1
00:00:00,080 --> 00:00:03,440
आशा करता हूं सभी कुशल मंगल

2
00:00:03,440 --> 00:00:08,200
होंगे इस लाइव को रखने का एक

3
00:00:08,200 --> 00:00:12,800
विशेष प्रयोजन यही है कि हमारी

4
00:00:12,800 --> 00:00:17,000
जो सिद्धांत है हमारे उन पर जब कोई प्रश्न उठता

5
00:00:17,000 --> 00:00:21,240
है तो सही बात है कि हमें नए नए दृष्टिकोण

6
00:00:21,240 --> 00:00:25,880
मिलते हैं और उन दृष्टिकोण

7
00:00:25,880 --> 00:00:30,280
से देखते हुए अपने सिद्धांत को

8
00:00:30,280 --> 00:00:34,560
रूप से समाज में स्थापित करने का

9
00:00:34,560 --> 00:00:40,280
एक अवसर प्राप्त होता है तो इसी

10
00:00:40,280 --> 00:00:45,720
के चलते अभी कुछ रिसेंटली जैसा कि आप लोगों ने देखा

11
00:00:45,720 --> 00:00:49,760
होगा कुछ सवाल उठाए गए हैं पर मैं कहूंगा कि यह जो

12
00:00:49,760 --> 00:00:54,720
सवाल है यह आज नहीं उठाए गए यह पहले से हैं

13
00:00:54,720 --> 00:01:00,600
और यथोचित इनके समाधान जो है

14
00:01:00,600 --> 00:01:04,720
जो हमारे पूर्वा चार्य गण है उन्होंने दिए

15
00:01:04,720 --> 00:01:08,720
हैं पर मैं इस सबको शुरू करने से पहले एक बात ये

16
00:01:08,720 --> 00:01:12,920
याद दिलाना चाहता हूं कि भाई बात शुरू हुई थी

17
00:01:12,920 --> 00:01:16,960
परंपरा से हमने सबसे पहले केवल इतना

18
00:01:16,960 --> 00:01:22,080
पूछा था कि आपको वेद मंत्र कैसे प्राप्त हुए

19
00:01:22,080 --> 00:01:26,520
अब उसमें हमारा हमने कहीं भी यह नहीं किया कि भाई नहीं हमारी जो परंपरा

20
00:01:26,520 --> 00:01:30,720
है वह सुपीरियर है वो बाद की बात है कि हम जो परंपरा

21
00:01:30,720 --> 00:01:35,600
बता रहे हैं उस पर किसी को विश्वास होता है कि नहीं होता है वो एक अलग परिपेक्ष है

22
00:01:35,600 --> 00:01:40,320
आप जो परंपरा बताएंगे उस पर किसी को विश्वास होगा कि नहीं होगा

23
00:01:40,320 --> 00:01:44,480
वो एक अलग परिपेक्ष है मगर क्या आपके पास कोई

24
00:01:44,480 --> 00:01:48,520
बताने के लिए ही सही कोई परंपरा है तो यहां

25
00:01:48,520 --> 00:01:53,000
से जब बात शुरू होती है और उसके बाद आप सभी ने जो लोग

26
00:01:53,000 --> 00:01:57,880
वीडियोस को देख रहे हैं लगातार बने हुए हैं साथ में

27
00:01:57,880 --> 00:02:02,120
तो अ जी मैं क्वेश्चंस लूंगा

28
00:02:02,120 --> 00:02:06,120
बैकुंठ धाम जी मैं अपनी बातों को रख लू फिर मैं क्वेश्चंस

29
00:02:06,120 --> 00:02:08,280
लूंगा

30
00:02:08,280 --> 00:02:13,520
तो इस एक बात का जवाब ना देते

31
00:02:13,520 --> 00:02:16,160
हुए पहले तो विषयात

32
00:02:16,160 --> 00:02:20,400
ही कह लीजिए कि बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए गए शंकर परंपरा

33
00:02:20,400 --> 00:02:24,400
पर हमने परंपरा पर सवाल नहीं खड़ा किया था हमने केवल पूछा था कि

34
00:02:24,400 --> 00:02:28,800
वेद मंत्र कैसे मिले अब इनका उनके पास

35
00:02:28,800 --> 00:02:33,480
उत्तर नहीं था जाहिर सी बात है कि जब आप राजनीतिक बहस देखेंगे

36
00:02:33,480 --> 00:02:37,880
तो उसमें विषयात किया जाता है बार-बार जब सवाल का

37
00:02:37,880 --> 00:02:42,680
जवाब नहीं होता तो विषयात उन्होंने किया कि अ

38
00:02:42,680 --> 00:02:44,920
आप

39
00:02:44,920 --> 00:02:48,960
यह आपके परंपरा में यह है आपने शांक का विरोध किया है

40
00:02:48,960 --> 00:02:52,960
आपने कपिल का विरोध किया है आप स्वयं को भिक्षु कहते हो

41
00:02:52,960 --> 00:02:57,480
और और भी ना जाने क्या-क्या उन्होंने इस तरह की बातें कही

42
00:02:57,480 --> 00:03:01,520
दशनामी परंपरा आपने शुरू नहीं की है बहुत सारी बातें कई तो इन

43
00:03:01,520 --> 00:03:06,160
सब बातों का यथोचित उत्तर हमने फिर से पुनः दिया फिर से अपनी बात को

44
00:03:06,160 --> 00:03:10,480
ऐसे समाप्त किया कि यह भी मान लिया जाए कि हम गलत

45
00:03:10,480 --> 00:03:16,240
हैं पर हमारे गलत होने से आपका सही सिद्ध

46
00:03:16,240 --> 00:03:20,280
होना माना नहीं जा सकता आपको स्वयं को तो

47
00:03:20,280 --> 00:03:24,320
सिद्ध करना पड़ेगा ना कि आपके पास वेद मंत्र कैसे आए वो

48
00:03:24,320 --> 00:03:28,440
आपने नहीं बताया और इसके बाद

49
00:03:28,440 --> 00:03:31,240
जब हमने कई सारी बातें बता दी तो उन्होंने फिर

50
00:03:31,240 --> 00:03:35,240
प्रतिकार स्वरूप फिर बहुत सारी चीजें की मगर मैं ये देख रहा हूं

51
00:03:35,240 --> 00:03:40,120
कि उन जो ऋषि उवाच है या जो भी

52
00:03:40,120 --> 00:03:44,360
आर्य समाज के फॉलोअर हैं हर

53
00:03:44,360 --> 00:03:48,680
हर महादेव भैया जो आर्य समाज के फॉलोअर हैं

54
00:03:48,680 --> 00:03:53,520
वो अ मेरे ख्याल से उन प्रश्नों

55
00:03:53,520 --> 00:03:57,880
को चयन करते हैं सिलेक्शन करते हैं सिलेक्टिव मूड प आते हैं

56
00:03:57,880 --> 00:04:02,320
जिन पर वह बात कर सकते हैं तो हालांकि उनकी सभी

57
00:04:02,320 --> 00:04:06,320
बातों पर हमने बात की है पर कुछ ऐसे

58
00:04:06,320 --> 00:04:10,360
सवाल है जिनका अलग से जिन पर अलग से बात करना मैंने

59
00:04:10,360 --> 00:04:14,840
आवश्यक समझा तो इसलिए मैं आपके सामने आज उपस्थित हुआ हूं

60
00:04:14,840 --> 00:04:18,960
तो सबसे पहला तो बात है कि भाई उन्होंने बड़े एक्शन पैक वाले मोड

61
00:04:18,960 --> 00:04:22,840
में बोला था कि नहीं भाई हमारा

62
00:04:22,840 --> 00:04:27,000
जो हम उस ईश्वर को मानते हैं जो नाच

63
00:04:27,000 --> 00:04:32,040
के नहीं दिखाएगा या इस तरह की चीजें नहीं करता है

64
00:04:32,040 --> 00:04:36,320
बुराई नहीं है एक तरीके से ईश्वर के अंदर यह उनका

65
00:04:36,320 --> 00:04:40,360
कहना था तो जो दूसरे

66
00:04:40,360 --> 00:04:45,680
जो सनातन विरुद्ध विचारधाराएं हैं वह कैसे हारती

67
00:04:45,680 --> 00:04:50,040
हैं सनातन विचारधारा से कैसे हारती है क्योंकि उन्होंने

68
00:04:50,040 --> 00:04:54,120
भी ईश्वर को पूर्ण रूप में नहीं स्वीकार किया है

69
00:04:54,120 --> 00:04:58,120
पूर्ण मतलब इस जगत का पूर्णतया इस जगत

70
00:04:58,120 --> 00:05:02,240
में ऐसी कोई चीज ना हो जिस को उसने ना बनाया हो इस

71
00:05:02,240 --> 00:05:06,240
रूप में स्वीकार नहीं किया या तो वो अपने को अलग कर लेगा या

72
00:05:06,240 --> 00:05:10,560
फिर जब ये प्रश्न पूछोगे तो हार जाएगा क्या प्रश्न है

73
00:05:10,560 --> 00:05:14,680
कि मान लो ईश्वर नाच नहीं सकता है पहली बात

74
00:05:14,680 --> 00:05:19,000
तो हमने प्रश्न ये नहीं किया कि वह नाचेगा या नहीं नाचेगा

75
00:05:19,000 --> 00:05:23,080
हमने प्रश्न ये नहीं किया कि वह अवतार ले सकता है

76
00:05:23,080 --> 00:05:27,080
या नहीं ले सकता है हमने हमने प्रश्न ये नहीं किया कि वो अवतार लेगा

77
00:05:27,080 --> 00:05:31,120
या नहीं लेगा हमने कहा कि उसके अंदर कैपेबिलिटी नहीं

78
00:05:31,120 --> 00:05:36,080
है है कि नहीं है तो आपने बड़े

79
00:05:36,080 --> 00:05:37,920
ही उसको क्या कहे

80
00:05:37,920 --> 00:05:42,080
चातुर्य भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि वो जाहिर बात है आपने इस बात

81
00:05:42,080 --> 00:05:46,360
का उत्तर ना देते हुए कि वह ले सकता है कि नहीं ले सकता कर सकता

82
00:05:46,360 --> 00:05:51,320
है या नहीं कर सकता

83
00:05:51,320 --> 00:05:55,720
उन्होंने जवाब दिया कि हमारा ईश्वर ऐसा नहीं

84
00:05:55,720 --> 00:06:00,320
करता करता में और कर सकने में अंतर है

85
00:06:00,320 --> 00:06:04,640
पहली बात मैं कोई कार्य कर सकता हूं

86
00:06:04,640 --> 00:06:09,040
इसका अर्थ यही नहीं होगा कि मैं वह कार्य करता भी हूं

87
00:06:09,040 --> 00:06:13,280
है ना तो उन्होंने यह जवाब दिया हमारा ईश्वर ऐसा नहीं बड़ा इमोशनल अंदाज में हमारा

88
00:06:13,280 --> 00:06:16,840
ईश्वर ऐसा नहीं है

89
00:06:16,840 --> 00:06:21,200
तो ठीक है अब सवाल यह आता है जब आपका ईश्वर बुराई

90
00:06:21,200 --> 00:06:25,960
नहीं कर सकता या तुच्छ कार्य नहीं कर सकता तो

91
00:06:25,960 --> 00:06:31,960
दुनिया में बुराई को बनाया किसने

92
00:06:32,920 --> 00:06:37,080
बुरा करने वालों को जन्म कौन दे रहा है वह आपका

93
00:06:37,080 --> 00:06:41,920
ईश्वर नहीं दे रहा है क्योंकि आपके ईश्वर के अंदर तो बुराई है ही नहीं अगर

94
00:06:41,920 --> 00:06:46,880
आप यह कह दे कि भाई बुराई प्रकृति में है वह जो गुण है वह प्रकृति में है

95
00:06:46,880 --> 00:06:51,520
और ईश्वर केवल बनाता है प्रकृति के साथ

96
00:06:51,520 --> 00:06:55,520
संबंध बना कर के प्रभावित होकर के वो व्यक्ति बुराई वगैरह करने लगता है

97
00:06:55,520 --> 00:06:59,800
फिर भी इसका क्या जवाब होगा कि आदमी जो है बुराई

98
00:06:59,800 --> 00:07:03,840
करेगा या नहीं करेगा जाकर के प्रभावित होगा कि नहीं होगा तामसिक गुणों से

99
00:07:03,840 --> 00:07:08,000
प्रभावित होगा कि नहीं होगा अगर ईश्वर को जो कहो कि

100
00:07:08,000 --> 00:07:12,600
ईश्वर को पता है कि यह प्रभावित हो जाएगा

101
00:07:12,600 --> 00:07:16,640
तो इसका मतलब है कि तुच्छ काम को बुराई को बनाने

102
00:07:16,640 --> 00:07:20,720
वाला भी ईश्वर ही है और जो कहो कि उसको नहीं पता

103
00:07:20,720 --> 00:07:25,120
है तो वो ईश्वर सर्व ज्ञाता नहीं है

104
00:07:25,120 --> 00:07:29,200
दोनों ही स्थितियों में आपकी चीजें कॉम्प्रोमाइज हो गई या

105
00:07:29,200 --> 00:07:33,400
तो आपको मानना पड़ेगा कि उसने सोच समझ

106
00:07:33,400 --> 00:07:37,600
के ही बुराई को जन्म दिया उसको मालूम था किय आदमी ऐसा

107
00:07:37,600 --> 00:07:41,760
ऐसा कार्य करेगा य रेप करेगा या यह चोरी करेगा यह पाप करेगा यह

108
00:07:41,760 --> 00:07:47,600
डांस करेगा आपके हिसाब से यह है

109
00:07:47,600 --> 00:07:52,320
तो उसने यह सब जानते बूझ हुए किसी को बनाया

110
00:07:52,320 --> 00:07:56,360
या तो यह मानना पड़ेगा या फिर यह मानना पड़ेगा

111
00:07:56,360 --> 00:08:00,520
कि उसको पता ही नहीं था कि जिस जीव को मैं शरीर दे रहा हूं जन्म

112
00:08:00,520 --> 00:08:06,520
दे रहा हूं बना रहा हूं जन्म दे कुछ भी कर रहा हूं मनुष्य रूप में

113
00:08:07,640 --> 00:08:11,720
तो उसको मालूम नहीं था कि यह क्या करेगा तो वह सर्व ज्ञाता सिद्ध

114
00:08:11,720 --> 00:08:16,240
नहीं होता तो इस हिसाब से आप पहले

115
00:08:16,240 --> 00:08:20,360
अपना वैसे मैं इसके बाद और कोई प्रति उत्तर में नहीं बनाऊंगा क्योंकि

116
00:08:20,360 --> 00:08:24,760
जो इस सीरीज को देख रहा होगा उसमें वह अब तक अगर वो

117
00:08:24,760 --> 00:08:28,960
न्यूट्रल हो कर के देखेगा पक्षपात विहीन तरीके से देखेगा तो उनका पक्ष बहुत

118
00:08:28,960 --> 00:08:33,800
जगह बत कमजोर रहा है उन्होंने कई प्रश्नों के तो जवाब छुए ही नहीं

119
00:08:33,800 --> 00:08:37,920
जैसे हमने बार-बार प्रश्न किया अलंकार का आधार क्या

