1
00:00:01,360 --> 00:00:05,520
तो सभी को जय श्री राम। आशा करता हूं

2
00:00:05,520 --> 00:00:09,680
आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। तो जैसा कि प्रकरण

3
00:00:09,680 --> 00:00:14,320
आप सभी को मालूम है। आप सभी अवगत हैं। एक

4
00:00:14,320 --> 00:00:18,560
वातावरण क्रिएट हो गया है हमारी चर्चा के बाद से और

5
00:00:18,560 --> 00:00:22,720
हर कोई व्यक्ति अपनीपनी टपली अपना अपना राग बजा रहा है।

6
00:00:22,720 --> 00:00:26,720
कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मौका परस्त

7
00:00:26,720 --> 00:00:30,720
हैं अवसरवादी जो बहती गंगा में हाथ धोने का प्रयास

8
00:00:30,720 --> 00:00:34,880
में लगे हुए हैं। फिलहाल जो दो मेन मुख्य

9
00:00:34,880 --> 00:00:39,600
रूप से मेरे सामने मुझे दिख रहे हैं आर्य समाज के जो विद्वान है

10
00:00:39,600 --> 00:00:43,680
एक योगेश भारद्वाज जी और एक जिनके साथ हमारी चर्चा

11
00:00:43,680 --> 00:00:47,920
हुई थी अग्निव्रत जी इसके

12
00:00:47,920 --> 00:00:52,480
साथ ही साथ एक व्यक्ति और दिख रहा है मुझे कोई सवाई माधोपुर का है कोई

13
00:00:52,480 --> 00:00:56,640
कुटापिटा संगीतकार जैसा दिखता है वो क्या नाम है सोमदेव

14
00:00:56,640 --> 00:01:00,720
करके कुछ है तो वह भी सोच रहा है कि बहती गंगा में हाथ धो

15
00:01:00,720 --> 00:01:04,880
ले हम भी वैसे कोई सुनता नहीं है। चलो इसी प्रकार से

16
00:01:04,880 --> 00:01:09,680
कोई सुन ले हमारा वह भी इसमें लगे हुए हैं। खैर कोई बात नहीं।

17
00:01:09,680 --> 00:01:15,680
तो योगेश भारद्वाज जी ने हमें लेकर के एक प्रतिक्रिया

18
00:01:16,240 --> 00:01:20,320
प्रदान की है और उसमें

19
00:01:20,320 --> 00:01:24,560
जो है उन्होंने बताया कि उनके

20
00:01:24,560 --> 00:01:29,200
पास कौन-कौन से बहाने हैं जिनके कारण वो

21
00:01:29,200 --> 00:01:33,520
अपनी जिनके आधार पर वह अपनी जो

22
00:01:33,520 --> 00:01:37,520
सामने ना आ पाने की जो असमर्थता है उसको छुपाने

23
00:01:37,520 --> 00:01:41,920
का प्रयास कर रहे हैं। तो उन्होंने वह बहाने बड़े ही सुंदर

24
00:01:41,920 --> 00:01:46,160
तरीके से प्रस्तुत किए हैं अपने वीडियो में जिस पर अभी हम चर्चा करेंगे।

25
00:01:46,160 --> 00:01:50,480
चर्चा दो भागों में है। तीन भागों में पहला

26
00:01:50,480 --> 00:01:54,560
भाग है जो योगेश भारद्वाज जी ने प्रतिक्रिया दी है चर्चा

27
00:01:54,560 --> 00:01:58,800
के विषय में और दूसरा भाग है

28
00:01:58,800 --> 00:02:02,880
जो कुछ प्रतिक्रिया दी चर्चा को

29
00:02:02,880 --> 00:02:07,120
लेकर के और उसके बाद के कुछ दिन जो बीते उसको लेकर के अग्निव्रत

30
00:02:07,120 --> 00:02:11,200
जी ने उसके बाद उन्होंने तीसरी जो अप्रामाणिकता और अपनी हमारी

31
00:02:11,200 --> 00:02:15,760
अप्रामाणिकता और अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए जो

32
00:02:15,760 --> 00:02:20,000
विधि का आलंबन लिया है जिस विधि का तो उस पर भी बात करेंगे

33
00:02:20,000 --> 00:02:24,160
और आज बहुत सारी यह मान के चलिए कि तड़कती भड़कती

34
00:02:24,160 --> 00:02:28,640
चीजें आपको प्राप्त होने वाली हैं। जिस तरीके से अग्निव्रत जी ने दी हैं

35
00:02:28,640 --> 00:02:32,160
वीडियो में तो आपको यहां पर भी मिलने वाली है। तो

36
00:02:32,160 --> 00:02:36,480
अंत तक बने रह और सीट की पेटियां

37
00:02:36,480 --> 00:02:41,120
बांध ले कमर कस। तो [गला साफ़ करने की आवाज़]

38
00:02:41,120 --> 00:02:46,400
सबसे पहले मैं एक बात कहूंगा कि

39
00:02:46,400 --> 00:02:50,400
आर्य समाज अपने आप को तार्किक

40
00:02:50,400 --> 00:02:54,480
रूप में प्रस्तुत करता रहा है सदैव कि हमने तर्क किया, हमने

41
00:02:54,480 --> 00:02:59,200
प्रश्न किया और अ

42
00:02:59,200 --> 00:03:03,200
इसके बाद वो अपने आप को इस तरह से ख्यापित करते

43
00:03:03,200 --> 00:03:07,360
हुए बड़े लॉजिकल तरीके से और वो प्रयास करता

44
00:03:07,360 --> 00:03:11,360
रहा। उसके विद्वान इस तरीके से प्रयास करते रहे स्वयं

45
00:03:11,360 --> 00:03:15,440
को तार्किक दिखाते हुए कि उनसे बड़ा तार्किक कोई है नहीं और तर्क

46
00:03:15,440 --> 00:03:19,840
से उन्होंने सभी को परास्त किया हुआ है। तर्क तर्क तर्क चिल्लाते रहे

47
00:03:19,840 --> 00:03:24,080
और आज देखिए आप कि अवतारवाद पर चर्चा प्रारंभ

48
00:03:24,080 --> 00:03:28,080
होती है। उसमें जब व्यवस्थित तरीके से

49
00:03:28,080 --> 00:03:32,240
तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं। एक सवाल पूछा जाता है। यद्यपि

50
00:03:32,240 --> 00:03:36,640
वह बहुत कठिन सवाल नहीं है। मुझे मालूम है कि आर्य समाज में ऐसे

51
00:03:36,640 --> 00:03:41,040
लोग हैं। जो उस सवाल से आगे बढ़कर के आगे आने वाले सवालों पर अटकेंगे।

52
00:03:41,040 --> 00:03:45,040
अटकेंगे वह भी पर इस सवाल पर नहीं अटकेंगे। यह हमारे

53
00:03:45,040 --> 00:03:47,520
बीच में वो

54
00:03:47,520 --> 00:03:51,760
वाला सवाल नहीं है जिस पर कि मैच का कोई निर्णय निकले। है ना?

55
00:03:51,760 --> 00:03:56,160
परंतु यहां पर अग्निव्रत जी अटक जाते हैं। कहां पर? कि जब

56
00:03:56,160 --> 00:04:00,160
निराकार ईश्वर जो है जिन कार्यों

57
00:04:00,160 --> 00:04:04,240
में लिप्त होने के बाद भी निराकार ईश्वर को दोष नहीं लग रहा है तो उन्हीं

58
00:04:04,240 --> 00:04:08,960
कार्यों में लिप्त होने पर अवतार लेने पर ईश्वर को दोष क्यों लगेगा?

59
00:04:08,960 --> 00:04:12,960
अवतार ना लेने वाले ईश्वर पर जब दोष नहीं लग रहा है तो अवतार लेने वाले ईश्वर पर दोष

60
00:04:12,960 --> 00:04:17,120
क्यों लग जाएगा? भाई हम ये थोड़ी ना कहते हैं कि जब उसने अवतार लिया तब वो सर्वव्यापक

61
00:04:17,120 --> 00:04:21,120
नहीं है। वही सर्व्यापक ईश्वर सब जगह जो अगोचर

62
00:04:21,120 --> 00:04:26,000
है वहां पर दृष्टिगोचर हो गया। सिर्फ इतना अंतर है

63
00:04:26,000 --> 00:04:30,000
आंखों का विषय बनने में और आंखों का विषय ना बनने में। इतनी जगह पर आंखों का

64
00:04:30,000 --> 00:04:34,720
विषय बन गया और बाकी की जगह आंखों का विषय अभी भी नहीं है। जैसे पहले था

65
00:04:34,720 --> 00:04:38,800
तो हम यह नहीं कहते कि अब वो सर्व्यापक नहीं है। वो जब अवतार

66
00:04:38,800 --> 00:04:43,120
अवतार में आ गया और यह बात उन्हें भी पता है। ऐसा नहीं है कि वो कोई

67
00:04:43,120 --> 00:04:47,200
पुराने चावल है वो भी तो यह सब मान्यताएं उनको पता है। और अगर नहीं पता

68
00:04:47,200 --> 00:04:51,280
है और तब वो इस तरीके से विवाद उत्पन्न कर रहे हैं। तब कटाक्ष करते हैं।

69
00:04:51,280 --> 00:04:55,760
मूर्ति पूजा का विरोध करते हैं। तो यह एक विचारणीय बात है। सोचना

70
00:04:55,760 --> 00:04:59,760
चाहिए। तो कहने का तात्पर्य यह है कि एक सवाल पूछा जाता

71
00:04:59,760 --> 00:05:02,720
है कि भाई जिन कार्यों को करने पर मनुष्य

72
00:05:02,720 --> 00:05:07,120
को पापी माना जाता है। उन्हीं कार्यों को करने पर निराकार

73
00:05:07,120 --> 00:05:12,320
ईश्वर को पापी नहीं माना जाता।

74
00:05:12,320 --> 00:05:14,560
परंतु

75
00:05:14,560 --> 00:05:20,000
ईश्वर अवतार कर

76
00:05:20,000 --> 00:05:26,000
माना जाएगा। अंतष्ट आ जाएगा।

77
00:05:27,040 --> 00:05:33,040
थोड़ी लाइट तो तब उसके अंदर अंत का चतुष्ट आ जाए

78
00:05:41,840 --> 00:05:45,840
कोई परेशानी आ रही है। नेटवर्क का कुछ इशू आ रहा

79
00:05:45,840 --> 00:05:49,840
है। खैर कोई बात नहीं हम लोग आगे बढ़ते

80
00:05:49,840 --> 00:05:54,080
हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो इन प्रश्नों पर जब जब

81
00:05:54,080 --> 00:05:58,320
हम इस पॉइंट पर पहुंच गए अग्निवत जी के साथ और जब मैंने पूछा कि ऐसा क्यों

82
00:05:58,320 --> 00:06:02,480
है तो उन्होंने वहां जवाब नहीं दिया और वहां पर वो बात अभी

83
00:06:02,480 --> 00:06:06,560
तक रुकी हुई है ना तो योगेश भारद्वाज जी ने जवाब दिया है उसके बाद उन्होंने

84
00:06:06,560 --> 00:06:11,840
बड़े व्यक्तिगत कटाक्ष किए ये सब वो अभी भी मैं बात करूंगा उन पर

85
00:06:11,840 --> 00:06:16,320
अब देखिए कि दोनों ही लोगों ने ऐसा पलायन किया है ऐसी भागमभाग

86
00:06:16,320 --> 00:06:17,840
स्टार्ट की है एक

87
00:06:17,840 --> 00:06:22,160
व्यक्ति जाकर के व्याकरण के पीछे अपना मुंह छुपा रहा एक व्यक्ति जाकर

88
00:06:22,160 --> 00:06:26,240
के उसकी जानकारी में जो अप्रामाणिक भाष्य है शय

89
00:06:26,240 --> 00:06:30,400
आचार्य शण का उसके पीछे अपना मुंह छुपा रहे पर कोई भी यह बात नहीं

90
00:06:30,400 --> 00:06:34,800
कर रहा है कि ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता बात

91
00:06:34,800 --> 00:06:37,680
यह हो रही है

92
00:06:37,680 --> 00:06:42,000
शिवश नारायण द्विवेदी को व्याकरण नहीं आती इसलिए

93
00:06:42,000 --> 00:06:46,320
चर्चा नहीं होगी तो मैं पूछना चाहूंगा बड़े ही सम्मान

94
00:06:46,320 --> 00:06:50,320
के साथ योगेश जी आपने क्या हमारे ऊपर टिप्पणी

95
00:06:50,320 --> 00:06:54,320
संस्कृत में की थी। आप संस्कृत में कटाक्ष करते हैं।

96
00:06:54,320 --> 00:06:58,320
आचार्य शारण के भाष्य का अपमान आप संस्कृत में करते हैं। क्यों करते

97
00:06:58,320 --> 00:07:02,320
हैं हिंदी में? संस्कृत में करिए। हमें

98
00:07:02,320 --> 00:07:08,160
आवश्यक लगेगा तो टोकेंगे। संस्कृत सीख के टोकेंगे वरना नहीं टोकेंगे।

99
00:07:08,160 --> 00:07:13,200
सत्यार्थ प्रकाश केवल संस्कृत में छप पाइए।

100
00:07:13,200 --> 00:07:17,360
मतलब आप क्लेम कर सकते हो हर भाषा में।

101
00:07:17,360 --> 00:07:21,440
पर कोई व्यक्ति जिस भाषा में उसको हर्ट हुआ है,

102
00:07:21,440 --> 00:07:25,600
जिस भाषा में उसको उसके हृदय को चोट पहुंची है,

103
00:07:25,600 --> 00:07:30,000
वह व्यक्ति उस भाषा में जिस भाषा में उसको पता चला कि भाई मेरे बारे में ऐसा-सा

104
00:07:30,000 --> 00:07:34,400
कहा जा रहा है, उस भाषा में वो प्रश्न नहीं कर सकता। प्रश्न करेगा तो उससे कहोगे कि व्याकरण

105
00:07:34,400 --> 00:07:38,400
सीख के आओ। और तुम्हारा वो तुम्हारी ओर का

106
00:07:38,400 --> 00:07:41,600
व्यक्ति था राहुल आर्य।

107
00:07:41,600 --> 00:07:45,840
इस से तर्क कर रहा था जब वह इस वालों ने कहा था भाई व्याकरण में आइए संस्कृत

108
00:07:45,840 --> 00:07:49,920
में होगा शास्त्रार्थ जब शास्त्रार्थ की बात आई थी तब तुमने क्यों नहीं

109
00:07:49,920 --> 00:07:54,000
कहा था भाई सही कह रहे हैं इस वाले राहुल आर्य को

110
00:07:54,000 --> 00:07:58,240
पहले जो है व्याकरण सीखनी चाहिए हां तब तो राहुल

111
00:07:58,240 --> 00:08:02,560
आर्य पीछे हट गए थे तो आप अपना वीडियो हमें लेकर के जो आपत्ति

112
00:08:02,560 --> 00:08:06,640
जता रहे हो वो वीडियो भी संस्कृत में बनाइए ना हम फिर देखेंगे हमें करना है कि नहीं आपको

113
00:08:06,640 --> 00:08:10,800
चर्चा के लिए बोलना है कि नहीं मतलब एक तो आप पहले कायरता

114
00:08:10,800 --> 00:08:14,880
पूर्वक यहां वहां पीठ पीछे मुंह छुपा करके शिवश नारायण द्विवेदी यह कर रहे हैं

115
00:08:14,880 --> 00:08:18,880
वह कर रहे हैं यह सब कर रहे हो और फिर हमने

116
00:08:18,880 --> 00:08:22,880
कहा कि भाई पीठ पीछे क्यों कर रहे हो कायरता क्यों दिखा रहे हो सामने आकर के बात कर लो

117
00:08:22,880 --> 00:08:26,880
तो आप फिर अब व्याकरण को ला रहे हो

118
00:08:26,880 --> 00:08:28,400
मगर इस प्रश्न का उत्तर

119
00:08:28,400 --> 00:08:32,560
नहीं है कि ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता

120
00:08:32,560 --> 00:08:37,040
ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि शिव मोहिनी प्रकरण आपको समझ में नहीं आता है

121
00:08:37,040 --> 00:08:41,120
ऑब्जेक्टिव हो गए भाई शिव मोहिनी प्रकरण समझ में नहीं

122
00:08:41,120 --> 00:08:45,200
आता है। इसका मतलब यह यह माना जाएगा ना कि ईश्वर अवतार ले तो

123
00:08:45,200 --> 00:08:49,600
सकता है पर वो शिव मोहिनी वाला रूप नहीं। वो कहानी ठीक नहीं है।

124
00:08:49,600 --> 00:08:53,600
तो पहले इतना मानो फिर हम देखें शिव मोहिनी वाले में आपको निराकरण क्या प्रस्तुत करना

125
00:08:53,600 --> 00:08:57,600
है क्या दिक्कत है क्या नहीं तो सबसे पहली बात यह है कि अगर

126
00:08:57,600 --> 00:09:02,560
आपको व्याकरण चाहिए तो आप व्याकरण में वीडियो बनाइए ना

127
00:09:02,560 --> 00:09:07,120
टिप्पणी व्याकरण में करिए ना

128
00:09:07,120 --> 00:09:11,120
बात चल रही है अवतारवाद की आप ला रहे हो कि

129
00:09:11,120 --> 00:09:16,000
भैया व्याकरण सीख के आओ तब होगा शास्त्रार्थ। अच्छा शास्त्रार्थ की बात भी कर लो।

130
00:09:16,000 --> 00:09:20,320
नहीं कुछ ठीक शास्त्रार्थ की बात भी कर लो। हमने कब कहा शास्त्रार्थ?

131
00:09:20,320 --> 00:09:24,960
हमने कहा है क्या शास्त्रार? हमने तो चर्चा के लिए कहा है।

132
00:09:24,960 --> 00:09:29,120
शास्त्रार्थ तो आपके लोगों के अंदर गूंजा करता है कि मैंने इसको चुनौती दे दी।

133
00:09:29,120 --> 00:09:33,200
उसको चुनौती दे दी। मैंने ये चैलेंज कर दिया। वो चैलेंज कर दिया। का जब सामना हो जाता

134
00:09:33,200 --> 00:09:37,280
है तो अपना जो स्तर है

135
00:09:37,280 --> 00:09:41,360
ज्ञात हो जाता है। इसी तरीके से बगले झांकते घूमते हैं आपके लोग और

136
00:09:41,360 --> 00:09:46,000
आप फिलहाल आप भी ऐसा ही कर रहे हैं। अच्छा

137
00:09:46,000 --> 00:09:50,000
व्याकरण जानने वाला ही यदि विद्वान हो सकता है, चर्चा के योग्य

138
00:09:50,000 --> 00:09:54,000
हो सकता है तो फिर आप क्यों सम्मान दे रहे हैं इनको? आपके

139
00:09:54,000 --> 00:09:58,000
जो तथाकथित सो कॉल्ड वैज्ञानिक यह तो खुद कह रहे

140
00:09:58,000 --> 00:10:02,080
हैं कि इनको व्याकरण नहीं आती है। और ही भाष्य करके

141
00:10:02,080 --> 00:10:06,320
बैठे हैं शास्त्रों के खुद कहते हैं मैंने तो और ही भाष्य कर रखे

142
00:10:06,320 --> 00:10:10,400
हैं। तो अगर व्याकरण के आधार पर चर्चा हो सकती है तो फिर

143
00:10:10,400 --> 00:10:14,480
आप उनकी साइड क्यों खड़े हैं? वो भी अयोग्य व्यक्ति हैं। आपको उन्हें भी

144
00:10:14,480 --> 00:10:18,720
कह देना चाहिए। तो यह बहाने बनाना छोड़ो।

145
00:10:18,720 --> 00:10:22,240
मुझे आपसे उम्मीद नहीं थी क्योंकि आप एक

146
00:10:22,240 --> 00:10:26,720
कुशल वक्ता मैंने देखा है ना यह आप जो

147
00:10:26,720 --> 00:10:31,040
जो एक छीछा लेदर करवा रहे हैं आप इस समय

148
00:10:31,040 --> 00:10:35,040
इस तरीके से यह जो आपका बहाने प्रस्तुत करना है यह

149
00:10:35,040 --> 00:10:39,120
छीछा लेदर है। आपके पक्ष की छीछा लेदर

150
00:10:39,120 --> 00:10:43,120
अवतार ना ले सकने वाले ईश्वर की छीछा लेदर दयानंद

151
00:10:43,120 --> 00:10:47,200
जी की मान्यता की छीछा लेदर उनके

152
00:10:47,200 --> 00:10:52,960
भाष्य की छीछा लेदर ये सब आप छीछा लेदर करवा रहे हैं इस तरह से

153
00:10:52,960 --> 00:10:58,640
तो सबसे पहले तो इस पर थोड़ा ध्यान दीजिए कि आप दोहरी बातें कर रहे हैं। रामो दभाषते

154
00:10:58,640 --> 00:11:03,840
हम राम को मानने वाले लोग हैं ना इसमें तो मैं और आप एक होंगे शायद

155
00:11:03,840 --> 00:11:07,280
राम दो प्रकार की बातें नहीं करता। महाभारत

156
00:11:07,280 --> 00:11:11,120
में क्या लिखा है? अन्यों के साथ वही व्यवहार करिए जो स्वयं के लिए स्वीकार

157
00:11:11,120 --> 00:11:15,280
रहे हो। तो ये क्या दोगलापन है? अग्निव्रत जी के लिए अलग

158
00:11:15,280 --> 00:11:19,280
मेरे लिए अलग। क्यों? क्योंकि मैं दयानंद जी को नहीं

159
00:11:19,280 --> 00:11:25,280
मानता हूं इसलिए पक्षपात करेंगे। यही तो है पहली नजर।

160
00:11:27,040 --> 00:11:31,200
अच्छा अब दूसरी बात आती है अशिष्टता। मैंने

161
00:11:31,200 --> 00:11:35,360
आपके नाम के सामने जी नहीं लगाया। अच्छा अगले ही पल

162
00:11:35,360 --> 00:11:39,440
आप यह भी बात बता रहे हैं कि भाई वह जो साहित्य भाषा होती है आपने आगे बात

163
00:11:39,440 --> 00:11:43,680
करेंगे आपने समालोचना की एक आपने चर्चा देखी

164
00:11:43,680 --> 00:11:47,680
उसकी आपने समीक्षा कर दी उसमें आपका कुछ ऐसा नहीं था कि आपको किसी की

165
00:11:47,680 --> 00:11:51,920
वो करनी पता नहीं मुझे बुरा क्यों लग गया उसमें आपने मेरे ऊपर टिप्पणी की कि शायद मैं साहित्य

166
00:11:51,920 --> 00:11:56,000
की साहित्य में मेरी गति नहीं है इस कारण से आप मैं जो

167
00:11:56,000 --> 00:12:00,880
है बुरा मान गया आपकी उस समालोचना को स्वीकार नहीं कर पाया

168
00:12:00,880 --> 00:12:05,040
तो जब आपको साहित्य में इतनी गति है आप बड़े ही कुशल

169
00:12:05,040 --> 00:12:09,120
साहित्य वाले व्यक्ति हैं। बहुत गति है आपकी साहित्य में। तो आपको यह

170
00:12:09,120 --> 00:12:13,440
नहीं पता है कि साहित्यिक जब साहित्य के रूप में काव्य रचना

171
00:12:13,440 --> 00:12:17,440
इत्यादि होती है तब जो सम्माननीय व्यक्ति होता है उसके लिए भी कई

172
00:12:17,440 --> 00:12:22,880
बार तू तड़ाक जैसी भाषा आ जाती है।

173
00:12:22,880 --> 00:12:27,120
ईश्वर के लिए आ जाती है। ईश्वर ऐसा करता है।

174
00:12:27,120 --> 00:12:31,120
कृष्ण ऐसा करता है। राम ऐसा करता है। आप लोग निराकार ईश्वर ऐसा करता

175
00:12:31,120 --> 00:12:35,120
है। क्यों आ रहा है कर्ता? वहां जी

176
00:12:35,120 --> 00:12:39,120
क्यों नहीं लगा रहे? श्री क्यों नहीं लगा रहे? अनेकानेक बार काव्य रचनाओं में

177
00:12:39,120 --> 00:12:43,200
इस तरह का आ ही जाता है। और जो आपके नाम के आगे जी नहीं

178
00:12:43,200 --> 00:12:47,200
लगा है वो क्यों नहीं लगा है? क्योंकि एक गाने की पंक्ति थी

179
00:12:47,200 --> 00:12:51,200
जो आप पर शूट शूट कर रही थी। शूट नहीं आपसे

180
00:12:51,200 --> 00:12:56,160
मैच कर रही थी। शूट नहीं करूंगा। चिंता ना करिएगा। आप ही का बालक हूं छोटा।

181
00:12:56,160 --> 00:13:00,560
है ना? तो क्या है?

182
00:13:00,560 --> 00:13:04,560
आपसे मैच कर रही थी। मैच

183
00:13:04,560 --> 00:13:09,760
तो मिलान करने की वजह से उस पंक्ति को मैंने आपसे जोड़ा कि

184
00:13:09,760 --> 00:13:14,800
150 बरस की समाजी उपज को सलाम

185
00:13:14,800 --> 00:13:18,880
भरद्वाज तेरी तेरी नहीं भरद्वाज की तेरी भी नहीं

186
00:13:18,880 --> 00:13:23,120
बोला उसमें तेरी शब्द फिट बैठ रहा था पर मैंने उसको रोका कि नहीं तेरी ना बोलूं

187
00:13:23,120 --> 00:13:27,120
भरद्वाज की पैनी नजर को प्रणाम

188
00:13:27,120 --> 00:13:31,120
यह पंक्ति में वहां पर जी नहीं लगाया और उसको

189
00:13:31,120 --> 00:13:35,600
लेकर के आपने एक शिष्टता का एक बड़ा लंबा सा लेक्चर दे दिया। अच्छा तू तड़ाक

190
00:13:35,600 --> 00:13:38,400
प्रारंभ किसने की है?

191
00:13:38,400 --> 00:13:42,480
आपका ही वीडियो है जिसमें आप किसी व्यक्ति के साथ

192
00:13:42,480 --> 00:13:46,560
बातचीत कर रहे हैं और उसमें कह रहे हैं तेरी परंपरा तो कोर्ट की परंपरा है। आज से

193
00:13:46,560 --> 00:13:50,640
कम से कम तीन महीने पहले का प्राप्त है वीडियो मुझे। दो-तीन महीने पहले का

194
00:13:50,640 --> 00:13:54,720
अभी का नहीं। तू तड़ाक तो आप चालू कर रहे हैं। तेरी परंपरा कोर्ट

195
00:13:54,720 --> 00:13:59,360
की परंपरा है।

196
00:13:59,360 --> 00:14:04,160
तो इस तरह की बातें जो आप कह रहे हैं कि

197
00:14:04,160 --> 00:14:08,240
अपनी ओर से आपने प्राथमिकता से यह सब चालू किया

198
00:14:08,240 --> 00:14:12,400
कि तेरी परंपरा कोर्ट की परंपरा है और

199
00:14:12,400 --> 00:14:16,480
खुद मुझे ज्ञान दे रहे हैं। आप साहित्य का और स्वयं साहित्य

200
00:14:16,480 --> 00:14:21,200
में गति होने के बाद भी देख नहीं पा रहे हैं। इसको कहते हैं त्रयाचरित्र।

201
00:14:21,200 --> 00:14:25,360
दोगलापन कहते हैं और टपोरी

202
00:14:25,360 --> 00:14:29,760
होना छपरी होना या और कौन सा वर्ड था वो

203
00:14:29,760 --> 00:14:33,920
टपोरी छपरी और और भी एक आध वर्ड था

204
00:14:33,920 --> 00:14:37,920
ये सब चल जाता है मगर साथ में अगर वो छपरी टपोरी

205
00:14:37,920 --> 00:14:42,960
इत्यादि होने के साथसाथ दोगला भी हो ना तो बड़ा ही नीच हो जाता है व्यक्ति

206
00:14:42,960 --> 00:14:47,040
आपकी बात नहीं कर रहा हूं सामान्य तौर पर बात बता रहा हूं

207
00:14:47,040 --> 00:14:51,120
यदि व्यक्ति सामने वाला अशिष्ट हो छपरी हो टपोरी हो और

208
00:14:51,120 --> 00:14:53,600
साथ में दोगला भी हो ना

209
00:14:53,600 --> 00:14:59,440
तो फिर वह बहुत नीच हो जाता है। नीचों की कैटेगरी में आने लगता है।

210
00:14:59,440 --> 00:15:04,560
तो यह परंपरा आपके यहां की है। दोगलापन परंपरा

211
00:15:04,560 --> 00:15:08,800
प्राप्त दोगलापन विषयांतर परंपरा प्राप्त विषयांतर

212
00:15:08,800 --> 00:15:14,800
विषयांतर परंपरा दोगलापन परंपरा ये सब आपके नाम है।

213
00:15:17,360 --> 00:15:21,520
तो अब इसमें आप एक बात आपने बताई कि भाई आपने

214
00:15:21,520 --> 00:15:25,600
मुझे शिवशु कह दिया। मैंने आपत्ति जताई। फिर आपने बताया जो है

215
00:15:25,600 --> 00:15:29,760
कि आपके यहां हरियाणा में ऐसा कहा जाता है वैसा कहा जाता है।

216
00:15:29,760 --> 00:15:33,840
तो पहले थोड़ा अकल के आपको पता नहीं कौन से पर्दे

217
00:15:33,840 --> 00:15:37,920
पड़े हुए हैं। कौन से अपने चापलूसों के इर्दगिर्द घिरे रहते

218
00:15:37,920 --> 00:15:42,000
हैं आपके। चापलूसों के बीच में रहते हैं क्या जो आपको वही सुनाते

219
00:15:42,000 --> 00:15:46,080
हैं जिससे कि आपकी वो भड़भड़ाती हुई आवाज बाहर निकले। उनहीं के बीच में रहते

220
00:15:46,080 --> 00:15:48,480
हैं क्या?

221
00:15:48,480 --> 00:15:52,640
आपको ऐसी ही जानकारियां पहुंचाते हैं जिन जानकारियों

222
00:15:52,640 --> 00:15:56,640
के कारण आप भड़काऊ भाषण दें। उनका काम चले एंटरटेन

223
00:15:56,640 --> 00:16:00,640
हो उनको और शायद और कुछ लाभ हो उनको। अरे

224
00:16:00,640 --> 00:16:06,640
भाई अपनी भी तो अकल दौड़ाइए। वैसे तो बड़े घोड़े दौड़ते हैं आपके।

225
00:16:06,880 --> 00:16:09,360
यहां पे क्या हो जाता है?

226
00:16:09,360 --> 00:16:14,160
मेरी वो पंक्ति दिखा दीजिए मुझे जहां पर मैंने आपत्ति जताई हो।

227
00:16:14,160 --> 00:16:20,160
शिवांशु कहने पर उस पर आप स्पष्टीकरण दे रहे हैं। बताइए

228
00:16:20,720 --> 00:16:25,040
कितने कितना निम्न स्तर का हो गया ये कार्य आपसे अनजाने में आपके

229
00:16:25,040 --> 00:16:29,120
लोगों के कारण हा कौन

230
00:16:29,120 --> 00:16:33,840
सी पंक्ति में आपत्ति जता दी मैंने जो आप स्पष्टीकरण दे रहे हैं।

231
00:16:33,840 --> 00:16:37,920
व्यक्ति विषय से हटकर दूसरी बातें बड़ी-बड़ी

232
00:16:37,920 --> 00:16:42,160
सजा के बहुत अच्छे से एक वैश्या होती है ना

233
00:16:42,160 --> 00:16:46,320
वो स्वयं को बहुत सजा के रखती है इसलिए रखती है सजा

234
00:16:46,320 --> 00:16:50,880
करके क्योंकि वो जो मूल विषय है ना यह अपवित्र

235
00:16:50,880 --> 00:16:54,880
है अशुद्ध है दूषित है उस पर व्यक्ति की नजर ना जाए

236
00:16:54,880 --> 00:16:59,120
उसी प्रकार से वैश्या की भांति इस प्रकार से दूसरी दूसरी चीजों

237
00:16:59,120 --> 00:17:03,200
से अपने को सजा रहे हैं आप

238
00:17:03,200 --> 00:17:07,200
यह सजा रहे हैं व्याकरण और जबरदस्ती शिवंश के

239
00:17:07,200 --> 00:17:11,280
नाम पर जो है शिवांश और शिवांशु के नाम पर स्पष्टीकरण फिर अपनी कुल परंपरा को

240
00:17:11,280 --> 00:17:15,440
बताना यह सब क्या है जैसे वैश्या लिपस्टिक लगाती

241
00:17:15,440 --> 00:17:20,240
है टीका लगाती है सब वो सब चल रहा है

242
00:17:20,240 --> 00:17:24,240
ऐसा आपको शोभा नहीं देता है आपको ऐसा नहीं

243
00:17:24,240 --> 00:17:28,670
करना चाहिए ऐसी चीजों से आपको दूर रहना चाहिए तो

244
00:17:28,670 --> 00:17:32,720
[गला साफ़ करने की आवाज़] आप बच रहे हैं मूल विषय

245
00:17:32,720 --> 00:17:37,120
क्या है अवतार ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता

246
00:17:37,120 --> 00:17:41,440
तो आप क्या कर रहे हैं अन्य विषयों से स्वयं को सजा रहे हैं

247
00:17:41,440 --> 00:17:45,680
लोग उस पर इतना वाह वाह वाह वाह वाह वाह करने लग जाए वाह क्या व्याकरण बोली

248
00:17:45,680 --> 00:17:49,760
वाह क्या कुल परंपरा बताई वाह शिवांशु शिवंशु में क्या स्पष्टीकरण दिया

249
00:17:49,760 --> 00:17:53,840
वाह क्या कटाक्ष मारे व्यक्ति ये प्रश्न ना पूछे

250
00:17:53,840 --> 00:17:57,920
कि ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है आप ही

251
00:17:57,920 --> 00:18:01,920
तो अपने वीडियो में कहते हो कि आजकल के युवाओं को प्रश्न करना

252
00:18:01,920 --> 00:18:06,480
चाहिए प्रश्न करना करना चाहिए। प्रश्न करना चाहिए। आज एक साधारण सा व्याकरण

253
00:18:06,480 --> 00:18:10,960
विहीन युवक आपसे प्रश्न कर रहा है कि आप मुझे बताइए योगेश भारद्वाज

254
00:18:10,960 --> 00:18:15,680
जी ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है?

255
00:18:15,680 --> 00:18:18,960
तो आप कह रहे हो कि व्याकरण सीख के आओ।

256
00:18:18,960 --> 00:18:23,280
अशिष्टता की बात करते हो। भांड है, पोंगे

257
00:18:23,280 --> 00:18:27,520
हैं, पंडे हैं, रामानुजाचार्य हुआ। ये

258
00:18:27,520 --> 00:18:32,000
सब भरा पड़ा है आपकी सत्यार्थ प्रकाश में। उसको छोड़ो।

259
00:18:32,000 --> 00:18:37,120
वृंदावन को वैश्यावन भागवत लिखने वाला मर क्यों नहीं गया?

260
00:18:37,120 --> 00:18:41,520
कौन बोल रहा है यह सब? कौन बोल रहा है?

261
00:18:41,520 --> 00:18:46,160
आपके ही इर्दगिर्द के लोग बोल रहे हैं ना सच्चिदानंद स्वामी को सुन लेना।

262
00:18:46,160 --> 00:18:50,160
तब आपको याद नहीं आता है कि मलच्छ देख रहे हैं हमारी ये सब चीजें।

263
00:18:50,160 --> 00:18:54,240
अरे भैया निराकार ईश्वर से हमने कब आपत्ति की? करो निराकार

264
00:18:54,240 --> 00:18:56,720
की पूजा।

265
00:18:56,720 --> 00:19:01,200
आप हमारी चीजों को अधर्म कहने आए हो ना?

266
00:19:01,200 --> 00:19:05,920
और उसके आधार पर अपना प्रचार तंत्र खड़ा कर रखा है।

267
00:19:05,920 --> 00:19:11,520
और तो और हमारे लोग गुमराह हो रहे हैं।

268
00:19:11,520 --> 00:19:15,520
जब हम मूर्ति की रक्षा करने जाते हैं वो आते नहीं है।

269
00:19:15,520 --> 00:19:19,600
ईश्वर तो मूर्ति पूजा तो अधर्म है। लो क्या करूं

270
00:19:19,600 --> 00:19:22,640
मैं?

