1
00:00:01,440 --> 00:00:07,440
गुरु पूर्णिमा की सभी को हार्दिक

2
00:00:09,880 --> 00:00:14,880
शुभकामनाएं तो बहुत सारे प्रश्न हमें आते रहते हैं

3
00:00:14,880 --> 00:00:20,120
तो उनका कुछ स्वा अध्यन से गुरुदेव के द्वारा

4
00:00:20,120 --> 00:00:24,440
जो स्वीकार्य सिद्धांत उनकी सीमाओं में रहते

5
00:00:24,440 --> 00:00:28,520
हुए और जिनका जिनके बारे में

6
00:00:28,520 --> 00:00:32,670
उत्तर नहीं होता है उसके बारे में में जो हमारे आचार्य गण

7
00:00:32,670 --> 00:00:36,800
[संगीत] है जैसे आचार्य राम शंकर

8
00:00:36,800 --> 00:00:41,560
शुक्ल जी जो गुरुदेव के गुरु भाई हैं पूज्य पाद धर्म सम्राट

9
00:00:41,560 --> 00:00:45,680
कपाती जी महाराज के शिष्य हैं उनसे और

10
00:00:45,680 --> 00:00:51,560
कुछ ऐसे जटिल प्रश्न भी होते हैं जिनके लिए गुरुदेव के पास भी जाना पड़ता है

11
00:00:51,560 --> 00:00:55,640
तो ऐसे कई सारे प्रश्न है जो हमारे पास एकत्रित हो चुके पिछले

12
00:00:55,640 --> 00:01:00,360
एक दो महीने से हमने लाइव भी नहीं किया है इस कारण से

13
00:01:00,360 --> 00:01:06,360
बहुत सारे प्रश्न एकत्रित हो गए प्रश्नों पर जाने से पहले

14
00:01:06,480 --> 00:01:10,480
एक आप लोगों से बात करना चाहूंगा एक वीडियो भी फिर से अपलोड

15
00:01:10,480 --> 00:01:14,560
हुआ है बीइंग द स्पिरिट सोल वाले का उसम

16
00:01:14,560 --> 00:01:16,480
उ उसने फिर से वही बातें कही

17
00:01:16,480 --> 00:01:20,720
है हो सकता है उसे मालूम नहीं था कि हमारा एक दिन पहले ही वीडियो आ जाएगा उसने

18
00:01:20,720 --> 00:01:24,920
जो वीडियो डाला है उसम उसने मैंने तो बता ही दिया

19
00:01:24,920 --> 00:01:29,160
कि मैं उसके रेलीन में कोई वीडियो नहीं बनाने वाला उसमें

20
00:01:29,160 --> 00:01:34,440
जो उसने वीडियो बना कर के बताना चाहा है कि भाई

21
00:01:34,440 --> 00:01:38,640
जो शंकराचार्य वाले हैं या उसमें जो

22
00:01:38,640 --> 00:01:42,680
हमारे पूर्वा चार्य है भारती कृष्ण तीर्थ जी उनका नाम लेते

23
00:01:42,680 --> 00:01:46,920
हुए पुरी शंकराचार्य जी का नाम लेते हुए भी उसने य सिद्ध करने का प्रयास

24
00:01:46,920 --> 00:01:51,280
किया कि इन लोगों ने अब्राम आइडल जीी को स्वीकार

25
00:01:51,280 --> 00:01:56,040
किया है और प्रमोट किया है तो यह सभी बातें

26
00:01:56,040 --> 00:02:00,040
मतलब एक दिन पहले ही जो हमारा वीडियो आया है

27
00:02:00,040 --> 00:02:04,120
के माध्यम से ही निरस्त हो जाती क्योंकि

28
00:02:04,120 --> 00:02:08,640
सीधा पहला प्रश्न आता है कि भाई आपने शंकर परंपरा

29
00:02:08,640 --> 00:02:12,640
का जो ज्ञान है जो उनके लिखे हुए ग्रंथों का अर्थ आप

30
00:02:12,640 --> 00:02:16,640
बता रहे हो वह कहां से लिया हमने अपनी तरफ

31
00:02:16,640 --> 00:02:21,080
से कुछ भी नहीं कहा स्कोन की के ग्रंथों

32
00:02:21,080 --> 00:02:25,160
को किताबों को पढ़ के जो हमें समझ में आया उसे पहले कंफर्म किया और

33
00:02:25,160 --> 00:02:30,720
जब कन्फर्मेशन मिली तब हमने ये आपत्ति जताई ये बात तो गलत है

34
00:02:30,720 --> 00:02:31,840
अगर आप कृष्ण

35
00:02:31,840 --> 00:02:36,040
और अल्लाह को एक नहीं मानते हो तो अपने जन प्रतिनिधियों द्वारा यह बोलवा

36
00:02:36,040 --> 00:02:40,880
ना भरी सभा में कि नहीं मानते कुरान के अल्लाह को हम कृष्ण के समान नहीं

37
00:02:40,880 --> 00:02:44,920
मानते और बाइबल के यहोवा को हम कृष्ण के समान नहीं मानते

38
00:02:44,920 --> 00:02:48,920
मगर वह तो ठोक के कहते हैं ना कि हां

39
00:02:48,920 --> 00:02:53,160
कृष्ण यहोवा और अल्लाह एक है दूसरा

40
00:02:53,160 --> 00:02:57,600
क्या है कि आप गुरुदेव के अच्छा

41
00:02:57,600 --> 00:03:01,920
एक पक्ष भी रखा आपने कि वो देखो खंडन हो रहा है

42
00:03:01,920 --> 00:03:05,920
देखो इस कन के द्वारा उसकी आडलज का खंडन हो रहा है बाइबल

43
00:03:05,920 --> 00:03:10,560
की डोलजी का या किसी विधि का तो यह तो आपका प्रश्न होना चाहिए ना

44
00:03:10,560 --> 00:03:14,640
उनसे यदि बाइबल का यवा और भागवत का कृष्ण एक है तो फिर

45
00:03:14,640 --> 00:03:18,640
यहां पर गलत कसे लिखा जा रहा है तो आपका अपना प्रश्न है आप

46
00:03:18,640 --> 00:03:23,160
प्रश्न करिए कांट्रडिक्टिंग बातें क्यों हो रही है अा दूसरी बात यह है कि

47
00:03:23,160 --> 00:03:27,160
हमने जो भाई हमने एक चीज बताई थी हम इकोन की

48
00:03:27,160 --> 00:03:31,400
उन चीजों पर बात करते हैं जो इन स्वीकार करते स्न के जो

49
00:03:31,400 --> 00:03:36,840
प्रतिनिधि है व स्वीकार करते हैं और

50
00:03:36,840 --> 00:03:42,720
जो आप लोग जो बातें कर रहे हैं

51
00:03:42,720 --> 00:03:47,400
वह आप उन चीजों पर बात कर रहे हैं जो हमारे जो परंपरा प्राप्त आचार

52
00:03:47,400 --> 00:03:51,600
स्वीकार ही नहीं करते जैसे कि आप

53
00:03:51,600 --> 00:03:55,800
एक बोलना चाह रहे हो कि जो पूरी शंकराचार्य

54
00:03:55,800 --> 00:03:59,840
जी है भारतीय कृष्ण तीर्थ जी है उन्होंने इस्लाम को

55
00:03:59,840 --> 00:04:04,520
प्रमोट किया अब सीधे-सीधे उनका जो

56
00:04:04,520 --> 00:04:08,920
वक्तव्य प्राप्त है कुरान की सीमा का ईश्वर साक्षात अवतार

57
00:04:08,920 --> 00:04:13,280
नहीं ले सकता सीमित है बाइबल की सीमा का ईश्वर

58
00:04:13,280 --> 00:04:17,760
साक्षात अवतार नहीं ले सकता सीमित है जिनका ईश्वर जगत

59
00:04:17,760 --> 00:04:22,000
जगत बनाता ही नहीं बनता भी है उन्हीं का ईश्वर श्री राम कृष्ण आदि के रूप में अवतार

60
00:04:22,000 --> 00:04:26,360
लेता है तो क्या हुआ

61
00:04:26,360 --> 00:04:30,880
इसका अर्थ यही हुआ कि उन्होंने यहां पर खंडन

62
00:04:30,880 --> 00:04:34,880
किया मना किया ना हमारा हमारा ईश्वर और उनका ईश्वर एक

63
00:04:34,880 --> 00:04:39,160
समान नहीं है तो उनके आप अपने

64
00:04:39,160 --> 00:04:43,160
मन से अर्थ ना करें उनके ग्रंथों का कोई भी हो अपने मन से अर्थ ना

65
00:04:43,160 --> 00:04:48,120
करें इसकी उसका रोड़ा भानुमति का कुमा जोड़ा ना करें

66
00:04:48,120 --> 00:04:51,920
वैसे भी आपकी तो हिंदी दुरुस्त नहीं है किसी और के पास पहले ट्रांसलेशन कराने जाते

67
00:04:51,920 --> 00:04:56,240
होंगे तो यह सब है बाकी आइए

68
00:04:56,240 --> 00:05:00,400
कभी सामने से बात करते हैं और एक अंत

69
00:05:00,400 --> 00:05:04,520
में फिर एक बात बताऊंगा मैं हमने अगर यह प्रश्न किया है कि

70
00:05:04,520 --> 00:05:08,640
इसकन ब्राह्मण चीजों के साथ कृष्ण की तुलना क्यों कर रहा है

71
00:05:08,640 --> 00:05:13,320
तो यह आपका फिर दायित्व है आप अपनी बात बताइए कि

72
00:05:13,320 --> 00:05:17,320
हम अ ऐसा मानते हैं क्या

73
00:05:17,320 --> 00:05:21,520
नहीं मानते हैं अगर आप मान नहीं मानते हो कृष्ण अल्ला को एक तो बोलो

74
00:05:21,520 --> 00:05:25,560
ना अपने रिप्रेजेंटेटिव से बोलो के मंच प आके बोले कि अगर

75
00:05:25,560 --> 00:05:30,120
हम अल्लाह को प्रेज कर रहे हैं तो उस समय हम कुरान के अल्लाह की बात नहीं कर रहे हैं

76
00:05:30,120 --> 00:05:34,160
यह बोलो अच्छा दूसरी एक बात यह भी है कि आप इसके

77
00:05:34,160 --> 00:05:38,240
एप्लीकेशन में अगर हमारी चीज दिखा देंगे देखो इन्होने य किया देखो इन्होने वो किया

78
00:05:38,240 --> 00:05:42,520
तो किसी और के गलत हो जाने से आपका सही होना सिद्ध

79
00:05:42,520 --> 00:05:47,000
नहीं होता है अपने सही होने के पक्ष में क्या कह रहे हो आप

80
00:05:47,000 --> 00:05:51,440
आप बोल दो कृष्ण अल्ला एक नहीं है मंच से आकर के कुरान का अल्लाह

81
00:05:51,440 --> 00:05:55,680
और भागवत का कृष्ण एक नहीं है हम मान लेंगे आपकी किताबों में कुछ भी लिखा

82
00:05:55,680 --> 00:05:59,800
हो अपने रिप्रेजेंटेटिव से कहिए जो मंच पर जाते हैं जनप्रतिनिधि बनके वो

83
00:05:59,800 --> 00:06:03,800
बोले कि नहीं कुरान का अल्लाह और कृष्ण में जमीन आसमान का अंतर

84
00:06:03,800 --> 00:06:06,960
है बोलिए हम आपके साथ खड़े हो जाएंगे

85
00:06:06,960 --> 00:06:11,000
तो ये नहीं कर रहे हैं ना वो तो हम उसी चीज पर बोल रहे हैं

86
00:06:11,000 --> 00:06:15,040
जो आप लिखा भी है और स्वीकार भी कर रहे हो आप लिखे हुए

87
00:06:15,040 --> 00:06:19,120
का अपने हिसाब से मैनिपुलेट करके अर्थ बता दो आप आइए हम सिद्ध

88
00:06:19,120 --> 00:06:23,360
करेंगे कि आपने जो अर्थ लिया वो गलत लिया है सिंपल और फिर वही बात

89
00:06:23,360 --> 00:06:27,480
कि अगर आपको ये लगता भी है अतो गत्वा कि हम गलत है हमारी

90
00:06:27,480 --> 00:06:31,720
ओर से इस्लाम को प्रेज किया जा रहा है प्रमोट किया जा रहा है

91
00:06:31,720 --> 00:06:35,840
तो हमारे गलत होने से भी आपका सही होना सिद्ध नहीं होता आप बताइए

92
00:06:35,840 --> 00:06:39,880
भागवत का कृष्ण सनातन कृष्ण को आप

93
00:06:39,880 --> 00:06:44,920
जो कुरान का अल्लाह या बाइबल का यवा उसके साथ खड़ा कैसे कर रहे

94
00:06:44,920 --> 00:06:49,040
हो ठीक है तो ये आपकी जिम्मेदारी है वही वाली बात हो गई टिकट

95
00:06:49,040 --> 00:06:53,280
वो रेलवे ट्रेन में जब टीसी पूछता है कि भाई टिकट कहां है अरे

96
00:06:53,280 --> 00:06:57,280
उसने उसके पास भी तो टिकट नहीं है उसके पास भी तो टिकट नहीं है तो क्या

97
00:06:57,280 --> 00:07:01,480
इस तरह से आपका चालान होने से बच जाएगा क्या आप निर्दोष सिद्ध हो जाएंगे दूसरे

98
00:07:01,480 --> 00:07:05,720
का दोषी सिद्ध होने से नहीं अपना बताइए

99
00:07:05,720 --> 00:07:09,880
खैर बहुत बातें हो गई इतना

100
00:07:09,880 --> 00:07:14,000
ज्यादा मैं आपसे स्कन के बारे में बात करना चाहता हूं मैं स्कन

101
00:07:14,000 --> 00:07:18,080
कानपुर से हूं हम बात करेंगे पर अभी यह जो लाइव सेशन है यह

102
00:07:18,080 --> 00:07:24,080
दूसरी चीजों के लिए है आप एक नंबर नोट कर लीजिए

103
00:07:24,960 --> 00:07:30,960
74036 पियूष वादवानी छोटा भाई भी आया स्न से

104
00:07:31,000 --> 00:07:35,080
लोग लोग मुझे कहते हैं इस बच्चे को क्यों बुला लेते हो यह

105
00:07:35,080 --> 00:07:39,160
मेरे पीछे पड़ा रहता है मेरे साथ दोबारा लाइव आओ मेरे साथ दोबारा लाइव

106
00:07:39,160 --> 00:07:43,560
आओ वहां पर आकर के ऊट पटांग बचकानी हरकत करता है बस और कुछ

107
00:07:43,560 --> 00:07:46,600
नहीं

108
00:07:46,600 --> 00:07:50,800
तो यह सब चीजें हैं हम लोग लाइव आएंगे

109
00:07:50,800 --> 00:07:56,800
740 8301 69

110
00:07:57,640 --> 00:08:01,760
तो इस पर आप करिए एक फॉर्म मिलेगा

111
00:08:01,760 --> 00:08:06,360
आपको जिसमें

112
00:08:06,360 --> 00:08:08,960
की

113
00:08:08,960 --> 00:08:13,760
ये आप फॉर्म को भर

114
00:08:13,760 --> 00:08:17,800
देंगे वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा वाला फॉर्म

115
00:08:17,800 --> 00:08:22,000
तो उसको आप भर दीजिएगा जिसमें कि हम लोग आपसे संपर्क

116
00:08:22,000 --> 00:08:26,800
कर लेंगे और आपके साथ हमारा एक हमारी लाइव चर्चा

117
00:08:26,800 --> 00:08:32,800
सुनिश्चित हो जाएगी

118
00:08:36,400 --> 00:08:40,520
तो अभी हम लोग कुछ क्वेश्चन आंसर कर रहे हैं पहला

119
00:08:40,520 --> 00:08:44,680
प्रश्न है अवनीश यादव जी का मुजफ्फरपुर से हैं बिहार

120
00:08:44,680 --> 00:08:49,080
से इन्होंने पूछा है कि हनुमान जी वानर जाति के थे तो

121
00:08:49,080 --> 00:08:53,760
वह जनेऊ कैसे धारण करते थे वानर

122
00:08:53,760 --> 00:08:57,840
जो है वानर जाति से उनका वर्ण प्रभावित नहीं होता है वो क्षत्रिय वर्ण

123
00:08:57,840 --> 00:09:01,840
के थे राजका थाना बाली सुग्रीव भी राज करते थे क्षत्रिय वर्ण के

124
00:09:01,840 --> 00:09:05,920
थे क्षत्रिय कुल में उत्पन्न और फिर क्षत्रियो चित धर्म का अनुपालन

125
00:09:05,920 --> 00:09:10,120
करते हुए क्षत्रिय वर्ण के थे तो इसलिए वह जने

126
00:09:10,120 --> 00:09:14,200
धारण करते थे यह हमने आचार्य राम शंकर शुक्ल जी से भी इस

127
00:09:14,200 --> 00:09:18,280
बारे में कंफर्म किया था हर्षदीप सिंह

128
00:09:18,280 --> 00:09:22,520
जी का कहना है कृष्ण हर्षदीप सिंह जी लुधियाना से इनका

129
00:09:22,520 --> 00:09:27,840
कहना है कि श्री कृष्ण ने गीता में ऐसा क्यों कहा कि

130
00:09:27,840 --> 00:09:33,840
जो लोग अन्य देवी देवताओं की पूजा करते हैं वह

131
00:09:38,640 --> 00:09:42,640
अविधवा सत्ता को स्वीकार कर लेते हो तो अपने आप ही वह

132
00:09:42,640 --> 00:09:46,680
सीमित हो गया भगवान श्री कृष्ण से अगर अलग

133
00:09:46,680 --> 00:09:50,920
समझते हुए आप भगवान शिव को पूज रहे हैं भगवान विष्णु को पूज

134
00:09:50,920 --> 00:09:55,320
रहे हैं या किसी किसी भी रूप में ईश्वर को पूज रहे हैं तो वो अविधवा

135
00:09:55,320 --> 00:09:59,560
हो जाएगी मगर हमारे यहां क्या है कि अतो गत्वा शेव और विष्णु

136
00:09:59,560 --> 00:10:03,840
एक है शिव और कृष्ण एक है तो इस अगर इस तरह से आप

137
00:10:03,840 --> 00:10:07,920
किसी की पूजा कर रहे हो तब तो सही है मगर आप ये समझते

138
00:10:07,920 --> 00:10:12,080
हो कि नहीं शिव इज मोर पावरफुल देन कृष्ण शिव इज मोर पावरफुल

139
00:10:12,080 --> 00:10:16,120
देन विष्णु ये सनातन सिद्धांत के रूप में स्वीकार

140
00:10:16,120 --> 00:10:20,840
करते हुए अगर भज रहे हो तो फिर आप अवेध पूर्वक कर रहे हो आपको एक मानना पड़ेगा

141
00:10:20,840 --> 00:10:25,000
इनके बीच में एकत्व को स्वीकार करते हुए कि हे ब्रह्मा

142
00:10:25,000 --> 00:10:29,080
विष्णु महेश भगवती और गणेश मैं आप सबकी भक्ति शिव रूप में कर रहा

143
00:10:29,080 --> 00:10:33,360
हूं मुझे शिव रूप में अपनी भक्ति प्रदान करें इस तरह से जब आप वंदना

