1
00:00:02,520 --> 00:00:08,520
तो सभी को जय श्री

2
00:00:09,880 --> 00:00:13,880
राम आर्य समाज की ओर से एक सज्जन आने वाले हैं

3
00:00:13,880 --> 00:00:18,080
व अभी तक जवाइन नहीं किया है उन्होने लिंक हमने

4
00:00:18,080 --> 00:00:24,080
उन्हें दे दिया है

5
00:00:24,600 --> 00:00:28,800
और आप सब लोग जितना

6
00:00:28,800 --> 00:00:32,920
हो सके यथा सामर्थ नाम जप अभियान से अवश्य

7
00:00:32,920 --> 00:00:37,600
जुड़े ऑपरेशन नाम जप नामा स्त्र

8
00:00:37,600 --> 00:00:41,600
समय आ गया है कि जो कलयुग में हमें भगवान की

9
00:00:41,600 --> 00:00:45,680
ओर से सबसे बड़ा शस्त्र मिला है

10
00:00:45,680 --> 00:00:49,880
उसको धारण करें उसका उपयोग करें धर्म संस्थापन

11
00:00:49,880 --> 00:00:54,080
के लिए अपने व्यक्तिगत उत्थान के लिए भौतिक

12
00:00:54,080 --> 00:00:58,360
उत्थान के लिए आध्यात्मिक उत्थान के लिए सभी

13
00:00:58,360 --> 00:01:00,880
प्रकार के

14
00:01:00,880 --> 00:01:04,960
जितने भी आपके उद्देश्य हो सकते हैं

15
00:01:04,960 --> 00:01:09,040
मनोकामनाएं हो सकती हैं जो आपके हित में हो उन

16
00:01:09,040 --> 00:01:13,200
सबके लिए हम सबको मिलकर

17
00:01:13,200 --> 00:01:17,800
के यह शस्त्र यह अस्त्र उठाना

18
00:01:17,800 --> 00:01:21,960
है और इस तरह से हमारा

19
00:01:21,960 --> 00:01:27,960
संगठन का बल भी निर्मित होगा जो दूसरा घटक

20
00:01:28,000 --> 00:01:32,560
है अगर आपने फ भरा है तो आपको

21
00:01:32,560 --> 00:01:36,680
अवश्य ही कल से जो प्रारंभ हो रहा है

22
00:01:36,680 --> 00:01:41,240
सुबह से तो आपको अवश्य ही उससे जोड़ दिया जाएगा

23
00:01:41,240 --> 00:01:46,520
आप उसके लिए निश्चिंत रहिए थोड़ा सा संसाधनों

24
00:01:46,520 --> 00:01:50,640
का कर्मठ लोगों का

25
00:01:50,640 --> 00:01:54,720
अभाव होता है तो उसके चलते थोड़ा सा ऊपर

26
00:01:54,720 --> 00:01:58,760
नीचे होता रहता है इस विषय में आपसे अपेक्षा

27
00:01:58,760 --> 00:02:01,920
है कि

28
00:02:01,920 --> 00:02:06,880
आप इसको अन्यथा ना लेते हुए इसमें सहयोग की भावना रखेंगे

29
00:02:06,880 --> 00:02:12,120
धैर रखेंगे लिंक आपको मिलेगा 7483

30
00:02:12,120 --> 00:02:16,120
869 यहां पर

31
00:02:16,120 --> 00:02:20,240
अच्छा तब तक हम कुछ और बात कर लेते हैं जब तक य आर

32
00:02:20,240 --> 00:02:26,240
समाज के सज्जन आ रहे हैं या नहीं आ रहे तब तक

33
00:02:26,800 --> 00:02:31,440
एक रियल इंटेंशन नाम के व्यक्ति हैं

34
00:02:31,440 --> 00:02:35,480
जिनको निरुक्त में कहीं पर यास्का चार्य जी का एक कथन मिल

35
00:02:35,480 --> 00:02:39,840
गया कि जब तुम्हारा कोई गुरु नहीं होगा तो तुम्हारा गुरु तुम्हारा तर्क

36
00:02:39,840 --> 00:02:44,640
होगा इसका आलंबन लेते हुए वह हमारे इस प्रश्न का

37
00:02:44,640 --> 00:02:49,200
उत्तर देने का प्रयास करते हैं उनको ऐसा लगता है स्वांता सुखाए के लिए

38
00:02:49,200 --> 00:02:53,520
उनको ऐसा लगता है कि जब हम उनका गुरु पूछेंगे

39
00:02:53,520 --> 00:02:57,640
उनसे आमने सामने वैसे संभवत व आ नहीं पाएंगे हमने कई

40
00:02:57,640 --> 00:03:01,880
बार उनको प्रयास किया कि आइए उन्होंने भी किया मगर उन्होंने अपने

41
00:03:01,880 --> 00:03:06,000
कुछ जानकारी वाले चैनलों पर बुलाने का वो किया

42
00:03:06,000 --> 00:03:10,600
जिस पर हमें जाना उचित नहीं दिखा हम हमारी ओर से भी उनको सुझाए

43
00:03:10,600 --> 00:03:14,720
गए कि आप यहां पर आ जाइए मध्यस्थ चैनल पर जो न्यूट्रल होकर

44
00:03:14,720 --> 00:03:17,280
के बात करता है तो वहां नहीं आए

45
00:03:17,280 --> 00:03:21,920
तो ना आने की स्थिति में हमने ऐसा नहीं कहा कि तुम्हारे

46
00:03:21,920 --> 00:03:26,000
यह नहीं है वो नहीं मगर उनकी ओर से जाहिर सी बात है ज धर्म पूर्ण रूप

47
00:03:26,000 --> 00:03:30,120
से स्थापित नहीं होता है तो वहां पर आप धर्म नियंत्रित आचरण

48
00:03:30,120 --> 00:03:34,960
की अपेक्षा भी नहीं कर सकते वह कहीं ना कहीं विस्फोट होगा ही और व्यक्ति का

49
00:03:34,960 --> 00:03:39,200
जो अधर्म नियंत्रित आचरण है वह सामने आएगा

50
00:03:39,200 --> 00:03:43,520
या फिर धर्म की सीमा के बाहर का जो आचरण है वो सामने आएगा

51
00:03:43,520 --> 00:03:47,720
तो निरुक्त के मैं जो यास्का

52
00:03:47,720 --> 00:03:51,760
चार्य जी का जो कथन है उसको लेकर के वो यह सोचते हैं कि जब उनसे पूछा

53
00:03:51,760 --> 00:03:55,760
जाएगा कि आपके गुरु का नाम क्या है तो व कह देंगे मेरे गुरु का नाम तर्क है

54
00:03:55,760 --> 00:03:59,920
ठीक मगर उनको यह नहीं पता है कि निरुक्त में ही आचार्य

55
00:03:59,920 --> 00:04:04,040
यासक ने कितनी बार कहा है कि यह जो परंपरा प्राप्त अर्थ है वो मैंने यहां

56
00:04:04,040 --> 00:04:08,080
बताया यह जो परंपरा प्राप्त अर्थ है यह मैंने बताया यह जो

57
00:04:08,080 --> 00:04:12,240
परंपरा प्राप्त अर्थ है गुरुओं के द्वारा प्राप्त अर्थ है ये मैंने बताया ये उन्होंने

58
00:04:12,240 --> 00:04:16,320
ना जाने कितनी बार उसमें कहा है ठीक है अब बात

59
00:04:16,320 --> 00:04:20,400
आ जाती है कि अगर उन्होंने यह कहा है कि परंपरा प्राप्त अर्थ है ये मैंने बताया

60
00:04:20,400 --> 00:04:24,440
और दूसरी और उन्होंने यह लिख दिया है कि कलयुग में गुरु का भाव होगा या ऐसी

61
00:04:24,440 --> 00:04:28,440
स्थितियां आएंगी जब गुरु नहीं होगा तब तुम्हारा तर्क ही तुम्हारा गुरु होगा

62
00:04:28,440 --> 00:04:32,360
तो क्या उसका आलंबन हम इसमें ले कि निरुक्त जी

63
00:04:32,360 --> 00:04:36,560
नि जो यास्का चार्य जी हैं आचार्य यासक है उनकी ही बात को

64
00:04:36,560 --> 00:04:40,640
हम ना माने जहा दूसरी ओ उन्होंने कहा है कि परंपरा प्राप्त अर्थ मैं आपको

65
00:04:40,640 --> 00:04:44,840
बता रहा हूं है ना तो इसका अर्थ

66
00:04:44,840 --> 00:04:48,960
हमें यह लेना चाहिए कि हमें जब गुरु प्राप्त नहीं हो रहा

67
00:04:48,960 --> 00:04:53,000
है मिल नहीं रहा है उस समय जो हमारी तर्क

68
00:04:53,000 --> 00:04:57,800
शक्ति है उसके आधार पर बुद्धि और विवेक के आधार पर ही हम आगे बढ़ते हैं

69
00:04:57,800 --> 00:05:01,840
मगर यदि इसका अर्थ यह माना जाए कि गुरु की आवश्यकता ही नहीं

70
00:05:01,840 --> 00:05:05,920
है तो यह जो भाई साहब है जो निरुक्त के आधार पर यह बोल रहे

71
00:05:05,920 --> 00:05:10,040
हैं कि मुझे गुरु की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आचार्य यासक ने ऐसा कहा है ठीक है और

72
00:05:10,040 --> 00:05:14,320
वहां पर वो तर्क के साथ य भी कहते क्या आप आचार्य यासक से भी बड़े हो गए

73
00:05:14,320 --> 00:05:18,480
तो मेरे भाई मैं आपको यह कहना चाहूंगा य यदि तर्क

74
00:05:18,480 --> 00:05:22,640
ही आपका गुरु है तो फिर आपका यह प्रमाण दिखाना सिद्ध ही नहीं होता

75
00:05:22,640 --> 00:05:26,880
है आप मुझे प्रमाण दिखा क्यों रहे हैं प्रमाण

76
00:05:26,880 --> 00:05:30,880
का अर्थ है आप किसी ना किसी ऐसे की वाणी मुझे बता रहे हैं

77
00:05:30,880 --> 00:05:35,360
जिस वाणी को मैं भी प्रमाण के रूप में स्वीकार करता हूं यास्का

78
00:05:35,360 --> 00:05:39,480
आचार्य यासक जी की वाणी आप मुझे प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं वो

79
00:05:39,480 --> 00:05:43,560
भी तो गुरु ही है आपके जो आपको यह बता रहे हैं तो आप

80
00:05:43,560 --> 00:05:47,840
अपनी बात को सिद्ध करने के लिए गुरु का ही तो आलंबन ले रहे हैं

81
00:05:47,840 --> 00:05:51,960
और फिर कह रहे हैं कि गुरु नहीं है तो आपने अपनी बात को

82
00:05:51,960 --> 00:05:56,080
बताने के लिए भी गुरु का ही आलंबन लिया गुरु की कही हुई बात को लिया अगर वो

83
00:05:56,080 --> 00:06:00,240
वाली बात छोड़ दे कि आप अर्ध कुकुट न्याय कर रहे हो उन्होंने ही अनेका

84
00:06:00,240 --> 00:06:04,440
अनेक जगह श्रुति परंपरा की बात की है मगर अगर आप उन बातों को

85
00:06:04,440 --> 00:06:09,560
नेगलेक्ट भी कर दे तब भी आपने

86
00:06:09,560 --> 00:06:13,600
यहां पर अपनी बात को रखने के लिए किसी गुरु वाणी को ही तो प्रस्तुत किया

87
00:06:13,600 --> 00:06:17,640
कि ये देखो इसको तो तुम्हें मानना पड़ेगा ना यह भी बता यह

88
00:06:17,640 --> 00:06:21,920
भी कहा अपने वीडियो में कि आपके आचार्य आस्क से भी आगे हो गए यानी

89
00:06:21,920 --> 00:06:26,040
आप वहां पर गुरु की वाणी को प्रमाण मान रहे

90
00:06:26,040 --> 00:06:30,240
हो माना ना प्रमाण गुरु की वाणी को

91
00:06:30,240 --> 00:06:34,320
तो फिर फिर गुरु तत्व का खंडन कैसे कर रहे हो खुद

92
00:06:34,320 --> 00:06:38,360
ही तो प्रमाण के रूप में गुरु की वाणी को प्रस्तुत कर रहे हो आप

93
00:06:38,360 --> 00:06:42,400
यह चाहते हो कि आपने जैसे आचार्य यासक को गुरु रूप में प्रस्तुत

94
00:06:42,400 --> 00:06:46,440
किया और हम भी उनको स्वीकार करते हैं निर्विवाद रूप से जाहिर सी

95
00:06:46,440 --> 00:06:50,480
बात है मगर अगर आप गुरु तत्व का खंडन

96
00:06:50,480 --> 00:06:54,640
कर रहे हैं उनकी किसी बात को लेकर के अर्ध कोट न्याय करते हुए

97
00:06:54,640 --> 00:06:58,680
तो फिर आप उनकी बात का आलंबन कैसे ले रहे हैं वहां पर तो आपने गुरु

98
00:06:58,680 --> 00:07:02,840
तत्व को स्वीकार कर लिया तो ये

99
00:07:02,840 --> 00:07:03,340
ना

100
00:07:03,280 --> 00:07:07,400
करें सामने आए और आचार्य आस्क ने कई जगह पर गुरुओं

101
00:07:07,400 --> 00:07:12,000
की बात कही है कि गुरुओं के द्वारा ही

102
00:07:12,000 --> 00:07:16,120
परंपरा के द्वारा ही यह अर्थ मुझे प्राप्त हुआ है तो अपनी परंपरा बताएं

103
00:07:16,120 --> 00:07:20,280
भागे नहीं जब तार्किक बात आएगी कि आचार्य

104
00:07:20,280 --> 00:07:24,360
यास का आप मुझे प्रमाण बता रहे हैं तो आचार यासक का वो जो

105
00:07:24,360 --> 00:07:28,600
कथन है वो आप तक कैसे पहुंचा बताओ मुझे ये है तर्क

106
00:07:28,600 --> 00:07:33,120
तर्क ये है इसमें मैंने गुरु का आलंबन नहीं लिया आपका खंडन करने के लिए

107
00:07:33,120 --> 00:07:37,160
यह है ओनली तर्क की बात आचार्य यासक की बात आपने

108
00:07:37,160 --> 00:07:41,320
रखी आपने तो आचार्य आस्क का आलंबन लिया अपनी बात मनवाने के लिए

109
00:07:41,320 --> 00:07:45,480
मैं आपसे पूछ रहा हूं आचार्य आस्क का वो जो तर्क है वो जो कथन है वो आप

110
00:07:45,480 --> 00:07:49,480
तक कैसे आया यह तर्क है इसमें गुरु नहीं है मैं आपसे पूछ

111
00:07:49,480 --> 00:07:54,440
रहा हूं कैसे आया आप तक सपने में आके दे गए आचार्य आस्क जी

112
00:07:54,440 --> 00:07:58,520
या भाही जो परंपरा के बारे में अलंकार समाज की ओर से

113
00:07:58,520 --> 00:08:02,840
बताया जाता है कि वहां से ब्रह्मा जी ने उधर से कैच किया इधर जमनी ऋषि तक आया जमनी

114
00:08:02,840 --> 00:08:06,880
ऋषि ने उधर से बॉल फेंक दी तो सीधे लपक लिया क्या कुछ इस तरह का है

115
00:08:06,880 --> 00:08:12,880
क्या कैसे आया अब

116
00:08:14,040 --> 00:08:18,320
तक अरे 500 ईसवी पूर्व के क्यों ाज

117
00:08:18,320 --> 00:08:22,760
ईसवी पूर्व के आदि शंकराचार्य जी का नाम ले लीजिए

118
00:08:22,760 --> 00:08:27,160
500 ईसवी पूर्व का ही नाम क्या बताए आदि

119
00:08:27,160 --> 00:08:31,280
शंकराचार्य जी के बाद से हर प्रत्येक आचार्य

120
00:08:31,280 --> 00:08:35,320
जो है सभी के नाम हमारे पास उपलब्ध है और पहली बात

121
00:08:35,320 --> 00:08:39,400
यह है कि अगर आप परंपरा को नहीं मानते हैं कि यह परंपरा नहीं

122
00:08:39,400 --> 00:08:43,440
है तो फिर आप यह नहीं सिद्ध कर पाएंगे कि आप जिन वेदों को अपना प्रमाण मानते

123
00:08:43,440 --> 00:08:47,560
हैं वह वेद अनादि काल से चले आ रहे ग्रंथ है

124
00:08:47,560 --> 00:08:51,560
जहां तक का आपके पास इतिहास है वहीं तक का आप मान सकते हैं अगर आप

125
00:08:51,560 --> 00:08:56,480
इतिहास को स्वीकार नहीं करते आदि शंकराचार्य के ठीक है

126
00:08:56,480 --> 00:09:00,600
और जब वेदों को स्वीकार नहीं करेंगे तब भी हम छोड़ेंगे नहीं

127
00:09:00,600 --> 00:09:05,160
वेद विरुद्ध होते ही हां वो आए नहीं है

128
00:09:05,160 --> 00:09:09,280
वेद विरुद्ध होते ही क्या होगा आप

129
00:09:09,280 --> 00:09:13,560
सनातन विरुद्ध हो जाएंगे सनातन विरुद्ध होते ही

130
00:09:13,560 --> 00:09:17,840
आप सर्व शक्तिमान सत्ता के विरुद्ध हो जाएंगे सर्वशक्तिमान

131
00:09:17,840 --> 00:09:22,080
सत्ता के विरुद्ध होते ही आप नास्तिक हो जाएंगे

132
00:09:22,080 --> 00:09:26,280
नास्तिक होते ही आप जानवर हो जाएंगे इसीलिए कहता

133
00:09:26,280 --> 00:09:30,000
हूं मत पढ़ो चक्कर में कोई

134
00:09:30,000 --> 00:09:34,040
टक्कर कहीं से भी इधर से उधर से नास्तिक होकर

135
00:09:34,040 --> 00:09:38,240
सनातना भासी होकर तंत्र के रूप में या धर्मा

136
00:09:38,240 --> 00:09:42,680
भासी होके धर्म के रूप में किसी भी तरह से आओगे

137
00:09:42,680 --> 00:09:46,280
तो चोट

138
00:09:46,280 --> 00:09:50,480
खाओगे मत आओ वही रहो

139
00:09:50,480 --> 00:09:54,640
सुखी रहो अपने सपनों के संसार में वो जो मुंगेरी

140
00:09:54,640 --> 00:09:58,840
लाल के जो भव्य सपनों का संसार है उसमें सुखी रहो कि हम बिल्कुल

141
00:09:58,840 --> 00:10:03,080
सही क्योंकि आप एन केन प्रकार निन

142
00:10:03,080 --> 00:10:09,080
कहीं से भी आप करेंगे तो आपको चोट लग

143
00:10:21,000 --> 00:10:25,200
जाएगी भाई साहब आ नहीं रहे हैं क्या बताया

144
00:10:25,200 --> 00:10:31,200
जाए

145
00:10:56,320 --> 00:11:00,800
अगर कोई फिलहाल यहां दिए जा रहे

146
00:11:00,800 --> 00:11:05,360
व्यक्त वक्तव्य से सहमत नहीं है और

147
00:11:05,360 --> 00:11:09,800
कायर नहीं है तो वह सामना

148
00:11:09,800 --> 00:11:14,240
कर सकते हैं आ सकते हैं ऊपर एक सौहार्द

149
00:11:14,240 --> 00:11:18,240
पूर्ण चर्चा के निमित्त आप आ जाए या वैचारिक मतभेद के निमित्त

150
00:11:18,240 --> 00:11:22,440
आ जाए वह आप ऊपर आ सकते

151
00:11:22,440 --> 00:11:26,760
हैं हां शास्त्री जी आ नहीं रहे उन्होंने समय तो दिया था हमको

152
00:11:26,760 --> 00:11:30,920
पर वो आ नहीं रहे हैं इसका क्या कारण वही जानते हैं हो सकता

153
00:11:30,920 --> 00:11:34,920
है उन्होंने हमारा वक्तव्य सुना हो कि मत पढ़ो चक्कर

154
00:11:34,920 --> 00:11:39,120
में कोई नहीं है टक्कर में तो उन्होंने शायद

155
00:11:39,120 --> 00:11:43,320
देख लिया हो कि वह चक्कर क्या हो जाता है अब आपने देखा जो

156
00:11:43,320 --> 00:11:47,600
आहवान के द्वारा पांच सिद्धांत जो प्रतिपादित किए जाते हैं

157
00:11:47,600 --> 00:11:51,800
इन पांच सिद्धांतों का हमको इतना प्रचार करना है कि

158
00:11:51,800 --> 00:11:55,840
हर हर बच्चे तक वृद्ध से लेकर हर बच्चे

159
00:11:55,840 --> 00:12:01,160
तक यह बात पहुंच जाए यह पांच सिद्धांत ऐसे हैं

160
00:12:01,160 --> 00:12:06,040
कि आप कहीं से भी किसी भी प्रकार से सनातन

161
00:12:06,040 --> 00:12:10,880
का या सनातन के किसी घटक का जो है

162
00:12:10,880 --> 00:12:15,840
पक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं पांच सिद्धांत पहला

163
00:12:15,840 --> 00:12:20,240
संसार का प्रत्येक मनुष्य भगवान को ही ढूंढ रहा है फिर वह भले ही

164
00:12:20,240 --> 00:12:24,240
स्वयं को नास्तिक ही क्यों ना कहता हो दूसरा य ये किसके

165
00:12:24,240 --> 00:12:28,320
लिए नास्तिकों के लिए दूसरा ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता

166
00:12:28,320 --> 00:12:32,360
है इसमें धर्मा भास भी आ जाते हैं और सनातना भास भी

167
00:12:32,360 --> 00:12:36,600
आ जाते हैं धर्मा भास शुरू होता है कि भाई हमारा ईश्वर वादित

168
00:12:36,600 --> 00:12:37,440
है जन्म नहीं ले सकता

169
00:12:37,440 --> 00:12:41,640
अवतार नहीं ले सकता यह सारी चीजें मगर फिर क्या होता है

170
00:12:41,640 --> 00:12:46,720
कि कुछ सनातना भा सनातन के नाम पर भी ऐसे प्रचार तंत्र शुरू हो जाते

171
00:12:46,720 --> 00:12:50,800
हैं जो अपने मंतव्य की सिद्धि के लिए

172
00:12:50,800 --> 00:12:54,840
या उनके प्रचार प्रसार में कहीं विदेशों में दिक्कत आ रही है तो सनातन ईश्वर को

173
00:12:54,840 --> 00:12:59,160
वहीं के ईश्वर जैसा प्रस्तुत कर दो इन सबके कारणों से सनातना भास

174
00:12:59,160 --> 00:13:03,600
लाते हैं जहां सनातन नाम से होता है वस्तुतः वो आभास

175
00:13:03,600 --> 00:13:07,800
होता है तो इन दोनों ही प्रकार के तंत्रों के लिए भी यही

176
00:13:07,800 --> 00:13:09,960
है ईश्वर वही है जो कुछ भी

177
00:13:09,960 --> 00:13:14,200
कर सकता है तीसरा ईश्वर के विषय में

178
00:13:14,200 --> 00:13:17,280
केवल वही शास्त्र प्रमाणिक जिन्ह ईश्वर ने भी ना

179
00:13:17,280 --> 00:13:23,280
रचाओ हम वेदों को क्यों मानते हैं अपौरुषेय

180
00:13:29,080 --> 00:13:33,240
क्रिश्चियनिटी के ईश्वर ने बाइबल को रचा अगर वेद को भगवान रच देते

181
00:13:33,240 --> 00:13:37,280
तो वेद की क्रेडिबिलिटी पर वो हो जाता है क्यों हो जाता है

182
00:13:37,280 --> 00:13:41,520
क्योंकि बुराई को भी बनाने वाले भगवान ही हैं तो वह शास्त्र

183
00:13:41,520 --> 00:13:45,480
बुराई नहीं है यह कैसे

184
00:13:45,480 --> 00:13:49,800
पता अगर वह यह कहते कि नहीं बुराई को बनाने वाले भगवान नहीं

185
00:13:49,800 --> 00:13:53,880
है तो फिर उन्हें मानना पड़ेगा कि बुराई का रचता कोई और

186
00:13:53,880 --> 00:13:58,120
है जैसे कल वो महानुभाव आए थे हमने उनसे पूछा उन्होंने

187
00:13:58,120 --> 00:14:02,160
सोचा होगा अ जीवन मरण वाला प्रश्न पूछेंगे कि क्या ईश्वर

188
00:14:02,160 --> 00:14:06,440
अपनी देह का नाश कर सकता है तो हमने उसमें

189
00:14:06,440 --> 00:14:10,920
कहा उनसे प्रश्न को बदल दिया मैंने कहा क्या आपका ईश्वर झूठ बोल सकता है

190
00:14:10,920 --> 00:14:14,920
तो ईश्वर की सर्वशक्ति मत्ता को स्वीकार करने के चक्कर में बोले हां कर सकता

191
00:14:14,920 --> 00:14:19,080
है तो मैंने कहा कि जब ईश्वर झूठ बोल सकता है

192
00:14:19,080 --> 00:14:23,240
तो जो कबीर वाणी है जो आपके अनुसार कबीर ने लिखी

193
00:14:23,240 --> 00:14:27,360
है वो सच कैसे फस गए चक्कर

194
00:14:27,360 --> 00:14:31,680
में ये तीसरा सिद्धांत यह उनके लिए भी है

195
00:14:31,680 --> 00:14:32,680
जो कहेंगे

196
00:14:32,680 --> 00:14:36,680
आपसे कि हमारे पास तो स्वयं भगवान आए थे उन्होंने

197
00:14:36,680 --> 00:14:40,720
य कहा है भा इस्लाम की शुरुआत भी तो इसी आधार पर है कि

198
00:14:40,720 --> 00:14:45,360
भगवान नहीं डायरेक्ट किसी फरिश्ते को भेजा और व सारी हो गई चीजें

199
00:14:45,360 --> 00:14:49,400
तो भगवान ने आकर के स्वयं कोई बात कही सनातनी

200
00:14:49,400 --> 00:14:53,400
वह नहीं जो उसको मान ले अगर वह वेद विरुद्ध है तो उसको भी नहीं मानेगा उसका

201
00:14:53,400 --> 00:14:57,560
नाम सनातनी है बुद्ध के रूप में भगवान विष्णु ने आकर

202
00:14:57,560 --> 00:15:02,000
के यज्ञों की रक्षा की के लिए ही सही पर उन्होंने यज्ञों

203
00:15:02,000 --> 00:15:06,640
का खंडन किया था हमने उनको भगवान माना मगर उनके

204
00:15:06,640 --> 00:15:11,520
सिद्धांत को नहीं माना है

205
00:15:11,520 --> 00:15:15,720
ना तो ईश्वर के विषय में केवल

206
00:15:15,720 --> 00:15:20,000
वही शास्त्र प्रमाणिक जिन्ह ईश्वर ने भी ना रचा हो

207
00:15:20,000 --> 00:15:24,480
चौथा ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो

208
00:15:24,480 --> 00:15:29,080
इसमें आपके सभी वो सारे

209
00:15:29,080 --> 00:15:33,720
घटक टूट जाएंगे जो राम कथा मर्मज्ञ बनते हैं तथाकथित आचार्य

210
00:15:33,720 --> 00:15:37,840
बनते हैं कहते हैं आदि शंकराचार्य जी के सिद्धांतों को पढ़ाने

211
00:15:37,840 --> 00:15:42,160
और मानने वाले हैं और उन्हीं

212
00:15:42,160 --> 00:15:46,400
का खंडन करते हैं उन्हीं का बुराई करते हैं उनके सिद्धांतों

213
00:15:46,400 --> 00:15:48,120
की कमी निकालते हैं

214
00:15:48,120 --> 00:15:52,200
अपने मनगण बातें करते हैं मातृ शक्ति से यूटरस निकाल दो

215
00:15:52,200 --> 00:15:56,400
यह कर दो वो कर दो संसार को ही चेंज कर दो अंत

216
00:15:56,400 --> 00:16:01,120
तो गत्वा जा तो उधर ही रहे हो

217
00:16:01,120 --> 00:16:05,120
तो इन सबका निवारण क्या होगा इन सबका

218
00:16:05,120 --> 00:16:09,720
निवारण है ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त

219
00:16:09,720 --> 00:16:14,240
और फिर जब परंपराओं में भी दिक्कत आने लगे

220
00:16:14,240 --> 00:16:18,560
जब कोई परंपरा के नाम पर भी

221
00:16:18,560 --> 00:16:23,240
अ ऐसे सिद्धांतों का प्रतिपादन कराने लगे जो सार्वभौम नहीं हो

222
00:16:23,240 --> 00:16:27,480
सकते ऐसे सिद्धांतों का प्रचार करने लगे

223
00:16:27,480 --> 00:16:31,760
जो जिसमें परंपरा का आलंबन लेते हुए परंपरा की आड़ में

224
00:16:31,760 --> 00:16:35,920
तब वहां पर आता है कि परंपरा में कौन सी परंपरा तो सार्वभौम

225
00:16:35,920 --> 00:16:40,360
सर्वमान्य परंपरा नारायण समारंभा शंकराचार्य

226
00:16:40,360 --> 00:16:46,360
मध्यमाम अवदा चार्य पर्यंत वंदे गुरु परंपरा

227
00:17:02,640 --> 00:17:06,920
निर्गुण और सगुण में ईश्वर वही है जो

228
00:17:06,920 --> 00:17:11,000
शुद्ध रूप से जिसमें बुराई

229
00:17:11,000 --> 00:17:15,120
ना हो हा ठीक है हम मान लेते हैं तो बुराई को बनाने वाला कौन है

230
00:17:15,120 --> 00:17:19,200
यानी संसार में कुछ ऐसा है जिसे ईश्वर ने नहीं बनाया जो ईश्वर की मर्जी

231
00:17:19,200 --> 00:17:23,280
के बाहर है उसके बिना मर्जी के बन गया है यह सब

232
00:17:23,280 --> 00:17:27,840
व्यवहारिक धरातल पर है ये सब

233
00:17:27,840 --> 00:17:32,200
बातें ठीक है इनको अंततोगत्वा आप

234
00:17:32,200 --> 00:17:38,200
यह नहीं कर सकते हो कि लिंक डाल दीजिए भाई वो आ नहीं रहे

235
00:17:39,440 --> 00:17:43,720
हैं आ जाइए जो चेहरा

236
00:17:43,720 --> 00:17:49,720
दिखा सकते

237
00:17:51,400 --> 00:17:57,400
हो लिंक डाल दिया गया है

238
00:18:06,240 --> 00:18:10,280
साइंस जर्नी वाले बहुत सारी हिस्ट्री इत्यादि लेकर के खंडन करने

239
00:18:10,280 --> 00:18:13,440
का प्रयास करते हैं सनातन

240
00:18:13,440 --> 00:18:17,560
का कभी भी उन्होंने वहां पर कोई दार्शनिक धरातल पर मुझे नहीं लगता

241
00:18:17,560 --> 00:18:22,080
कोई वीडियो बनाया है ईश्वर की सर्वशक्ति मत्ता पर नास्तिक

242
00:18:22,080 --> 00:18:26,280
आस्तिक इन सब चीजों पर कभी कोई वीडियो मैंने नहीं देखा मैंने वीडियो हमेशा

243
00:18:26,280 --> 00:18:30,320
देखे कि वहां तुम्हारे य लिखा है शूद्रों के साथ लिखा है उसने यह किया

244
00:18:30,320 --> 00:18:34,560
था महाभारत में यह हुआ था वो हुआ था यह सब चीजें है

245
00:18:34,560 --> 00:18:38,640
भाई सीधी बात है आपके पास माता

246
00:18:38,640 --> 00:18:42,680
बहन और पत्नी में अंतर करने का आधार क्या है

247
00:18:42,680 --> 00:18:46,800
तो वह आधार आएगा धर्म यदि आप स्वयं को मनुष्य कहते

248
00:18:46,800 --> 00:18:50,800
हैं तो आपको स्वीकार करना होगा कि

249
00:18:50,800 --> 00:18:54,800
इस संसार में कोई सर्वशक्तिमान सत्ता है

250
00:18:54,800 --> 00:18:58,840
जिसे प्राप्त करने के निमित्त आपने उन

251
00:18:58,840 --> 00:19:03,160
नियमों का आलंबन ले रखा है जिसे धर्म कहते हैं

252
00:19:03,160 --> 00:19:07,240
और यदि आप यह

253
00:19:07,240 --> 00:19:11,360
मानते हैं कि इस संसार में कोई सर्वशक्तिमान सत्ता है तो आपको यह

254
00:19:11,360 --> 00:19:15,840
मानना होगा कि आप वेदों के

255
00:19:15,840 --> 00:19:19,880
द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर को और धर्म

256
00:19:19,880 --> 00:19:24,440
को मानते हैं और यदि आप यह मानते हैं कि वेदों के द्वारा प्रतिपादित

257
00:19:24,440 --> 00:19:29,280
होने वाला जो ईश्वर है वो सर्वशक्तिमान है तो इसका अर्थ होगा

258
00:19:29,280 --> 00:19:34,000
कि आप शंकराचार्य भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी द्वारा निर्धारित

259
00:19:34,000 --> 00:19:38,360
जो सीमाए हैं ईश्वर के विषय में जो उनके सिद्धांत है उनकी सीमा

260
00:19:38,360 --> 00:19:42,360
में रहते हुए भगवान का भजन ध्यान स्मरण जो

261
00:19:42,360 --> 00:19:46,560
भी है वह करते हैं कोई आ गए

262
00:19:46,560 --> 00:19:52,520
हैं राम जी

263
00:19:52,520 --> 00:19:58,520
शरण जी राम जी शरण जी स्मार्थ जय श्री राम

264
00:20:03,280 --> 00:20:07,640
ये मेरी कमेंट आपके लाइव स्ट्रीम

265
00:20:07,640 --> 00:20:11,400
में नहीं जा रही

266
00:20:11,400 --> 00:20:15,960
हा आपके वीडियो पर लाइव स्ट्र पर

267
00:20:15,960 --> 00:20:19,960
मेरी पया नहीं जा अच्छा

268
00:20:19,960 --> 00:20:25,960
पता नहीं हमें इस बारे में नहीं पता है शायद कुछ होगा बताइए

269
00:20:29,000 --> 00:20:33,040
है नाय का कमेंट वाला मामला मुझे भी नहीं समझ में आता है

270
00:20:33,040 --> 00:20:37,080
कई बार कई लोगों की शिकायत आती है कि वह कुछ कमेंट कर देते हैं

271
00:20:37,080 --> 00:20:41,120
तो य विबल नहीं करता है का थोड़ी देर बाद अपने आप कर देता है कभी कभी करता

272
00:20:41,120 --> 00:20:47,120
ही नहीं

273
00:20:48,680 --> 00:20:54,680
है आवाज आपकी साफ नहीं आ रही है

274
00:21:01,320 --> 00:21:05,560
य का मैं कह रहा थाय का अधिक अनुभव मुझे नहीं है

275
00:21:05,560 --> 00:21:09,560
हम लोग क्या फ पर भी अ रहते और वहा

276
00:21:09,560 --> 00:21:13,800
परही चर्चा होते हमारी भी चैनल

277
00:21:13,800 --> 00:21:18,600
है य

278
00:21:18,600 --> 00:21:22,720
पर कोई आ गए हैं मैं एक काम करता हूं आप

279
00:21:22,720 --> 00:21:28,720
रहिए मैं ले लेता हूं इनको य जुगल किशोर जी को लेता

280
00:21:29,800 --> 00:21:34,200
जी जुगल जी आप अपना चेहरा रिवील करें

281
00:21:34,200 --> 00:21:38,280
न जय श्री राम गुरुदेव जय श्री

282
00:21:38,280 --> 00:21:42,680
राम सर मेरा एक प्रश्न

283
00:21:42,680 --> 00:21:47,000
है आप किसी वैचारिक मतभेद के निमित्त नहीं आए

284
00:21:47,000 --> 00:21:51,280
नहीं नहीं नहीं मैं तो केवल मैं स्वाध्याय करता हूं तो उसका मतलब मुझे कोई व्याकरण

