2277
02:48:51,320 --> 02:48:55,480
एक चीज क्लियर कर दो कि तत्वदर्शी कौन होता है जो शास्त्र के

2278
02:48:55,480 --> 02:49:00,200
अनुकूल भक्ति

2279
02:49:00,200 --> 02:49:04,760
बताए तत्वदर्शी का मतलब यह होता है वो तत्व ज्ञान को दे

2280
02:49:04,760 --> 02:49:08,800
देखिए अरे मेरे भाई शास्त्र के अनुकूल भक्ति बताए वो होता है

2281
02:49:08,800 --> 02:49:12,240
कि नहीं मैं पूछ रहा

2282
02:49:12,240 --> 02:49:17,120
हूं जैसे कि इस गीता में गीता

2283
02:49:17,120 --> 02:49:21,200
कहा देखो मैं पूछ रहा हूं तुम्हे दोबारा

2284
02:49:21,200 --> 02:49:25,960
शास्त्र के अनुकूल भक्ति बताने वाला तत्वदर्शी है कि नहीं

2285
02:49:25,960 --> 02:49:29,960
जी शास्त्र के अनुकूल ही बताने वाला तत्वदर्शी होता है जो शास्त्र में

2286
02:49:29,960 --> 02:49:34,120
लिखा हुआ है वही तर्शी होता है शास्त्र के अनुकूल

2287
02:49:34,120 --> 02:49:38,400
भक्ति बताए शास्त्र के अनुकूल ठीक है जी जी जी

2288
02:49:38,400 --> 02:49:44,400
ठीक है अब खोलो शलोक लोक क्रमांक 10

2289
02:49:57,760 --> 02:50:02,160
हा खुल गया सर

2290
02:50:02,160 --> 02:50:06,160
पढो मन अ इंद्रियों सहित शरीर को वश

2291
02:50:06,160 --> 02:50:11,040
में रखने वाला आशा रहित और संग्रह रहित योगी

2292
02:50:11,040 --> 02:50:15,080
अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा

2293
02:50:15,080 --> 02:50:20,760
को निरंतर परमात्मा में लगावे

2294
02:50:20,760 --> 02:50:24,840
यह बताते हैं रामपाल की

2295
02:50:24,840 --> 02:50:29,360
नहीं बताए है ना सर यह बताते हैं

2296
02:50:29,360 --> 02:50:34,240
जी जी ठीक है चलो अगला

2297
02:50:34,240 --> 02:50:37,560
पढ़ो

2298
02:50:37,560 --> 02:50:41,560
गवा गवा लिखा हुआ शुद्ध भूमि में जिसके ऊपर

2299
02:50:41,560 --> 02:50:45,600
क्रम से कुसा मृग छला और वस्त्र बिछे है

2300
02:50:45,600 --> 02:50:49,880
जो ना बहुत ऊंचा है और ना बहुत नि है

2301
02:50:49,880 --> 02:50:54,840
ऐसा अपने आसन को स्थिर स्थापन करके

2302
02:50:54,840 --> 02:50:59,000
उस आसन पर बैठकर चित अवर इंद्रियों की क्रियाओं

2303
02:50:59,000 --> 02:51:03,080
को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अंतः

2304
02:51:03,080 --> 02:51:07,960
करणी शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें सही बात है

2305
02:51:07,960 --> 02:51:12,000
बिल्कुल सही क नहीं य करने को कहते

2306
02:51:12,000 --> 02:51:17,000
नहीं बकुल बताते जी जीवा

2307
02:51:17,000 --> 02:51:21,080
पढ़ो ब पढ़े सर उस आसन पर

2308
02:51:21,080 --> 02:51:25,200
बैठकर चित और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में

2309
02:51:25,200 --> 02:51:29,360
रखते हुए मन को एकाग्र करके अंतः करणी शुद्धि

2310
02:51:29,360 --> 02:51:33,960
के लिए योग का अभ्यास करें बिल्कुल सही बात है

2311
02:51:33,960 --> 02:51:38,080
अच्छा और एक और पढ़ दो आगे

2312
02:51:38,080 --> 02:51:42,280
13वां काया सर और गले को

2313
02:51:42,280 --> 02:51:48,280
समान एवं अचल धारण करके अवर स्थिर होकर अपनी

2314
02:51:48,680 --> 02:51:52,920
नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि जमाकर अन्य दिशाओं

2315
02:51:52,920 --> 02:51:55,680
को ना देखते

2316
02:51:55,680 --> 02:51:59,920
हुए बरवा में है

2317
02:51:59,920 --> 02:52:03,920
ना देखता हुआ और 13 चवा पढ़ दो

2318
02:52:03,920 --> 02:52:08,160
चवा चवा ब्रह्मचारी के व्रत में

2319
02:52:08,160 --> 02:52:12,760
स्थित ब्रह्मचारी के ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित

2320
02:52:12,760 --> 02:52:16,960
भय रहित तथा भली भाति शांत अंतःकरण वाला

2321
02:52:16,960 --> 02:52:21,520
सावधान योगी मन को रोक कर मुझ में चित वाला अवर

2322
02:52:21,520 --> 02:52:25,760
मेरे परायण होकर स्थित होवे बहुत

2323
02:52:25,760 --> 02:52:30,320
बढ़िया उसने उसने बोल रहा है किन

2324
02:52:30,320 --> 02:52:34,320
अब ये बताओ जो तुम्हारे जो तत्वदर्शी है ये आसन बिछा के ऐसे

2325
02:52:34,320 --> 02:52:38,760
ही नासिका को अग्र भाग यह पीछे जो लिखा है रवा

2326
02:52:38,760 --> 02:52:42,760
कि नासिका पर ध्यान लगाओ एक चित्र हो करके और

2327
02:52:42,760 --> 02:52:47,240
आसन बिछा के बैठो ये सब बताते हैं रामपाल

2328
02:52:47,240 --> 02:52:51,440
नहीं बता इसको नहीं बताते इस

2329
02:52:51,440 --> 02:52:55,480
इस श्लोक की तरह नहीं बताते नहीं यह जो लिखा है

2330
02:52:55,480 --> 02:52:59,520
शुद्ध भूमि में जिसके ऊपर कुशा

2331
02:52:59,520 --> 02:53:04,120
मृग छलावा निकालो

2332
02:53:04,120 --> 02:53:08,280
गवा जी जी जी जी इसमें लिखा

2333
02:53:08,280 --> 02:53:12,360
है शुद्ध भूमि में जिसके ऊपर क्रमश आसन बिछाकर

2334
02:53:12,360 --> 02:53:16,520
बहुत ऊंचा नहीं हो आसन बिछाकर वहां पर बैठे और तपस्या करें ध्यान

