1
00:00:02,240 --> 00:00:06,880
तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे।

2
00:00:06,880 --> 00:00:09,600
अ

3
00:00:09,600 --> 00:00:13,680
सबसे पहले एक

4
00:00:13,680 --> 00:00:17,840
आपको शुभ समाचार प्रदान करना है। आदित्य [नाक से की जाने वाली आवाज़] वाहिनी

5
00:00:17,840 --> 00:00:22,240
की अपनी गौशाला लखनऊ में लक्ष्मणपुरी में प्रारंभ

6
00:00:22,240 --> 00:00:26,320
हो चुकी है और बेसिकली हमने इस गौशाला का

7
00:00:26,320 --> 00:00:31,440
निर्माण किया है जो

8
00:00:31,440 --> 00:00:35,600
जिनका कोई देखरेख करने वाला नहीं होती होता है। ऐसा जो गौवंश

9
00:00:35,600 --> 00:00:39,760
होता है जो हमें सड़कों पर मिलता है और कई बार उनको

10
00:00:39,760 --> 00:00:44,480
चोट होती है या उनको रोग होता है

11
00:00:44,480 --> 00:00:49,200
और उनको समय पर चिकित्सा नहीं प्राप्त हो पाने के कारण कई बार

12
00:00:49,200 --> 00:00:53,280
उनका शरीर भी छूट जाता है। शरीर नहीं छूटता है तो उन्हें

13
00:00:53,280 --> 00:00:57,520
बहुत सारे समय तक कष्ट

14
00:00:57,520 --> 00:01:01,760
का सामना करना पड़ता है। तो ऐसे सभी गौवंश जो हमें

15
00:01:01,760 --> 00:01:07,760
लक्ष्मणपुरी में हमने व्यवस्था कर ली है। ये

16
00:01:07,840 --> 00:01:11,840
गौवंश को अब लक्ष्मणपुरी में यदि हमारी जानकारी में ऐसा कुछ आएगा तो

17
00:01:11,840 --> 00:01:16,640
हम अवश्य ही उनको एक संरक्षण प्रदान कर पाएंगे।

18
00:01:16,640 --> 00:01:22,640
तो यह गुरुदेव के कुछ वचन थे कि

19
00:01:25,120 --> 00:01:30,960
अपने जैसे 10 और खड़े करिए। पहले स्वयं

20
00:01:30,960 --> 00:01:35,040
स्वयं मैदान में उतरिए फिर अपने जैसे 10 अन्य को खड़ा

21
00:01:35,040 --> 00:01:39,520
करिए। तो उसी दिशा में यह हमारा प्रयास है और

22
00:01:39,520 --> 00:01:43,920
बहुत जल्द वीडियो इत्यादि के माध्यम से वहां की कुछ

23
00:01:43,920 --> 00:01:48,080
झलकियां आपको मिल जाएंगी गौशाला की।

24
00:01:48,080 --> 00:01:52,800
अभी फिलहाल आज हमारे साथ जो चर्चा

25
00:01:52,800 --> 00:01:56,880
में आ रहे हैं मयंक जायसवाल जी इनके साथ एक दो ढाई घंटे की

26
00:01:56,880 --> 00:02:01,440
चर्चा पहले पूर्व में हो चुकी है और उसमें

27
00:02:01,440 --> 00:02:06,160
कई सारी चीजें हैं जो स्पष्ट होती हैं उस चर्चा में भी उसी

28
00:02:06,160 --> 00:02:10,320
चर्चा को अभी कंटिन्यू किया जा रहा है और जिसने वह चर्चा नहीं देखी

29
00:02:10,320 --> 00:02:14,400
है तो वह उस चर्चा को अवश्य देख ले क्योंकि इस चर्चा में ऐसी कई बातें

30
00:02:14,400 --> 00:02:18,400
होने वाली हैं जो उस चर्चा से रिलेट हो करेंग तो इसलिए

31
00:02:18,400 --> 00:02:22,480
आप लोग उसको भी अवश्य देख लें। बहुत ही सारगर्भवित और

32
00:02:22,480 --> 00:02:22,980
अच्छी चर्चा

33
00:02:22,960 --> 00:02:26,960
रही थी वो। जो भी पक्ष है जो कुछ समझना चाहता है अवतार विषय

34
00:02:26,960 --> 00:02:30,960
को लेकर के वो विरोध और प्रतिकार

35
00:02:30,960 --> 00:02:35,280
बाद की बात है मगर उससे काफी कुछ जानने को मिलेगा। निष्पक्ष

36
00:02:35,280 --> 00:02:38,800
होकर के देखें। जी

37
00:02:38,800 --> 00:02:43,840
जय श्री राम मयंक जी।

38
00:02:43,840 --> 00:02:49,840
आवाज आ रही है मेरी?

39
00:02:50,800 --> 00:02:55,600
हेलो जी जय श्री राम जी जय श्री राम अटक

40
00:02:55,600 --> 00:02:59,680
जी बताएं रहा है मेरा मेरा अटक रहा है या

41
00:02:59,680 --> 00:03:03,760
आपका अटक रहा है अटक रहा है अटक रहा है आपका पिक्चर

42
00:03:03,760 --> 00:03:07,760
अटक रहा है मैं मैं दूसरे फोन से आता हूं ये अटक रहा है

43
00:03:07,760 --> 00:03:11,920
मुझे सुनाई नहीं दे रहा हां जी हां जी नहीं मेरी साइड से मेरी साइड से मेरी साइड

44
00:03:11,920 --> 00:03:16,160
से आप दूसरे फोन दूसरे फोन से आ जाइए आप हां मैं एक काम करता हूं दूसरे पहुंचाता

45
00:03:16,160 --> 00:03:22,160
हूं। एक मिनट। हां।

46
00:03:26,160 --> 00:03:30,640
आज सुबह एक बड़ी ही मार्मिक चर्चा

47
00:03:30,640 --> 00:03:34,800
हमने की थी जिसमें कि सरिता

48
00:03:34,800 --> 00:03:39,200
शर्मा जी थी जिन्होंने अपनी आपबीती सुनाई कि कैसे उनकी

49
00:03:39,200 --> 00:03:44,160
फूल सी बिटिया जो एकमात्र उनके जीवन का सहारा थी

50
00:03:44,160 --> 00:03:48,560
उसको धीरे-धीरे करके जहर भर के उसके मस्तिष्क

51
00:03:48,560 --> 00:03:52,880
में उसकी ही मां के विरुद्ध उसके के

52
00:03:52,880 --> 00:03:57,680
अपने पूर्वजों के विरुद्ध जहर भर के किस प्रकार से

53
00:03:57,680 --> 00:04:01,680
उस अकेली रहने वाली मातृशक्ति का

54
00:04:01,680 --> 00:04:06,000
जीवन का जो जीने का सहारा था वो उससे छीन लिया

55
00:04:06,000 --> 00:04:10,640
और विश्वास करिए जिसने वह चर्चा नहीं देखी वह अवश्य देखे और

56
00:04:10,640 --> 00:04:14,800
आपको हृदय आपका द्रवित हो जाएगा। यदि आप सत्य के पक्षधर

57
00:04:14,800 --> 00:04:19,600
होंगे तो आपके आंसू रुक नहीं पाएंगे और

58
00:04:19,600 --> 00:04:24,000
देखिए किस तरीके से वहां पर उस महिला की इकलौती

59
00:04:24,000 --> 00:04:28,160
संतान को उससे छीन लिया गया। संतान का किस तरीके

60
00:04:28,160 --> 00:04:34,160
से माइंड वाश किया गया। तो ये सब आप अवश्य देखें।

61
00:04:48,200 --> 00:04:52,800
[खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़]

62
00:04:52,800 --> 00:04:56,240
ये

63
00:04:56,240 --> 00:05:00,320
कुछ सिद्धांत हमारे परंपरा प्राप्त वैष्णव सिद्धांत से मिलते हैं। फिर क्या

64
00:05:00,320 --> 00:05:03,280
करें?

65
00:05:03,280 --> 00:05:08,880
कुछ चीजें तो हमारी मुस्लिम से भी मिलती हैं।

66
00:05:08,880 --> 00:05:12,880
सबकी कुछ कुछ ना कुछ चीजें आपस में मैच कर जाती हैं। तो

67
00:05:12,880 --> 00:05:17,040
यह समस्या का कारण नहीं है। देखा जाता है कि

68
00:05:17,040 --> 00:05:21,760
गौ कौन से कारण है और प्राथमिक कौन से कारण है।

69
00:05:21,760 --> 00:05:25,280
जी मयंक जी जय श्री राम।

70
00:05:25,280 --> 00:05:29,280
जय श्री राम। अब अटक नहीं रहा ना अब तो? हां

71
00:05:29,280 --> 00:05:32,480
अब स्मूथ है

72
00:05:32,480 --> 00:05:37,120
जी [गला साफ़ करने की आवाज़] तो तो सबसे पहले तो मैं मतलब

73
00:05:37,120 --> 00:05:41,120
जहां तक हमारी चर्चा हुई थी उसको थोड़ा सा अप कर दूं क्योंकि पिछली बार मौका

74
00:05:41,120 --> 00:05:45,360
नहीं मिल पाया था तो मुख्य रूप से दो तीन बातें हुई थी एक तो

75
00:05:45,360 --> 00:05:49,440
आपके द्वारा ये कहा गया था कि ईश्वर जो है स्वभाव के विरुद्ध जा

76
00:05:49,440 --> 00:05:53,520
रहा है तो उसको मैंने क्लेरिफाई कर दिया था कि पैसे रहकर भी वो अपने

77
00:05:53,520 --> 00:05:57,680
स्वभाव में रह रहा है एक तो मुख्य ये बात थी एक दूसरी बात सहायता वाली थी

78
00:05:57,680 --> 00:06:01,760
कि ईश्वर आप बोल रहे थे कि जड़ प्रकृति की और आत्मा की सहायता ले रहा है। तो मैंने

79
00:06:01,760 --> 00:06:03,440
बताया निमित रूप से किसी कार्य में सहायता

80
00:06:03,440 --> 00:06:06,080
नहीं ले रहा है। वो

81
00:06:06,080 --> 00:06:10,320
साधारण कारण और अपना इस तरीके से सहायता ले रहा है।

82
00:06:10,320 --> 00:06:14,400
साधारण कारण साधारण कारण और

83
00:06:14,400 --> 00:06:17,280
उपादान

84
00:06:17,280 --> 00:06:21,760
साधारण कारण के रूप में सहायता ले रहा है ईश्वर।

85
00:06:21,760 --> 00:06:25,840
हम एक तो ये बात थी थी और तीसरी बात मुख्य जो

86
00:06:25,840 --> 00:06:29,920
यहां पर आके अटकी थी अपनी कि शून्य क्रिया वाले विषय पे कि जिसको

87
00:06:29,920 --> 00:06:34,080
मैं विरोधाभास करके असंभव सिद्ध करना चाह रहा था उसको आप जो है शून्य क्रिया सिद्ध

88
00:06:34,080 --> 00:06:38,080
कर रहे थे। ठीक है? तो अब जो है कि अगर मैं उसको असंभव सिद्ध कर

89
00:06:38,080 --> 00:06:42,320
देता हूं। आप बोल रहे थे असंभव नहीं है शून्य। तो फिर वहां से मैं एक्सप्लेन करना चालू

90
00:06:42,320 --> 00:06:46,800
करता हूं। ठीक है? एक मिनट। एक मैं भी थोड़ा समराइज कर दूं।

91
00:06:46,800 --> 00:06:51,280
ठीक है। एक तो आपने जो हमारा मोटे-मोटे

92
00:06:51,280 --> 00:06:55,600
तौर पर तीन विषयों पर बात हुई थी। अ

93
00:06:55,600 --> 00:07:00,240
एक बात हुई थी कि भाई जब ईश्वर जो कुछ कर रहा है

94
00:07:00,240 --> 00:07:04,640
उसमें दूसरी चीजों का आलंबन भी ले रहा है। अब उस आलंबन

95
00:07:04,640 --> 00:07:09,680
लेने को आपने अभी नाम दिया है कि वो साधारण कारण के रूप में

96
00:07:09,680 --> 00:07:13,760
यूज करता है। इसलिए वो नहीं माना

97
00:07:13,760 --> 00:07:19,680
जाएगा। और उस दिन आपने कहा था कि ईश्वर

98
00:07:19,680 --> 00:07:24,240
जड़ प्रकृति और चेतन जीव की

99
00:07:24,240 --> 00:07:28,320
जीव का क्या कहते हैं? आलंबन लेकर के और

100
00:07:28,320 --> 00:07:32,400
सृष्टि रचना करता है। और यह ईश्वर का कार्य है। इसमें वो

101
00:07:32,400 --> 00:07:36,480
किसी की सहायता नहीं लेता। आपने ये कह दिया है ना? मतलब

102
00:07:36,480 --> 00:07:40,800
जीव की सहायता लेकर और प्रकृति की सहायता

103
00:07:40,800 --> 00:07:44,960
लेकर सृष्टि रचना करना यह ईश्वर का कार्य है। अब यह जो दो सहायता

104
00:07:44,960 --> 00:07:49,120
आ गई सो आ गई। मगर अब इस सहायता को लेते हुए

105
00:07:49,120 --> 00:07:53,200
सृष्टि रचना करने में वो किसी की सहायता नहीं कर वो वो किसी की सहायता नहीं

106
00:07:53,200 --> 00:07:57,200
लेता इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। हां नियत रूप से और किसी की सहायता

107
00:07:57,200 --> 00:08:00,320
जी।

108
00:08:00,320 --> 00:08:04,960
एक तो ये हो गया। दूसरा फिर हमने बात किया था लीला पर। ठीक है।

109
00:08:04,960 --> 00:08:09,200
लीला में बात यह आई थी। लीला में बात यह आई थी कि मैं

110
00:08:09,200 --> 00:08:13,360
उचित शब्द का उपयोग नहीं कर रहा था। मैंने कहा कि भाई स्वरूप विरुद्ध क्योंकि आप

111
00:08:13,360 --> 00:08:17,520
लोग लीला को स्वरूप विरुद्ध कहते हो तो मैंने उस चीज को लेकर के स्वरूप विरुद्ध आगे

112
00:08:17,520 --> 00:08:21,840
आगे करके बढ़ा। मगर आगे चलकर के फिर मैंने इसको क्लेरिफाई

113
00:08:21,840 --> 00:08:25,920
किया कि कुछ ऐसा आचरण जिससे कि सामने वाला दूसरा जो

114
00:08:25,920 --> 00:08:30,080
तत्व है वह भ्रमित हो सके। ऐसा आचरण ईश्वर करता है कि नहीं। तो वो हमने

115
00:08:30,080 --> 00:08:34,080
सिद्ध किया था उस उस समय भी कि ऐसा आचरण

116
00:08:34,080 --> 00:08:38,160
क्या कहते वो स्वरूप विरुद्ध है कि नहीं है ये तो बाद की बात है मगर ऐसा

117
00:08:38,160 --> 00:08:42,480
आचरण जिससे भ्रम उत्पन्न हो ये आचरण आर्य समाज का ईश्वर भी करता

118
00:08:42,480 --> 00:08:46,560
है ऐसे ही आचरण को हम लीला कहते हैं जिससे भ्रम उत्पन्न हो

119
00:08:46,560 --> 00:08:50,640
जाए सामने वाले को लगे कि भाई ये तो मैं ही कर रहा हूं। जैसे आपसे मैंने पूछा था कि भाई

120
00:08:50,640 --> 00:08:54,720
जब आप कोई कार्य कर रहे होते हैं तो उसमें थोड़ा आपने इधर-उधर की बात की थी

121
00:08:54,720 --> 00:08:59,120
मगर मूल वाली बात नहीं भ्रम वाली बात मैंने नहीं बोली थी भ्रम वाली बात आपने भ्रम

122
00:08:59,120 --> 00:09:03,360
आपने भ्रम नहीं बोली वो हमारे बीच में जब मैं अभी उस पर दोबारा

123
00:09:03,360 --> 00:09:07,360
बात कर लेंगे मगर ये वाली बात आई थी कि ईश्वर कुछ ऐसा कार्य करता है जिससे

124
00:09:07,360 --> 00:09:11,360
कि सामने वाला उसके उलट समझता है। इसी को हम लीला कहते हैं। अब यदि

125
00:09:11,360 --> 00:09:15,680
ऐसा आचरण आपने कहा ये आचरण करना भी ईश्वर का उसके स्वरूप

126
00:09:15,680 --> 00:09:19,680
कार्य है इसलिए वो वो जो है स्वरूप विरुद्ध नहीं कहलाएगा तो बिल्कुल ठीक है

127
00:09:19,680 --> 00:09:23,840
अगर यह जो आचरण है भ्रम उत्पन्न करना वो ईश्वर के स्वरूप

128
00:09:23,840 --> 00:09:27,920
में है तो ठीक है यही हमारी लीला है इसी को हम लीला कह रहे हैं तो स्वरूप विरुद्ध हुआ

129
00:09:27,920 --> 00:09:31,920
ही नहीं फिर और तीसरा आपने वो शून्य क्रिया वाला कहा था तो शून्य

130
00:09:31,920 --> 00:09:35,920
क्रिया पर हम लोग काफी देर तक चले भी थे यह तीन चीजें हो

131
00:09:35,920 --> 00:09:39,920
गई इसके अलावा उप कुछ उपविषय भी थे जो उससे उत्पन्न हो

132
00:09:39,920 --> 00:09:43,920
गए जैसे कि एक आपने यह माना था

133
00:09:43,920 --> 00:09:48,000
कि जीव ही चेष्टा करता। जीव केवल चेष्टा करता है। उसके

134
00:09:48,000 --> 00:09:52,240
सारे कार्य ईश्वर ही करता है। एक ये आपने माना था।

135
00:09:52,240 --> 00:09:56,240
है ना? सारी क्रियाएं ईश्वर ही करता है। केवल जीव बस चेष्टा करता है।

136
00:09:56,240 --> 00:10:00,320
हम और इसी से निकल कर के फिर वो भी वो भी एक उपविषय

137
00:10:00,320 --> 00:10:04,800
आ जाता है कि अ बात

138
00:10:04,800 --> 00:10:08,800
ये है कि इंटेंशन क्या है? आसक्ति या

139
00:10:08,800 --> 00:10:12,880
भोग इंटेंशन है तो होने वाली क्रिया का दोष

140
00:10:12,880 --> 00:10:17,120
उस पर आएगा और यदि आसक्ति और क्या कहते हैं यह आसक्ति

141
00:10:17,120 --> 00:10:21,440
और भोग इंटेंशन नहीं है तो होने वाली क्रिया जो भी हो उसका दोष नहीं आएगा

142
00:10:21,440 --> 00:10:25,600
तो इस तरीके से उसी क्रिया से जुड़ा होने पर भी ईश्वर को दोष नहीं लगता।

143
00:10:25,600 --> 00:10:29,600
उसी क्रिया से जुड़े होने पर इंटेंशनली जुड़े होने पर इसको दोष लग

144
00:10:29,600 --> 00:10:31,120
जाता है जीव को। यह

145
00:10:31,120 --> 00:10:35,520
दो उपविषय आ गए थे। और एक अनंत

146
00:10:35,520 --> 00:10:39,680
वाली बात भी हमारी अधूरी रह गई थी। ठीक है? अनंत

147
00:10:39,680 --> 00:10:43,840
वाली बात जो मैंने की थी वो भी अधूरी रह गई थी। तो अब हम सबसे पहले सबसे पहली

148
00:10:43,840 --> 00:10:48,320
बात जो अधूरी रह गई थी। एक बार बता अनंत वाली कौन सी बात अधूरी रह गई थी वो

149
00:10:48,320 --> 00:10:52,320
थोड़ा बता दें। जब मैंने पूछा था कि ये अनंत

150
00:10:52,320 --> 00:10:56,560
सामर्थ्यवान का अर्थ क्या है? तो आपने कहा कि

151
00:10:56,560 --> 00:11:00,880
अनंत सामर्थ्यवान का अर्थ है कि जो जो बल एक्सिस्ट करते हैं वह वह

152
00:11:00,880 --> 00:11:05,280
बल ईश्वर के अंदर अनंत रूप से हैं। असीमित रूप से।

153
00:11:05,280 --> 00:11:09,280
ठीक है? तो फिर जब मैं ये पूछ रहा था कि अवतार लेने का बल एक्सिस्ट करता

154
00:11:09,280 --> 00:11:13,600
है कि नहीं करता है? तो आप वो वाली बात अधूरी रह गई। वो एक्सिस्ट

155
00:11:13,600 --> 00:11:18,720
करता है कि नहीं करता? अब अब यदि अवतार को स्वरूप

156
00:11:18,720 --> 00:11:22,880
अब यदि अवतार को स्वरूप विरुद्ध कार्य कह रहे हैं तो इसका मतलब सीधा

157
00:11:22,880 --> 00:11:26,960
आ गया क्योंकि अवतार को आपने स्वरूप विरुद्ध कार्य माना हुआ है इसलिए वो अवतार

158
00:11:26,960 --> 00:11:31,280
नहीं ले सकता। ठीक है? तो अवतार लेने का वो जो बल है वो भी एक्सिस्ट

159
00:11:31,280 --> 00:11:35,360
नहीं करता और जब बल एक्सिस्ट नहीं करता तो उसका होने का जरूरी आवश्यक

160
00:11:35,360 --> 00:11:39,760
नहीं रहा। तो जो जो बल है उनका सबका सामर्थ्य है। ठीक है?

161
00:11:39,760 --> 00:11:43,840
ये है। ठीक है? है ना? कुल मिलाकर के जो पिछली चर्चा का

162
00:11:43,840 --> 00:11:46,640
आपका मैंने सार देखा तो उसमें

163
00:11:46,640 --> 00:11:50,800
आपने ईश्वर के यह कार्य हैं या

164
00:11:50,800 --> 00:11:54,960
फिर मतलब कुल मिलाकर के सारी बात यही है ईश्वर के कार्य क्या है या ईश्वर

165
00:11:54,960 --> 00:11:59,200
का स्वरूप क्या है ये पहले हमने निश्चित कर लिया है हम प्रमाण

166
00:11:59,200 --> 00:12:03,200
के आधार पर प्रमाण के आधार पर हमने पहले निश्चित

167
00:12:03,200 --> 00:12:07,520
कर लिया कि ये ये ईश्वर का स्वरूप है। अब् हमने प्रमाण

168
00:12:07,520 --> 00:12:11,680
के आधार पर जो भी हमने हमने अपने अर्थ के आधार पर प्रमाण के अपने अर्थ के आधार

169
00:12:11,680 --> 00:12:15,920
पर हमने यह तय कर लिया कि ईश्वर के यह कार्य हैं। अब जो भी कार्य इसके विपरीत

170
00:12:15,920 --> 00:12:20,080
आएंगे वो सब जो है उसके स्वरूप के विरुद्ध होने के कारण

171
00:12:20,080 --> 00:12:24,480
स्वीकार नहीं किए जा सकते। है ना? यानी

172
00:12:24,480 --> 00:12:28,640
कि ईश्वर का अवतार निषेध इसलिए है या उसका

173
00:12:28,640 --> 00:12:33,120
जो है सर्वशक्तिमान इस तरीके से अवतार ले सकने वाला

174
00:12:33,120 --> 00:12:37,280
वाले होने के रूप में इसलिए निषेध है क्योंकि हमने हम पहले यह

175
00:12:37,280 --> 00:12:41,520
मान लें कि जो शास्त्रों का अर्थ आर्य समाज के अनुसार

176
00:12:41,520 --> 00:12:45,760
जो स्वीकारा गया है पहले हम उसको स्वीकार कर लें और अब क्योंकि इस स्वीकारे

177
00:12:45,760 --> 00:12:50,880
हुए अर्थ के विरुद्ध वो कार्य है तो अब क्यों

178
00:12:50,880 --> 00:12:56,640
एक यही यही है मैं मैं बता दूंगा आपको कैसे है ये

179
00:12:56,640 --> 00:13:01,120
क्योंकि [गला साफ़ करने की आवाज़] अब जो सारे कार्य हैं वह ईश्वर के जो

180
00:13:01,120 --> 00:13:01,920
अब जो कार्य

181
00:13:01,920 --> 00:13:06,720
हैं वो क्योंकि ईश्वर के स्वरूप के विरुद्ध है तो इसलिए वो ना होना उसकी सर्वशक्तिमत्ता

182
00:13:06,720 --> 00:13:10,080
को भंग नहीं करता। ठीक है?

183
00:13:10,080 --> 00:13:14,080
ठीक है? ये ये है। अब ये स्वरूप अब ये बात है कि आपने ये

184
00:13:14,080 --> 00:13:18,160
नहीं बोला। मगर आपने ये बोला कि यह कार्य जो है ईश्वर का स्वरूप है। यह

185
00:13:18,160 --> 00:13:22,720
स्वरूप वाली बात बार-बार आई। जैसे कि जब मैंने पूछा कि भाई ईश्वर

186
00:13:22,720 --> 00:13:26,800
कार्य ईश्वर कर रहा है पर अ प्रतीति ऐसी

187
00:13:26,800 --> 00:13:31,120
हो रही है कि स्वयं मनुष्य ही कार्य कर रहा है। जबकि कार्य तो ईश्वर कर रहा है।

188
00:13:31,120 --> 00:13:35,760
तो आपने कहा इस तरीके से कार्य करना भी उसका स्वरूप है।

189
00:13:35,760 --> 00:13:39,760
जैसे मैंने कई बार इसको कहा कि भाई यहां पे तो ये मिथ्या आचरण हो गया ना।

190
00:13:39,760 --> 00:13:43,760
तो आपने कहा ये मिथ्या आचरण नहीं हुआ। मिथ्याचरण इसलिए नहीं हुआ क्योंकि

191
00:13:43,760 --> 00:13:47,760
इस तरीके से कार्य करना ही ईश्वर का स्वरूप है। मिथ्या मतलब जिसको मैं

192
00:13:47,760 --> 00:13:51,920
मिथ्या कह रहा हूं। फिर मैंने मिथ्या को खोला। मिथ्या को मैंने खोला

193
00:13:51,920 --> 00:13:56,160
कि भाई ऐसा आचरण जिससे कि भ्रम उत्पन्न हो जाए। तो भ्रम तो उत्पन्न

194
00:13:56,160 --> 00:14:00,160
हो रहा है। इसको तो मानना ही पड़ेगा। भाई कर ईश्वर रहा है। मगर मुझे लग

195
00:14:00,160 --> 00:14:05,360
रहा है कि मैं कर रहा हूं। है ना? तो भ्रम मानना पड़ेगा।

196
00:14:05,360 --> 00:14:09,360
इसको आप भ्रमित बोल रहा हूं। भ्रम अब एक-एक करके करते हैं। अब

197
00:14:09,360 --> 00:14:13,440
एक एक करके अब एक पिछली बार जहां पे अधूरी रखी

198
00:14:13,440 --> 00:14:16,960
थी उसको कंप्लीट कर दूं मैं। जो पॉइंट था

199
00:14:16,960 --> 00:14:21,680
वाला शुरू शुरू से चलिए शुरू से पीछे से अधूरी है

200
00:14:21,680 --> 00:14:26,000
पीछे से अधूरी है वो ठीक है पर जो अटकी थी जहां पर आप बोल रहे थे असंभव नहीं है शून्य असंभव

201
00:14:26,000 --> 00:14:30,080
नहीं है शून्य उसको कंप्लीट कर दूं मैं असंभव शून्य का अंतर तो शुरू की भी

202
00:14:30,080 --> 00:14:34,240
बातें अटकी है ना आपने कहा था मैंने भी प्रश्न नहीं किया तो आए थे हम उस पे शुरू

203
00:14:34,240 --> 00:14:38,240
की बातें अटकी है सारी बातें अटकी थी ना

204
00:14:38,240 --> 00:14:42,320
उसप भी आएंगे पर ये जो चर्चा चल रही थी उसप कंप्लीट तो कर दूं मैं अगर आपको

205
00:14:42,320 --> 00:14:48,320
उस जो चर्चा चल जो चर्चा चर्चा शुरू में चल रही थी वह पहले कंप्लीट करी है ना

206
00:14:48,480 --> 00:14:52,560
तो वह तो कंप्लीट हो गई थी ना उसमें क्या बचा था आपको कंप्लीट नहीं आपने कहा था मैंने एक भी प्रश्न

207
00:14:52,560 --> 00:14:56,560
नहीं किया था तो मैंने कहा था ठीक है अब कर लीजिए भाई मैं तो पूछना चाह रहा था जब हम

208
00:14:56,560 --> 00:15:00,800
जब हम पहले जो टॉपिक चल रहा था वो था कि जब ईश्वर बिना

209
00:15:00,800 --> 00:15:04,880
ईश्वर सहायता ले रहा है तो फिर उसको सर्वशक्तिमान क्यों कह रहे हैं तो फिर आपने

210
00:15:04,880 --> 00:15:08,880
उसको कंप्लीट नहीं हो पाई फिर हम लीला पे आ गए लीला कंप्लीट नहीं हो पाई जब मैं वापस

211
00:15:08,880 --> 00:15:12,960
वहां जा रहा था तो फिर यह हुआ था मैंने एक भी प्रश्न नहीं पूछा है तो मैंने

212
00:15:12,960 --> 00:15:17,200
कहा था ठीक है आप पूछ लीजिए प्रश्न और फिर ऐसे करके हम

213
00:15:17,200 --> 00:15:21,200
वहां पर पॉइंट बताइए कौन से पॉइंट पे कंप्लीट नहीं होते आपको

214
00:15:21,200 --> 00:15:25,280
आप पहले शून्य वाला बता दीजिए चलिए शून्य वाला चलो ठीक

215
00:15:25,280 --> 00:15:29,680
है शून्य का ये था कि जो जिस प्रकार के मैं कार्य बताना चाह रहा था जो

216
00:15:29,680 --> 00:15:32,320
लॉजिकली कंट्राडिक्शन जिनको बोलते हैं लॉजिकल इंपॉसिबिलिटी

217
00:15:32,320 --> 00:15:36,560
या विरोधाभास जिसे कहते हैं तो उनको आपने एक शून्य क्रिया का नाम दे दिया

218
00:15:36,560 --> 00:15:40,720
उनको शून्य क्रिया नहीं बोलेंगे उनको असंभव बोलेंगे ठीक है

219
00:15:40,720 --> 00:15:44,800
अब इसका कारण क्या है कि शून्य क्रिया और असंभव क्रिया की परिभाषा में भेद है।

220
00:15:44,800 --> 00:15:48,800
शून्य क्रिया उसको बोलते हैं मतलब शून्य क्रिया यानी फिजिक्स के सेंस में जिसको कहा जाता है वर्क

221
00:15:48,800 --> 00:15:53,200
डन जीरो वर्क डन ऐसा कुछ नल लक्षण बोलते हैं। तो यानी कि एक प्रयास

222
00:15:53,200 --> 00:15:57,680
हुआ लेकिन कोई कार्य ना हुआ है ना उसको बोलते हैं शून्य क्रिया। असंभव

223
00:15:57,680 --> 00:16:01,680
उसको कहा जाता है जो तार्किक रूप से संभव ही ना हो। कभी संभव ही होना

224
00:16:01,680 --> 00:16:05,840
मतलब संभावना ही नहीं है कुछ संभव होने की। उसको बोलते हैं असंभव। तो मैं जिस

225
00:16:05,840 --> 00:16:10,000
दिशा में ले जाना चाह रहा था बात को आपने उसको शून्य क्या नाम दिया। तो वो तो वहां अटक

226
00:16:10,000 --> 00:16:14,000
गई मैं बोल रहा था बार-बार असंभव है और आप बोल रहे थे नहीं है। मतलब कुल मिलाकर के

227
00:16:14,000 --> 00:16:18,160
इसमें भी प्रमाण आ गया। नहीं नहीं प्रमाण नहीं ना। अभी तक आप

228
00:16:18,160 --> 00:16:22,480
आप प्रमाण दे रहे हैं ना कि शून्य क्रिया का मतलब तो ये होता है जो हम बता रहे हैं।

229
00:16:22,480 --> 00:16:27,040
नहीं हम नहीं बता रहे। ये तो आप इसको मानते या नहीं पहले मैंने जो बोला ये बता दीजिए। मैं मैं

230
00:16:27,040 --> 00:16:31,040
इसको मैं बताऊंगा। फिलहाल मैं आपसे पूछ रहा हूं। इसमें आप प्रमाण ही तो ला रहे

231
00:16:31,040 --> 00:16:36,080
हो कि आज की फिजिक्स की टर्म्स ये हैं।

232
00:16:36,080 --> 00:16:40,160
देता हूं। आज की फिजिक्स की टर्म्स ये है। हां जो

233
00:16:40,160 --> 00:16:44,160
आपने शब्द उपयोग किया ना उस शब्द का अर्थ जो हिंदी आपने शून्य क्रिया उपयोग किया

234
00:16:44,160 --> 00:16:47,600
और मैंने जो असंभव उपयोग किया तो उसका जो हिंदी में जो अर्थ होता है उसी को लेंगे

235
00:16:47,600 --> 00:16:52,720
ना और क्या अर्थ लेंगे हिंदी में सर्व का अर्थ क्या होता है

236
00:16:52,720 --> 00:16:56,720
सब कुछ तो फिर क्यों नहीं ले रहे सब कुछ

237
00:16:56,720 --> 00:17:00,720
ले रहे ले रहे कहां ले रहे हो आप कह रहे हो वो सब

238
00:17:00,720 --> 00:17:04,720
कुछ जो मेरे उसमें आता है सीमा में वो सब सर्वज्ञ में भी

239
00:17:04,720 --> 00:17:08,800
सब सर्वज्ञ में भी जो ज्ञान जानना संभव हो सब कुछ आ रहा है

240
00:17:08,800 --> 00:17:12,880
सर वो वही आ गया ना उसमें उसमें आपने जोड़ दिया ना उसमें आपने

241
00:17:12,880 --> 00:17:17,040
जोड़ दिया ना आप ऐसा ऐसा तो आपने भी मना करा था ना कि ये क्रिया ही नहीं है ये क्रिया

242
00:17:17,040 --> 00:17:21,120
है ही नहीं तो वहां क्रिया है ही नहीं वो वो बात बिल्कुल ठीक है वो क्रिया

243
00:17:21,120 --> 00:17:25,120
है ही नहीं आप मुझे बता दो क्या करना है इसीलिए तो मैं बता रहा हूं आपको तो

244
00:17:25,120 --> 00:17:30,080
अब मैं मैं इसको मैं इसको मैं इसको ऐसे ले लेता हूं

245
00:17:30,080 --> 00:17:34,160
आपने कहा कि वो शून्य क्रिया नहीं है। वो असंभव क्रिया है।

246
00:17:34,160 --> 00:17:38,240
ठीक है? असंभव है। असंभव असंभव। अच्छा ऐसी क्रिया

247
00:17:38,240 --> 00:17:43,920
को क्या कहेंगे जो पूर्व में हुई थी मगर अभी असंभव है।

248
00:17:43,920 --> 00:17:48,080
क्रिया तो एक्सिस्ट कर रही है। कभी हुई है दुनिया में मगर अभी

249
00:17:48,080 --> 00:17:52,160
असंभव है। होना उसको क्या कहेंगे? नहीं फिर जिसके

250
00:17:52,160 --> 00:17:56,160
द्वारा हुई थी उसमें सामर्थ्य अभी है या नहीं वो प्रश्न आ जाएगा। तो प्रश्न

251
00:17:56,160 --> 00:18:00,240
आएगा तो मगर क्रिया तो अभी है ना। असंभव

252
00:18:00,240 --> 00:18:02,720
नहीं हो पा रही ना। असंभव क्रिया

253
00:18:02,720 --> 00:18:06,800
उसी को कहेंगे। असंभव क्रिया उसी को कहेंगे। सबसे पहले क्रिया का अस्तित्व

254
00:18:06,800 --> 00:18:10,960
माना जाएगा और क्रिया का अस्तित्व मानने के बाद उसमें असंभव लगेगा

255
00:18:10,960 --> 00:18:15,040
कि हो नहीं सकती। एक मैं पूरा कर लूं। पूरा कर लूं। मैं पूरा कर लूं। मैं पूरा कर

256
00:18:15,040 --> 00:18:19,120
लूं। सीधी सी बात है। मेरा क्लेम यह है।

257
00:18:19,120 --> 00:18:23,200
ईश्वर सब कुछ कर सकता है। आप हम आप हमें कार्य बता दो। हम कर देंगे।

258
00:18:23,200 --> 00:18:27,360
बताओ क्या कार्य है? करना है जो हां हां तो जो मैं कार्य

259
00:18:27,360 --> 00:18:31,360
बता रहा हूं उसको आप शून्य बोल रहे हैं। मैं असंभव बोल रहा हूं। वो वो कार्य वो

260
00:18:31,360 --> 00:18:35,360
कार्य नहीं है। एक शब्द है आपकी पंक्ति है। उसका कोई अर्थ ही नहीं

261
00:18:35,360 --> 00:18:39,760
है। वो कार्य

262
00:18:39,760 --> 00:18:43,840
मैं क्यों बोल रहा हूं भाई असंभव मैं तो कह रहा हूं। आप मुझे क्रिया दो मैं कर दूंगा।

263
00:18:43,840 --> 00:18:48,000
मैं क्यों बोलूं वो संभव है। वही तो मैं वही तो बोल रहा हूं। क्रिया होना ही संभव नहीं है।

264
00:18:48,000 --> 00:18:52,080
क्रिया वो क्रिया है ही नहीं ना। वो शब्द है आपका केवल।

265
00:18:52,080 --> 00:18:56,240
एक तो आप बता दीजिए शून्य क्रिया का अर्थ क्या होता है? वो बता दीजिए

266
00:18:56,240 --> 00:19:00,960
आप। मैंने शून्य क्रियाओं से कहा है जो क्रिया है ही नहीं जिसका अस्तित्व ही नहीं है।

267
00:19:00,960 --> 00:19:05,360
मैंने शून्य क्रियाओं से कहा असंभव का क्या होता है मतलब? क्रिया

268
00:19:05,360 --> 00:19:09,520
एक्सिस्ट करती है मगर वो हो नहीं सकती। क्रिया एक्सिस्ट करती है। क्रिया

269
00:19:09,520 --> 00:19:13,840
एक्सिस्ट क्रिया एक्सिस्ट करती है। लॉजिकली एक्सिस्टेंस है उस क्रिया का। ये आप बोल रहे हो। हां

270
00:19:13,840 --> 00:19:18,320
हां लॉजिकली एक्सिस्टेंस है उस क्रिया का। असंभव थोड़ी बोला जाएगा उसको।

271
00:19:18,320 --> 00:19:22,400
क्या कहा जाएगा? लॉजिकल इंपॉसिबिलिटी को ही असंभव कहते हैं। मैं

272
00:19:22,400 --> 00:19:26,480
ये समझाना चाह रहा हूं आपको। तो यही देखिए यहां पर बात आ गई

273
00:19:26,480 --> 00:19:30,480
प्रमाण की कि आप मैं जो मैं जो शब्द उसे दे रहा हूं आप वो नहीं

274
00:19:30,480 --> 00:19:34,720
लेना चाहते हो दूसरा लेना चाहते हो आप जो देना चाहते हो मैं नहीं लेना चाहता हूं और

275
00:19:34,720 --> 00:19:38,880
क्या कहते हैं मैं दूसरा देना एक मिनट मैं दूसरा दे ये प्रमाण की बात है अब

276
00:19:38,880 --> 00:19:42,960
बात आ गई सीधीसीधी बात मेरा क्लेम है कि ईश्वर सारी

277
00:19:42,960 --> 00:19:47,440
क्रियाएं कर सकता है अब आप क्रिया मुझे दे दीजिए मैं बता दूंगा कर दिया

278
00:19:47,440 --> 00:19:51,520
कौन-कौन सी क्रिया करनी है आप आप ठीक है आप ये लाइन बोल रहे हैं अच्छी बात है आप

279
00:19:51,520 --> 00:19:55,680
ये बोलिए ना कि ईश्वर सारी क्रियाएं कर सकता है। सारी संभव क्रिया कर सकता है। अरे

280
00:19:55,680 --> 00:19:59,680
भाई तो क्रिया का मतलब ही संभव है। क्रिया का मतलब ही

281
00:19:59,680 --> 00:20:03,840
संभव है ना। असंभव असंभव नहीं कर सकता। सिंपल

282
00:20:03,840 --> 00:20:08,000
क्रिया वो क्रिया है ही नहीं जिसमें आप असंभव लगा दोगे। अगर आपका

283
00:20:08,000 --> 00:20:12,000
वाला संभव ले लिया जाए। अगर आपका वाला असंभव ले लिया जाए तो वो क्रिया है

284
00:20:12,000 --> 00:20:16,000
ही नहीं। क्रिया तो वही है जो संभव है। ठीक है? असंभव

285
00:20:16,000 --> 00:20:20,080
है ना? असंभव है ना? यानी वो जो संभव नहीं है। आप मैं ये आप थोड़ा

286
00:20:20,080 --> 00:20:24,400
शांति से सोचिए। जो संभव नहीं है उसी को तो असंभव कहते हैं।

287
00:20:24,400 --> 00:20:28,480
बात यह है कि वो क्रिया ही नहीं है। मैं क्यों बोलूं आपकी बात? वो क्रिया ही नहीं है ना।

288
00:20:28,480 --> 00:20:32,720
मैं यह कह रहा हूं। मैं ये कह रहा हूं आप मुझे आप सीधी

289
00:20:32,720 --> 00:20:34,800
बात है।

290
00:20:34,800 --> 00:20:38,800
तार्किक रूप से क्रिया है ही नहीं। वो तार्किक रूप से जो क्रिया नहीं होती उसको असंभव कहा जाता है। मैं ये

291
00:20:38,800 --> 00:20:43,280
समझाना चाह रहा हूं आपसे। ये ये आपकी परिभाषा है। मैं तो उसे शून्य क्रिया कहता हूं।

292
00:20:43,280 --> 00:20:47,280
ये हिंदी हिंदी आप हिंदी डिक्शनरी इंग्लिश। हां तो भैया बात

293
00:20:47,280 --> 00:20:52,000
आ गई प्रमाण की ना? बात आ गई प्रमाण की

294
00:20:52,000 --> 00:20:56,640
हिंदी की डिक्शनरी आपको कहां से मिली? चलिए हिंदी की डिक्शनरी कहां से मिली?

295
00:20:56,640 --> 00:21:00,720
उदाहरण हिंदी की डिक्शनरी कहां से मिली? और मैं मैं पूछ रहा हूं

296
00:21:00,720 --> 00:21:04,800
हिंदी मैंने आपसे मैंने पूछा हिंदी की डिक्शनरी कहां से मिली आपको? अरे

297
00:21:04,800 --> 00:21:09,120
उस पे आ जाएंगे। एक थोड़ी सी बात और सुन लीजिए बीच में। मैं ये बोल रहा हूं आपने और मैंने बोल

298
00:21:09,120 --> 00:21:13,440
शब्द का उपयोग किया था। तो क्या आपने बोलर शब्द का उपयोग करते समय अर्थ समझाया था मुझे?

299
00:21:13,440 --> 00:21:17,440
नहीं समझाया था ना? यानी आप ये मान के चल रहे थे कि मुझे जो अर्थ पता है उस हिसाब से वो बात

300
00:21:17,440 --> 00:21:21,760
कर रहे क्योंकि क्योंकि बोतल शब्द के अर्थ में हम दोनों एकमत

301
00:21:21,760 --> 00:21:25,840
थे इसलिए नहीं समझाया। अब अर्थ में ही तो समस्या आ रही है। अब इस अर्थ में एक मत

302
00:21:25,840 --> 00:21:29,840
हो जाते हैं। शून्य क्रिया और किस अर्थ में? किस शून्य क्रिया

303
00:21:29,840 --> 00:21:33,840
और असंभव असंभव और शून्य पे। तो आप हो

304
00:21:33,840 --> 00:21:38,880
जाओ शून्य बना लो उसको। जिसका अस्तित्व नहीं है ऐसी क्रिया।

305
00:21:38,880 --> 00:21:43,120
हां। तो इसी को तो असंभव बोलते हैं। अब आप सामान्य हिंदी में ये आप बोलो

306
00:21:43,120 --> 00:21:47,120
भाई। हम नहीं बोल रहे ना। हम कह रहे हैं कि ऐसी कोई क्रिया नहीं है जो ईश्वर

307
00:21:47,120 --> 00:21:49,920
कर सके। अब जो क्रिया है आप बताओ तो सही कौन सी क्रिया

308
00:21:49,920 --> 00:21:53,920
करनी है ईश्वर को? चलिए जैसे मान लो आप अपनी वो

309
00:21:53,920 --> 00:21:59,280
आप अपनी वो जो क्रिया है वो दोबारा बोल लो एक बार क्या क्रिया है वो जरा बोलो।

310
00:21:59,280 --> 00:22:03,600
क्रिया कोई भी विरोधाभास लीजिए जैसे कहा जाता है कि ईश्वर क्या वैश्या को कुमारी

311
00:22:03,600 --> 00:22:07,600
बना सकता है? क्या ईश्वर अपना अंत बता सकता है?

312
00:22:07,600 --> 00:22:11,680
क्या कुल मिलाकर के इसमें आप दो ऐसी बातें बोल रहे हैं जो एक दूसरे को कंट्राडिक्ट

313
00:22:11,680 --> 00:22:15,680
करके एक दूसरे को समाप्त कर देती है। ठीक है? तो क्रिया कहां से हुई?

314
00:22:15,680 --> 00:22:19,680
यह तो शब्द मात्र है। तो इसीलिए तो यह आपस में जो

315
00:22:19,680 --> 00:22:23,760
दो बातें एक दूसरे को घाटती है उसी को लॉजिकल कंट्राडिक्शन कहा जाता है। इसी को

316
00:22:23,760 --> 00:22:27,760
इसमें सामर्थ्य की बात कहां आ गई? आप हमें क्रिया दो ना इस पत्थर को सरकाना है। सरका

317
00:22:27,760 --> 00:22:32,560
देगा। आप हमें क्रिया दो भाई। हमें पंक्ति

318
00:22:32,560 --> 00:22:36,720
ठीक है। मैं समझ रहा हूं। आप समझ पा रहे हैं। मैं असंभव इसको बोलना चाह रहा हूं।

319
00:22:36,720 --> 00:22:40,960
मैं कह रहा हूं असंभव क्रिया जिसे आप कह रहे हैं वो है ही नहीं।

320
00:22:40,960 --> 00:22:44,960
वो क्रिया ही नहीं है। जिसको आपने असंभव कह दिया वो क्रिया ही नहीं

321
00:22:44,960 --> 00:22:49,120
है। क्योंकि क्रिया का तो मतलब ही है कि जो हो वो क्रिया

322
00:22:49,120 --> 00:22:53,120
है ही नहीं। शून्य है। उसका अस्तित्व ही नहीं है। अभाव क्रिया है। अभाव

323
00:22:53,120 --> 00:22:57,200
है उसका। हमारी देखिए मैं मैं बताऊं। मैं

324
00:22:57,200 --> 00:23:01,280
बताऊं। जैसे आपने कहा उस उस दिन की बात मैं आपको बता रहा हूं।

325
00:23:01,280 --> 00:23:05,280
क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसको वो स्वयं ना उठा सके?

