1
00:00:02,160 --> 00:00:06,160
तो सभी को जय श्री राम और

2
00:00:06,160 --> 00:00:10,200
आज हमारे साथ मंगा राम जी है मंगल राम जी आपका बहुत बहुत स्वागत

3
00:00:10,200 --> 00:00:15,680
है आभार आपका पधारने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

4
00:00:15,680 --> 00:00:20,320
आपने जी तो

5
00:00:20,320 --> 00:00:24,840
किया जी जी बिल्कुल नहीं हम लोग चाहते हैं कि

6
00:00:24,840 --> 00:00:29,160
जो वैचारिक मतभेद समाज में आ रहे हैं जिसके कारण से हम लोग

7
00:00:29,160 --> 00:00:33,280
कमजोर दिखाई देते हैं हिंदू समाज जो है वो वैचारिक मतभेद

8
00:00:33,280 --> 00:00:37,560
धीरे धीरे दूर हो वैचारिक क्रांति आए और हम लोग

9
00:00:37,560 --> 00:00:42,000
वैचारिक स्तर पर एक हो जिससे कि व्यवहारिक स्तर में हम

10
00:00:42,000 --> 00:00:46,320
विरोधियों का सामना कर सके एक साथ खड़े होकर

11
00:00:46,320 --> 00:00:50,320
तो बक मंगाराम जी

12
00:00:50,320 --> 00:00:54,400
का परिचय हमें जो बताया गया है वह यही है कि

13
00:00:54,400 --> 00:00:58,880
मंगाराम जी ने स्वा अध्ययन किया है अपने ग्रंथों का

14
00:00:58,880 --> 00:01:02,920
और उसके आधार पर उन्हें हमारी कुछ बातों से शायद वो

15
00:01:02,920 --> 00:01:06,920
सहमत नहीं है जिसमें से मुख्य बात है जिसके निमित्त आज

16
00:01:06,920 --> 00:01:11,000
हम बात करने वाले हैं कि ईश्वर अवतार लेता है या

17
00:01:11,000 --> 00:01:15,280
नहीं ईश्वर साकार है या नहीं तो

18
00:01:15,280 --> 00:01:17,280
मंगाराम जी आप

19
00:01:17,280 --> 00:01:21,320
सबसे पहले हमको ये बता दें

20
00:01:21,320 --> 00:01:25,440
कि आपके अनुसार ईश्वर अवतार ले

21
00:01:25,440 --> 00:01:29,440
सकता है या नहीं ईश्वर साकार हो सकता है

22
00:01:29,440 --> 00:01:33,800
या नहीं यह आप पहले बता द

23
00:01:33,800 --> 00:01:38,160
हा तो देखिए सर जो मेरा सवाल जो

24
00:01:38,160 --> 00:01:42,240
आया उसका मैं बैकग्राउंड बता देता हूं कि आपको आपसे मैंने

25
00:01:42,240 --> 00:01:46,320
व सवाल पूछा क्यों उसका य कि मैंने आपका एक वीडियो देखा मुझे बड़ा

26
00:01:46,320 --> 00:01:50,680
इंटरेस्टिंग लगा आपका जो सवाल पूछने का जो तरीका था और

27
00:01:50,680 --> 00:01:54,680
जो आप एक तरफ की जो लास्ट सीमा है वहा तक जाके

28
00:01:54,680 --> 00:02:00,320
आप बात करते हैं मुझे वो आपका तरीका अच्छा लगा और मैंने वीडियो को ध्यान से दिखा

29
00:02:00,320 --> 00:02:04,360
और और भी मैंने आपके एक दो वीडियो ध्यान से देखे तो वहा

30
00:02:04,360 --> 00:02:08,520
से जब ये है कि आपने ज ईश्वर की परिभाषा दी भगवान की

31
00:02:08,520 --> 00:02:12,680
मतलब जो भी आपको भगवान की परिभाषा दे रहे थे जिन जिन लोगों ने आपसे

32
00:02:12,680 --> 00:02:16,680
बात लोग की और उन्होने भवान की परिभाषा दी

33
00:02:16,680 --> 00:02:20,840
और उस भगवान की परिभाषा में आपकी तरफ से जो सवाल था वो था कि क्या व किसी

34
00:02:20,840 --> 00:02:24,880
नियम में बंधे हुए हैं क्या भगवान किसी नियम में बंधे या

35
00:02:24,880 --> 00:02:30,080
नहीं बंधे हुए और यहां पर आके जो है वो

36
00:02:30,080 --> 00:02:33,000
जब उन्होंने बोला कि वह जन्म नहीं लेता

37
00:02:33,000 --> 00:02:37,080
तो आपने बताया कि वह जन्म नहीं लेता य क्या नियम है अगर यह

38
00:02:37,080 --> 00:02:41,240
नियम है तो इसका मतलब नियम में बंधा हुआ है और व भगवान नहीं है तो

39
00:02:41,240 --> 00:02:45,320
मेरे सवाल का जो बैकग्राउंड ही था कि अगर आपके अनुसार

40
00:02:45,320 --> 00:02:49,520
वो जन्म लेते हैं तो वह जन्म किन परिस्थितियों

41
00:02:49,520 --> 00:02:53,640
में लेते हैं यहां पर मैं अपना कोई मत नहीं रख रहा

42
00:02:53,640 --> 00:02:58,000
हूं कि वो जन्म लेते हैं या नहीं लेते हैं वो साकार है या निराकार

43
00:02:58,000 --> 00:03:02,520
है मैं आपको बताऊ कि मैं एक तरह से यहां पर बिल्कुल शुद्ध

44
00:03:02,520 --> 00:03:06,680
श्रेणी का य शुद्ध श्रेणी का मनुष्य बनके मैं आपके

45
00:03:06,680 --> 00:03:11,280
सामने आया हूं ये क्योंकि मुझे लगा की अगर

46
00:03:11,280 --> 00:03:15,320
व वो आपके तर्क पर रे नहीं उतर रहे हैं इसका मतलब

47
00:03:15,320 --> 00:03:19,520
आपके पास एक उनसे अच्छा कोई तरक होगा तभी आप उनके तक को काट पा रहे

48
00:03:19,520 --> 00:03:24,040
हैं और यही से मेरी जिज्ञासा हुई की यह सवाल मुझे

49
00:03:24,040 --> 00:03:28,480
आपसे पूछना चाहिए हो सकता है कि मुझे इसका बहुत अच्छा एक जवाब

50
00:03:28,480 --> 00:03:33,040
मिल जाए जो मेरी भी मतलब जो

51
00:03:33,040 --> 00:03:37,080
उसके आधार पर पूरा खड़ हो सके तो सवाल मेरा

52
00:03:37,080 --> 00:03:41,200
जै की आपने बताया य क्या आवश्यकता है

53
00:03:41,200 --> 00:03:43,920
जो व लेते

54
00:03:43,920 --> 00:03:47,920
हैं आवश्यकता की चलो आवश्यकता आप मान

55
00:03:47,920 --> 00:03:48,420
सकते

56
00:03:48,160 --> 00:03:52,280
है पहली बात तो वही है अगर अवतार लेने की आवश्यकता पड़ती

57
00:03:52,280 --> 00:03:57,200
है तो किन परिस्थितियों में प नहीं नहीं

58
00:03:57,200 --> 00:04:01,680
आपका मत क्लियर पूछ रहा हभी मैंने जब देना शुरू नहीं किया है

59
00:04:01,680 --> 00:04:05,720
अच्छा आप थोड़ा सा अपना जो अभी भी आप ब्लूटूथ डिवाइस से ही बात

60
00:04:05,720 --> 00:04:09,880
कर रहे हैं हाय इयरफोन है क्योंकि

61
00:04:09,880 --> 00:04:14,520
दूर हो जाएगा कमरा तो उसको थोड़ा नजदीक करू मोबाइल को देखता हूं

62
00:04:14,520 --> 00:04:18,600
आपकी आवाज में ना इको आ रहा है थोड़ा सा एक

63
00:04:18,600 --> 00:04:22,960
ऐसा साउंड आ रहा है जो नॉर्मल नहीं है तो

64
00:04:22,960 --> 00:04:27,040
आप ब्लूटूथ डिवाइस की बजाय किसी अन्य तरीके से अगर बात करने

65
00:04:27,040 --> 00:04:31,840
का प्रयास करें इसको बंद कर दो सीधा करता हूं

66
00:04:31,840 --> 00:04:37,840
फिर सीधे करिए बार बंद कर

67
00:04:38,120 --> 00:04:42,360
हा अभी बोलिए हां

68
00:04:42,360 --> 00:04:46,680
अब बताइए आवाज आ रही है सही हा अब ठीक है

69
00:04:46,680 --> 00:04:50,760
उससे थोड़ा अजीब टाइप की आ रही तो जी जी

70
00:04:50,760 --> 00:04:55,000
आप बता ईश्वर जो है सबसे पहली बात ये है कि

71
00:04:55,000 --> 00:05:00,520
हमने कभी यह मामला उठाया ही नहीं कि ईश्वर अवतार लेता है कि नहीं लेता है

72
00:05:00,520 --> 00:05:04,680
है ना लेता है कि नहीं लेता यह तो बाद की बात है

73
00:05:04,680 --> 00:05:09,280
हमारा सवाल यह होता है कि ले सकता है या नहीं उसमें कैपेबिलिटी

74
00:05:09,280 --> 00:05:13,360
है कि नहीं क्षमता है कि नहीं तो इस बात का

75
00:05:13,360 --> 00:05:17,480
घुमा फिरा करके कुल मिलाकर जवाब नहीं दिया जाता है क्योंकि उनके यहां

76
00:05:17,480 --> 00:05:21,760
पर वह मन मानते नहीं है कि वह ले सकता है मगर नहीं ले सकता है बोलने

77
00:05:21,760 --> 00:05:25,800
में उनको प्रॉब्लम होती है नहीं ले सकता जैसे बोल देंगे तो उनको ये

78
00:05:25,800 --> 00:05:31,280
मानना पड़ जाएगा कि हमारा ईश्वर वादित है ईश्वर को जिस रूप में हम मानते हैं

79
00:05:31,280 --> 00:05:35,320
तो अब यह तो रही बात यह ले सकता है कि नहीं तो बिल्कुल क्योंकि वह

80
00:05:35,320 --> 00:05:39,560
सर्व सामर्थ्य वान है इसलिए वह ले सकता है अच्छा इसमें य

81
00:05:39,560 --> 00:05:44,000
बात आती है कुछ तर्क दिए जाते हैं ना लेने वालों के द्वारा

82
00:05:44,000 --> 00:05:48,000
वो कहते हैं जो सब जगह है वो एक जगह कैसे आ सकता है इसका अर्थ

83
00:05:48,000 --> 00:05:52,040
क्या हुआ कि वह अवतार को इसलिए नहीं मान रहे हैं ईश्वर के

84
00:05:52,040 --> 00:05:53,440
अवतार पर विश्वास इसलिए

85
00:05:53,440 --> 00:05:57,840
नहीं कर रहे हैं क्योंकि वो तार्किक सिद्ध नहीं हो रहा है है ना

86
00:05:57,840 --> 00:06:02,120
कि जो सर्वव्यापक है एक देशीय कैसा हो सकता है जैसे वो महिला मात्र

87
00:06:02,120 --> 00:06:06,160
शक्ति थी जो आर समाज की निष्ठा अलंकार जिनको

88
00:06:06,160 --> 00:06:10,360
आधुनिक गर्गी भी कहा गया बाद में तो उन्होंने भी य बात कही थी जो सर्वव्यापक

89
00:06:10,360 --> 00:06:14,680
है व एक देशीय कैसे हो सकता है तो इसमें दोनों तरीके हमारे पास तर्क

90
00:06:14,680 --> 00:06:18,760
भी है और हम लोग उसको प्रायोगिक

91
00:06:18,760 --> 00:06:22,800
दृष्टि से समझा भी सकते हैं प्रायोगिक दृष्टि

92
00:06:22,800 --> 00:06:26,880
से कैसे समझा सकते हैं कि ईश्वर जब

93
00:06:26,880 --> 00:06:31,520
हमने माना कण कण में है कण कण में ईश्वर है

94
00:06:31,520 --> 00:06:35,880
हा और इतना सभी लोग मानते हैं कि जो जीव है वो अज्ञानी

95
00:06:35,880 --> 00:06:39,920
है जो फस गया है तो पहली

96
00:06:39,920 --> 00:06:44,080
बात तो यह हो गई कि अज्ञानी उसको इसलिए कहा जा रहा है उनके

97
00:06:44,080 --> 00:06:48,240
भी अनुसार जो लोग नहीं मानते हैं बिल्कुल क्योंकि

98
00:06:48,240 --> 00:06:52,960
वो कुछ ऐसा देख रहा है जो वास्तविक नहीं है उसी को तो अज्ञान

99
00:06:52,960 --> 00:06:57,160
कहेंगे जो वास्तविक नहीं है तो जब ईश्वर उसको

100
00:06:57,160 --> 00:07:01,560
ऐसा कुछ दिखा सकता है जो वास्तविक नहीं है

101
00:07:01,560 --> 00:07:05,760
तो वो उसको ऐसा चित्र भी तो दिखा वो जो वास्तविक नहीं है जैसे

102
00:07:05,760 --> 00:07:08,520
मान लीजिए कि मैं चेयर देख रहा हूं ठीक

103
00:07:08,520 --> 00:07:12,600
है अब चेयर से चेयर वास्तविक नहीं है और

104
00:07:12,600 --> 00:07:17,040
साथ ही साथ अगर यहां की दृष्टि से भी देखा जाए जिस दुनिया को मैंने स्वीकार

105
00:07:17,040 --> 00:07:21,160
किया हुआ है इस चेयर में ईश्वर की ईश्वर भी नहीं

106
00:07:21,160 --> 00:07:25,160
है व्यवहारिक दृष्टि से ईश्वर की ईश्वर का भी नहीं

107
00:07:25,160 --> 00:07:29,840
है मगर फिर भी इसमें ईश्वर तो है तो यह कैसा ईश्वर

108
00:07:29,840 --> 00:07:34,120
जिसमें ईश्वर की ईश्वर मुझे फील नहीं हो रही चेयर से तो इसको

109
00:07:34,120 --> 00:07:38,280
कहा गया सावरण ब्रह्म ब्रह्म का वो रूप

110
00:07:38,280 --> 00:07:42,600
ईश्वर का वो रूप जिस पर आवरण चढ़ा हुआ है उसको आप अविद्या

111
00:07:42,600 --> 00:07:46,720
का कह ले अज्ञानता का कह ले आवरण चढ़ा हुआ है वहां

112
00:07:46,720 --> 00:07:51,040
भी ईश्वर है वहां भी ईश्वर की चेतना है मगर उस पर आवरण चढ़ा

113
00:07:51,040 --> 00:07:55,080
हुआ है किसका अविद्या का अज्ञान का

114
00:07:55,080 --> 00:07:59,120
तो यानी कि हम य जो पूरी सृष्टि देख रहे हैं पूरी दुनिया पेड़ पौधे सब

115
00:07:59,120 --> 00:08:03,560
कुछ इस पर एक आवरण चढ़ा हुआ है ईश्वर सब जगह विद्यमान है

116
00:08:03,560 --> 00:08:08,160
मगर उस पर एक आवरण चढ़ा हुआ है किस बात का अज्ञानता का अविद्या

117
00:08:08,160 --> 00:08:13,120
का अब क्या होता है कि मान लीजिए एक चादर है अज्ञानता

118
00:08:13,120 --> 00:08:17,680
की जिसमें कि हम सावरण ब्रह्म को देख रहे हैं सावरण

119
00:08:17,680 --> 00:08:22,080
अज्ञानता का आवरण उड़ रखा है ब्रह्म ने

120
00:08:22,080 --> 00:08:23,560
तो अब इस चादर में

121
00:08:23,560 --> 00:08:28,200
एक चीरा लगाया जाए मानवीय आकृति के अनुसार

122
00:08:28,200 --> 00:08:32,640
उसको काटा जाए तो ये का ये चादर काट के

123
00:08:32,640 --> 00:08:36,680
जितनी जगह से हमको यह सावरण ब्रह्म ना दिख करके पर्दे के उस

124
00:08:36,680 --> 00:08:40,880
तरफ ब्रह्म उस तरफ वाला जो ब्रह्म दिखेगा है ना

125
00:08:40,880 --> 00:08:45,040
वो अवतार है वो जो चीरा लगा है अविद्या में

126
00:08:45,040 --> 00:08:49,280
अविद्या रूपी चादर में जो चीरा लगाया हमने मानवीय आकृति

127
00:08:49,280 --> 00:08:53,280
के रूप में वह जो है अवतार होता है भगवान का इसको और सरल कर

128
00:08:53,280 --> 00:08:57,920
लेते हैं कि हम माया रूपी संसार के कक्ष में बंद है

129
00:08:57,920 --> 00:09:02,120
ठीक है या अज्ञानता रू संसार के कक्ष में बंद है अभी

130
00:09:02,120 --> 00:09:06,320
भी इसके अंदर भी हमको वो ईश्वर होता दिख रही है आकाश इसके अंदर भी है मगर

131
00:09:06,320 --> 00:09:10,440
हमको आकाश फील नहीं हो रहा है क्योंकि हमने एक कमरे में हम लोग बंद है अब हम एक

132
00:09:10,440 --> 00:09:14,680
खिड़की खोलते हैं उससे हमें आकाश दिखाई देता है जो इस कक्ष के बाहर

133
00:09:14,680 --> 00:09:18,880
का आकाश वो आकाश हमें दिखाई देता है वो आकाश का अवतार

134
00:09:18,880 --> 00:09:23,000
है तो यह तो हो गया प्रायोगिक दृष्टि दूसरी बात

135
00:09:23,000 --> 00:09:27,400
ये आती है हमने एक बात वो तर्क से निकाल ली

136
00:09:27,400 --> 00:09:31,520
कि जब जीव जीव को ईश्वर ऐसी चीजें दिखा सकता है जीव

137
00:09:31,520 --> 00:09:35,600
ऐसी चीजें देख सकता है जो वास्तविक नहीं है जिसके कारण जीव

138
00:09:35,600 --> 00:09:38,680
को अज्ञानी कहा जा रहा है जिसके कारण जीव को

139
00:09:38,680 --> 00:09:42,720
बंधन में बताया जा रहा है जिसके कारण उसको अभी जो

140
00:09:42,720 --> 00:09:46,720
चित की उपाधि है सत चित आनंद में से अभी चि है वो उसके पास नहीं है

141
00:09:46,720 --> 00:09:50,760
जिसके कारण इसका अर्थ है कि वो कुछ ऐसा देख रहा है जो कि रियलिटी नहीं

142
00:09:50,760 --> 00:09:54,800
है तो फिर जब जो रियलिटी नहीं है जब

143
00:09:54,800 --> 00:09:59,560
भगवान हमको कुर्सी दिखा सकता है जो रियलिटी नहीं है पेटी

144
00:09:59,560 --> 00:10:03,680
सकता है जो रियलिटी नहीं है तो वह एक ऐसी आकृति

145
00:10:03,680 --> 00:10:08,520
भी दिखा सकता है जिसके अंदर वह स्वयं की चेतना को जोड़े

146
00:10:08,520 --> 00:10:12,560
हो जैसे उसने कुर्सी दिखाई कुर्सी में अपनी चेतना को उसने नहीं

147
00:10:12,560 --> 00:10:16,640
रिफ्लेक्ट किया उसने पेटी दिखाई उसमें उसने अपनी

148
00:10:16,640 --> 00:10:20,800
चेतना को रिफ्लेक्ट नहीं किया मगर उसने एक मानव मानव ऐसा रूप

149
00:10:20,800 --> 00:10:25,000
दिखाया आपको जिसमें उसने अपनी चेतना को कनेक्ट कर दिया

150
00:10:25,000 --> 00:10:29,320
और वह आराम से आपसे व्यवहारिक रू व्यवहारिक हो गया वो ईश्वर

151
00:10:29,320 --> 00:10:33,720
अब दूसरी बात ये आती है कि आवश्यकता क्या है जो आपका प्रश्न था ये तो मैंने

152
00:10:33,720 --> 00:10:38,240
हा बताया कि वो कैसे कैसे ले सकता है एक चीज और है

153
00:10:38,240 --> 00:10:42,560
कि अगर आप ईश्वर को मानते हैं तीसरा तर्क तो र ही गया

154
00:10:42,560 --> 00:10:46,680
तो आपको किसी ना किसी जगह जाकर के मानना पड़ेगा कि ईश्वर

155
00:10:46,680 --> 00:10:51,400
ने कुछ ऐसे कार्य किए जो तार्किक नहीं है यह भी है

156
00:10:51,400 --> 00:10:53,760
किसी ना किसी जगह जाकर के आपको

157
00:10:53,760 --> 00:10:58,000
ये मानना पड़ेगा कि जो ईश्वर ने कुछ ऐसे कार्य

158
00:10:58,000 --> 00:11:02,520
किए जो तार्किक नहीं है जै से अथुनी सृष्टि की रचना कर द

