1
00:00:00,440 --> 00:00:04,960
तो जो लोग फॉलो करते हैं चैनल को उनको ज्ञात होगा

2
00:00:04,960 --> 00:00:09,320
कि आज हमने एक लाइव स्ट्रीम फिर से रखी है जिसमें

3
00:00:09,320 --> 00:00:13,320
की एक स्कन डिपल है वह आज हमारे साथ जुड़ने

4
00:00:13,320 --> 00:00:15,960
वाले

5
00:00:15,960 --> 00:00:20,400
हैं कुछ वही सारे जो टॉपिक्स कई दिनों से चल रहे हैं

6
00:00:20,400 --> 00:00:24,600
आपको मालूम होगा कुछ संशय संशय पूर्ण शिक्षाए हैं जो कि विवादास्पद

7
00:00:24,600 --> 00:00:28,720
है मतलब जिस पर मैंने कुछ प्रश्न उठाए तो यह एक स्वस्थ

8
00:00:28,720 --> 00:00:32,840
चर्चा मान के चलिए इसको ऐसा ना समझे कि कोई डिबेट होने वाली है हां एक

9
00:00:32,840 --> 00:00:37,880
वास्तविकता तक पहुंचने का प्रयास है सनातन योद्धा नाम से जुड़ रहे

10
00:00:37,880 --> 00:00:43,880
हैं आ गए हैं

11
00:00:46,440 --> 00:00:49,920
वो

12
00:00:49,920 --> 00:00:54,560
तो भ जय श्री राम जय श्री राम

13
00:00:54,560 --> 00:00:59,280
बड़ा सौभाग्य है जो आपके सामने बैठने का मौका मिल रहा है जय श्री राम

14
00:00:59,280 --> 00:01:03,400
जय श्री राम तो आप अपना थोड़ा सा परिचय देंगे

15
00:01:03,400 --> 00:01:05,880
हमें सबसे

16
00:01:05,880 --> 00:01:10,520
पहले मेरा नाम शिवांग रस्तोगी है अच्छा

17
00:01:10,520 --> 00:01:15,360
मैं स्वर्णकार परिवार से आता हूं अच्छा

18
00:01:15,360 --> 00:01:19,600
और मैं उत्तर प्रदेश के बरेली जिला

19
00:01:19,600 --> 00:01:23,680
का रहने वाला हूं अच्छा अच्छा बहुत

20
00:01:23,680 --> 00:01:27,720
बहुत सुरर तो ये मतलब जो शिक्षा है धार्मिक विषय पर आज

21
00:01:27,720 --> 00:01:32,000
हम चर्चा करने वाले तो आपकी बैकग्राउंड है वो थोड़ा सा शेयर कर

22
00:01:32,000 --> 00:01:36,200
दीजिए मतलब कहां से आप शिक्षित

23
00:01:36,200 --> 00:01:40,600
है कहां से शिक्षा प्राप्त हो रही है किससे जुड़े हुए हैं प्रत्यक्ष

24
00:01:40,600 --> 00:01:45,040
रूप से आपके जो गुरु है वो कौन

25
00:01:45,040 --> 00:01:49,120
हैसे भैया मैं गुरुजनों की बातें

26
00:01:49,120 --> 00:01:53,280
मतलब जो दोहराते हैं उनका उनका मतलब

27
00:01:53,280 --> 00:01:58,840
बातों को मैं प्रस्तुत करता हूं और इस समय

28
00:01:58,840 --> 00:02:03,760
मैं जी महाराज 108 108

29
00:02:03,760 --> 00:02:07,920
पीठा पर महाराज का आहवान करता हूं

30
00:02:07,920 --> 00:02:11,960
क्या शुभ नाम बताया आपने उनका श्री वेदांती जी

31
00:02:11,960 --> 00:02:16,200
महाराज श्री 1008 वेदांती जी महाराज अ अा ये किस परंपरा

32
00:02:16,200 --> 00:02:20,240
से जुड़े हुए

33
00:02:20,240 --> 00:02:24,360
जी यह राम भद्राचार्य के परंपरा से जुड़े

34
00:02:24,360 --> 00:02:28,760
हुए अच्छा मतलब आप इसकन से शिक्षित नहीं है

35
00:02:28,760 --> 00:02:32,800
आप जी नहीं जी नहीं बकल नहीं

36
00:02:32,800 --> 00:02:37,000
तो आपने क्योंकि हमारी जो आपकी भेंट हुई है जो हमारी और आपकी वार्ता हो रही है

37
00:02:37,000 --> 00:02:41,000
वो एक्चुअली हो रही है क्योंकि हमने स्कोन की शिक्षा पर कुछ प्रश्न उठाए

38
00:02:41,000 --> 00:02:45,080
थे तो अभी अभी आप यह कह रहे कि स्कोन

39
00:02:45,080 --> 00:02:49,080
की शिक्षा में आंशिक रूप से त्रुटियां है आप

40
00:02:49,080 --> 00:02:53,160
य स्कार कर रहे आपने कमेंट के माध्यम से भी बताया था कि आंशिक रूप से शिक्षा में

41
00:02:53,160 --> 00:02:57,400
त्रुटिया है तो आप ये स्वीकार करते हुए बता रहे कि हम

42
00:02:57,400 --> 00:03:00,200
मगर हा कुछ चीज है जो जानने लायक है उस बारे

43
00:03:00,200 --> 00:03:04,480
में आप बताना चाहते हैं तो फिर इसका अर्थ

44
00:03:04,480 --> 00:03:09,280
तो ये हुआ कि काफी सारे क्वेश्चन ऐसे किए हैं हमने इस कन के लिए

45
00:03:09,280 --> 00:03:13,560
जैसे कि जिस प्रकार दूध से दही बन सकता है पर दही से दूध नहीं उसी प्रकार

46
00:03:13,560 --> 00:03:17,560
कृष्ण तो शिव बन सकते हैं पर शिव बनने के बाद वो कृष्ण वापस कृष्ण नहीं बन सकते

47
00:03:17,560 --> 00:03:21,640
तो यहां पर ईश्वर बाधित होता है और ईश्वर अगर बाधित हो

48
00:03:21,640 --> 00:03:25,720
गया तो फिर वो ईश्वर नहीं जिसको हम ईश्वर कह रहे हैं अगर ईश्वर

49
00:03:25,720 --> 00:03:30,440
बाधित हो गया तो वो ईश्वर नहीं तो यहां पर जो

50
00:03:30,440 --> 00:03:34,480
स्न से प्राप्त होने वाली शिक्षा है उसको आप मानते हैं कि हा यह जो चीज

51
00:03:34,480 --> 00:03:40,080
है य नहीं य ठीक नहीं है

52
00:03:40,080 --> 00:03:44,920
जी इसकन का मैं कुछ मतलब विषयों पर

53
00:03:44,920 --> 00:03:49,120
समर्थन करता हूं और कुछ विषयों पर मैं अस

54
00:03:49,120 --> 00:03:53,440
समर्थन भी करता हूं जैसे कि हां

55
00:03:53,440 --> 00:03:58,680
यह जो बात है कि मतलब

56
00:03:58,680 --> 00:04:02,880
महादेव श्री कृष्ण के वो मतलब फॉर्म है जो

57
00:04:02,880 --> 00:04:07,040
मतलब कर्ड तो मन सकते हैं पर कड से कभी मिल्क नहीं मन

58
00:04:07,040 --> 00:04:11,200
सकते तो यह बात आप मानते हैं

59
00:04:11,200 --> 00:04:15,400
यह बात नहीं नहीं मानता हूं मैं मतलब यह जो लिखा हुआ है

60
00:04:15,400 --> 00:04:20,000
यह ब्रह्म संहिता में लिखा हुआ है जी ब

61
00:04:20,000 --> 00:04:24,160
ब्रह्म संहिता में लिखा हुआ है यह प्रॉपर श्लोक है पर

62
00:04:24,160 --> 00:04:28,160
इस श्लोक में यह बताया गया है कि श्री कृष्ण की इच्छा से

63
00:04:28,160 --> 00:04:31,480
वहां पर शिव की बात नहीं

64
00:04:31,480 --> 00:04:35,960
शिव की बात नहीं हुई शंकर की बात हुई है शंकर और शिव में बहुत बड़ा

65
00:04:35,960 --> 00:04:39,960
भेद है कि मतलब शिव अलग चीज

66
00:04:39,960 --> 00:04:44,640
है सदा शिव अलग चीज है और शंकर भी अलग चीज है

67
00:04:44,640 --> 00:04:49,440
तो वहां पर शंकर की बात की कि शंकर श्री कृष्ण

68
00:04:49,440 --> 00:04:53,560
के रोम रोम से अनेकों शंकर अनेकों विष्णु और अनेकों

69
00:04:53,560 --> 00:04:55,200
ब्रह्मा प्रकट होते

70
00:04:55,200 --> 00:05:00,320
हैं और उनकी इच्छा से उनमें मिल जाते हैं

71
00:05:00,320 --> 00:05:04,360
चलिए आप मतलब कह रहे हैं कि जो संदर्भ है मैं समझ नहीं पाया हूं और

72
00:05:04,360 --> 00:05:08,720
आप ठीक से उसे समझा रहे हैं तरीके से जी

73
00:05:08,720 --> 00:05:12,720
तो मैं यह पूछूंगा कि जब श्री कृष्ण भगवान के रूम रूम वो

74
00:05:12,720 --> 00:05:17,000
पार्ट्स निकलते हैं अलग अलग बहुत सारे शंकर बनते हैं तो जब

75
00:05:17,000 --> 00:05:21,280
श्री कृष्ण अपने रोम रोम में आ जाते हैं रोम रोम श्री कृष्ण का रोम मान लीजिए

76
00:05:21,280 --> 00:05:25,720
एक रोम और वह एक शंकर है मान लीजिए तो

77
00:05:25,720 --> 00:05:29,720
जब रोम पर्ट पार्टीशन होता रोम के रूप में तो क्या उस

78
00:05:29,720 --> 00:05:33,120
वो सर्व शक्तिमान नहीं होते

79
00:05:33,120 --> 00:05:35,880
हैं

80
00:05:35,880 --> 00:05:40,240
जी विष्णु पुराण में

81
00:05:40,240 --> 00:05:44,960
शक्तिया बताई मैं आगे बढूंगा मैं आपसे य पूछ रहा हूं जिस समय वो

82
00:05:44,960 --> 00:05:49,120
रोम रोम पार्टीशन होता है जब करोड़ों शंकर बन जाते

83
00:05:49,120 --> 00:05:53,280
हैं तो जो रोम के रूप में कृष्ण जा रहे हैं तो क्या रोम के रूप में वो पूर्ण

84
00:05:53,280 --> 00:05:56,160
नहीं

85
00:05:56,160 --> 00:06:00,160
है श्री कृष्ण अपने रोम के रूप में पूर्ण है या नहीं मैं य

86
00:06:00,160 --> 00:06:04,480
पूछ रहा हूं जैसे मान लीजिए कि मैं एक इंसान हूं मैं एक इंसान

87
00:06:04,480 --> 00:06:08,560
हूं और मैं अपने इस हिस्से को हल्का सा हल्का सा अपने से अलग कर देता हूं और

88
00:06:08,560 --> 00:06:12,560
शंकर बना देता हूं आपका ये कहने का मतलब है मैंने ये बनाया तो ये जो

89
00:06:12,560 --> 00:06:17,200
मेरा हिस्सा है मेरे बराबर ताकत इस हिस्से में नहीं है ठीक है

90
00:06:17,200 --> 00:06:21,200
क्योंकि मैं बाध्य हूं अब श्री कृष्ण का जो हिस्सा है तो

91
00:06:21,200 --> 00:06:25,280
क्या श्री कृष्ण जब एक रोम के रूप में कहीं पर जा रहे हैं तो पूर्ण है या नहीं

92
00:06:25,280 --> 00:06:30,000
है क्योंकि वो तो अबाध है बिल्कुल है बिल्कुल है

93
00:06:30,000 --> 00:06:34,280
और समान भाव से है यानी जो उनका हर रोम

94
00:06:34,280 --> 00:06:38,520
है वो भी पूर्ण रूप से श्री कृष्ण ही है जी

95
00:06:38,520 --> 00:06:42,960
बिल्कुल और कोई भी भेदभाव नहीं है इसमें भगवत गीता में

96
00:06:42,960 --> 00:06:47,200
लोक में हमें ये पता चलता है कि कोई भी भेदभाव नहीं है जी बिल्कुल तो

97
00:06:47,200 --> 00:06:51,000
भेदभाव जब है ही नहीं तो फिर बात ही नहीं है कोई उसम विवाद की बात

98
00:06:51,000 --> 00:06:55,400
तो तब है ना जब यह कहा जाए कि भेदभाव है श्री कृष्ण भगवान

99
00:06:55,400 --> 00:07:00,040
यदि शंकर बन रहे हैं और वो अपने रूम से शंकर बन रहे हैं मगर

100
00:07:00,040 --> 00:07:04,080
रोम भी पूर्ण है अगर श्री कृष्ण भगवान पूर्ण है या फिर हमें नियम

101
00:07:04,080 --> 00:07:08,360
लागू करना पड़ेगा कि श्री कृष्ण भगवान जना रोम अपने से अलग करते हैं

102
00:07:08,360 --> 00:07:12,480
तो वह जो रोम होता है उस हिस्से में पूर्ण शक्तिमान नहीं हो व

103
00:07:12,480 --> 00:07:16,480
पूर्ण ईश्वर नहीं होते अगर हम यह कर देंगे तो हमें यह नियम मानना पड़ेगा

104
00:07:16,480 --> 00:07:20,520
कि श्री कृष्ण के ऊपर एक नियम लागू हो गया कि श्री कृष्ण

105
00:07:20,520 --> 00:07:24,600
भगवान अपने रोम के रूप में पूर्ण ईश्वर नहीं है जब

106
00:07:24,600 --> 00:07:28,600
नियम लागू हो गया तो ईश्वर की व्याख्या है सत्यम ज्ञान अनंतम

107
00:07:28,600 --> 00:07:32,720
ब्र ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है

108
00:07:32,720 --> 00:07:36,880
वह तो सभी नियमों के बनाने वाला सर्व नियामक है तो अगर वो इस रूप

109
00:07:36,880 --> 00:07:41,000
में अपने रोम के रूप में पूर्ण ईश्वर नहीं है तो बाधित बाधित

110
00:07:41,000 --> 00:07:45,440
हो गए और जो बाधित हो गए तो व ईश्वर ही नहीं रहे और जब ईश्वर नहीं रहे

111
00:07:45,440 --> 00:07:49,720
तो फिर वहां पर पूजा किसकी हो रही है भक्ति किसकी हो रही है

112
00:07:49,720 --> 00:07:54,040
भाई हमारे दर्शन में और अन्य दर्शनों में यही तो अंतर है सबसे बड़ा

113
00:07:54,040 --> 00:07:58,040
हम जिस ईश्वर को पूजा करते हैं वो ईश्वर है पूर्ण ईश्वर

114
00:07:58,040 --> 00:08:02,240
अन्य ग्रंथों के माध्यम विचारधारा के माध्यम से प्रतिपादित होने वाला

115
00:08:02,240 --> 00:08:06,080
जो ईश्वर है ित है वण ईश्वर नहीं है वो स्वयं य

116
00:08:06,080 --> 00:08:10,920
कहते व ग्रंथ स्वयं य कहते हैं जैसे की में जो

117
00:08:10,920 --> 00:08:14,960
इस्लाम के ईश्वर है व कह रहे कि मैं अवतार नहीं ले सकता मेरी संतान जन्म नहीं ले

118
00:08:14,960 --> 00:08:19,080
सकती इसीलिए उनके मति पूजा नहीं है मगर हमारा

119
00:08:19,080 --> 00:08:23,120
ईश्वर है यदाय धर्म भ भारता अन

120
00:08:23,120 --> 00:08:27,360
धर्म स हमारा ईश्वर कह रहा है जब

121
00:08:27,360 --> 00:08:31,440
जब धरती पर पाप बढ़ेगा साधु उधार के लिए धरती मा की रक्षा के लिए प्रकट

122
00:08:31,440 --> 00:08:35,520
हो जाऊंगा तो यह है वो अबाध ईश्वर मगर जैसे ही हम यह कहेंगे

123
00:08:35,520 --> 00:08:39,720
कि वो शिव तो बनते हैं मगर शिव जी कृष्ण नहीं बनते तो वहां पर हमें

124
00:08:39,720 --> 00:08:43,800
मानना पड़ेगा कि श्री कृष्ण अपने मूल फॉर्म में जितने ज्यादा

125
00:08:43,800 --> 00:08:47,840
ताकतवर है जितने ज्यादा आबाद है उतने अबाध वो शंकर

126
00:08:47,840 --> 00:08:53,160
के रूप में नहीं है अगर हम यह मानेंगे तो श्री कृष्ण को हमने बाधित मान

127
00:08:53,160 --> 00:08:57,240
लिया श्री कृष्ण के अध्य रूप की रक्षा करने के लिए हमको

128
00:08:57,240 --> 00:09:01,400
यह मानना पड़ेगा कि श्री कृष्ण जब भी कोई फॉर्म ले रहे हैं करोड़ों शंकर बन रहे

129
00:09:01,400 --> 00:09:06,680
कुछ भी बन रहा है वो भी पूर्ण ही है

130
00:09:06,680 --> 00:09:10,800
नहीं नहीं मतलब मैं हल्का

131
00:09:10,800 --> 00:09:14,840
सा बताना चाहूंगा जी कि जैसे

132
00:09:14,840 --> 00:09:20,600
कि नहीं अभी आपने माना ना कि वो पूर्ण है

133
00:09:20,600 --> 00:09:25,120
जी मैंने ये कहा कि वो जिस भी रूप में

134
00:09:25,120 --> 00:09:29,280
इस जगत में आते हैं इस माया में आते हैं

135
00:09:29,280 --> 00:09:33,840
उ उन रूपों में कोई भी भेदभाव नहीं है पर

136
00:09:33,840 --> 00:09:37,840
ईश्वर एक है श्री कृष्ण और उनकी ही इच्छा

137
00:09:37,840 --> 00:09:42,000
से उनके जितने भी रूम है वो सारे कम करते हैं

138
00:09:42,000 --> 00:09:46,200
अब जैसे कि आप मेरी बात समझ नहीं रहे हम लोग भटक जाएंगे

139
00:09:46,200 --> 00:09:50,560
मैं यह कह रहा हूं कि आपने कहा कि उनके जितने भी रोम है

140
00:09:50,560 --> 00:09:55,160
वो उनसे अलग होते हैं वो जगत में आते हैं वो रोम

141
00:09:55,160 --> 00:09:59,360
वो रोम पूर्ण होता है एक एक रोम की नहीं होता है

142
00:09:59,360 --> 00:10:03,560
मैं यह नहीं कह रहा कि श्री कृष्ण भगवान सर्वोच्च सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है भाई मैं भी राम की पूजा

143
00:10:03,560 --> 00:10:07,680
करता हूं राम रूप में ईश्वर की पूजा मैं करता हूं भक्ति करता हूं मगर जब हम ये

144
00:10:07,680 --> 00:10:11,720
कहते हैं कि शिव भगवान का जो शिव रूप है वो पूर्ण नहीं

145
00:10:11,720 --> 00:10:16,280
है तो यहां पर मेरे और आपकी विचारधारा गलत अंतर आ जाएगा

146
00:10:16,280 --> 00:10:20,480
मेरा कहना है भगवान के कितने भी रूप है उम भेद नहीं है भगवान

147
00:10:20,480 --> 00:10:24,480
शिव भी पूर्ण है शंकर रूप भी पूर्ण है भगवती रूप भी पूर्ण है और

148
00:10:24,480 --> 00:10:29,600
क्या कहते गणपति रूप भी पूर्ण है ब्रह्मा रूप भी पूर्ण है विष्णु रूप भी पूर्ण है

149
00:10:29,600 --> 00:10:33,760
अपनी तर ये जो है ये

150
00:10:33,760 --> 00:10:35,760
सारे पांचों देवताओं का पंच देव

151
00:10:35,760 --> 00:10:39,840
उपासना कोई ये नहीं कि सि पुराणों के आधार पर वेदों में

152
00:10:39,840 --> 00:10:43,960
स्वीकार किया गया पांचों देव पांचों रूपों की पूर्णता वेदों

153
00:10:43,960 --> 00:10:48,960
में श शास्त्रों में छ छ

154
00:10:48,960 --> 00:10:53,320
है जी जी बोलिए बोलिए आप बोलिए प्रभु जी

155
00:10:53,320 --> 00:10:57,400
छह है छह और मैं ये कहना चाहूंगा जैसे कि अभी मैं आपको

156
00:10:57,400 --> 00:11:01,960
थोड़ा सा उदाहरण देता हूं मैं ना पहले एक

157
00:11:01,960 --> 00:11:06,080
हम एक विषय हम लोग सेट कर ले पहले कि हम लोग किस

158
00:11:06,080 --> 00:11:10,120
चीज पर हमारे बीच में मतभेद है क्या आप यह मानते हैं कि

159
00:11:10,120 --> 00:11:14,320
उनसे उनके यय हम मतभेद सेट कर ले

160
00:11:14,320 --> 00:11:18,480
तो मतभेद हमारा यह है कि मैं यह कह रहा हूं कि श्री कृष्ण से जब उनके रोम

161
00:11:18,480 --> 00:11:22,480
अलग होते हैं तो वोह पूर्ण होते हैं अगर व रोम पूर्ण होंगे

162
00:11:22,480 --> 00:11:26,640
तभी श्री कृष्ण पूर्ण होंगे अगर वो पूर्ण

163
00:11:26,640 --> 00:11:31,920
नहीं है तो श्री कृष्ण पूर्ण नहीं है

164
00:11:31,920 --> 00:11:35,920
जी आवाज आ रही आपको क्या यही हमारा विषय है बात करने का

165
00:11:35,920 --> 00:11:39,920
कि आप यह कह रहे हो जो रो अलग अलग हो रहे हैं वो पूर्ण

166
00:11:39,920 --> 00:11:44,360
नहीं है आप यह कह रहे हो उसी पर आ रहा हूं उसी पर

167
00:11:44,360 --> 00:11:48,480
आहा पहले हम लोग य चेक तो करें कि क्या आप य मानते हो व पूर्ण

168
00:11:48,480 --> 00:11:53,360
है कि नहीं मानते हो पूर्ण है फिर उसके बाद

169
00:11:53,360 --> 00:11:57,400
जी श्री कृष्ण के अलावा कोई भी पूर्ण नहीं है और मैं आपको प्रॉपर

170
00:11:57,400 --> 00:12:01,440
भगवत गीता का देखिए भगवत गीता का उदाहरण

171
00:12:01,440 --> 00:12:05,920
भगवत गीता का उदाहरण मैं भी आपको दूंगा मैं आपको शास्त्रों से ही बात करूंगा

172
00:12:05,920 --> 00:12:10,000
तो आपका कहने का मतलब है जो श्री कृष्ण का जो

173
00:12:10,000 --> 00:12:14,080
टुकड़ा उनसे अलग होता है रोम शंकर जी शंकर भगवान जो होते हैं

174
00:12:14,080 --> 00:12:18,280
व श्री कृष्ण का ही रोम होता है ना तो रोम रूप में श्री कृष्ण भगवान

175
00:12:18,280 --> 00:12:22,000
अपने पूर्ण नहीं होते आप यह कह रहे

176
00:12:22,000 --> 00:12:26,120
हैं जी बिल्कुल तो इसका अर्थ यह हुआ कि

177
00:12:26,120 --> 00:12:30,440
जब जब श्री कृष्ण भगवान अपना रूम अलग तो वो उसम पूर्ण

