1
00:00:07,280 --> 00:00:11,280
इसने बताया कि पंडित कौन होते हैं? इसके यहां के लोगों को पंडित से बड़ी नफरत है। मुझे

2
00:00:11,280 --> 00:00:15,680
कुछ ऑडियो प्राप्त हुई है। लखनऊ का जो वकील है ना दिनेश चंद्र छोकरा

3
00:00:15,680 --> 00:00:21,040
उसकी कुछ ऑडियो सुनी है। उसमें वो जब बात करता है अपने

4
00:00:21,040 --> 00:00:25,120
गुरु भाई से ऐसा गुरु भाई जो उनके पहले उनके खेमे में था अब अलग हो गया।

5
00:00:25,120 --> 00:00:29,360
तो जब वो बात कर रहा है तो कह रहा है यादव

6
00:00:29,360 --> 00:00:33,520
पंडित की गोदी में बैठ गया जाकर पंडित की बड़ी पंडितों से बड़ी चिढ़ है

7
00:00:33,520 --> 00:00:37,680
इन लोगों को फुअर लोगों को तो पंडित के बारे में यहां क्या लिखा है इसके

8
00:00:37,680 --> 00:00:41,920
बाबा जेल कट्टू ने वो भी सुन लो पांच श्लोक 18 में पंडित की परिभाषा

9
00:00:41,920 --> 00:00:46,000
बताते हुए बताया गया है कि जो समदर्शी

10
00:00:46,000 --> 00:00:51,360
ज्ञान योगी देखिए ज्ञान योगी तत्वदर्शी साधक पंडित तत्वज्ञानी

11
00:00:51,360 --> 00:00:55,440
यानी पंडित की परिभाषा पंडित को इसने माना है तत्व ज्ञानी पंडित कौन होते हैं?

12
00:00:55,440 --> 00:00:59,600
तत्वज्ञानी। और तत्व ज्ञानी कौन है? जो क्या

13
00:00:59,600 --> 00:01:03,760
कहते हैं? पंडित होते हैं तत्व ज्ञानी। जो तत्व ज्ञानी

14
00:01:03,760 --> 00:01:07,840
वो तो पूर्ण वो हो गए। पूर्ण संत हो गए। तो तू जिनकी गोदी में

15
00:01:07,840 --> 00:01:12,080
जाकर के बैठने को कह रहा है क्या उनकी गोदी में नहीं बैठना चाहिए? पूर्ण संत की गोदी में

16
00:01:12,080 --> 00:01:16,160
इस फोर्ड आदमी जो जो यहां का जो वकील है जो

17
00:01:16,160 --> 00:01:20,320
ऐसी बातें करता है द्वेष भावना रखता है जाति के आधार

18
00:01:20,320 --> 00:01:22,560
पर। है ना कि पंडित

19
00:01:22,560 --> 00:01:27,200
और यहां कमेंट में भी कई पंडित पंडित कर रहे होंगे यह रहा

20
00:01:27,200 --> 00:01:31,520
यह रहा मिल गया अरे ऊपर निकल गया जरा ऊपर

21
00:01:31,520 --> 00:01:35,680
निकल गया जरा लाइए जरा उसको पंडित वाला अभी अभी हां पंडित को तो राक्षस बताया

22
00:01:35,680 --> 00:01:39,680
गया है जिसका मेरे पास बड़ा सबूत है लो भाई अरे देख ले तेरा

23
00:01:39,680 --> 00:01:43,920
जेलकट्टू बाबा यहां क्या कह रहा है पंडितों के बारे में तत्वज्ञानी है पंडित जा

24
00:01:43,920 --> 00:01:47,920
अपने जेलकट्टू दादा को बाबा को जाकर के आन मिलो सजना वाला जो पट्टा होता

25
00:01:47,920 --> 00:01:52,080
है ना थाने में रखा हुआ उससे उसका परिचय करा अपने बाबा का

26
00:01:52,080 --> 00:01:56,240
थाने में एक पट्टा होता है पुलिस के पास उसमें लिखा होता है आन मिलो

27
00:01:56,240 --> 00:02:00,320
सजना या लिखा होता है फिर कब मिलोगे वो पट्टा लेके अपने बाबा

28
00:02:00,320 --> 00:02:04,320
के पास जा और उसको परिचित करवाओ पट्टे पट्टे से ठीक