285
00:21:51,280 --> 00:21:55,280
के बारे में जानना था आपसे आप जानने के लिए

286
00:21:55,280 --> 00:21:59,400
आप क्लासेस में आइए पा मिनट का पाच मिनट

287
00:21:59,400 --> 00:22:03,560
कुछ छोटा सा क्वेश्चन है मेरा बोलिए

288
00:22:03,560 --> 00:22:08,040
सर जैसे दुर्गा शस्ती में एक मंत्र आता है यादवी

289
00:22:08,040 --> 00:22:13,640
सर्व भूतेषु विष्णु मायती शब्द ता तो इसमें विष्णु माया का अर्थ क्या होता

290
00:22:13,640 --> 00:22:18,320
है विष्णु माया

291
00:22:18,320 --> 00:22:22,600
हां यह तो जो प्रकरण चल रहा है पीछे

292
00:22:22,600 --> 00:22:27,160
से उसके हिसाब से देखा जा सकता है वो अलग-अलग आचार अपने हिसाब से कर सकते हैं

293
00:22:27,160 --> 00:22:33,160
विष्णु माया का एक अर्थ भी होता है विष्णु की

294
00:22:33,880 --> 00:22:37,960
माया उनकी माया शक्ति है जो हां

295
00:22:37,960 --> 00:22:42,040
विष्णु भगवान की माया शक्ति और इसका निक भ्रम

296
00:22:42,040 --> 00:22:46,080
का मानसिक

297
00:22:46,080 --> 00:22:50,640
भ्रम व्यवहारिक धरातल और परमार्थिक धरातल को देखना होगा

298
00:22:50,640 --> 00:22:54,880
कि किस धरातल के अनुसार निकाला जा रहा है इसका वास्

299
00:22:54,880 --> 00:22:58,880
करते से क्या होगा स्विक

300
00:22:58,880 --> 00:23:04,600
अर्थ तो विष्णु की माया ही कहा जाएगा

301
00:23:04,600 --> 00:23:09,040
क्योंकि इ पावर

302
00:23:09,040 --> 00:23:13,160
हा मतलब उनकी जो खुद की जो शक्ति है मतलब

303
00:23:13,160 --> 00:23:17,560
ही माना जाएगा उनको हां उनकी शक्ति सजन शक्ति जो जिसके

304
00:23:17,560 --> 00:23:21,880
जिसके द्वारा संसार बनता है इसका

305
00:23:21,880 --> 00:23:26,600
मतलब भ्रम तो नहीं होता ब्रम माया

306
00:23:26,600 --> 00:23:31,080
माया तो माया का श होता इसलिए

307
00:23:31,080 --> 00:23:35,200
भ्रम भी होता है इसलिए देखना पड़ेगा कि भ्रम

308
00:23:35,200 --> 00:23:39,440
भी होता है माया का माया का अर्थ कुछ आचार्यों ने लिखा

309
00:23:39,440 --> 00:23:44,760
है कि जो नहीं है उसको माया कहा जाता

310
00:23:44,760 --> 00:23:49,480
है जी साहब सिंह जी

311
00:23:49,480 --> 00:23:55,480
ठीक है आप क्लासेस क्लासेस आप जवाइन करिए उसम आइए

312
00:23:58,720 --> 00:24:04,720
साहब सिंह जी आप अपना कैमरा ऑन करें तो हम आपसे चर्चा

313
00:24:07,080 --> 00:24:11,760
करें नहीं करेंगे तो हटाएंगे आपको

314
00:24:11,760 --> 00:24:17,760
हटा

315
00:24:18,520 --> 00:24:24,520
दीजिए किरमाड़ा जी आप चेहरा अपना

316
00:24:25,720 --> 00:24:30,320
दिखाएं नहीं दिखा रहे

317
00:24:30,320 --> 00:24:36,320
चलिए

318
00:24:38,080 --> 00:24:42,080
फिर वह नहीं दिखा रहे साहब सिंह जी चेहरा नहीं दिखा रहे और कोई

319
00:24:42,080 --> 00:24:46,440
अगर आना चाहे तो आ सकता है मगर मैं एक रिक्वेस्ट करूंगा केवल

320
00:24:46,440 --> 00:24:50,480
वैचारिक मतभेद के निमित्त आए जिज्ञासाओं के लिए क्लासेस

321
00:24:50,480 --> 00:24:54,440
में

322
00:24:54,440 --> 00:25:00,440
आए जिज्ञासाओं के लिए ना आए

323
00:25:00,520 --> 00:25:06,520
अरे भेजो ना भाई भेज दीजिए ना

324
00:25:06,520 --> 00:25:10,960
उसे आपको लगता है कि जो आपकी विश्व विख्यात अंतरराष्ट्रीय जो

325
00:25:10,960 --> 00:25:15,480
मातृ शक्ति है जिन्होंने कहा कि

326
00:25:15,480 --> 00:25:19,040
जो वर्ण है

327
00:25:19,040 --> 00:25:23,040
वो उन्होंने कुछ कही थी कुछ बातें वर्ण के

328
00:25:23,040 --> 00:25:29,040
बारे में जो आपके ही विरोध में है कि हां

329
00:25:29,040 --> 00:25:33,160
जो जो जनेऊ होता है यज्ञोपवित संस्कार होता

330
00:25:33,160 --> 00:25:37,200
है व पूर्वजों के आधार पर होता है उसके पूर्वज क्या करते थे उस आधार पर होता

331
00:25:37,200 --> 00:25:41,520
है तो वर्ण को यहां पर उन्होंने जन् से मान लिया अब

332
00:25:41,520 --> 00:25:47,520
आपको लगता है कि जो आपकी अंतरराष्ट्रीय व मातृ शक्ति है आर्य समाज के

333
00:25:49,200 --> 00:25:53,200
प्रचारक उनको नहीं पता है और आपके अनुसार यह जो

334
00:25:53,200 --> 00:25:57,240
क्या है आप इनका नाम अजय आर्य इनको ज्यादा पता है

335
00:25:57,240 --> 00:26:01,840
भेजिए भेजिए ना हमने कहां मना किया है 7408

336
00:26:01,840 --> 00:26:06,280
30169 इस पर उनको कहिए ट करें और ट

337
00:26:06,280 --> 00:26:09,160
करके फॉर्म भर

338
00:26:09,160 --> 00:26:13,320
दे साहब सिंह जी की बात

339
00:26:13,320 --> 00:26:17,400
हो रही है यहां पर हां बताइए साहब

340
00:26:17,400 --> 00:26:23,400
सिंह जी जय श्री राम कहां से हैं आप

341
00:26:31,080 --> 00:26:37,080
आवाज नहीं आ रही साब सिंह जी

342
00:26:40,720 --> 00:26:44,760
आपकी टूट टूट के आ रही कट कट के

343
00:26:44,760 --> 00:26:48,760
अरे आवाज नहीं आ रही आपकी आपको नहीं

344
00:26:48,760 --> 00:26:54,760
आ रही होगी आपके नेटवक खराब

345
00:26:55,360 --> 00:26:59,560
है आपका नेटवर्क खराब है बाकी सबको आवाज

346
00:26:59,560 --> 00:27:03,560
आ रही है और भाई साहब कपड़े

347
00:27:03,560 --> 00:27:09,560
पहन लीजिए आप बनियान बनियान में कोई तरीका थोड़ी ना आने

348
00:27:14,640 --> 00:27:19,080
का तो इस इस प्रकार के लोग हैं कल एक भाई साहब आए थे

349
00:27:19,080 --> 00:27:25,080
जो गर्मी के कारण वो टीशर्ट को ऊपर डाले हुए

350
00:27:25,840 --> 00:27:30,520
थे सही बात है लोग आजकल क्या है एक तोय

351
00:27:30,520 --> 00:27:34,800
स्वाध्याय श बड़े ही आसानी से लोग प्रयोग

352
00:27:34,800 --> 00:27:39,920
कर लेते हैं परंतु सूत्र को नहीं जानते हैं स्वाध्याय

353
00:27:39,920 --> 00:27:44,160
अवा परंपरा से ही स्वाध्याय संभव है एक विधि

354
00:27:44,160 --> 00:27:48,240
है जो आचार्य के द्वारा ही पहले

355
00:27:48,240 --> 00:27:54,240
त्र संस्कार हो गायत्री प्राप्त

356
00:27:54,560 --> 00:27:58,960
हो ये आर्य समाज के द्वारा सिखाया जाता है

357
00:27:58,960 --> 00:28:02,200
देखिए क्या भाषा है

358
00:28:02,200 --> 00:28:06,280
इनकी नपुंसक इत्यादि शब्दों का उपयोग किया जा रहा

359
00:28:06,280 --> 00:28:10,440
है जो यह कह रहे हैं कि उससे अजय आर्य से जो है वो कर ले भाई

360
00:28:10,440 --> 00:28:14,560
तरीका है कोई मर्यादा है कि नहीं कहां से सीखे आप लोग आप लोग राम को

361
00:28:14,560 --> 00:28:18,560
मानने वाले कहां से हो गए बताइए आप राम ने

362
00:28:18,560 --> 00:28:22,600
कहां पर प्रस्तुत कर दिया कि आप किसी भी कारण से

363
00:28:22,600 --> 00:28:26,840
ये अश्लील बातों को आप बीच में ले आए लोगों के प्रति अश्लील

364
00:28:26,840 --> 00:28:30,880
हो जाए कि कहां से आप लोगों को इस धर्म की शिक्षा मिल

365
00:28:30,880 --> 00:28:34,920
रही है भले ही वह आर्य समाज को मानते हो भले ही वह शंकराचार्य

366
00:28:34,920 --> 00:28:39,480
जी को मानते हो इस कौन को मानते हो किसी को भी मानते हो मगर

367
00:28:39,480 --> 00:28:43,520
सनातन धर्मावलंबी को यह कार्य बिल्कुल शोभा नहीं

368
00:28:43,520 --> 00:28:48,080
देता है कि अपनी कहीं पर

369
00:28:48,080 --> 00:28:52,120
अगर कहीं बात छोटी हो रही है खंडन हो रहा है बात नहीं चल पा

370
00:28:52,120 --> 00:28:56,480
रही है या आपका पक्ष सिद्ध नहीं हो पा रहा है तो आप मर्यादा को लांग गए

371
00:28:56,480 --> 00:29:01,680
तो क्या फायदा हुआ गिरो लड़ो

372
00:29:01,680 --> 00:29:05,720
लड़ो गिरो गिरो मगर उस झरने की तरह

373
00:29:05,720 --> 00:29:09,840
जो गिर के भी अपनी सुंदरता को भंग नहीं होने देता आप लड़

374
00:29:09,840 --> 00:29:14,320
अपनी चीजों के लिए रखिए अपना पक्ष मगर मर्यादा में

375
00:29:14,320 --> 00:29:18,320
शी अगर कोई सामने वाला भी आपको कह रहा है तब भी आपकी एक मर्यादा

376
00:29:18,320 --> 00:29:22,320
होनी चाहिए अगर सामने वाला पहली बात तो य

377
00:29:22,320 --> 00:29:26,480
है जब कोई व्यक्ति अश्लील भाषा का उपयोग करने लगता है तो

378
00:29:26,480 --> 00:29:30,720
सबसे पहले अश्लील भाषा का करने में ही उसका खंडन हो जाता है जैसे आप जिस अजय

379
00:29:30,720 --> 00:29:35,000
आर्य की बात कर रहे हैं वो कितना गाली

380
00:29:35,000 --> 00:29:39,200
अप शब्द इत्यादि का आलंबन लेते हैं तो इसमें ही

381
00:29:39,200 --> 00:29:43,720
उसका खंडन हो जाता है कि उसके पास अपने तार्किक और प्रामाणिक

382
00:29:43,720 --> 00:29:47,800
वो नहीं है बिंदु जिनके ऊपर बात हो सके इस कारण से उसे गाली का

383
00:29:47,800 --> 00:29:53,800
आलंबन लेना पड़ रहा है ऐसा ना

384
00:29:54,320 --> 00:29:59,160
करिए संबंध में हमारे आचार्य ने एक बार कहा था

385
00:29:59,160 --> 00:30:03,160
जो अपशब्दों का अ भाषा का प्रयोग करता है

386
00:30:03,160 --> 00:30:07,880
उसकी सरस्वती उससे रु हो जा

387
00:30:07,880 --> 00:30:13,880
इसलिए सबको बड़ी सावधानी से ही शब्दों का चयन करना चा

388
00:30:14,400 --> 00:30:19,280
भाने रावण ने सीता माता का हरण कर लिया

389
00:30:19,280 --> 00:30:23,440
तो श्री राम ने तो हमें यह नहीं सिखाया कि आप मंदोदरी का हरण

390
00:30:23,440 --> 00:30:27,480
कर लेना तो ये ध्यान रखना पड़ेगा कि हम राम

391
00:30:27,480 --> 00:30:32,080
को मान वाले हैं इस्लामिस्ट नहीं है इस्लाम वाले

392
00:30:32,080 --> 00:30:36,240
एक अपनी उसमें यह बातें कर रहे थे कि जब

393
00:30:36,240 --> 00:30:40,440
उनसे प्रश्न आया कि उसमें यह क्यों दिया गया है कि वहां की

394
00:30:40,440 --> 00:30:45,160
स्त्रियों का हरण कर लो इसलिए दिया गया कि वह कर रहे हैं

395
00:30:45,160 --> 00:30:49,280
धर्म और धर्म का निर्णय इस बात प होगा कि सामने वाला क्या कर रहा है उसके अनुसार तुम यह

396
00:30:49,280 --> 00:30:53,640
कर लो तुम भी उसकी स्त्रियों को ले

397
00:30:53,640 --> 00:30:58,040
आओ हा

398
00:30:58,040 --> 00:31:02,240
आप आ जाइए भाई आप बहुत दिन से संपर्क

399
00:31:02,240 --> 00:31:07,040
में आप आ सकते हैं और

400
00:31:07,040 --> 00:31:11,200
आइए इस कोन के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर को सर्वशक्तिमान

401
00:31:11,200 --> 00:31:16,360
सिद्ध

402
00:31:16,360 --> 00:31:22,360
करिए अजय आर के रिकॉर्डिंग्स

403
00:31:40,240 --> 00:31:44,240
या फिर कोई साईं बाबा को मानने वाले हो जय श्री राम या फिर कोई

404
00:31:44,240 --> 00:31:48,280
साईं बाबा को मानने वाले हो तो वो आए वो

405
00:31:48,280 --> 00:31:52,320
जो है साईं बाबा को आकर के अवतार सिद्ध करें ऐसा

406
00:31:52,320 --> 00:31:57,120
कोई भी व्यक्ति है जो अभी आ सकता है राजा राय जी अरे आप

407
00:31:57,120 --> 00:32:03,120
दिल्ली से अच्छा अच्छा जय श्री

408
00:32:03,320 --> 00:32:07,680
राम जय श्री राम तो

409
00:32:07,680 --> 00:32:11,800
भाई साहब आज अजय व जो आने वाले थे आचार्य नाम था उनका उन्होंने

410
00:32:11,800 --> 00:32:13,240
हमको आप

411
00:32:13,240 --> 00:32:18,080
जराय प्रदर्शित कर दीजिए जो आने वाले थे

412
00:32:18,080 --> 00:32:22,200
वो उनका विजिटिंग कार्ड था क्योंकि लोग पूछ रहे हैं कि कौन आने

413
00:32:22,200 --> 00:32:27,660
वाले थे क्या हुआ वो शास्त्री जी है उनका विटिंग कार्ड

414
00:32:27,660 --> 00:32:32,400
[संगीत] वसे आ समायो का इतिहास रहा है

415
00:32:32,400 --> 00:32:36,640
इतने जल्दी ट में आते नहीं है वैसे

416
00:32:36,640 --> 00:32:41,160
हम डिबेट करते ही नहीं है हम डिबेट नहीं चर्चा करते हैं डिबेट हम नहीं

417
00:32:41,160 --> 00:32:43,640
करते

418
00:32:43,640 --> 00:32:49,640
हमारा चर्चा ही इतना कमाल का हो जाता है कि ट की जत नहीं

419
00:33:02,600 --> 00:33:07,240
तो जो भी रियल इंटेंशन को जानते हैं उनको बताए जाके भाई

420
00:33:07,240 --> 00:33:11,280
तर्क के लिए आप प्रमाण उपयोग उपयोग में ना ले क्योंकि जब आप

421
00:33:11,280 --> 00:33:15,280
प्रमाण उपयोग में लेंगे तो अपने आप आपने गुरु का ही आलंबन लेकर के वो किया

422
00:33:15,280 --> 00:33:19,800
है और और तर्क और तर्क पर बात हम कर रहे

423
00:33:19,800 --> 00:33:23,880
हैं किके पास आचार्य यासक का वो जो कथन

424
00:33:23,880 --> 00:33:28,040
है वो आया कैसे ये तसे सबसे बड़ी बात यही है मेन

425
00:33:28,040 --> 00:33:32,920
बात यही है आपके पास कहां से आया किस परंपरा से आ दरही

426
00:33:32,920 --> 00:33:37,040
राजकुमार वो राजकुमार एक फिल्म अभिनेता

427
00:33:37,040 --> 00:33:39,840
थे उनका एक डायलॉग था मुझे याद आता

428
00:33:39,840 --> 00:33:44,080
है कि सांप और बिू सांप और बिच्छू शेरों

429
00:33:44,080 --> 00:33:47,920
को काटा नहीं करते दूर ही दूर से रंग कर निकल जाते

430
00:33:47,920 --> 00:33:53,680
हैं हा पिक्चर में देखा

431
00:33:53,680 --> 00:33:57,960
र ये वो वाली बात है

432
00:33:57,960 --> 00:34:03,960
फिट हो जाता है भया कहीं का ट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुवा

433
00:34:05,000 --> 00:34:09,440
जो एक देख रियल इंटेंशन की

434
00:34:09,440 --> 00:34:12,080
रियल

435
00:34:12,080 --> 00:34:17,520
इशन रियल इंटेंशन की एक चीज आप

436
00:34:17,520 --> 00:34:22,240
देखिए एक चीज आप देखिए रियल इंटेंशन की की

437
00:34:22,240 --> 00:34:28,000
जब स्कन का

438
00:34:28,000 --> 00:34:34,000
हा इन्होंने एक विजिटिंग कार्ड दिया था

439
00:34:38,720 --> 00:34:42,840
ना यह इन्होंने हमको विजिटिंग कार्ड कल दिया था संपर्क

440
00:34:42,840 --> 00:34:48,840
सूत्र को हमने ब्लर कर दिया है इसको थोड़ा बड़ा कर

441
00:34:49,480 --> 00:34:53,040
दीजिए

442
00:34:53,040 --> 00:34:58,080
अच्छा अच्छा भैया इसमें क्या लिखा है देखिए नामकरण मुंडन यप

443
00:34:58,080 --> 00:35:02,120
विवाह तथा कथा आदि वैदिक संस्कारों के लिए संपर्क

444
00:35:02,120 --> 00:35:06,560
करें ये कितने बड़ी देखि कितना बड़ा छलावा हैय देखिए नहीं

445
00:35:06,560 --> 00:35:10,840
वो जो भी हो छलावा वो जो भी हो मगर फिलहाल हमारा यह बताने

446
00:35:10,840 --> 00:35:15,000
का वो है कि ये इनका विजिटिंग कार्ड था जो इन्होंने हमको दिया था

447
00:35:15,000 --> 00:35:19,640
और एक बजे आने वाले थे मगर नहीं आए अब इसका कारण क्या है वही जाने

448
00:35:19,640 --> 00:35:23,640
मगर नहीं आए अब हो सकता है कि जो हमारे

449
00:35:23,640 --> 00:35:28,120
लिए जो एक वो भेजा गया था ना पूरे आर समाज में ल ओवर इंडिया

450
00:35:28,120 --> 00:35:32,240
एक पर्चा निकाला गया था कि इनके साथ

451
00:35:32,240 --> 00:35:36,560
चर्चा ना करें किसी बड़े विद्वान को लाए

452
00:35:36,560 --> 00:35:40,560
इत्यादि हम उस पचय को पढ़ कर के एक बात की प्रसन्नता हुई

453
00:35:40,560 --> 00:35:43,080
थी गुरुदेव कहते

454
00:35:43,080 --> 00:35:47,120
हैं जब विरोधी भी आपके मन की बात करने लग जाए

455
00:35:47,120 --> 00:35:51,200
वो है आपकी वास्त जादू जादू वो जो स

456
00:35:51,200 --> 00:35:55,320
चढ़कर बोले तो वो सामने उनके उनके परिचय

457
00:35:55,320 --> 00:35:59,600
में लिखा था कि करपात्री जी का अनन्य भक्त उनके

458
00:35:59,600 --> 00:36:04,040
पचे में लिखा था हमारे बारे में तो हमने कहा हमने कभी अपने आपको को अनन्य

459
00:36:04,040 --> 00:36:08,360
नहीं समझा क्योंकि हमको लगता है कि हम बहुत छोटे से वो है पता नहीं कितनी 100 गलतिया

460
00:36:08,360 --> 00:36:12,640
करते होंगे दिन भर में मगर वो सामने वाले ने लिखा वो अच्छा लगा वो सुखद

461
00:36:12,640 --> 00:36:16,800
था भैया इस बारे मुझे भी एक चीज याद आ गई कि जैसे जो वेदांत

462
00:36:16,800 --> 00:36:20,800
पारिजात जो ग्रंथ लिखा धर्म सम भगवान ने तो उसका खंडन

463
00:36:20,800 --> 00:36:24,840
करने के लिए समाजी थे विशुद्धानंद मिश्र वो उठे यद वो

464
00:36:24,840 --> 00:36:29,040
कर नहीं पाए क्योंकि उनके तर्को का पूर्व में रख प्रमाणों को पूर्व पक्ष

465
00:36:29,040 --> 00:36:33,200
में रखकर अपने सिद्धांत का प्रतिपादन व नहीं कर पाए लेकिन उन्होने शुरुआत में क्या ऐसा

466
00:36:33,200 --> 00:36:37,440
श्लोक लिख दिया कि जब वेदों की हानि हुई

467
00:36:37,440 --> 00:36:42,080
तो भगवान श्री हरि ने दयानंद सती को स्वर्ग से नीचे भेजा

468
00:36:42,080 --> 00:36:46,440
स्क्रीनशॉट लेकर भेजा है अब देखिए दु दुबे जी चले चौ

469
00:36:46,440 --> 00:36:50,520
बने दुबे भी ना रहे अरेई तुमने स्वर्ग को मान लिया ह को मान

470
00:36:50,520 --> 00:36:55,320
लिया अवतार मान लि आए थे खंडन करने पौराणिक बन ग

471
00:36:55,320 --> 00:36:58,480
और उससे बड़ मजे की बात सुने नाम लिखा वेदा

472
00:36:58,480 --> 00:37:02,560
कल्पम अरे भाई तो पारिजात ष तो स्वर्ग में होता है हमारी मान्यता है

473
00:37:02,560 --> 00:37:07,280
आपने कब से मान लिया वेदा क नाम लिख कर अपना खंडन करा लिया आपने

474
00:37:07,280 --> 00:37:11,480
और लोक आपको भेजूंगा भया आप देखिएगा उस ग्रंथ के पहले पाच नंबर शलोक

475
00:37:11,480 --> 00:37:15,480
में लिख रहे है कि जब संसार में वेदों की हानि हुई तो श्री

476
00:37:15,480 --> 00:37:19,520
हरि ने प्रमोद लोक से यानी स्वर्ग से सरती को भेजा

477
00:37:19,520 --> 00:37:24,400
वेद की स्थापना करो पढ़ के हसते हसते रह गया और मैंने पता कहां पड़ा

478
00:37:24,400 --> 00:37:28,400
के जो पूर्व शंकराचार्य महाग जो थेमी निरंजन देवती जी

479
00:37:28,400 --> 00:37:32,440
महाराज उन्होने उसका जो खंडन किया ऐसे कैसे जब मैंने खुद ग्रंथ

480
00:37:32,440 --> 00:37:36,600
पढ वही बात लिखी हुई थी कितने बड़ आश्चर्य की बात है तुम आए

481
00:37:36,600 --> 00:37:40,760
हो हमारा खंडन करने हमारे तक से इस

482
00:37:40,760 --> 00:37:45,040
कहते सनी पात्र खुद ही नहीं मालूम अच्छा अपना उन्होने परिचय क्या दिया भैया

483
00:37:45,040 --> 00:37:49,160
ग्रंथ के शुरुआत में उन्होने अपना परिचय दिया भगु वंशी गोत्री ब्राह्मण हूं अरे

484
00:37:49,160 --> 00:37:54,240
भाई तुम जन्म से मान लिया तुमने वण परंपरा व परंपरा मान

485
00:37:54,240 --> 00:37:58,320
लिया मुझे ऐ लहा है मुझे ऐसा लग रहा

486
00:37:58,320 --> 00:38:03,240
है वेदार्थ पारिजात का खंडन करने के नाम पे वो

487
00:38:03,240 --> 00:38:07,640
वेदार्थ पारिजात का समर्थन करने के लिए उन्होंने वो ग्रंथ लिखा होगा

488
00:38:07,640 --> 00:38:11,760
जब तुमने ये लिख दिया कि मैं भगु गोत्री वंश का ब्राह्मण हूं तो तुमने मान लिया जन्म

489
00:38:11,760 --> 00:38:13,560
से वंश परंपरा

490
00:38:13,560 --> 00:38:18,400
भाई भृगु वंश से गोत्र के ब्राह्मण कैसे हो जाओगे जब तक ये नहीं मानोगे कि वंश परंपरा जन्म से है

491
00:38:18,400 --> 00:38:22,680
जन्म से मान लिया ना तुम अपना खंडन करवाने आए हो हम

492
00:38:22,680 --> 00:38:26,920
करने आए हो एक आर्य जी आए हैं आर्य जी आप

493
00:38:26,920 --> 00:38:31,080
अपना फेस रिवील करें तो हम आपको ऊपर ले अन्यथा हम

494
00:38:31,080 --> 00:38:35,160
तब तक लेते हैं दुर्गेश जी को इन्होंने शाय अपने नाम की स्पेलिंग

495
00:38:35,160 --> 00:38:39,680
ग लिख दि

496
00:38:39,680 --> 00:38:43,920
है जी दुर्गेश जी आपका नाम दुर्गेश

497
00:38:43,920 --> 00:38:47,640
या दर्श

498
00:38:47,640 --> 00:38:52,440
है आपको सुनाई दे रहा है

499
00:38:52,440 --> 00:38:58,440
दृश जी आपको सुनाई दे रहा है हा जी

500
00:38:58,880 --> 00:39:03,200
आपका नाम दीर्घ है या दुर्गेश है

501
00:39:03,200 --> 00:39:07,320
दीर्घ भाई साहब आप थोड़ा कपड़े पपड़े पहन लीजिए ना इस

502
00:39:07,320 --> 00:39:11,920
तरह से क्यों आ रहे हैं बदहाल

503
00:39:11,920 --> 00:39:16,040
में इतना भी नहीं है कि हमको सारा देश देखने वाला है तो कम

504
00:39:16,040 --> 00:39:20,400
से कम कपड़े तो वस्त्र तो धारण कर ले और अगर फिर

505
00:39:20,400 --> 00:39:24,760
अगर फिर उसमें हो या तो पारंपरिक जो वेष है कि

506
00:39:24,760 --> 00:39:30,760
धोती और अचले में हो अचला हो उपवत उसम

507
00:39:35,800 --> 00:39:40,640
हो या तो उस तरह का आपको शूट ही करना हो कि आप आपके

508
00:39:40,640 --> 00:39:44,680
कई बार होता है कि ऐसा भी दृश्य दिखाना होता है यज्ञ पवित संस्कार

509
00:39:44,680 --> 00:39:48,800
हो रहा है या इस तरह का कोई दृश्य दिखाना है उस समय आपने ऐसा

510
00:39:48,800 --> 00:39:53,240
अपने आपको को प्रस्तुत किया मर घर में बैठे हैं कहीं पर भी बैठे हैं और

511
00:39:53,240 --> 00:39:59,240
अपना कैमरा ऑन कर दिया

512
00:40:02,360 --> 00:40:06,440
आर्य चले गए जो स्वयं को कहते

513
00:40:06,440 --> 00:40:10,480
हैं कि हम पूर्ण वैदिक हैं चले

514
00:40:10,480 --> 00:40:15,360
गए और कोई नहीं आ रहा है

515
00:40:15,360 --> 00:40:19,880
चलो हमें लग रहा है कि उन्होंने हम हमारी जो

516
00:40:19,880 --> 00:40:23,880
बात है कि मत पढ़ो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में इसको मान

517
00:40:23,880 --> 00:40:29,480
लिया है इसको मान

518
00:40:29,480 --> 00:40:32,920
योगदान देने

519
00:40:32,920 --> 00:40:37,920
जाए परिचय वाला काड दिखाया था

520
00:40:37,920 --> 00:40:43,920
उसम मेरे मन में एक प्रश्न आया

521
00:40:44,400 --> 00:40:48,840
र मैं अभी विचार कर रहा था सत्र के आधार

522
00:40:48,840 --> 00:40:53,080
परकार करवाते होंगे क्योंकि हमारे यहां

523
00:40:53,080 --> 00:40:59,080
तो प्रक ब्राह्मण कुल की शाखा होती है

524
00:41:00,320 --> 00:41:06,320
श के अनुसार होता

525
00:41:10,240 --> 00:41:16,240
है की श के

526
00:41:17,440 --> 00:41:21,480
अनुसार आपकी आवाज थोड़ी सी

527
00:41:21,480 --> 00:41:25,480
ऐसी है कि जो कम मतलब समझ में आ रही है या तो आप

528
00:41:25,480 --> 00:41:29,480
फोन से दूर है या कोई और बात है जिसके कारण उतनी

529
00:41:29,480 --> 00:41:34,040
स्पष्ट नहीं आ रही

530
00:41:34,040 --> 00:41:38,640
आवाज

531
00:41:38,640 --> 00:41:42,840
कोईम हा दोबारा फिर कभी आते हैं अभी

532
00:41:42,840 --> 00:41:47,560
उस उना वो नहीं है जय

533
00:41:47,560 --> 00:41:52,160
श राधे राधे राधे राधे राधे

534
00:41:52,160 --> 00:41:56,280
देखिए ठाकुर जी अरे वाह दर्शन हो रहे हैं ठाकुर

535
00:41:56,280 --> 00:42:00,560
जी के दर्शन आप जहां पर है वहीं के हैं भगवान

536
00:42:00,560 --> 00:42:04,840
ये नहीं है गार्डन है

537
00:42:04,840 --> 00:42:09,250
उसम अच्छा अच्छा बहुत

538
00:42:09,250 --> 00:42:11,520
[संगीत]

539
00:42:11,520 --> 00:42:15,520
बढ़िया हरि दासो हम आप

540
00:42:15,520 --> 00:42:21,520
ऊपर

541
00:42:21,640 --> 00:42:25,840
आए हां कोई साईं बाबा साईं के नाम से

542
00:42:25,840 --> 00:42:31,840
चांद मिया को मानने वाले हैं तो वो भी आ सकते

543
00:42:36,080 --> 00:42:40,080
हैं कोई अगर चांद मिया को मानता हो कि वह भगवान के

544
00:42:40,080 --> 00:42:44,360
अवतार थे भगवान है उनके साथ राम को जोड़ दिया जाता

545
00:42:44,360 --> 00:42:48,840
है कोई ब्रह्मा कुमारी वाले हो तो आ सक प्रणव

546
00:42:48,840 --> 00:42:53,120
प्रणव को जोड़ दिया जाता है तो वह सब आए अपने पक्ष को यहां रख सकते

547
00:42:53,120 --> 00:42:57,400
हैं और वेदों में परमाण कबीर साहब भगवान

548
00:42:57,400 --> 00:43:01,880
कहां गए वो कहां गए

549
00:43:01,880 --> 00:43:06,160
भाई मतलब जिनका वहां पर नाम स्पष्ट लिखा है

550
00:43:06,160 --> 00:43:10,320
रुद्र शिव विष्णु स्पष्ट लिखा है वो

551
00:43:10,320 --> 00:43:14,360
भगवान नहीं है है ना मगर उसी लॉजिक के अनुसार

552
00:43:14,360 --> 00:43:18,720
जिका नाम स्पष्ट नहीं लिखा है वो जो र आ रहा है वो

553
00:43:18,720 --> 00:43:23,520
अगले शब्द के साथ संधि होने के कारण व रा उत्पन्न हो रहा है

554
00:43:23,520 --> 00:43:27,800
तो वो जो है आपके अनुसार

555
00:43:27,800 --> 00:43:33,000
भगवान भगवान पणी ने पता नहीं कौन सा सूत्र बनाया है अष्टा में

556
00:43:33,000 --> 00:43:37,840
और देख जो रामपाल दास जी जो वीडियो बनाते

557
00:43:37,840 --> 00:43:41,880
हैं उसमें देखा है जो उनकी कक पॉइंट

558
00:43:41,880 --> 00:43:45,880
होते हैं ना उस पर बहुत ज्यादा बात ना करके आगे बढ़ जाते हैं तुरंत

559
00:43:45,880 --> 00:43:50,040
हा कक पॉइंट होता है जो उस पर ज्यादा बात नहीं करते

560
00:43:50,040 --> 00:43:51,320
जैसे कि अभी

561
00:43:51,320 --> 00:43:55,360
अभी एक नया प्रे में बता रहे हैं विष्णु पुराण में काल के

562
00:43:55,360 --> 00:43:59,600
बारे में बता रहे हैं ये देखो काल का यहां लिखा है ठीक है

563
00:43:59,600 --> 00:44:03,680
उसके वहीं प लिखा है कि काल यहां पर्र परम ब्रह्म को काल भी कहा

564
00:44:03,680 --> 00:44:07,760
जा रहा है हां हां ये ये मैंने पढ़ा है तो तुरंत उन्होंने कहा ये

565
00:44:07,760 --> 00:44:12,000
अज्ञानता वश हो गया ज्यादा देर रुके नहीं ये अज्ञानता वश हो गया आगे बढ़ गए

566
00:44:12,000 --> 00:44:16,040
पकड़े जाएंगे ना पकड़े वहां कोई टिप्पणी वहां ज्यादा टिप्पणी नहीं की जैसे इनके

567
00:44:16,040 --> 00:44:20,680
मतलब की बात आ जाती टिप्पणी करते हैं ना ये देखो हो गया ना इनका बाप हो गया ना ऐसे बोलते

568
00:44:20,680 --> 00:44:25,000
हैं है ना वेद पार जात की भूमिका में लिखा है कि जैसे रात्रि

569
00:44:25,000 --> 00:44:29,440
के अंधेरे में घर में चोर घुसता है ना रात्रि के अंधेरे में चुपचाप कोई

570
00:44:29,440 --> 00:44:33,600
ना देख रहा हो और फिर उसमें सामान लेकर तुरंत भाग जाता है

571
00:44:33,600 --> 00:44:37,640
दिन के प्रकाश में घुसेगा तो पकड़ा जाएगा इसलिए शास्त्रों के प्रकाश में जब

572
00:44:37,640 --> 00:44:42,160
घुसो ग तो फिर पकड़े जाओगे तुरंत भागना पड़ता है चोर के

573
00:44:42,160 --> 00:44:46,160
समान हा यह बात सही कह रहे हैं ये भाई साहब एक लिख रहे हैं कि

574
00:44:46,160 --> 00:44:50,240
पोप आर्य समाज से द्वेष क्यों करते हैं पहली

575
00:44:50,240 --> 00:44:56,240
बात तो द्वेष आपका छलक रहा है जब आप पोप कह रहे हैं हा

576
00:44:57,200 --> 00:45:01,320
और अगर बा अगर बात विरोध की शुरू की जाए कि किसने किसका

577
00:45:01,320 --> 00:45:05,840
विरोध किया तो विरोध आपने किया सत्यार्थ प्रकाश

578
00:45:05,840 --> 00:45:09,840
में आपकी तरफ से विरोध शुरू हुआ है शुरुवात आपने किया

579
00:45:09,840 --> 00:45:13,960
है हम दूसरी बात ये है निषे प्राप्त वस्तु का निषेध

580
00:45:13,960 --> 00:45:17,960
किया जाता है ना ये परंपरा कहीं से प्राप्त ी तभी तो आपने निषे किया दूसरी बात ये आप

581
00:45:17,960 --> 00:45:22,120
निराकार को मानिए कि भगवान अवतार नहीं ले सकते ये है वो है वो बात

582
00:45:22,120 --> 00:45:26,480
बाद में सबसे पहले आप गैर सनातनी तो हो जाइए

583
00:45:26,480 --> 00:45:30,520
सम अपने सिद्धांतों का वो प्रचार क्यों कर रहे हैं नहीं कर सकते