178
00:12:30,440 --> 00:12:34,720
सर्व शक्तिमान नहीं रह सकते

179
00:12:34,720 --> 00:12:38,880
नहीं कोई भी रोम अलग होने प तीन चीजें बाधित

180
00:12:38,880 --> 00:12:43,520
होती है तीन चीजें उसम बंद जाती है जी पहला

181
00:12:43,520 --> 00:12:46,960
परमात्मा तत्व जो तत्व है परमात्मा

182
00:12:46,960 --> 00:12:51,360
तत्व वो आत्म

183
00:12:51,360 --> 00:12:55,480
त तत्व बताए गए हैं अब जैसे कि मैं आपसे पूछता

184
00:12:55,480 --> 00:12:59,680
हूं कि आपको कौन सा खेल खेलना पसंद है है ये बताइए

185
00:12:59,680 --> 00:13:04,000
आप मेरे मेरे को खेल खेलना पसंद है मान लेते हैं कि

186
00:13:04,000 --> 00:13:08,080
क्रिकेट वैसे मैं उसको प्रोत्साहन नहीं देता मगर

187
00:13:08,080 --> 00:13:12,120
मैं एक उदाहरण के तौर पर कह देता हूं क्योंकि सबसे ज्यादा प्रासंगिक है वो तो मैंने

188
00:13:12,120 --> 00:13:16,520
मान लिया आपकी बात का जवाब देने के लिए मान लेता हूं कि क्रिकेट आप

189
00:13:16,520 --> 00:13:20,680
बताइए जी पहले तो आप यह तो एक तो बात मानते ही

190
00:13:20,680 --> 00:13:24,760
है कि मतलब भगवान तो एक ही है भगवान

191
00:13:24,760 --> 00:13:28,840
एक है उसके रूप अनेक है जी

192
00:13:28,840 --> 00:13:32,960
तो वो अनेक रूप क्यों हुए हैं अनेक रूप क्यों हुए हैं

193
00:13:32,960 --> 00:13:37,120
ये एक अलग ये अलग विषय हो जाएगा अभी ये है कि अगर वो शंकर बन

194
00:13:37,120 --> 00:13:41,160
रहे हैं तो शंकर बनने के बाद व पूर्ण हो सकते हैं या नहीं हो सते अगर हो सकते

195
00:13:41,160 --> 00:13:45,880
हैं तो व बाध्य है नहीं हो सकते तो बाध्य

196
00:13:45,880 --> 00:13:50,240
है यह

197
00:13:50,240 --> 00:13:54,480
आपकी भी सही है ये आता है

198
00:13:54,480 --> 00:13:58,760
के ऊपर परिस्थिति परिस्थिति

199
00:13:58,760 --> 00:14:03,000
कि जगत में परिस्थितियां कैसे मन नहीं है आप वो परिस्थिति बाद

200
00:14:03,000 --> 00:14:07,200
में मुझे आप ये समझाइए कि अगर श्री कृष्ण भगवान शंकर बन

201
00:14:07,200 --> 00:14:11,400
रहे हैं उनका एक छोटा सा हिस्सा शंकर बन रहा है तो क्या वह सर्वशक्तिमान

202
00:14:11,400 --> 00:14:16,240
है कि नहीं है उसम पूर्ण है कि नहीं

203
00:14:16,240 --> 00:14:20,680
उसमें आप देखिए मैं आपको बता रहा हूं कि

204
00:14:20,680 --> 00:14:25,280
हर रोम में हर शरीर में और हर आत्मन में

205
00:14:25,280 --> 00:14:29,400
भगवान प्रत्येक भौतिक शरीर

206
00:14:29,400 --> 00:14:34,160
में हर संभव प्रयास से एक ही है

207
00:14:34,160 --> 00:14:38,240
कोई भी भेदभाव नहीं है पर जैसे कि अभी

208
00:14:38,240 --> 00:14:43,200
आपने कहा कि आपका खेल क्रिकेट है खेलना पसंद आपको जी उसको आगे बढ़ाए

209
00:14:43,200 --> 00:14:47,440
हा क्रिकेट आपका खेलना पसंद है अब मैं

210
00:14:47,440 --> 00:14:51,720
एक नियम से बंधा हुआ हूं अब मैं आपसे कह रहा हूं कि भाई

211
00:14:51,720 --> 00:14:56,440
आपने बाउंड्री के पार सीधे बाउंड्री मारी है आपने

212
00:14:56,440 --> 00:15:00,480
बाउंड्री के बा आपने सीधे मारा है तो

213
00:15:00,480 --> 00:15:02,080
क्यों

214
00:15:02,080 --> 00:15:06,240
है वो द रन क्यों नहीं है वो रन क्यों नहीं है वो

215
00:15:06,240 --> 00:15:10,000
सिक्स ही क्यों है

216
00:15:10,000 --> 00:15:14,520
जी यह जो चल रहा है जगत में तो खेल है तो परिस्थितियां

217
00:15:14,520 --> 00:15:18,720
है जो उसको अनुकूल बनाती है टपा

218
00:15:18,720 --> 00:15:22,920
ि जो आप बोल रहे है ना वो व्यवहारिकता है

219
00:15:22,920 --> 00:15:27,000
ईश्वर के दो है स्तर एक ईश्वर है ऋगवेद

220
00:15:27,000 --> 00:15:31,240
में शलोक आया है व जो ना आने लायक है ईश्वर का एक रूप

221
00:15:31,240 --> 00:15:35,320
हो गया जिसके लिए वहार नहीं कर सकते ईश्वर का एक रूप हो गया

222
00:15:35,320 --> 00:15:39,400
जिसके लिए व्यवहार कर सकते हैं जैसे की साकार सगुण साकार व व्यवहार का

223
00:15:39,400 --> 00:15:43,440
विषय और निर्गुण निराकार परमार्थ का विषय अब

224
00:15:43,440 --> 00:15:47,960
अगर मनुष्य की तरफ खड़े हो कर के देखेंगे तो जो निर्गुण निराकार

225
00:15:47,960 --> 00:15:51,960
है वह आश्रित है किसके सगुण साकार के मनुष्य

226
00:15:51,960 --> 00:15:56,560
के मनुष्य को निर्गुण निराकार का बोध ही तब होगा जब सगुण साकार

227
00:15:56,560 --> 00:16:00,920
से होकर गुजरेगा मनुष्य दुनिया में जब बिजली चमकी तो मनुष्य

228
00:16:00,920 --> 00:16:05,040
ने सोचा यहां पर इस दुनिया में कोई ऊर्जा है अगर बिजली नहीं चमकेगी तो

229
00:16:05,040 --> 00:16:10,920
ऊर्जा का कोई होने का अस्तित्व नहीं है तो ये

230
00:16:10,920 --> 00:16:15,080
जो की तरफ अगर हम खड़े हैं मनुष्य दृष्टि से अगर हम देख रहे हैं तो

231
00:16:15,080 --> 00:16:17,080
जो भगवान का जो निर्गुण निराकार

232
00:16:17,080 --> 00:16:21,360
स्वरूप है वो किसके अधीन हो गया सगुण साकार के वो हम तक तभी पहुंच सकता है

233
00:16:21,360 --> 00:16:25,800
जब सगुण साकार रूप के माध्यम से हम तक पहुंचेगा इसी प्रकार से अगर

234
00:16:25,800 --> 00:16:30,040
मुक्त की दृष्टि से हम देखेंगे जीव मुक्त हो जाता है की दृष्टि से जब देखेंगे

235
00:16:30,040 --> 00:16:34,800
तो सगुण साकार अधीन हो गया इधर तो यय

236
00:16:34,800 --> 00:16:38,960
जो लास्ट हमारी जो एक चर्चा हुई थी महानुभाव आए थे उन्होंने

237
00:16:38,960 --> 00:16:43,280
अंत में यही वाला श्लोक दिया था जिसम व कहा गया था कि वो ब्रह्म के

238
00:16:43,280 --> 00:16:47,360
जो ब्रह्म है वो भी मेरे ही आश्रित है तो इसका अर्थ यह

239
00:16:47,360 --> 00:16:51,640
है कि मनुष्य दृष्टि से हा जो उनका जो निर्गुण निराकार

240
00:16:51,640 --> 00:16:55,680
रूप है जो प्राप्ति का विषय है वो सगुण साकार के वो है अब

241
00:16:55,680 --> 00:16:59,800
जो आपने कहा कि जो प्रपंच है य मिथ्या यह सब एक

242
00:16:59,800 --> 00:17:03,840
खेल है बात आप सब बिल्कुल सही कह रहे हो मैंने तो मैंने

243
00:17:03,840 --> 00:17:07,920
तो अपने लगभग हर वीडियो में एक ही बात कही है

244
00:17:07,920 --> 00:17:12,000
एक ही बात की इस दुनिया में यदि कोई व्यक्ति

245
00:17:12,000 --> 00:17:16,600
ऐसा है जो स्वयं को पशुओं से भिन्न मानता है

246
00:17:16,600 --> 00:17:20,680
भिन मैं पशु नहीं हूं मैं मनुष्य हूं तो इसका अर्थ है

247
00:17:20,680 --> 00:17:23,840
कि व मानता है कि इस दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान

248
00:17:23,840 --> 00:17:27,840
ईश्वर है जिसे प्राप्त करने के लिए उसने उन

249
00:17:27,840 --> 00:17:30,480
मर्यादा का अलंबन लिया हुआ है जिसे धर्म

250
00:17:30,480 --> 00:17:34,760
कहते हैं जी ठीक है अब

251
00:17:34,760 --> 00:17:38,880
अगली पंक्ति है यदि कोई व्यक्ति दुनिया में ऐसा है जो

252
00:17:38,880 --> 00:17:42,880
यह मानता है कि इस दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर है तो

253
00:17:42,880 --> 00:17:46,920
इसका अर्थ है कि उसने वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर को

254
00:17:46,920 --> 00:17:51,840
मान रखा है स्वीकार कर रखा है जी वेदों के

255
00:17:51,840 --> 00:17:55,960
दवारा अब इसके बाद जो अगली पंक्ति है इसके बाद जो

256
00:17:55,960 --> 00:18:00,240
अगली पंक्ति है वो ये है कि इस दुनिया में कोई मनुष्य अगर ऐसा है जो ये मानता

257
00:18:00,240 --> 00:18:04,240
है कि वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो

258
00:18:04,240 --> 00:18:08,320
इसका अर्थ है उसने वेदों के उस अर्थ को स्वीकार कर रखा है जो

259
00:18:08,320 --> 00:18:12,520
अर्थ भगवान आदि शंकराचार्य ने दिया उन्होंने कहा किय दुनिया

260
00:18:12,520 --> 00:18:16,720
प्रपंच है माया है खेल उन्होंने कहा जी अब बात ये है कि

261
00:18:16,720 --> 00:18:21,400
अलग अलग जो आचार समय समय पर आए तो उन्होंने

262
00:18:21,400 --> 00:18:25,560
वो जो एक बार जैसे भगवान श्री कृष्ण ने भगवत

263
00:18:25,560 --> 00:18:29,640
गीता में संस्कृत में कहा उस समय के लोग समझ पाए मगर कालांतर में लोगों

264
00:18:29,640 --> 00:18:33,760
की भाषा जो है भ्रष्ट हो गई मिलावट हो गई भाषाओ में तो समझना मुश्किल हो गया तो हर

265
00:18:33,760 --> 00:18:37,880
बार थोड़े थोड़े टाइम के बाद ऐसे हमारे दिव्य दिव्या आत्मा आती

266
00:18:37,880 --> 00:18:41,960
है पृथ्वी पर जो उसको उस समय की जो प्रासंगिक श

267
00:18:41,960 --> 00:18:45,560
शब्दावली है उसके अनुसार वो सरल करती है तो बाद में जितने

268
00:18:45,560 --> 00:18:49,840
भी आचार्य आए उन्होंने जहां तक जहां तक है जो भगवान

269
00:18:49,840 --> 00:18:54,400
आदि शंकराचार्य की कही हुई बात है उसी को ही घुमा फिरा कर के दूसरे शब्दों में लिखा

270
00:18:54,400 --> 00:18:58,400
है अब बात ये आती है कि आप भी प्रपंच मान रहे हो

271
00:18:58,400 --> 00:19:02,440
आप भी व्यवहारिक रूप से अनेक मान रहे हो मगर मूल रूप से आप भगवान को एक ही मान

272
00:19:02,440 --> 00:19:06,560
रहे हो तो आप तो मेरे साथ ही हो आप फिर आप

273
00:19:06,560 --> 00:19:10,720
में और मुझ में कोई वैचारिक मतभेद बचा ही नहीं जो थोड़े बहुत वो

274
00:19:10,720 --> 00:19:14,760
जो व्यावहारिक मतभेद होंगे वो भी हो सकता है कि ज्यादा हम लोग कई

275
00:19:14,760 --> 00:19:18,800
दिनों तक जब बातचीत करते रहे तोव भी दूर हो जाए मतभेद कहां बचा आपने

276
00:19:18,800 --> 00:19:23,440
इस दुनिया को प्रपंच मान लिया खेल मान लिया माया मान लिया

277
00:19:23,440 --> 00:19:28,560
आपने मान लिया कि भाई वो जो भी हिसा उनका अलग होगा देखिए आपने कहा

278
00:19:28,560 --> 00:19:33,440
कि कि यह दुनिया खेल है इस दुनिया में आने के बाद

279
00:19:33,440 --> 00:19:37,560
वह जो है तब प्रपंच चालू होते हैं ठीक है अब बात यह है कि

280
00:19:37,560 --> 00:19:41,760
जब हम ईश्वर की ऐसी व्याख्या करते हैं कि श्री कृष्ण भगवान अपने रूम

281
00:19:41,760 --> 00:19:45,760
को अलग करते हैं और वह अलग करके और जो है शंकर बन जाते

282
00:19:45,760 --> 00:19:49,960
हैं उनका रूम मगर वो श्री कृष्ण भगवान की तरह पूर्ण ईश्वर नहीं होता है

283
00:19:49,960 --> 00:19:54,240
तो जब आप भगवान के सण साकार विग्रह की बात कर रहे हैं

284
00:19:54,240 --> 00:19:59,040
तो यह विग्रह तो मनुष्य के व्यवहार का विषय हो गया

285
00:19:59,040 --> 00:20:01,040
परमार्थ का विष आ ही नहीं है

286
00:20:01,040 --> 00:20:05,160
प्रपंच के अंदर की चीज हो गई व्यवहार में आने वाली चीज हो गई जिसको हम

287
00:20:05,160 --> 00:20:09,320
समझ सकते जिसके बारे में बात कर सकते हैं यह वो चीज हो गई जिसकी हम भक्ति कर सकते

288
00:20:09,320 --> 00:20:13,320
हैं ये वो चीज हो गई अब जब व्यवहार का विषय हो गया तो व्यवहार में

289
00:20:13,320 --> 00:20:17,360
तो सर्व शक्तिमान ईश्वर बाधित है ही नहीं भाई प्रपंच वाली दुनिया

290
00:20:17,360 --> 00:20:21,520
में ही तो उसका कंट्रोल है पूरी तरीके से यहां पर तो बाधित हो ही नहीं सकता फिर

291
00:20:21,520 --> 00:20:25,640
हम यह नहीं कह सकते कि नहीं परमार्थ है अगर परमार्थ कहेंगे तो फिर सगुण साकार

292
00:20:25,640 --> 00:20:29,760
की व्याख्या नहीं होगी फिर वहा पर क्योंकि सगुण साकार

293
00:20:29,760 --> 00:20:34,600
स्वरूप तो व्यवहार का विषय है ना व्यवहार में आ रहा है ओम जय जगदीश हरे

294
00:20:34,600 --> 00:20:38,880
गलती हो गई श्री जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकट

295
00:20:38,880 --> 00:20:42,920
क्षण में दूर करे ये क्या व्यवहार का विषय मनुष्य के प्रेम का विषय भक्ति का

296
00:20:42,920 --> 00:20:47,200
विषय तो ये तो वो वाला नहीं है इसको परमार्थ

297
00:20:47,200 --> 00:20:51,240
की परमार्थ की घटना है इसलिए यह जो है अलग है और यहां

298
00:20:51,240 --> 00:20:55,400
पर अलग है व्यवहार का विषय जब जब हम सगुण साकार की बात कर रहे भगवान

299
00:20:55,400 --> 00:21:00,360
के सगुण साकार स्वरूप की तो ये मनुष्य के व्यवहार का विषय सब्जेक्ट ऑफ

300
00:21:00,360 --> 00:21:04,520
बिहेवियर तो वो हमारे जब व्यवहार का विषय है तो फिर हम वहां

301
00:21:04,520 --> 00:21:08,520
पर व्यवहार के विषय में तो भगवान जो है बाद है अब जैसे कि परमार्थ की

302
00:21:08,520 --> 00:21:12,520
बात में आपको बताऊ हम यह नहीं कह सकते कि वेदों का मार्ग अपनाने वाला

303
00:21:12,520 --> 00:21:16,280
धर्म पर चलने वाला अंत में जाएगा तो भगवान ऐसा नहीं कर सकते उसको मोक्ष

304
00:21:16,280 --> 00:21:20,640
ना दे है ना जी ऐसा नहीं कह सकते ना तो ये तो बाधित

305
00:21:20,640 --> 00:21:25,000
हो गया ईश्वर बाधित हो गया मगर ये बाधित कहां हो रहा है

306
00:21:25,000 --> 00:21:29,040
परमार्थ में तो परमार्थ में ईश्वर निश्चित है सुनिश्चित

307
00:21:29,040 --> 00:21:33,080
है सब कुछ है मगर हमको ईश्वर वो चाहिए हमें उस ईश्वर

308
00:21:33,080 --> 00:21:37,200
की अपेक्षा है जो इस व्यावहारिक दुनिया को कंट्रोल कर ले इसमें कुछ

309
00:21:37,200 --> 00:21:41,520
भी कर सके हमें समझ में आने वाली कोई भी चीज हो जहां जो दुनिया

310
00:21:41,520 --> 00:21:45,520
हमें समझ में आ रही है उस दुनिया में वो कुछ भी कर सकता हो जिस दुनिया

311
00:21:45,520 --> 00:21:49,560
में वो निश्चित है जिस दुनिया में वो सुनिश्चित है वो दुनिया तो

312
00:21:49,560 --> 00:21:54,040
हमें तब समझ में आती है जब इस दुनिया में हम किसी को ईश्वर मान ले

313
00:21:54,040 --> 00:21:58,440
परमार्थ का अस्तित्व हमारे लिए तब सिद्ध होता है जब हमने किसी को ईश्वर मान लि

314
00:21:58,440 --> 00:22:02,560
अन्यथा परमार्थ हमारे लिए एसिस्ट ही नहीं करता जैसे नास्तिक जब नास्तिक

315
00:22:02,560 --> 00:22:06,680
व्यक्ति ईश्वर को मानता ही नहीं है तो फिर वो यह थोड़ी ना कहेगा

316
00:22:06,680 --> 00:22:10,920
कि नहीं कोई परलोक भी है पहले ईश्वर को स्वीकार करना पड़ेगा

317
00:22:10,920 --> 00:22:15,680
ईश्वर को स्वीकार कब करेंगे जब वो कुछ भी कर सकने वाला हो इसीलिए

318
00:22:15,680 --> 00:22:19,880
हमारे भगवान क्या करते हैं कोई कहे कि अगर वो जन्म नहीं ले सकता अवतार नहीं ले सकता प्रकट

319
00:22:19,880 --> 00:22:24,040
हो जाते हैं कोई कहे कि वो मृत्यु को प्राप्त नहीं हो सकता मृत्यु को प्राप्त हो करके भी दिखा

320
00:22:24,040 --> 00:22:28,120
देते हैं फिर भी जीवित रहते हैं कोई कहे कि वो झूठ नहीं बोल सकता

321
00:22:28,120 --> 00:22:31,480
बन जाते हैं छल नहीं कर सकता मोहिनी बन जाते हैं

322
00:22:31,480 --> 00:22:35,600
बुद्ध बन जाते हैं आधा जानवर आधा इंसान नहीं हो सकता नरसिंग बन

323
00:22:35,600 --> 00:22:40,120
जाते हैं वो सब कुछ करके दिखाएंगे जो एक मनुष्य बुद्धि से सोचा जा सकता है

324
00:22:40,120 --> 00:22:44,360
और जो परमार्थ में वो वेदों

325
00:22:44,360 --> 00:22:48,560
के मार्ग को अपनाने वाला भटक नहीं सकता तो यह हो गई परमार्थ

326
00:22:48,560 --> 00:22:52,840
वाली बात परमार्थ में ईश्वर ऐसा नहीं कर सकते कि आपको मोक्ष

327
00:22:52,840 --> 00:22:56,840
ना मिले उनका सिस्टम ऐसा है ही नहीं मगर वो कहां पर वो हो रहे

328
00:22:56,840 --> 00:23:00,880
हैं निश्चित कहां प नियमित कहा पर हो रहे उनके अलावा और कुछ है ही

329
00:23:00,880 --> 00:23:05,360
नहीं दुनिया में हम तो उन्हीं के अंदर है ना सब कुछ हिरण्य गवा ईश्वर

330
00:23:05,360 --> 00:23:09,880
तो वह निश्चित कहां हो रहे हैं उस दुनिया में जिस दुनिया का एक्जिस्टेंस

331
00:23:09,880 --> 00:23:14,240
हमारे लिए तब चालू हुआ जब हमने उन्हें इस दुनिया में ईश्वर मान लिया

332
00:23:14,240 --> 00:23:18,320
तो ईश्वर की जो आदता है सर्वशक्ति मत्ता है व

333
00:23:18,320 --> 00:23:22,440
सिद्ध होनी चाहिए क्रिकेट के इस मैदान में तो

334
00:23:22,440 --> 00:23:27,120
इस मैदान में आने के बाद आप ये नहीं कह सकते ईश्वर के लिए नहीं वो शंकर बनते हैं

335
00:23:27,120 --> 00:23:32,000
इस मैदान में आने के बाद आप ये नहीं कह सकते कि वो शंकर बनते तो पूर्ण नहीं होते हैं

336
00:23:32,000 --> 00:23:36,240
क्योंकि फिर ये हो जाएगा कि मैं एक इंसान हूं अगर मैंने अपने ये इतना

337
00:23:36,240 --> 00:23:40,600
सा एक टुकड़ा अगर अलग किया तो यह टुकड़ा मैं इस टुकड़े में उतना

338
00:23:40,600 --> 00:23:44,640
शक्तिशाली नहीं हूं जितना मैं पूर्ण रूप से हूं मगर वो भगवान

339
00:23:44,640 --> 00:23:46,520
है वो अगर अपना एक रोया

340
00:23:46,520 --> 00:23:50,640
भी अलग करें तो उसमें भी उतनी ताकत होगी यह नियम लागू नहीं हो सकता कि इसमें कम

341
00:23:50,640 --> 00:23:54,800
ताकत है अगर कम ताकत हो गई तो भगवान बाधित है व्यवहारिक दुनिया में बाधित

342
00:23:54,800 --> 00:23:58,960
हो गया भगवान और जब व्यवहारिक मतलब क्रिकेट के नहीं के अंदर

343
00:23:58,960 --> 00:24:03,360
जी जी जी मैं एक बात कहना चाहूंगा जी

344
00:24:03,360 --> 00:24:09,160
मैंने ये नहीं कहा कि मतलब प्रभु ने अपना एक अंश निकाला