29
00:02:04,320 --> 00:02:08,640
है और या फिर उसको बिल से बाहर निकाल तो हम लोग हम में से कोई ऐसा योद्धा

30
00:02:08,640 --> 00:02:12,960
जाएगा और वो उसका परिचय करवाएगा उस पट्टे से

31
00:02:12,960 --> 00:02:17,040
वो तेरा बाबा ही लिख रहा है यहां पे पंडित कौन होता है ठोको ताली पंडित कौन होता है

32
00:02:17,040 --> 00:02:21,360
तत्व ज्ञानी अच्छा गौ 100 कुत्ते हाथी

33
00:02:21,360 --> 00:02:25,600
व चांडाल को एक समझता है। वह जीवित मुक्त कहलाता है। वह तथा भगवान प्राप्ति

34
00:02:25,600 --> 00:02:29,840
के लिए भक्ति में लग चुका है। जो ऐसा नहीं करता है वह बेशक बात बनाए। 84

35
00:02:29,840 --> 00:02:34,000
लाख योनियों का कष्ट भोगेगा तथा इसने फिर अपनी आगे की जो

36
00:02:34,000 --> 00:02:40,000
है बकवास लिख दी है।

37
00:02:40,480 --> 00:02:46,480
[गला साफ़ करने की आवाज़] आगे चलते हैं।

38
00:02:49,200 --> 00:02:55,200
इसने फिर आगे जो है 122 नंबर पेज निकाली।

39
00:02:55,360 --> 00:03:01,360
122 नंबर पेज है। उसमें

40
00:03:04,080 --> 00:03:08,400
इसने फिर आगे जो है 122 नंबर पेज पर पहला पैराग्राफ

41
00:03:08,400 --> 00:03:12,560
और उसकी लास्ट की दो लाइन कर्म योगी ब्रह्मचारी या गृहस्ती

42
00:03:12,560 --> 00:03:16,560
कार्य करते-करते साधना करने वाला भक्त कर्म सन्यासी भक्तों से श्रेष्ठ है

43
00:03:16,560 --> 00:03:20,560
तथा जो पूर्ण परमात्मा की भक्ति करते हैं वह सर्वोत्तम है। यहां पे फिर से यह

44
00:03:20,560 --> 00:03:24,880
गृहस्ती का पक्ष ले रहा है। वहां पर

45
00:03:24,880 --> 00:03:29,200
गृहस्ती का विरोध करता है। कहां पर? रुचि ऋषि की उसमें फिर सुखदेव

46
00:03:29,200 --> 00:03:33,360
जी की में गृहस्ती का पक्ष लेता है। फिर यहां पर पक्ष लेता है।

47
00:03:33,360 --> 00:03:37,360
तो यह कशमकश में है कि मुझे ड्रामा तो करना है विरक्त

48
00:03:37,360 --> 00:03:41,440
होने का और फिर मुझे जो है गृहस्ती वाले सुख भी चाहिए कि अप्सरा आए तो मैं छू

49
00:03:41,440 --> 00:03:45,520
लूं। ऐसी बातें करता है ये कि सुखदेव जी के पास अप्सरा आई। उसने उन्होंने

50
00:03:45,520 --> 00:03:49,520
छुआ नहीं। यानी कि छू लेना चाहिए। यानी इसका स्वभाव है। यानी कि

51
00:03:49,520 --> 00:03:52,880
काल के वश में यह भी है।

52
00:03:52,880 --> 00:03:55,040
अच्छा

53
00:03:55,040 --> 00:03:55,680
आगे चलते

54
00:03:55,680 --> 00:04:01,680
हैं। अब आ जाइए भाई। अभी

55
00:04:04,720 --> 00:04:10,080
ये सीधे पांच श्लोक 23 पे क्यों आ गया है?

