1
00:00:00,120 --> 00:00:04,560
लाइव हो गए हैं तो सभी को जय श्री

2
00:00:04,560 --> 00:00:08,720
राम जैसा कि आप सभी जानते हैं अभी

3
00:00:08,720 --> 00:00:13,840
हम लोग लाइव आ कर वापस लौट चुके हैं और

4
00:00:13,840 --> 00:00:16,040
तकनीकी

5
00:00:16,040 --> 00:00:20,120
समस्याए आज के हमारे जो अतिथि

6
00:00:20,120 --> 00:00:24,480
है इनका नाम शर्मा जी है और

7
00:00:24,480 --> 00:00:27,240
मित्र

8
00:00:27,240 --> 00:00:31,240
है वैसे हमने अपने चैनल पर एक मर्यादा बना रखी कि हम उसी से

9
00:00:31,240 --> 00:00:35,360
चर्चा करते हैं जहां डिसएग्रीमेंट होता है वहां

10
00:00:35,360 --> 00:00:39,440
उसी से चर्चा करते हैं जो अपने पहचान को

11
00:00:39,440 --> 00:00:44,000
छिपाए बिना आए क्योंकि वहां पर ऐसा होता है कि वह स्वतंत्र हो जाता है ज अपनी

12
00:00:44,000 --> 00:00:48,160
पहचान को छिपा नहीं रहा होता तो स्वतंत्र हो जाता है किसी भी प्रकार का अमर्यादित

13
00:00:48,160 --> 00:00:52,440
व्यवहार करने के लिए पर जो शर्मा

14
00:00:52,440 --> 00:00:57,160
जी है यह इनका चैनल है संविधान नाम से और यह

15
00:00:57,160 --> 00:01:01,440
जो चर्चा है वो डिस एग्रीमेंट पर नहीं है ऐसा विषय

16
00:01:01,440 --> 00:01:05,760
जिस पर हम दोनों जो है एक ही मत के हैं

17
00:01:05,760 --> 00:01:10,280
इस कारण से यह जो मर्यादा है इनके लिए हमने

18
00:01:10,280 --> 00:01:14,600
नहीं रखी अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान

19
00:01:14,600 --> 00:01:15,600
है

20
00:01:15,600 --> 00:01:20,120
तो क्या वह अपने जैसा एक और ईश्वर बना सकता है जिसके पास

21
00:01:20,120 --> 00:01:24,280
उससे ज्यादा शक्तियां हो हां जी बिल्कुल बना

22
00:01:24,280 --> 00:01:28,840
सकता है रामचंद्र जी के रूप में आएंगे

23
00:01:28,840 --> 00:01:32,920
उसी समय वो हनुमान जी के रूप में भी आ जाएंगे ठीक

24
00:01:32,920 --> 00:01:37,880
है और मैं एक प्रश्न का उत्तर और दे दूं शुरुआत में ही

25
00:01:37,880 --> 00:01:42,920
कि

26
00:01:42,920 --> 00:01:47,240
अ एक क्रिश्चियन महोदय थे उन्होंने एक प्रश्न किया था मुझसे व्यक्तिगत

27
00:01:47,240 --> 00:01:51,280
रूप से तो व्यक्तिगत रूप से किसी का भी उत्तर देना ठीक नहीं लगता है

28
00:01:51,280 --> 00:01:55,440
क्योंकि ऊर्जा उतनी ही नष्ट होती है मगर जो जानकारी

29
00:01:55,440 --> 00:02:00,720
है वह सीमित हो जाती है उन्होंने पूछा था कि

30
00:02:00,720 --> 00:02:05,080
क्या ईश्वर कोई बुरा घृणित कार्य कर सकता है से रेप वगैरह ऐसा

31
00:02:05,080 --> 00:02:10,080
कुछ तो बात यह है कि जिस जिसको व वह ईश्वर मान रहे

32
00:02:10,080 --> 00:02:14,880
हैं क्या जहां पर रेप हो रहा है

33
00:02:14,880 --> 00:02:19,760
वह जो जगह है वह उनके द्वारा स्वीकारा गए ईश्वर से

34
00:02:19,760 --> 00:02:23,960
के नियंत्रण से बाहर है दूसरी बात जो

35
00:02:23,960 --> 00:02:28,360
रेप करने वाला है चलो मान लिया कि उनका ईश्वर खुद रेप नहीं करता

36
00:02:28,360 --> 00:02:30,760
है मगर जो रेप करने वाला

37
00:02:30,760 --> 00:02:35,720
है क्या उसको उनके ईश्वर ने नहीं बनाया किसी और ने बनाया है

38
00:02:35,720 --> 00:02:40,320
और साथ ही साथ एट द सेम टाइम

39
00:02:40,320 --> 00:02:44,400
कि जब वोह उसको बना रहा है तो क्या उसको नहीं मालूम

40
00:02:44,400 --> 00:02:48,440
है कि आगे चलकर के इस तरह के गणित कार्य करेगा तो मुझे इसे नहीं बनाना

41
00:02:48,440 --> 00:02:52,480
चाहिए तो कुल मिलाकर के यदि वह अपने ईश्वर को सर्वव्यापक

42
00:02:52,480 --> 00:02:56,800
सर्वशक्तिमान मानते हैं सब कुछ उसके नियंत्रण में है तो उन्हें स्वीकार करने

43
00:02:56,800 --> 00:03:00,840
करना पड़ेगा कि मान लीजिए प्रत्यक्ष रूप से वह अगर नहीं भी कर

44
00:03:00,840 --> 00:03:05,040
रहा है रेप मगर जो रेप बनाने वाला

45
00:03:05,040 --> 00:03:09,080
है उसको वही बना रहा है और जहां पर रेप हो रहा है वोह जगह भी उसके

46
00:03:09,080 --> 00:03:13,160
नियंत्रण में आती है तो इस स्थिति में उस रेप

47
00:03:13,160 --> 00:03:17,280
का जिम्मेदार भी कारण भी कौन हुआ अगर वह उसको ईश्वर मानते

48
00:03:17,280 --> 00:03:21,520
हैं तो वह हो गया वह बात बात की है कि शक्ति अगर उनकी

49
00:03:21,520 --> 00:03:25,520
वहां पर है तो शक्ति के रूप में वह स्वयं है या फिर उनकी

50
00:03:25,520 --> 00:03:31,520
शक्ति उनसे अलग है अगर शक्ति उनसे अलग है

51
00:03:31,960 --> 00:03:36,160
तो अगर शक्ति ईश्वर से अलग है तो हमें मानना पड़ेगा

52
00:03:36,160 --> 00:03:41,000
कि शक्ति कहीं ना कहीं प्रभावशाली कम है कंपेरटिवली टू ईश्वर

53
00:03:41,000 --> 00:03:45,160
और जब हम ऐसा मानेंगे तो हमें यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर जहां पर है

54
00:03:45,160 --> 00:03:49,320
वहां पर उसका नियंत्रण अधिक है कंपेरटिवली विद

55
00:03:49,320 --> 00:03:54,680
जहां पर वह नहीं है उसकी शक्ति है या तो आपको यह मानना पड़ेगा

56
00:03:54,680 --> 00:03:58,680
कि जहां पर शक्ति है वहां शक्ति के रूप में ईश्वर ही है

57
00:03:58,680 --> 00:04:03,720
तो कुल मिलाकर के दत हो गया है ना

58
00:04:03,720 --> 00:04:07,800
तो इससे आप भाग नहीं पाएंगे ईश्वर की सर्वशक्ति

59
00:04:07,800 --> 00:04:12,160
मक्ता सिद्ध तभी होगी जब जहां पर किसी भी प्रकार का कार्य हो रहा है

60
00:04:12,160 --> 00:04:16,400
संसार का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां पर ईश्वर

61
00:04:16,400 --> 00:04:21,120
नहीं है ईश्वर का नियंत्रण नहीं है वह बात अलग है कि जिस प्रकार से

62
00:04:21,120 --> 00:04:26,200
जो पानी है उसकी नमी है पूरे संसार में भले ही फैली हुई है

63
00:04:26,200 --> 00:04:30,280
मगर हम हमारी प्यास पानी के उसी रूप से घुसती जिस रूप

64
00:04:30,280 --> 00:04:34,520
से बुझती है उसी प्रकार से ईश्वर तो सर्व सर्वत्र

65
00:04:34,520 --> 00:04:38,720
सर्वव्यापक है दीवार में भी ईश्वर है स्वान में भी ईश्वर है गाय

66
00:04:38,720 --> 00:04:41,920
में भी ईश्वर है

67
00:04:41,920 --> 00:04:45,920
पर पर हमें हमारी जो

68
00:04:45,920 --> 00:04:47,000
हम ईश्वर के उस

69
00:04:47,000 --> 00:04:51,000
रूप की भक्ति करते हैं जो हमें वेदों का प्रतिपादन कराती

70
00:04:51,000 --> 00:04:55,160
है मोक्ष का प्रतिपादन कराती है ईश्वर के उस रूप की भक्ति हम करते

71
00:04:55,160 --> 00:05:00,040
हैं

72
00:05:00,040 --> 00:05:04,160
तो मैं ज्यादा विलंब ना करते हुए सबसे पहले अपने जो आज

73
00:05:04,160 --> 00:05:08,200
के हमारे गेस्ट हैं उनको मैं चाहूंगा कि वह अपना

74
00:05:08,200 --> 00:05:13,000
वक्तव्य दे और अपना परिचय दे जो हमारे दर्शक है उनको

75
00:05:13,000 --> 00:05:17,560
फिर हम आगे बढ़े जो हमारा आज का विषय है उस

76
00:05:17,560 --> 00:05:23,080
सभी को जय श्री राम हर हर महादेव मेरी आवाज आ रही है सभी

77
00:05:23,080 --> 00:05:28,160
को हां सभी को आ रही है जब मुझे आ रही तो

78
00:05:28,160 --> 00:05:32,280
पिछली बार इनको आ रही थी आपको नहीं आ रही थ अभी क्वेश्चन हम

79
00:05:32,280 --> 00:05:36,360
लेंगे पहले हमारी बातें हो जाए फिर हम ले लेंगे

80
00:05:36,360 --> 00:05:40,520
ब्रह्म माया से लिप्त होता है कि नहीं या फिर वो जो क्वेश्चन आ रहे हैं वो

81
00:05:40,520 --> 00:05:44,680
हम ले लेंगे जी तो मेरा नाम सत्यम

82
00:05:44,680 --> 00:05:49,240
शर्मा है नाम से मेरा चैनल

83
00:05:49,240 --> 00:05:53,280
है आज का जो विषय है वो आर्य समाज के ऊपर हम चर्चा करने

84
00:05:53,280 --> 00:05:57,400
वाले हैं तो मेरी बात को अगर कोई भी

85
00:05:57,400 --> 00:06:02,200
आर्य समाज का व्यक्ति अगर यहां सुन रहा है तो बड़े धैर्य के साथ सुने

86
00:06:02,200 --> 00:06:06,400
मेरा आर्य समाज से कोई द्वेष नहीं है सिर्फ सैद्धांतिक जो मत

87
00:06:06,400 --> 00:06:10,640
है उनका उसी पर मैं कुछ विषय रखना चाहता हूं अगर उनको लगता

88
00:06:10,640 --> 00:06:15,400
है कि वह सही है तो मैं जो खंडन करने जा रहा हूं उसको

89
00:06:15,400 --> 00:06:19,800
अकेले में बैठ के समझिए कि उसका खंडन हो पा रहा है कि नहीं हो पा रहा है

90
00:06:19,800 --> 00:06:24,000
आप लड़ मत कि आर्य समाज

91
00:06:24,000 --> 00:06:28,440
का सबसे बड़ा समस्या यह है कोई भी खंडन करने आता है तो सबसे पहले उसको पाखंड कह देते हैं

92
00:06:28,440 --> 00:06:32,480
जबकि उसकी सुनते भी नहीं तो सबसे पहला मेरा निवेदन यही है कि

93
00:06:32,480 --> 00:06:35,600
धैर्य पूर्वक

94
00:06:35,600 --> 00:06:40,440
सुनिए तो मैं अब शुरू करता हूं

95
00:06:40,440 --> 00:06:45,160
जी कहानी पता है कि दयानंद जी बचपन में

96
00:06:45,160 --> 00:06:49,360
शिवलिंग के ऊपर चूहा देखते हैं कि चूहा चढ़ गया है तो चूहा

97
00:06:49,360 --> 00:06:53,640
चढ़ने के बाद उनके मन में क्या आया कि उनकी देवों में आस्था

98
00:06:53,640 --> 00:06:57,880
समाप्त हो गई कि देवता तो होते ही नहीं है अगर होते तो शिवजी चूहे

99
00:06:57,880 --> 00:07:02,560
के चूहे को हटा पाते लेकिन उनके मन में आया कि देवता तो होते ही नहीं

100
00:07:02,560 --> 00:07:06,720
इसका प्रभाव बाद पर जाकर उनके भाष्य पर पड़ा क्योंकि उन्होंने देवताओं को नकार

101
00:07:06,720 --> 00:07:11,520
दिया तो जो भी भाष्य उन्होंने किया है वोह हम मान नहीं सकते क्योंकि उन्होंने

102
00:07:11,520 --> 00:07:15,640
देवता को ना मानते हुए वो सब भाष्य किया है

103
00:07:15,640 --> 00:07:17,360
अच्छा हम सत्या प्रकाश

104
00:07:17,360 --> 00:07:21,760
के सातव समुल्लास को देखेंगे तो उसमें प्रश्न किया गया है

105
00:07:21,760 --> 00:07:25,840
कि वेदों को किन आत्मा में प्रवेश किया यानी प्रकाश

106
00:07:25,840 --> 00:07:29,920
किया गया प्रश्न है किनके आत्मा में कब वेदों का प्रकाश

107
00:07:29,920 --> 00:07:33,960
किया दयानंद जी उत्तर दे रहे हैं

108
00:07:33,960 --> 00:07:38,160
शतपथ ब्राह्मण का प्रमाण देकर कि प्रथम सृष्टि

109
00:07:38,160 --> 00:07:42,600
की आदि में परमात्मा ने अग्नि वायु आदित्य अंगिरा

110
00:07:42,600 --> 00:07:47,480
इन ऋषियों के आत्मा में एक एक वेद का प्रकाश किया

111
00:07:47,480 --> 00:07:52,200
सारी कहानी यहीं से शुरू होती है आदित्य अंगिरा

112
00:07:52,200 --> 00:07:56,880
और वायु और अग्नि इनको ऋषि कहा गया है

113
00:07:56,880 --> 00:08:01,040
दयानंद जी ने य ऋषि कह दिया कि ये ऋषि थे मेरा प्रश्न यहीं

114
00:08:01,040 --> 00:08:05,080
से शुरू होता है कि इन चारों को ऋषि

115
00:08:05,080 --> 00:08:09,360
किस वैदिक ग्रंथ में कहा गया मैंने वैदिक ग्रंथ इसलिए लिखा कि पुराणों

116
00:08:09,360 --> 00:08:13,680
को तो मानते नहीं है वेद मतलब वैदिक जो ग्रंथ उन्ही को मानेंगे आर्य समाज

117
00:08:13,680 --> 00:08:17,880
तो किस वैदिक ग्रंथों में इनको ऋषि कहा गया है

118
00:08:17,880 --> 00:08:22,040
ऐसा मेरा प्रश्न था क्योंकि जहां भी हम देखते

119
00:08:22,040 --> 00:08:26,080
हैं वहां यह सब देवता के रूप में ही आते हैं कि इनको देव कहा

120
00:08:26,080 --> 00:08:30,160
गया है इसके प्रमाण में हम मनु मति पर चलते

121
00:08:30,160 --> 00:08:33,560
हैं जहां से स्पष्ट हो जाएगा सारा

122
00:08:33,560 --> 00:08:37,560
विषय मनुस्मृति अध्याय

123
00:08:37,560 --> 00:08:40,160
एक

124
00:08:40,160 --> 00:08:44,360
श्लोक 24 अध्याय एक श्लोक 24

125
00:08:44,360 --> 00:08:48,560
अगर कोई आर्य समाज सुन रहा है तो लिख ले आगे वो चेक कर पाएगा कि यह लिखा

126
00:08:48,560 --> 00:08:52,720
भी है नहीं लिखा भाष्य जो मैं पढ़ रहा हूं व सुरेंद्र कुमार जी का है आर्य समाज

127
00:08:52,720 --> 00:08:57,720
के ही है तो श्लोक

128
00:08:57,720 --> 00:09:01,800
सॉरी 27 है श्लोक 27 में लिखा है दश

129
00:09:01,800 --> 00:09:05,920
के आधे अर्थात पांच पांच महा भूतों को ही जो

130
00:09:05,920 --> 00:09:09,000
विनाश शल

131
00:09:09,000 --> 00:09:13,640
अर्थात कौन सा हां 23 सॉरी 23 है दूसरा शलोक पढ

132
00:09:13,640 --> 00:09:18,000
23 वा जो श्लोक है उसम लिखा है उस परमात्मा ने जगत में समस्त

133
00:09:18,000 --> 00:09:22,280
धर्म अर्थ काम मोक्ष आदि व्यवहारों की सिद्धि के लिए जगत

134
00:09:22,280 --> 00:09:26,280
की सिद्धि अर्थात जगत के समस्त रूपों के ज्ञान के लिए अग्नि

135
00:09:26,280 --> 00:09:30,360
वायु और रवि यहां पर अग्नि वायु

136
00:09:30,360 --> 00:09:34,560
रवि को देवता कहा गया है लेकिन सुरेंद्र कुमार जी ने अपना अर्थ

137
00:09:34,560 --> 00:09:39,360
करते हुए इनको ऋषि कह दिया अग्नि वायु रवि नामक ऋषियों

138
00:09:39,360 --> 00:09:43,480
से त्रिवेद ज्ञान वाले ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद नामक

139
00:09:43,480 --> 00:09:47,640
नित्य वेदों को दहक प्रकट किया गया है

140
00:09:47,640 --> 00:09:48,640
इससे

141
00:09:48,640 --> 00:09:52,840
जस्ट अगर 22 वा श्लोक देखेंगे तो उसमें

142
00:09:52,840 --> 00:09:56,960
देवताओं को रचने की बात ब्रह्मा जी ने कह दी कि मैंने देवताओं को रचा

143
00:09:56,960 --> 00:10:01,120
है उसके जस्ट बाद यह वाला श्लोक आता है कि अग्नि वायु रवि नामक जो

144
00:10:01,120 --> 00:10:05,440
देवता है इनके माध्यम से यजुर्वेद ऋग्वेद सामवेद को दोहक

145
00:10:05,440 --> 00:10:09,880
प्रकट किया दोहक प्रकट किया का अर्थ है जो दोते हैं हम गाय से दूध दुहते

146
00:10:09,880 --> 00:10:14,520
यानी गाय से ले रहे हैं तो इन जो

147
00:10:14,520 --> 00:10:18,520
ग अगनि वायु रवि जो है देवता इनसे भी दोहक प्रकट किया गया

148
00:10:18,520 --> 00:10:22,760
है इनसे लिया गया है जबकि दयानंद जी कहते हैं कि इनको दिया गया है

149
00:10:22,760 --> 00:10:26,880
जो परमेश्वर है वो इनको दे रहा है जबकि मनुस्मृति कह रहा है इनसे लिया गया

150
00:10:26,880 --> 00:10:31,320
है वेद ठीक है दहक प्रकट किया गया फिर

151
00:10:31,320 --> 00:10:35,440
इसका एक और प्रमाण कहां मिलता है कि चलो मनुस्मृति को तो मिलावटी

152
00:10:35,440 --> 00:10:40,120
बोल देते हैं कि इसमें तो मिलावट हुआ है हम नहीं मानते तो उपनिषद

153
00:10:40,120 --> 00:10:43,080
अगर आप देखेंगे छांदोग्य

154
00:10:43,080 --> 00:10:48,520
उपनिषद छांदोग्य उपनिषद सतवा

155
00:10:48,520 --> 00:10:52,640
खंड अध्याय चार सवा खंड

156
00:10:52,640 --> 00:10:56,880
आप इसमें 17 खंड में देखेंगे तो मैं आपको हिंदी

157
00:10:56,880 --> 00:11:00,920
पढ़कर बता रहा हूं प्रजा ने लोको को लक्ष्य

158
00:11:00,920 --> 00:11:03,840
बनाकर ध्यान रूप तप किया उन तप

159
00:11:03,840 --> 00:11:08,200
किए जाते हुए लोको से उसने रस निकाले पृथ्वी से अग्नि अंतरिक्ष

160
00:11:08,200 --> 00:11:12,320
से वायु द लोक से आदित्य को उद्धृत

161
00:11:12,320 --> 00:11:16,520
किया उसने इन तीन देवताओं को लक्ष्य करके तप किया

162
00:11:16,520 --> 00:11:20,680
यहां पर उनको देवता कह दिया ठीक अग्नि वायु और

163
00:11:20,680 --> 00:11:24,680
आदित्य को यहां देवता कह दिया तप किए जाते हु

164
00:11:24,680 --> 00:11:28,840
देवताओं से उसने रस निकाले अग्नि से रिक वायु से यजू और आदित्य

165
00:11:28,840 --> 00:11:32,840
से को ग्रहण किया तो यहां पर भी वो वेदों को प्रकट

166
00:11:32,840 --> 00:11:36,920
करने की ही बात की गई है यहां से इनसे रस निकाल के वेदों को प्रकट किया गया है

167
00:11:36,920 --> 00:11:41,160
ना कि इनको वेद इनके हृदय में प्रकाशित किया गया है

168
00:11:41,160 --> 00:11:45,320
तो अभी भी इनको यहां देवता कहा है ऋषि नहीं कहा गया है कहीं पर भी तो

169
00:11:45,320 --> 00:11:49,560
छंद उपनिषद का एक प्रमाण हो चुका है तो आर्य

170
00:11:49,560 --> 00:11:53,560
समाज वालों से यही एक ब्राह्मण ग्रंथ में भी यह प्रकरण आता है तो

171
00:11:53,560 --> 00:11:57,560
ब्राह्मण ग्रंथ में भी इनसे लिया ही गया है इनको दिया कुछ

172
00:11:57,560 --> 00:12:02,000
नहीं गया इनको देवता कहा गया हर जगह इनको ऋषि कहीं नहीं कहा

173
00:12:02,000 --> 00:12:06,120
गया अग्नि ऋषि काफी ग्रंथों में लिखा हुआ है लेकिन

174
00:12:06,120 --> 00:12:10,200
मेरा प्रश्न यह है कि यह जो अग्नि वायु आदित्य है

175
00:12:10,200 --> 00:12:14,360
जिनसे वेदों को धकर प्रकट किया जा रहा है इन ऋषियों इनको कहीं पर

176
00:12:14,360 --> 00:12:18,480
भी वैदिक ग्रंथ में ऋषि कहा गया हो तो आप मुझे दिखाइए

177
00:12:18,480 --> 00:12:19,080
ऐसा कहीं

178
00:12:19,080 --> 00:12:23,280
नहीं कहा गया है इनको सिर्फ देवता कहा गया है अब यह देवता योनि को मानने

179
00:12:23,280 --> 00:12:27,440
को स्वीकार स्वीकार करने को तैयार ही नहीं होते हैं क्योंकि अगर यह

180
00:12:27,440 --> 00:12:31,560
स्वीकार कर लेते हैं तो इनको सारे भाष्य बदलने पड़ जाएंगे मनुस्मृति

181
00:12:31,560 --> 00:12:35,840
का जो भाष्य कराया है उसमें जानबूझकर जहां जहां देवता शब्द आए हैं वहां

182
00:12:35,840 --> 00:12:39,840
वहां उनको विद्वान पुरुष बता दिया गया है

183
00:12:39,840 --> 00:12:44,080
तो इस तरह का भाष्य हम कभी नहीं मान पाएंगे

184
00:12:44,080 --> 00:12:48,320
और अगर किसी आर्य समाजी सज्जन भाई को लगता है कि वो इसका

185
00:12:48,320 --> 00:12:52,320
प्रमाण दे सकता है कि इनको कहीं ऋषि कहा गया है तो आप

186
00:12:52,320 --> 00:12:57,000
शिवांश भाई को या मुझे मैसेज कर दीजिए उसको अगली लाइव में जरूर

187
00:12:57,000 --> 00:13:01,200
बुलाएंगे उसका प्रमाण देखेंगे या फिर आप प्रमाण सीधे भेज

188
00:13:01,200 --> 00:13:05,920
भी सकते हैं लाइव की भी जरूरत नहीं है उसम

189
00:13:05,920 --> 00:13:10,960
तो अच्छा इनका द्वेष पूर्ण भाष्य है

190
00:13:10,960 --> 00:13:15,000
इसमें पूर्ण भाष्य की मैं आपको एक बात बताऊ

191
00:13:15,000 --> 00:13:19,240
ये जितने भी लोग हैं जो पुराणों की जो कथाए

192
00:13:19,240 --> 00:13:23,520
हैं उनको लेकर के और मजाक बनाते

193
00:13:23,520 --> 00:13:28,200
हैं पुराणिक कथाओं का भले ही उसका अर्थ आदि दैविक आदि भौतिक आध्यात्मिक हो

194
00:13:28,200 --> 00:13:32,320
उससे उसको नजर अंदाज करते हुए उनका बनाते हैं अब

195
00:13:32,320 --> 00:13:34,840
बात यह आती है कि जो

196
00:13:34,840 --> 00:13:38,880
ऋग्वेद आदी जो हमारे वेदा शास्त्र है उसमें

197
00:13:38,880 --> 00:13:43,240
भी इसी भाषा शैली में बात की गई है जो पौराणिक

198
00:13:43,240 --> 00:13:47,320
भाषा शैली है व उसमें भी है ंद जी ने तासर का वध ऐसे

199
00:13:47,320 --> 00:13:51,360
किया वहां पर वो ये है जो देवताओं की कुतिया है

200
00:13:51,360 --> 00:13:55,560
वह आई थी वेद के मंत्र पढ़े थे और इस तरीके की घटनाए सब वेदों

201
00:13:55,560 --> 00:13:59,600
में भी दी गई मगर जब वेद

202
00:13:59,600 --> 00:14:03,600
में व बात आ रही है तो क्या हो रहा है वहां पर यह अपने

203
00:14:03,600 --> 00:14:08,000
मन से वहां पर लिख दिया गया फलाना अलंकार यह फलाना

204
00:14:08,000 --> 00:14:12,160
अलंकार है यह फलाना अलंकार है क्योंकि इनको वेद

205
00:14:12,160 --> 00:14:17,200
की सीमा में अपने आप को दिखाते हुए ही अर्थ करना था इस कारण से

206
00:14:17,200 --> 00:14:21,480
वरना वेद की किसी बात को कल्पना समझना अलंकार का अर्थ क्या होता

207
00:14:21,480 --> 00:14:25,920
है वास्तविकता नहीं है वास्तविकता

208
00:14:25,920 --> 00:14:31,160
नहीं है मगर हम जो है क्या कर रहे हैं व

209
00:14:31,160 --> 00:14:35,640
वहां पर एक जो चीज है नहीं उसको हम दिखा रहे हैं अलंकार के रूप

210
00:14:35,640 --> 00:14:39,880
में जैसे कि कई जगह होता है ना उ

211
00:14:39,880 --> 00:14:43,880
उपमा अलंकार हो जाता है उसको एक उपाधि दे दी जाती तो अलंकार

212
00:14:43,880 --> 00:14:48,200
की बात तो यहां प्रश्न य उठता है कि जब आप वेदों की मर्यादा को वेदों