120
00:08:37,920 --> 00:08:42,200
है जैसे हम कहते हैं व्यवहार और परमार्थ तो उनकी तरफ से क्वेश्चन आता है कि भाई

121
00:08:42,200 --> 00:08:46,400
व्यवहार और परमार्थ शास्त्रों में नहीं दिया वेदों में नहीं

122
00:08:46,400 --> 00:08:50,400
दिया पहली बात तो व्यवहार और परमार्थ हम आपको समझाने के लिए बोल रहे

123
00:08:50,400 --> 00:08:54,400
हैं और शास्त्रों में भी मिल जाएगा ऐसा नहीं है मगर अगर कहते कि नहीं

124
00:08:54,400 --> 00:08:58,520
मिले तो क्या वेदों के मंत्रों को अलंकार माना

125
00:08:58,520 --> 00:09:02,840
जाए इस संबंध में कोई प्रमाण

126
00:09:02,840 --> 00:09:06,840
है वेदों का कि उसके मंत्रों को अलंकार

127
00:09:06,840 --> 00:09:11,040
मान लिया जाए जी जी जय श्री राम सभी को

128
00:09:11,040 --> 00:09:15,040
तो यह हो गई बात अब बात करते कि जब ईश्वर

129
00:09:15,040 --> 00:09:19,080
के अंदर बुराई भी है तो फिर ईश्वर की पूजा क्यों

130
00:09:19,080 --> 00:09:23,360
हो रही है ईश्वर के अंदर सब कुछ

131
00:09:23,360 --> 00:09:27,640
है हम ईश्वर के उस रूप की पूजा करते हैं जो वेदों का प्रतिपादन

132
00:09:27,640 --> 00:09:32,400
कराए जो मोक्ष का प्रतिपादन कराए मगर उसके जो बाकी का जो रूप है

133
00:09:32,400 --> 00:09:36,480
उससे हम उसको डिटैच नहीं मानते अगर डिटैच कर लेंगे अलग कर देंगे बाकी के रूप

134
00:09:36,480 --> 00:09:40,760
से तो उसकी सर्वशक्ति मत्ता भंग हो जाएगी चाहे कैसे भी करके देख

135
00:09:40,760 --> 00:09:44,800
लो अगर ईश्वर को आप किसी चीज से अलग करेंगे

136
00:09:44,800 --> 00:09:48,880
ईश्वर से भिन्न किसी चीज का अस्तित्व मानेंगे तो ईश्वर को सर्वशक्तिमान

137
00:09:48,880 --> 00:09:53,360
आप सिद्ध नहीं कर पाएंगे मैंने तो कई बार कहा और

138
00:09:53,360 --> 00:09:57,720
आपसे इसको ऐसा नहीं आर समाज वालों से आगे भी चर्चा होनी है

139
00:09:57,720 --> 00:10:01,800
बिल्कुल मैं जाऊंगा संभ्रांत जो थोड़े बहुत संभ्रांत होंगे उनके पास

140
00:10:01,800 --> 00:10:05,880
जाऊंगा अमर्यादित भाषा शैली का उपयोग करने वालों के मंच पर या

141
00:10:05,880 --> 00:10:10,640
उनसे बात करने अपने मंच पर उनको नहीं बुलाऊंगा यह

142
00:10:10,640 --> 00:10:14,680
सिद्धांत है तो अलंकार

143
00:10:14,680 --> 00:10:18,280
हों से मेरा प्रश्न यही है कि यदि

144
00:10:18,280 --> 00:10:22,720
ईश्वर बुराई कर नहीं सकता पर वह करने वालों को बना रहा

145
00:10:22,720 --> 00:10:26,920
है तो इस अंश में भी तो वह बुरा हुआ

146
00:10:26,920 --> 00:10:32,360
बुराई को जन्म देने वाला बुराई को बना बने वाला

147
00:10:32,360 --> 00:10:36,440
उसको मालूम है कि ऐसा करेगा फिर भी वह उसको बना रहा है या तो कहो कि

148
00:10:36,440 --> 00:10:40,640
उसको नहीं मालूम है ऐसा करेगा अब जरा यह देखते हैं

149
00:10:40,640 --> 00:10:45,000
क्या ईश्वर के लिए कुछ भी अच्छा बुरा है एक पेंटर

150
00:10:45,000 --> 00:10:49,080
जब पेंटिंग बनाता है तो यदि वह पेंटिंग

151
00:10:49,080 --> 00:10:55,080
में अगर किसी स्त्री की व पेंटिंग बना रहा है तो

152
00:10:55,600 --> 00:11:01,600
वह वर्टिकल ही तो है ये येय हॉरिजॉन्टल करने को बोलर

153
00:11:04,080 --> 00:11:10,080
यह वर्टिकल है ना ऊपर से नीचे की

154
00:11:13,200 --> 00:11:17,200
तरफ कोई बताएगा मेरी मेरा आपको वर्टिकल दिख रहा है हॉरिजॉन्टल

155
00:11:17,200 --> 00:11:21,440
दिख रहा

156
00:11:21,440 --> 00:11:25,560
है ठीक है हां

157
00:11:25,560 --> 00:11:30,960
जैसे एक पेंटर ने पेंटिंग बनाई वो एक स्त्री की पेंटिंग

158
00:11:30,960 --> 00:11:35,120
तो जब वह स्त्री की पेंटिंग है तो उसमें जब वह आंखों

159
00:11:35,120 --> 00:11:39,480
में कलर भर रहा होगा कानों में कलर भर रहा होगा या फिर

160
00:11:39,480 --> 00:11:43,520
वह नीचे का जो अंग प्रत्यंग होते

161
00:11:43,520 --> 00:11:47,800
हैं मातृशक्ति के उसमें जब वो रंग भर रहा होगा तो उसके लिए

162
00:11:47,800 --> 00:11:52,200
क्या ऊपर और नीचे में कोई भेद होगा भेद हमारे

163
00:11:52,200 --> 00:11:56,640
पर्सपेक्टिव से है क्योंकि हम उस पेंटिंग के अंदर है हमारे लिए

164
00:11:56,640 --> 00:12:00,800
सब अंतर है उसके लिए सब कुछ एक है तो इसलिए वह जो बुराई

165
00:12:00,800 --> 00:12:05,080
हमको लग रही है कि ईश्वर बुराई कर सकता है वह सभी तत्व ईश्वर के ही है ईश्वर

166
00:12:05,080 --> 00:12:09,120
ही है ब्रह्मे गंतव्य ब्रह्म कम समाधि ना भगवत

167
00:12:09,120 --> 00:12:11,080
गीता 4 24

168
00:12:11,080 --> 00:12:15,320
यज्ञ में करने वाला भी ब्रह्म है क्रिया भी ब्रह्म

169
00:12:15,320 --> 00:12:20,360
है क्रिया भी ब्रह्म है यह भी ध्यान रखिए

170
00:12:20,360 --> 00:12:25,120
और सामग्री जो डाली जा जा रही है यज्ञ में वो भी ब्रह्म है

171
00:12:25,120 --> 00:12:29,280
फल स्वरूप प्राप्त भी ब्रह्म होगा तो ब्रह्म के पर्सपेक्टिव से कुछ भी बड़ा

172
00:12:29,280 --> 00:12:33,280
छोटा है ही नहीं जो कुछ दुनिया में भेद है वह भेद

173
00:12:33,280 --> 00:12:39,280
हमारे पर्सपेक्टिव से है अच्छा बुरा यह है

174
00:12:39,400 --> 00:12:44,240
ब्रह्म अगर इसको नहीं मानेंगे

175
00:12:44,240 --> 00:12:47,840
अगर इसको नहीं मानेंगे

176
00:12:47,840 --> 00:12:52,240
तो हमको ईश्वर को बाधित सिद्ध करना होगा बाधित

177
00:12:52,240 --> 00:12:56,600
सिद्ध हो जाएगा तो वो ईश्वर की वो मनुष्य की चाह का विषय नहीं

178
00:12:56,600 --> 00:13:02,600
रहेगा जब मनुष्य की चाह का विषय नहीं

179
00:13:02,640 --> 00:13:07,280
रहेगा जब वह मनुष्य की चाह का विषय नहीं रहेगा

180
00:13:07,280 --> 00:13:11,400
तो फिर मनुष्य को क्या आवश्यकता है कि वह उसकी भक्ति करे उसको प्राप्त करने

181
00:13:11,400 --> 00:13:15,880
के लिए प्रयासरत हो वह उसकी चाह का विषय नहीं है

182
00:13:15,880 --> 00:13:19,960
क्योंकि मनुष्य जो है स्वयं अवाद बनना चाहता है अवाद य

183
00:13:19,960 --> 00:13:24,000
मैं नहीं कह रहा आपने भी माना भगवान श्री कृष्ण अपनी इच्छा

184
00:13:24,000 --> 00:13:28,200
अनुसार जन्म लेने की बात कर रहे हैं सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार आपने

185
00:13:28,200 --> 00:13:32,240
इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया है ना कि

186
00:13:32,240 --> 00:13:36,440
भगवान श्री कृष्ण की चाह का विषय क्या था जब ईश्वर भी ऐसा नहीं है जो अपनी

187
00:13:36,440 --> 00:13:40,160
इच्छा अनुसार जन्म ले

188
00:13:40,160 --> 00:13:44,320
सके अच्छा अब आगे जो दूसरी

189
00:13:44,320 --> 00:13:49,360
बात आती है कि

190
00:13:49,360 --> 00:13:51,640
ईश्वर

191
00:13:51,640 --> 00:13:55,720
अ पक्ष अ इसी तरीके की और भी

192
00:13:55,720 --> 00:13:59,880
उन्होंने बातें कही जैसे उन्होंने ये सब बातें तो हम लोग कर ही चुके हैं

193
00:13:59,880 --> 00:14:03,240
कि ब्रह्म को उन्होंने कहां

194
00:14:03,240 --> 00:14:07,480
पर क्या कहते ब्रह्म को उन्होंने व्यावहारिक धरातल पर वादित

195
00:14:07,480 --> 00:14:11,920
करने का प्रयास किया या परमार्थिक धरातल पर इस पर हम नहीं जाएंगे

196
00:14:11,920 --> 00:14:16,480
हम केवल अभी इस जो भौतिक दुनिया जो मनुष्य को दिखाई दे रही है

197
00:14:16,480 --> 00:14:20,840
उस दुनिया के ही पर्सपेक्टिव से केवल अगर देख ले तो उनका जो ईश्वर है

198
00:14:20,840 --> 00:14:24,920
वो बाधित सिद्ध होता है बहुत से कार्य नहीं कर सकता है जैसे उन्होंने कहा

199
00:14:24,920 --> 00:14:29,200
कि भाई वो लीला नहीं करेगा वो डांस नहीं करेगा वो ये नहीं करेगा

200
00:14:29,200 --> 00:14:33,840
तो यह सारे तत्व भी उसके नियंत्रण से बाहर है मैं पूछ रहा हूं

201
00:14:33,840 --> 00:14:38,280
ऐसे ईश्वर की किसको आवश्यकता है कि कहीं पर कुछ हो रहा है

202
00:14:38,280 --> 00:14:42,600
गलत अन्याय अन्याय हो रहा है

203
00:14:42,600 --> 00:14:46,880
मगर वह जो अन्याय जो जगह हो रही है वहां पर ईश्वर का कोई नियंत्रण नहीं है वहा ईश्वर

204
00:14:46,880 --> 00:14:51,360
कुछ नहीं कर सकता मैं ये नहीं कह रहा वो करेगा कि नहीं फिर ध्यान रखना

205
00:14:51,360 --> 00:14:55,840
करेगा कि नहीं वह अलग बात है कर सकता है कि नहीं

206
00:14:55,840 --> 00:15:01,120
क्या वह नियम में बंधा हुआ है कि नहीं कर सकता यह मैं पूछ

207
00:15:01,120 --> 00:15:05,400
और मैंने अगर वह किसी प्रकार

208
00:15:05,400 --> 00:15:10,200
से किसी का किसी की कोई सहायता कर ही नहीं सकता है

209
00:15:10,200 --> 00:15:14,440
तो वह मनुष्य की चाह का विषय कैसे होगा क्या संबंध

210
00:15:14,440 --> 00:15:18,440
है उसके मनुष्य के बीच चलो इस तरह से देख लेते हैं कि भाई

211
00:15:18,440 --> 00:15:22,600
दुनिया में कोई ऐसा है जिसने सृष्टि बनाई है ठीक है बनाई है

212
00:15:22,600 --> 00:15:27,120
हम क्या करें हमें क्या मतलब बनाई

213
00:15:27,120 --> 00:15:31,200
है हम क्यों करें उसकी भक्ति जै दुनिया में कोई बहुत पैसे वाला है

214
00:15:31,200 --> 00:15:35,680
बहुत शक्तिशाली है तो हम क्या उसकी भक्ति करने लग जाए

215
00:15:35,680 --> 00:15:40,120
क्योंकि वह शक्तिशाली है क्यों करने लगे भक्ति

216
00:15:40,120 --> 00:15:44,120
तो जब तक हम इसको रिलेट नहीं करेंगे कि तुम्हारी चाह का विषय वही है तुम्हें

217
00:15:44,120 --> 00:15:48,200
उसी को प्राप्त करना है तुम्हारे उसके बीच में संबंध है तुम उसके अंश हो व

218
00:15:48,200 --> 00:15:52,760
अंशी है तब तक हम ये उसकी जो उसके पीछे पढ़ना

219
00:15:52,760 --> 00:15:57,040
प्रतिबद्धता के साथ वेग के साथ

220
00:15:57,040 --> 00:16:01,920
हम सिद्ध नहीं कर पाएंगे और फिर हमारा जो ईश्वर है अब्राम हो कर के रह गया

221
00:16:01,920 --> 00:16:06,600
क्योंकि वह फला फला फला फला कार्य नहीं कर सकता उसके ऊपर नियम है

222
00:16:06,600 --> 00:16:10,760
पूर्ण का मतलब होता है पूर्ण किसी भी प्रकार से

223
00:16:10,760 --> 00:16:11,260
किसी

224
00:16:11,160 --> 00:16:15,600
भी प्रकार से वह बाधित ना हो व्यवहारिक धरातल ध्यान रखिए

225
00:16:15,600 --> 00:16:19,720
क्योंकि परमार्थिक धरातल व्यवहार का विषय है ही नहीं प्राप्त व्य

226
00:16:19,720 --> 00:16:24,200
का विषय जैसे कि कैलोरी

227
00:16:24,200 --> 00:16:28,400
प्राप्त व्य का विषय है और कैलोरी प्रदान

228
00:16:28,400 --> 00:16:34,240
करने वा वाला जो

229
00:16:34,240 --> 00:16:38,440
अ फूड है सगुण साकार भोजन है वह

230
00:16:38,440 --> 00:16:42,680
व्यवहार का विषय है आप कैलोरी के लिए हाथ पैर नहीं मार

231
00:16:42,680 --> 00:16:46,720
सकते इसी प्रकार से व्यवहार और परमार्थ में अंतर है और

232
00:16:46,720 --> 00:16:52,720
भी कई सारी बातें हैं

233
00:16:59,400 --> 00:17:04,600
अब इसके बाद जब हम भक्ति पर आ गए पूजा पर आ गए हैं