271
00:19:22,640 --> 00:19:27,040
ऐसा नहीं था मैं। आप जैसे लोगों ने मुझे ऐसा बनाया। सामान्य

272
00:19:27,040 --> 00:19:29,920
जीवन था।

273
00:19:29,920 --> 00:19:34,000
अपना आजीविकोपार्जन हो रहा था।

274
00:19:34,000 --> 00:19:37,840
एक सामान्य जीवन काट रहा था मैं।

275
00:19:37,840 --> 00:19:42,880
आप जैसे लोगों के ऊपर दायित्व था। सही जानकारी

276
00:19:42,880 --> 00:19:47,200
लोगों तक पहुंचाने का। आपने मिलावट की। आपने

277
00:19:47,200 --> 00:19:51,280
परंपरा प्राप्त सिद्धांतों में मिलावट की। अपना मंतव्य उसमें

278
00:19:51,280 --> 00:19:55,440
डाला। आप जैसे लोगों ने तब मुझ जैसे किसी

279
00:19:55,440 --> 00:19:59,520
व्यक्ति का भाई छीना गया। बहन छनी गई। तब

280
00:19:59,520 --> 00:20:05,520
मेरे जैसा कोई व्यक्ति घातक बनता है, खड़ा होता है।

281
00:20:12,400 --> 00:20:18,400
आप लोग अपनी दायित्व को निभाइए ना अगर बने हैं आचार्य तो

282
00:20:19,280 --> 00:20:23,280
वरना हर दिन कोई नया शिवाश द्विवेदी खड़ा होगा जो

283
00:20:23,280 --> 00:20:28,000
पूछेगा आपसे और पूछ रहे हैं आपसे।

284
00:20:28,000 --> 00:20:32,720
कल जो आपने वह वीडियो बनाया है मेरे लिए उसमें आप ही के यहां पर

285
00:20:32,720 --> 00:20:37,120
मेरे पूज्य गुरुदेव जगदगुरु शंकराचार्य बोलते थे

286
00:20:37,120 --> 00:20:42,240
आज उनकी वाणी मुझे याद आ रही है

287
00:20:42,240 --> 00:20:46,560
अपने जैसे 10 बनाओ बनाए मैंने 10 पूछ

288
00:20:46,560 --> 00:20:51,040
रहे हैं वहां पर जाकर के बता रहे हैं आपको विषयांतर

289
00:20:51,040 --> 00:20:55,280
कर रहे हो और ऐसे प्रश्न पूछ रहे हैं कि

290
00:20:55,280 --> 00:20:59,520
आपके पास उत्तर नहीं है उनके उनके प्रश्नों का वहां पूछ रहे हैं धक्का कैसे

291
00:20:59,520 --> 00:21:05,520
लगा? वहां पूछ रहे हैं लोग कि भौतिक प्रकृति

292
00:21:05,760 --> 00:21:10,080
का सृष्टि के रूप में निर्माण करने के लिए भौतिक व्यवहार

293
00:21:10,080 --> 00:21:15,680
हुआ तो कैसे किया? ईश्वर ने

294
00:21:15,680 --> 00:21:19,680
कैसे किया? भौतिक व्यवहार हुआ या नहीं हुआ? वहां

295
00:21:19,680 --> 00:21:23,840
प्रकृति के साथ पूछ रहे हैं वहां। इतने डेप्थ में

296
00:21:23,840 --> 00:21:29,840
वहां पर आपके प्रश्न पड़े हुए हैं।

297
00:21:30,160 --> 00:21:34,800
तो

298
00:21:34,800 --> 00:21:38,880
आपने अगर अपना दायित्व सही से निभाया होता, गुरुकुल चरा रहे हो, यह कर रहे हो, वो कर

299
00:21:38,880 --> 00:21:43,040
रहे हो। अगर आपने अगर अपना दायित्व सही से निभाया होता

300
00:21:43,040 --> 00:21:47,120
तो मुझे क्या जरूरत पड़ी थी? आपको बड़ी चिंता है ना मेरे पेट की। सिक्स पैक

301
00:21:47,120 --> 00:21:53,120
ऐप ले घूम रहा था। वर्कउ करता था।

302
00:21:53,280 --> 00:21:57,440
मुझे क्या जरूरत पड़ी थी यह सब पूछने की लोगों से? मगर

303
00:21:57,440 --> 00:22:01,440
नहीं देखा गया। अपने धर्म का अपमान नहीं देखा गया। अपने भाई को दूर जाता

304
00:22:01,440 --> 00:22:06,000
हुआ नहीं देखा गया। इस जैसी संस्थाएं आके

305
00:22:06,000 --> 00:22:12,000
सिखा रही हैं कि हम अभक्त हैं।

306
00:22:12,240 --> 00:22:16,240
हमसे बात नहीं करनी चाहिए। जैसे काफिरों से बात नहीं करनी चाहिए।

307
00:22:16,240 --> 00:22:20,640
आर्य समाजी जैसी संस्थाएं सिखा रही है। ये तो पौराणिक पंडे हैं।

308
00:22:20,640 --> 00:22:26,240
मूर्ति पूजा अधर्म है। गए गुजरे लोग हैं ये लोग।

309
00:22:26,240 --> 00:22:30,800
तो कोई ना कोई तो आता है ना।

310
00:22:30,800 --> 00:22:35,040
तो बस भगवान ने मुझे ही भेज दिया। खैर

311
00:22:35,040 --> 00:22:37,760
कोई बात नहीं।

312
00:22:37,760 --> 00:22:41,680
अब आगे आपने कहा है

313
00:22:41,680 --> 00:22:46,320
हम

314
00:22:46,320 --> 00:22:52,320
फिर आगे आपने अपनी कुल परंपरा बताई है। अब जरा कुल परंपरा पर बात होगी।

315
00:22:54,000 --> 00:22:58,000
तो

316
00:22:58,000 --> 00:23:01,200
आप बता रहे हैं

317
00:23:01,200 --> 00:23:05,600
कुल परंपरा। आपने अपनी कुल परंपरा बताई है कि आप फला है।

318
00:23:05,600 --> 00:23:09,600
वो भारद्वाज जो हमने कहा वो भारद्वाज है। है ना? पहली

319
00:23:09,600 --> 00:23:13,760
बात तो हमने इस बात पर बहुत ज्यादा गौर किया ही नहीं कि आप भारद्वाज हैं कि भारद्वाज

320
00:23:13,760 --> 00:23:18,000
है और ना ही हमें कोई आवश्यकता इतना महत्व नहीं रखता है आपका यह भारद्वाज टाइटल

321
00:23:18,000 --> 00:23:22,080
हमारे लिए। हां अगर आप परंपरा प्राप्त सिद्धांतों को मानने वाले

322
00:23:22,080 --> 00:23:26,160
होते तब हम अवश्य ये चीज देखते। अरे क्या रखा है आप लोगों के भारद्वाज और

323
00:23:26,160 --> 00:23:31,920
इत्यादि चीजों में? सब तो आपने सप्रेटा दही बना रखा है।

324
00:23:31,920 --> 00:23:36,160
क्या कुल परंपरा बता रहे हो? सबसे पहले तो बेसिक यह बता दो कि नियोग

325
00:23:36,160 --> 00:23:40,640
वाले हो कि नॉर्मल वाले हो।

326
00:23:40,640 --> 00:23:44,640
नियोग माना गया ना आपके यहां। फिर नियोग वाले हो तो कौन

327
00:23:44,640 --> 00:23:48,800
से वर्ण से आया था? वह जो नियोग का पिता था तो वो कहां से आया था?

328
00:23:48,800 --> 00:23:53,280
ये सब चीजें आ जाएंगी ना। तो क्या करें आपका ये भारद्वाज और भारद्वाज

329
00:23:53,280 --> 00:23:57,520
जान के?

330
00:23:57,520 --> 00:24:02,640
भाई कौन से वाले पिता से आया है ये जो आप बता रहे हैं कि मैं फलाना हूं।

331
00:24:02,640 --> 00:24:06,720
भाई नियोग आपके यहां पर माना गया है कि नियोग है 11 पति हो सकते हैं। आगे

332
00:24:06,720 --> 00:24:11,040
बात होगी तो आपके यहां उसको एक सामान्य रूप से लिया गया है नियोग

333
00:24:11,040 --> 00:24:15,200
को तो आपका जन्म सामान्य रूप से हुआ है या फिर नियोग

334
00:24:15,200 --> 00:24:19,200
के प्रक्रिया से हुआ है यह पहली बात तो आ जाएगी। इतनी सारी चीजें

335
00:24:19,200 --> 00:24:23,440
आपने डाल रखी है। क्या करना आपके भारद्वाज

336
00:24:23,440 --> 00:24:27,440
और भारद्वाज से? जिनके साथ माता जी

337
00:24:27,440 --> 00:24:31,520
का विवाह हुआ था वहां से संतान की प्राप्ति हुई है उन्हें वह

338
00:24:31,520 --> 00:24:35,760
हैं आप या फिर नियोग वाले तरीके से हुए हैं वो हैं आप कौन से तरीके

339
00:24:35,760 --> 00:24:39,920
से होने पर आपका वो जो कुल वंश परंपरा आप प्रवर इत्यादि बता

340
00:24:39,920 --> 00:24:44,080
रहे हैं क्या करूंगा ये भारद्वाज भारद्वाज जान के

341
00:24:44,080 --> 00:24:48,080
दूसरी बात करणा वर्ण व्यवस्था है जो व्यक्ति

342
00:24:48,080 --> 00:24:53,200
जिस समय जो कार्य कर रहा हो वह वही है

343
00:24:53,200 --> 00:24:58,160
अगर एक सिक्योरिटी गार्ड कहीं पर खड़ा हुआ है

344
00:24:58,160 --> 00:25:02,320
और उसने भय देख के कि भैया

345
00:25:02,320 --> 00:25:06,880
यहां पर इस समय ड्यूटी करना ठीक नहीं है। यहां पे जान के लाले पड़ जाएंगे।

346
00:25:06,880 --> 00:25:11,840
जान को खतरा है। टमाटर बेचना शुरू कर दिया। वैश्य बन गया।

347
00:25:11,840 --> 00:25:16,480
तो ड्यूटी से भागना आपने उसकी ड्यूटी बना दी है।

348
00:25:16,480 --> 00:25:20,480
कर्तव्य से पलायन भी आपने उसको कर्तव्य बना दिया। तो

349
00:25:20,480 --> 00:25:24,880
उसको दोष कैसे लगेगा? कर्तव्य से भागना भी जब कर्तव्य

350
00:25:24,880 --> 00:25:27,840
हो जाएगा तो दोष कैसा

351
00:25:27,840 --> 00:25:31,120
भाग गया

352
00:25:31,120 --> 00:25:33,360
हम

353
00:25:33,360 --> 00:25:37,440
फिर तो कौन सी भैया किसकी बेटी कहां बाई क्या

354
00:25:37,440 --> 00:25:41,440
है कैसे आपकी कुल परंपरा चली है ये वाली बात एक आ गई

355
00:25:41,440 --> 00:25:45,440
तो जो आप कुल परंपरा पे बता रहे हैं इतनी अच्छी स्पीच पहले तो

356
00:25:45,440 --> 00:25:49,600
इसमें ये बेसिक से प्रश्न है कि कुल परंपरा किस ओर से बताई है

357
00:25:49,600 --> 00:25:53,840
सामान्य विवाह से बताई है या अग्नि नियोग वाले विवाह से बताई है।

358
00:25:53,840 --> 00:25:58,000
नियोग वाला विवाह नहीं सॉरी नियोग वाली प्रक्रिया से बताई है। फिर उसमें नियोग

359
00:25:58,000 --> 00:26:02,160
वाले में भी कौन से वाले भाई उसमें 11 तक होते हैं। तो पांच

360
00:26:02,160 --> 00:26:07,200
छ सात आठ नौ 10 कौन से नंबर का वो था मामला?

361
00:26:07,200 --> 00:26:11,200
ये भी आ जाएगा। अगर है तो नहीं है तो फिर वो बात अलग है। पहले तो

362
00:26:11,200 --> 00:26:16,560
यही क्लियर हो। सामान्य विवाह के नियोग है। अच्छा

363
00:26:16,560 --> 00:26:20,640
उसके बाद फिर वर्ण परंपरा का आपके अनुशासन पालन किया

364
00:26:20,640 --> 00:26:24,960
गया कि नहीं किया गया? किसके यहां कैसे हालांकि सत्यार्थ प्रकाश

365
00:26:24,960 --> 00:26:29,040
में दयानंद जी स्वयं लिखते हैं कि भैया अच्छे कुल में जहां पर वेद

366
00:26:29,040 --> 00:26:34,560
का वो हो रहा हो पाठ वहां पर विवाह करें।

367
00:26:34,560 --> 00:26:38,720
यानी कि यहां पर यह जन्म से थोड़ी थोड़ी सी चीजें आ रही है कि भाई वेद

368
00:26:38,720 --> 00:26:42,800
का पाठ जहां पर हो रहा है इसका अर्थ यह थोड़ी ना है कि वहां पर उत्पन्न होने वाली जो संतान होगी वो

369
00:26:42,800 --> 00:26:46,320
भी गुणी होगी वो तो कर्म से होगी जन्म से नहीं होती है

370
00:26:46,320 --> 00:26:52,320
मगर यहां पर उन्होंने कह दिया कि ऐसे घर में विवाह करें जहां वेद का पाठ हो रहा है।

371
00:26:54,080 --> 00:26:58,240
तो अब आपके यहां कुल परंपरा का इसका ध्यान रखा गया है कि नहीं रखा

372
00:26:58,240 --> 00:27:02,800
गया विवाह होते समय और फिर उस तरीके से आप परिपूर्ण

373
00:27:02,800 --> 00:27:08,800
है कि नहीं तब तो हम ये सोचे कि भारद्वाज है कि भारद्वाज है।

374
00:27:09,680 --> 00:27:13,680
अच्छा इसके बाद फिर एक चीज और आ जाती है कि

375
00:27:13,680 --> 00:27:17,840
आपके माता-पिता जो थे वो मूर्ति पूजक थे या

376
00:27:17,840 --> 00:27:23,040
नास्तिक थे या हर समाजी थे।

377
00:27:23,040 --> 00:27:27,920
अग्निव्रत जी ने कहा है कि आर्य समाज था ही नहीं।

378
00:27:27,920 --> 00:27:32,720
दयानंद से पहले दयानंद जी से पहले तक। ठीक है?

379
00:27:32,720 --> 00:27:36,800
था ही नहीं। इसका अर्थ क्या हुआ कि आज

380
00:27:36,800 --> 00:27:41,280
अगर आपने दयानंद जी के सिद्धांतों को विधि विधानों को

381
00:27:41,280 --> 00:27:45,280
आपने कहा कि यह ठीक है। यह धर्म है। और दयानंद जी ने

382
00:27:45,280 --> 00:27:49,360
कहा कि वो अधर्म है मूर्ति पूजा। और आपके घर में जो विवाह हुआ है

383
00:27:49,360 --> 00:27:53,600
वह मूर्ति पूजा के अनुसार हुआ है। मूर्ति पूजा को करने वाले लोगों के द्वारा हुआ है।

384
00:27:53,600 --> 00:27:57,840
तो वह विवाह तो वैध है ही नहीं आर्य समाज के अनुसार

385
00:27:57,840 --> 00:28:02,720
क्योंकि आर्य समाज के लॉ वहां पर लागू नहीं है। धर्म क्या होता है?

386
00:28:02,720 --> 00:28:06,800
धर्म का पर्यावसान मोक्ष में है। और मूर्ति पूजकों

387
00:28:06,800 --> 00:28:12,800
का मोक्ष तो आर्य समाज के अनुसार है ही नहीं। तो जहां मोक्ष नहीं है वहां धर्म कैसे?

388
00:28:13,440 --> 00:28:17,440
तो जो आपने कहा कि आज अगर आप अपनी पीढ़ी में आर्य

389
00:28:17,440 --> 00:28:21,920
समाज बने हैं क्योंकि आपसे पहले तो आर्य समाज था नहीं या आपके शायद माता-पिता

390
00:28:21,920 --> 00:28:25,920
बने हैं तो फिर उनकी बात आ जाएगी कि भाई उन्होंने तो वैध तरीके

391
00:28:25,920 --> 00:28:30,320
से आर्य समाज के ही अनुसार विवाह हुआ नहीं तो फिर वो संतान क्या कहलाएगी

392
00:28:30,320 --> 00:28:34,640
साथ में रहने वाली मातृशक्ति क्या कहलाएंगी ये सारी चीजें आ जाएंगी

393
00:28:34,640 --> 00:28:38,880
ना तो क्या करें आपका भारद्वाज और भारद्वाज जान के आचार डालेंगे

394
00:28:38,880 --> 00:28:42,880
क्या इसका इतनी सारे प्रश्न तो पहले ही खड़े हुए हैं। पहले

395
00:28:42,880 --> 00:28:47,040
तो उनको सॉर्ट आउट करें। तब जो आप जब उससे आश्वस्त हो जाए तब

396
00:28:47,040 --> 00:28:51,280
हम पूछे कि भैया आप तब हम यह विचार करें कि भैया आपका नाम भारद्वाज

397
00:28:51,280 --> 00:28:55,760
है। हमसे त्रुटि हो गई बोलने की। कुल परंपरा

398
00:28:55,760 --> 00:28:59,760
बता रहे हो। आपको ध्यान देना चाहिए था। परंपरा की

399
00:28:59,760 --> 00:29:03,760
बातें हमसे नहीं करनी चाहिए थी। है ना? उसमें आपने

400
00:29:03,760 --> 00:29:07,760
शटर घोट कर रखा है अपने यहां। सटर घोट सपरेटा

401
00:29:07,760 --> 00:29:11,840
दही बना रखा है। इसलिए और या फिर

402
00:29:11,840 --> 00:29:16,080
कहने को आप बन गए हैं। दयानंदी आर्य

403
00:29:16,080 --> 00:29:20,080
समाजी आप बन गए हैं। पर आपके हृदय में कहीं ना कहीं अभी

404
00:29:20,080 --> 00:29:24,320
भी वो बीज बाकी है। शुद्ध कुल परंपरा वाला जिसकी

405
00:29:24,320 --> 00:29:28,400
वजह से आपने उसको बड़े ही गर्व के साथ बताया। अगर ऐसा है तो बहुत अच्छी

406
00:29:28,400 --> 00:29:28,900
बात

407
00:29:28,560 --> 00:29:33,760
है भाई। आपके हृदय में अभी भी वो बाकी है। बीज कुल परंपरा का

408
00:29:33,760 --> 00:29:38,720
बीज की रक्षा भगवान को अभीष्ट है। करते रहना।

409
00:29:38,720 --> 00:29:42,960
अगर ऐसा है तो स्वागत है आपका। तो पहले आपको

410
00:29:42,960 --> 00:29:47,040
कुल परंपरा से पहले अपने यह वाले जो मामले हैं तीन प्रकार

411
00:29:47,040 --> 00:29:51,040
से आपकी जो कुल परंपरा की शुद्धता है उससे संबंधित आर्य

412
00:29:51,040 --> 00:29:54,880
समाज को लेकर के मामले उस पर बात करनी चाहिए।

413
00:29:54,880 --> 00:29:58,880
वो तो आपने की हमारे यहां नहीं है। हमारे यहां जन्म

414
00:29:58,880 --> 00:30:02,880
से माना जाता है। नियोग इत्यादि को पहली बात

415
00:30:02,880 --> 00:30:07,200
तो आपत धर्म उसमें भी प्राथमिकता वो वाली थी। कलयुग में निषेध

416
00:30:07,200 --> 00:30:11,280
है। द्वापर तक मान्य था जब तक लोगों के अंदर इतना

417
00:30:11,280 --> 00:30:15,280
बल था कि अगर वह इस प्रकार की प्रक्रिया से होकर के गुजरे भी

418
00:30:15,280 --> 00:30:19,280
तो उसमें वो लिप्त ना हो जाए, आसक्त ना हो जाए। इतनी प्रज्ञा

419
00:30:19,280 --> 00:30:23,440
शक्ति थी। तीसरी बात उसमें भी प्राथमिकता थी कि जो मानसिक

420
00:30:23,440 --> 00:30:27,600
रूप से आधान हो जाए

421
00:30:27,600 --> 00:30:31,600
बीज का दय रूप से यह सब चीजें तो

422
00:30:31,600 --> 00:30:35,760
आपके यहां स्वीकार्य है नहीं।

423
00:30:35,760 --> 00:30:40,960
आपके यहां तो नियोग का मतलब यही है कि दो शरीरों में जो है

424
00:30:40,960 --> 00:30:45,600
पुरुष का स्त्री के साथ संग शारीरिक रूप से

425
00:30:45,600 --> 00:30:51,360
व्यवहारिक रूप से हमारे यहां केवल इतना नहीं है।

426
00:30:51,360 --> 00:30:55,040
तो वो बात हो गई।

427
00:30:55,040 --> 00:30:59,040
ठीक है। अच्छा अब आगे चलते हैं। फिर आपने

428
00:30:59,040 --> 00:31:01,360
कहा

429
00:31:01,360 --> 00:31:05,760
कि

430
00:31:05,760 --> 00:31:10,400
बुरा क्यों माना? आपने समालोचना की थी।

431
00:31:10,400 --> 00:31:14,480
आपने हमारी जो चर्चा हुई थी उसकी समालोचना की है।

432
00:31:14,480 --> 00:31:18,480
अब मैंने बुरा क्यों मान लिया? भाई मैंने कब कहा कि आपने बुरा मैंने बुरा

433
00:31:18,480 --> 00:31:22,800
माना है। पूरे वीडियो में एक जगह बता दीजिए।

434
00:31:22,800 --> 00:31:26,880
कहां पर कह दिया? मैंने तो उल्टा आपको कहा कि आप निशुल्क

435
00:31:26,880 --> 00:31:30,960
आइए हमारे यहां पर और निशुल्क आकर के पढ़िए। आपने कहा था कि मुझे आप समझाइए।

436
00:31:30,960 --> 00:31:35,120
तो मैंने कहा था पढ़ लीजिए आप आकर के निशुल्क आपके यहां आर्य समाज मंदिरों

437
00:31:35,120 --> 00:31:39,760
में जो जिहादियों के साथ हिंदू बेटियों के विवाह होते हैं

438
00:31:39,760 --> 00:31:43,840
वो विवाह करके जो धन जो धनोपार्जन

439
00:31:43,840 --> 00:31:47,840
होता है 5100 5100 कहीं-कहीं तो 2100 में भी हो

440
00:31:47,840 --> 00:31:50,800
जाता है उस धनोपार्जन के लिए हम आपसे

441
00:31:50,800 --> 00:31:55,200
नहीं कहेंगे कि उससे हमें आप शुल्क दीजिए ना फ्री

442
00:31:55,200 --> 00:31:59,680
फ्री कक्षाएं हम हमने कहां बुरा मान लिया आपने कहा बुरा मान गए आप

443
00:31:59,680 --> 00:32:05,680
मुझे लगता है आप बुरा मान गए मेरी समालोचना को।

444
00:32:07,120 --> 00:32:10,400
अच्छा

445
00:32:10,400 --> 00:32:13,360
तो

446
00:32:13,360 --> 00:32:17,440
एक ये बात हो गई। फिर आपने बताया कि भाग क्यों गए?

447
00:32:17,440 --> 00:32:21,520
भाग क्यों गए? आपकी नजरों में मैं चारों खाने चित हूं। इससे मुझे

448
00:32:21,520 --> 00:32:25,600
कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं आपकी नजरों में क्या हूं। है ना?

449
00:32:25,600 --> 00:32:29,600
मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मुझे वैचारिक क्रांति लानी

450
00:32:29,600 --> 00:32:33,840
है। लोगों को बताना है कि ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है।

451
00:32:33,840 --> 00:32:39,840
ईश्वर सर्वशक्तिमान है और वह वैचारिक क्रांति आ रही है।

452
00:32:44,640 --> 00:32:48,720
आपके हिसाब से भाग क्यों गए? जो आपने कहा भाग क्यों गए भाई? आपके

453
00:32:48,720 --> 00:32:52,960
हिसाब से मुझे कब तक बैठे रहना था वहां पर? जब तक

454
00:32:52,960 --> 00:32:56,960
आपके जो तथाकथित आचार्य या वैज्ञानिक महोदय हैं

455
00:32:56,960 --> 00:33:00,960
जब तक वह यह ना कह दे कि हां मैं हार मानता हूं ईश्वर

456
00:33:00,960 --> 00:33:05,520
अवतार ले नहीं सकता। इस जन्म में तो वो ये कहने वाले नहीं है। तो मैं उनके

457
00:33:05,520 --> 00:33:09,600
चैनल पर बैठा रहूं। अगर वो गाली दे तो गाली सुनू। मेरी

458
00:33:09,600 --> 00:33:14,080
मान्यताओं का उपहास उड़ाए तो उपस सुनू। अगर वो संडास जाए

459
00:33:14,080 --> 00:33:18,720
पानी पिए तो मैं बैठा रहूं।

460
00:33:18,720 --> 00:33:22,800
हिलूं ना वहां से। और यह यह सब बातें ना शिष्टता की वो

461
00:33:22,800 --> 00:33:27,040
मुझे मत बताया करिए पहले जाकर देखिए सत्यार्थ प्रकाश भांड

462
00:33:27,040 --> 00:33:29,680
यह वो

463
00:33:29,680 --> 00:33:33,680
आपसे लाख गुना वो जो शैली अपनाई है ना सत्यार्थ प्रकाश में

464
00:33:33,680 --> 00:33:38,320
और आपके लोग जो अपनाते हैं शिव क्या है

465
00:33:38,320 --> 00:33:42,480
यदि उसका कैलाश में घर है तो वहां पर जो वो हो गया क्या जो

466
00:33:42,480 --> 00:33:46,800
यहां तुम उसकी पूजा कर रहे हो ये क्या है जो हमारे

467
00:33:46,800 --> 00:33:50,880
भगवान हैं जिनके प्रति हम भगवान की बुद्धि रखते

468
00:33:50,880 --> 00:33:55,600
हैं उसके लिए तू तड़ाक कर रहे हो और बिना किसी काव्य रचना के

469
00:33:55,600 --> 00:33:59,440
फिर कह रहे हो शिष्टता

470
00:33:59,440 --> 00:34:03,440
मैंने पूरे वीडियो में आपके लिए जहां भी है अभी भी जी लगा

471
00:34:03,440 --> 00:34:07,440
के ही बात की थी केवल एक जो वो गाना था गाने की जो

472
00:34:07,440 --> 00:34:11,600
पंक्ति थी उसके लिए आवश्यकता थी अपेक्षा थी कि वहां

473
00:34:11,600 --> 00:34:15,840
पर आपके साथ अगर जी लगाएंगे तो र ठीक से नहीं आएगी बस उसमें लगाया

474
00:34:15,840 --> 00:34:19,920
बस उसी को आपने जो है सबसे बड़ा बड़ा राई का पहाड़ बना

475
00:34:19,920 --> 00:34:24,000
लिया अपने लिए और मुझे साहित्य का आप ज्ञान दे रहे हैं जबकि गति आपकी

476
00:34:24,000 --> 00:34:27,860
साहित्य में है।

477
00:34:27,860 --> 00:34:32,000
[खांसने की आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़] तो भाग क्यों गए? आपके हिसाब से ये होना चाहिए था

478
00:34:32,000 --> 00:34:36,000
कि वो पलंग लगा के अपना सोते कहते तुम अगर जाओगे तो तुम

479
00:34:36,000 --> 00:34:40,000
भगोड़े कहलाओगे। मैं आ नहीं सकता वहां से। भले ही वो ये कहने

480
00:34:40,000 --> 00:34:44,080
लगे। मैं नहीं दूंगा उत्तर। मैं जो कहूंगा वो बात होगी।

481
00:34:44,080 --> 00:34:48,080
तुम जो कहोगे वो बात नहीं होगी। पूछा यह जा रहा है कि निराकार ईश्वर पर पाप नहीं

482
00:34:48,080 --> 00:34:52,080
लग रहा है तो ईश्वर अवतार ले लेगा तो पाप क्यों लगेगा? पूछा ये जा रहा है तो वो कह

483
00:34:52,080 --> 00:34:56,160
रहे हैं शिव मोहिनी पे आओ।

484
00:34:56,160 --> 00:35:00,320
विषयांतर पर विषयंतर कर रहे हैं। बीच-बीच में पापी कह रहे हैं कि तुम्हारे यहां पाप लिखा

485
00:35:00,320 --> 00:35:05,600
हुआ है। इससे सिद्ध होगा अवतार ना होना।

486
00:35:05,600 --> 00:35:09,440
चले क्यों गए?

487
00:35:09,440 --> 00:35:14,960
तो बैठ के उनकी वहां डींगे सुनता। रश्म थ्योरी की

488
00:35:14,960 --> 00:35:18,960
सोते तो मैं बैठा रहता जागते तो मैं बैठा रहता और

489
00:35:18,960 --> 00:35:24,960
जाता तो आप जैसे लोग पक्षपाती लोग

490
00:35:25,360 --> 00:35:29,680
वो कहते हैं कि भाई भाग गए चारों खाने चित्त हो गए एक सवाल

491
00:35:29,680 --> 00:35:33,840
का जवाब नहीं था अग्निव्रत जी के पास एक सवाल का

492
00:35:33,840 --> 00:35:38,080
हर जगह अटके हैं जिस सवाल पर पकड़ रहा था उसी सवाल पर अटक

493
00:35:38,080 --> 00:35:44,080
रहे थे कौन से सवाल का जवाब नहीं दिया उनके

494
00:35:44,320 --> 00:35:48,560
प्रमाण मांगा प्रमाण दिया नहीं मेरा अर्थ चलेगा तो

495
00:35:48,560 --> 00:35:53,360
भाई अपनी प्रमाणिकता बताओ अगर तुम्हारा ही चलेगा तो आप मेरी पूछ रहे हो तो छोड़ दो प्रमाण

496
00:35:53,360 --> 00:35:57,520
मैं भी अप्रामाणिक तुम भी अप्रामाणिक चलो अब बताओ

497
00:35:57,520 --> 00:36:01,920
तर्क से सिद्धि कर दो नहीं ले सकता ईश्वर अवतार बड़े तार्किक

498
00:36:01,920 --> 00:36:06,000
घूमते हो ना कर दो भाई मुझे अपनी प्रमाणिकता

499
00:36:06,000 --> 00:36:10,400
के लिए तुम्हारे ऊपर डिपेंड रहना नहीं है जरूरी आपको मेरी प्रमाणिकता

500
00:36:10,400 --> 00:36:14,800
आपको मेरी प्रमाणिकता पर आप डिपेंड हो। आप अगर मुझे नकारोगे

501
00:36:14,800 --> 00:36:18,800
कि मेरे पास वेद मंत्र कहां से आए तो आप अपने आप को नकारोगे। आपको घोषित करना

502
00:36:18,800 --> 00:36:23,200
पड़ेगा। आप अवैदिक हो। सुन लो अगर आप शंकराचार्य

503
00:36:23,200 --> 00:36:27,280
परंपरा की प्रमाणिकता पर प्रश्न कर रहे हो तो आप पहले स्वयं को ये घोषणा कर दो

504
00:36:27,280 --> 00:36:31,600
कि आप अवैदिक हो। क्योंकि शंकराचार्य परंपरा अप्रामाणिक है। तो उससे

505
00:36:31,600 --> 00:36:35,600
होकर पास होकर आने वाले जो ग्रंथ है उन पर आपका बिलीव सिद्ध नहीं होगा।

506
00:36:35,600 --> 00:36:39,200
अर्ध कुकुट न्याय हो जाएगा।

507
00:36:39,200 --> 00:36:43,360
हम आप पर डिपेंड नहीं है। हम स्वतंत्र हैं। तो हम आपसे क्वेश्चन कर सकते हैं।

508
00:36:43,360 --> 00:36:47,520
कहां से आए? पर आप जब क्वेश्चन करेंगे तो साथ की साथ

509
00:36:47,520 --> 00:36:51,600
क्वेश्चन करते समय सबसे पहले यह कहना होगा कि हम अवैदिक हैं और यही

510
00:36:51,600 --> 00:36:55,920
सच्चाई तो आपके सामने लानी है और तमाम सारे जितने भी ये तथाकथित सनातन

511
00:36:55,920 --> 00:36:59,600
का चोला ओढ़ के सनातन में दीमक की तरह छेद करने वाले लोग हैं उनकी

512
00:36:59,600 --> 00:37:03,760
यही सच्चाई बाहर लानी है कि वो वेद वेद

513
00:37:03,760 --> 00:37:07,840
का नाम लेकर के जो हमें दबाना चाहते हैं ना अपनी मन

514
00:37:07,840 --> 00:37:11,840
मुखी व्याख्या के नीचे वेद का नाम लेकर के उस वेद के

515
00:37:11,840 --> 00:37:15,920
नाम को छोड़ना पड़ेगा हमसे आया है ना वह आपके बीच

516
00:37:15,920 --> 00:37:21,920
में हम पर विश्वास नहीं वेद पर विश्वास नहीं बात खत्म

517
00:37:24,240 --> 00:37:28,240
इसीलिए लाता हूं परंपरा आप शब्द शब्द प्रमाण को

518
00:37:28,240 --> 00:37:32,880
आप ला रहे हो ना बीच में तर्क पर बात हो रही है सिद्धांतिक तरीके से सिद्ध करिए

519
00:37:32,880 --> 00:37:37,920
नहीं कर पा रहे हैं तो प्रमाण ला रहे हैं प्रमाण लाओ बीच में

520
00:37:37,920 --> 00:37:42,400
प्रमाण लाए अच्छा वो कह रहे परता प्रमाण स्वता प्रमाण

521
00:37:42,400 --> 00:37:46,480
स्वता प्रमाण नहीं मानते तुम वेद को स्वता

522
00:37:46,480 --> 00:37:50,880
प्रमाण मानते तो उसमें अपना भाष्य क्यों डालोगे? वेद

523
00:37:50,880 --> 00:37:54,960
कहां रह गया? स्वता प्रमाण? प्रमाण तो वो है कि जो

524
00:37:54,960 --> 00:37:58,960
वेद का अर्थ तुम करोगे। जो तुमसे मैच खाएगा आपसे जो मैच खाएगा वो उसको तुम

525
00:37:58,960 --> 00:38:04,960
प्रमाण मानते हो।

526
00:38:10,000 --> 00:38:12,160
अच्छा

527
00:38:12,160 --> 00:38:16,480
फिर आपने एक बात कही कि भाई आपके पास

528
00:38:16,480 --> 00:38:19,680
टाइम बहुत ज्यादा है

529
00:38:19,680 --> 00:38:23,760
मैंने तो आपके ऊपर वीडियोस नहीं बनाए थे। आप मेरे ऊपर वीडियोस बना रहे थे। Facebook पे

530
00:38:23,760 --> 00:38:27,840
मैंने देखा यहां वहां हाइपरस्ट के यहां आपके दिमाग से मैं उतर

531
00:38:27,840 --> 00:38:32,080
ही नहीं रहा था। शायद आपके सपनों में भी आता होगा और आपसे परंपरा पूछताऊंगा।

532
00:38:32,080 --> 00:38:38,080
आपसे पूछता हूंगा अगर ईश्वर सब शक्तिमान है तो अवतार क्यों नहीं ले सकता शायद

533
00:38:38,800 --> 00:38:43,600
अच्छा आपने मेरे ऊपर जो वीडियो बनाया था पहला वो 30 मिनट का था

534
00:38:43,600 --> 00:38:47,600
और वो एडिटेड वीडियो था तो लगभग उसमें कितनी देर लगी

535
00:38:47,600 --> 00:38:51,600
होगी एडिटिंग वगैरह करने में रेंडर होने में 20 मिनट लग जाते हैं

536
00:38:51,600 --> 00:38:55,840
फाइल तो एक डेढ़ घंटा तो आपने भी लगाया मैंने

537
00:38:55,840 --> 00:39:00,240
जो बोला नेचुरल बोला लाइव बोला आपने बोला वो रिहर्सल करके बोला

538
00:39:00,240 --> 00:39:06,240
तैयारी करके बोला जो गलत चीज हो गई काटी एडिट किया

539
00:39:08,640 --> 00:39:12,720
टाइम तो आपका भी उतना ही गया मैंने उस दिन आपके लिए जो बोला है वो 1 घंटे

540
00:39:12,720 --> 00:39:16,720
50 मिनट बोला है उसके बाद आपके बारे में बात मतलब आपके बारे

541
00:39:16,720 --> 00:39:20,720
में बात हुई है मगर जो मेरा आपको मैसेज था 1 घंटे 50 मिनट पर हो गया था

542
00:39:20,720 --> 00:39:24,800
पूरा और वहां पर मैंने बोला भी है कि बस यहीं तक का मैसेज है जो जरूरी है

543
00:39:24,800 --> 00:39:28,880
आप तक पहुंचे तो लगभग इससे मिलती जुलती

544
00:39:28,880 --> 00:39:33,440
कहानी तो आपकी भी है जब आप मेरे ऊपर वीडियो बना रहे हो।

545
00:39:33,440 --> 00:39:37,520
फिर कहां से टाइम मेरे पास ज्यादा हो गया? दूसरी बात एक चीज

546
00:39:37,520 --> 00:39:41,760
मुझे बहुत अच्छी लगी आपकी। एक चीज के लिए मैं आपको जो है धन्यवाद देना चाहूंगा।

547
00:39:41,760 --> 00:39:46,320
साधुवाद करना चाहूंगा कि

548
00:39:46,320 --> 00:39:51,760
आपने पहले वीडियो में ना मेरी तुलना रामपाल से की थी।

549
00:39:51,760 --> 00:39:55,760
दूसरे वीडियो में आप इस पर आ गए कि भाई तुम रामपाल वालों को ही ठीक करते रहो। उसकी बैंड

550
00:39:55,760 --> 00:39:59,920
अच्छे से बजा रखी है। उसके लिए साधुवाद। ये ये है परिवर्तन।

551
00:39:59,920 --> 00:40:04,160
इसको कहते हैं वैचारिक क्रांति। गुरुदेव कहते हैं

552
00:40:04,160 --> 00:40:10,080
आपकी तारीफ जब सामने वाला करे तब समझ लेना कि आप सही रास्ते पर जा रहे हो।

553
00:40:10,080 --> 00:40:14,480
तो पहले वीडियो में क्या कह रहे थे कि रामपाल और मेरे लिए मेरे में और रामपाल में समानता

554
00:40:14,480 --> 00:40:18,560
ढूंढ रहे थे ना। दूसरे वीडियो में खुद ही कह रहे हो कि रामपाल की हमने बैंड बजा रखी

555
00:40:18,560 --> 00:40:22,720
है। पर यहां पर भी आपका एक वह है। आपकी बातें आपस

556
00:40:22,720 --> 00:40:26,880
में टकरा रही हैं। दोगलापन है। आप मुझसे कह रहे हो मेरे पास टाइम बहुत

557
00:40:26,880 --> 00:40:31,360
ज्यादा है। फिर दूसरी ओर कह रहे हो कि एक बहुत बड़ा जो स्कैम चल रहा है भारत में

558
00:40:31,360 --> 00:40:34,880
उससे मैं लड़ रहा हूं।

559
00:40:34,880 --> 00:40:40,160
उसको चटनी चटा रहा हूं। उसके सेंटर्स बंद करवा रहा हूं।

560
00:40:40,160 --> 00:40:44,240
आपको शायद ये सब मालूम नहीं होगा। आपके वो होता है चापलूसों से घिरा हुआ

561
00:40:44,240 --> 00:40:48,400
जो व्यक्ति होता है उस तक वो सही खबरें आती नहीं है। चापलूसों

562
00:40:48,400 --> 00:40:52,640
से घिरा है। चापलूस अपने दृष्टिकोण से देते हैं और वो व्यक्ति

563
00:40:52,640 --> 00:40:57,280
उसी के अनुसार जो है रिएक्ट करता है। वो हो रहा है। पता करो

564
00:40:57,280 --> 00:41:02,080
फिर बोलो अर्ध ज्ञानी भयंकर

565
00:41:02,080 --> 00:41:06,640
हम तो टाइम नहीं है। रामपाल

566
00:41:06,640 --> 00:41:07,140
के

567
00:41:06,800 --> 00:41:10,800
साथ व्यवहारिक युद्ध चल रहा है। आप जैसों के

568
00:41:10,800 --> 00:41:14,960
साथ वैचारिक शोधन के निमित्त कई

569
00:41:14,960 --> 00:41:18,160
सारी चीजें चल रही हैं।

570
00:41:18,160 --> 00:41:22,160
और फिर आप एक एक ओर को कह भी रहे हो कि अच्छा कार्य कर रहे हैं। यानी

571
00:41:22,160 --> 00:41:26,240
कि वहां पर टाइम स्पेंड हो रहा है। फिर दूसरी ओर कह रहे हो कि भाई टाइम बहुत है

572
00:41:26,240 --> 00:41:30,720
आपके ऊपर आपके पास। यह सब चीजें आपके

573
00:41:30,720 --> 00:41:34,960
जैसे जो महान वक्ता हैं, इतने प्रखर विद्वान हैं, स्वयंभू

574
00:41:34,960 --> 00:41:38,960
हैं, भगवान के बाद सीधे महर्षि और तथाकथित महर्षि

575
00:41:38,960 --> 00:41:43,120
और फिर सीधे आप आपके जैसे लोगों के ऊपर ये शोभा नहीं देता

576
00:41:43,120 --> 00:41:46,710
है।

577
00:41:46,710 --> 00:41:50,880
[गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा फिर आप जो है इस पर आ गए

578
00:41:50,880 --> 00:41:53,280
कि भाई

579
00:41:53,280 --> 00:41:57,360
परंपरा परंपरा कोर्ट की परंपरा हमारी

580
00:41:57,360 --> 00:42:01,360
कोर्ट की परंपरा है। चलो कोर्ट की परंपरा ही है तो

581
00:42:01,360 --> 00:42:05,360
तुम्हें कोट परंपरा से वेद मंत्र मिले हैं ना अग्निवृत से वीडियो में देख

582
00:42:05,360 --> 00:42:09,360
लो। बोल रहे हैं कि मूल तो सारणी है। अरे वेद मंत्र के

583
00:42:09,360 --> 00:42:14,560
लिए तो कोट परंपरा पे आधारित हो। कहां जाओगे?