2335
02:53:16,520 --> 02:53:20,760
लगाए यह बताते हैं कि नहीं जी जी बताते हैं इसको

2336
02:53:20,760 --> 02:53:25,120
अच्छा अब तुम कितने बड़े वाले धूर तो हो

2337
02:53:25,120 --> 02:53:29,400
जो तत्वदर्शी का खंडन कर रहे हो यहां पर बैठ कर के दिखाओ भैया इनको

2338
02:53:29,400 --> 02:53:33,600
पेज नंबर खोलो इनकी ज्ञान गरमा गीता की अभी

2339
02:53:33,600 --> 02:53:37,960
पता चलेगा तुम्हारी सच्चाई ूर्त कहीं

2340
02:53:37,960 --> 02:53:40,280
के

2341
02:53:40,280 --> 02:53:44,560
दिखाओ गरमा गीता की खोलो छवा

2342
02:53:44,560 --> 02:53:50,560
अध्याय खोलो

2343
02:53:53,920 --> 02:53:58,080
आप मुझसे गीता के ऊपर बात नहीं कर सकते इसलिए नहीं हमको बोलने

2344
02:53:58,080 --> 02:54:04,080
देते हो हां नीचे करो इसमें खोलो जरा छह से नौ वाला

2345
02:54:04,800 --> 02:54:09,240
श्लोक कोई मतलब नहीं है क्या बोल रहे हैं क्या नहीं बोल रहे हैं

2346
02:54:09,240 --> 02:54:12,720
चले आए मुंह उठा

2347
02:54:12,720 --> 02:54:16,720
के अभी तुम्हारी पोल खुलने वाली है रुक

2348
02:54:16,720 --> 02:54:21,040
जाओ हो जाओ बोलना नहीं बोलना

2349
02:54:21,040 --> 02:54:23,240
नहीं

2350
02:54:23,240 --> 02:54:27,440
जी से छ श्लोक एक का सारांश और नीचे चलो भैया और

2351
02:54:27,440 --> 02:54:30,600
नीचे

2352
02:54:30,600 --> 02:54:34,600
चलो पाच से छ और नीचे चलो आ से न

2353
02:54:34,600 --> 02:54:38,640
का सारांश अब और नीचे चलो थोड़ी और

2354
02:54:38,640 --> 02:54:43,280
नीचे चलो हा 10 से 15 आ गया आ गया ऊपर ऊपर है

2355
02:54:43,280 --> 02:54:47,560
हा य ये ठीक है हट योग करके

2356
02:54:47,560 --> 02:54:52,880
ध्यान कर गीता ज्ञान दाता का मत व्यर्थ

2357
02:54:52,880 --> 02:54:57,080
है य वह मना कर रहे हैं छठ अध्याय

2358
02:54:57,080 --> 02:55:02,080
के दवे लोक से लेकर 15 तक गलत है पढ़ो

2359
02:55:02,080 --> 02:55:06,960
चवा शलोक में भी तो बोला पढ़ो क्या लिखा है

2360
02:55:06,960 --> 02:55:11,560
गीता अध्याय शलोक पहले रुको बाबू रुक जाओ

2361
02:55:11,560 --> 02:55:16,120
गीता अध्याय लोक 10 से 15 का सारांश

2362
02:55:16,120 --> 02:55:21,040
इन लोको में एक स्थान पर बैठकर हट योग द्वारा

2363
02:55:21,040 --> 02:55:25,040
अभ्यास करने को कहा गया है जबकि फला फला

2364
02:55:25,040 --> 02:55:29,440
अध्याय में फला फला श्लोक में इसके विपरीत कहा गया है

2365
02:55:29,440 --> 02:55:34,000
जो एक स्थान पर बैठकर हट कर के इंद्रियों को रोककर साधना

2366
02:55:34,000 --> 02:55:38,200
करते हैं व पाखंडी हैं एक स्थान पर बैठ रहा

2367
02:55:38,200 --> 02:55:42,600
है तो निर्वाह कैसे होगा इस अध्याय श्लोक

2368
02:55:42,600 --> 02:55:45,760
छ इस अध्याय छ श्लोक 10 से 15

2369
02:55:45,760 --> 02:55:49,960
के आधार पर आज कल के भोले जिज्ञासु

2370
02:55:49,960 --> 02:55:54,080
अब अगर तुमको किसी ने य चीज बताई है रामपाल दास जी ने

2371
02:55:54,080 --> 02:55:58,880
तो तुम यहां पर भोले जिज्ञासु हो और उन्हें यह चीज बताने वाला कौन है

2372
02:55:58,880 --> 02:56:02,960
भक्त भोले जिज्ञासु भक्त आत्म ध्यान योग केंद्रों के चक्कर

2373
02:56:02,960 --> 02:56:07,280
लगाते हैं ध्यान साधना कोई अढ़ाई घंटे सुबह

2374
02:56:07,280 --> 02:56:11,320
शाम आवश्यक बताता है कोई किसी फिल्मी गाने की धुन

2375
02:56:11,320 --> 02:56:15,640
बजाकर नाच नाच कर दिखाता है फिर थक जाए

2376
02:56:15,640 --> 02:56:19,720
तब सब आसन पर निडल होकर आनंद तथा

2377
02:56:19,720 --> 02:56:24,520
फिर निद्रा को ध्यान की अंतिम स्थिति बताते

2378
02:56:24,520 --> 02:56:29,000
हुए एक मिनट कोई प्रश्न न लगाए

2379
02:56:29,000 --> 02:56:33,640
उत्तर मिलता है त्र पर लगाए

2380
02:56:33,640 --> 02:56:37,760
त्रिकुटी कोई प्रश्न करता है कि ध्यान त्रिकुटी

2381
02:56:37,760 --> 02:56:42,120
का उस साधक को कोई ज्ञान नहीं है तो इन्होंने शुरू

