1
00:00:02,840 --> 00:00:07,080
तो सभी को जय श्री राम और आज हम यहां

2
00:00:07,080 --> 00:00:11,280
प्रस्तुत हुए हैं आर्य समाज के एक बंधु

3
00:00:11,280 --> 00:00:15,280
हैं जो आर्य समाज को फॉलो करते हैं और आर्य समाज

4
00:00:15,280 --> 00:00:19,360
को लेकर के जो वैचारिक मतभेद आ रहे हैं हमारे बीच में उसके निमित्त

5
00:00:19,360 --> 00:00:24,440
आज यहां पर चर्चा के लिए हम लोग उपस्थित हुए

6
00:00:24,440 --> 00:00:28,480
हैं पिछली जो एक लाइव हुई थी जिसमें

7
00:00:28,480 --> 00:00:30,780
कि

8
00:00:30,780 --> 00:00:35,400
[संगीत] रामपाल को फॉलो करने वाले एक बंधु थे वो आए

9
00:00:35,400 --> 00:00:40,040
थे उसमें हमें एक थोड़ा सा हृदय को विदर करने वाला

10
00:00:40,040 --> 00:00:44,960
एक कमेंट टिप्पणी प्राप्त हुई थी जिसमें कि उन्होंने कहा था

11
00:00:44,960 --> 00:00:48,960
कि बाकी सब तो ठीक है मगर हम जो है सामने वाले

12
00:00:48,960 --> 00:00:53,440
को बोलने का अवसर नहीं देते हैं ऐसा कुछ उसमें टिप्पणी में लिखा

13
00:00:53,440 --> 00:00:57,440
था मगर ऐसा नहीं है हम अपनी जानकारी में तो देते

14
00:00:57,440 --> 00:01:02,120
ही है मगर होता क्या है जब विषयात हो रहा होता है या

15
00:01:02,120 --> 00:01:06,480
फिर हमें बोलने का अवसर नहीं दिया जा रहा होता है तो ऐसे

16
00:01:06,480 --> 00:01:10,600
में हमको थोड़ा सा प्रयास करना पड़ता है कि सामने वाला

17
00:01:10,600 --> 00:01:14,960
विषयात ना कर सके क्योंकि मुझे ऐसा लगता है

18
00:01:14,960 --> 00:01:17,920
कि संसार भर में जितनी भी जो लड़ाइयां

19
00:01:17,920 --> 00:01:22,360
है ईश्वर को लेकर के वैचारिक मतभेद है उसका मूल कारण विषयात

20
00:01:22,360 --> 00:01:26,840
है जब भी कभी दो लोग चर्चा करने बैठे तो उसमें

21
00:01:26,840 --> 00:01:30,960
कोई बात निकल सकती थी तथ्यात्मक रूप से मगर वो बदल दी जाती

22
00:01:30,960 --> 00:01:35,000
बदल बदल के बदल बदल के इतना हल्ला हो गया इतना हल्ला हो गया कि जो मूल जिस पर चर्चा

23
00:01:35,000 --> 00:01:39,880
हो रही थी वह ना होकर के कहीं और ही पहुंच गए और

24
00:01:39,880 --> 00:01:44,440
तो मैं आशा करूंगा कि आज हम लोग विषयात ना करें आपसे

25
00:01:44,440 --> 00:01:49,000
भी हरिओ मर्य जी आए हैं जी अवश्य

26
00:01:49,000 --> 00:01:53,040
जी जी और एक चीज और है कि ऐसा नहीं है कि

27
00:01:53,040 --> 00:01:57,440
आपको बोलने का अवसर नहीं मिलेगा कई बार ऐसा होता है कि जैसे

28
00:01:57,440 --> 00:02:01,480
मैं कोई बात बोल रहा हूं तोम वाले सज्जन है अगर उनकी कोई

29
00:02:01,480 --> 00:02:05,520
बात ऐसा होता इंस्टिगेट हो जाते हैं कोई बात कट जाती तो इंस्टिगेट हो

30
00:02:05,520 --> 00:02:09,920
जाते हैं तो उसके कारण वह फिर बौखलाहट में फिर पंक्ति

31
00:02:09,920 --> 00:02:14,040
को पूरा करने का अवसर दिए बिना ही अपनी बात बोलते रहते हैं तो उससे क्या है जो

32
00:02:14,040 --> 00:02:18,160
हमारा य वीडियो हो रहा होता लाइव इसकी क्वालिटी फर बिगड़ती है इसमें कब

33
00:02:18,160 --> 00:02:22,440
किसने क्या बोला व वो जो ने लगता है ओवरलैपिंग होने लगती है आवाज

34
00:02:22,440 --> 00:02:26,680
की वह सब ना

35
00:02:26,680 --> 00:02:31,600
हो विय में एक नियम भी हम बना ले

36
00:02:31,600 --> 00:02:35,800
आप बोल रहे हैं रख रहे हैं तो मैं में नहीं इंटरप्ट

37
00:02:35,800 --> 00:02:40,080
करूंगा मैं बोल रहा एक अपना विषय जो

38
00:02:40,080 --> 00:02:44,160
लगभग एक मिनट में कंप्लीट हो जाता लगभग तो आप इंटरप्ट नहीं

39
00:02:44,160 --> 00:02:48,400
करें और स्टेप बाय स्टेप अपने कुछ विषय है जिन

40
00:02:48,400 --> 00:02:52,560
पर हम चर्चा करेंगे और लगभग रहेगी हमारी

41
00:02:52,560 --> 00:02:56,600
यह चर्चा प्रयास रहेगा कि मतलब ऐसा ना हो किसी के भी जो

42
00:02:56,600 --> 00:03:00,640
मौलिक अधिकार है उनका हनन ना हो और अप अपनी अपनी जानकारी

43
00:03:00,640 --> 00:03:05,080
में दोनों ही लोग हमें ऐसा लगता है कि धर्म की रक्षा कर रहे हैं इसीलिए यहां पर

44
00:03:05,080 --> 00:03:09,160
आए वो धर्म की व्याख्या हो सकता है दोनों की जानकारी में अलग-अलग

45
00:03:09,160 --> 00:03:13,160
हो थोड़ी बहुत तो प्रयास यही रहेगा कि

46
00:03:13,160 --> 00:03:17,200
मौलिक अधिकारों का हनन ना हो फिर भी जैसे रोड पर

47
00:03:17,200 --> 00:03:21,200
निकलने से पहले हम यह नहीं तय कर सकते हैं कि कहां पर ब्रेक

48
00:03:21,200 --> 00:03:25,520
लगानी है कहां पर नहीं तो उसी तरीके से बाकी

49
00:03:25,520 --> 00:03:29,840
जगह में भी होता है कि एट द एंड जो निर्णय होता है वो बुद्धि और विवेक

50
00:03:29,840 --> 00:03:34,040
का हो जाता है मगर ईश्वर को ईश्वर से प्रार्थना करते

51
00:03:34,040 --> 00:03:38,240
हैं कि भाई वो हमें ऐसी सद्बुद्धि दे कि हमारी जो चर्चा

52
00:03:38,240 --> 00:03:41,880
हो वो मर्यादित रहे और किसी के भी अधिकारों का हनन ना

53
00:03:41,880 --> 00:03:46,520
हो अच्छा तो अब हम सीधे आ जाते हैं अपने मूल विषय पर

54
00:03:46,520 --> 00:03:50,840
सबसे पहला वही है कि क्या आर्य समाज के द्वारा

55
00:03:50,840 --> 00:03:55,160
प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है वह सर्व नियामक

56
00:03:55,160 --> 00:04:00,080
है क्या वह किसी भी नियम के नीचे नहीं है या है

57
00:04:00,080 --> 00:04:06,080
क्या वह सर्वशक्तिमान है क्या वह अनंत है अवाद है

58
00:04:06,240 --> 00:04:10,280
बताए जी शिवान जी जो आर्य

59
00:04:10,280 --> 00:04:14,800
समाज में सत्या प्रकाश मुख्य वेष रहता है इस विषय का

60
00:04:14,800 --> 00:04:18,960
जो वेदों की उसमें ऋषि परमात्मा

61
00:04:18,960 --> 00:04:23,320
को सर्वशक्तिमान मानते हैं और सतिमान

62
00:04:23,320 --> 00:04:27,560
के रूप में आप जब देखते हैं तो परमात्मा की कुछ ड्यूटीज

63
00:04:27,560 --> 00:04:31,960
है जिसमें विशेषकर ओडी के रूप में कहते हैं वो जनरेटर

64
00:04:31,960 --> 00:04:36,600
है ऑपरेटर और डिस्ट्रॉय प्रकृति काता

65
00:04:36,600 --> 00:04:41,000
है पालन करता है और एक समय अंतराल

66
00:04:41,000 --> 00:04:45,320
बाद डिस्ट्रॉय होती है और फिर प्रकृति बनती है परमात्मा की व्यवस्था

67
00:04:45,320 --> 00:04:49,320
से चलती है फिर एक और उनका मुख्य कार्य जो बताया जाता

68
00:04:49,320 --> 00:04:53,760
है विशेष रूप से कर्मों का फल देना जैसे

69
00:04:53,760 --> 00:04:56,960
हम सभी कर्म करने में आत्मा स्वतंत्र है

70
00:04:56,960 --> 00:05:02,200
और परमात्मा कर्मों का फल देने में

71
00:05:02,200 --> 00:05:06,240
है तो इस रूप में वह सर्वशक्तिमान कह

72
00:05:06,240 --> 00:05:10,320
सकते हैं और इसको मोटे रूप में ऋषि के माध्यम से कहा गया

73
00:05:10,320 --> 00:05:14,960
है इसको अगर हम एक पति में पिरो इस विषय को सर्वशक्तिमान

74
00:05:14,960 --> 00:05:19,320
को कि वह अपना स्वयं का कार्य करने में

75
00:05:19,320 --> 00:05:23,320
किसी का भी नहीं लेता वह अपने सभी कार्य

76
00:05:23,320 --> 00:05:28,000
स्वयं करने में सक्षम है ठीक है

77
00:05:28,000 --> 00:05:30,640
आपने कहा

78
00:05:30,640 --> 00:05:34,800
आपकी बात हो गई आपकी बात हो गई जी

79
00:05:34,800 --> 00:05:38,920
जी आपने कहा सर्वशक्तिमान वो इसलिए

80
00:05:38,920 --> 00:05:43,000
है क्योंकि वह किसी की सहायता नहीं लेता है अपने काम करने में जो उसके कार्य हैं

81
00:05:43,000 --> 00:05:47,000
निश्चित चार कार्य तो इसमें दो प्रश्न आते हैं पहली

82
00:05:47,000 --> 00:05:51,240
बात हमारा पहला प्रश्न था क्या वो इसमें दो प्रश्न आते हैं

83
00:05:51,240 --> 00:05:55,720
पहला हमारा प्रश्न था क्या वो किसी क्या वो किसी भी नियम के नीचे है

84
00:05:55,720 --> 00:05:59,840
या नहीं है तो पहले इसको स्पष्ट कर दें जी बिल्कुल

85
00:05:59,840 --> 00:06:04,320
स्पष्ट करेंगे बिल्कुल जी ये बड़ा महत्त्वपूर्ण प्रश्न किया आपने

86
00:06:04,320 --> 00:06:08,320
जैसे उसके गुणों से ही हमें पता चलता

87
00:06:08,320 --> 00:06:12,640
है कि परमात्मा न्याय कारी है तो इस

88
00:06:12,640 --> 00:06:17,040
विरु परमात्मा किसी के साथ अन्याय नहीं कर सकता

89
00:06:17,040 --> 00:06:21,720
दूसरे उसके गुण भाई साहब चर्चा चर्चा

90
00:06:21,720 --> 00:06:25,840
व्यर्थ ही जा रही है सिर्फ इतना बताना है आपको कि वो भी कुछ

91
00:06:25,840 --> 00:06:30,000
नियमों के नीचे है या नहीं मैं नियम नहीं पूछ रहा हूं किन नियम के नीचे

92
00:06:30,000 --> 00:06:34,200
है आप आप यह बता रहे हैं कि उस पर भी कोई नियम लागू होते हैं आप सिर्फ इतना

93
00:06:34,200 --> 00:06:38,120
बता दीजिए नियमों को नीचे है या

94
00:06:38,120 --> 00:06:42,120
नहीं जी उनकी परमात्मा की अपनी व्यवस्था है और व

95
00:06:42,120 --> 00:06:48,120
नियमों से ही कार्य करता है नियम के नीचे

96
00:06:48,520 --> 00:06:52,600
है को आप नियम कह सकते हैं मतलब

97
00:06:52,600 --> 00:06:56,840
आप स्पष्ट नहीं बोलेंगे कि हां नियम के नीचे है वो बिल्कुल स्पष्ट

98
00:06:56,840 --> 00:07:02,840
है वो नियमों के अंत ही कार्य करता है

99
00:07:03,640 --> 00:07:07,680
वोम नियम के चे नियम

100
00:07:07,680 --> 00:07:11,200
के चे निम से

101
00:07:11,200 --> 00:07:15,320
बाउंड क्या नियमों परमात्मा के मैंने बताया

102
00:07:15,320 --> 00:07:18,800
आपको

103
00:07:18,800 --> 00:07:23,000
वो आप अगर अन्याय को वसा माने कि अन्याय नहीं कर सकता

104
00:07:23,000 --> 00:07:27,080
तो कम ये बातें बात की है कि

105
00:07:27,080 --> 00:07:31,240
वो नियम कौन से वाले हैं अभी हम लोग क्लियर कर रहे हैं वो

106
00:07:31,240 --> 00:07:35,480
नियमों से बाउंड है या नहीं है नियमों से बंधा

107
00:07:35,480 --> 00:07:39,520
हुआ है नियमों से बंधा हुआ यानी कि पहला कंक्लूजन

108
00:07:39,520 --> 00:07:43,680
हमारा यह आया कि जो आर्य समाज के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर

109
00:07:43,680 --> 00:07:47,680
है वह नियमित है नियमित

110
00:07:47,680 --> 00:07:51,840
है व है ना और वो भी नियमों

111
00:07:51,840 --> 00:07:55,960
से बाउंड है उसकी भी एक सीमा है

112
00:07:55,960 --> 00:08:00,240
है ना हा जी उसके व्यवस्था है उन व्यवस्था से बा वो कार्य

113
00:08:00,240 --> 00:08:03,680
नहीं करता उसकी भी सीमा है कार्य कर सकने की कार्य

114
00:08:03,680 --> 00:08:08,360
करने की उसकी सीमा है ठीक है ना बिल्कुल ठीक

115
00:08:08,360 --> 00:08:13,240
अब जब हमने यह मान लिया कि उसकी सीमाएं हैं

116
00:08:13,240 --> 00:08:17,600
जिसकी सीमा है जिसकी सामर्थ्य की सीमा है कि वह इन

117
00:08:17,600 --> 00:08:21,680
इन कार्यों के बाहर कार्य नहीं करेगा तो उसको हम क्या अनंत

118
00:08:21,680 --> 00:08:26,200
कह सकते हैं अनंत सामर्थ क

119
00:08:26,200 --> 00:08:30,960
बिल्कुल कह सकते है अनंत सामर्थ्य वान कैसे

120
00:08:30,960 --> 00:08:35,400
अनंत का अर्थ क्या हुआ जिसकी प्रत्येक

121
00:08:35,400 --> 00:08:40,160
व्यवस्था प्रत्येक गति अनंत तक हो

122
00:08:40,160 --> 00:08:44,240
अनाद मैं सिर्फ अनंत का अर्थ पूछ रहा हूं आपसे अनंत का अर्थ

123
00:08:44,240 --> 00:08:48,360
क्या है इस श् को मत जोड़ ईश्वर

124
00:08:48,360 --> 00:08:54,360
को मत जोड़ अंत ना जिसकी कोई सीमा ना

125
00:08:54,800 --> 00:08:59,960
हो इसम एक चीज और ड कर देते अनंत में सामर्थ्य

126
00:08:59,960 --> 00:09:04,320
तो अब इसका अर्थ क्या निकलेगा जिसकी सामर्थ्य

127
00:09:04,320 --> 00:09:08,600
जो है अनंत सामर्थ्य वाला हो जिसकी सामर्थ्य की भी कोई सीमा

128
00:09:08,600 --> 00:09:13,080
ना हो हा अपने काने हमने कहा कि अनंत

129
00:09:13,080 --> 00:09:17,560
का अर्थ है जिसका कोई अंत ना हो और अनंत सामर्थ्य का अंतर

130
00:09:17,560 --> 00:09:19,440
मतलब है कि जिसकी

131
00:09:19,440 --> 00:09:23,520
सामर्थ्य की कोई सीमा ना हो मगर मगर आप

132
00:09:23,520 --> 00:09:27,760
कह रहे हैं कि ईश्वर की भी कुछ सीमाएं हैं वो उसके अंदर ही रहता

133
00:09:27,760 --> 00:09:31,920
है बाउंड है वो आपने कहा पंक्ति में आपको स्पष्ट

134
00:09:31,920 --> 00:09:36,000
कर दिया व जो सीमा है कि परमात्मा कोई

135
00:09:36,000 --> 00:09:40,520
गलत कार्य नहीं कर सकता अन्याय नहीं कर सकता असत्य नहीं बोल

136
00:09:40,520 --> 00:09:44,520
सकता अजन्मा वो जन्म नहीं ले सकता किसी के गर्भ

137
00:09:44,520 --> 00:09:48,520
से और इसके साथ ही व अपना जैसा कोई दूसरा

138
00:09:48,520 --> 00:09:52,560
ईश्वर नहीं बना सकता वह अवतार नहीं ले सकता यह आप

139
00:09:52,560 --> 00:09:57,040
उसकी सीमाए मान सकते हैं ऐसा वो कभी नहीं कर सीमाए

140
00:09:57,040 --> 00:10:01,480
देखिए मैं इस ईश्वर को एक्सेप्ट कर सकता हूं एक

141
00:10:01,480 --> 00:10:05,880
चर्चा के उसमें कि मैं आपके ईश्वर को एक्सेप्ट करता हूं मगर जिसकी

