1
00:00:02,400 --> 00:00:05,920
तो सभी को जय श्री राम।

2
00:00:05,920 --> 00:00:10,000
मेरी आवाज आ रही है सभी को?

3
00:00:10,000 --> 00:00:14,160
ठीक है। तो सभी को मालूम है हाल ही में हमारी एक

4
00:00:14,160 --> 00:00:18,480
चर्चा हुई है अग्निव्रत जी के साथ जो आर्य समाज

5
00:00:18,480 --> 00:00:22,800
के वैज्ञानिक आचार्य के रूप में जाने जाते हैं।

6
00:00:22,800 --> 00:00:27,040
आधे मतलब आधा आर्य समाज उन्हें मानता है कि आर्य समाज

7
00:00:27,040 --> 00:00:31,040
हैं और कुछ ऐसा वर्ग भी है बहुत बड़ा जो नहीं मानता कि वो जो

8
00:00:31,040 --> 00:00:35,040
है आर्य समाज की बातें मानते हैं। कई हिस्सों में वो जो है उनमें

9
00:00:35,040 --> 00:00:39,360
मान्यता को लेकर के यह है कि आप दयानंद जी का विरोध कर रहे हैं।

10
00:00:39,360 --> 00:00:44,000
तो [गला साफ़ करने की आवाज़] इस चर्चा को लेकर के

11
00:00:44,000 --> 00:00:48,080
एक समीक्षात्मक कम कहूंगा।

12
00:00:48,080 --> 00:00:52,480
पक्षपाती कटाक्ष पूर्वक वीडियो प्राप्त हुआ है। योगेश

13
00:00:52,480 --> 00:00:56,640
भारद्वाज जी का। तो सबसे पहली बात तो मैं साधुवाद

14
00:00:56,640 --> 00:01:01,360
कहूंगा। योगेश भारद्वाज जी ने इस पर प्रतिक्रिया दी है इस वीडियो पर

15
00:01:01,360 --> 00:01:04,560
और

16
00:01:04,560 --> 00:01:08,560
उसका कारण यह है कि योगेश भारद्वाज जी जैसे लोग आर्य

17
00:01:08,560 --> 00:01:12,720
समाज के विद्वानों में गिने जाते हैं। आर्य समाज की ओर से जो

18
00:01:12,720 --> 00:01:16,880
विद्वान है कुछ गिने चुने मेरी जानकारी में उसमें से एक नाम उनका भी

19
00:01:16,880 --> 00:01:21,200
है। तो क्या था कि मैं जब

20
00:01:21,200 --> 00:01:25,360
अपने मान बिंदुओं को लेकर के मैं बहुत बार बता चुका हूं कि क्यों गया क्यों निकला हूं। वो

21
00:01:25,360 --> 00:01:29,680
सब ठीक है। तो मैं जब निकला था तो मुझे एक नाम यह भी था कि आचार्य

22
00:01:29,680 --> 00:01:34,080
ये जो योगेश भारद्वाज जी का जो प्रसिद्ध जो इनकी जो प्रसिद्धि

23
00:01:34,080 --> 00:01:38,080
है आचार्य के रूप में और इनका भाई इनको लोग मानते हैं बड़े विद्वान

24
00:01:38,080 --> 00:01:42,240
है। इनके साथ अगर चर्चा हो जाएगी तो बहुत बढ़िया रहेगा।

25
00:01:42,240 --> 00:01:46,240
तो मुझे इस चीज को लेकर के समस्या

26
00:01:46,240 --> 00:01:50,240
होती है कि आर्य समाज के किसी बड़े व्यक्ति के साथ चर्चा कैसे करें?

27
00:01:50,240 --> 00:01:54,240
अगर हम उसको कहते भी हैं चर्चा करने को तो वह टालता है, मना कर

28
00:01:54,240 --> 00:01:58,720
देता है। उसके पास अपनी रीजनिंग हो सकती है चर्चा ना करने की। हमसे

29
00:01:58,720 --> 00:02:03,360
डायरेक्ट इंटरेक्ट ना करने की हो सकती है कि मैं उनके योग्य नहीं हूं। मैं

30
00:02:03,360 --> 00:02:07,520
उस स्तर पर नहीं खड़ा हुआ हूं। भाई अगर हमारे यहां के कोई आचार्य संपर्क करना

31
00:02:07,520 --> 00:02:11,520
चाहे तो व्यवस्थित रूप से चर्चा मतलब बहुत सारी रीजनिंग उनके पास हो सकती है जो

32
00:02:11,520 --> 00:02:16,240
बिल्कुल सही है। उसमें कोई आपत्ति नहीं है। तो फिर हम क्या करें?

33
00:02:16,240 --> 00:02:20,720
हम क्या करें कि उनके यहां के जो

34
00:02:20,720 --> 00:02:24,800
ऊंचे स्तर पर बैठे हुए लोग हैं। वह भी एक

35
00:02:24,800 --> 00:02:28,960
समय ऐसा आए जो हमसे बात करें तो हम अपने आप को

36
00:02:28,960 --> 00:02:32,960
योग्य बनाएं। क्या करें? इस योग्य बनाएं कि

37
00:02:32,960 --> 00:02:37,040
एक दिन हम उनकी नजरों में आने लगे। वो विवश हो जाए

38
00:02:37,040 --> 00:02:41,040
हमारा उत्तर देने के लिए। हमसे सामना करने के लिए उनको विवश किया

39
00:02:41,040 --> 00:02:46,320
जाता है। जैसे भगवान श्री कृष्ण ने जब कंस के यहां पहुंचे

40
00:02:46,320 --> 00:02:50,480
तो कंस के अनेक पहलवानों को जो है कूट दिया। एक-एक करके

41
00:02:50,480 --> 00:02:55,280
एक-एक करके एक-एक करके अंत में कंस को आना ही पड़ा

42
00:02:55,280 --> 00:02:59,600
अखाड़े में। तो वही वाली बात है

43
00:02:59,600 --> 00:03:03,760
कि भाई ठीक है बड़े पहलवान से सीधे अगर नहीं मिल

44
00:03:03,760 --> 00:03:08,400
रहा है तुम्हें मुकाबले का अवसर तो ठीक है जो मिल जाए उसी को कूटो

45
00:03:08,400 --> 00:03:12,480
उसी को पटको पटकते रहो कभी ना कभी उस उस

46
00:03:12,480 --> 00:03:16,640
दल का जो बड़ा पहलवान होगा उसको आने पर विवश होना पड़ेगा तो वही

47
00:03:16,640 --> 00:03:20,880
वाली बात है इसी कारण से यह अग्निव्रत जी आ पहुंचे

48
00:03:20,880 --> 00:03:26,480
थे भाई कुछ हमने ऐसा किया ना कि वह आ गए

49
00:03:26,480 --> 00:03:30,960
उन्होंने फोन किया हमको हमने ऐसा कुछ किया तो

50
00:03:30,960 --> 00:03:35,120
योगेश जी ने वीडियो बना के सीधे तौर पर इंटरेक्शन में आकर के अखाड़े

51
00:03:35,120 --> 00:03:35,760
में कूद के

52
00:03:35,760 --> 00:03:39,840
बड़ा अच्छा कर दिया क्योंकि हमारा बड़ा एक विचार यह था कि योगेश

53
00:03:39,840 --> 00:03:44,160
जी के साथ भी जो है चीजें

54
00:03:44,160 --> 00:03:48,480
सुनिश्चित हो जाए चीजें स्पष्ट हो जाए वो हो गया। अच्छा

55
00:03:48,480 --> 00:03:52,560
एक चीज और है कि योगेश

56
00:03:52,560 --> 00:03:56,560
भारद्वाज जी की नजरों में हम काफी दिनों से हैं। यह आज उनके वीडियो

57
00:03:56,560 --> 00:04:00,720
से मुझे पता चला काफी दिनों से हैं। उन्होंने कहा कि भाई

58
00:04:00,720 --> 00:04:05,120
उन्होंने हमारा प्रीति विमर्शनी जी का वीडियो भी देखा है। और भी कई आचार्यों

59
00:04:05,120 --> 00:04:09,200
के साथ जो उनके आगे वीडियो हुए हैं। मतलब हम यह सोच रहे हैं कि हम अभी उनकी नजरों

60
00:04:09,200 --> 00:04:13,200
में नहीं है। इसीलिए भाई कोई ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं या फिर हमने अभी तक ऐसा कुछ

61
00:04:13,200 --> 00:04:17,360
नहीं किया कि कुछ कहना करना पड़ जाए। अच्छा हमें

62
00:04:17,360 --> 00:04:21,360
उनका एक वीडियो और भी प्राप्त हुआ जिसमें वह कह रहे हैं कि भाई शिवश नारायण द्विवेदी

63
00:04:21,360 --> 00:04:25,360
हैं और वह जो है परंपरा पूछते हैं कोर्ट परंपरा इत्यादि

64
00:04:25,360 --> 00:04:29,360
वहां भी कटाक्ष कर रहे हैं। किसी और के साथ वार्ता कर रहे हैं और उस वार्ता में

65
00:04:29,360 --> 00:04:33,520
ये कह रहे हैं। यह भी मालूम पड़ा कि हाइपरकस्ट के यहां पर भी वो गए। वहां पर भी शिवश नारायण

66
00:04:33,520 --> 00:04:37,680
द्विवेदी उनके स्मरण में और इतना सब होने के साथ-साथ आज

67
00:04:37,680 --> 00:04:41,840
के वीडियो में उन्होंने यह कहा कि मोहित गॉड ने हमको जो है चर्चा के लिए बुलाया था

68
00:04:41,840 --> 00:04:45,840
पर हम नहीं गए। तो बुलाया तो आचार्य जी हमने भी आपको है।

69
00:04:45,840 --> 00:04:49,920
आप क्यों नहीं आए? डर लगता है। डरना तो

70
00:04:49,920 --> 00:04:50,880
नहीं चाहिए। हमने आपसे

71
00:04:50,880 --> 00:04:55,040
काफी कुछ सीखा है आज की वीडियो से। हां। और आप उस वीडियो

72
00:04:55,040 --> 00:04:59,280
में यह कह रहे हैं कि हमें समझा दीजिए। वैसे हमारी निशुल्क कक्षाएं चलती

73
00:04:59,280 --> 00:05:03,440
हैं। उसमें आपको वो जो 515100 लेकर के जो मंदिरों में

74
00:05:03,440 --> 00:05:07,920
चंदा इकट्ठा किया जाता है। जिहादियों के साथ हिंदू बिटिया को विवाह करा के

75
00:05:07,920 --> 00:05:11,920
वो खर्च नहीं करना पड़ेगा। हमारी कक्षाएं निशुल्क चलती है। आप

76
00:05:11,920 --> 00:05:16,160
आ सकते हैं। आपका स्वागत है। कुछ समझना चाहते हैं। वैसे काफी कुछ आपके जो जिज्ञासाएं

77
00:05:16,160 --> 00:05:20,160
हैं वह आज के वीडियो में मैं शांत करा दूंगा। फिर भी आप अगर हमारी कक्षाएं

78
00:05:20,160 --> 00:05:24,240
ज्वाइन करना चाहते हैं तो आपके लिए छूट है। निशुल्क वैसे भी है। आपको और भी

79
00:05:24,240 --> 00:05:28,320
कुछ हम अपनी ओर से प्रदान कर देंगे। यदि आप आएंगे तो तो आपको

80
00:05:28,320 --> 00:05:32,400
वो वाली जो राशि है जो आर्य समाज मंदिरों से आती होगी आपके यहां भी ₹5100

81
00:05:32,400 --> 00:05:36,400
वाली राशि वो खर्च नहीं करनी पड़ेगी। खैर मोहित गड के बुलाने पर हम क्यों

82
00:05:36,400 --> 00:05:40,960
नहीं गए? यह भी एक बड़ी अच्छी बात आपने कही मोहित गड के बुलाने पर।

83
00:05:40,960 --> 00:05:44,960
यानी कि कोई व्यक्ति अगर आपसे आकर के पूछ रहा है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि

84
00:05:44,960 --> 00:05:49,040
नहीं? अवतार क्यों नहीं ले सकता? तो आपने अपने लोगों को

85
00:05:49,040 --> 00:05:53,280
ये सिखाया है कि उसके घर की स्त्रियों की फोटो ढूंढो। कहां से फोटो

86
00:05:53,280 --> 00:05:57,520
मिल जाए और उस फोटो को जो है बैठकर के उसका मखौल उड़ाओ। वातावरण बनाओ।

87
00:05:57,520 --> 00:06:01,520
उसमें गालीबाजों को बुला लो। है ना? टपोरियों को बुला लो और उनको

88
00:06:01,520 --> 00:06:05,600
बिठा करके उसका मजाक उड़ाओ। उसका और उसके घर की स्त्रियों का क्योंकि उसने पूछ लिया

89
00:06:05,600 --> 00:06:06,100
था कि

90
00:06:06,080 --> 00:06:10,160
तुमने जनेऊ वेदोक्त रीति से क्यों नहीं किया क्योंकि उसने आर्य समाज से पूछ लिया है

91
00:06:10,160 --> 00:06:14,320
कि क्या आर्य समाज का ईश्वर सर्वशक्तिमान है? क्योंकि उसने आर्य समाज

92
00:06:14,320 --> 00:06:18,320
से यह पूछ लिया है कि भैया आपको वेद कहां से

93
00:06:18,320 --> 00:06:22,400
प्राप्त हुए? आपकी परंपरा क्या है? तो अब मैं अब मैं समझ पाया कि

94
00:06:22,400 --> 00:06:26,560
मोहित गड जो है वह आपके द्वारा सिखाया पढ़ाया हुआ व्यक्ति है

95
00:06:26,560 --> 00:06:30,720
जो ऐसे कार्यों में लिप्त था और जिन कार्यों की वजह से हमने उसके साथ चर्चा से

96
00:06:30,720 --> 00:06:36,560
उस समय दूरी बनाई थी जिस समय उसने हाल ही में ये कार्य किया था

97
00:06:36,560 --> 00:06:40,720
तो मजा आ गया आपकी इतनी अच्छी शिक्षा प्रणाली देख के वैसे

98
00:06:40,720 --> 00:06:44,800
ये भी वेद भाष्य में लिखा होगा आपके तथाकथित स्वकल्पित वेद भाष्य जो

99
00:06:44,800 --> 00:06:48,960
आपके उसी में लिखा होगा यह सब भी कि कोई आर्य समाज से अगर प्रश्न करने आए तो क्या-क्या

100
00:06:48,960 --> 00:06:52,960
करना उसकी एफबी से चार साल पहले की 5 साल पहले की

101
00:06:52,960 --> 00:06:57,040
फोटो निकालनी है। उनको किस-किस तरीके से इस्तेमाल करना है और वो ऋषिवाच भी

102
00:06:57,040 --> 00:07:01,040
उस चर्चा में था जिसमें मोहित गड था। ऋषि वाच जो है शंकराचार्य

103
00:07:01,040 --> 00:07:05,200
के लिए और उन मान्य आचार्यों के लिए जो आपके लिए मान्य है ना आपके

104
00:07:05,200 --> 00:07:09,520
वो आए थे ना तथाकथित वैज्ञानिक जी वो कह रहे थे हम ऋणी हैं शायण के शंकराचार्य

105
00:07:09,520 --> 00:07:13,840
के ऋणी है हम तो जिनके हम ऋणी है उनको गालियां

106
00:07:13,840 --> 00:07:18,560
देना और ना जाने कौन-कौन सा बाज बताना व्यश्यावत्त

107
00:07:18,560 --> 00:07:21,440
में लिप्त रहने वाला बताना भोग करने वाला बताना

108
00:07:21,440 --> 00:07:25,520
यह सब आप ही ने सिखाया आज मुझे पता चला आपकी वीडियो से आपका बहुत अच्छा कनेक्शन

109
00:07:25,520 --> 00:07:29,600
वो बात और है कि मोहित गड को शर्म आती

110
00:07:29,600 --> 00:07:33,600
है यह कहते हुए कि मैं आर समाजी हूं। उसको लज्जा होती

111
00:07:33,600 --> 00:07:37,600
है यह कहते हुए मैं आर समाजी हूं। कैसा सिस्टम है आपका? एक

112
00:07:37,600 --> 00:07:41,600
तरफ वो अग्निव्रत जी चर्चा के बीच में कहते हैं कि भाई मैं दयानंद जी की बात नहीं

113
00:07:41,600 --> 00:07:45,680
कर रहा हूं। दयानंद जी के भाष्य पर जब प्रश्न किए जाते हैं। सत्यार्थ प्रकाश पर जब प्रश्न

114
00:07:45,680 --> 00:07:50,960
किए जाते हैं वो कहते हैं मैं दयानंद जी की बात नहीं कर रहा हूं। आर्य समाज को छोड़ने लगता है व्यक्ति।

115
00:07:50,960 --> 00:07:54,960
और यदि कोई प्लस पॉइंट हो जाए तो यह भी हमारा वह

116
00:07:54,960 --> 00:07:59,120
भी हमारा और कोई माइनस पॉइंट हो जाए तो तू कौन? मैं कौन?

117
00:07:59,120 --> 00:08:03,520
हम आपके हैं कौन? अच्छी चीज हो जाए तो हम साथ-साथ हैं

118
00:08:03,520 --> 00:08:07,760
और कोई गलत चीज हो जाए तो हम आपके हैं कौन? सिंपल।

119
00:08:07,760 --> 00:08:12,720
यह अपना अच्छा नजरिया आपने बताया। खैर

120
00:08:12,720 --> 00:08:17,440
तो योगेश भारद्वाज जी का जो वीडियो है

121
00:08:17,440 --> 00:08:21,440
उसको देख के मैंने एक फिल्मी गाना

122
00:08:21,440 --> 00:08:27,440
है। उसकी मुझे एक पंक्ति याद आ रही है। वो कुछ इस तरीके की है कि

123
00:08:27,920 --> 00:08:32,800
क्या था? [गला साफ़ करने की आवाज़] मैंने लिख ली थी उसको। हम

124
00:08:32,800 --> 00:08:36,800
पंक्ति ये याद आ रही है मुझे गाने की। मिलती जुलती रहेगी।

125
00:08:36,800 --> 00:08:41,120
150 बरस की 150 बरस

126
00:08:41,120 --> 00:08:46,080
की समाजी उपज को सलाम।

127
00:08:46,080 --> 00:08:50,240
भारद्वाज की पहनी नजर

128
00:08:50,240 --> 00:08:54,560
को प्रणाम 150 बरस की

129
00:08:54,560 --> 00:08:58,960
समाजी उपज को सलाम भरद्वाज

130
00:08:58,960 --> 00:09:03,200
की पैनी नजर को प्रणाम। पैनी

131
00:09:03,200 --> 00:09:07,280
नजर क्या है यह पैनी नजर? पैनी

132
00:09:07,280 --> 00:09:11,840
नजर यह है कि जब हमें कोई मटेरियल

133
00:09:11,840 --> 00:09:16,320
मिलता है तो उसमें यह ढूंढना है कि किस-किस

134
00:09:16,320 --> 00:09:20,400
प्रकार से हमें अपने व्यक्ति को कौन-कौन से पॉइंट हैं

135
00:09:20,400 --> 00:09:24,400
जहां पर बचाना है और विपक्षी दल के व्यक्ति

136
00:09:24,400 --> 00:09:28,480
पर आक्रमण करना है। गिद्ध की तरह कहां पर मांस

137
00:09:28,480 --> 00:09:32,720
है कहां कहां पर शिकार है उसको ढूंढना है वो बस उसी जगह

138
00:09:32,720 --> 00:09:36,720
मारना है। वो जो एक एक चीज और याद आ रही

139
00:09:36,720 --> 00:09:40,720
है इससे। वो शायद इनका कुछ विधर्मी से सैद्धांतिक कनेक्शन है तो वो रिफ्लेक्ट हो जाता

140
00:09:40,720 --> 00:09:43,040
है। मूर्ति पूजा का विरोध है

141
00:09:43,040 --> 00:09:47,280
ना वो बुद्ध परिस्थिति का विरोध करते हैं। मूर्ति पूजा का विरोध करते हैं। ईश्वर अवतार

142
00:09:47,280 --> 00:09:51,680
नहीं ले सकता उनका इनका दोनों तो सैद्धांतिक एग्रीमेंट है इनके बीच में जो अनुबंध

143
00:09:51,680 --> 00:09:55,840
वो कहीं-कहीं पर रिफ्लेक्ट हो जाता है। इस प्रकार की चीजों से उनका क्या है?

144
00:09:55,840 --> 00:10:00,160
हमारे देश में हमारे देश में जहांजहां पर भी

145
00:10:00,160 --> 00:10:04,400
हमारे जो मुख्य स्त्रोत है ना केंद्र हैं धर्म के

146
00:10:04,400 --> 00:10:08,400
वहीं वहीं पर जो विधर्मी हैं वो कब्जा करना चाहते हैं।

147
00:10:08,400 --> 00:10:13,120
उसी को खराब करना चाहते हैं। आप काशी चले जाओ तो काशी में भी

148
00:10:13,120 --> 00:10:17,120
मामला चल रहा है। कृष्ण जन्मभूमि चले जाओ। राम जन्मभूमि चले जाओ। हां वो

149
00:10:17,120 --> 00:10:21,520
आर्य समाज के मंदिरों पर कब्जा नहीं करना चाहते। वो जगह नहीं हड़पना चाहते हैं।

150
00:10:21,520 --> 00:10:25,520
क्या रखा है वहां पर? वो तो अपने ही जैसा है। बस नाम ही तो चेंज है। समय आने पर नाम

151
00:10:25,520 --> 00:10:29,600
भी बदल लेंगे। क्या दिक्कत है? बहु बेटियां तो आ ही रही है वहां से यहां। वही तो

152
00:10:29,600 --> 00:10:33,680
एक जरिया है जहां से उनके यहां की बिटियां यहां आ रही हैं। तो क्या दिक्कत

153
00:10:33,680 --> 00:10:37,680
है? वहां नहीं करते। वो कृष्ण जन्मभूमि जहां भगवान को अवतार माना जाता है।

154
00:10:37,680 --> 00:10:41,920
राम जन्मभूमि जहां भगवान को अवतार माना जाता है। वो काशी

155
00:10:41,920 --> 00:10:45,920
विश्वनाथ इत्यादि परिसरों के आसपास अपना ये बेड़ा

156
00:10:45,920 --> 00:10:50,000
लगाते हैं और जिस तरीके से वो ढूंढते हैं कि

157
00:10:50,000 --> 00:10:54,000
कहां इनकी सबसे ज्यादा ताकत है वहीं पर

158
00:10:54,000 --> 00:10:58,160
प्रहार करते और वहीं पर कमजोरी करना करते। तो आज का पूरा मैंने वीडियो जो

159
00:10:58,160 --> 00:11:02,160
देखा उसमें जहांजहां पर आचार्य जी की सबसे नीची हो रही

160
00:11:02,160 --> 00:11:07,200
थी वहीं वहीं पर इन्होंने पकड़ के और कुछ ऐसी बातों बातें की

161
00:11:07,200 --> 00:11:11,520
जिनमें कि व्यक्ति को लगे वाह वाह वाह वाह वही वाली बात मेरा

162
00:11:11,520 --> 00:11:16,240
कल मेरा कल आचार्य जी हार गए पर मेरा कल मेरा कल वाह क्या

163
00:11:16,240 --> 00:11:20,880
वो मारा है तीर मारा है खैर [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा

164
00:11:20,880 --> 00:11:24,880
अब आगे बढ़ने से पहले मैं

165
00:11:24,880 --> 00:11:27,440
एक चीज

166
00:11:27,440 --> 00:11:33,120
समझाना चाहूंगा कि आज मैंने क्या सीखा

167
00:11:33,120 --> 00:11:37,280
आज इनका योगेश जी का वीडियो देख के मैंने क्या सीखा है। मैं अभी

168
00:11:37,280 --> 00:11:41,600
तक समझता था टू द पॉइंट का जो अर्थ होता है वो यह होता है कि ऐसी

169
00:11:41,600 --> 00:11:45,680
बातें करने से बचना जो हमारे विषय की नहीं है

170
00:11:45,680 --> 00:11:49,760
जिस विषय पर बातचीत चल रही है उस उससे बहुत ज्यादा उनका मतलब

171
00:11:49,760 --> 00:11:54,000
नहीं है और जिन पर बात करने की कारण ऐसा हो सकता

172
00:11:54,000 --> 00:11:56,800
है कि

173
00:11:56,800 --> 00:12:00,880
विषय बदल जाए या हमारा खामखा दूसरी चीजों में बहुत ज्यादा टाइम

174
00:12:00,880 --> 00:12:04,960
स्पेंड होने लगे तो ऐसी चीजों से ऐसी चीजें ना करना और मूल

175
00:12:04,960 --> 00:12:09,520
विषय से संबंधित बातें ही करते रहना। तो आज योगेश जी से मेरी जो

176
00:12:09,520 --> 00:12:13,200
मैंने योगेश जी का जो मैं बहुत-बहुत साधुवाद करता हूं। बहुत आपने मैं

177
00:12:13,200 --> 00:12:17,200
ऋणी हूं आपका भी। आज आपने मुझे यह अर्थ बताया कि टू द पॉइंट रहने का

178
00:12:17,200 --> 00:12:21,520
मतलब है, विषय पर रहने का मतलब है ऐसी सारी बातें करना जिनका

179
00:12:21,520 --> 00:12:25,600
विषय से कोई मतलब नहीं है और ऐसी बातों के आधार पर ही यह सिद्ध

180
00:12:25,600 --> 00:12:30,000
करना कि हमने अपना पक्ष सिद्ध कर लिया। यह

181
00:12:30,000 --> 00:12:35,680
है टू द पॉइंट का मतलब। यह है विषय पर रहने का मतलब। अब कैसे?

182
00:12:35,680 --> 00:12:40,560
तो मैं थोड़ा सा उदाहरण दे देता हूं।

183
00:12:40,560 --> 00:12:44,720
कुछ उदाहरण देता हूं। तीन भागों में होगा मेरा जो यह समीक्षा

184
00:12:44,720 --> 00:12:48,800
है उनके वीडियो की प्लस जो वो क्या कहते हैं

185
00:12:48,800 --> 00:12:54,800
वो जो चर्चा हुई थी उस पर भी हम थोड़ी बहुत बातें करेंगे और

186
00:12:55,920 --> 00:13:00,000
एक कि इन्होंने जो ये टू द पॉइंट वाला जो शटर घोट किया

187
00:13:00,000 --> 00:13:04,000
है ना अपनी वीडियो में कि ऐसी ही बातों पर जोर

188
00:13:04,000 --> 00:13:08,160
देना जिनका विषय से कोई मतलब नहीं है। एक ये वाला भाग है। एक यह वाला

189
00:13:08,160 --> 00:13:12,400
भाग है कि जो मुझे लगता है कि जो उन्होंने क्वेश्चन रेज किए हैं और जिनका

190
00:13:12,400 --> 00:13:16,800
उत्तर बनता है। हालांकि वह सारे उत्तर हम अपनी वीडियो में दे चुके हैं। पर योगेश भारद्वाज

191
00:13:16,800 --> 00:13:20,960
जी निशुल्क कक्षाओं में आना चाहते हैं। इसलिए मैंने कहा कि भाई कक्षाओं में आने से पहले यहीं पर थोड़े

192
00:13:20,960 --> 00:13:25,040
बहुत आंसर्स आप ले लीजिए जिससे आप समझ

193
00:13:25,040 --> 00:13:29,280
सके कि जिसको आप गुरु बनाने के लिए जा रहे हैं वो उस योग्य है कि नहीं।

194
00:13:29,280 --> 00:13:33,840
है ना? खैर [गला साफ़ करने की आवाज़] तो क्या है

195
00:13:33,840 --> 00:13:38,080
कि इन्होंने सबसे पहले तो एक कटाक्ष

196
00:13:38,080 --> 00:13:42,080
करने का प्रयास किया वहां पर कि मैंने जो अपना

197
00:13:42,080 --> 00:13:46,080
परिचय दिया वर्तमान पूरी पीठाधीश्वर वो

198
00:13:46,080 --> 00:13:50,080
कहना चाहिए था पूरी के वर्तमान पीठाधीश्वर जो है खैर उसमें भी अगर देखा

199
00:13:50,080 --> 00:13:54,320
जाए तो बहुत सारी शाब्दिक वो निकल आएंगी कि वर्तमान के जगुरु शंकराचार्य

200
00:13:54,320 --> 00:13:58,640
पीठ के पीठाधीश्वर बहुत सी चीजें हैं जो उसमें निकाली जा सकती है और उसमें

201
00:13:58,640 --> 00:14:02,720
व्याकरण का पक्ष मेरा गलत है कि नहीं गलत है मैं इस पर भी

202
00:14:02,720 --> 00:14:06,800
नहीं जाऊंगा और स्लिप ऑफ टंग तो इन्होंने मान ही लिया है स्लिप ऑफ टंग इन्होंने भी मान

203
00:14:06,800 --> 00:14:11,040
लिया। हालांकि इस वीडियो में इनकी भी स्लिप ऑफ टंग हुई है। मैं इनको प्रिविलेज दूंगा

204
00:14:11,040 --> 00:14:15,360
क्योंकि मैंने इनसे आज बहुत कुछ सीखा है। इसलिए इनको प्रिविलेज में दूंगा।

205
00:14:15,360 --> 00:14:19,440
बिल्कुल दूंगा। तो स्लिप ऑफ टंग हो

206
00:14:19,440 --> 00:14:23,840
गई या मेरी व्याकरण गलत है। मगर कुल मिलाकर के ये बात करने की आवश्यकता

207
00:14:23,840 --> 00:14:28,800
क्यों थी? भारद्वाज जी को। क्यों आवश्यकता थी?

208
00:14:28,800 --> 00:14:32,880
इसलिए आवश्यकता थी कि स्लिप ऑफ टंग से मानो या व्याकरण की

209
00:14:32,880 --> 00:14:37,200
गलती मानो। इसी से सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है।

210
00:14:37,200 --> 00:14:42,560
पहला पॉइंट वाह वाह वाह वाह मिरेकल मिरेकल करिए ताली पीटिए।

211
00:14:42,560 --> 00:14:46,720
शिवश नारायण द्विवेदी ने अपना परिचय ठीक से नहीं दिया। इसी से सिद्ध होता

212
00:14:46,720 --> 00:14:52,320
है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है। मिरेकल मिरेकल ताली पीटिए।

213
00:14:52,320 --> 00:14:55,040
अच्छा

214
00:14:55,040 --> 00:14:59,520
आगे चलते हैं। पन्ने पलटने की बात भी आएगी इसमें।

215
00:14:59,520 --> 00:15:03,840
खैर अच्छा स्वयं जो वैज्ञानिक

216
00:15:03,840 --> 00:15:08,000
महोदय हैं वह प्रिंट आउट निकाल निकाल कर एक पूरी

217
00:15:08,000 --> 00:15:12,080
फाइल बना के बैठे हैं एक अल्पज्ञ शिष्य से बात करने के लिए

218
00:15:12,080 --> 00:15:16,240
शंकराचार्य के अल्पज्ञ शिष्य अभी वो आचार्य

219
00:15:16,240 --> 00:15:20,240
जो धर्म को धारण किए हुए हैं ना वो तो आए नहीं है फिल्म में उनका कोई रोल

220
00:15:20,240 --> 00:15:24,720
अभी तक हुआ ही नहीं है एक अल्पज्ञ शिष्य से बात करने के लिए आपके वैज्ञानिक

221
00:15:24,720 --> 00:15:28,880
वैदिक रश्मिक थ्योरी देने वाले बड़े वैज्ञानिक

222
00:15:28,880 --> 00:15:33,040
फाइल बना के बैठे हैं और पन्ने वो भी पलट रहे हैं। मगर उनको उनका

223
00:15:33,040 --> 00:15:37,280
पन्ना पलटना ध्यान नहीं दिया। हालांकि कुछ तैयारी तो योगेश जी ने भी की थी लिखी

224
00:15:37,280 --> 00:15:41,600
हुई जो नीचे देख रहे थे पर उनको वो भी दिखाई नहीं दिया। उनको

225
00:15:41,600 --> 00:15:46,560
क्या दिखाई दिया कि मैंने पन्ने पलट करके कुछ बताया क्योंकि

226
00:15:46,560 --> 00:15:50,800
मैं ऐसा मानता हूं कि मुझे अपने धर्म

227
00:15:50,800 --> 00:15:55,120
की रक्षा करने के लिए अपने पक्ष के लिए किसी तैयारी की कोई जरूरत

228
00:15:55,120 --> 00:16:00,160
नहीं है। सीधी बात सर्वशक्तिमान

229
00:16:00,160 --> 00:16:04,560
ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म हर विधर्मी का

230
00:16:04,560 --> 00:16:08,560
अंत आउट अब बबा होने लगता

231
00:16:08,560 --> 00:16:10,560
है।

232
00:16:10,560 --> 00:16:14,640
इस तरीके से बार-बार यह कॉलर पर यहां पर हृदय गति चेक करने लगता है। व्यक्ति

233
00:16:14,640 --> 00:16:19,040
कहीं रुक ना जाए। पानी पीने लगता है व्यक्ति। गला सूखने

234
00:16:19,040 --> 00:16:23,280
लगता है। जान अटक जाती है ना हलक में। ये सब होने लगता है। मुझे तैयारी की जरूरत

235
00:16:23,280 --> 00:16:27,360
नहीं है। है ना? फिर भी ना तो

236
00:16:27,360 --> 00:16:31,600
उनको स्वयं का पन्ने पलटना दिखाई दिया। ना तो उनको

237
00:16:31,600 --> 00:16:36,000
तथाकथित जो वैज्ञानिक महोदय हैं उनका पन्ना पन्ने पलटना

238
00:16:36,000 --> 00:16:40,320
दिखाई दिया। उनको तो शिवांश नारायण द्विवेदी के पन्ने पलटना ही दिखाई दिया

239
00:16:40,320 --> 00:16:44,400
और उन्होंने यह बात कही क्यों अपने वीडियो में पन्ने पलटने की बात क्योंकि

240
00:16:44,400 --> 00:16:50,160
इसी से सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है बिंगो

241
00:16:50,160 --> 00:16:54,480
बहुत बढ़िया ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है क्योंकि शिवश

242
00:16:54,480 --> 00:16:58,480
नारायण द्विवेदी ने पन्ने पलट करके बताया था प्रमाण बिना

243
00:16:58,480 --> 00:17:04,480
पन्ने पलटे बताना था भाई है ना अच्छा

244
00:17:04,720 --> 00:17:10,720
फिर आगे एक बात और आती है कि

245
00:17:12,080 --> 00:17:17,360
प्रश्न मैंने पूछा था। मैंने प्रश्न क्या पूछा था कि

246
00:17:17,360 --> 00:17:21,360
मैंने प्रश्न पूछा था जिस पदार्थ से स्पर्श हो जाने पर मनुष्य

247
00:17:21,360 --> 00:17:25,520
को पाप लग रहा है उसी पदार्थ से स्पर्श हो जाने पर उसमें एकीभूत

248
00:17:25,520 --> 00:17:29,600
होते हुए भी ईश्वर को दोष नहीं लगता है ना। तो फिर आप क्यों मान रहे हैं कि

249
00:17:29,600 --> 00:17:33,600
जिन पापों से लिप्त होने पर मनुष्य को दोष लगेगा। जिन कर्मों में लिप्त

250
00:17:33,600 --> 00:17:37,760
होने पर मनुष्य को पापी कहा जाएगा। उन्हीं कर्मों में लिप्त होने पर भगवान को दोष लगेगा।

251
00:17:37,760 --> 00:17:41,920
क्योंकि वह तो रूप धारण करके करे या बिना रूप

252
00:17:41,920 --> 00:17:47,920
धारण करके करे वह तो प्रत्येक कार्य में किसी ना किसी प्रकार से लिप्त है ही।

253
00:17:48,400 --> 00:17:52,400
यदि कोई व्यक्ति किसी को चाकू मार रहा है तो चाकू मारने की शक्ति

254
00:17:52,400 --> 00:17:56,480
तो ईश्वर ने ही प्रदान की है। वह तो लिप्त है ही उसमें। मगर

255
00:17:56,480 --> 00:18:00,560
ईश्वर को नहीं पड़ता है। यह आप भी मानते हो।

256
00:18:00,560 --> 00:18:06,560
लिप्त होते हुए भी ईश्वर को उसका जो

257
00:18:07,920 --> 00:18:11,920
दोष है वह नहीं लगता है। सिंपल सी बात। तो मेरा कहना यह था कि रूप

258
00:18:11,920 --> 00:18:16,160
ले लेने पर क्यों लग रहा है? बिना रूप के भी ईश्वर उन कार्यों

259
00:18:16,160 --> 00:18:20,160
में लिप्त है जिन कार्यों को मैं लिप्त होने के कारण ईश्वर को पाप

260
00:18:20,160 --> 00:18:24,240
मनुष्य को पापी कहा जाएगा। उसको दोषी माना जाएगा। पर ईश्वर को नहीं माना

261
00:18:24,240 --> 00:18:28,400
जाएगा। यहां पे आप भी एक मत है। मैं भी एक मत हूं। तो फिर उसके

262
00:18:28,400 --> 00:18:32,960
रूप ले लेने पर उस पर वो पाप क्यों चढ़ा रहे हो आप?

263
00:18:32,960 --> 00:18:37,120
पर यहां पर जो तथाकथित वैज्ञानिक जी

264
00:18:37,120 --> 00:18:41,360
थे शायद मेरे प्रश्न को समझ नहीं पाए और मेरे प्रश्नों को समझने

265
00:18:41,360 --> 00:18:46,240
की बजाय जो है उन्होंने कुछ अपनी ओर से कुछ देने

266
00:18:46,240 --> 00:18:50,640
का प्रयास किया तो उनकी वो वैदिक रश्मि थ्योरी वाली खुजली शायद थी

267
00:18:50,640 --> 00:18:55,200
तो उन्होंने वो मिटाने का प्रयास किया तो उन्होंने बताया कि भाई वो नाली में जो है

268
00:18:55,200 --> 00:18:59,760
मॉलिक्यूल्स होते हैं और यह होता है और वो होता है। वाह

269
00:18:59,760 --> 00:19:03,520
अगर किसी से पूछा जा रहा है कि भैया इसको दोषी क्यों ना माना

270
00:19:03,520 --> 00:19:07,680
जाए इस पर जो है मुकदमा चल रहा है और पूछा जा रहा है कटघरे में खड़े

271
00:19:07,680 --> 00:19:12,080
हुए व्यक्ति को जो है वो दोष क्यों नहीं लग रहा है

272
00:19:12,080 --> 00:19:16,080
वो गुनहगार क्यों नहीं है अपराधी क्यों ना माना जाए उसको तो इसलिए ना माना जाए

273
00:19:16,080 --> 00:19:20,080
क्योंकि चाकू जो है लोहे का बना होता है और

274
00:19:20,080 --> 00:19:24,240
चाकू जहां पर जिसको जिसकी हत्या की गई थी वहां पर वो जो है ईंटों

275
00:19:24,240 --> 00:19:28,240
का मकान बना हुआ था यह सारे कारण है उसको दोषी ना मानने के कटघरे में

276
00:19:28,240 --> 00:19:32,400
खड़े हुए व्यक्ति के और तो और कारण है

277
00:19:32,400 --> 00:19:36,560
कि नहीं है ठीक है एक तरफ हटा देते हैं पर मुझे

278
00:19:36,560 --> 00:19:40,560
जो है साइंस नहीं आती वो बात और है कि आप जो है अग्निवृत्त जी की जो वैदिक

279
00:19:40,560 --> 00:19:44,720
साइंस होगी उससे पूरी तरीके से सहमत होंगे वैदिक रश्मि थ्योरी है जो उनकी

280
00:19:44,720 --> 00:19:49,040
बढ़िया वाली आई नहीं बारी सही बता रहे हैं अगर

281
00:19:49,040 --> 00:19:53,120
अग्निव्रत जी विषयांतर करके व्यक्तिगत कटाक्ष इत्यादि का आलंबन

282
00:19:53,120 --> 00:19:57,120
ना लेते बहुत अच्छा किया उन्होंने उनकी प्राणों की भी रक्षा हुई मुझे लगता है उन्होंने

283
00:19:57,120 --> 00:20:01,600
कई वीडियोस में बताया कि उनको बहुत सारी बीमारियों ने घेरा हुआ था

284
00:20:01,600 --> 00:20:06,000
और वृद्ध तो हैं ही और मैं देख रहा था कि बार-बार छाती पर हाथ जा रहा है। पानीानी

285
00:20:06,000 --> 00:20:10,080
पी रहे हैं। हालत खराब हो रही है। तो किसी प्रकार

286
00:20:10,080 --> 00:20:14,320
से मुझे भी उसका निमित्त बनना था कि भाई इनके प्राणों की रक्षा करने की

287
00:20:14,320 --> 00:20:18,560
करने का दायित्व मेरा भी है। और मेरे प्रश्न करने से कहीं कुछ हो गया तो खामखा

288
00:20:18,560 --> 00:20:22,640
एक नया आरोप ना लग जाए। हां। आत्महत्या के लिए उकसाने

289
00:20:22,640 --> 00:20:26,800
का या किसी तरीके से कोई एक नई चीज बना दे कोई तो मेरा तो वहां

290
00:20:26,800 --> 00:20:30,800
से हटना भी वो भी उनके लिए फायदेमंद रहा और उन्होंने

291
00:20:30,800 --> 00:20:35,280
बहुत अच्छा किया जो विषय करके पलायन कर गए इस तरीके से

292
00:20:35,280 --> 00:20:39,520
हां आपको मेरी खांसी दिख रही थी ना वो खांसी में भी यही बात थी

293
00:20:39,520 --> 00:20:43,600
उनकी वो जो कपी इत्यादि थी और ये सब ये जो था ये सब देख

294
00:20:43,600 --> 00:20:48,080
के मुझे हंसी आ रही है। कैसे रोकूं अपनी हंसी? तो मैं रोक रहा हूं भाई।

295
00:20:48,080 --> 00:20:52,240
भाई खांसने के पीछे की रीजनिंग एक ही थोड़ी ना होती है। हां खांस रहे हैं

296
00:20:52,240 --> 00:20:56,320
तो यदि बीमार नहीं है व्यक्ति। हालांकि मेरे गले में था इनफेक्शन अभी भी

297
00:20:56,320 --> 00:21:00,720
है। पर यदि व्यक्ति खांस रहा है और तो उसका

298
00:21:00,720 --> 00:21:04,800
उसका मतलब यही नहीं है कि वो जो है परेशान है। वो जो है व्याकुल है या चिंतित

299
00:21:04,800 --> 00:21:08,800
है। डर रहा है। खांसने के तो कई अर्थ हो सकते हैं। वो अपनी हंसी छुपाने के लिए

300
00:21:08,800 --> 00:21:12,880
खांस रहा हो। उसको क्रोध आ रहा हो सामने वाले को उठा के पटक दूं। बेकार की बातें

301
00:21:12,880 --> 00:21:16,960
कर रहा है। शायद इसलिए खांस रहा हो और उसको यह भी हो सकता है कि वास्तविकता में

302
00:21:16,960 --> 00:21:20,960
परेशान हो। तो यहां पे आप लोग न्याय दर्शन इत्यादि की बातें थोड़ी ना करोगे।

303
00:21:20,960 --> 00:21:24,960
ऐसे ही अपने मन से जो आएगा वो सामने वाले पर थोप दोगे कि इसलिए

304
00:21:24,960 --> 00:21:29,280
इसीलिए खांस रहा है। खैर ठीक है। कोई बात नहीं। [गला साफ़ करने की आवाज़]

305
00:21:29,280 --> 00:21:33,440
अब आ जाते हैं तो कुल मिलाकर के हम प्रश्न कर रहे हैं कि जिस

306
00:21:33,440 --> 00:21:33,940
पदार्थ

307
00:21:33,920 --> 00:21:38,000
से स्पर्श हो जाने पर मनुष्य को दोष लग रहा है पर ईश्वर के द्वारा

308
00:21:38,000 --> 00:21:42,000
उस पदार्थ के साथ एक ही भूत होने पर भी उस पर दोष नहीं लग रहा है क्योंकि कुछ उसकी

309
00:21:42,000 --> 00:21:46,080
रीजनिंग है तो फिर ईश्वर यदि रूप ले लेगा तो उसको आप दोषी क्यों मान रहे हो

310
00:21:46,080 --> 00:21:50,320
जिन कर्मों से संलग्न होने पर मनुष्य को दोष लग रहा है उन्हीं कर्मों

311
00:21:50,320 --> 00:21:54,560
से संलग्न उसी प्रकार के कर्मों से संलग्न होने पर ईश्वर को दोष नहीं लग रहा है निराकार

312
00:21:54,560 --> 00:21:58,720
रहते हुए तो यदि वो एक रूप धारण करके खड़ा हो जाएगा तो फिर उस पर दोष

313
00:21:58,720 --> 00:22:02,880
क्यों लगने लगेगा? प्रश्न यह था जिसका उत्तर शायद आपने इस वीडियो में आगे

314
00:22:02,880 --> 00:22:06,880
दिया हो पर उन्होंने वहां नहीं दिया। वो मुझे मॉलिक्यूल बता रहे हैं और मैंने कहा ना कि

315
00:22:06,880 --> 00:22:10,880
जहां-जहां पर उनकी कमजोरी है वही वही उसी उसी को पकड़ के आपने मखौल बनाया है।

316
00:22:10,880 --> 00:22:14,960
इसी को कहते हैं टू द पॉइंट रहना। आपने ढूंढा मेरा मित्र कहां-कहां

317
00:22:14,960 --> 00:22:19,440
फंसा या मेरे पूजनीय आपके पूजनीय होंगे शायद। तो मेरा पूजनीय आदरणीय

318
00:22:19,440 --> 00:22:23,680
व्यक्ति कहां-कहां फंसा है? वही वही मोटे-मोटे पॉइंट हैं। कहां अयोध्या है, कहां

319
00:22:23,680 --> 00:22:27,760
जन्मभूमि है, कहां काशी है, कहां वो क्या कहते हैं? त्रिपति

320
00:22:27,760 --> 00:22:31,920
है, कहां शंगेरी है वहीं वहीं जो जो ऐसे पॉइंट हैं द्वारका

321
00:22:31,920 --> 00:22:36,080
इत्यादि वो सारे पॉइंट पकड़ के और वहीं पर ऐसी चीज करो कि लोग असली पॉइंट

322
00:22:36,080 --> 00:22:40,800
को भूल ही जाए। यही कहानी रही है हालांकि आर्य समाज की पर

323
00:22:40,800 --> 00:22:45,040
नहीं तो नहीं तो इस बात को कहने की आवश्यकता क्या

324
00:22:45,040 --> 00:22:49,040
थी कि शिवश नारायण द्विवेदी को विज्ञान से कोई मतलब नहीं है। विज्ञान नहीं

325
00:22:49,040 --> 00:22:53,200
आता है। मुझे लगता है आपने सारे विज्ञान के जितने भी नियम वर्तमान में

326
00:22:53,200 --> 00:22:57,360
उद्भाषित कर लिए गए हैं। आप वैज्ञानिक नहीं हो। मगर जितने भी वैज्ञानिक नियम है भाषित

327
00:22:57,360 --> 00:23:01,360
कर लिए गए सारी थ्योरीज आपको आती होंगी। मैं जानता हूं ईश्वर के बाद आप ही हो।

328
00:23:01,360 --> 00:23:05,360
ईश्वर के बाद जो दूसरे थे वो थे वो आपके तथाकथित महर्षि

329
00:23:05,360 --> 00:23:08,320
और तीसरे आप।

330
00:23:08,320 --> 00:23:12,320
इसीलिए आपको सारा ज्ञान विज्ञान आता है। इसीलिए तो आप किसी पर ही कटाक्ष कर

331
00:23:12,320 --> 00:23:16,800
रहे हैं कि इसको साइंस से क्या मतलब? अब मैं अपनी साइंस बताऊं आपको।

332
00:23:16,800 --> 00:23:20,960
तो कुल मिलाकर के आपने वहां पर जो यह बात रखी कि

333
00:23:20,960 --> 00:23:25,760
भाई इनका विज्ञान से क्या मतलब है? इस रखने इसे रखने की आवश्यकता क्या थी वीडियो?