144
00:10:33,360 --> 00:10:37,440
करेंगे तो ही आपकी वंदना विधि पूर्ण मानी जाएगी अगर आपने कृष्ण को शिव

145
00:10:37,440 --> 00:10:41,600
से अलग मान कर के कृष्ण की पूजा करनी शुरू कर दी वो भी अ विधि पूर्वक है अगर आपने

146
00:10:41,600 --> 00:10:45,680
शिव को कृष्ण से अलग मान करके शिव की पूजा करना शुरू कर दिया तो व

147
00:10:45,680 --> 00:10:50,280
भी अध पूर्वक है इसी भाव को भगवान ने यहां पर दर्शाया

148
00:10:50,280 --> 00:10:53,760
है अभिजीत मंडल जी है

149
00:10:53,760 --> 00:10:58,240
यह मालदा से हैं और इनके

150
00:10:58,240 --> 00:11:02,440
दलित ब्रैकेट में लिखा है शूद्र पहली बात मैं क्लियर

151
00:11:02,440 --> 00:11:06,640
कर दूं कि जो दलित शब्द है ये धार्मिक ग्रंथों से प्राप्त

152
00:11:06,640 --> 00:11:10,880
शब्द नहीं है तो आप केवल शूद लिखें दलित भाइयों के सनातन धर्म

153
00:11:10,880 --> 00:11:15,400
में क्या-क्या अधिकार है वो तो बहुत लंबी लिस्ट है छोटे-छोटे से बहुत सारे हो सकते

154
00:11:15,400 --> 00:11:20,280
हैं तो उसको वर्बल इस तरह से बता पाना संभव नहीं है

155
00:11:20,280 --> 00:11:24,360
बजाय इस पर ध्यान देने के क्या-क्या अधिकार है इस पर ध्यान अगर हम दे ले कहां क्या-क्या

156
00:11:24,360 --> 00:11:28,440
अधिकार में नहीं है तो हमारे वो अधिकार सुनिश्चित हो जाते हैं जो जो उसकी सीमा में

157
00:11:28,440 --> 00:11:32,960
ना आते हो जो निषेध की सीमा में ना आते वो सब अधिकार है है ना

158
00:11:32,960 --> 00:11:37,120
तो निषेध के बारे में आप जानकारी कर लेंगे तो आपको अपने आपको शूद्रों

159
00:11:37,120 --> 00:11:41,240
का जो क्राइटेरिया व पता चल जाएगा और यह क्राइटेरिया केवल शूद्र के लिए

160
00:11:41,240 --> 00:11:45,320
ही नहीं है ब्राह्मण के लिए भी है जैसे ब्राह्मण का अधिकार नहीं है 50 वर्ष के

161
00:11:45,320 --> 00:11:49,320
बाद गृहस्थ आश्रम में रहना ब्राह्मण का अधिकार

162
00:11:49,320 --> 00:11:53,320
नहीं है 25 वर्ष से ज्यादा गृहस्थ आश्रम में रहना तो अधिकार

163
00:11:53,320 --> 00:11:58,000
नहीं है ब्राह्मण का अधिकार नहीं है अपनी जो

164
00:11:58,000 --> 00:12:02,440
रोटी कपड़ा और मकान उससे ज्यादा धन संचय करना ब्राह्मण

165
00:12:02,440 --> 00:12:06,480
का अधिकार नहीं है सम्मान के लिए खोज करना सम्मान

166
00:12:06,480 --> 00:12:12,480
के लिए इधर उधर सर्चिंग

167
00:12:13,160 --> 00:12:18,040
करना दलित को मंदिर में जाने का प्रवेश है कि नहीं हां बिल्कुल है

168
00:12:18,040 --> 00:12:22,480
कुछ ऐसे विशेष मंदिर होते हैं द्विज के द्वारा स्थापित जहां पर

169
00:12:22,480 --> 00:12:26,600
वैदिक विधि विधान के अनुसार जो प्राण प्रतिष्ठा

170
00:12:26,600 --> 00:12:30,760
आदि होती है वहां डायरेक्ट जो गर्भ ग्रह होता है उससे बाहर

171
00:12:30,760 --> 00:12:34,960
की सीमा में रहना चाहिए और वहां पर यदि कोई वहां पर यदि कोई

172
00:12:34,960 --> 00:12:39,080
ब्राह्मण भी उपयुक्त उसमें नहीं है और सामने वाले

173
00:12:39,080 --> 00:12:43,120
को पता चल गया कि उपयुक्त स्थिति में नहीं अंदर जाने योग्य स्थिति में नहीं है तो भी

174
00:12:43,120 --> 00:12:47,280
वह अंदर नहीं जाएगा तो शूद्रों शूद्र के लिए ऐसा इसलिए

175
00:12:47,280 --> 00:12:51,400
कहा गया क्योंकि शूद्रों का जो जीवन यापन होता है वह जो

176
00:12:51,400 --> 00:12:55,520
गर्भ ग्रह में मंदिर में सेवा करने के जो विधि

177
00:12:55,520 --> 00:12:59,600
विधान होते हैं उनके बिल्कुल प्रतिकूल होता है और वो अगर नहीं हो तो यह

178
00:12:59,600 --> 00:13:04,240
भी संभव नहीं हो पाएगा तो सबकी अपनी अपनी अहमियत है मगर

179
00:13:04,240 --> 00:13:08,720
हम समान अधिकार से सबको नहीं देख सकते

180
00:13:08,720 --> 00:13:12,840
कि सभी को बिल्कुल एक जैसा बिल्कुल कार्य करने को दे दिया जाए कभी

181
00:13:12,840 --> 00:13:16,880
किसी को कुछ कार्य करने को दिया गया किसी को कुछ कार्य करने को दिया गया जिसको ऐसा

182
00:13:16,880 --> 00:13:21,400
कार्य करने को दिया गया जो इस कार्य करने वाले की जो कार्य प्रणाली है उसके प्रतिकूल

183
00:13:21,400 --> 00:13:25,400
है तो इस स्थिति में उसको वहां से निषेध किया गया तो मंदिर

184
00:13:25,400 --> 00:13:28,280
में जाना सभी को अलाउ नहीं है आप खुद सोचो

185
00:13:28,280 --> 00:13:32,360
मैं भी अगर मंदिर जाता हूं अधिकांशत हम जिस मंदिर

186
00:13:32,360 --> 00:13:36,360
में हिंदू राष्ट्र संगोष्ठी साप्ताहिक रूप से करते हैं वहां

187
00:13:36,360 --> 00:13:40,560
पर मंदिर के प्रशासन के द्वारा हमको कहा गया कि आप यहां के जो विग्रह

188
00:13:40,560 --> 00:13:44,640
है उनकी सेवा स्वयं कर सकते हैं मगर अंदर से वह आत्मविश्वास नहीं

189
00:13:44,640 --> 00:13:48,960
होता है जब हम वहां पहुंचते हैं कि हम इसको छू पाए तो इसलिए

190
00:13:48,960 --> 00:13:53,480
जो व्यक्ति उसके लिए नियुक्त होता है पूरी तरीके से उस

191
00:13:53,480 --> 00:13:57,520
पर्यावरण के लिए उस वातावरण के लिए जो पूरे दिन केवल उसका यही

192
00:13:57,520 --> 00:14:01,760
काम है कि मुझे मंदिर के उपयुक्त बने रहना है उसको ही उसमें प्रवेश

193
00:14:01,760 --> 00:14:06,160
की अनुमति दी जाती है शास्त्रों के अनुसार इवन जो गुरुदेव

194
00:14:06,160 --> 00:14:10,280
है पूज्य गुरुदेव पूरी शंकराचार्य जी वो भी कई बार ऐसे मंदिरों में जाते हैं जहां के पुजारी

195
00:14:10,280 --> 00:14:14,680
कोई और होते हैं महंत कोई और होते हैं तो वहां पर अपने वो

196
00:14:14,680 --> 00:14:18,880
शंकराचार्य नहीं उठाते ऐसा नहीं कि कोई उन्ह रोक देगा मगर

197
00:14:18,880 --> 00:14:23,600
वहां पर जो गुरुदेव होते हैं वो रुक जाते हैं और एक

198
00:14:23,600 --> 00:14:27,720
श्रद्धालु की तरह से वहां पर दर्शन करके वापस आ जाते हैं वहां पर सीमाओं का अतिक्रमण

199
00:14:27,720 --> 00:14:31,800
नहीं करते इसी रूप में जो जो हमारा चतुर्थ

200
00:14:31,800 --> 00:14:36,320
वर्ण है शूद्र को शूद्रों को मंदिर प्रवेश में उस जगह जहां पर वैदिक

201
00:14:36,320 --> 00:14:40,400
विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा की गई है वहां पर गर्भ

202
00:14:40,400 --> 00:14:43,360
ग्रह में ऐसा नहीं मंदिर बहुत बड़ा होता है तो गर्भ ग्रह

203
00:14:43,360 --> 00:14:47,520
में जाने से वो किया जाता है और सबसे इसका एक कारण यह

204
00:14:47,520 --> 00:14:51,800
भी है क्योंकि यह बैलेंसिंग बनाई गई है कि

205
00:14:51,800 --> 00:14:55,840
शूद्र को दायित्व से मुक्त किया गया है कि अगर तुम भी मंदिर में

206
00:14:55,840 --> 00:14:59,960
जा अगर तुम्हारा भी मंदिर में जाना हम अनिवार्य कर देंगे तो फिर

207
00:14:59,960 --> 00:15:04,680
तुम्हें वैसा जीवन यापन करना पड़ेगा तो तुम्हें बहुत कठिनाई हो जाएगी क्योंकि तुम ऐसी

208
00:15:04,680 --> 00:15:08,880
ऐसी फील्ड में वर्क कर रहे हो जहां पर तुम्हारा इन नियमों का पालन

209
00:15:08,880 --> 00:15:12,960
कि इसके बाद इतने कुल्ले इसके बाद इतने कुल्ले मट्टी लेकर साथ में चलना सौचा

210
00:15:12,960 --> 00:15:17,040
चार यह सब ध्यान नहीं रहे ये सब धारण कर पाना

211
00:15:17,040 --> 00:15:21,200
इन सब चीजों का पालन कर पाना आपके लिए बहुत ज्यादा कठिन हो जाएगा इसलिए

212
00:15:21,200 --> 00:15:25,880
आपको कुछ दायित्वों से मुक्त किया गया है तो यह एक आपको

213
00:15:25,880 --> 00:15:30,160
सरलता दी गई है जिससे कि आपका जीवन सरल हो जाए जब आप इतनी ज्यादा मेहनत इधर

214
00:15:30,160 --> 00:15:34,840
कर रहे हो तो आपसे कह दिया जा गया कि आपका जो मोक्ष है वो केवल

215
00:15:34,840 --> 00:15:39,000
जो मंदिर की ध्वजा है उसको ही देख लोगे तो वहीं से हो जाएगा बाध्यता

216
00:15:39,000 --> 00:15:43,400
इसलिए डाली गई कि अगर बाध्यता नहीं डालेंगे तो व्यवस्था भंग हो जाएगी बाध्यता

217
00:15:43,400 --> 00:15:47,560
इसलिए डाली गई जैसे कि जैसे कि हमने

218
00:15:47,560 --> 00:15:51,680
कहा कि शूद्र का जो जीवन होता है वो ऐसा होता है कि वोह उपयुक्त नहीं होता

219
00:15:51,680 --> 00:15:55,800
है मंदिर के अंदर के पर वातावरण के लिए उसके लिए

220
00:15:55,800 --> 00:15:58,360
जो उसी के लिए पूरे दिन जीवन बिता रहा है

221
00:15:58,360 --> 00:16:02,480
कुल्ले करना ये करना वो करना जनी उधारण करना पूरे बिल्कुल विधि विधान से

222
00:16:02,480 --> 00:16:06,520
तो उसके लिए वो सही होता है अब बात ये आ जाती है कि हो सकता है कि कोई शुद्र

223
00:16:06,520 --> 00:16:10,600
ऐसा भी हो जो बिल्कुल इसी तरीके से अपनी जो अपने जीवन का यापन

224
00:16:10,600 --> 00:16:14,600
कर रहा हो बिल्कुल हो सकता है ऐसा नहीं है कि नहीं हो सकता मगर यहां पर क्या होगा कि हमें

225
00:16:14,600 --> 00:16:18,640
फिर व्यक्ति को चेक करना पड़ेगा मान लीजिए 100 लोग आकर के खड़े

226
00:16:18,640 --> 00:16:22,680
हो गए तो हमें ऐसी व्यवस्था वहां पर लगानी पड़ेगी हर व्यक्ति को चेक करो कौन व्यक्ति

227
00:16:22,680 --> 00:16:26,720
ने कैसा जीवन जिया कहां से आ रहा है वो और चेक करने के बाद तो ये

228
00:16:26,720 --> 00:16:30,920
क्या हुआ हमारा समय हमारा श्रम श्रम अधिक लगने लगा और

229
00:16:30,920 --> 00:16:34,960
जबकि वो जो है एक मूल उद्देश्य नहीं है तो इसलिए

230
00:16:34,960 --> 00:16:39,040
श्रम समय ना हो अव्यवस्था ना फैले इसलिए एक लिमिट बना

231
00:16:39,040 --> 00:16:43,520
दी गई कि इसके अंदर इस वर्ग के लोग जाए ही ना काम खत्म अब

232
00:16:43,520 --> 00:16:47,560
जिस चीज से वंचित हो रहे हैं उसका क्या उससे मिलने वाले फल का क्या नहीं ये

233
00:16:47,560 --> 00:16:51,640
लोग बाहर से अगर ध्वजा का दर्शन कर लेंगे तो इससे इन्ह वही फल मिलेगा जो एक

234
00:16:51,640 --> 00:16:55,800
ब्राह्मण को अंदर जाकर के मिलेगा सिंपल तो कहीं भी मंदिर के

235
00:16:55,800 --> 00:17:01,000
अंदर प्रवेश जीवन का मूल उद्देश्य नहीं कहीं

236
00:17:01,000 --> 00:17:05,200
भी प्रतिमा का जो प्रतिमा

237
00:17:05,200 --> 00:17:09,280
को स्पर्श करना जीवन का मूल उद्देश्य नहीं है शास्त्रों में नहीं लिखा शास्त्रों

238
00:17:09,280 --> 00:17:13,400
में दो चीजें लिखी है अथातो धर्म जिज्ञासा यानी कि धर्म को धारण करना

239
00:17:13,400 --> 00:17:17,560
आपका उद्देश्य है अथातो ब्रह्म जिज्ञासा यानी कि ब्रह्म को जानना आपका

240
00:17:17,560 --> 00:17:21,640
उद्देश्य और इन दोनों को चीजों को साधने से क्या होगा

241
00:17:21,640 --> 00:17:25,920
मोक्ष तो आपके जीवन का जो मूल उद्देश्य है वो मोक्ष है वो आपको

242
00:17:25,920 --> 00:17:30,040
मिल रहा है तो यह जो चीजें हैं कि मुझे मंदिर के अंदर जाना

243
00:17:30,040 --> 00:17:34,520
है पर वंचित हो गया या मुझे उसी मूर्ति को छूना है मैं वंचित हो गया

244
00:17:34,520 --> 00:17:39,080
ये जो चीजें हैं ये जो विरोधी तंत्र है उनके द्वारा हमारे लिए

245
00:17:39,080 --> 00:17:43,160
नैरेटिव बनाए गए हैं कैसे देखिए सबसे

246
00:17:43,160 --> 00:17:45,760
पहली बात है

247
00:17:45,760 --> 00:17:49,800
कि जो जो चीजें मनुष्य के लिए सर्वाधिकार रूप से लागू

248
00:17:49,800 --> 00:17:53,840
है इक्वली रूप से सबके लिए हैं उन उन चीजों की जो प्यास है वो

249
00:17:53,840 --> 00:17:58,040
मनुष्य के अंदर बचपन मतलब जन्म से ही है बाय बर्थ उसके अंदर

250
00:17:58,040 --> 00:18:02,200
इनबिल्ट प्यास प्यास है क्या है कि जैसे कि बाय

251
00:18:02,200 --> 00:18:06,200
बर्थ सबको पानी की प्यास है बाय बर्थ सबको खाने की भूख है तो खाना उनके लिए

252
00:18:06,200 --> 00:18:10,240
अवेलेबल है बाय बर्थ सबको सांस चाहिए ऑक्सीजन चाहिए तो

253
00:18:10,240 --> 00:18:14,240
सबके लिए ऑक्सीजन अवेलेबल है यदि प्रतिमा को छूना

254
00:18:14,240 --> 00:18:18,240
वेद को उसी रूप में पढ़ना जिस रूप में वेद

255
00:18:18,240 --> 00:18:22,240
हमें प्राप्त है उसी रूप में पढ़ना उन्हीं रचाओ के रूप में पढ़ना यदि

256
00:18:22,240 --> 00:18:26,280
यह सब भी इक्वली रूप से सबके लिए होता तो सबके अंदर इस चीज के

257
00:18:26,280 --> 00:18:29,120
लिए ईश्वर ने इनबिल्ट इच्छा दी होती

258
00:18:29,120 --> 00:18:33,120
अब बात ये आती है कि कई कई बार आपने आर समाज

259
00:18:33,120 --> 00:18:37,120
के लोगों को भी कहते हुए सुना होगा कि आप बस सत्यार्थ प्रकाश पढ़ लो आपका

260
00:18:37,120 --> 00:18:41,160
सब हो जाएगा सब कुछ आपको हो जाएगा यानी वहा उन्होंने माना कि वेद का

261
00:18:41,160 --> 00:18:45,240
ज्ञान ही सत्यार्थ प्रकाश के रूप में भी अगर व्यक्ति ले लेगा तो उसका फुलफिल

262
00:18:45,240 --> 00:18:49,440
हो जाएगा तो इसी प्रकार से वेद का ज्ञान तो सबको चाहिए मगर वेद

263
00:18:49,440 --> 00:18:53,800
की जो रचाए है जो उसका व्यवहारिक स्वरूप है उसी रूप में चाहिए ऐसा नहीं है

264
00:18:53,800 --> 00:18:57,920
इसके साथ ही साथ इसमें हम एक तर्क देखते हैं क्या भगवान पक्षपाती

265
00:18:57,920 --> 00:19:02,240
है जो वेद से कुछ लोगों को वो कर देगा तो यह तो तब भी लागू होता है कि एक

266
00:19:02,240 --> 00:19:06,320
एक बच्चे का जो जन्म है वह उस घर में हो रहा है जहां पर वेद

267
00:19:06,320 --> 00:19:10,360
रखे हुए हैं वेद के पाठ हो रहे हैं और एक बच्चे का जन्म हो रहा है सा साउथ अफ्रीका के

268
00:19:10,360 --> 00:19:14,440
जंगलों में तो वेद की प्यास ना होना मंदिर के अंदर

269
00:19:14,440 --> 00:19:18,880
जाने की प्यास ना होना मंदिर के अंदर स्थापित जो मूर्ति है उसकी

270
00:19:18,880 --> 00:19:23,640
प्यास ना होना बाय बर्थ यह सिद्ध करता है कि उसके लिए आप