142
00:10:05,880 --> 00:10:10,120
सीमाएं है उसको हम अनंत कैसे कह सकते हैं

143
00:10:10,120 --> 00:10:14,160
जिसकी सामर्थ्य का अंत है जिसकी सामर्थ्य का अंत

144
00:10:14,160 --> 00:10:18,360
है उसको अनंत सामर्थ्य वान कैसे कह रहे हैं

145
00:10:18,360 --> 00:10:22,360
जी आप जिस रूप में इस विषय को ले रहे

146
00:10:22,360 --> 00:10:26,520
हैं आपने जो शुरू में आपने उसकी जो परिधि

147
00:10:26,520 --> 00:10:30,800
बांधी और उसमें मैंने जो आपको क किया है उसमें आपको

148
00:10:30,800 --> 00:10:34,440
भेद करना पड़ेगा वह एक अयोग्य अ

149
00:10:34,440 --> 00:10:38,600
विद्वान बुद्धि शल परमात्मा भी चेतन और

150
00:10:38,600 --> 00:10:42,720
आत्मा भी चेतन कहने का अर्थ य है कि

151
00:10:42,720 --> 00:10:46,920
परमात्मा की सामर्थ्य का अंत है फिर भी हम उसे अनंत

152
00:10:46,920 --> 00:10:51,000
सामर्थ वान कहेंगे यही बात है अ करने में

153
00:10:51,000 --> 00:10:55,360
वह सपूर्ण सामर्थ्य शली है उसको किसी भी

154
00:10:55,360 --> 00:10:59,680
योग की आवश्यकता नहीं है इसलिए उसको आप

155
00:10:59,680 --> 00:11:05,040
प्रशाली वेदों में कहा गया है

156
00:11:05,040 --> 00:11:09,280
मैंने अभी आपसे पूछा था कि अनंत का अर्थ क्या है अनंत

157
00:11:09,280 --> 00:11:13,400
का अर्थ था जिसका कोई अंत ना हो और अनंत सामर्थ वान

158
00:11:13,400 --> 00:11:17,440
का अर्थ आपने बताया था कि जिसकी सामर्थ्य का कोई अंत ना हो

159
00:11:17,440 --> 00:11:21,960
इसमें अपने कार्यों को करने की बात आई थी

160
00:11:21,960 --> 00:11:24,160
क्या

161
00:11:24,160 --> 00:11:28,200
जी अब जो आप परिभाषा दे रहे हैं उसमें अपने कार्य जो

162
00:11:28,200 --> 00:11:32,240
कर सकता हो बिना किसी की सहायता से तो यह बात आ रही है क्या

163
00:11:32,240 --> 00:11:36,320
अनंत और सामर्थ्य वान का जब हम अर्थ कर रहे हैं उसमें अपने

164
00:11:36,320 --> 00:11:40,440
कार्य कर सकता हो यह आपने जोड़ा ना इसमें मैं पूछ रहा

165
00:11:40,440 --> 00:11:44,760
हूं जब हमने अनंत का अर्थ लिया कि जिसका अंत ना हो और

166
00:11:44,760 --> 00:11:48,840
अनंत सामर्थ्य का अंतर अर्थ हुआ जिसकी सामर्थ्य का अंत ना

167
00:11:48,840 --> 00:11:50,000
हो इसमें

168
00:11:50,000 --> 00:11:54,200
इस इस शब्द के अर्थ में ये आया क्या कि जिसको अपने कार्य करने

169
00:11:54,200 --> 00:11:58,480
में किसी की सहायता ना ले सके वो अनंत है मैं फिर से पूछ रहा हूं आपसे अनंत

170
00:11:58,480 --> 00:12:02,960
का अर्थ क्या है नहीं जी आप देखिए द्विवेदी

171
00:12:02,960 --> 00:12:07,040
जी जिस शब्द के साथ आप ये अपनी डिबेट

172
00:12:07,040 --> 00:12:11,200
को चला रहे हैं शब्द के साथ

173
00:12:11,200 --> 00:12:15,320
व्यवस्था के साथ जो आप क्लियर करना चाहते हैं उसमें

174
00:12:15,320 --> 00:12:19,400
आप अच्छी तरह अने प्रबलम क्या है प्रॉब्लम यह है कि हम

175
00:12:19,400 --> 00:12:23,800
लोगों की एक चर्चा और हो सकती है कौन सी कि भाई वह

176
00:12:23,800 --> 00:12:28,280
क्यों सीमित है या वह सर्वव्यापक होते हुए भी

177
00:12:28,280 --> 00:12:32,720
अवतार क्यों नहीं हो सकता यह सब हमारी अगली चर्चाएं भी हो सकती है

178
00:12:32,720 --> 00:12:37,040
मगर प्रॉब्लम यह है कि जैसे अभी आपने स्पष्ट किया कि हां आर्य

179
00:12:37,040 --> 00:12:41,040
समाज का ईश्वर भी नियमित है तो ऐसे ही

180
00:12:41,040 --> 00:12:45,160
यहां पर यह स्पष्टता नहीं प्राप्त हो रही है कि जब आपने कहा

181
00:12:45,160 --> 00:12:49,360
अनंत का अर्थ है जिसका कोई अंत ना हो अनंत सामर्थ्य

182
00:12:49,360 --> 00:12:54,160
का अंत है अर्थ है जिसकी सामर्थ्य का कोई अंत ना हो उसके बाद

183
00:12:54,160 --> 00:12:58,160
मैं मान सकता हूं कि यही ईश्वर असली है ईश्वर की यही व्याख्या

184
00:12:58,160 --> 00:13:02,960
असली है मगर इसके सामने हम अनंत सामर्थ्य वान क्यों लिख रहे हैं

185
00:13:02,960 --> 00:13:05,200
क्योंकि जब हम अनंत शब्द का अर्थ

186
00:13:05,200 --> 00:13:09,680
करते हैं और अनंत सामर्थ्य का अर्थ करते तो उसमें यह कहीं नहीं आता है

187
00:13:09,680 --> 00:13:13,760
कि जो अपने कार्य बिना किसी की सहायता के कर ले जिस उसमें

188
00:13:13,760 --> 00:13:18,680
सिर्फ ये आता है जिसकी सामर्थ्य का अंत ना हो

189
00:13:18,680 --> 00:13:22,720
यह आता है तो फिर हम इसमें जब ईश्वर से जोड़ के व्याख्या करने

190
00:13:22,720 --> 00:13:26,880
लगते हैं तो इसमें अपने दो चार शब्द जोड़ देते हैं वो क्या कि जो

191
00:13:26,880 --> 00:13:31,120
अपने कार्य कर सकता हो बिना किसी जी की सहायता से वो अनंत सामर्थ वान है

192
00:13:31,120 --> 00:13:35,240
तो ये बदलाव क्यों हो रहा है मेरा कहने का मतलब है आप इस शब्द को भी जैसे नियमित

193
00:13:35,240 --> 00:13:39,320
था उसको छोड़ दीजिए इस शब्द को फिर हम आगे बढ़े इस शब्द को हटा

194
00:13:39,320 --> 00:13:43,440
दीजिए भाई हां ठीक है ईश्वर की भी सामर्थ्य का अंत हो सकता है

195
00:13:43,440 --> 00:13:47,520
और ऐसा भी ईश्वर हम स्वीकार कर सकते हैं वेदा दि शास्त्र सम्मत के द्वारा

196
00:13:47,520 --> 00:13:51,560
अगर वोह प्रतिपादित हो रहा है तो वह बात एक अलग है कि हम करेंगे या नहीं

197
00:13:51,560 --> 00:13:55,560
करेंगे उस पर जाया जा सकता है वो अभी से हम ये डिसाइड नहीं कर रहे

198
00:13:55,560 --> 00:13:59,600
कि वो ईश्वर गलत है कि सही है हम ये डिसाइड नहीं कर रहे मगर हमें अनंत

199
00:13:59,600 --> 00:14:04,080
सामर्थ्य का शब्द जो है छोड़ना होगा अगर हम कह रहे हैं कि उसकी सामर्थ्य

200
00:14:04,080 --> 00:14:08,080
का अंत है वह नियमित है वह बाउंड है वो बाधित

201
00:14:08,080 --> 00:14:12,160
है तो हमें ये शब्दों को छोड़ना होगा जैसे ही

202
00:14:12,160 --> 00:14:17,040
दिव्यांश जी मैं इस अनंत सामर्थ्य को

203
00:14:17,040 --> 00:14:20,240
बदलकर शद उपयोग करता हूं कि वह

204
00:14:20,240 --> 00:14:24,640
कुछ भी कर सकता है तो इसी के

205
00:14:24,640 --> 00:14:28,680
साथ इस विषय में मैं आपको जवाब दूंगा कि क्या वो कुछ भी कर

206
00:14:28,680 --> 00:14:33,080
सकते क्या वो मर सकता है क्या वो अपने जैसा दूसरा ईश्वर बना सकता है

207
00:14:33,080 --> 00:14:37,120
यह सब बातों का जवाब मैं आपको दूंगा मगर अभी विषय ये चल रहा

208
00:14:37,120 --> 00:14:41,280
है अभी विषय मान लीजिए मेरे पास भी मैं कह रहा हूं

209
00:14:41,280 --> 00:14:45,800
मेरे पास इनका जवाब नहीं है ठीक है मेरा भी ईश्वर गलत है ठीक अभी ये मान लीजिए

210
00:14:45,800 --> 00:14:49,840
फिर भी अगर हम किसी को ईश्वर मान मान रहे हैं इस हिसाब से कि

211
00:14:49,840 --> 00:14:54,240
वह जो है अपने काम स्वयं कर सकता है तो उसके साथ हम अनंत सामर्थ्य

212
00:14:54,240 --> 00:14:58,360
का वो नहीं जोड़ सकते कहने का मतलब यह है कि अगर मैं गलत हूं तो

213
00:14:58,360 --> 00:15:02,400
उससे आपका का सही होना सिद्ध नहीं होता अगर हमें पीने

214
00:15:02,400 --> 00:15:06,520
के पीने के लिए दूध नहीं मिल रहा है तो इसका मतलब ये नहीं है हम मदरा पान करने

215
00:15:06,520 --> 00:15:10,560
लगे तो मैं गलत हो सकता हूं वो आगे की बात है

216
00:15:10,560 --> 00:15:14,680
ठीक है नहीं तो क्या होता है ना मैं अभी यहीं पर जवाब देने लगूंगा आपको इन बातों का

217
00:15:14,680 --> 00:15:18,800
क्या ईश्वर मर सकता है क्या ईश्वर बुरे काम कर सकता है इन बातों का जवाब देने लगूंगा

218
00:15:18,800 --> 00:15:23,120
उसमें भी तर्क प तर्क तर्क प तर्क तो वही वही बात होगी विषयात होता गया

219
00:15:23,120 --> 00:15:27,760
और हमारी जो जो मूल चर्चा थी वो बदलती चली जाएगी

220
00:15:27,760 --> 00:15:31,800
इसलिए मैं थोड़ा आगे के लिए रख रहा हू अभी आप ये मान लीजिए मेरे पास

221
00:15:31,800 --> 00:15:35,320
भी मेरे पास भी ईश्वर है ही नहीं अभी मैं

222
00:15:35,320 --> 00:15:39,320
आपसे पूछ रहा हूं जिसको जिसको आप ईश्वर जिसको आप ईश्वर

223
00:15:39,320 --> 00:15:43,320
कह रहे हैं जब आपने खुद बताया कि अनंत का मतलब जिसका

224
00:15:43,320 --> 00:15:47,320
कोई अंत ना हो अनंत सामर्थ्य का मतलब जिसकी

225
00:15:47,320 --> 00:15:51,360
सामर्थ्य का अंत ना हो उसके बाद जब ईश्वर की डिफाइन करने की बात आती

226
00:15:51,360 --> 00:15:55,920
है कि हम ईश्वर को अनंत सामर्थ्य वान क्यों कह रहे तो उसमें हम दो तीन शब्द अलग से लगाते हैं

227
00:15:55,920 --> 00:16:00,080
कि जो अपने कार्यों को करने के लिए की सहायता ना लेता

228
00:16:00,080 --> 00:16:04,480
हो वो अनंत सामर्थ्य वान है तो यहां तो आपने अपनी ही डेफिनेशन को बदल दिया

229
00:16:04,480 --> 00:16:08,560
कहने का मतलब यह है इस शब्द को छोड़कर हम लोग आगे बढ़ सकते हैं

230
00:16:08,560 --> 00:16:12,720
पहले हमें इस शब्द को छोड़ना पड़ेगा कि वो अनंत सामर्थ वान

231
00:16:12,720 --> 00:16:16,800
हैरा मैंने जो वि दिया अनंत सामर्थ्य वाला और

232
00:16:16,800 --> 00:16:20,880
मैंने उसकी साथ में एक पॉजिटिव बंडिंग भी बना दी इस

233
00:16:20,880 --> 00:16:25,000
दृष्टिकोण के साथ इसी डेफिनेशन को लेकर

234
00:16:25,000 --> 00:16:29,120
आपका क्या विचार है क्योंकि जहां अभ

235
00:16:29,120 --> 00:16:33,280
मैंने जितनी भी आपकी वीडियो देखी वहां इस विषय पर आकर

236
00:16:33,280 --> 00:16:37,360
विषय बार-बार उलझ रहा है तो क्या इसको आप अपने लेवल पर

237
00:16:37,360 --> 00:16:41,480
एक्सप्लेन कर सकते ताकि मैं वो विषय जो नहीं जान पा रहा मैं समझ जी

238
00:16:41,480 --> 00:16:45,640
जी जी मैं बता देता हूं देखिए दो डायमेंशन है

239
00:16:45,640 --> 00:16:49,640
अब आपने मुझे समझाने को कहा थोड़ा सा मुझे टाइम दीजिएगा मैं अच्छे से समझाऊ

240
00:16:49,640 --> 00:16:50,520
दो डायमेंशन

241
00:16:50,520 --> 00:16:54,720
एक है व्यवहार और एक है परमार्थ ठीक है

242
00:16:54,720 --> 00:16:58,920
परमार्थ जो है वो प्राप्त व्य है वो मनुष्य के व्यवहार का

243
00:16:58,920 --> 00:17:03,120
सब्जेक्ट नहीं है और जो व्यवहार है व्यवहार वाला डायमेंशन है

244
00:17:03,120 --> 00:17:08,120
वो मनुष्य के व्यवहार का सब्जेक्ट है अब इसको ऐसे समझ लेते हैं

245
00:17:08,120 --> 00:17:12,120
जैसे कि जब कोई व्यक्ति मुक्त हुआ आर्य

246
00:17:12,120 --> 00:17:16,520
समाज के अनुसार तो क्या अंतरिक्ष में कोई गेट खुलता है

247
00:17:16,520 --> 00:17:20,520
दूसरी दुनिया में जाने के लिए नहीं खुलता आपसे पूछ रहा हूं

248
00:17:20,520 --> 00:17:24,680
नहीं खुलता यानी कि उसकी डायमेंशन बदल जाती है और जब वोह

249
00:17:24,680 --> 00:17:30,440
दूसरी डायमेंशन में जाता है तो उसके लिए यह वाली जो डायमेंशन थी वो क्या हुई

250
00:17:30,440 --> 00:17:34,560
ये ह व्यर्थ उसके लिए य वाली जो डायमेंशन थी जिसमें अब तक वो

251
00:17:34,560 --> 00:17:38,560
जिसको सच मान रहा था वो सब उसके लिए बालक का बकवास समान हो

252
00:17:38,560 --> 00:17:42,640
गया है ना तो ऐसे ही ऐसे

253
00:17:42,640 --> 00:17:46,840
ही ऐसे ही यह जो डायमेंशन है आप

254
00:17:46,840 --> 00:17:51,120
कह रहे हो कि भगवान क्या मर सकता है क्या अपना अपने जैसा दूसरा ईश्वर परमार्थ

255
00:17:51,120 --> 00:17:55,440
में नहीं कर सकता यह बात सत्य है मगर परमार्थ के आधार

256
00:17:55,440 --> 00:17:59,600
पर उस ईश्वर को नकारा नहीं जा सकता क्यों क्योंकि उस ईश्वर

257
00:17:59,600 --> 00:18:03,680
की अभिव्यक्ति हमारे सामने तब हो रही है जब हमने इस दुनिया में किसी

258
00:18:03,680 --> 00:18:05,520
को ईश्वर के रूप में स्वीकार

259
00:18:05,520 --> 00:18:09,640
किया जैसे कि कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता मैं किसी के

260
00:18:09,640 --> 00:18:13,840
आवाज देने से उठ गया कोई व्यक्ति ये नहीं कह सकता क्यों क्योंकि

261
00:18:13,840 --> 00:18:17,880
अगर वह सुन सकता था तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता और अगर

262
00:18:17,880 --> 00:18:18,800
वह सो रहा है तो

263
00:18:18,800 --> 00:18:22,840
उसका सुनना सिद्ध नहीं होता तो सुनने के आधार पर उठना

264
00:18:22,840 --> 00:18:27,320
सिद्ध नहीं होता है इसी प्रकार से परमार्थ में यदि ईश्वर

265
00:18:27,320 --> 00:18:31,560
एक ही है वो व्यवहार का विषय है ही नहीं वहां पर क्रिया का उपयोग

266
00:18:31,560 --> 00:18:36,200
हो ही नहीं सकता तो उसके आधार पर तो उसे नहीं निकाला जा सकता मगर

267
00:18:36,200 --> 00:18:40,680
य एक मिनट यदि वो यदि वो व्यवहार

268
00:18:40,680 --> 00:18:44,720
में भी बाधित होने लगा जहां जो क्रिया का विषय है जो मनुष्य

269
00:18:44,720 --> 00:18:48,760
के व्यवहार का विषय वहां पर भी यदि वो बाधित होने लगा अपने जैसा दूसरा ईश्वर नहीं बना

270
00:18:48,760 --> 00:18:53,000
क्यों नहीं बना सकता राम बने कृष्ण बने उसी समय पर उष राम भी थे अगर

271
00:18:53,000 --> 00:18:57,280
इस धारणा को हम माने तो एक ही समय में ईश्वर अपने जैसे ईश्वर बना सकता है