334
00:23:25,760 --> 00:23:30,080
आवश्यकता यही थी कि इसी से सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है।

335
00:23:30,080 --> 00:23:34,080
बिंगो बहुत बढ़िया। तो क्या

336
00:23:34,080 --> 00:23:38,480
है सिद्धांत? ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी

337
00:23:38,480 --> 00:23:42,640
ने विज्ञान की पढ़ाई नहीं पढ़ी है। जो थोड़ा बहुत बेसिक चीजें हैं विज्ञान से संबंधित वही

338
00:23:42,640 --> 00:23:46,880
जानता है। चौथी क्लास फेल हूं। और बोलो। चौथी क्लास

339
00:23:46,880 --> 00:23:51,120
फेल हूं। मगर जो सनातन का चोला ओढ़

340
00:23:51,120 --> 00:23:55,280
के सनातन विरोधी कार्यक्रम चला रहे हैं ना उनकी नाक में नकेल

341
00:23:55,280 --> 00:23:59,280
डालने के लिए पर्याप्त हूं। भगवत कृपा से गुरु गोविंद ग्रंथ की

342
00:23:59,280 --> 00:24:03,520
कृपा से है ना चौथी क्लास फेल ले लो

343
00:24:03,520 --> 00:24:04,160
जाओ

344
00:24:04,160 --> 00:24:08,320
इसी से जीत जाओ ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता

345
00:24:08,320 --> 00:24:12,320
है क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी चौथी क्लास फेल है लिख लो

346
00:24:12,320 --> 00:24:16,480
अपने यहां पर वो जो 10 नियम है ना ईश्वर सर्वशक्तिमान है ये

347
00:24:16,480 --> 00:24:21,680
वो वो 10 नियम है ना उसमें एक नियम और बढ़ा लो 11वा

348
00:24:21,680 --> 00:24:25,680
कि ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता है क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी को

349
00:24:25,680 --> 00:24:30,400
साइंस का ज्ञान ध्यान नहीं है। चौथी क्लास फेल है। जाओ खुश हो जाओ।

350
00:24:30,400 --> 00:24:34,400
अच्छा फिर आगे [गला साफ़ करने की आवाज़] चलते हैं। बड़ा मजेदार बड़ा रोचक वीडियो

351
00:24:34,400 --> 00:24:38,400
बनाया। मुझे मतलब हृदय गदगद हो गया आपका वीडियो देख के।

352
00:24:38,400 --> 00:24:42,320
आनंद आ गया कि चलो भाई

353
00:24:42,320 --> 00:24:46,960
कोई तो आया सामने से आ ही नहीं रहा था कोई इतने दिनों से। ठीक है?

354
00:24:46,960 --> 00:24:50,960
अब आगे चलते हैं। टू द पॉइंट बातें इनकी। ईश्वर अवतार क्यों क्यों नहीं

355
00:24:50,960 --> 00:24:54,960
ले सकता? जरूरी बातें हैं। सबसे इंपॉर्टेंट चीज है। ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले

356
00:24:54,960 --> 00:25:00,960
सकता? इस बारे में जरूरी बातें सुनिए। ठीक है?

357
00:25:02,080 --> 00:25:07,920
अ इसके बाद इन्होंने क्या कहा है?

358
00:25:07,920 --> 00:25:12,160
अच्छा इन्होंने एक चीजों पे और जोर दिया कि मैंने भाई

359
00:25:12,160 --> 00:25:16,480
प्रमाण नहीं दिया काफी देर तक। बहुत इन्होंने लेंस

360
00:25:16,480 --> 00:25:20,560
लेकर के वो चीजें देखी हैं। टाइम भी बता रहे हैं। टाइम स्ट भी बता रहे

361
00:25:20,560 --> 00:25:24,720
हैं। 5 बज के वो 50 सेकंड पे ये हुआ। 26व मिनट

362
00:25:24,720 --> 00:25:28,720
पे ये हुआ। बहुत अच्छे तरीके से बता रहे हैं। हम तो इसका मतलब बड़े

363
00:25:28,720 --> 00:25:33,280
बड़े अच्छे से इन्होंने वीडियो देखा और फिर क्या ढूंढा? वजनदार

364
00:25:33,280 --> 00:25:37,760
बातें हैं कि मैंने प्रमाण कितने मिनट पे दिया?

365
00:25:37,760 --> 00:25:41,840
ये ढूंढा इन्होंने। मैंने प्रमाण कितने मिनट पे दिया और कितने

366
00:25:41,840 --> 00:25:46,000
मिनट तक नहीं दिया? ये देना। अच्छा प्रमाण देना है। क्या

367
00:25:46,000 --> 00:25:50,000
प्रमाण देना था? सच में सच्ची ना।

368
00:25:50,000 --> 00:25:54,080
कसम से प्रमाण देना था। प्रमाण देना था। या

369
00:25:54,080 --> 00:25:58,320
प्रमाण का वह अर्थ देना था जो तुम मानते हो। क्या

370
00:25:58,320 --> 00:26:02,560
करूंगा मैं प्रमाण देकर तुम्हें? भाई तुमसे चर्चा करते

371
00:26:02,560 --> 00:26:07,760
समय मुझे प्रमाण देना है या प्रमाण का वो अर्थ देना है जो तुम मानते हो।

372
00:26:07,760 --> 00:26:12,400
इसमें सेलेक्ट कर लो कि कौन सी चीज तुम्हें चाहिए। हां।

373
00:26:12,400 --> 00:26:16,480
तुमने अपनी किताबों में जो लिख रखा है

374
00:26:16,480 --> 00:26:17,120
वो ढूंढ के

375
00:26:17,120 --> 00:26:21,920
बताना है क्या तुम्हें? क्योंकि उसके बाहर का तो तुम मैं लाऊंगा तो तुम मानोगे नहीं।

376
00:26:21,920 --> 00:26:26,480
तुम तो वही मानोगे जो किताबों में लिख रखा है। तो मुझे लगता है चोरी छुपे तुम भी मानतेगे

377
00:26:26,480 --> 00:26:30,640
अवतार को। इसीलिए कह रहे हो प्रमाण दो प्रमाण दो। तुमने कहीं ना कहीं चोरी छुपे

378
00:26:30,640 --> 00:26:34,960
लिख रखा है ना? सच बताना आर्य समाजियों और आप भी बता दीजिए।

379
00:26:34,960 --> 00:26:38,960
भरद्वाज जी कहीं ना कहीं लिख रखा है ना अपनी किताबों में ईश्वर अवतार लेता

380
00:26:38,960 --> 00:26:43,040
है। उसी प्रमाण को ढूंढना मेरा मुख्य कार्य है। इसीलिए आप

381
00:26:43,040 --> 00:26:47,120
कह रहे हो प्रमाण दो। क्योंकि जब मैं आपकी मान्यता के विरुद्ध प्रमाण

382
00:26:47,120 --> 00:26:52,000
लाऊंगा तो आप तो मना करने वाले हो। तो क्या करूंगा प्रमाण देकर? अच्छा

383
00:26:52,000 --> 00:26:56,240
थोड़ा और तर्क की बात करते हैं। शायद भारद्वाज जी थोड़े व्यक्ति

384
00:26:56,240 --> 00:27:00,320
हैं जो शायद मेरे से अगर उनका मन बना है शिक्षा ग्रहण

385
00:27:00,320 --> 00:27:04,400
करने का तो इसका मतलब है कि उनमें वो बल होगा उनकी प्रज्ञा

386
00:27:04,400 --> 00:27:08,480
में जो वो मेरे से शिक्षा दीक्षा ग्रहण

387
00:27:08,480 --> 00:27:12,640
करना चाहते हैं। अच्छी बात है। मैंने बता ही दिया निशुल्क है। तो अब जरा आगे चलते

388
00:27:12,640 --> 00:27:16,880
हैं। प्रमाण की बात करते हैं। जब मैं उनको कोई प्रमाण दिखाता हूं

389
00:27:16,880 --> 00:27:21,040
तो वह कहते हैं कि प्रमाण इसलिए गलत है कि वहां पर मुझे गलत लग रहा है

390
00:27:21,040 --> 00:27:25,280
और किस आधार पर गलत लग रहा है क्योंकि प्रमाण तो प्रमाण है। प्रमाण को गलत गलत

391
00:27:25,280 --> 00:27:29,440
ठहराने के लिए उससे परम प्रमाण चाहिए होगा। प्रमाण को

392
00:27:29,440 --> 00:27:32,240
प्रमाण को गलत ठहराने के लिए उससे परम प्रमाण चाहिए

393
00:27:32,240 --> 00:27:36,400
होगा। उसमें अपना तर्क दे रहे हैं कि वेदों में पशु

394
00:27:36,400 --> 00:27:40,560
बलि दी है। शय भाष पशु बलि दी है कि नहीं दी है यह

395
00:27:40,560 --> 00:27:44,560
एक अलग विषय है। पशु बलि सही है या

396
00:27:44,560 --> 00:27:48,800
गलत है यह भी एक अलग विषय अलग से बात हो सकती है। ठीक है?

397
00:27:48,800 --> 00:27:52,960
परंतु यदि आप वेद पर आधारित हैं यह निर्णय करने

398
00:27:52,960 --> 00:27:56,960
के लिए कि क्या सही है और क्या गलत। जिस प्रकार से आप वेद पर आधारित

399
00:27:56,960 --> 00:28:01,040
हैं। आपकी जानकारी में कि नियोग सही है या गलत है। किस

400
00:28:01,040 --> 00:28:05,040
पर आधारित है? नियोग देखने में गलत लग रहा है। यह उदाहरण

401
00:28:05,040 --> 00:28:09,440
मैंने वहां उनको भी दिया था। नियोग देखने में गलत लग रहा है। व्यभचार

402
00:28:09,440 --> 00:28:13,520
लग रहा है। यह पूर्व पक्ष रखा है दयानंद जी ने। पढ़ लेना। सत्यार्थ प्रकाश आपने ना पढ़ी हो

403
00:28:13,520 --> 00:28:17,600
तो पढ़ लेना। अपने ग्रंथों पढ़ पढ़ सकते हैं। सभी लोगों के लिए छूट है। तो पढ़

404
00:28:17,600 --> 00:28:21,680
लेना। नियोग का नियोग विषय में उन्होंने पूर्व

405
00:28:21,680 --> 00:28:26,320
पक्ष रखा दयानंद जी ने। इस बात को लेकर के मैं दयानंद जी से सहमत हूं। बिल्कुल सही पूर्वक

406
00:28:26,320 --> 00:28:30,480
है। जब जब हम विवाह के विषय में शास्त्र पर निर्भर

407
00:28:30,480 --> 00:28:34,720
करते हैं तो किसी भी चीज के धर्म और अधर्म होने के विषय में हमें शास्त्र

408
00:28:34,720 --> 00:28:39,040
पर ही निर्भर करना पड़ेगा। तो बलि गलत है

409
00:28:39,040 --> 00:28:43,200
यह हमने कहां से तय किया? जब हमें वेद भाष्य में यह मिल रहा है। वेद के अर्थ

410
00:28:43,200 --> 00:28:47,360
में ये मिल रहा है कि बलि है और उससे मिल रहा है जो वेद के विषय में हमारा

411
00:28:47,360 --> 00:28:51,360
प्रमाण है। यानी वेद से पहले हमारे पास

412
00:28:51,360 --> 00:28:55,440
सही और गलत निर्णय करने का कोई आधार है। जबकि शास्त्र में

413
00:28:55,440 --> 00:28:59,840
तो लिखा है तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण है।

414
00:28:59,840 --> 00:29:04,160
तो धर्म को जानने से पहले ही हमें धर्म पता है तो धर्म की आवश्यकता क्या है?

415
00:29:04,160 --> 00:29:08,960
वेद को जानने से पहले ही हमें पता है हमारा धर्म क्या है? तो वेद की आवश्यकता क्या है?

416
00:29:08,960 --> 00:29:13,040
यह उसका तार्किक उत्तर है जो मैं वहां दे रहा था। पर उन्होंने फिर अरे इस मंत्र का अर्थ बताओ।

417
00:29:13,040 --> 00:29:17,280
इस इस मंत्र का अर्थ बताओ। विषयंतर जो आपके यहां एक

418
00:29:17,280 --> 00:29:21,280
स्पेशल क्लासेस चलती होंगी उसके अनुसार जैसे मोहित ग को सिखाया

419
00:29:21,280 --> 00:29:25,280
वैसे ही खैर वेद को जानने

420
00:29:25,280 --> 00:29:29,360
से पहले ही आपने तय किया ना कि पशु बलि गलत है यानी

421
00:29:29,360 --> 00:29:33,520
कि आपको आपका धर्म वेद से नहीं मिल रहा है जबकि वो तो कह रहे हैं

422
00:29:33,520 --> 00:29:37,760
दयानंद जी तो कि बिना किसी के सिखाए नहीं सीख सकता व्यक्ति

423
00:29:37,760 --> 00:29:41,920
माना है ना सत्यार्थ प्रकाश में तो फिर कहां से सीख रहे हो वेदों

424
00:29:41,920 --> 00:29:46,000
में पशु बलि है कि नहीं है शयन ने क्या कहा है? परंपरा प्राप्त

425
00:29:46,000 --> 00:29:50,240
आचार्यों ने क्या कहा है? उसका अर्थ अलंकारिक है, प्रतीकात्मक है। क्या

426
00:29:50,240 --> 00:29:54,240
लेना है? क्या नहीं लेना है? यह एक विषय है। परंतु यदि जिनसे तुम्हें

427
00:29:54,240 --> 00:29:58,240
वेद के मंत्र प्राप्त हो रहे हैं और उन मंत्रों को तुम मान रहे हो कि

428
00:29:58,240 --> 00:30:02,320
ईश्वर से आए हुए मंत्र हैं। यानी कि वेद के विषय में आप

429
00:30:02,320 --> 00:30:02,880
जिनको

430
00:30:02,880 --> 00:30:06,960
प्रमाण मानते हैं। उन्हीं का लिखा हुआ कोई अर्थ

431
00:30:06,960 --> 00:30:10,960
है वो आपको हजम नहीं हो रहा है। तो फिर आपने नियोग के

432
00:30:10,960 --> 00:30:14,960
विषय में शास्त्रों का अर्थ क्यों हजम कर लिया? उसमें भी तो देखने में यही लग रहा

433
00:30:14,960 --> 00:30:18,960
है कि नियोग गलत है तो करा दो उसको और अपना भाष्य

434
00:30:18,960 --> 00:30:23,440
लिखो नया पर नियोग में मान लिया क्यों मान लिया क्योंकि वो 111

435
00:30:23,440 --> 00:30:27,680
करना है ना कलयुग में ये सब वर्ण

436
00:30:27,680 --> 00:30:32,320
संकर्ता इत्यादि को चीजों को कैसे मिलेगा समर्थन

437
00:30:32,320 --> 00:30:36,640
अगर ऐसा नहीं करेंगे तो तो खैर ये है प्रमाण

438
00:30:36,640 --> 00:30:40,640
की प्रमाण के संबंध में दो तीन बातें पहला जो

439
00:30:40,640 --> 00:30:44,640
आपने मैंने पूछा कौन सा प्रमाण देना सत्यार्थ प्रकाश से प्रमाण देना है अवतार के

440
00:30:44,640 --> 00:30:48,640
संबंध में क्योंकि सत्यार्थ प्रकाश के जो प्रतिकूल होगा वह तो आपको मानना नहीं है

441
00:30:48,640 --> 00:30:52,640
तो क्या करूं मैं प्रमाण देकर अरे कुछ होश

442
00:30:52,640 --> 00:30:56,880
संभाल के तो बातें करो भाई तर्क कहां है आपकी बातों में प्रमाण लाओ प्रमाण

443
00:30:56,880 --> 00:31:01,120
लाऊंगा अरे ये नहीं अर्थ नहीं मानने मुझे मालूम है ना अर्थ मानने नहीं है इसीलिए

444
00:31:01,120 --> 00:31:04,640
तो आज यहां बैठे हैं

445
00:31:04,640 --> 00:31:08,720
खैर चलो अच्छा हमारी

446
00:31:08,720 --> 00:31:12,960
शर्तें आपने देखी नहीं होंगी ठीक है मैं अभी पढ़ के बताऊंगा शर्तें क्या कह

447
00:31:12,960 --> 00:31:17,200
थी? एक शर्त थी कि यदि तर्क नहीं होगा

448
00:31:17,200 --> 00:31:18,000
तो घोषणा

449
00:31:18,000 --> 00:31:22,000
करनी होगी कि हमारे समाज में हमारी परंपरा में तर्क है नहीं। ईश्वर का

450
00:31:22,000 --> 00:31:26,000
अवतार निषेध करने के लिए बार-बार थोड़ी सी

451
00:31:26,000 --> 00:31:30,320
देर होने के बाद ही आपको ज्ञान नहीं है। आपको जो है आप कुतर्क

452
00:31:30,320 --> 00:31:34,480
कर रहे हो। फिर थोड़ी देर बाद कुतर्क कर रहे हो।

453
00:31:34,480 --> 00:31:38,640
यहां तक कि जब मैंने प्रश्न पूछे थे उनसे तो यह तक कहने लगे थे इसको छोड़िए इसको

454
00:31:38,640 --> 00:31:42,880
छोड़िए। अथातो धर्म जिज्ञासा अथा तो ब्रह्म

455
00:31:42,880 --> 00:31:47,200
जिज्ञासा अगर इसको छोड़िए ही कहने लगते तो जितने प्रश्न उठाए हैं दयानंद

456
00:31:47,200 --> 00:31:51,360
जी ने सत्यार्थ प्रकाश में सबको छोड़िए और केवल जो सामने

457
00:31:51,360 --> 00:31:55,440
वाला कह रहा है जिसका विरोध कर रहे हैं उसको मान लीजिए पर नहीं

458
00:31:55,440 --> 00:31:59,680
आप स्वयंभू है ना बता तो रहा हूं ईश्वर के बाद पहले

459
00:31:59,680 --> 00:32:04,880
तो महर्षि वो और दूसरे आप स्वयंभू

460
00:32:04,880 --> 00:32:10,000
महाभारत में लिखा हुआ है अन्यों के साथ जो व्यवहार

461
00:32:10,000 --> 00:32:14,400
अपने लिए जो व्यवहार स्वीकार कार्य नहीं है ना अन्यों के साथ वही व्यवहार किया करिए

462
00:32:14,400 --> 00:32:18,400
और अपने लिए जो स्वीकार नहीं है वह अन्यों के साथ भी ना करें यही धर्म

463
00:32:18,400 --> 00:32:22,560
परंतु नहीं कोई धर्म नहीं केवल धर्म का डंका बजेगा

464
00:32:22,560 --> 00:32:27,280
धर्म का प्रचार करेंगे समय आने पर पक्षपाती हो जाएंगे अन्यायकारी

465
00:32:27,280 --> 00:32:31,920
हो जाएंगे सारी चीजों से लिपट जाएंगे

466
00:32:31,920 --> 00:32:35,920
क्योंकि उसी को उसी में लिपटना तो धर्म है खैर आगे चलते

467
00:32:35,920 --> 00:32:40,400
हैं तो तर्क [गला साफ़ करने की आवाज़] छोड़कर प्रमाण पर भागे

468
00:32:40,400 --> 00:32:44,400
अब प्रमाण का अर्थ कौन सा होगा जो उनके अनुसार फिट बैठेगा

469
00:32:44,400 --> 00:32:48,480
तो उन्होंने तो अवतार का विरोध कर रखा है हर जगह

470
00:32:48,480 --> 00:32:52,720
तो हम कहां से प्रमाण दें उनको

471
00:32:52,720 --> 00:32:56,720
व्यर्थ में चीजें करना तब पड़ती हैं जब

472
00:32:56,720 --> 00:33:00,960
व्यक्ति के पास वास्तविकता में अपने पक्ष की सिद्धि के लिए कुछ नहीं होता है

473
00:33:00,960 --> 00:33:06,080
समझे यह व्यर्थ है तुम आप जैसे लोगों को प्रमाण उपलब्ध कराना

474
00:33:06,080 --> 00:33:10,320
अभी खैर प्रमाण में भी आऊंगा अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़]

475
00:33:10,320 --> 00:33:14,400
कुल मिलाकर के हमने हमें अगर

476
00:33:14,400 --> 00:33:18,400
प्रमाण देना भी है तो आपके किए हुए अर्थ के अनुसार देना है। क्योंकि आपने मान रखा

477
00:33:18,400 --> 00:33:22,400
है कि जो है जो परंपरा प्राप्त आचार्य

478
00:33:22,400 --> 00:33:26,400
उन्होंने वेदों के भाष्य में यहां यहां पे गलती कर रखी है। इस तरह से उनका जो है प्रमाणिक सिद्ध होता

479
00:33:26,400 --> 00:33:30,560
है। गलती किस आधार पे की है? तर्क के आधार पर। देखिए आप तर्क का जब उत्तर

480
00:33:30,560 --> 00:33:34,560
नहीं बचा तो व्यक्ति प्रमाण भाग रहा है। और प्रमाण जब दिया जा रहा है

481
00:33:34,560 --> 00:33:38,640
तो प्रमाण को नकार किस आधार पर रहा है? तर्क के आधार पर। क्या लूप हो

482
00:33:38,640 --> 00:33:43,120
लूप क्या लूप बनाया वाह बहुत बढ़िया और

483
00:33:43,120 --> 00:33:47,600
यह लूप आगे काम आएगा मौत का कुआं एक मौत के कुएं की बात भी की है भारद्वाज

484
00:33:47,600 --> 00:33:51,920
जी ने बहुत मतलब अंत तक देखते रहिएगा बहुत अच्छी बातें की है इन्होंने

485
00:33:51,920 --> 00:33:56,000
खैर कुल मिलाकर के मुझे अगर इनको प्रमाण

486
00:33:56,000 --> 00:34:00,080
देना था तो इन्हीं की किताबों से ढूंढ कर देना था कि ईश्वर अवतार कहां ले सकता है तो

487
00:34:00,080 --> 00:34:04,080
इन्होंने ये जो बात की है प्रमाण नहीं दिया कम दिया देर से

488
00:34:04,080 --> 00:34:08,480
दिया ये बात की क्यों है इसलिए क्योंकि

489
00:34:08,480 --> 00:34:12,880
इसी से सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। बिंगो

490
00:34:12,880 --> 00:34:16,880
एक और पॉइंट क्या है वो पॉइंट कि ईश्वर

491
00:34:16,880 --> 00:34:21,040
अवतार इसलिए नहीं ले सकता कि शिवश नारायण द्विवेदी आर्य समाज

492
00:34:21,040 --> 00:34:25,040
की किताबों से ये प्रमाण नहीं दे पाया कि ईश्वर अवतार लेता

493
00:34:25,040 --> 00:34:29,120
है। बस सिंपल हमारी किताबों से निकाल

494
00:34:29,120 --> 00:34:31,790
के दो प्रमाण।

495
00:34:31,790 --> 00:34:36,080
[हंसी] क्या बात है। बहुत बढ़िया। बड़े बड़े

496
00:34:36,080 --> 00:34:40,160
लॉजिकल व्यक्ति हैं आप तो आज बहुत अच्छा लगा आपकी चीजें

497
00:34:40,160 --> 00:34:44,320
जानकर के। खैर चलिए आगे चलते हैं। अच्छा इन्होंने

498
00:34:44,320 --> 00:34:48,720
आगे एक बात कही व्यवहार और परमार्थ पर इन्हें आपत्ति है।

499
00:34:48,720 --> 00:34:52,800
चीजें इनको आपत्ति लग रही है। अच्छा तो ये कोई गेट खुलता है क्या जब व्यक्ति

500
00:34:52,800 --> 00:34:56,800
मोक्ष में जाता है तो व्यवहार और परमार्थ में आपको आपत्ति

501
00:34:56,800 --> 00:35:00,800
है ना। तो कोई गेट खुलता होगा आपके यहां कहां पे खुलता है? कितने किलोमीटर दूर

502
00:35:00,800 --> 00:35:04,960
है वो आकाशगंगा का वो जो अंतरिक्ष है आकाश है उसमें वो जगह कहां

503
00:35:04,960 --> 00:35:08,960
पर है जहां गेट खुलता है व्यक्ति मोक्ष मोक्ष के बाद वहां जाता है फिर वो वापस वहां से इधर

504
00:35:08,960 --> 00:35:12,960
इस दुनिया में आता है गेट खुलता है ना खुलता है तो फिर डायमेंशन चेंज

505
00:35:12,960 --> 00:35:16,960
होती है उसी को व्यवहार परमार्थ कहते हैं थोड़ा समझिए क्लासेस में आइए निशुल्क

506
00:35:16,960 --> 00:35:21,040
है थोड़ा समझ लीजिए बातों को फिर आप जो है बोलिए तो पहली

507
00:35:21,040 --> 00:35:23,600
बात तो ये हो गई अच्छा इसी में इन्होंने

508
00:35:23,600 --> 00:35:27,680
व्यवहार और परमार्थ में व्यवहार और परमार्थ से जुड़ी आगे की एक बात

509
00:35:27,680 --> 00:35:32,960
है जो प्रमाण से संबंधित है जो मैंने बात कही थी।

510
00:35:32,960 --> 00:35:37,040
जब मैंने कहा था कि ईश्वर व्यवहार में ना आ सकने वाला है

511
00:35:37,040 --> 00:35:41,040
और इन्होंने भी माना है। इन्होंने भी माना है कि ईश्वर

512
00:35:41,040 --> 00:35:45,200
व्यवहार में नहीं आ सकता। ठीक है?

513
00:35:45,200 --> 00:35:51,200
एक मिनट।

514
00:35:53,120 --> 00:35:57,520
इन्होंने भी माना है कि ईश्वर व्यवहार में नहीं आ सकता। ठीक है?

515
00:35:57,520 --> 00:36:02,320
क्यों नहीं आ सकता? क्योंकि वह इंद्रियों का विषय नहीं बन सकता।

516
00:36:02,320 --> 00:36:06,480
आगे बात करेंगे इंद्रियों के विषय वाले मामले पर। तो

517
00:36:06,480 --> 00:36:10,640
ईश्वर व्यवहार में नहीं आ सकता। तो जो मैंने प्रमाण दिया था उसमें जो

518
00:36:10,640 --> 00:36:14,640
सूर्य, चंद्रमा इत्यादि यानी जगत को उत्पन्न करने के रूप में भगवान के

519
00:36:14,640 --> 00:36:20,640
ईश्वर के प्रकट होने की बात उसमें लिखी हुई है। अब जो

520
00:36:21,840 --> 00:36:25,920
इनका कहना है कि ईश्वर वहां पर अपने कार्य

521
00:36:25,920 --> 00:36:29,920
के रूप में प्रकट होना होता है। हालांकि यह बात आगे भी कही गई है इनके

522
00:36:29,920 --> 00:36:33,920
द्वारा। इनके जो सो कॉल्ड जो वैज्ञानिक महोदय

523
00:36:33,920 --> 00:36:38,000
जी हैं उन्होंने भी यह बात आगे कही है। मतलब आगे बात आएगी

524
00:36:38,000 --> 00:36:42,160
जब मैं आपको बताऊंगा। अभी फिलहाल सिर्फ इतना लेना है कि

525
00:36:42,160 --> 00:36:46,480
पहले कोई देखने वाला नहीं था। सो रहे थे सब इन्होंने भी कही है भारद्वाज

526
00:36:46,480 --> 00:36:50,480
जी ने अपने वीडियो में बात कि पहले कोई देखने वाला नहीं था। तो जब

527
00:36:50,480 --> 00:36:54,480
व्यक्ति जागा उसने देखा उसी को प्रकट होना कहा गया है। ठीक है? तो यह

528
00:36:54,480 --> 00:36:58,720
बताइए कि पहला जो व्यक्ति था वह तिब्बत में जन्मा

529
00:36:58,720 --> 00:37:03,040
था या फिर वायुमंडल में जन्मा था।

530
00:37:03,040 --> 00:37:07,040
अगर वायुमंडल में जन्मा है पहले वो हवा में उड़ रहा है और फिर उसके

531
00:37:07,040 --> 00:37:11,040
सामने जो है सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी इत्यादि का निर्माण हो रहा है। तब तो कह सकते हैं कि एक

532
00:37:11,040 --> 00:37:15,040
साक्षी है जो देख रहा है कि ईश्वर जो है कार्य कर रहा है। साक्षी

533
00:37:15,040 --> 00:37:19,040
तभी है ना। यहां तो पृथ्वी पहले बन रही है। सूर्य पहले बन रहा है। पृथ्वी के ऊपर फिर

534
00:37:19,040 --> 00:37:23,280
मनुष्य जन्म ले रहा है। तो वहां पर कौन सा साक्षी हो गया जिसके कारण प्रकट

535
00:37:23,280 --> 00:37:27,520
होना मान रहे हो? कौन साक्षी है वहां पर? साक्षी ना होने के कारण

536
00:37:27,520 --> 00:37:31,920
चीजों को अप्रकट और प्रकट कहोगे। कहां का सनातन सिद्धांत

537
00:37:31,920 --> 00:37:36,000
है? अच्छा ठीक है। अगर कहोगे भी तो फिर वहां पर साक्षी

538
00:37:36,000 --> 00:37:37,280
कौन था ईश्वर के अलावा?

539
00:37:37,280 --> 00:37:42,240
तो ईश्वर स्वयं को स्वयं के ही समक्ष प्रकट कर रहा होगा। हम

540
00:37:42,240 --> 00:37:46,720
स्वयं को स्वयं के समक्ष ही प्रकट कर रहा होगा कि वाह मैंने देखा हां मैंने देखा

541
00:37:46,720 --> 00:37:50,880
मेरा कार्य है हां मैंने अपना कार्य जान लिया देख लिया यही हुआ होगा

542
00:37:50,880 --> 00:37:55,040
सूर्य बनाते समय क्योंकि तब तक जीव तो मनुष्य के रूप में आए नहीं थे

543
00:37:55,040 --> 00:37:59,040
कि मुक्त जीवों के समक्ष प्रकट कर रहा था जो मुक्त जीव तो उसको भोग ही रहे थे ईश्वर को

544
00:37:59,040 --> 00:38:03,040
वो तो ईश्वर के संपर्क में ही थे इस पर भी आऊंगा कि वहां व्यवहार होता है कि नहीं

545
00:38:03,040 --> 00:38:07,040
होता है तो व्यवहार और परमार्थ का अंतर आप नहीं जानते क्या ना तो गेट

546
00:38:07,040 --> 00:38:11,120
के बारे में आपने आज तक कुछ बताया है ना आपने यह बताया है अरे भाई वहां पर

547
00:38:11,120 --> 00:38:15,520
साक्षी कौन था? फिर कौन साक्षी था? अच्छा

548
00:38:15,520 --> 00:38:19,600
इसके आगे बात चलती है। आपने बात कही पृथ्वी गोल

549
00:38:19,600 --> 00:38:23,600
और चपटी आप मेरी बात समझे नहीं। यहीं पे मौत का कुआं है। यहीं

550
00:38:23,600 --> 00:38:28,000
पे यहीं पे मौत का कुआं है। क्या है मौत का कुआ? आपने

551
00:38:28,000 --> 00:38:30,800
कहा कि अक्षांश

552
00:38:30,800 --> 00:38:34,880
इत्यादि के अनुसार व्यवहार में भी चपटी जो है वह व्यवहार में भी धरती जो

553
00:38:34,880 --> 00:38:38,960
है चपटी है। नहीं नहीं स्लिप ऑफ टंग हो गया दोबारा।

554
00:38:38,960 --> 00:38:43,360
स्लिप ऑफ टंग आपने कहा अक्षांश इत्यादि के जो अक्षा

555
00:38:43,360 --> 00:38:47,840
अक्षांश इत्यादि के रूप में जो वैज्ञानिक

556
00:38:47,840 --> 00:38:51,920
सिद्धांत हैं उनके अनुसार व्यवहार में भी पृथ्वी गोल है।

557
00:38:51,920 --> 00:38:52,480
ये आपने

558
00:38:52,480 --> 00:38:57,040
कहा तो इसका मतलब यह है कि व्यवहार में पृथ्वी गोल है।

559
00:38:57,040 --> 00:39:01,120
तो भरद्वाज जी किसी को रास्ता दिखाते होंगे तो यूं दिखाते

560
00:39:01,120 --> 00:39:05,360
होंगे। भैया वो मुझे जो है विवाह करने जाना है। हिंदू बिटिया

561
00:39:05,360 --> 00:39:09,360
के साथ जिहादी पूछता होगा जब प्यार समाज मंदिर कहां है? है ना? मुझे

562
00:39:09,360 --> 00:39:13,440
₹5100 मेरे पास हैं। तुरंत नगद कैश है और हिंदू बिटिया के साथ मुझे विवाह करना

563
00:39:13,440 --> 00:39:17,440
है। यह लड़की है और जो है मुझे ब्राह्मण बनना है और आप मुझे जल्दी आर्य समाज

564
00:39:17,440 --> 00:39:21,760
का मंदिर बता दीजिए। तो योगेश भारद्वाज जी कहते होंगे उधर चले जाओ

565
00:39:21,760 --> 00:39:26,000
गोल इशारा करते होंगे क्योंकि व्यवहार में पृथ्वी गोल नहीं है व्यवहार

566
00:39:26,000 --> 00:39:30,000
में तो पृथ्वी चपटी है या फिर ये कहे कि यह भी एक

567
00:39:30,000 --> 00:39:34,000
और व्यवहार में ना आकने वाला मामला है जो हमें शब्द प्रमाण के

568
00:39:34,000 --> 00:39:38,240
अनुसार या दूसरे अनुमान प्रमाण के अनुसार प्राप्त हो रहा है

569
00:39:38,240 --> 00:39:42,320
कि पृथ्वी गोल ही है अक्षांश इत्यादि के विज्ञान

570
00:39:42,320 --> 00:39:46,320
द्वारा व्यवहार में हमको दिख तो चपटी ही रही है और हमारा व्यवहार उसी प्रकार से होता

571
00:39:46,320 --> 00:39:50,720
है जैसा हम लोग देख रहे यह सब बातें आपके समझ में नहीं आई।

572
00:39:50,720 --> 00:39:54,800
खैर तो अगर समझ में नहीं आई और आपके अनुसार व्यवहार

573
00:39:54,800 --> 00:39:58,960
में पृथ्वी गोल है, चपटी नहीं है तो आप लोगों को रास्ता ऐसे ही बताते होगे

574
00:39:58,960 --> 00:40:02,960
आर समाज मंदिर का और स्वयं जो मोटरसाइकिल चलाते होगे वो मौत के

575
00:40:02,960 --> 00:40:07,120
कुएं वाली चलातेगे। गोल मौत के कुएं वाली सीधी

576
00:40:07,120 --> 00:40:07,760
थोड़ी ना चलाते

577
00:40:07,760 --> 00:40:12,480
हो क्योंकि व्यवहार में पृथ्वी गोल है। तो अग्निव्रत जी कौन है?

578
00:40:12,480 --> 00:40:16,960
मौत के कुएं में जो गाड़ी चला ले या फिर

579
00:40:16,960 --> 00:40:21,440
ऐसा ना कहें तो योगेश भारद्वाज जी कौन है

580
00:40:21,440 --> 00:40:25,440
जो मौत के कुएं में गाड़ी चला लें वो जो करतब दिखाते हैं ना वैसी गाड़ी

581
00:40:25,440 --> 00:40:29,520
आप चला ले हम जरा इस मामले में कमजोर हैं। हम मौत के कुएं वाली गाड़ी नहीं

582
00:40:29,520 --> 00:40:33,600
चला पाते। हम सीधी गाड़ी चलाते हैं। सीधा रास्ता बताते हैं।

583
00:40:33,600 --> 00:40:37,920
हमारे व्यवहार में धरती चपटी है। हां थ्योरिकली शब्द

584
00:40:37,920 --> 00:40:42,000
प्रमाण से अनुमान प्रमाण से वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह

585
00:40:42,000 --> 00:40:46,080
जाना जाता है कि पृथ्वी गोल है। खैर

586
00:40:46,080 --> 00:40:50,160
यह ज्यादा आगे की बातें हो रही मुझे लगता है। अच्छा कुछ कुल मिलाकर

587
00:40:50,160 --> 00:40:54,240
के अगर जो भी बात थी कि पृथ्वी अक्षांश इत्यादि

588
00:40:54,240 --> 00:40:58,320
जो आपने बताया तो ये सब बातें

589
00:40:58,320 --> 00:41:02,320
आपने अपने आचार्य जी को रटाई क्यों नहीं है? वो वहां पर बोले क्यों नहीं?

590
00:41:02,320 --> 00:41:06,400
इन सबका उत्तर जो आपको बोलना पड़ रहा है। कई बातें ऐसी है

591
00:41:06,400 --> 00:41:10,480
जो पक्ष उन्होंने रखे ही नहीं वहां पर जो आपको बोलना पड़ रहा है। नहीं नहीं

592
00:41:10,480 --> 00:41:14,640
पृथ्वी व्यवहार में भी वो गोल ही है। क्यों नहीं बोला?