345
00:24:09,160 --> 00:24:13,280
और बाकी जो अंश है और निकालेंगे अंश

346
00:24:13,280 --> 00:24:17,400
बाकी जो अंश है उनमें भेदभाव है ऐसा नहीं कहा मैंने आपका प्रश्न यह

347
00:24:17,400 --> 00:24:21,640
था कि जो उनका जो अंश निकला हुआ है क्या वो प्रभु के बराबर

348
00:24:21,640 --> 00:24:25,680
है यही आदि शंकराचार्य ने भी इस बात का खंडन किया

349
00:24:25,680 --> 00:24:30,440
है कि हे प्रभु हम ये आप

350
00:24:30,440 --> 00:24:34,480
सब है एक बराबर पर हम सब मिलकर भी

351
00:24:34,480 --> 00:24:38,720
आपकी पूर्णता नहीं कर सकते क्योंकि सागर

352
00:24:38,720 --> 00:24:43,080
सागर है पर उनमें जो लहर हैं वो तो उठती है और

353
00:24:43,080 --> 00:24:47,120
समा जाती है पर उन लहरों का

354
00:24:47,120 --> 00:24:51,840
जो सागर है उसकी बराबरी कभी नहीं कर पाती है

355
00:24:51,840 --> 00:24:55,960
मैंने तो मैं मैंने आपको यह बात कही है मैंने आपको यह बात कही

356
00:24:55,960 --> 00:25:00,080
है कि जो भगवान आद शंकराचार्य उनके ऊपर एक

357
00:25:00,080 --> 00:25:02,080
एक वो बनाया गया रा

358
00:25:02,080 --> 00:25:06,200
खासतौर पर इकन वालो के द्वारा कि

359
00:25:06,200 --> 00:25:10,480
भैया वो मायावादी है मायावादी मायावादी है भगवान आदिक शंकराचार्य

360
00:25:10,480 --> 00:25:14,520
ने कहीं पर भी पूर्ण रूप से अद्वैत को नहीं कहा है अद्वैत प्राप्ति

361
00:25:14,520 --> 00:25:18,560
की स्थिति है अंतिम स्थिति है व्यवहार में उन्होंने द्वैत को माना है

362
00:25:18,560 --> 00:25:22,640
आपका जो मार्ग है वो द्वैत है और आप आपकी जो डेस्टिनेशन

363
00:25:22,640 --> 00:25:26,880
है आपकी जो मंजिल है आपकी जो प्राप्ति का विषय है वो है अद्वैत

364
00:25:26,880 --> 00:25:31,000
जब आप इस दुनिया में इस दुनिया में जब आप भेद

365
00:25:31,000 --> 00:25:35,160
का निर्वाह करोगे तब आप अभेद तक पहुंचो जैसे कि

366
00:25:35,160 --> 00:25:39,160
गुरुदेव पूज्य गुरुदेव इसमें एक वक्तव्य देते हैं कि धरती पर गिरा हुआ

367
00:25:39,160 --> 00:25:43,320
व्यक्ति धरती से उठने के लिए धरती का ही आलंबन लेता है इसी

368
00:25:43,320 --> 00:25:47,360
प्रकार से भेद भेद भेद से अभेद

369
00:25:47,360 --> 00:25:51,520
तक पहुंचने के लिए भेद का ही आलंबन लिया जाता है इसको एक इसको

370
00:25:51,520 --> 00:25:55,640
एक उससे और देख ले मैंने अपनी लास्ट जो स्ट्रीम हुई थी

371
00:25:55,640 --> 00:25:59,640
उसमें भी कहा था कि उसमें एक

372
00:25:59,640 --> 00:26:03,720
कांसेप्ट है जैसे कि पृथ्वी हम लोग पृथ्वी हम

373
00:26:03,720 --> 00:26:07,880
लोग जानते हैं कि पृथ्वी गोल है मगर

374
00:26:07,880 --> 00:26:12,000
हम लोग पृथ्वी के साथ व्यवहार कैसा करते हैं कि पृथ्वी चपटी

375
00:26:12,000 --> 00:26:16,120
है हम लोग किसी को रास्ता बताते हैं हम लोग

376
00:26:16,120 --> 00:26:17,160
किसी को रास्ता बताते हैं

377
00:26:17,160 --> 00:26:21,200
कि उधर चले जाओ ठीक है समय हम रास्ता बता रहे हैं उस

378
00:26:21,200 --> 00:26:25,560
समय हमारी उंगली अंतरिक्ष की ओर जाती है अगर हम गोल मान रहे हैं पृथ्वी

379
00:26:25,560 --> 00:26:29,640
को हा अगर हमने इशारा किया तो हमारी उंगली जो है वो बाहर गई

380
00:26:29,640 --> 00:26:33,800
आउट आउट ऑफ द अर्थ वो किसी और ऊपर अंतरिक्ष में गई मगर

381
00:26:33,800 --> 00:26:38,000
हम ये सोचते हैं कि हमने इसको पूर्व दिशा में भेजा हमने इसको फलानी दिशा में भेजा

382
00:26:38,000 --> 00:26:42,000
तो क्या है हम व्यवहार कर रहे हैं चपटी का और जो पृथ्वी का गोल

383
00:26:42,000 --> 00:26:46,120
होना है वो कौन सी स्थिति है मुक्त की स्थिति जब हम पृथ्वी को ऐसी जगह

384
00:26:46,120 --> 00:26:50,160
से ऐसे पर्सपेक्टिव से देखेंगे जब हम पृथ्वी के अंदर नहीं पृथ्वी से बाहर

385
00:26:50,160 --> 00:26:54,320
होंगे तो वो हमारे लिए दिखाई देगी पृथ्वी तो गोल है तभी

386
00:26:54,320 --> 00:26:58,400
तो हमें दिखाई देती पृथ्वी तो गोल है वरना हम पृथ्वी पर खड़

387
00:26:58,400 --> 00:27:02,400
हम जो पथवी के साथ बिहेव करते हैं वो चपटा वाला बिहेव होता है बस वैसे

388
00:27:02,400 --> 00:27:06,840
ही है प्राप्ति का विषय मुक्त का विषय अभेद यानी कि अद्वैत

389
00:27:06,840 --> 00:27:11,200
और धारण करने का विषय व्यवहार का विषय वो है भक्ति

390
00:27:11,200 --> 00:27:15,280
द्वैत सामने प्रभु खड़े हैं श्री राम के भजन करते मैं उन जैसा कभी नहीं

391
00:27:15,280 --> 00:27:19,320
हो सकता मैं उनके चरणों की धूल नहीं बन सकता उन जैसा होने की तो

392
00:27:19,320 --> 00:27:23,320
बात अलग है तो एक दिन प्रभु श्री राम ही मुझे गले से ऐसा लगा लेंगे

393
00:27:23,320 --> 00:27:29,320
कि बस मेरे को मुक्ति मिल जाए

394
00:27:29,320 --> 00:27:33,320
जी तो मब भगवान आदि शंकराचार्य ने कहीं

395
00:27:33,320 --> 00:27:37,840
पर भी केवल अद्वैत को नहीं माना है उन्होंने परस्पर सामंजस की शिक्षा दी है

396
00:27:37,840 --> 00:27:42,000
तो यह प्रोपेगेंडा फैलाया गया है कि नहीं साहब वो अद्वैत वादी थे अद्वैत वादी

397
00:27:42,000 --> 00:27:46,040
थे ऐसा नहीं है अद्वैत अंतिम स्थिति इसलिए उनके दर्शन का नाम

398
00:27:46,040 --> 00:27:50,280
अद्वैत पड़ गया उन्होंने द्वैत को भी निर्वाह किया ऐसा ना होता तो

399
00:27:50,280 --> 00:27:54,400
जगन्नाथ पुरी में दारू ब्रह्म को क्यों पुनर स्थापित करते 1 स साल तक मूर्ति

400
00:27:54,400 --> 00:27:58,520
भंजक ने उसको जो है मूर्ति को उनकी लुप्त रही उसको पुनर

401
00:27:58,520 --> 00:28:03,000
स्थापित क्यों करते जगन्नाथ पुरी और बड़े-बड़े जितने भी हमारे मंदिर है उसको क्यों

402
00:28:03,000 --> 00:28:07,480
शंकर दिग्विजय यात्रा के दौरान उन्होंने ये सब किया अगर वो केवल अद्वैत

403
00:28:07,480 --> 00:28:11,600
को ही मानते थे तो निर्वाह करने के लिए बिहेव करने के लिए हमें

404
00:28:11,600 --> 00:28:16,520
स्वीकारना पड़ेगा कि वो जो प्रभु है हम उनकी पूजा करनी है

405
00:28:16,520 --> 00:28:20,520
जी हां तो मुझे नहीं लगता कि हमारे बीच में कोई वो

406
00:28:20,520 --> 00:28:25,280
बचा है वैचारिक मतभेद अगर है तो आप बता दीजिए

407
00:28:25,280 --> 00:28:29,840
और इसकन का विरोध में इसलिए इसको कसे विरोध नहीं कहेंगे

408
00:28:29,840 --> 00:28:34,120
इसको कहेंगे कि वास्तविकता तक पहुंचने का प्रयास इसको

409
00:28:34,120 --> 00:28:37,840
कुछ शिक्षाए है

410
00:28:37,840 --> 00:28:41,880
जो स्पद मतलब क्वेश्चनेबल अब क्वेश्चनेबल क्यों हो जाती

411
00:28:41,880 --> 00:28:45,880
है जैसे की पिछली स्ट्री में आए थे भाई तो मैंने उनसे पूछा

412
00:28:45,880 --> 00:28:49,960
कि आप ईश्वर और अल्लाह को एक क्यों कहते हैं तो वो बोलते हैं कि

413
00:28:49,960 --> 00:28:54,080
भाई ईश्वर के कई नाम हो सकते हैं तो अल्लाह भी हो सकता है ठीक

414
00:28:54,080 --> 00:28:58,200
है मान लिया जब अल्लाह हो सकता है तो फिर कई नाम हो सकते

415
00:28:58,200 --> 00:29:02,880
तो सिर्फ कृष्ण क्यों भजना है फिर तो आप हरे अल्लाह हरे अल्लाह भी कर सकते हैं

416
00:29:02,880 --> 00:29:06,920
तो यहां पर उन्होंने कहा नहीं वो वो तो हम जो उनकी जो कुरान

417
00:29:06,920 --> 00:29:11,040
है वो कुछ और कहती है तो वही तो मैं कह रहा हूं इसका मतलब आप जब कह रहे हो कि कृष्ण और अल्लाह एक है

418
00:29:11,040 --> 00:29:15,080
तो आप कुरान के ईश्वर की बात कर रहे हो मगर वहां प

419
00:29:15,080 --> 00:29:19,120
आपने कहा हम तो भागवत पुराण का वो नियम अपनाते हैं जहां पर कहा गया ईश्वर के कई नाम हो सकते

420
00:29:19,120 --> 00:29:23,480
हैं तो पहली बात तो ये है कि जब हम जानते हैं कि अल्लाह

421
00:29:23,480 --> 00:29:27,480
किसको समझते हैं लोग तो अगर हम कृष्ण और अल्लाह कह भी रहे हैं तो हम

422
00:29:27,480 --> 00:29:31,920
वहां पर पॉइंट आउट करना चाहिए कि हम जब अल्लाह कह रहे हैं कृष्ण अल्लाह एक

423
00:29:31,920 --> 00:29:36,240
तो अल्लाह का अर्थ ये नहीं है कि कुरान के द्वारा प्रतिपादित

424
00:29:36,240 --> 00:29:40,560
होने वाला ईश्वर हम उस हम उस संदर्भ में नहीं कह रहे हम यह कह रहे हैं कि

425
00:29:40,560 --> 00:29:44,840
भगवान के क्योंकि कई नाम हो सकते हैं तो हम उसे अल्लाह भी स्वीकार रहे मगर फिर भी अगर हम अल्लाह

426
00:29:44,840 --> 00:29:48,920
नाम स्वीकार करते हैं भगवान का तो हमें फिर ये स्वीकार करना पड़ेगा कि हम

427
00:29:48,920 --> 00:29:52,920
जो अपने जो महामंत्र है जिसका वो जाप कराते हैं हरे कृष्ण वाला उसम अल्ला नाम

428
00:29:52,920 --> 00:29:56,960
भी यूज किया जा सकता है जब कोई अंतर नहीं है तो अल्लाह नाम हो सकता है उनका तो

429
00:29:56,960 --> 00:30:01,040
भगवान भगवान नाम का जप किया जा सकता है फर तो संकीर्तन दूसरी एक

430
00:30:01,040 --> 00:30:05,040
बात फर इसमें अगला पॉइंट य आता है ये चीज क्लियर नहीं करते वो अब इसमें अगला

431
00:30:05,040 --> 00:30:10,880
पॉइंट य आता है की भाई

432
00:30:10,880 --> 00:30:15,240
प इसमें अगला पॉइंट य आता है कि जब आप अल्लाह को कृष्ण

433
00:30:15,240 --> 00:30:19,280
से संतुल्य बता सकते हो क्योंकि भगवान के कई नाम हो सकते हैं

434
00:30:19,280 --> 00:30:23,360
आपने कहीं पर भी ये लिखा है कि शिव और कृष्ण एक है

435
00:30:23,360 --> 00:30:27,680
आपने कभी बोला शिव और कृष्ण एक है यहां पर आपका वो लॉजिक

436
00:30:27,680 --> 00:30:31,840
लागू हुआ कि भगवान के कई नाम हो सकते हैं यहां पर

437
00:30:31,840 --> 00:30:36,640
लोग कहते शंकर भगवान उनके सबसे बड़े वैव

438
00:30:36,640 --> 00:30:41,000
भक्त है परम वैष्णव है तो अब मैंने अपने लास्ट वीडियो

439
00:30:41,000 --> 00:30:45,120
में ये दिया था कि अगर सबसे बड़े वैष्णव

440
00:30:45,120 --> 00:30:49,120
भगवान शिव है तो सबसे बड़े भगवान विष्णु है और इसके

441
00:30:49,120 --> 00:30:54,040
शास्त्र में प्रमाण है बिल्कुल सही बात है जी

442
00:30:54,040 --> 00:30:58,160
तो कुल मिलाकर कान इधर से पकड़ ले इधर से पकड़ ले बात घुमा फिरा

443
00:30:58,160 --> 00:31:02,200
कर के एक ही आनी है कि भगवान आदि शंकराचार्य के द्वारा दी गई जो शिक्षा है जो उन्हें

444
00:31:02,200 --> 00:31:06,360
परंपरा से उन्होंने पीछे से आई आगे दिया उस शिक्षा के अंदर रहते

445
00:31:06,360 --> 00:31:08,040
हुए में कितना हम लोग कितना भी

446
00:31:08,040 --> 00:31:12,040
शब्दावली को बदल के किसी तरीके से लोगों को समझाने के लिए ज्ञान

447
00:31:12,040 --> 00:31:16,040
को प्रस्तुत करते वो बात एक अलग है मगर जिस दिन हम ये कहेंगे कि हम आदि शंकर के विरोध में

448
00:31:16,040 --> 00:31:20,120
खड़े हैं तो उस दिन हम सबसे पहले वेदों के विरोध

449
00:31:20,120 --> 00:31:24,120
में पूर्ण ईश्वर के विरोध में और उसके बाद तदा अनुसार हम लोग धर्म के विरोध

450
00:31:24,120 --> 00:31:28,160
में तदा अनुसार हम मानवता के विरोध में हो जाएंगे मानवता के विरोध में

451
00:31:28,160 --> 00:31:32,680
और फिर अंत में हम बन जाएंगे वो धर्मे ना पशु भी समाना

452
00:31:32,680 --> 00:31:36,960
जी जी अ बिल्कुल

453
00:31:36,960 --> 00:31:41,080
मैं आपकी बात का समर्थन करता हूं अब जैसे कि आपने उनसे प्रश्न

454
00:31:41,080 --> 00:31:45,360
पूछे थे उन्होने कुछ के मतलब मतलब

455
00:31:45,360 --> 00:31:49,360
उत्तर नहीं दे पाए वो अब जैसे कि आपने पूछा कि भाई

456
00:31:49,360 --> 00:31:53,760
तुम लोग महामंत्र का जाप करते हो हरे महामंत्र

457
00:31:53,760 --> 00:31:57,880
का जाप करते हैं आप लोग महामंत्र का जाप मैं भी करता हूं भैया

458
00:31:57,880 --> 00:32:02,240
जी भी करता हूं अपने सब लोग करते हैं आपने

459
00:32:02,240 --> 00:32:06,320
मंत्र कोईन के द्वारा प्रतिपादित किया हुआ थड़ी ना महाम तो हमारे शास्त्र

460
00:32:06,320 --> 00:32:10,920
में हैन उस नाम से फेमस हो गया हैन

461
00:32:10,920 --> 00:32:14,920
जो है उस नाम से फेमस हो गया हरे क का मतलब एक ही हैन

462
00:32:14,920 --> 00:32:20,360
ऐसा नहीं है

463
00:32:20,360 --> 00:32:24,680
जी का मतलब पहली वारी अपने मुख से निकाली

464
00:32:24,680 --> 00:32:28,880
थी पहली वाणी तो जैसे कि अब

465
00:32:28,880 --> 00:32:33,200
महामंत्र में सिर्फ राम और कृष्ण के नाम क्यों आते हैं शंकर

466
00:32:33,200 --> 00:32:37,240
का नाम क्यों नहीं आता है शिव का नाम क्यों नहीं आता है ब्रह्मा का नाम क्यों नहीं

467
00:32:37,240 --> 00:32:41,480
आता है इस बात को आप सोचिए और

468
00:32:41,480 --> 00:32:45,480
इसका जो उत्तर है वो आपको मतलब आप ये

469
00:32:45,480 --> 00:32:49,520
कह रहे हैं क्योंकि चैतन्य महाप्रभु ने इसको स्वीकारा तो हम ये मान ले कि विष्णु

470
00:32:49,520 --> 00:32:54,720
जो है वो पूर्ण है वो ज्यादा श्रेष्ठ है और जो शिव शंकर है वो वो

471
00:32:54,720 --> 00:32:59,000
है विष्णु और शिव एक है विष्णु और शिव

472
00:32:59,000 --> 00:33:03,280
एक है मैं कह रहा हूं नारायण या श्री हरि या श्री कृष्ण मान लीजिए कि क्योंकि चैतन्य

473
00:33:03,280 --> 00:33:07,360
महाप्रभु ने हरे कृष्ण महामंत्र को स्वीकारा है इसलिए हम

474
00:33:07,360 --> 00:33:11,400
यह माने कि श्री कृष्ण श्रेष्ठ है और जो है यह जो हमारे शिव शंकर

475
00:33:11,400 --> 00:33:16,600
है विष्णु है ये थोड़े से

476
00:33:16,600 --> 00:33:21,280
डाउन जी देखिए श्रीमद् भागवत में

477
00:33:21,280 --> 00:33:25,440
भगवान के आप संदर्भ तब प्रस्तुत

478
00:33:25,440 --> 00:33:29,640
करिए जब आप एक को स्वीकार करिए कि आपके अनुसार

479
00:33:29,640 --> 00:33:33,800
चैतन्य महाप्रभु ने क्योंकि महामंत्र को स्वीकारा है और उसमें सिर्फ कृष्ण और राम

480
00:33:33,800 --> 00:33:38,080
का नाम है इसलिए इससे सिद्ध होता है कि जो शिव और विष्णु

481
00:33:38,080 --> 00:33:42,200
है भगवान के अन्य जो रूप है वो जो है थोड़े से

482
00:33:42,200 --> 00:33:46,560
डाउन है ये आप स्वीकार करते हैं

483
00:33:46,560 --> 00:33:50,960
नहीं मैं डाउन नहीं कह सकता प्रभु की इच्छा के

484
00:33:50,960 --> 00:33:54,960
बिना क्या मैं ये कहूंगा बस मतलब वो वो

485
00:33:54,960 --> 00:33:59,000
भी श्रेष्ठ है वो भी संतुल्य है कुछ नहीं कर सकते प्रभु की इच्छा के

486
00:33:59,000 --> 00:34:03,960
बिना तो इसका मतलब अधीन हो अधीन हो गए ना वो

487
00:34:03,960 --> 00:34:08,080
अधीन हो गए ना हां वो उनके जो अधीन हो गया

488
00:34:08,080 --> 00:34:12,840
जो अधीन हो गया वो पूर्ण नहीं

489
00:34:12,840 --> 00:34:17,000
है जो अधीन हो गया वो पूर्ण नहीं है बाधित है यानी बाधित

490
00:34:17,000 --> 00:34:21,400
हो गया तो वो ईश्वर नहीं

491
00:34:21,400 --> 00:34:25,440
है नहीं नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है देखिए

492
00:34:25,440 --> 00:34:28,200
प्रभु जी अ

493
00:34:28,200 --> 00:34:32,680
अब वही मैं आपको बताना चाहता कि श्रीमद् भागवत में भगवान के

494
00:34:32,680 --> 00:34:36,680
हम प्रमाणों प तब जाए ना जब हम प्रमाणों की आवश्यकता पड़े

495
00:34:36,680 --> 00:34:40,880
हम लोग प्रमाणों तब जाए प्रमाणों की आवश्यकता पड़े पहले तो हम लोग

496
00:34:40,880 --> 00:34:45,000
एक चीज प पहुचे कि भाई आप जो कुछ कह रहे वो मैं मानू तो हमें पहले

497
00:34:45,000 --> 00:34:49,120
स्वीकार करना पड़ेगा ना कि जो जो शिव है वो पूर्ण नहीं है जो विष्णु

498
00:34:49,120 --> 00:34:53,560
है वो पूर्ण नहीं है श्री कृष्ण का नाम क्योंकि महामंत्र

499
00:34:53,560 --> 00:34:57,800
में आता है और उनका नाम आता है क्या कहते राम

500
00:34:57,800 --> 00:35:01,800
जी का श्री राम जी का तो इसलिए यह पूर्ण है और जो विष्णु और

501
00:35:01,800 --> 00:35:06,080
शिव है शंकर है यह कहीं ना कहीं इनके

502
00:35:06,080 --> 00:35:10,120
अधीन हा बिल्कुल

503
00:35:10,120 --> 00:35:14,360
जी अवतार और अवतारी

504
00:35:14,360 --> 00:35:18,600
इसका अर्थ तो ये हुआ इसका अर्थ य हुआना कि शिवजी

505
00:35:18,600 --> 00:35:23,280
के शिवजी जो है वो पूर्ण नहीं है य स्वीकार किया ना आपने

506
00:35:23,280 --> 00:35:27,680
शिव शंकर और ये जो अपने विष्णु भगवान है पूर्ण नहीं है पूर्ण परमात्मा

507
00:35:27,680 --> 00:35:28,180
तुम

508
00:35:27,880 --> 00:35:31,760
अंतर्यामी गलत लाइन

509
00:35:31,760 --> 00:35:35,800
है जी वो एक अवतार है और जो

510
00:35:35,800 --> 00:35:39,960
श्री कृष्ण है वो अवतार है अच्छा श्री कृष्ण के अवतार है ठीक है अब

511
00:35:39,960 --> 00:35:44,120
ये बात जो आपने मानी है अब ये बात जो आपने मानी है अब हम लोग अब

512
00:35:44,120 --> 00:35:48,520
ये आया कोई डिबेटेबल अभी तक कोई डिबेटेबल मामला ही नहीं था अब आया

513
00:35:48,520 --> 00:35:52,520
तो अब आपने कहा कि श्री चैतन्य महाप्रभु के उन्होंने जो है