584
00:42:14,560 --> 00:42:18,880
हमसे बच के जाओगे कैसे? खुद से हमें छुपाओगे कैसे?

585
00:42:18,880 --> 00:42:23,920
हम वो खुशबू हैं जो तुम्हारे वेद मंत्रों में बसते हैं।

586
00:42:23,920 --> 00:42:28,000
हम वो खुशबू हैं जो तुम्हारी वेद मंत्र रूपी सांसों में बसते हैं। अपनी

587
00:42:28,000 --> 00:42:32,160
सांसों को रोक पाओगे कैसे? कैसे हमको नकारोगे

588
00:42:32,160 --> 00:42:36,560
भाई? या तो अपनी असलियत बता दो समाज को।

589
00:42:36,560 --> 00:42:40,880
हम अवैदिक हैं। हम वेद विरोधी नास्तिक हैं। अकॉर्डिंग

590
00:42:40,880 --> 00:42:45,280
टू मनुस्मृति। हां।

591
00:42:45,280 --> 00:42:49,440
समझ रहे हैं ना? हमसे खुद को अलग भी नहीं कर सकते। प्रॉब्लम

592
00:42:49,440 --> 00:42:53,520
तो आपकी यह है ना। कैसे कर लोगे अलग? मूल में हम बैठे

593
00:42:53,520 --> 00:42:57,600
हुए हैं ना। हां। तो क्या है? कोर्ट

594
00:42:57,600 --> 00:43:01,840
परंपरा से आपको वेद प्राप्त हुआ है। तो अगर कोर्ट परंपरा से आने

595
00:43:01,840 --> 00:43:05,920
वाली चीजें अप्रामाणिक है। सम्माननीय नहीं है। तो वेद को क्यों स्वीकार

596
00:43:05,920 --> 00:43:10,080
कर लिया भाई? क्योंकि ढिंढोरा पीटना है। वेद के नाम पर अपने मन

597
00:43:10,080 --> 00:43:14,160
मुखी व्याख्याएं डालनी है। ईश्वर के अवतार की असिद्धि करनी है। मूर्ति

598
00:43:14,160 --> 00:43:18,160
पूजा को अधर्म बोलना है। इस्लाम बनाना है। बुत

599
00:43:18,160 --> 00:43:22,160
परस्ती का विरोध करना है।

600
00:43:22,160 --> 00:43:26,720
ईसाइयत फैलानी है। रूपांतरित करके

601
00:43:26,720 --> 00:43:30,800
सनातन के नाम से। इसलिए इसलिए

602
00:43:30,800 --> 00:43:34,880
वेद का नाम लेकर के और इस्लामिक बातें बतानी है। ईश्वर अवतार नहीं

603
00:43:34,880 --> 00:43:38,880
ले सकता। बाधित है। बहुत से कार्य नहीं कर सकता। त्रिकालदर्शी

604
00:43:38,880 --> 00:43:42,880
नहीं है। यह नहीं है, वो नहीं है। और फिर कहीं पर त्रिकालदर्शी बोल भी

605
00:43:42,880 --> 00:43:46,000
देंगे

606
00:43:46,000 --> 00:43:50,720
कोर्ट की परंपरा। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो आपका ये समाज क्या है? रजिस्ट्रेशन समाज।

607
00:43:50,720 --> 00:43:54,800
हमारा तो विभाग जो है तब भी न्यायालय है। आपका

608
00:43:54,800 --> 00:43:59,920
कहां है? रजिस्ट्रार ऑफिस तक सीमित हो गया। आपका तो पंजीकरण कार्यालय।

609
00:43:59,920 --> 00:44:03,920
और आप कह रहे हो मुक्तेश्वर जी का निर्णय हो गया कि नहीं हो गया? अरे तुम अपना निर्णय

610
00:44:03,920 --> 00:44:08,000
कर लो जाकर के। जगह-जगह लोग मंदिर खोल रहे हैं आर समाज मंदिर और हिंदू

611
00:44:08,000 --> 00:44:12,080
बहन बेटियों का विवाह करा रहा है जिहादियों से जाओ जाके उनको

612
00:44:12,080 --> 00:44:17,760
देख लो पहले

613
00:44:17,760 --> 00:44:22,480
कोर्ट जब यह कहता है कि अमुक शंकराचार्य

614
00:44:22,480 --> 00:44:27,760
हैं अथवा अमुक नहीं है तो अंबेडकर के सिद्धांत के आधार पर कहता है कोर्ट

615
00:44:27,760 --> 00:44:32,960
किस आधार पर कहता है मठामना अनुशासनम

616
00:44:32,960 --> 00:44:36,960
कोर्ट को जवाब देने का अर्थ केवल इतना है कि यदि हमारी प्रामाणिकता

617
00:44:36,960 --> 00:44:41,280
पर किसी ने उंगली उठाई है तो हम वहां जाकर के प्रस्तुत हो रहे हैं। अपने दस्तावेज

618
00:44:41,280 --> 00:44:46,960
दे रहे हैं। जो वर्तमान में शासन तंत्र लागू है उसके अकॉर्डिंगली

619
00:44:46,960 --> 00:44:51,760
हम अपनी प्रमाणिकता को ख्यापित कर रहे हैं।

620
00:44:51,760 --> 00:44:55,920
अच्छा चलो यही मान लिया जाए कि भाई

621
00:44:55,920 --> 00:45:00,000
हम जो है वर्तमान के शासन तंत्र का आलंबन ले रहे हैं

622
00:45:00,000 --> 00:45:04,400
तो ना ले वर्तमान के शासन तंत्र का शोधन

623
00:45:04,400 --> 00:45:08,640
करने के लिए मनुवादी शासन तंत्र लाने के लिए

624
00:45:08,640 --> 00:45:12,800
उसकी ही विधियों का ऐसा आलंबन ना ले अपने उसके लिए लड़े

625
00:45:12,800 --> 00:45:16,960
नहीं अधिकारों के लिए तो राम मंदिर के लिए बेकार ही लड़े

626
00:45:16,960 --> 00:45:21,040
वही मंदिर मंदिर का निर्णय कैसे होगा कोर्ट से होगा तो मंदिर के लिए ना

627
00:45:21,040 --> 00:45:25,120
लड़े हालांकि आपके लिए तो अधर्म है। वो बात अलग है कि दोहरी चाल

628
00:45:25,120 --> 00:45:29,520
चलते हुए वहां भी जाकर खड़े हो जाते हो। वाह वाह वाह वाह।

629
00:45:29,520 --> 00:45:33,040
आपके लिए तो वो अधर्म है।

630
00:45:33,040 --> 00:45:37,120
और आपके यहां ना जाने कितने मुकदमे चल रहे हैं। यह मंदिर, वो प्रॉपर्टी ये सब

631
00:45:37,120 --> 00:45:41,200
आपके यहां चल रहा है। आप बात करते हो। कितने निचले लेवल पर चल

632
00:45:41,200 --> 00:45:44,560
रहा है आपके यहां।

633
00:45:44,560 --> 00:45:48,640
आज अगर मैं पूछने निकल जाऊं ना अगर मैं एक एक बुक छपवा दूं सत्यार्थ

634
00:45:48,640 --> 00:45:52,640
प्रकाश नाम से। यह आपकी सच्चाई सुन लो अब आंख खोल के

635
00:45:52,640 --> 00:45:56,640
आपकी स्थिति क्या है? कान भी खोल लेना जो जो

636
00:45:56,640 --> 00:46:01,120
जिन जिन छिदों से अंदर सूचनाएं जाती है वो सब खोल लेना।

637
00:46:01,120 --> 00:46:03,440
तो

638
00:46:03,440 --> 00:46:07,760
क्या है मैं एक बुक छपवा लूं अगर सत्यार्थ

639
00:46:07,760 --> 00:46:11,920
प्रकाश नाम से उसमें ये लिख दूं ना गिल्ली डंडे से मोक्ष होता

640
00:46:11,920 --> 00:46:16,480
है फुटबॉल खेलने से मोक्ष होता है जो

641
00:46:16,480 --> 00:46:19,040
तथाकथित

642
00:46:19,040 --> 00:46:23,360
जो काल नेमी है ना उनको गली में दौड़ा दौड़ा कर पीटने से मोक्ष होता है

643
00:46:23,360 --> 00:46:27,440
अगर मैं यह सब भी लिख दूं ना चैलेंज के साथ कह रहा हूं कोई मालाल

644
00:46:27,440 --> 00:46:31,440
ऐसा जना नहीं किसी माता ने ऐसा पूत

645
00:46:31,440 --> 00:46:35,520
नहीं जना है जो आकर के यह अकाट रूप से स्थापित कर दे

646
00:46:35,520 --> 00:46:39,520
कि वो जो सत्यार्थ प्रकाश है वो अप्रामाणिक है।

647
00:46:39,520 --> 00:46:44,240
समझ रहे हो? यह है परंपरा को त्यागने का नतीजा।

648
00:46:44,240 --> 00:46:48,320
आज कोई भी दयानंद जी के नाम से खड़ा होकर के खुद को आर्य समाझी कह सकता

649
00:46:48,320 --> 00:46:52,320
है। कह रहा है और आपके पास क्वेश्चन करने

650
00:46:52,320 --> 00:46:56,400
का अधिकार नहीं है। क्योंकि खुद आपने परंपरा के सिद्धांत को त्यागा

651
00:46:56,400 --> 00:47:00,000
हुआ है। झांक लो अपने अंदर खुद

652
00:47:00,000 --> 00:47:06,000
जाके देखो रायपुर छत्तीसगढ़ में मरही माता का मंदिर

653
00:47:07,120 --> 00:47:11,120
कौन सा चौक है? फाफड़ी चौक के आसपास कवर किया

654
00:47:11,120 --> 00:47:15,120
था हमने वहां का। मरई माता का मंदिर आर्य समाज

655
00:47:15,120 --> 00:47:19,280
बढ़िया माता पिता की मर्जी हो या ना हो आओ

656
00:47:19,280 --> 00:47:23,440
विवाह करो जाओ छुट्टी सेम डे चल रहा है वहां

657
00:47:23,440 --> 00:47:27,760
पर आप कुछ नहीं कह सकते अरे हम कह तो सकते हैं

658
00:47:27,760 --> 00:47:31,840
क्योंकि हमारे यहां सिद्धांत है कि भैया शंकराचार्य कौन बनेगा जिसको

659
00:47:31,840 --> 00:47:36,400
उसने जिसको शंकराचार्य ने शंकराचार्य बनाया हो सिद्धांत

660
00:47:36,400 --> 00:47:40,400
है आपके यहां कोई सिद्धांत ही नहीं है ना कर्मणा वर्ण व्यवस्था

661
00:47:40,400 --> 00:47:43,280
कर्मणा गुरु व्यवस्था

662
00:47:43,280 --> 00:47:48,480
कि जिसको ब्रह्म का ज्ञान होगा वही जो है वह होगा विद्वान।

663
00:47:48,480 --> 00:47:52,480
इसका मतलब विद्वान की विद्वता को जानने के लिए हमें पहले

664
00:47:52,480 --> 00:47:58,240
विद्वान बनना पड़ेगा। तब हम जाकर के विद्वान की विद्वता जान पाएंगे।

665
00:47:58,240 --> 00:48:02,560
पहले हम विद्वान बन जाए। फिर फायदा क्या है भैया किसी गुरु के पास जाने का?

666
00:48:02,560 --> 00:48:06,560
किसी गुरु के गुरु की प्रामाणिकता को समझने के

667
00:48:06,560 --> 00:48:10,640
लिए हमें यह जानना होगा कि उसको ब्रह्म ज्ञान है कि नहीं।

668
00:48:10,640 --> 00:48:14,720
उसके लिए पहले हमें ब्रह्म ज्ञान चाहिए तो बिना गुरु के ही चाहिए। फिर

669
00:48:14,720 --> 00:48:15,280
क्या फायदा

670
00:48:15,280 --> 00:48:18,080
गुरु का?

671
00:48:18,080 --> 00:48:22,640
ये सब तार्किक बातें कभी सोचने बैठो तो सही। चिंतनशील

672
00:48:22,640 --> 00:48:26,800
व्यक्ति लगते हैं आप। थोड़ा बैठ के विचार

673
00:48:26,800 --> 00:48:30,800
मंथन तो कर लीजिए। तर्क पर कभी तार्किक

674
00:48:30,800 --> 00:48:34,960
बुद्धि से सोचेंगे। छोड़ दिया, लपेट दिया कह के भैया

675
00:48:34,960 --> 00:48:38,960
हम बहुत बड़े तार्किक हैं। हमारा सबसे बड़ा तर्क है कि तुम कुतर्की हो। यही था

676
00:48:38,960 --> 00:48:44,400
ना उस दिन। उत्तर क्या आप कुतर्क कर रहे हैं?

677
00:48:44,400 --> 00:48:48,480
यह उत्तर था आपके आर्य समाज का। आप कुतर्क कर रहे हैं।

678
00:48:48,480 --> 00:48:53,280
ये

679
00:48:53,280 --> 00:48:57,520
अरे बैठ के चिंतन तो करो भाई। कह क्या रहा है सामने वाला। पहले ही

680
00:48:57,520 --> 00:49:01,600
एक अपने अंदर जो है एक बना लिया

681
00:49:01,600 --> 00:49:07,600
एक स्वरूप कि भाई यह व्यक्ति जो है विरोधी है। इसका तो विरोध ही करना है।

682
00:49:11,460 --> 00:49:17,460
[गला साफ़ करने की आवाज़]

683
00:49:17,520 --> 00:49:21,680
तो कोर्ट की परंपरा आपका है रजिस्ट्रेशन समाज और रजिस्ट्रेशन

684
00:49:21,680 --> 00:49:25,840
समाज ऐसा वैसा नहीं है। रजिस्ट्रेशन वो पहले स्वयं का कराता

685
00:49:25,840 --> 00:49:29,840
है रजिस्ट्रार ऑफिस में जाकर के और फिर उसके बाद

686
00:49:29,840 --> 00:49:34,160
जिहादियों के साथ हिंदू बिटियाओं का विवाह हो करके उनका रजिस्ट्रेशन करता है।

687
00:49:34,160 --> 00:49:38,240
एक दिन में कर्मणा ब्राह्मण बनाता है। एक दिन में कर्मणा वैश्य क्षत्रिय इत्यादि

688
00:49:38,240 --> 00:49:42,240
बनाता है उनका भी रजिस्ट्रेशन करता है तो आपका क्या

689
00:49:42,240 --> 00:49:45,120
है रजिस्ट्रेशन समाज

690
00:49:45,120 --> 00:49:49,280
तो आपने तो उस हिसाब से यदि हमारे को कोर्ट की कोड परंपरा कहोगे तो आप कौन से

691
00:49:49,280 --> 00:49:53,840
वैदिक हैं रजिस्ट रजिस्टर्ड वैदिक रजिस्टर्ड

692
00:49:53,840 --> 00:49:59,840
ऑफिस से मान्यता प्राप्त वैदिक

693
00:50:01,040 --> 00:50:05,440
सीधी सी बात है धरती पर जो

694
00:50:05,440 --> 00:50:09,600
वायु वायुयान होता है जिसको आकाश में उड़ना होता है। आप सिद्धांत सुनिए। आपके यहां पर इतने

695
00:50:09,600 --> 00:50:13,680
गढ़ सिद्धांत है ही नहीं। बहुत सही स्तर तक बातें होती फिर छोड़ दिया जाता है।

696
00:50:13,680 --> 00:50:17,680
ज्यादा सवाल मत करो। वही कुरान पांच पांच 101 ज्यादा

697
00:50:17,680 --> 00:50:22,000
प्रश्न मत करो। नहीं तो तुम्हारे लिए वो आयतें खोल दी जाएंगी जो

698
00:50:22,000 --> 00:50:26,160
तुमसे पहले जो है कुछ लोगों ने प्रश्न किए थे और वो इन आयतों की वजह से बागी

699
00:50:26,160 --> 00:50:30,560
हो गए थे। वही हाल है आपका। अब सुनिए सिद्धांत।

700
00:50:30,560 --> 00:50:35,040
धरती पर दौड़ने वाला जो एरोप्लेन है उसका उसका जो

701
00:50:35,040 --> 00:50:39,760
गंतव्य होता है वह होता है आकाश में उसे दौड़ना है। उसके लिए

702
00:50:39,760 --> 00:50:44,400
वो धरती का ही आलंबन लेता है। उसी प्रकार यदि आपको

703
00:50:44,400 --> 00:50:48,480
मनुवाद स्थापित करना है। आपको आज की अराजकता

704
00:50:48,480 --> 00:50:52,800
जो हो रही है उसका शोधन करना है तो आपको उसी अराजक

705
00:50:52,800 --> 00:50:58,800
शासन तंत्र का आलंबन लेना पड़ेगा।

706
00:51:02,160 --> 00:51:06,640
[गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़] अच्छा

707
00:51:06,640 --> 00:51:10,960
फिर आपने एक और लगाया है आरोप कि आपके मठों में हत्याएं

708
00:51:10,960 --> 00:51:15,200
होती हैं बलात्कार होता हमने तो भाई हमारे यहां ये सब नहीं सुना है हां कुछ

709
00:51:15,200 --> 00:51:19,200
जो नकली नाम ओढ़ के बैठ जाते जिनको हम कह सकते हैं

710
00:51:19,200 --> 00:51:23,360
सीना तान के आपकी तरह नहीं पीठ पीछे कहे मराई माता का मंदिर हो रहा है जाओ

711
00:51:23,360 --> 00:51:27,520
जा के रोक लो उसको जाओ बंद करवा दो और मुझे बता दो कहां नकली

712
00:51:27,520 --> 00:51:33,280
शंकराचार्य मैं जाकर के चिल्ला करके कह दूंगा नकली शंकराचार्य भाई और कहते हैं देख लो

713
00:51:33,280 --> 00:51:38,080
नकली शंकराचार्य जो बनकर के घूम रहे हैं पूर्णतः अप्रमाणिक

714
00:51:38,080 --> 00:51:42,080
अप्रमाणिक है जो उनके गेट पर जाकर के वीडियो

715
00:51:42,080 --> 00:51:46,320
बनाया है आप जाओ मरही माता मंदिर ऐसे ना जाने कितने

716
00:51:46,320 --> 00:51:50,960
अभी मैंने लखनऊ में एक किया था कवर जहां वो

717
00:51:50,960 --> 00:51:54,960
हिंदू बहन बेटियों का विवाह करना स्वीकार कर रहे हैं। कोर्ट के अनुसार हम कर देते हैं। एक

718
00:51:54,960 --> 00:51:59,040
ही दिन में कर देते हैं। जाओ जाकर के उनको कहो कि तुम गलत हो फर्जी

719
00:51:59,040 --> 00:52:03,440
हो बंद करो करवा दो एक दो बंद अरे बंद मत करवाओ घोषणा

720
00:52:03,440 --> 00:52:08,240
करो अभी देखो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा है

721
00:52:08,240 --> 00:52:12,480
साहस नहीं है क्योंकि परंपरा है ही नहीं

722
00:52:12,480 --> 00:52:16,960
तो कैसे कहोगे कि तुम फर्जी हो वैदिक

723
00:52:16,960 --> 00:52:17,460
रश्मि

724
00:52:17,360 --> 00:52:21,360
थ्योरी वाला भी प्रमाणिक आर्य समाजी और वैदिक रश्मि थ्योरी को ना मानने

725
00:52:21,360 --> 00:52:25,680
वाला भी प्रमाणिक आर्य समाजी ये है

726
00:52:25,680 --> 00:52:30,480
वास्तविक ता कौन आर्य समाजी है कौन नहीं है यही नहीं पता

727
00:52:30,480 --> 00:52:34,800
बस हाथी पर बैठ के चिल्लाओ आर्य समाज आर्य समाज

728
00:52:34,800 --> 00:52:39,280
है कहां आर्य समाज वही निराकार ईश्वर की तरह है ही नहीं अस्तित्व

729
00:52:39,280 --> 00:52:43,280
है ही नहीं जहां भी है वो किन किस आधार पर है

730
00:52:43,280 --> 00:52:47,520
कि विधर्म की आलोचना करो विधर्मियों को मलेच्छों

731
00:52:47,520 --> 00:52:51,680
पे अच्छी चीज है ठीक है उनकी चीजों उनकी असलियत सामने लाओ मगर

732
00:52:51,680 --> 00:52:56,480
आपका अस्तित्व इसी पर है ख्याति कैसे प्राप्त होती

733
00:52:56,480 --> 00:53:00,480
कि मलेच्छों की समीक्षा करो बैठकर के उससे

734
00:53:00,480 --> 00:53:06,480
हमारा हिंदू खुश हो जाएगा प्रभावित हो जाएगा जुड़ जाएगा

735
00:53:06,480 --> 00:53:10,720
उसके बाद मिलीजुली भड़काऊ बातें भी करो इनके प्रति

736
00:53:10,720 --> 00:53:15,360
परंपराओं के प्रति क्योंकि जब तक ये हैं तब तक आपका पूर्णत अस्तित्व तो हो नहीं सकता

737
00:53:15,360 --> 00:53:20,320
और बीच-बीच में क्रांतिकारी बन जाओ

738
00:53:20,320 --> 00:53:24,400
दार्शनिक बातें भगवान की भक्ति की बातें ये सब

739
00:53:24,400 --> 00:53:28,400
बातें बहुत न्यून फलाने तंत्र की बुराई

740
00:53:28,400 --> 00:53:33,120
भड़काऊ भाषण अपनों के लिए काशी शास्त्रार्थ स्मृति स्थल

741
00:53:33,120 --> 00:53:37,840
और अंतत गतवा कुछ हो जाए तो हमने क्रांतिकारी दिए ये तीन खंबे हैं

742
00:53:37,840 --> 00:53:43,840
प्रचार के अस्तित्व के इस पर खड़े हैं

743
00:53:46,570 --> 00:53:51,360
[गला साफ़ करने की आवाज़] उन्नत उधर आपको दिख रहा है मेरा खैर

744
00:53:51,360 --> 00:53:55,440
ये बात अलग है कि अभी समय नहीं मिलता है।

745
00:53:55,440 --> 00:53:59,440
व्यायाम नहीं कर पाता हूं। आप जैसे

746
00:53:59,440 --> 00:54:04,160
लोगों ने जो खिचड़ी पका रखी है, जो रोक नहीं पा रहे हो कन्वर्शन

747
00:54:04,160 --> 00:54:08,480
क्यों नहीं रोक पा रहे हो? क्यों हमारे भाई बहन छीन रहे हैं? क्यों 35 टुकड़े हो रहे हैं बेटियों

748
00:54:08,480 --> 00:54:12,080
के?

749
00:54:12,080 --> 00:54:16,720
तब छोड़ना पड़ा ना व्यायाम। प्रायोरिटीज बदलनी पड़ी। नहीं।

750
00:54:16,720 --> 00:54:20,880
इस शरीर को जो है फिट एंड फाइन रखने से ज्यादा जरूरी है कुछ और। धर्म की रक्षा

751
00:54:20,880 --> 00:54:24,880
ज्यादा जरूरी है। छोड़ो नहीं रहेंग। सिक्स पैक एप्स

752
00:54:24,880 --> 00:54:28,560
तो कोई बात नहीं।

753
00:54:28,560 --> 00:54:32,800
खैर फिर भी आज भी पौरुष इतना है

754
00:54:32,800 --> 00:54:37,200
कि ये जो आपको जो उदर दिख रहा है ना बढ़ा हुआ

755
00:54:37,200 --> 00:54:41,520
वो जो उदर है आज भी पौरुष इतना है कि भगवान ना करे

756
00:54:41,520 --> 00:54:45,600
अगर कभी सामना होता है चर्चा में और जैसे

757
00:54:45,600 --> 00:54:49,920
अग्निवत जी का तो हो ही रहा था। हार्ट पर बार-बार हाथ जा ही रहा था। गले पर बार-बार

758
00:54:49,920 --> 00:54:54,000
जा ही रहा था। जान सूख ही रही थी। इधर आपकी भी जान सूखने लगे। कुछ हो

759
00:54:54,000 --> 00:54:58,080
जाए भगवान ना करे तो आप दोनों को एक कंधे पे एक और एक

760
00:54:58,080 --> 00:55:03,120
कंधे पर एक ऐसे दोनों को जाकर के मैं हॉस्पिटल जरूर छोड़ आऊंगा।

761
00:55:03,120 --> 00:55:06,720
इतना सामर्थ्य पर्याप्त

762
00:55:06,720 --> 00:55:11,760
शारीरिक रूप से इतना मजबूत हूं। आप दोनों कंधे पर डाल के एक साथ

763
00:55:11,760 --> 00:55:16,240
अस्पताल छोड़ आऊंगा। और क्या चाहिए?

764
00:55:16,240 --> 00:55:21,920
भाई अपनों के काम आ जाऊं। इससे बढ़के और क्या है?

765
00:55:21,920 --> 00:55:25,920
भगवान ना करे ऐसा हो कभी ऐसा हो कि मेरे से सामना हो जाए और

766
00:55:25,920 --> 00:55:30,240
फिर आपका इस तरह की स्थिति हो जाए पर अगर हो गई तो आपका वहां पर ये भाई बालक

767
00:55:30,240 --> 00:55:34,480
जो भी जिस भी दृष्टि से देखते हो वो इतना सामर्थ

768
00:55:34,480 --> 00:55:38,720
रखता है इसी उदर के साथ कि आपको कंधे पर डाल के आराम से गोद

769
00:55:38,720 --> 00:55:43,760
में उठा के छोड़ आए अस्पताल

770
00:55:43,760 --> 00:55:49,760
अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़]

771
00:55:52,960 --> 00:55:57,200
आपने कहा कि चर्चा लगी पड़ी हो ये हो रहा हो वो हो रहा हो लगी

772
00:55:57,200 --> 00:56:01,520
पड़ी हो वैद से भी शांत ना हो रही हो तो मेरे यहां के जो गुरुकुल के छात्र

773
00:56:01,520 --> 00:56:05,680
हैं उनसे कर लो मैं तो करता रहूंगा आज

774
00:56:05,680 --> 00:56:09,840
नहीं तो कल मैं आपको विवश करूंगा कि आप चर्चा करिए

775
00:56:09,840 --> 00:56:14,080
मुझसे और या तो समाज को कहिए कि ईश्वर अवतार

776
00:56:14,080 --> 00:56:18,800
ले सकता है इस मामले में आर्य समाज गलत है इस मामले में दयानंद गलत

777
00:56:18,800 --> 00:56:24,800
से कहिए घोषणा करिए मैं करूंगा चर्चा मैं नहीं रुकने वाला

778
00:56:24,800 --> 00:56:29,600
आज मैं योग्य नहीं हूं हो सकता है आगे चलकर के आपको योग्यता दिखाई दे जैसे

779
00:56:29,600 --> 00:56:33,840
भाई मैंने जब ये सब शुरू किया था तब मैं योग योग्य नहीं दिखा था ना

780
00:56:33,840 --> 00:56:37,840
इनको अग्निव्रत जी को आए ना एक दिन फोन आया ना इनका मेरे पास हां

781
00:56:37,840 --> 00:56:42,000
भाई चर्चा आपका भी आया था आपने तो कहा ही है अच्छा चर्चा से पलायन देखिए क्या

782
00:56:42,000 --> 00:56:46,240
है आप खुद कह रहे हैं मैंने बहुत प्रयास किया प्रयास किया और अब

783
00:56:46,240 --> 00:56:50,480
भाग रहे हैं ये ये तो वो वाली बात हो गई जैसे आमतौर पर एक जनरल

784
00:56:50,480 --> 00:56:54,560
सिद्धांत है जैसे वो अभी थोड़ी देर पहले मैंने एक जनरल सिद्धांत दिया था कि

785
00:56:54,560 --> 00:56:58,640
एक वैश्या क्या करती है कि अपने दोष को छुपाने के लिए अपने आप को एक्स्ट्रा

786
00:56:58,640 --> 00:56:59,200
छुपाती

787
00:56:59,200 --> 00:57:03,200
है। आपकी बात नहीं कर रहा था फिलहाल और अभी

788
00:57:03,200 --> 00:57:07,440
भी नहीं कर रहा हूं। तो जैसे कार जा रही होती है तो कुत्ते जो होते हैं पीछे दौड़ते

789
00:57:07,440 --> 00:57:11,600
हैं कार के पीछे। मगर कार को जब रोक देते हैं और खोलते हैं दरवाजा तो

790
00:57:11,600 --> 00:57:15,680
भाग जाते हैं। आपकी बात नहीं कर रहा हूं।

791
00:57:15,680 --> 00:57:21,680
मगर यह दृश्य अगर आप ऐसा बना रहे हैं तो ऐसा ही दिखेगा वह दृश्य।

792
00:57:22,800 --> 00:57:25,360
हम

793
00:57:25,360 --> 00:57:29,440
तो अंतत गत्वा बात यही है कि विषयंतर ना

794
00:57:29,440 --> 00:57:33,520
करें। अवतारवाद की बात हो रही थी और अवतारवाद

795
00:57:33,520 --> 00:57:37,680
पर भी विरोध आपकी तरफ से प्रारंभ हुआ है। आपकी ओर से भड़काऊ

796
00:57:37,680 --> 00:57:42,320
भाषण आते हैं। आप उनको उनका नियंत्रण करें।

797
00:57:42,320 --> 00:57:46,400
उनको समझाइए जाकर के। आपने बोला ना म्लेच्छ देख रहे हैं खुश हो रहे हैं भाई

798
00:57:46,400 --> 00:57:50,640
समझाओ उनको सच्चिदानंद स्वामी को वैश्यावन ये सब करते रहते हो उसको सिखाया

799
00:57:50,640 --> 00:57:54,640
किसने है दयानंद जी ने उनको सिखाया किसने दयानंद जी ने

800
00:57:54,640 --> 00:57:58,960
तो आपको ये सब देखना पड़ेगा ना और फिर भी ये सब जो जो आस्था

801
00:57:58,960 --> 00:58:03,360
वाली बात है ये तो उतने समय की बात है जब मैं उसमें इन्वॉल्व हूं डायरेक्ट बात

802
00:58:03,360 --> 00:58:08,000
मुख्य ये है कि हम सनातनी बट रहे हैं इन कारणों से

803
00:58:08,000 --> 00:58:12,000
और इसका फायदा जो दूसरा है वह उठाता है हम बट

804
00:58:12,000 --> 00:58:14,720
रहे हैं आर्य समाजी

805
00:58:14,720 --> 00:58:19,040
अनास्थावान है मूर्ति के प्रति भगवान के सगुण साकार स्वरूप के प्रति

806
00:58:19,040 --> 00:58:23,280
रामचरितमानस के प्रति और यही वो घटक है जिनके जिनके आसपास

807
00:58:23,280 --> 00:58:27,280
हमारी लड़ाईयां होती है हमारे युद्ध होते हैं तो

808
00:58:27,280 --> 00:58:31,280
वहां पर आर्य समाज निष्ठा के साथ उपलब्ध नहीं है ना एक आध बार कहीं

809
00:58:31,280 --> 00:58:35,280
आपने अपने आर्य समाज के ही सिद्धांतों के विरुद्ध जाकर के कुछ कर दिया उसका ढिंढोरा कब

810
00:58:35,280 --> 00:58:39,360
तक पीटोगे सच्चाई तो ये है ना कि आपके अनुसार भी वो अधर्म है

811
00:58:39,360 --> 00:58:44,400
जब तक वहां पर मूल में आप परिवर्तन नहीं करोगे उससे कुछ नहीं होना जाना

812
00:58:44,400 --> 00:58:50,080
दिखावा करने से तो इन सब बातों का ध्यान रखें और

813
00:58:50,080 --> 00:58:54,160
जो मां के दूध की बात कही थी वो आपके लिए नहीं कही थी आप

814
00:58:54,160 --> 00:58:59,040
अपने लिए मत समझो वो एक जनरल बात कही थी किसी मां ने तो

815
00:58:59,040 --> 00:59:03,120
आर्य समाज में किसी मातृशक्ति ने कोई तो मां की कोख ऐसी

816
00:59:03,120 --> 00:59:08,720
जन्मी होगी जो आकर के बिना किसी

817
00:59:08,720 --> 00:59:12,960
पूर्वाग्रह के सच्चाई तक पहुंचने का प्रयास करेगी।

818
00:59:12,960 --> 00:59:18,000
एक चर्चा ऐसी हो कि भाई ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है?