234
00:17:04,600 --> 00:17:09,000
तो इसमें एक बात आती है कि भगवान की भक्ति करने से

235
00:17:09,000 --> 00:17:13,240
उन्होंने कहा अपनी वीडियो में कि मैंने

236
00:17:13,240 --> 00:17:17,560
झूठ कहा है सत्यार्थ प्रकाश के बारे में देखिए उन्होंने वहां पर एक

237
00:17:17,560 --> 00:17:21,640
कोई ब्रह्म सूत्र का भाष्य दिखाया था आदि शंकराचार्य जी का तो पहली

238
00:17:21,640 --> 00:17:25,640
बात तो मैं फिर वही कहूंगा कि वो कहां पर व्यवहार की बात कर रहे हैं कहां परमार्थ की

239
00:17:25,640 --> 00:17:29,640
बात कर रहे हैं यह आपको नहीं पता है दूसरी बात हम हमारे किसी भी

240
00:17:29,640 --> 00:17:33,760
ग्रंथ से कोई भी क्लेम करने से पहले

241
00:17:33,760 --> 00:17:38,000
आपको परंपरा प्राप्त आचार्य के पास जाना होगा क्योंकि

242
00:17:38,000 --> 00:17:42,160
आप भले ही परंपरा प्राप्त अध्ययन को माने या ना माने हमारे लगभग

243
00:17:42,160 --> 00:17:46,160
सभी ग्रंथों में माना गया है श्रुति के प्रमाण

244
00:17:46,160 --> 00:17:50,200
के साथ उन श्रुति हों को आप हटा दे उन प्रमाणों को आप नजरअंदाज कर दे तो

245
00:17:50,200 --> 00:17:54,560
बात एक अलग है वो एक बात चर्चा का अलग विषय हो पर कम से कम हमारे

246
00:17:54,560 --> 00:17:58,560
ग्रंथ का अध्ययन आप अगर कर रहे हैं और उस अध्ययन के अनुसार अगर

247
00:17:58,560 --> 00:18:02,840
कोई प्रश्न खड़ा कर रहे हैं तो पहले जाइए परंपरा प्राप्त

248
00:18:02,840 --> 00:18:07,200
आचार्य उसमें भी सार्वभौम आचार्य पद पर बैठने वाले आचार्य के पास

249
00:18:07,200 --> 00:18:11,480
जाकर के यह वहां पर कंफर्म कीजिए कि मैं आपके ग्रंथ का

250
00:18:11,480 --> 00:18:14,840
जो अर्थ ले रहा हूं क्या वही अर्थ है यह

251
00:18:14,840 --> 00:18:18,840
पहली बात दूसरी बात आपने सत्यार्थ

252
00:18:18,840 --> 00:18:23,120
प्रकाश का कहा कि उसमें जो है ईश्वर की भक्ति करने से ईश्वर के गुण

253
00:18:23,120 --> 00:18:27,200
का आना नहीं लिखा है बल्कि उसके प्रभाव से

254
00:18:27,200 --> 00:18:31,600
हमारा जो है सुधरना लिखा है गुणों का सुधरना हमारे अंदर सुधार

255
00:18:31,600 --> 00:18:36,160
होगा और ऐसा कहीं नहीं लिखा कि ईश्वर के गुण आपके अंदर आ

256
00:18:36,160 --> 00:18:40,440
जाएंगे तो वह मैं आपको दिखा देता

257
00:18:40,440 --> 00:18:46,000
हूं यह है पृष्ठ

258
00:18:46,000 --> 00:18:48,760
संख्या

259
00:18:48,760 --> 00:18:53,000
151 ठीक है 151 पृष्ठ संख्या

260
00:18:53,000 --> 00:18:57,120
है सत्यार्थ प्रकाश अभी मैंने इसमें कोई अपनी तरफ से

261
00:18:57,120 --> 00:19:01,640
पृष्ठ चिपकाया नहीं है अगर एक दिन चिपका उा ये भी मैं बता द

262
00:19:01,640 --> 00:19:05,760
एक दिन चिपका उंग और आपके पास आऊंगा मैं पूछूंगा कि इसमें

263
00:19:05,760 --> 00:19:10,600
लिखा हुआ है कि गिल्ली डंडा खेलने से मोक्ष प्राप्त होता है ऐसा लिखा है क्या

264
00:19:10,600 --> 00:19:15,080
आप कहोगे नहीं लिखा है तो क्या होगा

265
00:19:15,080 --> 00:19:20,480
मैं कहूंगा कि आपका ग्रंथ क्यों माना जाए मेरा ग्रंथ क्यों नहीं माना

266
00:19:20,480 --> 00:19:24,800
जाए आपके पास कोई जवाब नहीं होगा यदि आप परंपरा की बात नहीं करेंगे

267
00:19:24,800 --> 00:19:28,920
तो ठीक है मैं आऊंगा एक ना एक दिन मैं बता रहा हूं मैं

268
00:19:28,920 --> 00:19:33,520
एक सत्यार्थ प्रकाश ऐसी छपवा ंगा जिसमें कि

269
00:19:33,520 --> 00:19:37,600
जिसके आधार पर मैं प्रश्न करूंगा आपसे कि इसमें ये

270
00:19:37,600 --> 00:19:41,800
ये ये ये लिखा हुआ है तो फिर आपकी

271
00:19:41,800 --> 00:19:45,920
बात क्यों मानी जाए और ये मेरी वाला जो ग्रंथ है इसको क्यों ना माना जाए आपके

272
00:19:45,920 --> 00:19:50,080
पास कोई जवाब नहीं है यदि आप परंपरा की बात नहीं करेंगे तो और हो

273
00:19:50,080 --> 00:19:54,720
तो बताइएगा उसी दिन जिस दिन मैं लाऊंगा ठीक है

274
00:19:54,720 --> 00:19:59,520
आपके पास नहीं आऊंगा आपके पास क्योंकि अब आपको ये बता दिया तो आपके पास नहीं आऊंगा

275
00:19:59,520 --> 00:20:03,760
किसी के पास जाऊंगा यह परंपरा वाली बात को क्लियर करने के लिए कि परंपरा

276
00:20:03,760 --> 00:20:08,120
कितना महत्त्वपूर्ण शब्द है जिसको आपने ताक में उठा के रख दिया

277
00:20:08,120 --> 00:20:13,320
है ना गधा समझते हैं परंपरा को आप ना

278
00:20:13,320 --> 00:20:17,640
ठीक अब इसमें आप देख लीजिए सत्या प्रकाश है

279
00:20:17,640 --> 00:20:22,600
और यह लिखा हुआ

280
00:20:22,600 --> 00:20:27,280
है स्तुति का फल क्या है इससे

281
00:20:27,280 --> 00:20:32,000
फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण

282
00:20:32,000 --> 00:20:36,400
है वैसे गुण कर्म स्वभाव अपने

283
00:20:36,400 --> 00:20:40,440
भी करना ईश्वर के जैसे

284
00:20:40,440 --> 00:20:44,640
गुण है वैसे गुण कर्म स्वभाव अपने भी

285
00:20:44,640 --> 00:20:48,960
करना अब ईश्वर के गुण क्या क्या है आगे उदाहरण भी है

286
00:20:48,960 --> 00:20:53,920
आगे उदाहरण भी है जैसे वह न्याय कारी है

287
00:20:53,920 --> 00:20:59,440
तो आप भी न्याय कारी होवे यह भक्ति का फल

288
00:20:59,440 --> 00:21:03,560
कितना झूठ बोलोगे भाई पहली बात तो जो प्रश्नों का चयन

289
00:21:03,560 --> 00:21:07,600
करते हो वह अपने कंफर्ट जोन उनके हिसाब

290
00:21:07,600 --> 00:21:11,880
से करते हो किस किस प्रश्न पर मैं बोल सकता हूं मैं आर्य समाज के मंदिर

291
00:21:11,880 --> 00:21:15,880
में 2100 लेकर के विवाह की

292
00:21:15,880 --> 00:21:19,000
बात पर नहीं बोलूंगा है ना

293
00:21:19,000 --> 00:21:23,040
उस पर नहीं बोलूंगा वह हमारी दुकाने चल रही ना व

294
00:21:23,040 --> 00:21:27,520
घर से माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध

295
00:21:27,520 --> 00:21:32,040
जो ताने वो जा रही है लापता हो गई उनका विवाह हो रहा है

296
00:21:32,040 --> 00:21:36,280
उस पर आप नहीं बोलेंगे ठीक है मुस्लिम मुस्लिम के साथ गैर हिंदुओ

297
00:21:36,280 --> 00:21:40,400
के साथ विवाह हो रहा है उस पर आपने कोई जवाब नहीं दिया अलंकार पर आपने कोई जवाब

298
00:21:40,400 --> 00:21:44,560
नहीं दिया श्री कृष्ण वाले सवाल पर आपने कोई जवाब नहीं दिया

299
00:21:44,560 --> 00:21:49,120
भाई मनुष्य अगर दुनिया में भगवान ने सृष्टि की रचना कर भी दी है

300
00:21:49,120 --> 00:21:53,360
तो उसका आप संबंध तो स्थापित करिए अगर कोई शक्तिशाली

301
00:21:53,360 --> 00:21:57,560
है तो हम क्या करें

302
00:21:57,560 --> 00:22:01,840
होगा भ अपने जब तक वह हमसे उसका कोई कनेक्शन

303
00:22:01,840 --> 00:22:05,840
आप नहीं सिद्ध करोगे तब तक वह क्यों बाद होगा उसके अनुसार

304
00:22:05,840 --> 00:22:10,240
धर्मा आचरण करने को तो अधर्म का प्रतिपादन

305
00:22:10,240 --> 00:22:16,160
कौन कर रहा

306
00:22:16,160 --> 00:22:20,200
है अब बात आती झूठ पर

307
00:22:20,200 --> 00:22:24,320
कितना इसमें आपने अपने वीडियोस में बोला कि सत्यार्थ

308
00:22:24,320 --> 00:22:28,480
प्रकाश में ऐसा नहीं लिखा हुआ है अब आप चेक करिए यह वाला प्रश्न मैंने

309
00:22:28,480 --> 00:22:32,680
चिपकाया नहीं है हां मगर मैं एक दिन आपसे परंपरा के विषय

310
00:22:32,680 --> 00:22:36,720
में प्रश्न करूंगा जरूर कि यदि सत्यार्थ प्रकाश में

311
00:22:36,720 --> 00:22:40,920
यह लिख दिया जाए कोई झूठा पब्लिशर यह लिख दिया

312
00:22:40,920 --> 00:22:44,920
जाए कि झूठे पब्लिशर के द्वारा य छाप दिया जाए

313
00:22:44,920 --> 00:22:49,160
कि गिल्ली डंडा खेलने से मोक्ष मिलता है टेनिस खेलने से मोक्ष

314
00:22:49,160 --> 00:22:53,360
मिलता है है ना चुटकुले सुनाने से मोक्ष मिलता

315
00:22:53,360 --> 00:22:59,360
है तो उसको क्यों ना माना जाए

316
00:23:02,480 --> 00:23:06,880
उसको क्यों ना माना जाए और आपके वाले ग्रंथ को क्यों माना

317
00:23:06,880 --> 00:23:10,960
जाए आपको आना होगा कि जो चेन ऑफ नरेशन

318
00:23:10,960 --> 00:23:15,480
है हमारी अर्थात परंपरा है सत्यार्थ प्रकाश से जो होके चली आ रही है

319
00:23:15,480 --> 00:23:19,480
वह लोग जो बात कहेंगे वह मान्य होगी नहीं कहेंगे तो आप

320
00:23:19,480 --> 00:23:23,960
सिद्ध नहीं कर पाएंगे कि कौन सी किताब सच्ची है कौन सी झूठी

321
00:23:23,960 --> 00:23:28,560
परंपरा के बिना अस्तित्व नहीं है अलंकार

322
00:23:28,560 --> 00:23:34,200
समाज जो आपने बनाया है परंपरा का खंडन कर कर

323
00:23:34,200 --> 00:23:38,480
के अच्छा अब एक दूसरी बात आती है ईश्वर

324
00:23:38,480 --> 00:23:42,560
की भक्ति के विषय में यह तो प्रश्न हो ही गया आपने जो कहा

325
00:23:42,560 --> 00:23:46,560
था वह झूठ सिद्ध हो गया आपकी सत्या प्रकाश में लिखा है

326
00:23:46,560 --> 00:23:50,560
कि ईश्वर की भक्ति का फल यह है कि उसके जैसे कर्म

327
00:23:50,560 --> 00:23:54,920
स्वभाव गुण हमारे भी हो अगर ईश्वर न्याय कारी है

328
00:23:54,920 --> 00:23:59,600
तो हम भी न्याय कारी हो इसका अर्थ क्या हुआ ईश्वर उत्पत्ति

329
00:23:59,600 --> 00:24:03,600
स्थिति समार करने वाला है कर्मों

330
00:24:03,600 --> 00:24:08,160
का फल देने वाला है तो हम भी वही हो आ गया ना

331
00:24:08,160 --> 00:24:12,440
अद्वैत आप शाब्दिक भेद करते रहो मगर आपको आना अद्वैत

332
00:24:12,440 --> 00:24:16,480
पर ही पड़ेगा या तो आप ये मानो कि बहुत

333
00:24:16,480 --> 00:24:17,520
सारे ईश्वर हो जाएंगे

334
00:24:17,520 --> 00:24:21,520
उत्पत्ति स्थिति समार करने वाले और या फिर यह मानोगे उसमें

335
00:24:21,520 --> 00:24:25,520
लीन हो जाओगे नहीं तो इस बात को सिद्ध करो कि गुण आने का

336
00:24:25,520 --> 00:24:29,560
क्या मतलब है अगर उत्पत्ति स्थिति समान कर्मों के फल देने

337
00:24:29,560 --> 00:24:33,840
को छोड़कर बाकी के गुण आ रहे हैं न्याय कारी होना दयालु होना

338
00:24:33,840 --> 00:24:37,960
तो यह फिल्टर किस आधार पर है यह भी बताइए अभी एक

339
00:24:37,960 --> 00:24:42,840
तरीका और है मैं आपको मूर्ति पूजक भी सिद्ध करूंगा व भी आप

340
00:24:42,840 --> 00:24:47,280
देखिए अब वो कैसे होगा आपने

341
00:24:47,280 --> 00:24:51,280
कहा कि ईश्वर की भक्ति का फल यह है कि उसके गुण

342
00:24:51,280 --> 00:24:55,840
आएंगे हमारे अंदर और जो आपका भाव प्रकट हो रहा है सिद्ध नहीं है

343
00:24:55,840 --> 00:25:00,680
आपका भाव प्रकट हो रहा है कि ईश्वर की उत्पत्ति समार वाली चीज तो नहीं आएंगी

344
00:25:00,680 --> 00:25:04,800
मगर हा आप परोपकारी हो जाओगे दयालु हो जाओगे

345
00:25:04,800 --> 00:25:08,800
और क्या क्या हो जाओगे मतलब जितने भी अच्छे भाव होते

346
00:25:08,800 --> 00:25:13,040
हैं व सब आपके अंदर आ जाएंगे ठीक है तो फिर इसके लिए ईश्वर