584
00:45:30,520 --> 00:45:35,440
अच्छा एक मैं लॉजिक बताऊ आपको कि

585
00:45:35,440 --> 00:45:39,840
ईश्वर अवतार नहीं ले सकता इसके संबंध में इनकी तरफ से प्रमाण

586
00:45:39,840 --> 00:45:43,960
दिया जाता है अर्ध कुट न्याय से हां ईश्वर का अवतार है वो ना लेकर

587
00:45:43,960 --> 00:45:48,160
के जहां ईश्वर का अवतार नहीं है केवल वो ईश्वर निराकार है केवल

588
00:45:48,160 --> 00:45:52,200
उ उसका प्रमाण दिया जाता है इसी प्रकार से इनके द्वारा

589
00:45:52,200 --> 00:45:56,280
क्या किया जाता है मैंने एक शैली नोट करने मैंने शैली को देखने का

590
00:45:56,280 --> 00:46:01,160
प्रयास किया प्रकाश के अनुसार उसमें क्या है

591
00:46:01,160 --> 00:46:05,400
कि जैसे ये लोग कहते हैं अरे ये कैसा ईश्वर

592
00:46:05,400 --> 00:46:09,800
है जो वहां रास हो रहा है वहां जो है यह हो रहा है वो हो रहा है ठीक है

593
00:46:09,800 --> 00:46:12,320
तो इन्होंने अब ईश्वर का जो आधार है वो

594
00:46:12,320 --> 00:46:16,840
यह माना कि हमारी नैतिकता क्या कहती है जो हमारी नैतिकता

595
00:46:16,840 --> 00:46:21,040
की सीमा में आएगा वो वो ईश्वर

596
00:46:21,040 --> 00:46:25,280
हम स्वीकार करेंगे भले ही उसके संबंध में प्रमाण हो मगर वो हमारी नैतिकता

597
00:46:25,280 --> 00:46:30,240
के मगर वो हमारी नैतिकता के सीमा में नहीं है इसलिए हम उसे स्वीकार नहीं करेंगे

598
00:46:30,240 --> 00:46:34,880
इसी और इसी तरीके शैली में दयानंद जी ने बात की है

599
00:46:34,880 --> 00:46:38,920
प्रमाण से प्रमाण से अगर सर्वशक्ति मत्ता की

600
00:46:38,920 --> 00:46:42,960
सिद्ध करने की बात करेंगे तो वहा तर्क लाएंगे और तर्क

601
00:46:42,960 --> 00:46:48,000
से जब उनकी बात का खंडन होगा तो वहा प्रमाण

602
00:46:48,000 --> 00:46:52,000
लाएंगे तो उसम क्या हुआ आगे चल कर के

603
00:46:52,000 --> 00:46:56,040
मैंने जब नियोग वाला चैप्टर उनका मैंने देखा उसके बारे में बहुत

604
00:46:56,040 --> 00:47:00,200
ज्यादा प्रश्न नियोग नियोग के बारे में तो अब इन्होंने क्या

605
00:47:00,200 --> 00:47:04,560
कहा कि हम रास लीला को इसलिए नहीं मानते क्योंकि ये सामर्थ्य

606
00:47:04,560 --> 00:47:08,840
वान गुरुओ के पास गए नहीं तो पुराणों कोय समझ नहीं पाए

607
00:47:08,840 --> 00:47:12,960
मगर हम नहीं मानते क्योंकि वो नैतिकता की सीमा के अंदर नहीं है ठीक

608
00:47:12,960 --> 00:47:17,080
है इनके हिसाब से नहीं है मगर आगे जब इनके यहां

609
00:47:17,080 --> 00:47:21,120
पर नियोग का चैप्टर आता है और वहां पर पूर्व पक्ष के रूप में जब यह प्रश्न

610
00:47:21,120 --> 00:47:25,200
रखा जाता है कि भाई ये जो मातृ

611
00:47:25,200 --> 00:47:29,320
शक्ति से कहा जा रहा है कि इससे नहीं तो उसके साथ नियोग कर लो उसके उससे नहीं तो उसके

612
00:47:29,320 --> 00:47:33,440
साथ नियोग कर लो ऐसा कर लो ऐसा कर लो देवर का अर्थ

613
00:47:33,440 --> 00:47:37,960
है दूसरा वर मातृ शक्ति जिसको भी दूसरा वर बनाएगी अपना

614
00:47:37,960 --> 00:47:42,000
वो देवर है अपने पति का छोटा भाई देवर नहीं है

615
00:47:42,000 --> 00:47:46,160
देवर का अर्थ है मात शक्ति जिसको भी दूसरा वर बनाएगी उसके

616
00:47:46,160 --> 00:47:50,280
संबंध में भी व अपने कुछ अपने हिसाब से गैर परंपरा प्राप्त

617
00:47:50,280 --> 00:47:54,440
जो किसी तरीके से उसको अपने करते हैं मगर

618
00:47:54,440 --> 00:47:58,560
ठीक है जब वहा पर इन्होने पूर्व पक्ष के में प्रश्न आया

619
00:47:58,560 --> 00:48:02,960
ये मुझे व्यभिचार जैसा दिख रहा है मतलब वहा पर उसने यह बताया कि यह मेरी नैतिकता

620
00:48:02,960 --> 00:48:03,460
की

621
00:48:03,120 --> 00:48:07,280
सीमा के अंदर नहीं आ रहा है तो वहा पर उन्होने क्या जवाब दिया मालूम

622
00:48:07,280 --> 00:48:11,480
है स प्रकाश में कि भाई तुम्हारी जो नैतिकता

623
00:48:11,480 --> 00:48:16,040
है वो कहां से आ रही है धर्मशास्त्रों से

624
00:48:16,040 --> 00:48:20,160
धर्मशास्त्रों ने जब नैतिकता बताई है तो धर्मशास्त्रों के द्वारा

625
00:48:20,160 --> 00:48:24,920
अगर यह चीज बताई जा रही है तो यह भी आपकी नैतिकता है

626
00:48:24,920 --> 00:48:29,000
तो जब उन्हे भगवान श्री कृष्ण के जो यह

627
00:48:29,000 --> 00:48:33,480
जो आदि दैविक आदि भौतिक आध्यात्मिक अ समझाने वाली जो उनकी

628
00:48:33,480 --> 00:48:37,520
लीलाए है इनका खंडन करना था तो अपनी नैतिकता की सीमा में तब

629
00:48:37,520 --> 00:48:42,120
ये बात नहीं सोची कि भा जब धर्म से ही हमारी नैतिकता है

630
00:48:42,120 --> 00:48:46,520
तो धर्म से ही नैतिकता और धर्म से ही जो ये जो स्मृतियां

631
00:48:46,520 --> 00:48:50,960
है वो है तो हमें इसका खंडन नहीं करना हमें इसका ऐसा अर्थ निकालना है

632
00:48:50,960 --> 00:48:55,000
जो कि लोगों को समझ में आ सके और वेदों

633
00:48:55,000 --> 00:48:59,680
का और वेदों की के लिए इन्होंने किया भी है

634
00:48:59,680 --> 00:49:03,760
जहां जहां पर इनके अनुरूप बातें नहीं है वेदों में उसमें वहां पर इन्होंने अपने

635
00:49:03,760 --> 00:49:07,960
हिसाब से किया है मगर जब इनसे प्रश्न

636
00:49:07,960 --> 00:49:12,840
किया जाए मगर मगर जब इनसे प्रश्न किया गया कि

637
00:49:12,840 --> 00:49:17,080
भाई यह मुझे नैतिकता नहीं दिखाई दे रही तो इन्होंने उसके ऊपर प्रमाण लाद दिया

638
00:49:17,080 --> 00:49:18,400
भाई यह प्रमाण है

639
00:49:18,400 --> 00:49:22,480
इसको तुम्हें मानना पड़ेगा मगर तो एक जगह क्या

640
00:49:22,480 --> 00:49:26,960
हो रहा है प्रमाण का खंडन क्योंकि मेरी नैतिकता के अंदर नहीं है और एक

641
00:49:26,960 --> 00:49:31,160
क्या हो रहा है नैतिकता का खंडन क्योंकि व प्रमाण है वहा तो

642
00:49:31,160 --> 00:49:36,400
वही साइकलिंग अपने हिसाब से कहीं पर

643
00:49:36,400 --> 00:49:40,680
हा कोई आए हैं पंडित जी आए हैं

644
00:49:40,680 --> 00:49:44,920
फकी जय श्री राम जय श्री राम जय श्री

645
00:49:44,920 --> 00:49:49,800
राम महादेव किया व

646
00:49:49,800 --> 00:49:53,920
कोई आर समाज जी से होने वाला था लेकिन क्या हुआ

647
00:49:53,920 --> 00:49:59,920
वो चर्चा नहीं हुई क्या उनसे वो आए नहीं ही हो

648
00:50:01,720 --> 00:50:06,160
गए आकाश जी आप अपना चेहरा रिवील करें

649
00:50:06,160 --> 00:50:10,160
आकाश नहीं अक्षत जी चेहरा दिखाए

650
00:50:10,160 --> 00:50:14,320
अक्षत जी जय श्री राम

651
00:50:14,320 --> 00:50:18,760
राधे राधे जय श्री राम आपका शुभ

652
00:50:18,760 --> 00:50:23,320
नाम अक्षत तिवारी अक्षर

653
00:50:23,320 --> 00:50:27,440
तिवारी तो आप संभवत कौन का पक्ष

654
00:50:27,440 --> 00:50:31,600
रखने आए हैं नहीं प्रभु जी मतलब मेरा

655
00:50:31,600 --> 00:50:36,480
यह प्रश्न है कि आप यह कह रहे हैं कि श्री कृष्ण

656
00:50:36,480 --> 00:50:40,560
परम सत्ता नहीं है नहीं हम यह नहीं कह रहे

657
00:50:40,560 --> 00:50:44,760
इस कन के अनुसार इकोन के अनुसार श्री

658
00:50:44,760 --> 00:50:49,120
कृष्ण सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं होते हम यह कह रहे हैं इकोन

659
00:50:49,120 --> 00:50:53,200
जिस ईश्वर ईश्वर इकोन की परिभाषा के अनुसार जो

660
00:50:53,200 --> 00:50:59,200
श्री कृष्ण है वह सीमित है हम यह कह रहे हैं

661
00:51:04,000 --> 00:51:08,600
बोलिए हा तो मेरा प्रश्न इतना ही था अगर आपका अगर ये

662
00:51:08,600 --> 00:51:12,800
टॉपिक ऐसा है कि श्री कृष्ण अगर हम श्री कृष्ण को

663
00:51:12,800 --> 00:51:17,640
सर्वशक्तिमान ही मानते हैं परम ब्रह्म परम सत्ता परमेश्वर ही मानते हैं

664
00:51:17,640 --> 00:51:21,680
मगर अगर स्कोन की सीमा में आ जाए स्कोन की धारणा

665
00:51:21,680 --> 00:51:26,600
को स्वीकार करना पड़े तो उसके अनुसार श्री कृष्ण बाधित है

666
00:51:26,600 --> 00:51:31,200
यह कह रहे हैं इकोन के अनुसार जो श्री कृष्ण है वो बाधित है

667
00:51:31,200 --> 00:51:35,520
इकोन का ही आप कोई ग्रंथ पढ़ेंगे जो

668
00:51:35,520 --> 00:51:40,000
पूरा सारांश है व भगवत गीता का सारांश ऐसा कोई ग्रंथ है

669
00:51:40,000 --> 00:51:44,240
उस ग्रंथ में सबसे पहले उन्होंने ईश्वर को पूर्ण कहा है पूर्ण

670
00:51:44,240 --> 00:51:48,640
जिसमें कोई कमी नहीं आ सकती किसी भी प्रकार से न केन

671
00:51:48,640 --> 00:51:52,920
प्रणन एक बार जब मुस्लिम्स के साथ में बैठा हुआ था तो उन्होंने

672
00:51:52,920 --> 00:51:57,520
मुझे तर्क दिया कि भाई

673
00:51:57,520 --> 00:52:01,960
व्यक्ति को छोटा होने की आवश्यकता क्या है इसको

674
00:52:01,960 --> 00:52:06,040
समझिए मतलब अगर यह यह तर्क जो है आर समाज हों

675
00:52:06,040 --> 00:52:10,080
की ओर से भी आता है यह तर्क जो है बाधित करने वाले जितने

676
00:52:10,080 --> 00:52:14,200
लोग हैं सबकी तरफ से आता है कि अगर कोई प्रधानमंत्री है

677
00:52:14,200 --> 00:52:18,200
तो उसको जो है वहां जाने की आवश्यकता क्या है मगर आपने देखा होगा

678
00:52:18,200 --> 00:52:19,120
चुनावी दौरे पर

679
00:52:19,120 --> 00:52:23,480
तो होते हैं तो प्रधानमंत्री भी लोगों के जा जाकर भोजन करने लगते हैं

680
00:52:23,480 --> 00:52:27,520
झाड़ू लगाकर दिखाने लगते हैं कि हम स सफाई भी कर रहे हैं

681
00:52:27,520 --> 00:52:31,560
करते हैं ना उनकी उनको सफाई करने की आवश्यकता नहीं होती म लीला कर

682
00:52:31,560 --> 00:52:36,400
रहे होते हैं वोट वोट के लिए वोट के लिए लीला कर रहे होते हैं

683
00:52:36,400 --> 00:52:40,440
ना तो अब तर्क ये आता है

684
00:52:40,440 --> 00:52:44,560
कि अगर भगवान स्वयं को रेगुलेट नहीं कर सकते

685
00:52:44,560 --> 00:52:49,320
अपना जो असीमित रूप है उससे वो सीमित नहीं हो सकते

686
00:52:49,320 --> 00:52:53,440
है ना जो व्यवहार में आ सकते हैं ऐसे रूप में नहीं आ सके

687
00:52:53,440 --> 00:52:57,720
आ सकते तो इस सृष्टि का निर्माण ही नहीं हो सकता

688
00:52:57,720 --> 00:53:01,960
हो सकता है क्या सोचो ईश्वर सर्वज्ञ है

689
00:53:01,960 --> 00:53:06,120
समान रूप से अगर ईश्वर यह नहीं कर सकते कि मैं मेरा केवल इतना

690
00:53:06,120 --> 00:53:10,160
ही हिस्सा इस समय काम करे तो पृथ्वी बन पाएगी

691
00:53:10,160 --> 00:53:14,280
क्या नहीं भाई जब हरकत होगी तो पूरे संसार में एक साथ

692
00:53:14,280 --> 00:53:18,960
होगी ना तो पृथ्वी बन ही नहीं पाएगी पृथ्वी तभी बनेगी

693
00:53:18,960 --> 00:53:23,920
जब ईश्वर जो सर्वज्ञ निर्गुण निराकार व सगुण हो जाए

694
00:53:23,920 --> 00:53:28,000
और जैसे ही सगुण हुआ तो अवतार हो गया

695
00:53:28,000 --> 00:53:32,160
जैसे ही उन्होंने पृथ्वी बनाने के लिए अपने अपने किसी एक हिस्से को

696
00:53:32,160 --> 00:53:34,320
एक्टिव किया पूरा अगर

697
00:53:34,320 --> 00:53:39,280
पूरा हिस्सा एक्टिव होगा तो संसार में किसी भी चीज का निर्माण ही नहीं हो पाएगा

698
00:53:39,280 --> 00:53:44,640
तो वह अपने को सोच समझ के किसी एक हिस्से में एक्टिव

699
00:53:44,640 --> 00:53:48,880
करेंगे है ना तो तभी तो संसार बनेगा

700
00:53:48,880 --> 00:53:53,240
अन्यथा संसार बन ही नहीं सकता जब भी हरकत होगी जब भी वो एक्टिव होंगे पूरा

701
00:53:53,240 --> 00:53:58,200
पूरा ब्रह्मांड में एक साथ होंगे तो वो एक्टिव होना होना सब

702
00:53:58,200 --> 00:54:02,920
बराबर एक्टिव जब वो किसी एक स्थान में

703
00:54:02,920 --> 00:54:07,080
एक परिस्थिति में जब वो एक्टिव होंगे उनका एक हिस्सा एक्टिव होगा तभी

704
00:54:07,080 --> 00:54:11,440
तो सृष्टि का निर्माण होगा तो यह कहना गलत है कि वो

705
00:54:11,440 --> 00:54:15,520
अपने से अच्छा इसको मैंने वहां पर जो मुस्लिम्स के साथ बात हो रही थी तो वहां

706
00:54:15,520 --> 00:54:19,600
मैंने इस बात को ऐसे रखा था कि एक शेर

707
00:54:19,600 --> 00:54:23,880
है वो चूहे को खाना चाहता है अब चूहा

708
00:54:23,880 --> 00:54:27,960
बिल में घुस गया ठीक है अगर

709
00:54:27,960 --> 00:54:32,240
शेर के अंदर ये शक्ति नहीं है कि वह चूहे के बराबर

710
00:54:32,240 --> 00:54:36,680
छोटा हो सके तो यहां पर शेर असफल

711
00:54:36,680 --> 00:54:39,200
सिद्ध हो

712
00:54:39,200 --> 00:54:43,400
जाएगा है ना तो ईश्वर वही है

713
00:54:43,400 --> 00:54:47,600
जो कुछ भी कर सकता है ईश्वर पूर्ण है श्री कृष्ण

714
00:54:47,600 --> 00:54:50,000
पूर्ण है मगर इकोन

715
00:54:50,000 --> 00:54:54,200
के अनुसार यदि श्री कृष्ण की व्याख्या को हम धारण करेंगे अपनाएंगे तो

716
00:54:54,200 --> 00:54:58,440
श्री कृष्ण वादित है इसका अर्थ यह कि श्री कृष्ण इकोन

717
00:54:58,440 --> 00:55:02,720
के द्वारा पूजित होने वाले जो कृष्ण है वह वोह कृष्ण नहीं है जो हमारे सनातन

718
00:55:02,720 --> 00:55:06,920
सर्वशक्तिमान कृष्ण है क्यों क्योंकि जब हम उनसे पूछेंगे

719
00:55:06,920 --> 00:55:10,960
कि जिस प्रकार दूध से दही बन जाता है पर दही से दूध नहीं आप कहते हो

720
00:55:10,960 --> 00:55:15,000
उसी प्रकार कृष्ण से शिव बनते हैं मगर शिव से कृष्ण नहीं तो जब आपने यह

721
00:55:15,000 --> 00:55:19,400
कह दिया कि कृष्ण ही शिव बने मगर शिव से वह वापस कृष्ण नहीं बन

722
00:55:19,400 --> 00:55:23,480
सकते तो फिर यहां पर शिव के रूप में कृष्ण

723
00:55:23,480 --> 00:55:27,240
बाधित हो गए

724
00:55:27,240 --> 00:55:31,360
अच्छा पूर्ण का क्या है परिभाषा कि पूर्ण से अगर कुछ निकाला जाएगा तो

725
00:55:31,360 --> 00:55:35,760
वोह भी पूर्ण होगा पूर्ण से अगर कुछ निकाला जाएगा

726
00:55:35,760 --> 00:55:39,760
वो भी पूर्ण होगा तो अगर कृष्ण से शिव निकल रहे हैं हमने मान लिया हमने

727
00:55:39,760 --> 00:55:43,800
शिव पुराण को अलग हटा दिया हमने देवी भागवत को अलग हटा दिया हमने

728
00:55:43,800 --> 00:55:47,840
श्रीमद् भागवत के उन श्लोकों को भी अलग हटा दिया जिसमें कि जो

729
00:55:47,840 --> 00:55:51,960
शिव है उनसे सब कुछ निकल रहा है श्रीमद् भागवत में आठवें स्कंद

730
00:55:51,960 --> 00:55:55,960
के सातव अध्याय में शिव से सब कुछ निकल रहा है उनकी स्तुति में बताया जा रहा है

731
00:55:55,960 --> 00:56:00,040
शिव से हमने उसको भी अलग हटा दिया अब हम तो यह कह रहे

732
00:56:00,040 --> 00:56:04,200
हैं मान लिया कि श्री कृष्ण ही मूल है और उनसे शिव निकल रहे

733
00:56:04,200 --> 00:56:05,160
हैं तब

734
00:56:05,160 --> 00:56:10,120
भी शिव अगर निकल रहे हैं तो शिव पूर्ण होने चाहिए ना

735
00:56:10,120 --> 00:56:14,160
और यदि शिव पूर्ण होने चाहिए तो शिव जी पूर्ण हो गए तो व ईश्वर हो

736
00:56:14,160 --> 00:56:18,280
गए फिर कोई अंतर नहीं रहा उनमें और कृष्ण में

737
00:56:18,280 --> 00:56:23,320
कोई अंतर नहीं रहा आप भले ही शिव रूप में भगवान का ध्यान कर

738
00:56:23,320 --> 00:56:27,440
लो आप भले ही शिव रूप में भगवान का ध्यान कर लो और भले

739
00:56:27,440 --> 00:56:31,600
ही कृष्ण रूप में कर लोय आपके प्रारब्ध है आपका पूर्व जन्म का

740
00:56:31,600 --> 00:56:36,040
या इस जन्म के संस्कार है तो

741
00:56:36,040 --> 00:56:40,120
यह नहीं हो पाएगा उनसे उनसे शिव भक्तों का आदर

742
00:56:40,120 --> 00:56:44,760
नहीं हो पाएगा उनसे माता के भक्तों का आदर नहीं हो पाएगा हां

743
00:56:44,760 --> 00:56:48,800
इस्लाम के भक्तों का आदर हो जाएगा इस्लाम के भक्तों

744
00:56:48,800 --> 00:56:53,240
के लिए कह देंगे कि कृष्ण कृष्ण अल्लाह एक है कृष्ण यहोवा एक है

745
00:56:53,240 --> 00:56:57,320
मगर शिव भक्तों का सम्मान नहीं हो पाएगा शिव को भगवान बनने वाले शिव

746
00:56:57,320 --> 00:57:01,960
को कृष्ण के समान मानने वाले पाखंडी है मूर्ख है

747
00:57:01,960 --> 00:57:06,880
पापी

748
00:57:06,880 --> 00:57:10,880
हैं प्रभु जी जो चैतन्य महाप्रभु ने

749
00:57:10,880 --> 00:57:15,000
जो मायावादी शंकराचार्य जी

750
00:57:15,000 --> 00:57:19,040
के जो संप्रदाय उस पर लागू होता है कि नहीं होता है जैसे आपने

751
00:57:19,040 --> 00:57:23,320
पछ नहीं होता क्योंकि

752
00:57:23,320 --> 00:57:27,440
चैतन्य महाप्रभु खुद शक चार्य के ही परंपरा

753
00:57:27,440 --> 00:57:31,680
के हैं यह तो उनके द्वा उनके नाम पर यह फैलाया गया

754
00:57:31,680 --> 00:57:35,840
कि नहीं चेतन महाप्रभु ने आदि शंकराचार्य जी का विरोध किया प

755
00:57:35,840 --> 00:57:40,160
पढ़ाई तो वो उसी की कर रहे हैं सी धरी टीका तो उसी का मान रहे

756
00:57:40,160 --> 00:57:44,400
हैं भाई जो आपका गुरु है वो

757
00:57:44,400 --> 00:57:48,720
वोह कहलाता है जो आपको ब्रह्म का मार्ग प्रशस्त करे यह भागवत

758
00:57:48,720 --> 00:57:53,760
का सिद्धांत है गुरु कौन है

759
00:57:53,760 --> 00:57:59,760
गुरु वो है जो

760
00:58:05,560 --> 00:58:09,560
यह अभी मैंने लास्ट जो स्ट्रीम की थी उसमें मैंने बताया था

761
00:58:09,560 --> 00:58:13,560
भागवत के अनुसार गुरु वो

762
00:58:13,560 --> 00:58:19,560
है जो आपको ब्रह्म का प्रतिपादन

763
00:58:20,760 --> 00:58:25,400
कराए और अगर चैतन्य महाप्रभु

764
00:58:25,400 --> 00:58:29,600
समझ पाए भगवान को किसके द्वारा श्रीधर स्वामी के द्वारा

765
00:58:29,600 --> 00:58:33,600
तो उनके गुरु जो हुए वास्तविक गुरु भागवत के अनुसार उनके जो गुरु

766
00:58:33,600 --> 00:58:36,840
हुए वो कौन

767
00:58:36,840 --> 00:58:41,440
हुए वो हुए श्रीधर स्वामी श्रीधर

768
00:58:41,440 --> 00:58:45,680
स्वामी अब जब वो उनके गुरु हुए तो व श्रीधर स्वामी का ही खंडन

769
00:58:45,680 --> 00:58:49,680
करने वाले हैं क्या श्रीधर स्वामी ने कई जगह व माया की बात हो

770
00:58:49,680 --> 00:58:53,760
रही है गुण गुण माया मया उन्होंने कितनी बार लिखा

771
00:58:53,760 --> 00:58:57,840
है मैं आपको दिखाता हूं एक मिनट रुक यह देखिए भागवत

772
00:58:57,840 --> 00:59:02,080
पुराण का व है दसवा स्कंद 80 वा अध्याय 32

773
00:59:02,080 --> 00:59:06,400
वा श्लोक मनुष्य के तीन गुरु होते हैं ज्ञानो

774
00:59:06,400 --> 00:59:11,120
उपदेश करके परमात्मा को प्राप्त कराने वाला गुरु सबसे बड़ा होता है

775
00:59:11,120 --> 00:59:15,200
परमात्मा के बारे में जिसने बताया परमात्मा समझा

776
00:59:15,200 --> 00:59:19,320
दिया और वह भागवत को समझ पाए कहां से श्रीधर स्वामी

777
00:59:19,320 --> 00:59:21,040
के यहां से

778
00:59:21,040 --> 00:59:25,120
और तो और श्रीधर स्वामी के विरोध में यदि कोई

779
00:59:25,120 --> 00:59:29,280
टीका लिखता है तो व गलत होगा तो श्रीधर स्वामी के विरोध में पूरी

780
00:59:29,280 --> 00:59:33,520
टीका है इसकन की देख लीजिए जहां शिव की स्तुति स्वीकार

781
00:59:33,520 --> 00:59:37,760
की जा रही है वहां भी इस कोन ने विष्णु की स्तुति डाल दी अपने

782
00:59:37,760 --> 00:59:41,760
मंतव्य के लिए अभी मैंने

783
00:59:41,760 --> 00:59:46,000
लास्ट वाली स्ट्रीम में खोल के बताया था यह बात एक आए थे सज्जन

784
00:59:46,000 --> 00:59:52,000
इटावा से वह फिर आउट हो

785
00:59:52,840 --> 00:59:57,080
गए प्रभु जी पर चैतन्य महाप्रभु तो

786
00:59:57,080 --> 01:00:01,080
मधुवा चार्य जी के संप्रदाय से आते हैं ना मधुवा चार्य से तो मधुवा चार्य

787
01:00:01,080 --> 01:00:07,080
जी के संप्रदाय से आते हैं तो उन्होंने मधुवा चार्य जी की भागवत क्यों नहीं

788
01:00:07,840 --> 01:00:12,320
पढ़ी प्रॉब्लम य है मतलब वही वाली बात

789
01:00:12,320 --> 01:00:16,480
इसकी ईट उसका रोड़ा भानुमति का कुनबा जोड़ा

790
01:00:16,480 --> 01:00:21,200
अरे भैया आप पढ़ने जा रहे हो श्रीधर स्वामी के पास

791
01:00:21,200 --> 01:00:25,240
भागवत को समझ रहे हो श्रीधर स्वामी से आप जो भगवान को समझ रहे

792
01:00:25,240 --> 01:00:29,280
हो श्रीधर स्वामी से ठोक के कह रहे हो कि इनके अलावा सभी टीका मेरे लिए

793
01:00:29,280 --> 01:00:33,360
अमान्य है इनके विरोध में हर टीका मेरे लिए मान्य है फिर आपने

794
01:00:33,360 --> 01:00:39,360
कह दिया कि मैं नवाचार का फॉलोअर हूं यह होता है

795
01:00:40,600 --> 01:00:44,720
ना इसको कहां तक ले जाएंगे महाप्रभु जी ने कहा

796
01:00:44,720 --> 01:00:49,120
था क्या वो मधु आचार्य से आते हैं या ये खुद से बनाया गया है

797
01:00:49,120 --> 01:00:53,240
यह सब खुद से बनाया है मधवा चार वाले खुद नहीं मानते महाप्रभु जी के जो

798
01:00:53,240 --> 01:00:57,240
पहले के जो गुरु दिखाए गए हैं इस कोन की तरफ से उनको स्वीकार

799
01:00:57,240 --> 01:01:03,240
नहीं किया जाता मधवा चार्य जी के

800
01:01:09,120 --> 01:01:13,240
द्वारा ईश्वर साकार नहीं हो सकता

801
01:01:13,240 --> 01:01:19,240
ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है आर समाज के अनुसार

802
01:01:28,600 --> 01:01:33,320
अपनी बात को रखने के लिए प्रमाण और प्रमाण को काटने के लिए तर्क

803
01:01:33,320 --> 01:01:37,320
तर्क को काटने के लिए प्रमाण प्रमाण को काटने के लिए तर्क इसी में खेला है

804
01:01:37,320 --> 01:01:41,520
पूरा सत्यार्थ प्रकाश में आप देखोगे तो तर्क

805
01:01:41,520 --> 01:01:45,680
को काटने के लिए प्रमाण लाएंगे प्रमाण को काटने के लिए तर्क लाएंगे या तो

806
01:01:45,680 --> 01:01:49,880
मान लो कि तर्क ऊंचा है प्रमाण ऊंचा है या तो दोनों में सामंजस्य

807
01:01:49,880 --> 01:01:54,160
बिठा लो जब तर्क कहा जाएगा कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है

808
01:01:54,160 --> 01:01:58,400
तो वेदों का कोई मंत्र दिखा देंगे वो बात अलग है अपने हिसाब से अर्थ किया जो भी किया

809
01:01:58,400 --> 01:02:02,960
मगर वेदों का मंत्र ले आए देखो य देखो वेद में कहा जा रहा है

810
01:02:02,960 --> 01:02:07,040
अच्छा भैया और जब तर्क दिया जाएगा तो

811
01:02:07,040 --> 01:02:11,240
प्रमाण प्रमाण दिखा देंगे नियोग रख रहा अरे तो प्रमाण

812
01:02:11,240 --> 01:02:15,640
है [संगीत] तो मैंने खुद पढ़

813
01:02:15,640 --> 01:02:19,640
प्रकाश में जब ईश्वर के साकार पर प्रश्न आया तो दयान जी खुद ही

814
01:02:19,640 --> 01:02:23,760
लिख रहे हैं कि अगर साकार है सव सर्वव्यापक है तो

815
01:02:23,760 --> 01:02:24,260
एक जग

816
01:02:24,200 --> 01:02:28,200
कैसे हो सकता है ख तक दे रहे उन्ही के तर्क में उत्तर है और

817
01:02:28,200 --> 01:02:32,720
अगर अग जो कहो अग जो कहो कि एक जगह व्यापक

818
01:02:32,720 --> 01:02:36,760
है सब जगह कैसे हो सकता है और अगर जो कहो उसने खुद से

819
01:02:36,760 --> 01:02:41,080
शरीर बना लिया तो शरीर बनाने से पहले निराकार था या नहीं कि फस गए

820
01:02:41,080 --> 01:02:45,560
आपने खुद ही कह दिया जो कहो अगर उसने खुद सेही शरीर बना लिया

821
01:02:45,560 --> 01:02:49,880
तो व शरीर बनाने से पूर्व निराकार अरे भया हम भी तो यही कह रहे हैं

822
01:02:49,880 --> 01:02:54,000
विपे सुर संत हित लीन मनुज अवतार निज इच्छा निर्मित तनु माया

823
01:02:54,000 --> 01:02:58,400
गुण गोपाल यही कह हम और क्या कह रहे भैया भगवान

824
01:02:58,400 --> 01:03:03,960
अपनी शरीर स्वेच्छा से उद्धव जी ने कहा था ना भागवत में कि

825
01:03:03,960 --> 01:03:07,960
आप भगवान भगवान यहां पर एक

826
01:03:07,960 --> 01:03:12,600
बात क्लियर करना आवश्यक है कि भगवान का जो पार मार्थी स्वरूप है

827
01:03:12,600 --> 01:03:17,440
वो साकार है निराकार है इस बात को लेकर हम किसी से नहीं बड़ते

828
01:03:17,440 --> 01:03:21,480
पमा मगर भगवान साकार हो सकते हैं कि नहीं

829
01:03:21,480 --> 01:03:25,920
हमारे व्यवहार में आ सकते हैं कि नहीं हां वो अवतार ले सकते हैं

830
01:03:25,920 --> 01:03:31,600
हमारे हमारे व्यवहार का विषय बन सकते

831
01:03:31,600 --> 01:03:37,600
हैं काफी लोग हैं यहां पर आए हैं

832
01:03:37,920 --> 01:03:42,400
रुक्मण आपके साथ तो अलग से एक दिन रखा जाए

833
01:03:42,400 --> 01:03:46,680
हरि ओम जी ह माधवदास जी हरि ओम जी

834
01:03:46,680 --> 01:03:50,880
जय श्री राम जय जय श्री राम जी मैं बस दो मिनट लूंगा क्योंकि

835
01:03:50,880 --> 01:03:55,120
आपकी चर्चा चल रही है ठीक है मैं बीच में बस एक बात बोल र हूं कि शिवांश

836
01:03:55,120 --> 01:03:59,240
जी मैं बड़ी आप हाथ जोड़ के प्रार्थना करना चाहूंगा आप एक सेशन कम से कम

837
01:03:59,240 --> 01:04:03,320
ज्ञान गंगा पुस्तक के ऊपर जरूर रखिए जिसमें पुस्तक की समीक्षा की जाएगी

838
01:04:03,320 --> 01:04:07,920
अलग से आप उसकी तैयारी कर लीजिए हमें बता दीजिए

839
01:04:07,920 --> 01:04:12,280
डन है मेरी तरफ से तो फिर कल कल कर

840
01:04:12,280 --> 01:04:16,400
लेंगे बस ठीक है चलेगा ठीक है

841
01:04:16,400 --> 01:04:20,720
आप अभी अपनी चर्चा जारी रखिए मैं बस यही प्रार्थना करने आया था

842
01:04:20,720 --> 01:04:25,840
अक्षत जी कहां चले गए धन्यवाद धन्यवाद जी धन

843
01:04:25,840 --> 01:04:31,200
अक्षत जी कहां चले गए शायद चले

844
01:04:31,200 --> 01:04:35,690
गए अक्षत जी अपना फेस कम ऑन

845
01:04:35,690 --> 01:04:40,880
[संगीत]

846
01:04:40,880 --> 01:04:45,040
करिए तो इसके साथ ही

847
01:04:45,040 --> 01:04:50,600
साथ जोन है उसके

848
01:04:50,600 --> 01:04:54,720
द्वारा इसकन के द्वारा विष्णु और कृष्ण में भी भेद किया

849
01:04:54,720 --> 01:04:57,240
जाता है

850
01:04:57,240 --> 01:05:01,360
कि विष्णु थोड़े से कम है

851
01:05:01,360 --> 01:05:05,560
कृष्ण ही सुप्रीम है अगर यह अनन्य की रक्षा के लिए

852
01:05:05,560 --> 01:05:09,960
है तो यही बात तो हम भी कह रहे हैं कि पुराणों में अनन्य

853
01:05:09,960 --> 01:05:13,960
होता की रक्षा के लिए ही विष्णु भग व्यास जी ने कहीं कहीं पर

854
01:05:13,960 --> 01:05:17,960
विष्णु को छोटा और शिव को बड़ा कहा और कहीं कहीं पर शिव को छोटा विष्णु को

855
01:05:17,960 --> 01:05:22,200
बड़ा कहा तो उसे हमें अन्यता के भाव से स्वीकार कर लेना चाहिए यही

856
01:05:22,200 --> 01:05:26,200
तो हम भी कह रहे हैं मगर वोह अपनी बात को तो अन्यता रक्षा

857
01:05:26,200 --> 01:05:30,200
के हिसाब से बनवा लेते हैं व अनंता की रक्षा के लिए कहा है

858
01:05:30,200 --> 01:05:34,800
और वेद व्यास जी के ऊपर आरोप लगा देते हैं कि उन्होंने शिव और विष्णु में भेद