159
00:11:02,520 --> 00:11:06,560
इस इस बाद में करेंगे इस भी आएंगे सवाल मेरा होगा

160
00:11:06,560 --> 00:11:10,560
ऐसा क्यों किया हां व वो भी करेंगे वो भी करेंगे हा वो बाद

161
00:11:10,560 --> 00:11:15,480
में किया भी जाए क्यों किया प भी जाएंगे अच्छा सवाल

162
00:11:15,480 --> 00:11:19,560
तो ईश्वर ने कई कार्य ऐसे किए जो आज हम जिस जिस ज्ञान

163
00:11:19,560 --> 00:11:23,600
को जानते हैं विज्ञान के आधार पर वो तार्किक नहीं है जैसे

164
00:11:23,600 --> 00:11:27,600
कि अमनी सृष्टि की रचना यह तार्किक नहीं है आज के टाइम में और

165
00:11:27,600 --> 00:11:31,640
भी चीज बिना मुख के व रूपी वेद कैसे प्रदान किए तो

166
00:11:31,640 --> 00:11:35,920
वहां पर बिना मुख के बिना

167
00:11:35,920 --> 00:11:41,360
मुख के शब्द रूपी वेद कैसे प्रदान किए

168
00:11:41,360 --> 00:11:45,440
बना वेद कैसे प्रदान किए अब जैसे आर्य समाज की

169
00:11:45,440 --> 00:11:49,520
विचारधारा को माने तो फिर उसमें भी कई

170
00:11:49,520 --> 00:11:53,600
जगह तर्क की कमी आ जाएगी ईश्वर तो जब तर्क की कमी आएगी

171
00:11:53,600 --> 00:11:57,920
तो आर्य समाज ने भी कई जगह माना है कि भा

172
00:11:57,920 --> 00:12:02,320
क्योंकि ईश्वर अनंत सामर्थ वान है इसलिए उससे हम यह नहीं पूछ सकते

173
00:12:02,320 --> 00:12:06,520
कि तुम अथुनी सृष्टि की रचना कैसे कर पा रहे हो या तुम बिना मुख

174
00:12:06,520 --> 00:12:10,520
के शब्द रूपी वेद कैसे प्रकट कर पा रहे हो यानी उसने

175
00:12:10,520 --> 00:12:14,640
भी कई अंशों में माना कि हां भाई ईश्वर के कई कार्य ऐसे हो सकते

176
00:12:14,640 --> 00:12:18,720
हैं जो वैज्ञानिक दृष्टि से तार्किक नहीं होते तो अब जब

177
00:12:18,720 --> 00:12:22,800
वो अन्य कार्यों को अब्जॉर्ब कर रहा है मथनी सृष्टि की रचना को स्वीकार

178
00:12:22,800 --> 00:12:26,880
कर रहा है शब्द रूपी वेद को प्रकट करने के प्रकट करने को स्वीकार

179
00:12:26,880 --> 00:12:31,000
कर रहा है तो फिर उसको अवतार के वादित क्यों कर रहा है

180
00:12:31,000 --> 00:12:35,880
या तो यह माने कि जितने जितने अतार्किक जितने

181
00:12:35,880 --> 00:12:40,520
बिना तर्क वाले कार्य आप स्वीकार करेंगे वह ईश्वर कर सकता है

182
00:12:40,520 --> 00:12:44,640
बाकी बिना तर्क वाला कार्य कोई ईश्वर नहीं कर सकता तो ईश्वर

183
00:12:44,640 --> 00:12:48,720
अनंत सामर्थ्य वान है केवल इस बात से ही हो जाएगा कि हां

184
00:12:48,720 --> 00:12:52,840
वह जन्म भी ले सकता है अब बात आती है आपकी कि

185
00:12:52,840 --> 00:12:56,760
ईश्वर किन परिस्थितियों में अवतार लेता है

186
00:12:56,760 --> 00:13:00,880
यह आपने बात कही तो कि इसका जवाब तो है

187
00:13:00,880 --> 00:13:05,360
मगर जवाब देने के लिए मैं प्रमाण लाऊंगी ग्रंथ पर बात आएगी फिर

188
00:13:05,360 --> 00:13:09,400
उसमें ये होगा कि नहीं इसका एक मिनट

189
00:13:09,400 --> 00:13:13,640
थोड़ा सा मैं कहना चाहूंगा कि जब बात आप

190
00:13:13,640 --> 00:13:17,840
प्रमाण किसी ग्रंथ से देंगे क्योंकि आपने मेरी बात सुनी नहीं

191
00:13:17,840 --> 00:13:22,040
मैं वही जो आप मुझे कहने वाले मैं वही आपको बताने वाला हूं वही कह रहा हूं

192
00:13:22,040 --> 00:13:26,080
जब मैं किसी ग्रंथ से प्रमाण के साथ आपको बोलूंगा कि वो है

193
00:13:26,080 --> 00:13:30,320
अपने पास ऐसा नहीं है ग्रंथों में भी है मगर अगर आप कहेंगे इसका अर्थ

194
00:13:30,320 --> 00:13:34,320
ये नहीं है प्रॉब्लम यहां आएगी कि आप जो बता रहे हैं इसका अर्थ ये

195
00:13:34,320 --> 00:13:38,600
नहीं है इसका अर्थ तो वो है जो मैं कहूंगा फिर बात यहां से उठक के अवतारवाद

196
00:13:38,600 --> 00:13:42,680
से उठकर के कहां चली जाएगी कि आपने ज्ञान कहां से प्राप्त

197
00:13:42,680 --> 00:13:46,680
किया परंपरा है क्या है उस चली जाएगी हा वो विषयात हो

198
00:13:46,680 --> 00:13:50,680
जाए इसलिए अभी मैं आपको सीधे बता दे रहा हूं कि

199
00:13:50,680 --> 00:13:55,320
जैसे हमें यह स्वीकार करना है कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई

200
00:13:55,320 --> 00:13:59,640
क्यों ईश्वर ने सृष्टि बनाई जीव को मोक्ष देने के लिए

201
00:13:59,640 --> 00:14:03,840
तो फिर सभी जीवों के मन में वेदों के मंत्र क्यों नहीं भर दिए डायरेक्ट

202
00:14:03,840 --> 00:14:07,880
हर व्यक्ति वेदों के मंत्र के साथ ही जन्म लेता क्यों उसको मेहनत करनी

203
00:14:07,880 --> 00:14:11,920
पड़ रही है वेदों के मंत्र तक पहुंचने के लिए क्यों क्यों क्यों बहुत सारे

204
00:14:11,920 --> 00:14:16,160
हम ऐसे क्यों बना सकते हैं तो जैसे हम बिना किसी क्योंकि मान लेते

205
00:14:16,160 --> 00:14:20,200
उसका मन उसने ऐसे किया उसका मन उसने

206
00:14:20,200 --> 00:14:24,280
ऐसे किया तो उसका मन उसने अवतार लिया उसका

207
00:14:24,280 --> 00:14:28,760
मन उसने अवतार लिया उसका मन यूं ही और

208
00:14:28,760 --> 00:14:33,400
जो एक जगह तर्क दिया है उन्होंने बहुत अच्छा है वो

209
00:14:33,400 --> 00:14:36,160
कि

210
00:14:36,160 --> 00:14:40,160
आंख आंख देखती क्यों है हम आंख

211
00:14:40,160 --> 00:14:44,440
से कह रहे हैं कि आंख देखती क्यों है तो अब आंख देखती क्यों है

212
00:14:44,440 --> 00:14:48,440
तो इसमें आ जाएगा यदि आप आंख से प्रश्न कर रहे हैं कि

213
00:14:48,440 --> 00:14:52,520
वह देखती क्यों है तो फिर इसका अर्थ है कि आंख का

214
00:14:52,520 --> 00:14:56,600
देखने के अलावा भी कुछ और अस्तित्व है हो गया तो आप

215
00:14:56,600 --> 00:15:00,600
आंख को देखने वाला नहीं मानते जबक आंख क्या है जो देखती है

216
00:15:00,600 --> 00:15:04,720
तो जब आपने आंख से प्रश्न कर दिया कि आंख देखती क्यों है तो उतने अंश में आपने

217
00:15:04,720 --> 00:15:08,960
आंख को आंख नहीं माना तो जब आपने आंख को आंख नहीं माना

218
00:15:08,960 --> 00:15:13,000
तो उसके द्वारा देखा जाना भी सिद्ध नहीं हुआ तो आपका जो प्रश्न है

219
00:15:13,000 --> 00:15:17,040
वो आप ही ने काट दिया क्यों क्योंकि आंख के द्वारा देखा जाना सिद्ध नहीं हो रहा

220
00:15:17,040 --> 00:15:21,800
है तो फिर आप ये प्रश्न नहीं कर सकते कि आंख देखती क्यों है पहले आपको मानना पड़ेगा

221
00:15:21,800 --> 00:15:25,840
कि आंख आंख है तो आपका ये प्रश्न आप करने पर खुद ही खंडित हो जाता है तो

222
00:15:25,840 --> 00:15:27,120
इसी प्रकार से जो क्यों

223
00:15:27,120 --> 00:15:31,240
आते हैं कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई क्यों ईश्वर ईश्वर इसलिए क्योंकि उसने

224
00:15:31,240 --> 00:15:35,280
सृष्टि बनाई है अगर आप उस पर यह प्रश्न ले जाएंगे कि उसने

225
00:15:35,280 --> 00:15:39,480
बनाई क्यों है तो आप यह कह रहे हैं कि ईश्वर ईश्वर

226
00:15:39,480 --> 00:15:43,560
नहीं है तो जब ईश्वर ईश्वर नहीं है तो उसके द्वारा सृष्टि बनना भी सिद्ध नहीं होता

227
00:15:43,560 --> 00:15:47,640
तो जब सृष्टि बनना सिद्ध नहीं होता तो फिर आपका य प्रश्न खत्म हो गया कि ईश्वर ने

228
00:15:47,640 --> 00:15:51,760
सृष्टि बनाई क्यों तो इसलिए यह जो प्रश्न

229
00:15:51,760 --> 00:15:55,880
है अपने आप में ही खत्म हो जाता है इसके बाद जैसे मैं

230
00:15:55,880 --> 00:15:59,880
हूं जैसे आप है अभी आप समय बीच-बीच

231
00:15:59,880 --> 00:16:03,880
में कुछ ऐसे मूवमेंट कर रहे हैं जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है कर रहे हैं

232
00:16:03,880 --> 00:16:08,200
ना हिल रहे हल्का सा मैं बारबार पन को पकड़ रहा हूं

233
00:16:08,200 --> 00:16:12,520
मैं अपने हाथों को य कर रहा हूं कोई आवश्यकता नहीं है क्यों कर रहा हूं सामर्थ्य

234
00:16:12,520 --> 00:16:16,760
है सामर्थ है यूं ही कर दिया इसीलिए भगवान यूं ही सृष्टि

235
00:16:16,760 --> 00:16:20,840
की रचना करते हैं बिना किसी आवश्यकता के यूं ही

236
00:16:20,840 --> 00:16:24,960
क्योंकि उनके अंदर सामर्थ्य और इसी प्रकार से व

237
00:16:24,960 --> 00:16:29,160
अवतार भी लेते हैं मगर अगर गीता आदि का अनुसरण

238
00:16:29,160 --> 00:16:33,560
भी किया जाए तो उनके अवतार लेने के पीछे अमुक अमुक उसमें कोई उनकी मजबूरी

239
00:16:33,560 --> 00:16:37,560
नहीं थी कि व वो अवतार ना भी लेते तो नहीं लेते तो काम

240
00:16:37,560 --> 00:16:41,640
ना चलता मगर उनका मन कि उनको यह कार्य ऐसे ही करना था उनका

241
00:16:41,640 --> 00:16:42,280
मन

242
00:16:42,280 --> 00:16:46,360
तो उन्होंने ऐसे किया तो उन्होंने क्यों क्यों किया तो जो अवतार हमें प्राप्त

243
00:16:46,360 --> 00:16:50,560
होता है जिन अवतारों की हम पूजा करते हैं तो भगवान बताते हैं जब जब धर्म

244
00:16:50,560 --> 00:16:54,600
की हानि होती है तो और अधर्म की

245
00:16:54,600 --> 00:16:58,920
वृद्धि होती है तब तब मैं अवतार लेता हूं उन्होंने बता दिया

246
00:16:58,920 --> 00:17:03,400
आवश्यकता नहीं है यहां पर वो बिना उसके भी बिना अवतार के भी

247
00:17:03,400 --> 00:17:07,600
अपनी शक्ति के द्वारा ही वह कार्य कर सकते हैं जैसे कि वेद

248
00:17:07,600 --> 00:17:11,800
मंत्रों का किसी ग्रंथ में लिखा होना आवश्यक नहीं है अगर भगवान

249
00:17:11,800 --> 00:17:16,400
चाहे तो हर व्यक्ति की मस्तिष्क में व वेद मंत्र डाल सकते हैं

250
00:17:16,400 --> 00:17:20,520
डाल सकते हैं ना तो उसी प्रकार से मगर फिर भी वो

251
00:17:20,520 --> 00:17:24,760
एक व्यवहारिक तौर पर उनको एक वेद मंत्र देते हैं गुरु से सुनते

252
00:17:24,760 --> 00:17:28,880
हैं या किसी प्रकार से वो वेद जो है व्यवहारिक रूप से प्राप्त होते हैं

253
00:17:28,880 --> 00:17:33,400
मनुष्य के मन के साथ मन में लेकर के वेद जन्म नहीं लेता

254
00:17:33,400 --> 00:17:37,440
मनुष्य जबकि वो ले सकता है अगर भगवान चाहे तो तो यह भगवान के ऊपर

255
00:17:37,440 --> 00:17:41,480
है कि उन्होंने कुछ कार्य अवतार लेकर के कर दिए कुछ कार्य केवल सिद्ध शक्ति से ही कर

256
00:17:41,480 --> 00:17:45,560
दिए मगर हम उन पर ये अंकुश नहीं लगा सकते इस कारण से कि नहीं अगर उससे आवश्यकता

257
00:17:45,560 --> 00:17:49,760
नहीं है तो वो ले क्यों रहा है बहुत सारे सवाल खड़े हो जाएंगे वेदों में आर समाज

258
00:17:49,760 --> 00:17:54,040
ने कई जगह पर अलंकार माना है अलंकार क्यों लगाया

259
00:17:54,040 --> 00:17:57,280
अगर वो कहे कि अलंकार की आवश्यकता होती

260
00:17:57,280 --> 00:18:01,360
है तो फिर हर मंत्र में क्यों नहीं लगाया अगर अलंकार की

261
00:18:01,360 --> 00:18:05,720
आवश्यकता होती है तो प्रत्येक मंत्र में क्यों नहीं लगाया वस्तु

262
00:18:05,720 --> 00:18:10,320
स्थिति यह है कि जहां जहां पर चमत्कारिक बातें हुई है

263
00:18:10,320 --> 00:18:14,360
जहां जहां पर आर्य समाज ने जो वेद से पहले जो अपनी विचारधारा

264
00:18:14,360 --> 00:18:18,400
तैयार कर ली उसके विरुद्ध जाती हुई जो बातें हुई है वेदों में

265
00:18:18,400 --> 00:18:24,000
उनके लिए उसने तुरंत एक मामला निकाल के रखा

266
00:18:24,000 --> 00:18:28,080
अवतार तो अव वो अलंकार सॉरी उन्होंने क्या किया हर

267
00:18:28,080 --> 00:18:32,440
जगह अलंकार भा राम जी गए अहिल्या को स्पर्श किया

268
00:18:32,440 --> 00:18:36,600
जो शिला में परिवर्तित हो गई थी उसको स्पर्श किया तो वो मुक्त

269
00:18:36,600 --> 00:18:40,680
हो गई तो वहा उन्होंने कह दिया अलंकार में कहा है उनके स्पर्श

270
00:18:40,680 --> 00:18:45,040
से जो श्राप से मुक्त हुई अहिल्या जी वो तो केवल

271
00:18:45,040 --> 00:18:49,400
एक अलंकार है जहां जहां पर चमत्कार चमत्कार वाली बातें कि जो

272
00:18:49,400 --> 00:18:53,400
वो है शर्मा जो देवताओं की कुतिया है वो मंत्रों

273
00:18:53,400 --> 00:18:57,400
मंत्र कैसे बोल रही है तोय अलंकार है कबूतर मंत्र कैसे बोल रहा

274
00:18:57,400 --> 00:19:01,840
है तो अलंकार तो जहां जहां पर भी उनकी जो एक उन्होंने

275
00:19:01,840 --> 00:19:05,960
वेदों से पहले अपना एक वो बना लिया है नियम उसके विरुद्ध जब जाने

276
00:19:05,960 --> 00:19:10,400
लगेंगे वेद भी तो उसमें वो वेदों को अलंकार कह

277
00:19:10,400 --> 00:19:13,120
देंगे अब आप

278
00:19:13,120 --> 00:19:17,120
बताएं तो अभी आपने कहा कि उसका मन किया

279
00:19:17,120 --> 00:19:21,200
उसने अवतार ले लिया वो अवतार के रूप में आए तो

280
00:19:21,200 --> 00:19:25,440
उससे पहले आपने बताया था कि आवरण से ढका हुआ है जो संसार

281
00:19:25,440 --> 00:19:29,800
है जिन चीजों को हम देख रहे हैं वो एक आवरण ढके हुए अज्ञानता

282
00:19:29,800 --> 00:19:34,000
के आवरण से जो हमारी अज्ञानता है उसके आवरण से वो ढके हुए हैं

283
00:19:34,000 --> 00:19:38,000
आपने यह भी कहा कि जैसे यह कुर्सी है यह कुर्सी मुझे इसमें भी

284
00:19:38,000 --> 00:19:42,080
ईश्वर है मगर क्योंकि य आवरण से ढकी हुई है इसलिए मुझे इसमें

285
00:19:42,080 --> 00:19:46,120
जो भगवान जो है वो मुझे दिखाई नहीं दे रहे क क

286
00:19:46,120 --> 00:19:50,640
में जैसे भगवान बोला प्रकट नहीं हो रही ईश्वर प्रकट नहीं हो रही उससे

287
00:19:50,640 --> 00:19:54,920
फीलिंग नहीं आ रही ई नहीं हो रही तो यह जो आवरण

288
00:19:54,920 --> 00:19:58,920
है जिस आवरण की बात की गई है वो आवरण

289
00:19:58,920 --> 00:20:03,160
बुद्धि या मेरी आत्मा के ऊपर है या वह सामने वाली चीज जिसको

290
00:20:03,160 --> 00:20:07,160
मैं देख रहा हूं उसके ऊपर है यह आवरण कहां पर है मेरे ऊपर य आवरण है

291
00:20:07,160 --> 00:20:11,240
जिसकी वजह मैं नहीं देख पा रहा या फिर जो सामने चीज है उसके

292
00:20:11,240 --> 00:20:15,760
ऊपर व आवरण है जिसकी वजह से मैं उसके अंदर परमात्मा नहीं देख पा रहा यह मेरा सवाल है

293
00:20:15,760 --> 00:20:20,600
मेरी बुद्धि बुधि के पर आवरण है

294
00:20:20,600 --> 00:20:25,000
मतलब आवरण मेरे अज्ञानता का है मेरी बुद्धि का जिसकी व से

295
00:20:25,000 --> 00:20:29,440
जैसे आपने बोर बु

296
00:20:29,440 --> 00:20:33,440
यह पमार्ट चीज हो गई और व्यवहारिक चीज हो गई कि वो उसके

297
00:20:33,440 --> 00:20:37,480
ऊपर है सामने वाले के परर परमार्थिक चीज ऐसे हो गई बता

298
00:20:37,480 --> 00:20:41,560
रहा परमा हो हा मैं चाहूंगा बात

299
00:20:41,560 --> 00:20:45,640
कर व्यवहारिक बात करें व्यवहारिक बात इसलिए करें क्योंकि

300
00:20:45,640 --> 00:20:49,760
मे और आपको देखने वाला जो सामने जो देख रहा है हम दोनों को उसको

301
00:20:49,760 --> 00:20:53,840
एक व्यवहार में आने वाली चीज की जानकारी मिले की भाई व्यवहार में क्या वो

302
00:20:53,840 --> 00:20:58,080
इस्तेमाल कर सकता है वो दो चीज ब आपको

303
00:20:58,080 --> 00:21:02,200
चीज बताऊंगा हम कि हम जो ये लाइव करते

304
00:21:02,200 --> 00:21:06,280
हैं वो इसलिए नहीं करते कि हम भगवान के टॉपिक्स को

305
00:21:06,280 --> 00:21:10,480
हम क्या कहते हैं आप क्या सोचते हैं हम क्या सोचते हैं अगर आपको

306
00:21:10,480 --> 00:21:14,720
हमारी किसी बात से आपत्ति होती है जिज्ञासा के लिए हम क्लासेस करते