819
00:59:18,000 --> 00:59:22,000
तीन चीजें हैं। सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म

820
00:59:22,000 --> 00:59:27,440
बस मुझे दे दो। मैं चलता हूं तुम्हारे साथ बना लो आर समाजी मुझे

821
00:59:27,440 --> 00:59:30,160
क्योंकि जीव की चाह का वास्तविक विषय तो सच्चिदानंद

822
00:59:30,160 --> 00:59:33,440
स्वरूप परमेश्वर है ना।

823
00:59:33,440 --> 00:59:37,440
सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और इन दोनों चीजों को प्राप्त

824
00:59:37,440 --> 00:59:41,680
साधने के लिए प्राप्त कराने के लिए शाश्वत धर्म मनमुखी धर्म नहीं

825
00:59:41,680 --> 00:59:46,160
परंपरा प्राप्त धर्म मिलावट वाला धर्म नहीं

826
00:59:46,160 --> 00:59:50,960
ये सब चीजें दे दो मुझे ले चलो अपने साथ

827
00:59:50,960 --> 00:59:54,960
तो ये सब चीजें ध्यान रखें और स्नेह आपसे

828
00:59:54,960 --> 00:59:59,440
मेरा बना रहेगा आपको मैं अपने एक बड़े के रूप में देखता आया हूं आगे भी देखूंगा

829
00:59:59,440 --> 01:00:03,440
और आज आप तैयार नहीं है कोई बात नहीं मैं समझ सकता हूं आपके हृदय में किस

830
01:00:03,440 --> 01:00:07,760
प्रकार का भय होगा, पीड़ा होगी, बचने के रास्ते ढूंढ रहे होंगे। मैं भगवान

831
01:00:07,760 --> 01:00:11,920
से प्रार्थना करता हूं कि आगे वो आपको इस प्रकार के कुछ

832
01:00:11,920 --> 01:00:15,920
बल प्रदान करें कि आप जो है इस पूरी के

833
01:00:15,920 --> 01:00:19,920
शंकराचार्य जी के अल्पज्ञ शिष्य का सामना करने का सामर्थ्य जुटा

834
01:00:19,920 --> 01:00:23,920
पाए। ठीक है? इसी के साथ मैं आपसे आपके साथ जो वार्ता चल रही

835
01:00:23,920 --> 01:00:27,920
है उसको यहां विराम देता हूं। एक बात और आपने मोहित गड का नाम लिया है अपनी दोनों

836
01:00:27,920 --> 01:00:32,960
ही चर्चाओं में। मोहित गड की स्थिति आपको ज्ञात है।

837
01:00:32,960 --> 01:00:36,960
ना जाने कितने स्टेटमेंट्स में मोहित गड स्वयं को बोल बोल

838
01:00:36,960 --> 01:00:41,280
चुके हैं कि वो जो है आर्य समाजी नहीं है। अभी सूचना

839
01:00:41,280 --> 01:00:47,280
प्राप्त हो रही है कि वो जो है अवतार को लेकर के कोई विरोधी नहीं है।

840
01:00:48,560 --> 01:00:52,560
किस किस किस चीज के बारे में बात करूं? और आपको ज्ञात नहीं

841
01:00:52,560 --> 01:00:56,720
है किन कारणों से उससे उनके साथ चर्चा नहीं हो पाई थी।

842
01:00:56,720 --> 01:01:01,680
तो पहले एक बार फोन मिला लो मोहित गड को और पता कर लो कि तुम आर समाजी हो कि नहीं

843
01:01:01,680 --> 01:01:05,760
तुम अवतार का विरोध करते हो कि नहीं हमारी तरह कट्टर विरोधी हो कि

844
01:01:05,760 --> 01:01:09,760
नहीं मूर्ति पूजा के मूर्ति पूजा को अधर्म मानते हो कि नहीं

845
01:01:09,760 --> 01:01:14,000
अगर मोहित गड ये सब है पहली बात तो चर्चा हो गई होना

846
01:01:14,000 --> 01:01:18,160
सुनिश्चित हो गया है मोहित गड से बातचीत हुई है परंतु उन्होंने यही कहा मुझे कि

847
01:01:18,160 --> 01:01:22,160
भाई मेरा ऐसा कोई मैंने आज तक कभी विरोध नहीं किया उनकी अपनी मान्यता कुछ

848
01:01:22,160 --> 01:01:26,320
भी हो मगर उन्होंने विरोध नहीं किया ऐसा उनका कहना है मेरी मेरी जानकारी

849
01:01:26,320 --> 01:01:30,400
में किया भी नहीं। एक जगह पर सर्वशक्तिमान का तर्क मुझे जरूर सुनाई दिया था कि सर

850
01:01:30,400 --> 01:01:34,400
यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो क्या वास्तविकता में अपने आप को खत्म कर

851
01:01:34,400 --> 01:01:38,400
सकता है? हालांकि इसमें भी मुझे ये नहीं सुनाई

852
01:01:38,400 --> 01:01:42,720
दिया कि वो जो है अवतार नहीं ले सकता। तो अगर अवतार ना

853
01:01:42,720 --> 01:01:46,880
ले सकना से दूर होकर के कोई ये बातें कर रहा है। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई दिक्कत

854
01:01:46,880 --> 01:01:50,880
नहीं। तो पहले आप उससे उनसे पूछिए फोन लगाकर। आपकी तो बनती है

855
01:01:50,880 --> 01:01:55,280
ना अच्छी। आपके तो वही है ढाल। आपका

856
01:01:55,280 --> 01:01:59,440
सम्मान बचाने के लिए इस समय एक ही नाम मिला है आपको मोहित गड तो

857
01:01:59,440 --> 01:02:03,520
भैया फोन लगा के पूछ लो उससे भाई तू क्या कर रहा है

858
01:02:03,520 --> 01:02:04,020
पूछ

859
01:02:03,840 --> 01:02:08,720
तो लो उनसे कि उनकी मान्यता क्या है

860
01:02:08,720 --> 01:02:12,800
आप उनका नाम बार-बार ले रहे हो वो अलग परेशान हो रहे होंगे भाई ये मेरा नाम

861
01:02:12,800 --> 01:02:17,600
मेरे नाम पर क्यों मेरे कंधे पर रख के बंदूक क्यों चला रहे हो है ना

862
01:02:17,600 --> 01:02:20,960
अच्छा

863
01:02:20,960 --> 01:02:25,440
अब यहां पर एक घंटा हुआ आपको जवाब दिए हैं मैंने

864
01:02:25,440 --> 01:02:29,600
और इसमें कोई एडिटिंग वगैरह नहीं की है। यहां तक आपका समाप्त हो रहा है। अब मैं आता

865
01:02:29,600 --> 01:02:33,850
हूं अग्निव्रत जी पर। [खांसने

866
01:02:33,850 --> 01:02:36,880
की आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़]

867
01:02:36,880 --> 01:02:41,280
उन्होंने पहले कुछ आक्षेप लगाए हैं। शर्तें तोड़ी मैंने

868
01:02:41,280 --> 01:02:45,280
अपना वीडियो बनाया जो परंपरा वाला तो उसमें कह रहे

869
01:02:45,280 --> 01:02:50,640
कि शर्तें तोड़ी।

870
01:02:50,640 --> 01:02:54,720
तो शर्तें किसकी ओर से टूट रही है वो तो देख ही रहे हैं दर्शक इसमें

871
01:02:54,720 --> 01:02:58,720
मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा उनको शायद पता नहीं वो भी कुछ चापलूसों से घेरे

872
01:02:58,720 --> 01:03:02,960
रहते हैं शर्तें अग्निवत जी सर्वप्रथम आपने

873
01:03:02,960 --> 01:03:07,040
तोड़ी है जब आप तर्क से प्रमाण पर गए हैं तो आपने घोषणा नहीं की कि

874
01:03:07,040 --> 01:03:10,640
मेरे पास तर्क नहीं है

875
01:03:10,640 --> 01:03:15,040
आप विषयंतर कर रहे हैं बात हो रही है कि निराकार ईश्वर पर पाप लगेगा

876
01:03:15,040 --> 01:03:19,200
नहीं लगेगा तो अवतार पर पाप कैसे लगेगा आप कह रहे कि नहीं नहीं

877
01:03:19,200 --> 01:03:24,240
अब से मोहिनी पर आ जाओ। नहीं नहीं अब श भाष्य पर आ जाओ। नहीं नहीं यह कर लो।

878
01:03:24,240 --> 01:03:28,320
इसको विषयंतर कहते हैं। शर्तें आप तोड़ रहे हैं।

879
01:03:28,320 --> 01:03:32,400
जब तय हुआ है कि किसी के आराध्य के प्रति अपमानजनक बातें नहीं बोलींगी तो आप

880
01:03:32,400 --> 01:03:36,480
कह रहे हो आपकी परंपरा में जो पाप लिखा हुआ है। आपने पाप लिखा है। तो

881
01:03:36,480 --> 01:03:40,480
भाई शुरू में ही कहते तो चर्चा करता ही नहीं मैं। फस रहे हो तब क्यों कह

882
01:03:40,480 --> 01:03:44,480
रहे हो? फस रहे हो। जब आप पर आंसर नहीं

883
01:03:44,480 --> 01:03:48,800
आ रहा है तब आप क्यों कह रहे हो?

884
01:03:48,800 --> 01:03:53,200
एक कमेंट में जब मुगल मंदिर तोड़ रहे थे तब दयानंद जी ने निराकार

885
01:03:53,200 --> 01:03:57,360
की उपासना पर जोर दिया और साकार पूजा का खंडन किया ताकि मुस्लिम ज्यादा विरोध

886
01:03:57,360 --> 01:04:01,760
ना करें लेकिन आज दयानंद की नीति की जरूरत नहीं है। तो मैंने कहा ना

887
01:04:01,760 --> 01:04:06,160
शाश्वत धर्म शाश्वत हमें

888
01:04:06,160 --> 01:04:10,320
हमारा धर्म क्या है? सनातन किसी भी देश काल परिस्थिति में जो

889
01:04:10,320 --> 01:04:14,560
ना बदले उसका नाम सनातन। आपने किसी परिस्थिति वश अगर कुछ नियम कायदे

890
01:04:14,560 --> 01:04:18,640
कानून बना दिए तो उनको आप थोपो मत समाज पर वास्तविक धर्म

891
01:04:18,640 --> 01:04:21,920
बताते रहो।

892
01:04:21,920 --> 01:04:24,160
[गला साफ़ करने की आवाज़]

893
01:04:24,160 --> 01:04:28,160
खैर अच्छा फिर आगे वो बोल रहे हैं कि हमने

894
01:04:28,160 --> 01:04:32,320
पहले ही कहा था वेद प्रमाण होंगे। फिर उसके बाद मनुस्मृति इत्यादि परतः

895
01:04:32,320 --> 01:04:36,480
प्रमाण होंगे। तो भाई वेद आपके लिए स्वत प्रमाण नहीं है

896
01:04:36,480 --> 01:04:40,720
ना वेद भी परता प्रमाण है उनका उनका प्रमाण

897
01:04:40,720 --> 01:04:45,440
तब तक मान्य है आपके लिए जब तक वो आपकी वाणी से आपके पहले से जो आपने

898
01:04:45,440 --> 01:04:49,520
सिस्टम बना रखा है उससे जब मैच खाएगा तब वेद प्रमाण है आपके लिए तो ये

899
01:04:49,520 --> 01:04:53,680
आप भूल कर रहे हैं स्वतः प्रमाण नहीं है आपके लिए और जब

900
01:04:53,680 --> 01:04:58,080
आप ऐसा करते हैं कि नहीं हमारी वाणी से वेद मैच करने वाला अर्थ होगा वेद का मान्य

901
01:04:58,080 --> 01:05:02,400
तब हम आपसे आपकी परंपरा पूछते हैं कि वेद कहां से आए सिंपल अच्छा

902
01:05:02,400 --> 01:05:08,160
इन्होंने ने एक घंटे का वीडियो बना दिया पर उसमें यह नहीं बता पाए कि

903
01:05:08,160 --> 01:05:12,160
क्या कहते हैं ये इनकी परंपरा क्या है चैन

904
01:05:12,160 --> 01:05:17,360
क्या है पीछे की कुछ चार पांच पीढ़ी तक नहीं बताई

905
01:05:17,360 --> 01:05:21,520
और एक घंटे विधवा विलाप जैसा लगता रहा और रोते रहे कि

906
01:05:21,520 --> 01:05:25,600
मेरी परंपरा मेरी परंपरा आर परंपरा बड़ा

907
01:05:25,600 --> 01:05:30,000
हास्यास्पद था वो

908
01:05:30,000 --> 01:05:34,240
आगे कहते हैं कि ढेला नहीं चलाया वो धक्के वाली बात है ना कि जड़ पदार्थों

909
01:05:34,240 --> 01:05:38,240
को ईश्वर की इच्छा किस रूप में प्राप्त हुई मूव कैसे किया ये सब तो वो कह

910
01:05:38,240 --> 01:05:42,480
रहे ढेला नहीं चलाया मेरे सामने नहीं तो मैं बताता अरे भाई तुम इतने निचले

911
01:05:42,480 --> 01:05:48,000
स्तर के तर्क दे रहे थे वहां पर आप

912
01:05:48,000 --> 01:05:52,160
तो आप तो उस स्तर पर जा ही नहीं रहे ना वो बहुत आगे

913
01:05:52,160 --> 01:05:56,160
का प्रश्न है जब आप यहां पर अटकेंगे कि जो सब जगह है वो एक जगह कैसे हो

914
01:05:56,160 --> 01:06:00,160
सकता है वो अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य कैसे कर सकता है तब ये चीज आएगी ना

915
01:06:00,160 --> 01:06:04,320
आप अटकिए तो आप तो यहीं पर ढेर हुए जा रहे हैं कि

916
01:06:04,320 --> 01:06:08,320
वो जो है पाप पाप नहीं कर सकता निराकार उसको पाप लगेगा नहीं

917
01:06:08,320 --> 01:06:12,400
फिर भाग गए आप जो प्रमाण पर भाग गए फिर प्रमाण से परंपरा पे आपने कहा कि

918
01:06:12,400 --> 01:06:16,400
मैं क्यों बताऊं और फिर जो है आप ये व्यक्तिगत कटाक्ष करने लगे शिव

919
01:06:16,400 --> 01:06:20,480
मोहिनी पे आ गए फटाफट फटाफट जल्दी जहां पर गिरने लगे वहां से

920
01:06:20,480 --> 01:06:25,360
अच्छा इन्होंने देखिए इन्होंने एक बात कही सुखदेव जी को लेकर के

921
01:06:25,360 --> 01:06:29,360
कि सुखदेव जी और ग पादाचार्य जी के बीच में गैप है तो इसको मैं

922
01:06:29,360 --> 01:06:33,520
कई बार बता चुका हूं एक बार और बता देता हूं कि अगर वैष्णव परंपराओं

923
01:06:33,520 --> 01:06:37,600
के अनुसार जो हमारा सामप्य सारूप्य सालोक्य और

924
01:06:37,600 --> 01:06:41,760
सायुज्य मोक्ष है अगर उसके अनुसार मोक्ष मानेंगे तो यह इस

925
01:06:41,760 --> 01:06:45,440
प्रकार के जो मोक्ष होते हैं श्रोता शत्रुपनिषद इत्यादि में प्रमाण है

926
01:06:45,440 --> 01:06:49,600
कि जो योगी योगी हो जाते हैं ऐसी सिद्धियां प्राप्त

927
01:06:49,600 --> 01:06:54,160
होती है। परमहंस बन जाते हैं। ऐसी सिद्धि प्राप्त होती है। लोक में ट्रेवल कर सकते हैं।

928
01:06:54,160 --> 01:06:58,240
यानी कि भगवान के लोक में जाने के बाद भी आवागमन कर सकते

929
01:06:58,240 --> 01:07:02,240
हैं। ऐसा मोक्ष भी होता है। तो अगर यह वाली मोक्ष इस

930
01:07:02,240 --> 01:07:06,240
मोक्ष को मानेंगे कि उनका ऐसा मोक्ष हुआ था तो वहां से सुखदेव

931
01:07:06,240 --> 01:07:10,480
जी ने आकर के उपदेश दे दिया ग पादाचार्य जी को। ठीक?

932
01:07:10,480 --> 01:07:15,120
दूसरा अगर आर्य समाज का मोक्ष भी मान ले तो उसमें

933
01:07:15,120 --> 01:07:19,120
यह माना जाता है कि जो जीव मुक्त हो गया वो एक इतने परांत काल

934
01:07:19,120 --> 01:07:23,120
के बाद वापस आएगा। ठीक है? तो उस हिसाब

935
01:07:23,120 --> 01:07:27,280
से भी वापस आने वाले हो गए। और अगर कैवल्य के हिसाब से वहां देखें कि

936
01:07:27,280 --> 01:07:31,680
उनको कैवल्य वाला मोक्ष प्राप्त हुआ था तो पहले भी ब्रह्म ही सुखदेव

937
01:07:31,680 --> 01:07:35,680
के रूप में प्रकट हुए थे जिनको हमने सुखदेव माना था। तो अब दोबारा जब वो सुखदेव

938
01:07:35,680 --> 01:07:40,560
के रूप में प्रकट होंगे और शब्द प्रमाण कहेंगे कि सुखदेव है तो हम उन्हें सुखदेव ही मानेंगे।

939
01:07:40,560 --> 01:07:44,640
है ना? इसमें शब्द प्रमाण हो गया। क्योंकि एक ही ब्रह्म ही तो सबके रूप में प्रकट

940
01:07:44,640 --> 01:07:48,640
हो रहे हैं। एक ही परम तत्व तो प्रकट हो रहे हैं। तो क्यों मान

941
01:07:48,640 --> 01:07:52,720
रहे हैं हम किसी को अलग-अलग? क्यों मान रहे हैं ईश्वर? क्योंकि शब्द

942
01:07:52,720 --> 01:07:57,200
प्रमाण कह रहे हैं कि यह ईश्वर है। यह अवतार है। ठीक है?

943
01:07:57,200 --> 01:08:01,760
तो वहां पर जो है शब्द प्रमाण आ गया।

944
01:08:01,760 --> 01:08:04,960
योगेश

945
01:08:04,960 --> 01:08:09,120
योगेश भारद्वाज जी ने भृगु से भार्गव की सिद्धि

946
01:08:09,120 --> 01:08:13,360
करने में व्याकरण की कितनी गलतियां की है? सूत्र की संख्या तक गलत बताइए।

947
01:08:13,360 --> 01:08:17,360
अच्छा हां हुई है। हुई होंगी चीजें। जिस चीज में गति नहीं है

948
01:08:17,360 --> 01:08:21,920
उस चीज में ज्यादा हम नहीं बोलते। ठीक है भाई उनका क्राइटेरिया

949
01:08:21,920 --> 01:08:25,920
है। हां मगर इतनी बात है कि यह सब बातें जो मैं बोलता हूं जैसे

950
01:08:25,920 --> 01:08:30,000
उन्होंने एक बात कही कि आपको यह व्याकरण समझ में नहीं आई होगी तो मुझे लगता

951
01:08:30,000 --> 01:08:34,000
है कि आपको जो मेरे प्रश्न है वो अभी तक समझ में नहीं आए। भारद्वाज

952
01:08:34,000 --> 01:08:38,000
जी इसीलिए आप बगले झांक रहे हैं या फिर बहाने ढूंढ रहे हैं

953
01:08:38,000 --> 01:08:42,080
चर्चा से दूर दूर रहने के या फिर मोहित गौर के कंधे पर

954
01:08:42,080 --> 01:08:46,160
रख के बंदूक चलाने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि जो व्यक्ति पहले ये कह

955
01:08:46,160 --> 01:08:50,320
रहा है कि भाई हमने बहुत प्रयास किया इनसे इनके साथ आमने सामने की चर्चा

956
01:08:50,320 --> 01:08:54,400
करने का वो व्यक्ति आज ये कह रहा है कि भैया ये बहाने हैं मेरे पास इसलिए मैं नहीं आ

957
01:08:54,400 --> 01:08:58,560
सकता तो इसका अर्थ क्या है कि आप मेरे

958
01:08:58,560 --> 01:09:02,640
प्रश्नों को समझ नहीं पा रहे हैं और आप आपके ऊपर की चीज है मुझे मालूम है आपको ये सब चीजें समझ समझ

959
01:09:02,640 --> 01:09:06,640
में नहीं आई जो अवतार के पक्ष में मैंने

960
01:09:06,640 --> 01:09:10,880
बोली कई बार सुनिएगा उनको तो आपको समझ में

961
01:09:10,880 --> 01:09:14,960
ठीक है वापस आते हैं कंप्यूटर पॉइंट ऑपरेटर जी ये हटा दीजिए कमेंट पढ़

962
01:09:14,960 --> 01:09:17,040
लिया मैंने

963
01:09:17,040 --> 01:09:19,600
हम

964
01:09:19,600 --> 01:09:23,760
तो ढेला इसलिए नहीं चलाया अग्निवत जी क्योंकि आप उस

965
01:09:23,760 --> 01:09:27,760
स्तर तक पहुंचे ही नहीं चर्चा को लेकर के भाई मैं आपसे पूछ रहा हूं अवतार क्यों नहीं

966
01:09:27,760 --> 01:09:31,840
ले सकता तो आप कहो कि वो उसका स्वरूप ऐसा है वो तो सर्वव्यापक है वो

967
01:09:31,840 --> 01:09:35,920
एक जगह आ नहीं सकता तब हम आपको बताएंगे क्या कैसे आएगा एक जगह तो

968
01:09:35,920 --> 01:09:41,040
आपने उस चीज पर अटके ही नहीं तो हम क्यों लाए उस चीज को

969
01:09:41,040 --> 01:09:45,280
अगर ले आते अगर ले आते आप ही ले आते वैदिक

970
01:09:45,280 --> 01:09:49,600
रश्म थ्योरी इत्यादि आप एक व्यक्तिगत कटाक्ष पहना जाते तो आपको और आनंद

971
01:09:49,600 --> 01:09:53,680
देते आपको बिल्कुल आनंद दे देते बिल्कुल

972
01:09:53,680 --> 01:09:58,000
असली वाला जो आपने कभी भी दूध इत्यादि पिया होगा असली

973
01:09:58,000 --> 01:10:02,240
वाला वो सब याद स्मरण में आ जाता

974
01:10:02,240 --> 01:10:06,560
पर बस आपने बहुत पहले ही हथियार डाल दिए।

975
01:10:06,560 --> 01:10:10,560
आपने बहुत पहले ही अपना जो तप्त का इक्का है ना विषयंतर और

976
01:10:10,560 --> 01:10:14,720
व्यक्तिगत कटाक्ष वाला शर्तों का उल्लंघन वाला वो पहले ही आपने निकाल

977
01:10:14,720 --> 01:10:18,720
दिया। हमें मालूम था इस चर्चा का जो एंड है

978
01:10:18,720 --> 01:10:22,880
वो ऐसे ही होगा क्योंकि निर्णायक कोई वहां है नहीं जो ये बोलेगा

979
01:10:22,880 --> 01:10:26,880
हां अब अमुक जीतते हैं या अमुक की बात सिद्ध हो जाती है। अमुक

980
01:10:26,880 --> 01:10:30,960
का पक्ष सिद्ध हो जाता है। निर्णायक तो वहां कोई है नहीं। आप यह कहने नहीं

981
01:10:30,960 --> 01:10:32,080
वाले कि नहीं भैया मैं मानता

982
01:10:32,080 --> 01:10:36,800
हूं अवतार होता है और मैं भी नहीं कहने वाला

983
01:10:36,800 --> 01:10:40,800
तो तो कैसे खत्म होगी वो चर्चा ऐसी इसी प्रकार से खत्म

984
01:10:40,800 --> 01:10:44,800
होगी वो चर्चा कि कोई ना कोई गरमा गर्मी होगी जिसमें कि

985
01:10:44,800 --> 01:10:48,880
क्योंकि मैं आपके दरवाजे पर आया हूं तो मैं अपना भैया चला आऊंगा वहां से

986
01:10:48,880 --> 01:10:53,120
ऐसे ही होनी थी चाहे जिस तरह से भी कर लेते एक घंटे और चलती तब भी एक

987
01:10:53,120 --> 01:10:57,200
हालांकि आपने वहां पर हथियार जल्दी डाल दिए फिर आपका कहना है कि

988
01:10:57,200 --> 01:11:02,080
भाई गवारों के स्तर के तर्क हैं और जो है

989
01:11:02,080 --> 01:11:06,080
नंगी स्त्रियों को देखना। हालांकि यह नंगी शब्द बोलने मुझे असहजता

990
01:11:06,080 --> 01:11:10,160
हो रही है। आपको नहीं हो रही है। मैंने वहां पर स्त्रियों को नहाते हुए देखने की बात

991
01:11:10,160 --> 01:11:14,560
की थी। मेरे मुख से नंगी शब्द नहीं निकल रहा था। आपने

992
01:11:14,560 --> 01:11:18,640
बोला तो गवार कौन है वो आप देखो। फड़ता

993
01:11:18,640 --> 01:11:22,640
किसके शब्दों में है वो आप देखो। मैंने कहा था स्त्रियों को नहाते हुए देख। आप इन

994
01:11:22,640 --> 01:11:26,640
नंगी स्त्रियों को देख रहा है तो आपको नंगी नंगी ज्यादा दिखाई देती है

995
01:11:26,640 --> 01:11:30,720
इसलिए शायद आप नंगी शब्द पर ज्यादा जल्दी से पहुंच गए मैंने नंगी शब्द का उपयोग

996
01:11:30,720 --> 01:11:34,880
नहीं किया तो फवरता आप अपनी चेक करिए और

997
01:11:34,880 --> 01:11:39,120
[गला साफ़ करने की आवाज़] और फता देखनी है तो आप सत्यार्थ प्रकाश पढ़ लीजिए देखिए कभी

998
01:11:39,120 --> 01:11:43,280
भी इस सब चीजों पर आएंगे ना कटाक्ष किया ये किया उसमें शुरुआत आप ही की

999
01:11:43,280 --> 01:11:47,600
ओर से मिलेगी क्योंकि हम आपके पूर्वज हैं आपके

1000
01:11:47,600 --> 01:11:53,040
मूल में बैठे हैं ना आपसे पहले हमारा अस्तित्व है

1001
01:11:53,040 --> 01:11:57,200
तो कभी भी यह सब चीजें शुरू करेंगे आप कटाक्ष किया यह किया यह गलत

1002
01:11:57,200 --> 01:12:01,200
कहा उसमें पहले आपकी ओर से प्राथमिकता से शुरुआत की गई होगी

1003
01:12:01,200 --> 01:12:05,360
क्योंकि हम जब थे तब तो आप थे ही नहीं हम

1004
01:12:05,360 --> 01:12:08,960
तब से हैं जब आप थे भी नहीं

1005
01:12:08,960 --> 01:12:13,120
तो जो भी शुरुआत होगी जब आप है ही नहीं तो हमारी ओर से आपके लिए कटाक्ष होना

1006
01:12:13,120 --> 01:12:17,120
सिद्ध ही नहीं होगा हमारी ओर से उसका

1007
01:12:17,120 --> 01:12:21,120
प्रारंभ सिद्ध नहीं होगा तो वो तार्किकता से यही है

1008
01:12:21,120 --> 01:12:25,200
कि आप ही की ओर से पहला बार हुआ। ठीक है? इस पर ध्यान दें। अच्छा आगे चलते

1009
01:12:25,200 --> 01:12:29,280
हैं। एक भी प्रमाण नहीं ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं

1010
01:12:29,280 --> 01:12:33,760
है। प्रमाण मैंने दिया है यहां वहां नैन चिनती शस्त्राण नैन धति पावका

1011
01:12:33,760 --> 01:12:38,720
चैन क्ल मारता। ये क्या प्रमाण नहीं है क्या?

1012
01:12:38,720 --> 01:12:43,040
प्रमाण है। एक भी प्रमाण नहीं कैसे कह दिया? यह आपकी बालक बुद्धि

1013
01:12:43,040 --> 01:12:47,200
है। 60 बरस में व्यक्ति सिया जाता है। कुछ ऐसा

1014
01:12:47,200 --> 01:12:52,000
प्रतीत हो रहा है। है ना? अगर आप ऐसा करेंगे

1015
01:12:52,000 --> 01:12:56,000
तो ऐसा प्रतीत बिल्कुल लोगों को ऐसा समझ मतलब लोग ऐसा

1016
01:12:56,000 --> 01:13:00,320
समझ लेंगे तो इसलिए ऐसा ना करें। अच्छा आगे शय

1017
01:13:00,320 --> 01:13:02,720
भस भाष्य जो है ना मंत्र पढ़ा ना

1018
01:13:02,720 --> 01:13:06,800
भाष्य पढ़ा। हां मैं जितनी देर आसन

1019
01:13:06,800 --> 01:13:11,120
पर बैठता हूं उतनी देर ही मंत्र पढ़ता हूं। आसन

1020
01:13:11,120 --> 01:13:15,280
पर नहीं होता तो मुझे लगता है कि बहुत सारी अशुद्धियां होती है, पवित्रताएं होती

1021
01:13:15,280 --> 01:13:19,600
हैं। तो मैं मंत्र इत्यादि को पढ़ने से दूर रहता हूं। मैं उनकी जो शक्ति है उस पर बिलीव

1022
01:13:19,600 --> 01:13:23,760
करता हूं कि मंत्र में होती शक्ति और हम सदैव उस शक्ति को धारण

1023
01:13:23,760 --> 01:13:27,840
करने के लिए तैयार नहीं रहते हैं। मेरे जैसा सामान और निकृष्ट व्यक्ति तो नहीं रहता

1024
01:13:27,840 --> 01:13:32,080
है। आप बहुत महान है चलते फिरते जो है आप तो टेप रिकॉर्डर

1025
01:13:32,080 --> 01:13:36,240
में आप जैसे लोगों की कृपा है जो आज जो है डोर बेल में गायत्री मंत्र लगा हुआ

1026
01:13:36,240 --> 01:13:40,480
है। कचरे वाला आ रहा है। गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल

1027
01:13:40,480 --> 01:13:44,480
बेल बजा रहा है तो उसमें जो है भू भव स्वाहा तत्स

1028
01:13:44,480 --> 01:13:48,640
वितुरण्यम यह आप लोगों की कृपा है। गायत्री माता

1029
01:13:48,640 --> 01:13:52,640
जाकर के बुला रही कचरे वाला आया कचरा दे दो भाई यह आप लोगों की कृपा

1030
01:13:52,640 --> 01:13:56,720
है ना हम ऐसे नहीं है ना हमारी उनमें

1031
01:13:56,720 --> 01:14:00,800
आस्था है हम ढिंढोरा नहीं पीटते हैं

1032
01:14:00,800 --> 01:14:03,200
केवल

1033
01:14:03,200 --> 01:14:07,440
हम वैदिक है हम वैदिक है हम वैदिक है हम ढिंढोरा नहीं पीटते केवल वो

1034
01:14:07,440 --> 01:14:11,440
क्या उसको क्या कहते हैं फोकस बाजी नहीं करते हमारी

1035
01:14:11,440 --> 01:14:15,520
उसमें आस्था है निष्ठा है उसमें सम्मान है उन चीजों का वो हमारे

1036
01:14:15,520 --> 01:14:18,400
लिए बहुमूल्य चीजें

1037
01:14:18,400 --> 01:14:22,400
डर लगता है। प्रणव का उच्चारण करने में डर लगता है। नहीं करेंगे। जब जिस

1038
01:14:22,400 --> 01:14:26,400
समय नहा के निकलेंगे स्नान ध्यान स्नान ध्यान के लिए पहुंच स्नान करके

1039
01:14:26,400 --> 01:14:30,560
जब ध्यान करने बैठेंगे भगवान का उस समय जब आसन पर तमाम सारे मंत्र

1040
01:14:30,560 --> 01:14:34,640
इत्यादि के द्वारा स्वयं को शुद्ध कर चुके होंगे संध्या वंदन में तब जाकर के हमारे

1041
01:14:34,640 --> 01:14:38,880
मुख से गायत्री मंत्र निकलेगा।

1042
01:14:38,880 --> 01:14:44,880
वेद मंत्र नहीं पढ़ सकते।

1043
01:14:46,240 --> 01:14:50,560
अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़] हमारे आचार्यों को भी देख लीजिए।

1044
01:14:50,560 --> 01:14:54,720
आप लोग जब भी किसी मंत्र की बात करेंगे अपने ग्रंथों में पूरा

1045
01:14:54,720 --> 01:14:58,880
पूरा मंत्र लिखते हैं। हमारे आचार्य गण भी इतना ध्यान रखते हैं। अगर कोई

1046
01:14:58,880 --> 01:15:02,960
शास्त्र की कोई बात भी बता रहे होंगे तो उनके शास्त्र उनके भाष्य को इत्यादि

1047
01:15:02,960 --> 01:15:06,960
को आप खोल के देखिएगा। जैसे वेदार्थ पारजात है इत्यादि भक्ति

1048
01:15:06,960 --> 01:15:12,960
सुधा है कहीं तो शास्त्र के जो मंत्र इत्यादि तो पूरे पूरे कभी नहीं लिखते।

1049
01:15:14,080 --> 01:15:18,160
बहुत उनका भी प्रयास यही होता है कि मंत्र पूरे ना लिखे। यदि

1050
01:15:18,160 --> 01:15:22,160
व्यक्ति कोई शास्त्र का कोई मर्म समझने के लिए

1051
01:15:22,160 --> 01:15:26,160
ग्रंथ पढ़ रहा हो तो ऐसा ना हो कि वो जो है उसे मंत्र वो मंत्र उच्चारित

1052
01:15:26,160 --> 01:15:30,320
कर दे। इस बात का वो ध्यान रखते हैं। ठीक है? वैल्यूएबल चीजें हैं।

1053
01:15:30,320 --> 01:15:34,320
आपने इनको बना दिया खेल पर बिकने वाला। तभी रामपाल जैसे

1054
01:15:34,320 --> 01:15:37,600
लोग खड़े होते हैं ना।

1055
01:15:37,600 --> 01:15:42,240
अपनी सबसे प्रिशियस चीजों को, बहुमूल्य चीजों को, कीमती चीजों को

1056
01:15:42,240 --> 01:15:46,560
आपने गलीगली नुक्कड़ पर सब्जी तरकारी की दुकान की तरीके से उसकी दुकानें

1057
01:15:46,560 --> 01:15:50,720
लगवा दी। उसी का तो नतीजा है। आज

1058
01:15:50,720 --> 01:15:54,720
बर्बाद गुलिस्ता करने को सिर्फ एक ही उल्लू काफी है। यहां हर

1059
01:15:54,720 --> 01:15:59,040
डाल पे उल्लू बैठा है। हर साग पे उल्लू बैठा है। अंजाम में गुलिस्ता

1060
01:15:59,040 --> 01:16:03,360
क्या होगा? हर कोई व्यक्ति वेद का भाष्य कर रहा है।

1061
01:16:03,360 --> 01:16:07,840
आप आप तो चलिए आप तो जनक हैं इन लोगों के। ब्रह्मा कुमारी लोग

1062
01:16:07,840 --> 01:16:12,400
इस लोग ये निरंकारी लोग रामपाली लोग

1063
01:16:12,400 --> 01:16:16,560
अरे हर कदम पर बैठे हैं लोग भाई और जितने सब तंत्र है उन्हीं

1064
01:16:16,560 --> 01:16:21,360
से और तंत्र निकलते जा रहे हैं इस से निकलता है हरे कृष्णा मूवमेंट

1065
01:16:21,360 --> 01:16:27,280
ऋत्विक ब्रह्मा कुमारी से निकलता है ईश्वरीय विश्वविद्यालय

1066
01:16:27,280 --> 01:16:30,720
फलानी मंडली शंकर मंडली

1067
01:16:30,720 --> 01:16:34,960
आपकी देन है ये सब करो परंपरा की परंपरा

1068
01:16:34,960 --> 01:16:38,720
प्राप्त आचार्यों का विरोध

1069
01:16:38,720 --> 01:16:42,720
ठीक है

1070
01:16:42,720 --> 01:16:46,720
साय ने भाष्य नहीं किया तो वो वाक स्कलन वाली

1071
01:16:46,720 --> 01:16:51,040
बात है शुक्ल यजुर्वेद की माध्यानी

1072
01:16:51,040 --> 01:16:55,600
शाखा पर उनका भाष्य नहीं है

1073
01:16:55,600 --> 01:16:59,760
पर जो भाष्य मैंने आपको बताया वो हमारी जो परंपरा है उसमें स्वीकार्य

1074
01:16:59,760 --> 01:17:03,920
है प्रामाणिक आचार्य के द्वारा स्वीकार्य बस इतना पर्याप्त

1075
01:17:03,920 --> 01:17:08,240
है मैच कर रहा परंपरा से विरोध नहीं है।

1076
01:17:08,240 --> 01:17:12,640
अच्छा और क्या है? पढ़ना भी नहीं आता। तो इसका तो उत्तर मैंने दे ही दिया।

1077
01:17:12,640 --> 01:17:15,920
बड़ी

1078
01:17:15,920 --> 01:17:18,160
हां

1079
01:17:18,160 --> 01:17:22,160
अच्छा हां एक बात और है। संभवत शायण

1080
01:17:22,160 --> 01:17:26,160
ने भाष्य नहीं किया है। यह बात आपने कही। जबकि जो

1081
01:17:26,160 --> 01:17:30,720
भारद्वाज जी हैं भारद्वाज जी वो भगु ऋषि के वंशज

1082
01:17:30,720 --> 01:17:35,120
हालांकि उनकी चीजों में काफी सारी मैंने प्रश्न किए हैं तो भारद्वाज

1083
01:17:35,120 --> 01:17:39,360
जी जो हैं उन्होंने शायद ये स्वीकार किया है कि सायण ने यह भाष्य

1084
01:17:39,360 --> 01:17:43,360
किया है अपने वीडियो में पहले जो वीडियो बनाया था तो

1085
01:17:43,360 --> 01:17:47,360
ये गलती उनसे भी हो गई [गला साफ़ करने की आवाज़] खैर आगे चलते हैं कोई इतनी इंपॉर्टेंट

1086
01:17:47,360 --> 01:17:51,360
बात नहीं वो आगे है योगेश जी ने बहुत अच्छी

1087
01:17:51,360 --> 01:17:55,440
वीडियो बनाई थी हां बहुत अच्छी वीडियो बनाई थी बड़े ही कटाक्ष पूर्ण तरीके से बातें

1088
01:17:55,440 --> 01:17:59,440
की थी घुमा घुमा करके परंपरा अब आप यहां पर आते हैं अपनी

1089
01:17:59,440 --> 01:18:03,680
परंपरा बताते हैं परंपरा आपकी क्या है परंपरा है ब्रह्मा

1090
01:18:03,680 --> 01:18:08,160
से जैमिनी पर्यंत हम

1091
01:18:08,160 --> 01:18:12,240
अच्छा ब्रह्मा से जैमिनी पर्यंत आपकी परंपरा है ब्रह्मा से जैमिनी जैमिनी से दयानंद

1092
01:18:12,240 --> 01:18:16,400
जी तक ये आपने बोला आप खुद कह रहे हैं कि एक

1093
01:18:16,400 --> 01:18:20,960
समय था आपने अपनी वीडियो में बोला जब आप यह बता रहे हैं कि क्रांतिकारी

1094
01:18:20,960 --> 01:18:25,040
इतने दिए आर्य समाज ने तो आपने वहां पर पूर्व पक्ष रखा कि अगर

1095
01:18:25,040 --> 01:18:29,120
कोई यह कहे कि भैया उस समय कहां थे जब यह हो रहा था हरिहर मुक्का के

1096
01:18:29,120 --> 01:18:31,280
समय पर कहां थे तो आपने

1097
01:18:31,280 --> 01:18:35,360
कहा कि भाई उस समय आर्य समाज था ही नहीं तो ये प्रश्न क्यों कर रहे हो तो वो तो एक

1098
01:18:35,360 --> 01:18:39,360
अलग विषय हो जाएगा कि अगर आर्य समाज है नहीं

1099
01:18:39,360 --> 01:18:43,440
तो कोई अपनी उपलब्धियों के बारे में ना बताएं क्योंकि आप तो बता रहे हो

1100
01:18:43,440 --> 01:18:47,440
अपनी उपलब्धियों के बारे में। दूसरी बात यह तो एक बात अलग हो

1101
01:18:47,440 --> 01:18:52,240
गई। मगर आप खुद कह रहे हो कि एक समय पर आपकी परंपरा नहीं थी।

1102
01:18:52,240 --> 01:18:56,400
बिंगो क्या कर रहे हो आप? आप कह रहे हो कि

1103
01:18:56,400 --> 01:19:00,560
जैमनी से लेकर आप तक परंपरा है। फिर कह रहे हो कि हम वहां पर हैं नहीं।

1104
01:19:00,560 --> 01:19:04,800
हमारा अस्तित्व ही नहीं है वहां पर। तो कहां गए थे उस समय? कौन था उसका धारक?