326
00:23:05,280 --> 00:23:09,520
तो इसमें आपने ईश्वर कह के पत्थर ना उठाने

327
00:23:09,520 --> 00:23:13,520
वाली बात को काट दिया और पत्थर ना उठाना कह के ईश्वर वाली बात को

328
00:23:13,520 --> 00:23:17,840
काट दिया। इस तरीके से आपने कहा आपने अपनी

329
00:23:17,840 --> 00:23:21,840
आपने कहा कि क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है? फिर आपने कहा कि ईश्वर

330
00:23:21,840 --> 00:23:26,000
को ऐसा नहीं करना है। ईश्वर ईश्वर

331
00:23:26,000 --> 00:23:30,160
को ऐसा सिद्ध करो। फिर कहा ईश्वर को ऐसा सिद्ध ना करो। ये आपने

332
00:23:30,160 --> 00:23:34,480
कहा। ठीक है? यानी आप ही कह रहे हो ये करो फिर कह रहे हो नहीं करो। यानी

333
00:23:34,480 --> 00:23:38,800
कि यह ऐसे करो कि कुछ ना करो। अब जब मैंने आपसे पूछा कि

334
00:23:38,800 --> 00:23:43,120
भाई इसमें क्रिया क्या है? मुझे क्रिया बताओ ना जहां पर फोर्स का उपयोग हो, किसी सामर्थ्य

335
00:23:43,120 --> 00:23:47,120
का उपयोग हो। वो सामर्थ्य बताओ। वो क्रिया बताओ जिसमें सामर्थ्य का उपयोग हो, बल का

336
00:23:47,120 --> 00:23:51,280
उपयोग हो, किसी प्रकार की शक्ति का उपयोग हो। आपने कहा मैं क्यों बताऊं? सिद्ध आपको

337
00:23:51,280 --> 00:23:55,760
करना है। इसका मतलब आपको भी नहीं पता है उसमें क्रिया क्या है।

338
00:23:55,760 --> 00:23:59,760
उसमें क्रिया क्या है? नहीं पता है। आप नहीं बता

339
00:23:59,760 --> 00:24:04,000
रहे हो ना कि भैया ये ऐसे करने पर ये होगा। आप नहीं बता रहे हो।

340
00:24:04,000 --> 00:24:09,120
आप कह रहे हो मैं क्यों बताऊं? एक मिनट पूरा कर

341
00:24:09,120 --> 00:24:13,120
तो आपने कहा कि मैं क्यों बताऊं सिद्ध आपको करना है। भाई मुझे वो

342
00:24:13,120 --> 00:24:17,280
करके दिखाना है। आपको बताना है करना क्या है? तो आपको बताना होगा

343
00:24:17,280 --> 00:24:20,400
ऑब्जेक्टिवली कि भैया यह कर सकता है क्या? तो आप

344
00:24:20,400 --> 00:24:24,640
वो बताने से पीछे हट रहे। मैं क्यों बताऊं? इसका मतलब कि क्या ईश्वर ऐसी

345
00:24:24,640 --> 00:24:28,640
कोई क्रिया कर सकता है जो मुझे खुद ना ज्ञात हो। अगर

346
00:24:28,640 --> 00:24:32,880
मैं प्रश्न करता हूं तो क्या ईश्वर कोई ऐसी क्रिया कर सकता है जो

347
00:24:32,880 --> 00:24:36,880
मुझे खुद ना ज्ञात हो? यही तो हुआ। मतलब ईश्वर

348
00:24:36,880 --> 00:24:40,960
को कुछ ऐसा करना है कि आपको कुछ ना पता हो। ये आपका प्रश्न है।

349
00:24:40,960 --> 00:24:45,120
तो इसका मतलब क्या हुआ? ऐसे बहुत से कार्य हैं जो ईश्वर करता है जो आपको नहीं पता है।

350
00:24:45,120 --> 00:24:49,840
जिनका ज्ञान आपको नहीं है। हो गई क्रिया। देखिए

351
00:24:49,840 --> 00:24:54,080
आप शब्द कुछ भी आप बात ये है आप शब्द कुछ भी बोले उसके

352
00:24:54,080 --> 00:24:58,160
मूल में इंफॉर्मेशन आएगा। आप शब्दों को ना

353
00:24:58,160 --> 00:25:02,160
शब्द चेंज कर दीजिए मुझे मैं हट जाऊंगा इस टॉपिक से आप शब्द चेंज कर दीजिए आप उसको असंभव बोल

354
00:25:02,160 --> 00:25:06,240
कौन सा शब्द चेंज कर दूं शून्य को असंभव बोल दीजिए आप क्यों

355
00:25:06,240 --> 00:25:10,320
बोलू हां तो यही यहां अब हम अब हमको इस पे आना

356
00:25:10,320 --> 00:25:14,960
पड़ेगा ना कि शून्य का मतलब क्या होता है और असंभव का मतलब क्या होता है इसी पे आना पड़ेगा ना अभाव

357
00:25:14,960 --> 00:25:19,120
अभाव मेरा शून्य का मतलब है अभाव जिस क्रिया

358
00:25:19,120 --> 00:25:23,520
का अस्तित्व नहीं है अस्तित्व नहीं है और अस्तित्व हो भी

359
00:25:23,520 --> 00:25:28,240
अच्छा अस्तित्व नहीं है और अस्तित्व हो भी नहीं सकता अस्तित्व

360
00:25:28,240 --> 00:25:32,720
नहीं है। अस्तित्व हो भी नहीं सकता। ये फिर वही आ

361
00:25:32,720 --> 00:25:35,520
फिर वही अभाव क्रिया अब जितना पीछे जाओगे

362
00:25:35,520 --> 00:25:39,520
मैं फिर दूंगा। फिर इसमें भी अभाव है। भाई जिसका अस्तित्व नहीं है उसका

363
00:25:39,520 --> 00:25:44,560
अस्तित्व हो नहीं सकता। दोनों बातें एक दूसरे को फिर काट रही है।

364
00:25:44,560 --> 00:25:48,560
देखिए देखिए मेरी बात सुन लीजिए। मेरी बात सुन लीजिए। उस दिन भी

365
00:25:48,560 --> 00:25:52,640
इस टॉपिक पे बहुत अच्छे से हो गई थी। आज भी हो गई है। अब आपको आगे करनी

366
00:25:52,640 --> 00:25:56,640
है चर्चा कि नहीं करनी है ये बता दीजिए। अब तक हमारे अब तक हमारे बीच

367
00:25:56,640 --> 00:26:00,720
में जो हुआ है वो वो जनता देख चुकी है। ठीक है? वो निर्णय कर लेगी कि

368
00:26:00,720 --> 00:26:04,800
शून्य क्रिया पे मैं गलत हूं। अभाव क्रिया पे मैं गलत हूं या आप गलत हैं। यहां कोई

369
00:26:04,800 --> 00:26:08,800
निर्णायक तो बैठा नहीं है। नहीं नहीं नहीं सही बात है। मैं मैं इस पे खाली

370
00:26:08,800 --> 00:26:13,280
एक लास्ट लाइन बोलता हूं। फिर अगले टॉपिक पे जाते हैं। इसमें सिर्फ इतना है कि यहां पर मतभेद

371
00:26:13,280 --> 00:26:17,280
हमारा जो है परिभाषा को लेकर के कि आप शून्य का मतलब क्या समझ रहे हो और मैं शून्य का

372
00:26:17,280 --> 00:26:21,520
मतलब और भाव का मतलब क्या? प्रमाण पे भी मैं ही जीतूंगा।

373
00:26:21,520 --> 00:26:26,240
प्रमाण भी मैं जीत जाऊंगा। यहीं पे यहीं पे यहीं पे खत्म करें ना इस टॉपिक को।

374
00:26:26,240 --> 00:26:30,480
मैं कह रहा हूं इस बात पे भी मैं आपको चित कर सक मतलब अगर एज ए आर समाजी

375
00:26:30,480 --> 00:26:34,640
आप मेरे सामने खड़े हो तो मैं इस पे भी आपको चित कर दूंगा। आप मेरे सामने प्रमाण लाएंगे

376
00:26:34,640 --> 00:26:38,800
मैं उसको चित्त कर दूंगा। अरे उसप तो आप

377
00:26:38,800 --> 00:26:42,800
चाहते हैं मैं लाऊं प्रमाण? आए उस पे या फिर आप अगले टॉपिक पे जाना चाह रहे हो। अगर आप

378
00:26:42,800 --> 00:26:47,280
प्रमाण लाना चाहते हो तो ला सकते हैं। फिर मैं पूछूंगा कहां से आया प्रमाण आपके पास?

379
00:26:47,280 --> 00:26:50,720
मैं आपसे पूछूंगा कि आप यदि वैदिक आप वैदिक हैं तो वेद

380
00:26:50,720 --> 00:26:54,800
कहां से आया? बता दो। वेदों के प्रमाण की बात नहीं कर रहा हूं मैं।

381
00:26:54,800 --> 00:26:58,880
यह शून्य क्रिया और असंभव क्रिया हिंदी के शब्द है। भाई आज

382
00:26:58,880 --> 00:27:02,880
के जो वर्तमान के जो आचार्य गण हैं जो वेद

383
00:27:02,880 --> 00:27:07,040
ला के आपको दे रहे हैं उनकी जो परिभाषा है यदि आप कोई ऐसा प्रमाण

384
00:27:07,040 --> 00:27:11,280
ला रहे हैं जो उनकी परिभाषा को कट करेगी तो हम पूछेंगे ना फिर आप वैदिक कैसे? तो घोषित

385
00:27:11,280 --> 00:27:15,440
करो मैं भैया वेदों के बारे में। मैं अपनी तरफ से परिभाषा नहीं दे रहा हूं ना मैं। आपकी

386
00:27:15,440 --> 00:27:19,520
परिभाषा से ही बता रहा हूं। मैं अपनी तरफ से परिभाषा दूं तब आएगी ना वो बात तो मैं आपकी तरफ

387
00:27:19,520 --> 00:27:23,680
से प्रमाण ला रहे हैं ना प्रमाण ला रहे हैं ना आपका ही

388
00:27:23,680 --> 00:27:27,760
परिभाषा है आपका ही है मेरा नहीं है फिर प्रमाण की जरूरत क्या है जब

389
00:27:27,760 --> 00:27:32,080
मेरी परिभाषा है तो हां तो मैं वही दर्शाना चाह रहा हूं कि आप अपने परिभाषा के ही

390
00:27:32,080 --> 00:27:36,080
अभी आपने क्या अभी आपने क्या कहा कि मैं प्रमाण लाऊं प्रमाण का मतलब ही है कि आप

391
00:27:36,080 --> 00:27:41,200
कहीं से ला रहे हैं बताइए कौन सा है मेरा प्रमाण बताइए एक

392
00:27:41,200 --> 00:27:47,200
इसमें ये आता है अपने एक सेकंड में लिखा था शायद एक मिनट

393
00:27:47,760 --> 00:27:52,640
हां नास्तिक आस्तिकवाद कृपात्री जी के द्वारा लिखी गई है।

394
00:27:52,640 --> 00:27:57,040
इसमें यह बात आती है कि ईश्वर वैश्या को इस जन्म में तो नहीं लेकिन

395
00:27:57,040 --> 00:28:01,040
मैं पढ़ चुका हूं मेरे भाई मैं पढ़ चुका हूं। ये किताब आपके पास कहां से आई

396
00:28:01,040 --> 00:28:05,280
है? ये बताइए। फस गए? आपके पास से आई है। आपके

397
00:28:05,280 --> 00:28:10,720
पास से आई है। मेरे पास तो इसकी इसका जो सही अर्थ है वो कौन बताएगा?

398
00:28:10,720 --> 00:28:14,880
आप बताओगे? तो फिर मैं सही अर्थ के पक्ष में जो परिभाषा बता रहा हूं वही

399
00:28:14,880 --> 00:28:18,960
इसका अर्थ है। लोग इसका इसका इसका जवाब देता हूं। इसका जवाब देता हूं। हां दो बात यह

400
00:28:18,960 --> 00:28:23,360
है कि आप ये कहना चाह रहे हो कि आप अगर मेरे ऊपर प्रश्न उठाना चाह रहे हो

401
00:28:23,360 --> 00:28:27,440
आपका ये मत है कि तो आपको मेरी बात से आप डिसए्री नहीं कर सकते। अल्टीमेटली

402
00:28:27,440 --> 00:28:31,840
पॉइंट नहीं नहीं नहीं। आपको अपने पक्ष में यदि मेरी सामग्री

403
00:28:31,840 --> 00:28:36,080
जो मुझसे प्राप्त हो रही है। आपको अपने पक्ष में यदि मेरी सामग्री का उपयोग

404
00:28:36,080 --> 00:28:40,320
करना है तो उस संबंध में अपनी प्रामाणिकता या तो बतानी होगी मुझसे

405
00:28:40,320 --> 00:28:44,480
स्वतंत्र हो के मुझसे स्वतंत्र हो के उस उस सामग्री

406
00:28:44,480 --> 00:28:48,560
का उपयोग करने के संबंध में अपनी प्रामाणिकता बतानी होगी और नहीं तो मेरी

407
00:28:48,560 --> 00:28:52,720
प्रमाणिकता को मान लो वरना बुलाओ मत बीच में काम खत्म बिल्कुल बिल्कुल इसका इसका

408
00:28:52,720 --> 00:28:56,800
इसका एक्सप्लेनेशन देता हूं सरल रास्ता मुझे मुझे स्वतंत्र

409
00:28:56,800 --> 00:29:00,960
होके अपनी तरफ से परिभाषा देने की आवश्यकता नहीं है क्यों नहीं है क्योंकि एक

410
00:29:00,960 --> 00:29:03,200
चीज होती है जिसको बोलते हैं अभगम

411
00:29:03,200 --> 00:29:07,440
सिद्धांत या फिर दुर्जन दोष न्याय बोलते हैं शायद आप उसको यानी आपके ही मत

412
00:29:07,440 --> 00:29:11,440
या तो मैं अगर तुम्हारी कोई चीज मैं समझ गया दोष

413
00:29:11,440 --> 00:29:15,680
न्याय आप मेरे मान के चल रहे हो कि मैं आपकी बात मान के चल रहा हूं

414
00:29:15,680 --> 00:29:19,760
10 10 15 सेकंड आप बोलने तो दीजिए कर लो कर लो कर लो इसमें होता

415
00:29:19,760 --> 00:29:23,840
क्या है शायद इंग्लिश मेंटेन सिटी बोलते हैं इसको इसमें क्या होता है कि सामने वाले

416
00:29:23,840 --> 00:29:27,920
की ही प्रमिस लिया जाता है उसकी किसी बात को मान भैया ये मैं जानता

417
00:29:27,920 --> 00:29:32,160
हूं यहां बैठे सभी दर्शक जानते हैं यहां बैठे सभी दर्शक

418
00:29:32,160 --> 00:29:36,720
जानते हैं ये 10 सेकंड आप बोलने नहीं दे रहे। 10 सेकंड में कंप्लीट हो जाएगी बाकी कुछ

419
00:29:36,720 --> 00:29:40,720
की बातें ले जा रहे हो ना उस दिन कितना कट टू कट चल रहे थे। अभी आप व्यर्थ आपने अभी भी

420
00:29:40,720 --> 00:29:44,880
एक्सटेंड किया ना वो मामला कुछ नहीं जीरो है वो। चलिए आप जानते हैं ना दुर्जन

421
00:29:44,880 --> 00:29:48,960
दोष ने न्याय ठीक है। ले लीजिए। तो आपने मेरी बात को एज

422
00:29:48,960 --> 00:29:53,200
इट इज थोड़ी ना लिया है। आपने किताब में पढ़ के उसका इंटरप्रिटेशन अपना निकाला

423
00:29:53,200 --> 00:29:57,200
है। मैं तो मैं इंटरप्रिटेशन वो है जिसके पक्ष में

424
00:29:57,200 --> 00:30:01,360
मैं बात कर रहा हूं। यानी अगर यहां पर असंभव शब्द

425
00:30:01,360 --> 00:30:05,440
इसका मतलब क्या है? इसका मतलब क्या है? असंभव शब्द आया है। नहीं शब्द आया नहीं

426
00:30:05,440 --> 00:30:09,440
कर सकता इस जन्म में। इस असंभव आया है। इसका मतलब ये है कि आप यहां उस असंभव शब्द

427
00:30:09,440 --> 00:30:13,520
का मतलब वही है अभाव क्रिया। उस असंभव का मतलब वही है अभाव क्रिया।

428
00:30:13,520 --> 00:30:18,000
आपका वाला असंभव नहीं। ठीक है। ठीक है। यानी अपने हिसाब से आप इंटरप्रिटेशन

429
00:30:18,000 --> 00:30:18,500
निकाल रहे

430
00:30:18,320 --> 00:30:22,880
हैं कि इसका मतलब अभाव है। अपने हिसाब से नहीं। परंपरा प्रामाणिक रूप से कर्पात्री

431
00:30:22,880 --> 00:30:27,040
जी से जुड़े होने के वजह से मैं निकाल रहा हूं। आपको शंकराचार्य जी से मना

432
00:30:27,040 --> 00:30:31,200
करवाना पड़ेगा। उस संबंध में हां करपात्री जी ने कहीं पर भी शून्य

433
00:30:31,200 --> 00:30:35,360
अभाव अभाव क्रिया शून्य क्रिया बोला ही नहीं अरे भैया तो ऐसे तो वेदों

434
00:30:35,360 --> 00:30:39,440
में भी सर्वशक्तिमान बोला है अनंत अबाद बोला है ये नहीं बोला गया जिसके उसके स्वभाव के

435
00:30:39,440 --> 00:30:43,440
अनुसार वो कार्य कर सकता है बहुत सी बातें नहीं बोली है आप आप

436
00:30:43,440 --> 00:30:47,520
जस्टिफाई कैसे कर रहे हैं मैं वो जानना चाह रहा हूं यानी आप इसका शून्य असंभव का अभाव कैसे

437
00:30:47,520 --> 00:30:51,600
ले रहे हैं मैं जस्टिफिकेशन जानना चाह रहा हूं कैसे कर रहे हैं आप असंभव का अभाव

438
00:30:51,600 --> 00:30:55,600
ऐसे ही ले रहा हूं ना कि वो केवल एक शब्द मात्र जैसे कि धर्मनिरपेक्ष

439
00:30:55,600 --> 00:30:59,760
जैसे कहा जाए कि भैया ये जो क्या कहते हैं यह मैं

440
00:30:59,760 --> 00:31:04,480
एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति हूं। ठीक है? धर्मनिरपेक्ष का मतलब क्या हुआ?

441
00:31:04,480 --> 00:31:08,960
कि मैं सभी धर्मों को बराबर रूप से देखता हूं।

442
00:31:08,960 --> 00:31:13,200
कहां से देख लेगा? इस्लाम कह रहा है कि जो वैदिक है वो काफिर है।

443
00:31:13,200 --> 00:31:17,200
वेद कह रहा है कि जो दूसरे जितने भी मार्ग बनाए गए, वो सब गलत है

444
00:31:17,200 --> 00:31:21,200
मेरे अलावा। इसी प्रकार की बात बाइबल कर रही है। जैसे

445
00:31:21,200 --> 00:31:25,200
ही आपने सबको कहा, ये केवल एक शब्द बन करके रह गया और आपका धर्म हुआ ये किसी

446
00:31:25,200 --> 00:31:29,600
को ना मानने वाला। आपका धर्म अभी भी है। आपका अभी भी आप धर्मनिरपेक्ष

447
00:31:29,600 --> 00:31:33,520
नहीं है। आप हो गए किसी को भी ना मानने वाले। आपने सबको अमान्य कर

448
00:31:33,520 --> 00:31:37,760
दिया। तो धर्मनिरपेक्ष एक शब्द बन करके रह गया केवल। उसका कुछ

449
00:31:37,760 --> 00:31:41,760
अर्थ नहीं है। जिस व्यक्ति ने कहा मैं धर्मनिरपेक्ष हूं। एक मिनट। जिस

450
00:31:41,760 --> 00:31:45,760
व्यक्ति ने कहा मैं धर्मनिरपेक्ष हूं। वो व्यक्ति स्वयं नास्तिक सिद्ध

451
00:31:45,760 --> 00:31:49,760
हो गया। किसी भी धर्म को ना मानने वाला। क्योंकि उसने कुरान

452
00:31:49,760 --> 00:31:53,760
की वो बात नहीं मानी कि वो काफिर है। कुरान को ना मानने वाले। वेद

453
00:31:53,760 --> 00:31:57,760
की वो बात नहीं मानी। भेद भी बहुत बराबर है। कट रही है बातें कट रही है। आप ये

454
00:31:57,760 --> 00:32:01,760
कहना चाह रहे हैं कि वो धर्म धर्मनिरपेक्ष की वजह से जो अनंत दूसरी दूसरी

455
00:32:01,760 --> 00:32:06,080
बातें एक दूसरे को काट रही है तो मान ही नहीं सकता। सही बात है। तो अब इसका यानी

456
00:32:06,080 --> 00:32:10,160
ये पॉइंट यहीं पे अब इस हिसाब से क्लोज हुआ कि आप उसका इंटरप्रिटेशन असंभव

457
00:32:10,160 --> 00:32:14,160
को अभाव के रूप में दे रहे हैं। ठीक है? भाई मेरी किताब आप लाए तो उसका इंटरप्रिटेशन मैं दूंगा

458
00:32:14,160 --> 00:32:18,560
ना। तीन बेर खाती थी वो तीन बेर खाती है। इसका इंटरप्रिटेशन कौन देगा?

459
00:32:18,560 --> 00:32:22,640
बेर शब्द का उपयोग दो बार हो रहा है। नहीं तो

460
00:32:22,640 --> 00:32:26,800
अब इस इस पर अगर आप भाई जाकिर नायक सुनिए फाउंडेशन

461
00:32:26,800 --> 00:32:30,880
की बात सुन लीजिए मेरी बात सुन सुन लेंगे मेरा मेरा एक पॉइंट

462
00:32:30,880 --> 00:32:35,120
सुन लीजिए इसका जस्टिफिकेशन आपका यही है ना कि भाई मैं जो बोल रहा हूं वही मानना पड़ेगा

463
00:32:35,120 --> 00:32:39,440
और मैं करपात्री जी के हिसाब से एक्सप्रेशन नहीं दूंगा जो मैं दूंगा वो फाइनल है अल्टीमेटली

464
00:32:39,440 --> 00:32:43,600
आपका पॉइंट यही है नहीं मैंने करपात्री जी के हिसाब से दिया है क्योंकि मैंने उनके

465
00:32:43,600 --> 00:32:48,000
परंपरा प्राप्त शिष्य से उस ग्रंथ को पढ़ा है आपने नहीं पढ़ा है

466
00:32:48,000 --> 00:32:48,560
प्रामाणिक

467
00:32:48,560 --> 00:32:52,800
पद्धति से मैंने उस ग्रंथ को पढ़ा है जी के कर्पात्री जी के हिसाब से वहां अभाव

468
00:32:52,800 --> 00:32:56,960
कैसे लिया जाएगा वो बताइए जी का आपको नहीं पता ना मेरे भाई

469
00:32:56,960 --> 00:33:01,440
आपको कर्पात्री जी की किताब मिली है आपने उस किताब का अर्थ नहीं समझा है

470
00:33:01,440 --> 00:33:05,680
आपको तो पता है करपात्र जी तो बता तो दिया तो बता तो दिया

471
00:33:05,680 --> 00:33:10,480
उनका वहां पे उन्होंने वहां जो शब्द का उपयोग

472
00:33:10,480 --> 00:33:14,480
क्या आप एक्सप्लेनेशन नहीं दे रहे हो कि आप बहस कर रहे हो आप बेकार की बहस कर

473
00:33:14,480 --> 00:33:18,480
रहे हो आपको आगे चलना है रुक लेना हां आगे चलते आगे चलते

474
00:33:18,480 --> 00:33:23,680
हैं इस बात को यहीं पर कंप्लीट करके आगे हां

475
00:33:23,680 --> 00:33:27,840
अब आप मुझे अब आप मुझे बता दीजिए आपने माना था कि सर्वशक्तिमान वो

476
00:33:27,840 --> 00:33:32,080
है जो बिना दूसरे की सहायता के जो है कार्य करता है। ठीक है? हां नहीं सर

477
00:33:32,080 --> 00:33:36,160
बिल्कुल ठीक है।

478
00:33:36,160 --> 00:33:40,400
अब आप मुझे ये बता दीजिए कि आपने कहा क्योंकि

479
00:33:40,400 --> 00:33:44,480
इन इन का आलंबन लेकर कार्य करना ईश्वर का स्वरूप है।

480
00:33:44,480 --> 00:33:48,960
इसलिए वो अपने सारे कार्य बिना किसी की सहायता के कर रहा है। ठीक?

481
00:33:48,960 --> 00:33:53,040
आलंबन एक बार थोड़ा सा मैं एक्सप्लेन कर देंगे तो अच्छा रहेगा।

482
00:33:53,040 --> 00:33:57,280
आलंबन का एग्जैक्ट मतलब क्या आलंबन क्या बताऊं किसी चीज का उपयोग करना

483
00:33:57,280 --> 00:34:01,600
और क्या हां ठीक है

484
00:34:01,600 --> 00:34:05,760
है ना और मैंने यहां पर ये भी कर दिया कि वो धर्म स्थापना करने के

485
00:34:05,760 --> 00:34:09,760
लिए चार ऋषियों के अंतकरण में ज्ञान देता है ये सोच कर कि ये आगे जो है

486
00:34:09,760 --> 00:34:13,840
इस ज्ञान को फैलाएंगे हां इस पे इसप जवाब दे दूं मैं

487
00:34:13,840 --> 00:34:17,840
इसी पॉइंट पे हां दे दो हां इसप इसप मुख्य

488
00:34:17,840 --> 00:34:21,920
बात ये आती है कि जैसे एक कोई ऋषि है अब उसने ध्यान समाधि

489
00:34:21,920 --> 00:34:26,000
लगाई और वेदों से ग्रहण अपना वेद ग्रहण किया ईश्वर से ज्ञान ग्रहण

490
00:34:26,000 --> 00:34:30,000
किया। ठीक है? अब वो जो ज्ञान ग्रहण कर लिया अब आगे

491
00:34:30,000 --> 00:34:34,080
क्या करना है? इस ज्ञान को कैसे-कैसे फैलाना है? धर्म की स्थापना कैसे करनी है?

492
00:34:34,080 --> 00:34:38,240
वेदों का मतलब जो भी सारी चीजें हैं वहां पर ईश्वर हस्तक्षेप

493
00:34:38,240 --> 00:34:42,320
नहीं करेगा। ईश्वर का कार्य केवल इतना ही है कि कोई ऋषि अपना योगस्थ हो

494
00:34:42,320 --> 00:34:46,560
चुका है। प्राप्त करने के योग्य हो गया है। समाधि लगा ली। उसको ज्ञान दे दो। इससे इसके

495
00:34:46,560 --> 00:34:50,560
आगे जितना भी काम है जो भी करेंगे भाई हम धर्म की स्थापना करते हैं अधर्म की स्थापना

496
00:34:50,560 --> 00:34:51,200
करते हैं अच्छा करते

497
00:34:51,200 --> 00:34:55,200
हैं बुरा करते हैं तो सारा हमारे अंदर ही आएगा वो ईश्वर के अंतर्गत नहीं आएगा कि ईश्वर जबरदस्ती

498
00:34:55,200 --> 00:34:59,440
हमसे धर्म की स्थापना मैंने क्या कहा ईश्वर ने जब उनको ज्ञान दिया तो उसका

499
00:34:59,440 --> 00:35:03,600
वो क्या है उद्देश्य क्या है उद्देश्य हमारा भला है धर्म

500
00:35:03,600 --> 00:35:07,680
की स्थापना है बिल्कुल है धर्म की स्थापना है

501
00:35:07,680 --> 00:35:11,760
तो धर्म की स्थापना में ये है ना कि आगे ज्ञान को प्रवाह करें

502
00:35:11,760 --> 00:35:15,840
हां करें ठीक है तो ज्ञान का प्रवाह करें इसलिए उन्होंने ने

503
00:35:15,840 --> 00:35:20,080
चार ऋषियों को केवल दिया ना यानी कि ज्ञान के प्रवाह कराने

504
00:35:20,080 --> 00:35:24,080
के लिए वो चार ऋषियों पर डिपेंड हो रहा है ना सहायता ले रहा है ना चार

505
00:35:24,080 --> 00:35:28,080
ऋषियों की ज्ञान के प्रवाह के लिए तो मैं बता तो रहा हूं कहां तक

506
00:35:28,080 --> 00:35:32,640
कहां तक ईश्वर का कार्य मैं पॉइंट लगा रहा हूं कि भाई ईश्वर का ज्ञान देना

507
00:35:32,640 --> 00:35:37,600
ये पॉइंट है यहां तक ईश्वर का कार्य है आप क्या कर रहे हो कि आगे जो ज्ञान

508
00:35:37,600 --> 00:35:41,840
ज्ञान दे क्यों रहा है भाई ज्ञान देना है स्थापना का प्रवाह कराना

509
00:35:41,840 --> 00:35:46,080
है नहीं नहीं अब इस इसको एक्सप्लेन कर देता हूं। ज्ञान

510
00:35:46,080 --> 00:35:50,240
देने तक मैं एक्सप्लेन कर देता हूं। ज्ञान देने तक ईश्वर का जो

511
00:35:50,240 --> 00:35:54,320
है क्या कह लीजिए ईश्वर अपने ज्ञान दे रहा है उनको बेसिकली ज्ञान

512
00:35:54,320 --> 00:35:58,400
दे दिया। अब उस ज्ञान का आगे क्या करना है? उसमें ईश्वर ने उसमें भी उद्देश्य दे रखा है ईश्वर

513
00:35:58,400 --> 00:36:02,480
ने कि भाई इस ज्ञान को फैलाओ धर्म की स्थापना करो हर चीज करो। लेकिन ये करने

514
00:36:02,480 --> 00:36:06,400
के लिए आप स्वतंत्र हो। ये नहीं कि यहां पे मैं जबरदस्ती आपसे करवाऊंगा।

515
00:36:06,400 --> 00:36:12,160
ये पॉइंट नहीं आ रहा है यहां पे। जबरदस्ती करवाने की बात नहीं है।

516
00:36:12,160 --> 00:36:16,320
बात यह है प्रवाह कराने का उद्देश्य है कि नहीं ईश्वर का या केवल उन

517
00:36:16,320 --> 00:36:20,640
चार ऋषियों को ही मोक्ष का ज्ञान देने का उद्देश्य है? नहीं नहीं प्रह प्रवाह कराने का उद्देश्य है।

518
00:36:20,640 --> 00:36:25,360
उद्देश्य है तो प्रवाह कराने के लिए चार चेतनाओं पर डिपेंड हो रहा है ना ईश्वर।

519
00:36:25,360 --> 00:36:29,520
हां हां ना बिल्कुल हो गया ना तो सहायता हो गई चार चेतनाओं

520
00:36:29,520 --> 00:36:33,600
की। नहीं प्रवाह करने अब इसलिए तो मैं

521
00:36:33,600 --> 00:36:37,680
आपको एक्सप्लेन किया कि सहायता कहां तक है? जहां तक

522
00:36:37,680 --> 00:36:41,680
भाई ज्ञान देने के लिए ज्ञान लेने वाला होना तो चाहिए। उस उस रूप में सहायता चाहिए।

523
00:36:41,680 --> 00:36:45,840
यह नहीं कि ज्ञान फैलाने में सहायता चाहिए। ज्ञान फैलाना ईश्वर का काम है ही नहीं। ये हमारा

524
00:36:45,840 --> 00:36:50,880
काम है। तो इसका मतलब प्रवाह उद्देश्य नहीं था।

525
00:36:50,880 --> 00:36:55,200
प्रवाह आप समझ ही नहीं रहे। प्रवाह ईश्वर चाहता है आप ज्ञान का प्रवाह करो।

526
00:36:55,200 --> 00:36:59,440
लेकिन आप अपनी स्वतंत्रता से करो। ये ईश्वर नहीं चाहता कि भाई मैं करवाऊंगा तुमसे। स्वतंत्रता

527
00:36:59,440 --> 00:37:03,440
से तो वो करेगा ही वो दूसरा जीव है। चेतन सत्ता है वो। आपने चेतन

528
00:37:03,440 --> 00:37:07,680
सत्ता माननी तो वो स्वतंत्रता से करेगा। वो मैं नहीं कह रहा हूं जबरदस्ती करवाएगा।

529
00:37:07,680 --> 00:37:11,760
जबरदस्ती की बात नहीं कर रहा हूं। ईश्वर का उद्देश्य केवल उन चार लोगों

530
00:37:11,760 --> 00:37:16,000
को एक मशीन की तरह ज्ञान देना मात्र है। या फिर ईश्वर का उद्देश्य

531
00:37:16,000 --> 00:37:20,080
चार लोगों को ही मोक्ष का ज्ञान देना मात्र है। या फिर ईश्वर का उद्देश्य

532
00:37:20,080 --> 00:37:21,440
यह है कि वो चार लोगों को

533
00:37:21,440 --> 00:37:25,760
ज्ञान दे। आगे चार लोग ज्ञान का प्रवाह करें।

534
00:37:25,760 --> 00:37:30,160
अगर प्रभा अगर प्रवाह है देते समय अगर प्रवाह का उद्देश्य

535
00:37:30,160 --> 00:37:34,320
है देते समय तो यहां पर दूसरे चेतन की सहायता हो गई प्रवाह

536
00:37:34,320 --> 00:37:38,880
के कार्य में।

537
00:37:38,880 --> 00:37:42,880
यानी आप इस पॉइंट पर थोड़ा सा वो करिएगा। आप

538
00:37:42,880 --> 00:37:47,120
क्या प्रवाह कराने को ईश्वर का कार्य बोल रहे हैं? बिल्कुल

539
00:37:47,120 --> 00:37:51,120
धर्म संस्थापना के लिए ईश्वर का कार्य वही तो मैं बोल रहा हूं। मैं वही तो

540
00:37:51,120 --> 00:37:55,120
बोल रहा हूं। वो ईश्वर का कार्य नहीं धर्म संस्थापना करना। मेरे भाई बोल दो ना प्रभा

541
00:37:55,120 --> 00:38:01,120
कराना उद्देश्य नहीं है। मैं बात को [हंसी] क्यों करते

542
00:38:01,280 --> 00:38:05,440
समझ पा रहे हैं। ईश्वर का काम है कि आपको उपदेश कर दिया। और ईश्वर

543
00:38:05,440 --> 00:38:09,440
ये चाहता है कि आप प्रवाह करो। ठीक है? लेकिन ईश्वर का काम यह नहीं है कि प्रवाह करवाए।

544
00:38:09,440 --> 00:38:13,680
मैंने क्लियर बता दिया आपको। तो वो ये वो प्रवाह कराने

545
00:38:13,680 --> 00:38:17,840
के लिए डिपेंड हुआ ना दूसरी चेतनाओं पे। अगर वो ये चाहता है कि प्रवाह

546
00:38:17,840 --> 00:38:21,920
हो और वो एक मिनट अगर वो ये चाहता है प्रवाह हो। प्रभाव हो,

547
00:38:21,920 --> 00:38:25,920
धर्म संस्थापना हो, प्रभाव हो और वो केवल चार

548
00:38:25,920 --> 00:38:30,080
ऋषियों को दे रहा है। केवल चार ऋषियों को ज्ञान दे रहा है। अगर वास्तविकता

549
00:38:30,080 --> 00:38:34,160
में वास्तविकता ये है कि यदि

550
00:38:34,160 --> 00:38:39,360
वो किसी की सहायता लिए बिना कार्य करता है दूसरी चेतना की। ठीक है?

551
00:38:39,360 --> 00:38:43,360
दूसरे चेतन की तो फिर उसको हर

552
00:38:43,360 --> 00:38:47,440
एक के दिमाग में उसी तरीके से ज्ञान दे देना चाहिए वेद का जैसे कि

553
00:38:47,440 --> 00:38:51,440
उसने उन चार ऋषियों को दिया और फिर उसके ऊपर है कि वो धर्मानुसार

554
00:38:51,440 --> 00:38:55,440
आचरण करे या ना करे मतलब हम लोग वेद

555
00:38:55,440 --> 00:38:59,600
के ज्ञान के साथ इनबिल्ट होने चाहिए अगर वो सहायता

556
00:38:59,600 --> 00:39:03,840
नहीं ले रहा है तो और अगर उस अगर स्थिति रखने के लिए धर्म

557
00:39:03,840 --> 00:39:07,840
धर्म का प्रवाह करने के लिए धर्म को फैलाने के लिए स्थापना के

558
00:39:07,840 --> 00:39:11,920
लिए अगर वह कह रहा है कि मैंने चार ऋषियों को दूंगा बाकी के चार ऋषि आगे बढ़ाएंगे

559
00:39:11,920 --> 00:39:17,920
तो वो डिपेंड हो रहा है दूसरे चेतन पर।

560
00:39:19,280 --> 00:39:23,520
इसका अब मैं वही आंसर रिपीट करूंगा। फिर वही बात दिक्कत आ जाएगी।

561
00:39:23,520 --> 00:39:27,520
सेम बात बोलूंगा मैं कि ईश्वर का कार्य ज्ञान देना। ज्ञान का प्रवाह करवाना

562
00:39:27,520 --> 00:39:31,680
ईश्वर का कार्य नहीं है। ईश्वर का ईश्वर ने उपदेश किया है। ज्ञान का प्रवाह तुम करो।

563
00:39:31,680 --> 00:39:35,920
ज्ञान भाई ऐसा है। ईश्वर एक मशीन मैंने तीन आपको पॉइंट

564
00:39:35,920 --> 00:39:40,160
बोले। ईश्वर का कार्य है क्या कहते हैं

565
00:39:40,160 --> 00:39:44,560
मशीन के तरीके से चार लोगों को ज्ञान दे दिया जो उसके

566
00:39:44,560 --> 00:39:48,960
मैंने नहीं बोला मशीन वाले शब्द मत उपयोग करिए आप गलत उसमें

567
00:39:48,960 --> 00:39:52,960
जा रहा है अगर उसका कोई अर्थ नहीं है मैंने दूसरा ऑप्शन

568
00:39:52,960 --> 00:39:57,120
भी दिया कि भाई वो चार ऋषियों की मुक्ति के लिए उन्हें ज्ञान दे कि मैंने

569
00:39:57,120 --> 00:40:01,360
चार ऋषियों की मुक्ति के लिए उनको ज्ञान देना है क्योंकि वो मैंने मैंने योग्य समझे दूसरा

570
00:40:01,360 --> 00:40:05,440
पॉइंट भी दिया जब उसका कोई अर्थ नहीं होगा मशीन की तरह तब है

571
00:40:05,440 --> 00:40:09,680
जब उसका कोई उद्देश्य नहीं बस वो कर रहा है। ठीक है? उसको

572
00:40:09,680 --> 00:40:13,840
करना है वो कर रहा है। उसका स्वभाव है करना। तो उसका अगर आगे

573
00:40:13,840 --> 00:40:19,120
उससे कोई उद्देश्य नहीं है। जैसे यहां पर उद्देश्य जुड़ गया चार ऋषियों की मुक्ति।

574
00:40:19,120 --> 00:40:23,120
ठीक है? और इधर तीसरा मैंने विकल्प आपको

575
00:40:23,120 --> 00:40:27,120
दिया कि आगे जो प्रवाह वाला मामला है कि वो जो

576
00:40:27,120 --> 00:40:31,120
धर्म जो है प्रवाहित होगा कि नहीं होगा। अगर उसका उद्देश्य है तो यहां चार ऋषियों

577
00:40:31,120 --> 00:40:34,400
की सहायता ले रहा है धर्म के उसमें प्रवाह कराने में। तो इनमें से

578
00:40:34,400 --> 00:40:38,560
तीन ऑप्शन में से अगर केवल ज्ञान देना है मुक्ति भी नहीं है ना प्रवाह

579
00:40:38,560 --> 00:40:42,960
है तो आप केवल ये बोल दीजिए कि केवल ज्ञान देना है मैंने

580
00:40:42,960 --> 00:40:46,960
चौथा ऑप्शन तो दे दिया आपको चौथा ऑप्शन यही है कि उनको हां चौथा

581
00:40:46,960 --> 00:40:51,120
ऑप्शन यही है उनको ज्ञान दिया और उनके द्वारा ज्ञान प्रवाह

582
00:40:51,120 --> 00:40:55,120
हो ऐसा ईश्वर ने उनको उपदेश भी दिया अब ज्ञान प्रवाह हो

583
00:40:55,120 --> 00:40:59,120
रहा है या नहीं हो रहा है उसमें ईश्वर को कोई ये नहीं है कि भाई मैं

584
00:40:59,120 --> 00:41:03,360
ये नहीं कह रहा आगे क्या हुआ देते समय ईश्वर का उद्देश्य क्या

585
00:41:03,360 --> 00:41:07,360
है प्रयोजन क्या है ज्ञान देने का बिल्कुल बिल्कुल ज्ञान प्रवाह करवाना बिल्कुल

586
00:41:07,360 --> 00:41:11,680
यही उद्देश्य है यानी कि प्रवाह करने के लिए वो यह सोच रहा है ना कि

587
00:41:11,680 --> 00:41:15,680
चार लोग करें नहीं करें वो बात अलग है वो तो उसकी इच्छा के विरुद्ध हो गई मैं बता देता हूं ठीक है मैं

588
00:41:15,680 --> 00:41:19,840
बता देता हूं प्रवाह करवाना और प्रवाह करना

589
00:41:19,840 --> 00:41:24,000
दो अलग-अलग बातें हैं। आप इस पे थोड़ा गौर कीजिए। ईश्वर चाहता है कि इनके द्वारा

590
00:41:24,000 --> 00:41:28,320
मैं प्रवाह करवाऊं। ईश्वर ये नहीं चाहता कि मैं इनके द्वारा

591
00:41:28,320 --> 00:41:32,320
प्रवाह यानी ईश्वर के कार्य में नहीं आएगा। वो ईश्वर के उपदेश

592
00:41:32,320 --> 00:41:36,640
में आ जाएगा। कार्य में नहीं आने वाला। कार्य में आने के लिए फिर ईश्वर को ही इन्वॉल्व होना पड़ेगा।

593
00:41:36,640 --> 00:41:40,880
ईश्वर वहां पर स्वतंत्र आपको छोड़ रहा है। ईश्वर इंटरफेयर नहीं कर रहा। ईश्वर के कार्य में नहीं आ रहा वो।

594
00:41:40,880 --> 00:41:44,880
जहां ईश्वर आएगा इंटरफेरेंस करने वो ईश्वर के कार्य में आएगा। प्रवाह करवाना और

595
00:41:44,880 --> 00:41:49,200
प्रवाह करने इसमें अंतर है। ठीक है? अब मैंने एक्सप्लेन कर दिया इसको।

596
00:41:49,200 --> 00:41:49,700
अब

597
00:41:49,440 --> 00:41:53,440
बोलिए आप प्रवाह करवाना। प्रवाह करने में अंतर है।

598
00:41:53,440 --> 00:41:57,680
मैं ये पूछ रहा हूं जब वो ज्ञान दे रहा होता है चार ऋषियों

599
00:41:57,680 --> 00:42:01,680
को तो उसके मन में ये होता है। मैं मैं ज्ञान दे रहा हूं। इसका क्या अर्थ है?

600
00:42:01,680 --> 00:42:05,840
क्या नहीं है? इसका कुछ नहीं है। मेरा स्वभाव है। ज्ञान देना मैं दे रहा हूं। ये होता है या

601
00:42:05,840 --> 00:42:09,920
फिर या फिर या फिर ये होता है कि मैं स्वभाव है मेरा

602
00:42:09,920 --> 00:42:14,080
स्वभाव है धर्म स्थापना करवाने के निमित्त चार

603
00:42:14,080 --> 00:42:18,240
ऋषियों को ज्ञान दूं। यानी कि धर्म स्थापना में वो चार ऋषियों के

604
00:42:18,240 --> 00:42:22,240
द्वारा प्रवाह कराने के निमित्त वो उन पर आलम क्या कहते?

605
00:42:22,240 --> 00:42:26,480
उनकी सहायता पर डिपेंड हो रहा है। तो ये आ गया। वो

606
00:42:26,480 --> 00:42:30,640
क्या सोच रहा है उस समय? हां मैं बता देता हूं। ईश्वर यह

607
00:42:30,640 --> 00:42:35,360
चाहता है कि इन चार ऋषियों के द्वारा ज्ञान प्रवाहित हो। लेकिन

608
00:42:35,360 --> 00:42:39,760
लेकिन ईश्वर यह नहीं चाहता है कि अगर इन चार ऋषियों के द्वारा ज्ञान प्रवाहित

609
00:42:39,760 --> 00:42:43,760
नहीं हुआ तो इसमें मेरा इंटरफेरेंस हो या मेरा कुछ रोल हो। वहां पर ऋषि

610
00:42:43,760 --> 00:42:47,920
स्वतंत्र है। ऋषि को जो है क्या बोलना चाहिए? किसी प्रकार का ईश्वर ये

611
00:42:47,920 --> 00:42:51,920
नहीं कर रहा बाधित नहीं कर रहा कि आप जबरदस्ती करो। समझ रहे हैं मेरा

612
00:42:51,920 --> 00:42:55,920
पॉइंट समझ रहे हैं? इसका ईश्वर नहीं करवा। अपनी इसका अर्थ ये है कि ईश्वर की

613
00:42:55,920 --> 00:42:59,920
इच्छा ये है कि भाई ये कर दे तो अच्छा होगा। ऐसा है पर उन्होंने

614
00:42:59,920 --> 00:43:04,000
किया नहीं अब समझे बिल्कुल बिल्कुल अगर नहीं करे तो ईश्वर को ये चिंता

615
00:43:04,000 --> 00:43:04,500
नहीं है कि

616
00:43:04,480 --> 00:43:08,480
ईश्वर टेंशन में आ गया अरे नहीं हो रहा ज्ञान प्रभावित धर्म नहीं हो रहा ईश्वर टेंशन में नहीं आएगा

617
00:43:08,480 --> 00:43:12,560
मैं ये बोलना चाह रहा हूं ठीक है ठीक है तो यानी कि वो ये चाहता है कि वो ऐसा

618
00:43:12,560 --> 00:43:16,640
करें करे करे तो अच्छा है नहीं करे तो इनके लिए बुरा है

619
00:43:16,640 --> 00:43:20,640
दोनों बातें हैं इसमें नहीं करें तो वो हमारे हमारे ऊपर

620
00:43:20,640 --> 00:43:24,640
डिपेंड करता है हमारे ऊपर डिपेंड करता है हम करें या ना करें तो उसके

621
00:43:24,640 --> 00:43:28,720
अंदर तो यह भाव आएगा ना जब वो नहीं करेंगे तो क्या

622
00:43:28,720 --> 00:43:34,240
भाव आएगा इस बात का कि भाई वो ऐसा करें धर्म स्थापना हो

623
00:43:34,240 --> 00:43:38,560
नहीं मतलब नहीं करेंगे तो क्या भाव आएगा वो पूछना चाह रहा हूं आपसे अगर

624
00:43:38,560 --> 00:43:42,560
चार ऋषि धर्म स्थापना आगे प्रवाह नहीं करेंगे जबकि वो

625
00:43:42,560 --> 00:43:46,560
ऐसा सोच के ही कर रहा है कि करें हां ठीक

626
00:43:46,560 --> 00:43:50,720
है ऐसा ऐसा सोच के ही कर रहा है ना कि करें तो

627
00:43:50,720 --> 00:43:54,880
जब उसका जब उसका उद्देश्य प्रवाह कराना हो गया

628
00:43:54,880 --> 00:43:59,200
उसका उद्देश्य ज्ञान देना मात्र नहीं था प्रभा भी था उसका उद्देश्य। उसका उद्देश्य प्रवाह

629
00:43:59,200 --> 00:44:04,720
था। ज्ञान देना मात्र नहीं था। हम

630
00:44:04,720 --> 00:44:07,040
ठीक है।

631
00:44:07,040 --> 00:44:11,360
हेलो आप अटक गए शायद।

632
00:44:11,360 --> 00:44:13,840
हेलो

633
00:44:13,840 --> 00:44:18,640
ये क्या हो गया? हेलो हेलो हेलो हेलो हेलो

634
00:44:18,640 --> 00:44:24,640
अटक गए क्या?