307
00:21:14,720 --> 00:21:18,720
हैं जिज्ञासा के लिए हम क्लासेस करते हैं उसमें आप आ सकते हैं

308
00:21:18,720 --> 00:21:22,880
और ये आपकी जो जिज्ञासा है बहुत अच्छे से शांत हो सकती है मगर यहां आते

309
00:21:22,880 --> 00:21:27,000
हैं वैचारिक मतभेद के निमित्त जैसे अभी

310
00:21:27,000 --> 00:21:30,160
क्योंकि मैं

311
00:21:30,160 --> 00:21:34,320
आगे बढ़ रहा आपके साथ तो अब आप ये बताए मुझे कि

312
00:21:34,320 --> 00:21:38,920
आपको कहां पर आपत्ति है हां ये एक

313
00:21:38,920 --> 00:21:43,040
मतलब मुझे लगा कि अगर हम ये व्यवहारिक और

314
00:21:43,040 --> 00:21:44,560
जो आपने परमार्थिक दो दो

315
00:21:44,560 --> 00:21:48,600
चीजों का बात किया कि एक एक बात हम व्यवहारिक में करेंगे एक बात हम परमार्थिक में

316
00:21:48,600 --> 00:21:53,040
करेंगे वो परमार्थिक की बजाय अगर हम व्यवहारिक बात करेंगे तो थोड़ा सा

317
00:21:53,040 --> 00:21:57,040
ज्यादा सही रहेगा क्योंकि एक देखिए वही मैं कह रहा हू यहां

318
00:21:57,040 --> 00:22:01,160
पर लोगों को मैं बता हम लोग उसके लिए लोगों को जो व

319
00:22:01,160 --> 00:22:05,520
चीजें हैं अलग से इनफॉर्मेटिव वीडियो भी बनाते हैं और हम लोग क्लासेस

320
00:22:05,520 --> 00:22:09,560
भी चलाते हैं मगर अभी क्या है यह जो जा रहा है उस

321
00:22:09,560 --> 00:22:13,960
तरफ जा रहा है कि जैसे एक क्लास चल रही है और उसमें आप स्टूडेंट नहीं है

322
00:22:13,960 --> 00:22:18,080
मगर एक जो है अपने कुछ जानने के लिए आए हैं तो हम

323
00:22:18,080 --> 00:22:22,240
लोग य जो सेशन करते हैं यह वैचारिक मतभेद के निमित्त से करते हैं

324
00:22:22,240 --> 00:22:26,280
जानने के लिए हमारी क्लासेस चलती है समझ रहे

325
00:22:26,280 --> 00:22:30,520
हैं तो आप अपना पक्ष रखिए यद मेरी कही हुई किसी चीज से आपको

326
00:22:30,520 --> 00:22:34,640
आपत्ति है तो वह आप अपना पक्ष रखें हा वो मैंने आपको बता दिया कि मुझे

327
00:22:34,640 --> 00:22:39,360
इस चीज से आपत्ति थी तो वो मैंने आपको बता दिया तो मतलब हमारी अज्ञानता

328
00:22:39,360 --> 00:22:43,720
की वजह से हम सामने वाली चीजों को नहीं देख पाते ठीक है

329
00:22:43,720 --> 00:22:47,720
ये सही क्लियर हो गया आपने बता दिया कि उनका मन था तो उन्होंने अवतार

330
00:22:47,720 --> 00:22:52,280
लिया अब यहां पर ये चीज है कि उनका जब मन था उन्होंने अवतार लि

331
00:22:52,280 --> 00:22:56,600
पहले पहले अब आप अपना मत वो करिए क्लियर कि आप मानते

332
00:22:56,600 --> 00:23:00,080
हैं अवतार को नहीं मानते हैं

333
00:23:00,080 --> 00:23:04,160
मैंने आपको बताया कि मैं आपके सामने इस टाइम प जीरो होके बैठा

334
00:23:04,160 --> 00:23:08,200
हूं शून्य नहीं तो वैचारिक मतभेद तो तब

335
00:23:08,200 --> 00:23:12,280
होगा ना जब आपके पास कुछ होगा कुछ परसेंटेज होगी कि भाई ये चीज मुझे नहीं मैं

336
00:23:12,280 --> 00:23:16,440
नहीं मानता वो बताइए देखो मैं मैं ये कह रहा हूं कि जब

337
00:23:16,440 --> 00:23:20,720
मैं आपके सामने आया आपसे कुछ पूछने के लिए और क्यों आया

338
00:23:20,720 --> 00:23:24,720
पूछने के लिए आप पूछने के लिए आप क्लास में आ सकते हैं आप समझिए मेरी बात को मैं

339
00:23:24,720 --> 00:23:29,000
जो कह रहा हूं ये ये ठीक है आप सही कह रहे क्लास सकते सहमति

340
00:23:29,000 --> 00:23:33,080
है वो आप यहां बताए नहीं मैं सहमति

341
00:23:33,080 --> 00:23:37,160
असहमति की जब बात करते क्योंकि देखो मैं जानकारी के लिए आया

342
00:23:37,160 --> 00:23:41,560
और क्यों आया आप आप कह रहे क्लास में आ सकता हूं मुझे भी पता है कि मैं आप

343
00:23:41,560 --> 00:23:46,200
जहां प जो भी आपका सेंटर है हो सकता आपने जब नहीं नहीं आपने जब

344
00:23:46,200 --> 00:23:50,720
किया होगा तो आपको एक लिंक मिला होगा आवान पाठ्यक्रम

345
00:23:50,720 --> 00:23:54,840
से जुड़ने के लिए उसमें यदि आप फॉर्म भर देते तो आप कल की क्लास

346
00:23:54,840 --> 00:23:59,520
हुई थी उसमें भी आते अगले हफ्ते शनिवार को आएगी उसमें भी आते तो उसमें

347
00:23:59,520 --> 00:24:03,760
असल में क्या है बात ये है ये पर हम लोग अगर

348
00:24:03,760 --> 00:24:07,760
यह जो क्लास वाली बातें हैं जो कि उतनी प्रासंगिक नहीं है

349
00:24:07,760 --> 00:24:11,840
जिसको सुनने के लिए लोग बैठे हैं तो फिर इसकी जो रीच आदी

350
00:24:11,840 --> 00:24:15,280
होती है पब्लिक तक पहुंचने की व व्यर्थ हो जाता है

351
00:24:15,280 --> 00:24:19,560
कम हो जाता है ज्यादा से ज्यादा जन समाज को जो हमारे वो होते हैं उसका प्रभाव

352
00:24:19,560 --> 00:24:23,680
पड़ता है तो एक इसलिए मर्यादा बनाई कि हम जो वैचारिक मतभेद के निमित्त बात

353
00:24:23,680 --> 00:24:27,880
होगी व यहां करेंगे और जो जानने जिज्ञासा की बात होगी

354
00:24:27,880 --> 00:24:31,920
व हम क्या कहते हैं वहां करेंगे अब अपनी बात कह दीजिए

355
00:24:31,920 --> 00:24:36,000
क्योंकि आप आए हैं आप बोलिए मतलब आपको कुल मिलाकर के असहमति नहीं है

356
00:24:36,000 --> 00:24:40,400
कोई भी या आप थोड़ी देर के लिए ये कह रहे हैं कि असहमति नहीं है

357
00:24:40,400 --> 00:24:44,440
हां अभी मैं य कह रहा हूं कि असहमति नहीं क्योंकि अभी एक बात प असहमति थी तो मैंने

358
00:24:44,440 --> 00:24:48,520
आपको बता दी कि मुझे इस बात प असहमति है बाकी अभी तक मुझे कोई असहमति नहीं है आपने जो

359
00:24:48,520 --> 00:24:52,840
कहा कि उनका मन था अवतार लेने का तो उन्होंने अवतार लिया यहां प मुझे कोई असहमति

360
00:24:52,840 --> 00:24:57,120
नहीं है सहमति है मगर यहां पर एक असहमति जो यह है कि आपसे

361
00:24:57,120 --> 00:25:01,200
असहमति नहीं है हालांकि कि उन्होंने अवतार लिया

362
00:25:01,200 --> 00:25:05,720
आप क्या वो अवतार लेकर कुछ ऐसे कार्य भी करते हैं

363
00:25:05,720 --> 00:25:09,920
कि जिनसे दुनिया के को एक दूसरा गलत एग्जांपल

364
00:25:09,920 --> 00:25:14,040
जाए कि भाई ऐसा व्यवहार अगर भगवान ने किया था तो फिर

365
00:25:14,040 --> 00:25:18,080
जब भगवान ऐसा व्यवहार कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते क्या वो इस

366
00:25:18,080 --> 00:25:22,720
तरह के कार्यकलाप भी करेंगे इसको आप समझिए

367
00:25:22,720 --> 00:25:26,720
कि भगवान अवतार लेकर के कर रहे हैं उसको छोड़ दीजिए

368
00:25:26,720 --> 00:25:30,480
दुनिया में जहां पर भी कुछ भी हो रहा है

369
00:25:30,480 --> 00:25:34,600
गलत या अच्छा उसमें भगवान की मर्जी शामिल है

370
00:25:34,600 --> 00:25:39,040
कि नहीं अगर हम कहते हैं नहीं है तो उसकी सामर्थ

371
00:25:39,040 --> 00:25:43,080
कम हो गई कट गई तो भगवान तो वहां पर भी है जहां पर

372
00:25:43,080 --> 00:25:47,200
व साकार रूप से नहीं है और कहते हैं कण कण में ईश्वर

373
00:25:47,200 --> 00:25:51,520
है अद्वैत को मान लीजिए तो ईश्वर ही कल्पित हुआ है अद्वैत विचारधारा

374
00:25:51,520 --> 00:25:55,560
को अगर मान लेते हैं तो ईश्वर ही कल्पित हुआ है तो इसका मतलब क्या

375
00:25:55,560 --> 00:25:59,720
हुआ कि जहां पर हत्या हो रही है वो भी ईश्वर है और जहां

376
00:25:59,720 --> 00:26:03,760
पर जो है हत्या नहीं हो रही है पुण्य हो रहा है वो भी ईश्वर है तो फिर

377
00:26:03,760 --> 00:26:07,760
फायदा क्या हुआ ऐसे ईश्वर का तो इसको कहा गया

378
00:26:07,760 --> 00:26:11,880
कि ईश्वर ही सब जगह है सब जगह विद्यमान है मगर

379
00:26:11,880 --> 00:26:16,160
हमारे लिए अनुकरणीय अनुसरण ईश्वर के वह

380
00:26:16,160 --> 00:26:20,240
रूप है जो हमारे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करें वेद

381
00:26:20,240 --> 00:26:24,360
आदि शास्त्र सम्मत धर्म का अनुपालन करवाने में सहायक हू

382
00:26:24,360 --> 00:26:28,680
धर्म की सिद्धि में सहायक हूं तो हमारे लिए ईश्वर

383
00:26:28,680 --> 00:26:32,680
के रूप में पूजनीय भजनी है वही रूप है ईश्वर

384
00:26:32,680 --> 00:26:36,720
के जो इस र हमें ले जाए कहां वेदों की ओर मोक्ष की ओर भगवत

385
00:26:36,720 --> 00:26:40,880
प्राप्ति की र अब जैसे इसको समझ लेते हैं दूसरा जैसे हमने कहा

386
00:26:40,880 --> 00:26:44,960
कि ईश्वर कण कण में है तो ईश्वर तो मल में भी है ईश्वर तो

387
00:26:44,960 --> 00:26:45,480
हर जगह

388
00:26:45,480 --> 00:26:49,600
लास्ट में भी ईश्वर है तो फिर हम केवल ईश्वर के उस रूप की क्योंकि वो

389
00:26:49,600 --> 00:26:53,960
हमारे फिर जाता है जो हमारे वेदा शास्त्र सम्मत जो ईश्वर के जो

390
00:26:53,960 --> 00:26:58,240
ऐसी व्याख्या की गई जहां पर ईश्वर को उस तरीके से साकार रूप में बजा जा सकता है

391
00:26:58,240 --> 00:27:02,720
तो वही अब इसको और समझ लीजिए जैसे पानी है

392
00:27:02,720 --> 00:27:06,720
पानी नमी के रूप में पूरे वातावरण में मौजूद है

393
00:27:06,720 --> 00:27:10,920
पूरे वातावरण में मगर हमारी प्यास कौन सा पानी

394
00:27:10,920 --> 00:27:14,920
बुझाएगा जो हमारे गिलास की या चुल्लू की या मुंह

395
00:27:14,920 --> 00:27:18,960
की सीमा में आता हो तो इसी प्रकार से ईश्वर सब जगह

396
00:27:18,960 --> 00:27:23,120
है ये हमारे शास्त्रों ने ही बता दिया कि ईश्वर सब जगह है मगर

397
00:27:23,120 --> 00:27:27,560
हमारी प्यास कौन बुझाएगा हमारे लिए हमारे लिए ईश्वर का कौन सा रूप ग्राह

398
00:27:27,560 --> 00:27:31,600
है ग करने लो योग्य है जो वेदा दि शास्त्रों की

399
00:27:31,600 --> 00:27:35,640
सीमा में आता हो जैसे कई बार एक कुत किया था एक

400
00:27:35,640 --> 00:27:39,880
आर्य समाजी है उसने कुतर किया

401
00:27:39,880 --> 00:27:44,200
उसने कहा यह जो अभ मुक्तेश आनंद जी है ज्योतिष

402
00:27:44,200 --> 00:27:48,240
पीठ के जो शंकराचार्य के रूप में जाने जा रहे हैं वर्तमान

403
00:27:48,240 --> 00:27:50,400
में

404
00:27:50,400 --> 00:27:54,520
तो उन्होंने किसी वीडियो को इनके पास प्रश्न आया

405
00:27:54,520 --> 00:27:58,520
था मूर्ति पूजा को लेकर के तो मूर्ति पूजा को लेकर के उन्होने साकार

406
00:27:58,520 --> 00:28:00,560
भगवान की कहां कहा बात हो रही भगवान के साकार

407
00:28:00,560 --> 00:28:04,920
स्वरूपों की बात कहां हो रही है वो उन्होंने बता दिया

408
00:28:04,920 --> 00:28:08,920
भाई देखो यहां साकार की बात हो रही है मूर्ति पूजा भी हो हालांकि वेदों

409
00:28:08,920 --> 00:28:12,920
में ऐसे भी मंत्र डायरेक्टली जो बोला जा रहा है कि हे देवता इस

410
00:28:12,920 --> 00:28:17,120
पत्थर में आकर के निवास करो इस मूर्ति में आकर निवास करो 100 हज साल तक

411
00:28:17,120 --> 00:28:21,120
ऐसे भी मंत्र है अब वो बात आ जाएगी कि उसकी व्याख्या

412
00:28:21,120 --> 00:28:25,400
अलग कर दी गई अलंकार कह कर के नकार दिया गया वो बात अलग है

413
00:28:25,400 --> 00:28:30,040
मगर जब उन्होंने ऐसा कहा कि ईश्वर कण कण में है तो

414
00:28:30,040 --> 00:28:34,480
वो जो कुतर्क था उसने कुतर्क वाला वीडियो बनाया उसने कहा

415
00:28:34,480 --> 00:28:38,600
ऋषि वाज नाम का चैनल है उसका उसने कहा कि

416
00:28:38,600 --> 00:28:42,640
अगर ईश्वर कण कण में है इसलिए तुम भगवान की पूजा कर रहे हो तो

417
00:28:42,640 --> 00:28:47,560
जीसस की क्यों नहीं करोगे जीसस की क्यों नहीं करोगे

418
00:28:47,560 --> 00:28:51,600
मोहम्मद की क्यों नहीं करोगे कण कण में है तो उसकी भी पूजा करो बात वही

419
00:28:51,600 --> 00:28:55,920
आ जाती है मैं कह रहा हूं इस दुनिया में जो भी कुछ है सब में भगवान

420
00:28:55,920 --> 00:29:00,040
है अगर सब में भगवान है तो इसका मतलब दुनिया में

421
00:29:00,040 --> 00:29:04,040
जो भी कुछ शब्द है भगवान का ही नाम है कोई भी शब्द

422
00:29:04,040 --> 00:29:08,280
है भगवान का ही नाम है क्योंकि हर जगह ईश्वर है उस नाम में भी भगवान है

423
00:29:08,280 --> 00:29:12,360
क्योंकि कण कण में भगवान है उस नाम में तो फिर आप एक प्रणव

424
00:29:12,360 --> 00:29:15,600
को ही लेकर क्यों चल रहे हो क्यों प्रणव

425
00:29:15,600 --> 00:29:19,920
को ही झंडे में लगाते हो इसका मतलब क्या हुआ वही वाली बात हो गई कि ईश्वर

426
00:29:19,920 --> 00:29:24,040
तो सर्वत्र विद्यमान है मगर हमारे लिए अनुकरण करने योग्य

427
00:29:24,040 --> 00:29:28,440
ईश्वर का वह रूप है जो वेदा दि शास्त्रों की सीमा में आता हो यानी कि

428
00:29:28,440 --> 00:29:33,000
पानी का वह रूप जो हमारे लिए व्यवहारिक हो जाए जैसे कि

429
00:29:33,000 --> 00:29:37,720
सूर्य से आने वाली जो ऊर्जा है जो हमें अंत गत्वा चाहिए

430
00:29:37,720 --> 00:29:41,840
इंटेस्टाइन को उसकी आवश्यकता है कैलोरी के रूप में वह सर्वत्र

431
00:29:41,840 --> 00:29:45,960
विद्वान है मगर हमारे लिए वो कैसे हम प्राप्त कर पाते

432
00:29:45,960 --> 00:29:50,520
हैं उसे जो हमारे व्यवहार में आ जाए बर्गर पिज्जा रोटी

433
00:29:50,520 --> 00:29:54,520
पुलाव उस व्यवहारिक रूप में जब वो आ जाए वहां उसको खा कर

434
00:29:54,520 --> 00:29:59,520
के हमारे इंटेस्टाइन में सूर्य से आने वाली ऊर्जा पहुंचती है

435
00:29:59,520 --> 00:30:03,560
तो इसी प्रकार से इसी प्रकार से जो उनका

436
00:30:03,560 --> 00:30:07,720
कुतर्क था कि भाई अगर ईश्वर कण

437
00:30:07,720 --> 00:30:12,360
कण में है सभी नाम ईश्वर के ही है दुनिया में इसकन वाले भी तर्क देते हैं

438
00:30:12,360 --> 00:30:16,440
कि दुनिया में सभी नाम भगवान के बहुत से नाम है तो अगर वो हरे

439
00:30:16,440 --> 00:30:20,520
अल्लाह हरे अल्लाह वो अल्लाह और कृष्ण को एक कहा जा रहा तो क्या दिक्कत है तो बात

440
00:30:20,520 --> 00:30:25,000
वही आ जाती है अल्लाह जो है वो हमारे शास्त्रों द्वारा वर्णित

441
00:30:25,000 --> 00:30:29,040
नहीं है हमारे शास्त्रों का ऐसा अर्थ नहीं निकाला जा सकता

442
00:30:29,040 --> 00:30:30,640
जो कुरान के द्वारा प्रतिपादित होने

443
00:30:30,640 --> 00:30:34,800
वाले ईश्वर के रूप में ख्या पित हो जाए इसलिए हम उसका नाम नहीं लेंगे वह

444
00:30:34,800 --> 00:30:39,240
नाम भी उस नाम में भी ईश्वर है ऐसा नहीं है मगर वह अव्यावहारिक ईश्वर

445
00:30:39,240 --> 00:30:43,480
है वही और व्यवहारिक कौन सा है जो हमारे वेदा दि शास्त्रों की सीमा

446
00:30:43,480 --> 00:30:47,680
में बताए तो इसका मतलब वही है कि जिसको हमने

447
00:30:47,680 --> 00:30:51,720
सीमा में बांधा कुछ शब्दों की सीमा में जो कि हमको शास्त्रों से मिले

448
00:30:51,720 --> 00:30:55,760
हैं या उन शब्दों की सीमा या उस परिभाषा में जिसको

449
00:30:55,760 --> 00:30:59,760
हमने बांध दिया या जिस उसको परिभाषित किया गया

450
00:30:59,760 --> 00:31:03,960
वही ईश्वर हमारे अनुकरणीय है या हम उसी ईश्वर को वहार

451
00:31:03,960 --> 00:31:07,960
तौर पर ले सकते हैं का रूप ईश्वर

452
00:31:07,960 --> 00:31:12,440
नहीं ईश्वर का वह रूप अनुकरणीय जो वेदा शास्त्रों की सीमा में हो

453
00:31:12,440 --> 00:31:15,760
ईश्वर का वह रूप अनुकरणीय

454
00:31:15,760 --> 00:31:19,760
इसको आपको क्लियर कर दू अगर हम ईश्वर के बाकी के रूप को

455
00:31:19,760 --> 00:31:23,760
जानेंगे ही नहीं सभी नियम को तोड़ के रख देने वाला तो