593
00:41:14,640 --> 00:41:20,640
हां। खैर [गला साफ़ करने की आवाज़] नहीं बोला कोई बात नहीं।

594
00:41:21,520 --> 00:41:25,680
अगर वो ऐसा वहां पर बोलते तो मैं उनको काउंटर करता। यही मौत के कुएं वाला

595
00:41:25,680 --> 00:41:29,680
और शायद वह समझ पाते। खैर आपने बोल दी कोई बात नहीं।

596
00:41:29,680 --> 00:41:34,800
पर इसमें यह बात आती है कि इस बात पर जोर देने का

597
00:41:34,800 --> 00:41:38,880
जोर देने की आवश्यकता क्या हुई? योगेश जी को इस बात पर

598
00:41:38,880 --> 00:41:42,960
जोर देने की आवश्यकता क्यों हुई? क्योंकि इसी से

599
00:41:42,960 --> 00:41:47,840
सिद्ध होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। बिंगो टू द पॉइंट।

600
00:41:47,840 --> 00:41:53,200
ताली बजाइए। इसी से सिद्ध होता है ना कि

601
00:41:53,200 --> 00:41:57,520
ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि अग्निव्रत जी और

602
00:41:57,520 --> 00:42:01,600
योगेश भारद्वाज जी दोनों ही शिवश नारायण द्विवेदी के उदाहरण

603
00:42:01,600 --> 00:42:05,920
की गढ़ता को समझ नहीं पाए। इसलिए सिद्ध

604
00:42:05,920 --> 00:42:10,000
होता है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। 12वा नियम

605
00:42:10,000 --> 00:42:13,840
आर्य समाज का लिख लो भाई।

606
00:42:13,840 --> 00:42:18,000
अच्छा इन्होंने एक जगह कहा कि मैंने कहा कि

607
00:42:18,000 --> 00:42:22,160
भावनाएं जो है जो आहत करने वाली चीजें

608
00:42:22,160 --> 00:42:26,640
हैं। हालांकि आर्य समाज का स्ट्रक्चर ही इस पर खड़ा हुआ है और जो भी कोई परंपरा

609
00:42:26,640 --> 00:42:30,720
प्राप्त सनातन सिद्धांतों का विरोध करता है

610
00:42:30,720 --> 00:42:35,120
उनका स्ट्रक्चर इसी शैली पर टिका हुआ है

611
00:42:35,120 --> 00:42:36,800
कि लोगों जो

612
00:42:36,800 --> 00:42:40,880
संवेदनशील मुद्दे हो ना उन पर बात करो जीतने के लिए।

613
00:42:40,880 --> 00:42:45,120
सामने वाले को असहज स्थिति में डालने के लिए जो संवेदनशील मुद्दे

614
00:42:45,120 --> 00:42:49,520
हो उनप बात करो। उसी से हमारी जीत होगी। हमें सत्य का अनुसंधान

615
00:42:49,520 --> 00:42:53,680
नहीं करना है। हमें वाकई टू द पॉइंट ये नहीं बताना है कि ईश्वर अवतार कैसे नहीं

616
00:42:53,680 --> 00:42:58,720
ले सकता है। हां अब क्या है

617
00:42:58,720 --> 00:43:03,200
कि जैसे ओशो और वर्तमान में जो वर्तमान के ओशो पीठाधीश्वर

618
00:43:03,200 --> 00:43:07,280
है तथाकथित एक और आचार्य प्रशांत यह

619
00:43:07,280 --> 00:43:10,720
लोग जिस तरीके से फेमिनिज्म

620
00:43:10,720 --> 00:43:14,880
इत्यादि रूपों में विक्टिम कार्ड जो खेलते हैं वही विक्टिम

621
00:43:14,880 --> 00:43:19,840
कार्ड आर्य समाज यह सारी जो चीजें निकली हैं जो जो ये कह रहे हैं रामपाल

622
00:43:19,840 --> 00:43:23,840
को मेरा प्रणाम है और गांधी जी ये रामपाल इत्यादि तो

623
00:43:23,840 --> 00:43:28,800
तुम्हारे ही द्वारा फैलाए हुए रायते हैं जिनको हम बटोर रहे हैं।

624
00:43:28,800 --> 00:43:32,880
ये नास्तिक पैदा कर रहे हो आप लोग दिव्य कीर्ति जैसे।

625
00:43:32,880 --> 00:43:37,040
आप लोगों के द्वारा फैलाए गए रायते हैं। यह जो आपने बुद्धिज्म जैसा

626
00:43:37,040 --> 00:43:41,280
ही सिस्टम पूरा बना रखा है। बस कहने को बोल दिया ईश्वर है।

627
00:43:41,280 --> 00:43:45,360
ठीक है? पर कम टू द पॉइंट। मैं थोड़ा टू द

628
00:43:45,360 --> 00:43:49,760
पॉइंट रहने का प्रयास कर रहा हूं। हालांकि आपने जो आज मुझे टू द पॉइंट सिखाया वो कुछ और है

629
00:43:49,760 --> 00:43:51,840
कि विषय से हटकर सारी बातों पर जोर देना

630
00:43:51,840 --> 00:43:57,680
है। तो क्या है कि ऐसी संवेदनशील बातें करो।

631
00:43:57,680 --> 00:44:01,840
ऐसी संवेदनशील बातें करो जिस पर या तो बहुत लंबी एक्सप्लेनेशन देनी

632
00:44:01,840 --> 00:44:06,080
पड़ जाए सामने वाले को और लंबी एक्सप्लेनेशन देने के चक्कर में जो मूल

633
00:44:06,080 --> 00:44:10,160
विषय है वो खत्म हो जाए। उसको लोग भूल जाए और राम राम श्याम

634
00:44:10,160 --> 00:44:14,160
श्याम और या फिर वो उन बातों

635
00:44:14,160 --> 00:44:18,160
को सुनकर के विषय को बचाने के लिए मौन हो जाए। उन बातों के बारे

636
00:44:18,160 --> 00:44:22,240
में बात ही ना करें और फिर बाद में आपके लोग

637
00:44:22,240 --> 00:44:26,320
यह वीडियो बनाए कि देखो देखो इनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था।

638
00:44:26,320 --> 00:44:30,400
अरे भाई ईश्वर अवतार नहीं ले रहा है। क्यों

639
00:44:30,400 --> 00:44:34,640
नहीं ले रहा है? अगर बात हो रही है क्यों नहीं ले सकता है?

640
00:44:34,640 --> 00:44:38,640
ठीक है? तो इसका जवाब आपको तात्विक विवेचना

641
00:44:38,640 --> 00:44:42,960
से देना है कि ऐसा ऐसा उसका स्ट्रक्चर है, उसकी उसके जो फीचर्स हैं,

642
00:44:42,960 --> 00:44:47,040
उसकी तात्विक विवेचना यह है, वो है वो देना है आपको ईश्वर के।

643
00:44:47,040 --> 00:44:51,200
इसलिए और इस इस कारण से ईश्वर का अवतार लेना सिद्ध नहीं होता। और

644
00:44:51,200 --> 00:44:55,200
ईश्वर के अवतार ना लेते हुए भी उसका सर्वशक्तिमान ना होना सिद्ध नहीं होता।

645
00:44:55,200 --> 00:44:59,200
यह आपको बताना है। पर आप उस बात पर बात करने की

646
00:44:59,200 --> 00:45:03,520
बजाय तमाम सारी चीजें कर रहे हो। वो आगे आ भी जाएंगी।

647
00:45:03,520 --> 00:45:07,360
फिलहाल ये बात कर रहे हो कि भैया यदि ईश्वर अवतार

648
00:45:07,360 --> 00:45:11,360
लेता है तो अगर वो सब कुछ कर सकता है

649
00:45:11,360 --> 00:45:15,440
तो क्या वो जनरल डायर के रूप में भी आ सकता है? क्या वो औरंगजेब के रूप

650
00:45:15,440 --> 00:45:19,760
में भी आ सकता है? फिर वो कर्म फल वाली बात भी ले आते हो कि जो है अगर

651
00:45:19,760 --> 00:45:23,760
ईश्वर अवतार लेता है पापियों का नाश करने के लिए तो यह हो रहा है वो हो रहा

652
00:45:23,760 --> 00:45:27,840
है। केवल इतना कह देने मात्र से आपका प्रश्न समझ

653
00:45:27,840 --> 00:45:31,920
में आएगा। ठीक है? इतना कहने मात्र से कि

654
00:45:31,920 --> 00:45:36,000
बहुत सारे पाप हो रहे हैं। इस समय आके क्यों नहीं रोक रहा है? अच्छा उदाहरण देना है कि

655
00:45:36,000 --> 00:45:40,160
गलत गलत बन के आ सकता है तो एक उदाहरण दे सकते हो। मगर 10 ठो उदाहरण

656
00:45:40,160 --> 00:45:44,160
क्यों देने हैं? 10 ठो उदाहरण इसलिए देने हैं क्योंकि हमारे

657
00:45:44,160 --> 00:45:48,400
पास तात्विक विवेचना है ही नहीं। तो हम ऐसे उदाहरण संवेदनशील

658
00:45:48,400 --> 00:45:52,400
उदाहरण ज्यादा मोटे तौर पर इसलिए दे देंगे कि उन उदाहरणों का

659
00:45:52,400 --> 00:45:56,400
उत्तर निराकरण करते करते इतना टाइम हो जाए और फिर लास्ट में हम

660
00:45:56,400 --> 00:46:00,720
कुछ ऐसी गरमा गर्मी पैदा कर दें जिससे कि यह चर्चा भंग हो जाए। जीत गए जीत गए मिरेकल

661
00:46:00,720 --> 00:46:04,720
मिरेकल। और यदि मैं इस चीज को होने से रोक रहा हूं विषय

662
00:46:04,720 --> 00:46:08,800
को बचाने के लिए तो आप जैसे लोग आकर के प्रश्न करोगे कि भाई भावनाओं को घर पर छोड़कर

663
00:46:08,800 --> 00:46:13,280
आओ तर्क और प्रमाण पर बात करो। और जब मैं भावनात्मक

664
00:46:13,280 --> 00:46:17,920
वो दे रहा हूं, उत्तर काउंटर दे रहा हूं तब

665
00:46:17,920 --> 00:46:22,000
सामने वाला कह रहा है कुतर्क है। मैं पूछ रहा हूं कुतर्क है कहां लिखा हुआ है? सामने

666
00:46:22,000 --> 00:46:22,500
वाला कह

667
00:46:22,400 --> 00:46:26,400
रहा है नहीं बताऊंगा। तो वो चीजें आपको दिखाई नहीं दे

668
00:46:26,400 --> 00:46:30,960
रही है क्योंकि वो लेंस लेके आपने वीडियो देखा है ना कहां-कहां से

669
00:46:30,960 --> 00:46:35,200
सबसे ज्यादा कमजोरी सिद्ध हो रही है अग्निव्रत

670
00:46:35,200 --> 00:46:39,920
जी की। वहीं पर मैं उनको जो है बड़ा बनाऊंगा। तो

671
00:46:39,920 --> 00:46:45,280
भावनाएं मेरी नहीं थी। मैं समाज की भावनाओं की बात कर रहा हूं।

672
00:46:45,280 --> 00:46:49,360
कई ऐसे विषय होते हैं जिन पर बात करने के लिए एक व्यवस्थित रूप से अलग

673
00:46:49,360 --> 00:46:53,440
से समय चाहिए होता है। जब हम अवतार पर बात करने बैठे हैं तो ऐसे

674
00:46:53,440 --> 00:46:57,440
विषयों पर बात करने से हम बचेंगे ना जिनसे कि खामखा एक अलग से हमें उस

675
00:46:57,440 --> 00:47:01,600
पर समय देना पड़ जाए। एक टॉपिक एक एक नाम आप ले लो। दो नाम आप ले लो जनरल

676
00:47:01,600 --> 00:47:05,600
डायर औरंगजेब और 50 नाम क्यों ले रहे हो? एक उदाहरण दे दो। यह हो रहा

677
00:47:05,600 --> 00:47:09,680
है। यह पाप कर्म हो रहा है। वह पाप कर्म हो रहा है। और उदाहरण क्यों दे रहे हो? जिससे कि

678
00:47:09,680 --> 00:47:14,480
सामने वाला या तो लंबी एक्सप्लेनेशन में जाए और या फिर इस पर मौन रह जाए।

679
00:47:14,480 --> 00:47:18,320
ठोको ताली। खैर

680
00:47:18,320 --> 00:47:22,800
तो [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा इसका मैं उदाहरण भी दे देता हूं।

681
00:47:22,800 --> 00:47:26,880
अग्निव्रत जी से जब मैंने योग नियोग पर बात की थी। अग्निव्रत जी ने वहां पर कहा

682
00:47:26,880 --> 00:47:32,560
क्या कि नियोग पर मैं अलग से नियोग पर भी मैं चर्चा कर सकता हूं। क्यों कहा?

683
00:47:32,560 --> 00:47:36,640
नियोग पर मैं चर्चा कर सकता हूं। यह उन्होंने क्यों कहा? नियोग के संबंध में सवाल

684
00:47:36,640 --> 00:47:37,600
आ रहा है। धड़ाधड़ देना

685
00:47:37,600 --> 00:47:41,680
शुरू करो जवाब। हालांकि मैं नियोग के विषय में भी

686
00:47:41,680 --> 00:47:45,920
आक्षेप नहीं लगा रहा था। वो अलग बात थी। मैं ला रहा था उस तर्क को

687
00:47:45,920 --> 00:47:50,240
जो दयानंद जी ने वहां पर दिया है। आपका अच्छा बुरा

688
00:47:50,240 --> 00:47:54,240
यदि शास्त्र से तय हो रहा है तो शास्त्र की किसी

689
00:47:54,240 --> 00:48:00,240
बात को आप शास्त्र अपने मन से नकार नहीं सकते।

690
00:48:00,400 --> 00:48:05,440
यदि शास्त्र आपके लिए प्रमाण है तो ठीक है

691
00:48:05,440 --> 00:48:09,520
अच्छा और यदि तर्क से ही तय होना है तो प्रमाण जा क्यों रहे हो दे तो रहा हूं

692
00:48:09,520 --> 00:48:13,760
आपको डलिया भर के तर्क दिए डलिया भर के और जो जो

693
00:48:13,760 --> 00:48:17,760
आएगा उसको दूंगा ठीक है तर्क से ही

694
00:48:17,760 --> 00:48:22,240
होना है ना तो तर्क से करो फिर भागे क्यों प्रमाण पे तर्क से

695
00:48:22,240 --> 00:48:26,400
जान बचानी है तो प्रमाण में भागो प्रमाण से जान बचानी है तो तर्क पे भागो यही हुआ

696
00:48:26,400 --> 00:48:30,960
है सत्यार्थ प्रकाश में भी यही भरा हुआ खैर आगे चलते हैं।

697
00:48:30,960 --> 00:48:36,000
तो उन्होंने भी यह कहा

698
00:48:36,000 --> 00:48:40,080
कि भैया नियोग पर चर्चा करने को मैं तैयार हूं। इसका मतलब ही था कि वो एक विशेष

699
00:48:40,080 --> 00:48:44,080
रूप से वहां लंबी चर्चा है नियोग को समझने के लिए। उनके नजरिए

700
00:48:44,080 --> 00:48:48,160
में हमारे नजरिए में हम नियोग आर्य समाज के नियोग से हम सहमत

701
00:48:48,160 --> 00:48:52,560
नहीं है। ठीक है? जो उन्होंने नियोग की परिभाषा दी है, जो

702
00:48:52,560 --> 00:48:53,200
दृष्टांत

703
00:48:53,200 --> 00:48:57,600
दिए, उससे सहमत नहीं है। परंतु नियोग पर जब एक व्यवस्थित

704
00:48:57,600 --> 00:49:01,680
चर्चा करना उनको उचित लगा तो उन्होंने यही बात कही कि नियोग पर मैं चर्चा कर सकता

705
00:49:01,680 --> 00:49:07,600
हूं। ऐसे ही पशु बलि पर मैं चर्चा कर सकता हूं।

706
00:49:07,600 --> 00:49:11,680
पर इन चर्चाओं के लिए अलग से समय चाहिए होता है और अपने विषय को

707
00:49:11,680 --> 00:49:15,680
बचाने के लिए टू द पॉइंट को टू द पॉइंट रखने के लिए। यह बात वहां

708
00:49:15,680 --> 00:49:20,000
कही गई थी कि आप ऐसी बातें ज्यादा मत करिए। उदाहरण दे रहे हैं। एक दो दे दीजिए।

709
00:49:20,000 --> 00:49:24,000
संक्षिप्त में दे दीजिए। ज्यादा करेंगे मुझे एक-एक उदाहरण को जाके काटना पड़ेगा। उसी में दो

710
00:49:24,000 --> 00:49:28,000
घंटे जाएंगे। तब तक सामने वाले को इतनी सारी बीमारियां वो बता चुके हैं। पता

711
00:49:28,000 --> 00:49:33,360
नहीं कौन से समय जो है पीछे से आ जाए बुलावा डॉक्टर का।

712
00:49:33,360 --> 00:49:37,360
तो ये सब चीजें ध्यान रखनी पड़ती है ना। खैर आप क्लासेस में आएंगे तो मैं जरूर आपको

713
00:49:37,360 --> 00:49:41,360
ट्रेनिंग दूंगा इन सब चीजों की। अच्छा अब आगे चलते हैं।

714
00:49:41,360 --> 00:49:45,680
तो अब [गला साफ़ करने की आवाज़] आपने एक जगह कहा है कि ईश्वर इंद्रिय

715
00:49:45,680 --> 00:49:49,760
विषय नहीं बनता। यह आपने कहा। आपने मेरा जो

716
00:49:49,760 --> 00:49:52,240
है कुछ

717
00:49:52,240 --> 00:49:57,600
कटाक्ष किया कि ईश्वर इंद्रिय विषय नहीं बनता है। और

718
00:49:57,600 --> 00:50:01,680
पहली बात तो यह है कि ईश्वर का इंद्रिय विषय बनने से मेरा तात्पर्य

719
00:50:01,680 --> 00:50:05,920
है व्यवहार में आना। किसी प्रकार से उसकी जानकारी

720
00:50:05,920 --> 00:50:08,320
होने होना भी। व्यवहार में आना है कि मुझे किसी

721
00:50:08,320 --> 00:50:12,640
प्रकार से उसकी जानकारी हो रही है। यानी कि ईश्वर व्यवहार

722
00:50:12,640 --> 00:50:16,640
में आ सकता है किसी प्रकार से। तो उसी रूप में मैंने कहा कि इंद्रिय विषय

723
00:50:16,640 --> 00:50:20,800
इंद्रियों के जाने वहां पर मैंने विकल्प कहे पर आपने वह विकल्प सुनने नहीं

724
00:50:20,800 --> 00:50:24,960
थे। शायद उस समय कान पर कुछ रख लेते हो जहां पर मेरे पक्ष की कोई बात हो रही हो

725
00:50:24,960 --> 00:50:28,960
तभी तो लेंस लेकर के ढूंढ पाते हो। खैर आगे की

726
00:50:28,960 --> 00:50:33,120
बात ये है कि फिर ईश्वर ज्ञान कैसे देता है अपना?

727
00:50:33,120 --> 00:50:37,440
अंतःकरण में मन नहीं होता है क्या? अच्छा ईश्वर ने सृष्टि बनाई

728
00:50:37,440 --> 00:50:43,040
तो मांस मज्जा को कैसे जोड़ा? भाई मांस मज्जा बना।

729
00:50:43,040 --> 00:50:47,040
बहुत सारे छोटे-छोटे कण हैं उनसे कुछ बना फिर उनसे कुछ बना

730
00:50:47,040 --> 00:50:51,120
एंड में मास बना उस मास को संगीभूत किया होगा उन्होंने तो

731
00:50:51,120 --> 00:50:56,560
ये सब क्या स्पर्श इत्यादि में नहीं आ रहा है कैसे बनेगी सृष्टि

732
00:50:56,560 --> 00:51:01,040
अब यहां पे आ जाओगे कहने अचिंत विषय है बन जाओगे इसको

733
00:51:01,040 --> 00:51:05,680
हम बात नहीं हुई ना खैर और आगे चलते हैं तो अंतःकरण

734
00:51:05,680 --> 00:51:11,680
का विषय बनता है ना ईश्वर भू स्वा प्रचोदयात

735
00:51:11,760 --> 00:51:15,840
बुद्धि मांग रहे हैं ना ईश्वर गायत्री मंत्र पढ़ने वालों को बुद्धि देगा ना कि

736
00:51:15,840 --> 00:51:19,920
नहीं मानते नहीं देगा हालांकि वह बात अलग है कुछ नहीं देता ईश्वर जो है भक्ति का

737
00:51:19,920 --> 00:51:24,080
कोई वो नहीं करता है पर बुद्धि दे देगा चलो बुद्धि दे रहा है तो व्यवहारिक

738
00:51:24,080 --> 00:51:28,240
हुआ ना इसी व्यवहारिक होने को ही इंद्रियों का विषय मैंने कहा ज्ञान देता है ना

739
00:51:28,240 --> 00:51:32,400
ऋषियों को अंतकरण का विषय बनता है ना भूल गए क्या आप अपनी

740
00:51:32,400 --> 00:51:36,640
चीजें भूल रहे हो इतना ज्यादा द्वेष है मुझसे इतना ज्यादा द्वेष

741
00:51:36,640 --> 00:51:41,360
मुझसे है या सत्य से है किसको छुपा रहे वो

742
00:51:41,360 --> 00:51:46,720
आत्मवलोकन भी करें थोड़ा बहुत। खैर आगे चलते हैं।

743
00:51:46,720 --> 00:51:51,120
तो मांस मज्जा इत्यादि ईश्वर के बिना संपर्क

744
00:51:51,120 --> 00:51:57,120
में आए ही जुड़ गए। यही बात थी ना? अच्छा

745
00:51:58,640 --> 00:52:02,960
आगे क्या है कि सबसे

746
00:52:02,960 --> 00:52:07,040
दिक्कत वाली बात यह है ना। अच्छा इसमें एक बात और कहूंगा रश्मि थ्योरी

747
00:52:07,040 --> 00:52:10,720
जो है वैदिक रश्मि थ्योरी इनकी

748
00:52:10,720 --> 00:52:14,880
क्या नाम है अग्निवत जी की तो आपके जो तथाकथित वैज्ञानिक है इनकी

749
00:52:14,880 --> 00:52:19,040
रश्मि थ्योरी है उसमें थोड़ा देर लगेगी ईश्वर के व्यवहारिक होने पर

750
00:52:19,040 --> 00:52:23,040
ईश्वर के व्यवहार में आने आना आने वाला दिखाने के लिए थोड़ा

751
00:52:23,040 --> 00:52:27,040
देर लगेगी परंतु आपके अगर आपने

752
00:52:27,040 --> 00:52:31,200
इनकी वैदिक रश्मि थ्योरी नहीं मानी है और ईश्वर स्वयं कार्य करने वाला

753
00:52:31,200 --> 00:52:35,760
है सीधे वो क्या कह रहे हैं कि वहां पर वो पहले एक

754
00:52:35,760 --> 00:52:39,920
ओम रश्मि होती है काल होता है उसको जो है शक्ति प्रदान करते हैं। हालांकि

755
00:52:39,920 --> 00:52:44,000
वह शक्ति थोड़ी प्रदान करते हैं। अब सबसे पहले तो मैं एक बात कर यह वाली

756
00:52:44,000 --> 00:52:48,000
बात पहले पूरी कर लूं। तो वह क्या करते हैं कि ईश्वर का कार्य पहले ये

757
00:52:48,000 --> 00:52:52,000
जो ओम रश्मि है इसके साथ ईश्वर का संयोग होता है। फिर यह जो

758
00:52:52,000 --> 00:52:56,320
ओम रश्मि है यह सृष्टि निर्माण इत्यादि कर रही है। यानी सृष्टि के संपर्क

759
00:52:56,320 --> 00:53:00,400
में सीधे तौर पर ओम रश्मि आ रही है। ईश्वर नहीं आ रहा है। पर आपकी

760
00:53:00,400 --> 00:53:04,480
थ्योरी में ईश्वर आ रहा है। अगर आपने यह थ्योरी अपनाई नहीं है तो और रश्मि थ्योरी

761
00:53:04,480 --> 00:53:09,600
में भी आ रहा है। वह कैसे आएगा मैं बताऊंगा कैसे आएगा। पर

762
00:53:09,600 --> 00:53:13,600
इस कारण से तो आपको इनका आलंबन ले ही लेना चाहिए। भाई तुम्हारी थ्योरी ठीक है

763
00:53:13,600 --> 00:53:14,100
क्योंकि

764
00:53:13,840 --> 00:53:18,080
हमारे यहां पर सत्य से कोई मतलब नहीं है। इससे मतलब है कि आर्य

765
00:53:18,080 --> 00:53:22,560
समाज के पक्ष को ज्यादा मजबूती से कौन रखेगा? अगर वह कोई

766
00:53:22,560 --> 00:53:26,640
स्मकिया भी होगा, साइकिल चोर होगा, तोता चोर होगा तो उसको भी

767
00:53:26,640 --> 00:53:31,280
हम कहने लगे वाह वाह वाह वाह धो डाला। बहुत बढ़िया

768
00:53:31,280 --> 00:53:37,120
है ना यही सिद्धांत 13वा सिद्धांत आर्य समाज। खैर

769
00:53:37,120 --> 00:53:41,280
कुल [गला साफ़ करने की आवाज़] मिलाकर के आपका कहना है कि ईश्वर जो

770
00:53:41,280 --> 00:53:45,360
है एक बात तो यहां पे हमें माननी पड़ेगी ना

771
00:53:45,360 --> 00:53:49,680
कि ईश्वर जो है कोई रूप धारण करके। मैं अभी एक हां

772
00:53:49,680 --> 00:53:54,240
यहां पर यह चीज बड़ी आवश्यक है बताने की कि

773
00:53:54,240 --> 00:53:58,320
शायद आर्य समाजी इस बात को समझ नहीं

774
00:53:58,320 --> 00:54:02,400
पाए कि अवतार हम कहते किसे हैं। उसको बस यही समझ में आता

775
00:54:02,400 --> 00:54:06,400
है कि भैया वो जो अगर वो सामने वो कृष्ण भगवान और राम

776
00:54:06,400 --> 00:54:10,480
जी के रूप में अगर दिखाई दे रहा है बस वही अवतार है। भाई तुम अवतार का

777
00:54:10,480 --> 00:54:14,480
खंडन करते कैसे हो? यहां से फिल्म को चालू करो ना। यहां से अपना मनन चिंतन

778
00:54:14,480 --> 00:54:18,640
चालू करो ना। जो सर्वव्यापक है वह एक जगह कैसे

779
00:54:18,640 --> 00:54:21,360
आएगा?

780
00:54:21,360 --> 00:54:25,760
जो जिस जो कभी ना आया ना गया वो आएगा कैसे?

781
00:54:25,760 --> 00:54:31,040
जो पहले से है वो आएगा कैसे? जो अजन्मा है वो जन्म कैसे लेगा? ये सब है ना आपके?

782
00:54:31,040 --> 00:54:35,520
तो जब ईश्वर ओम रश्मि को अपनी

783
00:54:35,520 --> 00:54:39,680
थोड़ी सी शक्ति दे रहा है तो वो शक्ति क्या टूट रही है

784
00:54:39,680 --> 00:54:42,800
ईश्वर से?

785
00:54:42,800 --> 00:54:46,800
टूट के आ रही है। कैसे आ रही है? ओम रश्मि के

786
00:54:46,800 --> 00:54:51,040
अंदर वह शक्ति भी ईश्वर है ना। इस आने

787
00:54:51,040 --> 00:54:55,200
को ही कहते हैं अवतार। जैसे ही ईश्वर किसी कार्य

788
00:54:55,200 --> 00:54:59,200
में संलग्न होगा वहां पर ईश्वर का अवतार मानना

789
00:54:59,200 --> 00:55:01,680
पड़ेगा।

790
00:55:01,680 --> 00:55:05,920
वो व्यवहार में आ ही नहीं सकता। व्यवहार में विशेष होना पड़ेगा

791
00:55:05,920 --> 00:55:09,920
उसे। कहीं पर मंत्र दे रहा है, कहीं पर नहीं दे रहा

792
00:55:09,920 --> 00:55:14,000
है। हो गया एक एक कार्य करने वाला। अब यह एक देश कार्य

793
00:55:14,000 --> 00:55:18,720
कैसे हो रहा है? ईश्वर ही कर रहा है ना।

794
00:55:18,720 --> 00:55:22,960
तो यह कार्य करने वाला होने के रूप में ही ईश्वर का अवतार मान्य है। पहला

795
00:55:22,960 --> 00:55:27,840
ही यही हो गया। सिर्फ वही नहीं जो आंखों का रूप बने। वो तो आगे की बात है।

796
00:55:27,840 --> 00:55:31,920
यानी कि यह सारी जो धारणाएं हैं कि उसका आना जाना सिद्ध नहीं

797
00:55:31,920 --> 00:55:36,720
होता। तो किसी देश काल परिस्थिति में मंत्र देने वाला हो गया।

798
00:55:36,720 --> 00:55:40,800
सृष्टि रचना करने वाला हो गया, प्रकट होने वाला हो

799
00:55:40,800 --> 00:55:44,800
गया। हाड़ मास के इंसान के रूप में ही प्रकट होने

800
00:55:44,800 --> 00:55:48,960
वाला नहीं। अग्निव्रत जी ने कहा

801
00:55:48,960 --> 00:55:53,040
कि कार्य के रूप में प्रकट होता है। आप कहते हो ना कि भैया

802
00:55:53,040 --> 00:55:57,040
पहले कहा था जो नहीं। कार्य के रूप में प्रकट होता है। अग्निव्रत जी ने कहा यह सब चीजें

803
00:55:57,040 --> 00:56:01,120
लेंस लेकर नहीं ढूंढी। कार्य के रूप में प्रकट होता है। वह कार्य

804
00:56:01,120 --> 00:56:05,920
ईश्वर का शाश्वत है। लगातार हो रहा है। एक ही जैसा बिल्कुल ना

805
00:56:05,920 --> 00:56:09,920
तो वह शाश्वत है, ना तो वह नित्य है वह कार्य और ना ही वह एक

806
00:56:09,920 --> 00:56:14,560
देश है। सर्वव्यापक है। एक ही जैसा कार्य हो रहा है।

807
00:56:14,560 --> 00:56:18,560
कहीं पर सूर्य बन रहा है, कहीं चंद्रमा बन रहा है, कहीं कुछ कार्य हो रहा है। तो कार्य

808
00:56:18,560 --> 00:56:23,280
के रूप में जो ईश्वर प्रकट हो रहा है, यह ईश्वर का अवतार है।

809
00:56:23,280 --> 00:56:27,440
पर नहीं आपको यहां समझ में नहीं आएगा। आप क्लासेस में आइए निशुल्क वाली

810
00:56:27,440 --> 00:56:31,440
क्लासेस वो ₹5100 खर्च नहीं करने पड़ेंगे जो आर्य समाजी चंदे चंदे से

811
00:56:31,440 --> 00:56:33,840
आते हैं। जो हिंदू

812
00:56:33,840 --> 00:56:37,840
बिटियाओं का विवाह होता है ना वहां पर ₹5100 लेकर के एक ही दिन में ब्राह्मण बना दिया

813
00:56:37,840 --> 00:56:41,840
जाता है। ब्राह्मण बिटिया से विवाह करना है। एक ही दिन में ब्राह्मण तो वो जो आर्य समाज

814
00:56:41,840 --> 00:56:46,000
से जो पैसों का कलेक्शन होता है उसको कोई चोट नहीं पहुंचेगी। आप मेरे यहां फ्री निशुल्क

815
00:56:46,000 --> 00:56:50,080
पढ़ने के लिए आ सकते हैं। ठीक है भारद्वाज जी। हां। तो

816
00:56:50,080 --> 00:56:54,240
क्या है? ईश्वर का अवतार वही मानना

817
00:56:54,240 --> 00:56:58,240
पड़ जाएगा जैसे ही आप कार्य देखोगे। ईश्वर यदि अपने कार्य के

818
00:56:58,240 --> 00:57:02,640
रूप में प्रकट हो रहा है तो उस कार्य के रूप में भी अवतार ले रहा है।

819
00:57:02,640 --> 00:57:07,040
अच्छा उन्होंने एक बात और कही उसका ज्ञान प्रकट होता है।

820
00:57:07,040 --> 00:57:11,200
प्रकट होता है यानी कि वो शाश्वत नहीं है। शाश्वत नहीं है तो प्रकट कहां से हो रहा है? ईश्वर उसमें

821
00:57:11,200 --> 00:57:14,000
ज्ञान के रूप में।

822
00:57:14,000 --> 00:57:19,200
ईश्वर जैसे ही क्रियावान होगा, क्रियाशील होगा,

823
00:57:19,200 --> 00:57:23,280
जरा सा भी उसका कोई व्यवहार भी होगा, कहीं पर भी, किसी के भी साथ वैसे ही

824
00:57:23,280 --> 00:57:27,600
उसका अवतार मानना पड़ जाएगा। यही तो मैं सिद्ध कर रहा हूं। वो तो उन्होंने जल्दी विषयंतर

825
00:57:27,600 --> 00:57:31,840
कर दिया। नहीं तो वो धक्के वाली थ्योरी आने वाली थी। मैं लाता

826
00:57:31,840 --> 00:57:35,840
धक्के को फिर उनका वो सब वो जो बोले थे बल ये सब बातें तो हो ही नहीं पाई। मैंने

827
00:57:35,840 --> 00:57:39,520
उनको अगले दिन फिर कॉल किया था

828
00:57:39,520 --> 00:57:43,520
कि आप अगर विषयंतर ना करें और व्यक्तिगत ये सब ना करें तो चर्चा पूरी

829
00:57:43,520 --> 00:57:48,480
कर लो। अब तो खैर चीजें आगे बढ़ गई है। पर मैंने उनको अगले दिन कॉल किया था

830
00:57:48,480 --> 00:57:48,980
कि भाई

831
00:57:48,880 --> 00:57:52,880
क्योंकि मेन बात थी ये सब बातों के ये जितने उन्होंने जो निचले

832
00:57:52,880 --> 00:57:57,040
स्तर के तर्क दिए हैं ये छोटेमोटे आर शर्मा जी जो मेरे

833
00:57:57,040 --> 00:58:01,120
साथ आए दिन जुड़ा करते वो सब दे चुके सब जो बोले हैं वहां पर

834
00:58:01,120 --> 00:58:05,520
और आज आप आए हो इनकी सिफारिश करने वह

835
00:58:05,520 --> 00:58:10,720
सब आर्य समाजी आपके अपने नहीं थे। यही सब बोला था उन्होंने।

836
00:58:10,720 --> 00:58:14,720
और जब यहां पर गाड़ी आकर के अटकी थी कि ईश्वर सृष्टि करता

837
00:58:14,720 --> 00:58:17,920
कैसे है?

838
00:58:17,920 --> 00:58:22,080
बनाता कैसे है? चीजें इधर से उधर मूव कैसे हो रही है?

839
00:58:22,080 --> 00:58:26,160
वहां पे बल की बात आई थी। शक्ति की बात आई थी। शक्ति के रूप में अवतार लेता

840
00:58:26,160 --> 00:58:32,150
है भाई। पहला अवतार तो वहीं मान्य हो जाएगा ना जहां क्रियावान है ईश्वर। खैर

841
00:58:32,150 --> 00:58:36,240
[खांसने की आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा अब पहली बात तो एक निर्णय

842
00:58:36,240 --> 00:58:40,480
कर लीजिए आप ईश्वर सदैव व्यवहारिक है कि नहीं है

843
00:58:40,480 --> 00:58:44,560
यदि सदैव व्यवहारिक होता है सदैव वो व्यवहारिक है

844
00:58:44,560 --> 00:58:48,640
तो भी उसके लिए शब्द नहीं आना चाहिए कि वो प्रकट होता है क्योंकि वो तो पहले से ही व्यवहारिक

845
00:58:48,640 --> 00:58:52,640
है और यदि वो व्यवहारिक है तो अभी मेरे व्यवहार में क्यों नहीं आ रहा है तो मानना

846
00:58:52,640 --> 00:58:57,520
पड़ेगा ईश्वर व्यवहारिक नहीं है और

847
00:58:57,520 --> 00:59:01,600
यदि आपने उसको सदैव व्यवहारिक मान रखा रखा है कि ईश्वर सदैव

848
00:59:01,600 --> 00:59:05,680
से व्यवहारिक ही था। आपने आगे चलकर के एक तर्क दिया है कि ईश्वर

849
00:59:05,680 --> 00:59:10,560
का व्यवहार और परमार्थ में कोई अंतर नहीं होता है। व्यवहार और परमार्थ है क्या?

850
00:59:10,560 --> 00:59:14,640
हमारी दृष्टि से है जो भी ईश्वर के कार्य नहीं बदलते हैं। हमारी दृष्टि देखने

851
00:59:14,640 --> 00:59:18,880
की बदल जाती है। जैसे पृथ्वी नहीं बदल रही है। पृथ्वी

852
00:59:18,880 --> 00:59:23,200
तो गोल ही है। हमारी दृष्टि बदल रही है। हमारी दृष्टि

853
00:59:23,200 --> 00:59:27,200
के अनुसार प्राप्त होने वाली जो जानकारी वो बदल रही है। इसको व्यवहार परमार्थ कहते हैं। जो

854
00:59:27,200 --> 00:59:31,280
आपने कहा ना दोगला क्यों होगा? व्यवहार में कुछ और परमार्थ में कुछ और तो हम उसे

855
00:59:31,280 --> 00:59:35,280
किस तरीके से जान पा रहे हैं वो वाली बात उसको कहते [गला साफ़ करने की आवाज़] हैं व्यवहार परमार्थ कह बहुत ज्यादा

856
00:59:35,280 --> 00:59:39,840
गढ़ बातें हो जाएंगी और

857
00:59:39,840 --> 00:59:44,000
क्या है कि इतनी गढ़ बातों की अपेक्षा नहीं की जा सकती समाजियों से मुझसे

858
00:59:44,000 --> 00:59:48,080
मुझे क्षमा करिएगा मुझसे गलती हो गई इतनी गढ़ बातें ईश्वर जो है क्रियावान होते ही अवतार

859
00:59:48,080 --> 00:59:52,400
मानना पड़ेगा उसका ये सब बहुत उच्च कोटि की गुण बातें यहां तक

860
00:59:52,400 --> 00:59:56,480
समाज समाजी लोग कहां सोचते हैं आज तक कहां सोचा है किसी ने नहीं तो अवतार

861
00:59:56,480 --> 01:00:00,720
को ना मान लेते तो इतनी इतनी गढ़ बातें करने के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए। मुझसे गलती हो गई। अभी

862
01:00:00,720 --> 01:00:05,600
अभी मैं रोकूंगा आगे। इतनी गढ़ बातें नहीं करूंगा। [गला साफ़ करने की आवाज़]

863
01:00:05,600 --> 01:00:09,440
तो

864
01:00:09,440 --> 01:00:13,440
अगर ईश्वर सदैव व्यवहारिक है उसको आपने कहा ना

865
01:00:13,440 --> 01:00:17,440
कि वो केवल उसका कोई साक्षी नहीं था। यानी कि वो व्यवहार व्यवहारिक शुरू

866
01:00:17,440 --> 01:00:21,520
से था। केवल वहां पर जाना गया। तो अगर उसका कोई साक्षी नहीं था। यानी कि

867
01:00:21,520 --> 01:00:25,520
वो ऐसे मोड़ पर है जब वो व्यवहारिक है। ईश्वर सदैव से एक ही रहता है। आपने और भी जगह

868
01:00:25,520 --> 01:00:29,520
कहा कि वो व्यवहार और परमार्थ दोनों में तात्विक में भी वैसा ही होगा व्यवहारिक में

869
01:00:29,520 --> 01:00:33,680
भी यानी व्यवहारिक तो उसका जो व्यवहारिक है वह सदैव से व्यवहारिक

870
01:00:33,680 --> 01:00:37,680
है तब भी आपकी इंद्रियों के विषय में ना आने वाली बात खंड खंडित हो जाती है

871
01:00:37,680 --> 01:00:43,680
पर इतनी गुण बातें हैं। खैर तो

872
01:00:43,680 --> 01:00:47,920
मान लिया कि ये सब आप आप लोगों की सीमा के बाहर का विषय है।

873
01:00:47,920 --> 01:00:52,000
इनमें आपकी गति नहीं है। फिर भी जो भी पक्ष आप व्यवहार परमार्थ के विषय में

874
01:00:52,000 --> 01:00:55,040
दे रहे हैं। इंद्रियों के विषय में दे रहे हैं। यह सब बातें आपके

875
01:00:55,040 --> 01:00:59,200
तथाकथित वैज्ञानिक जी नहीं बोले। वह तो अपनी वैदिक रस्म

876
01:00:59,200 --> 01:01:03,280
थ्योरी आने से पहले ही पलायन कर गए। व्यक्तिगत कटाक्ष पर पहुंच गए। आप कुतर्क

877
01:01:03,280 --> 01:01:07,280
कर रहे हो। अद्वैतवाद बुरा है। अच्छा

878
01:01:07,280 --> 01:01:11,280
इसमें एक बात और आती है निर्णय वाली। खैर आगे मैंने

879
01:01:11,280 --> 01:01:15,360
नोट किया है। भाई मैं तो पन्ने पलटता हूं। आप जैसा मैं

880
01:01:15,360 --> 01:01:19,680
वो जो अद्भुत अदम्य साहस की परिभाषा

881
01:01:19,680 --> 01:01:23,680
नहीं हूं। आप जैसा शक्तिमान नहीं हूं। तो मैं पन्ने पलटता

882
01:01:23,680 --> 01:01:29,680
हूं। आप नहीं पलटते। खैर आगे चलते हैं।

883
01:01:31,600 --> 01:01:35,760
तो ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता? यहां से हमने क्या सीखा टू द पॉइंट में? ईश्वर अवतार

884
01:01:35,760 --> 01:01:39,760
इसलिए नहीं ले सकता है क्योंकि आर्य समाजियों की गति इतने

885
01:01:39,760 --> 01:01:43,840
गढ़ विषयों में नहीं है। 14वा सिद्धांत जोड़ते जाइए

886
01:01:43,840 --> 01:01:48,080
अपने मन लिस्ट बढ़ा दीजिए। ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है? क्योंकि आर्य

887
01:01:48,080 --> 01:01:52,080
समाजियों की गति व्यवहार परमार्थ को जानने में नहीं है। व्यवहार परमार्थ के विषय में और

888
01:01:52,080 --> 01:01:56,240
एक उत्तर दे देता हूं आपको। कोई व्यक्ति मुक्त हुआ

889
01:01:56,240 --> 01:02:01,440
है। अब वह मुक्ति में है। तो उसको

890
01:02:01,440 --> 01:02:05,520
यहां की चीजें ज्ञात है कि नहीं? या तो यह कहो कि उसको

891
01:02:05,520 --> 01:02:09,520
जो है कुछ ऐसा इंजेक्शन लगा दिया जाएगा जिससे उसको

892
01:02:09,520 --> 01:02:13,840
यहां की गतिविधियां देखने को ही ना मिले। छिपा दी जाए या फिर ज्ञात

893
01:02:13,840 --> 01:02:18,080
है। अगर ज्ञात है यहां की नॉलेज उसे मिल रही है मुक्ति