272
00:18:57,280 --> 00:19:01,280
लीला करके मार भी सता है अपनी दे का नाश करके भाई मरना हमारे

273
00:19:01,280 --> 00:19:05,560
लिए अगर दे का नाश है तो दे का नाश करके भी दिखा सकता है तो ये डायमेंशन

274
00:19:05,560 --> 00:19:09,840
का अंतर है और एक चीज और कि यदि हम यह मानते

275
00:19:09,840 --> 00:19:13,880
हैं कि यह पूरी दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है यह सब कुछ

276
00:19:13,880 --> 00:19:17,880
वास्तविकता वैसी रियलिटी नहीं है क्योंकि आपने य माना कि हम दूसरी डायमेंशन में

277
00:19:17,880 --> 00:19:21,960
जाएंगे तो यह वैसी रियलिटी नहीं है तो जब यह रियलिटी

278
00:19:21,960 --> 00:19:26,000
नहीं है और इसमें जो भी कुछ हमें दिखाई दे रहा है तो फिर यहां से भी सिद्ध होता है

279
00:19:26,000 --> 00:19:30,520
कि जब बाकी सब कुछ हो रहा है जो कि रियलिटी नहीं है तो भगवान

280
00:19:30,520 --> 00:19:33,880
अवतार भी ले सकता है जो कि रियलिटी नहीं है मगर वो

281
00:19:33,880 --> 00:19:38,040
हमारे लिए रियलिटी है हमारे लिए मनुष्य दृष्टि से वो रियलिटी है कहां

282
00:19:38,040 --> 00:19:42,240
से वो रियलिटी नहीं है जहां से भगवान बैठे हैं जहां से ब्रह्म है दूसरे

283
00:19:42,240 --> 00:19:46,240
डायमेंशन में जाने पर ही ये रियलिटी नहीं है उस पर्सपेक्टिव से

284
00:19:46,240 --> 00:19:51,080
रियलिटी नहीं है अब इसको मैं और बता देता हूं जैसे कि

285
00:19:51,080 --> 00:19:55,080
पथवी इसीलिए मैंने कहा था इसमें टाइम लगेगा इसीलिए मैंने कहा

286
00:19:55,080 --> 00:19:59,120
था इसमें टाइम लगेगा जैसे कि मैंने कहा

287
00:19:59,120 --> 00:20:03,400
कि जो पृथ्वी है वोह गोल है साइंस के अकॉर्डिंग

288
00:20:03,400 --> 00:20:07,880
पृथ्वी गोल है मगर वह कहां से गोल है वो गोल है

289
00:20:07,880 --> 00:20:11,920
जब हम पृथ्वी से मुक्त हो जाते हैं और उस मुक्त की दृष्टि से जब

290
00:20:11,920 --> 00:20:15,960
पृथ्वी को देखते तो गोल है व्यवहार में क्या है पृथ्वी चपटी

291
00:20:15,960 --> 00:20:20,440
है इसी प्रकार से व्यवहार में ईश्वर जो है किसी भी प्रकार से बाधित

292
00:20:20,440 --> 00:20:24,800
नहीं है तो उस ईश्वर को ईश्वर जब हम मान लेते हैं

293
00:20:24,800 --> 00:20:28,880
तभी यह सिद्ध होता है कि परमार्थ में भी उसका कोई एक्जिस्टेंस है वहां

294
00:20:28,880 --> 00:20:32,880
पर वो अद्वैत है वहां पर वो सब कुछ कुछ है ही नहीं सिर्फ वो प्राप्त

295
00:20:32,880 --> 00:20:36,920
किया जा सकता है तो अब क्या होता है कि हम यदि ये कहे नहीं नहीं तुम्हारा

296
00:20:36,920 --> 00:20:41,160
ईश्वर जो है परमार्थ में बाधित है उसको हम नहीं मान सकते कि वो ईश्वर है ठीक है

297
00:20:41,160 --> 00:20:45,160
तो जैसे ही हम ये कहेंगे कि वो ईश्वर को हम नहीं मानते तो हम किसी

298
00:20:45,160 --> 00:20:49,040
से ये नहीं बता सकते कि परमार्थ में वो बाधित था क्यों क्योंकि

299
00:20:49,040 --> 00:20:53,040
वो हमसे पूछेगा कि परमार्थ क्या है वो तो हमें ईश्वर से ही पता चला

300
00:20:53,040 --> 00:20:57,160
परमार्थ हमें किससे पता चला ईश्वर से पता चला तो परमार्थ के आधार

301
00:20:57,160 --> 00:21:01,200
पर जो ईश्वर की वो निश्चिता दिखाई दे रही है उसके आधार पर

302
00:21:01,200 --> 00:21:05,240
उसे नकारा नहीं जा सकता मगर यदि वो व्यवहार में भी बाधित होने लगा तो फिर ईश्वर

303
00:21:05,240 --> 00:21:09,240
को एक्सेप्ट ही क्यों किया जाए तो यह व्यवहार और परमार्थ

304
00:21:09,240 --> 00:21:13,440
के अंतर में ही बहुत बड़ा एक डिफरेंस आ गया डिफरेंसेस ऑफ ओपिनियन आ गया

305
00:21:13,440 --> 00:21:17,440
कि यह बात सब तक पहुंच नहीं पाती है तो ईश्वर जो

306
00:21:17,440 --> 00:21:21,520
है रावण के रूप में पाप भी करता है ईश्वर प्रभु

307
00:21:21,520 --> 00:21:25,760
श्री राम के रूप में पुण्य भी करता है ईश्वर अपनी देह का नाश

308
00:21:25,760 --> 00:21:31,080
भी करके दिखा देता है यह है अनंत अवाद ईश्वर

309
00:21:31,080 --> 00:21:35,480
तो यह वो ईश्वर है जो कुछ भी कर सकता है और वो जो मर्यादा

310
00:21:35,480 --> 00:21:39,600
है उस पर नहीं ती जी जी जी शिवान जी अब

311
00:21:39,600 --> 00:21:44,080
मैं बोल सकता हूं जी जी बो जी शिवान जी मुख्य

312
00:21:44,080 --> 00:21:48,200
इस चर्चा में हमारे दोनों के विषय में भेद आया उसका

313
00:21:48,200 --> 00:21:52,440
मूल आधार अद्वैत और त्रेत

314
00:21:52,440 --> 00:21:57,400
वाद तीन मूल व्यवस्थाएं समाज में चलती है

315
00:21:57,400 --> 00:22:01,480
जिसम चलिए बोलिए शंकराचार्य जी ने

316
00:22:01,480 --> 00:22:05,960
दिया था जिसमें ब्रह्म और आत्मा का योग बताते

317
00:22:05,960 --> 00:22:10,280
एक ही है और दत में अलग अलग लेकिन ऋषि दयानंद ने

318
00:22:10,280 --> 00:22:14,800
एक विशेष हटकर एक थ्योरी दी जिसम थरी

319
00:22:14,800 --> 00:22:18,920
ये थोरी रामर जी ने भी द है अब धन मेरा

320
00:22:18,920 --> 00:22:23,240
विषय आप सुनिए आप तवा ईश्वर

321
00:22:23,240 --> 00:22:27,440
अलग सत्ता है उसकी व्यवस्थाएं हैं उसके बारे में आर्य

322
00:22:27,440 --> 00:22:31,720
समाज का दूसरा ही नियम प्रतिपादित करता है कि

323
00:22:31,720 --> 00:22:37,720
ईश्वर जो है सच्चिदानंद स्वरूप निराकार सर्वशक्तिमान सर्व

324
00:22:40,040 --> 00:22:46,040
अंतरकासना करने योग्य है फिर दूसरा

325
00:22:52,040 --> 00:22:56,120
तवादिया हम और आप देख रहे हैं और इसके

326
00:22:56,120 --> 00:23:00,520
बारे में कुछ कुछ व्यवस्थाएं जैसे आत्मा जो होती है

327
00:23:00,520 --> 00:23:04,560
वह अल्प कुछ नहीं जानती

328
00:23:04,560 --> 00:23:08,560
वो एक देसी होती एक स्थान पर रहती है और

329
00:23:08,560 --> 00:23:12,840
अपनी इच्छा से शरीर नहीं बदल सकती व ईश्वर के अधीन कार्य करती है

330
00:23:12,840 --> 00:23:16,880
तो इसकी मोटी मोटी य हो गई और तीसरा प्रकृति जो जड़

331
00:23:16,880 --> 00:23:21,200
अवस्था में है जिसके माध्यम से ये सारी सृष्टि ईश्वर

332
00:23:21,200 --> 00:23:25,400
के सहाय से बनती है अब इसके बाद आपने विषय दिया

333
00:23:25,400 --> 00:23:29,680
कि रावण ईश्वर है राम भी ईश्वर है श्री कृष्ण भी ईश्वर

334
00:23:29,680 --> 00:23:33,680
है लेकिन जब हम पूरी रामायण का अध्ययन करते

335
00:23:33,680 --> 00:23:37,880
हैं तो वहां पर जो दृष्टि गोचर होता है विशेष तौर

336
00:23:37,880 --> 00:23:42,000
पर हमें इनके अंदर तो वहां पर श्री रामचंद्र जी

337
00:23:42,000 --> 00:23:46,080
को कहीं भी परमात्मा के रूप में वाल्मीकी रामायण में प्रतिपादित

338
00:23:46,080 --> 00:23:50,200
नहीं किया गया है और यही कारण है कि उनके

339
00:23:50,200 --> 00:23:54,200
जितने भी गुण कर्म स्वभाव है वहां पर उनकी पत्नी माता

340
00:23:54,200 --> 00:23:55,320
सीता का जब अपहरण

341
00:23:55,320 --> 00:23:59,920
हो जाता है तो वो उनको खोजना ही पड़ता है वो ईश्वर की बाती

342
00:23:59,920 --> 00:24:03,960
सब कुछ नहीं जानते कि माता सीता कहां है लेकिन ईश्वर जानता

343
00:24:03,960 --> 00:24:08,080
है वो सर्वव्यापक है और उसके बाद जब हम देखते हैं

344
00:24:08,080 --> 00:24:12,240
कि रावण रावण भी अविद्या युक्त थे

345
00:24:12,240 --> 00:24:16,280
क्योंकि अविद्या जो गुण है वो आत्मा का है आत्मा के अंदर विद्या

346
00:24:16,280 --> 00:24:20,440
भी और अविद्या आती रहती है लेकिन ईश्वर के अंदर सच्चा ज्ञान

347
00:24:20,440 --> 00:24:24,640
है उसके अंदर कोई दिक्कत नहीं आती वो वेदों के अनुसार वो पूर्ण

348
00:24:24,640 --> 00:24:28,920
जनी है और इसके बाद आपने एक विषय दिया अवतार

349
00:24:28,920 --> 00:24:32,960
का अगर हम इस रूप में ईश्वर का अवतार मान ले तो पहले

350
00:24:32,960 --> 00:24:37,040
तो हमें ब्रह्मांड की य अक्सर हमारा डिबेट का विषय रहता है

351
00:24:37,040 --> 00:24:41,080
इसको मैं स्पेशली थोड़ा पंच करूंगा क्या

352
00:24:41,080 --> 00:24:45,080
रहता है जैसे ही पुराणों में विशेषक अवतार का विषय

353
00:24:45,080 --> 00:24:49,120
आया है शैव में थोड़ आपको इंटरप्ट करना चाहूंगा

354
00:24:49,120 --> 00:24:53,400
मैं इंटरप्ट करना चाहूंगा इसीलिए मैं कहता हूं कि हमारा विषयात ना हो

355
00:24:53,400 --> 00:24:57,480
हमारी चर्चा ये चल रही थी इसीलिए मैं अपना पक्ष भी नहीं बता रहा था इसीलिए मैं

356
00:24:57,480 --> 00:25:01,480
नहीं बता रहा था क्योंकि जब मैं अपना ये बताऊंगा कि ईश्वर क्यों सब कुछ कर सकता

357
00:25:01,480 --> 00:25:05,520
है व्यवहार परमार्थ तो उसमें कुछ अलग ही व्याख्या खुल जाएगी अभी

358
00:25:05,520 --> 00:25:09,520
बात सबसे पहली बात तो क्वेश्चन यह है कि अगर अनंत

359
00:25:09,520 --> 00:25:10,560
सामर्थ्य वान

360
00:25:10,560 --> 00:25:15,080
का अर्थ यह है कि जिसकी सामर्थ्य का कोई अंत ना हो

361
00:25:15,080 --> 00:25:19,120
तो आपको यह बताना है कि क्या आर्य समाज का ईश्वर इस अर्थ को

362
00:25:19,120 --> 00:25:23,160
सिद्ध करता है अब आपने इसके विपक्ष में यह मुझसे अगर

363
00:25:23,160 --> 00:25:27,160
पूछा कि क्या आपका ईश्वर करता है मेरा ईश्वर मान मैं अभी

364
00:25:27,160 --> 00:25:31,600
अपनी व्याख्या को बिल्कुल गायब कर दे रहा हूं इस पूरी चर्चा से इसीलिए मैंने

365
00:25:31,600 --> 00:25:36,440
मैं नहीं बता रहा क्योंकि उससे हमारे विषय अंतर हो जाए तो थोड़

366
00:25:36,440 --> 00:25:38,840
हमगा

367
00:25:38,840 --> 00:25:42,960
ब मिनट उस देखिए मुझे पूरा पूरा कर लेने

368
00:25:42,960 --> 00:25:47,080
दीजिए मेरा वाक्य तो जी जी मैं अपनी उस व्याख्या को

369
00:25:47,080 --> 00:25:51,360
हटाए दे रहा हूं मेरे पास कोई ईश्वर है ही नहीं मैं बिल्कुल

370
00:25:51,360 --> 00:25:56,000
ईश्वर मेरे पास ईश्वर की कोई व्याख्या नहीं है अब मैं आपसे पूछ रहा हूं

371
00:25:56,000 --> 00:26:00,000
क्या आर्य समाज के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है वो

372
00:26:00,000 --> 00:26:04,400
अनंत सामर्थ्य वान है मैं आप फिर से पूछ रहा हूं

373
00:26:04,400 --> 00:26:08,800
हां तो अनंत का अर्थ आपने क्या बताया

374
00:26:08,800 --> 00:26:12,920
इस वर्ष पर शिवान जी हमारी चर्चा हो चुकी है नहीं

375
00:26:12,920 --> 00:26:17,120
नहीं आपने चर्चा में यह कहा ना कि मैं थोड़ी देर के लिए आपसे पूछना चाहता

376
00:26:17,120 --> 00:26:21,120
हूं इसमें आपका क्या पक्ष है तो मैंने आपका मान रखने के लिए आपकी

377
00:26:21,120 --> 00:26:25,280
बात रखने के लिए अपना पक्ष बताया मगर जब पक्ष बताया तो उस पर क्या हुआ नई

378
00:26:25,280 --> 00:26:25,780
चर्चा

379
00:26:25,600 --> 00:26:29,840
पुराण आ गया प्रमाण आ गया राम आ गया राम को कहीं भी परमात्मा

380
00:26:29,840 --> 00:26:34,080
नहीं कहा गया है प्रमाण पर आ गया प्रमाण नहीं है इस बात का तो यह हो गया

381
00:26:34,080 --> 00:26:38,600
उसमें नया पक्ष खुल गया आपको मुझे उत्तर यह देना है अनंत सामर्थ्य

382
00:26:38,600 --> 00:26:42,800
को सिद्ध करिए आर्य समाज के ईश्वर पर

383
00:26:42,800 --> 00:26:46,880
पहले तो शि मैं आपसे रिक्वेस्ट करूंगा कि वो आर्य

384
00:26:46,880 --> 00:26:51,400
समाज का ईश्वर बिल्कुल भी नहीं है ऋषि दयान समाज के द्वारा

385
00:26:51,400 --> 00:26:55,520
चलिए मैं अपने शब्द सही कर लेता हूं देखिए वही बात है ना छोटी छोटी

386
00:26:55,520 --> 00:26:59,960
सी बातों पर ही हम लोग अटके रहेंगे मूल विषय से टते रहेंगे मैं अपनी

387
00:26:59,960 --> 00:27:04,320
जो लाइन है वो सही करता हूं मैं सही करता हूं कि आर्य समाज

388
00:27:04,320 --> 00:27:08,760
के द्वारा जो ईश्वर की व्याख्या की गई है क्या उसके अनुसार

389
00:27:08,760 --> 00:27:13,080
जो ईश्वर है वह अनंत सामर्थ वान सिद्ध हो रहा है वह आप

390
00:27:13,080 --> 00:27:17,120
बताइए जी बिल्कुल वो इसकी हमारी व्याख्या जो है

391
00:27:17,120 --> 00:27:21,200
वेदों के अनुसार ऋषि द्याने सत्या प्रकाश में जो लिखा कितना लंबा

392
00:27:21,200 --> 00:27:25,520
बोलते है ना कितना लंबा बोलते प्रीफिक्स कितना लंबा बोलना पड़ता है

393
00:27:25,520 --> 00:27:29,840
जब व्यक्ति का पक्ष कमजोर मैं आपसे लड़ना नहीं चाता हूं हम लोग खामा

394
00:27:29,840 --> 00:27:34,200
खा इसको एक वो एक प्रवचन वाला क्यों बना देते हैं

395
00:27:34,200 --> 00:27:38,480
आपसे मैंने पूछा है अनंत का अर्थ क्या है सामर्थ्य के अंत क्या है ऋषि दयानंद

396
00:27:38,480 --> 00:27:40,680
जी ने जो वेदों के अनुसार जो व्याख्या यह सब

397
00:27:40,680 --> 00:27:44,760
क्यों बोलना पड़ रहा है अपनी बात को वजन देने के

398
00:27:44,760 --> 00:27:49,120
लिए बोलिए अनंत सामर्थ्य का अर्थ

399
00:27:49,120 --> 00:27:53,520
बताइए अनंत एक अलग शब्द है जिसका

400
00:27:53,520 --> 00:27:57,760
उसके उससे परिमाण से संबंध है अनंत

401
00:27:57,760 --> 00:28:02,200
क्रि वाला भी हो सकता है और जिसकी अ

402
00:28:02,200 --> 00:28:06,200
साहब मैं पूछ रहा हूं अनंत का अर्थ आप क्या मानते हैं अनंत केवल