213
00:14:48,200 --> 00:14:49,840
के सम्मान को गरिमा को बचाने के

214
00:14:49,840 --> 00:14:53,880
लिए अपने वहां पर उसको कहीं पर भी अपनी मनमर्जी

215
00:14:53,880 --> 00:14:58,040
से अलंकार कह सकते हैं तो

216
00:14:58,040 --> 00:15:02,120
जो पुराण मानने वा ले थे वो भी आपके सनातनी भाई बहन थे तो पुराण

217
00:15:02,120 --> 00:15:06,480
मानने वालों कोभी मजाक ना उड़ा कर के आप यह कर सकते थे कि आप

218
00:15:06,480 --> 00:15:10,560
पौराणिक कथाओं को अलंकार कह देते वो बात बात की है वो चर्चा का

219
00:15:10,560 --> 00:15:15,040
विषय बना रहता कि व अलंकार है या नहीं है है ना मगर

220
00:15:15,040 --> 00:15:19,080
आप इतना कर सकते थे मगर वो क्या किस प्रकार का द्वेष था क्योंकि

221
00:15:19,080 --> 00:15:23,160
वहां पर स्पष्ट लिखा उन्होंने मूर्ति पूजा करना पाप

222
00:15:23,160 --> 00:15:27,680
है मूर्ति पूजा करना अधर्म है तो वो एक तरीके से

223
00:15:27,680 --> 00:15:33,680
ज्वलंत अंदर का जो द्वेष है वो उसम दिखाई देता है

224
00:15:34,120 --> 00:15:38,680
जी दोष के बराबर है यह लिखा है किसके बराबर

225
00:15:38,680 --> 00:15:42,800
है 1000 हत्या के दोषों के बराबर है हां

226
00:15:42,800 --> 00:15:46,920
और आपने अभी वो बताया था कि जो राजा मूर्ति

227
00:15:46,920 --> 00:15:51,000
पूजा करता हो उससे दान लेना वो राजा किसके समान है

228
00:15:51,000 --> 00:15:55,520
वो क्या बताया था आपने मुझे कुछ एक सेकंड दे

229
00:15:55,520 --> 00:15:59,640
वो भी द्वेष पूर्ण भाष्य मैंने लिखा था कि उसका अर्थ कुछ भी कर रहे अपने मन से

230
00:15:59,640 --> 00:16:04,560
सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए कि हां मूर्ति पूजा मत करो कभी

231
00:16:04,560 --> 00:16:08,760
हम अच्छा खंडन करो बहुत अच्छी बात है खंडन मंडन

232
00:16:08,760 --> 00:16:12,880
चलता आया है लेकिन सही तरीके से तो करो आप अपना ही

233
00:16:12,880 --> 00:16:17,080
बनाए जा रहे हो कुछ भी सिर्फ खंडन मैंने एक चीज और देखी है देखिए इनसे

234
00:16:17,080 --> 00:16:21,800
बात करने में एक समस्या आती है जैसे मैंने अपने चैनल से मुख्यतः

235
00:16:21,800 --> 00:16:25,960
दो तंत्र है जिनका जिनकी शिक्षाओं पर जिनकी विचारधाराओं

236
00:16:25,960 --> 00:16:30,520
पर मैंने अ प्रश्न उठाया एक स्कन

237
00:16:30,520 --> 00:16:34,640
और दूसरा आर्य समाज इसके अलावा बात की है ब्रह्म कुमारी ब्रह्म

238
00:16:34,640 --> 00:16:39,400
कुमारी वालों से कम की है एक कल्की वाले उनसे कम की है

239
00:16:39,400 --> 00:16:43,400
एक ये अपने रामपाल है भाई मगर

240
00:16:43,400 --> 00:16:48,280
मैंने जब स्कोन में और आर समाज में एक फर्क देखा आर्य

241
00:16:48,280 --> 00:16:49,160
समाज को मैं

242
00:16:49,160 --> 00:16:53,440
देखता हूं इन सभी तंत्रों के जनक के रूप में यह जो जितने भी तंत्र

243
00:16:53,440 --> 00:16:57,520
आज चल रहे हैं जो परंपरा प्राप्त सनातन शास्त्र सम्मत

244
00:16:57,520 --> 00:17:01,680
विचारधाराओं के विरोध में सिद्धांतों के विरोध में उन सबका जनक

245
00:17:01,680 --> 00:17:05,840
के रूप में देखता हूं आर्य समाज को आर्य समाज ने जो एक पहल की तो

246
00:17:05,840 --> 00:17:09,960
उससे सभी को मौका मिल गया अपने अपने मन के हिसाब से वेदा आदि शास्त्रों

247
00:17:09,960 --> 00:17:14,240
का अपने हिसाब से अर्थ करने का वो

248
00:17:14,240 --> 00:17:18,440
तो एक अलग बात रही मगर फिर भी आज आज भी मैं अगर देखता हूं तो अगर

249
00:17:18,440 --> 00:17:23,080
इकोन के फॉलोअर्स मुझे जब काउंटर करते हैं

250
00:17:23,080 --> 00:17:27,200
और वहीं पर जब आर्य समाज को मानने वाले लोग मुझे काउंटर करते हैं

251
00:17:27,200 --> 00:17:31,720
तो आर्य समाजी जो व्यक्ति होता है वो बहुत जल्दी अभद्रता पर उतरता

252
00:17:31,720 --> 00:17:35,840
है यह आर समाज की तरफ से एक आ रहा हो सकता है सारे ऐसे ना

253
00:17:35,840 --> 00:17:39,920
हो पर आर समाज की तरफ से ज्यादातर ऐसा होता है कि जो काउंटर किया जाता है

254
00:17:39,920 --> 00:17:44,440
बहुत अभद्र तरीके से किया जाता है बिल्कुल तू तड़ाक चालू हो जाता है बिल्कुल और

255
00:17:44,440 --> 00:17:48,640
मेम्स बनाए जाते हैं बहुत जल्दी होता है मतलब ऐसा नहीं है स्न की तरफ

256
00:17:48,640 --> 00:17:52,640
से नहीं होगा होगा कम होगा मगर इधर से बहुत जल्दी

257
00:17:52,640 --> 00:17:56,640
होता है बहुत ज्यादा होता है स्कन की तरफ से हुआ ना के बराबर हुआ

258
00:17:56,640 --> 00:18:00,720
तो इकन वालों से बात करने में तब भी एक बात करने का एक

259
00:18:00,720 --> 00:18:04,520
स्तर बना रहता है कंपेरटिवली टू आर्य समाज

260
00:18:04,520 --> 00:18:08,400
वहां पर स्तर बिल्कुल गिर जाता है अभी

261
00:18:08,400 --> 00:18:12,440
जैसे कल या कल की बात है

262
00:18:12,440 --> 00:18:16,560
आर्य समाज जी का मेरे पास फोन आता है वह कहते कि भाई

263
00:18:16,560 --> 00:18:21,120
बहुत अच्छे से बात करना शुरू करते जब मैंने कहा कि ठीक है आप लाइव आइएगा

264
00:18:21,120 --> 00:18:25,120
जब लाइव आने की बात आई तो व बोलते हैं कि मैं लाइव आ

265
00:18:25,120 --> 00:18:29,160
जाता हूं मैंने कहा ठीक है अपनी फोटो भेज दीजिए तो उन्होंने पूछा क्यों

266
00:18:29,160 --> 00:18:32,440
मैंने कहा भाई हम किसी भी

267
00:18:32,440 --> 00:18:36,800
अ विरोधाभास के ऊपर की जाने वाली जो चर्चा होती है वो हम

268
00:18:36,800 --> 00:18:41,000
बिना फेस के नहीं करते उसने हमारा हमने अपना एक नियम बनाया हुआ है

269
00:18:41,000 --> 00:18:45,320
तो अब वो बोलता है बस और उसके आगे डॉट डॉट एक

270
00:18:45,320 --> 00:18:49,320
अभद्र भाव को प्रस्तुत करने वाला शब्द वहां पर

271
00:18:49,320 --> 00:18:53,440
उपयोग किया तो मैंने कहा भाई मैंने फोन काट दिया

272
00:18:53,440 --> 00:18:58,040
तो पलट के फोन करके कह रहे हैं कि भाई फोन क्यों काट रहे हो मैंने कहा भाई आपसे अवत्र

273
00:18:58,040 --> 00:19:02,200
अवत्र बातें सुनू आपके अभद्र शब्दों को सुनू बोले अभद्र शब्द

274
00:19:02,200 --> 00:19:06,520
तो नहीं रिकॉर्डिंग है मैंने रिकॉर्डिंग की है इस बात की तो बोले कि अभद्र

275
00:19:06,520 --> 00:19:10,600
शब्द तो नहीं मैंने कहा मैंने कहा क्या कहा आपका ये जो आपने कहा कि फट

276
00:19:10,600 --> 00:19:14,840
जाना इसका अर्थ क्या था क्या फट गया तो बोले कि मैंने कहा कि आप

277
00:19:14,840 --> 00:19:18,840
डर की कारण आपके जो दिल के आसपास की नश हैं वो फट गई

278
00:19:18,840 --> 00:19:19,840
अच्छा

279
00:19:19,840 --> 00:19:23,840
तो मैंने कहा ठीक है अब आप ऐसा करिए कि

280
00:19:23,840 --> 00:19:27,920
जो जो भगवत गीता भाष्य किया है दयानंद सरस्वती जी ने

281
00:19:27,920 --> 00:19:32,920
दयानंद जी ने आप उसकी सौगंध खा कर के कहिए

282
00:19:32,920 --> 00:19:37,560
कि आपका जो अर्थ है फटने का वो यही है तो हसने लगे

283
00:19:37,560 --> 00:19:42,480
व जो महानुभाव थे जो फोन कर रहे थे हसने लगे फस गए कैसे

284
00:19:42,480 --> 00:19:46,520
या तो यह सिद्ध करें अभी की अभी हम दयानंद को नहीं मानते क्योंकि जनता को जब वो बात जाएगी

285
00:19:46,520 --> 00:19:51,480
तो जनता तो जानती है ना फटने का अर्थ क्या है आप कितना भी दरदर की बातें कर

286
00:19:51,480 --> 00:19:55,520
लीजिए तो यह है वो व्यक्ति

287
00:19:55,520 --> 00:19:59,840
बहुत जल्दी स्तर गिरता है अब

288
00:19:59,840 --> 00:20:04,280
एक एक विषय में और छेड़ना चाहूंगा

289
00:20:04,280 --> 00:20:08,320
कि अभी हमने जो आर समाज ने एक बैठक की

290
00:20:08,320 --> 00:20:12,440
थी कुछ एक दो महीने पूर्व हमको बुलाया

291
00:20:12,440 --> 00:20:16,440
गया था फिर बुलाने के निमित्त जो बातचीत हो रही थी उसमें अभद्र भाषा शैली का उपयोग हुआ

292
00:20:16,440 --> 00:20:20,440
तो हमने वहां से कहा हम ऐसे व्यक्ति से बात करने नहीं जाएंगे और नहीं

293
00:20:20,440 --> 00:20:24,600
गए तो हमारी अनुपस्थिति में उन्होंने उनके हिसाब से मुंगेरी

294
00:20:24,600 --> 00:20:29,440
लाल के हसीन सपने देखते हुए और जो है यह सोच लिया कि हमने

295
00:20:29,440 --> 00:20:33,440
शंकर परंपरा का खंडन कर दिया शंकर परंपरा के चेत उसके बाद

296
00:20:33,440 --> 00:20:35,000
अभी हमने रिसेंटली उनमें जितने

297
00:20:35,000 --> 00:20:39,040
भी उन्होने क्रमानुसार एक एक पॉइंट जो जो उन्होंने बोला उसम सारे

298
00:20:39,040 --> 00:20:43,240
पॉइंट पर हमने एक एक पॉइंट पर हमने बात की और

299
00:20:43,240 --> 00:20:47,400
अच्छा सा प्रस्तुत किया अपना पक्ष अब इसके बाद उन्होंने इतनी

300
00:20:47,400 --> 00:20:51,720
बकला में अपने वीडियोस बनाए हैं अपनी बातें कह डाली है

301
00:20:51,720 --> 00:20:56,320
कि मुझे ऐसा लगता ही नहीं है कि मैं दोबारा से उनके लिए अलग से फिर वीडियो बनाऊ

302
00:20:56,320 --> 00:21:00,400
तो अगर कोई व्यक्ति हमारे वीडियो देखेगा और फिर उनके देखेगा

303
00:21:00,400 --> 00:21:04,480
तो उनका बहुत ही वीक आर्गुमेंट जो है पक्ष

304
00:21:04,480 --> 00:21:08,480
नजर आता है अब वो कैसे है जैसे सबसे पहले

305
00:21:08,480 --> 00:21:12,840
एक बात ले लेते हैं कि हमने कहा कि

306
00:21:12,840 --> 00:21:17,160
भाई हमने उनसे कहा कि आपने जो

307
00:21:17,160 --> 00:21:21,440
गोविंद पाद जी के गुरु को राक्षस सिद्ध करने का प्रयास किया

308
00:21:21,440 --> 00:21:25,520
उनकी आइडेंटिटी को गलत तरीके से दिखाने का प्रयास किया है तो आपके

309
00:21:25,520 --> 00:21:29,840
ही जो आचार्य है जो लिखते हैं उन्होंने

310
00:21:29,840 --> 00:21:34,160
अपने वेदांत दर्शन के इतिहास में लिखा है कि जो यह वाला प्रकरण

311
00:21:34,160 --> 00:21:38,280
है जो गोविंद पाद ये वाला है जिनके बारे में मिथ्या फैल रही है कि उनके गुरु

312
00:21:38,280 --> 00:21:42,640
राक्षस थे तो यह वो शंकराचार्य के गुरु सिद्ध नहीं होते बात किसने मानी

313
00:21:42,640 --> 00:21:47,040
उदयवीर जो इनके य उदयवीर शास्त्री नाम से जो ख्या पित है जिनके

314
00:21:47,040 --> 00:21:50,200
भाष्य है अब इन्होंने इसके काउंटर

315
00:21:50,200 --> 00:21:54,920
में आंसर क्या दिया है कि भाई अगर उदयवीर जी की बात आप मान रहे हो

316
00:21:54,920 --> 00:21:59,840
तो आप उनकी दूसरी बातें भी मानो मूर्ति पूजा का खंडन भी किया है और

317
00:21:59,840 --> 00:22:03,840
सुखदेव जी को शंकराचार्य का गुरु भी नहीं माना है तो हमने आपको

318
00:22:03,840 --> 00:22:08,800
व जो जवाब दिया है वह जवाब यह सोचते हुए नहीं दिया है

319
00:22:08,800 --> 00:22:12,960
कि हम जो है उसको मानते हैं हमने आपको जवाब यह

320
00:22:12,960 --> 00:22:17,240
सोचते हुए दिया है कि आप जो है मूर्ति विरोधी तो है

321
00:22:17,240 --> 00:22:21,280
आप जो है शंकराचार्य विरोधी तो है पर आप उदयवीर शास्त्री जी

322
00:22:21,280 --> 00:22:25,280
के विरोधी नहीं है इसलिए आपको उदयवीर शास्त्री जी से प्रमाण दिया

323
00:22:25,280 --> 00:22:29,320
आपने जो हम पर आक्षेप लगाया है व हमारे द्वारा स्वीकार ग्रंथ

324
00:22:29,320 --> 00:22:33,720
से आक्षेप नहीं लगाया है इसको उन्होंने कुछ नाम दिया था वो क्या था

325
00:22:33,720 --> 00:22:37,960
कि मीठा मीठा हप्ता और कड़वा कड़वा थू इसमें इन्होंने ऐसा

326
00:22:37,960 --> 00:22:42,160
कहा मीठा मीठा अपप्पा कड़वा कड़वा ू तो हमने तो

327
00:22:42,160 --> 00:22:46,240
हमने इनको बता दिया आपने जो आक्षेप लगाया है वोह हमारे द्वारा स्वीकार ग्रंथ

328
00:22:46,240 --> 00:22:50,480
से नहीं लगाया है हमने आपको वहां से इसलिए दिया कि भाई आपके

329
00:22:50,480 --> 00:22:54,600
ही लोग नहीं मानते तो पहले आप डिसाइड कर लो कि आपको क्या मानना है हम

330
00:22:54,600 --> 00:22:58,680
तो उनको पूरी तरीके से नहीं मानते मगर उनको ना मानने का अर्थ ये नहीं है कि हमने य

331
00:22:58,680 --> 00:23:02,760
मान लिया यह जो गलत ग्रंथ है कोई भी ग्रंथ छाप देगा तो हमने य मान लिया

332
00:23:02,760 --> 00:23:05,560
ऐसा नहीं है अब उन्होंने जो मीठा मठा

333
00:23:05,560 --> 00:23:09,800
मीठा मीठा ह् और कड़वा कड़वा थूका है शंकराचार्य जो

334
00:23:09,800 --> 00:23:13,880
शेरी के हैं उनको जो है मुगलों का हिमायती सिद्ध

335
00:23:13,880 --> 00:23:17,880
करने के लिए इन्होंने किस वेबसाइट से लिया संदर्भ शेरी

336
00:23:17,880 --> 00:23:22,000
मट की वेबसाइट से श अब पहली बात तो यह है कि कोई व्यक्ति अपनी

337
00:23:22,000 --> 00:23:26,200
वेबसाइट पर जाहिर सी बात है कि ऐसी ही बातें डालेगा जो उसके

338
00:23:26,200 --> 00:23:30,760
पक्ष में हो तो हमें उसकी बातो का जो अर्थ लेना चाहिए

339
00:23:30,760 --> 00:23:34,840
वह यह ढूंढते हुए लेने का प्रयास करना होगा कि हमें ऐसा अर्थ निकालना

340
00:23:34,840 --> 00:23:39,120
है कि इससे इनकी चीज ग्लोरिफाई हो मगर उन्होंने क्या किया

341
00:23:39,120 --> 00:23:43,280
वो क्या कहते आधा अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग

342
00:23:43,280 --> 00:23:47,400
इधर से ये उठा लिया उधर से उठा लिया जहां से वह यह सिद्ध कर रहे हैं

343
00:23:47,400 --> 00:23:51,440
कि शंकराचार्य के यज्ञ के कारण टीपू को

344
00:23:51,440 --> 00:23:55,520
फायदा हुआ तो टीपू को जो फायदा हुआ है भाई पहली बात तो यह है

345
00:23:55,520 --> 00:23:59,520
कि यह जो पत्र लिखा है वो टीपू ने लिखा है कि मुझे आपके यज्ञ

346
00:23:59,520 --> 00:24:04,120
के कारण फायदा हुआ सत्रु पर मैंने विजय प्राप्त की दूसरी बात

347
00:24:04,120 --> 00:24:08,360
जो यज्ञ है वह गांव की खुशहाली के लिए भी है मगर टीपू एट

348
00:24:08,360 --> 00:24:12,640
द सेम टाइम मठ मंदिरों को जो तोड़ते थे उनसे रक्षा करता था मंदिरों

349
00:24:12,640 --> 00:24:16,880
की रिकवरी करने में सहायता भी करता था यह भी वहीं पर इतिहास मेंशन

350
00:24:16,880 --> 00:24:20,840
है इसको आप निका नहीं सकते तो फिर जो यज्ञ से टीपू

351
00:24:20,840 --> 00:24:25,040
ने जीत जीत प्राप्त की वो किन शत्रुओं पर की जो मठ

352
00:24:25,040 --> 00:24:30,440
मंदिर को तोड़ने वाले शत्रु थे यह सिद्ध हुआ बात

353
00:24:30,440 --> 00:24:34,800
कि जो मराठा थे उस समय के वो भी शंकराचार्य के प्रति आस्थान

354
00:24:34,800 --> 00:24:39,120
वित थे तो फिर आप इस तरह से मराठा के भी विरोधी हो गए क्यों

355
00:24:39,120 --> 00:24:43,520
क्योंकि मराठा ऐसे व्यक्ति के प्रति आस्त क्यों हो रहे हैं

356
00:24:43,520 --> 00:24:47,640
जो उन्हीं को मारने वालो का शरण देता है आशीर्वाद देता है तो

357
00:24:47,640 --> 00:24:52,840
आपको यह भी जानना पड़ेगा और फिर अंत में बात आ जाएगी कि मीठा

358
00:24:52,840 --> 00:24:57,000
मठा आपने जब संगरी मठ की वेबसाइट से सिद्ध करने का

359
00:24:57,000 --> 00:25:01,000
प्रयास किया कि उस तत्कालीन जो शंकराचार्य

360
00:25:01,000 --> 00:25:05,000
थे वह टीपू के हिमायती थे तो वहीं पर है

361
00:25:05,000 --> 00:25:09,120
कि वह जो है शारदा के अवतार थे यह वहां से आप नहीं

362
00:25:09,120 --> 00:25:13,240
लोगे अब मीठा मठा अप्पा कड़वा कड़वा थू क गया वहीं पर

363
00:25:13,240 --> 00:25:17,360
लिखा हुआ है कि उनके प्रति उस समय उस प्रांत के जितने भी लोग थे सब

364
00:25:17,360 --> 00:25:21,680
आस्थान वित थे अब यह बात आप नहीं मानोगे तो मीठा

365
00:25:21,680 --> 00:25:25,680
मठा अप्पा कड़वा कवा तू कहां गया इसके बाद आपने उसी वेबसाइट में एक

366
00:25:25,680 --> 00:25:29,680
जानकारी और दी गई है विद्यारण्य स्वामी हरिहर बुक्का की

367
00:25:29,680 --> 00:25:33,680
इसको आपने अपने इसी वीडियो से खंडित कर दिया कि नहीं ऐसा कुछ नहीं है विद्यान

368
00:25:33,680 --> 00:25:35,840
स्वामी हरिहर बुक्का के गुरु नहीं थे ये वो जो भी

369
00:25:35,840 --> 00:25:39,920
कहा मगर फिर यहां पर आपने उसी वेबसाइट का खंडन कर दिया जिस वेबसाइट के आधार

370
00:25:39,920 --> 00:25:43,920
पर आप अपने किसी पक्ष को रखने का प्रयास कर रहे हैं तो यह क्या है मीठा

371
00:25:43,920 --> 00:25:47,200
मीठा अपा करवा

372
00:25:47,200 --> 00:25:51,880
करवात एट द एंड इन्होंने

373
00:25:51,880 --> 00:25:56,360
एक कहानी सुनाई और भी बहुत सारे हैं कि

374
00:25:56,360 --> 00:26:00,600
इन्होने भत में वो जो दिए गए हैं अद्वैत का तो इनका

375
00:26:00,600 --> 00:26:05,040
कुछ भी ऐसे इतना वीक आर्गुमेंट है कि उसको दोबारा से बनाने का

376
00:26:05,040 --> 00:26:09,760
मन ही नहीं कर रहा कि हम लोग दोबारा से बनाए

377
00:26:09,760 --> 00:26:13,880
उसको अच्छा उसमें अंत में उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति था

378
00:26:13,880 --> 00:26:18,000
उसने गधे पर अपने ग्रंथ लाग दिए और

379
00:26:18,000 --> 00:26:22,040
जब वो अपने घर लेकर के पहुंचा ग्रंथों को तो गधा बोलने लगा कि

380
00:26:22,040 --> 00:26:26,080
मैं तेरा गुरु हो गया तो मुझे गुरु मान तो उस व्यक्ति ने उसको गुरु नहीं

381
00:26:26,080 --> 00:26:30,160
माना बल्कि उसके डंडे लगाए भाई पहली बात तो यह है कि

382
00:26:30,160 --> 00:26:34,640
इस गधे का कंपैरिजन आपने जब अप्रत्यक्ष रूप से

383
00:26:34,640 --> 00:26:38,640
इधर परंपरा प्राप्त आचार्यों को किया है जिन्होंने पुराणों को स्वीकारा

384
00:26:38,640 --> 00:26:42,680
है तो पहली बात तो यह कि अनादर किया मगर ठीक है वह बाद

385
00:26:42,680 --> 00:26:46,800
में देखेंगे मगर दूसरी बात यह कि आपने अनकहे प्रत्यक्ष रूप से अनकहे शब्दों में

386
00:26:46,800 --> 00:26:51,680
माना कि आपको वेदा शास्त्र जो प्राप्त हुए हैं इन्हीं से हुए हैं

387
00:26:51,680 --> 00:26:56,400
दूसरी बात ये है कि जब आप ये कह रहे हैं कि

388
00:26:56,400 --> 00:27:00,600
गधे पर जो ग्रंथ ला दे थे वो उसी व्यक्ति ने ला दे थे जिसको

389
00:27:00,600 --> 00:27:04,760
बाद में गधे ने ग्रंथ दिए मगर क्या जिनको जिनसे आप

390
00:27:04,760 --> 00:27:08,920
वेद ले रहे हो क्या उनको आपने जाकर के वेद दिए थे

391
00:27:08,920 --> 00:27:12,920
क्या दूसरी बात ये कि यदि आप गधे को

392
00:27:12,920 --> 00:27:17,120
रास्ते में अकेला छोड़ देते हैं अपने आप गधा वहां से लेकर के आ रहा है आपके ग्रंथों

393
00:27:17,120 --> 00:27:21,480
को आपने उसके ऊपर ना तो लादा है ना ही रास्ते में आप उसके साथ साथ चल रहे हैं

394
00:27:21,480 --> 00:27:25,680
उसकी के लिए ऐसे में वो गधा आकर के आपसे जब कहेगा

395
00:27:25,680 --> 00:27:30,240
कि यह है तेरे जीवन का प्रमाण अंतिम प्रमाण वेद तो क्या आप उसको मानेंगे

396
00:27:30,240 --> 00:27:34,320
क्यों क्योंकि आपको गधे की बुद्धिमता पर और

397
00:27:34,320 --> 00:27:38,600
उसकी जो सामर्थ्य उस पर भरोसा नहीं है यह सच बोल रहा है कि झूठ बोल रहा है

398
00:27:38,600 --> 00:27:42,680
तो आप उसको नहीं मानेंगे मगर यहां पर तो आपने वेदों को अपने अपना अंतिम प्रमाण

399
00:27:42,680 --> 00:27:46,720
माना हुआ है भाई अगर आपने गधे

400
00:27:46,720 --> 00:27:52,720
के ऊपर ग्रंथ नहीं ला देते मैं कह रहा हूं

401
00:28:00,880 --> 00:28:06,120
मगर आप तो इसका अर्थ क्या हुआ

402
00:28:06,120 --> 00:28:10,320
कि इन्होंने यहां पर भी एक अन सेटल्ड सी अन

403
00:28:10,320 --> 00:28:14,400
एक अपने मन गणन से कहानी तो सुनाई मगर उसमें खुद ही फस गए पहली बात तो

404
00:28:14,400 --> 00:28:18,560
मान लिया कि मुझे इन्ही गुरुओं से प्राप्त हुआ है उनके बारे में अबद

405
00:28:18,560 --> 00:28:22,840
टिप्पणी तो की पर मान लिया और दूसरा क्या हुआ कि इन्होंने ऐसा

406
00:28:22,840 --> 00:28:27,000
जोक वहां पर किया है जो खुद ही में उलझ के रह गया कि भाई गधे को ग्रंथ देने

407
00:28:27,000 --> 00:28:31,120
वाले आप ही है मगर जिससे आपने वेदा आदि शास्त्र लिए उनको वेदा

408
00:28:31,120 --> 00:28:35,200
दि शास्त्र देने वाले आप नहीं है अगर आप किसी से वेदा दि

409
00:28:35,200 --> 00:28:39,360
शास्त्र ले रहे हो वेदा दि शास्त्रों को अपना अंतिम प्रमाण मान रहे हैं तो आपको

410
00:28:39,360 --> 00:28:43,640
यह कहना पड़ेगा कि मुझे जिस व्यक्ति से मिला है उस पर विश्वास है तभी

411
00:28:43,640 --> 00:28:47,720
आपको वे आपका वेद पर विश्वास होना सिद्ध होगा और अगर