859
01:05:34,800 --> 01:05:38,960
कहा जबकि शिव और विष्णु के लिए यह भी लिखा वेदव्यास जी ने कि इनमें भेद

860
01:05:38,960 --> 01:05:43,040
करने वाला नरगा होता है

861
01:05:43,040 --> 01:05:47,840
यह सारी चीजें आप वो कहते हैं कि हम भगवान के निराकार मानते

862
01:05:47,840 --> 01:05:51,920
नहीं भगवान के दो स्वरूप है एक स्वरूप जिसको सिर्फ प्राप्त

863
01:05:51,920 --> 01:05:56,600
किया जा सकता है जो व्यवहार का विषय नहीं है वाणी का विषय नहीं है

864
01:05:56,600 --> 01:06:00,840
और दूसरा स्वरूप है जिसको जिसके प्रति हम व्यवहार कर सकते हैं भक्ति कर सकते

865
01:06:00,840 --> 01:06:05,480
हैं वह साकार है भगवान साकार अवतार लेते हैं

866
01:06:05,480 --> 01:06:11,480
क्या दिक्कत है े

867
01:06:11,960 --> 01:06:16,240
मानने उनके जो मतभेद है जैसे अद्वैत

868
01:06:16,240 --> 01:06:20,640
और द्वत और इसमें जो भेद है तो वो इतनी

869
01:06:20,640 --> 01:06:26,000
कड़ी लैंग्वेज क्यों यूज करते हैं समझ में थोड़ा कम आता है

870
01:06:26,000 --> 01:06:30,760
सब तो जैसे इकन की जो साइड

871
01:06:30,760 --> 01:06:35,080
है जब यह हमें विचार मत जो हमारे हिंदू

872
01:06:35,080 --> 01:06:39,080
धर्म में अलग-अलग मत के अनुसार हमें अपनी जर्नी

873
01:06:39,080 --> 01:06:43,360
करनी पड़ती है जिससे हम आध्यात्म समझ पाए कभी

874
01:06:43,360 --> 01:06:47,440
हम अद्वैत का स् सहारा लेकर ज्ञान मार्ग

875
01:06:47,440 --> 01:06:51,680
से चलते हैं और कभी द्वैत का सहारा लेकर भक्ति मार्ग से पर उनके

876
01:06:51,680 --> 01:06:56,000
जब हम सुनते हैं कि यह जो जैसे मैं आदि शंकराचा

877
01:06:56,000 --> 01:07:00,080
मानता हू और बाकी जितने भी वल्लभाचार्य इन सबको

878
01:07:00,080 --> 01:07:04,280
मानता हूं पर जब वो भक्ति मार्ग वाले उनके एकदम कड़ी निंदा कर दे

879
01:07:04,280 --> 01:07:10,280
तो फिर ठीक नहीं लगता

880
01:07:10,880 --> 01:07:15,520
है ऐसा है कि द्वैत और अ

881
01:07:15,520 --> 01:07:20,240
द्वैत दोनों एक तरीके से जैसे बॉलर और बैट्समैन

882
01:07:20,240 --> 01:07:24,280
बॉलर की तुलना कभी बैट्समैन से नहीं कर सकते हैं क्योंकि

883
01:07:24,280 --> 01:07:28,360
बॉलर के विकेट गिने जा उसने कितने विकेट लिए कितने रन उसने बनाने

884
01:07:28,360 --> 01:07:32,520
दिए और क्रिकेट का क्या कर बैट्समैन का क्या करते हैं

885
01:07:32,520 --> 01:07:36,640
उसके रन गिने जाते हैं कि इसने शतक कितने मारे कितनी बॉलो में कितने रन बना

886
01:07:36,640 --> 01:07:40,880
दिए अगर विकेट के ऊपर देखा जाए तो बॉलर

887
01:07:40,880 --> 01:07:44,920
बहुत से बहुत कर लेगा तो उसके 11 ही विकेट आएंगे और रन

888
01:07:44,920 --> 01:07:49,440
बनाने की बात अगर देखी जाए तो उसके रन हो जाएंगे 300 बैट्समैन 300

889
01:07:49,440 --> 01:07:53,680
तक मार देता है कितने भी मार सकता है है ना तो

890
01:07:53,680 --> 01:07:57,880
11 की तुलना हम से किस हिसाब से करेंगे तो बॉलर और बैट्समैन

891
01:07:57,880 --> 01:08:02,360
का कोई कंपेरिजन नहीं होता है इसी प्रकार से द्वैत और अद्वैत

892
01:08:02,360 --> 01:08:07,280
का कंपेरिजन नहीं है द्वैत हमारे व्यवहार

893
01:08:07,280 --> 01:08:11,320
का आधार है द्वैत हमारा मार्ग

894
01:08:11,320 --> 01:08:16,040
है और अद्वैत उसके द्वारा प्राप्त होने वाली

895
01:08:16,040 --> 01:08:20,320
डेस्टिनेशन हमारा लक्ष्य तो हमने जो

896
01:08:20,320 --> 01:08:25,120
भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी ने द्वैत को नकारा नहीं है व्यवहार द्वैत

897
01:08:25,120 --> 01:08:26,000
और और उसका

898
01:08:26,000 --> 01:08:30,240
जो लक्ष्य है प्राप्त वो अद्वैत मगर अपनी रोटियां

899
01:08:30,240 --> 01:08:34,320
सेकने के लिए लोग इस तरह का कु प्रचार कर देते हैं कि नहीं नहीं वो

900
01:08:34,320 --> 01:08:38,720
अद्वैत मानते हैं अरे भाई अगर वो द्वैत को नहीं मानते तो जगन्नाथ

901
01:08:38,720 --> 01:08:42,760
मंदिर इत्यादि की पुनर स्थापना क्यों करते मणि रथ माला

902
01:08:42,760 --> 01:08:47,520
में क्यों कहते कि जब तुम फस गए जीव भाव को प्राप्त हो गए तो श्री कृष्ण की पूजा करो

903
01:08:47,520 --> 01:08:52,200
भज गोविंदम क्यों लिखते तो द्वैत

904
01:08:52,200 --> 01:08:56,400
हमारा मार्ग है और अद्वैत उसकी उसका

905
01:08:56,400 --> 01:09:00,680
लक्ष्य जिस तरीके से भक्ति हमारा मार्ग है और ज्ञान

906
01:09:00,680 --> 01:09:04,920
उसका लक्ष्य

907
01:09:04,920 --> 01:09:09,480
हां भक्ति हमारा मार्ग है ज्ञान उसका

908
01:09:09,480 --> 01:09:15,480
लक्ष्य यही अंतर व्यवहार और परमार्थ में

909
01:09:22,440 --> 01:09:27,000
है हां देवी भागवत में जो

910
01:09:27,000 --> 01:09:31,240
नाइंथ चैप्टर है उसमें सृष्टि की उत्पत्ति कृष्ण भगवान से ही दिखाई गई है देवी

911
01:09:31,240 --> 01:09:35,240
भागवत में यह कल्प भेद से होता है थोड़ा बहुत

912
01:09:35,240 --> 01:09:39,320
अपने शास्त्रों को पढ़ने का प्रयास करेंगे वैसे ही आपको य कल्प भेद समझ में

913
01:09:39,320 --> 01:09:43,320
आ जाएगा सृष्टि की रचना एक बार नहीं हुई है कई बार हुई है तो

914
01:09:43,320 --> 01:09:47,600
ईश्वर ने सर्व शक्ति मत्ता की सिद्धि के लिए अनन्य की रक्षा के

915
01:09:47,600 --> 01:09:51,760
लिए इस प्रकार से किया है कि एक ही परम

916
01:09:51,760 --> 01:09:55,760
तत्व कभी विष्णु के रूप में सृष्टि की रचना कर रहा है भी शिव

917
01:09:55,760 --> 01:10:01,760
के रूप में षष्टि की रचना कर रहा

918
01:10:05,960 --> 01:10:10,880
है हमारे आज जिनके कारण आज की सुनिश्चित हुई थी

919
01:10:10,880 --> 01:10:16,440
आज की चर्चा वही वह नहीं आए बाकी सब आ गए कुमार आर्य

920
01:10:16,440 --> 01:10:20,680
जी आप अपना य ऑन करें फेस कैम

921
01:10:20,680 --> 01:10:24,960
अच्छा यह थोड़ी एक अच्छी चीज हो जाती है कि जो

922
01:10:24,960 --> 01:10:29,320
वैसे त होते हैं ना सामाजिक तत्व फेस कैम की वजह से वो फिल्टर

923
01:10:29,320 --> 01:10:33,520
हो जाते हैं बिल्कुल जो

924
01:10:33,520 --> 01:10:39,520
अप्रिय आचरण करना चाहते हैं आकर

925
01:10:40,280 --> 01:10:45,920
के आज

926
01:10:45,920 --> 01:10:50,120
तो आज आपने वीडियो देखी व मैंने भेजा था जो

927
01:10:50,120 --> 01:10:54,240
मातृ शक्ति का जो जिसको जिसका संज्ञान मथुरा पुलिस ने ले लिया था उ

928
01:10:54,240 --> 01:11:00,240
उनसे संपर्क हो स तो शादी है उनको हम लाए अपने चैनल

929
01:11:01,000 --> 01:11:05,560
पर है ना करते हैं

930
01:11:05,560 --> 01:11:09,880
लेकिन वो उनकी हिंदी अच्छी है लेकिन वो है नहीं यहां के विदेशी है

931
01:11:09,880 --> 01:11:13,920
वो ति करके आए हैं कोई जो

932
01:11:13,920 --> 01:11:16,840
कल आए

933
01:11:16,840 --> 01:11:20,840
थे हां ऋतिक जी जय श्री राम जय

934
01:11:20,840 --> 01:11:21,720
श्री राम भैया जय श्री

935
01:11:21,720 --> 01:11:25,760
राम कैसे हो आप जय श्री राम हां बस मैं कुशल मंगल आप अपना

936
01:11:25,760 --> 01:11:30,680
जो धार्मिक आध्यात्मिक पक्ष है वो एक बार हमें याद दिला दें किसकी ओर से हैं

937
01:11:30,680 --> 01:11:34,680
आप जी मैं सामान्य हिंदू समझ सकते हैं क्योंकि

938
01:11:34,680 --> 01:11:38,720
अभी तो मैं वही जानने का प्रयास कर रहा हूं कि मुझे कौन-कौन से ग्रंथ पढ़ने चाहिए अध्ययन

939
01:11:38,720 --> 01:11:43,000
करने चाहिए सो दैट कि हमें नॉलेज मिल सके क्योंकि आप जानते हो कि जो मॉडर्न स्कूल्स

940
01:11:43,000 --> 01:11:47,040
में पढ़े हुए बंदे होते हैं तो हमें उन चीजों की ज्यादा नॉलेज नहीं होती बट ये कि हम लोग

941
01:11:47,040 --> 01:11:51,040
क्योंकि हम लोग बचपन से सुनते आ रहे हैं कथा प्रवचन वगैरह देखते आ रहे हैं हमारे

942
01:11:51,040 --> 01:11:55,080
दादा लोग या घर परिवार में जो चीजें होती है तो उससे भी कुछ कुछ हमें आईडिया लग जाता है बहुत कुछ मिलता

943
01:11:55,080 --> 01:11:59,240
है बाकी फिर जैसे आप लोग के चैनल हो गए और स्वामी

944
01:11:59,240 --> 01:12:03,240
जी के प्रवचन हो गए तो पूरी शंकराचार्य भगवान जी के

945
01:12:03,240 --> 01:12:07,240
तो बहुत कुछ वहा से भी थोड़ा थोड़ा मिलता है तो लेकिन कुछ कुछ डाउट्स है जो मैं पूछने वाला

946
01:12:07,240 --> 01:12:09,840
था और वो जो वो

947
01:12:09,840 --> 01:12:14,160
भी था मैंने एक बार मतलब बुक के सोर्सेस जैसे

948
01:12:14,160 --> 01:12:18,440
हर किसी के पास व मौका नहीं होता कि व गुरुकुल कहीं जाकर के या

949
01:12:18,440 --> 01:12:22,920
जाकर के सीख सकेसे डायरेक्टली तो इसीलिए एक बार अगर आप सो बताते

950
01:12:22,920 --> 01:12:26,920
पा ग्रंथ ले लीजिए हो सके तो हमा क्लासेस में आइए

951
01:12:26,920 --> 01:12:31,120
पांच ग्रंथ ले लीजिए पहला

952
01:12:31,120 --> 01:12:35,680
है ज्ञानेश्वरी गीता ज्ञानेश्वर महाराज की

953
01:12:35,680 --> 01:12:41,120
और दूसरा है श्री रामचरित मानस तीसरा

954
01:12:41,120 --> 01:12:45,640
है एकनाथी भागवत समर्थ रामदास जी द्वारा

955
01:12:45,640 --> 01:12:50,240
रचित है वो दास बोध चौथा है भक्ति

956
01:12:50,240 --> 01:12:54,320
सुधा और पांचवा है गर्भ से कहो हम हिंदू है

957
01:12:54,320 --> 01:12:58,480
दास बोध गीता प्रेस नहीं छपती है वो आपको किसी

958
01:12:58,480 --> 01:13:00,520
और पब्लिकेशन का मिलेगा और

959
01:13:00,520 --> 01:13:05,120
गर्व से कहो हिंदु है यह आपको गोवर्धन की जो वेबसाइट है

960
01:13:05,120 --> 01:13:09,400
जो स्वस्ती प्रकाशन है वहां से मिलेगा गोवर्धन मट से

961
01:13:09,400 --> 01:13:11,360
और बाकी के तीनों ग्रंथ आपको गीता

962
01:13:11,360 --> 01:13:15,560
प्रस से मिल जाएंगे ठीक है इनका आप स्व

963
01:13:15,560 --> 01:13:19,720
अध्ययन करिए स् अध्ययन करते समय एक नोटबुक बनाइए स्व अध्ययन

964
01:13:19,720 --> 01:13:24,000
वाली नोटबुक जो भी प्रश्न फसे उस प्रश्न

965
01:13:24,000 --> 01:13:28,200
को लिख लीजिए जो भी शंका आए उसको

966
01:13:28,200 --> 01:13:32,400
उसमें नोट कर लीजिए ये मुझे पूछना है फिर उन शंकाओं

967
01:13:32,400 --> 01:13:37,240
को आप हमारे पास भेज यदि सामर्थ हुआ तो हम

968
01:13:37,240 --> 01:13:41,680
आपको बताने का प्रयास करेंगे अन्यथा फिर उनको गुरुदेव के पास ले जाए

969
01:13:41,680 --> 01:13:45,840
गुरुदेव से आएंगे जो आचार्य उनसे पूछा जाएगा यथा सामर्थ आपकी

970
01:13:45,840 --> 01:13:50,320
व शंकाएं दूर हो जाएंगी इसके साथ ही साथ एक रेगुलर प्रैक्टिस

971
01:13:50,320 --> 01:13:54,400
के लिए हमारी जो क्लासेस चलती है उनसे जुड़ जाइए आपको मैंने

972
01:13:54,400 --> 01:13:58,000
कल नंबर दिया

973
01:13:58,000 --> 01:14:02,960
74839 उसमें आप ट करेंगे आपको फॉर्म मिल जाएगा

974
01:14:02,960 --> 01:14:07,680
जीया कुछ प्रश्न थे अगर मैं अगर आप कंफर्टेबल हो तो थोड़ा

975
01:14:07,680 --> 01:14:11,720
आप वही पर आ जाइए क्लासेस मेंही क्लासेस में कर लेंगे

976
01:14:11,720 --> 01:14:15,800
थोड़ी बहुत चर्चा अगर य भी हो जाए तो मुझे एक चीज ऐड कर देता हूं उसम ज्यादा

977
01:14:15,800 --> 01:14:19,960
समय नहीं लूगा आपका मेरी आवाज आ रही है

978
01:14:19,960 --> 01:14:24,200
रही है हा मैं कह रहा हूं कि गुरुदेव ने बता बता रहे थे कि एक

979
01:14:24,200 --> 01:14:28,360
संत एकनाथ द्वारा ना भागवत पर के 11 स्कं

980
01:14:28,360 --> 01:14:32,600
पर एक बहुत सुंदर सी टीका लिखी है जिसको एक नाथ भागवत बोलते हैं

981
01:14:32,600 --> 01:14:36,760
तो उसका भी अध्ययन करके आपको काफी ज्ञान

982
01:14:36,760 --> 01:14:40,840
प्राप्त हो जो पांच ग्रंथ बताए हैं शिवास जी ने वो तो है ही

983
01:14:40,840 --> 01:14:44,920
अगर आप और इसमें ऐड करना चाहते तो एक मेरी तरफ से और ड कर लीजिए बिल्कुल

984
01:14:44,920 --> 01:14:49,200
अच्छा भैया तो जैसे कल ज मैं पूछ रहा था कि जो परमार्थ

985
01:14:49,200 --> 01:14:53,400
ईश्वर है उनकी सिद्धि कैसे होती है तो आप बता रहे थे एक बार वो कंप्लीट कर दिए थोड़ा सा

986
01:14:53,400 --> 01:14:56,360
वो रह क्या था

987
01:14:56,360 --> 01:15:00,440
सिद्धि व्यवहार के ईश्वर से होती है व्यवहार के

988
01:15:00,440 --> 01:15:04,480
ईश्वर से परमार्थ की सिद्धि होती है अच्छ जब हम व्यवहार में किसी को

989
01:15:04,480 --> 01:15:08,520
ईश्वर जब हम व्यवहार में ईश्वर को अपनाते हैं तो उसकी वाणी उसके

990
01:15:08,520 --> 01:15:13,000
वचन उसके द्वारा परमार्थ की सिद्धि हो जाती जैसे कि

991
01:15:13,000 --> 01:15:17,840
अग्नि के प्रकट होने से काठ की लकड़ी जब जलती है ना

992
01:15:17,840 --> 01:15:21,920
काठ की लकड़ी से जब लपटे निकलती है तो

993
01:15:21,920 --> 01:15:26,120
उस लपट से सिद्धि हो जाती है कि इस काट की लकड़ी पू काट की लकड़ी में

994
01:15:26,120 --> 01:15:30,400
दाक शक्ति विद्यमान है जो हमारे व्यवहार का विषय नहीं

995
01:15:30,400 --> 01:15:34,560
है उसी प्रकार से जब भगवान व्यवहार में सर्वशक्तिमान व्यवहार

996
01:15:34,560 --> 01:15:38,640
सिद्ध होते हैं उनके द्वारा ही परमार्थ का उनका परमार्थिक जो स्वरूप

997
01:15:38,640 --> 01:15:42,640
है उसका अस्तित्व सिद्ध हो जाता है लेकिन भ इसमें पॉइंट

998
01:15:42,640 --> 01:15:46,960
है जैसे अगर हम किसी भी चीज की सिद्धि करते हैं ना तो सिद्धि उसके लक्षणों

999
01:15:46,960 --> 01:15:51,480
से होती है परमार्थ के लक्षण क्या है

1000
01:15:51,480 --> 01:15:55,480
परमार्थ का लक्षण परमार्थ परमार्थ का लक्षण व्यवहार का

1001
01:15:55,480 --> 01:15:59,680
ईश्वर है ना तो फ व्यवहारिक ईश्वर की हुई तो फिर परमार्थिक

1002
01:15:59,680 --> 01:16:03,760
ईश्वर की तो फिर भी नहीं हुई वही तो बता रहा है परमार्थिक उसका

1003
01:16:03,760 --> 01:16:08,000
क्योंकि देखिए इसमें क्या होता है कि हमा द में किसी को देखिए

1004
01:16:08,000 --> 01:16:12,400
बात ऐसी है अगर आपने किसी को व्यवहार में ईश्वर अपना लिया

1005
01:16:12,400 --> 01:16:16,520
जी अगर आपने उसे ईश्वर मान लिया तो जब ईश्वर मान

1006
01:16:16,520 --> 01:16:20,920
लिया तो उसके अनुसार उसकी परमार्थ की सिद्धि हो गई क्योंकि परमार्थ

1007
01:16:20,920 --> 01:16:21,800
का जो लक्षण आपने

1008
01:16:21,800 --> 01:16:26,160
कहा ना लक्षण किसी भी चीज की लक्षण से होती है अब जब लक्षण

1009
01:16:26,160 --> 01:16:30,240
की आप बात कर रहे हैं तो वो तो व्यवहार हो गया

1010
01:16:30,240 --> 01:16:34,360
लक्षण लक्षण तो व्यवहार हो गया ना तो जब आप लक्षण

1011
01:16:34,360 --> 01:16:38,560
की बात कर रहे हैं तो व्यवहार से ही तो उसकी सिद्धि होगी बिल्कुल तो सिद्धि

1012
01:16:38,560 --> 01:16:42,600
अगर हम किसी की कर सकते तो हम व्यवहारिक की ही कर सकते हैं परमार्थिक कर ही नहीं सकते इस दृष्टि से देखा जाए

1013
01:16:42,600 --> 01:16:47,520
तो वही तो हम कह रहे हैं वाणी का विषय है मतलब

1014
01:16:47,520 --> 01:16:51,880
परमार्थिक परमार्थिक ईश्वर एक्चुअली उसकी सिद्धि नहीं हो सकती वो

1015
01:16:51,880 --> 01:16:56,280
केवल प्राप्त का विषय है उसकी सिद्धि सिद्धि नहीं हो सकती ना

1016
01:16:56,280 --> 01:17:00,400
हां उसके बारे में जो हमारा व्यवहार का ईश्वर है उसके प्रति व्यवहार करके

1017
01:17:00,400 --> 01:17:04,560
उसको केवल प्राप्त किया जा सकता है अब जैसे ये देखिए जैसे सृष्टि का निर्माण

1018
01:17:04,560 --> 01:17:08,560
करता है देखिए देखिए आपने कहा सिद्धि तो सिद्धि भी एक कर्म

1019
01:17:08,560 --> 01:17:12,760
है बिल्कुल बिल्कुल सिद्धि भी एक कर्म है वो भी व्यवहार है

1020
01:17:12,760 --> 01:17:17,200
बिल्कुल तो सिद्धि जो हो रही है एक्चुअली में व्यवहारिक ईश्वर की हो रही है परमार्थिक

1021
01:17:17,200 --> 01:17:21,440
की नहीं हो सकती क्योंकि वो व्यवहार का विषय है ही नहीं है ना सीधी बात परमार्थिक

1022
01:17:21,440 --> 01:17:25,520
की सिद्धि नहीं होती तो हमें कैसे पता चलेगा कि परमार्थ जसा कोई ईश्वर

1023
01:17:25,520 --> 01:17:29,520
वाणी वाणी वाणी प्रमाण शब्द प्रमाण शब्द

1024
01:17:29,520 --> 01:17:33,680
प्रमाण विवा हा इसमें जैसे भैया इसमें क्या होता है शब्द प्रमाण

1025
01:17:33,680 --> 01:17:36,880
की वैलिडिटी तब होती है जब उसकी सिद्धि प्रत्यक्ष अनुमान से होती

1026
01:17:36,880 --> 01:17:40,880
है लेकिन प्रत्यक्ष अनुमान से परमार्थ की सिद्धि नहीं होती तो फिर वो शब्द

1027
01:17:40,880 --> 01:17:45,320
प्रमाण की वैलिडेशन तो खत्म हो गई ना नहीं कैसे खत्म हो गई जब हमने प्रत्यक्ष

1028
01:17:45,320 --> 01:17:49,400
प्रमाण से जान लिया हमें इस पर विश्वास है तो अब वो बोल रहा है कि परमार्थ में ये है

1029
01:17:49,400 --> 01:17:53,400
तो मानना पड़ेगा जैसे मालिक किसी किताब में कुछ लिखा हुआ

1030
01:17:53,400 --> 01:17:57,560
है ठीक है उसके विषय में ऐसा लिखा हुआ है जिसके विषय में मुझे ज्ञान नहीं है जो वहां पर लिखा

1031
01:17:57,560 --> 01:18:01,560
हुआ है उस बात की सिद्धि ना प्रत्यक्ष से हो रही है ना अनुमान से हो रही है तो अल्टीमेटली

1032
01:18:01,560 --> 01:18:05,640
उसकी सिद्धि शब्द में मानी नहीं जाएगी दर्शन के अकॉर्डिंग तो यही होता है फिलॉसफी वेस्टर्न फिलॉसफी में भी यही

1033
01:18:05,640 --> 01:18:09,840
रीजन है नहीं नहीं नहीं इसमें आप जो है परंपरा प्राप्त आचार्य

1034
01:18:09,840 --> 01:18:14,040
आचार्यों के सानिध्य में जाकर के वो करिए स्व अध्ययन करिए मगर

1035
01:18:14,040 --> 01:18:18,480
परंपरा प्राप्त आचार्यों की सीमा में रहकर करिए जो

1036
01:18:18,480 --> 01:18:22,480
हमारी आस्था का विषय हो गया निष्ठा का विषय हो गया विश्वास का विषय

1037
01:18:22,480 --> 01:18:27,880
हो गया फिर वो शब्द प्रमाण से माना जाता

1038
01:18:27,880 --> 01:18:32,200
जैसे मैं आपको एक बात बताऊ कि हमारे माता

1039
01:18:32,200 --> 01:18:36,680
पिता ने हमें कहा कि बहन के साथ संबंध नहीं बनाना है

1040
01:18:36,680 --> 01:18:41,440
बिल्कुल अब इसमें ना तो हमारे पास

1041
01:18:41,440 --> 01:18:43,560
अनुभव

1042
01:18:43,560 --> 01:18:47,640
है हमारे पास और कुछ नहीं है केवल एक ही प्रमाण है हमारे माता पिता ने

1043
01:18:47,640 --> 01:18:51,960
मना किया और हमने उस बात को मान लिया इसमें यह कर सकते हैं क्या

1044
01:18:51,960 --> 01:18:56,000
पहले उसको पहले उसको चेक करेंगे उसके बाद करेंगे क्या ऐसा

1045
01:18:56,000 --> 01:19:00,040
किया जा सकता है इसमें जैसे अभी हम मेले में गए थे

1046
01:19:00,040 --> 01:19:04,040
माघ मेले में तो वहां पर हमारा हमारा

1047
01:19:04,040 --> 01:19:06,640
सामना हुआ

1048
01:19:06,640 --> 01:19:11,040
इनसे स्वयं को कल्की कहने वालों से सामना

1049
01:19:11,040 --> 01:19:15,160
हुआ ऐसे भी लोग आ गए हा हां बिल्कुल आप माग

1050
01:19:15,160 --> 01:19:19,160
में जाइए कभी देखिए पूरा मेला है पूरा

1051
01:19:19,160 --> 01:19:23,360
उसम वास्तविक संत भी है और नकली संत भी है

1052
01:19:23,360 --> 01:19:28,000
नकली संत भी है हां तो उसमें स्वयं को कलकी

1053
01:19:28,000 --> 01:19:32,800
उसमें स्वयं को कल्की कहने वाला कोई व्यक्ति है

1054
01:19:32,800 --> 01:19:36,920
कि 2006 में वो हुआ था और उसकी

1055
01:19:36,920 --> 01:19:41,240
गोली मारकर हत्या भी की गई थी वो ऐसा ऐसा कुछ कलकी वाला मामला था

1056
01:19:41,240 --> 01:19:42,960
उसको कल्की के रूप में स्थापित

1057
01:19:42,960 --> 01:19:47,840
करते हुए कि जो भविष्य का जो कल्की अवतार है

1058
01:19:47,840 --> 01:19:51,960
वो हो चुका है वो हो चुका है और हम उसकी

1059
01:19:51,960 --> 01:19:56,120
पूजा करते हैं तो के लोगों से जब मेरी भेंट

1060
01:19:56,120 --> 01:20:00,280
हुई तो उन्होंने हमको कहा कि मानो

1061
01:20:00,280 --> 01:20:04,600
मत मानो मत जानो मानो

1062
01:20:04,600 --> 01:20:09,280
मत जानो तो फिर मैंने उनसे पूछा

1063
01:20:09,280 --> 01:20:13,360
कि जानने का मतलब आप यह है कि जब हमें यह सिखाया जाए

1064
01:20:13,360 --> 01:20:17,440
कि बहन के साथ विवाह नहीं करना है तो हम पहले उसको ट्र चेक करें

1065
01:20:17,440 --> 01:20:21,440
जो हमें बताया जा रहा है उसके बाद हम उसको माने तो शब्द

1066
01:20:21,440 --> 01:20:25,680
प्रमाण भी मायने रखता है अगर शब्द प्रमाण पर हम नहीं रहे ना

1067
01:20:25,680 --> 01:20:29,880
तो दुनिया एक मिनट नहीं खिसक सकती है एक मिनट नहीं

1068
01:20:29,880 --> 01:20:34,000
खगी आप अगर ये सोचते हैं कि फलाना

1069
01:20:34,000 --> 01:20:38,320
ऐसा है फलाना वैसा है जी जैसे

1070
01:20:38,320 --> 01:20:42,400
मान लीजिए कि मैं टिकट लेता हूं जी

1071
01:20:42,400 --> 01:20:46,840
वो मैं समझ गया थोड़ा शंख में एक बात जोड़ता हूं आपकी बात

1072
01:20:46,840 --> 01:20:51,080
तरीका काफी अच्छा है तो स्पष्ट कर देते तो इसमें जैसे क्या है कि आपकी बात ठीक है शब्द प्रमाण

1073
01:20:51,080 --> 01:20:55,160
की वैल्यू होती है ठीक है हर चीज की वैलिडेशन नहीं मांगते लेकिन फिर भी

1074
01:20:55,160 --> 01:20:58,000
जो भी शब्द प्रमाण है अगर हम हर एक चीज को मानने लगेंगे

1075
01:20:58,000 --> 01:21:02,720
ठीक है तो हर चीज को नहीं मान सकते विरोध बोले य लिखा मान लो

1076
01:21:02,720 --> 01:21:06,920
तो हमें क्या पता है हमें एक बार बुद्धि का प्रयोग करना पड़ता है ठीक है हमें उसकी

1077
01:21:06,920 --> 01:21:11,000
जो समीक्षा बहुत बार करनी पड़ती है तो आपने य स्वीकार

1078
01:21:11,000 --> 01:21:15,240
कर लिया ना कि वह वाणी का विषय है तो फिर उसके लिए बुद्धि का प्रमाण क्यों चाहिए

1079
01:21:15,240 --> 01:21:19,560
जब आप खुद ही कह रहे हो बुद्धि का विषय है तो

1080
01:21:19,560 --> 01:21:23,640
उस मुझे जानना कि सिद्धि कैसे हो रही है सिद्धि के लिए हमारे पास सिद्धि

1081
01:21:23,640 --> 01:21:27,640
के लिए सिद्धि करने के लिए प्रमाण चाहिए होते है प्रमाण जो है

1082
01:21:27,640 --> 01:21:31,680
बता रहा हूं ना सिद्धि कैसे हो रही है जो सर्वशक्तिमान सत्ता है वो आपको ये

1083
01:21:31,680 --> 01:21:35,880
बता रही है कि ऐसा है आपने अगर उसको सर्वशक्तिमान मान लिया

1084
01:21:35,880 --> 01:21:39,880
तो उसकी सिद्धि हो रही है अगर सर्वशक्तिमान नहीं माना तो उसकी सिद्धि नहीं

1085
01:21:39,880 --> 01:21:44,040
हो रही है अच्छा भ सर्वशक्तिमान प ही थोड़ा सा डाउट था जैसे आप जो सर्वशक्तिमान

1086
01:21:44,040 --> 01:21:48,040
का मतलब लेते हैं कि ईश्वर ऐसा है जो कुछ भी कर सकता है तो आप ये निष्कर्ष

1087
01:21:48,040 --> 01:21:52,240
पर कैसे निकले कि ऐसा ईश्वर उसको बोलेंगे जो कुछ भी कर सकता आप इस कंक्लूजन प कैसे

1088
01:21:52,240 --> 01:21:56,680
पहुंचे इस निष्कर्ष पर कैसे पहुचे हा

1089
01:21:56,680 --> 01:22:00,880
क्योंकि देखिए दुनिया अलग फिलॉसफी है हर को अलल मानता है क्योंकि अतो

1090
01:22:00,880 --> 01:22:05,160
मा सगम तमस जति मृत मतम जो चाह विद्यमान

1091
01:22:05,160 --> 01:22:09,360
है मनुष्य के अंदर प्रत्येक जीव के अंदर इस चाह का विषय

1092
01:22:09,360 --> 01:22:13,080
वही हो सकता है जो किसी भी प्रकार की सीमा से

1093
01:22:13,080 --> 01:22:17,240
ग्रसित ना हो अबाध हो पूर्ण हो

1094
01:22:17,240 --> 01:22:21,280
अबाध हो पूर्ण हो जैसे

1095
01:22:21,280 --> 01:22:26,440
कि हमारे मन में ये सब भाव आते हैं ना

1096
01:22:26,440 --> 01:22:30,720
हमारे मन में य भाव आता है कि अगर वैज्ञानिकों से

1097
01:22:30,720 --> 01:22:35,160
पूछा जाए कि वह कौन सा आविष्कार

1098
01:22:35,160 --> 01:22:39,880
होगा जिसको करने के बाद आप संतुष्ट हो

1099
01:22:39,880 --> 01:22:44,160
जाएंगे तो वह एक ही अविष्कार हो सकता है ऐसी

1100
01:22:44,160 --> 01:22:49,360
स्थिति जो जिसमें आप जो सोचो वो कर सकते

1101
01:22:49,360 --> 01:22:55,280
हो है ना उसी को कहते हैं सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर

1102
01:22:55,280 --> 01:22:59,520
तो क्योंकि मनुष्य क्योंकि ईश्वर की सिद्धि ही उससे हो रही है कि

1103
01:22:59,520 --> 01:23:03,760
मनुष्य के अंदर प्रत्येक जीव के अंदर सभी प्राकृतिक सीमाओं को लांग

1104
01:23:03,760 --> 01:23:07,920
जाने की चा विद्यमान है वो मृत्यु विमुख होना चाहता है

1105
01:23:07,920 --> 01:23:11,920
वो दुख से विमुख होना चाहता है वो अज्ञानता से विमुख होना चाहता है

1106
01:23:11,920 --> 01:23:16,040
इन सबका निचोड़ है सर्वशक्तिमान अध्य किसी

1107
01:23:16,040 --> 01:23:20,480
भी नियम के नीचे ना आने वाला और देखिए आर्य

1108
01:23:20,480 --> 01:23:24,520
समाज की जो सत्यार्थ प्रकाश है उसमें भगवान ने कहा य मतलब

1109
01:23:24,520 --> 01:23:28,120
सत्या प्रकाश में उसको लिया गया खंडन किया गया द धर्म सेला

1110
01:23:28,120 --> 01:23:32,200
भवति भारता बात ये आती है कि अगर ईश्वर

1111
01:23:32,200 --> 01:23:36,840
अवतार नहीं ले सकता है ईश्वर भी अपनी इच्छा से जन्म नहीं ले सकता है

1112
01:23:36,840 --> 01:23:41,240
तो अपनी इच्छा से जन्म लेने की कामना श्री कृष्ण क्यों कर रहे हैं वह चाहा

1113
01:23:41,240 --> 01:23:45,320
एक आप्त पुरुष के अंदर क्यों विद्यमान है क्यों कर रहे ऐसी कामना

1114
01:23:45,320 --> 01:23:50,080
जो पूरी नहीं हो सकती बिल्कुल बक

1115
01:23:50,080 --> 01:23:54,160
अ इसम मुझे बात बताइए इसम मुझे बात बताइए जैसे चा

1116
01:23:54,160 --> 01:23:58,160
तो कामुकता की भी होती है तो क्या कोई ऐसी भी एंटिटी मौजूद है जो कि कामुकता से

1117
01:23:58,160 --> 01:24:02,560
भरी पड़ी है ईश्वर के अंदर क्या नहीं है

1118
01:24:02,560 --> 01:24:06,560
जब पूरा संसार ही उसने बनाया है तो हम ऐसा नहीं कह सकते ना

1119
01:24:06,560 --> 01:24:10,760
कि कामुकता ईश्वर के अंदर नहीं है ईश्वर तो पूर्ण है मतलब

1120
01:24:10,760 --> 01:24:14,920
हमें मानना पड़ेगा कि ईश्वर जो है वो काम से परिपूर्ण है ये भी मानना पड़ेगा अरे

1121
01:24:14,920 --> 01:24:19,400
भाई तो फिर उसकी उत्पत्ति कहां से हुई अगर नहीं मानेंगे तो