1105
01:19:04,800 --> 01:19:08,800
आर्य समाज के सिद्धांतों का धारक कौन था? उस समय जब आप

1106
01:19:08,800 --> 01:19:12,880
यह कह रहे हो कि आर्य समाज नहीं था। और यदि कोई धारक था

1107
01:19:12,880 --> 01:19:17,200
ही नहीं तो परंपरा कहां से जुड़ गई दयानंद जी से? या

1108
01:19:17,200 --> 01:19:22,000
तो यह कहो कि था आर्य समाज। था तो बहुत सारे क्वेश्चन उठ जाएंगे।

1109
01:19:22,000 --> 01:19:26,400
दयानंद जी को यह क्यों लिखना पड़ा कि बौद्धों का खंडन करके अच्छा किया शंकराचार्य

1110
01:19:26,400 --> 01:19:29,680
जी ने

1111
01:19:29,680 --> 01:19:33,840
बहुत सारे प्रश्न उठ जाएंगे आपकी तो परंपरा अब रूप से चली आ

1112
01:19:33,840 --> 01:19:37,840
रही है तो आप बताइए कि आर्य समाज के सिद्धांतों को धारक किए हुए कौन था धारण

1113
01:19:37,840 --> 01:19:43,840
किसने कर रखा था उस समय आर्य समाज के निराकार ईश्वर को

1114
01:19:44,480 --> 01:19:47,120
ये सब बहुत

1115
01:19:47,120 --> 01:19:51,360
बातें बिल्कुल तर्क के साथ है और बहुत जेन्युइन क्वेश्चंस है जिनको आपको

1116
01:19:51,360 --> 01:19:55,440
तर्क कह के भाग जाते हैं। अरे भाई मुझे मत दो।

1117
01:19:55,440 --> 01:19:59,600
कम से कम अपने लोगों को तो दे दो। और जो लोग यहां पर कमेंट करेंगे अभी

1118
01:19:59,600 --> 01:20:03,680
भी कर रहे हैं। भाई तुम अपमान कर लो मेरा। बहुत अपमान

1119
01:20:03,680 --> 01:20:09,680
अच्छे से कर लो। पर इन क्वेश्चंस का जवाब तो मांगो जाकर के अपने आकाओं से।

1120
01:20:10,880 --> 01:20:14,880
जिसके वेद मंत्र पर विश्वास है उसके अर्थ पर विश्वास के लिए मना कैसे

1121
01:20:14,880 --> 01:20:19,040
कर सकते हैं? और यदि विश्वास नहीं है तो उसके वेद मंत्र पर विश्वास मत

1122
01:20:19,040 --> 01:20:23,280
करो। वेद के लिए स्वतंत्र कोई स्त्रोत निकालो ढूंढ के हमें

1123
01:20:23,280 --> 01:20:27,600
यहां से मिला। जैसे जो व्यक्ति तुम्हारे यहां के प्रबुद्ध है जितने भी

1124
01:20:27,600 --> 01:20:31,840
जो मेरे से जिनका संघर्ष चला है युवा है ऋषिवाच का

1125
01:20:31,840 --> 01:20:36,000
और निर्भय आर्य का तो वो जब इस चीज पर एक एक पीक

1126
01:20:36,000 --> 01:20:40,320
टाइम आता है अंत में व्यक्ति को कहना पड़ता है मुझे डायरेक्ट भगवान ने दिए तो ऋषिवाच

1127
01:20:40,320 --> 01:20:46,320
ने भी यह कहा डायरेक्ट भगवान ने दिए घोषित करो

1128
01:20:46,400 --> 01:20:50,480
डायरेक्ट ये निर्भय ने भी कह दिया एक जगह डायरेक्ट डायरेक्ट भगवान ने

1129
01:20:50,480 --> 01:20:54,560
दिए बात खत्म ये घोषित करो फिर उसके आगे बात होगी। फिर

1130
01:20:54,560 --> 01:20:58,720
उस पर आगे के प्रश्न होंगे। समझ रहे हो? हम पर डिपेंड

1131
01:20:58,720 --> 01:21:02,560
हो के अपने आप को वैदिक मत कहो।

1132
01:21:02,560 --> 01:21:06,560
क्योंकि हम आपके लिए अप्रामाणिक हैं अर्थ में। और यदि आप ये

1133
01:21:06,560 --> 01:21:10,640
पूछोगे कि भैया तुम्हारी भी तो परंपरा नहीं है। तो भाई हम कब कह रहे हैं कि हमें तुम प्रमाणिक मान

1134
01:21:10,640 --> 01:21:14,800
लो। तुम तो पहले ही हमें अप्रामाणिक कह रहे हो ना। हमें अप्रामाणिक

1135
01:21:14,800 --> 01:21:18,960
घोषित करके तुम स्वयं को अवैदिक सिद्ध कर रहे हो। हमें अप्रामाणिक

1136
01:21:18,960 --> 01:21:22,960
कहने के लिए तुम्हें अगर स्वयं को वैदिक कहते हुए अप्रामाणिक कहना है

1137
01:21:22,960 --> 01:21:27,120
उसके लिए पहले स्वतंत्र स्त्रोत को स्थापित करो

1138
01:21:27,120 --> 01:21:31,120
ऐसे आए वेद फिर उस पर बातें होंगी आगे

1139
01:21:31,120 --> 01:21:36,080
कैसे आए कैसे नहीं आए फिर मैं पूछूंगा भागवतानंद की तरह चलो शास्त्र सुनाओ

1140
01:21:36,080 --> 01:21:41,600
कान में दिया माथा में दिया [हंसी]

1141
01:21:41,600 --> 01:21:45,280
ठीक है अच्छा

1142
01:21:45,280 --> 01:21:47,970
हम

1143
01:21:47,970 --> 01:21:50,960
[खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़]

1144
01:21:50,960 --> 01:21:55,360
ठीक है। अब आगे इन्होंने कहा अग्निव्रत जी ने

1145
01:21:55,360 --> 01:22:01,360
कि

1146
01:22:01,440 --> 01:22:05,440
सबने अपशय माना है। सायण अर्थ परंपरा वेद में संपूर्ण ज्ञान विज्ञान

1147
01:22:05,440 --> 01:22:10,080
है। वेद अपशय है ये सब। और फिर इन्होंने एक बात कही कि

1148
01:22:10,080 --> 01:22:14,320
इन्होंने कहा कि भाई आप ऐसा भाष्य दिखा दो।

1149
01:22:14,320 --> 01:22:19,040
इन्होंने एक आरोप लगाया कि भैया इन्होंने जो शायण ने जो भाष्य किया है

1150
01:22:19,040 --> 01:22:23,040
इनकी यहां से जो बातें शुरू हो रही है ये है अगर संक्षिप्त में कहें

1151
01:22:23,040 --> 01:22:27,120
कि शय ने जो भाष्य किया है कहीं भी विज्ञान इत्यादि नहीं है

1152
01:22:27,120 --> 01:22:31,200
उपयोगी चीजें नहीं है केवल कर्मकांड है और फिर ये कटाक्ष भी किया

1153
01:22:31,200 --> 01:22:35,790
कि कर्मकांड होते रहे हैं फिर भी देश लुटता रहा बर्बाद होता रहा और

1154
01:22:35,790 --> 01:22:38,160
[गला साफ़ करने की आवाज़]

1155
01:22:38,160 --> 01:22:42,320
ये इनका कहना है तो इस इस बात को लेकर के मैं बाद में आऊंगा

1156
01:22:42,320 --> 01:22:46,800
क्योंकि आगे इससे जुड़ी हुई एक और चीज है। आगे और चलते हैं। फिर यह कह रहे कर्मकांड

1157
01:22:46,800 --> 01:22:50,880
होते रहे फिर भी मंदिर टूटते रहे। तो भाई अभी मेरे ख्याल से 150 साल से तो आप

1158
01:22:50,880 --> 01:22:55,200
भी आ चुके हो। शासन तंत्र आपके अनुसार है। वैश्य

1159
01:22:55,200 --> 01:22:56,960
कर्मणा है।

1160
01:22:56,960 --> 01:23:01,040
है ना? जो जो कर रहा है वो वही है। तो जो वर्ण व्यवस्था वो

1161
01:23:01,040 --> 01:23:05,280
आपकी लागू है। आप क्या कर रहे हैं? 150 वर्ष में क्या परिवर्तन

1162
01:23:05,280 --> 01:23:09,440
ले आए? मुझे तो यह दिख रहा है कि और गर्त में जा रहा है

1163
01:23:09,440 --> 01:23:13,200
राष्ट्र हमारा।

1164
01:23:13,200 --> 01:23:17,280
150 वर्ष से आपकी व्यवस्था लागू हो चुकी है। क्योंकि अंग्रेजों के शासनकाल में आपका

1165
01:23:17,280 --> 01:23:21,280
आप प्रादुर्भाव हुआ है आर्य समाज का और उसके बाद से लेकर अभी तक

1166
01:23:21,280 --> 01:23:25,280
कर्मणा ही हैं। कोई राजतंत्र तो आ नहीं गया है। मनुवाद

1167
01:23:25,280 --> 01:23:29,440
तो स्थापित हो नहीं गया। आप जिस तरीके से चल रहे हैं लेकर के और जिस तरीके से

1168
01:23:29,440 --> 01:23:34,400
आप जो है स्थापित करते हैं व्यवस्था का सामाजिक ढांचा

1169
01:23:34,400 --> 01:23:38,480
उसी के अनुसार तो देश आज चल रहा है जो

1170
01:23:38,480 --> 01:23:42,480
आप चाहते हैं जिस प्रकार की व्यवस्था वही व्यवस्था लागू है इस समय देश में

1171
01:23:42,480 --> 01:23:46,640
तो 150 साल में क्या परिवर्तन ले आए आप तो और गिराते जा रहे हैं गिर

1172
01:23:46,640 --> 01:23:50,800
रहा है पतन हो रहा है व्यक्ति का तो सवाल तो आपसे होना चाहिए कि

1173
01:23:50,800 --> 01:23:54,960
आप क्या कर रहे हैं आपके ऊपर से आपके अनुसार व्यवस्था होने

1174
01:23:54,960 --> 01:23:59,120
के बावजूद आपके यहां पर जो है यह सब हो रहा है। हिंदू बहन बेटियों का विवाह

1175
01:23:59,120 --> 01:24:01,920
करा रहे हो आप।

1176
01:24:01,920 --> 01:24:06,320
बहुत हालत खराब है। आपकी अपनी व्यवस्था की। चरमराई हुई है आपकी अपनी व्यवस्था।

1177
01:24:06,320 --> 01:24:10,960
जरा झांक के देखिए आप अपने अंदर। खैर आगे चलते हैं।

1178
01:24:10,960 --> 01:24:13,120
अवतार

1179
01:24:13,120 --> 01:24:19,120
इन्होंने कहा कि गुरुदेव ने जो है अवतार माना।

1180
01:24:20,240 --> 01:24:24,320
कब माना? तो अभी एक वीडियो देख के आ रहा हूं। जब गौ रक्षा

1181
01:24:24,320 --> 01:24:28,720
आंदोलन हुआ था तो आर्य समाजी भी साथ में खड़े हुए थे और उसकी बहुत प्रशंसा

1182
01:24:28,720 --> 01:24:32,720
करते हैं गुरुदेव और तब वहां जब सब जेल में थे जी

1183
01:24:32,720 --> 01:24:36,800
वहां पर सबसे वरिष्ठ थे तो वहां जब जेल में थे वहां आर्य

1184
01:24:36,800 --> 01:24:41,120
समाजी भी थे तो एक दिन वहीं पर दयानंद जी का जो

1185
01:24:41,120 --> 01:24:45,120
जन्म दिवस था वो पड़ा तो उसमें जो है

1186
01:24:45,120 --> 01:24:49,520
उनको प्रमुख वक्ता के रूप में उन्होंने कहा डेली वहां प्रवचन करते थे भाई सब

1187
01:24:49,520 --> 01:24:53,680
आध्यात्म से जुड़े हुए लोग थे तो डेली वहां प्रवचन करते थे सब सुनते थे करपात्री

1188
01:24:53,680 --> 01:24:57,760
जी को तो करपात्री जी को यह निवेदन किया गया कि भाई आप

1189
01:24:57,760 --> 01:25:02,640
ही आज बोले आज उनका जन्म दिवस तो करपात्री जी ने

1190
01:25:02,640 --> 01:25:08,000
जितने अंशों में वो जितने अंश उनके उपयोगी हैं

1191
01:25:08,000 --> 01:25:12,000
उतने अंशों में उनका सम्मान भी किया उनके लिए

1192
01:25:12,000 --> 01:25:16,720
जो है जो भाव थे अपने साधुवाद वाले वो प्रकट किए

1193
01:25:16,720 --> 01:25:21,040
ये गुरुदेव बताते हैं अपने वीडियो में तो वो भगवान

1194
01:25:21,040 --> 01:25:25,200
का अवतार स्वीकार नहीं किया है। अवतार से उनका तात्पर्य

1195
01:25:25,200 --> 01:25:28,160
है कि प्रकट होना वहां पर। यहां पर भी

1196
01:25:28,160 --> 01:25:32,320
आप मिलावट कर रहे हो।

1197
01:25:32,320 --> 01:25:36,320
ईश्वर के अवतार के रूप में दयानंद जी को नहीं स्वीकार किया है। जो आप यहां कह रहे हो दयानंद क्या

1198
01:25:36,320 --> 01:25:40,480
दयानंद जी को अवतार माना है। ईश्वर के अवतार के रूप में स्वीकार स्वीकार

1199
01:25:40,480 --> 01:25:45,200
नहीं किया है। प्रकट होने की बात हो रही है। तो प्रकट होने पर वो उन्होंने अवतार

1200
01:25:45,200 --> 01:25:49,520
बोल दिया उन्हें। वो उन्हें ईश्वर का अवतार नहीं कह रहे हैं वहां पर।

1201
01:25:49,520 --> 01:25:53,520
ठीक है? और वहां उन्होंने माना कि मूर्ति पूजा का अतिरेक हो रहा था। मूर्ति पूजा के नाम

1202
01:25:53,520 --> 01:25:57,520
पर जो है धन उगाई हो रही थी। भ्रष्ट हो रहे थे

1203
01:25:57,520 --> 01:26:01,760
चीजें तो ठीक है। बिल्कुल ठीक है। इसी परिस्थिति

1204
01:26:01,760 --> 01:26:05,520
के कारण परिस्थिति जन्य

1205
01:26:05,520 --> 01:26:09,520
किसी व्यक्ति के सिद्धांत उद्भाषित हो जाए अच्छी बात है। उसने उन्होंने जो है उस समय

1206
01:26:09,520 --> 01:26:13,520
जो है समाज सुधार की भूमिका निभाई। पर उसको ही सनातन

1207
01:26:13,520 --> 01:26:17,520
सिद्धांत के रूप में स्थापित कर देना। पीछे पड़ जाना यही सनातन है। यह

1208
01:26:17,520 --> 01:26:21,680
गलत है। बरसात से बचने के लिए आपने कहीं किसी टीन शेड

1209
01:26:21,680 --> 01:26:27,680
का सहारा ले लिया तो उसको घर नहीं बना लेते। ठीक है।

1210
01:26:27,920 --> 01:26:30,640
अच्छा

1211
01:26:30,640 --> 01:26:35,200
फिर आगे आप आ गए। हां। इसके बाद यह और कहते हैं

1212
01:26:35,200 --> 01:26:39,440
कि भैया [गला साफ़ करने की आवाज़] आपके गुरुदेव ऐसे कह रहे हैं फिर आप जो है गालियां

1213
01:26:39,440 --> 01:26:44,880
देते हैं। मैंने कब गालियां दी? अग्निव्रत जी मैंने कब गालियां दे दी?

1214
01:26:44,880 --> 01:26:49,120
आपके लोग गालियां देते फिरते हैं। मैंने गाली नहीं दी है। कोई भी व्यक्ति हमारी

1215
01:26:49,120 --> 01:26:53,360
ओर का जो प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत होगा कभी गाली इत्यादि नहीं देगा। वो ऐसे ही आपको अपनी

1216
01:26:53,360 --> 01:26:57,440
चीजों से छका लेगा सिद्धांतों से। हमारे सिद्धांत इतने मजबूत है गुरु गोविंद और

1217
01:26:57,440 --> 01:27:01,760
ग्रंथ सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म

1218
01:27:01,760 --> 01:27:06,080
परंपरा हमारे पास सिद्धांत इतने मजबूत है हमें गालियों गालियों

1219
01:27:06,080 --> 01:27:10,160
की आवश्यकता उसको है जिसके सिद्धांत कमजोर होते हैं व्यक्तिगत कटाक्ष पर जाने की

1220
01:27:10,160 --> 01:27:14,240
आवश्यकता उसको है जिसके सिद्धांत कमजोर होते हैं मैं तो ऐसे ही छका लूंगा ना

1221
01:27:14,240 --> 01:27:19,360
आपको छकाया तो फिर भागे आप विषय पर

1222
01:27:19,360 --> 01:27:25,300
करना पड़ा आपको व्यक्तिगत कटाक्ष शर्तों का उल्लंघन

1223
01:27:25,300 --> 01:27:29,680
[गला साफ़ करने की आवाज़] और दूसरी बात अगर अवतार मान भी लिया जाए दुर्जन तोष ने माना

1224
01:27:29,680 --> 01:27:33,840
नहीं है तो हमारे यहां बुद्ध को भी अवतार माना गया है भगवान विष्णु

1225
01:27:33,840 --> 01:27:37,840
इसका मतलब यह नहीं कि उनके सिद्धांत स्वीकार कर ले यज्ञों की

1226
01:27:37,840 --> 01:27:42,080
रक्षा करने के लिए उन्होंने जो वैदिक वाक्यों का विरोध किया

1227
01:27:42,080 --> 01:27:46,080
तो हम उतने अंशों में उनको उनका अनुकरण नहीं करते

1228
01:27:46,080 --> 01:27:52,080
ठीक है भगवान के रूप में स्वीकार है

1229
01:27:58,050 --> 01:28:02,160
[गला साफ़ करने की आवाज़] और एक आपकी यहीं पे वो वाली बात

1230
01:28:02,160 --> 01:28:08,080
भी कर देता हूं। कृष्ण जो है ऐसा कार्य करते हैं। तो

1231
01:28:08,080 --> 01:28:12,400
भगवान कृष्ण ने स्वयं भगवत गीता में कहा है कि जो लोग मनुष्य दृष्टि का चश्मा

1232
01:28:12,400 --> 01:28:16,640
लगा के मुझे देखते हैं और मुझे मानव समझ लेते हैं मेरे ब्रह्म

1233
01:28:16,640 --> 01:28:20,720
भाव को नहीं ध्यान रखते। आपके द्वारा स्वीकार गीता में नहीं हमारी गीता जो गीता के

1234
01:28:20,720 --> 01:28:26,080
700 श्लोक हमारे स्वीकार जो

1235
01:28:26,080 --> 01:28:30,080
मेरे ब्रह्म भाव को भूल जाते हैं मूर्ख होते हैं तो मनुष्य दृष्टि का

1236
01:28:30,080 --> 01:28:34,160
चश्मा लगाकर उनको देखने के लिए कृष्ण भगवान को स्वयं वो मना कर रहे हैं

1237
01:28:34,160 --> 01:28:38,400
तो वो कह ही नहीं रहे कि मुझे मनुष्य के हिसाब से देखो

1238
01:28:38,400 --> 01:28:42,640
वो बता रहे हैं कि मैं परम स्वतंत्र जो

1239
01:28:42,640 --> 01:28:46,640
ईश्वर परम स्वतंत्र सत्ता है वो हूं और मैं आया हूं तुम्हें यह

1240
01:28:46,640 --> 01:28:50,720
बताने के परम स्वतंत्र सत्ता किस तरह से कार्य करती है जिससे कि उसको जान

1241
01:28:50,720 --> 01:28:54,720
करके उसमें तुम्हारी निष्ठा आ सके और जिस कारण से

1242
01:28:54,720 --> 01:28:58,800
उसका चिंतन करके तुम मुक्त हो सकते। अब इसमें योगेश भारद्वाज

1243
01:28:58,800 --> 01:29:03,040
जी ने एक बात कही थी वो याद आ गई मुझे यहां पर जिसका उत्तर मैंने नहीं दिया।

1244
01:29:03,040 --> 01:29:09,040
वो रह गया। उन्होंने कहा कि भाई क्या ईश्वर बिना

1245
01:29:10,000 --> 01:29:14,080
अवतार धारण किए क्या लोगों को आकर्षित नहीं कर सकता? कर सकता है? बिल्कुल

1246
01:29:14,080 --> 01:29:18,160
कर सकता है। तो यही तो बात है। इसी को तो आप सोच नहीं

1247
01:29:18,160 --> 01:29:22,320
रहे हो। मैं कह रहा हूं बिना वेद मंत्रों के वह ज्ञान नहीं दे सकता क्या? दे सकता है। मगर

1248
01:29:22,320 --> 01:29:26,480
उसने वेद मंत्र के रूप में दिया। बात बस इतनी है। बाउंड नहीं है वो। आप

1249
01:29:26,480 --> 01:29:29,920
बाउंड कर रहे हो।

1250
01:29:29,920 --> 01:29:34,640
ये अवतार ले ही नहीं सकता। मैं ये नहीं कह रहा हूं कि नहीं अवतार लेके ही आकर्षित करेगा।

1251
01:29:34,640 --> 01:29:38,720
क्यों? आपको आकर्षित किया तो है निराकार रूप से। हम कहां

1252
01:29:38,720 --> 01:29:42,800
मना कर रहे हैं? गीता में उन्होंने यह कहा कठिन होता है। अव्यक्त

1253
01:29:42,800 --> 01:29:47,920
की पूजा करना कठिन होता है। पर यह तो नहीं कहा कि असंभव होता है।

1254
01:29:47,920 --> 01:29:52,080
है ना? आप बाउंड कर रहे हो। नहीं नहीं अवतार ले नहीं सकता। हम बाउंड नहीं कर रहे।

1255
01:29:52,080 --> 01:29:56,480
अवतार ले ही आकर्षित करेगा। नहीं निराकार ईश्वर भी आकर्षित

1256
01:29:56,480 --> 01:30:00,480
कर रहा है। कर करता है। हो रहे हैं लोग आकर्षित। जिनकी चेतना

1257
01:30:00,480 --> 01:30:04,640
का स्तर और बहुत आगे है वो आकर्षित हो जाते हैं सीधे।

1258
01:30:04,640 --> 01:30:08,880
मगर जो व्यक्ति सामान्य रूप से जन्म लेता है भैया उसके लिए तो सगुण साकारी पहला रास्ता

1259
01:30:08,880 --> 01:30:13,200
है। आगे बढ़ने का तो आप उसको

1260
01:30:13,200 --> 01:30:17,440
बाधा लगा रहे हैं ना कि अवतार नहीं लेगा। हम तो तीनों रूपों में स्वीकार कर रहे हैं। निर्गुण

1261
01:30:17,440 --> 01:30:21,500
निराकार, सगुण निराकार और सगुण साकार। ठीक है?

1262
01:30:21,500 --> 01:30:25,040
[गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा अब आगे चलते

1263
01:30:25,040 --> 01:30:29,120
हैं। युधिष्ठिर मीमांसक जी से शास्त्रार्थ हुआ था इस बात पे कि विज्ञान

1264
01:30:29,120 --> 01:30:33,280
है कि नहीं? तो भाई आप अगर अपना मनमुखी कुछ भी अगर डाल दोगे कुछ भी चीजें

1265
01:30:33,280 --> 01:30:37,280
जोड़ दोगे जिससे कि उपास के पात्र बन जाएंगे लोग। हां

1266
01:30:37,280 --> 01:30:41,360
तो वहां पर तो कोई व्यक्ति अगर उसको मालूम होगा कि यहां पर आप गलत जोड़ रहे हो आगे चलकर के

1267
01:30:41,360 --> 01:30:45,440
हमें जो है पास का पात्र बनना पड़ेगा तो वो ऑब्जेक्शन करेंगे ना आपकी वैदिक रस्म

1268
01:30:45,440 --> 01:30:49,680
रश्मि थ्योरी का ऑब्जेक्शन कर तो रहे हैं आपके यहां के सन्यासी गण है जो आर्य

1269
01:30:49,680 --> 01:30:53,840
समाज के ही सन्यासी आपका विरोध कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं शास्त्रार्थ तक के लिए ललकार चुके

1270
01:30:53,840 --> 01:30:59,360
आप बहाने बाजी कर रहे हो कौन है वो

1271
01:30:59,360 --> 01:31:03,360
कोई है मुनि करके हैं उन्होंने शास्त्रार्थ के लिए ललकारा भाग रहे

1272
01:31:03,360 --> 01:31:07,360
हो वहां से वैदिक रश्मि थ्योरी को नहीं मान वो

1273
01:31:07,360 --> 01:31:12,880
तो जबरदस्ती जहां पर जो चीज नहीं है जहां झूठ का सहारा लिया जाएगा

1274
01:31:12,880 --> 01:31:17,360
हमें अपने वा सच्चे सिद्धांतों को स्थापित

1275
01:31:17,360 --> 01:31:21,360
करने के लिए झूठ की आवश्यकता है क्या कि जबरदस्ती जहां जहां पर जो

1276
01:31:21,360 --> 01:31:25,520
चीज नहीं है वहां भी जोड़ दो ऐसे ही दयानंद जी ने एक तोप जोड़ दी। किसी ने कहा

1277
01:31:25,520 --> 01:31:31,120
वेदों में तोप का फार्मूला है तो उन्होंने तोप जोड़ दी कहीं पर

1278
01:31:31,120 --> 01:31:35,520
ये तरीका है काम करने का। धर्म की रक्षा ऐसे होगी

1279
01:31:35,520 --> 01:31:40,320
जो चीज आवश्यकता दिखाई दे रही है उसको जबरदस्ती जोड़ते जाओ जबरदस्ती जोड़ते जाओ

1280
01:31:40,320 --> 01:31:44,320
वही वाली बात नेता जी नेता जी से पूछा गया बाढ़ का पानी जो है

1281
01:31:44,320 --> 01:31:48,400
खतरे के निशान तक आ गया है क्या करें बाढ़ से कैसे बचे तो

1282
01:31:48,400 --> 01:31:52,400
नेताजी ने कहा खतरे का निशान दो इंच और ऊपर बढ़ा दो लो हो गया

1283
01:31:52,400 --> 01:31:56,400
समाधान

1284
01:31:56,400 --> 01:32:00,400
धर्म [गला साफ़ करने की आवाज़] को बचाने के लिए धर्म को बदलते जाओ ये शाश्वत

1285
01:32:00,400 --> 01:32:04,400
धर्म नहीं है सनातन धर्म नहीं है यह परिवर्तित धर्म और

1286
01:32:04,400 --> 01:32:08,480
यह शैली इस्लाम की है, बाइबल की है। हमारी नहीं है।

1287
01:32:08,480 --> 01:32:14,480
जो किसी भी देश काल परिस्थिति में ना बदले उसका नाम ईश्वर।

1288
01:32:17,440 --> 01:32:21,520
ब्रह्मवरत पुराण यहां से इनका वो चालू हो गया। गाय को अग्न्या

1289
01:32:21,520 --> 01:32:27,520
कहा गया है। पांच मकार काट छाट। [गला साफ़ करने की आवाज़]

1290
01:32:27,680 --> 01:32:31,680
इन्होंने कहा कि भैया हमने तो जो है धर्म को बचाया है।

1291
01:32:31,680 --> 01:32:35,760
आपकी वह जो मनुस्मृति आपने उसमें ये सब डाल दिया है।

1292
01:32:35,760 --> 01:32:38,640
पांच मकार इत्यादि

1293
01:32:38,640 --> 01:32:42,720
और उसको हमने विशुद्ध बनाया। हमने धर्म को बचाया।

1294
01:32:42,720 --> 01:32:46,880
आपने कैसे बचाया वो मैं अभी बताता हूं थोड़ी देर। अच्छा इंद्र भी

1295
01:32:46,880 --> 01:32:51,200
खाते हैं मास इंद्र भी खाते हैं। इंद्र भी मनुष्य हैं। मैथुन

1296
01:32:51,200 --> 01:32:55,280
सृष्टि इंद्र की भी है ना तभी कह रहे हो कि भैया वो इंद्र

1297
01:32:55,280 --> 01:32:59,280
भी खाते हैं। उनके उनकी भी वैसा ही पाचन तंत्र होगा। प्रोटीन कार्ब और फैट

1298
01:32:59,280 --> 01:33:03,520
जाता होगा। न्यूट्रिशंस जो होते होंगे न्यूट्रिएंट्स जो होते होंगे डिवाइड

1299
01:33:03,520 --> 01:33:07,600
होते होंगे। फिर उनके मसल्स गेन होते होंगे।

1300
01:33:07,600 --> 01:33:11,600
माइटोकांड्रिया में जाके सब जलती होगी। एनर्जी प्रोवाइड होती होगी। ऐसे ही तो है

1301
01:33:11,600 --> 01:33:16,000
अंदर इत्यादि। तो इसलिए उनकी गतिविधियों को हमारे मनुष्यों की तरह सामान्य

1302
01:33:16,000 --> 01:33:22,000
गतिविधियों से आप जोड़ करके देखें।

1303
01:33:35,380 --> 01:33:39,760
[गला साफ़ करने की आवाज़] कृष्ण पाप करते हैं। जवाब दे चुका। शिवश केवल कुतर्क कर पाएगा। इसका आंसर

1304
01:33:39,760 --> 01:33:43,840
दे ही दिया। कुतर्क कौन कर रहा है? सबसे बड़ा तर्क क्या है इस

1305
01:33:43,840 --> 01:33:48,000
समय अगर जो भी आर्य अगर आर्य समाज इस समय इनके

1306
01:33:48,000 --> 01:33:52,080
पक्ष में खड़ा हुआ है अग्निवत जी के पक्ष में खड़ा हुआ है तो इसका अर्थ है कि आर्य समाज

1307
01:33:52,080 --> 01:33:56,400
के पास जो सबसे बड़ा लॉजिक है सबसे बड़ा जो तर्क है वो यह है

1308
01:33:56,400 --> 01:34:00,960
कि तुम कुतर्क कर रहे हो यह सार है उसका

1309
01:34:00,960 --> 01:34:05,600
तुम कुतर्क कर रहे हो यह लॉजिक है सबसे बड़ा

1310
01:34:05,600 --> 01:34:09,760
आर्य समाज का बाकी जो 17 18 सिद्धांत जो मैंने गिना ही दिए

1311
01:34:09,760 --> 01:34:14,000
हैं अच्छा अब बात आती है कि इन्हों इनका

1312
01:34:14,000 --> 01:34:18,240
दावा है इन्होंने बार-बार एक चैलेंज किया है कि आप जो

1313
01:34:18,240 --> 01:34:22,720
है उसकी वैज्ञानिकता सिद्ध कर दो सायण भाष्य की वैज्ञानिकता

1314
01:34:22,720 --> 01:34:26,960
सिद्ध कर दो सायण भाष्य की इन्होंने दावा किया हालांकि

1315
01:34:26,960 --> 01:34:30,960
इनकी वैज्ञानिकता कितनी है वह तो तब पता चले जब सामने आए और

1316
01:34:30,960 --> 01:34:34,960
इन्होंने यह भी कहा है कि मैंने जो भाष्य किया उसका मैं चैलेंज करता हूं। मैं

1317
01:34:34,960 --> 01:34:38,960
चैलेंज कर रहा हूं शंकर परंपरा के

1318
01:34:38,960 --> 01:34:43,040
सिद्धांतों को माने बिना नास्तिकता का खंडन

1319
01:34:43,040 --> 01:34:45,440
कर दो।

1320
01:34:45,440 --> 01:34:49,840
ईश्वर के बारे में जो अपनी अवधारणा है। बौद्धों से जब शास्त्रार्थ होगा,

1321
01:34:49,840 --> 01:34:50,480
बौद्धों से

1322
01:34:50,480 --> 01:34:54,640
जब टकराव होगा वैचारिक तो वहां उनसे ये कहोगे ना वेद से प्रमाण दिखाओ।

1323
01:34:54,640 --> 01:34:58,640
वेद से प्रमाण दिखाओ। यही कहोगे ना तब

1324
01:34:58,640 --> 01:35:02,640
वहां शंकर के सिद्धांत काम आएंगे। यह

1325
01:35:02,640 --> 01:35:07,680
ध्यान रखना धर्म का जो प्राथमिक

1326
01:35:07,680 --> 01:35:13,280
उद्देश्य है ना उसका परवसान मोक्ष में है। मोक्ष

1327
01:35:13,280 --> 01:35:18,000
सच्चिदानंद स्वरूप मोक्ष में है।

1328
01:35:18,000 --> 01:35:22,640
सबसे पहला कार्य है उसका मोक्ष।

1329
01:35:22,640 --> 01:35:27,040
और अगर मोक्ष नहीं है मोक्ष पे आप मोक्ष को आप गण करेंगे। धर्म का अस्तित्व

1330
01:35:27,040 --> 01:35:31,840
मिटा देंगे। तो मैं चैलेंज कर रहा हूं।

1331
01:35:31,840 --> 01:35:36,240
आप शंकर का विरोध करते हुए स्थापित कर दीजिए ईश्वर के अस्तित्व को उपास