2382
02:56:42,120 --> 02:56:46,440
में ही कह दिया ऊपर कर दीजिए भैया

2383
02:56:46,440 --> 02:56:50,720
जरा इन्होंने श्लोक नंबर 10

2384
02:56:50,720 --> 02:56:55,240
से 15 तक जो ज्ञान है वह व्यर्थ

2385
02:56:55,240 --> 02:56:59,400
है और तुम कह रहे हो हमको तत्वदर्शी ने यह बताया है करने

2386
02:56:59,400 --> 02:57:05,040
को अरे तो चवा लोक में भी तो मना किया था कि इसको नहीं बताते

2387
02:57:05,040 --> 02:57:09,040
हैं मैं कह रहा हूं च को छोड़ दो को तो माना बवे

2388
02:57:09,040 --> 02:57:11,880
को तो

2389
02:57:11,880 --> 02:57:16,080
माना लेकिन 14 लोक अभी

2390
02:57:16,080 --> 02:57:20,120
तो आपने 11 12 के लिए भ इनको हटाओ के

2391
02:57:20,120 --> 02:57:24,680
साथ झूठे मक्कार व्यक्ति को हटाइए हटाइए

2392
02:57:24,680 --> 02:57:29,680
हटाइए

2393
02:57:29,680 --> 02:57:34,000
कितने बड़े झूठ बताइए झूठ

2394
02:57:34,000 --> 02:57:38,040
की कोई हद होती है अपने ही गुरु का खंडन कर रहे

2395
02:57:38,040 --> 02:57:42,280
हैं अपने ही गुरु को बचाने के लिए गुरु कह रहा है 10 से 15 तक

2396
02:57:42,280 --> 02:57:46,400
के श्लोक में व्यर्थ है और यहां हमसे छक लड़ाने के लिए आए हैं

2397
02:57:46,400 --> 02:57:51,280
और इसलिए बोल रहे हैं कि नहीं यह बताया है हमारे गुरु

2398
02:57:51,280 --> 02:57:55,360
नेरे शिवा पहली बार लोक पढ़े

2399
02:57:55,360 --> 02:57:59,880
वो वो पहली बार वो लोक देखे हैं

2400
02:57:59,880 --> 02:58:05,000
व इसलिए भटक

2401
02:58:05,000 --> 02:58:09,560
गए कुछ नहीं रामपाल जी बाबू को बाबू बना दिए रामपाल

2402
02:58:09,560 --> 02:58:13,960
दास जी ने व आसन पर बैठना बताया है क्या जो

2403
02:58:13,960 --> 02:58:18,600
गवा श्लोक है वह आपको बताया है भक्ति करने को

2404
02:58:18,600 --> 02:58:22,920
जी जी आप हारने लगते हैं तो हटा देते

2405
02:58:22,920 --> 02:58:27,960
हैंक रामपाल दास जी ने बताया है कि

2406
02:58:27,960 --> 02:58:32,160
नहीं हमने चवा शलोक आपको मना किया थावा शलोक सही नहीं है

2407
02:58:32,160 --> 02:58:36,240
उसने अपने बारे में बताया दिया मैंने चवा छोड़ दिया

2408
02:58:36,240 --> 02:58:41,040
बाकी के क्या करें बाकी को भी छोड़ दीजिए

2409
02:58:41,040 --> 02:58:45,120
उस दो प्रकार का आप कह रहे हो आप कह रहे हो किवा जो

2410
02:58:45,120 --> 02:58:49,320
है शलोक हमको बताया है रामपाल दास जी ने करने को रामपाल

2411
02:58:49,320 --> 02:58:53,440
दास जी कह रहे हैं गलत है वो श्लोक नहीं करना है नहीं करना है जब उन्होंने

2412
02:58:53,440 --> 02:58:58,400
मना कर दिया तो नहीं करना है उसको क्या दिक्कत है अब आप जाइए तेजी के साथ चलिए

2413
02:58:58,400 --> 02:59:02,720
गीता तो कह रही है ना ऐसे करने को देखो कितना कितना

2414
02:59:02,720 --> 02:59:06,720
धूर्त व्यक्ति है रामपाल दास जी ने मना किया तो

2415
02:59:06,720 --> 02:59:10,720
नहीं करना फिर अभी कह रहा था कि वो हमें क बताया है वो हमें बताया

2416
02:59:10,720 --> 02:59:15,200
है थोड़ा पीछे का सीन दिखा दो इनको जरा स्क्रीन में जब ये

2417
02:59:15,200 --> 02:59:19,400
11वां श्लोक पढ़ रहे थे बिल्कुल सही है बिल्कुल सही है ऐसे बोल रहे

2418
02:59:19,400 --> 02:59:20,200
इसको

2419
02:59:20,200 --> 02:59:24,320
हट योग बताया है रामपाल दास जी ने हट योग बताया

2420
02:59:24,320 --> 02:59:27,800
रामपाल दास जी

2421
02:59:27,800 --> 02:59:33,800
ने दिखाओ

2422
02:59:37,920 --> 02:59:42,680
इनको यह पाखंड है ना खुद ही अपने पोल खोल रहे हैं

2423
02:59:42,680 --> 02:59:46,840
ये जय श्री राम भाई जी जय श्री राम आज

2424
02:59:46,840 --> 02:59:50,920
तो आप नए अवतार में दिख थोड़ा आजकल हम बाहर

2425
02:59:50,920 --> 02:59:56,920
हैं सभी को एकादशी प्रबोधन एकादशी की बहुत बहुत

2426
02:59:57,040 --> 03:00:01,440
शुभकामनाएं बहुत बहुत आपको भी हार्दिक शुभकामनाए अब मेरा गला

2427
03:00:01,440 --> 03:00:07,440
बैठ गया तीन घंटे हो चुके हैं आज

2428
03:00:08,280 --> 03:00:10,720
बहुत

2429
03:00:10,720 --> 03:00:15,040
जैसे आए थे ना काशीराज ने उनको उकसाया था

2430
03:00:15,040 --> 03:00:19,400
को तुम भगवान बन जाओ तो वही दशा इनकी है

2431
03:00:19,400 --> 03:00:23,520
वही हमारे गुरुदेव कहते हैं मूर्ख और शक दूसरों के बजाने से