347
00:25:13,040 --> 00:25:17,120
की भक्ति की आवश्यकता क्यों है भाई यह सारे गुण तो दयानंद

348
00:25:17,120 --> 00:25:21,160
सरस्वती जी में भी थे यह सारे गुण तो आपके अनुसार

349
00:25:21,160 --> 00:25:25,480
भगवान नहीं को ईश्वर नहीं है श्री कृष्ण मगर उनके अंदर भी यह सारे गुण

350
00:25:25,480 --> 00:25:29,600
है राम के अंदर भी य सारे गुण है तो फिर निराकार

351
00:25:29,600 --> 00:25:32,560
ईश्वर की आवश्यकता फिर क्यों है बाध्यता क्यों है

352
00:25:32,560 --> 00:25:36,800
चलो ठीक है बाध्यता क्यों है निराकार ईश्वर की

353
00:25:36,800 --> 00:25:41,480
जब हमें उससे वह जो विवेक रूपी

354
00:25:41,480 --> 00:25:47,440
जो गुण है वह प्राप्त करने हैं तो फिर बाध्यता क्यों

355
00:25:47,440 --> 00:25:51,680
है निराकार ईश्वर की पूजा करने को जो भी ऐसा कोई व्यक्तित्व

356
00:25:51,680 --> 00:25:56,280
मिल जाए जिसमें परोपकार हो जिसमें दुलार हो

357
00:25:56,280 --> 00:26:00,920
जिसमें प्रेम हो न्याय हो दया हो

358
00:26:00,920 --> 00:26:05,480
उसी ईश्वर की पूजा करो उसी व्यक्ति की पूजा करो पुरुष की महापुरुष की

359
00:26:05,480 --> 00:26:09,720
और जब महापुरुष की पूजा करो तो दयानंद सरस्वती भी महापुरुष है आपके

360
00:26:09,720 --> 00:26:14,520
अकॉर्डिंग श्री कृष्ण भी महापुरुष है आपके अकॉर्डिंग

361
00:26:14,520 --> 00:26:18,560
राम भी महापुरुष है आपके अकॉर्डिंग तो फिर क्यों ना उनकी पूजा

362
00:26:18,560 --> 00:26:22,600
की जाए उनसे तो और ज्यादा कनेक्शन है वो तो और हमारे बीच में रहे

363
00:26:22,600 --> 00:26:27,080
हैं ऐतिहासिक है उनका चित्र वर्णित हो सकता है ज्यादा वो

364
00:26:27,080 --> 00:26:31,120
रिलेट करता है वक्ति उनसे चलो मान लो

365
00:26:31,120 --> 00:26:35,160
कि यह रिलेशन वाली बात ना भी हो मगर बाध्यता तो नहीं होनी चाहिए ना कि

366
00:26:35,160 --> 00:26:39,280
निराकार की पूजा करो अगर गुण प्राप्त करने के लिए पूजा

367
00:26:39,280 --> 00:26:43,440
करनी है न्याय काता परोपकार दयालुता

368
00:26:43,440 --> 00:26:47,640
इन सबको प्राप्त करने के लिए भक्ति करनी है तो राम कृष्ण

369
00:26:47,640 --> 00:26:52,440
की भक्ति क्यों ना की जाए बताइए आप क्यों ना की जाए

370
00:26:52,440 --> 00:26:56,480
दयानंद की भक्ति क्यों ना की जाए और जब इन जैसे लोगों

371
00:26:56,480 --> 00:27:00,600
की भक्ति की जाएगी तो फिर इनकी मूर्ति क्यों ना बनाई

372
00:27:00,600 --> 00:27:04,640
जाए बन गए ना मूर्ति पूजक या तो यह कहो

373
00:27:04,640 --> 00:27:09,080
कि वहां पर सर्वशक्तिमान की पूजा कर रहे हैं अंसी

374
00:27:09,080 --> 00:27:13,280
अपने अंश की पूजा कर रहा है मनुष्य की चाह का विषय

375
00:27:13,280 --> 00:27:17,640
वास्तविकता में वही है इसलिए उस स्थिति को प्राप्त

376
00:27:17,640 --> 00:27:21,760
करने के निमित्त उसकी पूजा भक्ति कर रहा है जिससे कि उसके अंदर व सामर्थ्य वो

377
00:27:21,760 --> 00:27:25,920
बल प्राप्त हो जिससे कि वो इस दुनिया से विरक्त हो पाए और

378
00:27:25,920 --> 00:27:30,080
ईश्वर में लीन हो पाए और ईश्वर में लीन होना आपका

379
00:27:30,080 --> 00:27:34,280
आप दोहरी बातें कर रहे हो अगर आप यह कह रहे हो कि

380
00:27:34,280 --> 00:27:38,440
उत्पत्ति स्थिति समार यह सब नहीं आएगा केवल दयालुता आएगी

381
00:27:38,440 --> 00:27:42,480
परोपकार आएगी तो भी आप अधूरी बात कर

382
00:27:42,480 --> 00:27:46,520
रहे हो और अगर आप यह कह रहे हो कि सब कुछ आ जाएगा उत्पत्ति

383
00:27:46,520 --> 00:27:50,600
स्थिति समार आ जाएगा तो भी आप दोरी बात कर रहे हो क्योंकि

384
00:27:50,600 --> 00:27:55,240
आप एक तरफ अद्वैत का खंडन कर रहे हो और अगर

385
00:27:55,240 --> 00:27:59,440
आप यह जो दयालुता वगैरा वाली भक्ति

386
00:27:59,440 --> 00:28:02,640
की बात कर रहे हो प्राप्त करने के निमित्त भक्ति की बात कर रहे हो तो

387
00:28:02,640 --> 00:28:06,640
आप दूसरी तरफ मूर्ति पूजा का खंडन कर रहे हो जबकि यहां से मूर्ति पूजा आपकी सिद्ध हो रही

388
00:28:06,640 --> 00:28:11,120
है तो ये ईश्वर के विषय में जो

389
00:28:11,120 --> 00:28:15,560
आपने बहुत एक्शन पैक तरीके से बातें की है

390
00:28:15,560 --> 00:28:19,960
आपको मेरे जो भाव है वो

391
00:28:19,960 --> 00:28:24,120
बहुत ही सामान्य दिख रहे होंगे क्योंकि मैं बहुत संतुष्ट

392
00:28:24,120 --> 00:28:28,360
हो चुका आपका पक्ष सुन सुन के मतलब

393
00:28:28,360 --> 00:28:33,440
मेरे अंदर अब कोई इस प्रकार का नहीं है कि मुझे उत्तर देना उत्तर देना है हां

394
00:28:33,440 --> 00:28:37,480
मगर जो कुछ ऐसी चीजें थी जो

395
00:28:37,480 --> 00:28:41,600
मुझे लगता था कि इससे लोगों को थोड़ा लर्न करने को मिलेगा

396
00:28:41,600 --> 00:28:45,680
अध्ययन करने को मिलेगा तार्किक धरातल पर प्रामाणिक धरातल तो इसलिए

397
00:28:45,680 --> 00:28:49,080
मैंने कहा कि चलो लाइव करते

398
00:28:49,080 --> 00:28:54,440
हैं अच्छा इसके

399
00:28:54,440 --> 00:28:59,080
बाद एक वो और था

400
00:28:59,080 --> 00:29:03,240
जैसे पक्षपाती की बात की जा रही है अलंकार समाज के द्वारा

401
00:29:03,240 --> 00:29:08,280
सत्यार्थ प्रकाश में कि क्या ईश्वर पक्षपाती है

402
00:29:08,280 --> 00:29:12,320
तो प्रश्न फिर यह आ जाता है मैंने अपनी पिछली लाइव में कहा

403
00:29:12,320 --> 00:29:16,320
था कि यदि संसार में

404
00:29:16,320 --> 00:29:20,320
जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य के लिए

405
00:29:20,320 --> 00:29:24,360
वेद पढ़ना समान रूप से अधिकृत है वो वेद पढ़ने

406
00:29:24,360 --> 00:29:28,760
के लिए प्रत्येक मनुष्य समान रूप से अधिकृत है

407
00:29:28,760 --> 00:29:32,800
तो फिर यह जो वेद की ऋचाएं हैं यह मनुष्य के अंदर इनबिल्ट होनी

408
00:29:32,800 --> 00:29:36,840
चाहिए इनबिल्ट उनके साथ ही जन्म ले कम से

409
00:29:36,840 --> 00:29:40,880
कम साथ में जन्म ना ले तो कम से कम वेदों के

410
00:29:40,880 --> 00:29:44,960
प्रति उसके अंदर अट्रैक्शन हो

411
00:29:44,960 --> 00:29:49,160
जैसे जब पानी पर सबका अधिकार है तो पानी की प्यास लेकर

412
00:29:49,160 --> 00:29:53,200
के जन्म लेता है व्यक्ति भोजन पर सबका अधिकार है

413
00:29:53,200 --> 00:29:57,200
तो भोजन की प्यास लेकर के व्यक्ति जन्म लेता है तो

414
00:29:57,200 --> 00:30:01,280
वेद की दि भौतिक रूप से पढ़ने का अगर सबको करना है

415
00:30:01,280 --> 00:30:05,480
तो वेद की ऋचाओं का आकर्षण भी तो होना चाहिए इनबिल्ट वो

416
00:30:05,480 --> 00:30:09,200
तो नहीं है और

417
00:30:09,200 --> 00:30:10,200
अगर

418
00:30:10,200 --> 00:30:14,280
वेद का अध्ययन से तय हो रहा है कि ईश्वर पक्षपाती है कि नहीं तो फिर

419
00:30:14,280 --> 00:30:18,320
इसका क्या जवाब होगा कि एक व्यक्ति साउथ अफ्रीका के जंगलों में जन्म ले रहा

420
00:30:18,320 --> 00:30:22,560
है और उसका पूरा जीवन निकल गया उसने वेद का शब्द वेद नाम का शब्द

421
00:30:22,560 --> 00:30:25,120
भी नहीं

422
00:30:25,120 --> 00:30:29,120
सुना हा वेदना का उसने शब्द भी नहीं सुना

423
00:30:29,120 --> 00:30:33,600
तो ये पक्षपात नहीं है उसको ऐसी जगह जन्म क्यों दिया उसको किसी अलंकार

424
00:30:33,600 --> 00:30:38,120
समाजी के यहां पर जन्म देना चाहिए था किसी अलंकारी के य जन्म देना चाहिए था

425
00:30:38,120 --> 00:30:42,240
जिससे कि बगल में वेद की रचाए होती वेद के मंत्र होते वो तो नहीं

426
00:30:42,240 --> 00:30:46,320
किया तो पक्षपात हो गया किसी को अमेरिका में जन्म दे रहे हैं ये भी पक्षपात

427
00:30:46,320 --> 00:30:50,320
हो गया मैं तो यहां तक कह रहा हूं कि अगर

428
00:30:50,320 --> 00:30:54,720
किसी को वेद के सबसे निकटतम स्थिति में जन्म प्राप्त हो रहा है

429
00:30:54,720 --> 00:30:59,440
और उससे एक सेंटीमीटर ज्यादा भी कोई दूरी पर जन्म ले रहा है एक सेंटीमीटर एक

430
00:30:59,440 --> 00:31:03,920
बाल के बराबर की दूरी पर भी अगर कोई जन्म ले रहा है तो ईश्वर उसके साथ पक्षपात

431
00:31:03,920 --> 00:31:08,720
कर रहा है क्यों क्यों कर रहा है पक्षपात

432
00:31:08,720 --> 00:31:12,840
पक्षपात नहीं है ना ईश्वर हमें य मानना होगा कि

433
00:31:12,840 --> 00:31:16,840
पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर इस जन्म

434
00:31:16,840 --> 00:31:20,880
का शरीर प्राप्त होता है शरीर की सीमा में कुल

435
00:31:20,880 --> 00:31:23,560
वर्ण प्राप्त होता है कुल वर्ण की सीमा में

436
00:31:23,560 --> 00:31:27,920
इस जन्म के हम पुन कर्म हमारे वो होते हैं सिद्ध

437
00:31:27,920 --> 00:31:32,040
और अगर हम उन कर्मों को करते हैं तो हम उत्तम वर्ण

438
00:31:32,040 --> 00:31:36,320
के ख्याति को प्राप्त करते हैं और अगर यथोचित कर्मों

439
00:31:36,320 --> 00:31:40,320
को नहीं करते तो हम पतित हो जाते ब्राह्मण

440
00:31:40,320 --> 00:31:44,520
पतित होता है ना भाही गलत कार्य करने

441
00:31:44,520 --> 00:31:48,800
पर शूद्र को भी दंड है और ब्राह्मण को भी दंड है ब्राह्मण को ज्यादा दंड

442
00:31:48,800 --> 00:31:53,680
है ठीक है यह हो गया

443
00:31:53,680 --> 00:31:58,280
सर्वशक्तिमान की बात मैंने बता ही दी आपको के आपका कहना

444
00:31:58,280 --> 00:32:02,520
सर्वशक्तिमान का अर्थ है इस पर भी आपने कोई जवाब नहीं दिया मैंने बहुत स्पष्ट अक्षर

445
00:32:02,520 --> 00:32:06,720
में शब्दों में पूछा था कि भाई यदि

446
00:32:06,720 --> 00:32:11,200
आपके हिसाब से सर्वशक्तिमान का अर्थ यह है कि जो

447
00:32:11,200 --> 00:32:15,200
जिस व्यक्ति का जिस एंटिटी का जो कार्य है जिस तत्व

448
00:32:15,200 --> 00:32:19,720
का जो कार्य है अगर वह अपने आप व कार्य कर पा रहा है तो वह सर्वशक्तिमान

449
00:32:19,720 --> 00:32:23,800
है तो जिसका जो कार्य नहीं है यदि वो

450
00:32:23,800 --> 00:32:28,000
भी वो कर पाएगा उसको क्या कहा जाएगा कोई ना कोई उपमा

451
00:32:28,000 --> 00:32:32,120
तो दो उ से कर पाएगा करेगा कि नहीं करेगा

452
00:32:32,120 --> 00:32:36,280
इस पर मत जाना क्योंकि मुझे मालूम है इस पर अगर जाएंगे तो फिर तुम लगाने लगोगे

453
00:32:36,280 --> 00:32:38,640
कि वो बुद्धू है वो बेवकूफ है नहीं

454
00:32:38,640 --> 00:32:42,920
क्षमता है कि नहीं इसकी बात बताओ जिसका जो करने का कार्य

455
00:32:42,920 --> 00:32:47,040
नहीं है अगर वो कार्य वो कर सकता है वोह क्षमता

456
00:32:47,040 --> 00:32:51,160
है अगर उसके अंदर उसको हम कहे क्या क्योंकि

457
00:32:51,160 --> 00:32:55,160
सर्व शक्तिमान शब्द तो आपने ले लिया चुरा लिया

458
00:32:55,160 --> 00:32:59,160
है ना कि सर्वशक्तिमान का अर्थ तो यह है सीमित कर दिया

459
00:32:59,160 --> 00:33:03,160
तो अब हमें कोई ऐसा शब्द तो दे दो कि जो उससे ज्यादा काम कर