271
00:19:23,640 --> 00:19:27,640
लोग समान रूप से सभी के लिए वो चीजें नहीं है

272
00:19:27,640 --> 00:19:31,880
अब इसमें क्या है कि नैरेटिव कैसे चलाया गया कि जब आपको

273
00:19:31,880 --> 00:19:36,200
आपके भाइयों से अलग करना है तोड़ना है

274
00:19:36,200 --> 00:19:40,400
फूट डलवानी है तो क्या करना है कि पहले नैरेटिव चलाओ जो

275
00:19:40,400 --> 00:19:44,160
चीजों से आपको प्यार नहीं है जो चीजें आपके लिए अभी

276
00:19:44,160 --> 00:19:48,800
क्योंकि आप कुछ जानते नहीं हो तो जो चीजें आपके लिए आवश्यक नहीं है पहले

277
00:19:48,800 --> 00:19:52,840
मार्केट में एजेंडा चलाया जाए और उन चीजों को पहले आवश्यक बनाया जाए तो

278
00:19:52,840 --> 00:19:57,000
क्या आवश्यक गायत्री मंत्र गायत्री मंत्र गायत्री मंत्र वेद का पाठ वेद का पाठ वेद

279
00:19:57,000 --> 00:20:01,080
का पाठ या फिर इस मंदिर प्रवेश मंदिर प्रवेश मंदिर प्रवेश ये सब

280
00:20:01,080 --> 00:20:05,920
चीजें आपको बचपन से नहीं चाहिए थी बचपन से आप क्या मांगते थे सच्चितानंद

281
00:20:05,920 --> 00:20:10,000
आपको सचित आनंद चाहिए था बचपन से आप जो खाना मांग रहे हो एसी

282
00:20:10,000 --> 00:20:14,040
मांग रहे हो टीवी मांग रहे हो फ्रिज मांग रहे हो इन सब में आपको सत चित आनंद मांग रहे

283
00:20:14,040 --> 00:20:18,560
हो आप बचपन से आपको सच्चित आनंद चाहिए था जन्म से ही

284
00:20:18,560 --> 00:20:22,760
और उसके लिए कहीं भी मना नहीं किया गया है तो यह

285
00:20:22,760 --> 00:20:27,080
आपके लिए व्यवहारिक स्वरूप में आपको पहले एक नैरेटिव फैलाया जाता है

286
00:20:27,080 --> 00:20:31,120
कि भाई जो है वेद का पाठ का पाठ गायत्री गायत्री मंत्र गायत्री मंत्र गायत्री

287
00:20:31,120 --> 00:20:35,640
मंत्र जिससे कि एक वातावरण ऐसा तैयार हो जाए कि भैया

288
00:20:35,640 --> 00:20:39,760
अगर भगवत प्राप्ति करनी तो गायत्री मंत्र के द्वारा ही करनी

289
00:20:39,760 --> 00:20:43,960
है अगर जो है आपको ज्ञान लेना है तो वेद पाठ

290
00:20:43,960 --> 00:20:48,240
के द्वारा ही मिलेगा अब बताइए जो सत्यार्थ प्रकाश पढ़ लेगा आर

291
00:20:48,240 --> 00:20:52,400
समाज के अनुसार वर्ण व्यवस्था को ना मानने वालों के अनुसार जो सत्यार्थ प्रकाश

292
00:20:52,400 --> 00:20:56,560
को पढ़ लेगा उसको समग्र ज्ञान हो जाएगा क्या ऐसा कहना नहीं है आर समाज यों

293
00:20:56,560 --> 00:20:59,320
का तो फिर वो उसको तो कैसे ज्ञान

294
00:20:59,320 --> 00:21:03,400
हो रहा है वेद का ही ज्ञान है ना उनके अनुसार बात कर रहे हैं वेद का ही ज्ञान

295
00:21:03,400 --> 00:21:07,600
सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार अगर कोई व्यक्ति प्राप्त कर लेता

296
00:21:07,600 --> 00:21:11,880
तो उसका उसकी भी सद्गति हो जाएगी य आ समाज के अनुसार बोल रहा हूं इसी प्रकार

297
00:21:11,880 --> 00:21:15,920
से जो प्रभुपाद जी के द्वारा लिखे गए ग्रंथ है इसकन

298
00:21:15,920 --> 00:21:20,360
के अनुसार उनका यदि कोई समग्र रूप से अध्ययन कर लेगा तो उसकी भी सद्गति हो जाएगी

299
00:21:20,360 --> 00:21:24,400
तो इसका अर्थ क्या है कि व्यक्ति को व्यक्ति को ज्ञान की

300
00:21:24,400 --> 00:21:28,720
आवश्यकता है जो व्यवहारिक स्वरूप में जिस रूप में वेदा आदि शास्त्र या

301
00:21:28,720 --> 00:21:33,120
विधि विधान है उसी रूप में उनका अनुकरण अनुसरण

302
00:21:33,120 --> 00:21:37,320
या उन्हें प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है तो यह

303
00:21:37,320 --> 00:21:41,400
हमें आपस में फूट डलवाने के लिए एजेंडा चलाया जाता है कि

304
00:21:41,400 --> 00:21:45,840
गायत्री मंत्र इंपॉर्टेंट है वेद पाठ इंपॉर्टेंट है अगर वेद पाठ ही इंपॉर्टेंट

305
00:21:45,840 --> 00:21:50,120
है तो फिर सत्यार्थ प्रकाश की वैल्यू क्या है क्यों है

306
00:21:50,120 --> 00:21:54,160
सीधे वेद पढ़ाइए मत लिखिए सत्यार्थ प्रकाश आपने सत्यार्थ

307
00:21:54,160 --> 00:21:58,920
प्रकाश में वही तो लिखा वेदों का मर्म आपके अनुसार

308
00:21:58,920 --> 00:22:04,040
हमारे अनुसार मर्म नहीं है वो कुछ और है मगर आपके अनुसार तो आपने वही लिखा

309
00:22:04,040 --> 00:22:08,320
ना तो आप ही जब वेदों

310
00:22:08,320 --> 00:22:12,640
का विकल्प लोगों को दे रहे हो तो इससे सिद्ध हो रहा है

311
00:22:12,640 --> 00:22:14,680
कि वेदों को वेदों के द्वारा

312
00:22:14,680 --> 00:22:18,680
ही भक्ति प्राप्ति हो ऐसा नहीं है वेदों के व्यवहारिक स्वरूप द्वारा ही

313
00:22:18,680 --> 00:22:22,720
लोगों को भगवत प्राप्ति हो ऐसा नहीं है तो यह क्या हुआ

314
00:22:22,720 --> 00:22:27,320
जो चीज आपके लिए आवश्यक नहीं थी जो चीज आपके लिए मनमोहक नहीं थी

315
00:22:27,320 --> 00:22:31,600
वो चीजें आपने जो है इंपॉर्टेंट बनाई

316
00:22:31,600 --> 00:22:35,880
वह चीज आपने नहीं जो लोगों के द्वारा नैरेटिव चलाया ग जिससे कि आपके कानों

317
00:22:35,880 --> 00:22:39,960
में एक प्रोग्रामिंग होने लगी कि नहीं मुझे जो है गायत्री मंत्री चाहिए गायत्री मंत्री

318
00:22:39,960 --> 00:22:44,080
चाहिए गायत्री मंत्री चाहिए राम नाम नहीं व फीका है हनुमान नाम वो फीका

319
00:22:44,080 --> 00:22:48,400
है गायत्री मंत्री चाहिए गाय म प्रणवी चाहिए प्रणवी चाहिए यज्ञ प चाहिए ञ प

320
00:22:48,400 --> 00:22:52,440
चाहिए मंदिर में जाना चाहिए मंदिर में जाना ही चाहिए मूर्ति को छूना चाहिए मूर्ति को

321
00:22:52,440 --> 00:22:56,480
छना चाहिए इस तरह से यह नैरेटिव चलाए गए अब इसके बाद

322
00:22:56,480 --> 00:23:00,640
जब यह प्रोग्रामिंग हो गई कि को स्पर्श डायरेक्ट करना सबसे जरूरी

323
00:23:00,640 --> 00:23:04,720
है उसके बाद आपके पास आए क्रिश्चियन मिशनरीज की तरह लोग और फिर कहना

324
00:23:04,720 --> 00:23:08,720
शुरू किया कि वो लोग तुझे नीच समझते हैं वो

325
00:23:08,720 --> 00:23:12,720
लोग तुझे नीच समझते हैं इसलिए तुझे गायत्री मंत्र से वंचित कर रहे हैं फिर आपके अंदर

326
00:23:12,720 --> 00:23:16,720
फिर उनके अंदर वो आना शुरू होता है भाव अरे यार मेरे साथ इतना बड़ा

327
00:23:16,720 --> 00:23:20,840
अन्याय मतलब जो समस्या थी ही नहीं पहले उसको बिल्ड अप किया गया

328
00:23:20,840 --> 00:23:25,000
फिर उस समस्या से आपको जोड़ दिया गया तो ये एक तरीका है

329
00:23:25,000 --> 00:23:29,520
कैसे फूट डाली जाती कैसे वर्ण व्यवस्था को भंग किया जाता है अब

330
00:23:29,520 --> 00:23:30,020
इसका

331
00:23:29,880 --> 00:23:33,880
एक वो भी है वर्ण व्यवस्था का कि अगर जो

332
00:23:33,880 --> 00:23:38,040
चीज शास्त्रों ने कही है तो वो तो आज लागू है अगर वर्ण व्यवस्था

333
00:23:38,040 --> 00:23:42,200
जन्म से नहीं है और सबका समान अधिकार है तो वो तो आज लागू

334
00:23:42,200 --> 00:23:46,400
है सब लोग सब जगह व्यापार कर रहे हैं आज की स्थिति ज्यादा वो है

335
00:23:46,400 --> 00:23:50,760
भयावह आज अधर्म ज्यादा है या जब यह चीजें

336
00:23:50,760 --> 00:23:54,800
ये जो तथाकथित तंत्र जो आकर के ज पिछले 100 स सालों में वर्ण

337
00:23:54,800 --> 00:23:58,920
व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं तब की स्थिति ज्यादा अच्छी थी बताइए धर्म

338
00:23:58,920 --> 00:24:03,000
की दृष्टि से देखिए आज दुनिया में कौन सी जो साइट

339
00:24:03,000 --> 00:24:07,080
है अश्लील साइट वो सर्चिंग में है सबसे नंबर वन

340
00:24:07,080 --> 00:24:11,920
पर कौन सी सेट रहती है आज अधर्म ज्यादा है आज से 100 स साल पहले

341
00:24:11,920 --> 00:24:16,360
रामराज में लिखा हुआ है कि सब लोग अपने अपने वर्णा अनुसार कर्म करते थे

342
00:24:16,360 --> 00:24:20,680
तो अगर वहां पर कर्मणा वण व्यवस्था थी तो आज तो वही माला

343
00:24:20,680 --> 00:24:24,680
वही उसी के अनुसार काम हो रहा है किसी को भी कहीं भी भर्ती कर दिया जाता है

344
00:24:24,680 --> 00:24:28,720
कहीं पर भी जन्म लेने वाला कहीं पर भी लागू हो जाता है हालांकि कुछ चीज ऐसी है अभी

345
00:24:28,720 --> 00:24:33,680
भी अनुकरण किया जाता है जैसे आप फौज देखो आप फौज को देखो

346
00:24:33,680 --> 00:24:37,720
फौज में बटालियन बनी होती वो वाली रेजीमेंट

347
00:24:37,720 --> 00:24:41,800
वो वाली रेजीमेंट वहां पर व्यक्ति के जन्म के हिसाब से उसम उसको डाल दिया जाता है

348
00:24:41,800 --> 00:24:44,960
ऐसा आज भी चल रहा है राजपूताना राइफल्स

349
00:24:44,960 --> 00:24:49,040
या ये जो थापा होते हैं उनकी एक अलक्ष से होती है उनका क्या नाम होता

350
00:24:49,040 --> 00:24:53,080
है कुछ एक नाम होता है ध्यान नहीं आ रहा है तो ऐसे करके रेजीमेंट्स बनी

351
00:24:53,080 --> 00:24:57,080
होती है अच्छा इसका एक उदाहरण और ले लीजिए अगर व्यक्ति के कर्म से ही उसे

352
00:24:57,080 --> 00:25:01,760
जांचना है तो मैंने एक जो हमारी क्लासेस होती है

353
00:25:01,760 --> 00:25:05,880
उसमें मैंने एक बार बताया था कि किसी भी दृष्टांत को

354
00:25:05,880 --> 00:25:10,000
यदि समझना है तो आप

355
00:25:10,000 --> 00:25:14,400
उसके उस स्थिति को बड़ा कर दो सबसे

356
00:25:14,400 --> 00:25:18,520
उसकी मतलब जो जिस चीज जिस दृष्टांत को समझ रहे हैं उसके निमित्त ऐसा

357
00:25:18,520 --> 00:25:22,520
उदाहरण सोचो जो उदाहरण बहुत हायर लेवल का उसमें क्वांटिटी बढ़

358
00:25:22,520 --> 00:25:26,560
जाए जैसे की जब हम कहते ना नास्तिक के पास नियम

359
00:25:26,560 --> 00:25:30,600
नहीं होते हैं तो अगर उससे छोटे मोटे नियम पूछे कि भाई

360
00:25:30,600 --> 00:25:34,800
तुम हाथ क्यों धोते हो तो कह देगा नहीं धो अरे भाई किचन में तुम चप्पल

361
00:25:34,800 --> 00:25:38,960
पहन के क्यों नहीं जाते जाते हो तो वो कह देगा नहीं छोटे मोटे नियम जब पूछेंगे

362
00:25:38,960 --> 00:25:43,040
तो वो कह देगा ठीक है मैं इन नियमों के बिना भी रह लूंगा मगर जब

363
00:25:43,040 --> 00:25:47,200
हम उससे पूछेंगे सामने खड़ी हुई तीन स्त्रियों में से माता बहन और पत्नी

364
00:25:47,200 --> 00:25:51,480
में अंतर कैसे करोगे तो उस वो यहां पर अटक जाएगा तो इसलिए किसी दृष्टांत

365
00:25:51,480 --> 00:25:56,000
को समझने के लिए उसके बहुत एक्सट्रीम लेवल के उदाहरण को निकालना पड़ता है

366
00:25:56,000 --> 00:26:00,080
तो अब ऐसे ही मैंने आपको एक बात कही कि अगर मंदिर के अंदर यह

367
00:26:00,080 --> 00:26:04,200
व्यवस्था कर दी जाए कि हम उसको कर्म से वहां पहचाने कि कौन शूद्र

368
00:26:04,200 --> 00:26:08,320
है या कौन कौन किस तरह का जीवनयापन कर रहा है और तब अंदर

369
00:26:08,320 --> 00:26:12,840
ले तो कितनी अवस्था फैल जाएगी अब इस चीज को हम एक बड़े उदाहरण से समझते

370
00:26:12,840 --> 00:26:17,000
हैं अभी सभी लोग वो कोई

371
00:26:17,000 --> 00:26:21,200
बिल पास करा रहे थे एनआरसी बाहर से रोहिंग्या मुसलमानों को आने नहीं दिया

372
00:26:21,200 --> 00:26:25,760
जाएगा तो हर रोहिंग्या

373
00:26:25,760 --> 00:26:29,960
मुसलमान गलत है या सही है आपको पता आप बॉर्डर पर खड़े

374
00:26:29,960 --> 00:26:33,960
हो जाओ और चेक करो कौन व्यक्ति अच्छा है उससे बातचीत करो

375
00:26:33,960 --> 00:26:37,960
उसका पता लगाओ और कौन व्यक्ति वहां पर रोहिंग्या मुसलमान है जो अच्छा

376
00:26:37,960 --> 00:26:42,200
है वो कैसा जीवनयापन कर रहा है उसकी हिस्ट्री क्या है वो सब पता लगाओ उसके बाद जो

377
00:26:42,200 --> 00:26:46,520
गलत जो सही ना हो उसको मत आने दो और जो सही हो उसको आने दो

378
00:26:46,520 --> 00:26:50,720
मगर यहां पर तो सारे जितने भी लोग इस इस सिचुएशन में जितने भी

379
00:26:50,720 --> 00:26:55,080
लोग इस तरह से विरोध करते हैं वहां पर यहां से उसको

380
00:26:55,080 --> 00:26:59,480
जन्म से ही मान लिया कि नहीं भैया ये अगर वहां पर जन्मा है तो इसके इस इस तरह के फीचर्स

381
00:26:59,480 --> 00:27:03,560
होंगे तो ये ऐसा इसलिए किया गया कि हमारे पास इतना सामर्थ्य नहीं है कि हम

382
00:27:03,560 --> 00:27:08,080
बॉर्डर पर खड़े होकर ऐसी व्यवस्था कर सके कि जो अच्छा मुसलमान हो वो अंदर आए

383
00:27:08,080 --> 00:27:12,400
जो अच्छा रोहिंग्या हो वो अंदर आए और जो ना हो वो अंदर ना आए ठीक है

384
00:27:12,400 --> 00:27:15,160
इसी तरीके से ये होता है

385
00:27:15,160 --> 00:27:19,480
कि वहां पर भी यही होता है कि किसने ऐसा जीवन यापन

386
00:27:19,480 --> 00:27:23,920
किया जो मंदिर में आने के लिए अनुकूल है और किसने ऐसा नहीं किया जो प्रतिकूल

387
00:27:23,920 --> 00:27:28,080
है तो इसके लिए हम वहां खड़ा नहीं कर सकते किसी को ये अव्यवस्था का धोत होता

388
00:27:28,080 --> 00:27:32,200
है ठीक है और इसके अलावा और भी कई कारण है

389
00:27:32,200 --> 00:27:36,400
चलिए अब आगे होते हैं क्या देखिए आप दलित दलित

390
00:27:36,400 --> 00:27:42,400
लिख रहे तो मुझसे भी दलित ही

391
00:27:43,560 --> 00:27:47,800
बुलवाएं नहीं हो सकती हमारे कई ऐसे शूद्र भाई है गुरु भाई है

392
00:27:47,800 --> 00:27:51,880
और वह आते हैं और हम सब मिलकर हिंदू राष्ट्र जो अभियान है उसम कार्य कर

393
00:27:51,880 --> 00:27:55,920
रहे हैं अपने अपने जो मर्यादा है उसकी सीमा के अंदर रहते हुए क्यों

394
00:27:55,920 --> 00:27:58,520
नहीं हो सक

395
00:27:58,520 --> 00:28:02,880
समाज अन्य धर्म में ना जाए इसके लिए क्या कदम उठाए इसके लिए जो

396
00:28:02,880 --> 00:28:07,080
सामर्थ वान गुरुओं के द्वारा जो व्याख्या की जाती है धर्म ग्रंथ की

397
00:28:07,080 --> 00:28:11,120
उस व्याख्या को सामर्थ वान गुरुओं तक उन्हें पहुंचाए एक

398
00:28:11,120 --> 00:28:15,160
सौहार्द पूर्ण संवाद स्थापित करवाए सबसे बड़ी बात

399
00:28:15,160 --> 00:28:19,520
है संचय आत्मा विनती वह छोड़िए कि शूद्र

400
00:28:19,520 --> 00:28:24,160
जा रहे अरे भाई मैंने तो क्षत्रियों को बदलते हुए देखा है