894
01:02:18,080 --> 01:02:22,400
में मुक्ति अवस्था में आपके अनुसार

895
01:02:22,400 --> 01:02:26,800
तो उसकी जो यहां पर कल तक माताएं बहने थी या

896
01:02:26,800 --> 01:02:30,880
उसके जो बंधु बांधव थे उनके साथ कुछ अनहोनी

897
01:02:30,880 --> 01:02:35,040
हो रही है कुछ अप्रिय घटनाएं हो रही हैं तो उसको

898
01:02:35,040 --> 01:02:39,040
बुरा लगेगा मुक्ति में नहीं लगेगा

899
01:02:39,040 --> 01:02:43,040
तो क्यों नहीं लगेगा उसके लिए सब पाप नहीं होगा उनके साथ कुछ

900
01:02:43,040 --> 01:02:46,880
गलत हो रहा है कुछ हो रहा है प्रभाव डालने वाला नहीं होगा।

901
01:02:46,880 --> 01:02:50,880
हालांकि थ्योरी तो यही कहती है कि भाई मुक्ति वाले को नहीं होता है। तो यह क्या

902
01:02:50,880 --> 01:02:54,880
है? कल तक उसकी जो माताएं थी, बहने थी, आज उसको कोई फर्क ही

903
01:02:54,880 --> 01:02:58,880
नहीं पड़ रहा है। यही है व्यवहार और परमार्थ का अंतर। दृष्टि का अंतर

904
01:02:58,880 --> 01:03:02,880
एक है मुक्त दृष्टि, एक है बंधन में बंधन वाली दृष्टि। इसी को व्यवहार और

905
01:03:02,880 --> 01:03:06,880
परमार्थ कहते हैं। खैर इतनी गढ़ बातें हैं। क्षमा करिए। फिर मैंने पूरा

906
01:03:06,880 --> 01:03:12,080
कर दिया। अच्छा अब आगे एक वो और आ जाता है।

907
01:03:12,080 --> 01:03:16,720
स्वयं हिंदी में वीडियो बना रहे हैं।

908
01:03:16,720 --> 01:03:20,960
अग्निव्रत जी हिंदी में ही अपने भाषण देते हैं। प्रचार प्रचार प्रचार

909
01:03:20,960 --> 01:03:25,200
प्रसार व्यवस्था के लिए हिंदी में ही वीडियो बनाते हैं। हिंदी में ही किताबें

910
01:03:25,200 --> 01:03:29,200
लिखते हैं। और पूरे वांगमय को वैदिक वांगमय को आपने

911
01:03:29,200 --> 01:03:33,520
हिंदी में ट्रांसलेट करके लिखा है। तो इनको

912
01:03:33,520 --> 01:03:37,840
अपना हिंदी में वीडियो बनाना हिंदी में

913
01:03:37,840 --> 01:03:41,920
आज मेरा जो समीक्षात्मक वीडियो बनाया है उसमें भी इन्होंने हिंदी

914
01:03:41,920 --> 01:03:46,160
भाषा का उपयोग किया है। संस्कृत का नहीं किया है। तो इन्होंने स्वयं

915
01:03:46,160 --> 01:03:50,240
तो स्वीकार कर लिया कि हम जैसा जो उचित होगा अपेक्षित होगा उस भाषा

916
01:03:50,240 --> 01:03:54,240
में करेंगे। पर शिवश नारायण द्विवेदी यदि अपेक्षित भाषा में

917
01:03:54,240 --> 01:03:58,880
करेगा तो हम ये मुद्दा उठाएंगे। भैया इसने संस्कृत नहीं बोली। नहीं आती है संस्कृत।

918
01:03:58,880 --> 01:04:02,160
चौथी क्लास फेल हूं ना। बता तो दिया नकेल

919
01:04:02,160 --> 01:04:06,640
डालने के लिए पर्याप्त हूं। नाक में चौथी क्लास फेल नकेल

920
01:04:06,640 --> 01:04:10,640
डालने के लिए पर्याप्त शंकराचार्य का अल्पज्ञ शिष्य

921
01:04:10,640 --> 01:04:15,440
सुन लो दोबारा अल्पज्ञ शिष्य पर्याप्त है

922
01:04:15,440 --> 01:04:19,520
समूचे सनातन विरोधी तत्वों को नष्ट कर देने के लिए

923
01:04:19,520 --> 01:04:23,600
तुम वो नष्ट की सीमा से बाहर हो शोधन वाली सीमा

924
01:04:23,600 --> 01:04:28,000
में हो आप लोग उसमें नष्ट में ना जाना तो क्या है मामला

925
01:04:28,000 --> 01:04:32,000
कि संस्कृत में मैंने चीजें नहीं बोली इसका

926
01:04:32,000 --> 01:04:36,240
आपको बड़ा अफसोस है और अग्निव्रत जी ने

927
01:04:36,240 --> 01:04:40,400
संस्कृत में प्रचार प्रसार किया। आपने प्रचार प्रचार प्रसार किया हिंदी

928
01:04:40,400 --> 01:04:44,960
में संस्कृत में नहीं तो हिंदी में प्रचार प्रसार आपने किया

929
01:04:44,960 --> 01:04:49,280
वो आप नहीं देखो। अच्छा जब ये चर्चा तय हुई थी

930
01:04:49,280 --> 01:04:53,520
उस चर्चा को तय करते समय भी आपने उनको फोन करके बताया नहीं। अनबन

931
01:04:53,520 --> 01:04:57,600
है ना वैदिक रश्मिक थ्योरी की वजह से आपस में अनबन है आज शिवश

932
01:04:57,600 --> 01:05:01,760
नारायण द्विवेदी की वजह से जैसे कई भेड़िए एक नहीं हो जाते हैं शेर का शिकार

933
01:05:01,760 --> 01:05:05,920
करने के लिए वैसे एक हो रहे हैं ऐसा ही दिख रहा है वैसे तो अनबन है ना हनुमान

934
01:05:05,920 --> 01:05:10,000
जी उड़ते थे कि नहीं उड़ते थे ये सब चीजों को लेकर के अनबन है पर फिर भी उस

935
01:05:10,000 --> 01:05:14,400
अनबन के चलते लगता है आपने फोन नहीं किया ये कहने के लिए कि संस्कृत में शास्त्रार्थ

936
01:05:14,400 --> 01:05:17,200
करना भाई चर्चा थी हमको तो किसी ने कहा

937
01:05:17,200 --> 01:05:21,200
नहीं था कि संस्कृत में करनी है आपको फोन करके

938
01:05:21,200 --> 01:05:25,200
उन्हें बता देना चाहिए बचना अगर शंकराचार्य के सैनिक से बचना है तो

939
01:05:25,200 --> 01:05:29,840
भाई उसको संस्कृत के लिए बोलो। तो ना तो आपने फोन किया

940
01:05:29,840 --> 01:05:35,040
ना स्वयं संस्कृत में वीडियो बनाया और ना ही आपने

941
01:05:35,040 --> 01:05:39,040
अग्निव्रत जी से कहा कि आप संस्कृत में क्यों नहीं बात कर रहे हैं? हिंदी में क्यों

942
01:05:39,040 --> 01:05:43,040
कर रहे हैं? पर आपको मेरा संस्कृत में ना बोलना इतना खल गया

943
01:05:43,040 --> 01:05:48,400
कि आपने एक 16वा सिद्धांत दे दिया आर्य समाज का। क्या है सिद्धांत?

944
01:05:48,400 --> 01:05:52,640
कि ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता है क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी

945
01:05:52,640 --> 01:05:56,640
को संस्कृत नहीं आता। वाह वाह बिंगो 16वा सिद्धांत मिल

946
01:05:56,640 --> 01:06:02,240
गया। ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता है क्योंकि

947
01:06:02,240 --> 01:06:06,480
शिवश नारायण द्विवेदी को संस्कृत में ही आती है। ये है आपके

948
01:06:06,480 --> 01:06:10,800
सिद्धांत। भाई इसी पे तो खड़ा है आर्य समाज का स्ट्रक्चर। सत्य से मतलब

949
01:06:10,800 --> 01:06:15,440
नहीं है, न्याय से मतलब नहीं है, धर्म से मतलब नहीं है। मतलब इस बात से है

950
01:06:15,440 --> 01:06:19,440
कैसे सामने वाले की कमियां निकालनी है। जिन कमियों का उस

951
01:06:19,440 --> 01:06:23,840
विषय से कोई मतलब नहीं है जिस विषय पर चर्चा होगी। है ना?

952
01:06:23,840 --> 01:06:28,000
चलिए, [गला साफ़ करने की आवाज़] यहां तक आपने आपकी कई सारी बातें

953
01:06:28,000 --> 01:06:32,160
अगर मैं कुछ भूल रहा हूं तो आप जब क्लासेस में आएंगे ना, आपने जो जो बातें रेज की है, कुछ

954
01:06:32,160 --> 01:06:32,660
भूल

955
01:06:32,400 --> 01:06:36,640
रहा हूं अगर आपकी बातों को, तो आप जब क्लासेस आएंगे, निशुल्क वाली में

956
01:06:36,640 --> 01:06:40,720
तो आप वहां मुझे बता दीजिएगा। तो मैं बाकी की चीजें भी पूरी कर दूंगा।

957
01:06:40,720 --> 01:06:44,960
अच्छा आगे चलते हैं। तो अब आ गई कुछ ऐसी

958
01:06:44,960 --> 01:06:49,040
बातें जिनका उत्तर देना मैं आवश्यक समझता हूं। अब एक बात तो

959
01:06:49,040 --> 01:06:53,680
बात आपने की कर्म के फल वाली।

960
01:06:53,680 --> 01:06:59,360
आपने कहा

961
01:06:59,360 --> 01:07:04,080
कर्मों का फल। हां। आपने एक आरोप लगाया कि इनका ईश्वर

962
01:07:04,080 --> 01:07:08,240
अपने मन के अनुसार कार्य करता है।

963
01:07:08,240 --> 01:07:12,240
है ना? तो सबसे पहली बात तो यह है कि

964
01:07:12,240 --> 01:07:16,240
वह सृष्टि जो करता है उसमें

965
01:07:16,240 --> 01:07:20,480
कई चीजें होती हैं जो अभी भी सुनिश्चित नहीं है। वो ईश्वर ने बस की है।

966
01:07:20,480 --> 01:07:24,880
बहुत सारी है। ईश्वर ने चीजों को हरा,

967
01:07:24,880 --> 01:07:29,280
पेड़ों को हरा कलर क्यों दिया? या फिर ईश्वर ने वेदों

968
01:07:29,280 --> 01:07:33,520
में अलंकार क्यों लगाए? ये बातें आगे भी आएंगी। मंत्रों के रूप में क्यों दिया? सूक्त

969
01:07:33,520 --> 01:07:38,000
के रूप में क्यों दिया? वेद का ज्ञान ये सब चीजें आगे आएंगी। खैर

970
01:07:38,000 --> 01:07:42,080
जो मोटी बात है इसमें कि हमने यह नहीं कहा कि ईश्वर मनमाने ढंग

971
01:07:42,080 --> 01:07:46,240
से कार्य करता है। परंतु किसको क्या फल

972
01:07:46,240 --> 01:07:47,440
देना है और

973
01:07:47,440 --> 01:07:51,440
उसने कितना कर्म कौन सा गलत किया है जिसके कारण भगवान अवतार ले रहे

974
01:07:51,440 --> 01:07:55,520
हैं। हालांकि अवतार लेने के लिए भी हमने ये नहीं कहा है कि ईश्वर केवल कर्मों

975
01:07:55,520 --> 01:08:00,160
का फल देने के लिए पापी को मारने के लिए ही अवतार लेता है। उसमें उनकी कुछ अपनी

976
01:08:00,160 --> 01:08:04,240
चीजें हैं। कब लेना है, कितने अंतराल के बाद लेना है। जैसे कर्मों का फल

977
01:08:04,240 --> 01:08:08,480
देने में उनकी अपनी चीजें हैं। तो कर्मों का फल वह अपने मन

978
01:08:08,480 --> 01:08:13,200
से देता है। हम यह नहीं कह रहे। हालांकि मन भी है उसमें पर हमने यह नहीं कहा है।

979
01:08:13,200 --> 01:08:17,280
हम यह कह रहे हैं कि उन विषयों में हमारी गति नहीं है कि

980
01:08:17,280 --> 01:08:21,440
किसके साथ क्या व्यवहार कर रहा है ईश्वर। जैसे कि

981
01:08:21,440 --> 01:08:25,440
चार ऋषियों को ईश्वर ने वेद का ज्ञान दिया। अन्य को क्यों

982
01:08:25,440 --> 01:08:29,520
नहीं दिया? ये तो अन्याय हो गया। अब हमारी इसमें गति थोड़ी ना है कि उन

983
01:08:29,520 --> 01:08:33,840
ऋषियों ने उन उन मुक्त आप ही के अनुसार बोल रहा हूं। ठीक है?

984
01:08:33,840 --> 01:08:38,480
दुर्जन तोष न्याय कहते हैं इसे। दुर्जन्या तो

985
01:08:38,480 --> 01:08:43,280
वो जो ऋषि के रूप में प्रकट होते हैं

986
01:08:43,280 --> 01:08:47,440
उन्होंने अपने पूर्व में क्या-क्या कर्म किए जिनके कारण ईश्वर ने उन्हें

987
01:08:47,440 --> 01:08:51,440
ऋषि बनाया और उनके अंतःकरण में वो ज्ञान दिया। इसमें हमारी गति

988
01:08:51,440 --> 01:08:55,600
नहीं है। इसी बात को बोला जाता है कि किस

989
01:08:55,600 --> 01:08:59,600
रूप में बोला जाता है कि ईश्वर उसमें हमारी गति नहीं है। तो ईश्वर अपनी इच्छा के अनुसार जो कार्य करना

990
01:08:59,600 --> 01:09:02,480
है जहां पर करना है वैसे करेगा। कर्मों का

991
01:09:02,480 --> 01:09:06,720
फल दे रहा है। तो जब आप यह सुनिश्चित नहीं कर रहे हैं कि किस प्रकार से दिया जाएगा

992
01:09:06,720 --> 01:09:10,800
तो यह सुनिश्चित क्यों कर रहे हैं कि कब दिया जाएगा। आप यही तो कह रहे हैं ईश्वर अब क्यों नहीं

993
01:09:10,800 --> 01:09:14,800
आ रहा है? इसका अर्थ है कि उसकी वो जो सेटिंग है जिसमें हमारी गति नहीं है।

994
01:09:14,800 --> 01:09:18,880
जिस विधि के अनुसार ईश्वर कार्य करता है कर्म का फल देने वाला

995
01:09:18,880 --> 01:09:23,040
उसमें हमारी गति नहीं है उसको जानने की। बस हमें यह

996
01:09:23,040 --> 01:09:28,000
मानना पड़ता है कि जैसे आपने कहा कि नहीं ईश्वर हर क्षण कर्मों का फल दे रहा है

997
01:09:28,000 --> 01:09:32,080
तो वहां पर आप फंस जाओगे। जहां किसी व्यक्ति ने कुछ किया

998
01:09:32,080 --> 01:09:36,080
होगा और जो है वो बहुत सुखी होगा।

999
01:09:36,080 --> 01:09:40,160
आपको मानना पड़ेगा शब्द प्रमाण के कारण कि ईश्वर कर्मों का फल दे रहा है।

1000
01:09:40,160 --> 01:09:44,240
परंतु व्यवहारिक रूप से सूचना प्राप्त नहीं हो रही कि ईश्वर कर्मों का

1001
01:09:44,240 --> 01:09:48,800
फल दे रहा है। यहां भी आ गया व्यवहार और परमार्थ। तात्विक विवेचना

1002
01:09:48,800 --> 01:09:52,880
हमें जो शब्द प्रमाण से मिली है उससे हमने माना कर्मों का फल दे रहा है अनुमान

1003
01:09:52,880 --> 01:09:56,960
प्रमाण से माना पर इंद्रियों के द्वारा नहीं पता चल रहा है कर्म का कर्मों का फल मिल

1004
01:09:56,960 --> 01:10:00,960
रहा है उसे ठीक है तो क्या

1005
01:10:00,960 --> 01:10:05,040
हुआ [गला साफ़ करने की आवाज़] इसी में इन्होंने कहा कि ये बात तो आपके लिए भी आ सकती

1006
01:10:05,040 --> 01:10:09,120
है कि हनुमान जी यहां क्यों नहीं कर रहे वो क्यों नहीं कर रहे वही तो हम कह रहे हैं भाई भाई वो

1007
01:10:09,120 --> 01:10:13,280
ईश्वर की अपनी एक विधि है जिन विधि के अनुसार वो तय करता है किसको कब

1008
01:10:13,280 --> 01:10:17,280
देना है किसको किस रूप में देना है हमने ये थोड़ी ना कहा है

1009
01:10:17,280 --> 01:10:17,780
कि हर

1010
01:10:17,680 --> 01:10:21,920
व्यक्ति को कर्मों का फल देने के लिए हर पापी को मारने के लिए ईश्वर आएगा। आप

1011
01:10:21,920 --> 01:10:25,920
वहां पर अलंगा लगा रहे हो ना कि क्यों नहीं आ रहा है। क्योंकि उसकी विधि के

1012
01:10:25,920 --> 01:10:30,480
अनुसार उन लोगों को मारने के लिए अवतार लेना नहीं है।

1013
01:10:30,480 --> 01:10:34,960
उन उन अधर्मियों को रोकने के लिए अवतार लेना नहीं है।

1014
01:10:34,960 --> 01:10:39,120
जिस प्रकार से आपके अनुसार कि जो इस समय कर्म हो रहे हैं वो

1015
01:10:39,120 --> 01:10:43,120
इस प्रकार से हो रहे हैं कि उनको कर्मों का फल इस प्रकार से दिया जाए जो हमारी

1016
01:10:43,120 --> 01:10:47,360
जानकारी में आना आवश्यक नहीं है। सुन लेना रिपीट करके कभी-कभी

1017
01:10:47,360 --> 01:10:51,520
होती है ऐसी लाइन जो एक बार में समझ में ना आए। रिपीट करके सुन लेना थोड़ा 1.5

1018
01:10:51,520 --> 01:10:55,600
की स्पीड पर लगा लेना। ठीक है? तो यह प्रश्न आप

1019
01:10:55,600 --> 01:10:59,840
कर रहे हैं कि इतना सब हो रहा है तो कर्मों का कर्मों का फल वो अवतार क्यों नहीं ले रहा है?

1020
01:10:59,840 --> 01:11:03,840
अवतार लेना कर्मों का फल दे। हालांकि अवतार केवल एक कर्मों के

1021
01:11:03,840 --> 01:11:08,240
फल के लिए नहीं है। मगर अगर कर्म कर्मों के फल से उसे जोड़ भी लिया जाए।

1022
01:11:08,240 --> 01:11:13,120
तो प्रत्येक कर्म का फल देने के लिए अवतार नहीं है।

1023
01:11:13,120 --> 01:11:17,200
हां अवतार लेते समय का एक प्रयोजन यह भी होता है कि ठीक है। यह भी

1024
01:11:17,200 --> 01:11:22,160
करेंगे। पर यही एक प्रयोजन नहीं है कि अवतार ले ही हर पापी को मारना है।

1025
01:11:22,160 --> 01:11:26,320
और यदि आप यह सेट करेंगे कि अभी क्यों नहीं हो रहा है? तो हम पूछेंगे कि

1026
01:11:26,320 --> 01:11:30,480
भैया फलाना जो व्यक्ति है उसकी इस प्रकार से

1027
01:11:30,480 --> 01:11:32,720
मृत्यु क्यों नहीं हो रही है? उस प्रकार से मृत्यु क्यों

1028
01:11:32,720 --> 01:11:36,800
नहीं हो रही है? ये सब चालू हो जाएगा। या अभी क्यों नहीं हो रही है? वहां क्यों नहीं हो

1029
01:11:36,800 --> 01:11:40,960
रही है? बहुत से ऐसे लोग हैं जो अभी भी जीवित हैं। और

1030
01:11:40,960 --> 01:11:44,960
हमारी दृष्टि में और मनुस्मृति की दृष्टि में उनको मृत्युदंड है। तो क्यों नहीं मिल

1031
01:11:44,960 --> 01:11:49,120
रहा है मृत्युदंड? क्यों ईश्वर उन्हें मृत्युदंड नहीं दे रहा है? ये

1032
01:11:49,120 --> 01:11:53,760
सारी चीजें वहां पर तो इसको समझिएगा। तो जिस प्रकार से

1033
01:11:53,760 --> 01:11:58,000
आप यह तय नहीं कर सकते कि किसको कब किस रूप में

1034
01:11:58,000 --> 01:12:02,400
ईश्वर कर्मों का फल देगा। उसी प्रकार से आप यह भी तय मत करिए कि

1035
01:12:02,400 --> 01:12:06,480
ईश्वर कब किस समय और किस रूप में

1036
01:12:06,480 --> 01:12:10,560
आकर के उसको उसके कर्मों का फल देगा। अवतार से भी उस बात

1037
01:12:10,560 --> 01:12:14,800
को मत जोड़िए। यह बात ठीक है।

1038
01:12:14,800 --> 01:12:19,440
अच्छा इसके बाद आपने एक तंज कसा।

1039
01:12:19,440 --> 01:12:23,520
ईश्वर के मन नहीं होता है। ईश्वर के मन नहीं होता है। इस बात

1040
01:12:23,520 --> 01:12:28,000
पे आपने तंज कसा है। ईश्वर के ईश्वर के मन होता है। तो सत्यार्थ

1041
01:12:28,000 --> 01:12:32,240
प्रकाश पढ़िए। उसमें लिखा हुआ है कि ईश्वर अपने शक्ति

1042
01:12:32,240 --> 01:12:36,800
रूपी हाथों से कार्य करता है। हाथों से। ओ हो हो हो।

1043
01:12:36,800 --> 01:12:41,200
ये कैसी गलती कर दी दयानंद जी ने? ईश्वर के हाथ नहीं होते हैं।

1044
01:12:41,200 --> 01:12:45,280
क्यों लिख दिया? तो जैसे ईश्वर ने शक्ति रूपी

1045
01:12:45,280 --> 01:12:47,760
हाथ दिए हैं तो ज्ञान विज्ञान को

1046
01:12:47,760 --> 01:12:52,480
ग्रहण धारण करने वाली शक्ति शक्ति रूपी मन नहीं हो सकता उसके।

1047
01:12:52,480 --> 01:12:56,800
हमने कह दिया तो आफत है। जाइए फाड़ के फेंक दीजिए। सत्यार्थ

1048
01:12:56,800 --> 01:13:02,080
प्रकाश का उपना जहां लिखा है शक्ति रूपी आंख ईश्वर की।

1049
01:13:02,080 --> 01:13:06,560
और यहां पर भी मैं आपकी वही जो आपने बचकानापन किया है इसमें उसको

1050
01:13:06,560 --> 01:13:10,560
याद दिलाऊंगा टू द पॉइंट। कि मैंने वहां पर प्रॉपर

1051
01:13:10,560 --> 01:13:14,560
सेंटेंस नहीं बोला कि शक्ति रूपी मन ज्ञान विज्ञान को

1052
01:13:14,560 --> 01:13:18,960
धारण ग्रहण भाई कुछ तो लौकिक भाषा में नाम देने पड़ते हैं ना

1053
01:13:18,960 --> 01:13:22,720
जैसे आपके यहां दिए गए हैं।

1054
01:13:22,720 --> 01:13:26,800
ईश्वर बलवान है। बल जहां लगेगा वहां वो धक्के का

1055
01:13:26,800 --> 01:13:30,880
विषय बन जाएगा। चीजों को स्पर्श का विषय बन जाएगा। जड़ पदार्थों के स्पर्श का

1056
01:13:30,880 --> 01:13:35,440
विषय बन जाएगा। अवतार हो जाएगा वहां बल के रूप में।

1057
01:13:35,440 --> 01:13:40,720
खैर आगे चलते हैं। तो आप

1058
01:13:40,720 --> 01:13:44,800
यदि मेरे द्वारा यह कहने पर कि ईश्वर के मन में ईश्वर के मन है इस

1059
01:13:44,800 --> 01:13:49,120
पर आप तंज कस रहे हैं तो आप अपने उनहीं तथाकथित जो आपके परम

1060
01:13:49,120 --> 01:13:53,200
महषि हुए हैं उनकी बात पर भी तंज कस रहे हैं क्योंकि वो भी कह रहे हैं ईश्वर

1061
01:13:53,200 --> 01:13:57,200
के हाथ होते हैं। शक्ति रूपी हाथ होते हैं। और यदि उनके शक्ति रूपी

1062
01:13:57,200 --> 01:14:01,520
हाथ आपको स्वीकार रहे हैं तो आपको निसंकोच होकर मेरा भी शक्ति

1063
01:14:01,520 --> 01:14:02,800
रूपी मन स्वीकार कर लेना

1064
01:14:02,800 --> 01:14:07,360
चाहिए। हाथ से तो उच्च कोटि की चीज है ना मन।

1065
01:14:07,360 --> 01:14:12,090
है कि नहीं? चलिए आगे चलते हैं।

1066
01:14:12,090 --> 01:14:16,480
[खांसने की आवाज़] तो यहां पर भी यही वाली बात आ जाती है

1067
01:14:16,480 --> 01:14:20,640
कि ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है? क्योंकि आचार्य जो

1068
01:14:20,640 --> 01:14:25,200
योगेश भारद्वाज जी हैं सहारनपुर वाले हैं शायद। आचार्य योगेश भारद्वाज

1069
01:14:25,200 --> 01:14:29,520
जी की जानकारी में ईश्वर के शक्ति रूपी हाथ नहीं होते हैं।

1070
01:14:29,520 --> 01:14:33,600
मेरे और आचार्य योगेश भारद्वाज जी की जानकारी में सत्यार्थ

1071
01:14:33,600 --> 01:14:37,840
प्रकाश का ज्ञान विज्ञान अभी थोड़ा कम है। इसलिए ईश्वर अवतार नहीं

1072
01:14:37,840 --> 01:14:40,400
ले सकता है।

1073
01:14:40,400 --> 01:14:43,040
अच्छा

1074
01:14:43,040 --> 01:14:48,320
अब इन्होंने एक बात और कही है सर्वज्ञ इत्यादि के विषय में।

1075
01:14:48,320 --> 01:14:52,320
ईश्वर हां इन्होंने एक बात और कही कि ईश्वर व्यवहार में

1076
01:14:52,320 --> 01:14:56,480
अलग हो जाता है। परमार्थ में अलग हो जाता है। दोहरा चरित्र क्यों है? यह तो दोगला कहा

1077
01:14:56,480 --> 01:15:00,720
जाएगा। ईश्वर नहीं बदल रहा है। हमारी उसको देखने की दृष्टि बदल रही है। एक

1078
01:15:00,720 --> 01:15:04,720
एक है मुक्त दृष्टि अविद्या से रहित और एक है

1079
01:15:04,720 --> 01:15:08,880
बद्ध की दृष्टि अविद्या से सहित और उस

1080
01:15:08,880 --> 01:15:12,880
कारण से ईश्वर हमें अलग रूप में दिखाई देता है। अविद्या

1081
01:15:12,880 --> 01:15:16,880
में रहते हुए जब ईश्वर व्यवहारिक होगा अविद्या में रहते हुए जब

1082
01:15:16,880 --> 01:15:17,920
ईश्वर व्यवहारिक होगा उसको

1083
01:15:17,920 --> 01:15:22,080
अवतार कहा जाएगा। और अविद्या से मुक्त

1084
01:15:22,080 --> 01:15:26,480
रहते हुए जब ईश्वर होगा तो वहां पर कुछ वहां

1085
01:15:26,480 --> 01:15:30,640
परमार्थ है। वहां व्यवहार है ही नहीं। तो

1086
01:15:30,640 --> 01:15:34,800
वहां पर जरूरी नहीं कहा जाएगा कि ईश्वर ने अवतार लिया क्योंकि वो परमार्थ

1087
01:15:34,800 --> 01:15:38,880
है। अविद्या से रहित है। तत्व

1088
01:15:38,880 --> 01:15:43,680
से चीजों को हम देख समझ जान पा रहे हैं। वही तो विद्या है।

1089
01:15:43,680 --> 01:15:48,370
खैर

1090
01:15:48,370 --> 01:15:51,760
[गला साफ़ करने की आवाज़]

1091
01:15:51,760 --> 01:15:56,640
तो यह व्यवहार और परमार्थ का मतलब आप समझ गए। अब एक चीज और है

1092
01:15:56,640 --> 01:16:00,800
कि आपने एक बात कही है हमने सर्व

1093
01:16:00,800 --> 01:16:04,800
का मतलब नहीं समझा। हालांकि इसमें भी वो खेल गए। योगेश भारद्वाज जी थोड़ा सा

1094
01:16:04,800 --> 01:16:08,800
खेल गए। जब सर्व शब्द पर बात आई है तो थोड़ा

1095
01:16:08,800 --> 01:16:12,880
सा खेल गए। क्या खेल गए? जैसे मैंने कहा कि भाई

1096
01:16:12,880 --> 01:16:17,840
सर्वशक्तिमान का मतलब यह नहीं है कि जो सब कुछ कर सके यदि

1097
01:16:17,840 --> 01:16:21,840
तो आपने सर्वज्ञ का मतलब यह क्यों माना है कि जो सब कुछ

1098
01:16:21,840 --> 01:16:25,840
जानता है और आपने सर्व्यापक का अर्थ क्यों माना है कि

1099
01:16:25,840 --> 01:16:30,480
जो सब जगह है तो यहां योगेश भारद्वाज जी क्या खेल गए कि इन्होंने मेरे

1100
01:16:30,480 --> 01:16:34,960
सर्वज्ञ को मात्र पकड़ा और सर्वव्यापक में बात ही नहीं की।

1101
01:16:34,960 --> 01:16:39,280
सर्वव्यापक का अर्थ इन्होंने माना है कि ईश्वर

1102
01:16:39,280 --> 01:16:43,520
सब जगह है। ऐसा कुछ नहीं है जहां पर ईश्वर ना हो। सब

1103
01:16:43,520 --> 01:16:47,600
जगह है ईश्वर। ठीक है? पर सर्वज्ञ का अर्थ

1104
01:16:47,600 --> 01:16:51,920
इन्होंने क्या माना है पता है? इन्होंने माना है कि ईश्वर भविष्य नहीं देख रहा है। त्रिकालदर्शी

1105
01:16:51,920 --> 01:16:55,600
नहीं है। ईश्वर

1106
01:16:55,600 --> 01:17:00,560
उसके ऊपर आधारित है। ईश्वर पहले से नहीं जानता है कि क्या कर्म करने वाला है।

1107
01:17:00,560 --> 01:17:04,720
वो जो कर रहा है वो ईश्वर जानता है। जैसा वो कर रहा है वैसा ईश्वर जानता

1108
01:17:04,720 --> 01:17:06,880
है। और कुछ उसमें अनुमान प्रमाण की बात भी

1109
01:17:06,880 --> 01:17:11,040
कही कि उसने एक संभावना व्यक्त कर ली कि भाई ऐसा ऐसा

1110
01:17:11,040 --> 01:17:17,040
मैंने बहुत देखा इसलिए ऐसा करेगा। इस तरीके से सेट हो गया कि

1111
01:17:17,840 --> 01:17:22,160
ईश्वर जो है यह जानता है। इस तरीके से यह चीजें निश्चित हो पाई

1112
01:17:22,160 --> 01:17:26,400
कि ईश्वर ये जानता है कि अब क्या होगा अब क्या होगा। मगर वो भविष्य

1113
01:17:26,400 --> 01:17:30,400
दृष्टा नहीं है। त्रिकाल दर्शी नहीं है। वो जो संभावना है संभाव

1114
01:17:30,400 --> 01:17:34,560
संभावना जन्य वो चीजें हैं। अगर ईश्वर ऐसा कुछ जानता है जो

1115
01:17:34,560 --> 01:17:38,640
भविष्य से संबंधित है तो वो संभावना जन्य चीजें हैं। और दूसरी बात यह

1116
01:17:38,640 --> 01:17:42,640
है कि जैसा जैसा मनुष्य करता जा रहा है वैसा वैसा ईश्वर जानता जा रहा है।

1117
01:17:42,640 --> 01:17:46,640
इस रूप में वो सर्वज्ञ है। तो इन्होंने सर्वज्ञ को भी वो जो सब कुछ जान

1118
01:17:46,640 --> 01:17:50,720
सकने वाला भविष्य भी देखता है उससे ही बाहर निकाला है। तो पहली बात तो

1119
01:17:50,720 --> 01:17:54,720
मैं यह कहूंगा कि अगर हम

1120
01:17:54,720 --> 01:17:59,040
यह कह देंगे कि वह क्या सोचने वाला है ईश्वर नहीं जानता

1121
01:17:59,040 --> 01:18:04,320
है तो आपका जो वो जो पेरोल जैसा जो वो है ना

1122
01:18:04,320 --> 01:18:08,400
मोक्ष पेरोल में जिस प्रकार से नहीं जेल से कैदी को छोड़

1123
01:18:08,400 --> 01:18:12,720
दिया जाता है जाओ इतने दिनों में आप वापस आ जाना उसी प्रकार से बद्ध

1124
01:18:12,720 --> 01:18:16,800
जीवों को छोड़ा जाता है मुक्ति में जाओ इतने दिनों में वापस आ जाना 36 लाख

1125
01:18:16,800 --> 01:18:20,800
कुछ वर्षों पता नहीं कितने वर्ष के बाद वो जो आपका परांत काल है

1126
01:18:20,800 --> 01:18:22,000
तो वो बाधित हो जाएगा

1127
01:18:22,000 --> 01:18:26,240
क्योंकि उसमें आपने यही वहां पर लिखा है सत्यार्थ प्रकाश में कि वो

1128
01:18:26,240 --> 01:18:30,320
ऊब जाता है जो जीव है मुक्त जीव

1129
01:18:30,320 --> 01:18:34,320
वो मुक्ति के उससे आनंद से ऊब जाता है हालांकि फिर वो एक नई चीजें

1130
01:18:34,320 --> 01:18:38,400
खुलंगी कि वो आनंद बाधित कैसा फिर वो सच्चिदानंद कैसा वो तो आनंद है ही

1131
01:18:38,400 --> 01:18:43,040
नहीं जब वो बाधित है तो फिर यहां वाले आनंद में उसमें ये अंतर है वो दीर्घ काल के लिए

1132
01:18:43,040 --> 01:18:47,280
और ऊब जाता है तो मनुष्य क्या सोचने वाला है

1133
01:18:47,280 --> 01:18:51,360
जीव क्या सोचने वाला है क्या विचार करने वाला है बंधन में और

1134
01:18:51,360 --> 01:18:55,520
मुक्ति में तो आपका बाधित हो जाएगा क्योंकि फिर प्रत्येक जीव

1135
01:18:55,520 --> 01:18:59,600
जो है वापस नहीं आना चाहिए ना अगर वो अगर वो नहीं हुआ तो

1136
01:18:59,600 --> 01:19:04,880
उसने कहा नहीं नहीं मुझे तो रहना है तो आपको 36 लाख वर्ष वाली थ्योरी तो फेल हो जाएगी

1137
01:19:04,880 --> 01:19:08,960
तो पहली बात तो यह है कि बड़ा निरी टाइप के ईश्वर की

1138
01:19:08,960 --> 01:19:13,120
परिभाषा दे रखी है फिर इस इस प्रकार से आर्य समाज यहां भी बाधित है भविष्य नहीं देख

1139
01:19:13,120 --> 01:19:17,440
सकता है और दूसरी बात इससे आपका मोक्ष भी खंडित हो रहा है मोक्ष की जो धारणा है वो भी खंडित

1140
01:19:17,440 --> 01:19:21,680
हो जा रही है तो तो इस पे थोड़ा काम करें। इसको ऐसा सेट करें कि 17वा कुछ सिद्धांत

1141
01:19:21,680 --> 01:19:25,680
बन पाए। कुल मिलाकर के यहां तक यह बात कई बार आ

1142
01:19:25,680 --> 01:19:29,760
रही है कि आचार्य जी ये सारे पक्ष नहीं रख पाए। उनको जल्दी से कूदना पड़

1143
01:19:29,760 --> 01:19:34,320
गया कि प्रमाण दो। तर्क को छोड़कर के प्रमाण में आना पड़ गया।

1144
01:19:34,320 --> 01:19:37,280
तो थोड़े आचार्य जी को हालांकि वैज्ञानिक विज्ञान की कोटि

1145
01:19:37,280 --> 01:19:41,360
कोटि के हैं पर उनको थोड़ी ट्रेनिंग आप दीजिए और उनको समझाइए कि

1146
01:19:41,360 --> 01:19:45,520
भाई ये तर्क पर ये सारे तर्कों पर भी बात हो सकती थी। हालांकि आपके तर्कों का उत्तर

1147
01:19:45,520 --> 01:19:50,880
भी मैंने दे दिया है। क्लास में भी दूंगा यहां पे भी दे दिया है। पर फिर भी

1148
01:19:50,880 --> 01:19:55,360
उनको तो कहनी चाहिए थी इनमें से कुछ थोड़ी बहुत बातें हैं जो आपने कही है।

1149
01:19:55,360 --> 01:19:59,840
पर नहीं कही फिर भी भाई ताली पीटो थोको ताली

1150
01:19:59,840 --> 01:20:05,440
वैज्ञानिक जी ने धो डाला। कल मुझे एक

1151
01:20:05,440 --> 01:20:09,440
फोटो प्राप्त हुई थी। हम पोस्ट करेंगे। उसमें किसी ने पता नहीं क्यों

1152
01:20:09,440 --> 01:20:13,760
भेजी थी वह फोटो। उसमें दिखाया गया था। शेर के जबड़े में

1153
01:20:13,760 --> 01:20:18,560
शेर के जबड़े में जो है एक शान था

1154
01:20:18,560 --> 01:20:23,280
और वह कुकू कुकू कर रहा था। फोटो आई मुझे WhatsApp पर

1155
01:20:23,280 --> 01:20:27,520
और शेर के ऊपर लिखा था

1156
01:20:27,520 --> 01:20:31,520
सैनिक और वो कुकू कुकू कर रहा था

1157
01:20:31,520 --> 01:20:35,920
जो उसके जबड़े में स्वान था और नीचे वही स्वान

1158
01:20:35,920 --> 01:20:40,160
जब जहां पर शेर नहीं है फिर दूसरा दृश्य पहला दृश्य कुकू कुकू

1159
01:20:40,160 --> 01:20:44,400
शेर के जबड़े में और दूसरा दृश्य वही जो स्वान है वो बैठा

1160
01:20:44,400 --> 01:20:48,640
हुआ है और वो जो है

1161
01:20:48,640 --> 01:20:52,400
लोगों को सुना रहा है मैंने धो डाला बोलती बंद कर दी थी मैंने उसकी

1162
01:20:52,400 --> 01:20:56,640
इस तरह से बातें कर रहा है वो जब शेर नहीं है उसकी अनुपस्थिति में और उसके सामने

1163
01:20:56,640 --> 01:21:00,720
कई सारे उसके छोटे छोटे छोटे से जो पिल्ले होते हैं वो बैठे हुए

1164
01:21:00,720 --> 01:21:05,040
बहुत छोटे-छोटे से और वो फिर कह रहे हैं वाह

1165
01:21:05,040 --> 01:21:09,040
वाह बॉस आपने अपने ज्ञान विज्ञान

1166
01:21:09,040 --> 01:21:13,040
से उसको धो डाला वाह वाह मेरा अकल मेरा अकल ये सब बातें

1167
01:21:13,040 --> 01:21:17,760
हो रही पता नहीं क्यों भेजी थी यह तस्वीर किसी ने भेजी थी मुझे कल

1168
01:21:17,760 --> 01:21:22,080
खैर [गला साफ़ करने की आवाज़] आगे चलते हैं।

1169
01:21:22,080 --> 01:21:26,080
तो दोगलेपन वाली बात तो हमने ले ली जो

1170
01:21:26,080 --> 01:21:32,080
आपने कहा कि व्यवहार परमार्थ में अलग और उसमें अलग। अब इसमें

1171
01:21:32,640 --> 01:21:37,680
यहां पर देखिए आठ मिनट और 14व सेकंड पर

1172
01:21:37,680 --> 01:21:41,920
भरद्वाज जी ने ये भी मान लिया कि परमात्मा व्यवहारिक

1173
01:21:41,920 --> 01:21:46,480
है। व्यवहारिक कैसे है?

1174
01:21:46,480 --> 01:21:50,480
परमात्मा आपके हिसाब से इंद्रियों का विषय नहीं है। व्यवहारिक कैसे हुआ? कौन से रूप

1175
01:21:50,480 --> 01:21:54,800
में व्यवहारिक हुआ? व्यवहार कैसे होता है? योगेश जी कैसे

1176
01:21:54,800 --> 01:21:59,680
होता है व्यवहार? इंद्रियों से होता है ना व्यवहार? आप तो कह रहे हो 84 पे

1177
01:21:59,680 --> 01:22:03,840
तात्विक भी व्यवहारिक तत्व की दृष्टि से भी व्यवहारिक है और यहां पर भी व्यवहारिक

1178
01:22:03,840 --> 01:22:08,000
है तो आपका परमात्मा यदि इंद्रियों का विषय बन नहीं सकता तो

1179
01:22:08,000 --> 01:22:12,720
वो पूर्णतः अव्यवहारिक है

1180
01:22:12,720 --> 01:22:16,960
और यदि वो व्यवहार का विषय बन नहीं सकता तो ये वेद का ज्ञान विज्ञान आएगा

1181
01:22:16,960 --> 01:22:21,120
कैसे सृष्टि होगी कैसे जीवो के शरीर

1182
01:22:21,120 --> 01:22:26,000
का निर्माण होगा कैसे ये सारी चीजें

1183
01:22:26,000 --> 01:22:30,000
मांडक उपनिषद में लिखा है ईश्वर अव्यवहारिक है। व्यवहार में ना

1184
01:22:30,000 --> 01:22:34,000
आ सकने वाला है। फिर वो व्यवहार में ना फिर वो व्यवहार में आ सकने वाला

1185
01:22:34,000 --> 01:22:38,000
बनता है। उसी को कहा गया सूर्य चंद्रमा इत्यादि के रूप में प्रकट

1186
01:22:38,000 --> 01:22:42,400
होता है। पर आप जिन धारणाओं से आप जिन कसौटियों

1187
01:22:42,400 --> 01:22:46,640
पर कसने का प्रयास करते हो और ईश्वर के अवतार की राम कृष्ण के रूप में

1188
01:22:46,640 --> 01:22:47,680
असिद्धि करने का

1189
01:22:47,680 --> 01:22:51,840
प्रयास करते हो। उनहीं कसौटियों से यह सूर्य चंद्रमा का निर्माण ईश्वर

1190
01:22:51,840 --> 01:22:55,920
के द्वारा सिद्धि नहीं होगा। क्योंकि जब ईश्वर सूर्य,

1191
01:22:55,920 --> 01:23:00,320
चंद्रमा इत्यादि को बनाएगा तो विशेष व्यवहार करेगा। जड़ पदार्थों

1192
01:23:00,320 --> 01:23:04,400
के साथ विशेष व्यवहार करने के लिए उसे विशेष रूप में प्रकट

1193
01:23:04,400 --> 01:23:08,400
होना पड़ेगा। आंखों का विषय वाला नहीं विशेष शक्ति के रूप में आना पड़ेगा।

1194
01:23:08,400 --> 01:23:12,960
अगर वो अपनी अनंत सर्व्यापक शक्ति को ही

1195
01:23:12,960 --> 01:23:17,840
लगाएगा कहीं भी व्यवहार करेगा तो क्या होगा?