514
00:35:52,520 --> 00:35:56,960
हरे कृष्ण महामंत्र का जाप किया है तो आप ये सोचना कि उसम श्री राम का

515
00:35:56,960 --> 00:36:00,960
जी इसका अर्थ य है आप जो है यह मानते हैं यही

516
00:36:00,960 --> 00:36:05,160
एक मंत्र ऐसा है जो सबसे मतलब सबसे श्रेष्ठ मंत्र है क्योंकि

517
00:36:05,160 --> 00:36:08,760
इसको श्री चेतन महाप्रभु ने

518
00:36:08,760 --> 00:36:12,880
स्वीकारा यही हुआ इसके अलावा अन्य सभी जो मंत्र है वो

519
00:36:12,880 --> 00:36:17,280
कहीं ना कहीं अगर शिव का मंत्र मैं आपको बता दूं तो जिसमें

520
00:36:17,280 --> 00:36:21,520
केवल शिव का नाम है जी जी जी वही वही

521
00:36:21,520 --> 00:36:25,720
मैं उसी पर आ रहा हूं जी अब आप मुझसे पूछेंगे कि भाई मेरे

522
00:36:25,720 --> 00:36:29,760
को नहीं नहीं मैं आपसे मैं आपसे प्रमाण नहीं मांग रहा हूं

523
00:36:29,760 --> 00:36:33,880
मैं क्योंकि मैंने आपको बिना प्रमाण दिखाओ आप प्रमाण मत दिखाओ

524
00:36:33,880 --> 00:36:37,960
मैंने आपके प्रमाण को स्वीकार कर लिया कि आपने कहीं पढ़ा है किय मंत्र बहुत बड़ा

525
00:36:37,960 --> 00:36:42,200
है अब मुझे बताइए कि चैतन्य महाप्रभु गुरु

526
00:36:42,200 --> 00:36:42,920
भाव किसके लिए

527
00:36:42,920 --> 00:36:48,040
रखते

528
00:36:48,040 --> 00:36:52,120
थे जी देखिए श्री मैंने यह कहा

529
00:36:52,120 --> 00:36:56,520
था कि जो महामंत्र है वो प्रकृति

530
00:36:56,520 --> 00:37:00,520
में पहले से था ऐसा तो है नहीं कि श्री चैतन्य महा चैतन्य महाप्रभु ने उसका

531
00:37:00,520 --> 00:37:04,640
आलंबन लिया श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसका आलंबन लिया जैसे अभी प्रेमानंद

532
00:37:04,640 --> 00:37:08,760
जी है प्रेमानंद जी महाराज है तो प्रेमानंद जी महाराज ये नहीं कहते

533
00:37:08,760 --> 00:37:12,760
भगवान के अन्य नाम जो है वो उतने शक्तिशाली नहीं है प्रेमानंद जी कहते

534
00:37:12,760 --> 00:37:16,760
हमने आलंबन लिया राधा भाई मैं मेरे को प्यार है भगवान के

535
00:37:16,760 --> 00:37:20,840
राम रूप से मगर इसका अर्थ ये नहीं है कि मैं ये कह कि नहीं साहब शिवजी जो है

536
00:37:20,840 --> 00:37:24,840
वो थोड़े से अधीन है राम के और कृष्ण अधीन है मैं तो यह कहता

537
00:37:24,840 --> 00:37:29,040
हूं हे पांचों ईश्वर के सभी हे पाच रूप मुझे राम रूप में दर्शन

538
00:37:29,040 --> 00:37:33,680
दीजिए मैं तो इस रूप में आपकी भक्ति करूंगा मुझे आपके इस रूप से बड़ा प्रेम

539
00:37:33,680 --> 00:37:37,960
है तो ये मेरा फंडामेंटल है और जो जो

540
00:37:37,960 --> 00:37:42,040
प्रेमानंद जी महाराज है वृंदावन में है वो भी यही कहते हैं वो

541
00:37:42,040 --> 00:37:46,120
ये कहते हैं कि क्या कहते हम राधा का वो लेते हैं मगर भगवान के किसी भी नाम का आलंबन आप

542
00:37:46,120 --> 00:37:50,400
ले सकते हैं हम राधा राधा करते उन्होंने तो नहीं कहा कि नहीं अब उनके

543
00:37:50,400 --> 00:37:54,840
अगर हरे कृष्ण के पर्सपेक्टिव से देखा जाए तो राधा नाम गल उनका

544
00:37:54,840 --> 00:37:58,520
उतना शक्तिशाली नहीं है वो नाम

545
00:37:58,520 --> 00:37:59,020
दूसरी

546
00:37:58,880 --> 00:38:03,960
बात अब मैं आपसे पूछूंगा कि चैतन्य महाप

547
00:38:03,960 --> 00:38:08,040
मैं एक आपसे मैं एक आपसे बात पूछूंगा श्री चैतन्य महाप्रभु

548
00:38:08,040 --> 00:38:12,760
जी गुरु भाव किसके लिए रखते थे इस बारे में आप बताइए

549
00:38:12,760 --> 00:38:17,080
आपने श्री चैतन्य महाप्रभु जी को स्वीकारा है ना प्रमाण के रूप में

550
00:38:17,080 --> 00:38:21,280
जी बक उसके लिए आवश्यक है ना कि हम उनके बारे में जानते हो जिसको हम प्रमाण

551
00:38:21,280 --> 00:38:25,400
के रूप में स्वीकारें तो हमको यह तो पता होना चाहिए किसको स्वीकार कर रहे हैं हम

552
00:38:25,400 --> 00:38:31,400
तो इस हिसाब से चैतन्य महाप्रभु जी गुरु भाव किसके लिए रखते

553
00:38:31,960 --> 00:38:36,120
थे श्री चैतन्य महाप्रभु नित्य गौरंगा आपने सुने होंगे

554
00:38:36,120 --> 00:38:40,600
उनके लिए अपना गुरु भाव रखते थे अब

555
00:38:40,600 --> 00:38:45,000
क्या उन्होने कभी शंकराचार्य को अपना गुरु माना

556
00:38:45,000 --> 00:38:49,760
किन्ने चैतन्य महाप्रभु

557
00:38:49,760 --> 00:38:53,840
ने बिल्कुल देखिए इसका तो मैं

558
00:38:53,840 --> 00:38:58,040
देखिए आपसे झूठ नहीं बोलूंगा कि हां भाई माना होगा नहीं माना

559
00:38:58,040 --> 00:39:02,080
होगा पर आपको नहीं पता है आदि शंकराचार्य श्री

560
00:39:02,080 --> 00:39:04,640
चैतन्य

561
00:39:04,640 --> 00:39:08,680
महाप्रभु आपकी आवाज नहीं आही प्रमाण है आपकी

562
00:39:08,680 --> 00:39:12,960
आवाज नहीं आ रही नहीं नहीं माना होगा

563
00:39:12,960 --> 00:39:16,960
नहीं अगर माना होगा तो तो शंकराचार्य कहते ईश्वर के पांचों

564
00:39:16,960 --> 00:39:21,000
रूप पर कोई शंकराचार्य होते वो कृष्ण

565
00:39:21,000 --> 00:39:25,320
की भक्ति करते कोई शंकराचार्य होते हैं शिव की भक्ति करते हैं और देखिए शंकराचार्य

566
00:39:25,320 --> 00:39:29,640
का मतलब ऐसा नहीं नाम में शंकर आ गया तो शब हो गए शंकराचार्य का मतलब है

567
00:39:29,640 --> 00:39:33,680
जो पांच ईश्वर के पांचों रूपों को वेद सत जो पांच रूप है उनको एज इट

568
00:39:33,680 --> 00:39:37,840
इज अपनाते हैं उसमें कोई बड़ा छोटा नहीं करते नहीं वेद में छह है छ भक्ति

569
00:39:37,840 --> 00:39:42,040
भक्ति वो एक ही करते हैं ठीक है वो वो हम ये एक अलग टॉपिक

570
00:39:42,040 --> 00:39:46,080
हो जाएगा वेद में छह है मैं बाकायदा आपको श्लोक

571
00:39:46,080 --> 00:39:47,320
दूंगा छह है

572
00:39:47,320 --> 00:39:51,360
पांच नहीं है छह है कारतीय भगवान को भूल रहे मैं कह रहा

573
00:39:51,360 --> 00:39:55,440
हूं वो मैं आपकी इस बात को रख लेता हूं छह मगर फिलहाल मैं ये कह

574
00:39:55,440 --> 00:40:00,680
रहा हूं जो शंकराचार्य है वो ऐसा नहीं है कि उन्होंने केवल

575
00:40:00,680 --> 00:40:04,680
सिर्फ वैष्णव से ही शास्त्रार्थ किया है शंकराचार्य

576
00:40:04,680 --> 00:40:08,680
जी का जो शास्त्रार्थ हुआ है वह बौद्धों को बौद्धों

577
00:40:08,680 --> 00:40:12,840
का खंडन करने के बाद जैनों का खंडन करने के बाद इस उद्देश्य से कि

578
00:40:12,840 --> 00:40:17,040
मैं अपने धर्म को अपने समाज को एक करूं और जहां पर कहीं पर मिथ्या

579
00:40:17,040 --> 00:40:21,400
के कारण बट रहा है समाज शिव और विष्णु के नाम पर उन्होंने शवों से भी शास्त्रार्थ

580
00:40:21,400 --> 00:40:25,920
किया है उन्होंने वैष्णव से भी शास्त्रार्थ किया है उन्होंने सातो

581
00:40:25,920 --> 00:40:30,040
से भी थ किया है शास्त्रार्थ का वो क्या था उद्देश्य कि यहां

582
00:40:30,040 --> 00:40:34,120
पर जो भ्रम है वो दूर हो यह लोग एक हो वैष्णव

583
00:40:34,120 --> 00:40:38,440
शैव के साथ खड़े हो शकतो के साथ खड़े होप गणपति

584
00:40:38,440 --> 00:40:43,160
के साथ खड़े हो सबके साथ में खड़े हो तो इसलिए

585
00:40:43,160 --> 00:40:47,160
शंकराचार्य जी केवल ऐसा नहीं है वो शिव की पूजा करने वालों के गुरु है

586
00:40:47,160 --> 00:40:51,320
तो अभी हम वापस आ जाते हैं अपने विषय पर कि आपने ये कहा

587
00:40:51,320 --> 00:40:55,640
कि चैतन्य महाप्रभु ने हरे कृष्ण महामंत्र को स्वीकारा तो अब आप चैतन्य

588
00:40:55,640 --> 00:40:59,960
महाप्रभु को जानते हैं जहां से वो जाहिर सी बात है कि वो स्कन की ग्रंथावली

589
00:40:59,960 --> 00:41:02,400
है यही है ना चैतन्य

590
00:41:02,400 --> 00:41:06,200
महाप्रभु को आप कहां से जानते

591
00:41:06,200 --> 00:41:10,920
हैं देखिए वृंदावन तो आप गए होंगे

592
00:41:10,920 --> 00:41:15,160
जी नहीं नहीं मैं मैं एक एक एक एक चीज क्लियर कर लेना आप चैतन्य

593
00:41:15,160 --> 00:41:19,840
महाप्रभु को जो जानते हैं कहां से जानते हैं

594
00:41:19,840 --> 00:41:24,080
आप जैसे हम श्री कृष्ण और शंकर मानते

595
00:41:24,080 --> 00:41:28,200
हैं श्र कृष्ण शंकर को परंपरा प्राप्त जो

596
00:41:28,200 --> 00:41:32,280
हमारे आचार्य हैं पूज्य गुरुदेव शंकराचार्य जी पुरी पीठाधीश्वर जी

597
00:41:32,280 --> 00:41:36,400
उनके द्वारा बताए गए जो शास्त्र है उनके आलंबन से मैं जानता हूं उन्होंने

598
00:41:36,400 --> 00:41:40,920
गीता प्रेस गोरखपुर की पढ़ने को कहा है जो पुस्तक मैं उसकी पढ़ता हूं जो पुस्तक उन्होंने

599
00:41:40,920 --> 00:41:44,920
चौखंबा पब्लिकेशन के लिए पढ़ने को कहा मैं उसकी पढ़ता हूं उनके माध्यम से जो

600
00:41:44,920 --> 00:41:50,920
गोविंद को मैं जानता हूं आप किस किन ग्रंथों के माध्यम से जानते

601
00:41:53,800 --> 00:41:57,960
हैं देखिए अब आप मे से पूछ रहे हैं कि आप

602
00:41:57,960 --> 00:42:02,160
चैतन्य महाप्रभु को किन ग्रंथों मानते देख एक नाम सुन

603
00:42:02,160 --> 00:42:06,720
लेना एक अलग सुनि नाम सुन लेना एक अलग बात है जब हम किसी को अपनाते आत्मसात

604
00:42:06,720 --> 00:42:10,800
करते हैं तो कहीं ना कहीं उसके बारे में अध्ययन करते हैं तो व

605
00:42:10,800 --> 00:42:15,080
अध्ययन आपका क्या है कहां से अन चैतन्य महाप्रभु जी

606
00:42:15,080 --> 00:42:19,160
का यह कोई आपसे स नहीं आपकी एबिलिटी के लिए सवाल नहीं कर रहा हूं

607
00:42:19,160 --> 00:42:24,040
मैं एक तत्व पर पहुंचना चाहता हूं इसलिए सवाल कर जी

608
00:42:24,040 --> 00:42:28,160
अब आपने प्रेमानंद जी काने ठीक

609
00:42:28,160 --> 00:42:34,160
है प्रेमानंद जी हमारे लिए

610
00:42:34,520 --> 00:42:38,600
प्रमाण वो क्या देख मान्यवर आप मेरी

611
00:42:38,600 --> 00:42:43,480
बात समझिए विषयात हो जाएगा विषयात में क्या होगा

612
00:42:43,480 --> 00:42:48,280
चलिए चलिए बोलिए आपकी

613
00:42:48,280 --> 00:42:52,440
बात जो प्रेमानंद जी ने जिनसे दीक्षा ली है व श्री हरिवंश

614
00:42:52,440 --> 00:42:56,440
है इस बात को मानते हैं मान लिया मान

615
00:42:56,440 --> 00:43:00,760
जी श्री हरिवंश राधा वल्लभ

616
00:43:00,760 --> 00:43:04,840
मंदिर को चलाते हैं इस बात को मानते होंगे

617
00:43:04,840 --> 00:43:09,200
मान लिया जी तो उसी

618
00:43:09,200 --> 00:43:13,600
श्री हरिवंश में उसी हरिवंश की मतलब लिख

619
00:43:13,600 --> 00:43:17,920
लिखित किताब है उसको उसको पढ़िए उसमें भी मतलब श्री चैतन्य

620
00:43:17,920 --> 00:43:22,040
महाप्रभु का वर्णन आता है और नित्य गौरंगा का आता है

621
00:43:22,040 --> 00:43:26,120
आप मतलब आपने उसका अ आपने उसका अध्ययन किया है

622
00:43:26,120 --> 00:43:30,160
चैतन्य महाप्रभु के लिए या किसी और पुस्तक का मैं सीधे-सीधे पूछ

623
00:43:30,160 --> 00:43:34,160
रहा हूं चैतन्य महाप्रभु को जानते आप कहां से है आपने कहां

624
00:43:34,160 --> 00:43:38,440
से अध्ययन किया है उनका श्री ह श्री हरिवंश की किताबों

625
00:43:38,440 --> 00:43:42,640
से अच्छा तो मैं कुछ प्रमाणिक शास्त्रों की बात बता रहा हूं

626
00:43:42,640 --> 00:43:46,760
मैं कुछ प्रमाणिक शास्त्रों की बात आपको बता रहा हूं कि

627
00:43:46,760 --> 00:43:49,560
श्री चैतन्य महाप्रभु ने

628
00:43:49,560 --> 00:43:55,080
जी प्रभु जी एक मिनट एक मिनट जी

629
00:43:55,080 --> 00:43:59,040
जी

630
00:43:59,040 --> 00:44:05,040
जी किसी का कोई प्रश्न हो तो पूछ ले कुछ देर के लिए व विराम हुआ

631
00:44:08,360 --> 00:44:13,720
है लाइव चैट में

632
00:44:13,720 --> 00:44:17,760
लसे नहीं नहीं ऐसा नहीं स्थान पर शास्त्र

633
00:44:17,760 --> 00:44:23,760
प्रमाण तार्किक आधार पर वार्ता क्यों नहीं करते बिल्कुल अस्पष्ट वक्तव्य देते

634
00:44:25,000 --> 00:44:29,000
हैं प्रभु जी जी जी आवाज आ रही है प्लीज इकन

635
00:44:29,000 --> 00:44:33,360
के प्रभुजी के साथ पॉडकास्ट वाले वीडियो का लिंक भेजें

636
00:44:33,360 --> 00:44:38,680
जी मैं अभी अभी भेज दूंगा संसाधनों का अभाव है थोड़ा सा

637
00:44:38,680 --> 00:44:42,800
तो इसलिए उतना ज्यादा उत्कृष्ट

638
00:44:42,800 --> 00:44:47,000
स्तर का हम नहीं कर पाएंगे स्ट्रीम यार्ड का उपयोग किया

639
00:44:47,000 --> 00:44:51,360
करिए प्लीज हा हम लोग कोशिश करेंगे ये समय के अभाव क्योंकि

640
00:44:51,360 --> 00:44:55,520
हम केवल देखिए मैं जो देख रहे हैं इस समय उनको एक बात बता

641
00:44:55,520 --> 00:45:01,520
दूं कि केवल य ही नहीं है हमारा कार्य स्थली

642
00:45:03,080 --> 00:45:07,560
youtube4 इसके लिए य का आलंबन लिया जाता है बाकी हम

643
00:45:07,560 --> 00:45:11,560
ग्राउंड लेवल पर बहुत सारे कार्य करते हैं तो अभी भी आपको मैं

644
00:45:11,560 --> 00:45:15,600
बताऊं कि मैं कहीं और था उनके साथ सज्जन के साथ मेरी वार्ता

645
00:45:15,600 --> 00:45:19,600
चल रही थी वार्ता चलते चलते कब समय बीत गया अचानक से मुझे याद आया कि 7:00

646
00:45:19,600 --> 00:45:23,840
बजे का टाइम दिया गया था मैं वापस आया जल्दी बहुत जल्दी जल्दी अपना संध्या

647
00:45:23,840 --> 00:45:28,320
बंदन किया सायंकाल का और उसके बाद य उपस्थित हुआ तो केवल

648
00:45:28,320 --> 00:45:32,480
य का जिनका वो रहता है तो वो बहुत जल्दी जल्दी उसम आपको

649
00:45:32,480 --> 00:45:36,640
देखेंगे कि आप तरह तरह से वो संसाधनों का उपयोग भी करेंगे हम प्रयास

650
00:45:36,640 --> 00:45:40,720
करेंगे कि हम भी यहां पर उपलब्ध करा पाए वो चीज मगर अभी

651
00:45:40,720 --> 00:45:46,720
सारी चीज अवेलेबल नहीं है

652
00:45:47,960 --> 00:45:52,760
और भगवान एक रूपन हां बिल्कुल सही बात है

653
00:45:52,760 --> 00:45:56,840
जय श्री राम कट्टर हिंदू जी कट्टर हिंदू जी जय श्री राम

654
00:45:56,840 --> 00:46:00,840
नमस्ते आर्य आओ करें सनातन सुद्धि जी जी जी आपका

655
00:46:00,840 --> 00:46:05,080
स्वागत है नारायण भैया नमस्ते

656
00:46:05,080 --> 00:46:09,280
जय श्री राम जय श्री राम आदित्य वशिष्ठ जी जय श्री राम

657
00:46:09,280 --> 00:46:13,360
वेदांत है इन्होंने कोई मोटन दिया है इनके मैं कमेंट पढ़ता

658
00:46:13,360 --> 00:46:17,480
हूं आपका बड़ा सहयोग मिलता है हमें जो आप वहां पर आकर के प्रति उत्तर

659
00:46:17,480 --> 00:46:23,080
देते हैं वैचारिक मतभेद रखने वालो

660
00:46:23,080 --> 00:46:27,120
को भगवा रेवोल्यूशन ये तो अद्वैत बोल रहा

661
00:46:27,120 --> 00:46:31,280
है जी जी जी जी वो अद्वैत घुमा फिरा के आप जब पीछे

662
00:46:31,280 --> 00:46:35,320
पड़ जाएंगे ना ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध करने के मोक्ष को

663
00:46:35,320 --> 00:46:39,600
परम स्वतंत्र सिद्ध करने के और व्यवहारिक धर्म को कभी ना बदलने

664
00:46:39,600 --> 00:46:44,200
वाला सिद्ध करने के तो आप पहुंच जाएंगे आदि शंकराचार्य के

665
00:46:44,200 --> 00:46:48,240
पास हरि हर में भेद गया स्कोन वाले तो हरि हरि के ही अवतार में भेद

666
00:46:48,240 --> 00:46:52,640
करते हैं जी जी जी जी ये क्वेश्चन था उसम बात नहीं हो रही है अभी

667
00:46:52,640 --> 00:46:57,200
प्रभु करना ही तो है आप इकन के किसी गुरु के साथ डिस्कशन डिबेट करें

668
00:46:57,200 --> 00:47:01,320
यह सब करके कुछ नहीं होगा लोकेश नहीं देखिए एक वैचारिक

669
00:47:01,320 --> 00:47:05,520
मतभेद जहां से प्राप्त होता है और जो उपलब्ध हो जाता है तो हम यहां पर बैठ कर के

670
00:47:05,520 --> 00:47:09,760
अगर हम एक व्यक्ति की भी को भी जागरूक बना पाए तो हम अपने को सौभाग्यशाली

671
00:47:09,760 --> 00:47:13,840
समझते हैं और इस तरह की चर्चा से हम मुझे लगता है कि अगर 10 लोग

672
00:47:13,840 --> 00:47:17,840
देख रहे होंगे इस चर्चा को तो कहीं ना कहीं कोई एक व्यक्ति तो है जो जिसमें

673
00:47:17,840 --> 00:47:21,840
जागरूकता आएगी धर्म के लिए वो चीजों को समझ पाएंगे

674
00:47:21,840 --> 00:47:26,400
किधर है बरो य सम इनके चैनल

675
00:47:26,400 --> 00:47:30,640
ही है हा अच्छा अच्छा वो आपस में बात कर रहे हैं उस वीडियो में भी इसकन के प्रभु जी ने क्लियर

676
00:47:30,640 --> 00:47:34,640
कुछ नहीं कहा जी हां उन्होंने क्लियर नहीं जितना अच्छे

677
00:47:34,640 --> 00:47:38,080
से क्लियर क्लियर महानुभाव सामने बैठे हैं जो बात कर रहे हैं

678
00:47:38,080 --> 00:47:42,120
इतना क्लियर उन्होंने नहीं कहा था उन्होंने तो बस यह कहा था उनके दो

679
00:47:42,120 --> 00:47:46,360
तीन चीजें थी जो बहुत ही कहूंगा कि वो रही संशय

680
00:47:46,360 --> 00:47:50,560
पूर्ण पहली कि आत्मा को यह सोचना होगा कि संशय

681
00:47:50,560 --> 00:47:54,560
कहां पर करना चाहिए यह उन्होंने कहा था मुझे आज भी याद है उनका य

682
00:47:54,560 --> 00:47:58,560
संशय कहां करना चाहिए य भी अब ये भी एक सवाल हो गया कि यह कहा लिखा