456
00:31:23,760 --> 00:31:27,960
ईश्वर की ईश्वर सिद्ध नहीं होगी और जब ईश्वर की

457
00:31:27,960 --> 00:31:32,120
ईश्वर सिद्ध नहीं होगी तो उसके प्रति निष्ठा सिद्ध नहीं होगी जब निष्ठा

458
00:31:32,120 --> 00:31:36,320
सिद्ध नहीं होगी तो अज्ञानता का वो हरण कैसे होगा

459
00:31:36,320 --> 00:31:40,600
जब ईश्वर में मन ही नहीं लग रहा है मतलब ये है कि हम

460
00:31:40,600 --> 00:31:44,840
उसको सिद्ध करने के लिए ईश्वर को अपने शास्त्र की जो सीमा

461
00:31:44,840 --> 00:31:45,960
है उससे बाहर जाक

462
00:31:45,960 --> 00:31:50,160
भी उसको सिद्ध करेंगे वो सीमा से शास्त्र ने ही बताया

463
00:31:50,160 --> 00:31:54,800
है वो भी बताया है ईश्वर ने ईश्वर ने जब कहा वो अनंत

464
00:31:54,800 --> 00:31:58,880
है जब ईश्वर ने ये कह दिया वो अनंत है तो वो शास्त्र के बाहर भी

465
00:31:58,880 --> 00:32:03,200
ईश्वर है फिर ईश्वर ने कहा कि वो ऐसा ऐसा रूप लेते हैं

466
00:32:03,200 --> 00:32:07,600
ऐसा ऐसा करते हैं विष्णु रूप बताया शिव रूप बताया

467
00:32:07,600 --> 00:32:11,800
गणेश रूप बताया भगवती रूप बताया रूप लेते हैं

468
00:32:11,800 --> 00:32:16,000
कि वो वस्तुत वो निर्गुण है वो ना स्त्री है ना पुरुष है ना कुछ है देवी भागवत

469
00:32:16,000 --> 00:32:20,200
में आया कुछ नहीं है वो मगर वो सृष्टि की रचना करते समय

470
00:32:20,200 --> 00:32:24,320
ऐसा ऐसा रूप लेती है तो जो रूप बताए गए वो रूप

471
00:32:24,320 --> 00:32:28,560
हमारे लिए अनुकरणीय जैसे कि इसको ऐसे समझ लीजिए जैसे हम जानते हैं हनुमान जी जी को

472
00:32:28,560 --> 00:32:32,800
ठीक है हम हनुमान जी की व्याख्या है वाल्मीकि रामायण

473
00:32:32,800 --> 00:32:37,280
के अनुसार वो बाल ब्रह्मचारी थे ठीक हम तो इस तरीके से

474
00:32:37,280 --> 00:32:41,640
हनुमान जी का विवाह होना सिद्ध नहीं होता उनके द्वारा स्त्री

475
00:32:41,640 --> 00:32:45,640
का जो स्पर्श है स्त्री को स्त्री संघ उनके द्वारा सिद्ध

476
00:32:45,640 --> 00:32:49,680
नहीं होता मगर जब भगवान श्री कृष्ण ने विराट रूप

477
00:32:49,680 --> 00:32:53,720
दिखाया तो विराट रूप में एक मुख उनका बताया जाता है हनुमान जी का

478
00:32:53,720 --> 00:32:58,040
भी था यानी उन्होंने बताया मैं ही हनुमान हूं और

479
00:32:58,040 --> 00:33:00,960
अगर वही अनुमान है तो भगवान श्री कृष्ण ने तो स्त्रियों को

480
00:33:00,960 --> 00:33:05,280
छुआ स्त्री संग हुआ उनका य सिद्ध है तो फिर

481
00:33:05,280 --> 00:33:09,280
उस रूप में फिर बजरंग बली को भी हमें मानना पड़ेगा कि हां भाई स्त्री संग कर सकते

482
00:33:09,280 --> 00:33:13,600
हैं तो एक रूप हो गया वाल्मीकि रामायण के अनुसार निश्चित रूप

483
00:33:13,600 --> 00:33:17,960
कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार बजरंग बली जो है वोत्री गमन नहीं करते

484
00:33:17,960 --> 00:33:21,960
और एक रूप हो गया कि वो कुछ भी कर सकने वाले ईश्वर है वो कुछ भी कर सकते

485
00:33:21,960 --> 00:33:26,040
हैं तो अब क्या हुआ कि जो कुछ भी कर सकने वाला रूप है जब वो कुछ भी करेंगे

486
00:33:26,040 --> 00:33:30,080
जब वो हनुमान जी की सीमा के बाहर वाला हनुमान जी के ही रूप में आकर के जब वो करेंगे तो हम

487
00:33:30,080 --> 00:33:36,080
उनकी बात नहीं मानेंगे हम कहेंगे तुम हनुमान नहीं हो आप बहरूपिया

488
00:33:37,280 --> 00:33:41,400
का पालन नहीं करेंगे तो हम यह कहने लगेंगे कि आप हनुमान

489
00:33:41,400 --> 00:33:45,400
नहीं हो या फिर इतने अंश में हम आपको नहीं मानते जैसे बुद्ध बुद्ध भगवान

490
00:33:45,400 --> 00:33:49,400
विष्णु के अवतार माने गए यज्ञों की रक्षा के लिए उन्होंने वो बुद्ध

491
00:33:49,400 --> 00:33:53,600
अलग है जो गौतम बुद्ध वाले वो एक अलग चैप्टर खुल जाएगा

492
00:33:53,600 --> 00:33:57,760
मगर जो सिद्धार्थ जो इनके बौद्धों के जो

493
00:33:57,760 --> 00:34:01,800
बुद्ध है वो अलग है मगर जो हमारे बुद्ध है विष्णु भगवान

494
00:34:01,800 --> 00:34:06,000
के अवतार जिनको माना गया तो विष्णु भगवान के अवतार ने यज्ञों की रक्षा

495
00:34:06,000 --> 00:34:10,520
के लिए यज्ञों में अनाधिकृत व्यक्तियों को दूर हटाने के लिए व अवतार लिया

496
00:34:10,520 --> 00:34:14,720
तो जब उन्होंने यज्ञों का खंडन किया उतने अंश में तो लोगों ने उनको

497
00:34:14,720 --> 00:34:18,840
नकार दिया उनको भगवान माना मगर उनको नकार दिया ना तो उनको

498
00:34:18,840 --> 00:34:23,560
फॉलो किया ना ही हम लोग उनको उस तरह से लेते जैसे राम कृष्ण आदि को लेते हैं

499
00:34:23,560 --> 00:34:27,760
तो ऐसे ही हनुमान जी के रूप में ही ईश्वर अगर हनुमान जी के विरुद्ध

500
00:34:27,760 --> 00:34:32,200
आचरण करने लगेंगे तो क्योंकि रामायण है जो उसके अनुसार वाल्मीकि

501
00:34:32,200 --> 00:34:36,280
वो बाल ब्रह्मचारी है तो हमारे लिए ग्रहण करने योग्य क्या हुआ हनुमान जी तो

502
00:34:36,280 --> 00:34:40,280
यही है व्यवहारिक हनुमान जी यही है व्यवहार

503
00:34:40,280 --> 00:34:44,680
और परमार्थ का यही अंतर है परमार्थ से कुछ भी कर सकने वाले हैं व्यवहारिक

504
00:34:44,680 --> 00:34:48,800
हनुमान जी जी बताए तो क्या हम इनको

505
00:34:48,800 --> 00:34:52,600
जो हमारा असली जो ईश्वर है जो असली भगवान है जिसको कि अनलिमिटेड

506
00:34:52,600 --> 00:34:56,720
बोला गया कि कुछ भी करने में सक्षम है और जो सब कण कण में है

507
00:34:56,720 --> 00:35:00,720
तो क्या हम इन को एक छाया के तौर पर ले रहे हैं एक तरह से

508
00:35:00,720 --> 00:35:04,840
उनकी छाया जैसे या चित्र जैसे भगवान का मान ले उस तौर

509
00:35:04,840 --> 00:35:09,280
पर हम इसको ले रहे हैं कुछ लिमिटेशन के साथ कुछ लिमिटेशन

510
00:35:09,280 --> 00:35:13,280
के साथ आपका प्रश्न क्लियर नहीं हो रहा है हां मैं ये

511
00:35:13,280 --> 00:35:17,680
कहना चाह रहा हूं कि भगवान तो अनंत है भगवान अनंत

512
00:35:17,680 --> 00:35:21,680
है उनको किसी शब्द की सीमा में किसी

513
00:35:21,680 --> 00:35:25,800
तस्वीर के तौर पर बनाकर या किसी तरह से उसको बांधा नहीं जा सकता हम या बांध

514
00:35:25,800 --> 00:35:29,920
के उसको समझा नहीं सकते वो अनंत है यही आप कहना चाह रहे हैं और जो

515
00:35:29,920 --> 00:35:34,000
हम आकार देख रहे हैं जो कि हमारे श्री राम जी के तौर पर

516
00:35:34,000 --> 00:35:38,400
जो आए थे श्री के न अनंत तक पहुंचने

517
00:35:38,400 --> 00:35:42,640
का रास्ता बताया कि व्यक्ति की जो मूल

518
00:35:42,640 --> 00:35:46,800
इच्छा है वह खुद है अनंत हो जाने की असतो मा सद

519
00:35:46,800 --> 00:35:50,840
गम तमसो मा जति गम मृत मतम गम व्यक्ति

520
00:35:50,840 --> 00:35:54,840
की जो मूल इच्छा है जीव की चाह का मूल इच्छा ही यही है कि मैं अनंत हो

521
00:35:54,840 --> 00:35:59,440
जाऊ चित सच्चित आनंद सत का मतलब

522
00:35:59,440 --> 00:36:03,840
जिसमें कभी बदलाव ना आए सनातन सत्य हो शाश्वत सत्य हो चित

523
00:36:03,840 --> 00:36:07,840
जहां पर कहीं खंडन ना हो ऐसा कुछ ना हो जो मुझे ना पता हो और

524
00:36:07,840 --> 00:36:11,880
आनंद ऐसा आनंद जिसकी कोई सीमा ना हो जो कभी खत्म ना हो बूढ़ा

525
00:36:11,880 --> 00:36:16,320
ना हो यह ना हो तो व्यक्ति की मूल इच्छा तो यही है कि वो वो हो जाए

526
00:36:16,320 --> 00:36:20,440
मगर उसके लिए जैसे धरती पर गिरा हुआ व्यक्ति धरती का ही सहारा

527
00:36:20,440 --> 00:36:24,560
लेकर के खड़ा होता है तो उसी तरीके से

528
00:36:24,560 --> 00:36:29,040
भेद का निर्वाह करते ही अभेद की होती है

529
00:36:29,040 --> 00:36:33,280
तो यह जो अनंतता वाला ईश्वर है यह व्यवहारिक नहीं है

530
00:36:33,280 --> 00:36:37,440
यह व्यवहारिक नहीं है यह अनंतता वाला ईश्वर वेदा आदि शास्त्रों

531
00:36:37,440 --> 00:36:41,440
के द्वारा आपके लिए व्यवहारिक होने बनाया जाता है या अब

532
00:36:41,440 --> 00:36:45,520
यह जो जैसे अज्ञानता कहा गया यह सब अज्ञान है तो वेद भी

533
00:36:45,520 --> 00:36:49,680
तो अज्ञान हो गए एक कुतर्क आता है यह आता है इसन

534
00:36:49,680 --> 00:36:54,320
की तरफ से कि भाई वेद भी तो अज्ञान हो गया हां हो गया

535
00:36:54,320 --> 00:36:59,040
मगर यह वेद का वो रूप है जो ब्रिज का काम कर सकता है

536
00:36:59,040 --> 00:37:03,120
जैसे कि यह अज्ञानता का व रूप है जो हमारे लिए

537
00:37:03,120 --> 00:37:07,320
ब्रिज का काम करेगा हमको इससे बाहर ले जाने वाली माया है माया

538
00:37:07,320 --> 00:37:11,440
माया यह भी है अविद्या यह भी है क्योंकि इसमें हमें दिखाई दे रही है

539
00:37:11,440 --> 00:37:15,600
मगर यह हमारे क्या कहते हैं

540
00:37:15,600 --> 00:37:20,000
माया का वो रूप है जो माया को कनेक्ट करेगा अविद्या को कनेक्ट करेगा

541
00:37:20,000 --> 00:37:22,920
विद्या से इसको ऐसे समझ लीजिए जैसे

542
00:37:22,920 --> 00:37:27,120
कि पृथ्वी गोल है बाहर से देखिए सेटेलाइट के द्वारा

543
00:37:27,120 --> 00:37:31,200
तो गोल है मगर हम लोग खुद अपनी आंखों से देखें कोई भी

544
00:37:31,200 --> 00:37:35,360
बय तरीके से ना देखे तो पृथ्वी चपटी है हम लोग उसके साथ चपटे पन का व्यवहार करते

545
00:37:35,360 --> 00:37:39,560
हैं अब हमारा हमारा उद्देश्य है कि हमको जो है यहां से मुक्त

546
00:37:39,560 --> 00:37:43,720
होना है पृथ्वी की गोलाई को देखना है तो कैसे देखेंगे

547
00:37:43,720 --> 00:37:48,160
हम कोई सेटेलाइट बनाएंगे स्पेसशिप बनाएंगे कि हम पृथ्वी की गोलाई को देख सके

548
00:37:48,160 --> 00:37:52,240
ठीक है वह जो सेटेलाइट बना रहे हैं हम उस

549
00:37:52,240 --> 00:37:56,440
सेटेलाइट को बनाते समय हम किसका सहारा ले रहे

550
00:37:56,440 --> 00:38:00,640
हैं पृथ्वी की गोलाई का या चपटे पन का धरती का

551
00:38:00,640 --> 00:38:04,800
धरती चपटी है उसी साती धरती के चपटे पन का जब हम वो बना रहे

552
00:38:04,800 --> 00:38:08,800
होंगे सेटेलाइट गाड़ी चलाएंगे मोटरसाइकिल चलाएंगे तो चपटे पन का ही सहारा लेंगे जबकि

553
00:38:08,800 --> 00:38:12,800
चपटा पन तो गलत था मगर उसका सहारा लिया तो ये जो चपटा पन जिसका

554
00:38:12,800 --> 00:38:16,800
हम सेटेलाइट के लिए उपयोग कर पा रहे हैं ये ब्रिज का काम कर रहा है स्पेसशिप

555
00:38:16,800 --> 00:38:20,880
का काम कर रहा है तो इसी तरीके से जो अनंत ईश्वर है

556
00:38:20,880 --> 00:38:25,080
वो हमारे लिए व्यावहारिक नहीं है वेदा आदि शास्त्रों के द्वारा वो व्यावहारिक होता है

557
00:38:25,080 --> 00:38:29,320
जिससे कि उसका निर्वाह करके उस अनंतता वा ईश्वर को प्राप्त कर सके

558
00:38:29,320 --> 00:38:33,360
जी अब मैं कहूंगा कि आप कुछ अपना अगर वैचारिक मतभेद हो तो

559
00:38:33,360 --> 00:38:37,360
उसको रखें वरना मैं आपको कहूंगा कि आप क्लास में देखिए मुझे मुझे

560
00:38:37,360 --> 00:38:37,960
ऐसा लगता है

561
00:38:37,960 --> 00:38:42,080
कि आप वैचारिक मतभेद की बारबार बात करके वो

562
00:38:42,080 --> 00:38:46,560
क्योंकि लोगों को इंटरेस्ट आता है थोड़ा लड़ाई में मैं

563
00:38:46,560 --> 00:38:50,760
नहीं लड़ाई की बात नहीं हैय हमने एक सिस्टम बनाया है कि यदि आपको कोई

564
00:38:50,760 --> 00:38:55,200
जिज्ञासा है तो आप क्लास में आए अगर आपत्ति या असहमति है तो यहां

565
00:38:55,200 --> 00:38:59,200
अब वो मर्यादा जो है भंग हो रही है देखिए क्या होता

566
00:38:59,200 --> 00:39:03,440
क्या है मुझे आपका नहीं पता हालाकि मुझे आपका रूल नहीं पता कि आपका नियम

567
00:39:03,440 --> 00:39:07,480
क्या है कि आप किस नियम से आपने जो फम भरा था उस फॉर्म का नाम

568
00:39:07,480 --> 00:39:11,720
क्या था उसम जो आपने फॉर्म

569
00:39:11,720 --> 00:39:15,880
भरा था उस फॉर्म का नाम क्या था उस फम

570
00:39:15,880 --> 00:39:19,920
फम मुझे अ याद नहीं हैद निम उसका नाम

571
00:39:19,920 --> 00:39:23,600
था वैचारिक मतभेद के निमित्त

572
00:39:23,600 --> 00:39:27,680
चर्चा क्योंकि अभी तक तो मैं आपके विचार से सहमत हूं जहां

573
00:39:27,680 --> 00:39:32,000
पर मुझे ल अब आप देखिए मैं काफी कुछ बोल चुका हूं

574
00:39:32,000 --> 00:39:36,800
और अब आप अपना अगर कोई मतभेद है तो वो प्रस्तुत

575
00:39:36,800 --> 00:39:41,360
करें मैं वही कहने जा रहा हूं आपको जी तो

576
00:39:41,360 --> 00:39:45,400
आपने बताया कि मैं आपसे जो पूछ रहा था म मतभेद ही था मेरा वो आप

577
00:39:45,400 --> 00:39:50,000
मतभेद मान के चल सकते हो उसको कि ईश्वर अनंत है प्रूव

578
00:39:50,000 --> 00:39:53,000
हो चुका है आप भी बता रहे मैं मान चुका हूं

579
00:39:53,000 --> 00:39:57,040
कि ईश्वर अनंत है भगवान अनंत है उसकी कोई सीमा नहीं है हर कण

580
00:39:57,040 --> 00:40:01,120
कण में वो बसा हुआ है आपने बोला कि वो व्यावहारिक तौर पर

581
00:40:01,120 --> 00:40:05,120
आता है अवतार के रूप में आपने ये कहा तो

582
00:40:05,120 --> 00:40:09,280
क्या मैं इन अवतार जो अवतार हुए हैं चाहे उसका कोई भी नाम दे दे

583
00:40:09,280 --> 00:40:13,920
हनुमान जी अगर मान लो या शिव जी श्री कृष्ण जी या

584
00:40:13,920 --> 00:40:17,920
श्री राम जी जो भी अवतार हुए हैं क्या मैं इनको एक उनकी छाया

585
00:40:17,920 --> 00:40:22,000
मान के चलू या पूर्णतः एक तरह से पूर्ण भगवान

586
00:40:22,000 --> 00:40:26,080
के तौर पर मान के चलू ये मैं मैं बताता हूं

587
00:40:26,080 --> 00:40:30,720
मैं बताता हूं देखिए पहली बात तो येय आ जाती है

588
00:40:30,720 --> 00:40:34,720
समझ गया आपका क्वेन क्या है बहुत अच्छा क्वेन बहुत अच्छा क्वेश्चन है मैं समझ

589
00:40:34,720 --> 00:40:38,840
गया अब देखिए पहली बात य आ जाती है कि अभी जैसे मैंने आकाश

590
00:40:38,840 --> 00:40:43,280
का उदाहरण दिया था बिल्कुल आकाश का उदाहरण दिया था

591
00:40:43,280 --> 00:40:47,400
तो उसमें खिड़की है खिड़की अब जो खिड़की

592
00:40:47,400 --> 00:40:51,400
के साइज से जो आकाश लिख रहा है वह पूर्ण तो है नहीं हा

593
00:40:51,400 --> 00:40:56,040
पूर्ण आकाश तो कुछ और है खिड़की से तो उसका केवल एक अंश दिख रहा है

594
00:40:56,040 --> 00:41:00,160
तो अब हम उसे माने कि ना माने ये आर समाज की तरफ

595
00:41:00,160 --> 00:41:04,920
से कुतर्क आ सकता है ये वाला ये आता है एक जगह किया भी था कमेंट

596
00:41:04,920 --> 00:41:08,440
हा तो अब यहां यह बात आती है कि यदि

597
00:41:08,440 --> 00:41:12,960
ईश्वर दुनिया में कुछ भी कर रहा है तो व पूर्ण ईश्वर ने किया ही नहीं

598
00:41:12,960 --> 00:41:17,200
है ईश्वर ने पृथ्वी बनाई मान लीजिए

599
00:41:17,200 --> 00:41:21,440
ईश्वर ने पृथ्वी बनाई ईश्वर ने पृथ्वी बनाई

600
00:41:21,440 --> 00:41:25,440
तो उसने क्या किया भाई मिट्टी के कण इधर उधर एक मोटा मोटा बोल

601
00:41:25,440 --> 00:41:29,600
रहा हूं मिट्टी के कण इधर उधर आकाश गंगा में टल रहे

602
00:41:29,600 --> 00:41:34,360
ठीक है ईश्वर ने अपने निश्चित अनुपात

603
00:41:34,360 --> 00:41:38,520
को कंट्रोल करते हुए उसकी रचना की अगर जो

604
00:41:38,520 --> 00:41:42,600
सर्वव्यापक ईश्वर है वह हरकत करता उसको संगठित करने के लिए