412
00:28:47,720 --> 00:28:51,920
नहीं है विश्वास वेद जहां से प्राप्त हो रहे हैं उस पर तो फिर आपका वेदा

413
00:28:51,920 --> 00:28:56,440
दि शास्त्रों पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता तो खैर

414
00:28:56,440 --> 00:29:00,640
इसी तरीके से इनके और भी आर्गुमेंट है इन्होने भिक्षु शब्द की बात की भिक्षु शब्द

415
00:29:00,640 --> 00:29:04,680
मारे से पुराण में दिया गया है हा इन्होने एक और बोखला में जल्दबाजी में किया वो भी

416
00:29:04,680 --> 00:29:08,960
मैं बता दूं इन्होंने क्या किया जल्दबाजी में अब वो भगवान जाने

417
00:29:08,960 --> 00:29:13,040
खरीदा है वायु पुराण के किसी से लेकर आए मांग के लाए हैं वो नहीं पता

418
00:29:13,040 --> 00:29:15,960
मगर उन्होने वायु पुराण दिखा दिया भाई चौखंबा

419
00:29:15,960 --> 00:29:20,360
से छपता है और जो है जो देखो इसमें कहां पर है एक भी जगह परंपरा नहीं है

420
00:29:20,360 --> 00:29:24,640
मेरे भाई वायु पुराण का ही एक भाग है

421
00:29:24,640 --> 00:29:29,480
एक लिंग महात्मा है वो अलग से प्रकाशित करते पब्लिशर

422
00:29:29,480 --> 00:29:33,760
वो वो भाग बड़ा हो जाता है इसलिए वो अलग से प्रकाशित करते हैं और

423
00:29:33,760 --> 00:29:38,160
उसमें वो परंपरा दी गई है तो जहां से आपने वायु पुराण खरीदा वही से पूछिए

424
00:29:38,160 --> 00:29:42,200
एकलिंग महात्मा मुझे दे दीजिए वो बताएंगे कि हा ये वायु पुराण का खंड है

425
00:29:42,200 --> 00:29:46,200
अलग से ये सारी चीज इतना वीक है कि उसके लिए मुझे ठीक

426
00:29:46,200 --> 00:29:50,280
नहीं लगता कि मैं अलग से एक वीडियो बनाऊ और इसी प्रकार अब जैसे हमने बताया

427
00:29:50,280 --> 00:29:54,280
कि भाई जो महाभारत में कपिल मुनि के द्वारा जो दर्शन

428
00:29:54,280 --> 00:29:58,360
बताया गया है अद्वैत दर्शन सांख्य दर्शन

429
00:29:58,360 --> 00:30:02,440
उसका लय जो होता है वह जाकर के होता है किसम अद्वैत में मैंने

430
00:30:02,440 --> 00:30:07,120
श्लोक क्रमांक तक बताए थे अपनी वीडियो में मगर इन्होंने क्या किया इन्होंने वहा

431
00:30:07,120 --> 00:30:11,360
अपना एक जो पर्सनल रूम में बैठ कर के जब य वीडियो बना रहे थे

432
00:30:11,360 --> 00:30:15,520
तो इन्होंने सीधे-सीधे वहां पर कह दिया कि नहीं नहीं वहां पर सिर्फ

433
00:30:15,520 --> 00:30:19,640
सांख्य की बात हुई है तत्व हुई है 24 तत्वों की बात हुई है मैंने 26

434
00:30:19,640 --> 00:30:24,000
तत्वों का श्लोक क्रमांक दिया है अगर ऐसा होता तो अगर वो

435
00:30:24,000 --> 00:30:28,000
जो श्लोक क्रमांक मैंने दिया है आपने क्या खोल के बताया जैसे आप जब

436
00:30:28,000 --> 00:30:31,240
आरोप लगा रहे थे तब आपने खोल के बताया था मैंने श्लोक क्रमांक

437
00:30:31,240 --> 00:30:35,640
दिया है आपको खोल के बताना चाहिए कि वहां पर 26 में तत्व की बात हो रही है

438
00:30:35,640 --> 00:30:39,720
मैंने श्लोक क्रमांक दिया है आपको बताना चाहिए कि वहा अद्वैत की बात हो रही

439
00:30:39,720 --> 00:30:43,920
है कि नहीं जीव ब्रह्म की एकता की बात हो रही है ब्रह्म को माना गया है कि नहीं माना गया है तो

440
00:30:43,920 --> 00:30:47,920
यह सब चीज इनकी इतनी वीक रही है कि अब उसके बारे में वीडियो

441
00:30:47,920 --> 00:30:52,000
बनाना कहीं से भी उचित नहीं दिखाई देता

442
00:30:52,000 --> 00:30:56,280
और गीला गीला अप्पा और मीठा मठा थू शुरुआत तो इन्होने ही की शंकराचार्य

443
00:30:56,280 --> 00:31:00,320
जब इनका यस से जो चीज मानोगे उसको मानना है तो

444
00:31:00,320 --> 00:31:04,560
भाई तुम वेबसाइट से जब य सिद्ध कर रहे हो और एक बात और कि

445
00:31:04,560 --> 00:31:08,760
यह परंपरा को माने ना माने अभी सत्यार्थ प्रकाश

446
00:31:08,760 --> 00:31:13,080
में अगर कोई व्यक्ति एक पेज एक्स्ट्रा चिपका

447
00:31:13,080 --> 00:31:17,120
दे जिसमें लिखा हो एक्स्ट्रा बढ़ा दे प्रिंट करवा ले अपनी सत्यार्थ

448
00:31:17,120 --> 00:31:21,200
प्रकाश कितना खर्चा आएगा हज रप 00000 अपनी सत्यार्थ

449
00:31:21,200 --> 00:31:25,240
प्रकाश प्रिंट करवा ले और उसमें लिख डाले कि बैडमिंटन खेलने से गिल्ली

450
00:31:25,240 --> 00:31:29,600
डंडा खेलने से मोक्ष प्राप्त होता है और यह बात कही है सरस्वती जी ने अभ

451
00:31:29,600 --> 00:31:33,840
ये आक्षेप लगाया जाएगा तो अब ये क्या कहेंगे ये सत्यार्थ प्रकाश

452
00:31:33,840 --> 00:31:37,880
नकली है क्यों नकली है क्योंकि

453
00:31:37,880 --> 00:31:41,880
उनसे जुड़े हुए जो लोग हैं चैन ऑफ नरेशन दयानंद जी की वो

454
00:31:41,880 --> 00:31:46,200
नहीं मान रहे हैं कि ये सत्या प्रकाश भाही सत्या प्रकाश है जो दयानंद जी ने

455
00:31:46,200 --> 00:31:47,200
लिखी

456
00:31:47,200 --> 00:31:51,360
अगर येय ये चीज नहीं करेंगे तो कभी सिद्धि नहीं कर पाएंगे किय जो छापी गई किताब

457
00:31:51,360 --> 00:31:55,560
है वो नकली है इसी प्रकार से ये लोग भले ही परंपरा को ना माने मगर अपने

458
00:31:55,560 --> 00:32:00,280
को बचाने के लिए इनको परंपरा को ही मानना पड़ेगा और

459
00:32:00,280 --> 00:32:04,440
अब बात यह आती है कि परंपरा की अगर बात करें तो यह मानते हो

460
00:32:04,440 --> 00:32:08,680
ना मानते हो मगर हम तो मानते हैं अगर हम पुराणों को मानते तो हम परंपरा को मानते

461
00:32:08,680 --> 00:32:12,680
हैं परंपरा की बात ांद उपनिषद में कही गई आचार्य से प्राप्त होने

462
00:32:12,680 --> 00:32:16,760
वाली जो विद्या होती है वही फलदायक होती है ये सब

463
00:32:16,760 --> 00:32:21,200
ध्यान नहीं देते खैर फिर भी हम तो मानते हैं तो जब ये

464
00:32:21,200 --> 00:32:25,200
उसकी वेबसाइड से कोई बात प्राप्त कर रहे हैं जब शंकराचार्य के बारे में

465
00:32:25,200 --> 00:32:29,280
कोई बात प्राप्त कर रहे हैं तो पहले जा कर के इनको क्लियर तो

466
00:32:29,280 --> 00:32:33,520
करना पड़ेगा कि जो अर्थ मैं इसका समझ रहा हूं इस पंक्ति का वही अर्थ है कि नहीं

467
00:32:33,520 --> 00:32:37,600
वरना वही हो जाएगा तीन बेर खाती थी वो तीन बेर खाती है अब इसमें

468
00:32:37,600 --> 00:32:43,080
बेर शब्द का जो उपयोग हो रहा है दो बार वो अपने मन से कोई भी कुछ भी लगा

469
00:32:43,080 --> 00:32:47,120
लेगा मगर इन सब बातों से इन्ह मतलब नहीं है और इनके जो वो होते हैं

470
00:32:47,120 --> 00:32:51,120
अनुयाई वो भी आके वा वा वा वा वा खंडन हो गया खंडन हो गया ऐसे

471
00:32:51,120 --> 00:32:55,840
करते खंडन मतलब हसी आती है खंडन भी हो गया सब

472
00:32:55,840 --> 00:33:00,200
ध्यान नहीं देना कौन क्या कह रहा है कौन क्या नहीं कह रहा है बस खंडन हो गया साब

473
00:33:00,200 --> 00:33:03,200
वाह वाह वाह वा वा वा वही वाली बात वो

474
00:33:03,200 --> 00:33:07,200
अमा एक एक मूवी थी ना उसमें वो कहता है

475
00:33:07,200 --> 00:33:11,200
मैं अर्ज किया है तो अर्ज करने से पहले ही वो कहने लगते वाह वा वा

476
00:33:11,200 --> 00:33:15,800
वा वा वा तो वो कहता है अमा शुरू तो करने दो भाई तो यहां वो वाला हाल

477
00:33:15,800 --> 00:33:19,880
है तो इनकी एक सबसे बड़ी समस्या है कि इनका

478
00:33:19,880 --> 00:33:24,440
जो ग्रंथों का भाष्य है ना वो ये समझ नहीं पा रहे एक उदाहरण देता हूं मनुस्मृति

479
00:33:24,440 --> 00:33:29,400
का अध्याय ये है दूसरा और इसका श्लोक है 176

480
00:33:29,400 --> 00:33:33,960
इसमें आप भाष्य देखिए आर्य समाज के विद्वान का ही है

481
00:33:33,960 --> 00:33:38,120
प्रतिदिन विद्वानों देवताओं का अर्थ इन्होने विद्वान कर दिया विद्वानों

482
00:33:38,120 --> 00:33:42,640
ऋषियों ज्ञान वयो वृद्ध व्यक्तियों की सेवा अभिवादन आदि

483
00:33:42,640 --> 00:33:46,640
प्रसन्नता कारक कार्यों से तृप्ति संतुष्टि का व्यवहार

484
00:33:46,640 --> 00:33:50,640
और स्नान करके यानी यह कहना चाह रहे है पहले आप विद्वान

485
00:33:50,640 --> 00:33:54,880
ऋषि इनके पास जाओ बिना नहाए फिर नहाओ जबकि इसका प्रचलित

486
00:33:54,880 --> 00:33:59,160
अर्थ यहां दे रखा है ब्रह्मचारी नित्य स्नान देवताओं ऋषियों

487
00:33:59,160 --> 00:34:03,160
तथा पित्रों का तर्पण श्लोक का आप अनुवाद करेंगे तो

488
00:34:03,160 --> 00:34:07,600
आप बताइए कि इन्होंने श्लोक का अर्थ मोड़ने के लिए

489
00:34:07,600 --> 00:34:11,720
पहले विद्वान ऋषियों के पास जाना लिख दिया बाद में स्नान करना लिख दिया तो आप

490
00:34:11,720 --> 00:34:16,000
मुझे बताइए उससे पहले क्या बिना नहाए आप कहीं और ही चले जाएंगे ऋषियों

491
00:34:16,000 --> 00:34:18,640
के पास चले जाएंगे बिना नहाए या पहले स्नान

492
00:34:18,640 --> 00:34:22,760
करेंगे तो लेकिन इन्होने श्लोक को मोड़ना है भाई देवता का अर्थ

493
00:34:22,760 --> 00:34:26,920
विद्वान कैसे करे तो फिर उन्होंने दे पहले लिखा है यह सब तो

494
00:34:26,920 --> 00:34:31,080
इस तरह का बड़े छल के साथ किया है तो कोई सामान्य

495
00:34:31,080 --> 00:34:35,400
व्यक्ति पढ़ेगा तो उसको तो पता ही नहीं चलेगा कि उसके साथ हो क्या रहा

496
00:34:35,400 --> 00:34:39,560
है जी और आपको बताऊ रामलीला देखने

497
00:34:39,560 --> 00:34:43,680
को भी 1000 हत्या के दोषों के बराबर बताया

498
00:34:43,680 --> 00:34:47,880
दयानंद सरस्वती जी ने देखिए आपको मैं बता देता

499
00:34:47,880 --> 00:34:52,720
हूं फिर बैठ कर के राम राम मंदिर के पक्षधर बनते

500
00:34:52,720 --> 00:34:57,080
हैं हजार हत्या के समान दोष है और इसी प्रकार

501
00:34:57,080 --> 00:35:01,320
मूर्ति पूजा करना हजार हत्या के समान पाप है ठीक है

502
00:35:01,320 --> 00:35:05,800
यह जीवनी है लेखराम जी की है संभव

503
00:35:05,800 --> 00:35:10,160
न है प्रमाणिक है अच्छा इनकी एक किताब छपती है मानस पियुष

504
00:35:10,160 --> 00:35:14,280
विशेषांक अंक छपता है प्रेम इसके बारे में जरा

505
00:35:14,280 --> 00:35:19,080
स्पष्ट कर दीजिए किस ग्रंथ में है ये जो आपने ग्रंथ दिखाया अभी

506
00:35:19,080 --> 00:35:23,840
ये लेखराम जी वाली जीवनी है

507
00:35:23,840 --> 00:35:28,080
अच्छा और अगर लेखराम जी वाले में नहीं हो तो मैं ढूंढ के बता द

508
00:35:28,080 --> 00:35:32,120
या लेखराम जी वाली में है या एक अन्य भाष्य का लेखक है आर्य समाज के

509
00:35:32,120 --> 00:35:33,840
उनकी है एक यह

510
00:35:33,840 --> 00:35:37,920
पढ़िए नीचे वाली राम कृष्ण की भाति ही बुद्ध

511
00:35:37,920 --> 00:35:42,320
महावीर शिवा प्रताप कबीर नानक दयानंद गांधी यही नहीं मोहम्मद

512
00:35:42,320 --> 00:35:46,480
और ईसा भी अपने युग के महापुरुष हुए राम कृष्ण के समान बता

513
00:35:46,480 --> 00:35:51,000
दिया मोहम्मद और ईसा को अच्छा मोहम्मद भी महापुरुष है

514
00:35:51,000 --> 00:35:55,080
भाई इनका जो है आप प्रमाणिक रेफरेंस प्रामाणिक रेफरेंस

515
00:35:55,080 --> 00:35:59,080
दे दीजिएगा तो पिट कमेंट में डाल दूंगा क्योंकि अगर यह बात है क्योंकि ये लोग

516
00:35:59,080 --> 00:36:03,200
मुझे इस मामले में अच्छे लगते हैं कि भले ही इनका दर्शन जो है उधर

517
00:36:03,200 --> 00:36:07,320
जाता हुआ इस्लाम की तरफ मगर इस्लाम का प्रत्यक्ष रूप से वो तो करते हैं

518
00:36:07,320 --> 00:36:11,880
लोग सामने आते हैं वहां पर लोहा लेते हैं तो यहां

519
00:36:11,880 --> 00:36:15,880
पर के समान कह दिया तो अा

520
00:36:15,880 --> 00:36:19,920
इसी में नहीं क्या लिखा है प्रेम भिक्षु अच्छा यहां पर एक

521
00:36:19,920 --> 00:36:24,200
और चीज आ गई प्रेम भिक्षु मान लिया उन्होने अपने को प्रेम

522
00:36:24,200 --> 00:36:27,680
भिक्षु नाम

523
00:36:27,680 --> 00:36:31,720
का आरोप लगाया था इन्होंने प्रेम भिक्षु आर्य लिख लिया इन्होंने अपने को मानस पीयूष

524
00:36:31,720 --> 00:36:35,960
विशेषांक हां भाई हो गए बध

525
00:36:35,960 --> 00:36:40,040
ये तो वो जब इन्होंने चीड़ उड़ाने वाला वीडियो बनाया

526
00:36:40,040 --> 00:36:46,040
था तो उसमें बड़ा बारबार एक शब्द आ रहा था मोए मोए हो

527
00:36:46,080 --> 00:36:50,120
गया वो आशीष कर रहा था ना आशीष की चैट दिखाऊ तो

528
00:36:50,120 --> 00:36:54,240
रिप्लाई तक नहीं देता नहीं आशीष नहीं है

529
00:36:54,240 --> 00:36:58,320
ऋषि उवाच नाम के हैं कोई वो कर रहे ऋषि अलंकार समाज

530
00:36:58,320 --> 00:37:02,920
के समय अलंकार समाज के जो सोशल मीडिया

531
00:37:02,920 --> 00:37:07,080
जो निचले स्तर की सोशल मीडिया के वो बने हुए हैं इस समय अगवा का

532
00:37:07,080 --> 00:37:11,400
निचले स्तर की गौतम खट्टर वगैरह का तो थोड़ा ऊपर ऊंचा स्तर हो गया भाई फम

533
00:37:11,400 --> 00:37:15,520
नेम फेम है तो निचले स्तर की जो सोशल मीडिया के जो निचले

534
00:37:15,520 --> 00:37:19,520
स्तर के जो मिल जाते हैं कि हमारा सरगना कौन है तो उसके अगवा का जो

535
00:37:19,520 --> 00:37:23,560
बने हुए हैं वो इस समय ऋषि उवा जी बने हुए हैं तो वही ये बोल रहे थे

536
00:37:23,560 --> 00:37:28,640
मोए मोए हो गया और ये देखो आप ये भिक्षु शब्द लिखा हुआ है

537
00:37:28,640 --> 00:37:32,640
प्रेम भिक्षु आर्य अब ये बहुत हो गए कि नहीं हो गए अच्छा

538
00:37:32,640 --> 00:37:37,200
एक एक मैं बात कहना चाह रहा था अगर कोई आर समाजी हो तो व सुन

539
00:37:37,200 --> 00:37:41,240
ले कि मैंने तो आप लगभग लगभग उन्होंने जितना भी मुझे

540
00:37:41,240 --> 00:37:43,040
ध्यान आया तो मैंने बताया

541
00:37:43,040 --> 00:37:47,160
मगर हमने जो प्रश्न किया हा उन्होंने एक बात और कही है क्या कहा

542
00:37:47,160 --> 00:37:51,280
है व ब्रह्म जो है वोह माया से लिप्त हो गया यह हो गया भाई यह सब

543
00:37:51,280 --> 00:37:55,720
चीजें जो हो रही है पहली बात तो आप अलग ही तरीके से उनको व्याख्या कर रहे हो

544
00:37:55,720 --> 00:38:00,560
मगर अगर मैं मान लेता हूं हो भी रही है तो व व्यावहारिक धरातल पर नहीं है

545
00:38:00,560 --> 00:38:04,680
ईश्वर सर्वशक्तिमान सिद्ध होना चाहिए व्यावहारिक धरातल पर मनुष्य को

546
00:38:04,680 --> 00:38:08,680
समझ में आज आने वाली दुनिया में ईश्वर अपने एक्जिस्टेंस

547
00:38:08,680 --> 00:38:12,720
से बाहर जा सकता है नहीं जा सकता कहां परमार्थ में क्या ईश्वर मर सकता

548
00:38:12,720 --> 00:38:16,960
है नहीं मर सकता कहां परमार्थ में यह सारी चीज परमार्थ में हो रही मगर परमार्थ

549
00:38:16,960 --> 00:38:21,760
और व्यवहार में अंतर है परमार्थ का एक्जिस्टेंस आपके लिए तब तक है

550
00:38:21,760 --> 00:38:26,480
जब तक आप ईश्वर को ईश्वर मान रहे हो

551
00:38:26,480 --> 00:38:30,640
यानी कि परमा के एक्जिस्टेंस से पहले आपके लिए ईश्वर को ईश्वर रूप में स्वीकार करना

552
00:38:30,640 --> 00:38:34,720
आवश्यक है तो इसलिए व्यावहारिक दुनिया में ईश्वर का सर्वशक्तिमान

553
00:38:34,720 --> 00:38:39,040
सिद्ध होना आवश्यक है परमार्थिक दुनिया में तो ईश्वर निश्चित है वो प्राप्त

554
00:38:39,040 --> 00:38:43,080
व्य है व्यवहार की वही नहीं है व्यवहार का विषय नहीं है वो प्राप्त व्य है

555
00:38:43,080 --> 00:38:47,480
तो इसका अर्थ है कि जितने भी व्यवहार में आ सकने वाली बातें हैं

556
00:38:47,480 --> 00:38:51,680
वो सब कुछ ईश्वर करके दिखा दे वो सर्वशक्तिमान है आपका ईश्वर

557
00:38:51,680 --> 00:38:55,720
व्यवहार में बाधित है जन्म नहीं ले सक रहा है बहुत सी और चीजें नहीं

558
00:38:55,720 --> 00:38:58,280
कर सकता इसीलिए मूर्ति पूजा का विरोध है मगर

559
00:38:58,280 --> 00:39:02,400
आप जो बातें कर रहे कि व माया से लिप्त हो गया यह हो गया वो हो गया वो एक अलग विषय

560
00:39:02,400 --> 00:39:06,400
लंबा हो जाएगा मगर फिर भी आप करतो से बाधित

561
00:39:06,400 --> 00:39:10,840
परमार्थिक धरातल पर रहे हो ना जैसे अभी शुरू में किसी ने प्रश्न पूछ लिया था

562
00:39:10,840 --> 00:39:15,320
क्या ईश्वर अपने आपको अपने जैसा एक और ईश्वर बना सकता है नहीं परमार्थिक

563
00:39:15,320 --> 00:39:19,960
धरातल पर नहीं बना सकता मगर वो परमार्थ है क्या

564
00:39:19,960 --> 00:39:24,120
जीवन कर रहा है जब तक आप किसी को सर्वशक्तिमान ईश्वर मान रहे

565
00:39:24,120 --> 00:39:28,240
हो है ना अगर आपने परमार्थिक धरातल पर

566
00:39:28,240 --> 00:39:32,520
ईश्वर के एक्जिस्टेंस को मना कर दिया मैं नहीं मानता ऐसे ईश्वर क्योंकि ये परमार्थिक धरातल

567
00:39:32,520 --> 00:39:36,560
में बाध्य हो गया बाधित हो गया तो क्या होगा जैसे ही आपने ईश्वर

568
00:39:36,560 --> 00:39:40,760
को मना किया वैसे ही आपके पास परमार्थिक धरातल का एक्जिस्टेंस भी नहीं बचा क्योंकि

569
00:39:40,760 --> 00:39:45,120
परमार्थ को आप देख किसकी नजरों से रहे हो ईश्वर की नजरों से और आप ईश्वर

570
00:39:45,120 --> 00:39:49,200
को ईश्वर माना नहीं तो जब आपने ईश्वर को ईश्वर नहीं माना तो जैसे ही ईश्वर को

571
00:39:49,200 --> 00:39:53,280
ईश्वर नहीं माना तो परमार्थिक धरातल आपका नष्ट हो गया जब नष्ट हो गया

572
00:39:53,280 --> 00:39:57,480
तो आपके पास फिर ये प्रश्न शेष रह गया कि आप ईश्वर को ईश्वर क्यों

573
00:39:57,480 --> 00:40:02,080
नहीं मान रहे आप अगर ये कहोगे परमार्थ में वो वादित है तो आपको

574
00:40:02,080 --> 00:40:06,080
सामने वाला आपसे पूछेगा मैं आपसे पूछूंगा कि परमार्थ तो एजिस्ट ही नहीं करता ना

575
00:40:06,080 --> 00:40:10,240
जब आप ईश्वर को ईश्वर नहीं मान रहे तो तो कहने का अर्थ ये है कि व्यवहार

576
00:40:10,240 --> 00:40:13,360
में सब कुछ कर देने वाला कर सकने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान होना

577
00:40:13,360 --> 00:40:17,440
चाहिए परमार्थ का तो मेरी आवाज आ रही है

578
00:40:17,440 --> 00:40:21,040
सभी

579
00:40:21,040 --> 00:40:25,560
को सभी को आवाज आ रही है आ आ रही है ठीक हां

580
00:40:25,560 --> 00:40:29,640
तो व्यवहारिक अच्छा धरातल पर ईश्वर का सब कुछ कर सकने

581
00:40:29,640 --> 00:40:34,120
वाला एक एक मिनट बस मैं फिनिश कर लू अपनी जिस प्रकार से

582
00:40:34,120 --> 00:40:37,240
एक सोता हुआ व्यक्ति जगने के बाद यह नहीं कह सकता

583
00:40:37,240 --> 00:40:41,400
कि मैं किसी की आवाज सुनक जगा हूं क्योंकि अगर वह सुन सकता है

584
00:40:41,400 --> 00:40:45,680
तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता और अगर वह सो रहा है तो उसका सुनना सिद्ध

585
00:40:45,680 --> 00:40:49,840
नहीं होता इसी प्रकार से परमार्थ के आधार पर कोई व्यक्ति यह

586
00:40:49,840 --> 00:40:54,080
नहीं कह सकता कि मैं ईश्वर को नहीं मानता क्योंकि अगर

587
00:40:54,080 --> 00:40:58,120
वह परमार्थ को जानता है तो ईश्वर को तो उसका को ना मानना

588
00:40:58,120 --> 00:41:02,200
सिद्ध नहीं होता और अगर व ईश्वर को नहीं मानता है तो

589
00:41:02,200 --> 00:41:03,200
उसका

590
00:41:03,200 --> 00:41:08,000
जानना सिद्ध नहीं

591
00:41:08,000 --> 00:41:12,400
होता अा यह

592
00:41:12,400 --> 00:41:16,520
देखिए सबसे पहले तो यह ओम देखिए ओम

593
00:41:16,520 --> 00:41:20,600
ऐ आर्य समाज लिखते हैं इस्लाम के दीपक यह देखिए

594
00:41:20,600 --> 00:41:24,840
आर्य समाज चोक से य प्रकाशित होती है इसमें इस्लाम की इतनी तारीफ

595
00:41:24,840 --> 00:41:27,960
की गई है बहुत ज्यादा

596
00:41:27,960 --> 00:41:32,040
अच्छा इस्लाम इस्लाम और आर्य समाज अच्छा अब

597
00:41:32,040 --> 00:41:36,040
ये कोई कह देंगे भाई साहब ये तो गलत मतलब मिलावटी है किसी और ने

598
00:41:36,040 --> 00:41:42,040
छाप दी ऐसे कैसे छाप देगा भाई आर्य समाज चौक से छपी हुई

599
00:41:43,200 --> 00:41:47,240
है ठीक है तो भाई मतलब यह अपना तो छुपा के रखते

600
00:41:47,240 --> 00:41:51,360
हैं कि भाई किसी को दिख ना जाए अच्छा एक बात और बता अगर यह पीडीएफ कोई वायरल करता है ना

601
00:41:51,360 --> 00:41:55,640
तो उसको धमकी देते हैं कि मूर्ख हो के तो ये क सब वायरल कर रहे हो भाई क्यों नहीं वायरल