683
00:47:58,560 --> 00:48:02,960
मिलेगा यह शास्त्र में कहा मिलेगा कि कहां संशय करना कहां नहीं करना है

684
00:48:02,960 --> 00:48:06,960
यहां तो हम लोग जो ब्राहमम आडलज जिसमें

685
00:48:06,960 --> 00:48:11,160
कहा जाता है ज्यादा सवाल मत करो ज्यादा प्रश्न मत करो प्रश्न करोगे तो तुम्ह कठिनाइया

686
00:48:11,160 --> 00:48:15,280
हो जाएंगी तुम ये होगा तुम्ह वो होगा वैसी आइजी हो गई जब हम ये कह देंगे कि संशय

687
00:48:15,280 --> 00:48:19,720
मत करो जबक हमारा धर्म किस पर टिका हुआ है अथातो

688
00:48:19,720 --> 00:48:24,120
धर्म जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा हमारा धर्म तो इस पर चलता है असतो

689
00:48:24,120 --> 00:48:28,440
सत गमाया मुझे असत से सत ले चलो तम माया मुझे अंधेरे

690
00:48:28,440 --> 00:48:33,000
से उजाले की ओर ले चलो मृत मतम गमाया मुझे मृत्यु से अमृत

691
00:48:33,000 --> 00:48:37,200
की ओर ले चलो तो हमारा धर्म इस पर चलता है हमारा धर्म यह कहता है कि सवाल

692
00:48:37,200 --> 00:48:41,280
करो आप सवाल करिए और आप देखिए हमारे सारे

693
00:48:41,280 --> 00:48:45,440
जितने भी धर्म ग्रंथ कहीं ना कहीं सवालों पर टिके हुए हैं पुराण शुरू होगा

694
00:48:45,440 --> 00:48:49,440
कि वहा इतने महा ऋषि बैठे हुए थे ऋषि उन्होंने उनसे पूछा सवाल

695
00:48:49,440 --> 00:48:53,360
से शुरू होता है हमारा ग्रंथ भगवत गीता सवाल से शुरू होती है

696
00:48:53,360 --> 00:48:57,480
तो यह सारी चीज सवाल प है हमारी प्रश्नों पर और जब प्रश्न करने

697
00:48:57,480 --> 00:49:01,680
को मना कर दिया उसके बाद उनका था कि शास्त्रों की गहराइयों में

698
00:49:01,680 --> 00:49:06,040
जाना इनमें जाना यह हमारा उद्देश्य नहीं है तो जब शास्त्रों

699
00:49:06,040 --> 00:49:10,280
की गहराई में जाना नहीं है तो क्यों हम लोग भगवत गीता को रोड

700
00:49:10,280 --> 00:49:14,440
पर जाकर के और जो है जो भी करते हैं वहा पर विक्रय करते हैं क्रय करते

701
00:49:14,440 --> 00:49:18,880
हैं तो क्यों करते हैं जब शास्त्रों की गहराई में उनको गहराई से जानना ही नहीं है

702
00:49:18,880 --> 00:49:23,120
तो हमें करना क्या है फर उनका भगवत गीता का ये उनके वक्तव्य थे इसके

703
00:49:23,120 --> 00:49:27,280
अलावा एक वक्तव्य और था कि बस कुछ नहीं आप जो है हरे

704
00:49:27,280 --> 00:49:32,040
कृष्ण का जाप करिए तो ये उन्होंने अंतता बस यही कहा कि भाई

705
00:49:32,040 --> 00:49:36,480
मुझे मैं कुछ जानता नहीं मैं तो बस वो है जो मुझे बता दिया मैं बोलूंगा

706
00:49:36,480 --> 00:49:40,640
और आप हरे कृष्ण का जाप करिए तो इस तरह का वक्तव्य था लखनऊ केन प्रेसिडेंट

707
00:49:40,640 --> 00:49:44,680
है जो तो बड़ा निराश हुए थे हम वहा से क्योंकि हम गए थे वहा

708
00:49:44,680 --> 00:49:49,520
पर अपनी शंकाएं दूर

709
00:49:49,520 --> 00:49:53,840
करने जी जी जी जी बिल्कुल आप सही कह रहे मन जी शास्त्र प्रमाण

710
00:49:53,840 --> 00:49:58,000
की आवश्यकता नहीं पड़ेगी कौन के वक्तव्य का खंडन तार्किकता से ही

711
00:49:58,000 --> 00:50:02,120
हो जाएगा आप ये बिल्कुल सही कह रहे इसीलिए मैं कह रहा हूं ना इसीलिए मैं कह रहा हूं

712
00:50:02,120 --> 00:50:06,160
कि शास्त्रों प त हम जाए जब हमें आवश्यकता पड़े पहले तो वो

713
00:50:06,160 --> 00:50:10,400
तार्किकता ही खत्म हो जाती है ना ठीक है चलिए प्रभु

714
00:50:10,400 --> 00:50:16,400
जी हम वापस आते हैं प्रभु जी तो बताइए

715
00:50:16,800 --> 00:50:22,120
मान्यवर हेलो जी जी आप क्या कह रहे थे

716
00:50:22,120 --> 00:50:26,160
बताइए पहले तो आपसे माफी मांगूंगा जो मैंने आपका मतलब समय

717
00:50:26,160 --> 00:50:30,200
थोड़ा सा उधर चला गया था कोई बात नहीं कोई बात नहीं इसके लिए माफी मांग उतनी देर थोड़ा

718
00:50:30,200 --> 00:50:34,680
सा जो जो छोटे भाई है या फिर समकक्ष है या फिर थोड़े से

719
00:50:34,680 --> 00:50:38,960
वरिष्ठ है मुझसे उनसे थोड़ा सा आदान प्रदान करने का एक

720
00:50:38,960 --> 00:50:43,200
अवसर प्राप्त हो गया उसके कारण तो वो भी एक अच्छी चीज है बताइए

721
00:50:43,200 --> 00:50:47,480
नहीं नहीं बिल्कुल अब जैसे कि मैं आपसे एक

722
00:50:47,480 --> 00:50:52,240
प्रश्न करना चाहूंगा कि अवतार और अवतारी मतलब क्या अंतर

723
00:50:52,240 --> 00:50:56,600
है अवतार और अवतारी में क्या अ मैं जो है

724
00:50:56,600 --> 00:51:01,440
कोई बहुत एक आचार्य नहीं हूं ठीक है

725
00:51:01,440 --> 00:51:04,600
जिस भाष मैं आचार्य नहीं

726
00:51:04,600 --> 00:51:08,760
हूं मैं केवल एक धर्म रक्षक के रूप में स्वयं को देखता हूं और मैं शंकराचार्य का

727
00:51:08,760 --> 00:51:14,760
सैनिक ह और मेरा बस

728
00:51:17,280 --> 00:51:21,400
य पूज्य गुरुदेव ने एक बात कही थी जिसके हृदय में ताप

729
00:51:21,400 --> 00:51:25,400
हो गौ हत्या आदि को लेकर दर्द हो पीड़ा हो

730
00:51:25,400 --> 00:51:30,280
सनातन मान हिंदुओ की रक्षा का भाव हो तो पुरी के शंकराचार्य से आक मिलना

731
00:51:30,280 --> 00:51:34,880
तो बस जी मैं उनसे जाकर मिल लिया और यही मेरा अस्तित्व है

732
00:51:34,880 --> 00:51:39,000
पूरी पीठाधीश्वर जी का अल्पज्ञ शिष्य और प्रभु श्री राम का साधारण सा

733
00:51:39,000 --> 00:51:43,000
भक्त मैं कोई आचार्य नहीं हूं और जिस भाषा शैली में आप जो है

734
00:51:43,000 --> 00:51:47,080
अवतार अवतारी में जो वो सब आप ये हमारे विषय

735
00:51:47,080 --> 00:51:51,080
नहीं है मैं उस पर बात कर सकता हूं ऐसा नहीं इनका अर्थ नहीं मालूम अवतारी

736
00:51:51,080 --> 00:51:55,160
वो है जो अवतार लेता है अवतार वो है जो अवतार लिया गया नहीं

737
00:51:55,160 --> 00:51:59,200
नहीं अ अभिज और अभिजन का अंतर

738
00:51:59,200 --> 00:52:03,200
है इस विषय से ही आपके सारे जितने भी मतभेद है वो

739
00:52:03,200 --> 00:52:07,240
शायद प्रभु की कृपा से मिट सकते हैं

740
00:52:07,240 --> 00:52:11,440
आप समझ नहीं रहे पहले तो यह तय नहीं होता है कि मतभेद क्या है जब जब मैंने जो जो भेद

741
00:52:11,440 --> 00:52:15,440
बोला तो उस उसम आपने एग्री किया जब आपने एग्री किया तो भेद कहां रहा फिर आप जब

742
00:52:15,440 --> 00:52:21,440
भेद नहीं है तो आप सही किस चीज को कर रहे

743
00:52:23,280 --> 00:52:27,360
हैं हम तो फिर भी मन प्रभु नियम से

744
00:52:27,360 --> 00:52:31,560
बंधे हुए हैं प्रभु नियम से बंधे हुए हैं परमार्थ में और

745
00:52:31,560 --> 00:52:35,680
परमार्थ का एक्जिस्टेंस तब होगा जब यहां पर इस इस व्यवहार में व

746
00:52:35,680 --> 00:52:39,880
हर नियम को तोड़ दे वो रावण बन के पाप करेंगे हमारे आपके रूप

747
00:52:39,880 --> 00:52:43,880
में मूर्ख बन जाएंगे और वो हर वो चीज करके दिखा देंगे जो एक

748
00:52:43,880 --> 00:52:48,040
मनुष्य बुद्धि से सोचा जा सकता है एक खिड़की है

749
00:52:48,040 --> 00:52:52,080
उसका छोटे से छोटा छेद है हम उसके अंदर से घुस के नहीं निकल सकते

750
00:52:52,080 --> 00:52:56,080
वो निकल के दिखा देंगे वो भूत भविष्य सब कुछ कर देंगे सब

751
00:52:56,080 --> 00:53:00,840
कुछ बदल डालेंगे क्योंकि वो ईश्वर है किसके मनुष्य

752
00:53:00,840 --> 00:53:05,240
के वो प्रभु अपने नियमों से बने प्रभु निश्चित है अद्वैत

753
00:53:05,240 --> 00:53:09,360
है उनके अलावा किसी और चीज का एेंस नहीं है वो सब वहां है परमार्थ

754
00:53:09,360 --> 00:53:13,560
परमार्थ हमारा सिद्ध तब होता है जब यहां पर हमने

755
00:53:13,560 --> 00:53:17,600
उन्हें ईश्वर मान लिया तो ईश्वर किसी को ईश्वर मानने के लिए

756
00:53:17,600 --> 00:53:21,680
यहां पर उनका आबाद सिद्ध होना आवश्यक है तो यहां पर भी अगर

757
00:53:21,680 --> 00:53:26,000
हम उन्ह बाधित कर देंगे आपने जैसे आपने कहा कि प्रभु

758
00:53:26,000 --> 00:53:30,440
भूत और भविष्य सब एक कर देंगे तो प्रभु किस रूप में कर

759
00:53:30,440 --> 00:53:34,440
देंगे यह मेरा प्रश्न है कि किस रूप में कर देंगे आप लोग किस

760
00:53:34,440 --> 00:53:40,320
रूप में उन्हें देखना चाहते हैं और आप लोग उन्हें किस रूप में देखते हैं

761
00:53:40,320 --> 00:53:44,320
व्यवहारिक व्यवहारिक रूप का अनुकन क्या है जो आप

762
00:53:44,320 --> 00:53:48,320
जैसे कह रहे हो वो श्री कृष्ण है तोय व्यवहार वाले हो गए यह ईश्वर व्यवहारिक

763
00:53:48,320 --> 00:53:52,400
हो गया जैसे ही हमने उसके बारे में बात व्याख्या करना शुरू कर दी अगर वो

764
00:53:52,400 --> 00:53:56,640
परिभाषित कर पा रहे हैं कि उनका कंधा यहां से शुरू हो रहा का शरीर है हम लोग व्याख्या

765
00:53:56,640 --> 00:54:01,600
कर रहे हैं तो व्यवहारिक ईश्वर हो गया वो जिसके साथ व्यवहार किया जा सके

766
00:54:01,600 --> 00:54:05,840
जैसे ईश्वर के दो रूप है एक जिसको हम नहीं समझ सकते एक जिसको हम समझ सकते हैं

767
00:54:05,840 --> 00:54:09,840
अब राम वो आप स निगुण में जा रहे हैं

768
00:54:09,840 --> 00:54:14,080
जी जी व्यवहारिक हो गया सगुण साकार और संग में एक और

769
00:54:14,080 --> 00:54:18,240
एक और रूप है वो है अवतार का वो भी तो है तीन रूप

770
00:54:18,240 --> 00:54:22,680
है जी तो फिर मैं मैं इसी बात प आ रहा हूं कि अवतार और अवतारी

771
00:54:22,680 --> 00:54:27,160
में क्या मतभेद है मतलब क्या अंतर है

772
00:54:27,160 --> 00:54:31,520
अवतार जिस जो अवतार अवतार वो है जो अवतार लिया गया वो रूप और अवतार

773
00:54:31,520 --> 00:54:35,960
ही वो है जिसने अवतार लेता है जो अवतार लेता है वो हो गया अवतार

774
00:54:35,960 --> 00:54:40,000
जी तो इनमें कोई भेदभाव है तात्विक

775
00:54:40,000 --> 00:54:45,280
दृष्टि से देखेंगे तो कुछ नहीं है व्यवहारिक दृष्टि से देखेंगे तो

776
00:54:45,280 --> 00:54:49,400
है तो उसी बात प मैं आज मैंने यह भी पहले बोला था

777
00:54:49,400 --> 00:54:53,680
मैं अब भी यही बोलता हूं कि परिस्थितियां जैसे होती है प्रभु

778
00:54:53,680 --> 00:54:55,360
भी वैसे

779
00:54:55,360 --> 00:54:59,720
व्यवहार व्यवहार व्यवहार में बाधित है व्यवहार में बाधित

780
00:54:59,720 --> 00:55:03,760
है तो वही तो मेरा भी कहना है मेरा मेरा भी वही कहना

781
00:55:03,760 --> 00:55:07,760
है कि व्यवहार में हम ईश्वर को बाधित नहीं कर सकते

782
00:55:07,760 --> 00:55:11,800
व्यवहार में हम ईश्वर को बाधित नहीं कर सकते व्यवहारिक ईश्वर अगर बाधित हो गया तो फिर

783
00:55:11,800 --> 00:55:15,840
ईश्वर कहां से रहा पर वो जो व्यवहार

784
00:55:15,840 --> 00:55:19,840
जो परिस्थितियां जो उठ रही है वो भी तो उनकी ही कृपा से उठ रही है और

785
00:55:19,840 --> 00:55:24,120
उन्ही की कृपा से बंद हो जाए इसका मतलब इसका अर्थ य है इसका अर्थ

786
00:55:24,120 --> 00:55:29,360
हमको देर व है

787
00:55:29,360 --> 00:55:33,960
नहीं अब वही प आ रहा मैं अब आप ये बताइए की

788
00:55:33,960 --> 00:55:38,640
शंकर भगवान कौन है शकर

789
00:55:38,640 --> 00:55:42,760
भगवान रूप है जो समार नामक कत के निर्वाह का प्रकट करता

790
00:55:42,760 --> 00:55:47,200
है निर्वाह करता है व है शंकर भगवान शिव शंकर भगवान

791
00:55:47,200 --> 00:55:51,200
रुद्र जी करुणा अवतारम संसार

792
00:55:51,200 --> 00:55:55,360
सारम भुजग हारम सदा वसंतम हदे भव

793
00:55:55,360 --> 00:55:59,360
भवानी सतम नमामि तो करुणा के अवतार है मतलब सीधी

794
00:55:59,360 --> 00:56:04,280
भाषा में करुणा के अवतार है शंकर भगवान हम तो

795
00:56:04,280 --> 00:56:08,280
भगवान का अगर एक अंश करुणा के रूप में निकल चुका है

796
00:56:08,280 --> 00:56:12,400
तो क्या वह भगवान की पूर्णता रूप जिसमें हर रूप सलात

797
00:56:12,400 --> 00:56:17,280
है वो क्या उसकी टक्कर ले लेगा यह बताइए

798
00:56:17,280 --> 00:56:21,800
आप जो व्यवहारवाद है ना जो व्यवहारवाद

799
00:56:21,800 --> 00:56:25,840
उसकी कौन है देखिए मैं बताऊ आपको इसकन जो है

800
00:56:25,840 --> 00:56:30,040
गलत नहीं कहता है थोड़ी सी बातें अब जैसे कि इस उनने मतलब

801
00:56:30,040 --> 00:56:34,320
कृष्ण और अल्लाह को उने एक कर दिया यह बात गलत है

802
00:56:34,320 --> 00:56:38,480
पर अगर आप मुसलमान से पूछोगे तो मुसलमान कहेगा मेरा एक भगवान

803
00:56:38,480 --> 00:56:42,560
है अल्लाह आप सिखों से पूछेंगे

804
00:56:42,560 --> 00:56:44,520
सिख वाहेगुरु का नाम लेंगे वो

805
00:56:44,520 --> 00:56:48,560
भी कहेंगे एक है आप क्रिश्चन से पूछें कश्चन

806
00:56:48,560 --> 00:56:52,680
कहेगा हमारे जीसस क्राइस्ट यसा मसीह के रूप में

807
00:56:52,680 --> 00:56:56,760
गॉड की फॉर्म में पूजे जाते हैं हमारे एक भगवान है आप हिंदुओ से पूछेंगे

808
00:56:56,760 --> 00:57:01,120
ना हिंदुओ में सबसे ज्यादा कन्फ्यूजन रहता है कि हमारे भगवान कृष्ण है

809
00:57:01,120 --> 00:57:05,240
शंकर है राम है का मैं आपको बताऊंगा पूरी कर लो अपनी बात मैं इसका कारण

810
00:57:05,240 --> 00:57:09,360
बताऊंगा इसका समाधान भी बताऊंगा जी जी इसका कारण

811
00:57:09,360 --> 00:57:13,760
ये है इसका कारण यह है पहली बात तो यह है कि

812
00:57:13,760 --> 00:57:18,280
अगर भगवान ने कहा भागवत भागवत पुराण में भगवान कहते हैं

813
00:57:18,280 --> 00:57:22,440
कि मैंने तुम्हें इन्हीं स्थितियों के साथ इन्ही गुणों के साथ

814
00:57:22,440 --> 00:57:26,640
इन्ही विचारधाराओं के साथ पशुता के उत्पन्न किया है

815
00:57:26,640 --> 00:57:30,960
और तुम्हारा जीवन सार्थक तब होगा जब तुम अपनी इस पशुता को खत्म कर दोगे

816
00:57:30,960 --> 00:57:35,080
मेरा मेरे बताए हुए मार्ग को अपनाते हुए यानी कि अगर आपके अंदर

817
00:57:35,080 --> 00:57:39,200
लट है भोग की प्रवृत्ति है तो उसको विवाह आदि के माध्यम से मुझसे जोड़

818
00:57:39,200 --> 00:57:43,280
दो संतान उत्पत्ति के लिए केवल भोग करो अगर आपके

819
00:57:43,280 --> 00:57:47,280
पास खाने की भूख है तो आप खाना तब खाओ जब मुझे भोग लगा दो हर जगह मुझे

820
00:57:47,280 --> 00:57:51,520
आप जोड़ दो तो आप धीरे धीरे आपकी जो पता है वो समाप्त करना

821
00:57:51,520 --> 00:57:55,600
मेरा काम मैं देखूंगा आपकी सारी चिंताए तो

822
00:57:55,600 --> 00:58:00,200
सबसे पहली बात यह है जो मैं कह रहा था कि

823
00:58:00,200 --> 00:58:04,320
जो धर्म होता है ना अगर जो एक पशु रूप में उत्पन्न होने वाले व्यक्ति की नजर

824
00:58:04,320 --> 00:58:08,320
से हम देखें तो धर्म का निर्वाह करना बहुत मुश्किल होता है

825
00:58:08,320 --> 00:58:13,120
एक बच्चा जब जन्म लेता है उसको उसके माता पिता ना सिखाए कपड़े

826
00:58:13,120 --> 00:58:17,160
पहनना या फिर बड़े लोग अपने गुरुजनों को प्रणाम करना

827
00:58:17,160 --> 00:58:21,440
यह सब अगर उसके माता पिता उसको नहीं सिखाएंगे तो वो थोड़े कालांतर में

828
00:58:21,440 --> 00:58:25,800
एक मानव रूप में जानवर होगा मान ना इस बात को

829
00:58:25,800 --> 00:58:29,920
अब हम उससे कहे मानव रूप में जानवर होगा

830
00:58:29,920 --> 00:58:34,000
इसका अर्थ क्या है धर्म का निर्वाह करना जो एक मनुष्य रूप में

831
00:58:34,000 --> 00:58:38,200
जन्मा है ना उसके हिसाब से बहुत कठिन है कठिन मगर

832
00:58:38,200 --> 00:58:42,640
इसका अर्थ ये नहीं है क्योंकि कठिन हो रहा है तो हम धर्म को ही बदल दे नहीं

833
00:58:42,640 --> 00:58:46,840
हमको जिस रूप में धर्म है उसी रूप में जब हम किसी को देंगे

834
00:58:46,840 --> 00:58:50,920
क्योंकि यह जो कंफ्यूजन फैलाने वाली शिक्षा है इस शिक्षा के कारण

835
00:58:50,920 --> 00:58:55,520
कंफ्यूजन फैलती है तो शिक्षा कोही बदल दे तो ये धर्म का प्रचार प्रसार

836
00:58:55,520 --> 00:58:59,640
जिस रूप में धर्म प्राप्त है जो सच्चाई है जो जैसी है उसको

837
00:58:59,640 --> 00:59:03,800
वैसा ही अब ज फैलाए तो है तब वो होगा कि धर्म का प्रचार

838
00:59:03,800 --> 00:59:07,800
प्रसार किया कि भाई वर्ण व्यवस्था से दिक्कत आती है उससे भेद भाव फैलता है

839
00:59:07,800 --> 00:59:11,960
वर्ण वस्था हटा दो ईश्वर के कई रूपों से दिक्कत आती है ईश्वर के कई रूप हटा

840
00:59:11,960 --> 00:59:15,240
दो यह तो तरीका नहीं है किसी चीज के प्रचार प्रसार का फिर

841
00:59:15,240 --> 00:59:19,440
अंतत हमने धर्म को धर्म का प्रचार प्रसार नहीं किया अधर्म का किया क्योंकि

842
00:59:19,440 --> 00:59:23,640
हम अशा स्त्रीय हो गए महा ऋषि वेदव्यास कहते हैं

843
00:59:23,640 --> 00:59:27,680
महा ऋषि वेदव्यास स्मृति है दो 11 में व्यक्तिगत त कमान्य ये

844
00:59:27,680 --> 00:59:31,680
कहीं पर कहा गया है क्या कि भाई अगर उससे कंफ्यूजन फैल रही है

845
00:59:31,680 --> 00:59:35,720
तो आप अपने हिसाब से धर्म में थोड़ा बहुत वो कर दो कि भाई कई रूप है

846
00:59:35,720 --> 00:59:40,000
ईश्वर के उससे कंफ्यूजन होती है इसलिए एक रूप प आ जाओ ये कौन सी बात

847
00:59:40,000 --> 00:59:44,080
उसको उसको हजम करवाओ जिसको हजम नहीं हो रहा है उसको