2432
03:00:23,520 --> 03:00:27,600
बचते हैं तो वही इनकी हालत है तो प को बड़ा घमंड हो गया

2433
03:00:27,600 --> 03:00:31,800
था मैं स्वयं

2434
03:00:31,800 --> 03:00:36,280
भगवान एक मिनट जरा इनको सुन लो

2435
03:00:36,280 --> 03:00:40,320
सुनाइए

2436
03:00:40,320 --> 03:00:43,120
क्या

2437
03:00:43,120 --> 03:00:47,120
प मन और इंद्रियों सहित शरीर को वश

2438
03:00:47,120 --> 03:00:52,000
में रखने वा आशा रहित और संग्रह रहित योगी

2439
03:00:52,000 --> 03:00:56,240
अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर

2440
03:00:56,240 --> 03:01:00,400
परमात्मा में लगावे यह बताते हैं रामपाल

2441
03:01:00,400 --> 03:01:04,560
की नहीं बताए सर ये बताते

2442
03:01:04,560 --> 03:01:10,560
हैं जी जी चलो अगला

2443
03:01:10,720 --> 03:01:14,880
पोवा लिखा शुद्ध भूमि में जिसके ऊपर क्रमश कुसा मृग छला

2444
03:01:14,880 --> 03:01:19,560
और वस्त्र बछ है जो न बहुत ऊचा है और बत नी है ऐसा

2445
03:01:19,560 --> 03:01:23,800
अपने आसन को स्थापन करके उस आसन पर बैठकर चित

2446
03:01:23,800 --> 03:01:28,000
अवर इंद्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अंतक

2447
03:01:28,000 --> 03:01:34,000
शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें सही बात है

2448
03:01:37,920 --> 03:01:42,040
ब बकल सही बात है और यह रामपाल दास

2449
03:01:42,040 --> 03:01:46,760
जी बताते हैं बिल्कुल सही बात है गुरु का द्रोह

2450
03:01:46,760 --> 03:01:51,200
और रामपाल दास जी बताते नैतिकता का द्रोह झूठ रामपाल

2451
03:01:51,200 --> 03:01:55,520
दास जी ने यह नहीं बताया वो मना कर रहे हैं श्लोक

2452
03:01:55,520 --> 03:01:59,560
क्रमां छ से छ का छठ अध्याय का जो दसव से लेकर

2453
03:01:59,560 --> 03:02:03,880
के पवा श्लोक है वो ठोक के कह रहे हैं यह काल का अपना

2454
03:02:03,880 --> 03:02:07,960
मत है यह मानने योग्य नहीं है और यह य बोल रहे हैं कि बिल्कुल

2455
03:02:07,960 --> 03:02:12,160
सही बात है और हमारे रामपाल दास जी ने बताया दो बातें हो गई

2456
03:02:12,160 --> 03:02:14,880
एक गुरु

2457
03:02:14,880 --> 03:02:19,320
द्रोह क्यों क्योंकि गुरु जो कह रहा है उसके विपरीत तुम कह रहे हो

2458
03:02:19,320 --> 03:02:23,360
और दूसरा दूसरा क्या है नैतिकता

2459
03:02:23,360 --> 03:02:27,680
का द्रोह झूठ बोल रहे हो कि रामपाल दास जी नेय बताया है किस लिए

2460
03:02:27,680 --> 03:02:31,840
जबक जब तक बुद्धि में एकाग्रता नहीं आएगी तब तक वो कुछ

2461
03:02:31,840 --> 03:02:36,040
नहीं कर सकती उन क्यों उनका तो रत ज्ञान है जितना ज्ञान रामपाल

2462
03:02:36,040 --> 03:02:40,400
जी ने बताया किताब खोल करके उससे आगे आप उनको कहीं भी पूछ लो

2463
03:02:40,400 --> 03:02:44,520
कहीं कुछ नहीं बताने वाले मतलब इनको समझाना

2464
03:02:44,520 --> 03:02:48,520
स दीवाल पर सिर मारने के समान है वो तो आप पर

2465
03:02:48,520 --> 03:02:52,560
भगवान इतनी क् रखी है कि आप इतना उनके साथ सर खपा

2466
03:02:52,560 --> 03:02:53,640
लेते हैं

2467
03:02:53,640 --> 03:02:58,440
हमारे बस का नहीं है पर हमें जब तक हम आपका शो नहीं देखते हैं

2468
03:02:58,440 --> 03:03:03,160
उत्तराखंड में हूं बड़ी ठंड है यति की म

2469
03:03:03,160 --> 03:03:07,840
इस व्यक्ति की मूर्खता की पराकाष्ठा देखिए आप

2470
03:03:07,840 --> 03:03:11,960
आज ही हमने अपनी लाइव में बताया है कि छव अध्याय के

2471
03:03:11,960 --> 03:03:16,160
10 से लेकर पवे श्लोक को रामपाल दास ने मानने से मना

2472
03:03:16,160 --> 03:03:20,160
किया है उसका कोई भी कारण दिया हो सही

2473
03:03:20,160 --> 03:03:24,640
बात और ये व्यक्ति तब भी आ कर के बोलना बिल्कुल सही है बिल्कुल सही

2474
03:03:24,640 --> 03:03:28,720
क्यों हराने आया हूं उसको मतलब नहीं है कि

2475
03:03:28,720 --> 03:03:33,120
धर्म जीते ईश्वर जीते गुरु जीते यह मतलब

2476
03:03:33,120 --> 03:03:37,320
नहीं है उनके से कोई लेना शिवा नारायण द्विवेदी

2477
03:03:37,320 --> 03:03:42,560
को आहवान को चुप कैसे कराया जाए

2478
03:03:42,560 --> 03:03:47,840
बस जी पाड़ी ये हरर महादेव सभी लोगम

2479
03:03:47,840 --> 03:03:51,960
ये दिक्कत जब होती है जब खुद कुछ नहीं पढ़ते हैं दूसरे की

2480
03:03:51,960 --> 03:03:56,200
बातों को मान लेते हैं ना तब होता है ऐसी स्थिति ब सुनी सुनाई