56
00:04:10,080 --> 00:04:13,680
51 19 की बात इसने की नहीं।

57
00:04:13,680 --> 00:04:18,080
51 की बात हां देखिए अब इसने 51 की बात की

58
00:04:18,080 --> 00:04:22,320
पृष्ठ क्रमांक 51 18 की बात की पृष्ठ क्रमांक

59
00:04:22,320 --> 00:04:27,120
119 पे उसके बाद इसने कुछ खिचड़ी पकाई और

60
00:04:27,120 --> 00:04:31,760
फिर इसके बाद इसने 5 19 20

61
00:04:31,760 --> 00:04:35,840
21 22 इनकी बात ही नहीं की गायब

62
00:04:35,840 --> 00:04:39,840
पी गया वो सारी मीडिया खबरों की तरह पी गया अब

63
00:04:39,840 --> 00:04:45,840
सीधे आ गया यहां पर पांच श्लोक 23 में

64
00:04:48,640 --> 00:04:52,640
और क्या करता है जिन जिन श्लोकों में से चोरी करनी होती है तो

65
00:04:52,640 --> 00:04:56,720
वैसे श्लोक श्लोक लिखेगा तो उसमें हेडिंग डालेगा कि पांच श्लोक

66
00:04:56,720 --> 00:05:00,720
19 में ये कहा पांच श्लोक 20 में 21 में ये कहा मगर जब इसे चोरी

67
00:05:00,720 --> 00:05:04,800
करनी होगी तो क्या करेगा कहीं और से किसी और शब्दों से बात शुरू करेगा और

68
00:05:04,800 --> 00:05:08,880
पांच 19 20 21 की समराइज करते हुए बात बीच में घुसा देगा जैसे

69
00:05:08,880 --> 00:05:14,880
इसने यहां पर इसमें बीच में घुसाई क्या घुसाई है

70
00:05:15,360 --> 00:05:19,440
बीच में हर श्लोक में लिखता है अध्याय पांच के श्लोक 23 में बताया

71
00:05:19,440 --> 00:05:23,600
गया है कि और यहां पे क्या लिख रहा है यहां पे 5 19 20

72
00:05:23,600 --> 00:05:29,600
21 की हेडिंग से शुरू ही नहीं है पैराग्राफ ऊपर देखो बड़ा करो

73
00:05:30,640 --> 00:05:34,720
हां इसमें इसने इस पैराग्राफ के मध्य से ये बात शुरू की है कि पांच के

74
00:05:34,720 --> 00:05:39,040
श्लोक 19 से 21 में फिर प्रमाण है कि वही व्यक्ति को मुक्त

75
00:05:39,040 --> 00:05:43,280
समझो जिसमें निम्न लक्षणों जो गीता जी के श्लोकों में निम्न निम्नलिखित है। पांच श्लोक 22

76
00:05:43,280 --> 00:05:47,440
में कहा है कि हे अर्जुन कर्मों के संयोग से उत्पन्न भोग राज के लिए लड़ाई

77
00:05:47,440 --> 00:05:51,520
करना। फिर भगवान कह रहा है कि अर्जुन तू युद्ध कर यदि युद्ध में मारा गया

78
00:05:51,520 --> 00:05:55,680
तो स्वर्ग में मौज मारेगा।

79
00:05:55,680 --> 00:05:59,760
पांच के श्लोक 22 में कहा है कि हे अर्जुन कर्मों के

80
00:05:59,760 --> 00:06:03,840
संयोग से उत्पन्न भोग राज के लिए लड़ाई करना तथा फिर

81
00:06:03,840 --> 00:06:07,840
मौज मारना नाशवान है। ज्ञानवान व्यक्ति इससे दूर

82
00:06:07,840 --> 00:06:12,000
रहता है तथा अध्याय दो के श्लोक 37 में भगवान कह रहा है कि अर्जुन तू युद्ध

83
00:06:12,000 --> 00:06:16,240
कर यदि युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग में मौज मारेगा और यदि जीत गया तो राज का आनंद

84
00:06:16,240 --> 00:06:20,240
लेगा। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] यहां पर मतलब

85
00:06:20,240 --> 00:06:24,320
श्लोक 237 की बात को यहां 22 52 से काट रहा

86
00:06:24,320 --> 00:06:28,480
है यह और हालांकि इसने यहां पर भी 51 19 से लेकर

87
00:06:28,480 --> 00:06:32,720
के 52 तक का अनुवाद शब्दार्थ नहीं किया

88
00:06:32,720 --> 00:06:36,800
अपने मन से गड़बड़ जिम्म कर दिया। खैर आगे चलते

89
00:06:36,800 --> 00:06:40,560
हैं।

90
00:06:40,560 --> 00:06:45,120
अब यहां पर बात यह है कि अगर यह 52 से

91
00:06:45,120 --> 00:06:49,200
237 काट रहा है तो 237 से 52 क्यों नहीं काट रहा है? यह बाबा

92
00:06:49,200 --> 00:06:53,600
जी जेल कट्टू कभी इस बात का उत्तर नहीं दे पाएंगे। ठोको ताली।

93
00:06:53,600 --> 00:06:57,600
अब पांच श्लोक 23 पे आ जाते हैं। अच्छा 5:1 से लेकर 5:18

94
00:06:57,600 --> 00:07:02,240
भी हमें पढ़ना है। 5 18 क्या है? हमारा 5 18 क्या कह रहा है?