460
00:33:03,160 --> 00:33:07,360
सकता है उसको क्या कहा जाएगा नहीं दोगे

461
00:33:07,360 --> 00:33:11,520
कोई ना कोई उससे सु क्या कहते सुपरलेटिव डिग्री लगाते हुए आपको देना

462
00:33:11,520 --> 00:33:15,800
पड़ेगा ना ऐसा परम सर्वशक्तिमान अत्यंत

463
00:33:15,800 --> 00:33:19,920
सर्वशक्तिमान कुछ ना कुछ तो आपको उसम एडजेक्टिव लगाना पड़ेगा

464
00:33:19,920 --> 00:33:24,000
ना सर्वशक्तिमान के आगे क्योंकि उसमें वो कार्य भी

465
00:33:24,000 --> 00:33:28,200
करने की क्षमता है जो इसमें नहीं है यह सिर्फ वही कर सकता है जो उसको

466
00:33:28,200 --> 00:33:32,320
करना है दूसरा वो है वो वो भी कर सकता है जो उसको नहीं करना है कर

467
00:33:32,320 --> 00:33:37,620
सकता है करेगा नहीं करेगा वो अलग बात ठीक

468
00:33:37,620 --> 00:33:41,840
[संगीत] है ये आप नहीं बोलोगे अब अब

469
00:33:41,840 --> 00:33:46,000
जो आर समाज का जो अलं और जो जो ईश्वर

470
00:33:46,000 --> 00:33:50,280
है आपके द्वारा प्रतिपादित होने वाला अगर उसको देखा जाए

471
00:33:50,280 --> 00:33:54,360
तो क्या हो रहा है कि

472
00:33:54,360 --> 00:33:58,520
अच्छा उसमें एक तर्क और दिया गया है कि ईश्वर यदि वह

473
00:33:58,520 --> 00:34:02,840
सारे कार्य कर रहा है जो उसको करने हैं तो वह सर्वशक्तिमान

474
00:34:02,840 --> 00:34:07,160
है अगर वह कर सकता है बिना किसी की सहायता के किसी पर निर्भर

475
00:34:07,160 --> 00:34:11,400
नहीं है वह और यदि वह कार्य कर पा रहा है तो वह जो है सर्वशक्तिमान

476
00:34:11,400 --> 00:34:15,600
है और अब एक प्रश्न आता है कि भाई ईश्वर के कार्य कौन-कौन

477
00:34:15,600 --> 00:34:20,120
से हैं तो यह इसके लिए क्या लिखा गया यह तो ईश्वर ही

478
00:34:20,120 --> 00:34:24,360
बताएगा ठीक है अब इस हिसाब से

479
00:34:24,360 --> 00:34:30,360
यह जो तर्क है तो मैं अगर ताली बजा

480
00:34:30,360 --> 00:34:34,720
लग कोई मुझसे आकर के पूछे भाई तू क्या कर रहा है तो मैं कहूंगा

481
00:34:34,720 --> 00:34:40,200
भाई मैं ताली बजाकर यह सिद्ध कर रहा हूं कि मैं सर्वशक्तिमान हूं

482
00:34:40,200 --> 00:34:45,080
कैसे अगर मैं वह कार्य कर सकता हूं जो मुझे करने हैं

483
00:34:45,080 --> 00:34:49,160
तो मैं सर्वशक्तिमान हूं अगर मैं बिना किसी की सहायता के वह कार्य कर सकता हूं जो मुझे

484
00:34:49,160 --> 00:34:53,240
करने हैं अच्छा और यह तय कौन कर रहा है

485
00:34:53,240 --> 00:34:57,720
कि तुझे कौन-कौन से कार्य करने है मैं खुद मैं तय कर रहा हूं

486
00:34:57,720 --> 00:35:01,800
मुझे ताली बजानी है मैं बजा रहा हूं अब मैं हो

487
00:35:01,800 --> 00:35:06,720
गया सर्वशक्तिमान हो गया ना

488
00:35:06,720 --> 00:35:11,400
यह तर्क है तो थोड़ा इस पर वर्क करिए

489
00:35:11,400 --> 00:35:16,280
सब लोग ताली बजाएंगे और स्वयं को सर्वशक्तिमान घोषित करेंगे

490
00:35:16,280 --> 00:35:20,360
और यह कह देंगे हमारा कार्य भाई ताली बजाना अब हम ताली बजा

491
00:35:20,360 --> 00:35:25,160
पा रहे हैं देखो मेरा कार्य है सर में

492
00:35:25,160 --> 00:35:29,360
ये खुजली मिटाना तो मैं मिटा पा रहा हूं मैं हो गया सर्वशक्तिमान

493
00:35:29,360 --> 00:35:35,360
कितना अच्छा तर्क है ना बहुत

494
00:35:35,680 --> 00:35:41,560
बढ़िया

495
00:35:41,560 --> 00:35:45,720
अच्छा ऋषि वाच जी से चर्चा

496
00:35:45,720 --> 00:35:49,960
हो सकती थी पर उन्होंने बहुत ही भदे तरीके से बातें की

497
00:35:49,960 --> 00:35:54,200
उस चर्चा में जो इसलिए हो रही थी कि हमें चर्चा कब कहां

498
00:35:54,200 --> 00:35:58,200
और कैसे करनी है तो इसलिए ऐसे व्यक्ति

499
00:35:58,200 --> 00:36:02,440
के साथ जो अमर्यादित व्यवहार करता है उसके साथ मैं मंच साझा

500
00:36:02,440 --> 00:36:06,680
नहीं कर सकता क्योंकि जब वह इंटरनेट पर हम लोग सब मंच साझा

501
00:36:06,680 --> 00:36:10,680
कर रहे होंगे और वह कोई अभद्र बात करेगा तो मैं उसको पकड़

502
00:36:10,680 --> 00:36:15,120
के तो थप्पड़ नहीं लगा पाऊंगा

503
00:36:15,120 --> 00:36:19,160
इसलिए हां धरातल पर आप करवाइए आयोजित

504
00:36:19,160 --> 00:36:24,120
कर लेंगे धरातल पर आप आयोजित करवाइए कर लेंगे

505
00:36:24,120 --> 00:36:28,280
उसके लिए जो व्यवस्थाएं है वो कर दीजिए कर लेंगे जब वहां

506
00:36:28,280 --> 00:36:32,720
पर क्या होगा कि उसके पास उतनी स्वतंत्रता नहीं होगी

507
00:36:32,720 --> 00:36:37,360
कि चीत उड़ा देंगे एक एक एक एक मिनट की वो कमाने वाला

508
00:36:37,360 --> 00:36:41,440
पैसे कमाने वाला फिर उसके बाद उनके फॉलोअर्स ने बहुत गंदी गंदी बातें

509
00:36:41,440 --> 00:36:46,240
की है शर्म आ जाएगी अगर कोई सत्य का पक्षधर होगा तो

510
00:36:46,240 --> 00:36:50,560
ठीक है आप जाकर के देख लीजिए

511
00:36:50,560 --> 00:36:54,920
इस पर एक वीडियो बनाया है कि उनकी तरफ से क्या क्या कहा गया और स्क्रीनशॉट डाले गए

512
00:36:54,920 --> 00:36:59,360
हैं तो हम ऐसे के साथ मंच साझा नहीं कर सकते

513
00:36:59,360 --> 00:37:03,160
ना आप

514
00:37:03,160 --> 00:37:07,240
करिए तो सर्वशक्तिमान कौन हो गया भाई

515
00:37:07,240 --> 00:37:11,600
जो व्यक्ति यह बताएगा कि मेरा काम क्या है

516
00:37:11,600 --> 00:37:16,160
और यदि वह वह कार्य कर लेगा तो वह सर्वशक्तिमान है सभी

517
00:37:16,160 --> 00:37:20,800
लोग ताली बजाएंगे

518
00:37:20,800 --> 00:37:25,360
और ताली बजा कर के वोय सिद्ध कर सकते हैं कि वह सर्वशक्तिमान है

519
00:37:25,360 --> 00:37:29,560
पलक चपका दे ये लो झपक गई पलक मेरा कार्य

520
00:37:29,560 --> 00:37:33,600
क्या है पलक झपका मैं सर्वशक्तिमान हूं कितना अच्छा

521
00:37:33,600 --> 00:37:37,720
तर्क है ना सर्वशक्तिमान मतलब सर्व

522
00:37:37,720 --> 00:37:41,880
शक्तिमान शब्द का आलंबन लेना है तो सर्व शक्तिमान की

523
00:37:41,880 --> 00:37:46,040
परिभाषा ही बदल दो अद्य का आलंबन लेना

524
00:37:46,040 --> 00:37:50,120
है तो अद की परिभाषा ही बदल दो वेद का आलंबन लेना है

525
00:37:50,120 --> 00:37:54,160
तो वेद की परिभाषा ही बदल दो क्योंकि आलंबन लेना है अपनी मंतव्य की सिद्धि

526
00:37:54,160 --> 00:37:58,320
के लिए इसलिए वेद की परिभाषा ही बदल दो जिस जिस

527
00:37:58,320 --> 00:38:02,760
चीज जिस जिस चीज का उपयोग किए बिना आपका मंतव्य सिद्ध

528
00:38:02,760 --> 00:38:08,560
नहीं हो पा रहा है उस उस चीज का अर्थ ही बदल

529
00:38:08,560 --> 00:38:12,640
दो और यही मैंने शुरू से कहता आ रहा हूं मुझे कोई दिक्कत नहीं

530
00:38:12,640 --> 00:38:16,720
है अलंकार समाज से या फिर वह कृष्ण विस्कन

531
00:38:16,720 --> 00:38:18,240
संस्था है जो मुझे

532
00:38:18,240 --> 00:38:22,240
कोई दिक्कत नहीं है इन सबसे ईश्वर को सर्वशक्तिमान

533
00:38:22,240 --> 00:38:26,280
कहिए बस और यदि आपके अपने अपने अलग अलग

534
00:38:26,280 --> 00:38:30,840
थोड़े सीमित सीमित वाले सर्वशक्तिमान ईश्वर है तो असीमित सर्वशक्तिमान

535
00:38:30,840 --> 00:38:34,880
का जो सही शब्द हो वो मुझे बता दीजिए व्याकरण के आप ज्यादा ज्ञाता है आप

536
00:38:34,880 --> 00:38:38,960
बताइए मुझे मैंने आपसे प्रश्न किया कि जो अपने

537
00:38:38,960 --> 00:38:43,000
से बाहर के कार्य भी करेगा उसको हम क्या कहे भैया हम वही कह लेंगे अपने

538
00:38:43,000 --> 00:38:47,080
ईश्वर को हम सर्वशक्तिमान कहना बंद कर लेंगे उस पर आपने क्योंकि पेटेंट कर लिया

539
00:38:47,080 --> 00:38:51,080
अपना पिछले 100 डे स सालों में हम बंद कर देंगे कहना

540
00:38:51,080 --> 00:38:56,440
आप हमें शब्द दे दो दूसरा कोई जो न्याय

541
00:38:56,440 --> 00:39:00,520
हो जिसमें की उसकी सार्थकता हो जाए

542
00:39:00,520 --> 00:39:06,000
कि जो जिसके करने के कार्य नहीं है उनको भी यदि वो कर पा रहा है

543
00:39:06,000 --> 00:39:10,440
तो वह फलाना उसको उपमा दी जा सकती है यह

544
00:39:10,440 --> 00:39:14,480
हमें बताइए आप और फिर वो जन समाज देखेगा कि वह

545
00:39:14,480 --> 00:39:20,000
आपने क्या दिया क्या निर्णय

546
00:39:20,000 --> 00:39:24,880
है सांख्य दर्शन के बारे में हमने बात की थी

547
00:39:24,880 --> 00:39:28,960
हमने सांख्य दर्शन के संबंध में ने श्लोक क्रमांक के साथ

548
00:39:28,960 --> 00:39:33,120
बताया था कि यहां यहां पर 26 में तत्व की बात हुई है ब्रह्म

549
00:39:33,120 --> 00:39:37,120
की बात हुई है महाभारत में और अंततः जीव और ब्रह्म

550
00:39:37,120 --> 00:39:41,240
की एकता की बात हुई है आपने सिरे से नकार दिया हालांकि

551
00:39:41,240 --> 00:39:45,400
आपने झूठ तो बोल ही दिया है आपने वायु पुराण

552
00:39:45,400 --> 00:39:49,440
दिखा दिया पर वायु पुराण का जो अंश है मोतीलाल बनारसी प्रकाशन

553
00:39:49,440 --> 00:39:53,440
से छपता है एकलिंग महात्मा है

554
00:39:53,440 --> 00:39:57,440
वायु पुराण का जो अंश है बड़ा होने के कारण उसमें काफी सारी व्याख्या होने

555
00:39:57,440 --> 00:40:01,960
के कारण उसको स्पेशल एडिशन में अलग से छापा जाता है

556
00:40:01,960 --> 00:40:06,040
वो भी आपने पता करने का प्रयास नहीं किया अधूरी जानकारी

557
00:40:06,040 --> 00:40:10,760
और अपने सुविधा अनुसार शब्दों का चयन और विषयात

558
00:40:10,760 --> 00:40:14,760
इस पर हमारी चर्चा चल रही है शुरू से और उसमें

559
00:40:14,760 --> 00:40:18,840
बड़ा आपका जो रोल रहता है व तो क्या कहने कुछ

560
00:40:18,840 --> 00:40:22,920
भी कह दो आप हमने अभी तक आपके पूर्वा चार्य

561
00:40:22,920 --> 00:40:28,160
के संबंध में कोई अभद्र टिप्पणी की हो कुछ कहा हो तो बताइए

562
00:40:28,160 --> 00:40:32,360
आपने क्याक नहीं कह दिया थड़े उड़ा देंगे

563
00:40:32,360 --> 00:40:36,000
और बहुत सी चीजें हैं मैं उनको करना नहीं चाहता

564
00:40:36,000 --> 00:40:40,000
हूं कपिल जी का विरोध आता है आदि शंकराचार्य इसका भी

565
00:40:40,000 --> 00:40:44,240
हमने बताया जवाब कि भाई आप मानो या ना मानो आदि

566
00:40:44,240 --> 00:40:48,600
शंकराचार्य जी ने उनके अनुसार उस कपिल का विरोध

567
00:40:48,600 --> 00:40:52,720
नहीं किया था जिस कपिल ने महा भारत में सांख्य का ज्ञान दिया

568
00:40:52,720 --> 00:40:56,720
था उस कपिल का जो वशिष्ठ से रिलेट कर रहा है जो परंपरा से रिलेट कर

569
00:40:56,720 --> 00:41:00,960
रहा है उसका विरोध शंकराचार्य के अनुसार उन्होंने नहीं किया था अब वो विश्वास

570
00:41:00,960 --> 00:41:05,000
है कि नहीं है वो फिर दूसरी बात है किसको किस पर विश्वास है कि नहीं

571
00:41:05,000 --> 00:41:09,160
वो फिर बात वही आ जाएगी परंपरा फिर मैं कहूंगा सत्यार्थ

572
00:41:09,160 --> 00:41:13,200
प्रकाश छपे कीी जिसमें टेनिस गिल्ली डंडे से मोक्ष

573
00:41:13,200 --> 00:41:17,640
बताया जाएगा तो आप सिद्ध नहीं कर पाओगे यह सत्यार्थ