1332
01:35:36,240 --> 01:35:40,240
के रूप में प्राप्तव्य के रूप में मनुष्य के एकमात्र प्राप्तव्य के रूप

1333
01:35:40,240 --> 01:35:44,320
में स्थापित कर सकते हैं। नहीं अरे ईश्वर तो

1334
01:35:44,320 --> 01:35:48,320
ईश्वर दूर की बात है। वो तो बाधित है ही है। आपका तो मोक्ष तक परम स्वतंत्र

1335
01:35:48,320 --> 01:35:52,640
नहीं है। कहां से स्थापित करेंगे? सच्चिदानंद है ही नहीं। मोक्ष वापस

1336
01:35:52,640 --> 01:35:58,640
आता है व्यक्ति परांत काल के बाद।

1337
01:35:59,280 --> 01:36:03,520
बिना शंकर के सिद्धांत को स्वीकार किए स्थापित कर दोगे

1338
01:36:03,520 --> 01:36:06,880
ईश्वर की सत्ता

1339
01:36:06,880 --> 01:36:11,360
कार्य है तो कारण होगा हां ठीक है तो क्या करे उसका व्यक्ति

1340
01:36:11,360 --> 01:36:15,840
जब तक उसको जीव के एकमात्र जीव

1341
01:36:15,840 --> 01:36:19,920
की चाह का वास्तविक विषय नहीं बनाओगे तब तक क्या करें कार्य का

1342
01:36:19,920 --> 01:36:24,320
कारण है ठीक है दुनिया में एलन मस्क है ठीक है हमें क्या मतलब भाई

1343
01:36:24,320 --> 01:36:28,320
जब तक उनके बीच में संबंध स्थापित नहीं करोगे तार्किकता

1344
01:36:28,320 --> 01:36:34,320
के साथ तब तक क्या उपयोगिता है उस ईश्वर की

1345
01:36:34,640 --> 01:36:38,640
उसको प्राप्तव्य के रूप में स्थापित करने की बारी जब आएगी तब आपको शंकर की

1346
01:36:38,640 --> 01:36:42,960
जरूरत पड़ेगी ध्यान रखना इसीलिए बार-बार

1347
01:36:42,960 --> 01:36:47,120
कहता हूं शंकराचार्य ने जो सिद्धांत का सुरक्षात्मक घेरा बनाया

1348
01:36:47,120 --> 01:36:51,440
हुआ है ना आस्तिकों के लिए उसके अंदर बैठ के अपने ही सुरक्षा

1349
01:36:51,440 --> 01:36:55,760
के घेरे को घाव मारते जाओ पंजों से जिस दिन बाहरी

1350
01:36:55,760 --> 01:36:59,920
आक्रमण होगा आस्तिकता के बाहर से उस दिन आखिरी चुनौती

1351
01:36:59,920 --> 01:37:04,000
उसको शंकराचार्य से मिलेगी और वह उसका अंत होगा। कोई नहीं चुप

1352
01:37:04,000 --> 01:37:09,600
करा सकता नास्तिकता को। ध्यान रखो कोई है ही नहीं।

1353
01:37:09,600 --> 01:37:13,600
एकमात्र शंकर का सिद्धांत चुप कराएगा वहां पर जाकर। तो इसलिए सब

1354
01:37:13,600 --> 01:37:19,040
चैलेंज वेंज देना बंद करो। बचपना किया करते हो।

1355
01:37:19,040 --> 01:37:23,920
चैलेंज दे रहा हूं। चैलेंज दे रहा हूं।

1356
01:37:23,920 --> 01:37:27,920
विवादित वातावरण खुद बनाएंगे अर्थ। अब यह क्या

1357
01:37:27,920 --> 01:37:32,240
कह रहे हैं? आप देखिए मेरे अर्थ कितने सुंदर है। इन्होंने पूरी 50 मिनट की वीडियो

1358
01:37:32,240 --> 01:37:36,400
मेरी परंपरा मेरी परंपरा मान लो। मेरी परंपरा मान लो प्लीज।

1359
01:37:36,400 --> 01:37:40,480
मैं बहुत सिंपैथी चाहता हूं आप लोगों की। मेरी परंपरा आर्ट्स परंपरा मान

1360
01:37:40,480 --> 01:37:44,720
लो। प्लीज पूरी 50 मिनट की वीडियो में उन्होंने यही

1361
01:37:44,720 --> 01:37:49,600
विलाप किया है। परंपरा बताऊंगा नहीं पर मान लो।

1362
01:37:49,600 --> 01:37:53,760
हवा में मान लो। खुद कह रहा हूं कि एक समय बीच

1363
01:37:53,760 --> 01:37:59,760
में है जहां आर्य समाज है ही नहीं। म मेरी परंपरा मान लो।

1364
01:38:04,720 --> 01:38:08,720
के तुम्हारी भी तो नहीं है तो हमसे वेद क्यों ले रहे हो? बोलो ना किसी और

1365
01:38:08,720 --> 01:38:12,880
से लिए। बताओ किससे लिए? हम का कह रहे हैं हमसे वेद लो।

1366
01:38:12,880 --> 01:38:17,600
हमारे वेदों को मानो। हम तो नहीं कह रहे।

1367
01:38:17,600 --> 01:38:21,600
आप खुद कह रहे हो हमसे वेद लिए तब हम पूछ रहे हैं। आप मत कहो ना कि हमसे

1368
01:38:21,600 --> 01:38:26,000
वेद लिए। आप बताओ कहां से लिए दूसरे से? किसी

1369
01:38:26,000 --> 01:38:30,000
और का इतिहास अस्तित्व है ही नहीं। जिस डाल पर

1370
01:38:30,000 --> 01:38:34,000
बैठे हो उसी को काट रहे हो। जो तुम्हारा शब्द प्रमाण

1371
01:38:34,000 --> 01:38:38,080
है शंकर परंपरा उसको काटते हो तुम लोग। जो तुम्हें जीत

1372
01:38:38,080 --> 01:38:43,120
दिलाएगा ना आखिरी उसको काटते हो तुम लोग। सनातन

1373
01:38:43,120 --> 01:38:47,120
की सबसे बड़ी शक्ति है शंकराचार्य परंपरा उसको काटते हो तुम

1374
01:38:47,120 --> 01:38:51,280
लोग दूर की दृष्टि नहीं देख पाते कि जब बाहरी

1375
01:38:51,280 --> 01:38:55,600
आक्रमण होगा तब कैसे लड़ेंगे जाकिर नायक भी अर्थ करेगा वेदों

1376
01:38:55,600 --> 01:39:01,440
का अपने अनुसार नहीं चुप करा पाओगे उसे हम कराएंगे चुप

1377
01:39:01,440 --> 01:39:04,960
तब काम आएगी परंपरा

1378
01:39:04,960 --> 01:39:09,120
कुछ सोचना है नहीं कुछ चिंतन है नहीं ना कोई तर्क है ना प्रमाण

1379
01:39:09,120 --> 01:39:11,920
है बस

1380
01:39:11,920 --> 01:39:16,800
सिंपैथी गेम खेलो, इमोशनल कार्ड खेलो और क्रिएट कर दो

1381
01:39:16,800 --> 01:39:20,160
एक वातावरण।

1382
01:39:20,160 --> 01:39:24,640
अब इनका तर्क क्या है कि भाई हमने बहुत अच्छा अर्थ किया है

1383
01:39:24,640 --> 01:39:29,680
इसलिए मेरा अर्थ प्रामाणिक है। मैंने बहुत अच्छा अर्थ किया है।

1384
01:39:29,680 --> 01:39:33,920
इसलिए मेरा अर्थ प्रामाणिक है। यानी अर्थ से

1385
01:39:33,920 --> 01:39:38,000
यह चेक होगा कि वह प्रामाणिक है कि नहीं। प्रामाणिकता से अर्थ की प्रामाणिकता

1386
01:39:38,000 --> 01:39:42,080
सिद्ध नहीं होगी। अर्थ से अर्थ की सुंदरता से यह सिद्ध होगा कि

1387
01:39:42,080 --> 01:39:46,240
वह प्रामाणिक है कि नहीं। अगर कल को कोई आपसे

1388
01:39:46,240 --> 01:39:50,640
और अच्छी उन्नत टेक्नोलॉजी को वेद मंत्रों से जोड़ देगा तो आप अप्रामाणिक

1389
01:39:50,640 --> 01:39:54,640
हो जाओगे और वो प्रामाणिक हो जाएगा। फिलहाल के लिए अगर मान लिया जाए कि आपने

1390
01:39:54,640 --> 01:39:59,200
बहुत ही उन्नत टेक्नोलॉजी को वेदों से जोड़ दिया। यह

1391
01:39:59,200 --> 01:40:02,640
आपकी तार्किकता है।

1392
01:40:02,640 --> 01:40:04,800
अच्छा

1393
01:40:04,800 --> 01:40:09,040
अर्थ प्रमाणिक है कि नहीं? इसके लिए मुझे जानना पड़ेगा कि ये अर्थ

1394
01:40:09,040 --> 01:40:13,280
जो है सुंदर है कि नहीं, उपयोगी है कि नहीं? इसका अर्थ क्या हुआ? इसका

1395
01:40:13,280 --> 01:40:17,280
अर्थ है कि मुझे क्या सही है, क्या गलत है? वो उस वेद मंत्र को जानने

1396
01:40:17,280 --> 01:40:21,680
से पहले तय कर लेना होगा। कहां से करूंगा?

1397
01:40:21,680 --> 01:40:25,760
अपने आप या इस्लाम से सीख के आऊंगा। क्या सही है, क्या गलत? वही वाली

1398
01:40:25,760 --> 01:40:29,760
बात स्कूल की प्रामाणिकता कैसे चेक होगी कि स्कूल पढ़ा क्या रहा

1399
01:40:29,760 --> 01:40:33,920
है उससे चेक होगी? अरे भैया पढ़ाने से अगर चेक करनी है तो इसका मतलब

1400
01:40:33,920 --> 01:40:35,280
मुझे मालूम होना चाहिए ना कि

1401
01:40:35,280 --> 01:40:40,000
क्या है पढ़ाई बेसलेस बात है।

1402
01:40:40,000 --> 01:40:44,160
अर्थ से प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। प्रामाणिकता से अर्थ

1403
01:40:44,160 --> 01:40:48,240
सिद्ध होता है।

1404
01:40:48,240 --> 01:40:52,560
आज के समय में गो का मतलब जाना लिखा हुआ है। जाओ

1405
01:40:52,560 --> 01:40:56,560
और कल को जो है आना अच्छा हो जाए स्थिति के कारण।

1406
01:40:56,560 --> 01:41:00,640
ये गो का मतलब है छोड़ो आना भी छोड़ दो। गो का

1407
01:41:00,640 --> 01:41:04,640
मतलब है भाई आप पानी ले जाओ। तो जब हम

1408
01:41:04,640 --> 01:41:08,720
कल के आने वाले समय में अगर यह पानी ले जाने की डिमांड जो है

1409
01:41:08,720 --> 01:41:12,800
बढ़ गई तो हम कहेंगे कि गो का मतलब जाना नहीं है। क्योंकि

1410
01:41:12,800 --> 01:41:16,800
गो क्योंकि पानी की आवश्यकता है तो पानी ले जाना जो है गो का

1411
01:41:16,800 --> 01:41:21,200
मतलब यह प्रमाणिक अर्थ है। वाह चाहे जो जोड़ दो

1412
01:41:21,200 --> 01:41:25,360
वही प्रामाणिक है जो सुंदर होगा। और सुंदर क्या है क्या नहीं

1413
01:41:25,360 --> 01:41:29,760
है यह हम खुद तय करेंगे। वेदों के विधा तय करेंगे।

1414
01:41:29,760 --> 01:41:33,920
यह तरीका है प्रामाणिकता जांचने का। मैं

1415
01:41:33,920 --> 01:41:38,080
कह रहा हूं यह जो है अग्निव्रत जी अभी कुछ

1416
01:41:38,080 --> 01:41:42,160
दिनों के लिए दो चार दिन के लिए गायब हो जाए। मैं कह रहा हूं मैं जो बातें बता रहा

1417
01:41:42,160 --> 01:41:46,240
हूं अग्निव्रत जी की बातें हैं। और मैं हर चीज को जोड़ दूंगा आपकी चीजों

1418
01:41:46,240 --> 01:41:50,240
से आपकी किताबों से मूर्ति पूजा को जोड़ दूंगा। शिव जी शिव मोहिनी के

1419
01:41:50,240 --> 01:41:50,740
जो जो

1420
01:41:50,560 --> 01:41:54,640
आप मना कर रहे हैं सब जोड़ दूंगा। फिर कैसे कहोगे कि ये

1421
01:41:54,640 --> 01:41:58,800
अप्रामाणिक है। कहोगे ना कि ये भैया उनसे पढ़ा नहीं लिखा नहीं। उनसे

1422
01:41:58,800 --> 01:42:03,600
कोई कनेक्शन नहीं। यही होती है परंपरा

1423
01:42:03,600 --> 01:42:07,760
और जो आपके लोग होंगे उनकी बात वहां पर प्रामाणिक माननी पड़ेगी क्योंकि वो

1424
01:42:07,760 --> 01:42:11,760
डायरेक्ट आपसे जुड़े हुए थे कि अग्निव्रत जी ने क्या कहा यह कौन

1425
01:42:11,760 --> 01:42:16,320
बताएगा? शिवांश नहीं बताएगा। यह बताएगा अग्निव्रत जी के जो सीधे-सीधे

1426
01:42:16,320 --> 01:42:20,400
शिष्य हैं वो बताएंगे। फिर उनके शिष्य बताएंगे उनके

1427
01:42:20,400 --> 01:42:24,400
ना होने की स्थिति में। और अगर ऐसे ही क्लेम करना है तो मैं भी कह रहा

1428
01:42:24,400 --> 01:42:28,560
हूं। मूर्ति पूजा कही है दयानंद जी ने। लो और जब किसी भी

1429
01:42:28,560 --> 01:42:32,800
चीज का कुछ भी अर्थ जोड़ा जा सकता है तो मैं आपकी चीजों में जोड़ दूंगा ले आओ सत्यार्थ प्रकाश

1430
01:42:32,800 --> 01:42:37,120
निकाल दूंगा मूर्ति पूजा ईश्वर शक्ति रूपी हाथ से सृष्टि बनाता

1431
01:42:37,120 --> 01:42:42,080
है कार्य करता है लो शक्ति रूपी हाथ

1432
01:42:42,080 --> 01:42:46,240
ईश्वर के हाथ आ गए शक्ति के रूप में लो हो गई मूर्ति पूजा

1433
01:42:46,240 --> 01:42:50,480
चालू हाथों की ठीक है

1434
01:42:50,480 --> 01:42:54,800
ऐसे ही जोड़ दूंगा फिर आप मुझे कैसे क्लेम करेंगे कि मैं जो है

1435
01:42:54,800 --> 01:42:59,440
दयानंद जी का सही अर्थ नहीं बता रहा हूं। कैसे क्लेम करेंगे?

1436
01:42:59,440 --> 01:43:03,440
इस बात से क्लेम करेंगे कि इसका अर्थ श्रेष्ठ नहीं

1437
01:43:03,440 --> 01:43:05,680
है, सुंदर नहीं है। तो यह सुंदरता

1438
01:43:05,680 --> 01:43:08,400
चेक कौन करेगा?

1439
01:43:08,400 --> 01:43:12,400
जहां आप खड़े हो वहां मैं खड़ा हूं। वहां देखना होगा कि क्या मैं

1440
01:43:12,400 --> 01:43:16,560
उनसे प्रामाणिक रूप से जुड़ा हुआ था कि नहीं जुड़ा हुआ था। जो जुड़ा हुआ होगा

1441
01:43:16,560 --> 01:43:20,640
उनसे। हालांकि उन्होंने तो परंपरा को कैंसिल कर रखा है। तो वहां पर तो यह

1442
01:43:20,640 --> 01:43:24,800
हो ही नहीं सकता। कोई भी उठ के कह सकता है कि मैं दयानंद जी की ओर से खड़ा हूं। कोई भी

1443
01:43:24,800 --> 01:43:30,800
और जिस दिन ऐसा हुआ उस दिन आपको पता चलेगा परंपरा कहते किसे।

1444
01:43:30,880 --> 01:43:36,560
कोई नहीं करेगा तो एक ना एक दिन मैं जरूर करने वाला हूं। तब आप लोगों के होश ठिकाने आएंगे।

1445
01:43:36,560 --> 01:43:40,560
दयानंद जी के नाम से ही मैं कहूंगा कि मूर्ति पूजा आप सिद्ध नहीं कर पाओगे बिना परंपरा

1446
01:43:40,560 --> 01:43:44,640
को माने। वहां आपको कहीं ना कहीं लाना पड़ेगा कि भैया यह व्यक्ति हमसे जुड़ा हुआ नहीं है।

1447
01:43:44,640 --> 01:43:48,640
यही तो मैं कह रहा हूं कि आप डायरेक्ट उन लोगों से जुड़े हुए नहीं है जहां

1448
01:43:48,640 --> 01:43:52,720
से वेद आ रहे हैं। बीच में हम है। हमको झुठला करके आप उनका क्लेम नहीं

1449
01:43:52,720 --> 01:43:56,240
कर सकते।

1450
01:43:56,240 --> 01:44:00,400
कुछ लोग हैं कहते हैं मैं आर्य समाज से नहीं जुड़ा। मैं तो दयानंद जी को मानता हूं। दयानंद जी की किताबें

1451
01:44:00,400 --> 01:44:04,480
कहां से आई? आर्य समाज से आई। आर्य समाज को बिना माने कोई दयानंद जी तक

1452
01:44:04,480 --> 01:44:08,080
कैसे पहुंच रहा है?

1453
01:44:08,080 --> 01:44:13,200
इतनी बुद्धि उनमें नहीं है।

1454
01:44:13,200 --> 01:44:17,680
ठीक है। [गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़]

1455
01:44:17,680 --> 01:44:21,680
फिर इन्होंने फिर बुराइयां चालू की है। यजुर्वेद में 231 19 में जो घोड़े

1456
01:44:21,680 --> 01:44:25,760
के द्वारा महिला को गर्भवती इत्यादि अश्लील नंगा नाच ऐत ब्राह्मण में

1457
01:44:25,760 --> 01:44:29,840
ये बिन ब्याही और ये वो गाय काटना ये वो

1458
01:44:29,840 --> 01:44:33,920
ये सब बता रहे हैं। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा

1459
01:44:33,920 --> 01:44:38,240
फिर इन्होंने वह शूद्र वाला मामला भी कर लूं। इन्होंने

1460
01:44:38,240 --> 01:44:42,320
एक बात कही है कि ब्राह्मण को दंड कम देते थे और शूद्र को ज्यादा देते थे।

1461
01:44:42,320 --> 01:44:46,320
यह आपकी गलतफहमी है। जिस श्लोक के आधार पर आपने अपना महिमागान

1462
01:44:46,320 --> 01:44:50,320
किया उस श्लोक को हमने नकारा नहीं है। जो अपराध करने

1463
01:44:50,320 --> 01:44:54,560
पर शूद्र को कम दंडे हैं, कम दंड है, वही

1464
01:44:54,560 --> 01:44:58,640
अपराध करने पर ब्राह्मण को ज्यादा दंड है। मदिरापान करने पर शूद्र

1465
01:44:58,640 --> 01:45:02,640
को दंड नहीं है। मदिरापान करने पर ब्राह्मण को दंड है कि वह जो है

1466
01:45:02,640 --> 01:45:06,720
जलती हुई सलाख का आलिंगन कर ले। कब तक? जब तक मर ना जाए। यह है

1467
01:45:06,720 --> 01:45:09,840
प्रायश्चित।

1468
01:45:09,840 --> 01:45:14,400
शूद्र के लिए नहीं कहा गया है। कि उसको जो है

1469
01:45:14,400 --> 01:45:18,480
धन केवल इतना अर्जित करना है कि अपना रोटी कपड़ा

1470
01:45:18,480 --> 01:45:23,280
और मकान चल सके। प्राण रक्षा के निमित्त केवल धनार्जन करना है। प्राण रक्षा

1471
01:45:23,280 --> 01:45:27,760
धन जोड़ना नहीं है क्योंकि जोड़ेंगे तो तामस प्रवृत्ति आएगी और उसको जो है

1472
01:45:27,760 --> 01:45:33,760
जो जो सात्विक ज्ञान है उसको धारण करना है। तो इसलिए

1473
01:45:33,760 --> 01:45:38,720
आवश्यकता से अधिक धन का संग्रह नहीं कर सकता। यह शूद्र के लिए नहीं कहा है।

1474
01:45:38,720 --> 01:45:42,720
कोई व्यक्ति उसका पालन ना करे वो बात अलग है। मगर हमने सिद्धांत कौन

1475
01:45:42,720 --> 01:45:48,720
से स्वीकार कर रखे हैं वो सुन लो। आपके यहां भी ये नहीं स्वीकार रहे होंगे ये वाले सिद्धांत।

1476
01:45:50,400 --> 01:45:52,880
और सुनो

1477
01:45:52,880 --> 01:45:57,200
ब्राह्मण को सदैव अपमान का भूखा

1478
01:45:57,200 --> 01:46:01,280
होना चाहिए। अपमान जो है उसके लिए अमृत के समान है। सम्मान उसके

1479
01:46:01,280 --> 01:46:05,280
लिए विष के समान है। क्यों? क्योंकि भिक्षा पर उसको

1480
01:46:05,280 --> 01:46:10,000
जीवित रहना है। भिक्षा पर वेतन नहीं ले सकता। व्यापार नहीं कर सकता।

1481
01:46:10,000 --> 01:46:14,400
पतित हो जाएगा। धारण नहीं कर पाएगा ज्ञान।

1482
01:46:14,400 --> 01:46:18,400
इसलिए जो भिक्षा में मिला है उस पर जीवित रहना है। और योगेश भारद्वाज जी कह रहे

1483
01:46:18,400 --> 01:46:24,400
हैं कि मैं मजाक उड़ा रहा हूं। यह मजाक उड़ा रहा हूं मैं। मुझे गर्व है

1484
01:46:24,800 --> 01:46:27,600
इस बात पर।

1485
01:46:27,600 --> 01:46:33,600
यह मजाक नहीं है ब्राह्मणों का।

1486
01:46:36,000 --> 01:46:40,000
यह सब सिद्धांत हमने स्वीकार किए हुए हैं। शूद्र क्या वो लिख

1487
01:46:40,000 --> 01:46:44,080
रखा है उन्होंने वो नारी नरक का द्वार है। अरे क्या

1488
01:46:44,080 --> 01:46:48,080
छोटे बच्चे हो गए हो क्या? नई बातें कर रहे हो। अवतारवाद से बचने

1489
01:46:48,080 --> 01:46:51,840
के लिए कहां-कहां तक भागोगे?

1490
01:46:51,840 --> 01:46:55,840
अवतार ईश्वर के अवतार से इतना भय है। नारी नरक का द्वार ले आए।

1491
01:46:55,840 --> 01:47:01,200
अब और कुछ मिला नहीं तुम्हें।

1492
01:47:01,200 --> 01:47:05,200
आप नैष्ठिक है, ब्रह्मचारी मुझे नहीं पता। एक सन्यासी

1493
01:47:05,200 --> 01:47:09,200
के लिए नारी को भोग की दृष्टि से देखना क्या है?

1494
01:47:09,200 --> 01:47:15,200
वो बात वो वहां कह रहे हैं।

1495
01:47:16,800 --> 01:47:20,960
यही तो करना था। बात यही है। कभी भी निष्कर्ष निकालना

1496
01:47:20,960 --> 01:47:25,040
ही नहीं है। ऐसे करके चर्चा को ऐसा मटियामेट कर दो कि

1497
01:47:25,040 --> 01:47:30,240
निष्कर्ष निकले ही नहीं। वाह वाह वाह वाह करते रहो।

1498
01:47:30,240 --> 01:47:35,040
यही तो होना था। अभी और होगा। अभी मैं लाया हूं आपके लिए सामग्री बढ़िया वाली।

1499
01:47:35,040 --> 01:47:39,040
तो अच्छा स्त्री जो है वो स्त्रियों को गायत्री मंत्र नहीं पढ़ने

1500
01:47:39,040 --> 01:47:43,040
देते। आप बड़ा पूछते हो कि आवश्यकता क्या है? आवश्यकता क्या

1501
01:47:43,040 --> 01:47:47,040
है? अब मैं पूछ रहा हूं आवश्यकता क्या है? भाई

1502
01:47:47,040 --> 01:47:52,160
स्त्रियों जो गायत्री मंत्र पढ़ने का परवसान है वो मोक्ष में है ना।

1503
01:47:52,160 --> 01:47:57,280
तो जब मोक्ष उनको राम राम से मिल रहा है तो गायत्री मंत्र ही आवश्यक क्यों है?

1504
01:47:57,280 --> 01:48:02,880
क्योंकि इसके आधार पर आप कन्वर्ट करोगे उन्हें।

1505
01:48:02,880 --> 01:48:06,880
अच्छा स्त्री स्त्री मांग भरती है पुरुष पुरुष क्यों नहीं भरता है भाई?

1506
01:48:06,880 --> 01:48:10,880
आप भरते हो मांग। आप भी मांग भरवाते हो अपने। आपके यहां जो

1507
01:48:10,880 --> 01:48:16,880
विवाहित पुरुष होंगे वो मांग भरते हैं। इक्वल कर दो सबको।

1508
01:48:19,680 --> 01:48:23,840
मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग अलग हैं।

1509
01:48:23,840 --> 01:48:27,840
उनकी दहिक संरचना के अकॉर्डिंगली मोक्ष

1510
01:48:27,840 --> 01:48:32,000
से वंचित कोई नहीं है। ना ब्राह्मण ना वैश्य ना शूद्र ना क्षत्रिय ना

1511
01:48:32,000 --> 01:48:36,080
स्त्री सबके लिए मोक्ष अवेलेबल है। बस उनकी दह

1512
01:48:36,080 --> 01:48:40,160
जो उनको जन्म मिला है उस उस के अनुसार जन्म के अनुसार जो उनका

1513
01:48:40,160 --> 01:48:46,160
अधिकार है उनकी सीमा में उनको विधि प्राप्त है। उसका आलंबन लीजिए।

1514
01:48:47,600 --> 01:48:51,760
एक पतित ब्राह्मण से [गला साफ़ करने की आवाज़] कहीं उच्चतम गति

1515
01:48:51,760 --> 01:48:56,080
प्राप्त करेगा स्वधर्म निष्ठ शूद्र ये कहा गया है आपको तो शूद्र

1516
01:48:56,080 --> 01:49:01,440
के अस्तित्व से नफरत है क्या बात करते हो आपके

1517
01:49:01,440 --> 01:49:05,520
यहां पर कितने शूद्र बनाए आपने जो जाता है समाज में वो ब्राह्मण

1518
01:49:05,520 --> 01:49:10,000
हो जाता है ना क्षत्रिय ना वैश्य सब आचार्य बने डोल रहे हैं

1519
01:49:10,000 --> 01:49:14,000
सब आचार्य बने डोल रहे हैं कोई कोई है ही नहीं ना शूद्र ना क्षत्रिय ना

1520
01:49:14,000 --> 01:49:18,000
वैश्य

1521
01:49:18,000 --> 01:49:22,160
शद्र से नफरत है आपको। आप कह शद मूर्ख होता है, अनार्य होता है। आर्य

1522
01:49:22,160 --> 01:49:26,240
समाज में जगह ही नहीं शूद्र के लिए। आप कहते हो कि हम लोग उनके

1523
01:49:26,240 --> 01:49:30,240
साथ भेदभाव कर रहे हैं।

1524
01:49:30,240 --> 01:49:34,400
स्त्रियां इतनी हुई है। भैया कबूतर भी उसमें वेद मंत्र का दृष्टा

1525
01:49:34,400 --> 01:49:38,560
बना है। तो कबूतरों का भी जनेऊ करवा दो। वो

1526
01:49:38,560 --> 01:49:42,800
शर्मा नाम की एक शर्मा सूक्त है उसमें वो स्वान

1527
01:49:42,800 --> 01:49:48,800
है मादा स्न वो भी मंत्र की दृष्टा है उसको भी जनेऊ कराने लगो

1528
01:49:50,800 --> 01:49:56,240
सांड को भी ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी कहा गया है उसमें

1529
01:49:56,240 --> 01:50:00,400
बैल को ब्रह्मचारी कहा गया है उसमें वेदों में

1530
01:50:00,400 --> 01:50:04,720
उनका भी जनेऊ कराने लगो ब्रह्मचारी शब्द आ गया भाई इसीलिए

1531
01:50:04,720 --> 01:50:08,720
कहते हैं ना कि परंपरा प्राप्त आप भी कई जगह जाकर के

1532
01:50:08,720 --> 01:50:13,120
जहां पर साफ साफ कुछ और दिखाई दे रहा होता है वहां अपना भाव लगाते हो ना

1533
01:50:13,120 --> 01:50:17,280
तो भाव जब लग ही रहा है तो किसका भाव लगेगा जब

1534
01:50:17,280 --> 01:50:21,280
स्पष्ट दिखाई दे रहा है उससे भिन्न कुछ अर्थ लेना है तो जरा

1535
01:50:21,280 --> 01:50:25,440
सोच के देखिए कि भाव अगर लगाना है उसमें तो किसका भाव प्रामाणिक

1536
01:50:25,440 --> 01:50:29,600
माना जाएगा भाई जिसने वो चीजें आपको दी है उसका ना कम से कम उसका

1537
01:50:29,600 --> 01:50:33,840
नकार के तो अपना नहीं लगा पाओगे ना

1538
01:50:33,840 --> 01:50:39,840
तीन बेर खाती थी वह तीन बेर खाती है बेर शब्द दो बार आ गया।

1539
01:50:40,240 --> 01:50:44,480
अब इसमें से जिस व्यक्ति ने यह लिखा है वह बताएगा ना भैया कि मैंने बेर

1540
01:50:44,480 --> 01:50:45,360
शब्द का मतलब क्या

1541
01:50:45,360 --> 01:50:49,520
कहा है? आप अपने मन से कर लोगे। एक बार कहा है

1542
01:50:49,520 --> 01:50:53,520
थ्री टाइम्स इन ए डे वो खाना खाती थी। दूसरी

1543
01:50:53,520 --> 01:50:57,920
दूसरी बार कहा है कि दिन भर में वो मात्र तीन बेर खाती है।

1544
01:50:57,920 --> 01:51:02,160
फल छोटे-छोटे बेर एक रानी की दुर्दशा

1545
01:51:02,160 --> 01:51:06,320
बताई जा रही है। पहले वो ऐसे रहती थी। दिन में तीन बार भोजन करती थी

1546
01:51:06,320 --> 01:51:11,120
और आज उसको दिन भर में सिर्फ तीन बेर प्राप्त होते हैं।

1547
01:51:11,120 --> 01:51:15,120
तो जब इस प्रकार से हमें अर्थ निकालना पड़ेगा तो

1548
01:51:15,120 --> 01:51:19,760
हमें प्रामाणिक रीति से उसको जानने वाला बनना पड़ेगा। यह नहीं

1549
01:51:19,760 --> 01:51:24,800
कि उस समय की उपयोगिता हमने देखी जो अर्थ अच्छा लग रहा है वही इसका अर्थ है।

1550
01:51:24,800 --> 01:51:28,960
ऐसे नहीं हो सकता ना कि जो आपको अच्छा लग रहा है वही इसका अर्थ है। इसका मतलब कि

1551
01:51:28,960 --> 01:51:33,200
आपका अच्छे और बुरे का चुनाव पहले है। उसके बाद धर्म है।

1552
01:51:33,200 --> 01:51:37,280
धर्म से पहले ही आपको धर्म का बोध है। कुछ समझ में आ रहा है जो

1553
01:51:37,280 --> 01:51:39,920
कह रहा हूं।

1554
01:51:39,920 --> 01:51:42,720
अच्छा फिर आगे

1555
01:51:42,720 --> 01:51:47,120
कुरान बाइबल से मिलान कर दिया। गायत्री मंत्र का अधिकार नहीं है। अश्वमेध यज्ञ।

1556
01:51:47,120 --> 01:51:52,400
अच्छा हां एक बात और कही है वो अश्वमेद यज्ञ के लिए जो है

1557
01:51:52,400 --> 01:51:56,720
वहां पर जो है वैश्याओं का वर्णन आया रामायण तो क्या नास्तिक नहीं होते

1558
01:51:56,720 --> 01:52:00,400
थे? जब राम जी को लेने जाते हैं

1559
01:52:00,400 --> 01:52:04,400
तो भरत जी होते हैं। वशिष्ठ जी होते हैं। साथ में एक और

1560
01:52:04,400 --> 01:52:08,560
थे राज परिवार से। वो नास्तिक थे। वहां पर

1561
01:52:08,560 --> 01:52:13,440
श्री रामचंद्र जी उनका खंडन करते हैं। किसी

1562
01:52:13,440 --> 01:52:18,000
घटना का घटित होना प्रमाण नहीं होता है। घटना को

1563
01:52:18,000 --> 01:52:22,000
धर्म के रूप में स्वीकार किया जाना प्रमाण होता है। महाभारत में लिखा है

1564
01:52:22,000 --> 01:52:26,880
घटनाएं तो है ही है। भरी पड़ी है घटनाएं।

1565
01:52:26,880 --> 01:52:30,960
शास्त्रों में तो सभी घटनाएं वो अनुकरणीय हो

1566
01:52:30,960 --> 01:52:34,960
गई। क्या रावण ने सीता का हरण किया। हमारे शास्त्र में ये घटना है

1567
01:52:34,960 --> 01:52:39,120
तो हम उसका अनुकरण करने लगे। नहीं रावण का अनुकरण करने

1568
01:52:39,120 --> 01:52:43,520
योग्य नहीं कहा गया तो जितना जो अनुकरण योग्य घटनाएं कही जाएंगी उनका अनुकरण

1569
01:52:43,520 --> 01:52:49,520
किया जाएगा। इसीलिए रामो विग्रह धर्म

1570
01:52:50,400 --> 01:52:56,400
इतने तह तक कभी सोचा ही नहीं तो क्या करें? सत ही स्तर पर घूमते रहे।

1571
01:52:59,840 --> 01:53:04,080
कह रहे हैं स्त्री का वक्ष स्थल देखना पाप नहीं था। किसने कहा पाप नहीं था? बोला

1572
01:53:04,080 --> 01:53:08,160
तो है उन्होंने। पाप था। इन्होंने एक प्रश्न

1573
01:53:08,160 --> 01:53:12,240
उठाया अपनी वीडियो में कि मैंने जब गुरुदेव से शंकराचार्य

1574
01:53:12,240 --> 01:53:16,240
जी से एक मैंने प्रश्न किया था वह वीडियो डला हुआ है चैनल पर तो उसमें

1575
01:53:16,240 --> 01:53:22,240
मैंने पूछा था कि भाई जब रावण आता है उनको सीता मैया को

1576
01:53:22,800 --> 01:53:26,800
हरण करने के लिए तो वहां पर वो जो है स्पष्ट रूप से जो

1577
01:53:26,800 --> 01:53:30,800
है व ऐसे शब्द उन अंगों के बारे में भी स्पष्ट रूप

1578
01:53:30,800 --> 01:53:35,120
से बात करता है जो हमारे लिए आपत्तिजनक

1579
01:53:35,120 --> 01:53:38,000
है सुनने

1580
01:53:38,000 --> 01:53:42,800
तो वहां मैंने प्रश्न किया कि उन्होंने ऑब्जेक्शन क्यों नहीं किया सीता मैया?