403
00:28:06,200 --> 00:28:10,560
अनंत क्या है केवल अनंत जिसका कोई अंत ना हो

404
00:28:10,560 --> 00:28:14,720
अनंत सामर्थ्य का मतलब क्या है अनंत सामर्थ्य

405
00:28:14,720 --> 00:28:19,200
का अर्थ है जिसका कोई सामर्थ्य का अंत ना हो हां

406
00:28:19,200 --> 00:28:23,200
तो क्या अनंत सामर्थ्य को आर्य समाज के ईश्वर से जोड़ा जा

407
00:28:23,200 --> 00:28:27,720
सकता है अब ये डेफिनेशन बढ़ाएगा नहीं कम मत करिएगा

408
00:28:27,720 --> 00:28:32,160
अब अब आपने डेफिनेशन द जिसके सामर्थ्य का कोई अंत ना हो ये डेफिनेशन

409
00:28:32,160 --> 00:28:36,280
अब इस डेफिनेशन के साथ बोलिए

410
00:28:36,280 --> 00:28:40,360
जो परमात्मा है उसका सामर्थ्य अनंत

411
00:28:40,360 --> 00:28:44,400
है अनंत है और अनंत सामर्थ्य है

412
00:28:44,400 --> 00:28:49,200
वह अपने सभी काम अपने अपने सामर्थ्य से पूरे कर सकता है

413
00:28:49,200 --> 00:28:53,280
अपने सभी काम सभी काम नहीं अपने सभी काम

414
00:28:53,280 --> 00:28:55,800
जी जी उसके जो कार्य है वो स्वयं कर

415
00:28:55,800 --> 00:28:59,880
सकता है उसके तो ये अन सामर्थ की डेफिनेशन में य है क्या

416
00:28:59,880 --> 00:29:04,200
कि उसके जो कार्य है वह कर सकता है तो अनंत सामर्थ्य वान है यही प्रॉब्लम

417
00:29:04,200 --> 00:29:08,200
है बस यही पर प्रॉब्लम है यह टैग हम क्यों नहीं छोड़ सकते

418
00:29:08,200 --> 00:29:12,360
कि वह सर्वशक्तिमान है इस टग को छोड़ सकते हैं मगर नहीं छोड़ रहे क्यों

419
00:29:12,360 --> 00:29:16,360
पकड़ के रखना है व भगवान जाने अनंत सामर्थ्य वान को हम क्यों नहीं

420
00:29:16,360 --> 00:29:20,440
छोड़ रहे इस टैग को अगर उसकी वह नियमित है वह नियमों से

421
00:29:20,440 --> 00:29:24,520
बाउंड है तो इस टैग को हमने क्यों पकड़ा है अनंत सामर्थ्य

422
00:29:24,520 --> 00:29:28,560
को छट सकता शवास जी य ही

423
00:29:28,560 --> 00:29:32,640
आप इसका अनंत को हटाओ ग ना जैसे ही मैं कह देता हूं कि वह

424
00:29:32,640 --> 00:29:36,640
अनंत नहीं है सामर्थ्य शली नहीं है तो उसका दूसरा ट हट जाएगा

425
00:29:36,640 --> 00:29:41,000
वो सर्वशक्तिमान भी नहीं है

426
00:29:41,000 --> 00:29:45,240
श् नहीं होगा वो ईश्व सिद्ध नहीं होगा उसके ईश्वर

427
00:29:45,240 --> 00:29:49,800
को बचाने के लिए हमें जबरदस्ती इसका अर्थ जोड़ना पड़ता है मजबूरी

428
00:29:49,800 --> 00:29:53,880
और च सर्वव्यापक भी नहीं रहेगा

429
00:29:53,880 --> 00:29:58,360
वो वो वो अगला विषय वो अगला विषय सर्वव्यापक रहे

430
00:29:58,360 --> 00:30:02,560
नहीं वो अलग विषय मगर हम लोग अनंत सामर्थ्य को इसलिए

431
00:30:02,560 --> 00:30:06,720
नहीं हटा रहे हैं आर्य समाज द्वारा प्रतिपादित ईश्वर से

432
00:30:06,720 --> 00:30:10,760
जिससे कि उसका ईश्वर बचा रहे जैसे

433
00:30:10,760 --> 00:30:11,260
हमने

434
00:30:11,040 --> 00:30:16,640
कहा सर्वशक्तिमान ठीक है सर्व में है

435
00:30:16,640 --> 00:30:20,960
शिवा जैसे हमने कहा जैसे हमने कहा सर्व शक्तिमान सर्व

436
00:30:20,960 --> 00:30:25,080
का मतलब हो गया सब इसमें य नहीं अपने सब इसमें य

437
00:30:25,080 --> 00:30:29,520
नहीं आया सर्वशक्तिमान सर्वशक्तिमान में आया सब

438
00:30:29,520 --> 00:30:33,560
और हम उसका अर्थ क्या करते हैं अपने सब कार्य करने की जिसकी शक्ति हो

439
00:30:33,560 --> 00:30:37,960
वह है समझ रहे मेरी जो मैं कोई

440
00:30:37,960 --> 00:30:42,120
लड़ाई या कोई द्वेष भावना नहीं है जो वैचारिक मतभेद है वो

441
00:30:42,120 --> 00:30:46,120
इस शब्द को लेकर है कि आप ईश्वर के ईश्वर

442
00:30:46,120 --> 00:30:50,240
को पोषित करने के लिए वह जो अनंत जिसका जो टैग नहीं

443
00:30:50,240 --> 00:30:54,880
लग सकता है मगर उसको लगाते हैं ईश्वर के साथ

444
00:30:54,880 --> 00:30:59,080
शमांस जी इस रूप में जो आप इस विषय को घुमा रहे है ना

445
00:30:59,080 --> 00:31:03,200
तो इसको मैं स्पष्ट कर देता हूं यह डेफिनेशन हमारी नहीं

446
00:31:03,200 --> 00:31:07,240
है यह वेदा अनुकूल डेफिनेशन है और चलिए

447
00:31:07,240 --> 00:31:11,280
ये वेद की बात फिर आ गई प्रमाण प जैसे अभी आपने रामायण में प्रमाण की बात

448
00:31:11,280 --> 00:31:15,600
कही थी अब प्रमाण की बात फिर आ गई कुल मिला के ये है डेफिनेशन

449
00:31:15,600 --> 00:31:19,600
देखिए डेफिनेशन ये वाली आप डेफिनेशन बताइए मुझे कहां पर है कि

450
00:31:19,600 --> 00:31:23,720
जो अपने कार्य स्वयं कर सके उसे सर्वशक्तिमान कहेंगे बताइए कहां प वेद

451
00:31:23,720 --> 00:31:26,040
में है य मैं

452
00:31:26,040 --> 00:31:30,120
आपको नोट कर लेता हूं मैं इसको खोज के बताऊंगा क्योंकि मेरा वेद के

453
00:31:30,120 --> 00:31:34,560
अनुकूल ब्राउंड चलिए चलिए ठीक है यह बहुत अच्छा आपने

454
00:31:34,560 --> 00:31:39,480
मतलब बहुत सच्चाई के साथ य बात कही अच्छा लगा अब हम आगे आ जाते हैं

455
00:31:39,480 --> 00:31:43,680
कि हम लोग भले ही वह नियमों से बाउंड है भले

456
00:31:43,680 --> 00:31:47,680
ही वह सीमाओं से सीमित है भले ही उसकी सामर्थ्य का अंत

457
00:31:47,680 --> 00:31:51,920
है मगर हम उसे ईश्वर मान सके इसलिए हम यह कहते हैं कि

458
00:31:51,920 --> 00:31:57,920
अनंत सामर्थ मान है अब हम आगे चलते हैं किने

459
00:31:58,160 --> 00:32:02,480
बना बना दी डेफिनेशन आप दूसरी डेफिनेशन

460
00:32:02,480 --> 00:32:06,480
बना यही तो यही दिक्कत है यही दिक्कत है प्रॉब्लम

461
00:32:06,480 --> 00:32:10,520
यही है मैं वही बोल रहा हूं जो आप बोल रहे हैं बस मैं क्लियर बोल रहा हूं

462
00:32:10,520 --> 00:32:14,760
और आप थोड़ा उसको उसको थोड़ा सा पेंटिंग पेंटिंग

463
00:32:14,760 --> 00:32:19,440
करके बोल रहे हैं मैं वही बोल रहा हूं स्पष्ट जो आप बोल रहे हैं आप बोल दीजिए

464
00:32:19,440 --> 00:32:23,480
जो अनंत निर्विकार और निराकार

465
00:32:23,480 --> 00:32:28,560
स शक्तिमान ये एक साथ जुड़े हुए शब्द हैं

466
00:32:28,560 --> 00:32:32,880
और परमात्मा जिसका इतना विशाल क्षेत्र

467
00:32:32,880 --> 00:32:36,960
है केवल हम पृथ्वी को लेकर इसकी उसकी गणना नहीं कर

468
00:32:36,960 --> 00:32:41,560
सकते ऐसी पृथ्वी मिल गैलेक्सी पृथ्वी

469
00:32:41,560 --> 00:32:45,840
जिसमें हमारी मौजूद है ऐसी अनेक गलेसी ब्रह्मांड

470
00:32:45,840 --> 00:32:50,200
को जो संचालक है ये कह रहा हूं मैं तो

471
00:32:50,200 --> 00:32:54,360
आपसे यहां तक कहने को मैं तो आपसे यहां तक कहने को तैयार हूं

472
00:32:54,360 --> 00:32:58,360
कि यदि वेद में यह लिखा है कि वह जो है सीमित है फिर वेद में

473
00:32:58,360 --> 00:33:02,400
उसके लिए लिखा है तो फिर हम क्यों माने वेद को यह भी तो

474
00:33:02,400 --> 00:33:06,480
बात आएगी मैं आपसे एक जिज्ञासु बनकर प्रश्न कर रहा हूं हिंदू बन

475
00:33:06,480 --> 00:33:10,840
के नहीं कर रहा हूं आप मुझे बताइए कि जिसकी सामर्थ्य

476
00:33:10,840 --> 00:33:13,160
का अंत है उसे हम अनंत सामर्थ्य वान

477
00:33:13,160 --> 00:33:17,360
क्यों कह रहे हैं अनंत ही है शिवान

478
00:33:17,360 --> 00:33:22,520
जी इसका मूल कारण क्या है जहां पर आप उ आपको

479
00:33:22,520 --> 00:33:26,560
मैं आपको क्लियर कर दे उलझन हमारी पैदा हो रही है

480
00:33:26,560 --> 00:33:30,760
आप जिस ईश्वर को मानते हैं वो अद्वैत के अनुसार है

481
00:33:30,760 --> 00:33:35,040
वो आत्मा भी है और वो ब्रह्म भी है वो दोनों एक सत्ता मानते

482
00:33:35,040 --> 00:33:39,080
हैं आप उनकी और जैसे न मैं क्या मानता हूं वो मत बताइए मैं

483
00:33:39,080 --> 00:33:43,120
नहीं मानता हूं मैं जिज्ञासु हूं मैं सिर्फ अभी आपसे प्रश्न कर रहा हूं मैं नहीं मानता हूं

484
00:33:43,120 --> 00:33:47,200
कुछ भी अभी आप मुझे बस ये बताइए अनंत शब्द का अर्थ जब

485
00:33:47,200 --> 00:33:51,360
जिसका कोई अंत नहीं है सामर्थ्य शब्द का सामर्थ्य को जोड़ देने

486
00:33:51,360 --> 00:33:55,400
पर आता है कि जिसकी सामर्थ्य का कोई अंत नहीं है तो जब हम व्याख्या कर रहे हैं

487
00:33:55,400 --> 00:33:59,880
उसकी कि ईश्वर अनंत सामर्थ्य वान है कि नहीं वहां जोड़ रहे हैं क्योंकि ईश्वर

488
00:33:59,880 --> 00:34:03,920
अपने सब काम कर सकता है सब कार्यों को करने की उसमें सामर्थ्य

489
00:34:03,920 --> 00:34:07,920
है इसलिए वो अनंत सामर्थ्य वान है तो ये दो चार वर्ड ऐड क्यों हो रहे हैं

490
00:34:07,920 --> 00:34:11,960
उसके साथ चलो हम इन वर्ड को हटा देते हैं केवल इतना ही

491
00:34:11,960 --> 00:34:16,600
रखते हैं कि परमात्मा जो है अनंत है और सामर्थ्य

492
00:34:16,600 --> 00:34:20,720
वान अनंत है सामर्थ्य वान नहीं ये मान सकते हैं कि भाई वो क्योंकि सारी

493
00:34:20,720 --> 00:34:24,720
सृष्टि में है तो अनंत है अनंत सामर्थ्य वान नहीं है ये ये

494
00:34:24,720 --> 00:34:28,160
कह सकते हैं अनंत सामर्थ्य वान है वो अनंत

495
00:34:28,160 --> 00:34:33,000
सामर्थ करट कौन सा वर्ड हटाया अभी

496
00:34:33,000 --> 00:34:37,000
आपने नहीं अभी आपने चलो वर्ड हटा देते हैं अभी आपने

497
00:34:37,000 --> 00:34:41,000
कहाना एक वर्ड हटा देते हैं वो कौन सा वड हटाया करेक्ट कर

498
00:34:41,000 --> 00:34:45,680
देता हूं दोबारा से इसको अ

499
00:34:45,680 --> 00:34:50,400
सामर्थ अनंत सामर्थ शली हमने एक्से कर इसको

500
00:34:50,400 --> 00:34:54,560
अब इसको हमारे अब देखिए अभी क्या हुआ अभी

501
00:34:54,560 --> 00:34:58,840
आपने कहा चलिए एक वर्ड को हटा देते हैं अनंत है व अनंत सामर्थ

502
00:34:58,840 --> 00:35:02,840
वो सामर्थ नहीं है अनंत सामर्थ नहीं है अनंत है आपने बोला खल वो रिकॉर्डेड

503
00:35:02,840 --> 00:35:07,280
है वो दिख जाएगा रड कोई बात नहीं मैं दोबारा बता देता

504
00:35:07,280 --> 00:35:11,760
कोई कमेंट करके बताएगा क्या इन्होंने एक शब्द छोड़ा था

505
00:35:11,760 --> 00:35:15,800
क्या एक कोई कमेंट करके बताएगा इन्होंने एक शब्द छोड़ा है अभी

506
00:35:15,800 --> 00:35:19,960
अभी अभी छोड़ा था इसको फिर पकड़ लिया इन्होंने सामर्थ को पहले

507
00:35:19,960 --> 00:35:23,960
छोड़ा शिवान जी मैं यही बैठा हूं मैं कहीं

508
00:35:23,960 --> 00:35:27,960
नहीं गया हूं मैं दोबारा करेक्ट कर देता हूं इसका मतलब से

509
00:35:27,960 --> 00:35:32,160
गलती से हो गयाली है पर अरे भाई

510
00:35:32,160 --> 00:35:36,560
तो जब वो अनंत सामर्थ्य शली है तो आप ही तो कह रहे हो कि वो कुछ नियमों से बाउंड

511
00:35:36,560 --> 00:35:40,560
है तो फिर वह अनंत कैसे हुआ या तो बाउंड नहीं

512
00:35:40,560 --> 00:35:43,680
है या फिर अनंत नहीं है नहीं

513
00:35:43,680 --> 00:35:47,720
बाउंड तो उस रूप में वो परमात्मा विद्वान है

514
00:35:47,720 --> 00:35:52,280
तो अविद्या वाले गुणों से तो बाउंड हो गया आप कहेगे क्या वो अविद्या

515
00:35:52,280 --> 00:35:56,360
चोरी कर सकता परमात्मा नहीं कर सकता इस रूप में आप इसको बाउंड

516
00:35:56,360 --> 00:36:00,400
मान सकते हैं या परमात्मा बुराई नहीं कर सकता इसलिए वो

517
00:36:00,400 --> 00:36:04,840
बाउंड है तो ये

518
00:36:04,840 --> 00:36:09,040
परमात्मा बुरा करता हाय अंत आया

519
00:36:09,040 --> 00:36:13,280
उसकी सामर्थ का उसके गुणों के अनुसार आप इसको अंत

520
00:36:13,280 --> 00:36:16,480
नहीं कह

521
00:36:16,480 --> 00:36:20,560
सकते आपकी ऑडियंस में कोई जुड़ा हो तो डिस बोल रही

522
00:36:20,560 --> 00:36:25,440
है आशुतोष द्वेदी जी बोल रहे हैं मैं इसको बता देता हूं देखिए

523
00:36:25,440 --> 00:36:29,840
अनंत है सामर्थ वान नहीं है ये आपने

524
00:36:29,840 --> 00:36:33,880
बोला ठीक है आशुतोष बताया है

525
00:36:33,880 --> 00:36:39,880
कि अनंत है सामर्थ्य नहीं ऐसा बोला है

526
00:36:40,760 --> 00:36:44,960
दो मतलब आपकी जबान फसल गई है मान ले आपकी जुबान फिसल

527
00:36:44,960 --> 00:36:49,120
गई ये मान ले मान सकते हैं लेकिन मैं करेक्ट बारबार यही

528
00:36:49,120 --> 00:36:53,120
शुरू से यही विषय देने भाईब अगर ये बोला होगा तो

529
00:36:53,120 --> 00:36:57,840
तो आप क्या करेंगे अगर आपने बोला होगा यह वर्ड आपके मैं आपको वीडियो दिखा दूंगा

530
00:36:57,840 --> 00:37:01,880
तो आप क्या करेंगे जी क्या ये बहस का विषय

531
00:37:01,880 --> 00:37:05,960
है सामने जब व्यक्ति झूठ बात

532
00:37:05,960 --> 00:37:10,240
बोलने लगता है तो फिर तो बात बदल जाएगी ना हमारे बीच में कितनी स्वाध