401
00:28:24,160 --> 00:28:28,280
मैंने क्षत्रियों को बदलते हुए देखा है कलमा पढ़ते हुए देखा है शूद्र की तो बात छोड़ छोड़

402
00:28:28,280 --> 00:28:30,280
दीजिए जब भटका जाएगा जिसके मन

403
00:28:30,280 --> 00:28:34,360
में संसद इंजेक्ट कर दिया जाएगा तो वो तो फिर कोई

404
00:28:34,360 --> 00:28:38,720
भी हो सकता है धर्म अपना परिवर्तित कराने वाला ठीक है इसको छोड़िए

405
00:28:38,720 --> 00:28:43,200
तो समग रूप से बात क्या है संशय आत्मा विनश्यति भगवत गीता

406
00:28:43,200 --> 00:28:47,400
440 हमारा शत्रु है संशय और हिंदुओं के मन में भरा हुआ है अपने धर्म

407
00:28:47,400 --> 00:28:51,400
ब्रह्म को लेकर के संशय तो क्या करना है हमें

408
00:28:51,400 --> 00:28:55,640
उस संशय का निवारण करना है तो निवारण भी अपने द्वारा मत करिए शास्त्रों में उसकी व्यवस्था

409
00:28:55,640 --> 00:28:59,640
है संशय कौन दूर करेगा गुरु अंधकार कौन दूर

410
00:28:59,640 --> 00:29:03,640
करेगा गुरु गु का मतलब अंधकार रू का मतलब निकालने वाला गुरु

411
00:29:03,640 --> 00:29:08,000
उसके बाद गुरु भी अपने मन से ऐसे नहीं छोड़ दिया जाओ गुरु किसी को रामपाल को बना लो

412
00:29:08,000 --> 00:29:12,160
या जो कहे कि हमें शास्त्रों की गहराई में जाने की आवश्यकता नहीं है बस

413
00:29:12,160 --> 00:29:16,400
हमें तो जो कहा जा रहा है वो करने लगो शास्त्रों की गहराई में नहीं जाना है और फिर शास्त्रों की गहराई

414
00:29:16,400 --> 00:29:20,640
से ही बात करो फिर यहां ये लिखा है वहां वो लिखा है अपनी बात को बताने

415
00:29:20,640 --> 00:29:25,000
के लिए यहां ये लिखा है वहां वो लिखा है और जब हम कुछ पूछे शास्त्रों से

416
00:29:25,000 --> 00:29:29,120
तो शास्त्रों की गहराई में नहीं जाना है बस हरे कृष्ण का जाप करो तो

417
00:29:29,120 --> 00:29:33,840
ऐसा नहीं होना चाहिए तो क्या है गुरु के लक्षण क्या है पहली बात

418
00:29:33,840 --> 00:29:37,840
वो लक्षण से अंतिम निर्णय ऐसा नहीं है ग्रस्त आपका गुरु नहीं हो सकता

419
00:29:37,840 --> 00:29:41,960
है हो सकता है मगर वो भी किसी सन्यासी की सीमा में रह कर के ही

420
00:29:41,960 --> 00:29:45,880
आपको शिक्षा दे रहा हो किसी सन्यासी का शिष्य तो

421
00:29:45,880 --> 00:29:49,960
क्या है पहला है अंतिम निर्णायक कौन होगा ब्रह्मचारी

422
00:29:49,960 --> 00:29:54,240
ही आचार्य बनता है धर्म में संशय होने पर अधिष्ठाता

423
00:29:54,240 --> 00:29:58,520
ब्रह्मचारी को बनाए पहला लक्षण दूसरा क्या है ज्ञान वही प्रमाणिक

424
00:29:58,520 --> 00:30:02,680
जो परंपरा से प्राप्त हो तीसरा क्या है कि सभी शति

425
00:30:02,680 --> 00:30:06,680
स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा दे ऐसा ना कहे विष्णु पुराण को मत मानो

426
00:30:06,680 --> 00:30:10,960
शिव पुराण को मानो यह गलत है सभी में सामंजस ऐसी शिक्षा दे

427
00:30:10,960 --> 00:30:16,960
कि उसमें सामंजस हो जाए किसी का खंडन ना हो और चौथा क्या है

428
00:30:17,240 --> 00:30:21,560
कि चौथा है गुरु वही जो आपको संशय से निकाल दे आपका अंधकार

429
00:30:21,560 --> 00:30:26,000
दूर कर दे आपसे ये ना कहे अरे ज्यादा प्रश्न मत करो 5101

430
00:30:26,000 --> 00:30:30,040
कुरान में कहा गया कि ज्यादा ऐसे सवाल मत करो कि आपके

431
00:30:30,040 --> 00:30:34,200
लिए ऐसे प्रश्नों को ऐसी ऐसे

432
00:30:34,200 --> 00:30:38,280
विधियों को खोल दिया जाए जिसके कारण आपके जीवन में कठिनाई आ जाए क्योंकि पहले

433
00:30:38,280 --> 00:30:42,920
ऐसा हुआ था तो कुछ लोग बागी हो गए थे तो ऐसा नहीं अथातो

434
00:30:42,920 --> 00:30:46,920
धर्म जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा आपका संशय दूर हो आपका संशय करने

435
00:30:46,920 --> 00:30:50,920
वाला आपका गुरु तो यह चार पांच जो पैरामीटर है इनकी

436
00:30:50,920 --> 00:30:56,920
सीमा में आने वाले आपके गुरु हो सकते

437
00:30:56,920 --> 00:31:00,920
हैं अभी लेंगे आपके कुछ कुछ प्रश्न ले लेंगे नास्तिक कहता

438
00:31:00,920 --> 00:31:05,080
है कि किताबी परिभाषा नहीं पहली बात तो ये है कि अनुभव की परिभाषा

439
00:31:05,080 --> 00:31:09,480
भी है अनुभव की परिभाषा भी है मगर यदि हम अनुभव

440
00:31:09,480 --> 00:31:13,640
के ऊपर ही तुल जाए जब हमें अनुभव होगा तो

441
00:31:13,640 --> 00:31:17,720
आपके जीवन का एक मिनट नहीं खिसक पाएगा अनुभव के आधार

442
00:31:17,720 --> 00:31:22,000
पर आप अगर चलेंगे तो आपके जीवन का एक मिनट नहीं खिसक पाएगा

443
00:31:22,000 --> 00:31:26,280
आपने जापान को नहीं देखा मगर किसी ने बताया कि जापान है

444
00:31:26,280 --> 00:31:31,120
आपको उस पर विश्वास हुआ आपने मान लिया कि जापान है आपने अनुभव नहीं किया

445
00:31:31,120 --> 00:31:35,400
तो यह दुनिया जो चलती है वो विश्वास में चलती है ठीक है अनुभव भी अवेलेबल

446
00:31:35,400 --> 00:31:40,520
है मगर वही अव्यवस्था वाला कार्य आप अपना जीवन

447
00:31:40,520 --> 00:31:44,520
बिना अनुभव बिना विश्वास के एक दिन

448
00:31:44,520 --> 00:31:48,720
जीवन काट के दिखा दे नास्तिक एक दिन ऐसा कोई

449
00:31:48,720 --> 00:31:52,800
ना कोई कार्य वो करेगा ही पूरे दिन में जिसमें वह केवल विश्वास पर कर

450
00:31:52,800 --> 00:31:56,840
लेगा मंजन भी करेगा तो वो विश्वास में करेगा कि

451
00:31:56,840 --> 00:32:01,280
इसमें जो है ऐसा पदार्थ नहीं डाला गया है जो

452
00:32:01,280 --> 00:32:05,360
मुझे नहीं चाहिए विश्वास प करेगा अपने मुंह में डालेगा पैकेट

453
00:32:05,360 --> 00:32:09,520
लाकर खोलेगा फाड़े विश्वास पर खाएगा ठीक है तो

454
00:32:09,520 --> 00:32:12,000
यह खामा खा का तर्क है ऐसे लोगों को आप

455
00:32:12,000 --> 00:32:16,080
हमारा नंबर दिया करें और अभी बहुत जल्द हम लोगों का लाइव चर्चा शुरू

456
00:32:16,080 --> 00:32:20,120
हो जाएगी

457
00:32:20,120 --> 00:32:24,480
[संगीत] ओके क्या शूद्र ब्राह्मण

458
00:32:24,480 --> 00:32:30,280
क्षत्रिय वैश्य हो सकते हैं जी हो सकते हैं जन्म जनमा

459
00:32:30,280 --> 00:32:34,360
में हो सकते हैं जन्म जन्मांतर में एक 10 65 नंबर का श्लोक

460
00:32:34,360 --> 00:32:38,520
है मनुस्मृति का जहां पर जहां से उठा कर के इसका विवरण दिया जाता है इससे

461
00:32:38,520 --> 00:32:42,640
जस्ट पहले वाला श्लोक है उसका ही अगला अंश है जन्म जन्मांतर में ऐसा हो सकता

462
00:32:42,640 --> 00:32:47,000
है या फिर स्वयं भगवान आ करके कह दे कि हां अ ये हो गया जैसे विश्वामित्र

463
00:32:47,000 --> 00:32:51,360
जी के उसम हुआ था उनका जो जन्म है उनके जन्म का प्रयोजन ही ऐसा था

464
00:32:51,360 --> 00:32:55,920
कि उसमें जो है उनकी माता जी ने ब्राह्मण उचित खीर खाई थी तो उनके अंदर

465
00:32:55,920 --> 00:32:59,920
दिव्य लीला के दवा पहले से ही ब्राह्मण वाले गुण व्याप्त

466
00:32:59,920 --> 00:33:04,000
थे उसके बाद उन्होंने उन्होंने परंपरा प्राप्त जो वश जी थे उनके

467
00:33:04,000 --> 00:33:08,040
पास कई बार गए कि हमें ब्राह्मण घोषित कर द अगर उन्होंने मना कर दिया तो इससे भी सिद्ध

468
00:33:08,040 --> 00:33:12,080
हो रहा है जन्म से कौन थे वो ब्राह्मण ब्राह्मण जन्म से थे

469
00:33:12,080 --> 00:33:16,160
तो इससे सिद्ध हो रहा घटना से इसके बात उन्होंने बहुत तपस्या की तो भगवान आए

470
00:33:16,160 --> 00:33:20,480
ब्रह्मा जी आदि के द्वारा उनको घोषित किया गया कि वो ऐसा तो आप हो सकते हैं

471
00:33:20,480 --> 00:33:24,880
इतनी ऐसी तपस्या हो जाए कि भगवान या ऐसी दिव्य लीला के द्वारा आप

472
00:33:24,880 --> 00:33:27,320
घोषित हो जाए बाकी जन्म जन्मांतर

473
00:33:27,320 --> 00:33:31,800
में हो स जन् में कैसे कर्म करें और मैं तो यह कहूंगा फिर वही बात ब्राह्मण

474
00:33:31,800 --> 00:33:35,880
बनना जीवन का उद्देश्य है यह आप कहां लिखा है यही तो बात

475
00:33:35,880 --> 00:33:39,880
है समस्या बनाई गई है यह हमारे जीवन में

476
00:33:39,880 --> 00:33:44,120
समस्या नहीं है ब्राह्मण बनना हमारे जीवन का उद्देश्य नहीं है एक जब

477
00:33:44,120 --> 00:33:48,640
शिशु जन्म लेता है वह खाना मांगता है खुशी मांगता है

478
00:33:48,640 --> 00:33:52,760
ब्राह्मण बनना नहीं मानता मांगता है यह ब्राह्मण बनना

479
00:33:52,760 --> 00:33:56,760
बनने में खुशी मिलेगी यह आपको समझाया गया है ये

480
00:33:56,760 --> 00:34:00,960
आपके दिमाग में ग्रामिंग की गई हमारा उद्देश्य है सत चितता

481
00:34:00,960 --> 00:34:06,360
आनंद असतो मा सद गम ये नहीं लिखा है असतो मा ब्राह्मण

482
00:34:06,360 --> 00:34:10,440
गम है ना मृत्युर मा मतम गम ये नहीं लिखा है

483
00:34:10,440 --> 00:34:14,600
मृतु मा ब्राह्मण गम ये सब नहीं लिखा है हमारे शास्त्रों

484
00:34:14,600 --> 00:34:18,600
में तो क्या लिखा है हमारा उद्देश्य जीवन का है हमें

485
00:34:18,600 --> 00:34:22,880
चाहिए सच्चितानंद हमें ब्राह्मण बनना चाहिए ही नहीं आपकी

486
00:34:22,880 --> 00:34:27,040
सबसे ऊंची पहचान है आप राम के भक्त है और सामर्थ्य मान गुरु

487
00:34:27,040 --> 00:34:31,320
के शिष्य मेरी सबसे ऊंची पहचान है मैं प्रभु श्री राम का साधारण

488
00:34:31,320 --> 00:34:35,720
सा भक्त और श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर जी काल्पा

489
00:34:35,720 --> 00:34:40,000
जैसा शिष्य इससे ऊंची कोई हो ही नहीं सकती आप बताइए

490
00:34:40,000 --> 00:34:42,320
व्यवहारिक जीवन में इससे बड़ी कोई हो तो

491
00:34:42,320 --> 00:34:46,440
बताइए जो राम का भक्त हो गया वो सब कुछ हो गया तो ब्राह्मण

492
00:34:46,440 --> 00:34:51,480
बनना जीवन का उद्देश्य है ही नहीं उसको आप जीवन के उद्देश्य में क्यों ले रहे

493
00:34:51,480 --> 00:34:55,640
हैं और फिर भी जो शास्त्र है वो कहते हैं कि

494
00:34:55,640 --> 00:34:59,680
जन्म जन्मांतर में बन सकते हैं मगर फिर वही बात क्यों जन्म जन्मांतर की बात

495
00:34:59,680 --> 00:35:03,680
हम सोचे भाई हमें तो इसी जन्म में भगवान से मिलना है ऐसा

496
00:35:03,680 --> 00:35:07,800
सोचिए ना क्यों सोच रहे हैं कि अभ और हम अगले दो चार जन्म यहां

497
00:35:07,800 --> 00:35:10,960
पर

498
00:35:10,960 --> 00:35:15,200
बिताए फिर उसमें जन्म लेंगे छोटे बच्चे के रूप में फिर कभी

499
00:35:15,200 --> 00:35:19,280
बुझली के बोर्ड में उंगली डाल देंगे चित की प्यास के कारण छोटे

500
00:35:19,280 --> 00:35:23,400
बच्चे जो ये सब कार्य करते हैं कि मना करने पर भी कूद जाते हैं

501
00:35:23,400 --> 00:35:28,000
पलंग से और बिजली के बोर्ड में उंगली डाल देते हैं य सब कार्य क्यों करते हैं

502
00:35:28,000 --> 00:35:32,200
चित की प्यास होती है अखंड ज्ञान यह भी जान लो बोर्ड में क्या है

503
00:35:32,200 --> 00:35:36,200
यह सब बातें उसके उस समय दिमाग में आ रही होती है ना यह क्या कर रहे वो क्या कर रहे है सब

504
00:35:36,200 --> 00:35:40,400
ये लोग मेरी बात क्यों नहीं मान रहे यह क्या है चित की प्यास अखंड ज्ञानी बन

505
00:35:40,400 --> 00:35:44,520
जाने की प्यास और वहीं पर आनंद की प्यास क्या होती है

506
00:35:44,520 --> 00:35:49,120
कि मुझे कुछ चाहिए दूध चाहिए या मैंने

507
00:35:49,120 --> 00:35:53,160
मूत्र त्याग कर दिया है तो मेरे को गीला महसूस हो रहा है अब सही क्यों

508
00:35:53,160 --> 00:35:57,160
नहीं रहा बोल पा नहीं रहे सक्षम नहीं है शरीर सामने वाले को बताने के लिए

509
00:35:57,160 --> 00:35:57,660
तो रो

510
00:35:57,400 --> 00:36:02,560
रहे वो क्या है अखंड सुख की प्यास अनंत आनंद की प्यास है

511
00:36:02,560 --> 00:36:07,000
ना हर्षदीप सिंह जी हैं लुधियाना

512
00:36:07,000 --> 00:36:11,000
से नाथस प्रतिमा अस्थ का अर्थ है कोई भी परमात्मा के बराबर

513
00:36:11,000 --> 00:36:15,120
नहीं है तो क्या यह बात केवल निराकार ब्रह्म

514
00:36:15,120 --> 00:36:21,120
पर ही लागू होती है क्योंकि साकार ईश्वर की प्रतिमा बनाई जा सकती है

515
00:36:22,000 --> 00:36:26,040
हां यह जो बात है भगवान के परमार्थिक स्वरूप की बात

516
00:36:26,040 --> 00:36:31,360
हो रही है जो परमार्थिक स्वरूप है भगवान का उसकी कोई प्रतिमा नहीं है ठीक

517
00:36:31,360 --> 00:36:35,600
है परमार्थिक स्वरूप निर्गुण निराकार निराकार स्वरूप जो है उसकी

518
00:36:35,600 --> 00:36:41,200
कोई प्रतिमा नहीं

519
00:36:41,200 --> 00:36:46,680
है अभिजीत मंडल जी दोबारा पश्चिम बंगाल

520
00:36:46,680 --> 00:36:51,640
से आप लोकतंत्र को मलित शासन व्यवस्था बताया है

521
00:36:51,640 --> 00:36:55,920
क्या लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था भारत के लिए अनुकूल नहीं है

522
00:36:55,920 --> 00:36:59,720
आपको क्या लगता है अनुकूल है

523
00:36:59,720 --> 00:37:03,800
भारत के संविधान के प्रति हमको निष्ठा बनाए रखना चाहिए कि नहीं हां

524
00:37:03,800 --> 00:37:08,200
बिल्कुल बनाए रखना चाहिए तब तक जब तक उसके ध्वज के नीचे हम लोग

525
00:37:08,200 --> 00:37:12,280
अपने देश की रक्षा कर रहे हैं बिल्कुल बनाना चाहिए क्यों

526
00:37:12,280 --> 00:37:16,360
नहीं बनाना चाहिए मगर प्रॉब्लम यह है कि हम उसे शाश्वत सिद्धांत

527
00:37:16,360 --> 00:37:20,480
के रूप में नहीं ले सकते क्यों क्योंकि मैं चलो अभी मैं

528
00:37:20,480 --> 00:37:25,040
मान गया आप ही से पूछता हूं अभी कुछ लोग ज्यादा ऐसे सत्ता में पहुंच गए

529
00:37:25,040 --> 00:37:29,320
पहली बात तो आपको य मानना पड़ेगा ऐसे लोग भी चना जीत सकते हैं जो आपके अनुकूल

530
00:37:29,320 --> 00:37:33,360
ना हो वह लोग वहां पर पहुंच करके संसद में ऐसा बिल

531
00:37:33,360 --> 00:37:37,520
पास करा सकते हैं जो आपको बिल्कुल स्वीकार ना हो और हो रहा

532
00:37:37,520 --> 00:37:41,760
है भाई जो धर्म नहीं है जो सनातन सिद्धांत

533
00:37:41,760 --> 00:37:46,400
नहीं उसकी पहचान क्या व बदलता है तो संविधान बदल रहा है

534
00:37:46,400 --> 00:37:50,440
लिविन रिलेशनशिप जिसको हमारे यहां पर व्यभिचार कहा गया