574
00:41:17,640 --> 00:41:22,040
प्रकाश नकली अगर आप परंपरा को नहीं मानते हो तो आपको मानना पड़ेगा

575
00:41:22,040 --> 00:41:26,480
परंपरा सोचो और एक शास्त्र भी कहते हैं मांड

576
00:41:26,480 --> 00:41:30,880
के उपनिषद में परंपरा बताई जाती है यह ग्रंथ यहां तक कैसे

577
00:41:30,880 --> 00:41:34,880
आया निरुक्त में परंपरा बताई जाती

578
00:41:34,880 --> 00:41:39,080
है शास्त्रों में बार-बार भगवान परंपरा की बात करते हैं

579
00:41:39,080 --> 00:41:43,280
चार दो में तीन 16 में तो इनसे आप

580
00:41:43,280 --> 00:41:47,360
मुंह नहीं फेर सकते मीठा मीठा अपप्पा कड़वा

581
00:41:47,360 --> 00:41:51,520
कड़वा थू पे भी आपने कुछ नहीं बोला जब

582
00:41:51,520 --> 00:41:55,560
हमने जो आपने प्रश्न किया था कि वो गड पादा चार्य

583
00:41:55,560 --> 00:42:00,400
गोविंद पाद जी के जो गुरु है वो राक्षस सिद्ध हो रहे हैं

584
00:42:00,400 --> 00:42:04,760
तो आपने वहां क्या किया हमने वहां पर यह समझते

585
00:42:04,760 --> 00:42:09,120
हुए कि आप आर समाज के समर्थक है आपको मूर्ति पूजा का समर्थक

586
00:42:09,120 --> 00:42:13,120
बताने के लिए हमने वो प्रमाण आपको नहीं दिया था आर समाज के समर्थक होने के

587
00:42:13,120 --> 00:42:17,280
नाते वह प्रमाण आपको दिया था आपने जो आक्षेप लगाया

588
00:42:17,280 --> 00:42:21,600
था वह हमारे द्वारा स्वीकार किए गए ग्रंथ से नहीं लगाया था

589
00:42:21,600 --> 00:42:26,280
मगर हमने जो आपको उस आक्षेप के प्रति उत्तर में उत्तर दिया

590
00:42:26,280 --> 00:42:30,400
वो जरूर उन ग्रंथों से दिया जिन ग्रंथों को आप स्वीकार करते

591
00:42:30,400 --> 00:42:34,480
हैं है ना हम तो सिरे से नकार रहे व ग नकली है बताइए

592
00:42:34,480 --> 00:42:38,560
क्या कर लेंगे फि नकली है वो ग्रंथ झूठा लिखा गया है

593
00:42:38,560 --> 00:42:42,560
क्या करें शंकराचार्य से जाकर कंफर्म करिए यह ग्रंथ

594
00:42:42,560 --> 00:42:46,800
असली है कि नकली है हम तो परंपरा को मानते हैं ना मनुष्य

595
00:42:46,800 --> 00:42:51,000
चाहे चारों वेद पढ़ ले सारे पुराण पढ़ ले उपनिषद पढ़ ले जब तब व्रत

596
00:42:51,000 --> 00:42:55,200
दान पुण्य कर्म तीर्थ दान यज्ञ सब कुछ व्यर्थ है यदि

597
00:42:55,200 --> 00:42:59,360
आपका कोई आचार्य नहीं है आचार्य से प्राप्त

598
00:42:59,360 --> 00:43:05,360
शिक्षा ही विद्या ही फलदायक है जो व्यक्ति गुरु में

599
00:43:06,480 --> 00:43:10,480
और गोविंद में अंतर करता है व गुरु पत्नी

600
00:43:10,480 --> 00:43:14,480
गमन के समान पापी है स्वेता शत्र उपनिषद

601
00:43:14,480 --> 00:43:19,720
में लिखा है उसको कभी मोक्ष नहीं मिल सकता 6

602
00:43:19,720 --> 00:43:23,880
में और आपके ही अनुसार जो वेद का जो वेद का जो वेद

603
00:43:23,880 --> 00:43:28,200
पढ़ाए वो गुरु है और आपने अपनी कहा कनी जो सुनाई थी अप्रत्यक्ष

604
00:43:28,200 --> 00:43:32,680
रूप से अलंकार समाज वालों ने

605
00:43:32,680 --> 00:43:36,720
उन्होंने अपनी कहानी में भी अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया था कि हमको जो

606
00:43:36,720 --> 00:43:40,840
वेदों की मंत्र वगैरह है वह कहां से मिले हैं वेदा शास्त्रों के मंत्र कहां

607
00:43:40,840 --> 00:43:44,880
से मिले हैं गुरु परंपरा पौराणिक गुरु परंपरा जिसको हमको पौराणिक

608
00:43:44,880 --> 00:43:49,560
कहते हैं तो ठीक है

609
00:43:49,560 --> 00:43:53,760
तो जिससे आपको मंत्र मिले वो आपका गुरु हो गया ना

610
00:43:53,760 --> 00:43:58,880
और जब वो गुरु हो गया तो आपने गुरु में अंतर कर

611
00:43:58,880 --> 00:44:02,880
दिया गुरु की बातें मानी नहीं तो आप

612
00:44:02,880 --> 00:44:07,720
क्या हुए थोड़ी देर पहले बताया शास्त्रों के

613
00:44:07,720 --> 00:44:11,920
अनुसार तो इसके बाद दूसरी बात क्या

614
00:44:11,920 --> 00:44:16,320
है कि वो जो कहानी आपने सुनाई

615
00:44:16,320 --> 00:44:21,120
अलंकार समाज के द्वारा एक कहानी सुनाई गई कि भाई मेरे पास एक गधा था

616
00:44:21,120 --> 00:44:21,760
और गधे

617
00:44:21,760 --> 00:44:26,040
पर मैंने कुछ ग्रंथ ला दे उसको लेकर घर गया वापस जाकर गधा कह रहा

618
00:44:26,040 --> 00:44:30,280
है क्योंकि ग्रंथ मेरी पीठ पर लाद कर आए हैं इसलिए मैं तुम्हारा

619
00:44:30,280 --> 00:44:34,840
गुरु हो गया अरे भाई उस गधे पर ग्रंथ आपने ला दे हैं

620
00:44:34,840 --> 00:44:39,320
जिनसे आप वेदों के मंत्र ले रहे हो उनको वेदों के मंत्र आपने नहीं दिए

621
00:44:39,320 --> 00:44:43,920
हैं उस गधे के साथ सुरक्षा की दृष्टि से आप साथ में हो

622
00:44:43,920 --> 00:44:48,040
क्योंकि आपको गधे पर विश्वास नहीं है रास्ते में उन ग्रंथों को कोई

623
00:44:48,040 --> 00:44:52,720
ले जाए या कोई बदल दे आपको इस बात का भरोसा नहीं

624
00:44:52,720 --> 00:44:57,040
है क्योंकि अगर ऐसा अगर इस तरह से छोड़ के लाए हुए ग्रंथ आपको

625
00:44:57,040 --> 00:45:02,040
प्राप्त होंगे तो आप उन्हें अपने जीवन का अंतिम प्रमाण नहीं समझ

626
00:45:02,040 --> 00:45:06,120
पाएंगे अंतिम प्रमाण पर यहां

627
00:45:06,120 --> 00:45:10,120
तो आप जिनके साथ आप रहे नहीं सुरक्षा की दृष्टि से

628
00:45:10,120 --> 00:45:14,160
जिनको आपने ग्रंथ दिए नहीं उनसे लेकर के ग्रंथ जो है उन

629
00:45:14,160 --> 00:45:18,200
पर उनको अपना जीवन का प्रमाण माना मान रहे हो कैसे

630
00:45:18,200 --> 00:45:22,880
मान रहे हो भाई उन्होंने रास्ते में चेंज तो नहीं कर दिया

631
00:45:22,880 --> 00:45:28,360
किसी ने उनके ऊपर हावी होकर के बदल तो नहीं दिया आपको गलत मंत्र तो नहीं दिलवा दिए

632
00:45:28,360 --> 00:45:32,800
आपकी मानने की बाध्यता इसलिए है क्योंकि अगर आपने वेदों की बजाय

633
00:45:32,800 --> 00:45:36,800
किसी और तरीके से अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन किया तो

634
00:45:36,800 --> 00:45:41,080
फिर आप स्वयं को सनातन कैसे कहेंगे

635
00:45:41,080 --> 00:45:45,240
जब भी कोई नई विचारधारा को स्थापित

636
00:45:45,240 --> 00:45:49,960
करना होता है तो कोई पुरानी विचारधारा को आलंबन जरूर लिया जाता है

637
00:45:49,960 --> 00:45:54,000
अभी थोड़ी देर में हमारा ब्रह्मा कुमारी वाला वीडियो डाला जा रहा

638
00:45:54,000 --> 00:45:58,080
है उसमें ब्रह्मा कुमारी का भी यही है कहने को वैदिक है वेदों को मानते

639
00:45:58,080 --> 00:46:03,120
हैं टटोला जाएगा तो नहीं मानते मना कर देंगे नहीं मानेंगे

640
00:46:03,120 --> 00:46:07,440
तो यहां पर क्या है भाई वेद

641
00:46:07,440 --> 00:46:11,440
मंत्र अगर आपने ले लिए उसके अर्थों को आपने नहीं लिया तो अपनी अपने मन से

642
00:46:11,440 --> 00:46:16,200
अर्थ करोगे क्या कहां से सीखी व्याकरण

643
00:46:16,200 --> 00:46:20,320
परंपरा से सीखने के बाद अपने मन मुताबिक अर्थ

644
00:46:20,320 --> 00:46:24,360
कर लो और उनको भगा दो जिनसे सीखा सब

645
00:46:24,360 --> 00:46:28,600
कुछ तो यह सब कुछ यह

646
00:46:28,600 --> 00:46:33,440
सामान्य से प्रश्न है य बहुत गहराई

647
00:46:33,440 --> 00:46:39,440
गुण वाले प्रश्न नहीं

648
00:46:40,000 --> 00:46:44,000
है और अभी जो लास्ट हमारी जो चर्चा हुई थी ई

649
00:46:44,000 --> 00:46:48,000
सविधा के साथ हा लॉजिकल बातें मैंने की

650
00:46:48,000 --> 00:46:52,920
तो है आपके शायद कानों में कुछ खराबी हुई

651
00:46:52,920 --> 00:46:56,960
है यह बबलू कुमार नाम के हैं कोई

652
00:46:56,960 --> 00:47:01,240
मैंने पूछा ना अलंकार यों ने अपने वीडियो में

653
00:47:01,240 --> 00:47:05,640
कहा कि सत्यार्थ प्रकाश में ईश्वर का

654
00:47:05,640 --> 00:47:09,640
गुण मनुष्य के अंदर आए यह नहीं लिखा है मैंने

655
00:47:09,640 --> 00:47:13,760
आपको दिखा दिया अब इससे ज्यादा और क्या बात करूं अब

656
00:47:13,760 --> 00:47:18,560
भाई अगर यह भी लॉजिकल नहीं है तो सर्वशक्तिमान का जिस तरीके से आप गलत अर्थ लेकर के

657
00:47:18,560 --> 00:47:23,360
ले कर के अपना पेटेंट कर रहे हो तो लॉजिकल का भी एक और

658
00:47:23,360 --> 00:47:27,840
नया अर्थ हमें दे दीजिए कि लॉजिकल जिससे कि य जो प्रत्यक्ष

659
00:47:27,840 --> 00:47:31,840
जो मैं प्रमाण के साथ जो बात कर रहा हूं जब इन बातों को

660
00:47:31,840 --> 00:47:35,880
लॉजिकल नहीं कहा जाएगा कुछ अन्य बातों को लॉजिकल कहा जाएगा तो

661
00:47:35,880 --> 00:47:39,920
इन बातों को क्या कहा जाएगा इसके बारे में नया शब्द दे दीजिए हम

662
00:47:39,920 --> 00:47:44,880
सब मान लेंगे हम आपकी सारी बातें मान लेंगे आप दीजिए तो

663
00:47:44,880 --> 00:47:49,040
समाज के सामने आए तो सही कि आपकी सच्चाई

664
00:47:49,040 --> 00:47:53,440
है क्या उद्देश्य है क्या

665
00:47:53,440 --> 00:47:55,320
नई धारणा दे दो सर्वशक्तिमान

666
00:47:55,320 --> 00:47:59,360
का अर्थ बदल दो क्योंकि सर्वशक्तिमान का टैग लेना है वेदों का अर्थ

667
00:47:59,360 --> 00:48:03,400
बदल दो क्योंकि वैदिक होने का टैग लेना है विचारधारा

668
00:48:03,400 --> 00:48:07,560
वेद विरुद्ध देनी है विचारधारा सर्वशक्तिमान के विरुद्ध देनी

669
00:48:07,560 --> 00:48:11,880
है मगर उस शब्द को पकड़े रहो

670
00:48:11,880 --> 00:48:13,920
तो इसलिए मैंने

671
00:48:13,920 --> 00:48:18,160
कई बार अपनी वीडियोस में कहा है कि सनातन का जो

672
00:48:18,160 --> 00:48:22,440
शत्रु है वो सामने शस्त्र लिए खड़ा हुआ कोई अजनबी

673
00:48:22,440 --> 00:48:26,840
नहीं है पीछे शास्त्र लिए खड़ा हुआ

674
00:48:26,840 --> 00:48:29,040
कोई अपना है तो

675
00:48:29,040 --> 00:48:34,400
इसे हमें जानने की आवश्यकता है बाकी आप

676
00:48:34,400 --> 00:48:38,520
सभी समझदार है एक दो बातें हुई थी पिछली बार जो

677
00:48:38,520 --> 00:48:42,560
मुझे ठीक नहीं लगी एक वो आपने अलंकार हों के द्वारा कहा

678
00:48:42,560 --> 00:48:46,600
गया कि भाई वो अपने आप को भिक्षु लिखते हैं तो बहुत दोग है आपके

679
00:48:46,600 --> 00:48:51,080
यहां के जो ग्रंथ लेखाकार है वह भी अपने आप को भिक्षु लिख रहे हैं प्रेम भिक्षु

680
00:48:51,080 --> 00:48:55,400
आर्य तो इसको भी आप थोड़ा सुधार थोड़ा त्रुटी

681
00:48:55,400 --> 00:48:59,640
सही करिए उनकी ऐसा ना करें वह जिससे कि आपके जो

682
00:48:59,640 --> 00:49:05,640
वक्तव्य हैं वह निराधार सिद्ध हो

683
00:49:11,120 --> 00:49:15,120
जाए और बहुत सारी बातें जैसे अब

684
00:49:15,120 --> 00:49:19,120
आर समाज के अनुसार जो है मैंने

685
00:49:19,120 --> 00:49:23,400
अभी तक सुना था इसमें कोई गलत हो तो बताइएगा कि वर्ण

686
00:49:23,400 --> 00:49:28,160
जो है मनुष्य के कर्म से होता है इस पर एक अलग से वीडियो आने वाला है

687
00:49:28,160 --> 00:49:32,280
पर फिलहाल के लिए मैं वो जो संस्कार विधि में बताया गया कि यदि