602
00:41:55,640 --> 00:42:00,720
करेंगे

603
00:42:00,720 --> 00:42:05,760
एक बात और बताता हूं कि राहुल आर्य को सब जानते

604
00:42:05,760 --> 00:42:10,040
होंगे ठीक है जी जी राहुल आर्य ने एक वीडियो

605
00:42:10,040 --> 00:42:14,080
बनाई थी कि जो कुंभकरण है वह

606
00:42:14,080 --> 00:42:18,320
छ महीने तक नहीं सोता था ऐसा वाल्मीकि

607
00:42:18,320 --> 00:42:22,320
रामायण में प्रकरण ही नहीं मिलता है कि कुंभकरण छ महीने सोता था

608
00:42:22,320 --> 00:42:26,360
इनकी वाल्मीकि रामायण अलग है य जगदीश्वरानंद सरस्वती नाम के कोई व्यक्ति

609
00:42:26,360 --> 00:42:30,480
है जी जी उने मेरे पास है वो वाल्मीकि रामायण भी है वो

610
00:42:30,480 --> 00:42:34,480
वाली ठीक है तो उसमें श्लोक नहीं था जिसमें छ

611
00:42:34,480 --> 00:42:38,480
महीने सोता था चलो यहां तक ठीक थी बात वो व्यक्ति वही बोल

612
00:42:38,480 --> 00:42:42,560
रहा है जो उनकी वाल्मीकि रामायण लिखा है उसने आगे यह बोला कि मिलावटी

613
00:42:42,560 --> 00:42:46,560
वाली वाल्मीकि रामायण में भी वो श्लोक नहीं है जबकि तीन चार श्लोक

614
00:42:46,560 --> 00:42:50,720
मिलते हैं जिसमें कुंभकरण छ महीने तक सोता है ऐसी बात लिखी है वाल्मीकि रामायण

615
00:42:50,720 --> 00:42:54,800
में गीता प्रेस से जो छपती है तो उस व्यक्ति ने वो वाली वाल्मीकि रामायण भी

616
00:42:54,800 --> 00:42:58,280
नहीं पढ़ी है कभी वो सिर्फ लेख पढ़ के ही वीडियो

617
00:42:58,280 --> 00:43:02,520
बना डालता है ठीक है और लोगों को भ्रम में डालता है लोग सोचते हैं अरे ये तो पंडितों

618
00:43:02,520 --> 00:43:06,560
ने मिला दी ये तो पंडितों ने मिला दी दूसरा ये खुद

619
00:43:06,560 --> 00:43:10,560
के दयानंद जी को भी नहीं पढ़ते हैं एक वीडियो बनाई थी राहुल आर्य ने उसमें कह

620
00:43:10,560 --> 00:43:14,560
रहा था कि अगर मासिक धर्म चालू है किसी स्त्री के तो

621
00:43:14,560 --> 00:43:18,960
पंडा लोग कहते हैं कि उसको पूजा में ना बैठाए पूजा में ना बैठाए

622
00:43:18,960 --> 00:43:23,040
उसका स्पर्श ना करे वो पूजा पठ दि ना करे तब वो कहता है छाती ठोक

623
00:43:23,040 --> 00:43:27,320
के राहुल आर कि कौन से वैदिक ग्रंथों में ऐसा लिखा हुआ है कि स्त्री को

624
00:43:27,320 --> 00:43:31,480
ये सब नहीं करना चाहिए सब पंडितों ने मिला दिया है ये अपने स्वार्थ सिद्धि करते हैं ऐसा

625
00:43:31,480 --> 00:43:35,560
कुछ नहीं लिखा हुआ अरे जब दिखाऊं आपको दयानंद सरस्वती जी ने

626
00:43:35,560 --> 00:43:40,040
क्या लिखा है उसमें हम ये देखिए

627
00:43:40,040 --> 00:43:44,280
ये संस्कार विधि है इसमें पढ़िए अगर आपको दिख रहा है तो

628
00:43:44,280 --> 00:43:48,520
उस रज स्ला के हाथ का छुआ पानी भी ना पिए पूजा

629
00:43:48,520 --> 00:43:52,640
तो दूर की बात छुआ पानी तक पीने को मना कर दिया

630
00:43:52,640 --> 00:43:56,760
ये कहां लिखा है कौन सा ग्रंथ है ये ये संस्कार विधि सं विधि

631
00:43:56,760 --> 00:44:00,840
अच्छ अच्छा अच्छा दयानंद सरस्वती जी ने लिखी है ये ना वह

632
00:44:00,840 --> 00:44:05,120
स्त्री कुछ काम करे किंतु एकांत में बैठी रहे तो भाई खुद के मतलब

633
00:44:05,120 --> 00:44:09,640
खुद के तो ग्रंथ पढ़ लो तुम पंडा पंडा के के पंडितो आरोप लगाते हो

634
00:44:09,640 --> 00:44:13,360
खुद कुछ नहीं पढ़ते जीवन भर हा सारे

635
00:44:13,360 --> 00:44:18,040
ग्रंथ इनके अपने अब बात एक चीज यह आती है कि मैंने उस

636
00:44:18,040 --> 00:44:22,240
वीडियो में सवाल इतने इनसे पूछे हैं उसमें से सवालों को इन्होने

637
00:44:22,240 --> 00:44:26,240
लिया ही नहीं कि भाई जब आना जाना स नहीं होता नहीं

638
00:44:26,240 --> 00:44:30,560
लेते सवाल पूछे उनको लिया ही नहीं इन्होने अपने उसम जबक

639
00:44:30,560 --> 00:44:34,600
हमने इनका एक एक सवाल लिया था जब बनाया था वीडियो बहुत बैठ के विस्तार से इनकी

640
00:44:34,600 --> 00:44:39,000
सारी अभी एक अच्छा एक चीज मुझे और दिखाई देती है

641
00:44:39,000 --> 00:44:43,120
कि जो इनका फलना फूलना है वह ऐसा दिखाई

642
00:44:43,120 --> 00:44:47,600
देता है जैसे क्रिश्चन जो मिशनरी जिस तरह से काम करते हैं

643
00:44:47,600 --> 00:44:51,680
कि जो दबा कुचला वर्ग होता है उनको यह दबा कुचला पिछड़ा या फिर

644
00:44:51,680 --> 00:44:56,400
अन गया अनजान उस वर्ग के ऊपर यह लोग

645
00:44:56,400 --> 00:45:00,720
हाथ रख और उनको ऐसा दिखाते हैं कि हम तुम्हारे हिमायती हैं

646
00:45:00,720 --> 00:45:04,760
और जिस तरह से मिशनरी उनका परिवर्तन करती हैं इसी

647
00:45:04,760 --> 00:45:08,760
तरीके से य भी अब जैसे किसी का किसी ने शूद्र

648
00:45:08,760 --> 00:45:12,880
कुल में जन्म लिया है तो यह उसको बोलते हैं कि भाई तुम ब्राह्मण हम तुम्हें ब्राह्मण

649
00:45:12,880 --> 00:45:16,880
बना द तो क्या है वही चीज है बिल्कुल जैसे वो क्रिश्चन व पर बना रहे हैं यह

650
00:45:16,880 --> 00:45:21,080
उसको जो आ समाजी बना रहे कि तुम शूद्र हम तुमहे ब्राह्मण बना

651
00:45:21,080 --> 00:45:25,320
देंगे अरे भाई आपने आज तक शूद्र

652
00:45:25,320 --> 00:45:28,640
किसको बनाया है में आपके अकॉर्डिंग शूद्र

653
00:45:28,640 --> 00:45:33,000
है भी कोई कि नहीं एक अगला वीडियो आने वाला है ये वर्ण व्यवस्था पर

654
00:45:33,000 --> 00:45:37,080
जिसमें केवल मैंने तर्क पूछे इन्होने आज तक किसी को शूद्र बनाया ही नहीं

655
00:45:37,080 --> 00:45:41,280
है जितने भी ऐसे ता

656
00:45:41,280 --> 00:45:45,480
पता है इन्होने मनुस्मृति का भाष्य

657
00:45:45,480 --> 00:45:49,480
करते हुए लिखा है व लोक ढूंढना पड़ेगा कि

658
00:45:49,480 --> 00:45:53,480
अगर कोई व्यक्ति अपने नामकरण संस्कार जब होता है अगर कोई

659
00:45:53,480 --> 00:45:57,520
व्यक्ति अपने पुत्र को शुद्र बनाना चाहता हो तो वो शुद्र जैसा नाम रखे अपने पुत्र

660
00:45:57,520 --> 00:46:01,560
का इस तरह सेने मनु में लिख रखा है आपको श्लोक में बता

661
00:46:01,560 --> 00:46:05,760
देता हूं ढूढ के लेकिन आप मुझे बताइए ऐसा कोई

662
00:46:05,760 --> 00:46:09,880
व्यक्ति होगा जो अपने पुत्र को शुद्र बनाना चाहता हो वही तो मैं कह

663
00:46:09,880 --> 00:46:13,960
रहा हूं अगर मनुष्य की इच्छा पर आप वर्ण व्यवस्था को छोड़ दोगे तो विप्लव होगा

664
00:46:13,960 --> 00:46:18,200
और वो विप्लव हो रहा है ब आज हर कोई दूसरे के कार्यक्षेत्र में बाजी

665
00:46:18,200 --> 00:46:22,960
मारना चाहता है कोई कोई अपने साब सीमा में है ही नहीं

666
00:46:22,960 --> 00:46:27,200
जब भगवान श्री कृष्ण कहेंगे जब भगवान श्री कृष्ण कहे

667
00:46:27,200 --> 00:46:31,240
हे अर्जुन तू क्षत्रिय जा रक्षा करना तेरा धर्म है सोही

668
00:46:31,240 --> 00:46:35,280
श्री कृष्ण भगवान वो अर्जुन कहेगा अर्जुन कहेंगे श्री कृष्ण से

669
00:46:35,280 --> 00:46:39,320
मैंने अभी अभी कर्म ना ण कर्मणा वर्ण व्यवस्था के अनुसार

670
00:46:39,320 --> 00:46:43,520
अपना जो है वर्ण बदल लिया है और अभी अभी मैंने पंडिताई करने की सोची

671
00:46:43,520 --> 00:46:44,120
है

672
00:46:44,120 --> 00:46:48,160
मैं जा रहा हूं कथा बचने मैं तो यहां से चला अब आप संभालो और व

673
00:46:48,160 --> 00:46:52,200
रथ से उतर के चला जाएगा और पीछे श्री कृष्ण भगवान अर्जुन सुन भाई

674
00:46:52,200 --> 00:46:56,920
अरे सुन ले भाई जन्म से होता मण से नहीं होता मया सिस्टम माया

675
00:46:56,920 --> 00:47:00,960
ने बनाया है अरे सुन नहीं नहीं कर्मणा मैं आर समाजी हो गया

676
00:47:00,960 --> 00:47:06,160
हूं मैं स्कन वाला हो गया हूं कर्मणा मैं तो कर्मणा मानता हूं

677
00:47:06,160 --> 00:47:10,320
वाह अ एक बात और जोड़ना चाहता हूं कि

678
00:47:10,320 --> 00:47:14,400
यसे बोलते कि वण बदल जाता है ठीक है मान मनुस्मृति में सजा

679
00:47:14,400 --> 00:47:18,480
का दंड का विधान है कि चारों वर्णों को अगर चार वर्ण के लोगों

680
00:47:18,480 --> 00:47:23,400
ने एक अपराध किया है एक ही अपराध तो चारों को अलग अलग सजा मिलेगी

681
00:47:23,400 --> 00:47:27,480
आज सुबह ला वा हा ब्राह्मण क्या करेगा कि

682
00:47:27,480 --> 00:47:31,520
पहले शुद्र बनेगा कि अ मैं शुद्र वाला कार्य करके शुद्र बन गया अपराध कर दिया

683
00:47:31,520 --> 00:47:35,720
तो साबित हुआ तो शद कम सजा मिलेगी तो भाई य प्लानिंग करके बच

684
00:47:35,720 --> 00:47:39,920
सकते है इसमें तो लोग इनका मेरा सीधा सा प्रश्न है

685
00:47:39,920 --> 00:47:44,520
कि जैसे अभी ये भी एक बहुत बात फैलाई जाती हैकन के द्वारा

686
00:47:44,520 --> 00:47:48,520
कि भैया वो जो शास्त्र है तमोगुण शास्त्र है तमोगुण लोगों के लिए

687
00:47:48,520 --> 00:47:52,640
है तो अगर वो तमोगुण लोग है तो इसका मतलब तमोगुण लोग एजिस्ट

688
00:47:52,640 --> 00:47:56,880
करते होंगे ना दुनिया में अब एजिस्ट करते तो क्या इनके बाहर

689
00:47:56,880 --> 00:47:59,120
गेट पर कोई खड़ा होता है क्या जो

690
00:47:59,120 --> 00:48:03,560
पूछता है तुम्हा तुम तमोगुण हो कि सतोगुण हो तो तो अंदर जाओ

691
00:48:03,560 --> 00:48:07,720
क्योंकि अंदर जो भागवत पढ़ाया जाएगा शिव पुराण जो है नहीं पढ़ाया जाएगा

692
00:48:07,720 --> 00:48:11,800
तो इन्होंने आज तक जितने भी ऐसे तंत्र है उन्होंने कभी किसी

693
00:48:11,800 --> 00:48:15,840
को शूद्र बनाया है घोषित किया है तो इनके हिसाब से तो सर्विस

694
00:48:15,840 --> 00:48:20,080
डिपार्टमेंट है ही नहीं दुनिया में तो सर्विस कर कौन रहा है अगर

695
00:48:20,080 --> 00:48:24,120
सर्विस व शूद्र कर रहे हैं तो इन्होंने क्या उसको शूद्र कहा है नहीं कहा है

696
00:48:24,120 --> 00:48:28,640
इन्होंने किसी को शूद्र कहा ही नहीं है आप देख लेना इस कन और आर

697
00:48:28,640 --> 00:48:33,400
समाज के द्वारा घोषित शूद्र एक भी निकलवा दो

698
00:48:33,400 --> 00:48:37,480
और ये जो प्रमाण पत्र की बात है घोषणा य कौन से नियमों के आधार पर कौन होता

699
00:48:37,480 --> 00:48:41,560
है कौन देता है क्या होता है कुछ नहीं बिल्कुल अच्छा

700
00:48:41,560 --> 00:48:45,960
ये देखिए अध्याय दो श्लोक 31 और 32

701
00:48:45,960 --> 00:48:50,320
ब्राह्मण बनाने के इच्छुक बालक का नाम शुभ तत्व श्रेष्ठ तत्व भाव

702
00:48:50,320 --> 00:48:55,240
बोधक शब्दों से जैसे ब्रह्मा विष्णु मनु शिव अग्नि वायु रवि

703
00:48:55,240 --> 00:48:59,840
आदि रखना चाहिए अब इसमें देखिए जैसे शुद्र वाला आया है

704
00:48:59,840 --> 00:49:04,000
ये शुद्र रखने के इच्छुक बालक का यानी आप शुद्र बनाना चाहते हैं तो

705
00:49:04,000 --> 00:49:08,000
शुद्र जैसा रखिए जबकि इसका अर्थ यह नहीं था इसका प्रचलित अर्थ क्या है

706
00:49:08,000 --> 00:49:12,000
ब्राह्मण का मंगल मंगल सूचक शब्द से युक्त है ना तो

707
00:49:12,000 --> 00:49:14,160
लेकिन अब इनको मिलावटी भी घोषित नहीं कर

708
00:49:14,160 --> 00:49:18,240
सकते श्लोक को तो क्या करें तो इसका अर्थ यह कर दिया जबकि श्लोक

709
00:49:18,240 --> 00:49:24,240
के विपरीत है मूल संस्कृत के विपरीत अर्थ है यह तो बिल्कुल तो

710
00:49:27,280 --> 00:49:32,000
बहुत बढ़िया काफिर है आजम जी बहुत

711
00:49:32,000 --> 00:49:36,040
बढ़िया मैं और ब जिसको चर्चा करनी है

712
00:49:36,040 --> 00:49:40,200
ना वर्ण व्यवस्था पर या किसी भी बात पर हमारा एक

713
00:49:40,200 --> 00:49:44,920
फॉर्म है एक नंबर नोट कर लीजिए यह

714
00:49:44,920 --> 00:49:49,840
कोई चुनौती नहीं है शास्त्रार्थ की चर्चा का आमंत्रण है

715
00:49:49,840 --> 00:49:53,960
जिसको भी जो भी असहमत है हमारे विचारों से

716
00:49:53,960 --> 00:49:58,160
तो वो एक नंबर नोट करें उस पर वो मैसेज अगर करता है जय श्री राम

717
00:49:58,160 --> 00:50:02,480
या किसी भी प्रकार का अभिवादन करेगा तो उसको

718
00:50:02,480 --> 00:50:06,560
एक फॉर्म प्राप्त होगा कि वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा के

719
00:50:06,560 --> 00:50:10,680
लिए फॉर्म भरें वह फॉर्म आप भरेंगे डिटेल वैसे

720
00:50:10,680 --> 00:50:14,920
ही हमें आपकी सारी जानकारी प्राप्त हो जाएंगी और हमारी और आपकी एक स्वस्थ चर्चा सुनिश्चित

721
00:50:14,920 --> 00:50:18,960
हो जाएगी फॉर्म की एक मर्यादा है कि यदि डिसएग्रीमेंट पर

722
00:50:18,960 --> 00:50:23,240
हमारी चर्चा होनी है तो आपको फेस के साथ आना है बिना फेस

723
00:50:23,240 --> 00:50:27,280
के हम चर्चा नहीं करेंगे अभी अभी कोई सूरज जी उन्होने कहा मुझे

724
00:50:27,280 --> 00:50:29,240
लिंक दो यह दो वो दो

725
00:50:29,240 --> 00:50:34,560
तो सूरज सनातनी जी आप वो फॉर्म भर दीजिए मैं आपको नंबर बता रहा

726
00:50:34,560 --> 00:50:39,640
हूं 740

727
00:50:39,640 --> 00:50:43,760
8369 इस पर आप व करेंगे तो आपको फॉर्म मिल जाएगा

728
00:50:43,760 --> 00:50:47,840
और जैसे ही फॉर्म मिलेगा बस उसको आप भरिए उसमें अपनी फोटो

729
00:50:47,840 --> 00:50:52,000
वगैरह लगाइए हम थंबनेल वगैरह बनाएंगे और सोशल मीडिया के निमित और

730
00:50:52,000 --> 00:50:56,000
सारी प्रचार सामग्री बनाएंगे और आपको वो दे देंगे आप आइए

731
00:50:56,000 --> 00:51:00,520
आपका नि आमंत्रित है स सम्मान स सम्मान कोई

732
00:51:00,520 --> 00:51:04,760
वहां पर अबे तू तड़ाक मैंने ऋषि वाज के चैनल पर जाकर के देखा

733
00:51:04,760 --> 00:51:08,840
कि उसम एक जगह मेम बनाया है अरे शिवांश द्विवेदी

734
00:51:08,840 --> 00:51:13,320
तूने दो चार तेरे फॉलोअर क्या हो गए तो तू अपने आप को बड़ी तोप समझने लगा

735
00:51:13,320 --> 00:51:17,360
यह है वो तोय इस स्तर पर तुरंत आ जाते हैं अकन वाले थोड़ा

736
00:51:17,360 --> 00:51:21,520
देर में आते हैं और ये मैं कहूंगा इकन के द्वारा

737
00:51:21,520 --> 00:51:25,600
प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है व तब भी आर समाज के ईश्वर से ज्यादा शक्तिशाली है

738
00:51:25,600 --> 00:51:30,280
भाई इतना तो है क्योंकि वो अवतार ले सकता है

739
00:51:30,280 --> 00:51:34,600
बिल्कुल अच्छा इसकी मैं इस पर एक बात करना चाहूंगा वो जो ईश्वर

740
00:51:34,600 --> 00:51:38,760
की जो शक्ति है ना शक्ति संपन्नता से ही धर्म की स्थापना होती है तो जिसके पास

741
00:51:38,760 --> 00:51:42,960
जितना कमजोर ईश्वर उसकी मर्यादा उतनी कमजोर है

742
00:51:42,960 --> 00:51:44,320
ना मेरे कुछ

743
00:51:44,320 --> 00:51:48,360
आर्य समाज मित्र है जो अब पौराणिक बन चुके हैं वो मुझे

744
00:51:48,360 --> 00:51:52,520
ऐसे ही कहते हैं कि जीवन में कुछ भी कर लेना लेकिन कभी सत्या

745
00:51:52,520 --> 00:51:56,880
प्रकाश मत पढ़ने को देना किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो कुछ नहीं जानता हो

746
00:51:56,880 --> 00:52:00,880
उसका जीवन बर्बाद हो जाएगा उसके आगामी पाच साल बर्बाद हो जाएंगे क्यों कारण

747
00:52:00,880 --> 00:52:05,200
वो बताते हैं कि हम जब हमने जब पढ़ा तो हमारे अंदर सत्या

748
00:52:05,200 --> 00:52:09,680
सत्या प्रकाश पढ़ने के बाद यह अहंकार आ गया कि भाई हम हो गए ज्ञानी

749
00:52:09,680 --> 00:52:13,720
ठीक है ये आचार्य कौन ये संत कौन यह माता

750
00:52:13,720 --> 00:52:17,800
पिता कौन भाई मैं हूं ज्ञानी सबसे बड़ा ज्ञानी हो गया

751
00:52:17,800 --> 00:52:21,880
तो हर चीज में मुझे कमी दिखने लग गई कि इसमें भी कमी है इसमें भी

752
00:52:21,880 --> 00:52:26,120
कमी है इसमें भी कमी है अच्छा ग्रंथ भी मैं इसलिए पढ़ूंगा कि मुझे उसमें खंडन

753
00:52:26,120 --> 00:52:30,160
करना है है भाई हम इस स्तर के हो गए हैं सत्या प्रकाश पढ़ के कि अब तो हम खंडन

754
00:52:30,160 --> 00:52:34,280
करेंगे पढ़ना अरे हमने सब कुछ सीख लिया तो आगामी पा साल बस

755
00:52:34,280 --> 00:52:38,320
ही खंडन वणन खंडन वर्न लेख किताब जो भी है वह करता रहेगा

756
00:52:38,320 --> 00:52:42,560
जीवन अपना बर्बाद कर लेगा कुछ नहीं कर पाएगा जीवन में मूर्ति पूज

757
00:52:42,560 --> 00:52:46,960
को से द्वेष करेगा कि भाई दिखते ही चिड़चिड़ापन उसके अंदर चिड़चिड़ापन

758
00:52:46,960 --> 00:52:51,560
हमेशा रहता है इस कारण यह कभी ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर पाते इसका मैं

759
00:52:51,560 --> 00:52:56,520
सामने कह रहा हूं भाई किसी को चड़ लगे ना तो भाई अंदर अपने मन पर हाथ रख के

760
00:52:56,520 --> 00:52:59,400
अपने मन से ही कह लेना कि भाई यह सत्य है नहीं है आपको

761
00:52:59,400 --> 00:53:03,520
लगेगा भाई सत्य है ठीक है आपके अंदर चिड़चिड़ापन है यह सत्य

762
00:53:03,520 --> 00:53:07,680
है आप इस कारण ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर पाते यह भी सत्य है मा

763
00:53:07,680 --> 00:53:12,680
एक कोने में कहीं तो सत्य का होगा ना कि हा सही कह रहा है

764
00:53:12,680 --> 00:53:16,720
य तो अब ये वो जो मैं कह रहा था कि दयानंद सरस्वती जी ने

765
00:53:16,720 --> 00:53:21,560
द्वेष पूर्वक भाष्य किया है की अध्याय चार लोक

766
00:53:21,560 --> 00:53:26,600
य 87 8 है स

767
00:53:26,600 --> 00:53:30,920
मनुस्मृति यह देखिए आर्य समाज का ही है

768
00:53:30,920 --> 00:53:36,920
हां हा विशुद्ध [हंसी]

769
00:53:37,240 --> 00:53:41,600
मनुस्मृति हा तो

770
00:53:41,600 --> 00:53:45,920
अच्छा मेरे 700 और बर्बाद हो गए इसमें ठीक है

771
00:53:45,920 --> 00:53:50,120
कि आज मेरे को पस्ता पहले मैं जब आर्य समाजी था तब खरीदा था जो जोश में

772
00:53:50,120 --> 00:53:54,240
आज पछतावा होता है अर्थ गलत है सारे

773
00:53:54,240 --> 00:53:59,680
क्या पढ इसमें तो इसमें देखिए इन्होने जो अर्थ किया

774
00:53:59,680 --> 00:54:04,120
है यह वाला वर्ड देखिए दश ध्वज सम

775
00:54:04,120 --> 00:54:08,480
वेष दश ध्वज के समान वेश अर्थात वेष भंडवा

776
00:54:08,480 --> 00:54:12,640
भांड दूसरे की नकल अर्थात पाषाण मूर्तियों के पूजक अब मुझे

777
00:54:12,640 --> 00:54:17,640
बताइए पाषाण मूर्तियों के पूजक अर्थ कैसे हुआ इसमें

778
00:54:17,640 --> 00:54:21,880
अ करने की क्या जरूरत थी अर्थात लिखकर और दूसरी

779
00:54:21,880 --> 00:54:25,920
बात ये स्टार आपकी आवाज कट रही है अच्छा अब आ रही है साफ आपकी

780
00:54:25,920 --> 00:54:29,920
आवाज कट रही है साफ आ रही

781
00:54:29,920 --> 00:54:32,160
है

782
00:54:32,160 --> 00:54:36,440
अब तो इन्होंने ये मूर्ति ये जो है मूर्ति

783
00:54:36,440 --> 00:54:40,600
पूज मूर्तियों के पूजक यानी पुजारी ब्रैकेट में पुजारी तक लिखा है यह क्यों

784
00:54:40,600 --> 00:54:44,600
लिखा है इसका अर्थ जबकि इसका अर्थ तो यह है ही नहीं और दूसरा अ ये

785
00:54:44,600 --> 00:54:48,600
स्टार देखिए ये स्टार देखिए

786
00:54:48,600 --> 00:54:52,480
इसका अर्थ है कि सुरेंद्र कुमार जी जो आर्य समाज के विद्वान है इसको मिलावट माना

787
00:54:52,480 --> 00:54:56,480
है इस श्लोक को लेकिन दयानंद सरस्वती जी ने तो इसको प्रमाण

788
00:54:56,480 --> 00:55:00,480
स्वरूप माना है तो दयानंद जी जो है वह सही है

789
00:55:00,480 --> 00:55:05,240
कि कुमार जी सही है मुझे तो आज तक यही समझ नहीं आ रहा

790
00:55:05,240 --> 00:55:09,760
दयानंद जी को भी सही नहीं मानते भाई साब उन्होंने प्रमाण स्वरूप प्रयोग किया होगा

791
00:55:09,760 --> 00:55:13,960
वोह गलत है क्योंकि यह तो मिलावटी है श्लोक ही तो इनम आपस में

792
00:55:13,960 --> 00:55:16,400
नहीं बनती

793
00:55:16,400 --> 00:55:20,480
कभी हा मैं देखो मैं यहां पर एक बात कहना चाहूंगा कि भाई

794
00:55:20,480 --> 00:55:24,480
हम आपके ग्रंथों से कुछ बातें निकाल करके बता रहे हैं अगर हम

795
00:55:24,480 --> 00:55:28,680
गलत मतलब समझ रहे हैं तो आप सही मतलब बताने के लिए आमंत्रित है अगर

796
00:55:28,680 --> 00:55:31,920
हम जो आपने लिखा है

797
00:55:31,920 --> 00:55:35,920
वो मानते हैं भाई जैसे आपने व ंं का अर्थ कह दिया

798
00:55:35,920 --> 00:55:39,920
कि गुरुदेव ने जो है करपात्री जी का विरोध किया फिर उसका हमने निस्तारण दे