1196
01:23:17,840 --> 01:23:21,840
तो होगा ये कि कहीं पर कुछ होगा ही नहीं। समझ में

1197
01:23:21,840 --> 01:23:25,920
आ रहा है? खैर मुझे अच्छा लगा कि इसी तरीके

1198
01:23:25,920 --> 01:23:29,920
से जो है जिस प्रकार से चीटियों के जगह जो होती

1199
01:23:29,920 --> 01:23:34,000
है और उनको जो है बाहर निकालने के लिए उसमें दवाई डालो तो चीटियां सारी बाहर

1200
01:23:34,000 --> 01:23:38,000
आ जाती है। अच्छा रहा कि इसमें थोड़ा बहुत स्पेस छूटा कुछ

1201
01:23:38,000 --> 01:23:42,000
कहने का आधार छूटा। कुछ मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने का मौका मिला।

1202
01:23:42,000 --> 01:23:46,080
समाजियों को जो जिस मौके के कारण जो अब तक मुंह छुपा करके

1203
01:23:46,080 --> 01:23:50,160
घूम रहे थे, पीठ पीछे बातें कर रहे थे। वो लोग भी सामने आकर के बात

1204
01:23:50,160 --> 01:23:54,240
करने लगे। उनको मौका मिल गया। उनको कुछ खयाली पुलाव

1205
01:23:54,240 --> 01:23:58,720
बनाने का आधार मिल गया। तो अब तक तो पीठ पीछे बातें हो रही थी। दूर दूर रह के

1206
01:23:58,720 --> 01:24:02,800
मेरे पास मैं रिकॉर्डिंग होगी तो सुना दूंगा। मेरे

1207
01:24:02,800 --> 01:24:07,040
पास कुछ दिन पहले एक महीने पहले फोन भी आ चुका है इनके यहां से योगेश भारद्वाज

1208
01:24:07,040 --> 01:24:11,040
जी के यहां से कि भाई आपको डिस्कशन करना है। हालांकि वो डिबेट कह रहे थे

1209
01:24:11,040 --> 01:24:15,040
कि आपको डिबेट करते हो। आप सहारनपुर आ सकते हो। मैंने कहा सहारनपुर अभी तो

1210
01:24:15,040 --> 01:24:19,040
मेरा आना नहीं है। आऊंगा तो फिर देखूंगा। आप ऑनलाइन कर

1211
01:24:19,040 --> 01:24:23,040
लीजिए तब तक अगर तुरंत करना है निस्तारण तो अगर

1212
01:24:23,040 --> 01:24:27,120
आप बदतमीजी नहीं करेंगे या जो

1213
01:24:27,120 --> 01:24:31,440
वैज्ञानिक महोदय आए थे अगर इनका व्यवहार कुशलता नहीं बिगड़ेगी

1214
01:24:31,440 --> 01:24:35,440
तो निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे ना कि अवतार ले सकता है तो इसलिए अंत में यही

1215
01:24:35,440 --> 01:24:39,520
करना पड़ेगा इसी तरीके से टू पॉइंट निकालने पड़ेंगे वो

1216
01:24:39,520 --> 01:24:45,520
छह सात 10 नियम जो बताए मैंने तो

1217
01:24:47,440 --> 01:24:51,520
अच्छा अच्छा इन्होंने कहा कि इन्होंने ये भी माना कि अवतार नहीं लेता है।

1218
01:24:51,520 --> 01:24:55,520
उसके साथ साथ मैंने क्या कहा है कि अवतार उतना ही

1219
01:24:55,520 --> 01:24:59,760
सत्य है जितना कि ये सृष्टि मेरे लिए सत्य है। यह जगत मेरे

1220
01:24:59,760 --> 01:25:02,480
लिए सत्य है।

1221
01:25:02,480 --> 01:25:06,560
पारमार्थिक रूप से जगत है ही नहीं।

1222
01:25:06,560 --> 01:25:10,640
वो फिर विवेचना अलग हो जाती है। फिर वो आपका वो जो

1223
01:25:10,640 --> 01:25:14,640
मोक्ष इत्यादि वो सब खंडित हो जाता है। आना पड़ेगा भाई अद्वैत की सीमा में। ये सब

1224
01:25:14,640 --> 01:25:19,120
जो ताना-बाना बुन रखा है ना ये तब तक बुन रखा है जब तक अद्वैतवाद शंकराचार्य

1225
01:25:19,120 --> 01:25:23,760
का सिद्धांत नास्तिकों का मुंह बंद करा रहा है।

1226
01:25:23,760 --> 01:25:27,760
शंकराचार्य के द्वारा निर्मित जो सुरक्षा का घेरा है उसके अंदर बैठकर

1227
01:25:27,760 --> 01:25:31,840
के खूब बातें बना लो। नास्तिकों से सामना

1228
01:25:31,840 --> 01:25:35,840
होगा। बैठ जाओगे एक तरफ जाकर के। नास्तिकों

1229
01:25:35,840 --> 01:25:39,840
से सामना होने से मुझे याद आया। योगेश भारद्वाज जी स्वयं अपने एक वीडियो

1230
01:25:39,840 --> 01:25:43,840
में नास्तिकों का खंडन करते हुए बता रहे हैं कि आपने कुछ

1231
01:25:43,840 --> 01:25:48,000
बोला वो आवाज मेरे पास सीधी आई सीधी कैसे आ जाएगी भाई

1232
01:25:48,000 --> 01:25:52,000
घूम के आएगी ना सीधी कैसे आएगी आप

1233
01:25:52,000 --> 01:25:56,000
तो मौत के कुएं के कुशल ड्राइवर हो मेले में जो लगता है ना मौत का

1234
01:25:56,000 --> 01:26:00,320
कुआं गोल चलती है मोटरसाइकिल व्यवहार में भी पृथ्वी

1235
01:26:00,320 --> 01:26:02,640
जो है गोल है तो सीधा ट्रेवल

1236
01:26:02,640 --> 01:26:06,640
क्यों दिखा रहे हो आप उसमें देखो आप अपना जा के उंगली आपने सीधी दिखाई

1237
01:26:06,640 --> 01:26:11,040
सीधी नहीं यूं यू दिखाइए सबको ऐसे ही रास्ता बताइएगा

1238
01:26:11,040 --> 01:26:15,040
व्यक्ति भाग जाएगा वो एक जुदाई पुरानी

1239
01:26:15,040 --> 01:26:20,000
फिल्म है उसमें एक प्रश्नवाचक था

1240
01:26:20,000 --> 01:26:24,400
अभिनेता था वो प्रश्न बहुत करता था ऐसा क्यों ऐसा क्यों ऐसा क्यों

1241
01:26:24,400 --> 01:26:29,040
तो [हंसी] उससे कोई रास्ता पूछ रहा होता है

1242
01:26:29,040 --> 01:26:33,120
तो जैसे ही उससे रास्ता पूछता है तो वो ऐसा क्यों ऐसा

1243
01:26:33,120 --> 01:26:37,200
क्यों करने लगता है तब तक दूसरा व्यक्ति आता है वो देखता है ना जैसे प्रश्न पूछने

1244
01:26:37,200 --> 01:26:41,520
वाले को उसकी आदत थी। प्रश्न पूछता ही चला जाता था। तो वह उल्टा

1245
01:26:41,520 --> 01:26:46,480
एक्सलरेटर लेकर के भाग जाता है पीछे। तो

1246
01:26:46,480 --> 01:26:50,640
ऐसे ही जब आप लोगों को रास्ता बताएंगे आर्य समाज मंदिर का जिहादियों के साथ विवाह

1247
01:26:50,640 --> 01:26:55,120
कराने के लिए ₹5100 लेकर के जैसे ही आप रास्ता बताएंगे

1248
01:26:55,120 --> 01:26:59,520
आर्य समाज मंदिर का यूं यू व्यक्ति उल्टा भाग जाएगा एक्सलरेटर

1249
01:26:59,520 --> 01:27:04,340
लेकर रिवर्स गियर सीधे

1250
01:27:04,340 --> 01:27:08,160
[खांसने की आवाज़][हंसी]

1251
01:27:08,160 --> 01:27:10,960
अच्छा

1252
01:27:10,960 --> 01:27:14,960
एक फिर इन्होंने बात कही है आगे आवश्यकता वाली बात इन्होंने भी कही

1253
01:27:14,960 --> 01:27:18,960
इन्होंने शायद मेरी वो बात सुनी नहीं क्योंकि लेंस लेकर के ढूंढ रहे थे ना कि कहां पर मेरा

1254
01:27:18,960 --> 01:27:22,960
व्यक्ति जो है सबसे कमजोर सिद्ध हुआ है तो वहीं पर उसका जो ताना वाना खड़ा करना है

1255
01:27:22,960 --> 01:27:27,040
तो इन्होंने वहां पर भी आवश्यकता की बात कर ली तो आवश्यकता की बात सुन

1256
01:27:27,040 --> 01:27:31,040
लो भाई वहां पर उसमें भी पूछा है आपके आपके आचार्य श्री को

1257
01:27:31,040 --> 01:27:35,040
उत्तर देना चाहिए था कि यदि

1258
01:27:35,040 --> 01:27:39,200
ईश्वर को अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है तो वेदों

1259
01:27:39,200 --> 01:27:44,640
का ज्ञान मंत्रों के रूप में सूक्त के रूप में देने की आवश्यकता भी नहीं है।

1260
01:27:44,640 --> 01:27:48,800
क्यों दे रहा है? अलंकार लगाने की आवश्यकता भी नहीं है। क्यों लगा

1261
01:27:48,800 --> 01:27:53,040
रहा है? तो आवश्यकता ना दिखाते हुए

1262
01:27:53,040 --> 01:27:57,040
आप ईश्वर के अवतार का निषेध नहीं कर सकते। तात्विक

1263
01:27:57,040 --> 01:28:01,280
विवेचना आप कर नहीं पा रहे हो। एक देसी वाली वो जो सर्व्यापक

1264
01:28:01,280 --> 01:28:05,440
एक देसी कैसे हो सकता है? अजन्मा अजन्म कैसे ले सकता है? अजन्मा तो

1265
01:28:05,440 --> 01:28:10,400
आत्मा भी है। वह तो देह धारण कर रही है ना।

1266
01:28:10,400 --> 01:28:14,640
इसमें कारण कुछ और है। उनका कारण कुछ और है। आने

1267
01:28:14,640 --> 01:28:18,960
का प्रयोजन कुछ और है। बस इतनी बात है ना। मगर आपके

1268
01:28:18,960 --> 01:28:19,460
पास

1269
01:28:19,440 --> 01:28:23,760
ये बाध्यता कैसे है कि वो ले ही नहीं सकता।

1270
01:28:23,760 --> 01:28:26,240
अच्छा

1271
01:28:26,240 --> 01:28:30,320
एक जगह आपने कहा कि निर्णय दे रहे हैं। इस पर आपको

1272
01:28:30,320 --> 01:28:34,560
आपत्ति मैंने उनसे कहा था जब वो ये कह रहे थे कि अद्वैत बुरा है। अद्वैत

1273
01:28:34,560 --> 01:28:39,040
ही सबसे बुरा है। अद्वैत ही समस्त उसका कारण

1274
01:28:39,040 --> 01:28:43,040
है सारे उसका ये सब वो निर्णय दे रहे थे। तो मैं क्या करूं? वहां पर

1275
01:28:43,040 --> 01:28:47,120
जब वो ऐसा निर्णय दे रहे हो तो मैं यह कहने लगूं कि भैया आर्य समाजियों

1276
01:28:47,120 --> 01:28:51,280
में जिहादियों का विवाह होता है। हिंदू बिटियाओं को विवाह विवाह कराया

1277
01:28:51,280 --> 01:28:55,680
जा रहा है। हमारी बिटियां वहां जा रही है। ऐसा ऐसा हो रहा है। आर्य समाज में नियोग है और कलयुग

1278
01:28:55,680 --> 01:28:59,680
में जो है नियोग नहीं है। जबकि आर्य समाज की सत्यार्थ प्रकाश सबसे बुरी और सड़ी हुई किताब है।

1279
01:28:59,680 --> 01:29:03,920
आर्य समाज की धारणा सबसे सड़ी हुई है। बिल्कुल निचले स्तर की है। मच्छों

1280
01:29:03,920 --> 01:29:08,000
से भी ज्यादा बुरी है। और इत्यादि इत्यादि बहुत घटिया से घटिया मल के साथ तुलना

1281
01:29:08,000 --> 01:29:12,000
इत्यादि सब कर दूं उसकी वहीं पर जिससे कि चर्चा आगे

1282
01:29:12,000 --> 01:29:16,000
बढ़ने की बजाय वही रुक जाए और इसी पर बात होने लगे आपने ये कैसे कहा

1283
01:29:16,000 --> 01:29:22,000
चर्चा हो रही है अवतारवाद पर अवतार ले नहीं सकता तो क्यों नहीं ले सकता

1284
01:29:22,240 --> 01:29:26,560
उसका कोई मतलब नहीं है आपको उसकी तात्विक विवेचना

1285
01:29:26,560 --> 01:29:30,800
देनी होगी कि वह क्यों नहीं ले सकता यह बाध्यता

1286
01:29:30,800 --> 01:29:36,160
दिखानी होगी और नहीं ले सकने वाली स्थिति में भी

1287
01:29:36,160 --> 01:29:40,560
आप जो है उसको सर्वशक्तिमान कैसे कहेंगे? अच्छा सर्वशक्तिमान से मुझे याद आया।

1288
01:29:40,560 --> 01:29:44,640
हां इन्होंने सर्व और सर्वज्ञ पर बात कही थी। तो वहां

1289
01:29:44,640 --> 01:29:48,800
पर इन्होंने चतुराई क्या की थी? वहां पर इन्होंने सर्वव्यापकता

1290
01:29:48,800 --> 01:29:52,880
की बात ही नहीं की। भिंगो सर्वज्ञ की बात तो की

1291
01:29:52,880 --> 01:29:57,040
कि वो इतना ही है। वहां भी कह देते कि नहीं नहीं उनका सर्वज्ञ

1292
01:29:57,040 --> 01:30:01,360
यही अच्छी-अच्छी जगह पे है ईश्वर। जो जो जगह बुरी है वहां पर ईश्वर नहीं है

1293
01:30:01,360 --> 01:30:06,160
वहां फस जाते तो सर्व व्यापकता पर बात ही नहीं की

1294
01:30:06,160 --> 01:30:11,280
है ना

1295
01:30:11,280 --> 01:30:15,520
निर्णय देने वाली बात पे आ जाते हैं तो पहली बात तो यह है कि

1296
01:30:15,520 --> 01:30:19,680
आपने कहा कि भाई आपका कुछ निर्णय होगा इसीलिए तो आप कोई पक्ष

1297
01:30:19,680 --> 01:30:23,760
रख रहे हो हां मेरा निर्णय है। मैंने निर्णय लिया हुआ है पर

1298
01:30:23,760 --> 01:30:28,000
मैं निर्णय दे नहीं रहा हूं चर्चा के बीच में क्योंकि दूंगा

1299
01:30:28,000 --> 01:30:32,000
तो विषयांतर होगा। मैं तो यह

1300
01:30:32,000 --> 01:30:36,080
तक कह सकता हूं चर्चा के बीच में मैंने निर्णय लिया हुआ है कि आज जो

1301
01:30:36,080 --> 01:30:41,680
आर्य समाजी है या जिसका पिता आर्य समाजी है

1302
01:30:41,680 --> 01:30:46,080
वो कभी ना कभी आर्य समाजी नहीं था और आर्य समाजी

1303
01:30:46,080 --> 01:30:50,160
के अनुसार आर्य समाज को आर्य समाज के सिद्धांतों को

1304
01:30:50,160 --> 01:30:54,320
ग्रहण ना करने वाला अधर्मी है। मूर्ति पूजक अधर्मी है। और उसकी

1305
01:30:54,320 --> 01:30:58,960
पिछली कुछ पीढ़ियां अधर्मी थी। मूर्ति पूजा करती थी। 90%

1306
01:30:58,960 --> 01:31:02,960
99% आर्य समाजी वहीं से आया ना जहां मूर्ति पूजा है फिर आर्य समाजी हो गए

1307
01:31:02,960 --> 01:31:07,040
99% वही है तो मेरी जानकारी में मेरा निर्णय तो यह है कि

1308
01:31:07,040 --> 01:31:11,200
अगर वो अधर्मी थी तो उनका जो विवाह हुआ उनके जो कर्म

1309
01:31:11,200 --> 01:31:15,200
हुए वो सही तरीके से नहीं हुए विवाह कर्म इत्यादि तो

1310
01:31:15,200 --> 01:31:19,360
उनके साथ रहने वाली जो मातृशक्तियां है वो कौन हुई उनके पिता की जिनको

1311
01:31:19,360 --> 01:31:23,360
वो अपना पिता मानते हैं और उनकी फिर संताने कौन हुई ये सारे प्रश्न हो जाएंगे

1312
01:31:23,360 --> 01:31:26,320
और इस संबंध में मेरे पास अपना निर्णय है

1313
01:31:26,320 --> 01:31:30,400
भाई जो व्यक्ति आज इस पीढ़ी का आर्य समाजी बन रहा है। यानी कि उससे

1314
01:31:30,400 --> 01:31:34,480
पहले उसके माता-पिता आर्य समाजी नहीं थे। यानी आर्य समाज के जो सिद्धांत है धर्म

1315
01:31:34,480 --> 01:31:38,480
और अधर्म के विषय में वो नहीं मानते थे। ज्यादातर मूर्ति पूजक तो मूर्ति पूजक कौन

1316
01:31:38,480 --> 01:31:42,640
है? अधर्मी। तो उसके द्वारा किए जाने वाले

1317
01:31:42,640 --> 01:31:46,720
जो कर्म है क्योंकि सभी कर्मों का परवसान मोक्ष में है। धर्म

1318
01:31:46,720 --> 01:31:50,960
का परवसान क्या है? मोक्ष। महाभारत पढ़िए। धर्म का परवसान मोक्ष

1319
01:31:50,960 --> 01:31:55,120
में है तो जिन कर्मों का परसान मोक्ष में नहीं है

1320
01:31:55,120 --> 01:31:59,280
और मूर्ति पूजकों का परसान मोक्ष में नहीं है आज समाज के अनुसार तो

1321
01:31:59,280 --> 01:32:03,360
उनके द्वारा किए जाने जो धर्म कर्म है वो भी मोक्ष के हेतु

1322
01:32:03,360 --> 01:32:07,920
नहीं है मोक्ष के हेतु नहीं है तो वो फिर उनका विवाह हुआ ही नहीं

1323
01:32:07,920 --> 01:32:12,000
विवाह हुआ नहीं तो कौन हुई इनके उनकी माताएं कौन हुई इनके पिता के साथ रहने वाली

1324
01:32:12,000 --> 01:32:15,840
ये निर्णय है

1325
01:32:15,840 --> 01:32:20,000
परंतु मैं वहां उस चर्चा के बीच में अपने यह निर्णय इसलिए नहीं सुना

1326
01:32:20,000 --> 01:32:24,640
रहा हूं कि जो मूल विषय है सर्वशक्तिमान ईश्वर

1327
01:32:24,640 --> 01:32:28,720
उस पर बात पूरी हो जाए। ऐसा ना हो कि इन गरम गरम बातों पर कि

1328
01:32:28,720 --> 01:32:33,120
वो मातृ शक्तियां कौन कहलाएंगी जिनके पिता आर्य समाजी नहीं थे। जिन्होंने

1329
01:32:33,120 --> 01:32:37,280
आर्य समाज में आर्य समाज मंदिरों में विवाह नहीं किया है। आर्य समाज की मान्यता

1330
01:32:37,280 --> 01:32:42,160
को धारण पूर्वक जिन्होंने विवाह नहीं किया है। उनकी माताएं क्या कहलाएंगी?

1331
01:32:42,160 --> 01:32:46,240
जो रह रही हैं। और आधे से ज्यादा ऐसे होंगे आर्य समाजी होने के बाद पुनर् विवाह

1332
01:32:46,240 --> 01:32:50,320
नहीं किया होगा। आर्य समाज मंदिर में जाकर के वर्तमान में भी उनकी जो मातृ शक्तियां वो

1333
01:32:50,320 --> 01:32:54,480
क्या कहलाएंगी ये सारे तार्किक प्रश्न है ना ये सब निर्णय

1334
01:32:54,480 --> 01:32:58,640
है और वो संताने क्या कहलाएंगी जो आज आर्य समाजी हो रहे हैं जो ये कह रहे हैं आर्य समाज

1335
01:32:58,640 --> 01:33:02,720
सही है ये कहते हुए कि आर्य समाज सही है मूर्ति पूजा गलत है अधर्मी है राम

1336
01:33:02,720 --> 01:33:06,720
लीला देने देखने वाला पापी है तो भाई पापियों के

1337
01:33:06,720 --> 01:33:10,800
द्वारा जो कर्म इत्यादि हुए हैं वो थोड़ी हम स्वीकार रहे हैं हमारे यहां

1338
01:33:10,800 --> 01:33:14,880
क्योंकि पापियों के कर्मों का परेशान मोक्ष में नहीं है तो वो धर्म नहीं है तो

1339
01:33:14,880 --> 01:33:18,960
अधार्मिक रीति से विवाह हुआ वो विवाह विवाह नहीं है। जब विवाह नहीं है

1340
01:33:18,960 --> 01:33:23,440
तो संताने क्या कहलाएंगी? माताएं क्या कहलाएंगी? मेरे लिए तो बड़ी सम्माननीय

1341
01:33:23,440 --> 01:33:27,440
है। आपकी भी और आपके पिताजी की। पर आपने ये प्रश्न उठाया

1342
01:33:27,440 --> 01:33:33,280
है ना कि निर्णय क्यों दे रहे हो? ये निर्णय देता वहां।

1343
01:33:33,280 --> 01:33:37,280
चलिए अच्छा आगे चलते हैं। निर्णय वाली

1344
01:33:37,280 --> 01:33:41,520
बात बहुत बढ़िया रही। इन्होंने कहा ईश्वर और जीव में अंतर मान लिया। बिल्कुल

1345
01:33:41,520 --> 01:33:45,920
भाई व्यवहार में है ना। यही तो खेल है। निशुल्क

1346
01:33:45,920 --> 01:33:51,920
कक्षाओं में आओगे तब पता चलेगा। व्यवहार में

1347
01:33:52,560 --> 01:33:56,560
अच्छा चलो ठीक है इसको छोड़ देते हैं। केवल जीवात्माएं हैं

1348
01:33:56,560 --> 01:34:01,200
ना तो व्यवहारिक अंतर क्यों आ रहा है कि माता है, बहन है, पत्नी है।

1349
01:34:01,200 --> 01:34:05,440
आप कह रहे हो व्यवहार और परमार्थ में अंतर ही नहीं है। व्यवहार

1350
01:34:05,440 --> 01:34:09,920
और परमार्थ में अंतर है कि नहीं? परमार्थ में केवल जीवात्मा

1351
01:34:09,920 --> 01:34:14,080
आर समाजी सिद्धांत के अनुसार परमार्थ में केवल जीवात्मा मात्र है। आप जीव हो दूसरा

1352
01:34:14,080 --> 01:34:18,880
जीव है। कोई किसी की माता नहीं, कोई किसी की बहन नहीं, कोई किसी की पत्नी नहीं है।

1353
01:34:18,880 --> 01:34:23,200
व्यवहार में तो है। यही है व्यवहारिक अंतर। यही है व्यवहार और परमार्थ।

1354
01:34:23,200 --> 01:34:29,200
समझ लो थोड़ा। खैर इतनी गढ़ बातें जो है आर्य समाजियों के साथ करना ठीक नहीं रहता है।

1355
01:34:32,160 --> 01:34:37,280
कुल मिलाकर के प्रश्न यही था।

1356
01:34:37,280 --> 01:34:41,840
कुल मिलाकर के प्रश्न यही था योगेश भारद्वाज जी कि

1357
01:34:41,840 --> 01:34:45,200
जिस प्रकार से

1358
01:34:45,200 --> 01:34:49,440
जिन कर्मों में जिन पदार्थों के साथ लिप्त होने पर मनुष्य को पाप का

1359
01:34:49,440 --> 01:34:53,440
दोषी माना जाता है उनहीं पदार्थों के साथ लिप्त होने पर ईश्वर

1360
01:34:53,440 --> 01:34:57,440
को ईश्वर पर दोष नहीं लगेगा। आप कह रहे हो कि भैया उसको दोष इसलिए लगता

1361
01:34:57,440 --> 01:35:01,440
है उसके अंतःकरण है। तो हमने कब कहा कि ईश्वर का जो शरीर होता है

1362
01:35:01,440 --> 01:35:05,440
जब वो अवतार लेता है तो वह सेम वैसा ही शरीर होता है जैसा कि मनुष्य का होता

1363
01:35:05,440 --> 01:35:09,520
है। केवल देखने में दिख रहा है वैसा केवल वो आंखों का विषय बन

1364
01:35:09,520 --> 01:35:13,680
रहा है। जब वो सृष्टि बना रहा है तब वो धक्का दे रहा है। चीजों को मूव करा

1365
01:35:13,680 --> 01:35:17,840
रहा है। वहां पर वो एक देश होकर कार्य कर रहा है।

1366
01:35:17,840 --> 01:35:21,840
जब वो ओम रश्मि को शक्ति दे रहा है। वहां पर वो ओम रश्मि को ही शक्ति दे रहा है।

1367
01:35:21,840 --> 01:35:27,840
निश्चित शक्ति दे रहा है। निश्चित कैसे हो रहा है? सर्वव्यापी है तो

1368
01:35:28,960 --> 01:35:33,040
तो हम प्रश्न हमारा यह था जो आपने कहा ना कि अंतकरण

1369
01:35:33,040 --> 01:35:37,120
अंतःकरण नहीं होता है। जी ईश्वर के अंतकरण नहीं होता

1370
01:35:37,120 --> 01:35:41,200
है। जीव के तो जीव के होता है अंतकरण जीव के भी

1371
01:35:41,200 --> 01:35:45,280
नहीं होता है। मनुष्य बनने पर होता है। तो जीव क्यों समझ

1372
01:35:45,280 --> 01:35:49,520
रहा है? कि मैं गंदा हो गया। उन्होंने

1373
01:35:49,520 --> 01:35:53,600
कहा था कि मोटरसाइकिल जिस तरीके से हम चला रहे हैं अगर मोटरसाइकिल गंदी होती

1374
01:35:53,600 --> 01:35:57,680
है तो मोटरसाइकिल को साफ करते हैं। जीव शरीर साधन है जीव का।

1375
01:35:57,680 --> 01:36:01,840
इसलिए वो प्रभावित होता है। प्रभावित होता है। मोटरसाइकिल अगर

1376
01:36:01,840 --> 01:36:05,920
गंदी होगी तो चलाने वाला चालक है। वो ये नहीं सोचता है मैं गंदा हो गया।

1377
01:36:05,920 --> 01:36:10,080
मोटरसाइकिल गंदी हुई। भले ही वो उसका साधन है। मगर यहां तो जीव सोच रहा है ना मैं

1378
01:36:10,080 --> 01:36:14,160
गंदा हो गया। यही है व्यवहार और परमात्मा। उसका ये सोचना कि

1379
01:36:14,160 --> 01:36:18,320
मैं गंदा हो गया। यह व्यवहार है। वास्तविकता में वो गंदा

1380
01:36:18,320 --> 01:36:22,480
नहीं हुआ है। यह परमार्थ है। यह परमार्थ की दृष्टि मुक्त के पास है। ईश्वर के पास

1381
01:36:22,480 --> 01:36:28,400
है। और व्यवहार की दृष्टि बद्ध जीवो के पास है। हमारे पास

1382
01:36:28,400 --> 01:36:32,720
व्यवहार और परमार्थ ही नहीं जान सके। प्रश्नोपनिषद पढ़िए। खूब व्यवहार परमार्थ

1383
01:36:32,720 --> 01:36:36,160
भरा पड़ा है।

1384
01:36:36,160 --> 01:36:40,320
[गला साफ़ करने की आवाज़] ईश्वर अपनी माया के द्वारा विभिन्न रूपों

1385
01:36:40,320 --> 01:36:46,320
में प्रकट होता है। क्या दू मैं प्रमाण? वेद में लिखा है।

1386
01:36:46,720 --> 01:36:50,000
अब आप कह रहे हो कि भैया

1387
01:36:50,000 --> 01:36:54,080
जिन कर्मों में या जिन पदार्थों के साथ लिप्त होने

1388
01:36:54,080 --> 01:36:58,720
पर मनुष्य को पाप लगता है

1389
01:36:58,720 --> 01:37:02,720
उनहीं कर्मों में लिप्त होने पर उनहीं पदार्थों के साथ लिप्त होने

1390
01:37:02,720 --> 01:37:06,800
पर ईश्वर को दोष नहीं लगता क्योंकि उसके अंतःकरण नहीं है। तो आपसे किसने

1391
01:37:06,800 --> 01:37:11,600
कहा है कि जब ईश्वर अवतार ले रहा है तो उसके अंतःकरण है।

1392
01:37:11,600 --> 01:37:16,160
किसने कहा है वह उसका जो शरीर है वह जीव जैसा है।

1393
01:37:16,160 --> 01:37:20,400
भाई आप ईश्वर के अवतार का निषेध इसलिए कर रहे हो क्योंकि ईश्वर अवतार

1394
01:37:20,400 --> 01:37:24,560
लेगा तो वो पाप का भागी बन रहा है। उनहीं कार्यों को जब वो बिना अवतार

1395
01:37:24,560 --> 01:37:28,720
के कर रहा है उनमें लिप्त है तो उसको दोष नहीं लग रहा क्योंकि उसके अंतकरण नहीं है। मगर रूप

1396
01:37:28,720 --> 01:37:33,120
ले लेने पर उसका अंतकरण बन गया। किसने कहा भाई? यही

1397
01:37:33,120 --> 01:37:36,480
तो मेरा पॉइंट है।

1398
01:37:36,480 --> 01:37:40,640
अवतार लेने ले लेने पर ईश्वर पर दोष लग जाएगा। उनहीं

1399
01:37:40,640 --> 01:37:44,800
कार्यों से लिप्त होने पर जहां पर बिना अवतार लिए वो लिप्त है तो दोष नहीं लग रहा है। यह

1400
01:37:44,800 --> 01:37:48,960
कहां का सनातन सिद्धांत है? केवल अभी आंखों का वो विषय हो

1401
01:37:48,960 --> 01:37:52,080
गया है।

1402
01:37:52,080 --> 01:37:56,320
अब इनकी पैनी नजर पे भी थोड़ी बात कर लूं। इन्होंने बहुत सारी बातें की

1403
01:37:56,320 --> 01:38:00,960
जो पैनी नजर पे गाना गाया। हालांकि अभी तक आपको इनकी पैनी नजर समझ में आ गई होगी।

1404
01:38:00,960 --> 01:38:06,080
पर इनकी पैनी नजर क्या थी कि उनका मॉलिक्यूल पर भागना।

1405
01:38:06,080 --> 01:38:10,080
ठीक है? सर्व का अर्थ पर बात ही ना करना। अच्छा इन्होंने

1406
01:38:10,080 --> 01:38:14,080
एक बात और कही है कि सर्व का अर्थ हम लेते हैं। मैं प्रश्न आपसे कर रहा हूं। वीडियो बना के दे

1407
01:38:14,080 --> 01:38:18,080
दीजिएगा उत्तर। हालांकि हो सकता है हमारी भी चर्चा हो सकती

1408
01:38:18,080 --> 01:38:22,240
है। उसमें दे दीजिएगा कि भाई सर्व का अर्थ

1409
01:38:22,240 --> 01:38:26,320
है कि जो अपने अपने ये कर सकता है। ठीक है? सर्व्यापक तो आपने लिया ही

1410
01:38:26,320 --> 01:38:30,560
नहीं। मगर अब मैं पूछ रहा हूं जो सब कुछ कर सकता है उसको

1411
01:38:30,560 --> 01:38:34,640
क्या एडजेक्टिव लगाओगे आप? जो अपने कार्य जो उसे

1412
01:38:34,640 --> 01:38:39,600
करने हैं वह कर सकता है वह हो गया सर्वशक्तिमान।

1413
01:38:39,600 --> 01:38:43,600
और जो जो मुझे जानना चाहिए वह वह यदि मैं जान रहा हूं तो

1414
01:38:43,600 --> 01:38:47,840
मैं भी हो गया सर्वज्ञ। हालांकि इसमें भी दोष है इस बात में भी। मगर

1415
01:38:47,840 --> 01:38:53,120
मैं यह कहता हूं कि जो ये किसी भी बाधा से बाधित ना हो

1416
01:38:53,120 --> 01:38:56,160
उसको क्या कहेंगे?

1417
01:38:56,160 --> 01:39:00,400
जो यह भी जान जो उसे नहीं करना है पर वो कर सकता है। जिसमें यह क्षमता

1418
01:39:00,400 --> 01:39:04,800
भी हो उसको क्या कहेंगे? सर्वशक्तिमान तो आपने ले लिया।

1419
01:39:04,800 --> 01:39:07,280
क्या कहेंगे? सर्व सर्वशक्तिमान कहेंगे

1420
01:39:07,280 --> 01:39:11,680
तो एक घोषणा करवा दो आर्य समाजियों का ईश्वर सर्वशक्तिमान

1421
01:39:11,680 --> 01:39:16,000
है और जो परंपरा प्राप्त आचार्य

1422
01:39:16,000 --> 01:39:20,240
हैं उनके द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्व परम सर्व परम

1423
01:39:20,240 --> 01:39:24,320
लगा दो परम से चल जाता है परम सर्वशक्तिमान है

1424
01:39:24,320 --> 01:39:28,640
ले जाओ कर दो घोषित नहीं

1425
01:39:28,640 --> 01:39:32,720
सर्व का अर्थ तो हम सीमित लगाएंगे फिर हम यह बताएंगे ही नहीं कि जो सीमाओं से रहे

1426
01:39:32,720 --> 01:39:35,680
तो उसका क्या होगा

1427
01:39:35,680 --> 01:39:39,920
ऐसे ही सर्वज्ञ में कर देना परम सर्वज्ञ है कर दो घोषणा

1428
01:39:39,920 --> 01:39:43,120
पर नहीं

1429
01:39:43,120 --> 01:39:47,360
उनके जब तर्क नष्ट हो रहे हैं वो कह रहे हैं प्रमाण दो प्रमाण दो

1430
01:39:47,360 --> 01:39:51,680
वो शुरू में ही कह रहे हैं आपको ज्ञान नहीं है व्यक्तिगत हो रहे हैं शर्तों का उल्लंघन

1431
01:39:51,680 --> 01:39:56,160
कर रहे हैं शर्त बताता हूं क्या शर्तें थी

1432
01:39:56,160 --> 01:40:00,240
क्या शर्तें थी वो बता देता हूं आपको ठीक है आपने कहा ना वो भाग

1433
01:40:00,240 --> 01:40:04,240
गए आप तो 1 घंटे 22 मिनट में ही भाग गए ये वो शर्त क्या

1434
01:40:04,240 --> 01:40:10,240
आती है वो पढ़ लो। सत्य के पक्षधर बनिए सत्य के पक्षधर।

1435
01:40:20,830 --> 01:40:25,760
[गला साफ़ करने की आवाज़] पहले तो इन्होंने बहुत व्यक्तिगत कटाक्ष पूर्वक

1436
01:40:25,760 --> 01:40:30,160
शर्तें भेजी थी। फिर मैंने इनको अच्छा सा व्यक्तिगत कटाक्ष पूर्वक उत्तर दिया था

1437
01:40:30,160 --> 01:40:34,400
WhatsApp में ही तो सुधर गए वही वही सुधर गए थे। फिर

1438
01:40:34,400 --> 01:40:38,640
उन्होंने उसको मिटाया, डिलीट किया और फिर नया शर्तों का एक व्यक्तिगत

1439
01:40:38,640 --> 01:40:42,960
कटाक्ष हटाते हुए और फिर शर्तें भेजी थी। उसमें

1440
01:40:42,960 --> 01:40:46,960
पहली शर्त है चर्चा का उद्देश्य सत्य का ग्रहण तथा असत्य का त्याग

1441
01:40:46,960 --> 01:40:52,720
होगा। व्यर्थ का विवाद करना नहीं होगा। अद्वैतवाद बुरा है।

1442
01:40:52,720 --> 01:40:58,720
यह बात आप क्यों बोल रहे हो? जब बात हो रही है अवतार की।

1443
01:40:58,800 --> 01:41:02,880
हमारा वहां पर माया प्रपंच इत्यादि कहना केवल इसमें निहित है

1444
01:41:02,880 --> 01:41:06,880
कि यदि आपके पास कुछ कारण है किनहीं

1445
01:41:06,880 --> 01:41:10,880
कारणों से ऐसा हो सकता है कि बुरे कर्मों में लिप्त हुए

1446
01:41:10,880 --> 01:41:14,960
भी लिप्त होते हुए भी ईश्वर को दोषी ना माना जाए। उसी तरीके

1447
01:41:14,960 --> 01:41:19,040
से यह भी हो सकता है अवतार लेने पर भी बुरे कार्यों में लिप्त

1448
01:41:19,040 --> 01:41:23,360
होने पर भी या बुरे पदार्थों के संपर्क में आने पर भी कुछ ऐसा हो सकता है जिसके कारण

1449
01:41:23,360 --> 01:41:27,360
ईश्वर पर दोष ना आए। तो

1450
01:41:27,360 --> 01:41:31,600
फिर आप अवतार का निषेध कैसे कर सकते हैं इस बात से केवल

1451
01:41:31,600 --> 01:41:35,680
यह बताना था माया प्रपंच इत्यादि शब्दों का उपयोग

1452
01:41:35,680 --> 01:41:40,160
करना फिर भी आवश्यकता पड़ने पर हमने वहां पर दृष्टांत दिया

1453
01:41:40,160 --> 01:41:44,400
उन दृष्टांतों का खंडन या विरोध करने का कटाक्ष पूर्वक आपने प्रयास

1454
01:41:44,400 --> 01:41:48,400
किया उनका भी प्रति उत्तर यहां दे दिया है ठीक है जो आपने

1455
01:41:48,400 --> 01:41:52,960
पृथ्वी गोल चपटी में किया है ना मौत के कुए मौत के कुएं वाली मोटरसाइकिल चलाकर

1456
01:41:52,960 --> 01:41:57,040
वो सब दे दिया है दूसरा है कोई भी पक्ष पक्ष विषय से बाहर की चर्चा नहीं

1457
01:41:57,040 --> 01:42:02,160
करेगा। हां, विषय से संबंधित उप विषयों पर आवश्यकता अनुसार चर्चा की जा सकेगी।

1458
01:42:02,160 --> 01:42:06,160
तो कोई भी पक्ष विषय से बाहर की चर्चा नहीं करेगा। अब मैं पूछ रहा

1459
01:42:06,160 --> 01:42:10,960
हूं कि नाली के साथ लिप्त होने पर ईश्वर को दोष नहीं लगता है ना।

1460
01:42:10,960 --> 01:42:14,080
यानी कि जिन कर्मों में जिन स्थानों

1461
01:42:14,080 --> 01:42:18,080
में लिप्त होने पर मनुष्य को दोष लगता है। उनहीं स्थानों में लिप्त होने पर निराकार ईश्वर

1462
01:42:18,080 --> 01:42:22,320
को दोष नहीं लगता है ना। तो फिर उनहीं कर्मों में उनहीं स्थानों

1463
01:42:22,320 --> 01:42:26,400
में लिप्त होने पर अवतार को दोष क्यों लगेगा? मैं पूछ ही रहा हूं। वो बता

1464
01:42:26,400 --> 01:42:31,600
रहे हैं कि नाली बनी किन-किन चीजों से है?