535
00:37:50,440 --> 00:37:54,560
जिसको पाप कहा गया उसको अलाउ कर दिया गया जहां तक मेरी

536
00:37:54,560 --> 00:37:57,640
जानकारी है तो

537
00:37:57,640 --> 00:38:01,680
बहुत सी चीज है बदलता जाएगा दुनिया में धर्म

538
00:38:01,680 --> 00:38:06,960
और अधर्म के मूल में है ईश्वर बाधित और ईश्वर

539
00:38:06,960 --> 00:38:12,880
अबाध धर्म जहां है वहां पर ईश्वर अबाध है

540
00:38:12,880 --> 00:38:16,920
और ये अधर्म जहां है वहां पर ईश्वर बाधित है इसके भी

541
00:38:16,920 --> 00:38:21,200
मूल में क्या है हम लोग सोचते धर्म के नाम पर लड़ाया जा रहा नहीं मानवता

542
00:38:21,200 --> 00:38:27,200
और पशुता ह्यूमैनिटी वर्सेस एनिमलिज्म तो

543
00:38:28,000 --> 00:38:32,080
टी वो जहां पर ईश्वर हो अवाद ईश्वर

544
00:38:32,080 --> 00:38:36,080
और एनिमलिस म वो जहां पर ईश्वर ना हो या फिर हो

545
00:38:36,080 --> 00:38:40,880
तो बाधित ईश्वर हो ठीक है

546
00:38:40,880 --> 00:38:44,920
तो यदि ऐसा संविधान है जिसको कभी भी चेंज किया जा सकता

547
00:38:44,920 --> 00:38:48,920
है तो उसको आप अपने जीवन का आधार नहीं

548
00:38:48,920 --> 00:38:53,360
बना सकते हां क्योंकि अभी स्थितियां विपरीत

549
00:38:53,360 --> 00:38:57,480
है तो जो है उसके प्रति यथा सामर्थ

550
00:38:57,480 --> 00:39:01,920
निष्ठा होनी चाहिए उसकी सीमा में रहकर के कार्य करना

551
00:39:01,920 --> 00:39:06,080
चाहिए क्या प्राचीन भारत में राजाओं के युग के शासन व्यवस्था

552
00:39:06,080 --> 00:39:10,840
ही अनुकूल है जो मनुस्मृति से या अन्य शास्त्र से होता था

553
00:39:10,840 --> 00:39:12,840
भैया रामराज मनुस्मृति के हिसाब

554
00:39:12,840 --> 00:39:17,000
से ही था अगर हम यह नहीं मानते कि वह व्यवस्था अनुकूल है तो पहली बात

555
00:39:17,000 --> 00:39:21,040
तो हम राम को नहीं मानते राम को नहीं मानते तो सनातन को

556
00:39:21,040 --> 00:39:25,400
नहीं मानते सनातन को नहीं मानते तो ईश्वर को नहीं मानते

557
00:39:25,400 --> 00:39:29,680
अवाद श्वर को अवाद को नहीं मानते अबद ईश्वर को नहीं मानते तो ईश्वर

558
00:39:29,680 --> 00:39:34,560
को नहीं मानते ईश्वर को नहीं मानते तो हम पशु है यही सिद्ध

559
00:39:34,560 --> 00:39:38,760
होगा कान को कैसे भी पकड़ लीजिए

560
00:39:38,760 --> 00:39:43,000
सनातन का विरोध करने वाला वह स्वयं को मनुष्य

561
00:39:43,000 --> 00:39:47,200
भी सिद्ध नहीं कर पाएगा उसको सनातन की शरण में आना पड़ेगा

562
00:39:47,200 --> 00:39:50,520
ठीक

563
00:39:50,520 --> 00:39:54,880
है अगर आप या हम आधुनिक भारत में राजाओं सम्राटों का शासन व्यवस्था

564
00:39:54,880 --> 00:39:59,200
कैसे संभव होगा क्या करना पड़ेगा मानवता

565
00:39:59,200 --> 00:40:03,640
की जो शिक्षा है धर्म की शिक्षा मानवता

566
00:40:03,640 --> 00:40:06,800
का अर्थ है

567
00:40:06,800 --> 00:40:11,080
धर्म तो धर्म की जो शिक्षा उसको ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना

568
00:40:11,080 --> 00:40:15,200
शुरू करिए और आप देखेंगे कि आपको

569
00:40:15,200 --> 00:40:21,200
नींद भी बहुत अच्छी आएगी साथ ही साथ

570
00:40:21,360 --> 00:40:25,720
आपको आप एक धर्मार्थ का के अग्रणी

571
00:40:25,720 --> 00:40:30,120
सैनिक भी बनेंगे भारत की स्वदेशी न्याय व्यवस्था कैसे संचालित होनी चाहिए

572
00:40:30,120 --> 00:40:34,560
क्या परिवर्तन करना चाहिए और कैसे संभव होगा यह सब कुछ

573
00:40:34,560 --> 00:40:39,280
निर्भर करता है जब व्यास गद्दी का शोधन

574
00:40:39,280 --> 00:40:43,400
यानी कि व्यास गद्दी पर ऐसे सामर्थ वान गुरु बैठे

575
00:40:43,400 --> 00:40:47,640
हो व्यास के रूप में लोग उन सामर्थ वान गुरुओं को जानते हो

576
00:40:47,640 --> 00:40:51,680
जो धर्म की ऐसी सही शिक्षा आपको बताए वो

577
00:40:51,680 --> 00:40:55,880
अकाट्य शिक्षा जिसके नीचे मानव समाज सुनियोजित

578
00:40:55,880 --> 00:41:00,120
तरीके से एक छत्र हो स तब यह सब चीजें लागू होंगी

579
00:41:00,120 --> 00:41:04,160
तो व्यास गद्दी और शासन तंत्र का शोधन जब व्यास गद्दी

580
00:41:04,160 --> 00:41:05,640
सही होगी व्यास गद्दी को उसकी

581
00:41:05,640 --> 00:41:09,840
सही जगह मिलेगी व्यास गद्दी पर सही व्यक्ति बैठेगा तो उसके द्वारा

582
00:41:09,840 --> 00:41:14,080
जो चयनित शासन तंत्र होगा वोह भी सही से चलेगा पहले क्या होता था

583
00:41:14,080 --> 00:41:18,240
कि जो धर्म होता जो राजनीति होती थी वह धर्म के आधार पर होती थी

584
00:41:18,240 --> 00:41:22,280
प्रभु श्री राम भी अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने

585
00:41:22,280 --> 00:41:26,560
के लिए जो निर्भर करते थे भगवान जो गुरु वशिष्ठ

586
00:41:26,560 --> 00:41:30,760
थे उन पर वहां जाते थे और उनसे जाकर के

587
00:41:30,760 --> 00:41:34,800
वो निर्देश लेते थे कि क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए धर्म और अधर्म

588
00:41:34,800 --> 00:41:38,840
का निर्णय कौन करते थे तो राजनीति कैसे चली धर्म से

589
00:41:38,840 --> 00:41:43,280
अभी क्या हो रहा है कि ऐसे लोग भी व्यास गद्दी पर बैठे हैं

590
00:41:43,280 --> 00:41:47,320
जिनको शासन तंत्र से निर्देश मिलता है कि उन्हें क्या करना चाहिए तो जैसे

591
00:41:47,320 --> 00:41:50,400
ही यह चीज बदलेगी

592
00:41:50,400 --> 00:41:54,440
सार्वभौम जो आचार गद्दी है वो हमारी खित हो जाएगी मैं

593
00:41:54,440 --> 00:41:58,560
ये नहीं कह रहा शंकराचार्य के रूप में ही ह आप करने जब जाओगे

594
00:41:58,560 --> 00:42:02,720
तार्किक रूप से तो आपको आना पड़ेगा व बात बात की है मगर मैं ये कह रहा हूं आप

595
00:42:02,720 --> 00:42:06,800
ही कोई जो इस बात को ना मानते हो आप ही कोई

596
00:42:06,800 --> 00:42:11,360
ऐसी व्यास गद्दी बना दीजिए जिसके नीचे पूरा सनातन समाज एक हो सके

597
00:42:11,360 --> 00:42:16,080
जब सनातन समाज एक होगा तो उसके द्वारा जो विरचित

598
00:42:16,080 --> 00:42:20,400
मानवीय व्याख्या मानव उचित शल की व्याख्या वह ज्यादा से ज्यादा वर्ल्ड

599
00:42:20,400 --> 00:42:20,900
में फेमस

600
00:42:20,840 --> 00:42:26,840
होंगी और पूरा मानव समाज में तो कह रहा हूं वो एक होगा

601
00:42:27,960 --> 00:42:32,880
तो व्यास गद्दी का शोधन और शासन तंत्र का शोधन

602
00:42:32,880 --> 00:42:37,160
ये दो चीजें आधार है स्वदेशी और गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था कैसी

603
00:42:37,160 --> 00:42:41,360
होनी चाहिए क्या क्योंकि मै कोले ने शिक्षा व्यवस्था से अधिक हानि पहुंचाई

604
00:42:41,360 --> 00:42:45,400
है देश में ऐसा कैसे संभव है फिलहाल तो

605
00:42:45,400 --> 00:42:49,400
जो अवेलेबल है प्राप्त ज्ञान का समादार करिए जो उपलब्ध

606
00:42:49,400 --> 00:42:53,640
है यथा सम्मत यदि उसका ही पालन करने लगेंगे तो बहुत सशक्तिकरण हो

607
00:42:53,640 --> 00:42:58,080
जाएगा एक बार गुरुदेव से किसी ने बोला था कि

608
00:42:58,080 --> 00:43:02,360
अगर हमने फलान को नहीं मारा तो वो लोग हमें मार देंगे क्या करना चाहिए

609
00:43:02,360 --> 00:43:06,440
गुरुदेव ने कहा था यदि हिंदू यथा सम्मत अपने

610
00:43:06,440 --> 00:43:10,440
धर्म का निर्वाह करने लगे तो बहुत बड़ा तो

611
00:43:10,440 --> 00:43:14,960
जो तंत्र है हिंदू विरोधी जितने तंत्र है उन तंत्रों में

612
00:43:14,960 --> 00:43:18,960
ऐसे लोग खड़े हो जाएंगे जो अपने तंत्रों का शोधन कर देंगे उदाहरण के लिए उन्होंने

613
00:43:18,960 --> 00:43:22,960
बताया बौद्धों के य देखो अहिंसा को बताया गया किसी भी हालत में

614
00:43:22,960 --> 00:43:27,080
हिंसा नहीं करनी है मगर जब उन्हें लोग खा खाने आ रहे थे तो

615
00:43:27,080 --> 00:43:31,400
तो उन्होंने एक नया नियम निकाला कि भाई अपनी रक्षा के लिए अगर हिंसा करनी पड़े तो हिंसा नहीं है

616
00:43:31,400 --> 00:43:35,640
तो क्या हुआ उतने अंश में वो बौद्ध मत को छोड़ कर के हिंदू हो गए

617
00:43:35,640 --> 00:43:36,140
इसी

618
00:43:35,920 --> 00:43:40,200
प्रकार से कोई इस्लाम को मानने वाली स्त्री जब मन में यह सोच रही होती है

619
00:43:40,200 --> 00:43:44,320
कि मेरा जो पति हो वो केवल मेरे बारे में सोचे और किसी के बारे में ना सोचे

620
00:43:44,320 --> 00:43:48,360
जबकि वहां कहा गया है कि एक से चार तक विवाह करना अधर्म

621
00:43:48,360 --> 00:43:52,560
नहीं है मतलब उसे निम्न नहीं कहा गया हमारे यहां पर अमुक अमुक

622
00:43:52,560 --> 00:43:56,640
स्थितियों में ही कर सकते हो जब आपको ऐसी स्थिति हो जाए

623
00:43:56,640 --> 00:44:00,920
जिसकी बाध्यता हो जाए उसमें ही वो दिया गया वरना एक नारी सदा

624
00:44:00,920 --> 00:44:05,240
ब्रह्मचारी भगवान राम की भले भगवान राम के पिताजी की भले

625
00:44:05,240 --> 00:44:09,240
ही तीन पत्नियां थी मगर भगवान राम ने जब वैष्णो माता

626
00:44:09,240 --> 00:44:13,480
आई उनके पास या सूप नका आई तो उससे कह दिया मैं विवाहित हूं मैं

627
00:44:13,480 --> 00:44:17,520
मैं एक पत्नी व्रत धारण किए हुए हूं और मैं जो है एक से

628
00:44:17,520 --> 00:44:21,680
ज्यादा विवाह नहीं कर सकता और इस मर्यादा को मर्यादा पुरुषोत्तम

629
00:44:21,680 --> 00:44:25,800
कह कर के सिद्ध कर दिया गया एक नारी तक सीमित रहना ही सनातन

630
00:44:25,800 --> 00:44:29,960
धर्म के द्वारा दी गई म ज्यादा है जो सर्वोच्च है

631
00:44:29,960 --> 00:44:34,080
अब बाकी विशेष आपातकालीन परिस्थिति में अलग-अलग चीजें

632
00:44:34,080 --> 00:44:38,160
हो सकती है मगर सामान्य स्थितियों में नहीं हो सकती तो क्या हुआ

633
00:44:38,160 --> 00:44:42,520
हमारे यहां पर सामान्य स्थिति में क्या कहा गया एक नारी और वहां पर सामान्य

634
00:44:42,520 --> 00:44:46,600
स्थिति में कहा गया क्या क्या कहा गया एक से ज्यादा

635
00:44:46,600 --> 00:44:50,600
तो एक इस्लाम को मानने वाली जो स्त्री होती है वो भी अपने मन में

636
00:44:50,600 --> 00:44:51,100
एक सोच

637
00:44:51,040 --> 00:44:55,240
रही होती है कि भाई मेरा पति जो है मुझ तक सीमित हो कर के रहे इसका

638
00:44:55,240 --> 00:44:59,520
अर्थ क्या है कि मन ही मन उस समय जहां पर

639
00:44:59,520 --> 00:45:03,720
एक या चार विवाह करने वाले को समान कहा गया है इस शिक्षा का खंडन

640
00:45:03,720 --> 00:45:07,760
कर रही होती है और जहां पर एक विवाह करने वाले को श्रेष्ठ और

641
00:45:07,760 --> 00:45:11,880
उससे ज्यादा विवाह करने वाले को निम्न कहा गया है उस शिक्षा का अनुकरण कर रही

642
00:45:11,880 --> 00:45:15,920
होती मनी मन तो क्या होगा इसका अर्थ क्या है

643
00:45:15,920 --> 00:45:20,320
क्यों पड़े हो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में घुमा फिरा करके आपको

644
00:45:20,320 --> 00:45:24,800
मानना ही पड़ेगा सनातन के सनातन के उसमें आना ही

645
00:45:24,800 --> 00:45:28,240
पड़ेगा अ

646
00:45:28,240 --> 00:45:32,360
नोनिया जाति से मुझे संस्कृति यह शिवम कुमार जी हैं गौतम

647
00:45:32,360 --> 00:45:36,760
बुद्ध नगर से हैं और इनको अद्वैत वेदांत के दर्शन के बाद देखिए शुरुआत

648
00:45:36,760 --> 00:45:40,800
यह करिए जो गुरुदेव आपके मन में जो जो ब्रह्म विषयक धर्म विषयक प्रश्न

649
00:45:40,800 --> 00:45:45,040
आते हैं उन प्रश्नों को एज इट टाइप करिए वहां

650
00:45:45,040 --> 00:45:49,400
टू के स उसम बार में और आगे डाल दीजिए पूरी शंकराचार्य जी

651
00:45:49,400 --> 00:45:53,440
तो गुरुदेव ने करीब साढ़े 5000 प्रश्नों के जवाब दिए हुए अब तो बहुत ज्यादा हो

652
00:45:53,440 --> 00:45:57,520
गए होंगे हम लोग करीब 6000 प्रश्न हो गए होंगे तो आप के प्रश्नों

653
00:45:57,520 --> 00:46:01,560
के जवाब पहली बात तो यह है कि उनको सुनना शुरू करिए जो प्राप्त है

654
00:46:01,560 --> 00:46:05,800
पहले उसको धारण करिए और जो जो चीज अभी दुर्गम

655
00:46:05,800 --> 00:46:06,300
है उनके

656
00:46:06,160 --> 00:46:10,200
पीछे बाद में करिएगा ऐसा नहीं वो नहीं करनी मगर जो अवेलेबल है वहां से

657
00:46:10,200 --> 00:46:15,080
शुरुआत करिए जहां खड़े हैं वहीं से शुरुआत करिए

658
00:46:15,080 --> 00:46:19,080
ठीक है तो यह सारी आपकी शिक्षा पद्धति शुरू हो जाएगी दूसरी बात एक बात

659
00:46:19,080 --> 00:46:23,200
जरूर कहूंगा कि भगवान के नाम का नाम का वो लीजिए

660
00:46:23,200 --> 00:46:27,280
शरण लीजिए दिन भर में कम से कम सवा घंटे

661
00:46:27,280 --> 00:46:31,680
भगवान के नाम का वो करिए जाप करिए इससे क्या होगा भगवान ने क्या कहा

662
00:46:31,680 --> 00:46:34,080
भगवत गीता 92 में कि

663
00:46:34,080 --> 00:46:38,520
जब तू मेरी शरण में आ जाता है तो तेरी प्राप्ति की रक्षा अप्राप्य

664
00:46:38,520 --> 00:46:39,560
की चिंता मैं करता

665
00:46:39,560 --> 00:46:43,640
हूं फिर आपको कुछ करना ही नहीं पड़ेगा भगवान आपके पीछे पीछे चलेंगे चलो

666
00:46:43,640 --> 00:46:47,760
भाई अद्वैत का य वाला ग्रंथ दिलवा उसको ऐसे गुरुओं के पास आपको स्वत ले

667
00:46:47,760 --> 00:46:51,760
जाएंगे कि आपको पता ही नहीं चलेगा मगर व्यक्ति की प्रॉब्लम

668
00:46:51,760 --> 00:46:55,880
क्या है कि वो सब कुछ अपने हाथों से करना चाहता है भगवान के पास नहीं

669
00:46:55,880 --> 00:46:59,880
जाता है प भगवान के पास जाओ भगवान की शरण पहले

670
00:46:59,880 --> 00:47:04,240
लो राम राम रटने लगो अभी सुबह से लेकर रात तक अभी देखो

671
00:47:04,240 --> 00:47:08,400
कुछ ही दिनों में आपकी काया पलट होने लगी जो जो चीज आपके लिए बहुत आवश्यक है सब आने

672
00:47:08,400 --> 00:47:14,400
लगेंगी आपके पास तो पहले भगवान की शरण

673
00:47:15,320 --> 00:47:19,440
पकड़ी मेरे जीवन में भी जो पूज्य गुरुदेव का आगमन हुआ है भगवान

674
00:47:19,440 --> 00:47:25,440
के जो नाम का रट्टा लगाने के कारण ही हुआ एक वीडियो मैंने बताया था

675
00:47:28,200 --> 00:47:32,320
मैं शंकराचार्य महाराज को सुनता हूं उनसे दीक्षा प्राप्त करना चाहता हूं इसके

676
00:47:32,320 --> 00:47:36,520
लिए गुरुदेव जहां पर भी होते हैं वहां पर आपको

677
00:47:36,520 --> 00:47:40,520
पहुंचना होता है अपने पारंपरिक वस्त्र के साथ आप घर से