605
00:41:42,600 --> 00:41:46,640
तो क्या हो पाता सब जगह एक ही जैसी प्रक्रिया होती तो

606
00:41:46,640 --> 00:41:50,800
एक निश्चित आकार में पृथ्वी बन पाती तो क्या हम यह माने कि पृथ्वी को पूर्ण ईश्वर

607
00:41:50,800 --> 00:41:54,880
ने नहीं बनाया हा क्योंकि ईश्वर अपनी इच्छा

608
00:41:54,880 --> 00:41:59,040
से अपने आप को कंट्रोल करके आपको दिख रहा है इसलिए उसको

609
00:41:59,040 --> 00:42:04,320
पूर्ण मानना मानना पड़ेगा ये पूर्ण

610
00:42:04,320 --> 00:42:08,560
है हा दस दूसरा तर्क ले लेते दूसरा तर्क

611
00:42:08,560 --> 00:42:13,920
ले लेते हैं मैं अपनी बात खत्म कर लू तब आप बोलिएगा दूसरा तर्क ले लेते

612
00:42:13,920 --> 00:42:17,960
कि पृथ्वी के साथ जब पृथ्वी चपटी नहीं है

613
00:42:17,960 --> 00:42:22,920
तो हम उसके साथ चपटे पन का व्यवहार जो कर रहे होते हैं

614
00:42:22,920 --> 00:42:27,360
वो यह समझ के कर रहे होते हैं कि पृथ्वी गोल है या चपटी करके

615
00:42:27,360 --> 00:42:31,600
समझ के कर रहे होते हैं हमको मालूम है पृथ्वी गोल है मगर

616
00:42:31,600 --> 00:42:35,920
जब हम उसके साथ व्यवहार कर रहे होते हैं तो हमारी निष्ठा उसके चपटे पन में होती है

617
00:42:35,920 --> 00:42:40,160
या गोल में होती है देखिए जब मैं यहां

618
00:42:40,160 --> 00:42:44,200
पर बैठा हूं अभी मैं एक चपटी धरती पर बैठा हूं कक इसका इतना

619
00:42:44,200 --> 00:42:48,280
हिस्सा तो हमें यह मालूम होते हुए भी हमें यह मालूम होते

620
00:42:48,280 --> 00:42:52,360
हुए भी कि वस्तुतः पृथ्वी गोल है हमारी निष्ठा उसके चपटे बद

621
00:42:52,360 --> 00:42:56,440
में है हमारे हमें ये मालूम होते हुए हमारे

622
00:42:56,440 --> 00:43:00,840
मान यही तो बात है व्यवहार और परमार्थ यही बात है यही जनजन को पहुंचाना

623
00:43:00,840 --> 00:43:04,840
है तो हमारे को मालूम है कि वास्तविकता का स्वरूप क्या है

624
00:43:04,840 --> 00:43:08,880
पृथ्वी का मगर पृथ्वी के उस स्वरूप तक पहुंचने के लिए हमको पृथ्वी

625
00:43:08,880 --> 00:43:13,200
के इस स्वरूप में अपनी निष्ठा को लाना होगा तो सत्य क्या क्या करें तो

626
00:43:13,200 --> 00:43:17,480
उसके लिए कहा गया अचिंत जान ले मगर

627
00:43:17,480 --> 00:43:19,640
अब उसका चिंतन मत कर अब

628
00:43:19,640 --> 00:43:23,720
उसके बारे में मत सोच क्योंकि अगर सोचेगा तो तेरा यहां का व्यवहार बिगड़ने

629
00:43:23,720 --> 00:43:28,200
लगेगा जानना इसलिए आवश्यक है जिससे कि की सर्व सामर्थ

630
00:43:28,200 --> 00:43:32,400
पता चले जानना इसलिए आवश्यक है कि पृथ्वी का गोलाई का पता नहीं लगेगा

631
00:43:32,400 --> 00:43:36,680
तो तुम उसे प्राप्त करने की आवश्यकता क्या रहेगी तो आवश्यकता है

632
00:43:36,680 --> 00:43:41,080
मगर व्यवहार में उसे नहीं लाना यही दिक्कत होती है कई बार लोग कहते हैं अरे मैं भी ब्रह्म

633
00:43:41,080 --> 00:43:45,080
तू यह हमारा व्यवहारिक सत्य नहीं है मैं भी ब्रह्म हूं त भी ब्रह्म

634
00:43:45,080 --> 00:43:49,160
है यह प्राप्ति का विषय है यह प्राप्त करना है अभी तो यही है कि

635
00:43:49,160 --> 00:43:53,240
राम जी अलग है जब यहां व्यवहार में हम लोग इसको मान के जैसे

636
00:43:53,240 --> 00:43:58,360
नैनम चिंति सण नैनम दती पावक ना चैनले

637
00:43:58,360 --> 00:44:03,480
मारता आत्मा को कोई नहीं कुछ कर सकता आत्मा का टॉपिक हो जाएगा

638
00:44:03,480 --> 00:44:07,480
अभी मैं आपको उदाहरण ही दे रहा हूं मैं आपको उदाहरण दे रहा हूं अपने टॉपिक

639
00:44:07,480 --> 00:44:11,480
से मैं जाऊंगा नहीं चिंता मत करिए तो क्या हुआ आत्मा को कोई कुछ

640
00:44:11,480 --> 00:44:15,760
नहीं कर सकता यह सच्चाई है कोई कुछ नहीं कर सकता हमारा मौलिक स्वरूप

641
00:44:15,760 --> 00:44:19,920
आत्मा ही है फिर भी अभी हमारी और कोई थप्पड़ घुमाएगा तो हमारी पलक

642
00:44:19,920 --> 00:44:24,040
झपके गी तो क्या हुआ कि आत्मा की वो जो सच्चाई है

643
00:44:24,040 --> 00:44:28,240
वो प्राप्त करना है आपको वहां तक आपको पहुंचना फिलहाल

644
00:44:28,240 --> 00:44:32,960
आपको वह चीज आपने थ्योर कली जान ली है मगर अभी आत्मसात नहीं हुआ है

645
00:44:32,960 --> 00:44:34,640
तो अभी आत्मसात करने

646
00:44:34,640 --> 00:44:38,680
तक की जो यात्रा है उस दौरान आपको डर भी लगेगा आपकी पलक झपके

647
00:44:38,680 --> 00:44:42,760
गी आपकी अगर कोई घुसा मारेगा तो वह सब चीजें आपके साथ होंगी उसी

648
00:44:42,760 --> 00:44:46,760
प्रकार से जो भगवान का जो वो वाला स्वरूप है उस

649
00:44:46,760 --> 00:44:50,760
तक पहुंचने के लिए भगवान के जोय स्वरूप है जो वेदा श शास्त्रों की

650
00:44:50,760 --> 00:44:54,840
सीमा में है उनका अनुकरण आवश्यक है मगर यह भी नहीं कह सकते कि उस रूप को जानो

651
00:44:54,840 --> 00:44:59,000
ही मत जानेंगे नहीं तो इधर करण क्यों करेंगे यही

652
00:44:59,000 --> 00:45:03,000
यही दुनिया में जो धर्म और अधर्म को लेकर के

653
00:45:03,000 --> 00:45:07,080
या धर्म और विधर्मी बने ईश्वर को लेकर के इतनी सारी जो कवायत है इस

654
00:45:07,080 --> 00:45:12,000
व्यवहार और परमार्थ को ना जानने के चक्कर में है डायमेंशन यही

655
00:45:12,000 --> 00:45:16,040
इसी बात प मैं आ रहा था आपके पास इस डायमेंशन की सच्चाई ये है कि आप

656
00:45:16,040 --> 00:45:20,360
उस डायमेंशन तक पहुंचो ग ही तभी जब इस डायमेंशन में आप जो

657
00:45:20,360 --> 00:45:24,920
है अपने इस यहां की जो निष्ठा है पूर्ण निष्ठा लगाओ

658
00:45:24,920 --> 00:45:29,240
जी अब मान लो कि मुझे कोई कहता है मुझसे कोई पूछता

659
00:45:29,240 --> 00:45:33,280
है कि धरती चपटी है या गोल है मुझसे

660
00:45:33,280 --> 00:45:37,360
किसी ने पूछा कि धरती चपटी है या गोल है या इसी तरह से मान के चलो कि मुझसे किसी

661
00:45:37,360 --> 00:45:41,360
ने पूछा ईश्वर अनंत निराकार है या भाई साहब आप यहां

662
00:45:41,360 --> 00:45:45,400
फिर जिज्ञासा प आ रहे हैं आप विरोध बताइए जिज्ञासा नहीं है जिज्ञासा नहीं

663
00:45:45,400 --> 00:45:49,520
आप मेरी पूरी बात सुन ले फिर मैं आपसे पूछ आप इसका जवाब देना कि

664
00:45:49,520 --> 00:45:50,020
मुझसे

665
00:45:49,920 --> 00:45:54,440
किसीने पूछ मैं मैं आपका प्रश्न पूछ आप प्रश्न कर लीजिए फिर मैं बोलूंगा

666
00:45:54,440 --> 00:45:58,600
हां तो अगर मैं उसको ये बोलता हूं कि नहीं भाई धरती चपटी

667
00:45:58,600 --> 00:46:02,600
है गोल नहीं है तो क्या मैं मूर्ख साबित नहीं हुआ क्या मैं अज्ञानी

668
00:46:02,600 --> 00:46:06,720
साबित नहीं हुआ उसने इसी तरह से दूसरा सवाल पूछ लिया क्या

669
00:46:06,720 --> 00:46:10,840
भगवान निराकार और अनंत और निराकार है तो मैं उसको

670
00:46:10,840 --> 00:46:15,080
बोलू कि नहीं वो साकार है तो क्या मैं उसमें अज्ञानी साबित नहीं हुआ

671
00:46:15,080 --> 00:46:19,200
क्या मैं सामने वाले को भ्रमित नहीं कर रहा हूं क्या मैं सामने वाले को

672
00:46:19,200 --> 00:46:22,440
भी अपना अज्ञान नहीं दे रहा

673
00:46:22,440 --> 00:46:26,560
हूं पहली बात तो ये है मैं आपके प्रश्न का उत्तर दे दूं

674
00:46:26,560 --> 00:46:30,760
कि जो अज्ञान आप दे रहे हो मैं वही तो बोल रहा हूं जो अज्ञान

675
00:46:30,760 --> 00:46:35,120
आप दे रहे हो वो अज्ञानता ब्रिज का काम कर रही है आपको यहां से मुक्ति दिलाने में

676
00:46:35,120 --> 00:46:39,120
सहायक ठीक है क्योंकि उस अज्ञानता के ब्रिज के बिना

677
00:46:39,120 --> 00:46:43,280
आप वहां से बाहर ही नहीं निकल सकते दूसरी बात ये है कि मैंने अभी आपको

678
00:46:43,280 --> 00:46:48,160
कहा कि पृथ्वी जो है गोल आपको चपटे का ही अनुसरण करना है आपने मुझे मूर्ख कहा

679
00:46:48,160 --> 00:46:52,400
क्या आपने मुझे मूर्ख समझा क्या आपको सुनो आप

680
00:46:52,400 --> 00:46:56,400
आपने क्या किया मैं बताऊ आपने जो प्रश्न किया है वो एक अंश पर प्रश्न

681
00:46:56,400 --> 00:47:00,680
किया है आप पूरा बताइए ना आदमी को वस्तुतः पृथ्वी गोल है मगर

682
00:47:00,680 --> 00:47:04,960
यहां पर उसकी गोलाई से अपने दिमाग को हटाना है तुझे और उसकी चपटे

683
00:47:04,960 --> 00:47:09,320
पन पर आपको ध्यान केंद्रित करना है जिससे कि तू गोल तक पहुंच

684
00:47:09,320 --> 00:47:13,520
पाएगा वस्तुत प गोल है मगर तुम्हें अपना ध्यान

685
00:47:13,520 --> 00:47:18,080
लगाना है यहां इस पर लगाना है जिससे कि तू उस तक पहुंच सके

686
00:47:18,080 --> 00:47:22,080
वस्तुतः जो ईश्वर है वो अनंत सामर्थ वान है अनंत है वो व्यवहार

687
00:47:22,080 --> 00:47:26,280
में नहीं आ सकता है मगर तुझे अपना ध्यान लगाना है व्यवहार में आ सकने वाले

688
00:47:26,280 --> 00:47:30,320
रूप के ऊपर जो व्यवहार में आ सके

689
00:47:30,320 --> 00:47:34,680
तभी तू उस तक पहुंच पाएगा तो आप उसको एक लाइन नहीं बताएंगे आप

690
00:47:34,680 --> 00:47:38,840
उसको पूरा बताएंगे उदाहरण देंगे तरह-तरह के पृथ्वी की गोलाई

691
00:47:38,840 --> 00:47:42,880
का एक उदाहरण देंगे या फिर मृत्यु का उदाहरण देंगे वस्तुत तुझे मर जाना

692
00:47:42,880 --> 00:47:47,400
है वस्तुत एक दिन तुझे मर जाना है मरेगा निश्चित

693
00:47:47,400 --> 00:47:51,560
है मगर अभी तुझे निष्ठा रखनी है अभी तुझे निष्ठा रखनी

694
00:47:51,560 --> 00:47:57,040
है अपने जीवन पर यहां

695
00:47:57,040 --> 00:48:01,680
होगी हा हा अब ये कि मान लो कि मैं

696
00:48:01,680 --> 00:48:06,000
अब अब अब मैं अब मैं आपसे प्रश्न करूंगा आप मुझे बताए

697
00:48:06,000 --> 00:48:10,000
आपके अनुसार ईश्वर साकार है या निराकार अब ये

698
00:48:10,000 --> 00:48:14,000
बताइए देखिए क्योंकि अब यहां पर

699
00:48:14,000 --> 00:48:18,120
जो डेफिनेशन की बात है आपने बोला अब मैं आपको बताता

700
00:48:18,120 --> 00:48:20,000
हूं कि बता भी नहीं रहा एक

701
00:48:20,000 --> 00:48:24,080
तरह से इसको आप अज्ञानता मान सकते हो मेरी ठीक है पहली तो बात

702
00:48:24,080 --> 00:48:28,480
यह है कि आप जैसे की द्वैतवाद और की बात हुई है

703
00:48:28,480 --> 00:48:32,520
दत अद्वैत है हम लोग आगे चलेंगे हम

704
00:48:32,520 --> 00:48:36,680
लोग आगे चलेंगे पहले आप एक जो हेडलाइन है वह क्लियर

705
00:48:36,680 --> 00:48:41,400
करें आपके अनुसार ईश्वर निराकार है या साकार है वो बताए

706
00:48:41,400 --> 00:48:45,560
देखिए मेरे अनुसार या किसी के भी अनुसार

707
00:48:45,560 --> 00:48:49,840
ईश्वर जो है वह निराकार है अनंत है असीमित है

708
00:48:49,840 --> 00:48:54,160
उसकी कोई सीमा नहीं है और यह भी मेरे अनुसार

709
00:48:54,160 --> 00:48:58,600
है कि जब उसकी कोई सीमा नहीं है जब उसका कोई आकार नहीं है वो निराकार

710
00:48:58,600 --> 00:49:02,840
है वो कण कण में व्यापत है व आप में भी है वो मुझ में भी

711
00:49:02,840 --> 00:49:06,960
है मुझ में भी है मगर वो मेरी अज्ञानता की वजह से

712
00:49:06,960 --> 00:49:10,960
मैं उसको नहीं देख पा रहा हूं उसको मैं समझ नहीं रहा पा रहा हूं उसकी क्रियाकलाप को

713
00:49:10,960 --> 00:49:15,080
मैं नहीं समझ पा रहा हूं इसलिए मुझे वो नहीं पता चल रहा उसका मैं

714
00:49:15,080 --> 00:49:19,360
अनुभव नहीं कर पा रहा हूं एक तरह से मैं उस उसके साथ

715
00:49:19,360 --> 00:49:23,520
उसका दर्शन नहीं कर पा रहा हूं तो ये है कि वो मेरी अज्ञानता

716
00:49:23,520 --> 00:49:28,040
की वजह से है जब बात आती है यह व्यवहारिक

717
00:49:28,040 --> 00:49:32,840
नहीं है व्यवहारिक सत्य नहीं है जैसे कि

718
00:49:32,840 --> 00:49:35,160
मैं पूछ मैं पूछ रहा हूं आपसे जैसे ईश्वर कण

719
00:49:35,160 --> 00:49:39,200
कण में है कहीं कोई भेद नहीं है फिर भी माता और पत्नी में भेद होगा

720
00:49:39,200 --> 00:49:43,400
कि नहीं करोगे कि नहीं करोगे तोय

721
00:49:43,400 --> 00:49:47,280
आपकी अज्ञानता है

722
00:49:47,280 --> 00:49:51,320
मिनट एक मिनट मिनट मैं आपसे य पूछ रहा हूं क्या माता

723
00:49:51,320 --> 00:49:56,000
और पत्नी में भेद करना को आप अज्ञानता मानोगे कि नहीं मानोगे

724
00:49:56,000 --> 00:50:00,120
व वो भेद दोनों में भेद है और आप जब

725
00:50:00,120 --> 00:50:04,680
तक आप जीव भाव को प्राप्त है मुक्त नहीं हो गए तब तक

726
00:50:04,680 --> 00:50:08,720
व्यवहारिक जो सत्य है वो यही है कि वो अज्ञानता नहीं है माता और पत्नी में

727
00:50:08,720 --> 00:50:13,000
भेद मानना और जब आप मुक्त हो जाएंगे तो माता पत्नी का भेद ही नहीं रह

728
00:50:13,000 --> 00:50:17,000
जाएगा फिर तो कुछ है ही नहीं नहीं

729
00:50:17,000 --> 00:50:21,080
आप बात अगर ये अज्ञानता अगर ये अज्ञानता है अगर

730
00:50:21,080 --> 00:50:25,360
इसको अज्ञानता कहेंगे कि ईश्वर अनंत है और जो है वो दिख रहा है या फिर

731
00:50:25,360 --> 00:50:29,760
पृथ्वी गोल है तो फिर यह भी अज्ञानता है कि माता और पत्नी

732
00:50:29,760 --> 00:50:34,840
एक नहीं है यह भी अज्ञानता है यह कहेगा क्या

733
00:50:34,840 --> 00:50:39,080
वो अब मैं आपको बताता हूं कि आपने बहुत

734
00:50:39,080 --> 00:50:43,080
बड़े जो कांसेप्ट था बहुत बड़ा कांसेप्ट में से एक छोटा सा उसका टुकड़ा

735
00:50:43,080 --> 00:50:47,520
आपने लेकर उसको सवाल बनाया एक जब ईश्वर

736
00:50:47,520 --> 00:50:51,080
अब ये होता क्या है कि

737
00:50:51,080 --> 00:50:55,080
हम मान रहे कि प्रकृति है और यह प्रकृति एक तरह से आवरण का

738
00:50:55,080 --> 00:50:59,560
मतलब मेरी जोा आप कहने का एक मिनट हम लोग अपना डिस्कशन

739
00:50:59,560 --> 00:51:03,680
क्लियर कर ले कि हम लोग कहां जा रहे हैं आपका कहने का अर्थ ये है कि

740
00:51:03,680 --> 00:51:07,760
जो पार मार्थी सत्य है केवल वही बताओ व्यावहारिक सत्य मत बताओ

741
00:51:07,760 --> 00:51:11,880
यही बात है ना दो अविद्या के अंदर

742
00:51:11,880 --> 00:51:16,560
की दुनिया के सत्य को ना बताओ परमार्थिक सत्य बताओ

743
00:51:16,560 --> 00:51:20,800
केवल आप जब बात कर रहे हैं जब आपने बात की माता और

744
00:51:20,800 --> 00:51:25,400
पत्नी की वो एक साभ अभी मैं कांसेप्ट क्लियर कर रहा हूं जिस पर हम डिस्कशन कर रहे हैं

745
00:51:25,400 --> 00:51:29,760
पारिक सत्य बताओ केवल जो व्यवहारिक

746
00:51:29,760 --> 00:51:33,800
सत्य मत बताओ परमार्थिक सत्य केवल व्यक्ति को बताया

747
00:51:33,800 --> 00:51:37,840
जाए बिल्कुल जब वो उसको ज्ञान होगा

748
00:51:37,840 --> 00:51:41,960
तो उसको हर चीज का उसको अच्छे बुरे

749
00:51:41,960 --> 00:51:47,240
गलत सबज की जानकारी होगी ठीक है ज्ञान होगा

750
00:51:47,240 --> 00:51:51,400
कैसे ज्ञान होगा कैसे वही जो मेरे मेरे

751
00:51:51,400 --> 00:51:55,520
ऊपर जो आवरण है मेरी बुद्धि के ऊपर जो आवरण है अज्ञानता का जब