688
00:49:32,280 --> 00:49:36,400
किसी को अपने पुत्र को सूत्र बनाना हो तो व ऐसा नाम रखे

689
00:49:36,400 --> 00:49:41,360
तो इसका अर्थ है कर्म से नहीं होता है पिता की इच्छा से होता है

690
00:49:41,360 --> 00:49:45,360
है ना कर्म से नहीं होता है

691
00:49:45,360 --> 00:49:50,000
पिता की इच्छा से होता है अब बात ये आती

692
00:49:50,000 --> 00:49:54,240
है कि कोई व्यक्ति का

693
00:49:54,240 --> 00:49:58,320
जो पिता है वो उनका स्वर्गवास हो गया वो गुजर गए निधन

694
00:49:58,320 --> 00:50:02,400
हो गया उसके यज्ञ पवित होने

695
00:50:02,400 --> 00:50:06,520
से पहले वो व्यक्ति जीवन भर अपना जो है वर्ण निर्धारण नहीं

696
00:50:06,520 --> 00:50:10,600
कर सकता वो कौन है वोह दयानंद की तरह ही

697
00:50:10,600 --> 00:50:15,160
हो जाएगा स्वामी दयानंद जब पहुंचे थे ऐसा प्रकरण बताया जाता है कि वह

698
00:50:15,160 --> 00:50:19,200
जाकर बोलते हैं कि दरवाजा कट कटाते व कौन यही तो

699
00:50:19,200 --> 00:50:23,960
जानने आया हूं तो यह जो बच्चे होंगे जो जिनके पिता नहीं होंगे

700
00:50:23,960 --> 00:50:27,400
समय पर यह नहीं बताएंगे कि हमारा

701
00:50:27,400 --> 00:50:32,040
मैं अपने बेटे का वर्ण या आपके अनुसार बालिका का भी यज्ञ होता है

702
00:50:32,040 --> 00:50:36,360
तो बालिका का वर्ण क्या होना चाहिए वो ये नहीं बताएंगे तो

703
00:50:36,360 --> 00:50:41,120
क्या होगा कि वो बालिकाएं भी दरवाजा खटखटा एंगी बालक भी दरवाजा खटखटा एंगे

704
00:50:41,120 --> 00:50:45,360
थक ठक कौन कि मैं अपना वर्ण जानने

705
00:50:45,360 --> 00:50:50,640
आया हूं मेरा वर्ण क्या है बता दो

706
00:50:50,640 --> 00:50:55,520
भाई तो यह सब चीजें हैं बाकी

707
00:50:55,520 --> 00:50:59,720
जो भाई मुझे देख रहे हैं और सहमत

708
00:50:59,720 --> 00:51:05,720
है आवाज नहीं आ रही है

709
00:51:10,920 --> 00:51:16,800
क्या आवाज आ रही है

710
00:51:16,800 --> 00:51:21,560
क्या अच्छा अच्छा तो जो लोग सहमत है

711
00:51:21,560 --> 00:51:25,840
इस लाइव के बाद एक बार शीशे के सामने खड़े हो कर के

712
00:51:25,840 --> 00:51:29,920
ताली जरूर बजाएगा और ताली बजा के कहिए

713
00:51:29,920 --> 00:51:34,680
मैं हूं सर्वशक्तिमान कोई पूछे तो उसे बता दीजिएगा

714
00:51:34,680 --> 00:51:39,000
मेरा काम है ताली बजाना और मैं ताली बजा रहा हूं इसलिए मैं सर्वशक्तिमान

715
00:51:39,000 --> 00:51:43,160
हूं अकॉर्डिंग टू अलंकार समाज

716
00:51:43,160 --> 00:51:47,160
तो इतना आप सब लोग मुझे प्रॉमिस करिए

717
00:51:47,160 --> 00:51:51,480
जाने के बाद यह जब अभी लाइव स्ट्रीम पूरी हो जाएगी

718
00:51:51,480 --> 00:51:56,240
तो सभी को ताली जरूर बचानी बजानी है और यदि आपका कोई फबुक अकाउंट है

719
00:51:56,240 --> 00:52:00,240
य य आपका कोई ा अकाउंट है तो उस पर उसको ताली को शेयर

720
00:52:00,240 --> 00:52:04,360
करिए मैं सर्वशक्तिमान हूं ताली बजाने से ही सिद्ध हो जाएगा

721
00:52:04,360 --> 00:52:08,680
कि मैं स शक्तिमान हां ऐसे ही बहुत

722
00:52:08,680 --> 00:52:12,960
बढ़िया जो इंसान ताली बजा लेगा वही सर्वशक्तिमान

723
00:52:12,960 --> 00:52:17,520
है उसका कर्म ताली बजाना है वो बता देगा मेरा

724
00:52:17,520 --> 00:52:22,040
कर्म जी अब किसी का कोई अगर प्रश्न हो तो वो बताए

725
00:52:22,040 --> 00:52:26,000
कुछ रह तो नहीं गया है उनके ही वीडियो से अगर कुछ रह गया हो तो

726
00:52:26,000 --> 00:52:28,640
बता दीजिए

727
00:52:28,640 --> 00:52:32,640
वैसे लगभग सारी चीजें ले ली है जी जी

728
00:52:32,640 --> 00:52:36,920
ताली सबको ताली बजा बजानी है बजानी है कि मैं भाई ताली

729
00:52:36,920 --> 00:52:40,960
बजाऊंगा और मैं हूं सर्वशक्तिमान है ना

730
00:52:40,960 --> 00:52:45,000
ताली बजाने वाला सर्वशक्तिमान है क्यों क्योंकि

731
00:52:45,000 --> 00:52:49,040
मेरा काम है ताली बजाना किसने बताया मैं बता रहा हूं ना मैं

732
00:52:49,040 --> 00:52:53,120
ही बताऊंगा मेरा काम क्या है मेरा काम है ताली बजाना इस बात को

733
00:52:53,120 --> 00:52:57,360
मैं आपको दिखा दूं कोई आपको संशय हो तो सब समुल्लास में

734
00:52:57,360 --> 00:53:01,440
है ये ईश्वर का काम क्या है यह

735
00:53:01,440 --> 00:53:07,440
तो ईश्वर ही बताएगा

736
00:53:10,960 --> 00:53:15,720
ना और मैं एक बात और कहूंगा अलंकार से

737
00:53:15,720 --> 00:53:19,760
कि वोह जब बनाया करें उत्तर देने वाला वीडियो

738
00:53:19,760 --> 00:53:24,560
तो उसमें समग्र प्रश्नों को ले एक एक एक एक पॉइंट

739
00:53:24,560 --> 00:53:29,160
को ले फिर वीडियो बनाए ऐसे आधा अधूरा

740
00:53:29,160 --> 00:53:33,160
वो इसकी वो क्या था भानुमति ने कुनबा जोड़ा

741
00:53:33,160 --> 00:53:38,880
आप ही ने अपने वीडियो में कहा तो ऐसे मत किया

742
00:53:38,880 --> 00:53:44,840
करिए सप्तम सम उल्लास में है

743
00:53:44,840 --> 00:53:49,000
देखिए यह देखिए सर्वशक्तिमान

744
00:53:49,000 --> 00:53:53,040
शब्द का यही अर्थ है कि ईश्वर अपने

745
00:53:53,040 --> 00:53:57,800
काम अर्थात उत्पत्ति पालन प्रलय आदि

746
00:53:57,800 --> 00:54:02,320
सब जीवों के पुण्य पाप की यथा योग्य व्यवस्था

747
00:54:02,320 --> 00:54:06,840
करने में किंचित भी किसी की सहायता नहीं

748
00:54:06,840 --> 00:54:10,920
लेता ठीक है अर्थात अपने

749
00:54:10,920 --> 00:54:14,960
अनंत सामर्थ्य से ही सब अपना काम पूर्ण कर

750
00:54:14,960 --> 00:54:20,880
लेता है

751
00:54:20,880 --> 00:54:25,560
और इसी में एक जगह लाइन आती है कि उसके कार्य क्या है

752
00:54:25,560 --> 00:54:31,560
तो

753
00:54:39,440 --> 00:54:43,920
इसी में आप इसका अध्ययन करेंगे तो कहीं पर लिखा है

754
00:54:43,920 --> 00:54:48,800
कि भाई ईश्वर के क्या क्या काम है तो यह तो ईश्वर ही बताएगा

755
00:54:48,800 --> 00:54:54,800
ठीक है तो इस तरह से

756
00:54:57,520 --> 00:55:03,520
भैया हम मार्गदर्शन कैसे ले सकते हैं किस बारे

757
00:55:04,160 --> 00:55:08,840
में पुरी शंकराचार्य जी ने कहा था कि भारत

758
00:55:08,840 --> 00:55:14,840
2023 तक के लिए नहीं कहा था अभी उसमें लगभग एक वर्ष और

759
00:55:17,720 --> 00:55:22,560
है सूत्रों के प्रथम पूर्वज द्वितीय पूर्वज कौन थे

760
00:55:22,560 --> 00:55:27,120
यह इस तरह के वस्तुनिष्ठ प्रश्न होते हैं आप हमारे चैनल से जुड़े ग्रुप से जुड़े

761
00:55:27,120 --> 00:55:31,480
वहां पर आप आए और वेद ईश्वर

762
00:55:31,480 --> 00:55:35,920
ने नहीं रचे वेद ईश्वर की सांस के समान पहले से ही अस्तित्व में थे

763
00:55:35,920 --> 00:55:40,280
कृपया इस शास्त्र वचन को समझावे हां वैसे इस पर हमारे वीडियोस

764
00:55:40,280 --> 00:55:44,920
है आप देखेंगे हम स्कूल्स वगैरह में जाते हैं बताने के लिए

765
00:55:44,920 --> 00:55:49,040
जो हम उन ग्रंथों पर विश्वास करते हैं जो यह कहते हैं कि

766
00:55:49,040 --> 00:55:53,440
उनको ईश्वर ने रचा नहीं अब स्वास

767
00:55:53,440 --> 00:55:57,480
यहां पर जो कहा गया उससे क्या मतलब है हम दो प्रकार

768
00:55:57,480 --> 00:56:01,720
के कार्य करते हैं एक चाहकर यानी

769
00:56:01,720 --> 00:56:06,080
जिसमें हमारा बुद्धि का प्रयोग होता है वो और दूसरा बिना चाहकर जिसमें

770
00:56:06,080 --> 00:56:10,280
हमारा बुद्धि का प्रयोग नहीं होता है जब हमारी बुद्धि का प्रयोग

771
00:56:10,280 --> 00:56:13,000
हो जाता है जुड़ जाता है किसी भी कार्य से

772
00:56:13,000 --> 00:56:17,120
तो उसमें हमारे पास यह विकल्प होता है कि हम उस कार्य को

773
00:56:17,120 --> 00:56:21,480
किसकिस प्रकार से कर सकते हैं जैसे मान लीजिए कि मेरे

774
00:56:21,480 --> 00:56:25,520
सामने एक है यह अलंकार समाज की सत्यार्थ

775
00:56:25,520 --> 00:56:28,560
प्रकाश

776
00:56:28,560 --> 00:56:34,560
और दूसरा अन्य कोई ग्रंथ है मान लीजिए

777
00:56:34,720 --> 00:56:39,040
कि दूसरी और कोई चीज है मान लीजिए पेन है

778
00:56:39,040 --> 00:56:43,120
तो मेरे सामने दो चीजें हैं कि एक

779
00:56:43,120 --> 00:56:47,240
तरफ है अलंकार समाज का ग्रंथ और एक तरफ है

780
00:56:47,240 --> 00:56:51,600
पेन तो अब यदि मैं चाहता हूं कुछ उठाना

781
00:56:51,600 --> 00:56:55,800
तो मैं चाहूं तो पेन उठाऊं और मैं चाहूं तो यह अलंकार की

782
00:56:55,800 --> 00:57:00,000
किताब और यदि तो मैं इसमें

783
00:57:00,000 --> 00:57:04,720
से कुछ भी उठा सकता हूं अलंकार की किताब भी उठा सकता हूं पेन भी उठा सकता

784
00:57:04,720 --> 00:57:09,000
हूं परंतु कुछ कार्य हम ऐसे भी करते हैं

785
00:57:09,000 --> 00:57:13,880
जिसमें हमारी बुद्धि का उपयोग नहीं होता है जो हम बिना चाह के करते हैं

786
00:57:13,880 --> 00:57:18,520
ऐसा ही एक कार्य है सांस लेना जैसे

787
00:57:18,520 --> 00:57:22,640
एक शिशु माता के गर्भ से जन्म ले रहा है पर वो सांस ले रहा है उसके

788
00:57:22,640 --> 00:57:27,280
उसको कोई बुद्धि उसने नहीं लगाई पर वो सांस ले रहा है प्रकार

789
00:57:27,280 --> 00:57:28,280
से

790
00:57:28,280 --> 00:57:32,320
जो जो वेदा आदि शास्त्र है वो ईश्वर की सांस रूप

791
00:57:32,320 --> 00:57:36,480
में सदैव से विद्यमान है उसके लिए उनको उसके ज्ञान को रचा नहीं है

792
00:57:36,480 --> 00:57:40,480
ईश्वर ने रच करके वो नहीं रचे गए हैं

793
00:57:40,480 --> 00:57:45,080
बुद्धि के प्रयोजन के साथ वो रचे नहीं गए हैं जिस कारण से

794
00:57:45,080 --> 00:57:49,120
तार्किकता की पराकाष्ठा सिद्ध होती है क्योंकि यदि ईश्वर कोई

795
00:57:49,120 --> 00:57:53,520
चीज बना देगा तो उसकी क्रेडिबिलिटी हमारे लिए उतनी नहीं होगी

796
00:57:53,520 --> 00:57:57,560
क्यों नहीं होगी क्योंकि ईश्वर की मर्जी से तो

797
00:57:57,560 --> 00:58:01,760
दुनिया में सब कुछ हो रहा है सनातन विरुद्ध विचारधारा

798
00:58:01,760 --> 00:58:05,920
जैसे इस्लाम आदि भी ईश्वर की मर्जी सेही उत्पन्न हुई बिना उसकी

799
00:58:05,920 --> 00:58:10,000
मर्जी के तो नहीं हुई इसलिए ईश्वर के जो

800
00:58:10,000 --> 00:58:14,280
चीजें है उस पर हम डायरेक्ट क्रेडिबिलिटी नहीं ला सकते हम उन शास्त्रों पर भरोसा

801
00:58:14,280 --> 00:58:18,440
करते हैं उन शास्त्रों को अपना नियामक मानते हैं अपना अंतिम

802
00:58:18,440 --> 00:58:22,720
निर्णायक मानते हैं जिन शास्त्रों को ईश्वर ने रचा नहीं है वो ईश्वर

803
00:58:22,720 --> 00:58:27,080
का ही स्वरूप है ईश्वर की सांस के रूप सदैव वि

804
00:58:27,080 --> 00:58:31,280
यह कौन कह रहा है य स्वयं वेद कह रहे हमें उन पर आस्था

805
00:58:31,280 --> 00:58:35,720
है आस्था से शुरू होता है पर तार्किकता की पराकाष्ठा

806
00:58:35,720 --> 00:58:39,800
जैसे सनातन विरुद्ध विचारधाराओं से आप बात करेंगे तो वह स्वयं इस