635
00:44:30,240 --> 00:44:35,040
हां आपका शायद नेटवर्क का इशू था। अच्छा होगा।

636
00:44:35,040 --> 00:44:39,280
तो मैं ये कह रहा था कि उसका उद्देश्य सीधी

637
00:44:39,280 --> 00:44:43,520
सी बात है इसको मतलब थोड़ा सा शब्दों में ना उलझाया जाए।

638
00:44:43,520 --> 00:44:47,600
एक सीधी बात स्पष्ट दिखाई दे रही है कि अगर ईश्वर का

639
00:44:47,600 --> 00:44:51,680
उद्देश्य प्रवाह है तो वो डिपेंड हो रहा है देते टाइम। वो

640
00:44:51,680 --> 00:44:55,760
बात अलग है कि वो आगे करें कि ना करें उसमें वो इंटरफेयर करेगा कि नहीं करेगा।

641
00:44:55,760 --> 00:45:00,000
मगर प्रभा अगर उसका उद्देश्य है तो उन चार ऋषियों मात्र को

642
00:45:00,000 --> 00:45:04,000
ज्ञान देकर के डिपेंड हो रहा है वहां पर इंटरफेयर

643
00:45:04,000 --> 00:45:08,160
ना करने से डिपेंड ना होना सिद्ध नहीं होता कि वो इंटरफेयर नहीं करेगा तो डिपेंड

644
00:45:08,160 --> 00:45:12,480
ना होना सिद्ध हो जाएगा। एक मिनट एक मिनट अगर उसका उद्देश्य प्रवाह है। अगर प्रवाह

645
00:45:12,480 --> 00:45:16,480
नहीं है उसका उद्देश्य या तो ये है कि मुझे बस ज्ञान देना होता है तो मैंने चार को दे

646
00:45:16,480 --> 00:45:20,480
दिया। ये हो गया मशीन वाला कार्य और या फिर ये है कि मुझे इनकी मुक्ति के लिए ज्ञान देना है

647
00:45:20,480 --> 00:45:25,840
तो फिर ये हो गया वो वाला ज्ञान। ठीक है? ठीक है। ठीक। दे दो उत्तर।

648
00:45:25,840 --> 00:45:30,080
दो ईश्वर का उद्देश्य है प्रवाह कराना। परंतु इनकी इच्छा

649
00:45:30,080 --> 00:45:34,240
से ही प्रवाह करें। ये उद्देश्य है ईश्वर का। समझ रहे हैं आप? इच्छा

650
00:45:34,240 --> 00:45:38,800
जो ऋषियों की या मनुष्यों की इच्छा आएगी इसमें बीच में प्रवाह।

651
00:45:38,800 --> 00:45:42,800
दूसरे पर डिपेंड हो गया ना। हां। तो ये तो बोल ही

652
00:45:42,800 --> 00:45:45,360
रहा हूं मैं। इसमें समस्या क्या है?

653
00:45:45,360 --> 00:45:49,600
तो मतलब दूसरे चेतन का अपने उद्देश्य में दूसरे चेतन का आलंबन

654
00:45:49,600 --> 00:45:52,640
हो गया ना

655
00:45:52,640 --> 00:45:56,880
फिर आप उसको आगे वाले पे लेके आएंगे उद्देश्य केवल इतना ही था

656
00:45:56,880 --> 00:46:00,960
कि ये जो है ज्ञान का प्रवाह करें ज्ञान देने तक ईश्वर का खुद का कार्य

657
00:46:00,960 --> 00:46:04,960
है आगे उनका कार्य नहीं है मैं एक्सप्लेन कर दिया हूं कितनी बार तो

658
00:46:04,960 --> 00:46:09,120
उसका उद्देश्य प्रवाह मान प्रवाह है लेकिन इनके हिसाब

659
00:46:09,120 --> 00:46:13,200
से प्रवाह करें ईश्वर उसमें ईश्वर का ये उद्देश्य नहीं है कि ये जबरदस्ती प्रवाह

660
00:46:13,200 --> 00:46:17,200
मैं करवाऊं या जबरदस्ती करें ही करें ईश्वर हां ये एक पॉइंट सुन लीजिए।

661
00:46:17,200 --> 00:46:21,280
ईश्वर का उद्देश्य ये नहीं कि करें ही करें। अगर ना करेंगे तो मेरा जो उद्देश्य भंग

662
00:46:21,280 --> 00:46:26,240
हो जाएगा। नहीं ईश्वर का है कि इनकी इच्छा से करें। मतलब

663
00:46:26,240 --> 00:46:31,040
मतलब कि ईश्वर ने जब उनको ज्ञान दिया तो ये सोच कर दिया

664
00:46:31,040 --> 00:46:35,120
कि ये ज्ञान आगे फैले या ना फैले मुझे कोई मतलब नहीं है। वो तो

665
00:46:35,120 --> 00:46:39,200
ऋषियों की कृपा रही। हां बिल्कुल हम सपुर्ण

666
00:46:39,200 --> 00:46:43,200
रहे। इसमें ना फैला तो हमारी मर्जी। अगर ऋषि अगर आगे नहीं

667
00:46:43,200 --> 00:46:47,440
बढ़ाते तो ईश्वर फिर दोबारा ज्ञान देता भी नहीं क्योंकि उसने दिया नहीं।

668
00:46:47,440 --> 00:46:51,440
ये तो ये तो दूसरी ये तो दूसरा विषय हो गया। मेरा पॉइंट ये है बाद में ज्ञान

669
00:46:51,440 --> 00:46:55,440
देना है ना देना वो दूसरा विषय मेरा पॉइंट सिर्फ इतना सा है कि अगर वो ज्ञान ना भी

670
00:46:55,440 --> 00:46:59,680
फैलाएं अगर स्वतंत्र इच्छा से ऋषि जो है या फिर ऋषि चल रहे ऋषि को हटा दो। आगे

671
00:46:59,680 --> 00:47:00,480
चलके आगे

672
00:47:00,480 --> 00:47:04,640
भी तो चल ही रही ना। मतलब आगे भी हमारे तक तो ज्ञान आया है। इस बीच

673
00:47:04,640 --> 00:47:08,640
में भी अगर कोई ऐसा समय आता कि भाई यहां पे ज्ञान नहीं फैल

674
00:47:08,640 --> 00:47:12,720
रहा है या यहां ज्ञान इसमें समस्या आ जा रही है। वैदिक धर्म का नाश हो रहा है या अधर्म

675
00:47:12,720 --> 00:47:17,040
फैल रहा है कुछ भी तो वहां उस केस में भी हर केस में भी ईश्वर कभी भी चिंतित

676
00:47:17,040 --> 00:47:21,120
नहीं होगा। एक% भी मैं चिंतित ना होने की बात नहीं कर रहा

677
00:47:21,120 --> 00:47:25,280
हूं। चिंतित ना होने की [गला साफ़ करने की आवाज़] बात नहीं कर रहा। उद्देश्य ईश्वर

678
00:47:25,280 --> 00:47:29,440
कभी भी ये नहीं सोचेगा कि मेरा उद्देश्य जो है मैं कहां कह रहा हूं? मैं कह रहा हूं उसके

679
00:47:29,440 --> 00:47:33,440
चिंतित ना होने से उसका आलंबन ना लेना सिद्ध कहां से हुआ? अगर

680
00:47:33,440 --> 00:47:37,680
उसका उद्देश्य ज्ञान का प्रवाह है। आलंबन ज्ञान

681
00:47:37,680 --> 00:47:41,920
के प्रवाह में अगर उसके उद्देश्य ज्ञान का प्रवाह

682
00:47:41,920 --> 00:47:46,320
है तो उसके उसके उद्देश्य में दूसरा चेतन शामिल है।

683
00:47:46,320 --> 00:47:50,400
अब वो आगे चलकर के दे या ना दे अगर वो उसमें इंटरफेयर

684
00:47:50,400 --> 00:47:54,480
करेगा कि नहीं करेगा। इससे यह मतलब सिद्ध नहीं होता है कि वो डिपेंड

685
00:47:54,480 --> 00:47:58,960
नहीं है ज्ञान के प्रवाह के लिए उनके ऊपर। क्योंकि उसका

686
00:47:58,960 --> 00:48:03,520
डिपेंड है। मैं तो खुद ही बोलता हूं। डिपेंड है। डिपेंड है।

687
00:48:03,520 --> 00:48:07,520
डिपेंड है। ये तो शुरुआत ही बोल दिया था मैंने। डिपेंड हो।

688
00:48:07,520 --> 00:48:11,600
ठीक है। डिपेंड हो गया। अब आप अब ईश्वर डिपेंड कर रहा है

689
00:48:11,600 --> 00:48:15,520
चार ऋषियों के ऊपर प्रवाह के लिए। चार ऋषियों के नहीं। समस्त

690
00:48:15,520 --> 00:48:21,280
मनुष्य के ऊपर डिपेंड कर रहा है धर्म की स्थापना के लिए। केवल चार ऋषि क्यों ले रहे हैं?

691
00:48:21,280 --> 00:48:25,280
चार ऋषि क्यों ले रहे? क्योंकि चार ऋषियों को उसने ज्ञान दिया ना

692
00:48:25,280 --> 00:48:29,520
पॉइंट धर्म स्थापना के लिए अगर समस्त उन पर डिपेंड करता

693
00:48:29,520 --> 00:48:33,600
अगर वो समस्त मनुष्यों पे तो वो समस्त मनुष्यों को ज्ञान देता

694
00:48:33,600 --> 00:48:39,600
ना फिर तो ये होता कि मैंने ज्ञान एक मिनट मैं

695
00:48:41,120 --> 00:48:45,280
ईश्वर [गला साफ़ करने की आवाज़] सर्वव्यापक है। सबके अंदर है।

696
00:48:45,280 --> 00:48:49,440
ठीक है? सबके मन में भी है। अंतकरण में तो ज्ञान

697
00:48:49,440 --> 00:48:53,680
दे रहा है। तो यदि वह सब मनुष्यों

698
00:48:53,680 --> 00:48:58,960
के ऊपर डिपेंड होता तो सब मनुष्यों के अंतकरण में ज्ञान दे देकर ही भेजता।

699
00:48:58,960 --> 00:49:03,040
नहीं वो वाली बात नहीं कह रहा था। मैं दूसरी बात बोल रहा था। मैं एक्सप्लेन कर देता हूं मैं क्या

700
00:49:03,040 --> 00:49:07,200
बोलना चाह रहा था। मैं बोल रहा था कि चार ऋषियों को दिया उसके बाद जितना

701
00:49:07,200 --> 00:49:11,440
भी सृष्टि बनी जितने भी मनुष्य आए वो सब में जिनके भी प्यास

702
00:49:11,440 --> 00:49:15,520
स्वतंत्रता इच्छा थी। सुनिए मैं कंप्लीट तो कर आप काट रहे हैं। कंप्लीट करने दीजिए

703
00:49:15,520 --> 00:49:20,480
ना। आप काट क्यों रहे मैं कंप्लीट कर देता हूं। थोड़ा सा बचा है आप जितने भी

704
00:49:20,480 --> 00:49:24,480
जितने भी मनुष्य के पास ये ऑप्शन था कि हम अच्छा कर्म करें धर्म

705
00:49:24,480 --> 00:49:28,480
की स्थापना करें धार्मिक काम करें या धार्मिक करें उन सबके पास ये

706
00:49:28,480 --> 00:49:30,720
ऑप्शन था कि वो करें या ना करें

707
00:49:30,720 --> 00:49:36,720
सिंपल ठीक है

708
00:49:36,720 --> 00:49:40,960
उन सबके पास धर्म का आचरण करने का और ना करने का ऑप्शन है दुनिया के प्रत्येक

709
00:49:40,960 --> 00:49:46,000
मनुष्य के पास जिसको ज्ञान है उसी को

710
00:49:46,000 --> 00:49:50,160
वही बात आ आ गई ना इसका मतलब वो सब मनुष्यों पर डिपेंड नहीं है।

711
00:49:50,160 --> 00:49:54,320
सब मनुष्यों से प्रवाह नहीं करा रहा है। वैसे जिसको ज्ञान है ना

712
00:49:54,320 --> 00:49:58,320
है उसको ज्ञान लेने का तो ऑप्शन है। मैं वही तो कुछ समझाना चाह रहा हूं आपको। अच्छा सब मनुष्यों

713
00:49:58,320 --> 00:50:02,320
के पास ज्ञान लेने का ऑप्शन है। पक्का कर लीजिए

714
00:50:02,320 --> 00:50:06,560
आप। हां। सबके पास ज्ञान लेने का ऑप्शन

715
00:50:06,560 --> 00:50:10,640
है या नहीं है? वो इस दृष्टि से बोलिए कि भाई सब में जो जो मनुष्य

716
00:50:10,640 --> 00:50:14,640
जिन जिन के पास ऑप्शन है ज्ञान लेने का उनके पास ऑप्शन आ जाएगा कि मैं धर्म का करूं या अधर्म का

717
00:50:14,640 --> 00:50:18,640
करूं। यह बोला मैंने। सबके पास ज्ञान लेने का ऑप्शन है।

718
00:50:18,640 --> 00:50:23,680
मैं यह पूछ रहा हूं। ऑप्शन होना चाहिए ज्ञान लेने का। सबके पास

719
00:50:23,680 --> 00:50:27,840
सबके पास हर समय नहीं है। नहीं नहीं ये नहीं बोला। तो मैं पूछ

720
00:50:27,840 --> 00:50:31,920
रहा हूं। है क्या? नहीं है। नहीं है। बिल्कुल नहीं है। नहीं

721
00:50:31,920 --> 00:50:36,080
है ना? तो इसका मतलब ये कथन गलत है कि वो सब पर डिपेंड कर रहा है धर्म

722
00:50:36,080 --> 00:50:40,480
उसके लिए धर्म स्थापना के लिए। धर्म के प्रवाह के लिए। नहीं सबके पास।

723
00:50:40,480 --> 00:50:44,720
चार उसने चार ऋषियों को देखिए आप यहां पर

724
00:50:44,720 --> 00:50:46,160
वही बात आ रही है।

725
00:50:46,160 --> 00:50:50,320
उसने चार जो सच्चाई है उसको एक्सेप्ट भी किया करें कहीं-कहीं पर उसने

726
00:50:50,320 --> 00:50:54,400
चार ऋषियों को जो दिया वो ये सोच के दिया आगे इसका प्रवाह करेंगे

727
00:50:54,400 --> 00:50:58,480
और उन्होंने किया और ये प्रवाह कराना उनका उसका कार्य था

728
00:50:58,480 --> 00:51:02,560
ईश्वर का कि प्रवाह हो प्रवाह हो और

729
00:51:02,560 --> 00:51:06,640
अगर अब इसप आओ हां हां इस पे

730
00:51:06,640 --> 00:51:10,880
इसप प्रवाह हो अगर आप कहना चाह ऐसा है कि वो ऋषि

731
00:51:10,880 --> 00:51:14,880
अगर ऐसा है कि वो ऋषि नहीं करने वाले हैं। नहीं करना भी उनके पास

732
00:51:14,880 --> 00:51:18,960
विकल्प है तो ईश्वर इसकी व्यवस्था करता। फिर नहीं करने का विकल्प

733
00:51:18,960 --> 00:51:22,960
भी है ऋषियों के पास यदि तो फिर उसका वो चुनाव गलत गलत कहलाता है

734
00:51:22,960 --> 00:51:26,960
कि उसने गलत लोगों को चुना उसके लिए अच्छा अच्छा अच्छा यानी यानी

735
00:51:26,960 --> 00:51:31,040
आप ये कहना चाह रहे हैं कि जिनके पास धर्म का ज्ञान आ गया उनके पास ये

736
00:51:31,040 --> 00:51:35,360
विकल्प नहीं बचता है कि वो धर्म का काम कर भी कर सके। विकल्प नहीं ना

737
00:51:35,360 --> 00:51:39,760
मैं चार ऋषियों की बात कर रहा हूं। जिनको जिनको जिनको

738
00:51:39,760 --> 00:51:43,840
ईश्वर ने चुना धर्म के प्रवाह के लिए आगे चलके ऋषियों

739
00:51:43,840 --> 00:51:48,000
ने जिसको चुना उसने किसको चुना वो बातें जिनको ईश्वर ने चुना

740
00:51:48,000 --> 00:51:52,480
धर्म की स्थापना के लिए मैं उनकी बात कर रहा हूं। हां उनको

741
00:51:52,480 --> 00:51:56,640
ईश्वर ने यही सोच के चुना कि ये योग्य है, अच्छी आत्माएं

742
00:51:56,640 --> 00:52:00,880
हैं, पुण्य आत्माएं हैं और ये जो है डेफिनेटली ये जो है प्रवाह करेंग

743
00:52:00,880 --> 00:52:01,380
इसलिए

744
00:52:01,200 --> 00:52:05,440
उन्होंने उनको ही ज्ञान दिया और उन्होंने प्रवाह किया और इस कार्य के लिए ईश्वर

745
00:52:05,440 --> 00:52:09,440
डिपेंड कहलाया जो आपने भी माना। हां हां ये तो बोल ही

746
00:52:09,440 --> 00:52:14,160
रहा हूं मैं। हां। तो डिपेंड हो गया। तो बस ठीक है। अब अब मैं इस पे आता हूं।

747
00:52:14,160 --> 00:52:18,160
अब मैं यह पूछ रहा हूं आपसे कि आपने

748
00:52:18,160 --> 00:52:22,640
एक बात कही थी जब मैंने आपसे उदाहरण पूछा यहां पर बात

749
00:52:22,640 --> 00:52:26,800
थोड़ी सी पलट गई थी। बात यह हो रही थी

750
00:52:26,800 --> 00:52:30,960
कि

751
00:52:30,960 --> 00:52:34,960
हां जब मैंने कहा कि जब ईश्वर

752
00:52:34,960 --> 00:52:39,120
सृष्टि कर रहा है तो उसमें वो मिट्टी

753
00:52:39,120 --> 00:52:43,200
का भी उपयोग कर रहा है और आत्मा का भी उपयोग

754
00:52:43,200 --> 00:52:47,200
कर रहा है। ठीक है? मिट्टी का भी उपयोग कर रहा है,

755
00:52:47,200 --> 00:52:51,280
आत्मा का भी उपयोग कर रहा है, जीव का भी उपयोग कर रहा है। तो

756
00:52:51,280 --> 00:52:55,520
फिर आपने कहा कि इस तरीके से उपयोग करके सृष्टि बनाना

757
00:52:55,520 --> 00:52:59,680
ये ईश्वर का कार्य है और इस कार्य के लिए वो किसी की सहायता नहीं लेता।

758
00:52:59,680 --> 00:53:03,760
ठीक बिल्कुल। ठीक। हम तो अब मैं

759
00:53:03,760 --> 00:53:08,000
अगर ये कहूं कि ईश्वर की सहायता लेकर के

760
00:53:08,000 --> 00:53:12,240
हम मोक्ष को साधना या अपने जीवन को संचालित

761
00:53:12,240 --> 00:53:16,240
करना। ठीक है। ईश्वर की सहायता लेकर

762
00:53:16,240 --> 00:53:20,240
के प्रकृति की सहायता लेकर के अपने जीवन को संचालित करना मोक्ष को

763
00:53:20,240 --> 00:53:24,320
साधना या जो भी क्रियाएं करनी है करना यह मनुष्य

764
00:53:24,320 --> 00:53:28,320
का कार्य है और इसमें वो और किसी की सहायता नहीं लेता इसलिए क्या मनुष्य

765
00:53:28,320 --> 00:53:34,000
भी सर्वशक्तिमान है नहीं है

766
00:53:34,000 --> 00:53:36,240
क्यों

767
00:53:36,240 --> 00:53:40,320
तो आप समानता दिखा दीजिए क्या समानता है ईश्वर का जो सामर्थ्य

768
00:53:40,320 --> 00:53:44,720
है अनंत मैं बताता हूं मैं बताता हूं मनुष्य को

769
00:53:44,720 --> 00:53:48,880
एक मिनट मैं अपने विषय को क्लियर कर दूं। आपने

770
00:53:48,880 --> 00:53:53,040
उसमें अभी लास्ट लाइन बोली उसमें एक प्रश्नवाचक वो था

771
00:53:53,040 --> 00:53:56,800
शब्द। ठीक है? हम

772
00:53:56,800 --> 00:54:00,880
अ जो मैं कह रहा था ना कि आपकी चीजें

773
00:54:00,880 --> 00:54:04,960
शुरू हो रही है प्रमाण से। ठीक है? कैसे

774
00:54:04,960 --> 00:54:09,040
शुरू हो रही है? कि जो भी चीज आपके सिद्धांत के

775
00:54:09,040 --> 00:54:13,200
बाहर जा रही जो भी मेरा तर्क सिद्धांत के बाहर जा रहा है उसको आप अपने सिद्धांत में शामिल

776
00:54:13,200 --> 00:54:17,520
कर ले रहे हो। जैसे कि भ्रमित करने वाला

777
00:54:17,520 --> 00:54:21,520
वो मैं वो मैं बताऊंगा जैसे उदाहरण दे रहा हूं भाई थोड़ा मुझे

778
00:54:21,520 --> 00:54:25,600
बोलने तो दो उदाहरण दे रहा हूं मैं जैसे कि भ्रमित करने वाले कार्य

779
00:54:25,600 --> 00:54:29,600
ईश्वर द्वारा होना सिद्ध हो गया। कार्य ईश्वर कर रहा है मगर जीव को लग

780
00:54:29,600 --> 00:54:32,400
रहा है मैं कर रहा हूं। ठीक है?

781
00:54:32,400 --> 00:54:36,400
यहां तक कि थ्योरिकली ईश्वर को जान लेने के बाद भी लग रहा है मैं ही कर

782
00:54:36,400 --> 00:54:40,480
रहा हूं। वो बात अलग है कि अपने आप को बताते रहना है। ध्यान रखना

783
00:54:40,480 --> 00:54:44,480
है कि ईश्वर कर रहा है हम नहीं कर रहा। वो एक अलग मगर प्रथम दृष्ट्या में वो यही मान

784
00:54:44,480 --> 00:54:48,640
रहा है मैं ही कर रहा हूं। ठीक? तो जब ये वाली बात आई भ्रमित

785
00:54:48,640 --> 00:54:52,720
भ्रम उत्पन्न हो ऐसा कार्य ईश्वर करेगा। तो ये इस तरह से आचरण करना आपने कहा यह

786
00:54:52,720 --> 00:54:56,720
कार्य ईश्वर के स्वभाव में आता है। ष्ठी कर्म फल सिद्धांत के लिए कर्म फल

787
00:54:56,720 --> 00:55:00,720
सिद्धांत के लिए भ्रम उत्पन्न होने वाले कार्य भी कार्य करना भी ईश्वर के उसमें

788
00:55:00,720 --> 00:55:04,960
आता है। तो आपने तुरंत इसको अंदर ले लिया। अब जब मैंने

789
00:55:04,960 --> 00:55:09,520
कहा कि भाई ईश्वर जो है वह सृष्टि

790
00:55:09,520 --> 00:55:13,600
रचना करने के लिए जड़ प्रकृति की सहायता भी ले रहा है।

791
00:55:13,600 --> 00:55:17,760
चेतन जीव की सहायता भी ले रहा है। ठीक है? अब

792
00:55:17,760 --> 00:55:21,840
उसमें जब वो चेतन जीव की सहायता भी ले रहा है तो

793
00:55:21,840 --> 00:55:26,000
फिर भाई उसकी वो तो दोनों तरीके के जितने भी पदार्थ है जैसे आपके लोग कहते

794
00:55:26,000 --> 00:55:30,000
हैं मुझे चश्मे की जरूरत है जड़ जड़ जड़ की सहायता दो ये

795
00:55:30,000 --> 00:55:34,160
इस सहायता के कारण आप कहते हैं कि जीव बाधित है वो सर्वशक्तिमान है ईश्वर वो नहीं जबकि वो

796
00:55:34,160 --> 00:55:38,320
ले रहा है जड़ की सहायता भी ले रहा है चेतन की भी ले रहा है तो आपने कहा इस तरीके से उनका

797
00:55:38,320 --> 00:55:43,680
उपयोग करके सृष्टि रचना करना ये ईश्वर का कार्य है यहां फिर आ गया प्रमाण

798
00:55:43,680 --> 00:55:48,000
यहां फिर प्रमाण आ गया कि ईश्वर के कार्य क्या ये कौन बताएगा?

799
00:55:48,000 --> 00:55:52,080
ईश्वर के कार्य क्या है? यह कौन बताएगा? या ईश्वर का स्वरूप क्या है? स्वभाव क्या

800
00:55:52,080 --> 00:55:56,160
है? कौन बताएगा? आर्य समाज या फिर प्रमाण आ गया। तो प्रमाण

801
00:55:56,160 --> 00:56:00,480
तो आप ही लेके आए पहले। नहीं ये प्रमाण कहां ले आया मैं पहले?

802
00:56:00,480 --> 00:56:05,600
सर्वशक्तिमान की परिभाषा से सर्वशक्तिमान की परिभाषा कहां से आई?

803
00:56:05,600 --> 00:56:09,680
मैंने पूछा क्या आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि नहीं? नहीं नहीं।

804
00:56:09,680 --> 00:56:14,080
आपने अपनी परिभाषा डाली ना कि ईश्वर जो कुछ भी कर सकता है ये प्रमाण आप लाए ना।

805
00:56:14,080 --> 00:56:18,880
आपने पूछा होगा ना?

806
00:56:18,880 --> 00:56:22,880
बिल्कुल वही से शुरू हुआ है। प्रमाण नहीं है। ये प्रमाण नहीं है। मैंने आपसे सीधे एक

807
00:56:22,880 --> 00:56:27,440
तार्किक क्वेश्चन किया। सीधे तार्किक

808
00:56:27,440 --> 00:56:31,760
प्रमाण एक्सप्लेन कर मैं बता रहा हूं।

809
00:56:31,760 --> 00:56:35,840
आप ये ये प्रमाण आप कैसे यूज़ कर रहे हो कि पहले

810
00:56:35,840 --> 00:56:39,920
आप आर्य समाजी हो जाओ। जब आप आर्य समाजी हो जाओगे तो आप ये मान

811
00:56:39,920 --> 00:56:44,160
लोगे कि ईश्वर का स्वभावगत कार्य एक मिनट ईश्वर का स्वभावगत

812
00:56:44,160 --> 00:56:48,160
कार्य क्या-क्या है? तो जो जो चीजें हम जो क्लेम करते हैं हमारे अगर विरुद्ध भी जा

813
00:56:48,160 --> 00:56:52,320
रहे वो चीजें हम स्वभाव में डालते जाएंगे हमारा ईश्वर बच जाएगा। ईश्वर वही कर रहा है जो उसका

814
00:56:52,320 --> 00:56:56,400
कार्य है। तो ये प्रमाण में आ गई बात। ठीक है? तो

815
00:56:56,400 --> 00:57:00,560
उस दिन आपने ये कहा था अब मैं पॉइंट मेन पॉइंट पे दोबारा आ जाऊं। उस दिन

816
00:57:00,560 --> 00:57:04,560
आपने ये कहा था कि

817
00:57:04,560 --> 00:57:09,360
भाई ये जो चेतन और जड़ है इसकी

818
00:57:09,360 --> 00:57:13,600
सहायता से ये जो चेतन और जड़ है

819
00:57:13,600 --> 00:57:17,840
इसके आलंबन से सृष्टि रचना करना ये ईश्वर का कार्य है। इसमें वो किसी की सहायता

820
00:57:17,840 --> 00:57:21,840
नहीं ले रहे। तो अगर मैं यह कह दूं कि अपने

821
00:57:21,840 --> 00:57:26,240
जीवन को संचालित करना और अपनी इच्छा अनुसार मोक्ष

822
00:57:26,240 --> 00:57:31,040
को साधना अथवा ना साधना ईश्वर की सहायता से

823
00:57:31,040 --> 00:57:35,520
ईश्वर का आलंबन लेकर और जड़ प्रकृति का आलंबन

824
00:57:35,520 --> 00:57:39,520
लेकर यह मनुष्य का कार्य है तो फिर आपकी परिभाषा के अनुसार मनुष्य भी

825
00:57:39,520 --> 00:57:43,520
सर्वशक्तिमान सिद्ध हो जाएगा। अब बताइए इसका आंसर दे दूं मैं।

826
00:57:43,520 --> 00:57:47,760
दो दो चीजें इसमें एक तो प्रमाण वाली बात का पहले एक्सप्लेनेशन देता हूं मैं। आप प्रमाण

827
00:57:47,760 --> 00:57:51,760
कैसे लाए? बात यह है कि सर्वशक्तिमान आपने बोला और

828
00:57:51,760 --> 00:57:55,760
मैंने बोला। आप एक परिभाषा लेके चल रहे हैं। मैं एक परिभाषा लेके चल रहा हूं। तो ये मत

829
00:57:55,760 --> 00:57:59,760
बोलिए प्रमाण मैं लाया। प्रमाण से ही शुरू होगी दोनों की बातें। आप एक परिभाषा

830
00:57:59,760 --> 00:58:03,920
ले सुनिए सुन लीजिए। सुन लीजिए। इसका देना मैं कंप्लीट कर दूं। ये

831
00:58:03,920 --> 00:58:07,920
वाला पॉइंट कि क्योंकि भाई मैं भी सर्वशक्तिमान का एक मतलब लेके चल रहा हूं।

832
00:58:07,920 --> 00:58:12,080
आप भी एक मतलब लेके चल रहे हो। दोनों बराबर है वहां पे। ठीक है? अब दूसरा पॉइंट आपका क्या

833
00:58:12,080 --> 00:58:16,080
था कि जो मूल अपने मनुष्य जो है मूल

834
00:58:16,080 --> 00:58:19,680
प्रकृति का और ईश्वर का सहायता ले मोक्ष में जा रहा है तो वो भी सर्वशक्तिमान है। इसमें

835
00:58:19,680 --> 00:58:23,760
डिफरेंस है एक डिफरेंस मेन डिफरेंस क्या है कि मनुष्य मनुष्य

836
00:58:23,760 --> 00:58:27,760
बोल रहा हूं सॉरी आत्मा स्वयं से जीवात्मा जीवात्मा की बात हो रही

837
00:58:27,760 --> 00:58:32,240
है। स्वयं से जीवात्मा जो है मूल प्रकृति में

838
00:58:32,240 --> 00:58:36,240
कंपन उत्पन्न कराने या फिर एक प्रकार का उससे कुछ बनाने में सामर्थ्यवान है

839
00:58:36,240 --> 00:58:40,320
ही नहीं। ईश्वर आएगा जीवात्मा के हिसाब मतलब भूत

840
00:58:40,320 --> 00:58:44,480
प्रकृति और जीवात्मा को लेके सृष्टि बनाएगा। उस सृष्टि में फिर सृष्टि बन गई।

841
00:58:44,480 --> 00:58:49,040
अब आएगा कि भाई अब तू कर्म कर। समझ रहे हैं? अब आप कर्म करो। ये वाली बात आएगी।

842
00:58:49,040 --> 00:58:53,200
इसमें ईश्वर में और इसमें मूल जीवात्मा में ये मेन डिफरेंस

843
00:58:53,200 --> 00:58:57,200
ये है कि जीवात्मा खुद से नहीं कर सकती। ईश्वर खुद से उसमें कंपन कराने में

844
00:58:57,200 --> 00:59:01,360
सामर्थवान है। और फिर ईश्वर ने ही आपका शरीर बनाया है। ईश्वर ने आपका शरीर बनाया।

845
00:59:01,360 --> 00:59:05,520
ईश्वर ने ही आपको मनुष्य बनाया है। ठीक है? फिर मनुष्य बनाया। फिर सारे ऑप्शन आए। तो

846
00:59:05,520 --> 00:59:09,680
आप डिपेंडेंट हो ईश्वर पे। आप स्वतंत्र रूप से नहीं कर सकते। ईश्वर अपने अपने आप

847
00:59:09,680 --> 00:59:13,840
से कर सकता है। आप अपने आप से नहीं कर सकते। यही है मेन डिफरेंस। ठीक है?

848
00:59:13,840 --> 00:59:17,680
तो दोनों बातें मैंने एक्सप्लेन कर दी। अब आप बोल

849
00:59:17,680 --> 00:59:22,960
बात हो रही है डिपेंड तो ईश्वर भी है ना

850
00:59:22,960 --> 00:59:27,120
कि भैया आत्मा होगी तो मैं कुछ कर पाऊंगा।

851
00:59:27,120 --> 00:59:31,280
अगर प्रकृति होगी तो मैं कुछ कर पाऊंगा। तो ये डिपेंड वाली बात ये कट गई जो आपने

852
00:59:31,280 --> 00:59:34,800
कहा कि मेरा जन्म होगा।

853
00:59:34,800 --> 00:59:38,880
आपने कहा ईश्वर ने आपका शरीर बनाया। ईश्वर ने आपका शरीर बनाया तो मैं

854
00:59:38,880 --> 00:59:42,880
जैसे ईश्वर पर डिपेंड हो गया कि ईश्वर ने क्योंकि बनाया तो मैं कुछ कर पाऊंगा। ठीक

855
00:59:42,880 --> 00:59:46,960
है? तो डिपेंड मैं हूं तो ऐसे तो ईश्वर भी अपने कार्य को करने

856
00:59:46,960 --> 00:59:51,280
के लिए डिपेंड होगा। पहली बात। दूसरी बात ये है।

857
00:59:51,280 --> 00:59:56,880
दूसरी बात ये है कि जीव

858
00:59:56,880 --> 01:00:01,360
चेतन है। तो वो साधारण कारण में कैसे कहलाएगा?

859
01:00:01,360 --> 01:00:05,600
कि वो साधारण कारण में उपयोग हुआ। तीसरा प्रश्न है। इसको आप अलग

860
01:00:05,600 --> 01:00:09,600
रख दीजिए ना। इसका भी दे दूंगा मैं उत्तर पर पहले ये वाला कंप्लीट हो जाता डिपेंड वाला

861
01:00:09,600 --> 01:00:13,600
कंप्लीट कर लेते हैं फिर इस पे आ जाएंगे अब डिपेंड वाली बात मैंने डिपेंड डिपेंड जो

862
01:00:13,600 --> 01:00:17,680
आपने जो कहा है ना उसका अभी पूरा नहीं हुआ है आपने एक तो कहा है डिपेंड

863
01:00:17,680 --> 01:00:20,400
और क्या कहा है

864
01:00:20,400 --> 01:00:24,400
मैंने बोला ना कि जो जीवात्मा है वो डिपेंडेंट है ईश्वर पे कि

865
01:00:24,400 --> 01:00:28,400
ईश्वर पहले मेरे लिए शरीर बनाएगा फिर शरीर का उपयोग करके फला फला तू ये बोला मैंने

866
01:00:28,400 --> 01:00:32,560
तो ऐसे तो ईश्वर भी डिपेंड है आत्मा पर कि आत्मा होगी तो मैं संसार बना

867
01:00:32,560 --> 01:00:36,640
पाऊंगा बिल्कुल बिल्कुल इसका जवाब और मैं कह रहा हूं और कुछ और

868
01:00:36,640 --> 01:00:40,880
भी कुछ कहा है आपने और भी कुछ कहा है आपने मतलब

869
01:00:40,880 --> 01:00:46,640
क्या बोला मैं और इसके अलावा दूसरा पॉइंट कहा है ना आपने

870
01:00:46,640 --> 01:00:50,560
इसके अलावा और क्या बोला यही तो बात चल रही है और क्या बात चल रही है

871
01:00:50,560 --> 01:00:54,640
अरे भाई दो बातें कही है एक आपने डिपेंड होने वाली बात कही है एक कही है कि स्वतंत्र

872
01:00:54,640 --> 01:01:00,480
होकर कुछ नहीं कर सकता है ऐसा कुछ कहा था

873
01:01:00,480 --> 01:01:04,640
अपने से कुछ नहीं कर सकता ठीक है मैं रिपीट करता हूं मैं रिपीट कर देता हूं अपने

874
01:01:04,640 --> 01:01:08,720
से प्रकृति में बल लगाना जीवात्मा के लिए संभव नहीं है। ईश्वर कर सकता है

875
01:01:08,720 --> 01:01:12,800
अपने से। ये बोला था उन्होंने। तो बात ये

876
01:01:12,800 --> 01:01:16,880
हो रही है इसकी सहायता लेता है कि नहीं? बात ये नहीं हो रही है कौन सा काम ईश्वर कर सकता है।

877
01:01:16,880 --> 01:01:21,600
कौन सा काम मनुष्य नहीं कर सकता है। सहायता लेता है कि नहीं?

878
01:01:21,600 --> 01:01:25,680
बात ये हो रही है सहायता लेता है कि नहीं? देखिए आप आप पहले अपनी मैं बता

879
01:01:25,680 --> 01:01:29,920
रहा हूं। मैंने मैंने किस चीज पे आपका काउंटर किया है? आपने यह कहा

880
01:01:29,920 --> 01:01:34,080
है जो आपकी लाइव डिबेट है। जब मैंने कहा कि

881
01:01:34,080 --> 01:01:38,080
भैया ईश्वर तो इन इनका सहारा लेकर के काम कर रहा है। इसको

882
01:01:38,080 --> 01:01:42,240
थोड़ा सा ध्यान से सुनिए। जब आपने ये कहा कि ईश्वर इन अमुक अमुक

883
01:01:42,240 --> 01:01:46,320
पदार्थों का सहारा लेकर के काम कर रहा है। जब मैंने ये कहा तो आपने कहा

884
01:01:46,320 --> 01:01:50,560
कि इनका सहारा लेना ऐसा नहीं है कि इनका सहारा लेगा ही नहीं। इनका सहारा

885
01:01:50,560 --> 01:01:55,120
लेकर सस्ती बनाना ये ईश्वर का कार्य है और इसमें वो किसी की सहायता नहीं लेता।

886
01:01:55,120 --> 01:01:59,840
अब मैंने क्लेम क्या किया है? मैंने क्लेम किया है कि

887
01:01:59,840 --> 01:02:03,840
ईश्वर का सहारा लेकर मैं कह तो रहा हूं। आपने जैसे सहारा शब्द

888
01:02:03,840 --> 01:02:05,680
का उपयोग कर लिया ऐसे मैं भी तो

889
01:02:05,680 --> 01:02:09,680
ले रहा हूं। तो मैं अब आप अब आप स्वतंत्र कर रहे हो तो

890
01:02:09,680 --> 01:02:13,760
मैं उधर स्वतंत्र करूंगा। फिर सहारा जो आपने कहा था वो बाद की बात है। मगर अभी

891
01:02:13,760 --> 01:02:17,760
आपने जो ये बात कही है कि इनका सहारा लेकर सृष्टि

892
01:02:17,760 --> 01:02:22,080
रचना करना इसमें वो किसी और का सहारा नहीं लेता। इसलिए वो सर्वशक्तिमान

893
01:02:22,080 --> 01:02:26,080
है। ये आपका क्लेम है। तो मैंने क्लेम कर दिया कि

894
01:02:26,080 --> 01:02:30,080
मनुष्य का काम है ईश्वर की सहायता लेकर। मैं तो कह ही नहीं रहा वो स्वतंत्र होकर

895
01:02:30,080 --> 01:02:34,080
कर रहा है। मैं तो खुद कह रहा हूं ईश्वर की सहायता लेकर। मगर क्योंकि ये

896
01:02:34,080 --> 01:02:38,480
उसका कार्य है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। हां बोल।

897
01:02:38,480 --> 01:02:42,720
मैंने उसके मतलब मैंने आपकी ही भाषा में जिस तरीके से आप सारे कार्यों

898
01:02:42,720 --> 01:02:46,800
को ईश्वर में लाते जा रहे हैं। ऐसे ही मैं मनुष्य के स्वाभाविक

899
01:02:46,800 --> 01:02:51,040
कार्य में उसको ले आया। हां जी। बताइए। ठीक है। ठीक है। मैं बताता हूं।

900
01:02:51,040 --> 01:02:55,280
निमित्त रूप से मुख्य शब्द ये है कि निमित्त रूप से जैसे कि

901
01:02:55,280 --> 01:02:59,280
मैं जो है इस फोन को या मूल प्रकृति से बनी हुई कोई भी

902
01:02:59,280 --> 01:03:03,280
चीज को खुद से बिना ईश्वर के निमित्त के खुद से

903
01:03:03,280 --> 01:03:07,280
मूवमेंट नहीं करा सकता। ईश्वर को किसी का निमित्त नहीं चाहिए। ईश्वर खुद से मूवमेंट करा सकता है। ये है

904
01:03:07,280 --> 01:03:11,280
मेन डिफरेंस। इसप थोड़ा सा मतलब मैं थोड़ा सा और इसप अच्छे से एक्सप्लेन कर

905
01:03:11,280 --> 01:03:15,280
दूं आपको। मतलब होता क्या है? मैं मैं नहीं नहीं एक्सप्लेनेशन जरूरी है क्योंकि

906
01:03:15,280 --> 01:03:19,280
वो बार-बार उसी पे रिपीटेशन आ रहा है। इसलिए थोड़ा सा शांति से चलते हैं। कोई इशू नहीं है। बात

907
01:03:19,280 --> 01:03:21,040
ये आ रही है। हां

908
01:03:21,040 --> 01:03:25,120
तो मैंने जब ये फोन को इस ऐसे उठाया है ना

909
01:03:25,120 --> 01:03:29,360
ये एक कार्य हो गया। ठीक है? अब ये कार्य करने के लिए

910
01:03:29,360 --> 01:03:33,360
अगर अच्छा इस कार्य को एक कार्य है और एक है कि सूर्य जो है

911
01:03:33,360 --> 01:03:37,920
अह अपना अंतरिक्ष में घूम रहा है। ये एक कार्य है। है ना? ये दो कार्य का हम वो करेंगे।

912
01:03:37,920 --> 01:03:41,920
अह कंपैरिजन लेके चलेंगे। ठीक है? तो मैंने जब यह फोन ऐसे उठाया, यह

913
01:03:41,920 --> 01:03:45,920
मैंने कार्य किया, इस कार्य में मैं भी निमित्त हूं और

914
01:03:45,920 --> 01:03:49,920
ईश्वर भी निमित्त है। बिना ईश्वर के निमित्त के मैं फोन उठा ही नहीं सकता हूं। लेकिन सूरज

915
01:03:49,920 --> 01:03:54,160
उठाने में केवल ईश्वर निमित्त है। मैं वहां कुछ नहीं कर रहा हूं। ईश्वर का सहायता या कुछ भी और कोई अन्य

916
01:03:54,160 --> 01:03:58,160
चेतना सा तो है ही नहीं। सहायता कर सके। तो वहां पर ईश्वर स्वयं से जो

917
01:03:58,160 --> 01:04:02,320
सूर्य को घुमा रहा है, सूर्य को चला रहा है। जितने भी चीजें कर रहा है। वहां पर ईश्वर के अलावा

918
01:04:02,320 --> 01:04:06,320
और कोई उसकी हेल्पर नहीं है। मेरा हेल्पर निमित्त रूप से ही ईश्वर है।

919
01:04:06,320 --> 01:04:10,640
मैं बिना ईश्वर के निमित्त के फोन उठा ही नहीं सकता। यहां कुछ भी नहीं हो सकता। निमित्त के तो

920
01:04:10,640 --> 01:04:14,800
यहां पे मेन डिफरेंस जीवात्मा में और ईश्वर में डिफरेंस ये आ रहा है कि ईश्वर को और किसी का निमित्त

921
01:04:14,800 --> 01:04:18,880
के रूप में सहायता नहीं चाहिए। मेरे को चाहिए जीवात्मा को चाहिए। ये है

922
01:04:18,880 --> 01:04:22,880
मेन डिफरेंस। अब आप बोलिए मतलब निमित्त

923
01:04:22,880 --> 01:04:27,040
रूप से सहायता लेने वाली बात है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। आपका क्लेम वो पूरा

924
01:04:27,040 --> 01:04:31,200
मतलब थोड़ा अधूरा था। अधूरा था वो। नहीं नहीं ये ये बात मैंने पिछली लाइन में भी बोली

925
01:04:31,200 --> 01:04:35,360
थी और इस लाइन में भी बोली है। दोनों ये रिपीट की है मैंने। आपने वहां पर आपने वहां

926
01:04:35,360 --> 01:04:36,240
पर एग्जैक्ट

927
01:04:36,240 --> 01:04:40,400
यही बोला है कि इन इनकी सहायता से सृष्टि रचना करना ये

928
01:04:40,400 --> 01:04:44,480
ईश्वर का कार्य है और इसमें वो किसी की सहायता नहीं लेता इसलिए वो सर्वशक्तिमान है।

929
01:04:44,480 --> 01:04:48,560
यह आपकी शब्द नियमित शब्द वो आगे पीछे किया हो वह आगे

930
01:04:48,560 --> 01:04:52,560
पीछे किया हो जैसे एक बार मैंने मैंने कहा था ना उसके गर्भ

931
01:04:52,560 --> 01:04:56,640
में शून्य छिपा है तो आपने कहा छिपा है तो थोड़ी देर बाद परिभाषा आई

932
01:04:56,640 --> 01:05:01,040
थी मेरी तो आपको उसप थोड़ी सी आपत्ति हुई थी वो जो कंप्लीट

933
01:05:01,040 --> 01:05:05,120
परिभाषा है थोड़ी देर बाद मैंने आपको जब समझाई थी तो आपने कहा था अब आप ये छिपा

934
01:05:05,120 --> 01:05:09,200
हुआ ले आए गर्भ में छिपा है तो ये भी आपका वैसे ही है क्योंकि

935
01:05:09,200 --> 01:05:13,440
आपने वहां पर तो क्लियर हो गया ना अभी क्लियर है पॉइंट क्लियर नहीं हुआ है

936
01:05:13,440 --> 01:05:17,760
क्लियर तो अब बात करेंगे। अच्छा बोलिए। [हंसी]

937
01:05:17,760 --> 01:05:22,480
बात ये हो रही है सबसे पहली बात तो है कि

938
01:05:22,480 --> 01:05:26,720
जीव जो है स्वयं से कंपन नहीं करा सकता है और ईश्वर

939
01:05:26,720 --> 01:05:31,280
जो है कंपन करा सकता है। ठीक है? अच्छा एक बात और है

940
01:05:31,280 --> 01:05:36,800
कि

941
01:05:36,800 --> 01:05:42,560
सृष्टि क्या बिना जीवो के भी सृष्टि कहलाएगी?

942
01:05:42,560 --> 01:05:46,720
नहीं कहलाएगी। नहीं कहलाएंगे। यानी जीव चाहिए।

943
01:05:46,720 --> 01:05:51,520
अच्छा जीव चाहिए जीव चाहिए तो चेतन चाहिए।

944
01:05:51,520 --> 01:05:55,840
बिल्कुल तो ये तो निमित्त हो गया। कैसे निमित्त

945
01:05:55,840 --> 01:06:01,200
हुआ? अगर यहां पर आकर के जीव वैसा रह जाए।

946
01:06:01,200 --> 01:06:05,680
कुछ ना करना भी तो होता है ना। जड़वत

947
01:06:05,680 --> 01:06:08,320
व्यवहार कर दे।

948
01:06:08,320 --> 01:06:12,080
तो सृष्टि रचना संभव है

949
01:06:12,080 --> 01:06:16,240
नहीं है नहीं है संभव नहीं है नहीं चेतन पे

950
01:06:16,240 --> 01:06:20,400
डिपेंड हो गया ना हां बिल्कुल डिपेंड हो गया तो

951
01:06:20,400 --> 01:06:24,560
फिर सहायता हो गई तो निमित्त रूप से कहां डिपेंड

952
01:06:24,560 --> 01:06:29,280
हो रहा है मैं निमित्त निमित्त शब्द उपयोग किया मैंने स्पेसिफिकली वो निमित्त

953
01:06:29,280 --> 01:06:33,520
भाई निमित्त से आप मुझे बता दो निमित्त का अर्थ क्या ले रहे हो बताओ चलो निमित्त

954
01:06:33,520 --> 01:06:37,520
निमित्त का अर्थ जैसे जैसे उदाहरण के लिए कहा जाता है कि कुम्हार

955
01:06:37,520 --> 01:06:41,680
ने घड़ा बनाया। ठीक है? तो कुम्हार ने घड़ा

956
01:06:41,680 --> 01:06:45,680
बनाया। कुम्हार ने अकेले घड़ा बनाया और किसी अन्य कुम्हार

957
01:06:45,680 --> 01:06:49,760
का सहारा ना लेकर के अकेले घड़ा बनाया। तो घड़ा बनाने की जो क्रिया है

958
01:06:49,760 --> 01:06:51,840
उस क्रिया के अंदर कुमार ने और

959
01:06:51,840 --> 01:06:55,920
किसी अन्य का सहारा नहीं लिया। बस यही निमित्त का मतलब ठीक है?