678
00:47:40,520 --> 00:47:45,120
निकल सकते हैं अपने गृहस्थ वाली वेशभूषा में जो आज की प्रासंगिक वेशभूषा

679
00:47:45,120 --> 00:47:49,160
उसमें मगर जब आपको गुरुदेव दीक्षा देने के लिए

680
00:47:49,160 --> 00:47:53,600
देख रहे होंगे तो उस समय आपने धोती और उपवत यानी की जो

681
00:47:53,600 --> 00:47:57,600
गमछा है वो धारण किया हो अचला और

682
00:47:57,600 --> 00:48:01,680
उस रूप में वह आपको देखेंगे और आपको दीक्षा दे देंगे इसके

683
00:48:01,680 --> 00:48:05,880
लिए कोई शुल्क नहीं होता है कुछ भी ले जाना अलग से नहीं होता जो आपकी श्रद्धा हो गुरु

684
00:48:05,880 --> 00:48:10,720
के लिए वह आप ले जा सकते हैं कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि

685
00:48:10,720 --> 00:48:14,960
दीक्षा को जो है बांटा जा रहा है ऐसे किया जा रहा है भाई दीक्षा से ही तो विद्या

686
00:48:14,960 --> 00:48:18,960
आना शुरू होता है व जो ब्राह्मण को दीक्षा

687
00:48:18,960 --> 00:48:23,480
प्राप्त हो जाती गायत्री मंत्र की कब पाच वर्ष से माना गया है मनुस्मृति

688
00:48:23,480 --> 00:48:27,760
में तो तो आपका जो शिक्षा शुरू ही होती है व दीक्षा

689
00:48:27,760 --> 00:48:33,760
से ही होती है तो यह कुतर्क हो

690
00:48:35,280 --> 00:48:39,080
गया इसके बाद

691
00:48:39,080 --> 00:48:43,160
है देव सत्यम पॉल

692
00:48:43,160 --> 00:48:49,160
हा यह है सिलिगुरी से वेस्ट

693
00:48:51,320 --> 00:48:55,920
बंगाल वो कब आएंगे वो कब कहां होते हैं इसके लिए

694
00:48:55,920 --> 00:49:00,520
बहुत पहले नहीं बताया जाता है कुछ सुरक्षात्मक कारणों के कारण आप

695
00:49:00,520 --> 00:49:04,800
हमारे चैनल्स को गोवर्धन मटके चैनल को ट चैनल है गोवर्धन

696
00:49:04,800 --> 00:49:09,080
मट का इनको फॉलो करते रहिए गोवर्धन

697
00:49:09,080 --> 00:49:13,200
मट का एक ऑफिशियल नंबर भी है वहां दीक्षा के लिए जाने

698
00:49:13,200 --> 00:49:17,520
के लिए या फिर आदित्य वाहिनी से जुड़ने के लिए जो है

699
00:49:17,520 --> 00:49:21,720
आप जो है इन सब चीजों को फॉलो करिए टेलीग्राम चैनल है हमारा उसको जरूर फॉलो

700
00:49:21,720 --> 00:49:26,320
करिए वहां पर हम लोग कोशिश करते हैं कि अपडेटेड रहे

701
00:49:26,320 --> 00:49:30,640
ह दीप सिंह फिर से आए आ गए लुधियाना से इस

702
00:49:30,640 --> 00:49:34,760
कौन कहता है कि चार वैष्णव संप्रदाय प्रामाणिक है और इसका प्रमाण

703
00:49:34,760 --> 00:49:38,800
शास्त्रों में है तो क्या शंकर परंपरा का वर्णन हमने दिखाया है ना

704
00:49:38,800 --> 00:49:42,920
शंकर परंपरा का वर्णन वायु पुराण उक्त एक लिंग महात्म में

705
00:49:42,920 --> 00:49:47,040
है और आप उस जो एक जगह पर एक पंक्ति में दिया

706
00:49:47,040 --> 00:49:50,480
उसको छोड़ भी दीजिए तो अलग अलग जब शास्त्रों का अध्ययन करेंगे तो इसके गुरु

707
00:49:50,480 --> 00:49:54,520
यह थे ये मिल जाएगा राम जी के गुरु ये थे ये मिल जाएगा वशिष्ठ जी के पुत्र ये

708
00:49:54,520 --> 00:49:58,520
थे ये मिल जाएगा ऐसे करते हुए चेन बन जाएगी आपकी नाम

709
00:49:58,520 --> 00:50:01,400
सार्थक श्रीवास्तव

710
00:50:01,400 --> 00:50:05,600
आयु जिला बस्ती देवदासी

711
00:50:05,600 --> 00:50:09,920
प्रथा की सत्यता क्या है देवदासी प्रथा देखिए प्रथा

712
00:50:09,920 --> 00:50:13,960
की बात ऐसी होती है कि कहीं कहीं पर

713
00:50:13,960 --> 00:50:18,080
शिक्षा में विकृति के कारण कोई परंपरा

714
00:50:18,080 --> 00:50:22,400
अगर चालू हो गई है तो कई बार ऐसा कहते हैं लोग कि

715
00:50:22,400 --> 00:50:26,760
जो जो हमारे यहां पर जने शादी के समय होता है वो हमारे यहां

716
00:50:26,760 --> 00:50:30,840
क्या सनातन से बाहर है क्या तो हमें करना ये चाहिए अगर हमें पता चल गया

717
00:50:30,840 --> 00:50:34,880
कि शास्त्र सत नहीं है और हमारा सामर्थ्य है तो हमें ऐसी प्रथाओं को

718
00:50:34,880 --> 00:50:37,880
रोकना चाहिए

719
00:50:37,880 --> 00:50:42,080
तो हमारे यहां की परंपरा के नाम पर स्वयं को सनातन विरुद्ध घोषित

720
00:50:42,080 --> 00:50:48,080
नहीं करना [संगीत]

721
00:50:50,680 --> 00:50:54,760
चाहिए और सामर्थ वान गुरुओं की शरण में

722
00:50:54,760 --> 00:50:58,960
जाएं तो आपके जो धर्म और ब्रह्म

723
00:50:58,960 --> 00:51:04,120
का जो वह है साधन वह सुलभ हो जाएगा

724
00:51:04,120 --> 00:51:09,480
हा यह देखिए यह वस्तुनिष्ट बातें हो गई जो आपने पूछी है 36 से 96

725
00:51:09,480 --> 00:51:13,560
ऐसा यह वस्तुनिष्ट बातें हैं सैद्धांतिक विषयक

726
00:51:13,560 --> 00:51:17,600
प्रश्न आप किया करें कि जो विधि विधान से निमित्त जो चीज

727
00:51:17,600 --> 00:51:21,960
होती है कि इसमें इतना यह करना है वह हम भी आचार्य श्री से ही मार्गदर्शन

728
00:51:21,960 --> 00:51:27,960
लेते हैं तो

729
00:51:28,000 --> 00:51:32,400
हर्षदीप सिंह लुधियाना से क्या श्रीमत जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी महाराज

730
00:51:32,400 --> 00:51:36,400
से सूत्रों को भी दीक्षा मिल सकती है हां बिल्कुल गुरुदेव जो

731
00:51:36,400 --> 00:51:40,480
दीक्षा देते हैं वह शूद्रों को भी देते हैं और हमारे कई शूद्र गुरु भाई

732
00:51:40,480 --> 00:51:44,480
हैं ऑलरेडी कई लोग कहते हैं

733
00:51:44,480 --> 00:51:49,320
निराकार का अर्थ होता है जिससे सभी आकार आए हैं यह अर्थ भी होता है

734
00:51:49,320 --> 00:51:53,440
मगर जिससे सभी आकार आए हैं तो इसका अर्थ एक ये भी तो हो गया

735
00:51:53,440 --> 00:51:57,640
कि उसका कोई आकार नहीं है अगर इस अर्थ को भी मान ले सभी आकार आए

736
00:51:57,640 --> 00:52:02,000
हैं तो अगर जिससे सभी आकार आए हैं तो इसका मतलब

737
00:52:02,000 --> 00:52:06,200
सभी आकारों के आने से पहले कोई आकार नहीं था तो अपने आप ही इसी

738
00:52:06,200 --> 00:52:10,320
परिभाषा में ही निराकार शब्द है दूसरी बात हमारे धर्म शास्त्रों में

739
00:52:10,320 --> 00:52:14,640
निराकार वोह जो है यह जो कहा गया

740
00:52:14,640 --> 00:52:18,840
एक बात आई है कि अनाक नहीं कहा गया है ना

741
00:52:18,840 --> 00:52:22,960
अनाक कहना चाहिए मगर अनाक शब्द का उपयोग भी हमारे शास्त्रों में

742
00:52:22,960 --> 00:52:27,080
है और यह बात गलत है कि

743
00:52:27,080 --> 00:52:32,040
निराकार का अर्थ केवल यही है कि जिससे सभी आ आकार जो है निकले हैं

744
00:52:32,040 --> 00:52:36,400
और रामानंदाचार्य जी निराकार का अर्थ यह भी है

745
00:52:36,400 --> 00:52:40,520
कि हमारी जो कर्मेंद्रियां है उनका वो विषय

746
00:52:40,520 --> 00:52:43,000
नहीं है यह भी अर्थ हो गया हमारी आंखें नहीं

747
00:52:43,000 --> 00:52:47,400
देख सकती वोह भले ही वास्तव में आकार वाला ही हो जैसे नामन

748
00:52:47,400 --> 00:52:51,720
जो शुद्ध द्वैत परंपरा उसम माना गया कि भगवान है तो मगर भगवान साकार

749
00:52:51,720 --> 00:52:55,720
तो है मगर उनका वो अभौतिक स्वरूप है दिव्य स्वरूप है तो हमारी

750
00:52:55,720 --> 00:53:00,000
इन आंखों का विषय नहीं हो सकता व्यावहारिक दृष्टि से व निराकार

751
00:53:00,000 --> 00:53:04,040
है आफ्टर ऑल व एक रूप है मगर व ऐसा रूप है जो हमारी

752
00:53:04,040 --> 00:53:08,080
आंखें नहीं देख सकती तो व्यावहारिक दृष्टि क्या हो गई मनुष्य की दृष्टि से निराकार ही

753
00:53:08,080 --> 00:53:12,440
हो [संगीत]

754
00:53:12,440 --> 00:53:16,840
गए अभिषेक पाठक जी यह जो जानकारी है शुद्ध

755
00:53:16,840 --> 00:53:21,120
दत वाली की आखिरी में उन्होंने क्या माना इसको कन्फर्म भी कर लीजिएगा

756
00:53:21,120 --> 00:53:27,120
काफी दिन हो गए इस बारे में पढ़े हुए

757
00:53:29,840 --> 00:53:33,840
अभिषेक पाठक जी ब्राह्मण क्या पुराण वैदिक है

758
00:53:33,840 --> 00:53:38,160
यदि हां तो किन वेदों उपनिषदों में इसका प्रमाण है देखि

759
00:53:38,160 --> 00:53:42,360
सबसे पहली बात तो कई उसम है पुराणों के बारे में बताया

760
00:53:42,360 --> 00:53:45,880
गया है

761
00:53:45,880 --> 00:53:49,880
और कई जगह पर वर्णन है मगर मैं आपको एक जगह का भी बता दे

762
00:53:49,880 --> 00:53:53,480
रहा हूं पुराणों को प्रमाणिक माना गया

763
00:53:53,480 --> 00:53:57,480
है यह देखिए अ अवेद 11

764
00:53:57,480 --> 00:54:01,840
सा च अथर्ववेद 11 सा च अच्छा

765
00:54:01,840 --> 00:54:05,920
उल्टा दिखाई दे रहा है तो

766
00:54:05,920 --> 00:54:09,920
इसमें जो है पुराणों की बात हो रही है

767
00:54:09,920 --> 00:54:13,920
और कई जगह पर भी है जैसे बदर उपनिषद दो च द

768
00:54:13,920 --> 00:54:18,120
यहां पर भी पुराणों को माना गया है और पंचम वेद के रूप में पुराणों

769
00:54:18,120 --> 00:54:22,240
को माना जाता है दूसरी बात यह है कि अब बात

770
00:54:22,240 --> 00:54:26,480
य आती पुराण को तो सभी मानते हैं बस यह है कि

771
00:54:26,480 --> 00:54:30,760
ये दिक्कत हो सकती ये अंतर आ जाता है कि वो लोग उनको पुराण नहीं कहते

772
00:54:30,760 --> 00:54:34,840
जिनको हम पुराण कहते हैं ये अंतर हो सकता है ऐसा नहीं है कि वो

773
00:54:34,840 --> 00:54:39,040
लोग पुराण को ठुकरा सकते तो जो लोग ये कहते हैं पौराणिक

774
00:54:39,040 --> 00:54:43,200
जो लोग ये कहते हैं पौराणिक वो खुद अवैध हो जाते हैं पौराणिक को

775
00:54:43,200 --> 00:54:45,280
अपने से अलग करते हैं यदि

776
00:54:45,280 --> 00:54:49,440
तो वो खुद अवैध हो जाते हैं क्योंकि पौराणिक का अर्थ तो ये हो गया जब पुराण

777
00:54:49,440 --> 00:54:53,560
शब्द उसमें आया वेदों में शास्त्रों के रूप में तो पुराण

778
00:54:53,560 --> 00:54:58,320
के अर्थ में वो किसी भी शास्त्र को मानते हो वो ब्राह्मण ग्रंथ को मानते हो मगर

779
00:54:58,320 --> 00:55:02,360
पुराण को तो मान रहे हैं ना ब्राह्मण ग्रंथ के रूप में मान रहे हैं तो पुराण को यदि वो मान

780
00:55:02,360 --> 00:55:06,600
रहे तो पौराणिक तो वो भी हो गए तो फिर इसलिए पौराणिक संज्ञा देकर के

781
00:55:06,600 --> 00:55:11,200
पौराणिक से अपने आप को अलग नहीं करना चाहिए को कोई और संज्ञा ढूंढनी चाहिए दूसरी

782
00:55:11,200 --> 00:55:15,320
बात कि इस प्रमाण को हटा दीजिए जो मैंने

783
00:55:15,320 --> 00:55:19,600
आपको दिया है प्रमाण को अभी साइड कर दीजिए मैं बस इतना पूछूंगा

784
00:55:19,600 --> 00:55:24,040
कि वेद आपको प्राप्त कैसे हुए आपको परंपरा प्राप्त आचार्यों

785
00:55:24,040 --> 00:55:28,280
से वेद प्राप्त हुए जब परंपरा प्राप्त आचार्य से वेद प्राप्त

786
00:55:28,280 --> 00:55:32,960
हुए तो क्या हुआ

787
00:55:32,960 --> 00:55:37,120
कि यदि आपको परंपरा प्राप्त आचार्यों

788
00:55:37,120 --> 00:55:41,360
से प्राप्त होने वाले वेदों पर विश्वास है

789
00:55:41,360 --> 00:55:45,760
तो उनके द्वारा प्राप्त होने वाले पुराणों पर अविश्वास होना

790
00:55:45,760 --> 00:55:49,800
उचित सिद्ध नहीं होता और यदि परंपरा प्राप्त आचार्यों से प्राप्त

791
00:55:49,800 --> 00:55:53,880
होने वाले पुराणों पर आपको विश्वास नहीं है तो उन्हीं से प्राप्त होने वाले

792
00:55:53,880 --> 00:55:58,080
वेदों पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता तो आप पहले निर्णय करें कि

793
00:55:58,080 --> 00:56:00,280
हमारे पास यह वेदा आदि शास्त्र

794
00:56:00,280 --> 00:56:04,480
आए कैसे बात खत्म हो जाएगी या तो आप यह मानिए कि अभी 100

795
00:56:04,480 --> 00:56:08,640
स साल पहले दयानंद जी ने ही वेदों का लिखा है और वही वैदिक धर्म है

796
00:56:08,640 --> 00:56:13,040
प्राचीन धर्म है ही नहीं सनातन शास्त्र है ही नहीं वरना बताइए कैसे आए

797
00:56:13,040 --> 00:56:17,440
किसने किसको दिए नाम लेकर थोड़ा बताइए ज्यादा पीछे मत जाइए

798
00:56:17,440 --> 00:56:21,440
कुछ जैसे अभी टीपू सुल्तान आदि की बात

799
00:56:21,440 --> 00:56:25,480
आप करते हैं अलंकार समाजी तो उसमें क्या है

800
00:56:25,480 --> 00:56:29,640
टीपू सुल्तान की बात जब करते यानी कि आपको दुनिया का 200 300

801
00:56:29,640 --> 00:56:34,280
साल पुराना भी वो मालूम है इतिहास तो अपना तो बता

802
00:56:34,280 --> 00:56:38,480
दो अपना तो बता दो भाई तुम दुनिया

803
00:56:38,480 --> 00:56:42,640
भर की बातें कर रहे हो 5000 साल पहले ये वहां ये वहां वो अपना

804
00:56:42,640 --> 00:56:47,200
इतिहास बता नहीं रहे हो दो 300 साल पहले का नहीं बता रहे हो तो ये है

805
00:56:47,200 --> 00:56:51,440
ठीक है और यह जो

806
00:56:51,440 --> 00:56:55,440
यह वाली बात जो है कि टीपू सुल्तान की सहायता

807
00:56:55,440 --> 00:57:00,120
की थी तो जो शंकराचार्य वो एक मान्य के रूप में

808
00:57:00,120 --> 00:57:04,360
उन्हें माना जाता था उनको महाराष्ट्रीय जो मराठा थे वह भी उनकी सेवा करते थे

809
00:57:04,360 --> 00:57:08,360
और यदि कोई यह टीपू सुल्तान जैसा व्यक्ति था तो वह भी

810
00:57:08,360 --> 00:57:12,440
सेवा कर सकता था ऐसा नहीं है कि उनकी आइडल जीी को

811
00:57:12,440 --> 00:57:15,600
उनके द्वारा लिए जा रहे निर्णयों

812
00:57:15,600 --> 00:57:19,680
को समर्थन प्राप्त था मगर वह एक मंदिर के जैसा था तो वहां पर कोई भी अपना

813
00:57:19,680 --> 00:57:23,960
माथा टेक सकता था तो सभी टेकते थे अगर ऐसा होता तो जो उसी

814
00:57:23,960 --> 00:57:28,080
जहां इतिहास में ये भी लिखा है जिस वेबसाइट में ये सब आया

815
00:57:28,080 --> 00:57:30,600
है

816
00:57:30,600 --> 00:57:34,680
जिस के ऊपर टीपू सुल्तान का समर्थक होने का आरोप लगाया

817
00:57:34,680 --> 00:57:38,680
जा रहा है और टीपू सुल्तान जिनका दुश्मन है मराठा का मराठा भी उन्हें

818
00:57:38,680 --> 00:57:42,800
मराठा ने खुद घोषित किया बाजीराव पेशवा द्वितीय ने यह घोषित किया कि

819
00:57:42,800 --> 00:57:47,000
हमारे यहां सबसे पहले जो शेरी के शंकराचार्य हैं उनका

820
00:57:47,000 --> 00:57:51,080
पूजन होगा मतलब गुरु के रूप में तो

821
00:57:51,080 --> 00:57:55,120
अगर वो वाकई में उनके समर्थक थे और दुश्मन थे तो फिर आपका कटाक्ष तो