752
00:51:55,520 --> 00:51:59,720
वो आवरण वहा से तो मेरे अरने हटाने के लिए

753
00:51:59,720 --> 00:52:03,760
वो आवरण हटाने के लिए आवरण वो आवरण

754
00:52:03,760 --> 00:52:07,320
हटाने के लिए उद्योग क्या किया

755
00:52:07,320 --> 00:52:11,600
जाएगा हा आपने कहा कि वो आवरण हटाने के लिए उद्योग क्या

756
00:52:11,600 --> 00:52:15,720
करें अब यहां पर मैं अपना उद्योग भी आपको बताऊंगा कि मेरा

757
00:52:15,720 --> 00:52:19,960
मैं क्या उद्योग करना चाहता हूं या मैं क्या कर रहा हूं या क्या करना चाहिए

758
00:52:19,960 --> 00:52:24,560
तो खैर मैं इसके लिए तो नहीं कहूंगा कि भाई क्योंकि मैं दूसरे को पाबंदी

759
00:52:24,560 --> 00:52:28,600
नहीं लगा सकता दूसरे के ऊपर उसको क्या करना चाहिए मगर य प वही

760
00:52:28,600 --> 00:52:32,680
है कि ये था कि अब टॉपिक भूल

761
00:52:32,680 --> 00:52:36,960
गया आपका उद्योग क्या आपने पूछा उद्योग क्या करना चाहिए उसके

762
00:52:36,960 --> 00:52:41,120
लिए चलो खैर इसी प आ जाते हैं अगर आपने यही सवाल पूछा है तो

763
00:52:41,120 --> 00:52:45,240
मैं जो करता हूं मैं क्योंकि दूसरे के बारे में नहीं कहूंगा गीता में जो

764
00:52:45,240 --> 00:52:49,400
बताया गया है जो कर्म की परिभाषा गीता में बताई गई है मैं

765
00:52:49,400 --> 00:52:53,520
उसको फॉलो करता हूं उसके उसम जो जैसा कि उसने बताया

766
00:52:53,520 --> 00:52:57,840
कि आप जाप ओम का करिए गीता को फॉलो करते

767
00:52:57,840 --> 00:53:02,160
हैं हां मैं उसको सही मानता हूं कि उसमें जो चीजें

768
00:53:02,160 --> 00:53:06,160
है वो सही बताई गई है और जब उसको मैं व्यावहारिक तौर पर भी

769
00:53:06,160 --> 00:53:10,360
लेता हूं और मेरी जो समस्याएं होती है जब मैं कभी समस्या

770
00:53:10,360 --> 00:53:14,600
में उलझता हूं या मुझे कभी संदेह होता है तो उन संदेह को भी

771
00:53:14,600 --> 00:53:18,680
वहां से मुझे निवारण मिल जाता है इसलिए खैर मुझे वो सही लगता है और

772
00:53:18,680 --> 00:53:22,440
मैं उसको मान के चलता य आपको क्लियर कर दूं एक बात आपको

773
00:53:22,440 --> 00:53:26,560
क्लियर कर दूं कि आपने पूछा था मुझसे कि

774
00:53:26,560 --> 00:53:31,440
अगर धरती गोल है और हम उसको चपटे पन के लिए बता रहे हैं गोलाई

775
00:53:31,440 --> 00:53:35,680
बताते हुए भी उसर ध्यान ना देने के लिए कह रहे हैं मैंने यह नहीं कहा था उसको बताना

776
00:53:35,680 --> 00:53:39,680
ही नहीं है आपने कहा तो क्या मैं अज्ञानी नहीं कहला आंगा अगर वो गोल है और मैं उसको

777
00:53:39,680 --> 00:53:43,680
कहू चपटी है मेरा उत्तर वहां पर क्या था मेरा उत्तर वहां पर ये

778
00:53:43,680 --> 00:53:48,040
था कि आप उसको बताएंगे कि गोल है मगर उस और ध्यान नहीं देना है तुझे

779
00:53:48,040 --> 00:53:52,320
तो आप अज्ञानी नहीं कहलाएंगे दूसरी बात ये है कि

780
00:53:52,320 --> 00:53:56,560
हां जीव की संज्ञा ही अज्ञानी है आप

781
00:53:56,560 --> 00:54:00,920
भी मानते हैं कि आप अज्ञानी है जब तक आप मुक्त नहीं हो गए आप भी अज्ञानी है तो हां

782
00:54:00,920 --> 00:54:04,960
उस रूप में अगर अज्ञानी की संज्ञा लग रही है हमारे ऊपर तो ज्ञानी है

783
00:54:04,960 --> 00:54:09,120
बिल्कुल है हम जीव है ही इसलिए कि हम अज्ञानी है

784
00:54:09,120 --> 00:54:13,120
कहीं से भी आप देख लीजिए कोई भी सेक्ट हो उसको देख लीजिए तो इसमें

785
00:54:13,120 --> 00:54:17,120
भी कोई आपत्ति नहीं है इस इसको इसको स्वीकार करने में कोई

786
00:54:17,120 --> 00:54:21,240
आपत्ति नहीं है कि पार मर्थक दृष्टि से ब्रह्म दृष्टि से मुक्त

787
00:54:21,240 --> 00:54:25,400
दृष्टि से हम लोग अज्ञानी है बिल्कुल है तो

788
00:54:25,400 --> 00:54:29,480
क्या हम अनी मगर जब बात आ जाती है व्यवहार के मगर जब

789
00:54:29,480 --> 00:54:33,920
बात आ जाती है व्यवहार के अंदर इसी डायमेंशन की तो हम अज्ञानी

790
00:54:33,920 --> 00:54:38,400
नहीं है अब मैं वही कह रहा हूं

791
00:54:38,400 --> 00:54:43,320
गीता को फॉलो कर रहे थे अब आप गीता को फॉलो कर रहे थे वो बताए

792
00:54:43,320 --> 00:54:47,440
हां ठीक है मैंने बता दिया कि जैसा कि उसम बताया गया वो करना है वो मैं करता

793
00:54:47,440 --> 00:54:51,640
हूं ठीक है और अब वही

794
00:54:51,640 --> 00:54:57,520
आपने कहा ईश्वर साकार नहीं मानता मैं निराकार है ठीक है

795
00:54:57,520 --> 00:55:01,720
आप अज्ञानी है या विद्वान है अज्ञानी के अकॉर्डिंग आपको

796
00:55:01,720 --> 00:55:06,000
मानना होगा ईश्वर साकार भी है निराकार भी है और विद्वान के मुक्त

797
00:55:06,000 --> 00:55:10,000
के अकॉर्डिंग आपको मालूम है कि ईश्वर क्या है तो आप मुक्त है कि व

798
00:55:10,000 --> 00:55:14,200
बंधे हुए हैं अभी भी अभी आपका स्टेटस क्या है देखिए

799
00:55:14,200 --> 00:55:18,520
अभी मैं स्टेटस की बात यह है कि जब

800
00:55:18,520 --> 00:55:22,640
तकने मुक्त है कि नहीं मैं चल रहा हूं राही हूं

801
00:55:22,640 --> 00:55:26,440
मुसाफिर हूं मंजिल

802
00:55:26,440 --> 00:55:30,440
मैं पूछ रहा हूं मुक्त है कि नहीं मुक्त नहीं यानी आप यानी आप

803
00:55:30,440 --> 00:55:34,920
अज्ञानी हैर मेरा वही है यानी आप अज्ञानी है अभी

804
00:55:34,920 --> 00:55:39,320
यानी आप अज्ञानी है तो आप अपने आप को अज्ञानी

805
00:55:39,320 --> 00:55:43,320
मानते हुए दुनिया में और सारी जितनी भी अज्ञानता एं है माता पत्नी

806
00:55:43,320 --> 00:55:47,600
का भेद अज्ञानता है पिता पुत्र का भेद अज्ञानता है यहां से मिलने

807
00:55:47,600 --> 00:55:51,680
वाली और सारी चीजें जो अज्ञानता ही है अज्ञानी स्वीकार करते

808
00:55:51,680 --> 00:55:53,480
हुए उन अज्ञानता को

809
00:55:53,480 --> 00:55:57,840
आप स्वीकार कर लेते हैं अपने जीवन में व्यवहारिक सत्य तौर पर

810
00:55:57,840 --> 00:56:02,000
मगर आपको भगवान के अवतार को स्वीकार करने में दिक्कत

811
00:56:02,000 --> 00:56:06,040
है पहली बात अब दूसरी बात में आ जाता हूं आप भगवत गीता को

812
00:56:06,040 --> 00:56:10,480
फॉलो करते हैं भगवत गीता आपके पास आई कहां

813
00:56:10,480 --> 00:56:14,560
कहां से आई देखो अभी मैं आपको बताऊ कि मेरा गुरु

814
00:56:14,560 --> 00:56:18,600
कौन है या क्या है वो एक तरह से दूसरा टॉपिक कन्वर्ट

815
00:56:18,600 --> 00:56:22,840
हो जाएगा उस क और अत्यंत आवश्यक है वो अत्यंत आवश्यक

816
00:56:22,840 --> 00:56:27,120
है एक बात तो ये हो गई कि आप जो है भता

817
00:56:27,120 --> 00:56:31,240
का अर्थ जो भी लेते हैं जो भी लेते हैं उसमें दोनों सत्य बताए गए व्यवहारिक

818
00:56:31,240 --> 00:56:35,280
और परमार्थिक उसमें दोनों सत्य बताए गए मगर आप केवल पार मर्थक सत्य को

819
00:56:35,280 --> 00:56:39,360
इसलिए पकड़ते हैं क्योंकि वहां पर आप मुक्त की दृष्टि से देख रहे हैं और

820
00:56:39,360 --> 00:56:43,520
बाकी की जिंदगी आप जी रहे हैं बाकी का जीवन जो आप निर्वाह कर रहे हैं वो अज्ञानी होते हुए

821
00:56:43,520 --> 00:56:47,800
कर रहे हैं सारे वेदों का निर्वाह कर रहे हैं केवल एक उस उस रूप में उसको

822
00:56:47,800 --> 00:56:51,840
नहीं स्वीकार करेंगे कि भगवान जो है अवतार ले सकता है केवल

823
00:56:51,840 --> 00:56:56,240
उसमें हम जो है ज्ञानी है उसमें हम अविद्या युक्त नहीं है जीव भाग

824
00:56:56,240 --> 00:57:00,320
प्राप्त नहीं है मुक्त हो गए उसमें हम उस तरीके से देखेंगे तो इसलिए अब मुझे कहना

825
00:57:00,320 --> 00:57:04,640
पड़ेगा कि अगर आप गीता को मानते हैं भगवत गीता को तो गीता

826
00:57:04,640 --> 00:57:07,440
आपके पास आई

827
00:57:07,440 --> 00:57:08,800
कैसे इस

828
00:57:08,800 --> 00:57:12,840
इस सवाल का अगर मैं जवाब देता हूं इस सवाल पर हम जाते हैं तो मैं वही

829
00:57:12,840 --> 00:57:17,480
आपको कह रहा हूं कि ये निरर्थक होगा यहां पे ये आपका सवाल भी कोई सार्थक नहीं है

830
00:57:17,480 --> 00:57:21,560
और नहीं इसका गीता में आपके अनुसार

831
00:57:21,560 --> 00:57:25,600
आप कह रहे हैं कि उन्होंने व्यवहार का सत्य नहीं पार मार्थी सत्य ही बताया

832
00:57:25,600 --> 00:57:30,080
यही कह रहे व्यवहारिक सत्य बताया कि नहीं बताइए

833
00:57:30,080 --> 00:57:35,040
यही इसीलिए वर की व्यवहार की जितने सवाल होते हैं

834
00:57:35,040 --> 00:57:39,040
में व्यवहारिक सत्य बताया है कि नहीं भगवान ने अपने दोनों प्रकार के रूप

835
00:57:39,040 --> 00:57:43,200
बताए नहीं वो व्यवहारिक सत्य भी है

836
00:57:43,200 --> 00:57:47,400
वो वाला नहीं भगवान ने जब अपने ब्रह्म की व्याख्या की तो दोनों ही तरीके

837
00:57:47,400 --> 00:57:52,120
के ब्रह्म को बताया ग नहीं पार मार्थी ब्रह्म और व्यवहारिक ब्रह्म

838
00:57:52,120 --> 00:57:56,400
पार मार्थी ईश्वर और वर पार मार्थी ब्रह्म और व्यवहारिक ईश्वर

839
00:57:56,400 --> 00:58:01,000
बताया कि नहीं नहीं आप उसम क्या कहना चाह

840
00:58:01,000 --> 00:58:05,000
रहे भगवान ने निर्गुण निराकार और सगुण साकार

841
00:58:05,000 --> 00:58:09,120
दोनों की व्याख्या की कि नहीं नहीं उन्होंने

842
00:58:09,120 --> 00:58:13,560
क्या वहां प मैं पूछ रहा हूं आपसे गीता के अनुसार

843
00:58:13,560 --> 00:58:17,640
भगवान ने निर्गुण निराकार और सगुण

844
00:58:17,640 --> 00:58:22,240
साकार दोनों की व्याख्या की कि नहीं की उसम यह बताइए

845
00:58:22,240 --> 00:58:24,000
वहां पर वो कहते हैं कि ध्यान

846
00:58:24,000 --> 00:58:28,200
मेरा दो देखिए अब आप बच रहे हैं इतनी देर से आप इंटेलेक्चुअल पर्सन

847
00:58:28,200 --> 00:58:33,120
की तरह कर रहे थे बहुत अच्छी चर्चा चल रही है अभी मैं आपसे पूछ रहा हूं उन्होने

848
00:58:33,120 --> 00:58:37,480
क्योंकि अब मुझे क् बताइए उन्होंने निराकार साकार

849
00:58:37,480 --> 00:58:42,200
दोनों की बात की है या केवल निराकार की बात की है गीता में

850
00:58:42,200 --> 00:58:46,200
आप जो है उस टॉपिक को अगर एक शब्द में बांधने की कोशिश करेंगे कि मैं

851
00:58:46,200 --> 00:58:50,720
एक शब्द आपको बोलूं तो वो सही नहीं रहेगा मैं एक शब्द में उस चीज को नहीं

852
00:58:50,720 --> 00:58:54,800
बता सकता आपको आप कह रहे हैं कि खाली उसने साकार और निराकार की बात की है तो

853
00:58:54,800 --> 00:58:59,760
एक शब्द से मैं उसको रामपाल जी को फॉलोअर है

854
00:58:59,760 --> 00:59:05,000
रामपाल जी के फॉलोअर है नहीं बिल्कुल नहीं है रामपाल

855
00:59:05,000 --> 00:59:09,440
जी वो मैंने आपको पहले बता दिया था कि मैं फॉलोअर किसी का नहीं हूं

856
00:59:09,440 --> 00:59:13,760
स्टिल डेट आज तक कि बुलाना शबद

857
00:59:13,760 --> 00:59:18,120
शबद जब आपने बोला तो उससे पता चला यह भाषा जो है रामपाल जी के फॉलोअर्स

858
00:59:18,120 --> 00:59:22,600
की होती है चलो वो उनकी हो सकती है रामपाल

859
00:59:22,600 --> 00:59:26,640
को आप ठीक नहीं मानते रामपाल को आप ठीक नहीं मानते

860
00:59:26,640 --> 00:59:30,720
रामपाल के बारे में जानते हैं कि नहीं रापा बाद में कर बाद में कर लेंगे बात अभी

861
00:59:30,720 --> 00:59:34,800
आपने सवाल पूछा एक चीज क्लियर पूछ लू रामपाल जी को आप मानते

862
00:59:34,800 --> 00:59:39,080
हैं कि नहीं मानते हैं नहीं वो इतना झूठ तो कोई नहीं बोलता खैर

863
00:59:39,080 --> 00:59:43,080
जितना झूठ वो बोलते हैं और जितने झूठी उनकी प्रचार तंत्र जो है वो

864
00:59:43,080 --> 00:59:47,120
चलता है शायद ही कहीं प दुनिया में इतना बड़ा झूठ कभी देखने

865
00:59:47,120 --> 00:59:51,160
को मिला हो इतना बड़ा झूठ च अलग

866
00:59:51,160 --> 00:59:55,400
चीज है चलिए आपने पूछा साकार या निराकार साकार

867
00:59:55,400 --> 00:59:59,560
मैं ये पूछ रहा हूं क्री कृष्ण जी ने

868
00:59:59,560 --> 01:00:04,120
जब श्री कृष्ण जी अर्जुन को बता रहे हैं कि भाई मुझे तुम ध्यान मेरा दो

869
01:00:04,120 --> 01:00:08,120
तो इसका मतलब व साकार रूप में श्री कृष्ण जी अर्जुन के सामने है तो

870
01:00:08,120 --> 01:00:12,240
आप य कहना चाहते कि वह साकार है क्योंकि मैं गीता को फॉलो कर रहा हूं गीता जो है मैंने

871
01:00:12,240 --> 01:00:16,520
आपसे प्रमाण मांगा ही नहीं मैं आपसे सिर्फ यह बोल रहा हूं आपके

872
01:00:16,520 --> 01:00:20,520
जानकारी में गीता में साकार और निराकार दोनों की बात

873
01:00:20,520 --> 01:00:24,840
है या केवल निराकार की बात है बस ये बताइए दोनों

874
01:00:24,840 --> 01:00:28,960
की बात है दोनों की बात है बात तो फिर साकार

875
01:00:28,960 --> 01:00:33,480
से आपत्ति क्यों है मैं वही आपको बताना चाहता

876
01:00:33,480 --> 01:00:37,840
ये तो व्यक्ति की यह तो व्यक्ति की क्षमता के ऊपर है उन्होंने कहा उसमें जो अव्यक्त

877
01:00:37,840 --> 01:00:42,280
की पूजा करते हैं उनका जीवन बहुत कठिन होता है तो व्यक्ति की क्षमता के ऊपर है उसका अव्यक्त

878
01:00:42,280 --> 01:00:46,360
में मन लग पा रहा है भैया उसका वो कठिन नहीं है जीवन मगर दिक्कत

879
01:00:46,360 --> 01:00:50,680
निराकार ना होने से नहीं निराकार होने से दिक्कत नहीं है दिक्कत साकार

880
01:00:50,680 --> 01:00:54,360
के ना होने से जब कोई कहता है साकार है ही नहीं वहां दिक्कत है

881
01:00:54,360 --> 01:00:58,440
निराकार की आप पूजा करो कोई दिक्कत आपका मन अगर निराकार में लग

882
01:00:58,440 --> 01:01:02,480
पा रहा है आप जीवन का कठिन कठिनाई आपको नहीं हो रही तो करो मगर

883
01:01:02,480 --> 01:01:06,560
आप यह मत कहो कि साकार है ही नहीं तो हम फिर वहा

884
01:01:06,560 --> 01:01:11,080
पर बात आ जाएगी तो फिर बचार म आपके साथ

885
01:01:11,080 --> 01:01:15,160
य है मेरा व बक्शन यह है कि वहा पर मैं मान रहा कि व

886
01:01:15,160 --> 01:01:19,320
साकार रूप में अर्जुन को बता रहे हैं मगर उस साकार रूप में व जन्म ले रहे

887
01:01:19,320 --> 01:01:23,360
हैं ये ऑब्जेक्शन है कि वो जन्म लेंगे

888
01:01:23,360 --> 01:01:27,800
मान ईश्वर जो है जन्म नहीं ले

889
01:01:27,800 --> 01:01:32,000
यहा यही बात क रहा गीता का अ आपने गीता का अर्थ आपने

890
01:01:32,000 --> 01:01:36,520
ये निकाला ठीक है मैंने यही कहा

891
01:01:36,520 --> 01:01:40,880
जो इसके अलावा और भी कुछ शास्त्र पढ़े

892
01:01:40,880 --> 01:01:44,880
आपने नहीं मैं अभी वही बात क रहा हूं कि आपने पढ़े हुए हैं आप

893
01:01:44,880 --> 01:01:50,120
मुझे बताइए मैं आपकी हर बात को मानने के लिए तैयार हूं वो

894
01:01:50,120 --> 01:01:54,480
में लिखा है कि ईश्वर जो है गर्भ के मध्य में विचर

895
01:01:54,480 --> 01:01:58,720
है यद्यपि अजन्मा अविनाशी है फिर भी वह नाना

896
01:01:58,720 --> 01:02:03,080
अपनी माया द्वारा नाना प्रकार के रूप बनाता है जब यह संसार माया

897
01:02:03,080 --> 01:02:07,240
है जब यह संसार माया है और हमारे

898
01:02:07,240 --> 01:02:09,400
लिए संसार सत्य है तो

899
01:02:09,400 --> 01:02:13,480
हमारे लिए ईश्वर का जन्म होना साकार होना सब कुछ सिद्ध हो जाता है और

900
01:02:13,480 --> 01:02:17,560
जो ईश्वर जो है अनंत जो उसका व्यवहार में ना

901
01:02:17,560 --> 01:02:21,640
आ सकने वाला रूप है वो मुक्त की दृष्टि से है क्योंकि अभी हमें जीव