2481
03:03:56,200 --> 03:03:58,440
बात

2482
03:03:58,440 --> 03:04:02,920
है शिवांश जी को देख देख देख कर के तो वो भी सीख गए

2483
03:04:02,920 --> 03:04:07,040
उनको तो कुछ पता ही नहीं था वो तो शिवांश जी ने दिखा सिखा दिया उनको

2484
03:04:07,040 --> 03:04:11,040
इतना भी मगर फिर भी वो कहते हैं ना कि बिल्ली शेर को

2485
03:04:11,040 --> 03:04:15,320
सब सिखाती है मगर छलांग मारना नहीं सिखाती ये कितना

2486
03:04:15,320 --> 03:04:19,400
भी कर ले जैसे ही दर्शन वाला भाग आएगा ईश्वर

2487
03:04:19,400 --> 03:04:23,560
ने सब कुछ कैसे किया यह वाला भाग जब आएगा इन लोगों के आज

2488
03:04:23,560 --> 03:04:27,880
तक किसी ने जवाब दिया हो तो बता दो किसी ने नहीं जवाब

2489
03:04:27,880 --> 03:04:32,920
किसी ने नहीं आश्चर्य वाली बात यह

2490
03:04:32,920 --> 03:04:35,600
देखिए जो है

2491
03:04:35,600 --> 03:04:40,360
सारे ज्ञानी थे ब्रह्मा विष्णु

2492
03:04:40,360 --> 03:04:44,520
महेश दुर्गा और ब्रह्म इनका पिता

2493
03:04:44,520 --> 03:04:49,240
सर पुरुष और सतयुग के ब्राह्मण ये सारे

2494
03:04:49,240 --> 03:04:50,720
अज्ञानी लो

2495
03:04:50,720 --> 03:04:54,720
यथ ज्ञान भ सारे अज्ञानी है एक मिनट बंद

2496
03:04:54,720 --> 03:04:59,040
कर दीजिए बस ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती

2497
03:04:59,040 --> 03:05:03,160
गणेश ब्रह्म सब अज्ञानी है तो वह जो शास्त्र दे रहे

2498
03:05:03,160 --> 03:05:09,080
हैं उसमें अज्ञान होगा या ज्ञान होगा

2499
03:05:09,080 --> 03:05:13,480
बताइए अज्ञान होगा तो जब उसमें अज्ञान है

2500
03:05:13,480 --> 03:05:17,720
और उसके आधार पर आप कह रहे हो वेदों में प्रमाण है और कबीर भगवान है

2501
03:05:17,720 --> 03:05:23,720
तो इसका मतलब यह भी अज्ञानता

2502
03:05:26,040 --> 03:05:30,720
है हमारे गुरु जी कहते हैं कि दोष हो तो मिट जाएगा

2503
03:05:30,720 --> 03:05:34,960
स्वभाव में ही उनका जो है अज्ञान अज्ञानता भरी हुई है तो

2504
03:05:34,960 --> 03:05:39,040
स्वभाव मिट नहीं सकता उनका दोष हो

2505
03:05:39,040 --> 03:05:42,080
तो दूर हो

2506
03:05:42,080 --> 03:05:46,480
जाएगा शिवांश भाई एक चीज आपने देखा है

2507
03:05:46,480 --> 03:05:50,880
एक चीज आपने देखा कि आप जब से डिबेट

2508
03:05:50,880 --> 03:05:54,920
करने लगे हैं तो लोगों के पास अब भगवत गीता की नई किताब आ

2509
03:05:54,920 --> 03:05:59,160
गई [संगीत]

2510
03:05:59,160 --> 03:06:03,280
है कुछ दिनों तक य चलता रहा तो जैसे आपके पीछे रखे

2511
03:06:03,280 --> 03:06:05,880
हुए ग्रंथ है ऐसे हो सकता है उनके पास

2512
03:06:05,880 --> 03:06:11,600
भी ग्रंथ आ जाए अरे और चल गया थोड़े दिन

2513
03:06:11,600 --> 03:06:15,640
तो रामपाल के फॉलोअर नहीं रहेंगे और थोड़े दिन

2514
03:06:15,640 --> 03:06:19,720
चलता रहा तो पूर्णत सना हो जाएंगे वो बोलेंगे

2515
03:06:19,720 --> 03:06:24,400
रामपाल जी आप जेल में रहो ये लोग एक्चुअली कर क्या रहे हैं

2516
03:06:24,400 --> 03:06:28,520
कि जीतने के लिए रामपाल ने बोला हो या ना बोला हो ये

2517
03:06:28,520 --> 03:06:32,880
हमारी बात को कॉपी कर रहे हैं जीतने के लिए कॉपी करते

2518
03:06:32,880 --> 03:06:36,880
करते अंत में आएंगे कहां कि मैं एक दिन पूछूंगा गणेश जी की

2519
03:06:36,880 --> 03:06:41,760
भक्ति बताई है हां बताई है करते हो हां करते

2520
03:06:41,760 --> 03:06:45,840
हैं अभी एक दिन एक व्यक्ति बोल के गया है एक दिन एक व

2521
03:06:45,840 --> 03:06:50,280
बोल गया करते हैं भगवती की भक्ति करते हैं रामपाल

2522
03:06:50,280 --> 03:06:54,320
दास जी जेल में बोल के गया जीतने के

2523
03:06:54,320 --> 03:06:58,520
चक्कर में ये हां हां हां हां करते जाएंगे और एक दिन वही

2524
03:06:58,520 --> 03:07:02,520
बन जाएंगे जो हमें बनाना है यह सोच रहे हैं कि हम

2525
03:07:02,520 --> 03:07:06,520
हरा रहे हैं और हम वस्तुत हम जीत रहे हैं

2526
03:07:06,520 --> 03:07:10,000
बिल्कुल

2527
03:07:10,000 --> 03:07:14,360
ब इन लोग पिछले दो घंटे से आपने इतनी

2528
03:07:14,360 --> 03:07:20,280
खोल खोल के दिखाया फिर भी मैं कमेंट देख रहा था आपके नीचे

2529
03:07:20,280 --> 03:07:24,600
शिवांश अज्ञानी है शिवांश अज्ञानी है मतलब सामने