822
00:57:55,120 --> 00:57:59,960
इनके ऊपर भी होना चाहिए बाजीराव पेशवा के ऊपर तो आप फिर

823
00:57:59,960 --> 00:58:04,360
शिवाजी आदि के विरोधी हो जाएंगे विरोधी तो है ही क्योंकि व हिंदवी धज

824
00:58:04,360 --> 00:58:08,640
के नीचे लड़ते थे और आप कह रहे हो हिंदू का अर्थ है काफिर चोर लुटेरा

825
00:58:08,640 --> 00:58:13,520
तो फिर वही होता ऐसा जब उनके पास

826
00:58:13,520 --> 00:58:18,600
[प्रशंसा]

827
00:58:18,600 --> 00:58:22,720
कहोगे जब भैरव परमात्मा स्वरूप है तो वृंदावन वाले पंडित

828
00:58:22,720 --> 00:58:26,960
यह सब रस की बातें हो सकती है जब भैरव परमात्मा स्वरूप है

829
00:58:26,960 --> 00:58:30,960
तो वृंदावन वाले पंडित माधवाचार्य जी जिन्होंने 13 ब बार गायत्री

830
00:58:30,960 --> 00:58:35,360
मंत्र पुरश्चरण किया था 12 वर्षों की पुरश्चरण के पश्चात

831
00:58:35,360 --> 00:58:39,760
एक अवधूत के कहने पर शीघ्र परिणाम प्राप्त करने के लिए

832
00:58:39,760 --> 00:58:44,280
भगवान भैरव की भी साधना करने लगे थे भगवान भैरव ने उनके सामने

833
00:58:44,280 --> 00:58:48,560
प्रकट होने से मना कर दिया था क्योंकि भगवान

834
00:58:48,560 --> 00:58:52,760
भैरव का यह कहना था कि उन्होंने 12 वर्ष तक गायत्री का पुरश्चरण किया है

835
00:58:52,760 --> 00:58:56,880
इसलिए उनके तेज के सामने व प्रकट नहीं हो सकते यदि वह प्रकट हो हैं

836
00:58:56,880 --> 00:59:01,200
तो वह भस्म हो जाएंगे यदि पंडित माधवाचार्य वही वृंदावन

837
00:59:01,200 --> 00:59:05,480
के पंडित जी थे जिन्होंने माधव निदान नाम करके एक आयुर्वेद ग्रंथ

838
00:59:05,480 --> 00:59:09,680
पुस्तक लिखी थी तो मेरा प्रश्न यह है जो मैंने उपयुक्त शलोक लिखा है एवं

839
00:59:09,680 --> 00:59:13,760
जो मैंने आपको कथा कही है मुझे तो विवादास्पद है यदि

840
00:59:13,760 --> 00:59:17,960
भैरव परमात्मा स्वरूप है गायत्री मंत्र से मतलब भस्म कैसे हो सकते हैं

841
00:59:17,960 --> 00:59:22,200
ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है जब

842
00:59:22,200 --> 00:59:26,600
भगवान श्री कृष्ण सबको वश में

843
00:59:26,600 --> 00:59:30,640
करने वाले होते हुए भी रण को छोड़कर भाग सकते हैं तो

844
00:59:30,640 --> 00:59:33,760
फिर वह गायत्री मंत्र से सस भी हो सकते

845
00:59:33,760 --> 00:59:37,920
हैं तो पहला सिद्धांत अपने माइंड में फीड करके रखिए ईश्वर के ऊपर कोई भी नियम

846
00:59:37,920 --> 00:59:41,960
लागू नहीं होता वह कुछ भी कर सकते हैं कुछ भी का मतलब कुछ भी

847
00:59:41,960 --> 00:59:46,520
कोई लिमिट नहीं है कोई वो नहीं है तो भस्म हो के भी दिखा सकते हैं आपको

848
00:59:46,520 --> 00:59:51,040
इसमें इसमें बुरा क्या मानना दूसरी बात यह

849
00:59:51,040 --> 00:59:55,120
है सिद्धांत आदेश अभी अभी बात कर लेंगे आप लोग थोड़ा

850
00:59:55,120 --> 00:59:59,280
अपने सवालों को थोड़ा रोक के रखिए ये प्रश्न खत्म हो जाए पहले उसके बाद

851
00:59:59,280 --> 01:00:03,960
हम बात करेंगे होने वाले हैं

852
01:00:03,960 --> 01:00:08,280
तो ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है दूसरी बात आपने जो वृतांत

853
01:00:08,280 --> 01:00:12,760
लिया है य वस्तुनिष्ठ प्रसंग है तो इसके बारे में जो

854
01:00:12,760 --> 01:00:16,960
पूरी जानकारी मतलब आप जहां से पढ़ रहे हैं वहां कौन से परंपरा है

855
01:00:16,960 --> 01:00:21,000
उस परंपरा प्राप्त आचार्य में वहां जाकर के जानकारी ले के ऐसा हुआ भी था कि नहीं हुआ

856
01:00:21,000 --> 01:00:25,200
था यह है पहली बात मगर अगर मैं कह रहा हूं ऐसा हुआ भी था

857
01:00:25,200 --> 01:00:29,200
तो जो हमरा साम सिद्धांत वो क्या है ईश्वर वही है जो

858
01:00:29,200 --> 01:00:33,200
कुछ भी कर सकता है व किसी भी प्रकार के नियम के नीचे भी नहीं है वह सभी नियमों को

859
01:00:33,200 --> 01:00:37,520
बनाने वाला सर्व नियामक है तो व हसेगा भी व रोएगा भी

860
01:00:37,520 --> 01:00:42,200
वह रास भी रचाए वह भस्म भी होगा लो

861
01:00:42,200 --> 01:00:46,800
कुछ भी नहीं कुछ भी संसार में ऐसा नहीं है जो

862
01:00:46,800 --> 01:00:48,760
वह नहीं कर सकता वह

863
01:00:48,760 --> 01:00:53,840
गायत्री मंत्र से बसम के भी दिखा देगा ठीक है

864
01:00:53,840 --> 01:00:58,080
बाकी आप वस्तुनिष्ट इसकी कफ कर लीजिएगा मगर भगवान

865
01:00:58,080 --> 01:01:03,240
यदि ऐसी लीला कर रहे हैं तो उससे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए

866
01:01:03,240 --> 01:01:07,880
राधा जी और कृष्ण का क्या रिश्ता

867
01:01:07,880 --> 01:01:10,000
था

868
01:01:10,000 --> 01:01:14,040
जो रस का जो भाव होता है

869
01:01:14,040 --> 01:01:18,040
देखिए आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत सारी बातें हैं क्या बिना

870
01:01:18,040 --> 01:01:22,440
विवाह के संबंध रखना ठीक है आपको

871
01:01:22,440 --> 01:01:26,720
ये जो दो दृष्टि है परमार्थिक दृष्टि और व्यवहारिक

872
01:01:26,720 --> 01:01:31,240
दृष्टि भगवान कृष्ण की कई ऐसी लीलाए हैं जो

873
01:01:31,240 --> 01:01:35,600
मानवीय दृष्टि से नहीं देखी गही है आध्यात्मिक दृष्टि व्यास

874
01:01:35,600 --> 01:01:39,680
जैसे आचार्य गणों ने उनको देखा और उनको नोट डाउन किया और आपको किसी एक

875
01:01:39,680 --> 01:01:44,080
विशेष मंतव्य से बताया जैसे कि जो रामायण है महाभारत

876
01:01:44,080 --> 01:01:48,120
इसका जो युद्ध है यह मनुष्य ने भी देखा मगर यह कुछ

877
01:01:48,120 --> 01:01:52,480
घटनाए भगवान श्री कृष्ण की जास लीला या उनका ऐसा हुआ उनके साथ ये मनुष्य

878
01:01:52,480 --> 01:01:56,720
ने नहीं देखा कई ऐसी लीला भगवान श्री कृष्ण की जिनको मनुष्य ने नहीं

879
01:01:56,720 --> 01:02:01,040
तो उनको आचार्य आपको क्यों बता रहे हैं इसका अर्थ आपको आचार्य की दृष्टि

880
01:02:01,040 --> 01:02:03,880
से ही लेना चाहिए अगर

881
01:02:03,880 --> 01:02:07,920
आचार्य कह रहे हैं कि यह करके भगवान यह दिखाना चाह रहे हैं आपको तो उसमें फिर आपको यह

882
01:02:07,920 --> 01:02:12,000
नहीं कहना चाहिए कि नहीं इससे तो अधर्म की स्थापना हो रही है ये ठीक इस प्रकार

883
01:02:12,000 --> 01:02:16,800
से है जैसे कि वायु

884
01:02:16,800 --> 01:02:20,800
हर जगह जा सकती है अब वायु आपको बताना चाहती है कि मैं कहां कहा

885
01:02:20,800 --> 01:02:24,840
जा सकती हूं तो वायु के पास यदि सामर्थ्य है तो उसने ऐसा

886
01:02:24,840 --> 01:02:29,160
रूप बनाया जो आप कर्मेंद्रियों का ज्ञानेंद्रियों का विषय बन सके

887
01:02:29,160 --> 01:02:33,160
तो वह प्रकट हो गई एक मानव रूप में अब बोली मैं वायु

888
01:02:33,160 --> 01:02:37,880
हूं जैसे आपने देखा है आजकल कुछ ऐसे

889
01:02:37,880 --> 01:02:42,280
प्रोग्राम्स है बैंक वगैरह में अक्सर होते हैं हेलो आई एम

890
01:02:42,280 --> 01:02:46,560
एलेक्सा तो जो पूरा सिस्टम है बैंक का वह एक एलेक्सा

891
01:02:46,560 --> 01:02:50,800
नाम की लड़की के रूप में दिखने लगा उसको वो सारी चीजें उसके अंदर जो उस पूरे सिस्टम

892
01:02:50,800 --> 01:02:54,840
के अंदर तो इसी तरीके से अब उसने सिस्टम ने क्या किया

893
01:02:54,840 --> 01:02:58,840
कि वो जो सिस्टम है उसने आपसे संपर्क स्थापित करने के

894
01:02:58,840 --> 01:03:03,120
लिए एक ऐसा रूप बनाया जिसको आप जिसकी बातें आप समझ सको सुन सको

895
01:03:03,120 --> 01:03:07,120
जो आपकी कर्म इंद्रियों का विषय बन सके इसी तरीके से भगवान

896
01:03:07,120 --> 01:03:11,200
भी है वो अवतार लेते हैं ऐसे ही स सर्वव्यापक भगवान ऐसे ही अवतार

897
01:03:11,200 --> 01:03:15,320
ले लेते हैं दूसरा क्या है कि

898
01:03:15,320 --> 01:03:19,240
जैसे कि अ ये वायु

899
01:03:19,240 --> 01:03:23,240
ने वायु ने कहा कि भाई मैं ऐसा करता हूं मैं बताता हूं तो उसने एक अवतार

900
01:03:23,240 --> 01:03:28,080
लिया वो वायु के रूप में आ गया अब वो आपको बताना चाह मैं कान के अंदर जा सकता हूं

901
01:03:28,080 --> 01:03:32,160
आपको बताना चाह रहा है मैं हर जगह जा सकता हूं तो वायु जो है हर जगह जाकर बता

902
01:03:32,160 --> 01:03:36,200
रही है नाली में भी जाक बता रही ऐसी जगह पर जहां पर जाना आपको

903
01:03:36,200 --> 01:03:40,200
आपत्ति जनक लग सकता है अब आप उसके उस दृष्टिकोण को ना देखते हुए

904
01:03:40,200 --> 01:03:44,600
उससे यह कह रहे हो कि देखो ये यह कैसी जगह जा रहा है

905
01:03:44,600 --> 01:03:48,640
यह कैसा आपत्ति जनक कार्य कर रहा है तो इसी प्रकार से भगवान ने इस बात को

906
01:03:48,640 --> 01:03:51,000
कहा भी भगवत गीता में कि जो लोग मानव

907
01:03:51,000 --> 01:03:55,040
देह में देखकर मुझे मेरे ब्र ब्रह्म को भूल जाते हैं वो मूर्ख

908
01:03:55,040 --> 01:03:56,990
होते हैं

909
01:03:56,990 --> 01:04:02,990
[संगीत]

910
01:04:08,040 --> 01:04:14,040
नाम सार्थक श्रीवास्तव अच्छा य हो

911
01:04:15,980 --> 01:04:21,200
[संगीत] गया देखिए हमारे आचार्य जो

912
01:04:21,200 --> 01:04:25,240
है आप अपने जो जैसे आपने प्रश्न पूछा क्या ब्रह्म वैवर्त

913
01:04:25,240 --> 01:04:29,520
पुराण में में कोई मिलावट हुई है क्या भगवान कृष्ण का जीवन पालन

914
01:04:29,520 --> 01:04:33,560
करने योग्य है भगवान श्री कृष्ण को कहीं भी धर्म नहीं

915
01:04:33,560 --> 01:04:38,000
कहा गया है वो लीला पुरुषोत्तम है मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं है तो उनका हम अनुसरण

916
01:04:38,000 --> 01:04:42,720
कर सकते अनुकरण नहीं कर सकते तो फॉलो और ओबे

917
01:04:42,720 --> 01:04:46,920
यह दोनों हम राम का कर सकते हैं मगर यहां पर केवल ओबे करना

918
01:04:46,920 --> 01:04:51,120
है आपको उनका अनुसरण नहीं करना है अनुसरण करेंगे तो आपके अंदर वैसा

919
01:04:51,120 --> 01:04:55,280
सामर्थ्य भी होना चाहिए वो कुछ भी कर सकते हैं तो आपको भी कुछ भी कर सकने वाला होना

920
01:04:55,280 --> 01:04:59,920
चाहिए ये ठीक

921
01:04:59,920 --> 01:05:04,280
है य इसके बाद क्या है हां

922
01:05:04,280 --> 01:05:08,560
ब्रह्म वैवर्त पुराण में कोई मिलावट हुई है तो देखिए आपको परंपरा प्राप्त

923
01:05:08,560 --> 01:05:12,960
आचार्यों पर निर्भर होना होगा कि कौन से शास्त्र हमारे लिए

924
01:05:12,960 --> 01:05:17,120
सही है और कौन से शास्त्र नहीं है खत्म हो गई बात यह जो हम

925
01:05:17,120 --> 01:05:21,680
अगर प्रामाणिक आचार को जान जाएंगे तो हमारी यह चीज खत्म हो जाएगी प्रामाणिक आचार्य

926
01:05:21,680 --> 01:05:25,880
बताएंगे भाई ये परंपरा प्राप्त सही है इसमें मिलावट नहीं हुई है और यह परंपरा प्राप्त

927
01:05:25,880 --> 01:05:29,960
सही नहीं है इस मिलावट हुई है और अगर मिलावट हुई भी होगी तो व यह भी बता देंगे

928
01:05:29,960 --> 01:05:34,120
इतने अंश में मिलावट हुई है उतने अंश में नहीं हुई है जैसे

929
01:05:34,120 --> 01:05:38,440
कि कुछ ऐसे आगम शास्त्र वैष्णव और शवों के

930
01:05:38,440 --> 01:05:42,440
जैसे ब्रह्म समिता और यह पंचरा इत्यादि इसके लिए पूरी तरीके से

931
01:05:42,440 --> 01:05:46,880
अमान्य नहीं कहा है आचार्य ने उन्होंने क्या कहा कि उनका वह

932
01:05:46,880 --> 01:05:51,120
अंश जो वेद के विरुद्ध है वह केवल अनम में नहीं बाकी

933
01:05:51,120 --> 01:05:55,680
वो भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा ठीक है

934
01:05:55,680 --> 01:06:01,680
[संगीत]

935
01:06:02,000 --> 01:06:06,280
क्या शूद्र को पुराण गीता रामायण महाभारत इतिहास

936
01:06:06,280 --> 01:06:10,440
पढ़ने का अधिकार है भाई मैं तो कह रहा हूं

937
01:06:10,440 --> 01:06:14,600
ब्राह्मण को भी वेद पुराण वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है यदि गुरु के सानिध्य

938
01:06:14,600 --> 01:06:18,880
ना हो तो गुरु का सानिध्य प्राप्त करिए डायरेक्ट स्वाध्य

939
01:06:18,880 --> 01:06:23,160
ना करि गुरुओं के द्वारा निर्धारित जो सिद्धांत

940
01:06:23,160 --> 01:06:27,200
स्वीकार किए गए हैं उनकी सीमा में र कर के जिससे आप जब अध्ययन करेंगे

941
01:06:27,200 --> 01:06:31,440
तो भटक नहीं दूसरी बात अगर शास्त्र में ऐसी कोई चीज आती जो हमारे समझ

942
01:06:31,440 --> 01:06:35,600
में नहीं आ रही है तो हम शास्त्र के प्रति धर्म के प्रति अनास्ता मान नहीं होंगे

943
01:06:35,600 --> 01:06:39,680
उस समय हमारे पास य होगा इसका जरूर कोई ना कोई आंसर गुरुदेव के पास होगा

944
01:06:39,680 --> 01:06:44,000
किसी समय जाऊंगा और ले लूंगा और उसको अपनी नोटबुक में आप लिख लीजिए तो अध्ययन

945
01:06:44,000 --> 01:06:48,200
करिए बिल्कुल मन से अध्ययन करिए क्या हमारे धर्म ग्रंथों

946
01:06:48,200 --> 01:06:52,440
में किसी भी प्रकार की मिलावट

947
01:06:52,440 --> 01:06:56,520
बाहरी लोगों के द्वारा की गई है और अगर की गई है तो क्या उनको हम किसी

948
01:06:56,520 --> 01:07:01,240
किस प्रकार से सुधार सकते हैं इन सबका एक वही है निराकरण

949
01:07:01,240 --> 01:07:05,320
पहली बात तो की गई है और नहीं भी की गई है कई जहां की गई

950
01:07:05,320 --> 01:07:09,760
है तो वहां के बारे में परंपरा प्राप्त आचार्य बता देंगे ये चीज गलत है प्रक्षिप्त है

951
01:07:09,760 --> 01:07:13,760
और जहां नहीं की गई है वहां के बारे में परंपरा प्राप्त आचार्य बता देंगे प्रक्षिप्त नहीं है तो हमें

952
01:07:13,760 --> 01:07:17,200
परंपरा प्राप्त आचार्यों की ओर मुख करना हो हम

953
01:07:17,200 --> 01:07:21,320
खुद अपने जैसे वही वाली बात कही ना मैंने कि वो

954
01:07:21,320 --> 01:07:25,600
हम अपने हिसाब से सब कुछ करना चाहते हैं तो पहले भगवान की ओर जाओ

955
01:07:25,600 --> 01:07:29,880
तो इसी तरीके से ग्रंथ आदि विषयक जो चीजें हैं इसमें क्या है आप आप परंपरा

956
01:07:29,880 --> 01:07:34,840
प्राप्त आचार्य की शरणागति हो जाओ जब ऐसा होगा तो

957
01:07:34,840 --> 01:07:38,920
क्या होगा कि आपका यह जो धर्म अधर्म का निर्णय है बहुत सरल

958
01:07:38,920 --> 01:07:44,920
हो

959
01:07:46,440 --> 01:07:52,440
जाएगा एक प्रश्न और है

960
01:08:05,150 --> 01:08:09,400
[संगीत]