848
00:59:44,080 --> 00:59:48,280
डाइजेस्ट करवाओ जिसे डाइजेस्ट नहीं हो रहा है उसको समाधान दो समाधान

849
00:59:48,280 --> 00:59:52,640
क्या है स्कंद पुराण में कहा गया है मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले

850
00:59:52,640 --> 00:59:56,840
सारे पुराण पढ़ ले सारे उपनिषद पढ़ ले जप तप व्रत दान पुण्य कर्म तीर्थ आदि

851
00:59:56,840 --> 01:00:00,880
तीर्थ दान यज्ञ सब कुछ व्यर्थ है अगर अगर मनुष्य का

852
01:00:00,880 --> 01:00:05,040
गुरु नहीं है 99 पर लोग आज हिंदू वो

853
01:00:05,040 --> 01:00:09,120
है जिसका कोई गुरु नहीं है इसलिए ये प्रॉब्लम है

854
01:00:09,120 --> 01:00:13,200
जी और अगर गुरु है अगर अगर गुरु है

855
01:00:13,200 --> 01:00:17,200
अगर गुरु है भी तो फिर यह नहीं है कि व प्रमाणिक है कि नहीं कहां

856
01:00:17,200 --> 01:00:21,800
से आया कौन है जो जहां पर थोड़े दिन पहले जो

857
01:00:21,800 --> 01:00:26,640
कुमार विश्वास जी थे कवि थे थोड़े दिन पहले राम कथा मर्मज्ञ हो गए

858
01:00:26,640 --> 01:00:30,320
आचार्य प्रशांत ज्ञान बांटते हैं धर्म का अपनी आईआईटी

859
01:00:30,320 --> 01:00:34,360
की शिक्षा के लिए बताते हैं मैं आईआईटी हूं यानी कि मैंने आईआईटी कहां से की

860
01:00:34,360 --> 01:00:38,800
वो ये बताते हैं मैंने धर्म का ज्ञान कहां से लिया नहीं बताते

861
01:00:38,800 --> 01:00:42,880
इसका अर्थ क्या हुआ कि जिन 99 पर लोगों को तो गुरु तत्व

862
01:00:42,880 --> 01:00:47,040
का मालूम नहीं है और फिर उसके बाद जब गुरु तत्व का मालूम पड़ा तो प्रमाणिक गुरु का नहीं मालूम

863
01:00:47,040 --> 01:00:51,120
है तो ये जो स्थिति है कि कंफ्यूजन फैलती हैय स्थितियां इनके

864
01:00:51,120 --> 01:00:55,440
कारण है अगर वो किसी प्रमाणिक गुरु के सानिध्य में जाएगा उसको सब

865
01:00:55,440 --> 01:00:59,960
कुछ संतोष प्राप्त हो जाएगा उसका भक्ति का लेवल अप हो जाएगा तो यह कंफ्यूजन

866
01:00:59,960 --> 01:01:04,080
का कंफ्यूजन का समाधान यह नहीं है कि हम अगर पांच रूपों है क्योंकि दुनिया

867
01:01:04,080 --> 01:01:08,080
में सबका एक एक रूप है भाई उन्होंने वेदों का वेदों के विरुद्ध अपनी संरचना की है

868
01:01:08,080 --> 01:01:12,240
तभी तो उनका अस्तित्व है अगर वेद सम्मत ही वो अपनी संरचना करते तो उनका

869
01:01:12,240 --> 01:01:16,520
अस्तित्व कहां से होता उन्होंने वेदों के विरुद्ध अपनी

870
01:01:16,520 --> 01:01:20,920
जो शिक्षा है अपनी ग्रंथावली उसकी संरचना की तभी तो आज वो एजिस्ट

871
01:01:20,920 --> 01:01:25,040
करते हैं वरना वो हमारे ही कोई अंश होते हमारा ही कोई भाग होते वैदिक

872
01:01:25,040 --> 01:01:29,040
होते तो हम ये करें कि भाई कक हम ये करें क्योंकि

873
01:01:29,040 --> 01:01:33,160
भाई सनातन धर्म में पांच रूप पांच रूप ईश्वर के बताए गए छह रूप ईश्वर बताए

874
01:01:33,160 --> 01:01:37,240
गए हम इसलिए और वहां पर देखिए कोई कन्फ्यूजन नहीं है इसलिए

875
01:01:37,240 --> 01:01:41,360
अपने को बदल दे तो हमने तो अंतत अपनाया उसी कोई यह

876
01:01:41,360 --> 01:01:45,920
तो एक तरीके से ऐसा हो गया जैसे वो भूतों वाली फिल्म आती थी ना

877
01:01:45,920 --> 01:01:50,080
जिसमें की एक एक को मार दिया तो उसके शरीर से निकल कर के भूत दूसरे

878
01:01:50,080 --> 01:01:54,640
के शरीर में आ गया फिर वो हा करने लगा तो ये तो वो वाली बात हो गई

879
01:01:54,640 --> 01:01:58,680
कि भाई हमने जब अधर्म से लड़ते लड़ते अपने अधर्म को छोड़कर

880
01:01:58,680 --> 01:02:02,960
उनके जैसा ही अपना लिया तो अंततः जीत किसकी हुई

881
01:02:02,960 --> 01:02:07,200
अधर्म की जी तो हम इस बहाव प कि भाई कंफ्यूजन फैलती है दिक्कत

882
01:02:07,200 --> 01:02:11,320
आती है कठिन होता है रास्ता इस बहाव प हम ये चेंज नहीं कर सकते कि नहीं एक

883
01:02:11,320 --> 01:02:15,320
ईश्वर माने हम भी और ना इसकी क शास्त्रों ने

884
01:02:15,320 --> 01:02:20,000
परमिशन दी बल्कि मना और किया है व्यक्तिगत तर का मान मषि वेदव्यास

885
01:02:20,000 --> 01:02:24,080
दो शास्त्रों के विरोध में कहीं भी आप व्यक्तिगत तर्क नहीं लगा

886
01:02:24,080 --> 01:02:28,280
सकते अगर शास्त्र कह रहे शिवजी पूर्ण ब्रह्म है तो आप ये नहीं कर सकते क्योंकि

887
01:02:28,280 --> 01:02:32,440
भा कन्फ्यूजन फैले गी इसलिए हम एक को मानेंगे नहीं ये तो नहीं कह रहे

888
01:02:32,440 --> 01:02:37,320
शास्त्र जी बताए आप

889
01:02:37,320 --> 01:02:41,600
मतलब आपका कहने का मतलब यह है कि लोगों को अपने गुरु बहुत

890
01:02:41,600 --> 01:02:45,400
हिसाब से चुनने चाहिए बिल्कुल

891
01:02:45,400 --> 01:02:49,480
जी तो फिर कुछ लोग हैं जो मतलब कह देते

892
01:02:49,480 --> 01:02:55,080
हैं कि आप ये बताए कि गुरु क्या भगवान है

893
01:02:55,080 --> 01:02:59,320
गुरु स्वेता सत्र उपनिषद स्वेता सत्र उपनिषद में लिखा

894
01:02:59,320 --> 01:03:01,200
हुआ है कि गुरु में और भगवान

895
01:03:01,200 --> 01:03:05,400
में अंतर ना करे मगर हम कभी भी अपने गुरुदेव की पूजा नहीं करते गुरुदेव स्वयं

896
01:03:05,400 --> 01:03:09,560
मना करते कि मेरी कहीं पर मूर्ति लगा कर पूजा नहीं होनी चाहिए भगवान

897
01:03:09,560 --> 01:03:13,880
भगवान वो है प्राप्ति का विषय गुरु जो है व्यवहार का विषय वैसे ही हो गया दोबारा

898
01:03:13,880 --> 01:03:18,120
से गुरु का आ ले हा मैं अपना

899
01:03:18,120 --> 01:03:22,360
उदाहरण दे दूं मेरे को किसी ने गुरु मान लिया

900
01:03:22,360 --> 01:03:26,520
या आपको किसी ने गुरु मान लिया ठीक है जी

901
01:03:26,520 --> 01:03:30,720
आपको किसी ने गुरु मान लिया और मुझे किसी ने गुरु मान लिया मैं

902
01:03:30,720 --> 01:03:35,160
तो कुछ भी नहीं हूं पर फिर भी लोग कहते

903
01:03:35,160 --> 01:03:39,240
कि गुरु ब्रह्मा गुरु देव महेश्वरा

904
01:03:39,240 --> 01:03:43,320
गुरु साक्षात परब्रह्म श्री गुरुदेव नमः

905
01:03:43,320 --> 01:03:47,360
तो यह तो फिर बात गलत हो गई है कैसे गलत हो गई आपने गुरु

906
01:03:47,360 --> 01:03:51,560
कैसे मान लिया क्या सुनिए जो गुरु बताया गया अंतिम निर्णय गुरु बताया

907
01:03:51,560 --> 01:03:55,720
गया है अधर्म वेद 117 16 ब्रह्मचारी आचार बनता है मनुस्मृति 12

908
01:03:55,720 --> 01:03:59,960
अध्याय 112 से 114 नंबर श्लोक कि धर्म में संशय होने पर

909
01:03:59,960 --> 01:04:03,960
ब्रह्मचारी के पास जाए तो आप ब्रह्मचारी है नहीं है अंतिम निर्णायक

910
01:04:03,960 --> 01:04:07,960
आपको नहीं माना जा सकता ना मैं हूं ना आप है दूसरी बात कि ज्ञान

911
01:04:07,960 --> 01:04:12,160
वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो भगवत गीता पढ़ता है ना व्यक्ति

912
01:04:12,160 --> 01:04:16,480
ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो शांतो उपनिषद मांड उपनिषद

913
01:04:16,480 --> 01:04:20,480
और व्यवहारिकता भी देख लीजिए व्यक्ति अगर अपने बच्चे

914
01:04:20,480 --> 01:04:24,720
को एडमिशन दिलाने जाएगा तो उस स्कूल में जाएगा जो कहीं ना कहीं से सफाइड

915
01:04:24,720 --> 01:04:29,040
हो अगर डॉक्टर से इलाज कराने जाएगा तो वहां जाएगा जो कहीं से सर्टिफाइड हो

916
01:04:29,040 --> 01:04:33,160
पढ़ाने के लिए ट्यूशन भेजेगा तो देखेगा कि कहां से इसकी डिग्री है वो डिग्री

917
01:04:33,160 --> 01:04:37,160
वो सर्टिफिकेशन वो डिग्री वो सर्टिफ आरहा जी

918
01:04:37,160 --> 01:04:41,160
जी मैं एक मिनट खत्म करू वो डिग्री वो सर्टिफिकेशन क्या बता रहे हैं उसके

919
01:04:41,160 --> 01:04:45,480
गुरु का नाम यानी कि उसकी गुरु परंपरा वो डिग्री वो सर्टिफिकेशन

920
01:04:45,480 --> 01:04:49,800
उसके गुरु का नाम बता रहे हैं तो कोई व्यक्ति हमको गुरु ऐसे ही क्यों मान लेगा

921
01:04:49,800 --> 01:04:53,800
जब हम किसी गुरु परंपरा से नहीं तो ये उसकी मूर्खता है कि जीवन के छोटे

922
01:04:53,800 --> 01:04:57,840
छोटे से लौकिक शिक्षाओं को प्राप्त करने के लिए लौकिक ज्ञान प्राप्त करने

923
01:04:57,840 --> 01:05:01,840
के लिए व गुरु परंपरा का आलंबन ले रहा है मगर जब धर्म के लिए जा रहा है

924
01:05:01,840 --> 01:05:06,480
तो वो किसी को भी बिना कुछ सोचे समझे गुरु मान ले रहा है ये उसकी गलती

925
01:05:06,480 --> 01:05:10,480
है तीसरा है मत्स पुराण 145

926
01:05:10,480 --> 01:05:15,160
अध्याय 5वा श्लोक की सभी सुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य

927
01:05:15,160 --> 01:05:19,520
की शिक्षा ही साधु सम्मत धर्म है तो हमें गुरु उसको बनाना है

928
01:05:19,520 --> 01:05:23,520
जो किसी भी प्रमाणिक आर्स ग्रंथ का खंडन ना करते हुए सामंजस्य

929
01:05:23,520 --> 01:05:27,800
की शिक्षा दे ऐसा ना हो शिव पुराण को छोड़ दो भगवती पुराण को छोड़ दो विष्णु

930
01:05:27,800 --> 01:05:31,520
पुराण को मानो भागवत पुराण को मानो ऐसा ना हो शिव पुराण की भी

931
01:05:31,520 --> 01:05:35,520
सामंजस हो भगवती पुराण का भी सामंजस्य हो ब्रह्मवर्त पुराण

932
01:05:35,520 --> 01:05:40,320
का भी सामंजस हो ऐसी शिक्षा होनी चाहिए इसमें सब सबका मान

933
01:05:40,320 --> 01:05:44,320
वो है गुरु और अंतत गुरु का क्या लक्षण है अंतत गुरु का लक्षण

934
01:05:44,320 --> 01:05:48,760
है अद्वय तारका उपनिषद गु का मतलब अंधकार रु का मतलब निकालने

935
01:05:48,760 --> 01:05:52,800
वाला गुरु वही जो संशय दूर करते आपको आपकी अज्ञानता रूपी अंधकार

936
01:05:52,800 --> 01:05:56,920
से निकाल दे ये चार रूप है इसमें से जो माना हुआ गुरु है क्या वो माना

937
01:05:56,920 --> 01:06:01,080
हुआ गुरु प्रश्न करने पर बताता है जैसे कई लोग होते हैं अब

938
01:06:01,080 --> 01:06:05,560
जैसे आपसे मान लिया आपसे आपको उन्होने मनी मन गुरु मान लिया

939
01:06:05,560 --> 01:06:09,560
आपसे वो कुछ पूछने आया तो आपके पास सारे प्रश्नों के जवाब तो नहीं होंगे संशय तो आप दूर कर

940
01:06:09,560 --> 01:06:13,680
नहीं पाएंगे तो संशय ज दूर नहीं

941
01:06:13,680 --> 01:06:17,680
बिल्कुल नहीं होंगे तो जब संशय दूर नहीं हो रहे तो आपको वो गुरु कैसे मान

942
01:06:17,680 --> 01:06:21,840
रहा है हम तो उसको गुरु मान हम तो हमारे

943
01:06:21,840 --> 01:06:25,920
गुरु तो वो है जो सभा में आने के बाद कथा

944
01:06:25,920 --> 01:06:30,000
वगैरह ना करते हुए सबसे पहले आकर के ये कहते हैं कि भाई

945
01:06:30,000 --> 01:06:34,160
किसी का कोई प्रश्न हो तो वो पूछे वो पूरे भारतवर्ष

946
01:06:34,160 --> 01:06:38,320
में केवल इसीलिए यात्रा करते हैं कि संशय दूर हो क्योंकि वह संशय फैलाया

947
01:06:38,320 --> 01:06:42,440
गया है हमारे हिंदुओं के मन में जिसके कारण आज ये नतीजा है हमारी शिक्षा

948
01:06:42,440 --> 01:06:46,440
पद्धति पर जो वार किया है व पूरे आज वो करीब 81 82

949
01:06:46,440 --> 01:06:46,940
साल

950
01:06:46,680 --> 01:06:50,880
वर्ष के हो गए आयु हो गई है उनकी पूरे भारतवर्ष में आज भी वो यात्रा करते

951
01:06:50,880 --> 01:06:54,960
हैं केवल इसलिए कि धर्म की रक्षा करनी है उनका का एक वीडियो उसको देख

952
01:06:54,960 --> 01:06:59,600
कर के आंसू आ जाएंगे शायद आप अ आप देखिएगा वीडियो

953
01:06:59,600 --> 01:07:02,240
उसमें कह रहे हैं पूज्य गुरुदेव ने हमसे अकेले में कहा

954
01:07:02,240 --> 01:07:06,320
था कि लोग तुमसे कहेंगे लोग तुमसे कहेंगे

955
01:07:06,320 --> 01:07:10,360
कलयुग है यह है वो है किसी की बात मत सुनना बीच

956
01:07:10,360 --> 01:07:13,040
की रक्षा भगवान को अभीष्ट करते रहना तो

957
01:07:13,040 --> 01:07:17,240
असफल होना हमने सीखा ही नहीं ऐसे गुरु है हमारे तो ऐसे

958
01:07:17,240 --> 01:07:21,400
किसी को गुरु माना बनाना चाहिए मैं ये नहीं कह रहा हूं कि केवल उन्हीं को गुरु बनाइए

959
01:07:21,400 --> 01:07:25,400
ऐसा जहां भी ऐसा महापुरुष आपको मिल जाए को गुरु बनाइए और

960
01:07:25,400 --> 01:07:29,400
जब व्यक्ति धर्म को एक साइड वाली चीज मानते हुए करता है कि

961
01:07:29,400 --> 01:07:33,400
य खोला और वहां से हमको ज्ञान मिल जाए तो वो ऐसे लोगों पढ़ते

962
01:07:33,400 --> 01:07:37,400
हैं आचार्य प्रशांत जी हो गए उनको ऐसा मिल गया उनको राम वो राम कथा मर्मज्ञ

963
01:07:37,400 --> 01:07:41,560
हो गए उन्होंने कह दिया उत्तरकांड प्रक्षिप्त है गलत लोगों की गलत शिक्षा

964
01:07:41,560 --> 01:07:45,680
देने वालों की शरण में जाने से लोग आजकल मुझसे पूछते हैं कि आप इसकन के लिए इतना वो

965
01:07:45,680 --> 01:07:49,720
क्यों उठाते हैं ये सारे चैप्टर्स है स्कन है और जहां जहां पर आर समाज की

966
01:07:49,720 --> 01:07:53,920
विवादास्पद शिक्षाएं वो है जहां जहां पर ये संत राम

967
01:07:53,920 --> 01:07:58,400
संत रामपाल वाले हैं ब्रह्मा कुमारी वाले हैं इसी की वजह से तो आज हिंदू धर्म वो

968
01:07:58,400 --> 01:08:02,560
है निर्मल इसी की वजह से तो हम सेंट्रलाइज नहीं हो पाते

969
01:08:02,560 --> 01:08:07,480
भाई एक सिंपल सा उदाहरण ले लीजिए कि

970
01:08:07,480 --> 01:08:11,560
रामचरित गीता प्रेस गोरखपुर से छपने वाली जो वाल्मीकि रामायण

971
01:08:11,560 --> 01:08:15,560
है उसमें उत्तरकांड दिया गया है अब उसको कोई व्यक्ति चौराहे पर

972
01:08:15,560 --> 01:08:19,680
जलाने वाला है जो लोग कुमार विश्वास को प्रमाण

973
01:08:19,680 --> 01:08:24,080
मानते होंगे अपना जो लोग कुमार विश्वास को फॉलो करते होंगे वो हिंदू

974
01:08:24,080 --> 01:08:28,560
उस चौराहे पर नहीं जाएंगे रामायण की रक्षा करने के लिए क्या हुआ

975
01:08:28,560 --> 01:08:32,720
गलत गुरु के सानिध्य में पहुंच जाने से हिंदू बटा यही

976
01:08:32,720 --> 01:08:37,040
है गलत गुरु जहां जहां व्यक्ति पकड़ रहा है वैसे वैसे हिंदुओं का हास

977
01:08:37,040 --> 01:08:41,120
होहा हमारी शक्तियां विघटित हो रही है अब शिव और विष्णु के नाम पर लड़ा

978
01:08:41,120 --> 01:08:45,240
दिया कि शिवजी ब्रह्म नहीं है भगवती ब्रह्म नहीं है तो

979
01:08:45,240 --> 01:08:49,880
व कहां एक हो पाएंगे शिवजी के मंदिर पर हमला होगा हमने एक नाट्य मंचन किया था कुछ

980
01:08:49,880 --> 01:08:53,960
कुछ दिन पहले शिव जी के मंदिर पर हमला होगा हम जाएंगे

981
01:08:53,960 --> 01:08:58,400
मंदिर जाता होगा बचाने नहीं आएगा कि हम तो जहा जाना

982
01:08:58,400 --> 01:09:02,560
जाते वहा जाते हैं कहीं पर भंडारा हम लोग करवा रहे होंगे शिवजी के नाम

983
01:09:02,560 --> 01:09:06,560
का भंडारा होगा वो इंटरेस्टेड नहीं होगा चंदा देने में दान

984
01:09:06,560 --> 01:09:10,800
करने में जो जिनको सिखा दिया गया शिवजी ब्रह्म नहीं है ऐसे

985
01:09:10,800 --> 01:09:14,920
ऐसे लोग हैं जो अगर अगर पंच देव उपासना वाले घर में चले

986
01:09:14,920 --> 01:09:18,920
जाए तो घणा से देखते हैं इफट ये आप लोग कैसे हो गए

987
01:09:18,920 --> 01:09:23,200
हो एक भगवान की जग कितने भगवान तुमने रख रखे हैं मतलब इरिटी

988
01:09:23,200 --> 01:09:27,400
से देखते उन हिंदुओ को जो पंचदेव उपासना करते हैं

989
01:09:27,400 --> 01:09:31,520
यह है इकोन की शिक्षा तो

990
01:09:31,520 --> 01:09:35,640
ऐसी शिक्षा पर हम प्रश्न उठाते हैं जहां से तो इस शिक्षा के जब

991
01:09:35,640 --> 01:09:39,840
गुण में जाएंगे जब भी कोई व्यक्ति शास्त्र विरुद्ध और

992
01:09:39,840 --> 01:09:44,000
परंपरा विरुद्ध शिक्षा देगा कहीं ना कहीं वह दो तीन चीजें कर बैठेगा

993
01:09:44,000 --> 01:09:48,000
पहली चीज कि वह उस ईश्वर को उसके द्वारा प्रतिपादित

994
01:09:48,000 --> 01:09:52,320
होने वाला ईश्वर सर्व शक्तिमान नहीं रह जाएगा उसके द्वारा

995
01:09:52,320 --> 01:09:56,680
जीव को मिलने वाला जो मोक्ष हो परतंत्र सिद्ध होगा उसके द्वारा

996
01:09:56,680 --> 01:10:00,760
जो मनुष्य को प्राप्त होने वाला धर्म है वह शाश्वत नहीं होगा बदलता होगा

997
01:10:00,760 --> 01:10:04,920
जैसे कि ब्रह्मा कुमारी को ले लीजिए ब्रह्मा कुमारी कहते हैं हमारे य रोज

998
01:10:04,920 --> 01:10:09,200
आकाशवाणी होती है रोज जो भगवान है व आ कर के वो आकाशवाणी करके जाते पूरे विश्व में फैलाया

999
01:10:09,200 --> 01:10:13,400
जाता है है ना तो यानी क्या है रोज नया धर्म आ रहा है किसी भी देश

1000
01:10:13,400 --> 01:10:18,280
काल परिस्थिति में जो ना बदले उसी का नाम सनातन है अथर्ववेद

1001
01:10:18,280 --> 01:10:22,480
तो यहां पर वो स अब कह तो खुद को सनातन ही रहे

1002
01:10:22,480 --> 01:10:26,760
क तो स्वयं को नात रहे मगर वो क्या है सनातन

1003
01:10:26,760 --> 01:10:30,800
विरोधी तो ऐसे लोग हो गए अज्ञात नास्तिक खैर आप कुछ कह

1004
01:10:30,800 --> 01:10:35,200
रहे थे

1005
01:10:35,200 --> 01:10:39,240
बताइए नहीं मैं आपकी बात से सब बातों से मैं आपके