799
00:55:39,920 --> 00:55:44,120
दिया तो उसके बारे में आपने अपने वीडियो में बात नहीं की चंदासी वाले

800
00:55:44,120 --> 00:55:49,000
मामले में आपने बहुत से प्रश्नों पर बात ही नहीं की है

801
00:55:49,000 --> 00:55:53,480
जो निचले स्तर के आर समाज यों के सरगना है उनसे कह रहा हूं मैं

802
00:55:53,480 --> 00:55:57,640
और इनका सबसे अच्छा नाम जो मुझे लगता है व आरमा की बज अलंकार समाजी

803
00:55:57,640 --> 00:56:01,640
ज्यादा अच्छा लगता है क्योंकि इन्होंने जो अलंकार दिया है ना वो

804
00:56:01,640 --> 00:56:05,880
वो जो है प्रशंसा के योग्य है अलंकार इन्होंने जो

805
00:56:05,880 --> 00:56:07,480
वैदिक मंत्रों को अलंकार दिया

806
00:56:07,480 --> 00:56:11,480
है वो बहुत ज्यादा एक शशांक श्री

807
00:56:11,480 --> 00:56:17,160
श्रीवास्तव जी कह रहे हैं कि करते रहो सूत्रों का शोषण शास्त्रों के

808
00:56:17,160 --> 00:56:21,240
अनुसार नहीं गलत समझ नहीं आ रहा शूद्र

809
00:56:21,240 --> 00:56:25,600
जो संज्ञा है वो गणा सूचक नहीं है

810
00:56:25,600 --> 00:56:29,960
आपको अगर कोई आपत्ति है शशांक जी तो आप सादर आमंत्रित है आप

811
00:56:29,960 --> 00:56:34,720
आइए और आपसे चर्चा होगी तू तड़ाक में हम बात नहीं करेंगे जैसे

812
00:56:34,720 --> 00:56:38,800
आपके लोगों ने किया आप देखिएगा जाकर के कितने गलत तरीके से बात किया और हम हमारे

813
00:56:38,800 --> 00:56:42,800
वीडियो देखिएगा हमने कैसे जवाब भी दिया और

814
00:56:42,800 --> 00:56:46,840
देखिएगा स्तर बताइएगा कैसा है किसका और फिर बताइए कि स्तर से क्या

815
00:56:46,840 --> 00:56:51,200
पता चलता है कहां पर धर्म का पालन हो रहा

816
00:56:51,200 --> 00:56:55,360
है हसलो हसलो अच्छी बात

817
00:56:55,360 --> 00:56:59,480
आप मुझ सपने जी आपको

818
00:56:59,480 --> 00:57:05,480
मैं बताता हूं अध्याय 12

819
00:57:07,680 --> 00:57:12,360
श्लोक ठीक है देखिए

820
00:57:12,360 --> 00:57:16,560
श्लोक देखिए अध्याय 12 श्लोक 40 मनुस्मृति ही है

821
00:57:16,560 --> 00:57:21,160
इसमें जीव की तीन गतियां बताई गई है तो

822
00:57:21,160 --> 00:57:25,200
सत्व गुण का आचरण करने वाले पर जन्म देवत्व

823
00:57:25,200 --> 00:57:29,360
अर्थात दिव्य गुणों से युक्त विशेष मनुष्य का जन्म प्राप्त करते

824
00:57:29,360 --> 00:57:33,840
हैं ठीक है जन्म से मनुष्य विद्वान हो गया इनम रजोगुण

825
00:57:33,840 --> 00:57:38,000
अर्थात रजोगुण आचरण करने वाले साधारण मनुष्य का जन्म पाते

826
00:57:38,000 --> 00:57:42,040
हैं एक साधारण मनुष्य होता है एक असाधारण मनुष्य होता

827
00:57:42,040 --> 00:57:46,120
है जो आर्य समाजी होता है ठीक है जन्म से सत्या प्रकाश का ज्ञान

828
00:57:46,120 --> 00:57:50,280
लिए लेता है व तमोगुण आचरण करने वाले पशु पक्षी

829
00:57:50,280 --> 00:57:54,560
कीट पतंग वृक्ष वनस्पति आदि त्रय जन्मों में प्राप्त करते हैं

830
00:57:54,560 --> 00:58:00,560
तो ऐसा ही सेम श्लोक एक महाभारत में भी मिलता है वो मैं बता देता

831
00:58:00,960 --> 00:58:05,040
हूं बारात आ रही है किसी की तो आवाज आएगी शायद

832
00:58:05,040 --> 00:58:08,160
गानों

833
00:58:08,160 --> 00:58:10,280
की

834
00:58:10,280 --> 00:58:14,440
देखिए महाभारत का श्लोक है प्राणी पहले ही सुख

835
00:58:14,440 --> 00:58:18,880
दुख तथा प्रिय और अप्रिय विषयों में विचरण करके कर्म के अनुसार

836
00:58:18,880 --> 00:58:23,280
नरक त्रक योनि मनुष्य योनि अथवा देव योनि में जाते हैं

837
00:58:23,280 --> 00:58:27,480
तो अब इनको मानना पड़ रहा है यह श्लोक मिलावटी कह

838
00:58:27,480 --> 00:58:32,240
नहीं पा रहे इसलिए इन्होंने क्या करा है उस देवता को हमेशा विद्वान बताया है

839
00:58:32,240 --> 00:58:36,480
देवता क्यों नहीं मान रहे मुझे यह समझ नहीं आ रहा देवता योनि के

840
00:58:36,480 --> 00:58:40,920
कर्म के अनुसार जन्म सुनिए कर्म के अनुसार

841
00:58:40,920 --> 00:58:45,320
जन्म जन्म जो है प्राप्त होना जो है वह छंद उपनिषद

842
00:58:45,320 --> 00:58:49,720
में भी बताया गया है कि कर्म के अनुसार योनि प्राप्त होती है और सुनिए

843
00:58:49,720 --> 00:58:54,080
सबसे बड़ी बात मैं मान लू यदि

844
00:58:54,080 --> 00:58:58,120
जो ईश्वर इन्होने एक जगह कहा है प्रकाश में क्या जब यह बात आए

845
00:58:58,120 --> 00:59:02,280
कि शूद्रों को या महिलाओं को वेद मंत्र नहीं पढ़ने चाहिए भाई वेद मंत्र से ही मोक्ष

846
00:59:02,280 --> 00:59:06,640
मिलेगा ऐसा तो है नहीं उन्हीं वेद मंत्रों की व्याख्या प्रवचन

847
00:59:06,640 --> 00:59:10,840
के रूप में की जाएगी भाष्य के रूप में की जाएगी तो उससे भी मोक्ष मिल जाएगा मतलब

848
00:59:10,840 --> 00:59:14,920
तो ज्ञान से है उसी रूप में ज्ञान मिले जो रूप जो है हर कोई

849
00:59:14,920 --> 00:59:16,160
संभाल सकता है नहीं संभाल

850
00:59:16,160 --> 00:59:22,160
सकता व अलग बात है मगर बात य है

851
00:59:22,760 --> 00:59:26,880
कि जो इन्होने लिखा क्या ईश्वर पक्षपात जो व ऐसा

852
00:59:26,880 --> 00:59:31,160
करेगा तो अब यह बताइए कि जो

853
00:59:31,160 --> 00:59:35,160
व्यक्ति वेदों के बगल में जहां वेद रखे हैं मान

854
00:59:35,160 --> 00:59:39,400
लीजिए आ समाज का ही घर है उसमें वेद रखे हैं उसके बगल में जिसका जन्म

855
00:59:39,400 --> 00:59:43,440
हो रहा है वह व्यक्ति उससे ज्यादा सौभाग्यशाली

856
00:59:43,440 --> 00:59:47,800
हो गया जो वेद से उतने ही सेंटीमीटर या फिर इंच

857
00:59:47,800 --> 00:59:52,080
या फिर किलोमीटर दूर है मान लीजिए किसी का जन्म हुआ वेस्ट इंडीज में

858
00:59:52,080 --> 00:59:56,280
और किसी का जन्म हुआ वैदिक घर में वैदिक घर मतलब य अलंकार का घर उसकी

859
00:59:56,280 --> 01:00:00,280
बात कर रहा हूं अलंकार समाज के घर में जब किसी बच्चे का जन्म हुआ किसी

860
01:00:00,280 --> 01:00:04,320
शिशु का जन्म हुआ उसके कंपैरिजन में एक बच्चे का जन्म जब

861
01:00:04,320 --> 01:00:08,480
वेस्ट इंडीज में हो रहा है अलंकार समाजी के घर में जन्म लेने वाला

862
01:00:08,480 --> 01:00:12,600
जो शिशु है वह आसानी से वेद को ग्रहण कर सकता है उसके सामने

863
01:00:12,600 --> 01:00:16,640
वेद है वेदों तक उसकी रीच है मगर एक वेस्ट इंडीज में या फिर

864
01:00:16,640 --> 01:00:20,680
साउथ अफ्रीका के जंगलों में ज जन्म लेने वाला जो प्राणी है उसका

865
01:00:20,680 --> 01:00:24,680
हो सकता है पूरा जीवन बीत जाए वो वेदों तक पहुंच ना पाए तो क्या ईश्वर पक्षपाती है

866
01:00:24,680 --> 01:00:28,800
जो उसने वहां पर जन्म दिया उ वेदों के बगल में ही सबको

867
01:00:28,800 --> 01:00:31,240
जन्म मिलना चाहिए अगर ईश्वर पक्षपाती नहीं

868
01:00:31,240 --> 01:00:35,440
है और कर्म के अनुसार जन्म नहीं मिलता तो वेद जहां रखे

869
01:00:35,440 --> 01:00:39,600
हैं बिल्कुल उसके बगल में होना चाहिए या फिर इससे भी ज्यादा कोई नजदीकी

870
01:00:39,600 --> 01:00:43,840
स्थिति हो सकती है तो वहां पर दुनिया के हर प्राणी को

871
01:00:43,840 --> 01:00:48,040
जन्म मिलना चाहिए क्यों मिल रहा है वेदों से हजारों किलोमीटर दूर किसी को जन्म

872
01:00:48,040 --> 01:00:52,080
और किसी को वेदों वाले घर में जन्म मिल रहा है इसका कारण क्या है क्यों

873
01:00:52,080 --> 01:00:56,120
ईश्वर ऐसा पक्षपात कर रहा है किसी के साथ के उसका पूरा जीवन बीत जाए तब

874
01:00:56,120 --> 01:01:00,800
जाकर के वेद नाम सुन पाए ऐसा क्यों कर रहा है ईश्वर

875
01:01:00,800 --> 01:01:04,920
क्या ईश्वर पक्षपाती है और जो कहो वो सत्यार्थ प्रकार

876
01:01:04,920 --> 01:01:09,000
का स्टाइल है उसमें इसी तरह से इसी भाषा में बात की जो कहो

877
01:01:09,000 --> 01:01:13,880
जो कहो जो कहो बड़ा अच्छा लगता है वहां जब पढ़ते हैं तो

878
01:01:13,880 --> 01:01:18,120
जी सत्या प्रकाश की एक बात में मुझे हंसी आती है कि वो

879
01:01:18,120 --> 01:01:22,280
भागवत पुराण तो भाई किसी बोपदेव ने बनाया है और किसी को विश्वास

880
01:01:22,280 --> 01:01:26,400
ना हो तो वो पत्र खोज ले क्योंकि हमसे तो वो घूम गया प्रमाण

881
01:01:26,400 --> 01:01:30,400
था वही पत्र खो दिया ये तो अचंभे वाली बात है ऐसा

882
01:01:30,400 --> 01:01:34,400
तो मैं कह दूं कि मेरे पास एक पत्र है जिसमें लिखा हुआ है

883
01:01:34,400 --> 01:01:38,640
कि दयानंद सरस्वती अंग्रेजों से मिले हुए थे दयानंद जीहे

884
01:01:38,640 --> 01:01:42,760
ऐसा काल्पनिक पत्र है कि ऐसे मिले हुए थे

885
01:01:42,760 --> 01:01:46,360
पत्र खोल ले एक चीज अभी ये चीज

886
01:01:46,360 --> 01:01:50,360
समझ में आ रही है कि एक तरफ ये कह रहे हैं जो शूद्र होता

887
01:01:50,360 --> 01:01:54,360
है वो वो है जो अज्ञानी है जो जिसके बुद्धि कम है ऐसा ही तो है ना और

888
01:01:54,360 --> 01:01:58,560
एक जगह कह रहे हैं कि अगर व्यक्ति को शूद्र बनाना यानी कोई व्यक्ति

889
01:01:58,560 --> 01:02:02,560
अपने बच्चे को अज्ञानी भी बनाना चाहेगा अपनी बिटिया को अपने बाबू को

890
01:02:02,560 --> 01:02:07,320
अज्ञानी भी बनाना चाहेगा तो ये

891
01:02:07,320 --> 01:02:11,400
समझ में नहीं आया भाई कोई हो तो आप जरूर आइएगा और इन बातों को

892
01:02:11,400 --> 01:02:15,480
बताइएगा जरा क्योंकि हम परंपरा को मानते तो जब तक

893
01:02:15,480 --> 01:02:19,480
आपकी तरफ से ठप्पा नहीं मिल जाएगा तब तक ये सवाल रहेगा आक्षेप नहीं

894
01:02:19,480 --> 01:02:23,480
है ना अच्छा वो आप मैं बता

895
01:02:23,480 --> 01:02:28,280
रहा था ना 1000 हत्या के दोषों के बराबर है जी जी

896
01:02:28,280 --> 01:02:32,920
वो एक तो मिलता है दयानंद जी का पत्र व्यवहार में

897
01:02:32,920 --> 01:02:37,080
देखिए जी रामलीला देखने का दोष हा

898
01:02:37,080 --> 01:02:41,320
दोष है हजार हत्या के समान दोष है यह पत्र व्यवहार है

899
01:02:41,320 --> 01:02:45,440
ठीक है हा पत्र व्यवहार लखनऊ हा यह

900
01:02:45,440 --> 01:02:49,880
मैं आपको भेज दूंगा इसकी पीडीएफ जी जी जी ऋषि दयानंद

901
01:02:49,880 --> 01:02:55,880
सरस्वती विपन राम मंदिर के पक्षधर है भाई

902
01:02:56,360 --> 01:03:00,880
और दूसरा था जीवनी है एक उसम

903
01:03:00,880 --> 01:03:05,640
है हा देवेंद्रनाथ जी

904
01:03:05,640 --> 01:03:09,800
मनीष शर्मा जी देखिए आप

905
01:03:09,800 --> 01:03:14,080
व्यक्तिगत तर्क देते हैं हमारे पास सनातन सिद्धांत है अगर सनातन

906
01:03:14,080 --> 01:03:18,360
सिद्धांतों को आप लागू करेंगे तो वह आसान भी होगा लागू करना

907
01:03:18,360 --> 01:03:22,680
और आसानी से हम अपने जो धर्म है हमारा समाज है उसका भला कर पाएंगे

908
01:03:22,680 --> 01:03:26,880
ये सब अगर ऐसा नहीं करेंगे अगर अगर ईश्वरी सत्ता के नीचे खड़े

909
01:03:26,880 --> 01:03:30,960
होकर के हम अपने विचार प्रकट नहीं करेंगे तो हर व्यक्ति का अपनी अपनी ढपली

910
01:03:30,960 --> 01:03:35,120
अपना अपना राग होगा हम लोग एक हो कैसे पाएंगे अब आपने

911
01:03:35,120 --> 01:03:39,160
एक निकाल दिया अलग-अलग सरनेम होने से हि हिंदू समाज टूट गया है

912
01:03:39,160 --> 01:03:43,480
भाई सनातन ने तो ऐसा कहा नहीं कि अलग-अलग सरनेम

913
01:03:43,480 --> 01:03:47,520
होने की वजह से टूट गया है तो इस पर विचार करिए सनातन सिद्धांत लाइए उनको हम

914
01:03:47,520 --> 01:03:51,640
मानेंगे बिल्कुल मानेंगे मनीष शर्मा जी आप अच्छे

915
01:03:51,640 --> 01:03:55,960
व्यक्ति है देवेंद्रनाथ जी की जीवनी है दयानंद जी का

916
01:03:55,960 --> 01:04:00,080
जीवन जीवनी पुस्तक का नाम है और देवेंद्रनाथ जी जो आरी समाज के वो है

917
01:04:00,080 --> 01:04:04,080
इसमें भी हजार हत्या के दोषों के बराबर बताया है रामलीला देखना

918
01:04:04,080 --> 01:04:08,200
और मूर्ति पूजा करना अच्छा ये रहा

919
01:04:08,200 --> 01:04:11,600
तो हम कोई शास्त्रों से ही बातें बोल मतलब आपकी लिखी

920
01:04:11,600 --> 01:04:15,800
पुस्तको से ही बात बोल रहे कोई अपने मन से नहीं

921
01:04:15,800 --> 01:04:20,040
बोल तो मेरे को बता दीजिएगा

922
01:04:20,040 --> 01:04:24,160
सा हजार हत्या दोष लगा दिया है आपने रामलीला देखने

923
01:04:24,160 --> 01:04:28,320
का तो आर्य समाज तो एक मूवी भी बना रहे थे रामायण के ऊपर तो वो

924
01:04:28,320 --> 01:04:32,600
भी तो रामलीला ही है पूरे टीम को हजार हत्या के दोष के बराबर

925
01:04:32,600 --> 01:04:36,760
माना जाए जी जी जी अरे मैं कह रहा हूं वो आर्य

926
01:04:36,760 --> 01:04:40,840
समाज छोड़ दो कि वो रामलीला पर बना रहे थे चलिए मान लीजिए

927
01:04:40,840 --> 01:04:44,960
और किसी पर बना रहे थे तो मान लीजिए रामलीला तो तब भी एक श्रेष्ठतम

928
01:04:44,960 --> 01:04:49,000
साहित्य हो गया उस पर मूवी बनाने को लोग हत्या बता रहे हैं तो जो

929
01:04:49,000 --> 01:04:53,040
इनके जो अभी अंकुर आर्य बता रहे थे हम फिल्म बना रहे हैं ये बना रहे हैं तो

930
01:04:53,040 --> 01:04:57,440
वो तो कितनी हत्याओं के पा पाप लग गया उनको अंकुर

931
01:04:57,440 --> 01:05:01,640
आर्य छोड़ो क्या ही बोल ति के बारे में बोलते हुए मुझे

932
01:05:01,640 --> 01:05:06,200
थोड़ा ऐसा लगता है कि वो व्यक्ति सिर्फ कमाने के लिए आया है य पर

933
01:05:06,200 --> 01:05:10,360
इन सारी इन सभी बातों का जवाब है आर्य जी जो आप बातें

934
01:05:10,360 --> 01:05:15,120
कर रहे हैं तर्क सम्मत और शास्त्र सम्मत दोनों प्रकार का जवाब है

935
01:05:15,120 --> 01:05:19,280
एंट्री नहीं मिलनी चाहिए तो क्यों नहीं मिलनी चाहिए मिलनी चाहिए तो क्यों मिलनी चाहिए पर इस पर हम लोग

936
01:05:19,280 --> 01:05:23,440
बात कर भी चुके हैं और कभी आप अगर पधारेंगे तो आपसे बात

937
01:05:23,440 --> 01:05:26,840
होगी चर्चा होगी इन लेन की एक बात बताता

938
01:05:26,840 --> 01:05:30,840
हं जब य खंडन करने आते हैं तो जो आप पूछ

939
01:05:30,840 --> 01:05:35,680
रहे शीशा पिघलाकर डालने को इसका जवाब दे दिया है आप पिछली बारी

940
01:05:35,680 --> 01:05:39,800
वो देखिएगा या फिर अभी एक दो दिन में हम लोग शॉर्ट बना देंगे यह जो

941
01:05:39,800 --> 01:05:45,800
बात है पिगला के डालने वाली जो

942
01:05:47,080 --> 01:05:51,240
व्यक्ति को चुराने के निमि वेद मंत्र को

943
01:05:51,240 --> 01:05:55,680
सुन रहा है रट रहा हैब से

944
01:05:55,680 --> 01:05:59,680
दंड दंड के रूप में अगर कोई गुप्त मंत्रणा कहीं पर चलती है

945
01:05:59,680 --> 01:06:03,800
और उसको कोई सुनने का प्रयास करता है मान लीजिए फौज वगैरह का कार्य चल रहा है तो वहां पर जिस

946
01:06:03,800 --> 01:06:07,960
प्रकार से गुप्त मंत्रणा को सुनने उस तरह

947
01:06:07,960 --> 01:06:12,240
से यहां पर है और

948
01:06:12,240 --> 01:06:16,520
अगर स्कार करते उनके हिसाब से देखा जाए तो ब्राह्मणों

949
01:06:16,520 --> 01:06:20,600
के पास पहली बात तो जरूरत से ज्यादा धन कमाने का अधिकार ही नहीं

950
01:06:20,600 --> 01:06:24,920
है और दूसरी बात हां व वो बहुत हो गए क्योंकि परंपरा

951
01:06:24,920 --> 01:06:29,120
प्राप्त जाते ना एक जगह आती है जहां अपने

952
01:06:29,120 --> 01:06:33,600
मत को आगे कर देते हैं और जो सनातन शास्त्र

953
01:06:33,600 --> 01:06:37,720
उनको पीछे कर देते हैं शास्त्र कह रहे हैं परंपरा पर जाओ मगर

954
01:06:37,720 --> 01:06:41,920
आप नहीं जा रहे शास्त्र में मांड को उपनिषद में परंपरा बताई

955
01:06:41,920 --> 01:06:45,920
जा रही है निरुक्त में परंपरा बताई जा रही है मगर आपसे जब पूछा जाता है आपकी परंपरा

956
01:06:45,920 --> 01:06:50,120
क्या है आप नहीं बताते हो बताते हो तो अपने जिनसे आपने वेद लिया

957
01:06:50,120 --> 01:06:54,360
है उनको ही मना कर देते हो य हमारे गुरु नहीं है उनको गधा तक कह देते हो जिनसे आपको वेद

958
01:06:54,360 --> 01:06:58,520
मंत्र प्राप्त हुए तो इसलिए सिद्धांत बदल रहे हैं ना

959
01:06:58,520 --> 01:07:02,680
व्यक्तिगत कौन हो रहा है एक बात मैं बताता और मैं वो बोल रहा था

960
01:07:02,680 --> 01:07:06,800
कि मैं जो बोल रहा था शीशा पिघलाने की जो बात है व सापेक्ष बात

961
01:07:06,800 --> 01:07:11,000
है कि पहली बात तो ब्राह्मणों को जरूरत

962
01:07:11,000 --> 01:07:15,480
से ज्यादा धन कमाने की आज्ञा ही नहीं है दूसरी बात उस पर भी यह है

963
01:07:15,480 --> 01:07:19,680
कि केवल उनके पास वेदी शास्त्रों की जो व्याख्या है या फिर

964
01:07:19,680 --> 01:07:24,160
उनका ही जो उनका ही आलंबन लेकर के आजी को पार्जन था

965
01:07:24,160 --> 01:07:28,320
तो उस पर भी यदि कोई उनके उस चीज को चुराना चाहता तो उस चुराने की दृष्टि

966
01:07:28,320 --> 01:07:32,560
से वहां कहा गया नहीं तो रामायण जो स्वीकार की गई आदि

967
01:07:32,560 --> 01:07:36,600
शंकराचार्य जी के द्वारा तो उसम अद यज्ञ अद यज्ञ में शूद्र भी होते थे जो

968
01:07:36,600 --> 01:07:40,600
सेवा का करते थे उनको बहुत अच्छे आदर से स्वीकारा गया उनके कानों में क्या

969
01:07:40,600 --> 01:07:45,080
वेद मंत्र नहीं पढ़ते

970
01:07:45,080 --> 01:07:50,000
थे आपको मैं एक बात बताता

971
01:07:50,000 --> 01:07:54,040
हूं विवेकानंद जी जो थे अच्छा यहां विवेकानंद जी

972
01:07:54,040 --> 01:07:58,080
का नाम ले रहा हूं तो विवेकानंद एक बार साइड में रख दीजिए उन्होने क्या किया क्या नहीं किया

973
01:07:58,080 --> 01:08:02,280
उसका मेरे को मतलब नहीं है विवेकानंद जी की

974
01:08:02,280 --> 01:08:08,280
पुस्तक इन्होंने कोट किया उनका नाम है आचार्य अग्निवंशी

975
01:08:25,480 --> 01:08:29,520
महिला की कितनी तारीफ करते हैं कि वह ऐसी है वह ऐसी है व विदेशी महिलाओं में

976
01:08:29,520 --> 01:08:33,520
खोए रहते हैं तो ऐसा विवेकानंद

977
01:08:33,520 --> 01:08:38,280
जी के बारे में कहा बो ठीक है कह दिए लेकिन वही दयानंद

978
01:08:38,280 --> 01:08:42,320
दयानंद जी ने भी अपनी पुस्तकों में विदेशी महिलाओं की तारीफ

979
01:08:42,320 --> 01:08:46,400
करी है उसको आप क्यों नहीं बताते भाई

980
01:08:46,400 --> 01:08:50,600
दयानंद जी ने भी तो तारीफ करी है विदेशी महिलाओ की तो सिर्फ

981
01:08:50,600 --> 01:08:54,920
विवेकानंद जी पर ही आप आक्षेप क्यों उठाते हो इस मुद्दे को लेकर कि वो तो विदेशी

982
01:08:54,920 --> 01:08:59,400
महिलाओ की तारीफ करते थे विदेशी महिलाओं की तारीफ तो ये भी करते थे दयानंद जीपी

983
01:08:59,400 --> 01:09:00,160
लेकिन हमको तो

984
01:09:00,160 --> 01:09:04,200
सिर्फ वही नहीं नहीं भाई

985
01:09:04,200 --> 01:09:08,280
वही मानेंगे जो दूसरा करेगा वो गलत सौ सीधी एक बात है पुराणों

986
01:09:08,280 --> 01:09:12,360
पर पुराणिक कथाओं पर या शंकराचार्य के भाष्य

987
01:09:12,360 --> 01:09:16,400
पर देखिए मैं अपने भाई गुरु भाइयों को बताना चाह रहा हूं या

988
01:09:16,400 --> 01:09:20,640
जो भी इस चैनल को फॉलो कर रहे हैं उनको बताना चाह रहा हूं प्रमाण शास्त्र

989
01:09:20,640 --> 01:09:25,480
सम्मत तर्क वितर्क देने के पहले सबसे पहले एक ही बात करिए

990
01:09:25,480 --> 01:09:29,600
कि आप वेदा जो हमारे द्वारा स्वीकार ग्रंथ है उनका

991
01:09:29,600 --> 01:09:33,800
जो अर्थ आप लेकर के आए हैं प्रश्न करने वह अर्थ आपने

992
01:09:33,800 --> 01:09:37,920
पहले किसी हम क्योंकि परंपरा को मानते तो परंपरा प्राप्त

993
01:09:37,920 --> 01:09:42,120
आचार्य से जाके कंफर्म कर लिया है कि आपकी लिखी हुई

994
01:09:42,120 --> 01:09:46,240
बात का हम यह अर्थ समझ रहे हैं शीशा पिघलाकर डालने का यह

995
01:09:46,240 --> 01:09:51,080
अर्थ समझ रहे हैं मंदिर में ना घुसने का हम यह अर्थ समझ रहे हैं

996
01:09:51,080 --> 01:09:55,760
या फिर छुआछूत का हम यह अर्थ समझ रहे हैं रणा मूलक अर्थ समझ रहे हैं

997
01:09:55,760 --> 01:10:01,760
जब आप

998
01:10:03,360 --> 01:10:07,800
य जिन शास्त्रों को हमने स्वीकार किया है या फिर आप रासलीला

