1
00:00:02,400 --> 00:00:08,000
जय श्री राम सभी को। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और

2
00:00:08,000 --> 00:00:12,000
आप जानते हैं अभी एक आर्य समाज को मानने

3
00:00:12,000 --> 00:00:17,600
वाले हैं। वो यहां पर उपस्थित हैं। मैं उनको स्टेज पर ले लेता हूं।

4
00:00:17,600 --> 00:00:21,440
जी मयंक जी

5
00:00:21,440 --> 00:00:25,440
मयंक [गला साफ़ करने की आवाज़] जी आप अपना कैमरा ऑन कर लें। सुन पा

6
00:00:25,440 --> 00:00:28,480
रहे हैं मयंक जी?

7
00:00:28,480 --> 00:00:32,720
जी मैं सुन पा रहा हूं। एक मिनट वाईफाई से कनेक्ट कर लूं वरना ये अटकेगा थोड़ा।

8
00:00:32,720 --> 00:00:36,880
एक मिनट एक मिनट बस और आपके

9
00:00:36,880 --> 00:00:41,760
यहां किसी और भी डिवाइस में चल रहा है क्या ये लाइव

10
00:00:41,760 --> 00:00:46,400
मतलब जिससे आप बात कर नहीं वो दूसरा हां

11
00:00:46,400 --> 00:00:50,960
उसको आप कहीं और भेज दीजिए। मतलब आपके आप जहां पर है वहां पर रहेगा तो दिक्कत आएगी।

12
00:00:50,960 --> 00:00:55,040
रिपीटेटिंग आवाज सुनाई देगी। हेलो नहीं

13
00:00:55,040 --> 00:00:59,280
नहीं बंद कर दिया हमने बंद कर दिया। दूसरा फोन था वो बंद कर दो। ठीक

14
00:00:59,280 --> 00:01:03,520
ठीक है तो मैं तो सबसे पहले थोड़ा सा मयंक जी

15
00:01:03,520 --> 00:01:09,520
आप अपने बारे में थोड़ा सा बता दीजिए दर्शकों को।

16
00:01:10,480 --> 00:01:13,440
क्या बताऊं इसमें?

17
00:01:13,440 --> 00:01:17,440
मैं मतलब आर्य समाज से कहां से जुड़े हुए हैं? कैसे फॉलो करते हैं आर्य

18
00:01:17,440 --> 00:01:20,640
समाज को?

19
00:01:20,640 --> 00:01:24,640
जी ऐसे आधिकारिक रूप से

20
00:01:24,640 --> 00:01:28,880
संस्था से तो नहीं जुड़े होते हैं लेकिन आर्य सामाजिक विचारधारा को फॉलो करते हैं। बस

21
00:01:28,880 --> 00:01:31,760
इतना ही

22
00:01:31,760 --> 00:01:35,760
तो ठीक है। सीधे सर्वशक्तिमान अवतार

23
00:01:35,760 --> 00:01:39,920
पर आते हैं। तो आप यह बताएं कि क्या आर्य समाज

24
00:01:39,920 --> 00:01:45,120
को आर्य समाज ईश्वर आर्य समाज के द्वारा परिभाषित ईश्वर

25
00:01:45,120 --> 00:01:49,520
वो यदि सर्वशक्तिमान है क्योंकि आर्य समाज मानता है कि है

26
00:01:49,520 --> 00:01:54,000
तो फिर वो अवतार क्यों नहीं ले सकता

27
00:01:54,000 --> 00:01:58,320
अच्छा अवतार वाले पे मुझे लगा था पहले सर्वशक्तिमान वाले से शुरुआत करें

28
00:01:58,320 --> 00:02:02,480
सर्वशक्तिमान एक ही बात है मैं आप

29
00:02:02,480 --> 00:02:07,840
सर्वशक्तिमान के अर्थ को बताएं ऐसा जो जिससे कि अवतार देखिए

30
00:02:07,840 --> 00:02:12,000
जी आप हां वही उसी पे आ रहा था मैं कि सर्वशक्तिमान का अर्थ

31
00:02:12,000 --> 00:02:16,000
कुछ भी कर सकता है उसी आधार पे आप अवतार को बताते हैं कि अवतार भी ले सकता

32
00:02:16,000 --> 00:02:21,440
है तो उसी पे आ जाता है ना कुछ भी कर सकने वाली बात पे आ जाते हैं

33
00:02:21,440 --> 00:02:25,520
हां ठीक है आ जाते हैं तो कुछ

34
00:02:25,520 --> 00:02:30,000
भी मतलब सर्वशक्तिमान का अर्थ आप आप ये नहीं मानते कि

35
00:02:30,000 --> 00:02:34,160
सर्वशक्तिमान का अर्थ ये नहीं मानते हैं कि वो कुछ भी कर सकता है। सर्वशक्तिमान का अर्थ

36
00:02:34,160 --> 00:02:38,160
है कि जो जो वो आप अपनी एक बात को रख दीजिए कि सर्वशक्तिमान का अर्थ

37
00:02:38,160 --> 00:02:42,880
यही है तब जिससे कि हम उस पर डिसाइड करें आगे। हां हां सर्वशक्तिमान

38
00:02:42,880 --> 00:02:47,200
का अर्थ [गला साफ़ करने की आवाज़] यही है कि ईश्वर अपने सभी गुण

39
00:02:47,200 --> 00:02:51,280
कर्म स्वभाव के अनुसार अपने सभी कार्यों को करने में सामर्थ्य है। स्वयं

40
00:02:51,280 --> 00:02:55,280
से करने में ईश्वर सामर्थ रखता है। अब उसमें ऐसा नहीं कि कुछ भी

41
00:02:55,280 --> 00:02:59,280
कर दे जैसा आप बताते हैं वो वाली बात नहीं आती। ईश्वर के जो कार्य

42
00:02:59,280 --> 00:03:04,800
हैं ईश्वर उन सभी कार्यों को करने में समर्थ है। ऐसा कह सकते

43
00:03:04,800 --> 00:03:08,960
ईश्वर के जो कार्य हैं मतलब गुण कर्म स्वभाव के अनुसार ईश्वर के जो कार्य

44
00:03:08,960 --> 00:03:09,520
हैं

45
00:03:09,520 --> 00:03:13,680
वो करने में वो समर्थ है। इसलिए वो

46
00:03:13,680 --> 00:03:17,840
वो जो कार्य करता है

47
00:03:17,840 --> 00:03:21,920
उसके अनुसार वो सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है। ठीक है? अच्छा इसमें एक

48
00:03:21,920 --> 00:03:27,440
चीज ये आएगी जैसे ईश्वर को आपने अनंत भी कहा है। अनंत सामर्थ्यवान

49
00:03:27,440 --> 00:03:31,600
जब हम ये कहते कि वो यह कर सकता है, यह नहीं कर सकता तो यहां पर अनंतता को कैसे आप

50
00:03:31,600 --> 00:03:34,240
डिफाइन करेंगे?

51
00:03:34,240 --> 00:03:38,480
इसमें ये है कि अनंत सामर्थ्यवान का आप ऐसा लेते हैं कि अनंत प्रकार

52
00:03:38,480 --> 00:03:42,480
के सभी प्रकार के अनंत प्रकार के सामर्थ्य उसमें है। आप इसी प्रकार से लेते हैं

53
00:03:42,480 --> 00:03:46,480
ना हम है ना? मतलब कंफर्म कर दीजिए। बात आ गई

54
00:03:46,480 --> 00:03:50,640
भाई हां इसी प्रकार से तो अनंत अनंत अनंत का मतलब अनंत

55
00:03:50,640 --> 00:03:54,800
हां मेरी आवाज में लैग तो नहीं हो रहा है कि मैं बोल रहा हूं दो

56
00:03:54,800 --> 00:03:59,520
तीन सेकंड बाद आ रही है ऐसा तो नहीं है ना नहीं नहीं बिल्कुल बिल्कुल

57
00:03:59,520 --> 00:04:04,000
तो अनंत सामर्थ का इस तो प्रकार वाले तरीके से लेते हैं तो अनंत

58
00:04:04,000 --> 00:04:08,000
का जो अनंत सामर्थ का जो परिभाषा हम जो उस तरीके

59
00:04:08,000 --> 00:04:12,240
से लेते हैं कि अनंत जैसे ब्रह्मांड अनंत है तो अनंत

60
00:04:12,240 --> 00:04:16,320
ब्रह्मांड को क्या बोलना चाहिए धारण करा हुआ है ईश्वर अनंत

61
00:04:16,320 --> 00:04:20,400
ब्रह्मांड में अपनी क्रिया कर रहा है। इस

62
00:04:20,400 --> 00:04:24,400
प्रकार से अनंत सामर्थ प्रकार की दृष्टि से अनंतता के फैलाव

63
00:04:24,400 --> 00:04:24,900
की

64
00:04:24,560 --> 00:04:28,960
दृष्टि से अनंत अनंत आत्मा हो या अनंत प्रकृति

65
00:04:28,960 --> 00:04:34,160
मतलब कि अनंत प्रकार के जो बल

66
00:04:34,160 --> 00:04:38,400
एकिस्ट करते हैं वो सारे बल नहीं है उसमें। अनंत प्रकार के जो सामर्थ्य

67
00:04:38,400 --> 00:04:42,720
एक्सिस्ट करते हैं वह सारे सामर्थ्य नहीं है। उसमें अब

68
00:04:42,720 --> 00:04:46,800
वो वही बात है ना एक्सिस्ट करते या नहीं करते उसी पे तो बात है कि वो जो

69
00:04:46,800 --> 00:04:50,880
आप कुछ भी कह सकते हैं जो सामर्थ्य ले रहे हैं वो एक्सिस्ट करता है या नहीं कहां कहां पे आप उसका

70
00:04:50,880 --> 00:04:56,880
बंधन मान रहे हैं कि कौन सा वाला सामर्थ उसमें नहीं है

71
00:04:57,120 --> 00:05:01,280
विरोधाभासी जैसे आप मानते चीजें और भी काफी चीजें

72
00:05:01,280 --> 00:05:05,360
हैं पर एक आप मुझे एक प्रैक्टिकल उदाहरण दीजिए कि यह वाला सामर्थ उसमें

73
00:05:05,360 --> 00:05:08,240
नहीं है

74
00:05:08,240 --> 00:05:12,240
भाई जैसे आपने प्रकार से जोड़ा है ना प्रकार देखिए प्रकार क्या है

75
00:05:12,240 --> 00:05:16,640
चीजों को धक्का मारना खींचना देखना

76
00:05:16,640 --> 00:05:20,640
ये सब [गला साफ़ करने की आवाज़] प्रकार है बल के है ना जानना ये भी एक बल

77
00:05:20,640 --> 00:05:24,960
है ये भी एक शक्ति है जानना अब्सॉर्ब करना ज्ञान ग्रहण करना

78
00:05:24,960 --> 00:05:29,200
चीजों को तो कौन से प्रकार का है जो उसके पास नहीं है

79
00:05:29,200 --> 00:05:34,240
जो आप प्रकार से उसको कह रहे हैं अनंतता को कह रहे हैं

80
00:05:34,240 --> 00:05:38,640
जैसे आप ये ले सकते हैं कि ईश्वर जो है

81
00:05:38,640 --> 00:05:42,800
सर्वव्यापक है। ईश्वर सर्वव्यापक है तो सर्व्यापक ही रहेगा। कभी

82
00:05:42,800 --> 00:05:46,880
भी अपने आप को किसी एक जगह से हटा नहीं सकता या उस जगह में

83
00:05:46,880 --> 00:05:50,960
से व्यापक होने से हट नहीं सकता। ऐसा कह सकते हैं। ये एक अगर आपकी

84
00:05:50,960 --> 00:05:55,360
दृष्टि से देखा जाए तो बाधा है। लेकिन हमारी दृष्टि से बिल्कुल सही है। क्योंकि ईश्वर अपने आप को

85
00:05:55,360 --> 00:05:59,440
सर्वव्यापकता से हटा नहीं सकता। बेसिकली सर्व्यापक है तो सर्वव्यापक ही रहेगा। हर

86
00:05:59,440 --> 00:06:04,480
जगह रहेगा ही रहेगा। ईश्वर और भी

87
00:06:04,480 --> 00:06:08,480
ईश्वर जो है वो सर्व्यापक है। सर्व्यापक ही रहेगा।

88
00:06:08,480 --> 00:06:12,160
ये तत्व की दृष्टि से तो सही है। बिल्कुल मगर क्या लौकिक दृष्टि

89
00:06:12,160 --> 00:06:16,480
से भी ये ये बाधा है ईश्वर के ऊपर

90
00:06:16,480 --> 00:06:20,560
और क्या ये क्या ये एक प्रकार का बल है? क्या ये एक प्रकार का

91
00:06:20,560 --> 00:06:23,040
बल है?

92
00:06:23,040 --> 00:06:27,200
मतलब कि ये जो आप कह रहे हैं ना कि इधर से उधर

93
00:06:27,200 --> 00:06:31,440
नहीं होगा। अगर वह सर्वव्यापक है तो वह सर्वव्यापक

94
00:06:31,440 --> 00:06:35,520
रहेगा। मगर कहीं ऐसी जगह नहीं आएगी जहां पर वो ना हो।

95
00:06:35,520 --> 00:06:39,920
है ना? तो क्या ये एक प्रकार का बल है? मैं फिलहाल

96
00:06:39,920 --> 00:06:43,920
बात कर रहा हूं फोर्स की। होता क्या है? बल मतलब क्या? बल बल

97
00:06:43,920 --> 00:06:47,920
मतलब शक्ति। शक्ति। प्रकार की शक्ति। ठीक है? प्रकार की शक्ति।

98
00:06:47,920 --> 00:06:51,920
अब जैसे आपकी दृष्टि से क्या होता है कि कई बार यह वाली

99
00:06:51,920 --> 00:06:56,240
बात आती है सामने से कि क्या ईश्वर

100
00:06:56,240 --> 00:07:00,320
कुरान का ज्ञान दे सकता है? ठीक है? तो कुरान

101
00:07:00,320 --> 00:07:04,320
जैसे जैसे मेरी बातचीत हो रही थी अग्निव्रत जी से मेरे ख्याल से आप वही

102
00:07:04,320 --> 00:07:09,360
चीजें देख के आए हैं। है ना? तो अग्निव्रत जी ने एक

103
00:07:09,360 --> 00:07:13,440
उदाहरण दिया था। जब मैंने उनसे कहा था क्या नाली में भी ईश्वर हो सकता है? तो मैंने जब

104
00:07:13,440 --> 00:07:17,440
यह कहा तो अग्निव्रत जी ने उसका जो तात्विक विवेचन है

105
00:07:17,440 --> 00:07:21,520
वह करना चालू कर दिया वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कि नाली है क्या मॉलिक्यूल्स ये

106
00:07:21,520 --> 00:07:25,520
है वो है मतलब जो चीज हमें बुराई बुराई दिख रही है उस

107
00:07:25,520 --> 00:07:27,440
चीज को तत्व की दृष्टि से देखने लगो

108
00:07:27,440 --> 00:07:31,760
तो उसकी वो जो बुराई दिख रही है बुराई देखना बंद हो जाएगा तो अगर हम कुरान

109
00:07:31,760 --> 00:07:35,840
से इस चीज को जोड़ें कुरान के ज्ञान देने से इस चीज को जोड़ें या अन्य जो

110
00:07:35,840 --> 00:07:40,080
चीजें हमें पाप लग रही गलत चीज में आ रही मगर उसमें वहां पर बल

111
00:07:40,080 --> 00:07:44,880
तो वही है ना जैसे किसी को को कुछ ज्ञान देना, कुछ बताना,

112
00:07:44,880 --> 00:07:48,960
कुछ हम हमारे पास कुछ ऐसा है जो हम किसी को कह रहे हैं। जैसे कि

113
00:07:48,960 --> 00:07:52,960
मैं किसी को कोई बात कह रहा हूं तो मेरे पास अपने विचार दूसरे को

114
00:07:52,960 --> 00:07:56,960
प्रदान करने की शक्ति है। अब वो मैं कर रहा हूं कि नहीं कर रहा हूं वो तो बाद की

115
00:07:56,960 --> 00:08:01,200
बात हो जाएगी। मगर मैं मेरे अंदर क्षमता है कि मैं कुछ बात

116
00:08:01,200 --> 00:08:05,200
किसी को कह सकूं। तो जब यह आएगा कि क्या वो उसके

117
00:08:05,200 --> 00:08:09,200
अंदर क्षमता है किसी को कुरान जैसा ज्ञान दे देने की? तो

118
00:08:09,200 --> 00:08:13,200
कुरान जैसा ज्ञान एक हो गया मान्यता। कुरान जैसी

119
00:08:13,200 --> 00:08:17,280
ज्ञान हो गया मान्यता। मगर वहां पर क्रिया क्या हो रही है?

120
00:08:17,280 --> 00:08:22,240
वहां पर व्यवहार क्या हो रहा है? कि विचार प्रदान किया जा रहा है।

121
00:08:22,240 --> 00:08:26,400
यानी कि भौतिक जो एक क्रिया है वहां पर वो क्या हो रही है? विचार प्रदान

122
00:08:26,400 --> 00:08:30,560
करने की। तो ऐसा कौन सा ऐसी भौतिक कौन सी कौन सा

123
00:08:30,560 --> 00:08:34,640
बल है जो ईश्वर के पास नहीं है? पहले तो मैं ये पूछ रहा हूं।

124
00:08:34,640 --> 00:08:38,880
कोई आप मानते हैं जो उसके पास ना हो। भौतिक भौतिक में

125
00:08:38,880 --> 00:08:42,480
जाने की जरूरत नहीं ना मैंने बता तो दिया सर्वव्यापकता ईश्वर अगर आप

126
00:08:42,480 --> 00:08:46,480
बोलते हो जाने की जरूरत है ना मैंने क्या कहा जाने की

127
00:08:46,480 --> 00:08:50,480
जरूरत है इसलिए है क्योंकि जब हम ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता

128
00:08:50,480 --> 00:08:54,960
की बात करते हैं तो आप उसमें उसकी क्रियाओं से उत्पन्न

129
00:08:54,960 --> 00:08:59,280
होने वाली जो मान्यता है उसको साथ में ऐड करके यह प्रयास

130
00:08:59,280 --> 00:09:03,520
होता है कि भाई वह गलत काम नहीं कर सकता। जबकि गलत

131
00:09:03,520 --> 00:09:07,680
काम करने में भी उसी प्रकार से तात्विक विवेचना में

132
00:09:07,680 --> 00:09:11,840
ईश्वर के दृष्टिकोण से न्यूट्रल न्यूट्रल दृष्टिकोण छिपा

133
00:09:11,840 --> 00:09:16,080
हुआ है। जैसे उसके लिए नाली क्या है? वो बताने लगे मॉलिक्यूल्स हैं ये हो वो ये

134
00:09:16,080 --> 00:09:20,560
मतलब जिसको जिसके लिए जिससे एक मनुष्य

135
00:09:20,560 --> 00:09:24,560
को दिक्कत हो सकती है, समस्या हो सकती पर ईश्वर को

136
00:09:24,560 --> 00:09:28,560
नहीं हो सकती। वो वहां पर भी है। तो ये जो दोष

137
00:09:28,560 --> 00:09:32,560
और निर्दोष वाली बात है दूषित और निर्दोष दूषित और

138
00:09:32,560 --> 00:09:36,720
निर्दोष वाली बात है इसके आधार पर वो कहते हैं

139
00:09:36,720 --> 00:09:40,960
कि भाई जहां पे गलत कार्य हो रहा है वो ईश्वर नहीं कर सकता। जैसे किसी की हत्या

140
00:09:40,960 --> 00:09:45,040
हो रही है वो ईश्वर नहीं कर सकता। फिर हम उसकी तात्विक विवेचन में जाएंगे कि भाई गोली चल रही मान

141
00:09:45,040 --> 00:09:49,200
लीजिए। तो गोली चल रही किसी को बहुत फोर्सफुली धक्का मिला बुलेट को और बुलेट

142
00:09:49,200 --> 00:09:53,200
आगे गई। तो यह जो गोली चलने वाला बल है यह ईश्वर के पास है

143
00:09:53,200 --> 00:09:57,360
कि नहीं? तो यहां पर वो कहेंगे है इसका मतलब वो गोली भी चला सकता

144
00:09:57,360 --> 00:10:00,800
है।

145
00:10:00,800 --> 00:10:04,800
यह वाली चीज आ जाती है। इसलिए मैंने आपसे पूछा कि कई कई प्रकार के बलों की

146
00:10:04,800 --> 00:10:08,960
जब बात हो रही है तो कोई ऐसा बल एक्सिस्ट करता है जो

147
00:10:08,960 --> 00:10:13,200
है मगर ईश्वर में नहीं है। जितने बल आप मानते हैं कि हैं।

148
00:10:13,200 --> 00:10:17,520
अभी उसकी बात कर रहे हैं। वो जो है ना स्वरूप विरुद्ध कार्य जो आप कह रहे हैं सर

149
00:10:17,520 --> 00:10:21,760
सर वो जो है स्वरूप विरुद्ध कार्य वाला आपके हिसाब

150
00:10:21,760 --> 00:10:25,920
से वो एक्सिस्ट नहीं करता है। और उस पर हम बात करेंगे। वो एक अलग चैप्टर हो गया।

151
00:10:25,920 --> 00:10:29,920
फिलहाल मैं यह कह रहा हूं कोई भौतिक बल ऐसा है जो एक्सिस्ट तो

152
00:10:29,920 --> 00:10:34,480
करता है परंतु ईश्वर में वो नहीं है।

153
00:10:34,480 --> 00:10:39,760
इसमें ये बात आ जाएगी ना कि जैसे आपने उदाहरण दिया गोली चलाना।

154
00:10:39,760 --> 00:10:44,560
तो क्या गोली चलाने में ईश्वर ने मतलब जितने भी बीच में जो चीजें थी बल

155
00:10:44,560 --> 00:10:49,120
परमाणु वगैरह सारी ईश्वर ने धारण करे हो। ठीक है? प्रक्रिया पूरी ईश्वर के द्वारा

156
00:10:49,120 --> 00:10:53,200
मैं नहीं मैं यह नहीं कह रहा पूरी ईश्वर के द्वारा हो रही कि नहीं उसमें इच्छा किसकी मैं

157
00:10:53,200 --> 00:10:57,520
यह नहीं कह रहा जो वहां पर एनर्जी यूज़ हो रही है

158
00:10:57,520 --> 00:11:03,520
जो वहां पर बल यूज़ हो रहा है वो बल ईश्वर के पास है कि नहीं

159
00:11:04,400 --> 00:11:08,480
पास है का मतलब क्या ईश्वर सामर्थ्य मेरा पूरा सुन लीजिए फिर

160
00:11:08,480 --> 00:11:12,880
जवाब दे देना क्या ईश्वर आप ये पूछना चाह रहे कि क्या ईश्वर परमाणुओं

161
00:11:12,880 --> 00:11:17,040
को क्या बोलते गति कराने में सामर्थ्यवान है या अगर

162
00:11:17,040 --> 00:11:21,120
ये पूछ रहे हैं तो बिल्कुल है लेकिन हां तो ये इसमें तो हां जवाब है

163
00:11:21,120 --> 00:11:25,200
तो फिर आगे बढ़ जाता तो क्या तो क्या बुलेट बुलेट

164
00:11:25,200 --> 00:11:29,680
वाले जो परमाणु है उसको गति कराने में सामर्थ नहीं है

165
00:11:29,680 --> 00:11:33,760
नहीं नहीं सभी सब बुलेट वाले तो सभी आ गए ना परमाणु में तो सारे आ जाएंगे कुछ मैंने

166
00:11:33,760 --> 00:11:37,760
बोला नहीं इसका अर्थ यह है कि ईश्वर के

167
00:11:37,760 --> 00:11:41,760
पास समस्त भौतिक क्रियाओं को करने का सामर्थ्य है जितने प्रकार के बल

168
00:11:41,760 --> 00:11:45,840
है वो हमारे ऊपर है कि हम कौन सी चीज को पाप और पुण्य से जोड़

169
00:11:45,840 --> 00:11:49,920
सकते हैं। यही बात हो गई ना मैं नहीं

170
00:11:49,920 --> 00:11:54,080
सामर्थ्य है का फिर उसमें यह बात आ जाएगी कि क्या ईश्वर के गुण

171
00:11:54,080 --> 00:11:58,880
में वो सामर्थ्य आएगा या नहीं जैसे मैं समझाता हूं आपको कि

172
00:11:58,880 --> 00:12:03,040
ईश्वर के गुण में जैसे मैं उदाहरण के लिए

173
00:12:03,040 --> 00:12:07,120
बोलूं कि क्या ईश्वर अभी ये जो पेन है इसको अभी के अभी हवा में उड़ा के दिखा

174
00:12:07,120 --> 00:12:11,440
दे मुझे क्या ये वाला सामर्थ्य है या नहीं ठीक है तो सामर्थ

175
00:12:11,440 --> 00:12:15,440
है तो बोलना चाहिए सामर्थ है सामर्थ्य है परंतु उसकी इच्छा है

176
00:12:15,440 --> 00:12:19,840
कि नहीं वो स्वतंत्र है अपना निर्णय लेने के लिए दिखा दे। हां। तो

177
00:12:19,840 --> 00:12:24,160
तो वही तो इसमें ये आती है ना कि ईश्वर जो अपनी

178
00:12:24,160 --> 00:12:28,240
ऐसे कुछ भी फालतू-फालतू चीजें नहीं करता। इच्छा में

179
00:12:28,240 --> 00:12:32,320
भी अगर वो फिर इच्छा वाली बात पूछा है मैंने पूछा है समस्त क्रियाओं को

180
00:12:32,320 --> 00:12:36,320
करने का सामर्थ्य है कि नहीं? जितने बल है दुनिया में

181
00:12:36,320 --> 00:12:41,360
एकिस्ट कर रहे हैं वो सारे कार्य करने का सामर्थ्य है कि नहीं?

182
00:12:41,360 --> 00:12:45,360
देखिए प्रश्न के लिए फिर हमको डीप में जाना ही पड़ेगा। मैं ऐसे हां या ना में जवाब दे

183
00:12:45,360 --> 00:12:49,440
ही नहीं सकता क्योंकि फिर वो स्पष्टता नहीं आ रही ना प्रश्न में से डीप डीप में

184
00:12:49,440 --> 00:12:53,680
जाइए आप डीप में जाइए देखिए मैं समझना चाहता हूं इसमें हां जी तो इसमें

185
00:12:53,680 --> 00:12:58,320
ये बात आती है कि जैसे अभी अभी ये जो पेन है ये सारे

186
00:12:58,320 --> 00:13:02,320
नियमों को फॉलो कर रही है ज्ञान के जो नियम है उसमें से एक

187
00:13:02,320 --> 00:13:06,560
है गुरु गुरुत्वाकर्षण बल ठीक है उसकी वजह से ये ऐसे नीचे गिर रही है ठीक है

188
00:13:06,560 --> 00:13:10,960
तो आपका प्रश्न मतलब फिर ये है कि क्या ईश्वर अभी के अभी इसका गुरुत्वाकर्षण

189
00:13:10,960 --> 00:13:15,040
बल को तोड़ मतलब गुरुत्वाकर्षण बल को हटा हटा के इसको हवा में उड़ा सकता

190
00:13:15,040 --> 00:13:19,600
है। तो यहां मेरा जवाब होगा नहीं। अब

191
00:13:19,600 --> 00:13:23,760
मैंने अभी आप बार-बार मेरी बात में अभी जोड़ दे रहे हैं। जब

192
00:13:23,760 --> 00:13:28,080
अभी जोड़ दे रहे हैं तो ईश्वर क्या मेरे अनुसार कार्य कर सकता है ये वाली बात आ जाएगी। वो स्वतंत्र

193
00:13:28,080 --> 00:13:32,880
है ना। मैं कह रहा हूं उसमें सामर्थ्य है कि नहीं?

194
00:13:32,880 --> 00:13:35,200
सामर्थ्य में फिर वो बात आ जाएगी।

195
00:13:35,200 --> 00:13:39,200
ईश्वर अपने अपने ईश्वर का गुण जो है जैसे ईश्वर वही बात

196
00:13:39,200 --> 00:13:43,440
आ जाएगी ना कि ईश्वर कोई भी कार्य क्यों करेगा बात आ जाएगी। तो क्यों मैं फिर बात करेगी

197
00:13:43,440 --> 00:13:47,440
कि क्या ईश्वर देखिए बात यह हो रही है जैसे

198
00:13:47,440 --> 00:13:51,440
मैंने पूछा है आपसे क्या मैं पानी पी सकता हूं कि

199
00:13:51,440 --> 00:13:55,520
नहीं फिर आप कह रहे हैं कि आप पानी क्यों पिएंगे ये एक अलग

200
00:13:55,520 --> 00:13:59,520
बात है कि मुझे पानी पीना है कि नहीं नहीं इसी से जुड़ी हुई है इसी से

201
00:13:59,520 --> 00:14:03,680
नहीं इसी से जुड़ी हुई है क्यों जुड़ी हुई है क्योंकि कोई भी आप स्वतंत्र बोलते हैं ईश्वर

202
00:14:03,680 --> 00:14:08,000
को मतलब कि मतलब कि वो समस्त परमाणुओं को गति

203
00:14:08,000 --> 00:14:12,080
करा सकता है गति में अवरोधक बन सकता है

204
00:14:12,080 --> 00:14:16,320
ना? अवरोधक भी तो बन सकता है। हां। और

205
00:14:16,320 --> 00:14:20,880
यहां तक कि जो पृथ्वी इसको खींच रही है पेन को

206
00:14:20,880 --> 00:14:25,040
जो पृथ्वी गुरुत्वाकर्षण शक्ति वो खींच रही है पेन को तो

207
00:14:25,040 --> 00:14:29,040
वो भी वो कर सकता है। परंतु एक समय आएगा जब कहेंगे कि यहां पे ईश्वर

208
00:14:29,040 --> 00:14:35,040
की शक्ति नहीं है। यह वाली शक्ति नहीं है। तो वो कौन सी शक्ति है जो उसमें नहीं है?

209
00:14:35,920 --> 00:14:40,000
मैंने बताया तो सही ईश्वर के अंदर वही बात है फिर क्यों पर बात

210
00:14:40,000 --> 00:14:44,000
आ जाएगी ना ईश्वर क्यों करेगा तो ईश्वर के अंदर यह इच्छा वाली जो बात है ना यह वाली इच्छा

211
00:14:44,000 --> 00:14:48,320
है ही नहीं कि किसी भी प्रकार से जो नियमों को तोड़ा जाए या नियम

212
00:14:48,320 --> 00:14:52,320
मैंने आपसे पूछा सामर्थ्य के बारे में उसका निर्णय क्या होगा क्या

213
00:14:52,320 --> 00:14:56,400
नहीं होगा ये एक अलग चैप्टर है ये एक अलग

214
00:14:56,400 --> 00:15:00,480
मैं पूछ रहा हूं सामर्थ्य है कि नहीं

215
00:15:00,480 --> 00:15:04,640
जो जो क्रियाएं एक्सिस्ट कर रही है देखिए जैसे जैसे

216
00:15:04,640 --> 00:15:08,720
कि किसी ने किसी को धक्का दिया। अब ये जो धक्का दिया है धक्के में जो

217
00:15:08,720 --> 00:15:12,800
फोर्स लग रही है पुश करने की फोर्स ये उसके अंदर एक्सिस्ट कर रही है। अब वो

218
00:15:12,800 --> 00:15:17,120
बात अलग है कि इसका उपयोग कहीं पर ऐसा हो जाए किसी धक्के

219
00:15:17,120 --> 00:15:21,120
का उपयोग कहीं पर ऐसा हो जाए कि किसी के साथ कोई अत्याचार हो जाए। उस

220
00:15:21,120 --> 00:15:25,280
क्रिया से होने वाली मान्यता क्या है? वो एक अलग मैटर है। मगर जितनी

221
00:15:25,280 --> 00:15:30,880
क्रियाएं हो रही है उसका अधिष्ठान ईश्वर है कि नहीं? या फिर कोई

222
00:15:30,880 --> 00:15:35,200
जवाब उसका तो जवाब दे दिया ना मैंने परमाणु को संसार में

223
00:15:35,200 --> 00:15:39,760
यानी कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वो सारी शक्तियां

224
00:15:39,760 --> 00:15:43,920
ईश्वर में है। हां है ही पर हां ठीक

225
00:15:43,920 --> 00:15:47,920
है। आप जाना नहीं वो सब कुछ

226
00:15:47,920 --> 00:15:53,280
करने की शक्तियां ईश्वर में है। है ना?

227
00:15:53,280 --> 00:15:57,360
फिर मैं उसी में फिर डिटेल में जाऊंगा तो आप रोक लेंगे बीच में। इसलिए अब क्या बोलूं? मैं इसका उत्तर

228
00:15:57,360 --> 00:16:01,600
दे ही नहीं सकता ना। मुझे जाना ही पड़ेगा। आ जाता हूं। अब मैं डिटेल पे आ जाता हूं।

229
00:16:01,600 --> 00:16:05,680
आपका मानना है [गला साफ़ करने की आवाज़] ईश्वर का अवतार लेना।

230
00:16:05,680 --> 00:16:10,560
उसके जो क्या कहते हैं जो उसके स्वरूप

231
00:16:10,560 --> 00:16:14,800
है ईश्वर का अवतार अवतार पर नहीं आना चाहता।

232
00:16:14,800 --> 00:16:19,040
चलिए नहीं नहीं नहीं वो मैं अभी सर्वशक्तिमान

233
00:16:19,040 --> 00:16:23,040
पे ही रहूंगा मैं। अभी मैं सर्वशक्तिमान पे ही रहूंगा। मगर एक टैगलाइन

234
00:16:23,040 --> 00:16:27,200
फिट कर रहा हूं कि आप आपका मानना है आर्य समाज का मानना है कुल

235
00:16:27,200 --> 00:16:31,600
मिलाकर के कि ईश्वर का अवतार इसलिए निषेध है क्योंकि

236
00:16:31,600 --> 00:16:35,600
ईश्वर का अवतार उसके स्वरूप के विरुद्ध कार्य है क्योंकि वो सर्वव्यापी

237
00:16:35,600 --> 00:16:39,680
है तो एक जगह नहीं हो सकता इसलिए अवतार नहीं हो सकता सर्व्यापी ही

238
00:16:39,680 --> 00:16:43,760
रहेगा वो यानी अवतार होना एक तो अवतार होना

239
00:16:43,760 --> 00:16:47,920
कि जो दूसरे तरीके से ईश्वर सर्वव्यापक होकर एक देश हो जाए वो वाली बात अलग है और

240
00:16:47,920 --> 00:16:52,240
इच्छा वाली जो बात है ना ईश्वर के अंदर इच्छा होना भी संभव नहीं

241
00:16:52,240 --> 00:16:56,960
इच्छा होती उसके अंदर है जिसके अंदर कोई कमी

242
00:16:56,960 --> 00:17:01,120
स्वयं के लिए कुछ करने के लिए करने को अभी तक आपकी जो बातें मुझे समझ

243
00:17:01,120 --> 00:17:05,520
में आई है कि जो उसके गुण कर्म और स्वभाव के अनुसार जो सारे कार्य

244
00:17:05,520 --> 00:17:09,920
हैं वो सारे कार्य ईश्वर कर सकता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है

245
00:17:09,920 --> 00:17:14,480
और है ना जी और अवतार लेने वाला जो विषय है और एक आपकी ओर

246
00:17:14,480 --> 00:17:18,560
एक आपकी ओर से यह तर्क जो आया आता है

247
00:17:18,560 --> 00:17:22,720
कि क्योंकि वो अपने सारे कार्य बिना किसी सहायता के कर सकता है। यह

248
00:17:22,720 --> 00:17:27,200
वाले तर्क का आप सपोर्ट नहीं करते हैं। एक नहीं वही वही

249
00:17:27,200 --> 00:17:31,200
मैंने जो बोला वो उसी में आ जाएगा ना। ईश्वर के जितने भी समस्त कार्य ईश्वर

250
00:17:31,200 --> 00:17:35,360
स्वयं करने में स्वयं से सक्षम है। उसी के अंदर ही आएगी। सारे

251
00:17:35,360 --> 00:17:39,520
कार्य एक मिनट वो अपने सारे कार्य बिना किसी की सहायता के कर

252
00:17:39,520 --> 00:17:43,680
सकता है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। यह बात

253
00:17:43,680 --> 00:17:47,840
ठीक है ना? और एक आपने अनंत की बात तो स्वीकार कर ली कि उसके उसके

254
00:17:47,840 --> 00:17:52,080
अंदर अनंत बल है। हां अनंत बल है अनंत अनंत

255
00:17:52,080 --> 00:17:56,240
बल किस तरीके से बता दिया क्योंकि अवतार लेने वाला जो

256
00:17:56,240 --> 00:18:00,880
बल है आपके हिसाब से एक्सिस्ट ही नहीं करता है इसलिए वो बल नहीं है

257
00:18:00,880 --> 00:18:04,960
यही तो हुआ वही ना बल बल एक्सिस्ट करता नहीं करता बात आएगी

258
00:18:04,960 --> 00:18:08,960
नहीं ना ईश्वर के अंदर वो इच्छा ही एक्सिस्ट नहीं करती है मैं ये बोलना चाह रहा हूं

259
00:18:08,960 --> 00:18:12,080
या इच्छा होने की संभावना भी नहीं करती चलिए महेंद्र

260
00:18:12,080 --> 00:18:16,400
जी मैं वो बात ला रहा हूं मैं कह रहा हूं अवतार लेने का बल आपके अकॉर्डिंग

261
00:18:16,400 --> 00:18:21,200
एक्सिस्ट करता है कि नहीं करता है मैं यह पूछ रहा हूं

262
00:18:21,200 --> 00:18:25,520
आप क्या कहना चाह रहे कि फिर वही बात आ जाएगी परमाणु वाली बात दुनिया में जैसे

263
00:18:25,520 --> 00:18:30,160
दुनिया में धक्का देने का बल एक्सिस्ट करता है। हम

264
00:18:30,160 --> 00:18:34,240
थोड़ी चीजें क्लियर करते चले कि हमें एक दूसरे को काउंटर

265
00:18:34,240 --> 00:18:38,320
किस बात पे करना है। है ना? तो जैसे

266
00:18:38,320 --> 00:18:42,720
दुनिया में धक्का देने का बल एकिस्ट करता है। वो ईश्वर में है।

267
00:18:42,720 --> 00:18:46,800
ठीक है? दुनिया में ज्ञान आदान प्रदान करने की जो

268
00:18:46,800 --> 00:18:50,880
शक्ति है वह एक्सिस्ट करती है व्यवहार करने की तो

269
00:18:50,880 --> 00:18:54,960
वह ईश्वर में है। ठीक है? ठीक

270
00:18:54,960 --> 00:18:59,040
है ना? ईश्वर में है का अब वही बात आ जाएगी ना ईश्वर में है का मतलब

271
00:18:59,040 --> 00:19:04,400
आप ये पूछना चाह रहे हैं कि क्या ईश्वर स्वयं से किसी नियम मतलब

272
00:19:04,400 --> 00:19:08,640
एट एन इंस्टेंस खुद से कोई बल लगा दे जो पहले से जो नियम

273
00:19:08,640 --> 00:19:12,880
है उनको तोड़ करके तो वो सामर्थ्य नहीं है जो नियम बने

274
00:19:12,880 --> 00:19:16,960
ईश्वर ने बनाए है वो ईश्वर नियम के अनुसार ही चलेगा वो वाला सामर्थ ईश्वर में नहीं है कि ईश्वर अभी

275
00:19:16,960 --> 00:19:20,960
के अभी इस फोन को हवा में उड़ा के बता दे वो वाला सामर्थ ईश्वर में नहीं है आप

276
00:19:20,960 --> 00:19:24,960
आपसे जब मैं फाइनल बात करने जाता हूं तो आप पीछे आते हैं जब मैं पीछे पे

277
00:19:24,960 --> 00:19:27,360
आके बात करता हूं तो आप फाइनल पे जाते हैं। नहीं

278
00:19:27,360 --> 00:19:31,360
क्योंकि आप कंक्लूजन गलत दे रहे हैं ना आप गलत मैं क्लियर बोल रहा

279
00:19:31,360 --> 00:19:35,680
हूं। पहले तो यह देख लेते हैं कि उसके अंदर बल है कौन-कौन

280
00:19:35,680 --> 00:19:39,760
से। तो अगर सामान्य तौर पर बात करें पुश

281
00:19:39,760 --> 00:19:44,080
पुल। ठीक है? देखना और बताना,

282
00:19:44,080 --> 00:19:48,080
ज्ञान धारण करना, ग्रहण करना और प्रदान करना ये सारे बल है

283
00:19:48,080 --> 00:19:52,160
उसके अंदर। ठीक है ना? हम तो अब मैं पूछ रहा

284
00:19:52,160 --> 00:19:56,400
हूं कि आपके अकॉर्डिंगली क्योंकि अह या कोई

285
00:19:56,400 --> 00:20:00,560
भी ऐसा कार्य जो कार्य आप जिन कार्यों से अवतारों अवतार

286
00:20:00,560 --> 00:20:04,560
को जोड़ रहे हैं वो जो कार्य है एक्सिस्ट

287
00:20:04,560 --> 00:20:08,640
ही नहीं करता है। अभाव है उस बल का इसलिए आप मानते हैं कि ईश्वर जो

288
00:20:08,640 --> 00:20:14,080
है अवतार नहीं ले सकता या फिर वह सर्वशक्तिमान के अकॉर्डिंगली खड़ा नहीं उतरता।

289
00:20:14,080 --> 00:20:18,160
उस सामर्थ्य का अभाव है। बल का अभाव बल अभी छोड़ दीजिए। उस सामर्थ्य का अभाव

290
00:20:18,160 --> 00:20:23,040
इतना रख लीजिए बस। इससे आगे बढ़ जाइए क्योंकि फिर बल में

291
00:20:23,040 --> 00:20:27,040
देखिए जो अनंत सामर्थ की बात आपने कही थी ना कि सभी प्रकार

292
00:20:27,040 --> 00:20:31,360
के सामर्थ है तो हम उनको कहते हैं सभी प्रकार के नहीं है

293
00:20:31,360 --> 00:20:35,360
ठीक है तो सभी प्रकार के सभी प्रकार के हम कहते

294
00:20:35,360 --> 00:20:39,520
हैं आप कहते सभी प्रकार के नहीं मगर जो भी है वो अनंत है सभी प्रकार के

295
00:20:39,520 --> 00:20:42,560
नहीं है मगर जितने प्रकार के हैं वो अनंत है

296
00:20:42,560 --> 00:20:46,560
नहीं नहीं नहीं नहीं ये नहीं बोला मैंने नहीं नहीं नहीं आप गलत गलत समझ रहे गलत मैं क्लियर कर देता हूं मैं

297
00:20:46,560 --> 00:20:50,640
क्लियर कर देता हूं थोड़ा रोक देता हूं क्लियर कर दीजिए। सभी प्रकार के

298
00:20:50,640 --> 00:20:54,800
हैं। लेकिन जितने प्रकार के अनंत ऐसा तो बोला ही नहीं मैंने। उसमें यह है कि ईश्वर का

299
00:20:54,800 --> 00:20:58,800
जो अनंत ब्रह्मांड को धारण कर रखा है। उस दृष्टि से

300
00:20:58,800 --> 00:21:03,840
विस्तार की दृष्टि से कह सकते हैं या फिर आप उस दृष्टि से भी कह सकते हैं कि भाई अनंत

301
00:21:03,840 --> 00:21:07,920
प्रकृति के जो कण है उनको धारण कर रखा। उस दृष्टि से अनंत प्रकार की दृष्टि

302
00:21:07,920 --> 00:21:12,960
से मैं कभी नहीं बोल रहा हूं। यानी मैंने कब कहा? मैंने कहा

303
00:21:12,960 --> 00:21:17,760
जितने मैंने यह कहा है जितने प्रकार के हैं वो है

304
00:21:17,760 --> 00:21:22,800
उसमें अनंत [गला साफ़ करने की आवाज़] प्रकार जितने प्रकार के बल एक्सिस्ट करते हैं वो उसके अंदर है

305
00:21:22,800 --> 00:21:26,800
हां बल नहीं सामर्थ बल बल से

306
00:21:26,800 --> 00:21:31,360
समस्या सामर्थ ले लीजिए जितने जितने प्रकार के सामर्थ्य

307
00:21:31,360 --> 00:21:36,480
एक्सिस्ट करते हैं वो उसमें है ईश्वर ठीक है

308
00:21:36,480 --> 00:21:40,480
और जो भी है मतलब जैसे मान लीजिए मेरे पास धक्का देने का सामर्थ

309
00:21:40,480 --> 00:21:45,280
है तो धक्का का मैं अनंत दे सकता हूं। यही तो हुआ।

310
00:21:45,280 --> 00:21:49,520
हम अनंत बल है ना? हां हां

311
00:21:49,520 --> 00:21:53,760
तो अनंत है वो खत्म नहीं होता। तो जितने प्रकार के बल है

312
00:21:53,760 --> 00:21:57,760
वो अनंत रूप से उसके पास है। इसलिए वो अनंत सामर्थ्यवान है।

313
00:21:57,760 --> 00:22:01,760
जितने प्रकार के सामर्थ है वो अनंत रूप से उसके पास है। इसलिए वो

314
00:22:01,760 --> 00:22:06,080
अनंत सामर्थ्यवान है। यही तो हुआ। जी हम जी।

315
00:22:06,080 --> 00:22:10,160
तो इसका मतलब ये है कि जो अवतार का निषेध किया जाता है वो इसलिए किया

316
00:22:10,160 --> 00:22:14,160
जाता है क्योंकि अवतार धारण करने वाला जो सामर्थ्य है वो एक्सिस्ट ही नहीं

317
00:22:14,160 --> 00:22:18,640
करता और इसलिए नहीं करता क्योंकि वो स्वभाव के विरुद्ध है।

318
00:22:18,640 --> 00:22:21,040
ये बात मान लो। हां। ठीक

319
00:22:21,040 --> 00:22:25,760
है। तो अब आपने एक बात कही कि ईश्वर अपने

320
00:22:25,760 --> 00:22:29,920
सारे कार्य करता कर सकता है बिना किसी की सहायता के।

321
00:22:29,920 --> 00:22:35,360
तो वो सर्वशक्तिमान कहा जाता है। है ना?