95
00:07:02,240 --> 00:07:06,400
ये भी आप पढ़ते चलो। वह ज्ञानी जन विद्या और विनय युक्त

96
00:07:06,400 --> 00:07:10,560
ब्राह्मण में कौन ज्ञानी जन जो तद रूप काम करते हैं जो

97
00:07:10,560 --> 00:07:14,560
इसको ले चल रहे हैं एक एक श्लोक का जो श्लोकों के अनुसार जो कर्म कर रहे

98
00:07:14,560 --> 00:07:18,640
हैं तो उनको ज्ञानी जन कहा गया जो परमात्मा में स्थित हो जाते हैं पूर्ण शांति को प्राप्त

99
00:07:18,640 --> 00:07:23,760
कर जाते हैं जो कि पांच 17 में कहा गया है ना

100
00:07:23,760 --> 00:07:27,760
अपुनरावृति यानी कि दोबारा पुनरावृति नहीं होती तो वो कौन है

101
00:07:27,760 --> 00:07:32,000
वो ज्ञानी जन जो विद्या और विनय युक्त ब्राह्मण में तथा गौ

102
00:07:32,000 --> 00:07:36,320
हाथी कुत्ते और चांडाल में समदर्शी होते हैं। व्यवहार अलग हो सकता है।

103
00:07:36,320 --> 00:07:40,800
परंतु सब में ही परम तत्व को देखने का प्रयास करते हैं। तो वह जो है

104
00:07:40,800 --> 00:07:45,520
परम शांति को प्राप्त कर लेते हैं। यहां ये कहा गया है। जबकि इसने क्या कर लिया?

105
00:07:45,520 --> 00:07:49,760
इसने पंडित किसको कहा है? इसने पंडित उसको माना है

106
00:07:49,760 --> 00:07:54,560
जो पूर्ण भक्ति में लग चुका है। यानी कि इसने तब भी यह नहीं माना

107
00:07:54,560 --> 00:07:56,000
कि वो जो है मुक्त

108
00:07:56,000 --> 00:08:00,080
हो जाएगा। उसको मुक्त होने वाला नहीं कहलाएगा। वो नहीं माना

109
00:08:00,080 --> 00:08:04,240
इसने। अब इसने 51 में क्या कहा है वह भी देख

110
00:08:04,240 --> 00:08:06,670
लेते हैं।

111
00:08:06,670 --> 00:08:10,240
[गला साफ़ करने की आवाज़] 51

112
00:08:10,240 --> 00:08:14,240
51 19 का हमारा अर्थ है जिनका मन समभाव में स्थित है यानी कि हार और

113
00:08:14,240 --> 00:08:18,320
जीत में जीत का लालच हार का भय ये दोनों चीजें नहीं

114
00:08:18,320 --> 00:08:22,400
होनी चाहिए। तो जिनका मन समभाव में स्थित है उनके द्वारा इस

115
00:08:22,400 --> 00:08:26,400
जीवित अवस्था में ही संपूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि उनको

116
00:08:26,400 --> 00:08:30,400
अब राग द्वेष नहीं है इसलिए उनको कोई कष्ट नहीं है

117
00:08:30,400 --> 00:08:34,720
जब कष्ट नहीं तो जीत लिया संसार को तो संपूर्ण संसार जीत लिया

118
00:08:34,720 --> 00:08:39,280
है क्योंकि सच्चिदानंद घन परमात्मा निर्दोष

119
00:08:39,280 --> 00:08:43,440
और सम है। इसका मतलब जब आप सम स्थिति में पहुंच गए तो आप जो है

120
00:08:43,440 --> 00:08:47,440
एकत्व में है। किसके साथ एकत्व में है? ईश्वर के साथ। इससे