1465
01:42:31,600 --> 01:42:35,680
इसका क्या आवश्यकता थी? विषय से बाहर जाने की जिससे कि उनका

1466
01:42:35,680 --> 01:42:41,200
पक्ष मजबूत दिखाई दे लोगों को कि वैज्ञानिक दृष्टि रखते हैं।

1467
01:42:41,200 --> 01:42:45,280
यही बस बात है और कुछ नहीं है। मॉलिक्यूल्स वाली बात बताने की और उसी पर

1468
01:42:45,280 --> 01:42:49,520
आपने जोर दिया। यहां फंस रहे थे वो। मैंने कहा ना आपने उनहीं उनहीं जगह पर उनकी रक्षा

1469
01:42:49,520 --> 01:42:54,560
की है जिन जिन जगहों पर वो फेल होते हुए आपको दिखाई दिए।

1470
01:42:54,560 --> 01:42:58,030
खैर आगे चलते हैं।

1471
01:42:58,030 --> 01:43:02,320
[खांसने की आवाज़] विषय से बाहर की चर्चा हमें सिद्ध ये करना है

1472
01:43:02,320 --> 01:43:07,680
कि ईश्वर अवतार ले सकता है कि नहीं ले सकता है। फिर

1473
01:43:07,680 --> 01:43:11,680
आप पहुंचे कहां कि ईश्वर

1474
01:43:11,680 --> 01:43:15,920
अवतार इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि शायण के भाष्य में पशु बलि

1475
01:43:15,920 --> 01:43:21,920
है। जो ना हमने उनकी परंपरा से जाना ना देखा ना समझा।

1476
01:43:21,920 --> 01:43:26,000
के भाष्य में पशु बल है इसलिए अवतार नहीं ले सकता है। इसीलिए तो इसको विषय से

1477
01:43:26,000 --> 01:43:29,520
भागना नहीं कहा जाएगा। शिव मोहिनी का प्रकरण ले आओ

1478
01:43:29,520 --> 01:43:33,520
और तमाम सारी बातें करो। ये भी कह दो तुम्हारे उसमें पाप लिखा

1479
01:43:33,520 --> 01:43:38,000
हुआ है। ये सब विषय से हटने की बातें नहीं है आपके अनुसार।

1480
01:43:38,000 --> 01:43:42,480
तो फिर विषय से हटने की बातें होती कौन सी है? जब भी बात होगी

1481
01:43:42,480 --> 01:43:47,920
तो दुनिया भर की हर एक बात पर ही बात होगी। इस हिसाब से तो

1482
01:43:47,920 --> 01:43:53,920
सत्यार्थ प्रकाश में जो जो कुतर्क किए हैं सब पर बात होगी

1483
01:43:55,670 --> 01:43:59,760
[गला साफ़ करने की आवाज़] क्योंकि जब तक एक-एक पक्ष सही नहीं हो

1484
01:43:59,760 --> 01:44:03,760
जाएगा अगर यह पक्ष भी खत्म हो जाता तो भैया आप लोग हिंदू शब्द का

1485
01:44:03,760 --> 01:44:08,000
उपयोग करते हो इसलिए जो है ईश्वर अवतार नहीं ले सकता

1486
01:44:08,000 --> 01:44:12,080
आप लोग स्त्रियों का जनेऊ नहीं होने दे सकते हो देते हो स्त्रियों का जनेऊ नहीं

1487
01:44:12,080 --> 01:44:16,400
करवाते हो उनको जो है नाम जप करवाते हो भक्ति करवाते इसलिए जो है आप

1488
01:44:16,400 --> 01:44:20,800
ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है। ये है ईश्वर अवतार

1489
01:44:20,800 --> 01:44:25,040
विषय पर चर्चा करते समय जितनी बातें हो सकती है सारी बातें

1490
01:44:25,040 --> 01:44:29,200
करी जाएंगी और एक भी बात नहीं हुई तो अधूरी

1491
01:44:29,200 --> 01:44:33,200
हो गई चर्चा निष्कर्ष निकलेगा ही नहीं तो मुझे बता देना

1492
01:44:33,200 --> 01:44:38,080
विषयों से भागना किसे कहते हैं

1493
01:44:38,080 --> 01:44:42,080
अच्छा दोनों वक्ता शांत एवं शिष्ट भाषा

1494
01:44:42,080 --> 01:44:46,400
का ही प्रयोग करेंगे क्रोध कटुता अवता अथवा

1495
01:44:46,400 --> 01:44:50,720
अशिष्ट व्यवहार नहीं करेंगे स्वीकार नहीं होगा। यह भी एक चर्चा थी।

1496
01:44:50,720 --> 01:44:55,120
यह भी एक शर्त थी। आप कुतर्क कर रहे हो।

1497
01:44:55,120 --> 01:44:59,120
अद्वैतवाद बुरा है। आपको ज्ञान नहीं है। आपने पढ़ा

1498
01:44:59,120 --> 01:45:03,280
नहीं है। सब किसने चालू किया? व्यक्तिगत कटाक्ष

1499
01:45:03,280 --> 01:45:07,600
किसने चालू किए? यह सब आपको दिखाई नहीं दिया होगा।

1500
01:45:07,600 --> 01:45:11,600
इसी में हमने एक चर्चा और लिखी थी कि भैया तर्क यदि आपके पास

1501
01:45:11,600 --> 01:45:15,680
नहीं होगा तो आपके आपको जो है यह घोषित करना होगा। तर्क नहीं

1502
01:45:15,680 --> 01:45:21,200
है। उन्होंने घोषित किया तर्क से प्रमाण में जाने पर

1503
01:45:21,200 --> 01:45:25,520
घोषित ही नहीं कर रहे हैं। वो तो उसमें अपनी व्यक्तिगत कटाक्ष

1504
01:45:25,520 --> 01:45:29,680
ला के लीपापोती करके और किसी तरीके से गरमागरम मामला करना चाहते हैं। जिसके

1505
01:45:29,680 --> 01:45:35,040
कारण ये चर्चा जो है स्थगित हो जाए। वही हुआ।

1506
01:45:35,040 --> 01:45:38,160
आगे देखते हैं।

1507
01:45:38,160 --> 01:45:42,480
तो यदि कोई हम अच्छा इसमें एक शर्त हमने भी बढ़ाई थी

1508
01:45:42,480 --> 01:45:46,880
जिसको कि फिर उन्होंने आगे स्वीकार किया था। वो

1509
01:45:46,880 --> 01:45:50,880
चर्चा क्या थी? जब एक पक्ष अपनी बात रख रहा

1510
01:45:50,880 --> 01:45:54,880
हो तो दूसरा पक्ष धैर्य पूर्वक सुनेगा। ये ये शर्त इनकी भी थी। ठीक है?

1511
01:45:54,880 --> 01:45:58,960
इनकी हमारी सेम है। ये वाली। तो जब वो कह रहे

1512
01:45:58,960 --> 01:46:03,840
हैं कि भाई शायण आचार्य और

1513
01:46:03,840 --> 01:46:07,840
गडपाद जी और व्यास जी के बीच के बीच में गैप क्यों है और

1514
01:46:07,840 --> 01:46:11,840
मैं बताने चल रहा हूं तो फिर बीच में कह रहा है इसको छोड़ो आप तो शायन आचार्य के मंत्र का

1515
01:46:11,840 --> 01:46:15,840
अर्थ बताओ लो ये क्या है कौन कर रहा है उल्लंघन ये

1516
01:46:15,840 --> 01:46:20,000
कर रहे हैं विषयंतर कर रहे हैं इनको जहां पे लग रहा है कि ये जवाब दे देगा वहां

1517
01:46:20,000 --> 01:46:24,000
विषयंतर कर रहे हैं ये बार-बार कुरान और मोहम्मद की बात ला रहे हैं कुरान और मोहम्मद

1518
01:46:24,000 --> 01:46:29,840
पर पहचान कैसे होगी इन्होंने प्रश्न किया था पहचानेंगे कैसे

1519
01:46:29,840 --> 01:46:34,240
दुनिया में तमाम ध्वनिया ये वैदिक रश्मि थ्योरी में ध्वनि है ना तमाम ध्वनिया

1520
01:46:34,240 --> 01:46:38,480
ईश्वर से ही आ रही है तो सारी ध्वनिया ईश्वर मान ली जाए ईश्वर का प्रतीकात्मक

1521
01:46:38,480 --> 01:46:43,840
नाम मान लिया जाए सारे शब्द जितने भी ईश्वर के ही है

1522
01:46:43,840 --> 01:46:48,800
तो सबको क्यों नहीं माना प्रणव को ही क्यों माना शास्त्र ने लिखा है

1523
01:46:48,800 --> 01:46:50,560
तो जिस प्रकार पानी सर्वत्र

1524
01:46:50,560 --> 01:46:54,560
व्याप्त होते हुए भी हमारी प्यास पानी का वही स्वरूप बुझा सकता

1525
01:46:54,560 --> 01:46:58,720
है जो हमारे व्यवहार की सीमा है पात्र के उसी

1526
01:46:58,720 --> 01:47:02,720
प्रकार ईश्वर सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी सब

1527
01:47:02,720 --> 01:47:06,800
कुछ में ईश्वर होते हुए सब कुछ ईश्वर होते हुए भी ईश्वर का

1528
01:47:06,800 --> 01:47:11,200
वही रूप व्यवहार में हमारी प्यास बुझा सकता है मोक्ष की जो हमारे शास्त्र

1529
01:47:11,200 --> 01:47:15,280
की सीमा में आए। शास्त्र से पहचानेंगे कौन

1530
01:47:15,280 --> 01:47:21,280
अवतार है कौन नहीं है। आई बात समझ में?

1531
01:47:23,310 --> 01:47:27,600
[गला साफ़ करने की आवाज़] तो इन्होंने कई बार ऐसा

1532
01:47:27,600 --> 01:47:31,600
किया जहां पर जो है मैं कुछ बताने जा रहा हूं। उन्होंने खट से दूसरी बात करके वो

1533
01:47:31,600 --> 01:47:35,840
मुझे बताने ही नहीं दिया। वो मेरा चीजें रह ही गई। वो गॉड पादाचार्य जी वाला जो गैप

1534
01:47:35,840 --> 01:47:40,480
में भरने वाला था। सुन लीजिए अब यहां बता देता हूं।

1535
01:47:40,480 --> 01:47:44,480
गड पादाचार्य जी के जो गुरु है वो है सुखदेव जी। सुखदेव जी कौन थे?

1536
01:47:44,480 --> 01:47:48,560
जिन्हें महाभारत काल में जिनका मोक्ष हो गया था। महाभारत के अनुसार। अब

1537
01:47:48,560 --> 01:47:52,640
इनका कहना है कि भाई उनका तो मोक्ष हो गया था। आर्य समाजियों के अनुसार ही मुक्त

1538
01:47:52,640 --> 01:47:56,640
जीव दोबारा आते हैं। हालांकि 36 लाख वर्ष बाद आते हैं। आते तो है

1539
01:47:56,640 --> 01:48:00,960
ना। योगेश भारद्वाज जी के अनुसार कई गैलेक्सी है, कई ब्रह्मांड

1540
01:48:00,960 --> 01:48:03,840
है।

1541
01:48:03,840 --> 01:48:09,200
तो क्या मुक्त सुखदेव जी वहां से यहां नहीं आ सकते?

1542
01:48:09,200 --> 01:48:11,680
सीधे

1543
01:48:11,680 --> 01:48:15,520
तात्विक बाधा तो नहीं हो रही है।

1544
01:48:15,520 --> 01:48:19,760
शब्द प्रमाण आपको परंपरा प्राप्त मानना नहीं है। जो

1545
01:48:19,760 --> 01:48:23,920
तात्विक विवेचना है वो बाधा तो नहीं हो रही ना। आपके अनुसार योगेश भारद्वाज जी का ही मैंने

1546
01:48:23,920 --> 01:48:28,080
वीडियो देखा जिसमें वो कई ब्रह्मांडों की बात कर रहे हैं जिसमें वो यह बता रहे हैं कि स्वर्ग का मतलब

1547
01:48:28,080 --> 01:48:32,480
क्या होता है कि यदि कोई कलयुग का व्यक्ति इस समय कहीं पर जहां जिस

1548
01:48:32,480 --> 01:48:38,480
सृष्टि में सतयुग चल रहा होगा वहां पहुंच जाएगा तो उसके लिए वो स्वर्ग है

1549
01:48:38,800 --> 01:48:42,960
स्वर्ग में पहुंच जाएगा। ये होता है स्वर्ग का मतलब ये योगेश भारद्वाज जी ने बताया।

1550
01:48:42,960 --> 01:48:47,600
तो इस प्रकार से सुखदेव जी नहीं आ सकते हैं। मंत्र देने ज्ञान देने

1551
01:48:47,600 --> 01:48:51,680
दूसरी सृष्टि से स्वर्ग से और मुक्त

1552
01:48:51,680 --> 01:48:56,320
मुक्त जीव वापस आता है। चलिए हमारा ही है। जो

1553
01:48:56,320 --> 01:49:00,640
सारूप मोक्ष होता है उसमें टाइम

1554
01:49:00,640 --> 01:49:05,920
ट्रेवल और ये लोकरंतर का ट्रेवल कर सकता है।

1555
01:49:05,920 --> 01:49:10,080
इस प्रकार से भी सुखदेव जी का आना सिद्ध हो गया। और अगर कैवल्य मान

1556
01:49:10,080 --> 01:49:14,320
लोगे तो फिर ईश्वर ही जीव जगत जगदीश्वर के रूप में प्रकट हो रहे हैं। फिर तो उनके आने में कोई बाध्यता

1557
01:49:14,320 --> 01:49:18,640
ही नहीं है। तो आपके सिद्धांतों के अनुसार भी सुखदेव जी आकर के

1558
01:49:18,640 --> 01:49:19,140
मंत्र

1559
01:49:18,880 --> 01:49:23,360
दे रहे हैं। दे सकते हैं। हमारे जो

1560
01:49:23,360 --> 01:49:27,520
द्वैत के सिद्धांत है परंपरा प्राप्त उनके अनुसार भी सुखदेव जी मोक्ष

1561
01:49:27,520 --> 01:49:31,680
का मंत्र दे सकते हैं। ज्ञान विज्ञान दे सकते हैं। अपने शिष्य को शिष्य

1562
01:49:31,680 --> 01:49:36,240
के रूप में ग पादाचार्य को और कैवल्य

1563
01:49:36,240 --> 01:49:40,240
के अनुसार अद्वैत के अनुसार भी दे सकते हैं। और यह बात मैंने ही नहीं मानी है।

1564
01:49:40,240 --> 01:49:44,240
यह बात भी माधवाचार्य शास्त्री जी ने विशिष्टा द्वैत परंपरा

1565
01:49:44,240 --> 01:49:48,800
के हैं। रामानुजाचार्य परंपरा उन्होंने इस बात का निराकरण प्रस्तुत किया है।

1566
01:49:48,800 --> 01:49:52,880
ठीक है? पुराण दिग दर्शन में तो यह वाली चीज

1567
01:49:52,880 --> 01:49:57,840
पढ़ लेना। खैर तो जब जब मैं ऐसे आवश्यक

1568
01:49:57,840 --> 01:50:02,080
उत्तर देने वाला था तबतबत आपके जो तथाकथित वैज्ञानिक

1569
01:50:02,080 --> 01:50:06,080
जी हैं वो विषयंतर कर गए और आप कह रहे हो कि जो है

1570
01:50:06,080 --> 01:50:10,560
हमने वो चर्चा से पलायन कर लिया। स्पष्ट रूप से था।

1571
01:50:10,560 --> 01:50:15,280
जैसे ही कोई व्यक्तिगत कटाक्ष माना करेगा और

1572
01:50:15,280 --> 01:50:19,360
अह जो है इस अनुशासन का पालन

1573
01:50:19,360 --> 01:50:23,760
करने में असफल सिद्ध होगा वैसे ही चर्चा को निष्फल मान लिया जाएगा।

1574
01:50:23,760 --> 01:50:27,760
हम क्या करें उस बूढ़े व्यक्ति से तू तू मैंम करें वहां जब

1575
01:50:27,760 --> 01:50:32,000
वो व्यक्तिगत कटाक्ष पे आ रहा है। बार-बार सीने

1576
01:50:32,000 --> 01:50:34,720
पे हाथ रख रहा है। पानी पी रहा है।

1577
01:50:34,720 --> 01:50:38,080
क्या करें वहां?

1578
01:50:38,080 --> 01:50:43,920
हम भी तुम्हारी तुम्हारे जैसे हो जाए। हमें सिखाया नहीं गया ना भाई यही बात है बस

1579
01:50:43,920 --> 01:50:48,000
जब चर्चा की शर्त है कि नहीं रुकना है निष्फल

1580
01:50:48,000 --> 01:50:52,320
मान लिया जाएगा उस चर्चा को तुरंत तो क्यों कर रहे हो व्यक्तिगत कटाक्ष

1581
01:50:52,320 --> 01:50:56,320
क्योंकि तुम्हारे पास उत्तर नहीं है और आप ऐसे लोगों का पक्ष

1582
01:50:56,320 --> 01:51:00,560
ले रहे हो आ के तो आपने ये सब नहीं देखा शर्त

1583
01:51:00,560 --> 01:51:04,640
क्या थी उन्होंने विषयंतर किया कि नहीं उन्होंने व्यक्तिगत कटाक्ष

1584
01:51:04,640 --> 01:51:09,120
किया कि नहीं कौन-कौन से प्रश्नों के उत्तर दे ही नहीं पाए

1585
01:51:09,120 --> 01:51:13,200
आपने आपने जो उत्तर दिए वो उत्तर तक नहीं रख पाए वहां पर। ऐसा भी नहीं

1586
01:51:13,200 --> 01:51:17,520
कह सकते कि उनको बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा था। अच्छा

1587
01:51:17,520 --> 01:51:21,520
ये तक कह दिया कि परंपरा मत पूछो। ये मत पूछो कि वेद कहां से

1588
01:51:21,520 --> 01:51:25,600
आया? भाई ये तो पूछा जाएगा ना। मैंने तो यहां तक कह दिया कि शय

1589
01:51:25,600 --> 01:51:29,680
आचार्य यदि प्रमाणिक नहीं है तो तुम्हारे पास वेद कहां से आया? वो बताओ ना। मैं हो जाता हूं।

1590
01:51:29,680 --> 01:51:33,680
बिहार समाज जी। बताओ मुझे वेद के विषय में प्रमाणिकता

1591
01:51:33,680 --> 01:51:38,480
बताओ। तो वो कह रहे हैं मेरी प्रमाणिकता। मेरी प्रमाणिकता

1592
01:51:38,480 --> 01:51:42,640
के भाष्य में पशु बलि ये मेरी प्रमाणिकता है। अच्छा मान लिया पशु

1593
01:51:42,640 --> 01:51:46,640
बलि गलत है। तो क्या किसी तोता चोर से

1594
01:51:46,640 --> 01:51:49,840
तोता चोर की बातों को प्रमाण मान लोगे आप मानते होगे। आपके

1595
01:51:49,840 --> 01:51:53,840
यहां माना जाता है ये मैं जानता हूं। आपके यहां मान लिया जाता है। चीनी चोर

1596
01:51:53,840 --> 01:51:58,160
तोता चोर सबको प्रमाण मान लिया जाएगा। क्योंकि श के भाष्य में पशु बल है

1597
01:51:58,160 --> 01:52:02,160
या फिर कोई सिद्धांत है किसी को प्रमाण मानने का

1598
01:52:02,160 --> 01:52:06,160
तो बता देना कभी हो सके तो दे नहीं पाया आज तक कोई आर्य

1599
01:52:06,160 --> 01:52:11,120
समाज इन बातों का जवाब

1600
01:52:11,120 --> 01:52:15,200
अभी भी खांसी आ रही है वीडियो बना लेना इस पर

1601
01:52:15,200 --> 01:52:19,280
खांस रहा था तो व्यक्ति बार-बार विषयांतर कर

1602
01:52:19,280 --> 01:52:23,280
रहा है कुतर्की कह रहा है व्यक्तिगत कटाक्ष कह

1603
01:52:23,280 --> 01:52:27,600
रहा है निरुत्तर हो रहा है प्रश्न प्रश्न करने से ही मना कर दे रहा है।

1604
01:52:27,600 --> 01:52:31,680
ये मत पूछो इस बात को तय कौन कर रहा है चर्चा के बीच में? ये मत पूछो। कौन

1605
01:52:31,680 --> 01:52:35,680
कर रहा है तय? क्यों ना पूछा जाए? भाई

1606
01:52:35,680 --> 01:52:39,840
आप जो है वेद के संबंध में अपने आप को प्रमाणिक कह रहे हो तो प्रमाणिकता बताओ

1607
01:52:39,840 --> 01:52:44,720
ना क्या है? अथातो धर्म जिज्ञासा

1608
01:52:44,720 --> 01:52:48,720
ये मत पूछो। अगर ये मत पूछो वाली बात कह दी जाए तो पूरी

1609
01:52:48,720 --> 01:52:52,720
सत्यार्थ प्रकाश में यही सारी बातों को हम मना कर दें। ये मत पूछो।

1610
01:52:52,720 --> 01:52:57,680
बस जो कहा जा रहा है मान लो मंत्र के विषय में तो हम आपके प्रमाण है ही

1611
01:52:57,680 --> 01:53:02,640
चाहे जर्मनी से ले आओ कहीं से भी ले आओ प्रमाणित तो यही से कराना पड़ेगा परंपरा प्राप्त से

1612
01:53:02,640 --> 01:53:05,200
तो ये सब चीजें थी जिसके कारण चर्चा

1613
01:53:05,200 --> 01:53:09,360
को स्थगित किया गया और पर्याप्त रूप से वहां पर आर्य

1614
01:53:09,360 --> 01:53:13,360
समाजी सिद्धांतों की धुलाई हुई और आज यहां पर सारे जो

1615
01:53:13,360 --> 01:53:17,360
है एक हो रहे हैं अच्छे अच्छा है आप लोग बाहर आ रहे हो इंटरेक्शन और

1616
01:53:17,360 --> 01:53:21,520
सीधी सी बात है ना भाई आपके यहां से दो महीने पहले फोन आया था कि

1617
01:53:21,520 --> 01:53:25,600
आप सहारनपुर आ रहे कि नहीं उसके बाद मैंने कहा कि ठीक है आप जो है ऑनलाइन का

1618
01:53:25,600 --> 01:53:31,120
देख के पता करो नहीं तो अगर होगा तो देखा जाएगा सहारनपुर भी आएंगे

1619
01:53:31,120 --> 01:53:35,200
तो क्यों नहीं क्या अभी तक धानस नहीं बटोर पाए मोहित गौर ने मुझे पुकारा मैं

1620
01:53:35,200 --> 01:53:39,520
नहीं गया आपको मैंने पुकारा आप क्यों नहीं आ रहे यानी कि कुछ वजह

1621
01:53:39,520 --> 01:53:43,600
हो सकती है ना जाने की वो बात और है कि आपने खुद मुझे अपनी

1622
01:53:43,600 --> 01:53:47,760
तरफ से फोन भी करवा लिया पता करवा लिया कि भाई क्या है क्या नहीं है और

1623
01:53:47,760 --> 01:53:52,800
उसके बाद भी आप जो है संपर्क नहीं कर पा रहे हो यहां वहां मेरे बारे में बातें भी कर रहे हो

1624
01:53:52,800 --> 01:53:56,880
बयानबाजी भी कर रहे हो पीठ पीछे मगर इतना साहस एकत्र नहीं हो पा रहा है कि

1625
01:53:56,880 --> 01:54:00,880
शिवश नारायण द्विवेदी को कह दे या तो ऑनलाइन चर्चा कर लो

1626
01:54:00,880 --> 01:54:05,040
शर्तों के साथ और या फिर यहां आ जाओ सहारनपुर किसी बीच के स्थान

1627
01:54:05,040 --> 01:54:09,600
पर बैठकर के चर्चा हो जाएगी साहस नहीं है क्या वैसे

1628
01:54:09,600 --> 01:54:13,680
तो स्वयंभू बने फिर रहे हैं आप ये अच्छा नहीं लगा साहस

1629
01:54:13,680 --> 01:54:18,080
दिखाइए सीधी सी बात है किसी भी प्रकार के वैचारिक

1630
01:54:18,080 --> 01:54:20,320
मतभेद के निमित्त सुन ले पूरा आर्य

1631
01:54:20,320 --> 01:54:24,400
समाज जितने लोग हैं बनाने ठीक है

1632
01:54:24,400 --> 01:54:28,720
जितने लोग हैं आर समाज को मानने वाले किसी भी प्रकार के वैचारिक मतभेद

1633
01:54:28,720 --> 01:54:32,800
के निमित्त अगर आपको कुछ हमारे चीजों से विरोध

1634
01:54:32,800 --> 01:54:36,960
है यदि आपको लगता है कि आप सत्य के पक्षधर हैं तो और

1635
01:54:36,960 --> 01:54:41,200
बचपन में माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया है तो प्रत्यक्ष

1636
01:54:41,200 --> 01:54:45,280
वार्ता करने का साहस प्रकट करो प्रत्यक्ष यू बयान बाजी मुंह छुपा

1637
01:54:45,280 --> 01:54:49,440
के पीठ पीछे बातें करना बंद करो ठीक है जिसको भी

1638
01:54:49,440 --> 01:54:53,840
लग रहा है कि उस उस चर्चा चर्चा में उनका पक्ष भारी रहा था। अरे

1639
01:54:53,840 --> 01:54:57,920
उनको फॉलो करने वाले लोग जो दो महीने पहले मुझसे कह रहे थे अग्निव्रत जी से चर्चा

1640
01:54:57,920 --> 01:55:02,000
कर लो। वो तक तो कह रहे हैं कि अग्निव्रत जी इसमें जो है बहुत ढीले

1641
01:55:02,000 --> 01:55:06,320
दिखाई दिए। अरे वो बल वाली बात आ ही नहीं पाई। उससे पहले व्यक्तिगत कटाक्षों

1642
01:55:06,320 --> 01:55:11,280
पर उतर आए। तो आ जाना जिसजिस ने अपनी मां का दूध

1643
01:55:11,280 --> 01:55:14,160
पिया हो।

1644
01:55:14,160 --> 01:55:18,400
बात कर लेना मुझसे। या जिसकी भी माता जी ने निष्ठा पूर्वक

1645
01:55:18,400 --> 01:55:22,560
दूध पिलाया हो और वह जो है ये अवतार का निषेध

1646
01:55:22,560 --> 01:55:27,040
सिद्ध कर सकता हो आ जाना कर लेना

1647
01:55:27,040 --> 01:55:31,280
आमने सामने से और भरद्वाज जी आपके लिए तो वो वाली छूट

1648
01:55:31,280 --> 01:55:35,360
भी है। आप सहारनपुर में अगर व्यवस्थित करेंगे तो वहां पर भी कोई

1649
01:55:35,360 --> 01:55:39,680
अच्छा सा स्थान देख के कर लिया जाएगा। ठीक है? अब आप

1650
01:55:39,680 --> 01:55:44,880
करिए तैयारी।

1651
01:55:44,880 --> 01:55:49,760
ठीक है।

1652
01:55:49,760 --> 01:55:54,720
तो

1653
01:55:54,720 --> 01:55:58,880
अब जो है जो लोग जुड़ सकते हैं कुछ 101 मिनट कुछ बातें कर लेंगे।

1654
01:55:58,880 --> 01:56:04,880
उसके बाद जो है चर्चा को समाप्त करेंगे।

1655
01:56:13,440 --> 01:56:19,440
वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा नहीं करनी है।

1656
01:56:21,070 --> 01:56:26,880
[गला साफ़ करने की आवाज़]

1657
01:56:26,880 --> 01:56:31,040
दुनिया तो देख रही है एक अकेले शिवश जी कितने समाजियों पर भारी कर

1658
01:56:31,040 --> 01:56:35,280
अच्छा यह मैं देख रहा हूं कि इन लोगों को वीडियो बनाने भी इसीलिए पड़

1659
01:56:35,280 --> 01:56:39,440
रहे हैं। इन लोगों को वीडियो इसीलिए बनाने पड़ रहे हैं

1660
01:56:39,440 --> 01:56:45,360
कि किस तरीके से वह जो मिट्टी पली हुई है उस पर लीपापोती की जाए।

1661
01:56:45,360 --> 01:56:48,480
है ना?

1662
01:56:48,480 --> 01:56:53,280
राम मनोहर जी आप जुड़ सकते हैं। अच्छा यहां पर लिंक दे दीजिए आप।

1663
01:56:53,280 --> 01:56:57,920
शास्त्रवाद जी, सनातन शंकर जी और कुछ

1664
01:56:57,920 --> 01:57:02,880
लोग हैं जो जुड़ सकते हैं।

1665
01:57:02,880 --> 01:57:06,880
विशाल जी क्या कह रहे हैं? विभूति जी का कहना

1666
01:57:06,880 --> 01:57:11,120
है कोई नहीं है टक्कर में। क्यों पड़े हो चक्कर में? हां, यह मेरा व्यक्तिगत

1667
01:57:11,120 --> 01:57:15,120
परामर्श है सभी को कि मत पड़ो चक्कर में। कोई

1668
01:57:15,120 --> 01:57:19,360
है नहीं टक्कर में। यह लिंक दे दिया गया है। कोई अगर जुड़ना

1669
01:57:19,360 --> 01:57:25,360
चाहता है तो जुड़ सकता है। [खांसने की आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़]

1670
01:57:28,480 --> 01:57:34,160
विज्ञान दर्शन यानी कि मोहित गड। उसने जब वह

1671
01:57:34,160 --> 01:57:38,160
एक ऐसी चीज की थी जो उपयुक्त

1672
01:57:38,160 --> 01:57:42,240
नहीं थी व्यवहार व्यवहारिक चीज नहीं थी। अव्यवहारिक चीज से जुड़ा था वो

1673
01:57:42,240 --> 01:57:46,240
तो हमने उसका निषेध किया था। मगर अभी जब आर्य समाज

1674
01:57:46,240 --> 01:57:50,400
के द्वारा प्रतिनिधि सभा के द्वारा आमंत्रण पत्र आया था उसका जब जवाब लिखा था उसमें बता

1675
01:57:50,400 --> 01:57:54,400
दिया था कि अब वह वीडियो जो था जिससे मोहित गड जुड़े थे वो डिलीट हो

1676
01:57:54,400 --> 01:57:58,800
चुका है तो मोहित गड के साथ चर्चा हो सकती है। यदि मोहित गड के द्वारा संपर्क

1677
01:57:58,800 --> 01:58:02,960
किया जाएगा तो जरूर उससे अवतार विषय पर चर्चा हो जाएगी। हालांकि आप इन विषयों

1678
01:58:02,960 --> 01:58:07,040
पर बात ज्यादा आपको मोहित गड से चर्चा बहुत आवश्यक नहीं है क्योंकि वो तो स्वयं

1679
01:58:07,040 --> 01:58:11,840
को आर्य समाजी मानते नहीं है। फिर भी वो अगर संपर्क करता है

1680
01:58:11,840 --> 01:58:16,000
मोहित गड अगर हमसे करते हैं तो चर्चा जरूर हो जाएगी क्योंकि ऐसा

1681
01:58:16,000 --> 01:58:18,080
मुझे संदेश प्राप्त हुआ था कि उस चर्चा

1682
01:58:18,080 --> 01:58:22,320
से जिसमें व्यक्तिगत चीजों पर हास्य किया गया था हमारे ऊपर उन बातों

1683
01:58:22,320 --> 01:58:26,640
को लेकर वो क्षमा प्रार्थी भी हैं। क्षमा मांगने

1684
01:58:26,640 --> 01:58:30,640
के लिए भी तैयार है और अब वो वीडियो भी हट चुका है। दोनों ही कारण

1685
01:58:30,640 --> 01:58:35,040
है जिसके कारण उनके साथ चर्चा की जा सकती है। तो

1686
01:58:35,040 --> 01:58:39,360
इसीलिए मोहित गौ से चर्चा जी राम मनोहर जय श्री राम

1687
01:58:39,360 --> 01:58:43,600
हटा दीजिए जय श्री राम जी राम मनोहर जी जय श्री राम

1688
01:58:43,600 --> 01:58:48,720
जय श्री राम [गला साफ़ करने की आवाज़] आवाज जा रही है मेरी

1689
01:58:48,720 --> 01:58:52,880
जी बोल राम मनोहर जी जी जय श्री राम शिवश

1690
01:58:52,880 --> 01:58:58,880
भैया मैंने ये लगा आपको नहीं आ रही है शायद

1691
01:59:00,960 --> 01:59:06,960
हेलो

1692
01:59:11,440 --> 01:59:15,600
एक एक मिनट जी बोले जी जी

1693
01:59:15,600 --> 01:59:18,240
जय श्री राम

1694
01:59:18,240 --> 01:59:22,240
बोले राम मनोज हेलो आवाज आपको नहीं जा रही है शिवश

1695
01:59:22,240 --> 01:59:26,560
भैया हां आ रही है हेलो जी

1696
01:59:26,560 --> 01:59:30,720
जय श्री राम शिवश भैया आ रही है। बोलिए।

1697
01:59:30,720 --> 01:59:34,720
जी जी मैं वही कह रहा था कि आज आपने

1698
01:59:34,720 --> 01:59:38,880
बहुत ही अच्छा किया। जी। अरे पता नहीं आवाज क्यों

1699
01:59:38,880 --> 01:59:43,360
नहीं आ रही।

1700
01:59:43,360 --> 01:59:48,000
प्रवीण कुमार जी

1701
01:59:48,000 --> 01:59:52,160
जी जय श्री राम। प्रवीण कुमार जी। जय श्री राम। जय जगन्नाथ। आपको बहुत-बहुत

1702
01:59:52,160 --> 01:59:56,240
धन्यवाद। आपने तुरंत इसका जवाब देने इसको

1703
01:59:56,240 --> 02:00:00,320
बंद कर आपने तुरंत दवा देने के लिए आज वीडियो

1704
02:00:00,320 --> 02:00:04,880
प्रस्तुत किया अच्छा हुआ और आपने बोला कि जिसने अपना माता का

1705
02:00:04,880 --> 02:00:09,360
दूध निष्ठा पूर्वक पिया है आ जाइए हम तो चाहते भरदा जी आए

1706
02:00:09,360 --> 02:00:13,360
उन्होंने बहुत हिम्मत दिखाया और उनका उनको कुछ

1707
02:00:13,360 --> 02:00:17,520
चीज दिखाई नहीं दिया जो उनका पक्ष में था शुरू शुरू से आपको

1708
02:00:17,520 --> 02:00:21,520
शिवाशु द्विवेदी या द्विवेदी क्या है आपका नाम उनको भी डाउट है क्लियर

1709
02:00:21,520 --> 02:00:26,080
नहीं हो पा रहा है आपका नाम को लेकर हम आवाज

1710
02:00:26,080 --> 02:00:30,240
जा रही है मेरी आपके पास जी आ रही है आ रही है एक

1711
02:00:30,240 --> 02:00:34,240
एक जी जय श्री राम जरा प्रवीण जी अपनी बात को

1712
02:00:34,240 --> 02:00:39,040
पूरा कर ले बिल्कुल मेरी आवाज नहीं आ रही

1713
02:00:39,040 --> 02:00:43,520
फिर कह रहे हैं कि आपको क्वार्क एटम आदि

1714
02:00:43,520 --> 02:00:47,600
साइंटिफिक वर्ड्स को आप समझ नहीं पाएंगे कैसे बोल दिया

1715
02:00:47,600 --> 02:00:51,760
अग्निवर्त जी ने आप क्या कर ले आप साइंटिस्ट हो

1716
02:00:51,760 --> 02:00:56,000
हमको पता है अग्निवर्त जी कितना बड़ा साइंटिस्ट है पूर्व जन्म में शायद अभी गए थे

1717
02:00:56,000 --> 02:00:58,560
लेन बन के वो चंद्रमा पुष् में इस जन्म

1718
02:00:58,560 --> 02:01:02,720
में साइंटिस्ट बन गया नासा का कोई बात नहीं हम यही चाहते

1719
02:01:02,720 --> 02:01:06,720
हैं कि भरतदास जी आए और सामना सामने हो जाए एक बार

1720
02:01:06,720 --> 02:01:10,960
बढ़िया रहेगा क्योंकि उनका फॉलोवर्स Facebook वगैरह में जो कमेंट छोड़ रहे हैं कि

1721
02:01:10,960 --> 02:01:15,120
शिवास जी माने भाग गए डिबेट छोड़ के

1722
02:01:15,120 --> 02:01:19,120
भाग गए उधर क्या शेष रह गया जो रहना था वक करना था

1723
02:01:19,120 --> 02:01:23,200
वो खुद पानी पी रहे थे थे एक बूढ़े व्यक्ति के साथ

1724
02:01:23,200 --> 02:01:29,120
मुंह चोरी करनी थी वहां पर और कुछ नहीं था वहां

1725
02:01:29,120 --> 02:01:33,200
अगर वो तू पे आते तो मैं भी उनको तूग बोलूं और अगर चर्चा छोड़ दो तो

1726
02:01:33,200 --> 02:01:37,280
भाग गए। भरद्वाज जी कह रहे हैं कि वो कांप रहे थे। कांप

1727
02:01:37,280 --> 02:01:41,520
रहे थे। उनको दिखाई दिया कम से कम ये चीज ऐसा हुआ कंपना ऐसेसे बार-बार

1728
02:01:41,520 --> 02:01:47,520
उनका हाथ हो रहा है। पानी पी रहे हैं। हां जी सर

1729
02:01:48,720 --> 02:01:52,800
जी जी जय श्री राम सभी लोगों को

1730
02:01:52,800 --> 02:01:58,800
जय श्री राम। शिवश भैया जय श्री राम। जय श्री राम जी राम जी

1731
02:01:59,040 --> 02:02:03,680
जी बहुत ही आपने बहुत ही अच्छा कार्य किया

1732
02:02:03,680 --> 02:02:07,680
आपने आज ये स्ट्रीम रखी है विवेचना वाली जो स्ट्रीम रही

1733
02:02:07,680 --> 02:02:11,840
है बहुत अच्छा ही रहा वो तो खैर जो आर्य

1734
02:02:11,840 --> 02:02:15,840
समाज का एक नियम भी है ना कि सत्य को ग्रहण करना और सत्य का परित्याग

1735
02:02:15,840 --> 02:02:19,920
कर देना तो अगर आंशिक रूप से भी अगर कोई देखेगा उस डिबेट को

1736
02:02:19,920 --> 02:02:24,000
तो उनको समझ में आएगा कि एक्चुअल सत्य क्या है और जो

1737
02:02:24,000 --> 02:02:28,000
असत्य क्या है उसके हिसाब से ये लोग जो है ना वो कहते नहीं है कि

1738
02:02:28,000 --> 02:02:32,160
अगर किसी व्यक्ति का अगर पट का जीप

1739
02:02:32,160 --> 02:02:36,160
अगर खुल जाता है तो फिर शर्ट को जो है बाहर निकाल लेता है ताकि जीप खुली

1740
02:02:36,160 --> 02:02:40,480
हुई नजर ना आए लोगों को है ना तो [हंसी] जो लोग अंदर

1741
02:02:40,480 --> 02:02:42,960
की

1742
02:02:42,960 --> 02:02:47,120
शर्ट को बाहर निकालने के लिए शर्ट ही बाहर निकल निकल के लोग आ रहे हैं अभी

1743
02:02:47,120 --> 02:02:51,280
अभी और लोग आएंगे अभी और लोग आएंगे है ना एक

1744
02:02:51,280 --> 02:02:55,600
और दूसरे ऋषि जो है उनके भी तो WhatsApp पे आए

1745
02:02:55,600 --> 02:02:59,760
सॉरी YouTube पे आए ही थे कि सिवान

1746
02:02:59,760 --> 02:03:03,760
जी कैसे हैं और क्या बोलते हैं वो तो सबको पता है और क्या

1747
02:03:03,760 --> 02:03:07,840
बालक बुद्धि और क्या नहीं है तो ये वही वही जो जिनके जीभ टूट

1748
02:03:07,840 --> 02:03:11,840
गए ना लघु शंका के समय में तो

1749
02:03:11,840 --> 02:03:15,920
ज्यादा है तो भाई वो फिर कैसे 18वा सिद्धांत

1750
02:03:15,920 --> 02:03:20,080
है [हंसी] शिवश ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता

1751
02:03:20,080 --> 02:03:24,880
क्योंकि शिवश बालक बुद्धि है बाबा

1752
02:03:24,880 --> 02:03:29,360
भाई वही मैं YouTube वाला था वही तो मैं कह रहा था आपको

1753
02:03:29,360 --> 02:03:33,360
एक दूसरे जो महर्षि दयानंद को तो महर्षि पता नहीं

1754
02:03:33,360 --> 02:03:37,600
कैसे बना दिए लोगों ने एक दूसरे भी नए ऋषि नहीं हुए हैं जिनके

1755
02:03:37,600 --> 02:03:41,760
बारे में आपने कई बार ऑलरेडी चर्चा भी हम लोगों ने की है तो उन ऋषि

1756
02:03:41,760 --> 02:03:46,240
ने आपको बालक कहा है तो भाई हम तो देख रहे हैं कि सुंश

1757
02:03:46,240 --> 02:03:50,800
भैया के दांत तो इनके

1758
02:03:50,800 --> 02:03:54,880
लेकिन कई जो बड़े बुजुर्ग दांत लेकर के लंबे लंबे जो आए ना उनके

1759
02:03:54,880 --> 02:03:58,880
भी दांत उखड़ते हुए नजर आ रहे हैं। कोई

1760
02:03:58,880 --> 02:04:02,960
पानी पी रहा है, कोई हृदय पे हाथ रख रहा है। कोई कोई जो

1761
02:04:02,960 --> 02:04:06,960
है सलामी देने के लिए जीभ टूट गया तो शर्ट निकल निकल के बाहर आ रहे

1762
02:04:06,960 --> 02:04:11,120
हैं। ये तो दुनिया देख रही है इन चीजों को। जो व्यक्ति ईश्वर

1763
02:04:11,120 --> 02:04:15,200
को सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं कर सकता। अपने सिद्धांतों से वो क्या कर सकता है? थू है

1764
02:04:15,200 --> 02:04:20,000
ऐसे ईश्वर को जो सर्वशक्तिमान भी नहीं हो सकता। उसमें भी

1765
02:04:20,000 --> 02:04:25,840
उसमें भी बाधा आ रही है उस ईश्वर को। ऐसे कार्य करने

1766
02:04:25,840 --> 02:04:30,240
की परिभाषा है वो जरूर उस पर विचार हो सकता है मगर ये

1767
02:04:30,240 --> 02:04:34,720
थूकने जैसा शब्द का उपयोग ठीक नहीं है भाई मतलब

1768
02:04:34,720 --> 02:04:40,080
हम हम जैसे अज्ञानी व्यक्ति के लिए हम जैसे अज्ञानी व्यक्ति के लिए

1769
02:04:40,080 --> 02:04:44,960
हम तो वही मानेंगे ना हमारी मर्यादा मैं इसके लिए क्षमा

1770
02:04:44,960 --> 02:04:49,280
मैं मैं अपने वाणी को मैं अपने वाणी को वापस लेता हूं क्षमा चाहता हूं

1771
02:04:49,280 --> 02:04:53,440
मैं भाव हो के बोल गया ऐसा नहीं बोलना चाहिए मैं अपने वाणी

1772
02:04:53,440 --> 02:04:57,280
के लिए क्षमा प्रार्थी हूं। लेकिन

1773
02:04:57,280 --> 02:05:01,520
मैं यही कहना चाहूंगा कि हम जैसे जो कम पढ़े लिखे उनकी नजर में कम जानते

1774
02:05:01,520 --> 02:05:06,080
हैं। उनके लिए तो ईश्वर का मतलब ही है जो सर्वशक्तिमान हो। जो सार्वभौमिक

1775
02:05:06,080 --> 02:05:10,160
हो जोकालिक हो जिसका नियम निकृष्ट जैसे वो

1776
02:05:10,160 --> 02:05:14,400
कह रहे थे ना कि ईश्वर को पापी बनाया है तो हम हमारा ये कहना आपने बड़ा ही निकृष्ट

1777
02:05:14,400 --> 02:05:18,830
क्वालिटी का ईश्वर बना रखा है। अपनी किताबों उसपे चिंतन होना चाहिए।

1778
02:05:18,830 --> 02:05:24,830
[गला साफ़ करने की आवाज़] जी सत्यम जी जय श्री राम स्वागत है आपका

1779
02:05:25,040 --> 02:05:28,160
जय श्री राम

1780
02:05:28,160 --> 02:05:32,480
जी

1781
02:05:32,480 --> 02:05:36,640
तो सत्यम जी आवाज नहीं आ रही है आपकी अब आ रही है आवाज

1782
02:05:36,640 --> 02:05:40,640
हां अब आ रही है हां तो जब से वो लाइव

1783
02:05:40,640 --> 02:05:45,280
चर्चा हुई है तब से समीक्षा की बाढ़ आ चुकी है हर जगह से

1784
02:05:45,280 --> 02:05:49,360
अच्छी बात है समीक्षा की जरूरत उसे

1785
02:05:49,360 --> 02:05:54,240
ही पड़ती है जो अपनी हार छुपाना चाहता है।

1786
02:05:54,240 --> 02:06:00,160
नहीं ठीक है टाइम पास हो गया होगा सोचा होगा चलो इसी

1787
02:06:00,160 --> 02:06:04,480
इसी प्रकार से थोड़ा सा अपना वो कर लेते हैं इनका

1788
02:06:04,480 --> 02:06:08,640
काम हो जाएगा अग्निवत जी जो वहां पर रायता फैला के आए हैं उसको बटोर लिया

1789
02:06:08,640 --> 02:06:12,720
जाएगा और हमारे पास कुछ कामधाम है नहीं तो थोड़ा किसी काम में

1790
02:06:12,720 --> 02:06:16,720
हमारा संलग्नता हो जाएगी कुछ कर्तव्य का निर्वाह हो जाएगा समाज

1791
02:06:16,720 --> 02:06:20,720
के प्रति बिल्कुल बिल्कुल मतलब इतनी समीक्षा

1792
02:06:20,720 --> 02:06:25,520
करनी पड़ रही है पूरा उनके उनके पूरी लाइफ को

1793
02:06:25,520 --> 02:06:29,520
कि हम जीत गए इसके लिए किस किस को समीक्षा करनी पड़ रही है इससे समझ

1794
02:06:29,520 --> 02:06:33,840
आ रहा है कि ये हिल चुके हैं अंदर से बिल्कुल

1795
02:06:33,840 --> 02:06:38,000
और अग्निव्रत जी तो शुरू से ही ऐसे

1796
02:06:38,000 --> 02:06:42,480
रहे हैं कि वो अपना पक्ष सिद्ध करने के लिए खुद की चीजें ही नहीं पढ़ते कभी

1797
02:06:42,480 --> 02:06:46,480
जैसे मैंने आपको एक बार बताया था ये कह रहे थे कि विवेकानंद जी ने तो कहा है

1798
02:06:46,480 --> 02:06:50,480
कि विदेश की स्त्रियां बहुत सुंदर है। बहुत गुणवती है। अरे

1799
02:06:50,480 --> 02:06:54,720
दयानंद जी ने भी कहा है यही बात वो नहीं। [हंसी]

1800
02:06:54,720 --> 02:06:58,800
दयानंद जी ने अपने जीवनी में लिखा है कि विद्यावती है अंग्रेजों की स्त्रियां

1801
02:06:58,800 --> 02:07:02,880
तो। अब मैं नहीं ये कौन सी विद्यावती है अंग्रेजों

1802
02:07:02,880 --> 02:07:07,200
की स्त्री जो भारत की स्त्री नहीं है। अच्छा आप उसमें उसमें

1803
02:07:07,200 --> 02:07:11,200
एक चीज पे ध्यान देना। ये लोग इसलिए आ रहे हैं अग्निवत जी

1804
02:07:11,200 --> 02:07:15,520
को कवर अप करने के लिए क्योंकि अग्निव्रत जी इस समय जो है आर्य समाज

1805
02:07:15,520 --> 02:07:19,520
की ओर से हैं। उसी चर्चा में अग्निवत जी से जब मैं दयानंद

1806
02:07:19,520 --> 02:07:24,000
जी के संबंध में बात कर रहा हूं वो तुरंत छोड़ रहे हैं। मैं मैं कहां ले रहा हूं दयानंद जी का नाम?