1122
01:24:19,400 --> 01:24:23,400
जो सेक्सुअल डिजायर से परप में मानना पड़ेगा फिर तो थोड़ा सा अजीब हो गया देखो

1123
01:24:23,400 --> 01:24:27,640
इसमें ऐसा है कि ईश्वर सर्वत्र

1124
01:24:27,640 --> 01:24:31,840
समान रूप से विद्यमान है उसके अंदर सब कुछ है वह सब कुछ कर सकता है

1125
01:24:31,840 --> 01:24:35,920
मगर हम ईश्वर के उस रूप का अनुगमन करते हैं उस रूप का अनुसरण करते

1126
01:24:35,920 --> 01:24:40,040
हैं उस रूप की भक्ति करते हैं जो रूप वेदों की

1127
01:24:40,040 --> 01:24:43,200
सीमा के अंदर हो जो मोक्ष दायक

1128
01:24:43,200 --> 01:24:45,400
हो

1129
01:24:45,400 --> 01:24:50,160
यसे जैसे जैसे जैसे जैसे पानी है

1130
01:24:50,160 --> 01:24:54,600
तो पानी सर्वत्र नमी के रूप में भी व्याप्त है बकल

1131
01:24:54,600 --> 01:24:58,800
प्यास वो पानी भुजा है जो हमारे व्यवहार की सीमा में आ जाए तरल रूप में

1132
01:24:58,800 --> 01:25:02,800
बकुल तर रू जो हमारे व्यवहार की सीमा में आ जाए इसी प्रकार से

1133
01:25:02,800 --> 01:25:07,160
भगवान सर्वत्र व्याप्त है उनमें सब कुछ है है ना

1134
01:25:07,160 --> 01:25:11,240
मगर हमारी जो मुक्ति की प्यास है मोक्ष की प्यास है भगवान का वो स्वरूप

1135
01:25:11,240 --> 01:25:15,280
हो जाता है जो हमारे व्यवहार की सीमा में

1136
01:25:15,280 --> 01:25:20,080
आ जाए जो वे वेदों के द्वारा निर्धारित सीमा में हो

1137
01:25:20,080 --> 01:25:24,480
कि ये मुक्ति दायक है जैसे इसमें क्या होता हैसे

1138
01:25:24,480 --> 01:25:28,720
आपने पहले जो आपने बात बताया जो आपने उदाहरण दिया था कि जैसे व्यक्ति की

1139
01:25:28,720 --> 01:25:33,960
होती हैकी बात आपने कहा था मैं ज्यादा समय नहीं लूंगा बस

1140
01:25:33,960 --> 01:25:38,200
बसरा फाइनल है काफी देर हो चुकी है दो लोग और भी है

1141
01:25:38,200 --> 01:25:42,320
आपसे आरी बात कगा आर्य समाज से हैं

1142
01:25:42,320 --> 01:25:47,360
साहिब सिंह जी आप हा

1143
01:25:47,360 --> 01:25:51,520
जी जय श्री राम जय श्री राम जी आप पूरा कर लीजिए

1144
01:25:51,520 --> 01:25:55,600
बताइए जी जी मैं कह था जैसे आपने जो प्रपोजिशन दिया

1145
01:25:55,600 --> 01:25:58,320
उसे प्रपोजिशन माना जाएगा लेकिन उसे तब तक

1146
01:25:58,320 --> 01:26:02,560
वो सिद्धांत नहीं माना जाएगा और सिद्धांत की सिद्धि के लिए प्रमाण देने पड़ेंगे क्या

1147
01:26:02,560 --> 01:26:06,720
वास्तव में ईश्वर ऐसा है जो कि कुछ भी कर सकता है तो वो चीज आप कैसे मत उसकी सिद्धि

1148
01:26:06,720 --> 01:26:09,360
आप कैसे करते

1149
01:26:09,360 --> 01:26:13,520
हैं वास्तव में मैं बोल तो रहा हूं यह

1150
01:26:13,520 --> 01:26:17,760
प्रमाण ही तो है कि हमारे अंदर जो चाह आ रही है सब कुछ कर सकने की वही

1151
01:26:17,760 --> 01:26:22,560
प्रमाण है जिस चाह को हम अपने से अलग ना कर स

1152
01:26:22,560 --> 01:26:26,560
वो जैसे हमारे अंदर जैसे हमारे अंदर

1153
01:26:26,560 --> 01:26:30,800
जो भूख है उससे सिद्ध हो जाता है कि दुनिया में उसको मिटाने वाला भोजन

1154
01:26:30,800 --> 01:26:34,880
है जैसे हमारे अंदर प्यास है उससे सिद्ध हो जाता

1155
01:26:34,880 --> 01:26:38,920
है कि दुनिया में उसको उस प्यास को बुझाने वाला पानी है

1156
01:26:38,920 --> 01:26:43,040
इसी प्रकार से हमारे अंदर सब कुछ कर सकने वाला बनने की चाह है

1157
01:26:43,040 --> 01:26:47,080
तो इसी से सिद्ध हो जाता है कि दुनिया में सब कुछ कर सकने वाला ईश्वर इस प्यास को

1158
01:26:47,080 --> 01:26:51,160
मिटा सकने वाला ईश्वर विद्यमान है और अगर नहीं मानते हैं

1159
01:26:51,160 --> 01:26:55,280
मान लीजिए इसके आधार पर हम नहीं मानते हैं कि ईश्वर है तो फिर हमें

1160
01:26:55,280 --> 01:26:59,280
यह मानना पड़ेगा कि जो हम इनबिल्ट जो जिस चाह को हम अपने से दूर

1161
01:26:59,280 --> 01:27:03,400
नहीं कर पा रहे हैं यह मानते हुए कि इसका विषय नहीं है इस दुनिया में तो हमें

1162
01:27:03,400 --> 01:27:07,480
खुद को मूर्ख मानना पड़ेगा तो जो नास्तिक प्रवृत्ति ऐसा अगर यह

1163
01:27:07,480 --> 01:27:11,480
कहेगी कि भाई मैं नहीं मानता कि मेरे अंदर जो चाह है

1164
01:27:11,480 --> 01:27:13,400
उसका कोई अस्तित्व उसके विषय का

1165
01:27:13,400 --> 01:27:17,480
वो भी वो चाह इसको हम खुद कह रहे हैं कि उसका विषय नहीं है फिर भी मैं उसे चाह

1166
01:27:17,480 --> 01:27:21,520
रहा हूं तो वहां पर भी आप मूड मती ही सिद्ध होंगे तो कान को कैसे

1167
01:27:21,520 --> 01:27:25,520
भी पकड़ लो इसका कारण ये है ना उसका कारण जीव का जो स्वाभाविक गुण

1168
01:27:25,520 --> 01:27:29,720
है व इच्छा क्योंकि वो चेतन तोव इच्छा तो करेगा ही करेगा

1169
01:27:29,720 --> 01:27:34,000
ठीक है अभी मुझे यह बताइए कि वो इच्छा तो अल्पना

1170
01:27:34,000 --> 01:27:38,120
तोहा है आप एक काम करिए आप क्लासेस में आइए फर्म भरिए

1171
01:27:38,120 --> 01:27:42,320
आप क्लासेस में आइए है ना जय श्री राम चलिए

1172
01:27:42,320 --> 01:27:48,320
ठीक है कोई बात जय श्री

1173
01:27:52,640 --> 01:27:56,680
राम नि करके भी आए कोई रितिक जी आपने

1174
01:27:56,680 --> 01:27:59,800
नंबर नोट कर लिया होगा

1175
01:27:59,800 --> 01:28:05,800
ना जी साहब सिंह जी जय श्री राम

1176
01:28:09,440 --> 01:28:14,400
बताइए अरे भाई इनको अन म्यूट

1177
01:28:14,400 --> 01:28:20,400
करो साब सिंह जी अन म्यूट कर लीजिए अपना

1178
01:28:32,160 --> 01:28:38,160
जगन्नाथ जी आपका चेहरा

1179
01:28:55,760 --> 01:29:00,800
हां जय श्री राम साहब सिंह

1180
01:29:00,800 --> 01:29:05,080
जी ब

1181
01:29:05,080 --> 01:29:09,480
जी आर्य

1182
01:29:09,480 --> 01:29:14,120
समाज हा आर्य समाज स्वयं को वैदिक होने का आवाज

1183
01:29:14,120 --> 01:29:18,200
रही दावा करता आवाज आ रही है

1184
01:29:18,200 --> 01:29:23,160
आप ये लीड बड हटा के बात करिए अनथा दिक्कत आती

1185
01:29:23,160 --> 01:29:28,560
आप य हटा

1186
01:29:28,560 --> 01:29:33,840
जी अब आ रही है

1187
01:29:33,840 --> 01:29:38,520
आवाज अब आ रही है

1188
01:29:38,520 --> 01:29:43,440
आवाज अब आ रही है आवाज हां आ रही

1189
01:29:43,440 --> 01:29:48,000
है हेलो आपको आ रही

1190
01:29:48,000 --> 01:29:52,600
है आ रही है जी

1191
01:29:52,600 --> 01:29:58,600
आवाज ठीक से नहीं आ

1192
01:30:07,400 --> 01:30:10,080
रही

1193
01:30:10,080 --> 01:30:14,720
आप आप नंबर पर ट करिए

1194
01:30:14,720 --> 01:30:19,280
गोवर्धन मट का ट चैनल है उसे फॉलो कर लीजिए

1195
01:30:19,280 --> 01:30:24,240
हमारा ा चैनल है ट चैनल है उसे फॉलो कर लीजिए

1196
01:30:24,240 --> 01:30:27,840
और यह नंबर नोट कर लीजिए

1197
01:30:27,840 --> 01:30:32,160
74036 तो यथा सामर्थ आपकी सहायता की

1198
01:30:32,160 --> 01:30:34,640
जाएगी

1199
01:30:34,640 --> 01:30:38,680
और गोवर्धन मट का डायरेक्ट जो नंबर है

1200
01:30:38,680 --> 01:30:44,240
वह व्यस्तता के कारण है तो कई बार रिसीव नहीं हो पाता

1201
01:30:44,240 --> 01:30:49,840
है जी रमे जीता जय जगन्नाथ

1202
01:30:49,840 --> 01:30:54,600
जी मैं आपने तो मेरे से बात की हुई है पहले भी

1203
01:30:54,600 --> 01:30:59,160
अच्छा अच्छा हा तो मेरे को वैसे तो कोई ऐसा

1204
01:30:59,160 --> 01:31:03,160
विचार मतभेद तो नहीं है पर एक मेरे मैं पन

1205
01:31:03,160 --> 01:31:07,680
से इकन वालों से और आर्य समाज से

1206
01:31:07,680 --> 01:31:11,840
पहले य के द्वारा जुड़ा हुआ था

1207
01:31:11,840 --> 01:31:15,960
तो ये जब जो शिक्षा देते थे तो सबकी शिक्षा के मैच नहीं होता

1208
01:31:15,960 --> 01:31:20,000
था तो मुझे ऐसा लगता था कि भाई कि जो सत्य है व है क्या

1209
01:31:20,000 --> 01:31:24,000
मुझे मेरे अंदर भी जो डाउट आते है वो लोग उसका हल दे नहीं पा रहे हैं तो मैं

1210
01:31:24,000 --> 01:31:28,080
उसके बाद स्कन को फॉलो करते करते एक स्कन वाले ने आपके ऊपर वीडियो बनाया था

1211
01:31:28,080 --> 01:31:32,440
आपका खंडन करते हुए तो उसमें मुझे

1212
01:31:32,440 --> 01:31:36,480
आपका खंडन की जगह उसका खंडन ज्यादा लगा और मैंने आपको फॉलो करना चालू किया

1213
01:31:36,480 --> 01:31:40,600
और उसमें जो आपने मेरे को जो बताया कि अद्वैत और शंकराचार्य से

1214
01:31:40,600 --> 01:31:44,680
आपके द्वारा जुड़ा मैं पहले तो उसके लिए

1215
01:31:44,680 --> 01:31:49,920
बहुत-बहुत धन्यवाद आपका कि आपने वो मे वहां तक लेके गए

1216
01:31:49,920 --> 01:31:54,080
और उसके बाद जो मैं इसके इस मार्ग पर आगे चलता

1217
01:31:54,080 --> 01:31:58,520
गया चलता गया तो मुझे अपने सारे सवालों के जवाब मिलते गए मिलते

1218
01:31:58,520 --> 01:32:02,920
गए तो मेरा अ खाली इसमें ली एक ही प्रश्न बचा है वो आप

1219
01:32:02,920 --> 01:32:05,160
उत्तर दे सके तो अगर

1220
01:32:05,160 --> 01:32:10,200
कोई हमारा अद्वैत कोई अगर ऐ कोई कॉपी करते [संगीत]

1221
01:32:10,200 --> 01:32:14,600
हुए अगर कोई ऐसा बना दे कि भाई वो एक

1222
01:32:14,600 --> 01:32:18,680
कोई गुरु परंपरा से हमारे सब बराबर से पूरे से छाप दे कि

1223
01:32:18,680 --> 01:32:22,760
हमारी फिलॉसफी जो अवत की है वही बराबर से बना दे पर उसके अंदर जो धर्म की शिक्षा

1224
01:32:22,760 --> 01:32:26,960
है वो उल्टी दे दे कि मांस खाना धर्म है विचार करना धर्म

1225
01:32:26,960 --> 01:32:32,960
है तो उसका खंडन हम किस प्रकार कर सकते हैं क्योंकि वह

1226
01:32:32,960 --> 01:32:37,360
भी मास खाने को धर्म में लाएंगे या

1227
01:32:37,360 --> 01:32:41,440
उसम लाएंगे अ विधि पूर्वक मास खाना

1228
01:32:41,440 --> 01:32:45,640
अ विधि पूर्वक संबंध बनाना अगर उसको धर्म के नाम से ख्या पित

1229
01:32:45,640 --> 01:32:50,200
करेंगे तो जो दूसरे सिद्धांत है वो चरमरा

1230
01:32:50,200 --> 01:32:54,360
जाएंगे क्योंकि च की शि भगवत प्राप्ति होगी कैसे

1231
01:32:54,360 --> 01:32:58,360
चित्त की शुद्धि से और चित्त की शुद्धि में भक्ति आएगी

1232
01:32:58,360 --> 01:33:02,480
भक्ति के साथ में कर्म आएंगे तो यदि कर्म यहां

1233
01:33:02,480 --> 01:33:06,640
पर बाधित हो रहे हैं तो वह फिर मैच नहीं खाएगा वहां पर आपका चित्त की शुद्धि

1234
01:33:06,640 --> 01:33:10,680
नहीं हो पाएगी तो पहली बात तो यही ब्रेक लग जाएगी दूसरी बात ये भी आती है कि

1235
01:33:10,680 --> 01:33:15,360
फ प्रमाण केवल वो नहीं है तर्क प्रमाण भी तो चाहिए

1236
01:33:15,360 --> 01:33:19,440
शब्द प्रमाण भी तो चाहिए शति परंपरा वो तो जब कोई नया

1237
01:33:19,440 --> 01:33:20,560
व्यक्ति अपना

1238
01:33:20,560 --> 01:33:24,320
लिखेगा तो

1239
01:33:24,320 --> 01:33:28,360
जब कोई नया व्यक्ति अपना लिखेगा तो उसके पास चलो

1240
01:33:28,360 --> 01:33:33,080
तर्क ही तो होंगे हम इतिहास प्रमाण थोड़ी ना होगा

1241
01:33:33,080 --> 01:33:37,400
इसका गुरु ये था इसका गुरु ये था तो दोनों चीजें चाहिए

1242
01:33:37,400 --> 01:33:41,480
प्रमाण भी चाहिए युक्ति भी चाहिए दोनों चीजें चाहिए दर्शन विज्ञान

1243
01:33:41,480 --> 01:33:45,640
और व्यवहार तो युक्ति भी खत्म हो जाएगी और प्रमाण तो है ही नहीं

1244
01:33:45,640 --> 01:33:49,840
क्योंकि अपना बनाया है इसलिए वो संभव नहीं

1245
01:33:49,840 --> 01:33:55,840
है एक महानुभाव है वो कह रहे हैं कि

1246
01:33:57,280 --> 01:34:01,840
मेरा एक और सवाल था अगर आपका बहुत-बहुत

1247
01:34:01,840 --> 01:34:05,920
आभार इंफो डायरी वाले कह रहे हैं कि आवान जी की वजह

1248
01:34:05,920 --> 01:34:10,160
से ही मैं सनातन का सही अर्थ समझ पाया हूं बिना लाग

1249
01:34:10,160 --> 01:34:14,320
लपेट लीपा पोती के आभार आपका कौन

1250
01:34:14,320 --> 01:34:18,520
सा वीडियो था वो जिसमें आपने हमारा वो देखा था खंडन व बीइंग स्प

1251
01:34:18,520 --> 01:34:22,560
सोल का था क्या नहीं बनाता नहीं नहीं

1252
01:34:22,560 --> 01:34:27,040
वो तो एक इन के डिवटी है वो उनको

1253
01:34:27,040 --> 01:34:31,040
उन्होंने ज्यादा कुछ खंडन किया नहीं था आपका उसने ली ऐसा बोला था कि यह

1254
01:34:31,040 --> 01:34:35,480
इकन के नाम पर अपना फॉलोअर्स बढ़ा रहा है ऐसा बोल रहे थे वो

1255
01:34:35,480 --> 01:34:39,760
अच्छा आपने उसके नीचे कमेंट भी किए थे पर मेरा एक सवाल

1256
01:34:39,760 --> 01:34:43,920
था आखरी मैं पूछ सक तो बोलिए

1257
01:34:43,920 --> 01:34:49,920
कि कि जो परमाकुडी

1258
01:34:54,520 --> 01:34:59,080
पर अगर ऐसा है कि अगर हम जीव उसको प्राप्त कर लेते

1259
01:34:59,080 --> 01:35:03,160
हैं उसके बाद अगर हमारा मन करें कि हम भी भगवान

1260
01:35:03,160 --> 01:35:07,600
की तरह ऐसे व्यवहारिक धरातल पर अवतार

1261
01:35:07,600 --> 01:35:11,600
अवतार या कुछ रूप लेकर आ सके तो क्या आ सकते हैं कि नहीं

1262
01:35:11,600 --> 01:35:15,880
आ सकते हैं हमारे ऊपर वहां जाकर बाधा लग जाएगी कि हम भी

1263
01:35:15,880 --> 01:35:20,120
बाधा हमारे पर नहीं रहेगी ऐसा मैं पूछना चाहता हूं जब आपका

1264
01:35:20,120 --> 01:35:24,200
भगवान के साथ में एकत्व हो गया और भगवान

1265
01:35:24,200 --> 01:35:28,200
वही है जो कुछ भी कर सकते हैं तो उनके रूप में आप ही तो

1266
01:35:28,200 --> 01:35:32,600
सब कुछ कर रहे होगे हां वो तो बराबर है आपकी

1267
01:35:32,600 --> 01:35:36,960
बात अलग से आपका स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं है

1268
01:35:36,960 --> 01:35:41,120
हम हम स्वतंत्र अपना लेकर के आप जो है वो नहीं कर सकते

1269
01:35:41,120 --> 01:35:45,240
भगवान को प्राप्त करते हुए ही वो कर सकते हैं आप हम हम

1270
01:35:45,240 --> 01:35:51,240
कोई आ गए हैं हमारे रोहित सिंह जी आए

1271
01:35:51,880 --> 01:35:57,880
हैं जी रोहित जी

1272
01:36:00,640 --> 01:36:04,680
बताए रोहित जी बोले जय

1273
01:36:04,680 --> 01:36:09,640
श्री राम राम राम भैया राम

1274
01:36:09,640 --> 01:36:14,280
राम किसकी तरफ किसके पक्ष को प्रस्तुत कर रहे हैं

1275
01:36:14,280 --> 01:36:18,360
आप हम किसी को किसी के मतलब पक्ष विपक्ष

1276
01:36:18,360 --> 01:36:22,440
की तरफ से नहीं बोल रहे हैं हम

1277
01:36:22,440 --> 01:36:26,800
मान लो हम भी हिंदू है कोई गैर मलो जाते

1278
01:36:26,800 --> 01:36:30,880
उससे धर्म से नहीं बिलोंग करते हैं कहां के रहने वाले हैं आप

1279
01:36:30,880 --> 01:36:36,240
कानपुर से एक एक एक जगह स्थाई हो

1280
01:36:36,240 --> 01:36:40,320
जाइए आपके पीछे रोशनी है थोड़ा ऐसे रखिए कैमरा कि आपका

1281
01:36:40,320 --> 01:36:44,360
चेहरा दिखाई दे अब दिख रहा है ना जी अब दिख

1282
01:36:44,360 --> 01:36:50,360
रहा है बोलिए

1283
01:36:54,600 --> 01:36:58,720
तो एक दो प्रश्न थे आपसे पूछना था हमें भाई

1284
01:36:58,720 --> 01:37:03,000
साहब देखिए अब मैं बताऊं प्रश्न के लिए आप क्लासेस में आइए यहां

1285
01:37:03,000 --> 01:37:07,520
पर वैचारिक मतभेद के निमित्त आप बताइए कुछ है तो

1286
01:37:07,520 --> 01:37:11,760
तो क्या पूछ सकते हैं आपसे हम हमने कहा वैचारिक

1287
01:37:11,760 --> 01:37:15,840
मतभेद है कोई आपको यदि आप रामपाल की तरफ से ब्रह्मा कुमारी

1288
01:37:15,840 --> 01:37:19,920
की तरफ से हैं या आप आर्य समाज की तरफ से हैं या

1289
01:37:19,920 --> 01:37:24,080
आप स्कोन की तरफ से हैं या आप मुसलमान की तरफ

1290
01:37:24,080 --> 01:37:28,320
से हैं बाइबल की तरफ से हैं यदि ऐसा है तो बताइए प्रश्न

1291
01:37:28,320 --> 01:37:31,760
पूछना है तो आप क्लासेस में

1292
01:37:31,760 --> 01:37:36,000
आइए अरे मतलब जवाइन करना सोच रहे थे कि हम किसी

1293
01:37:36,000 --> 01:37:40,040
मतलब जैसे संत रामपाल जी हैं तो इनके सत्संग सुना

1294
01:37:40,040 --> 01:37:44,280
करते हैं तो उनको मतलब उनको फॉलो करना चाहते थे नाम दीक्षा लेना

1295
01:37:44,280 --> 01:37:48,600
चाहते थे तो यह एक दो प्रश्न थे जो

1296
01:37:48,600 --> 01:37:52,840
हम क्लियर लिया नहीं है ना ना क्लियर

1297
01:37:52,840 --> 01:37:56,840
नहीं है इस वजह से हम आपसे पूछ रहे हैं कि यह मतलब जो आपकी

1298
01:37:56,840 --> 01:38:00,880
तरफ से जो धर्म गुरु है जो मतलब उसमें उनका उनका भी सुनते हैं इनका भी

1299
01:38:00,880 --> 01:38:05,840
सुनते हैं तो इनमें यह प्रमाण देक बताते हैं और आपकी तरफ से

1300
01:38:05,840 --> 01:38:09,560
का कौन सा सुना है

1301
01:38:09,560 --> 01:38:13,920
आपने अरे जो प्रेमानंद

1302
01:38:13,920 --> 01:38:18,760
अरे जो प्रेमानंद है राधे राधे कर मतलब जाप देते हैं राधे

1303
01:38:18,760 --> 01:38:24,720
का और धरेंद्र शास्त्री सवाल क्या है आपका बताइए

1304
01:38:24,720 --> 01:38:30,720
सवाल ये है कि

1305
01:38:34,600 --> 01:38:39,080
ज आप गोवा से हैं ना रमेश जी हा हा

1306
01:38:39,080 --> 01:38:43,320
गोवा से हा वेद मंत्र वेद

1307
01:38:43,320 --> 01:38:47,440
मंत्र कहते हैं राधा वेद मंत्र है तो वो वेद में लिखा हुआ

1308
01:38:47,440 --> 01:38:51,760
है स्पष्ट रूप से राधा वेद मंत्र आप मुझे

1309
01:38:51,760 --> 01:38:57,760
बताइए भाई साहब कि यह वेद आपके पास आए

1310
01:38:58,080 --> 01:39:02,320
कैसे कौन से वेद जिसमें आपको

1311
01:39:02,320 --> 01:39:06,520
प्रमाण चाहिए राधा मा

1312
01:39:06,520 --> 01:39:11,800
का नहीं वही तो आपसे क्लियर करना है मैं

1313
01:39:11,800 --> 01:39:16,000
मतलब मैं आपको क्लियर करवा रहा हूं आप मुझे सवालों का जवाब

1314
01:39:16,000 --> 01:39:20,280
देते जाइए आपको क्लियर हो जाएगा वेद मंत्र आपके पास कैसे आए

1315
01:39:20,280 --> 01:39:25,840
जिनको आप प्रमाण मानते हो

1316
01:39:25,840 --> 01:39:30,160
अरे जो इनका इनका सुनते हैं ना रामपाल जी महाराज का तो वो

1317
01:39:30,160 --> 01:39:34,360
वो बताते हैं कि मने आप पूछ है वेद

1318
01:39:34,360 --> 01:39:37,920
आपके पास आए

1319
01:39:37,920 --> 01:39:42,040
कैसे वेद हमारे पास में नहीं आए लेकिन हम सुनते हैं तो उनसे

1320
01:39:42,040 --> 01:39:46,520
नॉलेज मिला हमें उनके पास कैसे आए आप तो विषय

1321
01:39:46,520 --> 01:39:50,640
आप तो विषय को इधर उधर कर देते हो आप जो हम कह रहे वो आपर

1322
01:39:50,640 --> 01:39:55,080
नहीं कर रहा हूं मैं आपके प्रश्न का उत्तर ही दे रहा हूं वेद

1323
01:39:55,080 --> 01:39:59,280
मंत्र उनके पास आए हैं परंपरा प्राप्त आचार्यों से कहां

1324
01:39:59,280 --> 01:40:03,280
से आए हैं कहां से आए

1325
01:40:03,280 --> 01:40:07,360
हां जो आपने बोला सही है मान लो लेकिन लेकिन आप बताइए

1326
01:40:07,360 --> 01:40:11,360
नात सुनि सिर्फ जो पूछ रहा हूं वो समझिए पहले

1327
01:40:11,360 --> 01:40:15,680
वेद मंत्र उनके पास आए परंपरा प्राप्त आचार्यों से तो

1328
01:40:15,680 --> 01:40:20,000
वेद मंत्रों का अर्थ कौन बताएगा जिससे

1329
01:40:20,000 --> 01:40:24,240
परंपरा प्राप्त आचार्यों से वेद मंत्र आ रहे हैं उ परंपरा प्राप्त

1330
01:40:24,240 --> 01:40:28,560
आचार्यों का खंडन करके आप वेद मंत्रों का अर्थ नहीं निकाल सकते

1331
01:40:28,560 --> 01:40:32,560
क्योंकि अगर आप अर्थ निकालेंगे तो इससे आपका उन आचार्यों

1332
01:40:32,560 --> 01:40:37,360
के प्रति अविश्वास सिद्ध होगा क्या सिद्ध होगा अविश्वास

1333
01:40:37,360 --> 01:40:41,800
तो यदि अविश्वास सि हो जाएगा अविश्वास सिद्ध

1334
01:40:41,800 --> 01:40:45,920
हो जाएगा अविश्वास सि हो जाएगा भाई

1335
01:40:45,920 --> 01:40:50,120
साहब भाई साहब रुक जाइए अविश्वास जब सिद्ध हो जाएगा

1336
01:40:50,120 --> 01:40:53,480
तो उनसे प्राप्त होने वाले वेद मंत्रों पर विश्वास

1337
01:40:53,480 --> 01:40:58,240
नहीं होगा तो आपको यह कहना छोड़ दीजिए

1338
01:40:58,240 --> 01:41:02,240
कि भैया वह वेदों में दिखा सकते हैं कि नहीं वोह दिखाते हैं वो उनका अर्थ

1339
01:41:02,240 --> 01:41:06,440
भी बताते हैं अपने जो वो अर्थ बता रहे हैं उसको सिद्ध करते हैं वैदिक

1340
01:41:06,440 --> 01:41:12,440
ग्रंथों सेगर आप य विश्वास

1341
01:41:12,960 --> 01:41:15,440
नहीं

1342
01:41:15,440 --> 01:41:19,760
क्या वही तो हम जानना चाहते लिखा

1343
01:41:19,760 --> 01:41:23,880
है तो हमने बता दिया है जो

1344
01:41:23,880 --> 01:41:28,240
हमने छठवां वीडियो बनाया है रामपाल जी की सच्चाई

1345
01:41:28,240 --> 01:41:32,240
के बारे में व एक सीरीज है पूरी उसमें जो छठवां वीडियो है

1346
01:41:32,240 --> 01:41:36,320
उसमें वीडियो के डिस्क्रिप्शन में उसमें

1347
01:41:36,320 --> 01:41:40,240
वीडियो के डिस्क्रिप्शन में

1348
01:41:40,240 --> 01:41:45,760
हमने यार इनको हटाओ भैया हटा दो

1349
01:41:45,760 --> 01:41:51,400
इनको छठवें वीडियो के डिस्क्रिप्शन में हमने

1350
01:41:51,400 --> 01:41:55,640
पीडीएफ हमने पीडीएफ लिंक भेजी है

1351
01:41:55,640 --> 01:41:59,960
और उस पीडीएफ लिंक में मां भगवती की वंदना

1352
01:41:59,960 --> 01:42:04,920
कहां कहा हो रही है वेदों में बताया है पुराणों में कहां क हो रही है वह बताया है

1353
01:42:04,920 --> 01:42:09,000
फिर पुराणों में राधा मां किस तरह से राधा जी जो

1354
01:42:09,000 --> 01:42:14,960
है भगवान की जो आलादिन शक्ति है वह भी उसमें दिया गया है उसको आप पढ़

1355
01:42:14,960 --> 01:42:20,640
लीजिए मैं एक बात बोलना चाहूंगा हां जी

1356
01:42:20,640 --> 01:42:24,640
बोलिए दर्शक से कहना चाहूंगा कि आप जो शिवांश ब ने जो

1357
01:42:24,640 --> 01:42:29,080
पांच ग्रंथ बताए वह पहले पढ़िए उसके बाद इकन

1358
01:42:29,080 --> 01:42:33,880
वालों से या आर्य समाज वालों से वहां जाकर उनकी बातें या वीडियो देखिए क्योंकि

1359
01:42:33,880 --> 01:42:37,960
उनके पास अभी हमारे पास तो क्या है जब कुछ पता नहीं होता है तो कुई तर्क शक्ति है

1360
01:42:37,960 --> 01:42:42,160
नहीं कुछ पता तो है नहीं तो हम उनका बात सुनते हैं हम उनको उनका भी सही लगता है आपका सुनते

1361
01:42:42,160 --> 01:42:46,480
आपका भी सही लगता है तो व बीच में फसे रह जाते हैं

1362
01:42:46,480 --> 01:42:50,720
हा पीयूष वादवानी आप आएंगे क्या चर्चा

1363
01:42:50,720 --> 01:42:56,720
में

1364
01:42:57,640 --> 01:43:03,640
कोई चेहरा नहीं दिखा रहा

1365
01:43:04,120 --> 01:43:08,320
है पृथु राज बताइए जय श्री

1366
01:43:08,320 --> 01:43:12,480
राम यह जो पियूष वादवानी नाम का बालक आया था अभी

1367
01:43:12,480 --> 01:43:16,480
कुछ दिन पूर्व इसने यहां पर श्री

1368
01:43:16,480 --> 01:43:21,080
कृष्ण के चरणों की सौगंध खाई थी य कौन के भक्त की बात हो रही है

1369
01:43:21,080 --> 01:43:25,160
हटा दीजिए कमेंट हटा दीजिए

1370
01:43:25,160 --> 01:43:29,440
इसने इकन के ये इकन के भक्त हैं और इसने श्री कृष्ण

1371
01:43:29,440 --> 01:43:33,440
के चरणों की सौगंध खाक कहा था कि मैं आपको जो हैवान कहा

1372
01:43:33,440 --> 01:43:37,680
वह गलत कहा मुझसे गलती हो गई मुझे क्षमा कर दीजिए आगे नहीं कहूंगा और

1373
01:43:37,680 --> 01:43:43,680
यह हाल है कि दोबारा चालू कर दिया इन्होंने दोबारा वही कहना कमेंट

1374
01:43:46,120 --> 01:43:50,360
में पृथ्वीराज जी बताइए पथराज जी

1375
01:43:50,360 --> 01:43:54,720
मेरी आवाज आ रही है सही से हां आ रही है आप

1376
01:43:54,720 --> 01:43:58,720
किस आध्यात्मिक मार्ग पर चल रहे हैं मैं दर्शनों

1377
01:43:58,720 --> 01:44:03,160
का इच्छुक हूं मैंने कुछ दर्शन के इधर उधर की चीज पी है दर्शनों

1378
01:44:03,160 --> 01:44:07,680
में मेरी बहुत दू है आप किसी के फॉलोअर है क्या

1379
01:44:07,680 --> 01:44:11,840
फॉलोअर मैं जैसे अभी मैं फॉलोवर तो नहीं हूं लेकिन

1380
01:44:11,840 --> 01:44:16,000
मैंने पढ़ा है कुछ लोगों को जैसे तो तो ये वो जगह

1381
01:44:16,000 --> 01:44:20,440
नहीं है ये वो जगह नहीं है यदि आप किसी के फॉलोअर है

1382
01:44:20,440 --> 01:44:24,840
तो क्योंकि वैचारिक मतभेद के निमित्त ये चल रहा है तो आप आइए

1383
01:44:24,840 --> 01:44:28,880
अन्यथा आप जिज्ञासु है तो क्लासेस में आइए यह क्लासेस

1384
01:44:28,880 --> 01:44:33,080
का जगह नहीं है जहा आपकी शंकाओं का समाधान किया जाए मेरे मतभेद

1385
01:44:33,080 --> 01:44:37,280
है सुन लीजिए मेरे मतभेद है लेकिन मैं किसी गुरु को नहीं वो मतभेद मेरे अंदर से आते

1386
01:44:37,280 --> 01:44:41,280
है गुरु हम मतभेद बताते हैं बोलिए म

1387
01:44:41,280 --> 01:44:44,320
मदद बोलिए

1388
01:44:44,320 --> 01:44:48,400
म मैंने जो है अवेद परंपरा देखी है या

1389
01:44:48,400 --> 01:44:52,520
अवेद के बारे में जितना मैंने पढ़ा है वो ये ब है

1390
01:44:52,520 --> 01:44:56,640
कहा पढ़ा कु मेरे अवती दोस्त है उन्होंने मुझे

1391
01:44:56,640 --> 01:45:00,720
समझाया उ चीजों के बारे में तो मैं आपसे उन्ही के बारे

1392
01:45:00,720 --> 01:45:01,720
में

1393
01:45:01,720 --> 01:45:06,040
की जो मेरे अवती दोस्तो ने कहा कि दो तरह की सप्ताह होती है एक परमार्थिक

1394
01:45:06,040 --> 01:45:10,320
और एक व्यवहार व्यवहार में जो ईश्वर होता है वो अपता लेता है और परमार्थ

1395
01:45:10,320 --> 01:45:14,520
वाला कुछ नहीं करता तो मेरा इस प्रश्न है एक मिनट

1396
01:45:14,520 --> 01:45:18,120
एक मिनट एक मिनट इनको

1397
01:45:18,120 --> 01:45:22,280
पियूष हा भाई पियूष जी इनका जरा माइक ऑन

1398
01:45:22,280 --> 01:45:26,440
करिए हां जी बो आपने तो चरणों की सौगंध खाई थी श्री कृष्ण

1399
01:45:26,440 --> 01:45:30,640
जी भगवान के चरणों की सौगंध खाई थी आप आपकी

1400
01:45:30,640 --> 01:45:35,120
वोय प्रभुपाद जी की मैंने फोटो देखी मैंने बहुत

1401
01:45:35,120 --> 01:45:40,880
बहुत नीच काम किया है आपके लोगों

1402
01:45:40,880 --> 01:45:46,880
ने उसका क्या करें इनको आप हटा

1403
01:45:50,320 --> 01:45:55,240
दो अगर किसी ने हमारे नाम से

1404
01:45:55,240 --> 01:46:01,160
कोई गलत कार्य किया है तो उसको हमसे जोड़कर आप किस आधार पर देख सकते