999
01:10:07,800 --> 01:10:12,320
पर आक्षेप लगा रहे हैं ब्रह्मवर्त पुराण पर आक्षेप लगा रहे हैं तो आक्षेप लगाने

1000
01:10:12,320 --> 01:10:16,400
से पहले आप हमारे परंपरा प्राप्त आचार्यों से कंफर्म

1001
01:10:16,400 --> 01:10:21,000
करके आइए कि क्या जो अर्थ में समझ रहा हूं

1002
01:10:21,000 --> 01:10:25,360
वही अर्थ इस संदर्भ में इस भाष्य में इस ग्रंथ में दिया जा रहा है

1003
01:10:25,360 --> 01:10:29,480
और जब वहां से आपको संतुष्टि जनक उत्तर नहीं मिलता है तब आपको आक्षेप

1004
01:10:29,480 --> 01:10:33,480
लगाना चाहिए क्योंकि हम हम जिन ग्रंथों को स्वीकार

1005
01:10:33,480 --> 01:10:37,840
करते हैं उसमें बार-बार लिखा हुआ है कि मनुष्य चाहे

1006
01:10:37,840 --> 01:10:42,040
चारों वेद पढ़ ले सारे पुराण पढ़ ले सारे उपनिषद पढ़ ले

1007
01:10:42,040 --> 01:10:46,160
जप तप व्रत दान पुण्य कर्म तीर्थ दान यज्ञ सब कुछ व्यर्थ है

1008
01:10:46,160 --> 01:10:50,200
यदि आपका कोई प्रामाणिक आचार्य गुरु नहीं है

1009
01:10:50,200 --> 01:10:54,720
हम इसको मानते हैं हमारे यहां रामचरित मानस प्रारंभ होती है

1010
01:10:54,720 --> 01:10:58,800
तो उसम सबसे पहले गुरु वंदना होती है हमारे य पुराण जब शुरू होते हैं तो उसमें

1011
01:10:58,800 --> 01:11:02,920
सबसे पहले गुरु वंदना होती है भगवत गीता का अध्ययन करते हैं तो हम चार दो

1012
01:11:02,920 --> 01:11:07,000
को नकारते नहीं है जहा लिखा है एवं परंपरा प्राप्ति मांड को उपनिषद

1013
01:11:07,000 --> 01:11:11,280
का अध्ययन करते तो उसमें उस श्लोक को नकारते नहीं है पहले ही अध्याय में जो परंपरा

1014
01:11:11,280 --> 01:11:15,680
दी गई है कि कैसे ब्रह्मा जी से ग्रंथ यहां तक आए जब हम छंद

1015
01:11:15,680 --> 01:11:18,840
उपनिषद का अध्ययन करते तो चौथे अध्याय के संभवत

1016
01:11:18,840 --> 01:11:23,400
चवा या दूसरा श्लोक है उसको नकारते लिखा हुआ है कि आचार्य

1017
01:11:23,400 --> 01:11:27,480
से प्राप्त विद्या ही फलदायक है पढ़ लीजिएगा जाकर

1018
01:11:27,480 --> 01:11:31,880
के तो इन सब चीजों को अनदेखा नहीं करते हम

1019
01:11:31,880 --> 01:11:37,480
उसको कहते हैं सनातन वैदिक आर्य

1020
01:11:37,480 --> 01:11:43,280
हिंदू एक एक

1021
01:11:43,280 --> 01:11:47,320
आचार्य आचार्य प्रशांत नाम के व्यक्ति है जो आचार्य प्रशांत

1022
01:11:47,320 --> 01:11:51,720
शर्मा जी आर्य समाज वाले वो वेदांती नहीं नवीन वेदांती नहीं

1023
01:11:51,720 --> 01:11:55,880
जो नशा करते हैं तो जी उन्होंने

1024
01:11:55,880 --> 01:12:00,560
एक वीडियो बनाई जो आर्य समाज के आचार्य प्रशांत शर्मा है उन्होंने वीडियो बनाई वर्ण व्यवस्था

1025
01:12:00,560 --> 01:12:04,720
उन्होंने यही कहा मैं आपको कहूंगा आप आर्य समाज की आप

1026
01:12:04,720 --> 01:12:09,520
आर्य समाज की बजाय थोड़ा आदत डाले अलंकार समाज कहने की तो वो ज्यादा थोड़ा

1027
01:12:09,520 --> 01:12:13,640
रस रहेगा उसमें तो उन्होंने यही कहा कि

1028
01:12:13,640 --> 01:12:17,680
वर्ण ऐसे नहीं बदलता है जैसा आजय अलंकार अलंकार

1029
01:12:17,680 --> 01:12:21,840
समाज वाले बता रहे हैं ठीक है उन्होंने ऐसा कहा तो उस

1030
01:12:21,840 --> 01:12:26,000
उनको भी वीडियो पर आर्य समाज के लोग अलंकार समाज के लोग भला बुरा

1031
01:12:26,000 --> 01:12:30,040
कह रहे थे कि आपको कुछ नहीं पता भाई अपने आचार्यों को ही यह कह देते

1032
01:12:30,040 --> 01:12:33,920
कि आपको कुछ नहीं पता जबकि वह आचार्य गुरुकुल में पढ़कर आ

1033
01:12:33,920 --> 01:12:38,080
रहे हैं और यह घर बैठे सत्या प्रकाश पढ़ के आचार्यों पर आक्षेप लगा रहे कि आपको

1034
01:12:38,080 --> 01:12:42,240
कुछ नहीं आता तो आप बताइए कि सत्या प्रकाश पढ़ने पर फिर कैसे व्यक्ति की स्थिति

1035
01:12:42,240 --> 01:12:48,240
हो जाती है गए ना पा साल आगे कचरे

1036
01:12:49,360 --> 01:12:53,720
में जब उन्होंने महाभारत पढ़ा तो उनको समझ आया कि वण ऐसा नहीं बदलता

1037
01:12:53,720 --> 01:12:57,880
है ऋषि आज जब मेरे समूह में आया तब मैंने एक प्रश्न रखा

1038
01:12:57,880 --> 01:13:02,000
था कि वर्ण जो बदल रहा है इसका सर्टिफिकेट कौन दे रहा है

1039
01:13:02,000 --> 01:13:06,120
कौन से ग्रंथ में लिखा है कि यह इसके इतने कर्म को देख के वर्ण का तुम्हारा

1040
01:13:06,120 --> 01:13:10,160
वर्ण बदल जाएगा और इसका सर्टिफिकेट तुमको दे दूंगा यह कहा लिखा हुआ है तो उसको

1041
01:13:10,160 --> 01:13:14,600
समझ नहीं आया यह तो कहीं लिखा हुआ ही नहीं है क्योंकि

1042
01:13:14,600 --> 01:13:18,840
ब्राह्मण का तो न साल या 6 साल की उम्र में ही उपनयन संस्कार हो जाता है

1043
01:13:18,840 --> 01:13:24,120
शूद्रों का तो होता ही नहीं है यह तो दयानंद जी खुद कहते हैं कि शूद्रों का उप संस्कार नहीं

1044
01:13:24,120 --> 01:13:28,320
होगा तो मुझे ये बताइए कि कौन से ग्रंथ में ऐसा लिखा

1045
01:13:28,320 --> 01:13:32,320
हुआ है कि वर्ण बदला जा सकता है और

1046
01:13:32,320 --> 01:13:36,880
उसका सर्टिफिकेट कोई देगा ऐसा कहीं नहीं लिखा हुआ उसने वो जबाला वाला

1047
01:13:36,880 --> 01:13:40,920
जो उदाहरण है ना उपनिषद में नहीं तो अब सर्टिफिकेट की कोई बात ही नहीं

1048
01:13:40,920 --> 01:13:45,080
बची ना अब तो सर्टिफिकेट की कोई बात ही नहीं बची ना पिता जो होगा व

1049
01:13:45,080 --> 01:13:49,000
अपनी क्या बनाना है हा बात ही नहीं रह

1050
01:13:49,000 --> 01:13:53,040
गई अब तो पिता तय करेगा इसको मूर्ख बनाना है

1051
01:13:53,040 --> 01:13:57,440
विद्वान तो ऐसे भी कई पिता होंगे जो मूर्ख बनाते

1052
01:13:57,440 --> 01:14:01,680
होंगे बिल्कुल भाई तुम शत्र बनो संतान

1053
01:14:01,680 --> 01:14:05,680
को हां तुझे सूत्र बनना है भाई नहीं तो सेवा का

1054
01:14:05,680 --> 01:14:10,160
कैसे होंगे वैसे है परंपरा परंपरा बहुत करते रहते

1055
01:14:10,160 --> 01:14:14,640
हैं तो कभी-कभी ऐसा लगता है जो कर्मणा

1056
01:14:14,640 --> 01:14:19,560
को पोषित करने वाले तंत्र है उनके लिए मुझे ऐसा लगता है कभी कभी

1057
01:14:19,560 --> 01:14:23,640
कि दो बातें नजर आती है एक तो जो सूत्रों को

1058
01:14:23,640 --> 01:14:27,720
जो सरल जीवन दिया गया है कि आप कितना भी धन कमा सकते हैं

1059
01:14:27,720 --> 01:14:31,720
आप जो है आजीवन गृहस्थ रह सकते हैं और भी बहुत सी ऐसी चीजें

1060
01:14:31,720 --> 01:14:35,720
जो अगर ब्राह्मणों के पर्सपेक्टिव से आप देखोगे तो बड़ी सरल जीवन है

1061
01:14:35,720 --> 01:14:40,120
तो मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि ये उन लोगों के द्वारा बनाए गए नैरेटिव है

1062
01:14:40,120 --> 01:14:44,160
वो ऐसे ऐसे धूर्त ब्राह्मण जो कि शूद्रों का

1063
01:14:44,160 --> 01:14:48,200
जीवन जीना चाहते हैं तो क्या किया शूद्रों को तो लगा दो इधर

1064
01:14:48,200 --> 01:14:53,040
के तू ब्राह्मण बन और उनका जीवन खुद जिएंगे है

1065
01:14:53,040 --> 01:14:57,280
ना पहली बात तो ये और दूसरी बात वही क्रिश्चियन मिशनरी

1066
01:14:57,280 --> 01:15:01,360
वाली कि भाई कैसे जो कन्वर्जन होगा कन्वर्जन ऐसे ही होगा

1067
01:15:01,360 --> 01:15:04,120
कि जो वहां से तुमको किसी भी पहले तो

1068
01:15:04,120 --> 01:15:08,400
एक प्रॉब्लम क्रिएट करेंगे जो है ही नहीं कि भैया

1069
01:15:08,400 --> 01:15:12,920
जीवन का लक्ष्य ब्राह्मण बनना नहीं है जीवन का लक्ष्य शंकराचार्य

1070
01:15:12,920 --> 01:15:17,160
बनना नहीं है जीवन का लक्ष्य वेद जो हमारे शास्त्र है उनको ही पढ़ना

1071
01:15:17,160 --> 01:15:21,320
नहीं है जीवन का लक्ष्य बल्कि वेद वेदों के उससे

1072
01:15:21,320 --> 01:15:26,240
फूटने वाला जो ज्ञान है उनका आलंबन लेते हुए और जो

1073
01:15:26,240 --> 01:15:31,040
मोक्ष को प्राप्त करना हमारे जीवन का लक्ष्य तो पहली बात तो एक प्रॉब्लम क्रिएट की

1074
01:15:31,040 --> 01:15:35,080
कि एक मार्केट में एक नैरेटिव फैलाया कि नहीं सबका जो लक्ष्य है वो

1075
01:15:35,080 --> 01:15:39,280
यही है गायत्री मंत्र पढ़ना प्रणव का उच्चारण करना

1076
01:15:39,280 --> 01:15:43,840
ब्राह्मण कहलाना रस सला की स्थिति में भी पूजन पाठन करना

1077
01:15:43,840 --> 01:15:48,120
यह पहले तो नैरेटिव बनाए फिर इन नैरेटिव को आपसे चिपका दिया

1078
01:15:48,120 --> 01:15:52,160
देख वो तुझे वेद नहीं पढ़ने दे रहे तेरे लिए वही सबसे इंपोर्टेंट है पता

1079
01:15:52,160 --> 01:15:56,360
है ना देख वो तुझे गायत्री मंत्र नहीं बोलने दे रहे तेरे लिए वही सबसे इंपोर्टेंट

1080
01:15:56,360 --> 01:16:00,360
है पता है ना तो वो व्यक्ति भी वो जो प्रोग्रामिंग हुई थी

1081
01:16:00,360 --> 01:16:04,440
ना मार्केट में नैरेटिव जो बनाए गए थे उसमें आ गया कि हां यार वो मैंने

1082
01:16:04,440 --> 01:16:08,440
सुना इतने दिनों से कि सबसे इंपॉर्टेंट तो गायत्री मंत्र का जाप ही है

1083
01:16:08,440 --> 01:16:12,680
अब क्या हुआ जिनको गायत्री मंत्र का जाप करना है वो तो कर नहीं

1084
01:16:12,680 --> 01:16:17,120
रहे और इनको इनको कहा गया इनकी जीवन को वो जीरहे हैं

1085
01:16:17,120 --> 01:16:19,280
कि तुम यहां से जाओगे सर्विस सर्विसेस

1086
01:16:19,280 --> 01:16:23,760
से जाओगे जगह खाली होगी तो हम आराम से अपना जीवन बिताएंगे तो

1087
01:16:23,760 --> 01:16:27,760
यह सब चीजें दिखाई देती जी आर जी आपका धन्यवाद आपको हमारी बातें

1088
01:16:27,760 --> 01:16:31,880
लॉजिकल लगी और मैं कहूंगा कि आप जो है शंकराचार्य जी

1089
01:16:31,880 --> 01:16:36,040
जो है उनके पास जाइए शीशे वाली बात मैंने वैसे आपको बता दी है करपात्री जी

1090
01:16:36,040 --> 01:16:40,080
ने भी बताई है अभी कुछ दिन पहले एक ऑडियो था मैं हो सकता है आप कहीं पर कनेक्ट होंगे

1091
01:16:40,080 --> 01:16:45,920
तो ऑडियो भेज दूंगा यह जो शीशा पिघलाने वाली बात है सापेक्ष

1092
01:16:45,920 --> 01:16:50,040
है और आप जो है

1093
01:16:50,040 --> 01:16:54,240
कोई अच्छे पद पर जो विराजमान आचार्य गण है उनके पास जाइए परंपरा प्राप्त

1094
01:16:54,240 --> 01:16:58,240
उनसे जो है जब उनसे आपको संतुष्टि ना मिले तो आप आक्षेप कर सकते

1095
01:16:58,240 --> 01:17:02,520
हैं और यहां पर यही होता है हां जी बताइए

1096
01:17:02,520 --> 01:17:06,720
आप बो एक इसमें जोड़ता हूं कि एक किसी सीरीज

1097
01:17:06,720 --> 01:17:11,160
का डायलॉग है कि दुख होता है बहुत जब कोई

1098
01:17:11,160 --> 01:17:15,520
हमारी योग्यता हो और हमारी योग्यता को कोई ना पहचाने ठीक है सबको

1099
01:17:15,520 --> 01:17:19,680
सबने सुना होगा रील्स में आता रहता है मिर्जापुर का डायलॉग है तो

1100
01:17:19,680 --> 01:17:23,680
जो वर्ण व्यवस्था है इसमें जब आप किसी वर्ण में जन्म ले रहे कि आपने

1101
01:17:23,680 --> 01:17:27,680
शुद्र वर्ण में जन्म ले लिया शूद्र कुल में फिर आप बड़े हो गए आपको ज्ञान बहुत

1102
01:17:27,680 --> 01:17:31,760
है लेकिन आप वह सब नहीं कर सकते क्योंकि आपने शास्त्रों ने रोक दिया तो वह

1103
01:17:31,760 --> 01:17:34,360
दुख हुआ तो वो दुख ही तो आपके कर्मों

1104
01:17:34,360 --> 01:17:38,400
की सजा है व इतना ही तो समझना है कि हमें जो दुख हो रहा है व पूर्व

1105
01:17:38,400 --> 01:17:42,520
जन्म के फल है जो हमें यही भोगने है एक तरफ तो आप कहते हो कि स्वर्ग

1106
01:17:42,520 --> 01:17:47,000
नर्ग यही है कहीं दूसरी जगह नहीं है तो जब इसको

1107
01:17:47,000 --> 01:17:51,120
मैं इसको दूसरे तरीके से समझाना चाहूंगा जैसे कि एक जगह

1108
01:17:51,120 --> 01:17:55,400
पर 932 में जो आदि शंकराचार्य जी ने य कह दिया कि व पाप योनि

1109
01:17:55,400 --> 01:17:59,760
कह दिया है वो स्त्रियों को अब मैं एक बात कह रहा हूं कि पुरुषों

1110
01:17:59,760 --> 01:18:03,800
की कंपेरटिवली क्या स्त्री एक नेचुरल

1111
01:18:03,800 --> 01:18:07,880
कष्ट लेकर के शारीरिक कष्ट लेकर के जन्म लेती है कि नहीं लेती

1112
01:18:07,880 --> 01:18:11,960
है क्या उसको मास जो हर महीने जो माह

1113
01:18:11,960 --> 01:18:16,680
में एक बार मासिक धर्म आ रहा है नेचुरली उसको दर्द होना ही है पेट में

1114
01:18:16,680 --> 01:18:20,760
गर्भाशय में उसको दर्द होना ही है यह पुरुषों की अपेक्षाकृत उसको

1115
01:18:20,760 --> 01:18:24,880
दर्द क्यों दिया है ईश्वर ने इसका अर्थ है

1116
01:18:24,880 --> 01:18:28,920
फिर वो मैंने एक बात कही कि कोई व्यक्ति वेदों के बिल्कुल एक सेंटीमीटर दूर

1117
01:18:28,920 --> 01:18:32,920
जन्म ले रहा है एक इंच दूर जन्म ले रहा है और कोई व्यक्ति

1118
01:18:32,920 --> 01:18:37,640
हजारों किलोमीटर दूर जन्म ले रहा है लाखों किलोमीटर दूर जन्म ले रहा है तो

1119
01:18:37,640 --> 01:18:41,640
ऐसे में य बात आती है कि भाई एक को इतनी दूर जन्म क्यों दिया गया हर व्यक्ति

1120
01:18:41,640 --> 01:18:45,760
को वहां जन्म मिले जहां वेद रखा हो वेदा शास्त्र वो

1121
01:18:45,760 --> 01:18:49,480
भी हमारे अलंकार समाज वाले रखे हो कम से कम जिससे कि वो

1122
01:18:49,480 --> 01:18:52,400
भटके अपने जीवन

1123
01:18:52,400 --> 01:18:56,720
में तो एकय इसमें कि आपको

1124
01:18:56,720 --> 01:19:00,840
आपको पूजा करनी है आपको मंदिर जाना है आपको यज्ञ करना है यह कहां

1125
01:19:00,840 --> 01:19:05,200
से पता चल रहा है यह शास्त्रों से पता चल रहा है तो वही शास्त्र फिर कह रहे हैं

1126
01:19:05,200 --> 01:19:09,320
कि ब्राह्मण अरनी पूजा कर मनी शर्मा जी आपका धर्म सनातन

1127
01:19:09,320 --> 01:19:13,600
है सनातन सिद्धांत लाइए सनातन शास्त्रों से सिद्धांत

1128
01:19:13,600 --> 01:19:17,880
लाइए मनमुक बातें मत करिए हर दूसरा आदमी एक नया सिद्धांत

1129
01:19:17,880 --> 01:19:22,160
ला देगा क्या करोगे फिर धर्म धर्म

1130
01:19:22,160 --> 01:19:26,440
तय होता है हमारे शास्त्रों से अपने मनम की बात बातो से नहीं होता है जी

1131
01:19:26,440 --> 01:19:30,480
जी आप कुछ कह रहे थे उस वो शास्त्र कह रहा है कि ब्राह्मण अंदर

1132
01:19:30,480 --> 01:19:34,520
जाके पूजा करेगा जो भी करेगा ध्यान जप करेगा

1133
01:19:34,520 --> 01:19:38,640
उसका पुण्य मिल जाएगा उसको और वही कह रहा है कि कोई शुद्र मंदिर के बाहर से

1134
01:19:38,640 --> 01:19:42,800
सिर्फ ध्वजा को भी देख लेगा मंदिर के ध्वजा को तो उतना ही पुण्य उसको मिल जाएगा

1135
01:19:42,800 --> 01:19:46,800
यही शत्र कह रहा है वो उनको एक सरलता दी गई है क्योंकि उनके जीवन

1136
01:19:46,800 --> 01:19:50,800
में ऑलरेडी शारीरिक रूप से श्रम है तो इसलिए उनका भार हल्का किया

1137
01:19:50,800 --> 01:19:54,840
गया है लेकिन

1138
01:19:54,840 --> 01:19:58,840
केंगे क्योंकि जब गर्भ क्योंकि जब गर्भ ग्रह

1139
01:19:58,840 --> 01:20:03,120
में जाएगा तो उसको विभिन्न प्रकार के जो नियम है उनको फॉलो

1140
01:20:03,120 --> 01:20:07,280
करना होगा तो उसका जीवन तो ऑलरेडी पहले से ही कठिन है

1141
01:20:07,280 --> 01:20:11,360
अब व वहां पर ग गर्ग में जाने के लिए अपने बैग में जो लेकर चल रहा है उसके

1142
01:20:11,360 --> 01:20:15,560
साथ में मट्टी भी लेकर चले अगर म मूत्र मूत्र

1143
01:20:15,560 --> 01:20:19,880
त्याग के लिए जाए तो दो बार धोए मिट्टी से और उसके बाद अगर वो

1144
01:20:19,880 --> 01:20:23,920
क्या कहते हैं मल त्याग के लिए जाएगा तो चार बार धोए मिट्टी

1145
01:20:23,920 --> 01:20:28,120
से और फिर मिट्टी से मिट्टी से साफ करने के लिए उसे समुचित

1146
01:20:28,120 --> 01:20:32,120
जगह भी चाहिए तो कितना यह तो एक पक्ष मैंने

1147
01:20:32,120 --> 01:20:36,200
बताया है फिर उसके बाद कुल्ले हैं तो कितना ज्यादा और

1148
01:20:36,200 --> 01:20:40,280
शिखा खोलनी है बांधनी बहुत सारी चीज तब निर्वा अगर शास्त्र सम्मत

1149
01:20:40,280 --> 01:20:44,280
गर्भ ग्रह है जहां पर अभी भी सनातन सिद्धांत लागू

1150
01:20:44,280 --> 01:20:48,520
है जैसे शंकराचार्य के उसम नियंत्रण

1151
01:20:48,520 --> 01:20:52,880
में आने वाले जो मंदिर है वहा इसी प्रकार की वो होती है तो इतने

1152
01:20:52,880 --> 01:20:57,080
सारे प्रोटोकॉल से भाई उन प्रोटोकॉल से आपको मुक्ति दी गई है इसलिए आपको कहा

1153
01:20:57,080 --> 01:21:01,080
गया कि आप जो है सिर्फ ध्वजा देख लीजिए उससे भी हम आपको वही फल देंगे

1154
01:21:01,080 --> 01:21:06,640
जो इतने सारे कठिन नियमों का पालन करने वाले ब्राह्मण को देते

1155
01:21:06,640 --> 01:21:10,160
हैं अच्छा एक बात बताइए जी

1156
01:21:10,160 --> 01:21:14,240
मैं ऐसा पूछना चाहता हूं कि दयानंद जी को मोक्ष मिला है

1157
01:21:14,240 --> 01:21:18,360
नहीं

1158
01:21:18,360 --> 01:21:22,560
मिला से मैंने पूछा है अब मैं बताता हूं एक

1159
01:21:22,560 --> 01:21:26,680
जो देवेंद्रनाथ जी द्वारा दयानंद जी लिखी है उसम कह रहे कि दयानंद

1160
01:21:26,680 --> 01:21:30,760
सरस्वती जी दयानंद जी शिव सहस्त्र नाम का पाठ करते थे त्रिपुंड धारण

1161
01:21:30,760 --> 01:21:35,000
करते थे ठीक है और सूर्य को अर्ग देते थे इनके

1162
01:21:35,000 --> 01:21:39,000
जो गुरु विरजानंद जी थे वो दुर्गा अष्टक का पाठ करते थे रोजाना जिनको देख के स्वामी

1163
01:21:39,000 --> 01:21:43,120
जी भी ये जो दयानंद जी ये भी दुर्गा अष्टक का पाठ करते थे तो मूर्ति पूजक तो

1164
01:21:43,120 --> 01:21:47,160
ये भी हो ही गए ठीक है तो इनको भी 1000 हत्या का दोष लगा

1165
01:21:47,160 --> 01:21:51,760
तो क्या 1000 हत्या का दोष ये धोती है क्या इसी जीवन में

1166
01:21:51,760 --> 01:21:56,520
तो इनके य तो ऐसा है नहीं ना कि भक्ति का फल मिलता नहीं

1167
01:21:56,520 --> 01:22:00,760
फल तो लेकिन क्या इन्होने मना किया है इन्होने मैंने

1168
01:22:00,760 --> 01:22:05,120
प्रश्न पूछा है ना इनसे इन्होंने जवाब नहीं दिया मैंने कहा ईश्वर की भक्ति

1169
01:22:05,120 --> 01:22:09,280
करने से आप लिख रहे हो कि ईश्वर कोई फल नहीं देता अगर फल नहीं देता

1170
01:22:09,280 --> 01:22:13,440
तो भक्ति का क्या फायदा ईश्वर के अस्तित्व का क्या फायदा अच्छा बाद में अगर

1171
01:22:13,440 --> 01:22:17,560
आप यह मान लो कि फल मिलता है तो आपकी वो वाली बात गलत अगर फल

1172
01:22:17,560 --> 01:22:21,640
मिलता है तो वह बात गलत कि भक्ति का फल नहीं मिलेगा और अगर फल

1173
01:22:21,640 --> 01:22:25,200
नहीं मिलता है तो फिर भक्ति करना गलत और उसम में भी उन्होने य

1174
01:22:25,200 --> 01:22:29,320
मान लिया है कि भक्ति करने से आपके अंदर ईश्वर के गुण आते हैं

1175
01:22:29,320 --> 01:22:33,400
तो यहां अद्वैत हो गए भाई ईश्वर के गुण क्या है उत्पत्ति स्थिति

1176
01:22:33,400 --> 01:22:37,520
समार करने की क्षमता यही गुण है ना तो भक्ति करने

1177
01:22:37,520 --> 01:22:41,560
से ईश्वर के गुण आते हैं यानी भक्ति करने से वो ईश्वर बनने लगता है उत्पत्ति

1178
01:22:41,560 --> 01:22:46,920
स्थिति सार के गुण आ जाते हैं तो ये तो अ अद्वैत हो

1179
01:22:46,920 --> 01:22:51,120
गया अच्छा आपको मैं बताता हूं कि आपका जो मोई

1180
01:22:51,120 --> 01:22:55,320
मोय वाला व्यक्ति था आशीष मैसेज भेजा है

1181
01:22:55,320 --> 01:22:59,520
देखिए वो मेरे को रिप्लाई कभी नहीं देता है यह व्यक्ति रहा आशीष तुम बात करोगे

1182
01:22:59,520 --> 01:23:03,560
वीसी पर मेरे से उसका कोई रिप्लाई नहीं दिया वो 16 सितंबर की बात है मैंने आज मैसेज

1183
01:23:03,560 --> 01:23:07,880
किया सीन करके छोड़ दिया यह व्यक्ति क्यों तैयार नहीं होते आपको बड़ा ललकार

1184
01:23:07,880 --> 01:23:11,960
हैं जो मासूम व्यक्ति है उनको बड़ा ललकार हैं कि आओ डिबेट