322
00:22:35,360 --> 00:22:39,440
हां तो जब ईश्वर ईश्वर का कार्य

323
00:22:39,440 --> 00:22:42,410
क्या है?

324
00:22:42,410 --> 00:22:46,480
[गला साफ़ करने की आवाज़] पूछ रहे हैं आप मेरे से। हां तो ईश्वर

325
00:22:46,480 --> 00:22:50,480
का ईश्वर का कार्य यही है सृष्टि रचना करना धारण करना

326
00:22:50,480 --> 00:22:54,480
फिर प्रलय करके फिर पूरा सृष्टि चक्र चलाना और जितने भी

327
00:22:54,480 --> 00:22:58,480
चीजें बीच में आती है कर्म सिद्धांत मनुष्य की मनुष्य कह रहा हूं सभी

328
00:22:58,480 --> 00:23:02,480
जीवों के लिए रचनाएं करना और सस्टेन करना हर चीज को बेसिकली

329
00:23:02,480 --> 00:23:06,480
यानी उत्पत्ति उत्पत्ति स्थिति संहार और

330
00:23:06,480 --> 00:23:11,280
कर्म फल देना ये चार चीजें मैंने पढ़ी थी उसमें शायद है ना

331
00:23:11,280 --> 00:23:15,680
यही है ना हां यही है तो तो ये बताइए

332
00:23:15,680 --> 00:23:20,480
कि ईश्वर के अलावा और कौन-कौन से तत्व हैं जो एक्सिस्ट करते हैं

333
00:23:20,480 --> 00:23:24,320
सृष्टि रचना से पहले?

334
00:23:24,320 --> 00:23:28,720
वो प्रकृति अब क्योंकि आप मैं सोचा था कि सर्वशक्तिमान

335
00:23:28,720 --> 00:23:33,440
वाले पे आएंगे तो आप दिशा अलग ही ले जा रहे हैं।

336
00:23:33,440 --> 00:23:37,600
इससे क्या होगा? मतलब इसमें इससे फर्क क्या पड़ेगा? तो इससे

337
00:23:37,600 --> 00:23:41,920
सर्वशक्तिमान फर्क पड़ेगा ना फर्क

338
00:23:41,920 --> 00:23:46,560
ये पड़ेगा कि जो ईश्वर है वो प्रकृति

339
00:23:46,560 --> 00:23:51,200
की और जीव की सहायता ले रहा है उत्पत्ति

340
00:23:51,200 --> 00:23:55,360
स्थिति संहार और ये सब करने में सहायता ले रहा है वो फिर

341
00:23:55,360 --> 00:24:00,320
आप ये क्यों कह रहे हो कि वो अपने से कर लेता है कौन से

342
00:24:00,320 --> 00:24:04,320
माना जाए कि हां हां निमित्त

343
00:24:04,320 --> 00:24:08,480
है सर ये तो निमित रूप से सहायता नहीं ले रहा। उपादान तो चाहिए ना

344
00:24:08,480 --> 00:24:12,480
ईश्वर को। मूल प्रकृति आप आज में समझ गया। आप ये कहना चाह रहे हैं कि मूल प्रकृति एक्सिस्ट कर

345
00:24:12,480 --> 00:24:16,640
रही है। तो मूल प्रकृति के अस्तित्व के बिना ईश्वर नहीं बना सकता। तो

346
00:24:16,640 --> 00:24:20,800
इससे आप वो दिखाना चाह रहे समझ रहे। दो ही चीजें वहां पे दो ही

347
00:24:20,800 --> 00:24:24,800
चीजें ईश्वर के अलावा है। उन दोनों चीजों का वो उपयोग कर रहा है। ये वाली

348
00:24:24,800 --> 00:24:29,040
बात जो कही जाती है कि ईश्वर बिना किसी की सहायता के नहीं करता। तो इसमें ये मानना

349
00:24:29,040 --> 00:24:33,200
पड़ेगा या तो कोई एक और ईश्वर था जिसकी सहायता उसने नहीं ली। क्योंकि जिसकी

350
00:24:33,200 --> 00:24:37,440
जो उपलब्ध है उसको उसको तो यूज़ कर रहा है। अगर बात करें कि जड़

351
00:24:37,440 --> 00:24:39,520
जड़ यही सही सही सही पकड़ा

352
00:24:39,520 --> 00:24:43,920
पॉइंट पहला वाला सही पकड़ा। एक मिनट एक मिनट जड़ का वो यूज़ कर रहा है।

353
00:24:43,920 --> 00:24:48,080
अगर कहे चेतन का नहीं कर रहा है तो वो अपने धर्म का जो धार्मिक

354
00:24:48,080 --> 00:24:52,080
ज्ञान है उसका विस्तार करने के लिए भी चेतन का यूज़ कर रहा है। पहले वो ऋषियों को देता

355
00:24:52,080 --> 00:24:56,080
है। ऋषियों से प्रवाह आगे बढ़ता है। चेतन का यूज़ भी हो गया। जो

356
00:24:56,080 --> 00:25:00,160
वो है ना उत्पत्ति स्थिति स्थिति में आ गया धर्म

357
00:25:00,160 --> 00:25:04,160
और धर्म के प्रवाह के लिए वो ऋषियों की ऋषियों की सहायता ले रहा है। चेतन की

358
00:25:04,160 --> 00:25:08,160
सहायता ले रहा है। वो खुद तो हर एक को जाकर के वेद नहीं दे रहा है। वो

359
00:25:08,160 --> 00:25:12,240
चार ऋषियों को दे रहा है। फिर चार ऋषि आगे काम कर रहे हैं। ठीक है। ठीक है। मैं इसका जवाब दे देता

360
00:25:12,240 --> 00:25:16,240
हूं। पॉइंट समझ गया मैं। तो ईश्वर जो है

361
00:25:16,240 --> 00:25:20,240
उपादान तो ईश्वर को चाहिए ही चाहिए। जो आप बोल रहे हो मूल प्रकृति ईश्वर उपादान चाहिए

362
00:25:20,240 --> 00:25:24,640
चाहिए। और सहायता ना लेने का कारण क्या है? वो बताइए।

363
00:25:24,640 --> 00:25:28,640
सहायता ना लेने का अर्थ यानी किसी और की सहायता ना लेकर के खुद से कर रहा

364
00:25:28,640 --> 00:25:32,640
है वो चीजें और खुद से करने का मतलब जो है निमित्त रूप से

365
00:25:32,640 --> 00:25:36,800
सहायता सृष्टि बिना जीव के भाई किस चीज की सहायता

366
00:25:36,800 --> 00:25:40,800
नहीं लेनी जड़ की या ची दोनों की नहीं लेनी सहायता लेने का

367
00:25:40,800 --> 00:25:44,960
अर्थ गलत समझ रहे हैं क्योंकि ये तो फिर आप ये तो शुरू से ही गलत समझ रहे हैं आप ये

368
00:25:44,960 --> 00:25:49,760
तो आर्य समाज में कोई भी नहीं बोलता है कि ईश्वर जो है बिना मूल प्रकृति के बिना

369
00:25:49,760 --> 00:25:53,760
जीवात्मा के एक्सिस्टेंस के बना देता नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह कि आर्य समाज यह

370
00:25:53,760 --> 00:25:54,560
बोलता है कि वो बिना

371
00:25:54,560 --> 00:25:58,640
प्रकृति की बिना प्रकृति का उपयोग किए बना देता है। मुझे इस बात का अर्थ

372
00:25:58,640 --> 00:26:02,720
समझाइए वो यह जो यह जो तर्क दिया जा रहा है आर्य समाज की ओर से कि

373
00:26:02,720 --> 00:26:06,880
वो अपने सारे कार्य बिना किसी की सहायता अन्य आपने जो

374
00:26:06,880 --> 00:26:10,880
पहले वाली बात बोली थी ना वही बात है कि अन्य किसी और चेतन सत्ता और को एक्सिस्ट नहीं कर रही

375
00:26:10,880 --> 00:26:15,600
जिसकी सहायता लेके वो कुछ बना रहा है। जैसे उदाहरण के लिए अ

376
00:26:15,600 --> 00:26:19,760
बोतल है ये ईश्वर का ईश्वर का कार्य ईश्वर का कार्य स्थिति

377
00:26:19,760 --> 00:26:24,000
है ना स्थिति पालन स्थिति

378
00:26:24,000 --> 00:26:28,160
रखना मेंटेन रखना पालन उसमें धर्म की स्थापना आ गया ना

379
00:26:28,160 --> 00:26:32,560
ईश्वर का कार्य कि नहीं आया हम धर्म

380
00:26:32,560 --> 00:26:37,440
की स्थापना अब वो उसप बात चली जाएगी वो फिर

381
00:26:37,440 --> 00:26:41,840
दूसरा विषय हो जाएगा नहीं होगा धर्म की स्थापना

382
00:26:41,840 --> 00:26:45,840
का मतलब यही नहीं है कि जब जब कंस आए रावण आए तब स्थापना करनी है

383
00:26:45,840 --> 00:26:50,160
कोई व्यक्ति धर्म को जानने वाला नहीं है तब चार ऋषियों के अंतःकरण

384
00:26:50,160 --> 00:26:54,160
में वेद का ज्ञान देना ये भी धर्म ठीक है। मैं इसका हां

385
00:26:54,160 --> 00:26:58,240
मैं इसका जवाब ऐसा देता हूं। ईश्वर जो है समस्त आत्माओं

386
00:26:58,240 --> 00:27:03,840
का कल्याण चाहता है और कल्याण चाहने के लिए व्यवस्था जो बनाई

387
00:27:03,840 --> 00:27:07,920
कल्याण करने के लिए चाहने के लिए नहीं नहीं मैं कह रहा हूं वो

388
00:27:07,920 --> 00:27:10,160
सहायता ले रहा है ना चेतन की

389
00:27:10,160 --> 00:27:14,160
आपने कहा चेतन की सहायता नहीं लेता है। वो तो ले रहा है। चेतन से

390
00:27:14,160 --> 00:27:18,240
अपना काम करवा रहा है ना। अपना काम वही

391
00:27:18,240 --> 00:27:23,040
अपना काम कुछ उसका थोड़ी है धर्म की धर्म की स्थापना करना या जो भी करना

392
00:27:23,040 --> 00:27:29,040
वह ईश्वर का काम नहीं है वो चेतन मतलब हमारा काम है बेसिकली

393
00:27:29,040 --> 00:27:33,280
तो वो क्या चीज है जिसके कारण ये कहा जा रहा है ये जो है ये हमारा

394
00:27:33,280 --> 00:27:37,360
काम है ये धर्म की स्थापना करना ईश्वर का नहीं है हम

395
00:27:37,360 --> 00:27:41,600
ईश्वर का नहीं है ना ईश्वर ने हमें हमारे हमें स्वतंत्र छोड़ रखा है

396
00:27:41,600 --> 00:27:46,000
यदि ईश्वर हस्तक्षेप करके स्थापना कर देगा तो फिर वो तो ईश्वर का काम हो जाएगा वो

397
00:27:46,000 --> 00:27:50,000
मैंने आपको क्या कहा है मयंक जी असल में क्या है कि आप मुझे लगता

398
00:27:50,000 --> 00:27:54,080
है कि मेरी कुछ चर्चाओं को देख के एक लिमिटेड क्राइटेरिया को लेकर

399
00:27:54,080 --> 00:27:58,320
के यहां उपस्थित हुए हैं और शायद मैं वो विषय ला नहीं पाया जिसके लिए आप प्रिपेयर

400
00:27:58,320 --> 00:28:02,320
हो के आए हैं मुझे ऐसा लग रहा है क्योंकि बात नहीं नहीं मैं ये तो चाह रहा

401
00:28:02,320 --> 00:28:06,400
था कि पहले से हम थोड़ा डिसाइड कर ले किस पर बात होनी है एक मिनट मैं जरा

402
00:28:06,400 --> 00:28:10,400
पूरा बात तो सर्वशक्तिमान पे ही चल रही है ना सर्वशक्तिमान पे ही बात चल

403
00:28:10,400 --> 00:28:14,640
रही है जो सर्वशक्तिमान के लिए तर्क दिया जा रहा है ईश्वर अपने सारे कार्य

404
00:28:14,640 --> 00:28:18,800
कर सकता है वो तर्क मुझे वहां से

405
00:28:18,800 --> 00:28:22,800
संतुष्टि नहीं मिल रही है क्योंकि ईश्वर अपने सारे कार्य कर सकता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान

406
00:28:22,800 --> 00:28:25,280
है उसका कार्य उत्पत्ति स्थिति सब पार

407
00:28:25,280 --> 00:28:29,360
और ये अब उसी उत्पत्ति में वो जीव का भी उपयोग कर रहा है

408
00:28:29,360 --> 00:28:33,440
संसार बनाने के लिए जीव का उपयोग हो रहा है चेतन का उपयोग हो रहा है उसके

409
00:28:33,440 --> 00:28:37,520
बाद स्थिति में धर्म के लिए वो जीव का उपयोग कर रहा है उसको बता रहा है कि ये

410
00:28:37,520 --> 00:28:42,000
ले भाई वेद और इसको जाकर के आगे आप बढ़ाइए तो ये उपयोग हो गया

411
00:28:42,000 --> 00:28:46,000
तो वो कौन सा फिर अंतर क्या रहा जब वो तो दूसरी चीजों का जो जो

412
00:28:46,000 --> 00:28:50,000
भी चीज एक्सिस्ट कर रही है वो उसका उपयोग कर रहा है उसकी सहायता ले रहा है तो अंतर

413
00:28:50,000 --> 00:28:54,080
क्या रहा [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो वही है ना आप सहायता का

414
00:28:54,080 --> 00:28:58,080
अर्थ गलत समझ रहे हैं वही है उसका उत्तर हो गया सहायता का अर्थ आप ये समझ रहे हैं कि क्या

415
00:28:58,080 --> 00:29:02,160
ईश्वर स्वयं से बिना मूल प्रकृति के एक्सिस्टेंस के उसके

416
00:29:02,160 --> 00:29:06,240
बना दे रहा है या फिर स्वयं से आत्मा मैं नहीं कह रहा कि मैं ये नहीं कह

417
00:29:06,240 --> 00:29:10,240
रहा कि मैं सहायता का अर्थ मुझे आप इस वाक्य का अर्थ बताइए कि वो बिना किसी की

418
00:29:10,240 --> 00:29:14,320
सहायता के करता है वो अर्थ बताइए मैंने सहायता सिद्ध कर दी वो सबकी सहायता

419
00:29:14,320 --> 00:29:19,680
ले रहा है जो भी उपलब्ध है उनकी सहायता ले रहा है वो

420
00:29:19,680 --> 00:29:23,840
वही है ना सहायता तो लेता ही है ना आप समझ ही नहीं रहे सहायता

421
00:29:23,840 --> 00:29:28,000
लेने का अर्थ अगर आप ये करें कि भाई कुछ एक्सिस्ट ना करे मैं मैं

422
00:29:28,000 --> 00:29:32,080
ये नहीं कह रहा कि मैं आप यह मत बताइए कि क्या नहीं है

423
00:29:32,080 --> 00:29:36,240
अच्छा मैं मैं बताता हूं चलो मैं एग्जांपल देता हूं एक मिनट थोड़ा टाइम क्यों

424
00:29:36,240 --> 00:29:40,480
लग रहा है आप ये मत बताइए कि क्या नहीं है आप ये बताइए क्या है अपनी

425
00:29:40,480 --> 00:29:45,360
बात बताइए आप ठीक

426
00:29:45,360 --> 00:29:50,160
तो मूल प्रकृति है जीवात्माएं

427
00:29:50,160 --> 00:29:54,160
जीवात्माओं के लिए जो है संसार बनाना ये है ईश्वर का

428
00:29:54,160 --> 00:29:58,240
एक कार्य ठीक है अब इस कार्य को करने के लिए

429
00:29:58,240 --> 00:30:02,320
जीवात्माओं की जरूरत तो पड़ेगी शरीर में जीवात्मा को डालेगा और किसको डालेगा मूल

430
00:30:02,320 --> 00:30:06,480
प्रकृति से ही वह संसार बनाएगा ठीक है यह कार्य मैंने डिफाइन कर दिया

431
00:30:06,480 --> 00:30:10,480
ठीक है अब इस कार्य को करने के लिए ईश्वर को और किसी की सहायता की जरूरत नहीं है ईश्वर

432
00:30:10,480 --> 00:30:14,640
स्वयं सामर्थ्य रखता है यह कार्य करने का ठीक है और

433
00:30:14,640 --> 00:30:18,800
किसी और और कौन है जीव की सहायता ले ली जड़

434
00:30:18,800 --> 00:30:22,800
की सहायता ले ही ली अच्छा ये भी हो कि चलो मेरा कंट्रोल है अगर

435
00:30:22,800 --> 00:30:26,800
मैं कहूं कि मेरा कंट्रोल है सहायता करना ना करने के ऊपर

436
00:30:26,800 --> 00:30:30,960
ठीक है कि भाई मैं जीव की इच्छा के बिना भी उसका उपयोग

437
00:30:30,960 --> 00:30:34,720
कर सकता हूं है ना आप वो बात नहीं कह

438
00:30:34,720 --> 00:30:39,200
पा रहे मैं आपके पक्ष की ओर से नहीं नहीं नहीं नहीं कर नहीं नहीं

439
00:30:39,200 --> 00:30:43,280
ईश्वर फिर वही बात आ जाएगी ना ईश्वर क्यों करेगा पे ही आना पड़ेगा कि ईश्वर

440
00:30:43,280 --> 00:30:47,440
की अगर आत्मा है मान लीजिए जीवात्मा एक्सिस्ट नहीं कर रही है ईश्वर मूर्त प्रकृति से अपना

441
00:30:47,440 --> 00:30:51,840
कुछ कर रहा है सुन रहे मैं क्या कह रहा हूं आपने मेरी बात समझी नहीं आप नहीं

442
00:30:51,840 --> 00:30:56,240
बोलने लगे पहले ही मैंने कहा कि प्रकृति

443
00:30:56,240 --> 00:31:00,240
निर्णय नहीं ले सकती कि मुझे उपयोग में आना है कि नहीं आना है जीव

444
00:31:00,240 --> 00:31:04,240
निर्णय नहीं ले सकता है कि मुझे जन्म लेना है कि नहीं ले तो उसका क्योंकि कंट्रोल

445
00:31:04,240 --> 00:31:08,240
होता है इस कारण से जीव का उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं

446
00:31:08,240 --> 00:31:12,400
हो सकता नहीं मैं संसार नहीं बनने दूंगा मैं नहीं आऊंगा तो इस तरीके से देखा

447
00:31:12,400 --> 00:31:16,400
जाए तो वह स्वतंत्र रूप से यह निर्णय लेता है कि मुझे संसार बनाना है, कैसे बनाना

448
00:31:16,400 --> 00:31:20,480
है, आगे क्या करना है, जीव को कैसे जन्म देना है? इस तरीके से वो बिना

449
00:31:20,480 --> 00:31:24,560
किसी की सहायता के क्योंकि करता है अपना कार्य इसलिए वो सर्वशक्तिमान

450
00:31:24,560 --> 00:31:30,400
है। मैंने आपकी ओर से एक पक्ष रख दिया क्योंकि वो

451
00:31:30,400 --> 00:31:34,400
क्योंकि वहां क्योंकि जीव और प्रकृति दोनों

452
00:31:34,400 --> 00:31:39,440
उसके अधीन होते हैं। हां होते हैं।

453
00:31:39,440 --> 00:31:43,680
है ना? ठीक है। जीव और प्रकृति दोनों उसके अधीन होते हैं। इस

454
00:31:43,680 --> 00:31:47,680
कारण से ये कहा जाता है कि उसने उनकी बिना मर्जी

455
00:31:47,680 --> 00:31:49,760
उनसे कोई इच्छा थोड़ी ना पूछता है वो कि भाई

456
00:31:49,760 --> 00:31:54,000
तुझे जाना है कि नहीं जाना है संसार है ना हम तो वहां पे जो सहायता

457
00:31:54,000 --> 00:31:58,320
होती है वो इच्छा पूर्वक नहीं होती मगर दिक्कत ये है जब वो पालन करता है ना स्थिति

458
00:31:58,320 --> 00:32:02,400
करता है जब वो धर्म धर्म का ज्ञान देता है पालन में स्थिति

459
00:32:02,400 --> 00:32:06,480
में तो वो धर्म का जब ज्ञान देता है तो वहां पर

460
00:32:06,480 --> 00:32:10,720
उनकी इच्छा है कि मैं इसको आगे बढ़ाऊं कि ना बढ़ाऊं तो ये सहायता

461
00:32:10,720 --> 00:32:14,720
हो गई चेतन की सहायता यहां हो गई और जड़ की सहायता वो ले

462
00:32:14,720 --> 00:32:17,600
ही रहा है।

463
00:32:17,600 --> 00:32:21,680
नहीं आपने क्या बोला लास्ट लाइन कि भाई धर्म का ज्ञान देने

464
00:32:21,680 --> 00:32:25,840
के लिए ईश्वर इच्छा करता है। ये बोलना चाह रहे हैं। मैंने इच्छा

465
00:32:25,840 --> 00:32:29,920
कहा क्या आप बार-बार इच्छा इच्छा में फसा के दूसरी

466
00:32:29,920 --> 00:32:33,920
ओर क्यों ले जा रहे हैं? मैं कह रहा हूं वो वो कार्य वो

467
00:32:33,920 --> 00:32:38,080
एक कार्य करता है कि नहीं करता है उनको ज्ञान देने का ऋषियों को ज्ञान देने का?

468
00:32:38,080 --> 00:32:42,320
हां बिल्कुल यह कार्य अनावश्यक है या फिर उसके चार कामों

469
00:32:42,320 --> 00:32:46,560
में से एक काम है? हां आवश्यक है।

470
00:32:46,560 --> 00:32:52,160
तो चार में से किसी एक में है ना वो ये अलग से एक्सिस्ट करता है।

471
00:32:52,160 --> 00:32:56,160
नहीं ये ईश्वर ने बनाई ही जो दुनिया वगैरह सब बनाया है जीव कल्याण के

472
00:32:56,160 --> 00:33:00,240
लिए और कल्याण के लिए धन को देना ही पड़ता। पूछा चार में से मैंने पूछा चार में से किसी

473
00:33:00,240 --> 00:33:04,320
एक काम में आता होगा ना धर्म का क्या ज्ञान देना? चार में

474
00:33:04,320 --> 00:33:04,880
से अगर आप

475
00:33:04,880 --> 00:33:07,200
ये

476
00:33:07,200 --> 00:33:11,280
चार पांच ये तो फिर [हंसी] आप मैंने ये बोला ही नहीं कि ये चार में ये

477
00:33:11,280 --> 00:33:15,440
चीजें नहीं आती है। ये फिर आप समझने की गलती कर रहे हैं। ये मैंने कभी नहीं बोला। आती

478
00:33:15,440 --> 00:33:19,440
है। बोल दीजिए आती है चार में से। अब आप ये ये सवाल पहले ही पूछ लीजिए। आप इतना

479
00:33:19,440 --> 00:33:23,440
लंबा लाने की जरूरत नहीं है। आप पूछ लीजिए ना मुझसे पहले से ही। मतलब अब अब आप

480
00:33:23,440 --> 00:33:27,440
ये टॉपिक नहीं आप जो टॉपिक चल रहा है वो नहीं डिसाइड वो ये कहेंगे आपने पहले क्यों

481
00:33:27,440 --> 00:33:31,440
नहीं पूछा। ये है मतलब मैं ऐसा करके आया हूं कि आपको किस

482
00:33:31,440 --> 00:33:35,440
किस वे में आपसे स्ट्रक्चर [गला साफ़ करने की आवाज़] में आपसे क्वेश्चन अब इस बात

483
00:33:35,440 --> 00:33:40,640
पे हमारी चर्चा होगी कि मैंने पहले क्या नहीं पूछा बाद में क्या नहीं पूछा मैं पूछ रहा हूं

484
00:33:40,640 --> 00:33:45,120
ये जो धर्म का ज्ञान है देना है ये आवश्यक कार्य है ना

485
00:33:45,120 --> 00:33:49,280
हां आवश्यक है हां तो अच्छा मैं एक लाइन एक

486
00:33:49,280 --> 00:33:53,520
लाइन बोल देता हूं एक लाइन बोल देता हूं तो उससे थोड़ा क्लेरिटी आ जाएगी ईश्वर

487
00:33:53,520 --> 00:33:58,800
जितने भी कार्य करता है सारे ही आवश्यक है अनावश्यक कुछ भी नहीं करता

488
00:33:58,800 --> 00:34:02,800
ठीक है? तो यह जो धर्म का ज्ञान देना है, यह उसके चार में से एक काम

489
00:34:02,800 --> 00:34:07,200
में आ गया। हम इसको स्थिति में मान लेते हैं। पालन में

490
00:34:07,200 --> 00:34:11,360
हां, किसी में मान सब में आएगा। वैसे तो किसी में मान ले। सृष्टि सृष्टि

491
00:34:11,360 --> 00:34:16,720
रचना में मान ले क्या? हां सब में ही आएगा क्योंकि ईश्वर

492
00:34:16,720 --> 00:34:20,560
रचना के लिए धर्म सृष्टि रचना सृष्टि रचना के लिए

493
00:34:20,560 --> 00:34:24,800
ये ज्ञान देना आवश्यक हो गया। क्योंकि रचना कर

494
00:34:24,800 --> 00:34:29,040
रचना के लिए ज्ञान देना आवश्यक नहीं। रचना कर किसके लिए रहा है? जीवात्मा के लिए तो कर रहा है। तो

495
00:34:29,040 --> 00:34:33,920
अल्टीमेटली जीवात्मा के कल्याण के लिए भाई फिर तो पालन जीवात्मा के

496
00:34:33,920 --> 00:34:37,920
आप ना आप खामखा उसको खींच रहे

497
00:34:37,920 --> 00:34:42,000
हैं बात को। ऐसे अगर ऐसे अगर सृष्टि रचना में

498
00:34:42,000 --> 00:34:46,080
ही सब कुछ आ गया तो आप पालन को भी रचना में डाल दो। आप प्रलय

499
00:34:46,080 --> 00:34:50,240
को भी रचना में डाल दो। आप कर्म फल नहीं एक मिनट अब मुझे बोलने

500
00:34:50,240 --> 00:34:54,480
दीजिए। आप कर्म फल को भी रचना में डाल दो। पता नहीं क्यों स्पष्टता से दूर

501
00:34:54,480 --> 00:34:58,640
रहना मैं मैं क्योंकि मैं मैंने ठीक है मैं मैं

502
00:34:58,640 --> 00:35:02,640
बोल देता हूं स्पष्टता से दूर नहीं मैं इस मतलब ये जो आप बोल रहे हैं ना मैं

503
00:35:02,640 --> 00:35:06,640
हर चीज को आवश्यक कार्यों के अंदर पूरी एक उसमें डाल के चल रहा

504
00:35:06,640 --> 00:35:10,720
हूं ऐसे तीन चार पांच ऐसे ये नहीं करके चल रहा हूं इसमें इसकी

505
00:35:10,720 --> 00:35:14,960
आवश्यकता भी नहीं है करने की इसलिए मैंने बोल दिया कि आप सब

506
00:35:14,960 --> 00:35:19,120
आवश्यकता है पालन सृष्टि के पालन में धर्म का ज्ञान

507
00:35:19,120 --> 00:35:23,120
देना एक अंग है और उसके लिए वो चेतन की सहायता ले

508
00:35:23,120 --> 00:35:27,120
रहा है कि धर्म कैसे स्थापित हो दुनिया दुनिया में कि चार ऋषियों को ज्ञान

509
00:35:27,120 --> 00:35:31,200
दो। नहीं तो सारे नास्तिक हैं। जानवर हैं।

510
00:35:31,200 --> 00:35:35,280
धर्म नहीं है। माता कौन है? पत्नी कौन है? बहन कौन है? नहीं पता।

511
00:35:35,280 --> 00:35:35,780
सीधी

512
00:35:35,760 --> 00:35:39,760
बात धर्म का ज्ञान दे रहा है। और उसके

513
00:35:39,760 --> 00:35:44,160
लिए सहायता ठीक है। मैं मैंने पहले ही बता दिया। सहायता

514
00:35:44,160 --> 00:35:48,480
किस दृष्टि से ले रहा है और किस दृष्टि से नहीं ले रहा है। मैंने एक्सप्लेन कर दिया। आप आप अंतर

515
00:35:48,480 --> 00:35:52,560
बता दीजिए कि मनुष्य ऐसा ऐसा काम करता है। यहां पे देखिए वो बाधित हो रहा है

516
00:35:52,560 --> 00:35:56,560
और देखिए ईश्वर ऐसा-सा नहीं करता है इसलिए बाधित नहीं होता है। अंतर बताइए

517
00:35:56,560 --> 00:36:00,640
उदाहरण के साथ जी मतलब समझा नहीं

518
00:36:00,640 --> 00:36:04,800
मैं कैसे मनुष्य क्या कर सकता है? ईश्वर क्या कर सकता है? मैंने आपने कहा

519
00:36:04,800 --> 00:36:10,080
ईश्वर बिना किसी की सहायता के अपने सारे कार्य कर सकता है। ठीक है?

520
00:36:10,080 --> 00:36:14,400
अपने सारे कार्य कर सकता है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। अब आप मुझे उदाहरणार्थ

521
00:36:14,400 --> 00:36:18,480
बताइए कि मनुष्य ने ये यहां पर देखिए मनुष्य का मनुष्य कोई भी अपना

522
00:36:18,480 --> 00:36:22,560
कार्य बिना किसी की सहायता के नहीं कर सकता। इसलिए मनुष्य जो है बाधित है

523
00:36:22,560 --> 00:36:26,640
और ईश्वर सर्वशक्तिमान है क्योंकि उसने इस इस तरीके से अपना कार्य बिना

524
00:36:26,640 --> 00:36:30,800
किसी की सहायता के किया। वो मुझे उदाहरणार्थ बता दीजिए। उदाहरण देते

525
00:36:30,800 --> 00:36:35,360
हुए। हां तो हां जीवात्मा जैसे सृष्टि रचना ही है।

526
00:36:35,360 --> 00:36:39,440
जीवात्मा जो है खुद से जो है मूल प्रकृति में बल या फिर

527
00:36:39,440 --> 00:36:43,600
कुछ मतलब मूल प्रकृति पर इन्फ्लुएंस नहीं कर सकती। खुद से ईश्वर

528
00:36:43,600 --> 00:36:47,920
करके जीवात्मा का ये काम है। नहीं कर सकती।

529
00:36:47,920 --> 00:36:51,040
मैं वही तो बोल रहा हूं। नहीं कर सकती। मनुष्य का यह काम

530
00:36:51,040 --> 00:36:55,040
है भाई। आप मैं

531
00:36:55,040 --> 00:36:59,040
पूछ रहा हूं मनुष्य के जो जो काम है वो बिना किसी की सहायता के

532
00:36:59,040 --> 00:37:03,200
कर नहीं कर सकता। ऐसे करके मुझे उदाहरणार्थ बताइए।

533
00:37:03,200 --> 00:37:07,360
जैसे उसको सांस चाहिए सांस। मनुष्य को सांस लेनी है मान लीजिए

534
00:37:07,360 --> 00:37:11,440
तो उसको प्रकृति चाहिए, ऑक्सीजन चाहिए तो वो सांस ले पाएगा। है

535
00:37:11,440 --> 00:37:15,760
कि नहीं? है ना? या फिर उसको इधर उधर चलना फिरना

536
00:37:15,760 --> 00:37:19,760
है रोटी खानी तो उसे ईश्वर से ईश्वर के द्वारा मिलने वाली शक्ति

537
00:37:19,760 --> 00:37:24,480
चाहिए तो वो चल फिर पाएगा अपने भोजन पान की व्यवस्था कर पाएगा

538
00:37:24,480 --> 00:37:28,480
तो इस तरीके से जो मनुष्य है वो निर्भर हो गया ऐसे उदाहरण

539
00:37:28,480 --> 00:37:32,560
उदाहरण देते हुए अंतर करिए ईश्वर ईश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य

540
00:37:32,560 --> 00:37:37,120
में जी मैं उदाहरण

541
00:37:37,120 --> 00:37:41,280
मनुष्य कोई भी कार्य एक भी कार्य बिना सहायता कर ही नहीं सकता इसमें

542
00:37:41,280 --> 00:37:45,760
उदाहरण क्या देना आपको एक उदाहरण दे दीजिए तो मैं उससे नाप के दिखाऊंगा।

543
00:37:45,760 --> 00:37:49,760
यह मैंने बोतल ठीक है ये ये मैंने बोतल उठाई है अपने हाथों में यह

544
00:37:49,760 --> 00:37:53,760
मैं ईश्वर की सहायता के उठा बिना ईश्वर की सहायता के उठा ही नहीं सकता। ये

545
00:37:53,760 --> 00:37:57,840
ले लीजिए उदाहरण। अच्छा मतलब सबसे

546
00:37:57,840 --> 00:38:01,840
पहले तो एक चीज हो गई कि अगर किसी ने किसी को चाकू मारा तो वो बिना

547
00:38:01,840 --> 00:38:05,840
ईश्वर की सहायता के नहीं मार सकता। कुछ भी नहीं हो सकता। बिना ईश्वर की

548
00:38:05,840 --> 00:38:06,340
सहायता

549
00:38:06,080 --> 00:38:10,160
के। एक भी कार्य बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। बिना ईश्वर की सहायता के

550
00:38:10,160 --> 00:38:14,560
नहीं हो सकता। इसको रख लेना बात के लिए। अब दूसरी बात आ गई

551
00:38:14,560 --> 00:38:19,120
सहायता निमित हर कार्य में ईश्वर ही है ना बीच में इसमें मैंने

552
00:38:19,120 --> 00:38:23,360
ईश्वर के सस्टेन नहीं कर सकते इसमें मैंने ईश्वर की किस रूप में सहायता

553
00:38:23,360 --> 00:38:26,400
ली है किस रूप में सहायता ली है चेतन के रूप में

554
00:38:26,400 --> 00:38:30,560
या जड़ के रूप में

555
00:38:30,560 --> 00:38:35,760
समझा नहीं क्या मतलब जड़ के रूप में चेतन के रूप में मतलब जब मैंने बोतल उठाई

556
00:38:35,760 --> 00:38:39,840
जब मैंने बोतल उठाई तो ईश्वर की मैंने सहायता किस रूप में

557
00:38:39,840 --> 00:38:44,320
ली है एक एक सहायता इस रूप में ली है क्योंकि

558
00:38:44,320 --> 00:38:48,560
जो बोतल है या कुछ भी है वह संसार

559
00:38:48,560 --> 00:38:52,560
एक्सिस्ट करने के लिए जिस प्रकार जो बेसिकली विज्ञान के जितने भी

560
00:38:52,560 --> 00:38:57,040
नियम है उनकी वजह से जो है हर चीज एक्सिस्ट कर रही है मेरा शरीर भी

561
00:38:57,040 --> 00:39:01,040
ठीक है तो आत्मा जो है अपने अंदर चेष्टा करती है और बाकी

562
00:39:01,040 --> 00:39:05,360
चेष्टा के बाद बीच में जितनी भी चीजें आती है वो सारी ईश्वर की सहायता

563
00:39:05,360 --> 00:39:09,520
से ही होती है ईश्वर के निमित्त से होती है यानी

564
00:39:09,520 --> 00:39:13,680
मैं एज एन आत्मा खुद से शरीर नहीं बना सकता। खुद से कुछ भी नहीं कर सकता।

565
00:39:13,680 --> 00:39:17,840
खुद से मोशन कुछ भी नहीं कर सकता। शरीर बनाना आत्मा का काम है ही नहीं।

566
00:39:17,840 --> 00:39:22,240
आत्मा का कार्य तो अभी हम मनुष्य की बात कर रहे हैं। पहली बात तो मनुष्य

567
00:39:22,240 --> 00:39:26,400
का कार्य तो खाना खाना है। उसका कार्य

568
00:39:26,400 --> 00:39:30,480
मैं मनुष्य थोड़ी मैं तो मैं तो आत्मा आत्मा की दृष्टि से बता रहा हूं

569
00:39:30,480 --> 00:39:34,560
ना आपको। तो मैंने तो आपसे पूछा है ना? मनुष्य से

570
00:39:34,560 --> 00:39:38,720
पूछा है ना मैंने आपसे। अच्छा आप आप स्पेसिफाई स्पेसिफाई करिए। कौन

571
00:39:38,720 --> 00:39:41,920
कौन सी चीज की बात कर एक उदाहरण आप मैं स्पेसिफाई

572
00:39:41,920 --> 00:39:45,920
कर दिया। मनुष्य और ईश्वर के कार्य में अंतर बताइए कि कैसे मनुष्य

573
00:39:45,920 --> 00:39:50,000
बाधित है और कैसे ईश्वर अपने कार्य कर लेने पर सर्वशक्तिमान

574
00:39:50,000 --> 00:39:54,240
है। ऐसे अंतर बताइए मनुष्य के कार्यों से क्योंकि

575
00:39:54,240 --> 00:39:58,320
यह कहा जाता है कि मनुष्य अपने सारे कार्य जो है वो करने के

576
00:39:58,320 --> 00:40:02,400
लिए किसी ना किसी की सहायता लेता है और वो नहीं लेता है। अब इसमें

577
00:40:02,400 --> 00:40:06,480
बात ये आती है जैसे आपने कहा कि बोतल को उठाया तो बोतल को उठाया

578
00:40:06,480 --> 00:40:10,480
इसमें ईश्वर ने किस रूप में सहायता की? ईश्वर ने सहायता की जड़

579
00:40:10,480 --> 00:40:14,880
रूप में चेतन रूप में नहीं की। हालांकि वह चेतन है पर

580
00:40:14,880 --> 00:40:19,040
यहां पर उसने अपने आप को न्यूट्रल दिखाया। आप मेरी शक्ति में नहीं नहीं

581
00:40:19,040 --> 00:40:23,200
चेतन रूप में की है। चेतन रूप में ही की है। इस बोतल

582
00:40:23,200 --> 00:40:27,280
को धारण करने में मतलब इस बतल के एक्सिस्ट होने में या फिर जितनी भी चीजें

583
00:40:27,280 --> 00:40:31,280
हैं बीच में सब कुछ एक्सिस्ट होने के लिए ईश्वर चेतन रूप से

584
00:40:31,280 --> 00:40:35,440
ही रचना मतलब धारण किए हो है ना। मूल प्रकृति को जितना भी मोशन में रखे हो

585
00:40:35,440 --> 00:40:39,440
ईश्वर क्योंकि ईश्वर मोशन में नहीं रखा हुआ होगा बाकी एक्सिस्ट नहीं करेगी

586
00:40:39,440 --> 00:40:43,440
जहां पर चाकू चल रहा होता है वहां ईश्वर बुद्धि पूर्वक सहायता करता है

587
00:40:43,440 --> 00:40:47,600
चाकू मारने वाले की हां आप अब आप उस

588
00:40:47,600 --> 00:40:52,880
मतलब उस बात पे आए आप ये बोलना चाह रहे हैं क्या ईश्वर मेरे उस एक्शन को

589
00:40:52,880 --> 00:40:57,040
मैंने इन्फ्लुएंस नहीं कर रहा है अगर मैं चाहता हूं किसी को चाकू मारना

590
00:40:57,040 --> 00:41:02,160
तो उसमें ईश्वर बुद्धि पूर्वक वहां पर उपलब्ध होता है बुद्धि पूर्वक

591
00:41:02,160 --> 00:41:06,320
उसका भी चयन बुद्धि पूर्वक मतलब बिना बुद्धि पूर्वक उपलब्ध होता बुद्धि

592
00:41:06,320 --> 00:41:10,320
पूर्वक ये क्या बात हुई बिना बुद्धि पूर्वक कहां उपलब्ध होता है आप कह रहे हैं चेतन आप

593
00:41:10,320 --> 00:41:14,480
कह रहे हैं चेतन रूप में वो इनकी सहायता कर रहा है मनुष्यों की कोई भी कार्य

594
00:41:14,480 --> 00:41:18,000
करने में है ना हर छोटे से छोटा कार्य चेतन

595
00:41:18,000 --> 00:41:22,160
चेतन चेतन रूप का मतलब क्या समझ रहे हैं आप मुझे बता दीजिए पहले चेतन रूप का मतलब

596
00:41:22,160 --> 00:41:27,040
किस प्रकार बता देता हूं बता देता हूं बता देता हूं जैसे मेरे पास

597
00:41:27,040 --> 00:41:31,280
मेरे पास एनर्जी है खाना खाया तो इस समय जो मेरी एनर्जी है ना

598
00:41:31,280 --> 00:41:35,280
अगर मैं भौतिक दृष्टि से देखूंगा तो यह एनर्जी मेरे

599
00:41:35,280 --> 00:41:39,840
लिए क्या कहते हैं ऐसी है कि इसके पास अपना कोई

600
00:41:39,840 --> 00:41:44,080
प्रज्ञा नहीं है या बुद्धि नहीं है या वहां पर कोई भी दिमाग अक्ल

601
00:41:44,080 --> 00:41:48,400
इस तरह की कोई चीज नहीं निर्णायक क्षमता नहीं है मैं जैसा इसको उपयोग

602
00:41:48,400 --> 00:41:52,480
करना चाहता हूं मैं जैसा इसको उपयोग करना चाहता हूं वो हो रही है

603
00:41:52,480 --> 00:41:56,560
उपयोग अब अगर आप यह कहेंगे जो शक्ति है जिसका मैं

604
00:41:56,560 --> 00:42:00,640
अपने मन मुताबिक उपयोग कर रहा हूं यह जड़ रूप से है तो यह मानना

605
00:42:00,640 --> 00:42:04,640
पड़ेगा कि ईश्वर यहां चेतन होते हुए भी जड़ के

606
00:42:04,640 --> 00:42:08,640
रूप में उपस्थित हो रहा है तो हम उसके उसकी सहायता ले रहे हैं। ठीक? चेतन

607
00:42:08,640 --> 00:42:12,720
होते हुए भी जड़ रूप में उपस्थित हो रहा है तो हम उसकी सहायता ले रहे हैं।

608
00:42:12,720 --> 00:42:16,800
और या फिर यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर ईश्वर जो है

609
00:42:16,800 --> 00:42:20,880
बुद्धि पूर्वक हमारे समस्त कार्यों में उतना ही भागीदार होता

610
00:42:20,880 --> 00:42:23,920
है जितना हम होते हैं।

611
00:42:23,920 --> 00:42:27,920
वही ना भागीदारी यानी निर्णय लेने में ईश्वर का कितना भागीदारी है। यही बोलना चाह

612
00:42:27,920 --> 00:42:32,080
रहे ना अल्टीमेटली यही सवाल है आपका। यही बोला आपने अभी मैं मैं

613
00:42:32,080 --> 00:42:33,120
इस पर चर्चा आगे नहीं

614
00:42:33,120 --> 00:42:37,280
बढ़ाना चाह रहा हूं। यह तो मैं बाद के लिए रख रहा हूं। वो मुझे बस इतना बता दीजिए कि वो

615
00:42:37,280 --> 00:42:41,280
जड़ के रूप में उपयोग होता होता है ईश्वर

616
00:42:41,280 --> 00:42:45,440
शक्ति जड़ के रूप में या चेतन के रूप में होती है। ये बता दीजिए बस

617
00:42:45,440 --> 00:42:49,520
फिर बाद में बात कर लेंगे इस बारे में। अभी वो सर्वशक्तिमान वाला चल रहा है। वो

618
00:42:49,520 --> 00:42:53,600
चलता रहेगा। जी देखिए जड़ के रूप में

619
00:42:53,600 --> 00:42:57,840
फिर वही बात है ना। जड़ के रूप में नहीं चेतन सत्ता के रूप में अवेलेबल है। जड़

620
00:42:57,840 --> 00:43:01,840
के रूप में मूल प्रकृति अवेलेबल है। जड़ के रूप में ईश्वर

621
00:43:01,840 --> 00:43:06,080
नहीं ईश्वर से इंटरेक्शन नहीं करते। बात को समझ थोड़ा सा स्ट्रक्चरल

622
00:43:06,080 --> 00:43:10,080
वे में चाहिए। बात ये अभी हो रही है कि मनुष्य

623
00:43:10,080 --> 00:43:14,080
जो भी काम करता है उसमें ईश्वर सहायक होता है। ठीक है? तो

624
00:43:14,080 --> 00:43:18,240
क्योंकि ईश्वर तो चेतन है। ईश्वर चेतन है ना?