533
00:37:10,240 --> 00:37:14,320
पूर्ण बात हो रही थी मगर आप अपनी कही हुई बात को भी छिपा रहे हैं आप बोल सकते

534
00:37:14,320 --> 00:37:18,600
हैं हा मेरे मुह से निकल गया आपर आप भी नहीं

535
00:37:18,600 --> 00:37:23,160
बो आप हमारे बड़े भाई है मैं फिर कह रहा हूं परमात्मा

536
00:37:23,160 --> 00:37:27,520
अनंत सामर्थ्य वाला समझ परमात्मा आपके अंगली अनत

537
00:37:27,520 --> 00:37:31,520
सामर्थ वान है मैं अभी समझ गया मैं पूछ रहा हूं आपने ये लाइन

538
00:37:31,520 --> 00:37:36,040
जो लिखी है अनंत आपने बोली कि नहीं बोली

539
00:37:36,040 --> 00:37:40,360
शिवांस जी मैं बार-बार एक बात कह रहा हूं उसी बात पर मैं अटल

540
00:37:40,360 --> 00:37:44,440
हूं और मैं आपको कह रहा हूं अब इसे बा नहीं ये

541
00:37:44,440 --> 00:37:48,480
लाइ मैं य मैं ये मान सकता हूं मेरे भाई मैं अपने आप

542
00:37:48,480 --> 00:37:52,720
को क्या बहरा मान लू आप एक बात बताओ मैं अपने आप को बहरा मान लू

543
00:37:52,720 --> 00:37:56,720
क्या मान लूने मेरे देखिए

544
00:37:56,720 --> 00:38:00,800
जोही ना जब बात अटकती है तो विषयात होता है अब मैं

545
00:38:00,800 --> 00:38:05,200
आपको विषय प कैसे लाऊ बारबार आपने अभी एक लाइन बोली अनंत

546
00:38:05,200 --> 00:38:09,360
है सामर्थ वान नहीं है यह आपने लाइन बोली आप कह सकते हैं कि हां

547
00:38:09,360 --> 00:38:13,360
वह मुंह से निकल गया मगर इस बारे में जवाब ना दे कर के बार-बार मैं अ

548
00:38:13,360 --> 00:38:17,440
भी बार-बार स्पष्ट मुझे स्पष्ट है कि आप अनंत सामर्थ्य वान बोल रहे मगर

549
00:38:17,440 --> 00:38:22,280
आपसे एक बार यह निकला है कि ईश्वर अनंत है सामर्थ्य वान नहीं है

550
00:38:22,280 --> 00:38:26,440
आपने बोला ऐसा शिवान जी ऐसा

551
00:38:26,440 --> 00:38:31,280
अगर बोला है मेरे सेय गलती हुई है मैं इसको ठीक कर रहा

552
00:38:31,280 --> 00:38:35,680
हूं ये है सच्चाई ये सच्चाई है ऐसे हम लोग आगे चल सकते

553
00:38:35,680 --> 00:38:40,320
हैं और एक पॉइंट इसम साथ में जोड़ सकता हूं

554
00:38:40,320 --> 00:38:44,400
इस दिशा में परमात्मा रावण की तरह अत्याचारी नहीं

555
00:38:44,400 --> 00:38:46,920
बन सकता अगर आप इसको अनंत

556
00:38:46,920 --> 00:38:51,120
ऐड करके काटेंगे तो उस रूप में ना काटिए

557
00:38:51,120 --> 00:38:55,200
बराई परमात्मा सर्वव्यापक

558
00:38:55,200 --> 00:38:59,280
जी जी बुराई सर्वव्यापक और

559
00:38:59,280 --> 00:39:03,320
आवश्यकता ठीक है तो अब हमारे

560
00:39:03,320 --> 00:39:07,520
पास अगले तीन पॉइंट है यह तो हमने देख लिया कि हमारे

561
00:39:07,520 --> 00:39:11,760
नजर में हम जो जानते हैं आपके बारे में कि

562
00:39:11,760 --> 00:39:15,760
आपका जो ईश्वर है आपके अनुसार जो ईश्वर है वह अनंत

563
00:39:15,760 --> 00:39:20,160
सामर्थ वान नहीं है मेरी जानकारी में मेरी जानकारी मैं आपकी लाइन नहीं बोल रहा हूं

564
00:39:20,160 --> 00:39:24,400
हमारी जानकारी में आपके अनुसार जो ईश्वर है वह अनंत सामर्थ

565
00:39:24,400 --> 00:39:28,800
वान नहीं है वो सर्वशक्तिमान नहीं है फिर भी आप लोग नहीं छोड़ते हैं

566
00:39:28,800 --> 00:39:32,800
अब हम आगे बढ़ रहे हैं आपका यह कहना है नहीं नहीं उसको नियमों से बाउंड

567
00:39:32,800 --> 00:39:36,840
तो है वो बुराई तो नहीं कर सकता वो अवतार तो नहीं ले सकता उसकी सामर्थ्य का अंत है मगर

568
00:39:36,840 --> 00:39:41,600
है वो अनंत सामर्थ्य वान यह हमारी जानकारी में आपकी अभी तक की व्याख्या है

569
00:39:41,600 --> 00:39:45,720
ठीक है आपकी व्याख्या य है नहीं आपकी व्याख्या क्या है वो तो आप बता ही

570
00:39:45,720 --> 00:39:50,040
चुके हैं बकुल सही कहा है परमात्मा अनंत

571
00:39:50,040 --> 00:39:54,320
सामर्थ्य शली है और आपने जिस अंग चलते

572
00:39:54,320 --> 00:39:59,000
आगे चलते अब बात आती है एक बात बहुत ब सुनने को मिली

573
00:39:59,000 --> 00:40:01,920
कि ईश्वर बुराई नहीं कर

574
00:40:01,920 --> 00:40:06,080
सकता बताए क्या यह सही है आर समाज का ईश्वर

575
00:40:06,080 --> 00:40:10,600
बुराई नहीं कर सकता बुरे कर्म अविद्या

576
00:40:10,600 --> 00:40:15,200
युक्त कर्म उस परमात्मा के अंतर्गत नहीं घट सकते

577
00:40:15,200 --> 00:40:19,240
जिस तरह आप कह रहे रावण भी ईश्वर है इस रूप में रावण ईश्वर नहीं

578
00:40:19,240 --> 00:40:23,320
हो सकता परमात्मा के बुरे कर्म मैं आपसे एक बात पूछ रहा

579
00:40:23,320 --> 00:40:28,880
हूं क्या ईश्वर बुराई कर सकता है या नहीं

580
00:40:28,880 --> 00:40:32,960
नहीं नहीं अच्छा तो संसार में

581
00:40:32,960 --> 00:40:38,120
जो बुराई करने वाले हैं बुराई को बनाना बुराई है कि

582
00:40:38,120 --> 00:40:42,760
नहीं अविद्या युक्त जो कार्य होते हैं बुरे कामों के अंतर्गत

583
00:40:42,760 --> 00:40:46,840
ग से सिंपल पूछ रहा हूं बुराई को बनाना बुराई मानते

584
00:40:46,840 --> 00:40:51,640
हैं कि नहीं जी बुराई को मानते हैं अभी

585
00:40:51,640 --> 00:40:56,240
बुराई को बनाना बुराई को बनाना बुराई है

586
00:40:56,240 --> 00:41:00,320
अविद्या कम मैं दोबारा

587
00:41:00,320 --> 00:41:05,280
पूछ लेता हूं बुराई को बनाना बुराई है कि नहीं

588
00:41:05,280 --> 00:41:09,280
दोबारा रिपीट करना बुराई को बनाना बुराई का निर्माण

589
00:41:09,280 --> 00:41:13,400
करना बुराई है कि नहीं

590
00:41:13,400 --> 00:41:18,040
बुराई शब्द से आपका क्या व्याख्या करेंगे बुराई

591
00:41:18,040 --> 00:41:22,400
श जैसे आपने रावण को जिन जिन कार्यों को करने के लिए दोषी

592
00:41:22,400 --> 00:41:26,760
बनाया रावण के जैसा व कार्य नहीं कर सकता है तो रावण

593
00:41:26,760 --> 00:41:31,000
को बना ने वाला यह जानते हुए कि रावण क्या करेगा रावण

594
00:41:31,000 --> 00:41:35,080
को बनाने वाला बुराई कर रहा है कि

595
00:41:35,080 --> 00:41:39,960
नहीं जी जो बुरे काम है जो बुरे काम है

596
00:41:39,960 --> 00:41:44,520
वे बुराई के अंतर्गत आते हैं और इसमें जो जीवात्मा है

597
00:41:44,520 --> 00:41:49,440
अच्छे और बुरे कर्म कर पूर्ण रूप से स्वतंत्र है तो जीवामा

598
00:41:49,440 --> 00:41:53,760
क्या मतलब मैंने पूछा क्या है हरि हरि प्रण हरि प्रणव जी

599
00:41:53,760 --> 00:41:57,960
मैंने आपसे पूछा क्या है आप मुझे क्या बता रहे हैं मैंने आपसे पूछा

600
00:41:57,960 --> 00:42:02,400
कि रावण बुराई करेगा अपनी जो उसकी जो चचेरी

601
00:42:02,400 --> 00:42:06,520
बहू है उसके साथ दुराचार करेगा यह जानते हुए

602
00:42:06,520 --> 00:42:11,160
भी उसको बनाने वाला रावण को क्या

603
00:42:11,160 --> 00:42:15,560
वह बुराई कर रहा है या नहीं बुराई को बनाना

604
00:42:15,560 --> 00:42:19,800
बुराई है या नहीं इस रूप

605
00:42:19,800 --> 00:42:23,880
में जो आप बोल रहे हैं भविष्य में प्रत्येक जीव उसी का

606
00:42:23,880 --> 00:42:28,160
मैं उत्तर दे रहा हूं प्रत्येक अपने कर्म

607
00:42:28,160 --> 00:42:32,440
करने में समत है छोटी सी बात छोटी सी बात जो व्याख्यान है

608
00:42:32,440 --> 00:42:33,040
वो पहले

609
00:42:33,040 --> 00:42:37,480
आप एक पंक्ति स्पष्ट कर द यह आपका मानना है फिर उसके सं

610
00:42:37,480 --> 00:42:42,080
संबंध में उसके समर्थन में आप अपना व्याख्यान पहले वो पंक्ति स्पष्ट कर दीजिए

611
00:42:42,080 --> 00:42:46,200
बुराई को बनाना बुराई है या नहीं

612
00:42:46,200 --> 00:42:50,480
बुराई को बनाना बुराई है हां अब अब आप आगे

613
00:42:50,480 --> 00:42:54,920
चलिए अब अब दिक्कत ये देखिए अब देखिए आपका व्याख्यान तो मैं सुन लूंगा

614
00:42:54,920 --> 00:42:58,920
उसमें कोई दिक्कत नहीं है जब आपने यही पर यह कह दिया कि बुराई को बनाना

615
00:42:58,920 --> 00:43:02,920
बुराई है तो हमें तो कोई आपत्ति है नहीं आपकी इस पंक्ति से

616
00:43:02,920 --> 00:43:06,920
जो आपको इसके समर्थन में कोई व्याख्यान देना पड़े ठीक है हमें कोई

617
00:43:06,920 --> 00:43:11,040
आपत्ति बिल्कुल सही बात है बुराई को बनाना भी बुराई है तो अगला प्रश्न

618
00:43:11,040 --> 00:43:15,840
यह आता है कि रावण आदि को बना कौन रहा

619
00:43:15,840 --> 00:43:20,280
है प्रत्येक जीव को परमात्मा बना रहा है प्रत्येक जीव को

620
00:43:20,280 --> 00:43:24,600
तो फिर वो भी बुराई कर रहा उसका बुराई करना सिद्ध हो गया आपकी पंक्ति

621
00:43:24,600 --> 00:43:28,640
से नहीं जी इससे सिद्ध नहीं होता जी क्योंकि प्रत्येक

622
00:43:28,640 --> 00:43:32,720
जीव मैंने जीव का आपको बताया था कर्म करने में स्वतंत्र

623
00:43:32,720 --> 00:43:36,840
है तो रावण और आजकल जितने भी रेप हो र ये रेप करने में

624
00:43:36,840 --> 00:43:41,080
स्वतंत्र है लेकिन इनका फल भोगने में परतंत्र है प्रथम

625
00:43:41,080 --> 00:43:45,080
कार्य राज व्यवस्था का नियंत्र करने में स्वतंत्र है मैं

626
00:43:45,080 --> 00:43:48,480
समझ गया रावण यह बुरा कर्म

627
00:43:48,480 --> 00:43:53,000
करेगा बांग्लादेश में किसी बच्ची के साथ दुराचार

628
00:43:53,000 --> 00:43:57,240
होगा यह ईश्वर को पता है कि नहीं पहले से बनाने

629
00:43:57,240 --> 00:44:00,400
से

630
00:44:00,400 --> 00:44:04,680
पहले परमात्मा को इस विषय की जानकारी अनंत

631
00:44:04,680 --> 00:44:09,000
सामर्थ वाला है तो जानकारी है जैसे जैसे मनुष्य

632
00:44:09,000 --> 00:44:13,640
के फिर भी बना रहा है फिर भी बना रहा है

633
00:44:13,640 --> 00:44:17,640
सर जानकारी यानी यानी की उसको मालूम है ये आगे जाकर के

634
00:44:17,640 --> 00:44:22,040
क्या करेगा फिर भी बना रहा है ना तो यहां पर फील होने

635
00:44:22,040 --> 00:44:26,280
तो यहां पर वो फ्रीविल वाली बात तो रह ही नहीं गई उसको पता ना होता कि वो क्या करेगा

636
00:44:26,280 --> 00:44:30,360
तब तो बात थी उसको तो पता है बुराई करेगा फिर भी बना रहा है

637
00:44:30,360 --> 00:44:34,560
तो यह क्या हु एक बार द्विवेदी जी यह विषय क्लियर

638
00:44:34,560 --> 00:44:38,560
कीजिए हमारा इस विषय की डि ये जो डिबेट

639
00:44:38,560 --> 00:44:42,600
में विषय चल रहा है इससे हमारे

640
00:44:42,600 --> 00:44:46,840
व्यवस्था में हमारे विषय निर्धारित हुए थे उनसे क्या लेना देना

641
00:44:46,840 --> 00:44:51,080
क्योंकि उससे लेना देना है आपने यह तर्क दिया कि ईश्वर बुराई

642
00:44:51,080 --> 00:44:55,440
नहीं कर सकता तो मैं आपके ईश्वर के द्वारा भी बुराई होना सिद्ध करके दिखा रहा

643
00:44:55,440 --> 00:44:59,560
हूं आर स दरा आ समाज ने

644
00:44:59,560 --> 00:45:03,560
सुनि आर समाज ने जिस रूप में ईश्वर को स्वीकार किया

645
00:45:03,560 --> 00:45:07,680
उस रूप में भी ईश्वर के द्वारा बुराई होना सिद्ध करके दिखा रहा हूं या तो आपको यह मानना पड़ेगा

646
00:45:07,680 --> 00:45:13,680
कि व भविष्य नहीं

647
00:45:15,400 --> 00:45:18,480
जानता

648
00:45:18,480 --> 00:45:22,480
देता है दूसरी बात अब मैं आपको बता रहा हूं इस

649
00:45:22,480 --> 00:45:27,640
बारे में सत्यार्थ प्रकाश में क्या तर्क दिया गया है वो मैं आपको बता रहा हूं

650
00:45:27,640 --> 00:45:31,680
यदि सत्यार्थ प्रकाश में तर्क यह दिया था जिससे मैं संतुष्ट नहीं

651
00:45:31,680 --> 00:45:35,720
हो सका कि यदि कहीं से

652
00:45:35,720 --> 00:45:39,800
कोई खनिज नि निकाल रहा है और खनिज यानी लोहा

653
00:45:39,800 --> 00:45:43,840
लोहा निकाल लिया ठीक है लोहा निकाल कर

654
00:45:43,840 --> 00:45:48,760
के उसने आगे मार्केट में बेच दिया उस लोहे का एक

655
00:45:48,760 --> 00:45:53,040
हथियार बनाया गया ठीक है तलवार बनाई

656
00:45:53,040 --> 00:45:57,760
हा क्या कह र तलवार बनाई गई

657
00:45:57,760 --> 00:46:02,120
एक मिनट बनाने वा अरे मैं बता रहा हूं मुझे बताने दीजिए

658
00:46:02,120 --> 00:46:06,120
उस लोहे का एक लोहे की एक तलवार बनाई गई

659
00:46:06,120 --> 00:46:10,240
तलवार बनाने के बाद उस तलवार से किसी

660
00:46:10,240 --> 00:46:14,920
और ने थर्ड पर्सन ने हत्या कर दी बुराई कर दी

661
00:46:14,920 --> 00:46:18,680
तो यहां पर जो व्यक्ति जमीन से लोहा निकाल कर के बेच

662
00:46:18,680 --> 00:46:23,120
रहा है मार्केट में वो उस हत्या का दोषी नहीं हुआ ठीक है

663
00:46:23,120 --> 00:46:27,280
नहीं है ये सत्या प्रकाश में तर्क दिया गया है अब इस तर्क

664
00:46:27,280 --> 00:46:31,400
से मैं संतुष्ट इसलिए नहीं हुआ कि वो जो लोहार है वो यह नहीं जानता

665
00:46:31,400 --> 00:46:35,520
कि वो किसको बेच रहा है वो उससे क्या बनाएगा और वो जो बेच जो

666
00:46:35,520 --> 00:46:40,480
बनाने वाला है वो ये नहीं जानता कि इससे रक्षा होगी या इससे दमन होगा

667
00:46:40,480 --> 00:46:44,480
मगर जो ईश्वर है वो लोहार के जैसा नहीं है उसको मालूम है कि

668
00:46:44,480 --> 00:46:48,640
तलवार ये लोहा कहां जाएगा उससे क्या होगा उससे तलवार बनेगी

669
00:46:48,640 --> 00:46:53,000
कि नहीं बनेगी या उससे सब्जी काटने का चाकू बनेगा और

670
00:46:53,000 --> 00:46:57,840
उसके भी आगे वो ये जानता है कि उससे कौन क्या लेकर के क्या-क्या कार्य करेगा