807
00:58:39,800 --> 00:58:43,720
बात की गवाही देंगे कि हमको ईश्वर ने रचा और

808
00:58:43,720 --> 00:58:47,880
उसी ग्रंथ में आपको यह भी मिल जाएगा कि ईश्वर झूठ बोल सकता है ईश्वर भटका सकता

809
00:58:47,880 --> 00:58:52,200
है ईश्वर अपनी बातों से पलट सकता है जैसे कि

810
00:58:52,200 --> 00:58:56,360
इस्लाम की बात करें तो दो

811
00:58:56,360 --> 00:59:00,640
ईश्वर कह रहा है कि यदि हम अपनी कोई आयत

812
00:59:00,640 --> 00:59:04,880
हटा देते निरस्त कर देते हैं या बदल देते तो उससे पह उससे

813
00:59:04,880 --> 00:59:08,960
बढ़िया आयत देते हैं इसका अर्थ क्या हुआ

814
00:59:08,960 --> 00:59:13,560
यदि आज उनके य कहा जा रहा है कि मूर्ति पूजा

815
00:59:13,560 --> 00:59:18,240
वह है कुफ्र मूर्ति पूजा जो है क्या कहते हैं उसको

816
00:59:18,240 --> 00:59:22,320
हराम है तो कल को य आयत बदली जा सकती है

817
00:59:22,320 --> 00:59:26,400
और इस आयत में हटा कर के दूसरी आयत आ सकती है कि जो

818
00:59:26,400 --> 00:59:30,840
है मूर्ति पूजा आप जो है मान्य हो गई हलाल हो गई है

819
00:59:30,840 --> 00:59:34,920
ना इस आयत इस एक आयत ने सारी चीजों

820
00:59:34,920 --> 00:59:39,040
प सारी चीजों की क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठा दिया अब इसके बाद

821
00:59:39,040 --> 00:59:43,400
वो एक तर्क आपको दे सकते हैं कि भाई

822
00:59:43,400 --> 00:59:47,880
उसमें यह लिखा हुआ है कि अब इसके बाद कोई भी आयत नहीं आएगी अब

823
00:59:47,880 --> 00:59:52,440
इसके बाद कोई भी नबी नहीं आएगा ये वो आपको तर्क दे सकते हैं मगर

824
00:59:52,440 --> 00:59:56,440
जब बदलने की बात लिखी है तो वो तो ये आयत भी बदल सकती है ना

825
00:59:56,440 --> 00:59:59,480
जहां लिखा है कि अब कुछ नहीं आएगा वो

826
00:59:59,480 --> 01:00:03,480
आयत बदल देगी दूसरी आयत आ जाएगी आएगा एक और

827
01:00:03,480 --> 01:00:07,600
नया आ जाएगा कोई यह चीज हो गई और दूसरी बात कि वोह

828
01:00:07,600 --> 01:00:12,000
अपनी बातों को पलटते हैं यह भी सिद्ध है

829
01:00:12,000 --> 01:00:16,280
दो 187 में जो उनकी जो किताब है

830
01:00:16,280 --> 01:00:20,280
उस किताब में लिखा हुआ है कि आज से पहले

831
01:00:20,280 --> 01:00:24,400
तक रोजों की रात में

832
01:00:24,400 --> 01:00:28,800
अ अपनी पत्नी के साथ गमन करना

833
01:00:28,800 --> 01:00:32,960
अलाउ नहीं था पर आज से वो वहां पर कोई कारण

834
01:00:32,960 --> 01:00:37,040
है आज से हम इसको जो है अलाउ कर दे रहे हैं

835
01:00:37,040 --> 01:00:41,080
आज के बाद से तुम रोजों की रात में अपनी पत्नी

836
01:00:41,080 --> 01:00:45,080
के साथ गमन कर सकते हो आधी आधी उसमें लिखा यहां से

837
01:00:45,080 --> 01:00:49,160
क्या चीज तय हुई एक कि उनके

838
01:00:49,160 --> 01:00:53,680
द्वारा दिए जाने वाले जो सिद्धांत है वो बदले जा सकते हैं

839
01:00:53,680 --> 01:00:57,680
इसका मतलब उनको शाश्वत धर्म के रूप

840
01:00:57,680 --> 01:01:01,680
में नहीं लिया जा सकता और वह खुद

841
01:01:01,680 --> 01:01:05,880
इस बात की गवाही दे रहे हैं कि उनकी किताब के द्वारा प्रतिपादित होने

842
01:01:05,880 --> 01:01:09,960
वाला जो धर्म है जो सिद्धांत है वह शाश्वत नहीं है व

843
01:01:09,960 --> 01:01:14,000
गवाही खुद दे रहे हैं व यह नहीं कह सकते कि हम उस किताब को मानते हैं

844
01:01:14,000 --> 01:01:14,640
जिसमें दिया

845
01:01:14,640 --> 01:01:20,080
गया जो धर्म है सिद्धांत है मर्यादा है वह थी है और रहेगी

846
01:01:20,080 --> 01:01:24,240
क्यों इस बात की गवाही वो स्वयं दे रही है जो अब तक नहीं था

847
01:01:24,240 --> 01:01:28,280
वो हमने दे दिया हमारे ऐसा नहीं है

848
01:01:28,280 --> 01:01:32,560
अथर्व वेद के अनुसार जो ना कभी उत्पन्न हो जो ना कभी खत्म

849
01:01:32,560 --> 01:01:36,560
हो जिसका ना अंत है जो अनादि है

850
01:01:36,560 --> 01:01:41,400
जो किसी भी देश काल परिस्थिति में भी ना बदले उसका नाम सनातन

851
01:01:41,400 --> 01:01:45,960
है हम उसको मानते हैं और इसीलिए

852
01:01:45,960 --> 01:01:50,240
वेदा दि शास्त्रों पर शास्त्रों की प्रमाणिकता सबसे ज्यादा बढ़ आस्था

853
01:01:50,240 --> 01:01:54,320
तो है आस्था से शुरू होता है और प्रमाणिकता सबसे ज्यादा हो जाती

854
01:01:54,320 --> 01:01:59,160
है उसके बाद आगे क्या है कि ईश्वर

855
01:01:59,160 --> 01:02:03,280
जो लोग अवतार को मानते हैं और मानते क्या है वह सच है

856
01:02:03,280 --> 01:02:07,320
कोई नहीं मानता है बात अलग है मगर ईश्वर आए बुद्ध के रूप में भगवान

857
01:02:07,320 --> 01:02:11,600
बुद्ध ने यज्ञों की रक्षा के लिए ही मगर यज्ञों

858
01:02:11,600 --> 01:02:16,600
का तिरस्कार किया यज्ञों से दूर करने के लिए अनाधिकृत लोगों

859
01:02:16,600 --> 01:02:20,760
को यज्ञों की रक्षा के लिए सब किया मगर हमने बुद्ध

860
01:02:20,760 --> 01:02:24,840
को बुद्ध को भगवान तो माना मगर उनकी शिक्षाओं

861
01:02:24,840 --> 01:02:29,200
को न नहीं लिया

862
01:02:29,200 --> 01:02:30,000
ठीक है तो

863
01:02:30,000 --> 01:02:36,000
यह सारी आज की चर्चा थी अन्य किसी का कोई प्रश्न हो तो जल्दी से कर ले

864
01:02:36,680 --> 01:02:40,800
क्योंकि ताली सभी लोग बजाइए और स्वयं को सर्वशक्तिमान

865
01:02:40,800 --> 01:02:44,920
सिद्ध करिएगा और हा एक बात और अच्छा अच्छा याद आ गया

866
01:02:44,920 --> 01:02:49,080
जादूगर यह और कहा जा रहा है कि भाई एक बारबार एक वक्तव्य आ रहा है कोई मनीष

867
01:02:49,080 --> 01:02:53,880
जी उनके द्वारा क्या सनातन ईश्वर कोई जादूगर है अरे भाई

868
01:02:53,880 --> 01:02:58,000
पहली बात तो यह है कि जादू केवल उतनी बात है कि जिस विद्या को आप जानते नहीं

869
01:02:58,000 --> 01:03:02,000
है वही आपको चमत्कार लगने लगता है दूसरी बात अब मैं बता

870
01:03:02,000 --> 01:03:06,280
दूं आपके अनुसार भी सिद्ध पुरुषों के द्वारा कालांतर में आवागमन माना

871
01:03:06,280 --> 01:03:10,440
गया है यह क्या चमत्कार नहीं है यह क्या जादू जैसा

872
01:03:10,440 --> 01:03:15,320
नहीं है वही मीठा मठा अप्पा कड़वा कड़वा

873
01:03:15,320 --> 01:03:20,000
तू अमनी सृष्टि जो हुई

874
01:03:20,000 --> 01:03:24,080
किसी समय तो ऐसा हुआ ना प्रथम जीव है वो उत्पन्न किया भगवान ने

875
01:03:24,080 --> 01:03:28,400
वो क्या था चमत्कार नहीं था जो साइंस

876
01:03:28,400 --> 01:03:32,400
नहीं कर पा रही है और वो हो रहा है तो वो चमत्कार है

877
01:03:32,400 --> 01:03:36,520
तो फिर वहां पर उतने अंश में तो आपने भी उस ईश्वर अपने ईश्वर

878
01:03:36,520 --> 01:03:40,640
को जादूगर बना दिया नहीं तो वह फार्मूला दे दो मुझे किस फार्मूले

879
01:03:40,640 --> 01:03:44,680
के द्वारा वह बना था पहला जीव और

880
01:03:44,680 --> 01:03:45,800
जिसको

881
01:03:45,800 --> 01:03:49,880
भी हां भगवान बुद्ध नारायण के अवतार हैं मगर

882
01:03:49,880 --> 01:03:55,880
ये वो वाले बुद्ध नहीं जिनके नाम से वह चल रहा है बौद्ध मत

883
01:03:56,720 --> 01:04:01,360
हां तो वही जादू को परिभाषित तो करो क्या है आपका जादू भाई

884
01:04:01,360 --> 01:04:06,200
आपके में इस बात में कंफर्म नहीं हूं करेक्ट कर दीजिएगा

885
01:04:06,200 --> 01:04:10,360
सुना है कि दयानंद भी मुक्त हो गए थे तो

886
01:04:10,360 --> 01:04:14,440
ऐसा उनके लिए भी कहा जाता है कुछ दे बता दीजिएगा मैं कंफर्म

887
01:04:14,440 --> 01:04:19,880
नहीं सुना था

888
01:04:19,880 --> 01:04:24,080
तो हां अब अलंकार समाज ये भी मानने लगा कि हनुमान जी उड़ सकते

889
01:04:24,080 --> 01:04:28,200
हैं पहले नहीं मानता था अब मानने लगा तो

890
01:04:28,200 --> 01:04:32,240
मुक्त पुरुषों के द्वारा तो जादू को स्वीकार कर रहा है मगर ईश्वर के द्वारा जादू को स्वीकार

891
01:04:32,240 --> 01:04:36,520
नहीं करेगा तो सारी चीजें जितनी भी आपने

892
01:04:36,520 --> 01:04:40,840
सवाल उठाए हैं सब कुछ है बस मैं अपना वक्तव्य का

893
01:04:40,840 --> 01:04:46,840
जो अंत करूंगा वह इस बात से करूंगा

894
01:04:47,400 --> 01:04:51,680
कि पहली बात तो अगर किसी को भी हमसे जुड़ना है

895
01:04:51,680 --> 01:04:57,680
तो हमारा एक ट नंबर है 7408

896
01:04:59,400 --> 01:05:03,520
3069 व स्कन में गए थे उन्होंने कह दिया कि वह हमारा अभी कोई

897
01:05:03,520 --> 01:05:07,880
विद्वान यहां पर है नहीं और फिर कभी रखेंगे

898
01:05:07,880 --> 01:05:11,920
चर्चा तो संभवत किसी और दिन होगी उनका कोई विद्वान था

899
01:05:11,920 --> 01:05:16,000
नहीं पूरे वृंदावन में जो बात कर सके तो संपर्क सूत्र

900
01:05:16,000 --> 01:05:19,960
नोट कर लीजिए

901
01:05:19,960 --> 01:05:24,200
7483 189 इस पर आप ट करेंगे

902
01:05:24,200 --> 01:05:29,120
तो आपको चार तरह के प्राप्त होंगे एक

903
01:05:29,120 --> 01:05:33,440
हमसे जुड़ने के लिए हमारे अभियान में साथ निभाने के लिए धरातल पर

904
01:05:33,440 --> 01:05:37,640
या इंटरनेट के माध्यम से आप साथ देना चाहते

905
01:05:37,640 --> 01:05:41,720
हैं या फिर आप किसी भी प्रकार से हमसे जुड़ना चाहते हैं

906
01:05:41,720 --> 01:05:46,200
तो आप उसको वहां फॉर्म आप फिल कर सकते हैं

907
01:05:46,200 --> 01:05:50,880
आगे दूसरा जो फॉर्म है वो है अध्ययन के लिए हम लोग

908
01:05:50,880 --> 01:05:54,960
एक क्रमानुसार अध्ययन करते हैं जो हमारे विभिन्न पूर्वा चार्य

909
01:05:54,960 --> 01:05:58,960
के ग्रंथ हैं उनको संकलित किया जो मुख्य मुख्य विषय उनको लेकर के

910
01:05:58,960 --> 01:06:03,120
एक कोर्स है आहवान उस कोर्स को करते जिससे कि

911
01:06:03,120 --> 01:06:07,480
जगह जगह पर धार्मिक योद्धा खड़े हो सके तीसरा जो फॉर्म है

912
01:06:07,480 --> 01:06:11,840
वो है आपका कोई प्रश्न है वस्तुनिष्ठता के साथ व्यक्तिगत प्रश्न

913
01:06:11,840 --> 01:06:14,480
है कोई जैसे कि ऐसे करें कि ऐसे

914
01:06:14,480 --> 01:06:19,040
करें ये माला करें कि वो माला करें जैसे अभी एक प्रश्न आया था शास्त्रों से कुछ

915
01:06:19,040 --> 01:06:23,360
तो वो आप प्रश्न कर सकते हैं वहां पर और चौथा

916
01:06:23,360 --> 01:06:27,640
जो है डिसएग्रीमेंट का है कि अगर आप हमारे सिद्धांतों

917
01:06:27,640 --> 01:06:31,720
से एग्री नहीं करते हैं असहमति है तो आप वह फॉर्म

918
01:06:31,720 --> 01:06:35,720
भरिए उसकी एक कंडीशन है कि आपको अपनी पहचान के

919
01:06:35,720 --> 01:06:39,920
साथ आना होगा आप व फॉर्म भरिए

920
01:06:39,920 --> 01:06:44,680
और उस फॉर्म को भरने पर हमारी तरफ से आपसे संपर्क किया जाएगा

921
01:06:44,680 --> 01:06:48,760
और ज जिस प्रकार का फॉर्म आपने भरा होगा उस प्रकार से आप हमसे जुड़

922
01:06:48,760 --> 01:06:53,200
सकते तो आशा करता हूं आज का लाइव आपको अच्छा लगा हो

923
01:06:53,200 --> 01:06:57,200
सभी को जय श्री राम और