1185
01:23:11,960 --> 01:23:16,040
करो जब मैं इनको डिबेट के लिए बुलाता हूं चर्चा के लिए बुलाता हूं तो रिलाई रिप्लाई तक

1186
01:23:16,040 --> 01:23:20,360
नहीं देते सीन करके छोड़ देते हैं ये उनको लड़ते जिनके बारे में इयह

1187
01:23:20,360 --> 01:23:24,800
लगता है कि हम इनको दबा लेंगे दबोच लेंगे उनको लड़ते जब पता लग जाता

1188
01:23:24,800 --> 01:23:28,800
इसको दबोच नहीं पाएंगे तो फिर दूर रहने लगते हैं फि या फिर वो उस पर आ जाते हैं जो

1189
01:23:28,800 --> 01:23:33,000
निचले स्तर की चीज होती है ना वो सब करने लगते हैं तड़ा के गाली

1190
01:23:33,000 --> 01:23:37,280
गलो जैसे इन्होंने क्या किया था जब मैंने जब इन लोगों ने मेरे मेम

1191
01:23:37,280 --> 01:23:40,280
बनाया था पहला जिसम मेरी आवाज को इन्होने वो किया था

1192
01:23:40,280 --> 01:23:44,480
तो मैंने मर्यादित शब्दों में इनसे कहा था कि निष्ठा से माता ने अगर दूध

1193
01:23:44,480 --> 01:23:48,480
पिलाया है आपको तो आप एक स्वस्थ चर्चा के लिए आमंत्रित है

1194
01:23:48,480 --> 01:23:52,640
कोई भी अभद्र टिप्पणी नहीं कोई तू तड़ग नहीं मगर मैंने मुझे ऐसा लगता

1195
01:23:52,640 --> 01:23:56,680
है कि ज्यादातर जो आर् समाज से जुड़ने वाले वो हरियाणा के जाट है

1196
01:23:56,680 --> 01:24:00,840
या पता नहीं जो आर समाज में सबसे ज्यादा

1197
01:24:00,840 --> 01:24:05,720
जो जो थोड़ी सी अकड़ भाषा होती है ना तो ऐसा तत्व लगता है कि वो

1198
01:24:05,720 --> 01:24:09,760
जो दिल्ली के छात्र घरों में

1199
01:24:09,760 --> 01:24:13,840
पैदा होने वाले जो है ना तो ऐसा उनने लगता है कि वो

1200
01:24:13,840 --> 01:24:18,080
लोग है तो वो तुरंत तू तड़ाक पर आते तो एक तो वो भी खराब लगा हम लोग तूतक की सुनने के आदि

1201
01:24:18,080 --> 01:24:22,200
नहीं है तो मैंने इस तरह से बोला कि अगर माता ने निष्ठा से दूध पिलाया है तो आप

1202
01:24:22,200 --> 01:24:27,120
आमंत्रित है एक स्वस्थ चर्चा के लिए उसके बाद

1203
01:24:27,120 --> 01:24:31,360
स् चर्चा के लिए बात होने लगी और बात होने में

1204
01:24:31,360 --> 01:24:35,440
उन्होंने पतरा फेंका ऋषि उबास दूसरी तरफ से वो बोल

1205
01:24:35,440 --> 01:24:39,480
रहे हैं कि

1206
01:24:39,480 --> 01:24:43,880
भाई जो वक्ता है उसका समय निर्धारित होगा बोलने का पाच मिनट

1207
01:24:43,880 --> 01:24:47,880
तो मैंने कहा नहीं समय निर्धारित नहीं होगा आपको ठीक लग रहा है मुझे ठीक

1208
01:24:47,880 --> 01:24:51,880
नहीं लग रहा तो बोले कि इससे क्या दिक्कत है भाई आपने हो सकता है कोई

1209
01:24:51,880 --> 01:24:55,920
रणनीति बनाई हो ना बनाई हो पर मैं ये नहीं मानता कि मेरे को निश्चित समय में अपनी बात

1210
01:24:55,920 --> 01:25:00,160
रखूंगा कि पाच मिनट में ही बोलूंगा मैं इसको नहीं मानता मैं नहीं आऊंगा चर्चा

1211
01:25:00,160 --> 01:25:04,360
में मेरा अधिकार हैय तो इस पर ही अरे एक एक रुपए की एक एक मिनट की रील

1212
01:25:04,360 --> 01:25:08,440
बना कर के ये करने वाला और जो है भाग रहा है हम तुम्हारी परंपरा के चिथड़े उड़ाएंगे

1213
01:25:08,440 --> 01:25:12,720
मतलब इतनी बात पर इनकी जो है मर्यादा सब भंग हो गई अगले

1214
01:25:12,720 --> 01:25:16,880
दिन इनके जो है मुझे ट्रोल करने लगे वो स्टोरी वगैरह लगा के कुछ

1215
01:25:16,880 --> 01:25:21,040
इनके पले स्तर के जो फॉलोअर है वो मूत्र ये है वो

1216
01:25:21,040 --> 01:25:25,360
है मूत निकल गया बहुत गंदी गंदी बातें उसमें करने लग लगे

1217
01:25:25,360 --> 01:25:29,600
उसके बाद भी इनके लोग आ कर के कहते कि तुम भागे भाई भागे नहीं है

1218
01:25:29,600 --> 01:25:33,800
आप सामने आ जाइए धरती पर हमारे सामने हम भागेंगे नहीं आपके सामने से

1219
01:25:33,800 --> 01:25:38,040
इंटरनेट पर हम आपसे दूरी इसलिए बनाए हुए हैं क्योंकि इंटरनेट पर जब आप गंदी बातें

1220
01:25:38,040 --> 01:25:42,280
बोलेंगे अश्लील बातें बोलेंगे हमारे बारे में तो हम आपको रोक नहीं

1221
01:25:42,280 --> 01:25:46,560
पाएंगे समझ रहे हैं इंटरनेट पर हम आपको रोक नहीं पाएंगे दूसरी

1222
01:25:46,560 --> 01:25:50,640
बात पुलिस कारवाई कानूनी कारवाई जब करेंगे तब करेंगे मगर अभी

1223
01:25:50,640 --> 01:25:55,360
उसका हमारे पास समय नहीं है दूसरी चीजें हैं

1224
01:25:55,360 --> 01:25:59,520
है ना और कभी सामना करिए मैं एड्रेस हमारी वेबसाइट पर लिखा

1225
01:25:59,520 --> 01:26:03,600
हुआ है नंबर है मेरे पास लखनऊ आइए बिल्कुल साथ में बैठते हैं देखे कौन भागेगा

1226
01:26:03,600 --> 01:26:08,360
हम तो ढूंढ रहे हैं आर समाजी को जो बैठ कर के बात करें हम तो अभी एक दो दिन में फिर जाएंगे

1227
01:26:08,360 --> 01:26:12,360
जो हमारे आसपास लखनऊ कानपुर उत्तर प्रदेश में जो हमें विद्वान मिलेंगे उनके साथ बैठकर

1228
01:26:12,360 --> 01:26:16,560
चर्चा करेंगे जी अलंकार समाज जो है

1229
01:26:16,560 --> 01:26:20,720
अलंकार समाज अपनी बुद्धि को विकसित करने के स्थान पर

1230
01:26:20,720 --> 01:26:24,960
अनंत ज्ञान को ही दबाकर जैसे तैसे अपने शुद्र शुद्र में घुसाना

1231
01:26:24,960 --> 01:26:29,200
चाहता है और इसमें असफल रहने पर उन बातों को ही मिलावटी कह देता है इतना

1232
01:26:29,200 --> 01:26:33,240
सा है ये अलंकार समाज और कुछ नहीं है चाहे आप इसमें ऋषि उवाच जैसे

1233
01:26:33,240 --> 01:26:37,800
छोटे मतलब मतलब छोटे क्या ऋषि उवाच को ले लीजिए

1234
01:26:37,800 --> 01:26:42,000
और इसको तो मैं आर्य समाज अलंकार समाज से मानता भी नहीं हूं

1235
01:26:42,000 --> 01:26:46,360
यह सिर्फ ब्राह्मणों से द्वेष करता है ब्राह्मणों से इसको कोई व्यक्तिगत दुश्मनी

1236
01:26:46,360 --> 01:26:50,520
है इसने अलंकार समाज का सहारा लिया है कि मैं ब्राह्मणों को गरिया सकूं इसलिए

1237
01:26:50,520 --> 01:26:54,720
ही अलंकार समाज में टिका हुआ है उसके अलावा उसको कुछ भी नहीं है

1238
01:26:54,720 --> 01:26:58,760
ब्राह्मणों को गरि आना है आप मेरे को तीन चार व्यक्तियों ने कह दिया यह बात

1239
01:26:58,760 --> 01:27:02,760
आर्य समाज के एक आचार्य ने भी कह दिया कि ऋषि उवा सिर्फ ब्राह्मणों को गरि

1240
01:27:02,760 --> 01:27:06,880
आता है उसको ब्राह्मणों से समस्या है इसलिए यह सब कर रहा है तो फिर उस

1241
01:27:06,880 --> 01:27:10,360
व्यक्ति पर ध्यान देना योग्य कु और अभी मैंने एक

1242
01:27:10,360 --> 01:27:14,600
वीडियो देखा था शंकराचार्य जी के लिए अभी मैंने एक वीडियो देखा था शंकराचार्य

1243
01:27:14,600 --> 01:27:18,720
जी पर बोल रहा था कि कि ये देखो ये स्टील

1244
01:27:18,720 --> 01:27:22,920
इसलिए बनाई है क्योंकि छूते छूने से ये हो जाएगा वो हो जाएगा भाई छूने

1245
01:27:22,920 --> 01:27:27,000
से क्या क्या हो सकता है पहले तो आप ये समझो छूने

1246
01:27:27,000 --> 01:27:31,360
से जो गुण और दोष है वो दोनों एक दूसरे में

1247
01:27:31,360 --> 01:27:35,600
जो है ट्रांसफर होते हैं और इस बात को पीक लेवल

1248
01:27:35,600 --> 01:27:39,720
पर हमारे धर्म ने कहा अब मैं आपसे पूछ रहा हूं अगर

1249
01:27:39,720 --> 01:27:43,960
कोई स्त्री है या फिर कोई पुरुष है जो पराई स्त्री

1250
01:27:43,960 --> 01:27:48,280
या फिर स्त्री पर पुरुष के साथ केवल चुंबन कर रही है

1251
01:27:48,280 --> 01:27:52,280
तो उससे क्या हुआ जा रहा है बुरा लगेगा कि नहीं लगेगा

1252
01:27:52,280 --> 01:27:55,440
इस बारे में विचार करिए

1253
01:27:55,440 --> 01:28:00,360
नहीं क्योंकि छूने से कुछ होता नहीं है ना छूने से कुछ होता नहीं है

1254
01:28:00,360 --> 01:28:04,880
आपने अभी इनके अंदर के ग्रुप की बातें नहीं य

1255
01:28:04,880 --> 01:28:09,280
जो ये जो व्यवस्था है ना छूने की घृणा मूलक आपको बनाई गई है

1256
01:28:09,280 --> 01:28:13,360
ना छूने की व्यवस्था व्यवस्था मूलक है जिससे कि किसी भी प्रकार का

1257
01:28:13,360 --> 01:28:18,160
जो गुण दोष है वह एक दूसरे में ट्रांसफर ना हो

1258
01:28:18,160 --> 01:28:22,200
उसको केवल क्रिएट करके आपको इंजेक्ट किया गया देख भाई े छू नहीं रहे तुझसे

1259
01:28:22,200 --> 01:28:25,560
दूर है अरे भाई एक जो स्त्री है वो अपने सतीत्व की रक्षा

1260
01:28:25,560 --> 01:28:29,560
करती है किसी पराय पुरुष को ना छू करके तो वो

1261
01:28:29,560 --> 01:28:33,560
क्या वो अछूत है वो घृणा मूलक है उसका दूर रहना उससे

1262
01:28:33,560 --> 01:28:38,000
ये व्यवस्था मूलक है चलिए

1263
01:28:38,000 --> 01:28:42,080
जी और ये इनके अंदर की जो ग्रुपों की बातें अगर मैं यहां दिखाने

1264
01:28:42,080 --> 01:28:46,200
लग जाऊ कि शंकराचार्य जो कितना ब बुरा भला कहते हैं इसमें कितनी

1265
01:28:46,200 --> 01:28:50,440
सात्विकता है किय गालिया तक देते रहते हैं उसम बैठे बैठे मैंने देखा है बहुत गंदी गंदी

1266
01:28:50,440 --> 01:28:54,440
वोर के कुछ फोटो है मेरे पास अब वो राम जाने एडिट क्या है मगर

1267
01:28:54,440 --> 01:28:58,640
देख हुआ मुझे सत्य है तो मैंने जो है

1268
01:28:58,640 --> 01:29:02,760
मैं जो है क्रोध को पालने वाला व्यक्ति हूं और मैं क्रोध को पालना

1269
01:29:02,760 --> 01:29:08,120
पालता हूं और उसको सही दिशा देता हूं

1270
01:29:08,120 --> 01:29:12,160
क्योंकि गुरुदेव ने हमें सिखाया है ना कि कोरी भाविक के वशीभूत हो कर

1271
01:29:12,160 --> 01:29:16,240
के अपने कदम ना उठाना सदैव दर्शन विज्ञान और व्यवहार को साध

1272
01:29:16,240 --> 01:29:20,360
के अपनी बात कहना कोई तुम्हारा कुछ नहीं बगाड़ पाएगा तो गुरुदेव के जो वचन है वो मेरे कानों

1273
01:29:20,360 --> 01:29:24,560
में गूंजते रहते हैं वो गुरुदेव के जो वचन कर्मन

1274
01:29:24,560 --> 01:29:25,880
वादी का रस्ते माफ लेस

1275
01:29:25,880 --> 01:29:29,880
कदाचना जब तक नौका डूबती नहीं तब तक तुम्हारा काम है खेते रहना

1276
01:29:29,880 --> 01:29:33,360
खेते रहना तो आप

1277
01:29:33,360 --> 01:29:37,360
गा इनका कोई गुरु तो है नहीं जो इन्ह ये सब सिखाए ये तो खुद से

1278
01:29:37,360 --> 01:29:41,600
ही बने फिरते हैं गुरु तो ये है गीता

1279
01:29:41,600 --> 01:29:45,720
संग्रह महाभारत की गीता है उसमें से एक श्लोक मैं आपको

1280
01:29:45,720 --> 01:29:51,200
बताता हूं जी एक सेकंड

1281
01:29:51,200 --> 01:29:55,440
यहां पर बताया गया है मनुष्य लोक में एक

1282
01:29:55,440 --> 01:29:59,600
कल्प तक स्वधर्म जनित बंधनों से बंधकर

1283
01:29:59,600 --> 01:30:04,240
क्लेश उठाता हुआ जब धीरे-धीरे अपनी तपस्या को

1284
01:30:04,240 --> 01:30:08,320
बढ़ाता है तब हल्दी कि स कांति वाले पित्त वर्ण देव भाव को

1285
01:30:08,320 --> 01:30:12,360
प्राप्त होता है अब ये देव योनि को तो नकारते हैं कि देवता योनि

1286
01:30:12,360 --> 01:30:16,360
होती नहीं मनुष्य से भिन्न लेकिन महाभारत का ये प्राण प्रमाण स्पष्ट कह रहा

1287
01:30:16,360 --> 01:30:20,520
है कि देवता योनि होती है भिन्न होती है मनुष्य से लेकिन इस श्लोक को बोल

1288
01:30:20,520 --> 01:30:24,600
देंगे मिलावटी है सिर्फ इसी कारण बोलेंगे क्योंकि ये देवता योनि नहीं मानते

1289
01:30:24,600 --> 01:30:28,840
इसी कारण ये मिलावटी है तो सोचिए कितने ग्रंथों के साथ अत्याचार

1290
01:30:28,840 --> 01:30:32,920
कर कर के उनको मिलावटी घोषित करे जा रहे हैं कितने सामान्य लोगों के साथ उ

1291
01:30:32,920 --> 01:30:36,960
छल कर रहे हैं कि भाई देवता योनि तो होती नहीं इसलिए तुम ये सब मिलावट मानो

1292
01:30:36,960 --> 01:30:41,200
तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है मैं कह रहा हूं छल है सभी

1293
01:30:41,200 --> 01:30:45,440
के साथ छल हो रहा है आर्य आर्य समाज द्वारा और अगर कोई आर्य

1294
01:30:45,440 --> 01:30:48,760
समाज का सही व्यक्ति होगा तो वो आपको बताएगा

1295
01:30:48,760 --> 01:30:52,800
कि देवता होते हैं चाहे दयानंद जी ने जल्दबाजी में

1296
01:30:52,800 --> 01:30:57,200
शायद ये सब हो गया हो उनसे कि उन्होंने देवता योनि स्वीकार नहीं करी

1297
01:30:57,200 --> 01:31:01,280
हो ऐसा भी सुनने में आता है ना कि दयानंद दयानंद जी के बारे

1298
01:31:01,280 --> 01:31:05,320
में ऐसा भी सुनने में आता है कि शायद ऐसा हुआ था कि पहले

1299
01:31:05,320 --> 01:31:09,400
जो वेद का भाष उन्होंने किया था उसमें काफी सारी उनको ठीक नहीं लगी

1300
01:31:09,400 --> 01:31:15,400
थी बातें तो फिर उन्होंने दोबारा किया पहले वाले का खंडन

1301
01:31:15,680 --> 01:31:21,680
करके ऐसा कुछ मेरे पास बीच में आया था इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं

1302
01:31:22,400 --> 01:31:26,520
है इसमें वो मेरे पास वो कुछ है स्क्रीनशॉट्स वगैरह

1303
01:31:26,520 --> 01:31:30,520
पर पता नहीं इसमें दिखाने का सिस्टम है कि नहीं मामला बिगड़ ना जाए तो

1304
01:31:30,520 --> 01:31:35,840
अभी मैं छूंगा नहीं इस बारे में और फिर किसी दिन इस बात को

1305
01:31:35,840 --> 01:31:39,880
लेंगे देखिए मनीष जी आप जो कह रहे हैं ना कि सरनेम हटा

1306
01:31:39,880 --> 01:31:43,960
देने चाहिए देखिए ब्राह्मण क्षत्रिय वैश शूद्र भी कहने लगेंगे फिर भी

1307
01:31:43,960 --> 01:31:48,040
आपको क्या करना पड़ेगा ना जैसे जैसे प्रभु श्री

1308
01:31:48,040 --> 01:31:52,280
राम की बात ले लीजिए तो आप वहां पर बारबार बताना पड़ेगा कि वो रघुकुल

1309
01:31:52,280 --> 01:31:56,320
वंशी है और क्षत्रिय हैं इस तरह जब उनके बारे में बताया जाता है तो

1310
01:31:56,320 --> 01:32:00,480
फिर उनकी चीजें आपको बतानी पड़ेगी उसी के बारे में यहां पर एक सरनेम

1311
01:32:00,480 --> 01:32:04,720
की व्यवस्था है जो सरनेम से उनके कुल का पता चल रहा है कौन से कुल के हैं किस प्रकार

1312
01:32:04,720 --> 01:32:09,080
के ब्राह्मण है ऐसे जैसे आपके जो

1313
01:32:09,080 --> 01:32:13,400
स्वामी दयानंद ने दयानंद जी ने भी अपने

1314
01:32:13,400 --> 01:32:17,920
नाम के आगे सरस्वती टाइटल लगाया तो सबसे पहले तो आप उसको

1315
01:32:17,920 --> 01:32:22,120
बदलिए यह एक व्यवस्था है जिससे कि समझ सके कौन से वाले सन्यासी

1316
01:32:22,120 --> 01:32:26,120
है वो दशनामी परंपरा व तो इसी प्रकार से सब चीजें चल

1317
01:32:26,120 --> 01:32:30,360
रही है जी देखिए यहां पर भी दूसरे

1318
01:32:30,360 --> 01:32:34,440
श्लोक में वह जीव निरंतर देवलोक में विहार करता है और वहां से

1319
01:32:34,440 --> 01:32:37,600
भ्रष्ट होने पर ऑफलाइन ऑफलाइन करेंगे ऑफलाइन

1320
01:32:37,600 --> 01:32:41,880
करेंगे उनको यहां बुला लीजिए या फिर हमें गुजरात की हमारी व्यवस्था करवा दीजिए हम वहां

1321
01:32:41,880 --> 01:32:46,520
जाकर कर लेंगे अब व आजा लखनऊ कर लेंगे हम जी

1322
01:32:46,520 --> 01:32:51,120
बताइए यहां पर भी देवलोक से जब उसके कर्म

1323
01:32:51,120 --> 01:32:55,160
क्षीण हो जाते हैं तो वो मनुष्य योनि को प्राप्त कर ऐसी बात भी

1324
01:32:55,160 --> 01:32:59,720
अन्य पुराण में भी लिखा है इसमें भी ऐसा ही इसका वो है अर्थ है तो देव

1325
01:32:59,720 --> 01:33:03,720
तो अपने मन से इसको भी मिलावटी कह दिया हां य जहां

1326
01:33:03,720 --> 01:33:07,720
जहां देवताओं को विद्वान मनुष्य नहीं बता पाते वहां उसको मिलावट कह देते हैं या

1327
01:33:07,720 --> 01:33:11,760
फिर परमात्मा ले लेते हैं ऋगवेद वैसे वेदों की चर्चा अभी नहीं करनी

1328
01:33:11,760 --> 01:33:16,080
चाहिए रात्रि को लेकिन ऋग्वेद में मंत्र जो शुरू में जो मंत्र

1329
01:33:16,080 --> 01:33:20,400
तीसरा है शुरु श्र मंडल एक का उसमें भौतिक

1330
01:33:20,400 --> 01:33:24,520
अग्नि और निराकार परमात्मा को एक ही बता रखा है द जी ने मैं आपको बता

1331
01:33:24,520 --> 01:33:27,040
देता हूं

1332
01:33:27,040 --> 01:33:31,040
वाष्य उसमें मतलब जो आप निराकार परमात्मा से

1333
01:33:31,040 --> 01:33:35,120
ले सकते हैं वो आपको भौतिक अग्नि देने में भी सक्षम है

1334
01:33:35,120 --> 01:33:40,000
तो इसमें तो कोई अंतर ही नहीं रहा जड़ और निराकार में निराकार ईश्वर में

1335
01:33:40,000 --> 01:33:44,360
उनके भाष्य को देखा जाए तो नहीं तो मैंने अपने उसम कहा ना कि भाई ये

1336
01:33:44,360 --> 01:33:49,120
ईश्वर जो है आपने सिर्फ ईश्वर को स्वीकारा है जिससे कोई नास्तिक ना कहे

1337
01:33:49,120 --> 01:33:52,800
मगर भाई ईश्वर जन्म ले नहीं सकता है ईश्वर अच्छाई

1338
01:33:52,800 --> 01:33:57,120
और बुराई को कर नहीं सकता है वो केवल बैठा है बिल्कुल एक

1339
01:33:57,120 --> 01:34:01,160
बिल्कुल एक सिस्टम की तरीके से जिसने अच्छा कार्य किया उसको वो देगा

1340
01:34:01,160 --> 01:34:05,480
उसके कर्मों के अनुसार सजा देगा ऐसा ईश्वर नहीं कर सकता है कि

1341
01:34:05,480 --> 01:34:09,680
कहीं पर कुछ हो रहा है उसको जाकर के रोक दे वो उसके अंदर नहीं है तो ऐसे ईश्वर

1342
01:34:09,680 --> 01:34:13,840
से किसी प्रकार की आशा रखना वो व्यर्थ है कोई व्यक्ति उससे आशा रख

1343
01:34:13,840 --> 01:34:17,880
ही नहीं सकता कि ईश्वर हमारे लिए कुछ हमें कुछ फल देंगे हमें शक्ति देंगे हमें

1344
01:34:17,880 --> 01:34:22,280
आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करेंगे वो ऐसा ईश्वर है वो बस प्रकृति

1345
01:34:22,280 --> 01:34:26,520
के नियमों के अधीन ईश्वर तो ऐसे व्यक्ति

1346
01:34:26,520 --> 01:34:30,880
को मतलब ऐसे ईश्वर की आवश्यकता कहां रह जाती है फिर मनुष्य

1347
01:34:30,880 --> 01:34:35,800
को जो कुछ कर नहीं सकता जैसे एक सवाल आता है कि

1348
01:34:35,800 --> 01:34:39,880
अब इनके अनुसार जो है कभी कभी तर्क होता है वही जो शुरू में मैंने क्रिश्चन

1349
01:34:39,880 --> 01:34:44,080
से पूछा था वही इनसे पूछ रहा हूं कि य पूछते क्या अगर ईश्वर आपका

1350
01:34:44,080 --> 01:34:48,960
व है तो क्या वह हत्या कर सकता है क्या व रेप कर सकता है तो फिर वही बात आ जाती है

1351
01:34:48,960 --> 01:34:53,720
जहां रेप हो रहा है उसको आप आप जिस ईश्वर को मानते हो उसने

1352
01:34:53,720 --> 01:34:57,840
उसको आपके ईश्वर ने बनाया कि नहीं बनाया है अगर बनाया है तो वो

1353
01:34:57,840 --> 01:35:02,400
बुरा हो गया क्योंकि रेप करने वाले को बना रहा है अगर उसको नहीं पता था कि वो रेप करेगा

1354
01:35:02,400 --> 01:35:06,560
अगर उसको नहीं पता था कि व रेप करेगा तो इसका मतलब क्या हुआ कि वह

1355
01:35:06,560 --> 01:35:07,920
सर्व ज्ञाता नहीं है भविष्य

1356
01:35:07,920 --> 01:35:12,160
नहीं जानता है तो वो अब अगर यह कहेंगे कि नहीं बना नहीं सकता

1357
01:35:12,160 --> 01:35:16,160
ऐसे को तो वो बाद बनाने वाला वो नहीं है बनाने वाला है तो रेप

1358
01:35:16,160 --> 01:35:20,280
करवाने वाला है अगर रेप करवाने वाला है उसको पता नहीं तो वो सर्व ज्ञाता नहीं कैसा

1359
01:35:20,280 --> 01:35:24,280
ईश्वर है भाई और ईश्वर के बारे में बहुत सारे मैंने कुछ सवाल उनका

1360
01:35:24,280 --> 01:35:28,840
कोई आंसर नहीं दिया गया जी

1361
01:35:28,840 --> 01:35:33,800
तो यह देखिए आप मैं भाष्य दिखाता हूं

1362
01:35:33,800 --> 01:35:37,920
इनका 80 साल बाद आर्य समाजी अद्वैत हो गए

1363
01:35:37,920 --> 01:35:42,040
आचार्य शंकर का भाष्य पढ़ के वाह बहुत अच्छी बात बताई सब

1364
01:35:42,040 --> 01:35:46,280
ये देखिए ये है पतंजलि योग प्रदीप है योग दर्शन

1365
01:35:46,280 --> 01:35:50,680
है ये एक महानुभाव है जिन्होंने एक

1366
01:35:50,680 --> 01:35:54,960
सूचना दी है आचार्य प्रदुमन है कोई जो ब्रह्म सूत्र

1367
01:35:54,960 --> 01:35:59,080
पर आचार्य शंकर का भाष्य पढ़ रहे थे वह भी 80

1368
01:35:59,080 --> 01:36:03,680
साल की उम्र में जीवन भर आर समाजी थे अब अवती हो गए