625
00:43:18,240 --> 00:43:22,400
तो तो मैं यहां पर आपसे ये पूछ रहा हूं कि

626
00:43:22,400 --> 00:43:26,560
चेतन होते हुए भी वो जड़ जैसा बिहेव करता है क्या?

627
00:43:26,560 --> 00:43:30,560
चेतन होते हुए भी नहीं करता। तो इसका मतलब

628
00:43:30,560 --> 00:43:34,560
वहां पर वो जो ईश्वर की सहायता ली जा

629
00:43:34,560 --> 00:43:38,640
रही है वो ईश्वर की चेतना के साथ ली जा रही है। मतलब चेतना भी वहां

630
00:43:38,640 --> 00:43:42,640
इन्वॉल्व है। ईश्वर एक ईश्वर का निर्णय है वहां पर।

631
00:43:42,640 --> 00:43:46,800
ईश्वर की सत्ता है। निर्णय नहीं है। वही तो आप गलती कर रहे हैं। निर्णय नहीं

632
00:43:46,800 --> 00:43:48,400
है। निर्णय मेरा स्वयं

633
00:43:48,400 --> 00:43:52,560
का है। निर्णय में ईश्वर ने कैसे आ सकता है? आप क्या बात कर रहे हो? तो निर्णय आएगा

634
00:43:52,560 --> 00:43:56,640
नहीं। निर्णय नहीं है तो वो जड़ जड़ के बिहेव कर रहा

635
00:43:56,640 --> 00:44:00,640
है। हां नहीं आप शब्दों का चुनाव आप शब्दों का चुनाव गलत

636
00:44:00,640 --> 00:44:04,640
कर रहे हैं। मैं बताता हूं मैं बताता हूं कैसे जड़ को ईश्वर ने धारण किए हुआ।

637
00:44:04,640 --> 00:44:08,640
जड़ के रूप में ईश्वर बिहेव नहीं कर रहा है। जड़ को ये ईश्वर ने खुद जो

638
00:44:08,640 --> 00:44:12,720
है जड़ को यानी मूड प्रकृति देखो धारण किए हुए इसलिए एक्सिस्टेंस है सारी। ईश्वर

639
00:44:12,720 --> 00:44:16,800
खुद नहीं बिहेव कर रहा है उस रूप में या फिर हां रूप यानी ईश्वर का

640
00:44:16,800 --> 00:44:20,800
फॉर्म ट्रांसफॉर्म नहीं हो रहा है जिस प्रकार से आप ले जाना चाहे बात को वो

641
00:44:20,800 --> 00:44:24,880
नहीं हो रहा है ईश्वर निर्णायक रूप से बिल्कुल नहीं सहायता कर रहा है ईश्वर ने जो

642
00:44:24,880 --> 00:44:28,880
है ऐसा कह लीजिए कि बना रखी है हमारे

643
00:44:28,880 --> 00:44:32,960
लिए है वो बुद्धि है फिर भी वहां पर अपनी बुद्धि पूर्वक वहां पर

644
00:44:32,960 --> 00:44:37,120
हस्तक्षेप नहीं कर रहा है इसका मतलब कि मैं डला हुआ हूं आप मुझे जैसा

645
00:44:37,120 --> 00:44:41,280
उपयोग में लेना चाहते हो ले सकते हो यही जड़ होता है इसी को मैं जड़

646
00:44:41,280 --> 00:44:42,400
कह रहा हूं ऐसा ही कर रहा

647
00:44:42,400 --> 00:44:46,480
है ईश्वर नहीं मूल प्रकृति आप मुझे का शब्द मुझे का

648
00:44:46,480 --> 00:44:51,040
शब्द ईश्वर के लिए उपयोग कर रहे हैं ना वो गलत कर रहे हैं आप मूल प्रकृति का जो

649
00:44:51,040 --> 00:44:56,320
सुनिए सुनिए सुनिए मूल प्रकृति की बात भी कर ले प्रकृति ये है

650
00:44:56,320 --> 00:45:00,480
उपादान मैं इस थोड़ा सा इस कंक्लूड कर दूं फिर आप अगली

651
00:45:00,480 --> 00:45:04,560
बात करना थोड़ा सा आप कंफ्यूज हो रहे हैं

652
00:45:04,560 --> 00:45:08,560
मूल प्रकृति जो प्रकृति है ना वो उपादान कारण है जिससे सब

653
00:45:08,560 --> 00:45:12,800
कुछ बना हुआ है है ना जिसको अब हम छू भी रहे हैं बाद में।

654
00:45:12,800 --> 00:45:17,040
ठीक है? छू रहे हैं ना स्पर्श रूप रस रूप रस स्पर्श गंध

655
00:45:17,040 --> 00:45:20,160
इत्यादि उसमें गुण है।

656
00:45:20,160 --> 00:45:24,240
ये तो हो गई प्रकृति। मगर ये प्रकृति रूपी पदार्थों को

657
00:45:24,240 --> 00:45:28,240
गति कराने के लिए जो मैं कर रहा हूं। गति ये प्रकृति थोड़ी ना है। ये तो

658
00:45:28,240 --> 00:45:31,760
भगवान की शक्ति है।

659
00:45:31,760 --> 00:45:35,760
ये प्रकृति नहीं है। ये बोलना चाह रहे। अरे अरे भाई ये

660
00:45:35,760 --> 00:45:39,760
प्रकृति है। मगर जो मैं इसमें गलती कराने के लिए फोर्स का इस्तेमाल कर

661
00:45:39,760 --> 00:45:44,160
रहा हूं। फोर्स फोर्स क्यों लग रही है? फोर्स वो प्रकृति

662
00:45:44,160 --> 00:45:48,720
ना है। वो भी प्रकृति है।

663
00:45:48,720 --> 00:45:53,840
वो भी प्रकृति फोर्स तो सारी प्रकृति से ही लगती है ना।

664
00:45:53,840 --> 00:45:57,840
मतलब ईश्वर फोर्स बलवान नहीं है। वो बल जो

665
00:45:57,840 --> 00:46:01,440
है प्रकृति में है।

666
00:46:01,440 --> 00:46:05,440
अब वही है ना फोर्स की जो डेफिनेशन आप लेंगे पुष्प पुल वाली तो वो तो

667
00:46:05,440 --> 00:46:09,440
मूल प्रकृति के वजह से पुष्प पुल एक्सिस्ट करता है। लेकिन ईश्वर में क्या

668
00:46:09,440 --> 00:46:13,600
स्वयं से बल है? आपका सवाल ये है कि ईश्वर में क्या स्वयं से बल है कि

669
00:46:13,600 --> 00:46:17,760
मूल प्रकृति में कंपन करा दे वो सामर्थ्य है या नहीं? तो वो तो है

670
00:46:17,760 --> 00:46:21,760
ईश्वर में। बिल्कुल आप कंफ्यूज कर रहे हैं। ईश्वर का जो

671
00:46:21,760 --> 00:46:25,920
बल है और इस वाले फोर्स को आप दोनों को मिक्स कर रहे हैं। गलत है ये।

672
00:46:25,920 --> 00:46:29,920
अच्छा अच्छा मैं मैं क्लियर कर लेता हूं। यानी कि जब कोई मनुष्य

673
00:46:29,920 --> 00:46:35,920
कार्य करता है तो ईश्वर की सहायता से नहीं करता है। वो प्रकृति से ही करता है।

674
00:46:36,000 --> 00:46:40,160
मैंने एक्सप्लेन कर तो दिया। किस तरीके से एक्सप्लेन कर दिया भाई साहब। मैं पूछ

675
00:46:40,160 --> 00:46:44,400
रहा हूं आपसे। आपने कहा था ईश्वर की सहायता के बिना नहीं कर सकता। मैंने कोई काम बताया

676
00:46:44,400 --> 00:46:48,480
तो आप कह रहे हो नहीं प्रकृति हर तरह से यूज़ हो रही है। जो उपादान

677
00:46:48,480 --> 00:46:53,040
कारण के रूप में भी यूज़ हो रही है। उसको गतिमान कराने वाले कारण के रूप में भी वही है।

678
00:46:53,040 --> 00:46:57,120
यही कह रहे हो ना? तो फिर ईश्वर की ईश्वर का उपयोग कहां हो गया? ईश्वर की सहायता कहां हो गई?

679
00:46:57,120 --> 00:46:59,680
इसमें

680
00:46:59,680 --> 00:47:03,840
ईश्वर की सहायता ये है कि उस मूल प्रकृति को बनाए रखने या फिर उस मूल

681
00:47:03,840 --> 00:47:08,160
प्रकृति में अभी अभी भी तो इसमें गति हो रही है। इसमें अभी गति नहीं हो रही है। क्या?

682
00:47:08,160 --> 00:47:14,080
ठीक है। अभी इस चीज में गति हो रही है। तो वह गति कौन कर रहा है?

683
00:47:14,080 --> 00:47:18,160
बताइए यानी कि यानी कि प्रकृति में जो गति आ रही है वह ईश्वर

684
00:47:18,160 --> 00:47:22,320
से ही आ रही है। हां प्रकृति

685
00:47:22,320 --> 00:47:26,320
में जो गति आ रही है वो ईश्वर से ही आ रही है ना। हां हां अब

686
00:47:26,320 --> 00:47:30,400
ईश्वर ने जो है संसार बना रखा है। प्रकृति सब कुछ बना रखा है।

687
00:47:30,400 --> 00:47:34,400
निर्णय लेने में ईश्वर का कोई इन्फ्लुएंस नहीं है। आप जिस ला रहे

688
00:47:34,400 --> 00:47:39,360
थे कि बुद्धि पूर्वक एक्सिस्ट। नहीं नहीं नहीं मैं मैं मैंने

689
00:47:39,360 --> 00:47:43,600
अभी यहां पर है हम लोग कि प्रकृति में जो गति हो गति

690
00:47:43,600 --> 00:47:48,880
आ रही है वो ईश्वर से आ रही है। गति होने की शक्ति

691
00:47:48,880 --> 00:47:53,120
गति होने की शक्ति प्रकृति में नहीं आ रही। गति होने की शक्ति ईश्वर में वो शक्ति

692
00:47:53,120 --> 00:47:57,360
या फिर सामर्थ ईश्वर में है। उस सामर्थ की वजह से ईश्वर प्रकृति में गति करवा रहा है।

693
00:47:57,360 --> 00:48:01,440
ट्रांसफर नहीं हो जा रही है। यानी की जो यानी की जो गति

694
00:48:01,440 --> 00:48:05,440
है वो ईश्वर के कारण है ना? जड़ पदार्थों में जो गति है वो ईश्वर के कारण है

695
00:48:05,440 --> 00:48:09,440
ना? बिल्कुल बिल्कुल गति है जो ईश्वर के

696
00:48:09,440 --> 00:48:13,680
कारण है। यानी कि कोई जड़ पदार्थ जब मैं हिला रहा हूं ईश्वर स्वयं हिला

697
00:48:13,680 --> 00:48:18,160
रहा है तो वो तो उसके कार्य हो गए। जब मैं हिला रहा हूं तो उसमें ये देखा जाएगा मेरी इंटेंशन

698
00:48:18,160 --> 00:48:22,640
क्या है? उसके हिसाब से पाप पुण्य मुझे लगेगा। हालांकि हालांकि

699
00:48:22,640 --> 00:48:26,720
हालांकि हालांकि जड़ पदार्थ को गति जब मैंने भी कराई

700
00:48:26,720 --> 00:48:31,120
है तब भी ईश्वर की ही शक्ति का उपयोग हुआ है। आप

701
00:48:31,120 --> 00:48:35,120
वही तो मैं बोल रहा हूं। आप आत्मा की दृष्टि से आप कुछ कर ही नहीं रहे

702
00:48:35,120 --> 00:48:39,360
हो कि आप मनुष्य नहीं हो आप आत्मा हो जब आप बोलते हो मैं इसलिए मैंने शुरुआत

703
00:48:39,360 --> 00:48:43,360
में ही वो जवाब दे दिया था आपको कि आत्मा केवल चेष्टा करती है बाकी मैंने चेष्टा की

704
00:48:43,360 --> 00:48:47,600
उसके बाद बीच के जितने भी प्रोसेससेस हैं जो जिसमें मेरा इन्फ्लुएंस

705
00:48:47,600 --> 00:48:51,920
हो ही नहीं सकता आत्मा कुछ कर नहीं सकती वो सारा ईश्वर ही कर रहा है बीच में जितने भी सारी प्रोसेससेस

706
00:48:51,920 --> 00:48:56,000
है गुड समझे आप गुड आत्मा ने आत्मा ने प्रेरणा

707
00:48:56,000 --> 00:49:00,960
की और फिर ईश्वर ने सब कुछ किया उसमें आत्मा कुछ नहीं कर सकती ये हो गया

708
00:49:00,960 --> 00:49:04,000
हां मान आत्मा कुछ नहीं कर सकती। नहीं आत्मा ही प्रेरणा कर

709
00:49:04,000 --> 00:49:09,040
रही है। जी आत्मा ने प्रेरणा की और ईश्वर ने सारी प्रोसेसिंग कर दी।

710
00:49:09,040 --> 00:49:13,200
हम ठीक है। तो अब ईश्वर यहां पर जड़ के रूप में उपयोगित

711
00:49:13,200 --> 00:49:17,200
हुआ ना। जड़ के रूप में उपयोग होने

712
00:49:17,200 --> 00:49:21,680
का मतलब क्या है? आप मतलब ही गलत समझ। बताइए। प्रयोगित होने का मतलब यह है कि

713
00:49:21,680 --> 00:49:26,400
ईश्वर स्वतंत्र है। ईश्वर जो है बुद्धिमान है। ईश्वर सर्वशक्तिमान

714
00:49:26,400 --> 00:49:30,480
है। [गला साफ़ करने की आवाज़] ईश्वर चेतन है। उसके पास अपना निर्णय लेने की क्षमता है कि

715
00:49:30,480 --> 00:49:34,640
वो क्या करता है, क्या नहीं करता है। सारी क्षमता है ना?

716
00:49:34,640 --> 00:49:38,640
मगर उसने मुझे उसने प्रेरणा की। जीव ने प्रेरणा

717
00:49:38,640 --> 00:49:42,720
की कि मुझे किसी को चाकू मारना है। वो सारी प्रोसेससेस उसने कर

718
00:49:42,720 --> 00:49:46,880
दी ईश्वर ने। तो ईश्वर ने यहां पे अपना जो

719
00:49:46,880 --> 00:49:50,960
स्वतंत्र होने वाला वो था व्यवहार कि भाई मेरे पास

720
00:49:50,960 --> 00:49:55,040
अपनी नॉलेज है मेरे पास अपनी निर्णायक क्षमता है उसको एक साइड

721
00:49:55,040 --> 00:49:59,680
रखते हुए उसने जीव के अनुसार जो वो करना चाहता था वो कर दिया

722
00:49:59,680 --> 00:50:03,760
यही तो हुआ मतलब ये तो हां ये

723
00:50:03,760 --> 00:50:07,760
स्वतंत्र का अर्थ क्या है सर ये बताइए आप लोग

724
00:50:07,760 --> 00:50:11,840
स्वतंत्र का अर्थ क्या आप ये लेते हैं कि ईश्वर अपने जो गुण

725
00:50:11,840 --> 00:50:15,840
है गुण स्वभाव है जो ईश्वर उसके विपरीत जाके कोई कार्य आप

726
00:50:15,840 --> 00:50:19,200
ना आप किसी बात को नहीं आपने सही बात सही बात बोली

727
00:50:19,200 --> 00:50:23,440
आपने तो आप पहले उसको क्लेम को कर दीजिए कि हां ईश्वर

728
00:50:23,440 --> 00:50:27,440
ने ऐसा ही कार्य किया है नहीं क्योंकि उसमें समस्या ये है कि आप जो

729
00:50:27,440 --> 00:50:32,720
जब शब्दों का अर्थ आप वो नहीं समझ रहे हैं जो मैं समझ रहा क्योंकि शब्दों के अर्थ में

730
00:50:32,720 --> 00:50:37,040
वो आप समझाइए वो आप समझाइए पहले हेडलाइन बता दीजिए ईश्वर

731
00:50:37,040 --> 00:50:41,120
ने क्षमता चेतन होते हुए भी

732
00:50:41,120 --> 00:50:45,200
पूरी तरीके से जीव के ऊपर निर्भर रहते हुए वो

733
00:50:45,200 --> 00:50:49,680
कार्य कर दिया। जीव की बुद्धि पर निर्भर रहते हुए वो कार्य कर दिया।

734
00:50:49,680 --> 00:50:55,040
ये हो गया। तो जीव की

735
00:50:55,040 --> 00:50:59,040
अपनी बुद्धि उसमें नहीं लगाई। ठीक है। तो यहां

736
00:50:59,040 --> 00:51:03,120
पर ईश्वर जड़ जड़ के तरीके से ही तो उपयोगित हुआ। जीव के

737
00:51:03,120 --> 00:51:07,200
द्वारा फिर वही बात है ना। जड़ के तरीके से उपयोग

738
00:51:07,200 --> 00:51:11,360
नहीं हुआ। देखिए देखिए मैं बताऊं। चेतन के तरीके से उपयोग

739
00:51:11,360 --> 00:51:15,360
क्या होगा? जैसे कि ये आप अपने हिसाब से फिर शब्द

740
00:51:15,360 --> 00:51:19,360
अपने हिसाब से परिभाषा बना रहे ना आप नहीं बात

741
00:51:19,360 --> 00:51:23,440
एक मिनट जैसे जैसे कि मान लीजिए जैसे कि मेरा कोई मित्र है

742
00:51:23,440 --> 00:51:28,080
मैंने कहा कि भाई बैंक डकैती डालनी है।

743
00:51:28,080 --> 00:51:33,360
ठीक है हम बैंक डकैती डालनी है। तो मित्र ने कहा

744
00:51:33,360 --> 00:51:37,360
अब मित्र की मुझे सहायता चाहिए क्योंकि वहां पर मुझे एक से ज्यादा अपने

745
00:51:37,360 --> 00:51:41,360
से ज्यादा और चेतन चाहिए। है ना? मुझे

746
00:51:41,360 --> 00:51:45,600
वहां पर और लोग भी चाहिए जो अपना दिमाग यूज़ कर सकें। केवल मेरे पास

747
00:51:45,600 --> 00:51:49,760
ये नहीं कि मेरे पास जड़ पदार्थ हो केवल मशीन गन वगैरह मुझे जो है और भी

748
00:51:49,760 --> 00:51:53,840
चीजें चाहिए वहां पर बैंक डकैती के लिए। मगर मेरा जो मित्र है

749
00:51:53,840 --> 00:51:58,160
उसने मुझे परामर्श दिया कि यार इसमें जो है

750
00:51:58,160 --> 00:52:02,480
ये बाधा हो सकती तो ये जेल हो सकती है। ये परामर्श भी दिया। इसके

751
00:52:02,480 --> 00:52:06,480
साथ ही साथ [गला साफ़ करने की आवाज़] अगर मैं नहीं माना और वह भी मान गया तो फिर उसने

752
00:52:06,480 --> 00:52:10,160
मुझे चेतन होने के जरिए और

753
00:52:10,160 --> 00:52:14,320
भी चीजें उपलब्ध करवाई। जैसे कुछ प्लान

754
00:52:14,320 --> 00:52:18,400
था उसमें कमी थी तो उसने और प्लान को दुरुस्त किया। ये हो

755
00:52:18,400 --> 00:52:23,440
गया। ये हो गया। मैंने किसी चेतन की सहायता ली।

756
00:52:23,440 --> 00:52:27,440
ठीक। अब मेरे साथ में एक रोबोट खड़ा हुआ है। और

757
00:52:27,440 --> 00:52:31,520
मैं उस रोबोट को ले जाकर के यूज़ कर लूं। तो मैंने चेतन की सहायता नहीं

758
00:52:31,520 --> 00:52:36,720
ली। भले ही उस रोबोट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी थी

759
00:52:36,720 --> 00:52:40,800
मगर मैंने उसकी सहायता नहीं ली। मुझे मैंने उससे उसका कोई दिमाग का उपयोग नहीं

760
00:52:40,800 --> 00:52:45,120
लिया। मैंने उसको एज इट इज जाकर के यूज कर लिया। तो मैंने उसके जड़

761
00:52:45,120 --> 00:52:49,360
रूप में सहायता ली। या फिर कोई मनुष्य ही रख लीजिए

762
00:52:49,360 --> 00:52:53,360
जो है चेतन वाला। मगर वो इतना ज्यादा

763
00:52:53,360 --> 00:52:57,520
मेरे ऊपर डिपेंड है कि मैंने उससे जब सहायता मांगी तो उसने

764
00:52:57,520 --> 00:53:01,520
कहा भाई मेरे शरीर का तुम्हें जैसे उपयोग करना है वैसे कर लो तो ये हो गया

765
00:53:01,520 --> 00:53:05,680
वो न्यूट्रल रहा जैसे करना है करना है नहीं करना है वो तुम कर लो

766
00:53:05,680 --> 00:53:10,160
तो जब ईश्वर ईश्वर ईश्वर की सहायता ले रहा है जीव

767
00:53:10,160 --> 00:53:13,440
अपने कार्य करने में

768
00:53:13,440 --> 00:53:17,760
बीच में तो थोड़ा हम लोग वो हो गए थे ट्रैक भदक भटक

769
00:53:17,760 --> 00:53:22,480
गया था बीच में हम यहां चले गए थे कि भाई वो

770
00:53:22,480 --> 00:53:25,360
आप यह कहने लगे थे नहीं नहीं वो प्रकृति करती है वो केवल

771
00:53:25,360 --> 00:53:30,400
ईश्वर ने एक बार दे दिया काम खत्म करती प्रकृति है हालांकि एक बार दे दिया

772
00:53:30,400 --> 00:53:35,200
नहीं नहीं नहीं ये फिर आप गलत बोल रहे हैं ये नहीं बोला था आपने आपने बोला था

773
00:53:35,200 --> 00:53:39,840
आपने बोला था जो जो कार्य कर रही है वो प्रकृति कर रही है

774
00:53:39,840 --> 00:53:44,000
ईश्वर कोई कार्य फिर उसके बाद बात आई प्रकृति में तो इस समय भी गति हो रही है बोतल

775
00:53:44,000 --> 00:53:48,160
के अंदर वो कौन कर रहा है फिर मैंने और डीपली पूछा तो आपने फिर ये माना कि नहीं नहीं

776
00:53:48,160 --> 00:53:52,160
सारे कार्य ईश्वर ही कर रहा है जीव तो केवल इच्छा कर रहा है। ये सब

777
00:53:52,160 --> 00:53:56,240
हो चुका है। आप देखिए केवल ठीक है।

778
00:53:56,240 --> 00:54:00,320
छोड़िए आप क्योंकि मैंने ऐसा मैंने क्या बोला था वो है उसमें

779
00:54:00,320 --> 00:54:04,320
रहेगा। हम तो अब आप यहां पर

780
00:54:04,320 --> 00:54:07,200
अब हम यहां पर आ गए हैं कि

781
00:54:07,200 --> 00:54:11,360
ईश्वर की स्वतंत्र बुद्धि लेने की निर्णायक लेने की क्षमता

782
00:54:11,360 --> 00:54:15,680
होते हुए भी फुली पूरी तरीके से वो डिपेंड

783
00:54:15,680 --> 00:54:19,680
होता है वहां जीव के ऊपर और जो है वो वहां बिहेव करता

784
00:54:19,680 --> 00:54:23,760
है कि उसका जैसा उपयोग वो करना चाहता है उसकी सीमा में जो आ

785
00:54:23,760 --> 00:54:27,760
सकता है वो कर लेता है। जैसा भी उपयोग वो करना चाहता

786
00:54:27,760 --> 00:54:31,840
है। अब मैं बोलूं इसका उत्तर। हां बोलिए। जी

787
00:54:31,840 --> 00:54:36,000
बोलिए। इसका जवाब यह है कि जो संसार बना है ईश्वर

788
00:54:36,000 --> 00:54:40,320
ने बनाया है ईश्वर की खुद की

789
00:54:40,320 --> 00:54:44,320
ईश्वर का खुद का गुण है कि उस गुण की वजह से ईश्वर ने संसार बनाया है।

790
00:54:44,320 --> 00:54:48,320
और वो संसार ईश्वर ने खुद से ही जानबूझकर ऐसा बनाया है कि

791
00:54:48,320 --> 00:54:52,400
हमारी कर्म करने की स्वतंत्रता बनी रहे। ठीक है? अब कर्म करने

792
00:54:52,400 --> 00:54:57,200
की स्वतंत्रता बनी रहे। ये अह क्या बोलना चाहिए? ये जो

793
00:54:57,200 --> 00:55:01,280
मर्जी है वो ईश्वर की है। ईश्वर ही चाहता है कि हमारे पास कर्म करने

794
00:55:01,280 --> 00:55:05,840
की सुंदरता बनी रहे। ठीक है? ऐसा मैंने क्या कहा? देखिए है क्या? कंप्लीट कर

795
00:55:05,840 --> 00:55:09,840
सुन लीजिए ना टोकिए मत बीच में। ये जरूरी है कंप्लीट करना। अच्छा

796
00:55:09,840 --> 00:55:14,160
कर लीजिए। इसमें क्या समझ मुझे कंप्लीट करने दीजिए ना पूरा पॉइंट। कर लीजिए कर लीजिए। तो

797
00:55:14,160 --> 00:55:18,160
ये जो हम ये जो संसार में क्या

798
00:55:18,160 --> 00:55:22,160
बोल रहा हूं? कर्म करने की स्वतंत्रता जो है ईश्वर

799
00:55:22,160 --> 00:55:22,880
की

800
00:55:22,880 --> 00:55:27,200
हमारी सॉरी तो यह ईश्वर अपनी मर्जी से बनाता है

801
00:55:27,200 --> 00:55:31,840
और ईश्वर चाहता है कि मतलब चाहता है शब्द गलत हो जाएगा

802
00:55:31,840 --> 00:55:36,000
ईश्वर खुद से ये चलो चाहता ही ले लो अभी के लिए क्योंकि फिर अभी बेटर अवार्ड

803
00:55:36,000 --> 00:55:40,320
ईश्वर खुद ही चाहता है कि हम जो है कर्म स्वतंत्र स्वतंत्र रूप से करें इसीलिए

804
00:55:40,320 --> 00:55:44,400
ईश्वर ने हमें यह अवसर प्रदान कर रखा है और इस अवसर प्रदान

805
00:55:44,400 --> 00:55:48,400
करने में ही ये निहित है कि ईश्वर इंटरफेयर नहीं करेगा जिस प्रकार से हम

806
00:55:48,400 --> 00:55:52,400
इंटरफेरेंस करवाना चाह रहे हैं कि भाई या फिर आप बोल रहे हैं कि भाई

807
00:55:52,400 --> 00:55:56,560
बीच में क्या अपना चेतन रूप से क्या कोई प्रभाव डाल

808
00:55:56,560 --> 00:56:00,560
दे। ठीक है? एक तो ये बात है और एक दूसरी बात ये है कि आप जो बोल रहे जड़

809
00:56:00,560 --> 00:56:04,560
रूप में प्रयोग में आता है वो शब्द गलत है। प्रोसेस मैंने आपको समझा दिया। अब शब्दों

810
00:56:04,560 --> 00:56:08,880
की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि मैंने पूरा एक्सप्लेन कर दिया। लेकिन आप अगर वो शब्द डालेंगे

811
00:56:08,880 --> 00:56:13,120
जो कि मैं करना चाहूंगा। वो शब्द नहीं डाल सकते। जड़ रूप में प्रयोग का जड़

812
00:56:13,120 --> 00:56:17,200
रूप में प्रयोग मूल प्रकृति हो रही है। आप उसको किसी और सेंस

813
00:56:17,200 --> 00:56:18,960
में समझ रहे हैं तो उसको छोड़ दीजिए। अभी

814
00:56:18,960 --> 00:56:23,040
हम देखिए मैं आपसे दो रिक्वेस्ट करूंगा।

815
00:56:23,040 --> 00:56:27,040
एक उसको छोड़ दीजिए। इस बात का निर्णय ना करिए। उसमें आप पूछिए क्या नहीं चलो

816
00:56:27,040 --> 00:56:31,120
उसको मत छोड़िए। उस बात को मत छोड़िए। मैं मैं ये बोल रहा हूं उस बात को मत छोड़। बोलने के

817
00:56:31,120 --> 00:56:36,720
बाद इतनी देर बोलने के बाद मैं बोला हूं। आप प्लीज इंटरप मत करिए।

818
00:56:36,720 --> 00:56:40,880
पहली बात आप यह मत बोलिए कि उसको छोड़ दीजिए। इसमें आप तर्क

819
00:56:40,880 --> 00:56:45,360
वितर्क करिए कि उस उस पर बात क्यों करनी है? क्यों नहीं करनी है? अगर आपको लगता है।

820
00:56:45,360 --> 00:56:49,680
दूसरी बात आप यह मत कहिए कि

821
00:56:49,680 --> 00:56:53,840
एक चीज और थी। आपने इंटरप्ट करके बुलवा दी मुझे। आपने इंटरप्ट करके बुलवा

822
00:56:53,840 --> 00:56:57,840
दी। एक चीज और थी। छोड़ दीजिए वाला कंप्लीट कर दूं मैं। छोड़ दीजिए वाला।

823
00:56:57,840 --> 00:57:02,800
मतलब मेरा कहने का मतलब है। नहीं नहीं अभी कुछ मत बोलिए। आप दो मिनट प्लीज शांत रहिए।

824
00:57:02,800 --> 00:57:07,120
तो एक तो आप ये छोड़ दीजिए वाली बात मत बोलिए। और एक बात और आपने बोली

825
00:57:07,120 --> 00:57:11,200
थी वो मैं रिवाइंड करके देखना पड़ेगा। खैर अभी

826
00:57:11,200 --> 00:57:16,320
इस पर ही चलते हैं हम लोग जो बात चल रही है। अब इसमें [गला साफ़ करने की आवाज़] ऐसा है

827
00:57:16,320 --> 00:57:20,480
कि एक व्यक्ति मैंने फिर पूछा कि जड़ रूप में उसे

828
00:57:20,480 --> 00:57:24,480
नहीं कह सकते हैं। यानी कि ईश्वर वहां बुद्धि पूर्वक

829
00:57:24,480 --> 00:57:26,720
देखिए हां प्रश्न यह था। मूल प्रश्न यह था।

830
00:57:26,720 --> 00:57:30,800
आपने जवाब क्या दिया है? कि ईश्वर ने कर्म फल करने की स्वतंत्रता दी

831
00:57:30,800 --> 00:57:35,040
है। इसलिए वह वहां पर कुछ हस्तक्षेप नहीं करता है। ठीक है?

832
00:57:35,040 --> 00:57:39,200
बोलता नहीं है बीच में। यही कहा ना आपने? पर मैं ये पूछ रहा हूं

833
00:57:39,200 --> 00:57:44,000
कि इसका मतलब यह है कर्म फल की स्वतंत्रता देने के कारण

834
00:57:44,000 --> 00:57:48,960
ईश्वर वहां पे जड़ की तरह से व्यवहार करता है ना।

835
00:57:48,960 --> 00:57:53,440
उसका व्यवहार क्या हुआ वहां पर? कैसा व्यवहार हुआ? जड़ का व्यवहार

836
00:57:53,440 --> 00:57:57,520
का हुआ। अगर जड़ का व्यवहार हुआ जैसे कि मान

837
00:57:57,520 --> 00:58:01,520
लीजिए ईश्वर की शक्ति है। मैं मैं [गला साफ़ करने की आवाज़] शब्द दे देता हूं आपको। आप

838
00:58:01,520 --> 00:58:05,680
थोड़ा थोड़ा इंटरफेर कर रहा हूं। यह कंप्लीट हो जाएगा एक पॉइंट। आप जड़ शब्द को हटा

839
00:58:05,680 --> 00:58:09,680
दीजिए। आप आप सिंपली यह बोलना चाह रहे हैं कि ईश्वर पैसिवली पैसिवली

840
00:58:09,680 --> 00:58:14,320
समझ रहे एक्टिवली या पैसिवली तो ईश्वर वहां पर है।

841
00:58:14,320 --> 00:58:18,400
कुछ कर नहीं रहा है। बीच में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है निर्णायक रूप से और ईश्वर बस

842
00:58:18,400 --> 00:58:22,640
वहां पर है। एक्सिस्ट कर रहा है। इसको ये रख दीजिए। जड़ जड़ रूप। जड़

843
00:58:22,640 --> 00:58:26,880
रूप बोलेंगे तो फिर वो गलत हो जाएगा। जड़ रूप उसमें

844
00:58:26,880 --> 00:58:30,880
उसमें बात है। एक बात उठाई जाती है। ईश्वर लीला कर सकता

845
00:58:30,880 --> 00:58:34,960
है कि नहीं? एक बात उठाई जाती है। मैं यहां पर ईश्वर की लीला सिद्ध

846
00:58:34,960 --> 00:58:39,200
कर रहा हूं। समझे आप? क्या सिद्ध कर

847
00:58:39,200 --> 00:58:41,840
ईश्वर की लीला सिद्ध कर रहा हूं ना मैं यहां पे?

848
00:58:41,840 --> 00:58:46,000
ईश्वर के पास निर्णय लेने की स्वतंत्र सत्ता है।

849
00:58:46,000 --> 00:58:50,640
ईश्वर चेतन है। ईश्वर बुद्धिमान है। सर्वशक्तिमान

850
00:58:50,640 --> 00:58:55,440
है। फिर भी वो अपने से निकृष्ट

851
00:58:55,440 --> 00:59:00,400
जो तत्व है अल्पज है जीव के द्वारा

852
00:59:00,400 --> 00:59:04,480
उपयोग होता है। न्यूट्रल रहता है। चाहे भले ही वो उसका

853
00:59:04,480 --> 00:59:08,640
उपयोग किसी भी कार्य में कर रहा हो। वो न्यूट्रल रहता है। तो यह जो ईश्वर

854
00:59:08,640 --> 00:59:13,360
का बिहेव है, यह बिहेव उसका जो चेतन स्वरूप है, सर्वशक्तिमत्ता

855
00:59:13,360 --> 00:59:17,360
का स्वरूप है, उसके विपरीत लीला है। अब वो करता क्यों

856
00:59:17,360 --> 00:59:21,600
है? वो बात एक अलग है। उसने लीला क्यों की? वो शांत क्यों रहा?

857
00:59:21,600 --> 00:59:25,840
वो चुप क्यों रहा? उसने अपने आप को उपयोग में क्यों आने दिया? इसके

858
00:59:25,840 --> 00:59:29,920
पास आपके अकॉर्डिंगली उसके पास एक लॉजिकल कारण है।

859
00:59:29,920 --> 00:59:34,640
क्योंकि वो कर्म फल के लिए स्वतंत्रता देता है जीव को।

860
00:59:34,640 --> 00:59:38,880
स्वतंत्रता देने के लिए ही ईश्वर वहां पर ऐसा

861
00:59:38,880 --> 00:59:42,960
बिहेव करता है जैसे कि उसके पास कोई बुद्धि

862
00:59:42,960 --> 00:59:46,960
है ही नहीं। पूरी बुद्धि जीभ लगा रहा है। उसकी शक्ति का उपयोग कर रहा

863
00:59:46,960 --> 00:59:51,040
है और मर्डर हो रहा है। चीजें हो रही है। ईश्वर वहां पर शांत

864
00:59:51,040 --> 00:59:55,120
रह रहा है। वो कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा। जैसा जीव

865
00:59:55,120 --> 00:59:56,960
के द्वारा उसको उपयोग किया जाना वैसा

866
00:59:56,960 --> 01:00:01,120
होने दे रहा है। कारण आपने दिया है वह बात एक अलग है

867
01:00:01,120 --> 01:00:05,360
कि ऐसा करने का उसके पास एक कारण है। वो बात एक अलग

868
01:00:05,360 --> 01:00:09,920
है। मगर वो कर तो रहा है ना वहां पर लीला वो

869
01:00:09,920 --> 01:00:14,160
चेतन होते हुए भी वहां पर जड़ जैसा उपयोग में आ रहा है। जैसे मैं इस बोतल है।

870
01:00:14,160 --> 01:00:18,160
मैं इसको उठा रहा हूं। अब यह जो बोतल है प्रकृति तत्व

871
01:00:18,160 --> 01:00:22,480
जो इसमें है प्रकृति उसका इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है। उठाने

872
01:00:22,480 --> 01:00:26,720
अथवा ना उठाने। इसी प्रकार से इस बोतल को उठाने

873
01:00:26,720 --> 01:00:30,720
के लिए जो शक्ति एनर्जी यूज़ हुई जो कि ईश्वर से मुझे प्राप्त हो रही है

874
01:00:30,720 --> 01:00:35,440
उसने भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया इसको उठाने ना उठाने हां

875
01:00:35,440 --> 01:00:39,760
वो तो है ही ना हस्तक्षेप तो मैंने प्लेन क्लियर कर दिया हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं किया तो

876
01:00:39,760 --> 01:00:45,760
इसका मतलब ईश्वर यहां पर जड़ की तरह से बिहेव कर रहा है ना

877
01:00:47,200 --> 01:00:51,760
जिस प्रकार आप चलो मैं इसको और अच्छे से रख देता हूं जिस प्रकार जड़ हस्तक्षेप

878
01:00:51,760 --> 01:00:56,000
नहीं कर रहा है वैसे ही उसी प्रकार ईश्वर भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा। क्या आप यह बोलना चाह रहे हैं?