671
00:46:57,840 --> 00:47:02,200
तो यहां पर लोहार को मुक्त किया जा सकता है इस दोष से कि उसने हत्या

672
00:47:02,200 --> 00:47:06,280
की मगर यदि इसको हम बुराई मानते हैं ईश्वर

673
00:47:06,280 --> 00:47:10,520
के परिपेक्ष से भी अगर हम इसको बुराई में लेते हैं तो यह बुराई

674
00:47:10,520 --> 00:47:14,560
भी ईश्वर से जुड़ जाएगी क्योंकि ईश्वर ने जानते हुए

675
00:47:14,560 --> 00:47:18,560
कि उस लोहे से कौन क्या क्या करेगा उसने उस लोहे को मार्केट में दे

676
00:47:18,560 --> 00:47:22,680
दिया इसलिए मैं इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुआ आपके पास कोई

677
00:47:22,680 --> 00:47:26,920
और तर्क हो तो बताइए यह दंड व्यवस्था

678
00:47:26,920 --> 00:47:30,920
के सं धर्म में एग्जांपल दिया गया था ऋषि ध्यान के द्वारा

679
00:47:30,920 --> 00:47:34,240
और इसमें बताया गया था जिस तरह लोहा

680
00:47:34,240 --> 00:47:38,320
लोहा निकालने वाला एक खान से बनाने वाला और

681
00:47:38,320 --> 00:47:42,320
उससे खरीदकर हत्या करने वाला इन तीनों में केवल हत्या करने वाला

682
00:47:42,320 --> 00:47:46,520
ही दोषी होता है अन्य नहीं ता के संदर्भ में नहीं है यह

683
00:47:46,520 --> 00:47:50,600
स्पष्ट है ये ईश्वर विषयक प्रश्न है कि ईश्वर बुरे काम क्यों होने

684
00:47:50,600 --> 00:47:54,800
देता है जब वहां पर फ्रीविल की बात हो रही थी करने

685
00:47:54,800 --> 00:47:59,200
वाला ही दोषी होता है हां तो फिर बात यही है ना कि वो जो लोहार

686
00:47:59,200 --> 00:48:03,240
है उसको नहीं मालूम है कि वो उससे तलवार बनाई जाएगी और उस वो आगे

687
00:48:03,240 --> 00:48:07,360
कोई कातिल होगा हत्यारा होगा जो उस तलवार से वध करेगा हत्या करेगा

688
00:48:07,360 --> 00:48:11,880
मगर ईश्वर को मालूम है मगर ईश्वर को मालूम है इससे क्या क्या

689
00:48:11,880 --> 00:48:16,160
होगा तो इसलिए ईश्वर इससे अलग नहीं रहेगा अब इसमें मेरा उत्तर सुन लीजिए

690
00:48:16,160 --> 00:48:20,280
मेरा भी उत्तर सुन लीजिए बताइए हां इसमें मेरा

691
00:48:20,280 --> 00:48:24,280
उत्तर सुन लीजिए कि भगवान ने एक बात कही है हालांकि

692
00:48:24,280 --> 00:48:28,360
मैं प्रमाण में बात नहीं कर रहा हूं फिर भी मैं एक बात भगवान ने एक बात कही

693
00:48:28,360 --> 00:48:32,440
मैं सभी कर्मों से लिप्त होते हुए भी कर्मों में लिप्त नहीं होता

694
00:48:32,440 --> 00:48:36,720
उसका एग्जांपल दे रहा हूं ईश्वर के लिए इस दुनिया

695
00:48:36,720 --> 00:48:40,720
में कोई अच्छाई बुराई नहीं है उसने इसको इक्वली बनाया

696
00:48:40,720 --> 00:48:45,120
है ईश्वर की दृष्टि में वह कुछ गलत नहीं कर रहा है जो भी दुनिया में अच्छाई

697
00:48:45,120 --> 00:48:49,320
बुराई है वह हमारे लिए है अब इसको हम समझ सकते हैं कैसे

698
00:48:49,320 --> 00:48:53,320
जैसे अभी मैंने कल एक आज एक शॉट डाला है वहा ा पर उसमें

699
00:48:53,320 --> 00:48:57,720
क्या था कि मान लीजिए कोई जीवात्मा यहां

700
00:48:57,720 --> 00:49:01,760
से मुक्त हो जाती है इतनी धारणा तो आपके यहां भी है मुक्त होने की ठीक

701
00:49:01,760 --> 00:49:05,800
है बकुल है अब जब वोह जो आत्मा है वह

702
00:49:05,800 --> 00:49:10,120
जो मुक्त हो गई है उसके परिवार के साथ यहां

703
00:49:10,120 --> 00:49:14,120
पर भूकंप हो रहा है प्रलय आ रही है उसको दुख

704
00:49:14,120 --> 00:49:18,240
तकलीफ दर्द हो रहा है उसका परिवार वही उसकी पत्नी वही उसकी

705
00:49:18,240 --> 00:49:22,400
माता वही उसकी बहने वही उसकी बेटी वही उसका भाई वही उसके पिता यहां

706
00:49:22,400 --> 00:49:26,400
पर दुख भोग रहे हैं जब तक वो यहां पर था उसको भी दुख

707
00:49:26,400 --> 00:49:30,440
होता था उसकी माता और पत्नी को अगर दुख होता था तो अभी वो

708
00:49:30,440 --> 00:49:34,960
जो मुक्त हो गया तो क्या अभी जब वो मुक्त हो गया तो क्या उसको दुख

709
00:49:34,960 --> 00:49:38,960
होगा नहीं होगा नहीं होगा क्यों नहीं होगा

710
00:49:38,960 --> 00:49:43,160
क्योंकि यहां के जो प्रपंच है वास्तविकता में वो मूल वो

711
00:49:43,160 --> 00:49:47,160
ओरिजनलिटी है ही नहीं वो प्रपंच यहां के लोगों के लिए सुख

712
00:49:47,160 --> 00:49:51,480
दुख अच्छाई बुराई यहां के लोगों के लिए है इसी प्रकार से जब मुक्त

713
00:49:51,480 --> 00:49:55,480
आत्मा को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है क्या अच्छा है क्या बुरा ईश्वर को कैसे

714
00:49:55,480 --> 00:50:00,080
फर्क पड़ेगा क्या अच्छा है क्या बुरा वो जो अच्छाई बुराई है वो हमारी दृष्टिकोण

715
00:50:00,080 --> 00:50:04,280
से है ईश्वर के दृष्टिकोण से सब प्रपंच है खेल

716
00:50:04,280 --> 00:50:04,780
है

717
00:50:04,560 --> 00:50:08,680
तमाशा है तो इसलिए वो जो दोष है वो

718
00:50:08,680 --> 00:50:12,920
दोष ही नहीं हुआ ईश्वर क्योंकि ईश्वर की दृष्टि में तो ये सब खेल

719
00:50:12,920 --> 00:50:17,080
है कुछ नहीं हमको लगता है कि नहीं अच्छा हो रहा है ये बुरा हो रहा है

720
00:50:17,080 --> 00:50:21,120
तो जब मुक्त आत्मा के लिए अच्छाई बुराई नहीं है संसार में तो ईश्वर के लिए

721
00:50:21,120 --> 00:50:25,200
अच्छाई बुराई कैसे है बिल्कुल

722
00:50:25,200 --> 00:50:29,240
जी है ना तो इसका यह है तो अभी

723
00:50:29,240 --> 00:50:33,840
दोबारा पॉइंट पर आ जाते हैं कि आगे

724
00:50:33,840 --> 00:50:38,040
हां आपने जो तर्क दिया था कि बुराई नहीं कर सकता तो यहां

725
00:50:38,040 --> 00:50:42,160
पर बुराई करने वाले को बुराई को जन्म देकर के ईश्वर भी बुराई से लिप्त

726
00:50:42,160 --> 00:50:46,320
हो रहा है तो इस आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि नहीं ईश्वर ये काम नहीं कर सकता

727
00:50:46,320 --> 00:50:50,400
दूसरे पर दूसरे पर बात करते हैं सर्वव्यापक ठीक

728
00:50:50,400 --> 00:50:54,840
है जी जी हां सर्वव्यापक पर बात करते

729
00:50:54,840 --> 00:50:59,040
हैं अब सर्व व्यापक में बात ये आ जाती है वैसे जो

730
00:50:59,040 --> 00:51:03,200
हमारे जो आचार्य गण है जो जगतगुरु शंकराचार्य पूज्य करपाती जी महाराज भक्ति

731
00:51:03,200 --> 00:51:07,360
सुदा में उन्होंने बताया अवतार रहस्य में गुरुदेव की जो

732
00:51:07,360 --> 00:51:11,840
गुरुदेव का ग्रंथ है अवतार रहस्य उसमें उन्होंने समझाया कि

733
00:51:11,840 --> 00:51:15,920
ईश्वर के अवतार और उसका जो सर्वव्यापक रूप है उसमें

734
00:51:15,920 --> 00:51:20,200
केवल एक अंतर है कि उसका जो अवतार है वह उसका आविर्भव

735
00:51:20,200 --> 00:51:24,320
है और जो उसका बाकी का रूप है वो है मगर वो तिरो

736
00:51:24,320 --> 00:51:28,400
भाव है ईश्वर ने कुछ ऐसे इफेक्ट पैदा कि अगर हम यहां से

737
00:51:28,400 --> 00:51:32,560
देखें तो भौतिक इफेक्ट जिसके कारण वो जो पूरा रूप हमें

738
00:51:32,560 --> 00:51:36,720
अनंत दिखाई दे रहा था उसके बीच में एक बाधा आने लगी एक स्ट्रक्चर बन

739
00:51:36,720 --> 00:51:40,920
गया और उस स्ट्रक्चर के माध्यम से ईश्वर आदान प्रदान कर रहा

740
00:51:40,920 --> 00:51:45,000
है हमसे संदेश का इसलिए व अवतार कहलाया

741
00:51:45,000 --> 00:51:49,160
अब हम यह भी नहीं कह सकते कि वोह पूर्ण ईश्वर नहीं है क्यों क्योंकि वह अलग

742
00:51:49,160 --> 00:51:53,320
नहीं हुआ है लक्षण साम में से वस्तु साम में जो वो चाहेगा

743
00:51:53,320 --> 00:51:57,480
वो अभी भी वो कर सकता है तो उसको अवतार कहा वो जो एक बाधा

744
00:51:57,480 --> 00:52:01,960
जैसी हमारी दृष्टि और जोय सर्वव्यापक जैसे आकाश

745
00:52:01,960 --> 00:52:06,480
आकाश जो होता है वह अनंत है ठीक है मगर हमारी

746
00:52:06,480 --> 00:52:10,960
आंखों के सामने एक बाधा बनाई गई कमरे की और उसमें

747
00:52:10,960 --> 00:52:15,000
खिड़की नुमा स्थान खाली छोड़ दिया गया उससे

748
00:52:15,000 --> 00:52:19,200
भी आकाश दिख रहा है यह जो खिड़की रूमा जो स्थान

749
00:52:19,200 --> 00:52:23,720
है खाली स्थान इससे जो हमें ईश्वर दिखाई दे रहा है ये

750
00:52:23,720 --> 00:52:28,520
इससे जो हमें आकाश दिखाई दे रहा है यह आकाश का का अवतार है

751
00:52:28,520 --> 00:52:32,600
आकाश के साथ हम कनेक्ट होते हैं यह तो हमारी व्याख्या है

752
00:52:32,600 --> 00:52:35,640
मैंने इसलिए कहा कि आपकी व्याख्या क्या है वो भी बता दे

753
00:52:35,640 --> 00:52:39,680
अब मैं सवाल यह करता हूं वापस बन जाता हूं जिज्ञासु ठीक है

754
00:52:39,680 --> 00:52:43,680
अब मैं आपसे सवाल ये करता हूं कि इसका मतलब यह है कि जो

755
00:52:43,680 --> 00:52:48,080
सर्वव्यापक है वह एक देशीय नहीं हो सकता यह आपका कहना

756
00:52:48,080 --> 00:52:52,200
यही कहना है ना कि जो सब जगह है वो एक जगह कैसे हो सकता

757
00:52:52,200 --> 00:52:56,800
है यानी कि यहां पर हम तर्क पर जानना चाह रहे हैं कि ईश्वर

758
00:52:56,800 --> 00:53:01,360
कैसे ले सकता है तक पर एक तरीके से साइंटिफिक पैरामीटर्स पर

759
00:53:01,360 --> 00:53:05,840
है ना यही हुआ ना अच्छा

760
00:53:05,840 --> 00:53:09,960
अब मैं आपसे पूछता हूं ईश्वर ने अथुनी सृष्टि की रचना

761
00:53:09,960 --> 00:53:15,200
कैसे की पहला इंसान कैसे

762
00:53:15,200 --> 00:53:19,200
बनाया साइंटिफिक तरीके से बनाया साइंटिफिक तरीके

763
00:53:19,200 --> 00:53:23,240
से बनाया या फिर अपनी अनंत सामर्थ्य से

764
00:53:23,240 --> 00:53:27,520
बनाया इसका जवाब द्विवेदी जी हमें मिल है कि अक्सर

765
00:53:27,520 --> 00:53:31,800
एक क्वेश्चन खड़ा होता है कि पहले मुर्गी आई या अंडा आया मैं ये

766
00:53:31,800 --> 00:53:35,920
नहीं भाई साहब मैं मुर्गी अंडे पर नहीं जा रहा हूं मैं यह कह रहा हूं

767
00:53:35,920 --> 00:53:40,400
ईश्वर ने जो पहला इंसान बनाया व वज्ञान के नियम पर बनाया

768
00:53:40,400 --> 00:53:45,040
विज्ञान का नियम है इंसान बनने का स्त्री और पुरुष जो है आपस में

769
00:53:45,040 --> 00:53:49,320
संबंध मेल और फीमेल का संबंध है उससे बनता है ठीक है तो पहला

770
00:53:49,320 --> 00:53:50,920
इंसान ऐसे बनाया

771
00:53:50,920 --> 00:53:55,440
या फिर उसने अपने आप बना दिया बिना किसी साइंस के नियम के बिना किसी तर्क

772
00:53:55,440 --> 00:53:59,600
के द्विवेदी जी पहले तो इस विषय को क्लियर कीजिए

773
00:53:59,600 --> 00:54:04,080
आप कि जो आज की हमारी मॉडर्न साइंस है वो ईश्वर

774
00:54:04,080 --> 00:54:08,080
की शक्तियों की व्यवस्थाओं की और यहां तक कि आत्मा तक

775
00:54:08,080 --> 00:54:12,120
भी कैचिंग में नहीं है उनके और इन विषयों

776
00:54:12,120 --> 00:54:16,120
पर कर बत अच्छी बात कही ये तो बहुत अच्छी बात कही ये

777
00:54:16,120 --> 00:54:20,480
तो आपने बहुत अच्छी बात कही तो इसका अर्थ ये है कि हमें आज जो साइंस प्राप्त

778
00:54:20,480 --> 00:54:24,520
है उसके आधार पर हम ईश्वर के सभी चीजों को नहीं समझ सकते तो फिर वहां पर

779
00:54:24,520 --> 00:54:29,320
यह तर्क भी खत्म हो जाता है कि वो सर्व होते हुए एक देशीय कैसे हो सकता है

780
00:54:29,320 --> 00:54:33,440
या फिर आप यह कहिए नहीं उतने तर्क तो माने जाएंगे जो आ समाज

781
00:54:33,440 --> 00:54:37,560
कहेगा बाकी न कर देंगे पूरा कर

782
00:54:37,560 --> 00:54:41,880
दीजिए पूरा करने दीजिए तो वहां पर जो

783
00:54:41,880 --> 00:54:46,360
शरू में सृष्टि होती है कहते हैं अनादि काल की सृष्टि है

784
00:54:46,360 --> 00:54:51,120
शुरुआत तो कहीं से अवश्य हुई होगी तो उसमें जब

785
00:54:51,120 --> 00:54:55,280
विषय आता है तो यही आता है मुर्गी और अंडे वाला तो कहते

786
00:54:55,280 --> 00:54:59,440
मुर्गी पहले अ पहले आया तो विद्वानों ने भी यही विषय

787
00:54:59,440 --> 00:55:03,440
दिया कि पहले मुर्गी आई अगर अंडा दे दिया तो पालन पोषण कौन करेगा व

788
00:55:03,440 --> 00:55:06,040
भी युवावस्था में ऐसे ही सृष्टि

789
00:55:06,040 --> 00:55:10,120
का जो तक सत्या प्रकाश में मेंशन है और न

790
00:55:10,120 --> 00:55:14,440
का जो मंतव्य था उसमें यही था कि शुरुआत में परमात्मा

791
00:55:14,440 --> 00:55:18,520
अवश्य ही पूर्ण मनुष्य उतारे हैं पूर्ण नहीं उतारे

792
00:55:18,520 --> 00:55:22,560
का बुजुर्ग उतार आ का आंसर आएगा रमण

793
00:55:22,560 --> 00:55:26,640
आर जी इस सवाल का आंसर आएगा और आप अपने ने जो

794
00:55:26,640 --> 00:55:30,680
प्रश्न है वो बिना ये जो खिलखिला वाले जो चेहरे होते हैं इनके बिना भी कर सकते

795
00:55:30,680 --> 00:55:34,800
हैं देखिए कितनी स्वार्थ पूर्ण बातें हो रही है तो आपको अपने जो भाई

796
00:55:34,800 --> 00:55:38,960
है आपके आर समाजी हैं उनका प्रोत्साहन उनका मनोबल बढ़ाना चाहिए अच्छे

797
00:55:38,960 --> 00:55:43,200
तरीके से बात रख करके ना कि ये खिया खिया के आपको कहना चाहिए

798
00:55:43,200 --> 00:55:47,240
ठीक है तो इस पर हम आ रहे हैं इस पर हम आ रहे हैं कि वो उसके बिना ये नहीं