2530
03:07:24,600 --> 03:07:28,840
खोल खोल के भी जो चीज दिखाई उसको देखने के बाद भी यह बोल

2531
03:07:28,840 --> 03:07:32,840
कि अज्ञानी है तो इसका मतलब कि यह तो भ्रम जाल में जी रहे

2532
03:07:32,840 --> 03:07:36,920
हैं फिर अगर कोई शास्त्र

2533
03:07:36,920 --> 03:07:41,240
कोई दूसरा खोल के दिखा रहा है वह गलत है हां अगर रामपाल कुछ मनगण

2534
03:07:41,240 --> 03:07:46,040
कहानिया भी आके दूसरे दिन बता रहा है वो सही है तो ये

2535
03:07:46,040 --> 03:07:50,520
ब्रेन वश ही हुआ एक तरफ

2536
03:07:50,520 --> 03:07:54,560
से जिसको समझना था मैं शिवांश भाई मैं सही बताऊ

2537
03:07:54,560 --> 03:07:58,720
मैं तीन लोगों को रामपाल के चंगुल से मैं निकाल चुका हूं पिछले

2538
03:07:58,720 --> 03:08:02,720
एक महीने में अच्छा वो

2539
03:08:02,720 --> 03:08:07,880
भी छछ सा सात साल के जिन्होने नाम दीक्षा ले रखी

2540
03:08:07,880 --> 03:08:12,440
थी मैंने उनसे सिर्फ इतना बोला आप मेरी बात मत मानो

2541
03:08:12,440 --> 03:08:16,560
आप किसी की बात मत मानो भगवत गीता है उठाओ

2542
03:08:16,560 --> 03:08:20,720
श्लोक एक से लेकर श्लोक 700 तक कंटिन्यू पढ़ो बीच का

2543
03:08:20,720 --> 03:08:25,120
कोई भी श्लोक मिस मत करना पहला जो श्लोक का जो शब्द आता है

2544
03:08:25,120 --> 03:08:29,520
ध गीता का और लास्ट शब्द जो आता है मर धर्म

2545
03:08:29,520 --> 03:08:33,760
ये ये बाबूराम पूछ रहे हैं यदि अज्ञानी नहीं हो तो हटाए क्यों क्योंकि

2546
03:08:33,760 --> 03:08:37,800
गुरु द्रोही से क्या बात करें तुम आए हो रामपाल दास का

2547
03:08:37,800 --> 03:08:41,840
पक्ष रखने और रामपाल दास जी की दास का ही विरोध कर

2548
03:08:41,840 --> 03:08:46,320
रहे हो तो तुमसे बात क्या करें पहले अपनी चीज तो क्लियर करो कि रामपाल

2549
03:08:46,320 --> 03:08:52,120
का पक्ष नहीं मैं रामपाल का द्रोही हूं फिर

2550
03:08:52,120 --> 03:08:56,440
आना जब जब उन्होंने गीता पढ़नी शुरू करी

2551
03:08:56,440 --> 03:09:01,040
लगभग एक महीने डेढ़ महीने दो महीने तक उन्होंने मेरे से खूब बहस करी

2552
03:09:01,040 --> 03:09:05,120
खूब बहस करी खूब बहस करी लास्ट में जब मैंने बोला कि

2553
03:09:05,120 --> 03:09:09,200
आप खुद गीता पढ़ लीजिए शुरू से मैंने एक एग्जांपल दिया उनको

2554
03:09:09,200 --> 03:09:14,320
कि मैंने गुस्से से कह दिया कि आप चोर हो

2555
03:09:14,320 --> 03:09:18,400
तो मेरे ऊपर बरस पड़े बरस पड़ा बोला से बोल ले कि चोर हो मैंने

2556
03:09:18,400 --> 03:09:22,480
कहा भाई बात तो पूरी सुनो मैं समझता था आपको चोर हो आप तो आप तो बहुत

2557
03:09:22,480 --> 03:09:26,680
अच्छे व्यक्ति हो इससे क्या समझे आप बोला

2558
03:09:26,680 --> 03:09:30,920
अब उसके दिमाग में तो सिर्फ रामपाल बैठा है तो मैंने कहा कि इसका मतलब

2559
03:09:30,920 --> 03:09:35,360
यह हुआ कि आपने आधी ही बात सुनी मेरी पूरी बात आपने नहीं सुनी

2560
03:09:35,360 --> 03:09:40,440
आपने पूरी बात सुननी है तो आप पूरी गीता पढ़िए

2561
03:09:40,440 --> 03:09:44,920
तब आपको समझ में आएगा कि भगवान किसकी शरण में जाने को बोल रहे हैं और

2562
03:09:44,920 --> 03:09:49,000
किसको पापों से मुक्ति कराने के लिए कह रहे हैं तुम कह रहे हो कि भग अर्जुन

2563
03:09:49,000 --> 03:09:53,080
तो पहले ही उनके शरण में था वहां क्या शिक्षा लेने के लिए

2564
03:09:53,080 --> 03:09:57,320
शरण में था यहां पापों की मुक्ति के लिए शरण में आने को बोलने हैं

2565
03:09:57,320 --> 03:10:01,320
दो चीज हो गई देखिए शरण वाली बात तो ऐसी

2566
03:10:01,320 --> 03:10:05,400
है कि कोई अपने सवालों की जानकारी मांगने

2567
03:10:05,400 --> 03:10:09,600
गया कि मैं आपकी शरण में आया हूं मुझे मेरे सवालों

2568
03:10:09,600 --> 03:10:13,880
का हल बताओ मेरी प्रॉब्लम कहां से सॉल्व होगी जी

2569
03:10:13,880 --> 03:10:17,960
तो उन्होंने सब कुछ बता दिया और यह बताया कि तेरी प्रॉब्लम मुसे ही

2570
03:10:17,960 --> 03:10:22,480
सॉल्व होगी तू मेरी शरण में आ और कहीं मत जा

2571
03:10:22,480 --> 03:10:26,720
सिंपल जिस रूप को तू मेरे अभी तक जानता था उससे भिन्न

2572
03:10:26,720 --> 03:10:30,720
मेरा जो रूप है उसको जान लिया है जब उस रूप के साथ