121
00:08:47,440 --> 00:08:51,520
वह सच्चिदानंद घन परमात्मा में स्थित है। आप देखिए ये

122
00:08:51,520 --> 00:08:55,600
कितना अंतर करता है। 5:19 से लेकर 22 तक इस फूल में

123
00:08:55,600 --> 00:08:59,680
बकवास कर दी। शब्दार्थ तथा इसने कोई अनुवाद नहीं किया। अपने मन से

124
00:08:59,680 --> 00:09:04,000
जो मन आता है लिखता है। ठीक है? जो पुरुष

125
00:09:04,000 --> 00:09:08,480
20वें का पढ़ रहा हूं। जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं होता है। यानी समदर्शिता

126
00:09:08,480 --> 00:09:11,120
क्या है? जो पुरुष यह समदर्शिता वहीं से चल

127
00:09:11,120 --> 00:09:15,200
रही है जिसके मन में अहंकार ना हो

128
00:09:15,200 --> 00:09:19,200
जो गुण ही गुण में बरत रहे हैं ऐसा समझे

129
00:09:19,200 --> 00:09:23,360
जो गौ पांच 18 जो इनमें अंतर ना करता हो गौ कुत्ते

130
00:09:23,360 --> 00:09:27,520
हाथी चंडाल में ब्राह्मण में समदर्शिता रखता हो

131
00:09:27,520 --> 00:09:31,520
तो वही आगे चल रही है जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित ना

132
00:09:31,520 --> 00:09:35,680
हो और प्रिय को प्राप्त होकर जो पुरुष

133
00:09:35,680 --> 00:09:39,840
प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित ना हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्वग्न ना

134
00:09:39,840 --> 00:09:44,000
हो वह स्थिर बुद्धि संशय रहित ब्रह्मवत्ता कौन

135
00:09:44,000 --> 00:09:47,440
ब्रह्मवेत्ता

136
00:09:47,440 --> 00:09:51,600
51 19 520 है इसने क्या कहा है 520 में 19

137
00:09:51,600 --> 00:09:57,600
से 21 में प्रमाण है कि लिखित में

138
00:09:59,760 --> 00:10:04,480
देखिए अपने मन से यहां पर ब्रह्मत्ता कहा जा रहा है

139
00:10:04,480 --> 00:10:08,480
संशय रहित कहा जा रहा है कहां ले जाओगे इन शब्दार्थों को क्या

140
00:10:08,480 --> 00:10:12,480
यह रामपाल के फहड़ चेले चिलए भगत

141
00:10:12,480 --> 00:10:16,720
क्या यह संशय रहित हैं? एक सवाल में एक

142
00:10:16,720 --> 00:10:21,680
प्रश्न में गीले गीला होने लगती गीली होने लगती इनकी पतलू

143
00:10:21,680 --> 00:10:25,840
ऐसे ऐसे तो लोग हैं। और क्या कह रहे हैं? यहां संशय रहित

144
00:10:25,840 --> 00:10:29,840
वाली बात को काट ही दिया। ब्रह्मवित्ता संशय रहित कौन है? जो ब्रह्मवित्ता

145
00:10:29,840 --> 00:10:34,000
है। ब्रह्म की बात करता है। लो इनके इनके अनुसार तो ब्रह्म

146
00:10:34,000 --> 00:10:38,000
से मुक्ति नहीं होगी। मगर ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म की बात करने वाला

147
00:10:38,000 --> 00:10:42,320
वही संशय रहित है और वही सच्चिदानंद घन

148
00:10:42,320 --> 00:10:46,400
ब्रह्म परमात्मा में एक ही भाव से नित्य स्थित है

149
00:10:46,400 --> 00:10:51,280
और वहां क्या कह रहा है फड़ अपनी कुछ अलग ही बकवास चला रहा है

150
00:10:51,280 --> 00:10:55,920
21 में क्या कहा जा रहा है बाहर के विषयों में आसक्ति रहित अंतःकरण

151
00:10:55,920 --> 00:10:59,920
वाला देखिए 21 में बहुत जरूरी बात है

152
00:10:59,920 --> 00:11:02,640
बाहर के विषयों में अंतःकरण बाहर के विषयों

153
00:11:02,640 --> 00:11:06,640
में आसक्ति रहित अंतःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो

154
00:11:06,640 --> 00:11:11,200
ध्यान जनित सात्विक आनंद है उसको प्राप्त होता है। तदंतर वह सच्चिदानंद

155
00:11:11,200 --> 00:11:16,560
घन ब्रह परम ब्रह्म परमात्मा के ध्यान रूप योग्य में अभिन्न भाव से स्थित

156
00:11:16,560 --> 00:11:21,040
पुरुष अक्षय आनंद का अनुभव करता है। अब

157
00:11:21,040 --> 00:11:25,280
यहां पे 5:21 को इसने क्यों नहीं खोला? पता है आपको क्यों नहीं खोला? इसलिए

158
00:11:25,280 --> 00:11:29,440
नहीं खोला कि यहां पे ब्रह्म के साथ योग युगात्मा शब्द

159
00:11:29,440 --> 00:11:33,600
आया है ब्रह्म के साथ और उसके लिए कहा जा रहा है कि उसको

160
00:11:33,600 --> 00:11:37,680
अक्षय अक्षय सुख की प्राप्ति होती है 5:21

161
00:11:37,680 --> 00:11:41,840
में यहां भी मुक्ति मिल गई अक्षय सुख प्राप्त होता है

162
00:11:41,840 --> 00:11:46,000
कौन किसको प्राप्त होता है जो ब्रह्म ब्रह्म

163
00:11:46,000 --> 00:11:50,240
योग युगात्मा युक्त आत्मा ब्रह्म योग से युक्त युक्त है जो आत्मा

164
00:11:50,240 --> 00:11:54,320
वो उसको अक्षय सुख की प्राप्ति होती है इसलिए

165
00:11:54,320 --> 00:11:58,720
इसने किसने छोड़ा है ये? क्योंकि यहां ब्रह्म की बात आ रही। ब्रह्मवित्ता की बात आ गई। संशय

166
00:11:58,720 --> 00:12:02,800
रहित तो ये कभी कर ही नहीं सकता। इसके चपड़ू चेलों को आपने देखा होगा कैसा सूखा

167
00:12:02,800 --> 00:12:07,200
सा मुंह लेकर आते हैं मेरे सामने। संशय रहित तो ये कभी कर ही नहीं सकता।

168
00:12:07,200 --> 00:12:11,600
और यहां पर ब्रह्म योग युक्त आत्मा

169
00:12:11,600 --> 00:12:15,680
को अक्षय सुख प्राप्त करने वाला कहा गया। इसलिए

170
00:12:15,680 --> 00:12:17,840
यह जो है जेलकट्टू इन चीजों

171
00:12:17,840 --> 00:12:22,000
के बारे में खोल खोल कर बात नहीं करता। फिर 22 में क्या कहा गया है? जो यह इंद्रिय

172
00:12:22,000 --> 00:12:26,960
तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाला सब भोग है। वे यद्यपि विषय

173
00:12:26,960 --> 00:12:31,200
पुरुषों को सुख रूप भासते हैं तो भी वे दुख के ही हेतु है

174
00:12:31,200 --> 00:12:35,200
और आदि अंत वाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन

175
00:12:35,200 --> 00:12:40,640
बुद्धिमान विवेक पुरुष में पुरुष उनमें नहीं रमता।

176
00:12:40,640 --> 00:12:44,800
अब एक बात है यहां पर जो इसने अर्जुन को इस अर्जुन को कहे

177
00:12:44,800 --> 00:12:48,800
गए इस वाक्य का खंडन करने का प्रयास किया है कि भाई अर्जुन अगर तू युद्ध

178
00:12:48,800 --> 00:12:53,040
में जीत गया तब तो तू राजमल का सुख भोगेगा ही और अगर हार भी

179
00:12:53,040 --> 00:12:57,280
अगर तू इसमें जो वीरगति को प्राप्त भी हो गया तब भी तू जो है स्वर्ग जाएगा

180
00:12:57,280 --> 00:13:01,440
तो भैया एक कायर और पीठ दिखाकर भागने

181
00:13:01,440 --> 00:13:05,520
वाले से तो उत्तम गति वहां पर बताई जा रही है ना कि

182
00:13:05,520 --> 00:13:09,520
कम से कम तेरी अपकीर्ति तो नहीं होगी। इस बारे में वहां