799
00:55:47,240 --> 00:55:51,400
कर सकता क्या कर सकता है हमारे लिए हम हम

800
00:55:51,400 --> 00:55:55,840
व्यवहार उसके लिए कैसे करेंगे उसके लिए ईश्वर का अवतार होता है उसको आवश्यकता नहीं है

801
00:55:55,840 --> 00:55:59,840
ठीक है चलिए मैं इस इस विस्तृत तरीके से हम लोग बात करेंगे इस क्वेश्चन

802
00:55:59,840 --> 00:56:04,720
प आप अपनी बात बोलिए विषय को पूरा

803
00:56:04,720 --> 00:56:08,920
कर कहते हैं उनके अनुसार है कि अवश्य ही

804
00:56:08,920 --> 00:56:13,640
पूर्ण अवस्ता में युवावस्था में पुरुष

805
00:56:13,640 --> 00:56:17,920
और महिला और अन्य जो आपके जीव जंतु युवावस्था में उन्होंने अवश्य

806
00:56:17,920 --> 00:56:21,720
उतारे थे तभी सृष्टि आगे कंटिन्यू हो पाई थी

807
00:56:21,720 --> 00:56:26,960
और परमात्मा की जहां तक आप आज की साइंस के अकॉर्डिंग इसको

808
00:56:26,960 --> 00:56:30,960
कवर करेंगे तो कहीं कहीं असंभव प्रतीत होगा यह क्योंकि

809
00:56:30,960 --> 00:56:35,360
उसका सामर्थ्य अनंत है अभी तक हम उसको पूर्ण नहीं जान मलब तक

810
00:56:35,360 --> 00:56:39,400
के आधार पर आर समाज के द्वारा भी प्रतिपादित होने वाली

811
00:56:39,400 --> 00:56:43,600
ईश्वर के कई कार्य ऐसे हैं जो तर्क के आधार पर सिद्ध नहीं हो सकता वहां

812
00:56:43,600 --> 00:56:48,080
पर हमें ईश्वर की अनंत सामर्थ वान अनंत सामर्थ्य का ही आधार

813
00:56:48,080 --> 00:56:52,280
मानना पड़ेगा यही तो हो गया तक के आधार

814
00:56:52,280 --> 00:56:56,520
पर मैं दोबारा दोबारा क्लियर कर देता हूं मैं दोबारा क्लियर कर देता हूं

815
00:56:56,520 --> 00:57:00,520
के आधार पर आर्य समाज के द्वारा भी ईश्वर द्वारा किए जाने

816
00:57:00,520 --> 00:57:04,640
वाले जो कार्य हैं है ना उनको पूर्ण तरीके

817
00:57:04,640 --> 00:57:08,800
से तर्क के आधार पर नहीं अपनाया जा सकता उनके लिए भी हमको

818
00:57:08,800 --> 00:57:12,840
कहीं कहीं पर ईश्वर की सर्व सामर्थ होता को

819
00:57:12,840 --> 00:57:17,040
आधार बनाना पड़ेगा सही कह रहा हूं और बनाया भी है

820
00:57:17,040 --> 00:57:21,080
ऋगवेद भूमिका में सुनिए बनाया भी है ऋग्वेद आदि

821
00:57:21,080 --> 00:57:25,280
भाष्य भूमिका में जब पूर्व पक्ष के रूप में

822
00:57:25,280 --> 00:57:29,520
दयानंद जी ने ये रखा कि उसका मुख नहीं है वो बोल कैसे सकता

823
00:57:29,520 --> 00:57:33,520
है तो उन्होंने कहा वोह सर्व सामर्थ मान है यहां उन्होंने तर्क नहीं दिया

824
00:57:33,520 --> 00:57:36,840
कोई उन्होंने कहा वोह सर्व सामर्थ्य वान यानी कि

825
00:57:36,840 --> 00:57:41,040
सर्व सामर्थ्य वान होना ही काफी है ईश्वर द्वारा किसी भी प्रकार

826
00:57:41,040 --> 00:57:45,320
के कार्य की सिद्धि के लिए तो जब वह अपने जो उन्होंने चुने

827
00:57:45,320 --> 00:57:49,720
हैं उन कार्यों के लिए सर्व सामर्थ को आधार बना रहे हैं तो फिर अवतार

828
00:57:49,720 --> 00:57:53,720
के लिए क्यों अटका रहे हैं कि इसमें भी लॉजिक चाहिए हमें तो

829
00:57:53,720 --> 00:57:58,040
द्विवेदी जी मैं विषय अवतार का कवर कर दे ह इसमें समस्या

830
00:57:58,040 --> 00:58:02,240
क्या आती है अवतार शब्द मुख्य रूप से हमें दृष्टि गोचर

831
00:58:02,240 --> 00:58:06,360
होता है एक पंक्ति बता दू समस्या क्या है मैं

832
00:58:06,360 --> 00:58:10,520
एक पंक्ति बोलू समस्या क्या है समस्या यह है कि तर्क को

833
00:58:10,520 --> 00:58:14,600
जो आप तर्क दे रहे हैं वो सर्वव्यापी है मगर एक देसी कैसे हो सकता है उसके बारे में व्याख्या है

834
00:58:14,600 --> 00:58:18,720
कैसे हो सकता है व बात अलग है और तमाम सारी व्याख्या मगर तर्क को आधार

835
00:58:18,720 --> 00:58:22,720
बना कर के ईश्वर द्वारा किसी के किसी प्रकार के कार्य को

836
00:58:22,720 --> 00:58:26,800
झुट नहीं जा सकता तक तर्क को आधार बना कर के क्यों कई जगह

837
00:58:26,800 --> 00:58:31,120
पर आर्य समाज ने भी त तर्क को हटाया ईश्वर की सर्व सामर्थ

838
00:58:31,120 --> 00:58:35,400
को डाल दिया है ठीक है तो जी अब आप बताइए

839
00:58:35,400 --> 00:58:39,680
अपनी बात तो अवतार विषय पर जो समस्या आती है

840
00:58:39,680 --> 00:58:44,240
वह पुराणों में मुख्य रूप से इसका चिंतन मिलता है परमात्मा

841
00:58:44,240 --> 00:58:48,240
बात कर नहीं रहा पुराणों की बात नहीं कर रहा आपि बात बोलिए पुराणों की बात

842
00:58:48,240 --> 00:58:52,040
नहीं कर रहा हूं मैंने बोला क्या पुराण

843
00:58:52,040 --> 00:58:56,280
और दूसरा पुराणों के बाद विष्णु बमा

844
00:58:56,280 --> 00:59:00,600
से सृष्टि फिर शिव पुराण में शिव से सृष्टि और इसके

845
00:59:00,600 --> 00:59:05,240
बाद जब रामायण और महाभारत लेखन

846
00:59:05,240 --> 00:59:09,760
सारे सवालों के देखिए ये वो वाली बात हो गई फिर से वही कि आपके

847
00:59:09,760 --> 00:59:13,840
इन चीजों की वजह से हम अवतार को नहीं मानते भाई इन चीजों को समझने

848
00:59:13,840 --> 00:59:17,880
के लिए क्या आप इन चीजों को मानने वाले ऑथेंटिक जगह पर

849
00:59:17,880 --> 00:59:22,320
गए परंपरा प्राप्त आचार्य के पास गए पुराण

850
00:59:22,320 --> 00:59:26,600
को माना जा रहा है दयानंद जी से पहले से तो जो उनके परंपरा

851
00:59:26,600 --> 00:59:31,080
प्राप्त मठ है मंदिर है वहां आप गए कि मुझे समझा दीजिए शंकराचार्य जी

852
00:59:31,080 --> 00:59:35,120
जगतगुरु रामानुजाचार्य जी आप मुझे समझा दीजिए यह अवतार का मुझे समझ में नहीं आ

853
00:59:35,120 --> 00:59:39,400
रहा है इसमें विष्णु बना रहे हैं इसमें शिव बना रहे हैं आप गए तो

854
00:59:39,400 --> 00:59:43,400
हमारी चीज गलत हमारी चीजें आप जान नहीं सके कि क्या सही है

855
00:59:43,400 --> 00:59:49,080
क्या गलत है इसकी इसके आधार पर आप निर्णय नहीं दे

856
00:59:49,080 --> 00:59:53,280
सकते आर्य समाज गुरु परंपरा को मानता है वो अगला

857
00:59:53,280 --> 00:59:57,360
पार्ट वो अगला पार्ट है इसमें मत लाइए गुरु परंपरा मैं ये कह रहा हूं

858
00:59:57,360 --> 01:00:01,560
अगर आपने पुराणों को लेकर के शिव विष्णु के द्वारा षष्टि को लेकर

859
01:00:01,560 --> 01:00:05,840
के कोई अपने दिमाग में धारणा सिद्ध की

860
01:00:05,840 --> 01:00:07,280
निर्मित की तो क्या

861
01:00:07,280 --> 01:00:11,320
उसको आपने वेरीफाई कराया जैसे कि

862
01:00:11,320 --> 01:00:15,360
मैं अभी कह दूं मैं अभी कह दूं मैं अभी कह दूं कि बास्केटबॉल खेलने

863
01:00:15,360 --> 01:00:20,120
से मोक्ष मिलता है ऐसा दयानंद जी ने कहा है

864
01:00:20,120 --> 01:00:24,560
तो इसको मैं यूं ही मान लू या पर्टिकुलर आर्थ समाज का जो प्रमाणिक

865
01:00:24,560 --> 01:00:29,160
तरीका है मानने का तब मानू कि यूं ही मान लू

866
01:00:29,160 --> 01:00:33,560
परमाणु से ही परीक्षा करनी पड़ेगी तभी मानना पड़ेगा हा तो मुझे

867
01:00:33,560 --> 01:00:37,600
अगर मान लीजिए अगर मान लीजिए सत्यार्थ प्रकाश नामक बुक एक किसी ने

868
01:00:37,600 --> 01:00:41,640
छाप दी और उसमें लिख दिया कि गिल्ली डंडा खेलने से मोक्ष मिल जाएगा ऐसा

869
01:00:41,640 --> 01:00:45,680
नंद जी ने लिखा है तो मैं उसको मान लू

870
01:00:45,680 --> 01:00:50,560
नहीं मानना चाहिए परमाणु से परीक्षा करनी चाहिए कैसे कैसे कैसे तय करूंगा

871
01:00:50,560 --> 01:00:54,960
सत्या प्रकाश असली है कि नकली मैं आपका जो अधिकृत कार्यालय होगा

872
01:00:54,960 --> 01:00:59,160
अधिकृत केंद्र होगा वहां जाऊंगा वहां पूछताछ करूंगा भाई यह बात समझ

873
01:00:59,160 --> 01:01:03,160
में नहीं आ रही मुझे ये आप मुझे समझा दीजिए और अगर मैं ये नहीं कर रहा

874
01:01:03,160 --> 01:01:07,280
हूं अपने आप अपने घर पर बैठे बिठाए मैंने अपनी मंत्रणा कर ली कि हां वो दयानंद

875
01:01:07,280 --> 01:01:11,400
जी ने तो गिल्ली डंडे से मोक्ष प्राप्त करने को की शिक्षा दी है तो क्या मैं सही

876
01:01:11,400 --> 01:01:15,600
हूं इस जगह पर नहीं जी आप बिल्कुल गलत है और

877
01:01:15,600 --> 01:01:19,640
ऐसी ऐसे ही पुराण के विषय में ऐसे ही पुराण

878
01:01:19,640 --> 01:01:22,440
के विषय में उत्पन्न होने वाले जो सवाल हैं वो

879
01:01:22,440 --> 01:01:26,520
आपको पहले जाकर के सामर्थ्य वान गुरुओं से पूछने चाहिए अगर वह

880
01:01:26,520 --> 01:01:30,680
आपको संतुष्ट ना कर सके तब आप अपनी धारणा बना कर के बैठिए नहीं पुराण गलत

881
01:01:30,680 --> 01:01:35,280
है यह गलत है वो मुझे नहीं लगता कि आपने ऐसा कोई प्रयास किया है

882
01:01:35,280 --> 01:01:39,800
बिलकुल हमने प्रयास किया है और ऐसी कहीं

883
01:01:39,800 --> 01:01:43,880
अवतार सध जैसे आज हम देखते भी है साई

884
01:01:43,880 --> 01:01:48,200
बाबा को भी अवतार घोषित कर दिया गया है उनके पुराण भी लिखे गए हैं देखिए

885
01:01:48,200 --> 01:01:52,280
अभी थोड़ी देर पहले अभी थोड़ी देर पहले एक व्यक्ति का फोन आया कि भाई इन इन

886
01:01:52,280 --> 01:01:56,280
बातों की वजह से हमारे धर्म को छोड़कर लोग जा रहे हैं क्यों अवतार

887
01:01:56,280 --> 01:02:00,360
वाली बात है तो हर कोई अपने आप को अवतार कह लेता है तो इसलिए अवतार वाली बात को

888
01:02:00,360 --> 01:02:04,400
मानना गलत है ठीक है मेरे भाई हम लोग धर्म की रक्षा कर

889
01:02:04,400 --> 01:02:08,760
रहे हैं अगर धर्म की कोई विषय वस्तु को समाज समझ नहीं पा रहा है

890
01:02:08,760 --> 01:02:12,840
तो हमारा कर्तव्य उस विषय वस्तु का सही रूप समाज में

891
01:02:12,840 --> 01:02:17,120
पहुंचाना ना कि उस विषय वस्तु को छोड़ ही देना वही वाली बात

892
01:02:17,120 --> 01:02:19,160
कि बाढ़ का पानी खतरे के निशान तक आ

893
01:02:19,160 --> 01:02:23,240
गया है तो नेता जी ने कहा कि दो इंच और ऊपर खिसका दो खतरे

894
01:02:23,240 --> 01:02:24,160
का निशान

895
01:02:24,160 --> 01:02:28,160
मतलब जो जो चीज हमारी समझ नहीं आ रही है जटिल होती जा रही है धर्म की

896
01:02:28,160 --> 01:02:32,200
उन उन चीजों को हटा दो पीछे कर दो क्योंकि उसके

897
01:02:32,200 --> 01:02:36,240
कारण लोग वो अब देखिए

898
01:02:36,240 --> 01:02:41,000
देख आपने आपने आधार बताया सुनिए सुनिए आपने आधार

899
01:02:41,000 --> 01:02:45,080
एक मिनट एक मिनट आपने आधार बताया कि क्योंकि आज समाज में

900
01:02:45,080 --> 01:02:49,200
हर कोई अपने आप को अवतार कहने लगा है नहीं यह आधार नहीं हो सकता

901
01:02:49,200 --> 01:02:53,200
अवतारवाद को ना मानने का हम उसको सही करेंगे कि अवतार कौन होगा कौन नहीं कौन कह

902
01:02:53,200 --> 01:02:57,480
सकता है कौन नहीं है ना उस देखिए जो जो मनुष्य

903
01:02:57,480 --> 01:03:01,880
है इतना तो आप भी मानते हैं कि लस्ट के साथ जन्म लेता है मानते हैं

904
01:03:01,880 --> 01:03:06,160
ना आप सही कीजिए किस आधार पर अवतार

905
01:03:06,160 --> 01:03:10,240
की मान्यता को आप सही से बता रहे ताकि हमारी

906
01:03:10,240 --> 01:03:14,320
भी जानकारी करेक्ट हो अभी हम लोग फिर से मूल विषय से भटक गए हैं

907
01:03:14,320 --> 01:03:19,280
हम लोग फिर मूल विषय पर आते हैं कि जो लॉजिक है

908
01:03:19,280 --> 01:03:23,400
लॉजिक के बिना भी कई बार ईश्वर की चीजों को आर्य समाज

909
01:03:23,400 --> 01:03:27,400
ने माना लॉजिक के बिना ठीक है लॉजिक

910
01:03:27,400 --> 01:03:31,600
के बिना ईश्वर की कई चीजों को माना तो इसका मतलब है लॉजिक ना होने

911
01:03:31,600 --> 01:03:35,920
के कारण हम यह नहीं कह सकते ईश्वर अवतार नहीं ले सकता

912
01:03:35,920 --> 01:03:39,440
नहीं अनेक कारण है जी अवतार नहीं लेने

913
01:03:39,440 --> 01:03:43,600
कारण कारण को हटा रहा हूं एक कारण पर चलेंगे अभी एक कारण

914
01:03:43,600 --> 01:03:47,840
हटाया बुराई वाला दूसरा कारण अब लॉजिक लॉजिक के आधार

915
01:03:47,840 --> 01:03:52,760
पर हम ईश्वर के अवतारवाद को मना नहीं कर सकते अब हम अगले प

916
01:03:52,760 --> 01:03:56,800
आएंगे बहुत बढ़िया अब हम आ जाते हैं आवश्यकता जैसा अभी

917
01:03:56,800 --> 01:04:01,360
भाई साहब ने कहा था कि ईश्वर अपने संदेश नहीं पहुंचा सकता तो ईश्वर को आवश्यकता

918
01:04:01,360 --> 01:04:05,440
क्या है ठीक है अच्छा एक यह लॉजिक वाला मामला जो है

919
01:04:05,440 --> 01:04:09,800
इसको मैं और क्लियर कर दूं अच्छा याद आ गया

920
01:04:09,800 --> 01:04:13,880
कि आपने कहा जो सर्वव्यापक है वह एक देशीय रूप में

921
01:04:13,880 --> 01:04:18,560
प्रकट नहीं हो सकता ठीक है है ना

922
01:04:18,560 --> 01:04:22,680
अब जी जो वेद के मंत्र

923
01:04:22,680 --> 01:04:27,120
है वेद के मंत्र है व वो ईश्वर में ही

924
01:04:27,120 --> 01:04:31,280
है ठीक है है ना वेद

925
01:04:31,280 --> 01:04:35,840
के मंत्र ईश्वर सर्वज्ञ है

926
01:04:35,840 --> 01:04:40,440
जी मनुष्य के अंदर भी है जी

927
01:04:40,440 --> 01:04:45,000
एक देशी रूप से मंत्र प्रकट हो रहे हैं कि नहीं ऋषियों के मन