960
01:06:55,920 --> 01:07:00,080
तो ये तो केवल जो सृष्टि के जड़ पदार्थ जो हो रहे हैं

961
01:07:00,080 --> 01:07:04,080
या मनुष्य की देह बन रही है। ये तो केवल उतना है ना। आपने खुद माना ना

962
01:07:04,080 --> 01:07:08,080
कि जब तक व्यवहार नहीं चालू होगा क्रियाएं नहीं होंगी जीवों के द्वारा

963
01:07:08,080 --> 01:07:12,160
तब तक सृष्टि रचना संभव है नहीं है ये तो ये

964
01:07:12,160 --> 01:07:16,240
तो केवल ईश्वर का जो ईश्वर ने सृष्टि रचना की है उसमें से एक

965
01:07:16,240 --> 01:07:20,880
कार्य हुआ ना कुमार के द्वारा घड़े बनाने जैसा मगर

966
01:07:20,880 --> 01:07:24,960
मगर जब व्यवहार चाहिए तो वहां पर तो जो मनुष्य है उसकी जो जीव

967
01:07:24,960 --> 01:07:29,200
है उसकी इच्छा डिपेंड कर रही है ना चेतन की दूसरे

968
01:07:29,200 --> 01:07:33,360
हां हां तो तो डिपेंड हो गया ना सृष्टि रचना

969
01:07:33,360 --> 01:07:37,600
सृष्टि रचना केवल यह नहीं है कि जड़ पदार्थों को आकार

970
01:07:37,600 --> 01:07:41,760
दे देना केवल सृष्टि रचना ये नहीं है सृष्टि रचना

971
01:07:41,760 --> 01:07:46,000
में मनुष्यगत व्यवहार भी है जीवगत व्यवहार भी है प्राणीगत

972
01:07:46,000 --> 01:07:50,160
व्यवहार कह लो इतने सारे जीव जंतु बनाए ठीक है तो

973
01:07:50,160 --> 01:07:52,560
उनकी

974
01:07:52,560 --> 01:07:56,640
क्रियाओं में ईश्वर का निमित घुसाना चाह रहे हो आप ये करना चाह रहे हो कि जीव जो क्रिया कर रहा है

975
01:07:56,640 --> 01:08:00,640
उसमें ईश्वर नहीं नहीं नहीं मैं ये कह रहा हूं कि सृष्टि

976
01:08:00,640 --> 01:08:04,880
तो तभी कहलाएगी जब जीव इसमें चेतन रूपी कार्य करने

977
01:08:04,880 --> 01:08:07,120
वाला भी हो कार्य करे भी तभी तो सृष्टि

978
01:08:07,120 --> 01:08:11,280
कहलाएगी। नहीं नहीं नहीं तब वो अब हां अच्छा

979
01:08:11,280 --> 01:08:15,360
ठीक है मैं एक्सप्लेन कर देता हूं इसको ईश्वर का आप बिल्कुल आप

980
01:08:15,360 --> 01:08:19,520
उसको आप यानी आप ये कहना चाह रहे हो कि अगर जो है जीव अपना कर्म

981
01:08:19,520 --> 01:08:23,600
वगैरह ना करे तो ईश्वर का कार्य अधूरा रह जाएगा। ये आप कहना चाह रहे हो। जीव अपने से कुछ भी कर्म ना करे

982
01:08:23,600 --> 01:08:27,840
तो ईश्वर का कार्य अधूरा रह जाएगा। ये कहना चाह रहे हो आप। ईश्वर का कार्य सृष्टि बनाना।

983
01:08:27,840 --> 01:08:31,920
अब जीव कर्म करे या ना करे उससे ईश्वर का उसमें ईश्वर का कार्य आएगा ही

984
01:08:31,920 --> 01:08:36,080
नहीं। उस यानी कि जीव यानी कि जीव के व्यवहार

985
01:08:36,080 --> 01:08:40,480
के बिना भी सृष्टि आप मानते हो तो ये कहो ना सृष्टि

986
01:08:40,480 --> 01:08:44,960
रचना यानी कि यानी कि जीव के व्यवहार के बिना सृष्टि

987
01:08:44,960 --> 01:08:49,040
का मतलब बता देता हूं। जीव का व्यवहार जो है एक तो जीव

988
01:08:49,040 --> 01:08:53,040
के व्यवहार के बिना जो सृष्टि आप जिसको लेके चल रहे हो वो ऐसा है कि ईश्वर ने सृष्टि

989
01:08:53,040 --> 01:08:57,280
बनाई। जीव बनाए आत्मा डाल दी। अब यह सृष्टि हो गई। अब उस सृष्टि

990
01:08:57,280 --> 01:09:01,280
में कार्य करना है नहीं करना है वो सारा जीव पर डिपेंड करता है। उसमें ईश्वर का ये वो नहीं

991
01:09:01,280 --> 01:09:05,440
कि सृष्टि अगर जीव ईश्वर जो है सृष्टि नहीं कहलाएगी। ऐसा नहीं होगा।

992
01:09:05,440 --> 01:09:11,440
ठीक मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं। हम

993
01:09:12,320 --> 01:09:16,400
संसार को संसार तब कहा जाएगा जब उसमें जड़ पदार्थ जो बने हुए हैं

994
01:09:16,400 --> 01:09:20,400
वो भी हो और साथ में उसमें सांसारिक क्रियाकलाप

995
01:09:20,400 --> 01:09:24,720
करने वाले चेतन भी हो। मनुष्य इत्यादि प्राणी इत्यादि

996
01:09:24,720 --> 01:09:28,720
तब कहा जाएगा। तो यदि

997
01:09:28,720 --> 01:09:32,800
क्योंकि वह स्वेच्छा है कर्म करना ना करना हां

998
01:09:32,800 --> 01:09:37,120
ठीक है अगर वो क्या कहते हैं चेतन रूपी व्यवहार करेगा

999
01:09:37,120 --> 01:09:41,120
नहीं क्रियाकलाप इत्यादि नहीं करेगा तो क्या संसार

1000
01:09:41,120 --> 01:09:45,600
का अस्तित्व संसार कहलाएगा ये जैसे मान लीजिए कि मान लीजिए एक व्यक्ति जन्म

1001
01:09:45,600 --> 01:09:50,320
देता हूं हां हां बताइए बता दीजिए

1002
01:09:50,320 --> 01:09:54,800
कि सृष्टि सृष्टि बनाना तक मतलब

1003
01:09:54,800 --> 01:09:59,040
आपने क्या बोला था लास्ट टाइम कर्म करेगा नहीं करेगा वाली बात थी हां सृष्टि

1004
01:09:59,040 --> 01:10:03,440
जो बनाई है ईश्वर ने सृष्टि बना दी सृष्टि बनाने तक

1005
01:10:03,440 --> 01:10:07,600
यानी जीव का कर्म उसके बाद आएगा जीव कर्म अगर मान लो उदाहरण

1006
01:10:07,600 --> 01:10:11,600
के लिए आपका एग्जांपल लेके जाता हूं मान लो जो सृष्टि बना दी मूल प्रकृति का लेके

1007
01:10:11,600 --> 01:10:15,600
और जीव का आत्मा का लेके सृष्टि बना दी अब वो कर्म नहीं कर रहा है जैसा आपने वो बात बोली

1008
01:10:15,600 --> 01:10:19,680
थी कर्म अगर नहीं कर रहा है वो ऐसे पढ़ा है वो वाली बात हालांकि हो नहीं सकता

1009
01:10:19,680 --> 01:10:23,840
असंभव है लेकिन अगर फिर भी एक बार उसको लेके चले कर्म नहीं कर रहा है वो

1010
01:10:23,840 --> 01:10:27,600
तो उससे वो सृष्टि नहीं है ऐसा नहीं कह सकते सृष्टि है वो तब भी

1011
01:10:27,600 --> 01:10:31,600
हालांकि असंभव है कर्म ना करना है वो मैं बता दूंगा फिर

1012
01:10:31,600 --> 01:10:35,840
यानी कि यानी कि व्यवहार के बिना भी आप मानते

1013
01:10:35,840 --> 01:10:40,000
हो कि ये संसार संसार ही है उसमें भले ही कोई व्यवहार हो

1014
01:10:40,000 --> 01:10:44,080
या ना हो सृष्टि रचना रचना जब सृष्टि बन रही है तब वो मैं

1015
01:10:44,080 --> 01:10:48,160
आपसे वही तो कह रहा हूं आप क्लियर आपने पहले क्या कहा था नहीं व्यवहार भी होना

1016
01:10:48,160 --> 01:10:52,240
चाहिए तभी संसार कहलाया आपने खुद कहा रचना मैंने

1017
01:10:52,240 --> 01:10:56,880
क्या कहा बिना व्यवहार के सुनिए आप अपनी बातों से थोड़ा पलट रहे हैं।

1018
01:10:56,880 --> 01:11:01,040
एक मिनट भाई साहब आप अपनी बात से पलट रहे हैं। मैं इसीलिए पहले क्लियर किया कि

1019
01:11:01,040 --> 01:11:05,120
क्या आप व्यवहार के बिना संसार मानते हैं? तो आपने कहा नहीं व्यवहार तो

1020
01:11:05,120 --> 01:11:10,160
होना आवश्यक है। तब संसार अब आप कह रहे हैं व्यवहार के बिना भी संसार है।

1021
01:11:10,160 --> 01:11:14,240
मैं बता देता हूं। हां बोल दूं इस पे। संसार

1022
01:11:14,240 --> 01:11:18,240
और सृष्टि रचना। सृष्टि जब बन रही है तब तो जीवात्मा कुछ कर्म कर

1023
01:11:18,240 --> 01:11:22,560
ही नहीं सकती। अभी तो बन ही रही है। अभी तो बनी ही नहीं है। मैं उससे उससे डिफरशिएट कर रहा हूं। संसार

1024
01:11:22,560 --> 01:11:27,120
में तो फिर सारी चीजें आ गई। उसमें तो जीवात्मा का कर्म भी आएगा। बोल रहा सृष्टि रचना

1025
01:11:27,120 --> 01:11:31,200
सृष्टि रचना पूछ रहा हूं। सृष्टि रचना पूछ रहा हूं। सृष्टि रचना बिना

1026
01:11:31,200 --> 01:11:36,000
उसके संभव है। सृष्टि जिसमें बिना

1027
01:11:36,000 --> 01:11:40,320
मैं बता देता हूं ना सृष्टि जब बन रचना का मतलब है सृष्टि अलग है। संसार

1028
01:11:40,320 --> 01:11:42,720
अलग है। सृष्टि अलग है, संसार अलग

1029
01:11:42,720 --> 01:11:46,880
है। नहीं नहीं आप सृष्टि रचना संसार का एक पार्ट

1030
01:11:46,880 --> 01:11:50,880
है। मैं बता देता हूं कैसे। अभी जो है धरती बन रही है। धरती की रचना हो

1031
01:11:50,880 --> 01:11:54,880
रही है। तो अभी तो मैं कर्म कर ही नहीं सकता हूं। मैं कैसे कर्म करूंगा? बिना धरती बने कर्म करूंगा ही नहीं।

1032
01:11:54,880 --> 01:11:58,880
तो अगर रचना हो जाएगी उसके बाद मेरा कर्म आएगा। ये

1033
01:11:58,880 --> 01:12:03,680
पॉइंट था। क्लियर हो गया? भाई ये

1034
01:12:03,680 --> 01:12:07,680
नहीं है कब क्या आएगा। मैं ये पूछ रहा हूं। यह संसार संसार

1035
01:12:07,680 --> 01:12:12,080
तब कहलाएगा ना कि इसमें जब पहाड़ झरने नदियां इत्यादि

1036
01:12:12,080 --> 01:12:16,240
के साथसाथ उनका मतलब प्रकृति के साथ-साथ उनका भोग करने

1037
01:12:16,240 --> 01:12:20,320
वाला व्यवहारिक रूप से उपस्थित मनुष्य भी हो जो भोग कर रहा तब

1038
01:12:20,320 --> 01:12:24,320
कहलाएगा ना संसार

1039
01:12:24,320 --> 01:12:28,560
हां बिल्कुल हां अगर मान लीजिए उसने

1040
01:12:28,560 --> 01:12:32,880
मान लीजिए मैं कह रहा हूं पांच लोक बनाए और पांचों लोग जड़वंत

1041
01:12:32,880 --> 01:12:36,880
व्यवहार कर रहे हैं मतलब वो लेटे हैं कुछ नहीं कर रहे हिल भी हिले भी

1042
01:12:36,880 --> 01:12:41,120
नहीं रहे तो यह संसार कहलाया कहलाएगा

1043
01:12:41,120 --> 01:12:45,200
आपके हिसाब से नहीं कहलाया नहीं कहलाएगा

1044
01:12:45,200 --> 01:12:49,440
तो फिर इसका मतलब संसार का संसार को बनाने के लिए डिपेंड

1045
01:12:49,440 --> 01:12:53,920
हुआ ना वो जीवात्मा पे हां बिल्कुल हुआ हां

1046
01:12:53,920 --> 01:12:58,000
हो गया तो फिर अंतर क्या रहा जब वो जीव

1047
01:12:58,000 --> 01:13:02,000
पर डिपेंड हो रहा है [हंसी] मैं बता देता हूं मैं बताता हूं निमित्त

1048
01:13:02,000 --> 01:13:06,080
रूप से और जो है बनाने के लिए प्रयोजन रूप से साधारण कारण

1049
01:13:06,080 --> 01:13:10,320
के रूप में ये डिफरेंस समझिए आप निमित्त कारण और साधारण कारण का अंतर समझिए आप निमित्त

1050
01:13:10,320 --> 01:13:14,400
कारण उसको कहा जाता है कि भाई मैं बना रहा हूं ठीक है अब मैं

1051
01:13:14,400 --> 01:13:18,400
किसी और की बनाने में सहायता नहीं ले रहा हूं किसी चेतन सत्ता की मैं घड़ा बना रहा हूं मैं खुद

1052
01:13:18,400 --> 01:13:23,360
से घड़ा बना रहा हूं मेरे अलावा और कोई घड़ा बनाने वाला नहीं है वो बात संसार बनाई कहां

1053
01:13:23,360 --> 01:13:27,440
संसार कहां जब तक जब तक उन्होंने संसार बनना अब आप

1054
01:13:27,440 --> 01:13:31,680
शब्द चेंज कर रहे हो शब्द चेंज कर रहे हो मैं बताता हूं कैसे पहले आपने बोला था सृष्टि रचना

1055
01:13:31,680 --> 01:13:36,080
यानी रचना मुझे नहीं मालूम था कि संसार बनना और सृष्टि रचना आपके लिए अलग-अलग

1056
01:13:36,080 --> 01:13:39,440
है। नहीं मैं बता देता हूं। क्यों क्यों अलग-अलग है? क्योंकि पिछली बार जब बात हुई

1057
01:13:39,440 --> 01:13:43,520
थी अभी मैंने पूछा संसार और सृष्टि अलग है। तो आपने कहा आपने कहा कि

1058
01:13:43,520 --> 01:13:47,520
भैया नहीं अलग है। फिर आप कह रहे हो अलग है। एक्सप्लेन कर देता हूं। मैं एक्सप्लेन कर देता हूं क्योंकि पिछली

1059
01:13:47,520 --> 01:13:51,600
बार जब बात हुई थी तब सृष्टि रचना सृष्टि चलना फिर सृष्टि प्रलय

1060
01:13:51,600 --> 01:13:56,000
करना। आपने ऐसे तीन तीन अलग शब्द उपयोग किए थे। इसलिए मुझे लगा आप केवल रचना की बात कर रहे हैं कि स्पेसिफिक

1061
01:13:56,000 --> 01:14:00,240
स्टार्ट। नहीं नहीं तीन नहीं यूज़ किए मैंने। आप पीछे देख लीजिए।

1062
01:14:00,240 --> 01:14:04,240
आप गलत कह रहे हैं आपने सृष्टि रचना की बात कर

1063
01:14:04,240 --> 01:14:08,560
रहा हूं और प्रलय ईश्वर के कारण में ऐसा बोला था ना आपने ना पालन प्रलय

1064
01:14:08,560 --> 01:14:12,800
बोला ही नहीं भाई पिछली लाइन में नहीं बोला आपने नहीं पिछली

1065
01:14:12,800 --> 01:14:17,040
अभी मैंने प्रश्न किया है तो सृष्टि रचना का तो मैं वही मतलब समझूंगा

1066
01:14:17,040 --> 01:14:22,160
ना मैं जो जानता हूं आप जो समझ रहे हैं वही मतलब समझूंगा ना मैं कौन सा

1067
01:14:22,160 --> 01:14:26,800
भाई सृष्टि रचना है फिर पालन है फिर प्रलय यही समझूंगा ना मैं तो

1068
01:14:26,800 --> 01:14:30,880
यह सृष्टि रचना का मतलब है मैंने कहा है हां बिल्कुल आपने

1069
01:14:30,880 --> 01:14:35,120
बोला ईश्वर के कर्म में सृष्टि रचना पालन प्रलय आते हैं। ये आपने बोला है पिछली लाइव में

1070
01:14:35,120 --> 01:14:39,120
ईश्वर के कर्म में ये तीन चीजें आती है और सृष्टि रचना का मतलब है पालन

1071
01:14:39,120 --> 01:14:43,120
प्रलय ये तो आप कह रहे हो मैंने तो कहा ही नहीं है आप बताओ मुझे कहां कहा है मैंने अभी

1072
01:14:43,120 --> 01:14:47,120
भी नहीं कहा है पिछली बार मैं आपने क्या कहा मैं बता

1073
01:14:47,120 --> 01:14:51,440
देता हूं आपने बोला था ना कि भाई सृष्टि रचना पालन करना फिर प्रलय

1074
01:14:51,440 --> 01:14:54,880
करना ये सारे ईश्वर के कर्म है ऐसा आपने बोला था कि

1075
01:14:54,880 --> 01:14:58,880
नहीं ऐसा मैंने नहीं बोला ऐसा आपने बोला था मैंने उसको सही किया था आप

1076
01:14:58,880 --> 01:15:02,880
आप रचना में ही प्रलय आप पालन प्रलय सबको रचना

1077
01:15:02,880 --> 01:15:06,880
में ही डाल दे रहे थे तब मैंने कहा था ये भी कर दो आपने अलग अलग अलग किए

1078
01:15:06,880 --> 01:15:11,120
थे इन तीनों को यही तो बोल रहे हां हां तो आप रचना

1079
01:15:11,120 --> 01:15:15,600
में इन पालक प्रलय को नहीं ले रहे थे ना पिछली बार तो मैं इस बार ले रहा नहीं ले रहा

1080
01:15:15,600 --> 01:15:19,920
यानी यानी संसार अलग है ना

1081
01:15:19,920 --> 01:15:24,080
यानी संसार ये है जहां क्रिया हो रही है और सृष्टि रचना सृष्टि वो

1082
01:15:24,080 --> 01:15:28,400
है जो केवल जड़वत तरीके से बना दिया है ना हां हां

1083
01:15:28,400 --> 01:15:32,400
सृष्टि रचना नहीं सृष्टि रचना वो है स्पेसिफिक बोलिए

1084
01:15:32,400 --> 01:15:36,560
शब्द सृष्टि रचना वो है जो बना दिया

1085
01:15:36,560 --> 01:15:40,560
और संसार बनाना क्या है संसार फिर आप

1086
01:15:40,560 --> 01:15:44,560
संसार शब्द का उपयोग करेंगे ना ओवरऑल ले रहे हैं आप मैं बोल रहा हूं सृष्टि रचना

1087
01:15:44,560 --> 01:15:48,720
में जीव का कर्म में इन्वॉल्वमेंट नहीं आएगा पालन या फिर उसके बाद आएगा बन गई

1088
01:15:48,720 --> 01:15:52,800
उसके बाद आएगा मैं खाली ये बोल रहा हूं मैंने क्या पूछा है मेरे भाई संसार बनना क्या

1089
01:15:52,800 --> 01:15:57,200
है सृष्टि रचना और संसार बनने में अंतर क्या है मैं ये पूछ रहा हूं

1090
01:15:57,200 --> 01:16:01,680
रचना में और संसार रचना के अंदर केवल रचना आएगी संसार

1091
01:16:01,680 --> 01:16:05,760
पूरे रचना पालन प्रलय सब आ जाएंगे। ये डिफरेंस

1092
01:16:05,760 --> 01:16:09,520
संसार बनने में ये आ जाएगा।

1093
01:16:09,520 --> 01:16:10,020
संसार

1094
01:16:09,920 --> 01:16:14,640
में सब आएंगे ना। संसार में मैं कह रहा हूं संसार बनने में ये सब आएगा कि उत्पत्ति

1095
01:16:14,640 --> 01:16:18,880
प्रलय में रचना सेम सृष्टि रचना संसार रचना सेम बात हुई है। मैं

1096
01:16:18,880 --> 01:16:23,120
तो सेम आ गई तो फिर आप अलग क्यों कर रहे हैं? संसार

1097
01:16:23,120 --> 01:16:27,360
ओवरऑल में तीनों आएंगे। सृष्टि संसार रचना तो सेम सृष्टि रचना एक ही बात है। इसमें डिफरेंस

1098
01:16:27,360 --> 01:16:32,480
क्या है? संसार बनना सृष्टि रचना एक है।

1099
01:16:32,480 --> 01:16:36,560
बिल्कुल बिल्कुल तो अभी आप क्यों कह रहे हो कि भैया उसमें

1100
01:16:36,560 --> 01:16:40,560
वो भी आ जाएगा। क्या कहते हैं उसका पालन और फिर सम्मार वो भी आ जाएगा। ये क्यों कह रहे

1101
01:16:40,560 --> 01:16:44,640
हो फिर? संसार की आपने संसार पहले संसार पन्ना नहीं बोला था।

1102
01:16:44,640 --> 01:16:49,120
आपने बोला था संसार संसार में सारे आएंगे।

1103
01:16:49,120 --> 01:16:53,360
चलो खैर ठीक है। ठीक है। ठीक है। तो कुल मिलाकर

1104
01:16:53,360 --> 01:16:57,760
के बात हो गई कि संसार बनाने के लिए

1105
01:16:57,760 --> 01:17:03,280
ईश्वर को जीव की सहायता की आवश्यकता है।

1106
01:17:03,280 --> 01:17:07,520
किस रूप में? नियमित रूप में या साधारण कारण के रूप में? अच्छा

1107
01:17:07,520 --> 01:17:11,600
ये साधारण कारण कहां लिखा है ईश्वर का? जरा बताइए। कैसे कह रहे हो आप? साधारण कारण

1108
01:17:11,600 --> 01:17:15,600
के रूप में वो यूज़ करता है। हमारे मत में कहां लिखा है? ये पूछ रहे हो आप।

1109
01:17:15,600 --> 01:17:20,400
हां आपके मत में बता दो। वेदांत प्रकाश में लिखा है

1110
01:17:20,400 --> 01:17:24,560
कि आत्मा का उपयोग साधारण कारण के रूप में होता है। हां

1111
01:17:24,560 --> 01:17:25,060
साधारण

1112
01:17:24,960 --> 01:17:29,520
कारण नहीं आत्मा संसार बनने में बता देता हूं। एक्सप्लेन कर देता हूं थोड़ा सा। नहीं नहीं नहीं

1113
01:17:29,520 --> 01:17:33,840
मैं देखिए देखिए थोड़ा भाग थोड़ा टॉपिक मत छोड़िए। सत्यार्थ

1114
01:17:33,840 --> 01:17:38,400
प्रकाश में ये लिखा है कि जीव का उपयोग साधारण कारण के रूप में होता है।

1115
01:17:38,400 --> 01:17:42,400
मैंने पढ़ा है उसमें वहां पे मुझे तो नहीं मिला है। हां ठीक है। मैं

1116
01:17:42,400 --> 01:17:46,400
एक्सप्लेन कर दूंगा ना जीव साधारण कारण कैसे है? वो एक्सप्लेन कर दूंगा। हां तो वो

1117
01:17:46,400 --> 01:17:50,560
एक्सप्लेन करो। फिर आप यह मत बताओ कैसे है। हां ठीक है मैं एक्सप्लेन

1118
01:17:50,560 --> 01:17:54,880
कर देता हूं। साधारण कारण ऐसा है कि साधारण कारण के अंतर्गत आता है प्रयोजन।

1119
01:17:54,880 --> 01:17:59,040
प्रयोजन का मतलब ये होता है कि किस उद्देश्य से आप काम कर रहे हो? जैसे कि मैं

1120
01:17:59,040 --> 01:18:03,360
घड़ा बना रहा हूं। तो मैं घड़ा क्यों बना रहा हूं? मेरे को उसमें पानी पीना है। मेरे को उसको बेचना

1121
01:18:03,360 --> 01:18:07,360
है। आदि आदि चीजें प्रयोजन में आ गई। तो वैसे ही मैं सृष्टि क्यों बना रहा हूं?

1122
01:18:07,360 --> 01:18:11,520
मैं सृष्टि इसलिए बना रहा हूं ताकि जीवात्मा जो है अपना भोग करेगी। सिंपल

1123
01:18:11,520 --> 01:18:16,080
साधारण कांड का मतलब था प्रयोजन।

1124
01:18:16,080 --> 01:18:20,320
साधारण कारण का मतलब क्या होता है? यह क्या बताया आपने? साधारण

1125
01:18:20,320 --> 01:18:24,480
कारण में प्रयोजन आता है। मैं यह बोलना चाह रहा हूं। क्या

1126
01:18:24,480 --> 01:18:28,480
आता है? प्रयोजन। तो इसमें इसमें क्या करूं? फिर मैं

1127
01:18:28,480 --> 01:18:32,640
प्रयोजन आता है। प्रयोजन का मतलब प्रयोजन का मतलब बता दिया ना मैंने। प्रयोजन।

1128
01:18:32,640 --> 01:18:37,760
तो इसका क्या करूं? मैं प्रयोजन का इससे हमारी बात का क्या सिद्ध हो गया?

1129
01:18:37,760 --> 01:18:41,760
देखो जैसे कि मेरा प्रयोजन क्या है किसी कार्य को करने का? मैं

1130
01:18:41,760 --> 01:18:45,760
कार्य क्यों कर रहा हूं? उस प्रयोजन अगर मेरा कोई प्रयोजन ही नहीं है। मैं सृष्टि बना रहा

1131
01:18:45,760 --> 01:18:49,840
हूं बस तो ऐसे ही बना रहा हूं। मेरा कोई मतलब ही नहीं बनाने का। सृष्टि बना क्यों रहा हूं?

1132
01:18:49,840 --> 01:18:54,320
क्योंकि एक कारण मौजूद है जो मेरा प्रयोजन बन रहा है।

1133
01:18:54,320 --> 01:18:58,320
अगर जीवात्मा मौजूद ही ना हो तो

1134
01:18:58,320 --> 01:19:02,400
[हंसी] आपको नहीं पता ये चीज प्रयोजन के अंदर जीवात्मा आती है। आप

1135
01:19:02,400 --> 01:19:07,920
इस समय जलेबी बना रहे हो बातों की। कुछ नहीं कर रहे हो? नहीं कोई जलेबी नहीं। कोई जलेबी नहीं। जलेबी बना

1136
01:19:07,920 --> 01:19:13,520
कोई जलेबी नहीं है। भाई मैं ये पूछ रहा हूं कि

1137
01:19:13,520 --> 01:19:17,520
आप जो कह रहे हो कि साधारण कारण के रूप में उपयोग होता है तो इसमें

1138
01:19:17,520 --> 01:19:21,520
क्या डिफरेंस आ रहा है

1139
01:19:21,520 --> 01:19:25,680
क्योंकि वहां पर लिखा है वहां पे लिखा है बल समय इत्यादि

1140
01:19:25,680 --> 01:19:30,240
ये सब साधारण कारण के रूप में उपयोजित होते हैं। इनमें से कोई भी चेतन नहीं है।

1141
01:19:30,240 --> 01:19:31,120
प्रयोजन आता है

1142
01:19:31,120 --> 01:19:35,120
ना प्रयोजन तो प्रयोजन से साधारण कारण निमित्त हो

1143
01:19:35,120 --> 01:19:39,200
जाएगा। निमित्त कारण साधारण हो जाएगा। ये मुझे बताइए कहां पर है आपकी परिभाषा?

1144
01:19:39,200 --> 01:19:43,200
नहीं नहीं बोलिए। ये परिभाषा कहां पर है? साधारण कारण के

1145
01:19:43,200 --> 01:19:47,280
अंदर प्रयोजन आता है। ये तो आपने पढ़ा ही होगा सिंपल। ये तो ये परिभाषा आप जो दे रहे हैं ये

1146
01:19:47,280 --> 01:19:51,280
कहां पर है? चलिए ये बताइए। अरे साधारण कारण में प्रयोजन आता है

1147
01:19:51,280 --> 01:19:55,360
ना। ये आप पूछ रहा हूं। आप जो कह रहे हैं साधारण कारण में प्रयोजन आता

1148
01:19:55,360 --> 01:20:01,200
है। ये परिभाषा कहां पर है? सत्याचार प्रकाश में लिखा हुआ है। ये

1149
01:20:01,200 --> 01:20:05,520
बताइए कहां लिखा है? पहले तो देखूं आपका क्या है? अरे मैं इसका

1150
01:20:05,520 --> 01:20:10,160
सत्य प्रकाश का अच्छा अभी बताऊं क्या

1151
01:20:10,160 --> 01:20:14,240
और क्या बताओ एक मिनट मैं वो देख रहा हूं टाइम लगेगा

1152
01:20:14,240 --> 01:20:18,400
थोड़ा वाला क्या लिख रहे हैं ईश्वर सप्तम

1153
01:20:18,400 --> 01:20:22,640
उल्लास में मुझे टाइम थोड़ा सा थोड़ा सा रुकिएगा मुझे पता नहीं था कि साधारण इसका

1154
01:20:22,640 --> 01:20:27,040
देना पड़ेगा रेफरेंस एक मिनट

1155
01:20:27,040 --> 01:20:31,120
नहीं साधारण का ही नहीं देना है जरा इसमें देखें कि उन्होंने निमित्त माना है क्या माना

1156
01:20:31,120 --> 01:20:35,440
है बात की है कि नहीं मकी है ठीक हां प्रयोजन प्रयोजन

1157
01:20:35,440 --> 01:20:39,440
आया है साधारण कार्ड में बता देता हूं। देखते हैं क्या कह

1158
01:20:39,440 --> 01:20:45,440
रहे हैं ये।

1159
01:20:45,740 --> 01:20:51,740
[गहरी सांस लेने की आवाज़]

1160
01:20:52,300 --> 01:20:58,300
[हंसी]

1161
01:20:59,360 --> 01:21:05,360
एक मिनट आता हूं। एक मिनट। हां, एक मिनट के लिए कैमरा ऑफ कर रहा हूं।

1162
01:21:35,920 --> 01:21:41,760
सब जीव के पुण्य पाप अथवा यथा योग्य व्यवस्था

1163
01:21:41,760 --> 01:21:46,960
देखिए व्यवस्था करने में भी वही है। देखो व्यवस्था उसका कार्य है। लो

1164
01:21:46,960 --> 01:21:50,240
यथा योग्य व्यवस्था

1165
01:21:50,240 --> 01:21:53,680
ठीक है।

1166
01:21:53,680 --> 01:21:57,840
व्यवस्था करना भी उसका कार्य है। इसका

1167
01:21:57,840 --> 01:22:02,000
मतलब कि जब वह चार

1168
01:22:02,000 --> 01:22:06,000
मनुष्यों को वह करता है ना प्राणियों को जन्म देता है

1169
01:22:06,000 --> 01:22:12,000
तो वहां पर व्यवस्था के लिए भी उनके ऊपर डिपेंड कर रहा है व्यवस्था करें।

1170
01:22:12,160 --> 01:22:16,400
उसका कार्य व्यवस्था करना भी है। यह कह रहे हैं सत्यार्थ

1171
01:22:16,400 --> 01:22:20,560
प्रकाश जो कि प्रक्षिप्त है। किसके अनुसार? अग्निव्रत जी के अनुसार

1172
01:22:20,560 --> 01:22:24,650
यह सत्यार्थ प्रकाश भी प्रक्षिप्त है।

1173
01:22:24,650 --> 01:22:30,650
[गला साफ़ करने की आवाज़]

1174
01:22:36,240 --> 01:22:41,120
कहां पर है ये वाली बात इसमें कि परमेश्वर जो है

1175
01:22:41,120 --> 01:22:45,120
एक जगह यह लिखा है कि बल समय इत्यादि ये साधारण

1176
01:22:45,120 --> 01:22:49,360
कारण है ईश्वर उसके सृष्टि रचना में मुझे

1177
01:22:49,360 --> 01:22:55,360
लगता है सृष्टि रचना वाला विषय होगा अलग से

1178
01:22:57,280 --> 01:23:03,280
ले आए आप प्रमाण ले आए

1179
01:23:07,280 --> 01:23:11,280
हां ये है षष्टि उत्पाद उत्पत्ति 101

1180
01:23:11,280 --> 01:23:15,680
तुम्हारा माइक ऑफ था क्या मेरा माइक ऑफ

1181
01:23:15,680 --> 01:23:21,680
हां

1182
01:23:23,040 --> 01:23:26,800
पीडीएफ है अच्छा साहब

1183
01:23:26,800 --> 01:23:30,880
131 पेज खोलिए। निमित्त कारण परमात्मा

1184
01:23:30,880 --> 01:23:35,200
से उत्पन्न हुआ है और परंतु

1185
01:23:35,200 --> 01:23:41,200
इसका उपादान कारण प्रकृति है।

1186
01:23:42,080 --> 01:23:46,320
जो ब्रह्म और जीव दोनों चेतना चेतनता और पालना आदि गुणों

1187
01:23:46,320 --> 01:23:50,400
से व्याप व्यापक भाव से संयुक्त परस्पर

1188
01:23:50,400 --> 01:23:54,480
मित्रता युक्त सनातन अनादि है और वैसा ही अनादि

1189
01:23:54,480 --> 01:23:58,480
मूल रूप कारण और शाखा रूप कार्य युक्त वृक्ष अर्थात स्थूल होकर प्रलय

1190
01:23:58,480 --> 01:24:02,560
में छिन्न भिन्न हो जाता है। वह तीसरा अनादि पदार्थ इन तीनों गुण

1191
01:24:02,560 --> 01:24:06,720
कर्म और स्वभाव इन जीव और ब्रह्म में से एक को जी एक जो

1192
01:24:06,720 --> 01:24:11,040
जीव है वह इस वृक्ष रूप संसार में पाप पुण्य फलों को अच्छे प्रकार से भोगता

1193
01:24:11,040 --> 01:24:15,120
है और दूसरा परमात्मा कर्म कर्मों के फलों को ना

1194
01:24:15,120 --> 01:24:19,280
भोगता हुआ चारों अर्थात भीतर बाहर सर्वत्र

1195
01:24:19,280 --> 01:24:25,280
प्रकाशमान हो रहा है जीव से ईश्वर वो

1196
01:24:25,280 --> 01:24:29,440
हां बताइए आप बताइए तब मैं बाद में देख लूंगा अपना मैं

1197
01:24:29,440 --> 01:24:32,720
पढ़ लेता हूं

1198
01:24:32,720 --> 01:24:37,600
जब दो जब कोई वस्तु बनाई जाती है तब

1199
01:24:37,600 --> 01:24:42,320
वो आपके पास फिजिकल बुक है ना मेरे पास पीडीएफ है ये तो दिक्कत आ रही है कैसे बताऊं

1200
01:24:42,320 --> 01:24:46,560
अरे चैप्टर का उल्लास बताओ ना पहले कौन सा है

1201
01:24:46,560 --> 01:24:50,080
एक मिनट

1202
01:24:50,080 --> 01:24:56,080
पेज नंबर 245 245 खोल लीजिए शायद उसप से

1203
01:24:56,240 --> 01:25:00,160
अरे मैं पूछ रहा हूं उल्लास तो बताओ

1204
01:25:00,160 --> 01:25:04,320
आठवा समुलस आठवा

1205
01:25:04,320 --> 01:25:06,560
245

1206
01:25:06,560 --> 01:25:12,560
हम

1207
01:25:14,080 --> 01:25:18,080
खोल लिया तो तीसरे पैराग्राफ पे आ जाइए उपादान कारण

1208
01:25:18,080 --> 01:25:22,480
वाला सेकंड पैराग्राफ इसके नीचे आ जाइए जब कोई वस्तु बनाई जाती है तब जिनजिन साधनों

1209
01:25:22,480 --> 01:25:27,120
से अर्थात ज्ञान दर्शन बल हाथ और नाना प्रकार के औजार

1210
01:25:27,120 --> 01:25:31,200
और दिशा काल और आकाश का साधारण कारण जैसे घड़े

1211
01:25:31,200 --> 01:25:35,200
को बनाने वाला कुम्हार निमित्त मिट्टी उपादान और दंड चक्र आदि

1212
01:25:35,200 --> 01:25:39,520
सामान्य निमित्त दिशा काल आकाश प्रकाश आंख

1213
01:25:39,520 --> 01:25:43,600
हाथ ज्ञान क्रिया आदि निमित्त निमित साधारण और निमित्त

1214
01:25:43,600 --> 01:25:48,240
कारण भी होते हैं। इन तीनों एक एक मिनट एक मिनट एक मिनट

1215
01:25:48,240 --> 01:25:52,480
अ मुझे एग्जैक्ट थोड़ा सा हेडलाइन बता दीजिए

1216
01:25:52,480 --> 01:25:56,560
इसकी पहुंच जाऊं मैं। पेज आपने 245 खोला

1217
01:25:56,560 --> 01:26:00,640
है ना? मगर वह मेरे ख्याल से आपसे अलग है। वो थोड़ा सा

1218
01:26:00,640 --> 01:26:04,720
पीछे से प्रश्नों के नाम बताइए। प्रश्न कौन सा है?

1219
01:26:04,720 --> 01:26:08,800
क्या प्रश्न हो रहा है वहां पे? प्रश्न तो उसके पीछे वाले पेज

1220
01:26:08,800 --> 01:26:11,920
पे एक मिनट

1221
01:26:11,920 --> 01:26:15,920
आठवें समुल्लास में आपको मैं आपको पेज भेज दूं क्या? ये जो

1222
01:26:15,920 --> 01:26:20,480
मेरे पास फोटो है ये भेज दूं आपको WhatsApp पर?

1223
01:26:20,480 --> 01:26:24,560
प्रकाश का ये जो फोटो है मेरे पास ये भेज दूं आपको WhatsApp पर। हां ये ज्यादा

1224
01:26:24,560 --> 01:26:28,720
आसान रहेगा। जी।

1225
01:26:28,720 --> 01:26:32,800
प्रश्न जगत के कारण कितने होते हैं? यह प्रश्न है। अगर आपने

1226
01:26:32,800 --> 01:26:38,800
प्रश्न पूछा यह प्रश्न के हिसाब से बात हो रही है।

1227
01:26:42,000 --> 01:26:46,080
एक मिनट किसी फोन से भेजना पड़ेगा ना इसको

1228
01:26:46,080 --> 01:26:52,080
WhatsApp में। एक मिनट

1229
01:27:17,520 --> 01:27:23,520
देखिए WhatsApp पर डाला है हमने।

1230
01:27:39,920 --> 01:27:45,920
उपादान कारण हेडिंग है।

1231
01:28:29,600 --> 01:28:35,600
चलो

1232
01:28:53,440 --> 01:28:59,440
मुझे लग रहा है अद्वैत का खंडन चल रहा होगा यहां जहां पर ये बात है।

1233
01:29:01,600 --> 01:29:06,320
हां वो खंडन चल रहा पर सिद्धांत तो बताया ना अपना

1234
01:29:06,320 --> 01:29:11,200
तो मैं कहां कह रहा हूं कुछ अलग

1235
01:29:11,200 --> 01:29:16,320
अष्टम समुल्लास

1236
01:29:16,320 --> 01:29:22,320
समुल्लास तो आठवा ही है हां हां समुल्लास आठवा ही है

1237
01:29:45,760 --> 01:29:50,240
यार ये वाला मिल ही नहीं रहा है।

1238
01:29:50,240 --> 01:29:54,320
नहीं तो ये जो मैंने स्क्रीनशॉट भेजा है ना ये आपको 70 प्रकाश में मिल जाएगा मतलब एक

1239
01:29:54,320 --> 01:29:58,800
मिनट मैं [गला साफ़ करने की आवाज़] इस स्क्रीनशॉट को शेयर कर स्क्रीनशॉट

1240
01:29:58,800 --> 01:30:02,800
को ही शेयर कर रहा हूं। मैं ऑपरेटर को शेयर कर रहा हूं। आप जरा इसको स्क्रीन पर दिखा

1241
01:30:02,800 --> 01:30:06,400
दीजिए ऑपरेटर

1242
01:30:06,400 --> 01:30:11,440
या [गहरी सांस लेने की आवाज़] मैं पढ़ लेता हूं रहने दीजिए पढ़ लेता हूं

1243
01:30:11,440 --> 01:30:17,440
इसमें लिखा है जब कोई वस्तु बनाई जाती है

1244
01:30:17,520 --> 01:30:21,840
तब जिनजिन साधनों से अर्थात ज्ञान दर्शन बल हाथ और नाना प्रकार के

1245
01:30:21,840 --> 01:30:25,840
औजार और दिशा काल और आकाश साधारण साधारण कारण जैसे घड़े को बनाने

1246
01:30:25,840 --> 01:30:30,080
वाला कुमार निमित्त मिट्टी उपादान और दंड चक्र आदि सामान्य

1247
01:30:30,080 --> 01:30:34,480
निमित्त दिशा काल आकाश, प्रकाश, आंख, हाथ, ज्ञान,

1248
01:30:34,480 --> 01:30:40,320
क्रिया आदि निमित्त, साधारण और निमित्त कारण भी होते हैं।

1249
01:30:40,320 --> 01:30:44,400
इसमें सबसे पहली बात तो ये आ गई कि इसमें वस्तु

1250
01:30:44,400 --> 01:30:49,520
बनाने की बात हो रही है। ध्यान रखिए।

1251
01:30:49,520 --> 01:30:53,520
इसमें क्या? इसमें एक वस्तु बनाने की बात हो रही है

1252
01:30:53,520 --> 01:30:58,240
जो आप कह रहे हैं। और कारणों को

1253
01:30:58,240 --> 01:31:02,320
मैं एक्सक्टली लाइन बता देता हूं आपको। हम लिखा है ना

1254
01:31:02,320 --> 01:31:05,280
इन तीन कारणों के बिना कोई भी वस्तु नहीं बन सकती और ना बिगड़

1255
01:31:05,280 --> 01:31:07,840
सकती।

1256
01:31:07,840 --> 01:31:12,160
हां ठीक है। तो संसार वस्तु है क्या? बिल्कुल

1257
01:31:12,160 --> 01:31:16,160
वस्तु है। अच्छा उसमें मनुष्य प्राणी

1258
01:31:16,160 --> 01:31:20,240
नहीं है। ये वस्तु है मनुष्य। ये वस्तु नहीं है।

1259
01:31:20,240 --> 01:31:24,240
क्योंकि ये मैं बता देता हूं वस्तु का मतलब क्या है? जी वस्तु

1260
01:31:24,240 --> 01:31:28,240
मतलब कि यह है कि भाई जो नॉन फिजिकल है यानी जो चेतन से हटकर जितनी भी

1261
01:31:28,240 --> 01:31:32,880
चीजें वस्तु है। सृष्टि रचना वस्तु में आएगी। बराबर

1262
01:31:32,880 --> 01:31:37,040
सृष्टि रचना वस्तु में आएगी। जबकि सृष्टि तो वो है ना जिसमें मनुष्य

1263
01:31:37,040 --> 01:31:41,040
व्यवहार भी हो। मैं बताता हूं जीवात्मा को नहीं बना रहा है ना।

1264
01:31:41,040 --> 01:31:45,040
जीवात्मा तो पहले से है। मैं नहीं कह रहा जीवात्मा को बना रहा है। मैं

1265
01:31:45,040 --> 01:31:49,280
नहीं कह रहा जीवात्मा को बना रहा है। मैंने कहा कि सृष्टि रचना

1266
01:31:49,280 --> 01:31:53,680
सृष्टि तो वो है ना जिसमें मनुष्य व्यवहार भी हो कि केवल जड़वत

1267
01:31:53,680 --> 01:31:57,840
जड़वत जो सृष्टि है वही वो है। अभी हम पीछे क्लियर

1268
01:31:57,840 --> 01:32:02,320
करके आए हैं। आपने माना कि हां डिपेंड है बनाने में। क्लियर है ना?

1269
01:32:02,320 --> 01:32:06,480
जो सृष्टि रचना है सृष्टि रचना है वो केवल

1270
01:32:06,480 --> 01:32:10,560
जड़वत वस्तु नहीं है। उसमें मन जो जीव है

1271
01:32:10,560 --> 01:32:14,560
उसका उसकी चेतना युक्त जो संसार है वही संसार है। जीव

1272
01:32:14,560 --> 01:32:19,360
की चेतना विहीन संसार संसार ही नहीं है। तो वही तो मैं कह रहा हूं।

1273
01:32:19,360 --> 01:32:20,320
वाली बात खत्म हो

1274
01:32:20,320 --> 01:32:24,720
गई। आप क्या हां

1275
01:32:24,720 --> 01:32:28,720
क्या बनाता है ईश्वर आत्मा बना रहा है क्या मैं आत्मा बनाने की

1276
01:32:28,720 --> 01:32:32,800
बात कहां कर रहा हूं जब संसार की बात करेंगे तो जड़ जड़ संसार बनाने

1277
01:32:32,800 --> 01:32:36,880
की बात करेंगे कि उसमें व्यवहार करने वाला ईश्वर मनुष्य की भी बात करेंगे मैं

1278
01:32:36,880 --> 01:32:40,880
पूछ रहा हूं बनाया बनाने की बात हो रही है बनाया किसको है बनाया

1279
01:32:40,880 --> 01:32:45,200
तो जड़ से लेकर के परम कॉम्बिनेशन से सृष्टि बनाई है

1280
01:32:45,200 --> 01:32:48,400
अब आप

1281
01:32:48,400 --> 01:32:52,560
अगर जड़ की बात यानी कि जड़ पदार्थ को बनाने की बात करेंगे तो ठीक ठीक है

1282
01:32:52,560 --> 01:32:56,640
कि उसमें ये लगा वो लगा मगर जब संसार बनाने की बात करेंगे तो उसमें वो

1283
01:32:56,640 --> 01:33:00,800
उपादान कारण सिद्ध नहीं हो रहा है। फिर वो संसार बनाने में

1284
01:33:00,800 --> 01:33:04,960
चेतन को बनाना आ ही नहीं रहा है। आप बता तो चेतन को कहां बना रहा? चेतन को बनाना कहां आ रहा है? चेतन

1285
01:33:04,960 --> 01:33:08,960
का यूज़ हो रहा है ना भाई। हो रहा है। ठीक है। लेकिन चेतन

1286
01:33:08,960 --> 01:33:13,280
को बना नहीं रहा है ना? कर्म। अच्छा ये बताइए। ये बताइए और इसमें

1287
01:33:13,280 --> 01:33:17,360
एक उदाहरण ले लेता हूं। कर्म पॉइंट क्लियर हो जाए। प्रयोजन

1288
01:33:17,360 --> 01:33:21,440
वाला क्लियर कर दूं मैं पहले। जो पॉइंट के क्लियर हो ही

1289
01:33:21,440 --> 01:33:25,600
नहीं रहा है। इसमें वस्तु की बात कर रहे हैं। जड़वत वस्तु की बात हो रही है। फिर तो संसार

1290
01:33:25,600 --> 01:33:29,680
को हमने तब माना है। संसार संसार को हमने तब माना है। संसार जब

1291
01:33:29,680 --> 01:33:33,680
उसमें चेतना युक्त व्यवहार भी हो। जड़वत वस्तु व्यवहार नहीं

1292
01:33:33,680 --> 01:33:35,600
करती है।

1293
01:33:35,600 --> 01:33:39,840
इसमें उदाहरण दिया है। वस्तु का उदाहरण दिया है। हां बताओ कहां उदाहरण

1294
01:33:39,840 --> 01:33:43,920
है? बताओ उदाहरण कौन सा है जिसमें वो वो है? इन तीन कारणों

1295
01:33:43,920 --> 01:33:48,640
के बिना कोई वस्तु नहीं हां तो

1296
01:33:48,640 --> 01:33:53,600
चेतन सत्ता कौन सी है? इसमें से उपादान वो साधारण कारण में

1297
01:33:53,600 --> 01:33:57,920
जब मैंने एक्सप्लेन कर दिया चेतन सत्ता बनाने में चेतन सत्ता नहीं बना रहा है।

1298
01:33:57,920 --> 01:34:02,000
मैं कहां कह रहा हूं चेतन सत्ता बना रहा है। मैं कह रहा हूं जब ये संसार बना रहा है।

1299
01:34:02,000 --> 01:34:06,080
संसार केवल जड़वत व्यवहारिक संसार को नहीं माना जब तक उसमें व्यवहार

1300
01:34:06,080 --> 01:34:10,080
ना हो। चेतन युक्त व्यवहार तब संसार संसार है। और इसको

1301
01:34:10,080 --> 01:34:15,120
मैं इसको और एक्सप्लेन कर दूंगा।

1302
01:34:15,120 --> 01:34:19,200
ईश्वर का ईश्वर जो है ईश्वर का कर्म

1303
01:34:19,200 --> 01:34:25,200
फल सिद्धांत है।

1304
01:34:25,760 --> 01:34:29,840
है ना? एक बार रिपीट करिए थोड़ा सा ये लाइन

1305
01:34:29,840 --> 01:34:34,640
इस लाइन को रिपीट कर दीजिए। ईश्वर का कर्म फल से कर्म फल देता है ना ईश्वर?