1369
01:36:03,680 --> 01:36:07,840
क्या बात है ऐसे तो बहुत से लोग हैं

1370
01:36:07,840 --> 01:36:11,920
तो ये देखिए साधना पाद का सूत्र 44 वा है इसमें

1371
01:36:11,920 --> 01:36:16,240
लिखा है कि व्यास भाष्य पढ़ता हूं मैं

1372
01:36:16,240 --> 01:36:20,480
व्यास भाष्य इसमें दे रखा है स्वाध्याय

1373
01:36:20,480 --> 01:36:22,920
से इष्ट इष्ट देवता

1374
01:36:22,920 --> 01:36:26,920
का साक्षात होता है अच्छा यहां पर आर्य समाज का अगर आप योग

1375
01:36:26,920 --> 01:36:31,320
दर्शन पढ़ेंगे तो वहां पर विद्वान लोग लिखा है अब मुझे बताइए विद्वान

1376
01:36:31,320 --> 01:36:35,440
लोगों का साक्षात्कार हो रहा है स्वाध्याय हर जगह वो देवता का अर्थ

1377
01:36:35,440 --> 01:36:39,600
अपने हिसाब से विद्वान कर देते हैं वही वो अलंकार वाली बात जहां प भी वैसी बात आए

1378
01:36:39,600 --> 01:36:44,160
व अलंकार टाइप की बात बोल लो ठीक व्यास भाष्य भी देख

1379
01:36:44,160 --> 01:36:48,400
लीजिए मतलब अपने अपने मत को अनुवाद में बदल दो वही

1380
01:36:48,400 --> 01:36:53,040
जैसे कन करता है ना उसने क्या किया कि ब्रह्म कर्म समाधि ना ब्रहम

1381
01:36:53,040 --> 01:36:57,160
गंतव्य तो इन सब चीजों में ब्रह्म का अर्थ उन्होने कृष्ण भावना भावित

1382
01:36:57,160 --> 01:37:01,400
कर दिया चार 24 भगवत गीता में अब बात ये आती है कि अगर आप यहीं

1383
01:37:01,400 --> 01:37:05,440
पर अपने मंतव्य को डाल देंगे तो नीचे भाष्य में क्या लिखेंगे भाई अनुवाद का

1384
01:37:05,440 --> 01:37:09,640
मतलब होता है संस्कृत से हिंदी में अनुवाद यह अनुवाद है शब्दार्थ

1385
01:37:09,640 --> 01:37:14,120
तो शब्दार्थ करिए आप फिर बाद में अपना मंतव्य लिखिए भाष्य में

1386
01:37:14,120 --> 01:37:20,120
मगर जहां पर उनको अर्थ से प्रॉब्लम हो रही होती है वहां अर्थ में भी वो अपना

1387
01:37:21,640 --> 01:37:25,760
भाष ये देखिए एक अब

1388
01:37:25,760 --> 01:37:30,200
ये देखिए व्यास भाष्य अगर आप पढ़ेंगे तो स्वाध्याय शल

1389
01:37:30,200 --> 01:37:34,360
को देवता ऋषियों और सिद्धों के दर्शन अब ये देवता ऋषि और सिद्ध

1390
01:37:34,360 --> 01:37:38,680
के ऊपर अगर आप सोचेंगे तो विद्वान लोग में ऋषि आ जाते हैं

1391
01:37:38,680 --> 01:37:42,880
सिद्ध लोग आ जाते हैं तो फिर य व्यास जी ने देवता जो शब्द लिखा

1392
01:37:42,880 --> 01:37:47,160
है वह कौन है क्योंकि ऋषि आ गए विद्वान लोगों में सिद्ध

1393
01:37:47,160 --> 01:37:51,240
भी आ गए विद्वान लोगों में तो देवता कौन है देवता को अलग मानना पड़ेगा

1394
01:37:51,240 --> 01:37:55,360
आपको तो इस सिद्धों

1395
01:37:55,360 --> 01:38:01,360
के दर्शन होते हैं और वे इसके योग कार्यों में सहायक होते

1396
01:38:03,480 --> 01:38:07,680
हैं तो यहां पर भोज वृति और व्यास भाष्य

1397
01:38:07,680 --> 01:38:11,720
में अलग अलग बता रखा है कि देवता योनी होती है लेकिन यहां पर उसको विद्वान

1398
01:38:11,720 --> 01:38:15,720
जबरदस्ती घोषित कर रखा है अगर आपको

1399
01:38:15,720 --> 01:38:19,720
यह दिख रहा हो जी जी जी यह ऋग्वेद का तीसरा मंत्र

1400
01:38:19,720 --> 01:38:23,760
है प्रथम मंडल यह मनुष्य ी

1401
01:38:23,760 --> 01:38:27,800
प्रकार ईश्वर की उपासना और भौतिक अग्नि ही

1402
01:38:27,800 --> 01:38:32,600
को कलाओं में संयुक्त करने से प्रतिदिन

1403
01:38:32,600 --> 01:38:36,800
आत्मा और शरीर की पुष्टि करने वाला जो उत्तम कीर्ति का

1404
01:38:36,800 --> 01:38:41,040
ब बढ़ाने वाला जिस और जिसको

1405
01:38:41,040 --> 01:38:45,960
अच्छे-अच्छे विद्वान व शूरवीर लोग चाहा करते हैं

1406
01:38:45,960 --> 01:38:50,080
विद्या और स्वर्ण आदि उत्तम उस धन को सुगमता से प्राप्त

1407
01:38:50,080 --> 01:38:54,280
होता है तो यहां पर परमात्मा और भौतिक अग्नि से आप ये सब प्राप्त कर सकते हैं

1408
01:38:54,280 --> 01:38:58,520
तो परमात्मा और भौतिक अग्नि को आपने एक ही कर दिया अचानक से क्योंकि आप अग्नि को देवता

1409
01:38:58,520 --> 01:39:02,720
तो मान नहीं पाएंगे क्योंकि आपने खंडन कर रखा है तो य भौतिक अग्नि से ही यह सब प्राप्त

1410
01:39:02,720 --> 01:39:06,840
हो रहा है तो परमात्मा से जो जो प्राप्त कर सकते हैं वह सब शक्ति भौतिक अग्नि

1411
01:39:06,840 --> 01:39:12,840
के पास भी है इन्होने ऐसा कर दिया इसका अर्थ य पर कोई आर्य समाजी

1412
01:39:13,440 --> 01:39:17,560
बताएगा सही बिल्कुल सही ब बहुत

1413
01:39:17,560 --> 01:39:21,640
अच्छे आपने पॉइंट रेज किए बहुत बढ़िया पॉइंट रेज किए एक

1414
01:39:21,640 --> 01:39:26,000
यहां पर है जो पूछ रहे ईश्वर को ईश्वर कोई जादूगर

1415
01:39:26,000 --> 01:39:30,640
नहीं है जो चमत्कार

1416
01:39:30,640 --> 01:39:35,480
करे दुनिया में जब भी कुछ सृष्टि का

1417
01:39:35,480 --> 01:39:39,960
से हुआ साइंस के द्वारा हुआ है व चमत्कार

1418
01:39:39,960 --> 01:39:44,000
सिर्फ वह है जिसको आप जानते नहीं हो बस और कुछ नहीं

1419
01:39:44,000 --> 01:39:49,120
जिस विद्या को आप जानते नहीं हो उसको आप चमत्कार कहते हो

1420
01:39:49,120 --> 01:39:53,120
जरा सोचना प पहला ह्यूमन बीइंग पहला ह्यूमन बीइंग समाज

1421
01:39:53,120 --> 01:39:59,080
के द्वारा चमत्कार से हुआ या वैसे करती

1422
01:39:59,080 --> 01:40:05,080
है और साइंस की व थ्योरी भी है वो सनातन

1423
01:40:05,480 --> 01:40:09,880
थ्योरी एक दयानंद जी की जीवनी है

1424
01:40:09,880 --> 01:40:13,880
योगी नाम से है श योगी जीवनी इस तरह से उसमें दयानंद जी उड़ रहे हैं उनके

1425
01:40:13,880 --> 01:40:18,560
पास सिद्धियां है तो क्या यह चमत्कार नहीं है

1426
01:40:18,560 --> 01:40:22,640
ये चमत्कार नहीं भाई अभी वो योगी जो योगी जो योगी

1427
01:40:22,640 --> 01:40:26,680
हो जाता है जो योगी हो जाता है व 3000 पता नहीं कितने युगों बाद या

1428
01:40:26,680 --> 01:40:30,720
जो भी है अभी वोह आ जाता है कालांतर में यह कर सकता है वो कर सकता

1429
01:40:30,720 --> 01:40:35,240
है यह क्या है चमत्कार नहीं है क्या जब यह योगी कर सकते हैं चमत्कार तो ईश्वर नहीं कर सकता

1430
01:40:35,240 --> 01:40:39,480
वाह और दूसरी बात चमत्कार को छोड़ दो अपनी

1431
01:40:39,480 --> 01:40:43,800
इच्छा के अनुसार ईश्वर तो जन्म नहीं ले सकता ना और जब ईश्वर नहीं ले सकता

1432
01:40:43,800 --> 01:40:48,200
तो आपके जो आप्त पुरुष है श्री श्री कृष्ण जिन्ह आप आप्त

1433
01:40:48,200 --> 01:40:53,760
पुरुष मानते हो वो कैसे अपने मन में इच्छा ला रहे हैं अपनी इच्छा अनुसार जन्म लेने की

1434
01:40:53,760 --> 01:40:58,240
कभी सोचा है आप तो पुरुष जिससे कभी कोई गलती नहीं हुई

1435
01:40:58,240 --> 01:41:02,240
वो कैसे इच्छा ला रहे हैं अपने मन में अपनी इच्छा अनुसार जन्म लेने की

1436
01:41:02,240 --> 01:41:06,240
जब ईश्वर तक जन्म नहीं ले सकता तो अपनी इच्छा अनुसार जन्म

1437
01:41:06,240 --> 01:41:10,320
लेने की इच्छा कैसे आ रही श्री कृष्ण में अगर आ रही है तो

1438
01:41:10,320 --> 01:41:14,480
या तो वो अज्ञानी है इसलिए आ रही है आपके अनुसार आपके

1439
01:41:14,480 --> 01:41:18,480
जो जो हाथरस के जो वो है

1440
01:41:18,480 --> 01:41:21,160
प्रभारी उन्होंने माना

1441
01:41:21,160 --> 01:41:25,480
है उन्होंने माना है की

1442
01:41:25,480 --> 01:41:29,880
जो सत्यार्थ प्रकाश है उसके अनुसार श्री कृष्ण अज्ञानी

1443
01:41:29,880 --> 01:41:33,880
है यह माना है अब जाइए उनके विरुद्ध कारवाई करिए

1444
01:41:33,880 --> 01:41:38,680
पहले नहीं करेंगे सिर्फ यहां पर आएंगे बातें

1445
01:41:38,680 --> 01:41:42,840
करने अ ये अंदर ही अंदर आपस में भी लड़ लेते हैं कई बार

1446
01:41:42,840 --> 01:41:48,400
क्योंकि इनको लड़ने कोई नहीं मिलता आपस में मक्का मारी कर लेते हैं लेखा

1447
01:41:48,400 --> 01:41:52,840
लेखी य तिवारी जी थे जो इनकारी

1448
01:41:52,840 --> 01:41:56,840
जी थे जो इनका बहुत क्रमानुसार इनके पीछे पड़े हुए थे बस उनकी एक चीज थी

1449
01:41:56,840 --> 01:42:00,960
जो मुझे भी लगती थी ठीक नहीं है थोड़ा सा अमर्यादित हो जाते थे और मैंने उनको

1450
01:42:00,960 --> 01:42:05,360
कई बार कहा भी था कि मर्यादा का आलंबन

1451
01:42:05,360 --> 01:42:09,480
मेरे गुरु भाइयो सबसे कहूंगा कभी भी

1452
01:42:09,480 --> 01:42:13,760
कभी भी धर्म का धर्म से अधर्म से लड़ते लड़ते कभी भी अधर्म का आलंबन

1453
01:42:13,760 --> 01:42:17,880
मत लो क्योंकि अगर अधर्म से लड़ते लड़ते हमने अधर्म

1454
01:42:17,880 --> 01:42:21,920
का आलंबन लिया तो अंततः भौतिक रूप से शारीरिक रूप से भले

1455
01:42:21,920 --> 01:42:26,040
ही हम जीत जाए मगर अंत में जो विजय होगी वो अधर्म की होगी फर्क

1456
01:42:26,040 --> 01:42:30,200
सिर्फ इतना होगा कि तब अधर्म वहां हमारे अंदर आ चुका होगा

1457
01:42:30,200 --> 01:42:36,200
जैसे भूत प्रेत की फिल्में आती थी

1458
01:42:36,960 --> 01:42:41,000
ना अपने अंदर कभी मत आने दो बात मैं कहूंगा

1459
01:42:41,000 --> 01:42:43,440
इसको ऐसे

1460
01:42:43,440 --> 01:42:47,480
गिरो गिरो मगर उस झरने की तरह जो गिर के भी

1461
01:42:47,480 --> 01:42:51,640
को खोने नहीं दे तो अपनी बात को रखो मगर दर्शन

1462
01:42:51,640 --> 01:42:55,640
विज्ञान व्यवहार के अनुसार सामने वाला कभी आपके सामने नहीं टिक

1463
01:42:55,640 --> 01:42:59,640
पाएगा सदैव ध्यान रखिए ये बात

1464
01:42:59,640 --> 01:43:05,200
तो गुरु हो तब बताए ना गुरु है ही नहीं तो खुद ही गुरु बने फिरते हैं खुद के

1465
01:43:05,200 --> 01:43:07,400
भी

1466
01:43:07,400 --> 01:43:12,120
जी देखिए एक विरजानंद जी द्वारा रचित पुस्तक

1467
01:43:12,120 --> 01:43:16,160
है तो दयानंद जी जब विरजानंद जी के पास गए थे

1468
01:43:16,160 --> 01:43:20,160
कि दरवाजा खटखटाया तो उनसे पूछता है कि कौन हो तो बोलते हैं कि

1469
01:43:20,160 --> 01:43:20,660
यही

1470
01:43:20,440 --> 01:43:25,520
तो जानने आया हूं ये ऐसा कहते हैं किय कल्पना

1471
01:43:25,520 --> 01:43:29,640
इसका मैं प्रमाण जल्दी ही दूंगा आज

1472
01:43:29,640 --> 01:43:34,240
इस विषय पर चर्चा नहीं है इसलिए नहीं बता सकता चलिए

1473
01:43:34,240 --> 01:43:38,480
थोड़ा विराम देते आज जी तो अंतिम में यह बात कह देता हूं

1474
01:43:38,480 --> 01:43:42,800
कि जितने भी आर्य बंधु सुन रहे हैं वह आराम से खोजे परखे

1475
01:43:42,800 --> 01:43:46,880
कि देवता जो मैंने पूछा है कि उन तीन जो आपने ऋषि माना है

1476
01:43:46,880 --> 01:43:50,880
उनको ऋषि कहीं कहा गया है

1477
01:43:50,880 --> 01:43:54,920
आवाज कट रही है तो हम इसको चर्चा रोकना पड़ेगा कोई तकनीकी खराबी

1478
01:43:54,920 --> 01:43:59,040
आ रही है आवाज कट रही है और यश तिवारी जी अच्छा

1479
01:43:59,040 --> 01:44:03,120
कार कर रहे थे मगर उनका जो तरीका था उससे मैं सहमत नहीं हूं और अगर

1480
01:44:03,120 --> 01:44:07,760
वो मेरी बात अगर सुनेंगे तो मैं उन्हें आमंत्रित करता हूं कि पुनः

1481
01:44:07,760 --> 01:44:11,760
इस युद्ध में हमें आप जैसे योद्धाओं की आवश्यकता है दर्शन

1482
01:44:11,760 --> 01:44:15,760
विज्ञान और व्यवहार का आलंबन लेते हुए हमारा साथ निभाए

1483
01:44:15,760 --> 01:44:19,800
और एक महानुभाव उन्होंने कहा है कि वो टिकट के पैसे भेज देंगे सिर्फ

1484
01:44:19,800 --> 01:44:23,880
टिकट के पैसे नहीं हम यहां पर जो कार्य कर रहे

1485
01:44:23,880 --> 01:44:28,280
हैं उनमें जो जो प्रभाव पड़ेंगे उ आजीवक उपार्जन जो भी है

1486
01:44:28,280 --> 01:44:32,320
वो सारी चीजें आपको देखनी होंगी अगर हम गुजरात आते हैं तो और वहां

1487
01:44:32,320 --> 01:44:35,600
पर यह सारी चीजें हमसे आप बात करिएगा हमारा कांटेक्ट

1488
01:44:35,600 --> 01:44:39,800
नंबर लीजिए तो यह सारी चीजें अगर आप व्यवस्था कराएंगे जो आना जाना

1489
01:44:39,800 --> 01:44:44,200
रहना रुकना खाना पीना मैं और मेरे साथ जो भी लोग जाएंगे वो हमारे

1490
01:44:44,200 --> 01:44:48,400
आना रहने की स्थिति में जो भी विकार उत्पन्न होंगे जो भी स्थितियां उत्पन्न

1491
01:44:48,400 --> 01:44:52,600
होंगी उनको यथा सम्मत यथा संभव उनकी स्थिति

1492
01:44:52,600 --> 01:44:56,640
को न करने के लिए जो भी प्रभाव उत्पन्न होंगे व सबकी व्यवस्था आपको करनी पड़ेगी तब

1493
01:44:56,640 --> 01:45:00,640
हम गुजरात जाएंगे है ना अन्यथा हो सकता

1494
01:45:00,640 --> 01:45:04,960
है हम कभी गुजरात जाए तो आपको हम सूचित करेंगे आप हमें अपना नंबर दे दीजिए

1495
01:45:04,960 --> 01:45:09,040
ठीक है तो अभी हमारी आवाज ठीक से

1496
01:45:09,040 --> 01:45:15,040
आ रही है कि नहीं आ रही

1497
01:45:15,200 --> 01:45:21,200
है आवाज के बारे में कोई बताएगा

1498
01:45:23,840 --> 01:45:28,080
यश तिवारी जी के बारे में मैं भी ज्यादा नहीं जानता हूं उनका चैनल था पहले उन्होंने कन

1499
01:45:28,080 --> 01:45:32,320
को एक्सपोज किया था बाद में व आर समाज को व कर रहे थे चीज

1500
01:45:32,320 --> 01:45:36,360
तो दोनों बार उन पर जो है संवैधानिक कारवाई की गई थी आवाज नहीं

1501
01:45:36,360 --> 01:45:40,840
आ रही ठीक है इनको आ रही है आवाज ठीक है

1502
01:45:40,840 --> 01:45:45,320
ठीक है तो आप अपनी बात पूरी कर लीजिए समता जी आवाज आ रही

1503
01:45:45,320 --> 01:45:49,800
है

1504
01:45:49,800 --> 01:45:54,720
तो यह जो देवेंद्रनाथ मुखोपाध्याय जी है

1505
01:45:54,720 --> 01:45:59,000
आर्य समाज के इन्होंने ही इस बात को कल्पना कही है कि वह दरवाजा

1506
01:45:59,000 --> 01:46:03,360
खटखटा आते हैं अंदर से आवाज आती है कौन दयानंद जी कहते हैं कि यही तो जानने

1507
01:46:03,360 --> 01:46:07,400
यह कल्पना कह देते हैं इस पूरी बात को लेकिन इसको प्रचारित बहुत किया जाता

1508
01:46:07,400 --> 01:46:11,480
है कि देखो दयानंद जी तो ऐसा कहा है

1509
01:46:11,480 --> 01:46:16,840
अच्छा और अंतिम बात कोई भी आर्य स

1510
01:46:16,840 --> 01:46:20,960
इस इस बात को आप दोबारा पीछे से बता दीजिए थोड़ा सा क्योंकि वो बीच में काफी

1511
01:46:20,960 --> 01:46:26,000
लंबी चर्चा द

1512
01:46:26,000 --> 01:46:30,160
जब दयानंद जी गुरु की तलाश में जाते हैं तो गिरजानंद जी के कक्ष

1513
01:46:30,160 --> 01:46:34,240
का दरवाजा खटखटा हैं तो विरजानंद जी पूछते हैं कि कौन तो दयानंद

1514
01:46:34,240 --> 01:46:39,080
जी कहते हैं यही तो जानने आया हूं इस बात को लेकर अलंकार समाज वाले बड़े

1515
01:46:39,080 --> 01:46:43,280
चरित करते हैं कि देखो यह है ये है और लेकिन जबक देवेंद्रनाथ मुखोपाध्याय

1516
01:46:43,280 --> 01:46:47,440
जो आर्य समाज के है इसके लेखक है जीवनी के

1517
01:46:47,440 --> 01:46:51,480
वो कहते हैं कि ये तो कल्पना है ठीक है ये तो कवि की कल्पना है ऐसा कुछ

1518
01:46:51,480 --> 01:46:57,480
नहीं हुआ था ऐसा लिखते हैं इसका प्रमाण दिखा

1519
01:46:58,960 --> 01:47:03,240
देता यहां पर यह जो लाइनों के बीच में अगर दिख

1520
01:47:03,240 --> 01:47:09,240
रहा

1521
01:47:10,720 --> 01:47:15,160
हो जी उसको सीधा कर दीजिए

1522
01:47:15,160 --> 01:47:19,560
आप उसको सीधा कर दीजिए जी

1523
01:47:19,560 --> 01:47:23,600
तो यही जानने के लिए तो आपको आपकी शरण में

1524
01:47:23,600 --> 01:47:28,280
आया हूं जैसे कल्पना पूर्ण प्रसंगों की उद् भावना स्वामी जी ने ही

1525
01:47:28,280 --> 01:47:33,360
की है लो स्वामी जी ने ही की है और किसी

1526
01:47:33,360 --> 01:47:37,480
कल्पना में तो एक्सपर्ट है देखिए हम अपने

1527
01:47:37,480 --> 01:47:41,560
सामर्थ्य के अनुसार जो कर सकते हैं वह कर रहे हैं दूसरी बात यह है कि

1528
01:47:41,560 --> 01:47:45,680
हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम अपने सारे काम धामों को छोड़

1529
01:47:45,680 --> 01:47:49,800
कर के गुजरात चले जाए तो जब हमारे पास समय होगा जब

1530
01:47:49,800 --> 01:47:53,840
भी होगा सामर्थ होगा तो हम वहां पहुंचेंगे इससे भिन्न यदि

1531
01:47:53,840 --> 01:47:58,040
किसी को बहुत ज्यादा आपत्ति है बहुत ज्यादा उसके अंदर जो है एकदम

1532
01:47:58,040 --> 01:48:02,200
ज्वाला भड़क रही है तो मैंने उन चीजों के बारे में बताया कि आप ऐसी ऐसी अमुक

1533
01:48:02,200 --> 01:48:06,240
अमुक व्यवस्थाएं करेंगे तो हम जाने में सक्षम हो पाएंगे मुझे पता है कि आप वो नहीं

1534
01:48:06,240 --> 01:48:10,560
करेंगे इसीलिए मैंने वो चीजें की है कि हम अगर आप कर देते तो हम जाएंगे

1535
01:48:10,560 --> 01:48:15,000
मगर हमारे पास यहां धरातल पर करने के बहुत सारे कार्य हैं

1536
01:48:15,000 --> 01:48:19,000
हर हफ्ते कई जगहो पर हिंदू राष्ट्र संगोष्ठी करना

1537
01:48:19,000 --> 01:48:23,760
शोभा यात्रा निकालना लोगों को जो धर्म

1538
01:48:23,760 --> 01:48:26,000
की चीजें हैं उनसे जानकारी दिलवाना

1539
01:48:26,000 --> 01:48:30,320
और इकट्ठा करना सजक करना अपनी चीजों के प्रति वोह आका

1540
01:48:30,320 --> 01:48:34,720
सिद्धांत बताना जिनके कारण हमारा सनातन समाज एक हो पाए व अकाट्य

1541
01:48:34,720 --> 01:48:39,000
सिद्धांत है क्या हमारे पास ज्यादातर लोगों पास नहीं है तो ऐसी चीजों

1542
01:48:39,000 --> 01:48:43,080
लेकर के कर रहे हैं कार्य कर रहे हैं तो इसलिए ऐसा संभव नहीं है कि अचानक से किसी ने चुनौती

1543
01:48:43,080 --> 01:48:47,440
दे दी तो हम चले ग भैया गुजरात मगर फिर भी आपके अंदर बहुत ज्यादा ऊर्जा

1544
01:48:47,440 --> 01:48:51,640
है तो हम यहां की जो चीजें कर रहे भंडारे चल रहे हैं हर हफ्ते हर

1545
01:48:51,640 --> 01:48:55,880
समय लगातार कुछ ना कुछ चल रहा है धरातल पर तो यदि अगर

1546
01:48:55,880 --> 01:49:00,120
किसी को बहुत ज्यादा जल्दी है हमें वहां पहुंचाने की उनसे उनसे साथ सामना

1547
01:49:00,120 --> 01:49:04,400
कराने की तो वो यहां की जो व्यवस्थाएं है उनको उठाने का बाहर

1548
01:49:04,400 --> 01:49:08,880
उठाए है ना उनको उनको वहन करे और फिर हम वहां जाएंगे अन्यथा

1549
01:49:08,880 --> 01:49:12,880
कभी ना कभी हो सकता गुजरात जाएंगे बिल्कुल जाएंगे कभी ना कभी आपको सूचित

1550
01:49:12,880 --> 01:49:17,680
करेंगे तब तक आप धैर रखिए जी तो

1551
01:49:17,680 --> 01:49:21,680
मैं अब थोड़ा सा विराम दूंगा आज की काफी लंबी चर्चा हो गई है एक घंटा

1552
01:49:21,680 --> 01:49:24,880
अंतिम बात

1553
01:49:24,880 --> 01:49:29,120
जी जी कि मैंने बता दिया है कि अलंकार

1554
01:49:29,120 --> 01:49:33,120
समाज देवता योनि नहीं मानता तो इनके जितने भी भाष्य है अब

1555
01:49:33,120 --> 01:49:37,280
जो देवता शब्द जिन श्लोकों में आया है इन्होंने जान मूच करर उसका अर्थ

1556
01:49:37,280 --> 01:49:41,280
अलग लगाया है आप सब समझ सकते हैं इस बात को कोई

1557
01:49:41,280 --> 01:49:45,760
है नहीं कोई भी वो तो मैंने कहा ना वो अलंकार अपने मन से जहां इनके

1558
01:49:45,760 --> 01:49:51,640
इनके मंतव्य की पूर्ति नहीं हो रही है वहा

1559
01:49:51,640 --> 01:49:55,720
अलंकार किसी को भी असहमति है हमारे विचारों से हमारे

1560
01:49:55,720 --> 01:49:59,920
सिद्धांतों से तो मैं फिर से अपना नंबर दे रहा हूं नंबर है

1561
01:49:59,920 --> 01:50:02,200
740

1562
01:50:02,200 --> 01:50:06,280
8369 जैसे ही आप वहां पर व करेंगे एक आपको

1563
01:50:06,280 --> 01:50:10,600
फॉर्म प्राप्त होगा उस फॉर्म को भर कर के हमारी

1564
01:50:10,600 --> 01:50:14,600
जो चर्चा है सुनिश्चित हो सकती है सभी को जय श्री राम और

1565
01:50:14,600 --> 01:50:18,760
शर्मा जी भव्य शर्मा जी आपको आने के लिए बहुत-बहुत आभार आपने बहुत

1566
01:50:18,760 --> 01:50:22,920
अच्छा प्रकाश डाला कई तथ पर जी

1567
01:50:22,920 --> 01:50:26,920
जी क्षमा करिएगा सत्यम जी आपने प्रकाश

1568
01:50:26,920 --> 01:50:31,080
डाला बहुत-बहुत आभार आपका चलिए जय श्री राम सभी को जय श्री राम हर

1569
01:50:31,080 --> 01:50:35,080
हर महादेव नमस चंडिका हर हर महादेव हर हर महादेव