1006
01:10:39,240 --> 01:10:44,760
सहमत हूं अब जैसे कि मैंने आप आपने

1007
01:10:44,760 --> 01:10:49,320
एक आपने कमेंट मतलब आपने एक रील ली थी

1008
01:10:49,320 --> 01:10:53,600
जिसमें आप बता रहे थे कि भगवान

1009
01:10:53,600 --> 01:10:57,760
श कृ पहले तो आप एकज एक चीज आप दर्शको को क्लियर कह दीजिए

1010
01:10:57,760 --> 01:11:01,880
आप भी इकन की शिक्षाओं से कहीं कहीं पर मतभेद रखते हैं

1011
01:11:01,880 --> 01:11:06,000
यह आप बता दीजिए

1012
01:11:06,000 --> 01:11:10,040
पहले देखिए इकन की संस्था में बहुत सारे लोग जुड़े

1013
01:11:10,040 --> 01:11:12,800
हुए

1014
01:11:12,800 --> 01:11:17,000
हैं आगे बोलिए इसकन की संस्था में बहुत सार

1015
01:11:17,000 --> 01:11:21,160
लोग जुड़े हुए हैं पर एक संस्था के नाम

1016
01:11:21,160 --> 01:11:25,280
पर हम सबको बदनाम नहीं कर सकते हम वो बातें कर

1017
01:11:25,280 --> 01:11:29,360
रहे हैं मान्यवर हम वो बातें कर रहे हैं जो उनके ग्रंथ में लिखी है

1018
01:11:29,360 --> 01:11:33,480
हम वो बातें कर ही नहीं रहे जो वो वर्बल बोलते हैं हम हमेशा उन बातों पर बात

1019
01:11:33,480 --> 01:11:37,960
करते हैं जो उनके ग्रंथ में लिखी है 3 152 में लिखा है

1020
01:11:37,960 --> 01:11:43,960
कि कई मूर्ख ऐसे हैं

1021
01:11:50,880 --> 01:11:56,880
जो हेलो

1022
01:12:01,520 --> 01:12:07,520
हेलो आवाज आ रही है

1023
01:12:19,520 --> 01:12:23,520
हेलो जी नहीं आवाज नहीं आही थी

1024
01:12:23,520 --> 01:12:27,560
तो आप हां आवाज आ रही है हुआ क्या है यहां

1025
01:12:27,560 --> 01:12:31,600
पर सप्लाई कट हो गई है आपकी आवाज धीमी

1026
01:12:31,600 --> 01:12:36,120
आ रही है प्रभु जी आ

1027
01:12:36,120 --> 01:12:40,680
रही अब थोड़ी सही हुई है

1028
01:12:40,680 --> 01:12:44,840
जी ठीक है तो मैं यह कह रहा

1029
01:12:44,840 --> 01:12:50,840
था कि जैसे मान लिया कि आप ये

1030
01:12:51,560 --> 01:12:55,600
मानते मैं आपने कहा इकोन की शिक्षा

1031
01:12:55,600 --> 01:13:00,000
हम इकोन की उन शिक्षा को गलत मानते हैं जो उन शिक्षा पर क्वेश्चन करते हैं

1032
01:13:00,000 --> 01:13:06,000
जो उनके शास्त्रों में लिखी उनके ग्रंथों में लिखी है हम

1033
01:13:07,880 --> 01:13:11,960
किसी का विज्ञान है जो उसम कृष्ण और कृष्ण और क्राइस्ट

1034
01:13:11,960 --> 01:13:16,520
है इनकी एकता स्थापित करने का प्रयास किया गया है

1035
01:13:16,520 --> 01:13:22,040
यहोवा जो बाइबल का ईश्वर है यवा

1036
01:13:22,040 --> 01:13:26,240
वो की जो कृष्ण है और क्राइस्ट यहोवा

1037
01:13:26,240 --> 01:13:30,360
उनकी एकता स्थापित करने का प्रयास किया गया इसके अलावा जो कृष्ण अल्ला वाली बात

1038
01:13:30,360 --> 01:13:34,400
है वो भी एक ऑफिशियल इनकी साइट है उन पर से आप जाकर देख

1039
01:13:34,400 --> 01:13:39,800
लेंगे

1040
01:13:39,800 --> 01:13:44,120
उसमें प्र जी अच्छे उन्होने स्वीकारा कि नहीं स्वीकारा अल मैटर

1041
01:13:44,120 --> 01:13:48,720
मगर प्रभुपाद जी के नाम

1042
01:13:48,720 --> 01:13:54,720
से जब हमारे बच्चे यह समझेंगे कि

1043
01:13:56,520 --> 01:14:00,680
यह समझने में कि कोई भी पढ़ो किताब सब एक है अगर

1044
01:14:00,680 --> 01:14:05,040
वैचारिक अंतर नहीं होता तो फिर य अलग जो भी विचार धाराए

1045
01:14:05,040 --> 01:14:09,840
है आज अस्तित्व में उनका अस्तित्व होता ही ना

1046
01:14:09,840 --> 01:14:15,840
के उसके अंग मान सकते हैं कि अंग होते मगर

1047
01:14:22,280 --> 01:14:28,280
एक

1048
01:14:32,680 --> 01:14:36,720
हेलो मुझे लगता है कि आपको आवाज नहीं आ

1049
01:14:36,720 --> 01:14:41,040
रही है एक चीज हम लोग क् कर लेते है एक चीज क्लियर

1050
01:14:41,040 --> 01:14:45,040
कर लेते हैं आप ये स्वीकार करते हो कि ईश्वर

1051
01:14:45,040 --> 01:14:49,600
एक ही है वही अनेक रूपों में प्रकट होते हैं पहली बात ये बात तो मैंने पहले क थी ठीक

1052
01:14:49,600 --> 01:14:54,200
है ठीक है ठीक है ठीक है दूसरा एक पॉइंट है कि

1053
01:14:54,200 --> 01:14:58,960
वो जो आपका

1054
01:14:58,960 --> 01:15:03,000
जो पहले कुछ और है जैसे की एक चीज और है कि दूध जिस प्रकार

1055
01:15:03,000 --> 01:15:07,040
दूध से दही बन सकता है पर दही से दूध नहीं उसी प्रकार कृष्ण शिव बन सकते हैं पर शिव बनने के

1056
01:15:07,040 --> 01:15:11,840
बाद कृष्ण जो शिव है जो वापस कृष्ण नहीं बन

1057
01:15:11,840 --> 01:15:14,360
सकते

1058
01:15:14,360 --> 01:15:20,120
जी या ब्रह्म के कारण को मानते हैं सही

1059
01:15:20,120 --> 01:15:24,600
है जी ब्रह्म संहिता के सं अनेको

1060
01:15:24,600 --> 01:15:28,040
पुराणों में इसका

1061
01:15:28,040 --> 01:15:32,120
मतलब बताया गया है जैसे कि आपको बरा

1062
01:15:32,120 --> 01:15:36,800
पुराण में मिलेगा श्रीमद् भागवत पुराण मिलेगा आपको

1063
01:15:36,800 --> 01:15:42,800
विष्णु पुराण में भी इसका

1064
01:15:44,440 --> 01:15:49,440
मिलेगा तो ब्रह्म समता एक आग सा

1065
01:15:49,440 --> 01:15:53,680
बता तो उस शिव गणों ने वि

1066
01:15:53,680 --> 01:15:59,680
को वो दे दिया

1067
01:16:01,040 --> 01:16:05,040
था शास्त्रों की रचना हुई थी व उन्ह

1068
01:16:05,040 --> 01:16:09,280
नाम दिया गया और साफ साफ मेंशन है कि इन शास्त्रों

1069
01:16:09,280 --> 01:16:13,400
में दी गई जो सारी शिक्षा है व तभी तक मान जब तक व वेदों का विरोध ना

1070
01:16:13,400 --> 01:16:18,280
कर रही हो इसका मतलब कि हम इसे अंतिम प्रमाण नहीं मान सकते

1071
01:16:18,280 --> 01:16:22,360
तो ब्रह्म समता में जहां जहां पर ऐसी शिक्षा है जो वेदों का विरोध नहीं

1072
01:16:22,360 --> 01:16:26,520
कर रही उसको वेद में कहा जा रहा है कि शिव पर्र है मगर

1073
01:16:26,520 --> 01:16:30,520
यहां पर कृष्ण की स्थापना हो रही है परब्रह्म के रूप में तो हम इसको नहीं मान

1074
01:16:30,520 --> 01:16:34,560
सकते नहीं वेद में नहीं कहा गया है कि शिव परब्रह्म है

1075
01:16:34,560 --> 01:16:40,560
वेद में कभी नहीं कहा गया है आप मेरे कोष का आपको

1076
01:16:40,800 --> 01:16:45,280
शता उपनिषद और प्रमाण नहीं है उपनिषद

1077
01:16:45,280 --> 01:16:49,400
आपके लिए प्रमाण नहीं है जी नहीं वेद है उपनिषद

1078
01:16:49,400 --> 01:16:53,480
को तो मानता ही नहीं मैं अच्छा ठीक है लिए निषद

1079
01:16:53,480 --> 01:16:57,480
को नहीं मानते तो ये ज्ञान आपको कहां से मिला

1080
01:16:57,480 --> 01:16:59,520
जी देखिए यह ज्ञान

1081
01:16:59,520 --> 01:17:03,520
आपको कहां से मिला पहली बात तो मैं आपको क्लियर कर

1082
01:17:03,520 --> 01:17:07,880
एक क्लियर कर दूं वेदों में भी भगवान शिव की परब्रह्म

1083
01:17:07,880 --> 01:17:12,000
के मैं प्रमाण आपको उपलब्ध करा दूंगा ये इस फोन में है इस

1084
01:17:12,000 --> 01:17:16,080
फोन में ही है जिससे मैं आपसे बात कर रहा हूं तो मैं आपको श्लोक क्रमांक वगैरह जब

1085
01:17:16,080 --> 01:17:20,120
इससे आगे कोई रील बनाऊंगा इस हिस्से की तो उसमें वेदों में प्रमाणिकता डाल दूंगा

1086
01:17:20,120 --> 01:17:24,920
जहां पर शिवजी को परब्रह्म माना गया हो ठीक है अब दूसरी बात ये है

1087
01:17:24,920 --> 01:17:29,200
कि आप उपनिषदों को प्रमाण नहीं

1088
01:17:29,200 --> 01:17:33,240
मानते उपनिषदों को देखिए आपने आपने अभी कहा

1089
01:17:33,240 --> 01:17:37,320
नहीं मानता अब आप मानते हैं कि नहीं मानते दोबारा बता दीजिए नहीं मानते

1090
01:17:37,320 --> 01:17:41,320
ब ये नाम उपनिषदों को प्रमाण ना मानने वाला जो ज्ञान है

1091
01:17:41,320 --> 01:17:45,440
आपने कहां से प्राप्त किया है कि मैं उपनिषद को नहीं मानना

1092
01:17:45,440 --> 01:17:49,480
पुराण नहीं पुराणों से नहीं परंपरा प्राप्त आचार

1093
01:17:49,480 --> 01:17:53,480
उपनिषद का एक बार भी मैंने ब्रह्म संहिता का नाम लिया मैंने उपनिषद का मैंने

1094
01:17:53,480 --> 01:17:57,840
एक भी नाम नहीं लिया शिव पुराण मैं क कह रहा हूं मैं ये कह रहा हूं कि उपनिषदों

1095
01:17:57,840 --> 01:18:02,000
को आप प्रमाण नहीं मानते हैं

1096
01:18:02,000 --> 01:18:06,320
जी नहीं मानते तो अब ये उन्ह उपनिषदों को प्रमाण

1097
01:18:06,320 --> 01:18:10,560
ना मानने का जो ज्ञान है कि उपनिषदों को प्रमाण नहीं मानना है

1098
01:18:10,560 --> 01:18:14,800
यहां पर आप देखिए वो जो 145 अध्याय 5वा शलोक था ना मत्स पुराण वहा

1099
01:18:14,800 --> 01:18:18,840
उसको आप क्रॉस कर रहे हैं कि भाई मैं जो है समस्त शास्त्रों को आश ग्रंथ जो

1100
01:18:18,840 --> 01:18:23,040
हमारे आप उपनिषद को नहीं मानते उपनिषदों को तो आर्य समाज मानता है

1101
01:18:23,040 --> 01:18:27,080
आप बताइए कैसे आप सामान्य धारा के हिंदू हैं आप उपनिषदों को नहीं

1102
01:18:27,080 --> 01:18:31,200
मानते ठीक है मैं इसको करेक्ट कर देता हूं अब आप ये बताइए आपको

1103
01:18:31,200 --> 01:18:35,920
किस परंपरा प्राप्त आचार्य ने कहा है कि उपनिषद प्रमाण नहीं

1104
01:18:35,920 --> 01:18:40,320
है पहले आप मेरे को ये बताइए कि उपनिषद क्या

1105
01:18:40,320 --> 01:18:44,680
है श्वेता जो हमारे 108 उपनिषद है उसमें से 11

1106
01:18:44,680 --> 01:18:49,040
और भी जो क्या कहते हैं श्वेता सतो उपनिषद है ब्र उपनिषद है

1107
01:18:49,040 --> 01:18:53,240
ये सब आप प्रमाण नहीं मानते हैं ठीक है तो अब आप मुझे बताइए

1108
01:18:53,240 --> 01:18:58,120
किस आचार्य ने आपको यह कहा है कि उपनिषद हमारे लिए प्रमाण नहीं है

1109
01:18:58,120 --> 01:19:02,360
असतो मा स जति हमारे लिए प्रमाण

1110
01:19:02,360 --> 01:19:06,520
नहीं है निजी अनुभव

1111
01:19:06,520 --> 01:19:10,440
मैं आपसे यह कहना चाहता

1112
01:19:10,440 --> 01:19:14,480
हूं मषि वेदव्यास निजी अनुभव

1113
01:19:14,480 --> 01:19:18,840
मत बताइए आप मुझे बताइए आपको किस परंपरा प्राप्त आचार्य ने कहा है

1114
01:19:18,840 --> 01:19:24,840
उपनिषद प्रमाण नहीं है

1115
01:19:25,320 --> 01:19:29,440
जी नहीं मेरे से किसी ने नहीं कहा है पर मैं ये

1116
01:19:29,440 --> 01:19:33,560
क क्या है मैं आपसे प्रश्न करता हूं कि उपनिषद

1117
01:19:33,560 --> 01:19:37,680
क्या के अंग है वेदों के अंग है जिस अंग में अंग

1118
01:19:37,680 --> 01:19:42,040
किने बनाए वेदों के अंग किन्ने बनाए

1119
01:19:42,040 --> 01:19:47,000
पुराण किसने बना भवान ने तो सिर्फ चार वेद की ही रचना की थी पुराण किसने बनाए

1120
01:19:47,000 --> 01:19:51,840
उपनिषद कहां से आ गए पुण किसने बनाए भगवान ने तो सिर्फ चार वेदों

1121
01:19:51,840 --> 01:19:55,880
की किसी और दिन सुनिए सुनि इस हम किसी और दिन अच्छे

1122
01:19:55,880 --> 01:20:00,040
से चर्चा करेंगे फिलहाल मैं आपसे पूछ रहा हूं कि आपसे किसी भी आचार्य

1123
01:20:00,040 --> 01:20:04,040
ने ये नहीं कहा कि उपनिषद को प्रमाण मत मानो आपने आपने अपने मन

1124
01:20:04,040 --> 01:20:08,320
से य कर लिया है जी निजी अनुभव

1125
01:20:08,320 --> 01:20:12,680
निजी अया सुनि जब आप निजी अनुभव हो जाते हैं तो शास्त्रों

1126
01:20:12,680 --> 01:20:16,800
के विरोध में महारसी वेदव्यास ने कहा पुराण को मानते हैं ना पुराण को

1127
01:20:16,800 --> 01:20:21,160
मानते हैं ना पुराणों को मानते हैं कि नहीं मानते

1128
01:20:21,160 --> 01:20:25,680
हैं पुराणों को देखिए मैं तो

1129
01:20:25,680 --> 01:20:31,680
बिल्कुल मानता हूं मैं पुराणों कोनते तो म वेदव्यास को मानते

1130
01:20:32,040 --> 01:20:36,120
हैं जी महा ऋषि वेदव्यास स्मति को

1131
01:20:36,120 --> 01:20:39,200
मानते

1132
01:20:39,200 --> 01:20:43,200
हैं महा महा ऋषि वेदव्यास जी को मानता हूं और सुखदेव

1133
01:20:43,200 --> 01:20:48,080
जी को भी मानता हूं मैं तो वेदव्यास जी ने कहा है व्यक्तिगत तर्क अमान्य

1134
01:20:48,080 --> 01:20:52,160
अ ये आपका अनुभव है आप अपने अनुभव पर बात कर रहे हैं शास्त्र प्रमाण

1135
01:20:52,160 --> 01:20:56,600
बात नहीं कर रहे तो हम लोग सनातन के ऊपर बात नहीं कर रहे अब हम लोग बात कर रहे हैं

1136
01:20:56,600 --> 01:21:00,600
एक अ हिंदू के रूप में नॉन हिंदू के रूप में और हम लोग

1137
01:21:00,600 --> 01:21:04,680
य आए क्यों थे हिंदुत्व के ऊपर बात करने धर्म के ऊपर बात करने मगर

1138
01:21:04,680 --> 01:21:08,880
य धर्म तो है ही नहीं क्योंकि आप यहां पर तो अपने मन का जो नियम है वो बता रहे

1139
01:21:08,880 --> 01:21:13,240
हैं और हम अपने मन के नियम में बात नहीं

1140
01:21:13,240 --> 01:21:17,640
करते जी मतलब हिंदू तो बात कहना अलग बात है

1141
01:21:17,640 --> 01:21:21,920
अब मैं आपसे पूछ लू कि भाई मेरे को ये बताओ कि हिंदू पंथ

1142
01:21:21,920 --> 01:21:25,960
है या फिर धर्म अब आप ये भी तो प्रश्न है

1143
01:21:25,960 --> 01:21:30,120
ना तो आप कहोगे तो हिंदू तो प आप य पर अगर मेरी योग्यता

1144
01:21:30,120 --> 01:21:34,360
को जांचने की कोशिश कर रहे तो बात अलग है मैं बता सकता हूं आपको हिंदू

1145
01:21:34,360 --> 01:21:38,720
कौन है हीनता हीनता से दूर रहने वाला हिंदू है

1146
01:21:38,720 --> 01:21:41,320
हिमालय से लेकर हिंदू सरोवर यानी कन्याकुमारी

1147
01:21:41,320 --> 01:21:45,480
के बीच में जो स्थान है उस स्थान को न कहते आपकी आवाज कट रही

1148
01:21:45,480 --> 01:21:49,800
है जी अब आ रही है

1149
01:21:49,800 --> 01:21:55,280
अब आ रही है हां आ रही है अब आ रही है

1150
01:21:55,280 --> 01:21:59,560
हेलो जी आ रही है आ रही है जी तो

1151
01:21:59,560 --> 01:22:03,560
ये ये एक हो गया कि आप मेरी परीक्षा लेने आए हैं परीक्षा मत

1152
01:22:03,560 --> 01:22:07,840
दीजिए आप मेरी हिंदू का अर्थ मैं आपको बता सतां हिंदू कौन है

1153
01:22:07,840 --> 01:22:12,200
गुरुजी हा आप ये पूछ रहे हैं ना मैं आपसे पूछ ऐसे विषयात

1154
01:22:12,200 --> 01:22:18,200
हो जाता है देखिए एक विष हो जाता है आप भगवत गीता को मानते

1155
01:22:20,200 --> 01:22:25,920
हैं भगवत गीता को मानते हैं आप

1156
01:22:25,920 --> 01:22:30,200
जी मैं भगवत गीता को मानता हूं तो भगवत गीता में चौथे अध्याय के दूसरे

1157
01:22:30,200 --> 01:22:34,320
श्लोक में भगवान ज्ञान का परंपरा से प्राप्त होना बता रहे हैं तीसरे अध्याय के 16

1158
01:22:34,320 --> 01:22:38,760
श्लोक में बता रहे जो लोग परंपरा चक्र से प्राप्त होने वाले ज्ञान के विरुद्ध जाते हैं

1159
01:22:38,760 --> 01:22:42,960
वो लोग कभी सुखी नहीं रह पाते और जो साथ में चलते हैं वही सुखी रहते हैं यहां

1160
01:22:42,960 --> 01:22:47,080
पर आप जब यह कह रहे कि मेरा व्यक्तिगत अनुभव है परंपरा प्राप्त ज्ञान जो क्या कहता

1161
01:22:47,080 --> 01:22:51,560
है उससे मतलब नहीं है तो यहां पर तो आप विरोध कर रहे हैं भगवत गीता

1162
01:22:51,560 --> 01:22:55,640
का वो जो परंपरा चक्र है व सुमता नारी

1163
01:22:55,640 --> 01:22:59,760
के बीच में जो आने वाले सात चक्र है उनकी बात हो रही है ना कि गुरु

1164
01:22:59,760 --> 01:23:04,600
परंपरा के चक्रों की बात हो रही है चार दो जी

1165
01:23:04,600 --> 01:23:09,440
चार दो चार दो

1166
01:23:09,440 --> 01:23:14,480
चौथे अध्याय का दूसरा

1167
01:23:14,480 --> 01:23:19,440
शलोक चौथे अध्याय का दूसरा

1168
01:23:19,440 --> 01:23:25,440
लोक चौथे अध्याय का दूसरा लोक

1169
01:23:28,680 --> 01:23:32,760
चौथे अध्याय का दूसरा श्लोक आपको मेरी आवाज आ रही है आप

1170
01:23:32,760 --> 01:23:38,760
मेरे को आपकी आवाज आ रही है चौथे अध्याय का दूसरा

1171
01:23:44,760 --> 01:23:48,960
श्लोक आवाज नहीं आ रही तो फिर ऑफ करें चौथे अध्याय का दूसरा

1172
01:23:48,960 --> 01:23:53,600
श्लोक आवाज आ रही है आपको

1173
01:23:53,600 --> 01:23:57,640
आवाज आवाज आपकी आ रही है कट कट के आ रही है अभी आपने

1174
01:23:57,640 --> 01:24:01,880
बोला कि श्लोक आपने बोला मैं सुन पा रहा हूं पर कट के आ रही है आपकी

1175
01:24:01,880 --> 01:24:06,520
प चौथे अध्याय का दूसरा लोक दोबारा बोल रहा

1176
01:24:06,520 --> 01:24:10,640
हूं चौथे अध्याय का दूसरा श्लोक चौथे

1177
01:24:10,640 --> 01:24:14,640
अध्याय का दूसरा श्लोक चौथे अध्याय का

1178
01:24:14,640 --> 01:24:18,720
दूसरा श्लोक चौथा अध्याय दूसरा श्लोक जी मेरे को

1179
01:24:18,720 --> 01:24:23,120
कंठस्थ नहीं है मेरे को देखना पड़ेगा का उपयोग परंपरा

1180
01:24:23,120 --> 01:24:27,240
से प्राप्त हुआ ज्ञान मुझे यह ज्ञान मुझे परंपरा से य

1181
01:24:27,240 --> 01:24:29,840
भगवान को नहीं यह परंपरा से परंपरा

1182
01:24:29,840 --> 01:24:33,920
वाला ज्ञान है जो मुझे जो मैं तुम्ह आज बता रहा हूं बीच में लुप्त हो गया था

1183
01:24:33,920 --> 01:24:39,920
अब दूसरी एक बात बता दीजिए कि आप वेदों का एक्जिस्टेंस मानते