1306
01:34:34,640 --> 01:34:40,640
हां हां बिल्कुल। हां। तो

1307
01:34:40,720 --> 01:34:46,080
किसी छोटे बच्चे का अभी अभी जन्म हुआ है। ठीक है?

1308
01:34:46,080 --> 01:34:50,320
उसकी हत्या कर दी। हत्या हो गई। क्या

1309
01:34:50,320 --> 01:34:54,320
ऐसा हो सकता है कि ईश्वर किसी जीव का यह

1310
01:34:54,320 --> 01:34:58,480
फल दे उसे कि उसका जन्म होते ही उसको मृत्यु को प्राप्त

1311
01:34:58,480 --> 01:35:02,560
हो जाए। वो क्योंकि उसने पूर्व जन्म में पाप किए थे। कर्म फल वाला दूसरा टॉपिक

1312
01:35:02,560 --> 01:35:06,800
आ जाएगा ना इस टॉपिक। नहीं नहीं मैं मैं अभी चेतन की सहायता

1313
01:35:06,800 --> 01:35:12,400
और आपको सिद्ध कर रहा हूं अपने कार्यों में

1314
01:35:12,400 --> 01:35:16,560
टॉपिक दूसरा व्यवस्था में आ जाएगा नहीं क्योंकि

1315
01:35:16,560 --> 01:35:20,640
पहले आप प्रयोजन वाले पे आ रहे थे ना कि प्रयोजन कैसे है कैसे नहीं तो वो मैं एक्सप्लेन करने पे

1316
01:35:20,640 --> 01:35:24,720
आया था फिर अब आप कर्म पे जा रहे हो कहां एक्सप्लेन हो रहा है भाई साहब आप यहां वस्तु

1317
01:35:24,720 --> 01:35:28,960
बनाने की बात कर रहे हो मैं चेतना युक्त व्यवहारिक संसार बनाने की बात कर रहा हूं

1318
01:35:28,960 --> 01:35:30,240
अगर केवल जड़वत

1319
01:35:30,240 --> 01:35:34,240
संसार है तो ठीक है ये वाली बात आपकी ले ली मगर जब उसमें मनुष्यों

1320
01:35:34,240 --> 01:35:38,480
का व्यवहार है, क्रिया है जहां पर तो वहां पर तो चेतना की सहायता

1321
01:35:38,480 --> 01:35:42,800
हो रही है और संसार उसी को कहा जाएगा जहां व्यवहार हो। तो संसार

1322
01:35:42,800 --> 01:35:46,800
बन ही नहीं रहा है। व्यवहार के बिना मनुष्य की वो जीव की इच्छा के बिना

1323
01:35:46,800 --> 01:35:51,040
संसार हो ही नहीं रहा कंप्लीट। जब उसने इच्छा की क्रिया की तब वो संसार

1324
01:35:51,040 --> 01:35:55,040
संसार हुआ। बनाना मैंने एक्सप्लेन कर अगर आप ये

1325
01:35:55,040 --> 01:35:59,280
कहे अगर आप यह कहे अगर आप यह कहें कि वो पृथ्वी सूर्य

1326
01:35:59,280 --> 01:36:03,600
चंद्रमा इत्यादि जो जड़ प्रकृति है इसका निर्माण जो जड़ सृष्टि है

1327
01:36:03,600 --> 01:36:08,400
इसका निर्माण यहां तक कि जीव की जो बॉडी है

1328
01:36:08,400 --> 01:36:13,040
मनुष्यगत या किसी भी प्राणीगत जो उसकी देह है

1329
01:36:13,040 --> 01:36:17,600
उसको भी बनाने में किसी की सहायता नहीं लेता तब तो चल जाएगा

1330
01:36:17,600 --> 01:36:21,680
मगर हम संसार उसको ले चल रहे हैं। आपने पहले भी कह दिया है हम

1331
01:36:21,680 --> 01:36:26,560
संसार उसको लेकर के चल रहे हैं जिसमें व्यवहार भी हो चेतना युक्त

1332
01:36:26,560 --> 01:36:30,560
तो चेतना युक्त व्यवहार जहां पर हो वही संसार है तो ऐसे संसार

1333
01:36:30,560 --> 01:36:34,800
को बनाने के लिए दूसरे चेतन की सहायता है वहां पर उसकी इच्छा

1334
01:36:34,800 --> 01:36:39,680
भी है उसकी इच्छा है तो व्यवहार कर रहा है

1335
01:36:39,680 --> 01:36:45,040
ठीक है फिर रिपीट करूंगा कर तो दिया

1336
01:36:45,040 --> 01:36:45,540
ठीक

1337
01:36:45,280 --> 01:36:51,120
है अब मैं फिर वही बात बोलूंगा कि बनाना ना बनाने वाले फिर

1338
01:36:51,120 --> 01:36:55,280
क्या आप आप दूसरा टॉपिक जिस टॉपिक का एक्सप्लेनेशन चाह रहे हैं वो वाला कंप्लीट

1339
01:36:55,280 --> 01:37:01,280
हो गया अपने प्रयोजन वाला हो गया पूरा

1340
01:37:02,080 --> 01:37:06,400
पूरा कहां हुआ यहां पे जीव की सहायता हो गई ना संसार में

1341
01:37:06,400 --> 01:37:10,560
आपने जो प्रमाण दिया है आपने जो प्रमाण दिया है वो प्रमाण लागू हुई

1342
01:37:10,560 --> 01:37:14,720
पहली बात तो मैं अभी इस पे जा ही नहीं रहा हूं कि भैया ये आपका अर्थ है कि मेरा अर्थ

1343
01:37:14,720 --> 01:37:18,880
है वो तो छोड़ दीजिए आपने जो बात कही है तो जड़ जड़ संसार की रचना

1344
01:37:18,880 --> 01:37:23,040
के लिए बात हो रही है। इसमें तो आप जो उसको कह रहे हैं ना वो साधारण कारण

1345
01:37:23,040 --> 01:37:27,360
है। वो निमित्त कारण नहीं है। तो यहां पे जीव

1346
01:37:27,360 --> 01:37:31,680
के निमित्त कारण होने के संसार चेतना युक्त संसार बनने

1347
01:37:31,680 --> 01:37:36,160
में प्रमाण की आवश्यकता कहां पर पड़ती है? ठीक है?

1348
01:37:36,160 --> 01:37:40,240
मैं आपको बता दूं मेरे जीवन का एक एक्सपीरियंस छोटा सा। अच्छा लगेगा। थोड़ा लाइट हो जाएगा

1349
01:37:40,240 --> 01:37:45,280
वातावरण भी। ठीक है? प्रमाण की आवश्यकता कहां पर पड़ती है?

1350
01:37:45,280 --> 01:37:49,680
जहां पर जैसे मान लीजिए मैंने कहा कि ईश्वर जो है

1351
01:37:49,680 --> 01:37:52,560
विद्या और अविद्या

1352
01:37:52,560 --> 01:37:57,040
दोनों ही समान रूप से ब्रह्म में

1353
01:37:57,040 --> 01:38:00,480
अनादि काल से हैं। ब्रह्म जो है विद्या दोनों चीजें

1354
01:38:00,480 --> 01:38:04,480
उसके पास है। ठीक है? विद्या और अविद्या। अब सामने वाले

1355
01:38:04,480 --> 01:38:08,480
ने कहा नहीं नहीं जहां विद्या है वहां विद्या कैसे हो सकती है? मैंने कहा भाई हो

1356
01:38:08,480 --> 01:38:12,800
सकती है। मैंने कई प्रकार से तर्क भी दिए। मगर जब

1357
01:38:12,800 --> 01:38:16,800
हम दोनों की बात इस तरह से अटक जाती है तब हम कहते हैं कि भाई प्रमाण

1358
01:38:16,800 --> 01:38:20,800
से देख लेते प्रमाण में लिखा है कि नहीं लिखा है। ठीक है? तो अब

1359
01:38:20,800 --> 01:38:25,120
मेरी और आपकी बात अटकी कौन सी बात अटकी? कि भैया

1360
01:38:25,120 --> 01:38:29,120
जो जीव है उसको आप कह रहे हो साधारण कारण मानो।

1361
01:38:29,120 --> 01:38:33,200
मैंने कहा कि भैया वो तो साधारण कारण तो सेट हो ही नहीं पाएगा। उस पर साधारण

1362
01:38:33,200 --> 01:38:37,360
कारण तो ऐसे पदार्थ है जो जिनकी जो चेतना

1363
01:38:37,360 --> 01:38:42,320
विहीन चेतना विहीन टाइप के हैं।

1364
01:38:42,320 --> 01:38:46,400
चेतन सत्ता नहीं है साधारण कारण में कहीं भी सांकेतिक रूप से भी तो

1365
01:38:46,400 --> 01:38:50,400
फिर हमने प्रमाण खोला अब प्रमाण जब आपने दिखाया तो दो वहां पर दिक्कतें

1366
01:38:50,400 --> 01:38:54,400
आई पहली कि वहां पर बात ही हो रही है जड़ पदार्थ के बनने

1367
01:38:54,400 --> 01:38:58,480
की वस्तु के बनने की जिसके लिए साधारण कारण की बात हो

1368
01:38:58,480 --> 01:39:02,640
रही है। ठीक और मैंने जो आपसे प्रश्न किया वो

1369
01:39:02,640 --> 01:39:06,720
किया है एक मिनट मैंने जो आपसे प्रश्न किया वो चेतना युक्त

1370
01:39:06,720 --> 01:39:10,880
व्यवहारिक संसार का या चेतना युक्त व्यवहारिक सृष्टि का वो किया

1371
01:39:10,880 --> 01:39:15,280
है प्रश्न और यहां पे जड़ सृष्टि की बात दूसरी बात

1372
01:39:15,280 --> 01:39:15,780
उसमें

1373
01:39:15,680 --> 01:39:19,840
जो साधारण कारण के लिए उन्होंने उदाहरण दिए ना वो ठीक विपरीत

1374
01:39:19,840 --> 01:39:22,960
सिद्ध होते हैं जीव के

1375
01:39:22,960 --> 01:39:27,040
जीव के ठीक विपरीत सिद्ध होते हैं वो इनमें से कोई भी नहीं जो

1376
01:39:27,040 --> 01:39:32,000
भोग कर रहा हो अपने आप में सब अल्टीमेट है

1377
01:39:32,000 --> 01:39:36,000
और फिर आप इनसे कह रहे हो कि इनके आधार पर मान लूं। आप मुझे दयानंद

1378
01:39:36,000 --> 01:39:40,160
जी का ही दिखा दीजिए। दयानंद जी ने कहीं पे मान लिया हो कि जीव जो है वो साधारण

1379
01:39:40,160 --> 01:39:44,320
कारण में आता है। दिखा दीजिए। मैं बता देता हूं। मेरी आवाज आ रही है

1380
01:39:44,320 --> 01:39:46,960
क्लियर?

1381
01:39:46,960 --> 01:39:51,440
तो आपने बोला कि बना रहा है। उसका

1382
01:39:51,440 --> 01:39:57,440
कारण बताइए मुझे क्यों बना रहा है?

1383
01:39:57,520 --> 01:40:01,520
हम क्या क्या क्यों बना रहा है मेरी

1384
01:40:01,520 --> 01:40:05,600
आवाज नहीं आ रही क्या क्यों बना रहा है हेलो कट रही है

1385
01:40:05,600 --> 01:40:09,680
क्या आवाज तो नहीं कट रही मेरी देखिए मेरे साथ नाटकबाजी मत

1386
01:40:09,680 --> 01:40:14,080
करिए ये सब मैं बहुत नाटकबाजी नहीं कर रहा हूं

1387
01:40:14,080 --> 01:40:18,080
ये जो आप कर रहे हो ना इस समय ये सब मैं धुरंधर हूं फिर मैं जब आऊंगा इन

1388
01:40:18,080 --> 01:40:22,160
सब चीजों पे फिर आपको नहीं कर रहा हूं सहन नहीं होगा मैं समझ रहा हूं

1389
01:40:22,160 --> 01:40:26,240
ये सब चीजें मेरे साथ मत करिए मेरी आवाज कट रही है क्या मैंने बोल भी दिया क्या

1390
01:40:26,240 --> 01:40:30,560
उसके बाद कट रही है क्या सब नाटक मेरे साथ मत करिए चलो मैं फिर से

1391
01:40:30,560 --> 01:40:34,560
फिर से बोल देता हूं फिर से बोल देता हूं हां फिर से बोलिए

1392
01:40:34,560 --> 01:40:38,640
रिपीट कर ये आपने पिछली लाइव में भी किया था मैंने इग्नोर कर दिया

1393
01:40:38,640 --> 01:40:42,880
था जानबूझ के किया था अरे जेनुइनली आपको समझ में आ रहा है

1394
01:40:42,880 --> 01:40:46,880
पूछ रहा हूं जेनुइनली नहीं पूछ रहे थे आप पूछने के बाद बार-बार

1395
01:40:46,880 --> 01:40:51,360
पूछ रहे थे जब मेरी मेरी आवाज स्पष्ट आपको सुनाई दे गई उसके बाद भी

1396
01:40:51,360 --> 01:40:55,360
ये होता है सामने वाले को आपको को ये कैसे पता कि मुझे स्पष्ट

1397
01:40:55,360 --> 01:40:58,880
सुनाई या नहीं सुनाई आपको कैसे पता

1398
01:40:58,880 --> 01:41:02,880
वो हो जाता है समझ में आ जाती है कुछ चीजें तो वही

1399
01:41:02,880 --> 01:41:06,960
तो आप अंदाजा लगा रहे हैं वही तो बोल रहा हूं तो मैंने

1400
01:41:06,960 --> 01:41:11,040
इसलिए मैंने अंदाजा लगाया क्योंकि मैंने पिछली वाली लाइव में भी उसको इग्नोर

1401
01:41:11,040 --> 01:41:12,800
किया था और आज आपने वही हरकत

1402
01:41:12,800 --> 01:41:16,800
दोबारा की है। एक बार आप एक बार आपने पूछा ठीक है। एक बार आपने

1403
01:41:16,800 --> 01:41:20,800
पूछा आपने ठीक है। उसके बाद भी आपने पूछा रुक के

1404
01:41:20,800 --> 01:41:25,120
पूछा आप आपने रिसोंस नहीं दिया ना आपने कोई चलिए ठीक है

1405
01:41:25,120 --> 01:41:29,200
ठीक है आप सत्यार्थ प्रकाश पे हाथ रख के कह दीजिए ईश्वर साक्षी है कि मैंने आपको

1406
01:41:29,200 --> 01:41:33,280
दूसरी भावना से नहीं कहा है वो कह दीजिए चलिए हां फिजिकल तो

1407
01:41:33,280 --> 01:41:38,480
पीडीएफ है पीडीएफ पे चलेगा

1408
01:41:38,480 --> 01:41:44,480
छोड़ो खैर फिजिकल नहीं है वो में है मेरे पास बोल देता हूं

1409
01:41:44,960 --> 01:41:49,200
कुछ नहीं है बताइए तो अल्टीमेटली पॉइंट पॉइंट निकल के ये आ रहा है कि जड़

1410
01:41:49,200 --> 01:41:53,520
जो बना रहा है यानी जड़ का उपयोग जड़ जड़ बना रहा है ये बोला तो

1411
01:41:53,520 --> 01:41:57,600
भाई बात ये आएगी कि क्यों बना रहा है अल्टीमेटली पॉइंट ये आएगा क्यों बना

1412
01:41:57,600 --> 01:42:01,840
रहा है तो उस क्यों में ज्ञान आएगा जो बना रहा है

1413
01:42:01,840 --> 01:42:05,920
मैंने तो कहा ही नहीं मैं बोल रहा हूं आपने बोला ना इसमें आपने बोला ना

1414
01:42:05,920 --> 01:42:11,200
इसमें कैसे आएगी जीवात्मा कैसे आएगी मैं वो उसप लाना चाह रहा हूं कैसे आएगी

1415
01:42:11,200 --> 01:42:15,200
तो ये अल्टीमेटली इसप आप सबसे पहला

1416
01:42:15,200 --> 01:42:19,280
क्लेम ये कर रहे है अल्टीमेटली बात इसपे आएगी क्यों बना रहा है? तो पहले इस

1417
01:42:19,280 --> 01:42:23,360
क्यों बनाने को बनाने के अंदर ही जीवात्मा आएगी? इस

1418
01:42:23,360 --> 01:42:27,360
क्यों बनाने को सिद्ध करिए पहले ये कहां से आ गया? एकदम से क्यों बना रहा है?

1419
01:42:27,360 --> 01:42:30,240
जी

1420
01:42:30,240 --> 01:42:34,320
मैंने सबसे पहली लाइन क्या बोली थी? प्रयोजन। प्रयोजन का मतलब क्या है? कि

1421
01:42:34,320 --> 01:42:38,640
क्यों बना रहा है? वो मैंने पहले ही बोली थी बात। अब क्यों बना रहा है कि अंदर जीवात्मा

1422
01:42:38,640 --> 01:42:42,800
कैसे आएगी? ये पॉइंट है ना? तो जो साधारण कारण के अंदर जो

1423
01:42:42,800 --> 01:42:46,880
चीज आई है वो है ज्ञान और प्रयोजन। ठीक है? तो प्रयोजन

1424
01:42:46,880 --> 01:42:51,280
प्रयोजन क्या होता है कि भाई मैं किस उद्देश्य से कोई कार्य कर रहा हूं मैं सृष्टि

1425
01:42:51,280 --> 01:42:55,680
बना रहा हूं तो क्यों बना रहा हूं उस क्यों के अंदर जीवात्मा आएगी कि जीवात्मा एक्सिस्ट

1426
01:42:55,680 --> 01:43:00,000
करती है इसीलिए मैं इनके लिए बना रहा हूं वो क्यों वाली बात तो

1427
01:43:00,000 --> 01:43:04,160
ये क्यों ऐसे क्यों ऐसे आएगा जी इसमें प्रयोजन इसमें

1428
01:43:04,160 --> 01:43:10,160
प्रयोजन वाली जो आप बात कह रहे हैं एक मिनट

1429
01:43:26,000 --> 01:43:31,360
इसका मतलब साधारण कारण वो है जिसके लिए वो चीज बनाई जाए।

1430
01:43:31,360 --> 01:43:35,760
अगर इस तरीके से आप जोड़ेंगे हां

1431
01:43:35,760 --> 01:43:40,480
प्रयोजन में इसका मतलब इसका मतलब कि

1432
01:43:40,480 --> 01:43:46,320
ये औजार भी साधारण कारण है। इसका मतलब औजार के लिए सृष्टि बन रही है।

1433
01:43:46,320 --> 01:43:50,400
मैंने बोला ना ज्ञान के अंदर प्रयोजन आएगा। वह साधारण कारण वह भी

1434
01:43:50,400 --> 01:43:54,560
है और वह भी साधारण कारण है। साधारण कारण दे रखे ना मेंशन प्रयोजन अपने आप में साधारण

1435
01:43:54,560 --> 01:43:59,280
कारण है। प्रयोजन अपने आप में साधारण कारण है।

1436
01:43:59,280 --> 01:44:03,360
ये कहां लिखा है? ज्ञान के अंदर प्रयोजन कहां से आ गया

1437
01:44:03,360 --> 01:44:07,440
भाई? ज्ञान तो ये है कि भैया इस चीज की नॉलेज होनी चाहिए। कैसे बनानी है, क्या

1438
01:44:07,440 --> 01:44:11,440
करना है? ये ज्ञान है। प्रयोजन कहां से आ गया? नॉलेज

1439
01:44:11,440 --> 01:44:14,640
है वो तो

1440
01:44:14,640 --> 01:44:18,640
जबरदस्ती। एक मिनट। ज्ञान के अंदर प्रयोजन नहीं

1441
01:44:18,640 --> 01:44:24,000
आ रहा है।

1442
01:44:24,000 --> 01:44:28,960
ज्ञान के अंदर प्रयोजन नहीं आ रहा है।

1443
01:44:28,960 --> 01:44:32,800
ठीक है।

1444
01:44:32,800 --> 01:44:38,250
आपकी आवाज नहीं आ रही है।

1445
01:44:38,250 --> 01:44:41,440
[खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़]

1446
01:44:41,440 --> 01:44:45,520
मैं यह बोल रहा हूं कि ज्ञान शब्द आया है। ज्ञान के अंदर ही प्रयोजन आएगा। मैं यह कहना चाह

1447
01:44:45,520 --> 01:44:48,720
रहा हूं।

1448
01:44:48,720 --> 01:44:52,800
ज्ञान के अंदर ही प्रयोजन आया है। तो वह कैसे आया है? ज्ञान के

1449
01:44:52,800 --> 01:44:56,800
अंदर प्रयोजन बताइए मुझे। हां एक्सप्लेन कर देता हूं। हां

1450
01:44:56,800 --> 01:45:00,800
हां एक्सप्लेन कर देता हूं। ज्ञान के अंदर ही प्रयोजन ऐसा आता है कि ज्ञान में क्या

1451
01:45:00,800 --> 01:45:04,880
होता है? उदाहरण के लिए आप कोई कार्य कर रहे हैं। तो ज्ञान में क्या-क्या आता है?

1452
01:45:04,880 --> 01:45:08,880
मैं किससे ये कार्य कर रहा हूं? मैं कैसे ये कार्य कर रहा हूं? और मैं क्यों ये

1453
01:45:08,880 --> 01:45:12,960
कार्य कर रहा हूं? ये सारी चीजें ज्ञान के अंदर ही आएंगी। तो क्यों? मैं क्यों कार्य कर रहा हूं?

1454
01:45:12,960 --> 01:45:17,120
मैं इसलिए कर रहा हूं ताकि जीवात्मा का अ जो है संसार बनाओ

1455
01:45:17,120 --> 01:45:22,000
और जीवात्मा भोग करे। मैं इस क में जो है ज्ञान के अंदर प्रयोजन आ गया।

1456
01:45:22,000 --> 01:45:27,040
फिर ठीक है। प्रयोजन के अंदर जीवात्मा आ गई।

1457
01:45:27,040 --> 01:45:31,760
अरे भैया इससे जीवात्मा साधारण कारण कैसे सिद्ध हो गई?

1458
01:45:31,760 --> 01:45:35,920
साधारण कारण में ज्ञान आया नहीं आया। आपने माना अभी ज्ञान आया।

1459
01:45:35,920 --> 01:45:40,160
साधारण कारण आपने लिखा है यहां ज्ञान। ठीक है। और उसमें वो प्रयोजन

1460
01:45:40,160 --> 01:45:44,240
आ गया कि मुझे मालूम है क्यों कर रहा हूं। ज्ञान में हां ज्ञान में प्रयोजन

1461
01:45:44,240 --> 01:45:49,120
आ गया और प्रयोजन में जीवात्मा आ गई।

1462
01:45:49,120 --> 01:45:53,440
प्रयोजन में जीवात्मा कैसे आ गई? प्रयोजन

1463
01:45:53,440 --> 01:45:57,440
क्या होता है? मैं एक मिनट एक मिनट एक मिनट एक मिनट मैं मैं पूछ मैं सवाल

1464
01:45:57,440 --> 01:46:01,680
पूछता हूं। मैंने कहा कि मैं

1465
01:46:01,680 --> 01:46:05,760
आपके लिए मैंने कहा कि मैं आपके लिए कोई कार्य

1466
01:46:05,760 --> 01:46:10,240
कर रहा हूं। ठीक है? हम आपके लिए कोई कार्य कर रहा हूं।

1467
01:46:10,240 --> 01:46:14,320
ठीक है ना? तो इसका मतलब यह है कि आपका उपयोग करना वो

1468
01:46:14,320 --> 01:46:18,080
आपकी सहायता लेना नहीं होगा।

1469
01:46:18,080 --> 01:46:22,400
मान लीजिए मैं आपको बर्थडे पर आपको जो है एक मिनट

1470
01:46:22,400 --> 01:46:26,400
मान लीजिए कोई बर्थडे पर किसी को गिफ्ट देता है तो मैं गिफ्ट क्यों दे

1471
01:46:26,400 --> 01:46:30,560
रहा हूं क्योंकि भैया मुझे ज्ञान है कि मुझे आपको देना है आपका बर्थडे है आज।

1472
01:46:30,560 --> 01:46:34,640
अब उस गिफ्ट देने के लिए अगर अगर उस गिफ्ट देने के लिए मैंने आपका

1473
01:46:34,640 --> 01:46:38,960
यूज कर लिया। आपका ही उपयोग कर लिया।

1474
01:46:38,960 --> 01:46:42,960
यूज कर लिया आपका। और उसमें आपकी निर्णायक क्षमता का

1475
01:46:42,960 --> 01:46:47,040
भी उपयोग है। ऐसा उपयोग नहीं है। नॉर्मल उपयोग नहीं है। आपकी

1476
01:46:47,040 --> 01:46:51,200
निर्णायक क्षमता का भी उपयोग कर लिया मैंने। और मैंने आपका

1477
01:46:51,200 --> 01:46:57,200
यूज़ कर लिया तो ये आपकी सहायता नहीं ले ली मैंने।

1478
01:46:57,360 --> 01:47:01,040
मैं बोल दूं। अब हां

1479
01:47:01,040 --> 01:47:05,280
निर्णायक में उपयोग नहीं आएगा। वो मैंने एक्सप्लेन कर दिया ना। क्योंकि निर्णायक

1480
01:47:05,280 --> 01:47:09,360
में ईश्वर का कार्य नहीं है। निर्णय निर्णय लेना में ईश्वर का कार्य आएगा ही नहीं आएगा क्योंकि वो

1481
01:47:09,360 --> 01:47:13,360
कार्य ईश्वर का है ही नहीं। वो कार्य आपका है। निर्णय लेने के अलावा जितने भी कार्य

1482
01:47:13,360 --> 01:47:18,240
उस सब में ईश्वर आएगा। ये मैंने पहले बताया था एक्सप्लेनेशन में।

1483
01:47:18,240 --> 01:47:22,560
तो मेरे भाई मैंने आपको शुरू ही वहीं पे किया है। यह निर्णय जीव

1484
01:47:22,560 --> 01:47:27,440
के पास है ना कि मैं हरकत करूं कि ना करूं।

1485
01:47:27,440 --> 01:47:31,440
हां। तो मैं इस संसार की बात कर रहा हूं

1486
01:47:31,440 --> 01:47:35,680
जहां हरकत है, जहां क्रिया है,

1487
01:47:35,680 --> 01:47:40,080
जहां व्यवहार है, जड़वत संसार की रचना मैंने नहीं कहा।

1488
01:47:40,080 --> 01:47:44,240
उसमें ठीक है वो जीव को उपयोग किया और बना दिया मनुष्य। मगर मैं

1489
01:47:44,240 --> 01:47:48,400
जिस संसार की बात कर रहा हूं, वहां क्रिया है। जिसके बिना आपने माना

1490
01:47:48,400 --> 01:47:52,560
संसार को संसार कहा ही नहीं जा सकता है। जहां क्रिया नहीं है। हां।

1491
01:47:52,560 --> 01:47:56,960
तो चेतन क्रिया युक्त संसार की रचना करने के लिए

1492
01:47:56,960 --> 01:48:01,120
ईश्वर इस पर डिपेंड कर रहा है जीव पर। जीव जहां अपने

1493
01:48:01,120 --> 01:48:05,280
साधारण कारण अगर मान भी ली जाए अपनी डेफिनेशन तो वो जड़वत संसार बन रहा है। बन

1494
01:48:05,280 --> 01:48:10,800
गया। मगर व्यवहार के बिना वो संसार नहीं है।

1495
01:48:10,800 --> 01:48:12,400
वो अभी भी जड़ है।

1496
01:48:12,400 --> 01:48:16,560
दुनिया व्यवहार जहां पर है वही संसार है।

1497
01:48:16,560 --> 01:48:21,440
और ये बात आपने मानी है। हां तो डिपेंड है। तो डिपेंड है।

1498
01:48:21,440 --> 01:48:25,520
तो जब डिपेंड है तो डिपेंड है तो फिर ये कहां से सिद्ध हुआ कि वो

1499
01:48:25,520 --> 01:48:30,800
सहायता नहीं ले रहा है। और दूसरी बात

1500
01:48:30,800 --> 01:48:34,960
चलो ठीक है। ये ये हमारा काफी देर

1501
01:48:34,960 --> 01:48:37,920
हो गया।

1502
01:48:37,920 --> 01:48:42,000
इसमें मेरा एक अवतार को लेके अवतार विषय पे आप आ नहीं पाए अभी

1503
01:48:42,000 --> 01:48:46,320
तक। उसप मेरा पॉइंट था। अगर ये वाला कंप्लीट आपका हो गया हो तो हम उसप आ जाए।

1504
01:48:46,320 --> 01:48:50,400
मैंने एक्सप्लेनेशन दे दिया जितना दे सकता था मैं। इसमें

1505
01:48:50,400 --> 01:48:54,480
इसमें चीज और बाकी है। आप मुझे यह बता दीजिए

1506
01:48:54,480 --> 01:48:59,920
कि कर्मों का फल देना ईश्वर का कार्य है?

1507
01:48:59,920 --> 01:49:04,080
हां हां बिल्कुल हम तो क्या ईश्वर ऐसी

1508
01:49:04,080 --> 01:49:09,360
व्यवस्था भी कर सकता है जैसे कोई छोटा बच्चा हुआ और

1509
01:49:09,360 --> 01:49:15,360
5 वर्ष की आयु में ही उसकी मृत्यु हो जानी है

1510
01:49:17,440 --> 01:49:21,520
धोखे हो जानी है ये पहले से तय है ये पूछ रहे हो आप

1511
01:49:21,520 --> 01:49:25,680
ये उसके कर्मों का फल है पूर्व जन्म के छोटा

1512
01:49:25,680 --> 01:49:29,680
सा है नहीं नहीं ये ये कर्मों के फल में नहीं आया आएगा। यह कर्मों के फल में नहीं

1513
01:49:29,680 --> 01:49:34,080
है। अच्छा किस में आएगा ये? यह

1514
01:49:34,080 --> 01:49:38,080
स्वतंत्र इच्छा है। जी। मान लीजिए मैं किसी पांच साल के बच्चे को जाके मार देता हूं। ये वही

1515
01:49:38,080 --> 01:49:42,240
सवाल है। मैं हत्या की बात नहीं कर रहा। मृत्यु की बात कर रहा हूं अभी। हां

1516
01:49:42,240 --> 01:49:46,320
मृत्यु मृत्यु चल रही है। मृत्यु ले लीजिए। किस कारण से? मतलब कारण क्या

1517
01:49:46,320 --> 01:49:50,720
है मृत्यु का? कैसे मरा वो? मतलब तो थोड़ा स्पेसिफाई करिए।

1518
01:49:50,720 --> 01:49:54,800
किसी भी कारण से मरा। मैं अभी केवल मृत्यु के बाद क्या मृत्यु करा सकता है

1519
01:49:54,800 --> 01:49:58,880
कि नहीं करा सकता है? नहीं नहीं करा सकता। जानबूझ के मृत्यु नहीं

1520
01:49:58,880 --> 01:50:02,960
करा सकता। अरे भाई उसके पूर्व जन्म के कर्मों

1521
01:50:02,960 --> 01:50:07,600
के आधार पर उसकी मृत्यु नहीं हो सकती। जल्दी नहीं

1522
01:50:07,600 --> 01:50:10,000
हो सकती।

1523
01:50:10,000 --> 01:50:16,000
तो मतलब अगर कोई प्रलय में मर गया बच्चा तो ये किसको जाएगा ये मामला?

1524
01:50:16,000 --> 01:50:16,500
ये

1525
01:50:16,320 --> 01:50:20,640
तो वो हुआ ना दुर्घटना थी। तो इसमें ईश्वर

1526
01:50:20,640 --> 01:50:24,880
ईश्वर कारण नहीं है। नहीं ईश्वर इसमें ये ईश्वर ने जानबूझ

1527
01:50:24,880 --> 01:50:28,960
के दुर्घटना। अब आप बहक रहे हैं। आपके सारे आचार्य बोल चुके हैं। इसमें ईश्वर कारण

1528
01:50:28,960 --> 01:50:32,960
है। अग्निव्रत जी से पूछ लो। मैं तो आप

1529
01:50:32,960 --> 01:50:37,600
मेरी बात मैं क्या करूं जब आप अपने सिद्धांतों को ही छोड़ दे रहे हैं। नहीं नहीं नहीं

1530
01:50:37,600 --> 01:50:41,760
मैं एक्सप्लेन कर रहा हूं। कर्म कर्म फल कर्म फल एक्सप्लेन कर देता हूं मैं। कर्म फल एक्सप्लेन

1531
01:50:41,760 --> 01:50:45,920
कर देता हूं। आप कर्म फल एक्सप्लेन मत करिए भैया। आप मुझे ये बताइए कि कोई बच्चा

1532
01:50:45,920 --> 01:50:49,920
अभी जन्मा है। साल दो वर्ष साल दो साल का है और जो है वो

1533
01:50:49,920 --> 01:50:54,160
सुनामी आ गई। कुछ ऐसी प्राकृतिक घटना हो गई। खत्म हो गया। तो इसमें

1534
01:50:54,160 --> 01:50:59,680
उसके पूर्व जन्मों का कर्म का फल नहीं था। नहीं था।

1535
01:50:59,680 --> 01:51:03,760
ठीक है। तो अब यहां पर चर्चा हमारी बहुत हद तक हो गई

1536
01:51:03,760 --> 01:51:09,360
है। यहां अब अब आप आर्य समाज के सिद्धांत पर जा रहे हैं।

1537
01:51:09,360 --> 01:51:15,360
अवतार पे भी करेंगे। अवतार पे भी करेंगे। ठीक है? अवतार पे भी करेंगे।

1538
01:51:15,440 --> 01:51:19,360
अब

1539
01:51:19,360 --> 01:51:23,440
चलिए आप पूछ लीजिए अवतार के संबंध में। एक

1540
01:51:23,440 --> 01:51:28,400
मिनट

1541
01:51:28,400 --> 01:51:32,400
तो एक जो जैसे ईश्वर का गुण कहा जाता है वो

1542
01:51:32,400 --> 01:51:36,400
गुण है ईश्वर का कि ईश्वर जो है व्यवहारिक सत्ता में ही कम

1543
01:51:36,400 --> 01:51:40,480
से कम बिना किसी रोकटोक के बिना किसी बाधा के

1544
01:51:40,480 --> 01:51:44,560
झूठ भी बोल सकता है छल भी कर सकता है भ्रम में भी डाल सकता है हर चीज कर सकता है ईश्वर है ना

1545
01:51:44,560 --> 01:51:49,200
ये ईश्वर के कैपेबिलिटी सामर्थ्य में आता है

1546
01:51:49,200 --> 01:51:53,280
किसी भी प्रकार का छल करना आपके साथ और किसी के भी साथ करना ईश्वर हमें ये कोई बाधा नहीं किसके

1547
01:51:53,280 --> 01:51:57,440
साथ चल करेगा किसके साथ नहीं भरेगा। ठीक है? यह बात है। अब

1548
01:51:57,440 --> 01:52:01,440
बात यह आती है कि जो हमको ईश्वर के द्वारा ज्ञान प्रदान किया जाता है या

1549
01:52:01,440 --> 01:52:05,760
फिर ईश्वर के द्वारा कोई भी जानकारी प्रदान की जाती है किसी भी प्रकार की तो

1550
01:52:05,760 --> 01:52:09,760
उस जानकारी पर उस ज्ञान पर संशय रहित रूप

1551
01:52:09,760 --> 01:52:14,160
से भरोसा होने के लिए हमें यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर ने इसमें जो है छेड़छाड़

1552
01:52:14,160 --> 01:52:18,160
नहीं करी है। इसका मतलब यह है कि ईश्वर के द्वारा अगर यह बोला जा रहा

1553
01:52:18,160 --> 01:52:22,320
है कि भाई मैं कभी भी कहीं पर भी कुछ भी झूठ बोल सकता हूं और फिर वो जो है ईश्वर

1554
01:52:22,320 --> 01:52:26,640
एक फला फला हमको एक प्रकार से कोई चीज दे रहा है। ज्ञान दे रहा है। तो अब

1555
01:52:26,640 --> 01:52:30,640
दिक्कत ये आ रही है कि क्या ईश्वर ने यहां झूठ नहीं बोला होगा? अगर

1556
01:52:30,640 --> 01:52:34,560
ईश्वर ने यहां झूठ नहीं बोला होगा। यानी क्या ईश्वर यहां झूठ बोलने का सामर्थ्य

1557
01:52:34,560 --> 01:52:38,800
रखता था या नहीं था? अगर ईश्वर में यहां झूठ बोलने का सामर्थ्य था

1558
01:52:38,800 --> 01:52:42,880
तो यानी वो संशय में चला गया ज्ञान। और यदि ये बोल दो नहीं ईश्वर में यहां झूठ बोलने का

1559
01:52:42,880 --> 01:52:46,960
सामर्थ्य ही नहीं था। ईश्वर में सामर्थ्य नहीं तो बाधा आ जाएगी। आप वो फिर आपकी परिभाषा

1560
01:52:46,960 --> 01:52:50,960
जो होती है बाधा वाली वो आ जाएगी कि भाई ईश्वर में ईश्वर में बाकी चीजें करने का

1561
01:52:50,960 --> 01:52:55,200
तो सामर्थ था। लेकिन यहां पर भरोसा क्यों है? मैं

1562
01:52:55,200 --> 01:52:59,280
कंप्लीट कर दूं पॉइंट पॉइंट कंप्लीट कर देता हूं तो इसमें यह आ जाएगा

1563
01:52:59,280 --> 01:53:03,280
कि दो दो चीजें निकल रही है इसमें से कि या तो आप ये

1564
01:53:03,280 --> 01:53:07,520
बोल दो कि भाई ईश्वर ने जो है यहां पर छेड़छाड़ करने का या इसमें जो गलत चीज

1565
01:53:07,520 --> 01:53:11,680
वैदिक ज्ञान हर हर प्रकार का ज्ञान वैदिक ज्ञान और चलो वैदिक ज्ञान और हर चीज में ही आ जाएगा

1566
01:53:11,680 --> 01:53:15,680
इसका संशय तो क्योंकि ईश्वर जो है छेड़छाड़ कहीं पे भी कर सकता है केवल वैदिक ज्ञान में

1567
01:53:15,680 --> 01:53:19,680
नहीं आपके दिमाग में या अन्य मनुष्यों के दिमाग में या उनको भ्रम में डाल

1568
01:53:19,680 --> 01:53:23,760
सकता है। ये सारी चीजें आती है आपके अनुसार पूर्ण में। तो अब बात ये

1569
01:53:23,760 --> 01:53:27,760
आती है कि अगर हम ये माने कि भाई यहां ईश्वर छेड़छाड़ नहीं करेगा तो बाधा आ

1570
01:53:27,760 --> 01:53:31,840
रही है। अगर ये माने कि यहां छेड़छाड़ करेगा तो फिर वो ज्ञान सारा का सारा संशय में चले

1571
01:53:31,840 --> 01:53:35,920
जाएगा। यदि वो संशय में जाता है ज्ञान तो संशय में जाने की वजह से फिर उसको

1572
01:53:35,920 --> 01:53:39,920
प्रमाण के रूप में हम उपयोग नहीं कर पाएंगे। तो ये दो चीजें

1573
01:53:39,920 --> 01:53:45,920
निकल के आ रही है। अब आप बता दीजिए इसका सॉल्यूशन क्या है आपके पास?

1574
01:53:47,800 --> 01:53:53,800
[गला साफ़ करने की आवाज़] पहली बात तो यह है कि

1575
01:53:54,320 --> 01:53:58,560
छल करना। ठीक है? छल करने से अगर शुरुआत

1576
01:53:58,560 --> 01:54:02,560
करें तो यह बात वहां भी पूछी

1577
01:54:02,560 --> 01:54:07,120
थी मैंने अग्निवत जी से जब चर्चा हो रही थी और मैंने

1578
01:54:07,120 --> 01:54:11,440
जो इस तरह से जो मृत्यु हुई यह ईश्वर का कार्य अग्निवत जी मानते निर्विवाद

1579
01:54:11,440 --> 01:54:15,440
रूप से सब मानते हैं। जो अच्छे-अच्छे आर्य

1580
01:54:15,440 --> 01:54:19,520
समाज के जो वह हैं कि इस तरीके से मृत्यु होगी है

1581
01:54:19,520 --> 01:54:23,680
ना वह ईश्वर का ही कार्य है। तो इस

1582
01:54:23,680 --> 01:54:28,000
प्रकार से इस रूप में और जब सारे

1583
01:54:28,000 --> 01:54:32,080
कार्य ईश्वर ही कर रहा है तो हमें फीलिंग ये क्यों आ रही है कि

1584
01:54:32,080 --> 01:54:34,880
हम जो है

1585
01:54:34,880 --> 01:54:39,120
क्या कहते हैं? हम कर रहे हैं। ठीक है?

1586
01:54:39,120 --> 01:54:43,440
तो यहां पर भी भ्रम उत्पन्न करने वाला मामला हो गया। मगर क्योंकि

1587
01:54:43,440 --> 01:54:47,440
कर्म फल देना है तो इसलिए उसको यह फील होने देना है।

1588
01:54:47,440 --> 01:54:51,440
उसको स्वतंत्र छोड़ना है कि तुम क्या सोचो। तो इसलिए वो फील

1589
01:54:51,440 --> 01:54:55,520
वो होने मतलब कि ऐसा कृत

1590
01:54:55,520 --> 01:54:59,520
जिससे कि भ्रम उत्पन्न हो जाए। ऐसा कृत

1591
01:54:59,520 --> 01:55:03,120
ईश्वर के स्वरूप में आपने भी माना हुआ है।

1592
01:55:03,120 --> 01:55:07,200
ठीक है? ठीक है ना? भ्रम नहीं पूरा बोल लो।

1593
01:55:07,200 --> 01:55:11,280
फिर आप बोलना भाई आपके आचार्यों ने माना। अब आप नहीं मान

1594
01:55:11,280 --> 01:55:16,160
रहे तो मैं क्या करूं? बात किससे करूं? फिर मैं वो वाली बात हो जाएगी। ठीक है?

1595
01:55:16,160 --> 01:55:20,160
अब वो बात अलग है कि वो जो बच्चा जो प्रलय में जिसकी मृत्यु

1596
01:55:20,160 --> 01:55:24,880
हुई है प्रलय के कारण या और किसी के कारण। अच्छा

1597
01:55:24,880 --> 01:55:28,960
ये बताइए मैं इसको ऐसे पूछ लेता हूं

1598
01:55:28,960 --> 01:55:33,120
कि दंड जो होता है वो केवल यही है कि उसको

1599
01:55:33,120 --> 01:55:37,360
मृत्यु हो उसको चोट लगे या फिर धोखा प्राप्त करने की फीलिंग

1600
01:55:37,360 --> 01:55:41,440
भी दंड के रूप में दे सकता है ईश्वर दंड ऐसा भी हो सकता है

1601
01:55:41,440 --> 01:55:45,520
जिसमें किसी को धोखा मिलने का दुख हो ऐसा दंड मिल सकता

1602
01:55:45,520 --> 01:55:49,520
है नहीं धोखा नहीं मैंने मैंने ये कह रहा हूं किसी व्यक्ति

1603
01:55:49,520 --> 01:55:54,000
को किसी जीव ने कोई ऐसा क्या ऐसा कुछ कर्मों

1604
01:55:54,000 --> 01:55:58,480
कर्म है जिसके कारण उसको धोखा प्राप्त हो। दंड स्वरूप

1605
01:55:58,480 --> 01:56:02,080
दंड स्वरूप धोखा

1606
01:56:02,080 --> 01:56:06,080
इसमें एक टेक्निकिटी है ना दंड मतलब कि जैसे जैसे

1607
01:56:06,080 --> 01:56:10,080
मैं बता रहा हूं कई प्रकार के कष्ट हैं। ठीक है? मैं रोगी

1608
01:56:10,080 --> 01:56:14,240
हूं इस बात का कष्ट। ठीक? या मेरी

1609
01:56:14,240 --> 01:56:18,400
मृत्यु हो रही है। मेरे दर्द हो रहा है इस बात का कष्ट। या मैं फलानी चीजें प्राप्त

1610
01:56:18,400 --> 01:56:22,800
नहीं कर पा रहा हूं। आसक्तियां हैं। इस बात का कष्ट बहुत सी चीजें हैं।

1611
01:56:22,800 --> 01:56:27,440
ऐसे ही एक कष्ट होता है जब हमें कोई बेवकूफ बनाता है।

1612
01:56:27,440 --> 01:56:31,440
ठीक है? होता है ना कष्ट। जब हमें कोई झूठ बोल

1613
01:56:31,440 --> 01:56:35,840
देता है तो हमारी भावनाएं आहत होती है ना। जब हमें धोखा प्राप्त होता है।

1614
01:56:35,840 --> 01:56:40,080
तो एक प्रकार का कष्ट होता है हमें। तो क्या किसी

1615
01:56:40,080 --> 01:56:44,160
व्यक्ति के दंड में धोखा मिलना आ सकता है या नहीं आ सकता

1616
01:56:44,160 --> 01:56:48,400
है? उसका कारण यह हो सकता है कि उसने पहले बहुतों को कष्ट दिया हो।

1617
01:56:48,400 --> 01:56:50,720
यही वाला

1618
01:56:50,720 --> 01:56:53,760
यह बताइए।

1619
01:56:53,760 --> 01:56:57,920
फिर इसमें मैं एक प्रश्न इसमें क्लेरिफिकेशन के लिए पूछना पड़ेगा मुझे कि

1620
01:56:57,920 --> 01:57:02,000
क्या वो धोखा आप ईश्वर के द्वारा ईश्वर दे रहा है वो धोखा या मनुष्य दे रहा है वो धोखा ये

1621
01:57:02,000 --> 01:57:06,080
प्रश्न है। ये तो बाद की बात है मेरे भाई। मैं कह रहा हूं

1622
01:57:06,080 --> 01:57:10,080
ईश्वरीय व्यवस्था में अगर आप मैं ये बताइए

1623
01:57:10,080 --> 01:57:14,080
ईश्वरीय व्यवस्था में कर्म फल में कौन-कौन से दंड आते हैं? यह निश्चित कर

1624
01:57:14,080 --> 01:57:18,160
दीजिए। चलिए, यह भी दूध का दूध और पानी पानी हो जाए। आप कितना भी आप

1625
01:57:18,160 --> 01:57:22,240
आप खुद घुमा लीजिए। मैं चीज़ निकाल लूंगा आपसे।

1626
01:57:22,240 --> 01:57:26,320
नहीं नहीं मैं घुमा नहीं रहा हूं। देखिए इसमें इसमें ये घुमाना ही है भैया। आप आप

1627
01:57:26,320 --> 01:57:30,400
इस चीज से बच रहे हैं। धोखे का कष्ट उसको होगा कि नहीं? अब मैं

1628
01:57:30,400 --> 01:57:34,640
पूछ रहा हूं। ईश्वर को कौन-कौन से कष्ट दे सकता है कर्म फल सिद्धांत में?