183
00:13:09,520 --> 00:13:13,520
बात कर रहे हैं कि तुझे इस युद्ध को लड़ने में कितने वह

184
00:13:13,520 --> 00:13:17,760
हैं। अगर इस बात को लेकर के चल रहे हैं कि इस युद्ध को लड़ने

185
00:13:17,760 --> 00:13:21,920
से मुझे क्या फायदा होगा और व्यवहारिकता को लेकर के चल रहे हैं। उस व्यवहारिक ज्ञान

186
00:13:21,920 --> 00:13:25,920
के अनुसार वो बता रहे हैं कि अगर तू जीत गया तब तो तुझे यहां का सुख मिलेगा

187
00:13:25,920 --> 00:13:30,400
और तू अगर हार भी गया यानी कि वीरगति को प्राप्त हो गया। हारने का मतलब वीरगति

188
00:13:30,400 --> 00:13:33,280
को प्राप्त होना तो भी तुझे स्वर्ग मिलेगा क्योंकि तू क्षत्रिय

189
00:13:33,280 --> 00:13:37,360
और कर्तव्य कर्म करते हुए वो हुआ है। तो अगर तू तत्व ज्ञान

190
00:13:37,360 --> 00:13:41,360
जो तत्व ज्ञान है ब्रह्म के साथ एकत्व वाली बात को नहीं अभी समझ पा रहा है और

191
00:13:41,360 --> 00:13:45,520
केवल व्यवहारिकता के अनुसार देख रहा है। तब भी तेरी गति श्रेष्ठ होगी। उस

192
00:13:45,520 --> 00:13:49,600
कायर नपुंसक कहलाने वाले पुरुष की अपेक्षाकृत जिसकी

193
00:13:49,600 --> 00:13:53,680
स्त्रियों की गरमा भंग कर दी जाती है। जिसकी अपकीर्ति होती है जिसके

194
00:13:53,680 --> 00:13:57,840
कुल का नाश हो जाता है। ये वहां पर समझा रहे हैं। व्यवहारिक ज्ञान

195
00:13:57,840 --> 00:14:02,160
के अनुसार होने वाला फायदा बता रहे हैं। जैसे ये जैसे ये जेल कट्टू बताता

196
00:14:02,160 --> 00:14:06,160
है कि मैं बिजली के तारों से छुड़ा लूंगा। यह खुद भी तो बताता है

197
00:14:06,160 --> 00:14:10,320
भाई। यह भी तो भौतिक संसार का लालच देता है। गेहूं, शक्कर, आटा, चावल। तू

198
00:14:10,320 --> 00:14:14,640
क्यों देता है भौतिक संसार का? हम तू क्यों छोड़ता है अपने चेले

199
00:14:14,640 --> 00:14:18,720
पीछे गन मशीन लिए दो आदमी खड़े हुए हैं। क्यों छोड़ता है भाई अपने

200
00:14:18,720 --> 00:14:22,720
पहले तेरे पीछे भी रहते थे गन मशीन लिए हुए व्यक्ति अब तेरे चेलों के

201
00:14:22,720 --> 00:14:27,360
पीछे भी रहते हैं। यानी कि तू भी उनसे कह रहा है कि युद्ध कर

202
00:14:27,360 --> 00:14:31,440
और भोग किनको भोग वो बात अलग है। वो स्त्रियां चिपका

203
00:14:31,440 --> 00:14:36,160
चिपका के भोगते हैं बेचारे। [हंसी] ठोको

204
00:14:36,160 --> 00:14:40,320
ताली। खैर आगे चलते हैं। अब

205
00:14:40,320 --> 00:14:46,230
523 में क्या कह रहा है यह? अब इसका पढ़ लेते हैं। 5 23

206
00:14:46,230 --> 00:14:48,400
[गला साफ़ करने की आवाज़] 52 में

207
00:14:48,400 --> 00:14:52,640
पूर्ण मुक्ति बताई गई है और 5:21 में पूर्ण

208
00:14:52,640 --> 00:14:56,640
मुक्ति बताई गई है। इसने यहां पर कहीं भी पूर्ण मुक्ति की बात नहीं की

209
00:14:56,640 --> 00:15:02,640
है। ठीक है? 5:21 में

210
00:15:03,520 --> 00:15:08,080
पांच श्लोक 23 में बताया गया है कि

211
00:15:08,080 --> 00:15:12,160
योग योगी की व्याख्या इस प्रकार है कि जो अपने काम क्रोध को जीत लेता