879
01:00:56,000 --> 01:01:00,080
हां हां ये बात सही है। लेकिन आप फिर उसको जड़ रूप एक शब्द

880
01:01:00,080 --> 01:01:04,480
दे देंगे ना वो मत दीजिए। मैं खाली उसके लिए छोड़ दीजिए। रुकिए

881
01:01:04,480 --> 01:01:08,560
ईश्वर का जो व्यवहार ईश्वर का जो व्यवहार यहां पर हुआ वो जड़

882
01:01:08,560 --> 01:01:12,880
के जड़ जड़ पदार्थ के व्यवहार के समान हो गया ना।

883
01:01:12,880 --> 01:01:17,200
ईश्वर का जो व्यवहार हुआ जैसा जड़ जैसा जड़ पदार्थ व्यवहार

884
01:01:17,200 --> 01:01:21,280
कर रहा है। वैसा ही व्यवहार ईश्वर कर रहा है ना यहां पर।

885
01:01:21,280 --> 01:01:25,680
ये तो बोल ही रहा हूं। ये तो बोल ही बोला है मैंने। लेकिन आप मैंने छोड़ने वाली

886
01:01:25,680 --> 01:01:29,760
रुकिए रुकिए मैं क्लियर करूंगा। क्लियर करूंगा। छोड़ने वाली बात जो मैंने बोली

887
01:01:29,760 --> 01:01:34,000
वो जड़ रूप जो शब्द इस्तेमाल कर रहा थी क्योंकि उसका फिर मतलब कुछ और निकल कर रहा था।

888
01:01:34,000 --> 01:01:38,160
छोड़ने वाली बात इसलिए अगर आप हस्तक्षप

889
01:01:38,160 --> 01:01:42,320
नहीं रहे। इसीलिए इसीलिए बोला मैंने अब मैंने क्लियर कर दिया मेरा

890
01:01:42,320 --> 01:01:46,320
जड़ रूप क्या है कि यहां पर ईश्वर और जड़

891
01:01:46,320 --> 01:01:50,560
के व्यवहार में समानता आ गई। बिल्कुल ना वो हस्तक्षेप

892
01:01:50,560 --> 01:01:54,880
कर रहा है जड़ और ना ईश्वर कर रहा है। अब जड़ तो जड़ है। तो जड़ है।

893
01:01:54,880 --> 01:01:58,960
जड़ तो [गला साफ़ करने की आवाज़] जड़ है। वो तो इसलिए कर ही नहीं सकता। मगर ईश्वर चेतन है।

894
01:01:58,960 --> 01:02:02,320
फिर भी वो जड़ जैसा व्यवहार कर रहा है। इसका मतलब यहां पे

895
01:02:02,320 --> 01:02:06,400
वो लीला कर रहा है। जो वो नहीं है उसके जैसा बिहेव कर

896
01:02:06,400 --> 01:02:06,900
रहा

897
01:02:06,480 --> 01:02:11,600
है। अब मैं बता दूं वो वैसा ही है।

898
01:02:11,600 --> 01:02:15,760
अच्छा लीला का मतलब अपने मतलब ये है कि जो जैसा नहीं है वो बिहेव कर रहा है। ऐसा बोलना

899
01:02:15,760 --> 01:02:19,840
चाह रहा हूं। अब ईश्वर स्वतंत्रता की बात आ जाती है। आपने

900
01:02:19,840 --> 01:02:23,920
बोला था ईश्वर स्वतंत्र है। इसके विपरीत व्यवहार करने

901
01:02:23,920 --> 01:02:27,920
में भी स्वतंत्र है। फिर भी नहीं करता है। आप ये बोलना चाह रहे थे। तो इसीलिए मैंने

902
01:02:27,920 --> 01:02:31,920
स्वतंत्र शब्द पर बीच में रोका था आपको। आपने बोला था स्वतंत्र। तो स्वतंत्र का मतलब

903
01:02:31,920 --> 01:02:36,080
आप क्या कहना चाह रहे हैं कि क्या ईश्वर का जो व्यवहार

904
01:02:36,080 --> 01:02:40,720
करना चाहिए ईश्वर का सुनिए मैं कंप्लीट कर लूं आप।

905
01:02:40,720 --> 01:02:44,640
सवाल पूरा रख देता हूं। फिर आप आराम से जवाब देना। आप यह बोलना चाह रहे हो कि भाई ईश्वर

906
01:02:44,640 --> 01:02:48,720
का जो गुण कर्म स्वभाव है जो आप भी मानते हैं कुछ ना कुछ है

907
01:02:48,720 --> 01:02:52,800
उसके विपरीत जाके कुछ कार्य कर सकने की स्वतंत्रता ईश्वर के पास है या नहीं ये

908
01:02:52,800 --> 01:02:57,280
सवाल है ना आपका मुझसे नहीं ये सवाल है ही नहीं

909
01:02:57,280 --> 01:02:57,780
वो

910
01:02:57,520 --> 01:03:01,920
तो बाद की बात है कि हम उसको उसके व्यवहार नहीं

911
01:03:01,920 --> 01:03:05,920
आपने बोला ना कि ईश्वर आपने जब आपने जब सुनिए सुनिए रुकिए रुकिए आपने जब कंक्लूजन

912
01:03:05,920 --> 01:03:09,920
दिया था अपनी बात का आपने ये बोला था कि आपके यहां पर ईश्वर के पास

913
01:03:09,920 --> 01:03:14,080
स्वतंत्रता है कि ईश्वर आपके उपयोग में आए आए या नहीं आए फिर भी देखिए

914
01:03:14,080 --> 01:03:18,160
आपके उपयोग में आ रहा है पैसिवली करवाया जा रहा है सब कुछ तो आप यह मानते हो ना कि

915
01:03:18,160 --> 01:03:22,160
भाई उसके अलावा ईश्वर उस रूप में मतलब उस प्रकृति के मतलब जो

916
01:03:22,160 --> 01:03:26,160
भी व्यवहार में आ रहा है व्यवहार नहीं आपने क्या बोला था यार हमारे

917
01:03:26,160 --> 01:03:30,160
उपयोग में आ रहा है तो उस तरीके से उपयोग में ना आए हालांकि

918
01:03:30,160 --> 01:03:34,240
ईश्वर डायरेक्टली उपयोग में नहीं आ रहा मूल प्रकृति बीच में साधन तो वही है तो उस तरीके

919
01:03:34,240 --> 01:03:38,400
से उपयोग में ना आए इस प्रकार की स्वतंत्रता ईश्वर के पास है आपने ये

920
01:03:38,400 --> 01:03:42,640
बात बोल करके अपनी बात कंप्लीट की थी तो वो मैं पूछ रहा हूं आपसे तो आप यही बोलना चाह रहे हो कि इस प्रकार की स्वतंत्रता

921
01:03:42,640 --> 01:03:46,640
ईश्वर के पास है। ऐसा मैं मानता हूं। आप ये पूछना चाह रहे हैं मुझसे।

922
01:03:46,640 --> 01:03:50,800
स्वतंत्र स्वतंत्रता आपने उस का्टेक्स्ट में यूज़ किया। स्वतंत्रता का मतलब ये है कि उस उसके अलावा कुछ

923
01:03:50,800 --> 01:03:53,200
करने का ऑप्शन था। आप ये पूछना चाह रहे हैं।

924
01:03:53,200 --> 01:03:57,600
ईश्वर चेतन है। हां। चेतन है।

925
01:03:57,600 --> 01:04:03,600
वो एक जीव के अकॉर्डिंगली कार्यरत हो रहा है ना।

926
01:04:03,600 --> 01:04:07,680
नहीं हो रहा। बोल रहा हूं। जीव ईश्वर जो हां

927
01:04:07,680 --> 01:04:11,840
मैं बता देता हूं। ईश्वर के अकॉर्डिंग ही कर्म कर्म

928
01:04:11,840 --> 01:04:15,840
फल करने की स्वतंत्रता प्रदान ईश्वर ने की है और उसके अकॉर्डिंग ईश्वर

929
01:04:15,840 --> 01:04:20,400
का में आ रहा है। आप उसको गलत तरीके से ले रहे हैं।

930
01:04:20,400 --> 01:04:24,880
आप अगर ईश्वर के अकॉर्डिंग जीव के निर्णय कर दोगे तो फिर तो सीधे-सीधे

931
01:04:24,880 --> 01:04:29,040
मर्डर का निर्णय फिर वही फिर वही बात है। फिर जो बात मैंने बोली नहीं आप वो बोल रहे

932
01:04:29,040 --> 01:04:33,040
निर्णय की बात मैंने बोली नहीं। तो मैं बोल रहा हूं। मैं

933
01:04:33,040 --> 01:04:37,360
आप देखिए क्या करें? कान को इधर से पकड़ ले। कान को इधर से पकड़ ले। वो जीव के अनुसार

934
01:04:37,360 --> 01:04:41,520
चल रहा है ईश्वर या जीव उसके अनुसार चल रहा है ये बता दीजिए।

935
01:04:41,520 --> 01:04:45,840
कर्म करने वाली बात जो है कर्म करने वाली जो बात चल रही है

936
01:04:45,840 --> 01:04:50,000
उसमें जीव के अनुसार ईश्वर काम कर रहा है या ईश्वर के अनुसार जीव काम

937
01:04:50,000 --> 01:04:52,960
कर रहा है? बताइए

938
01:04:52,960 --> 01:04:57,040
जीव के अनुसार काम करना ही ईश्वर के अनुसार है। अब ये दिक्कत

939
01:04:57,040 --> 01:05:01,120
हो जाएगी समझने में। यानी वही मैं समझ गया। आप जो भी कार्य

940
01:05:01,120 --> 01:05:05,200
आपने क्या किया है? जो जो चीजें आप स्वीकार करते हो

941
01:05:05,200 --> 01:05:08,480
उनको आपने कह दिया यह उसका कार्य इसलिए वो कर रहा है।

942
01:05:08,480 --> 01:05:12,560
यह बात यह उसका कार्य इसलिए वो कर रहा है। कुल मिलाकर

943
01:05:12,560 --> 01:05:16,720
के सारी कहानियों के पीछे यही है कि आप पहले ये

944
01:05:16,720 --> 01:05:20,720
कर देते हैं कि ये उसका कार्य है इसलिए उसने किया और जो जो चीजें

945
01:05:20,720 --> 01:05:24,720
हमारी है क्योंकि वो उसका कार्य नहीं है। इसलिए वो नहीं कर सकता। अब ये

946
01:05:24,720 --> 01:05:28,720
जो अब ये जो उसका कार्य है अब ये जो उसका कार्य है वो उसने किया।

947
01:05:28,720 --> 01:05:32,800
यह फैसला कहां से होगा? यह प्रमाण से होगा। तर्क है नहीं इसमें कोई। क्या उसका कार्य

948
01:05:32,800 --> 01:05:36,960
है? क्या उसका कार्य नहीं है? फैसला प्रमाण से होगा। उसमें तर्क है नहीं। प्रमाण क्या है? वेद

949
01:05:36,960 --> 01:05:41,280
है। वेद का वो वो आंसर है जो हम करेंगे। यही यही बात आ गई।

950
01:05:41,280 --> 01:05:41,780
नहीं

951
01:05:41,520 --> 01:05:46,480
ये ये आप ये आप बोल रहे हैं। मैंने तो बोला ही नहीं है बात। ये आपने

952
01:05:46,480 --> 01:05:50,480
बात ये आप उस पॉइंट तक मैंने बोला

953
01:05:50,480 --> 01:05:54,560
ही नहीं। आपके हिसाब से निर्णायक बन रहे

954
01:05:54,560 --> 01:05:58,640
आप गलत बात। आपको निर्णायक नहीं बनना चाहिए। निर्णायक निर्णायक दूसरा

955
01:05:58,640 --> 01:06:02,800
वर्ड था। हां अच्छी बात आई। एक आपने छोड़ दीजिए कहा था वहां पर और

956
01:06:02,800 --> 01:06:07,040
एक दूसरा वर्ड था जो आपने निर्णय दिया था मैं रिवाइंड करके दिखाऊं

957
01:06:07,040 --> 01:06:11,680
आप निर्णायक बने थे अच्छा हुआ आपने याद दिला दिया मैं कहां

958
01:06:11,680 --> 01:06:15,840
मैं तो जितना बोला उतनी बार बोल भैया जो पीछे है जहां पे मैंने कहा था

959
01:06:15,840 --> 01:06:20,000
थोड़ा रिवाइंड करके दिखा दीजिए नहीं नहीं मैं पूछ आप

960
01:06:20,000 --> 01:06:24,080
सुना नहीं आपने सुन लीजिए मैं दिखाता हूं आपने निर्णय कहां दिया है मैं निर्णय दिखा

961
01:06:24,080 --> 01:06:28,240
रहा हूं आपने कहां दिया है दिखा दीजिए वहां पर जब अभी जहां मैं अटका था थोड़ी देर पहले

962
01:06:28,240 --> 01:06:34,240
जहां मैं भूल गया था

963
01:06:47,340 --> 01:06:50,160
[संगीत]

964
01:06:50,160 --> 01:06:55,040
मैं अटका था थोड़ी देर पहले कि ऐसा करने का

965
01:06:55,040 --> 01:06:58,400
इसके पास आप

966
01:06:58,400 --> 01:07:02,560
एक्सिस्ट कर रहा इसको ये रख दीजिए। जड़ रूप जड़ रूप बोलेंगे तो फिर वो गलत

967
01:07:02,560 --> 01:07:06,880
हो जाएगा। हां ये बात सही है। इसका मतलब

968
01:07:06,880 --> 01:07:12,000
यहां नहीं आए फिर भी देखिए आपके उपयोग में आ रहा है पैसे। इसका मतलब

969
01:07:12,000 --> 01:07:16,000
जो और पीछे जहां मैं अटका था ना बुद्धि लेने

970
01:07:16,000 --> 01:07:20,320
की निर्णायक उसमें कमी थी तो उसने और प्लान को दुरुस्त किया।

971
01:07:20,320 --> 01:07:25,280
यहां पर ईश्वर जड़ क्षमता है उसको एक

972
01:07:25,280 --> 01:07:29,360
मैंने शुरुआत में ही वो जवाब दे दिया था आपको कि आत्मा केवल चेष्टा गति होने की शक्ति

973
01:07:29,360 --> 01:07:33,680
ईश्वर में वो शक्ति वाले के रूप में भी वही है ईश्वर

974
01:07:33,680 --> 01:07:38,240
जो है कि आप जो ठीक है

975
01:07:38,240 --> 01:07:41,760
बैंक डकैती डालनी है

976
01:07:41,760 --> 01:07:45,760
जड़ रूप में प्रयोग मूल वो गलत हो जाएगा तो वो

977
01:07:45,760 --> 01:07:50,480
अपने से जड़ जैसा उपयोग में आ रहा है जैसे मैंने प्ले ले ले

978
01:07:50,480 --> 01:07:54,560
बिल्कुल नहीं तो इसका मतलब ईश्वर कर रहा है ना

979
01:07:54,560 --> 01:07:57,440
यहां पर

980
01:07:57,440 --> 01:08:02,240
हां सवाल पूरा रख देता हूं फिर आराम से जवाब हमारे

981
01:08:02,240 --> 01:08:06,240
उपयोग में आ रहा है उस तरीके से उपयोग में ना आए हालांकि

982
01:08:06,240 --> 01:08:10,320
ईश्वर डायरेक्टली उपयोग में नहीं आ रहा मूल प्रकृति बीच में साधन तो वही है तो उस तरीके

983
01:08:10,320 --> 01:08:14,480
से उपयोग में ना आए इस प्रकार की स्वतंत्रता ईश्वर के पास है आपने यह

984
01:08:14,480 --> 01:08:19,680
बात बोल करके अपनी बात कंप्लीट की थी तो वो मैं पूछ रहा हूं आपसे तो आप यही बोलना चाह रहे हो इस प्रकार की स्वतंत्र

985
01:08:19,680 --> 01:08:20,180
कर्म

986
01:08:20,080 --> 01:08:24,960
करने वाली बात जो है कर्म करने वाली जो बात चल रही है

987
01:08:24,960 --> 01:08:27,280
उसमें जीव के अनुसार ईश्वर काम कर जहां

988
01:08:27,280 --> 01:08:31,280
मैं भूला हूं ना जहां जहां मैं भूला हूं

989
01:08:31,280 --> 01:08:35,440
वहां से ठीक एक दो मिनट पहले आप बोल रहे मैंने तो बोला ही नहीं है

990
01:08:35,440 --> 01:08:39,600
ये बात आपाइए ये चलाइए ये चलाइए

991
01:08:39,600 --> 01:08:43,920
मैंने कहा था थोड़ा रिवाइंड करके दिखा दीजिए अरे नहीं नहीं मैं पूछ

992
01:08:43,920 --> 01:08:47,840
आप सुना नहीं आपने सुन लीजिए

993
01:08:47,840 --> 01:08:51,920
भाई कोई टाइम टाइमिंग बता दो कोई वो कर रहा है के अनुसार

994
01:08:51,920 --> 01:08:56,320
चल रहा है ईश्वर चेतन है

995
01:08:56,320 --> 01:09:01,360
उसके अलावा कर ही नहीं सकता मगर ईश्वर जिस प्रकार जड़ांत

996
01:09:01,360 --> 01:09:05,360
रह रहा है चलिए कोई नहीं कोई नहीं ठीक

997
01:09:05,360 --> 01:09:09,360
है कोई बात नहीं

998
01:09:09,360 --> 01:09:13,520
इसको हम अगर कोई भाई कोई देख के थोड़ा सा रिपीटेशन में जहां पर भुला

999
01:09:13,520 --> 01:09:18,160
हूं तो मैं मैं जहां पर भला था वहां पर इनकी एक बात थी इसको छोड़ दीजिए

1000
01:09:18,160 --> 01:09:22,400
तो छोड़ दीजिए वाली मुझे बात याद रही। फिर इन्होंने इंटरप्ट कर दिया तो उससे एक इन्होंने

1001
01:09:22,400 --> 01:09:26,400
निर्णय भी दिया था वहां पर। अगर कोई है थोड़ा सा पीछे करके देख करके आए

1002
01:09:26,400 --> 01:09:29,920
और यहां टाइमिंग बता दे तो मैं इनको दिखाऊंगा। इन्होंने निर्णय दिया था। अब

1003
01:09:29,920 --> 01:09:34,080
मैं बात कर रहा हूं यानी कि जो ईश्वर

1004
01:09:34,080 --> 01:09:38,160
नहीं है उसके अनुसार बिहेव करना भी ईश्वर ने

1005
01:09:38,160 --> 01:09:42,800
तय किया है कि मुझे ऐसा करना पड़ेगा।

1006
01:09:42,800 --> 01:09:47,280
वही तो बोल रहा हूं। ईश्वर नहीं किया।

1007
01:09:47,280 --> 01:09:51,440
जो ईश्वर है उसके अनुसार ही बिहेव कर रहा है। जो ईश्वर नहीं है उससे अनुसार बिहेव नहीं कर।

1008
01:09:51,440 --> 01:09:55,440
यानी कि ईश्वर के अनुसार ईश्वर के ईश्वर के उसमें

1009
01:09:55,440 --> 01:09:59,520
स्वरूप में लीला करना भी आ गया ना। लीला करना क्या है? नहीं

1010
01:09:59,520 --> 01:10:03,680
आया। लीला सुनिए आप आपने अभी बोला लीला करना यानी स्वरूप

1011
01:10:03,680 --> 01:10:07,840
में के विरुद्ध जाना। अब मैं जब स्वरूप के विरुद्ध जाना मान ही नहीं रहा हूं तो लीला कहां से आई? बीच में

1012
01:10:07,840 --> 01:10:11,360
लीला आएगी नहीं ना।

1013
01:10:11,360 --> 01:10:15,360
वहां पर वो अपने से अपने से निकृष्ट चेतन सत्ता वाले के

1014
01:10:15,360 --> 01:10:21,360
अनुसार बिहेव कर रहा है ना

1015
01:10:21,600 --> 01:10:26,960
क्या बिहेव कर रहा छोड़िए आपको मैं समझा दिया और कितनी बार रिपीट कर

1016
01:10:26,960 --> 01:10:31,040
भाई वो बिहेव कर तो रहा है जड़ के समान वहां पर जीव के द्वारा

1017
01:10:31,040 --> 01:10:35,120
उपयोग में आ रहा है हां आ रहा है

1018
01:10:35,120 --> 01:10:35,620
जड़

1019
01:10:35,440 --> 01:10:39,600
के समान आ रहा है नहीं मैंने बोल पहले आप ये पहले

1020
01:10:39,600 --> 01:10:43,840
आप ये समझ लीजिए कि लीला किसे कहते हैं। पहले आप

1021
01:10:43,840 --> 01:10:48,240
मैं थोड़ा बोल आप आप थोड़ा सा मुझे टोकिए मत आपके

1022
01:10:48,240 --> 01:10:53,040
यहां पर क्या है मैं बताऊं ना तो अवतार को कभी किसी ने समझा

1023
01:10:53,040 --> 01:10:57,360
किसी सामर्थवान के पास ये टिप्पणी टिप्पणी

1024
01:10:57,360 --> 01:11:01,520
वाली बातें हो जाएंगी ये मत करिए नहीं नहीं फिर मैं आपके ऊपर टिप्पणी करूंगा अच्छा नहीं लगेगा

1025
01:11:01,520 --> 01:11:05,520
इसको छोड़ ठीक है इसको छोड़ते इसको छोड़ देते हैं आपके यहां पर एक

1026
01:11:05,520 --> 01:11:09,760
चीज मुझे समझ में आ रही है कि आप लोगों ने लीला या

1027
01:11:09,760 --> 01:11:14,000
अवतार को ठीक से हमारे अकॉर्डिंगली कि हम क्या उसके

1028
01:11:14,000 --> 01:11:18,160
बारे में जानते हैं? इस बारे में विवेचना नहीं प्राप्त की है

1029
01:11:18,160 --> 01:11:22,320
समर्थवान लोगों के द्वारा। इस कारण से मिसअंडरस्टैंडिंग होती

1030
01:11:22,320 --> 01:11:26,320
है कि हम अवतार किसे कह रहे हैं? लीला किसे कह रहे हैं? आप किसे कह रहे हैं?

1031
01:11:26,320 --> 01:11:30,320
अब लीला क्या है? नहीं नहीं अब बोलूं मैं बोलू। आप बताइए लीला क्या है? बताइए।

1032
01:11:30,320 --> 01:11:34,640
आप बताइए लीला क्या है? लीला क्या है? कि

1033
01:11:34,640 --> 01:11:38,880
ऐसा बिहेव करना जो क्या

1034
01:11:38,880 --> 01:11:42,960
कहते हैं? जो वो नहीं है उसके अनुसार बिहेव करना। जैसे वो जड़ नहीं

1035
01:11:42,960 --> 01:11:47,040
है पर जड़ जैसा बिहेव करना। यह यह लीला में आ गया। अब आप इसको

1036
01:11:47,040 --> 01:11:50,720
और पीछे वाले डायमेंशन से देख रहे हैं कि ये जो लीला करना

1037
01:11:50,720 --> 01:11:55,040
है ये जो लीला करना है जो लीला हमें दिख रही है ये भी उसके स्वरूप

1038
01:11:55,040 --> 01:12:00,480
का कार्य है। ये भी उसका कार्य है। यही तो कह रहे हैं आप।

1039
01:12:00,480 --> 01:12:05,360
अगर जो हमें लीला दिख रही है। हां बोलिए। हां।

1040
01:12:05,360 --> 01:12:09,520
जैसे मूल प्रकृति हस्तक्षेप नहीं करती वैसे ईश्वर का पैसिव बने रहना

1041
01:12:09,520 --> 01:12:13,520
और हस्तक्षेप ना करना यह भी ईश्वर के स्वरूप के अंदर ही आता है।

1042
01:12:13,520 --> 01:12:17,680
लीला बताने के लिए आपको स्वरूप के बाहर बताना पड़ेगा। स्वरूप के अंदर ही आता है। ये ईश्वर

1043
01:12:17,680 --> 01:12:21,760
के स्वरूप के अंदर तो लीला हम कहां लीला को स्वरूप के बाहर बता रहे

1044
01:12:21,760 --> 01:12:26,000
हैं। यही तो बात है। यही तो मैं कह रहा हूं। आप नहीं जानते। चलिए आपने

1045
01:12:26,000 --> 01:12:30,240
आपने थोड़ी देर पहले आपने खुद ही बोला था कि लीला यानी वो जैसा

1046
01:12:30,240 --> 01:12:34,240
आप आप अब सुन लीजिए थोड़ा सा। आपने जो बात बोली मैं वो रिपीट कर रहा हूं। आपकी बात रिपीट कर रहा

1047
01:12:34,240 --> 01:12:38,320
हूं। आपने भी थोड़ी देर पहले लीला वाले मतलब थोड़ी शायद 10 पांच

1048
01:12:38,320 --> 01:12:42,880
10 मिनट पहले बोला होगा कि जैसा वो है उसके विपरीत

1049
01:12:42,880 --> 01:12:46,880
बिहेव करना इसको लीला बोलते हैं। ये आपने खुद बोला

1050
01:12:46,880 --> 01:12:50,960
उसके उसके गर्भ में ये बात छिपी हुई है कि वो प्रतीत मात्र होता

1051
01:12:50,960 --> 01:12:55,120
है। वो करता है। अब नहीं पॉइंट नहीं बदल

1052
01:12:55,120 --> 01:12:59,200
रहा हूं मैं। आप इसीलिए तो जानिए ना हम कह रहे हैं।

1053
01:12:59,200 --> 01:13:03,280
और अगर देखिए सीधी सी बात है। अगर किसी को यानी ईश्वर

1054
01:13:03,280 --> 01:13:05,760
अपने यानी आपके हिसाब से सुनिए सुनिए मैं एक सवाल

1055
01:13:05,760 --> 01:13:11,760
पूछता हूं क्लियर आपके हिसाब से ईश्वर अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकता। ठीक है?

1056
01:13:11,760 --> 01:13:15,840
स्वरूप के विरुद्ध कार्य व्यवहार में कर सकता है। लौकिक दृष्टि से कर

1057
01:13:15,840 --> 01:13:20,960
सकता है और पारमार्थिक दृष्टि से नहीं कर सकता है।

1058
01:13:20,960 --> 01:13:25,280
वास्तविकता में ईश्वर स्वरूप के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकता है।

1059
01:13:25,280 --> 01:13:29,280
मगर लीला लीला करना भी लीला शब्द का अर्थ

1060
01:13:29,280 --> 01:13:33,360
क्या बचेगा? जो लौकिक संसार है जो लौकिक संसार है

1061
01:13:33,360 --> 01:13:37,440
व्यवहारिक लौकिक दृष्टि से ईश्वर जितनी क्रियाएं

1062
01:13:37,440 --> 01:13:42,320
हो सकती है जितना कोई कुछ सोच सकता है वो सब कर सकता है

1063
01:13:42,320 --> 01:13:47,600
अवतार लेना ईश्वर के स्वरूप के अंदर ही आता है ना हां

1064
01:13:47,600 --> 01:13:51,680
तो फिर लीला कैसे हुआ अवतार अवतार लेना उसके स्वरूप के अंदर ही है तो फिर लीला लीला

1065
01:13:51,680 --> 01:13:55,680
शब्द का अर्थ ही नहीं बचा कुछ क्यों नहीं बचा लौकिक दृष्टि से

1066
01:13:55,680 --> 01:14:00,560
लीला हुई पारमार्थिक दृष्टि से उसने अपने स्वरूप का कार्य लीला

1067
01:14:00,560 --> 01:14:05,520
लीला लौकिक में होगी। परमार्थी में तो लीला हो भी नहीं सकती ना। लौकिक में होगी जितनी होगी।

1068
01:14:05,520 --> 01:14:09,840
हां नहीं उसमें भी कई डायमेंशंस है। सीधे व्यवहार

1069
01:14:09,840 --> 01:14:13,840
से परमार्थी नहीं है। बीच में और भी कई डायमेंशंस है। मगर

1070
01:14:13,840 --> 01:14:19,360
अंतत परमार्थ है। बीच में और क्या-क्या है बता दीजिए थोड़ा सा।

1071
01:14:19,360 --> 01:14:20,800
वो फिर एक लंबा प्रोसेस हो

1072
01:14:20,800 --> 01:14:26,240
जाएगा और क्या-क्या है। मगर डायमेंशंस और भी है।

1073
01:14:26,240 --> 01:14:30,400
तो अभी बात ये चल रही है कि आपका पॉइंट क्या है? पॉइंट बताइए।

1074
01:14:30,400 --> 01:14:34,480
अपना कंक्लूजन बता दीजिए आप कि आप जो जो मैंने बातें बोली उसके आधार पे आप

1075
01:14:34,480 --> 01:14:35,840
निष्कर्ष क्या निकाल पॉइंट मैं बता

1076
01:14:35,840 --> 01:14:39,920
रहा हूं। पॉइंट मैं बता रहा हूं कि जड़ ना होते हुए भी

1077
01:14:39,920 --> 01:14:44,080
चेतन होते हुए भी जड़ के जैसा व्यवहार करना यह ईश्वर

1078
01:14:44,080 --> 01:14:48,560
के स्वरूप में है शामिल है।

1079
01:14:48,560 --> 01:14:52,560
इस आप उसे कॉन्टक्स्ट ऐड

1080
01:14:52,560 --> 01:14:56,720
करना जरूरी है। कॉन्टक्स्ट अगर आप फिर वही बात है ना आप अगर जड़ जड़

1081
01:14:56,720 --> 01:15:00,880
का स्वरूप है जड़ के स्वरूप में अलग-अलग क्वालिटीज भी आती है जड़ की वो क्वालिटीज वाली

1082
01:15:00,880 --> 01:15:05,360
बात नहीं आएगी। यहां पर केवल और केवल हस्तक्षेप ना करना।

1083
01:15:05,360 --> 01:15:09,360
जैसे जड़ हस्तक्षेप तो कर ही नहीं सकता। कौन सी कौन सी क्वालिटी नहीं आएगी बताइए

1084
01:15:09,360 --> 01:15:13,360
जरा। देखें क्वालिटी वो मेरा पूरा

1085
01:15:13,360 --> 01:15:18,400
गजब हो जाना चाहिए। फिर बाद में क्वालिटी कौन सी आएगी नहीं आएगी उस पे आ जाएंगे। और अभी तक आप

1086
01:15:18,400 --> 01:15:22,480
सवाल पूछने केवल मुझे अभी तक सवाल पूछने का मौका दिया नहीं। अभी समझ

1087
01:15:22,480 --> 01:15:22,980
रहे हैं आप

1088
01:15:22,800 --> 01:15:26,960
उसको उस दिशा में बात है। तो मेरा क्वेश्चन अभी तक एक भी नहीं आया। तो अब मैं बता देता

1089
01:15:26,960 --> 01:15:31,040
हूं कि जिस प्रकार से जड़ हस्तक्षेप नहीं कर रहा है तो आपका सवाल

1090
01:15:31,040 --> 01:15:35,040
है कि जिस प्रकार जड़ हस्तक्षेप एट इंस्टेंट अभी नहीं कर सकता कर भी नहीं सकता वैसे

1091
01:15:35,040 --> 01:15:39,440
ही क्या ईश्वर भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा बिल्कुल नहीं कर रहा यही जवाब है इसका तो

1092
01:15:39,440 --> 01:15:43,520
हां बिल्कुल और ये स्वरूप के अंदर ही आएगा या स्वरूप के बाहर नहीं आएगा क्योंकि आपने पहले बोला था स्वरूप के बाहर

1093
01:15:43,520 --> 01:15:47,760
जाएगा वैसे लीला यानी यानी कि छोड़ क्यों दे

1094
01:15:47,760 --> 01:15:51,760
भाई यही तो निर्णय है आपका छोड़ दीजिए बार-बार अरे छोड़ दीजिए मतलब जो

1095
01:15:51,760 --> 01:15:57,760
शब्द आप पकड़ रहे हो गलत शब्द बोल रहे शब्द पे बता रहा हूं मैं जो आप बातें बोल रहे सारी

1096
01:15:58,720 --> 01:16:02,800
मैं बता रहा हूं हो क्या रहा है जैसे कि लौकिक दृष्टि से

1097
01:16:02,800 --> 01:16:06,880
हम देखें अगर तो ईश्वर ने ऐसा कुछ किया

1098
01:16:06,880 --> 01:16:10,880
जो कि उसके जो कि वो जैसा नहीं है

1099
01:16:10,880 --> 01:16:15,040
मगर उसने वैसा व्यवहार किया जैसे वो परतंत्र नहीं है

1100
01:16:15,040 --> 01:16:19,200
परंतु उसने जी से एक मिनट भाई मुझे बोलने [गला साफ़ करने की आवाज़] दीजिए

1101
01:16:19,200 --> 01:16:23,200
मुझे बोलने दीजिए मुझे बोलने दीजिए लौकिक दृष्टि से जब हम देख

1102
01:16:23,200 --> 01:16:28,080
रहे हैं तो हमने क्या देखा कि ईश्वर स्वतंत्र है, सर्वशक्तिमान

1103
01:16:28,080 --> 01:16:32,720
है। परंतु क्या हुआ कि उसने जीव की इच्छा मात्र से बिहेव कर दिया।

1104
01:16:32,720 --> 01:16:37,360
जीव के परतंत्र हो के जीव की इच्छा अनुसार बिहेव कर दिया। एक तरीके से। मगर

1105
01:16:37,360 --> 01:16:41,360
अब तात्विक और एक डायमेंशन खुल गया पीछे का। वो डायमेंशन क्या खुला

1106
01:16:41,360 --> 01:16:45,440
है? कि इस तरीके से कर्म फल के निमित्त

1107
01:16:45,440 --> 01:16:49,520
ईश्वर का इस तरीके से बिहेव करना भी उसका स्वरूप है। इसलिए उसने अपने स्वरूप

1108
01:16:49,520 --> 01:16:53,520
के विरुद्ध कुछ नहीं किया। वास्तविकता में उसने अपने स्वरूप के विरुद्ध कुछ नहीं

1109
01:16:53,520 --> 01:16:58,080
किया। ठीक है। मगर एक लौकिक सत

1110
01:16:58,080 --> 01:17:02,240
लौकिक स्तर से लौकिक दृष्टि से उसने स्वरूप के विरुद्ध उसने

1111
01:17:02,240 --> 01:17:06,800
ऐसा बिहेव किया जो वो नहीं है। जी बोलिए।

1112
01:17:06,800 --> 01:17:10,800
हालांकि जब आपने पहली बार जब ये कंक्लूजन दे रहे थे आपने

1113
01:17:10,800 --> 01:17:13,920
डायमेंशन वगैरह ये शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया था

1114
01:17:13,920 --> 01:17:18,160
और आपने क्लियरली बोला था कि स्वभाव के विरुद्ध। अब आप बोल रहे हैं कि वहां स्वभाव उसका वही

1115
01:17:18,160 --> 01:17:22,240
है। यहां पे स्वभाव के विरुद्ध जा रहा है। तो आपने अपनी बात को और क्लेरिफाई किया। आपने अगर

1116
01:17:22,240 --> 01:17:26,560
मेरे वीडियोस देखे हो तो मैं हमेशा अपने वीडियोस में व्यवहार और परमार्थ

1117
01:17:26,560 --> 01:17:30,720
शब्द का उपयोग करता हूं। आपने अगर वाला

1118
01:17:30,720 --> 01:17:34,880
भी देखा होगा तो उसमें करता हूं। जैसे कि मैं आपको बता देता हूं व्यवहार परमार्थ

1119
01:17:34,880 --> 01:17:39,200
का अंतर। एक जीव का यहां पॉइंट नहीं है। आगे बढ़ जाता हूं।

1120
01:17:39,200 --> 01:17:43,920
बेवजह क्यों लंबा खींच रहे? ये खत्म हो गई है बात। ठीक है बोलिए।

1121
01:17:43,920 --> 01:17:46,800
हम तो

1122
01:17:46,800 --> 01:17:50,800
इसलिए आप बीच में कहते हैं ना व्यवहार हां जिस प्रकार से व्यवहार परमार्थ आप

1123
01:17:50,800 --> 01:17:54,800
मानते हैं वैसे हम नहीं मानते तो आप हमारा जो मत की बात है

1124
01:17:54,800 --> 01:17:58,880
कि ईश्वर यहां पे इस प्रकार स्वभाव में कर रहा है नहीं कर रहा उस सुनिए सुनिए

1125
01:17:58,880 --> 01:18:03,120
सुनिए सुनिए सुनिए आप बीच में मत ठोके ना बीच में नहीं टोके

1126
01:18:03,120 --> 01:18:07,280
फिर वो लिंक टूट जाता है बात तो कंप्लीट हो नहीं पाती मेरा मेरा जिस

1127
01:18:07,280 --> 01:18:12,480
प्रकार से व्यवहार पॉइंट था वो

1128
01:18:12,480 --> 01:18:16,560
चलिए अभी या पहले कब की बात कर रहे अभी तो आपने टोका मुझे पहले तो

1129
01:18:16,560 --> 01:18:20,880
पहले पहले टोक चुके हैं ठीक है तो जिस

1130
01:18:20,880 --> 01:18:24,880
प्रकार हां व्यवहारिक परमार्थिक आप देखते हैं या मानते

1131
01:18:24,880 --> 01:18:28,960
हैं अलग-अलग तरीके से उस प्रकार से हम व्यवहारिक परमार्थिक नहीं मानते तो जो

1132
01:18:28,960 --> 01:18:33,280
आंसर हम अपने फिलॉसोफी के डायमें

1133
01:18:33,280 --> 01:18:37,600
डायमेंशन कहना चाह फ्रेमवर्क के अंदर दे रहे हैं उस आंसर को यूज़ करके आप

1134
01:18:37,600 --> 01:18:41,600
वहां यूज़ कर रहे हो जो फ्रेमवर्क हम मानते नहीं है समझ रहे हो आप क्या कहना चाह रहा हूं मैं

1135
01:18:41,600 --> 01:18:45,680
तो गलत गलत उस तरीके से आप दर्शाना चाह रहे हैं। फ्रेमवर्क हम

1136
01:18:45,680 --> 01:18:49,840
व्यवहारिक परमार्थ को उस तरीके है ही नहीं वो जो आप मान रहे हैं। ठीक है?

1137
01:18:49,840 --> 01:18:54,000
तो इस आंसर को आप उधर यूज़ कर रहे हैं जो कि ये वाली पॉइंट मुझे बोलना

1138
01:18:54,000 --> 01:18:58,000
था। ठीक है? अब इससे आपने जो कंक्लूजन निकाला आपने बता

1139
01:18:58,000 --> 01:19:02,080
दिया आप दूसरा दूसरा टॉपिक करिए। मैं ए वाले का

1140
01:19:02,080 --> 01:19:06,640
आंसर दे दूं ना। आप दो बातें कर रहे हैं ना। दे दीजिए

1141
01:19:06,640 --> 01:19:10,640
दे दीजिए दे दीजिए। मैं दिक्कत आएगी वो वाला जब वो जब करेंगे तब मैं आपको

1142
01:19:10,640 --> 01:19:14,640
दे दूंगा। अभी इसका ले लीजिए उत्तर जो आप बोल चुके हैं। ठीक है मैं पूरा

1143
01:19:14,640 --> 01:19:18,800
बोल देता हूं। उसके बाद आप दूसरा फिर आपके हिसाब से देख लेना। मैं अभी क्या बोल

1144
01:19:18,800 --> 01:19:22,720
रहा था यार हम

1145
01:19:22,720 --> 01:19:27,600
चलिए छोड़िए अब भूल गया मैं ऐसा कुछ यार कंप्लीट करनी चाहिए। आप बोलिए।

1146
01:19:27,600 --> 01:19:32,480
ठीक है। अब बात यह आती है कि आपने कहा कि हम आपके फ्रेम वर्क को

1147
01:19:32,480 --> 01:19:36,560
आपके फ्रेम के अंदर से निकल के अपने में ले रहे हैं। तो मैं इसको क्लियर कर

1148
01:19:36,560 --> 01:19:40,560
देता हूं कि आप व्यवहार और परमार्थ को नहीं मानते हैं एक तरीके

1149
01:19:40,560 --> 01:19:45,680
से। ठीक है? अब मैं व्यवहार परमार्थ आपका सिद्ध करता हूं।

1150
01:19:45,680 --> 01:19:49,760
जीव की दृष्टि से अच्छा ये बताइए कोई व्यक्ति

1151
01:19:49,760 --> 01:19:54,000
जन्म होता है तो लौकिक दृष्टि से हम उत्सव मनाते हैं कि नहीं मनाते?

1152
01:19:54,000 --> 01:19:56,960
देखिए आप व्यवहार प्रमाण सिद्ध करिए सब ठीक है लेकिन

1153
01:19:56,960 --> 01:20:01,120
अब मेरा भी तो अवसर आना चाहिए क्या मैं पूछूं कुछ सवाल है आप सर्वशक्तिमान

1154
01:20:01,120 --> 01:20:05,360
पे मैं ही सर्वशक्तिमत्ता का हमारी जो बात है वो तो हो गई

1155
01:20:05,360 --> 01:20:09,440
जो हमारी बात है वो तो रह ही गई आप आपने अपना पॉइंट पूरा कर

1156
01:20:09,440 --> 01:20:13,600
दिया ना कंप्लीट मैंने भी अपनी तौर से बता दिया आप आप अपना अंत

1157
01:20:13,600 --> 01:20:17,600
में भारी रख के जाना चाह रहे हैं यहां से फिर नहीं नहीं नहीं आप

1158
01:20:17,600 --> 01:20:21,600
मुझसे सवाल में पूछिए इस विषय इस विषय में जितनी बात हुई आपके हिसाब से जो भी आपको लगा

1159
01:20:21,600 --> 01:20:25,600
आप क्लिक कर दीजिए फिर मैं सवाल पूछूंगा अलग तरीके से हो मतलब अलग विषय हो

1160
01:20:25,600 --> 01:20:26,100
जाएगा एक

1161
01:20:26,000 --> 01:20:30,160
तरीके से मैं कंप्लीट कर देता हूं। सवाल पूछेंगे

1162
01:20:30,160 --> 01:20:34,240
फिर मुझे रिप्लाई देना ही पड़ेगा। व्यवहार और परमार्थ का अंतर बता रहा हूं।

1163
01:20:34,240 --> 01:20:38,240
एक व्यक्ति ने जन्म लिया। उसका हम उत्सव मना

1164
01:20:38,240 --> 01:20:43,040
रहे हैं। प्रतिवर्ष उसकी वर्षगांठ बन रही है। वास्तविकता

1165
01:20:43,040 --> 01:20:48,080
में तो उस दिन वो बंधन में आया था।

1166
01:20:48,080 --> 01:20:52,320
जबकि हम उस दिन का वर्षगाठ बना रहे हैं। यह हो गया लौकिक और पारमार्थिक दृष्टि

1167
01:20:52,320 --> 01:20:56,400
में अंतर। पारमार्थिक दृष्टि में उस जीव के साथ उस

1168
01:20:56,400 --> 01:21:00,400
दिन गलत हुआ था। उसके उसके पर्सेक्टिव से तो वो भैया बंधन में आया

1169
01:21:00,400 --> 01:21:04,400
था। फसा था वो तो मोक्ष से भी आता है आपके यहां बंधन

1170
01:21:04,400 --> 01:21:08,400
में। तो उस दिन तो वो फंसा था। तो वह फंसे फंसने का भी हम उत्सव मना रहे

1171
01:21:08,400 --> 01:21:12,640
हैं क्योंकि लौकिक दृष्टि में उस दिन वह उत्पन्न हुआ है। वह अब शरीर धारण

1172
01:21:12,640 --> 01:21:17,360
कर रहा है। अब आगे बढ़ रहा है। लौकिक दृष्टि में उसका जन्म जन्म दिवस की हम

1173
01:21:17,360 --> 01:21:22,000
खुशियां मनाते हैं। ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे लौकिक और परमार्थिक।

1174
01:21:22,000 --> 01:21:24,240
तो इसी प्रकार से बात यह

1175
01:21:24,240 --> 01:21:28,240
है कि ईश्वर होना उसी का सिद्ध हो सकता

1176
01:21:28,240 --> 01:21:32,720
है जो लीला कर सकता हो। कहने का मतलब यह था मेरा

1177
01:21:32,720 --> 01:21:36,720
ईश्वर होना जो व्यक्ति कहता है ना ईश्वर मिथ्याचारी कैसे हो

1178
01:21:36,720 --> 01:21:40,960
सकता है? ईश्वर तो ऐसा नहीं कर सकता। फिर वहां पर वो झूठ वाली वो अगर दूसरा

1179
01:21:40,960 --> 01:21:45,360
आचरण कर रहा है तो वो तो झूठा आचरण हो जाएगा। जबकि यहां पर जड़ के

1180
01:21:45,360 --> 01:21:49,840
साथ जीव के द्वारा उपयोग होने वाले विषय में वो

1181
01:21:49,840 --> 01:21:54,000
ऐसा आचरण कर रहा है जो जड़ का आचरण होता है। न्यूट्रल रहना। मुझे

1182
01:21:54,000 --> 01:21:58,240
जैसा चाहो वैसा उपयोग में ले लो। ऐसा ही आचरण वो कर रहा है। जबकि उसके

1183
01:21:58,240 --> 01:22:02,400
पास अपनी स्वतंत्र तो ईश्वर हो ही वो सकता है जो ऐसा आचरण कर सके।

1184
01:22:02,400 --> 01:22:06,480
आप जो यह कहते हैं कि वह उसका स्वरूप है इसलिए वो नहीं कर रहा है। तो वही मैं कह

1185
01:22:06,480 --> 01:22:11,280
रहा हूं। ईश्वर हो ही वो सकता है जो लीला कर सके। क्योंकि

1186
01:22:11,280 --> 01:22:15,280
ईश्वर में अगर सर्वशक्तिमत्ता है तो कर्म फल के

1187
01:22:15,280 --> 01:22:19,920
निमित्त आपके ही अनुसार ले रहा हूं। फिलहाल कर्म फल के निमित्त जीवों

1188
01:22:19,920 --> 01:22:24,160
को स्वतंत्र देने का भी उसका कार्य है। तो यह दोनों कार्य जहां

1189
01:22:24,160 --> 01:22:28,320
साथ में एक्सिस्ट कर सके। समझ रहे हैं? यह दोनों कार्य जहां

1190
01:22:28,320 --> 01:22:29,360
साथ में एक्सिस्ट करें

1191
01:22:29,360 --> 01:22:33,600
वह ईश्वर है। ना कि सिर्फ क्या कहते हैं? सृष्टि

1192
01:22:33,600 --> 01:22:37,600
और प्रलय करना ईश्वर का कार्य है। साथ ही साथ

1193
01:22:37,600 --> 01:22:41,600
जीव का पालन वाला जो हिस्सा है उसमें भी इनवॉल्व रहना ईश्वर

1194
01:22:41,600 --> 01:22:45,920
का कार्य है। इसलिए ईश्वर हो ही वो सकता है जिसमें लीला भी शामिल

1195
01:22:45,920 --> 01:22:50,000
हो जाए। पहली बात। ठीक है? अब दूसरी बात अब तक

1196
01:22:50,000 --> 01:22:54,080
हमारे बीच में यह आई है कि ईश्वर आपके

1197
01:22:54,080 --> 01:22:58,800
हिसाब से वह स्वरूप के विरुद्ध कार्य कर सकता है कि नहीं कर सकता है। हमारे