1184
01:24:40,640 --> 01:24:45,720
हैं वेदों का एक्जिस्टेंस मानते

1185
01:24:45,720 --> 01:24:49,920
हैं वेदों का एक्जिस्टेंस मानते हैं आप

1186
01:24:49,920 --> 01:24:54,360
आवाज नहीं आ रही जी अब आ रही है आरही

1187
01:24:54,360 --> 01:24:58,560
को मानते प्रमाण वेदों का

1188
01:24:58,560 --> 01:25:02,880
एक्जिस्टेंस नहीं मानता हूं वेदों का एक्जिस्टेंस नहीं मानते

1189
01:25:02,880 --> 01:25:06,880
अच्छा अच्छा तो आप सनातनी कैसे कह रहे अपने आप पुराणों

1190
01:25:06,880 --> 01:25:11,320
का मानते हैं पुराणों को मानता हूं

1191
01:25:11,320 --> 01:25:15,760
पुराणों को मानते हैं तो महाने महा ऋषि वेदव्यास

1192
01:25:15,760 --> 01:25:21,280
जी ने पुराण जो लिखे थे वो कब लिखे

1193
01:25:21,280 --> 01:25:26,160
थे

1194
01:25:26,160 --> 01:25:30,280
मतलब सुनि एक चीज क्लियर हो जाएगी आज की समय धारा में तो नहीं

1195
01:25:30,280 --> 01:25:34,440
लिखे गए नहीं लिखे गए ना आज

1196
01:25:34,440 --> 01:25:38,440
नहीं नहीं तो जो आपको वेद प्राप्त हुए

1197
01:25:38,440 --> 01:25:43,040
हैं पुराण सॉरी पुराण वो कैसे प्राप्त हुए

1198
01:25:43,040 --> 01:25:47,960
कैसे मिले आप

1199
01:25:47,960 --> 01:25:53,840
देखिए पुराण है प्राप्त कैसे हुए भाई साब

1200
01:25:53,840 --> 01:25:58,120
पुराण हमें वेद ब्याज जी की वजह से प्राप्त हुए हैं अरे

1201
01:25:58,120 --> 01:26:02,160
उनकी वजह से प्राप्त हुए उन्होंने अपने शिष्य को दिए उन्होंने अपने शिष्य को दिया

1202
01:26:02,160 --> 01:26:07,280
शिष्य के शिष्य के शिष्य परंपरा से प्राप्त हुए कि नहीं पुराण

1203
01:26:07,280 --> 01:26:11,720
पहले आप ये बताइए मेरे को कि वेद क्या है मैं देखिए

1204
01:26:11,720 --> 01:26:16,400
बा चर भगवान की मु मुख वाती है

1205
01:26:16,400 --> 01:26:22,400
क्या वेद भगवान के मुख से निकले हैं नहीं वेद अपौरुषेय

1206
01:26:23,440 --> 01:26:29,440
बिल्कुल आप किसी भी वेद

1207
01:26:30,040 --> 01:26:34,520
का हो रही है वो भी उस जिक्र किया जाता

1208
01:26:34,520 --> 01:26:38,560
है आपसे कह रहा हूं मैं आपसे कह रहा हूं आप परंपरा

1209
01:26:38,560 --> 01:26:42,800
प्राप्त ज्ञान का खंडन करते हैं इस समय आप अमिक विचारधारा की तरफ जा रहे

1210
01:26:42,800 --> 01:26:46,800
खैर मैं अब आपसे पूछ रहा हूं नहीं नहीं आप जाएंगे देखिए

1211
01:26:46,800 --> 01:26:51,040
आप जब वेद को प्रमाण नहीं मानते आप उपनिषद को प्रमाण नहीं मानते आप हिंदू नहीं है

1212
01:26:51,040 --> 01:26:56,200
सनातनी नहीं है आप सनातनी नहीं

1213
01:26:56,200 --> 01:27:00,240
आपको सिद्ध करूंगा आपको सिद्ध कर रहा उसी के लिए लाइव स्ट्रीम चालू

1214
01:27:00,240 --> 01:27:04,240
काट चुका होता क्योंकि आपने ऐसी बात कर दी है तो मैं आपको पूछ रहा हूं

1215
01:27:04,240 --> 01:27:08,400
पुराण को भी आप मानते हैं तो आप तक पुराण आया कैसे गीता प्रस

1216
01:27:08,400 --> 01:27:13,000
गोरखपुर से आया कैसे

1217
01:27:13,000 --> 01:27:17,400
आया कैसे आया देख शिष्य की व

1218
01:27:17,400 --> 01:27:23,000
गुरु परपरा के शिष्य है को आपने स्वीकार कर लिया य

1219
01:27:23,000 --> 01:27:27,720
परंपरा को आपने स्वीकार कर लिया ना यहां पर

1220
01:27:27,720 --> 01:27:31,960
जी तो परंपरा को जब आप स्वीकार कर रहे हैं तो आप इसका मतलब

1221
01:27:31,960 --> 01:27:36,160
आप य परंपरा प्राप्त जो आचार्य गुरु शिष्य परंपरा का नियम है आप इसको स्वीकार

1222
01:27:36,160 --> 01:27:40,160
करते हैं आपको भगवत गीता के शलोक की आपको किसी भी प्रमाण की

1223
01:27:40,160 --> 01:27:46,160
आवश्यकता नहीं आप परंपरा को स्वीकार कर

1224
01:27:47,360 --> 01:27:51,600
रहे आवाज आ रही है आपको मेरी आपकी आवाज आ रही

1225
01:27:51,600 --> 01:27:56,320
मैं आपसे पूछ रहा हूं कि आप यहां पर आप पुराणों के लिए

1226
01:27:56,320 --> 01:28:01,080
पकार कर रहे

1227
01:28:01,080 --> 01:28:05,480
हैं जी मेरी आप बात समझ जब आप परंपरा

1228
01:28:05,480 --> 01:28:09,800
परंपरा के नियम को स्वीकार कर रहे हैं तो आपको परंपरा प्राप्त आचार्य की बात माननी

1229
01:28:09,800 --> 01:28:14,480
पड़ेगी वरना आपके लिए पुराण भी एजिस्ट नहीं करते हैं

1230
01:28:14,480 --> 01:28:18,480
गुन आचार लिखे हैं गुरु

1231
01:28:18,480 --> 01:28:22,560
गोविंद और ग्रंथ ये तीनों से मिलाकर जो ज्ञान प्राप्त वो ज्ञान

1232
01:28:22,560 --> 01:28:27,160
प्रमाणिक माना जाएगा आपने गुरु को अलग हटा दिया कि मेरा व्यक्तिगत व अनुभव

1233
01:28:27,160 --> 01:28:31,440
फिर मैंने आपको परंपरा के बारे में बताया तो आपने वो नहीं माना नियम जब मैं आपको बता

1234
01:28:31,440 --> 01:28:35,680
जब मैंने आपसे पूछा पुराण कैसे प्राप्त हुए तो आपने कहा परंपरा से इसका अर्थ

1235
01:28:35,680 --> 01:28:39,880
क्या हुआ कि पुराणों को प्राप्त करने के लिए आपने परंपरा का ही आलंबन लिया है अन्यता

1236
01:28:39,880 --> 01:28:43,920
आपको प्राप्त कहां से होते

1237
01:28:43,920 --> 01:28:48,080
आपका नेटवर्क इशू है कुछ ऐसा लग रहा है बब तक

1238
01:28:48,080 --> 01:28:52,080
हम लोग बात कर ले खर हम लोगों की आज जो डिबेट है वो बहुत ही निथ

1239
01:28:52,080 --> 01:28:56,760
सिद्ध हो रही है ऐसा लगने में आ रहा है क्योंकि मुझे ऐसा लग रहा था कि एक

1240
01:28:56,760 --> 01:29:01,240
इकन का पक्ष रखेंगे वो इकन का पक्ष भी नहीं रख रहे हैं

1241
01:29:01,240 --> 01:29:02,640
और आपकी

1242
01:29:02,640 --> 01:29:06,640
खुद की मान्यता बहुत ज्यादा क्षमा करिएगा उसमें बहुत

1243
01:29:06,640 --> 01:29:12,640
ज्यादा शोधन की आवश्यकता

1244
01:29:18,680 --> 01:29:23,120
है नवीन शर्मा जी ने बता दिया जी भग गीता चार दो

1245
01:29:23,120 --> 01:29:27,120
इतने प्रश्न यदि इतने प्रश्न यदि अपने

1246
01:29:27,120 --> 01:29:31,120
स्कन के सो कॉल्ड गुरु को पूछते तो यहां अपनी पशु बुद्धि का प्रमाण नहीं

1247
01:29:31,120 --> 01:29:35,480
दे रहे होते क्या मतलब इनके गुरु भी ऐसे हैं

1248
01:29:35,480 --> 01:29:40,280
खैर आप लोगों ने देखा जब हम लोगों ने बात की भाई साहब से

1249
01:29:40,280 --> 01:29:44,400
तो वो जा चुके हैं आप लोगों

1250
01:29:44,400 --> 01:29:48,480
ने देखा जब हमने इनसे बात की तो यही बात है यही मैं सबको बताना चाहता

1251
01:29:48,480 --> 01:29:52,640
हूं जो इधर उधर गलत विचारधाराओं के अंदर फंसे हुए हैं उनको

1252
01:29:52,640 --> 01:29:57,240
जब आप पुरे दोगे तो उनके अंदर छुपा हुआ सनातन विरोध

1253
01:29:57,240 --> 01:30:01,280
मिलेगा यह इसका जीता जागता प्रमाण और जब इनकी

1254
01:30:01,280 --> 01:30:06,040
ऐसे मुख से निकलने वाली शिक्षाएं विस्तार करेंगी तो क्या होगा

1255
01:30:06,040 --> 01:30:10,360
मैंने अपनी आंखों से देखा है ऑनलाइन स्ट्रीम में एक

1256
01:30:10,360 --> 01:30:14,400
बिटिया आती है और कहती है कि मैं सात साल से इस इस विचारधारा

1257
01:30:14,400 --> 01:30:18,080
को फॉलो कर रही हूं और मैं आज अपना धर्म कन्वर्ट करना चाहती

1258
01:30:18,080 --> 01:30:22,880
हूं इसलिए क्योंकि ऐसे मुख से शिक्षा निकलती है

1259
01:30:22,880 --> 01:30:26,880
इसीलिए मैं पीछे पढ़ता हूं हमारे हमारा हिंदुओं

1260
01:30:26,880 --> 01:30:30,960
का सबसे बड़ा शत्रु कोई सामने खड़ा हुआ नहीं है वोह

1261
01:30:30,960 --> 01:30:35,120
है जो चोला जिन्होने सनातनी का ड़ रखा है मगर जब आप उनको

1262
01:30:35,120 --> 01:30:40,840
कुरे दोगे तो उनके मूल में सनातन का विरोध

1263
01:30:40,840 --> 01:30:45,000
निकलेगा उपनिषदों को प्रमाण नहीं मानते हैं

1264
01:30:45,000 --> 01:30:49,040
वेदों को प्रमाण नहीं मानते हैं गुरु परंपरा को अभी नहीं मान रहे थे पुराणों के लिए गुरु

1265
01:30:49,040 --> 01:30:53,200
परंपरा को मान लिया खैर अच्छा

1266
01:30:53,200 --> 01:30:57,280
लगा इनसे बात करके ज्यादा परेशानी तो नहीं हुई और ये

1267
01:30:57,280 --> 01:31:01,320
वहां पर कमेंट में आकर के ा वाला जो हमारा अकाउंट है वहां पर जो लोग

1268
01:31:01,320 --> 01:31:05,360
फॉलो कर रहे थे हमको उनको बोल रहे थे कि आप मैं आचार्य हूं मुझसे अगर

1269
01:31:05,360 --> 01:31:09,440
कुछ जानना हो तो आप आ कर के मुझसे पूछ लेना ये उन्होंने वहां पर वक्तव्य दिया

1270
01:31:09,440 --> 01:31:13,600
था मुझे अभी तक य वार्ता बड़ी अच्छी लग रही थी मगर मुझे हिट करने लगता

1271
01:31:13,600 --> 01:31:18,000
है जब कोई व्यक्ति सनातन का विरोध करता है इस तरह से

1272
01:31:18,000 --> 01:31:22,440
गुरु परंपरा का विरोध खुद अपने गुरु का नाम बता रहे हैं

1273
01:31:22,440 --> 01:31:26,720
मगर उसके बावजूद कह रहे मैं गुरु परंपरा को नहीं मान रहा हूं फिर गुरु परंपरा

1274
01:31:26,720 --> 01:31:32,200
को मान रहे हैं किसलिए कि भाई मुझे प्राप्त तो वहीं से

1275
01:31:32,200 --> 01:31:33,200
हुआ

1276
01:31:33,200 --> 01:31:37,720
भैया आपको च बहुत ही उत्तम कार्य करते जी

1277
01:31:37,720 --> 01:31:42,600
आपका जी जी जय हो जय हो मनु भैया आपकी

1278
01:31:42,600 --> 01:31:48,600
खुश रहिए आपने मनु जी आप खुश रहे

1279
01:31:49,080 --> 01:31:53,280
जी वी हु आर इ य आर कीपिंग

1280
01:31:53,280 --> 01:31:59,280
रसे सेपरेट इनवाइट एवन च वी कैन चट

1281
01:31:59,760 --> 01:32:05,760
अला ही इ द सेम सुप्रीम पर्सन सुप्रीम

1282
01:32:06,840 --> 01:32:10,880
नाम मेंटेनर एंड कंट्रोलर सुप्रीम

1283
01:32:10,880 --> 01:32:15,320
फादर सोस ऑ एव वेलकम एवरी बडी यर

1284
01:32:15,320 --> 01:32:19,760
वन गड ए व आर फमली ए व आर

1285
01:32:19,760 --> 01:32:22,960
र ग

1286
01:32:22,960 --> 01:32:27,280
ड मैटर ददर यू कॉल अल्ला और कृष्णाय

1287
01:32:27,280 --> 01:32:32,160
देखिए यहां पर किसी ने कमेंट में कहा है हम

1288
01:32:32,160 --> 01:32:36,440
आस्ता सिची जी को बोलना चाहेंगे अगर व हिंदी भाषा

1289
01:32:36,440 --> 01:32:41,520
का प्रयोग कर सके तो कभी आए हमारी लाइव चैट में और

1290
01:32:41,520 --> 01:32:44,800
इस पर हम बात करेंगे

1291
01:32:44,800 --> 01:32:49,040
कि हम अल्लाह क्यों नहीं कहेंगे कृष्ण को

1292
01:32:49,040 --> 01:32:53,080
क्योंकि हमारी जानकारी में अल्लाह वो है सबसे पहली

1293
01:32:53,080 --> 01:32:58,360
बात है स्वरूप निश्चित होना चाहिए सगुण साकार की भक्ति के लिए भक्ति का विषय सगुण

1294
01:32:58,360 --> 01:33:02,480
साकार इसलिए सगुण साकार स्वरूप है भगवान

1295
01:33:02,480 --> 01:33:06,640
का कृष्ण राम शिव शिव जी के भी दो रूप

1296
01:33:06,640 --> 01:33:11,240
होते हैं सग निराकार सगुण साकार दोनों है शिव जी का सगुण

1297
01:33:11,240 --> 01:33:15,920
साकार स्वरूप है उसकी अगर भक्ति करते हैं तो उसको हम अल्लाह से नहीं जोड़े क्योंकि अल्लाह जो है

1298
01:33:15,920 --> 01:33:20,120
वो खुद कह रहे हैं कि हम अवतार नहीं ले सकते तो व्यवहारिक रूप से भी

1299
01:33:20,120 --> 01:33:21,960
वो य क रहे

1300
01:33:21,960 --> 01:33:26,480
कि मेरे ऊपर कुछ नियम लागू होते

1301
01:33:26,480 --> 01:33:30,920
हैं सही कह रहे मनु जी आप

1302
01:33:30,920 --> 01:33:35,040
कि कैसे सनातनी योद्धा है जो वेद और उपनिषद को नहीं मानते

1303
01:33:35,040 --> 01:33:40,040
यही यही रूप ऐसे लोगों का हमें बाहर लाना

1304
01:33:40,040 --> 01:33:44,680
है हमें जो भ्रांति में है कि मैं सनातनी

1305
01:33:44,680 --> 01:33:48,680
ह किसी भी देश काल परिस्थिति में जो ना बदले उसका नाम सनातन

1306
01:33:48,680 --> 01:33:53,440
है अब इन्होंने कहा मैं पुराण को मानता हूं खुद कह रहे हैं म वेदव्यास जी ने पुराण लिखे

1307
01:33:53,440 --> 01:33:57,560
यानी कि उन्होंने जब पुराण लिखे थे इनके अनुसार तो उससे पहले तो एक्जिस्टेंस ही

1308
01:33:57,560 --> 01:34:01,560
नहीं था उनका तो यानी कि सनातन धर्म ग्रंथों को नहीं मानते जब तक ये

1309
01:34:01,560 --> 01:34:05,720
बात नहीं मानेंगे कि पं पुराण में लिखा गया है कि वेदों के समय पर भगवान

1310
01:34:05,720 --> 01:34:09,720
ब्रह्मा ने उसका स्मरण किया था पुराणों

1311
01:34:09,720 --> 01:34:13,920
का तब तो मान पाएंगे अगर य

1312
01:34:13,920 --> 01:34:18,120
ये मानेंगे कि वेदव्यास जी के लिखे हुए पुराण है तो फिर वो तो सनातनी

1313
01:34:18,120 --> 01:34:24,120
कहां से कह रहे हैं सबसे पहले तो आप सनातन से बाहर जाइए

1314
01:34:26,160 --> 01:34:32,160
सही कह रहे हैं वेदांत जी इतने प्रश्न

1315
01:34:38,160 --> 01:34:42,400
यदि वेद को भी नहीं मानता है जी इन्होंने

1316
01:34:42,400 --> 01:34:46,680
सारे वेद पढ़ लिए क्या ये क्लेम कर रहे हैं कि भगवान शिव को परब्रह्म नहीं बोला

1317
01:34:46,680 --> 01:34:50,760
गया है कौन से आधार पर यह बात क्लेम कर रहे हैं नहीं नहीं हम इनको जवाब देंगे हमने वो सेक्शन

1318
01:34:50,760 --> 01:34:54,880
में छोड़ दिया था उपनिषद नहीं मानता ठीक

1319
01:34:54,880 --> 01:34:59,040
है अब हम इसकन का पक्ष रखने वाले के जो ये जो वीडियोस है देखिए

1320
01:34:59,040 --> 01:35:03,040
हो सकता है कि मेरे तरफ से इस सम इस वक्त इस समय थोड़ा सा

1321
01:35:03,040 --> 01:35:07,800
अमर्यादित व्यवहार दिखाई दे रहा हो पर उसकी एक मात्र वजह है कि जो

1322
01:35:07,800 --> 01:35:11,880
मेरे अंदर कोई एक ऐसा फीड है कि जैसे ही कोई विरुद्ध बात करने

1323
01:35:11,880 --> 01:35:17,320
लगता है बिल्कुल अतार्किक बातें करने लगता है तो थोड़ा सा

1324
01:35:17,320 --> 01:35:22,080
ऐसा ब्लड फलो होने लगता है कि थोड़ा सा मेरे जो स्वर है बात करने का जो

1325
01:35:22,080 --> 01:35:26,280
तरीका है भाषा शैली है थोड़ी सी चेंज होती है हां मर्यादित रहती है कभी

1326
01:35:26,280 --> 01:35:29,240
मर्यादा को नहीं लाे

1327
01:35:29,240 --> 01:35:33,280
मगर इतना सब सुनने के बाद किसको धैर

1328
01:35:33,280 --> 01:35:39,280
रहेगा पूज्य गुरुदेव के

1329
01:35:50,400 --> 01:35:56,360
अलावा

1330
01:35:56,360 --> 01:36:00,840
ठीक है लगभग हमने सभी प्रश्नों के जवाब ले लिए हैं आप सभी को

1331
01:36:00,840 --> 01:36:04,880
जय श्री राम और आपका इस प्रकार से समर्थन प्रकट करने

1332
01:36:04,880 --> 01:36:09,560
के लिए आभार आपका हम लोग बहुत अतिशीघ्र एक

1333
01:36:09,560 --> 01:36:13,680
भगवान शिव का भक्ति गीत है वो लेके आने वाले हैं जिसमें

1334
01:36:13,680 --> 01:36:17,880
हमने द्वै अद्वैत साकार निराकार

1335
01:36:17,880 --> 01:36:22,160
ये सारी चीजों की बात की है और हमने इसका एक शॉर्ट भी डाल रखा है वहां अपने

1336
01:36:22,160 --> 01:36:26,160
हमारे शॉर्ट्स की गैलरी में आप जाकर देख सकते हैं तो एक रैप सॉन्ग बनाया

1337
01:36:26,160 --> 01:36:30,920
है युवाओं के लिए बहुत अच्छा रहेगा और उसके माध्यम से हम ये चीजें बताई है उसमें

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कि भाई साकार निराकार में क्या अंतर है साकार

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हमारे भक्ति का विषय व्यवहार का विषय और निराकार प्राप्ति

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का विषय तो निराकार के लिए हमें प्रयत्न नहीं करना है प्रयत्न करना है साकार

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के लिए सगुण साकार और ऐसे ही भक्ति हूं मैं द्वैत

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की अद्वैत का मैं ज्ञान हूं ज्ञान का विषय अद्वैत और भक्ति का विषय द्वैत

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और यह बातें हमें जनजन तक पहुंचा नहीं है ये लोग जो जितना इन्होंने प्रोपेगेंडा फैलाया

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है कि भई वो तो मायावादी उनसे दूर रहना यह

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इसलिए जब इनके ट्रेनिंग सेशन चलते हैं तो सबसे पहले क्लास

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में बताया जाता

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है कि भाई शंकराचार्य से दूर रहना शंकराचार्य क्योंकि

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उन्ह मालूम है कि जिस दिन य शंकराचार्य के पास पहुंच जाएंगे ना इनकी सारी चीज गलतफहमिया

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दूर हो जाएंगी तोय शंकराचार्य से एक निश्चित दूरी बना के रखते हैं शंकराचार्य

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के पास जि पहुंच गए भाई इकी दूरी ग दूर हो जाएगी तो हमा जो भी प्रोटोल है

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हमारी जो भी मान्यता है वो बंद हो जाए संभवत

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बात भी कर रहा हूं मैं निर्णायक नहीं मैं अंतिम बातें नहीं बोल रहा अगर इसमें

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कोई भी मैं गलत बात बोल रहा हूं जिसको आप सही कर सकते हैं तो आप करिएगा

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आप कहते शंकराचार्य जी मायावादी शंकराचार्य जी

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मायावादी है पहले तो यही सिद्ध नहीं होता और फिर

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वैष्णवास्त्र री बात अगर शंकराचार्य जी के सिद्धांत को आप स्वीकार नहीं

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तो तीन चीज प्राप्त नहीं कर पाएंगे तीन चीज परम स्वतंत्र

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01:37:58,640 --> 01:38:02,920
ईश्वर सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म

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ये तीन चीज आपको प्राप्त नहीं हो पाए और यही तीनों चीज मिलकर के

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धर्म असतो मा सद गम तमसो मा जमया म

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मतम गम इसका अर्थ है इसके मूल में कि

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मनुष्य जो है सब कुछ कर सकने वाला बनना चाहता है कंट्रोल चाहता है प्रकृति

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पर खैर मैं विराम लूंगा सभी

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को जय श्री

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राम