1581
01:53:42,800 --> 01:53:47,120
तो सीता मैया के मन में तो बहुत सारे विचार उस समय चल रहे हैं। रावण आया हुआ है। साधु

1582
01:53:47,120 --> 01:53:51,360
के बेस में है। जब तक वो कोई निर्णय ले पाए ऐसी स्थिति है। कोई पुरुष

1583
01:53:51,360 --> 01:53:55,440
नहीं है घर का। वो किस तरह से रिएक्ट करें, कोई श्राप ना दे दे, कोई यह

1584
01:53:55,440 --> 01:53:59,600
ना कर दे। बहुत सारी चीजें हैं। और वहां पर गुरुदेव

1585
01:53:59,600 --> 01:54:03,600
ने एक बहुत सुंदर उत्तर प्रस्तुत किया

1586
01:54:03,600 --> 01:54:06,320
था।

1587
01:54:06,320 --> 01:54:10,400
मैंने प्रश्न किया था कि श्री रामचंद्र जी ने जब वह अपनी व्यथा

1588
01:54:10,400 --> 01:54:14,640
सुना रहे हैं तो व्यथा सुनाते सुनाते जो लक्ष्मण

1589
01:54:14,640 --> 01:54:18,720
जी हैं उनको भी वो उन अंगों का नाम ले देते हैं। उनसे

1590
01:54:18,720 --> 01:54:22,720
वार्ता करते समय लक्ष्मण जी से वार्ता करते समय उन अंगों का नाम ले लेते

1591
01:54:22,720 --> 01:54:26,880
जो हमारे लिए आपत्तिजनक होता है। परंतु उनकी उस समय स्थिति क्या थी और

1592
01:54:26,880 --> 01:54:31,040
लक्ष्मण जी कौन थे? जो सदैव अपनी भाभी मां के चरण

1593
01:54:31,040 --> 01:54:35,120
देखते थे। आपकी तरह थोड़ी ना जहां नियो करा दिया जाता है। देवर के साथ

1594
01:54:35,120 --> 01:54:39,600
हमारे यहां तो पाप माना गया है नियोग कराना देवर

1595
01:54:39,600 --> 01:54:45,280
के साथ अपराधी कहा गया है

1596
01:54:45,280 --> 01:54:49,520
तो आपके यहां तो आपत्तिजनक है ही नहीं हमारे

1597
01:54:49,520 --> 01:54:53,680
यहां आपत्तिजनक है तो तो किसको उन्होंने ये बातें कही थी एक एक

1598
01:54:53,680 --> 01:54:57,920
चिकित्सक को यदि हम वहां पर अपने रोग

1599
01:54:57,920 --> 01:55:02,640
के निवारण के लिए अगर कोई बात कर रहे होते हो तो वहां पर क्या उसको पाप में गिना जाएगा

1600
01:55:02,640 --> 01:55:06,800
शारीरिक संरचना के बारे में बात हो रही होगी जब उसको पाप में गिना जाएगा

1601
01:55:06,800 --> 01:55:10,960
तो देखना पड़ता है कि मंतव्य क्या है सामने वाले का

1602
01:55:10,960 --> 01:55:15,680
तो यदि लक्ष्मण जी उनमें अपनी मां देखते हैं तो उनसे आपत्ति नहीं है

1603
01:55:15,680 --> 01:55:20,000
बात करने में उस विषय में जब सीता माता का हरण

1604
01:55:20,000 --> 01:55:24,400
हो गया उनका अपहरण हो गया है वो गायब हो गई है

1605
01:55:24,400 --> 01:55:28,800
ऐसी स्थिति में आपातकालीन स्थिति में उस समय जब लक्ष्मण

1606
01:55:28,800 --> 01:55:33,440
जी उनको अपनी मां के रूप में देखते हैं तब वहां पर कैसी आपत्ति

1607
01:55:33,440 --> 01:55:37,520
और आप आपने अपना अलग ही अर्थ निकाल लिया। आपने

1608
01:55:37,520 --> 01:55:41,600
वहां लगा लिया कि भैया वह जो है कहते हैं कि आपने

1609
01:55:41,600 --> 01:55:45,840
क्या कहा कि वक्त स्थल देखना पाप नहीं है। किसने कहा आपसे?

1610
01:55:45,840 --> 01:55:50,000
मतलब जो अभी बैठे हुए हैं। चलो ऋषियों को छोड़ दो। वो सामने उपस्थित

1611
01:55:50,000 --> 01:55:54,080
नहीं है। मैं बैठा हुआ हूं सामने। गुरुदेव इस समय विराजमान है। हमारी

1612
01:55:54,080 --> 01:55:58,720
बातों का भी मतलब अपने अनुसार निकाल करके फिर उसका खंडन करोगे।

1613
01:55:58,720 --> 01:56:00,720
इसको पता नहीं कौन सी कहते हैं।

1614
01:56:00,720 --> 01:56:04,720
फैलेसी कहते हैं। स्ट्रांग मैन आर्गुममेंट आर्गुममेंट पता नहीं

1615
01:56:04,720 --> 01:56:08,800
क्या कहते हैं। ऐसे करके कुछ है कि सामने वाले जो सोच रहा

1616
01:56:08,800 --> 01:56:12,800
है जो कह रहा है उसको एज इट इज ना लेना उसको अपने हिसाब

1617
01:56:12,800 --> 01:56:16,960
से मैनपुलेटिव तरीके से ले लेना। फिर इस बदले हुई

1618
01:56:16,960 --> 01:56:21,040
चीज का खंडन करना। वो आप कर रहे हो। ठीक

1619
01:56:21,040 --> 01:56:25,760
है। अच्छा

1620
01:56:25,760 --> 01:56:30,240
अब जो है इन्होंने एक बात कही कि आप भी खाते होंगे पीते होंगे। ये

1621
01:56:30,240 --> 01:56:34,720
झूठी परंपरा है काटने खाने वाली है। चिकन मटन आप देवताओं को खिलाते हो।

1622
01:56:34,720 --> 01:56:38,880
आप फिर अब बाद में कह रहे हैं आप नहीं खाते होंगे। पहले कह रहे हैं आप भी खाते

1623
01:56:38,880 --> 01:56:42,880
होंगे। 26 टुकड़े करता है। यह करता है वो करता है। फिर बाद में कह रहे नहीं भी

1624
01:56:42,880 --> 01:56:46,960
खाते होंगे। फिर पापों का भंडार तब भी और इतना

1625
01:56:46,960 --> 01:56:51,120
सब बता दिया। फिर भी बहस करते हैं। मेरे भाष पढ़ लेना, माता बच्ची

1626
01:56:51,120 --> 01:56:55,520
सब बहुत सारी कुल मिलाकर के प्रामाणिकता के विषय में कुछ नहीं है। इनकी जो सिंपैथी

1627
01:56:55,520 --> 01:56:59,840
गेम है वही मैंने बताया सिंपैथी गेम है। अरे वो तुमको मंत्र

1628
01:56:59,840 --> 01:57:04,160
नहीं पढ़ने देते। इमोशनल कार्ड भड़काऊ भाषण

1629
01:57:04,160 --> 01:57:08,640
और फिर ज्यादा दिक्कत हो जाएगी तो क्रांति की बातें और ज्यादा दिक्कत हो जाएगी तो मिलों

1630
01:57:08,640 --> 01:57:12,800
की बुराइयां। इस पर अस्तित्व खड़ा हुआ है। क्योंकि अपना ईश्वर तो ऐसा है कि उसकी

1631
01:57:12,800 --> 01:57:15,920
कितनी महिमा गान कर लो। उससे उसके प्रति व्यक्ति आपके

1632
01:57:15,920 --> 01:57:21,920
पास तो आने ही नहीं वाला जुड़ने के लिए।

1633
01:57:22,960 --> 01:57:28,720
फिर आखिर में इन्होंने जो है एक बात कही कि

1634
01:57:28,720 --> 01:57:32,720
हिंदू समाज दलित को स्त्री को दबाते रहे। वो सब ये सब इन्होंने

1635
01:57:32,720 --> 01:57:36,720
कहा। अच्छा दलित को दबाते रहे। तो अभी मैंने वो बता ही दिया। शूद्र के लिए

1636
01:57:36,720 --> 01:57:40,720
आपके क्या विचार है? किस तरह से आप शूद्र को जोड़ रहे हो। अब कुल

1637
01:57:40,720 --> 01:57:44,800
मिलाकर के अब बात आ जाती है [गला साफ़ करने की आवाज़] तीन जवाब

1638
01:57:44,800 --> 01:57:49,120
पहला जवाब है गाय के विषय में तो गाय के विषय में वेदार्थ पारिजात

1639
01:57:49,120 --> 01:57:53,280
में करपात्री जी ने क्या लिखा है वह आप सब लोगों के लिए श्रवण करने योग्य

1640
01:57:53,280 --> 01:57:59,280
है। मैं पढ़ के सुना देता हूं।

1641
01:57:59,980 --> 01:58:05,980
[गला साफ़ करने की आवाज़]

1642
01:58:07,600 --> 01:58:13,600
गोमेद वाला ही मामला है ना? एक

1643
01:58:33,360 --> 01:58:39,360
जी

1644
01:58:45,840 --> 01:58:49,920
थोड़ा सा अंश मैं आपको सुना देता हूं [गला साफ़ करने की आवाज़]

1645
01:58:49,920 --> 01:58:54,240
कि शंकर परंपरा का गोमेद यज्ञ नाम से जो बात प्रचलित हो रही है

1646
01:58:54,240 --> 01:58:58,480
उसमें क्या निर्णय है? कुछ लोग यह जिज्ञासा करते हैं वेदार्थ

1647
01:58:58,480 --> 01:59:02,640
पारिजात से पढ़ रहा हूं कि यद्यपि

1648
01:59:02,640 --> 01:59:07,040
कुछ श्रुतियों के अनुसार सभी प्राणी अवध्य बताए गए हैं। तथापि

1649
01:59:07,040 --> 01:59:11,040
यज्ञ में विधित पशुओं का तो वध किया ही जाता है। उसी तरह गोमेध यज्ञ

1650
01:59:11,040 --> 01:59:15,040
में गोव गो वध को भी मान लेना चाहिए। किंतु

1651
01:59:15,040 --> 01:59:19,200
उक्त जिज्ञासा का समाधान यह है कि अन्य प्राणियों

1652
01:59:19,200 --> 01:59:23,520
की अपेक्षा गौ की यह विशेषता है कि उसे अग्न

1653
01:59:23,520 --> 01:59:27,200
कहा गया कहा गया है।

1654
01:59:27,200 --> 01:59:31,200
अन्य पशुओं से यह जो शब्द है अन्य पशुओं को

1655
01:59:31,200 --> 01:59:35,760
इस शब्द से संबोधित नहीं किया गया। यदि यह कहा जाए कि अश्वमेध के सहचर्य

1656
01:59:35,760 --> 01:59:39,760
से अश्व के समान गो का भी गोमेद

1657
01:59:39,760 --> 01:59:43,840
में वध क्यों ना हो किंतु ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि वैसा

1658
01:59:43,840 --> 01:59:47,840
कहने पर सर्वमेद यज्ञ में सभी को वध समझना होगा।

1659
01:59:47,840 --> 01:59:51,920
सर्वमेद यज्ञ भी होता है। तो उसमें सबका वध मान लिया जाए क्या? यहां खंडन कर

1660
01:59:51,920 --> 01:59:56,000
रहे हैं। करपात्री जी महाराज गौ बलि का खंडन कर रहे हैं। जो

1661
01:59:56,000 --> 02:00:00,000
आप लोग दुष्प्रचार करते हो। इसीलिए मैंने उस दिन चर्चा के समय पर कहा था ना कि

1662
02:00:00,000 --> 02:00:00,960
जो आप आक्षेप लगा रहे

1663
02:00:00,960 --> 02:00:05,520
हो आप प्रामाणिक रीति से जान तो लो कि उनका अर्थ क्या है?

1664
02:00:05,520 --> 02:00:09,680
तब आप आक्षेप लगाया करो। यहां तो मेरे सामने मैं मैं

1665
02:00:09,680 --> 02:00:13,840
खड़ा हूं। मेरे सामने ही मेरी बातों को बदल करके आप जो है आक्षेप लगा रहे हो। तो

1666
02:00:13,840 --> 02:00:17,840
हमारे यहां पर कहीं पर भी गाय को बलि के रूप में यज्ञ में

1667
02:00:17,840 --> 02:00:21,920
पशु के रूप में उपयोग करने के लिए कहीं भी स्वीकार नहीं किया गया

1668
02:00:21,920 --> 02:00:26,080
है। गौवंश के लिए कहीं पर भी स्वीकार नहीं है।

1669
02:00:26,080 --> 02:00:30,240
निषेध है पूर्णतया। और इसमें आगे उन्होंने बहुत सी और भी व्याख्या

1670
02:00:30,240 --> 02:00:34,320
दी है। इस बारे में आपको पढ़ना चाहिए। ये वेदार्थ

1671
02:00:34,320 --> 02:00:38,320
पारिजात में। अब ये तो रही ये बात गौ के

1672
02:00:38,320 --> 02:00:42,720
विषय में। ये बात क्लियर हो गई। शंकर परंपरा का क्या मानना है? वेदार्थ पारिजात

1673
02:00:42,720 --> 02:00:47,280
में करपाती जी ने निर्णय दिया हुआ है और इसी प्रकार से उसमें

1674
02:00:47,280 --> 02:00:51,840
अलंकार जो उसमें उन्होंने बताया है किस प्रकार से जो मन से

1675
02:00:51,840 --> 02:00:55,920
मानसिक रूप से वो जो निवेदित किया जाता है जो वहां गौमेध शब्द

1676
02:00:55,920 --> 02:01:00,000
आया है उसको किस तरह से निवेदित किया जाना है वो आगे पूरी व्याख्या उन्होंने दी हुई है और

1677
02:01:00,000 --> 02:01:04,160
प्रमाण भी दिए वहां पर जैसे आप बता रहे हो निरुक्त का प्रमाण है इसका

1678
02:01:04,160 --> 02:01:08,400
प्रमाण है उसका ऐसे ही वहां पर प्रमाण केवल क्लेम कर देना कि

1679
02:01:08,400 --> 02:01:12,640
मैं जो है उनकी परंपरा से उससे सिद्ध नहीं होता है कि मैं उनहीं की परंपरा से हूं।

1680
02:01:12,640 --> 02:01:16,640
ब्रह्मा कुमारी वाले भी कहते हैं कि हम भी है भाई सनातनी

1681
02:01:16,640 --> 02:01:20,880
जबकि वेदों का विरोध कर रहे हैं। रामपाल भी कहता है कि मैं भी हूं सनातनी जबकि

1682
02:01:20,880 --> 02:01:24,880
वो वेदों का विरोध कर रहा है। तो क्लेम कर देने मात्र से तय

1683
02:01:24,880 --> 02:01:28,880
होगा क्या? आपके पूर्वाचार्य ने आपको घोषित किया होना

1684
02:01:28,880 --> 02:01:32,880
चाहिए कि भैया यह मेरे बाद अब यह बताएगा

1685
02:01:32,880 --> 02:01:37,120
शास्त्रकार। यह होती है गुरु शिष्य परंपरा। प्रामाणिक

1686
02:01:37,120 --> 02:01:41,200
रीति से आप जुड़े होने चाहिए उस पठन पाठन से।

1687
02:01:41,200 --> 02:01:45,200
अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़] यह हो गई गोमेदी यज्ञ के बारे

1688
02:01:45,200 --> 02:01:49,360
में बात। इसके बाद आगे की बात क्या है कि जो अन्य पशुओं की बात है तो

1689
02:01:49,360 --> 02:01:53,440
उसका परवसान मांसाहार की मांसाहार के प्रोत्साहन में नहीं

1690
02:01:53,440 --> 02:01:57,760
है। उसका परवसान न्यूनता में है। प्रवृत्ति से निवृत्ति

1691
02:01:57,760 --> 02:02:01,760
और निवृत्ति से निवत्ति ये जो आपने मनुष्मति का श्लोक लिया है

1692
02:02:01,760 --> 02:02:05,840
ना कि कोई दोष नहीं है। मांस, मध्य और मैथुन। तो

1693
02:02:05,840 --> 02:02:09,920
इसमें भाव यह है कहने का कि जो मन जो जीव जो

1694
02:02:09,920 --> 02:02:14,000
जन्म लेता है वह इन तीन चीजों के साथ लेता है। उसकी प्रवृत्ति प्रवृत्ति है

1695
02:02:14,000 --> 02:02:18,240
उसकी। तो इस धर्म का आलंबन लेकर अपनी इन प्रवृत्तियों

1696
02:02:18,240 --> 02:02:22,720
से मुक्त हो जाना ही मोक्ष की ओर अग्रसर होना है।

1697
02:02:22,720 --> 02:02:26,720
धर्म के द्वारा बताए गए नियमों का आलंबन लेकर इन प्रवृत्तियों से मुक्त

1698
02:02:26,720 --> 02:02:30,880
होना आपका लक्ष्य है। वहां यह बताया जा रहा है। यह आपकी ये आपके

1699
02:02:30,880 --> 02:02:32,080
स्वभाव में इनबिल्ट

1700
02:02:32,080 --> 02:02:36,400
है। यह चीजें मास मदद और मैथुन। और सुनिए

1701
02:02:36,400 --> 02:02:40,560
अब यह जो इनबिल्ट वाली बात है यह तो आपने भी स्वीकार किया है। कहां

1702
02:02:40,560 --> 02:02:44,800
स्वीकार किया है? जब आप नियोग का समर्थन कर रहे हैं

1703
02:02:44,800 --> 02:02:50,800
तो वहां पर यह पूछा जा रहा है नियोग की आवश्यकता क्या है? ठीक है?

1704
02:02:52,240 --> 02:02:55,600
नियोग कहां पर है भाई?

1705
02:02:55,600 --> 02:03:01,600
ये रहा शान

1706
02:03:02,880 --> 02:03:08,880
हम

1707
02:03:21,600 --> 02:03:26,400
इसमें देखिए

1708
02:03:26,400 --> 02:03:30,800
इसमें उन्होंने यही कहा है लाइन एक्सजेक्टली ढूंढनी पड़ेगी।

1709
02:03:30,800 --> 02:03:34,800
उन्होंने कहा है कि भाई आप जो स्वाभाविक जो प्रवृत्ति है ना वो

1710
02:03:34,800 --> 02:03:39,280
रहेगी ही। हालांकि हम उस पर देखिए वह वहां पर मांसाहार

1711
02:03:39,280 --> 02:03:43,600
में तो उसकी छूट नहीं दे रहे हैं। जबकि एक तरफ मांसाहार और एक तरफ शारीरिक संबंध

1712
02:03:43,600 --> 02:03:47,680
बनाना। एक पति मर गया उसके बाद दूसरा पति फिर तीसरा पति

1713
02:03:47,680 --> 02:03:51,680
फिर चौथा पति ये आएंगे हम इस पर। यहां पर वो छूट दे रहे हैं प्रवृत्ति से

1714
02:03:51,680 --> 02:03:55,680
निवृत्ति की। पर किसी के अंदर जो मांसाहार की प्रवृत्ति है उससे

1715
02:03:55,680 --> 02:03:59,680
निवृत्ति प्राप्त करने के लिए वहां पर विधि नहीं उपलब्ध

1716
02:03:59,680 --> 02:04:04,000
करा रहे। समझ रहे हैं? प्रवृत्ति से निवृत्ति की विधि यहां पर यह शारीरिक

1717
02:04:04,000 --> 02:04:08,480
संबंध में बनाने में तो दे रहे हैं। आर्य समाज वाले शारीरिक

1718
02:04:08,480 --> 02:04:12,560
संबंध बनाने इसलिए नियोग करते जाओ। एक के बाद दूसरा दूसरा मर जाए तो तीसरा तीसरा

1719
02:04:12,560 --> 02:04:16,640
छोड़ो तो चौथा चौथा के बाद पांचवा और बीच में अगर पहले वाला पति वापस लौट

1720
02:04:16,640 --> 02:04:22,640
आए विदेश से देखिए एक जगह लिखा हुआ है

1721
02:04:26,800 --> 02:04:31,040
यदि वह इतने दिनों के बाद वापस आ जाए

1722
02:04:31,040 --> 02:04:33,200
हां

1723
02:04:33,200 --> 02:04:37,200
देखिए क्या लिखा है नियोग के लिए क्या लिखा है इन्होंने दयानंद जी

1724
02:04:37,200 --> 02:04:41,520
ने विवाहित स्त्री जो विवाहित पति धर्म के अर्थ परदेश

1725
02:04:41,520 --> 02:04:45,920
गया हो तो आठ वर्ष विद्या और कीर्ति के लिए गया हो तो छह

1726
02:04:45,920 --> 02:04:50,000
और धनाद कामना के लिए गया हो तो तीन वर्ष तक बाट देख के मतलब

1727
02:04:50,000 --> 02:04:54,320
उसकी प्रतीक्षा करे अपने पति की स्त्री अपने पति की इतने दिनों तक प्रतीक्षा

1728
02:04:54,320 --> 02:04:58,400
करे इन इन कारणों से गया हो उसके पश्चात नियोग करके संतान उत्पत्ति

1729
02:04:58,400 --> 02:05:03,120
कर ले जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त पति छूट जावे।

1730
02:05:03,120 --> 02:05:07,120
यानी जिससे संतान जब जो नियुक्त पति हो गया अब वह जब

1731
02:05:07,120 --> 02:05:11,120
अगर वापस आ गया वो जो परदेश गया हुआ है तो जब वो वापस आएगा

1732
02:05:11,120 --> 02:05:15,120
ये वाला पति छूट जाएगा। कितना सरल है ना शारीरिक संबंध

1733
02:05:15,120 --> 02:05:19,360
बनाना चालू कर दे और फिर पुराना वाला वो आ गया पति तो अब तुम खत्म।

1734
02:05:19,360 --> 02:05:23,600
अब आज से आपका जो हमारा जो रिश्ता है वो संबंध खत्म कितना सरल

1735
02:05:23,600 --> 02:05:27,040
है। है ना?

1736
02:05:27,040 --> 02:05:31,200
तो आपने भी यहां पर इस चीज को माना है कि नियोग

1737
02:05:31,200 --> 02:05:35,360
की आवश्यकता क्यों है? क्योंकि अगर नियोग की व्यवस्था नहीं दी जाएगी

1738
02:05:35,360 --> 02:05:39,360
तो यह लोग फिर गलत तरीके से चोरी छुपे वह कार्य तो करेंगे ही क्योंकि उनके

1739
02:05:39,360 --> 02:05:41,920
अंदर प्रवृत्ति है। तो जो

1740
02:05:41,920 --> 02:05:46,000
यहां पर जो ये मांसाहार परख वाक्य हैं शास्त्र वचन है

1741
02:05:46,000 --> 02:05:50,960
उनका पर्यावसान भी प्रवृत्ति से निवृत्ति में है। उसके प्रोत्साहन में नहीं है

1742
02:05:50,960 --> 02:05:54,960
कि व्यक्ति उसमें इस तरीके से उसका आलंबन ले। अगर वो मांसाहार की

1743
02:05:54,960 --> 02:05:59,040
उसकी प्रवृत्ति है तो वो इस तरीके से उसमें गमन करे कि धीरे-धीरे उसके

1744
02:05:59,040 --> 02:06:03,120
प्रति अनासक्त हो जाए। इसलिए वहां पर विधि दी गई जैसे

1745
02:06:03,120 --> 02:06:08,160
किसी अस्पताल के बाहर यह नहीं लिख सकते यहां पर किसी रोगी का आना मना है।

1746
02:06:08,160 --> 02:06:12,400
उसी प्रकार से अगर इस प्रकार की एक कुछ प्रवृत्तियां है जिनसे उसको छुड़ाया

1747
02:06:12,400 --> 02:06:16,560
जा सकता है धर्म के आलंबन के द्वारा तो उस छुड़ाने की विधि के लिए शास्त्र

1748
02:06:16,560 --> 02:06:20,720
के ऐसे वचन है जिस प्रकार के वचन आप अपने नियोग को

1749
02:06:20,720 --> 02:06:24,800
जो है प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए जिस प्रकार

1750
02:06:24,800 --> 02:06:28,880
से आप ले रहे हो स्वयं ठीक है तो यह वाली बात

1751
02:06:28,880 --> 02:06:34,400
भी हो गई अब जो है आपने एक

1752
02:06:34,400 --> 02:06:38,560
प्रश्न उठाया है वो गड़ा नाम वाला जो महेंद्र जी का भाष्य

1753
02:06:38,560 --> 02:06:42,640
तो उसमें आपने प्रश्न उठाया कि वहां पर जो है स्त्री जो है

1754
02:06:42,640 --> 02:06:46,720
संतान प्राप्त गर्भधारण कर रही है अश्व के द्वारा। तो यहां पर फिर वही

1755
02:06:46,720 --> 02:06:50,880
धूर्तता है। फिर से वही धूर्तता है। क्या धूर्तता है कि वहां

1756
02:06:50,880 --> 02:06:55,120
पर कहीं भी अश्व के पहली बात तो वो जो अश्व है जिसके

1757
02:06:55,120 --> 02:06:57,440
पास एक रात ठहरने वाली बात है।

1758
02:06:57,440 --> 02:07:01,760
वो अश्व मरा हुआ है। फिर उससे गर्भ धारण करने वाली बात कहां से आ गई?

1759
02:07:01,760 --> 02:07:06,000
उसमें सीधेसीधे गणपति जी का आहान किया जा रहा है। गणपति जी की स्तुति

1760
02:07:06,000 --> 02:07:10,080
की जा रही है और गणपति जी के दिव्य तेज को ग्रहण करने की बात हो

1761
02:07:10,080 --> 02:07:14,240
रही है। और क्या कहते हैं जो माधवाचार्य शास्त्री

1762
02:07:14,240 --> 02:07:18,320
जी उन्होंने अपने ग्रंथ में लिखा है कि कई

1763
02:07:18,320 --> 02:07:22,480
जो दवाई कंपनियां हैं जो आज दवाई बना रही हैं नपुंसकता की

1764
02:07:22,480 --> 02:07:26,880
या फिर संतान प्राप्ति करने के लिए जो कुछ तत्व कार्य में आते हैं वो

1765
02:07:26,880 --> 02:07:30,960
घोड़े से भी वह तत्व प्राप्त होते हैं।

1766
02:07:30,960 --> 02:07:35,120
तो वह जो औषधि के रूप में या फिर वह एक दिव्य

1767
02:07:35,120 --> 02:07:39,120
तेज के रूप में जो प्राप्त करने वाली बात वहां पर उन्होंने स्वीकार की है महध जी ने

1768
02:07:39,120 --> 02:07:43,120
उसको बड़े ही इत्मीनान से अपने मन से महदर जी के

1769
02:07:43,120 --> 02:07:47,120
भाष्य का हिंदी में अर्थ करके और जो है प्रचारित कर दिया कि ये तो जो है घोड़े से संतान प्राप्ति

1770
02:07:47,120 --> 02:07:50,960
की बात कर रहे हैं।

1771
02:07:50,960 --> 02:07:54,960
खैर आज आपको बहुत आनंद आने वाला है। मैं आपको कुछ चीजें और भी सुनाने

1772
02:07:54,960 --> 02:08:00,480
वाला हूं। तो ये गणा नाम वाला भी हो गया और

1773
02:08:00,480 --> 02:08:05,860
हम्म

1774
02:08:05,860 --> 02:08:11,860
[गला साफ़ करने की आवाज़]

1775
02:08:23,440 --> 02:08:27,440
ठीक है। तो अब बात आती है कि इन्होंने जैसे हमारे शायण

1776
02:08:27,440 --> 02:08:31,440
भाष्य की चीजों पर प्रश्न उठाए गौ जो गौ का उपयोग

1777
02:08:31,440 --> 02:08:35,440
करना यज्ञ में उसका मैंने उत्तर दे दिया। फिर जो है मांसाहार

1778
02:08:35,440 --> 02:08:39,680
परक वचन का जो पर्यावसान है वह किस में है वह भी उत्तर मैंने दे दिया

1779
02:08:39,680 --> 02:08:44,000
और तर्क से भी दे दिया। इसके बाद जो आता है

1780
02:08:44,000 --> 02:08:48,640
ये जो इन्होंने एक अश्वमेद यज्ञ वाली बात बताई तो उसका भी मैंने समाधान

1781
02:08:48,640 --> 02:08:49,920
उपलब्ध करा दिया। अब

1782
02:08:49,920 --> 02:08:54,160
जो है मैं थोड़ा सा इनके भाष्य पर बात करने वाला हूं। तो अब आप सीट

1783
02:08:54,160 --> 02:08:58,160
की पेटियां बांध लें थोड़ा सा। बहुत रोचक चीजें आपके सामने आने वाली हैं।

1784
02:08:58,160 --> 02:09:02,240
मैं बस दो चार उदाहरण दूंगा। बहुत ज्यादा मैं उसमें नहीं

1785
02:09:02,240 --> 02:09:06,400
जाना चाहता हूं और मुझे थोड़ा सा पढ़ने में असहज भी है कहीं-कहीं

1786
02:09:06,400 --> 02:09:11,200
पर पर क्षमा करिए भाई वो उदारता

1787
02:09:11,200 --> 02:09:15,280
जो आपके अस्तित्व और आदर्श को नष्ट करने के लिए बाध्य करे

1788
02:09:15,280 --> 02:09:19,680
वो उदारता उदारता नहीं कायरता कहलाती है। इसलिए मैं पहले से ही क्षमा प्रार्थी

1789
02:09:19,680 --> 02:09:24,160
हूं। पर अब मुझे पढ़ना पड़ रहा है। जिस तरीके से इन्होंने पढ़ के वो एक

1790
02:09:24,160 --> 02:09:28,160
नफरत का गेम खेला कि अवतार इसलिए नहीं हो सकता कि देखिए इन्होंने कितना गंदा

1791
02:09:28,160 --> 02:09:32,160
गंदा लिखा है। तो अब मैं थोड़ा सा इनकी ओर आपका ध्यान आकर्षित करना

1792
02:09:32,160 --> 02:09:36,800
चाह रहा हूं। ठीक है? तो [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] दयानंद

1793
02:09:36,800 --> 02:09:41,040
जी अपने यजुर्वेद के भाष्य में लिखते हैं अध्याय 25

1794
02:09:41,040 --> 02:09:46,000
मंत्र सात। उसमें लिखते हैं हे मनुष्यों

1795
02:09:46,000 --> 02:09:50,800
तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुद्द्रियों

1796
02:09:50,800 --> 02:09:54,880
के साथ वर्तमान अंधे सर्पों

1797
02:09:54,880 --> 02:09:58,880
को गुद्दियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों

1798
02:09:58,880 --> 02:10:02,880
को आंतों से जलों को नाभि से नीचे के भाग

1799
02:10:02,880 --> 02:10:05,200
से जलों को नाभि के नीचे के

1800
02:10:05,200 --> 02:10:09,680
भाग से अंडकोष को आंडों से ठीक

1801
02:10:09,680 --> 02:10:13,680
है मैं नहीं पढ़ रहा घोड़े के गुप्तांग की

1802
02:10:13,680 --> 02:10:17,760
बात भी हो रही है वीर से संतान को ये सब बात हो रही है ठीक है

1803
02:10:17,760 --> 02:10:21,920
थोड़ा पढ़ने में असहजता आप लोग स्वयं पढ़ें। दयानंद जी के द्वारा

1804
02:10:21,920 --> 02:10:26,400
जो भाष्य किया गया है यजुर्वेद अध्याय 25 मंत्र सात।

1805
02:10:26,400 --> 02:10:30,480
अच्छा इसमें कई बातें की गई हैं। एक मैं प्रश्न

1806
02:10:30,480 --> 02:10:34,640
बता देता हूं। समीक्षा कर रहा है जो उन्होंने समीक्षा में एक प्रश्न उठाया है कि

1807
02:10:34,640 --> 02:10:38,960
अब दयानंदी हमें बताएं कि अंधे सर्पों को अंधे सर्पों

1808
02:10:38,960 --> 02:10:43,280
को गुदा द्वार में घुसाने और कुटिल सर्पों को आंतों से

1809
02:10:43,280 --> 02:10:47,520
लेने की आज्ञा क्या ईश्वर देता है? इसमें

1810
02:10:47,520 --> 02:10:51,520
एक प्रश्न और उठाया गया है। थोड़ा पढ़ने में असहजता है और आगे भी जो आने

1811
02:10:51,520 --> 02:10:57,520
वाले हैं उनको भी पढ़ने में असहता है। फिर भी मैं प्रयास करूंगा आपको बताने का।

1812
02:10:57,760 --> 02:11:02,400
अच्छा अब दयानंद कृत जो यजुर्वेद भाष्य है

1813
02:11:02,400 --> 02:11:06,480
अध्याय 25 और मंत्र एक उसमें क्या लिखा है? हे

1814
02:11:06,480 --> 02:11:12,320
अच्छे ज्ञान की चाहना करते हुए ज्ञानी जन

1815
02:11:12,320 --> 02:11:16,960
वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करने हारे

1816
02:11:16,960 --> 02:11:20,960
बोलना मुश्किल है थोड़ा पता नहीं दयानंद जी ने कैसे लिख दिया वीर

1817
02:11:20,960 --> 02:11:24,480
बरसाने वाली अंग

1818
02:11:24,480 --> 02:11:28,640
वीर बरसाने वाला जो अंग है अब समझ लीजिए गुप्तांग की बात हो रही है

1819
02:11:28,640 --> 02:11:32,640
उसके मुख से चारों ओर जो केश

1820
02:11:32,640 --> 02:11:36,720
है मुख के चारों ओर जो केश है वीर बरसाने वाला जो अंग है

1821
02:11:36,720 --> 02:11:41,200
गुप्तांग उसको मुख के चारों ओर जो केश है अर्थात दाढ़ी

1822
02:11:41,200 --> 02:11:45,200
उससे वह पदार्थ अच्छे प्रकार से ग्रहण करने चाहिए। अब ये यहां क्या

1823
02:11:45,200 --> 02:11:49,200
कहने चाह रहे हैं? दाढ़ी के आसपास जो है जो केश है और

1824
02:11:49,200 --> 02:11:55,200
वीर से आने वाला जो वीर वाला जो पदार्थ है

1825
02:11:55,600 --> 02:11:59,600
दयानंदी बताएं कि दयानंद अपने दयानंद जी अपने भाष्य

1826
02:11:59,600 --> 02:12:03,760
के द्वारा वीर्य वर्षाने वाला जो अंग है गुप्तांग

1827
02:12:03,760 --> 02:12:08,160
है और दाढ़ी से ऐसा कौन सा ईश्वरीय ज्ञान बांट रहे हैं?

1828
02:12:08,160 --> 02:12:12,240
ठीक है? यह प्रश्न उठता है। यह मैं पीडीएफ डाल दूंगा

1829
02:12:12,240 --> 02:12:15,120
जो लिखी हुई है।

1830
02:12:15,120 --> 02:12:19,360
इसमें संकलन है। यह यह आज की चीजें नहीं है। यह सब

1831
02:12:19,360 --> 02:12:23,520
जो यह अग्निव्रत जी ने मुद्दा उठाया है। यह बहुत पहले की चीजें

1832
02:12:23,520 --> 02:12:27,840
हैं। इधर आर्य समाजियों ने उनका भाष मुताबिक

1833
02:12:27,840 --> 02:12:32,080
निकाला और ये सब आक्षेप लगा दिए। फिर जो हमारी तरफ के जो परंपरा

1834
02:12:32,080 --> 02:12:36,480
प्राप्त आचार्य थे उन्होंने भी बताया भाई तुमने भी तो ये कर रखा है और

1835
02:12:36,480 --> 02:12:40,480
कई जगह तो ऐसी है जहां भावार्थ भी बदल नहीं रहा है कई जगह भावार्थ बदलता

1836
02:12:40,480 --> 02:12:44,640
है कई जगह भावार्थ भी नहीं बदलता है और तो और हम यह

1837
02:12:44,640 --> 02:12:48,960
कह सकते हैं कि हम परंपरा वाले हैं इसलिए आप हमारा जो अर्थ है वो हमारी प्रामाणिकता

1838
02:12:48,960 --> 02:12:52,960
प्रामाणिक रीति से आप लीजिए आप तो यह भी नहीं कह सकते आपने जो लिखा है

1839
02:12:52,960 --> 02:12:57,040
उसका जो अर्थ हम निकालना चाहे वो निकाल सकते हैं एज इट इज पढ़ेंगे तो एज इट इज ही पढ़ेंगे भाई

1840
02:12:57,040 --> 02:13:01,120
दयानंद जी यही कहना चाहते थे आपकी बात क्यों मान परंपरा को तो माना नहीं जाता है।

1841
02:13:01,120 --> 02:13:05,120
तो कैसे पता करें दयानंद जी यह नहीं कहना चाहते जो लिखा है।

1842
02:13:05,120 --> 02:13:05,760
आगे चलते

1843
02:13:05,760 --> 02:13:09,780
हैं और क्या लिखा है?