1198
01:22:58,800 --> 01:23:02,880
हमारे हिसाब से तो व्यवहार में सब कुछ कर सकता है। ऐसी कोई क्रिया नहीं है जो वो

1199
01:23:02,880 --> 01:23:06,960
नहीं कर सकता है। अब उससे होने वाली मान्यता वो एक अलग बात है कि माने

1200
01:23:06,960 --> 01:23:11,280
क्या व्यक्ति। ठीक है? जैसे कि सत्यार्थ

1201
01:23:11,280 --> 01:23:15,600
प्रकाश में एक बात कही गई कि अब विषय मत चालू करिए।

1202
01:23:15,600 --> 01:23:19,680
इसको कंप्लीट करिए फिर दूसरे विषय चढ़ जाएंगे। अगर मैं जवाब नहीं दूंगा तो फिर ऐसा

1203
01:23:19,680 --> 01:23:24,000
लगेगा कि भाई मैंने जवाब नहीं दिया वो दिक्कत हो जाएगी ना आप फिर मैं अपनी

1204
01:23:24,000 --> 01:23:28,000
बात को पूरा ही कर रहा हूं जैसे कि सत्यार्थ प्रकाश में एक बात कही गई

1205
01:23:28,000 --> 01:23:32,160
कि भाई बिना ज्ञान दिए व्यक्ति को ज्ञान हो नहीं सकता मनुष्य

1206
01:23:32,160 --> 01:23:36,320
को ज्ञान हो नहीं सकता ठीक है तो जब वो ईश्वर

1207
01:23:36,320 --> 01:23:40,320
बन के सतोगुण संपन्न हो के आया उसने ज्ञान दिया

1208
01:23:40,320 --> 01:23:44,480
सतोगुणी तरीके से तो वो तो हमने मान लिया कि ये धर्म है

1209
01:23:44,480 --> 01:23:48,560
मगर अधर्म का ज्ञान कहां से आया अधर्म

1210
01:23:48,560 --> 01:23:52,640
का ज्ञान आपने प्रश्न फिर प्रश्नात्मक शैली हुई ना

1211
01:23:52,640 --> 01:23:56,720
पूछ रहे दूसरा मुझे जवाब देना पड़ेगा या तो आप

1212
01:23:56,720 --> 01:24:00,880
इस बात को खत्म कर दीजिए मैं जो पूछना चाह रहा हूं उस पर आ जाते हैं फिर गलत हो जाएगा इसलिए

1213
01:24:00,880 --> 01:24:05,040
आपको रोक रहा हूं तो कहने का मतलब यही है कि

1214
01:24:05,040 --> 01:24:09,520
ईश्वर व्यवहार में सब कुछ कर सकता है। समस्त क्रियाएं कर सकता है।

1215
01:24:09,520 --> 01:24:13,760
हम उसको किस रूप में मान्यता लेते हैं वो हमारी दृष्टि है। ईश्वर

1216
01:24:13,760 --> 01:24:17,760
तो सभी कार्यों में वैसे भी इनवॉल्व है ही जैसा कि आपने बताया। और

1217
01:24:17,760 --> 01:24:21,840
अभी मैं अगर इसके और धागे खोलूंगा कि कितना परसेंटेज इनवॉल्व है। तो

1218
01:24:21,840 --> 01:24:26,080
देखने देखा जाए आपने कहा कि जीव जो है पूरी सहायता जीव केवल प्रेरणा

1219
01:24:26,080 --> 01:24:30,080
करता है। सारा कार्य ईश्वर करता है। लो ईश्वर स्वयं कर रहा है। ठीक

1220
01:24:30,080 --> 01:24:32,240
है? तो यह वाली बात हो गई। अब

1221
01:24:32,240 --> 01:24:36,240
आ जाती है कुल मिलाकर के एक बात अटक रही है क्योंकि हमारे और आपके बीच में

1222
01:24:36,240 --> 01:24:40,480
एक ही डिफरेंस है कि ईश्वर अवतार ले सकता है कि नहीं? और अवतार

1223
01:24:40,480 --> 01:24:44,640
ले सकने में बाधा है क्योंकि वह सर्वव्यापक है। वह सर्वशक्तिमान है। तो वह

1224
01:24:44,640 --> 01:24:48,640
अपने स्वरूप के विरुद्ध नहीं हो सकता। इसलिए वो है। तो क्या इस पर आप बात

1225
01:24:48,640 --> 01:24:52,400
करना चाहते हैं या कुछ और है? जी

1226
01:24:52,400 --> 01:24:56,640
ठीक है। अब वही है लीला शब्द का अर्थ कैसे

1227
01:24:56,640 --> 01:25:00,640
मतलब हमारी धारणा में फिर मैं एक्सप्लेनेशन दूं या फिर वही बात कंटिन्यू

1228
01:25:00,640 --> 01:25:04,640
हो जाएगी। मैंने पहले बता दिया कि लीला का अर्थ और व्यवहार परमार्थ आप जिस तरीके से

1229
01:25:04,640 --> 01:25:08,800
लेते हैं अलग-अलग वैसा हमारे में नहीं। हमारे में एक ही है व्यवहार को अलग नहीं

1230
01:25:08,800 --> 01:25:13,760
आप अगर आपके में नहीं है मैंने सिद्ध किया अगर आपको चाहते हैं तो उसको काटिए आप

1231
01:25:13,760 --> 01:25:17,840
तो फिर व्यवहार परमार तो वो तो वो विषय चला जाएगा ना फिर इसीलिए मैं बोल रहा था

1232
01:25:17,840 --> 01:25:21,840
कि आप वही तो आपके कंक्लूजन के बाद मुझे अपना कंक्लूजन देना

1233
01:25:21,840 --> 01:25:25,920
पड़ेगा ना आप ये कह के खत्म मत करिए कि भैया आपके यहां व्यवहार

1234
01:25:25,920 --> 01:25:29,920
परमार्थ हमारे यहां नहीं है ये कौन सी बात है हम लोग सत्य का अनुसंधान कर रहे हैं किसके

1235
01:25:29,920 --> 01:25:34,080
यहां क्या माना जाता है उसका अनुसंधान नहीं कर रहे हैं सत्य का कर रहे हैं।

1236
01:25:34,080 --> 01:25:38,080
हमने यह नहीं कहा हमारे यहां क्या चलिए व्यवहार और परमार्थ में भेद

1237
01:25:38,080 --> 01:25:43,280
है ना आपके यहां बिल्कुल है आपके यहां भी है

1238
01:25:43,280 --> 01:25:47,280
चलिए ठीक है अब खत्म करते हैं इसको इतने पे ही रख देते हैं वरना

1239
01:25:47,280 --> 01:25:51,680
फिर मैं बताऊंगा कि कैसे नहीं है कैसा है फिर वो अलग नीचे चला जाता है हां

1240
01:25:51,680 --> 01:25:56,480
ठीक है तो अब इस पे इस पे आते हैं अपना

1241
01:25:56,480 --> 01:26:00,560
सर्वशक्तिमान पे जैसे सर्वशक्तिमान का अर्थ आपके द्वारा

1242
01:26:00,560 --> 01:26:04,720
जो बताया जा रहा है वो है कि कुछ भी कर सकता है हम यही

1243
01:26:04,720 --> 01:26:08,800
अर्थ है। तो इसमें जो जैसे बेसिकली आपने यह सवाल जो इसके बाद जो

1244
01:26:08,800 --> 01:26:12,800
सवाल आएगा वो सुना भी होगा पहले कि भाई क्या ईश्वर ऐसी चीजें कर सकता

1245
01:26:12,800 --> 01:26:17,200
है विरोधाभास? क्या ऐसा पत्थर बना सकता है जो खुद ही ना उठा पाए?

1246
01:26:17,200 --> 01:26:21,360
तो एक तो ये बात है। ठीक है। अब पहले चलो इसका उत्तर दे दीजिए

1247
01:26:21,360 --> 01:26:24,880
आप। फिर आगे कंटिन्यू करते हैं।

1248
01:26:24,880 --> 01:26:28,960
ठीक है। इसका आज नए तरीके से उत्तर देता हूं। मैंने बहुत बार दे चुका

1249
01:26:28,960 --> 01:26:32,960
हूं। आज नए तरीके से देता हूं। आप

1250
01:26:32,960 --> 01:26:37,120
मुझे मैंने कहा ईश्वर सर्वशक्तिमान है। यानी सारी क्रियाएं

1251
01:26:37,120 --> 01:26:41,920
वो कर सकता है। तो आप मुझे यह बताइए क्रिया क्या करनी है?

1252
01:26:41,920 --> 01:26:46,080
उस क्रिया से आपको क्या मानना है ये एक अलग विषय है।

1253
01:26:46,080 --> 01:26:50,240
जैसे कि मैं मुझसे कहा जाए कि इस मोबाइल को यहां से यहां सरकाओ। ये

1254
01:26:50,240 --> 01:26:54,240
हो गई क्रिया। अब इस मोबाइल को सरकाने से आप ये मान लो

1255
01:26:54,240 --> 01:26:58,320
कि मैं फलाना काम नहीं कर सकता। या फिर जैसे

1256
01:26:58,320 --> 01:27:04,320
मैंने इसमें हाथ लगाया। ठीक? हाथ लगाने के बाद मैंने ऐसे किया।

1257
01:27:04,340 --> 01:27:09,120
[गला साफ़ करने की आवाज़] ठीक है? तो ये हो गई करने की क्रिया। हाथ लगाया और

1258
01:27:09,120 --> 01:27:13,520
किया। ये क्रिया हो गई। तो ये क्रिया ईश्वर कर सकता है।

1259
01:27:13,520 --> 01:27:17,600
अब आप इससे मान लो कि ईश्वर पत्थर नहीं उठा सका। वो आपके ऊपर है।

1260
01:27:17,600 --> 01:27:21,600
अगर केवल मान्यता बदलनी है तो बिना किसी क्रिया के ईश्वर मान्यता बदल

1261
01:27:21,600 --> 01:27:24,400
सकता है। आपकी

1262
01:27:24,400 --> 01:27:28,720
मान्यता बदलने की बात नहीं ना। ये तो वो बात हो गई। क्या ईश्वर मेरे दिमाग में जो है छेड़छाड़

1263
01:27:28,720 --> 01:27:32,720
कर रहा है या फिर मेरी बुद्धि में उस चीज को लेके जो ज्ञान है उसके प्रति छेड़छाड़

1264
01:27:32,720 --> 01:27:36,720
कर रहा है वो बात नहीं है। क्या ईश्वर ऐसा मैं फिर से रिपीट कर देता हूं।

1265
01:27:36,720 --> 01:27:40,960
क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जो खुद ना उठा सके? दो चीजों को मिक्स कर रहे हैं।

1266
01:27:40,960 --> 01:27:45,600
इस सवाल में दो चीजों का मिक्स मिक्सचर है। एक है क्रिया का।

1267
01:27:45,600 --> 01:27:49,760
एक है क्रिया का और एक है क्रिया से बनने वाली

1268
01:27:49,760 --> 01:27:54,160
मान्यता का। तो आप कह रहे हैं क्या है?

1269
01:27:54,160 --> 01:27:58,240
इसमें मान्यता यह है कि आपको यह बिलीव हो जाए कि मैं नहीं कर सका। यह मान्यता

1270
01:27:58,240 --> 01:28:02,240
ना कर सकने का सिद्धि कैसे होगी? नहीं बिलीव बिलीव बिलीव करने की

1271
01:28:02,240 --> 01:28:06,240
करवाने या करने की का तो सवाल ही नहीं था। बिलीव करने कह

1272
01:28:06,240 --> 01:28:10,320
रहा हूं नहीं कर सकने का वो क्या होगा? उदाहर वो क्या होगा? क्रिया

1273
01:28:10,320 --> 01:28:14,320
क्या होगी? नहीं कर सका। उसमें क्रिया क्या है? नहीं कर सका। क्रिया ये है कि

1274
01:28:14,320 --> 01:28:18,320
जैसे ये मोबाइल फोन है। मान लीजिए मोबाइल फोन ऐसा है

1275
01:28:18,320 --> 01:28:22,480
जो ईश्वर नहीं उठा सकता। यानी उसने ऐसे

1276
01:28:22,480 --> 01:28:26,560
ऐसे सुनिए तो सही मैं बता यानी आप ये कैसे

1277
01:28:26,560 --> 01:28:30,800
आप यह कैसे मानोगे कि ईश्वर नहीं उठा सका क्योंकि ईश्वर

1278
01:28:30,800 --> 01:28:35,200
अपने मन के अंदर जानता है कि मैं क्या कर सकता हूं क्या नहीं कर सकता मुझे मुझे नहीं

1279
01:28:35,200 --> 01:28:39,200
मानने की बात ही नहीं अरे भैया यही तो मैं कह रहा हूं

1280
01:28:39,200 --> 01:28:39,700
इसको

1281
01:28:39,440 --> 01:28:43,760
समझो आप मेरी बात को आप बिलीव कैसे करोगे

1282
01:28:43,760 --> 01:28:48,240
आप इस बात को कैसे मानोगे कि ईश्वर पत्थर नहीं उठा सका

1283
01:28:48,240 --> 01:28:52,320
कैसे मानोगे इस बात को जैसे जैसे कि आपने कहा क्या एक

1284
01:28:52,320 --> 01:28:56,480
मिनट क्या ईश्वर पत्थर बना सकता है? तो यानी कि अभी

1285
01:28:56,480 --> 01:29:00,560
यहां पर हवा है और और जो है मैंने यदि यहां पर या

1286
01:29:00,560 --> 01:29:04,720
ईश्वर ने यदि यहां पर पत्थर बना दिया तो हां आपने मान लिया कि ईश्वर

1287
01:29:04,720 --> 01:29:08,880
पत्थर बना सकता है। ठीक है? दो क्रियाएं आपने कही।

1288
01:29:08,880 --> 01:29:12,960
क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जो जिसे वो स्वयं

1289
01:29:12,960 --> 01:29:16,960
ना उठा सके। ठीक? दो क्रियाएं कही ना? एक

1290
01:29:16,960 --> 01:29:21,040
तो ना उठा सकने वाली क्रिया और एक बनाने वाली

1291
01:29:21,040 --> 01:29:25,120
क्रिया। ठीक है? ना उठा सकने वाली क्रिया नहीं ना उठा

1292
01:29:25,120 --> 01:29:29,360
सकना वो समता है। सामर्थ हेलो आपका स्क्रीन

1293
01:29:29,360 --> 01:29:33,840
अटक गया। हां मेरा स्क्रीन अटक रहा है। तो

1294
01:29:33,840 --> 01:29:38,400
नहीं वो एक सेकंड के लिए अटका था। शायद मेरे इशू होगा। एक सेकंड के लिए अटका था ज्यादा नहीं।

1295
01:29:38,400 --> 01:29:42,400
तो मैं ये बोल रहा हूं कि आप इस जो सवाल है

1296
01:29:42,400 --> 01:29:46,400
इस सवाल का उत्तर ना देकर के आप इसका उत्तर दे रहे हो कि आपको कैसे मनवाया जाए। आप

1297
01:29:46,400 --> 01:29:50,400
मुझे मनवाने पे तुले हुए हो कि भाई मुझे कैसे मैं बता रहा हूं ना आप मुझे क्रिया

1298
01:29:50,400 --> 01:29:54,560
बता दीजिए क्या-क्या क्रिया करनी है वो क्रिया बता दी क्रिया क्रिया क्रिया

1299
01:29:54,560 --> 01:29:59,040
बता दी क्या इस ऐसा पत्थर बना सकता है तो जिसको ना

1300
01:29:59,040 --> 01:30:03,440
जिसको ना उठा सके ना उठा सकने वाली क्रिया का बिलीव कैसे पता चलेगा

1301
01:30:03,440 --> 01:30:08,240
कि हां इस पत्थर को वो नहीं उठा पा रहा यह कैसे पता कैसे चलेगा

1302
01:30:08,240 --> 01:30:12,400
यह पता कैसे चलेगा? निर्णय कैसे होगा? जैसे मान लीजिए पता चलने

1303
01:30:12,400 --> 01:30:16,400
निर्णय देने की जरूरत ही नहीं है। हमें उस हमें उस क्रिया आप ये बोलना चाह रहे हैं क्या?

1304
01:30:16,400 --> 01:30:20,400
हमें उस क्रिया का साक्षी हो के कैसे पता चलेगा? ये बोलना चाह रहे हैं आप। हमारे अंदर क्या

1305
01:30:20,400 --> 01:30:25,200
इन आएगी उस क्रिया को मान ले। आप सुन।

1306
01:30:25,200 --> 01:30:29,200
आप ईश्वर से कुछ करने को कह रहे हो। ठीक है? उस करने में ये

1307
01:30:29,200 --> 01:30:33,200
है कि वो ऐसा पत्थर बनाए जिसे नहीं उठा सका। अब जैसे मान

1308
01:30:33,200 --> 01:30:37,360
लीजिए उसने पत्थर बना दिया और आपसे ये कह दिया कि ठीक है इसको मैं नहीं उठा

1309
01:30:37,360 --> 01:30:41,440
सकता तो क्या इस बोलने से आप मानोगे कि हां उसने ऐसा

1310
01:30:41,440 --> 01:30:45,440
पत्थर बना दिया जो वो नहीं उठा सकता वही ना मुझे

1311
01:30:45,440 --> 01:30:49,520
बनवाने पे आप लेके आ रहे हैं मुझे बनवाना या ना मानना ये विषय ही

1312
01:30:49,520 --> 01:30:53,600
नहीं चल रहा है विषय विषय चल रहा है विषय ये चल रहा है

1313
01:30:53,600 --> 01:30:57,600
कि ईश्वर सभी क्रियाएं कर सकता है जितनी क्रिया दिख रही है

1314
01:30:57,600 --> 01:31:01,680
आप मुझे बता दीजिए कौन सी क्रिया करनी है यानी यानी ये जो ये जो

1315
01:31:01,680 --> 01:31:05,840
मैं बात बोल रहा हूं। ये क्रिया नहीं की जा सकती। आप ये बोलना चाह रहे हैं। इसमें

1316
01:31:05,840 --> 01:31:09,600
क्रिया कहां है? आप बताइए ना कौन-कौन सी क्रिया करनी है? सब क्रिया

1317
01:31:09,600 --> 01:31:13,680
करेंगे। नहीं कर अरे तो क्रिया से अपनी

1318
01:31:13,680 --> 01:31:18,400
बात अपनी बात को क्रिया से जोड़िए। तो क्रिया

1319
01:31:18,400 --> 01:31:22,400
क्रिया क्रिया बता देता हूं। आपके वाक्य में एक ही क्रिया

1320
01:31:22,400 --> 01:31:26,400
दिख रही है मुझे। पत्थर बनाना ना उठा सकने में

1321
01:31:26,400 --> 01:31:30,640
क्रिया बताइए। कौन सी क्रिया होगी? ना उठा सकने की?

1322
01:31:30,640 --> 01:31:34,800
ना जैसे मैंने फोन उठाया वैसे ना उठा सका

1323
01:31:34,800 --> 01:31:38,880
तो आप कैसे चीज तो आप यह कैसे चीज मानोगे कि वो नहीं

1324
01:31:38,880 --> 01:31:43,120
उठा सका मुझे मनवाने की बात ही नहीं है ना अगर देखिए

1325
01:31:43,120 --> 01:31:47,600
आप समझ नहीं रहे हैं मैं उस क्रिया को देखूं या मैं उस क्रिया को मानू

1326
01:31:47,600 --> 01:31:51,600
या मैं कैसे मान लूं आप उस पे लाना चाह रहे जबकि वो बात ही नहीं हो रही है बात सिंपल सी

1327
01:31:51,600 --> 01:31:55,600
ये हो रही है ना सुनिए सुनिए सुनिए सुनिए बात इसमें ये हो रही है

1328
01:31:55,600 --> 01:31:59,840
देखिए अगर हमने कहा कि जिसको वो स्वयं ना उठा सके तो उसमें

1329
01:31:59,840 --> 01:32:03,840
इसमें निर्णय कैसे होगा? जैसे मान लीजिए ईश्वर ने केवल कह दिया कि भैया

1330
01:32:03,840 --> 01:32:09,760
मैं इस पत्थर को नहीं उठा पा रहा। मैंने बना दिया तो उससे आप संतुष्ट हो जाएंगे।

1331
01:32:09,760 --> 01:32:13,920
यानी ईश्वर में पत्थर उठाने का सामर्थ्य नहीं है। ईश्वर ऐसा बोल

1332
01:32:13,920 --> 01:32:18,400
सकता है आपसे। मैं ये कह रहा हूं। ईश्वर ऐसा बोलने की तो

1333
01:32:18,400 --> 01:32:22,480
बोलने की बात ही नहीं बोल रहा हूं ना। बोल के थोड़ी बताना है। बोलना थोड़ी है। तो फिर तो फिर

1334
01:32:22,480 --> 01:32:24,720
तय कैसे होगा कि वो पत्थर को उठा नहीं पा रहा है।

1335
01:32:24,720 --> 01:32:28,800
बताइए। तय नहीं तय करने पे तो बात आएगी ना। किसी को

1336
01:32:28,800 --> 01:32:32,880
कर ही नहीं पाएगा। क्या नहीं कर पाएगा? भाई ईश्वर ईश्वर

1337
01:32:32,880 --> 01:32:37,040
आपके सामने आया। ईश्वर ने ऐसा पत्थर बना दिया जिसको कोई नहीं उठा। बात

1338
01:32:37,040 --> 01:32:41,520
है थोड़ा सा थोड़ा सा बुद्धि पूर्वक इस बात को समझिए। इस बात में

1339
01:32:41,520 --> 01:32:45,600
जब आप ये कहते हैं क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसको वो स्वयं

1340
01:32:45,600 --> 01:32:49,600
ना उठा सके। तो स्वयं ना उठा सकने वाली बात में उसके अंदर

1341
01:32:49,600 --> 01:32:53,920
की क्षमता का निर्णय होता है। उसका निर्णय होता है कि वो आपको क्या प्रदर्शित करे।

1342
01:32:53,920 --> 01:32:59,920
इसमें क्रिया नहीं है कोई भौतिक। ठीक है? आप

1343
01:33:00,560 --> 01:33:04,320
भौतिक क्रिया बताइए कौनिक

1344
01:33:04,320 --> 01:33:08,640
नहीं भौतिक क्रिया क्यों बताइए

1345
01:33:08,640 --> 01:33:12,800
इंद्रियों के द्वारा दिखाई देने वाली समझ में आने वाली कौन

1346
01:33:12,800 --> 01:33:17,040
सी क्रिया है जो आपके अनुसार ईश्वर नहीं कर सकता मैं बता दूंगा कर सकता है बस

1347
01:33:17,040 --> 01:33:21,040
सीधी बात नहीं तो वही आप वही ना पॉइंट डायबिट करना चाह

1348
01:33:21,040 --> 01:33:25,120
रहे हैं आप इस पर लाना चाह रहे हैं कि भाई इंद्रियों के द्वारा तुमको क्या दिखा दो

1349
01:33:25,120 --> 01:33:29,120
कि ईश्वर ये चीज मान ले जबकि बात ये है ही नहीं। बात ये है

1350
01:33:29,120 --> 01:33:33,200
कि क्या ईश्वर ऐसा पत्थर कोई बना सकता है? ईश्वर ने एक पत्थर बना दिया।

1351
01:33:33,200 --> 01:33:37,360
ठीक है? आप ये समझिए। ईश्वर के एक पत्थर बना दिया। ठीक है? और ईश्वर

1352
01:33:37,360 --> 01:33:41,600
ने बोला कि ये पत्थर मैं खुद नहीं उठा सकता हूं। ठीक है?

1353
01:33:41,600 --> 01:33:45,680
और ईश्वर ये बात सत्य बोल रहा है। झूठ नहीं ये सत्य बात है। ठीक है? ईश्वर ने

1354
01:33:45,680 --> 01:33:49,760
ये बात बोल दी कि ये पत्थर मैं खुद नहीं उठा सकता हूं। ईश्वर ने ये सत्य बोला है। झूठ बोला

1355
01:33:49,760 --> 01:33:51,440
है। निर्णय कैसे करेंगे आप?

1356
01:33:51,440 --> 01:33:55,520
हां। तो आप भ्रम पे लाना चाह रहे हैं ना कि ईश्वर झूठ बोल रहा है वहां पे। आप ये बोल रहे है ना ईश्वर

1357
01:33:55,520 --> 01:34:00,080
झूठ बोल रहा है वहां पे। तो जहां पर ईश्वर बिना उसके उपयोग में आ रहा है

1358
01:34:00,080 --> 01:34:04,160
वहां पर क्या हो रहा है? मैं जब चाह बोतल उठा ली

1359
01:34:04,160 --> 01:34:08,320
यहां पे क्या कर रहा है ईश्वर जड़ की तरह सेव कर रहा है कि नहीं विपरीत

1360
01:34:08,320 --> 01:34:12,640
आचरण कर रहा है कि नहीं इसका इसका इसका मैं सवाल पूछ रहा हूं उससे क्या संबंध है

1361
01:34:12,640 --> 01:34:16,800
संबंध ये है कि ईश्वर जो ईश्वर लीला कर सके जो

1362
01:34:16,800 --> 01:34:20,960
ईश्वर ऐसी चीजें कर सके वही ईश्वर है जो नहीं कर सके वो ईश्वर नहीं

1363
01:34:20,960 --> 01:34:24,960
है उसकी सत्ता में ही कुरान का ज्ञान दिया जा रहा है वेद विरुद्ध है दिया जा रहा

1364
01:34:24,960 --> 01:34:29,120
है वो चुप है तो उसी तरीके से वो यहां पर

1365
01:34:29,120 --> 01:34:33,280
वो यहां पर आपको कह सकता है मैं नहीं उठा पा रहा ले मान लो

1366
01:34:33,280 --> 01:34:37,280
नहीं उठा पा रहा यानी यानी झूठ बोल रहा है ना ईश्वर तो वहां

1367
01:34:37,280 --> 01:34:41,360
पे भी झूठा आचरण कर रहा है ना ईश्वर झूठा वहां पे मत जाइए आप यहां

1368
01:34:41,360 --> 01:34:42,880
वो वहां पे झूठा आचरण नहीं कर

1369
01:34:42,880 --> 01:34:46,880
मैं बता देता हूं आप ऐसे सुनिए सुनिए सुनिए

1370
01:34:46,880 --> 01:34:51,120
आप आप क्या कर रहे हैं मैं मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं मैं एक्सप्लेन दो मिनट बोलूंगा आप बीच में रुकिए

1371
01:34:51,120 --> 01:34:55,200
दो मिनट आप क्या कर रहे हैं एक तो एक तो झूठा आचरण

1372
01:34:55,200 --> 01:34:59,440
नहीं है मैं पहले स्टेटमेंट दे देता हूं ठीक है झूठा आचरण नहीं है वो आचरण सही है मैं

1373
01:34:59,440 --> 01:35:03,440
मैं सिद्धू हां बोलिएगा बोलिएगा आप बोलिएगा मैं रिपीट कर लूं अपना

1374
01:35:03,440 --> 01:35:07,440
पॉइंट आप क्या कर रहे हो कि देखो देखो आपके यहां ये दिक्कत है तो मेरे

1375
01:35:07,440 --> 01:35:11,520
यहां मतलब मैंने जो आपके ऊपर आक्षेप लगाया कि भाई देखो आपके यहां ये समस्या है आपके

1376
01:35:11,520 --> 01:35:15,840
इस सिद्धांत में दिक्कत आ रही है तो देखो देखो आपके यहां भी तो दिक्कत है वो बाउंड्री

1377
01:35:15,840 --> 01:35:19,920
हो गई है हमारे यहां दिक्कत अगर मान लीजिए सुनिए पूरा पूरा पूरा

1378
01:35:19,920 --> 01:35:24,560
पॉइंट कर देता हूं पूरा पॉइंट कर देता हूं मैं आप बोल लीजिएगा आप बोल लीजिएगा बोल लीजिएगा

1379
01:35:24,560 --> 01:35:25,060
मेरा

1380
01:35:24,880 --> 01:35:29,200
कहने का मतलब सिर्फ इतना सा है कि अगर मैं अब सिद्धांत से

1381
01:35:29,200 --> 01:35:33,200
दुर्जन जो नया बोलते हैं उससे मान भी लूं एक बार के लिए कि भाई मेरी बात गलत है वहां

1382
01:35:33,200 --> 01:35:37,440
पे हमारी गलत बात गलत सिद्ध हो रही है तो इससे आपका

1383
01:35:37,440 --> 01:35:41,440
सही होना कहीं से भी सिद्ध नहीं हो जाएगा मैं बता रहा हूं ना सिद्ध कैसे हो रहा है

1384
01:35:41,440 --> 01:35:45,520
चलिए बोलिए क्योंकि हमने हमने ईश्वर को माना ही वो उसको है

1385
01:35:45,520 --> 01:35:49,920
जब वो अपनी चीजों के विपरीत आचरण भी करता हमें दिख सके उसकी विपरीत

1386
01:35:49,920 --> 01:35:54,480
आचरण करने की प्रतीति हो आपने आपने माना मैंने नहीं माना आपने

1387
01:35:54,480 --> 01:35:59,200
फिर आप पीछे चलो बता दो बिना उसको माने कैसे हो जाएगा सिद्ध

1388
01:35:59,200 --> 01:36:03,200
या तो क्या [हंसी] बिना आप सवाल क्या बिना क्या

1389
01:36:03,200 --> 01:36:07,280
माने ईश्वर जब स्वतंत्र सत्ताधारी है

1390
01:36:07,280 --> 01:36:11,440
चेतन है तो दूसरे जो चेतन उससे निकृष्ट जीव है उसके अंतर्गत जाकर के उसके

1391
01:36:11,440 --> 01:36:15,520
द्वारा नियंत्रित हो रहा है लो ये दोनों विपरीतार्थक वो

1392
01:36:15,520 --> 01:36:19,600
है उसमें हो रहे हैं घटित ईश्वर में नहीं हो रहा विपरीतार्थक है ही नहीं मैंने

1393
01:36:19,600 --> 01:36:23,600
पहले ही बता दिया कि भाई ईश्वर जो है ईश्वर अपनी स्वयं

1394
01:36:23,600 --> 01:36:28,000
की स्वतंत्रता के वजह स्वतंत्रता का आप अरे भैया

1395
01:36:28,000 --> 01:36:32,080
वहां ईश्वर का ईश्वर का जीव की प्रेरणा से काम करना हो

1396
01:36:32,080 --> 01:36:36,160
तो रहा है सिद्ध हां हो रहा है लेकिन वो स्वभाव के विरुद्ध है ही नहीं मैंने एक्सप्लेन

1397
01:36:36,160 --> 01:36:39,920
कर दिया था पहले भी वो वो वो जो वहां पर लीला है उसको आपने स्वभाव

1398
01:36:39,920 --> 01:36:44,320
माना है ना फिर लीला वो जो वो जो विपरीत

1399
01:36:44,320 --> 01:36:48,320
आचरण है उसको स्वभाव मान लिया है तो विपरीत आचरण

1400
01:36:48,320 --> 01:36:52,480
तो कर रहा है ना और वही उसका स्वभाव नहीं है विपरीत मैं वही आप देखिए

1401
01:36:52,480 --> 01:36:56,480
वही है ना आप बोल रहे हैं विपरीत आचरण मैं बोल रहा हूं नहीं जबरदस्ती आप क्यों अपनी

1402
01:36:56,480 --> 01:37:00,640
बात मनवाना चाह रहे हैं मैं बोल बोल ही रहा हूं आचरण है। वही उसका आचरण है।

1403
01:37:00,640 --> 01:37:04,720
मैं तो पहले से ही मान के चल रहा हूं। तो बस यही उसका आचरण है।

1404
01:37:04,720 --> 01:37:08,960
यही जो आचरण भटक रहे हैं। हां हां हां बताइए। अब अब एक सुन करिए क्या आचरण

1405
01:37:08,960 --> 01:37:13,040
है यहां पे ये बताइए। तो ठीक है आप वहां बताइए। झूठा आचरण है वहां पे।

1406
01:37:13,040 --> 01:37:17,040
वही उसका आचरण है। झूठा आचरण करना। नहीं कैसे फसाएंगे ना

1407
01:37:17,040 --> 01:37:21,600
तो मैं भी फसाऊंगा। अरे फसाएंगे फसाने वाली क्या बात है? मैंने अपना पूरा अरे भैया

1408
01:37:21,600 --> 01:37:25,680
एक ऐसा वर्ड नहीं एक्सप्लेन किया। जैसे यहां पर वो जो नहीं है वो

1409
01:37:25,680 --> 01:37:29,760
बोल रहा है तो आप कह रहे झूठ बोल रहा है। इसी प्रकार से वो जो नहीं है वहां वो उस

1410
01:37:29,760 --> 01:37:33,760
तरह से बिहेव कर रहा है। तो अमित क्या मैंने तो एक्सप्लेन कर दिया ना कि वो वही है।

1411
01:37:33,760 --> 01:37:37,840
आप जबरदस्ती मान रहे हो कि वो वो नहीं है। मैं तो बोल ही रहा हूं कि वो वही है। तो मैंने

1412
01:37:37,840 --> 01:37:42,160
मैंने उसको माना ना मैंने आप मैं उसको मान रहा हूं ना कि भैया

1413
01:37:42,160 --> 01:37:46,160
ईश्वर वही हो सकता है जिसमें अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य करते

1414
01:37:46,160 --> 01:37:51,760
हुए दिखना प्रतीति करवाना भी शामिल हो। वही हो सकता है ईश्वर।

1415
01:37:51,760 --> 01:37:55,440
लेकिन मैंने एक्सप्लेन कर दिया नहीं नहीं

1416
01:37:55,440 --> 01:37:59,440
मैंने एक्सप्लेन कर दिया कि वो स्वरूप के विरुद्ध है ही नहीं। आपने आपने

1417
01:37:59,440 --> 01:38:03,600
हां सुनिए सुनिए अब आप सुन अब रुकिए आप रुकिए रुकिए रुकिए रुकिए रुकिए

1418
01:38:03,600 --> 01:38:08,080
आपने बोला था आपने आपने अपने मुंह से ही बोला था कि आपने अनुसार

1419
01:38:08,080 --> 01:38:12,480
एक मिनट एक मिनट मैं क्लिटी पे पहुंच गया हूं। हमारी आपकी मिसअंडरस्टैंडिंग में

1420
01:38:12,480 --> 01:38:16,640
आपने उसका जो मिथ्या आचरण है उसको ही उसका

1421
01:38:16,640 --> 01:38:20,960
स्वरूप मान लिया है। नहीं नहीं फिर गलत शब्द है। मिथ्या आचरण है ही नहीं वो।

1422
01:38:20,960 --> 01:38:25,120
नहीं नहीं नहीं गलत शब्द है। ये आप जबरदस्ती मान के चल रहे हैं। ये गलत बात है।

1423
01:38:25,120 --> 01:38:29,280
मैंने ये कहीं पर भी ना बोला ना तो मैंने लीला बोला ना तो मैंने मिथ्या आचरण बोला।

1424
01:38:29,280 --> 01:38:33,360
फिर से अगर नहीं बोला तो बता दो ना भाई। वहां पे वो जीव के अनुसार बिहेव

1425
01:38:33,360 --> 01:38:37,920
क्यों कर रहा है? बता दो। क्योंकि वही उसका स्वरूप है।

1426
01:38:37,920 --> 01:38:42,080
तो बस इसका मतलब जीव के अनुसार आश्रित जैसा बिहेव करना भी उसका स्वरूप

1427
01:38:42,080 --> 01:38:44,640
है ना।

1428
01:38:44,640 --> 01:38:48,800
आश्रित फिर चलो मान लो अभी ठीक है। दूसरे चेतन

1429
01:38:48,800 --> 01:38:53,200
के अनुसार कार्य करना भी उसका स्वरूप है ना? हां

1430
01:38:53,200 --> 01:38:57,280
कार्य करना। ठीक है। दूसरे चेतन से निर्देश लेकर के कार्य करना भी

1431
01:38:57,280 --> 01:39:01,280
उसका स्वरूप है ना। ठीक है। हां। तो

1432
01:39:01,280 --> 01:39:05,440
यही तो मिथ्या आचरण उसका स्वरूप हो गया। कहां क्या मिथ्या आचरण है

1433
01:39:05,440 --> 01:39:10,000
स्वतंत्र मैंने एक्सप्लेन किया था ना सुन लीजिए आपने पहली बात तो

1434
01:39:10,000 --> 01:39:10,560
लीला वाली

1435
01:39:10,560 --> 01:39:15,920
बात मैंने एक्सप्लेन किया था मैंने कि स्वतंत्रता

1436
01:39:15,920 --> 01:39:20,240
कर्मों की स्वतंत्रता देने के लिए ईश्वर को ये जो आचरण

1437
01:39:20,240 --> 01:39:24,240
है जिसको आप मिथ्या आचरण आचरण बुलवाना चाह रहे कि स्वरूप के विरुद्ध स्वरूप के विरुद्ध नहीं क्योंकि

1438
01:39:24,240 --> 01:39:28,240
ईश्वर ने अपने स्वरूप के अनुसार ही जीवो को कर्म करने की स्वतंत्रता दी है

1439
01:39:28,240 --> 01:39:32,400
और उसके अंतर्गत ही जितने भी कार्य उसमें अंतर्गत

1440
01:39:32,400 --> 01:39:36,400
खुद उपयोग में आ रहा है। जड़ के जैसा व्यवहार कर रहा है।

1441
01:39:36,400 --> 01:39:40,640
जड़ के जैसा व्यवहार अपना इंटरफेरेंस ना करके कर रहा है। हां, ठीक है।

1442
01:39:40,640 --> 01:39:44,880
यही उसका स्वरूप है। इसमें दिक्कत क्या है? दिक्कत क्या है? इसका मतलब इसका

1443
01:39:44,880 --> 01:39:49,440
मतलब जो वो नहीं है उसके जैसा व्यवहार करना ही उसका स्वरूप है। वही

1444
01:39:49,440 --> 01:39:53,760
मैंने ये कहां बोला कि वो वो नहीं है। मैंने आप मुझे लाइन बताओ। मैंने कब बोला? मिलाकर

1445
01:39:53,760 --> 01:39:57,760
मैं बताऊं। वो हो क्या रहा है? मैं बताऊं। ईश्वर को केवल यहां पे सीमित

1446
01:39:57,760 --> 01:40:01,840
नहीं किया जा सकता। वो केवल सत्य ही बोलता है या वह सत्य आचरण

1447
01:40:01,840 --> 01:40:06,000
ही करता है। वह अपने स्वरूप के बाहर जाकर के भी कार्य करता

1448
01:40:06,000 --> 01:40:10,080
दिख सकता है क्योंकि उसके स्वरूप के बाहर जाकर के कार्य करना दिखना ही

1449
01:40:10,080 --> 01:40:14,560
उसका परम स्वरूप है। वास्तविक स्वरूप है। ये मानना पड़ेगा।

1450
01:40:14,560 --> 01:40:18,720
अगर ये नहीं मानेंगे ये नहीं मानूंगा। ये नहीं एक मिनट। अगर

1451
01:40:18,720 --> 01:40:22,800
ये नहीं मानेंगे तो जड़ के जैसा आचरण आप सिद्ध करिए। वो कैसे कर रहा है? वो

1452
01:40:22,800 --> 01:40:25,680
तो सत्यवादी है केवल। अगर केवल में सीमित

1453
01:40:25,680 --> 01:40:30,240
करेंगे ना उसे कि वह केवल वही करेगा है। आप मुझे समस्या

1454
01:40:30,240 --> 01:40:34,400
आप मुझे समस्या बता दीजिए ना कि जड़ के जैसा हस्तक्षेप ना करने वाला व्यवहार जड़

1455
01:40:34,400 --> 01:40:38,480
जड़ बोल रहे हो गलत है। हस्तक्षेप ना करके वो अपने स्वरूप के विरुद्ध

1456
01:40:38,480 --> 01:40:40,880
कैसे जा रहा है आप ये मुझे एक्सप्लेन कर दीजिए।

1457
01:40:40,880 --> 01:40:44,880
हालांकि आपने पॉइंट डाइवर्ट किया है। अपनी बात का जवाब नहीं दिया आपने। हमने

1458
01:40:44,880 --> 01:40:49,040
दे दिया मेरे पास उसके बहुत सारे बहुत सारे उसके जवाब है। ठीक है?

1459
01:40:49,040 --> 01:40:53,120
अभी उसप आएंगे उसको भूलिएगा नहीं। ठीक है। उसप आइएगा। उस पर

1460
01:40:53,120 --> 01:40:58,000
आएंगे उसको भूलिएगा नहीं। मुझे मालूम था सर्वशक्तिमान के लिए आप यही तोप एक लाए हैं।

1461
01:40:58,000 --> 01:41:02,000
मुझे मालूम था अब ये फिर टिप्पणी कर रहे हैं आप। मत करिए

1462
01:41:02,000 --> 01:41:06,000
टिप्पणी बीच में। यही एक तोप लाए हैं। आप कोई बात मत करिए। ठीक है।

1463
01:41:06,000 --> 01:41:10,400
ठीक है। ठीक है। मैं आता हूं। क्षमा करिए मुझे। जी क्योंकि ज्यादातर

1464
01:41:10,400 --> 01:41:14,480
आपकी तरह आर्य समाजी होते नहीं है। तो ऐसा वो एक हो जाता है। मुझे

1465
01:41:14,480 --> 01:41:18,480
क्षमा कर दीजिए। हां। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो

1466
01:41:18,480 --> 01:41:22,640
अब हम आते हैं उस पे कि आपने कहा कि उसका स्वरूप

1467
01:41:22,640 --> 01:41:26,720
ही है कि वो क्या कहते हैं जीवो के अनुसार

1468
01:41:26,720 --> 01:41:30,720
कार्य करेगा। ये उसका स्वरूप ही है कर्म फल देने के लिए।

1469
01:41:30,720 --> 01:41:34,720
हम ठीक है? यानी कि उसके स्वरूप में ये आ गया कि वो जो नहीं

1470
01:41:34,720 --> 01:41:38,720
है वैसा व्यवहार करेगा। ये आ गया ना गलत बात

1471
01:41:38,720 --> 01:41:42,800
है। जब आप बोल रहे हैं कि उसका स्वरूप ही है तो फिर बोल रहे हैं उसके स्वरूप के विरुद्ध जा

1472
01:41:42,800 --> 01:41:46,800
रहा है। ये दोनों बातें आप अपनी पहली बात दूसरी बात काट रहे हैं। आप मैं बता रहा हूं। मैं बता

1473
01:41:46,800 --> 01:41:50,880
रहा हूं पहली बात से दूसरी बात या तो वो उसका सुनिए सुनिए मैं मैं मैं क्लियर कर या तो वो उसका

1474
01:41:50,880 --> 01:41:55,040
स्वरूप है या तो वो उसका स्वरूप नहीं है उसके विपरीत जा रहा है दोनों बातें साथ

1475
01:41:55,040 --> 01:41:56,480
में कैसे हो सकती है

1476
01:41:56,480 --> 01:42:00,640
मैं बता रहा हूं साथ में कैसे हो रही है इसका मतलब ये मान ले कि ईश्वर

1477
01:42:00,640 --> 01:42:04,720
का गुण केवल सत्य बोलना सत्य आचरण करना नहीं है ये

1478
01:42:04,720 --> 01:42:07,360
माने

1479
01:42:07,360 --> 01:42:11,360
क्यों क्यों माने

1480
01:42:11,360 --> 01:42:16,080
क्योंकि वो अपने जड़ जैसा व्यवहार भी कर रहा है

1481
01:42:16,080 --> 01:42:20,160
जड़ जैसा व्यवहार हस्तक्षेप ना करने वाला जड़ जैसा व्यवहार उसके स्वरूप के अंदर

1482
01:42:20,160 --> 01:42:24,320
ही है। कर रहा है ना स्वरूप के अंदर जड़

1483
01:42:24,320 --> 01:42:28,720
जैसा व्यवहार कर रहा है ना वो चेतन होते हुए हां हां

1484
01:42:28,720 --> 01:42:32,720
तो यानी यानी कि उतने हिस्से में वो जड़ जैसा व्यवहार करके ऐसा कर

1485
01:42:32,720 --> 01:42:37,360
रहा है। चेतन होते हुए जड़ जैसा उपयोग में आ रहा है। ये क्या हुआ? चेतन मिथ्या

1486
01:42:37,360 --> 01:42:41,680
मैं बताता हूं। चेतन रुकिए रुकिए रुकिए। आपका ये कहना है कि चेतन

1487
01:42:41,680 --> 01:42:45,680
आप क्या करते हैं आप क्या करते हैं? मैं बताता हूं। दिक्कत

1488
01:42:45,680 --> 01:42:49,920
कहां? एक मिनट एक मिनट। आप क्या करते हैं? दिक्कत वहां आ रही है

1489
01:42:49,920 --> 01:42:53,920
कि जितनी भी चीजें आपके बनाए हुए सिद्धांत के बाहर

1490
01:42:53,920 --> 01:42:57,920
जाती हैं, यह उसका कार्य नहीं है। इसलिए वो उसके स्वरूप में शामिल नहीं है। इसलिए

1491
01:42:57,920 --> 01:43:02,240
ये नहीं हो सकता। बाकी वही सब चीजें दूसरे रूप में आपने अपने अंदर स्वीकार

1492
01:43:02,240 --> 01:43:07,120
कर रखी है। नहीं कर रखी। अब मैं बता देता हूं।

1493
01:43:07,120 --> 01:43:11,360
आप टोकते हैं तो पॉइंट दिमाग से उतर जाता है। आपने लास्ट

1494
01:43:11,360 --> 01:43:11,860
क्या

1495
01:43:11,600 --> 01:43:15,840
बोला था? इस ये बात के पहले इसके पहले क्या लास्ट बात बोली थी आपने? हां

1496
01:43:15,840 --> 01:43:20,480
चेतन वाली याद आ गई। याद आ गई। हां चेतन वाली बात आपने बोली थी कि

1497
01:43:20,480 --> 01:43:24,480
चेतन जैसा व्यवहार करने का मतलब आपका ये निकल रहा है

1498
01:43:24,480 --> 01:43:28,480
कि भाई चेतन जैसा व्यवहार है। यानी हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा। तभी वो

1499
01:43:28,480 --> 01:43:32,960
चेतन वाला व्यवहार है। हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। जड़ जैसा व्यवहार है। ठीक है?