1405
01:46:01,160 --> 01:46:05,320
हैं इनको ना लो भाई असभ्य लोग हैं इनसे

1406
01:46:05,320 --> 01:46:11,320
दिक्कत होगी इनको ना लीजिए ऊपर हटा

1407
01:46:13,360 --> 01:46:17,360
दीजिए शया मेरे को एक पूछना था आपसे जो

1408
01:46:17,360 --> 01:46:23,080
अभी बात कर रहे थे जिनसे वो कहां गए पथराज जी

1409
01:46:23,080 --> 01:46:27,680
वो वो लिफ्ट हो गया पता नहीं कैसे

1410
01:46:27,680 --> 01:46:31,720
हा पथराज जी आपकी समस्या बताइए हा समस्या यह है

1411
01:46:31,720 --> 01:46:37,720
कि मेरा प्रश्न यह था कि जो व्यवहार में जो ईश्वर है क्या वह सत्य है या

1412
01:46:38,480 --> 01:46:42,880
नहीं मनुष्य की दृष्टि से हमारे लिए वह सत्य है

1413
01:46:42,880 --> 01:46:47,240
जब तक हम जीव भाव को प्राप्त है जैसे मैं अगर देख

1414
01:46:47,240 --> 01:46:51,600
तो भगवान की दृष्टि से भगवान की दृष्टि से वो

1415
01:46:51,600 --> 01:46:55,640
सत्य नहीं है वह सब भगवान की लीलाएं हैं ईश्वर

1416
01:46:55,640 --> 01:46:59,760
की दृष्टि से ब्रह्म की दृष्टि से वह सब भगवान की लीलाए हमारी दृष्टि

1417
01:46:59,760 --> 01:47:04,160
से वह सब सत्य है जब तक हमें किसी के चाटा

1418
01:47:04,160 --> 01:47:08,520
मारने पर भय हो रहा है हमारी पलक छपक रही है हम जीव भाव को प्राप्त है

1419
01:47:08,520 --> 01:47:12,800
तब तक हमारे लिए वह सत्य है और यह आपका क्वेश्चन

1420
01:47:12,800 --> 01:47:17,400
है वैचारिक मतभेद नहीं है मतभेद बताइए आप

1421
01:47:17,400 --> 01:47:21,440
मदद इसमें यह आता है कि जब कहते हैं कि ईश्वर की दृष्टि

1422
01:47:21,440 --> 01:47:25,560
से जो है व स तो ईश्वर जानता

1423
01:47:25,560 --> 01:47:29,560
है कि वह असत्य है फिर भी व असत्य को क्यों

1424
01:47:29,560 --> 01:47:33,560
नहीं तोड़ता व सत्य को प्रतिपादित क्यों नहीं करता असत्य का सहारा क्यों लेता है

1425
01:47:33,560 --> 01:47:37,920
व तो सत्य है ना क्योंकि य दुनिया ही मिथ्या है

1426
01:47:37,920 --> 01:47:38,920
ना

1427
01:47:38,920 --> 01:47:42,960
मिथ्या के अंदर मिथ्या के अंदर सुनिए पहली

1428
01:47:42,960 --> 01:47:47,240
बात तोय इसमें आपका काउंटर नहीं है आप क्या मानते हैं वो

1429
01:47:47,240 --> 01:47:51,480
बताइए इसके विपक्ष में आप क्या मानते हैं वैचारिक मतभेद

1430
01:47:51,480 --> 01:47:55,480
क्या है यह तो मेरे मतभेद ये है

1431
01:47:55,480 --> 01:47:59,880
इसमें कि मैं ये मानता हूं जोय सृष्टि है यह मिथ्या नहीं है यह सत्य है

1432
01:47:59,880 --> 01:48:03,920
जीव भी सत्य है और जीव ब्रह्म से अलग है

1433
01:48:03,920 --> 01:48:08,000
से जाना आपने मैंने जाना

1434
01:48:08,000 --> 01:48:10,840
कौन

1435
01:48:10,840 --> 01:48:15,400
दर्शन मैंने अभी स प्रकाश पढ़ी है फिर

1436
01:48:15,400 --> 01:48:19,440
प्रकाश यानी आप समाजी पढ़ने का

1437
01:48:19,440 --> 01:48:23,640
मतलब आप भी स प्रकाश पते तो समा अरे तो आप

1438
01:48:23,640 --> 01:48:27,640
आपने उस दर्शन को स्वीकार किया हुआ है ना नहीं मैंने पूरी

1439
01:48:27,640 --> 01:48:32,480
तरह से स्वीकार नहीं किया ना अच्छा क्या नहीं स्वीकार किया उसका

1440
01:48:32,480 --> 01:48:36,600
जैसे मैं मेरे को अभी भी आर्य समाज प कुछ डाउट्स है जैसे उनकी परंपरा जो

1441
01:48:36,600 --> 01:48:40,760
ऋषि दयानंद जो देते परंपरा नहीं उनका सिद्धांत कौन सा स्वीकार

1442
01:48:40,760 --> 01:48:44,920
नहीं किया आपने ये बताइए सिद्धांत सिद्धांत है कि ईश्वर सब

1443
01:48:44,920 --> 01:48:49,360
कुछ नहीं कर सकता ठीक है कि वो कुछ चीजें नहीं कर सकता बादिता

1444
01:48:49,360 --> 01:48:53,440
ऐसा सिद्धांत मैंने नहीं माना उनका अब आपने क्या प्रश्न किया है कि

1445
01:48:53,440 --> 01:48:57,440
वो अपना प्रश्न दोबारा करिए अगर वो आपका जो

1446
01:48:57,440 --> 01:49:01,560
ईश्वर है अगर वह सत्य है तो वह मिथ्या का आश्रय

1447
01:49:01,560 --> 01:49:05,600
क्यों लेता है किसी भी रूप में व मिथ्या का आश्रय क्यों लेता है ठीक

1448
01:49:05,600 --> 01:49:09,680
है ठीक इसका आंसर य है कि ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता

1449
01:49:09,680 --> 01:49:13,800
है आप उसको बा नहीं कर सक आप उसको बाद नहीं कर सकते

1450
01:49:13,800 --> 01:49:17,880
व ऐसा क्यों नहीं कर रहा िक में जो आया है कि हर कार्य का

1451
01:49:17,880 --> 01:49:21,880
कोई ई कारण होता है तोवर आपने आपने

1452
01:49:21,880 --> 01:49:26,120
सनातन का अध्ययन किस गुरु परंपरा में किया है

1453
01:49:26,120 --> 01:49:30,120
मैंने परंपरा फिर प्रमाण तो फिर आप प्रमाण

1454
01:49:30,120 --> 01:49:34,680
क्यों दे रहे हैं मैं प्रमाण इसलिए दे रहा हूं आप दर्शन कोते

1455
01:49:34,680 --> 01:49:38,760
दर्शन को अरे मैंने मैंने आपको बता तो दिया आपको

1456
01:49:38,760 --> 01:49:43,040
मैंने बताया ना कि ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है ईश्वर

1457
01:49:43,040 --> 01:49:47,320
बिना किसी प्रयोजन के सृष्टि का निर्माण करते हैं पार मार्थी धरातल

1458
01:49:47,320 --> 01:49:51,320
प ईश्वर उसके पास इतनी स्वतंत्रता है इतनी शक्ति है कि व

1459
01:49:51,320 --> 01:49:56,480
बलात्कार भी कर सकता है क थ सकते किय बलात्कार करता है

1460
01:49:56,480 --> 01:50:01,080
आप गलत अपराधियों के रूप में ईश्वर बलात्कार भी कर रहा है ना अपराधियों

1461
01:50:01,080 --> 01:50:05,080
के रूप में कौन कर रहा है अच्छा आप यह मान लीजिए कि ईश्वर नहीं कर रहा है

1462
01:50:05,080 --> 01:50:10,480
अपराधियों के रूप में वो ईश्वर नहीं कर रहा है ईश्वर की सत्ता से बाहर हो रहा

1463
01:50:10,480 --> 01:50:14,760
है उसको रोक नहीं सकता है एक मिनट ईश्वर उसको रोक नहीं सकता

1464
01:50:14,760 --> 01:50:18,800
है रोक सकता है क्यों नहीं रोक रहा आप बोलिए

1465
01:50:18,800 --> 01:50:22,920
हा तो इसीलिए तो क्योंकि यह जो प्रपंच है वो उसके लिए

1466
01:50:22,920 --> 01:50:27,480
के बराबर है वो एक खेल है जैसे कि आप जब वीडियो गेम खेल रहे होते हैं

1467
01:50:27,480 --> 01:50:31,720
तो उस वीडियो गेम में आने वाली जो व्याधि है वो भी आप ही उत्पन्न कर रहे होते

1468
01:50:31,720 --> 01:50:35,840
हैं जो व्याधि है वो भी आप वो आपने स्वीकार किया

1469
01:50:35,840 --> 01:50:40,280
होता है कि इस वीडियो गेम को मैं ऑन कर रहा हूं इसमें आने ये व्याधि

1470
01:50:40,280 --> 01:50:41,320
आएंगी वो

1471
01:50:41,320 --> 01:50:45,360
एक आपने उसको स्वीकार किया होता है आप उसको रोक सकते हैं मगर जब अगर

1472
01:50:45,360 --> 01:50:49,440
मैं उसको रोक ही सकता हूं रोक ही सकता हूं तो मेरा जो है इस

1473
01:50:49,440 --> 01:50:53,920
वीडियो गेम को खेलने का ही कोई मतलब नहीं रह गया ना

1474
01:50:53,920 --> 01:50:58,120
तो खेलने की बात कर रहे हैं हम वीडियो गेम तब खेलते हैं जब हमें आनंद चाहिए

1475
01:50:58,120 --> 01:51:02,840
तो ईश्वर को वो तो सच्च आनंद है ना उसको आनंद थो चाहिए तो खेल क्यों रहा है वीडियो गेम

1476
01:51:02,840 --> 01:51:06,920
कारण नहीं बना हमको आनंद चाहिए मगर हम कई बार

1477
01:51:06,920 --> 01:51:11,160
कुछ कार्य ऐसे भी करते हैं जो हम बिना कारण के करते हैं वो भी सुन लीजिए जैसे

1478
01:51:11,160 --> 01:51:16,040
हाथ हिलाना जैसे जैसे अभी आपने चेहरे से हाथ हटाया

1479
01:51:16,040 --> 01:51:20,160
जैसे आपने अभी चेहरे से हाथ हटाया यूं ही आप बहुत सारे कार्य करते हैं

1480
01:51:20,160 --> 01:51:26,160
अगर आप आर समाज को भी मानेंगे तो आर्य समाज ने वेदों को अपौरुषेय

1481
01:51:27,880 --> 01:51:32,200
माना क्या माना वेद का अर्थ क्या

1482
01:51:32,200 --> 01:51:36,800
हुआ बिना प्रयोजन हो गया नाने नहीं लिखा हो जो निराकार

1483
01:51:36,800 --> 01:51:40,880
निराकार सर्वज्ञ ईश्वर ने मैं कह रहा हूं बिना प्रयोजन हो गया ना वो

1484
01:51:40,880 --> 01:51:44,920
भी वेद भी नहीं उनके पास प्रयोजन तो है कि सृष्टि

1485
01:51:44,920 --> 01:51:48,920
का कल्याण करने के लिए मनुष्य को ज्ञान देने के लिए नहीं नहीं जब

1486
01:51:48,920 --> 01:51:53,080
वो जब वो अप है उन्होंने बनाया ही नहीं है उसको तो वो तो बिना

1487
01:51:53,080 --> 01:51:57,080
प्रयोजन हो गया आपने खुद अपनी वीडियो में बताया कि वेद क्यों नहीं

1488
01:51:57,080 --> 01:52:01,160
बनाया गया है क्योंकि वो उसके पास पहले से था वो बनाएगा क् जब उसके पास पहले से है अगर

1489
01:52:01,160 --> 01:52:05,360
मुझे पता है तो वही तो मैं कह रहा हूं कि वेदों का प्रयोजन

1490
01:52:05,360 --> 01:52:09,560
ही नहीं रहा जब उन्होंने भगवान ने उनको बनाया नहीं अरे

1491
01:52:09,560 --> 01:52:13,560
उन्होंने दिया है ना बनाया भाई देखिए ये चर्चा जो

1492
01:52:13,560 --> 01:52:17,600
है विषय अलग हो रहा है आपने जो मुझसे पूछा है वो मैंने आपको बता दिया है

1493
01:52:17,600 --> 01:52:21,680
अगर आपको समझ में नहीं आ रहा है तो आप दोबारा आइए फॉर्म भरभरा के आइए आप

1494
01:52:21,680 --> 01:52:25,920
अच्छे से आप जो आप मुझे जो प्रश्न पूछ रहे हैं

1495
01:52:25,920 --> 01:52:29,960
मैं उसी प उत्तर रहा हूं आपको आप खुद विषय लेके जा रहे हैं मैं

1496
01:52:29,960 --> 01:52:34,160
नहीं लेके जा रहा बताइए आपका जो मूल तह ये है

1497
01:52:34,160 --> 01:52:38,160
कि ईश्वर बिना कारण को कार्य कर सकता है और वो बलात्कार भी करता है तो

1498
01:52:38,160 --> 01:52:42,200
क्या अगर को देखिए देखिए मेरी एक बात सुनिए

1499
01:52:42,200 --> 01:52:43,720
मेरी एक बात सुनिए

1500
01:52:43,720 --> 01:52:48,480
मैं आपको एक मिनट यहां पर पॉज करूंगा पहले अपनी भाषा का चयन

1501
01:52:48,480 --> 01:52:52,680
अपनी भाषा का चयन ठीक से करना सीखिए अब मैं आपको बताता हूं कैसे

1502
01:52:52,680 --> 01:52:56,680
एक मिनट चयन बिल्कुल सही है मैं बलात्कार कह रहा

1503
01:52:56,680 --> 01:53:00,680
हूं तो आप मुझे म्यूट

1504
01:53:00,680 --> 01:53:05,520
कर रहे हैं मट भाई इनको म्यूट करो भाई इनको म्यूट

1505
01:53:05,520 --> 01:53:10,240
करो हां अब सुनिए क्यों जैसे कि

1506
01:53:10,240 --> 01:53:14,560
आपसे अगर पूछा जाए आपके माता-पिता ने क्या किया

1507
01:53:14,560 --> 01:53:18,640
जिससे कि आपकी माता के गर्भ में आपके रू आपका जो बीज है

1508
01:53:18,640 --> 01:53:22,680
वो आया तो इसको आप वैसे ही बोलेंगे जैसे अभी आप ईश्वर के बारे में

1509
01:53:22,680 --> 01:53:26,760
कर रहे बोलिए आप मुझे वैसे ही बोल के

1510
01:53:26,760 --> 01:53:30,840
बताइए क्लियर क्लियर माता के एक मिनट

1511
01:53:30,840 --> 01:53:35,760
एक मिनट माता के घर में बीज आया वो बताओ अपने

1512
01:53:35,760 --> 01:53:40,120
य क्या इनको म्यूट करो हटाओ यहां पर व व मनता

1513
01:53:40,120 --> 01:53:46,120
फैलाने आए और इनका कोई अर्थ नहीं

1514
01:53:46,920 --> 01:53:51,440
है जय श्री राम भैया जय श्री राम जय श्री

1515
01:53:51,440 --> 01:53:55,600
राम मैं ये कह रहा था जो त सिंह परिहार आए थे ना

1516
01:53:55,600 --> 01:53:59,680
अभी उनका जो मुख्य उद्देश्य जो मैं समझ पा रहा था वो

1517
01:53:59,680 --> 01:54:04,040
ये था के वो रामपाल जी से जुड़े हैं लेकिन

1518
01:54:04,040 --> 01:54:08,120
और वो हमें हमारे गुरुओं के परंपरा प्राप्त आचार्यों को भी सुनते

1519
01:54:08,120 --> 01:54:12,120
हैं तो उनका ये प्रश्न था के उनमें जो

1520
01:54:12,120 --> 01:54:16,200
मतभेद है अभी हमने दीक्षा नहीं ली है तो हमारे शंका का समाधान

1521
01:54:16,200 --> 01:54:20,920
कर दीजिए जिससे कि हम राइट डायरेक्शन में जो है हम पहुंच जाए

1522
01:54:20,920 --> 01:54:25,200
नहीं उनका ये नहीं था वो व मनता फैलाने आए थे वह

1523
01:54:25,200 --> 01:54:29,360
इस आड़ में थे कि मैं अभी स्वीकार ना करूं जिससे जीतू तो रामपाल

1524
01:54:29,360 --> 01:54:33,400
का पक्ष जीते और हारू तो केवल मैं हारू जैसे होता है

1525
01:54:33,400 --> 01:54:37,600
ना अनऑफिशियल एजेंट जी माता जी

1526
01:54:37,600 --> 01:54:41,880
जय श्री राम जय श्री राम भैया बताइए

1527
01:54:41,880 --> 01:54:46,400
जय श्री राम रामपाल जी गुरु महाराज की दीक्षा

1528
01:54:46,400 --> 01:54:52,400
सास माली है मतलब पूरे घर घर का दिमाग खराब कर

1529
01:54:54,360 --> 01:54:58,720
ठाकुर जी नहीं पूजो माता नहीं पूजो भोले बाबा की पूजा करते वो नहीं पूजो

1530
01:54:58,720 --> 01:55:02,520
केवल सतगुरु रामपाल जी को

1531
01:55:02,520 --> 01:55:06,520
पूजो तो बताइए आप हम यहां पर हमसे क्या कहना

1532
01:55:06,520 --> 01:55:10,680
चाह रहे हैं मतलब उनका धर्म भी गलत

1533
01:55:10,680 --> 01:55:14,760
है और हम लोग पूछते भी है पूजा करते

1534
01:55:14,760 --> 01:55:19,760
हैं क जल ले आ ले में डाल

1535
01:55:19,760 --> 01:55:25,760
दे और जो भी पैसा है

1536
01:55:26,320 --> 01:55:31,000
जाती संत रामपाल लोग है वे तो मतलब

1537
01:55:31,000 --> 01:55:35,160
दिमाग से बिल्कुल ही पैदल हो ना किसी की सुनती

1538
01:55:35,160 --> 01:55:39,600
है ना कुछ बस अगर फ्रेश हो गया तो जोति कर

1539
01:55:39,600 --> 01:55:43,880
पूजा हो जो उनकी जो क्या सुधाम

1540
01:55:43,880 --> 01:55:48,520
है कैसी पूजा है हम

1541
01:55:48,520 --> 01:55:54,520
एक महीना सुनना हम आपके मतलब बातें अच्छी लगती

1542
01:55:55,080 --> 01:55:59,400
उनको हमारे वीडियो दिखाया करिए अपने घर में बड़ा टीवी एक टांग के उसमें

1543
01:55:59,400 --> 01:56:03,720
सब वीडियो आप चलाया करिए दिखाते है भैया लेकिन मान

1544
01:56:03,720 --> 01:56:09,720
बंद कर

1545
01:56:14,560 --> 01:56:18,760
दे मतलब एक भू सवार है

1546
01:56:18,760 --> 01:56:22,800
जो है जो रामपाल है बस उके अलावा कोई भगवान नहीं है कुछ

1547
01:56:22,800 --> 01:56:28,800
भी नहीं

1548
01:56:30,480 --> 01:56:34,720
है अगर हम मतलब हम लोग जैसी बातें करें कि रामपाल भगवान

1549
01:56:34,720 --> 01:56:38,760
नहीं है संत रूप के मान सकते तो क तुम पाप कर

1550
01:56:38,760 --> 01:56:44,760
रही अगर तुम उनको रा कर रही तो पाप कर र

1551
01:57:39,800 --> 01:57:45,600
भैया ड्रॉप हो गए

1552
01:57:45,600 --> 01:57:51,600
क्या भैया का चित्र दिख नहीं रहा

1553
01:57:52,720 --> 01:57:56,200
ड्रॉप हो ग लगता

1554
01:57:56,200 --> 01:58:02,200
है आ रहे आ

1555
01:58:03,240 --> 01:58:07,520
रहे अब अब आप देखिए रमेश जी के इस तरीके से ब्रेन

1556
01:58:07,520 --> 01:58:11,680
वश हो रहा है आप सोचिए कि परिवार देखिए कि पूरी व्यवस्था को कैसे तोड़ा

1557
01:58:11,680 --> 01:58:15,760
जा रहा है आप देखिए य इनकी जो है

1558
01:58:15,760 --> 01:58:19,760
सासु जिनके बारे में उने मा शक्ति ने बताया माता जी ने बताया

1559
01:58:19,760 --> 01:58:23,920
कि देखिए हमारे परिवार में कैसे हालात है और बहुत

1560
01:58:23,920 --> 01:58:28,280
से ब से बत्तर होते जा रहे हैं इस तरीके से ब्रेन वश किया जा रहा है इन तंत्रों

1561
01:58:28,280 --> 01:58:32,520
के द्वारा अब वही बात है ना कि मिथ्या फर इसको प्रचार

1562
01:58:32,520 --> 01:58:37,600
प्रसार जो है इस तरीके से दिमाग में बिल्कुल अंदर डाल दिया गया

1563
01:58:37,600 --> 01:58:41,800
है के आप जो है ना कि अब यह जो है ना अंदर

1564
01:58:41,800 --> 01:58:46,200
तक जो है के कैसे जो है खासकर जो है ग्रामीण

1565
01:58:46,200 --> 01:58:50,320
क्षेत्र के जो लोग हैं और वो इस तरीके से उनका ब्रेन वश किया

1566
01:58:50,320 --> 01:58:55,720
जाता है कि आप सब कुछ जो है

1567
01:58:55,720 --> 01:58:59,840
ना अब ऐसे परिवार नहीं टूटेंगे तो क्या होगा आप सामने दिख रहा है आपके

1568
01:58:59,840 --> 01:59:04,080
सामने प्रमाण है सब कुछ है उनके पास सिद्धांत नहीं है

1569
01:59:04,080 --> 01:59:10,080
ना समस्या तो वही आ रही

1570
01:59:10,200 --> 01:59:14,280
है लेकिन अब जो ग्रामीण क्षेत्र के जो लोग

1571
01:59:14,280 --> 01:59:18,600
हैं पारिवारिक जो लोग हैं उनको यह बातें

1572
01:59:18,600 --> 01:59:24,040
समझ में एकदम से नहीं आएंगी अब उनके दिमाग में य चीज तो डाल

1573
01:59:24,040 --> 01:59:28,800
परिवार टूट रहे चली गई क्या मातृ शक्ति थी जो

1574
01:59:28,800 --> 01:59:33,160
हा जी यह केवल एक परिवार की कहानी

1575
01:59:33,160 --> 01:59:38,800
नहीं है ऐसे बहुत से परिवार हैं

1576
01:59:38,800 --> 01:59:42,800
जो इस समस्या से जूझ रहे हैं

1577
01:59:42,800 --> 01:59:48,440
ये जो व्यक्ति एक आया था क्या नाम था उसका जो अभी

1578
01:59:48,440 --> 01:59:53,120
पथराज उस व्यक्ति का भी मंसा जो है यहां पर आकर के जो

1579
01:59:53,120 --> 01:59:57,640
असामाजिक वो कुछ उन्माद उत्पन्न कर दे जिससे कि जो है

1580
01:59:57,640 --> 02:00:02,040
इनके उसमें विघ्न आए जैसे वो राक्षस नहीं होते थे

1581
02:00:02,040 --> 02:00:06,120
जो विश्वामित्र जी के यज्ञ में मास डालने आते थे तो इन

1582
02:00:06,120 --> 02:00:10,240
लोगों का मतलब होता है केवल यहां पर आकर के यह जो यज्ञ से ऐसा

1583
02:00:10,240 --> 02:00:10,760
कुछ हो रहा है

1584
02:00:10,760 --> 02:00:15,040
तो हम कुछ उसमें तो ऐसे शब्दों का उपयोग करो ऐसी वाणी का उपयोग

1585
02:00:15,040 --> 02:00:19,240
करो जिससे कि सामने वाला इंस्टिगेट हो इसके लिए

1586
02:00:19,240 --> 02:00:23,360
भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि कई प्रकार के स होते हैं जो हमें परोक्ष

1587
02:00:23,360 --> 02:00:27,600
रूप में बोलने होते हैं परोक्ष माता पिता ने

1588
02:00:27,600 --> 02:00:31,800
क्या किया जिससे की गर्भ धारण किया माता ने इसको आप सदा ही परोक्ष रूप

1589
02:00:31,800 --> 02:00:36,000
में बोलेंगे नहीं बोलेंगे खुल के जैसे अभी ईश्वर

1590
02:00:36,000 --> 02:00:40,160
के लिए इस तरह से बोल रहे और कुल मिलाकर

1591
02:00:40,160 --> 02:00:44,640
के बात यह है हमारी सारी बातें मत मानो ईश्वर को अवाद सिद्ध करो

1592
02:00:44,640 --> 02:00:48,840
सर्वशक्तिमान सिद्ध करो सिंपल अब

1593
02:00:48,840 --> 02:00:53,120
वो कर नहीं पाएंगे और कुछ ना कुछ

1594
02:00:53,120 --> 02:00:57,680
बा बो मैंने मैंने उनका मान रखने के लिए मुझे लगा

1595
02:00:57,680 --> 02:01:01,920
हुई है बातें रटी हुई है हा मैंने उनका मान रखने के लिए मैं चाहता तो उस

1596
02:01:01,920 --> 02:01:06,080
पंक्ति को जब उन्होंने यह कहा ना ईश्वर बलात्कार भी कर सकता है तो मैंने मैं उनका मान रखने के लिए

1597
02:01:06,080 --> 02:01:10,560
मैंने कहा कि अपराधियों के रूप में कर सकता है इस प्रश्न का उत्तर होता है

1598
02:01:10,560 --> 02:01:14,760
कि हां तुम्हारे रूप में वो यह भी कर सकता है तुम बोलते जाओ हम ही

1599
02:01:14,760 --> 02:01:19,320
से जोड़ते जाएंगे बोलते जाओ जो जो बोलोगे

1600
02:01:19,320 --> 02:01:23,360
तुमसे जोड़ देंगे तुम्हारे रूप में व य भी कर सकता है और बोलो

1601
02:01:23,360 --> 02:01:26,000
कितना गिरोगे भाई

1602
02:01:26,000 --> 02:01:30,160
परमार्थिक सत्ता और जो व्यवहारिक सत्ता है उसमें अंतर होता है

1603
02:01:30,160 --> 02:01:34,280
ईश्वर ने संसार बनाया है उसने ही अगर कोई

1604
02:01:34,280 --> 02:01:38,480
पेंटर अपनी पेंटिंग बना रहा है तो उसके लिए आंख और

1605
02:01:38,480 --> 02:01:42,480
जो अन्य जो आपत्ति जनक अंग होते हैं एक मात्र शक्ति के उसकी अगर

1606
02:01:42,480 --> 02:01:46,640
पेंटिंग बन रही है तो उसमें नेत्र और बाकी के अंगों में पेंटर के लिए कोई

1607
02:01:46,640 --> 02:01:50,680
अंतर नहीं होता है ईश्वर वो है और आप वो है जो

1608
02:01:50,680 --> 02:01:54,680
उस उसके अ पेंटिंग के और उस पेंटिंग के अंदर

1609
02:01:54,680 --> 02:01:58,880
की ऊपर नीचे की चीजों से आप जुड़े हुए हैं उसके अंतर से

1610
02:01:58,880 --> 02:02:03,600
ईश्वर भी अगर अच्छाई बुराई से जुड़ गया तो व ईश्वर कैसा रहा

1611
02:02:03,600 --> 02:02:08,000
अगर उसको भी अच्छाई और बुराई प्रभावित करने लगी दूसरी बात आपके

1612
02:02:08,000 --> 02:02:12,360
अनुसार जो ईश्वर है वह ईश्वर है ही नहीं

1613
02:02:12,360 --> 02:02:16,440
वह केवल एक सिस्टम मात्र है एक जैसे

1614
02:02:16,440 --> 02:02:20,440
जो बौद्धों का ईश्वर था ना कि वो प्रकृति जो होती है वो अपने आप

1615
02:02:20,440 --> 02:02:24,760
आपको यह देती है वो देती है ऐसा करोगे ऐसा मिलेगा तो इनका जो ईश्वर

1616
02:02:24,760 --> 02:02:29,240
है वो केवल एक सिस्टम मात्र उसकी भक्ति करो ना करो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है

1617
02:02:29,240 --> 02:02:33,880
आपको कुछ नहीं मिलने वाला तो वो उसको ईश्वर ना भी कहो तब भी काम चल

1618
02:02:33,880 --> 02:02:37,920
जाएगा हमने इतने सारे प्रश्न किए उससे कोई मतलब नहीं है केवल वो

1619
02:02:37,920 --> 02:02:41,640
विवाद खड़ा करने के लिए अच्छा जब वैशेषिक

1620
02:02:41,640 --> 02:02:46,000
दर्शन की बात कर रहे हो तो इसका मतलब प्रमाण पर आ गए शब्द प्रमाण पर

1621
02:02:46,000 --> 02:02:50,040
जब शब्द प्रमाण हम पूछ रहे हैं कि आपके पास कैसे आया ग्रंथ तो आप बता रहे हो

1622
02:02:50,040 --> 02:02:54,280
नहीं पता प्रमाण को बीच में तब लाओ जब शब्द प्रमाण

1623
02:02:54,280 --> 02:02:57,280
को आप स्वीकार करते

1624
02:02:57,280 --> 02:03:01,800
हो शब्द प्रमाण को आप स्वीकार ही नहीं कर रहे ना

1625
02:03:01,800 --> 02:03:06,280
मेरा एक था कीने आपको अपना चेहरा

1626
02:03:06,280 --> 02:03:10,320
रिल करें तो हम आपको परर जी मेरा एक

1627
02:03:10,320 --> 02:03:14,320
सवाल था हा

1628
02:03:14,320 --> 02:03:18,440
जी अभी जैसे कि अगर कोई हिंदू है और

1629
02:03:18,440 --> 02:03:22,800
वो अगर उसे वेद नहीं पढ़ने है और खाली

1630
02:03:22,800 --> 02:03:27,080
गुरु दीक्षा लेनी है और मंत्र जाप करना है और नाम जाप कर रहा है वो बस

1631
02:03:27,080 --> 02:03:31,120
तो उसे क्या जनयुग करना जरूरी

1632
02:03:31,120 --> 02:03:35,160
है कि नहीं करेगा फिर भी चल सकता है क्योंकि बहुत लोग कहते हैं कि जरूरी है

1633
02:03:35,160 --> 02:03:39,440
क्योंकि आपको अधिकार है तो आपको करना ही चाहिए ऐसा बोलते हैं करपात्री जी से ऐसा

1634
02:03:39,440 --> 02:03:43,560
ही एक प्रश्न किया था तो करपात्री जी का गुरुदेव बताते हैं उ उनसे जब ये प्रश्न

1635
02:03:43,560 --> 02:03:47,680
किया गया था कि मैं ऐसे ऐसे कर लूं चल जाएगा तो करपात्री जी

1636
02:03:47,680 --> 02:03:53,560
ने उत्तर दिया था चल जाता मगर दुर्भाग्यवश तुम ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हो गए हो

1637
02:03:53,560 --> 02:03:56,720
हा विवेकी का दायित्व ज्यादा होता है जिसको

1638
02:03:56,720 --> 02:04:01,400
ब्राह्मण शरीर हुआ है वह अपने ब्राह्मण जो आचरण है उससे अगर बचेगा

1639
02:04:01,400 --> 02:04:06,400
तो हमारे बीच की रक्षा कैसे होगी कोई वैश्य है

1640
02:04:06,400 --> 02:04:10,400
तो जिसको जिसका जितना अधिकार है उसका उसे त्याग

1641
02:04:10,400 --> 02:04:14,800
नहीं करना चाहिए यथा सामर्थ उसका आलंबन लेना चाहिए मगर कोई व्यवस्था है

1642
02:04:14,800 --> 02:04:18,800
तो आगे बढ़ी नाम लेकर प्रभु का अपने मन में भाव ये रखिए कि वो

1643
02:04:18,800 --> 02:04:22,920
जो व्यवस्था है वही सर्वश्रेष्ठ है मैं पतित हूं जो नहीं

1644
02:04:22,920 --> 02:04:27,200
कर पा रहा हूं स्वयं के लिए अगर हम नियमों

1645
02:04:27,200 --> 02:04:31,440
के सीमा में नहीं है या नियमों का आलंबन नहीं ले पा रहे हैं

1646
02:04:31,440 --> 02:04:35,600
तो स्वयं के लिए नियमों को तोड़ने वाला सुनने के सुनने में क्या आपत्ति

1647
02:04:35,600 --> 02:04:39,760
है सुन लीजिए हा भाई मैं एक पतित वैश्य हूं

1648
02:04:39,760 --> 02:04:43,840
मैं एक पतित ब्राह्मण हूं मगर अपने पतित पन

1649
02:04:43,840 --> 02:04:48,360
को ना स्वीकार करने के चक्कर में हम शास्त्रों को पतित

1650
02:04:48,360 --> 02:04:52,600
या शास्त्रों में कही हुई बात को नकारना नहीं चाहिए यही बात भगवत गीता भगवान

1651
02:04:52,600 --> 02:04:57,000
ने कही कि व्यवस्था वस धर्म का अनुकरण ना कर पाने की स्थिति में

1652
02:04:57,000 --> 02:05:01,000
यदि आपके मन में उसके प्रति निष्ठा है जिसका आप पालन नहीं

1653
02:05:01,000 --> 02:05:05,120
कर पा रहे हो उसका सम्मान है और मन में

1654
02:05:05,120 --> 02:05:09,240
पश्चाताप है उसे ना कर पाने का कि सही तो वही है मैं गलत कर रहा

1655
02:05:09,240 --> 02:05:14,800
हूं तो भी आप

1656
02:05:14,800 --> 02:05:19,080
धर्मजीवन चाहता हो और एक सही गुरु के नीचे रहकर

1657
02:05:19,080 --> 02:05:23,240
शास्त्रों का अध्ययन करना चाहता हो तो वो किसी गुरु

1658
02:05:23,240 --> 02:05:27,640
से कैसे जुड़ेगा मतलब उसके बारे में आप कुछ बता सके तो जो लाइव

1659
02:05:27,640 --> 02:05:31,800
उसके जब सवाल पूछना चाहे तो सवाल भी पूछ सके वैसे तो गुरुदेव के वीडियो है ही है जो वीडियो

1660
02:05:31,800 --> 02:05:36,080
देख के पर देखिए चूल्हे से रोटी निकालने के लिए चिमटे

1661
02:05:36,080 --> 02:05:40,400
को अपना मुंह जलाना ही पड़ेगा हम जिसको अपने सवालों

1662
02:05:40,400 --> 02:05:44,520
का जवाब चाहिए वाकई में जिज्ञासु है उसको जतन करने

1663
02:05:44,520 --> 02:05:49,240
होंगे आप देखो कई ऐसे भक्त हुए वो अपने गुरु के मार्ग में लेट गए

1664
02:05:49,240 --> 02:05:53,240
गुरु ने स्वीकार नहीं किया तो लेट गए तर तरह की परीक्षाएं दी

1665
02:05:53,240 --> 02:05:57,360
तब जाकर के वो गुरु ने उनको स्वीकार किया गुरुदेव का लाइव

1666
02:05:57,360 --> 02:06:02,320
उनको बात करनी है गुरुदेव का भी दो दो ढाई महीने तक उनका वो चला

1667
02:06:02,320 --> 02:06:06,480
चातुर्मास जिनके अंदर जिज्ञासा है है ना

1668
02:06:06,480 --> 02:06:10,560
वो आ सकते थे मगर व ले दे कर के कितने लोग पहुंचे शायद पूरे

1669
02:06:10,560 --> 02:06:14,840
चातुर्मास में बहुत ज्यादा नहीं संख्या पहुंची तो कहने जिनके अंदर जिज्ञासा

1670
02:06:14,840 --> 02:06:19,680
है वो पहुंच जाएंगे हा जिनके अंदर जिज्ञासा है

1671
02:06:19,680 --> 02:06:24,040
वो पहुंच जाएंगे जी तो ये पियूष

1672
02:06:24,040 --> 02:06:28,400
वादवानी जैसे डगले और प्रिया चरित्र

1673
02:06:28,400 --> 02:06:29,840
वाले लोगों का निर्माण हो रहा

1674
02:06:29,840 --> 02:06:34,360
है क्या ये निर्माण इस कन में हो रहा है यह प्रश्न है