1629
01:57:34,640 --> 01:57:38,640
यह बताइए। ये आप कर्मफल सिद्धांत पे आ रहे हैं। आप फिर

1630
01:57:38,640 --> 01:57:43,040
से उसी टॉपिक पे आ रहे हैं। अब अब सुन लीजिए। बात यह है कि यह पहली बात

1631
01:57:43,040 --> 01:57:47,040
आप यह बोल रहे हैं कि क्या ईश्वर धोखा दे सकता है या नहीं? मैं यह नहीं बोल

1632
01:57:47,040 --> 01:57:52,160
रहा हूं मेरे भाई। मेरा प्रश्न सुनिए। मेरा प्रश्न है।

1633
01:57:52,160 --> 01:57:56,400
मैंने क्या कहा? मैंने ये पूछा है आप वो कष्ट बता दीजिए। कौन-कौन से कष्ट

1634
01:57:56,400 --> 01:58:01,200
हैं जो कर्म फल के अनुसार मिलते हैं।

1635
01:58:01,200 --> 01:58:05,360
अरे फिर आप कर्म फल में जा रहे हैं। टॉपिक चेंज क्यों कर रहे हैं आप? अरे

1636
01:58:05,360 --> 01:58:09,200
भैया ये टॉपिक उपविषय है ना। वहीं से उत्पन्न हो रहा है ना।

1637
01:58:09,200 --> 01:58:13,600
आप मना कर रहे हो? नहीं आप आप आप कर्मफल का विषय शुरू कर रहे हैं। मैं ये

1638
01:58:13,600 --> 01:58:17,600
इसलिए शुरू सुनिए मैं बता रहा हूं। मैं रिलेट कर रहा हूं। मैं रिलेट कर रहा हूं। विषय क्यों शुरू कर

1639
01:58:17,600 --> 01:58:21,600
रहा हूं? मैं रिलेट कर रहा हूं। अच्छा इसलिए शुरू कर रहा हूं क्योंकि आपने एक बात कही

1640
01:58:21,600 --> 01:58:25,600
है। आपने एक बात कही है मुझसे कि भैया ईश्वर वो

1641
01:58:25,600 --> 01:58:29,920
सब कुछ कर सकता है। छल भी कर सकता है। तो आप तो ऐसे मानते हो तो फिर छल हो जाएगा। संशय बुद्धि।

1642
01:58:29,920 --> 01:58:34,320
संशय बुद्धि का निराकरण है हमारे पास। कोई व्यक्ति सकारात्मकता

1643
01:58:34,320 --> 01:58:38,320
सुनेगा। अकाट उत्तर उसमें भी देंगे। वो कोई दिक्कत नहीं है। मगर जहां

1644
01:58:38,320 --> 01:58:42,560
से बात शुरू हुई है तो उन बातों को एक एक चीज को खोलते चले ना तो

1645
01:58:42,560 --> 01:58:46,560
आपने जब छल की बात की आपत्ति जताई एक तरीके से कि आपकी व्यवस्था में छल

1646
01:58:46,560 --> 01:58:50,640
नहीं है तो इसलिए जो है आपके यहां पर तो जो है वो ईश्वर की वाणी

1647
01:58:50,640 --> 01:58:54,640
पर जो है विश्वास सिद्ध है। तो हमारे में तो छल है तो ईश्वर

1648
01:58:54,640 --> 01:58:58,720
की वाणी पर विश्वास कैसे हो? ये वाली बात आ जाएगी। यही सवाल

1649
01:58:58,720 --> 01:59:02,720
हां हां ठीक है। यही सवाल था। तो अब मैंने पहले तो मैं

1650
01:59:02,720 --> 01:59:07,760
ये बता रहा हूं कि भैया आपके यहां पे छल कैसे हो सकता है? अब छल होने में आपने

1651
01:59:07,760 --> 01:59:12,160
आपके आचार्य स्वीकार करते हैं कि प्रलय इत्यादि के विषय में

1652
01:59:12,160 --> 01:59:16,400
क्या कहते हैं? आपने मान लिया कि ये जो है कर्म फल नहीं है ईश्वर का। आप अलग

1653
01:59:16,400 --> 01:59:20,960
हट गए। प्रामाणिक आचार्यों से आप अलग हट गए। अगर मैं चाहूं

1654
01:59:20,960 --> 01:59:25,120
यहीं पर इस चर्चा को खत्म कर सकता हूं। यहीं पर

1655
01:59:25,120 --> 01:59:29,840
कि भैया पहले अपने आचार्यों से आप लेकर के आइए तब बात करेंगे।

1656
01:59:29,840 --> 01:59:32,800
ठीक है। फिर भी मैंने

1657
01:59:32,800 --> 01:59:36,880
हम [गला साफ़ करने की आवाज़] जब आप आर्य समाज के विरुद्ध जा रहे हैं। एक

1658
01:59:36,880 --> 01:59:40,960
मिनट जब आप आर्य समाज के विरुद्ध जा रहे हैं तो मैं किसके साथ टाइम वेस्ट कर रहा हूं ये तय

1659
01:59:40,960 --> 01:59:45,840
करना पड़ेगा ना? नहीं नहीं नहीं जा रहा हूं। विरुद्ध नहीं जा रहा। अब बात

1660
01:59:45,840 --> 01:59:49,840
ये आ रही है कि आप ये बोल रहे हैं कि वो आचार्य विरुद्ध नहीं जा रहे आप जा रहे

1661
01:59:49,840 --> 01:59:54,720
हैं या आप जा रहे हैं वो नहीं जा रहे इस पर बात आ रही है। ठीक है तो ठीक है तो ठीक है

1662
01:59:54,720 --> 01:59:59,520
इसका मेरे पास उत्तर है नहीं हां हां पूरा सुन

1663
01:59:59,520 --> 02:00:04,160
तो इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैं

1664
02:00:04,160 --> 02:00:08,320
बताऊंगा फर्क पड़ता है मैं बता मैं बता देता हूं इससे

1665
02:00:08,320 --> 02:00:12,320
इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आप अब इस पे आ गए कि आर्य समाज क्या मानता

1666
02:00:12,320 --> 02:00:16,480
है इस पे आ गए अरे भैया मैं आर्य समाज के साथ ही तो बैठा हूं मैं किसके साथ

1667
02:00:16,480 --> 02:00:20,800
टाइम वेस्ट कर रहा हूं कोई अगर सड़क पे चलता हुआ मुझसे कहेगा भैया शक्तिमान

1668
02:00:20,800 --> 02:00:24,800
है तो मैं उसको टाइम मैं मैं बता रहा हूं ना मैं बता रहा हूं आर्य समाज

1669
02:00:24,800 --> 02:00:28,800
क्या मानता है मैं बता रहा हूं ना आर्य समाज क्या मानता है मैं ही तो बता

1670
02:00:28,800 --> 02:00:32,960
रहा हूं तो मैं उस पे काउंटर कर रहा हूं ना आपको मैं मैं सिद्ध करूंगा कि आप आप प्रामाणिक

1671
02:00:32,960 --> 02:00:36,960
नहीं है आर्य समाज की ओर से वो प्रामाणिक है इसीलिए तो आर्य समाज की व्यवस्था खराब

1672
02:00:36,960 --> 02:00:41,360
है जो आज आप जैसे लोग आचार्यों को ठुकरा सकते हो

1673
02:00:41,360 --> 02:00:45,360
इसीलिए तो हम लोग कहते हैं ऐसे शब्द ऐसे शब्द ना बोलिए मैं

1674
02:00:45,360 --> 02:00:49,520
बता रहा हूं मैं बता रहा मैं बता रहा हूं मैं उसको रिलेट करते हुए बोल रहा हूं ऐसे शब्दों का प्रयोग

1675
02:00:49,520 --> 02:00:53,520
नहीं कर रहा हूं सुनिए तो आपके पास सत्यार्थ प्रकाश कहां से आई

1676
02:00:53,520 --> 02:00:57,600
यह बता दीजिए। आपके पास सत्यार्थ प्रकाश कहां से आई यह बता

1677
02:00:57,600 --> 02:01:01,600
दीजिए। उस [हंसी] आप उनको अप्रामाणिक कह रहे हैं

1678
02:01:01,600 --> 02:01:06,080
ना आप उनको अप्रामाणिक कह रहे हैं ना। आप आप अपना

1679
02:01:06,080 --> 02:01:10,080
पॉइंट तो बोलने दीजिए मुझे कंप्लीट तो कर लूं बात। भाई साहब आप कह रहे हैं वो प्रामाणिक

1680
02:01:10,080 --> 02:01:14,080
नहीं है। देखिए दो घंटे पहले ही हो चुके हैं।

1681
02:01:14,080 --> 02:01:18,160
ठीक है। मेरे पास बहुत सारे टॉपिक्स है। व्यर्थ की बातें अगर आप ये

1682
02:01:18,160 --> 02:01:22,240
कह रहे हैं मैं प्रामाणिक हूं वो प्रामाणिक नहीं है। आपने यह बात पे अटकी है ना? मैं

1683
02:01:22,240 --> 02:01:26,560
तो उसको लेट गो कर रहा था। मैं उसको लेट गो कर रहा था। आप

1684
02:01:26,560 --> 02:01:30,640
आप कई बार कंप्लीट कर चुके हैं। मैं तो उसको लेट गो कर रहा था।

1685
02:01:30,640 --> 02:01:34,640
आपने कहा नहीं नहीं नहीं। अब आप ये कह रहे हैं मैं प्रामाणिक तो फिर ये फैसला होगा

1686
02:01:34,640 --> 02:01:38,720
कैसे कि कौन प्रामाणिक है? आर्य समाज की ओर से पहली बात। दूसरी बात। मैं आपको

1687
02:01:38,720 --> 02:01:42,960
तो अप्रामाणिक अभी के अभी सिद्ध कर रहा हूं। आपने खुद कहा मैं आधिकारिक

1688
02:01:42,960 --> 02:01:47,840
तौर से कहीं से जुड़ा नहीं हूं। ये एक आधिकारिक किताब है।

1689
02:01:47,840 --> 02:01:51,840
कहां से आई आपके पास? हां मैं बोल लूं। बताइए।

1690
02:01:51,840 --> 02:01:55,840
हां। अब इसमें इसमें ये बात आ रही है कि आप ये बोलना चाह रहे हो

1691
02:01:55,840 --> 02:01:56,480
कि जो दोष

1692
02:01:56,480 --> 02:02:00,560
मैं आपके यहां दिखाना चाह रहा हूं। आपके यहां जो दोष मैं दिखाना चाह रहा हूं। वो बोल रहे है कि आपके यहां भी

1693
02:02:00,560 --> 02:02:04,880
दोष है। यही है ना आपका मेन पॉइंट। नहीं नहीं ना मैं

1694
02:02:04,880 --> 02:02:09,040
आपके एक-एक शब्द का उत्तर दे रहा हूं। भाई साहब आपके एक एक

1695
02:02:09,040 --> 02:02:13,040
शब्द का उत्तर देता चल रहा हूं। आप मेरी बात सुनिए। अब मुझे

1696
02:02:13,040 --> 02:02:17,520
प्लीज आपको म्यूट करना पड़ेगा। मेरा टाइम आप वेस्ट करा रहे हैं।

1697
02:02:17,520 --> 02:02:21,520
अब आप वो वो मयंक जैसवाल अब नहीं रह गए जिससे मैं

1698
02:02:21,520 --> 02:02:25,680
कट टू कट बात कर रहा था वो केवल उतनी ही देर कट टू कट रहता है जब वो वाली

1699
02:02:25,680 --> 02:02:29,920
बात चल रही होती है जब वो जिसके लिए वो प्रिपेयर हो के आया था वो सर वो क्या

1700
02:02:29,920 --> 02:02:34,320
ईश्वर ईश्वर पत्थर वाली बात ठीक है अभी मयंक जैसवाल

1701
02:02:34,320 --> 02:02:40,000
बदल रहा है अब सुनिए क्या है बात

1702
02:02:40,000 --> 02:02:44,160
आपने होता क्या है जैसे आपने कहा छल कर सकता

1703
02:02:44,160 --> 02:02:48,240
है ठीक है बुराई हो सकती है होता क्या है कि जैसे मैंने आपको

1704
02:02:48,240 --> 02:02:52,480
डायरेक्ट मेन जो आपका मूल सवाल है उसका आंसर दे दिया छल

1705
02:02:52,480 --> 02:02:56,480
वाली बातों का नहीं दिया और मेरे भी दिमाग से उतर गया क्योंकि मैंने उत्तर दे दिया बाद

1706
02:02:56,480 --> 02:03:00,560
में तो होता क्या है फिर मैं भूल जाऊंगा और आपके द्वारा ये

1707
02:03:00,560 --> 02:03:04,560
लगाया गया जो ये जो बात आपत्ति प्रकट की गई है रह जाएगी और मुझे

1708
02:03:04,560 --> 02:03:08,720
लगता है कि यदि ऑन लाइव में ये आपत्ति जताई गई तो मुझे इसका निराकरण

1709
02:03:08,720 --> 02:03:13,360
प्रस्तुत करना है। बिल्कुल। ठीक है। जैसे

1710
02:03:13,360 --> 02:03:17,600
आपने जब मैंने पूछा था कि जीव चाकू

1711
02:03:17,600 --> 02:03:21,680
मार रहा है तो जीव तो केवल चेष्टा करता है। चाकू ईश्वर

1712
02:03:21,680 --> 02:03:24,720
ही मारता है।

1713
02:03:24,720 --> 02:03:28,720
सारे कार्य ईश्वर ही करता है। आपने माना आपने माना ना? सारे

1714
02:03:28,720 --> 02:03:33,120
कार्य ईश्वर करता है। केवल जीव चेष्टा करता है। चेष्टा

1715
02:03:33,120 --> 02:03:37,120
सारे कार्य ईश्वर करता है। ठीक? इसका अर्थ क्या

1716
02:03:37,120 --> 02:03:41,760
है? जितना भी पाप पाप से पाप है उस सब में

1717
02:03:41,760 --> 02:03:46,080
जीव की चेष्टा है और ईश्वर का मुझे इससे आपत्ति नहीं है। मगर

1718
02:03:46,080 --> 02:03:50,080
क्या होता है जब यही सत्य नग्न सत्य हम बताते हैं तो क्या होता है

1719
02:03:50,080 --> 02:03:54,080
कुछ लोग क्लिप निकालते हैं क्लिप निकाल के बताते हैं

1720
02:03:54,080 --> 02:03:55,280
देखिए देखो इसका ईश्वर

1721
02:03:55,280 --> 02:03:59,680
ये है समझ रहे हैं तो ऐसी क्लिप्स ना निकले इसलिए

1722
02:03:59,680 --> 02:04:03,920
मैं आपकी एक एक बात एक एक शब्द जो आपने आपत्तिजनक बोला है उसका

1723
02:04:03,920 --> 02:04:08,000
आंसर दे रहा हूं और ऐसा नहीं है कि आपका जो मूल प्रश्न

1724
02:04:08,000 --> 02:04:12,000
है उसका आंसर नहीं मिलेगा मगर थोड़ा धैर्य रखिए जब आपने प्रश्न

1725
02:04:12,000 --> 02:04:16,000
किया है तो ये क्यों मैंने बोलना शुरू किया नहीं मतलब मतलब

1726
02:04:16,000 --> 02:04:20,000
आप जो है ऐसा कर रहे हैं बस खत्म। अरे अब दूसरी बात जब मैंने आपके

1727
02:04:20,000 --> 02:04:24,320
छल और धोखे वाली बात पर विवेचना करना शुरू किया क्योंकि ये आध्यात्मिक

1728
02:04:24,320 --> 02:04:28,640
विषय होते हैं। एक-एक शब्द पे ही घंटों लग सकते हैं और मुझे लगता है कि आप प्रिपेयर

1729
02:04:28,640 --> 02:04:32,720
होके चला करें। मैं चाहूंगा कि चला करें। जब आप बोल

1730
02:04:32,720 --> 02:04:36,800
रहे हैं तो बोल रहे हैं। ठीक है। फिर जब मैं उसको खोल रहा हूं तो मुझे खोलने दीजिए।

1731
02:04:36,800 --> 02:04:41,440
और असल में क्या है कि यह जो बात है छल करने की या मिथ्या

1732
02:04:41,440 --> 02:04:45,520
यह आर्य समाज जब से अस्तित्व में आया है तब से लेकर

1733
02:04:45,520 --> 02:04:49,600
अब तक ये उन समस्याओं में से एक समस्या आर्य समाज के द्वारा उठाई

1734
02:04:49,600 --> 02:04:54,320
गई है। इसलिए मैं उसको पकड़ करके और उत्तर दे रहा हूं।

1735
02:04:54,320 --> 02:04:58,640
ठीक है? अब मैंने इस बीच एक बात कही कि भाई आप जो है ये वाले जो कार्य

1736
02:04:58,640 --> 02:05:02,640
हैं ये ईश्वर के मान ही नहीं रहे हैं। आपने कहा नहीं मान रहा हूं ये

1737
02:05:02,640 --> 02:05:06,720
नहीं है उसके कार्य। ठीक है। मैंने कहा कि आपके यहां के

1738
02:05:06,720 --> 02:05:10,400
जो प्रामाणिक आर्य समाजी हैं, प्रामाणिक रूप से जो संस्थागत हैं, संस्थाओं

1739
02:05:10,400 --> 02:05:14,640
से जुड़े हुए हैं, जहां से किताबें छप रही हैं, वहां पर जिनका

1740
02:05:14,640 --> 02:05:18,640
अधिकार है, आप उनके विरुद्ध जा रहे हैं। आपने यहां पर आपत्ति जता दी, मैं

1741
02:05:18,640 --> 02:05:22,800
विरुद्ध नहीं जा रहा हूं, वो लोग विरुद्ध जा रहे हैं। ठीक है? तो, इसका मतलब फिर

1742
02:05:22,800 --> 02:05:26,880
वही बात आ जाती है। मैं कई बार ये वाली बात आर्य समाज से कह

1743
02:05:26,880 --> 02:05:30,880
चुका हूं कि आपके यहां की व्यवस्था देखिए। कल को कोई खड़ा होकर के आपकी बातों को भी चैलेंज

1744
02:05:30,880 --> 02:05:35,040
कर देगा और वो हो रहा है। आसानी से चैलेंज हो रहा है। कोई

1745
02:05:35,040 --> 02:05:39,200
भी एक दूसरे की बात को कर सकता है। कोई व्यवस्था है ही नहीं। आर्य समाज को मानो मगर किसको

1746
02:05:39,200 --> 02:05:43,360
मानो यह पता ही नहीं है। सबके सिद्धांत अलग है। एक मिनट मुझे पूरा करने दीजिए। अब मुझे

1747
02:05:43,360 --> 02:05:47,600
आप ये बता दीजिए ये सत्यार्थ प्रकाश आपके पास आई कहां से?

1748
02:05:47,600 --> 02:05:51,920
बताइए। आप आप जो है आर्य समाज की प्रमाणिकता

1749
02:05:51,920 --> 02:05:57,200
पे आ रहे हैं। मैं बोल रहा हूं आप पहले संशय का निवारण तो कर दीजिए। उस पे भी आ जाएंगे हम।

1750
02:05:57,200 --> 02:06:01,280
आपने कहा कि आर्य समाज की ओर से मैं प्रामाणिक बात

1751
02:06:01,280 --> 02:06:05,440
बोल रहा हूं। वो जो बोल रहे हैं गलत बोल रहे हैं। तो आपको प्रमाणिक

1752
02:06:05,440 --> 02:06:09,440
आपने खुद बोला आप मैं बता देता हूं। आपने खुद बोला कि आर्य

1753
02:06:09,440 --> 02:06:13,920
समाज की ऊपर तरफ से कोई व्यक्ति स्पेसिफिक नियुक्त नहीं है।

1754
02:06:13,920 --> 02:06:18,160
आपने ये बात बोली क्योंकि आप बोलते ही हो अक्सर। ठीक है। स्पेसिफिक व्यक्ति नियुक्त

1755
02:06:18,160 --> 02:06:22,320
नहीं है। हां। अब बात ये आ जाती है कि अगर

1756
02:06:22,320 --> 02:06:25,440
मेरे सिद्धांत का आलंबन लेकर के खुद की पुष्टि करेंगे।

1757
02:06:25,440 --> 02:06:29,600
अरे भैया मैं तो यह ब्लेम कर ही रहा हूं। मगर फिर भी जब मैं किसी

1758
02:06:29,600 --> 02:06:33,600
फिर भी जब मैं किसी आर्य समाजी को आर्य समाजी मान करके बैठूंगा तो

1759
02:06:33,600 --> 02:06:37,680
उसको किसी ना किसी तरीके से तो प्रमाणिक रूप से मानूंगा ही ना यहां पर वो तो मेरा क्लेम है

1760
02:06:37,680 --> 02:06:42,960
उनके ऊपर आरोप है। आपत्ति है उनकी व्यवस्थाओं को लेकर के।

1761
02:06:42,960 --> 02:06:47,040
हां, ठीक है। तो आप उसे ये दर्शाना चाह रहे हैं कि मैं गलत अर्थ ले रहा हूं। अल्टीमेटली

1762
02:06:47,040 --> 02:06:51,200
पॉइंट यही है ना आपका? मैं आपसे सीधे-सीधे एक प्रश्न कर रहा हूं

1763
02:06:51,200 --> 02:06:55,200
कि जहां से छापी जा रही है उन लोगों की व्याख्या आप नहीं

1764
02:06:55,200 --> 02:06:59,440
मान रहे हैं। आप कह रहे हैं भाई मैं इसकी अपनी व्याख्या दूंगा। तो यह किताब आपके

1765
02:06:59,440 --> 02:07:03,840
पास आई कहां से है? बस अब ये बताइए उन लोगों की व्याख्या

1766
02:07:03,840 --> 02:07:08,080
उन लोगों की व्याख्या मान के ही मैं ये बात बोल रहा हूं। तो

1767
02:07:08,080 --> 02:07:12,080
अग्निव्रत जी ने और कई आचार्यों ने यह बात स्पष्ट रूप से मानी

1768
02:07:12,080 --> 02:07:16,240
है कि ये जो प्रलय इत्यादि वाला उल्का पिंड गिर जाना यह सब कार्य

1769
02:07:16,240 --> 02:07:19,360
ईश्वर के होते हैं।

1770
02:07:19,360 --> 02:07:23,440
कार्य ईश्वर के होते हैं लेकिन कर्मों का फल नहीं होता। मैं स्पेसिफाई कर रहा हूं ना यहां पर कर्मों

1771
02:07:23,440 --> 02:07:27,600
का फल नहीं है। कार्य है कार्य

1772
02:07:27,600 --> 02:07:31,840
है। कार्य है बिल्कुल है। बिल्कुल है [हंसी]

1773
02:07:31,840 --> 02:07:36,000
भाई। भाई मतलब करने में कार्य मतलब एक एक मिनट

1774
02:07:36,000 --> 02:07:41,680
एक मिनट एक मिनट। मतलब कि हम् अह

1775
02:07:41,680 --> 02:07:45,840
मतलब कि कोई बच्चा जन्म लिया है और ईश्वर ने वहां पर उसको

1776
02:07:45,840 --> 02:07:50,320
प्रलय से वो मर गया तो वो जो है

1777
02:07:50,320 --> 02:07:54,320
कार्य था ईश्वर का मगर उसके पीछे मोटिव ये नहीं था कि मुझे इसको इसके कर्मों का फल

1778
02:07:54,320 --> 02:07:58,880
देना है मोटिव नहीं था यूं ही मार दिया यूं ही मार दिया बिल्कुल

1779
02:07:58,880 --> 02:08:03,120
यूं ही मार दिया मार दिया मैं बता देता हूं इसका इसका आंसर दे देता हूं मैं

1780
02:08:03,120 --> 02:08:07,200
ईश्वर ने जो सृष्टि रचना कर रखी है और जो नियम बना रखे हैं विज्ञान उदाहरण

1781
02:08:07,200 --> 02:08:11,280
के लिए कोई सुनामी उठी सुनामी कैसे उठेगी पीछे से लहर चल पड़ी बड़ी लहर चल पड़ी

1782
02:08:11,280 --> 02:08:15,360
तो सुनामी आएगी आगे अब सुनामी वहां से चल पड़ी अब यहां पे इंसान खड़े

1783
02:08:15,360 --> 02:08:19,600
हैं बच्चे हैं जो भी आपने बताया उदाहरण के लिए वो खड़े हैं अब ईश्वर जो है अब सुनामी

1784
02:08:19,600 --> 02:08:23,600
तो चल पड़ी है अब ईश्वर जो है उन बच्चों को बचाने के लिए सुनामी रोक दे ऐसा

1785
02:08:23,600 --> 02:08:27,600
तो हो नहीं सकता यानी वो एक्सीडेंटल रूप में मरेंगे ही मरेंगे

1786
02:08:27,600 --> 02:08:31,600
लेकिन वो कर्मों का फल नहीं है मैं ये बोलना चाह रहा हूं तो मतलब

1787
02:08:31,600 --> 02:08:35,680
यूं ही मर गए ना वो यूं ही मर गए हां एक्सीडेंट एक्सीडेंट यू मर गए हां

1788
02:08:35,680 --> 02:08:38,880
हां बिल्कुल

1789
02:08:38,880 --> 02:08:42,960
तो ये शुरू में बोल देना था भाई यूं ही मर जाते हैं। मतलब आपके ईश्वर का वहां पर

1790
02:08:42,960 --> 02:08:47,200
भी कोई हस्तक्षेप नहीं है। यूं ही भी मरते हैं संसार में लोग।

1791
02:08:47,200 --> 02:08:52,080
यूं ही भी मरते हैं संसार में लोग। एक्सीडेंट एक्सीडेंट में मरते हैं यूं ही। हां

1792
02:08:52,080 --> 02:08:56,080
यूं ही मरते हैं। तो आपके जो आचार्य गण है वो नहीं मान रहे कि

1793
02:08:56,080 --> 02:08:59,360
यूं ही मरते हैं लोग।

1794
02:08:59,360 --> 02:09:03,360
आपके योगेश भारद्वाज जी हैं। योगेश भारद्वाज जी हैं। एक

1795
02:09:03,360 --> 02:09:07,840
मिनट एक मिनट एक मिनट। योगेश भारद्वाज जी हैं। योगेश

1796
02:09:07,840 --> 02:09:12,160
भारद्वाज जी क्यों नहीं आना चाह रहे आप? भाई भाई आप इस

1797
02:09:12,160 --> 02:09:16,160
आप अगर इसको पकड़ोगे कि मैं जो है प्रमाणिक हूं वह प्रमाणिक नहीं है या

1798
02:09:16,160 --> 02:09:20,320
फिर मैं कह रहा हूं कर्मों का फल नहीं है। योगेश भारद्वाज जी

1799
02:09:20,320 --> 02:09:24,800
योगेश भारद्वाज जी ऐसी चर्चा से जुड़े हुए हैं।

1800
02:09:24,800 --> 02:09:28,880
स्वयं वहां पर इनवॉल्व है जो यह वक्तव्य निर्गत हो

1801
02:09:28,880 --> 02:09:32,880
रहा है वहां पर कि भैया अगर ऐसा है तो उसके पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण

1802
02:09:32,880 --> 02:09:36,960
हमें मानना पड़ेगा कि उसके साथ ऐसा हुआ। आप कह रहे हो नहीं पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण

1803
02:09:36,960 --> 02:09:41,040
नहीं हुआ। इसका मतलब वो जो सुनामी आई एक तो अपने आप आई

1804
02:09:41,040 --> 02:09:45,120
और दूसरी बात यह है कि ईश्वर का कार्य कैसे हो गया फिर ये फिर तो

1805
02:09:45,120 --> 02:09:49,120
दुनिया के समस्त कार्य जितने भी हो रहे हैं वो विज्ञान जनित हो जाएंगे

1806
02:09:49,120 --> 02:09:53,360
उसमें फिर कण फल व्यवस्था ईश्वर की रही नहीं जाएगी कहां पर लागू हो रही है बता दो

1807
02:09:53,360 --> 02:09:53,920
कनफल

1808
02:09:53,920 --> 02:09:57,920
व्यवस्था ला दो कहां पर हो रही है लागू आप नए-नए विषय

1809
02:09:57,920 --> 02:10:01,920
खोल रहे हैं आप मुझे रुकिए आप जो मूल सवाल है उसका

1810
02:10:01,920 --> 02:10:05,920
आप जलेबी बना रहे हैं आप जलेबी बना रहे हैं नहीं बना रहा हूं लेकिन मैं

1811
02:10:05,920 --> 02:10:09,920
मैं एक्सप्लेन करता हूं थोड़ा आप मुझे इंटरप्ट इंटरप्ट मत करिएगा। हो क्या रहा है? यहां पर हो क्या रहा

1812
02:10:09,920 --> 02:10:14,000
है? मैं थोड़ा अपने हिसाब से एक्सप्लेन दे देता हूं। मैंने एक संशय वाला प्रश्न

1813
02:10:14,000 --> 02:10:18,000
उठाया कि ईश्वर छल कर सकता है तो ईश्वर पे सं अरे भैया मैं समझ गया हूं। इतना लंबा

1814
02:10:18,000 --> 02:10:22,320
क्यों पीछे जा रहे हो? अरे मैं नहीं कर रहा हूं। सुन तो लो यार थोड़ा सा प्लीज।

1815
02:10:22,320 --> 02:10:26,320
मैं थोड़ा एक्सप्लेन कर रहा हूं। रिलेट कर रहा हूं। तो आप क्या कर रहे हैं कि देखिए

1816
02:10:26,320 --> 02:10:30,480
आपके यहां भी ये है। आपके यहां भी ये दोष है। मान लेते हैं। मान लेते हैं। अब सिद्धांत

1817
02:10:30,480 --> 02:10:34,640
से अगर अरे मेरे भाई मैं आपको

1818
02:10:34,640 --> 02:10:38,640
मैं दोष नहीं बता रहा हूं। मैं आपको बनवा रहा हूं कि आप जो आपत्ति जता रहे हो

1819
02:10:38,640 --> 02:10:42,720
ना छल की वो आपके यहां भी है तो आप उसको छोड़

1820
02:10:42,720 --> 02:10:46,800
के अपना कोई अस्तित्व स्थापित नहीं कर पाओगे। फिर मैं फिर मैं

1821
02:10:46,800 --> 02:10:51,120
आपकी समस्या का निराकरण भी दूंगा मगर मुझे इसका आंसर

1822
02:10:51,120 --> 02:10:55,920
देने दीजिए कि आर्य समाज में भी ईश्वर कर रहा है

1823
02:10:55,920 --> 02:11:00,000
और उसमें भी एक 15 सेकंड में कर दूंगा। उसमें भी

1824
02:11:00,000 --> 02:11:04,080
एक उपविषय निकल आया कि आप यह ताल ठोकने लगे कि आप जो है वह

1825
02:11:04,080 --> 02:11:08,080
हैं आप जो बता रहे हैं सही बता रहे वो लोग सही नहीं बता रहे। फिर जब

1826
02:11:08,080 --> 02:11:08,960
मैंने इसको पकड़ा

1827
02:11:08,960 --> 02:11:13,760
तो इसने कहा नहीं नहीं वो कर्म फल जो है वो नहीं देता है मगर वो जो है

1828
02:11:13,760 --> 02:11:17,840
कार्य करता है ईश्वर का कार्य है। तो ईश्वर का कार्य अगर

1829
02:11:17,840 --> 02:11:21,840
फिर अच्छा एक मिनट एक मिनट अब ये आपने कहा विज्ञान के कारण हो

1830
02:11:21,840 --> 02:11:25,840
रहा है। ठीक है तो इसमें ईश्वर का कार्य कहां से हो गया? अब

1831
02:11:25,840 --> 02:11:30,880
मैंने जब उस प्रश्न किया तो आप कह रहे आप कैसे बदल रहे हैं?

1832
02:11:30,880 --> 02:11:34,960
हां मैं बता देता हूं। विज्ञान इसका सवाल का जवाब देता हूं। विज्ञान भी विज्ञान

1833
02:11:34,960 --> 02:11:39,120
के नियम ही ईश्वर धारण किए हुआ है। ठीक है? तो ईश्वर कार्य से अब बात मुख्य विषय

1834
02:11:39,120 --> 02:11:43,200
जो चल रहा है उसमें मुझे आप ये बता दो कहां पर ईश्वर कर्मों का फल देता

1835
02:11:43,200 --> 02:11:48,880
है। मैं ये पूछूंगा मुझे पूछने दो। ईश्वर

1836
02:11:48,880 --> 02:11:52,880
ईश्वर मैं पूछ रहा हूं। ईश्वर कर्मों का फल देता है तो कैसे देता है? एक उदाहरण

1837
02:11:52,880 --> 02:11:57,120
दे दो। ऐसे देता है उदाहरण दोति आयुति

1838
02:11:57,120 --> 02:12:01,520
आयु भोग के रूप में देता है। किस में

1839
02:12:01,520 --> 02:12:04,960
जाति आयु भोग

1840
02:12:04,960 --> 02:12:10,960
जाति आयु भोग थोड़ा प्रैक्टिकली इसको एक्सप्लेन कर दीजिए।

1841
02:12:11,280 --> 02:12:15,280
आपने कर्म किए इस जन्म में उसके हिसाब से आपके संस्कार बन गए। अब

1842
02:12:15,280 --> 02:12:19,600
उस संस्कारों के हिसाब से आपका अगला जन्म किस गर्भ में होगा? मनुष्य

1843
02:12:19,600 --> 02:12:23,600
का भी हो सकता है या किसी अन्य जीव का भी हो सकता है। वह सारे गर्भ ऑप्शन अवेलेबल

1844
02:12:23,600 --> 02:12:28,240
है। आपने जो कर्म किया उस हिसाब से आप जाति यानी

1845
02:12:28,240 --> 02:12:32,240
मनुष्य या जानवर या जो भी है जाति है ना आयु यानी

1846
02:12:32,240 --> 02:12:36,240
अपना ये क्या बोलते हैं शारीरिक मतलब आपका शरीर कितना अच्छा

1847
02:12:36,240 --> 02:12:40,320
होगा या नहीं होगा ये चीजें है ना और भोग यानी कितना अच्छा ये पूछने

1848
02:12:40,320 --> 02:12:44,240
में दिक्कत हो रही है कि वो कितना जिएगा

1849
02:12:44,240 --> 02:12:49,760
नहीं नहीं कितना नहीं ये नहीं आएगी बात ये नहीं आएगी इसमें आयु आयु में ये नहीं आएगा

1850
02:12:49,760 --> 02:12:53,840
आयु में आएगा कि आप कितनी आयु जी सकते हैं कितना जिएगा दोनों

1851
02:12:53,840 --> 02:12:58,800
अलग-अलग स्टेटमेंट है। कितनी जी सकते हैं और कितना जिएगा दोनों अलग-अलग बातें हैं।

1852
02:12:58,800 --> 02:13:03,040
यानी कि उदाहरण के लिए उदाहरण के लिए उदाहरण अगर आप

1853
02:13:03,040 --> 02:13:07,200
मान लीजिए एक समझ गया आप अगर देता हूं

1854
02:13:07,200 --> 02:13:11,600
आप हर बार काट रहे हो ये गलत बात है। बोलिए बोलिए

1855
02:13:11,600 --> 02:13:15,760
बोलिए बोलिए उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति है

1856
02:13:15,760 --> 02:13:19,840
जो स्वस्थ पैदा हुआ है तो सामान्य तौर पर वो 80 100

1857
02:13:19,840 --> 02:13:20,340
80

1858
02:13:20,240 --> 02:13:24,640
90 100 तक जिएगा अब इसमें 80 90 100 तक जिएगा इतनी ये आयु

1859
02:13:24,640 --> 02:13:28,720
लेकिन बीच में भी मर सकता है ये दोनों बातें आई। ठीक है? अब ये हो गया आयु। अब

1860
02:13:28,720 --> 02:13:32,720
भोग का मैंने बता दिया कि भोग में जो है अपना ये चीजें आ जाएंगी। क्या-क्या व्यवस्था

1861
02:13:32,720 --> 02:13:36,880
अवेलेबल है वो सारी भोग में आएगी। ठीक है? अभी जाती भोग में एक्सप्लेन कर दिया। अब

1862
02:13:36,880 --> 02:13:41,040
ये पॉइंट कंप्लीट हो चुका है। अब आप मुझे अब हो क्या रहा है कि आप

1863
02:13:41,040 --> 02:13:45,040
जो है जो आक्षेप लगाया है उसका उत्तर आप ऐसे दे रहे हैं कि आर्य समाज में भी ये दोष

1864
02:13:45,040 --> 02:13:49,200
है। आपने खुद बोला अभी अभी इंटरप्ट मत करिएगा। मुझे बोलने दीजिए कि आर्य समाज में भी ये दोष

1865
02:13:49,200 --> 02:13:53,360
है। यानी आप ये बोलना चाह रहे हो कि देखो आर्य समाज में भी दोष मैंने आपको

1866
02:13:53,360 --> 02:13:58,080
इस बात का उत्तर दे दिया। आप रिपीटेटिव मत करिए। मुझे भी रिपीट करना पड़ेगा।

1867
02:13:58,080 --> 02:14:02,560
आपके दुर्जन तोष न्याय वाले सवाल का मैंने उत्तर दे दिया है।

1868
02:14:02,560 --> 02:14:06,880
आप रिपीट करेंगे। मुझे भी रिपीट करना पड़ेगा। मैं इतना मैंने घी नहीं पिया। मैं बार-बार रिपीट

1869
02:14:06,880 --> 02:14:11,040
करूं। नहीं आपने उत्तर नहीं दिया। आपने बोला आपने आपने

1870
02:14:11,040 --> 02:14:15,200
आपने उत्तर नहीं दिया। उत्तर दिया है। आपने नहीं दिया। आप जो

1871
02:14:15,200 --> 02:14:19,360
ये दुर्जनोष न्याय वाली बात कह रहे हैं। इस दुर्जनोष न्याय वाली

1872
02:14:19,360 --> 02:14:23,200
बात का उत्तर दिया है मैंने। समझिए।

1873
02:14:23,200 --> 02:14:27,280
ये जो दुर्जनोष वाला आप आक्षेप उठा रहे हैं ना। मैंने इसका

1874
02:14:27,280 --> 02:14:32,160
उत्तर दिया है कि मैं क्यों दे रहा हूं एक एक बात का।

1875
02:14:32,160 --> 02:14:35,680
मेरे पास उस बात का भी निराकरण है। पर मैं इस बात को छोड़ना

1876
02:14:35,680 --> 02:14:39,680
नहीं चाहता हूं कि आपने छल होने की वो जताई है। ऐसा

1877
02:14:39,680 --> 02:14:43,840
नहीं है कि इससे स्वतंत्र हो के आपसे स्वतंत्र हो के मेरे पास उस समस्या

1878
02:14:43,840 --> 02:14:48,000
का निराकरण नहीं है। मगर आपको तब तक सुनना पड़ेगा और आप अगर बीच

1879
02:14:48,000 --> 02:14:52,720
में किसी किसी जगह पर मुझे काटोगे तो उन बातों को भी लेकर चलना पड़ेगा।

1880
02:14:52,720 --> 02:14:56,720
ये बात है। खत्म नहीं हुई ये बात। तो आप निराकरण दीजिए

1881
02:14:56,720 --> 02:15:00,800
ना। इसका मतलब कुल मिलाकर के ये है। इसका मतलब कुल

1882
02:15:00,800 --> 02:15:06,080
मिलाकर के ये है कि ईश्वर

1883
02:15:06,080 --> 02:15:10,480
जो कर्मों का फल देता है आर्य समाज के अनुसार वो केवल जन्मांतर

1884
02:15:10,480 --> 02:15:14,720
में देता है। दैट्स इट। जब जीव को दोबारा जन्म देगा तो उसमें

1885
02:15:14,720 --> 02:15:19,440
उसको पिछले कर्मों के अनुसार वो मिल जाएगा।

1886
02:15:19,440 --> 02:15:25,360
है ना? ठीक है। ठीक है। हां। अच्छा।

1887
02:15:25,360 --> 02:15:30,080
बाकी और कहीं पर किसी प्रकार का कष्ट होना इत्यादि होना भांतिभांति

1888
02:15:30,080 --> 02:15:34,720
प्रकार के कष्ट होना इन सब में ईश्वर का वो नहीं है।

1889
02:15:34,720 --> 02:15:38,720
ईश्वर काफेंस नहीं है इन सब में नहीं है। नहीं

1890
02:15:38,720 --> 02:15:42,720
है तो उसने जब

1891
02:15:42,720 --> 02:15:48,720
मतलब ये सब ईश्वर के कार्य नहीं है।

1892
02:15:49,600 --> 02:15:53,600
क्योंकि आपने एक स्टेटमेंट दिया है ना कि ये ईश्वर के कार्य हैं। ईश्वर

1893
02:15:53,600 --> 02:15:58,160
का कार्य तो सृष्टि स्थिति वो है प्रलय

1894
02:15:58,160 --> 02:16:02,160
ठीक है तो उसमें ऑब्जेक्टिवली स्थिति में आता है प्रलय इत्यादि

1895
02:16:02,160 --> 02:16:06,400
ये सुनामी इत्यादि ये स्थिति में आएगा क्योंकि

1896
02:16:06,400 --> 02:16:11,200
समार तो है नहीं ये हां मैंने इसका जवाब दे दिया आपको

1897
02:16:11,200 --> 02:16:16,160
जस्ट पहले जवाब दिया ये किस में आएगा ये स्थिति में आएगा

1898
02:16:16,160 --> 02:16:20,640
ये आएगा यहां तो यानी कि

1899
02:16:20,640 --> 02:16:24,720
हां ये स्थिति में आता आता है कि ईश्वर जो है

1900
02:16:24,720 --> 02:16:28,800
ईश्वर ने वैज्ञानिक नियम बनाए हैं। फिर प्रकृति अपने आप चल रही है। वहां पर ईश्वर

1901
02:16:28,800 --> 02:16:33,200
का कोई वो कार्य नहीं है। तो यानी जो फोर्स इत्यादि वहां पर है

1902
02:16:33,200 --> 02:16:37,200
जो फोर्स इत्यादि है वो वहां पर

1903
02:16:37,200 --> 02:16:42,000
ईश्वर नहीं कर रहा है। प्रकृति स्वयं से कर रही है।

1904
02:16:42,000 --> 02:16:46,320
ये कब बोला मैंने? मैंने स्टेटमेंट ये दिया है

1905
02:16:46,320 --> 02:16:51,280
कि विज्ञान के नियमों को ईश्वर ने धारण कर रखा है। मैंने यह बोला एक्सैक्ट।

1906
02:16:51,280 --> 02:16:55,360
ठीक है। हां तो कहने का अर्थ यह है विज्ञान के

1907
02:16:55,360 --> 02:16:59,440
नियमों के रूप में उस बच्चे को मारने वाला ईश्वर ही है। पर वहां पर

1908
02:16:59,440 --> 02:17:03,520
वह जो है विज्ञान के नियमों के अनुसार व्यवहार कर

1909
02:17:03,520 --> 02:17:07,840
रहा है। यानी जड़ जड़ प्रकृति कैसे व्यवहार करती है।

1910
02:17:07,840 --> 02:17:11,840
उसके अनुसार कर रहा है। वहां पर उसका कोई वो नहीं है। विज्ञान के अनुसार

1911
02:17:11,840 --> 02:17:16,000
जड़ हां बिल्कुल जड़ प्रकृति को विज्ञान के अनुसार व्यवहार करवा रहा है। उसमें ईश्वर

1912
02:17:16,000 --> 02:17:20,480
का मोटिव नहीं है कि उनको सबको मार डालू। कोई मोटिव नहीं है। वो एक्सीडेंटल मौत है।

1913
02:17:20,480 --> 02:17:25,360
हां। तो एक तो यह आ गया कि ईश्वर भांतिभांति के जो है वह जो

1914
02:17:25,360 --> 02:17:30,000
नहीं कराता है। अलग-अलग प्रकार के कष्ट नहीं कि तूने एक तूने

1915
02:17:30,000 --> 02:17:35,680
इसके साथ चोरी की थी ना तेरे घर में भी चोरी होना है। ऐसा कुछ नहीं है वहां।

1916
02:17:35,680 --> 02:17:38,160
है ना?

1917
02:17:38,160 --> 02:17:42,480
बहुत बढ़िया। ये सब आप लोग देख रहे हैं ना? ठीक है। अच्छा

1918
02:17:42,480 --> 02:17:47,280
अब इसमें एक बात आती है कि जब प्रलय होगी

1919
02:17:47,280 --> 02:17:51,360
सृष्टि में प्रलय होगी जब उस समय कुछ लोग जीवित

1920
02:17:51,360 --> 02:17:57,360
होंगे समार होगा जब समार

1921
02:17:57,920 --> 02:18:01,920
आप इस विषय को एक्सटेंड कर रहे हैं पर जो मूल विषय उससे आप आगे आ चुके हो सर जवाब नहीं

1922
02:18:01,920 --> 02:18:06,080
दिया आपने अभी तक आप देखिए आप अगर बार अबकी बार आपने

1923
02:18:06,080 --> 02:18:12,080
यह बात कही ना कि आपने जवाब नहीं दिया मूल विषय का तो मुझे आपको हटाना पड़ेगा

1924
02:18:12,160 --> 02:18:16,560
अगर आपने कोई टॉपिक पे मुझे काउंटर किया अगर आपने कोई टॉपिक पे मुझे काउंटर

1925
02:18:16,560 --> 02:18:20,880
किया तो मैं उसकी बाल की खाल निकालूंगा ना तो

1926
02:18:20,880 --> 02:18:26,560
आप जवाब दीजिए या तो वो या तो उसमें लेट गो कर रहा था तो करने देते

1927
02:18:26,560 --> 02:18:30,640
लेट गो मतलब मैं उसमें आगे बढ़ रहा था आपने कहा नहीं नहीं

1928
02:18:30,640 --> 02:18:35,760
मैं प्रमाणिक हूं मैं सिद्ध कर सकता हूं मैं हूं मैं सही बोल रहा हूं

1929
02:18:35,760 --> 02:18:40,160
तो मैंने कहा ठीक है चलो चलो चल रहे है

1930
02:18:40,160 --> 02:18:44,400
हां तो ठीक है ना ठीक है बोलिए हां तो अब आप बार-बार ये बात मत लाइए

1931
02:18:44,400 --> 02:18:48,720
आप उसका प्रश्न का उत्तर मैं जब तक इसको इसको इसको पूरा खींच नहीं लूंगा। मैं अटका

1932
02:18:48,720 --> 02:18:52,800
रहूंगा अब यही। ठीक है। ठीक है।

1933
02:18:52,800 --> 02:18:56,880
हां। अब आप मुझे बताइए जब प्रलय होती है तब कुछ लोग जीवित

1934
02:18:56,880 --> 02:19:00,880
होते हैं ना। वो भी एक्सीडेंटल बहुत है। सम्महार करना।

1935
02:19:00,880 --> 02:19:05,040
प्रलय प्रलय यानी कौन से प्रलय की बात कर रहे हैं आप? सम्मार

1936
02:19:05,040 --> 02:19:09,280
समार उत्पत्ति स्थिति सम्मार। पूरी दुनिया के प्रलय

1937
02:19:09,280 --> 02:19:13,520
एक साथ। हां। इसकी बात कर

1938
02:19:13,520 --> 02:19:17,680
हम उस समय कोई जीवित हो ही नहीं सकता। उस समय कैसे जीवित रहेगा? प्रलय हो गई

1939
02:19:17,680 --> 02:19:21,840
तो तो मतलब पहले सब अपनी मौत मर

1940
02:19:21,840 --> 02:19:25,840
चुके होंगे उसके बाद प्रलय करता है ईश्वर। नहीं नहीं प्रलय होगी तब

1941
02:19:25,840 --> 02:19:30,000
मर जाएंगे सारे। ये बोल रहा हूं। पहले कैसे मर जाएंगे? तो वो कार्य तो डायरेक्ट

1942
02:19:30,000 --> 02:19:34,080
ईश्वर का हो गया ना। मारने के लिए हो गया ना? नहीं वो

1943
02:19:34,080 --> 02:19:38,240
भी विज्ञान का ही नियम है।

1944
02:19:38,240 --> 02:19:42,320
वो विज्ञान का नियम है। हंसी आप हां तो कितने अच्छा

1945
02:19:42,320 --> 02:19:47,600
विज्ञान का नियम है तो कितने सालों बाद प्रलय हो जाएगी फिर बता दीजिए नियम है तो

1946
02:19:47,600 --> 02:19:51,600
भाई हर हर कल्प में जो जितने समय में ये बनेगी सृष्टि

1947
02:19:51,600 --> 02:19:55,760
जितने समय सृष्टि चलेगी जितने समय में प्रलय होगा ये सारी चीजें फिक्स

1948
02:19:55,760 --> 02:19:58,480
हैं।

1949
02:19:58,480 --> 02:20:02,080
तो कितने समय तक सृष्टि चलेगी?