1807
02:07:24,000 --> 02:07:28,080
मतलब उनका स्वतंत्र है। वो दयानंद जी से संबंध नहीं है। वो स्वतंत्र रूप

1808
02:07:28,080 --> 02:07:32,240
से अपने को प्रस्तुत कर रहे हैं। वैज्ञानिकता खंडित

1809
02:07:32,240 --> 02:07:38,240
हो रही है ना भैया। समझिए बात को आपके

1810
02:07:39,520 --> 02:07:43,200
साल पहले साल पहले

1811
02:07:43,200 --> 02:07:47,200
मेरे बारे में कह रहे हैं योगेश जी ने क्या स्लिप

1812
02:07:47,200 --> 02:07:51,760
ऑफ टन किया है जी जी अग्निवर्त

1813
02:07:51,760 --> 02:07:57,680
जी को कुछ साल पहले ऑफर मिल रहा था महर्षि होने का अच्छा

1814
02:07:57,680 --> 02:08:01,680
महर्षि आया था दयानंद जी के बाद सेकंड होने वाले थे

1815
02:08:01,680 --> 02:08:07,200
लेकिन इनको थोड़ा शर्म लगा तो हुए नहीं मना कर रहे थे इनका

1816
02:08:07,200 --> 02:08:11,840
उनसे वाले लगा रखा है सत्यम

1817
02:08:11,840 --> 02:08:16,000
जी आप अपनी बात अगर कुछ रह गई तो पूरा कर ले फिर हम धीरज जी है शायद उनको

1818
02:08:16,000 --> 02:08:20,240
सुन ले वो जितने अभी चाहे वो

1819
02:08:20,240 --> 02:08:24,560
एक जो थे ना जो कह रहे थे कि खांस रहे हैं आप खास रहे हैं

1820
02:08:24,560 --> 02:08:29,680
तो एक वो कुछ जो समीक्षा कर रहे हैं वो कह रहे शास्त्रों [हंसी]

1821
02:08:29,680 --> 02:08:30,800
से भाग गए डिबेट

1822
02:08:30,800 --> 02:08:34,880
से भाग गए तो मैं इतना कहना चाह चाहूंगा। आपको यही नहीं पता कि यह

1823
02:08:34,880 --> 02:08:38,960
चर्चा है। आप उसको शास्त्रार्थ कह रहे हो। घर पर अगर छोटी

1824
02:08:38,960 --> 02:08:42,960
सी भैंस हो जाती होगी तो ये शास्त्र कर लेते होंगे अपने माता पिता से और रात को

1825
02:08:42,960 --> 02:08:46,960
फिर टेलीग्राम पे WhatsApp पर कहते होंगे आज तो मैंने धो डाला शास्त्रार्थ में

1826
02:08:46,960 --> 02:08:51,040
अपने माता पिता को। नहीं इनके टेलीग्राम पे चलता है सब होता रहता है इनके

1827
02:08:51,040 --> 02:08:55,120
साथ। तो इनको नहीं पता ना कि शास्त्रार्थ नहीं है चर्चा है और

1828
02:08:55,120 --> 02:08:59,280
अग्निव्रत जी भी इनको नहीं कह रहे कि भैया शास्त्र नहीं है इसको सुधारो

1829
02:08:59,280 --> 02:09:03,360
क्योंकि वो चाहते इसको शास्त्रार्थ कह रहे हैं तो भैया हमारा पक्ष तो उसमें

1830
02:09:03,360 --> 02:09:08,720
पुष्ट हुआ है तो शास्त्रार्थ में हम विचित हुए हैं कोई आएगा तो उसको

1831
02:09:08,720 --> 02:09:12,880
अच्छा है शास्त्र इनको ज्ञान नहीं ज्ञान नहीं

1832
02:09:12,880 --> 02:09:17,200
है बात का [हंसी]

1833
02:09:17,200 --> 02:09:23,040
ज्ञान ज्ञान ज्ञान है ज्ञान नहीं है बस ठीक

1834
02:09:23,040 --> 02:09:28,880
जी धीरज जी बोले

1835
02:09:28,880 --> 02:09:33,040
अगर चर्चा आपको कोई वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा है तो वो

1836
02:09:33,040 --> 02:09:37,280
आप प्रोटोकॉल है उसके द्वारा आइएगा फिलहाल

1837
02:09:37,280 --> 02:09:42,960
आपको कोई विचार प्रकट करना हो तो आप कर सकते बोले

1838
02:09:42,960 --> 02:09:47,520
एनडी क्या नाम है आपका

1839
02:09:47,520 --> 02:09:52,640
जी शिवश भाई जय श्री राम जय श्री राम जी बताइए।

1840
02:09:52,640 --> 02:09:56,720
बहुत बढ़िया चर्चा रही। मेरा तो मन गदगद हो गया। आपने जिस

1841
02:09:56,720 --> 02:10:00,800
तरीके से इनको निरत्तर किया है जितना इनके अंदर दम है ना

1842
02:10:00,800 --> 02:10:05,040
जितना अंदर अंदर एटीट्यूड रहता है कि हमें सब कुछ ज्ञान है। हमें सब

1843
02:10:05,040 --> 02:10:09,120
हमें वेदों का ज्ञान है तो हमें सृष्टि की हर एक

1844
02:10:09,120 --> 02:10:13,120
प्रश्न हर एक क्वरी जो है उस सबका सभी का ज्ञान हमारे पास

1845
02:10:13,120 --> 02:10:18,160
है। तो इनका जो एटीट्यूड है ना ये आपने बहुत डाउन किया है इस चर्चा से।

1846
02:10:18,160 --> 02:10:22,320
ये इनसे चर्चा आप कर कैसे सकते हैं? देखिए आप उनको

1847
02:10:22,320 --> 02:10:26,320
प्रमाण दे रहे थे तो प्रमाण मानने को तैयार नहीं है। वो कह रहे हैं कि दयानंद

1848
02:10:26,320 --> 02:10:30,640
का प्रमाण मानेंगे हम और आप उन्हें तर्क अगर तर्क

1849
02:10:30,640 --> 02:10:32,320
यू नो प्रस्तुत कर रहे हैं तो तर्क को नहीं

1850
02:10:32,320 --> 02:10:36,400
मान रहे हैं वो तर्क कर ही नहीं पा रहे हैं बल्कि आपसे तो इनसे चर्चा

1851
02:10:36,400 --> 02:10:40,480
कैसे की जाए? अच्छा प्रमाण के अर्थ में भी अपने तर्क

1852
02:10:40,480 --> 02:10:44,480
के अनुसार अर्थ करेंगे। अपने करोगे

1853
02:10:44,480 --> 02:10:48,560
तो फिर तर्क पे ही बात कर लो ना भाई। शिवश भैया मैं एक छोटी सी

1854
02:10:48,560 --> 02:10:53,360
बात कहना चाहूंगा इसमें ऐड ऑन कर रहा हूं आप ही की बात जी जब

1855
02:10:53,360 --> 02:10:57,920
आप जब आपने बात रखी थीकि मैं तो पूरा ही उस कन्वर्सेशन

1856
02:10:57,920 --> 02:11:02,000
में पूरा लाइव ही था कामधाम छोड़ के मैं बैठा हुआ था उसी कन्वर्सेशन को इंतजार

1857
02:11:02,000 --> 02:11:06,400
भी था मुझे और मुझे पहले से ही परमात्मा

1858
02:11:06,400 --> 02:11:10,720
जिस परमात्मा को लोग मानते हैं भविष्य नहीं देख सकता

1859
02:11:10,720 --> 02:11:14,800
मैं एक तुच्छ मनुष्य हो के मैं जानता था कि सत्य की सदा

1860
02:11:14,800 --> 02:11:19,040
विजय होती है और अद्वैत आदि गुरु शंकराचार्य के

1861
02:11:19,040 --> 02:11:23,120
एक नगण्य से एकदम साधारण से

1862
02:11:23,120 --> 02:11:27,200
भक्त के भक्त की भी विजय होने वाली है। ये बात मैं पहले से जानता था।

1863
02:11:27,200 --> 02:11:31,360
मैं मेरे जैसा एक तुक्ष व्यक्ति जो शास्त्र का

1864
02:11:31,360 --> 02:11:35,440
उतना ज्ञान नहीं रखता। साधारण सा ज्ञान रखता है। उसको भी ये बात हमें पहले

1865
02:11:35,440 --> 02:11:39,600
से पता थी। वो आपने सिद्ध किया। पहली चीज। दूसरी चीज आपने

1866
02:11:39,600 --> 02:11:43,760
एक बात उस जब चर्चा चल रही थी तो आपने एक बात कही थी कि जब

1867
02:11:43,760 --> 02:11:47,520
तर्क पे बात होगी तो सिर्फ तर्क पे बात होगी। जब

1868
02:11:47,520 --> 02:11:51,920
तर्क खत्म हो जाएंगे तब हम प्रमाण पे चलेंगे। ये बात हुई थी ना?

1869
02:11:51,920 --> 02:11:56,000
और फिर प्रमाण पे विवाद होना है ना। प्रमाण से जाएगी

1870
02:11:56,000 --> 02:12:00,000
परंपरा पेवाद और परंपरा से परंपरा से फिर वो गरमा गर्मी होगी और वो खत्म

1871
02:12:00,000 --> 02:12:04,000
हो जाएगा। हां हां प्रमाण पे

1872
02:12:04,000 --> 02:12:09,680
बाद में जाता हूं मैं। प्रमाण से

1873
02:12:09,680 --> 02:12:13,760
प्रमाण का अर्थ नहीं शास्त्रों से प्रमाण देना है।

1874
02:12:13,760 --> 02:12:17,840
प्रमाण का अर्थ ये है कि इनके द्वारा प्रमाण का जो अर्थ

1875
02:12:17,840 --> 02:12:21,920
लिखा गया उन अर्थों में से ढूंढ के प्रमाण देना है। ये बात है। अच्छा शिवा जी

1876
02:12:21,920 --> 02:12:25,920
मैं एक्चुअली अभी अपनी अपनी जॉब पर हूं। मुझे बस दो मिनट दीजिए क्योंकि मुझे

1877
02:12:25,920 --> 02:12:30,000
वापस बोलिए बोलिए मैं जॉब पे

1878
02:12:30,000 --> 02:12:34,720
हूं। मेरे पास मेरा ब्रेक खत्म हो रहा है। मैं आपको बस देखिए मैं

1879
02:12:34,720 --> 02:12:38,720
ये कहना चाह रहा हूं कि इन्होंने [हंसी] मुझे तो सुन के हंसी

1880
02:12:38,720 --> 02:12:42,720
आती है। ये कहते हैं जी लैटीट्यूड और लोंगिट्यूड है तो उसके आधार पे

1881
02:12:42,720 --> 02:12:46,720
हम तय कर लेते हैं व्यवहारिक दुनिया में भी कि पृथ्वी गोल है। भाई

1882
02:12:46,720 --> 02:12:50,720
आप अपने घर से बाजार के लिए जाते हो तो लैटीट्यूड और लोंगिट्यूड को

1883
02:12:50,720 --> 02:12:55,040
कंसीडर करके जाते हो क्या बाजार को? [हंसी]

1884
02:12:55,040 --> 02:12:59,040
अब ये बताइए आप देशांतर और ये सारी चीजें कंसीडर करते हो क्या

1885
02:12:59,040 --> 02:13:02,880
जब आप मतलब घर से गाड़ी ले निकलते हो तो वो भी शब्द और अनुमान

1886
02:13:02,880 --> 02:13:06,880
प्रमाण ही है अगर लैंगिक वो जो आप बता रहे हैं बिल्कुल बिल्कुल

1887
02:13:06,880 --> 02:13:10,880
ऑब्वियसली हां वो भी सही है वही है अंदाजा ही है वो

1888
02:13:10,880 --> 02:13:14,880
एजमशन है वो और दूसरी बात ये आपको काउंटर करते हैं हर बार

1889
02:13:14,880 --> 02:13:18,960
जब भी कहते हैं कि इनको संस्कृत बोलनी नहीं आती भाई चलो हमने मान लिया आपको

1890
02:13:18,960 --> 02:13:23,600
संस्कृत बोलनी आती है ठीक है लेकिन क्या आप अपने दिन प्रतिदिन

1891
02:13:23,600 --> 02:13:28,400
जो आपकी डे डे टू डे की जो लाइफ है उसमें संस्कृत बोलते हो क्या?

1892
02:13:28,400 --> 02:13:33,600
आप हिंदी में ही वार्ता करते हो ना। क्यों करते हो आप हिंदी में वार्ता? ताकि आप अपने

1893
02:13:33,600 --> 02:13:38,000
जो विचार है सामने वाले को प्रकट कर सके। भाषा का

1894
02:13:38,000 --> 02:13:42,640
एक उपयोग यही तो होता है ना कि अपने आप को एक्सप्रेस करना।

1895
02:13:42,640 --> 02:13:46,880
तो अगर किसी को संस्कृत नहीं आती है इसका मतलब यह तो

1896
02:13:46,880 --> 02:13:51,280
हो नहीं सकता ना कि उनको वेदों का ज्ञान लेने प्रतिबंधित हो जाएगा

1897
02:13:51,280 --> 02:13:55,360
या वो फिर वो आपसे तर्क नहीं कर पाएंगे। ऐसा है ना इस बात का

1898
02:13:55,360 --> 02:13:59,520
उनका उद्देश्य यह नहीं है कि सत्य क्या है? ईश्वर अवतार ले सकता है कि नहीं? उद्देश्य

1899
02:13:59,520 --> 02:14:03,920
यह है कि हमें जो व्यक्ति हमारा विरोध करने आया है उसको किसी तरीके से व्यक्तिगत

1900
02:14:03,920 --> 02:14:08,000
कटाक्षों के घेरे में लाएंगे। उसको मोरली मोरली उसका डाउन उसको

1901
02:14:08,000 --> 02:14:12,000
डाउन करेंगे। उसके जो हृदय में ऐसी ऐसी बातें बोलेंगे जो उसका मोरल

1902
02:14:12,000 --> 02:14:16,160
डाउन हो जाए या तो वो उसके ऐसा कुछ कर बैठे जो कानूनी घेरे में आ जाए या ऐसे

1903
02:14:16,160 --> 02:14:17,920
घेरे में आ जाए जो ये चर्चा समाप्त

1904
02:14:17,920 --> 02:14:22,880
हो जाए और फिर बल्ले बल्ले हो जाए व्यक्तिगत

1905
02:14:22,880 --> 02:14:26,960
लास्ट में हां मैं लास्ट में बस आपसे एक एक बात और कहना

1906
02:14:26,960 --> 02:14:31,040
चाहता हूं एक जो मेरे मन में विचार है कि आप थोड़ा सावधान रहिए

1907
02:14:31,040 --> 02:14:35,120
ये संस्था को आप इतने लाइटली मत लीजिए ये संस्था इंटरनेशनल लेवल

1908
02:14:35,120 --> 02:14:39,200
पे जो है ना इसे बहुत सारी जो ऑ्गेनाइजेशन है उनका

1909
02:14:39,200 --> 02:14:43,600
सपोर्ट भी हासिल है। आप YouTube पर जाएंगे ना तो आपको

1910
02:14:43,600 --> 02:14:48,560
हमारे खिलाफ बहुत सारा कंटेंट मिल जाएगा लेकिन आर्य समाज के खिलाफ कंटेंट नहीं मिलेगा।

1911
02:14:48,560 --> 02:14:53,120
उसका कारण है कुछ। उसका रीजन यह है कि इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन

1912
02:14:53,120 --> 02:14:57,760
से इसे सपोर्ट मिलता है। ये बैन करते हैं इस कंटेंट को।

1913
02:14:57,760 --> 02:15:02,000
फिर कहीं ना कहीं तो साहस दिखाना ही पड़ेगा। बाकी

1914
02:15:02,000 --> 02:15:07,040
योगेश भारद्वाज जी को जानने वाले एक हमारे मित्र हैं

1915
02:15:07,040 --> 02:15:11,440
जो उनका नाम है वीरेंद्र जी। वो

1916
02:15:11,440 --> 02:15:15,600
ऋषिकेश हरिद्वार में रहते हैं। और मुझे लगता है कि अगर

1917
02:15:15,600 --> 02:15:19,600
योगेश भारद्वाज जी के साथ आमने सामने हरिद्वार बहुत ज्यादा दूर नहीं है सहारनपुर

1918
02:15:19,600 --> 02:15:24,960
से तो ये योगेश भारद्वाज जी के साथ

1919
02:15:24,960 --> 02:15:29,120
जो है चर्चा उनके समक्ष हो सकती है। वो मध्यस्थता का कार्य

1920
02:15:29,120 --> 02:15:33,200
कर सकते हैं आराम से। और ये कह रहे तेरी मां ने निष्ठा तो भाई मैं मैं तो बोल रहा

1921
02:15:33,200 --> 02:15:37,600
हवा में कर लूं क्या? बिना उनके माने बिना बिना उनकी स्वीकृति

1922
02:15:37,600 --> 02:15:41,840
लिए ही कर लूं क्या बोल तो रहा हूं करने को तैयार हूं तू अपने आकाओं

1923
02:15:41,840 --> 02:15:46,000
को बोल जा मेरे को कहने दीजिए मेरे को कहने दीजिए

1924
02:15:46,000 --> 02:15:50,240
ये अपना शब्द में शब्द है

1925
02:15:50,240 --> 02:15:54,240
तू अपने आकाओं को बोलना जा के वो इस चीज को स्वीकार करे

1926
02:15:54,240 --> 02:15:58,240
चर्चा होगी तो उनके यहां कोई व्यवस्थित

1927
02:15:58,240 --> 02:16:03,040
जगह देख ली जाएगी दोनों पक्ष आएंगे जी पुनीत जी ये

1928
02:16:03,040 --> 02:16:07,120
अश्लील व्यक्ति जी ये अश्लील व्यक्ति कु संस्कार के साथ अपना जो

1929
02:16:07,120 --> 02:16:11,760
परिचय दे रहा है। इसका कोई गुरु परंपरा नहीं है। इसलिए इसका संस्कार नहीं है। ये संस्कार

1930
02:16:11,760 --> 02:16:15,920
इधर लिखा है कमेटी ये अब असली भाषा में लिखा है। देखो ये

1931
02:16:15,920 --> 02:16:20,080
होता है इन लोगों का ज्ञान। ये वो ज्ञान

1932
02:16:20,080 --> 02:16:24,240
है जो तथाकथित दो ढाई सौ साल

1933
02:16:24,240 --> 02:16:28,240
पहले जो प्रकाशित हुई है ना नए विज्ञान

1934
02:16:28,240 --> 02:16:32,400
के स्वरूप में जो व्यवहारिक रूप में पृथ्वी को गोल समझते

1935
02:16:32,400 --> 02:16:36,400
हैं। उनहीं का ज्ञान है 150 साल

1936
02:16:36,400 --> 02:16:40,000
वही 150 साल वाली जो ज्ञान है ना जो व्यवहारिक रूप

1937
02:16:40,000 --> 02:16:44,880
से पृथ्वी हां ज्ञान

1938
02:16:44,880 --> 02:16:47,920
सही आपने किया

1939
02:16:47,920 --> 02:16:52,480
मैं वापस जाता हूं क्योंकि मैं इस समय अपने कार्य भी कर रहा हूं

1940
02:16:52,480 --> 02:16:56,480
आपका बहुत धन्यवाद एनडी जी नहीं मेरा मेरा वास्तविक नाम

1941
02:16:56,480 --> 02:17:00,560
कुछ और है मैं आपसे फोन पे कनेक्टेड हूं मैंने कल आपको मैसेज भी किया था मेरा नाम

1942
02:17:00,560 --> 02:17:04,880
कुछ और है अच्छा अच्छा ठीक है आपको याद होगा मैंने उसके

1943
02:17:04,880 --> 02:17:08,880
ईश्वर सर्वशक्तिमान होने के यू नो नेहित

1944
02:17:08,880 --> 02:17:12,880
कुश मैंने आपको एक मैसेज किया था छोटा सा बहुत-बहुत धन्यवाद

1945
02:17:12,880 --> 02:17:18,030
जय श्री राम जी जी बहुत-बहुत धन्यवाद जय श्री जी जी

1946
02:17:18,030 --> 02:17:22,320
[गला साफ़ करने की आवाज़] सनातन शंकर जी स्वागत है जय श्री राम बताएं जय श्री राम

1947
02:17:22,320 --> 02:17:27,280
जय श्री राम बहुत बढ़िया आज आपने तो इनके सारे मतलब

1948
02:17:27,280 --> 02:17:31,840
परखच्चे उड़ा दिए बढ़िया किया शंकर भैया जय श्री राम

1949
02:17:31,840 --> 02:17:36,160
जय जय श्री राम। जय श्री राम जी। अच्छा एक और

1950
02:17:36,160 --> 02:17:40,720
जोड़ लीजिए। 18वा रूल था ना। अब एक 19वां रूल भी जोड़ लीजिए

1951
02:17:40,720 --> 02:17:44,720
कि सनातन शंकर जो है शिवा नारायण द्विवेदी जी के साथ

1952
02:17:44,720 --> 02:17:50,720
है इसलिए ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। [हंसी] ठीक है।

1953
02:17:51,440 --> 02:17:55,520
ठीक है। ये भी जोड़ लीजिए के भैया ये कोई मतलब

1954
02:17:55,520 --> 02:17:59,520
पॉइंट होता है क्या? अब वो घातक

1955
02:17:59,520 --> 02:18:04,080
मूवी का एक सीन है जिसमें के जब सनी देओल वहां पर

1956
02:18:04,080 --> 02:18:08,560
जाता है अपने भाई के दुकान पे तो वहां पर एक गुंडा सबको डरा रहा होता है

1957
02:18:08,560 --> 02:18:12,640
और सनी देओल उसे लापा मारता है एक अब

1958
02:18:12,640 --> 02:18:16,640
वो घूम जाता है बोलता है कौन है कौन है अच्छा उसे दिख रहा होता है कि सामने कौन है फिर भी

1959
02:18:16,640 --> 02:18:20,720
वो इधर कहता है कौन है कौन है कोई हाथ नहीं लगाने का वो इधर पकड़ लेता है उसको है ना कोई

1960
02:18:20,720 --> 02:18:24,960
हाथ नहीं लगाने का इसको रुक अभी मैं लेके आता हूं वो लेके आता है बड़े बंदे को वो

1961
02:18:24,960 --> 02:18:28,960
जैसे ही वो आता है तलवार लेके एक कि मैं गुस्से में गिर जाता वो बंदा। [हंसी]

1962
02:18:28,960 --> 02:18:32,960
वो ऐसे दिखता है कि ये क्या हो गया एकदम से यही हालत हो रखी है आर्य

1963
02:18:32,960 --> 02:18:37,280
समाजियों की आजकल। ठीक है? तो ये पूरे

1964
02:18:37,280 --> 02:18:41,520
बौखला गए हैं कि भैया ये एक अचानक से क्या हो गया? हमारे

1965
02:18:41,520 --> 02:18:45,520
इतने बड़े साइंटिस्ट, इतने बड़े आचार्य जवाब नहीं दे पा रहे

1966
02:18:45,520 --> 02:18:49,680
हैं। यह व्यक्ति बार-बार पूछ रहे हैं कि यदि प्रकट होना

1967
02:18:49,680 --> 02:18:53,840
मात्र ही अवतार है तो ईश्वर पहले से सर्वत्र प्रकट है। ये आप उनसे पूछिए ना

1968
02:18:53,840 --> 02:18:57,920
जाकर के भाई वो क्यों कह रहे हैं कि सूर्य, चंद्रमा इत्यादि के प्रकट करने

1969
02:18:57,920 --> 02:19:02,000
के रूप में प्रकट होता है वो। और ईश्वर का ज्ञान कैसे

1970
02:19:02,000 --> 02:19:06,000
प्रकट हो जाता है? चार ऋषियों के अंतकरण में क्या वहां पर

1971
02:19:06,000 --> 02:19:06,560
ईश्वर पहले

1972
02:19:06,560 --> 02:19:10,720
नहीं था? फिर ईश्वर ज्ञान क्यों दे रहा है वहां पे? सिर्फ इतनी सी

1973
02:19:10,720 --> 02:19:15,200
बात है पहले वो ज्ञान व्यवहार में नहीं था व्यवहारिक हो गया

1974
02:19:15,200 --> 02:19:19,760
आज सामने आकर बात कर लो ज्यादा अच्छे व्यवस्थित तरीके से हम कोई खा थोड़ी ना जाएंगे

1975
02:19:19,760 --> 02:19:24,880
इतना डर क्यों लग रहा है लिंक दिया महाप्रभु नहीं

1976
02:19:24,880 --> 02:19:29,120
अभी नहीं अभी नहीं करोगे व्यवस्थित

1977
02:19:29,120 --> 02:19:33,280
तरीके से ठीक है इंटरनेट में घुस के नहीं खा जाएंगे शंकराचार्य

1978
02:19:33,280 --> 02:19:37,360
के सैनिक है डर लगता होगा जाहिर सी बात है पर इतना मत डरो कि इंटरनेट

1979
02:19:37,360 --> 02:19:41,440
में घुस के भी खा जाएंगे आपको अभी अभी इतना सर्व अभी हम इतने सर्वशक्तिमान

1980
02:19:41,440 --> 02:19:45,520
नहीं हुए हैं। वो बात और है आर माजी ईश्वर तो इसमें बाधित होगा। अच्छा हां

1981
02:19:45,520 --> 02:19:49,920
बाधित से मुझे एक बात याद आ गई जो रह गई जरूरी बात थी।

1982
02:19:49,920 --> 02:19:54,960
उन्होंने एक तर्क दिया है कि ईश्वर जो मनुष्य करता है

1983
02:19:54,960 --> 02:19:59,200
जैसा जैसा करता जाता है वैसा वैसा जानता है। ठीक है? तो

1984
02:19:59,200 --> 02:20:03,200
ये तर्क किस बात पे दिया? जब मैं ये कह रहा हूं ईश्वर रोकता क्यों नहीं है? है

1985
02:20:03,200 --> 02:20:07,360
ना? तो अब क्या है कि कई बार ऐसा होता है जैसे

1986
02:20:07,360 --> 02:20:11,360
हमारे घर में बच्चे हैं वो गिरने वाले हैं। हमने देखा अरे गिर रही है जाके

1987
02:20:11,360 --> 02:20:15,360
बचा लिया संतान है बच्चे छोटे-छोटे बच्चे बालक हैं या

1988
02:20:15,360 --> 02:20:19,520
कुछ हो रहा है गलत होने वाला है हमें पता चल गया होने वाला है रोक लिया तो

1989
02:20:19,520 --> 02:20:21,680
वो ना रोकने के संबंध में ये कह

1990
02:20:21,680 --> 02:20:25,760
रहे हैं कि उसको तब पता लगता है जब वो हो मतलब जैसा जैसा वो करता जाता है वैसा वैसा पता

1991
02:20:25,760 --> 02:20:29,760
होता है उसे पहले से नहीं पता होता कि वो क्या करेगा उसके मन में क्या विचार

1992
02:20:29,760 --> 02:20:33,920
चल रहा है ये उसको नहीं पता होता त्रिकाल दर्शिता नहीं है मगर भाई ये तो पता

1993
02:20:33,920 --> 02:20:38,080
चल जाता है ना कि अब ये जो है अगर दुराचार हो रहा है किसी किसी बिटिया

1994
02:20:38,080 --> 02:20:42,080
के साथ दुष्कर्म हो रहा है तो वहां पर कुछ शुरुआती चीजें ऐसी होती है ना

1995
02:20:42,080 --> 02:20:46,400
जिससे वह दिख जाता है ईश्वर को कि यह होने वाला है अपराध

1996
02:20:46,400 --> 02:20:50,640
तब तो उसे अगर इसके उत्तर में आप यह दे रहे हो कि ईश्वर को पता नहीं होता

1997
02:20:50,640 --> 02:20:54,720
है मगर यह तो दिख रहा है ना कि ऐसी ऐसी क्रियाएं हो रही है जिससे कि अगली क्रिया आपको

1998
02:20:54,720 --> 02:20:58,880
मालूम पड़ सके तब भी नहीं रोकता है तो अगर वो तब भी नहीं रोक

1999
02:20:58,880 --> 02:21:03,040
पा रहा तो कितना निकृष्ट और कितना निर ईश्वर हो गया फिर ये सब विचारणीय

2000
02:21:03,040 --> 02:21:07,120
नहीं है इससे एक बात ये भी पता चलता

2001
02:21:07,120 --> 02:21:11,200
है शिवश भैया कि ईश्वर सही मायने में सब कुछ देख भी नहीं रहा

2002
02:21:11,200 --> 02:21:15,360
है। [हंसी] ईश्वर का उस ईश्वर के पास इतना भी ज्ञान

2003
02:21:15,360 --> 02:21:19,440
नहीं है कि इस व्यक्ति को देखो और उस व्यक्ति को ना देखे। ये तो इतना निम्न

2004
02:21:19,440 --> 02:21:23,600
स्तर तक बाधित हो गया। ईश्वर की मतलब जिसकी कोई प्रकाष्ठा नहीं

2005
02:21:23,600 --> 02:21:27,600
है। जिसको एक बाथरूम में नहाता हुआ व्यक्ति को पता हो रहा है बाहर

2006
02:21:27,600 --> 02:21:31,600
से कि कितना इतना तेज तेज पानी गिरा रहा है। मतलब पानी का वेस्टेज कर रहा है।

2007
02:21:31,600 --> 02:21:35,600
एक साधारण व्यक्ति को पता लेकिन उस ईश्वर को पता नहीं चल पा रहा है कि इसकी

2008
02:21:35,600 --> 02:21:37,040
प्रतिक्रियाएं ऐसी है

2009
02:21:37,040 --> 02:21:41,200
बाद में जाकर के इस बालिका के साथ कुछ ऐसा करेगा।

2010
02:21:41,200 --> 02:21:45,680
तो निरी ईश्वर हो गया। निरह ईश्वर का प्रमाण है। ये सर्वशक्तिमान

2011
02:21:45,680 --> 02:21:49,840
ईश्वर का बात करना ईश्वर के लिए उसको ईश्वर को बड़ा निरह कहने के समान

2012
02:21:49,840 --> 02:21:53,920
हो गया ना शास्त्र जी जय श्री राम स्वागत

2013
02:21:53,920 --> 02:21:58,560
है। बोले जय श्री राम भैया जय श्री राम

2014
02:21:58,560 --> 02:22:02,640
आज का लाइव तो बहुत जबरदस्त रहा जी जय

2015
02:22:02,640 --> 02:22:06,880
श्री राम मेरा आवाज क्लियर है जी बिल्कुल क्लियर जी जी क्लियर

2016
02:22:06,880 --> 02:22:10,880
जी बहुत बहुत आनंद आया बहुत आनंद आया आज का लाइव में

2017
02:22:10,880 --> 02:22:14,880
आपने पूरे परफेक्ट तो ऐसे ही उड़ा दिए हैं वो लोग क्या ही

2018
02:22:14,880 --> 02:22:18,880
बोलेंगे अब इससे कुछ बचा नहीं है बोलने को आपने

2019
02:22:18,880 --> 02:22:23,120
तो वैसे सभी पॉइंट क्लियर कर दिए एक-एक करके मैंने तो योगेश भारद्वाज

2020
02:22:23,120 --> 02:22:27,200
जी का ही पक्ष रखा कि ईश्वर अवतार क्यों क्यों नहीं ले सकता है? वो जो उन्होंने जोर

2021
02:22:27,200 --> 02:22:31,680
दे के कहा है वही बताया मैंने तो

2022
02:22:31,680 --> 02:22:35,680
जी जी बिल्कुल बिल्कुल तो वही बात है ये लोग

2023
02:22:35,680 --> 02:22:40,000
ऐसे ही करते रहते हैं। आनंद तो आज बहुत मजा आया मुझे देख

2024
02:22:40,000 --> 02:22:44,160
के। आर्य समाजियों के पास भजन का अनुभव नहीं है। लकीर

2025
02:22:44,160 --> 02:22:48,720
के फकीर है। अगर होता है तो वो ऐसी मूर्खता की बातें नहीं करते।

2026
02:22:48,720 --> 02:22:52,800
देखो भाई कह रहे हैं कि भाई इनका एक वीडियो आया

2027
02:22:52,800 --> 02:22:56,880
नया तो भाई वीडियो तो आता ही रहेगा। ऐसा कुछ थोड़ी ना

2028
02:22:56,880 --> 02:23:01,040
हो गया कि वो अपनी फैक्ट्री बंद कर देंगे। सही बात है। भाई मंदिर कैसे चलेंगे

2029
02:23:01,040 --> 02:23:05,600
आर्य समाज के? जहां विवाह होता है ₹5100 में

2030
02:23:05,600 --> 02:23:09,600
तो कैसे चलेंगे? फैक्ट्री तो नहीं बंद हो जाएगी। मगर जब तक वो सामने

2031
02:23:09,600 --> 02:23:14,080
थे उनकी वो गिग्गी बंधी थी।

2032
02:23:14,080 --> 02:23:20,080
याद रहेंगे करंट छू करके गया मुझे। टच

2033
02:23:20,320 --> 02:23:24,960
झटका जोर का झटका हाय धीरे से लगा और वो

2034
02:23:24,960 --> 02:23:29,040
और वो अगर जो कूदते नहीं इधर से उधर इधर से उधर अगर बार बार जल्दी जल्दी

2035
02:23:29,040 --> 02:23:33,120
कूदते नहीं तो मैं उनकी वैदिक रश्म थ्योरी जो थी ना वो

2036
02:23:33,120 --> 02:23:37,920
बल इत्यादि वाली सब थ्योरी सब ढेर की ढेर होने वाली थी थोड़ी देर में

2037
02:23:37,920 --> 02:23:42,000
कुछ ना बचता अंत में ये आता पशु बल है अवतार नहीं ले सकता बस

2038
02:23:42,000 --> 02:23:46,080
पशु बलि है अरे भैया

2039
02:23:46,080 --> 02:23:50,160
आपके में चल रहा है। हां यह

2040
02:23:50,160 --> 02:23:54,400
जो यह जो चल रहा है भैया ऐसा लग रहा है जैसे वो नहीं होता आपने एक

2041
02:23:54,400 --> 02:23:59,760
जो वीडियो था जिसमें यह तो सपना है यह तो सपना है

2042
02:23:59,760 --> 02:24:03,840
वो वाला वो वाला चल रहा है [हंसी] ये लोगों

2043
02:24:03,840 --> 02:24:07,920
को सब कुछ आगे धो के चल जा रहे हैं लेकिन लोग जी लाइव जुड़ने का

2044
02:24:07,920 --> 02:24:11,920
प्रयास कर रहे हैं जतिन जी आप जुड़ जाइए बहुत लंबी चर्चा अब नहीं करनी है क्योंकि यह

2045
02:24:11,920 --> 02:24:16,240
वीडियो भारद्वाज जी तक भी जाना है तो इसलिए

2046
02:24:16,240 --> 02:24:20,320
भारद्वाज जी के लिए वीडियो एक घंटे घंटे 50 मिनट का ही है। उसके आसपास

2047
02:24:20,320 --> 02:24:24,320
वीडियो पूरा हो गया था तो वही तक के लिए तो इसलिए बहुत ज्यादा लंबा कर देंगे

2048
02:24:24,320 --> 02:24:28,400
तो भारद्वाज जी को भय लगने लगेगा तीन घंटे कैसे देखूंगा इस बात

2049
02:24:28,400 --> 02:24:32,720
का ध्यान भी रखना जी हां वो भी देखते हैं ना आप जुड़ जाइए जतिन

2050
02:24:32,720 --> 02:24:36,160
जी फिलहाल जी

2051
02:24:36,160 --> 02:24:40,400
जी जतिन जी बोले

2052
02:24:40,400 --> 02:24:44,640
राम मनोहर जी मैं स्टेज को खाली कर दूं आवाज आ रही है सर आपको

2053
02:24:44,640 --> 02:24:48,640
मेरी जय श्री राम सर जय श्री राम जय श्री राम

2054
02:24:48,640 --> 02:24:52,640
सर मैं आपकी जो मतलब आप मैं अभी भी कई चीजों से ना सर

2055
02:24:52,640 --> 02:24:57,120
एग्री करता हूं। मैं अभी जैसे हिंदूइज़्म प्रैक्टिस करना शुरू करूंगा ना

2056
02:24:57,120 --> 02:25:01,280
तो मैं आपकी कई चीजों से एग्री करता हूं। मतलब किस परंपरा से जुड़ना

2057
02:25:01,280 --> 02:25:05,440
चाहिए मुझे? मतलब परंपरा तो जरूरी है ना। नहीं तो सब अपनीप परंपरा बना रहे हैं। आपको

2058
02:25:05,440 --> 02:25:09,600
भी पता है। हमने सिद्धांत बताया है। परंपरा जो प्रामाणिक

2059
02:25:09,600 --> 02:25:13,840
परंपराएं हैं कुछ के नाम है ही है। शंकराचार्य परंपरा रामानुज

2060
02:25:13,840 --> 02:25:17,840
रामानुजाचार्य हो गए। मधवाचार्य जी हो गए। मैं बोल रहा

2061
02:25:17,840 --> 02:25:21,920
हूं। मुझे बोलने दीजिए। शंकराचार्य परंपरा, रामानुजाचार्य परंपरा, मधवाचार्य

2062
02:25:21,920 --> 02:25:26,080
परंपरा और नारकाचार्य परंपरा और जो है

2063
02:25:26,080 --> 02:25:30,240
गड़िया वैष्णव परंपरा में भी जा सकते हैं। तो ये सब परंपराएं हैं। इनसे

2064
02:25:30,240 --> 02:25:34,400
आप जुड़ सकते हैं और शंकराचार्य का विरोध करने से बस बचिएगा।

2065
02:25:34,400 --> 02:25:38,400
सभी कहीं भी जाए और इसके साथ ही

2066
02:25:38,400 --> 02:25:42,880
साथ आपका परम जो निर्णायक हो धर्म का वो उसमें

2067
02:25:42,880 --> 02:25:47,120
विरक्तता होनी चाहिए। सन्यास के लक्षण होने चाहिए और समस्त

2068
02:25:47,120 --> 02:25:51,280
श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा देते हो और अंतत गथवा

2069
02:25:51,280 --> 02:25:55,280
जो आपका अज्ञानता रूपी अंधकार है संशय है वो दूर कर दे ये

2070
02:25:55,280 --> 02:25:59,360
सारे पैरामीटर जहां पर सेट हो जाए जिस महानुभाव के साथ

2071
02:25:59,360 --> 02:26:03,440
वही आपके गुरु बन सकते हैं ठीक है मैं जैसे आपको एक साल

2072
02:26:03,440 --> 02:26:07,840
से फॉलो कर रहा हूं ना तो कल मैं आर्य समाज का वो रिप्लाई

2073
02:26:07,840 --> 02:26:11,840
आया था ना उनका अग्निव्रत जी हो गए तो उनके वहां पर कमेंट सेक्शन में

2074
02:26:11,840 --> 02:26:16,480
तो मेरी बहस हो गई थी तो बोले तुम्हारा वेदव्यास मुझको

2075
02:26:16,480 --> 02:26:20,560
अच्छा हां तुम्हारा भी इतिहास वो बोले

2076
02:26:20,560 --> 02:26:24,720
कोई और बोला वो मुझे बोले थे उनका कोई आर्य आर्य

2077
02:26:24,720 --> 02:26:28,720
करके था वो कोई उनका वो होगा मतलब आर्य समाज का ही होगा उसमें कुछ

2078
02:26:28,720 --> 02:26:33,920
कह नहीं सकते उन्होंने खुद नहीं बोला होगा

2079
02:26:33,920 --> 02:26:37,920
ठीक है ठीक है जतिन जी और कोई बात हो तो आप WhatsApp पर संपर्क

2080
02:26:37,920 --> 02:26:42,080
कर ले जी किया था मैंने आपको WhatsApp पे बीच में संपर्क

2081
02:26:42,080 --> 02:26:46,560
कई बहुत टाइम हो गया फिर कर लीजिएगा ठीक है

2082
02:26:46,560 --> 02:26:52,560
जय श्री राम ओके जय श्री राम

2083
02:26:53,680 --> 02:26:59,440
अनिकेत जी जय श्री राम

2084
02:26:59,440 --> 02:27:05,440
जी जय श्री राम भैया प्रणाम भैया जी

2085
02:27:07,200 --> 02:27:11,600
हां ये कह रहा था भैया कि आपने उसमें ये भी पूछा था कि याज्ञवल्

2086
02:27:11,600 --> 02:27:15,680
जी के ऊपर भी आपने पूछा था कि याज्ञवल् जी का ज्ञान आपका कहां से आया तो उन्होंने वहां पर

2087
02:27:15,680 --> 02:27:19,840
भी यही कहा कि ये कहां से आए? ये क्यों पूछ रहे हो? [हंसी]

2088
02:27:19,840 --> 02:27:23,840
कहीं से भी आए हो। कहां से आए हो? मतलब कुछ

2089
02:27:23,840 --> 02:27:28,480
भी हो मत पूछो। अच्छा मंत्र आ गए हैं तो मंत्र अच्छा तुम्हारा

2090
02:27:28,480 --> 02:27:32,480
मंत्र हमारे पास आए। तुम्हारा व्यक्ति स्पष्ट रूप

2091
02:27:32,480 --> 02:27:36,480
से पलायन कर रहा है। प्रश्नों से कह रहा है ये मत पूछो। कहीं से भी आया ये सब कर रहा

2092
02:27:36,480 --> 02:27:40,480
है। तुम कह रहे हो तुम वहां से भाग गए। भाई मैं दूसरे की चौखट पर खड़ा

2093
02:27:40,480 --> 02:27:44,560
हुआ हूं। मेरा कितना भी अपमान हो सकता है वहां पर ना।

2094
02:27:44,560 --> 02:27:48,560
वह तो मैंने साहस दिखाया कि मैं वहां गया। जैसे ही पता चलेगा कि अब यहां अपमान

2095
02:27:48,560 --> 02:27:49,200
हो सकता है

2096
02:27:49,200 --> 02:27:53,360
और मेरे रूप में वहां पर मेरा सिद्धांत है। मेरे रूप में वहां पर कईयों की निष्ठा

2097
02:27:53,360 --> 02:27:57,520
है। मैं उसकी गरिमा की भी तो रक्षा करूंगा। जैसे ही मुझे पता लगेगा

2098
02:27:57,520 --> 02:28:01,520
भाई यहां पर मेरा सम्मान नहीं होगा। यहां से आगे मेरी चीजों पर गलत तरीके

2099
02:28:01,520 --> 02:28:06,080
से कटाक्ष किया जा रहा है। तो मैं वहां से हटूंगा ही ना भाई। और

2100
02:28:06,080 --> 02:28:10,160
वहां पर बराबरी से उत्तर देने का मेरे पास अधिकार नहीं है। मैं तो उसकी चौखट पे

2101
02:28:10,160 --> 02:28:14,240
हूं। जब मैं बराबरी से बराबर वाली जगह

2102
02:28:14,240 --> 02:28:18,720
थी तो भ गया था। अकेला था। 50 लोगों से भिड़ गया था। कहां पर?