1500
01:43:32,960 --> 01:43:37,040
ये समझू मैं? हस्तक्षेप नहीं कर रहा है तो जड़

1501
01:43:37,040 --> 01:43:41,200
जैसा व्यवहार है। वो जड़ जैसा व्यवहार है। यही बोला ना? यह तो

1502
01:43:41,200 --> 01:43:45,280
यह तो आप कह रहे हैं कि वह हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। कर रहा है। मेरा तो कहने का

1503
01:43:45,280 --> 01:43:49,280
मतलब यह है कि वहां पर वह जब शांत रह रहा है और निर्णय नहीं दे

1504
01:43:49,280 --> 01:43:53,440
रहा है ना ही रोक रहा है। हां ठीक है। इसको कह सकते हैं ठीक है। हां

1505
01:43:53,440 --> 01:43:58,720
तो यही ये चेतन के व्यवहार के अंतर्गत ही आता है। ये

1506
01:43:58,720 --> 01:44:02,880
अलग हां ना करना चेतन के व्यवहार के अंदर ही आएगा।

1507
01:44:02,880 --> 01:44:06,880
आप इसको क्या कर रहे हैं कि आप ये बताना चाह रहे हैं। आप सुनिए सुनिए मैं कंप्लीट [हंसी]

1508
01:44:06,880 --> 01:44:09,280
कर कंप्लीट कर दे रहा हूं। हां हां हां

1509
01:44:09,280 --> 01:44:13,280
आप ये बताना चाह रहे हैं कि क्योंकि वो हस्तक्षेप नहीं कर रहा यानी वो चेतन

1510
01:44:13,280 --> 01:44:17,440
जैसा व्यवहार नहीं कर रहा है वहां पे आप ये बताना चाह रहे हैं और चेतन जैसा

1511
01:44:17,440 --> 01:44:21,520
व्यवहार नहीं कर रहा है यानी अपना स्वरूप जो चेतन वाला है उसके विरुद्ध जाके चेतन जैसा व्यवहार

1512
01:44:21,520 --> 01:44:25,520
कर रहा है वो पैसिव रहना भी चेतन का ही गुण है ठीक है

1513
01:44:25,520 --> 01:44:29,680
ठीक है इसका मतलब कि जहां पर पाप आचरण

1514
01:44:29,680 --> 01:44:33,760
हो रहा है वहां पर जैसे मनुष्य को दोष लगता है

1515
01:44:33,760 --> 01:44:36,480
मनुष्य को दोष लगता है ना हस्तक्षेप ना करने में दोष लगता

1516
01:44:36,480 --> 01:44:41,040
है कि नहीं हम हम हां हां हस्तक्षेप

1517
01:44:41,040 --> 01:44:45,840
ना करना भी पाप माना जाता है कि नहीं? हां बिल्कुल

1518
01:44:45,840 --> 01:44:49,920
तो वहां हेलो हेलो हेलो हेलो

1519
01:44:49,920 --> 01:44:54,800
आवाज आ रही आवाज आ रही है आ रही है जी तो मैंने बोल दिया

1520
01:44:54,800 --> 01:45:00,800
हां इस तरीके का कार्य भी ईश्वर कर सकता है

1521
01:45:04,720 --> 01:45:05,840
जी जी बोलिए हां

1522
01:45:05,840 --> 01:45:10,080
मैंने हां बोल दिया जी बोल दिया मैंने इस तरीके का कार्य भी ईश्वर

1523
01:45:10,080 --> 01:45:14,240
कर सकता है तो [गला साफ़ करने की आवाज़] अब इसमें यह

1524
01:45:14,240 --> 01:45:18,240
वाली बात आती है कि आपने कहा कि हस्तक्षेप ना करना

1525
01:45:18,240 --> 01:45:22,640
भी चेतन का ही व्यवहार है। शांत रहना भी चेतन का ही व्यवहार है।

1526
01:45:22,640 --> 01:45:26,880
इसलिए जो है हम यह मानते हैं कि

1527
01:45:26,880 --> 01:45:31,040
ईश्वर जो है अपने स्वरूप के निमित्त कार्य कर रहा है। ठीक है? अब

1528
01:45:31,040 --> 01:45:35,440
पहली बात तो ये आ गया कि शांत रहना। शांत रहना हस्तक्षेप

1529
01:45:35,440 --> 01:45:40,240
ना करना मनुष्यों में पाप माना जाता है कई जगह पर। हम

1530
01:45:40,240 --> 01:45:44,480
भीष्म जी को भीष्म जी को दोष लगा ना द्रोपदी का चरण देखने पर

1531
01:45:44,480 --> 01:45:48,560
पाप माना जाता है हस्तक्षेप ना करना तो जो हां उसको एक्सप्लेन कर सकता

1532
01:45:48,560 --> 01:45:53,120
हूं ठीक है ठीक है वो करेंगे अब दूसरी बात ये आती है

1533
01:45:53,120 --> 01:45:57,200
कि जब हम इसको इधर से उधर कर रहे होते हैं व्यवहार में तो हम अपने मन

1534
01:45:57,200 --> 01:46:00,400
में क्या सोच रहे होते हैं

1535
01:46:00,400 --> 01:46:04,400
ईश्वर करवा रहा है या मैं कर रहा हूं बंधन की ओर से देख रहा हूं मुक्ति की ओर से

1536
01:46:04,400 --> 01:46:09,440
नहीं देख रहा बंधन संसार में बंधन में जो है क्या आता है

1537
01:46:09,440 --> 01:46:13,760
क्या आता है भौतिकवादी विचार क्या आएगा

1538
01:46:13,760 --> 01:46:18,800
क्या कि मैं कर रहा हूं मतलब अरे भैया

1539
01:46:18,800 --> 01:46:21,200
मैं कर रहा हूं मैं कर रहा हूं

1540
01:46:21,200 --> 01:46:25,280
अगर यहां पे ईश्वर की उपस्थिति मानू तो ईश्वर कैसा उपयोग में आ रहा है मेरी जानकारी

1541
01:46:25,280 --> 01:46:31,280
में ईश्वर तो वही कर रहा है जो वो करता है मेरी जानकारी में क्या आ रहा है

1542
01:46:31,280 --> 01:46:35,360
यही आ रहा है कि ईश्वर की वजह से मूल प्रकृति है उसकी वजह से सॉरी मूल प्रकृति

1543
01:46:35,360 --> 01:46:39,520
से बनी हुई सारी चीजें हैं मैं भी वो मेरा शरीर मतलब मेरा ऐसा शरीर मैं नहीं मैं मेरा

1544
01:46:39,520 --> 01:46:43,680
शरीर भी बना हुआ है और उसी वजह से मैं व्यवहार कर रहा हूं। ये

1545
01:46:43,680 --> 01:46:47,760
जानकारी है नहीं जानकारी ये है कि

1546
01:46:47,760 --> 01:46:51,840
मैं ही कर रहा हूं। जानकारी यही है। हां तो मैं मैं कर रहा हूं

1547
01:46:51,840 --> 01:46:56,080
ना देखिए मैं अभी कर रहा हूं। इसका मतलब ये नहीं है। एक्सप्लेन

1548
01:46:56,080 --> 01:47:00,160
कर दूंगा। मैं मैं बता रहा हूं। व्यवहार में हमारे यही

1549
01:47:00,160 --> 01:47:04,480
है। व्यवहार में हमारे यही है। व्यवहारिक सत्य हमारा यही है

1550
01:47:04,480 --> 01:47:09,520
कि हम यह सोचते हैं कि इसको हमने उठाया ना कि ईश्वर ने उठवाया।

1551
01:47:09,520 --> 01:47:13,680
ठीक है? और इसीलिए हम बंधन में है। इसीलिए बंधन में है ना?

1552
01:47:13,680 --> 01:47:17,840
नहीं तो ये नहीं नहीं नहीं। ये तो अज्ञान

1553
01:47:17,840 --> 01:47:21,920
और ज्ञान की जैसे मुझे अगर जानकारी नहीं है कि ईश्वर है, मूल प्रकृति है।

1554
01:47:21,920 --> 01:47:25,920
ईश्वर ने संसार को बनाया है। तब मैं ये सोच रहा हूं कि ईश्वर को मैंने

1555
01:47:25,920 --> 01:47:30,160
उठाया। जो बंधन में है वही पूरा पूरा

1556
01:47:30,160 --> 01:47:34,160
पूरा एक्सप्लेन कर दूं मैं लेकिन अभी तो मुझे पता है ना कि भाई ईश्वर के निमित के बिना

1557
01:47:34,160 --> 01:47:38,000
मैं कर ही नहीं सकता हूं ये काम

1558
01:47:38,000 --> 01:47:42,240
इसमें दिक्कत क्या है मुझे पता है ये चीज ठीक है पता है तो फिर आपके

1559
01:47:42,240 --> 01:47:46,400
जीवन में आपके मुख से दिन भर में एक भी बार ऐसे नहीं निकलता है कि मैंने ये किया

1560
01:47:46,400 --> 01:47:50,480
मैंने वो किया आप हर बार ऐसे ही बोलते हो कि मैंने ही

1561
01:47:50,480 --> 01:47:54,480
नहीं मैंने किया ये गलत नहीं है मैं एक्सप्लेन कर देता हूं मैंने किया एक बात गलत मैं

1562
01:47:54,480 --> 01:47:58,560
इसको वो नहीं बोल रहा हूं कि मैंने किया ये बात गलत है आप अगर वो उस पॉइंट

1563
01:47:58,560 --> 01:48:02,960
पे लाना चाहते समय एक तरीके से जिसने

1564
01:48:02,960 --> 01:48:07,120
ईश्वर को मान लिया आर्य समाज के अनुसार जान लिया वो हर

1565
01:48:07,120 --> 01:48:11,520
काम करते समय अपने मन में यही सोच रहा होता है कि ये सब ईश्वर ने करवाया

1566
01:48:11,520 --> 01:48:15,680
है और वो अपने मुंह से अपनी धारणा ये नहीं होती मैंने कुछ किया मैंने

1567
01:48:15,680 --> 01:48:20,160
कुछ पास आउट किया मैंने ये बोला मैंने बोला धारणा नहीं होती है

1568
01:48:20,160 --> 01:48:24,160
मैंने किया का तो गलत मैं बोल नहीं रहा हूं मैंने किया मतलब मैंने ही किया यानी

1569
01:48:24,160 --> 01:48:29,280
मैंने ही चेष्टा करी है मैंने चेष्टा चे

1570
01:48:29,280 --> 01:48:33,440
आपके मन में आपके मन में सिर्फ चेष्टा की भावना होती है। यह भावना नहीं

1571
01:48:33,440 --> 01:48:37,600
होती है कि इसमें शक्ति मेरी लगी कि नहीं लगी?

1572
01:48:37,600 --> 01:48:41,680
इससे क्या फर्क पड़ता है? मेरे मन में होती है या नहीं होती? जो सच है वो सच ही है। मैं वो बताऊंगा

1573
01:48:41,680 --> 01:48:45,760
मैं आपसे पूछ रहा हूं। जो सच है वो तात्विक सत्य है। मैं आपसे आपका व्यवहारिक सत्य

1574
01:48:45,760 --> 01:48:49,840
पूछ रहा हूं ना। भौतिक सत्य क्या है? आपको ये फील आता है ना

1575
01:48:49,840 --> 01:48:55,520
मेरी ताकत लगी कि नहीं लगी कि नहीं आता है?

1576
01:48:55,520 --> 01:48:59,760
मेरी मैं अगर मैं अपने आप को शरीर देख के चल रहा हूं। शरीर

1577
01:48:59,760 --> 01:49:04,080
यानी मनुष्य देख के चल रहा हूं। मेरे भाई मैंने अभी आपको

1578
01:49:04,080 --> 01:49:08,240
एक सामान्य पुरुष जो बंधन में उसी हिसाब से हम लोग बात कर रहे हैं। तो क्यों बात को

1579
01:49:08,240 --> 01:49:12,400
ला रहे हैं कि मैं शरीर देख के चल रहा हूं। आप जो सोचते हैं किसी कार्य को करने

1580
01:49:12,400 --> 01:49:18,400
में वो क्या सोचते हैं? वो बताइए।

1581
01:49:20,400 --> 01:49:25,360
क्या सोचते हैं? हेलो यही सोचता हूं कि मैंने किया

1582
01:49:25,360 --> 01:49:29,920
हां मैंने अपनी शक्ति से किया कि नहीं नहीं

1583
01:49:29,920 --> 01:49:33,360
मैंने अपनी शक्ति से नहीं किया

1584
01:49:33,360 --> 01:49:37,360
ये तो ये तो तात्विक जानकारी आप हर कार्य को करते समय यही सोचते हैं

1585
01:49:37,360 --> 01:49:42,400
कि मैंने नहीं किया अपनी शक्ति से यही सोचते हैं

1586
01:49:42,400 --> 01:49:46,400
नहीं उस कार्य को करते समय नहीं सोचते हैं पर ये बात पता तो है ना कि

1587
01:49:46,400 --> 01:49:50,640
मैंने पता है वही मैं यही होता है व्यवहार और परमार्थ पता होते

1588
01:49:50,640 --> 01:49:54,640
हुए भी हमारे व्यवहार के अनुसार हमारे दिमाग में दूसरी जानकारियां चल

1589
01:49:54,640 --> 01:49:58,800
रही होती है। अभी मैं आ रहा हूं। व्यवहार परमार्थ पे आपको अटकाऊंगा नहीं। अब मैं आ रहा हूं। यानी

1590
01:49:58,800 --> 01:50:03,040
कि ईश्वर ऐसा कुछ कर सकता है जिससे हमें प्रतीति

1591
01:50:03,040 --> 01:50:08,240
ईश्वर के विपरीत हो जाए।

1592
01:50:08,240 --> 01:50:12,560
हस्तक्षेप ना करके आप सतही स्तर पर जितनी बार सोच रहे हो इस बोतल

1593
01:50:12,560 --> 01:50:16,560
को मैंने उठाया और आपने इसी इसी के अंदर बोला है। चार पांच

1594
01:50:16,560 --> 01:50:20,560
बार मैंने ये बोला मैंने ये बोला मैंने बोला। उसमें यही आ रहा है निकल कर के कि

1595
01:50:20,560 --> 01:50:24,560
वहां आप मान रहे हो मैंने नहीं किया जबकि उसमें आपने केवल चेष्टा की है और कर रहा

1596
01:50:24,560 --> 01:50:29,680
है ईश्वर वास्तविकता ये है पर आप मान के चल आप

1597
01:50:29,680 --> 01:50:33,760
मैं एक्सप्लेन [गला साफ़ करने की आवाज़] कर देता हूं करने का मतलब ये है कि जो

1598
01:50:33,760 --> 01:50:38,240
कर्म की चेष्टा जो है वो मैंने की है। उसके आगे की जो प्रोसेस

1599
01:50:38,240 --> 01:50:42,400
प्रोसेससेस है उसमें तो ईश्वर की सहायता ही है।

1600
01:50:42,400 --> 01:50:46,480
केवल चेष्टा मैंने की है। और जब भी हम मैं का उपयोग

1601
01:50:46,480 --> 01:50:50,480
सुनिए सुनिए सुनिए सुनिए आप दिन भर आप

1602
01:50:50,480 --> 01:50:54,480
दिन भर में जब काम करते हैं आप दिन भर में जब काम करते हैं

1603
01:50:54,480 --> 01:50:57,520
तो आप यही पूरी लाइन उसमें ध्यान रखते हैं

1604
01:50:57,520 --> 01:51:01,520
कि मैंने केवल चेष्टा की है और ये सारी शक्ति ईश्वर की है

1605
01:51:01,520 --> 01:51:05,600
मेरी शक्ति नहीं है ऐसा सोच सोच करके कार्य कर रहे होते हैं सोच सोच के

1606
01:51:05,600 --> 01:51:09,680
नहीं करते पर ये ध्यान तो होता ही है ना तो क्या सोच रहे होते

1607
01:51:09,680 --> 01:51:13,680
हैं उस समय आप जब आप

1608
01:51:13,680 --> 01:51:17,920
आप जब पास हो जाते हैं या कोई दौड़ जीत जाते हैं तो

1609
01:51:17,920 --> 01:51:22,000
आप वहां पर ऐसा फील करते हैं कि नहीं मैंने देखो उसको पटक दिया मैंने उसको यह बोला

1610
01:51:22,000 --> 01:51:26,240
मैंने वो किया मैं जो दौड़ में जीत गया अपनी शक्ति पर

1611
01:51:26,240 --> 01:51:30,720
आपको गर्व होता है आप चलिए आपने

1612
01:51:30,720 --> 01:51:35,120
ये बोला ना कि मिथ्या मतलब मिथ्या ज्ञान आपको मिथ्या

1613
01:51:35,120 --> 01:51:39,120
मिथ्या मिथ्या ये है कि आपके पास तो शक्ति है ही

1614
01:51:39,120 --> 01:51:43,520
नहीं फिर भी आप अपनी शक्ति पर गर्व करते हो लो

1615
01:51:43,520 --> 01:51:47,600
नहीं मैं अपनी चेष्टा पर गर्व करता हूं। मैं चेष्टा पर गर्व करता हूं। मैंने जो चेष्टा

1616
01:51:47,600 --> 01:51:51,600
की थी यहां यहां आप यहां जनता देख रही है। यहां आपकी बात वो

1617
01:51:51,600 --> 01:51:55,760
तय करेगी जनता। आप चेष्टा पे गर्व करते हो। पूरा आर्य समाज चेष्टा

1618
01:51:55,760 --> 01:52:01,760
पे गर्व करता है। अपने शक्ति

1619
01:52:02,640 --> 01:52:06,640
आप ये बोलना चाह रहे हैं कि अगर कोई अज्ञानी है और अज्ञानी होने की

1620
01:52:06,640 --> 01:52:10,640
वजह से जो है अपने अज्ञानी बंधन में जब तक है तब

1621
01:52:10,640 --> 01:52:15,200
तक हम अज्ञानी ही हैं। क्योंकि हमारी व्यवहारिक

1622
01:52:15,200 --> 01:52:19,280
जो क्योंकि हमारे अंदर जो व्यवहारिक इंफॉर्मेशन आ रही है

1623
01:52:19,280 --> 01:52:23,280
मैं बता रहा हूं आपको क्योंकि हमारे अंदर जो इंफॉर्मेशन आ रही

1624
01:52:23,280 --> 01:52:27,360
है बंधन में जब तक है तब तक हम इंद्रियों से इंफॉर्मेशन

1625
01:52:27,360 --> 01:52:31,440
हासिल कर रहे हैं और इंद्रियों से आने एक मिनट भाई साहब एक मिनट पूरा

1626
01:52:31,440 --> 01:52:35,760
कर लीजिए इंद्रियों से इंद्रियों के ऊपर हम इंडिपेंड है

1627
01:52:35,760 --> 01:52:39,760
ठीक है हमें अनुमान प्रमाण और शब्द प्रमाण गुरु इत्यादि जब तक

1628
01:52:39,760 --> 01:52:44,000
नहीं है हम एक जीव होते मनुष्य होते हुए प्राणी मात्र होते हुए

1629
01:52:44,000 --> 01:52:48,160
हम इंद्रियों से जानकारी हासिल करने वाले हैं और उन जानकारियों

1630
01:52:48,160 --> 01:52:52,160
के अनुसार बिल्कुल ऐसी प्रतीति होती है कि हां भाई मैंने ही किया

1631
01:52:52,160 --> 01:52:56,240
ये सारी जो जानकारी है कि ईश्वर ने किया ईश्वर ने करवाया ये हमारी

1632
01:52:56,240 --> 01:53:00,400
इंद्रियों से आने वाली सीधे तौर पर जानकारी नहीं होती है अनुमान

1633
01:53:00,400 --> 01:53:04,480
प्रमाण इनडायरेक्ट वे में या फिर शब्द प्रमाण इन चीजों

1634
01:53:04,480 --> 01:53:08,800
से आने वाली जानकारी होती है तब हम ये लोग ये मानते हैं तो

1635
01:53:08,800 --> 01:53:12,960
वो जो सत्यता है उसको ना जानने के संबंध में जितनी बार हम अपनी इंद्रियों

1636
01:53:12,960 --> 01:53:17,200
पर डिपेंड होंगे चीजों को जानने के लिए उतनी बार हम लोग अज्ञानी

1637
01:53:17,200 --> 01:53:17,840
ही कहलाएंगे

1638
01:53:17,840 --> 01:53:22,720
उस दृष्टि से भले ही हम यहां पर बहुत बड़े संस्कृतज्ञ अरे तो

1639
01:53:22,720 --> 01:53:26,880
ठीक है वो ज्ञानी अज्ञानी पे फिर मैं एक्सप्लेन करने लग जाऊंगा मुझे बताइए

1640
01:53:26,880 --> 01:53:31,600
इस बात का उससे क्या संबंध कि ईश्वर पत्थर उठा सकता है नहीं उठा सकता क्या संबंध है

1641
01:53:31,600 --> 01:53:35,760
इस बात का इससे संबंध है कि आपने बोला कि ईश्वर झूठ बोल देगा

1642
01:53:35,760 --> 01:53:38,480
तो आप वहां पर आपत्ति जता रहे हैं कि ईश्वर झूठ नहीं बोल

1643
01:53:38,480 --> 01:53:42,480
सकता नहीं तो आप बोल दीजिए ना बोल सकता है आपत्ति तो

1644
01:53:42,480 --> 01:53:46,960
उसके बाद जताऊंगा ना झूठ बोलना जिस प्रकार जिस प्रकार

1645
01:53:46,960 --> 01:53:50,960
रुकिए रुकिए अब मैं उसी पे आ रहा हूं बात आप भाई

1646
01:53:50,960 --> 01:53:55,200
साहब पूरी बात बोलने दीजिए वहां पे जैसे आपको बोलनी थी ना एक्सप्लेनेशन करनी पड़ेगी

1647
01:53:55,200 --> 01:53:58,800
केवल टैगलाइन नहीं बोल सकते मैंने कहा था वो करिए एक्सप्लेनेशन

1648
01:53:58,800 --> 01:54:02,880
तो ईश्वर ऐसी प्रतीति करवा सकता है अपनी विपरीत

1649
01:54:02,880 --> 01:54:07,520
प्रतीति वो करवा सकता है जैसे वो यहां पर करवा रहा है एक मनुष्य को कि

1650
01:54:07,520 --> 01:54:11,600
करो रहा है जबकि मनुष्य को प्रतीति हो रही है कि वो कर रहा है ईश्वर नहीं कर ईश्वर उसके

1651
01:54:11,600 --> 01:54:12,320
कंट्रोल में अगर

1652
01:54:12,320 --> 01:54:16,480
यह मानेंगे तो इसको तो यह लगेगा तो मैं अपने अनुसार कार्य करवा रहा हूं

1653
01:54:16,480 --> 01:54:20,480
ईश्वर से तो ये तो प्रतीति यही होगी ना यहां पे वो बात अलग है

1654
01:54:20,480 --> 01:54:25,600
कि गुरुजनों के वचनों के द्वारा शास्त्र के वचनों के द्वारा अनुमान प्रमाण

1655
01:54:25,600 --> 01:54:29,680
के द्वारा हम लोग ये पता लगाएंगे नहीं साहब यहां पर भी वो अपने अनुसार ही कार्य

1656
01:54:29,680 --> 01:54:34,000
कर रहा है ठीक है तो इसी प्रकार से वो वहां पर भी प्रतीति करवा सकता है जिसको

1657
01:54:34,000 --> 01:54:38,720
आप लौकिक दृष्टि से झूठ या मिथ्या आचरण कह सकते हैं वो कर सकता है ऐसा

1658
01:54:38,720 --> 01:54:42,880
अब आप आपका जो पत्थर बनाने वाला प्रश्न था। उसका और उत्तर

1659
01:54:42,880 --> 01:54:47,040
भी ले लीजिए। और उत्तर भी ले लीजिए। आपने जब बात

1660
01:54:47,040 --> 01:54:51,600
बोली क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है

1661
01:54:51,600 --> 01:54:55,840
जो जिसको वो स्वयं ना उठा पाए।

1662
01:54:55,840 --> 01:55:00,080
ठीक है? तो इसमें क्या है? दो दो

1663
01:55:00,080 --> 01:55:04,080
बातें हैं आपकी। ईश्वर पत्थर बना सकता है जिसको वो स्वयं ना उठा पाए।

1664
01:55:04,080 --> 01:55:08,080
तो इसमें आप जब ईश्वर कह रहे हैं तो ईश्वर हमने क्लेम ये किया

1665
01:55:08,080 --> 01:55:12,240
है कि ईश्वर वो है जो सब कुछ कर सकता है। ये

1666
01:55:12,240 --> 01:55:16,480
हमने स्वरूप बताया ईश्वर का। ठीक है? हम अब

1667
01:55:16,480 --> 01:55:20,800
आपने कहा वो ईश्वर पत्थर बना सकता है। तो ना करने की बात

1668
01:55:20,800 --> 01:55:25,040
ना कर सकने की बात उसके स्वरूप के विपरीत हो गई।

1669
01:55:25,040 --> 01:55:27,680
ठीक। तो आपने यहां पर दो बातें

1670
01:55:27,680 --> 01:55:31,760
कर दी। एक क्या वो क्या ईश्वर पत्थर बना

1671
01:55:31,760 --> 01:55:35,840
सकता है इस रूप में? आपने कहा कि क्या वो ईश्वर अपने सर्वशक्तिमत्ता को सिद्ध

1672
01:55:35,840 --> 01:55:39,920
कर सकता है और फिर दूसरी बार कह दिया क्या ईश्वर

1673
01:55:39,920 --> 01:55:45,440
ईश्वर ना हो के अपने आप को सिद्ध कर सकता है? ठीक है तो

1674
01:55:45,440 --> 01:55:49,600
एक मिनट एक मिनट आपने आपने आपने अपनी

1675
01:55:49,600 --> 01:55:53,600
पहली बात से दूसरी बात को काट दिया। आपने

1676
01:55:53,600 --> 01:55:57,760
एक पंक्ति ऐसी बोली जिसमें आपने ये कहा क्या ईश्वर ऐसा

1677
01:55:57,760 --> 01:56:01,920
कर सकता है? और फिर आगे कहा कि नहीं नहीं जैसे आपने

1678
01:56:01,920 --> 01:56:06,000
कहा कि क्या ईश्वर ऐसा करके दिखा सकता है? उसके बाद आपने

1679
01:56:06,000 --> 01:56:10,080
कहा क्या ईश्वर ऐसा नहीं करके दिखा सकता है? यह दो बातें हो गई। ईश्वर

1680
01:56:10,080 --> 01:56:14,080
जब कह दिया तो आपने मान लिया सब कुछ कर सकने वाला। और ना कर सकने

1681
01:56:14,080 --> 01:56:18,160
वाली बात जब कह दी तो आपने ईश्वर को काट दिया। जब ईश्वर को जब आपने

1682
01:56:18,160 --> 01:56:22,240
उसे ईश्वर कहा तो आपने उसका ना कर सकना काट दिया। और जब आपने

1683
01:56:22,240 --> 01:56:26,240
ना कर सकना कहा तो आपने ईश्वर काट दिया। इस तरीके से आपने

1684
01:56:26,240 --> 01:56:30,560
अंतत गतवाई जो बात कही है उसका जब निचोड़ निकालेंगे

1685
01:56:30,560 --> 01:56:34,640
तो निचोड़ निकलता है। क्या ईश्वर ऐसा कुछ कर सकता है कि

1686
01:56:34,640 --> 01:56:38,640
वो कुछ ना करे? क्योंकि जब आपने ईश्वर

1687
01:56:38,640 --> 01:56:42,880
कहा एक मिनट जब आपने ईश्वर कहा तो ना कर सकने को काट

1688
01:56:42,880 --> 01:56:47,520
दिया। जब आपने ना कर्षक ना कहा तो आपने ईश्वर को काट दिया।

1689
01:56:47,520 --> 01:56:51,600
ठीक है? तो अब इसका इसका जो आपके द्वारा मांगी जाने वाली

1690
01:56:51,600 --> 01:56:57,120
क्रिया है वो क्रिया आती है शून्य अभाव क्रिया

1691
01:56:57,120 --> 01:57:01,200
तो जब अभाव क्रिया आती है तो हम कहेंगे कि भैया आप हमें

1692
01:57:01,200 --> 01:57:06,480
क्रिया बताइए जिसका भाव हो जिससे कि हम करके दिखाएं आपको अभाव क्रिया

1693
01:57:06,480 --> 01:57:10,560
आपने कहा कि क्या ईश्वर आपने कहा कि क्या ईश्वर ऐसा कुछ कर सकता है कि

1694
01:57:10,560 --> 01:57:14,640
वो कुछ ना करे हां जैसे आपने कहा था ना हस्तक्षेप वाली बात यहां वो ऐसी

1695
01:57:14,640 --> 01:57:18,800
स्टेज में रह सकता है रह सकता है कुछ ना करे आप अपनी क्रिया सिद्ध

1696
01:57:18,800 --> 01:57:23,040
कर दीजिए इस वाक्य को। बोलिए। अब आपने काफी लंबा

1697
01:57:23,040 --> 01:57:29,040
बोला इस और आपने बीच में एक चीज बोली है कि जो

1698
01:57:29,440 --> 01:57:33,600
ईश्वर ऐसा पत्थर बना दे जो खुद ही ना उठा सके। ये बात ईश्वर के स्वरूप के विरुद्ध

1699
01:57:33,600 --> 01:57:37,600
है। ये आपने बोला है ना? ना उठा

1700
01:57:37,600 --> 01:57:42,320
सकना। ना उठा सकना। ये

1701
01:57:42,320 --> 01:57:46,400
जो है इससे ईश्वर की सिद्धि नहीं होगी। तो ईश्वर होना कटेगा

1702
01:57:46,400 --> 01:57:50,480
इससे। ना उठा सकने से ईश्वर होना कटेगा। तो या तो

1703
01:57:50,480 --> 01:57:56,160
आप उसे ईश्वर कह लीजिए या ना उठा सकने वाला कह लीजिए।

1704
01:57:56,160 --> 01:58:00,160
तो ना उठा अगर नहीं उठा सकता यानी ईश्वर उस उस सेंस में ईश्वर नहीं

1705
01:58:00,160 --> 01:58:05,280
रहेगा। फिर किस सेंस में?

1706
01:58:05,280 --> 01:58:09,280
आप मुझे ये बताइए कि ऐसा पत्थर बनाना कि जो खुद ना उठा सके। ये बात

1707
01:58:09,280 --> 01:58:13,840
ईश्वर के स्वरूप के विरुद्ध है ना? अल्टीमेटली आप यही बोलना चाह रहे हैं। आपने

1708
01:58:13,840 --> 01:58:17,840
खुद ये बात बोली है अभी आपने इतना लंबा मैं आपको दोबारा से बता देता

1709
01:58:17,840 --> 01:58:21,920
हूं। आपने एक क्रिया बोली है कि ऐसा पत्थर बना

1710
01:58:21,920 --> 01:58:26,720
सकता है जिसको वो स्वयं ना उठा सके। पहला आंसर मैं दे चुका हूं।

1711
01:58:26,720 --> 01:58:30,800
पहला वाला आंसर कि वो कौन सी क्रिया होगी जिससे आपको यह ज्ञात हो

1712
01:58:30,800 --> 01:58:35,040
जाएगा कि जिससे वह मान तो बता दी मैंने

1713
01:58:35,040 --> 01:58:39,120
आप वही आप अब गलती कर रहे हैं। आप फिर उसी मानने मनवाने

1714
01:58:39,120 --> 01:58:43,280
पर आ गए फिर से। आपने वहां खुद कहा था कि तो कैसे मानूंगा मैं

1715
01:58:43,280 --> 01:58:44,560
तो ईश्वर कहेगा कि हां

1716
01:58:44,560 --> 01:58:49,760
भाई मैं नहीं उठा पा रहा तो आपने मान लिया आपने यही तो

1717
01:58:49,760 --> 01:58:53,920
[हंसी] फिर उससे बात आई थी फिर वहां से बात चली गई थी इसका मतलब ईश्वर झूठ बोल सकता था तो मैंने

1718
01:58:53,920 --> 01:58:59,200
झूठ बोलने तो मैंने

1719
01:58:59,200 --> 01:59:03,520
कहां से झूठ बोलने वाली बात से यानी

1720
01:59:03,520 --> 01:59:07,600
आपके हिसाब से ईश्वर झूठ बोल रहा है वो ऐसा पत्थर नहीं उठा सकता

1721
01:59:07,600 --> 01:59:11,680
यानी उठा सकता है जब ईश्वर मुझे बोल रहा है कि मैं नहीं

1722
01:59:11,680 --> 01:59:15,680
उठा सकता यानी ईश्वर झूठ बोल रहा है। एक बात मेरी बात सुन मेरी बात

1723
01:59:15,680 --> 01:59:19,680
सुन सुन देखिए आपकी मान्यता को प्रभावित करना ये एक

1724
01:59:19,680 --> 01:59:23,840
अलग बात है। ठीक समस्त क्रियाओं को कर पाना

1725
01:59:23,840 --> 01:59:27,920
ये अलग बात है। आप मुझे बता दीजिए आपकी मान्यता को प्रभावित करना है या

1726
01:59:27,920 --> 01:59:32,160
समस्त क्रियाएं करनी है। अगर क्रिया करके दिखानी है तो बता दीजिए कौन सी क्रिया?

1727
01:59:32,160 --> 01:59:37,120
आपकी मान्यता को प्रभावित करना है तो वो बता दीजिए। आपने

1728
01:59:37,120 --> 01:59:41,280
इसका मतलब यह है कि यह जो क्रिया है यह नहीं आ रही है। समस्त

1729
01:59:41,280 --> 01:59:45,360
क्रियाओं में नहीं आ रही है। यही कहना चाह रहा हूं ना। ये क्रिया है ही नहीं ना। हां ये क्रिया है।

1730
01:59:45,360 --> 01:59:49,840
ये क्रिया है ही नहीं। ये क्रिया है ही नहीं। हां। है ही नहीं।

1731
01:59:49,840 --> 01:59:53,840
एक्सिस्ट ही नहीं करती। एक्सिस्ट नहीं करती। तो इसको एक्सिस्टेंस

1732
01:59:53,840 --> 01:59:57,920
में ला सकता है। किसको? इस क्रिया

1733
01:59:57,920 --> 01:59:59,600
को। इस क्रिया को हां

1734
01:59:59,600 --> 02:00:03,680
ला सकता है। आपको अविद्या से वो मूर्ख बना देगा। साक्षी कौन होगा? एक्सिस्टेंस में। फिर वही

1735
02:00:03,680 --> 02:00:07,680
फिर वही बात आ गई। आप मुझे मूर्ख बनाने वाली बात पे आ गए। आपने क्या

1736
02:00:07,680 --> 02:00:11,920
बोला? यह अब रुकिए। अब रुकिए। आपने स्टेटमेंट दिया कि यह जो क्रिया

1737
02:00:11,920 --> 02:00:15,920
है जो समस्त क्रियाएं कर सकने वाली है वो सब ईश्वर कर सकता है।

1738
02:00:15,920 --> 02:00:20,000
ठीक है? ये जो क्रिया है उन समस्त क्रियाओं में नहीं आ सकती। तो सीधा सवाल है क्या इन

1739
02:00:20,000 --> 02:00:24,240
इस क्रिया को ना कर सकने वाली जो क्रिया है या एक्सिस्ट नहीं करती। जो क्रिया घपोड़े

1740
02:00:24,240 --> 02:00:30,240
हैं। इस जो क्रिया को है कर सकने वाली क्रिया में ला सकता है।

1741
02:00:30,880 --> 02:00:34,960
यह जो एक्सिस्ट नहीं करती है। यह जो क्रिया है जो मैंने बताई

1742
02:00:34,960 --> 02:00:39,040
एक्सिस्ट नहीं करती उसको कर सकने वाली क्रिया में ला सकता है। मैं फिर वही कहूंगा कि

1743
02:00:39,040 --> 02:00:43,120
कर सकने वाली क्रिया में जब वो लाएगा मान लीजिए मैं स्वीकार कर लेता हूं

1744
02:00:43,120 --> 02:00:47,200
आपको कैसे पता चलेगा कि वो आ गई। मुझे पता चलना ना

1745
02:00:47,200 --> 02:00:51,200
चलना ये पॉइंट ही नहीं है। मैं पता करके अरे तो हम तो यही कह रहे हैं ना। हम

1746
02:00:51,200 --> 02:00:55,440
तो यही कह रहे हैं कि ईश्वर वो समस्त कार्य कर सकता है जो मुझे पता

1747
02:00:55,440 --> 02:00:59,680
चले। मैं तो यही कह रहा हूं। मेरा दावा यह थोड़ी ना है कि मुझे पता

1748
02:00:59,680 --> 02:01:03,840
चले ईश्वर सब कुछ कर ले। हां। यानी मुझे मुझे जो पता नहीं

1749
02:01:03,840 --> 02:01:07,840
चलेगा वो यह जो कार्य है मुझे पता नहीं चल सकता। अल्टीमेटली कंक्लूजन ये

1750
02:01:07,840 --> 02:01:12,000
है आपका। हां ठीक है। तो मुझे ये कार्य पता

1751
02:01:12,000 --> 02:01:15,200
नहीं वो क्रिया है। फिर वही बात फिर

1752
02:01:15,200 --> 02:01:19,200
अच्छा तो ये ये क्रिया जो है मुझे पता सकने पता चल सकने वाली क्रिया बन

1753
02:01:19,200 --> 02:01:23,280
जाए ऐसा कर सकता है ईश्वर। फिर मैं कहूंगा वो कैसे पता

1754
02:01:23,280 --> 02:01:27,440
चलेगा आपको? अटक जाओ आप इसी पे। तो वो तो आपको बताना पड़ेगा। वो मैं क्यों

1755
02:01:27,440 --> 02:01:31,440
बताऊं? वो तो आप बताओ। अरे आप मुझे यह बताओ कि भैया इस चीज

1756
02:01:31,440 --> 02:01:35,440
को इधर से उधर सरकाना यह क्रिया है। अब आप कहोगे कि मैं यह मान लूं

1757
02:01:35,440 --> 02:01:39,440
कि ईश्वर है ही नहीं। क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है कि मैं मान लूं कि ईश्वर है ही नहीं। तो

1758
02:01:39,440 --> 02:01:43,440
उसके लिए ईश्वर को किसी क्रिया की आवश्यकता नहीं है। वो आपके दिमाग को घुमा देगा। मान लो।

1759
02:01:43,440 --> 02:01:47,520
बहुत से नास्तिक घूम रहे हैं। उनको किसने घुमाया? दिमाग को दिमाग

1760
02:01:47,520 --> 02:01:51,520
को घुमाए बिना नहीं कर सकता। बेसिकली तो दिमाग

1761
02:01:51,520 --> 02:01:55,520
को ही तो घुमाया है। हां। तो दिमाग को घुमाए बिना नहीं कर सकता।

1762
02:01:55,520 --> 02:01:59,920
दिमाग अल्टीमेटली आपका आंसर यही है कि भाई आपके जो दिमाग को घुमा देगा यानी

1763
02:01:59,920 --> 02:02:04,560
जो मैं अस क्रिया को असंभव मान रहा हूं वो क्रिया को संभव मुझे मनवा देगा।

1764
02:02:04,560 --> 02:02:09,040
वास्तविकता में असंभव ही रहेगी। वास्तविकता में असंभव ही रहेगी।

1765
02:02:09,040 --> 02:02:13,360
वास्तविकता का साक्षी कौन होगा? जो आप उस रूप में

1766
02:02:13,360 --> 02:02:17,440
साक्षी की आवश्यकता साक्षी की आवश्यकता क्या है? मुझे साक्षी की आवश्यकता है। मैं

1767
02:02:17,440 --> 02:02:21,440
बताता हूं आपको। साक्षी की आवश्यकता ये है कि अगर आप यह कहेंगे कि देखिए वहां

1768
02:02:21,440 --> 02:02:25,520
पे बाधित हो रहा है ईश्वर। ठीक है? आप यह कहेंगे कि वहां

1769
02:02:25,520 --> 02:02:29,760
पर देखिए बाधित हो रहा है। तो बाधित हो रहा है इसलिए आपका

1770
02:02:29,760 --> 02:02:30,260
भी ईश्वर

1771
02:02:30,240 --> 02:02:34,560
सर्वशक्तिमान नहीं है। तो मैं ये पूछूंगा आपसे कि आप वहां पे पहुंचे कैसे?