1950
02:20:02,080 --> 02:20:06,880
कितने समय तक मैंने फिक्स आंसर दे दिया ना आपको कि सारा समय फिक्स है। हर कल्प में सेम रिपीट

1951
02:20:06,880 --> 02:20:12,400
है। जैसे आपका जैसे आपका परांत काल फिक्स है ना

1952
02:20:12,400 --> 02:20:15,280
फिक्स है ना

1953
02:20:15,280 --> 02:20:19,280
हर हर मैं बोल तो रहा हूं सारी चीजें फिक्स है। कल्पों में रिपीट होगी सेम। फिक्स

1954
02:20:19,280 --> 02:20:23,280
भैया फिक्स जब आप कर रहे हो तो मुझे प्रमाण चाहिए होगा ना। प्रमाण दो

1955
02:20:23,280 --> 02:20:27,280
कहां पर है? नंबर आप आप नंबर चाह रहे हो ना कि नंबर क्या दूं मैं? ये चाह

1956
02:20:27,280 --> 02:20:31,360
रहे हो आप। हां नंबर है कहीं पर मेंशन नंबर से

1957
02:20:31,360 --> 02:20:37,360
फर्क ही नहीं पड़ता। अगर मैं मेंशन बता भी तो क्या फर्क पड़ेगा नंबर से?

1958
02:20:37,520 --> 02:20:41,520
मैं फर्क ये पड़ेगा कि वहां पे ये देखना होगा वो वो जो प्रलय हो

1959
02:20:41,520 --> 02:20:45,520
रही है वो ईश्वर प्रलय कर रहा है या फिर वहां पर कौन सा

1960
02:20:45,520 --> 02:20:49,600
ऐसा विज्ञान का वो है जिसके कारण वो हो रही है। और अगर वो विज्ञान

1961
02:20:49,600 --> 02:20:53,920
है तो उसका वो वहां पर लिखा होगा इतने साल में पृथ्वी इस तरीके से फट जाएगी

1962
02:20:53,920 --> 02:20:58,240
या सूरज इस तरह से फट जाएगा। उसका प्रमाण होना नहीं तो मानना पड़ेगा।

1963
02:20:58,240 --> 02:21:02,400
नहीं तो मानना पड़ेगा। जैसे विज्ञान के नियमों के विरुद्ध निय विज्ञान

1964
02:21:02,400 --> 02:21:06,640
के नियमों की सीमा के बाहर जाकर के जड़ पदार्थों को इकट्ठा करके

1965
02:21:06,640 --> 02:21:10,720
उसने मनुष्य का देह बनाई चार ऋषियों को बनाया उसी

1966
02:21:10,720 --> 02:21:15,040
प्रकार से वो विज्ञान की सीमा के बाहर जाकर के प्रलय कर देगा लय कर देगा संसार

1967
02:21:15,040 --> 02:21:19,600
का नहीं तो मुझे बताओ कि भैया कहां लिखा है कि इतने में सूरज फट जाएगा

1968
02:21:19,600 --> 02:21:23,920
जिसके कारण पूरी मानव जाति समाप्त हो जाएगी विज्ञान के नियम है

1969
02:21:23,920 --> 02:21:27,920
हां हां मैं बता देता हूं आपने पूछा कि कितने समय में मैं बोल रहा हूं

1970
02:21:27,920 --> 02:21:31,920
कि अगर मैंने फिक्स बोल दिया फिक्स हर समय बाद रिपीट होगा तो नंबर बता

1971
02:21:31,920 --> 02:21:36,240
नंबर भी है नंबर बताने की आवश्यकता नहीं है मैं बोल रहा हूं नंबर बताने की क्या आवश्यकता है

1972
02:21:36,240 --> 02:21:40,960
मैं बोल रहा हूं मेरा मोटिव ये नहीं है मेरा मोटिव ये नहीं है मेरा मोटिव

1973
02:21:40,960 --> 02:21:45,120
मैं बता रहा हूं आप गलत जा रहे हैं मत दीजिए उदाहरण मत दीजिए गलत जा रहे हैं

1974
02:21:45,120 --> 02:21:49,680
मेरा मोटिव ये पूछना है कि

1975
02:21:49,680 --> 02:21:52,560
मेरा मोटिव ये पूछना है कि अगर यह फिक्स है कि

1976
02:21:52,560 --> 02:21:56,720
विज्ञान के नियमों के कारण ही होगा तो फिर इस बात का प्रमाण चाहिए ना हमें कि भैया

1977
02:21:56,720 --> 02:22:00,800
इतने साल में पृथ्वी फट जाती कोई ऐसा वैज्ञानिक कारण जिससे

1978
02:22:00,800 --> 02:22:04,800
कि प्रलय मान सके हम वो क्या वैज्ञानिक

1979
02:22:04,800 --> 02:22:09,040
कारण है प्रमाण यानी आप आर्य समा जी मत पूछ रहे कि आर्य विशेषण

1980
02:22:09,040 --> 02:22:13,360
ने क्या लिखा है इसमें ये पूछ रहे हैं आप हां हां हां यही बता दीजिए पहले

1981
02:22:13,360 --> 02:22:17,920
उन्होंने तो फिक्स बोल ही रखा है क्या ये

1982
02:22:17,920 --> 02:22:22,000
फिक्स है इतने टाइम में बात प्रलय होगी ही होगी ये बोल रखा है उन्होंने अरे भैया मैं

1983
02:22:22,000 --> 02:22:26,160
पूछ रहा हूं कौन सी वैज्ञानिक क्रिया होगी जिससे कि वो पूरा

1984
02:22:26,160 --> 02:22:30,320
लीला समाप्त होगी वो पूछ रहा हूं ये हां इसका इसका आंसर

1985
02:22:30,320 --> 02:22:34,560
ये है कि जो मूल प्रकृति होती है उसके द्वारा संसार बनाना

1986
02:22:34,560 --> 02:22:38,560
अपना धारण और प्रलय जो मूल प्रकृति की जो क्षमता है

1987
02:22:38,560 --> 02:22:42,720
उस क्षमता अनुसार कि भाई इतने इतने समय तक मूल प्रकृति के द्वारा सृष्टि बनने

1988
02:22:42,720 --> 02:22:46,800
मतलब सस्टेन होगी और जो क्षमता क्षमता होती है मूल प्रकृति की उस क्षमता

1989
02:22:46,800 --> 02:22:50,800
के बाहर जब मैं कह रहा हूं मैं आपसे पूछ रहा हूं कौन सी घटना

1990
02:22:50,800 --> 02:22:54,880
होगी प्राकृतिक घटना वैज्ञानिक नियमों के अनुसार जिससे

1991
02:22:54,880 --> 02:22:59,120
सृष्टि प्रलय होगी अगर अगर अगर ये चीज फिक्स अगर

1992
02:22:59,120 --> 02:23:03,360
यह चीज वैज्ञानिक नियमों के आधार पर है तो अगर ये चीज वैज्ञानिक

1993
02:23:03,360 --> 02:23:08,640
नियमों के आधार पर है तो मुझे वो घटना बताइए किस घटना को प्रलय मानेंगे आप?

1994
02:23:08,640 --> 02:23:12,880
देखिए मैं इसका जवाब देता हूं। ना तो मुझे समझ बताने की आवश्यकता

1995
02:23:12,880 --> 02:23:17,120
है ना मुझे कौन सी वैज्ञानिक नियम बताने मैंने क्या बताया है? क्योंकि आप ईश्वर

1996
02:23:17,120 --> 02:23:21,360
के कार्य को क्योंकि आप ईश्वर के अह

1997
02:23:21,360 --> 02:23:25,920
प्राकृतिक नियमों से परे कार्य को उसमें जोड़ रहे हैं।

1998
02:23:25,920 --> 02:23:29,920
वैज्ञानिक नियमों से तो मैं वैज्ञानिक नियमों से जोड़ रहा हूं तो आप मुझे बता दीजिए कौन सी घटना

1999
02:23:29,920 --> 02:23:33,920
घटित होगी? बादल फट जाएंगे वो

2000
02:23:33,920 --> 02:23:38,640
सूर्य फट जाएगा, पृथ्वी फट जाएगी किससे होगी प्रलय वो बता दीजिए। ये ये

2001
02:23:38,640 --> 02:23:42,640
कौन सी घटना घटित होगी मुझे नहीं पता।

2002
02:23:42,640 --> 02:23:46,640
तो फिर आपकी बात कैसे मानी जाए? वैज्ञानिक नियमों के आधार पे होगी वो। हां तो

2003
02:23:46,640 --> 02:23:50,880
मैं मैं कितनी बात बोल रहा हूं वो उस पर ध्यान से सुनिए। मैंने सिर्फ इतनी

2004
02:23:50,880 --> 02:23:55,040
बात बोली है कि निश्चित समय के आधार पे रिपीट होगा। आर्य

2005
02:23:55,040 --> 02:23:59,040
समाज का मत यह है और यही है जो मूल प्रकृति का नियम है। मूल प्रकृति

2006
02:23:59,040 --> 02:24:03,040
इसी हिसाब से काम करती है। निश्चित समय है। यह मत है। ठीक है? आपने कहा कि

2007
02:24:03,040 --> 02:24:07,040
वो कार्य ईश्वर का नहीं है। आपने कहा वो कार्य ईश्वर का नहीं

2008
02:24:07,040 --> 02:24:12,160
है। कि प्रलय के समय पर अमुक अमुक लोग मर जाएंगे।

2009
02:24:12,160 --> 02:24:16,240
हां हां। वो भी वो भी इसके अंदर

2010
02:24:16,240 --> 02:24:20,560
उसको भी आप एक्सीडेंटल बहुत मानेंगे। दृष्टि सोचिए

2011
02:24:20,560 --> 02:24:23,680
सोचिए। अच्छा एक बात बताइए प्रकृति

2012
02:24:23,680 --> 02:24:27,840
का अपना एक समय है जब वो चालू हो रही है। ईश्वर ने बना दिया। फिर प्रकृति

2013
02:24:27,840 --> 02:24:31,840
का अपना एक समय है। तो फिर प्रलय में ईश्वर का हाथ कहां रह गया?

2014
02:24:31,840 --> 02:24:35,920
जब उसका अपना एक समय है तो? फिर प्रलय करेगा तभी

2015
02:24:35,920 --> 02:24:40,160
तो अगली सृष्टि बनाएगा। ईश्वर का हाथ कहां है प्रलय

2016
02:24:40,160 --> 02:24:44,240
करने में? वो तो अपने आप फट रही है अपने उसके हिसाब से फट

2017
02:24:44,240 --> 02:24:49,600
नहीं फट नहीं रही है ना वो तो बता रहा हूं फटना नहीं मैंने फटना नहीं बोला है

2018
02:24:49,600 --> 02:24:52,080
समय निर्धारित

2019
02:24:52,080 --> 02:24:56,480
ठीक है अब आप अपना उत्तर ले लीजिए समझ गया मैं खूब खींच लिया

2020
02:24:56,480 --> 02:25:02,480
आप अपना उत्तर ले लीजिए हां सुनिए

2021
02:25:03,040 --> 02:25:07,680
अ हमारा जो विश्वास है

2022
02:25:07,680 --> 02:25:13,360
वो सीधेसीधे ईश्वर ईश्वर की वाणी पर नहीं है।

2023
02:25:13,360 --> 02:25:17,920
हम उन वेदों पर विश्वास करते हैं जो यह क्लेम नहीं करते हैं कि हमें ईश्वर ने रचा।

2024
02:25:17,920 --> 02:25:22,560
वेदों का कोई कर्ता नहीं। अपारुषय माना है। वेदों को अपौरुषय

2025
02:25:22,560 --> 02:25:27,040
जो वेद वाणी है वो ईश्वर के सांस में विद्यमान

2026
02:25:27,040 --> 02:25:31,360
है। के कब से जब से ईश्वर है। अनादि ईश्वर

2027
02:25:31,360 --> 02:25:35,520
ने रच दिया होता। जिन शास्त्रों को ईश्वर रच देगा तो उसमें भी वो बुद्धि

2028
02:25:35,520 --> 02:25:41,440
आ जाएगी। प्रमाण्य अप्रमाण्य वाली। ठीक है? तो

2029
02:25:41,440 --> 02:25:45,600
हम उन वेदों पर विश्वास करते हैं जिनको ईश्वर ने नहीं रचा है। इस संबंध

2030
02:25:45,600 --> 02:25:49,920
में ब्रदार उपनिषद का एक दृष्टव्य

2031
02:25:49,920 --> 02:25:53,040
है वो है।

2032
02:25:53,040 --> 02:25:57,280
दूसरा अध्याय शायद वहां पर है। ठीक है? तो ईश्वर

2033
02:25:57,280 --> 02:26:01,360
के स्वास रूप में स्थित जो वेद आदि शास्त्र हैं

2034
02:26:01,360 --> 02:26:05,360
उन पर हमारा विश्वास है। इसीलिए हमारे यहां पर जब बुद्ध के

2035
02:26:05,360 --> 02:26:09,440
रूप में ईश्वर आते हैं यज्ञों की रक्षा के लिए वेदों का

2036
02:26:09,440 --> 02:26:14,800
वेदों के इत बात करते हैं तो हम उनको ईश्वर के रूप में प्रणाम तो करते हैं।

2037
02:26:14,800 --> 02:26:18,080
मगर उनकी दी हुई शिक्षा को ग्रहण नहीं

2038
02:26:18,080 --> 02:26:22,560
करते। हम दूर से नमस्कार करते हैं। ठीक है? और

2039
02:26:22,560 --> 02:26:26,560
अब बात आती है कि वेद और फिर वेद के बाद जितने

2040
02:26:26,560 --> 02:26:31,040
शास्त्र वेद के अकॉर्डिंग रहेंगे यानी ईश्वर की

2041
02:26:31,040 --> 02:26:35,040
ईश्वर के अवतार द्वारा लेने अवतार लेने के बाद वो सारी वाणियां जो

2042
02:26:35,040 --> 02:26:39,520
वेद के अविरुद्ध है वो सारी ग्रहण हो जाती हैं। अब ये जो अविरुद्ध

2043
02:26:39,520 --> 02:26:44,160
है कि नहीं है ये कौन बताता है? परंपरा प्राप्त गुरु।

2044
02:26:44,160 --> 02:26:48,240
अब बताइए आप। ठीक है? ठीक है। तो क्योंकि

2045
02:26:48,240 --> 02:26:52,240
इस संशय रहित तरीके से इस पर भरोसा करने का कारण यह है कि यह

2046
02:26:52,240 --> 02:26:56,320
ज्ञान ऐसा है जो ईश्वर भी रचना नहीं कर रहा है। यानी ईश्वर आपको दे रहा

2047
02:26:56,320 --> 02:27:00,480
है। रचना नहीं कर रहा। बना नहीं रहा है। ईश्वर एट द टाइम। यही है ना पॉइंट। अनादि हां

2048
02:27:00,480 --> 02:27:04,560
अनादि है। अनादि बिल्कुल सही। तो अब इस पर पॉइंट ये

2049
02:27:04,560 --> 02:27:08,640
आ जाएगा कि ये ज्ञान अनादि है। ये ज्ञान वही वाला

2050
02:27:08,640 --> 02:27:12,640
है जो ईश्वर का अनादि वाला ज्ञान है या ये ज्ञान ईश्वर ने झूठा दे दिया। इस पर सवाल आ

2051
02:27:12,640 --> 02:27:16,640
जाएगा फिर। ये कौन सा वाला ज्ञान है? सवाल सवाल नहीं आएगा। सवाल नहीं आएगा

2052
02:27:16,640 --> 02:27:20,960
क्योंकि हम वेदों को प्रमाण मानते हैं। सवाल नहीं आएगा। वेद ने कहा मैं अनादि

2053
02:27:20,960 --> 02:27:24,960
हूं इसलिए अनादि है। बात खत्म। हां तो वही वही तो मैं

2054
02:27:24,960 --> 02:27:28,960
बोल रहा हूं। जैसे आपके पास जो वेद है उस वेद को प्रमाणिक आप क्यों मान

2055
02:27:28,960 --> 02:27:32,960
रहे हो? क्योंकि ईश्वर ने उसको नहीं रचा है। ये भी स्वास रूप में प्रकट

2056
02:27:32,960 --> 02:27:33,840
हो।

2057
02:27:33,840 --> 02:27:38,880
रचे नहीं गए। ईश्वर ने बुद्धि पूर्वक उसको नहीं रचा है।

2058
02:27:38,880 --> 02:27:42,880
बुद्धि पूर्वक हां बिल्कुल सही। यानी यह अनादि है। जैसे हर कल्प

2059
02:27:42,880 --> 02:27:46,960
में चलते आ रहे हैं वैसे ही वाले वेद है। ये तो अब यह बात यह आ जाएगी कि

2060
02:27:46,960 --> 02:27:51,040
यह वही वाले वेद हैं जो हर कल्प में ईश्वर के द्वारा रचे गए हैं। ये वही वाले वेद

2061
02:27:51,040 --> 02:27:55,040
है। इस पर आप कैसे भरोसा करोगे? कर हम बता तो रहे

2062
02:27:55,040 --> 02:27:59,120
हैं। श्रद्धा है हमारी ना। हमारी श्रद्धा है वेद में कि

2063
02:27:59,120 --> 02:28:03,200
हां भैया इस पर हमें विश्वास है। ये सच ही बोल रहा है। और उसी ने बोला है। जिस

2064
02:28:03,200 --> 02:28:07,200
पर हमारी श्रद्धा है वही बोल रहा है। मैं जो है अनादि हूं मैं वही वाला हूं। यहां से शुरू

2065
02:28:07,200 --> 02:28:12,000
होता है। वहां पे यह प्रश्न यह प्रश्न

2066
02:28:12,000 --> 02:28:16,000
हम जो है विधर्मियों से कर चुके कई बार और ये रामपाल इत्यादि

2067
02:28:16,000 --> 02:28:20,000
जैसों से भी करते हैं। ब्रह्मा कुमारी इत्यादि जैसों से भी करते हैं जो ये दावा करते हैं

2068
02:28:20,000 --> 02:28:24,160
कि हमारे पास ईश्वर ने स्वयं आकर के ज्ञान दिया। ठीक है? तो

2069
02:28:24,160 --> 02:28:29,120
हमारी जो श्रद्धा है वो केवल इस बात पे नहीं टिकी हुई है कि वो

2070
02:28:29,120 --> 02:28:31,920
क्या कहते हैं?

2071
02:28:31,920 --> 02:28:36,160
के केवल तर्क है। केवल तर्क पर नहीं टिकी है। उसमें फिर विश्वास

2072
02:28:36,160 --> 02:28:40,240
भी है। श्रद्धा भी है। जैसे एक मां के प्रति श्रद्धा होती है। तो हमारे वेदों

2073
02:28:40,240 --> 02:28:44,640
ने कहा है हम अनादि इसलिए हम मानते हैं अनादि। बात खत्म। विश्वास श्रद्धा

2074
02:28:44,640 --> 02:28:48,720
हां इसमें हां इसमें समस्या क्या आ रही है? मेन जो समस्या यह आ रही

2075
02:28:48,720 --> 02:28:49,220
है

2076
02:28:49,120 --> 02:28:53,120
कि यह जो वेद है यह ईश्वर के द्वारा मतलब जो सत्य वाले वेद है ये

2077
02:28:53,120 --> 02:28:57,120
उसी पर आपकी श्रद्धा है। लेकिन दिक्कत ये आ रही है कि एक जगह पर ऐसा भी

2078
02:28:57,120 --> 02:29:01,280
आ रहा है कि ईश्वर जो है आपको झूठा ज्ञान भी दे सकता है। तो ये वो झूठा ज्ञान

2079
02:29:01,280 --> 02:29:05,520
नहीं है। ये कैसे वेरीफाई करोगे आप? गुरु गुरु

2080
02:29:05,520 --> 02:29:09,680
गुरु बताएगा झूठा ज्ञान नहीं गुरु के द्वारा

2081
02:29:09,680 --> 02:29:13,760
हमारी श्रद्धा है तो ईश्वर हां तो ईश्वर तो गुरु के साथ भी शल

2082
02:29:13,760 --> 02:29:18,080
कर सकता है गुरु के ज्ञान गुरु के दिमाग में गलत ज्ञान डाल सकता है तो हमारी

2083
02:29:18,080 --> 02:29:22,960
श्रद्धा है ना वहां पर कि नहीं इसके साथ ऐसा नहीं हुआ श्रद्धा

2084
02:29:22,960 --> 02:29:27,120
आपकी इस बात पर है कि गुरु ने सही ज्ञान दिया ठीक है बिल्कुल सही बात है तो श्रद्धा

2085
02:29:27,120 --> 02:29:31,120
आपकी इस बात पर ऐसा नहीं हुआ गुरु के साथ ईश्वर ने छल नहीं

2086
02:29:31,120 --> 02:29:35,520
किया यह श्रद्धा है नहीं तो इसमें फिर यह श्रद्धा

2087
02:29:35,520 --> 02:29:39,600
मानने के लिए आपको यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर चल नहीं कर सकता था। सामर्थ्य नहीं था ईश्वर में छल

2088
02:29:39,600 --> 02:29:43,840
करने का। नहीं ये कहां मानना पड़ेगा? ईश्वर ने इनके साथ ऐसा नहीं किया।

2089
02:29:43,840 --> 02:29:48,080
ईश्वर में तो सामर्थ है तभी तो कुरान बनी दुनिया में। ईश्वर की सत्ता के बाहर

2090
02:29:48,080 --> 02:29:52,160
आप मानते हो। प्रलय इत्यादि हम थोड़ी ना मानते हैं। अल्टीमेटली

2091
02:29:52,160 --> 02:29:56,320
बात ये आ रही है कि ईश्वर में सामर्थ्य तो था कि इनके साथ छल कर सकता था। लेकिन नहीं किया।

2092
02:29:56,320 --> 02:30:01,200
हमने ये माना है कि इनके साथ नहीं किया। ईश्वर ने ये माना आप क्यों

2093
02:30:01,200 --> 02:30:04,160
अपने वर्ड मेरे ऊपर चिपका रहे हो? नहीं नहीं मैं

2094
02:30:04,160 --> 02:30:08,400
चिपका नहीं रहा हूं। मैं खाली क्लेरिफाई कर रहा हूं कि सामर्थ्य को था सामर्थ्य मान रहे हो आप। हां

2095
02:30:08,400 --> 02:30:12,560
सामर्थ्य मान रहे हैं। मगर नहीं किया यहां नहीं किया। इनके

2096
02:30:12,560 --> 02:30:16,560
साथ नहीं किया ऐसा पॉइंट पॉइंट कंप्लीट कर देता हूं। सामर्थ्य

2097
02:30:16,560 --> 02:30:20,640
था लेकिन फिर भी नहीं किया। इस बात को आप वेरीफाई नहीं कर सकते। किसी भी तरीके

2098
02:30:20,640 --> 02:30:25,200
से तो मैं कह तो रहा हूं। सिर्फ तर्क नहीं है। श्रद्धा की श्रद्धा भी है।

2099
02:30:25,200 --> 02:30:29,280
कह तो रहा हूं। अगर यह बात आप बोल अगर यह बात आप बोलते हो यही बात अगर मुसलमान

2100
02:30:29,280 --> 02:30:33,280
बोले कि मेरी भी कुरान पे श्रद्धा है ये वाला जो ज्ञान है ईश्वर के द्वारा दिया गया सही ज्ञान

2101
02:30:33,280 --> 02:30:37,440
है तो आप उसको कैसे काटोगे उसके ईश्वर को सर्वशक्तिमान असिद्ध

2102
02:30:37,440 --> 02:30:41,440
करके दूसरी बात नहीं तो सर्वशक्तिमान इस

2103
02:30:41,440 --> 02:30:45,600
आता था एक पॉइंट एक मिनट एक मिनट एक मिनट भाई साहब एक मिनट भाई साहब

2104
02:30:45,600 --> 02:30:50,000
उसके ईश्वर को जीव की चाह का वास्तविक अभिषय

2105
02:30:50,000 --> 02:30:54,080
सिद्ध करके कि जीव जिस ईश्वर को ढूंढ रहा है वो है ही नहीं

2106
02:30:54,080 --> 02:30:58,080
दूसरी बात दूसरी बात हमारी वो ईश्वर ने

2107
02:30:58,080 --> 02:31:02,240
दिया है। वो ये ये भूल करके खुद बैठे हुए हैं कि ईश्वर ने बुद्धि

2108
02:31:02,240 --> 02:31:06,320
पूर्वक ये ज्ञान दिया है। और बोलो ये भूल करके वो खुद बैठे हैं। तो

2109
02:31:06,320 --> 02:31:10,320
जो जो तीन बातें तीन बातें आपने बोली कि इन आधार पर हम उनको काट

2110
02:31:10,320 --> 02:31:14,400
रहे हैं और अपना सही बता रहे हैं। तीन जो बातें हैं तीन जो बातें हैं ये

2111
02:31:14,400 --> 02:31:18,560
बातें सही है। ये मानने के लिए आपको उन सातों पे डिपेंड होना पड़ रहा है। और शास्त्रों पे ही संशय

2112
02:31:18,560 --> 02:31:19,360
चल रहा है। अभी

2113
02:31:19,360 --> 02:31:23,360
आप डिसाइड करिए। मुझे बोलना मैंने कहा ना केवल तर्क नहीं है

2114
02:31:23,360 --> 02:31:27,680
श्रद्धा भी है मेरे भाई बार-बार रिपीट कर रहे हो आप मुझे मालूम है आप यही करते हो

2115
02:31:27,680 --> 02:31:31,760
आपने वहां भी यही किया था मैंने कह दिया खुल के स्पष्ट उस पॉइंट पे

2116
02:31:31,760 --> 02:31:35,760
कुरान कुरान वाले पॉइंट पे आ रहा हूं कि आपने बोला आप कुरान को इसी आधार पे काट रहा हूं मैं तीन

2117
02:31:35,760 --> 02:31:39,840
आधार बताए कि उनके जो ईश्वर ने रचना है या उनके ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं

2118
02:31:39,840 --> 02:31:44,560
है आदि आदि जो तीन कारण थे ये तीन कारण कहां से आए

2119
02:31:44,560 --> 02:31:48,880
असतो मा सद्गम अंदर से आए तर्क से आए तर्क

2120
02:31:48,880 --> 02:31:53,200
से जब कोई जो नास्तिक

2121
02:31:53,200 --> 02:31:58,560
व्यक्ति कोई प्रश्न करता है तो वह क्या वेदों से देखकर करता है?

2122
02:31:58,560 --> 02:32:03,200
सही बात है। सही बात है। तर्क से करता है। सही बात है। तर्क से करता है। तर्क से

2123
02:32:03,200 --> 02:32:07,440
बिना वेदों की सहायता के तर्क के आधार पर उसको काट देंगे।

2124
02:32:07,440 --> 02:32:11,520
हां। तो ये जो कारण आपके पास तर्क से आए हैं। ये कारण सही

2125
02:32:11,520 --> 02:32:15,600
है। ये कारणों में ईश्वर ने छल नहीं कर रखा है। आपके दिमाग में गलत तर्क नहीं डाले हैं। ये कैसे

2126
02:32:15,600 --> 02:32:21,600
वेरीफाई करोगे आप? श्रद्धा श्रद्धा

2127
02:32:23,520 --> 02:32:27,840
सुनिए सारी चीजें टिकी इस बात पे कि हमें मोक्ष चाहिए

2128
02:32:27,840 --> 02:32:31,840
हमें मोक्ष चाहिए सुख दुख से मुक्ति चाहिए इसी बात पे तो टिकी

2129
02:32:31,840 --> 02:32:35,840
है अब जो ईश्वर है अब जो अब

2130
02:32:35,840 --> 02:32:39,840
जो ईश्वर है वो इस बात पे सिद्ध नहीं हो रहा है अब आप कह रहे हो ये जो मेरे अंदर

2131
02:32:39,840 --> 02:32:43,840
फीलिंग आ रही है ये भी तो गलत हो सकता है तो ना तो धर्म का अस्तित्व सिद्ध हो रहा

2132
02:32:43,840 --> 02:32:47,840
है ना तो इस बात से धर्म का अस्तित्व सिद्ध होगा असिद्ध होगा कुछ भी सिद्ध नहीं होगा

2133
02:32:47,840 --> 02:32:52,000
फिर तो इससे आपने क्या कर लिया संशयात्मक संशयात्मक स्थिति

2134
02:32:52,000 --> 02:32:56,080
आ जाएगी ना कि जो वेदों के ज्ञान है उस संशय आ जाएगा आपको फिर तो मैंने उसको

2135
02:32:56,080 --> 02:33:00,400
दिया तो है भाई कि हमारे पास तर्क के साथसा श्रद्धा है मगर तर्क की पराकाष्ठा

2136
02:33:00,400 --> 02:33:05,200
पे खड़े हुए हैं हमारे वो हटा

2137
02:33:05,200 --> 02:33:09,280
हैं क्या तर्क मैं बताता हूं क्यों क्यों क्यों हटाना पड़ेगा मैं उसका

2138
02:33:09,280 --> 02:33:13,280
आंसर दे देता हूं मैं बोल रहा हूं आप श्रद्धा प्लस तर्क दो बातें लेके

2139
02:33:13,280 --> 02:33:17,360
चल रहे हो मैं बोल रहा हूं कि तर्क इसलिए हटा सुनिए

2140
02:33:17,360 --> 02:33:21,440
सुनिए तर्क की पराकाष्ठा [हंसी] हां तर्क की पराकाष्ठा ठीक

2141
02:33:21,440 --> 02:33:25,520
है तर्क की पराकाष्ठा ठीक है तो जब तर्क की पराकाष्ठा पे हम

2142
02:33:25,520 --> 02:33:29,840
जा रहे हैं कि तर्क पराकाष्ठा में क्या निकल रही है अपना सर्वशक्तिमान ईश्वर स्वतंत्र

2143
02:33:29,840 --> 02:33:33,840
मोक्ष आदि आदि चीजें तर्क परकाष्ठा में निकल रही है तो उस तर्क की पराकाष्ठा में भी

2144
02:33:33,840 --> 02:33:38,080
जब जा रहे हैं तब भी आपका आंसर श्रद्धा ही है अल्टीमेटली तो एंड ऑल बी श्रद्धा है तर्क

2145
02:33:38,080 --> 02:33:38,720
को हटाना

2146
02:33:38,720 --> 02:33:42,880
तर्क के अंदर जब हम जा रहे हैं तो श्रद्धा ही निकल रही है उसके अंदर भी तो वो वो वो फिर

2147
02:33:42,880 --> 02:33:47,360
हम जब उनसे वो करेंगे तो वहां पर जनता जनता डिसाइड कर लेगी किसकी बातें तार्किक

2148
02:33:47,360 --> 02:33:52,000
रूप से सिद्ध होती है किसकी नहीं होती बात खत्म आपको क्या टेंशन है कि विरोधी

2149
02:33:52,000 --> 02:33:56,080
तार्किक रूप से तार्किक रूप से सिद्ध हो अरे भैया जनता डिसाइड कर लेगी कि

2150
02:33:56,080 --> 02:34:00,240
इसने जनता ये डिसाइड कर लेगी कि इसने श्रद्धा कहा है तो वो कहां

2151
02:34:00,240 --> 02:34:04,320
तक सही है कहां तक सही नहीं है जनता ये डिसाइड कर लेगी समझ गए ना

2152
02:34:04,320 --> 02:34:08,400
हम जब अपनी बातें ये वाली रखेंगे तो जनता डिसाइड करेगी हमने तो उनके

2153
02:34:08,400 --> 02:34:12,480
हमने तो जब भी उनके टेप ही लगाया है हां ठीक है ठीक

2154
02:34:12,480 --> 02:34:16,480
है यानी इसका मतलब यह है कि जब आप यह सिद्ध करने जाओगे कि कुरान का ईश्वर सही है या

2155
02:34:16,480 --> 02:34:20,880
आपका ईश्वर सही है तो जनता ने जो निर्णय दिया वो सही हो जाएगा।

2156
02:34:20,880 --> 02:34:24,880
नहीं निर्णय तो वही सही होगा जो हमारा है। मगर हमने

2157
02:34:24,880 --> 02:34:29,040
कहा वहां पर जो जनता होगी डिसाइड कर आपका सही इसलिए

2158
02:34:29,040 --> 02:34:33,040
होगा क्योंकि आपके आपका आपके ऊपर श्रद्धा है अपने आप वाले पे। यही इसीलिए कहा है

2159
02:34:33,040 --> 02:34:37,120
ना श्रद्धा भी है तर्क भी है। श्रद्धा भी है तर्क भी है।

2160
02:34:37,120 --> 02:34:41,120
क्योंकि हमारा जो ईश्वर है क्योंकि हमारा जो ईश्वर है

2161
02:34:41,120 --> 02:34:45,120
मैं बता रहा हूं क्योंकि हमारा जो ईश्वर है वो

2162
02:34:45,120 --> 02:34:49,280
जीव की चाह का वास्तव हम ईश्वर को ढूंढ क्यों रहे हैं?

2163
02:34:49,280 --> 02:34:53,440
क्यों ढूंढ रहे हैं? जब चालू ही यहां से हो रहा है।

2164
02:34:53,440 --> 02:34:53,940
क्या कहते

2165
02:34:53,840 --> 02:34:58,320
हैं? जब चालू ही यहां से हो रहा है कि भैया असतम असत सच्चिदानंद की चाह।

2166
02:34:58,320 --> 02:35:02,480
सच्चिदानंद की चाह से हम ढूंढ रहे हैं। तो जब हमने ये मान

2167
02:35:02,480 --> 02:35:06,560
के शुरुआत की है कि हम सच्चिदानंद की चाह से ही ईश्वर

2168
02:35:06,560 --> 02:35:10,560
और धर्म की सिद्धि करें। अब आप कह रहे हो कि इसको भी बदल देगा तो। अगर

2169
02:35:10,560 --> 02:35:14,800
वह इसको भी बदल देगा। इसने गलत आपको जो है गलत वो दे दी है तो आप बताइए

2170
02:35:14,800 --> 02:35:19,120
उदाहरण के क्या दे देगा कौन सी चाह दे देगा फिर वो दूसरी हमारी

2171
02:35:19,120 --> 02:35:23,120
क्या चाह हो सकती है इससे ठीक है ठीक है आपने बताया

2172
02:35:23,120 --> 02:35:27,120
कि तर्क के आधार पे आपने ये जाना मैं मैं पूछ रहा हूं मैं

2173
02:35:27,120 --> 02:35:31,360
पूछ रहा हूं मैं पूछ रहा हूं सच्चिदानंद की चाह के इत कौन सी चाह

2174
02:35:31,360 --> 02:35:36,640
हो सकती है अब ये बताइए जो वो बदल बदल देगा

2175
02:35:36,640 --> 02:35:40,640
मैं ये बोल रहा हूं कि सच्चिदानंद की चाह ईश्वर की है यह बात आपने तर्क से

2176
02:35:40,640 --> 02:35:43,200
मानी है

2177
02:35:43,200 --> 02:35:47,520
तर्क दोनों से हां तर्क से ही मानिए

2178
02:35:47,520 --> 02:35:51,600
तर्क तर्क से मानिए अब जब हम तर्क पे जा रहे हैं कि क्या ईश्वर आपके दिमाग

2179
02:35:51,600 --> 02:35:55,680
में गलत तर्क डाल के गलत चाह डाल सकता है तो उस पे आपकी श्रद्धा अरे मेरे भाई तो

2180
02:35:55,680 --> 02:36:00,000
इसका कोई विकल्प ही नहीं है ना इसका कोई विकल्प कहां है

2181
02:36:00,000 --> 02:36:04,080
अच्छा इसका इसका कोई विकल्प नहीं है निर्णय कैसे लिया आपने बताओ

2182
02:36:04,080 --> 02:36:09,360
आप कौन सा हो सकता है विकल्प आपने बुद्धि से लिया ना निर्णय

2183
02:36:09,360 --> 02:36:14,240
आप मुझे बता दो विकल्प कौन सा हो सकता है? सच्चिदानंद की चाह के अलावा

2184
02:36:14,240 --> 02:36:18,400
आप भाई साहब आप आप बकवास कर रहे हैं। आप बकवास कर रहे हैं। कुछ नहीं कर रहे हैं।

2185
02:36:18,400 --> 02:36:22,640
नहीं हमारी हमारी चर्चा भी सुन ली लोगों ने। विकल्प मैं विकल्प

2186
02:36:22,640 --> 02:36:26,800
दे देता हूं। विकल्प देता हूं। विकल्प विकल्प दीजिए। विकल्प दीजिए। विकल्प देता हूं।

2187
02:36:26,800 --> 02:36:30,880
विकल्प ये है कि सच्चिदानंद की चाह होना ये सही बात है। विकल्प मैं देता हूं।

2188
02:36:30,880 --> 02:36:34,880
इसका उल्टा ईश्वर चाहता है कि हम सच्चिदानंद की चाह ना करें और भटकते रहे संसार

2189
02:36:34,880 --> 02:36:39,440
में। यह विकल्प है। क्या? तो मेरे अंदर तो है ना सच्चिदानंद

2190
02:36:39,440 --> 02:36:43,600
की चाह तो ये चाह झूठी है ना मैं वही तो मेरा क्लेम

2191
02:36:43,600 --> 02:36:47,600
ही है कि चाह झूठी है आप कैसे सही मान तो सच्ची चाह बताइए फिर आप सच्ची

2192
02:36:47,600 --> 02:36:51,600
चाह बताइए मैंने बता देखिए ऑप्शन क्या

2193
02:36:51,600 --> 02:36:55,680
है हमारे पास दो ऑप्शन है एक तो सच्चिदानंद की चाह होना और एक सच्चिदानंद की चाह ना होना ये

2194
02:36:55,680 --> 02:36:59,920
दो ऑप्शन है क्लियर बात है यानी कि यानी कि आप ये कह रहे हैं कि मेरे

2195
02:36:59,920 --> 02:37:04,080
अंदर मेरी मैं मैं समझ गया मैं समझ गया मैं समझ गया यानी

2196
02:37:04,080 --> 02:37:08,320
कि आप यह कह रहे हैं कि मेरे अंदर जो वास्तविक चाह है वो मरने की होनी चाहिए और

2197
02:37:08,320 --> 02:37:12,400
मूर्ख होने की होनी चाहिए। ये वास्तविक चाह हो सकती है मेरी। मैं इसी

2198
02:37:12,400 --> 02:37:16,400
इसी पे यही कह रहे हैं ना इसी कंप्लीट कर दूं मैं अपना पॉइंट कंप्लीट

2199
02:37:16,400 --> 02:37:20,720
कर दूं। दो चाह है हमारे अंदर। एक है सच्चिदान दो ऑप्शन है। चाह है तो आपने

2200
02:37:20,720 --> 02:37:25,360
प्लीज कहा ना भाई देखो मैं देखो ढाई घंटे हो चुके हैं। आपने

2201
02:37:25,360 --> 02:37:29,520
मैं भाई मैं आपकी बात को मैं कंप्लीट कर रहा हूं। प्लीज आप आप क्या है ना अनर्गल

2202
02:37:29,520 --> 02:37:33,600
बातें कर रहे हैं। मैं इसलिए कंप्लीट कर रहा हूं क्योंकि आप रिपीट कर रहे

2203
02:37:33,600 --> 02:37:37,920
हैं। आप रिपीट कर रहे हैं।

2204
02:37:37,920 --> 02:37:42,160
आप रिपीट कर रहे हैं। मैं इसलिए कंप्लीट कर रहा हूं। सुनिए

2205
02:37:42,160 --> 02:37:46,160
मैं आपकी मैं आपकी बात से जो समझा हूं अगर गलत बोलूं तो आप बताइएगा।

2206
02:37:46,160 --> 02:37:50,240
मैं टोकूंगा भैया। बहुत देर हो गई आपके साथ। आप तो मगजमारी करने

2207
02:37:50,240 --> 02:37:54,800
ही आए हो तो वो दिखाई दे रहा है। ठीक है। चलो

2208
02:37:54,800 --> 02:37:58,800
मैं आपकी बात बोल रहा हूं। अगर वह गलत हो तो आप बोल दीजिएगा। ठीक है?

2209
02:37:58,800 --> 02:38:02,800
आपने कहा कि हो सकता है हमारी चाह कुछ और हो। सच्चिदानंद

2210
02:38:02,800 --> 02:38:07,440
के विपरीत हो और ईश्वर ने बदल दी हो। ठीक है?

2211
02:38:07,440 --> 02:38:12,160
ठीक है ना? तो अब यहां पर बात आ जाती है

2212
02:38:12,160 --> 02:38:17,600
हां। ठीक है। अब यहां पर बात आ जाती है कि

2213
02:38:17,600 --> 02:38:21,680
इसका जवाब कई प्रकार से होता है कि ईश्वर

2214
02:38:21,680 --> 02:38:26,160
हमारी मूल चाह बदल सकता है कि नहीं बदल सकता। यही बात आती है ना

2215
02:38:26,160 --> 02:38:30,240
हमारी आंतरिक मूल चाह बदल सकता है कि नहीं बदल सकता यही बात आती है तो

2216
02:38:30,240 --> 02:38:34,560
यह फिर हो जाएगा पारमार्थिक विषय वही व्यवहार और परमार्थ

2217
02:38:34,560 --> 02:38:38,640
का अंतर और इसमें फिर वही शून्य क्रिया आ

2218
02:38:38,640 --> 02:38:40,720
जाएगी मैं कहूंगा

2219
02:38:40,720 --> 02:38:45,280
बदल नहीं सकता क्योंकि ईश्वर वही है जो इस चाह

2220
02:38:45,280 --> 02:38:49,280
जो इस एक मिनट गलत बात है हां

2221
02:38:49,280 --> 02:38:53,600
बोलिए बोलिए आप बोलिए आप अपना प्रश्न सही [हंसी] से कर जो

2222
02:38:53,600 --> 02:38:57,760
गलत कंक्लूजन दे रहे हो बता देता हूं कैसे कि आपने यह मान रखा है पहले से यह

2223
02:38:57,760 --> 02:39:01,920
सच्चिदानंद की जो चाहें सच्ची है मैं इसी पे आ रहा हूं कि यह जो मान रखा है ये कैसे

2224
02:39:01,920 --> 02:39:06,000
माना अब इसमें बात ये आ रही है कि ये मानने के लिए आप जो आ रहे हैं कि भाई मैंने

2225
02:39:06,000 --> 02:39:10,160
अपनी बुद्धि से तय किया मैंने तर्क कैसे किया जो जो चीजों से आप मान रहे हो वो सारी चीजें

2226
02:39:10,160 --> 02:39:14,240
ईश्वर के कंट्रोल में कि उन चीजों में ईश्वर छेड़छाड़ कर सकता है तो फिर कैसे मानोगे वेरीफाई

2227
02:39:14,240 --> 02:39:18,240
कैसे करोगे मूल प्रश्न ये है ये नहीं कि सच्चिदानंद की चाह है ये तो आप मान सकते हो ये नहीं

2228
02:39:18,240 --> 02:39:22,400
मान सकते हो आप इसी पे आ रहा हूं ये नहीं मान सकते हो आप सच्चिदानंद की चाह है

2229
02:39:22,400 --> 02:39:26,560
ये बात आपका निर्णय तक कैसे पहुंचे? इस निर्णय तक पहुंचने का प्रक्रिया बताइए मुझे। कैसे पहुंचे

2230
02:39:26,560 --> 02:39:30,640
इस निर्णय तक? इस निर्णय तक पहुंचे क्योंकि मेरे अंदर से उसका आभास आता

2231
02:39:30,640 --> 02:39:34,640
है कि सच्चिदानंद की चाह है मेरे अंदर और हर जीव के अंदर आभा। आपके

2232
02:39:34,640 --> 02:39:38,800
हां हां हां इसी पे आ रहा हूं। इसी पे आ रहा हूं। तो आपके अंदर जो अंदर से आभास आता है।

2233
02:39:38,800 --> 02:39:42,800
ये आभास सच्चा है। ये बात कैसे वेरीफाई करी आपने? तो

2234
02:39:42,800 --> 02:39:46,880
यहां पर यही बात आ गई ना कि वो इसको भी बदल सकता है कि नहीं? पहली बात तो ये आ गई ना।

2235
02:39:46,880 --> 02:39:50,960
नहीं ये बदल बदलने की बात नहीं है। मैं बोल रहा हूं कि ये है ही नहीं। और भी कुछ हो सकती

2236
02:39:50,960 --> 02:39:55,360
है। बदलने की तो बात ही नहीं। तो बाद में जब [हंसी] भी और भी कुछ

2237
02:39:55,360 --> 02:39:56,160
चलो उसमें

2238
02:39:56,160 --> 02:40:00,160
चलो उसमें और भी कुछ का जवाब दे देता हूं। हालांकि यहां पे अब चर्चा तुम्हारी

2239
02:40:00,160 --> 02:40:04,240
बकवास हो गई है आपकी कुछ नहीं बचा है मगर फिर भी मैं जवाब दूंगा

2240
02:40:04,240 --> 02:40:08,320
बकवास नहीं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि आप आप भाई साहब आप बकवास ही कर रहे हैं

2241
02:40:08,320 --> 02:40:12,480
इस समय इसलिए कर रहा हूं क्योंकि आप आप चलिए मैं बकवास शब्द को वापस

2242
02:40:12,480 --> 02:40:16,480
ले लेता हूं बकवास मैं बकवास शब्द को वापस ले ले रहा हूं मैं

2243
02:40:16,480 --> 02:40:20,800
असली वापस ले रहा हूं चर्चा चल सके मैं वापस ले लेता हूं ठीक है

2244
02:40:20,800 --> 02:40:24,800
और आप क्योंकि इस समय जो

2245
02:40:24,800 --> 02:40:28,800
वो तो काफी पहले ही दूर जा चुके हैं अलंकार समाज के। मैं इस

2246
02:40:28,800 --> 02:40:32,880
समय आगे आगे बढ़ता हूं। अह हम आपने

2247
02:40:32,880 --> 02:40:38,000
कहा विपरीत हो सकती है। यह ना हो के कुछ और हो सकती है। ठीक है?