1844
02:13:09,780 --> 02:13:13,840
[गला साफ़ करने की आवाज़] जैसे पुरुष का गुप्तांग मैं यहां पर दूसरे शब्दों का

1845
02:13:13,840 --> 02:13:18,480
उपयोग कर रहा हूं क्योंकि मुझे पढ़ने में असहजता हो रही है। जैसे पुरुष का गुप्तांग

1846
02:13:18,480 --> 02:13:22,480
स्त्री के गुप्तांग में प्रवेश करता हुआ वीर्य को छोड़ता है। यह

1847
02:13:22,480 --> 02:13:26,560
है यजुर्वेद 19 76 यजुर्वेद

1848
02:13:26,560 --> 02:13:30,720
1976 जैसे पुरुष का गुप्तांग स्त्री के गुप्तांग

1849
02:13:30,720 --> 02:13:34,800
में प्रवेश करता हुआ वीर्य को छोड़ता है और इससे अलग मूत्र को

1850
02:13:34,800 --> 02:13:38,960
छोड़ता है। इससे जाना जाता है कि शरीर में मूत्र के स्थान से पृथक

1851
02:13:38,960 --> 02:13:44,960
स्थान में वीर्य रहता है। यह वैज्ञानिक भाष्य है दयानंद जी का। तालियां बजाइए।

1852
02:13:51,600 --> 02:13:55,760
ये वैज्ञानिक भाष्य है ना? ये

1853
02:13:55,760 --> 02:14:00,240
कह रहे हैं ना वैज्ञानिक भाष्य हमारे पढ़िए प्रामाणिकता दयानंद

1854
02:14:00,240 --> 02:14:05,040
जी की यजुर्वेद 1988

1855
02:14:05,040 --> 02:14:09,600
क्या लिखा है? इसमें ये कर रहे हैं हे मनुष्यों जैसे

1856
02:14:09,600 --> 02:14:13,680
जिससे रस ग्रहण किया जाता है वह वाणी के समान स्त्री इस पति

1857
02:14:13,680 --> 02:14:17,680
के सुंदर अवयवों से विभक्त सिर के साथ सिर करें तथा मुख

1858
02:14:17,680 --> 02:14:21,680
के समीप पवित्र मुख करें। इसी प्रकार गृह आश्रम में

1859
02:14:21,680 --> 02:14:25,840
के व्यवहार में व्याप्त स्त्री पुरुष दोनों ही वर्त तथा जो इस रोग

1860
02:14:25,840 --> 02:14:30,000
से रक्षक वैद्य और बालक के समान वास करने का

1861
02:14:30,000 --> 02:14:34,000
हेतु पुरुष उपस्थेंद्रिय यहां पर गुप्तांग को

1862
02:14:34,000 --> 02:14:38,320
बल से करने हारा होता है। वह शांति करने के समान

1863
02:14:38,320 --> 02:14:42,400
वर्तमान में संतान उतत्पत्ति का हेतु होवे। यहां

1864
02:14:42,400 --> 02:14:46,880
मतलब बता रहे हैं कि किस प्रकार से पति को पत्नी के साथ रमण करना है।

1865
02:14:46,880 --> 02:14:51,760
वैज्ञानिकीकरण भाष्य दयानंद जी बता रहे हैं वेदों में। ठीक है?

1866
02:14:51,760 --> 02:14:55,840
अच्छा आगे चलते हैं। इसमें बहुत अच्छी समीक्षा भी

1867
02:14:55,840 --> 02:15:01,790
दी है। तो जिसके पास समय हो वही समीक्षा भी पढ़ सकता है।

1868
02:15:01,790 --> 02:15:04,480
[गला साफ़ करने की आवाज़]

1869
02:15:04,480 --> 02:15:07,120
आगे है यजुर्वेद 28 32

1870
02:15:07,120 --> 02:15:11,840
इसमें क्या लिखा हुआ है? दयानंद जी के भाष्य में हे मनुष्यों

1871
02:15:11,840 --> 02:15:16,000
जैसे बैल गायों को गाभिन करके पशुओं

1872
02:15:16,000 --> 02:15:20,240
को बढ़ता बढ़ाता है वैसे गृहस्थ लोग स्त्रियों को गर्भवती कर प्रजा

1873
02:15:20,240 --> 02:15:24,960
बढ़ावे

1874
02:15:24,960 --> 02:15:29,120
आगे लिखा है

1875
02:15:29,120 --> 02:15:33,280
यजुर्वेद 2160 इसमें लिखा

1876
02:15:33,280 --> 02:15:37,680
है हे मनुष्यों प्राण और अपान के लिए दुख विनाश

1877
02:15:37,680 --> 02:15:41,680
करने वाले छेरी आदि पशु से वाणी के लिए मेढ़ा

1878
02:15:41,680 --> 02:15:45,920
से और परम ऐश्वर्य के लिए बैल से भोग करें।

1879
02:15:45,920 --> 02:15:50,080
वाणी के लिए मेंढक से भोग करिए। परम ऐश्वर्य के

1880
02:15:50,080 --> 02:15:54,720
लिए बैल से भोग करिए। और दुख

1881
02:15:54,720 --> 02:15:58,800
का विनाश करने के लिए छेरी आदि पशु से भोग करिए। यह लिखा है

1882
02:15:58,800 --> 02:16:03,840
दयानंद जी के भाष्य में। है ना? भोग करिए। भोग

1883
02:16:03,840 --> 02:16:07,920
बैल के साथ भोग करिए। आर्य समाजियों के यहां पर यह चीजें लागू

1884
02:16:07,920 --> 02:16:12,880
होती है। मैं पूछना चाह रहा हूं। आगे चलते हैं।

1885
02:16:12,880 --> 02:16:17,040
यजुर्वेद 148 स्वामी

1886
02:16:17,040 --> 02:16:21,280
जी लिखते हैं स्त्री पति से और पति अपनी स्त्री से कहे

1887
02:16:21,280 --> 02:16:22,800
कि हे स्त्री

1888
02:16:22,800 --> 02:16:27,200
तू मेरे नाभि के नीचे भवेंद्रिय मार्ग से निकलने वाली अपान

1889
02:16:27,200 --> 02:16:31,840
वायु की रक्षा कर। अपान वायु समझते हैं

1890
02:16:31,840 --> 02:16:35,840
फार्ट कहते हैं ना इंग्लिश में और हिंदी में क्या कहते हैं आप लोग

1891
02:16:35,840 --> 02:16:41,440
समझ रहे होंगे अपान वायु जो वायु निकलती है

1892
02:16:41,440 --> 02:16:45,600
निचले द्वार से उसकी रक्षा करेगी कौन पत्नी ये

1893
02:16:45,600 --> 02:16:49,840
कहा जा रहा है हे स्त्री तू मेरे गुेंद्रिय

1894
02:16:49,840 --> 02:16:54,000
से निकलने वाली अपान वायु की रक्षा कर आगे

1895
02:16:54,000 --> 02:16:56,560
चलते हैं

1896
02:16:56,560 --> 02:17:00,640
योगेश भारद्वाज जी यही पर है अगर यहीं

1897
02:17:00,640 --> 02:17:04,720
पर हैं तो आपने तो कहा था यह मेरी अंतिम बात है। अंतिम बात है। तो आपको चर्चा करने

1898
02:17:04,720 --> 02:17:09,440
में कैसी आपत्ति है या कोई नकली आईडी से है यहां पर।

1899
02:17:09,440 --> 02:17:13,440
खैर

1900
02:17:13,440 --> 02:17:17,600
[गला साफ़ करने की आवाज़] ऑपरेटर से मैं कहूंगा कि आप थोड़ा सा पता लगा के बताएं। ओरिजिनल आईडी

1901
02:17:17,600 --> 02:17:21,600
से है तो इनको चर्चा करनी है तो चर्चा का समय सुनिश्चित करें और साथ चर्चा

1902
02:17:21,600 --> 02:17:25,280
करें। ठीक है?

1903
02:17:25,280 --> 02:17:25,780
आगे

1904
02:17:25,680 --> 02:17:28,480
चलते हैं।

1905
02:17:28,480 --> 02:17:32,480
यजुर्वेद छ 14 क्या लिखते हैं स्वामी जी

1906
02:17:32,480 --> 02:17:36,880
हे शिष्य मैं तेरी वाणी नेत्र नाभि जिसे मूत्रोत्सर्ग आदि

1907
02:17:36,880 --> 02:17:40,880
किए जाते हैं उस गुप्तांग यहां पर दूसरा शब्द लिखा

1908
02:17:40,880 --> 02:17:45,120
हुआ है मैं बचा के चल रहा हूं थोड़ा सा को तेरे गुद्दिय

1909
02:17:45,120 --> 02:17:49,920
के लिए शुद्ध करता हूं यहां पर गुरु जो है

1910
02:17:49,920 --> 02:17:54,000
शुद्ध कर रहे हैं गुेंद्रदिय को गुप्तांग को यह हो क्या

1911
02:17:54,000 --> 02:17:58,240
रहा है और वहां भाष्य में दयानंद जी यह भी लिख रहे हैं गुरु और गुरु पत्नी दोनों

1912
02:17:58,240 --> 02:18:02,240
कर रहे हैं। शिष्य की गुप्तांग को गु्दियों

1913
02:18:02,240 --> 02:18:06,720
को शुद्ध कर रहे हैं। सफाई कर रहे हैं वहां की।

1914
02:18:06,720 --> 02:18:12,400
यह सब शुद्ध करता हूं। ठीक है? चलिए आगे चलते हैं।

1915
02:18:12,400 --> 02:18:16,560
[नाक से की जाने वाली आवाज़] यजुर्वेद 3021 इसमें

1916
02:18:16,560 --> 02:18:20,960
लिखा हुआ है बंदर किसी छोटी आंखों

1917
02:18:20,960 --> 02:18:25,040
वाले शीत प्राय देसी मनुष्यों को पीली आंखों वालों

1918
02:18:25,040 --> 02:18:29,120
को उत्पन्न कीजिए। को गंजे

1919
02:18:29,120 --> 02:18:34,160
को काले रंग वाले पीले नेत्रों से युक्त पुरुष को दूर कीजिए।

1920
02:18:34,160 --> 02:18:39,920
ठीक है? यहां क्या हो रहा है? को दूर करो।

1921
02:18:39,920 --> 02:18:45,920
और आप एक और कहते हैं कि हमने अत्याचार किया है।

1922
02:18:48,720 --> 02:18:53,200
उनको तो कुछ

1923
02:18:53,200 --> 02:18:57,280
नीच कुल की की गंध इत्यादि ये सब कहा है उन्होंने कि की गंध

1924
02:18:57,280 --> 02:19:02,160
आती है उसको दूर रखो मुझसे। यह सब स्वीकार किया है।

1925
02:19:02,160 --> 02:19:06,400
और स्त्री पुरुष में भेद क्या दयानंद जी ने नहीं किया। वो

1926
02:19:06,400 --> 02:19:11,280
कह रहे हैं कि जब अगर न्यूक की बात करूं

1927
02:19:11,280 --> 02:19:15,360
तो न्यू के बारे में आपको कुछ बढ़िया चीजें आपको बता

1928
02:19:15,360 --> 02:19:21,360
दूं।

1929
02:19:26,640 --> 02:19:30,800
सबसे पहली बात है कि नियोग का आदेश कहां पर भी दिया जा

1930
02:19:30,800 --> 02:19:35,120
रहा है? हे विध्व नारी तू इस मरे हुए

1931
02:19:35,120 --> 02:19:39,200
पति जो है मरा हुआ पड़ा है सामने वह विलाप कर रही है वहां की बात है इस

1932
02:19:39,200 --> 02:19:43,600
मरे हुए पति की आशा छोड़ दे छोड़ के बाकी

1933
02:19:43,600 --> 02:19:47,840
पुरुषों में से जीते हुए दूसरे पति को प्राप्त हो इस बात

1934
02:19:47,840 --> 02:19:51,920
का विचार कर और निश्चय रख कि जो तुम विधवा के पुनः मतलब

1935
02:19:51,920 --> 02:19:55,920
पति वहां सामने लेटा हुआ है मृत्यु शैया पर उसको छोड़ और

1936
02:19:55,920 --> 02:20:00,160
आसपास जो जीवित लोग हैं उनमें से किसी को पति बना मतलब नियुक्त

1937
02:20:00,160 --> 02:20:04,560
कर नियोक्त के पति तो ना बना और फिर जो है उसके साथ अपना

1938
02:20:04,560 --> 02:20:08,640
वो जो आगे की प्रक्रिया है उसमें आप लिप्त हो जाइए। यह इनका कहना है। देवर

1939
02:20:08,640 --> 02:20:12,720
उसको कहते हैं जो विधवा का दूसरा पति होता है। इन सब चीजों का खंडन

1940
02:20:12,720 --> 02:20:16,800
करते हैं हम और यह कह रहे हैं कि आपके यहां पाप लिखा है।

1941
02:20:16,800 --> 02:20:21,040
देवर उसको कहते हैं जो विधवा का दूसरा पति होता है। चाहे वह छोटा भाई हो या बड़ा

1942
02:20:21,040 --> 02:20:25,200
भाई हो अथवा अपने वर्ण का वह अपने से उत्तम वर्ण वाला हो। जिससे नियो करे उसी

1943
02:20:25,200 --> 02:20:29,840
का नाम देवर। लो ये है देवर। और

1944
02:20:29,840 --> 02:20:33,520
यह लोग क्या कहते हैं

1945
02:20:33,520 --> 02:20:37,840
कि हमने जो सम्मान दिया है वो जो रानी

1946
02:20:37,840 --> 02:20:41,920
थी लक्ष्मीबाई पद्मावती इन सब का नाम लेते हैं। इनमें से कितनी कितनों का आप आप

1947
02:20:41,920 --> 02:20:47,520
जो है नियोग स्वीकार करते हैं जितनों का आपने अपनी वीडियो में नाम लिया है।

1948
02:20:47,520 --> 02:20:51,680
अरे अच्छा हुआ आपकी विचारधारा उस समय नहीं थी। नहीं रानी लक्ष्मीबाई और पद्मावती

1949
02:20:51,680 --> 02:20:55,920
का आप नियोग करवा देते वहां पर। उन्होंने तो जहर कर लिया था। आप कहते

1950
02:20:55,920 --> 02:21:00,320
जोहर मत करो संतान प्राप्ति करो नियोग करके। ये जो अलाउद्दीन

1951
02:21:00,320 --> 02:21:04,640
खिलजी आ रहा संतान प्राप्त करो भाई आप तो यह करते वहां पर

1952
02:21:04,640 --> 02:21:08,320
नियोग करवाते आप वहां पर

1953
02:21:08,320 --> 02:21:12,400
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नियोग करवाते आप यही

1954
02:21:12,400 --> 02:21:17,440
है ना आपके यहां पर स्त्रियों का अधिकार

1955
02:21:17,440 --> 02:21:20,640
नियोग करवाना उनका

1956
02:21:20,640 --> 02:21:24,800
बात करते हैं कितनी ज्यादा लालसा है नियोग

1957
02:21:24,800 --> 02:21:28,240
करवाने की देखिए आप

1958
02:21:28,240 --> 02:21:32,240
और क्या है इसमें 11 पतियों तक बताया

1959
02:21:32,240 --> 02:21:36,240
कि उसका क्या नाम होगा कहां से कहां तक सत्यार्थ

1960
02:21:36,240 --> 02:21:39,120
प्रकाश पढ़ रहा हूं

1961
02:21:39,120 --> 02:21:42,480
और देखिए

1962
02:21:42,480 --> 02:21:46,640
संतान उत्पत्ति में असमर्थ होवे अच्छा एक चीज और है

1963
02:21:46,640 --> 02:21:50,640
कि अग्निव्रत जी नियोग को आपत धर्म मानते हैं जबकि

1964
02:21:50,640 --> 02:21:54,640
वहां पर जो दयानंद जी वह तर्क दे रहे हैं

1965
02:21:54,640 --> 02:21:58,720
कि प्रवृत्ति होती है। प्रवृत्ति होती है व्यक्ति की

1966
02:21:58,720 --> 02:22:03,360
जो उसके अंदर स्वाभाविक दिए हैं मैथुन के प्रति आकर्षण

1967
02:22:03,360 --> 02:22:07,840
उसकी बात की है दयानंद जी ने तो जब उन्होंने

1968
02:22:07,840 --> 02:22:11,920
यह बात की प्रवृत्ति होती तो यहां पर आपत धर्म तो खत्म हो गया तो प्रवृत्ति से निवृत्ति

1969
02:22:11,920 --> 02:22:15,920
का मामला आ गया दूसरी बात यह है कि क्या केवल संतान प्राप्ति के लिए

1970
02:22:15,920 --> 02:22:21,200
जो एक बार रमण होगा उससे काम चल जाएगा प्रवृत्ति में का

1971
02:22:21,200 --> 02:22:25,280
उससे काम हो जाएगा प्रवृत्ति से निवृत्ति के

1972
02:22:25,280 --> 02:22:29,440
लिए आप जो जो है नियोग करवाते जा रहे हो। एक छूटा दूसरा गया, दूसरा गया, तीसरा आया, तीसरा गया,

1973
02:22:29,440 --> 02:22:32,480
चौथा आया, चौथा गया, पांचवा आया, पांचवा गया, छठवा आया, छठवा गया,

1974
02:22:32,480 --> 02:22:36,560
सातवां आया, सातवां गया, आठवां आया। ये धर्म लिखा हुआ है और

1975
02:22:36,560 --> 02:22:42,000
कितने आप लोग नियोग करवा रहे हो अपने यहां? ये बता दो।

1976
02:22:42,000 --> 02:22:46,000
आउटपुट कभी समझा है? आपने आरोप लगा दिए। गौ गौ का

1977
02:22:46,000 --> 02:22:50,560
वो मानते हो, यह मानते हो। आउटपुट पर भी तो ध्यान दो भाई।

1978
02:22:50,560 --> 02:22:54,560
गौ रक्षा के लिए लड़ रहे हैं कि नहीं लड़ रहे हैं? कितने

1979
02:22:54,560 --> 02:22:58,720
कितने हमारे मठ मंदिर है जहां पर जो गाय की बलि हो रही है। अरे गाय की बलि

1980
02:22:58,720 --> 02:23:02,800
छो बड़ी बलि हो रही है। कौन से चार शंकराचार्य के चारों

1981
02:23:02,800 --> 02:23:07,280
मठ में से कहां पर बलि चढ़ रही है बताइए? अगर मांसाहार को प्रोत्साहित

1982
02:23:07,280 --> 02:23:11,440
करने वाला ही अर्थ हम स्वीकार कर रहे हैं तो बलि होती ना हमारे यहां मठों में कहां

1983
02:23:11,440 --> 02:23:15,760
हो रही है? क्योंकि उसका परवसान जो मांसाहार

1984
02:23:15,760 --> 02:23:19,920
परक शास्त्र के वाक्य है उनका परवसान भी मांसाहार के प्रोत्साहन में नहीं है। जैसे

1985
02:23:19,920 --> 02:23:23,920
आपके अनुसार ये जो नियोग वाले वाक्य नियोग के प्रोत्साहन में नहीं है। वो बात

1986
02:23:23,920 --> 02:23:28,000
और है कि आप जो है नियोग से नियोग के द्वारा प्रवृत्ति से निवृत्ति

1987
02:23:28,000 --> 02:23:33,200
करा रहे हो।

1988
02:23:33,200 --> 02:23:33,700
एक

1989
02:23:33,440 --> 02:23:37,680
तरफ मांसाहार मांसाहार में आपको दिखाई नहीं दे रहा कि प्रवृत्ति से निवृत्ति

1990
02:23:37,680 --> 02:23:41,680
के लिए हो सकता है। मगर यहां आप जो है एक से एक के बाद दूसरा

1991
02:23:41,680 --> 02:23:46,000
दूसरे के बाद तीसरा तीसरे बाद चौथा व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनवा

1992
02:23:46,000 --> 02:23:49,760
बनवाते जा रहे हो

1993
02:23:49,760 --> 02:23:53,760
और फिर बात कर रहे हो कि भैया जो है इतना ऐसा कैसे हो सकता है? कोई मांस

1994
02:23:53,760 --> 02:23:57,920
खाने की आज्ञा कैसे दे सकता है? यहां अनेक स्त्री पुरुषों का आप संबंध बनवाने की आज्ञा

1995
02:23:57,920 --> 02:24:02,000
दे दे रहे हो। अरे भाई जो सुनने में अच्छा ना लगे क्यों जोड़ रहे हो शास्त्र

1996
02:24:02,000 --> 02:24:06,000
से? क्योंकि हमें तो पहले से ही पता है ना धर्म क्या है? फिर क्यों जोड़ रहे हो? फिर यहां पर आप

1997
02:24:06,000 --> 02:24:10,000
बाउंड हो जा रहे हो कि नहीं नहीं जो शास्त्र शास्त्र से धर्म पता चलेगा। एक

1998
02:24:10,000 --> 02:24:14,080
जगह कह रहे हो कि मुझे धर्म पता है। मैं जो अच्छी चीज बताऊंगा वो धर्म शास्त्र

1999
02:24:14,080 --> 02:24:18,320
का अर्थ होगा। और दूसरी जगह कह रहे हो कि नहीं नहीं हमें धर्म पता नहीं है। शास्त्र

2000
02:24:18,320 --> 02:24:22,400
से धर्म पता होगा। ये क्या है?

2001
02:24:22,400 --> 02:24:27,840
इसे कहते हैं दोगलाप।

2002
02:24:27,840 --> 02:24:32,160
तो भर भर के इनके प्रमाण है मैं और दे देता हूं दयानंद जी के जो बहुत बढ़िया

2003
02:24:32,160 --> 02:24:36,160
बढ़िया सुंदर वो हैं और ऐसी भी जीवनी में कई

2004
02:24:36,160 --> 02:24:40,160
चीजें हैं। मुर्दे को निकाला मुर्दे को जांच के

2005
02:24:40,160 --> 02:24:44,560
लिए निकाला ये किया वो सब किसी और भाग में अगर आवश्यकता पड़ी तो आपके समक्ष प्रस्तुत

2006
02:24:44,560 --> 02:24:48,640
करूंगा। ऐसा भी आया है कि वह कोई कुछ

2007
02:24:48,640 --> 02:24:52,720
व्यसन था उनको जिसका सेवन करते तो यह सब चीजें भी

2008
02:24:52,720 --> 02:24:56,960
अभी अगर आवश्यकता पड़ी तो अगले भाग में लाऊंगा। आज केवल इनके

2009
02:24:56,960 --> 02:25:02,960
भाष्य पर ही बात होगी। वो आप देखते जाइए।

2010
02:25:12,240 --> 02:25:14,960
ऋग्वेद

2011
02:25:14,960 --> 02:25:19,280
हे स्त्री ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त

2012
02:25:19,280 --> 02:25:23,440
85 और मंत्र 40 इसमें वह लिखते हैं हे

2013
02:25:23,440 --> 02:25:28,000
स्त्री जो तेरा प्रथम पहला विवाहित पति

2014
02:25:28,000 --> 02:25:33,840
तुझको प्राप्त होता है उसका नाम सुकुमार

2015
02:25:33,840 --> 02:25:37,920
सुकुमारता आदि है। गुण युक्त होने से सोम जो दूसरा नियोग होने

2016
02:25:37,920 --> 02:25:42,240
से प्राप्त होता है वह गंधर्व

2017
02:25:42,240 --> 02:25:47,280
एक स्त्री से संभोग करने से गंधर्व जो तृतीय

2018
02:25:47,280 --> 02:25:51,520
दो के पश्चात तीसरा पति हो होता है वह अग्नि

2019
02:25:51,520 --> 02:25:55,680
और इसी तरीके से आगे इनके नाम बताए गए हैं 11वीं 10 तक पति

2020
02:25:55,680 --> 02:25:59,680
हैं वैसे ही पुरुष भी 11वीं स्त्री तक नियोग कर सकता है

2021
02:25:59,680 --> 02:26:03,840
11 11 पुरुषों तक नियोग कर सकते हैं और अगर बाहर

2022
02:26:03,840 --> 02:26:07,840
जाने की वजह से नियोग कर रहे हैं ना कि वह चला गया कहीं तो उसमें सिस्टम

2023
02:26:07,840 --> 02:26:11,920
यह है कि अगर आपने किसी को नियुक्त कर लिया और अगर वह जो बाहर गया वापस आ जाएगा

2024
02:26:11,920 --> 02:26:16,560
तो जिसके जिसको आपने नियुक्त किया है उसको आप तब छोड़ दो वो

2025
02:26:16,560 --> 02:26:20,960
वो हटा दिया जाएगा नियुक्ति से वापस पुराने वाले पति के साथ पुराने वाला पुराना

2026
02:26:20,960 --> 02:26:25,040
व्यवहार शुरू हो जाएगा क्या बात है मांसाहार को

2027
02:26:25,040 --> 02:26:27,440
लेकर के आप लांछन लगाते हो जो पहली

2028
02:26:27,440 --> 02:26:31,440
सत्यार्थ प्रकाश छपी थी अभी प्रमाणिकता परंपरा तो है नहीं आपके यहां कौन प्रमाणिक

2029
02:26:31,440 --> 02:26:35,440
है कौन नहीं तो पहली सत्यार्थ प्रकाश में मांसाहार भरभर किताब वो किसी

2030
02:26:35,440 --> 02:26:39,760
दिन अगले भाग में हम लोग मैं आपके समक्ष प्रस्तुत करूंगा यदि आवश्यकता पड़ी तो

2031
02:26:39,760 --> 02:26:45,760
अभी केवल थोड़ा सा ट्रेलर दे देते हैं। है ना

2032
02:26:47,040 --> 02:26:51,520
ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 85

2033
02:26:51,520 --> 02:26:55,520
मंत्र 45 इसमें क्या है? वीर

2034
02:26:55,520 --> 02:26:59,520
सेचन में समर्थ ऐश्वर्य युक्त पुरुष तू इस

2035
02:26:59,520 --> 02:27:03,520
विवाहित स्त्री व विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ श्रेष्ठ पुत्र और

2036
02:27:03,520 --> 02:27:07,520
सौभाग्य युक्त कर इस विवाहित स्त्री में 10 पुत्र उत्पन्न कर और

2037
02:27:07,520 --> 02:27:11,520
11वीं स्त्री को मान हे स्त्री तू भी विवाहित पुरुष व नियुक्त

2038
02:27:11,520 --> 02:27:15,600
पुरुषों से 10 संतान उत्पन्न कर और 11 पति को समझ

2039
02:27:15,600 --> 02:27:21,600
बार-बार 10 11 10 11 10 11 के बिना तो काम ही नहीं चलेगा ना

2040
02:27:29,840 --> 02:27:35,840
यह तो मैंने पढ़ ही दिया एनारी विध्व

2041
02:27:36,080 --> 02:27:36,640
बताइए

2042
02:27:36,640 --> 02:27:41,120
पत्नी को पति कह रहा है गुदा द्वार से जो अपान वायु निकलती है उसकी रक्षा कर

2043
02:27:41,120 --> 02:27:47,120
यह भाष्य इनके वैज्ञानिक भाष्य प्रामाणिक भाष्य

2044
02:27:47,760 --> 02:27:53,760
है ना भूदा द्वार से निकले निकलने वाली अपान वायु

2045
02:27:56,720 --> 02:28:00,720
फिर आगे इसी तरीके से और भी भाष्य मनुस्मृति इत्यादि की भी वो लिया

2046
02:28:00,720 --> 02:28:04,800
है तो मैं इतना पर्याप्त समझता हूं और

2047
02:28:04,800 --> 02:28:08,800
काफी चीजें बातें बता दी है और इसके अलावा कहीं पर लिख रहे हैं

2048
02:28:08,800 --> 02:28:12,880
शूद्र को वेद पढ़ाने चाहिए कहीं पर लिख रहे हैं नहीं पढ़ाने चाहिए यजुर्वेद 26

2049
02:28:12,880 --> 02:28:17,200
दो शूद्र को अनार्य लिख रहे हैं आर्य है ही नहीं शूद्र के लिए कोई जगह नहीं है आर्य समाज

2050
02:28:17,200 --> 02:28:21,280
तो शूद्र का तो अस्तित्व ही मिटा देना चाहता है जो आर्य समाज

2051
02:28:21,280 --> 02:28:25,360
वास्तविकता में देखा जाए तो क्योंकि उसके अनुसार जो भी है जाएगा आर्य समाज में गायत्री मंत्र

2052
02:28:25,360 --> 02:28:29,920
पड़ेगा जो गायत्री मंत्र पड़ेगा जनेऊ धारण करे जने धारण करेगा शुद्र ही नहीं

2053
02:28:29,920 --> 02:28:34,560
और 26 दो के अनुसार भगवान कह रहे हैं

2054
02:28:34,560 --> 02:28:38,560
ईश्वर कह रहे हैं 26 दो के अनुसार यजुर्वेद 26 दो का जो

2055
02:28:38,560 --> 02:28:42,640
भाष्य वो किया है कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शद्र सबके लिए वेद जो वेद है

2056
02:28:42,640 --> 02:28:46,720
वेद का उपदेश है और सब पढ़ सकते हैं तो सब पढ़ सकते हैं तो शद्र भी पढ़

2057
02:28:46,720 --> 02:28:50,800
सकता है शद्र वो है जिसका जन्म नहीं होता शद्र वो है या तो ये

2058
02:28:50,800 --> 02:28:51,760
मान लो कि जन्मना वर्ण

2059
02:28:51,760 --> 02:28:55,840
व्यवस्था है। तब तो माना जाएगा कि हां भाई आप जन्म से मानते हैं ब्राह्मण क्षत्रिय

2060
02:28:55,840 --> 02:29:00,240
वैश्य शूद्र और तब आप कह रहे हैं कि हां ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सभी के लिए वो है

2061
02:29:00,240 --> 02:29:04,400
और अगर कर्मणा मानते हैं तो कर्मणा तो फिर शद्र शूद्र जो है उसकी गति

2062
02:29:04,400 --> 02:29:08,480
हो ही नहीं सकती वो तो जैसे ही उसको अधिकार

2063
02:29:08,480 --> 02:29:12,960
प्राप्त होगा वेद पढ़ने का वैसे ही वो द्विज हो जाएगा। ठीक है?

2064
02:29:12,960 --> 02:29:17,120
तो ये इनकी बातें हैं दोहरी। तो बहुत सारी चीजों का जवाब

2065
02:29:17,120 --> 02:29:21,200
दे दिया है और मुझे लगता है पर्याप्त चीजें मैंने बता दी

2066
02:29:21,200 --> 02:29:25,200
हैं। इन्होंने शिव मोहिनी प्रकरण पर जो प्रश्न उठाया था उसका उत्तर

2067
02:29:25,200 --> 02:29:29,520
मैंने तभी दे दिया था। शिव मोहिनी प्रकरण जब

2068
02:29:29,520 --> 02:29:33,680
वो उस दिन जब चर्चा समाप्त हुई थी उसके बाद मैंने शिव मोहिनी प्रकरण का उत्तर दे दिया

2069
02:29:33,680 --> 02:29:37,680
था और पुराणों से जुड़ी हुई बहुत सी कथाएं हैं जिस तरीके से

2070
02:29:37,680 --> 02:29:41,760
यह भावार्थ निकाल के वेदों में आने वाली बात का पहली बात तो गलत अर्थ करते

2071
02:29:41,760 --> 02:29:45,920
फिर अपनी बातों का कहीं अलंकार इत्यादि करके फिट करके अपना भावार्थ लगा देते

2072
02:29:45,920 --> 02:29:49,920
हैं। वेदों जो पुराणों में दी गई कथाएं हैं उनका संदर्भ वेदों में

2073
02:29:49,920 --> 02:29:54,000
भी मिलता है। शब्दांतर से शब्दांतर से वह वर्णन मिलता है वेदों

2074
02:29:54,000 --> 02:29:59,040
में। और यह सारी बातें इस ग्रंथ में बताई गई हैं। कई

2075
02:29:59,040 --> 02:30:03,280
प्रमुख जो घटनाएं हैं पुराणों की जिस पर आक्षेप लगाए

2076
02:30:03,280 --> 02:30:07,360
जाते हैं विरोधियों के द्वारा। याद से नहीं हो रहा है। काफी समय से हो रहा है। तो

2077
02:30:07,360 --> 02:30:11,600
जो उनका वास्तविक अर्थ है जैसे यह बता रहे थे ना आदि दैविक आध्यात्मिक आदि

2078
02:30:11,600 --> 02:30:15,760
भौतिक अर्थ ऐसे ही वो तीन प्रकार के अर्थ इसमें बताए गए हैं। प्रत्येक घटना के

2079
02:30:15,760 --> 02:30:19,760
कि वो घटना क्या प्रस्तुत करना चाहती है और यह स्वयं को

2080
02:30:19,760 --> 02:30:23,760
इतना ज्ञानी समझते हैं। इतना एक्सपीरियंस वाले समझते हैं। मगर आज तक इन्होंने जानने की कोशिश

2081
02:30:23,760 --> 02:30:28,240
नहीं की और अपने भाष्य को कह रहे हैं कि हमारे बहुत हमारे

2082
02:30:28,240 --> 02:30:32,240
अच्छे भाष्य सुंदर भाष्य वैज्ञानिक भाष्य इसलिए उसको स्वीकार करना चाहिए। ये

2083
02:30:32,240 --> 02:30:32,740
है

2084
02:30:32,400 --> 02:30:36,400
इनके वैज्ञानिक भाष्य। पति अपनी पत्नी से कह रहा है कि गुदा द्वार से निकलने

2085
02:30:36,400 --> 02:30:40,400
वाली जो अपान वायु है उसकी रक्षा कर और

2086
02:30:40,400 --> 02:30:45,920
वह अंधा सांप पता नहीं क्या है बैल से भोग

2087
02:30:45,920 --> 02:30:49,920
अब ये सब चीजें हैं जो मेरा कभी भी मंतव्य

2088
02:30:49,920 --> 02:30:54,160
नहीं रहा है क्योंकि अगर इस तरह से हम लोग चर्चा करेंगे

2089
02:30:54,160 --> 02:30:58,560
इन चीजों पर अंतहीन चर्चाएं चलती रहेंग बात अलग है हमारा ही पक्ष मजबूत

2090
02:30:58,560 --> 02:31:02,560
है उसमें भी मगर बहुत लॉन्ग प्रोसेस है इसलिए मैंने कहा था तीन चीजों

2091
02:31:02,560 --> 02:31:06,560
पर बात कर सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र शाश्वत धर्म जिसके पास

2092
02:31:06,560 --> 02:31:10,720
है उसकी बात सारी मान ली जाएगी हिंदू शब्द भी मान लिया जाएगा हिंदू शब्द गलत है मान लेंगे

2093
02:31:10,720 --> 02:31:14,800
भाई तुम्हारा भेदभाव सही है मान लेंगे भाई चीजें सिद्ध तो करो

2094
02:31:14,800 --> 02:31:17,360
अपनी

2095
02:31:17,360 --> 02:31:21,440
अभी वो जो बकरी बकरे का दूध और इनके यहां तो वो पतंजलि

2096
02:31:21,440 --> 02:31:25,680
वाले कह रहे गधी का गधी का दूध भी पी लो तो उसको भी स्वीकार कर लेंगे हमारे

2097
02:31:25,680 --> 02:31:29,760
यहां पर जो है जो दिखाई देने वाले गुण है उसके आधार पर स्वीकार नहीं की

2098
02:31:29,760 --> 02:31:33,760
जाती चीजें हमारे यहां पर शास्त्रों के द्वारा बताया जाने वाले जो गुण है उसके

2099
02:31:33,760 --> 02:31:37,920
आधार पर स्वीकार की जाती। यही तो अंतर है। यह जो इंद्रियों

2100
02:31:37,920 --> 02:31:42,080
से प्राप्त होने वाली सूचना है उसके आधार पर अपने धर्म अधर्म का निर्णय कर लेते हैं। और जहां

2101
02:31:42,080 --> 02:31:46,320
पर इनको समझ में नहीं आ रहा होता इंद्रियों से वहां कहते यह कैसे हो गया? आप मंत्र पढ़ने

2102
02:31:46,320 --> 02:31:50,320
से मना कैसे कर देते हो? खुद ही कहते हैं कि भैया रश्मि विज्ञान है। वेद मंत्रों में

2103
02:31:50,320 --> 02:31:54,560
भी वाइबेशंस हैं। उससे सृष्टि उत्पन्न होती है। जब वो वाइबेशंस

2104
02:31:54,560 --> 02:31:58,640
है तो यह भी तो आवश्यक होगा कि वो वाइबेशंस धारण कौन करेगा? किसके

2105
02:31:58,640 --> 02:32:02,720
कंठ से उच्चारित होने पर वाइबेशंस उचित होंगे। किसके कंठ से उच्चारित होने

2106
02:32:02,720 --> 02:32:06,960
पर वाइब्रेशन बदल सकते हैं। यह सब बातें नहीं सोची।

2107
02:32:06,960 --> 02:32:10,960
खैर मुझे लगता है मैंने पर्याप्त चीजें दे दी हैं और यह सारी

2108
02:32:10,960 --> 02:32:15,440
चीजें इनके यहां भरी पड़ी है और यह कहते हैं हमारा प्रामाणिक है। सुंदरता वैज्ञानिक है।

2109
02:32:15,440 --> 02:32:19,600
और इसलिए आप हमारे को मान लो। जबकि अर्थ से प्रामाणिकता सिद्ध

2110
02:32:19,600 --> 02:32:24,000
नहीं होती है। प्रामाणिकता से अर्थ प्रामाणिक सिद्ध होता है। ठीक है?

2111
02:32:24,000 --> 02:32:28,640
अर्थ सुंदर होने से अर्थ की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। प्रामाणिक

2112
02:32:28,640 --> 02:32:32,720
जब उसकी प्रामाणिकता सिद्ध होती है तब वह अर्थ मान्य होता है।

2113
02:32:32,720 --> 02:32:37,280
ठीक है ना? चलिए

2114
02:32:37,280 --> 02:32:41,840
और

2115
02:32:41,840 --> 02:32:46,320
समय देने के लिए सभी को आभार और किसी को भी अगर वैचारिक

2116
02:32:46,320 --> 02:32:50,800
मतभेद के निमित्त चर्चा करनी हो तो वह संपर्क कर सकता है

2117
02:32:50,800 --> 02:32:54,800
और मोहित गड जी से बात हो चुकी है। जल्दी उनके साथ

2118
02:32:54,800 --> 02:32:58,640
हमारी चर्चा होने वाली है।

2119
02:32:58,640 --> 02:33:04,640
जय श्री राम सभी को।

2120
02:33:26,790 --> 02:33:30,790
[संगीत]