2573
03:10:30,720 --> 03:10:34,840
मुझे स्वीकार करते हुए अब इस रूप को प्राप्त करने के निमित्त मेरी

2574
03:10:34,840 --> 03:10:38,880
शरण में आ यह भागवत के एकादश स्कंद में

2575
03:10:38,880 --> 03:10:43,360
भी है मुक्ति स्कंद भागवत का बहुत अ सारांश है विस्तृत सारांश

2576
03:10:43,360 --> 03:10:47,400
है भागवत के एकादश स्कंध में

2577
03:10:47,400 --> 03:10:51,440
तो आपकी जो डिबेट देख के बहुत

2578
03:10:51,440 --> 03:10:55,440
से लोगों का जो मन है वो चेंज हुआ है नीचे कमेंट से भी

2579
03:10:55,440 --> 03:10:59,800
मैं देखता हूं इससे पहले कमेंट से मैंने देखे थे कुछ लोग थे जो

2580
03:10:59,800 --> 03:11:05,800
जाल में थे वो लोग बाहर निकल रहे हैं अच्छी बात हैय

2581
03:11:06,040 --> 03:11:10,240
चलिए भैया मैं वो पवन दास की वीडियो देखा था जो बताए

2582
03:11:10,240 --> 03:11:14,320
थे ना क्या पवन दास

2583
03:11:14,320 --> 03:11:18,320
वानस की वीडि देखा था मैं हां वो आपको बोला

2584
03:11:18,320 --> 03:11:22,400
ये काल है आपको फसा रहा है अब

2585
03:11:22,400 --> 03:11:26,440
वो तो ठीक है मगर उन्होने उसने मेरे बारे में बोलते हुए इन

2586
03:11:26,440 --> 03:11:30,600
लोगों के लिए क्या क्या बोला वो तो सोचो भाई मैं तो विरोधी

2587
03:11:30,600 --> 03:11:34,840
पार्टी हु तो मुझे मुझे थोड़ी ना मेरे को कह देगा कि वो राइट है मगर

2588
03:11:34,840 --> 03:11:39,000
वो बोल रहा है कि तुम लोगों की ना शक्ल है ना सूरत है तुम लोग जाकर मुह उठा के चले

2589
03:11:39,000 --> 03:11:45,000
जाते हो इतनी हसी आई इतनी ऐसी

2590
03:11:45,320 --> 03:11:49,360
आई चलिए अमित जी की बात सुन ले फिर इस

2591
03:11:49,360 --> 03:11:53,480
चर्चा को हम लोग समाप्त करते हैं तीन घंटे हो चुके हैं

2592
03:11:53,480 --> 03:11:57,720
जय श्री राम जी जय श्रीम ज श्री राम

2593
03:11:57,720 --> 03:12:01,960
जय श्रम मेरा कहना यह है कि

2594
03:12:01,960 --> 03:12:06,120
वैसे तो मैं भी दो चार सवाल इनसे पूछना चाहता था पर अवसर नहीं मिला कोई बात नहीं नेक्स्ट टाइम

2595
03:12:06,120 --> 03:12:11,080
जरूर आप सवाल पूछना जब य

2596
03:12:11,080 --> 03:12:15,240
क्वेश्चन आप करते हो क्या ब्रह्मांड का ईश्वर कबीर है

2597
03:12:15,240 --> 03:12:19,320
कते हर चीज कबीर ने बनाई है जब कबीर ने सारी चीज बनाई है तो

2598
03:12:19,320 --> 03:12:23,440
जब असली रूप में 500 साल पहले पैदा हुआ था तो दो रोटी क

2599
03:12:23,440 --> 03:12:27,520
भी नहीं कमा पाता था पहनने के लिए दो कपड़े नहीं थे तो ब्रह्मांड

2600
03:12:27,520 --> 03:12:31,680
का ईश्वर कैसे हो गया फिर इनसे

2601
03:12:31,680 --> 03:12:36,720
पूछा जाता है कितने दिन में ब आए तो पूछ लीजिएगा

2602
03:12:36,720 --> 03:12:40,760
जरूर दो तीन और बात है बेशक आप याद रख लीजिएगा मैं ह

2603
03:12:40,760 --> 03:12:44,800
ना हू एक कुछ पूछ कबीर ने कते दिन

2604
03:12:44,800 --> 03:12:47,440
में बनाई

2605
03:12:47,440 --> 03:12:51,560
ये ईश्वर है कि राज मिस्त्री है

2606
03:12:51,560 --> 03:12:55,640
और तीसरा दिन में तो किसी का बाथरूम नहीं

2607
03:12:55,640 --> 03:12:59,640
बनता बताने सृष्टि बना दी दिन में साइंस नहीं पढ़ी इन लोगों ने सास के हिसाब

2608
03:12:59,640 --> 03:13:00,320
से भी

2609
03:13:00,320 --> 03:13:04,520
13.8 अरब साल

2610
03:13:04,520 --> 03:13:08,680
लगे नहीं यह तो ईश्वर का मन है अगर वह अपने मन से नहीं बना

2611
03:13:08,680 --> 03:13:12,760
पा रहा है तो ईश्वर कैसा स ईश्वर का मन है व सोचे

2612
03:13:12,760 --> 03:13:17,200
और सृष्टि बन जाए और एक चमत्कार वा

2613
03:13:17,200 --> 03:13:21,480
ईश्वर का मन है चाहे तो सालो लगा दे सृष्टि बनाने

2614
03:13:21,480 --> 03:13:26,080
में एक बात यह भी तो देखिए 500 साल पहले जो व्यक्ति 5000

2615
03:13:26,080 --> 03:13:30,200
पीछे जाकर भगवान कृष्ण के शरीर में घुस के काल बन रहा है यह

2616
03:13:30,200 --> 03:13:32,960
कैसा चमत्कार

2617
03:13:32,960 --> 03:13:36,960
है क्या है चौथा बंदी छोड़

2618
03:13:36,960 --> 03:13:41,040
बंदी छोड़ करते रहते हैं पता नहीं कौन सा बंदी छोड़ है