928
01:04:45,000 --> 01:04:49,960
में उसी समय जानवर के मन में आते हैं क्या

929
01:04:49,960 --> 01:04:54,120
मंत्र जिस समय ऋषि के मन में आए जिस समय ऋषि

930
01:04:54,120 --> 01:04:54,620
के मन

931
01:04:54,440 --> 01:04:58,880
में मंत्र आए उसी समय क्या पशु के मन में भी आते हैं

932
01:04:58,880 --> 01:05:02,960
क्या इसका मतलब इस विषय पर

933
01:05:02,960 --> 01:05:07,520
मैं अपनी अपना मत क्लियर करता हूं पहले फिर आप कंक्लूजन दीजिएगा

934
01:05:07,520 --> 01:05:11,760
जी जी आपने दिया ईश्वर के माध्यम से

935
01:05:11,760 --> 01:05:15,920
ही वेद मनुष्यों को प्राप्त हुए हैं इसमें जो ऋषि दनन का मत

936
01:05:15,920 --> 01:05:20,000
मैं आपको बताऊंगा केवल क्योंकि इसमें मेरा मत कोई ऐड नहीं हो सकता उस लेवल का मैं

937
01:05:20,000 --> 01:05:24,040
विद्वान नहीं हूं ये वेद जो है पवित्र

938
01:05:24,040 --> 01:05:28,480
आत्माओं को प्राप्त हुए थे उस समय या वो एक देशीय सर्वज्ञ

939
01:05:28,480 --> 01:05:32,640
होते हुए भी एक देशीय हो सकते हैं ना पूछ में ये रहा हूं मैं यह

940
01:05:32,640 --> 01:05:37,760
नहीं पूछ रहा कैसे हुए सर्वज्ञ होते हुए भी एक देशीय हुए

941
01:05:37,760 --> 01:05:42,040
ना क्या हुआ एक देय एक देशीय

942
01:05:42,040 --> 01:05:46,440
पमा पवित्र आत्माओ के अंदर आए ना केवल

943
01:05:46,440 --> 01:05:51,160
केवल पमा के अंदर आए ना जी जी जी

944
01:05:51,160 --> 01:05:55,800
सर्वव्यापक होते हुए भी एक देशीय हो गया अब मैं आपको एक चीज और दिखाऊ

945
01:05:55,800 --> 01:06:00,280
नहीं जी इस विषय से आप कैसे जोड़ सकते हैं आप इसको

946
01:06:00,280 --> 01:06:04,680
और दिखा देता हूं आपको एक चीज और दिखा देता कर दिया सर्व्य

947
01:06:04,680 --> 01:06:09,120
का मतलब होता है सब कुछ जानने वाला और उसने पवित्र आत्मा कोद

948
01:06:09,120 --> 01:06:09,620
दिया

949
01:06:09,520 --> 01:06:13,720
नहीं नहीं मैं कह रहा हूं ईश्वर सर्व सर्वव्यापक है ना

950
01:06:13,720 --> 01:06:18,200
सर्वव्यापक है ठीक है तो वोह मनुष्यों के मन में भी

951
01:06:18,200 --> 01:06:22,200
था बिल्कुल था जी तो इसका मतलब ईश्वर का

952
01:06:22,200 --> 01:06:26,120
ज्ञान मनुष्य के मन में भी था

953
01:06:26,120 --> 01:06:30,280
नहीं था चलिए मैं दूसरी दूसरे तरीके से बता देता

954
01:06:30,280 --> 01:06:36,280
हूं भगवत गीता चार

955
01:06:40,880 --> 01:06:45,000
छ जो पहले से है उसका प्रकट होना सिद्ध

956
01:06:45,000 --> 01:06:49,040
नहीं होता और जो सर्वव्यापक है उसका एक देशीय होना सिद्ध नहीं होता

957
01:06:49,040 --> 01:06:53,560
अब इसको हम ले लेते हैं चौथा

958
01:06:53,560 --> 01:06:59,560
अध्याय और

959
01:07:16,680 --> 01:07:22,000
चार पाच

960
01:07:22,000 --> 01:07:26,120
छ देखिए ये आर आर्य का ग्रंथ है आर

961
01:07:26,120 --> 01:07:30,440
समाज का देखिए इधर हा जी ठीक

962
01:07:30,440 --> 01:07:34,520
है इसमें यह कह रहे हैं कि

963
01:07:34,520 --> 01:07:39,080
हम अवतारवाद के सिद्धांत की बहस में यहां नहीं पढ़ना चाहते

964
01:07:39,080 --> 01:07:44,240
जो जो मानता हो व मानता हो शता

965
01:07:44,240 --> 01:07:48,760
शिवा जी मैं आपको ये पुस्तक

966
01:07:48,760 --> 01:07:52,800
आर्य ऋषि ध्यान के दवारा प्रमाणिक नहीं

967
01:07:52,800 --> 01:07:57,080
है ये प्रमाणिक नहीं है य ऋषि ध्यान के द्वारा

968
01:07:57,080 --> 01:08:01,160
परमाणिक नहीं है स्वामी सम इसको आर्य

969
01:08:01,160 --> 01:08:05,160
समाज का ना माने बिल्कुल भी नहीं अच्छा अच्छा

970
01:08:05,160 --> 01:08:09,840
तो फिर ठीक है फिर मैं इसको अलग हटा देता हूं फिर मैं अपने प्रमाण को अलग हटा देता हूं

971
01:08:09,840 --> 01:08:14,320
ये जो है त्य व्रत सि सिद्धांता

972
01:08:14,320 --> 01:08:18,320
अलंकार जी की है और यह जो भगवत गीता भाष्य है यह

973
01:08:18,320 --> 01:08:22,760
ऋषि दयानंद जी द्वारा प्रामाणिक नहीं है अब जो है ना नहीं

974
01:08:22,760 --> 01:08:26,960
हा अधिकृत पर भी अब बात करनी पड़ेगी आपसे कभी ना कभी कि कौन

975
01:08:26,960 --> 01:08:32,560
आर समाज की तरफ से अधिकृत है कौन नहीं है वैसे ये जो आया है मेरे

976
01:08:32,560 --> 01:08:36,560
पास यह जो आया है ये आर्स साहित्य

977
01:08:36,560 --> 01:08:41,040
ऑनलाइन बुक सेंटर जहां पर आर्थ समाज के ग्रंथ मिलते हैं जो प्रामाणिक संस्थान है वहां से आई

978
01:08:41,040 --> 01:08:45,200
है अनेक पुस्तकें छापते हैं ये बिल्कुल अनेक

979
01:08:45,200 --> 01:08:49,560
पते चलिए अब मैं आपको दूसरा प्रश्न पूछ लेता हूं

980
01:08:49,560 --> 01:08:54,440
क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापक है ठीक है

981
01:08:54,440 --> 01:08:58,520
तो फिर वो किसी एक जगह पर पृथ्वी का निर्माण कैसे कर रहा है

982
01:08:58,520 --> 01:09:02,560
जिस समय वह पृथ्वी का निर्माण करेगा उसी समय सभी जगह

983
01:09:02,560 --> 01:09:06,760
वही कार्य होगा क्योंकि वह तो सर्वव्यापक है समान रूप से व एक

984
01:09:06,760 --> 01:09:11,000
देशीय कैसे कार्य कर पा रहा है कि पृथ्वी जो है बन रही है

985
01:09:11,000 --> 01:09:15,080
या कुछ भी दुनिया में बन रहा है एक देशी बनेगा तभी बनेगा

986
01:09:15,080 --> 01:09:19,560
ना बिल्कुल बिल्कुल तो इसका कारण बता देता आपको शीवा

987
01:09:19,560 --> 01:09:23,920
जी जो आपके मन में शंका आई है जी वो परमात्मा

988
01:09:23,920 --> 01:09:28,240
निराकार है सूक्ष्म है और सब जगह विद्यमान

989
01:09:28,240 --> 01:09:32,280
है और अपने सामर्थ्य से एक उदाहरण के रूप में कहते

990
01:09:32,280 --> 01:09:36,360
हैं कि उसके हाथ नहीं लेकिन माता के गर्भ में अंधकार

991
01:09:36,360 --> 01:09:40,680
रूपी स्थान पर भी संतान का बस बस बस बस बस

992
01:09:40,680 --> 01:09:44,720
मैं समझ गया यानी कि बिना तर्क के हमें यहां भी मानना पड़ेगा कि वो

993
01:09:44,720 --> 01:09:47,800
अपने कार्य को कर सकता है बिना का तर्क के

994
01:09:47,800 --> 01:09:52,680
बस ऐसे ही मैं कह रहा था कि बिना तर्क के हम आगे बढ़ते हैं बिना तर्क के हमको

995
01:09:52,680 --> 01:09:56,800
सर तर्क तर्क के अभाव में पाया मेरी कमी

996
01:09:56,800 --> 01:10:01,880
हो स जी जी तर्क के अभाव

997
01:10:01,880 --> 01:10:05,880
में जी क्या कह रहे हैं मैं तर्क इस

998
01:10:05,880 --> 01:10:10,360
बारे में मेरा सामर्थ्य कम हो सकता है हां ठीक है

999
01:10:10,360 --> 01:10:14,440
तर्क के अभाव में ईश्वर के अवतार को हम मना नहीं कर सकते मैं बस इस तक

1000
01:10:14,440 --> 01:10:18,560
पहुंचना अब हम आगे चलते वो तो आपने पहले ही मान लिया था मेरे पास हालांकि ये भगवत

1001
01:10:18,560 --> 01:10:23,160
गीता थी तो मुझे मालूम नहीं था अधिकृत हम इस इस चर्चा को भी करेंगे

1002
01:10:23,160 --> 01:10:27,200
कि किसको आर्य समाज की तरफ से अधिकृत माना जाए या ना माना

1003
01:10:27,200 --> 01:10:31,200
जाए इसके लिए नियमावली क्या होनी चाहिए क्या है इस पर भी हम चर्चा करेंगे

1004
01:10:31,200 --> 01:10:35,320
र बकल करेंगे अब हम आ जाते हैं आवश्यकता

1005
01:10:35,320 --> 01:10:39,760
कि ईश्वर को आवश्यकता क्या है अवतार लेने की

1006
01:10:39,760 --> 01:10:44,120
सही बात है व बिना अवतार के भी सारे कार्य कर सकता है तो उसको अवतार लेने की आवश्यकता

1007
01:10:44,120 --> 01:10:48,320
क्या है अब यह बताइए वेदों में अलंकार कई

1008
01:10:48,320 --> 01:10:53,440
मंत्रों में है कि नहीं है अलंकार का उपयोग हुआ है कि नहीं कई मंत्रों

1009
01:10:53,440 --> 01:10:57,720
में परमाणिक यह विषय मैं नहीं दे पाऊंगा वेदों

1010
01:10:57,720 --> 01:11:02,120
का चलिए मैं आपके जो वेद है वो उठा लू उसमें दिखाऊं

1011
01:11:02,120 --> 01:11:03,400
हुआ

1012
01:11:03,400 --> 01:11:08,080
है हो सकता है जी नहीं ऐसे कैसे

1013
01:11:08,080 --> 01:11:12,200
चलिए मैं आपको ये बता रहा हूं मैं आपको दिखा देता हूं जिससे कि मैं अपने बात को प्रामाणिक

1014
01:11:12,200 --> 01:11:16,200
रूप से रख पाऊ मैं दिखा ऐसा कर लीजिए ऐसा कर लीजिए

1015
01:11:16,200 --> 01:11:22,200
आप दिखा दीजिए

1016
01:11:24,150 --> 01:11:30,150
[संगीत]

1017
01:12:01,800 --> 01:12:06,080
वो शर्मा वाला सूक्त कौन सा था कोई बताएगा क्या मैं उसका

1018
01:12:06,080 --> 01:12:10,080
प्रमाण स्थल भूल गया हूं शर्मा वाला सूक्त

1019
01:12:10,080 --> 01:12:16,080
कौन सा

1020
01:12:19,080 --> 01:12:22,240
था 10

1021
01:12:22,240 --> 01:12:28,240
108 106

1022
01:12:44,560 --> 01:12:50,560
1090 आ

1023
01:12:53,720 --> 01:12:57,880
गया नवीन जी अगर आप देख रहे हो तो अभी एक दो दिन पहले मैंने आपको

1024
01:12:57,880 --> 01:13:01,960
एक स्क्रीनशॉट लेकर के भेजा था

1025
01:13:01,960 --> 01:13:06,280
तो वो अगर आप यहां कमेंट में कर सकते हो तो मुझे आप कमेंट

1026
01:13:06,280 --> 01:13:10,320
कर दीजिए कि वह क्या श्लोक क्रमांक मंत्र का क्या

1027
01:13:10,320 --> 01:13:14,520
क्रमांक था प्रमाण स्थल क्या था वैसे तो इसमें भरे

1028
01:13:14,520 --> 01:13:18,960
ही पड़े हैं जगह जगह अलंकार अलंकार बहुत भरा है पूरा वेद भाष्य में अलंकार

1029
01:13:18,960 --> 01:13:23,200
है नहीं इस विषय से ऋग्वेद 10 108

1030
01:13:23,200 --> 01:13:29,200
हां मैं करता हूं मैं देखता हूं ऋगवेद 10

1031
01:13:29,840 --> 01:13:34,200
108 एक शिवान जी मेरा नेट डाउन पड़ रहा

1032
01:13:34,200 --> 01:13:40,200
है बस बस बस हो गया मेरा मेरा काम हो

1033
01:13:41,720 --> 01:13:45,920
गया ये आ गया

1034
01:13:45,920 --> 01:13:48,200
108

1035
01:13:48,200 --> 01:13:52,320
देखिए ये दयानंद जी का भाष्य है ठीक

1036
01:13:52,320 --> 01:13:57,080
है जी और यह आप देखिए

1037
01:13:57,080 --> 01:14:03,080
यहां पर लिखा है सूचना सूचना में इन्होने माना है अलंकारिक

1038
01:14:03,120 --> 01:14:07,200
वर्णन प आप पेज ं बता दीजिए पेज नंबर बता

1039
01:14:07,200 --> 01:14:12,720
दीजिए मैं चेक कर लूंगा इसको आपको दिख रहा है

1040
01:14:12,720 --> 01:14:16,720
क्या अलंकारिक वन पेज

1041
01:14:16,720 --> 01:14:20,920
नंबर दिखा दीजिए में नहीं दिखेगा य अच्छा

1042
01:14:20,920 --> 01:14:25,800
ठीक है तो यह पेज नंबर है 1036

1043
01:14:25,800 --> 01:14:30,440
कौन सा भाष है आपके पास

1044
01:14:30,440 --> 01:14:34,640
अभी ऋग्वेद है दसवा मंडल है 108 इसमें वह मान

1045
01:14:34,640 --> 01:14:38,800
रहे हैं कि अलंकारिक वर्णन है

1046
01:14:38,800 --> 01:14:42,920
जी ठीक है अब यह बताइए वेद के मंत्रों

1047
01:14:42,920 --> 01:14:47,000
में अलंकार की क्या आवश्यकता

1048
01:14:47,000 --> 01:14:51,680
है जी इस विषय में मैं आपको नहीं अपना वक्तव्य दे

1049
01:14:51,680 --> 01:14:55,800
पाऊंगा ठीक है तो बुराई क्या आधार पर ईश्वर

1050
01:14:55,800 --> 01:15:00,160
के अवतार को नहीं हटा सकते सर्वव्यापक के आधार पर नहीं हटा सकते

1051
01:15:00,160 --> 01:15:04,280
आवश्यकता के आधार पर फिलहाल नहीं हटा सकते आपको क्योंकि पता नहीं है ठीक

1052
01:15:04,280 --> 01:15:08,280
है तो इसके आगे हम अपनी चर्चा किसी और दिन

1053
01:15:08,280 --> 01:15:12,560
रख लेंगे क्योंकि आज भंडारा होता है प्रत्येक रविवार को सभी

1054
01:15:12,560 --> 01:15:16,640
जितने भी महानुभाव देख रहे हैं वो उनसे निवेदन

1055
01:15:16,640 --> 01:15:21,200
है कि भगवान की भक्ति अवश्य करें हो

1056
01:15:21,200 --> 01:15:25,640
दि जी मेरा इंटरनेट खत्म हो गया ठीक है ठीक है ठीक है भाई साहब बहुत बहुत

1057
01:15:25,640 --> 01:15:29,760
धन्यवाद आपको जो है आप यहां पर आए ठीक

1058
01:15:29,760 --> 01:15:34,480
है और बहुत सौहार्दपूर्ण आपसे चर्चा हुई कोई

1059
01:15:34,480 --> 01:15:38,560
अगर मुझसे अगर कोई किसी प्रकार का

1060
01:15:38,560 --> 01:15:42,920
जो अमर्यादित आचरण हुआ हो तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूं

1061
01:15:42,920 --> 01:15:47,040
तो सभी जितने भी लोग हैं वह अपने अपने नगर में जहां

1062
01:15:47,040 --> 01:15:50,760
पर गली मोहल्ले में रहते हैं वहां पर

1063
01:15:50,760 --> 01:15:55,200
अ हिंदू राष्ट्र अपने मत मट मंदिरों को केंद्र बनाए

1064
01:15:55,200 --> 01:15:59,280
वहां पर शिक्षा रक्षा सेवा के प्रकल्प चलाएं और हिंदू

1065
01:15:59,280 --> 01:16:02,120
राष्ट्र के निमित्त सनातन

1066
01:16:02,120 --> 01:16:06,160
समाज को हिंदू समाज को एकत्र करने के निमित्त वहां पर

1067
01:16:06,160 --> 01:16:11,760
जो है गोठिया करें हम लोग करते हैं साप्ताहिक रूप से आवान के द्वारा

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जो जगतगुरु शंकराचार्य जी हैं पूरी पीठाधीश्वर उनकी

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जो सेना है आदित्य वाहिनी के द्वारा वो आपको इस अभियान

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में सहायता कर सकती है आप उससे जुड़ सकते हैं और अपने क्षेत्र को किला

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बनाए सुरक्षित रहे यह जितने भी मत मता आ रहे हैं

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उनको दूर करें जिससे कि आपका ही भाई आपसे दूर ना रहे

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जिस समय आपको उसकी आवश्यकता हो तो ठीक है चलिए

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सभी को जय श्री राम