212
00:15:12,160 --> 00:15:16,160
है वही योगी परमात्मा और वही सुखी है। ठीक। फिर

213
00:15:16,160 --> 00:15:20,400
इसके बाद ये कह रहा है विचार करें। यह मन तथा इंद्रियां तो शंकर

214
00:15:20,400 --> 00:15:24,560
जी जैसे योगी से भी नहीं जीते गए। अन्य प्राणी अर्जुन जिसने दो-दो

215
00:15:24,560 --> 00:15:28,880
शादियां करवा रखी हैं। रखी थी। जैसे साधक कैसे योग युक्त परमात्मा

216
00:15:28,880 --> 00:15:32,960
को प्राप्ति हो सकता है। अब देखो भाई इसकी इस बात को काटते हैं कि अर्जुन जो है परमात्मा

217
00:15:32,960 --> 00:15:38,240
को प्राप्त हो सकता है कि नहीं? है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] ठोको ताली।

218
00:15:38,240 --> 00:15:42,480
इस फवड़ की बात का तो सारा इंतजाम इसकी ही किताबों में दिया गया

219
00:15:42,480 --> 00:15:48,320
है। मेरे ख्याल से

220
00:15:48,320 --> 00:15:52,240
प्रश्न क्रमांक

221
00:15:52,240 --> 00:15:56,560
अर्जुन को मोक्ष 99 प्रश्न क्रमांक 99

222
00:15:56,560 --> 00:16:02,560
निकालिए भाई।

223
00:16:08,320 --> 00:16:10,880
हम

224
00:16:10,880 --> 00:16:15,040
ये देखिए पृष्ठ क्रमांक 99 अब

225
00:16:15,040 --> 00:16:19,840
ये कह रहा है अर्जुन को मोक्ष नहीं मिल सकता। जबकि

226
00:16:19,840 --> 00:16:25,680
ये खुद ये फर्ड खुद ही कह रहा है कि अर्जुन को मोक्ष मिला।

227
00:16:25,680 --> 00:16:30,640
देखिए 99 99

228
00:16:30,640 --> 00:16:34,640
इसी में नीचे जाइए बस पहले पैराग्राफ की लास्ट की तीन लाइन पहले पैराग्राफ

229
00:16:34,640 --> 00:16:39,040
की लास्ट की तीन लाइन ऊपर ऊपर ऊपर चला गया हां देखिए

230
00:16:39,040 --> 00:16:43,200
लास्ट की तीन लाइन ये अर्जुन यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा

231
00:16:43,200 --> 00:16:47,280
को पहली बात तो अर्जुन को कोई तत्वदर्शी मिला नहीं भाई है ना वो तो काल से ज्ञान

232
00:16:47,280 --> 00:16:51,440
ले रहा था रामपाल के अनुसार तो अर्जुन यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमा पूर्ण पूर्ण परमात्मा

233
00:16:51,440 --> 00:16:55,680
को इष्ट रूप में मानकर यज्ञ करता है तथा यज्ञों के साथसाथ वास्तविक नाम का

234
00:16:55,680 --> 00:17:00,000
सुमिरण करके यानी कि उसको तत्वदर्शी मिल गया था। पूर्ण मोक्ष

235
00:17:00,000 --> 00:17:04,000
रूपी अमंत शायद अनंत होगा को प्राप्त हो

236
00:17:04,000 --> 00:17:08,080
जाता है। अर्थात पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं। यानी

237
00:17:08,080 --> 00:17:12,160
अर्जुन को मुक्ति मिल गई। ठोको ताली दोद पत्नियां करने वाले। अब

238
00:17:12,160 --> 00:17:16,160
बता फुअर तेरी कौन सी बात मानी जाए? एक तरफ तू कह रहा है अर्जुन जिसने

239
00:17:16,160 --> 00:17:20,160
दो-दो शादी करवा रखी है। उस जैसे साधक कैसे

240
00:17:20,160 --> 00:17:24,160
योग युक्त परमात्मा प्राप्ति हो सकती है। हैं इसको कहते

241
00:17:24,160 --> 00:17:30,160
हैं पागल फूहड़। ठीक है ना?

242
00:17:39,800 --> 00:17:43,800
[संगीत]