2619
03:13:41,040 --> 03:13:45,120
या तो जेल में बंद है उनको फिर बंद बना

2620
03:13:45,120 --> 03:13:49,360
मतलब मुक्ति अच्छा मेरे को लगा इनकी कोई बंदी

2621
03:13:49,360 --> 03:13:53,480
भाग गई मगर वो मुक्ति है नहीं वहां जाके भी लालसा बाकी रह जाती

2622
03:13:53,480 --> 03:13:57,600
है ठीक है च कुछ कहना

2623
03:13:57,600 --> 03:14:01,720
हो तो बताइए आखरी बात और मैं ये कह रहा हूं कि कुछ नई बात आज

2624
03:14:01,720 --> 03:14:05,760
पता चली है इनके सतलोक में भी जा काजू बादाम ही खाना पड़ रहा है

2625
03:14:05,760 --> 03:14:10,160
पंखे की हवा खानी पड़ रही है वो चीज तो धरती पर भी उपलब्ध है बकल

2626
03:14:10,160 --> 03:14:15,520
वाइ दुनिया में रह रहे तो यहां तो सब कुछ कलरफुल

2627
03:14:15,520 --> 03:14:19,680
है बाकी क्या बोलेगे तो

2628
03:14:19,680 --> 03:14:23,800
शास्त्रों की क्या नाम है एक चीज और मैं कहना चाहता हूं

2629
03:14:23,800 --> 03:14:28,200
शास्त्रों में वर्णन है कि अज्ञानी लोगों के आगे शास्त्र नहीं खोलना चाहिए जो अयोग्य

2630
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लोग है उनको ना पढ़नी चाहिए ना सुननी चाहिए

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बात कल से कम से कम 50 लोग कह

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03:14:41,120 --> 03:14:46,040
चुके हम किसी किसी को शास्त्र नहीं दिखा रहे

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03:14:46,040 --> 03:14:50,400
हम सामने वाले को निरुत्तर होता हुआ या जो अधर्म

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03:14:50,400 --> 03:14:55,160
फैला रहा है गलत बात फैला रहा है उसको दिखाकर जो

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03:14:55,160 --> 03:14:59,320
हमारे लोग जो फस सकते हैं उन्हें फसने से बचा रहे हैं

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03:14:59,320 --> 03:15:05,320
और हमारे लोग जो फसे हुए हैं उन्हें वापस लाने का प्रयास कर

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रहे बात केलिए आपकी बत प्र बहुत अच्छा काम कर

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रहे लेकिन फिर भी है अयोग्य के आगे

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03:15:15,560 --> 03:15:19,600
शास्त्र का ज्यादा वणन श कोने पाप लगता

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है तो मैं उस पाप को भुगत मैं अपने धर्म की रक्षा

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के लिए उस पाप को भुगतने के लिए तैयार हूं भाई और क्या बता

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03:15:28,320 --> 03:15:32,680
महाराजा बुद्धिमान होने के बाव ब्रा को

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03:15:32,680 --> 03:15:37,040
उ एक रस की कहानी है

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कि पता नहीं क्या हुआ था तो रुक्मिणी जी

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से या लक्ष्मी जी से जब उ उन्होंने वो डिमांड की

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कुछ ऐसा करने की जो श्री कृष्ण भगवान के विरुद्ध

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था मान लो झूठ बोलने की डिमांड की कि आप जो

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है झूठ अगर बोल दोगे श्री कृष्ण से तो श्री कृष्ण

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को यह फायदा हो जाएगा श्री कृष्ण से अगर आप

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03:16:04,520 --> 03:16:08,960
झूठ बोल दोगे तो आपको यह फायदा हो जाएगा तो लक्ष्मी

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03:16:08,960 --> 03:16:13,040
माता या रुक्मिणी माता ने उस समय मना कर दिया कि

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03:16:13,040 --> 03:16:17,240
नहीं नहीं मैं अपना मैं अपने पति से झूठ नहीं बोलूंगी अप मैं अपने पत्नी

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व्रता पतिव्रता धर्म का त्याग नहीं करूंगी जो

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पति से सच ही बोलूंगी मैं ऐसा एक एग्जांपल दे रहा हूं मुझे एक्जेक्टली

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03:16:25,360 --> 03:16:30,560
याद नहीं है वो क्या कथा थी क्या मांगा था डिमांड क्या थी

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03:16:30,560 --> 03:16:34,800
मगर फिर वही जो ऋषि थे वही ऋषि गोपियों के पास गए

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03:16:34,800 --> 03:16:38,880
या राधा के पास गए राधा जी के पास उनसे वही बात बताई कि अगर

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03:16:38,880 --> 03:16:42,880
तुम ऐसा कर दोगी छल श्री कृष्ण के साथ तो

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03:16:42,880 --> 03:16:46,920
श्री कृष्ण को यह फायदा हो जाएगा तो उन्होंने कहा

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03:16:46,920 --> 03:16:51,320
अच्छा हम तो करेंगे तो उन्होंने कहा अरे इसमें तुम्हें पाप

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03:16:51,320 --> 03:16:56,440
लगेगा अरे पाप लगता है तो लगने दो श्री

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03:16:56,440 --> 03:17:00,960
कृष् गोपियों के विषय में भी कुछ ऐसी कथा है कि उ चरणों की

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03:17:00,960 --> 03:17:02,720
ल भगवान

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श्री कुरुक्षेत्र की कहानी है भगवान को

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क्या हुआ था भगवान बहुत बीमार हुए थे भगवान एक लीला की थी कुरुक्षेत्र

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लास्ट में ग्रहण लगा था तो भगवान ने कहा कि गए लोग

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बोला जो पैर का धुला हुआ पानी पिलाए उसी से श्री

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कृष्ण जी ठीक हो जाएंगे रुक्मिणी जी के पास पहले

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रुण कोने कहा मुझे मेरे को पाप लग जाएगा मैं नरक में थोड़ी ना

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जाना चाहती हूं सबके पास गए मना किया फिर राधा

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जी के पास गए लास्ट में राधा जी ने कहा कि पाप लगना है तो लगने दो

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जो भी हो सकता है पानी जो है पैर का धुला हुआ भगवान जी को

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पिला दो मेरा इसमें कोई वो नहीं है यह कहानी है

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चलिए फिर सभी को जय श्री राम जय श्री राम

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हद हर हर महादेव हर हर महादेव

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[संगीत]