2103
02:28:18,720 --> 02:28:22,960
गंगा के घाट पर। इस वाली मंडली से

2104
02:28:22,960 --> 02:28:27,360
जब मेरे पास वहां पर समान अधिकार है ही नहीं और वो व्यक्तिगत कटाक्षों

2105
02:28:27,360 --> 02:28:31,360
पर उतर रहे हैं। यद्यपि मेरी शैली नहीं है कि मैं भी उनके साथ उसी शैली में

2106
02:28:31,360 --> 02:28:35,440
उतरू। एक हद तक जाऊंगा। अगर वो अमर्यादित हो जाएंगे तो मैं तब भी वहां से वापस

2107
02:28:35,440 --> 02:28:39,440
ही आऊंगा। मगर उस अमर्यादित जो मर्यादा

2108
02:28:39,440 --> 02:28:43,520
का उल्लंघन पूर्वक वहां जो चीजें होने वाली हैं वो करने के लिए भी

2109
02:28:43,520 --> 02:28:47,520
मेरे पास समान अधिकार थोड़ी ना है। वो कोई न्यूट्रल जगह थोड़ी ना थी। उनकी चौखट पर

2110
02:28:47,520 --> 02:28:51,920
खड़ा था मैं। ये अंतर होता है।

2111
02:28:51,920 --> 02:28:56,000
वहां से आना ही मेरे मेरे लिए था ना। अभी मैं हंस हंस तीर्थ

2112
02:28:56,000 --> 02:29:00,160
क्षेत्र में जो कब्जा करके बैठे हुए हैं वहां गया था। उसने

2113
02:29:00,160 --> 02:29:04,320
क्या क्या बोलने लगा? आपको कुछ नहीं आएगा। वहां से मुझे वापस आना पड़ा निकल कर के।

2114
02:29:04,320 --> 02:29:10,320
वहां क्या कर करता मैं? हां तर्कों से प्रश्नों से उसको हरा दिया था।

2115
02:29:10,320 --> 02:29:15,280
भागवतानंद के यहां गया था। भागवतानंद ने जब कह दिया कि भाई मैं उत्तर नहीं दूंगा

2116
02:29:15,280 --> 02:29:19,440
तो वहां से मैं आ गया कि वहां बैठा रहूं मैं अपना अपना

2117
02:29:19,440 --> 02:29:25,040
अपमान कराने के लिए। जब वहां व्यक्तिगत हो रहा है व्यक्ति

2118
02:29:25,040 --> 02:29:28,400
जी अंकित जी बोलिए।

2119
02:29:28,400 --> 02:29:32,800
तो यही याज्ञवलक वाला प्रश्न फिर आगे बढ़ा भैया

2120
02:29:32,800 --> 02:29:36,960
तो वहां पर यह देखने मिला कि वह निर्णायक हो रहे थे। आप निर्णायक नहीं हुए। आपने

2121
02:29:36,960 --> 02:29:41,600
बोला कि कहां से आया है? मोहम्मद से आया कहां से आया? आपने ये

2122
02:29:41,600 --> 02:29:45,680
प्रश्न किया उनसे कहां से आया? और उन्होंने निर्णय लिया। मोहम्मद से तो

2123
02:29:45,680 --> 02:29:49,760
तुमने लाया है। बलि लाया है। तो ये भी एक गौर करने वाली बात है कि

2124
02:29:49,760 --> 02:29:55,760
आप वहां पर निर्णायक नहीं बने। आपने प्रश्न किया। वो निर्णायक बन रहे थे जबरदस्ती।

2125
02:29:56,320 --> 02:30:00,800
वो इनकी शैली यही होती है ना कि सामने वाले को मोरली डाउन करो।

2126
02:30:00,800 --> 02:30:04,800
सिद्धांत तो है नहीं तो क्या करें? ये भाई साहब पूछ रहे हैं आपने जो है शंकराचार्य

2127
02:30:04,800 --> 02:30:08,800
से व्यास देव तक ढाई हजार सालों में चार ही गुरु दिखाए। इसका जवाब दे दिया है

2128
02:30:08,800 --> 02:30:12,800
भाई। देख लो वीडियो में। इसका जवाब दे दिया इसी वीडियो में।

2129
02:30:12,800 --> 02:30:16,960
अभी ट्रांसक्रिप्ट आ जाएगी। दो तीन घंटे बाद ट्रांसक्रिप्ट से सर्च कर लेना। सुखदेव

2130
02:30:16,960 --> 02:30:21,520
जी नाम से सर्च करना मिल जाएगा आपको।

2131
02:30:21,520 --> 02:30:24,160
ठीक है?

2132
02:30:24,160 --> 02:30:28,320
उसका भी तो उत्तर नहीं देने दिए ना। इसका भी तो उत्तर

2133
02:30:28,320 --> 02:30:32,400
कहां देने दिए? क्लियर हो जाता है। बिल्कुल मैं दे रहा था तो उन्होंने

2134
02:30:32,400 --> 02:30:36,480
कहा कि नहीं तुम तो मंत्र का अर्थ बताओ। वो समझ गए थे ना कि क्या

2135
02:30:36,480 --> 02:30:40,720
देने वाले थे। वो इसलिए समझ गए थे कि भैया अब ये सुखदेव

2136
02:30:40,720 --> 02:30:44,800
जी तो मोक्ष प्राप्त है तो वो बता देंगे। इसलिए उन्होंने बोला नहीं रोक दो रोक

2137
02:30:44,800 --> 02:30:48,880
समझ गया मैं। तो काफी जगह पर ना वो पहले से वो समझ जा रहे परंपरा

2138
02:30:48,880 --> 02:30:53,120
में वो पहले से समझ गए कि मेरी परंपरा का खंडन होने वाला है। वहां पर वो उन्होंने रोक

2139
02:30:53,120 --> 02:30:57,360
दिया और तर्क में वहां पर भी बोला फिर शास्त्र

2140
02:30:57,360 --> 02:31:01,440
प्रमाण पर चले गए। शास्त्र प्रमाण में बोला तो बोला हमारे वाला ही मानो है ना यह

2141
02:31:01,440 --> 02:31:05,520
तुम्हारे वाला गलत है। तुम्हें कुछ पता नहीं है। मैं तो बहुत बड़ा साइंटिस्ट हूं। तो

2142
02:31:05,520 --> 02:31:09,600
मैं सोच रहा हूं अगर इतने बड़े साइंटिस्ट हैं तो साइंस पे भी आ जाए डिबेट कर ले

2143
02:31:09,600 --> 02:31:11,760
भाई। हम तो खुला चैलेंज देते हैं नास्तिकों

2144
02:31:11,760 --> 02:31:15,760
को। एक नास्तिक आया था वो जिओसेंट्रिक मॉडल और उस

2145
02:31:15,760 --> 02:31:19,840
पे भी आया था। तो भैया अगर तुम्हें उस पर भी करना है वह तत्व पर और जो

2146
02:31:19,840 --> 02:31:23,840
एटम के उस पर तो वहां पर भी आ जाओ। वहां पर भी तुम्हें जितना हमें

2147
02:31:23,840 --> 02:31:27,840
हमारे गुरुदेव का ज्ञान है उस हिसाब से हम आपका तो खंडन वहां कर ही देंगे।

2148
02:31:27,840 --> 02:31:31,840
है ना? जो सृष्टि की संरचना का सिद्धांत पृथ्वी कैसे बनी है सिद्धांत जो

2149
02:31:31,840 --> 02:31:35,840
हमारे गुरुदेव ने हमें दिया है वो आप दे ही नहीं सकते। जितना अच्छे से एक्सप्लेनेशन

2150
02:31:35,840 --> 02:31:40,000
वहां पर है। अरे इनकी बातें मैंने देखी है। ओम रश्मि

2151
02:31:40,000 --> 02:31:45,280
थ्योरी इत्यादि की है। सब बंडल है कुछ नहीं है। बंडल थ्योरी

2152
02:31:45,280 --> 02:31:49,680
हम अच्छा जैसे न्यूटन लॉ ऑफ ग्रेविटी

2153
02:31:49,680 --> 02:31:54,080
न्यूटन ने ग्रेविटी की खोज की थी वैसे ही

2154
02:31:54,080 --> 02:31:58,160
जो ज्ञान रूप में प्रकट हुआ ईश्वर जो आपने अभी भी कहा था वीडियो में कि ज्ञान

2155
02:31:58,160 --> 02:32:02,160
रूप में ईश्वर तब प्रकट हुआ जब किसी ने उसे रियलाइज किया है

2156
02:32:02,160 --> 02:32:06,160
ना ऐसे ही कुछ बोला ना उन्होंने कि जैसे किसी ने अनुभव किया कि अच्छा ये चीज

2157
02:32:06,160 --> 02:32:10,240
है उसी वक्त ज्ञान रूप में प्रकट हो गया ईश्वर तो जैसे

2158
02:32:10,240 --> 02:32:14,240
गुरुत्वाकर्षण शक्ति किसी को नहीं पता थी कि वो शक्ति काम कर रही है बस न्यूटन ने

2159
02:32:14,240 --> 02:32:18,320
खोजा तो वो शक्ति काम करने लग गई। उससे पहले तो वह शक्ति काम ही नहीं कर रही

2160
02:32:18,320 --> 02:32:22,800
थी। भाई कैसा लॉजिक लाते हो? इसमें तो कोई मतलब

2161
02:32:22,800 --> 02:32:27,040
जितने भी सूडो साइंट है हां ये सही कह रहे हैं। काफिर आजम सूडो साइंस

2162
02:32:27,040 --> 02:32:33,040
है। सूडो साइंटिस्ट सारे के सारे जी संकल्प जी बोले जय श्री राम।

2163
02:32:33,840 --> 02:32:36,880
आ रही है आवाज भैया।

2164
02:32:36,880 --> 02:32:41,040
जी आ रही है। प्रणाम शंकर भैया प्रणाम शिवश भैया

2165
02:32:41,040 --> 02:32:45,120
प्रणाम। आवाज आपकी बहुत स्लो हो गई अभी भी पहले तेज आ रही थी। अब आ

2166
02:32:45,120 --> 02:32:49,200
रही है? जी हां प्रणाम जय हो जय

2167
02:32:49,200 --> 02:32:53,200
हो थैंक यू भैया और मैं काफी दिन से मैं सोच रहा था

2168
02:32:53,200 --> 02:32:57,280
किसी आर्य समाज के किसी एक मतलब मेन जो चेहरा है ना उसको आप थोड़ा करो

2169
02:32:57,280 --> 02:33:01,360
क्यों ये लोग जो श्री राधा का भगवान कृष्ण का जैसे अपमान करते

2170
02:33:01,360 --> 02:33:05,440
हैं आप इनके वीडियोस देखोगे ना तो मतलब एक वीडियो मैंने गलती से देख ली कि

2171
02:33:05,440 --> 02:33:09,440
क्या बोलते क्या है कि इनकी क्या थॉट है तो इतने गंदे गंदे शब्द की

2172
02:33:09,440 --> 02:33:14,400
पूरा मोरल डाउन हो गया पूरा दिमाग खराब हो गया और शब्द नहीं खाली वो आप

2173
02:33:14,400 --> 02:33:18,400
YouTube पर YouTube ऊपर देखे इनके वीडियोस ये भगवान

2174
02:33:18,400 --> 02:33:22,560
कृष्ण का राधा रानी का इतना गंदा अपमान हर कुछ शब्द जम्मू में आ रहे हैं वो

2175
02:33:22,560 --> 02:33:26,720
और अभी जैसे शब्द ही नहीं अब इन्होंने जैसे अभी जिनका आपने

2176
02:33:26,720 --> 02:33:31,280
भी खंडन किया इनका नाम याद नहीं है मेरे को अभी इन्होंने वीडियो बनाया था आपके ऊपर कि है ना

2177
02:33:31,280 --> 02:33:35,280
अग्निव्रत जी के सपोर्ट में तो उन्होंने भी कृष्ण भगवान के बारे में कहा ना कि लीला

2178
02:33:35,280 --> 02:33:39,280
करते हैं गोपियों के वस्त्र चुड़ते हैं तो वो शब्द बोल सकते हैं खाली कि हां मैं शब्दों से

2179
02:33:39,280 --> 02:33:42,160
बता रहा हूं लेकिन वो साथ में वो अर्धन फोटो लगा रहे

2180
02:33:42,160 --> 02:33:46,320
वहां पे उनको उनके देख लो क्या लेवल उनका तो थैंक यू

2181
02:33:46,320 --> 02:33:50,400
यही कह रहा था मैं आपको और बाकी वो एक भैया कह रहे थे कि इनसे रहना हाथापाई पर

2182
02:33:50,400 --> 02:33:54,480
जाते हैं सच्ची में मेरे किसी दोस्त की बहन पे किसी ने भगा ली थी तो

2183
02:33:54,480 --> 02:33:58,480
हम जैसे मैं राजस्थान से हूं तो दिल्ली थे तो हमें पता लगा हम दिल्ली गए अब जब

2184
02:33:58,480 --> 02:34:02,560
तक उनकी शादी हो चुकी थी अब वो लड़की भी उनके साथ ही थी तो हम कहते नहीं फिर हमने

2185
02:34:02,560 --> 02:34:06,880
उनसे मैंने कहा उनको कि मतलब तुम यही करवा सकते हो नाश कर रखा है धर्म का

2186
02:34:06,880 --> 02:34:10,880
और जो लड़कियां भगा के तुम शादी करवा रहे हो तो हाथापाई पर आ गए हाथापाई करने लग गए

2187
02:34:10,880 --> 02:34:15,040
हो भेज दिया उन्होंने

2188
02:34:15,040 --> 02:34:21,040
आदित्य नारायण जी को लिंक देना है।

2189
02:34:22,640 --> 02:34:27,040
एक बार लिंक और दे दीजिए। ये

2190
02:34:27,040 --> 02:34:33,040
नहीं बढ़िया बढ़िया इनका ध्यान।

2191
02:34:33,520 --> 02:34:38,320
ठीक है भैया। धन्यवाद। प्रणाम धन्यवाद।

2192
02:34:38,320 --> 02:34:42,320
लिंक दे दीजिए एक बार। ये मिल गया। आदित्य जी आपको लिंक दे दिया है देखो

2193
02:34:42,320 --> 02:34:46,320
नीचे। आदित्य जी बस जुड़े क्योंकि समापन की ओर है।

2194
02:34:46,320 --> 02:34:50,240
ढाई घंटे हो चुके हैं।

2195
02:34:50,240 --> 02:34:54,640
भैया ये जो योगेश भारद्वाज जी का जो चैनल पे आज मतलब जो वीडियो अपलोड

2196
02:34:54,640 --> 02:34:59,280
हुआ था उसमें क्या है उसमें वो क्या बोल रहे थे कि आपका

2197
02:34:59,280 --> 02:35:04,000
आपका जो अर्थ है ना वो मनमुखी है क्योंकि आप हिंदी में बता रहे थे।

2198
02:35:04,000 --> 02:35:08,240
ये बहुत मेरे को आशास्पद लगा कि जब आप मंत्र का अर्थ हिंदी

2199
02:35:08,240 --> 02:35:12,240
में बता रहे तो बोलते हैं कि मनमुखी है और उनका अर्थ मनमुखी

2200
02:35:12,240 --> 02:35:18,240
इसलिए नहीं क्योंकि वो संस्कृत में मंत्र पढ़ रहे थे।

2201
02:35:19,120 --> 02:35:23,280
अरे सब ये बहाने हैं संस्कृत और हिंदी के ना बात

2202
02:35:23,280 --> 02:35:26,560
ये मैं बताऊं क्या है

2203
02:35:26,560 --> 02:35:30,640
लोगों ने अपनी मन की बातों को धर्म के रूप में सिद्ध करने

2204
02:35:30,640 --> 02:35:34,880
के लिए एक खेल खेला है। वेद से जोड़कर

2205
02:35:34,880 --> 02:35:39,520
बहुत बड़ा एक जंजाल बना रखा है वेद वैदिक वांगमय से जोड़कर

2206
02:35:39,520 --> 02:35:43,520
अब उस जंजाल में घुसकर उसमें भेद करके और जो है सत्य

2207
02:35:43,520 --> 02:35:48,160
को सिद्ध करने के लिए एक बहुत लंबी समय अवधि लगेगी।

2208
02:35:48,160 --> 02:35:52,160
हर जगह से हर चीज सटीकता के साथ जो होनी चाहिए।

2209
02:35:52,160 --> 02:35:56,880
तो इतना दीर्घ काल से यह सब हो रहा है। इतना समय हो चुका है

2210
02:35:56,880 --> 02:36:02,160
कि इन्होंने जो माथा मथैया कर रखा है शास्त्रों के नाम पे

2211
02:36:02,160 --> 02:36:04,960
उसमें बड़ी

2212
02:36:04,960 --> 02:36:05,600
जटिलता

2213
02:36:05,600 --> 02:36:09,840
इन्होंने डाल दी है कि कहां से किधर से आओगे ऐसे करके बहुत

2214
02:36:09,840 --> 02:36:14,080
सारी चीजें तो इसीलिए इस जटिलता से इस जटिलता

2215
02:36:14,080 --> 02:36:18,160
रूपी इनका जो हथियार है उससे आपको

2216
02:36:18,160 --> 02:36:22,640
सुरक्षा प्रदान करने के लिए भगवान ने आपको एक ब्रह्मास्त्र

2217
02:36:22,640 --> 02:36:26,800
दिया है। उस ब्रह्मास्त्र का नाम होता है परंपरा। आ

2218
02:36:26,800 --> 02:36:29,360
जाओ।

2219
02:36:29,360 --> 02:36:33,600
तो इसलिए बहुत ज्यादा जब व्यक्ति प्रमाण के रूप में अपने

2220
02:36:33,600 --> 02:36:37,840
अर्थ को प्रचारित करने का प्रयास करता है तब बात आती है

2221
02:36:37,840 --> 02:36:41,920
परंपरा की। ये बार-बार एक ही प्रश्न किया

2222
02:36:41,920 --> 02:36:46,720
जा रहा है। भैया वीडियो को देख लो। जवाब दे दिया गया है। अंधे मत बनो।

2223
02:36:46,720 --> 02:36:50,720
और ज्यादा दिक्कत है तो सामने आकर बात कर लो। हां

2224
02:36:50,720 --> 02:36:55,040
जी आदित्य नारायण पांडे जी बताएं।

2225
02:36:55,040 --> 02:37:00,720
नारायण भैया नारायण नारायण नारायण जी

2226
02:37:00,720 --> 02:37:05,120
कह रहे हैं कि एक बड़ी रहस्य की बात है सबको हम बताते हैं आर्य

2227
02:37:05,120 --> 02:37:09,200
समाजियों में कई उपस संप्रदाय होते हैं जो प्रत्यक्ष नहीं

2228
02:37:09,200 --> 02:37:13,520
दिखते अंदर अंदर दिखते हैं पर वो सभी उपस संप्रदाय

2229
02:37:13,520 --> 02:37:17,600
जो है अब इकट्ठा हुए हैं। यह जितने भी आचार्य अग्निव्रत जी

2230
02:37:17,600 --> 02:37:21,920
के समर्थन में आर्य समाजी गण आ रहे हैं, वे सभी आर्य समाजी

2231
02:37:21,920 --> 02:37:26,160
गण आचार्य जी के रसमी थ्योरी को स्वयं फर्जी घोषित कर चुके हैं अथवा फर्जी

2232
02:37:26,160 --> 02:37:30,160
ही मानते हैं। मेरा तो मैंने तो उस थ्योरी को पढ़ा

2233
02:37:30,160 --> 02:37:34,240
नहीं है। अतः उस दिव्य थरी के बारे में मेरा कोई विचार नहीं है। अभी

2234
02:37:34,240 --> 02:37:38,320
तो जैसे आचार्य जी ने एक वीडियो बनाया था अग्निव्रत नष्टिक जी ने कि

2235
02:37:38,320 --> 02:37:42,640
हनुमान जी कैसे उड़ के गए। उन्होंने कहा कि रश्मि के माध्यम से उड़ के गए।

2236
02:37:42,640 --> 02:37:46,960
उनका शरीर रबड़ जैसे हो गया। जैसे रबड़ खींचने पर तन जाता है। स्प्रिंग

2237
02:37:46,960 --> 02:37:50,960
दबाने पर उठ जाती है। ऐसे हनुमान जी उड़ के गए। इसमें कुछ आर्य समाजियों

2238
02:37:50,960 --> 02:37:54,960
का मतलब उन्होंने माना कि छलांग मार के गए। अब इसमें कुछ आर्य समाजियों का

2239
02:37:54,960 --> 02:37:58,960
ऐसा मानना है कि हनुमान जी बहुत जोर जोोर से तैरते हुए गए

2240
02:37:58,960 --> 02:38:03,440
क्योंकि तैरने का वेग बहुत ज्यादा था इसलिए बोल दिया उड़ के गए।

2241
02:38:03,440 --> 02:38:07,840
जैसे हम लोग जोर से साइकिल चलाते हैं तो बोलते बहुत उड़ रहे हैं।

2242
02:38:07,840 --> 02:38:10,480
जहां अपना मत सिद्ध ना हो वही अरे

2243
02:38:10,480 --> 02:38:14,640
आज समाजी इनसे सहमत नहीं है। वो बात तो एक अलग है। ये खुद

2244
02:38:14,640 --> 02:38:18,880
दयानंद जी एंड पार्टी की जो मूल धारा है उससे खुद को अलग मानते हैं।

2245
02:38:18,880 --> 02:38:23,200
बातें सुनिएगा। यह स्वयं को ही मंत्र दृष्टा टाइप से

2246
02:38:23,200 --> 02:38:27,200
सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। बोलते मैंने ध्यान साधना लगा के

2247
02:38:27,200 --> 02:38:31,200
ज्ञान विज्ञान प्राप्त किया है। मैंने भाष से किया है। तो

2248
02:38:31,200 --> 02:38:35,360
गुरु परंपरा इनकी अपने आप ही अपनी खुद एक नई गुरु परंपरा बताते हैं।

2249
02:38:35,360 --> 02:38:39,440
ये कल जो परसों वो लाइव हो रहा था उस लाइव में भी एक बार को बोल

2250
02:38:39,440 --> 02:38:43,840
गए थे। मैं तो अपनी बात कर रहा हूं। दयानंद जी की बात ही नहीं कर रहा हूं। लो

2251
02:38:43,840 --> 02:38:48,000
और फिर मैंने पूछा आपकी कह दिया फिर मैंने ये कह

2252
02:38:48,000 --> 02:38:52,000
दिया ना तो घोषित कर दो समाज नहीं हूं तो इन्होंने फिर उसका जवाब नहीं दिया उस

2253
02:38:52,000 --> 02:38:54,400
बात का

2254
02:38:54,400 --> 02:38:58,400
वही बात है ना अब कोई कहता है कि जी मेरे को हिमालय में मैं गया था वहां मुझे

2255
02:38:58,400 --> 02:39:02,400
ज्ञान मिल गया तो मेरे गुरु का नाम मत पूछो क्योंकि मुझे ज्ञान हिमालय

2256
02:39:02,400 --> 02:39:06,400
में मिल गया तो मैंने उनसे कहा था कि भैया जैसे आपको हिमालय में ज्ञान मिल

2257
02:39:06,400 --> 02:39:10,480
गया वैसे हमें भी मिल जाएगा आप अपना रास्ता देखिए अब आर्य समाज वाले भी ऐसे ही

2258
02:39:10,480 --> 02:39:14,800
है कि जैसे दयानंद जी को अपने आप वो मंत्र का अर्थ प्रकट हो गया तो अग्निव्रत

2259
02:39:14,800 --> 02:39:18,880
जी को भी अपने आप मंत्र का अर्थ प्रकट हो रहा है। आगे वाले सबको अपने आप मंत्र का अर्थ

2260
02:39:18,880 --> 02:39:24,160
प्रकट हो जाएगा ना। यही सिद्धांत है उनका। सीधी सी बात है।

2261
02:39:24,160 --> 02:39:25,600
एक एक और मैं

2262
02:39:25,600 --> 02:39:29,680
बताता हूं। मैं एक बात जरूर कहूंगा कि मुझे लगता है कि

2263
02:39:29,680 --> 02:39:33,680
अग्निव्रत जी से तो कहीं ज्यादा अच्छा जो चर्चा के लिए

2264
02:39:33,680 --> 02:39:37,920
जो उपस्थित होने वाला व्यक्ति था वो था निर्भय आर्य।

2265
02:39:37,920 --> 02:39:42,080
निर्भय ने कहीं ना कहीं जो पक्ष को रखा था तो थोड़ा सॉलिड तैयारी

2266
02:39:42,080 --> 02:39:46,080
के साथ आया था। इनसे तो कहीं ज्यादा आगे थी। बात अलग है। हमारा सिद्धांत अकाट है

2267
02:39:46,080 --> 02:39:50,240
और व्यक्ति को एक जगह जाकर के फिर वो वो सगुण निराकार में ही अवतार

2268
02:39:50,240 --> 02:39:54,240
की सिद्धि हो जाती है। अगर स्वरूप विरुद्ध कार्य को देख तो सगुण निराकार

2269
02:39:54,240 --> 02:39:58,400
में अवतार की सिद्धि हो जाती है। मगर इनसे कहीं आगे जो था

2270
02:39:58,400 --> 02:40:02,480
निर्भय आया था और उससे चर्चा हुई थी। उसका लेवल इस चर्चा से कहीं ऊंचा

2271
02:40:02,480 --> 02:40:06,720
था। अगर आर्य समाजियों को सपोर्ट करना चाहिए।

2272
02:40:06,720 --> 02:40:11,200
तो भैया तुम लोग निर्भय को करो जाकर के सपोर्ट अग्निव्रत जी को छोड़ो

2273
02:40:11,200 --> 02:40:15,280
अग्निव्रत जी तो वही टटपुंजिया तर्क लेकर के बैठे थे

2274
02:40:15,280 --> 02:40:19,280
जो टटपुजिया तर्क जो हर निचले स्तर का या मतलब अभी

2275
02:40:19,280 --> 02:40:23,280
तक जितने भी आर समाजियों से बात हुई है कुछ एक को छोड़ के उनसे उनके

2276
02:40:23,280 --> 02:40:27,280
साथ जो है अवतार के विषय में बहुत ज्यादा बात हो नहीं पाई तो अवतार

2277
02:40:27,280 --> 02:40:31,280
के विषय में ज्यादातर जो इन्होंने जितने भी निकृष्ट वाले

2278
02:40:31,280 --> 02:40:35,360
जो तर्क इत्यादि प्रस्तुत किए वो सब आपके चलते फिरते चलती बिरिया

2279
02:40:35,360 --> 02:40:39,680
वाले जो फॉलोअ होते समाज के उन्होंने भी की एक निर्भय ने ऐसे तर्क वगैरह

2280
02:40:39,680 --> 02:40:40,800
दिए थे जो कुछ नए

2281
02:40:40,800 --> 02:40:44,880
थे और मुझे लगता था कि इस चर्चा में जो निर्भय

2282
02:40:44,880 --> 02:40:48,880
जिन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पा रहा है उस चीज से आगे बढ़ के अग्नि

2283
02:40:48,880 --> 02:40:52,960
जी अब कुछ ऐसा देंगे जिसके उत्तर मैं दूंगा उनको मगर ऐसा कुछ हुआ ही

2284
02:40:52,960 --> 02:40:57,280
नहीं उन्होंने बहुत जल्दी हथियार डाले पहले विषयंतर किया फिर व्यवहार वो व्यक्तिगत हुए

2285
02:40:57,280 --> 02:41:01,760
और चर्चा समाप्त करनी पड़ी उनके चैनल पर हो रही थी

2286
02:41:01,760 --> 02:41:06,000
अच्छा [नाक से की जाने वाली आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़] जी आदित्य जी आप अपनी बात कुछ करें फिर उसके बाद

2287
02:41:06,000 --> 02:41:11,040
हम थोड़ा थोड़ा अगर बात बताते हैं

2288
02:41:11,040 --> 02:41:15,440
उस समय हम जब लाइव देख रहे थे कमेंट में थे तो

2289
02:41:15,440 --> 02:41:19,520
आपको बोला कौन सा मंत्र है आपने कहा भाई हम मंत्र नहीं बोलते

2290
02:41:19,520 --> 02:41:23,600
बाद में वो बोलने लगे तो कुछ भी बोल रहे थे फंस फंस के उल्टा पुल्टा

2291
02:41:23,600 --> 02:41:27,840
हमने कमेंट में लिखा कि भाई हम मंत्र नहीं बोल पा रहे है तो क्यों लिख रहे हो

2292
02:41:27,840 --> 02:41:31,920
क्यों बोल रहे है नहीं बोल पा रहे है गलत

2293
02:41:31,920 --> 02:41:36,160
बाद में एक व्यक्ति लिखता है की भाई तुम्हारा व्यक्ति तो मंत्र

2294
02:41:36,160 --> 02:41:40,160
बोलने से ही कतरा रहा है। वो कम से कम कुछ तो बोल रहे हैं।

2295
02:41:40,160 --> 02:41:44,320
तो मैंने उसको उत्तर लिखा कि भाई हमारा व्यक्ति स्वयं को शंकराचार्य

2296
02:41:44,320 --> 02:41:48,640
जी का दास बोलता है। क्या बोलता है? दास। और तुम्हारा

2297
02:41:48,640 --> 02:41:52,960
व्यक्ति जो है वो स्वयं को आचार्य बोलता है और ऐसा आचार्य

2298
02:41:52,960 --> 02:41:56,080
बनता है कि अपने पूर्वाचार्य दयानंद का ही खंडन

2299
02:41:56,080 --> 02:42:00,160
करता है। उनमें ही दोष निकालता है। तो उसको

2300
02:42:00,160 --> 02:42:05,680
तो मंत्र बोलने आना चाहिए ना।

2301
02:42:05,680 --> 02:42:08,080
जी

2302
02:42:08,080 --> 02:42:12,160
ये सब बातें हैं सब ऐसे भटक रहे हैं बच्चे

2303
02:42:12,160 --> 02:42:16,320
दोष कारण

2304
02:42:16,320 --> 02:42:20,480
खराब होते कुछ दिन के लिए बन जाता है बहुत दिनों से आप एक ही प्रश्न

2305
02:42:20,480 --> 02:42:24,480
पूछते हो आज इस वीडियो में उत्तर दे दिया गया है इसको देख लेना ग

2306
02:42:24,480 --> 02:42:28,480
पाद सुखदेव यह कीवर्ड है इनके

2307
02:42:28,480 --> 02:42:33,280
द्वारा सर्च करना ट्रांसिप में मिल जाएगा

2308
02:42:33,280 --> 02:42:37,360
और पहले भी दे चुके हैं। ऋषिवाज को उत्तर दिया था। ठीक है। तो मुझे

2309
02:42:37,360 --> 02:42:41,520
लगता है सभी की बातें हो गई है पूरी पूरी। हां। किसी

2310
02:42:41,520 --> 02:42:47,200
का अगर कुछ महत्वपूर्ण बात है तो बोल दे नहीं तो फिर समाप्त करें।

2311
02:42:47,200 --> 02:42:50,880
नहीं भैया।

2312
02:42:50,880 --> 02:42:54,880
ठीक है। ठीक है। बहुत-बहुत आभार सभी का समय देने के लिए। मुझे लगता है आज बहुत

2313
02:42:54,880 --> 02:42:59,120
एक अच्छा सा वीडियो आप लोगों को प्राप्त हुआ है। तो जी जी। काफी

2314
02:42:59,120 --> 02:43:03,200
लोगों के जो जिनको निराशा हो गई थी कि भ शिवश जी ने क्यों

2315
02:43:03,200 --> 02:43:07,280
लाइव छोड़ी उनको तो काफी राहत मिली होगी क्योंकि कल भी

2316
02:43:07,280 --> 02:43:11,440
जब मैंने भी एक लाइव की थी आपकी जब दिन में डिस्कशन थी तो शाम को तो फिर वो

2317
02:43:11,440 --> 02:43:15,440
लोग कह रहे थे नहीं नहीं हमें अच्छा लगा कि आपने यह करा तो आज का करके तो

2318
02:43:15,440 --> 02:43:21,040
शायद उनके सारे संशय दूर हो ही गए होंगे आपकी लाइव देखकर लाइव छोड़ने का

2319
02:43:21,040 --> 02:43:25,360
जो मुख्य था कारण वो यही था कि विषयांतर

2320
02:43:25,360 --> 02:43:29,520
करते हुए व्यक्तिगत कटाक्ष पर आ रहे थे ऐसी बातें बातें बोल रहे थे जिससे कि मेरी

2321
02:43:29,520 --> 02:43:33,680
अवमानना हो। मेरे मान्यताओं की अवमानना हो। हम लोग जब तक तर्क वितर्क

2322
02:43:33,680 --> 02:43:37,680
कर रहे हैं तब तक आप निर्णय घोषित मत करिए क्या बुरा है क्या अच्छा है या

2323
02:43:37,680 --> 02:43:42,160
पापी लिखा है यह लिखा है आप तर्क लाइए तर्क से बात करिए

2324
02:43:42,160 --> 02:43:46,400
तर्क प्रस्तुत करिए हम तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं प्रमाण प्रस्तुत करिए हम भी प्रमाण प्रस्तुत

2325
02:43:46,400 --> 02:43:48,400
कर रहे हैं प्रमाण को प्रमाण नहीं मानोगे

2326
02:43:48,400 --> 02:43:52,400
तो उसमें भी तर्क प्रस्तुत करेंगे ठीक है वो एक बात अलग है

2327
02:43:52,400 --> 02:43:56,560
तो विषयांतर करते हुए व्यक्तिगत कटाक्ष वो काफी देर से चालू हो गए

2328
02:43:56,560 --> 02:44:00,720
थे वहां पर गरमा गर्मी ज्यादा हो रही थी अब वहां पर यही बचता है कि मैं भी गरमा गर्मी

2329
02:44:00,720 --> 02:44:04,800
का भागीदार बन जाऊं अगर गरमा गर्मी का भागीदार बनता हूं तो क्या वह

2330
02:44:04,800 --> 02:44:08,960
जगह इक्वल है? वहां पर जब वह कुछ बोलेंगे तो सुन

2331
02:44:08,960 --> 02:44:12,960
लिया जाएगा। हो सकता है मेरे को म्यूट ही कर दिया जाए। फिर क्या करूंगा मैं? तो जहां पर

2332
02:44:12,960 --> 02:44:18,080
समान अधिकार प्राप्त नहीं है वहां पर युद्ध करना

2333
02:44:18,080 --> 02:44:22,320
बेकार होता है। समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए। अब जैसे मैं इस मंदिर में जाकर के विरोध

2334
02:44:22,320 --> 02:44:26,560
थोड़ी ना कर सकता हूं कि तुम अगर शिव जी का अपमान करोगे तो मैं बोलूंगा क्योंकि

2335
02:44:26,560 --> 02:44:30,560
वो उनकी प्रॉपर्टी है। परंतु वो गंगा के घाट पर बैठकर के

2336
02:44:30,560 --> 02:44:35,040
अगर शिव जी का अपमान करेंगे तो वहां मैं बोल सकता हूं। ठीक है?

2337
02:44:35,040 --> 02:44:39,040
तो इसी उनकी चौखट पर था। इस कारण से जो है मुझे हटना ही

2338
02:44:39,040 --> 02:44:43,040
उचित लगा। या तो मैं उनसे मुंह चोरी करता। उसमें भी तू तड़ाक में आगे बात जाने वाली

2339
02:44:43,040 --> 02:44:47,520
थी या और गरमा गर्मी की बातें होने वाली थी। उसके बाद हटना तो था ही।

2340
02:44:47,520 --> 02:44:50,880
यह बात निश्चित है।

2341
02:44:50,880 --> 02:44:55,120
क्योंकि उन्होंने ऐसी चीजें शुरू कर किस बात पर मैं हटा हूं।

2342
02:44:55,120 --> 02:44:59,120
उन्होंने कहा तुमने पाप लिखा है। पापी लिखा है। मैं अपने

2343
02:44:59,120 --> 02:45:03,360
ईश्वर के बारे में ये सब क्यों सुनू? भाई हम लोग तात्विक सैद्धांतिक चर्चा

2344
02:45:03,360 --> 02:45:03,860
कर

2345
02:45:03,520 --> 02:45:07,680
रहे हैं कि ईश्वर अवतार क्यों नहीं ले सकता है? इसमें इस लाइन को बोलने की क्या जरूरत

2346
02:45:07,680 --> 02:45:11,680
है कि तुम्हारा ईश्वर जो है तुमने ईश्वर को पापी बना दिया। ग्रंथों में पाप लिखा है।

2347
02:45:11,680 --> 02:45:16,480
अद्वतवाद सबसे बुरा है। तुम्हें ज्ञान नहीं है।

2348
02:45:16,480 --> 02:45:21,280
आप तर्क दो ना अपनी बात को सिद्ध करने के संबंध में।

2349
02:45:21,280 --> 02:45:27,120
ऐसी बातें मत बोलो जिसके गवाह सिर्फ आप हो।

2350
02:45:27,120 --> 02:45:31,360
आप तर्क दीजिए। अपनी बात को सिद्ध करने के लिए। प्रमाण दीजिए। वो प्रमाण

2351
02:45:31,360 --> 02:45:34,800
जो मैं भी मान सकूं।

2352
02:45:34,800 --> 02:45:38,960
ऐसी बातें मत बोलिए जिसके लिए आप ही केवल प्रमाण हो। अद्वैत बात बुरा है। प्रमाण

2353
02:45:38,960 --> 02:45:44,960
क्या है? मैं बोल रहा हूं ना ऐसी बातें मत बोलिए।

2354
02:45:45,120 --> 02:45:49,600
ठीक है? और बाकी योगेश जी को हमारा संदेश दे ही दिया है हमने। योगेश जी

2355
02:45:49,600 --> 02:45:53,600
आपने बड़े दिनों तक जो है चोरी छुपे पीठ पीछे काफी सारी बातें की

2356
02:45:53,600 --> 02:45:57,920
हमसे हमारे बारे में और फिर आपने एक कॉल भी करवाया

2357
02:45:57,920 --> 02:46:02,160
हमको सहारनपुर आने के लिए। तो अगर आप

2358
02:46:02,160 --> 02:46:06,160
व्यक्तिगत कटाक्षों से बचते हुए और एक सैद्धांतिक चर्चा करना चाहते

2359
02:46:06,160 --> 02:46:10,160
हैं तो हम तैयार हैं। आपका स्वागत करते हैं। आप लखनऊ

2360
02:46:10,160 --> 02:46:14,160
आ सकते हैं। यहां पर आपका स्वागत है। अगर आप सहारनपुर या उसके

2361
02:46:14,160 --> 02:46:18,400
आसपास के क्षेत्र हरिद्वार में ज्यादा उचित रहेगा क्योंकि हरिद्वार में वो रहते

2362
02:46:18,400 --> 02:46:23,360
हैं वीरेंद्र वीरेंद्र जी गौधी वाले। तो

2363
02:46:23,360 --> 02:46:27,360
वहां कर सकते हैं चर्चा। सहारनपुर अगर आपके लिए वह होगा

2364
02:46:27,360 --> 02:46:31,440
ना क्या कहते हैं असंभव कहीं और करना तो

2365
02:46:31,440 --> 02:46:35,600
सहारनपुर में भी इंतजाम किया जा सकता है और अगर

2366
02:46:35,600 --> 02:46:39,760
आपको ऑनलाइन से दिक्कत नहीं तो ऑनलाइन में भी आ सकते हैं बसशर्ते व्यक्तिगत कटाक्षों से बचिएगा

2367
02:46:39,760 --> 02:46:43,930
वरना इसी तरीके से चर्चा स्थगित होगी [गला

2368
02:46:43,930 --> 02:46:48,160
साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़] ठीक है सभी का आभार समय देने

2369
02:46:48,160 --> 02:46:50,160
के लिए आदित्य जी सनातन

2370
02:46:50,160 --> 02:46:54,160
शंकर जी शास्त्र जी अनिकेत जी सभी को जय श्री राम जय श्री राम जी जय

2371
02:46:54,160 --> 02:46:58,160
श्री राम जय श्री राम भैया जय श्री राम जय श्री राम