1772
02:02:34,560 --> 02:02:38,800
आपने कैसे जाना कि वहां वो नहीं कर पा रहा है या कर पा रहा है। तब

1773
02:02:38,800 --> 02:02:42,880
आप कहोगे भैया तुम ही बता रहे हो। तो भैया मेरी बात पे तुम्हें तब

1774
02:02:42,880 --> 02:02:46,960
विश्वास हुआ जब तुमने मुझे ईश्वर मान लिया है। और ईश्वर तुमने मुझे तब

1775
02:02:46,960 --> 02:02:50,960
माना जब मैं यहां तुम्हें दिखाई देने वाली समस्त क्रियाएं कर सकता हूं। तो

1776
02:02:50,960 --> 02:02:55,200
ईश्वर का सभी क्रियाओं को कर सकने वाला होना आवश्यक है। भौतिक

1777
02:02:55,200 --> 02:02:59,680
दृष्टि से होने वाली क्रियाएं जो पारमार्थिक

1778
02:02:59,680 --> 02:03:04,400
या दिव्य दृष्टि है, आध्यात्मिक दृष्टि है उन क्रियाओं से उसके

1779
02:03:04,400 --> 02:03:08,400
उसके जो है सर्वशक्तिमत्ता होते हुए उसकी सिद्धि की कोई आवश्यकता नहीं। और ये

1780
02:03:08,400 --> 02:03:12,880
मैं अपने सभी वीडियोस में बताता हूं। जैसे कि एग्जांपल

1781
02:03:12,880 --> 02:03:15,520
ले लीजिए।

1782
02:03:15,520 --> 02:03:19,920
एग्जांपल ले लीजिए। एग्जांपल ले जिस

1783
02:03:19,920 --> 02:03:24,320
प्रकार कोई जिस प्रकार कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता

1784
02:03:24,320 --> 02:03:29,440
कि किसी के आवाज देने के कारण मैं जाग गया क्योंकि

1785
02:03:29,440 --> 02:03:33,440
अगर वो सुन रहा है तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता और

1786
02:03:33,440 --> 02:03:37,760
अगर वो सो रहा है तो उसका सुनना सिद्ध नहीं होता तो सुनने वाला

1787
02:03:37,760 --> 02:03:41,840
होने के आधार पे वो अपने जागने का खंडन नहीं कर

1788
02:03:41,840 --> 02:03:45,360
सकता। सुनने वाला होने के आधार पर वो अपने जागने

1789
02:03:45,360 --> 02:03:49,520
का खंडन नहीं कर सकता। क्यों? क्योंकि सुनने वाला वो हुआ तभी है जब उसने

1790
02:03:49,520 --> 02:03:53,600
जागने को स्वीकार किया है। इसी प्रकार से आध्यात्मिक दृष्टि से

1791
02:03:53,600 --> 02:03:57,600
पारमार्थिक दृष्टि से जो बाध्यता इत्यादि जिसको आप बाध्यता

1792
02:03:57,600 --> 02:04:01,760
के रूप में वो कर रहे हैं प्रस्तुत जिसके आधार पे आप ये कह रहे हैं भैया

1793
02:04:01,760 --> 02:04:05,760
आपका भी ईश्वर वहां पर सर्वशक्तिमान नहीं है। है ना? उसके आधार पे

1794
02:04:05,760 --> 02:04:09,840
आप ईश्वर का खंडन नहीं कर सकते। मगर जब हम उसको भौतिक क्रियाओं में

1795
02:04:09,840 --> 02:04:14,160
ही बाधित करते हैं, दिखाई देने वाली क्रियाओं में ही बाधित करते हैं,

1796
02:04:14,160 --> 02:04:18,240
तब वहां पर जो है उसकी जो सर्वशक्तिवत्ता बाधित होती है जिससे कि उसकी

1797
02:04:18,240 --> 02:04:22,720
सिद्धि नहीं हो पाती। तो हमने हमेशा यही क्लेम किया है।

1798
02:04:22,720 --> 02:04:26,800
नहीं तो आप बता नहीं क्योंकि तो सुनिए

1799
02:04:26,800 --> 02:04:30,800
सुनिए सुनिए मैं ये मान के चल रहा था कि कुछ भी का मतलब कुछ भी।

1800
02:04:30,800 --> 02:04:34,800
ठीक है? अब आप यह कहना चाह रहे हैं कि वो जो आप आप जो क्रिया बता रहे हो पत्थर बनाना

1801
02:04:34,800 --> 02:04:38,880
आदि ये जो क्रिया है ये क्रिया ही नहीं है। संभव क्रिया ही नहीं असंभव क्रिया है। ठीक है?

1802
02:04:38,880 --> 02:04:42,880
नहीं ना मैं बता रहा हूं। मेरे शब्दों में सुनो। आपने खुद बोला क्रिया ही नहीं

1803
02:04:42,880 --> 02:04:46,960
है। वो एक्सिस्ट ही नहीं करती। बता रहा हूं ना मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं ना। आप एक्सिस्ट करा

1804
02:04:46,960 --> 02:04:51,040
दो ना उसको। देखो मैंने क्या वो सब कर सकता है। मैं क्यों मैं क्यों करा रहा हूं? वो ईश्वर

1805
02:04:51,040 --> 02:04:55,520
करवाएगा ना। जो एक्सिस्ट नहीं करती उस में ईश्वर लाएगा ना। उसका एक्सिस्टेंस

1806
02:04:55,520 --> 02:04:59,840
उसका उसको एक्सिस्ट कराना भी एक क्रिया के रूप में आप एक्सिस्ट करा दो। लो

1807
02:04:59,840 --> 02:05:00,400
लूप में

1808
02:05:00,400 --> 02:05:04,480
फंस जाओगे करते जाओगे नहीं तो मैं क्यों कराऊं नहीं मैं क्यों कराऊं

1809
02:05:04,480 --> 02:05:08,560
भाई ईश्वर कराएगा ना वो तो क्योंकि आप कह रहे हो आप ये कर सकते हो कि नहीं

1810
02:05:08,560 --> 02:05:12,560
मैं कह रहा हूं बताओ क्या करना है तो आप कह रहा जीरो आप कह रहे

1811
02:05:12,560 --> 02:05:16,720
हो ये कर सकते हो कि नहीं एक मिनट आप कह रहे हो ये कर सकते हो कि नहीं

1812
02:05:16,720 --> 02:05:21,440
जब मैं आपको कह रहा हूं बताओ क्या करना है तो आप कह रहे हो जीरो कुछ नहीं करना है

1813
02:05:21,440 --> 02:05:25,600
तो भैया मुझे मैं आपको यह दिखाऊंगा ये बोतल

1814
02:05:25,600 --> 02:05:30,800
इधर से उधर गई आप मुझे बता दो क्या करके दिखाना जाएगी वो

1815
02:05:30,800 --> 02:05:34,800
यानी आपका कहना ये अल्टीमेटली मैं कंक्लूजन सही दे रहा हूं गलती आप

1816
02:05:34,800 --> 02:05:39,120
हां या ना जवाब देना सुनिए सुनिए मैं भी अपना कंक्लूजन दूंगा

1817
02:05:39,120 --> 02:05:43,520
मैं भी अपना कंक्लूजन दूंगा नहीं नहीं मैं आपकी बात सही समझा हूं या नहीं मैं

1818
02:05:43,520 --> 02:05:47,600
वो पूछना चाह रहा हूं आपसे ठीक है यानी समझ हमारी जो

1819
02:05:47,600 --> 02:05:51,600
हमारे भौतिक भौतिक दृष्टि से आपने बोला था भौतिक दृष्टि से

1820
02:05:51,600 --> 02:05:55,760
या व्यवहारिक दृष्टि से जो भी क्रियाएं हो मतलब कर सकने

1821
02:05:55,760 --> 02:06:01,280
वाली है वो सारी कर सकता है ईश्वर परमा परमार्थिक दृष्टि से नहीं कर सकता।

1822
02:06:01,280 --> 02:06:05,440
पारमार्थिक दृष्टि से क्रिया है ही नहीं। व्यवहार है ही नहीं।

1823
02:06:05,440 --> 02:06:09,840
परमार्थिक दृष्टि से क्रिया नहीं है। व्यवहार है। सुनिए।

1824
02:06:09,840 --> 02:06:13,840
ठीक है। तो परमार्थिक दृष्टि में क्रिया नहीं है। क्रिया होना

1825
02:06:13,840 --> 02:06:15,840
कर सकता है।

1826
02:06:15,840 --> 02:06:19,840
फिर मैं वही पूछूंगा कि क्रिया नहीं है जहां पे वहां पे

1827
02:06:19,840 --> 02:06:24,560
क्रिया होना ये क्रिया है। ये आप बता दीजिए मुझे के सिद्ध कर दीजिए। चलिए

1828
02:06:24,560 --> 02:06:28,800
नहीं अरे आपने व्यवहारिक दृष्टि में तो माना ना कोई सीधी सी बात है

1829
02:06:28,800 --> 02:06:33,040
सीधी सी बात है मान्यवर सीधी सी बात है आपको

1830
02:06:33,040 --> 02:06:37,440
ऐसी क्रिया के लिए चैलेंज करना है जिसका कोई साक्षी बन सके

1831
02:06:37,440 --> 02:06:41,600
स्वतंत्र रूप से बिना ईश्वर की दृष्टि लिए हुए बस

1832
02:06:41,600 --> 02:06:45,760
ऐसी क्रिया पूछिए आप मैं दूंगा आपको जवाब अब जिसमें

1833
02:06:45,760 --> 02:06:49,840
साक्षी ही मैं हूं जिसमें साक्षी ही मैं हूं तो मैं आपको कहता जाऊंगा

1834
02:06:49,840 --> 02:06:54,640
कर दिया फिर आप क्रिया सिद्ध करते जाइए उसको कैसे सिद्ध करेंगे क्रिया? यानी

1835
02:06:54,640 --> 02:06:58,800
साक्षी बन सकने वाली जो क्रियाएं हैं संभव क्रिया में आ रही है वही सारी

1836
02:06:58,800 --> 02:07:03,120
ईश्वर कर सकता है। साक्षी बनने वाली तो दूसरी

1837
02:07:03,120 --> 02:07:07,280
क्रिया है ही नहीं ना। मैंने कहा सब कुछ कर सकता है। मैंने

1838
02:07:07,280 --> 02:07:11,840
ही नहीं कहा जिसका एक्सिस्टेंस ही नहीं है वो नहीं वो भी करेगा वो।

1839
02:07:11,840 --> 02:07:15,840
हां। भाई जिसका एक्सिस्टेंस ही नहीं है जिसका एक्सिस्टेंस

1840
02:07:15,840 --> 02:07:20,320
जिसका अस्तित्व ही नहीं है तो उसको अगर वो करेगा भी तो आपको पता कैसे चलेगा?

1841
02:07:20,320 --> 02:07:24,560
मैं ये पूछूंगा ना। आप बोलो करेगा या नहीं

1842
02:07:24,560 --> 02:07:28,560
कर सकने का सामर्थ्य है या नहीं उसके अंदर आप आप ये बोलो आप दोहरी बातें कर रहे हो

1843
02:07:28,560 --> 02:07:30,880
आप एक तो आप बोल रहे हो कि उसका एक्सिस्टेंस नहीं है इसलिए नहीं

1844
02:07:30,880 --> 02:07:35,280
कर सकता और दूसरी तरफ आप बोल कर देगा तो पता कैसे चलेगा मैंने आप एक बात

1845
02:07:35,280 --> 02:07:39,440
या तो कर सकता है या नहीं कर सकता आप मुझे मैंने क्या कहा आप

1846
02:07:39,440 --> 02:07:43,520
मुझे जो भी क्रिया दोगे वो वो कर सकता है। आप क्रिया के नाम

1847
02:07:43,520 --> 02:07:49,520
पर चूर्ण दोगे तो मैं भी आपको चूर्ण दूंगा। सीधी सी बात

1848
02:07:49,760 --> 02:07:54,160
यानी क्रिया नहीं है बेसिकली फिर वही बात आ जाएगी यह क्रिया नहीं है आपके हिसाब से

1849
02:07:54,160 --> 02:07:59,440
आप जो मुझसे बुलवाना चाहोगे मैं आपसे बुलवाना चाहूंगा क्रिया सिद्ध करो चलो

1850
02:07:59,440 --> 02:08:04,400
आप नहीं है ना अभी इस पॉइंट को इस पॉइंट को रखते हैं ये क्रिया नहीं है

1851
02:08:04,400 --> 02:08:08,560
ठीक है आपने जो क्रिया दी है आपने जो क्रिया

1852
02:08:08,560 --> 02:08:12,880
दी है वो अभाव क्रिया है अभाव क्रिया का मतलब आप मुझसे ये कह रहे हो

1853
02:08:12,880 --> 02:08:17,040
क्या ईश्वर कुछ ऐसा करके दिखा सकता है जिसमें वो कुछ ना करे तो हां ईश्वर ऐसा

1854
02:08:17,040 --> 02:08:21,280
करके दिखा सकता है। यह हो गया उसका करना। यह हो गया उसका करना।

1855
02:08:21,280 --> 02:08:25,600
और मैं आपको बता दूं कि ईश्वर के पास एक अविद्या नामक शक्ति

1856
02:08:25,600 --> 02:08:29,600
है। वो आपके मन को कंट्रोल करेगा। आपको

1857
02:08:29,600 --> 02:08:33,600
आपको कहां-कहां से पता चलेगा कि जो जो आप सोचते थे वो सब ईश्वर

1858
02:08:33,600 --> 02:08:37,920
ने कर दिया। मन को कंट्रोल वाली बात तो हटा

1859
02:08:37,920 --> 02:08:42,400
दी थी हमने ना। मन को कंट्रोल वाली बात नहीं कर रही। अब

1860
02:08:42,400 --> 02:08:46,080
एक और ये एक और आंसर है इसी प्रश्न का।

1861
02:08:46,080 --> 02:08:50,320
देखिए बात ऐसी है अगर आप थोड़ा सा एक मिनट

1862
02:08:50,320 --> 02:08:54,320
अगर आप सकारात्मक दृष्टि से देखेंगे तो यह जो आप कह रहे

1863
02:08:54,320 --> 02:08:58,480
हैं यह क्रिया नहीं कह रहे हैं आप कह रहे हैं क्या ईश्वर मुझको

1864
02:08:58,480 --> 02:09:02,800
गलत इन दे सकता है या नहीं बस इसके मूल में ये है गर्भ

1865
02:09:02,800 --> 02:09:07,120
में उसको क्रिया के डिजाइन में आप कह रहे हैं बस इतना है अंत

1866
02:09:07,120 --> 02:09:12,160
गतवा उसमें आप इन मांग रहे हैं तो आपको इन गलत दे सकता है ईश्वर

1867
02:09:12,160 --> 02:09:16,960
बिल्कुल दे सकता है नास्तिक कैसे घूम रहा है क्रिया

1868
02:09:16,960 --> 02:09:20,960
जो है यह नहीं आपने बोला ठीक है वो वो

1869
02:09:20,960 --> 02:09:24,960
करते रहो आप वो करते रहो मैं भी करता हूं करते रहो

1870
02:09:24,960 --> 02:09:28,960
आप आप बोलना नहीं चाह रहे हो देखिए देखिए आप आप आप भी तो नहीं बोलना चाह रहे हो आप

1871
02:09:28,960 --> 02:09:33,040
भी तो आप भी तो नहीं बोलना चाह रहे हो आप भी तो नहीं बोलना चाह

1872
02:09:33,040 --> 02:09:37,040
रहे हो मैं तो देखिए अगर मैं मैं आप आपने ये

1873
02:09:37,040 --> 02:09:41,200
बोला कि क्रिया नहीं है। मैंने इस बात को मान लिया अब्दुल मुस्कान से कि भाई ये क्रिया

1874
02:09:41,200 --> 02:09:45,440
नहीं है। ठीक है। दीजिए करने के लिए

1875
02:09:45,440 --> 02:09:49,520
मुझे दीजिए क्रिया करने के लिए क्रिया नहीं है ना यह आपने ये बोला ना

1876
02:09:49,520 --> 02:09:53,600
स्टेटमेंट अभी यह क्रिया नहीं है आपने ऐसी बात बोली है

1877
02:09:53,600 --> 02:09:58,240
जिसमें आपने जो करने को कहा है उसको ना करने को भी कहा है ये बात है

1878
02:09:58,240 --> 02:10:02,240
ये क्रिया नहीं है ना अल्टीमेटली आपने आंसर यही दिया है

1879
02:10:02,240 --> 02:10:06,400
अल्टीमेटली आंसर ये है कि आपने शून्य क्रिया दी है तो शून्य क्रिया जो ईश्वर

1880
02:10:06,400 --> 02:10:10,640
है करके दिखा रहा है खड़ा है नहीं कर रहा है कुछ नहीं अब आप बदल रहे है आपने

1881
02:10:10,640 --> 02:10:15,680
बोला था कि आप ऐसी क्रिया आप बदल रहे हैं आप बदल बदल रहे हैं।

1882
02:10:15,680 --> 02:10:19,920
आपने ये बोला था कि आपने ऐसी क्रिया दी है जो क्रिया है ही नहीं। या फिर

1883
02:10:19,920 --> 02:10:24,320
क्रिया दोबारा सुन आप दोबारा सुन लीजिए। मैंने सभी चीजें बोली है जो आवश्यक

1884
02:10:24,320 --> 02:10:29,840
है और कोई भी इस चर्चा को देखेगा तो वो निकाल लेगा अपना निर्णय।

1885
02:10:29,840 --> 02:10:34,640
हां निर्णय को तो छोड़िए। निर्णय तो जो लोग देख रहे हैं वो निकाल

1886
02:10:34,640 --> 02:10:38,720
ठीक है। अब हम इसको एक चीज से ले आते हैं। अल्टीमेटली

1887
02:10:38,720 --> 02:10:43,280
सुनिए तो सही करेंगे फिर मैं क्रिया करूंगा। लूप में फंसे रहोगे।

1888
02:10:43,280 --> 02:10:47,600
नहीं नहीं मुझे बोलने दीजिए ना। मैं क्या बोल रहा हूं? सुन तो लीजिए। सुन तो लीजिए। बोल लीजिए। बोल बोल

1889
02:10:47,600 --> 02:10:51,680
सुन तो लीजिए। यानी ये जो क्रिया है ये क्रिया नहीं है। तो

1890
02:10:51,680 --> 02:10:55,840
फिर वही सवाल आ जाएगा कि ये जो क्रिया है ये क्रिया नहीं है। तो इसको

1891
02:10:55,840 --> 02:11:00,800
क्रिया ना होने से क्रिया हो सकना में ला सकता है ईश्वर।

1892
02:11:00,800 --> 02:11:04,880
क्रिया ना होने से क्रिया हो सकने में लाना एक क्रिया है।

1893
02:11:04,880 --> 02:11:08,960
ये आप बता दीजिए कैसे क्या करना होगा उसके लिए कि आप मान लो उसको। तो

1894
02:11:08,960 --> 02:11:13,040
हां मैं करके दिखा। करेगा मैं क्यों बताऊंगा कैसे करेगा आप तो

1895
02:11:13,040 --> 02:11:17,360
प्रक्रिया कैसे करेगा नहीं कैसे कैसे करेगा नहीं कैसे करेगा

1896
02:11:17,360 --> 02:11:21,360
नहीं मैं पूछ रहा हूं कि ये क्रिया है तो इसको क्रिया

1897
02:11:21,360 --> 02:11:25,360
सिद्ध करके दिखाइए आप अगर ये क्रिया है तो इसको क्रिया

1898
02:11:25,360 --> 02:11:29,360
सिद्ध करिए ना आप क्रिया क्रिया नहीं है ना हम ये मान

1899
02:11:29,360 --> 02:11:33,600
के चल रहे है ना कि क्रिया नहीं है अभी तो हमने मान लिया क्रिया नहीं है है

1900
02:11:33,600 --> 02:11:37,840
ये क्रिया है ये शून्य क्रिया है अभाव क्रिया है इसका

1901
02:11:37,840 --> 02:11:42,000
अभाव है अगर भाव है अभाव है। भाव है तो आप भाव करके दिखा

1902
02:11:42,000 --> 02:11:46,160
दीजिए मुझे कैसे भाव सिद्ध होगा मैं करके नहीं दिखाऊंगा ना करेगा तो ईश्वर

1903
02:11:46,160 --> 02:11:50,400
अभाव से भाव ईश्वर करेगा ना इस क्रिया को अभाव से भाव करने करना

1904
02:11:50,400 --> 02:11:54,480
क्रिया है ये भी एक अभाव क्रिया है लो मानोगे कैसे सब कुछ कर

1905
02:11:54,480 --> 02:11:58,640
सकता है वो खड़ा है हां यानी हां हां हां हां यानी ये अभाव से

1906
02:11:58,640 --> 02:12:03,040
भाव नहीं हो सकता असंभव क्रिया है बेसिकली

1907
02:12:03,040 --> 02:12:07,120
अभाव से भाव आप ये बोल रहे हो ना कि आप जो क्रिया बता रहे

1908
02:12:07,120 --> 02:12:11,120
हो वो क्रिया हो है ही नहीं असंभव क्रिया है यही बोलना चाह रहे हो ना आप नहीं मैं यह

1909
02:12:11,120 --> 02:12:15,120
बोलना चाह रहा हूं यह क्रिया है। शून्य क्रिया है। यह इस क्रिया

1910
02:12:15,120 --> 02:12:19,120
में ना कुछ ना करना ही यह क्रिया है। हस्तक्षेप ना करना ही

1911
02:12:19,120 --> 02:12:23,920
क्रिया है। लो मैं ये कहना चाह रहा हूं। फसो

1912
02:12:23,920 --> 02:12:28,240
असंभव क्रिया है ना ये बेसिकली। नहीं शून्य क्रिया है। अभाव

1913
02:12:28,240 --> 02:12:30,400
क्रिया।

1914
02:12:30,400 --> 02:12:32,480
फिर वही अभाव से अभाव

1915
02:12:32,480 --> 02:12:36,720
वाली बात आ जाएगी। फिर आप क्या बोलोगे? मैं फिर वही कहूं वो भी अभाव क्रिया

1916
02:12:36,720 --> 02:12:40,800
है। हां वो भी नहीं कर सकता। कर

1917
02:12:40,800 --> 02:12:44,880
तो रहा है कुछ ना करके वो अभाव क्रिया कर तो रहा है। जिसका अभाव है वो।

1918
02:12:44,880 --> 02:12:49,120
लो मैं क्यों कहूं क्यों नहीं कर सकता? कर रहा है। तो ये

1919
02:12:49,120 --> 02:12:53,280
तो असंभव को संभव कर रहा है क्या वो? वह

1920
02:12:53,280 --> 02:12:57,440
कुछ ना करके कुछ ना करने वाली क्रिया कर रहा है। आपने कहा मैं

1921
02:12:57,440 --> 02:13:01,600
यह नहीं कह रहा असंभव को संभव कर रहा है। आपने क्रिया ही ऐसी दी है जिसका

1922
02:13:01,600 --> 02:13:05,600
एकिस्टेंस नहीं है। तो यानी कि आप कह रहे हो वो असंभव है।

1923
02:13:05,600 --> 02:13:09,680
असंभव है वो क्रिया। नहीं शून्य क्रिया है। क्योंकि

1924
02:13:09,680 --> 02:13:13,760
वो बोली जा रही है इसलिए क्रिया तो है। मगर उसका क्या अंतर है? अगर

1925
02:13:13,760 --> 02:13:17,760
यह शून्य क्रिया असंभव क्रिया जो बोल रहा हूं उसमें अंतर क्या है? बता रहा हूं। बता रहा हूं

1926
02:13:17,760 --> 02:13:21,760
बता रहा हूं। आपने क्योंकि वह बोली है क्रिया के रूप में तो

1927
02:13:21,760 --> 02:13:26,000
इसलिए क्रिया को लेना पड़ा और क्योंकि अभाव है इसलिए शून्य है तो

1928
02:13:26,000 --> 02:13:30,080
शून्य प्लस क्रिया को जोड़ा तो हुआ कि भैया कुछ ना करना ही वो क्रिया

1929
02:13:30,080 --> 02:13:34,080
है। लो अब ठीक है काफी देख लिया

1930
02:13:34,080 --> 02:13:38,800
यहां तक लोग समझ जाएंगे नहीं हो गया आपको आगे बढ़ना है इस

1931
02:13:38,800 --> 02:13:42,800
पॉइंट को ठीक है इस पॉइंट को जितना ठीक है इस पॉइंट को यही खत्म

1932
02:13:42,800 --> 02:13:47,120
करते हैं देर तक खींच लेना वो लूप है उसमें ही आप घूमते घुमाते रहोगे

1933
02:13:47,120 --> 02:13:48,080
ठीक है

1934
02:13:48,080 --> 02:13:52,320
लोग निर्णय अब इसमें एक बात अब इसमें एक जरूरी

1935
02:13:52,320 --> 02:13:56,640
बात है। जरूरी बात है। इसमें एक जरूरी बात यह है

1936
02:13:56,640 --> 02:14:00,720
कि आप जो ये जोड़ रहे

1937
02:14:00,720 --> 02:14:04,880
हो इस तरह की चीजों क्या क्या ईश्वर मर सकता है? क्या ईश्वर अपना अंत

1938
02:14:04,880 --> 02:14:08,880
बता सकता है? क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है? जो इन चीजों से आप जोड़

1939
02:14:08,880 --> 02:14:12,880
रहे हो अवतार को। ठीक है? यानी कि अवतार को मैंने

1940
02:14:12,880 --> 02:14:18,320
ये बोला ही नहीं। मैंने ये नहीं बोला। आर्य समाज की ओर से आए हो ना आप

1941
02:14:18,320 --> 02:14:22,800
और ये सारी जनता के लिए हो रही है ना ये

1942
02:14:22,800 --> 02:14:26,880
सरता दोनों के लिए हो रही है क्या ईश्वर सर्वक्तिमान [हंसी] जो आप

1943
02:14:26,880 --> 02:14:31,120
बता रहे हो तो आप

1944
02:14:31,120 --> 02:14:35,120
ये गलत है फिर आप अवतार में जाके इसका कुछ पॉइंट बना के निकाल रहे हो ये गलत बात है मैंने अवतार की

1945
02:14:35,120 --> 02:14:39,120
बात करी नहीं अवतार में आए नहीं भाई अवतार के अवतार इसमें अवतार कहां है अभी

1946
02:14:39,120 --> 02:14:43,120
तो हम इसमें अवतार में आए नहीं अरे भैया तुम नहीं ला रहे तो मैं तो ला सकता

1947
02:14:43,120 --> 02:14:47,120
हूं मैं स्वतंत्र नहीं हूं क्या? आप नहीं

1948
02:14:47,120 --> 02:14:51,120
लाओगे तो मैं तो लाऊं। मेन जो हमारा हां

1949
02:14:51,120 --> 02:14:55,200
चलिए बोलिए। हां ठीक है। तो कुल मिलाकर के ये

1950
02:14:55,200 --> 02:14:59,280
सारे जो तर्क दिए जाते हैं ये वाले प्रश्न किए जाते हैं। इस पर हमने खूब

1951
02:14:59,280 --> 02:15:03,120
देर तक बात कर ली है। अब बात आगे बढ़ती

1952
02:15:03,120 --> 02:15:07,120
है कि क्या कहते हैं? ये जो

1953
02:15:07,120 --> 02:15:11,520
हां ये सारे तर्क इसलिए दिए जाते हैं क्योंकि आपके अनुसार अवतार

1954
02:15:11,520 --> 02:15:15,760
लेना इसी तरह का एक अभाव शून्य वाली क्रिया वाला कार्य

1955
02:15:15,760 --> 02:15:19,840
है क्योंकि अवतार लेना मतलब किसी एक जगह आ जाना ईश्वर का

1956
02:15:19,840 --> 02:15:24,160
और जबकि ईश्वर सर्व्यापक है तो जब ईश्वर सर्वव्यापक है तो उसके स्वरूप में स्थापित

1957
02:15:24,160 --> 02:15:28,160
है कि वो सर्व्यापक है। तो इसलिए वो किसी एक जगह आएगा तो उसका ईश्वर होने

1958
02:15:28,160 --> 02:15:32,400
का खंडन हो जाएगा। तो इसलिए कह सकते हो आपकी ओर से बोल रहा हूं। आपने

1959
02:15:32,400 --> 02:15:36,720
आप बोलते हो कि नहीं बोलते हो मुझे नहीं पता। आपकी ओर से बोल रहा हूं। तो इसलिए यह भी शून्य

1960
02:15:36,720 --> 02:15:42,160
क्रिया हो जाएगी अवतार लेना। तो इस पर बात करें हम

1961
02:15:42,160 --> 02:15:46,160
इस पर बात करेंगे उस

1962
02:15:46,160 --> 02:15:50,320
फिर आपकी ओर से आपको फिर उसमें बहुत लंबा चला जाएगा ना फिर आपकी

1963
02:15:50,320 --> 02:15:54,480
ओर से या आपने जो आर्य समाज का कंक्लूजन निकाला वो सही भी है या नहीं।

1964
02:15:54,480 --> 02:15:58,560
ये विषय पूरा चिढ़ जाएगा। सीधे आप सीधे आप ये बता दो

1965
02:15:58,560 --> 02:16:02,800
कि अवतार को आप मानते क्यों नहीं हो? बस ये बता दो सीधे काम खत्म जो

1966
02:16:02,800 --> 02:16:08,800
शुरू में मैंने पूछा था। यही तो बात है।

1967
02:16:09,520 --> 02:16:13,760
आप बता दो मैं उसका खंडन करता चलूं। अरे क्या खंडन

1968
02:16:13,760 --> 02:16:19,760
करेंगे? इसमें तो फिर दूसरा विषय हो जाएगा ना वो। हम

1969
02:16:20,560 --> 02:16:25,040
दूसरा विषय हो जाएगा। तो आप अवतार को मानते हो क्या?

1970
02:16:25,040 --> 02:16:29,040
नहीं मानते। पर ये तो अवतार को ना मानने के चक्कर

1971
02:16:29,040 --> 02:16:33,280
में ही तो सर्वशक्तिमान पे हम लोग वो कर रहे हैं ना। ऐसा

1972
02:16:33,280 --> 02:16:37,280
भी ऐसा नहीं है। सर्वशक्तिमान का अर्थ जो आप कुछ भी कर सकना बता

1973
02:16:37,280 --> 02:16:41,280
रहे थे उस पर उस पर आ रहा था मैं तो उस पर तो हो गई

1974
02:16:41,280 --> 02:16:45,440
चर्चा आपके पास और भी कुछ है कुछ भी करना कर सकना मैं या ये

1975
02:16:45,440 --> 02:16:51,440
शून्य क्रिया वाला ही है या और कुछ भी है

1976
02:16:51,920 --> 02:16:56,080
इसमें और भी चीजें आती है ना जो जैसे ईश्वर

1977
02:16:56,080 --> 02:17:00,240
कुछ भी कर सकता है ये बात आप रखते हैं ठीक है तो ये बात

1978
02:17:00,240 --> 02:17:04,320
रखते रखना यानी ये बात जो है ये सत्य है

1979
02:17:04,320 --> 02:17:08,640
ठीक है। प्रतीति है। प्रतीति है। वास्तविकता

1980
02:17:08,640 --> 02:17:12,720
में तो ईश्वर हलचल भी नहीं कर रहा है और आपका भी नहीं कर रहा है।

1981
02:17:12,720 --> 02:17:18,000
आप कहते हो गति कर रहा है। गति करवा रहा है। यही यही दिक्कत आ जाएगी।

1982
02:17:18,000 --> 02:17:22,640
बिना ये बात सत्य नहीं है।

1983
02:17:22,640 --> 02:17:26,720
पारमार्थिक सत्य है। व्यवहारिक सत्य नहीं है। व्यवहारिक सत्य है। पारमार्थिक

1984
02:17:26,720 --> 02:17:31,280
सत्य नहीं है। उल्टा बोल दिया आपने। [हंसी] तो व्यवहार

1985
02:17:31,280 --> 02:17:35,360
व्यवहारिक सत्य है ये। व्यवहार में ही आते हैं हम। ठीक है? व्यवहारिक

1986
02:17:35,360 --> 02:17:35,860
सत्य

1987
02:17:35,680 --> 02:17:40,000
में तो यानी इसका उल्टा असत्य होगा।

1988
02:17:40,000 --> 02:17:44,080
ईश्वर कुछ भी कर सकता है। इसका उल्टा ईश्वर कुछ भी कर सकता है। ये बात सत्य नहीं

1989
02:17:44,080 --> 02:17:47,920
है। इसका उल्टा असत्य ही होगा ना।

1990
02:17:47,920 --> 02:17:51,920
ईश्वर कुछ भी कर सकता है। ईश्वर कुछ भी नहीं कर सकता है।

1991
02:17:51,920 --> 02:17:55,920
असत्य हो गया। हम ईश्वर कुछ भी

1992
02:17:55,920 --> 02:17:59,920
कर सकता है। हां यानी इसका जस्ट उल्टा। सिंपली

1993
02:17:59,920 --> 02:18:04,080
बोलो तो तो क्या उल्टा नहीं

1994
02:18:04,080 --> 02:18:08,800
ये जो बात ये जो बात मैंने बोली कि ईश्वर कुछ भी कर सकता है

1995
02:18:08,800 --> 02:18:13,040
ये बात सत्य है व्यवहारिक में चलो व्यवहारिक में बात करते हैं अभी सत्य है ये बात व्यवहारिक

1996
02:18:13,040 --> 02:18:18,400
सत्य इसका उल्टा इसका उल्टा असत्य है

1997
02:18:18,400 --> 02:18:22,400
इसका उल्टा असत्य है किस परिपेक्ष में पूछ रहे हैं वो परिपेक्ष अपना पूरा बताइए

1998
02:18:22,400 --> 02:18:27,120
ना आप अपना पूरी बात अपना अपना क्लेम रखिए पूरा

1999
02:18:27,120 --> 02:18:31,120
तो इसका उल्टा क्या होगा आप मतलब मतलब आप समझ नहीं पा रहे मैं क्या बोलना चाह रहा हूं। आप मेरा

2000
02:18:31,120 --> 02:18:35,280
टेस्ट ले रहे हैं क्या? आप अपने पक्ष को रख टेस्ट टेस्ट ईश्वर

2001
02:18:35,280 --> 02:18:39,280
ईश्वर जो है कुछ भी कर सकता है यानी सर्वशक्तिमान है। ठीक है?

2002
02:18:39,280 --> 02:18:43,360
तो यानी ईश्वर सर्वशक्तिमान सर्वशक्तिमान जो आपकी परिभाषा है उसके

2003
02:18:43,360 --> 02:18:48,080
हिसाब से ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। ये बात असत्य है ना?

2004
02:18:48,080 --> 02:18:50,720
फिर आप शून्य क्रिया में जाएंगे लेके इसको। इसीलिए तो

2005
02:18:50,720 --> 02:18:55,680
बोल रहे हैं। आप असत्य असत्य ही हुआ ना? इसका क्या मतलब हुआ?

2006
02:18:55,680 --> 02:18:59,760
क्या? यानी ईश्वर जो है सर्वशक्तिमान नहीं है।

2007
02:18:59,760 --> 02:19:04,160
ईश्वर जो है अल्पशक्तिमान है। यह बात झूठ हुई ना? व्यवहारिक चलो व्यवहारिक में

2008
02:19:04,160 --> 02:19:08,160
झूठ है कि नहीं? हां हां झूठ है। ये बात झूठ

2009
02:19:08,160 --> 02:19:12,160
है। व्यवहारिक में ठीक है। तो इसका मतलब ये

2010
02:19:12,160 --> 02:19:16,160
है कि आप जो है ये ये बातें जो है एक दूसरे को

2011
02:19:16,160 --> 02:19:20,800
आपस में काटती। ठीक है ना? कि वो अल्पशक्तिमान

2012
02:19:20,800 --> 02:19:24,800
नहीं है। ये वाली बात यार फिर आप वहीं पे लेके

2013
02:19:24,800 --> 02:19:28,800
जा रहे हो। मुझे लग रहा है थोड़ा सा इंटेलेक्चुअल व्यक्ति आया है उससे बात

2014
02:19:28,800 --> 02:19:33,920
हो फिर आप शून्य क्रिया में लेके जाओगे इसीलिए तो मैं कह रहा हूं अपना पक्ष

2015
02:19:33,920 --> 02:19:37,920
आप आप सुनिए आप मैं मैं बता दूं आप मुझसे कुछ बुलवाइए मत

2016
02:19:37,920 --> 02:19:42,320
आप अपना पक्ष रखिए जैसे आपने एक समय कहा था मैं आपसे प्रश्न

2017
02:19:42,320 --> 02:19:46,800
एक मिनट पक्ष कैसे रखा जाएगा यह बताइए आप तो आप अपनी

2018
02:19:46,800 --> 02:19:50,960
आप मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं ना मैं बता रहा हूं ना कंफर्म

2019
02:19:50,960 --> 02:19:55,040
आप मेरे पर्सेक्टिव से जो जो आप समझ रहे हैं वो वो समझ के अनुसार अपना

2020
02:19:55,040 --> 02:19:59,120
पक्ष रख दीजिए। फिर मैं कहूंगा कि यहां पे आपने गलत समझा उसको करेक्ट करूंगा।

2021
02:19:59,120 --> 02:20:03,200
रखिए हम ये बात

2022
02:20:03,200 --> 02:20:08,000
क्या बोलते हैं अपना जो एक तार्किक

2023
02:20:08,000 --> 02:20:12,000
कैसे होंगे इस बात को? बहुत परेशान है आप शुरू

2024
02:20:12,000 --> 02:20:16,000
से ही। कहां परेशान हो? मैं क्योंकि जब सीधा

2025
02:20:16,000 --> 02:20:20,080
सवाल पूछ रहा हूं तो आप दो ही नहीं हो तो आपको एक्सप्लेन करना पड़ेगा डिटेल में।

2026
02:20:20,080 --> 02:20:24,160
इसका मतलब सीधा सवाल सीधा सवाल पूछ रहे हैं आप। शून्य क्रिया

2027
02:20:24,160 --> 02:20:28,320
मांग करते पूछ रहे हैं। सीधा ही सवाल असंभव

2028
02:20:28,320 --> 02:20:32,400
शून्य ये सब जो ये सब जो नास्तिकों की चीजें हैं ना क्या

2029
02:20:32,400 --> 02:20:36,480
ईश्वर ऐसा पत्थर ये सब बहुत सालों से चली आ रही है। कोई आज पहली

2030
02:20:36,480 --> 02:20:42,240
नहीं है। बस ये है कि आप वहां से उठाकर यहां दे देते हो। बस

2031
02:20:42,240 --> 02:20:46,320
ठीक है। टिप्पणीपणी इस प्रकार की ना करें। छोड़िए। ये टिप्पणी

2032
02:20:46,320 --> 02:20:51,280
नहीं है। मैं आपका आर्य समाज का ऑफिशियल चैनल दिखा दूंगा। जहां पर उन्होंने यही कहा है

2033
02:20:51,280 --> 02:20:55,680
ऊटपटांग प्रश्न नाम से वीडियो है उसमें यही कहा है आपके आर समाज जी ने ऑथेंटिक

2034
02:20:55,680 --> 02:21:00,400
आचार्य हैं जो उन्होंने ये ऐसा ऐसा प्रश्न करते हैं ऊटपटांग

2035
02:21:00,400 --> 02:21:04,560
नास्तिक ईश्वर को ना मानने वाले तो

2036
02:21:04,560 --> 02:21:09,120
ऊटपटांग आर्य समाज के फेम में लेंगे ना आपके में तो ऊपटांग है ही नहीं वो बातें

2037
02:21:09,120 --> 02:21:13,200
छोड़िए फिर मैं उस पे आ जाऊंगा तो रहने दीजिए फिर वो अलग विषय चला

2038
02:21:13,200 --> 02:21:17,280
जाएगा तो पॉइंट मेरा यही था कि क्या ईश्वर मैंने आपसे

2039
02:21:17,280 --> 02:21:21,280
कहा था ना आपसे मैंने ने कहा था ना कि आप जो है परेशान

2040
02:21:21,280 --> 02:21:25,280
तो आप शुरू से कई बार बड़बड़ा चुके छोड़िए फिर ऐसा हो जाएगा। छोड़िए फिर ऐसा हो जाएगा।

2041
02:21:25,280 --> 02:21:29,360
छोड़िए फिर ऐसा हो जाएगा। आपने करीबन अब तक कुछ नहीं तो 1500 रखा है।

2042
02:21:29,360 --> 02:21:33,600
इसलिए दूसरी में चले जाएगा। मैं आपको कुछ ऐसा

2043
02:21:33,600 --> 02:21:36,240
में नहीं बोल रहा हूं।

2044
02:21:36,240 --> 02:21:40,400
क्या नहीं तो इससे मुझे प्रतीति हो रही है ना कि आप परेशान है। थोड़ा सा बुदबुदा

2045
02:21:40,400 --> 02:21:44,720
लेते हैं। अपने मन में ही कुछ दो चार बातें अपने आप से बात कर लेते हैं। तो कुछ परेशानियों

2046
02:21:44,720 --> 02:21:48,800
का सामना कर रहे हैं। तो इसलिए मुझे वो 20 बार लगा एक जैसा। इसलिए मैंने कहा कि

2047
02:21:48,800 --> 02:21:52,800
आप परेशान दिख रहे हैं शुरू से। जी। हालांकि ये

2048
02:21:52,800 --> 02:21:57,040
टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। चलो ठीक है। आपने जब टिप्पणी

2049
02:21:57,040 --> 02:21:57,540
कर दी

2050
02:21:57,280 --> 02:22:01,280
कि आपके लिए तो वो पटांग नहीं है और अभी मैं छोड़ के आया

2051
02:22:01,280 --> 02:22:06,640
हूं वहां पर एक जगह आपने निर्णय दिया था वो भी आपको नहीं करना चाहिए था

2052
02:22:06,640 --> 02:22:10,640
और मुझे जो प्रतीति आप बार-बार

2053
02:22:10,640 --> 02:22:14,640
बड़बड़ा लेते हैं ना मन में। अपने अपने आप से बातें कर लेते हैं ऑनलाइन

2054
02:22:14,640 --> 02:22:18,640
लाइव चर्चा में बार-बार और एक ही बार नहीं कई बार इसलिए मुझे ऐसा

2055
02:22:18,640 --> 02:22:22,640
लगा कि आप परेशान है शुरू से ही आप ऐसा अपनी सामान्य जीवन में भी करते

2056
02:22:22,640 --> 02:22:28,640
हो तो बात अलग है मुझसे तो आप पहली बार मिल रहे हैं तो मुझे यही लगेगा

2057
02:22:28,880 --> 02:22:32,880
ठीक है इस बात को छोड़ दीजिए इस बात को छोड़ दीजिए ठीक है ना इसमें

2058
02:22:32,880 --> 02:22:37,840
तो कोई समस्या नहीं हम जी

2059
02:22:37,840 --> 02:22:42,000
तो होता क्या है व्यवहारिक इसमें सप्ताह काम

2060
02:22:42,000 --> 02:22:46,640
है। कारण कार्य के नियम काम करते हैं। यह बात आप मानते हो?