902
01:02:21,640 --> 01:02:26,040
भाव प्राप्त है क्योंकि अभी हमारी पलक झपक रही है मारने पर क्योंकि हमा

903
01:02:26,040 --> 01:02:30,280
अंदर भय है सब कुछ है जीव जीव भाव को हम प्राप्त है तो हमारी

904
01:02:30,280 --> 01:02:34,320
जो सच्चाई है वो यही है कि ईश्वर यहां पर आकर के जन्म भी ले सकता है कुछ भी कर

905
01:02:34,320 --> 01:02:38,400
सकता है यही सच्चाई है व्यवहारिक सत्य यही है

906
01:02:38,400 --> 01:02:42,520
तो आपका कहना है कि गीता में गीता के अनुसार भगवान जन्म

907
01:02:42,520 --> 01:02:46,520
नहीं लेते हैं सनातन शास्त्रों के अनुसार भगवान जन्म नहीं लेते

908
01:02:46,520 --> 01:02:50,760
हैं आपका तो आप जानते हैं शास्त्रों के अनुसार

909
01:02:50,760 --> 01:02:55,120
तो आप आपका वो है मैं शास्त्र के अनुसार नहीं बोल रहा हूं बोल

910
01:02:55,120 --> 01:02:59,160
क्या गीता बोल रहे वो क्या है अपना मत बताया है गीता बोल

911
01:02:59,160 --> 01:03:03,360
रहे वो क्या मानना बताया है गीता के अनुसार बताया

912
01:03:03,360 --> 01:03:07,520
आपने आपने गीता के अनुसार बताया ना कि गीता में जन्म लेना

913
01:03:07,520 --> 01:03:11,520
सिद्ध नहीं होता गीता के अनुसार क्योंकि श्री कृष्ण

914
01:03:11,520 --> 01:03:15,840
अर्जुन के सामने है वो उस टाइम प सकार रूप में है इसलिए गीता के अ

915
01:03:15,840 --> 01:03:20,560
पूछ रहा हूं गीता के अनुसार ईश्वर का जन्म लेना सिद्ध नहीं होता है ना

916
01:03:20,560 --> 01:03:24,520
नहीं जन्म लेना सिद्ध होता तो अब आपने इसका मतलब

917
01:03:24,520 --> 01:03:29,440
यह कहा कि सनातन शास्त्रों के अनुसार ईश्वर का जन्म लेना सिद्ध नहीं

918
01:03:29,440 --> 01:03:33,560
होता यह आपकी डेफिनेशन हो सकती है कि आप शास्त्रों के अनुसार उसको नहीं मानते गता

919
01:03:33,560 --> 01:03:37,920
शास्त्र नहीं है गीता के अनुसार

920
01:03:37,920 --> 01:03:42,120
ये जन्म लेना सिद्ध नहीं होता तो शास्त्र के अनुसार जन्म लेना सिद्ध

921
01:03:42,120 --> 01:03:46,160
नहीं होता ठीक बिल्कुल शास्त्र आपके

922
01:03:46,160 --> 01:03:50,320
पास आए कहां से ये ये जो आपका

923
01:03:50,320 --> 01:03:54,480
मैं वही कह रहा हूं कि आप मेरे सामने हैं मैं शिवांश जी को जान

924
01:03:54,480 --> 01:03:58,760
रहा हूं और मैं आपके सामने हूं आप मांग राम को जान रहे हैं ठीक है

925
01:03:58,760 --> 01:04:03,120
मैं अपने ज्ञान के तौर पर बात कर रहा हूं आप आपके अपने ज्ञान

926
01:04:03,120 --> 01:04:07,320
र पर बा देखिए मैं आपको काउंटर करने का मैं आपकी किसी बात

927
01:04:07,320 --> 01:04:11,440
पर आपत्ति होने का अधि मैं आपकी

928
01:04:11,440 --> 01:04:16,560
किसी बात पर आपत्ति करने का अधिकारी हूं या

929
01:04:16,560 --> 01:04:20,600
नहीं मैं आपकी किसी बात का विरोध कर सकता हूं यहां पर

930
01:04:20,600 --> 01:04:24,960
कि नहीं आपत्ति जता सकता हूं कि नहीं बिल्कुल बिल्कुल

931
01:04:24,960 --> 01:04:29,040
बिल्कुल बिल्कुल तो अब मैं आपसे इसीलिए आपत्ति जताने के लिए आपसे पूछ रहा

932
01:04:29,040 --> 01:04:33,200
हूं जिन शास्त्रों का अर्थ आप ये बता रहे हैं कि उसके अनुसार

933
01:04:33,200 --> 01:04:38,760
वो जन्म नहीं लेता है यह शास्त्र आपके आसपास आप तक आए कहां

934
01:04:38,760 --> 01:04:39,760
से

935
01:04:39,760 --> 01:04:43,800
अय मैं इसलिए इस सवाल का जवाब ये आपका

936
01:04:43,800 --> 01:04:48,000
सवाल भी सार्थक नहीं है ना ही मेरा जवाब देना इसके लिए सही है ये आप ये आप

937
01:04:48,000 --> 01:04:52,280
मत करिए मैंने मैंने आपका कोई भी सवाल ये नहीं कहा ये मत

938
01:04:52,280 --> 01:04:56,920
करिए आपके हर सवाल को लिया और उसको कहा नहीं नहीं

939
01:04:56,920 --> 01:05:01,040
आपे ब कर आप यहां प विषयात कर रहे हैं

940
01:05:01,040 --> 01:05:07,040
नहीं विषयात नहीं कर रहा होगा

941
01:05:07,200 --> 01:05:11,360
अभरा मुझे केवल आप मुझे बताइए जिन शास्त्रों का अर्थ

942
01:05:11,360 --> 01:05:15,600
आप ये बता रहे हैं कि ईश्वर अवतार नहीं लेता व शास्त्र आप तक

943
01:05:15,600 --> 01:05:19,840
आए कहां से सिर्फ मैं अभी सवाल पर रहना

944
01:05:19,840 --> 01:05:25,840
चाहता हूं कि साकार निराकार मैंने कहा कि श्री कृष्ण

945
01:05:25,840 --> 01:05:29,840
से किसी चीज को काउंटर कर सकते थे काउंटर करने के लिए कहा मैं भगवत गीता को फॉलो

946
01:05:29,840 --> 01:05:34,600
करता हूं भगवत गीता के अनुसार ईश्वर जन्म नहीं लेता

947
01:05:34,600 --> 01:05:38,800
आपने कहा कि नहीं कहा कहा ना देखो इसमें टाइम

948
01:05:38,800 --> 01:05:42,840
खराब होगा और जो अरे तो आपने आप अपनी बात

949
01:05:42,840 --> 01:05:46,880
से हट रहे हैं सु ठीक है कोई बात नहीं मैं ये कह रहा हूं कि जो

950
01:05:46,880 --> 01:05:50,960
आप सवाल आपका जो सवाल है और उसका जो जवाब है उससे

951
01:05:50,960 --> 01:05:55,000
क्या होगा कि हम यहां से हट के जो हमारा सवाल जवाब था उससे हट के हम कहीं

952
01:05:55,000 --> 01:05:59,000
दूर चले भाई साहब जब आप प्रमा जब आप प्रमाण को लाकर के बात कर

953
01:05:59,000 --> 01:06:03,080
रहे हैं तो मैं आपसे प्रमाण की वेरिफिकेशन पूछूं कि ना

954
01:06:03,080 --> 01:06:07,240
पूछूं नहीं मैं प्रमाण की बात कर ही नहीं रहा हूं कहां प मैंने

955
01:06:07,240 --> 01:06:11,280
मैंने बोला कि अब बात सुनिए मेरी पूरी बात सुन

956
01:06:11,280 --> 01:06:16,120
लीजिए आप एक बार फिर बताइए कि मैंने प्रमाण क्या दिया है गीता में से किस शलोक का प्रमाण दिया

957
01:06:16,120 --> 01:06:20,200
आप पूरी बात सुन लीजिए जो

958
01:06:20,200 --> 01:06:24,280
गीता प्लीज मुझे प्लीज आप प्रमाण की बात मत करिए आपको

959
01:06:24,280 --> 01:06:28,280
कहां पर तर्क के द्वारा मेरी बात पे आपत्ति जतानी है वो जताए हां

960
01:06:28,280 --> 01:06:32,480
हां तरक की बात कर रहा हूं मैं तो मैंने ये कहा कि

961
01:06:32,480 --> 01:06:36,640
वहां पे सवाल जवाब अर्जुन और श्री कृष्ण का सवाल जवाब हो रहा है

962
01:06:36,640 --> 01:06:40,800
ठीक है क्योंकि प्रमाण फिर आप प्रमाण ले आए अब

963
01:06:40,800 --> 01:06:41,300
मैं

964
01:06:41,080 --> 01:06:45,080
अब मैं इसको लाइव को बंद करूंगा या तो आप बताएं कहां से आए या

965
01:06:45,080 --> 01:06:49,120
फिर हम लोग बंद करेंगे हो गया नहीं अच्छा आप सिर्फ इतना जानना चाह रहे हैं कि मेरी

966
01:06:49,120 --> 01:06:53,160
नजर में क्या है मैं बता देता हूं आपको नहीं आप काउंटर करिए आपकी नजर जानने

967
01:06:53,160 --> 01:06:57,240
के लिए हम नहीं बैठे हैं आप काउंटर करिए आप मेरी कही

968
01:06:57,240 --> 01:07:01,960
हुई बात को काटिए तर्क पर से काट

969
01:07:01,960 --> 01:07:06,040
मैंने यही कहा कि साकार किस परिस्थिति में है

970
01:07:06,040 --> 01:07:10,360
और वो निराकार क्यों है जब तक इन

971
01:07:10,360 --> 01:07:14,360
जबतक जब तक हम इंसान है जब तक हम क्या कहते हैं जीव

972
01:07:14,360 --> 01:07:18,760
भाव को प्राप्त है तब तक भगवान साकार निराकार सब कुछ

973
01:07:18,760 --> 01:07:23,160
है तो आप ये कहना चा रहे हम इस जन्म में मनुष्य

974
01:07:23,160 --> 01:07:27,280
शरीर में हम कभी नहीं जान पाएंगे कि वो निराकार है क्या

975
01:07:27,280 --> 01:07:31,280
आप ये कह मनुष्य शरीर में हम नहीं जान पाएंगे ये

976
01:07:31,280 --> 01:07:35,520
कब थिकली तो देखिए मिशन है मिशन है

977
01:07:35,520 --> 01:07:39,640
उसको आत्मसात करना जान तो गए हैं अब उस तक पहुंचना वो

978
01:07:39,640 --> 01:07:43,640
जो मिशन है उसको प्राप्त करना उस स्थिति तक पहुंचना

979
01:07:43,640 --> 01:07:48,560
वो है मिशन मनुष्य जन्म का जान तो थ्योर कली गए

980
01:07:48,560 --> 01:07:53,600
क्या क्या वो लक्ष्य क्या वो मैं इस जन्म में नहीं प्राप्त कर

981
01:07:53,600 --> 01:07:57,000
सकता आप जो

982
01:07:57,000 --> 01:08:01,040
मैं बता रहा हूं आपको जो लक्ष्य प्राप्त करने के बाद आपका ये शरीर जो

983
01:08:01,040 --> 01:08:05,160
है वो तो अज्ञानता है तो लक्ष्य प्राप्त करने का

984
01:08:05,160 --> 01:08:09,320
मतलब ही यह है कि यह शरीर का वो अस्तित्व नहीं रहा वो उपाधि नहीं रही

985
01:08:09,320 --> 01:08:13,480
तो ये दोनों का एक जैसे वंद पुत्र जैसे बंध्या पुत्र होती है

986
01:08:13,480 --> 01:08:17,960
पुत्र होता है बंध्या पुत्र का मतलब पुत्र हो जाने का मतलब ही है कि

987
01:08:17,960 --> 01:08:21,960
जिसकी वो संतान है वो बंध्या नहीं है तो बन्या नहीं होता और बंद और

988
01:08:21,960 --> 01:08:26,000
अगर बंद है तो पुत्र नहीं संभव है तो यदि आप मो प्राप्त

989
01:08:26,000 --> 01:08:30,520
कर पा रहे तो आपको आपके जो शरीर से प्राप्त होने वाले जो वो है व्यवहारिक

990
01:08:30,520 --> 01:08:35,000
सत्ता वो नहीं रहेगी और अगर व्यवहारिक सता है तो आप मुक्त नहीं

991
01:08:35,000 --> 01:08:39,120
है तो आप ये कहना चा सुनि देखि

992
01:08:39,120 --> 01:08:43,440
मेरी बात सुनिए हमको यहां पर जिज्ञासा के लिए नहीं आए हैं आप या तो काउंटर

993
01:08:43,440 --> 01:08:48,000
करिए काउंटर करिए बात

994
01:08:48,000 --> 01:08:51,000
गल

995
01:08:51,000 --> 01:08:55,600
सवा आपने कहा इस शरीर में रहते हुए

996
01:08:55,600 --> 01:08:59,800
मेरा वो सवाल है सवाल तो काउंटर कर रहा हूं मैं काउंटर का मतलब थोड़ कोई य

997
01:08:59,800 --> 01:09:03,840
झगड़ा करूंगा आपके साथ मेरा सवाल ही होगा ना उसे काउंटर करूंगा मैं आपको

998
01:09:03,840 --> 01:09:09,520
आपने कहा कि शरीर में रहते हुए मैं कभी

999
01:09:09,520 --> 01:09:13,560
जाने बहुत सारे सवाल कर लिए मैंने बहुत सारे जवाब आपको दिए अब

1000
01:09:13,560 --> 01:09:17,640
आपके अनुसार ईश्वर निराकार है अब आप मेरे सवालों के जवाब दीजिए मैंने

1001
01:09:17,640 --> 01:09:21,640
बहुत सारे सवालों के जवाब दीजिए अब आपके अनुसार ईश्वर जो है निराकार

1002
01:09:21,640 --> 01:09:26,560
है अब मेरे सवालों का जवाब आप दीजिए ठीक है बताइए

1003
01:09:26,560 --> 01:09:31,200
आप पूछिए तो अब ये

1004
01:09:31,200 --> 01:09:35,200
बताइए कि आपके अनुसार ईश्वर

1005
01:09:35,200 --> 01:09:40,720
निराकार है तो क्या वह सर्व सामर्थ वान है

1006
01:09:40,720 --> 01:09:45,560
बिल्कुल वो सर्व समर्थन है सब कुछ कर सकता है

1007
01:09:45,560 --> 01:09:50,400
उसके ऊपर किसी भी प्रकार का नियम है या नहीं है

1008
01:09:50,400 --> 01:09:54,400
कोई नियम नहीं है नहीं है तो वो जन्म ले सकता है

1009
01:09:54,400 --> 01:09:57,800
कि नहीं

1010
01:09:57,800 --> 01:10:02,000
क्यों नहीं ले सकता ले सकता कह रहे जब सुनो सुनो

1011
01:10:02,000 --> 01:10:06,880
मेरी बात सुनिए आपने कहा कि कण कण में है ठीक है ना

1012
01:10:06,880 --> 01:10:11,040
केवल इतना बता हम आगे बढ़ेंगे इसका मतलब ईश्वर साकार भी हो सकता है ईश्वर

1013
01:10:11,040 --> 01:10:15,400
केवल निराकार नहीं है पारिक दृष्टि से ईश्वर

1014
01:10:15,400 --> 01:10:20,320
केवल निराकार है व्यवहारिक दृष्टि से ईश्वर साकार भी हो सकता है जन्म भी ले सकता

1015
01:10:20,320 --> 01:10:24,560
है बात सुनिए जन्म इंसान लेगा जन्म इंसान

1016
01:10:24,560 --> 01:10:29,280
लेता है जब वो जन्म लेता है तब वो भगवान नहीं है

1017
01:10:29,280 --> 01:10:33,720
तब वो भगवान नहीं है जन्म सिर्फ इंसान लेगा भगवान

1018
01:10:33,720 --> 01:10:37,760
कभी जन्म नहीं लेगा ना ही उसको कभी जन्म लेने की जरूरत है

1019
01:10:37,760 --> 01:10:41,760
ना ही वो कभी अपने मनोरंजन के लिए जन्म लेगा क्योंकि

1020
01:10:41,760 --> 01:10:45,840
उसको मनोरंजन करने की कोई जरूरत नहीं किसलिए मनोरंजन करेगा बताए मुझे ईश्वर

1021
01:10:45,840 --> 01:10:49,400
ने सृष्टि बनाई क्यों

1022
01:10:49,400 --> 01:10:53,560
है जब मेरा सृष्टि बनाने का प्लान बनेगा तब मैं

1023
01:10:53,560 --> 01:10:57,720
इस सवाल का जवाब दूंगा कि आपको बनाई कभ

1024
01:10:57,720 --> 01:11:02,200
तो आपका प्लान है सट बनाने सट बनाई क्यों है

1025
01:11:02,200 --> 01:11:06,200
मैं ये कह रहा हूं कि ना तो मेरा सृष्टि बनाने का प्लान है ना आपका बनाने का भी कोई

1026
01:11:06,200 --> 01:11:10,280
प्लान है बनाने का सवाल बहुत आगे का सवाल है

1027
01:11:10,280 --> 01:11:14,520
अरे भाई आप क रहे कि ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है जन्म लेने

1028
01:11:14,520 --> 01:11:18,520
की हा ईश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है जन्म लेने की

1029
01:11:18,520 --> 01:11:23,280
तो मैं आपसे पूछ रहा हूं कि ईश्वर ने सृष्टि क्यों बनाई

1030
01:11:23,280 --> 01:11:27,480
देखिए एक स्टेडियम है सृष्टि को आप एक स्टेडियम मान के चल सकते

1031
01:11:27,480 --> 01:11:31,520
हो और इस स्टेडियम के अंदर हम हम जो आत्माएं हैं इस

1032
01:11:31,520 --> 01:11:35,680
स्टेडियम में खिलाड़ी हैं वह भगवान

1033
01:11:35,680 --> 01:11:40,160
खुद रेफरी है यहां पर हम जो कर रहे हैं

1034
01:11:40,160 --> 01:11:44,600
जैसा कर रहे हैं वह खेल है

1035
01:11:44,600 --> 01:11:48,600
तो यह इस तरह से है इसमें बाकी इस सवाल का जवाब

1036
01:11:48,600 --> 01:11:52,680
जो सृष्टि की रचना क्यों की कैसे की यह

1037
01:11:52,680 --> 01:11:56,680
कोई एक तरह से प्रैक्टिकल ना तो सवाल है और नहीं स कोई जवाब

1038
01:11:56,680 --> 01:12:00,800
देने की इतनी कोई जरूरत है ये एक मतलब मैं जब क्वेश्चन

1039
01:12:00,800 --> 01:12:04,560
करू तो वो जवाब देने की जरूरत नहीं है

1040
01:12:04,560 --> 01:12:10,560
ईश्वर ने सृष्टि की रचना करने के लिए क्या ईश्वर को आवश्यकता

1041
01:12:10,800 --> 01:12:15,200
थी मैं वही कह रहा हूं कि यहां परता

1042
01:12:15,200 --> 01:12:19,240
थी नहीं ी आवश्यकता थी कि नहीं थी भाई कैसे जान सकता हूं

1043
01:12:19,240 --> 01:12:23,520
आवश्यकता थी या नहीं थी सृष्टि रचाने की तो इसका मतलब

1044
01:12:23,520 --> 01:12:27,600
आपकी जानकारी में नहीं है कि ईश्वर आवश्यकता के बाहर काम करता

1045
01:12:27,600 --> 01:12:32,560
है कि नहीं करता है जन्म नहीं लेगा

1046
01:12:32,560 --> 01:12:36,680
जम लेने की बात की बात है वो वो बात की बात है आपकी जानकारी

1047
01:12:36,680 --> 01:12:41,880
में नहीं है कि ईश्वर आवश्यकता के बिना काम करता है कि नहीं करता है ये पक्का नहीं

1048
01:12:41,880 --> 01:12:46,120
है देखिए ईश्वर ऐसा कोई काम नहीं करेगा

1049
01:12:46,120 --> 01:12:50,280
जिस क्लियर कट तो कुछ करेंगे ही नहीं यही तो होता है यही प्रॉब्लम

1050
01:12:50,280 --> 01:12:52,920
होती

1051
01:12:52,920 --> 01:12:57,080
है कोई ईश्वर ईश्वर ऐसा

1052
01:12:57,080 --> 01:13:01,160
कोई काम ऐसा कोई काम कभी नहीं करेगा कि मुझे इस चीज

1053
01:13:01,160 --> 01:13:05,560
की जरूरत नहीं है तब भी ईश्वर कोई काम करे क्योंकि उसको कोई

1054
01:13:05,560 --> 01:13:09,960
मनोरंजन ने वेदों में अलंकार क्यों लगाया

1055
01:13:09,960 --> 01:13:14,400
वो आर्य स माजियो से पूछना आप आपके अनुसार वेदों में अलंकार