1675
02:06:34,360 --> 02:06:38,520
और अगर यह आपसे जुड़े हुए हैं तो इनको समझाए कि श्री कृष्ण के चरणों की सौगंध

1676
02:06:38,520 --> 02:06:42,600
खाने के बाद इस तरह का त्रिया चरित्र यह कैसे कहां से करना

1677
02:06:42,600 --> 02:06:46,760
सीख रहे हैं क्या इन्ह सनातन के नाम पर इस्लाम

1678
02:06:46,760 --> 02:06:50,920
की शिक्षा दी जाती है या किसी सनातन विरुद्ध तंत्र की शिक्षा दी जाती है सब बातें

1679
02:06:50,920 --> 02:06:53,760
हैं

1680
02:06:53,760 --> 02:06:57,840
ध्यान देने की आवश्यकता

1681
02:06:57,840 --> 02:07:03,840
है जी साहब सिंह जी बताइए

1682
02:07:04,480 --> 02:07:08,920
जयम मैं भी आपसे दूसरी आडी से जुड़ा था आवाज नहीं आ रही थी

1683
02:07:08,920 --> 02:07:12,560
अभी हा

1684
02:07:12,560 --> 02:07:18,560
बोलिए आपकी डिबेट सुन रहा था अभी काफी

1685
02:07:22,080 --> 02:07:26,480
हां जी मैं उसी को फॉलो करता हूं तो क्या आर्य

1686
02:07:26,480 --> 02:07:29,640
समाज के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर

1687
02:07:29,640 --> 02:07:35,640
सर्वशक्तिमान

1688
02:07:36,640 --> 02:07:40,720
है हां जी क्या वो

1689
02:07:40,720 --> 02:07:46,280
अवतार ले सकता है

1690
02:07:46,280 --> 02:07:51,000
नहीं वो अनंत सामर्थ वान मानते हैं आप उसे

1691
02:07:51,000 --> 02:07:53,600
हा

1692
02:07:53,600 --> 02:07:57,640
तो जब वो अनंत सामर्थ वान है तो

1693
02:07:57,640 --> 02:08:00,960
फिर वो अवतार क्यों नहीं ले

1694
02:08:00,960 --> 02:08:05,080
सकता और यदि वो अवतार नहीं ले सकता है

1695
02:08:05,080 --> 02:08:08,760
तो फिर वो अनंत सामर्थ वान

1696
02:08:08,760 --> 02:08:12,760
कैसे अवतार लेने की जरूरत ही नहीं है अवतार

1697
02:08:12,760 --> 02:08:17,480
ले मैंने पूछा ले सकता है कि नहीं साहब सिंह जी

1698
02:08:17,480 --> 02:08:21,680
नहीं ले सकता है जी

1699
02:08:21,680 --> 02:08:25,920
ये बताइए कि जब वोह अवतार नहीं ले सकता तो अनंत सामर्थ

1700
02:08:25,920 --> 02:08:29,800
वान कैसे

1701
02:08:29,800 --> 02:08:33,200
हुआ

1702
02:08:33,200 --> 02:08:37,560
बोलिए क्यों जो यह बताओ जी जैसे अवतार

1703
02:08:37,560 --> 02:08:41,720
सामर्थ का अंत हो रहा है ना मैं पूछ रहा हूं

1704
02:08:41,720 --> 02:08:46,000
उसकी सामर्थ्य में सीमा है ना कि वो अवतार नहीं ले सकता है सीमा है ना

1705
02:08:46,000 --> 02:08:50,440
उसकी अच्छा

1706
02:08:50,440 --> 02:08:54,600
जी बोलिए सीमा है ना ये तो जब सीमित

1707
02:08:54,600 --> 02:08:59,040
हो गया तो अनंत

1708
02:08:59,040 --> 02:09:03,200
कैसे क्यों अवतार ये बताओ आपने कहा अवतार देगा

1709
02:09:03,200 --> 02:09:07,360
तो उसम बाद हो रहा अवतार नहीं ले रहा है तो ठीक

1710
02:09:07,360 --> 02:09:11,360
है हा तोय बताओ

1711
02:09:11,360 --> 02:09:15,520
अवतार लेगा तो फिर जन्म भी लेगा फिर उसका मरण भी होगा

1712
02:09:15,520 --> 02:09:19,600
तोर ये बताइए आपके अनुसार जीव

1713
02:09:19,600 --> 02:09:24,760
है अनुस हा जी

1714
02:09:24,760 --> 02:09:30,360
वो जन्म लेता

1715
02:09:30,360 --> 02:09:34,360
है जम लेता इन तो जन्म लेही रहा है लेता है उसका

1716
02:09:34,360 --> 02:09:38,400
मरण होता है और

1717
02:09:38,400 --> 02:09:44,400
क्या फिर भी आप जीव को अनाद अनंत कहते हैं कि

1718
02:09:45,680 --> 02:09:51,680
नहीं फिर भी आप जीव को अनादि अनंत कहते हैं कि नहीं

1719
02:09:52,600 --> 02:09:56,600
आपका मेरी समझ आपका सवाल नहीं आ रहा है जी आप समझ नहीं

1720
02:09:56,600 --> 02:10:01,160
रहे जब जन्म और मरण से जन्म और मरण से

1721
02:10:01,160 --> 02:10:05,720
जन्म और मरण होने के बावजूद भी आप जीव को अनंत कह पा रहे हैं

1722
02:10:05,720 --> 02:10:11,720
तो जन्म और मरण से आपको ईश्वर को अनंत मानने में क्या दिक्कत हो रही

1723
02:10:14,800 --> 02:10:18,920
है और कुल मिलाकर के सवाल यह है ही नहीं सवाल

1724
02:10:18,920 --> 02:10:23,440
तो यह है यदि एक मात्र भी सीमा है

1725
02:10:23,440 --> 02:10:27,640
तो वह अनंत कैसे एक मात्र भी सीमा

1726
02:10:27,640 --> 02:10:31,760
है एक नियम है जो उस पर लागू है तो

1727
02:10:31,760 --> 02:10:35,920
वह फिर असीमित कैसे अनंत कैसे उसको आप ईश्वर कहो

1728
02:10:35,920 --> 02:10:40,040
मगर अनंत सामर्थ वान मत कहो अच्छ उसको

1729
02:10:40,040 --> 02:10:44,640
आप ईश्वर कहो कोई दिक्कत नहीं है अनंत सामर्थ वान मत

1730
02:10:44,640 --> 02:10:48,920
कहो जैसे आप जो भी जने आप जो वेदों

1731
02:10:48,920 --> 02:10:53,120
में जो परिभाषा बताते हैं आप कहते हैं आर्य समाज

1732
02:10:53,120 --> 02:10:57,280
के वेद है ना यानी पारंपरिक नहीं है वो हमारे वेद

1733
02:10:57,280 --> 02:11:00,880
जो आए हैं वो विय बदल रहा है विषय

1734
02:11:00,880 --> 02:11:01,840
बदल रहा है

1735
02:11:01,840 --> 02:11:06,320
एक मिनट सुनो तो सही आप अचार उसम भी गए थे क्या

1736
02:11:06,320 --> 02:11:10,480
अचार जी के उसम गए थे क्या हा मैं गया था हां

1737
02:11:10,480 --> 02:11:14,560
मैं गया था हा मैं गया था वहां

1738
02:11:14,560 --> 02:11:19,400
पर उनसे मैंने कुछ सवाल भी किए थे अब मुझे

1739
02:11:19,400 --> 02:11:22,560
ठीक है काफी है अब मुझे आप बताइए

1740
02:11:22,560 --> 02:11:27,000
कि अगर ईश्वर की सामर्थ्य की सीमा है

1741
02:11:27,000 --> 02:11:31,840
तो फिर ईश्वर अनंत क्यों या तो आप आज य बोलिए

1742
02:11:31,840 --> 02:11:37,840
ईश्वर अनंत सामर्थ वान नहीं

1743
02:11:38,280 --> 02:11:42,360
है यह बताओ जी भाई साहब जो आप ये कह रहे हो अवतार

1744
02:11:42,360 --> 02:11:46,800
नहीं ले सकता है तो वो सा नहीं है मैंने आपसे पूछा

1745
02:11:46,800 --> 02:11:50,800
अगर उसकी सामर्थ्य की सीमा है तो उसको अनंत

1746
02:11:50,800 --> 02:11:55,600
मत कहिए अच्छा जी हां

1747
02:11:55,600 --> 02:11:59,800
अब बोलिए अब ईश्वर क्या है

1748
02:11:59,800 --> 02:12:04,280
अनुसार अनंत आपके अनुसार ईश्वर अनंत सामर्थ्य मान है

1749
02:12:04,280 --> 02:12:09,880
क्या

1750
02:12:09,880 --> 02:12:14,000
है अब यह बताओ बड़े भाई सा यह बताओ आप यह कहते हो कि

1751
02:12:14,000 --> 02:12:18,200
अवतार नहीं लेता तो आपका ईश्वर

1752
02:12:18,200 --> 02:12:22,440
है आप ये बताओ आप जो बता रहे हो आपके जो अनुसार

1753
02:12:22,440 --> 02:12:26,480
जो अर्थ है जो भी है अभी बताओ आपका गुरु

1754
02:12:26,480 --> 02:12:31,000
परंपरा क्या उनका आप ये कहते हो आर समाज का जो वेद है वो

1755
02:12:31,000 --> 02:12:35,080
उन्होंने अर्थ अलग से लिया है दूसरा विषय

1756
02:12:35,080 --> 02:12:39,080
पहले आप ईश्वर के ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध करिए अनंत सिद्ध

1757
02:12:39,080 --> 02:12:43,160
करिए या तो यह कहिए कि ईश्वर अनंत नहीं है फिर

1758
02:12:43,160 --> 02:12:47,320
आगे बढ़ते हैं बड़े भाई जी इसका जवाब

1759
02:12:47,320 --> 02:12:51,800
है ना हमारे गुरु जी वो दे पाएंगे अच्छा

1760
02:12:51,800 --> 02:12:56,080
तो आपके पास का इसका उत्तर नहीं है कौन है आपके गुरुजी

1761
02:12:56,080 --> 02:13:00,920
मेरे पास उत्तर नहीं है कौन है आपके गुरु सदानंद सर

1762
02:13:00,920 --> 02:13:05,120
स्वामी सच्चिदानंद मुझे अब आप मुझे ये बता दीजिए

1763
02:13:05,120 --> 02:13:09,800
आप हमारा चैनल कब से दे रहे हैं देख रहे हैं आप हमारा चैनल कब से देख रहे

1764
02:13:09,800 --> 02:13:14,280
हैं हो गए कम से कम छ महीने से ज्यादा हो गया

1765
02:13:14,280 --> 02:13:18,480
छ महीने से तो आपने हमारा ये सवाल सुना था कि नहीं ईश्वर सर्व

1766
02:13:18,480 --> 02:13:23,320
शक्तिमान है कि नहीं तो ये आप अपने गु से पूछ नहीं आज

1767
02:13:23,320 --> 02:13:25,080
तक मेरा अभी वहां

1768
02:13:25,080 --> 02:13:29,200
जाना नहीं हुआ है अनचार सभा में तो आप

1769
02:13:29,200 --> 02:13:33,200
चले गए अनिरुद्धाचार्य जी की सभा में तो आप चले गए मगर

1770
02:13:33,200 --> 02:13:37,320
अपने गुरु के पास नहीं पहुंच पाए वो मेरे गांव

1771
02:13:37,320 --> 02:13:41,360
के पास में अचार्य जी वृंदावन मेरे गांव के पास में

1772
02:13:41,360 --> 02:13:45,680
अच्छा नजदीक में छ महीने में छ महीने में आप फोन के माध्यम

1773
02:13:45,680 --> 02:13:49,720
से जा करर के किसी भी प्रकार से आपको मौका नहीं मिला कि आपने

1774
02:13:49,720 --> 02:13:54,240
गुरु से पूछ पाए कि जब ईश्वर अवतार नहीं ले सकता उसकी य सीमा है

1775
02:13:54,240 --> 02:13:58,360
तो फिर ईश्वर अनंत सामर्थ्य वान क्यों कैसे

1776
02:13:58,360 --> 02:14:02,880
है आपको छ महीने में इतना समय नहीं मिला चलिए र

1777
02:14:02,880 --> 02:14:07,160
आपने कह दिया गु दे पाएंगे कह दिया आपने गुरुजी दे पाएंगे

1778
02:14:07,160 --> 02:14:11,560
कोई बात नहीं अगली बार बात करेंगे अब बात आती है परंपरा की

1779
02:14:11,560 --> 02:14:15,720
तो मैं मैं यह कह रहा हूं कि

1780
02:14:15,720 --> 02:14:20,000
आर्य समाज को जो वैदिक ग्रंथ है वो कैसे प्राप्त हुए

1781
02:14:20,000 --> 02:14:24,040
यह बताइए मैं आपको अपने बारे में बताऊंगा बताऊंगा

1782
02:14:24,040 --> 02:14:28,240
पर उसका एक क्या है क्लेरिफिकेशन होता है इस तरह से आर समाज

1783
02:14:28,240 --> 02:14:32,440
के पास वेद कैसे आए वो ऋषि परंपरा से आए

1784
02:14:32,440 --> 02:14:36,680
ऋषियों के द्वारा वो नाम बताइए बजान के गुरु पूर्णानंद

1785
02:14:36,680 --> 02:14:40,120
और दो चार गुरु और बताइए पीछे के गुरुओं का नाम

1786
02:14:40,120 --> 02:14:44,160
बताइए क्यों आपने बता तो दिया बजान जो दयानंद जी

1787
02:14:44,160 --> 02:14:48,600
के गुरु बजान गजानंद के पीछे पूर्णानंद थे पूर्णानंद

1788
02:14:48,600 --> 02:14:53,520
के पीछे कौन थे

1789
02:14:53,520 --> 02:14:57,560
ये तो ऋषियों के द्वारा आए अब त भाई साहब नाम होता है ना

1790
02:14:57,560 --> 02:15:01,560
कुछ कौन से ऋषि थे जिन्होने पूर्णानंद को वेद

1791
02:15:01,560 --> 02:15:05,640
दिया अरे भाई जी एक बात बताओ आप आप ज शंकराचार्य जी

1792
02:15:05,640 --> 02:15:09,800
की बात करते हो ठीक है आज गुरु शंकराचार्य जी की बात करते हो

1793
02:15:09,800 --> 02:15:13,800
है ना उनके गुरु कौन थे आप बताओ गोविंद

1794
02:15:13,800 --> 02:15:17,880
योगेंद्र मस अच्छा जी अब ये बताओ जैसे

1795
02:15:17,880 --> 02:15:21,880
बौद्ध मत का 500 ईसा पूर्व आया उन सं कौन सी परंपरा आ

1796
02:15:21,880 --> 02:15:26,080
रही थी ये बताओ आप मेरे को नारायण समार बता

1797
02:15:26,080 --> 02:15:30,440
रहा हूं ना भाई सुनो पहली बात ये

1798
02:15:30,440 --> 02:15:34,480
नारायण समारंभा शंकराचार्य मध्यमाम ये नारायण से आ रही थी ये

1799
02:15:34,480 --> 02:15:38,680
परंपरा जो जिसका खंडन बहुत बौद्धों के काल में आके आदि शंकराचार्य

1800
02:15:38,680 --> 02:15:42,680
जी ने किया मगर अगर यह बात मान ले कि शंकराचार्य

1801
02:15:42,680 --> 02:15:46,800
जी की भी गुरु परंपरा पर आपको विश्वास नहीं है तो फिर यह हो

1802
02:15:46,800 --> 02:15:51,080
जाएगा कि वैदिक वांग में अनादिन अनंत नहीं है अभी जो 100 200 साल

1803
02:15:51,080 --> 02:15:55,320
का इतिहास आपका है तभी रचे गए हैं जैसे बड़े भाई

1804
02:15:55,320 --> 02:15:59,680
जी शंकराचार्य जी ने वेद का शंकराचार्य जी ने वेदों का भाष्य

1805
02:15:59,680 --> 02:16:03,880
तो किया नहीं वेदों का भाष्य सायनाचार्य ने तो किया उनकी

1806
02:16:03,880 --> 02:16:08,840
परंपरा में आने वाले

1807
02:16:08,840 --> 02:16:12,840
सा अरे भाई आप यह बताओ दयानंद सरस्वती जी ने सब

1808
02:16:12,840 --> 02:16:16,920
पर भाष्य किया है क्या जिसकी आवश्यकता हो रही है कर रहे नहीं

1809
02:16:16,920 --> 02:16:21,120
हो रही नहीं कर रहे फिर आगे चल कर के दोबारा जब प्रासंगिक भाष

1810
02:16:21,120 --> 02:16:25,600
बदल गई फिर किसी ने भाष्य किया आवश्यकता

1811
02:16:25,600 --> 02:16:29,800
दिखाई देगी तब भाष्य करेंगे कि यूं ही भाष करते चले जाए

1812
02:16:29,800 --> 02:16:34,720
तो बड़े भाई जी आवश्यकता थी तभी तो दयानंद सरस्वती ने उनका व भाष्य किया

1813
02:16:34,720 --> 02:16:38,840
अरे तो भाष्य किया वो जो ज्ञान था व उनके पास आया कहां से

1814
02:16:38,840 --> 02:16:43,720
उनके गुरु कौन थे पूर्णानंद

1815
02:16:43,720 --> 02:16:47,800
के आप बात ही नहीं समझ रहे हो मैं तो समझने

1816
02:16:47,800 --> 02:16:52,280
के लिए बैठा हूं चैनल खोल रखा है और क्यों खोला

1817
02:16:52,280 --> 02:16:56,440
चैनल अरे नहीं बड़े भाई जी या आप यह

1818
02:16:56,440 --> 02:17:00,560
बताइए कि आपके पास जो पूर्णानंद जी है

1819
02:17:00,560 --> 02:17:04,840
विजानंद जी के गुरु विजानंद जी है दयानंद सरस्वती के गुरु दयानंद

1820
02:17:04,840 --> 02:17:09,280
जी के पास जो ज्ञान पूर्णानंद से आ रहा है पूर्णानंद जी के पास व ज्ञान कहां से आया

1821
02:17:09,280 --> 02:17:13,520
था अगर वोह उनके पास सुनिए अगर उनके

1822
02:17:13,520 --> 02:17:17,560
पास अपना कोई वो नहीं है कि हमारे पास यहां से आया और

1823
02:17:17,560 --> 02:17:21,640
जिसके पास है जो ये बता रहा है मेरे पास यहां से आया

1824
02:17:21,640 --> 02:17:25,680
अगर उस पर विश्वास नहीं है अप्रत्यक्ष रूप से आप यह कह रहे

1825
02:17:25,680 --> 02:17:29,960
हैं कि वेदों का अस्तित्व तब का है जब वो साल पहले जितना

1826
02:17:29,960 --> 02:17:34,800
आपका दयानंद जी मानते हैं बस दयानंद जी से जो आया

1827
02:17:34,800 --> 02:17:38,880
दयानंद जी ने कभी वेदों का जो समय वो 100 200

1828
02:17:38,880 --> 02:17:43,120
वर्ष नहीं माना अरे भाई उनकी गुरु

1829
02:17:43,120 --> 02:17:47,120
परंपरा क्या है तो गुरु परंपरा क्या है

1830
02:17:47,120 --> 02:17:51,120
बड़े भाई जी बजान जी थे ना व्याकरण के बहुत बड़े आचार्य थे उसके

1831
02:17:51,120 --> 02:17:55,560
अनुसार उन्होंने वेदों का वो अनुवाद किया था क्योंकि वेदों में लोग

1832
02:17:55,560 --> 02:18:01,560
मैंने पूछा है गिरजानंद जी की गुरु परंपरा क्या

1833
02:18:01,920 --> 02:18:06,360
है चलो यह भी माना के चलो गुरु परंपरा से वेद आए

1834
02:18:06,360 --> 02:18:10,640
आपकी मेरी बात चलो मानी तो उस समय वेदों

1835
02:18:10,640 --> 02:18:15,680
में किसने माद में आपको

1836
02:18:15,680 --> 02:18:20,200
यह एन केन प्रकार मानना पड़ेगा कि आपके

1837
02:18:20,200 --> 02:18:24,440
पास जो वेद आए हैं वो इन्हीं परंपराओं से आए हैं जिनका आप

1838
02:18:24,440 --> 02:18:28,920
खंडन करते हो जिनका आप अनादर करते हो जिनको आप कोप

1839
02:18:28,920 --> 02:18:32,960
कहते हो जिनको आप पौराणिक कहते हो जिनका मजाक उड़ाने

1840
02:18:32,960 --> 02:18:37,200
के लिए आप उनकी सभा में जाकर के उलल प्रश्न करते हो

1841
02:18:37,200 --> 02:18:41,520
उल जूल कोई प्रश्न नहीं करता बड़े भाई

1842
02:18:41,520 --> 02:18:45,680
नहीं नहीं वो ठीक है कोई नहीं करता मैं देखूंगा आपका वो वीडियो जिसम

1843
02:18:45,680 --> 02:18:50,000
आप गए हैं मगर अभी फिलहाल बात में ये कर रहा हूं कि जिनसे

1844
02:18:50,000 --> 02:18:54,400
आपको मिले हैं उनका आप खंडन करते हो उनके प्रति अविश्वास

1845
02:18:54,400 --> 02:18:58,960
प्रकट करते हो बात य आती है कि जिनसे

1846
02:18:58,960 --> 02:19:03,240
आपको वेद मिले हैं हा जी यदि आपको उनके

1847
02:19:03,240 --> 02:19:08,080
ऊपर विश्वास नहीं है तो उनसे मिलने वाले वेदों पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता

1848
02:19:08,080 --> 02:19:12,240
और जिनसे मिले हुए वेदों पर विश्वास है उनके ऊपर जिनसे आपको

1849
02:19:12,240 --> 02:19:16,960
वेद मिले हैं जिनसे मिले हुए वेदों पर विश्वास है आपको

1850
02:19:16,960 --> 02:19:22,480
तो उन पर अविश्वास होना आपका सिद्ध नहीं होता

1851
02:19:22,480 --> 02:19:26,480
या तो अगर गुरुओं पर विश्वास नहीं है परंपरा प्राप्त तो वेदों पर विश्वास

1852
02:19:26,480 --> 02:19:32,160
मत करो और यदि वेदों पर विश्वास है तो गुरुओं पर विश्वास

1853
02:19:32,160 --> 02:19:36,240
करो आया कुछ आपके समझ में मैं आपकी

1854
02:19:36,240 --> 02:19:36,740
बात

1855
02:19:36,480 --> 02:19:40,600
समझ रहा हूं तो आप मेरी बात सुनो एक मिनट जैसे आप जो

1856
02:19:40,600 --> 02:19:44,920
बता रहे उनका जो नाम ले रहे हो जो आचार्य जी थे वो

1857
02:19:44,920 --> 02:19:49,080
उन्होंने तो वेदों में बलि को भी स्वीकृत किया है यज्ञ में बलि को भी

1858
02:19:49,080 --> 02:19:53,080
किया है और मूर्ति पूजा ये

1859
02:19:53,080 --> 02:19:57,360
अगला चैप्टर होगा हम अगला चैप्टर लेते हैं मगर अभी आपके

1860
02:19:57,360 --> 02:20:01,440
पास उनके ऊपर अविश्वास ना करने का कारण आप ठीक

1861
02:20:01,440 --> 02:20:05,640
है आपको बलि खराब लग रही है ठीक है आप ये कहो भैया

1862
02:20:05,640 --> 02:20:10,000
हम वो है जो वेदों को नहीं मानते क्योंकि वेद शंकराचार्य से आए हैं रावण

1863
02:20:10,000 --> 02:20:14,240
जाचार्य से आए हैं हम वेदों को नहीं मानते मगर हम जो है बलि का खंडन

1864
02:20:14,240 --> 02:20:19,040
करते हैं हम अवैध बलि के विरोधी है ये कहो

1865
02:20:19,040 --> 02:20:23,040
हम अवैध है आप आप बलि को नहीं मानते क्योंकि

1866
02:20:23,040 --> 02:20:27,440
शंकराचार्य ने अपने उसमें वो बलि को माना है और आपको शंकराचार्य

1867
02:20:27,440 --> 02:20:31,520
पर विश्वास नहीं है तो आपका उनके ग्रंथों पर उनके जो वेद

1868
02:20:31,520 --> 02:20:35,880
है उन पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता तो जब आपको वेदों पर विश्वास

1869
02:20:35,880 --> 02:20:40,720
नहीं है आप यह कहो बली गलत है यह मत कहो हम वैदिक है

1870
02:20:40,720 --> 02:20:44,760
यह मत कहो स्वयं को वेदों से क्यों जोड़ रहे हो जैसे आपको ईश्वर को

1871
02:20:44,760 --> 02:20:48,840
निराकार बाधित सिद्ध करना है आप कहो कि ईश्वर निराकार

1872
02:20:48,840 --> 02:20:51,560
है ईश्वर वादित है और ईश्वर जो है

1873
02:20:51,560 --> 02:20:55,760
बली बली वगैरह य सब गलत है यह कहो मगर स्वयं को वैदिक

1874
02:20:55,760 --> 02:21:00,440
नहीं कह सकते कि हम को मानने वाले

1875
02:21:00,440 --> 02:21:02,720
भाई आप आप तो ब कहते हो आप कसे

1876
02:21:02,720 --> 02:21:06,960
सिद्ध होते हो आप भी आप भी तो मानते पहले

1877
02:21:06,960 --> 02:21:11,200
देखो वेदों का अर्थ जो भी निकले वो नैतिक

1878
02:21:11,200 --> 02:21:15,360
है अनैतिक हैय एक अलग विषय है मगर वेद जहां से आए हैं

1879
02:21:15,360 --> 02:21:20,800
उस पर हमें भरोसा करना पड़ेगा कि इससे हमने अगर वेद लिए हैं तोय

1880
02:21:20,800 --> 02:21:24,960
हमारे लिए विश्वास पात्र है तभी उसके द्वारा दी गई सामग्री पर विश्वास

1881
02:21:24,960 --> 02:21:29,080
होना हमारा सिद्ध होगा तो अपने को वैदिक कहने के लिए सबसे पहले हमारी

1882
02:21:29,080 --> 02:21:33,320
गुरु परंपरा पर हमें विश्वास होना करना होगा

1883
02:21:33,320 --> 02:21:33,820
ठीक

1884
02:21:33,560 --> 02:21:38,440
है अब बात आती है बलि अब बात आती है

1885
02:21:38,440 --> 02:21:42,920
बलि तो बलि का अर्थ है भेंट

1886
02:21:42,920 --> 02:21:47,320
पहली बात तो बलि बहुत बड़ा चैप्टर है मगर इसको मैं अभी ऐसे समझा

1887
02:21:47,320 --> 02:21:51,440
दूं कि क्या श्वर का अर्थ

1888
02:21:51,440 --> 02:21:56,040
ये है कि संसार में कोई भी मरेगा

1889
02:21:56,040 --> 02:22:00,080
नहीं जिसने जन्म लिया उसे तो मरना पड़ेगा मैं

1890
02:22:00,080 --> 02:22:04,680
मतलब की लोगों की मृत्यु होती है ना हा होती है

1891
02:22:04,680 --> 02:22:09,800
होती है वहा ईश्वर वहा ईश्वर पर दोष नहीं लगेगा य मरने क्यों दे रहा है लोगों

1892
02:22:09,800 --> 02:22:14,680
को जिसका जन्म हुआ उसे तो मरना पड़ेगा कोई भी सही

1893
02:22:14,680 --> 02:22:18,800
भाई ईश्वर चाहे तो रोक सकता है ना मरने से

1894
02:22:18,800 --> 02:22:23,000
या य भी वादत है

1895
02:22:23,000 --> 02:22:25,360
क्यों

1896
02:22:25,360 --> 02:22:31,240
सता तो उस पर दोष नहीं लगेगा क्यों मरने दे रहा

1897
02:22:31,240 --> 02:22:35,360
है भाई जिसने जो जैसे जिसने जो कर्म किया उ उसे तो उसका

1898
02:22:35,360 --> 02:22:40,160
फल मिले रोक सकता है कि नहीं मुझे यह बताओ

1899
02:22:40,160 --> 02:22:44,360
कैसे मैं आपकी बात समझा नहीं ईश्वर मरने से बचा

1900
02:22:44,360 --> 02:22:48,600
सकता है कि नहीं मरने वालों को बचा सकता है

1901
02:22:48,600 --> 02:22:54,320
बताओ तो फिर उस दोष नहीं लग रहा कि तुम क्यों नहीं बचा रहे हो मरने

1902
02:22:54,320 --> 02:22:58,320
से इसका अर्थ है मैं आपको यह समझाना चाह रहा हूं भगवत

1903
02:22:58,320 --> 02:23:02,880
गीता के 2.1 आपकी भगवत गीता में कितना कितना है वो नहीं पता

1904
02:23:02,880 --> 02:23:07,040
नॉर्मल जो सामान्य जो सच्ची जो परंपरा प्राप्त भगवत

1905
02:23:07,040 --> 02:23:11,120
गीता है उसका जो दूसरा अध्याय है उसके 17 श्लोक से

1906
02:23:11,120 --> 02:23:15,200
लेकर 31 श्लोक तक भगवान ने यह समझाया है कि ना

1907
02:23:15,200 --> 02:23:19,360
कोई मरता है ना कोई मारता है जो ऐसा सम मूर्ख

1908
02:23:19,360 --> 02:23:22,000
है

1909
02:23:22,000 --> 02:23:26,120
सम हा तो वास्तविक सत्ता क्या

1910
02:23:26,120 --> 02:23:30,200
है ये तो अविद्या है ना आर समाज के अनुसार बताऊ आपको कहां

1911
02:23:30,200 --> 02:23:34,320
लिखा है यह तो अविद्या है जिसको आप जीना मरना समझ रहे हो

1912
02:23:34,320 --> 02:23:38,440
यह तो अविद्या है और बोलो आर

1913
02:23:38,440 --> 02:23:42,560
समाज के अनुसार बता देता हूं

1914
02:23:42,560 --> 02:23:46,680
वास्तविक तो ईश्वर की नजर में य सब क्या है किसी का मरना जीना

1915
02:23:46,680 --> 02:23:52,680
क्या है क्या है ईश्वर की नजर में बताइए आप

1916
02:23:52,760 --> 02:23:58,760
ईश्वर की नजर में यह सब नथिंग है कुछ

1917
02:24:01,280 --> 02:24:03,600
नहीं

1918
02:24:03,600 --> 02:24:07,880
और यह जो दृष्टि हमें प्राप्त है अविद्या युक्त दृष्टि जिसमें

1919
02:24:07,880 --> 02:24:11,960
हमें किसी के मरने जीने से फर्क पड़ रहा है इसी दृष्टि से

1920
02:24:11,960 --> 02:24:15,960
मुक्त हो जाना ही मुक्ति है इसी दृष्टि से

1921
02:24:15,960 --> 02:24:20,640
मुक्त हो जाना ही मोक्ष है तो जब हमें जब

1922
02:24:20,640 --> 02:24:25,040
जब हमारा मुक्ति के विषय में मुक्ति की स्थिति में

1923
02:24:25,040 --> 02:24:27,520
जब हमारा

1924
02:24:27,520 --> 02:24:31,560
यह मुक्ति की स्थिति में जब हमें किसी के मरने

1925
02:24:31,560 --> 02:24:35,800
जीने से फर्क नहीं पड़ रहा है तो हम यह क्यों सो सोच रहे हैं कि ईश्वर

1926
02:24:35,800 --> 02:24:40,840
वही है जिसको किसी की हत्या होगी तो उसको अच्छा लगे या बुरा

1927
02:24:40,840 --> 02:24:45,000
लगे ईश्वर का निर्धारण इस बात पर भी नहीं कर सकते आप कि

1928
02:24:45,000 --> 02:24:49,040
नहीं ईश्वर वही है जो अच्छाई है जिसके अंदर से अच्छाई है ईश्वर

1929
02:24:49,040 --> 02:24:53,360
सर्व शक्ति है ईश्वर ने सब कुछ बनाया है ईश्वर ने वो विचार

1930
02:24:53,360 --> 02:24:53,860
भी

1931
02:24:53,520 --> 02:24:57,800
बनाया है जो विचार ये कह रहा है कि इसकी बलि दो पहली बात अब दूसरी

1932
02:24:57,800 --> 02:25:02,120
बात आ जाती हैय एक पॉइंट हो गया बलि के संबंध

1933
02:25:02,120 --> 02:25:06,480
में अब दूसरा आ जाता है एक जगह आपके भाष्य

1934
02:25:06,480 --> 02:25:10,840
में लिखा है कहीं पर कि फलानी फलानी स्थिति में गाय को मार

1935
02:25:10,840 --> 02:25:15,360
दो वो दिखा दीजिए जरा गाय वाला

1936
02:25:15,360 --> 02:25:19,640
प्रकरण दिखाओ हम भी तो दे हम भी चेक करेंगे

1937
02:25:19,640 --> 02:25:25,640
दिखाओ मारने वाला प्रकरण

1938
02:25:47,240 --> 02:25:51,680
दिखाओ व गाय को मारने वाला प्रकरण दिखा

1939
02:25:51,680 --> 02:25:57,680
जरा आर्य समाज के भाष्य में आ जा

1940
02:26:02,010 --> 02:26:08,010
[संगीत]

1941
02:26:25,360 --> 02:26:29,840
हेलो मैं आपसे बड़े भाई एक बात कहना चाहता हूं

1942
02:26:29,840 --> 02:26:33,880
सुनिए सुनिए सुनिए आपको मैं दिखा दू एक

1943
02:26:33,880 --> 02:26:38,440
जगह पर सुनिए जो

1944
02:26:38,440 --> 02:26:42,520
बलि है पहली बात जो बलि का प्रावधान है सनातन वैदिक

1945
02:26:42,520 --> 02:26:47,240
वांगम में जो परंपरा प्राप्त गुरु के द्वारा स्वीकार किया जाता है

1946
02:26:47,240 --> 02:26:51,720
वो मासा हार के संकुचन में है उसका परवन

1947
02:26:51,720 --> 02:26:56,480
सर के प्रोत्साहन में नहीं संकोचन और प्रोत्साहन का अर्थ

1948
02:26:56,480 --> 02:27:00,480
समझिए जैसे कि कहीं पर निर्विवाद रूप से कोई कार्य हो

1949
02:27:00,480 --> 02:27:04,680
रहा है ठीक है और वोह ऐसा कार्य है

1950
02:27:04,680 --> 02:27:08,760
कि उसको डायरेक्ट हम लोग मना करके उसको खत्म नहीं कर सकते

1951
02:27:08,760 --> 02:27:13,400
हैं सीधे तो वहां पर एक नियम लागू कर दिया गया

1952
02:27:13,400 --> 02:27:17,760
जैसे कि मान लीजिए अभी आप और हम भी आजकल

1953
02:27:17,760 --> 02:27:22,240
समय पड़ने पर दवाइया यूज करते हैं कई बार

1954
02:27:22,240 --> 02:27:26,320
दवाइयों में हा इसको बड़ा करिए जरा जहा मारने

1955
02:27:26,320 --> 02:27:32,320
की बात हो रही

1956
02:27:35,160 --> 02:27:41,160
है लाइट कर सकते हैं क्या थोड़ा बड़ा करके

1957
02:27:52,080 --> 02:27:58,080
कहां पर है

1958
02:28:00,000 --> 02:28:04,120
इसमें हां यह लिखा है जहां एरो है इस

1959
02:28:04,120 --> 02:28:10,120
समय वहां देखिए वहां पर लिखा हुआ है

1960
02:28:11,560 --> 02:28:17,560
कि वन में रहने वाले गौ

1961
02:28:17,880 --> 02:28:22,640
से फलाना फलाना होता है और

1962
02:28:22,640 --> 02:28:26,760
उसको मार देना चाहिए और यह कहां पर लिखा है कौन से ग्रंथ

1963
02:28:26,760 --> 02:28:31,400
का नाम

1964
02:28:31,400 --> 02:28:37,400
है कौन सा ग्रंथ है

1965
02:28:39,080 --> 02:28:43,480
ये ये महर्षि दयानंद कृत भाष्य है

1966
02:28:43,480 --> 02:28:47,600
और इसकी डिटेल भी हम डाल दंग नीचे ठीक है

1967
02:28:47,600 --> 02:28:52,040
ये कौन सा कौन सा ग्रंथ है बड़े भाई जी

1968
02:28:52,040 --> 02:28:56,080
आप आप ऐसा करिए ग्रंथ का नाम लिख दीजिए अलग से इसमें स्पष्ट दिखाई नहीं देगा