961
01:08:09,400 --> 01:08:13,440
देखिए विष्णु में और शिव में तत्व कोई भेद नहीं है

962
01:08:13,440 --> 01:08:17,840
जैसे ही भेद को स्वीकार करेंगे तत्व में तो ईश्वर को आप सीमित करना

963
01:08:17,840 --> 01:08:22,320
पड़ेगा तो इसलिए जो संग्राम जीत सिंह जी हैं

964
01:08:22,320 --> 01:08:26,920
इन्होंने क्वेश्चन भेजा है कि

965
01:08:26,920 --> 01:08:31,080
थोड़ी व्याख्या आपने वस्तुनिष्ट दी है जिसमें कि आपने कहा है कि कुल मिलाकर के विष्णु

966
01:08:31,080 --> 01:08:35,800
जी लिमिटेड है 24 पुस्तक तो विष्णु जी को अगर

967
01:08:35,800 --> 01:08:40,000
आप शिव जी से अलग कर देंगे तो वह

968
01:08:40,000 --> 01:08:44,480
जो है सीमित हो जाएंगे शिव जी सीमित हो जाएंगे जैसे ही अलग करेंगे तो

969
01:08:44,480 --> 01:08:48,720
अलग करते समय आपको उनको सीमित करना पड़ेगा

970
01:08:48,720 --> 01:08:54,120
तो सीमित नहीं कर सकते कुल मिलाकर के सभी

971
01:08:54,120 --> 01:08:58,320
में यही ही है कि हे ब्रह्मा विष्णु महेश

972
01:08:58,320 --> 01:09:02,320
भगवती और गणेश जो वेदा दि शास्त्र है उनके द्वारा प्रतिपादित जो

973
01:09:02,320 --> 01:09:06,520
ईश्वर के पांच स्वरूप है उत्पत्ति स्थिति समार निग्रह अनुग्रह

974
01:09:06,520 --> 01:09:10,520
करने के लिए तो हे ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और

975
01:09:10,520 --> 01:09:15,240
गणेश मैं आप सबकी भक्ति भगवान विष्णु के रूप में

976
01:09:15,240 --> 01:09:19,480
या भगवान शिव के रूप में भगवान कृष्ण के रूप में माता

977
01:09:19,480 --> 01:09:23,520
के रूप में करना चाहता हूं आप सभी मुझे आपकी भक्ति इस

978
01:09:23,520 --> 01:09:28,080
रूप में प्रदान करें आशीर्वाद दें और फिर अपनी भक्ति

979
01:09:28,080 --> 01:09:32,480
कर ध्रुव सोलंकी जी हैं

980
01:09:32,480 --> 01:09:36,600
यह जो प्रश्न का मैंने आंसर दिया है इनका नाम है संग्रमजीत

981
01:09:36,600 --> 01:09:40,840
सिंह जो इन्होंने बताया नहीं हां वेस्ट बंगाल

982
01:09:40,840 --> 01:09:45,720
से मुर्शिदाबाद से इसके बाद ध्रुव सोलंकी जी

983
01:09:45,720 --> 01:09:51,480
हैं सूरत गुजरात

984
01:09:51,480 --> 01:09:55,600
से नहीं कर सकते क्योंकि पुराण इन्होंने पूछा है कि

985
01:09:55,600 --> 01:09:59,800
क्या वो पुराण का भाष्य कर सकते हैं नहीं करना चाहिए क्यों नहीं करना चाहिए

986
01:09:59,800 --> 01:10:03,960
देखिए सकते वाली भाषा जो है ना वो गलत हो जाती है करना नहीं चाहिए क्यों

987
01:10:03,960 --> 01:10:07,960
नहीं करना चाहिए क्योंकि ब्रह्म का जो ज्ञान उसमें

988
01:10:07,960 --> 01:10:12,400
भी है पुराणों में भी है और ब्रह्म का ज्ञान करते समय विदुर ने भी विदुर

989
01:10:12,400 --> 01:10:16,840
जी ने भी मना कर दिया था कि मैं जो है मैंने आपको काफी कुछ बता दिया है मगर मैं

990
01:10:16,840 --> 01:10:21,080
ब्राह्मण नहीं हूं तो मैं ब्रह्म ज्ञान नहीं दूंगा तो अगर भाष्य करने बैठेंगे तो आपको ब्रह्म

991
01:10:21,080 --> 01:10:25,400
ज्ञान भी लिखना पड़ेगा तो इसलिए भाष्य नहीं करना चाहिए गुरुओं के सानिध्य में अध्ययन

992
01:10:25,400 --> 01:10:29,640
करना चाहिए ठीक है तो यह प्रश्न हो

993
01:10:29,640 --> 01:10:34,640
गए कुल और अभी मेरे सामने कुछ एक

994
01:10:34,640 --> 01:10:38,680
प्रश्न आ रहा है कि ईश्वर यह भी कर सकता है वो भी कर सकता है कुल मिलाकर

995
01:10:38,680 --> 01:10:43,120
के देखिए आपके लिए जो चीजें बुरी है हमें इस कसौटी

996
01:10:43,120 --> 01:10:47,960
पर ईश्वर को कभी नहीं देखना चाहिए कि ईश्वर एक घृणित कार्य कैसे कर सकता है

997
01:10:47,960 --> 01:10:52,000
आपके लिए जो चीजें बुरी है आपके लिए अच्छाई बुराई है दुनिया

998
01:10:52,000 --> 01:10:56,200
में ईश्वर के लिए अच्छाई बुराई नहीं है इसको एक उदाहरण

999
01:10:56,200 --> 01:11:00,200
से आप समझिए कि अभी आप अपने परिवार के साथ

1000
01:11:00,200 --> 01:11:04,280
यहां पर रह रहे हैं और कुछ ऐसा हो कि भगवान आपको

1001
01:11:04,280 --> 01:11:06,800
अपने सा साथ ले जाए अपने साथ बिठा ले

1002
01:11:06,800 --> 01:11:11,000
और फिर जैसे वो इस दुनिया को देखते हैं वैसे ही आप भी देखे आप मुक्त हो जाए मोक्ष मिल जाए

1003
01:11:11,000 --> 01:11:15,040
और भगवान के साथ आप बैठ जाए जाकर आर्य समाज के ईश्वर के साथ आप बैठ

1004
01:11:15,040 --> 01:11:19,440
जाए अब जब आप वहां से इस दुनिया को देख रहे हैं तो इस दुनिया

1005
01:11:19,440 --> 01:11:23,480
में आपके जो सगे संबंधी रह गए हैं उनको दुख होगा क्लेश होगा सुनामी

1006
01:11:23,480 --> 01:11:27,480
आएगी यह होगा वो होगा तो क्या आप वहां पर बैठ कर

1007
01:11:27,480 --> 01:11:32,200
के घबराए परेशान होंगे या हंसी करेंगे

1008
01:11:32,200 --> 01:11:36,200
जो चीज आपके लिए बुरी है जो चीज आपके लिए दुखी है वह चीज वहां बैठे हुए

1009
01:11:36,200 --> 01:11:40,360
मुक्त आपके लिए बुरी नहीं होगी उस समय अगर बुरी है

1010
01:11:40,360 --> 01:11:44,720
उस समय भी तो आप मुक्त नहीं है मुक्त होने के लिए ही तो धर्म

1011
01:11:44,720 --> 01:11:48,880
है और अब आप क्या कह रहे हो कि आप

1012
01:11:48,880 --> 01:11:52,880
जो भगवान है वो इन चीजों से प्रभावित होते हैं भाई जो चीज आपके

1013
01:11:52,880 --> 01:11:57,160
लिए अच्छी या बुरी है वो चीज भगवान के लिए अच्छी बुरी नहीं उसने तो इन सबको समग्र

1014
01:11:57,160 --> 01:12:01,360
रूप से बनाया है उसके लिए कोई भेद नहीं है इन चीजों में आपके लिए है

1015
01:12:01,360 --> 01:12:05,400
तो जब आप मुक्त होने के बाद इन चीजों पर ध्यान नहीं दोगे

1016
01:12:05,400 --> 01:12:09,520
बल्कि हंसोगे एंजॉय करोगे तो भगवान से क्यों ऐसी अपेक्षा कर रहे हो कि वो इनसे

1017
01:12:09,520 --> 01:12:13,560
प्रभावित हो कि वो दारू अच्छी चीज है या वो बुरी चीज है वो वहां ये हो रहा

1018
01:12:13,560 --> 01:12:17,600
है भगवान प्रभावित अगर हो जाएंगे तो इसका मतलब है भगवान भी मुक्त नहीं

1019
01:12:17,600 --> 01:12:21,680
है और जब इसका अर्थ क्या है कि दुनिया में कोई ईश्वर ही नहीं है

1020
01:12:21,680 --> 01:12:22,180
और

1021
01:12:21,880 --> 01:12:26,040
इसका अर्थ क्या है कि ईश्वर को ना मानने वाला कौन है

1022
01:12:26,040 --> 01:12:30,440
आपको बेहतर पता है तो ठीक है तो भगवान पर इस तरह का कटाक्ष करने

1023
01:12:30,440 --> 01:12:34,560
पहले सोचा करिए और दूसरी बात य भी सोचिए चलिए दारू व नहीं पी सकता

1024
01:12:34,560 --> 01:12:38,560
है भगवान जैसा आपने वक्तव्य दिया मगर दारू पीने वाले को बना

1025
01:12:38,560 --> 01:12:42,560
सकता है दारू को बना सकता है तो बुराई को बनाना भी

1026
01:12:42,560 --> 01:12:46,640
बुराई होती है ठीक

1027
01:12:46,640 --> 01:12:52,640
है एक दो प्रश्न ले लेते हैं [संगीत]

1028
01:12:58,400 --> 01:13:04,400
मेरे ख्याल से काफी समय हो [संगीत]

1029
01:13:08,080 --> 01:13:12,120
गया कुल मिलाकर के भगवान को जो

1030
01:13:12,120 --> 01:13:16,560
आपकी मानवो चित मर्यादा है ना उस चश्मे को लगाकर देखना

1031
01:13:16,560 --> 01:13:20,600
बंद करिए भगवान व्यापक है यह आपके

1032
01:13:20,600 --> 01:13:24,600
लिए है कि अच्छा है और यह बुरा है यह आपके लिए क्योंकि आप मनुष्य भाव

1033
01:13:24,600 --> 01:13:28,600
से ग्रसित जीव भाव से ग्रसित है और आपको मुक्त होने के लिए धर्म

1034
01:13:28,600 --> 01:13:32,640
और अधर्म की व्याख्या की गई है अच्छाई और बुराई की व्याख्या की गई है कि

1035
01:13:32,640 --> 01:13:36,720
जब जो चीज आपको भगवान के समीप ले जाएगी वो अच्छी है जो चीज आपको भगवान से दूर ले

1036
01:13:36,720 --> 01:13:40,720
जाएगी वो बुरी है अगर भगवान भी अच्छाई और बुराई से प्रभावित हो रहे

1037
01:13:40,720 --> 01:13:45,200
हैं तो वो भगवान नहीं है वो भी आपकी तरह वो हो गए ना फसे हुए

1038
01:13:45,200 --> 01:13:49,240
जो मुक्त नहीं है तो क्या आपका ईश्वर ऐसा है

1039
01:13:49,240 --> 01:13:53,440
जो प्रभावित होता है और ऐसा नहीं है तो यहां

1040
01:13:53,440 --> 01:13:57,760
पर स्थिति कैसी है जैसे कि एक छोटा बच्चा होता है वह कभी-कभी क्रोध

1041
01:13:57,760 --> 01:14:02,000
में अपने माता-पिता के ऊपर घूंसे मारता है उनको लड़ने लगता है

1042
01:14:02,000 --> 01:14:06,320
उस समय उसके वो घूंसे गुदगुदी के समान लग रहे होते हैं

1043
01:14:06,320 --> 01:14:10,360
तो जैसे वह मूल शंकर जी ने वो देखा था चूहे जो है दयानंद जी ने देखा था

1044
01:14:10,360 --> 01:14:13,400
चूहे जो है शिवलिंग पर कूद रहे हैं तो उन्होंने कहा कि अरे जो

1045
01:14:13,400 --> 01:14:17,440
अपनी रक्षा नहीं कर सकता ऐसी कहानी प्रसिद्ध है उनके बारे में मुझे नहीं पता कंफर्म

1046
01:14:17,440 --> 01:14:21,640
क्या है तो जो अपनी रक्षा नहीं कर सकता वो हमारी रक्षा क्या करेगा

1047
01:14:21,640 --> 01:14:25,720
उस दिन से उन्होंने मूर्ति पूजा खंडन कि अरे भाई तुमको लग रहा है ना अगर

1048
01:14:25,720 --> 01:14:29,760
चूहों का उछलना कूदना बुरा है उन्हें तो अच्छा लग रहा हो

1049
01:14:29,760 --> 01:14:35,040
सकता है पता तो करो पहले तो

1050
01:14:35,040 --> 01:14:39,240
आपने अपने मन से मान लिया तो जैसे एक माता-पिता के साथ क्रोध

1051
01:14:39,240 --> 01:14:43,320
में जो बच्चा होता है वो घू से मार रहा होता ये कर रहा होता वो कई बार

1052
01:14:43,320 --> 01:14:47,320
ऐसा होता है कि माता-पिता हंस रहे होते हैं इस मूर्ख को पता नहीं है कि इससे

1053
01:14:47,320 --> 01:14:51,480
कुछ नहीं हो रहा है इसी प्रकार से यहां वाली जो चीजें हैं वो भगवान पर

1054
01:14:51,480 --> 01:14:56,600
प्रभाव नहीं डालती है कि दारू है कि ये है कि वो है प्रभाव डाल नहीं तो व भगवान

1055
01:14:56,600 --> 01:15:01,040
नहीं तो इसको थोड़ा समझिए समझने का प्रयास करिए सकारात्मक

1056
01:15:01,040 --> 01:15:05,040
दृष्टिकोण के साथ चलिए तो आपको समझ में आ जाएगा ठीक केवल यह

1057
01:15:05,040 --> 01:15:09,240
मत सोचिए कि हमें किसी को हराना है मैं नहीं कह रहा कि आप सभी

1058
01:15:09,240 --> 01:15:13,400
मत मंत्र को छोड़ कर के विचारों को छोड़ कर के आप जो है शंकराचार्य जी

1059
01:15:13,400 --> 01:15:18,080
के शिष्य बन जाइए मैं कभी नहीं कहता मैं तो आपको प्रामाणिक गुरु की व्याख्या ही बताता हूं ना सदैव

1060
01:15:18,080 --> 01:15:22,520
उनके आधार पर जो गुरु बन सके उसको बनाइए शास्त्र समत व्याख्या बताता हूं

1061
01:15:22,520 --> 01:15:26,760
दूसरी बात ये है कि आप तीन चीज पकड़ लीजिए जीवन

1062
01:15:26,760 --> 01:15:28,840
में क्या

1063
01:15:28,840 --> 01:15:33,320
परम स्वतंत्र मोक्ष सर्वशक्तिमान ईश्वर और शाश्वत धर्म

1064
01:15:33,320 --> 01:15:37,400
बस यह जहां से मिले वही आपका आप घुमा

1065
01:15:37,400 --> 01:15:41,640
फिरा के अपने आप शंकराचार्य तक पहुंच जाएंगे मुझे आपसे नाम

1066
01:15:41,640 --> 01:15:45,760
नाम लेकर के नहीं कहना पड़ेगा कि आप शंकराचार्य तक आइए तो

1067
01:15:45,760 --> 01:15:50,320
क्या तीन चीजें पकड़नी है परम स्वतंत्र मोक्ष ऐसा मोक्ष जिसके बाद परतंत्रता

1068
01:15:50,320 --> 01:15:54,480
ना रहे और सर्वशक्तिमान ईश्वर इस मोक्ष

1069
01:15:54,480 --> 01:15:58,600
को प्राप्त कैसे होगा जब सर्व शक्तिमान ईश्वर की ओर हम

1070
01:15:58,600 --> 01:16:02,920
जाएंगे और इस इन दोनों को इन दोनों

1071
01:16:02,920 --> 01:16:07,080
को प्राप्त कराने वाला साधन क्या है शाश्वत धर्म ऐसा

1072
01:16:07,080 --> 01:16:11,200
धर्म जो बदलता ना हो बस बदलने वाला धर्म ना हो

1073
01:16:11,200 --> 01:16:15,400
बाद ईश्वर ना हो और परतंत्र मोक्ष ना हो आप

1074
01:16:15,400 --> 01:16:19,680
खोल लीजिए अपना नया कॉलेज खोल लीजिए खूब बनाइए आर्य समाज हम भी आएंगे

1075
01:16:19,680 --> 01:16:23,920
हम भी उसका प्रचार प्रसार करेंगे खब बनाइए इसकन बनाइए ईश्वर

1076
01:16:23,920 --> 01:16:28,040
को बाधित मत करिए मोक्ष को परतंत्र मत करिए

1077
01:16:28,040 --> 01:16:32,400
और धर्म को बदलने वाला परिवर्तनशील मत दिखाइए बस हम आपका प्रचार

1078
01:16:32,400 --> 01:16:37,080
करेंगे करिए आप नई किताबें छापी श्रीमद् भागवत भाष्य लिखिए खब

1079
01:16:37,080 --> 01:16:42,160
और नई सत्या प्रकाश लिखिए है ना बाधित ना हो

1080
01:16:42,160 --> 01:16:45,270
ईश्वर और क्या

1081
01:16:45,270 --> 01:16:51,270
[संगीत]

1082
01:16:51,560 --> 01:16:55,680
है शारीरिक बनावट मैंने कहा ना ईश्वर वही

1083
01:16:55,680 --> 01:16:59,880
है जिसके ऊपर कोई नियम लागू नहीं होता तो गणेश जी और देखिए

1084
01:16:59,880 --> 01:17:03,920
पहला देखि भगवान की कई लीलाएं हैं उन सभी

1085
01:17:03,920 --> 01:17:08,200
लीलाओं के पीछे आदि दैविक आदि भौतिक आध्यात्मिक

1086
01:17:08,200 --> 01:17:12,400
दृष्टांत दिए गए मगर एक दृष्टांत ऐसा है जो इन

1087
01:17:12,400 --> 01:17:16,600
मालाओं के मोतियों में सूत्र के रूप में पिरोया गया है वह दृष्टांत

1088
01:17:16,600 --> 01:17:20,680
क्या है ईश्वर वही है जो कुछ भी

1089
01:17:20,680 --> 01:17:24,680
कर सकता है इसको ध्यान रखिए सदैव कभी

1090
01:17:24,680 --> 01:17:28,720
नहीं मात खाएंगे कहीं पर भी फसगे नहीं सामने वाले

1091
01:17:28,720 --> 01:17:32,840
को फसना होगा ईश्वर के ऊपर कोई नियम लागू नहीं

1092
01:17:32,840 --> 01:17:36,840
हो सकता ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है वह सभी नियमों को

1093
01:17:36,840 --> 01:17:41,680
बनाने वाला सर्व नियामक है ठीक है

1094
01:17:41,680 --> 01:17:44,260
जय श्री

1095
01:17:44,260 --> 01:17:50,260
[संगीत]

1096
01:17:53,840 --> 01:17:57,840
राम h