1056
01:13:14,400 --> 01:13:18,400
नहीं है मैं नहीं जानता वो मेरा

1057
01:13:18,400 --> 01:13:19,640
वो एरिया नहीं है

1058
01:13:19,640 --> 01:13:23,840
उसका मैं कोई नहीं जब आप जानते नहीं है भाई ईश्वर ने

1059
01:13:23,840 --> 01:13:28,080
इस दु चलिए ठीक है आपके अनुसार भगवत गीता आदि को ईश्वर ने हमारी

1060
01:13:28,080 --> 01:13:32,200
मुक्ति के लिए दिया है बिल्कुल उसमें जो जो चीजें

1061
01:13:32,200 --> 01:13:36,240
बताई है आप उनको फॉलो करेंगे आप मुक्त हो जाएंगे मुक्ति के लिए दिया है अब मुझे

1062
01:13:36,240 --> 01:13:40,400
बताइए कि ईश्वर ने वो जो ज्ञान है हमारे मन में फिट क्यों नहीं किया किताब

1063
01:13:40,400 --> 01:13:44,480
के रूप में क्यों लाना पड़ रहा है हां आपने पूछा

1064
01:13:44,480 --> 01:13:48,520
कि भाई मन में फिट क्यों नहीं किया किताब के रूप में क्यों आया

1065
01:13:48,520 --> 01:13:52,680
जो मोक्ष है जो ज्ञान है वो

1066
01:13:52,680 --> 01:13:56,880
कमाया जाता है आप अगर ज्ञान कमा ज्ञान कमाओ

1067
01:13:56,880 --> 01:14:00,960
सुनो ज्ञान कमाओ चलो मैं मान लू उसको भी मैं देख लूंगा कि ज्ञान

1068
01:14:00,960 --> 01:14:05,400
क्यों नहीं दिया डायरेक्ट क्यों कमाया जाए इसकी क्या आवश्यकता है

1069
01:14:05,400 --> 01:14:09,480
आपको मानना पड़ेगा कि ये खेल है जो उसका दृष्टा ईश्वर है जब तक

1070
01:14:09,480 --> 01:14:13,640
नहीं मानोगे जब तक नहीं मानोगे कि उसने अच्छाई बुराई दोनों बनाई ज्ञान

1071
01:14:13,640 --> 01:14:17,640
और अज्ञान दोनों बनाया यहां का तो तब तक जा

1072
01:14:17,640 --> 01:14:22,160
रहा हूं कि ईश्वर की जो गीता है उसको आप समझिए मत

1073
01:14:22,160 --> 01:14:26,160
उसके मंत्रों को रट के तो जन्म लीजिए ज्ञान जो

1074
01:14:26,160 --> 01:14:30,640
उसके अंदर छुपा है वह आप प्राप्त करिए जैसे कि

1075
01:14:30,640 --> 01:14:35,120
हमको अगर पानी की जरूरत है तो पानी की प्यास के साथ हम जन्म लेते हैं

1076
01:14:35,120 --> 01:14:39,720
हमको किसी को बताना नहीं पड़ता कि आपको पानी की आवश्यकता है

1077
01:14:39,720 --> 01:14:43,800
तो ऐसे ही गीता के जो श्लोक है वह श्लोक रटे

1078
01:14:43,800 --> 01:14:48,240
रटा हमने क्यों नहीं जन्म लिया क्यों उसको किताब के रूप में ही दे रहा

1079
01:14:48,240 --> 01:14:52,640
है क्या आवश्यकता है उसको किताब की क्योंकि वो

1080
01:14:52,640 --> 01:14:57,160
र जो उनका अर्थ है मैं फिर क कह रहा हूं जो उनका गुण रहस्य

1081
01:14:57,160 --> 01:15:01,160
है उसके लिए चलो मैंने आपकी बात अभी रख ली ये भी दुर्जन तोष ने आय

1082
01:15:01,160 --> 01:15:05,200
है मैं आपकी बात थोड़ी देर के लिए रख रहा हूं मगर मैंने आपकी बात रख ली थोड़ी

1083
01:15:05,200 --> 01:15:09,360
देर के लिए कि ईश्वर का ईश्वर जो ज्ञान है उसको

1084
01:15:09,360 --> 01:15:13,360
जो है वो कमाया जाता है ठीक है मगर मैं कह रहा हूं ज्ञान वो

1085
01:15:13,360 --> 01:15:17,520
कमाए ईश्वर को उसको जो गीता के श्लोक जो रटे रटा हैं उनको

1086
01:15:17,520 --> 01:15:21,720
वो समझने जाए किसी के पास कहीं से समझे किसी का भाष्य पढ़े

1087
01:15:21,720 --> 01:15:26,120
मगर जो श्लोक है वो रटे रटा क्यों नहीं जन्म लिए उसने क्या आवश्यकता

1088
01:15:26,120 --> 01:15:30,560
है उसको किताब की यही मैं कह रहा हूं कि किसी भी

1089
01:15:30,560 --> 01:15:34,720
कोई भी ग्रंथ चाहे मैं गीता को मान रहा हूं और गीता को फॉलो कर रहा

1090
01:15:34,720 --> 01:15:38,920
हूं कोई भी ग्रंथ कोई भी किताब

1091
01:15:38,920 --> 01:15:43,080
या कोई इंसान उसको पूरी तरह से परिभाषित नहीं करता

1092
01:15:43,080 --> 01:15:46,240
हां हमें उनको

1093
01:15:46,240 --> 01:15:50,600
प सुनिए मैं बता रहा हूं इसको मैं बता रहा हूं इसको परिभाषित

1094
01:15:50,600 --> 01:15:56,560
इसलिए नहीं करता है क्योंकि वह प्राप्त करने का विषय है व

1095
01:15:56,560 --> 01:16:00,600
यही मैं कहा तो जो व्यवहार का विषय है उस तरीके से ईश्वर की जो

1096
01:16:00,600 --> 01:16:04,720
व्याख्या की जा सकती है वो मैंने आपको बताई अब आप अगर यह कहोगे कि ईश्वर

1097
01:16:04,720 --> 01:16:08,800
जो है जन्म नहीं ले सकता मैंने आपसे जैसे पूछा तो आप इसलिए कह रहे

1098
01:16:08,800 --> 01:16:12,880
हो कि ईश्वर आवश्यकता के बाहर जो है कोई कार्य नहीं करता फिर मैंने पूछा कि वो श्लोक

1099
01:16:12,880 --> 01:16:16,920
को रटा रटा क्यों नहीं देता है वो जो है सृष्टि की रचना क्यों करता है तो

1100
01:16:16,920 --> 01:16:21,120
मुझे नहीं पता मुझे नहीं पता तो हो गया अब क्या बताऊ आपसे

1101
01:16:21,120 --> 01:16:25,200
भाई आपकी जानकारी में भी नहीं है कि ईश्वर आवश्यक

1102
01:16:25,200 --> 01:16:29,240
के बिना कोई कार्य करता है कि नहीं तो आप यह क्यों कह रहे नहीं

1103
01:16:29,240 --> 01:16:33,680
करता जन्म व लेगा आपकी मर्जी समझते रहे

1104
01:16:33,680 --> 01:16:37,720
अभी आप आपसे अगर बात होगी ना ज्यादा तो आप पहले तो सनातनी सिद्ध

1105
01:16:37,720 --> 01:16:42,040
नहीं होंगे आपको मैं बताऊ पहले आप सनातनी सि आपको

1106
01:16:42,040 --> 01:16:46,160
बात बता बता रहा क्या क्या होगा

1107
01:16:46,160 --> 01:16:50,560
आपने अगर मुझसे 10 प मिनट और बात बता दी तो पहले आप सनातनी

1108
01:16:50,560 --> 01:16:54,960
सिद्ध नहीं होंगे वेदों को मानने वाले अरे भाई मुझे बोल ले

1109
01:16:54,960 --> 01:16:59,080
होना अबकी बार बीच में प्लीज मत बोलिएगा अगर मैंने और 10 मिनट आपसे बात

1110
01:16:59,080 --> 01:17:03,120
कर ली तो आप पहले सनातनी सिद्ध नहीं होगे उसके बाद

1111
01:17:03,120 --> 01:17:05,840
आप क्या कहते हैं वेदों को मानने वाले सिद्ध

1112
01:17:05,840 --> 01:17:10,200
नहीं होंगे ईश्वर को मानने वाले सिद्ध नहीं होंगे आस्तिक सिद्ध नहीं होंगे

1113
01:17:10,200 --> 01:17:14,200
और अंततोगत्वा आप मनुष्य भी सिद्ध नहीं होंगे और

1114
01:17:14,200 --> 01:17:18,400
तब आप कहेंगे नहीं मुझे मनुष्य को सिद्ध करना है खद को अभी जैसे आप कह रहे हो ना मुझे

1115
01:17:18,400 --> 01:17:22,560
सिद्ध नहीं करना आप अपने आप को मनुष्य भी सिद्ध नहीं कर पाएंगे इसलिए

1116
01:17:22,560 --> 01:17:26,880
आने के लिए आभार आपका अच्छा लगा आपके साथ टाइम बीता

1117
01:17:26,880 --> 01:17:30,880
मनुष्य सिद्ध नहीं होंगे क्योंकि मनुष्य क्योंकि मनुष्य मनुष्य और

1118
01:17:30,880 --> 01:17:35,040
पशु में अंतर होता है कि पशु के पास सामने खड़ी हुई तीन

1119
01:17:35,040 --> 01:17:39,280
स्त्रियों में कौन माता है कौन बहन है कौन पत्नी है यह

1120
01:17:39,280 --> 01:17:43,400
चुनाव करने का कोई आधार नहीं होता है तो इसलिए वहां पर

1121
01:17:43,400 --> 01:17:47,440
व्यक्ति को चोट पहुंचती है वह सनातन को मना कर देगा मैं सिद्ध करने नहीं आया

1122
01:17:47,440 --> 01:17:51,840
वो वेदों को मना कर देगा मैंने मैं अपने को वे वैदिक नहीं मानना चाहता

1123
01:17:51,840 --> 01:17:55,920
वो ईश्वर को ना मानने वाला कोई आपत्ति नहीं मैं अपने आप को आस्तिक सिद्ध नहीं करना

1124
01:17:55,920 --> 01:18:00,000
चाहता मगर जब यहां बात आएगी तो आपको कहना पड़ेगा नहीं नहीं मनुष्य तो

1125
01:18:00,000 --> 01:18:04,240
हूं मैं तब आपको कहना पड़ेगा भावना आ जाती है सुनिए

1126
01:18:04,240 --> 01:18:08,320
आप जब अपने आप को एक कुछ सिद्ध करते हैं अपने आप को बड़ा सिद्ध करने की कोशिश

1127
01:18:08,320 --> 01:18:12,440
करते हैं बड़े छोटे का नाम किसीने नहीं लिया है हमारी

1128
01:18:12,440 --> 01:18:16,640
बात हो चुकी है आपका आने के लिए बहुत-बहुत आभार आज की जो चर्चा हुई

1129
01:18:16,640 --> 01:18:21,240
है मुझे ऐसा लगता है कि वो व्यर्थ रही ये सब बातें आप क्लास में आते

1130
01:18:21,240 --> 01:18:25,320
तो हमारी चीज डिकस हो सती व्य क्यों लगा मैं आपको बताता हूं व्यर्थ क्यों

1131
01:18:25,320 --> 01:18:27,680
लगा

1132
01:18:27,680 --> 01:18:31,920
अभी आपको व्यर्थ क्यों लगा क्योंकि ये चर्चा आपको व्यर्थ क्यों लगी आप चाहते

1133
01:18:31,920 --> 01:18:37,920
हैं एक झगड़ा

1134
01:18:43,120 --> 01:18:49,120
हो तो भाई यह थे मंगाराम जी

1135
01:19:01,240 --> 01:19:05,400
अलंकारी ईश्वर सर्व शक्तिमान है तो क्या वह भक्ति

1136
01:19:05,400 --> 01:19:09,560
करने वाला जब मांगेगा कि आप मेरे पुत्र बने तो

1137
01:19:09,560 --> 01:19:15,560
अलंकारी ईश्वर उनको पुत्र होने से मना कर

1138
01:19:16,120 --> 01:19:20,200
देगा यही होता है व्यक्ति जब केवल फौजी बन

1139
01:19:20,200 --> 01:19:24,800
जाता है और भक्ति नहीं करता तो उसका हाल यही होता है

1140
01:19:24,800 --> 01:19:28,960
आपने जैसा कि देखा यह सिद्धांत

1141
01:19:28,960 --> 01:19:33,320
विहीन हिंदू हैं सिद्धांत विहीन हिंदू कैसे

1142
01:19:33,320 --> 01:19:38,440
हिंदू भी है उनको हिंदू भी खुद को नहीं कहना है

1143
01:19:38,440 --> 01:19:42,480
कि भाई मैं गीता को मानता हूं अगर आप

1144
01:19:42,480 --> 01:19:46,880
सनातनी नहीं है तो आपके पास वह शास्त्र नहीं है जिनके आधार पर

1145
01:19:46,880 --> 01:19:51,080
ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध किया जा सके गुरु ग्रंथ गोविंद

1146
01:19:51,080 --> 01:19:55,560
नहीं है और अगर आपके पास

1147
01:19:55,560 --> 01:19:59,720
वह ग्रंथ नहीं है तो आप वैदिक नहीं है वैदिक नहीं है तो आपके पास

1148
01:19:59,720 --> 01:20:04,320
सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है जब सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है तो आप कौन

1149
01:20:04,320 --> 01:20:08,320
हुए ईश्वर ही नहीं है अगर वह जरा सा भी बाधित है तो व

1150
01:20:08,320 --> 01:20:12,600
ईश्वर ईश्वर ही नहीं है तो फिर आप नास्तिक हो गए जब नास्तिक

1151
01:20:12,600 --> 01:20:16,840
हो गए तो फिर आपका आपके पास ईश्वर को प्राप्त करने के निमित्त जो नियमावली

1152
01:20:16,840 --> 01:20:21,240
है विधि है वह नहीं है तो क्या हुआ

1153
01:20:21,240 --> 01:20:25,280
संसार में जो धर्म का स्थाई आ सकता

1154
01:20:25,280 --> 01:20:29,480
है धर्म को स्थापित किया जा सकता है तो सर्व शक्तिमान ईश्वर के

1155
01:20:29,480 --> 01:20:31,120
दम पर इसलिए

1156
01:20:31,120 --> 01:20:35,120
हम लोग लड़ते हैं ईश्वर की सर्व शक्तिमता के लिए और ईश्वर

1157
01:20:35,120 --> 01:20:39,400
जहां पर अनंत है अवाद है निर्गुण निराकार है व परमार्थिक

1158
01:20:39,400 --> 01:20:43,600
है जब व्यवहार में ईश्वर को स्वीकार कर लेते हैं तो ईश्वर सब कुछ कर सकने

1159
01:20:43,600 --> 01:20:47,720
वाला है ठीक है तो आज की

1160
01:20:47,720 --> 01:20:51,840
चर्चा कैसी ल आप लोग बताइएगा मुझे ऐसा लगा

1161
01:20:51,840 --> 01:20:56,040
कि हमने काफी निरर्थक बातें की यह बातें

1162
01:20:56,040 --> 01:21:00,280
वो क्लास में भी कर सकते थे और कोर्स

1163
01:21:00,280 --> 01:21:06,280
कैसे मिलेगा मैं बता देता हूं आपको 7408

1164
01:21:06,320 --> 01:21:10,400
30169 इस पर आप एक व जब करेंगे और कोई सवाल वगैरह मत

1165
01:21:10,400 --> 01:21:14,400
किया करिए केवल ट करिए वहां पर तीन प्रकार के फॉर्म है उनमें से एक फॉर्म है

1166
01:21:14,400 --> 01:21:18,640
क्लास वाला उस पर टच करिए अपनी इंफॉर्मेशन दीजिए

1167
01:21:18,640 --> 01:21:22,800
आपको एक दो हफ्ते में मतलब वो क्लास जवाइन करने को हमारी मिल

1168
01:21:22,800 --> 01:21:26,840
जाएगी और इसी तरीके के टॉपिक्स है बहुत रोचक रहते

1169
01:21:26,840 --> 01:21:30,880
हैं टॉपिक्स तो आप लोग जवाइन कर सकते हैं दूसरी बात मैं यह कह

1170
01:21:30,880 --> 01:21:34,320
रहा हूं भक्ति बहुत आवश्यक है

1171
01:21:34,320 --> 01:21:38,360
आप भक्ति अवश्य करें भगवान की सवा घंटे

1172
01:21:38,360 --> 01:21:42,360
डेली भक्ति करें हम लोग एक सेशन चालू करने वाले हैं गल मीट

1173
01:21:42,360 --> 01:21:47,000
के द्वारा जिसमें कि हम भक्ति युद्ध

1174
01:21:47,000 --> 01:21:51,560
स्तर पर करने वाले हैं सब लोग बैठ कर के साथ में वहां पर करेंगे नाम जप

1175
01:21:51,560 --> 01:21:55,600
उसके लिए भी आप लोग उसमें भी अपना एनरोल करवा लीजिएगा भक्ति

1176
01:21:55,600 --> 01:21:59,680
अवश्य करें सवा घंटे की डेली या तो एक साथ बैठ के कर ले या

1177
01:21:59,680 --> 01:22:04,160
फिर 1515 मिनट करके दिन में पांच बार करें

1178
01:22:04,160 --> 01:22:08,640
उपासना सेवा संकीर्तन स्वाध्याय यह

1179
01:22:08,640 --> 01:22:12,920
आपकी नीव है अब यह क्या है कि केवल अपने

1180
01:22:12,920 --> 01:22:17,200
अपने हिसाब से जो बुक अच्छी लगी यानी कि बुक को चुनाव

1181
01:22:17,200 --> 01:22:21,440
करने का जो धर्म है वो इनके पास पहले से है कौन सी बुक लेनी

1182
01:22:21,440 --> 01:22:25,480
तो क्या हुआ गुरु गोविंद और

1183
01:22:25,480 --> 01:22:29,520
ग्रंथ इसीलिए कहा जाता है तो भक्ति को साथ में रखिए गोविंद को साथ

1184
01:22:29,520 --> 01:22:33,600
में रखिए तब आप जो है ऐसी जटल जटिल जो बातें उनको

1185
01:22:33,600 --> 01:22:37,840
समझने के लिए समझ पाएंगे

1186
01:22:37,840 --> 01:22:41,960
और भक्ति करिए उपासना सेवा

1187
01:22:41,960 --> 01:22:46,400
संकीर्तन स्वाध्याय करिए स्मार्थ के विषय में हमारे एक

1188
01:22:46,400 --> 01:22:51,640
भाई है गुरु भाई उन्होंने हमें कहा कि यह बात बोलिएगा

1189
01:22:51,640 --> 01:22:55,680
कि जैसे कोई शैव है शिवजी को मानता है उससे कोई

1190
01:22:55,680 --> 01:22:59,880
आपत्ति नहीं है यदि वह यह कहता है कि विष्णु भगवान

1191
01:22:59,880 --> 01:23:04,280
शिव से अलग है और नीचे हैं तो आपत्ति है इसी प्रकार से

1192
01:23:04,280 --> 01:23:08,520
जो वैष्णव है अगर वह यह कहते हैं विष्णु भगवान सर्वोच्च है तो हम भी मानते हैं

1193
01:23:08,520 --> 01:23:12,840
मगर वह यह कहता है कि विष्णु भगवान शिव से अलग है और वो उच्च

1194
01:23:12,840 --> 01:23:16,960
है विष्णु तो दिक्कत है तो आपत्ति वाली बात तो

1195
01:23:16,960 --> 01:23:21,120
यह बातें उन्होंने बताने को कही थी और स्मार्थ वैष्णव

1196
01:23:21,120 --> 01:23:26,640
स्मार्थ स्मार्थ शैव होना ही

1197
01:23:26,640 --> 01:23:30,680
शास्त्रो चित और तार्किक भी सिद्ध होती है क्योंकि जैसे

1198
01:23:30,680 --> 01:23:34,800
ही हम अन्य तत्वों को स्वीकार करते हैं तो फिर ईश्वरीय

1199
01:23:34,800 --> 01:23:39,120
सत्ता जो है क्षीण होने लगती है तो स्मार्थ होते हुए वैष्णव

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बनिए स्मार्थ होते हुए बनिए स्मार्थ होते हुए

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सात बनिए नपत बनिए सौर बनिए स्मार्थ

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होते हुए ब क्या दिक्कत है दूसरों को भी अगर आप कह

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दोगे कि हे भगवान हे ब्रह्मा विष्णु महेश मैं आप सबकी भक्ति

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श्री राम के रूप में करना चाहता हूं इससे आपका क्या घट जाएगा

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कुछ नहीं घटेगा खैर समझने वाले समझेंगे

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और ना समझने वालों को प्रयास जारी

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है सभी को जय श्री राम