1969
02:28:56,080 --> 02:29:00,400
अलग से यहां लिख दीजिए पट्टी लगा दीजिए कौन सा ग्रंथ

1970
02:29:00,400 --> 02:29:05,360
मंत्र मंडल अध्याय सूक्त य सब लिख दीजिए

1971
02:29:05,360 --> 02:29:09,720
तो अब बात य आती है कि जैसे एक डॉक्टर होता है

1972
02:29:09,720 --> 02:29:13,960
ना एक डॉक्टर होता है वो भी मास

1973
02:29:13,960 --> 02:29:18,560
को काटता है ऑपरेशन के टाइम पर काटता है

1974
02:29:18,560 --> 02:29:22,800
मगर उसके प्रयोजन को अगर हटा लो पीछे से तो उसमें और

1975
02:29:22,800 --> 02:29:26,960
एक हत्या करने वाले में मास को काटने वाले में अगर कोई आपके

1976
02:29:26,960 --> 02:29:31,520
द्वेष वश एक कांटा भी चुबे वो भी हिंसा है

1977
02:29:31,520 --> 02:29:35,560
मगर वहीं पर डॉक्टर यदि आपका इलाज करने के लिए आपका मास काटे वो

1978
02:29:35,560 --> 02:29:39,640
भी हिंसा नहीं है इसी प्रकार

1979
02:29:39,640 --> 02:29:43,640
से जो अमुक अमुक स्थितियों से निकलने के लिए

1980
02:29:43,640 --> 02:29:47,880
बचने के लिए अमुक अमुक चीजें हुई है अमुक

1981
02:29:47,880 --> 02:29:51,920
अमुक स्थितियों से निकलने के लिए अमुक अमुक विधियों का आलंबन लेते

1982
02:29:51,920 --> 02:29:54,600
हुए जहां जहां पर गौ

1983
02:29:54,600 --> 02:29:58,720
मास जो मास है मा बली इत्यादि का वो किया गया

1984
02:29:58,720 --> 02:30:03,440
है वो केवल उसके उसका परवन जो है मांसाहार

1985
02:30:03,440 --> 02:30:07,720
के संकुचन में है अगर ऐसा होता कि बलि को स्वीकार

1986
02:30:07,720 --> 02:30:11,960
करते तो आप बलि को बलि का प्रोत्साहन करते तो आप यह बताइए

1987
02:30:11,960 --> 02:30:16,080
करपात्री जी के ऊपर अभी आलम वो लगाया जाता है आक्षेप शंकरा

1988
02:30:16,080 --> 02:30:22,080
उन्होंने कितनी बार बलि दी और कितनी बार मास खाया

1989
02:30:22,120 --> 02:30:26,120
इसमें ऐसा है इसमें ऐसा होता है कि आवश्यकता

1990
02:30:26,120 --> 02:30:30,280
पड़ने पर जब आपकी स्थिति ऐसी है कि मास से ही काम

1991
02:30:30,280 --> 02:30:34,280
चलना है तब उस काम के लिए आपको विधि दी

1992
02:30:34,280 --> 02:30:38,280
गई कि ऐसे ही खाना ऐसे नहीं खाया तो

1993
02:30:38,280 --> 02:30:42,840
आपके लिए और पाप हो जाएगा खाना तो ऐसे ही खाना

1994
02:30:42,840 --> 02:30:47,600
उस विधि के कारण आप निर्विवाद रूप से जब उसका सेवन नहीं करेंगे

1995
02:30:47,600 --> 02:30:51,760
तो आप अनुशासित रहेंगे और से आपके मन

1996
02:30:51,760 --> 02:30:56,640
में उसके प्रति उससे प्रथक होने की भावना उत्पन्न होगी जैसे

1997
02:30:56,640 --> 02:31:00,680
एक डॉक्टर के पास दो लोग जाते हैं एक

1998
02:31:00,680 --> 02:31:04,880
सिगरेट बहुत पीता है बेत सिगरेट पीता है

1999
02:31:04,880 --> 02:31:09,520
और एक सिगरेट पीता है सिर्फ दो तो

2000
02:31:09,520 --> 02:31:10,120
यजुर्वेद

2001
02:31:10,120 --> 02:31:14,240
13 अध्याय और उवा मंत्र देख लीजिएगा हा

2002
02:31:14,240 --> 02:31:18,880
मेरे पास हा तो जैसे

2003
02:31:18,880 --> 02:31:23,120
दो लोग अगर उसके के पास गए डॉक्टर के पास तो एक को डॉक्टर

2004
02:31:23,120 --> 02:31:27,320
ने कहा कि आज से तुम केवल आज से तुम सिगरेट नहीं पियोगे जिसने

2005
02:31:27,320 --> 02:31:32,200
दो जिसने जिसने जो दो सिगरेट पीता था और जो

2006
02:31:32,200 --> 02:31:36,800
बिना किसी सीमा के सिगरेट पीता था उसको डॉक्टर ने कहा कि

2007
02:31:36,800 --> 02:31:41,600
आज से आप केवल आठ सिगरेट पिएंगे केवल आठ

2008
02:31:41,600 --> 02:31:46,080
तो क्या हुआ जो 50 पी रहा था उसको आठ के रूप में उन्होंने

2009
02:31:46,080 --> 02:31:50,840
संकुचित कर दिया तो उसका परवन अंत

2010
02:31:50,840 --> 02:31:54,880
उससे पतक होने में आ आज कहा गया अगली बार

2011
02:31:54,880 --> 02:31:58,880
डॉक्टर के पास फिर जाएगा अब तुम छह पिया करो ये क्या हो रहा है उसकी

2012
02:31:58,880 --> 02:32:02,960
जो असीमित जो सीमित सीमा रहित था उसका सिगरेट

2013
02:32:02,960 --> 02:32:07,160
का सेवन उसको उन्होंने मर्यादित किया इसी भाव को यहां

2014
02:32:07,160 --> 02:32:11,880
पर वेदों में जहां जहां पर बली को स्वीकार किया गया है परंपरा प्रात आचार्य के द्वारा

2015
02:32:11,880 --> 02:32:16,000
यही भाव है वहा पर परि संख्या विधि आज के टाइम में

2016
02:32:16,000 --> 02:32:20,120
आर समाज को मानने वाले कई लोग जब दवाई लेने जाते

2017
02:32:20,120 --> 02:32:24,120
हैं ना मेडिकल स्टोर प तो उनका उसमें कई कई दवाइया ऐसी होती है जिसमें

2018
02:32:24,120 --> 02:32:25,440
की पशुओं

2019
02:32:25,440 --> 02:32:30,080
का उपयोग किया होता है मगर मगर वहां प वो

2020
02:32:30,080 --> 02:32:34,200
वहां प उस तरह से उसको ग्रहण करना अ विधि पूर्वक है

2021
02:32:34,200 --> 02:32:38,480
ऐसी स्थितियों से बचने के लिए ही विधि दी गई

2022
02:32:38,480 --> 02:32:42,560
है ऐसी स्थितियों से बचने के लिए ही विधि दी गई

2023
02:32:42,560 --> 02:32:47,120
है ये करपात्री जी ने गौ माता पर एक पूरा

2024
02:32:47,120 --> 02:32:51,240
ग्रंथ लिखा है गाय एक समग्र चिंतन और आप लोग कह रहे

2025
02:32:51,240 --> 02:32:55,600
हैं कि वो ग के वो थे पक्षधर है नरी

2026
02:32:55,600 --> 02:32:59,640
बात सुनो एक मिनट मेरी बात सुनलो अप बात मैं अपनी

2027
02:32:59,640 --> 02:33:03,640
पूरी बात कर लू तो पहली बात हमने ये जानी ईश्वर के होने

2028
02:33:03,640 --> 02:33:07,760
का अर्थ ये नहीं है कि कोई मरेगा नहीं दूसरी बात हमने यह जानी

2029
02:33:07,760 --> 02:33:11,760
कि ईश्वर ने हमको ही यह शिक्षा दी है कि आपको इस

2030
02:33:11,760 --> 02:33:15,760
मरने जीने की दृष्टि से मुक्त होने वाली दृष्टि को प्राप्त करना है जिसे हम

2031
02:33:15,760 --> 02:33:19,760
मोक्ष कहते हैं तीसरी बात यह है कि

2032
02:33:19,760 --> 02:33:23,800
द्वेष वस किसी को कांटा चुप देने पर भी वो हिंसा कहलाए गी

2033
02:33:23,800 --> 02:33:27,800
मगर अगर हित के लिए वो कार्य किया जा रहा है तो वहां पर

2034
02:33:27,800 --> 02:33:32,160
वो हिंसा नहीं कहलाए गी जैसे डॉक्टर जब किसी का ऑपरेशन करते टाइम मास्क काटता है

2035
02:33:32,160 --> 02:33:36,200
तो वो हिंसा में नहीं आता वो कार अभी मैं अगर चाकू से आपका मास

2036
02:33:36,200 --> 02:33:40,640
काटू तो आप वो हिंसा होगी ठीक है अब इसके बाद

2037
02:33:40,640 --> 02:33:45,160
फाइनल बात ये है कि अमुक अमुक स्थितियों में आपके ग्रंथों में भी

2038
02:33:45,160 --> 02:33:49,240
जीव हत्या का वो है निर्देश जीव

2039
02:33:49,240 --> 02:33:53,480
हत्या का तो हम हमें इससे कोई आपत्ति नहीं क्योंकि वो स्थिति

2040
02:33:53,480 --> 02:33:57,480
वश है इसी प्रकार की स्थितियों से निपटने के लिए विधियां दी

2041
02:33:57,480 --> 02:34:01,840
गई है उन विधियों का जो परवन है वो मास

2042
02:34:01,840 --> 02:34:06,120
के प्रोत्साहन में नहीं बल्कि उसके संकुचन में

2043
02:34:06,120 --> 02:34:11,120
है जैसे कि मान के चलिए आजकल आपने

2044
02:34:11,120 --> 02:34:16,000
हलाल सर्टिफाइड का नाम सुना है हां

2045
02:34:16,000 --> 02:34:20,800
सुनाला सुना उसमें क्या कर रहे हैं लोग

2046
02:34:20,800 --> 02:34:25,160
कि ज्यादातर आज के टाइम में यदि कोई हिंदू

2047
02:34:25,160 --> 02:34:29,400
खा रहा है मास हम तो नहीं खाते मगर यदि कोई हिंदू

2048
02:34:29,400 --> 02:34:33,640
मास खा रहा है आज के टाइम में तो वह ज्यादातर अगर

2049
02:34:33,640 --> 02:34:38,040
उत्तर भारत की बात करें तो ज्यादातर उन दुकानों से ले रहा है जहां पर हलाल करके मास

2050
02:34:38,040 --> 02:34:42,160
को काटा गया हो ठीक है ठीक

2051
02:34:42,160 --> 02:34:46,200
अब क्या हो रहा है कि जब आप किसी किसी मुस्लिम से मास

2052
02:34:46,200 --> 02:34:50,200
खरीदते तो उसम एक वो लगाई जा रही है कि वहां से वहा जो आपसे

2053
02:34:50,200 --> 02:34:54,720
जो अर्थ ग्रहण किया जा रहा है उस अर्थ का

2054
02:34:54,720 --> 02:34:55,720
नियोजन कहां होता

2055
02:34:55,720 --> 02:34:59,880
है जब कोई जब कोई मुस्लिम आपसे पैसे कमा रहा है एक तरीके से

2056
02:34:59,880 --> 02:35:04,280
तो पहली बात तो आपने जब उसने हलाल करके काटा तो अप्रत्यक्ष रूप से

2057
02:35:04,280 --> 02:35:08,400
आपने उसकी उस बात को स्वीकार कर लिया कि नहीं नहीं है कोई और

2058
02:35:08,400 --> 02:35:12,600
पूजनीय सिवाय अल्लाह के कर लिया ना अल्ला हा क्योंकि

2059
02:35:12,600 --> 02:35:16,600
आपने उस मास को सही मान लिया कि मैं खा सकता हूं सड़क में

2060
02:35:16,600 --> 02:35:19,880
पड़ा हुआ मास तो आप नहीं खा सकते

2061
02:35:19,880 --> 02:35:23,960
आप कलमा पढ़ के काटते है ना मैं मा कुछ नहीं खाता नहीं नहीं

2062
02:35:23,960 --> 02:35:28,040
आप नहीं जो हिंदू मास खाते हैं वो हिंदू मास लेने जाते

2063
02:35:28,040 --> 02:35:32,160
हैं कहां मुस्लिम मुस्लिमों की दुकान

2064
02:35:32,160 --> 02:35:36,160
अब मैं मैं एक शाकाहारी व्यक्ति हूं मैंने मास कभी नहीं खाया ना ही

2065
02:35:36,160 --> 02:35:40,480
मैं मास को प्रोत्साहन देता हूं मगर मैं मन में एक आईडिया सोचू

2066
02:35:40,480 --> 02:35:44,560
कि भाई हमारे हिंदू भाई जो मास खा रहे हैं अभी

2067
02:35:44,560 --> 02:35:48,840
मास को छोड़ने की स्थिति में नहीं है वो मास खरीदने जाते हैं मुसलमानों

2068
02:35:48,840 --> 02:35:53,600
के पास और हमारी जानकारी में एक हिंदू ऐसा है

2069
02:35:53,600 --> 02:35:57,680
जो रहता छत्तीसगढ़ में है मगर वह मास बेचता है तो

2070
02:35:57,680 --> 02:36:02,480
मैंने क्या किया कि तू एक काम कर भाई तू अपनी दुकान यहां खोल ले

2071
02:36:02,480 --> 02:36:06,640
जिससे कि यहां के जो हिंदू जो मास खाते हैं वह मास लेने वहां ना जाए

2072
02:36:06,640 --> 02:36:10,960
तेरी दुकान से ले तो यह करके क्या मैंने मास

2073
02:36:10,960 --> 02:36:16,240
का प्रोत्साहन किया या फिर मैं एक समस्या से लड़ा

2074
02:36:16,240 --> 02:36:20,560
बताइए समस्या से लड़ना हो गया य हां

2075
02:36:20,560 --> 02:36:24,600
इसी प्रकार से वेदों में जहां जहां पर यह दी गई है बलि

2076
02:36:24,600 --> 02:36:28,920
व्यवस्था वो समस्या से लड़ने के निमित्त है मास का कहीं भी प्रोत्साहन

2077
02:36:28,920 --> 02:36:33,000
नहीं है जिसको परंपरा प्राप्त परंपरा प्राप्त

2078
02:36:33,000 --> 02:36:37,080
आचार्य ने स्वीकार किया है कहीं भी अगर

2079
02:36:37,080 --> 02:36:41,200
ऐसा होता तो हमारे मंदिरों में आदि शंकराचार्य जी गोवर्धन मठ

2080
02:36:41,200 --> 02:36:45,440
में कहां पर बलि दी जाती है बताइए गोवर्धन मठ में हमारे

2081
02:36:45,440 --> 02:36:49,760
आचार्य गण तो सन 66 में

2082
02:36:49,760 --> 02:36:53,920
गाय माता के लिए आंदोलन कर रहे हैं उनको चोट लग गई उसके कारण वो जेल गए

2083
02:36:53,920 --> 02:36:58,200
जेल की उस जेल में लगी हुई चोट के साथ ही उन्होंने अपनी देह का त्याग किया

2084
02:36:58,200 --> 02:37:02,320
और उन पर आराम से आकर के खंडन करने के चक्कर में आराम से आकर

2085
02:37:02,320 --> 02:37:06,800
के वीडियो बन जाता है कपात जी तो बलि के समर्थक के समर्थक थे गौ माता की

2086
02:37:06,800 --> 02:37:11,120
बली के समर्थक नहीं है समस्या से लड़ने के निमित्त अमुक अमुक स्थितियों

2087
02:37:11,120 --> 02:37:15,240
में अमुक अमुक विधियों का आलंबन लेने के रूप में बलि व्यवस्था

2088
02:37:15,240 --> 02:37:19,960
है और इन सब का परवन अंत गत्वा प्रवृत्ति से निवृत्ति

2089
02:37:19,960 --> 02:37:24,280
और निवृत्ति से निर्वत में कि आप अपनी उस चीज से दूर हो पाओ

2090
02:37:24,280 --> 02:37:26,120
अगर आपको खुला छोड़ दिया

2091
02:37:26,120 --> 02:37:30,160
जाएगा तो आप उसी मेंही उलझे रहोगे अगर

2092
02:37:30,160 --> 02:37:34,800
आपको खुला छोड़ दिया जाए जैसे विवाह इत्यादि

2093
02:37:34,800 --> 02:37:38,800
में जो संबंध बनाए संबंध होता है संभोग इत्यादि के

2094
02:37:38,800 --> 02:37:41,270
विषय

2095
02:37:41,270 --> 02:37:45,720
[संगीत] में संभोग इत्यादि के विषय में अगर

2096
02:37:45,720 --> 02:37:49,880
विवाह की सीमा नहीं डाली जाएगी तो क्या होगा व्यक्ति निर् रूप

2097
02:37:49,880 --> 02:37:54,160
से कहीं भी संबंध बनाता रहेगा तो कभी निकल पाएगा संबंध बनाने से

2098
02:37:54,160 --> 02:37:58,480
नहीं निकल पाएगा क्योंकि उसके गर्भ से वही निकलता जाएगा

2099
02:37:58,480 --> 02:38:02,560
और और और तो इसलिए विवाह की एक विवाह की

2100
02:38:02,560 --> 02:38:06,760
सीमा मर्यादा कि विवाह में रहकर व्यक्ति सीमित हो जाए फिर धीरे धीरे

2101
02:38:06,760 --> 02:38:10,920
धीरे धीरे उसके जीवन में वैराग्य आए प्रवृत्ति मार्ग का आलंबन

2102
02:38:10,920 --> 02:38:15,000
लेते हुए निवृत्ति उसी प्रकार से

2103
02:38:15,000 --> 02:38:19,680
है तो इसको भी सामर्थ वान गुरुओं से समझने

2104
02:38:19,680 --> 02:38:23,880
वो है अगर सामर्थ्य वान गुरुओं के पास जाकर के हम समझने का प्रयास

2105
02:38:23,880 --> 02:38:28,160
करें सकारात्मक बुद्धि के साथ तो ऐसा नहीं है सब चीजों का निवारण

2106
02:38:28,160 --> 02:38:32,480
है सारे प्रश्नों का उत्तर है मगर होता क्या है व्यक्ति सामर्थ

2107
02:38:32,480 --> 02:38:36,640
वान गुरुओं के पास जाता नहीं है और दूर ही दूर से जो उनके बारे में कु

2108
02:38:36,640 --> 02:38:40,840
प्रचार किया जा रहा है उस कु प्रचार को आधार मान कर के अपनी

2109
02:38:40,840 --> 02:38:41,340
अपने

2110
02:38:41,120 --> 02:38:45,120
सिस्टम बना लेता है बना लो कोई बात नहीं मगर स्वयं

2111
02:38:45,120 --> 02:38:50,480
को वैदिक मत कहो क्योंकि वेदों को मानोगे तो परंपरा को मानना होगा

2112
02:38:50,480 --> 02:38:54,480
और अगर परंपरा को नहीं मानते तो वेदों को नहीं मानने वाला बनना होगा

2113
02:38:54,480 --> 02:39:00,240
जी मेरी बात मेरी बात सुनोगे बड़े

2114
02:39:00,240 --> 02:39:04,280
भाई मैं ये कह रहा हूं सुनो पहली बात तो

2115
02:39:04,280 --> 02:39:08,320
मैं आर्य समाज को फॉलो करता हूं क्योंकि

2116
02:39:08,320 --> 02:39:12,320
मुझे कुछ बातें आर्य समाज की बहुत अच्छी लगती है

2117
02:39:12,320 --> 02:39:16,560
और जतर अच्छी बातें लगती है मेरे को और

2118
02:39:16,560 --> 02:39:20,640
मैं रियल बताऊ मैं ये चाहता हूं देखिए

2119
02:39:20,640 --> 02:39:24,880
यहां बात ये नहीं हो रही आप किसको फॉलो करते किसको नहीं बात ये हो रही है

2120
02:39:24,880 --> 02:39:28,920
अगर आप परंपरा का खंडन करेंगे तो आप वैदिक सिद्ध नहीं होते आप आर समाज को

2121
02:39:28,920 --> 02:39:33,080
मानिए स्वयं को वैदिक मत कहिए कहिए सीना चौड़ा करके कि मैं वैदिक

2122
02:39:33,080 --> 02:39:37,120
नहीं हूं आप आप जो है ईश्वर को बाधित करिए आप निराकार

2123
02:39:37,120 --> 02:39:41,840
ईश्वर की पूजा करिए कोई दिक्कत नहीं है मगर फिर ईश्वर को अनंत सामर्थ्य वान मत कहिए

2124
02:39:41,840 --> 02:39:46,280
आप सु पहले आप सुनोगे पहले

2125
02:39:46,280 --> 02:39:50,320
जी मैं ये कह रहा हूं जैसे आप वेदों के बारे में

2126
02:39:50,320 --> 02:39:54,560
चर्चा कर रहे हो मैं वेदों का विद्वान तो नहीं हूं पर मैं यह चाहता हूं कि आप

2127
02:39:54,560 --> 02:39:56,360
मैं किसी विद्वान से आपकी

2128
02:39:56,360 --> 02:40:00,600
चर्चा कराना चाहता हूं चलो डिबेट नहीं करोगे चर्चा करोगे फिर क्यों

2129
02:40:00,600 --> 02:40:04,680
नहीं करेंगे मैंने तो कितनी बार कहा है जो आना चाहे आ सकता

2130
02:40:04,680 --> 02:40:08,800
है जैसे आपकी वीडियो देखी जैसे आप आर समाज

2131
02:40:08,800 --> 02:40:13,120
के उन में जाते हो मंदिरो में काफी मंदर में आपने वीडियो

2132
02:40:13,120 --> 02:40:17,920
काफी देखता हूं फलो आपको भी कर रहा हूं कर रखा मोबाइल पर तो

2133
02:40:17,920 --> 02:40:21,960
मैंने देखा है उनको सही तरह से जानकारी नहीं है

2134
02:40:21,960 --> 02:40:26,160
आप सही वालों को ले आइए जैसे मैं जानता हूं जैसे अंकुर

2135
02:40:26,160 --> 02:40:30,440
आर जी अंकुर आर जी गौतम खट्टर जी है और राहुल आर्या

2136
02:40:30,440 --> 02:40:34,880
जी मैं इन सबको जानता आप उनको ले आइए हा

2137
02:40:34,880 --> 02:40:38,960
मैं सुनो मैं खुद चाहता हूं कि एक बार दूध का दूध पानी का पानी

2138
02:40:38,960 --> 02:40:42,960
हो जाए जो सही हो वो सही हो बिल्कुल बिल्कुल ले आइए आप

2139
02:40:42,960 --> 02:40:47,160
ठीक है और क्या चलिए आने के लिए आभार और

2140
02:40:47,160 --> 02:40:51,520
सकारात्मक रवैया दिखाने के लिए अच्छा लगा आप लाइए उनसे चर्चा

2141
02:40:51,520 --> 02:40:56,480
करेंगे ला मेरी एक बात सुनो आप जी आप एक बात सुन

2142
02:40:56,480 --> 02:41:00,720
मैं आपकी जो जो आपने वो दिखाया था ना ग

2143
02:41:00,720 --> 02:41:04,920
के बारे में बताया था जो करपात्री महाराज की बुक है जो उसका नाम क्या

2144
02:41:04,920 --> 02:41:09,040
आपने बताया गाय एक

2145
02:41:09,040 --> 02:41:12,320
समग्र एक बार और दिखा दीजिए

2146
02:41:12,320 --> 02:41:17,720
उसको मगाऊ ना कहा मिलेगी

2147
02:41:17,720 --> 02:41:21,960
वैसे अगर मिले तो पीडीएफ तो मिल

2148
02:41:21,960 --> 02:41:26,120
जाएगी नेट पर तो होगा पीडीएफ

2149
02:41:26,120 --> 02:41:32,120
हा नेट प है चलो मैं लोड कर लूंगा

2150
02:41:38,200 --> 02:41:42,440
उ गाय एक समग्र चिंतन स्वामी करपाती

2151
02:41:42,440 --> 02:41:46,600
जी महाराज चलो मंगाऊ मैं उस पुस्तक को

2152
02:41:46,600 --> 02:41:50,760
मंगाइए पढ़िए और हो सके तो पाच ग्रंथ भी पढ़िए

2153
02:41:50,760 --> 02:41:54,760
मन से पढ़िए विरोधाभासी बनकर ना पढ़े आपको बहुत सारे प्रश्नों

2154
02:41:54,760 --> 02:41:59,320
के उत्तर मिलेंगे बड़े भाई सुनो

2155
02:41:59,320 --> 02:42:03,320
मैंने स्टार्टिंग में गोरखपुर की गीता जी पढ़ी थी और मेरे पास

2156
02:42:03,320 --> 02:42:06,480
भगवत पुराण भी है

2157
02:42:06,480 --> 02:42:11,080
और आप मेरी बात समझिए एक सीमा होती है

2158
02:42:11,080 --> 02:42:15,080
परंपरा प्राप्त गुरुओं के जो सिद्धांत है ना उनकी सीमा में

2159
02:42:15,080 --> 02:42:20,080
जब हम स्वा अध्ययन करते हैं तब हमें समझ में आता है अगर हमारे

2160
02:42:20,080 --> 02:42:24,920
गुरु नहीं है सुनिए तो हम स्वाध्य जो करेंगे उससे हमारी मति भ्रष्ट होगी

2161
02:42:24,920 --> 02:42:27,480
ये भी शास्त्र में ही लिखा है बड़े

2162
02:42:27,480 --> 02:42:31,560
भाई जी मेरे सवालों का जवाब नहीं मिला था नहीं मिलेगा

2163
02:42:31,560 --> 02:42:35,720
आप सामर्थ मान गुरुओं के पास जाइए तब मिलेगा आप

2164
02:42:35,720 --> 02:42:39,840
ये कहते हो कि सामर्थ वान गुरुओं के पास जाओ वो केवल ब्राह्मण को ही शिक्षा देते

2165
02:42:39,840 --> 02:42:44,080
हैं और किसी को देते ही नहीं है कहां कहां लिखा है बताइए

2166
02:42:44,080 --> 02:42:48,160
कहां खा भाई जी लिखा नहीं है मैं खुद बृंदावन गया हूं

2167
02:42:48,160 --> 02:42:52,240
वो खुद लेते ही नहीं है साहब अभी अभी अभी चातुर्मास लगा है

2168
02:42:52,240 --> 02:42:56,280
अभी जो गुरुदेव शिविर चल रहे हैं लोगों के प्रश्नों के उत्तर देते हैं

2169
02:42:56,280 --> 02:43:01,000
जब वहां माइक लेकर खड़ा होता है व्यक्ति तो उससे जात जात उसकी पूछी जाती है क्या

2170
02:43:01,000 --> 02:43:05,000
किस जात के हो आप अनिरुद्धाचार्य जी के उसम गए थे एक

2171
02:43:05,000 --> 02:43:09,120
मिनट आप अनिरुद्धाचार्य जी की सभा में गए थे

2172
02:43:09,120 --> 02:43:13,320
तो उन्होंने कौन सा बड़े भाई सवालों का जवाब दे दिया मैं नहीं नहीं नहीं

2173
02:43:13,320 --> 02:43:17,880
मैं आपसे पूछ रहा हूं गए थे कि नहीं गए थे हां गया था मैं

2174
02:43:17,880 --> 02:43:22,160
गए थे क्या क्या उन्होंने आपसे अपनी जात आपकी जात पूछी थी

2175
02:43:22,160 --> 02:43:26,320
क्या जात नहीं पूछी तो उन्होंने सवालों का जवाब कौन सा दे दिया बड़े भाई जी

2176
02:43:26,320 --> 02:43:31,200
सवाल का जवाब यह कहते हुए नहीं दिया था कि तुम ब्राह्मण नहीं हो हम तुम्हें उत्तर नहीं

2177
02:43:31,200 --> 02:43:35,200
देंगे उन्होंने कैसे भी नहीं दिया था अभी आप अभी आप यहां पर

2178
02:43:35,200 --> 02:43:39,720
आए हैं मैंने आपसे कहा कि मैं आपको जवाब नहीं

2179
02:43:39,720 --> 02:43:42,520
दूंगा आपने तो नहीं कहा ना मन गंत

2180
02:43:42,520 --> 02:43:46,600
बात है कि वो केवल ब्राह्मणों को ही शि ये तो ये क्या है ना ये द्वेष है फिर

2181
02:43:46,600 --> 02:43:51,640
अभी तक मुझे लग रहा था आपके अंदर द्वेष नहीं है ये

2182
02:43:51,640 --> 02:43:55,640
साबित करिए पुरी शंकराचार्य जी का एक वीडियो दिखाइए जहां

2183
02:43:55,640 --> 02:43:59,800
पर उन्होंने जात को पूछकर उत्तर दिया या ना दिया हो मना कर दिया होगा तुम

2184
02:43:59,800 --> 02:44:03,880
जात हो तुम्ह उत्तर नहीं मिलेगा मैं शंकराचार्य जी की बात नहीं कर रहा हूं

2185
02:44:03,880 --> 02:44:08,120
बड़े भाई जी परंपरा प्रात आचार कौन है परंपरा

2186
02:44:08,120 --> 02:44:12,600
प्राप्त आचार्य कौन है जैसे वृंदावन

2187
02:44:12,600 --> 02:44:15,840
में गुरुकुल खुल रख परंपरा

2188
02:44:15,840 --> 02:44:19,920
परंपरा देखिए वृंदावन में ऐसे ऐसे लोग हैं जो

2189
02:44:19,920 --> 02:44:25,080
वैष्णव टीका पैरों में लगा रहे हैं फिर क्या करेंगे

2190
02:44:25,080 --> 02:44:29,080
वृंदावन में ऐसे वृंदावन में तो स्कन वाले भी है विदेशों से आ

2191
02:44:29,080 --> 02:44:33,200
रहे गुरु हमारे इंपोर्ट हो रहे हैं वहां से गुरु वि

2192
02:44:33,200 --> 02:44:37,320
फिर क्या करेंगे मैं सुनो देखो बड़े भाई मेरे बच्चे हैं तो ठीक

2193
02:44:37,320 --> 02:44:41,560
है मैं उनके एडमिशन के लिए पूछने गया वृंदावन में तो उन्होने क्लियर

2194
02:44:41,560 --> 02:44:44,240
मना कर

2195
02:44:44,240 --> 02:44:48,240
दिया देखिए दो चीज है अब य पर विषयात हो रहा है हम लोग

2196
02:44:48,240 --> 02:44:52,440
फिर बात करेंगे आप उसको लेके आइए हां कर लेना एडमिशन बात अलग होती

2197
02:44:52,440 --> 02:44:56,440
है शिक्षा बात अलग होती है एडमिशन में व से

2198
02:44:56,440 --> 02:44:58,360
निकलती है

2199
02:44:58,360 --> 02:45:02,440
नहीं ऐसा नहीं है ऐसा नहीं है आप आपका वर्ण क्या है वैसे

2200
02:45:02,440 --> 02:45:06,480
जन्म से जन्म से हम तो

2201
02:45:06,480 --> 02:45:10,480
प्रजापत क्या है प्रजापति

2202
02:45:10,480 --> 02:45:15,440
हां मतलब प्रजापति अर्थात कुमार है कुमार

2203
02:45:15,440 --> 02:45:19,600
हां अच्छा हां जी ठीक है तो

2204
02:45:19,600 --> 02:45:23,760
आप अब आपसे फिर किसी दिन होगी चर्चा और

2205
02:45:23,760 --> 02:45:27,960
आप अपने प्रश्न कहीं पर भी जाकर पूछिए आपको पूरा प्रश्न का उत्तर

2206
02:45:27,960 --> 02:45:32,160
देने का प्रयास किया जाएगा हमने आपसे आपका वर्ण नहीं देखा आप

2207
02:45:32,160 --> 02:45:36,200
पूरी शंकराचार्य जी की सभा में जाएंगे आपसे वर्ण नहीं पूछा जाएगा आपका आप

2208
02:45:36,200 --> 02:45:40,680
अनिता चार्य जी की सभा में जाएंगे आपसे आपका वण नहीं पूछा जाएगा

2209
02:45:40,680 --> 02:45:44,800
ठीक है तो यह बात गलत है कि शिक्षा देने से मना कर दिया

2210
02:45:44,800 --> 02:45:50,040
जाता है तो भी तो जन्म से ही मानते हैं

2211
02:45:50,040 --> 02:45:54,600
भाई साहब अब आप किसी और को लेकर आइएगा वरना मैं एक घंटे वो दूंगा

2212
02:45:54,600 --> 02:45:58,760
अपनी समाधान आप लास्ट में कह दोगे मैं किसी और को लेके आऊंगा

2213
02:45:58,760 --> 02:46:03,520
तो आप किसी और को ले ठीक है चलो भी चाहता

2214
02:46:03,520 --> 02:46:09,520
य हा जय श्री

2215
02:46:09,720 --> 02:46:14,120
राम चलिए आज का समाप्त करते हैं बहुत सारे लोग हैं

2216
02:46:14,120 --> 02:46:18,160
चेहरा नहीं दिखा रहे जो दो बाकी के हैं समाप्त करते हैं आज का

2217
02:46:18,160 --> 02:46:22,240
भी बहुत ज्यादा मुझे नहीं लगता है कि

2218
02:46:22,240 --> 02:46:26,680
उपयोगी रही आज की चर्चा

2219
02:46:26,680 --> 02:46:32,680
क्योंकि लगभग तीन घंटे होने जा रहे हैं

2220
02:46:33,960 --> 02:46:39,960
और कोई एक एक धारा में हम लोगों की बात नहीं

2221
02:46:41,360 --> 02:46:45,880
हुई ठीक है सभी को जय श्री

2222
02:46:45,880 --> 02:46:50,440
राम कुमार आर जी आप किसी दिन आए

2223
02:46:50,440 --> 02:46:54,600
दो घंटे 46 मिनट की हो चुकी है यह आप किसी और दिन आए

2224
02:46:54,600 --> 02:47:00,600
जय श्री

2225
02:47:02,520 --> 02:47:08,520
राम एक मिनट में पूछ लू

2226
02:47:33,760 --> 02:47:38,000
और सभी को एक बार फिर से मैं याद दिला दूं हमारा

2227
02:47:38,000 --> 02:47:42,680
नामा स्त्र ऑपरेशन नाम जप शुरू हो रहा है कल

2228
02:47:42,680 --> 02:47:46,920
से आप लोग इस अभियान से जुड़ सकते हैं ना मास्त्र को उठाइए

2229
02:47:46,920 --> 02:47:51,120
और उसमें संग की शक् का भी आलंबन है और भगवान

2230
02:47:51,120 --> 02:47:55,720
की ईश्वर की भक्ति का भी आलंबन है नामा स्त्र उठाइए और

2231
02:47:55,720 --> 02:47:59,880
साथ में मिलकर के भगवान के नाम का आहवान करिए

2232
02:47:59,880 --> 02:48:05,000
नास्त्र ऑपरेशन नाम जप से जुड़िए फॉर्म के लिए

2233
02:48:05,000 --> 02:48:09,040
आपको हमारे नंबर पर ट करना है कॉल ना करें ट करें

2234
02:48:09,040 --> 02:48:13,080
7408 30169 पर इस पर ट करने

2235
02:48:13,080 --> 02:48:19,080
पर आपको प्राप्त होगा

2236
02:48:19,360 --> 02:48:23,640
एक ऑटो जनरेट मैसेज उसमें कई फॉर्म

2237
02:48:23,640 --> 02:48:27,840
होंगे एक यह भी फॉर्म होगा नाम नामा स्त्र

2238
02:48:27,840 --> 02:48:31,880
से जुड़ने का और किसी प्रकार के वैचारिक

2239
02:48:31,880 --> 02:48:37,880
मतभेद के निमित्त अगर आप लाइव चर्चा करना चाहते हैं तो उसके लिए भी उसमें फॉर्म

2240
02:48:40,840 --> 02:48:46,840
होगा सभी को जय श्री

2241
02:48:47,720 --> 02:48:51,720
राम हम