2248
02:40:38,000 --> 02:40:42,000
तो अब जब कुछ और हो सकती है तो वो

2249
02:40:42,000 --> 02:40:46,400
क्या हो सकती है? वो आप मुझे बताइए। तो आपने कहा कि विपरीत उल्टा

2250
02:40:46,400 --> 02:40:50,560
हो सकती है। तो आप यह कह रहे हैं कि हमारी चाह

2251
02:40:50,560 --> 02:40:55,120
हो सकता है ऐसी हो वास्तव में कि मैं मरना चाहता हूं।

2252
02:40:55,120 --> 02:40:59,120
ये कह रहे हैं ना आप या फिर मैं बुद्धू बनना चाहता हूं या फिर मैं

2253
02:40:59,120 --> 02:41:03,280
दुखी होना चाहता हूं। हो सकता है हमारी जो मूल चाह हो वो ये हो। ये आप कह

2254
02:41:03,280 --> 02:41:07,360
रहे हैं। हां हां हां ठीक है। तो यहां पे हमारा ये

2255
02:41:07,360 --> 02:41:11,280
डिस्कशन ये अब तक आपने ये कहा कि हो सकता है हमारी चाय ये हो सकती

2256
02:41:11,280 --> 02:41:15,280
है। जनता हमने हमारा डिस्कशन देगा। अब वो जनता डिसाइड कर लेगी। हमारी चर्चा

2257
02:41:15,280 --> 02:41:19,760
इसलिए नहीं है कि यहां से यहां पर जो है कोई निर्णय किया जाए।

2258
02:41:19,760 --> 02:41:23,760
हमारी चर्चा इसलिए है कि कोई देखे और उससे अपना लेके ज्ञान जाए। समझ गए

2259
02:41:23,760 --> 02:41:27,840
ना? यहां तक हो चुकी बात हो चुकी ना? आपका कहना

2260
02:41:27,840 --> 02:41:31,920
यह है कि हमारी चाय यह भी हो हमारी बात हमारी चाह वास्तविक

2261
02:41:31,920 --> 02:41:36,560
यह भी हो सकती है कि हम बुद्धू बनना चाहते हैं। आपके अनुसार

2262
02:41:36,560 --> 02:41:40,560
आप यह कह रहे हैं संभावना

2263
02:41:40,560 --> 02:41:44,560
सच्चिदानंद की चाह बुद्धू बनना चाह या और ऐसी कोई चाह जो हमको पता

2264
02:41:44,560 --> 02:41:48,960
ही ना हो। ऐसी जितनी भी संभावना है कुछ भी हो सकता है। कुछ भी हो सकता है। तो जब

2265
02:41:48,960 --> 02:41:53,360
तो भैया वही बात है ना जब लॉजिकली हम देखना शुरू करते हैं तार्किकता

2266
02:41:53,360 --> 02:41:57,360
से हम देखना तो हमें कोई विकल्प दूसरा मिलता ही नहीं है। और

2267
02:41:57,360 --> 02:42:01,760
जो आप विपरीत चाह बता रहे हैं जो आप विपरीत चाह बता रहे हैं सच्चिदानंद

2268
02:42:01,760 --> 02:42:05,840
के विपरीत चाह जो उसमें भी सच्चिदानंद है उसमें भी आनंद तो

2269
02:42:05,840 --> 02:42:08,480
है ना

2270
02:42:08,480 --> 02:42:12,560
भाई चाह का मतलब क्या है चाह का कि हमें

2271
02:42:12,560 --> 02:42:16,560
चाहिए क्या उस चाहने से हम संतुष्ट

2272
02:42:16,560 --> 02:42:20,720
होंगे तो आनंद तो उसके गर्भ में भी आ गया कुछ भी ले आओगे उसके गर्भ में आनंद

2273
02:42:20,720 --> 02:42:25,680
आ जाएगा हां ठीक है मैं बोल ठीक है ठीक है आपने

2274
02:42:25,680 --> 02:42:26,400
लॉजिक ये भाई

2275
02:42:26,400 --> 02:42:30,560
साहब ये ये चर्चा हो चुकी है। आप आगे आगे आगे आगे चर्चा करें। ये चर्चा

2276
02:42:30,560 --> 02:42:34,560
हो चुकी है। ये आगे चर्चा आप भाई साहब

2277
02:42:34,560 --> 02:42:38,720
आप ये चर्चा हो चुकी है। आगे चर्चा करनी है तो आप बताइए। ये

2278
02:42:38,720 --> 02:42:42,720
चर्चा हो चुकी है। आगे चर्चा करनी है पर इसको कंप्लीट तो कर दूं

2279
02:42:42,720 --> 02:42:46,800
मैं। करिए। चलिए करिए। कंप्लीट ऐसा कर देता हूं।

2280
02:42:46,800 --> 02:42:50,880
अंतवा आपने जो ये बताया कि हम इस चाह ये चाह सच्ची है। हम

2281
02:42:50,880 --> 02:42:54,880
ऐसे पहुंचे लॉजिकली हम पहुंचे। लॉजिकली का मतलब ये है कि आपने

2282
02:42:54,880 --> 02:42:59,120
संसार में सारे जीव देखे हैं और किसी जीव में भी ऐसी चाह नहीं मिली जो मूर्ख बनना चाहे जो

2283
02:42:59,120 --> 02:43:03,120
मरना चाहे एक मिनट एक मिनट

2284
02:43:03,120 --> 02:43:07,200
हेलो हां आपका मैं क्या हुआ

2285
02:43:07,200 --> 02:43:11,280
बोलिए बोलिए आपका चेहरा नहीं दिखाई दे रहा

2286
02:43:11,280 --> 02:43:15,360
मैं ये बोल रहा हूं कि हां मैं ये बोल रहा हूं कि अंत बतवा

2287
02:43:15,360 --> 02:43:19,520
ये बात निकल के आ रही है कि आपने जो है संसार में कभी भी ऐसा कोई जीव नहीं देखा होगा जो

2288
02:43:19,520 --> 02:43:23,680
मूर्ख बनना चाहे जो मरना चाहे या सच्चिदानंद उल्टा जो मैंने बताया उस

2289
02:43:23,680 --> 02:43:27,760
प्रकार का व्यवहार करना चाह सीधी बात नहीं देखा अब बात ये आती

2290
02:43:27,760 --> 02:43:31,840
है कि आपने ये निर्णय लिया कि ये जो प्रत्यक्ष था मेरा कि मैं देख रहा हूं

2291
02:43:31,840 --> 02:43:35,920
हर जीव आज जीना चाह रहा है हर जीव अनंत काल तक जीना चाह रहा है अनंत सुख भोगना चाह रहा है जितने भी

2292
02:43:35,920 --> 02:43:40,160
चाह है ये मैंने देखी ये इसका मैंने प्रत्यक्ष किया इस प्रत्यक्ष के आधार

2293
02:43:40,160 --> 02:43:41,440
पर मैंने बुद्धि पूर्वक ये

2294
02:43:41,440 --> 02:43:45,520
निर्णय किया कि इस चिदानंद की जो चाह है वो सच्ची है अल्टीमेटली ये बात

2295
02:43:45,520 --> 02:43:49,520
आ रही है तो फिर सवाल मेरा उसी पे आ जाएगा कि आपने जो बुद्धि पूर्वक प्रत्यक्ष

2296
02:43:49,520 --> 02:43:53,920
के आधार पर तर्क लगा के निर्णय किया और जिन बुद्धि

2297
02:43:53,920 --> 02:43:57,920
पूर्वक भी किया है और जिन माता पिता या गुरु गुरु

2298
02:43:57,920 --> 02:44:02,320
माता पिता के तुल्य गुरु और शास्त्र इत्यादि है उनके वचनों

2299
02:44:02,320 --> 02:44:06,400
से भी उसको लिया है। बुद्धि पूर्वक प्लस जिसमें मेरी श्रद्धा है उनसे भी

2300
02:44:06,400 --> 02:44:10,400
लिया है। जी ठीक है। ठीक है। ठीक है। तो बुद्धि पूर्वक श्रद्धा

2301
02:44:10,400 --> 02:44:14,480
और प्रत्यक्ष के आधार पर आपने तर्क पूर्ण ये निर्णय लिया कि सब जीवों की

2302
02:44:14,480 --> 02:44:18,480
ये चाह है। यानी आपने अंतत गतवा निर्णय अपनी निर्णय तो

2303
02:44:18,480 --> 02:44:22,720
बुद्धि से ले लेगा। बुद्धि के बिना निर्णय कैसा है? से श्रद्धा जिसमें

2304
02:44:22,720 --> 02:44:26,720
उसका श्रद्धा जिसमें उसकी बात माननी है वो भी एक तर्क है। हां हां वो भी

2305
02:44:26,720 --> 02:44:31,040
वो भी वो भी मान रहा हूं वो भी ले चल रहा हूं। वो आदमी इंक्लूड है उसको अलग नहीं कर रहा वो बात

2306
02:44:31,040 --> 02:44:36,000
ठीक है जल्दी करिए थोड़ा जल्दी करिए 2 घंटे 44 मिनट हो चुके हैं तो

2307
02:44:36,000 --> 02:44:40,080
हां तो अब बात ये आ रही है कि बुद्धि पूर्वक श्रद्धा से जो चीज आपने मानी है

2308
02:44:40,080 --> 02:44:44,080
अंत तो बताओ बुद्धि पूर्वक ये निर्णय लिया अब ये जो निर्णय लिया है

2309
02:44:44,080 --> 02:44:48,080
इसमें ईश्वर ने अगर छल किया तो आपके पास ये कोई तरीका नहीं है इसको पता लगाने

2310
02:44:48,080 --> 02:44:52,240
का कि ईश्वर में छल कर सकता है इस निर्णय में ये कंक्लूजन दे रहा हूं यानी कि

2311
02:44:52,240 --> 02:44:56,960
ईश्वर के छल करने की संभावना को स्वीकार करना है ना यहां पे

2312
02:44:56,960 --> 02:45:00,960
हां हां हां हां तो पहली बात तो ईश्वर

2313
02:45:00,960 --> 02:45:05,360
छल कर ही नहीं सकता। उसमें आ जाएगी वो वाली बात कि आपकी चाह जो वास्तविक चाह

2314
02:45:05,360 --> 02:45:09,440
पारमार्थिक दृष्टिकोण से मूल चाहे वो बदल सकता है कि नहीं। एक तो वो

2315
02:45:09,440 --> 02:45:13,520
वाली बात आ जाएगी कि बदल सकता है कि नहीं बदल सकता है। दूसरी बात मैं इसको इसको

2316
02:45:13,520 --> 02:45:17,840
नहीं ले जाऊंगा आगे। मैं यह कहूंगा कि अगर हमारी कुछ और

2317
02:45:17,840 --> 02:45:21,840
चाह हो सकती है। कुछ और चाह हो सकती है

2318
02:45:21,840 --> 02:45:26,640
ना जिसको बदला है ईश्वर ने।

2319
02:45:26,640 --> 02:45:30,640
हेलो हां हां हां हां हो सकती है तो मैं ये कह रहा हूं

2320
02:45:30,640 --> 02:45:34,720
वो जो भी चाह होगी उसके मूल में सच्चिदानंद फिर निकल आएगा

2321
02:45:34,720 --> 02:45:39,040
बताइए आप कोई भी चाह बताइए आप मैं उसमें आनंद निकाल दूं यानी

2322
02:45:39,040 --> 02:45:43,120
यानी अल्टीमेटली पॉइंट ये है कि अगर कोई भी विकल्प मैं दूं उसमें अल्टीमेटली सच्चिदानंद

2323
02:45:43,120 --> 02:45:47,520
निकल के आ जाएगा ठीक है ये निर्णय है आपका हम तो ये निर्णय

2324
02:45:47,520 --> 02:45:51,760
ये निर्णय आपने बुद्धि पूर्वक लिया है अबे भैया बकवास

2325
02:45:51,760 --> 02:45:56,320
मत करो ठीक है इतना घी नहीं बकवास नहीं

2326
02:45:56,320 --> 02:46:00,240
आपको अब अगले विषय पर बात करनी है।

2327
02:46:00,240 --> 02:46:06,240
अगले विषय पर बात करनी है।

2328
02:46:06,240 --> 02:46:10,560
अगले विषय पे बात करेंगे अब। आप जितने विषय

2329
02:46:10,560 --> 02:46:14,800
एक मिनट एक मिनट एक मिनट एक एक मिनट भाई साहब।

2330
02:46:14,800 --> 02:46:19,360
ठीक है आप जाइए जा सकते हैं। ये व्यक्ति अंत तक होते

2331
02:46:19,360 --> 02:46:23,600
यही लेकर के आए हैं। दो चीजें लेकर के आए थे। एक ले आए थे इनके

2332
02:46:23,600 --> 02:46:27,760
यह जो अपने से ले आए हैं। एक लेकर के आए हैं

2333
02:46:27,760 --> 02:46:32,320
क्या कहते हैं वह

2334
02:46:32,320 --> 02:46:37,680
एक लेकर के आए थे कि भैया ईश्वर पत्थर हम

2335
02:46:37,680 --> 02:46:40,160
और

2336
02:46:40,160 --> 02:46:44,400
ईश्वर पत्थर में खूब हमने इनको बता दिया कि भैया आप

2337
02:46:44,400 --> 02:46:48,400
यह कह रहे हैं कि क्या ईश्वर कोई ऐसा कार्य कर सकता है जो मैं भी नहीं जानता तो कौन सा कार्य

2338
02:46:48,400 --> 02:46:53,680
करने को कह रहे हो जब तुम जानते नहीं हो। फिर जो है

2339
02:46:53,680 --> 02:46:57,840
दूसरा इनका जो खंभा था बहुत बड़ा वह यही था कि वेदों पर विश्वास कैसे करेंगे? हमने

2340
02:46:57,840 --> 02:47:01,920
कह दिया श्रद्धा है तर्क की पराकाष्ठा है। समझा दिया वेद अपोष है

2341
02:47:01,920 --> 02:47:06,000
ये मान के हम चलते हैं। अब भैया इसमें बार

2342
02:47:06,000 --> 02:47:10,080
जब मैंने इन्होंने कहा सच्चिदानंद के विपरीत कोई इच्छा होगी। मैंने कहा उसके भी घर

2343
02:47:10,080 --> 02:47:14,560
में आनंद निकल आएगा। तो जितनी बार विपरीत करोगे उसके आनंद तो फिर ये लूप

2344
02:47:14,560 --> 02:47:19,280
बार-बार रिपीट करने का क्या मतलब है? फिर विषय को

2345
02:47:19,280 --> 02:47:21,280
बेकार की बात कोई और दूसरी बात

2346
02:47:21,280 --> 02:47:25,840
खुद स्वयं खुद स्वयं आर्य

2347
02:47:25,840 --> 02:47:29,920
समाज के आचार्यों के विरुद्ध जा रहे हैं। भैया वो जो मार रहा है वो ईश्वर नहीं

2348
02:47:29,920 --> 02:47:34,640
मार रहा है। अच्छा एक चीज और जानने को मिल रही है कि ईश्वर जो है

2349
02:47:34,640 --> 02:47:38,640
वो केवल आपको जो है वह देगा। अगला जन्म

2350
02:47:38,640 --> 02:47:43,120
उसमें ही वह आपका कर्म फल का निर्णायक है। अभी मैं यह चीजें तो लाया ही नहीं

2351
02:47:43,120 --> 02:47:48,320
क्योंकि उस पर मैं खोल रहा था जितनी बार वह एक्सटेंड कर रही थी बात कि

2352
02:47:48,320 --> 02:47:52,320
भांतिभांति प्रकार के जो भोग होते हैं वो तो व्यक्ति

2353
02:47:52,320 --> 02:47:56,480
मोक्ष में भोगता है। निश्चित रूप से भोगता है।

2354
02:47:56,480 --> 02:48:00,640
भांतिभांति प्रकार के भोग ठीक है। मगर भांतिभांति

2355
02:48:00,640 --> 02:48:05,360
प्रकार के दुख नहीं भोगता ईश्वर की इच्छा से। वहां तो भोग भुगवाता है ईश्वर।

2356
02:48:05,360 --> 02:48:09,600
मगर यहां पर दुख नहीं भोगता है। दुख आप अगर उसका

2357
02:48:09,600 --> 02:48:13,520
कोई वह है

2358
02:48:13,520 --> 02:48:18,400
क्या कहते हैं कर्म फल सिद्धांत इनका यह है कि वो उसको

2359
02:48:18,400 --> 02:48:22,640
वैसी योनि मिल जाएगी बस अगर उसको दर्द उसने किसी को दिया है

2360
02:48:22,640 --> 02:48:26,640
वो दर्द उसको दोबारा मिलेगा कि नहीं मिलेगा कोई गारंटी नहीं है ये

2361
02:48:26,640 --> 02:48:30,880
इनके ईश्वर का सिद्धांत ये इसने माना है मुझे नहीं लगता और आर्य समाझी मानते

2362
02:48:30,880 --> 02:48:35,040
होंगे ये इसने माना है जैसे किसी ना किसी को दर्द दिया

2363
02:48:35,040 --> 02:48:39,040
पिन चु हम ये मानते ये जो पिन भी अगर आपने किसी को चुबो दी ना तो

2364
02:48:39,040 --> 02:48:43,040
वो भी वो भी उस वो दर्द

2365
02:48:43,040 --> 02:48:47,200
भी आपको रिपीट में आना है। वो भी व्यास सहित हम यह मानते हैं। और यह व्यक्ति

2366
02:48:47,200 --> 02:48:51,600
क्या कह रहा है वो सिर्फ योनि दे देगा। वो उसका काम है भोगे भोगे नहीं भोगे नहीं भोगे

2367
02:48:51,600 --> 02:48:55,760
वो दर्द उसको मिला कि नहीं मिला रिपीट रिपीट रिपीटेड वो

2368
02:48:55,760 --> 02:49:00,000
कुछ नहीं पता है। मतलब इनके यहां पर क्या है जो कुछ भी यह हो रहा है

2369
02:49:00,000 --> 02:49:04,000
इसमें जीव ईश्वर का कुछ है ही नहीं क्योंकि इन्होंने जो अपना वेदों का अर्थ कर रखा है उसके

2370
02:49:04,000 --> 02:49:08,160
अनुसार ही बात करते जाएंगे। ठीक है और अंत में फिर

2371
02:49:08,160 --> 02:49:12,560
अब यह वेदों की बात लेकर आए जो श्रद्धा है मैंने जब कह दिया एक बार

2372
02:49:12,560 --> 02:49:16,720
अच्छा अंत तो श्रद्धा है भाई श्रद्धा है तरकी पराकाष्ठा है जब वो श्रद्धा

2373
02:49:16,720 --> 02:49:20,800
अपनी लाएंगे तो लोग उसमें लॉजिक देखेंगे जैसे अभी हमारी

2374
02:49:20,800 --> 02:49:24,960
आपकी बातों पे देख रहे हैं अच्छा फिर जब मैंने कह दिया वो लोग डिसाइड अच्छा

2375
02:49:24,960 --> 02:49:28,560
लोग डिसाइड करेंगे तो वो बार-बार अपनी वो वाली बात को छोड़

2376
02:49:28,560 --> 02:49:32,560
लेके जाना चाहता है कि वो ये अतवा तुम्हारी श्रद्धा है तो ठीक

2377
02:49:32,560 --> 02:49:37,040
है तुम यही मेरी श्रद्धा तार्किक िक चीजों में है कि अतार्किक

2378
02:49:37,040 --> 02:49:41,040
चीजों में ये तय करेगी जनता और जिसका पक्ष मजबूत होगा उसको उसको फॉलो किया

2379
02:49:41,040 --> 02:49:44,060
जाएगा। लो

2380
02:49:44,060 --> 02:49:49,040
[खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] जी पाड़ी जी जय श्री राम जय श्री राम हर हर महादेव

2381
02:49:49,040 --> 02:49:54,000
जी कैसे हो

2382
02:49:54,000 --> 02:49:59,200
आवाज आ रही बस कृपा है कृपा है ये कौन है चर्चा

2383
02:49:59,200 --> 02:50:03,920
बहुत अच्छी रही और लास्ट में आते-आते वो

2384
02:50:03,920 --> 02:50:08,000
बोलते हैं ना वही खिचड़ी पक गई फिर खिचड़ी नहीं मैं

2385
02:50:08,000 --> 02:50:12,240
मैं असल में यह जो रूप होता है ना मूर्ख ता वाला रूप यह

2386
02:50:12,240 --> 02:50:16,400
समाज के समक्ष लाना चाहता हूं। इसलिए मैंने कहा कि भाई विपरीत चीज बताओ। तो

2387
02:50:16,400 --> 02:50:20,880
जब सच्चिदानंद की विपरीत चीजें निकालेंगे तो अगर सत्य का मतलब अमरता

2388
02:50:20,880 --> 02:50:24,880
है। यानी व्यक्ति मरना चाहता है तो फिर भाई लोग पीटेंगे ताली इस बात पे

2389
02:50:24,880 --> 02:50:28,880
कि आर्य समाज को माना जाए कि ना माना जाए। कि जीव की वास्तविक चाय ये भी हो

2390
02:50:28,880 --> 02:50:32,880
सकती है। संभावित जी है ना? हम तो कह

2391
02:50:32,880 --> 02:50:36,880
रहे हैं विकल्प है ही नहीं। ये कह रहे हैं विकल्प है। यह कह रहे हैं ना विकल्प का

2392
02:50:36,880 --> 02:50:41,120
अस्तित्व है। हम नहीं कह रहे विकल्प का अस्तित्व है। और जब जिस फिर विकल्प

2393
02:50:41,120 --> 02:50:43,840
का अस्तित्व ही नहीं है तो ईश्वर वो चाह को वो चाह

2394
02:50:43,840 --> 02:50:48,640
को बदलने वाली बात फिर वो वही वाली बात हो जाएगी शून्य क्रिया वाली अभाव आप क्रिया

2395
02:50:48,640 --> 02:50:51,120
है ना

2396
02:50:51,120 --> 02:50:55,120
जी। आज भी बहुत से जगह वही हुआ

2397
02:50:55,120 --> 02:50:59,200
जो आधुनिक युग के वैदिक वैज्ञानिक क्या है हमारे

2398
02:50:59,200 --> 02:51:03,680
अग्निवरत जी के जैसाई इन्होंने दो-तीन

2399
02:51:03,680 --> 02:51:07,760
जगह अपनी बात को बदला बहुत जगह पहले कुछ

2400
02:51:07,760 --> 02:51:11,840
कहा [गला साफ़ करने की आवाज़] उसके बाद उसमें कुछ और ऐड किया फिर कुछ और ऐड किया लास्ट में

2401
02:51:11,840 --> 02:51:15,920
जो पहली वाली जो बात कही थी उसको हटा ही दिया और वो लास्ट वाली बात

2402
02:51:15,920 --> 02:51:20,000
को आपके सामने समक्ष रखा एक दूसरी बात ये कह

2403
02:51:20,000 --> 02:51:24,000
रहा है कि ये कह रहा एक एक व्यक्ति यह कह रहा है देखो कि

2404
02:51:24,000 --> 02:51:28,000
इसने जो यह किया वह किया अब पगले उसने कई जगह आर्य समाज के

2405
02:51:28,000 --> 02:51:32,000
सिद्धांतों को छोड़ दिया है मगर तुम्हें इससे मतलब नहीं

2406
02:51:32,000 --> 02:51:36,160
है कि आर्य समाज के सिद्धांत जीते कि नहीं जीते तुम्हें इससे मतलब

2407
02:51:36,160 --> 02:51:40,160
है कि कोई भी बकलोल कोई भी बकवास करने वाला व्यक्ति आकर के कुछ भी

2408
02:51:40,160 --> 02:51:44,160
कर गया और अगर वो कर गया और उसमें तुम ऐसा सोच रहे हो कि

2409
02:51:44,160 --> 02:51:48,400
तुम्हें लग रहा है कि वह विजय हो गया तो वो आर्य समाजी है। आर्य समाजी जितना

2410
02:51:48,400 --> 02:51:52,560
यह जरूरी नहीं है। जो जीतेगा वही आर्य समाजी है। भले ही वह अद्वैती बन के जीत जाए,

2411
02:51:52,560 --> 02:51:57,440
भले ही वह पागल बनके जीत जाए। है ना? अच्छा

2412
02:51:57,440 --> 02:52:01,120
जी जी। अच्छा उस

2413
02:52:01,120 --> 02:52:05,200
दिन अग्निव्रत जी ने ईश्वर छल करता है। ये स्वीकार किया

2414
02:52:05,200 --> 02:52:07,360
था।

2415
02:52:07,360 --> 02:52:11,440
उल्कापिंड गिर के मरा मारा। ये

2416
02:52:11,440 --> 02:52:16,080
स्वीकार किया था उन्होंने। ईश्वर का कार्य है। मृत्यु मृत्यु देना।

2417
02:52:16,080 --> 02:52:20,080
ये छल है। ये ये स्वीकार किया था उन्होंने। नहीं छल

2418
02:52:20,080 --> 02:52:24,720
नहीं स्वीकार किया था वो तो बात ही नहीं हो पाई मगर उल्कापिंड गिरने के विषय में स्वीकार किया दोनों

2419
02:52:24,720 --> 02:52:29,360
आपने कहा था ना कि ये छल हुआ ना उसके साथ तो उन्होंने स्वीकार नहीं किया

2420
02:52:29,360 --> 02:52:33,360
छल नहीं है तो लास्ट में जातेते ये आर्य समाज के

2421
02:52:33,360 --> 02:52:37,520
विरुद्ध भी चला गया है कि हां वो छल कर रहा है हां

2422
02:52:37,520 --> 02:52:41,520
और क्या बात और वो ये कह रहा है

2423
02:52:41,520 --> 02:52:45,680
ईश्वर ने एक बार सृष्टि चालू कर दी है उसके बाद ईश्वर का कुछ कार्य नहीं है फिर

2424
02:52:45,680 --> 02:52:49,680
ये भी कह रहा है कि ईश्वर ही करवा रहा है क्योंकि ईश्वर ने वैज्ञानिक नियमों को धारण कर रखा है।

2425
02:52:49,680 --> 02:52:53,840
मतलब वो करवा रहा है ना, कार्य कर रहा है ना वहां पे। मगर वो वो जब बच्चा मर

2426
02:52:53,840 --> 02:52:58,080
रहा है उसके कारण वो जब मार रहा मर रहा है बच्चा तो वहां पर जो है उसका कुछ ये सोचना

2427
02:52:58,080 --> 02:53:03,120
नहीं है कि इसको पूर्व जन्मों के कर्मों का फल मिल रहा है कि नहीं मिल रहा। अच्छा अब सोचिए

2428
02:53:03,120 --> 02:53:07,280
कि जो बच्चा सुनामी की वजह से मर गया। ठीक है? उस

2429
02:53:07,280 --> 02:53:11,440
बच्चे को अभी-अभी अभी-अभी जन्म दिया है ईश्वर ने वो शरीर

2430
02:53:11,440 --> 02:53:15,440
में आया। क्यों दिया भाई? जहां पर सुनामी आने वाली है।

2431
02:53:15,440 --> 02:53:16,400
जी

2432
02:53:16,400 --> 02:53:20,560
जहां पर सुनामी आने वाली है वह विज्ञान के नियमों को धारण कर रखा है। उसको मालूम

2433
02:53:20,560 --> 02:53:24,800
है यहां पर सुनामी आने वाली है। तो उसने क्यों दिया बच्चे को वहां पर जन्म?

2434
02:53:24,800 --> 02:53:28,960
क्या कहोगे इसको? वो तो ऐसी जगह जन्म देगा

2435
02:53:28,960 --> 02:53:33,040
ना जहां पर वो आयु भोग सके। और ये सुनामी जहां पर

2436
02:53:33,040 --> 02:53:37,120
सुनामी आने वाली है वहीं पर बच्चे को जन्म क्यों देगा? फिर आयु कहां रह गई उसमें?

2437
02:53:37,120 --> 02:53:41,360
कि इतनी आयु होती है उसकी। यानी वह अंधे में देगा

2438
02:53:41,360 --> 02:53:45,520
जन्म कि भैया तू यहां चला जा अपने मन से। वहां सुनामी आ गई। मर

2439
02:53:45,520 --> 02:53:49,600
गया। बच्चे ने कुछ नहीं किया। वो आया वो मर

2440
02:53:49,600 --> 02:53:54,240
गया। ये इनका ईश्वर है आर्य समाज जी का। जी बोलिए।

2441
02:53:54,240 --> 02:53:58,320
जी। सबसे ज्यादा वो ये व्यक्ति कहां पर फंसा है? जिस समय आपने

2442
02:53:58,320 --> 02:54:02,880
कहा कि वेद कि वो चार ऋषियों को

2443
02:54:02,880 --> 02:54:06,960
ज्ञान दिया। वो किस लिए? शिक्षा का परवाह करने के

2444
02:54:06,960 --> 02:54:12,960
लिए। वहां पर ये बहुत तगड़े तरीके से फसा है यह व्यक्ति

2445
02:54:13,280 --> 02:54:17,280
और ऐसा ऐसा होता है मैंने एक शिक्षा हासिल

2446
02:54:17,280 --> 02:54:21,920
की थी कि भैया

2447
02:54:21,920 --> 02:54:26,480
सिद्धांतवादी व्यक्ति से जीतना आसान

2448
02:54:26,480 --> 02:54:30,560
है मगर सिद्धांत विहीन से जितना मुश्किल है। समझ

2449
02:54:30,560 --> 02:54:34,800
रहे हो? जैसे नंगे नंगा होता है ना नंगा जो नंगा

2450
02:54:34,800 --> 02:54:39,120
ही करने लगे। मान लो एक होता है ना शब्द नंगा नंगपन

2451
02:54:39,120 --> 02:54:45,120
जी जी तो उससे आप कैसे जीतोगे जो कपड़े उतार के फाड़ के चिल्लाने लगेगा

2452
02:54:46,400 --> 02:54:50,720
हां तो वो वाली बात है कि जिसके सिद्धांत ही नहीं है

2453
02:54:50,720 --> 02:54:54,720
वो अपने हर सिद्धांत को बदल दे रहा है उसका उसका उद्देश्य यहां

2454
02:54:54,720 --> 02:54:58,800
पर किसी सत्य का अनुसंधान या किसी सत्य की स्थापना नहीं है ना ही आर्य समाजी

2455
02:54:58,800 --> 02:55:02,880
पक्ष की स्थापना है उसका उद्देश्य है कि मैं ऐसी कैसे एन केन प्रकार

2456
02:55:02,880 --> 02:55:06,960
बातें करूं कि जिससे कि यह दिखाई दे कि भैया इसके पास उत्तर नहीं है

2457
02:55:06,960 --> 02:55:11,040
और इनके पास कोई उत्तर नहीं है। हमारी बात का हर चीज मान ले रहे हैं। डिपेंड है डिपेंड

2458
02:55:11,040 --> 02:55:15,040
है। डिपेंड है। बिल्कुल लास्ट लास्ट में करी

2459
02:55:15,040 --> 02:55:19,200
ना उसने बिल्कुल ना जिसका सर ना पाव ये खुद अपनी आंखों से देखता है

2460
02:55:19,200 --> 02:55:23,440
संसार में कि कोई जीव मरना हमें यही हमें जो इसने

2461
02:55:23,440 --> 02:55:27,440
अंत में ये बातें की है यही रूप दिखाना हमारा उद्देश्य है। चर्चाओं का

2462
02:55:27,440 --> 02:55:31,440
उद्देश्य यही है कि आदमी इतना इतने उस पर आए लेवल पे

2463
02:55:31,440 --> 02:55:35,440
ऐसी बातें करने लग जाए। जी बोलिए बोलिए

2464
02:55:35,440 --> 02:55:40,480
हां तो ये जो लास्ट में जो इसने कहा कि जो सतचिदानंद

2465
02:55:40,480 --> 02:55:44,720
की जो प्यास है उसके विपरीत भी उसकी प्यास हो सकती है पर यह व्यक्ति

2466
02:55:44,720 --> 02:55:48,960
अपनी निजी लाइफ में भी रोज देख रोजाना देखता होगा कि एक व्यक्ति

2467
02:55:48,960 --> 02:55:53,360
अगर लास्ट घड़ी में भी पहुंचा है फिर भी उसको हॉस्पिटल ले जाते उसको हॉस्पिटल

2468
02:55:53,360 --> 02:55:57,440
दवाई खाता है आपने देखा होगा उसने

2469
02:55:57,440 --> 02:56:01,520
देखा होगा फिर भी वो एक उतर के दे रहा है हम

2470
02:56:01,520 --> 02:56:05,840
देखने के बाद भी तो वही तो मैं कह रहा हूं कि अब जैसे

2471
02:56:05,840 --> 02:56:10,000
हम कहे कि भैया दुनिया के समस्त ईश्वरों के अंदर जो है वो समस्त

2472
02:56:10,000 --> 02:56:14,400
जीवों के अंदर ईश्वर ने चाह बदल दी होगी तो ये तो वही आ गया ना

2473
02:56:14,400 --> 02:56:18,480
स्वभाव वो वो वाला कार्य अभाव शून्य क्रिया वाला मैं वो भी बोल

2474
02:56:18,480 --> 02:56:22,480
रहा हूं तब भी उसको समझ में नहीं आ रहा है अभाव क्रिया भी सिद्ध हो रही है उसका

2475
02:56:22,480 --> 02:56:26,480
विकल्प भी असिद्ध हो रहा है और यह भी सिद्ध हो रहा है कि जब भी तुम कुछ बोलोगे तो

2476
02:56:26,480 --> 02:56:30,640
उसमें सच्चिदानंद ही निकलेगा आनंद अनंतानंद अनंतानंद

2477
02:56:30,640 --> 02:56:34,720
चाहिए जो भी चाहिए इसके विपरीत और अनंतानंद को भोगने के लिए अनंत

2478
02:56:34,720 --> 02:56:38,800
ज्ञान चाहिए। अनंत ज्ञान को धारण करने के लिए अनंत अपना अस्तित्व चाहिए। हो गया

2479
02:56:38,800 --> 02:56:42,880
सच्चिदानंद तीनों बिल्कुल बिल्कुल जो तुम चाह रहे

2480
02:56:42,880 --> 02:56:47,280
हो जब तुम्हें वो चीज मिल गई तो आनंद तो आएगा। अगर तुम मूर्ख बना

2481
02:56:47,280 --> 02:56:51,360
रहने मूर्ख बने रहने की चाह है और वो तुम्हें मिल गई

2482
02:56:51,360 --> 02:56:55,360
तो उसमें भी आनंद ही है। एक भटकती आत्मा

2483
02:56:55,360 --> 02:56:59,440
बहुत दिनों से देख रहा हूं। विजय कुमार नाम की वो बड़े परेशान रहता है। हर

2484
02:56:59,440 --> 02:57:04,220
वीडियो पे इधर-उधर जाकर के कमेंट करता है। हां शास्त्र जी जय श्री राम।

2485
02:57:04,220 --> 02:57:08,480
[गला साफ़ करने की आवाज़] जय श्री राम भैया। जय श्री राम।

2486
02:57:08,480 --> 02:57:12,800
ये व्यक्ति बड़ा ये वाला ये व्यक्ति बहुत बुरी तरह फंसा है। जब

2487
02:57:12,800 --> 02:57:16,800
कर्मफल सिद्धांत पे आप उसको पटके बढ़िया से

2488
02:57:16,800 --> 02:57:21,120
वो बोलता है कि कर्मफल क्या है? जाति आयु भोग

2489
02:57:21,120 --> 02:57:25,600
और आयु में फंस गया। बोलता है कि आयु

2490
02:57:25,600 --> 02:57:29,760
पहले से जो है उस फस गया [गला साफ़ करने की आवाज़] ना वो आयु

2491
02:57:29,760 --> 02:57:35,760
पे आयु वो क्लियरली नहीं बोल पा रहा है मेरा आवाज

2492
02:57:36,000 --> 02:57:40,000
मतलब ईश्वर केवल जन्मांतर में आपको उचित योनि दे देता है

2493
02:57:40,000 --> 02:57:44,080
बाकी आपको वो कष्ट मिलेगा कि नहीं मिलेगा जो आपने दूसरों को दिया है यह

2494
02:57:44,080 --> 02:57:48,240
बात समझ लीजिए आज हम एक चींटी को मारते तो हम कहते हैं कि जिसका फल तुम्हें

2495
02:57:48,240 --> 02:57:52,400
मिलेगा ये जो दर्द है तुम्हें मिलेगा जरूरी नहीं है वो योनि

2496
02:57:52,400 --> 02:57:56,640
में गया वो दर्द मिला कि नहीं मिला कोई डजंट मैटर यह इनके

2497
02:57:56,640 --> 02:58:00,720
हिसाब से हालांकि मुझे नहीं पता कि आर्य समाजियों का सिद्धांत है कि नहीं वो कुछ भी बोल रहा था

2498
02:58:00,720 --> 02:58:04,960
वो लड़का नहीं नहीं ये रामपाल के रामपाल

2499
02:58:04,960 --> 02:58:09,040
का छोटे भाई हैं पता है ना कि वो उनके जो

2500
02:58:09,040 --> 02:58:13,280
समय-समय पर सिद्धांत बदलते रहते हैं कभी वो

2501
02:58:13,280 --> 02:58:17,440
आपके सिद्धांत पकड़ लेंगे खुद को सही करने के लिए कभी इस्लाम के सिद्धांत

2502
02:58:17,440 --> 02:58:21,680
पकड़ लेंगे सेम इनका भी यही है और कुछ अभी आप देखो अभी आप देखो

2503
02:58:21,680 --> 02:58:26,400
अभी मेरा ब्रह्मास्त्र तो मैंने खोला ही नहीं था।

2504
02:58:26,400 --> 02:58:30,480
ब्रह्मास्त्र तो अभी निकाला ही नहीं है। पहले मैं इनहीं को

2505
02:58:30,480 --> 02:58:31,840
देख ले रहा हूं कि भैया ये जो

2506
02:58:31,840 --> 02:58:36,080
बोल रहे हैं मेरा क्या होता है कि सामने वाला जो क्लेम कर रहा है ना केवल उसी

2507
02:58:36,080 --> 02:58:40,240
बात पर अटके रहो जो वो क्लेम कर रहा है।

2508
02:58:40,240 --> 02:58:45,280
अपने पास तो है ही है। फिर वो ब्रह्मास्त्र भी निकाला ही नहीं था। सृष्टि रचना

2509
02:58:45,280 --> 02:58:50,560
ईश्वर का धक्का पुष्प पोल ये सब तो अभी हुआ ही नहीं।

2510
02:58:50,560 --> 02:58:55,200
है ना? उससे पहले ही व्यक्ति अपना डामाडोल हो गया।

2511
02:58:55,200 --> 02:58:59,200
नहीं शुरू शुरू में बहुत अच्छी चर्चा चल रही थी। वो तर्कों के साथ ही चल

2512
02:58:59,200 --> 02:59:03,360
रहे थे। पर अंतिम में आतेआते पूरा मतलब कि खिचड़ी पका दी।

2513
02:59:03,360 --> 02:59:07,680
एक जगह नहीं टिके वो। सही कहेंगे क्योंकि सही को निष्पक्ष

2514
02:59:07,680 --> 02:59:11,680
तरीके से दूसरी बात। दूसरी बात ये भी है कि किसी विषय पे हम लोग बात कर रहे।

2515
02:59:11,680 --> 02:59:16,160
एक दो बार हमने बात कर ली। अब उसमें बार-बार इस तरीके से

2516
02:59:16,160 --> 02:59:20,560
वो करना कि भैया मतलब श्रद्धा ही है ना।

2517
02:59:20,560 --> 02:59:25,120
मतलब समझ रहे हो आप? अपनी बात को बड़ी जैसा प्रस्तुत करना करने का प्रयास दिखाना

2518
02:59:25,120 --> 02:59:29,200
वहां पर बार-ब भाई मैंने जब यह कह दिया चलो ठीक है तुम्हारी और

2519
02:59:29,200 --> 02:59:33,280
मेरी बात सुन ली लोगों ने। अब आगे बात करो अब भैया मैं पूछता हूं प्रश्न

2520
02:59:33,280 --> 02:59:37,360
ईश्वर धक्का मैं तब तक नहीं मुझे तो यही क्योंकि

2521
02:59:37,360 --> 02:59:43,280
वो उनके पास पिछली चर्चा में भी यही था। पिछली चर्चा में

2522
02:59:43,280 --> 02:59:46,640
क्या कहते हैं? ये

2523
02:59:46,640 --> 02:59:47,140
क्या

2524
02:59:46,880 --> 02:59:51,280
कहते हैं? क्योंकि पर अटक गए थे। क्या ईश्वर ऐसा पत्थर

2525
02:59:51,280 --> 02:59:55,520
बना सकता है इसको स्वयं नहीं उठा सकता। और फिर इसी मैंने जब अभाव क्रिया

2526
02:59:55,520 --> 02:59:59,680
कहा, शून्य क्रिया कहा उसके बाद करते करते फिर वो रिपीटेटिवली

2527
02:59:59,680 --> 03:00:03,760
शून्य क्रिया का ही दूसरा उदाहरण ले आए कि ईश्वर ऐसा कर सकता है। ईश्वर वैसा कर सकता

2528
03:00:03,760 --> 03:00:07,760
है। दूसरा उदाहरण भाई जब एक विषय पर बात हो गई है और उस

2529
03:00:07,760 --> 03:00:11,840
पर हम लोग अभी ये कर रहे हैं भैया यहां तक चर्चा देखी सबने। आगे वो देखेंगे।

2530
03:00:11,840 --> 03:00:15,840
अब अगला प्रश्न किया जाए तो वो जो है दूसरे उदाहरण

2531
03:00:15,840 --> 03:00:20,800
वही तब भी ऐसे ही समाप्त हुई थी चर्चा। आज भी वही हुआ।

2532
03:00:20,800 --> 03:00:24,880
जी मुझे लग रहा है कि उनको फील हो गया था कि नहीं कहीं ना कहीं मैं

2533
03:00:24,880 --> 03:00:28,960
मैंने कुछ गलत बोल दिया या कुछ गलत तरीके से मैंने कुछ पेश कर दिया तो

2534
03:00:28,960 --> 03:00:33,120
उसी को जस्टिफाई करने के लिए बार-बार उस विषय को घुमा

2535
03:00:33,120 --> 03:00:37,440
रहे थे। वो मुझे ऐसा लगा। हम [गला साफ़ करने की आवाज़]

2536
03:00:37,440 --> 03:00:42,240
कुल मिलाकर के अगर आर्य समाज को जीतना है तो उसे आना पड़ेगा ऐसे

2537
03:00:42,240 --> 03:00:46,400
कि पहले तो वो क्या कहते हैं ये वो विकल्प ढूंढेगा कि

2538
03:00:46,400 --> 03:00:50,480
सच्चिदानंद के विपरीत भी कोई चाह है हो सकती है जो ईश्वर

2539
03:00:50,480 --> 03:00:54,480
दे सकता है जबकि सच्चिदानंद के विपरीत कोई चाह

2540
03:00:54,480 --> 03:00:58,480
का अस्तित्व है ही नहीं तो देना अभाव क्रिया हो जाएगा फिर वही ईश्वर का

2541
03:00:58,480 --> 03:01:03,300
देना सिद्ध होगा कि नहीं होगा ये है इनका अंत

2542
03:01:03,300 --> 03:01:07,600
[हंसी] लास्ट का बिल्कुल भैया आर्य समाज के सिद्धांत को

2543
03:01:07,600 --> 03:01:13,040
जोड़ दिया उसने। जी बोले पहाड़ी जी

2544
03:01:13,040 --> 03:01:17,280
जी मतलब कि अंतिम में आके आतेआते कॉमेडी हो गई कि

2545
03:01:17,280 --> 03:01:21,840
कोई मूर्ख बना रहना चाहता है। मतलब कि

2546
03:01:21,840 --> 03:01:26,000
कुल मिला के लास्ट में तर्क खत्म हो गए तो कुतर्क में आ गए। फिर

2547
03:01:26,000 --> 03:01:30,640
ठीक है। ठीक है शास्त्रवाद जी आप बोलिए। जी जी

2548
03:01:30,640 --> 03:01:34,640
जी मैं तो वो बोल रहा हूं जब वो साधारण कारण पे आ गया था। जीव को लेकर

2549
03:01:34,640 --> 03:01:38,800
के साधारण कारण को जिसका वो प्रमाण भी नहीं दे सका

2550
03:01:38,800 --> 03:01:43,840
अच्छे से हम वो वस्तु को जीव

2551
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को वस्तु बता रहा है। हां और मैं उसको बोल रहा हूं मैं भाई

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03:01:48,240 --> 03:01:52,640
चेतना युक्त व्यवहारिक संसार की बात कर रहा हूं। तुम बार-बार सृष्टि रचना वो जो

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केवल जड़ रूप में सृष्टि का निर्माण क्यों बता रहे हो? या तो तुम कह दो कि सृष्टि

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रचना चेतना युक्त व्यवहार नहीं है। सृष्टि रचना

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03:02:00,880 --> 03:02:04,880
केवल जड़ जैसा एक व्यवहारिक ढांचा खड़ा हो जाना है। बोल दो फिर आगे चीजें

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उससे खुलें। ये बात है। ठीक है। सभी को चर्चा

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03:02:08,880 --> 03:02:13,760
अच्छी लगी हो बताएं कैसी लगी। और परिश्रम

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03:02:13,760 --> 03:02:18,000
किया था व्यक्ति ने। मगर उसकी दिशा में वही था। वहां तैयारी

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03:02:18,000 --> 03:02:18,640
उसकी वही

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03:02:18,640 --> 03:02:22,720
थी कि भाई कोई सिद्धांत सिद्ध नहीं करना है। केवल

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03:02:22,720 --> 03:02:26,800
इसको जो है शिवश नारायण द्विवेदी को ही दिखाना है। भैया तुम

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03:02:26,800 --> 03:02:30,800
गलत हो बस ना तो आर्य समाज को सिद्ध करना ना कुछ और

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03:02:30,800 --> 03:02:34,800
ठीक है शास्त्रवा जी कुछ कहना हो तो यही तो यही तो इन लोगों का रहता है

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03:02:34,800 --> 03:02:39,680
भैया आप इन लोगों के लिए वो कांटा बन चुके हैं कि जिसको हटाना है मार्ग से

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03:02:39,680 --> 03:02:43,680
तो वो आपके ऊपर ही वो करते हैं कि उनको अपने

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03:02:43,680 --> 03:02:47,920
अपने ही सिद्धांत से कोई मतलब नहीं रहता है वो आ के जो तो बोल के चल जाएंगे

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03:02:47,920 --> 03:02:52,000
आपके ऊपर जो भी है वो बोल के चल जाएंगे और अपने

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03:02:52,000 --> 03:02:56,080
आप को जीता हुआ समझेंगे या फिर हारा जबकि वास्तविकता क्या

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03:02:56,080 --> 03:03:00,240
जनता सब स्वयं बता देगी। [हंसी] ये

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03:03:00,240 --> 03:03:04,560
देखो एक शैतानगिरी में स्नातक बनो। ये सब इनके श्राप

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03:03:04,560 --> 03:03:08,800
चल रहे हैं। श्राप को मानते हैं क्या ये? आर्य

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03:03:08,800 --> 03:03:13,840
समाज नहीं। [हंसी] अच्छा अच्छा

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03:03:13,840 --> 03:03:19,600
इन लोगों के मोक्ष पे भी अच्छे खासे बात हो सकते हैं। इन लोगों का मोक्ष तो कुछ है ही नहीं।

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03:03:19,600 --> 03:03:24,480
भोग भी काम मिलाकर कुल मिलाकर अंत में आर्य समाज को नास्तिक

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03:03:24,480 --> 03:03:29,040
नास्तिक बनना पड़े बनना पड़ा। ये वाली बातें सच्चिदानंद

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03:03:29,040 --> 03:03:33,280
के खिलाफ जा सकता है और ये सब नास्तिकता वाली बात है ना।

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03:03:33,280 --> 03:03:34,160
चलिए

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03:03:34,160 --> 03:03:38,160
बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल ठीक है। और एक

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03:03:38,160 --> 03:03:42,160
और एक और हां एक और बात एक और बात है भैया

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03:03:42,160 --> 03:03:46,240
जब वो अभाव क्रिया को लेके आ रहा था और अभाव क्रिया को बोल रहा था ये

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03:03:46,240 --> 03:03:50,320
क्रिया है कि नहीं है? है है बोल रहा है उसको खुद नहीं पता है

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03:03:50,320 --> 03:03:54,320
कि भाई असंभव क्रिया और क्रिया शून्य क्या होता है शून्य क्रिया

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03:03:54,320 --> 03:03:58,560
जब आपने दो बार उसे बता दिया फिर भी उसी बात पे अटका नहीं असंभव है असंभव

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03:03:58,560 --> 03:04:02,640
है असंभव है जबकि भाई जो क्रिया हो वो ना हो सके उसे असंभव कहते हैं

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03:04:02,640 --> 03:04:06,880
पर जो क्रिया का अस्तित्व ही नहीं है वो उसमें करना ही कुछ नहीं है तो फिर शून्य

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03:04:06,880 --> 03:04:10,960
क्रिया ही होती है यही तो बात है लेकिन ये समझते नहीं हो ये लोग को

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03:04:10,960 --> 03:04:15,040
ये दिखाना है कि भाई आपका पे सर्वशक्तिता का सिद्धांत कमजोर है बस इतना ही दिखाना है

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03:04:15,040 --> 03:04:20,400
उसके लिए जो करेंगे कुतर्क हां कुतर्क करते रहेंगे और कुछ नहीं

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03:04:20,400 --> 03:04:24,480
चलिए ठीक है जय श्री राम सभी को जी

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03:04:24,480 --> 03:04:29,630
जय श्री राम विजय कुमार क्या कह रहा है देखो शिवश आप हो गलत

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03:04:29,630 --> 03:04:33,840
[हंसी] इसको रात में नींद नहीं आती लग रहा है इसको बिल्कुल

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03:04:33,840 --> 03:04:37,920
बिल्कुल कैसे नींद आएगी आज आज की जो धुलाई हुई है उसकी उसको देख के

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03:04:37,920 --> 03:04:42,400
आज तो इसको नींद आने वाली नहीं है ऐसे भी

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03:04:42,400 --> 03:04:45,760
चलिए जय श्री राम

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03:04:45,760 --> 03:04:51,760
जय श्री राम

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03:05:12,200 --> 03:05:16,200
[संगीत]