2061
02:22:46,640 --> 02:22:50,640
कारण कार्य के नियम या फिर विरोधाभास ना हो सकने वाले

2062
02:22:50,640 --> 02:22:55,200
जो नियम पूरी पूरी बात करने की

2063
02:22:55,200 --> 02:22:59,360
कारण कार्य के नियम काम करते हैं। ये बात आप मानते हो कि नहीं? क्योंकि उसके

2064
02:22:59,360 --> 02:23:03,520
बाद ही बात कही जाएगी ना। देखिए पहली बात तो यह

2065
02:23:03,520 --> 02:23:07,680
है कि इन सबके गर्भ में यह बात है कि भैया हम यह बात इसलिए कहते हैं क्योंकि ईश्वर

2066
02:23:07,680 --> 02:23:11,920
अवतार ले सकता है पर आप अवतार पर बात करने वाली बात से बच रहे हैं।

2067
02:23:11,920 --> 02:23:12,800
पे भी करेंगे

2068
02:23:12,800 --> 02:23:16,800
करेंगे। नहीं नहीं कोई दिक्कत नहीं है। उस भी करेंगे बात। सवा दो सवा दो घंटे हो चुके

2069
02:23:16,800 --> 02:23:21,040
हैं। सवा दो घंटे हो चुके हैं। सवा दो घंटे में आपने कितनी

2070
02:23:21,040 --> 02:23:25,280
कितना सवाल पूछे? मैंने कितने सवाल पूछे वो छोड़ दीजिए उस बात को।

2071
02:23:25,280 --> 02:23:29,360
बात सवाल पूछने की नहीं होती। ये बात होती है किसने किसके विषय पर कितना टाइम

2072
02:23:29,360 --> 02:23:34,480
गया। बात सवाल पूछने की नहीं होती है।

2073
02:23:34,480 --> 02:23:38,640
बात होती है किसके विषय में कितना टाइम गया? तो विषय

2074
02:23:38,640 --> 02:23:42,640
तो आप वही सेम ही चल रहा है। विषय कहां बदल रहे हैं? सर्वशक्तिमान वाले पे

2075
02:23:42,640 --> 02:23:46,720
विषय चल रहा है। हां तो आप अपनी बात बोलिए। फिर आप हां

2076
02:23:46,720 --> 02:23:51,280
बात तभी बोली जाएगी ना जब आप यहां नाम में उत्तर देंगे। व्यवहारिक दृष्टि से नहीं होता मुझे।

2077
02:23:51,280 --> 02:23:55,280
मैं मैं आपको ये बता रहा हूं कि आप अपने पक्ष को

2078
02:23:55,280 --> 02:23:59,280
इस्टैब्लिश करिए कि ये है मेरा मत। अब आप बताइए इसमें मैंने क्या-क्या गलत

2079
02:23:59,280 --> 02:24:02,800
कहा है। मैं उसको बता दूंगा।

2080
02:24:02,800 --> 02:24:07,360
जी कैसे कंप्लीट होगी बात? क्योंकि आप

2081
02:24:07,360 --> 02:24:11,360
शुरुआत में अगर अपनाट कंप्लीट नहीं आप उत्तर अगर

2082
02:24:11,360 --> 02:24:15,680
हां या ना में जवाब देंगे उसके आधार पे ऐसा है जैसे आपने

2083
02:24:15,680 --> 02:24:20,000
कार्य कारण वाला सिद्धांत कहा तो मैं किस परिपेक्ष में उसका उत्तर दूंगा।

2084
02:24:20,000 --> 02:24:24,080
उसमें कितनी बड़ी एक्सप्लेनेशन होगी? उसमें एक अलग से व्यर्थ का टाइम जाएगा। आप

2085
02:24:24,080 --> 02:24:28,080
पहले अपनी किस परिपेक्ष में आप मुझसे क्या प्रश्न पूछ रहे हैं उस परिपेक्ष

2086
02:24:28,080 --> 02:24:33,120
के साथ उस प्रश्न को रख दीजिए। फिर मैं अपना उत्तर दे दूंगा। जैसे

2087
02:24:33,120 --> 02:24:37,440
जब लीला की बात आई थी पूछ रहा हूं अपना परिप एक

2088
02:24:37,440 --> 02:24:41,680
मिनट जैसे अब मैं यहां पे बता दूं जैसे कि बीच में एक बात अटकी थी

2089
02:24:41,680 --> 02:24:45,680
कि क्या ईश्वर ऐसा आचरण कर सकता है जो जड़ के जैसा हो।

2090
02:24:45,680 --> 02:24:49,760
जबकि वो है चेतन। तो जब आप मेरी चीज को

2091
02:24:49,760 --> 02:24:54,720
समझ नहीं पा रहे मैंने अपना परिपेक्ष बताया था कि मैं यहां पर लीला सिद्ध कर रहा हूं

2092
02:24:54,720 --> 02:24:58,720
भगवान की। ठीक है? तो आपने फिर जो जिसको हम लीला

2093
02:24:58,720 --> 02:25:02,720
कह रहे हैं उस अगर वो लीला है आपके अनुसार जिसको

2094
02:25:02,720 --> 02:25:06,960
हम लीला कर रहे कह रहे हैं। अगर वो लीला है तो आपने उस लीला को जिसे

2095
02:25:06,960 --> 02:25:11,040
हम अपने शब्दों में लीला कहते हैं। उस लीला को आपने स्वरूप ईश्वर के

2096
02:25:11,040 --> 02:25:15,280
स्वरूप में फिट कर लिया। यहां ये उसका स्वरूप का कार्य है। इतने अंशों में इस इस

2097
02:25:15,280 --> 02:25:19,600
कारण से फिट कर लिया नहीं। ये गलत गलत बात है। फिट कर लिया नहीं।

2098
02:25:19,600 --> 02:25:23,920
इसका मतलब यह है कि आपको पहले से पद पता नहीं। अब आप अपने

2099
02:25:23,920 --> 02:25:28,000
अब आप अगर आप आर्य समाज के ऊपर आक्षेप कर रहे हैं। आर्य समाज के हिसाब से पहले

2100
02:25:28,000 --> 02:25:32,640
से ही आपको अब आप अपने अब आप अपने परिपेक्ष से बता दीजिए।

2101
02:25:32,640 --> 02:25:36,640
अब आप अपने परिपेक्ष से बता दीजिए कि आप कौन सा प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं।

2102
02:25:36,640 --> 02:25:40,640
जी बताइए। मेरा ठीक है। प्रश्न

2103
02:25:40,640 --> 02:25:44,400
सिंपल सा ये है कि या फिर ऐसे

2104
02:25:44,400 --> 02:25:48,400
या फिर ऐसे ऐसे कर लेते हैं या फिर ऐसे कर लेते हैं।

2105
02:25:48,400 --> 02:25:52,640
जैसे आपने मुझसे प्रश्न पूछा कारण कार्य तो इसका सर्वशक्तिमान से

2106
02:25:52,640 --> 02:25:56,880
या अवतार से क्या संबंध है वो बता दीजिए। हां

2107
02:25:56,880 --> 02:26:01,040
हां बिल्कुल संबंध पहले बात बताऊं उसके बाद संबंध बताऊंगा

2108
02:26:01,040 --> 02:26:05,120
ना। हम अपनी जो बात

2109
02:26:05,120 --> 02:26:09,280
है वो स्थाप रखूंगा उसके बाद संबंध इसका वो बताऊंगा क्या संबंध है इसका

2110
02:26:09,280 --> 02:26:13,360
हां बताइए है ना तो कारण कार्य ये

2111
02:26:13,360 --> 02:26:17,440
जो बात है ईश्वर कुछ भी यानी एक सत्य स्टेटमेंट जो व्यवहारिक

2112
02:26:17,440 --> 02:26:21,440
दृष्टि में सत्य स्टेटमेंट है ईश्वर सर्वशक्तिमान है ये बात सत्य

2113
02:26:21,440 --> 02:26:25,520
है इसका उल्टा असत्य है इस पर हमने एग्री कर लिया ठीक है तो

2114
02:26:25,520 --> 02:26:29,520
होता क्या है कि किसी सत्य बात को आप सुन रहे हैं क्या बोल रहा

2115
02:26:29,520 --> 02:26:33,760
हूं सुन रहा हूं सुन रहा हूं सुनो हम किसी सत्य

2116
02:26:33,760 --> 02:26:37,760
बात को रखने सत्य बात को रखने के लिए कुछ नियम है

2117
02:26:37,760 --> 02:26:41,920
जो हम पहले से मान के चलते हैं। ठीक है? जैसे लॉज़ ऑफ लॉजिक बोला

2118
02:26:41,920 --> 02:26:46,000
जाता है जिनको कि भाई लॉ ऑफ़ नॉन कंट्राडिक्शन हो गया

2119
02:26:46,000 --> 02:26:50,080
या फिर कारण कार्य को हम पहले से मान के चलते हैं कॉज एंड इफेक्ट को। उसके आधार

2120
02:26:50,080 --> 02:26:54,080
पे हम अपनी बात रखते हैं। हां मैं पूरा बोल ही रहा हूं ना। उसके

2121
02:26:54,080 --> 02:26:58,080
आधार पर हम कोई भी बात रखते हैं कि भाई यह बात सत्य है या कोई भी क्लेम करते हैं

2122
02:26:58,080 --> 02:26:59,600
बेसिकली। ठीक है?

2123
02:26:59,600 --> 02:27:03,760
उस नियम को मान करके लेकिन अगर हम यह

2124
02:27:03,760 --> 02:27:07,840
बात अगर हम यह सवाल पूछेंगे कि क्या ईश्वर उस नियम को तोड़ सकता

2125
02:27:07,840 --> 02:27:12,720
है या नहीं तोड़ सकता है? इस पर आप क्या जवाब देंगे?

2126
02:27:12,720 --> 02:27:16,720
इस सवाल का आर्य समाज और मेरे बीच में जो मतभेद है उससे क्या

2127
02:27:16,720 --> 02:27:21,760
संबंध है? सर्वशक्ति मता की परिभाषा में आएगा नहीं।

2128
02:27:21,760 --> 02:27:25,840
सर्वशक्तिता मैं एक्सप्लेन एक्सप्लेन एक्सप्लेन कर देता हूं। एक मिनट एक

2129
02:27:25,840 --> 02:27:30,000
मिनट एक मिनट क्या है? चर्चा चर्चा सुनिए चर्चा बहुत

2130
02:27:30,000 --> 02:27:34,000
लंबी हो चुकी है। तो अब जो है मैं थोड़ा सा मेन पॉइंट पे आना

2131
02:27:34,000 --> 02:27:38,240
चाह रहा हूं। इसलिए मैं अब आपसे पूछ रहा हूं। ये जो सर्वशक्तिमत्ता

2132
02:27:38,240 --> 02:27:43,520
से जोड़ते हुए आप ये पूछ रहे हो कि क्या बोला आपने? क्या पूछा है?

2133
02:27:43,520 --> 02:27:48,160
मैंने यह पूछा कि सर्व यह अपना जो नियम है

2134
02:27:48,160 --> 02:27:52,160
लॉ मतलब यह कारण कार्य वाले कारण कार्य समझ लो अभी के लिए इस बात

2135
02:27:52,160 --> 02:27:56,400
को मानकर ही हम कोई चीज आधार रखते हैं किसी भी चीज का ये

2136
02:27:56,400 --> 02:28:00,400
जो बात है कि ईश्वर कोई सर्वशक्तिमान है ये एक सत्य बात है व्यवहारिक दृष्टि में चलो

2137
02:28:00,400 --> 02:28:04,480
व्यवहारिक का ही ले लेते हैं व्यवहारिक दृष्टि से ये बात सत्य बात है इस

2138
02:28:04,480 --> 02:28:09,040
बात को कहने के लिए हमें कारण कार्य को आधार बनाना पड़ेगा

2139
02:28:09,040 --> 02:28:13,280
ठीक है हम अब कारण कार्य जो है आधार

2140
02:28:13,280 --> 02:28:14,720
बन गया हमारा हम

2141
02:28:14,720 --> 02:28:19,200
तो अब हम उस आधार को छोड़ नहीं सकते ठीक है

2142
02:28:19,200 --> 02:28:23,360
कारण कार्य ही आधार बनेगा हमारा मतलब कार्य के पीछे कारण होना

2143
02:28:23,360 --> 02:28:27,440
चाहिए ना ये कह रहे हो आप हां हां कह रहे हो तो यानी कि

2144
02:28:27,440 --> 02:28:31,680
सीधी बात बोलो ना अवतार लेने के पीछे का कारण क्या है नहीं नहीं नहीं नहीं

2145
02:28:31,680 --> 02:28:35,920
अवतार का तो बोल ही नहीं रहा हूं मैं सर्वशक्ति माता की परिभाषा भी आ रहा हूं अभी अवतार की बात नहीं अवतार

2146
02:28:35,920 --> 02:28:40,080
की बात भी है दूसरी आगे आएगी तो क्या

2147
02:28:40,080 --> 02:28:44,160
जो ये सिद्धांत है कारण कार्य का। क्या ईश्वर इस सिद्धांत

2148
02:28:44,160 --> 02:28:48,240
को भंग कर सकता है या नहीं कर सकता? अरे यार फिर तुम शून्य

2149
02:28:48,240 --> 02:28:52,320
क्रिया पे आ गए। अब आप जाओ बहुत देर हो गई। हो गया काफी लंबा टाइम हो गया।

2150
02:28:52,320 --> 02:28:57,040
आप जा सकते हो। कल बात रुकिए इसका जवाब दीजिए। इसका जवाब नहीं।

2151
02:28:57,040 --> 02:29:01,040
फिर से फिर से शून्य क्रिया पे आ गए ना आप। हो चुकी शून्य क्रिया पे बात। उसी का

2152
02:29:01,040 --> 02:29:05,280
एक दूसरा रूप प्रस्तुत कर रहे हो आप। आप यही तैयारी करके आए हो शून्य क्रिया।

2153
02:29:05,280 --> 02:29:09,280
फिर मैं आपको फसाऊंगा के ये क्रिया है ये शून्य। आप देखिए

2154
02:29:09,280 --> 02:29:13,280
मैं मैं बताता हूं। आप जो है उसकी नहीं मेरा काम है मेरा काम

2155
02:29:13,280 --> 02:29:17,520
है क्रिया करने का। आपका काम है मुझे क्रिया बताने का। आप क्रिया

2156
02:29:17,520 --> 02:29:21,680
बताओ मैं करके दिखाता हूं सीधी। क्रिया बता दी ना मैंने कारण कार्य कारण कार्य को भंग

2157
02:29:21,680 --> 02:29:25,680
कर दे ईश्वर। यही क्रिया है। ये ये क्रिया है या सिद्ध करके बताओ। मैं तो

2158
02:29:25,680 --> 02:29:30,080
शून्य क्रिया बोल रहा हूं ना इसको। नहीं ये क्रिया है ना? जैसे उदाहरण

2159
02:29:30,080 --> 02:29:34,160
के लिए कारण से ही कार्य होता है। ये आप जानते हो। मतलब ये आप बोल रहे हो।

2160
02:29:34,160 --> 02:29:38,320
ठीक है? व्यवहार में चलिए तो व्यवहार में कारण से कार्य

2161
02:29:38,320 --> 02:29:42,480
होता है। यह दिया है। व्यवहार में बिना कारण के कार्य

2162
02:29:42,480 --> 02:29:46,960
करके दिखा दे तो आप भंग हो जाएंगे। तो

2163
02:29:46,960 --> 02:29:51,120
यही तो बात है। अब ये बिना कारण के उसने कार्य किया है। ये ये सिद्ध

2164
02:29:51,120 --> 02:29:55,440
कैसे होगा? आपने कहा दिखा दे। दिखा दे। आपने

2165
02:29:55,440 --> 02:29:58,640
क्या बोला? दिखा दे नहीं।

2166
02:29:58,640 --> 02:30:02,720
नहीं नहीं अब दिखादे को पकड़ो ना। अब पकड़ो दिखादे को। दिखादे को पकड़ो

2167
02:30:02,720 --> 02:30:06,800
ना। हां दिखा दे अब किस चीज अब कैसे देखोगे कैसे डिसाइड

2168
02:30:06,800 --> 02:30:12,160
होगा देखा आपने बताओ चलो

2169
02:30:12,160 --> 02:30:16,640
यही है कि भाई बिना जैसे हम कारण के बिना कार्य नहीं मानते

2170
02:30:16,640 --> 02:30:20,800
ठीक है मैंने कहा आप कैसे मानोगे उसने बिना कारण के किया

2171
02:30:20,800 --> 02:30:24,800
कि कारण से किया है ये आप कैसे मानोगे बस ये बताओ अरे फिर आप

2172
02:30:24,800 --> 02:30:29,040
मानने का मानने की बात ही नहीं ना आपने कहा ना दिखा दे आपने कहा

2173
02:30:29,040 --> 02:30:33,040
दिखा दे अरे तो दिखा देते आप

2174
02:30:33,040 --> 02:30:37,120
कर रहे हो बात कर कर दे चलो ठीक है आप अब आप अब

2175
02:30:37,120 --> 02:30:41,520
जा सकते हो भाई साहब जा सकते हो आप अब अगली बार जो है

2176
02:30:41,520 --> 02:30:45,680
अवतार विषय पर चर्चा करने आइएगा शून्य क्रिया पे हमारी बहुत सारी बात हो चुकी है

2177
02:30:45,680 --> 02:30:49,840
जनता देख चुकी है ठीक है अब आप जो है सवा दो घंटे हो चुके

2178
02:30:49,840 --> 02:30:53,920
हैं और अब अवतार पे अगली बात हम करेंगे कि आप ये जो शून्य क्रिया से अवतार

2179
02:30:53,920 --> 02:30:59,920
को जोड़ते हो तो हम देखेंगे कि जुड़ता है कि नहीं। ठीक है? जय श्री राम।

2180
02:31:02,680 --> 02:31:05,360
[गला साफ़ करने की आवाज़]

2181
02:31:05,360 --> 02:31:09,520
ले दे के जो अभी तक मुझे समझ में आया जो

2182
02:31:09,520 --> 02:31:14,720
महानुभाव थे हां हालांकि इनसे बात करने में आज मुझे

2183
02:31:14,720 --> 02:31:18,880
जो अभी तक जितने भी आर्य समाजियों से बात की हो सकता है कि

2184
02:31:18,880 --> 02:31:23,280
निर्भय के साथ उस लेवल तक जा सकते थे मगर वो शायद

2185
02:31:23,280 --> 02:31:27,600
क्या कहते हैं निर्भय जो है उस मूड में आया था

2186
02:31:27,600 --> 02:31:31,760
कि उसको जो है लड़ना ही शायद उस मूड में आया था। वो

2187
02:31:31,760 --> 02:31:36,080
बता भी रहा था कि मेरा पहले से एक पर्सेक्टिव था। मगर अगर निर्भय

2188
02:31:36,080 --> 02:31:40,080
के साथ और बहुत आगे तक जा सकती थी चर्चा। इनके साथ चर्चा करके बहुत आनंद

2189
02:31:40,080 --> 02:31:44,240
आया और थोड़ा सा ये क्या है कि अभी तक का निष्कर्ष

2190
02:31:44,240 --> 02:31:48,240
ये निकल रहा है। ये आए थे शून्य क्रिया लेकर के अभाव क्रिया

2191
02:31:48,240 --> 02:31:52,320
लेकर के और उसके ही कई सारे उदाहरण होंगे अलग-अलग तरीके

2192
02:31:52,320 --> 02:31:56,480
से। है ना? तो वही जैसे पहले हो गया क्या

2193
02:31:56,480 --> 02:32:00,560
ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है? फिर बिना कार्य के कारण बिना कारण के कार्य कर सकता है। वो

2194
02:32:00,560 --> 02:32:04,640
सब शून्य क्रिया का ही एक प्रवाह है। तो शून्य क्रिया वो कर सकता है।

2195
02:32:04,640 --> 02:32:08,800
शून्य क्रिया का गर्भ में क्या है? कोई क्रिया नहीं है तो कोई क्रिया ना करने की उसमें रह

2196
02:32:08,800 --> 02:32:14,800
सकता है। वो नहीं कर रहा क्रिया। अच्छा

2197
02:32:18,080 --> 02:32:22,160
अब जैसे इन्होंने कहा बिना कारण के कार्य। ठीक है? तो नास्तिक

2198
02:32:22,160 --> 02:32:26,240
क्या मानते हैं? कि बिना कारण के सृष्टि बनी हुई है।

2199
02:32:26,240 --> 02:32:30,480
ईश्वर नहीं मानते वो। तो अब वो नास्तिक

2200
02:32:30,480 --> 02:32:36,480
जो मान रहे हैं वो किसकी सत्ता में मान रहे हैं? वहां ईश्वर की सत्ता नहीं है। है

2201
02:32:37,120 --> 02:32:39,920
तो

2202
02:32:39,920 --> 02:32:44,000
हां तो रावण ने वेद को नष्ट नहीं करने मोहम्मद ने वेद को नष्ट करने की कोशिश

2203
02:32:44,000 --> 02:32:48,080
नहीं की। क्या उसने क्या कहते हैं जो स्वामी प्रसाद

2204
02:32:48,080 --> 02:32:53,120
मौर्य ने रामचरितमानस को जलाया नहीं क्या?

2205
02:32:53,120 --> 02:32:57,920
तो कहने का मतलब यह जो महानुभाव आए थे यह अलग-अलग प्रकार से वह सर्वशक्तिमान

2206
02:32:57,920 --> 02:33:02,000
का खंडन करने आए थे। हालांकि इनके पास संभवत अभी अवतार की

2207
02:33:02,000 --> 02:33:06,000
तैयारी नहीं है। इसलिए जितनी बार हमने इन्हें अवतार पे लाना चाहा तो आ नहीं

2208
02:33:06,000 --> 02:33:10,000
रहे। सर्वशक्तिमान पे ही शुरू से चले हैं। तो पहला मैंने रख दिया था कि

2209
02:33:10,000 --> 02:33:14,080
भाई उस सर्व का अर्थ है। अनंत का अर्थ भी मान लिया इन्होंने कि जितने कार्य हो सकते वो

2210
02:33:14,080 --> 02:33:19,680
कर सकता है। शून्य क्रिया वाले नहीं करेगा। तो वहां पर अनंत माना

2211
02:33:19,680 --> 02:33:24,960
हां क्रिया शून्य से लिंक दे दीजिए थोड़े थोड़ा सा

2212
02:33:24,960 --> 02:33:28,960
वह कर लेते हैं काफी देर तक चर्चा हो गई है तो हल्का सा बात कर लेते

2213
02:33:28,960 --> 02:33:33,200
हैं लिंक दे दीजिए शास्त्रवाद जी आप जुड़ जाए शास्त्रवाद जी को तो लिंक

2214
02:33:33,200 --> 02:33:37,280
दिया था आप जुड़ जाइए तो कहने का अर्थ यह है कि आज जो भाई साहब आए

2215
02:33:37,280 --> 02:33:41,440
थे बहुत अच्छा लगा इनसे चर्चा करके बहुत लंबी वार्ता भी हुई हालांकि एक

2216
02:33:41,440 --> 02:33:45,840
ह्यूमन नेचर है तो कहीं कहीं पर मुझसे कुछ गलतियां हुई इसके लिए मैंने क्षमा भी मांगा

2217
02:33:45,840 --> 02:33:51,680
और इनसे भी हुई है हालांकि इन्होंने नहीं मांगा वो बात अलग है

2218
02:33:51,680 --> 02:33:56,240
और दूसरी बात यह है कि इनके पास तैयारी इसी संबंध में है कि सर्वशक्तिमान

2219
02:33:56,240 --> 02:34:00,240
में शून्य क्रिया का खंडन। तो हमने वो शून्य क्रिया पर अच्छे से बात

2220
02:34:00,240 --> 02:34:04,400
की है। आप लोग देख सकते हैं और फिर कोई आएगा तो फिर बात

2221
02:34:04,400 --> 02:34:08,480
होगी। अच्छा अवतार पर बात करने का प्रयत्न किया

2222
02:34:08,480 --> 02:34:12,560
हमने क्योंकि यह शून्य क्रिया से जोड़ रहे हैं। अवतार को भाई

2223
02:34:12,560 --> 02:34:16,640
यह चीज आ क्यों रही है? क्योंकि अवतार नहीं मानना है। तो यानी शून्य क्रिया

2224
02:34:16,640 --> 02:34:21,120
से अवतार को जोड़ रहे हैं। है ना?

2225
02:34:21,120 --> 02:34:25,520
तो

2226
02:34:25,520 --> 02:34:28,560
यह बात है।

2227
02:34:28,560 --> 02:34:32,640
अ जी जय

2228
02:34:32,640 --> 02:34:36,880
जय श्री राम। एक तो क्या होता है बहुत देर तक बहुत देर तक बात होते

2229
02:34:36,880 --> 02:34:40,880
ये भी होता है कि एकदम मतलब कई बार ऐसा होता है ब्लैक आउट जैसा हो जाता

2230
02:34:40,880 --> 02:34:44,880
है। काफी देर तक चर्चा जी बताइए जय जय श्री राम। जी

2231
02:34:44,880 --> 02:34:49,280
जी जय श्री राम आवान जी बहुत अच्छा लगा आज का डिबेट सुनके और

2232
02:34:49,280 --> 02:34:53,280
मेरा बस ये कहना था जी जी बहुत अच्छा लगा

2233
02:34:53,280 --> 02:34:57,440
आज का डिबेट थोड़ा पहले की डिबेट से बढ़िया था इसमें थोड़ा सा न्याय

2234
02:34:57,440 --> 02:35:01,440
के परिपेक्ष से कुछ बताना चाहूंगा और मतलब कि इसमें थोड़ा

2235
02:35:01,440 --> 02:35:05,840
सा दोष मैंने उनके पक्ष में देखा है। अब देखिए

2236
02:35:05,840 --> 02:35:10,480
एक होता है अन्वय एक होता है व्यतिरेक तो ये कार्यकारणता

2237
02:35:10,480 --> 02:35:15,040
का जैसे सिद्धांत बता रहे थे तो कार्यता के सिद्धांत में ही आता है कि जहांजहां

2238
02:35:15,040 --> 02:35:19,280
कारण उपलब्ध होगा वहां वहां कार्य होगा। जहांजहां कार्य जहां जहां

2239
02:35:19,280 --> 02:35:23,600
कारण का अभाव होगा वहां वहां कार्य का अभाव होगा। तो अब

2240
02:35:23,600 --> 02:35:27,600
यह बोल रहे हैं कि ईश्वर सृष्टि करने में अकेला निमित्त

2241
02:35:27,600 --> 02:35:31,760
बनता है। इसमें एक सवाल है कि ईश्वर सृष्टि करता

2242
02:35:31,760 --> 02:35:35,920
किसके लिए? हमारे लिए है। अब हम कौन सा कारण बन रहे हैं इस जगत

2243
02:35:35,920 --> 02:35:40,160
का? क्या उपादान उपादान कारण बन नहीं सकता है? क्योंकि

2244
02:35:40,160 --> 02:35:40,660
उपादान

2245
02:35:40,640 --> 02:35:44,720
कारण जो होता है वो तो वही पदार्थ होता है। उसी पदार्थ का जो है परिणाम स्वरूप

2246
02:35:44,720 --> 02:35:49,040
हो जाता है। वही कार्य बन जाता है। उपादान कारण तो बोल नहीं सकते। सामान्य कारण होता ही

2247
02:35:49,040 --> 02:35:53,200
हर सामान्य कारण का लक्षण ही है कि जो हर चीज का कारण हर चीज के कारण

2248
02:35:53,200 --> 02:35:57,200
हम है नहीं। इससे हम सामान्य कारण भी नहीं होंगे। तो तीन ही तो कारण माने जाते

2249
02:35:57,200 --> 02:36:01,200
हैं। अब बचा निमित्त कारण। निमित्त कारण के

2250
02:36:01,200 --> 02:36:05,200
अलावा आपके पास कोई और चीज कारण नहीं कहने को बचेगा। अगर आप

2251
02:36:05,200 --> 02:36:09,360
यह बोलते हैं कि ईश्वर अपने कार्य करने

2252
02:36:09,360 --> 02:36:13,440
में सिर्फ अकेला है निमित्त बनने में तो यह गलत है क्योंकि जीव

2253
02:36:13,440 --> 02:36:17,520
भी जीव के लिए ही क्योंकि सृष्टि बनाई जा रही है उसकी मुक्ति के

2254
02:36:17,520 --> 02:36:21,680
लिए। अच्छा आप इसको सोच के देखिए कि अगर जीव नहीं होता सृष्टि बनती। नहीं

2255
02:36:21,680 --> 02:36:25,840
क्योंकि वो ऐसा काम नहीं करता जो कि जिसका कोई मतलब नहीं बनता।

2256
02:36:25,840 --> 02:36:29,920
जिसका कोई प्रयोजन नहीं बनता। तो अगर जीव है तब सृष्टि बनती है।

2257
02:36:29,920 --> 02:36:33,920
उसकी मुक्ति नहीं होती। तो हां बिल्कुल यानी कि अन्वय व्यतिरेक से

2258
02:36:33,920 --> 02:36:38,000
जब जब सृष्टि बनती है वो जीव के लिए बनती है तो जीव किसी ना किसी प्रकार से तो कारण

2259
02:36:38,000 --> 02:36:42,080
होगा जगत का बिल्कुल बिल्कुल उपादान हो

2260
02:36:42,080 --> 02:36:46,160
नहीं सकता है जी उपादान निमित्त बन

2261
02:36:46,160 --> 02:36:50,720
गया निमित्त बन गया ये ये सिंपल हेतु

2262
02:36:50,720 --> 02:36:54,720
है और दूसरी बात इन्होंने बोला कि जो है

2263
02:36:54,720 --> 02:36:55,680
ईश्वर अपने

2264
02:36:55,680 --> 02:37:00,080
कार्य को करने में किसी भी प्रकार का जो है किसी और पे

2265
02:37:00,080 --> 02:37:04,160
किसी भी दूसरे निमित्त पे एक तो यह हमने उदाहरण दिखाया। इसमें दूसरा उदाहरण क्या हो

2266
02:37:04,160 --> 02:37:08,640
सकता है कि मान लीजिए ईश्वर इनका भविष्य जानता नहीं है।

2267
02:37:08,640 --> 02:37:12,640
सर्वमान्य सिद्धांत है आर्य समाज का। अब ईश्वर किसी

2268
02:37:12,640 --> 02:37:16,720
कर्म सामान्य को जब जानता है तो उस ज्ञान में

2269
02:37:16,720 --> 02:37:20,960
क्या वो वस्तु उपादान कारण बनती है? यानी कि जैसे मान लीजिए आहान जी आपने कोई कार्य

2270
02:37:20,960 --> 02:37:25,040
किया तो जब आपने वह कार्य किया तो उस कार्य

2271
02:37:25,040 --> 02:37:29,200
का ज्ञान जो है उसके क्या आप कारण बनेंगे? निमित्त बनेंगे। उपदान बन नहीं

2272
02:37:29,200 --> 02:37:33,360
सकते हैं। फिर से आप तो फिजिकल चीज है। आत्मा है आपकी। आपकी

2273
02:37:33,360 --> 02:37:37,440
तो उपदान कोई विचार में आप बन नहीं सकते हैं। सामान्य कारण फिर से बन नहीं सकते

2274
02:37:37,440 --> 02:37:41,440
हैं। निमित्त ही कारण बन सकते हैं। तो इसमें भी फंस गए

2275
02:37:41,440 --> 02:37:45,520
कि अगर ईश्वर को कोई ज्ञान भी हो रहा है तो अपने ज्ञान के लिए भी उसको दो निमित्त पे डिपेंडेंट होना

2276
02:37:45,520 --> 02:37:49,840
पड़ रहा है। एक मुझ पे और एक स्वयं पे। [हंसी]

2277
02:37:49,840 --> 02:37:54,240
बहुत अच्छे पॉइंट्स हैं। बहुत बढ़िया। जबरदस्त। जी।

2278
02:37:54,240 --> 02:37:58,320
बाकी आज की चर्चा में काफी कुछ सीखने को मिलेगा। दोनों पक्षों को

2279
02:37:58,320 --> 02:38:02,480
मिलेगा। ऐसा नहीं है। उनके पक्ष को भी काफी चीजें समझ में आ रही होंगी कि यह कहना

2280
02:38:02,480 --> 02:38:06,720
क्या चाहते हैं। भाई कोई दुश्मन नहीं है। समझने का प्रयास करो।

2281
02:38:06,720 --> 02:38:10,720
हम जिन बातों को मान के बैठे हैं उनहीं बातों को आपने दूसरे शब्दों में माना। मैंने तो

2282
02:38:10,720 --> 02:38:14,960
यही देखा है। माना तो है। दूसरे शब्दों में माना है। बस इतनी

2283
02:38:14,960 --> 02:38:19,200
सी बात है। तो आप गौर करो कि आप क्या मान के बैठे हो।

2284
02:38:19,200 --> 02:38:24,400
ये वाली बात है। जी शास्त्रवाद जी जय श्री राम।

2285
02:38:24,400 --> 02:38:28,720
जय श्री राम भैया। आज का चर्चा बहुत लंबा चला

2286
02:38:28,720 --> 02:38:32,720
बहुत देर तक और देखने को अच्छा भी लग रहा था लेकिन

2287
02:38:32,720 --> 02:38:36,800
यह क्या कर दी अंत में आते ये क्रिया शून्यता तो ये

2288
02:38:36,800 --> 02:38:41,040
सब बीचबीच में लाना वो दोबारा से एक और उदाहरण लाए भाई क्रिया

2289
02:38:41,040 --> 02:38:45,120
शून्य पे हमने जब इतनी देर बात कर ली है तो दोबारा से क्यों क्रिया शून्यता

2290
02:38:45,120 --> 02:38:49,280
पे जा रहे हो एक उदाहरण दे दिया बहुत देर खींच लिया उसको हमने अब

2291
02:38:49,280 --> 02:38:53,280
आओ उस नहीं वो तैयारी करके आए थे कई सारे उदाहरण तो ऐसे थोड़ी ना

2292
02:38:53,280 --> 02:38:57,440
चलता है बात घूम फिर के वही आएगी शून्य अभाव क्रिया

2293
02:38:57,440 --> 02:39:01,440
पर तो हां भाई अभाव क्रिया कर सकता है अभाव क्रिया क्या जिसका एक्सिस्टेंट ना हो ठीक है

2294
02:39:01,440 --> 02:39:06,480
कर रहे हैं जी बिल्कुल बिल्कुल

2295
02:39:06,480 --> 02:39:10,560
बाकी फिर भी चर्चा बहुत चर्चा बहुत बढ़िया रही

2296
02:39:10,560 --> 02:39:14,960
है आज की सीखने वाली है और क्या कहते हैं

2297
02:39:14,960 --> 02:39:20,960
निर्भय के साथ भी अच्छी हो सकती थी पर वो बीच में डिस्टर्ब हो गई

2298
02:39:21,040 --> 02:39:26,000
शायद और और आगे के लेवल पर हम लोग जा पाते आते तब

2299
02:39:26,000 --> 02:39:30,320
है ना वहां पर समझ सकते थे यहां

2300
02:39:30,320 --> 02:39:34,320
पे तो अच्छा एक अवतारवाद के ऊपर जी

2301
02:39:34,320 --> 02:39:39,680
जी जी आप बोल लीजिए आप बोल लीजिए जय जी

2302
02:39:39,680 --> 02:39:44,000
जी जी मैं ये कह रहा था कि एक अवतारवाद के ऊपर चर्चा की बात आती है

2303
02:39:44,000 --> 02:39:48,320
तो इसमें एक चीज ध्यान देने की बहुत ज्यादा चीज है आवाहन जी

2304
02:39:48,320 --> 02:39:52,400
कि जब हम कहते हैं कि आत्मा का ये शरीर है तो

2305
02:39:52,400 --> 02:39:56,480
इसका अर्थ क्या होता है कि आत्मा इस शरीर के साथ और मन के साथ संयोग

2306
02:39:56,480 --> 02:40:00,560
में है या जो भी संबंध आप उसका मानिएगा उसके अंदर होने

2307
02:40:00,560 --> 02:40:04,640
से या किस प्रकार से आप यह बोलिएगा कि आत्मा के आत्मा का

2308
02:40:04,640 --> 02:40:08,640
ये शरीर है क्योंकि आप ये दो ही चीज हो सकती है या तो आप बोलिएगा कि क्योंकि

2309
02:40:08,640 --> 02:40:12,880
आत्मा का ये शरीर इसलिए है क्योंकि वह आत्मा उस शरीर के पूरे तरीके से अंदर

2310
02:40:12,880 --> 02:40:17,280
है। मतलब हर एक कड़े के अंदर है और उसको कंट्रोल कर पा रही है। यानी कि

2311
02:40:17,280 --> 02:40:21,520
हाथ हिला पा रही है, पैर हिला पा रही है। अब ये चीज अगर इसको आप अवतारवाद

2312
02:40:21,520 --> 02:40:25,600
मानते हैं या इसको मतलब अवतारवाद हटा दीजिए। इसको आप कम से कम ये मानिएगा कि इसका मतलब

2313
02:40:25,600 --> 02:40:29,680
ये शरीर कंट्रोल करना हो गया। ये हमारा शरीर हो गया। ऐसा हम बोल सकते हैं।

2314
02:40:29,680 --> 02:40:33,680
अच्छा तो ईश्वर जब कण कणों के अंदर है और जब वो परमाणुओं में वियोग

2315
02:40:33,680 --> 02:40:37,840
सहयोग करता है तो वो तो उसके अंदर होता है और उसके अंदर

2316
02:40:37,840 --> 02:40:41,280
होते हुए उसी में परिवर्तन लाता है तो ईश्वर का शरीर

2317
02:40:41,280 --> 02:40:45,440
कैसे नहीं हुआ ये पूरा जगत। जिस प्रकार से हम अपने शरीर

2318
02:40:45,440 --> 02:40:49,600
का हम कब मतलब यह सवाल बेसिकली यही है कि हम किस तरीके

2319
02:40:49,600 --> 02:40:53,920
से यह कहते हैं कि यह शरीर हमारा है क्योंकि दो ही चीजें हो सकती है मन और इंद्रियों

2320
02:40:53,920 --> 02:40:58,240
के साथ हमारा पूरा तरीके से हम उसके अंदर हैं और उसका हम जो है

2321
02:40:58,240 --> 02:41:02,400
उसको हम शक्ति से अपने हिला डुला पा रहे हैं तो वो चीज तो

2322
02:41:02,400 --> 02:41:07,280
ईश्वर कर रहा है तो ईश्वर का शरीर क्यों ना माना जाए उसको

2323
02:41:07,280 --> 02:41:11,360
हम ये इस बारे में धक्के को लेकर के हम इस तरह के

2324
02:41:11,360 --> 02:41:15,360
कुछ चर्चा वो जो विभू है ना वो सर्व्यापक होते हुए भी केवल

2325
02:41:15,360 --> 02:41:19,760
कुछ चीजों को गति करवाता है। तो हम इस तरह की चर्चा बहुत सारी कर चुके हैं। हालांकि

2326
02:41:19,760 --> 02:41:24,080
आज तक मुझे यह लगता था कि आर्य समाज से जितनी भी चर्चाएं हुई है उसमें

2327
02:41:24,080 --> 02:41:28,320
सबसे अच्छी चर्चा मुझे वो लगती थी जो निर्भय के साथ हुई थी। हालांकि वो एक

2328
02:41:28,320 --> 02:41:32,480
परफेक्ट निष्कर्ष तक नहीं पहुंची। मगर अब यह जो आज जो चर्चा

2329
02:41:32,480 --> 02:41:36,560
हुई है यह जो है उससे भी अब और जो अच्छे लेवल पर

2330
02:41:36,560 --> 02:41:40,560
गई चर्चा और इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद दूंगा और जरूर मैं इनको

2331
02:41:40,560 --> 02:41:44,560
दोबारा लूंगा पर परंतु अपना ये हट छोड़ के आए कि इनको शून्य

2332
02:41:44,560 --> 02:41:48,640
क्रिया पर ही बात करनी है। शून्य क्रिया पर बात हो गई है। जनता निर्णय ले लेगी।

2333
02:41:48,640 --> 02:41:54,640
ठीक है। अच्छा अ

2334
02:41:56,320 --> 02:42:00,160
जी कन्हैया जी जय श्री राम।

2335
02:42:00,160 --> 02:42:04,960
जय श्री राम सभी लोगों को जी

2336
02:42:04,960 --> 02:42:09,280
हां मैं तो यह कहना चाह रहा हूं कि मेरा तो पर्सपेक्टिव ही अलग है शिवा जी मैं इससे

2337
02:42:09,280 --> 02:42:13,280
थोड़ा डिफर करता हूं मैं आपसे इस चीज में कि जैसे कहते

2338
02:42:13,280 --> 02:42:17,440
हैं क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसे वो स्वयं ना उठा सके इसका भी उत्तर सीधा

2339
02:42:17,440 --> 02:42:21,520
है हां बिल्कुल कर सकता है वो लेकिन वो करे क्यों वो सर्व स्वतंत्र है

2340
02:42:21,520 --> 02:42:25,440
मेरा कहना ये है

2341
02:42:25,440 --> 02:42:29,600
ठीक है आप समझे कि नहीं मेरी बात आपको मैं देखिए मैं आपसे आपसे यहां पर अभी

2342
02:42:29,600 --> 02:42:33,760
एक और चर्चा नहीं खोलना चाहता हूं। तो इस चीज को मैं आगे

2343
02:42:33,760 --> 02:42:38,400
नहीं बढ़ाना चाहता। आप और कुछ अगर कहना चाहे तो कहिए। जी

2344
02:42:38,400 --> 02:42:42,400
नहीं मैं तो यही कहना चाह रहा था। दूसरा दूसरा मैं ये कह रहा हूं कि कोई भी व्यक्ति यदि

2345
02:42:42,400 --> 02:42:46,480
ये पूछता है कि हां उत्तर हां या ना में दीजिए। जैसे वो भैया भी पूछ रहे थे कि अभी

2346
02:42:46,480 --> 02:42:50,480
उत्तर हां या ना में दीजिए तो फिर हमारी तरफ से एक प्रश्न है

2347
02:42:50,480 --> 02:42:54,480
कि क्या एक व्यक्ति ने चोरी करना छोड़ दिया है?

2348
02:42:54,480 --> 02:42:58,560
तो ये तो लॉजिकल फैलेसी हुई। चलिए ठीक है तो हां या

2349
02:42:58,560 --> 02:43:02,560
ना उत्तर दीजिए ना हर चीज ऐसा है ना मैंने इनसे जो पहला

2350
02:43:02,560 --> 02:43:06,560
प्रश्न जो किया था अग्निव जी ने अपने में कहा था कि देखो भाई

2351
02:43:06,560 --> 02:43:10,960
हम अपने कार्य को करने के लिए सहायता लेते हैं क्या सहायता लेते हैं

2352
02:43:10,960 --> 02:43:12,480
कि

2353
02:43:12,480 --> 02:43:16,720
ये हम लोग देख नहीं पा रहे तो चश्मा है देखो हम इससे देखते हैं ठीक है जड़ पदार्थ

2354
02:43:16,720 --> 02:43:20,800
का उपयोग करते हैं और ईश्वर का चेतन चेतन का उपयोग कर ही

2355
02:43:20,800 --> 02:43:25,040
रहे हैं चेतन तत्व का उपयोग कर ही रहे हैं जड़ का उपयोग कर ही रहे हैं ईश्वर

2356
02:43:25,040 --> 02:43:29,360
भी अपना कार्य करने के लिए अगर देखा जाए तो जो जड़ अवेलेबल है उसका उपयोग

2357
02:43:29,360 --> 02:43:33,520
कर ही रहा है और जो क्या कहते हैं चेतन अवेलेबल है उसका उपयोग

2358
02:43:33,520 --> 02:43:38,160
कर ही रहा है ना तो फिर यहां पर सर्वशक्तिता

2359
02:43:38,160 --> 02:43:42,400
कहां कैसे सिद्ध होगी उस वाले तर्क से तो

2360
02:43:42,400 --> 02:43:46,640
मेरे को मैंने सवाल इसलिए किया था उसमें उन्होंने ये वाली बात की थी कि हम लोग जो है

2361
02:43:46,640 --> 02:43:50,640
चश्मा चश्मे का उपयोग करते हैं और योगेश भारद्वाज जी ने भी जो वीडियो बनाया उसमें

2362
02:43:50,640 --> 02:43:54,800
भी बात की है। ठीक है यह वाली बात चलिए काफी देर की चर्चा

2363
02:43:54,800 --> 02:43:58,960
हो चुकी है 2 घंटे 43 मिनट की और काफी अच्छी रही और

2364
02:43:58,960 --> 02:44:03,120
दोबारा यह आना चाहेंगे महानुभाव तो अवश्य आएंगे ठीक है जय

2365
02:44:03,120 --> 02:44:07,440
जी आपने भी बहुत बढ़िया तर्क पूर्ण बातें कही

2366
02:44:07,440 --> 02:44:11,440
आप को साधुवाद बहुत सारा जी

2367
02:44:11,440 --> 02:44:17,440
जी धन्यवाद चर्चा को पूर्ण करते हैं जय श्री राम

2368
02:44:19,040 --> 02:44:25,040
जय श्री राम

2369
02:44:28,320 --> 02:44:34,320
जय श्री राम जय श्री राम

2370
02:44:51,270 --> 02:44:55,270
[संगीत]
